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छोटा मंदिर—बड़ा मंदिर/पचीस लघुकथाएं

सामान्य

1/छोटा मंदिरबड़ा मंदिर

एकांत देख बड़े मंदिर का ईश्वर अपने स्थान से उठा.

बैठेबैठे शरीर अकड़ा, पेट अफरा हुआ था. डकार लेतेलेते नजर सामने खड़ी कृषकाय आकृति पर नजर पड़ी. बड़े मंदिर का ईश्वर कुछ पूछे उससे पहले ही वह बोल पड़ी—

हम दोनों एक हैं.’

होंगे, मुझे क्या!’ बड़े मंदिर के ईश्वर ने तपाक से कहा.

बस्ती में अकाल पड़ा है. लोगों के पा अपने पेट के लिए कुछ नहीं है तो मेरे लिए कहां से लाएंगे.’

इसमें मैं क्या कर सकता हूं.’

इस मंदिर में रोज अकूत चढ़ावाहै. मामूली हिस्सा भी मिल जाए तो हमारा काम चल जाएगा.’

चढ़ावे का हिसाब तो पुजारी रखता है.’

पुजारी तुम्हारा कहना नहीं टाल पाएगा.’

पर मैं उससे क्यों कहने लगा?’

इतनी रात गए कौन है?’ कहता हुआ पुजारी बाहर आया. छोटे मंदिर के ईश्वर को देख त्योरियां चढ़ गईं.

यह छोटे मंदिर का ईश्वर है. आपके पास मदद के लिए आया है.’ बड़े मंदिर के ईश्वर ने बताया.

चल हटशहर में सैकड़ों मंदिर हैं. हर मंदिर का ईश्वर फरियादी बनकर आ गया तो मेरा क्या होगा?’ कहते हुए पुजारी ने धक्का देकर छोटे मंदिर के ईश्वर को बाहर निकाल दिया. बड़े मंदिर का ईश्वर चुपचाप अपनी मूर्ति में समा गया.

2/वयं ब्रह्माव

तानाशाह हंटर फटकारता है. लोग सहमकर जमीन पर बिछ जाते हैं. कुछ पल बाद उनमें से एक सोचता है—‘तानाशाही की उम्र थोड़ी है. जनता शाश्वत है.’ उसके मन का डर फीका पड़ने लगता है.

अहं ब्रह्मास्मिः!’ कहते हुए वह उठ जाता है. उसकी देखादेखी कुछ और लोग खड़े हो जाते हैं. सहसा एक नाद आसमान में गूंजता है

वयं ब्रह्माव.’ एकदूसरे की देखादेखी बाकी लोग भी खड़े हो जाते हैं. जनता को खड़े देख तानाशाह के हाथ से हंटर छूट जाता है. वह जमीन पर पसर जाता है.

3/तानाशाह

तानाशाह ने हंटर फटकारा —‘मैं पूरे राज्य में अमनचैन कायम करने की घोषणा करता हूं. कुछ दिन के बाद तानाशाह ने सबसे बड़े अधिकारी को बुलाकर पूछा—‘घोषणा पर कितना अमल हुआ?’

आपका इकबाल बुलंद है सर! पूरे राज्य में दंगाफसाद, चोरी चकारी, लूटमार पर लगाम लगी है. आपकी इच्छा के बिना लोग सांस तक लेना पसंद नहीं करते.’ तानाशाह खुश हुआ. उसने अधिकारी को ईनाम दिया. कुछ दिनों के बाद एक गुप्तचर ने तानाशाह को खबर दी—‘लोगों के दिलोदिमाग में हलचल मची है सर!’

तानाशाह को एटमबम से इतना डर नहीं लगता था, जितना लोगों के सोचने से. परंतु डर सामने आ जाए तो तानाशाह कैसा—

आदमी हैं तो दिलोदिमाग दोनों होंगे.’ तानाशाह ने लापरवाही दिखाई. गुप्तचर के जाते ही तानाशाह ने अधिकारी को तलब किया—‘हमें खबर मिली है कि लोगों के दिलोदिमाग में हलचल मची है. लोग जरूरत से ज्यादा सोचें, यह हमें हरगिज पसंद नहीं है.’

आदेश दें तो सबको जेल में डाल दूं. चार दिन भीतर रहेंगे तो अकल ठिकाने आ जाएगी.’

नहीं, तुम उनसे बस इतना करो कि जैसे हम हमेशा अपने बारे में सोचते हैं, वे भी केवल हमारे बारे में सोचें.’ तानाशाह ने हंटर फटकारा. कुछ दिन के बाद गुप्तचर फिर हाजिर हुआ.

सर! लोग कुछ ज्यादा ही सोचने लगे हैं.’

हमारे बारे में ही सोचते हैं न.’ तानाशाह हंसा. मानो गुप्तचर का मखौल उड़ा रहा हो.

जी, बस आप ही के बारे में सोचते हैं.’

उनके भाग्यविधाता जो ठहरे.’ तानाशाह ने हंटर फटकारा. गुप्तचर की आगे कुछ कहने की हिम्मत न हुई. वह चलने को हुआ. सहसा पीछे से तानाशाह ने टोक दिया—

जरा बताओ तो वे हमारे बारे में क्या सोचते हैं?’

जीमैंने लोगों को कहते सुना है….’

रुक क्यों गए, जल्दी बताओ?’

सब यही कहते हैं कि तानाशाह बुरा आदमी है.’

तानाशाह का चेहरा सफेद पड़ गया. हंटर हाथ से छूट गया. सहसा वह चिल्लाया—‘हरामखोरों को जेल में डाल दो. मैंने कहा था, मुझे सोचनेसमझने वाले लोग नापसंद हैं. सबको जेल में डाल दो.’

आजकल वह पागलखाने में है.

4/समाधान

तानाशाह ने पुजारी को बुलाया—‘राज्य में सिर्फ हमारा दिमाग चलना चाहिए. हमें ज्यादा सोचने वाले लोग नापसंद हैं.’

एकदो हो तो ठीक, पूरी जनता के दिमाग में खलबली मची है सर!’ पुजारी बोला.

तब आप कुछ करते क्यों नहीं?’

मुझ अकेले से कुछ नहीं होगा.’

फिर….’ इसपर पुजारी ने तानाशाह के कान में कुछ कहा. तानाशाह ने पूंजीपति को बुलवाया. पूंजीपति का बाजार पर दबदबा था. अगले ही दिन से बाजार से चीजें गायब होने लगीं. बाजार में जरूरत की चीजों की किल्लत बढ़ी तो लोग परेशान होने लगे. रोजमर्रा की चीजों के लिए एकदूसरे से झगड़ने लगे. एकदूसरे पर अविश्वास बढ़ गया. समाज में आपाधापी, मारकाट और लूटखसोट बढ़ गई. मौका देख पुजारी सामने आया. लोगों को संबोधित कर बोला—

हमारी धरती सोना उगल रही है. कारखाने रातदिन चल रहे हैं. फिर भी लोग परेशान हैं, जरा सोचिए, क्यों?’

आप ही बताइए पुजारी जी….’

ईश्वर नाराज है. उसे मनाइए, सब ठीक हो जाएगा.’

जैसा सोचा था, वही हुआ. मंदिरों के आगे कतार बढ़ गई. कीर्तन मंडलियां संकट निवारण में जुट गईं.

तानाशाह खुश है. पुजारी और पूंजीपति दोनों मस्त हैं.

5/अच्छे दिन

चारों ओर बेचैनी थी. गर्म हवाएं उठ रही थीं. ऐसे में तानाशाह मंच पर चढ़ा. हवा में हाथ लहराता हुआ बोला—

भाइयो और बहनो! मैं कहता हूं….दिन है.’

भक्तगण चिल्लाए—‘दिन है.’

मैं कहता हूं….रात है.’

भक्तगण पूरे जोश के साथ चिल्लाए—‘रात है.’

हवा की बेचैनी बढ़ रही थी. बावजूद उसके तानाशाह का जोश कम न हुआ. हवा में हाथ को और ऊपर उठाकर उसने कहा—‘चांदनी खिली है. आसमान में तारे झिलमिला रहे हैं.’

पूनम की रात है….आसमान में तारे झिलमिला रहे हैं.’ भक्तों ने साथ दिया.

अच्छे दिन आ गए….’ भक्तगण तानाशाह के साथ थे. दुगुने जोश से चिल्लाए—

अच्छे दिन आ…’ यही वह बात थी, जिसपर हवा आपा खो बैठी. अनजान दिशा से तेज झंझावात उमड़ा और तानाशाह के तंबू को ले उड़ा.

6/संविधान

आखिर जनता ने ठान लिया कि वह अपनी आस्था का ग्रंथ स्वयं चुनेगी. सारे धर्मग्रंथ उस दिन की प्रतीक्षा करने लगे. हर किसी को अपने देवता, अपने मसीहा की श्रेष्ठता पर भरोसा था. उनमें से प्रत्येक को अपने देवता की सर्वोच्चता पर गुमान था—

मेरा देवता सबसे पवित्र है. वह सबको बराबर मानता है. सबके साथ एक जैसा व्यवहार करता है.’ एक धर्मग्रंथ बोला.

मेरा मसीहा करुणानिधान है. वह हमारे पिता जैसा है. हमेशा हमारे भले की सोचता है.’ दूसरे ने दावा किया.

मेरा देवता सर्वाधिक शक्तिशाली है. उसके पास दिव्य अस्त्रशस्त्रों की भरमार है. पलक झपकते नई दुनिया को बना सकता है और मिटा भी सकता है.

एकएक कर सभी धर्म ग्रंथ आए. इतने कि आदमी गिनती करना भूल गया. आखिर में उसकी निगाह एक पुस्तक पर पड़ी.

क्या तुम अपने देवता के बारे में नहीं बताओगे?’

मेरा कोई देवता नहीं है.’

यदि देवता नहीं है तो तुम धर्मग्रंथ कैसे हुए?’

लाखों लोग मुझमें विश्वास रखते हैं. उन्हीं में से कुछ मुझे अपना मार्गदर्शक भी मानते हैं.’

यदि देवता नहीं तो ताकत कहाँ से पाते हो.’

जनता से?’

आखिर तुम हो कौन?’

संविधान.’

संविधान के पीछे नैतिकता का बल, न्याय की चाहत और जनता का विश्वास था. इसलिए बाकी सब धर्म ग्रंथ कन्नी काटते हुए वहां से खिसक गए.

7/एंटीक

मंदिर में अपनी मूर्ति के बराबर एक और मूर्ति देख ईश्वर चौंका. पुजारी के आते ही पूछा—

यह किसलिए?’

छोड़िए, क्या करेंगे जानकर?’ पुजारी ने टालने की कोशिश की.

इस मंदिर का देवता मैं हूं. यहां क्या हो रहा है, उसके बारे में मुझे ही मालूम न हो, यह ठीक नहीं है.’

महाराज कंपटीशन का जमाना है….ग्राहक उस शोरूम में ज्यादा जाते हैं, जिसमें ज्यादा वैराइटीज हों.’

तुम मुझे ‘वेराइटी’ मानते हो?’ ईश्वर ने नाराजगी जताई.

मैंने तो बस हकीकत बयां की है. बराबर की बस्ती में बहुत बड़ा मंदिर बना है. एक ही छत के नीचे सैकड़ों देवताओं के दर्शन हो जाते हैं. हर किस्म का श्रद्धालु वहां जाता है. जबकि यहां आने वाले गिनती के हैं. हम दोनों की तरक्की के लिए यहां दोचार ईश्वर और आ जाएं तो क्या बुराई है?’

पुजारी ने लाख समझाया, लेकिन उस मंदिर का ईश्वर अपनी बगल में दूसरे देवता की मूर्ति रखने को तैयार न हुआ. पुजारी भुनभुनाता हुआ घर लौट गया. ईश्वर हमेशा की तरह आत्ममुग्धता में खो गया. लेकिन पुजारी तो पुजारी था. जो पत्थर को देवता बना सकता है, वह खुद को देवता समझने लगे पत्थर को उसकी औकात की याद भी दिला सकता है. अगले दिन पुजारी ने मंदिर में कीर्तन का ऐलान कर दिया. कीर्तन समाप्त हुआ तो उसके लिए आई मूर्तियां मंदिर की शोभा बढ़ाने लगीं. पुरानी मूर्ति नई मूर्तियों के पीछे दबसी गई.

अगले दिन श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना थी. नए श्रद्धालु तरहतरह का चढ़ावा लेकर आए थे. रात हुई. चढ़ावे को समेट पुजारी गुनगुनाते हुए, मग्नमन बाहर निकला. तभी पुराने ईश्वर ने उसे टोक दिया—‘बहुत निष्ठुर हो. मैंने बीसियों वर्ष तुम्हारा साथ दिया था. अपने ही मंदिर में किनारा करते हुए तुम्हें जरा भी नहीं सोचा!’

सुनकर पुजारी हंसा—‘भगवन! धर्म का धंधा सोचने से नहीं, सोच पर पर्दा डालने से चलता है. नई मूर्तियां चीन से आयातित हैं. निखालिस मूर्तियां. कुछ तो इतनी क्यूटकि भक्तजन उनके साथ सेल्फी लेते दिखे.’ कहकर वह आगे बढ़ा. फिर चलतेचलते पलटकर बोला—‘पर तुम चिंता मत करो. इस धंधे में ‘एंटीक’ की बड़ी महिमा है. जल्दी ही यहां भव्य मंदिर बनेगा. वहां आसन पर तुम मजे से लोट लगाना.’

ईश्वर निरुत्तर. पुजारी गुनगुनाते हुए आगे बढ़ गया.

8/तानाशाहदो

बड़े तानाशाह के संरक्षण में छोटा तानाशाह पनपा. मौका देख उसने भी हंटर फटकारा—‘सूबे में वही होगा, जो मैं चाहूंगा. जो आदेश का उल्लंघन करेगा, उसे राष्ट्रद्रोह की सजा मिलेगी.’ हंटर की आवाज जहां तक गई, लोग सहम गए. छोटा तानाशाह खुश हुआ. उसने फौरन आदेश निकाला—‘गधा इस देश का राष्ट्रीय पशु है, उसे जो गधा कहेगा. उसे कठोर दंड दिया जाएगा.’

आदेश के बाद से सूबे में जितने भी गधे थे सब ‘गदर्भराज’ कहलाने लगे. उन्हें बांधकर रखने पर पाबंदी लगा दी गई. कुछ गधे तो फूल कर कुप्पा हो गए. वे मौकेबेमौके जहांतहां दुलत्ती मारने लगे. पूरे सूबे में अफरातफरी मच गई. कुछ दिनों के बाद छोटे तानाशाह ने एक भाषण में कहा—‘पिछली सरकारें, इतने वर्षों में कुछ नहीं कर पाई थीं. हमनें आने के साथ ही ‘गधा’ को ‘गदर्भराज’ बना दिया. इसे कहते हैं—‘सबका साथ—सबका विकास.’

भक्तगण जयजयकार करने लगे. ठीक उसी समय गधों का एक रेला आया. लोग उनके सम्मान में खड़े हो गए. अकस्मात एक गधा मंच के पीछे से आया और छोटे तानाशाह को एक दुलत्ती जड़ दी. छोटा तानाशाह जमीन बुहारने लगा.

इसे समझा देना. हर गधा, ‘गधा’ नहीं होता. कहकर वह वहां से नौदो ग्यारह हो गया.

9/ ईश्वर का पलायन

ईश्वर को जिज्ञासा हुई. 140 करोड़ की आबादी वाला भारत देश जिस संविधान के भरोसे चलता है, उसमें अपने अस्तित्व को खोजा जाए. उसे ज्यादा पढ़नेलिखने का अभ्यास तो था नहीं. फिर भी आखरआखर पूरा संविधान बांच डाला. ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को देखते ही उसका माथा ठनका. पुरोहित आया तो ईश्वर ने उसे आड़े हाथों लिया—‘तुम तो कहते थे कि देश में सारा कामकाज धर्मभरोसे चलता है. यहां तो पूरी सरकार धर्मनिरपेक्ष रहने का दावा करती है.’

महाराज! वह गफलत में लिखी गई ‘किताब’ है, भक्तगण उसे बदलने की कोशिश कर रहे हैं.’

तो बदलते क्यों नहीं….’

इतना आसान नहीं है. लोग नाराज हो जाएंगे.’ ईश्वर ने झूठ पकड़ लिया—

यानी लोग चाहते हैं कि सरकार धर्म की ओर से तटस्थ रहे.’

पुरोहित चुप. ईश्वर को लगा कि वह गफलत में था. उसका मन ग्लानि से भर गया. उसी रात सारा तामझाम समेट वह मंदिरों से कूंच कर गया. उस दिन के बाद से भक्त लोगों को धर्मनिरपेक्ष शब्द से चिढ़ होने लगी है. ‘सेकुलर’ शब्द उन्हें गालीजैसा लगता है.

कुछ भी हो, जनता इससे खुश है….

10/सबसे बड़ा देवता

स्कूल में निरीक्षण पर निकले प्रधानाचार्य का बच्चों का टेस्ट लेने का मन हुआ तो बराबर की कक्षा में घुस गए. बच्चे सम्मान में खड़े हो गए. प्रधानाचार्य कभी विज्ञान पढ़ाया करते थे. पर थे पूरी तरह धार्मिक. कक्षा में बच्चों को पढ़ाते कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, घर जाकर शेषनाग को जल चढ़ाते—

बच्चो! हिंदू धर्म के तीन सबसे बड़े देवताओं के नाम कौन बताएगा?’

