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हिंदी क्षेत्र में पेरियार के दर्शन-चिंतन की दस्तक

सामान्य

उस ईश्वर को नष्ट कर दो, जो तुम्हें शूद्र कहता है। उन पुराणों और महाकाव्यों को नष्ट कर डालो जो ईश्वर को शक्तिशाली बनाते हैं।  यदि कोई ईश्वर वास्तव में दयालु, हितैषी और बुद्धिमान है; तो उसकी प्रार्थना करो।’—सुनहरे बोल, पेरियार, पृष्ठ-44

स्वार्थी सत्ताएं अपने ‘महापुरुष’ भी सुविधानुसार गढ़ती हैं। वे उन्हीं को ‘महान’ घोषित करती हैं, जो उनकी सत्ता को बैधता प्रदान करते हों। इस कोशिश में वास्तविक और पुरोगामी नायक बरबस पीछे ढकेल दिए जाते हैं। इतिहास में इसके अनगिनत उदाहरण हैं। जैसे, साहित्यत्व की कसौटी पर कबीर की काव्य-चेतना तुलसी से कहीं आगे है। मगर मध्यकाल के महाकवि माने गए—तुलसी, जो रामकथा की आड़ में ब्राह्मणवाद की पुनर्स्थापना कर—रैदास, कबीर जैसे संत-कवियों की सामाजिक क्रांति पर पानी फेरने का काम करते हैं। उनीसवीं और बीसवीं शताब्दी के वास्तविक जननायक ज्योतिबा फुले, आयोथी थास, अय्यंकाली, ई. वी. रामासामी पेरियार, डॉ. आंबेडकर जैसे युगदृष्टा थे।  भारत को आधुनिक और एकीकृत राष्ट्र में ढालने में उनका योगदान किसी भी कांग्रेसी नेता से कहीं ज्यादा था। बावजूद इसके आजाद भारत के ‘राष्ट्रपिता’ का दर्जा गांधी को मिला। डॉ. आंबेडकर को दलितों के नेता; तथा पेरियार को दक्षिण भारत तक सीमित कर दिया गया। परिणामस्वरूप, स्वाधीनता संग्राम के दौरान भारतीय जनमानस में जन्मी परिवर्तन की चाहत, असमय काल-कवलित होने लगी।

अच्छी बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों में अभिजन वर्ग की इस साजिश के विरुद्ध बहुजन समाज में जागृति आई है। सोशल मीडिया पर बहुजन एकता के अभियान चलाए जा रहे हैं। वर्चस्वकारी अभिजन संस्कृति के समानांतर सामाजिक न्याय, समानता और बंधुत्व पर आधारित लोकोन्मुखी जनसंस्कृति की पुनर्स्थापना की कोशिशें निरंतर जारी हैं। ‘फारवर्ड प्रेस’ द्वारा प्रकाशित पुस्तक, ‘पेरियार : दर्शन चिंतन और सच्ची रामायण’ इसी दिशा में महत्वपूर्ण रचनात्मक अवदान है। इसका महत्व इसलिए भी है कि हिंदी पट्टी में पेरियार के बारे में लोगों की जानकारी बहुत सीमित है। अधिकांश उन्हें ‘सच्ची रामायण’ के लेखक के रूप में जानते हैं। वहीं कुछ उन्हें दक्षिण भारत में लंबे समय तक चले हिंदी विरोधी आंदोलन के प्रखर नेता के रूप में।  

पुस्तक को दो हिस्सों में बांटा गया है। पहले खंड में पेरियार के चुनींदा भाषण और वे लेख हैं जिन्हें उन्हें अपनी ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की पत्रिका ‘विदुथलाई’ और ‘कुदीअरासु’ के लिए लिखा था। दूसरे खंड में ‘सच्ची रामायण’ के रूप में रामायण का पुनर्पाठ दिया गया, जो अपने लेखन से आज तक उनकी सर्वाधिक विवादित कृति मानी जाती है। पेरियार की यह पुस्तक उनके रामायण संबंधी विस्तृत अध्ययन का परिणाम है। पुस्तक में कुछ स्थानों पर हालांकि वे सपाट नजर आते हैं। लेकिन रामायण को पढ़ते-पढ़ाते समय आस्थावादी जिस तरह से ‘समर्पण’ की अपेक्षा रखते है, उसे देखते हुए पेरियार का विमर्श काफी बुद्धिवादी सिद्ध होता है।  उनका मानना था कि राम बेहद साधारण व्यक्ति हैं, ‘ये कथाएं(रामायण और महाभारत) एक बार फिर इसलिए थोपी गई थीं कि इनके कथानायकों, उनके रिश्तेदारों तथा सहायकों को अलौकिक और अतिमानवीय माना जाए तथा उन्हें पूज्य मानते हुए जनसाधारण द्वारा उनकी पूजा-अभ्यर्थना कि जाए’(सच्ची रामायण, पृष्ठ 118)।     

प्रसंगवश बता दें कि पेरियार ने ‘सच्ची रामायण’ की रचना की थी, किंतु वे ‘सच्ची रामायण’ लिखकर ‘पेरियार’(महान) नहीं बने थे। यह पुस्तक उनके रचनात्मक अवदान का बहुत छोटा-सा हिस्सा है। इसमें रामकथा नहीं है। बल्कि रामायण के प्रमुख पात्रों के चरित्रों की साहसी और तर्कसम्मत समीक्षा है। ‘रामायण’ तथा उसके कथापात्रों प्राय: आस्था और विश्वास को केंद्र में रखकर किया जाता है। आकादमिक विमर्श भी लोक-आस्था से बंधे होते हैं। इसलिए ‘सच्ची रामायण’ पढ़ते समय आस्थावान हिंदू-मनस् में उसके लेखक के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण बन जाता है। श्रद्धा के आवेग में पाठक भूल जाता है कि पेरियार अपने समकालीनों में सर्वाधिक बुद्धिवादी और सबसे लोकप्रिय नेता थे। उनकी लोकप्रियता के मूल में थी, भारतीय समाज की ‘यूटोपियाई’ संकल्पना। लाभ-हानि, यश-अपयश की चिंता किए बगैर, उसके लिए निरंतर प्रयत्नरत रहना। आदर्श समाज संबंधी पेरियार की संकल्पना, सहअस्तित्व और ज्ञान-विज्ञान की नींव पर टिके समाज की थी। अंध-श्रद्धा स्वार्थपरता का दूसरा नाम है। वह न केवल समाज, अपितु व्यक्ति के अपने विकास के लिए भी अपकारी सिद्ध होती है— 

‘अंध श्रद्धालु….मान लेते हैं….जो उन्होंने सीखा है, वही एकमात्र सत्य है।  बुद्धिवादियों का यह तरीका नहीं है।  वे ज्ञानार्जन को महत्व देते हैं।  अनुभव से काम लेते हैं। उन सब वस्तुओं से सीखते हैं, जो उनकी नजर से गुजर चुकी हैं। ’(भविष्य की दुनिया, पृष्ठ-29)

अंध-श्रद्धा के नाम पर तर्क और विवेक को किनारे कर देने का मामला साधारण श्रद्धालुओं तक सीमित नहीं है। धर्माचरण के क्षेत्र में जो जितना बड़ा है, वह उतना ही भीरू और आडंबरवादी हैं—

‘हमारे धार्मिक नेता, विशेषकर हिंदू धर्म के अनुयायी; धर्माचार्यों से भी गए-गुजरे हैं। यदि धर्माचार्य लोगों को 1000 वर्ष पीछे लौटने की सलाह देता है, तो नेता उन्हें हजारों वर्ष पीछे ढकेलने की कोशिश में लगे रहते हैं। ये जनता को सदियों पीछे धकेल भी चुके हैं। बुद्धिवाद न तो धर्माचार्यों को रास आता है, न ही हमारे हिंदू नेताओं को। उन्हें केवल अवैज्ञानिक, मूर्खतापूर्ण और बुद्धिहीन वस्तुओं से लगाव है।’(भविष्य की दुनिया, पृष्ठ-30)

आलेखों की श्रेणी में ‘भविष्य की दुनिया’ को प्रथम स्थान पर रखना संपादकीय बुद्धिमत्ता का प्रतीक है। असल में यही वह दरवाजा है जिससे गुजरकर पेरियार को समझा जा सकता है। दूसरे शब्दों में पेरियार के समाज और धर्म से संबंधित विचारों को समझने के लिए पहले खंड के आलेख कुंजी का काम करते हैं। ‘भविष्य की दुनिया’ को पढ़ते समय लगता है मानो कोई सैद्धांतिक भौतिकवादी जीवन-जगत में ज्ञान-विज्ञान के नैतिक अनुप्रयोग की संभावनाओं पर विचार कर रहा हो। इस लेख पर टिप्पणी करते हुए अंग्रेजी समाचारपत्र ‘दि हिंदू’ ने पेरियार को ‘बीसवीं शताब्दी का एच. डी. वेल्स’ कहा था। इसमें वे ऐसे कई आविष्कारों की परिकल्पना करते हैं, जो आज हमारे रोजमर्रा की जीवन का हिस्सा हैं—

‘यातायात के साधन मुख्यतः हवाई होंगे और वे तीव्र गति से काम करेंगे।  संप्रेषण प्रणाली बिना तार की होगी।  सबके लिए उपलब्ध होगी और लोग उसे अपनी जेब में उठाए फिरेंगे।  रेडियो प्रत्येक के हेट में लगा हो सकता है। छवियां संप्रेषित करने वाले उपकरण व्यापक रूप से प्रचलन में होंगे। दूर-संवाद अत्यंत सरल हो जाएगा और लोग ऐसे बातचीत कर सकेंगे मानो आमने-सामने बैठे हों। आदमी किसी से भी कहीं भी और कभी भी तुरंत संवाद कर सकेगा। शिक्षा का तेजी से और दूर-दूर तक प्रसार करना संभव होगा। एक सप्ताह तक की जरूरत का स्वास्थ्यकर भोजन संभवतः एक केप्सूल में समा जाएगा जो सभी को सहज उपलब्ध होंगे। ’(पृष्ठ-36)

पेरियार के धर्म, दर्शन और ईश्वर संबंधी विचारों को जानने के लिए भी पुस्तक में काफी सामग्री है।  उनके एक भाषण को ‘दर्शनशास्त्र क्या है’ शीर्षक से संकलित किया गया है।  यह भाषण उन्होंने सलेम विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र के विद्यार्थियों के समक्ष प्रस्तुत किया था। उसे पढ़ते समय हम पेरियार के अंदर मौजूद तर्कवादी से रू-ब-रू होते हैं। इसमें वे ईश्वर, आत्मा, जीवन, मानव-प्रकृति आदि की समीक्षा करते हैं। अपनी सहज, प्रवाहपूर्ण भाषा में, बिना भारी-भरकम शब्दों की मदद के,  वे धर्म और आडंबरवाद का अंतर स्पष्ट कर देते हैं।  

पेरियार स्वयं-घोषित नास्तिक थे, किंतु उनकी नास्तिकता धर्म-दर्शन की उथली समझ की देन नहीं थी। तर्कवादी दार्शनिक की तरह वे ईश्वर, आत्मा, धर्म आदि उन सभी प्रतीकों पर गहन चिंतन करते हैं, जिनमें विश्वास के कारण किसी मनुष्य को आस्थावादी मान लिया जाता है—

‘यदि यह सत्य है कि ईश्वर का साक्षात्कार तथा उसकी प्राप्ति केवल धर्म के माध्यम से संभव है, तो उसके लिए इतने सारे धर्म क्यों होने चाहिए? क्या धार्मिक और दिव्यात्मा मनुष्यों की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए?….धार्मिक युद्धों का औचित्य क्या है? धर्म के नाम पर इतने नरसंहार क्यों होते हैं….मनुष्यता को इतने सारे कष्ट और पीड़ाएं क्यों झेलनी पड़ती हैं? कहा जा सकता है कि ये किसी दैवी शक्ति की देन न होकर मनुष्य की अज्ञानता के कारण उत्पन्न हुई हैं। ’(दर्शनशास्त्र क्या है, पृष्ठ-82)

पेरियार के लिए धर्म पुरोहित वर्ग की राजनीति है। धर्म के नाम पर रचा गया साहित्य उसे मान्यता प्रदान करता है। वे रामायण को धार्मिक ग्रंथ मानने से भी इन्कार करते थे।  उनका कहना था कि ‘ब्राह्मणवादियों का साहित्य अज्ञानता का साहित्य है’(पृष्ठ-57)।  मनुष्य की विवेकशीलता के लक्षणों यानी तर्क, विवेक तथा ज्ञान-विज्ञान से उसका कोई नाता नहीं है। धर्म की आड़ में सामाजिक भेदभाव, ऊंच-नीच, अमीरी-गरीबी आदि को दैवीय ठहराकर, वास्तविक समस्या से किनारा कर लिया जाता है। धर्म जाति का सुरक्षा-कवच है। पेरियार ‘रामायण’ को साहित्यिक कृति मानने से इन्कार करते हैं। उनके अनुसार वह ‘मनु की संहिता की तरह’(पृष्ठ-58) राजनीतिक कृति है।  

धर्म का सहारा लेकर ब्राह्मणों ने खुद को समाज के शिखर पर, तथा बाकी वर्गों को एक किसी न किसी रूप में दास बनाए रखा। गौरतलब है कि जातीय संरचना में दासता पिरामिडीय आकार लिए होती है। जैसे-जैसे पिरामिड के आधार की ओर जाते हैं, दासता का अनुपात उत्तरोत्तर बढ़ता चला जाता है।  इसलिए पेरियार जब कहते हैं कि इस ‘‘इस देश को जाति-व्यवस्था द्वारा बरबाद कर दिया गया है’—तो हमें कोई आश्चर्य नहीं होता।  इसके लिए वे ब्राह्मणों को जिम्मेदार ठहराते हैं।  उनके अनुसार—

‘ब्राह्मण आपको ईश्वर के नाम पर मूर्ख बना रहे हैं। वे आपको अंधविश्वासी बनाते हैं। वे अस्पृश्य के रूप में  आपकी निंदा कर, बहुत ही आरामदायक जीवन जीते हैं। वे आपकी तरफ से भगवान को प्रार्थना करके खुश करने के लिए आपके साथ सौदा करते हैं। मैं इस दलाली के व्यवसाय की दृढ़तापूर्वक निंदा करता हूं।’(सुनहरे बोल, पृष्ठ-44)

भारतीय समाज की जातीय संरचना तथा उसके विरोध में पेरियार के जीवनपर्यंत संघर्ष को समझने के लिए वी. गीता द्वारा लिखित भूमिका, ‘जाति का विनाश और पेरियार’ एक दस्तावेजी रचना है। उससे पता चलता है कि पेरियार किस तरह एक ही समय में, कई अलग-अलग मोर्चों पर, एक साथ लड़ रहे थे—

‘यद्यपि मैं पूरी तरह से जाति को खत्म करने को समर्पित था, लेकिन जहां तक इस देश का संबंध है, उसका एकमात्र निहितार्थ था कि मैं ईश्वर, धर्म, शास्त्रों तथा ब्राह्मणवाद के खात्मे के लिए आंदोलन करूं।  जाति का समूल नाश तभी संभव है जब इन चारों का नाश हो….केवल आदमी को गुलाम और मूर्ख बनाने के बाद ही जाति को समाज पर थोपा जा सकता था। ’(जाति का विनाश और पेरियार, पृष्ठ-3)

पेरियार स्त्री समानता के प्रबल पक्षधर थे। पुस्तक में उनके दो आलेख ‘पति-पत्नी नहीं, बनें एक-दूसरे के जीवनसाथी’ तथा ‘महिलाओं के अधिकार’ शामिल किया गया है। जिस दौर में तिलक जैसे नेता सामाजिक सुधारों को ‘राष्ट्रवाद के लिए खतरा’ मान रहे थे। यह कहकर कि ‘स्त्री का दिमाग पुरुष के दिमाग से औसतन 5 औंस कम होता है’(महराट्टा 13 नवंबर 1887) तिलक अपने अजब-गज़ब विज्ञानबोध का परिचय दे रहे थे—पेरियार महिलाओं के लिए समान अवसर और बराबरी कि मांग कर रहे थे। ऐसे समाज में ‘महिलाओं के अधिकार’ की बात कर रहे थे, जिसमें ‘जमींदार अपने नौकरों और ऊंची जाति के लोग नीची जाति के लोगों के साथ जिस प्रकार का व्यवहार करते हैं, पुरुष उससे भी बदतर व्यवहार अपनी स्त्री के साथ करता है…महिलाएं हर क्षेत्र में अस्पृश्यों से भी अधिक उत्पीड़न, अपमान और दासता झेलती हैं’(पृष्ठ-103)।

पेरियार ‘पति और पत्नी जैसे शब्दों को अनुचित मानते थे, ‘वे एक-दूसरे के साथी और सहयोगी हैं। गुलाम नहीं। दोनों का दर्जा समान है’(पृष्ठ-109)। यही कारण है कि स्त्रियां उन्हें ‘पेरियार’(महान) कहकर बुलाती थीं।

कुल मिलाकर प्रस्तुत पुस्तक ई. वी. रामास्वामी पेरियार और उनके माध्यम से भारतीय समाज की ग्रंथियों से साक्षात करने का अवसर देती है। पेरियार के आंदोलन का केंद्र मुख्यतः दक्षिण भारत था। परंतु जिन परिस्थितियों और संघर्षों का उल्लेख इस पुस्तक में हुआ है, वे पूरे भारत में एक समान थीं। इसलिए इस पुस्तक कि जितनी महत्ता दक्षिण भारत को समझने के लिए है उतनी ही शेष भारत के लिए भी है।

‘फारवर्ड प्रेस’ की बाकी पुस्तकों की तरह इस पुस्तक का प्रकाशन भी स्तरीय है। मुद्रण त्रुटिविहीन है। कुल मिलाकर पुस्तक में पेरियार के बहाने, हिंदी भाषी पाठकों के मानस को मथने के लिए भरपूर खुराक मौजूद है। यह ऐसी पुस्तक है जिसे बिना किसी पूर्वाग्रह के, हर हाल में पढ़ा जाना चाहिए।   

ओमप्रकाश कश्यप

पुस्तक का नाम : पेरियार: दर्शन चिंतन और सच्ची रामायण(पेरियार के मूल लेखों का चयनित संकलन)

प्रकाशक का नाम : फारवर्ड प्रेस 

पता : 803, दिपाली बिल्डिंग, 92 नेहरू पेलेस

  नई दिल्ली-110019

मूल्य : 400 रुपये

क्रांतिकारी कवि और उपदेशक : पोईकाइल योहन्नान

सामान्य

लेख

बीसवीं शताब्दी का दूसरा दशक। पूरा भारतवर्ष आजादी के संघर्ष में डूबा हुआ है। रविवार का दिन। दूर दक्षिण की त्रावणकोर रियासत में खपरैली छत की पुरानी इमारत प्रार्थना-संगीत से गूंज रही है। श्रद्धालु सफेद वस्त्र धारण किए, कच्चे फर्श पर विराजमान हैं। उनके आगे थोड़ा खाली स्थान है। उसके बाद चार फुट ऊंचा मिट्टी का बना चबूतरा। चबूतरे के बीचों-बीच दीपक झिलमिला रहा है। एक अधेड़, अधनंगा आदमी उसमें तेल डालने के लिए बार-बार उठकर आता है। दीपक के पीछे कोई दैवी प्रतीक है। उसका चेहरा एकदम खाली है। सिर के पीछे पीला प्रकाश फैला हुआ है। श्रद्धालुओं के आगे कुछ कुर्सियां और एक मेज हैं। एक बुजुर्ग आदमी कुर्सी के सहारे खड़ा होकर प्रवचन कर रहा है। सम्मोहित श्रद्धालु उसकी उपदेश गंगा में स्नान कर रहे हैं। बीच-बीच में वह अपनी आंखों में उतर आई नमी को साफ करता है। उपदेशक सीरियाई मारथोमा चर्च से छिटककर आया है। बाईबिल में इसलिए विश्वास नहीं करता, क्योंकि उसमें उसके लोगों और पूर्वजों के बारे में एक भी शब्द नहीं है। प्रवचन के बीच-बीच में वह उपस्थित श्रद्धालुओं को अपने दास पूर्वजों के बारे में बताता है। उनके साथ हुए जातीय और सामंती उत्पीड़न का जिक्र करता है। श्रद्धालुओं को उपदेशक की एक-एक बात पर विश्वास है। इसलिए कि जो वह बता रहा है, वे स्वयं उन्हीं हालात से गुजर रहे हैं। दास लोग हैं, उन्हें न खुलकर बोलने की आजादी है, न मनभाता खाने और पहनने की। सार्वजनिक स्थानों पर वे आ-जा नहीं सकते। अपने मालिक से बात करनी हो तो कम से कम पचास कदम की दूरी रखनी पड़ती है। कहीं देह की  छाया भी उनपर पड़ न जाए। ऊपर से बात-बात पर मार देने या बेच आने की धमकी। उपदेशक उन्हें उनके जीवन की त्रासदियों के साथ-साथ सपनों से भी परचाता है। प्रवचन में लीन श्रद्धालु कभी भाव-विभोर होकर झूमने लगते हैं, तो कभी उनकी आंखें छलछला जाती हैं। सारा देश अंग्रेजों से देश की आजादी चाहता है। वे लोग जातीय उत्पीड़न और अपने दासत्व से मुक्ति के लिए प्रार्थनारत हैं। मुक्ति-संदेश जब-जब आंखों में आजादी का बिंब बनकर उभरता है, झुर्राए चेहरों पर खुशी झिलमिलाने लगती है।

भारतीय इतिहास की कोई भी पुस्तक उठाकर देख लीजिए। इस तरह की घटनाओं का उल्लेख नहीं मिलेगा। क्योंकि इतिहासकारों को राजा-महाराजाओं की जय-पराजय, उनके वैभव-विलास और पर्दे के पीछे चलने वाले षड्यंत्रों को लिखने में मजा आता है। आम आदमी की समस्याएं, उसके सुख-दुख उनकी चिंता का विषय नहीं होते। ‘फलां राजा ने नहर बनवाई’─वे बस इतना लिखते हैं। नहर का पानी हर जरूरतमंद तक पहुंचा या नहीं, यह उनकी चिंता का विषय नहीं होता। उनीसवीं और बीसवीं शताब्दी को वे भारतीय समाज के नवजागरण का नाम देते हैं। लेकिन समाज सुधारकों का नाम पूछा जाए तो अधिकांश की सुई राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, दयानंद सरस्वती और विवेकानंद तक आते-आते अटक जाएगी। कुछ और खंगाला जाए तो संभव है, केशवचंद सेन, महादेव गोविंद रानाडे का नाम भी निकलकर सामने आ जाए। किसी पिछड़े या दलित समुदाय के समाज सुधारक का नाम जानने की कोशिश कीजिए? सवाल सुनते ही लोग कन्नी काटने लगेंगे। संभव है कुछ हंसने भी लग जाएं? कहें कि जो अपना भला नहीं कर सकते वे समाज का खाक सुधार करेंगे। इस तरह की टिप्पणी करने वालों पर आपको चाहे जितना गुस्सा आए, पर असल में उनका ज्यादा दोष नहीं है। शताब्दियों से उन्हें यही सिखाया गया है। यही उनकी मानस-रचना है। भारत का इतिहास, उसके धर्म-शास्त्र, नीति-शास्त्र सब समाज के खास लोगों द्वारा खास लोगों के लिए गढे़ गए हैं। इस तरह गढे़ गए हैं कि उनमें जो विरोधाभास और बड़बोलापन है, वह नजर ही नहीं आता। महाभारत के लिए नायक अवतारी कृष्ण हैं। परंतु धर्मराज का दर्जा पांडव-ज्येष्ठ को प्राप्त है। ये ‘धर्मराज’ एक बार 88000 ब्राह्मण स्नातकों को, प्रति स्नातक 30 के हिसाब से कुल 26,40,000 दासियां दान कर देते हैं(सभापर्व, शिशुपाल बध, भाग 48)। इतनी सारी दासियां कहां से जुटाई गईं? ब्राह्मण स्नातक इतनी दासियों का क्या करेंगे? ये सवाल दिमाग में आते ही नहीं हैं। क्योंकि सवाल करना उन धर्मग्रंथों के अनुसार पाप की श्रेणी में आता है।

यहां जो धर्म का लाभार्थी है, वह जाति का लाभार्थी भी है। जो इन दोनों का जितना बड़ा लाभार्थी है, समाज में उसका स्थान उतना ही ऊंचा है। जो इनका लाभार्थी नहीं है, उससे इस व्यवस्था में हस्तक्षेप करने का अधिकार ही छीना हुआ है। जातिवाद की पैठ इतनी गहरी है कि ईसाई और इस्लाम जैसे धर्म जिनकी मूल संरचना में जाति के लिए कोई स्थान नहीं था, भारत आकर वे भी जाति के प्रभाव से मुक्त न रह सके। हिंदू धर्म से राहत की उम्मीद लेकर दूसरे धर्मों में गए लोग, अपने साथ जाति ले जाना नहीं भूले─

एक के बाद एक नए-नए चर्च बनते गए

फिर भी जाति-भेद गया नहीं….

एक चर्च स्वामी की खातिर है

एक चर्च दास के लिए

एक चर्च पुलाया के लिए है

एक परायास के लिए

एक चर्च ‘मुराक्कन’

मछुआरे के लिए है।1

इस प्रवृत्ति का विरोध न हुआ हो, ऐसा भी नहीं है। उनीसवीं शताब्दी में दलितों और पिछड़ों को लेकर कई सुधारवादी आंदोलन समानांतर रूप से चले थे, जिनका नेतृत्व उन समाजों के महापुरुषों के हाथों में था। उनकी पहल करने वाले थे, ज्योतिराव फुले। महाराष्ट्र में ‘सत्यशोधक मंडल’ की स्थापना द्वारा उन्होंने सीधे ब्राह्मणवाद को चुनौती दी थी। पंजाब में जाति-भेद और ब्राह्मणवाद विरोधी चेतना ‘आदिधर्म आंदोलन’, मध्यप्रदेश में ‘आदि हिंदू आंदोलन’ और बंगाल में ‘नामशूद्र आंदोलन’ के रूप में विद्यमान थी। दक्षिण भारत भी अप्रभावित नहीं था। बल्कि कुछ मायनों में तो वह शेष भारत से भी आगे था। तमिलनाडु में पेरियार के नेतृत्व में ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के साथ वैकल्पिक राजनीति की मांग करते हुए धर्म तथा जाति से जुड़े सभी प्राचीन संस्थानों को चुनौती दे रहे थे। केरल में श्री नारायण गुरु, अय्यंकालि, तथा पोईकाइल योहन्नान के नेतृत्व में क्रमशः ‘श्री नारायण धर्म परिपालन योगम’, ‘साधु जन परिपालन संघम’ तथा ‘प्रत्यक्ष रक्षा दैव सभा’ ने भी शताब्दियों से व्याप्त जातीय असमानता के विरुद्ध लोगों को जागरूक करने का काम किया था। आधुनिक भारत के निर्माण में इन आंदोलनों की बड़ी भूमिका है। 

ऊपर जिस उपदेशक का जिक्र हुआ है, वे थे─पोईकाइल योहन्नान। जिस सभा का वर्णन किया गया है, वह थी पोईकाइल योहन्नान द्वारा स्थापित ‘प्रत्यक्ष रक्षा देव सभा’ की साप्ताहिक धर्म-गोष्ठी। आगे बढ़ने से पहले उचित होगा कि सरसरी निगाह केरल के तत्कालीन हालात पर भी डाल ली जाए। 19वीं शताब्दी का केरल तीन बड़े राज्यों─कोचीन, त्रावणकोर और मालाबार में बंटा हुआ था। ईसाई मिशनरियां वहां सक्रिय थीं। समाज मुख्यतः दो हिस्सों में विभाजित था। पहले में विशेषाधिकार प्राप्त जातियां थीं। नंबूदरी ब्राह्मण, जो स्थानीय ब्राह्मण थे। उनका दर्जा समाज में सबसे ऊंचा था। दूसरे स्थान पर बाहर से आए ब्राह्मण और क्षत्रिय थे। नैय्यर मुख्यतः जमींदार थे। मंदिरों की देखरेख का काम भी उन्हीं के अधीन था। सरकारी नौकरियों पर भी उनका अधिकार था। इनके अलावा चेट्यिार, मुस्लिम और ईसाई भी समाज के उच्च वर्गों में आते थे। निचले वर्गों में इझ़वा, पुलाया, परायास, चेनान जैसी जातियां शामिल थीं। इझ़वा पिछड़ी जाति में गिने जाते थे। उनकी कुल जनसंख्या लगभग 15 प्रतिशत थी।  इझ़वाओं की आर्थिक स्थिति दलितों से कुछ बेहतर थी; लेकिन सामाजिक स्तर पर वे भी भेदभाव का शिकार थे। पुलाया(पुलायार), परायास, चेन्नान जातियों  की स्थिति दास के समान थी। छूआछूत कायम थी। इझ़वा ब्राह्मण से 30 फुट दूर रखकर बात कर सकता था, जबकि नैय्यर के अधिकाधिक 12 फुट निकट जा सकता था। वहीं पुलाया को ब्राह्मण से 90 फुट तथा नैय्यर से 60 दूरी रखनी पड़ती थी। सब कुछ ब्राह्मणवादी व्यवस्था के अनुसार था।

दास प्रथा का चलन था। चांगनचेरी बड़ा बाजार था, जहां दासों की बड़े पैमाने पर खरीद-फरोख्त होती थी। अन्य बाजारों में तिरुअंकारा, अलेप्पी, कुनोल, अतिंग्गल, कायमकुलम जैसे बाजार थे। उनमें माता-पिता या सगे-संबंधी दास लड़के-लड़कियों को बिक्री के लिए लाते थे। एक दास युवक का मूल्य 6 से 18 रुपयों के बीच हो सकता था। डॉ। जेनफी के अनुसार अकेले त्रावणकोर में खरीदे गए दासों की संख्या 130000 थी। ईसाई मिशनरियां उनके बीच तेजी से पैठ बना रही थीं। धर्मांतरित पुलाया, परायास को ईसाई धर्म में स्वीकृति तो मिल जाती थी। परंतु उनकी सामाजिक स्थिति पर कोई अंतर नहीं पड़ता था। इझ़वा चूंकि समाज में बीच की हैसियत रखते थे, इसलिए तत्कालीन जातिप्रथा से उन्हें बहुत ज्यादा शिकायत नहीं थी। श्री नारायण गुरु ने इझ़वाओं को सड़क पर चलने और मंदिर प्रवेश की आजादी के लिए सफल आंदोलन किया था। जिसके लिए उन्हें पेरियार का समर्थन भी प्राप्त हुआ था, लेकिन पुलाया आंदोलन के नेता अय्यंकालि का, जिन्होंने दलित जातियों के आत्मसम्मान के लिए सवर्णों से सीधी लड़ाई लड़ी थी, श्रीनारायण गुरु ने कोई साथ नहीं दिया था। इससे तत्कालीन केरल की सामाजिक स्थिति को समझा जा सकता है। नारायण गुरु का नारा था─‘एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर।’ पेरियार और अय्यंकालि के सपने को उन आंदोलनों के साक्षी और सहभागी रहे, कवि सहोदरन अय्यपन(1889-1968) की कविता से समझा जा सकता है─

‘कोई धर्म नहीं, कोई जाति नहीं,

न कोई ईश्वर

केवल सदाचार, सदाचार….सदाचार

सबसे अच्छी तरह से,

और भी अच्छी तरह से’

पोईकाइल योहन्नान का जन्म 17 फरवरी 1879 को तत्कालीन त्रावणकोर राज्य तथा आधुनिक केरल के  पथानमथिट्टा जिले के इराबीपेरूर नामक गांव में हुआ था। पिता थे कंडन, मां केचि। माता-पिता ने उन्हें कोमारन नाम दिया था। ‘कोमारन’ कुमारन का अपभ्रंश है। जिस जाति, परायास में उनका जन्म हुआ था, समाज में उसकी हैसियत दास के समान थी। उन्हें शुद्ध संस्कृत नाम रखने की अनुमति न थी। हालांकि सरकार 1855 में कानून बनाकर दास प्रथा के उन्मूलन की घोषणा कर चुकी थी। बावजूद इसके दूर-दराज के क्षेत्रों हालात पहले जैसे ही थे। कुमारन के माता-पिता उसी गांव के जमींदार शंकरमंग्गलम के यहां दास थे। उस जाति के अधिकांश सदस्यों की हैसियत भू-दास के समान थी। जिस जमीन पर वे खेती करते थे, उसी के साथ उनका जीवन बंधा होता था। जमीन की खरीद-फरोख्त में आमतौर पर उससे जुड़े दास के स्वामी भी बदल जाते थे। ऐसा भी होता था कि दासों की खरीद-फरोख्त में उनका पूरा परिवार बिखर जाता था। नया मालिक केवल माता-पिता की कीमत लगाता, ऐसे में बच्चे अनाथ होकर रह जाते थे। कई बार माता-पिता अलग-अलग मालिकों की सेवा में चले जाते; और बच्चे बेसहारा होकर इधर-उधर भटकते रहते थे─

सुनो-सुनो

मेरे प्यारे भाइयो सुनो

हमारे पूर्वजों ने खूब झेला है

गुलामी में जीना

बिना रुके मालिक की मार सहना

कष्ट और अभावों से गुजरना

पिता एक बाजार में बिके

मां दूसरे में

बच्चे हुए अनाथ2

उन दिनों ईसाई मिशनरियां दलितों के बीच अपनी पैठ बनाने में लगी थीं। कुमारन जब पांच वर्ष का था, तभी उसका ‘बपत्सिमा’ कर दिया था। अपनी जाति के दूसरे किशोरों की भांति कुमारन को भी जमींदार के लिए काम करना पड़ता था। अपने मालिक के लिए वह जानवर चराता। हल जोतते समय यथासंभव मदद करता। इसके अलावा वह काम भी करता जो उसका मालिक उसे सौंपता था। दास के रूप में जन्म लेने के बावजूद कुमारन अपने हमउम्र बच्चों से अलग था। उसका मस्तिष्क सक्रिय था। अपनी सामाजिक स्थिति को देखकर उसके दिमाग में अनेक सवाल कौंधते रहते थे। जातीय ऊंच-नीच और छूआछूत के प्रति वह उद्धिग्न रहता था। घर में तरह-तरह के रीति-रिवाज देख वह चकित रह जाता था। 

परायास जाति का एक रिवाज था। बालक के शुद्धिकरण के नाम पर उसके कान में पानी डालना। कुमारन की मां जब उसका शुद्धिकरण करने चलीं तो उसने मां से सहज भाव से पूछा था─‘एक कान में पानी डालते समय, यदि दूसरे कान से गंदगी प्रवेश करेगी, तब तुम उसे कैसे रोकोगी?’3 भोली स्त्री को कोई जवाब न सूझा। वह बस बेटे के मुंह की ओर देखने लगी। कुमारन की व्यवस्था से विद्रोह, परंपराओं को लेकर सवाल खड़े करने की प्रवृत्ति, उम्र के साथ-साथ बढ़ती गई। उसकी जिज्ञासाएं व्यावहारिक होती थीं। उनका समाधान वह अपने रोजमर्रा के जीवन से ही खोजने की कोशिश करता था। निचली जातियों में तंत्र-मंत्र, झाड़-फूंक और काला जादू को लेकर अनेक भ्रांतियां व्याप्त थीं। एक जादूगर कौड़ियों और घंटी की मदद से काला-जादू दिखाया करता था। एक बार कुमारन ने खेल-खेल में उसकी कौड़ियां और घंटी चुरा लीं। जब वह तांत्रिक काला-जादू दिखाने लगा तो उसने इन चीजों को अपने झोले से गायब पाया। इसपर कुमारन ने उसे चुनौती दी, ‘यदि तुम्हारे काले जादू में सचमुच कोई शक्ति है तो उसकी मदद से उन चीजों को ढूंढकर दिखाओ।’ तांत्रिक बगलें झांकने लगा। कुमारन ने अपने दोस्तों को समझाया कि काला जादू जैसी कोई चीज नहीं होती─

‘यदि काला जादू ठीक उसी तरह काम करता, जैसा तांत्रिक का दावा है तो हम शताब्दियों से दास बनकर नहीं रह रहे होते।’4

इससे जहां कुमारन की सूझबूझ का पता चलता है, वहीं अंदाजा लगाया जा सकता है कि अपने दासत्व को लेकर वह बचपन में कितना सजग था। यही सजगता आगे चलकर जातीय शोषण और सामाजिक रूढ़ियों प्रति आक्रोश का रूप लेती गई। उन्हीं दिनों की एक घटना है। एक दिन कुमारन सामंत के खेतों में हल चला रहा था। उसकी जाति के कई और लड़के भी उसके साथ थे। खेत जोतते समय एकाएक नरकंकाल सामने आ गया। बाकी लड़के भी नरकंकाल को देखने के लिए आसपास सिमट आए। सभी के भीतर कंकाल के बारे में जानने की उत्सुकता थी। तब कुमारन ने अपने साथियों से कहा कि वह कंकाल उनके किसी पुरखे का भी हो सकता है, जो भूख-प्यास से व्याकुल काम करते-करते खेत में गिर पड़ा हो या मालिक ने मारकर यहां दफना दिया हो। सुनते ही उसके दोस्त सोच में पड़ गए। उन्होंने नरकंकाल के अवशेषों को संभालकर मिट्टी से उठाया और पूरे सम्मान के साथ पुनः जमीन में दफना दिया।

मालिक के यहां कुमारन को सुपारी के पत्तों पर खाना परोसा जाता था, जो उनके दासत्व को दर्शाता था। पोईकाइल नामकरण के पीछे भी एक कहानी है। कुमारन अपने अनुभव से जो सीखता था, उसे अपने दोस्तों को बता देता था। धीरे-धीरे दोस्तों के बीच उसकी इज्जत बढ़ने लगी। उसने ‘पोइका कूत्तर’(पोइका की सभा) नामक एक संगठन बनाया था, जिसमें वह अपने अनुभव द्वारा सीखी हुई बातें नियमित रूप से साथियों को बताता था। उसी से उसको ‘पोईकाइल’ उपनाम मिला। आगे चलकर वही उसकी मुख्य पहचान बन गया।  

ईसाई मिशनरियां दलितों में अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए कई तरह से प्रयास कर रही थीं। भयंकर जातिवाद के चलते सरकारी स्कूलों में दलित और निम्नतर जातियों को पढ़ाए जाने की सुविधा प्राप्त न थी। मिशनरियां ऐसी ही जातियों में पैठ बनाने की कोशिशा में लगी थीं। उनके लिए स्कूल खोले जा रहे थे। शिक्षा के नाम पर वहां केवल बाईबिल तथा ईसाई धर्म से जुड़े विश्वासों के बारे में सिखाया जाता था। विद्यालयों में प्रवेश के समय ही बच्चों को ईसाई परंपरा के अनुरूप नया नाम दिया जाता था। उसके बाद वे ईसाई समुदाय का हिस्सा मान लिए जाते थे, उसके लिए बपत्सिमा की रस्म, जो ईसाई धर्म का खास संस्कार है─आवश्यक नहीं थी। नए नाम या धार्मिक पहचान से जुड़ने का विद्यार्थी या उसके माता-पिता की सामाजिक हैसियत पर कोई अंतर नहीं पड़ता था, बावजूद इसके स्कूल प्रवेश के समय नया नाम देने की परंपरा बड़े पैमाने पर स्वीकार्य थी। इसका मुख्य कारण यह भी था कि हिंदू धर्म की मान्यताओं के चलते दास समुदाय अपने लिए अच्छे नाम चुन ही सकता था। बाकी स्कूलों के दरवाजे दलित समुदाय के लिए बंद थे। ऐसी स्थिति में मिशनरी स्कूल जो पहचान देते, वही मान ली जाती थी।

उन थेवरक्कुटू कोचकुंजु नाम का दलित अध्यापक बच्चों को ईसाई धर्म के अनुरूप शिक्षा देने के लिए पाठशाला चलाता था। कुमारन को उसी की पाठशाला में भर्ती कराया गया। वहीं रहकर उसने बाईबिल का अध्ययन किया। बाईबिल की कहानियों में पढ़ाया जाता था कि परमात्मा दुखी लोगों की मदद करता है। उनके लिए ईश्वर के दरवाजे सदैव खुले रहते हैं। इसपर वह सोचता कि यदि परमात्मा सचमुच ऐसा ही है तो वह दलितों और दासों के उद्धार के लिए कोई पहल क्यों नहीं करता? किसने उसे रोक रखा है? बाईबिल में किसी दास जाति का वर्णन क्यों नहीं है? यहीं से प्रचलित धर्म को लेकर उसके मन में शंकाएं पैदा होने लगीं। पर यह शुरुआत थी। शिक्षा के दौरान कुमारन ने स्वयं को अच्छा विद्यार्थी सिद्ध किया। बड़ा होने पर कुमारन की धर्म-संबंधी जिज्ञासाएं उसे चर्च की ओर ले गईं।

वे पोईकाइल के पोईकाइल योहन्नान बनने के लिए दिन थे। हालांकि माता-पिता और बस्ती वालों के लिए वह तब भी ‘कोमारन’ ही था। योहन्नान संत थॉमस द्वारा स्थापित मारथोमा चर्च में धर्म की शिक्षा देने लगे। चर्च का हिस्सा बनने के बावजूद योहन्नान के अपने समाज और जाति के प्रति सरोकार पूर्ववत थे। धीरे-धीरे उन्होंने खुलना आरंभ किया। दुनिया भर में बाईबिल को परमात्मा का संदेश खोजने के लिए पढ़ा जाता है। योहन्नान उसमें अपने समाज को खोजने लगे। उन्हें लगा कि बाईबिल के पात्रों की त्रासदी उनके अपने समाज के, त्रावणकोर के दास जीवन की त्रासदी से मेल खाती हैं। 

उन दिनों ईसाई धर्म की ओर आकर्षित होने वाले दो तरह के लोग थे। अंग्रेजों को अपना शासन चलाने के लिए अंग्रेजी के जानकार लोगों की आवश्यकता थी, ऐसे लोगों की आवश्यकता थी जो उनके भरोसेमंद रहकर सौंपी गई जिम्मेदारियों को निभा सकें। इससे आकर्षित होकर आरंभ में उच्च जाति के लोग बड़ी संख्या में ईसाई धर्म की ओर आकर्षित हुए थे। दूसरा वर्ग पुलाया, परायास जैसी दास जातियों का था, जो जातीय उत्पीड़न से तंग आकर या सरकारी स्कूलों में शिक्षा के अवसर न देखकर ईसाई मिशनरियों की शरण में चले जाते थे। वहां उन्हें, उनके चाहे-अनचाहे ईसाई पहचान से जोड़ दिया जाता था। उच्च जाति के ईसाई धर्म में शामिल हुए लोग अपने साथ अपने जातीय संस्कार भी ले जाते थे। इसलिए मूल ईसाई धर्म में जाति-आधारित विभाजन की भले ही कोई अनुमति न हो, परंतु भारतीय ईसाइयों में इस तरह का विभाजन सामान्य बात थी। इसी से योहन्नान के मन में ईसाई धर्म के प्रति शंकाएं उत्पन्न होने लगीं। उन्हें लगा कि ईसाई धर्मांतरित होकर आने वाले दलितों को कभी भी अपेक्षित मान-सम्मान देने वाले नहीं हैं। धर्म की सांगठनिक क्षमता का उपयोग करते हुए उन्होंने निचली जाति के लोगों को जोड़ना आरंभ किया।

लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए योहन्नान ने जो रास्ता अपनाया उसी में उनकी मौलिकता छिपी थी। दूसरे धर्मप्रचारक परमात्मा के साम्राज्य का महिमा-मंडन करते। इस संसार तो पाप और दुराचारों से भरपूर बताते थे। मानव-जीवन को वे अब्बा और ईव के दुराचार की देन मानते थे। योहन्नान का इस कहानी पर विश्वास नहीं था। जीवन चाहे जितना कष्टमय हो, पर है तो वह जीवन ही। जिस बाईबिल में यह कहानी है, वह उनके समाज की नहीं हो सकती। होगी किसी अदृश्य-अनाम समाज की। बाईबिल में जो स्थितियां हैं उनका देशकाल एकदम भिन्न है। उसमें एक भी अध्याय ऐसा नहीं है जो पुलायाओं और परायासों की कहानी कहता हो─