ब्रह्माविष्णुमहेश….सारे बच्चे एक साथ बुदबुदाने लगे. सिवाय एक बालक के जो कक्षा में सबसे पीछे, शांत बैठा था. मानो चोर पकड़ा गया हो. प्रधानाचार्य उसी की ओर इशारा करके बोले—‘ऐ तुम, हां तुम….हिंदुओं के तीन प्रमुख देवताओं के नाम बताओ?’

ब्राह्मण….!’ लड़के ने झट कहा. बच्चे उसके ‘अज्ञान’ पर हंसने लगे. कक्षाध्यापक की उंगलियां बैंत पर कस गईं. अपने धैर्य की छाप छोड़ने के लिए प्रधानाचार्य ने आराम से पूछा—‘कैसे?’

घर में मां सत्यनारायण की कथा कराती है. कथा शुरू करने से पहले पडिंज्जी देवताओं को बुलाते हैं. कथा समाप्त होते ही देवताओं को अपनेअपने घर भेज देते हैं. देवता उनके इशारे पर ऐसे नाचते हैं, जैसे मदारी के इशारे पर बंदर. फिर सबसे शक्तिशाली कौन हुआ. देवता या ब्राह्मण!.’

बच्चे तो बच्चे थे. फिर हंसने लगे. पर प्रधानाचार्य को कोई बोल न सूझा.

11 /राजा बदरंगा है

तानाशाह को नएनए वस्त्रों का शौक था. दिन में चारचार पोशाकें बदलता. एक दिन की बात. कोई भी पोशाक उसे भा नहीं रही थी. तुरंत दर्जी को तलब किया गया.

हमारे लिए ऐसी पोशाक बनाई जाए, जैसी दुनिया के किसी बादशाह ने, कभी न पहनी हो.’ तानाशाह ने दर्जी से कहा. दर्जी बराबर में रखे हंटर को देख पसीनापसीना था. हिम्मत बटोर जैसेतैसे बोला—

हुजूर, आप तो देशविदेश खूब घूमते हैं. कोई ऐसा देश नहीं, जहां आपके चरण न पड़े हों. वहां जो भी अच्छा लगा हो, बता दीजिए. ठीक वैसी ही पोशाक मैं आपके लिए सिल दूंगा.’

तानाशाह को जहां, जिस देश में, जो पोशाक पसंद आई थी, सब दर्जी को बता दीं. उन सबको मिलाकर दर्जी ने जो पोशाक तैयार की, तानाशाह ने उसे पहनकर एक ‘सेल्फी’ ली और सोशल मीडिया पर डाल दी.

पहली प्रतिक्रिया शायद किसी बच्चे की थी. लिखा था—‘राजा बदरंगा है.’

12/अछूत

ईश्वर पुजारी को रोज चढ़ावा समेटकर घर ले जाते हुए देखता. उसे आश्चर्य होता. दिनभर श्रद्धालुओं को त्याग और मोहममता से दूर रहने का उपदेश देने वाला पुजारी इतने सारे चढ़ावे का क्या करता होगा? एक दिन उसने टोक ही दिया—‘तुम रोज इतना चढ़ावा घर ले जाते हो. अच्छा है, उसे मंदिर के आगे खड़े गरीबों में बांट दिया करो. कितनी उम्मीद लगाए रहते हैं.’

रहने दो प्रभु. तुम क्या जानो इस दुनिया में कितने झंझट हैं. एक दिन मंदिर से बाहर जाकर देखो तब पता चले.’

ईश्वर को बात लग गई. उसने पुजारी से एक दिन मंदिर बंद रखने का आग्रह किया, ‘कल तुम्हें खुद कुछ नहीं करना पड़ेगा. मैं खुद इंतजाम करूंगा.’ पुरोहित सोच में पड़ गया. परंतु यह सोचकर कि लोग ईश्वर को मंदिर से निकलते देखेंगे तो अगले दिन दो गुना चढ़ावा आएगा, वह एक दिन कपाट बंद रखने को राजी हो गया. अगले दिन ईश्वर ने कमंडल उठाया. मंदिर की देहरी पर पहुंचा था कि भीतर से आवाज आई. आवाज में आदेश था. ईश्वर के पांव जहां के तहां जम गए—‘सुनो! सबसे पहले उत्तर दिशा में जाना. उस ओर सेठों की बस्ती है. जो भी नकदी मिले संभाल कर रखना. फिर पश्चिम दिशा में जाना. उस ओर क्षत्रियों की बस्ती है. वे दान देने में कंजूस होते हैं. उनसे धनधान्य जो भी मिले, मना मत करना. जब तक पूर्व दिशा में पहुंचोगे, गृहणियां भोजन की तैयारी कर चुकी होंगी. वहां से जो भी भोजन मिले, संभाल कर रख लेना.’ ईश्वर चलने को हुआ. पीछे से पुजारी ने फिर टोक दिया—‘सुनो! दक्षिण दिशा की ओर जाओ तो किसी को छूना मत. नकदी मिले तो दूर से लेना. भोजन मिले तो हाथ मत लगाना.’

क्यों!’

वे लोग अछूत हैं . किसी ने छू भी लिया तो अपवित्र हो जाओगे.’ ईश्वर को गुस्सा आया. उसने कमंडल फ़ेंक दिया. उसके बाद मंदिर से बाहर निकला तो कभी नहीं लौटा.

13/गैरजिम्मेदार

रात हुई तो बड़े मंदिर का ईश्वर टहलने के इरादे से बाहर निकला. उससे कुछ दूरी पर छोटा मंदिर भी था. बड़े मंदिर के ईश्वर को निकलते देख छोटे मंदिर के ईश्वर की भी टहलने की इच्छा हुई. उस समय तक रात हो चुकी थी. सड़कें सुनसान थीं. दोनों ईश्वर टहलतेटहलते दूर तक निकल गए. बड़े मंदिर का ईश्वर आगे था, छोटे मंदिर का ईश्वर पीछे. सहसा अंधेरे को चीरती चीख उभरी. बड़े मंदिर के ईश्वर के पांव ठिठके.

यह तो छोटे मंदिर के इलाके की स्त्री है.’ सोचते हुए बड़े मंदिर का ईश्वर तत्क्षण आगे बढ़ गया. पीछेपीछे चल रहे छोटे मंदिर के ईश्वर के पांव भी ठिठके.

सबसे ज्यादा चढ़ावा पाने के बावजूद जब वही कुछ नहीं कर रहा तो मैं चक्कर में क्यों पडूं!’ सोचते हुए छोटे मंदिर का ईश्वर भी आगे बढ़ गया. वहीं सड़क किनारे एक कुत्ता आराम कर रहा था. चीखें सुनकर उससे रहा नहीं गया. वह अपने परिवार के साथ उठा और लुटेरों पर टूट पड़ा. एकाएक आक्रमण से लुटेरों के औसान बिगड़ गए और वे वहां से भाग छूटे. उसके बाद कुत्ते की दृश्टि बड़े मंदिर और छोटे मंदिर के ईष्वरों पर पड़ी. वह उनपर भौंकने लगा. बड़े मंदिर के ईश्वर को इसपर हैरानी हुई—‘पहचाना नहीं, हम यहां से रोज गुजरते हैं.’

जानता हूं, पर असलियत आज ही समझ में आई है.’ कुत्ता पूरी ताकत लगाकर भौंकने लगा. दोनों ईष्वरों को धोती समेटकर भागना पड़ा.

14/भक्तगण

गाय और भैंस के बीच गहरी दोस्ती थी. दोनों साथसाथ चरतीं. साथसाथ उठतीबैठतीं. साथसाथ जुगाली करती थीं. अचानक भैंस ने गाय से दूरी बनाना शुरू कर दिया. गाय ने एकदो दिन देखा. कारण समझ न आया तो टोक दिया—‘बहन मुझसे कुछ भूल हुई है?’

ऐसा कुछ भी नहीं है.’ भैंस बोली. लेकिन उसके व्यवहार में परिवर्तन न आया. एक दिन की बात. चुगने के बाद दोनों नदी पर पहुंची. गाय पानी पीने लगी. भैंस भी उससे कुछ दूर हटकर पानी पीने लगी. जहां गाय थी, वहां की जमीन चिकनी थी. पानी गहरा. अचानक उसके पांव फिसले और वह नदी में गिरती चली गई. वहां गड्ढ़ा था. गाय बाहर आने को छटपटाने लगी. मगर जमीन चिकनी होने के कारण नाकाम रही. काफी परिश्रम के बावजूद सफलता न मिली तो वहीं, पसर गई.

भैंस ने गाय की हालत देखी तो रहा न गया. उसने इधरउधर गर्दन घुमाई. जब देखा कि आसपास कोई नहीं है, वह गाय के पास गई और उसके गले में पड़ी रस्सी को सींग में फंसा बाहर खींचने लगी. कठिन परिश्रम के बाद वह गाय को बाहर निकालने में सफल हो गई. भैंस बुरी तरह थक चुकी थी, इसलिए वहीं जमीन पर पसर गई—

तभी न जाने किधर से ‘भक्तों’ का रेला उमड़ा. सब हाथ में डंडे, बर्छी, भाले उठाए थे. उनमें से एक चिल्लाया—‘वो देखो! भैंस ने गाय को मार डाला.’ विवेकहीन भीड़ ‘मारोमारो’ के नारे लगाने लगी. इससे पहले कि गाय कुछ करे, अनगिनत लाठियां भैंस की पीठ पर एक साथ पड़ीं. उसने वहीं दम तोड़ लिया.

भक्तगण जिधर से आए थे—‘गौमाता की जय’ कहते हुए, वापस लौट गए.

15/ठूंठ

शिक्षा पूरी करने के बाद स्नातक भविष्य की योजना बनाता हुआ वापस लौट रहा था. रास्ते में एक साधु से टकरा गया.

क्या सोच रहे हो?’ साधु ने प्रश्न किया. अपने चारों ओर निहारते हुए स्नातक बोला—

यह दुनिया कितनी विविधवर्णी है. जिस रास्ते से मैं आया हूं उसपर नदीझरने, समंदरपहाड़, फूल, पत्तियां, लताएं, भांतिभांति के अनगिनत और विचित्र जीव दिखाई पड़े.’

सब देखा, पर जो देखना था, वह अनदेखा ही रहा.’

क्या?’ स्नातक ने पूछा.

तुमने जो देखा, वह तो नजर का धोखा है, माया है. काश! तुम उस महान रचनाकार को भी देख पाते?’

जिसका साक्षात अनुभव हुआ हो, उसे माया कैसे मान लूं? रचनाकार तो अपनी कृति से पहचाना जाता है, इसलिए मैंने जो देखा, मेरे लिए वही ईश्वर है.’

तुम्हारा ज्ञान अधूरा है. मेरे साथ कणकण में छिपे उस महान रचनाकार को पहचानने का प्रयत्न करो.’ साधु ने पेड़ की ओर इषारा किया—‘साधारण दृष्टि से फूल, पत्तियां, बीज, शाखाएं, तना, यानी जो दिख रहा है, वह वृक्ष है. उसके पीछे जो अदृश्य है, वही ईश्वर सृष्टि का वास्तविक कर्ताधर्ता है.’

जो अदृश्य केवल अनुमान पर आधारित है. आप उसपर विश्वास करें. मैं भी कर सकता हूं. लेकिन उसके लिए मैं जो दिखता है, उसे नहीं नकार सकता.’ साधु स्नातक के अज्ञान को दोष देने लगा. इसपर वह साधु को उस तने के पास ले गया, जो पत्ते झड़ जाने के बाद ठूंठ में बदल चुका था—‘कभी यह भी हराभरा रहा होगा. लेकिन इसके तने को गुमान था कि वही सबकुछ है. नाराज होकर एक दिन पत्तियों ने साथ छोड़ दिया. वे झड़ गईं. उसके बाद जो बचा वही यह ठूंठ है. प्रकृति में जो दिखता है, यदि उससे बाहर सच की खोज करोगे तो सिवाय ठूंठ के कुछ हाथ नहीं लगने वाला.’

साधु निरुत्तर हो गया.

16/ विद्रोही

तानाशाह का आदेश था, जिसकी मुस्कान एक इंच से अधिक होगी, उसे दंडित किया जाएगा. आदेश पाते ही तानाशाह के सैनिक पूरे राज्य में फैल गए. जो भी हंसता दिखाई पड़ता, उसे जेल के हवाले कर दिया जाता. कुछ ही दिनों में सारी जेलें भर गईं, लेकिन अपराधियों की संख्या बढ़ती ही जा रही थी. एक दिन तानाशाह ने उन सबको दंड सुनाने का फैसला लियाण् सभी कैदियों को खुले स्थान पर लाया गयाण् मैदान खचाखच भर गयाण् दंड सुनाने के लिए तानाशाह मंच पर चढ़ा. लोग गर्दन झुकाए चुपचाप खड़े थे—

प्रत्येक को पचास कोड़े लगाए जाएं.’ तानाशाह ने आदेश दिया. सैनिक कोड़े लेकर जनसमूह की ओर बढ़े. अचानक एक बालक जोर.जोर से हंसने लगा.

कौन बदतमीज है. तानाशाह गुस्से से चिल्लाया. सैनिकों ने बालक को पकड़कर तानाशाह के सामने खड़ा कर दिया—

तुम हंसे क्यों?’

इन लोगों को देखकर, जो इतनी संख्या में और निर्दोष होने के बावजूद गर्दन झुकाए खड़े हैं.’

तुम्हें कोड़ों से डर नहीं लगता?’ तानाशाह ने पूछा.

मैं किसी से नहीं डरता .’

इसके इरादे खतरनाक हैं. इसे मैं अपने हाथों से दंड दूंगा.’ तानाशाह क्रोध से चिल्लाया. उसने बराबर में खड़े सैनिक से हंटर छीन लिया. जैसे लोगों के स्वाभिमान ने अंगड़ाई ली हो. सोयी आत्माएं एक साथ जागी हों. झुकी गर्दनें एकाएक तन गईं. तानाशाह का हंटर बालक की पीठ पर पड़े उससे पहले ही लोगों ने हल्ला बोल दिया.

कुछ देर बाद वहां न तानाशाह था, न उसके सैनिक.

17/ज्ञान

यह सोचते हुए कि दुनिया बदलने का समय आ चुका है, ईश्वर ने अपना पूरा शृंगार किया. गदाशंखचक्र, धनुषवाणकृपा….सारे हथियार संभाले और मृत्युलोक की ओर प्रयाण कर गया. पहली मुलाकात स्कूल जाते बच्चों से हुई—

बहरूपिया.’ ईश्वर की विचित्र भेषभूषा को देख एक बालक ने टिप्पणी की. उसके साथी हंसने लगे.

मूर्खो! मैं ईश्वर हूं.’ ईश्वर चिल्लाया. उसके हाथ धनुषवाण तक पहुंच गए.

तो यहां क्या क्या रहे हैं, जाकर मंदिर संभालिए.’ बालक के स्वर में कटाक्ष था.

मैं दुनिया बदलने निकला हूं.’

गुरुजी तो कहते हैं कि अच्छी दुनिया बनाने के लिए अच्छे विचार जरूरी हैं. देखो, इस पुस्तक में भी यही लिखा है.’ कहकर बालक ने पुस्तक आगे बढ़ा दी. ईश्वर ने दोचार पन्ने पलटे. कुछ समझ में नहीं आया तो पुस्तक को एक ओर फेंक दिया.

समझ गया, तुम सचमुच ईश्वर हो.’ बच्चे हंसने लगे, ‘ज्ञान का तिरष्कार करना तुम्हारी पुरानी आदत है.’

क्या बकते हो?’ ईश्वर का चेहरा तमतमा गया.

गुरुजी कहते हैं, तुमने निर्दोष शंबूक को मारा था….उस दिन शंबूक को मारने के बजाय यदि उससे ज्ञान लिया होता तो पुस्तक की ऐसी उपेक्षा न करते.’

ईश्वर पानीपानी हो गया.

18/बड़ा कौन?

बस्ती के लोग मुखिया के चयन को जमा हुए. उसी समय एक दार्शनिक उधर से गुजरे. उन्हें देख सभी के चेहरे खिल उठे—

आप गुणी इंसान हैं. आ ही गए हैं तो मुखिया चुनने में हमारी मदद कीजिए.’ लोगों ने प्रार्थना की.

मुखिया चुनने का अधिकार तो सिर्फ आपका है?’ दार्शनिक बोले. लोगों के जोर देने पर दार्शनिक ने उनसे एक प्रश्न किया—‘तानाशाह और ईश्वर, दोनों में बड़ा कौन है?’

सुनते ही लोगों की बुद्धि चकरा गई. भला यह भी कोई सवाल हुआ. सवाल हो भी तो इसका मुखिया के चुनाव से क्या संबंध? सुना है, दार्शनिक आधे पागल होते हैं. परंतु यह तो पूरा का पूरा पागल है.’

जो लोग तानाशाह को बड़ा मानते हैं, वे अपने हाथ उठा लें.’ कुछ देर बाद दार्शनिक ने पूछा. एक भी हाथ ऊपर नहीं उठा.

अब वे लोग हाथ ऊपर करें, जो ईश्वर को बड़ा मानते हैं?’ इसपर सारे लोगों ने हाथ खड़े कर दिए. किंतु एक आदमी शांत बैठा रहा.

तुम क्या फैसला है? ईश्वर या तानाशाह?’

दोनों एक जैसे हैं. जीहुजूरी तानाशाह को पसंद है, ईश्वर को भी. अपनी आलोचना न ईश्वर सुन पाता है, न ही तानाशाह. नाराज होने पर तानाशाह बंदूक तान देता है, और ईश्वर….उसके पास तो अनगिनत हथियार हैं. दोनों को मनमानी पसंद है. दूसरों पर अपना फैसला लादने में दोनों को खुशी मिलती है.’