मैंने पढ़े हैं कई सभ्यताओं के इतिहास

खोजा है, देश-प्रदेश के प्रत्येक इतिहास में

कहीं, कुछ भी नहीं मिला मेरी जाति पर

पृथ्वी पर नहीं कोई ऐसा कलमकार

जो लिखे मेरी जाति का इतिहास

जिसे डुबा दिया गया है रसातल में

जो खो चुकी है

इतिहास की अतल गहराइयों में

यह एक प्रकार की राजनीति ही थी? शताब्दियों से लुटी-पिटी जातियों को न्याय दिलाने की राजनीति! या फिर पुराने धर्म को कठघरे में लाकर नया संप्रदाय चलाने की राजनीति! परंतु राजनीति कहां नहीं है? हिंदू धर्म स्वयं बड़ी राजनीति है जो जाति के नाम पर समाज का स्तरीकरण कर देता है। उसे ऊंच-नीच में बांट देता है। व्यवस्था ऐसी है कि जो इसमें सबसे ऊपर है, तमाम कमजोरियों के बावजूद वह वहीं बना रहता है। और जो नीचे है, वह कितना ही अच्छा करने का प्रयत्न करे, ऊपर जाने का उसका स्वप्न भी पाप मान लिया जाता है। यह ऐसी संस्कृति है जिसमें देवराज इंद्र चाहे जितने बलात्कार करें, उनका देवत्व कभी खंडित नहीं होता। अपवित्र और पतित मानी जाती हैं, बलत्कृत होने वाली स्त्रियां।

बाईबिल का स्वप्नलोक(यूटोपिया) यदि योहन्नान का स्वप्नलोक नहीं था तो फिर क्या था? कह सकते हैं कि योहन्नान ने अपना स्वप्नलोक बड़ी शाइस्तगी से गढ़ा था। वही द्रविड़ अस्मिता का यूटोपिया, जिसमें उसने बस थोड़ा-सा संशोधन किया था। ब्राह्मणों को विदेशी मूल का बताकर फुले ने अनार्य बहुजनों को इस देश का मूल निवासी घोषित किया था। मैक्समूलर से लेकर तिलक तक, सबकी यही मान्यता थी। यह दर्शाती थी कि दक्षिण भारत के निवासी ही इस देश के मूल निवासी हैं। ऐतिहासिक सिद्धांत के रूप में पेरियार ने इसी को आधार मानकर ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की रूपरेखा गढ़ी थी। योहन्नान ने इसका सीमित संदर्भों में, अपनी तरह से प्रयोग किया था। उसने पुलाया और परायास जातियों को समझाया कि उनके पूर्वज त्रावणकोर के वैभवशाली बाशिंदे थे। उसकी सुख-समृद्धि उनकी अपनी सुख-समृद्धि थी। आर्य उसे लूटकर खुद त्रावणकोर के वैभवशाली शासक बन बैठे। जो कभी स्वामी थे आज वे गुलामगिरी करने के लिए विवश हैं।

पुराने वैभव को प्राप्त करने के फुले बहुजनों को शिक्षित होने की सलाह देते हैं। पेरियार का तरीका लोकतांत्रिक था। वे चाहते थे कि धर्म और जाति का विनाश हो। लोग उनसे ऊपर उठकर सोचें। जातिवाद के संरक्षक ब्राह्मणवाद भी नाश हो। लोग लोकतांत्रिक तरीके से अपने अधिकारों के लिए संगठित हों। योहन्नान के लिए वही पुराना धर्म का रास्ता था। उद्धार के लिए मसीहा का इंतजार करना। कई बार वे स्वयं को ही मसीही दूत के रूप में पेश कर देते थे। रास्ता भले ही पुराना हो, सपना तो नया था। वह सपना ही लोगों को योहन्नान की ओर खींच रहा था। योहन्नान की धर्म-संबंधी व्याख्याएं चर्च के अधिकारियों को स्वीकार्य न थीं। भीतर ही भीतर उसके विरुद्ध माहौल बनता जा रहा था। लेकिन यह सोचकर कि लोग योहन्नान से प्रभावित हैं, उनकी सभाओं में भीड़ बढ़ती ही जा रही है, सब के सब अनुयायी ईसाई धर्म की निरंतर फूलती-फलती खेती हैं─वे आरंभ में उनके प्रति नर्म बने रहे।

उन्हीं दिनों एक घटना घटी जिससे योहन्नान को सीधे चर्च के विरोध में उतरना पड़ा। एक निम्न जातीय दलित को चर्च की कब्रगाह में दफनाया गया था। अधिकारियों को पता चला तो उन्होंने कब्र खोदकर उसका शव बाहर निकाल दिया। कहा कि उसे उसकी जाति की कब्रगाह में ले जाकर दफनाएं। योहन्नान के लिए यह सूचना हैरान कर देने वाली थी। उन्हें चर्च का व्यवहार पक्षपातपूर्ण लगा। विवाद बढ़ा तो योहन्नान ने सीरयाई चर्च को अलविदा कह दिया। बाद उन्होंने ‘चर्च मिशनरी सोसाइटी’ की सदस्यता ग्रहण कर ली। लोगों तक अपना संदेश पहुंचाने के लिए योहन्नान को खास ठिकाने की आवश्यकता नहीं थी। लोगों के बीच जाकर, जहां भी, जिस रूप में भी अपने विचार रखने का अवसर मिले, उन्हें स्वीकार था। वे चौराहों पर, सड़क किनारे, घरों और झोंपड़ियों के बीच कहीं भी उपयुक्त स्थान देख, लोगों को एकजुट कर, उपदेश देने लगते थे। बाईबिल की बातों को ज्यों का त्यों स्वीकारने के बजाए वे दलित दृष्टिकोण से उनकी व्याख्या करते। उनका मानना था कि बाईबिल ने स्वयं दमितों के साथ छल किया गया है। ये बातें चर्च की चारदीवारी में संभव नहीं थीं, इसलिए वे वहां से हटकर सभाएं करते। लोगों को समझाते कि उनकी सामाजिक हैसियत हमेशा से ऐसी न थी, अपितु त्रावणकोर के प्राचीन वैभव में उनका भी योगदान था। आर्यों ने उनपर हमला करके द्रविड़ों को अपना गुलाम बना लिया। वे लोगों को बताते कि प्राचीन द्रविड़ उदार सभ्यता के निर्माता थे। उनमें ऊंच-नीच की भावना नहीं थी। आर्यों ने न केवल उस सभ्यता को नष्ट किया, अपितु दास-पृथा भी लागू की। जिससे समाज में गुलाम और मालिक का चलन आरंभ हुआ। तभी से द्रविड़ों का जीवन नर्कमय बना हुआ है। योहन्नान के उपदेशों से प्रभावित होकर पुलायार और परायास जैसी दास जातियों के लोग उसके पीछे संगठित होने लगे। एक उपदेशक के रूप में उनका मान-सम्मान बढ़ता ही जा रहा था। योहन्नान ने बड़ी कुशलता से धर्म की ताकत को शताब्दियों से होते आ रहे शोषण से जोड़ा था। 

लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए वे कई कहानियों का सहारा लेते। कुछ मौखिक कहानियां भी दासों के बीच विद्यमान थी। उनमें से एक यह थी कि दास पृथा लागू होने से पहले खेती के लिए बैलों का उपयोग किया जाता था। दास पृथा लागू होने के बाद हल में बैलों के साथ-साथ दास भी जोते जाने लगे। उनकी साप्ताहिक बैठकों में एक किस्सा खूब चलता था, जिसमें एक कमजोर मरणासन्न दास को हल में बैल के साथ जुता हुआ दिखाया जाता। बताया जाता कि 1855 में दास-पृथा उन्मूलन से पहले प्रत्येक दास की पीठ पर सांड का निशान बना होता था, जो उसके दासत्व का प्रतीक था। उनके पुराने अनुयायी मानते थे कि वैसा ही निशान योहन्नान की पीठ पर भी था। साप्ताहिक सभाओं में योहन्नान अकसर यह गीत लोगों को सुनाया करते थे─

जंजीरों में जकड़े, तालों में कैद

रखा जाता था उन्हें बंदियों की तरह

पीठ पर बरसते कोड़े कर उन्हें देते थे अधमरा

जीवन उनका था जानवरों के समान

बैल के साथ हल में जोतकर

जुतवाए जाते थे खेत….

ये गीत दासों को उनके जीवन की त्रासदियों से परचाते थे। इसलिए लोग उन कहानियों पर सहज विश्वास कर लेते थे। योहन्नान उनके लिए न केवल उपदेशक थे, बल्कि मार्गदर्शक भी। अनुयायियों को लगता था कि केवल वही उनका उद्धार कर सकते हैं। 

उच्च जातियों में इसकी प्रतिक्रिया होनी स्वाभाविक थी। सो चर्च सहित तथाकथित उच्च जातियों का बड़ा वर्ग योहन्नान के विरोध में संगठित होने लगा। उसकी सभाओं पर हमले होने लगे। एक बड़ा हमला, 1905 में कडापरा में धर्मांतरित दलित ईसाई कुझीपरंबिल पैथ्रोस के घर पर हुआ। उस दिन योहन्नान ने एक गोपनीय बैठक बुलाई हुई थी। बैठक का विषय था, ‘अनैतिकता की संतान, ईश्वर की संतान तथा एशिया के सात चर्च’। उस बैठक में उनका व्याख्यान व्यंग्यात्मक था। दूसरा हमला जो पहले से भी बड़ा था, ‘ओथारा’ में हुआ। उस बैठक में भारी संख्या में लोग जमा थे। बैठक के लिए पंडाल का इंतजाम किया गया था। उपद्रवियों ने रोशनी के लिए लगाए गए लालटेनों की मदद से पंडाल को आग के हवाले कर दिया। दलितों को वहां से भागना पड़ा। योहन्नान को अपने अनुयायियों के साथ एक पेड़ के नीचे शरण लेने पड़ी। ऐसे ही एक बार जब हमलावर उनपर आक्रमण के उतारू थे, योहन्नान को भागकर नाले में छिपना पड़ा था। कोझुकुचिरा, वेलांदि, वैंकठनम, मंगलम् की सभाओं में भी व्यवधान उत्पन्न किया गया। वेत्तियादु की बैठक में उपद्रवियों के हमले में एक महिला की हत्या कर दी गई। एक बार जब वे प्रवचन कर रहे थे, उच्च जातियों का हमला हुआ। जान बचाने के लिए उन्हें स्त्रियों के बीच छिपना पड़ा।  

योहन्नान उच्च जाति के लोगों के साथ-साथ चर्च की निगाह में खटकने लगे थे। उसपर चर्च छोड़ने का दबाव बढ़ता ही जा रहा था। लोग किसी भी तरह योहन्नान को दंडित करना चाहते थे। दूसरी ओर लगातार हमलों से योहन्नान की प्रतिष्ठा बढ़ती ही जा रही थी। साथ ही बढ़ रहा था, उसका हौसला। एक अवसर ऐसा आया जब योहन्नान और चर्च एकदम आमने सामने थे। उन दिनों वे ‘ब्रेदरान मिशन’ के सदस्य थे। उस संप्रदाय के लोगों का विश्वास था कि यह संसार कपटपूर्ण लोगों का जमाबड़ा है। योहन्नान को वह कपट अपने चारों और नजर आता। उन्हीं दिनों योहन्नान ने बाईबिल को भी अपनी आलोचना के दायरे में शामिल कर लिया। उसके तर्क बहुत सीधे और लोगों के दिमाग में घर कर जाने वाले थे। जैसे कि उसका कहना था कि बाईबिल के धर्मादेश बाहरी लोगों के लिए हैं। नए धर्मादेश(न्यू टेस्टामेंट) के बारे में योहन्नान का कहना था कि उसमें संत पॉल और दूसरे लोगों के धर्म-संदेश उन लोगों, जैसे रोमन और कुरिंथवासियों के लिए हैं, जिन्हें वे संबोधित करना चाहते थे। उनमें त्रावणकोर के पुलायाओं के लिए एक भी धर्म-संदेश शामिल नहीं है। ईसाई धर्म कहता है कि स्वर्ग का राज्य उन लोगों के लिए है, जो शोषित और उत्पीड़ित हैं। यह सच के नाम पर मजाक है। वे लोगों को समझाते कि धरती से परे स्वर्ग कहीं नहीं है। पुलायाओं और परायासों का स्वर्ग कभी त्रावणकोर था। उसका वैभव उनका अपना वैभव था। उसकी समृद्धि उनके अपने जीवन से झलकती थी। कुछ कपटी लोगों के कारण उनका सुख-वैभव उनसे छिन चुका है। केवल बाईबिल के प्रति आस्था उसे नहीं लौटा सकती। उसे दुबारा प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए मृत्यु की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। मृत्यु बाद स्वर्ग का बाईबिल का दावा लोगों के साथ सिवाय छल के कुछ और नहीं है।

ध्यातव्य है कि पेरियार ने भी तमिलनाडु को द्रविड़ों की मूल भूमि घोषित करने के साथ-साथ ब्राह्मणों को बाहरी घोषित किया था। वे नास्तिक थे। किसी धर्म में विश्वास नहीं करते थे। योहन्नान आस्थावादी थे। उन्होंने अपना जीवन चर्च के उपदेशक से आरंभ किया था। लेकिन बाईबिल से उनका विश्वास हट चुका था। इस ईसाई मान्यता पर भी उनका विश्वास नहीं था कि परमात्मा सब देख रहा है। जितने भी दीन-दुखी हैं, अंत में सब उसकी शरण में होंगे। वह न्याय करेगा। योहन्नान ने स्वतंत्र रास्ता चुना था। ईसाई धर्म के प्रति उठते इन्हीं संदेहों के फलस्वरूप योहन्नान ने बहुप्रसिद्ध मेरामोन सम्मेलन का बहिष्कार कर दिया। उसके पहले वे वेकठनम की सभा में बाईबिल की आलोचना कर चुके थे। उनका कहना था कि दासों के लिए वह पुस्तक वृथा है। इसलिए उसे साथ लेकर चलना बेमानी है।

मेरामेन सम्मेलन के विरोध में मुथलपुरा में समानांतर सम्मेलन का आयोजन किया गया। उस समय तक योहन्नान अपने समर्थकों के हृदय में ईसाईधर्म और बाईबिल के प्रति आक्रोश पैदा कर चुके थे। मुथलपुरा सम्मेलन में उसका चरमोत्कर्ष देखने को मिला। उसके अनुयायी अपने हाथों में बाईबिल की प्रतियां लिए हुए थे। उत्साहित लोगों ने बड़ी वेदिका तैयार की। उसमें आग जलाई गई। देखते ही देखते लोग साथ लाई बाईबिल की प्रतियां उसमें फैंकने लगे। जो लोग बाईबिल को आग के हवाले करने से झिझक रहे थे, उन्हें दूसरे लोगों  द्वारा उकसाया गया। एक ही दिन में बाईबिल की हजारों प्रतियां आग के हवाले कर दी गईं।5 यह अप्रत्याशित था। योहन्नान के उस कदम से सारा ईसाई समुदाय सकते में आ गया। आनन-फानन में योहन्नान के कृत्य को धर्म-विरोधी घोषित कर दिया गया। जांच कमीशन बिठाया गया। योहन्नान को मारथोमा चर्च से निष्काषित कर दिया गया।

यह 1905 के आसपास की घटना है। उसके बाद वे ‘चर्च मिशनरी सोसाइटी’ से जुड़े। उसका नजरिया अपेक्षाकृत सुधारवादी था। उसका प्रभावक्षेत्र ऊंची जाति के लोगों में अधिक था। जाति-भेद के प्रति उसका नजरिया भी दूसरों से अलग न था। योहन्नान का बहुत जल्दी उससे भी मोह भंग हो गया। खिन्न होकर उन्होंने ‘चर्च मिशनरी सोसाइटी’ को छोड़ दिया। उसके बाद कुछ समय के लिए ‘ब्रोदरान मिशन’ में शामिल हुए। ये ईसाई धर्म की वे संस्थाएं थीं जो मानव-मात्र के बीच बराबरी का दावा करती थीं। लेकिन एक के बाद एक संस्था का अनुभव प्राप्त करने के बाद योहन्नान समझ चुके थे कि संस्थाओं का मूल चरित्र जो बताया जाता है, उससे बिलकुल अलग है। उनके साथ रहकर दासत्व और जातिभेद का समाधान तो दूर, उनके विरोध में आवाज उठाना भी संभव नहीं है। 1907 के आसपास उन्होंने ‘ब्रोदरान मिशन’ को भी छोड़ दिया और स्वतंत्र होकर काम करने लगे।

प्रत्यक्ष रक्षा दैव सभा

यह मानते हुए कि ईसाई धर्म में कपटी जातिवादी लोगों का जमाबड़ा है, बाईबिल दासों के लिए पूरी तरह अप्रासंगिक  है। वह दमित जातियों की समस्या का समाधान करने में अक्षम है─ योहन्नान ने 1909 में उन्होंने ‘प्रत्यक्ष रक्षा दैव सभा’ की स्थापना की। अब योहन्नान स्वतंत्र ‘उपदेशी’ थे। उनके सामने उनका समाज था, उसके दमन और शोषण की अंतहीन व्यथाएं थीं। अपने व्याख्यानों वे दास जातियों से साफ-सुथरा रहने को कहते। शिक्षा ग्रहण करने की सलाह देते और संगठित होने का आवाह्न करते। ‘प्रत्यक्ष रक्षा दैव सभा’ के मुख्य उद्देश्य थे─

1. ईसाई धर्म और हिंदुत्व दोनों का खंडन करना।

2. यह विश्वास करना कि ईश्वर दमित लोगों के उत्थान के लिए पुनः अवतरित होंगे।

3. समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व भाव में विश्वास रखना

4. सृष्टि रचियता के नाम पर प्रार्थना करना, लेकिन बलिप्रथा का परित्याग

5. चर्च से अलग, अपने मंदिर में प्रार्थना करना

‘प्रत्यक्ष रक्षा दैव सभा’ का एकमात्र स्वप्न था, दासत्व से मुक्ति उसका एकमात्र स्वप्न था। दास जातियों के पुराने वैभव को प्राप्त करना। हालांकि इसके लिए योहन्नान के पास सिवाय प्रार्थना के दूसरा कोई रास्ता न था। प्रत्यक्ष रक्षा दैव सभा का एक गीत6 जिसमें व्यंग्य भी झलकता है, इस प्रकार है─

ईश्वर को किसी ने नहीं सुना

देवदूतों को किसी ने भी देखा नहीं

मुक्ति की चाहत में प्रार्थना करने वाले

उसके सेवक भी दिखाई नहीं पड़ते

मैंने परमात्मा को नहीं देखा

मैंने जीसस को नहीं देखा

कोई देवदूत, कोई आत्मा

भी मेरी निगाह से नहीं गुजरी

…..

उनसे जुड़ी दुखद अनुभूतियों

की चर्चा न कर पाने का मुझे खेद है।

पेरियार की भांति योहन्नान ने भी अपने अनुयायियों को ‘आदि द्रविड़’ कहकर संबोधित किया है। उसका मानना था कि दलित एक समृद्ध परंपरा के अनुगामी थे। लेकिन लंबी दासता के चलते वे अपने ही इतिहास को भुला चुके हैं। और जब तक उनमें दास-भाव है, तब तक वे अपनी समृद्ध परंपरा की ओर नहीं लौट सकते। उसका विश्वास था कि ‘परमात्मा गुलामों की मुक्ति के रूप में उसके रूप में अवतरित हुए हैं।’7 यह कहना एकदम गलत है कि ‘स्वर्ग’ और ‘मोक्ष’ की प्राप्ति केवल मृत्यु के बाद ही संभव है। परमात्मा अपनी मर्जी से समय-समय पर जन्म लेते हैं। इसलिए उनके नाम पर बनी परंपराएं और कर्मकांड वृथा हैं। मुथलपुरा की घटना की जांच के लिए समिति के सदस्यों में के। वी। सिमॉन नाम का सदस्य भी था। जन्म से दलित सिमॉन कवि, लेखक और उपदेशक भी थे। अपनी पुस्तक ‘दि वर्क आफ पोईकाइल योहन्नान एंड पीआरडीएस’ में उसने लिखा है─

‘योहन्नान और उसके साथियों का मुख्य लक्ष्य था, अपने अनुयायियों को जाति-आधारित भेदभाव से मुक्ति दिलाना….बाईबिल उस समय या उसकी पीढ़ी(जाति) के लिए उपयोगी नहीं थी। इस दुनिया में चर्च को धर्मदूतों(जीसस के प्रथम 12 अनुयायी) के साथ ही समाप्त हो जाना चाहिए था। तब से आज तक हजारों वर्ष के अंतराल में एक भी व्यक्ति की रक्षा नहीं हो सकी है….कोई दुबारा आने वाला नहीं है, कोई हजार वर्ष लंबा शासन नहीं है। इन(बाईबिल के) उपदेशों के फलस्वरूप जिन्होंने स्वयं को औपचारिक रूप से ‘सुरक्षित’ मान लिया था, वे एक बार फिर योहन्नान के हाथों में सुरक्षित हुए(उनमें से अधिकांश निचली जाति के लोग थे)। इन ‘सुरक्षित’ अनुयायियों को योहन्नान के उपदेशों और विचारों से परे किसी चीज की आवश्यकता नहीं थी। इसलिए उन्होंने बाईबिल को आग के हवाले कर दिया। उनके लिए योहन्नान के शब्द किसी भी धर्मादेश या कानून से बढ़कर थे।’7  

यह ठीक है कि योहन्नान दलितों को कोई स्पष्ट पहचान देने में असमर्थ रहे। उनका प्रभाव क्षेत्र भी सीमित था। फिर भी वे अकेले संत थे, जो ईसाई धर्म को मंदिरों और चर्च की दीवारों से बाहर निकालकर लोगों के बीच ले आए थे। उनके लिए मुक्ति का अभिप्राय मोक्ष नहीं था, बल्कि उस दासत्व से मुक्ति थी, जिसे उनके लोगों पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुलामी के रूप में भोगते आए थे। ऐसे लोग पचास-सौ या हजार नहीं, लाखों में हैं। योहन्नान के समकालीन कवि और समाज सुधारक सहोदरान अय्यपन ने अपनी कविता में इस ओर इशारा करते हुए कहा है─

अपने पसीने और जीवन-रक्त के साथ

इस वसुंधरा के धन-भंडार भरने वाले बहुजनो

श्रमजनो….याद रखो

जीर्ण-शीर्ण झोपड़ियों में,

भोजन और वस्त्रों के लिए तिल-तिल करतीं संघर्ष

गरीब, अभावग्रस्त─कच्चे नर्म फर्श पर बच्चे जनती स्त्रियां                                                                                                                                                                                                               

एक-दो नहीं लाखों में हैं

योहन्नान के योगदान को देखते हुए उन्हें त्रावणकोर की पहली विधायिका ‘श्री मूलम पोपुलर असेंबली’ का सदस्य चुना गया था। वे 1921 और 1931 में दो बार उस पद पर रहे। वे कदाचित अकेले सदस्य थे जिन्हें कई जातियों के प्रतिनिधि के रूप में चुना गया था। उस पद पर रहते हुए योहन्नान ने दास कही जाने वाली जातियों के लड़कों को शिक्षा में अतिरिक्त मदद देने का प्रस्ताव पेश किया था, ताकि वे दूसरी जाति के बच्चों के साथ स्पर्धा कर सकें। इसके अलावा उन्होंने सरकार निचली जाति की गरीबी दूर करने के लिए उनके बीच छोटे उद्यमों को बढ़ावा देने की मांग भी की थी , जिससे वे आत्मनिर्भर होकर आगे बढ़ सकें। अपने अनुयायियों के बीच वे पोईकाइल अप्पचन, कुमार देवा के नाम से भी जाने जाते हैं.

ओमप्रकाश कश्यप

1-      PRDS and Dalit Renaissance: An essay set by The Association of Kerala History Publication Committee, translated by P. M. Abraham, February 1996, Page 15.

1.      PRDS and Dalit Renaissance: An essay set by The Association of Kerala History Publication Committee, translated by P. M. Abraham, February 1996, Page 15.

2.           Songs of Poykayil Appachan 1905 to 1939, Edited by V V Swamy and E V Anil, Institute of PRDS Studies, Kottayam

3.            An Anti-Slavery Spiritual Revolution in Kerala — Prathyaksha Raksha Daiva Sabha, article written by Tharun T. Tharun

4.           As above

5.            PRDS and Dalit Renaissance: An essay set by The Association of Kerala History Publication Committee, translated by P. M. Abraham, February 1996, Page 12.

6.      Above, page 14-15.

7।       As above page 13

1-      PRDS and Dalit Renaissance: An essay set by The Association of Kerala History Publication Committee, translated       by P। M। Abraham, February 1996, Page 15।

2।            Songs of Poykayil Appachan 1905 to 1939, Edited by V V Swamy and E V Anil, Institute of PRDS Studies,        Kottayam।

3।            An Anti-Slavery Spiritual Revolution in Kerala — Prathyaksha Raksha Daiva Sabha, article written by Tharun T।             Tharun

4।            As above।

5।            PRDS and Dalit Renaissance: An essay set by The Association of Kerala History Publication Committee, translated       by P। M। Abraham, February 1996, Page 12।

6।       Above, page 14-15।

7।       As above page 13

आधुनिक भारत के निर्माता : महात्मा ज्योतिराव फुले और डा. भीमराव आंबेडकर

सामान्य


मैं मानव-मात्र की समानता में विश्वास करता हूं. मेरे हिसाब से धर्म का अभिप्रायः ऐसे कर्तव्यों का अनुपालन करना है, जिनसे न्याय की स्थापना हो. दिलों में एक-दूसरे के प्रति दया, ममता, करुणा तथा प्रेम का उजियारा हो, ऐसे कर्तव्य करना जिनसे हमारे आसपास के प्राणी अधिकाधिक सुखी रह सके—थॉमस पेन.      

तुम उस समय तक अच्छा समाज नहीं गढ़ सकते जब तक तुम्हें पर्याप्त राजनीतिक अधिकार न हों. न ही तुम उस समय तक अपने राजनीतिक संकल्पों तथा विशेषाधिकारों पर अमल कर सकते हो, जब तक तुम्हारा सामाजिक  तंत्र तर्क और न्याय-भावना पर केंद्रित न हो. तुम उस समय तक अच्छा आर्थिक ढांचा खड़ा नहीं कर सकते जब  तक सामाजिक ढांचा बेहतर न हो. यदि तुम्हारा धर्म नैतिक आधार पर कमजोर और भटकाव-युक्त है तो तुम स्त्री तथा अन्य वर्गों के लिए समानतायुक्त वातावरण नहीं बना सकते. अन्योन्याश्रितता महज दुर्घटना नहीं, कुदरत  का नियम है.—महादेव  गोविंद  रानाडे.

आज देश में लोकतंत्र है. चुनावों के दौरान करीब एक अरब नागरिक अलग-अलग और एक साथ अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं. उसके आधार पर हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश होने का दावा कर सकते हैं. हालांकि कुछ कमजोरियां भी हैं. हमारे यहां भूख है, गरीबी है, भीषण समाजार्थिक असमानता तथा बेरोजगारी है. नेता सब्जबाग दिखाते हैं. सरकारें बनती हैं. जनाकांक्षाओं को पूरा किए बगैर चली भी जाती हैं. उनका शिकार समाज के निम्न-मध्यम, गरीब और विपन्न लोगों को होना पड़ता है. फिर भी चुनावों के दौरान सर्वाधिक भागीदारी इन्हीं लोगों की रहती है. लोकतंत्र से सर्वाधिक उम्मीद भी इसी वर्ग को है. यह उम्मीद नहीं होती, सपने नहीं होते. सपनों को पहचानने, उन्हें पूरा करने की हसरत तथा संघर्ष करने का जज्बा नहीं होता—यदि महात्मा ज्योतिराव फुले और डॉ. आंबेडकर नहीं होते. भारत को आधुनिक राज्य बनाने में इन दो महापुरुषों का सर्वाधिक योगदान रहा है. दोनों अलग-अलग समय में जन्मे. जो फुले का समय है वह डॉ. आंबेडकर का नहीं है. जिस वर्ष आंबेडकर का जन्म हुआ, उससे कुछ महीने पहले फुले दुनिया छोड़ चुके थे. फिर भी लगता है जैसे सबकुछ योजनाबद्ध हो. ओलंपिक के उन खिलाड़ियों की भांति जिनमें एक पूरे संकल्प और इरादे के साथ मशाल लेकर दौड़ता है, फिर उसे आगे वाले खिलाड़ी के हाथों में सौंपकर अंर्तध्यान हो जाता है. दोनों का संघर्ष अपने समाज के अलावा समय के साथ भी है. अतएव बिना उनके इतिहास को जाने, बगैर उस समय की पड़ताल किए—उनके योगदान को समझ पाना असंभव है.

ज्योतिबा फुले द्वारा स्थापित पाठशाला में पढ़ने वाली एक लड़की ने प्रदेश में महार और मांग जातियों की दुर्दशा पर एक निबंध लिखा था. निबंध इतना मार्मिक था कि मराठी समाचारपत्र ‘ज्ञानोदय’ ने 15 फरवरी 1855 के अंक में उसपर एक समाचार प्रकाशित किया. इस घटना का उल्लेख धनंजय कीर ने ‘महात्मा ज्योतिबा फुले’ में किया है. उसमें पेशवाई के अन्याय के विरोध में आक्रोश है, तो अंग्रेजी शासन के प्रति सहानुभूति की झलक भी है. निबंध उस समय के शूद्र एवं अतिशूद्रों की मनोस्थिति का दस्तावेज है—

‘‘ब्राह्मण कहते हैं, वेदों पर उनका विशेषाधिकार है. केवल वही उनका अध्ययन कर सकते हैं. इससे पता चलता है कि हमारा कोई धर्मग्रंथ नहीं है. यदि वेद ब्राह्मणों की रचना है तो उनके अनुसार आचरण करना भी उन्हीं की जिम्मेदारी है. हमें धर्मग्रंथों को पढ़ने की स्वतंत्रता नहीं है. कहना पड़ेगा कि हमारा कोई धर्म नहीं है. हम बिना धर्म के हैं. हे ईश्वर! तू ही बता, तूने हमारे लिए कौन-सा धर्म बनाया है, जिससे ब्राह्मणों की तरह हम भी उसका पालन कर सकें

पहले हम इमारतों की नींव तले दफना दिए जाते थे. शिक्षा सदनों में जाने की हमें अनुमति नहीं थी. यदि कोई ऐसा करे तो उसकी गर्दन नाप दी जाती थी. आज बाजीराव द्वितीय आकर देखे कि अछूत और शूद्र लड़के-लड़कियां स्कूल जा रहे हैं तो ईर्ष्या और क्रोध से उसका दिमाग फट जाएगा—‘अरे! यदि महार और मांग पढ़-लिख जाएंगे तो क्या ब्राह्मण उनकी सेवा करेगा? क्या ब्राह्मण बच्चे उसके लिए बोझा ढोकर लाएंगे? परमात्मा ने हमें ब्रिटिश राज्य की सौगात दी है. आज हमारे कष्टों में कमी आई है. अब कोई हमें परेशान नहीं कर सकता. कोई हमें फांसी नहीं चढ़ा सकता. कोई हमें जिंदा नहीं जला सकता. हमारी संतान सुरक्षित है. हम अपना शरीर ढक सकते हैं. चादर ओढ़ सकते हैं. आज हर किसी को अपने ढंग से जीने की आजादी है. कोई बंधन नहीं, किसी प्रकार का अंकुश नहीं है. कोई प्रतिबंध भी नहीं हैं. यहां तक कि हमें बाजार जाने की भी आजादी है.’’

उसी अखबार ने आगे लिखा था—‘‘वे(अछूत) किसी न्यायालय के भीतर नहीं जा सकते. रोगी का इलाज कराने के लिए उन्हें अस्पताल में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है. किसी सराय में नहीं ठहर सकते. न ही प्रदेश की सार्वजनिक सड़कों पर आने-जाने की अनुमति उनको है. किसान-शिल्पकार की हैसियत से उन्हें सदैव घाटा उठाना पड़ता है, क्योंकि बाजार में दुकान की सीढ़ियां चढ़ने की अनुमति उन्हें नहीं है. मजबूरी में उन्हें अपना माल दलालों के हाथों ओने-पौने भाव बेचना पड़ता है. कुछ तो इतने पतित मान लिए गए हैं कि उनसे कुछ काम नहीं लिया जा सकता….वे केवल भिक्षा के सहारे जीते हैं. भीख मांगने के लिए भी वे सड़क का प्रयोग नहीं कर सकते. उन्हें सड़क से दूर, ऐसी जगह जहां से कोई देख न ले, खड़ा होना पड़ता है. लोगों को आते-जाते देख दूर खड़े-खड़े गुहार लगाते हैं. दया करके यदि कोई दूर से ही भीख उछाल देता है, तो वे उसपर झपट नहीं पड़ते. बल्कि वे वहीं खड़े-खड़े उस समय तक प्रतीक्षा करते हैं, जब तक भीख देने वाला आंखों से ओझल न हो जाए. उसके जाते ही भीख को उठाकर वहां से भाग जाते हैं.’’1

कदाचित वह पहला अवसर था जब कोई अछूत बालिका अपने कष्टों को शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्त कर रही थी; और समाचारपत्र उसकी पीड़ा को सार्वजनिक कर रहा था. उससे पहले शूद्र और अतिशूद्र अपने कष्टों के बारे में बताना तो दूर सोचना तक नहीं जानते थे. उनके लिए सबकुछ नियतिबद्ध, दैवी आदेश जैसा था. शोषण एवं दमन से मुक्ति के लिए ईश्वर की विशेष अनुकंपा की कामना की जाती थी. कहा जाता था कि ईश्वरीय अनुकंपा तभी संभव है जब वे उन कर्मों का निर्वाह पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ करें, जो उनके लिए वर्ण-व्यवस्था द्वारा निर्धारित किए गए हैं. इस तरह दमन और शोषण का सोचा-समझा विधान था. खासकर अश्पृश्यता को लेकर. देवेंद्र कुमार बेसंतरी ने केरल का उदाहरण दिया है—‘नंबूदरी ब्राह्मण नायर जैसे सवर्णों से 32 फुट की दूरी से, नायर इढ़वा लोगों से जो अगम्य थे, परंतु जिनका सामाजिक ढांचे में बहुत ऊंचा स्थान था, 64 फुट कर दूरी से और इढ़वा जाति के लोग अछूतों पुलवा, परेया से सौ फुट की दूरी पर ही अपवित्र हो जाते थे.’(संदर्भ-भारत के सामाजिक क्रांतिकारी, देवेंद्र कुमार बेसंतरी, पेज, 136). ऐसे परिवेश में शूद्र अपने लिए भला कैसे मान-सम्मान की उम्मीद करता! नाउम्मीदी के बीच वे अपना जीवन जीने को विवश थे. पुरोहित वर्ग इसे भाग्यदोष अथवा पूर्व कर्मों का फल कहकर भरमाए रखता था. उत्पीड़न से मुक्ति का एक रास्ता धर्म-परिवर्तन भी था. लेकिन वह भी निरापद न था. जाति प्रथा के विषाणु बाकी धर्मों में भी प्रवेश कर चुके थे. धर्मांतरित व्यक्ति को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता था. यह दुर्दशा क्यों हुई? इसपर फुले ने विचार किया है. शूद्रों-अतिशूद्रों की अशिक्षा का मामला उनके लिए कितना महत्त्वपूर्ण था, वह इससे भी पता चलता है कि ‘किसान का कोड़ा’ पुस्तिका की भूमिका की शुरुआत ही उन्होंने इन शब्दों से की है—‘विद्या न होने से बुद्धि न रही, बुद्धि के न रहने से नैतिकता का हृास हुआ, नैतिकता न रहने से गतिशीलता का लोप हुआ, गतिशीलता के अभाव में धन-दौलत दूर होते गए, धन-दौलत के न रहने से शूद्रों का पतन हुआ. इतना अनर्थ एक अविद्या के कारण हुआ.’ डॉ. आंबेडकर ने बुद्ध और कबीर के अलावा फुले को भी अपना गुरु माना. दलितों की दुर्दशा का मूल कारण अशिक्षा है. दलित युवाओं को शिक्षा का महत्त्व समझाते हुए उन्होंने लिखा—‘शिक्षा शेरनी का दूध है. जो भी पीता है, दहाड़ने लगता है.’ डॉ. आंबेडकर आजीवन दलितों को शिक्षित होने, संगठित रहने तथा अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने का आवाह्न करते रहे.

उस समय के सभी सुधारवादी अंग्रेजी शिक्षा से प्रेरित थे. नई ज्ञान-चेतना, जिसके मूल में जॉन लाक, वाल्तेयर, रूसो, बैंथम, मार्क्स, थॉमस पेन जैसे महान दार्शनिकों की प्रेरणाएं थीं—से लबरेज होकर उन्होंने भारतीय समाज की कुरीतियों को समझा तथा उनसे संघर्ष किया था. बदले में यथास्थितिवादियों का विरोध और उत्पीड़न सहा. अपने-अपने क्षेत्र में वे सब कमोबेश सफल भी रहे. लेकिन उनके कार्यक्षेत्र का दायरा सीमित था. डॉ. आंबेडकर के मतानुसार उनके प्रयास केवल परिवार-सुधार तक सीमित थे.2 

समाज सुधार की दिशा में बहुत आगे बढ़ने की इच्छाशक्ति उनमें नहीं थी. राजा राममोहनराय, ईश्वरचंद विद्यासागर, स्वामी दयानंद जैसे महापुरुषों द्वारा चलाए जा रहे सुधारवादी आंदोलनों का प्रभाव जनता पर पड़ा था. लेकिन सीमित अर्थों में. हेनरी वर्नर हंपटन ने ‘ब्रह्मसमाज’ के संस्थापक राजा राममोहनराय को भारत में सुधारवादी आंदोलन का शिखर पुरुष घोषित करने के साथ-साथ, उन सीमाओं का उल्लेख भी किया है, जिनके पीछे उनके जन्मगत संस्कार थे. हंपटन के अनुसार राजा राममोहनराय, ‘अपने समय से बहुत आगे थे. लेकिन जहां तक शूद्रों की शिक्षा का सवाल है उनका मानना था कि शिक्षा ऊपर से शुरू होकर नीचे तक जानी चाहिए. इस प्रकार आरंभ में धीरे-धीरे, आगे चलकर तेजी से वह जनसाधारण तक पहुंच जाएगी. इस मामले में वे अपने समय की प्रचलित मान्यताओं के समर्थक थे. प्रकारांतर में वे उन लोगों में से थे जो बहुत आशावादी थे.’3 हंपटन ने इसे फिल्ट्रेशन का सिद्धांत कहा है.

‘ब्रह्म समाज’ प्रकट में समाज के जाति-आधारित विभाजन की आलोचना करता था. वर्ण-विभाजन को लेकर उसे कोई शिकायत न थी. उसके द्वारा निर्धारित पूजा-विधानों में पुरोहित की भूमिका केवल ब्राह्मण निभा सकता था. जिसे ऊपर ‘फिल्ट्रेशन का सिद्धांत’ कहा गया है, अर्थशास्त्र की भाषा में उसे ‘ट्रिकिल डाउन थियरी’(रिसाव का सिद्धांत) कहा जाता है. उसके अनुसार समृद्धि ऊपर से नीचे की ओर निस्सरित होती है. गोया समाज को अपने स्वार्थ के अनुसार चलाते आए लोग सुधार को भी अपने स्वार्थानुसार नियंत्रित कर लेते हैं. इसकी सबसे अच्छी व्याख्या डॉ. आंबेडकर ने 1936 में ‘जात-पांत तोड़क मंडल’ के महाधिवेशन के लिए अपने दिए न जा सकने वाले अध्यक्षीय भाषण में की थी. विधवा विवाह, सती प्रथा उन्मूलन, बाल-विवाह की रोकथाम आदि भारतीय समाज की प्रमुख समस्याओं जिनसे भारतीय समाज उन दिनों जूझ रहा था, को उन्होंने ‘हिंदू परिवार का सुधार’ कार्यक्रमों तक सीमित माना था. उनका विश्वास था कि वास्तविक सुधार किसी मसीही कृपा द्वारा संभव नहीं है. उसकी पुनर्रचना केवल समाज के पुनर्गठन द्वारा संभव है(जातिप्रथा का उन्मूलन). वे जानते थे कि शिखर पर मौजूद लोग अपने विशेषाधिकारों को एकाएक छोड़ने को तैयार न होंगे. केवल संगठित शक्ति द्वारा उन्हें काबू में लाया जा सकता है. यह तभी संभव है जब लोग अपने कष्ट, शोक, विपन्नता के प्रति संवेदनशील हों. उनके पीछे निहित कारणों को समझते हों. ऐसे प्रश्नों की ओर लोगों का ध्यान न जाए, इसके लिए धर्म को बीच में लाया जाता है. इस साजिश को फुले ने सबसे पहले समझा था. यह मानते हुए कि दूसरों के भरोसे आदमी अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता, उन्होंने निचली जातियों के युवक-युवतियों की पढ़ाई के लिए स्कूल खोले. सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिए आंदोलन चलाए. धर्म के नाम पर आडंबर फैला रहे ब्राह्मण पुरोहितों को चुनौती दी.

फुले ने जो कहा और जितना लिखा, बहुत बड़ा हिस्सा केवल दो मुद्दों पर केंद्रित है. पहला धर्म के नाम पर ब्राह्मणों द्वारा फैलाए जा रहे आडंबरों का विरोध, दूसरा शूद्र-अतिशूद्र के लिए शिक्षा पर जोर. दोनों मुद्दे बेहद चुनौतीपूर्ण थे. व्यवस्था के शिखर पर कुंडली मारे बैठी शक्तियां खुद को बदलने के लिए तैयार न थीं. जिस ‘फिल्ट्रेशन थियरी’ पर राजा राममोहनराय तथा उनके सहयोगियों की उम्मीदें टिकी थीं, वह नाकाम सिद्ध हुई थी. भारतीय समाज में शिक्षा की स्थिति का आकलन करने के लिए 1882 में ‘इंडियन एजुकेशन मिशन’ की स्थापना की गई थी. अपने अध्ययन के दौरान मिशन ने पाया कि कस्बों और शहरों में शिक्षा में सुधार हुआ था. लेकिन गांवों में वैसे ही हालात थे. शहरों में भी शिक्षा का जितना लाभ ऊंची जातियों ने उठाया था, शूद्रों, अतिशूद्रों तक उतना लाभ नहीं पहुंच पाया था. शिक्षा  विभाग में अधिकांश अध्यापक ब्राह्मण थे. वे निचली जातियों के विद्यार्थियों के साथ भेदभाव बरतते थे. यह बात कमोबेश उस समय के प्रमुख सुधारवादियों पर भी लागू थी. उच्च वर्गों से आए सुधारवादी सुधार तो चाहते थे, लेकिन हिंदू धर्म की मूल संरचना में छेड़छाड़ का न तो उनमें साहस था, न वैसी इच्छाशक्ति. इसीलिए थोड़े अंतराल के पश्चात हिंदू समाज में वही विकृतियां दुबारा पनपने लगती थीं. सती प्रथा पर कानूनी रोक 1829 में ही लग चुकी थी, मगर समाज उस विकृति से पूर्णतः मुक्त नहीं हो पाया था. मुंबई के समाचारपत्र ‘टेलीग्राफ एंड कुरियर’ में नवंबर 1852 में भुज की एक घटना छपी थी—

‘एक स्त्री को बलात् सती के लिए ले जाया जा रहा था. वह बचने के लिए चीख-चिल्ला रही थी. अंग्रेज अधिकारियों ने उसे बचाने का प्रयत्न किया. लेकिन साथ जा रहे ब्राह्मणों ने उसे जबरदस्ती खींचकर पुनः चिता पर बिठा दिया. युवती आगे चीखे-चिल्लाए नहीं इसके लिए उन्होंने उसके सिर पर प्रहार कर उसे बेहोश कर दिया फिर उसी अवस्था में चिता पर लिटाकर आग जला दी गई.’4

विकृति केवल सती प्रथा तक सीमित नहीं थी. प्रसिद्ध उपयोगितावादी दार्शनिक जेम्स मिल ने ‘ब्रिटिश भारत का इतिहास’ तथा अमेरिकी लेखिका कैथरीन मेयो ने ‘मदर इंडिया’ में भारतीय समाज की दुर्दशा का वर्णन किया है. उसके अनुसार पूरा भारतीय समाज घोर जातिवाद और आडंबरों में फंसा था. अनगिनत अंधविश्वास थे. एक अंधविश्वास यह भी था कि गंगा किनारे मृत्यु होने पर मोक्ष प्राप्त होता है. इसलिए बीमार परिजनों को मरणासन्न अवस्था में गंगा किनारे छोड़ देना धार्मिक कर्तव्य माना जाता था. बंगाल में तो यह मान्य प्रथा बन चुकी थी. माना जाता था कि गंगा किनारे मृत्यु होने पर आत्मा सीधे स्वर्ग की ओर प्रयाण कर जाती है. उस समय ‘कलकत्ता रिव्यू’ में ऐसे अनेक समाचार प्रकाशित हुए थे, जिसमें रोगी से छुटकारा प्राप्त करने के लिए उसे मरने के लिए गंगाघाट भेज दिया जाता था. कुछ धर्म-भीरू वृद्धाएं गैहूं या चावल के दाने रात-दिन गिनती रहती थीं. एक लाख की गिनती पूरी होने पर उन्हें दान कर दिया जाता था. तरह-तरह बत्तियां बंटकर दान करने की भी प्रथा थी. कई बार यह मानते हुए कि गाय की सेवा ही मुक्ति दिला सकती है, गाय को अनाज खिलाया जाता. फिर उसके गोबर और मूत्र को श्रद्धापूर्वक ग्रहण किया जाता था. पुजारी वर्ग ऐसे पाखंडों को बढ़ावा देता था. सरकार उनकी अनेक कुरीतियों पर प्रतिबंध लगा चुकी थी. तथापि अशिक्षा  और रूढ़ियों में फंसा धर्मभीरू भारतीय समाज उनसे बाहर निकल ही नहीं पा रहा था.