इस आदमी में मुखिया बनने का आवश्यक गुण मौजूद है.’ दार्शनिक ने कहा और आगे बढ़ गया.

19/असलियत


रोज की तरह पुजारी मूर्ति साफ करने लगा. अचानक हाथ चूका. झाड़न ईश्वर की आंख में जा लगी. वह दर्द से तिलमिलाने लगा. सुबह से शाम तक एक जगह, एक ही मुद्रा में बैठे रहने से उसका धैर्य पहले ही जवाब दे चुका था. पुजारी की हरकत ने आग में घी डालने का काम किया—
देखकर हाथ नहीं चला सकते?’
क्षमा करें भगवन. भक्तों के आने का समय हो चुका है, जल्दीजल्दी में….’
केवल आज की बात नहीं है, तुम दिनोंदिन लापरवाह होते जा रहे हो. मत भूलो कि….’ ईश्वर क्रोध में था.
बसबस….अब तुम कहोगे—सतयुग में बस मैं ही मैं था. त्रेता में मैंने रावण को मारा था, द्वापर में पूरा महाभारत मुझ अकेले ने लड़ा था. इस अवतार में मैंने ये किया था, उस अवतार में मैंने वो किया था….’
इसमें झूठ क्या है?’ ईश्वर बोला.
छोड़िए भगवन! मंदिर में बैठेबैठे चार कहानियां क्या सुन लीं, खुद को पंडित समझने लगे….उनमें असलियत कितनी है, यह केवल मैं जानता हूं….मुंह मत खुलवाओ.’
हकीकत से ईश्वर भी वाकिफ था. इसलिए चुप्पी साध गया.

20/ सिफारिश

अनुचर ने भूतआत्माओं को देवता का संदेश सुनाया—‘जल्दी ही तुम्हें इधरउधर भटकने से मुक्ति मिलने वाली है.’ भूतआत्माएं आश्चर्य से अनुचर की ओर देखने लगीं.

देवता तुमपर प्रसन्न हैं. इस बार तुम्हें लड़की के रूप में मृत्यलोक भेजा जाएगा.’

अनुचर के प्रस्थान करने के बाद एक भूतआत्मा दूसरी से बोली—

सुना है, भारत खंड में हरियाणा नामक प्रदेश है. वहां ‘बेटी बचाओ—बेटी पढ़ाओ’ आंदोलन चल रहा है. उस प्रदेश में जन्म हुआ तो जीवन धन्य हो जाएगा.’

देवता हमारी बात मानेंगे?’

देवता खुशामदपसंद हैं. प्रार्थना करने पर मान ही जाएंगे.’ कहकर भूतआत्मा मुस्कराने लगी.

बुलावा आया तो दोनों भूतआत्माएं देवता से मिलने पहुंचीं. वहां अलगअलग प्रांत के कक्ष बने थे. सबसे अधिक भीड़ हरियाणा वाले कक्ष थी. अधिकांश लड़की के रूप में जन्म लेने वाली आत्माएं.

इतनी भीड़ में हमारा नंबर आएगा.’ भूतआत्माएं परेशान हो गईं. तभी वह अनुचर नजर आया. दोनों भूतआत्माएं लपककर उसके पास पहुंची—‘क्या तुम देवता से सिफारिश कर सकते हो कि वह हमें हरियाणा में भेजने की कृपा करें.’

उसकी आवश्यकता नहीं पड़ेगी….तुम्हारा वहां जाना तय है.’ अनुचर ने हंसकर बताया.

क्यों?’

अब वहां कोई नहीं जाना चाहता.’ दोनों भूतआत्माओं की समझ में कुछ नहीं आया. तभी कुछ आत्माएं हाथ में दफ्ती लिए नजर आईं. उनपर नारे लिखे थे. भूतआत्माएं उन्हें पढ़ें उससे पहले ही एक स्क्रीन पर किसी नेता का भाषण दिखाया जाने लगा. पता चला कि हरियाणा का ही कोई नेता है. वह कह रहा था—‘हम आज भी कहते हैं—बेटी बचाओबेटी पढ़ाओ. लेकिन सड़क चलती लड़की की इज्जत की गारंटी नहीं है. जिन लड़कियों को इज्जत प्यारी है, वे घर रहकर चौकाचूल्हा देखें.’

हम भूतआत्मा के रूप में ही भलीं.’ कहते हुए वे दोनों उन आत्माओं में शामिल हो गईं जो हरियाणा न जाने की जिद ठाने थीं.

21/ अवसर

तानाशाह ने सुना कि ईश्वर के पास असीम ताकत होती है. उससे वह कुछ भी कर सकता है. दिव्य अस्त्रशस्त्र होते हैं. उनसे वह दुश्मन को तबाह कर सकता है. उसी दिन से उसने सर्वशक्तिमान बनने की ठान ली. जिन कारखानों में मशीनें बनती थीं, उनमें टेंक बनने लगे. जिनसे वस्त्रों की आपूर्ति होती थी, वहां सैनिकों के लिए बुलेट प्रूफ जॉकटें बनने लगीं. जिस धनराशि से अस्पतालों की औषधियां खरीदी जाती थीं, उनसे गोलाबारूद खरीदे जाने लगे. उस साल अकाल पड़ा. फसल तबाह होने से किसान आत्महत्या करने लगे. बात तानाशाह तक पहुंची—

मजबूत देश बनाने के लिए कुर्बानियां जरूरी हैं.’ तानाशाह ने कहा.

देश की असली ताकत तो जनता में होती है. लोग ही तबाह हो जाएंगे तो देश मजबूत कैसे बनेगा?’ जिस लेखक ने यह लिखा. उसे राज्यद्रोही बनाकर कारावास में ढकेल दिया गया. कुछ दिनों बाद भूख महामारी में बदल गई.

मरने वालों में किस धर्म के ज्यादा हैं?’ नया मृत्यु संदेश लेकर आए मंत्री से तानाशाह ने पूछा—

बराबर हैं?’ तानाशाह चिंता में पड़ गया. थोड़ी देर बाद उसका चेहरा फिर सपाट था—

हमारी संख्या उनसे कहीं अधिक है. दोनों बराबर भी मरे तो ज्यादा नुकसान न होगा, पर देश को विधर्मियों से मुक्ति मिल जाएगी.’

22/नाटक

चमत्कार हुआ. तानाशाह ने घोषणा की—‘आज से तानाशाही खत्म. आगे जनता की मर्जी का राज चलेगा.’ सुनकर ‘भक्तों’ ने जयकारा लगाया. आलोचक मौन हो गए. अधिकारी जोरशोर से चुनाव की तैयारियों में जुट गए. चुनाव के दिन चप्पेचप्पे पर पुलिस तैनात थी. मतदाताओं की सुविधा के लिए हर तरह का इंतजाम था. उत्साहित जनता मुंहअंधेरे मतदानकेंद्रों पर जा डटी.

चुनाव शुरू हुआ. पहला मतदाता भीतर गया; और शोर मचाते हुए तत्क्षण बाहर निकल आया—‘हर बटन पर तानाशाह की तस्वीर छपी है. यह कोई चुनाववुनाव नहीं है.’ लोग कुछ समझ पाएं उससे पहले ही सुरक्षाकर्मियों ने उसे दबोच लिया. वे उसे घसीटते हुए भीतर ले गए. कुछ देर बाद वोट पड़ने की आवाज आई.

चलिए अब आप भी मतदान कीजिए.’ पहले मतदाता को बाहर का रास्ता दिखाते हुए सुरक्षाकर्मियों ने कहा.

उस आदमी ने बताया, मशीन सारे वोट एक ही उम्मीदवार को दे रही है.’

खामोश!’ इंतजाम में लगा बड़ा अधिकारी चिल्लाया—‘तुम्हारा काम केवल वोट डालना है. मशीन ने कैसे वोट दिया, किसे वोट दिया, यह जानने का अधिकार तुम्हें नहीं हैये देखो, सरकार की ओर से भी यही लिखा है न!’ प्रमाण के लिए अधिकारी ने अखबार आगे कर दिया.

फिर हमारी क्या जरूरत है, तुम्हीं लोग काफी हो.’ इस बार कई लोग एक साथ बोल पड़े.

जनता लोकतंत्र चाहती है, तो हमने सोचा, यह नाटक भी सही.’ पीछे खड़ा तानाशाह, जो चुनाव का जायजा लेने निकला था, बोला.

23/ईश्वर की जात

ईश्वर विचारमग्न आगे बढ़ रहा था. चलतेचलते प्यास लगी. उसने इधरउधर देखा. तभी सामने से पुजारी आता दिखाई पड़ा. माथे पर चौड़ा तिलक. कंधे पर पोटली, दाएं हाथ में बड़ासा लोटा थामे. ईश्वर की उम्मीद बढ़ी—‘पानी मिलेगा?’

पुजारी ने ऊपर से नीचे तक देखा, ‘पहले जात बताओ?’

ईश्वर चकराया. देर तक कोई उत्तर न सूझा. प्यास गला जकड़ने लगी थी.

नाम क्या है?’ पुजारी ने अगला सवाल किया.

ईश्वर.’

ऊंह! आजकल नाम से कुछ पता नहीं चलता.’ पुजारी खुद पर झुंझलाया, ‘बाप का नाम?’

मेरा कोई पिता नहीं है.’

यह क्यों नहीं कहते कि वर्णसंकर यानी शूद्र हो!’

भूल गए, मैं वही ईश्वर हूं. जिसकी तुम सुबहशाम रोज आरती उतारते हो.’

चलो मान लिया कि तुम सचमुच के ईश्वर हो. फिर भी मैं तुम्हें पानी क्यों दूं. आज पानी मांग रहे हो, कल दूध, परसों दहीमक्खन, आगे चलकर चढ़ावे में हिस्सा भी मांगने लगोगे. मेरा काम तुम्हारी मूरत से चल जाता है. तुम अपना रास्ता नापो….’ ईश्वर को हटा पुजारी आगे बढ़ गया.

24/देवता का भय

भीषण दरिद्रता, भूखप्यास, गरीबी देखकर अकुलाए एक भलेमानुष ने दुनिया बचाने की ठान ली. समाधान की खोज में चलताचलता वह क्षीरसागर तक पहुंचा. आंखों के सामने दूध का समंदर लहराते देख उसके आनंद का पारावार न रहा—

यहां मेरी चिंताओं का समाधान संभव है?’ आदमी ने सोचा. तभी उसकी दृष्टी शेषनाग पर आंखें मूंदकर लेटी भव्य आकृति पर पड़ी. उसने विनीतभाव से कहा—

जहां से मैं आया हूं वहां भूख का तांडव मचा है. भरपेट भोजन न मिलने से बड़ों की अंतड़ियां सिकुड़ चुकी हैं. मासूम बच्चे माताओं के स्तन से चिपकेचिपके दम तोड़ रहे हैं. इस महासागर से थोड़ासा दूध मिल जाए तो लाखों मासूमों की जान बच सकती है.’

देवता के अधरों पर मुस्कान तैर गई. उसी को सहमति मान भलामानुष धरती की ओर दूध उलीचने लगा. अकस्मात कुछ पंडितजनों की टोली उधर से गुजरी. आदमी को क्षीरसागर के किनारे देख वे चौंक पड़े. उनमें से कई की भृकुटियां तन गईं—‘महाराज! जिस तेजी से यह दूध उलीच रहा है, उससे तो कुछ देर में क्षीरसागर भी खाली कर देगा.’

धरती की भूख मिटाने के लिए यह परमावश्यक है.’ शेषनाग पर लेटे देवता ने कहा.

सोच लीजिए भगवन्! लोग जब तक भूखेप्यासे हैं, तभी तक आपका नाम लेते हैं. भूख और गरीबी न रही तो तुम्हारे साथसाथ हमें भी कोई नहीं पूछेगा.’ देवता ने कुछ देर सोचा. अचानक उसने करवट बदली और मुंह दूसरी ओर कर लिया. भक्तों के लिए इतना इशारा काफी था. ‘असुरअसुर’ कहकर वे उस आदमी पर टूट पड़े.

उस दिन धर्म और भूख के रिश्ते से एक और पर्दा हटा.

25/गाय और ईश्वर

गाय जल्दी से जल्दी बस्ती से चूर निकल जाना चाहती थी. अचानक ईश्वर सामने आ गया—‘जंबूद्वीप में सब कुशल तो हैं?’ ईश्वर ने पूछा. उखड़ी सांसों पर काबू पाने का प्रयत्न करते हुए गाय ने उत्तर दिया—

कुछ भी ठीक नहीं है. लोग धर्म में शांति की खोज करते हैं, जो सर्वाधिक अशांत क्षेत्र है. ऐसी तकनीक के भरोसे बुद्धिमान होना चाहते हैं, जो उन्हें दिमागी तौर पर पंगु बनाने के लिए तैयार की गई है. चाहते सब हैं कि भ्रष्टाचार मिटे, परंतु हवस कोई छोड़ना नहीं चाहता.’

किसी महापुरुष ने कहा है—दुनिया से भागने से अच्छा है, उसे बदलो. वैसे भी भारतवासी तुम्हारी पूजा करते हैं. उन्हें छोड़कर जाना उचित न होगा.’ ईश्वर ने समझाया. गाय झुंझला पड़ी—

आदमी को मेरा दूध और चमड़ी चाहिए. इन दिनों हालात और भी बुरे हैं. हर दंगेफसाद में मेरा नाम घसीट लिया जाता है. जो कुछ नहीं कर पाता सकता, वह गौरक्षक बना फिरता है. मैं ऐसी जगह एक पल भी ठहरना नहीं चाहती.’

मुझसे कहतीं. मैं कभी का ठीक कर देता.’ ईश्वर बोला. गाय का गुस्सा भड़क उठा.

चुप रहो. सारे फसाद की जड़ केवल तुम हो. मंदिर में पड़ेपड़े रोटियां तोड़ते रहते हो. मेहनत न खुद करते हो न भक्तों से करने को कहते हो. तमाशबीन बनकर ईश्वर होने का दावा करने से तो अच्छाहै किसी कुआपोखर में डूब मरो. लोग कुछ दिन हैरानपरेशान रहेंगे. बाद में अपने भरोसे सबकुछ ठीकठाक कर लोगे.

ईश्वर स्तब्ध. वह कुछ उत्तर दे, उससे पहले गाय आगे बढ़ गई.

ओमप्रकाश कश्यप

बिल्लियों और बंदर की कहानी : एक पुनर्दृष्टि

सामान्य

एक अत्यंत पुरानी, मगर बहुश्रुत कहानी है जिसमें बिल्लियों को मूर्ख और बंदर को चालाक बताया गया है. बिना उनकी भूख और जरूरतों पर विचार किए. पाठक-श्रोता के रूप में हम भी उसपर विश्वास कर लेते हैं. न लेखक की मंशा पर संदेह करते हैं, न अपनी ओर से कुछ जोड़ते-घटाते हैं. वैसे भी कहानियां आमतौर पर मनोरंजन की चाहत के साथ पढ़ी जाती हैं. कहानी खत्म, बात खत्म. कहानी इस प्रकार हैーदो बिल्लियों को रोटी का टुकड़ा मिला. जो है, जितना है, उसे एक-दूसरे के साथ बांटने, मिल-जुलकर उपयोग करने के बजाए वे परस्पर झगड़ने लगीं. अकस्मात एक बंदर नमूदार हुआ. रोटी के टुकड़े को बराबर-बराबर बांटने के बहाने वह सारी रोटी चट कर गया. बिल्लियां एक-दूसरे का मुंह देखती रह गईं. लेखक बिल्लियों की चारित्रिक दुर्बलता दिखाकर एकता का सकारात्मक संदेश देता है. दो पक्षों की लड़ाई में लाभ कोई तीसरा ही उठाता है. कहानी का यह संदेश जगजाहिर है. पर क्या सिर्फ इतनी-सी बात है?

कहानी के अनुसार दोनों बिल्लियों को इतना विवेक भी नहीं था कि रोटी का स्वयं बंटवारा कर सकें. भूख की तीव्रता में वे अपनी सामान्य नैतिकता खो चुकी थीं. खुद पर, एक-दूसरे पर विष्वास नहीं था! क्या बिल्लियां शुरू से ही ऐसी थीं? या उनकी नीयत रोटी के मामूली टुकड़े को देखकर खराब हुई थी? अच्छा होता लेखक उनके हालात पर भी विचार करता. उनकी भूख और जरूरत को समझने की कोशिश करता. उन परिस्थितियों पर भी चर्चा करता जिन्होंने उन्हें मूर्खतापूर्ण आचरण के लिए विवश किया था. या फिर भिन्न स्थितियों के साथ ऐसी कहानी लिखता जिसमें बिल्लियां कुछ देर झगड़तीं. फिर रोटी के मामूली टुकड़े के लिए लड़ने के बजाय उसे एक ओर रख, उतनी रोटियों की तलाष में नए सिरे से निकल जातीं, जिनसे दोनों का पेट भली-भांति भर सके. आखिर वह उनके लिए एक दिन का काम तो था नहीं. पर्याप्त भोजन जुटाने के बाद वापस लौटतीं. मिल-बैठकर खातीं. भोजन इतना होता कि किसने कितना खाया, उसका हिसाब रखने की जरूरत ही नहीं पड़ती. बच जाता तो बंदर को दे देतीं. वह भी उपकृत हो, भविष्य में किसी को धोखा न देने का संकल्प कर लेता. वैसे साहित्य में बिल्लियों की समझदारी या समझदार बिल्ली की कहानियां भी अवश्य होंगी. लेकिन जब भी बिल्ली और बंदर की कहानी की चर्चा होती है, दिमाग में वही पुरानी कहानी आ जाती है. क्या इसका कारण कहानी की अतीव लोकप्रियता है, अतीतमोह है या कुछ और?

हमारा इरादा बिल्लियों और बंदर की कहानी के आदि लेखक की नीयत पर संदेह करने का नहीं है. रचनाकार का अधिकार है कि अपने मंतव्य को पाठकों तक पहुंचाने के लिए मनचाही विधा और भाषा-शैली का इस्तेमाल करे. वैसी स्वतंत्रता इस कथा-लेखक को भी थी. कहानी की वैश्विक लोकप्रियता से पता चलता है कि लेखक अपने उद्देश्य में सफल भी रहा है. इस कहानी और इस तरह की अनेक कहानियां हैं, जिनका संदेश इतना स्पष्ट और लोकव्यापी है कि मात्र शीर्षक से पूरी कहानी हमारे दिमाग में कौंध जाती है. यहां लेखकीय कौशल स्वतःप्रमाणित है. परंतु बात यहीं तक सीमित नहीं है. ऐसी कहानियां जो अपने संदेष के साथ रूढ हों या रूढ कर दी जाएं, लोग ऐसा मान लें कि उनका कोई और निहितार्थ असंभव है, मिथ में ढल जाती हैं. मिथ अपनी अर्थ-भंगिमाओं से बंधे होते हैं. उनमें ज्यादा फेरबदल संभव नहीं होती. कुछ ऐसा ही दृष्टांत में भी होता है. लेकिन दृष्टांत में कथापक्ष का अधिक महत्त्व होता है. लोग उसी के लिए उसे पढ़ना-सुनना पसंद करते हैं. स्थानीय जरूरत के हिसाब से उसमें थोड़ी-बहुत फेरबदल की भी छूट होती है. दृष्टांत पूरा होने पर पाठक-श्रोता को उसके संदेश की व्याख्या अपने विवेकानुसार करने की छूट होती है. जैसे रावण ऐसा मिथ है, जिसे समाज में बुराई का प्रतीक मान लिया गया है. विभिन्न देशों और संस्कृतियों में रामायण के भिन्न रूप प्रचलित हैं. लेकिन रावण के मूल-भूत चरित्र में कोई बदलाव नहीं मिलेगा. बिल्ली और बंदर की कहानी भी अपने कथानक से ज्यादा संदेश से बंधी है. हम उसके संदेश से इतने अनुकूलित हैं कि किसी दूसरे निहितार्थ, यहां तक कि उसकी संभावना की ओर भी हमारा ध्यान नहीं जाता. ऐसी कथाएं जैसी हैं, जिस रूप में हैं, उसी में पूर्ण मान ली जाती हैं. नतीजा यह होता है कि बिल्लियों की मूर्खता और बंदर की धूर्त्तता हमारे मनोमस्तिष्क पर छाई रहती है. कहानी जिस तरह बयान की गई है, उससे पता चलता है कि कहानीकार खुद नहीं चाहता कि पाठक बिल्लियों के जीवन की किसी और हकीकत से परिचित हो. आखिर क्यों?

कुछ देर के लिए मान लेते हैं कि बिल्लियां क्षुधा-पीड़ित थीं. इतनी कि सामान्य नैतिकता को खो बैठी थीं. भूख के कारण उनमें इतना सामर्थ्य भी नहीं था कि और रोटी की तलाश में निकल सकें. हताशा में वे परस्पर झगड़ने लगती हैं. कभी-कभी ऐसा हो जाता है. प्रेमचंद की कहानी ‘कफन’ इंसान और इंसानियत की इसी दुर्दशा को बयान करती है. बादल सरकार का बहुचर्चित नाटक हैー‘पगला घोड़ा’, जिसका हाल ही में फिल्मांकन हुआ है, इसी कड़ी में आता है. नाटक में चार आदमी शमशान के आगे बैठकर ताश के पत्ते फेंटते और शराब पीते हैं. भीतर जलती चिता की लपटें उनकी नैतिकता को झकझोरती हैं. रात के अंधेरे में वे चारों अपनी-अपनी कहानी जो एक तरह से उनका अपराधबोध भी है, से गुजरते हैं. उनके साथ-साथ दर्शक भी सामाजिक त्रासदियों से दो-चार होते हैं. संस्कृत की एक कहावत हैー‘भूखा व्यक्ति कौन-सा पाप नहीं करता.’ शास्त्रों में भूख को आपद्धर्म कहा गया है. आपद्धर्म के चलते क्षुधा-पीड़ित विश्वामित्र ने चांडाल के घर से कुत्ते का मांस चुराकर खाया था. यदि विश्वमित्र का ब्राह्मणत्व इससे आहत नहीं होता तो, मामूली झगड़े के लिए बिल्लियों के चरित्र पर हमेशा-हमेशा के लिए दाग क्यों लगे? हमें तो उन बेजुबान प्राणियों से सहानुभूति होनी चाहिए. परंतु कहानीकार हमें इस ओर नहीं ले जाता. एक झटके में वह हमें वहां पहुंचा देता है, जहां बिल्लियों को मूर्ख तथा बंदर को चालाक मानने के अलावा हमारे पास दूसरा रास्ता ही नहीं बचता. ठीक ऐसे ही जैसे वर्ण-व्यवस्था शूद्र को हेय और तिरस्कार योग्य मान लेती है, हम बिल्लियों को मूर्ख ठहरा देते हैं.

कहानी में बंदर का चरित्र उस पुरोहित की याद दिलाता है जो दिन-भर एक के बाद एक, यजमानों के घर जाकर पूजा-पाठ करता है और उनके लिए ईश्वरीय अनुकंपा के नाम पर अपनी दक्षिणा लेकर आगे बढ़ जाता है. कभी किसी याचक को नहीं कहता कि यह रहा देवता को प्रसन्न करने का मंत्र, यह रही समिधा की सूची और ये है कर्मकांड की प्रविधि. आगे जब मन करे, देवता को प्रसन्न करने का कर्मकांड स्वयं कर सकते हो. मंत्र नहीं पढ़ सकते तो टूटी-फूटी भाषा में ही देवता से संवाद करने की कोशिश करना. वह इसका बुरा नहीं मानेगा. लेकिन जैसे पुरोहित यजमान के प्रबोधन पर ध्यान नहीं देता, वैसे ही बंदर बिल्लियों के प्रबोधन की जरूरत नहीं समझता. अपने-अपने स्वार्थ के लिए दोनों दलाल-तंत्र को प्रश्रय देते हैं. पुरोहित ईश्वरीय अनुकंपा के नाम पर दलाली लेता है, बंदर न्याय के नाम पर. धर्म और राज्य का यह गठजोड़ शताब्दियों पुराना है.

अपना औचित्य सिद्ध करने के लिए राज्य नागरिकों को निरंतर यह विश्वास दिलाए रहता है कि वह न हो तो समाज में सबकुछ अस्त-व्यस्त हो जाए. सरकार के चहेते बुद्धिजीवी उन्हें समझाते हैं कि स्वभाव का जंगलीपन मनुष्य ने प्रकृति से उधार पाया है. यह उन प्रवृत्तियों का अवशेष है जब मनुष्य जंगल में वन्य प्राणियों के बीच रहता था. अस्तित्व पर संकट आ पड़े तो वन्य पशुओं को उतने ही जंगलीपन के साथ जवाब भी देता था. राज्य की बातों में आकर हम ऐसी कहानियों पर बहुत जल्दी विश्वास कर लेते हैं जिनमें गरीब और कमजोर को मामूली बातों पर लड़ते-झगड़ते दिखाया जाता है. वर्ण-व्यवस्था का स्थापित तर्क हैー‘शूद्र जन्मत: असभ्य होता है.’ हालांकि जो सभ्यता शूद्रों को असभ्य और विवेकहीन बताती है, उसी के धर्मग्रंथों में शूद्र-ऋषियों और शिल्पकारों की महिमा का बखान किया गया है. कितने ही धर्मग्रंथ उनकी रचना हैं. लेकिन प्रकट में शूद्रों को विवेकहीन, स्वार्थी, लालची बताया जाता है. कहानियों और मिथकों पर आंख-मूंदकर विश्वास करने के अभ्यस्त लोग उसपर आसानी से विश्वास भी कर लेते हैं. ‘बिल्लियां और बंदर’ जैसी कहानियां इस तरह फैसले करने का अभ्यस्त बनाती हैं. दरअसल, नई स्थितियों के प्रति मानव-मस्तिष्क की सक्रियता आरंभ में तीव्र होती है, किंतु जब कोई घटना, स्थिति, विचार या वस्तु एक-समान अवस्था में, बगैर किसी परिवर्तन के बारंबार गुजरती है, दिमाग उसका नोटिस लेना बंद कर देता है. उस अवस्था में वह अपने निष्कर्ष को अवचेतन के हवाले कर देता है. आगे जब वही स्थिति दुबारा सामने आती है, अवचेतन तत्क्षण अपना पूर्वनिर्धारित निर्णय सुना देता है. इससे पाठक-श्रोता तक रचना का बंधा-बंधाया संदेष तो पहुंचता है, मगर साहित्य होने का मर्म पूरा नहीं होता. क्योंकि साहित्य का काम निर्णय सुनाना नहीं, परिस्थिति के अनुसार सर्वात्तम निर्णय लेने का सामर्थ्य पैदा करना है.

प्लेटो ने न्याय को आदर्श राज्य का श्रेष्ठतम गुण माना है. बाद के विचारकों ने भी अपनी-अपनी तरह से उसका समर्थन किया है. हर राजनीतिज्ञ ‘न्याय’ के आश्वासन के साथ ही सत्ता-केंद्र तक पहुंचता है. परंतु सत्ता में आने के बाद उसकी भूमिका उपर्युक्त कहानी में ‘बंदर’ जैसी हो जाती है. वह समाज के विभिन्न संघर्षरत समूहों को इसलिए एक नहीं होने देता क्योंकि वह भली-भांति जानता है कि जनता की एकता तथा ऊंचे मनोबल से उसके स्वार्थ खटाई में पड़ सकते हैं. ऐसे में आत्मकल्याण के लिए जनता के पास एकमात्र यही उपाय शेष बचता है कि अपने प्रबोधन की जिम्मेदारी वह स्वयं संभाले. जनता समझदारी दिखाए तो राज्य की भूमिका अपने आप सिमट जाए. राज्य की भूमिका बनी रहे, इसलिए येन-केन-प्रकारेण जनता को मूर्ख, कमजोर आपस में लड़ते-झगड़ते दिखाया जाता है. जैसे उपर्युक्त कहानी में बंदर के पास अपना कोई अर्जन नहीं था, शासक वर्ग के पास भी अपना कोई अर्जन नहीं होता. उसका अस्तित्व जनता के परिश्रम पर टिका होता है. इस बात को शासक वर्ग और उससे जुड़े लोग भली-भांति जानते हैं. जबकि जनता परमशक्तिशाली होने के बावजूद, इस हकीकत के से अनजान बनी रहती है. लोग इसी तरह अनजान बने रहें, इसके लिए उनकी एकता और आत्मविश्वास पर लगातार हमला किया जाता है.

किसी कलाकृति या रचना का अर्थ-विशेष के साथ बंध जाना, उसके साहित्यपन को कमजोर करता है. मुहावरे और लोकोक्तियां भी शब्दों-प्रसंगों के अर्थ-रूढ हो जाने के कारण बनते हैं. हम अकसर लोगों को सलाह देते हुए सुनते हैंー ‘भैया पैर उतने पसारो जितनी चादर है.’ सुनने वाला इसका प्रतिवाद नहीं करता. तुरंत मान लेता है कि संतोषी होना अच्छी बात है. क्योंकि उसने जन्म से ही संतोष-धन का महिमा-मंडन होते देखा है. कबीर जैसे पहुंचे हुए कवि भी संतोष की महिमा का बखान करना नहीं भूलते. संतोष को परमधन बताने वाले इस सवाल को गोल कर जाते हैं कि देश में मुट्ठी-भर लोगों की ‘चादर’ उनकी जरूरत से कई गुना बड़ी और हजारों-हजार लोगों की चादर उनकी जरूरत के हिसाब से बेहद छोटी क्यों होती है? दूसरे यदि किसी की चादर उसके पैरों को पूर्णतः तरह ढकने में असमर्थ है तो उसे यह सलाह क्यों नहीं दी जानी चाहिए कि वह धैर्य-पूर्वक, अपने श्रम-कौषल और आत्मविश्वास के साथ चादर के आकार को उस समय तक बढ़ाता रहे जब तक उसमें न केवल वह स्वयंー बल्कि उसके मित्र-हितैषी, घर-परिवार, पड़ोसी सब सरंक्षण प्राप्त कर सकें. असंतोष की आलोचना करते समय प्रायः उसे लालच का पर्याय मान लिया जाता है. जबकि लोककल्याण की वांछा से जुड़ा असंतोष समाज के समग्र विकास हेतु एक प्रेरक-शक्ति बनने का सामर्थ्य रखता है.

संतोष को लेकर भारतीय संस्कृति के अंतर्विरोध कम नहीं हैं. संस्कृति के चार पुरुषार्थों में धनार्जन भी सम्मिलित है. पुरुषार्थ की मर्यादा होती है, सीमा नहीं. धन यदि पुरुषार्थ है तो भारतीय संस्कृति के अनुसार आदमी का कर्तव्य है कि वह अधिक से अधिक धन जुटाए. ऐसे में संतोष-धन का बखान किसके लिए था? जाहिर है, ‘शूद्र’ और ‘दास’ के लिए जिन्हें संपत्ति रखने की मनाही थी. यदि किसी कारण शूद्र के पास संपत्ति जमा हो जाए तो उसको बलात छीन लेने का अधिकार धर्मशास्त्रों में है. एक और बात. संतोष को परमगुण बताने वाले स्वयं भी संतोषी हों, यह आवश्यक नहीं है. ऐसे ही लोग राजाओं की साम्राज्यवादी लिप्साओं का वर्णन करते समय चंदबरदाई बन जाया करते हैं. संतोष को परमधन कहना भले ही ‘परउपदेश कुशल बहुतेरे’ जैसा प्रहसन हो, किंतु इसी का सहारा लेकर यथास्थितिवादी गरीबी और दैन्य का महिमामंडन करने लगते हैं. यथास्थिति का दूसरा रूप भाग्य भी है. ऐसे लोगों के लिए सामाजिक विषमता को पाटने का एकमात्र रास्ता है ー चमत्कार. सुदामा-कृष्ण जैसे अतार्किक मिथ उसे समाज में स्थापित किए रहते हैं. प्रकारांतर में वे दिखाना चाहते हैं कि महत्त्वाकांक्षी होना समृद्ध को शोभा देता है. गरीब का हित इसी में है कि वह गरीबी का महिमा-मंडन करते हुए अपने दिन काटे. सपने यदि आंखों में आएं तो निकाल फेंके. यह बात उसे कोई बताने नहीं आता. फिर भी हर आदमी समझ जाता है.

बात बिल्लियों और बंदर की कहानी से शुरू हुई थी और असंतोष पर आ गई. साहित्य में, जिसका काम अपने पाठक-श्रोता का प्रबोधन करना है ー यह संभावना बनी रहती है. साहित्यिक कृति की सफलता के लिए आवश्यक है कि पाठक उसके निहितार्थ को लेकर स्वतंत्र हो. प्रचलित अर्थों को लेकर संदेह की क्षीण संभावना उनके मन में हमेशा बनी रहे. यह धारणा बनी रहे कि कृति को जैसा समझा या समझाया गया है, उसका अर्थ उससे इतर भी संभव है. इसी से रचना के नए अर्थ खुलते हें. ‘बिल्लियां और बंदर’ जैसी कहानियां अपने निहितार्थ को लेकर इतनी स्पष्ट और संप्रेषणीय होती हैं. यह उनकी सफलता भी है और सीमा भी. क्योंकि अर्थ-विशेष के साथ रूढ़ हो जाने से वे पाठक का वैसा प्रबोधन नहीं कर पातीं, जैसा किसी साहित्यिक कृति से अपेक्षित होता है. समाज ऐसी कहानियों को सांस्कृतिकरण की जरूरत के रूप में सहेजता है. प्रकारांतर में वे समाज में यथास्थिति बनाए रखने में सहायक होती हैं.

ओमप्रकाश कश्यप

शब्द और सनसनी

सामान्य

विचारहीन राजनीति का दौर तो दशकों से था. हाल में उसका और भी अवमूल्यन हुआ है. इधर की राजनीति मानो कुछ शब्दों तक सीमित होकर रह गई है. शब्द नए नहीं हैं. सैकड़ोंहजारों वर्षों से वे हमारे सोच और विमर्श का हिस्सा रहे हैं. लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि शब्द ही विचार के रूप में अभिव्यक्त होने लगें; और गिनेचुने शब्द हमारे विमर्श तथा संपूर्ण सामाजिकराजनीतिक चेतना को अल्पकाल के लिए ही सही, पूरी तरह से हड़प लें. मगर पिछले कुछ महीनों से देखने में आया है कि चंद शब्द जानीअनजानी किसी भी दिशा से शरारताना उछाल दिए जाते हैं. पूंजीवादी हितों को समर्पित मीडिया उन्हें तत्काल लपक लेता है. फिर प्रायोजित विमर्श के माध्यम से पूरी बौद्धिक चेतना उन शब्दों की व्याख्या, पुनर्व्याख्या में जुट जाती हैविचारहीनता के माहौल में उपद्रवी संगठनों की जुबान पर चढ़े शब्द तेजाब का काम करने लगते हैं. प्रतिक्रियावाद पहले भी था, लेकिन उसकी मंशा प्रतिपक्षी को शहमात के खेल में उलझा देने की होती थी. वह इतना पश्चगामी भी नहीं था, जितना कि आज. जैसे, ‘पाकिस्तान’ हमारे लिए केवल पड़ोसी देश कभी नहीं रहा. अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए सरकार और राजनीतिज्ञ उसका नाम प्रायः उछालते आए हैं. आज भी वही सिलसिला जारी है. इस पड़ोसी देश के प्रति हमारे पूर्वाग्रह एवं प्रतीतियां इतनी गहरी हैं कि आज भी, प्रायः आतंकवाद के पर्याय के रूप में तो कई बार बेमतलब की बातों में भीवह हमारे दिलोदिमाग पर सवार हो जाता है. फिर भी कुल मिलाकर एक स्वतंत्र देश के नाते पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीयता से जुड़ा मसला है. इसलिए वह समाज को तात्कालिक रूप से उत्तेजित भले ही करे, ध्रुवीकरण में सफल नहीं हो पाता.