महाराष्ट्र में 1827 तक एक प्रथा थी कि शंकराचार्य आगमन पर दक्षिणा के रूप जो भी मांग लें उसे देना यजमान का कर्तव्य बन जाता था. इस कुरीति के बारे में किसी ने पूना के कलेक्टर से शिकायत कर दी तो उसने तत्काल उसपर प्रतिबंध लगा दिया. दान का निर्णय शंकराचार्य की मर्जी के बजाय दानदाता की इच्छा पर छोड़ दिया गया. विधवाओं का मुंडन करना, उन्हें शुभ घोषित  कर घर के किसी अंधेरे कोने में रहने के लिए विवश कर देना. अच्छा खाने, पहनने और रहने पर प्रतिबंध लगा देना—उन दिनों के स्त्री जीवन की त्रासदी थी. अगर कोई विधवा गलती से परपुरुषगमन करते हुए पकड़ी जाए तो दोष जानलेवा हो जाता था. 1854 में ऐसे ही एक मामले का शंकराचार्य द्वारा फैसला करने का एक उदाहरण है. घटना के अनुसार मुंहमांगी दक्षिणा का भरोसा होने के पश्चात शंकराचार्य ने विधवा के शुद्धीकरण का आश्वासन दिया. शंकराचार्य के पैर का अंगूठा विधवा स्त्री के सिर पर रखकर उसे पंच-गव्य से स्नान कराया गया. इस बीच लड़की के पिता ने बताया कि उसकी बेटी गर्भवती है, शुद्धीकरण के दौरान इसका भी ध्यान रखा जाए. इसपर शंकराचार्य क्रोधित हो गए. पुरुष हजार बदचलनी करे. इंद्र और विष्णु जैसे देवता दूसरों की पत्नियों के साथ बलात्कार करते फिरें. उससे धर्म की हानि नहीं होती. यदि स्त्री भूलवश भी कुछ कर दे तो ‘वैकुंठलोक’ संकट में पड़ जाता है. अंतत मनोवांछित दक्षिणा की शर्त पर शंकराचार्य ने विधवा के ‘उद्धार’ की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली. उन्होंने युवती को खोखले पेड़ के तने में रखकर आग लगाने का विधान किया. लड़की के पिता से कहा कि ‘अग्निपरीक्षा’ के बाद भी यदि उसकी बेटी बच रहती है तो उसका सिर मुंडवाने तथा एक सहस्र  ब्राह्मणों को भोज कराने के उपरांत उसका शुद्धीकरण संभव है.

ऐसा नहीं कि इन घटनाओं का हिंदू समाज के भीतर कोई विरोध नहीं था. यहां तक कि सवर्णों में भी ऐसे लोग मौजूद थे जो सामाजिक विकृतियों का विरोध करते थे. लेकिन उन लोगों की संख्या बहुत कम थी. 94 प्रतिशत जनता अशिक्षित थी. बाकी 6 प्रतिशत किसी न किसी रूप में उस व्यवस्था से लाभान्वित थे. वे सरकार और समाज के शीर्षस्थ पदों पर थे. बेहद जटिल सामाजिक ताने-बाने में फंसा आम आदमी केवल कराह सकता था. आडंबरों का बोलबाला था. तरह-तरह के भय दिखाकर पंडे-पुरोहित उसे लूटते रहते थे—

‘प्रत्येक नागरिक राज्य को कर देने से ज्यादा ब्राह्मणों को दान करता है. जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत, वह भू-देवता ब्राह्मणों का पोषण करने में लगा रहता है. जातक के जन्म के समय ब्राह्मण को भोजन कराना जरूरी माना जाता है, नहीं तो बच्चे के आजीवन कंगाल बने रहने की संभावना रहती है. जन्म के सोलहवें दिन घर के शुद्धीकरण की रस्म मनाई जाती है, उसमें भी ब्राह्मण को दक्षिणा दी जाती है. कुछ दिन बाद बच्चे के नामकरण के नाम पर फिर ब्राह्मण को दक्षिणा. तीसरे महीने मुंडन की रस्म होती है, ब्राह्मण पुनः दक्षिणा लेने पहुंच जाता है. उसके बाद अन्नप्राशन संस्कार. शिशु जब पहली बार अन्न चखता है, तब भी ब्राह्मण को भुगतान किया जाता है. बालक चलने लगता है तो एक बार फिर ब्राह्मण को दक्षिणा दी जाती है. साल-भर बाद बालक का जन्मदिवस आ जाता है. ब्राह्मण को फिर भोग के लिए आमंत्रित किया जाता है. वह आता है और दक्षिणा के साथ वापस लौटता है. सात वर्ष का होने पर बालक का शिक्षा  संस्कार होता है. उस समय भी ब्राह्मण को  भोज और दक्षिणा के लिए आमंत्रित किया जाता है.’5

उपनयन के बाद भी अनेक संस्कार थे, जिनसे हिंदुओं को गुजरना पड़ता था. सामाजिक संबंध और मर्यादाओं के निर्वहन के लिए बहुत जरूरी था. ‘किसान का कोड़ा’ में फुले ऐसी कई स्थितियों का वर्णन करते हैं, जिनमें पुरोहित द्वारा यजमान को डराकर, प्रलोभन देकर तरह-तरह से धन ऐंठते रहते थे. अधिकांश के लिए वही जीवन है. धर्म, संस्कृति और परंपरा के नाम पर वे अत्याचार को चुपचाप सह लेते हैं. लोगों को धर्म और ईश्वर का भय दिखाना पंडित का पुश्तैनी धंधा है. उस को जमाए रखने के लिए वह नए-नए देवता गढ़ता है. कर्मकांड की अमर-बेलि चढ़ाता है. परंपराओं का मनमाना विश्लेषण तो आम बात है. हालात जो भी हों, धर्म लोगों के विवेक पर पर्दा डालता है. लोगों की अज्ञानता तथा धर्म के बहाने भीतर पैठाए गए डर की मदद से पंडित पूरे समाज पर राज करता आया है. जनसंख्या की दृष्टि से वह अल्पसंख्यक है. मगर संगठन के आधार पर सबसे ताकतवर. अनगिनत जातियों, उपजातियों में विभाजित शूद्र-अतिशूद्र संख्या-बहुल होकर भी शक्ति-विपन्न बने रहते थे. दूसरी ओर ब्राह्मण के मुंह से निकले प्रत्येक शब्द को ज्ञान मान लिया जाता था. लोकश्रुति के अनुसार रामानंद नहीं चाहते थे कि कबीर को दीक्षा दें. मगर धुन के पक्के कबीर बनारस के गंगा घाट की सीढ़ियों पर जाकर लेट गए. रामानंद का वहां से रोज आना-जाना था. उस दिन घाट की सीढ़ियों से गुजरते रामानंद का पैर कबीर से टकराया. मुंह से निकला—‘राम-राम.’ अनायास निकले उन शब्दों को ही कबीर ने गुरुमंत्र मान लिया. यह कहानी समाज की मानसिकता को दर्शाती है. भला कबीर जैसे औघड़ ज्ञानी को ब्राह्मण गुरु की क्या आवश्यकता थी! इसकी आवश्यकता तो उन चेले-चपाटों को थी, जिन्होंने कबीर को गुरु बनाकर मठ स्थापित किए थे. लोग मठों को पूजें, उनके शिष्यत्व को स्वीकारें इसके लिए कबीर को गुरु परंपरा के प्रति समर्पित दिखाना जरूरी था.

परिवर्तन की आहट उनीसवीं सदी के आरंभ में ही मिलने लगी थी. जून 1818 में पेशवा बाजीराव द्वितीय द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी के आगे आत्मसमर्पण के साथ पेशवाई का अंत हो चुका था. उस लड़ाई में अछूत सैनिकों की बड़ी भूमिका थी. उनके लिए वह अस्मिता और आत्मसम्मान की लड़ाई थी. इसलिए ईस्ट इंडिया कंपनी के मात्र आठ सौ सैनिक बाजीराव द्वितीय के लगभग 28000 सैनिकों पर भारी पड़े थे. उसके साथ ही देश का अधिकांश हिस्सा ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन हो चुका था. तीस करोड़ भारतीयों का कुछ हजार अंग्रेजों के अधीन हो जाना शर्म की बात थी. परंतु धर्म, जाति, क्षेत्रीयता के आधार पर बंटे समाज के लिए तो यह नियतिबद्ध जैसा था. उससे पहले भी कई बार ऐसा हो चुका था. सत्तापक्ष से असंतुष्ट लोग स्वार्थ के वशीभूत हो, विदेशी आक्रामकों का साथ देते आए थे. कुछ ऐसे लोग भी अंग्रेजों के समर्थन में थे, जो योरोप की औद्योगिक क्रांति से प्रभावित थे. उनमें से अधिकांश के वाणिज्यिक हित अंग्रेजों से जुड़े थे. उस समय तक भारतीय उद्योग असंगठित था. व्यापारी वर्ग उत्पादों को देश-देशांतर तक पहुंचाने का काम करता था. अंग्रेजों के आने से इस वर्ग की महत्त्वाकांक्षाएं बढ़ी थीं. व्यापारियों के कंपनी के समर्थन में आने का सीधा असर रजबाड़ों की अर्थव्यवस्था पर पड़ा था. वे विरोध का सामर्थ्य गंवा चुके थे. शूद्रों-अतिशूद्रों के लिए पेशवाई का पराभव मुक्ति-संदेश जैसा था. उधर ‘चार्टर अधिनियम-1813’ के अनुसार देश की बागडोर अप्रत्यक्ष रूप से इंग्लेंड के हाथों में जा चुकी थी. कंपनी के अधिकार घटे थे. चीन को चाय और अफीम आदि के निर्यात के अलावा बाकी मामलों में उसे ब्रिटिश संसद की मंजूरी लेनी पड़ती थी.

जन-सहानुभूति हासिल करने के लिए कंपनी ने चार्टर अधिनियम द्वारा जो व्यवस्था लागू की थी, वह भारतीय सभ्यता के तब तक के इतिहास में सबसे मौलिक एवं क्रांतिकारी थी. उसके दो प्रावधान शूद्रों तथा अतिशूद्रों के लिए विशेष महत्त्वपूर्ण थे. उनमें पहला था—सभी के लिए समान कानून, जिसने स्मृतियों की ब्राह्मणवादी व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया था. दूसरा था—सभी वर्गों के लिए समान शिक्षा. उसके लिए भारत से होने वाली आय में से न्यूनतम एक लाख रुपये आधुनिक शिक्षा पर खर्च करना. शूद्रों-अतिशूद्रों ने उनका जोरदार स्वागत किया था. उनके लिए वह परीकथाओं में दिखने वाले चमत्कार जैसा था. चेटरसन ने उसके बारे में लिखा है—‘महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि परीकथाओं में राक्षस होते हैं. महत्त्वपूर्ण यह जान लेना है कि राक्षस को पराजित किया जा सकता है.’ पेशवाओं की पराजय से उनका आत्मविश्वास बढ़ा था. लगने लगा था कि ब्राह्मणवाद अपराजेय नहीं है. उसे पराजित किया जा सकता है. आने वाला समय तो अवसरों के लाभ उठाने का था. समान शिक्षा और एक जैसा कानून भारतीय सभ्यता के ज्ञात इतिहास में अद्वितीय थे. युगांतरकारी बदलाव की नींव रखने वाले. अंग्रेजों से पहले इस देश में बड़े-बड़े सम्राट हुए. किसी ने भव्य मंदिर बनवाए, किसी ने किले. नाम चलाने के लिए किसी-किसी ने कुएं, बावड़ियां भी बनवाईं. यहां तक कि धर्मशाला और गौशाला के नाम पर भी खर्च किया जाता था. लेकिन शिक्षा  की जरूरत किसी ने भी नहीं समझी. नालंदा और तक्षशिला जैसे विद्यालयों के बारे में पढ़ना-सुनना किसी को भी रोमांचित कर सकता है. लेकिन वे उस कालखंड की निर्मितियां हैं, जब ब्राह्मण धर्म सबसे कमजोर था. ब्राह्मण वर्चस्व के दौर में शिक्षा  आश्रम-भरोसे बनी रही. आश्रमों में केवल उच्च वर्ग के विद्यार्थी प्रवेश पा सकते थे. क्षत्रियों और वैश्यों को भी उतना पढ़ाया जाता था जितना उनके काम के लिए आवश्यक हो. शूद्रातिशूद्रों के लिए शिक्षा  पर पूरा प्रतिबंध था. अगर वे पढ़ना चाहें तो उसके लिए दंड का घोषित विधान था. एकलव्य, कर्ण, शंबूक के किस्से आज भले ही ब्राह्मणवाद की आलोचना के काम आते हों, उन दिनों इनका उपयोग उसके महिमामंडन के लिए किया जाता था. अशिक्षित लोग मनमानी व्याख्याओं पर विश्वास भी कर लेते थे.

फुले कदम-कदम पर शिक्षा  की जरूरत पर बल देते हैं. बल्कि ऐसा कोई अवसर ही नहीं है जब शूद्र-अतिशूद्रों की अशिक्षा उनकी चिंता का विषय न रही हो. शूद्रों की अशिक्षा के लिए ब्राह्मण को ही जिम्मेदार माना है—

‘ऐसे दुष्ट लोगों को अध्यापक बनाते

बच्चे वे गैरों(सवर्णों) के ही पढ़ाते

स्वजाति के बच्चे(को) गलती करने पर बार-बार समझाते

शिक्षा  यत्नपूर्वक देते

परजाति के बच्चे गलती करते, थप्पड़-मुक्का मारते

जोर से कान ऐंठते

शूद्र बालक के मन को घायल करके भगा देते.’(पांवड़ा, शिक्षा  विभाग के ब्राह्मण अध्यापक)

नए कानून यथास्थितिवादियों की ओर से उसका भी विरोध भी हुआ. आरोप लगाया गया कि आधुनिक शिक्षा के नाम पर सरकार निचली जातियों का ईसाईकरण करना चाहती है. मगर सरकार को समाज के बहुसंख्यक वर्ग का समर्थन हासिल था. अंग्रेजी शासन को औचित्यपूर्ण सिद्ध करने के लिए उसे भारत के परंपरागत शासकों से अलग दिखना था. इसलिए सुधारवाद का सिलसिला आगे बढ़ता गया.

इन्हीं परिस्थितियों में फुले का जन्म हुआ. तारीख थी, 11 अप्रैल 1827. पिता फूलों के व्यवसायी थे. सुखी-समृद्ध परिवार था. मगर शूद्र के लिए आर्थिक समृद्धि सामाजिक मान-सम्मान का आधार नहीं बनती. फुले के पिता पारंपरिक विचारों के थे. अपने बुद्धि-विवेक से उन्होंने व्यापार को ऊंचाई तक पहुंचाया था. जो सहज प्राप्य था, वे उसी से खुश थे. किंतु बचपन से ही स्वाभिमानी फुले को उससे संतुष्टि न थी. फिर परिस्थितियां ऐसी बनती गईं कि उन्हें युग-निर्माण के ऐसे रास्तों पर उतरना पड़ा जहां पोंगापंथी ब्राह्मणों से सीधा टकराव था. एक घटना से फुले के सामने समाज में व्याप्त जाति-व्यवस्था का घिनौना रूप एकाएक सामने आ गया. पिता गोविंदराव की दुकान पर ब्राह्मण युवक मुंशीगिरी करता था. उसके साथ फुले की गहरी मित्रता थी. उसने फुले को अपने विवाह पर आमंत्रित किया. दूल्हे का मित्र होने के नाते विवाह के दौरान फुले हर आयोजन में उसके साथ थे. एक आयोजन में केवल ब्राह्मण हिस्सा ले सकते थे. यह बात न तो फुले को मालूम थी, न उनके मित्र ने बताया था. फुले सहज भाव से अपने मित्र का साथ दे रहे थे. इस बीच कोई देखते ही चिल्लाया—‘अरे! वह तो शूद्र है. उसे यहां किसने आने दिया?’ इसी के साथ चीख-पुकार मच गई. समाज का क्रूर जातिवादी चेहरा एकाएक सामने आ गया. किशोर ज्योतिबा को अपमानित होकर लौटना पड़ा. उस दिन उन्हें पता चला कि मनुष्य अपने बुद्धि-विवेक और परिश्रम से आर्थिक दैन्य को मिटा सकता है. लेकिन जाति का कलंक एक बार लग जाए तो उससे मुक्ति पाना असंभव है. जातिभेद का सामना डॉ. आंबेडकर को भी करना पड़ा था. उनके पिता सेना में सूबेदार थे. अछूत होने के कारण बालक आंबेडकर के साथ स्कूल में भेदभाव किया जाता था. यहां तक कि जब वे विदेश से खूब पढ़-लिखकर वापस लौटे तब भी मुंबई में उन्हें कोई कमरा देने वाला न था. एक पारसी महिला ने उन्हें कमरा दिया था. लेकिन जब उसे उनकी जाति के बारे में पता चला तो उसने तत्काल घर खाली करने का हुक्म सुना दिया. कार्यालय में चपरासी उन्हें पानी लाने में संकोच करता था. इन प्रसंगों के बारे में दलित साहित्य का विद्यार्थी भली-भांति जानता है. महसूस करता है. क्योंकि वे स्वयं ऐसे ही उत्पीड़न को झेलकर बड़े हुए हैं. जातीय भेदभाव की वह न तो पहली घटना थी, न ही आखिरी. लेकिन स्वाभिमानी फुले को जो उससे चोट पहुंची वह बड़ी थी. पेशवाई शासन की क्रूरता के बारे में सुनते आए थे. अब वह नहीं था. कानून की निगाह में अब सभी बराबर थे. लेकिन लोगों की मानसिकता ज्यों की त्यों थी. आखिर क्यों? फुले ने न केवल इसे समझा, बल्कि उसके समाधान के लिए आगे बढ़कर पहल भी की.

इसके अतर्निहित कारण को समझना बहुत मुश्किल भी नहीं था. अंग्रेज इस देश के शासक बन चुके थे. शासन कैसे चलाया जाएगा, मागदर्षक सिद्धांत कौन-से होंगे—इसकी लिखित व्यवस्था थी. अशिक्षित शूद्रों के लिए उन्हें समझना भी कठिन था. इसलिए वे उनके किसी काम के न थे, जब तक उसे समझ न सकें. ब्राह्मण पढ़-लिख सकते थे, इसलिए जोड़-तोड़ द्वारा स्वार्थ-सिद्धि का कोई न कोई उपाय वे खोज ही लेते थे. न हो तो शास्त्रों का हवाला देकर अपना उल्लू सीधा करते रहते थे. फुले समझ चुके थे कि दलितों की दुर्दशा का कारण गरीबी न होकर अशिक्षा  है. नए प्रावधानों का लाभ उठाते हुए उन्होंने स्कूल-कॉलेज खोले. मुश्किलें वहां भी थीं. स्कूल चलाने के लिए अध्यापकों की आवश्यकता थी. उस समय के अधिकांश अध्यापक ब्राह्मण थे. उनके लिए शूद्रों की शिक्षा-दीक्षा निषिद्ध और धर्म-विरुद्ध कर्म था. फुले द्वारा स्थापित स्कूलों में अध्यापन के लिए वे भला क्यों तैयार होते! कहते हैं, जहां चाह वहां राह. दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे बाधाएं सिर झुकाए मौन समर्पण कर देती हैं. फुले ने अपनी पत्नी को तैयार किया. सावित्री बाई फुले की देखा-देखी दूसरी महिलाओं में भी उत्साह जगा. दबंगों के भय से फुले के परिजनों ने उन्हें घर से निष्कासित कर दिया था. उस मुश्किल घड़ी में फातिमा शेख और उसके पति उस्मान शेख सामने आए. उन्होंने फुले दंपति को रहने के लिए आश्रय दिया. फातिमा शेख ने घर-घर जाकर माता-पिताओं को प्रोत्साहित किया कि वे अपनी लड़कियों को स्कूल भेजें. उसके लिए यथास्थितिवादियों का विरोध सहा. वैसे भी राष्ट्र निर्माण की राह आसान नहीं होती. समाज सुधार की दिशा में फुले द्वारा किए जा रहे कार्यों से यथास्थितिवादी बेहद नाराज थे. पेशवाई के पराभव से वे हताश  अवश्य थे, लेकिन पीठ पीछे हमला करने, नए-नए षड्यंत्र रचने में उनका कोई सानी न था. ऐसे ही षड्यंत्रकारियों ने एक बार फुले पर जानलेवा हमले की योजना बनाई थी. फुले सावधान थे. उस समय तक महार और मांग फुले के साथ आ चुके थे. विरोधियों के सामने पीछे हटने के अलावा दूसरा कोई रास्ता ही नहीं था.

धीरे-धीरे शिक्षा  के क्षेत्र में सफलता मिलने लगी. मगर दूसरी समस्याएं सिर उठाए थीं. सती-प्रथा दबे-छिपे रूप में जारी थी. बिना दांपत्य संबंधों के जन्मी संतान की देखभाल का भी मसला था. लोकलाज से बचने के लिए स्त्रियां ऐसे बच्चों को जन्म लेते ही मार देती थीं. आड़े वक्त में परिजन मदद से हाथ खींच लेते थे. समस्या को देखते हुए फुले ने प्रसूतिग्रहों की स्थापना की. सामाजिक दृष्टि से अवैध कहे जाने बच्चों की देखभाल के लिए शिशु सदन खोले. उनमें किसी भी धर्म, जाति की महिलाएं जा सकती थीं. लोकलाज के भय से नवजात शिशु को अपने साथ न ले जाना चाहे तो शिशु-सदन उसकी देखभाल करता था. अंतरजातीय विवाहों को बढ़ावा देना भी क्रांतिकारी कदम था. सबसे बड़ी समस्या रूढ़ियों की थीं. समाज धर्म के नाम पर तंत्र-मंत्र और कर्मकांडों में फंसा हुआ था. पुजारी लोगों को तरह-तरह से भरमाकर, लूटने में लगा रहता था. फुले ने अपने समाज को जाग्रत करना शुरू किया. धार्मिक कर्मकांडों की निस्सारता पर खुलकर लिखा. सभाएं कीं. इश्तहार निकाले. इससे ब्राह्मण समाज उनसे नाराज रहने लगा. यहां तक कि जानलेवा हमला भी उनपर किया गया. उस समय तक महार और मांग युवकों का संगठन फुले के समर्थन में आ चुका था. इससे षड्यंत्रकारियों के मनसूबे धरे के धरे रह गए.

समाज सुधार के क्षेत्र में फुले द्वारा किए जा रहे अनथक उपायों से प्रभावित होकर उच्च जातियों के उदारमना लोग भी उनके साथ समाज सुधार के क्षेत्र में आए थे. उनमें से कुछ को फुले ने अपनी स्कूल समितियों का सदस्य बनने का अवसर दिया था. इसे इरादों की कमजोरी कहिए या सामाजिक बहिष्कार की धमकी का डर, सवर्ण सदस्य बीच में ही अपनी राह बदल लेते थे. अक्टूबर 1853 के अंतिम सप्ताह में मुंबई में एक सभा का आयोजन किया था. उद्देश्य था हिंदू समाज की विकृतियों को दूर करना और उसके लिए आवश्यक सुधारवादी कार्यक्रम लागू करना. उसमें प्रगतिशील ब्राह्मणों को आमंत्रित किया गया था. सम्मेलन की अध्यक्षता के लिए पंडित गंगाधर आप्टे को चुना गया. जो उस समय सुधारवादियों में गिने जाते थे. आप्टे को ब्राह्मण समाज के विरोध का अनुमान था. इसलिए सभा में उपस्थित होने का आश्वासन देने के बावजूद वे नियत दिन गायब रहे. सम्मेलन की अध्यक्षता भवानी विश्वनाथ ने की. बैठक में परंपरावादी ब्राह्मणों ने सुधारवादी कार्यक्रमों का इतना जबरदस्त विरोध किया कि बैठक को बेनतीजा समाप्त करना पड़ा. यह अकेला उदाहरण नहीं है. ‘इन्हीलेशन आफ कास्ट’ में डॉ. आंबेडकर ने सवर्ण नेताओं की मानसिकता पर विस्तार से लिखा है. जाति-व्यवस्था के विरोध में फुले जहां सीधी बात कहते या संकेत-भर करते हैं, वहीं आंबेडकर अपनी मान्यताओं के समर्थन में अकाट्य तर्क जुटाते हैं. उन्हीं ग्रंथों से जिनके बल पर ब्राह्मण जनसाधारण को भरमाते आए थे. बावजूद इसके रचनात्मक कार्यों को देखा जाए तो फुले आंबेडकर के गुरु सिद्ध होते हैं.

सामाजिक न्याय के पक्ष में बढ़ते दबाव को देख कांग्रेस ने ‘सोशल कांफ्रेंस’ नामक संगठन का गठन किया था. वह संगठन केवल दिखावे के लिए था. सवर्ण नेता राजनीति में तो रुचि लेते थे, लेकिन सामाजिक परिवर्तन की ओर से मुंह मोड़े रहते थे. इसलिए कांग्रेस के अधिवेशनों में जहां नेताओं की भीड़ उमड़ पड़ती थी, वहीं ‘सोशल कांफ्रेस’ के पंडाल खाली रह जाते थे—‘जनता की उदासीनता देख नेताओं ने ‘सामाजिक सम्मेलन’ का विरोध करना आरंभ कर दिया. ‘सामाजिक सम्मेलन’ के अधिवेशन कांग्रेस के पंडाल में हुआ करते थे. मगर तिलक के विरोध के पश्चात कांग्रेस ने अपना पंडाल देना बंद कर दिया. दोनों के बीच नफरत इस कदर बढ़ी कि ‘सोशल कांफ्रेस’ ने जब अपना अलग पंडाल लगाना चाहा तो दूसरे पक्ष के नेताओं ने उसे जलाने की धमकी दे डाली. धीरे-धीरे ‘सोशल कांफ्रेस’ कमजोर पड़कर समाप्त हो गई.’(इन्हीलेशन आफ कास्ट : डॉ. आंबेडकर). 1892 में हुए ‘सोशल कांफ्रेस’ के अंतिम सम्मेलन में अध्यक्ष पद से बोलते हुए डब्ल्यू. सी. बनर्जी ने जो कहा, उससे कांग्रेसी नेताओं की मानसिकता को समझने में मदद मिल सकती है. कांग्रेस की भविष्य की राजनीति की झलक भी उसमें है, जिसे गांधी सहित उस समय के सभी बड़े नेता अपने आचरण और भाषणों में दोहराते रहते थे. बनर्जी ने कहा था—‘मैं उन लोगों से सहमत नहीं हूं जो कहते हैं कि जब तक हम सामाजिक पद्धति में सुधार नहीं कर लेते, तब तक हम राजनीतिक सुधार के योग्य नहीं हो सकते. मुझे इन दोनों के बीच कोई संबंध नहीं दीखता. क्या हम राजनीतिक सुधार के योग्य इसलिए नहीं हैं क्योंकि हमारी विधवाओं का पुनर्विवाह नहीं होता. और दूसरे देशों के सापेक्ष हमारी लड़कियां कम उम्र में ब्याह दी जाती हैं. या हमारी पत्नियां और पुत्रियां हमारे साथ मोटरगाड़ी में बैठकर हमारे मित्रों से मिलने नहीं जातीं? या इसलिए कि हम अपनी बेटियों को आक्सफोर्ड और कैंब्रिज नहीं भेजते.’(इन्हीलेशन आफ कास्ट : डॉ. आंबेडकर). वह परिवर्तन विरोधी वक्तव्य था, जो तत्कालीन कांग्रेसी नेताओं की मानसिकता को दर्षाता है. प्रकारांतर में वह सामाजिक न्याय की मांग को दबाए रखने का प्रयास था. अंग्रेजों द्वारा सामाजिक सुधार के लिए उठाए गए कदमों से भारतीय समाज का सवर्ण तबका खासा आहत था. उसके लिए देश की स्वयंप्रभुता इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं थी, जितनी सामाजिक यथास्थिति बनाए रखने की चाहत. इस संबंध में हमें 1942 में गांधी द्वारा ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ आंदोलन के समय दिए गए ऐतिहासिक भाषण को याद करना चाहिए. उस समय तक कांग्रेस यह मान चुकी थी कि अंग्रेज भारत छोड़ने वाले हैं. सुरक्षित खेल खेलने के अभ्यस्त गांधी ने अपने ‘करेंगे या मरेंगे’ भाषण में अंग्रेजों से भारत को जैसा है उसी हालत में छोड़कर चले जाने का आवाह्न किया था. ताकि शूद्रों और अतिशूद्रों की समाज-सुधार की मांग को, जिसे आरंभ से ही अंग्रेजों की सहानुभूति प्राप्त थी, किसी न किसी बहाने हमेशा-हमेशा के लिए टाला जा सके. जबकि फुले, आंबेडकर, पेरियार जैसे नेता आरंभ से ही जानते थे कि एक न एक दिन अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना पड़ेगा. इसलिए जब तक वे देश में हैं, तब तक सामाजिक परिवर्तन के लिए सबसे अनुकूल समय है. दलितों और शूद्रों को उसका लाभ उठाना चाहिए. उस समय तक भारत आधुनिकीकरण की ओर बढ़ चुका था. जनता सांप्रदायिक द्वेष को बिसराकर राष्ट्रीय हितों के लिए एक हो चुकी थी. ‘तृतीय रत्न’ नाटक का सूत्रधार फुले की इन्हीं भावनाओं को अभिव्यक्त करता है—

‘ब्राह्मणों ने शूद्र-अतिशूद्रों पर जो शिक्षा बंदी लगाई थी, उसको समाप्त करके, उनको शिक्षा का मौका प्रदान करके होशियार बनाने के लिए भगवान ने इस देश में अंग्रेजों को भेजा है. शूद्र-अतिशूद्र पढ़-लिखकर होशियार होने पर वे लोग अंग्रेजों का अहसान नहीं भूलेंगे. फिर वे लोग पेशबाई से भी सौ गुना ज्यादा अंग्रेजों को पसंद करेंगे. आगे यदि मुगलों की भांति अंग्रेज लोग भी इस देश की प्रजा का उत्पीड़न करेंगे तो शिक्षा प्राप्त  बुद्धिमान शूद्र-अतिशूद्र पहले जमाने में हुए जवांमर्द शिवाजी की भांति अपने शूद्र-अतिशूद्र राज्य की स्थापना करेंगे और अमेरिकी लोगों की तरह अपनी सत्ता खुद चलाएंगे. लेकिन ब्राह्मण-पंडों की दुष्ट और भ्रष्ट पेशवाई को आगे कभी आने नहीं देंगे. यह बात जोशी-पंडों को भली-भांति समझ लेनी चाहिए.’6 

नई शिक्षा ने अनेक सुधारवादी आंदोलनों को जन्म दिया था. फुले को धर्म से गुरेज न था. यहां तक कि कर्मकांड में भी हिस्सा ले सकते थे. बशर्ते उसमें पुरोहित की भूमिका कोई गैर-ब्राह्मण निभा रहा हो. सत्यशोधक की नियमावलि में इस बात पर जोर दिया गया था कि शूद्र-अतिशूद्र रूढ़ियों और कर्मकांडों का बहिष्कार करें. जिन कर्मकांडों को वे परंपरासम्मत और आवश्यक मानते हैं, उनमें ब्राह्मण पुरोहित की अनिवार्यता न हो. धर्म के नाम पर आंबेडकर की भी यही नीति थी. फुले को उम्मीद थी कि नई ज्ञान-चेतना से सराबोर हो शूद्र-अतिशूद्र पुरोहितों की चालबाजियों को समझेंगे और धर्म को किनारे कर देंगे. इसलिए उन्होंने हिंदू धर्म की आलोचना तो की लेकिन उससे बाहर आने का आवाह्न नहीं किया. बल्कि उस समय के सभी बड़े हिंदू नेताओं जिनमें तिलक भी थे, के साथ मिलकर काम करते रहे. आंबेडकर मान चुके थे कि हिंदू धर्म का बदलना नामुमकिन है. क्योंकि जैसे-जैसे स्वतंत्रता निकट आ रही थी, सांप्रदायिक शक्तियां निरंतर उग्र हो रही थीं. धार्मिक कूपमंडूकता में भी वृद्धि हो रही थी. फिर भी हिंदू धर्म में सुधार के लिए उन्होंने लंबी प्रतीक्षा की थी. पूरी तरह निराश होने के बाद ही बौद्ध धर्म स्वीकार किया था. उस समय तक राजा राममोहन राय और केशवचंद सेन के आंदोलन को 130 वर्ष गुजर चुके थे. इसके बावजूद सवर्ण नेताओं की मानसिकता में बहुत अधिक बदलाव नहीं आया था. उनका चिंतन अतीतोन्मुखी था. भारत के प्राचीन गौरव के नाम पर वे उन दिनों की बार-बार याद दिलाते थे, जो उनके हिसाब से ब्राह्मणवाद के चरमोत्कर्ष के दिन थे. ताकि उनके माध्यम से निरंतर कमजोर पड़ती जा रही वर्ण-व्यवस्था को पुनर्स्थापित किया जा सके. जबकि फुले और आंबेडकर के प्रयासों से शूद्रों एवं अतिशूद्रों के बड़े वर्ग में जागरूकता आ चुकी थी. डॉ. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म स्वीकार करके एक तरह से हिंदू धर्म का ही भला किया था. उस समय तक धर्मांतरण के माध्यम से समाजार्थिक स्वतंत्रता की चाहत रखने वालों के लिए इस्लाम और ईसाई धर्म सबसे लोकप्रिय हुआ करते थे. डॉ. आंबेडकर के धर्मांतरण के पश्चात इस्लाम और ईसाई धर्म की ओर अंतरण लगभग रुक-सा गया. हिंदू धर्म से उत्पीड़ित-हताश लोग बौद्ध धर्म को अपनाने लगे. फलस्वरूप भारतीय बौद्ध धर्म जो मूल का था, चलन में आ गया.

फुले का जिक्र हो तथा उनकी पुस्तकों ‘गुलामगिरी’ तथा ‘किसान का कोड़ा’ उल्लेख से वंचित रह जाए—यह नामुमकिन है. यूं तो उनकी सभी पुस्तकें बेमिसाल हैं. वे उनके चिंतन और रचनात्मक कार्यों की एकता को दर्शाती हैं. इनमें वे अपने विचारों को एकीकृत रूप में प्रस्तुत करते हैं. लेकिन ये दोनों पुस्तकें उनके चिंतन और कर्म का प्रतिनिधि संग्रह कही जा सकती हैं. पांच छोटे-छोटे अध्यायों में फैली ‘किसान का कोड़ा’ में उन्होंने व्यापारियों द्वारा किसान और शिल्पकार वर्ग के बहुविध शोषण का खुलासा किया है. उनमें धर्म और संस्कृति के नाम पर ब्राह्मणों द्वारा शोषण तो शामिल है ही, मंडी में बिचैलियों द्वारा किसानों की ठगी पर भी उनकी नजर गई है. इस पुस्तक में फुले ने अंग्रेजी राज्य की खुलकर प्रशंसा की है. उसे पेशवाई शासन से श्रेेष्ठ बताया है. इसके साथ-साथ ही उन अंग्रेज अधिकारियों की आलोचना भी की है जो अपनी काहिली या ब्राह्मणों के प्रभाव में आकर अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़े रहते हैं. योरोप की औद्योगिक क्रांति की प्रशंसा करते हुए उन्होंने अंग्रेजों की यह कहकर आलोचना की है कि वे भारतीय प्रजा से धन ऐंठकर अपने मुल्क पहुंचाने में लगे रहते हैं. इस विषय पर दादा भाई नौरोजी ने भी लिखा है. उनका प्रसिद्ध भाषण ‘पावर्टी इन इंडिया’ 1876 का है, जबकि ‘किसान का कोड़ा’ 1882 में लिखी गई. फुले पर नौरोजी का कितना प्रभाव था, यह बता पाना तो कठिन है, लेकिन इससे इतना साफ हो जाता है कि उस समय तक अंग्रेजों की व्यापार नीति की आलोचना होने लगी थी. ‘किसान का कोड़ा’ में फुले उसे अपनी शैली में प्रस्तुत करते हैं. नौरोजी की पुस्तक जहां अर्थशास्त्रीय महत्त्व रखती है, वहीं फुले अंग्रेजों द्वारा देश के आर्थिक शोषण के साथ-साथ वर्गीय शोषण को भी उठाते हैं. इसलिए ‘किसान का कोड़ा’ का अर्थशास्त्र के साथ-साथ समाज-वैज्ञानिक महत्त्व भी है. पुस्तक से फुले की व्यापक दृष्टि का भी पता चलता है. खेती के विकास के लिए वे बांध बनाने, नए बीज अपनाने, बिचौलिए दुकानदारों पर पाबंदी लगाने, यहां तक कि किसानों के प्रशिक्षण की मांग भी सरकार से करते हैं. वे बौद्ध धर्म तथा उसके अनुयायियों की प्रशंसा करते हैं.

व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता की मांग करते हुए मार्टिन लूथर किंग ने कहा था—‘मैं मानता हूं कि सभी मनुष्य एक समान हैं. मेरा एकमात्र सपना है कि मेरे छोटे-छोटे बच्चे एक दिन ऐसे राष्ट्र के नागरिक होंगे जहां उनकी पहचान चमड़ी के रंग के बजाय उनके चारित्रिक गुणों के आधार पर तय की जाएगी.’ कुछ ऐसा ही सपना फुले का भी था. ‘गुलामगिरी’ और ‘किसान का कोड़ा’ दोनों में उन्होंने गणतंत्र की प्रशंसा की है. जूलिस सीजर की वे यह कहकर आलोचना करते हैं कि उसने अपने देश में गणतंत्र को कुचलकर सत्ता हासिल की थी. थाॅमस पेन का प्रभाव भी उनपर था. आगे चलकर आंबेडकर ने भी हिंदू प्रतीकों और मिथों की आलोचना की. काफी सोचने-समझने के बाद उन्होंने बौद्ध धर्म को स्वीकार किया. संविधान के माध्यम से वे भारत में गणतंत्र के प्रस्तोता बने. ‘किसान का कोड़ा’ में फुले ने बौद्ध धर्म तथा गणतंत्र की जैसी प्रशंसा की है, उससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि अपने-अपने समय के इन दोनों महामानवों के बीच विचार और कर्म की दृष्टि से कितना ज्यादा साम्य था.

‘किसान का कोड़ा’ को पढ़ते हुए यह बात भी सामने आती है कि शूद्रों-अतिशूद्रों की मुख्य समस्या गरीबी नहीं है. असली समस्या गरीबी के कारण को न समझ पाने की है. समाज के प्रमुख उत्पादक शिल्पकार और किसान हैं. लेकिन अपनी आय को अपनी मर्जी से खर्च करने का सत्साहस उनमें नहीं है. उनकी आय का बड़ा हिस्सा धार्मिक-सामाजिक कर्मकांडों पर खर्च होता है. आड़े समय पर किसानों को कर्ज लेना पड़ता है. फसल के समय महाजन और बिचैलिए उनकी फसल का बड़ा हिस्सा हड़प लेते हैं. जो बचता है, उसे भी अपनी मर्जी से, अपने विकास के लिए खर्च करना, उनके लिए संभव नहीं होता. शादी-विवाह, श्राद्ध, मुंडन, उपनयन जैसे अनेक संस्कार हैं, जो बेहद खर्चीले, मगर पूरी तरह अनुत्पादक हैं. वे लोगों की आर्थिक विपन्नता और बौद्धिक विकलांगता दोनों को बढ़ाते हैं. सामाजिक व्यवस्था ऐसी है कि व्यक्ति इनके चंगुल से निकल ही नहीं पाता. शिक्षा के अभाव में आम आदमी वही करता है, जो पुरोहित उन्हें बताता है. उसकी मानसिक संरचना पष्चगामी है. ‘तृतीय रतन’ नाटक में ब्राह्मण पुरोहित द्वारा अशिक्षित जनता के बहुआयामी शोषण को दर्शाया गया है. यह नाटक बताता है कि ब्राह्मण पुरोहित अशिक्षित जनता को कदम-कदम पर किस तरह भरमाते हैं. धर्म और अनीति का भय दिखाकर उनका धन लूटने में लगे रहते हैं. कोई ऐसा सामाजिक अनुष्ठान नहीं है जिसमें ब्राह्मण की मौजूदगी और उसके द्वारा दान-दक्षिणा के नाम पर गरीब जनता से धन न ऐंठा जाता हो. धर्म के नाम पर उन्हें इतना डराया जाता है कि कर्ज लेकर भी कर्मकांडों में लिप्त रहते हैं. इस उम्मीद से कि अंततः देवता उनपर कृपा करेगा. फिर उनके सारे दलिद्दर नष्ट हो जाएंगे. होता इसका उलटा है. दुख-दलिद्दर तो मिटना तो दूर, महाजन का कर्ज सिर पर चढ़ जाता है. उसे चुकाने के लिए वे जमींदार के घर बेगार करते रहते हैं. संक्षेप में ‘किसान का कोड़ा’ भारतीय किसान और मजदूर के जीवन का सबसे प्रामाणिक दस्तावेज है.

फुले की दूसरी महत्त्वपूर्ण पुस्तक का पूरा शीर्षक है—‘गुलामगिरी’ (ब्राह्मणधर्म की आड़ में होने वाली). छोटी-सी पुस्तिका को उन्होंने ‘संयुक्तराष्ट्र के सदाचारी जनों को जिन्होंने गुलामों को दासता से मुक्त करने के कार्य में उदारता, निष्पक्षता और परोपकार वृत्ति का प्रदर्शन किया था, के लिए सम्मानार्थ समर्पित’ किया गया है. भारत में इसे अपने विषय की इकलौती पुस्तक; जिसे आधार पुस्तक भी कहा जा सकता है. ‘सांस्कृतिक वर्चस्ववाद’ के विरुद्ध संघर्ष के इतिहास में इस पुस्तक का ठीक वही स्थान है, जो दुनिया-भर के मजदूर आंदोलनों के इतिहास में ‘कम्यूनिस्ट मेनीफेस्टो’ का है. धर्म के नाम पर फैलाए गए आडंबरों तथा निरर्थक कर्मकांडों का विरोध संत रविदास और कबीर ने भी किया था. उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए फुले ‘गुलामगिरी’ के माध्यम से उन मिथों पर सीधे प्रहार करते हैं, जो शताब्दियों से जनसमाज की बौद्धिक विकलांगता का कारण बने थे. जो छोटी-छोटी बात पर शूद्रों, अतिशूद्रों को ब्राह्मणों पर निर्भर बनाते थे. उनकी मदद से ब्राह्मण शिखर की दावेदारी करते हुए शेष तीनों वर्गों को अपना दासानुदास बनाए रखता था. वर्ण-व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण इस पृथ्वी के समस्त सुख-साधनों का एकमात्र स्वामी-संरक्षक है. क्षत्रिय का कर्तव्य उसकी रक्षा करना, वैश्य का धर्म कमा कर देना है. शूद्र-अतिशूद्रों के लिए मात्र ‘निष्काम सेवा’ निर्धारित है. पूजा-पाठ जैसे अनुत्पादक कार्यों के लिए मुंह-मांगी दक्षिणा लेना ब्राह्मण का एकाधिकार मान लिया जाता है. मजदूर अपने श्रम का मूल्यांकन स्वयं करना चाहे तो शास्त्र-विरुद्ध कहकर उसकी मांग को दबा दिया जाता है. क्षत्रिय और वैश्य ब्राह्मण के शीर्षत्व को स्वीकार करके संपत्ति के संरक्षक-संग्राहक बन सकते हैं. परंतु चौथे वर्ण को संपत्ति रखने का भी अधिकार नहीं है. इस वर्ग को जिसमें किसान, शिल्पकार, मजदूर आदि आते हैं, जिन्हें मार्क्स ने प्रमुख उत्पादक शक्ति माना है. बुद्धकालीन भारत में उनका यह स्थान और अपेक्षित मान-सम्मान सुरक्षित था. ब्राह्मण प्रभुत्व वाला तंत्र उन्हें न केवल वर्ण-विशेष के दायरे में कैद कर देता है, अपितु आजीविका के चयन के अधिकार के साथ-साथ उनसे श्रम और श्रमोत्पाद संबंधी समस्त अधिकार छीन लेता है. उत्पादक वर्ग विरोध न करे, उसके लिए जन्म-पुनर्जन्म, कर्मफल और पाप-पुण्य जैसी पश्चगामी व्यवस्थाएं हैं. ‘अवतारवाद’ की सैद्धांतिकी इन्हें पुष्ट करने के लिए ही गढ़ी गई है. ‘गुलामगिरी’ के माध्यम से फुले इसी पर प्रहार करते हैं.

‘गुलामगिरी’ संवाद की शैली में लिखी गई पुस्तक है. यह उन दिनों की प्रचलित शैली थी. यह जानते हुए कि अनपढ़ जनता प्रतीकों और मिथों से ही प्रेरणा लेती है, उन्हीं का हवाला देकर ब्राह्मणादि सवर्ण खुद को देव-सभ्यता का उत्तराधिकारी मानते आए हैं; तथा कुछ गिने-चुने मिथ शूद्रों-अतिशूद्रों की शारीरिक-मानसिक दासता का कारण हैं—फुले उनकी जड़ पर प्रहार करते हैं. आर्य बाहर से आए थे. यह उन दिनों स्थापित सत्य था. मैक्समूलर, विंसेंट स्मिथ, रिस डेविस, जॉन मार्शल जैसे विद्वानों का यही विचार था. इस दृष्टि से ब्राह्मणों को विदेशी मूल का बताना फुले की मौलिक स्थापना नहीं थी. मौलिक था, वाराह, कच्छप, नरसिंह जैसे कथित अवतारों के विवेचन से उस ऐतिहासिकता की खोज करना जिसके पीछे आर्य-अनार्य संघर्ष की अनेक कहानियां छिपी हैं. मिथों में उलझकर उनका वास्तविक इतिहास कहीं लुप्त चुका है. अनेकानेक मिथों पर टिकी प्राचीन भारतीय संस्कृति की आलोचना करते हुए फुले उस इतिहास की झलक दिखाते हैं, जिसकी कालावधि के बारे में ठोस जानकारी भले ही न हो, मगर वह सत्य के अपेक्षाकृत करीब है. यह असल में कांटे से कांटा निकालने की कोशिश है. जो सच हो न हो, मगर अपने सरोकारों के आधार पर सच के बहुत करीब दिखता है. देरिदा को ‘विखंडनवाद’ का आदि व्याख्याता माना जाता है. फुले उसका प्रयोग ‘गुलामगिरी’ में देरिदा से लगभग एक शताब्दी पहले करते हैं. उसी को अपना प्रस्थान-बिंदू बनाकर डॉ. आंबेडकर हिंदू धर्म की जटिल पहेलियों की विवेचना करते हैं. दोनों के निष्कर्ष आधुनिक दलित-बहुजन विमर्श की आधार सामग्री हैं. भारतीय संदर्भ में ‘गुलामगिरी’ ‘सांस्कृतिक विखंडनवाद’ की पहली पुस्तक है; तथा फुले ब्राह्मणों के ‘सांस्कृतिक आधिपत्य’ को चुनौती देने वाले पहले बहुजन नेता. दक्षिण भारत में उनकी प्रेरणा द्रविड़ आंदोलन के रूप में फलीभूत होती है. पेरियार उनके संघर्ष को नई ऊर्जा और वैचारिक चेतना के साथ आगे बढ़ाते हैं. ‘गुलामगिरी’ में फुले ने हिंदुओं की अवतारवादी धारणा का जोरदार खंडन किया है. पुस्तक का महत्त्व इससे भी आंका जा सकता है कि ब्राह्मणवाद के विरोध में जिन सांस्कृतिक प्रतीकों तत्वों का हवाला दिया जाता है, लगभग वे सभी इसमें मौजूद हैं. कुल मिलाकर बहुजन दृष्टि से फुले भारत के पहले और मौलिक इतिहासकार हैं. इस पुस्तक के प्रथम संस्करण का मूल्य 12 आना था. निर्धन तथा शूद्रातिशूद्रों के लिए उसकी कीमत मात्र छह आना रखी गई थी. इसके पीछे भी फुले की दूरदृष्टि थी. उद्देश्य यही था कि जो गरीब तथा शूद्र-अतिशूद्र ‘गुलामगिरी’ को पढ़ना चाहते हैं, पैसे की कमी उसमें बाधा न बने.

फुले के समय तक सिंधु सभ्यता के बारे में जानकारी उजागर नहीं हुई थी. संस्कृत ग्रंथों से केवल यही तथ्य सामने आता है कि बाहर से आने वाली प्रजाति, जिसने स्वयं को ‘आर्य’ घोषित किया था, का स्थानीय प्रजातियों से जोरदार संघर्ष हुआ था. समुद्र और पहाड़ियों द्वारा सुरक्षित अनार्य अपेक्षाकृत सुख और शांतिपूर्ण जीवन जीने के अभ्यस्त थे. इसके प्रमाण सिंधू सभ्यता से प्राप्त हो चुके हैं. लाखों वर्ग किलोमीटर में फैली सिंधू सभ्यता के उत्खनन से पुरात्वविदों को भंडारगृह, बर्तन, सौंदर्य प्रसाधन सामग्री, मूर्तियां, मुद्राएं, अनाज, मापन यंत्र आदि प्राप्त हुए हैं, लेकिन हथियार के बारे में कोई प्रमाण नहीं मिला है. उस सभ्यता का पराभव 1750 ईस्वी पूर्व के आसपास प्राकृतिक कारणों से हुआ था. आर्यों के भारत पहुंचने(1500 ईस्वी पूर्व) तक वह नष्टप्रायः अवस्था में थी. बचे-कुुचे सिंधुवासी हतोत्साहित होकर जंगलों में बिखर चुके थे. असंगठित और  शांतिप्रिय अनार्यों को पराजित करना आसान था. अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए आर्यों ने स्थानीय निवासियों के दिमाग को कब्जाना शुरू कर दिया था. उन्होंने काल्पनिक नायक इंद्र को केंद्र बनाकर मंत्र रचे. उसे उन पुरों का विनाशक घोषित किया, जो उनके आगमन से शताब्दियों पहले खंडहरों में बदलने लगे थे. सिंधू सभ्यता के आरंभिक अध्येता सुप्रसिद्ध पुरातत्वविद् जॉन मार्शल ने अपनी पुस्तक ‘मोहनजोदड़ो एंड इंड्स सिविलाइजेशन’(1931) में एक अध्याय सिंधुवासियों की धार्मिक मान्यताओं पर शामिल किया है. मार्शल का शोध उस सभ्यता को भारत की जनसंस्कृति के करीब रखता है, जो निश्चय ही ब्राह्मणेत्तर संस्कृति थी. ये तथ्य यदि फुले के सामने होते तो वे उनका उपयोग निश्चित रूप से वर्चस्वकारी ब्राह्मण संस्कृति के विखंडन हेतु करते. जातीय श्रेष्ठता का दंभ आर्यों से तीन हजार वर्ष बाद आने वाले अंग्रेजों में भी था, लेकिन उसके मूल में योरोपीय पुनर्जागरण की बेमिसाल उपलब्धियां थीं. जिसमें मानवीय गरिमा और मान-सम्मान पर जोर दिया गया था. मशीन-केंद्रित उत्पादन प्रणाली सामंतवाद के अत्याचारों से मुक्ति का भरोसा दिलाती थी. इसलिए शताब्दियों से आर्थिक-सामाजिक विषमता का दंश झेल रही जातियों ने उनका स्वागत किया था. फुले अंग्रेजी शासन की प्रशंसा करते हैं. वहीं, आर्थिक-सामाजिक शोषण के शिकार वर्गों की स्वतंत्रता के लिए पर्याप्त कदम न उठाने के कारण वे उसकी आलोचना भी करते हैं.

फुले की रचनाएं सीधे संवाद करती हैं. उनकी भाषा किसान-मजदूर की खरखरी भाषा है. मराठी में प्रशस्ति काव्य को पावड़ा कहा गया है. फुले ने कई पावड़े लिखे हैं. लेकिन वे निरे प्रशस्ति काव्य नहीं है. उनके सरोकार मानवीय हैं और सामाजिक न्याय की भावना पर खरे उतरते हैं. शिवाजी की गौरवगाथा को याद दिलाता एक पावड़ा है. एक अन्य पावड़े में वे निर्माण विभाग के अधिकारी की रिश्वत के बारे में बात करते हैं. ब्राह्मण अध्यापक अछूत विद्यार्थियों के साथ पक्षपात करते हैं. उन्हें पढ़ाने से बचते हैं. फुले इसकी पोल खोलते हुए शिक्षा अधिकारी से निवेदन करते हैं कि वह शिक्षा विभाग में शूद्र और अतिशूद्र विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए इसी वर्ग के अध्यापकों की नियुक्ति करे. किसान की उपज का बड़ा हिस्सा मंडी में दलाल खा जाते हैं. इसलिए एक पावड़ा उसकी दुर्दशा की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए भी है. ‘गुलामगिरी’ में परिशिष्ट के रूप में ‘ब्राह्मण कर्मचारी इंजीनियरिंग विभाग में किस प्रकार धांधली मचाते हैं’—इस विषय पर एक पांवड़ा दिया गया है, जिसमें उन्होंने ब्राह्मण कर्मचारियों की स्वार्थपरता और काहिली के साथ-साथ अंग्रेज अधिकारियों पर भी तंज कसा है—

‘ब्राह्मण बड़ी चतुराई करते. लिखने में कौशल दिखलाते. कुनबी को दिन-दहाड़े लूटते. हाजिरी-बही ले फैल(कार्यस्थल) पर जाते….फैल में जो हों शूद्र औरतें उनसे बरतन मंजवाते. बेगारी मजदूरों से फिर अपना बिस्तर हैं लगवाते. पागल से कुन्बी को पाकर उससे अपने पैर दबवाते. खूब मजे से खुर्राटे भरते. अपनी जात के बाम्हन को फैल पर काम को हैं ले जाते….किसान का लहू चूस-चूसकर मोटे-ताजे हैं बन जाते. जितना ये घी-शक्कर हैं उड़ाते, सब किसान के ऊपर.’

भाषा और अध्ययन की दृष्टि से डॉ. आंबेडकर फुले की अपेक्षा समृद्ध हैं. उनकी भाषा एक दार्शनिक और वैज्ञानिक की भाषा है. जो तर्क करती है; तथा उनके समर्थन में जरूरी प्रमाण भी देती है. फुले की भाषा की भांति उनके तर्क भी सीधे-सपाट हैं. डॉ. आंबेडकर का लेखन उनके विशद् अध्ययन का स्वतः प्रमाण है. ब्राह्मणवाद के विरुद्ध पिछड़े और दलित वर्गों में चेतना जगाने में फुले के लेखन का बड़ा योगदान है. उससे प्रेरणा लेकर दलित और पिछड़े समुदायों के सैकड़ों बुद्धिजीवी आगे आए. उन्होंने अनेकानेक आंदोलनों को जन्म दिया. सांस्कृतिक वर्चस्व से मुक्ति हेतु ग्राम्शी ने सर्वहारावर्ग से अपने बुद्धिजीवी पैदा करने का आवाह्न किया है. ऐसे चिंतक जिनकी मेधा स्वतंत्र हो, जो अभिजन बुद्धिजीवियों के मानसिक दास न हों. अपने विचार-कर्म से फुले, ग्राम्शी से आधी शती पहले ही इसे चरितार्थ करते नजर आते हैं. एक किसान की तरह वे भविष्य के दलित आंदोलन के लिए जमीन तैयार करते हैं.

फुले के समय भारतीयों, विशेषकर शूद्रों के लिए राजनीति में आने के अवसर कम थे. स्वयं फुले ने भी उस दिशा में कभी प्रयास नहीं किया. वे राजनीतिज्ञों यहां तक कि अंग्रेजों से भी दूरी बनाए रहे. निष्पक्ष बुद्धिजीवी की तरह जब आवश्यक समझा, तब अंग्रेजी शासन की प्रशंसा की और जहां कुछ आपत्तिजनक नजर आया, तत्काल आलोचना से भी बाज नहीं आए. राजनीति से प्रत्यक्ष संबंध न रखने के बावजूद शूद्रातिशूद्रों में संगठन और संघर्ष की प्रेरणा जगाने में फुले का योगदान अपने समकालीन किसी भी नेता से कहीं अधिक है. अच्छा शिष्य गुरु की शिक्षा  को ज्यों का त्यों नहीं अपनाता, बल्कि उसको निरंतर परिवर्धित-परिमार्जित करता जाता है. जिस आंदोलन को फुले खड़ा करते हैं, डॉ. आंबेडकर उसे और अधिक मजबूती, साहस, ईमानदारी और संकल्प के साथ आगे बढ़ाते हैं. अंततः अपनी अप्रतिम मेधा, अनथक संघर्ष तथा प्रतिबद्धता के बल पर उसे एक अंजाम तक पहुंचाने में सफल सिद्ध होते हैं. डॉ. आंबेडकर राजनीति की महत्ता को समझते थे. उन्होंने दलितों का आवाह्न किया कि अपने अधिकारों के लिए राजनीति में खुलकर हिस्सा लें. फुले के समय तक अस्मितावादी राजनीति का वातावरण नहीं बना था. वक्त की नजर और समाज की जरूरतों को पहचानते हुए उन्होंने खुद को सामाजिक सुधार तक सीमित रखा था. पहले पंद्रह वर्ष वे मुख्यतः शिक्षा-सुधार को समर्पित रहे. शूद्रातिशूद्र विद्यार्थियों के लिए स्कूल खोले. लेकिन राजनीति से दूरी बनाए रखी. डॉ. आंबेडकर राजनीति की ताकत तथा जरूरत को समझते थे. उनकी सक्रियता समाज और राजनीति, दोनों क्षेत्रों बराबर बनी रही.

अच्छा नागरिक के लिए अच्छे समाज का होना आवश्यक है; और एक अच्छा समाज ही अच्छे राज्य का गठन कर सकता है.  इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य का विवेक स्वतंत्र हो. प्रत्येक मनुष्य को अपने निर्णय खुद लेने की स्वतंत्रता हो. उसके लिए शिक्षा भी चाहिए और सहयोगपूर्ण वातावरण भी. इसी सपने के साथ फुले अपने आंदोलन की शुरुआत करते हैं. जिसे डॉ. आंबेडकर उसी निष्ठा एवं समर्पण के साथ आगे बढ़ाते हैं. आधुनिक भारत के निर्माण में दोनों की भूमिका अद्वितीय है. प्रतिक्रियावाद के इस दौर में जो लोग इन दोनों के योगदान को नकारने की कोशिश में हैं, उन्हें फ्रैड्रिक डगलस की यह चेतावनी याद रखनी चाहिए—‘जहां न्याय की अवमानना होती है, जहां जहालत और गरीबी है, जहां कोई भी समुदाय यह महसूस करे कि समाज सिवाय उसके दमन, लूट तथा अवमानना के संगठित षड्यंत्र के सिवाय कुछ नहीं है—वहां न तो मनुष्य सुरक्षित रह सकते हैं, न ही संपत्ति.’

ओमप्रकाश कश्यप

 संदर्भ:

1. Dhanajay Keer in Mahatama Jyotiba Phule

2.   इनहिलेशन आॅफ कास्ट, संतराम बीए द्वारा अनूदित, पृष्ठ 8.

3. Henry Verner Hampton in Biographical Studies of Education in India.

4. Dhanajay Keer in Mahatama Jyotiba Phule

5. Katherine Mayo, Mother India(1937), page 64.

6. तृतीय रत्न, नाटक, फुले, ज्योतिराव फुले रचनावली, अनुवाद डॉ. एल. जी. मेश्राम ‘विमलकीर्ति’ पेज—47

भविष्यलोक : एक नास्तिक का स्वप्न

सामान्य

(आज रामास्वामी पेरियार का जन्मदिवस है, भारत को आधुनिक राज्य बनाने में जितनी भूमिका डॉ. आंबेडकर की है, उतनी ही पेरियार की भी है. अपनी—अपनी भूमिका में दोनों महान हैं. डॉ. आंबेडकर साधारण परिवार से आए थे, अपने श्रम, स्वाध्याय, विद्वता, त्याग और विवेक के बल पर वे इस देश के निर्माता बने. समाज के बड़े वर्ग को जगाने का काम किया. पेरियार के पिता धनी व्यापारी थे. जीवन के आरंभिक वर्षों में धन उन्होंने भी खूब कमाया. धीरे—धीरे उसकी ओर से निस्पृह होते चले गए. आगे चलकर कांग्रेस से जुड़े. बहुत जल्दी समझ में आ गया कि कांग्रेस के सुधार की एक सीमा है. वह समाज के निचले हिस्सों के भले के लिए उतना की कर सकती है, जितना उपकार—भाव के साथ संभव है. पेरियार ने राजनीति को छोड़ा और केवल जनता पर भरोसा किया. खुद को जनांदोलनों के लिए समर्पित कर दिया. राजनीति से दूर रहते हुए बड़े आंदोलन चलाना, जिनसे आगे चलकर पूरे देश की राजनीति प्रभावित हुई, पेरियार जैसी हस्ती के लिए ही संभव था.

आदर्श समाज को लेकर हर महापुरुष का एक सपना रहा है. पश्चिम में प्लेटो से लेकर थॉमस मूर और आल्डोस हक्सले तक. भारत में संत रविदास ने भी समानता, सहयोग और स्वतंत्रता पर आधारित सपना देखा था, जिसे हम बेगमपुराके नाम से जानते हैं. आने वाली दुनियामें रामास्वामी पेरियार भी इसी प्रकार का सपना देखते हैं. यह आलेख उनके भाषण के अंग्रेजी अनुवाद(प्रो. ए. एस. वेणु)  का अनुवाद है, जो उन्होंने आत्मसम्मान आंदोलनके एक कार्यक्रम दिया था. वैज्ञानिक सोच के प्रसारक ईवी रामास्वामी इसमें ऐसे अनेक आष्विकारों की कल्पना करते हैं, जो आज हमारे सामने हैं. इससे उनकी दूरंदेशी का अनुमान लगाया जा सकता है. ओजस्वी विचारकों के कारण पेरियार को यूनेस्को ने दक्षिण एशिया का सुकरातकहा तो कुछ विद्वानों ने उन्हें भारत का वाल्तेयरमाना है. कुछ विद्वान उनकी तुलना रूसो से करते हैं. यह भाषण पुस्तकाकार भी प्रकाशित हुआ, जिसकी समीक्षा सुप्रसिद्ध अंग्रेजी दैनिक दि हिंदूमें छपी थी, जहां उनकी तुलना बीसवीं ताब्दी का एच.जी.वेल्स कहा गया था. लेख में गांधी का नाम नहीं है. उनकी ओर संकेत-भर है. परंतु इससे गांधी और पेरियार के सोच का अंतर पूरी तरह सामने आ जाता है.

यह लेख एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित हुआ था. पेरियार की भूमिका के साथ, जो लेख जितनी ही महत्त्वपूर्ण है.  परियार के जन्मदिन पर उन्हें याद करते हुए उन्हीं के लेख का अनुवाद प्रस्तुत कर रहे हैंओमप्रका कश्यप)

 

प्राक्कथन

कल की दुनिया कैसी थी? आज की दुनिया कैसी है? आने वाले कल की दुनिया कैसी होगी? समय के साथ-साथ, शताब्दियों के अंतराल में कौन-कौन से परिवर्तन होंगे? केवल तर्कवादी इन बातों को सही-सही समझ सकता है. धर्माचार्य के लिए इन्हें समझना अत्यंत कठिन है. यह बात मैं किस आधार पर कह रहा हूं?

धर्माचार्य मात्र उतना जानते हैं, जितना उन्होंने धर्मशास्त्रों और ऊटपटांग पौराणिक साहित्य को रट्टा लगाते हुए समझा है. उन सब चीजों से जाना है, जो ज्ञान और तर्क की कसौटी पर कहीं नहीं ठहरतीं. उनमें से कुछ केवल भावनाओं में बहकर सीखते-समझते हैं. दिमाग के बजाए दिल से सोचते हैं. अंध-श्रद्धालु की तरह मान लेते हैं कि उन्होंने जो सीखा है, वही एकमात्र सत्य है. बुद्धिवादियों का यह तरीका नहीं है. वे ज्ञानार्जन को महत्त्व देते हैं. अनुभवों से काम लेते हैं. उन सब वस्तुओं से सीखते हैं, जो उनकी नजर से गुजर चुकी हैं. प्रकृति में निरंतर हो रहे परिवर्तनों, जीव-जगत की विकास-प्रक्रिया से भी वे ज्ञान अर्जित करते हें. इसके साथ-साथ वैज्ञानिक शोधों, महापुरुषों के ज्ञान, व्यक्तिगत खोजबीन, उपलब्ध शोधकर्म को भी वे आवश्यकतानुसार और विना किसी पूर्वाग्रह के ग्रहण करते हैं.

धर्माचार्य सोचता है कि परंपरा-प्रदत्त ज्ञान ही एकमात्र ज्ञान है. उसमें कोई भी सुधार संभव नहीं है. अतीत को लेकर जो पूर्वाग्रह और धारणाएं प्रचलित हैं, वे उसमें किसी भी प्रकार के बदलाव के लिए तैयार नहीं होते. दूसरी ओर तर्कवादी मानता है कि यह संसार प्रतिक्षण आगे की ओर गतिमान है. सबकुछ तेजी से बदल रहा है. इसलिए वह अधुनातन और श्रेष्ठतर के स्वागत को सदैव तत्पर रहता है. मेरा आशय यह नहीं है कि दुनिया-भर के सभी धर्माचार्य एक जैसे हैं. लेकिन जहां तक ब्राह्मणों का सवाल है, वे सब के सब  बुद्धिवाद का विरोध करते हैं. परंपरा नएपन की उपेक्षा करती है. वह लोगों को तर्क और मुक्त चिंतन की अनुमति नहीं देती. न ही शिक्षा-तंत्र और परीक्षा-विधि को उन्नत करने में उन्हें कोई मदद पहुंचाती है. उलटे वह लोगों के पूर्वाग्रह रहित चिंतन में बाधा उत्पन्न करती है. यह जानते हुए भी परंपरा-पोषक धर्माचार्य अज्ञानता के दलदल में बुरी तरह धंसे हैं, पुराणों के दुर्गंधयुक्त कीचड़ में वे आकंठ लिप्त हैं. अंधविश्वाश और अवैज्ञानिक विचारों ने उन्हें खतरनाक विषधर बना दिया है.

हमारे धार्मिक नेता, विशेषकर हिंदू धर्म के अनुयायी धर्माचार्यों से भी गए-गुजरे हैं. यदि धर्माचार्य लोगों को 1000 वर्ष पीछे लौटने की सलाह देता है, तो नेता उन्हें हजारों वर्ष पीछे ढकेलने की कोशिश में लगे रहते हैं. ये जनता को सदियों पीछे ढकेल भी चुके हैं. बुद्धिवाद न तो धर्माचार्यों को रास आता है, न ही हमारे हिंदू नेताओं को. उन्हें केवल अवैज्ञानिक, मूर्खतापूर्ण और बुद्धिहीन वस्तुओं से लगाव है.

अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं, ये लोग नई दुनिया में भी उम्मीद लगाए रहते हैं कि आने वाला समय उन जैसे असभ्य और गंवारों का होगा. ‘स्वर्णिम अतीत’(ओल्ड इज गोल्ड) की परिकल्पना पर वही व्यक्ति विश्वास कर सकता है, जिसने नए परिवर्तन को न तो समझा हो, न उसकी कभी सराहना की हो. केवल अकल के अंधे लोग उनका अनुसरण कर सकते हैं.

हम जैसे तर्कवादी लोग पुरातन को पूर्णतः खारिज नहीं करते. उसमें जो अच्छा है, हम उसका स्वागत करते हैं. उसे अपनाने के लिए भी अच्छाई और नएपन में विश्वास करना अत्यावश्यक है. तभी हम नए और अधुनातन सत्य की खोज कर सकते हैं. समाज तभी प्रगति कर सकता है, जब हम नए और बेहतर समाज की रचना के लिए नवीनतम परिवर्तनों के स्वागत को तत्पर हों.

लोग चाहे वे किसी भी देश  अथवा संस्कृति के क्यों न हों, पुरातन से संतुष्ट कभी नहीं थे. उनकी दृष्टि सदैव अधुनातन ज्ञान एवं प्रगति पर केंद्रित रही हैं. वे जिज्ञासु और निष्पक्ष थे. इसी कारण वे विस्मयकारी वस्तुओं की खोज कर पाए. आज दुनिया के हर कोने के लोग मानवोपयोगी आविष्कारों का लाभ उठा रहे हैं. इसलिए यह आलेख केवल उन लोगों के लिए है जो सत्य को अनुभव करना जानते हैं. उसे आत्मसात् करने को तत्पर हैं. ऐसे ही लोग शताब्दियों आगे के परिवर्तनों की कल्पना कर सकते हैं.  

 

भविष्यलोक : एक नास्तिक का स्वप्न

अतीत के विहंगावलोकन और महान इतिहासकारों की राय से पता चलता है कि आने वाले समय में राजशाही का अंत हो जाएगा. बहुमूल्य सोना-चांदी, हीरे-जवाहरात प्रभु वर्ग का विशेषाधिकार नहीं रह पाएंगे. उस दुनिया में न तो शासक की आवश्यकता होगी, न शासन की. न राजा होगा, न ही राज्य. लोगों की आजीविका और सुख-शान्ति पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं होगा, जैसा आजकल का चलन है. आज रोजी-रोटी के लिए किया जाने वाला श्रम अत्यधिक है, अपनी ही मेहनत का सुख प्राप्त करने के अवसर अपेक्षाकृत अत्यंत सीमित. जबकि हमारे पास खेती-किसानी और सुखामोद, यहां तक कि वैभव-सामग्री जुटाने के विपुल संसाधन हैं. दूसरी ओर भूख, गरीबी और दैन्य के सताए लोग बड़ी संख्या में हैं. ऐसे लोगों के पास सामान्य सुविधाओं का अभाव हमेशा बना रहता है. उनके पास न तो भरपेट भोजन है, न ही जीवन का कोई सुख. हालांकि दुनिया में अवसरों की भरमार है. उनसे कोई भी व्यक्ति अपनी रुचि के अनुसार जीवन के लक्ष्य निर्धारित कर सकता है, अपने आप को ऊंचा उठा सकता है. फिर भी ऐसे लोग बहुत कम हैं जो उन सबका आनंद उठा पाते हैं. कच्चे माल और उत्पादन के क्षेत्र तेजी से विकास की ओर अग्रसर हैं. दूसरी ओर ऐसे लोग भी अनगिनत हैं जो मामूली संसाधनों के साथ गुजारा करने को विवश हैं. समाज में जीवन की मूलभूत अनिवार्यताएं होती हैं. उनके अभाव में जीवन बहुत कठिन हो जाता है. बहुत-से लोग न्यूनतम सुविधाओं के लिए तरसते हैं. बड़ी कठिनाई में वे जीवनयापन कर पाते हैं. हमारे पास कृषि भूमि की कमी नहीं. बाकी संसाधन भी पर्याप्त मात्रा में है. मगर ऐसे लोग भी हैं जिनके पास जमीन का एक टुकड़ा तक नहीं है. ऐसी दुनिया में एक ओर सुख-पूर्वक जीवनयापन के भरपूर संसाधन मौजूद हैं, दूसरी ओर भुखमरी गरीबी, और दुश्चिंताओं की भरमार है. उनके कारण समाज में चुनौतियां ही चुनौतियां हैं.

क्या इन सबके और ईश्वर के बीच कोई संबंध है?

क्या इन सबके और मनुष्य के बीच कोई तालमेल है?

ऐसे लोग भी हैं जो सांसारिक कार्यकलापों को ईश्वर से जोड़ते हैं. परंतु हमें ऐसा कोई नहीं मिलता जो दुनिया की बुराइयों के लिए ईश्वर को जिम्मेदार ठहराता हो. तो क्या यह मान लिया जाए कि आदमी नासमझ है, उसमें इन बुराइयों से निपटने का सामर्थ्य ही नहीं है?

प्राणीमात्र के बीच मनुष्य सर्वाधिक बुद्धिमान है. यह आदमी ही है, जिसने ईश्वर, धर्म, दर्शन, अध्यात्म को गढ़ा है. कहा यह भी जाता है कि असाधारण मनुष्य ईश्वर का साक्षात्कार करने में सफल हुए थे. कुछ लोगों के बारे में तो यह दावा भी किया जाता है कि वे ईश्वर में इतने आत्मलीन थे कि स्वयं भगवान बन चुके थे. मैं बड़ी हिम्मत के साथ पूछता हूं—आखिर क्यों ऐसे महान व्यक्तित्व भी दुनिया में व्याप्त तमाम मूर्खताओं को उखाड़ फेंकने में नाकाम रहे? क्या इससे स्पष्ट नहीं होता कि लोग अपने सामान्य बोध से यह नहीं समझ पाए कि सांसारिक चीजों का ईश्वर, धर्म, आध्यात्मिक निर्देश, न्याय, मर्यादा, शासन आदि से कोई संबंध नहीं है. ये सिर्फ इसलिए हैं क्योंकि अधिकांश लोग स्वतंत्र रूप से सोचने तथा निर्णय लेने में अक्षम हैं?

पश्चिमी देशों में अनेक विद्वानों ने बुद्धि को महत्त्व देते हुए तर्कसंगत ढंग से सोचना आरंभ किया. उन विचारों की मदद से उन्होंने विलक्षण ज्ञान के साथ-साथ चामत्कारिक आविष्कार किए हैं. उसके फलस्वरूप वे अपनी आध्यात्मिकता के परिष्कार के साथ-साथ, अंधविश्वासों और आत्म-वंचनाओं का समाधान खोजने में भी कामयाब रहे. अंततः वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि प्राचीन ढकोसले ज्यादा दिन टिकने वाले नहीं हैं. यही कारण है कि उन्होंने नए युग पर ध्यान-केंद्रित करना आरंभ कर दिया है.

हम क्यों जन्मे हैं? आम आदमी को आज भी रोजी-रोटी के लिए संघर्ष क्यों करना पड़ता है? क्यों लोग भूख और गरीबी के कारण अकाल मौत मरते हैं? जबकि दुनिया में संसाधनों का प्राचुर्य है. ये मानव-मस्तिष्क को स्तब्ध कर देने वाले प्रश्न हैं. आज हालात बदल रहे हैं. आजकल बुद्धिवादी तरीके से अनेक चीजों का वास्तविक रूप हमारे सामने है. कालांतर में यही तरीका न केवल परिवर्तन का वाहक बनेगा, बल्कि सामाजिक क्रांति को भी जन्म देगा. एक समय ऐसा आएगा जब धन-संपदा को सिक्कों में नहीं आंका जाएगा. न सरकार की जरूरत रहेगी. किसी भी मनुष्य को जीने के लिए कठोर परिश्रम नहीं करना पड़ेगा. ऐसा कोई काम नहीं होगा जिसे ओछा माना जाए; या जिसके कारण व्यक्ति को हेय दृष्टि से देखा जाए. आज सरकार के पास असीमित अधिकार हैं. किंतु भविष्य में ऐसी कोई सरकार नहीं होगी, जिसके पास अंतहीन अधिकार हों. दास प्रथा का नामोनिशान नहीं बचेगा. जीवनयापन हेतु कोई दूसरों पर आश्रित नहीं रहेगा. महिलाएं आत्मनिर्भर होंगी. उन्हें विशेष संरक्षण, सुरक्षा और सहयोग की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी.

आने वाली दुनिया में मनुष्य को सुख-पूर्वक जीवन-यापन करने के लिए एक अथवा दो घंटे का समय पर्याप्त होगा. उससे वह उतना ही वैभवशाली जीवन जी सकेगा, जैसा संत-महात्मा, जमींदार, शोषण करने वाले धर्मगुरु और तत्वज्ञानी जीते आए हैं. सामान्य सुख-सुविधाओं तथा समस्त आनंदोपभोग के लिए मात्र दो घंटे का श्रम पर्याप्त होगा. मनुष्य के सामान्य रोग जैसे पैरों का दर्द, कान, नाक, पेट, हड्डी आदि के विकार तथा अन्यान्य रोग सहन नहीं किए जाएंगे. आने वाली नई दुनिया में अकेले मनुष्य की दुश्चिंताएं और कठिनाइयाँ समाज द्वारा सही नहीं जाएंगीं. उस दुनिया में समाज एकता और सहयोग के आधार पर गठित होगा.

युद्ध जो इन दिनों आम हैं, भविष्य में उनके लिए कोई जगह नहीं होगी. लोगों को युद्ध में जान देने के लिए मजूबर नहीं किया जा सकेगा. हत्या और लूटमार की घटनाओं में उल्लेखनीय गिरावट होगी. कोई बेरोजगार नहीं रहेगा. न कहीं भोजन और आजीविका के लिए मारामारी होगी. लोग काम की तलाश अपने आप को सुखी और स्वस्थ रखने के लिए करेंगे. बहुमूल्य वस्तुएं, मनोरम स्थल, मनभावन दृश्य और दमदार प्रदर्शनियां, जहां लोग मिल-जुलकर जीवन का आनंद ले सकें—सभी को समान रूप से सदैव उपलब्ध होंगी. आने वाली दुनिया में साहूकार, निजी व्यापारी, उद्योगपति और पूंजीपतियों के अधीन चल रही संस्थाओं के लिए कोई जगह नहीं होगी. केवल लाभ की कामना के साथ करने वाला कोई एजेंट, ब्रोकर या दलाल आने वाली दुनिया में नजर नहीं आएगा.

सहयोगाधारित विश्व-राज्य में जल, थल और वायुसेना बीते जमाने की चीजें बन जाएंगी. बस्तियों को तबाह कर देने वाले युद्धक जहाज और हथियार खुद नष्ट कर दिए जाएंगे. आजीविका के लिए रोजगार की तलाश आसान और मानव-मात्र की पहुंच में होगी. सुखामोद में चौतरफा वृद्धि होगी. ज्ञान-विज्ञान की मदद से मनुष्य की औसत आयु में बढ़ोत्तरी होगी. जनसंख्या बृद्धि की चाहे जो रफ्तार हो, आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता तथा उन्हें जुटाने में लगने वाला श्रम मूल्य न्यूनतम स्तर पर होगा. मशीनी-क्रांति उसे सहज-संभव कर दिखाएगी.

मिसाल के तौर पर, कभी वे दिन थे जब एक कारीगर एक मिनट में औसतन 150 धागे बुन पाता था. आज ऐसी मशीनें हैं जो किस्म-किस्म के कपड़े 45,000 धागे प्रति मिनट की रफ्तार से आसानी से बुन लेती हैं. इसी तरह पहले कारीगर के लिए प्रति मिनट 2-3 सिगरेट बनाना भी मुश्किल हो जाता था. आज एक मशीन प्रति मिनट में ढाई हजार सिगरेट बना देती है. आज मशीन के डेशबोर्ड पर केवल तंबाकू की पत्तियां, कागज आदि रखने की जरूरत होती है. सिगरेट बनाने से लेकर उनके पैकेट बनाने, फिर पैक करने तक का काम मशीनें करती हैं. वहां से उन्हें आसानी से बाहर भेजा जा सकता है. इसके अलावा खराब सिगरेटों को अलग करने से लेकर नष्ट करने तक का काम मशीनें स्वत: कर लेती हैं. आज जीवन के सभी क्षेत्रों में मशीनों के जरिये आसानी से काम हो रहा है. प्रौद्योगिकी विषयक ज्ञान में तीव्र वृद्धि हो रही है. तकनीक की मदद से आने वाली दुनिया में ऐसा संभव होगा जब कोई आदमी सप्ताह में मात्र दो श्रम करके साल-भर के लिए जरूरी वस्तुओं का उपार्जन कर सकेगा.

इस बात से डरने की जरूरत नहीं है कि लोग इससे सुस्त और आराम पसंद हो जाएंगे. इस तरह की चिंता किसी को भी नहीं करनी चाहिए. यही नहीं जैसे-जैसे जीवनोपयोगी वस्तुएं के उपार्जन के तरीकों और संसाधनों का विकास होगा, और जैसे-जैसे सुख-सुविधाओं की मांग बढ़ेगी, स्वाभाविक रूप से मनुष्य के श्रम और क्षमताओं का लोकहित में पूरे वर्ष उपयोग करने के लिए आवश्यक कदम भी उठते रहेंगे. ऐसी योजनाएं बनाई जाएंगी जिससे मनुष्य के खाली समय का सार्थक सदुपयोग संभव हो सके. आधुनिकतम मानवोपयोगी आविष्कारों की कोई सीमा नहीं होगी. सभी लोगों को काम मिलेगा, विशेषरूप से गुणी, प्रतिभाशाली और मनुष्यता के हित में आधुनिक सोच से काम लेने वालों के लिए काम की कोई कमी नहीं होगी. मजदूर केवल मजदूरी के लिए काम नहीं करेगा, बल्कि वह अपने मानसिक विकास के लिए भी काम को समर्पित होगा. उससे प्रत्येक व्यक्ति व्यस्त रहेगा. केवल लार्भाजन के लिए कोई उत्पादन नहीं किया जाएगा.

अपने से बड़ों को काम करते देख छोटे भी समाज हित में बहुउपयोगी योगदान देने को आश्चर्यजनक रूप से तत्पर होंगे. ठीक है, कुछ लोग सोच सकते हैं कि उनके कुछ उत्तराधिकारी सुस्त और आराम-पसंद होंगे. मैं ऐसा नहीं मानता. यह सोचते हुए कि कुछ लोग आलसी और निकम्मे हो सकते हैं, वे समाज के लिए बोझ नहीं रहेंगे. समाज की प्रगति पर उनसे न्यूनतम प्रभाव पड़ेगा. यदि कोई जानबूझकर सुस्त रहने की जिद ठाने रहता है, तो वह उसके लिए नुकसानदेह होगा, न कि पूरे समाज के लिए. सच तो यह है कि आने वाले समय में कोई भी खुद को आलसी और सुस्त कहलवाने में लज्जित महसूस करेगा. लोगों में समाज के लिए कुछ न कुछ उपयोगी करने की स्पर्धा बनी रहेगी. उनके लिए अपेक्षाकृत अधिक काम होगा. और किसी काम को करने वाले हाथों की कमी नहीं रहेगी. कोई किसी काम को पूरा न करने का दोष अपने सिर नहीं लेना चाहेगा.

आप पूछ सकते हैं कि क्या कुछ आदमी ऐसे भी होंगे जिन्हें ओछे और गंदे कार्यों पर लगाया जाएगा? अभी तक गंदे और खराब कार्यों से हमारा जो मतलब रहा है, आने वाली दुनिया में उन्हें ऐसा नहीं माना जाएगा. न उनके कारण किसी को हेय दृष्टि से देखा जा सकेगा. आनी वाले समय में झाडू़ लगाना, मैला उठाना, झूठे बर्तन धोने, कप-प्लेट धोने जैसे कार्यों के लिए मशीनों की मदद ली जाएगी. आदमी से उम्मीद की जाएगी कि तकनीकी कौशल प्राप्त कर, मषीनों का उपयोग करना सीखे. सिर पर भारी बोझा ढोने, खींचने या गड्ढा खोदने के लिए मानव-श्रम की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. किसी भी कार्य को असम्मानजनक नहीं माना जाएगा. कवियों, कलाकारों, कलमकारों और मूर्तिकारों के बीच नई दुनिया गढ़ने के लिए स्पर्धा रहेगी. अच्छे आदमियों को अच्छे काम सौंपे जाएंगे, ताकि वे नाम और नामा दोनों कमा सकें.

कोई भी व्यक्ति आत्मगौरव, चरित्र और मान-मर्यादा से शून्य नहीं होगा. चूंकि व्यक्तिगत लाभ के सभी रास्ते बंद कर दिए जाएंगे, इसलिए कोई भी आदमी गलत चाल-चलन में नहीं पड़ेगा. ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होगा जिसका झुकाव अनुचित और अनैतिक कार्य की ओर हो. ये शर्तें प्रत्येक व्यक्ति को उच्च नैतिक मापदंडों के अनुसरण की प्रेरणा देंगीं. उसे अधिक सुसभ्य और संवेदनशील बनाएंगी. यदि कहीं ऊंच-नीच, विशेषाधिकार और अधिकारविहीनता दिखेगी, वहां घृणा, जुगुप्सा, और विरक्ति के कारण भी मौजूद होंगे—और जहां ये चीजें अनुपस्थित होंगी, वहां अनैतिकता के लिए कोई स्थान न होगा. नए विश्व में किसी को कुछ भी चुराने या हड़पने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी. पवित्र नदियों जैसे कि गंगा के किनारे रहने वाले लोग उसके पानी की चोरी नहीं करेंगे. वे केवल उतना ही पानी लेंगे, जितना उनके लिए आवश्यक है. भविष्य के उपयोग के लिए वे पानी को दूसरों से छिपाकर नहीं रखेंगे. यदि किसी के पास उसकी आवश्यकता की वस्तुएं प्रचुर मात्रा में होंगी, वह चोरी की सोचेगा तक नहीं. इसी प्रकार किसी को झूठ बोलने, धोखा देने या मक्कारी करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, क्योंकि उससे उसे कोई प्राप्ति नहीं हो सकेगी. नशीले पेय किसी को नुकसान नहीं पहुंचाएंगे. न कोई किसी की हत्या करने का ख्याल दिल में लाएगा. बक्त बिताने के नाम पर जुआ खेलने, शर्त लगाने जैसे दुर्व्यसन समाप्त हो जाएंगे. उनके कारण किसी को आर्थिक बरबादी नहीं झेलनी पड़ेगी.

पैसे की खातिर अथवा मजबूरी में किसी को वेष्यावृत्ति के लिए विवश नहीं होना पड़ेगा. स्वाभिमानी समाज में कोई भी दूसरे पर शासन नहीं कर पाएगा. कोई किसी से पक्षपात की उम्मीद नहीं करेगा. ऐसे समाज में जीवन और काम-संबंधों को लेकर लोगों का दृष्टिकोण उदार एवं मानवीय होगा. वे अपने स्वास्थ्य की देखभाल करेंगे. प्रत्येक व्यक्ति में आत्मसम्मान की भावना होगी. स्त्री-पुरुष दोनों एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करेंगे और किसी का प्रेम बलात् हासिल करने की कोशिश नहीं की जाएगी. स्त्री-दासता के लिए कोई जगह नहीं होगी. पुरुष सत्तात्मकता मिटेगी. दोनों में कोई भी एक-दूसरे पर बल-प्रयोग नहीं करेगा. आने वाले समाज में कहीं कोई वेष्यावृत्ति नहीं रहेगी.