इन दिनों ‘असहिष्णुता’, ‘बीफ’, राष्ट्रद्रोह’ आदि कुछ ऐसे शब्द हैं जो हमारी सामाजिक और राष्ट्रीय चेतनाओं को खंडखंड करने पर तुले हैं. जिन्हें लेकर अर्थहीन बहस चारों ओर जारी है. दोष इन शब्दों का नहीं है. प्रत्येक शब्द अनेकार्थी होता है. वाक्य में, अन्य शब्दों के साथ मिलकर वह विशिष्ट संदर्भों को अभिव्यक्त करने लगता है. इसलिए व्याकरण में शब्दार्थ के साथ शब्दशक्ति का महत्त्व भी बताया गया है. संदर्भ के अनुसार शब्द के विशिष्ट अर्थ को रचना में उभारकर, उसकी मदद से अपने मंतव्य को स्पष्ट कर देना ही लेखकीय सफलता है. आशय है कि विमर्श के दौरान शब्द अपनी अर्थवत्ता या अर्थवत्ताओं को आमतौर पर बड़े अर्थ यानी सर्जनात्मकता के निमित्त बलिदान कर देता है. रचना में ढलने के लिए शब्द की ओर से यह कुर्बानी जरूरी है. जैसे अनेक बूंदें एकसाथ मिलकर महासागर को जन्म देती हैं, शब्द भी दूसरे शब्दों से तालमेल कर, बड़े सृजन में ढलने का सामथ्र्य रखता है. लेकिन कुछ महीनों से शब्दों को, बड़ी अर्थवत्ता से जोड़ने के बजाए लोग उनके सीमित और स्थानिक अर्थों पर बहस करने में अपनी ऊर्जा खपाने लगे हैं

ऐसा नहीं है कि शब्दसंस्कार को पहचानने तथा उसका अनुकूल संदर्भों में प्रयोग करने की हमारी क्षमता कम हुई है. बल्कि इसलिए कि जनसंवाद कायम करने के लिए जो व्यक्ति और संस्थाएं जिम्मेदार हैं, वे उन लोगों के इशारों पर काम करने लगी हैं, जिनके निजी स्वार्थ मानवीय हितों पर भारी पड़ते हैं. यह न केवल हमारे समाजीकरण के लिए घातक है, बल्कि मानवीकरण की कोशिशों को भी झटका देने वाला है. चंद शब्दों को उछालकर सरगर्मी पैदा करने वाली कुछ शक्तियों को तो हम भलीभांति जानते हैं. उनके अपकर्म के लिए जबतब उन्हें धिक्कारते भी रहते हैं. तथापि कुछ शक्तियां ऐसी भी हैं जिन्हें हम जानते तो हैं, पर्दे के पीछे सारे अपकर्म वही करती हैं, फिर भी हमारी संवेदना, सारा समर्थन उनके पक्ष में बना रहता है. विकल्प के अभाव में ‘सोशल मीडिया’ को जो कहीं से भी ‘सोशल’ न होकर विशुद्ध पूंजीवादी तंत्र है, मुक्तिकामी लेखकों, संगठनों ने अभिव्यक्ति का अपरिहार्य माध्यम मान लिया है. वे उसे जनतांत्रिक मीडिया के रूप में पेश करते हुए सत्ता प्रतिष्ठानों से टकरा रहे हंै. टेलीविजन, अखबार आदि पर सरकार और अन्य वर्चस्वकारी शक्तियों का नियंत्रण होने के कारण वे उस मीडिया को अपनाने के लिए विवश हैं, जिसकी बागडोर बाजारवादी शक्तियों के हाथ में है. निहित स्वार्थ के लिए जो कभी भी, किसी भी दिशा में जा सकता है.

अर्थशास्त्र के क्षेत्र में ‘इन्विजीविल हेंड’(अदृश्य हाथ) की प्रसिद्ध अवधारणा है. उसकी परिकल्पना एडम स्मिथ ने बाजार के संतुलनकारी रूप की व्याख्या के लिए की है. स्मिथ के अनुसार बाजार स्वयंसिद्ध होता है. प्रत्येक चुनौती से निपटने में सक्षम. प्रतिकूल हालात में तत्काल समायोजन कर वह अपने अस्तित्व को बनाए रखता है. थोड़े भिन्न रूप में ऐसा ही अदृश्य वरद्हस्त ‘फेसबुक’ और ‘ट्विटर’ जैसे कथित ‘सोशल मीडिया’ को भी प्राप्त है. वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को वहीं तक सह सकते हैं, जहां तक वह उनके आकाओं के लिए लाभकारी हों. ये सब उनके लिए सरकार पर दबाव बनाए रखने के माध्यम हैं. ताकि हांफती हुई सरकारों से हड़बड़ी में मनमाने फैसले कराए जा सकें. आकालोग नहीं चाहते कि राजनीति के पीछे कोई विचार हो. सरकारों को एक सीमा से अधिक मजबूत न होने देना भी उनकी चाल होती है. जानते हैं कि वामपंथी हो या दक्षिणपंथी, राजनीति विचारकेंद्रित होगी तब वह न्यूनतम मूल्यों से भी समृद्ध होगी. मूल्यकेंद्रित होगी तो उसे वास्तविक लोकसमर्थन हासिल होगा. वास्तविक लोकसमर्थन हासिल होने पर सरकारें आत्मविश्वास से लबरेज रहेंगी. फिर उनसे मनमाने फैसले कराना मुश्किल होगा. ‘सोशल मीडिया’ उनके लिए लोगों के दिलोदिमाग पर नियंत्रण बनाए रखने का हथियार है. जैसे ही लोग इन माध्यमों का ऐसा उपयोग करने लगेंगे, जिनसे पूंजीपतियों का वास्तविक अहित होने की संभावना हो, अदृश्य हाथ फौरन काम करना शुरू कर देता है. आकालोग खुद सामने नहीं आते. वे सरकार, विपक्ष, धर्म और संस्कृति सभी के सक्षम कंधों का इस्तेमाल करते हैं. इसलिए जो लोग इन माध्यमों से वास्तविक बदलाव की उम्मीद पाले हैं, सोचते हैं कि ये माध्यम बदलाव के अंतिम क्षण तक मददगार सिद्ध होंगे, वे या तो अंधविश्वासी हैं या हद से अधिक भोले. वास्तविक बदलाव के लिए इन माध्यमों के पीछे जो ‘अदृश्य हाथ’ है, उसे पहचानने की जरूरत है.

कुछ महीने पहले ‘असहिष्णुता’ नामक शब्द उत्तेजक मीडियाविमर्श का हिस्सा था. देश में बढ़ती सांप्रदायिकता को लेकर जागरूक साहित्यकारों, संस्कृतिकर्मियों, कलाकारों आदि ने जागरूक पहल की थी. सरकार को सांप्रदायीकरण के लिए जिम्मेदार मानते हुए उन्होंने अपने सरकारी पुरस्कार/सम्मान लौटा दिए थे. यह न तो अलोकतांत्रिक था, न ही सरकार की अवज्ञा. बल्कि जो किया गया वह समय की मांग थी. उस समय उचित होता कि सरकार उनकी चिंताओं पर ध्यान देती. उनके बहाने समाज में बढ़ती असहिष्णुता, जातिभेद, उत्पीड़न तथा सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने वाली स्थितियों पर खुलकर चर्चा होती. किंतु मीडिया की मनमानियों और पर्दे के पीछे चलने वाले षड्यंत्रों के चलते ‘असहिष्णुता’ पर चर्चा के नाम पर पूरी बहस, देश के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिशों में जुटी रही. कुछ लोगों ने यह कहकर कि जिन्हें इस देश में असहिष्णुता नजर आती है वे पाकिस्तान चले जाएंपाकिस्तान संबंधी हमारी रूढ़ अवधारणाओं का बेजा इस्तेमाल किया. ‘बीफ’ का मुद्दा भी ऐसा ही था. मांसखाना कुछ लोगों की दृष्टि में भले अनैतिक हो, लेकिन वह न केवल बड़े हिस्से की इच्छाओं और जरूरतों को पूरा करता है, बल्कि भारत की पुरातन संस्कृति में भी जगह बनाए है. इसके बावजूद यह नाकुछसा शब्द कई दिनों तक सनसनी फैलाने का काम करता रहा. धर्म और संप्रदाय की राजनीति करने वालों ने उसका स्वार्थ हित भरसक उपयोग किया.

इधर एक नया शब्द हवा में है. वह हैᅳ‘राष्ट्रद्रोह’. सब समझते हैं कि यह शब्द ‘सामाजिक न्याय’ जैसे बड़े मुद्दे से ध्यान हटाने के लिए सोचीसमझी रणनीति के तहत उछाला गया है. हैदराबाद विश्वविद्यालय में प्रबंधन की मनमानियों से त्रस्त दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या ने विश्वविद्यालय की दमितशोषित वर्गों के प्रति भेदभावपूर्ण नीतियों को अचानक विमर्श में ला दिया था. उसको केंद्र में रखकर ‘सामाजिक न्याय’ की मांग कर रहे विद्यार्थी संगठनों, बुद्धिजीवियों, लेखकों और पत्रकारों ने आगे बढ़कर विश्वविद्यालय प्रबंधन की कारगुजारियों की ओर ध्यान आकर्षित कराना चाहा था. सरकार चाहे किसी भी दल अथवा विचारधारा की क्यों न हो, उसका संवैधानिक कर्तव्य है कि वह रंग, जाति, वर्ण, क्षेत्रीयता आदि के नाम पर होने वाले पक्षपात, अन्याय, उत्पीड़न को रोके. ऐसी स्थिति हरगिज उत्पन्न न होने दे जिससे कुछ नागरिकों को लगे कि किसी खास धर्म, जाति अथवा वर्ण में जन्म लेने के कारण उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है. लेकिन सरकार ने लापरवाही बरती. वह उस समय उत्पीड़नकर्ताओं के समर्थन में खड़ी नजर आई, जब हैदराबाद विश्वविद्यालय की घटना से लोगों का ध्यान हटाने के लिए जेएनयू को केंद्र बनाकर कुछ विद्यार्थियों को निशाना बनाया गया. ‘राष्ट्रद्रोह’ शब्द का प्रयोग पुलिस और कानून ने तो गिनीचुनी बार किया, परंतु सनसनीप्रेमी मीडिया ने उसे इतनी बार उच्चारा कि दक्षिणपंथी ताकतों का दबाव झेल रही सरकार प्रतिगामी शक्तियों के समर्थन में दिखने लगी. नतीजा पुलिस ने विश्वविद्यालय की स्वायत्तता के क्षेत्र में दखल दिया तो सरकार उसे कानून का मसला बताकर चुप्पी साधे रही. इस अलोकतांत्रिक कार्रवाही के मौन समर्थन के लिए उसे देशविदेश में आलोचनाओं का सामना करना पड़ा. यहां तक कि नाम चॉम्सकी जैसे विद्वान जेएनयू के विद्यार्थियों के समर्थन में खड़े नजर आए

शब्दों के रूढ़ अर्थ को लेकर वादविवाद वैचारिकी के संकट की ओर इशारा करता है. देश में इन दिनों देश में यही हो रहा है. ‘असहिष्णुता’, ‘राष्ट्रद्रोह’, ‘भारतमाता’ जैसे शब्दों को उछालकर उनके जरिये समाज में उत्तेजना पैदा करना, वस्तुतः एक ही राजनीतिक संस्कृति की उपज है. इसके कर्ताधर्ता वे समूह हैं जो इस देश को कल्याण राज्य की अवधारणा से हटाकर ‘शक्तिशाली समूहों द्वारा शासित’ राज्य में बदल देना चाहते हैं. जैसा कभी जर्मनी में हिटलर ने किया था. उनके नियंत्रण में संचार माध्यमों का उपयोग एकतरफा संवाद के लिए किया जाता है. उनके जरिये ‘मन की बात’ कही जाती है, सुनी नहीं जाती. क्योंकि जिन लोगों पर शब्दों को बड़े विमर्श में ढालने की जिम्मेदारी रहती है, वे पूर्वाग्रहों से काम लेते हैं. ऐसा नहीं है कि वे दूसरों की व्याख्या को मन से अस्वीकार करते हैं. बल्कि इसलिए कि उनके स्वार्थ शब्दों की रूढ़ व्याख्याओं से जुड़ जाते हैं. हर बहस में वे उन्हीं बुद्धिजीवियों को उतारते हैं, जो उनकी विचारधारा के अनुकूल हो. बहस को सोचीसमझी दिशा में आगे बढ़ाया जाता है. फिर उसका ऐसी जगह समापन कर दिया जाता था कि दर्शकश्रोता किसी ठोस निर्णय पर न पहुंच सके. वही नौ दिन चले अढाई कोस वाली स्थिति. यह तब है जब इतिहास के किसी भी कालखंड से अधिक प्रखर और विविध विषयों के जानकार विशेषज्ञ और बुद्धिजीवी हमारे पास हैं. देश युवाशक्ति का गढ़ कहा जाता है. लेकिन राजनीति और पूंजीपतियों के हितों को अपना हित मान बैठे बुद्धिजीवी वही कहते हैं, जिसमें उनके स्वार्थ सधते हों. ऐसे में जिसे बहुमत का निर्णय कहा जाता है, अंततः वह अभिजन शक्तियों द्वारा संसाधनों को ओनेपौने हड़प लेने की नीति का हिस्सा बन जाता है.

इधर ‘राष्ट्रद्रोह’ और ‘भारत माता’ जैसे शब्द बौद्धिक गरमाहट का हिस्सा बने हैं. यह बात किसी से छिपी नहीं है कि इन शब्दों को सामाजिक न्याय की कामना में तेजी से उभर रहे अस्मितावादी आंदोलनों को दबाने के लिए उछाला गया है. देश को राजनीतिक स्वतंत्रता 1947 में मिली थी, मगर जनसंख्या का दोतिहाई हिस्सा वास्तविक आजादी के लिए 68 वर्ष बाद भी संघर्षरत है. अधिकांश के लिए तो वह आज भी सपने की तरह है. शताब्दियों से जातीय शोषण का शिकार रहे वर्ग इधर कुछ वर्षों से शोषण के कारणों को समझने लगे हैं. इसलिए वे उन प्रतीकों की नए सिरे से व्याख्या कर रहे हैं, जिनके आधार पर उन्हें सहस्राब्दियों से दबाया गया है. संवैधानिक स्थितियां उनके अनुकूल हैं. फलस्वरूप तेजी से बढ़ती जनचेतना, वर्चस्वकारी समूहों से हजम नहीं होती. देश की सरकार ऐसे संगठन के इशारे पर चल रही है, जो संस्कृति और धर्म के नाम पर समाज के बहुसंख्यक वर्ग को न्याय एवं अधिकारों से वंचित रखता है. जानता है कि अल्पमत में होने के कारण वह लोकतांत्रिक मोर्चे पर फतह नहीं पा सकता, इसलिए लोगों को मानसिक रूप से गुलाम बनाने के लिए धर्म, संस्कृति और बाजार की तरहतरह से मदद लेता है. ‘राष्ट्रवाद’ और ‘भारत माता की जय’ जैसे नारे जनसमुदाय की भावनाओं को भड़काकर शोषणकारी नीतियों की ओर से ध्यान हटाने की उसकी सोचीसमझी नीति का हिस्सा हैं.