मानसिक अपंगता के शिकार लोगों को विशेषरूप से देखभाल की जरूरत पड़ सकती है. बावजूद इसके ऐसे व्यक्तियों को तभी बंद किया जा सकेगा, जब वे दूसरे लोगों के लिए परेशानियां खड़ी कर रहे हों. स्त्री-पुरुष दोनों पर किसी प्रकार के प्रतिबंध लागू करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. क्योंकि वे दोनों ही संबंधों की अच्छाई-बुराई की ओर से सावधान रहेंगे.

यातायात के साधन मुख्यतः हवाई होंगे और वे तीव्र से काम करेंगे. संप्रेषण प्रणाली बिना तार की होगी. सबके लिए उपलब्ध होगी और लोग उसे अपनी जेब में उठाए फिरेंगे. रेडियो प्रत्येक के हेट में लगा हो सकता है. छवियां संप्रेषित करने वाले उपकरण व्यापक रूप से प्रचलन में होंगे. दूर-संवाद अत्यंत सरल हो जाएगा और लोग ऐसे बातचीत कर सकेंगे मानो आमने-सामने बैठे हों. आदमी किसी से भी कहीं भी और कभी भी तुरंत संवाद कर सकेगा. शिक्षा का तेजी से और दूर-दूर तक प्रसार करना संभव होगा. एक सप्ताह तक की जरूरत का स्वास्थ्यकर भोजन संभवतः एक केप्सूल में समा जाएगा जो सभी को सहज उपलब्ध होंगे

मनुष्य की आयु सौ वर्ष अथवा उससे भी दो गुनी हो चुकी होगी.

नपुंसक स्त्री या पुरुष को संतान के लिए संभोग करने की जरूरत नहीं पड़ेगी. यही नहीं पषुओं की उन्नत नस्ल के लिए ताकतवर और सुदृढ़ सांड विशेषरूप से लाए जाएंगे, स्वस्थ्य और बुद्धिमान पुरुषों को वीर्य-दान के लिए तैयार किया जाएगा, तथा उसे वैज्ञानिक ढंग से स्त्री के गर्भाशय में स्थापित किया जाएगा. वह ऐसा रास्ता होगा जिससे आने वाली संतान शारीरिक एवं मानसिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ एवं तेजवंत होगी. बच्चे के जन्म की प्रक्रिया सरल होगी, जिसके लिए दंपति को संभोग की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. जनता के इच्छा और सहयोग से जनसंख्या-नियंत्रण का काम आसान हो जाएगा.

दैनिक उपभोग की वस्तुएं जैसी वे आज हैं, भविष्य में उससे अलग हांगीं. उदाहरण के लिए वाहनों का भार उल्लेखनीय रूप से कम हो जाएगा. उससे पैट्रोल की खपत में कमी आएगी. भविष्य की कारें बिजली अथवा दुबारा चार्ज होने वाली बैटरियों से चल सकेंगी. बिजली का उपयोग इस प्रकार किया जाएगा ताकि प्रत्येक व्यक्ति उसका लाभ उठा सके. वह मनुष्यता के लिए बहुउपयोगी होगी. इस तरह के अनेक वैज्ञानिक सुधार देखने में आएंगे. विज्ञान का बड़ी तेजी से विकास होगा, उसके माध्यम से नए-नए और उपयोगी आविष्कार सामने आएंगे.

उस दुनिया में आविष्कारों के दुरुपयोग के लिए कोई गुंजाइष नहीं होगी. आजकल संपत्ति, कानून और व्यवस्था की देखभाल, न्याय, प्रशासन, शिक्षा आदि के सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार संभालती है. इसके लिए सरकार के अलग-अलग विभाग हैं. आगे चलकर ये सब माध्यम अनावश्यक और अप्रचलित हो जाएंगे. इन कार्यों के लिए आजकल प्रचलित प्रणालियां कालांतर में अर्थहीन लगने लगेंगी.

संभव है आने वाली दुनिया में भी कोई व्यक्ति ईश्वर को समझने की चाहत रखे.

ईश्वर की संकल्पना स्वतः और स्वाभाविक रूप से नहीं जन्मी है. यह विश्वास की प्रक्रिया है, जो बड़ों द्वारा छोटों में अंतरित और उपदेशित की जाती है. आने वाली दुनिया में ईश्वर की चर्चा तथा कर्मकांड करने वाले लोग नगण्य होंगे. यही नहीं ईश्वर के नाम पर जितने चमत्कारों का दावा किया जाता है, कालांतर में वे लुप्त हो जाएंगे. मनुष्य ईश्वर की चर्चा करेगा किंतु बिना किसी अलौकिताबोध के. आज आदमी यह सोचकर ईश्वर को याद करता है, क्योंकि उसे उसकी आवश्यकता बताई जाती है. यदि हम काम करते समय अचानक बीच में आ जाने वाली बाधाओं के रहस्य को समझ लें, यदि मनुष्य की सामान्य जरूरतें उसकी आवश्यकता के अनुसार समय रहते आसानी से पूरी हो जाएं, तब उसे ईश्वर और सृष्टि की परिकल्पना की आवश्यकता ही न पड़े. स्वर्ग की परिकल्पना अवैज्ञानिक और अप्रामाणिक है. यदि मानव-मात्र के लिए धरती पर ही स्वर्ग जैसा वातावरण उपलब्ध हो जाए, तब उसे स्वर्ग जैसी आधारहीन कल्पना की आवश्यकता ही नहीं पड़े. न ही स्वर्ग मिलने की चाहत उसे परेशान करे. यही मानवीय बोध की चरमसीमा है. ज्ञान-विज्ञान और विकास के क्षेत्र में ईश्वर के लिए कोई स्थान नहीं है.

यदि व्यक्ति में खुद को जानने की योग्यता हो तो उसे ईश्वर की जरूरत ही नहीं है. यदि मनुष्य इस दुनिया को ही अपने लिए स्वर्ग मान ले तो वह स्वर्ग के आकाश में; तथा नर्क के पाताल में स्थित होने की जैसी भ्रामक बातों पर विश्वास ही नहीं करेगा. जागरूक और विवेकवान व्यक्ति इत तरह के अतार्किक सोच को तत्क्षण नकार देगा. जहां व्यक्तिगत इच्छाओं का लोप हो जाता है, वहां ईश्वर भी मर जाता है. जहां विज्ञान जिंदा हो, वहां ईश्वर को दफना दिया जाता है.

सामान्य धारणा में अपरिवर्तनीयता या अनश्वरता के बारे ठोस परिकल्पनाएं संभव हैं. इसका आशय क्या है? इसमें भ्रम पैदा करने वाले कारक कौन से हैं? अनश्वरता को लोग ईश्वर के पर्याय और गुण के रूप में देखते आए हैं. वैज्ञानिकों की दृष्टि में इस तरह का अर्थ निकालना मूर्खता है. हम अपने निजी अनुभवों को दूसरों को बताने में प्रायः संकोची रहे हैं. इसलिए दूसरों के अनुभव और विचार हमारे मस्तिष्क पर प्रभावी हो जाते हैं. हम अपनी अज्ञानता का प्रदर्शन करते हैं, जो प्रायः हमारी नहीं होती. जबकि वे दुनिया के जन्म और उसकी ऐतिहासिक सहनशीलता को समझने का आदर्श माध्यम हो सकती है. इन हालात में जबकि दुनिया के अनेक रहस्य हमें अभी तक अज्ञात हैं, आभार ज्ञापन के बहाने ही सही, कोई भी बुद्धिवादी ईष्वर की पूजा नहीं करेगा.

कोई भी व्यक्ति ज्ञानार्जन द्वारा अपने जीवन में सुधार ला सकता है. यही दुनिया का नियम है. जब कोई तर्कबुद्धि से घटनाओं की सही व्याख्या नहीं कर पाता, तब वह चुपचाप अज्ञानता के वृक्ष के नीचे शरण लेकर ईश्वर को पुकारने लगता है. इस तरह के अबौद्धिक कार्यकलाप आने वाले समय में सर्वथा अनुपयुक्त माने जाएंगे.

 आने वाले समय में न तो स्वर्ग होगा, न नर्क. क्योंकि उसमें सनातन पाप या पुण्य के लिए के लिए कोई स्थान नहीं होगा. किसी को किसी की मदद की जरूरत नहीं पड़ेगी. सिवाय पागल के कोई दूसरों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहेगा. इसलिए स्वर्ग और नर्क की परिकल्पना भविष्य में मनुष्यता के लिए अर्थहीन मान ली जाएगी.

इस तरह की आदर्श दुनिया अचानक नहीं गढ़ी जा सकती. धीर-धीरे, कदम-दर कदम आगे बढ़ते हुए मेहनती लोगों द्वारा, क्रमिक परिवर्तन के बाद, लंबे अंतराल में इस तरह की दुनिया अवश्य बनाई जा सकती है. समाज की विभिन्न समस्याओं के समाधान तथा मानवमात्र के बेहतर जीवन के लिए, नई दुनिया की संरचना के लिए यह रास्ता आदर्श होगा.

उस समाज में कोई यह नहीं पूछेगा, ‘हम क्या करें? जब सबकुछ ईश्वर की मर्जी से संचालित है.’ मनुष्यता की जो भी कमियां सामने आएंगी, लोग उनपर शांत नहीं बैठेंगे. लक्ष्य तक पहुंचने के लिए वे उनका समाधान अवश्य करेंगे. नियति और दुर्भाग्य की कोई बात नहीं होगी. प्रत्येक कार्य संपूर्ण आत्मविश्वास के साथ किया जाएगा. समाज में जो भी बुराइयां सामने आएंगी, बेहतर समाज की रचना के लिए उनका निदान तत्क्षण और निपुणता के साथ किया जाएगा.

प्राचीन रीति-रिवाजों और पंरपराओं में अंध-आस्था ने लोगों के सोचने समझने, तर्क-बुद्धि से काम लेने की प्रवृत्ति का लोप कर दिया है. ये चीजें दुनिया की प्रगति में बाधक बनी हुई हैं. कुछ लोगों के स्वार्थ इनसे जुड़े हैं. निहित स्वार्थ के लिए वही लोग, जो इन पुरानी और बकवास चीजों से ही कमाई करते रहते हैं. ऐसे लोग ही नई दुनिया की संरचना का विरोध करते हैं. उस दुनिया का विरोध करते हैं जिसमें खुशियों की, सुख-शांति की भरमार होगी. लोगों के विकास की प्रचुर संभावनाएं भी रहेंगी. बावजूद इसके जो मनुष्य के अज्ञान तथा कुछ लोगों के स्वार्थ के विरुद्ध खुलकर खड़े होंगे, वही नई दुनिया की रचना करने में समर्थ होंगे. नई दुनिया के निर्माताओं को मजबूत करते के लिए हमें उनके साथ, उनकी कतार में शामिल हो जाना चाहिए. युवाओं और बुद्धिवादियों के लिए उचित अवसर है कि वे नए विश्व की रचना हेतु अपने प्रयासों को अपने विचार, ऊर्जा और सपनों को समर्पित कर दें.

ई वी रामास्वामी पेरियार(1944)

संस्कृति की लोकयात्रा : बरास्ता महिषासुर आंदोलन

सामान्य

संस्कृति’ शब्द ‘कृति’ के आगे ‘सम्’ उपसर्ग लगाने से बना है. ‘संस्कृति’ का अभिप्राय है, जिसे बनाने और आगे बढ़ाने में समाज के सभी वर्गों का योगदान बराबर हो. जिसमें सभी की समान सहभागिता हो. उसके लिए आवश्यक है कि समाज में सभी बराबर हों तथा प्रत्येक को अपना पक्ष प्रस्तुत करने की पूर्ण स्वतंत्रता हो. व्यक्ति की चारित्रिक विविधताओं का सम्मान करते हुए संस्कृति सदस्य इकाइयों के मन, विचार, रीतिरिवाज के सामंजस्यीकरण का काम करती है, ताकि आगंतुक पीढ़ियां समाज के आदर्श, रीतिरिवाज तथा ज्ञानानुभवों का लाभ उठा सकें. समाजशास्त्र की दृष्टि से ‘अनेकता में एकता’ की व्याप्ति समाज की उदारता का परिचायक होती है. वह समाजीकरण के उच्चतम स्तर की संकेतक है. उदार संस्कृति नैतिकता से सदैव सामंजस्य बनाए रखती है. दोनों के लक्ष्य में बहुत अधिक अंतर नहीं होता. नैतिकता जिन कसौटियों का निर्माण करती है, संस्कृति विभिन्न प्रतीकों, परंपराओं एवं संस्कारों के माध्यम से समाज में उन्हें लोगों के आचरण का हिस्सा बनाने के लिए प्रयत्नरत रहती है. समानता और स्वतंत्रता ऐसी ही कसौटियां हैं, जो न केवल समाजीकरण का आधार, अपितु उसकी सभ्यता का मापदंड भी हैं. मनुष्य उनसे प्यार करता है, यथासंभव उन्हें सुरक्षित रखना चाहता है. उन पर कोई आंच न आए, उसके लिए वह अपनी स्वतंत्रता के थोड़ेसे हिस्से का बलिदान कर समाज के अनुशासन में बंधने को स्वीकार होता है. इस उम्मीद के साथ कि समाज उसके साथ समानतापूर्ण व्यवहार करेगा. जिस सुख को वह अकेले प्राप्त करने में असमर्थ है, समाज में रहते हुए वह सुख आसानी से और लगातार प्राप्त होता रहेगा. समाज तथा उसे नियंत्रित करने वाले विधान, चाहे वह नैतिक हो या कानूनी—की चुनौती होती है कि वह मनुष्य की इन अपेक्षाओं पर खरा उतरकर उसके मानवीकरण के लिए उत्प्रेरक का काम करे.

अनेकता में एकता’ का दावा करने वाली भारतीय संस्कृति को इस कसौटी पर परखें तो बहुत उम्मीद नहीं बंधती. ऊपर से एक नजर आने या एक बताई जानी वाली इस संस्कृति के कई चेहरे, अनेक रंग तथा अनगिनत रूपविधान हैं. उनके बीच प्रतिद्विंद्वता बनी ही रहती है. कुछ ऐसे बिंदू भी हैं, जहां उसके दो मुख्य रूपाकारों को साथसाथ रखना, उनके अंतर्विरोधों पर पर्दा डालना न केवल कठिन, बल्कि असंभवसा हो जाता है. उस समय लगने लगता है कि सांस्कृतिक एकता का भारतीय रूपक मात्र एक छद्म, एक दिखावा है. सामाजिक असमानता, ऊंचनीच एवं भेदभाव को मान्यता देते हुए भारतीय संस्कृति समाज के मुट्ठीभर लोगों के हाथों में इतने अधिकार सौंप देती है, जिनसे वे बाकी जनसमूहों पर अपनी मर्जी लाद सकें. वे सदैव इस प्रयास में रहते हैं कि दमित वर्गों की सांस्कृतिक एकता का जो सूत्र उन वर्गों को सुदूर अतीत में जाकर जोड़ता तथा उनके बीच आत्मगौरव का संचार करता है, वह पूर्णतः छिन्नभिन्न हो जाए तथा अलगअलग टुकड़ों में बंटे या बांट दिए गए सामान्यजन, वर्चस्वकारी संस्कृति की अधीनता को चिरकाल तक स्वीकारने को विवश बने रहें. ‘अनेकता में एकता’ का नारा उनकी इसी प्रवृत्ति का परिचायक है. जाति और धर्म भारतीय संस्कृति के ऐसे ही औजार हैं. उनके दबाव में बहुसंख्यक लोग शोषण और असमानता को अपनी नियति मानने लगते हैं. ऐसे में ‘अनेकता में एकता की खोज’ का नारा उदात्त कल्पना से अधिक महत्त्व नहीं रखता. प्राकृतिक न्याय की भावना के विपरीत भारतीय संस्कृति कुछ लोगों को जन्म से विशेषाधिकार घोषित कर बाकी को उनका सेवादार बनाने का समर्थन करती है. मनुष्य की रुचि, स्वभाव, व्यक्तिगत योग्यता उसके लिए कोई महत्त्व नहीं रखती. अभिजन हितों के संरक्षण की सतत चाहत के दौरान स्वतंत्रता एवं समानता जैसे समाजीकरण के मूलभूत सिद्धांत बहुत पीछे छूट जाते हैं. चूंकि ब्राह्मण को धर्म और संस्कृति में शीर्ष स्थान पर रखा गया है, और नीतियां उसी की इच्छा और स्वार्थ के स्तर से तय होती हैं, इस कारण सांस्कृतिक वर्चस्ववाद को उसके आलोचकों द्वारा ‘ब्राह्मणवाद’ की संज्ञा दी गई है, जो उचित ही है.

सवाल है कि सबकुछ जानतेबूझते हुए भी बहुसंख्यक वर्ग सांस्कृतिकसामाजिक अधीनता को स्वीकार क्यों करता है? क्यों वह वर्ग स्वयं को उस समाज का हिस्सा माने रहता है जो स्वतंत्रता एवं समानता जैसी समाजीकरण की मूलभूत शर्तों पर ही खरा नहीं उतरता. सुदूर अतीत में क्यों उसने मुट्ठीभर वर्चस्वकारियों को बौद्धिक एवं सांस्कृतिक स्तर पर श्रेष्ठ मानकर अपने जीवन, यहां तक कि खानपान और रहनसहन जैसे रोजमर्रा के कार्यकलापों को भी उनके हवाले कर दिया था? क्या वह वर्ग बौद्धिक स्तर पर सचमुच इतना पिछड़ा हुआ था कि रोजमर्रा के सामान्य प्रश्नों का समाधान भी अपने बूते न खोज सके? असलियत ठीक इसके उलट है. दमित वर्गों में कमी न तो योग्यता की थी, न ही कार्यकौशल की. ये गुण तो उनमें भरपूर थे. समाज की समृद्धि तथा शिखर का वैभवविलास इन्हीं वर्गों के हुनरमंदों और मेहनतकशों के श्रमकौशल की देन था. कमी अपने बुद्धिचातुर्य और सृजनसामर्थ्य का उपयोग अपने और अपने जैसे दूसरे लोगों के लिए करने के बजाय, अपना निर्णयसामर्थ्य दूसरों के हक में बलिदान कर देने की थी. मेहनत को अपना धर्म और विपन्नता को नियति मान लेना उन्हें इतना महंगा पड़ा कि गुलामी का दौर पीढ़ीदरपीढ़ी चलता रहा.

यह सब उन्होंने अपनी मर्जी से नहीं किया था. बल्कि सब कुछ ब्राह्मणवादियों की सोचीसमझी कार्ययोजना का हिस्सा था. जब तक अर्थव्यवस्था पशुबल तथा जंगलों पर निर्भर थी, तब तक ब्राह्मणवाद को पनपने का अवसर नहीं मिल पाया था. अस्थिर जीवन में न तो स्थायी देवताओं के लिए गुंजाइश थी, न ही ईश्वर की. पशु, पक्षी, पेड़, पौधे आदि में से जिससे भी सामूहिक मन मिल जाए, उसी को कबीला अपना ‘टोटम’ मान लेता था. सो जब तक यायावरी जीवन रहा, तब तक ‘टोटमवाद’ भी समाज में जगह बनाए रहा. कालांतर में समाज ने जैसे ही कृषिआधारित अर्थव्यवस्था की ओर कदम रखा, कार्यविभाजन के नाम पर ब्राह्मण को समस्त संसाधनों का स्वामी तथा क्षत्रिय को उनका संरक्षक घोषित कर दिया गया. कहा यह गया कि कार्यविभाजन पूरी तरह से योग्यता पर आधारित होगा. कुछ समय के लिए विभिन्न वर्गों के बीच आवागमन चला. ब्राह्मण की संतान ने क्षत्रिय और वैश्य का धंधा अपनाया तो उसका उल्टा भी देखने को मिला. मगर कोई भी आसानी से प्राप्त सुविधाओं को छोड़ने को तैयार न था. धीरेधीरे वर्णाश्रम व्यवस्था रूढ़ होकर जाति में ढलने लगी. इसी के साथ समाज के कुल संसाधनों पर मुट्ठीभर लोगों का अधिपत्य होने लगा. आजीविका के लिए दूसरे वर्गों पर निर्भरता ही बहुसंख्यक वर्ग की लंबी दासता तथा उत्पीड़न का कारण बनी. वर्चस्व को स्थायी बनाने के लिए अभिजात शीर्षस्थों ने हर वह काम किया, जिसे वे कर सकते थे. उत्पादकता पर समाज के बाकी वर्गों का दावा न रहे, इसके लिए नियति को बीच में लाया गया. इस कार्य में धर्म उनका मददगार बना. उसकी सहायता से लोगों के दिमाग में यह भर दिया गया कि उनकी दुर्दशा उनके पूर्वजन्म के कर्मों की देन है. यदि वे समाज द्वारा तय मर्यादा का पालन नहीं करते हैं तो कर्मफल के रूप में त्रासदी का सिलसिला आगे भी चलता रहेगा.

आरंभ में सामाजिक विभाजन त्रिस्तरीय था. ब्राह्मण और क्षत्रिय के अलावा बाकी सब शूद्र थे. ढाई हजार वर्ष पहले बौद्ध धर्म के उद्भव के पश्चात, समाज में नए शिल्पकार वर्ग का उदय हुआ जो व्यापार के माध्यम से धनार्जन में निपुण था. धीरेधीरे अनुकूल अवसर मिलते ही वह वर्ग इतना सशक्त हो गया कि ऊपर के दोनों वर्गों द्वारा उनकी उपेक्षा करना संभव न रहा. तब त्रिस्तरीय वर्णाश्रम व्यवस्था के स्थान पर चातुर्वर्ण्य समाज को मान्यता देनी पड़ी. लोग असलियत को समझे बिना केवल परंपरापोषी तथा अनुगामी बने रहें, इसके लिए मनु के विधान में शिक्षा एवं संसाधनों पर कुछ वर्गों का विशेषाधिकार घोषित किया गया. ब्राह्मण व्यवस्था के शिखर पर था और समाजहित में सोचने तथा नियम बनाने का अधिकार केवल उसके पास था. उचित यही था कि वह समाज के विश्वास और सौंपे गए कर्तव्यों पर खरा उतरता. लेकिन संस्कृति के हर प्रतीक, रूपक, घटना और चरित्र की व्याख्या उसने केवल अपने स्वार्थ को केंद्र में रखकर की. बाकी दो वर्गों की मदद से उसने खुद को इतना शक्तिशाली बना लिया कि चौथा वर्ग जो संख्या में बाकी तीन वर्गों की कुल संख्या का कई गुना था, वह शक्ति एवं संसाधनों के मामले में निरंतर कमजोर पड़ता गया. धीरेधीरे लोग हालात से समझौता करने लगे. आज स्थिति यह है कि भारतीय संस्कृति में शोषित एवं शोषक दोनों के चेहरे एकदम साफ नजर आते हैं. पाखंडी पंडितों द्वारा दिया गया परलोक का प्रलोभन यथास्थितिवादियों के लिए इतना फला है कि लोग कल के मिथ्या सुख के बदले अपने आज का सुखचैन और कमाई खुशीखुशी अर्पण कर देते हैं.

अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए ब्राह्मणवाद धर्म और संस्कृति को औजार बनाता है. उनके माध्यम से वह लोगों के दिलोदिमाग पर कब्जा जमाता है, फिर निरंतर उनका भावनात्मक और शारीरिक शोषण करता है. फासीवाद लोगों के दिलोदिमाग में भय का संचार करता है. इतना भयभीत कर देता है कि जनसाधारण अपने विवेक से काम लेना छोड़, केवल आदेश को ही कर्तव्य समझने लगता है. ताकत का भय दिखाकर वह लोगों को उसकी मनमानियां सहने के लिए मजबूर कर देता है. फासीवाद की उम्र अपेक्षाकृत कम होती है. वह व्यक्ति के दिलोदिमाग पर कब्जा तो करता है, लेकिन ऐसा कोई माध्यम उसके पास नहीं होता, जो देर तक प्रभावशाली हो. सत्ता बदलते ही उसका स्वरूप बदल जाता है. नहीं तो जनता स्वयं खड़ी होकर राजनीति के उस खरपतवार को समाप्त कर देती है. संस्कृति व्यक्ति को समाज का प्रदाय होती है और राजनीति उसका अपना वरण. सामाजिक इकाई के रूप में मनुष्य शेष सामाजिक इकाइयों के सहयोगसमर्थन से अपने लिए राजनीतिक दर्शन का चयन कर सकता है, अथवा वर्तमान स्वरूप में आवश्यक बदलाव प्रस्तावित कर सकता है, जिन्हें वह अपने लिए तात्कालिक रूप से आवश्यक मानता है. संस्कृति में त्वरित परिवर्तन संभव नहीं होते.

निर्ब्राह्मणीकरण : क्यों और कैसे

संस्कृति के निर्ब्राह्मणीकरण जरूरत पर चर्चा करने से पहले आवश्यक है कि ब्राह्मणीकरण की प्रक्रिया को समझ लिया जाए. इसे तुलसी से बेहतर शायद हमें कोई नहीं समझा सकता. उनकी प्रमुख कृति ‘रामचरितमानस’ को साहित्य के रूप में पढ़नेपढ़ाने की परिपाटी रही है. विद्यालयों, महाविद्यालयों से लेकर शोध के उच्चतम स्तर तक उसे साहित्य के गौरव से नवाजा जाता है. लोकजीवन में भी ‘मानस’ की चौपाइयां रूढ़ि, परंपरा और भाग्यवाद से डरेसहमे लोगों के मार्गदर्शन के काम आती हैं. सवाल है कि क्या यह पुस्तक साहित्यकर्म को साधती हैं? क्या इसे ऐसी ही मंशा के साथ रचा गया था? क्या यह मनुष्य के मौलिक सोच को विस्तार देने, उसे प्रश्नाकुल बनाने का काम करती है? यदि धार्मिक आग्रहों से परे हटकर सोचा जाए तो क्या इस पुस्तक को साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है? हमारा आक्षेप तुलसी के काव्यसामर्थ्य पर नहीं है. उनमें भरपूर कवित्व रहा होगा. लेकिन वे कविधर्म को भी समझते थे, यह बात दावे के साथ नहीं कही जा सकती. यहां हम केवल उनकी काव्यरचना के मर्म तथा उद्देश्य पर विचार करने जा रहे हैं.

संस्कृत में साहित्य को परिभाषित करते हुए कहा गया है—‘सहितस्य भावः साहित्यम्.’ अर्थात जो सभी को साथ लेकर चले, जिसमें सभी के हितसाधन का भाव हो—वही ‘साहित्य’ है. साहित्य का विचारक्षेत्र न केवल संपूर्ण प्राणिजगत, अपितु जड़, चेतन और वह सबकुछ है, जिससे प्राणिमात्र का हित प्रत्यक्ष या परोक्ष किसी भी रूप में जुड़ा है. लेकिन तुलसी जब कहते हैं—‘पूजिये विप्र ज्ञानगुन हीना. पूजिये न शूद्र ज्ञान परवीना.’(ज्ञानगुण विहीन ब्राह्मण भी पूजनीय है. ज्ञान और गुण की खान होने के बावजूद शूद्र की पूजा नहीं की जानी चाहिए); अथवा जब वह लिखते हैं—‘शापत ताड़त परुष कहंता. विप्र पूजि अस गावहिं संता.’(संतजन कहते हैं कि शाप देने वाला, प्रताड़ित करने वाला, अपशब्द कहने वाला ब्राह्मण भी पूजा के योग्य है)—उस समय वे स्वयं को लोककवि के बजाय ‘द्विजजनों का चारण’ सिद्ध कर रहे होते हैं. संवेदना साहित्य की पूंजी होती है. सर्वहित की भावना उसे निष्पक्ष बने रहने को प्रेरित करती है. तुलसी का यह लिखना—‘अधम जाति में विद्या पाए. भयहु यथा अहि दूध पिलाए.’(अधम जाति में जन्मे व्यक्ति को शिक्षा देना विषधर को दूध पिलाने जैसा अपकर्म है)—भी घोर आपत्तिजनक है. साहित्यकार का कर्तव्य ऐतिहासिक तथ्यों को ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर देना नहीं है. वस्तुनिष्ठ विवेचन इतिहासकार के लिए जरूरी हो सकता है. साहित्यकार का काम प्रत्येक घटना और चरित्र पर मानवतावादी दृष्टि से विचार करना तथा उन्हें इस तरह प्रस्तुत करना है, ताकि वे मनुष्यता का अधिकतम हित साध सकें. ‘रसेन सहितं साहित्यम्’—यानी साहित्य वह है जिसमें रागात्मकता और सर्वहित का भाव हो.’ साहित्यत्व की कसौटी पर न केवल ‘रामचरितमानस’ बल्कि तुलसी का बाकी साहित्य भी कहीं नहीं टिकता. शंबूक की हत्या का प्रसंग हो या स्त्री और शूद्रों को लेकर तुलसी की दृष्टि, इन सबसे वे ब्राह्मणवाद के सबसे मुखर कवि नजर आते हैं. ऐसी विभेदकारी व्यवस्थाओं के बावजूद ‘रामचरितमानस’ को पंचम वेद के रूप में समाज में प्रचलित करना ही साहित्य और संस्कृति दोनों का ब्राह्मणीकरण है.

जो काम तुलसी ने ‘रामचरितमानस’ में किया, वही सूर तथा कृष्ण भक्ति परंपरा के अन्य कवियों ने कृष्ण को ब्राह्मणवादी परंपरा में ढालकर किया. ऋग्वेद के आठवें मंडल में इंद्रकृष्णासुर संग्राम का वर्णन है. ऋग्वैदिक कृष्ण यदु कबीले का मुखिया है. वह द्रुतगामी(तीव्रता से प्रयाण करने वाला), दस सहस्र सेनाओं का नायक, चतुर योद्धा, कुशल रणनीतिकार भी है जो अंशुमति (यमुना) नदी के तट पर दीप्तिमान होकर निर्भीक विचरण करता है(ऋग्वेद-8/96/13-15). ऋग्वेद में देवताओं के लिए ‘देव’ तथा ‘असुर’ दोनों प्रकार के संबोधन मिलते हैं. वहां असुर का अर्थ देवता और अनिष्ठ दूर करने वाला भी है. कुछ स्थानों पर ‘वरुण’ को भी ‘असुर’ कहा गया है. मित्र अर्थात सूर्य के लिए ‘सुर’ और ‘असुर’ दोनों प्रकार के संबोधन ऋग्वेद में प्राप्त होते हैं. इससे अनुमान लगाया जाता है कि आरंभिक ऋग्वैदिक काल में देवताओं के लिए ‘सुर’ संबोधन उतना रूढ़ नहीं हुआ था, जितना आगे चलकर देखने को मिला. ‘कृष्ण’ के प्रति ‘कृष्णासुर’ संबोधन को भी इसी रूप में लेना चाहिए. ऋग्वैदिक कृष्ण आर्यअनार्य संघर्ष में भील तथा दूसरी जनजातियों के साथ मिलकर इंद्र को टक्कर देता है. ऋग्वेद में ही दस गणराज्यों तथा सुदास के बीच घमासान युद्ध का भी उल्लेख है. उसमें सुदास देवताओं की मदद से विजयी होता है. सुदास आर्य सम्राट था. जबकि प्रतिपक्ष में आर्यअनार्य दोनों सम्मिलित थे. इससे संकेत मिलता है कि वर्चस्व की लड़ाई आर्य राजाओं के बीच भी थी. कृष्णासुरइंद्र संग्राम में भी आर्यों की विजय होती है. ये तथ्य ऋग्वैदिक कृष्ण को अनार्य नायक सिद्ध करते हैं.

कृष्ण का दैवीकरण उसके लगभग एक सहस्राब्दी बाद ही संभव हो सका. आर्यों से युद्ध में पराजित यदु, पुरू, यक्ष, अज आदि प्राचीन कबीले उत्तरपश्चिम की ओर प्रयाण कर जाते हैं. 1000-1500 ईसा पूर्व में गंगायमुना के दोआब में पुनः विकसित संस्कृति उभरती है. यदु कबीले के वंशजों ने मथुरा और उसके आसपास बड़े राज्यों की स्थापना की थी. उन्हें अब भी अपने महानायक कृष्ण में आस्था थी. ईसा पूर्व चौथी शताब्दी से ही भारत पर विदेशी आक्रमण होने लगे थे. तब ब्राह्मणवादी सत्ताओं को बड़े राज्य बनाने की सुध आई. यह कार्य यदुओं को, जो उस समय तक संगठित ताकत का रूप ले चुके थे, साथ लिए बिना संभव न था. सांस्कृतिक दूरियों को मिटाने के लिए यदुओं के आर्यकरण की शुरुआत हुई. उस समय तक वैदिक देवता इंद्र अपनी व्यभिचारी प्रवृत्ति के कारण काफी बदनाम हो चुका था, और उसके साथ यदुओं की अनेक कड़वी स्मृतियां जुड़ी थीं, इसलिए वह सम्मिलन इंद्र के प्रधान देवता पद पर रहते हुए असंभव था. अतः पुराने देवताओं विशेषकर इंद्र का मोह छोड़ते हुए आर्यों ने त्रिवेद(चौथे वर्ग की भांति चौथा वेद भी बहुत बाद में, ईस्वी संवत आरंभ होने के आसपास रचा गया) और त्रिवर्ण की युति के आधार पर त्रिदेवों ब्रह्मा, विष्णु और शिव जैसे नए देवताओं की कल्पना की. इस कल्पना में भी अनार्य जातियों को ब्राह्मणीकरण की परिसीमा में लाने के बंदोबस्त थे. देवत्रयी में ‘शिव’ शस्त्र संधान में पारंगत किरात, भील, यक्ष, शंबर आदि अनार्य जातियों के सर्वमान्य मुखिया और अजेय महानायक का प्रतिनिधित्व करते थे. उन्हें त्रिदेवों में ‘संहार का देवता’ घोषित किया गया है. ‘संहार का देवता’ ही क्यों? दरअसल देवत्रयी में शिव भारत की जिन आदिम जातियों का प्रतिनिधित्व करते थे, वे युद्धकला में निपुण थीं. शिव को नाराज करना संगठितशक्तिशालीयुद्धकला में पारंगत आदिमजातियों की शत्रुता मोल लेना था, जो विदेशी आक्रामकों का भय झेल रही सत्ताओं के लिए आसान नहीं था. यह तत्कालीन ब्राह्मणों के हृदय में आदिम जातियों के प्रति बैठे भय को भी दर्शाता है.

देवत्रयी में दूसरा स्थान विष्णु को मिला. उन्हें सृष्टि का पालक देवता कहा गया. इस कार्य के लिए वे अवतार भी लेते हैं. अवतारवाद किसी सम्राट द्वारा सीधे अथवा दैवी व्यक्तित्व के नेतृत्व में बड़े राज्य की स्थापना तथा उसमें नई(धार्मिक) व्यवस्था लागू करने का प्रतीक है. ‘कृष्ण’ को देवत्व से नवाजने के लिए उन्हें विष्णु का अवतार घोषित किया गया. ब्रह्मा को सृष्टि का रचियता कहा गया. वह ब्राह्मण का प्रतीक था. चूंकि ब्राह्मण उत्पादकता से जुड़ा कोई कार्य नहीं करते इसलिए त्रिदेवों में सृष्टि रचना के बाद ब्रह्मा की भूमिका भी निष्क्रय रह जाती है. कृष्ण का आर्यकरण उनके चरित्र में आमूल परिवर्तन का वाहक बना. ‘महाभारत’ में कृष्ण का जो रूप मिलता है, वह लगभग एक ईस्वी पूर्व की ब्राह्मणवादी कल्पना है. चाणक्य बड़े राज्यों का समर्थक था. ‘अर्थशास्त्र’ में उसने गणराज्यों की आलोचना की. लिखा है कि गणराज्यों में युवा जुए के व्यसनी हो जाते हैं. कृष्ण की प्राचीन स्मृतियां गणराज्यों के मुखियापद से जोड़ती हैं. जबकि महाभारत में उसे चाणक्य की भांति ‘वृहद राष्ट्र्र’ का प्रबल समर्थक दर्शाया गया है. नए अवतार में कृष्ण से वह सब कराया जाता है, जिसके विरोध में उसने इंद्र से संघर्ष किया था. ‘महाभारत’ के युद्ध में भील योद्धा एकलव्य तथा असुर महायोद्धा बर्बरीक दोनों ही कौरवों के पक्ष में युद्ध करने को उद्धत थे. अवतरित कृष्ण एकलव्य की छलपूर्वक हत्या करता है, साथ ही अनार्य महायोद्धा बर्बरीक को भी आत्महत्या के लिए उकसाता है. कृष्ण का यह रूपांतरण यदुओं तथा अनार्य जातियों के बीच द्वेषभाव बढ़ाने के लिए आवश्यक था. आशय है कि यदुओं को कृष्ण के ब्राह्मणीकरण की कीमत चुकाने के लिए उन्हीं देवताओं की शरणागत होना पड़ा था, जिनके सेनापति इंद्र ने उनके पूर्वज कृष्णासुर की हत्या की थी; और जिसके कारण उन्हें अपने मूल स्थान को छोड़ उत्तरपश्चिम में प्रवजन करना पड़ा था.

कृष्ण का उदाहरण हमने ऊपर दिया. देखा कि ब्राह्मणीकरण की प्रक्रिया केवल घटनाओं के वर्गीय प्रस्तुतीकरण तक सीमित नहीं रहती. उसमें चरित्रों के साथ भी जमकर घालमेल किया जाता है. हर अच्छी बात का उत्स देवताओं को बताने की धुन में सत्य के साथ मनमाना व्यवहार किया जाता है. प्रायः दावा किया जाता है कि देवता सात्विक होते हैं. कि मनसावाचाकर्मणा सात्विकता के विभिन्न रूप देवताओं की प्रेरणा से ही बने हैं. कि शुभत्व का एकमात्र स्रोत देवगण हैं. सात्विकता देवताओं में है, इसी कारण वह संसार में भी है. ये बातें ऋग्वेद में वर्णित देवताओं के चरित्र तथा उत्तरवर्ती गं्रथों में देवसभा एवं अमरपुरी के वैभवपूर्ण उल्लेखों से मेल नहीं खाती. बावजूद इसके उदार एवं करुणामय मनुष्य को ‘देवता’ संबोधित करने की प्रथा प्राचीनकाल से चलती आई है. जबकि परंपरा में जो धत्तकर्म दैत्य के बताए जाते हैं, असलियत में वही कार्य ब्राह्मणवादियों के देवता भी करते हैं. उनके देवता कदमकदम पर छल करते हैं, दूसरों की स्त्रियों को बलत्कृत करते हैं. भेंटपूजा पाकर प्रसन्न होते हैं. यदि मनमाफिक चढ़ावा न मिले तो कुपित हो जाते हैं. तुलना करें तो उनके देवता और नकचढ़े सामंत में कोई अंतर ही नहीं है. क्या यह महज संयोग है कि बृहश्पति जो देवताओं के गुरु हैं, वही लोकायत दर्शन के प्रणेता भी हैं? देवसभाओं में अप्सराओं का नृत्यगायन, देवताओं की मौजमस्ती तथा सोमपान, चार्वाकों की ‘खाओपीओ मौज करो’ की विचारधारा को ही प्रतिबिंबित करता है. यानी ‘देवगुरु’ का दर्शन देवताओं की दिनचर्या से ही प्रेरित है. यह भी हो सकता है कि स्वयं देवता अपने गुरु के दर्शन के अनुगामी बने हों.

दूसरी ओर असुर गुरु शुक्राचार्य हैं, जिन्हें इतिहास, दंडनीति, नीतिशास्त्र का आदि व्याख्याकार बताया गया है. देवविधान में दंड की मात्रा पूर्णतः दंडाधिकारी की मनमानी पर निर्भर करती है. जबकि दंडविधान में अपराध की समीक्षा की संभावना भी निहित रहती है. जाहिर है सभ्यता के इन क्षेत्रों में भी असुर आर्यजनों से काफी आगे थे. लंका पहुंचे हनुमान को वहां एक भी दास दिखाई नहीं पड़ता. जबकि अयोध्या, मिथिला आदि में दासदासियों की भरमार है. अनार्यों की समृद्ध सभ्यता के बारे में ऋग्वेद में पर्याप्त वर्णन हैं. वे अपनी बढ़ीचढ़ी सभ्यता के साथ दुर्गों में रहते थे. उनके दुर्ग लोहे(2/58/8) के, पत्थर(4/30/20) के, लंबेचौड़े गौओं से भरे हुए(8/6/23) थे. सौ खंबों वाले(शतभुजी 1/16/8, (7/15/14) दुर्ग का उल्लेख भी ऋग्वेद में है. ‘महाभारत’ की ख्याति प्राचीन भारतीय राजनीतिक दर्शन पर गंभीर विमर्श के कारण भी है. हस्तिनापुर का राज्य संभालने से पहले युधिष्ठिर भीष्म के पास राजनीति का ज्ञान लेने जाता है. शुक्राचार्य के ज्ञान की महिमा इससे भी जानी जा सकती है कि युधिष्ठिर को राजनीति का पाठ पढ़ाने वाले भीष्म शुक्राचार्य के ही शिष्य हैं. उनके शिष्यों में दूसरा नाम पृथु का भी आता है, जिसे प्रथम निर्वाचित सम्राट वेन का पुत्र तथा पृथ्वी का प्रथम मनोनीत सम्राट कहा गया है. दूसरे किस्सेकहानियों की भांति शुक्राचार्य से जुड़ी कहानियां भी मिथ हो सकती हैं. कदाचित उनमें से अनेक हैं भी. फिर भी उनकी अपनी महत्ता है. क्योंकि भारत जैसे समाजों में जहां तर्कबोध, विज्ञानबोध की कमी हो, जनजीवन मिथों से ही प्रेरणा लेता है. बहरहाल आचार्य बृहश्पति तथा शुक्र के क्रमशः चार्वाक पंथ और दंडनीति का व्याख्याकार होने से क्या यह नहीं लगता कि ब्राह्मणवादी लेखकों ने अपने ग्रंथों में सुरों और असुरों की चारित्रिक विशेषताओं को पूरी तरह उल्टापल्टा है. कई बार तो ठीक 180 डिग्री का मोड़ देकर पेश किया है.

ऐसी उपलब्धियों के बावजूद असुरों को कामी, लोभी, लालची, व्यसनी और झगड़ालू दर्शाने वाले विवरण धर्मग्रंथों में भरे पड़े हैं. दुर्व्यसन के लिए ‘आसुरी वृत्ति’ लोकप्रचलित मुहावरा है. ‘सात्विक’ देवता चाहे जो दुराचरण करें, उनका देवत्व नष्ट नहीं होता. प्रायः उसे ‘लोककल्याण के निमित्त’, ‘धर्मसंस्थापनार्थायः’ मान लिया जाता है. असुर सम्राट जलंधर की भार्या वृंदा के साथ दुराचरण करने के बावजूद विष्णु का देवत्रयी में सम्मानजनक स्थान बना रहता है. ना ही ऋषिपत्नी अहिल्या के साथ बलात्कार करने पर इंद्र का देवत्व संकट में पड़ता है. उल्टे अहिल्या को ही शिलाखंड जैसा जीवन जीना पड़ता है. भाषा का खेल भी खूब खेला जाता है. देवता नशा करें तो ‘सोमपान’ और असुर करें तो मदिरापान. सोमपान से देवताओं की सात्विकता पर संकट नहीं आता, परंतु मदिरापान से असुर बदचलन और तिरस्कारयोग्य मान लिए जाते हैं. कारण समझने के लिए ज्यादा माथापच्ची की आवश्यकता नहीं है. समस्त धर्मग्रंथ ब्राह्मणों द्वारा रचे गए हैं. उनके अपने हित विभेदकारी व्यवस्था से जुड़े थे. इसलिए उनके द्वारा गढ़ी गई संस्कृति में समानता एवं सर्वसम्मति के अवसर बहुत कम हैं. जिधर देखो उधर उसका सर्वसत्तावादी रूप नजर आता है. यह सर्वसत्तावाद कदाचित अनार्य संस्कृति के अग्रपुरुषों को भी ललचाने लगा था. इसलिए जब आर्यों का आक्रमण हुआ तो अनेक अनार्य योद्धा भी उनके साथ मिल गए. सुदास और दस राजाओं का युद्ध आर्यों के बीच वर्चस्व की लड़ाई थी. उसमें सुदास का नेतृत्व वशिष्ट तथा दसराज्ञों का नेतृत्व विश्वामित्र द्वारा किया गया था. मगर दस राजाओं में अज, शिब्रु, शिम्यु, यदु, यक्षु आदि अनार्य कबीले भी सम्मिलित थे. इस तरह भारत को आर्यवर्त्त बनाने में अनार्य योद्धाओं का भी भरपूर योगदान था. हिरण्यकश्यपु पुत्र प्रहलाद भी इन्हीं में आता है. उसने विष्णु को अपना ईष्ट मानकर अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह में ब्राह्मणवादियों का साथ दिया था. विभीषण, हनुमान, जटायु जैसे पात्र महाकाव्यीन लेखकों की कल्पना की उपज रहे होंगे. संभव है उनसे मिलतेजुलते पात्र समाज में सचमुच रहे हों, जिन्होंने आर्यसंस्कृति से प्रभावित होकर उनके साथ मिलना स्वीकार किया हो. आर्यों की श्रेष्ठता को दर्शाने के लिए ऐसे मिथकीय पात्रों की कल्पना आवश्यक थी. जिसमें उन्हें भरपूर सफलता भी मिली थी. ब्राह्मणीकरण की यह प्रक्रिया बहुत धीमे, युगों तक चली थी. इसके लिए आर्यों को अनगिनत युद्ध लड़ने पड़े और समझौते भी करने पड़े.

स्वाभाविकसा प्रश्न है कि असुर सभ्यता यदि इतनी ही विकसित थी, तो उसका पतन कैसे हुआ? इसका एक कारण यह जान पड़ता है कि आर्यों के आगमन के पूर्व विभिन्न कबीलों के बीच गणतांत्रिक व्यवस्था थी. भूक्षेत्र समृद्ध था. इसलिए सभी अपनेअपने प्रांत में सुखपूर्वक रहते थे. खेती में वे पारंगत थे. हड़प्पा सभ्यता में मिले भंडारगृहों से संभावना जगती है कि किलों का उपयोग सामरिक उद्देश्यों के बजाय, बचे हुए अनाज के भंडारण हेतु किया जाता था. खुद को सुरक्षित मान वे प्रायः निश्चिंत रहा करते थे. इसलिए जब आर्यों की ओर से आक्रमण हुआ तो वे एकाएक स्वयं को संभाल न सके. कालांतर में आर्यों के संपर्क में आकर उनमें भी साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाएं पनपने लगी थीं. इसलिए आक्रामकों का एकजुट सामना करने के बजाए वे बंटकर अपने ही लोगों के विरुद्ध मोर्चा संभालने लगे. दुष्परिणाम यह हुआ कि उन्हें समृद्ध सिंधु प्रदेश छोड़, उत्तरपश्चिम और दक्षिण की ओर पलायन करना पड़ा. परास्त होकर या आर्यों के आक्रमण के भय से अनेक अनार्य जातियों ने समझौता कर लिया. धीरेधीरे वे ब्राह्मणीकरण के दायरे में सिमटने लगे. बावजूद इसके इतिहास में कभी ऐसा नहीं हुआ जब सभी ने ब्राह्मणीकरण के आगे हथियार डाल दिए हों. न ही कभी ऐसा हुआ जब किसी युद्ध में सारे आर्य या अनार्य किसी एक पक्ष में रहे हों. रावण, महिषासुर, हिरण्याक्ष, हिरण्यकश्यपु, बालि, बलि जैसे कुछ स्वाभिमानी अनार्य सम्राटों की लंबी कतार है, जो अपने मानसम्मान की खातिर आर्यों से आजीवन संघर्ष करते रहे. यदि उस संघर्ष का निष्पक्ष भाव से दस्तावेजीकरण किया गया होता तो भारतीय संस्कृति का स्वरूप कदाचित उतना विभेदकारी नहीं होता, जितना कि आज है.

अनार्य संस्कृति के पराभव का मूल कारण उसके राजाओं की सैन्य दुर्बलता न होकर, अपनी संस्कृति और इतिहास के दस्तावेजीकरण की ओर से उदासीन हो जाना था. जबकि आर्यगण जिन दिनों तक लेखनकला का विकास नहीं हुआ था, उन दिनों भी स्मृतिभरोसे इस कर्तव्य को निभाते रहे. लेखनकला का विस्तार होने के पश्चात उन्होंने प्रत्येक ऐतिहासिक प्रसंग का वर्णन अपने स्वार्थ को ध्यान में रखकर किया. यहां तक कि असुरों की उपलब्धियों और खोजों को भी अपने नाम करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी. उन्होंने संस्कृति को मूल माना और पीढ़ीदरपीढ़ी अनेकानेक प्रतिभाशाली लेखक अपने नाम से स्वतंत्र ग्रंथ रचने का मोह छोड़, बिना किसी यशलाभ की अपेक्षा के, पहले से उपलब्ध धर्मशास्त्रों में ही जोड़घटाव करते रहे. अनेक लोगों द्वारा, अलगअलग समय में लिखे जाने के कारण धर्मशास्त्रों में भारी दोहराव है. अंतर्विरोध और असंगतियां भी हैं. परंतु वे इन्हें कमजोरी नहीं मानते. तर्कशीलता के अभाव को ढांपने के लिए उन्होंने आस्था और विश्वास पर जोर दिया. धर्मशास्त्रों पर किसी भी प्रकार के अविश्वास को पाप मानते हुए वे शब्द के स्वयंप्रमाण होने की घोषणा करते रहे. इससे नए ज्ञान के अवसर कम हुए. मनुष्य की स्वाभाविक प्रश्नाकुलता पर भी विराम लगा. लेकिन ब्राह्मणवाद या जिस सर्वसत्तावादी ध्येय के निमित्त उन शास्त्रों की रचना हुई थी, उसमें उन्हें भरपूर कामयाबी मिली.

ब्राह्मणवाद : वर्चस्व की सनातनी परंपरा

संस्कृति मनुष्य की सामाजिक संरचना का आधार होती है. समाज में मनुष्य की पहचान संस्कृति के अलावा शिक्षा, उत्पादन के साधनों आदि से भी होती है. बावजूद इसके समाज का बड़ा हिस्सा अपनी सांस्कृतिक पहचान को ही वास्तविक पहचान माने रहता है. इसलिए वह सांस्कृतिक परिवर्तन के लिए एकाएक तैयार नहीं होता. यहां तक कि सांस्कृतिक अंतर्विरोधों, असमानताओं के आगे, उन्हें स्वाभाविक मान समर्पण किए रहता है. परिवर्तन संस्कृति में भी होते हैं. लेकिन वे कभी भी उस सीमा तक नहीं जा पाते कि समाज का तानाबाना ही छिन्नभिन्न हो जाए. चूंकि सांस्कृतिक प्रतीकों यहां तक कि विरोधाभासों, अंतर्विरोधों के प्रति भी मनुष्य का समर्पण स्वैच्छिक होता है, इसलिए सांस्कृतिक दासता राजनीतिक दासता की अपेक्षा कहीं अधिक टिकाऊ एवं प्रभावशाली होती है. लंबे समय तक केवल संस्कृतियां राज करती हैं. अतः दीर्घ काल तक राज करने की इच्छा रखनेवाला राजनीतिक हमलावर सबसे पहले विजित संस्कृति की उन विशेषताओं पर हमला बोलता है, जो उसे स्वतंत्र संस्कृति की मान्यता दे सकती हैं. यह कार्य आरंभ में बल प्रयोग द्वारा, बाद में सहमति तथा तरहतरह की कूटनीतिक चालों द्वारा किया जाता है. संस्कृति और मनुष्य का संबंध इतना गहरा होता है कि मनुष्य संस्कृति के अंतर्विरोधों को भी अपने व्यक्तित्व का हिस्सा मानकर आत्मसात कर लेता है. भारतीय संस्कृति का ब्राह्मणवाद के ढांचे में ढल जाना इसी प्रवृत्ति को दर्शाता है.

हिंदुत्व ब्राह्मणवाद का रुपहला पर्याय है. शानदार खिड़की जिसके पीछे वह अपने कुटिल चेहरे को छिपाए रखता है. इस हिंदुत्व को न्यायालय ने जीवनपद्धति भी माना है. दोष न्यायालय का नहीं है. लोकतंत्र में लोगों की इच्छा का महत्त्व होता है. यदि समाज का बहुसंख्यक वर्ग ब्राह्मणवाद की विभेदकारी व्यवस्थाओं के प्रति आंख मूंदकर, चाहेअनचाहे उसके रंग में रंगा हुआ है, तो न्यायालय इसमें क्या कर सकता है! उसका काम तो सिरों की गिनती करने से चल जाता है. अदालत के लिए वही सत्य होता है, जिसके पक्ष पर्याप्त साक्ष्य हों. गवाह बेमन से गवाही दे, या जानबूझकर गलतबयानी करे, चाहे सवाल को ढंग से समझे बिना सिर्फ हांहू करता जाए तो न्यायालय क्या करे! आदमी आलू भी खरीदने जाता है तो मंडी में चार जगह देखता है. मोलभाव और जांचपरख करता है. चाहे एक वक्त की खरीदारी हो या एक सप्ताह की—एकएक आलू को छांटकर खरीदता है. लेकिन धर्म जो उसके अपने और आने वाली पीढ़ियों के जीवन को प्रभावित करता है, उसके बारे में कभी कोई सवालजवाब नहीं करता. सवाल करना भी पाप समझता है. बात आ पड़े तो बिना सवालजवाब किए ही मरनेमारने पर उतारू हो जाता है, क्यों? कदमकदम पर एकदूसरे की आलोचना करने वाले, सर्वश्रेष्ठ होने का दावा करने वाले धर्मों में एक मुद्दे पर कमाल की सहमति होती है. मुद्दा है जन्म के साथ ही मनुष्य का धर्म तय कर दिया जाना. हर धर्म अपने समर्थकों के सिर गिनता है. सिर में मस्तिष्क भी हो, और मस्तिष्क अपना काम भी करे, इस ओर वह कभी ध्यान नहीं देता. जानता है कि इस ओर ध्यान देना शुरू किया तो चार दिन में सारी दुकानदारी बैठ जाएगी. इसलिए पुरानी शराब की भांति हर धर्म नशे के सामर्थ्य और उसके बहाने अपने कारोबार को बढ़ाता चला जाता है.

बहरहाल, बात हिंदुत्व और उसे जीवनपद्धति बताए जाने की हो रही थी. हिंदुत्व यदि जीवनपद्धति है तो मनुष्य को जो आजादी अपनी जीवनपद्धति को चुनने की होनी चाहिए, वैसी आजादी क्या यह धर्म देता है? कथित सनातनी हो या गैरसनातनी, हिंदू परिवारों की सामान्य जीवनचर्या मिलीजुली होती है. हर परिवार में कोई आला या कोना ‘मंदिर’ के नाम पर आरक्षित होता है. प्रत्येक घर में मूर्तियों को नहलाया जाता है. सुबहशाम की आरती, पूजाबंदन बिना नागा चलता है. जब तक पत्थर की मूर्ति से छुआ न लें, घर के सदस्य विशेषकर स्त्रियां अन्नजल तक ग्रहण नहीं करतीं. मंदिर में कागज, पत्थर, कांच, मिट्टी, लकड़ी या प्लास्टिक के आड़ेतिरछे, भांतिभांति के देवता आसन जमाए रखते हैं. हर घर में साल में एकदो बार ‘सत्यनारायण कथा’ कही जाती है. पंडित सारे कर्मकांड रचता है. परंतु कभी नहीं बताता कि बाबा ‘सत्यनारायण’ कौन हैं? उनका खानदान क्या है? किस हिंदू धर्मशास्त्र में उनका उल्लेख है? फिर भी डरीसहमी कुलललनाएं इस कथा के श्रवण से खुद को धन्य मानती रहती हैं. अब यह मत कहिए कि संकट के समय जरूरतमंद की मदद करना, सादा जीवन जीना, जीवमात्र पर दया करना, चोरीचकारी से परहेज रखना, सत्य वाचन, मातापिता का सम्मान करना और बुराइयों से दूर रहना हिंदुत्व हमें सिखाता है. ये सब बातें तो नैतिकता के हिस्से आती हैं. वही समाजीकरण का मुख्य आधार भी हैं. समाज के बीच जगह बनाने के लिए प्रत्येक धर्म चाहे वह मूर्तिपूजकों का हो या मूर्तिभंजकों का, इन सदाचारों को अपनाता है. इन्हें अपनाए बिना उसकी गति नहीं है. इसलिए अभिव्यक्ति का तरीका चाहे जो हो, हर धर्म में यही सदाचार सिखाए जाते हैं. इसे धर्म की धूर्त्तता कहें या बेईमानी, वह नैतिकता से उधार लिए इन सदाचारों को अपना बनाकर पेश करता है. इस तरह पेश करता है मानो धर्म है तो सदाचार हैं. असल में होता इसका उलटा है. मनुष्य धर्म को इसीलिए अपनाता है ताकि उसकी आने वाली पीड़ियां धर्म के साथ जुड़े शील और सदाचारों को अपनाएं. परंतु वह भूल जाता है कि शील और सदाचरण धर्म के बाहरी आवरण हैं. महज दिखावा, लोगों को प्रलोभन देने वाले. धर्म कोई भी हो. उसका मूल स्वरूप सामंतवादी होता है. समाजीकरण की अनिवार्यता धर्म नहीं, शील और सदाचरण हैं. यदि कहीं समाज है तो वहां धर्म भले ही न हो, समाजीकरण की प्रमुख शर्त के रूप में शील और सदाचरण रहेंगे ही. बिना धर्म के समाज गढ़ा जा सकता है, लेकिन बिना शील और सदाचार के उसका एक क्षण भी अस्तित्व में रहना मुश्किल है. आम हिंदू के लिए ‘हिंदुत्व’ नामक कथित ‘जीवनपद्धति’ का आशय मूर्तियों पर जल चढ़ाने, किसी न किसी देवता पर भरोसा करने, गाय को रोटी देने, व्रतउपवास रखने, पर्वत्योहार पर विधिसम्मत पूजनअर्चन करने जैसे कर्मकांडों तक सीमित है. ये सब ऐसे आयोजन हैं जिनमें ब्राह्मणों की प्रत्यक्ष या परोक्ष भूमिका बनी रहती है. दूसरे शब्दों में जिसे हिंदुत्व कहा जाता है, वह ब्राह्मणवाद का ही लौकिक विस्तार है. इसलिए हिंदुत्व का बने रहना, प्रकारांतर में ब्राह्मणवादी व्यवस्था का अस्तित्व में रहना है.

ब्राह्मणवाद’ को जीवित रखने के लिए उन्होंने अनेक षड्यंत्र रचे हैं. उनमें जनता द्वारा प्रथम निर्वाचित सम्राट वेन तथा महिषासुर की छलहत्या, एकलव्य का अंगूठा काट लेना, शंबूक की हत्या के बहाने उसके उत्तराधिकारियों को ज्ञान से वंचित कर देना जैसे उनके अनगिनत धत्तकर्म सम्मिलित हैं. चूंकि आरक्षण ने दलित एवं समाजार्थिक आधार पर पिछड़े वर्गों को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर दिया है, इसलिए वे उनके सबसे बड़े आलोचक हैं. जातिवाद को पीढ़ीदरपीढ़ी पोषते, उसके आधार पर अपने विशेषाधिकार गिनाते आए लोग आज उन वर्गों पर जातिवादी होने का आरोप लगा रहे हैं, जो शताब्दियों से जातीय उत्पीड़न का शिकार होकर इससे मुक्ति की कामना करते आए हैं. हिंदुत्व का उनका एजेंडा केवल धर्म तक सीमित नहीं है. इसे केवल धर्म से जोड़कर रखना परिवर्तनकामी शक्तियों की भारी भूल रही है. उनका असली एजेंडा संसाधनों पर मुट्ठीभर लोगों की इजारेदारी को मजबूत करना तथा उसे किसी भी चुनौती से बचाए रखना है. इसके लिए तरहतरह के टोटम, जादूटोने, पूजापाखंड समाज में लागू किए जाते हैं. जाति के आधार पर तीनचौथाई जनसंख्या को शूद्र या दलित बताकर जमीन तथा उत्पादन के अन्य संसाधनों से वंचित कर देने का अर्थ है—पंद्रहबीस प्रतिशत लोगों द्वारा समाज के कुल संसाधनों पर कब्जा. धर्म आधारित वर्चस्वकारी संस्कृति तथा जातिभेद के प्रति निरक्षर जनता का निःशर्त समर्पण उन्हें दीर्घजीवी बनाता है.

वर्चस्वकारी संस्कृति का जिक्र हुआ तो बता दें कि वह समाज को दो तरह से अपनी जकड़ में लेती है. पहले बलप्रयोग द्वारा, जिसमें शक्ति का उपयोग कर समाज के अधिकतम संसाधनों पर अधिकार कर लिया जाता है. दूसरे अपनी बौद्धिक प्रखरता के बल पर. उसके द्वारा पोषित बुद्धिजीवी प्रत्येक परिस्थिति को अपने स्वार्थ के अनुकूल ढालने में प्रवीण होते हैं. अपने बुद्धिचातुर्य के बल पर वे शेष जनसमाज को विश्वास दिला देते हैं कि केवल वही उनके सबसे बड़े शुभेच्छु हैं और जो व्यवस्था उन्होंने चुनी है वह दुनिया की श्रेष्ठतम सामाजिकराजनीतिक व्यवस्था है. ऐसा नहीं है कि जनसाधारण में बुद्धिविवेक की कमी होती है. ग्राम्शी की माने तो प्रत्येक व्यक्ति दार्शनिक होता है. लेकिन प्रत्येक व्यक्ति परिस्थितियों को अपने पक्ष में परिभाषित करने में दक्ष नहीं होता. इस कारण वर्चस्वकारी संस्कृति के समर्थक बुद्धिजीवियों पर विश्वास करना, जनसाधारण की मजबूरी बन जाता है. कभी हताशा तो कभी अज्ञान के चलते वह अपने शोषकों को ही अपना सर्वाधिक हितैषी और मुक्तिदाता मानने लगता है. ऐसे में परिवर्तन उसी दिशा में होता है, जिसका वास्तविक लाभ पूंजीपति और दूसरे एकाधिकारवादी संस्थान उठा सकें. स्थितियों में आमूल परिवर्तन तभी संभव है, जब गैर अभिजन समाज के अपने बुद्धिजीवी हों, जो उसकी समस्याओं और हितों की उसके पक्ष में सहीसही पड़ताल कर, प्रतिबद्धता के साथ उसका मार्गदर्शन कर सकें.

वर्चस्ववादी ब्राह्मण संस्कृति के पुनरीक्षण की शुरुआत हालांकि मध्यकाल में कबीर, रैदास, नानक जैसे संतकवियों द्वारा हो चुकी थी. लेकिन उनकी चिंता के केंद्र में केवल धार्मिक आडंबरवाद, छुआछूत तथा अन्यान्य सामाजिक रूढ़ियां थीं. आर्थिक असमानता जो बाकी सभी बुराइयों की जड़ है, को वे कदाचित मनुष्य की नियति मान बैठे थे. कबीर जैसे विद्रोही कवि ने भी संतोष को परमधन कहकर रूखीसूखी खाने, दूसरे की चुपड़ी रोटी देखकर जी न ललचाने की सलाह दी थी. वह गरीबी का महिमामंडन, दैन्य को आभूषण मान लेने जैसी चूक थी. रैदास ने जरूर ‘बेगमपुर’ के बहाने समानता पर आधारित समाज की परिकल्पना की थी. वह क्रांतिकारी सपना था, अपने समय से बहुत आगे का सपना, मगर उसके लिए उनका समाज ही तैयार नहीं था. जिन लोगों के लिए वह सपना देखा था वह इतना हताश हो चुका था कि शीर्षस्थ वर्गों की कृपा में ही अपनी मुक्ति समझता था. उस समय तक पश्चिम में भी यही हालात थे. वहां रैदास से दो शताब्दी बाद थामस मूर ने ‘बेगमपुर’ से मेल खाती ‘यूटोपियाई’ परिकल्पना की थी, जिसपर उसे स्वयं ही विश्वास नहीं था. इसलिए अपनी कृति ‘यूटोपिया’ में उसने समानताआधारित समाज की परिकल्पना पर ही कटाक्ष किया था. आगे चलकर, यूरोपीय पुनर्जागरण के दौर में यही शब्द आमूल परिवर्तन का सपना देख रहे लेखकों, बुद्धिजीवियों, आंदोलनकारियों और जनसाधारण का लक्ष्य और प्रेरणास्रोत बन गया. जबकि सामाजिक अशिक्षा और आत्मविश्वास की कमी के कारण रैदास के ‘बेगमपुर’ की परिकल्पना सूनी आंखों के सपने से आगे न बढ़ सकी थी. कुछ दिनों बाद उन लोगों ने ही उसे भुला दिया, जिन्हें उसकी सर्वाधिक आवश्यकता थी.

शताब्दियों बाद उस परिकल्पना को आगे बढ़ाने का काम फुले और डॉ. अंबेडकर ने किया. ग्राम्शी ने बुद्धिजीवी की जो परिभाषा उद्धृत की है, उस पर ये दोनों महामानव एकदम खरे उतरते हैं. उनकी प्रेरणा तथा लोकतांत्रिक अवसरों का लाभ उठाते हुए दलित बुद्धिजीवियों का एक वर्ग उभरा, जिसने ब्राह्मणवाद के विरुद्ध आवाज बुलंद की. इसी के साथसाथ पिछड़े वर्गों में भी राजनीतिक चेतना का संचार हुए. आबादी के हिसाब से पिछड़े पचास प्रतिशत से अधिक थे. कदाचित उनके नेताओं को लगता था कि उन्हें किसी बौद्धिक नेतृत्व की आवश्यकता नहीं है. उनमें कुछ उन दबंग जातियों में से भी थे, जो सामंती दौर में विप्र जातियों के ‘लठैत’ का काम करते आए थे. अपने ‘लट्ठपन’ पर उन्हें खूब भरोसा था. कदाचित यह गुमान भी था कि ‘बेलेट’ ने बात बिगाड़ी तो ‘लाठी’ से संभाल लेंगे. 1937 के चुनावों में कांग्रेस से मात त्रिवेणी संघ के पिछड़ी जाति के नेताओं ने यही तो कहा था—‘वोट से हार गए तो क्या हुआ. हमारी लाठी तो हमारे हाथ में है.’ इन्हीं कमजोरियों के कारण दलित और पिछड़े नेताबुद्धिजीवी वास्तविक सहयोगियों की पहचान करने में चूकते रहे. इसी का लाभ उठाकर वर्चस्वकारी संस्कृति के पैरोकार, दलितों और पिछड़ों को उनकी जाति की याद दिलाकर अलगअलग समूहों में बांटते रहे. पर्याप्त संख्याबल का अभाव दलितों के स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति बनने की बाधा था. नतीजा यह हुआ कि वर्चस्वकारी संस्कृति के विरुद्ध शोषितउत्पीड़ित वर्गों का कोई सशक्त मोर्चा न बन सका.

आज स्थिति बदली हुई है. शिक्षा और लोकतांत्रिक अवसरों का लाभ उठाकर दलितों और पिछड़ों में नया बुद्धिजीवी वर्ग उभरा है, जो न केवल अपने शोषकों की सहीसही पहचान कर रहा है, बल्कि अपने बुद्धिविवेक के बल पर उन्हें उन्हीं के मैदान में चुनौती देने में सक्षम है. वह जानता है कि जाति, धर्म, संस्कृति, राष्ट्रवाद आदि वर्चस्वकारी संस्कृति के वे हथियार हैं जिनका उपयोग अभिजन संस्कृति के पैरोकार अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए करते आए हैं. वह यह भी समझ चुका है कि कोरा राजनीतिक परिवर्तन केवल सत्तापरिवर्तन को संभव बना सकता है. आमूल परिवर्तन के लिए संस्कृति के क्षेत्र में भी बदलाव आवश्यक है. जानता है कि दलित और पिछड़ों के सपने, दोनों की समस्याएं यहां तक कि चुनौतियां भी एक जैसी हैं. उनके समाधान के लिए संगठित विरोध अपरिहार्य है. इस बात को शिखरस्थ वर्ग भी भलीभांति जानता है कि दलित और पिछड़े वर्गों की सामाजिकसांस्कृतिक और राजनीतिक एकता उसे सत्ता से हमेशाहमेशा के लिए बेदखल कर सकती है. उच्चशिक्षण संस्थानों से निकले ओबीसी, आदिवासी एवं दलित युवाओं का यही युगबोध वर्चस्वकारी संस्कृति के पैरोकारों को चिंता में डाले हुए है.

निर्ब्राह्मणीकरण : समानता आधारित समाज का सपना—बरास्ता महिषासुर आंदोलन

समानता और स्वतंत्रता के लिए वर्चस्वकारी संस्कृति से मुक्ति आवश्यक है. भारतीय समाज सामाजिकसांस्कृतिक स्तर पर बंटा हुआ है. अद्विज आज भी असमानता का दंश झेल रहे हैं. कारण किसी से छिपे नहीं है. ब्राह्मणवादी व्यवस्था मनुष्य को जन्म के साथ ही जाति और धर्म के खानों में बांट देती है. स्वतंत्र भारत में संवैधानिक प्रावधानों द्वारा इस अंतर को मेटने की कोशिश तो हुई, मगर सामाजिकसांस्कृतिक जकड़बंदी इतनी मजबूत है कि आजादी के 69 वर्ष बाद भी लोग उससे उबर नहीं पाए हैं. लोकतांत्रिक परिवेश ने उत्पीड़न का शिकार रहे लोगों को इतना अवसर जरूर दिया है कि वे इतिहास को अपने ढंग से समझने के साथसाथ उन कारणों की भी समीक्षा कर सकें, जो उनके दमन और दासता के मूल में हैं. इस छटपटाहट से भारतीय संस्कृति के मुख्य प्रतीकों, घटनाओं, चरित्रों यहां तक कि मिथकों के विवेचन की शुरुआत हुई. धीरेधीरे ही सही मगर संस्कृति के विखंडनात्मक विवेचन की प्रक्रिया आगे बढ़ी है. उसके सूत्रधार दमितशोषित वर्गों में जन्मे वे बुद्धिजीवी हैं, जिन्हें जाति या किसी और कारण से बौद्धिक विमर्श से बाहर रखा गया था. अवसर मिलते ही वे न केवल सवाल उठाने लगे थे. बल्कि उसके जवाब भी अपने बौद्धिक सामर्थ्य के आधार पर स्वयं खोजने को उद्धत थे. उन लोगों के लिए जो अभी तक समाज के बड़े हिस्से को अपनी कूटनीतिक चालों के आधार पर नचाते आए थे, यह बहुत बड़ी चुनौती थी. ‘महिषासुर दिवस’ का आयोजन उसी क्रम में हालिया आंदोलन की एक कड़ी है. वह हमारे समय की महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक परिघटना है. शताब्दियों से जो वर्ग दूसरों की निगाह से खुद को देखता आया थाकृ‘महिषासुर दिवस’ के बहाने वह खुद को अपनी दृष्टि से देखनेसमझने की कोशिश में लगा है. यह देर से हुई अच्छी और क्रांतिकारी शुरुआत है.

जो लोग ‘महिषासुर मर्दिनी’ कहकर देवी का गुणगान करते आए थे, बदले परिवेश में वे महिषासुर को मिथ बताने लगे हैं. जल्दबाजी में वे भूल जाते हैं कि महिषासुर को यदि मिथ मान लिया गया तो देवी दुर्गा भी मिथ ही सिद्ध होगी. साथसाथ उन देवीदेवताओं को भी मिथ मानना पड़ेगा, जिनके कंधों पर कथित देवसंस्कृति की इमारत खड़ी है. ऐसे में यदि कोई राम और दुर्गा के बहाने अपनी संस्कृति थोप सकता है, उनके माध्यम से वर्चस्वकारी सत्ता के शिखर पर टिका रह सकता है, तो उसकी मुक्ति के प्रतीक के रूप में शंबूक और महिषासुर को भी नायक बनाया जाता है. इतिहास की कमजोरी है कि वह बहुत भरोसे की चीज नहीं होता. वह हमेशा विजेता संस्कृति की इच्छाओं और कामनाओं के अनुसार ढाला जाता है. विवेकवान समाज ऐसे इतिहास की परवाह नहीं करता. जानता है कि सुविधानुसार नायक चुनने की जो आजादी अन्य वर्गों को है, उतनी आजादी उसे भी है. ऐतिहासिक भूलों से सीख लेते हुए वह अपने नायक स्वयं चुनता है. ‘महिषासुर’ ऐतिहासिक चरित्र है—इसके समर्थन में उतने ही तर्क जुटाए जा सकते हैं, जितने उनके पास ‘राम’ या ‘रावण’ को इतिहासपुरुष सिद्ध करने के हैं. पूरा मामला तार्किकता से जुड़ा है. इसमें प्रायः वे असफल होते हैं. उस समय वे आस्था का मामला बताकर लोगों के विवेक और इतिहासबोध को ही प्रभावित करने लगते हैं.

धर्मग्रंथों के जरिये एक बात जो प्रामाणिक रूप से सामने आती है, वह है संस्कृतियों का द्वंद्व. जिसमें महिषासुर की उपस्थिति जनसंस्कृति के प्रभावशाली मुखिया के रूप में है. वह श्रमसंस्कृति में भरोसा रखने वाली, पशुचारण अर्थव्यवस्था से नागर सभ्यता की ओर बढ़ती, तेजी से विकासमान भारत की प्राचीनतम सभ्यता का महानायक था. वह उस संस्कृति का प्रतिकार करता था जो अनेकानेक असमानताओं, आडंबरों और भेदभाव से भरी थी. दूसरों के श्रम पर अधिकार जताने वाली बेईमान संस्कृति. उसके सर्वेसर्वा रहे देवता सागरमंथन में बरा बरी का हिस्सा देने के वायदे के साथ असुरों से सहयोग मांगते हैं. कार्य पूरा होने पर बेईमानी करते हुए ‘अमृत’ तथा बहुमूल्य रत्न खुद हड़प लेते हैं. इस आंदोलन का वे लोग विरोध कर रहे हैं जिनके मन में 1000—1500 वर्ष पुराना भारत बसता है, जब ऊंची जातियां अपने से निचली जातियों के साथ मनमाना व्यवहार करने को स्वतंत्र थीं. संस्कृति की पुनरीक्षा तथा उसके आधार पर न्याय की मांग को कुछ लोग देशद्रोह भी कह रहे हैं. उनके सोच पर तरस आता है. वे या तो देश और देशद्रोह की परिभाषा से अनभिज्ञ हैं, अथवा लोगों को अपने शब्दजाल में उलझाए रखना चाहते हैं. जैसा वे हजारों वर्षों से करते आए हैं.

देश कोई भूखंड नहीं होता. वह अपने नागरिकों के सपनों और स्वातंत्रयचेतना में बसता है. लाखोंकरोड़ों लोग जहां एकजुट हो जाएं, वहीं अपना देश बना लेते हैं. जिन लोगों में स्वातंत्रय चेतना नहीं होती, उनका कोई देश भी नहीं होता. ऐसे लोग देश में रहकर भी उपनिवेश की जिंदगी जीते हैं. भारत अर्से से ब्राह्मणवाद का उपनिवेश रहा है. आगे भी रहे, यह न तो आवश्यक है, न ही स्वीकार्य. यहां वही संस्कृति चलेगी जो इस देश के सवा सौ करोड़ लोगों की साझा संस्कृति होगी. जो सामाजिकसांस्कृतिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता तथा संसाधनों में सभी की निष्पक्ष और समान सहभागिता सुनिश्चित करती हो. वैसे भी मनुष्य की स्वतंत्रता किसी व्यक्ति, समाज या संस्कृति का देय नहीं होती. यह मनुष्य होने की पहली और अनिवार्य शर्त है. यह प्रकृति का ऐसा अनमोल उपहार है जो मनुष्य को उसके जन्म से ही, वह चाहे जिस जाति, धर्म, वर्ग, देश या समाज में जन्मा हो—जीवन की पहली सांस के साथ स्वतः प्राप्त हो जाता है. जिस देश की संस्कृति अपने तीनचौथाई नागरिकों को समाजार्थिक एवं बौद्धिक रूप से गुलाम बनाती हो, वह ‘राष्ट्र’ तो क्या भूखंड कहलाने लायक भी नहीं होता. इसे देशद्रोह कहने वाले असल में वे लोग हैं जिनका देश कुर्सियों में बसा होता है. जो जनता से प्राप्त शक्तियों का उपयोग उसे छलने और मूर्ख बनाने के लिए करते हैं. इसके लिए वे कभी राष्ट्रवाद, कभी धर्म तो कभी जाति को माध्यम बनाते हैं. यह सरकार और उसके आसपास घूमने वाले मुट्ठीभर समूहों को ही राष्ट्र घोषित करने की साजिश है, जिसके सर्वोत्तम रूप को भी टॉमस पेन ने आवश्यक बुराई माना है.

महिषासुर आंदोलन’ का विरोध कर रहे लोग या तो इस देश के प्राचीन इतिहास से अनभिज्ञ हैं, अथवा जानबूझकर अनभिज्ञ बने रहना चाहते हैं. उनके मानस में पुष्यमित्र शुंग के बाद का भारत बसता है. भौतिक और अधिभौतिक दोनों ही दृष्टियों से वह देश के पराभव का दौर था. विदेशी व्यापार सिमटने लगा था. उपनिषदों की जगह पुराण लिखे जा रहे थे. वैदिक धर्म छोटेछोटे संपद्रायों में सिमट चुका था. महाकाव्यों को उनका वर्तमान स्वरूप उन्हीं दिनों प्राप्त हुआ, जिसने चातुर्वर्ण्य समाज की अवधारणा को मजबूती से स्थापित किया था. वे प्राचीन भारत की संपन्नता का बखान करते हुए नहीं थकते. बारबार याद दिलाते हैं कि भारत कभी ‘सोने की चिड़िया’ कहलाता था. इतिहास बताता है कि भारत का सबसे समृद्धिशाली दौर ईसा के चारपांच सौ वर्ष पहले से लेकर इतनी ही अवधि बाद तक का रहा है. उस दौर के बड़े सम्राट या तो बौद्ध थे, अथवा जैन. दूसरे शब्दों में ब्राह्मणवाद के सबसे बुरे दिन देश की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे अच्छे दिन थे. डॉ. रमेश मजूमदार के अनुसार उस दौर में आजीवक, जैन एवं बौद्ध दर्शनों के प्रभामंडल में जातीय स्तरीकरण घटा था. सामाजिक भेदभाव तथा यज्ञबलियों में कमी आई थी. उसके फलस्वरूप परस्पर सहयोगाधारित व्यापारिक संगठन तेजी से पनपे. बौद्ध दर्शन ने भारतीय मेधा को विश्वस्तर पर स्थापित किया था. हर कोई भारतीय व्यापारियों के साथ व्यापार करने को उद्यत था. फलस्वरूप व्यापार बढ़ा तथा देश आर्थिक समृद्धि के शिखर की ओर बढ़ता चला गया.

ब्राह्मणवाद तभी तक जीवित है, जब तक लोग धर्म, जाति, और आडंबरों के मोहजाल में फंसे हैं. इसलिए वह किसी भी प्रकार के प्रबोधन से घबराता है. ‘महिषासुर शहादत दिवस’ का आयोजन भारतीय संस्कृति के इतिहास में न तो कोई नया पन्ना जोड़ता है, न ही कुछ गायब करता है. असल में वह ब्राह्मणवाद द्वारा थोपी गई स्थापनाओं से बाहर आने की छटपटाहट है. यह मनुष्य के विवेकीकरण को समर्पित, धर्म और संस्कृति की सनातनी व्याख्याओं के विरुद्ध विखंडनवादी चेतना है. जो अप्रासंगिक हो चुके विचार, धारणा, प्रतीक आदि को किनारे कर आगे निकल जाना चाहती है. इसमें पर्याप्त ऊर्जा और वैचारिक तेज है. जिसका डर सत्ताधारी अभिजन चेहरों पर पढ़ा जा सकता है. वे जानते हैं कि बहुजन दृष्टि से मिथकों की पुनर्व्याख्या का सिलसिला एक बार आरंभ हुआ तो आगे रुकेगा नहीं. ऐसा नहीं है कि ब्राह्मणवाद को इतिहास में इससे पहले कोई चुनौती नहीं मिली थी. उसे कई बार चुनौतियों से गुजरना पड़ा है. लेकिन तब से आज तक धरती न जाने कितनी परिक्रमाएं कर चुकी है. ज्ञान पर तो किसी का कब्जा न तब संभव था, न आज. लेकिन तब ब्राह्मणेत्तर वर्गों की प्रतिभाओं को उपेक्षित किया जाता था. आज यह संभव नहीं है. लोकतांत्रिक परिवेश में उनके विरोध को दबाया जाना आसान नहीं है. आज पूरा विश्व एक परिवार सदृश है. उपेक्षित प्रतिभाएं देशविदेश में कहीं भी यशसम्मान अर्जित कर सकती हैं. ऊपर से राष्ट्रीयअंतरराष्ट्रीय स्तर के मानवाधिकारवादी संगठन. ब्राह्मणवादी संगठनों को यही डर खाए जा रहा है. वे भलीभांति समझते हैं कि बहुत जल्दी दूसरे व्यक्तित्व, घटनाएं और मिथ भी पुनर्व्याख्या के दायरे में आएंगे. इससे ब्राह्मणीय सर्वोच्चता का वह मिथ भी भरभरा कर गिर पड़ेगा, जिसे बनाने में उन्हें सहस्राब्दियां लगी हैं.

महिषासुर दिवस का आयोजन मात्र पांच वर्ष पुरानी घटना है. मगर सांस्कृतिक वर्चस्व से मुक्ति के लिए उत्पीड़ित वर्ग के संघर्ष का सिलसिला नया नहीं है. एकदम हाल की बात करें तो साठ के दशक में बिहार से आरंभ हुए ‘अर्जक संघ’ को ले सकते हैं. जिसने मेहनतकश लोगों ने जीवन में किसी भी धर्म की भूमिका को मानने से इन्कार कर दिया था. मध्यकालीन भारत में रैदास, कबीर, नानक का नाम हमने ऊपर उद्धृत किया है. हालिया इतिहास में डॉ. अंबेडकर तथा फुले दंपति का नाम हमने ऊपर लिया. फुले ने ब्राह्मणवाद का विरोध करते हुए जनसंस्कृति के उभार पर जोर दिया था. यदि बौद्धकालीन भारत तक जाएं तो आजीवक संप्रदाय, जिसे आज बहुजन संस्कृति कहा जा रहा है, भी श्रमसंस्कृति के उन्नयन को समर्पित था. धर्मिक आडंबरवाद से मुक्ति और आर्थिक स्वावलंबन उसका केंद्र था. आजीवक श्रमजीवियों के अपने संगठन थे. उनके माध्यम से वे देशविदेश के व्यापारियों के साथ कारोबार करते थे. जातक कथाओं के हवाले से डॉ. रमेश मजूमदार ने बौद्धकालीन भारत में 31 प्रकार के सहयोगाधारित संगठनों का उल्लेख किया है. उनमें लुहार, बढ़ई, चर्मकार, पत्थरतराश, सुनार, तेली, बुनकर, रंगरेज, किसान, मत्स्य पालन करने वाले, आटा पीसने वाले, नाई, धोबी, माली, कुम्हार यहां तक कि चोरों के संगठन का भी जिक्र है. वे अपने आप में स्वायत्त थे. अपने फैसलों के लिए पूरी तरह स्वतंत्र. उनके अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप का अधिकार राज्य को भी नहीं था. सम्राट विशेष अवसरों पर उनसे परामर्श करना आवश्यक समझता था. खास बात यह है कि उन समूहों में श्रमकौशल और सहभागिता को महत्त्व दिया जाता था. केवल बुद्धि के नाम पर, जैसा ब्राह्मणवादी व्यवस्था में था, विशेषाधिकार का कोई प्रावधान उनमें नहीं था.

कूटवणिज जातक’ में बनारस के दो व्यापारियों की कहानी दी है. उनमें एक ‘बुद्धिमान’ था ‘दूसरा अतिबुद्धिमान’. एक बार दोनों ने मिलजुलकर व्यापार करने का निर्णय लिया. उन्होंने बराबरबराबर निवेश कर पांच सौ छकड़े माल खरीदा. दोनों व्यापार के लिए साथ निकले और सारा माल बेचकर वापस लौट आए. उसके बाद दोनों मुनाफे के बंटवारे के लिए जमा हुए. ‘बुद्धिमान’ व्यक्ति ने पहल करते हुए लाभ को दो समान हिस्सों में बांट दिया. यह देख ‘अतिबुद्धिमान’ बोला—

मैं तुमसे दुगुना हिस्सा लूंगा.’ उसकी बात सुनकर बुद्धिमान चौंका. उसने पूछा—

दो गुना क्यों?’

इसलिए कि मैं अतिबुद्धिमान हूं.’

हमने व्यापार में बराबर धन लगाया है. मेहनत भी बराबरबराबर की है.’ ‘बुद्धिमान’ बोला.

तो क्या! सभी जानते हैं कि मैं तुमसे कहीं ज्यादा बुद्धिमान हूं. इसलिए मुझे लाभ में दुगुना हिस्सा मिलना चाहिए.’ कहते हुए दोनों व्यापारी आपस में झगड़ने लगे. न्याय के लिए अंततः वे बुद्ध की शरण में पहुंचे. बुद्ध ने दोनों का पक्ष सुना और अंत में लाभ को बराबरबराबर बांटने की सलाह दी. बाइबिल में भी एक कहानी है, जिसमें एक किसान खेतों में काम करने आए मजदूरों को बराबर मजदूरी देने की बात करता है. कहानी आमदनी को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का समर्थन करती है. लाभ के दुगने हिस्से पर अधिकार जताने वाले ‘अतिबुद्धिमान’ को बुद्ध ने ‘बेईमान व्यापारी’ कहा है.

वर्चस्वकारी व्यवस्था ऐसी बेईमानी कदमकदम पर करती है. वह श्रम के सापेक्ष बुद्धि को वरीयता देती है. उस व्यवस्था में ब्राह्मण का शारीरिक श्रम से कोई संबंध नहीं होता. वह दूसरों के श्रम पर परजीवी की भांति जीवनयापन करता है. कमोबेश यही हालत बाकी दो वर्गों की भी है. वर्णव्यवस्था में निचले पायदान पर मौजूद शूद्र को अधिकाधिक श्रम करना पड़ता है. लेकिन बात जब लाभ के बंटवारे की आती है तो उसे मामूली मजदूरी देकर टरका दिया जाता है. आय का बड़ा हिस्सा शीर्षस्थ वर्ग हड़प लेते हैं. कहानी के माध्यम से बुद्ध ने इस व्यवस्था को नकारा है. इससे उस बौद्धकालीन समाज में अपने श्रमकौशल के आधार पर जीवन जीने वालों की महत्ता का अनुमान लगाया जा सकता है. यह आदर्शोन्मुखी व्यवस्था थी, जिसे समय रहते रेखांकित करने की आवश्यकता थी. लेकिन इतिहास लेखन का काम ब्राह्मणों या ब्राह्मणवादी मानसिकता के लेखकों के अधीन रहने के कारण वह सदैव पूर्वाग्रहग्रस्त रहा है. उन्होंने इस देश की प्राचीनतम संस्कृति जिसे समानांतर संस्कृति, जनसंस्कृति या सर्बाल्टन संस्कृति कहा जाता है—के दस्तावेजीकरण के प्रति पूर्ण उपेक्षा बरती. उसके मानवतावादी मूल्यों को नकारा, जिसका खामियाजा विराट बहुजन समाज आज तक भुगत रहा है.

जबकि नैतिक मूल्यों को यदि निकाल दिया जाए तो धर्म में मिथकीय किस्सागोई और कोरे कर्मकांडों के अलावा कुछ नहीं बचता. चूंकि बाजारवादी अर्थतंत्र में नैतिक मूल्य धराशायी हो चुके हैं, और किस्सागोई का काम संचार माध्यम संभालने लगे हैं, ऐसे में धर्म के हिस्से कर्मकांडों के रहस्यमय पिटारे के अलावा कुछ नहीं बचता. स्वयंभू भगवानों के जरिये यदि कहीं कुछ धार्मिक मिथ बारबार कहेसुने जाते हैं तो उसके पीछे भी बाजार का ही योगदान है, जिसके चलते धर्म सस्ते मगर सबसे कमाऊ धंधे में बदल चुका है. ऐसे धर्म तथा धर्म को ही सबकुछ मानने वाली संस्कृति का प्रतिकार आवश्यक है. अतः लोगों को बारबार याद दिलाया जाना चाहिए कि जीवन और समाज धर्म से नहीं, मानवीय मूल्यों से चलते हैं, चलने चाहिए. समाज बदलते हैं, धर्म बदलता है मगर जीवन के शाश्वत मूल्य वही रहते हैं. इसलिए मिथकों की पुनर्व्याख्या की कसौटी समानता, स्वतंत्रता, सौहार्द्र, प्रेम, संवेदना, सामंजस्यभाव आदि को बनाया जाना चाहिए.