चर्चा राष्ट्रद्रोह की चली है तो कुछ बातें ‘राष्ट्र’ और ‘राष्ट्रवाद’ को लेकर भी कर ली जाएं. पिछले कुछ दिनों से ‘भारत माता की जय’ का मुद्दा भी बौद्धिक गरमाहट का हिस्सा बना है. जो इस देश में रहता है, वह इस देश का नागरिक है. इसलिए यह मान लेना चाहिए कि उसे इस धरती से उतना ही प्यार है, जितना किसी और को है. अपनी मातृभूमि के प्रति स्नेह और सम्मान को कोई किन शब्दों में व्यक्त करता है, यह उसका निजी विश्वास या मसला है. उसका कोई एक स्वरूप संभव भी नहीं है. सरहद पर लड़ रहे सैनिक ‘भारत माता की जय’ बोलकर धावा बोलते हैं या ‘अल्लाह हो अकबर’ कहकर दुश्मन के छक्के छुड़ाते हैं, यह बात उतनी मायने नहीं रखती, जितना उन सैनिकों का जोशोजुनून और अपनी मातृभूमि के लिए मरमिटने की कामना. किसी भी राष्ट्र के लिए उसकी सीमाओं का महत्त्व होता है. लेकिन राष्ट्र की पहचान में उसकी भौगोलिकता अधिक मायने नहीं रखती. राष्ट्र की पहचान उसकी सांस्कृतिक जीवंतता, नए जीवनमूल्यों को अपनाने की क्षमता, नागरिकों के सामंजस्य भाव और श्रमसंस्कृति के स्तर से होती है. प्रत्येक राष्ट्र अपने नागरिकों की निर्मिति होता है. किसी देश की नागरिक संस्कृति ही दूसरे देशों में उसकी पहचान बनकर उभरती है. जब हम किसी जापानी के बारे में बात करते हैं तो इस बात पर कतई ध्यान नहीं देते कि उसका धर्म क्या है, वह बौद्ध है या शिंतो धर्म में विश्वास करने वाला. उसकी कल्पना के साथ ही अपने कर्म के प्रति सचेत, कर्मठ, अनुशासित तथा अपने देश को बेहद प्यार करनेवाले नागरिक का प्रत्यय मस्तिष्क में उभर आता है. यही स्थिति यूरोप के अधिकांश देशों के बारे में भी सच है. इसके विपरीत भारतीय नागरिक की विदेशों में छवि धर्म, जाति, विभिन्न प्रकार के कर्मकांडों में जकड़े रूढ़िग्रस्त व्यक्ति की बनी है. हमारे यहां नागरिकताबोध की कमी है, इसलिए भारत को लेकर हमारी राष्ट्रीय पहचान भी नागरिक होने के नाते कुछ खास नहीं है. जो कुछ कमाई बुद्ध, महावीर, नानकदेव जैसे महामानव हमारे लिए छोड़ गए हैं, उसी को हम आज तक भुनाए जा रहे हैं.

नागरिकताबोध का विकास सरकार और नागरिक दोनों का कर्तव्य है. लोकतांत्रिक सरकारों का यह भी कर्तव्य है कि वे समाज के लोकतांत्रिकरण हेतु सभी आवश्यक कदम उठाएं. नागरिकअस्मिता की रक्षा करें. मानवीकरण के अनुकूल स्थितियां पैदा करें. बिना नागरिक अस्मिता का सम्मान किए राष्ट्रवाद लाना, घोड़े को सिर से पांव तक बनी लोहे की जीन में कस लेने जैसा है. कोरा राष्ट्रवाद केवल उन्मादक मनःस्थिति है. वह सामाजिक असमानता और वर्चस्वकारी सोच का प्रदर्शन करता है. ‘भारतमाता की जय’ बोलने से शायद ही किसी को शिकायत हो. लेकिन इसे सभी के लिए अनिवार्य बनाने की मांग करने वाली शक्तियां वे हैं जिनकी लोकतंत्र के प्रति आस्था सदैव संद्धिग्ध रही है. इसलिए जब भी वे ऐसी कोई बात करती हैं, बाकी समूह जिन्हें उनकी नीयत पर संदेह है, उसे अपने अधिकारों पर संकट के रूप में देखने लगते हैं.

ओमप्रकाश कश्यप

सभ्यता का विकास और कहानी

सामान्य

मनुष्य और किस्सागोई के नजदीकी संबंध के तीसचालीस हजार वर्ष पुराने पुख्ता प्रमाण आज मौजूद हैं. बावजूद इसके कहानी कला के उद्गम की खोज के लिए यह अवधि बहुत नई है. हिमयुग की दहलीज पर ही मनुष्य समय बिताने, अनुभव साझा करने तथा संघर्षपूर्ण जीवन में मनोरंजन की भरपाई के लिए किस्सेकहानियों का सहारा लेने लगा था. तब तक वह अक्षरज्ञान से अनभिज्ञ था. बाकी कलाएं भी अल्पविकास की अवस्था में थीं. खेती करना तक उसे नहीं आता था. पूरी तरह प्रकृतिआधारित जीवन में भोजन जुटाने का एकमात्र रास्ता थाशिकार करना. किसी कारण उसमें सफलता न मिले तो प्राकृतिक रूप से उपलब्ध भोजन यथा कंदमूलफल आदि पर निर्भर रहना. प्राकृतिक आपदाओं, वनैले जीवों से भरपूर घने जंगलों में जैसे भी संभव हो, अपनी सांगठनिक एकता एवं संघर्ष के बल पर खुद की रक्षा करना. अपने संगठनसामथ्र्य एवं परिस्थितिकीय सामंजस्य के हुनर के दम पर प्राचीन मनुष्य उन चुनौतियों से जूझता था. कभी सफल होता था, कभी असफल. प्राचीन वनाधारित यायावरी जीवन की वे सामान्य विशेषताएं थीं. उसमें जीतहार लगी ही रहती थी. जीवन का हर नया अनुभव उसे रोमांचित करता. यदाकदा हताशा के क्षण भी आते, किंतु मानवीय जिजीविषा के आगे उनका लंबे समय तक ठहर पाना संभव न था. या यूं कहो कि बुरे सपने की तरह उन्हें भुलाकर वह यायावर कर्मयोगी तुरंत आगे बढ़ जाता था. कठोर संघर्षमय जीवन तथा अनूठेपन से भरपूर अनिश्चितसी स्थितियां मानवीय कल्पनाओं के नित नए वितान तैयार करती थीं. उन्हें सहेजकर दूसरों तक पहुंचाने, उनके माध्यम से समूह का मनोरंजन करने की चाहत ने किस्सेकहानियों को जन्म दिया.

उस समय तक मनुष्य का स्थिर ठिकाना तो बना नहीं था. धरती का खुला अंचल और प्रकृति की हरियाली गोद उसे शरण देने को पर्याप्त थी. जंगल में शिकार का पीछा करते हुए आखेटी दल का यदाकदा दूर निकल जाना; अथवा लौटते समय रास्ता भटककर जंगलों में खो जाना बहुत सामान्य बात रही होगी. फिर भी आखेट के लिए गए लोगों के वापस लौटने तक उनके वे परिजन जो बीमारी, वृद्धावस्था अथवा किसी अन्य कारण से आखेट पर न जा पाए हों, उनकी प्रतीक्षा में परेशान रहते होंगे. आकुल मनस्थितियों में समय बिताने के लिए समूह के सदस्यों के साथ अनुभव बांटना, धीरेधीरे एक लोकप्रिय चलन बनता गया. मनोरंजन की उत्कट चाहत, जो उस संघर्षशील जीवन की अनिवार्यता थी, उत्पे्ररक का काम करती थी. आखेटी दल के लौटने पर समूह के बीच हर बार नए अनुभवों के साथ कुछ नए किस्से भी जुड़ जाते थे. अभियान सफल हो या असफल, आखेट से लौटे सदस्यों के पास अपने परिजनों को सुनाने के लिए भरपूर मसाला होता था. उनमें से कुछ वर्णन निश्चय ही दुख और हताशा से भरे होते होंगे, जिन्हें सुनकर समूह के सदस्यों की आंखें नम हो आती होंगी. फिर भी वे उनके यायावर जीवन का जरूरी हिस्सा थे और परिवार नामक संस्था के अभाव में, उन्हें एक होने की प्रतीति कराते थे. इसलिए शाम को भोजन के बाद अथवा फुर्सत के समय दिनभर के रोमांचक अनुभवों का पिटारा समूह के सदस्यों के आगे खोल दिया जाता. उन्हें सुनने के लिए बूढ़ोंबच्चों सभी में होड़ मच जाती होगी.

सुनाने के लिए शुरूशुरू में सीधेसपाट वर्णन का सहारा लिया जाता होगा. जैसेजैसे अनुभव बढ़ा, घटना को रोमांचक एवं मनोरंजनपूर्ण बनाने के लिए कल्पना का सहारा लिया जाने लगा. जो व्यक्ति घटनाओं को लुभावने अंदाज में सुनाने में सिद्ध होता, समूह उसकी बातें सुनने को उत्सुक रहता. उसको विशिष्ट सम्मान देता था. लंबे संघर्षपूर्ण जीवन के पश्चात, वृद्धावस्था को प्राप्त लोगों के लिए भी अपने पिछले जीवन के शौर्यपूर्ण किस्से सुनाना समय बिताने का एकमात्र जरिया रहा होगा. किस्सागोई की नींव ऐसे ही अनुभवसिद्ध लोगों द्वारा रखी गई. मनोरंजन की जरूरत के चलते लोग उनके पास आते. चूंकि उनके पास अनुभवों का विशाल खजाना होता था, इसलिए वे उनके साथ ससम्मान पेश आते थे. उस समय तक मनुष्य का जीवन स्वेच्छाचारी था. समाज का विधिवत गठन अभी नहीं हो पाया था. लेकिन किस्सेकहानी तथा दूसरी विकासमान कलाओं के प्रभाव में रागात्मक संबंध स्थायी रूप लेने लगे थे. इससे समूह की, बाद में जब समूह के सदस्यों की संख्या बढ़ने लगी तो परिवार की संकल्पना ने जन्म लिया. स्पष्ट है कि किस्सेकहानियां मनुष्य के समाजीकरण के न केवल साक्षी, बल्कि उत्पे्ररक और सहायक भी बने थे. फिर जैसेजैसे समाज बढ़ा, वैसेवैसे किस्सेकहानियों के रूपकलेवर में भी बदलाव आता गया. आरंभिक कहानियां व्यक्ति के रोजमर्रा के अनुभवों से उपजी सत्यकथाएं अथवा थोड़ीबहुत बढ़ाचढ़ाकर पेश की गईं कल्पकथाएं ही थीं. उनमें रहस्यरोमांच, हर्षविषाद, सुखदुख, करुणामैत्री, मिलनबिछोह, साहसउत्साह के साथसाथ मनुष्य की आदिम जिज्ञासाओं, प्रवृत्तियों, भावनाओं और कल्पनाशीलता की सहज और युगानुकूल अन्विति थी. कह सकते हैं कि कहानी कला दुनियाभर की उन आरंभिक कलाओं में से है जो सभ्यता के एकदम आदिम छोर पर, जीवन की धड़कनों के बीच स्वाभाविक तौर पर विकसी थीं. उसकी उत्पत्ति के मूल में यद्यपि मनोरंजन प्रमुख तत्व था, तथापि कहानी सहित विभिन्न कलाभिव्यक्तियों के विकास का एकमात्र वही अभिप्रेत नहीं था. उन कलारूपों के विकास के पीछे मनुष्य की ज्ञान की ललक, अपनी मौलिक कल्पना द्वारा उन्हें नए कलेवर में ढालकर अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की दृढ़ इच्छाशक्ति तथा उनसे कुछ सीखने, सिखाने एवं स्वयं को दैनंदिन के समर हेतु तैयार रखने की कामना सन्निहित थी

उनका नृत्य, जिसमें संभवतः कुछ लोग टोटम पशु की नकल उतारते थे, कुछ शिकारियों की, एक धर्मानुष्ठान के साथसाथ, आखेट का अभ्यास भी था. वह एक प्रकार से आखेट विधि की कवायद ही थी. इसी से कई हजार वर्ष पश्चात नृत्यनाट्य(वले) और नाटक का विकास होने वाला था. हिमयुग में जंगली पशुओं के जो हुबहू चित्र तैयार किए गए थे(फ्रांस एवं स्पेन की गुफाओं में) उन्हें अब अनुपम कलाकृतियां समझा जाता है. परंतु मूलतः ये चित्रकला की विशेष भावना से तैयार नहीं किए गए थे. जहां दिन का उजाला नहीं पहुंच सकता, ऐसी अंधेरी गुफाओं में ये चित्र चरबी से जलने वाले मंद दीपों या मशालों की रोशनी में तैयार किए गए थे. उत्कृष्ट पशु प्रतिमाओं का इस्तेमाल, जैसा कि इनपर भालों और तीरों से बने हुए छेदों से पता चलता है, लक्ष्यभेद के आनुष्ठानिक अभ्यास के लिए होता था.’

प्राकृतिक घटनाओं में एक नैरंतर्य एवं तारतम्यता रहती है. आरंभिक कहानियां उसी से अनुप्रेत थीं. प्रकृति की भांति कहानी के भी कई रंग थे. सुख हो या दुख, कहानी जीवन में प्रत्येक क्षण मनुष्य के साथ थी. उथलपुथल भरे उसके जीवन में नए किस्सेकहानी का बानक बन ही जाता था. घने जंगल तथा मौसम की विकट परिस्थतियों में, लंबे आखेट के उपरांत ठिकाने पर सकुशल लौट आना भी कम उत्सवधर्मी घटना न थी. हर्ष अथवा शोक के ऐसे समविषम क्षणों में आखेटकुशल पूर्वजों की वीरता, साहस, विपत्ति एवं त्रासदियों के किस्से खासे लोकप्रिय होते होंगे. स्वाभाविक रूप से ऐसे किस्सों को बारबार सुनासुनाया जाता होगा. सुनाते समय प्रत्येक व्यक्ति उन्हें अपनी तरह से प्रस्तुत करता. प्रस्तुतीकरण के दौरान वह श्रौत कथानक में अपनी रुचि के अनुसार कुछ न कुछ जोड़ताघटाता रहता था. फलस्वरूप समय के साथ उनमें कल्पना का पुट बढ़ता गया. कल्पना को गति देने में वातावरण एवं प्रकृति का योगदान कम न था. खुले, तारों से भरे आसमान, तरहतरह की वनवनस्पतियों, जंगली जानवरों, नदियों, पहाड़ों, झरनों आदि से भरे भूमांचल में बहुतसी बातें मनुष्य को प्रभावित करती थीं. आरंभिक कहानियां सत्यकथाओं के करीब थीं. रोजमर्रा के अनुभवों में मनुष्य को जो भी विचित्र लगता, उसे सहेजने के लिए वह कहानीकिस्सों में ढाल लेता था. उसको धीरेधीरे एहसास हुआ होगा कि सीधेसपाट ढंग से कहने की अपेक्षा प्रतीकों के रूप में बयान की गई घटना अधिक संप्रेषणीय होती है. उसका प्रभाव दीर्घकालिक होता है. उसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक, एक समाज से दूसरे भिन्न परिस्थितियों में रह रहे समाज तक, पहुचाने में आसानी रहती है. पात्रों एवं घटनाओं का प्रतीकीकरण इसलिए भी आवश्यक था, क्योंकि सुनिश्चित ठिकाने के अभाव, मौसम की मार और भोजन की जरूरत के चलते उसके यायावरी जीवन में प्रायः परिवर्तन होता रहता था. अतएव ऐसे पात्रों और घटनाओं का समावेश जरूरी था, जिनकी विभिन्न परिस्थितियों तथा कबीलाई समूहों के बीच अधिकतम स्वीकार्यता हो. इसके लिए नए कल्पनालोक गढ़े गए, ताकि मनुष्य के भौतिक आवत्र्तनप्रत्यावर्तन का उसके द्वारा गढ़े गए किस्सेकहानियों, जो तब तक उसकी जीवनसंस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन चुके थे, की विश्वसनीयता पर कोई संकट न पड़े. समाजीकरण के आरंभिक दौर में मनुष्य यह भी समझ चुका था कि समूह की एकता को बनाए रखने हेतु जीवनमूल्यों में स्थायित्व होना चाहिए. इसके लिए भी किस्सेकहानी मददगार बने. बढ़ते अनुभवों एवं कल्पनाशक्ति के फलस्वरूप मानवअभिव्यक्ति में प्रतीकात्मकता एवं गुणवत्ता में निखार आता गया. संघर्षपूर्ण जीवन में कल्पना और प्रतीकात्मकता से भरे किस्सों की अपनी उपयोगिता थी. प्रतीकों ने वर्णन को रोचक बनाया. उनके माध्यम से बात समझाना आसान था. एक कहानी के माध्यम से इसको आसानी से समझा जा सकता है

एक लकड़हारा था. बहुत ही चतुर और बुद्धिमान. उसके साथी उसकी अक्लमंदी का लोहा मानते थे. एक बार की बात लकड़हारा जंगल में लकड़ी काटने निकला. वहां एक सूखे पेड़ को देख उनकी बांछें खिल गईं. पेड़ बड़ा था. उसकी लकड़ी को अकेले घर ले जाना संभव न था. कुछ सोचकर उसने जंगल से ही कुछ मजदूर दिहाड़ी पर ले लिए. काम को जल्दी निपटाने के फेर में वह पेड़ पर चढ़ा और जल्दीजल्दी कुल्हाड़ी चलाने लगा. हड़बड़ी में कुल्हाड़ी का बेंट तने से टकराया और ‘खटाक्!’ कुल्हाड़ी हत्थे से अलग हो दूर जा गिरी.

उफ्!’ उसके मुंह से निकला, ‘काश! एक कुल्हाड़ी और ले आता.’ वह बड़बड़ाया. चेहरे पर परेशानी झलकने लगी

अब क्या करें उस्ताद?’ एक मजदूर ने इशारे में पूछा. लकड़हारा सोच में पड़ा था. वह खाली हाथ घर नहीं लौटना चाहता था. उपाय एक ही था, घर से नई कुल्हाड़ी मंगवाई जाए. कटी हुई लकड़ी को छोड़ वह खुद जाना न चाहता था. तब लकड़हारे ने निर्णय लिया कि किसी मजदूर को घर भेजकर कुल्हाड़ी मंगवा ली जाए. पर भेजा किसे जाए? नौकरों को उसकी भाषा आती न थी. और पत्नी थी अनपढ़. चैकाचूल्हे में रमी रहने वाली.