महिषासुर जैसे प्रतीकों की बहुजन व्याख्याएं हिंदुत्व की नींव पर प्रहार करती हैं. उस पतित संस्कृति का विरोध करती हैं जो बलात्कारी को ‘देवराज’ का दर्जा देती है. दलितबहुजन की नई बौद्धिक खेप का आदर्श राम नहीं है जो अपनी निर्दोष भार्या की शीलपरीक्षा लेता है, शंबूक को दंडित करता है. ‘महिषासुर शहादत दिवस’ जैसे आयोजन प्रकारांतर में एक सलाह भी है कि बहुजन, ब्राह्मणवादी नायकों को अपना नायक मान लेने की भूल न करें. यह चूक उन्होंने शताब्दियों पहले उनके पूर्वजों की ओर से हुई थी. जिसका दंड वे आज तक भुगत रहे हैं. इस काम में बड़ी सावधानी की जरूरत है. ‘महिषासुर’ एक सम्राट है. उस दौर का है जब यह दुनिया लोकतंत्र के बारे में जानती न थी. केवल तेजी से कुलीनतंत्र की ओर बढ़ता कबीलाई गणतंत्र था. आज जमाना लोकतंत्र का है. ‘महिषासुर’ जैसे प्रतीकों के माध्यम से वर्चस्वकारी संस्कृति पर हमला तो बोला जा सकता है. ऐसे हमलों से बचाव के लिए वह हमारी ढाल भी बन सकता है—लेकिन केवल उसके सहारे वर्चस्वकारी संस्कृति का रचनात्मक विकल्प दे पाना संभव नहीं है. अतएव आवश्यकता अनुकूल मिथकों के चयन के साथसाथ उन्हें लोकतांत्रिक परिवेश के अनुकूल ढालने की भी है. ताकि वे मिथक जो अभी तक वर्चस्वकारी संस्कृति के सुरक्षाकवच बने थे, प्रकारांतर में लोकतंत्र और सहजीवन का समर्थन करते नजर आएं.

संस्कृति की इमारत अनगिनत मिथों के सहारे खड़ी होती है. लेकिन मिथ की सीमा है कि वह अकेला किसी काम का नहीं होता है. वह समाज और सांस्कृतिक परंपरा के साथ जुड़कर कारगर होता है. किसी मिथ को कारगर और लोकप्रभावी बनाने के लिए अनगिनत मिथों की आवश्यकता पड़ती है. उनका समर्थन या विरोध करते हुए ही मिथ समाज में अपनी पहचान बनाए रखता है. मिथ प्रायः दीर्घजीवी होते हैं. मगर कोई भी मिथ जीवन में हर समय मार्गदर्शक नहीं रह सकता. अमावस्या की रात में दिये या एक स्फुर्लिंग की भांति वह केवल अवसरविशेष पर हमें राह दिखा सकता है. अनेक मिथों के साथ मिलकर वह मनुष्य की संपूर्ण सामाजिकसांस्कृतिक यात्रा का सहभागी बन जाता है. मिथों के उपयोग के लिए बहुत सावधानी की आवश्यकता होती है. किसी मिथ का उपयोग करने के लिए उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की जानकारी होना आवश्यक है. इसके अभाव में वह दोधारी तलवार की तरह काम करने लगता है. सही समय पर सटीक उपयोग न हो तो उसके मायने एकदम बदल जाते हैं. पिछले कुछ महीनों में ‘महिषासुर’ की पुनर्व्याख्या ने दलित, पिछड़ों एवं आदिवासियों को एकदूसरे के निकट लाने का काम किया है. लेकिन सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से लड़ाई में कोई एक मिथ कारगर नहीं हो सकता. उसके लिए अनेक मिथ तथा विखंडनवादी दृष्टिकोण चाहिए. लेकिन नए मिथ गढ़ना आसान नहीं होता. हां, पहले से ही प्रचलित मिथों को युगानुकूल संदर्भों के साथ पुनपर्रिभाषित अवश्य किया जाता है. अतः जो मिथ की ताकत को जानते हैं, जिन्हें अपने विवेक पर भरोसा है, और जो सचमुच बहुजन संस्कृति के विस्तार का सपना देखते हैं, उन्हें चाहिए कि वे महिषासुर जैसे दूसरे मिथकों को भी विमर्श के दायरे में लाएं. मिथकों को युगानुकूल संदर्भों में नए सिरे से परिभाषित करना. यह जितना कठिन कार्य है, उतनी ही अधिक उसकी आज हमें आवश्यकता है. जाहिर है यह एक चुनौती है. जिससे निपटने के लिए बहुजन समाज को लक्ष्यसमर्पित बुद्धिजीवियों की पूरी खेप तैयार करनी होगी.

ब्राह्मणवाद को सामान्यतः धर्म और संस्कृति से जोड़ा जाता है. यह उसकी सीमित व्याख्या है. असल में वह ‘सर्वसत्तावादी’ और ‘सर्वाधिकारवादी’ किले का पर्याय है, जहां से समस्त संसाधनों और विचारकेंद्रों को नियंत्रित किया जाता है. क्षत्रिय इस किले की रक्षा करते रहे हैं तो वैश्य उसके खजाने को समृद्ध करने का काम करते आए हैं. बदले में ब्राह्मणवाद कुछ सुविधाएं, मानसम्मान और संसाधनों के उपयोग का अवसर देकर उन्हें कृतार्थ करता आया है. इसे ब्राह्मणवादी वर्चस्व ही कहा जाएगा कि मामूली सुविधा, संसाधनों में सीमित हिस्सेदारी के बावजूद वे वर्ग लंबे समय से स्वयं को उस व्यवस्था का हिस्सा मानते आए हैं, जो उन्हें दूसरे या तीसरे दर्जे का नागरिक सिद्ध करती है. परिवर्तनकामी शक्तियों के लिए जितना आवश्यक ब्राह्मणवाद की कमजोरियों को समझना है, उतना ही आवश्यक समानांतर संस्कृति खड़ी करना भी है. ब्राह्मणवादी तंत्र में आमनेसामने की चुनौती नहीं होती, उसका एक कोना अपने घरपरिवार में भी मौजूद होता है. व्यवस्था से अनुकूलित लोग परिवर्तन की हर संभावना को निष्फल करने की कोशिश करते हैं. कुछ समय पहले तक धर्म और जाति उसके सुरक्षा कवच थे. बदली परिस्थितियों में उसने राष्ट्रवाद को अपनी बाड़ बनाया हुआ है. ‘महिषासुर’ जैसे मिथों की नवव्याख्या ने ब्राह्मणवाद के मर्मस्थल पर चोट की है. यह ज्ञान और तर्क की लड़ाई है. इतिहास में शताब्दियों बाद ऐसा हुआ है जब दलित और पिछड़े वर्ग के बुद्धिजीवी ब्राह्मणवाद को उसी के क्षेत्र में चुनौती दे रहे हैं. लेकिन यह शुरुआतभर है. संघर्ष यात्रा बहुत लंबी चलने वाली है. इसमें जो धैर्यवान होगा, सजग होगा और विवेक से काम लेगा, प्रलोभन जिसे डिगाएंगे नहीं, वही और केवल वही लंबे समय तक टिका रहेगा. अंतिम जीत उसी के हाथ रहेगी. जनसंस्कृतिकरण की यात्रा दुर्गम भले हो, असंभव नहीं है.

© ओमप्रकाश कश्यप

असफलताओं का आर्थिक मोर्चा

सामान्य

उत्पादन क्षेत्र में अभूतपूर्व मंदी है. विदेशी मुद्रा-भंडार में कमी आई है. अर्थशास्त्रियों के अनुसार आर्थिक विकास-दर मात्र एक प्रतिशत रह जाने की उम्मीद है. देश की शाख को भी बट्टा लगा है. बड़ी संख्या में लघु और कुटीर उद्यम या तो बंद चुके हैं, अथवा मंदी के शिकार हैं. छोटे उद्यमियों, दस्तकारों तथा उनमें लगे मजदूरों, कामगारों और शिल्पकर्मियों की हालत पतली है. निर्माण-क्षेत्र में नई परियोजनाओं पर काम रुक-सा गया है. जिन उद्यमियों ने बैंक-ऋण तथा ग्राहकों की मदद से परियोजनाएं चालू रखी थीं, उनकी आगे की बिक्री कम है. घटी आमदनी के कारण किश्त समय पर न चुका पाने से ग्राहकों की चिंताएं बढ़ती जा रही हैं. निरंतर कमजोर पड़ती मांग से बड़े-बड़े उद्योग छंटनी पर मजबूर हैं. छत्तीसगढ़ में ‘अल्ट्राटेक’ सीमेंट बनाने वाली कंपनी के मजदूर प्रदर्शन कर रहे हैं. कंपनी ने कुछ मजदूरों को बाहर का रास्ता दिखाया है तो कुछ की दैनिक मजदूरी में कटौती की है. सबसे चिंताजनक है छोटे और लघु व्यापारियों में फैली हताशा. रोजगार की दृष्टि से इस क्षेत्र की उपयोगिता कारपोरेट सेक्टर से कहीं अधिक है. यहां पसरी हताशा भविष्य में बड़े समाजार्थिक संकट का कारण बन सकती है. सरकार चुनावों की वजह से हालात के प्रबंधन में लगी है, लेकिन उसका पूरा ध्यान असल समस्या से भटकाने का है. जातिवाद, सांप्रदायिकता, राममंदिर जैसे मुद्दे उछाले जा रहें हैं. ताकि किसी भी प्रकार सत्ता में बने रहकर जातिवादी मंसूबों को साधा जा सके.

2014 में सत्ता संभालते समय केंद्र सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’, ‘स्किल इंडिया’, ‘न्यू इंडिया’ जैसे सपने लोगों को दिखाए थे. आज वे सब हवा में हैं. क्यों? सरकार उससे जुड़े प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पा रही है. यदि कुछ नहीं बदला है तो मीडिया का सरकार के प्रति भक्ति-भाव. वह जैसे पहले सरकार की हवा बनाने में लगा था, आज भी वही हाल है. बात बढ़ती है तो ध्यान हटाने के लिए या तो आतंकवाद को बीच में ले आता है, अथवा पाकिस्तान को. कुछ नया दिखाना हो चीन के साथ डांडा-मेंडी की खबरें छा जाती हैं. एक ओर विकास के नाम पर छल है, दूसरी ओर धर्म, सांप्रदायिकता और निरंतर बढ़ती जातीय हिंसा. एक साथ कई पाटों के बीच पिसती जनता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है. उधर कारपोरेट सेक्टर की पो-बारह है. देश के सबसे बड़े 100 उद्योगपतियों की संपत्ति में औसतन 26 प्रतिशत का इजाफा हुआ है. जबकि मुकेश अंबानी तथा सरकार के करीबी माने जा रहे अडानी की कुल संपत्ति में 67 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है. इस वर्ष एक नया नाम उद्योगपतियों की कतार में बाबा रामदेव के सहयोगी आचार्य बालकृष्ण का शामिल हुआ है. कारोबार में 176 प्रतिशत वृद्धि-दर के साथ उन्होंने दिखा दिया है कि भारतीय उपभोक्ताओं के मानस पर भगवा रंग अन्य किसी भी रंग से अधिक प्रभावशाली है.

ऐसा क्यों हो रहा है. क्यों प्रधानमंत्री की वायदों और असलियत के बीच की दूरी कम नहीं हो पा रही है. इसे समझने के लिए वर्तमान सरकार की प्राथमिकताओं को समझना आवश्यक है. यह जानना आवश्यक है कि जिस विकास के नारे के साथ सरकार सत्ता में आई थी, क्या उसकी नीतियां उसके अनुरूप हैं? अपने चुनावी भाषणों में मोदी जी ने गुजरात को विकास के मॉडल के रूप में पेश किया था. तथाकथित गुजराती मॉडल की वास्तविकता पर बुद्धिजीवियों ने उन दिनों भी प्रश्न उठाए थे. तब कांग्रेस सहित दूसरे राजनीतिक दल उस मुद्दे पर चुप्पी साधे रहे. गत साढ़े तीन वर्ष के केंद्र सरकार के कार्यकलापों द्वारा समझा जा सकता है कि विकास का तथाकथित गुजराती मॉडल कुछ नहीं, असलियत में पूंजीवाद एवं सांप्रदायिकता का गहरा गठजोड़ था. केंद्र में भाजपा सरकार बनने के बाद वह और भी उग्र हुआ है. आमजन को जाति, धर्म और क्षेत्रवाद में उलझाकर देश की संपदा पूंजीपतियों के हवाले की जा रही है. धर्म और पूंजीवाद का यह गठजोड़ इतना शक्तिशाली है कि जो इसके साथ नहीं, वह बेबस और लाचार नजर आता है. धर्म और राजनीति का गठजोड़ वर्तमान सामाजिक उथल-पुथल का वास्तविक कारण है. अस्थिरता के ऐसे माहौल में विदेशी  निवेशक भला क्यों पूंजी लगाना चाहेंगे! इसलिए प्रधानमंत्री की 150 से अधिक देषों की यात्रा और वहां की हंगामाखेज बैठकों, व्यापक प्रचार-प्रसार के बावजूद विदेशी निवेशक भारत में पूंजी निवेश से कतरा रहे हैं. बड़ी स्पर्धा न होने के कारण देशी पूंजीपतियों की पौ-बारह है. वे जानते हैं कि बाहरी पूंजी को तरसती सरकार के आगे मनमानी शर्तें थोपी जा सकती हैं. इससे वे बेलगाम होकर आगे बढ़ रहे हैं. वैश्विक मंदी के दौर में भी रिलायंस-अडानी जैसे बड़े कारपोरेट घरानों की चामत्कारिक वृद्धि-दर सरकार और लोगों के मानस पर उनकी पकड़ को दर्शाती है.

अनायास नहीं है कि भयावह मंदी के इस दौर में अकेला मीडिया ऐसा क्षेत्र है, जिसपर कोई अंतर नहीं पड़ा है. बल्कि वह तेजी से समृद्धि की ओर अग्रसर है. कारपोरेट मुनाफे का बड़ा हिस्सा उसकी ओर जा रहा है. वह अपनी सामाजिक प्रतिबद्धताओं को बिसराकर, लोकहित के महत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर मिट्टी डालने का काम बहुत बेशर्मी से कर रहा है. कभी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो कभी खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ दर्शाते हुए वह अपने लिए विशिष्ट सुविधाओं तथा अधिकारों की मांग करता है. जबकि हाल के दिनों में उसका वास्तविक कार्य नागरिकों के मानस का उपभोक्ताकरण कर, पूंजीवाद के रास्ते को निष्कंटक करना है. समाज में भय, असुरक्षा, लालच और हताशा का वातावरण तैयार करना, धर्म के नाम पर तंत्र-मंत्र, जादू-टोना परोसना और रूढ़ियों का महिमा-मंडन करना—मीडिया की इसी सोची-समझी नीति का हिस्सा है. उसकी कोशिश है कि अपने एकाकीपन को बांटने की जद्दोजहद में लोग आभासी दुनिया में शरण लेने को विवश हो जाएं. राजनीतिक दल मीडिया की ताकत को समझते हैं. इसलिए चुनावों में लोगों तक पहुंचने के लिए वे उसका इस्तेमाल उसी की शर्तों पर करने को विवश होते हैं.

पूंजीवाद के समर्थन में ‘ट्रिकल डाउन थ्योरी’ यानी ‘रिसाव का सिद्धांत’ का तर्क अकसर दिया जाता है. अर्थशास्त्रियों के अनुसार समृद्धि का रिसाव ऊपर से नीचे की ओर होता है. तदनुसार पूंजीपति जितना कमाते हैं, उतना टेक्स देते हैं. बेखुदी जैसी हालत में सरकार माने रहती है कि जितना उनका मुनाफा बढेगा, उतना ज्यादा टेक्स आएगा. अनुभव बताते हैं, ऐसा होता नहीं है. पूंजीपति जितना टेक्स के रूप में सरकार को देते हैं, सारा जनता की जेब से जाता है. ऊपर से विभिन्न प्रकार की छूट के रूप में वे सरकार से इतना बटोर लेते हैं कि कराधान के रूप में दी गई राशि छोटी पड़ जाती है. पश्चिम में इस सिद्धांत की हकीकत को बहुत पहले समझ लिया गया था. अर्थशास्त्री जान केनिथ गिल्वर्थ ने ‘घोड़े और गौरैया’ की सैद्धांतिकी कहकर उसका मजाक उड़ाया था—घोड़ों को जितना अधिक दाना मिलेगा वे उतनी ज्यादा लीद देंगे. उसमें से बिना पचे दाने चुगकर ज्यादा गौरैया पेट भर सकेंगी.

यह जानते हुए भी कि कथित ‘ट्रिकल डाउन थ्योरी’ प्राय: उलटी चाल चलती है—भारत सरकार आज भी उसपर भरोसा करती है. इसके दुष्परिणाम सामने हैं. पूंजीवाद जितनी तेजी से भारतीय जनसमाज पर अपनी पकड़ बना रहा है, उतनी तेजी से समृद्धि निचले स्तर से ऊपर की ओर गतिमान है. आजादी के बाद के दशकों में कठिन परिश्रम द्वारा जनता ने जो थोड़ी-बहुत समृद्धि अर्जित की थी, धीरे-धीरे उसका साथ छोड़ रही है. बड़ी पूंजी तरह-तरह के प्रलोभन देकर उसे अपनी ओर खींच रही है. सरकार बेबस है. चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री द्वारा जनता के साथ किए गए वायदे एक-एक कर झूठे साबित हो रहे हैं. उनके मन की बात, जनता के मन की बात बन ही नहीं पा रही है. सांप्रदायिकता के बुरी तरह शिकार समाज में ‘धर्मनिरपेक्षता’ तथा ‘साम्यवाद’ जैसे शब्द गाली बन चुके हैं. जिन्हें समाजार्थिक समानता का सिद्धांत नापसंद है, वे वामपंथ का सीधे सामना करने के बजाए, धर्म की आड़ लेकर हमला करते हैं. घोर सांप्रदायिक, जातिवादी लोगों ने एक वर्ग का मानस इस तरह तैयार किया है कि वह मार्क्स, सेकुलर, साम्यवाद, धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्दों को सुनते ही बलबलाने लगता है. धर्म और पूंजीवाद का जैसा गठजोड़ इन दिनों भारत में है, वैसा दुनिया के अन्य देश में नहीं है. चैनल पूंजीवाद से खाद-पानी लेकर धर्मांधता परोस रहे हैं. जनसरोकार भुला चुका टेलीविजन गाय और गोबर पर बहसें कराता है. विकास के नाम पर ये सब पतनोन्मुखी समाज की भूमिका रच रहे हैं.

सरकार में बैठे लोग भी मान चुके हैं कि उद्योग जगत के हालात षीघ्र सुधरने वाले नहीं हैं. सरकार आय-वृद्धि हेतु नए-नए प्रकल्प आजमा रही है. सारा जोर सेवा क्षेत्र पर है. किसी भी राज्य की प्रगति-दर के आकलन का मापदंड यह भी है कि उसकी आय के स्रोत स्थायी हों. उनमें प्रमुख योगदान कृषि, उत्पादन और विनिर्माण क्षेत्र का हो. सेवा-क्षेत्र की भूमिका अर्थव्यवस्था के सहायक अथवा पूरक क्षेत्र के रूप में होनी चाहिए. भारत में हालात एकदम उलट हैं. यह पूंजीवाद के समक्ष राज्य के समर्पण को दर्शाता है. कहा जा सकता है कि मतलब तो राजस्व वृद्धि से है. वह चाहे सेवा क्षेत्र से हो या उत्पादन से, क्या अंतर पड़ता है? यहां मार्क्स के ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’ की याद आती है. मनुष्यता के इतिहास की गहन समीक्षा करने के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि उत्पादकता के साधन सभ्यता और संस्कृति के स्वरूप को निर्धारित करते हैं. कृषि-केंद्रित अर्थव्यवस्था तक भारतीय समाज उत्पादक समाज था. उत्पादन अन्योन्याश्रित था. लोग बजाय लाभ कामना के, एक-दूसरे की जरूरत के अनुरूप उत्पादन करते थे. मशीनीकरण के साथ-साथ उत्पादन का स्वरूप भी बदलता गया. सेवा क्षेत्र में तीव्र वृद्धि दर्शाती है कि हम तेजी से उपभोक्ता-समाज की ओर बढ़ रहे हैं. ऐसा समाज जिसमें परंपरागत संबंध कमजोर पड़ जाते हैं. यह स्थिति पूंजीपतियों के लाभदायक है. वे इसका लाभ भी उठा रहे हैं. उत्पादन के अलावा राजनीति, समाज और संस्कृति के सभी क्षेत्रों पर बाजार का कब्जा है. आज बाजार तय करता है कि लोग अपने त्योहारों को किस प्रकार मनाएं. मानवीय संबंधों का रूप कैसा हो. यहां तक कि हमारे दोस्त और दुश्मन तय करने की जिम्मेदारी भी मीडिया उठा रहा है.

आखिर ऐसा क्यों हुआ? आर्थिक मोर्चे पर सरकार के बुरी तरह विफल होने के कारण क्या हैं? सरकार जिस स्फूर्त्ति के साथ अरविंद पनगढ़िया को नीति आयोग का सर्वेसर्वा बनाकर लाई थी, वे सरकार को अधबीच छोड़कर जाने के लिए क्यों विवश हुए? कथित रूप से गुजरात में कामयाब होने वाला यह मॉडल बाकी देश  में असफल क्यों हो रहा है? सरकार के पास इस संकट से उबरने की क्या कोई योजना है? यदि हां, तो उसका स्वरूप और सफल होने की संभावना क्या है? ये प्रश्न किसी भी संवेदनशील मन को विचलित कर सकते हैं. उनपर अर्थशास्त्रियों और समाजशास्त्रियों द्वारा विचार किया जाना आवश्यक है. लेकिन या तो वे जान-बूझकर उपेक्षा कर रहे हैं, अथवा उनके मुंह बंद कर दिए गए हैं. या फिर आलोचक अर्थशास्त्रियों के विचारों को सेंसर किया जा रहा है.

सबसे पहले ‘गुजरात मॉडल’ पर चर्चा करते हैं. विकास के नाम पर जिस ‘गुजरात मॉडल’ को चुनाव के दौरान आर्थिक विकास के मानक के तौर पर पेश किया गया था, वह मनमोहन सिंह की उदार आर्थिक नीतियों के अतिरेकी, अनियोजित विस्तार के अतिरिक्त कुछ नहीं था. केवल एक चीज उसे शेष भारत से अलग करती थी. वह थी, उग्र हिंदुत्व अथवा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के साथ पूंजी का तालमेल. केंद्र में उन दिनों कांग्रेस की सरकार थी. मनमोहन सिंह थे, जिन्होंने देष को आर्थिक उदारवाद की राह दिखाई थी. उग्र हिंदुत्व के पैरोकार बने मोदी जी केवल गुजरात तक सीमित थे. जो मीडिया आज हिंदू धर्म-दर्शन के नाम पर कचरा परोस रहा है, वह दबे स्वर में उग्र हिंदुत्व की आलोचना में सरकार और बुद्धिजीवियों के साथ था. सांप्रदायिकता विद्वेष इतना नहीं गहराया था, जितना  आज. सरकार समझती थी कि विदेशी निवेशकों को केवल राजनीतिक कूटनीति के तहत आमंत्रित नहीं किया जा सकता. उनका पहला और अंतिम उद्देश्य निवेश के माध्यम से अधिकाधिक लाभार्जन रहता है. यदि उन्हें युद्ध से लाभ दिखता है तो हजारों-लाखों जान की परवाह किए बिना वे युद्ध का समर्थन करेंगे.  अधिकतम मुनाफे की संभावना बनाए रखने के लिए वे जोखिम से तब तक बचना चाहते हैं, जब तक बदले में अतिरिक्त मुनाफे की संभावना न हो.

इन दिनों हालात अलग हैं. केंद्र में हालांकि बहुमत की सरकार है. लेकिन वह लोगों की सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काकर सत्ता में आई है. अपनी सत्ता अक्षुण्ण रखने के लिए वह सामाजिक-सांप्रदायिक विभाजन की खाई को चौड़ा करने में लगी है. संविधान की सौगंध उठाकर संसद और विधायिकाओं में पहुंचे उसके नेता कभी बीफ, कभी गाय, कभी सांप्रदायिकता और कभी जाति के नाम पर लोगों को भड़काने में लगे रहते हैं. उन्होंने जो उथल-पुथल पैदा की है, उससे देश और समाज के बीच अविश्वास बढ़ा है. कुल मिलाकर देश के हालात ऐसे नहीं हैं जो विदेशी निवेशकों को आकर्षित कर सकें. ऊपर से सरकार द्वारा नोटबंदी के नाम पर मुद्रा-बदली का आत्मघाती फैसला. सरकार का दावा कि नोटबंदी से आतंकवाद की कमर टूट जाएगी, भ्रष्टाचार कम होगा और दबा हुआ कालाधन एक झटके में बाहर आ जाएगा—पूर्णतः निष्फल सिद्ध हुआ है. आर्थिक मुद्दों को लेकर दिशाहीनता ऐसी है कि साढ़े तीन वर्ष के कार्यकाल में सरकार अभी तक पिछली सरकार की योजनाओं को ही नाम बदल-बदलकर कार्यान्वित कर रही है. कुछ मुद्दे जैसे वीआई कल्चर पर नियंत्रण हेतु वाहनों से लाल-नीली बत्तियां हटवाना, चुनावों के दौरान घर-जाकर वोट मांगना—उसने ‘आम आदमी पार्टी’ से लिए हैं. जिन दो योजनाओं के साथ सरकार अपना नाम जोड़ सकती है, उनमें पहली नोटबंदी थी, जिसकी विफलता का उल्लेख ऊपर किया गया है. दूसरी योजना जीएसटी है. विपक्ष में रहते हुए भाजपा उसका विरोध किया करती थी. सरकार में आने के बाद उसे इतनी लापरवाही से लागू किया कि अर्थव्यवस्था पर उसका नकारात्मक असर पड़ा है. ऐसे में शरद यादव का हालिया बयान कि आने वाला चुनावों में बिगड़ती अर्थव्यवस्था बड़ा मुद्दा होगी, अनुचित नहीं लगता.

भारतीय गांवों में संचय की प्रवृत्ति बहुत पुरानी है. कभी अपने भविष्य के लिए, कभी अचानक आ पहुंचे पाहुन के नाम पर; और कभी किसी परिजन के शादी-विवाह या किसी और कारज के लिए, लोग संचय को गृहस्थ का पुनीत कर्म मानते आए हैं. यह प्रवृत्ति ग्रामीण संस्कृति से निकलकर शहर में आ बसे लोगों के उपभोक्ताकरण की सबसे बड़ी बाधा है. इसलिए भय, असुरक्षा, अविश्वास, अशांति आदि के बहाने वाक्-बहादुर चैनल रात-दिन लोगों की सामाजिकता पर प्रहार करते रहते हैं. बहाना कभी आंतकवाद बनता है, कभी पाकिस्तान तो कभी सांप्रदायिकता. भारत-चीन तनाव को युद्ध की दुंदभि में बदल देना भी उनकी इसी रणनीति का हिस्सा था. उन दिनों एक भी चैनल ने इस तथ्य पर चर्चा करना जरूरी नहीं समझा कि पचास के दशक में भारत और चीन के हालात करीब-करीब एक समान थे. चीन भारत के बाद आजाद हुआ. बावजूद इसके उसने अपने उद्योग क्षेत्र को जिस कुशलता के साथ संभाला, मानव-संसाधनों का सुनियोजित उपयोग किया, छोटे-छोटे खेतों को मिलाकर ‘कम्यून’ आधारित कृषि को बढ़ावा दिया—भारत में वैसा नहीं हो सका. भारत चीन से विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था का सबक ले सकता था. लेना चाहिए था. किंतु सत्ताकेंद्र पर विराजमान नेताओं की मुश्किल यह थी कि विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था का रास्ता वर्गहीन समाज की स्थापना की ओर जाता है. उसे न पहले की सरकार चाहती थीं, न आज की भाजपा प्रणीत सरकार.

पूरा दोष वर्तमान सरकार का भी नहीं है. आजादी के बाद से ही देश में विदेशी पूंजी पर आधारित विकास की परिकल्पना की गई थी. यहां मौजूद विपुल प्राकृतिक संसाधनों तथा मानव-संपदा का लोक-हित में उपयोग करने को लेकर सरकारों की न तो नीति रही, न वैसा संकल्प. पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से यूँ तो कई विकास कार्यक्रमों का संचालन किया गया. किंतु भ्रष्ट नौकरशाही और प्रशासनिक दिशाहीनता के कारण वे अपेक्षित परिणाम न दे सकीं. वर्तमान सरकार की सारी राजनीति उग्र हिंदुत्व पर टिकी है. जातिवादी अजेंडे के तहत राजनीति करने वाली भाजपा को यह डर हमेशा लगा रहता है कि यदि वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मुद्दे पर कमजोर पड़ी तो उसका सवर्ण मतदाता समूह, जो केवल उग्र हिंदुत्ववादी छवि के कारण उससे जुड़ा है, एक ही झटके में छिटक जाएगा. आर्थिक विकास को लेकर उचित दिशा-दृष्टि के अभाव में भी सरकार को वे सब कष्ट उठाने पड़ रहे हैं. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस ने उदारीकरण की शुरुआत की थी. वर्तमान सरकार उसे और भी खुले मन से आगे बढ़ा रही है. पूरा देश अंबानी, अडानी और टाटाओं के लिए चरागाह बना है. सभी ने अपने-अपने घोड़े छोड़ दिए हैं. जब तक सरकार है, जहां तक संभव हो कब्जा लेना चाहते हैं. जनसंघ और अटलबिहारी वाजपेयी के जमाने में भाजपा स्वदेशी की समर्थक थी. मोदी जी ने पासा पलट दिया है. ‘मेक इन इंडिया’, ‘स्किल इंडिया’ के बहाने वह अंबानी-अडानी को ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ की जगह देना चाहती है. विडंबना यह है कि ‘भाजपा मुक्त’ भारत की राजनीति करने वाले नेताओं के पास भी अर्थव्यवस्था को लेकर कोई सार्थक विकल्प नहीं है.

ओमप्रकाश कश्यप

बिल्लियों और बंदर की कहानी : एक पुनर्दृष्टि

सामान्य

एक अत्यंत पुरानी, मगर बहुश्रुत कहानी है जिसमें बिल्लियों को मूर्ख और बंदर को चालाक बताया गया है. बिना उनकी भूख और जरूरतों पर विचार किए. पाठक-श्रोता के रूप में हम भी उसपर विश्वास कर लेते हैं. न लेखक की मंशा पर संदेह करते हैं, न अपनी ओर से कुछ जोड़ते-घटाते हैं. वैसे भी कहानियां आमतौर पर मनोरंजन की चाहत के साथ पढ़ी जाती हैं. कहानी खत्म, बात खत्म. कहानी इस प्रकार हैーदो बिल्लियों को रोटी का टुकड़ा मिला. जो है, जितना है, उसे एक-दूसरे के साथ बांटने, मिल-जुलकर उपयोग करने के बजाए वे परस्पर झगड़ने लगीं. अकस्मात एक बंदर नमूदार हुआ. रोटी के टुकड़े को बराबर-बराबर बांटने के बहाने वह सारी रोटी चट कर गया. बिल्लियां एक-दूसरे का मुंह देखती रह गईं. लेखक बिल्लियों की चारित्रिक दुर्बलता दिखाकर एकता का सकारात्मक संदेश देता है. दो पक्षों की लड़ाई में लाभ कोई तीसरा ही उठाता है. कहानी का यह संदेश जगजाहिर है. पर क्या सिर्फ इतनी-सी बात है?

कहानी के अनुसार दोनों बिल्लियों को इतना विवेक भी नहीं था कि रोटी का स्वयं बंटवारा कर सकें. भूख की तीव्रता में वे अपनी सामान्य नैतिकता खो चुकी थीं. खुद पर, एक-दूसरे पर विष्वास नहीं था! क्या बिल्लियां शुरू से ही ऐसी थीं? या उनकी नीयत रोटी के मामूली टुकड़े को देखकर खराब हुई थी? अच्छा होता लेखक उनके हालात पर भी विचार करता. उनकी भूख और जरूरत को समझने की कोशिश करता. उन परिस्थितियों पर भी चर्चा करता जिन्होंने उन्हें मूर्खतापूर्ण आचरण के लिए विवश किया था. या फिर भिन्न स्थितियों के साथ ऐसी कहानी लिखता जिसमें बिल्लियां कुछ देर झगड़तीं. फिर रोटी के मामूली टुकड़े के लिए लड़ने के बजाय उसे एक ओर रख, उतनी रोटियों की तलाष में नए सिरे से निकल जातीं, जिनसे दोनों का पेट भली-भांति भर सके. आखिर वह उनके लिए एक दिन का काम तो था नहीं. पर्याप्त भोजन जुटाने के बाद वापस लौटतीं. मिल-बैठकर खातीं. भोजन इतना होता कि किसने कितना खाया, उसका हिसाब रखने की जरूरत ही नहीं पड़ती. बच जाता तो बंदर को दे देतीं. वह भी उपकृत हो, भविष्य में किसी को धोखा न देने का संकल्प कर लेता. वैसे साहित्य में बिल्लियों की समझदारी या समझदार बिल्ली की कहानियां भी अवश्य होंगी. लेकिन जब भी बिल्ली और बंदर की कहानी की चर्चा होती है, दिमाग में वही पुरानी कहानी आ जाती है. क्या इसका कारण कहानी की अतीव लोकप्रियता है, अतीतमोह है या कुछ और?

हमारा इरादा बिल्लियों और बंदर की कहानी के आदि लेखक की नीयत पर संदेह करने का नहीं है. रचनाकार का अधिकार है कि अपने मंतव्य को पाठकों तक पहुंचाने के लिए मनचाही विधा और भाषा-शैली का इस्तेमाल करे. वैसी स्वतंत्रता इस कथा-लेखक को भी थी. कहानी की वैश्विक लोकप्रियता से पता चलता है कि लेखक अपने उद्देश्य में सफल भी रहा है. इस कहानी और इस तरह की अनेक कहानियां हैं, जिनका संदेश इतना स्पष्ट और लोकव्यापी है कि मात्र शीर्षक से पूरी कहानी हमारे दिमाग में कौंध जाती है. यहां लेखकीय कौशल स्वतःप्रमाणित है. परंतु बात यहीं तक सीमित नहीं है. ऐसी कहानियां जो अपने संदेष के साथ रूढ हों या रूढ कर दी जाएं, लोग ऐसा मान लें कि उनका कोई और निहितार्थ असंभव है, मिथ में ढल जाती हैं. मिथ अपनी अर्थ-भंगिमाओं से बंधे होते हैं. उनमें ज्यादा फेरबदल संभव नहीं होती. कुछ ऐसा ही दृष्टांत में भी होता है. लेकिन दृष्टांत में कथापक्ष का अधिक महत्त्व होता है. लोग उसी के लिए उसे पढ़ना-सुनना पसंद करते हैं. स्थानीय जरूरत के हिसाब से उसमें थोड़ी-बहुत फेरबदल की भी छूट होती है. दृष्टांत पूरा होने पर पाठक-श्रोता को उसके संदेश की व्याख्या अपने विवेकानुसार करने की छूट होती है. जैसे रावण ऐसा मिथ है, जिसे समाज में बुराई का प्रतीक मान लिया गया है. विभिन्न देशों और संस्कृतियों में रामायण के भिन्न रूप प्रचलित हैं. लेकिन रावण के मूल-भूत चरित्र में कोई बदलाव नहीं मिलेगा. बिल्ली और बंदर की कहानी भी अपने कथानक से ज्यादा संदेश से बंधी है. हम उसके संदेश से इतने अनुकूलित हैं कि किसी दूसरे निहितार्थ, यहां तक कि उसकी संभावना की ओर भी हमारा ध्यान नहीं जाता. ऐसी कथाएं जैसी हैं, जिस रूप में हैं, उसी में पूर्ण मान ली जाती हैं. नतीजा यह होता है कि बिल्लियों की मूर्खता और बंदर की धूर्त्तता हमारे मनोमस्तिष्क पर छाई रहती है. कहानी जिस तरह बयान की गई है, उससे पता चलता है कि कहानीकार खुद नहीं चाहता कि पाठक बिल्लियों के जीवन की किसी और हकीकत से परिचित हो. आखिर क्यों?

कुछ देर के लिए मान लेते हैं कि बिल्लियां क्षुधा-पीड़ित थीं. इतनी कि सामान्य नैतिकता को खो बैठी थीं. भूख के कारण उनमें इतना सामर्थ्य भी नहीं था कि और रोटी की तलाश में निकल सकें. हताशा में वे परस्पर झगड़ने लगती हैं. कभी-कभी ऐसा हो जाता है. प्रेमचंद की कहानी ‘कफन’ इंसान और इंसानियत की इसी दुर्दशा को बयान करती है. बादल सरकार का बहुचर्चित नाटक हैー‘पगला घोड़ा’, जिसका हाल ही में फिल्मांकन हुआ है, इसी कड़ी में आता है. नाटक में चार आदमी शमशान के आगे बैठकर ताश के पत्ते फेंटते और शराब पीते हैं. भीतर जलती चिता की लपटें उनकी नैतिकता को झकझोरती हैं. रात के अंधेरे में वे चारों अपनी-अपनी कहानी जो एक तरह से उनका अपराधबोध भी है, से गुजरते हैं. उनके साथ-साथ दर्शक भी सामाजिक त्रासदियों से दो-चार होते हैं. संस्कृत की एक कहावत हैー‘भूखा व्यक्ति कौन-सा पाप नहीं करता.’ शास्त्रों में भूख को आपद्धर्म कहा गया है. आपद्धर्म के चलते क्षुधा-पीड़ित विश्वामित्र ने चांडाल के घर से कुत्ते का मांस चुराकर खाया था. यदि विश्वमित्र का ब्राह्मणत्व इससे आहत नहीं होता तो, मामूली झगड़े के लिए बिल्लियों के चरित्र पर हमेशा-हमेशा के लिए दाग क्यों लगे? हमें तो उन बेजुबान प्राणियों से सहानुभूति होनी चाहिए. परंतु कहानीकार हमें इस ओर नहीं ले जाता. एक झटके में वह हमें वहां पहुंचा देता है, जहां बिल्लियों को मूर्ख तथा बंदर को चालाक मानने के अलावा हमारे पास दूसरा रास्ता ही नहीं बचता. ठीक ऐसे ही जैसे वर्ण-व्यवस्था शूद्र को हेय और तिरस्कार योग्य मान लेती है, हम बिल्लियों को मूर्ख ठहरा देते हैं.

कहानी में बंदर का चरित्र उस पुरोहित की याद दिलाता है जो दिन-भर एक के बाद एक, यजमानों के घर जाकर पूजा-पाठ करता है और उनके लिए ईश्वरीय अनुकंपा के नाम पर अपनी दक्षिणा लेकर आगे बढ़ जाता है. कभी किसी याचक को नहीं कहता कि यह रहा देवता को प्रसन्न करने का मंत्र, यह रही समिधा की सूची और ये है कर्मकांड की प्रविधि. आगे जब मन करे, देवता को प्रसन्न करने का कर्मकांड स्वयं कर सकते हो. मंत्र नहीं पढ़ सकते तो टूटी-फूटी भाषा में ही देवता से संवाद करने की कोशिश करना. वह इसका बुरा नहीं मानेगा. लेकिन जैसे पुरोहित यजमान के प्रबोधन पर ध्यान नहीं देता, वैसे ही बंदर बिल्लियों के प्रबोधन की जरूरत नहीं समझता. अपने-अपने स्वार्थ के लिए दोनों दलाल-तंत्र को प्रश्रय देते हैं. पुरोहित ईश्वरीय अनुकंपा के नाम पर दलाली लेता है, बंदर न्याय के नाम पर. धर्म और राज्य का यह गठजोड़ शताब्दियों पुराना है.

अपना औचित्य सिद्ध करने के लिए राज्य नागरिकों को निरंतर यह विश्वास दिलाए रहता है कि वह न हो तो समाज में सबकुछ अस्त-व्यस्त हो जाए. सरकार के चहेते बुद्धिजीवी उन्हें समझाते हैं कि स्वभाव का जंगलीपन मनुष्य ने प्रकृति से उधार पाया है. यह उन प्रवृत्तियों का अवशेष है जब मनुष्य जंगल में वन्य प्राणियों के बीच रहता था. अस्तित्व पर संकट आ पड़े तो वन्य पशुओं को उतने ही जंगलीपन के साथ जवाब भी देता था. राज्य की बातों में आकर हम ऐसी कहानियों पर बहुत जल्दी विश्वास कर लेते हैं जिनमें गरीब और कमजोर को मामूली बातों पर लड़ते-झगड़ते दिखाया जाता है. वर्ण-व्यवस्था का स्थापित तर्क हैー‘शूद्र जन्मत: असभ्य होता है.’ हालांकि जो सभ्यता शूद्रों को असभ्य और विवेकहीन बताती है, उसी के धर्मग्रंथों में शूद्र-ऋषियों और शिल्पकारों की महिमा का बखान किया गया है. कितने ही धर्मग्रंथ उनकी रचना हैं. लेकिन प्रकट में शूद्रों को विवेकहीन, स्वार्थी, लालची बताया जाता है. कहानियों और मिथकों पर आंख-मूंदकर विश्वास करने के अभ्यस्त लोग उसपर आसानी से विश्वास भी कर लेते हैं. ‘बिल्लियां और बंदर’ जैसी कहानियां इस तरह फैसले करने का अभ्यस्त बनाती हैं. दरअसल, नई स्थितियों के प्रति मानव-मस्तिष्क की सक्रियता आरंभ में तीव्र होती है, किंतु जब कोई घटना, स्थिति, विचार या वस्तु एक-समान अवस्था में, बगैर किसी परिवर्तन के बारंबार गुजरती है, दिमाग उसका नोटिस लेना बंद कर देता है. उस अवस्था में वह अपने निष्कर्ष को अवचेतन के हवाले कर देता है. आगे जब वही स्थिति दुबारा सामने आती है, अवचेतन तत्क्षण अपना पूर्वनिर्धारित निर्णय सुना देता है. इससे पाठक-श्रोता तक रचना का बंधा-बंधाया संदेष तो पहुंचता है, मगर साहित्य होने का मर्म पूरा नहीं होता. क्योंकि साहित्य का काम निर्णय सुनाना नहीं, परिस्थिति के अनुसार सर्वात्तम निर्णय लेने का सामर्थ्य पैदा करना है.

प्लेटो ने न्याय को आदर्श राज्य का श्रेष्ठतम गुण माना है. बाद के विचारकों ने भी अपनी-अपनी तरह से उसका समर्थन किया है. हर राजनीतिज्ञ ‘न्याय’ के आश्वासन के साथ ही सत्ता-केंद्र तक पहुंचता है. परंतु सत्ता में आने के बाद उसकी भूमिका उपर्युक्त कहानी में ‘बंदर’ जैसी हो जाती है. वह समाज के विभिन्न संघर्षरत समूहों को इसलिए एक नहीं होने देता क्योंकि वह भली-भांति जानता है कि जनता की एकता तथा ऊंचे मनोबल से उसके स्वार्थ खटाई में पड़ सकते हैं. ऐसे में आत्मकल्याण के लिए जनता के पास एकमात्र यही उपाय शेष बचता है कि अपने प्रबोधन की जिम्मेदारी वह स्वयं संभाले. जनता समझदारी दिखाए तो राज्य की भूमिका अपने आप सिमट जाए. राज्य की भूमिका बनी रहे, इसलिए येन-केन-प्रकारेण जनता को मूर्ख, कमजोर आपस में लड़ते-झगड़ते दिखाया जाता है. जैसे उपर्युक्त कहानी में बंदर के पास अपना कोई अर्जन नहीं था, शासक वर्ग के पास भी अपना कोई अर्जन नहीं होता. उसका अस्तित्व जनता के परिश्रम पर टिका होता है. इस बात को शासक वर्ग और उससे जुड़े लोग भली-भांति जानते हैं. जबकि जनता परमशक्तिशाली होने के बावजूद, इस हकीकत के से अनजान बनी रहती है. लोग इसी तरह अनजान बने रहें, इसके लिए उनकी एकता और आत्मविश्वास पर लगातार हमला किया जाता है.