खूब सोचविचार के बाद उसने एक पत्थर मंगवाया. उसपर खडि़या मिट्टी से कुछ रेखाएं खींचीं और मजदूर को थमा दिया. मजदूर गया. लौटा तो उसके हाथ में नई कुल्हाड़ी थी. लकड़हारा तो काम में जुट गया. मगर साथ काम कर रहे मजदूरों की समझ में कुछ न आया. यह कैसे संभव हुआ कि लकड़हारे की पत्नी ने बिना कुछ पूछे नई कुल्हाड़ी उसके हाथ में थमा दी. जरूर वह कोई जादू जानता है. जबकि जादू जैसी कोई बात संभव ही नही है. लकड़हारे ने पत्थर पर कुल्हाड़ी का चित्र बनाकर मजदूर को दिया था. उस संकेत को समझकर उसकी पत्नी ने उसको कुल्हाड़ी थमा दी थी.

जाहिर है कि कहानीकला के विकास के साथ उसके स्थूल कथानक का महत्त्व घट रहा था. धीरेधीरे लोग यह समझने लगे थे कि कहानी के पात्रों और घटनाओं की महत्ता सामान्यतः मनोरंजन तत्व को विस्तार देने तक सीमित है, असली चीज वह संदेश है, जिसे लोककल्याण के वास्ते सहेजना जरूरी है. कालांतर में समाज में ऐसी कहानियों तथा प्रतीकों का महत्त्व बढ़ता ही गया. नएनए प्रतीकों को जोड़ने के लिए मनुष्य ने अपनी कहन की कला का विस्तार किया. मनुष्य की आदिम सहयोगी बनीं वे कहानियां इतनी उपयोगी और महत्त्वपूर्ण मानी गईं कि मनुष्य उन्हें न केवल सुनतासुनाता था, बल्कि उन्हें सहेजने का भी प्रयत्न करता था. फ्रांस और स्पेन की सीमा पर मौजूद लेस्काक्स की रहस्यमयी कंदराओं में बनीं अनूठी चित्रमालाओं से सिद्ध होता है कि अपने अनुभवों और कल्पनाओं को स्थायी बनाने के लिए प्राचीन मनुष्य कितना सजग था. उन चित्रमालाओं के अध्ययन से यह भी सामने आया है कि उन कलाभिव्यक्तियों का उद्देश्य केवल मनःरंजन तक सीमित नहीं था, बल्कि उनका उपयोग नवांतुक पीढ़ी को जंगल की परिस्थितियों का बोध कराने तथा किशोर शिकारियों को आखेटकला में प्रवीण बनाने के लिए भी किया जाता था. जिन दीवारों पर ये चित्रमालाएं हैं, वहां कुछ निशान भी पाए गए हैं, जो तीर, भाले अथवा किसी नुकीले हथियार के हो सकते हैं. उनसे प्रतीत होता है कि आदिमानव समूह के सदस्य उनका उपयोग निशाना साधने के लिए भी करते थे. आदिमानव द्वारा वे चित्र गुफाओं में, चट्टानों तथा ऐसे सुरक्षित एवं बहुगंतव्य ठिकानों पर बनाए गए, जिधर आदिमसमूहों का निरंतर आनाजाना था. उद्देश्य यही था कि कबीले के सदस्य तथा नवांतुक कबीले वहां ठहरकर मनःरंजन के साथसाथ आखेटकला की भी एकांतसाधना कर सकें. वन्य जीवों से भरे जंगल में, जहां कदमकदम पर खतरनाक स्थितियां और जीवन की चुनौतियां हों, आखेट हेतु निर्विघ्न अभ्यास के लिए ऐसे सुरक्षा प्रबंध अपरिहार्य थे. लेस्काॅक्स और आसपास की पहाडि़यों में बने पांच सौ से अधिक चित्रों से पता चलता है कि कभी वहां पर अलगअलग कालखंड के दौरान प्राचीन मनुष्य की अनेक टुकडि़यों ने बसेरा किया था. आखेट के अभ्यास के अलावा वे भित्तिचित्र उनके मनोरंजन की कमी को भी पूरा करते होंगे. शोध के अनुसार इन चित्रावलियों की रचना अलगअलग समय में की गई. इसी प्रकार की चित्रावलियां मध्यप्रदेश के विंध्यांचल और सतपुड़ा की पहाडि़यों में भी मिलती हैं. इनमें सबसे उल्लेखनीय नाम भीमबैठका का है. भोपाल से 40 किलोमीटर दक्षिण में स्थित भइयापुर गांव के आसपास मौजूद पहाडि़यां कभी आदिवासियों का ठिकाना थीं. यहां पहाडि़यों पर मनुष्य की प्राचीनतम कलाभिव्यक्तियों के निशान मौजूद हैं. इस विश्वधरोहर को दुनिया के सामने लाने का श्रेय विक्रम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विष्णु श्रीधर वाकणकर को जाता है. शोध बताते हैं कि प्रस्तर काल में यहां बड़ी संख्या में आदिम मनुष्यों का बसेरा था. एक पूरी बस्ती. लगभग 750 शैलआश्रयों में से 500 शैलआश्रयों में गेरुए, लाल, सफेद हरे, कहींकहीं पीले और हरे रंग में चिंत्रों की लंबी शृंखला है. जिनमें बाघ, शेर, घडि़याल, कुत्ते, हाथी, नीलगाय आदि जानवरों को चित्रित किया गया है. इन चित्रावलियों की सटीक उम्र का आकलन तो अभी बाकी है, किंतु अभी तक जो शोध हुए हैं, उनके अनुसार प्राचीन मनुष्य की अभिव्यक्ति कला के वे अवशेष 15000 से 35000 वर्ष तक पुराने हैं. भारत के अलावा फ्रांस, स्पेन, आस्ट्रेलिया आदि में भी इसी प्रकार के चित्र प्राप्त हुए हैं. ये सभ्यता के उभार के एकदम आरंभिक दौर को सामने लाते हैं, जब मनुष्य ने अपनी स्मृति और कलाओं को सहेजने के प्रयास संभवतः शुरू ही किए थे.

स्पष्ट है कि कहानीकला मनुष्य की प्राचीनतम खोज है. वह तब से मनुष्य के साथ है, जब तक मनुष्य किसी ज्ञात सभ्यता के प्रभाव से दूर था. वह मनुष्य के सभ्यताकरण की साक्षी, उसकी प्रेरक और अनुगामिनी रही है. कहानीकला को विस्तार देने, कहानियों को और अधिक रोचक एवं कल्पनाप्रधान बनाने की कोशिश में मनुष्य अपनी रचना के साथ नित नए प्रयोग करता गया. आरंभिक किस्सेकहानियों के पात्र मनुष्य के अनुभव जगत से सीधे जुड़े पशुपक्षी तथा वन्यप्राणी होते होंगे. उनमें भी ऐसे पशुपक्षियोंवन्य प्राणियों की संख्या अधिक रहती होगी, जो किसी न किसी प्रकार उनके सहयोगी थे अथवा जिनसे खतरे की संभावना होने के कारण बचाव की जरूरत थी. उस समय तक लिपि का आविष्कार नहीं हुआ था. अतएव तत्कालीन भावाभिव्यक्तियों के स्वरूप का सटीक अनुमान लगा पाना तो असंभव है, तथापि भित्तिचित्रों तथा उस समय की अन्य कलाभिव्यक्तियों द्वारा हम आसानी से इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि वे सब विपरीत परिस्थितियों में हिम्मत न हारने, चुनौतियों में साहस और धैर्य बनाए रखने, खुद पर भरोसा करने तथा सतत संघर्ष की प्रेरणा देने वाली रही होंगी. कुछ विद्वानों का मानना है कि अभिव्यक्ति के क्षेत्र में पद्य का आगमन गद्य की अपेक्षा पहले हुआ था. इसमें पूरी सचाई भले न हो, मगर एक बात पद्य के पक्ष में अवश्य जाती थी. जब तक लिपि का आविष्कार नहीं हुआ था, भाषाभिव्यक्तियों को सहेजने के लिए स्मृति ही एकमात्र माध्यम थी. भारत में वेदादि ग्रंथों को श्रुति ग्रंथ इसीलिए कहा जाता है. चूंकि पद्य को गद्य की अपेक्षा आसानी से याद किया जा सकता था, वह सुननेसुनाने में भी प्रिय लगता था और उसमें दूसरों को प्रभावित करने की क्षमता अधिक थी, अतएव कहानी का प्रथम सहेजा गया रूप पद्यात्मक हो सकता है. प्रख्यात अमेरिकी लेखिका रुथ साॅवयर इस बारे में सुनिश्चित हैं

कहानी गढ़ने का सर्वप्रथम प्रयास, आदिम समूहों द्वारा चक्की चलाते, किश्ती खेते, शिकार अथवा युद्ध के लिए हथियारों की धार चढ़ाते या पर्वउत्सव के बहाने समयसमय पर सामूहिक रूप से गएगुनगुनाए जा सकनेवाले गीतों के माध्यम से हुआ होगा. आदिगायक या किस्सागो अपनी अद्वितीय वीरता पर इतरानेवाला, आत्माभिमानी तथा विजयोल्लास में डूबकर स्वच्छंद आनंद मनानेवाला पहला इंसान रहा होगा. अपनी पुस्तक ‘दि वे आफ स्टोरीटेलिंग’ में सावयर ने कनाडा के तटीय क्षेत्र में बसने वाले आदिवासियों के एक प्राचीनतम गीत को उद्धृत किया है

मैं, कोको, मैने एक भालू का शिकार किया

होहोहो…..

बड़ा भालू….डरावना भालू

हेहेहे…..

उसको मैंने अपने बल से परास्त किया

हेहेहे….

मेरी बाजुओं में अपार शक्ति है

वे भाला फेंकने के लिए काफी मजबूत हैं

वे नाव खेने के लिए मजबूत हैं….मैं कोको

हे….हे….हे….हो….हो….हो.

यह कविता दर्शाती है कि प्रारंभिक अभिव्यक्तियां जीवन से जुड़ी थीं. उनमें कल्पना का योग कम से कम था. लेकिन इससे यह मान लेना कि आरंभिक अभिव्यक्तियां केवल पद्यात्मक रही होंगी, उचित न होगा. दिनभर जंगल की परिस्थितियों से जूझने के बाद शाम को घर लौटने वाले आदिम मनुष्य के लिए समूह के सदस्यों के साथ अपने अनुभव साझा करने के लिए यह संभव न था कि वह उन्हें पद्य में तत्काल अभिव्यक्त कर सके. क्योंकि अनुभवों के पद्य रूपांतरण के लिए ज्यादा समय और काव्यात्मक प्रतिभा की आवश्यक थी. दूसरे सीधेसरल गद्य का आनंद बच्चे भी ले सकते थे. इसलिए अधिकांश सदस्यों के लिए अनुभवों की सीधी गद्यात्मक प्रस्तुति आसान रहती होगी. उनमें वह आवश्यकतानुसार कल्पना का प्रयोग भी करता होगा. पद्य का विकास कदाचित फुर्सत और एकांत के क्षणों में, आगत की कल्पना, अनुभवों को सहेजने की लालसा अथवा समूह के सदस्यों का मनोरंजन करने की कामना के साथ हुआ होगा. आज इस बात के पुरातात्विक प्रमाण मौजूद हैं कि मानवसभ्यता का विकास पृथ्वी के अलगअलग हिस्सों में हुआ. सिंधु घाटी, मेसोपोटामिया(इराक), मिस्र, चीन, बेबीलोन, आदि क्षेत्रों में लगभग एक ही समय में अलगअलग संस्कृतियां पनपीं. समय के साथसाथ वे एकदूसरे के संपर्क में आईं. उनमें आर्थिकसामाजिक लेनदेन बढ़ा. आपसी व्यापार में तेजी के फलस्वरूप उनमें सांस्कृतिक आदानप्रदान की भी शुरुआत हुई. फलस्वरूप कला और संस्कृति के दूसरे उपकरणों के आदानप्रदान में तेजी आई. इसलिए यह भी संभव है कि अपनी भावाभियक्तियों को सहेजने के लिए अलगअलग सभ्यताओं ने अलगअलग पद्धतियों को खोजकर उन्हें अपनाया हो. लिपि के आविष्कार का श्रेय बेबीलोनवासियों का जाता है. उससे पहले कलाभिव्यक्तियों को सहेजने का एकमात्र आधार स्मृति थी. यद्यपि चित्रलिपि और प्रस्तर कला का आविष्कार बहुत पहले, हिम युग में ही हो चुका था, लेकिन उसको दूसरे स्थान पर ले जाना संभव न था. इसलिए आरंभिक चित्र गुफाओं में, ऐसे सुरक्षित ठिकानों पर बनाए गए, जहां जीवन अधिक सुरक्षित था और जिधर से मानवसमूहों का आनाजाना लगा रहता था. लिपि का आविष्कार होने के पश्चात कलाभिव्यक्तियों को नए प्रारूप में सहेजना संभव हुआ. आरंभिक यायावरी जीवन में मनुष्य एक स्थान से दूसरे स्थान तक विचरता रहता था. एकदूसरे से संपर्क के समय जहां संघर्ष की संभावना थी, वहीं व्यक्तिगत अनुभवों और कलारूपों को साझा करने के अवसर भी मिलते होंगे. इसलिए आरंभिक कलारूपों में वैविध्य के साथसाथ एक किस्म की एकरूपता भी नजर आती है.

भारतीय उपमहाद्वीप में कहानी लेखन की परंपरा बहुत पुरानी है. ऋग्वेद, जिसे संसार के सबसे पुराना ग्रंथ होने का गौरव प्राप्त है, में अनेक कहानियां आई हैं. प्रत्येक कहानी का कोई न कोई उद्देश्य है. उसके माध्यम से उद्गाता ऋषि पाठकोंश्रोताओं तक एक नैतिक संदेश पहुंचाना चाहता है. इससे उस समय कहानी कला के विकास का अनुमान लगाया जा सकता है. महाभारत में तो छोटीछोटी हजारों कहानियां मिलकर बड़े ग्रंथ का रूप ले लेती हैं. उन्हीं कहानियों के बल पर वह जीवन और समाज का समग्र दस्तावेज बन जाता है. वे उसकी ‘जय’ से ‘विजय’ फिर ‘भारत’ और अंततः ‘महाभारत’ तक की यात्रा का बानक बनी हैं. वेदों के अलावा उपनिषद्, रामायण, कथासरित्सागर, जातक कथाओं आदि में भी सैकड़ों कहानियां संकलित हैं. उन सभी में गजब की एकरूपता है. इससे अनुमान लगा सकते हंै, कि उन ग्रंथों में पंक्तिबद्ध होने से पूर्व वे कहानियां लोकसाहित्य के रूप में समाज में बहुत पहले से विद्यमान रही होंगी. लोकसाहित्य के रूप में ही वे धरती के एक छोर से दूसरे छोर तक की यात्रा करती रही हैं. विश्वसभ्यताओं में नागरीकरण की शुरुआत ईसा से सातआठ वर्ष हजार पहले हो चुकी थी. ईसापूर्व 3000 वर्ष पहले तक धरती के अलगअलग कोनों में विकसित संस्कृतियों के बीच व्यापारिक संबंध विकसित हो चुके थे. उनके बीच आर्थिक के साथसाथ सामाजिकसांस्कृतिक आदानप्रदान भी बढ़ा था. उनके आपसी संपर्क को प्रगाढ़ बनाने, संबंधों में आत्मीयता का विस्तार करने में इन कहानियों का बड़ा योगदान था. एक क्षेत्र की लोकप्रिय कहानियां दूसरे हिस्से में जाकर न केवल लोकप्रिय हुईं, बल्कि उनमें वहां के क्षेत्रवासियों ने अपनी रुचि एवं परिस्थितियांे के अनुसार आवश्यक परिवर्तन भी किया.

सभ्यताकरण की साक्षी रही कहानियों ने हर समाज, हर परिवेश में अपनी उपस्थिति बनाए रखी है. इसके बावजूद दुनिया के पहले किस्सागो और प्रथम कथालेखक का पता लगाना असंभव है. केवल यह कहा जा सकता है कि मनुष्य को जिन दिनों पहली बार भाषाज्ञान हुआ, जब उसे अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने की कला आई, तभी से वह अपनी कहानियां भी एकदूसरे के साथ साझा करने लगा था. कहानियों के माध्यम से वह मनोरंजन और शिक्षा दोनों उद्देश्यों को साधता था. कहानी द्वारा मनोरंजन का पहला लिखित प्रमाण 2560 ईस्वीपूर्व का है. मिस्र की पहाडि़यों से प्राप्त दस्तावेज के अनुसार प्रसिद्ध पिरामिड निर्माता यूनानी सम्राट खुपु के तीन पुत्र अपने यशस्वी पिता के मनोरंजन के लिए बारीबारी से रोमांचभरी कहानियां सुनाते हैं. लेखनकला का आविष्कार बेवीलोनवासियों ने किया. प्रथम महाकाव्य के लेखन का श्रेय भी उन्हीं को दिया जाता है. विश्व का पहला महाकाव्य होने का गौरव ‘गिलगमेश’ को प्राप्त है. विद्वानों के अनुसार गिलगमेश उरुक का राजा था, जिसने 3000 ईस्वीपूर्व दक्षिणी बाबुल पर राज किया था. उसी गिलगमेश की र्कीतिकथा इस महाकाव्य का आधार है. उसमें भरपूर कल्पना तत्व है. कथानायक गिलगमेश बहादुर सम्राट है. कहानी में मिट्टी और लार से बना अर्धमानव पशु एनकिडु है, जो कालांतर में गिलगमेश का दोस्त बन जाता है. इस कथा को लगभग 2000 वर्ष पहले कीलाक्षरों में लिपिबद्ध किया गया था. यह भी संभावना है कि लिपिबद्ध होने से पूर्व गिलगमेश की र्कीतिकथा भी शताब्दियों तक लोकसाहित्य में श्रुति रूप में प्रचलित रही हो. गिलगमेश की कहानी इतनी लोकप्रिय हुई कि बेबीलोन की कीलाक्षर लिपि जहांजहां भी गई, वहां यह कथा भी पहुंची. गिलगमेश वीररस से भरपूर कृति है, उसमें इतिहास और कल्पना दोनों का सम्मिश्रण हैं. यह कहानी दर्शाती है कि 5000 वर्ष पहले तक मनुष्य कल्पना के आधार पर पात्र गढ़ने लगा था. विशिष्ट वीरता का प्रदर्शन करने वाला व्यक्ति समूह के बीच सम्मान का पात्र माना जाता था.