किसी कलाकृति या रचना का अर्थ-विशेष के साथ बंध जाना, उसके साहित्यपन को कमजोर करता है. मुहावरे और लोकोक्तियां भी शब्दों-प्रसंगों के अर्थ-रूढ हो जाने के कारण बनते हैं. हम अकसर लोगों को सलाह देते हुए सुनते हैंー ‘भैया पैर उतने पसारो जितनी चादर है.’ सुनने वाला इसका प्रतिवाद नहीं करता. तुरंत मान लेता है कि संतोषी होना अच्छी बात है. क्योंकि उसने जन्म से ही संतोष-धन का महिमा-मंडन होते देखा है. कबीर जैसे पहुंचे हुए कवि भी संतोष की महिमा का बखान करना नहीं भूलते. संतोष को परमधन बताने वाले इस सवाल को गोल कर जाते हैं कि देश में मुट्ठी-भर लोगों की ‘चादर’ उनकी जरूरत से कई गुना बड़ी और हजारों-हजार लोगों की चादर उनकी जरूरत के हिसाब से बेहद छोटी क्यों होती है? दूसरे यदि किसी की चादर उसके पैरों को पूर्णतः तरह ढकने में असमर्थ है तो उसे यह सलाह क्यों नहीं दी जानी चाहिए कि वह धैर्य-पूर्वक, अपने श्रम-कौषल और आत्मविश्वास के साथ चादर के आकार को उस समय तक बढ़ाता रहे जब तक उसमें न केवल वह स्वयंー बल्कि उसके मित्र-हितैषी, घर-परिवार, पड़ोसी सब सरंक्षण प्राप्त कर सकें. असंतोष की आलोचना करते समय प्रायः उसे लालच का पर्याय मान लिया जाता है. जबकि लोककल्याण की वांछा से जुड़ा असंतोष समाज के समग्र विकास हेतु एक प्रेरक-शक्ति बनने का सामर्थ्य रखता है.

संतोष को लेकर भारतीय संस्कृति के अंतर्विरोध कम नहीं हैं. संस्कृति के चार पुरुषार्थों में धनार्जन भी सम्मिलित है. पुरुषार्थ की मर्यादा होती है, सीमा नहीं. धन यदि पुरुषार्थ है तो भारतीय संस्कृति के अनुसार आदमी का कर्तव्य है कि वह अधिक से अधिक धन जुटाए. ऐसे में संतोष-धन का बखान किसके लिए था? जाहिर है, ‘शूद्र’ और ‘दास’ के लिए जिन्हें संपत्ति रखने की मनाही थी. यदि किसी कारण शूद्र के पास संपत्ति जमा हो जाए तो उसको बलात छीन लेने का अधिकार धर्मशास्त्रों में है. एक और बात. संतोष को परमगुण बताने वाले स्वयं भी संतोषी हों, यह आवश्यक नहीं है. ऐसे ही लोग राजाओं की साम्राज्यवादी लिप्साओं का वर्णन करते समय चंदबरदाई बन जाया करते हैं. संतोष को परमधन कहना भले ही ‘परउपदेश कुशल बहुतेरे’ जैसा प्रहसन हो, किंतु इसी का सहारा लेकर यथास्थितिवादी गरीबी और दैन्य का महिमामंडन करने लगते हैं. यथास्थिति का दूसरा रूप भाग्य भी है. ऐसे लोगों के लिए सामाजिक विषमता को पाटने का एकमात्र रास्ता है ー चमत्कार. सुदामा-कृष्ण जैसे अतार्किक मिथ उसे समाज में स्थापित किए रहते हैं. प्रकारांतर में वे दिखाना चाहते हैं कि महत्त्वाकांक्षी होना समृद्ध को शोभा देता है. गरीब का हित इसी में है कि वह गरीबी का महिमा-मंडन करते हुए अपने दिन काटे. सपने यदि आंखों में आएं तो निकाल फेंके. यह बात उसे कोई बताने नहीं आता. फिर भी हर आदमी समझ जाता है.

बात बिल्लियों और बंदर की कहानी से शुरू हुई थी और असंतोष पर आ गई. साहित्य में, जिसका काम अपने पाठक-श्रोता का प्रबोधन करना है ー यह संभावना बनी रहती है. साहित्यिक कृति की सफलता के लिए आवश्यक है कि पाठक उसके निहितार्थ को लेकर स्वतंत्र हो. प्रचलित अर्थों को लेकर संदेह की क्षीण संभावना उनके मन में हमेशा बनी रहे. यह धारणा बनी रहे कि कृति को जैसा समझा या समझाया गया है, उसका अर्थ उससे इतर भी संभव है. इसी से रचना के नए अर्थ खुलते हें. ‘बिल्लियां और बंदर’ जैसी कहानियां अपने निहितार्थ को लेकर इतनी स्पष्ट और संप्रेषणीय होती हैं. यह उनकी सफलता भी है और सीमा भी. क्योंकि अर्थ-विशेष के साथ रूढ़ हो जाने से वे पाठक का वैसा प्रबोधन नहीं कर पातीं, जैसा किसी साहित्यिक कृति से अपेक्षित होता है. समाज ऐसी कहानियों को सांस्कृतिकरण की जरूरत के रूप में सहेजता है. प्रकारांतर में वे समाज में यथास्थिति बनाए रखने में सहायक होती हैं.

ओमप्रकाश कश्यप

धर्मनिरपेक्षता और जाति

सामान्य
  • कोई भी व्यक्ति इतना न्यायप्रिय नहीं होता, जितना पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति.—गिल्बर्ट कीथ चेटरसन

  • ‘‘मेरे विचार में भारत न हिंदू देश बन सकता है ना हिंदू धर्म भारत सरकार का धर्म बन सकता है. हमें याद रखना चाहिए कि हमारे देश में अल्पसंख्यक भी रहते हैं और हमारा यह कर्तव्य है कि उनकी सुरक्षा का प्रबंध करें. यह देश सबका देश है. चाहे कोई धर्म, कोई जाति हो. हम उस रास्ते पर नहीं चल सकते़ जिसपर पाकिस्तान चल रहा है. हमें यह ध्यान रखना होगा कि हमारे धर्मनिरपेक्ष उद्देश्य सुरक्षित रहें. यहां हर मुसलमान, हर ईसाई और अन्य अल्पसंख्यक वर्गों को यह विश्वास होना चाहिए कि वह सुरक्षित है और उसे भारतीय नागरिक की हैसियत से बराबर के अधिकार प्राप्त हैं. अगर हम उसे यह विश्वासदिलाने में नाकाम रहे तो यह हमारी विरासत और इस देश का घोर अपमान होगा.’’—सरदार वल्लभभाई पट

धर्मनिरपेक्षता का मामला आधुनिक राष्ट्रराज्य की न्यायचेतना से जुड़ा है. जबकि जाति इस देश के लिए कम से कम तीन हजार वर्ष पुरानी संस्था है. जाति का भारतीय, विशेषकर हिंदू समाज पर इतना गहरा प्रभाव है कि बिना इसके हिंदुओं को अपनी पहचान अधूरी लगती है. जबकि इसी की वजह से समाज के बड़े वर्ग को कदमकदम पर अपमानितलांछित होना पड़ता है. विभिन्न सभ्यताओं में कार्यविभाजन के लिए समाज को अलगअलग बांटने की संस्कृति रही है. वर्तमान में दुनियाभर में केवल भारत ऐसा देश है जहां आज भी जाति का बोलबाला है. जिसके चलते बच्चे के जन्म के साथ ही तय कर दिया जाता है कि वह समाज में कौनसा काम करने के लिए जन्मा है. इन दिनों परिस्थितियां बदली हैं. विशेषरूप से शहरों में. वहां जाति के विरुद्ध आवाजें उठने लगी हैं. मगर यह सुगबुगाहट मुख्य रूप से जातिवादी अन्याय एवं शोषण का शिकार रहे वर्गों में देखने को मिलती है. जिन वर्गों को जातीय स्तरीकरण का लाभ मिलता आया है, वे मौका मिलते ही आज भी उसके समर्थन में खड़े हो जाते हैं. उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के सत्ता संभालने के बाद ऐसा स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है. हाल ही में भाजपा के एक वरिष्ठ नेता का बयान देखा. उनके अनुसार जाति ठीक, जातिवाद बुरा है. उनके कहने का आशय है कि जाति भले बनी रहे, परंतु जातिवाद जाना चाहिए. यह ठीक ऐसा ही कामना है कि धर्म और धार्मिक दुराग्रह बने रहें और सांप्रदायिकता समाप्त हो जाए. लोकप्रिय राजनीति के दबाव भी जातिवाद को संरक्षित करने का काम करते हैं. हिंदुओं में जाति, सभ्यता और संस्कृति परस्पर अंतर्गुंफित हैं. इसलिए वे एकदूसरे के गुणदोष से भी प्रभावित होते हैं.

जातिवाद की तुलना में धर्मनिरपेक्षता आधुनिक अवधारणा है. कुछ विद्वान इसे मध्यकाल तक ले जाते हैं. अकबर आदि आरंभिक मुगल सम्राटों की यह कहकर प्रशंसा की जाती है कि वे सभी धर्मों का सम्मान करते थे. उनके राज्य में धर्म के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं था. वे किसी सीमा तक सही भी हैं. लेकिन अकबर आदि की राजनीति धार्मिक उदारता अर्थात सर्वधर्म समभाव तक सीमित थी. वह स्वयं धार्मिक था और राज्य में अनेक पद धार्मिक आधार पर सुनिश्चित थे. उसे धार्मिक रूप से उदार सम्राट तो कहा जा सकता है, धर्मनिरपेक्ष नहीं. धर्मनिरपेक्षता के लिए राज्य का लोकतांत्रिक होना आवश्यक है. एक सिद्धांत के रूप में धर्मनिरपेक्षता यूरोपीय चिंतन की देन है. इस बारे में विचित्र बात यह है कि बहुधर्मिता जो कई बार सांप्रदायिकता के रंग में रंगकर भारत के लिए विकट स्थितियां पैदा कर देती है, जैसी कोई समस्या यूरोप में न थी. वहां धर्म का एकमात्र केंद्र चर्च था. उसके दो धड़े थे—कैथोलिक और प्रोस्टेंट. दोनों के बीच संघर्ष होता रहता था. वही दौर था जब वाल्तेयर, रूसो, हीगेल, फायरबाख, बूनो बायर, मार्क्स, मिखाइल बकुनिन आदि ने धार्मिक पाखंड और उसके सहारे फलतेफूलते सामंतवाद का विश्लेषण करते हुए, तज्जनित बौद्धिक जड़ता, शोषण आदि की ओर इशारा किया था. वहीं जॉन लाक, हॉब्स, बैंथम, जॉन स्टुअर्ट मिल, जेफरसन, थॉमस पेन जैसे विचारकों ने व्यक्ति स्वाधीनता और समानता की मांग को आगे बढ़ाते हुए विधिसम्मत राज्य की स्थापना पर जोर दिया था. उस समय तक औद्योगिक क्रांति की शुरुआत हो चुकी थी. उसे सफल बनाने का एकमात्र उपाय था, मानवमात्र की सामंतवाद से शारीरिकमानसिक मुक्ति.

धर्मनिरपेक्षता के विचार का जन्मदाता जार्ज जैकोब हॉलीयोक(1817—1906) को माना जाता है. विचारों से नास्तिक हॉलीयोक सहकारिता के पितामह कहे जाने वाले राबर्ट ओवेन से प्रभावित था. ओवेन ने इंग्लेंड एवं अमेरिका में सहजीवन पर आधारित बस्तियों की स्थापना की थी. धर्मनिरपेक्षकता उसके उद्देश्य में व्यावहारिक जरूरत थी. सहकारिता और सहजीवन पर आधारित बस्तियों की सफलता के लिए आवश्यक था कि लोगों में धर्म आदि को लेकर मतभेद न्यूनतम हों. हॉलीयोक धर्मकेंद्रित समाज के स्थान पर ऐसे समाज का सपना देखता था, जिसमें लोग आपसी सहयोग और मैत्री द्वारा बंधे हों. ज्ञानविज्ञान और तर्क के आधार पर निर्णय लेते हों. मानते हों कि मानवतावादी लक्ष्यों की प्राप्ति में मनुष्य का अपना विवेक किसी भी देवता या पैगंबर से अधिक मददगार होता है. 1851 में धर्मनिरपेक्षता का विचार प्रस्तुत करते हुए हॉलीयोक ने ऐसे आदर्शोन्मुखी समाज की परिकल्पना पेश की थी, जिसमें लोग शारीरिक, मानसिक, नैतिक और बौद्धिक उठान के उच्चतम स्तर पर हों. जीवन अदृश्य शक्तियों की कृपा के बजाय ठोस, यथार्थ, सकारात्मक जीवनबोध और मानवविकास के उद्देश्य को समर्पित हो. जिनमें नैसर्गिक शुभता, सदगुण, चारित्रिक उदात्तता तथा वैचारिक गहनता हो; तथा लोग आस्था और वायवी विश्वासों के बजाय ठोस, दृश्यमान, चराचर जगत से प्रेरणाएं ग्रहण करते हों; और विशुद्ध मानवतावादी लक्ष्यों के लिए निःस्वार्थ भाव से समर्पित हों. उसका मानना था कि मानवव्यवहार तथा उसके नैतिक प्रतिमानों का एकमात्र आधार लोककल्याण होना चाहिए. उसके लिए धर्म, आस्था, लोकपरलोक जैसी प्रगतिविरोधी मान्यताओं का बहिष्कार अत्यावश्यक है.

भारत में शासन के स्तर पर धर्मनिरपेक्षता के अनुसरण की पहली विधिवत घोषणा 1857 में प्रथम स्वाधीनता संग्राम की विफलता के बाद हुई थी. उस समय दिल्ली सहित अनेक बड़े राज्यों पर मुस्लिमों का शासक था. दूसरी ओर देश की बहुसंख्यक जनता हिंदू थी. दोनों ही समुदाय धार्मिक भावनाओं से गहराई से जुड़े थे. प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के मूल में भी धार्मिक भावनाओं के आहत होने से जन्मा आक्रोश था. इसलिए ईस्ट इंडिया कंपनी से शासन की बागडोर अपने हाथों में लेते हुए महारानी विक्टोरिया ने घोषणा की थी कि भारत धर्मनिरपेक्ष राज्य होगा. उसके तुरंत बाद देश में कानूनी सुधार के दौर की शुरुआत हुई. उसके फलस्वरूप धर्मनिरपेक्ष राज्य का स्वरूप सामने आने लगा. भारतीय संविधान भी धर्मनिरपेक्षता की भावना से ओतप्रोत है. 1951 में हिंदू कोड बिल पर भाषण देते हुए डॉ. आंबेडकर ने जो कहा, उससे धर्मनिरपेक्षता को भलीभांति समझा जा सकता है. आंबेडकर के अनुसार—

धर्मनिरपेक्ष राज्य का अर्थ यह नहीं है कि वह लोगों की धार्मिक भावनाओं का ध्यान नहीं रखेगा. धर्मनिरपेक्ष राज्य का अर्थ केवल यह है कि यह संसद सारी जनता पर कोई एक विशेष धर्म नहीं थोप पाएगी.’

भारतीय संविधान में धमनिरपेक्षता को सिद्धांततः 42वें संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया. तो क्या धर्मनिरपेक्षता का अर्थ राज्य का धर्म की ओर से महज तटस्थ हो जाना है? क्या यह केवल जनता के धार्मिक विश्वास एवं राज्य से जुड़ा विषय है? डॉ. आंबेडकर के उपर्युक्त कथन और संविधान संशोधन के समय सदस्यों की बहस पर विचार करें तो यही प्रतीत होता है. गांधी, नेहरू, पटेल, के. एम. मुंशी, लक्ष्मीकांत मेघ, के. एम. पणिक्कर, के. संथाराम, एच. आर. खन्ना, पी. वी. गजेंद्रड़कर आदि विद्वानों ने धर्मनिरपेक्षता को धर्म के संदर्भ में ही परिभाषित करने की कोशिश की है. कुछ ऐसे नेता भी थे जिन्हें धर्मनिरपेक्षता का विचार ही अस्वीकार था. उनमें प्रमुख नाम डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का है. डॉ. राधाकृष्णन की ख्याति दार्शनिकविचारक के रूप में है. परंतु व्यक्ति के रूप में उन्हें उदार आस्थावादी ही कहा जा सकता है. वे धर्म को नैतिकता के आलंबन के रूप में देखते थे. उन्हें क्षोभ था कि ‘आधुनिक मनुष्य की मानस रचना रूसो के ‘सोशल कांट्रेक्ट, मार्क्स की ‘दि कैपीटल’, डार्विन की ‘ऑन दि ओरीजिन्स ऑफ सोसाइटीज’ तथा स्पिंग्लर की ‘डिक्लाइन ऑफ वेस्ट’ के प्रभाव से हुई है.’ उनके अनुसार भारतीय राज्य की निष्पक्षता को धर्मनिरपेक्षता अथवा नास्तिकता के भ्रामक अर्थ में नहीं समझा जाना चाहिए. वे बिना धर्म के नैतिकता को असंभव मानते थे. इसलिए धर्मनिरेक्षता को उन्होंने अपने समय की सबसे बड़ी कमजोरी माना था(रिलीजन एंड सोसाइटी, पृष्ठ 20). इस तरह स्वयं डॉ. राधाकृष्ण भी धर्मनिरपेक्षता को धर्म के संबंध में ही देखसमझ रहे थे. वे इस तथ्य को जानबूझकर नजरंदाज करते रहे कि समाज में अपनी प्रतिष्ठा, अपना स्थान सुरक्षित के लिए धर्म स्वयं नैतिकता का सहारा लेता है. हमारे युग की त्रासदी ही यही है कि यहां धर्म ने नैतिकता को हड़प लिया है.

बहुलतावादी भारतीय समाज में अनेक संस्कृतियां और उपसंस्कृतियां हैं. एक ही राष्ट्र की सीमा में यहां हिंदू, जैन, पारसी, मुस्लिम, ईसाई, सिख आदि विभिन्न धर्मावलंबी रहते हैं. ऐसी स्थिति में धर्मनिरपेक्षता स्वयं एक मूल्य बन जाती है. ऐसा मूल्य जिसे समाज ने स्वयं हासिल किया है. सम्राट अकबर द्वारा सभी धर्मों के प्रति उदारता पूर्ण व्यवहार, महारानी विक्टोरिया द्वारा धर्मनिरपेक्षता की नीति लागू करना तथा संविधान में उसे एक मूल्य के रूप में शामिल करना इसलिए संभव हुआ क्योंकि भारतीय जनता ऐसा चाहती थी. धर्म उसके लिए निजी आस्था और व्यवहार का विषय रहा है, राजनीति का नहीं. इसलिए यहां धर्म को लेकर कभी सीमारेखाएं नहीं बनीं. स्वाधीनता संग्राम की स्थितियों का सूक्ष्म अवलोकन किया जाए तो तत्कालीन भारतीय समाज को सामान्यतः दो हिस्सों में बंटा पाते हैं. एक ओर संभ्रात तबका, जिसमें जमींदार, नबाव, राजेमहाराजे, पुरोहितकाजी, सेठसाहूकार आदि सम्मिलित थे. उन्हें सत्तासंरक्षण प्राप्त था. बदले में वे सरकारी अमले को भेटसौगात आदि देकर प्रसन्न रखते थे. उनकी निगाह में शासन का अभिप्राय जनता से कर वसूली तक सीमित था. लगभग छह सौ रियासतें उस समय देश में थीं. जिनके कर्ताधर्ता अंग्रेजियत में ढले हुए थे.

दूसरा वर्ग किसानों, मजदूरों, शिल्पकारों तथा उन छोटेछोटे व्यापारियों का था, जो अंग्रेजों तथा उनके मुंह लगे सामंतों के अत्याचारअनाचार का शिकार थे. अपने श्रमकौशल के भरोसे आजीविका कमाने वाला वह वर्ग अंग्रेजी सत्ता से मुक्ति चाहता था. संभ्रांत तथा गैर संभ्रांत दोनों ही वर्गों में धर्म के आधार पर कोई विभाजन न था. दोनों में सभी प्रकार के धर्मावलंबी शामिल थे. आपसी लेनदेन था. हो सकता है शुद्धतावादियों का एक छोटासा तबका इधरउधर दोनों तरफ रहा हो. लेकिन उसकी जनसमाज में कोई पैठ न थी. आजादी के संघर्ष में यह वर्ग और भी करीब आया था. स्वाधीनता संग्राम के दौरान ही यह तय हो चुका था कि स्वतंत्र भारत में सामंतों और पंडापुरोहितों के अधिकारों में भारी कटौती की दरकार होगी. नई व्यवस्था में धर्म का हस्तक्षेप न्यूनतम होगा. जनता मुख्य निर्णायक की भूमिका में रहेगी. स्वाधीनता संग्राम के दौरान गर्मदल, नरम दल, क्रांतिकारी, अहिंसावादी आदि जितने भी समूह बने, उनमें धर्मनिरपेक्षता को लेकर लगभग आमसहमति थी. कह सकते हैं कि जातिविहीन समाज और धर्मनिरपेक्षता, स्वतंत्रता से जुड़े महत्त्वपूर्ण सर्वसम्मत संकल्प थे. जनमत के दबाव के चलते गांधी जैसे वर्णव्यवस्था समर्थक नेता को भी धर्मनिरपेक्षता के समर्थन में आना पड़ा था. 1946 में ईसाई मिशनरी से संवाद करते हुए उन्होंने लिखा था—

यदि तानाशाह होता तो राज्य और धर्म को एकदूसरे से अलग कर देता. मैं अपने धर्म से बंधा हूं. उसके लिए अपनी जान भी दे सकता हूं. परंतु वह मेरा निजी मामला है. राज्य के साथ उसका कोई लेनादेना नहीं है. राज्य को स्वास्थ्य, लोककल्याण, संचार, विदेशनीति, मुद्रा जैसे धर्मनिरपेक्ष मामलों में फैसले लेने का पूरा अधिकार है; धर्मिक मामलों नहीं. धर्म प्रत्येक व्यक्ति का निजी मसला है.’2

क्या धर्मनिरपेक्षता और शासन की प्रकृति में कोई अंतःसंबंध है? राजतंत्र हो या गणतंत्र धर्मनिरपेक्षता की कसौटी पर क्या दोनों ही खरे हैं? असल में ऐसा नहीं है. राजतंत्रात्मक शासन प्रणालियां किसी न किसी रूप में धर्म से अनुशासित और प्रेरित रही हैं. धर्म की भांति उनका ढांचा भी सर्वसत्तावादी होता है. इसलिए उनके लिए पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष होना, न केवल कठिन बल्कि असंभव होता है. उदार सम्राट अपने राज्य में विभिन्न धर्मावलंबियों के बीच समानता का नियम लागू कर सकता है. वह धार्मिक भेदभाव से भी मुक्त हो सकता है. लेकिन धर्मनिरपेक्ष राज्य के लिए केवल इतना अपेक्षित नहीं होता. न ही उसका आशय सर्वधर्म समभाव तक सीमित होता है. राजतंत्र में सम्राट की हैसियत एकल संस्था की होती है. वह उदार हो या कठोर, सारे निर्णय उसकी के विवेककुविवेक से चलते हैं. राजा के कुछ सलाहकार भी होते हैं, परंतु दरबारियों की सलाह पर अमल करना सम्राट के लिए बाध्यकारी नहीं होता. सत्ताअंतरण में अनुवांशिक उत्तराधिकार का नियम राजा को और भी शक्तिशाली बनाता है. इस प्रकार उसकी हर इच्छा वैध मान ली जाती है. ऐसे राज्यों में धर्मनिरपेक्षता व्यक्तिगत निर्णय तक सिमटकर, प्रकारांतर में राजा या सम्राट की अनुकंपा के रूप में सामने आती है. राजा अपने निर्णय को इच्छानुसार कभी भी बदल सकता है. राजा के बाद, अथवा उसके विचारों में आए परिवर्तन के साथ ही धर्मनिरपेक्षता के आगे भी प्रश्नचिह्न लगने लगता है. उधर जो लोग राजा का गुणगान सभी धर्मों के प्रति उसकी उदारता और न्यायभावना के लिए करते आए थे, तत्काल उसे धर्मरक्षक, देवानामप्रिय, धर्मोद्धारक जैसी उपाधियों और अलंकारों से महिमामंडित करने लगते हैं. चूंकि राजतंत्र में राजा स्वयं एक संस्था होता है. इसलिए उसकी मर्जी राज्य की मर्जी भी मान ली जाती है. ऐसे में राजा की आस्था, राज्य की आस्था के रूप में प्रदर्शित होती रहती है. ऐसे राज्य में धर्मनिरपेक्षता न तो पूरी तरह फलित होती है, न ही लंबे समय तक टिकाऊ रह पाती है. आधुनिक राष्ट्रराज्य के लिए जो न्याय, समानता एवं स्वतंत्रता जैसे मानवमूल्यों के आधार पर गठित होते हैं, वहां धर्मनिरपेक्षता राज्य की ‘कृपा’ के बजाय उसके संवैधानिक कर्तव्य के रूप में निरूपायित होती है. वह राज्य की विभिन्न धर्मावलंबी नागरिकों के प्रति निष्पक्षता एवं न्यायभावना को दर्शाती है.

श्रेष्ठ राज्य की नैतिकता उसके नागरिकों के आचरण में झलकनी चाहिए. धर्मनिरपेक्ष राज्य की अपेक्षा होती है कि नागरिकगण अपने धार्मिक विश्वासों के साथसाथ दूसरों के विश्वासों का भी समादर करें. धर्मनिरपेक्ष आचरण के लिए नागरिकों का धर्मविशेष के प्रति आस्थावान रहना आवश्यक नहीं है. मनुष्य धार्मिक आस्था के बिना भी धर्मनिरपेक्ष रह सकता है. राज्य की ओर से धर्मनिरपेक्ष आचरण दर्शाता है कि वह नागरिकभावनाओं के प्रति कितना उदार और संवेदनशील है. ऐसा राज्य सभी धर्मों का सम्मान करता है. यदि कहीं विवाद हों तो उनका समाधान विधिमान्य कसौटियों के अनुरूप खोजा जाता है. जाहिर है, धर्मनिरपेक्ष राज्य धर्म की उपेक्षा नहीं करता. न ही वह विभिन्न धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन कर उनकी कोटियां बनाता है. न ही यह निर्धारित करता है कि प्रचलित धर्मों में से कौनसा धर्म संवैधानिक मान्यताओं के अधिक करीब है. वह केवल धर्म को व्यक्तिगत आस्था का विषय मानकर खुद को उसकी ओर से तटस्थ बना लेता है. चूंकि विभिन्न धर्मों के नैतिक सिद्धांतों में एक किस्म की एकता का भाव रहता है. इसलिए सुधी नागरिकगण धर्मनिरपेक्षता को गणतंत्र की अनिवार्यता के रूप में स्वीकारने लगते हैं. उन्हें यह विश्वास रहता है कि उनमें से कोई भी, धर्म को बीच में लाकर न तो किसी विशेष छूट का अधिकारी है न ही धर्म के आधार पर उसे उन अधिकारों और अवसरों से वंचित किया जा सकता है, जो नागरिक होने के नाते उसे सहज प्राप्त हैं.

जाति मुख्यतः हिंदू धर्म से जुड़ा मसला है. चूंकि जाति को हिंदुओं में धर्मसम्मत बताया जाता रहा है, इसलिए इसे हिंदू धर्म की मान्य संस्था भी कहा जा सकता है. कुछ विद्वान इसपर आपत्ति कर सकते हैं. कह सकते हैं कि धर्मग्रंथों में केवल वर्ण का उल्लेख है, जाति का नहीं. वे यह भी कह सकते हैं कि वर्णविभाजन की मिलीजुली परंपरा भारत के अलावा यूनान, अफ्रीका, यूरोप, मिस्र, पूर्वी एशिया, चीन, जापान आदि देशों में भी प्रचलित थी. इससे इन्कार नहीं किया जा सकता. लेकिन कहीं भी वह उतनी रूढ़ नहीं रही, जैसी कि भारत में. प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ में व्यक्तियों को उनके गुणों के आधार पर काम सांपने की अनुशंसा की है. उसने लोगों को उनकी प्रकृति के अनुसार बांटकर, स्वर्ण, रजत, कांस्य और लौह नामक श्रेणियां बनाई थीं. उसके पीछे प्लेटो की आदर्शवादी राज्य की संकल्पना थी. कार्यविभाजन को वंशानुगत न मान लिया जाए, इसके लिए सावधानी बरतते हुए उसने बच्चों का लालनपालन राज्य के संरक्षण में, उनकी पैत्रिक पहचान को छिपाकर करने का सुझाव दिया था. भारत में हालात भिन्न थे. यहां मान लिया गया कि ज्ञान और अज्ञान दोनों उत्तराधिकार में अंतरित किए जा सकते हैं. इसलिए पंडित के बेटे को पंडित और शूद्र की संतान को शूद्र का दर्जा दिया जाता रहा. समय के साथ जैसेजैसे नए पेशे बढ़े, जातियों की संख्या में भी वृद्धि होती गई. पेशागत जरूरत को रक्तसंकरण का नाम दिया गया.

यदि सब एक विराट पुरुष की संतान हैं तो रक्तशुद्धता का विचार क्यों? ऐसा तो हो नहीं सकता कि मस्तिष्क में एक प्रकार का खून बहता हो, और पैरों में दूसरा? सवाल जायज है. सवाल उठा भी होगा. परंतु नियम साधारण लोगों के लिए होते हैं. शिखर पर विराजमान लोग स्वार्थसिद्धि हेतु कोई न कोई चोर दरवाजा निकाल ही लेते हैं. ब्राह्मणों ने चोरदरवाजा निकाला था, द्विजीकरण का. एक संस्कार, जिसे ‘दूसरा जन्म’ कहा गया. जातियों और वर्णों के कथित रक्तसंकरण से जो बच्चे जन्मे उन्हें नई जातियों के रूप में समायोजित किया गया. प्राचीन धर्मग्रंथों में जातियां बनने का विस्तारसहित विवरण है. उसका विरोध या आलोचना कहीं भी नहीं है. न ही शूद्रत्व के आधार पर समाज के बड़े वर्ग के शोषण और उत्पीड़न की कहीं आलोचना है. अभिजात हिंदुओं की निगाह में वह आदर्श व्यवस्था रही है. इसलिए दैविक बताकर उसका जगहजगह महिमामंडन किया गया है. रक्तसंकरण के बहाने से मनु, याज्ञवल्क्य, गौतम आदि ने जातियों के बनने का जो विधान रचा है उसका विस्तृत वर्णन पांडुरंग वामन काणे की पुस्तक ‘धर्मसूत्रों का इतिहास’ में दर्ज है. इसलिए यह कहना पूरी तरह गलत है कि हिंदू धर्म केवल वर्णव्यवस्था को समर्थन देता है, जाति को नहीं. पौरोहित्य जातिवाद का संरक्षक रहा है. समाज में जैसेजैसे पुरोहितवाद का असर बढ़ा—न केवल जातियों की संख्या में वृद्धि हुई, बल्कि उनके बीच ऊेचनीच की भावना भी गहराती चली गई.

जातिव्यवस्था के कारण हिंदुओं को देशविदेश में इतनी बदनामी झेलनी पड़ी है कि सीधेसीधे उसके समर्थन में आने का कोई साहस कोई नहीं करता. प्रत्येक जाति के अपनेअपने मंच और संस्थाएं हैं. जिनके जरिये जातीय पहचान को बनाए रखने तथा संगठित शक्ति में बदलकर लोकतंत्र में दबावसमूह की तरह काम करने के प्रयास चलते ही रहते हैं. उच्चतम न्यायालय ‘हिंदुत्व को जीवनपद्धति’ बताना, प्रकारांतर में जातिआधारित समाज का समर्थन करना है. जातिव्यवस्था के समर्थक तर्क देते आए हैं कि मातापिता को काम करते देख संतान भी पैत्रिक व्यवसाय में दक्षता प्राप्त कर लेती है. इससे उनके आगे बेरोजगारी का संकट नहीं रहता. परंतु आजीविका की पहली शर्त उसका सम्मानजनक होना है. दूसरी मनुष्य को उससे इतनी आय होनी चाहिए कि वह अपने परिजनों की जरूरतों को पूरा करने के साथसाथ उन्हें बेहतर भविष्य दे सके. यदि व्यक्ति को लगता है कि उसकी वर्तमान आजीविका इन लक्ष्यों को पूरा करने में अक्षम है तो उसे अपने लिए उपयुक्त रोजगार चुनने का अधिकार होना चाहिए. जाति की अवधारणा इस मूलभूत सिद्धांत की उपेक्षा करती है. वह मनुष्य को अपने श्रम या सेवा के मूल्यांकन का अधिकार नहीं देती. धर्मसूत्रों और स्मृतियों में तो हर वह व्यवस्था की गई है जिससे शूद्र अपने दैन्य से कभी न उभर पाएं. ‘मनुस्मृति’ में शूद्र के पास संपत्ति जमा नहीं होने देने के स्पष्ट निर्देश हैं. यदि किसी कारण वह धन जमा करने में सफल हो जाए तो ब्राह्मण को यह अधिकार दिया गया है कि वह उसे बलात् छीन ले. गौतम धर्मसूत्र के अनुसार, ‘कन्या के विवाह का खर्च वहन करने के लिए और शास्त्रविहित किसी धार्मिक अनुष्ठान के लिए कोई व्यक्ति शूद्र से छल या बल का उपयोग करके धन ले सकता है.’(द्रव्यदान विवाहसिध्यर्थम धर्मतत्रसयोगे—गौतम धर्मसूत्र, 27/24, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, रामशरण शर्मा से उद्धृत). कह सकते हैं अपने आरंभ से ही यह व्यवस्था सामाजिक न्याय की भावना के विरुद्ध काम करती आई है.

समाज में लोग अपनेअपने धार्मिक विश्वास के आधार पर और उसके बिना भी रह सकते हैं. इसपर न तो समाज को आपत्ति होती है, न ही राज्य को. बल्कि राज्य का तो ध्येय ही व्यक्ति की स्वतंत्रता और निजी विश्वासों की सुरक्षा के लिए किया जाता है. ऐसा वह तभी कर सकता है, जब वह स्वयं किसी आस्था, विश्वास आदि से बंधा न हो. उसकी प्रतिबद्धता केवल और केवल अपने संविधान के प्रति हो. यदि वह स्वयं धर्म, जाति या वर्ग के प्रति आग्रहशील होगा तो उसके लिए तटस्थ भाव से काम करना कठिन हो जाएगा. समाज पूरी तरह समावेशी न हो तो भी उसके सदस्यों के बीच इतना समझौता अवश्य होता है जिससे वह न्यूनतम शांतिव्यवस्था को बनाए रख सके. जाहिर है संवैधानिक प्रतिबद्धताओं पर खरा उतरने हेतु राज्य का धर्मनिरपेक्ष आचरण समय की मांग बन जाता है. बहुधार्मिकता वाले समाजों में राज्य का धर्मनिरपेक्ष आचरण मात्र इसलिए अपेक्षित नहीं होता कि क्योंकि वहां अनेक धर्मावलंबी रहते हैं. वह इसलिए भी अपेक्षित होता है कि समानता, न्याय, स्वतंत्राता और निष्पक्षता के लिए राज्य को उन सभी विचारों और प्रतीकों से दूर रहना चाहिए, जिनके चयन में मानवीय विवेक की कोई भागीदारी न हो. जो व्यवस्था की मनमानी को दर्शाते हों. राज्य से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने नागरिकों के पक्ष में अधिकतम स्वतंत्रता सुनिश्चित करेगा. ऐसा वातावरण विनिर्मित करेगा, जिसमें लोग अपने विवेक और स्वतंत्रता का अधिकतम लाभ उठा सकें. उसके लिए थोपी गई किसी भी पहचान के आधार पर पक्षपात नहीं करेगा. धर्म के चयन में, जाति के चयन में मनुष्य की इच्छा या विवेक का कोई योगदान नहीं होता. ये जन्म के साथ ही उसपर थोप दी जाती हैं. धर्म के मामले में आध्यात्मिक विश्वास के अनुसार धर्मांतरण की छूट तो होती है, परंतु वह काम भी सर्वथा आसान नहीं होता. वहां धर्मकेंद्रित सामाजिकता आड़े आ जाती है.

वस्तुतः धर्म, जाति, वर्ण जैसी प्रतिगामी संस्थाएं परस्पर इतनी अंतर्गुंफित हैं कि इनमें से कौनसी, किसे और कब संबल प्रदान करती हैं, इस पर निर्णय लेना प्रायः कठिन होता है. धर्मसम्मत विधान विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच व्याप्त असमानता, ऊंचनीच आदि को दैविक सिद्ध करने की कोशिश में जुटे रहते है. इससे उनकी दुर्दशा के वास्तविक कारणों की पड़ताल कठिन हो जाती है. प्रकारांतर में सामाजिक न्याय की प्रक्रिया अवरुद्ध होती है; और राज्य अपने उद्देश्य में विफल सिद्ध होता है. अतः उचित यही है कि राज्य का संचालन सर्वसम्मत या बहुसम्मत विधान के माध्यम से हो, ताकि असमानता, अन्याय और अनाचार की हालत में जिम्मेदारी तय की जा सके. इस तरह धर्मनिरपेक्षता जहां लोकतंत्र का उदात्त लक्षण है, वहीं जाति सामंतवाद का ऐसा रूप है जिसमें अल्पसंख्यक वर्ग को बहुसंख्यक वर्गों पर शासन का अधिकार केवल इसलिए मिल जाता है कि उनका जन्म किसी जातिविशेष में हुआ है. परिस्थितिवश यदि सुधार की मांग उठे तो उसे वर्णव्यवस्था के ढांचे के भीतर रखने की पुरजोर कोशिश की जाती है. ऐसे में शासन का यह कर्तव्य है कि नागरिकों को अधिकतम स्वतंत्रता और समानता के अवसर उपलब्ध कराने के लिए प्रतिक्रियावादी शक्तियों को आगे न आने दे.

वर्णाश्रम व्यवस्था विकास विरोधी भी है. शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण के अनुक्रम में जो पहले स्थान पर है, उसे सर्वाधिक शारीरिक श्रम करना पड़ता है. जैसेजैसे आगे बढ़ते हैं, श्रम की मात्रा घटती चली जाती है. अंत में वह लगभग शून्य हो जाती है. ब्राह्मण का श्रम पूरी तरह अनुत्पादक है. जब वह भौतिक जगत एवं सुखसंसाधनों को मोहमाया, क्षणभंगुर आदि कहकर परंपरानुसार नकारता है, तो उत्पादकता का विरोधी बन जाता है. यह विधान ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के लिए तो विशेष सहायक सिद्ध होता है, परंतु शूद्रों के हितों के, जो मुख्य उत्पादक हैं—प्रतिकूल असरकारी होता है. अतः जब भी धर्मनिरपेक्षता की बात चलती है, समाज के वे वर्ग जिन्हें वर्णक्रम में ऊपर रखा गया है, कम या ज्यादा उसके विरोध में उठ खड़े होते हैं.

हम लेख के केंद्रीय विषय तक आ चुके हैं. भारत हिंदू बहुल देश है. जाति उसकी शास्त्रसम्मत संस्था. सवाल है कि धर्मनिरपेक्षता और जाति के संबंधों को कैसे परिभाषित किया जाए? सामाजिक न्याय के लिए धर्मनिरपेक्षता के साथ क्या जातिनिरपेक्षता भी आवश्यक है? चूंकि जाति के आधार पर समाज का बड़ा वर्ग शोषण का शिकार रहा है, इसलिए उत्तर तो ‘हां’ में ही आएगा. प्रथम दृष्टया यह अनुचित भी नहीं लगता. यह सच है कि धर्मनिरपेक्षता के साथ जातिनिरपेक्ष होना भी कामयाब लोकतंत्र की जरूरत है. परंतु मामला इतना आसान नहीं है, क्योंकि इस तरह हम ‘धर्म’ और ‘जाति’ को एक समान मान रहे होते हैं. जबकि जाति धर्म की अपेक्षा कहीं अधिक रूढ़ है. धर्म में जाति से ज्यादा खुलापन रहता है. हिंदुओं में व्यक्ति कथित तैंतीस करोड़ देवताओं में से किसी को भी अपना आराध्य मान सकता है. या फिर उसकी मर्जी है कि समस्त देवताओं तथा उनसे जुड़े कर्मकांडों को पूरी तरह नकारकर नास्तिक होने की घोषणा कर दे. उस समय लोग थोड़ीबहुत आलोचना करेंगे. लेकिन पूजापाठ एवं देवताओं को अंगूठा दिखाने से हिंदू धर्म से उसके संबंधों पर असर नहीं पड़ेगा. धर्म के नाम पर हिंदुओं में जितना खुलापन है, उतना शायद ही किसी दूसरे धर्म में हो. इसे उसकी विशेषता कहा जा सकता है. परंतु यह उसकी कमजोरी भी है. हिंदू धर्म अनेकास्थावादी धर्म है. इसमें साधक को इतनी छूट है कि वह अपने स्वतंत्र विश्वास के साथ हिंदू रह सकता है. जाति के साथ ऐसा नहीं है. वह जीवन के साथ जन्मती और जान के साथ जाती है. गांधी सहित इस देश के ऐसे असंख्य लोग हैं, जो धर्म के खुलेपन का समर्थन करते हैं, किंतु जाति और वर्ण के नाम पर कट्टर या परंपरापोषी देखे गए हैं. हिंदू समाज में जाति के आधार पर शोषण की शताब्दियों पुरानी रवायत है, जिसने समाज के बड़े वर्ग के जीवन को नर्क में बदल दिया था.

जाति के दो सामान्य पक्ष हैं. पहला व्यैक्तिक, दूसरा सामाजिक. समाज ने किसी जमाने में, सभ्यता के आदिचरण में तय किया कि व्यक्ति अपने पैत्रिक व्यवसाय को ही अपनाएगा. शुरूशुरू में लोगों ने भी मान लिया. उनके पास इसके अलावा दूसरा कोई रास्ता भी नहीं था. रक्षा और पाठपूजन के अलावा बाकी सारे काम शूद्रों के हिस्से आते थे. उन्हें पढ़नेलिखने या शस्त्र विद्या की जानकारी लेने की मनाही थी. प्राचीन भारत में ब्राह्मण के लिए पाठशालाएं और विद्यालय थे. क्षत्रियों के शिक्षणप्रशिक्षण के व्यापक प्रबंध थे. लेकिन शिल्पकारों के लिए पढ़नेलिखने या शिल्प के निखार के लिए कोई व्यवस्था न थी. श्रमिकों और कारीगरों का विधिवत विकास हो, इसकी आवश्यकता ही नहीं समझी जाती थी. लेकिन श्रम और शिल्पकर्म की मांग हर जगह थी. समाज में उनकी अबाध आपूर्ति रहे, इसके लिए नियम बनाया कि बेटा बाप के व्यवसाय को आगे बढ़ाएगा.

जब तक राज्य संस्था शक्तिशाली नहीं हुई थी, समाज में आवश्यक खुलापन था, शिल्पकारों ने भी उस व्यवस्था को सहज भाव से लिया होगा. आगे चलकर ब्राह्मणवाद ने लोगों के मनमस्तिष्क को जकड़ना शुरू किया. राजसत्ता के साथ मिलकर उन्होंने शिल्पकर्म और श्रम के मूल्यनिर्धारण का काम अपने हाथों में ले लिया. इस बीच बौद्धिक स्वातंत्रय का परिचय देते हुए, मेहनतकश वर्गों ने नए दार्शनिक सिद्धांतों की नींव भी रखी. फलस्वरूप आजीवक,