आशय है कि ईसा पूर्व दूसरी सहस्राब्दी तक कहानीकला काफी विकसित हो चुकी थी. उससे पहले तक कहानी या तो ठेठ अनुभवाधारित होती थी, अथवा अनुभव और कल्पना का सम्मिश्रण. आगे की कुछ शताब्दियों में इसमें परिवर्तन आया, फलस्वरूप कल्पना के आधार पर नएनए कथानक गढ़े जाने लगे. कहानी की बढ़ती लोकप्रियता को देखकर प्रतिभाशाली किस्सागो इस क्षेत्र से जुड़े थे, जो श्रोताओं की रुचि को समझते हुए कहानियां गढ़ने में माहिर थे. उन्हीं के फलस्वरूप कहानी में कल्पना का अनुपात बढ़ता गया. विशुद्ध कल्पना पर केंद्रित कथानक और कहानी कला की कसौटी पर सही पाए जानेवाली मिस्र की पुरानी ‘राजकुमार और उसके तीन नसीब’ (दि प्रिंस एंड दि थ्री फेट) का उल्लेख प्रायः होता है. इस कहानी में जहां लोककथा के भरपूर तत्व हैं, वहीं इसमें कल्पना का भी भरपूर इस्तेमाल किया गया है. इस कहानी का 1500 वर्ष पुराना लिखित प्रारूप उपलब्ध है. इस बात की भी प्रबल संभावना है कि लिखित रूप में आने से पहले यह कहानी लोकसाहित्य का हिस्सा रही होगी. अनूठी परिकल्पना और कथातत्व के आधार पर हम इसे विश्व की आदि परीकथा भी कह सकते हैं. इसमें कांचघर, बड़ी समुद्र जैसी नाव की अनूठी कल्पना है. कुछ विद्वान इसे कल्पना पर आधारित पहली कहानी मानते हैं. जो अस्वीकार्य है, क्योंकि वेदों, उपनिषदों तथा यूनानी ग्रंथों के अनुसार कल्पनाआधारित कहानियों के सृजन की शुरुआत 3000 वर्ष पहले ही हो चुकी थी.

भारतीय परंपरा में ऋग्वेद में, जो विश्व की पहली कृति है, अनेक उपकथाएं भी आई हैं. वे कल्पना के द्रष्टिकोण से भी अत्यंत विलक्षण हैं. निरे मनोरंजन के बजाय वे विशेष उद्देश्य को लेकर गढ़ी गई हैं, इसलिए कथारस के साथसाथ उनमें लक्ष्य की प्रधानता है. वस्तुतः ऋग्वेद के मनस्वी विद्वानों का ध्येय कहानी लिखना न होकर जीवनमूल्यों से भरपूर धार्मिकआध्यामिक संदेश को आनेवाली पीढि़यों के लिए सहेजना था. केवल मनोरंजन के लिए लेखन उनकी वृत्ति नहीं थी. इसलिए वेदों में आई प्रत्येक उपकथा का विशिष्ट उद्देश्य है. वहां कथातत्व मुखर न होकर प्रच्छन्न रूप में आया है. यहां ऋग्वेद से दो उदाहरण देना प्रासंगिक होगा. दो इसलिए क्योंकि आगे चलकर कहानी की जो यात्रा चलती है, दोनों कथासूत्र उसके आदिप्रतिनिधि अथवा दिशावाहक कहे जा सकते हैं. इनमें पहली कहानी जुआरी की है. उल्लेखनीय है कि जुआ वैदिक काल में ही एक बुराई के रूप में पनप चुका था. जुए की बुराई और उसके जुआरी के परिवार पर पड़नेवाले दुष्प्रभाव को दर्शाता हुआ एक अत्यंत मार्मिक कथासंकेत ऋग्वेद में आया है. उसके दशम मंडल का 34वां सूक्त जुआरी की मनोदशा का वर्णन करता है. स्थितियां यथार्थपरक और दिल को छू लेनेवाली हैं. कहानी के अनुसार एक जुआरी है. वह बारबार जुआ न खेलने की शपथ लेता है. लेकिन पासों की ध्वनि उसकी व्याकुलता को बढ़ा देती हैं. वह उसकी ओर खिंचा चला जाता है. निकट संबंधी उसकी आलोचना करते हैं. जुआरी के पिता, माता और भाई उससे दूरी बनाए रखते हैं, ‘हम उसको नहीं जानते, जुआरियो इसे पकड़कर ले जाओकहकर अपना पीछा छुड़ा लेते हैं.’ एकमात्र जुआरी की पत्नी उसको प्यार करती है. जुआरी भी उसको भरपूर प्रेम करता है. लेकिन जुए के अपने शौक के कारण एक दिन वह पत्नी को ही दांव पर लगा देता है. अपनी भार्या को दूसरों की बांहों में देखकर वह विगलित हो जाता है. इस दुर्दशा पर उसके अपने उसको दुत्कारते हैं. संपत्तिविहीन होते ही उसके साथी जुआरी भी उसको त्याग देते हैं. अपनी प्रिय भार्या को जीते हुए जुआरियों के अधीन देखकर वह बिलख उठता है. इसके बावजूद जुए का चस्का अपनी जगह है. सबकुछ गंवा देने के बावजूद जो बाकी है, वह है जीत की संभावना. सबकुछ खोकर पुनः सबकुछ पा लेने की भ्रांति. यह उम्मीद कि अगला दांव शायद सबकुछ वापस दिला दे उसको बारबार जुआघर ले जाती है. वहां पहुंचते ही हार की संभावना उसको डराने लगती है. वह लौट आना चाहता है. परंतु पासों की आवाज सुनकर उसका हृदय मचलने लगता है. वह रुक नहीं पाता और ‘जारिणी की भांति’ द्यूतस्थल की ओर दौड़ पड़ता है. उद्गाता ऋषि द्वारा जुआरी की मनोदशा का वर्णन देखिए

जुआरी द्यूतस्थल पर पहुंचता है. सबकुछ गंवा देने के बाद मन शंकाकुल है. तन में आग लगी है. पूछता हैᅳ‘क्या मैं जीतूंगा?’ पासे उसकी कामनाओं को भड़काते हैं. खुद पर उसका बस नहीं चलता. अपना बचाकुचा धन वह दांव पर लगा देता है. लेकिन ‘अक्ष, धन आदि से संयुक्त पासे उसको धोखा देते हैं. तपाते हैं, संताप जनते हैं. जुआरी को पहले थोड़ी जीत से लुभाकर अंततः उसका सबकुछ हर लेते हैं. वे जुआरी के श्रेष्ठतम धन द्वारा स्वयं अभिसिक्त होते हैं….जादू के अंगारों की भांति ढाले जाते हुए वे स्वयं तो शीतल हैं, पर दर्शकों के हृदय को जलाकर क्षार कर जाते हैं.’

कहानी के समापन पर उद्गाता ऋषि उसके आगे समर्पण कर, अपना सबकुछ गंवा चुके जुआरी को समझाता है, छोड़ दे जुआ, न खेल जुआ. धरती की ओर देख, खेतों को जोत. परिश्रम से जो प्राप्त होता है, उसी को पर्याप्त समझकर संतोष कर. उसी में खुश रहना सीख. अपने पसीने से कमा….वे तेरी गौए हैं, वह तेरी भार्या है….’’

उपर्युक्त कहानी या दृष्टांत के माध्यम से वैदिक ऋषि जुए की बुराइयों को सामने लाकर उसको व्यक्ति के लिए एक अभिशाप सिद्ध करना चाहता था. इसमें वह कामयाब भी हुआ है. वेदों को मुख्यतः आध्यात्मिक ग्रंथ के रूप में देखा जाता है. इसलिए उनमें सामाजिक संदेश युक्त कहानियों को अपेक्षित लोकप्रियता नहीं मिल पाई. कहानी में जुए के दुष्प्रभाव पर जोर दिया गया है. ऋग्वेद का जुआरी अपनी पत्नी को जुए में दांव पर लगाकर खिन्न है. इस कथानक का वास्तविक प्रस्फुटन महाभारत में देखने को मिलता है. वहां जुआरी स्वयं युधिष्ठर हैं, ज्येष्ठ पांडव पुत्र धर्मराज, जो जुआ खेलने की अपनी लत के कारण अपना राजपाटपत्नी सबकुछ गंवा देता है. वहां कहानी कला और नाटकीयता के संयोग से जो कथा निखरकर आती है, उसका प्रभाव शताब्दियों तक पाठकोंश्रोताओं के दिलोदिमाग पर बना बना रहता है. कहानियों की यह धारा आचारविचार, आचरण की शुद्धता और सामाजिक नैतिकता का पाठ पढ़ाती थी. इस धारा का विस्तार रामायण, महाभारत, कथासरित्सागर की कहानियों में खुलकर सामने आया. ऋग्वेदकाल में ही कहानियों की दूसरी धारा, जो कदाचित पहली से भी पुरानी थी, जन्म ले चुकी थी. इस धारा में पात्रों की उपस्थिति प्रतीकात्मक होती थी. इस धारा का प्रमुख उद्देश्य था, पशुपक्षी अथवा काल्पनिक पात्रों के माध्यम से पाठकों तक नैतिक संदेश पहुंचाना. पात्रों की प्रतीकात्मक उपस्थिति होने के कारण कहानी के समापन पर मनोमस्तिष्क पर उनका प्रभाव गौण हो जाता था. रह जाता केवल वह नीतिसंदेश, जिसे रचनाकार अपने पाठकों तक पहुंचाना चाहता है. ऋग्वेद में ऐसे भी प्रसंग हैं जहां मानवेतर जीवों को मनुष्यता के लिए कल्याणकारी कर्म करते हुए दिखाया गया है. अवसर आने पर वे रूढि़यों पर कटाक्ष करने से भी नहीं चूकते. सातवें अध्याय के 103वें सूक्त में तालाब में टर्राते हुए मेंढकों की तुलना वेदपाठ करते ब्राह्मणों से की गई है. दशम मंडल(108) में इंद्र की सरमा नामक कुतिया कृपण पणियों को उपदेश देती है. यह भी अपने आप में बहुत रोचक प्रसंग है

इंद्रगण, मैं इंद्र की दूत बनकर आई हूं. तुमने जो गौधन एकत्र किया है, उसको ग्रहण करने की मेरी बड़ी इच्छा है.’ पणि प्रत्युत्तर में सरमा को फुसलाते हैं

सरमा, जिस इंद्र की दूत बनकर तुम आई हो, वे कैसे हैं? उनका पराक्रम कितना है? उनकी सेना कैसी है? वे इंद्र आएं, हम उन्हें मित्र बनाने को तत्पर हैं….तुम स्वर्ग से चलकर आ रही हो. इतनी कठिन यात्रा के लिए तुम्हें जितनी गायें चाहिए, उतनी ले जा सकती हो. वरना बिना युद्ध के भला कौन गाय देता है!’

इसपर सरमा इंद्र के आयुधों की भीषण मारक क्षमता का बखान करती है. पणि सरमा से युद्ध का भय न दिखाने को कहते हैं

हमें डराओ मत, हमारे पास भी पर्याप्त सैन्यबल एवं तीक्ष्ण आयुध हैं.’ सरमा पुनः उन्हें इंद्र के बल से परचाने की कोशिश करती है

ये शरीर कहीं इंद्र के वाणों का लक्ष्य न हो जाएं. तुम्हारे यहां आने का जो मार्ग है, कहीं उसपर देवता लोग आक्रमण न कर बैंठंे! यदि तुम गाय नहीं दोगे तो आपदाएं सन्निकट हैं.’

सरमा, हमारी संपत्ति पर्वतों द्वारा रक्षित है. गायों, अश्वों तथा अन्यान्य धनों से परिपूर्ण है. रक्षाकार्य में समर्थ पणिसैनिक उसकी रखवाली करते हैं. गायों के शब्दों से अनुगूंजित इस स्थान पर तुम व्यर्थ ही चली आईं.’

सरमा पणियों को बारबार इंद्र के बल से परचाती है. उन्हें धमकी देती है. पणिगण सरमा को बहन मानकर उसका हिस्सा सौंपने का आश्वासन देते हैं. लेकिन सरमा इन्कार कर देती है. अंत में सरमा के साथ और भी आवाजें सम्मिलित हो जाती हैं. संदेश यह है कि गायें, अश्वादि पशु जिनपर पूरे समूह का जीवन निर्भर है, व्यापार की वस्तु नहीं है. देवगण पणियों से स्थान छोड़ जाने को कहते हैं.

वेदों को 35004000 वर्ष पुरानी रचना माना जाता है. उन्हें हिंदुओं के धार्मिक ग्रंथ होने का सम्मान प्राप्त है. विद्वानों का यह भी मानना है कि वेदादि ग्रंथों में वर्णित छोटीछोटी कहानियां, द्रष्टांत उनके रचनाकाल से भी कई शताब्दी पुराने हैं. श्रुति के रूप में वे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक अंतरित होते रहे हैं. निरुक्त में यास्क ‘इत्यैतिहासकाः’ कहकर इंद्र और वृत्रासुर संग्राम को कथारूप में ढालते हैं. ऐतरेय ब्राह्मण(713) में कथा के साथ नीतिसंबंधी आख्यान भी समाहित हैं. उपनिषदों में तो न जाने कितने दृष्टांत हैं जिनकी कहानियां लोकजीवन में भी प्रचलित रही हैं. छांदोग्योपनिषद में एक अद्भुत कहानी आई है जो उस समय की परंपरा से हटकर है. इसलिए कि गंभीर मानी जानेवाली संस्कृत में व्यंग्य की छटा कम ही देखने को मिलती है. मगर वह कहानी व्यंग्य में लिखी गई है. उसमें कुत्ते भोजन के लिए अपना एक नेता चुन लेते हैं. कहानी को पढ़ते समय आधुनिक राजनीति में व्याप्त अवसरवाद सहसा याद आने लगता है. रैक्व, सत्यकाम पुत्र जाबाल की सुप्रसिद्ध कहानियां भी इसी उपनिषद में हैं. एक कथा में बैल, हंस और मद्गु(जलचर पक्षी) ब्रह्मविद्या का उपदेश देते हैं. वैदिक कहानियों की खूबी उनकी प्रतीकात्मकता है. उनमें पशुपक्षियों को पात्र बनाकर बड़ी गंभीर बातें कही गई हैं. उनमें शेर, चूहा, बिल्ली, कबूतर, बैल, कुछआ आदि को पात्र बनाकर नैतिकता, आचारविचार एवं व्यवहार संबंधी संदेह दिया गया है. फलस्वरूप वे प्रत्येक वयस् के पाठक को उपयोगी जान पड़ती हैं. उनमें कथातत्व की अमूमन सभी विशेषताओं यथा कौतूहल, विनोद, हासपरिहास, रहस्य, उल्लासशोक आदि का उपयोग किया गया है. धर्म, नीति, सदाचार, व्यवहार, कूटनीति के प्रसंग उन कहानियांे में भरे पड़े हैं. जिससे वे कोरी कहानी न होकर दृष्टांत जान पड़ती हैं. इसलिए आवश्यकता पड़ने पर उन्हें उद्धरण की भांति उपयोग किया जाता रहा है.

महाभारत तक आतेआते भारत में कहानीकला काफी विकसित रूप ले चुकी थी. विशेषकर पशुपक्षी और प्रतीकों को केंद्र बनाकर कहानियां गढ़ने की कला. महाभारत में सोने के अंडे देने वाले पक्षी की कहानी है. धार्मिक बिल्ली की कहानी है जो चूहों को विश्वास दिलाकर उन्हें अपने काबू में कर लेती है. एक कथा चतुर शृगाल की है जो अपने मित्रों को भी धोखा देने से बाज नहीं आता. आदि पर्व में हाथी और कछुए की कथा, कुत्ते की कथा तथा वनपर्व में मनु और मत्स्य की कहानी है. तत्कालीन राजनीतिकव्यावहारिक दर्शन को समझाने के लिए शांतिपर्व में अनेक नीतिकथाएं हैंजो आगे चलकर भारतीय कथा साहित्य की प्रेरणा बनीं. कतिपय स्थलों पर यक्ष, गंदर्भ, अप्सरा, किन्नर जैसे विचित्र पात्र भी कहानियों में आए हैं, जो उस समय अभिव्यक्ति के क्षेत्र में नएनए काल्पनिक प्रयोगों की ओर इशारा करते हैं. यक्ष मनुष्य और देवता का मिलाजुला रूप हैं. पृथ्वी पर उनकी उपस्थिति कदाचित शापित देवता के रूप में है. गंदर्भ नृत्यगायनवादन आदि विभिन्न लोककलाओं में इतने प्रवीण थे कि सांस्कृतिक इतिहास में उनकी उपस्थिति चमत्कार के रूप में दर्ज है. महाभारत में यक्ष की परिकल्पना एवं संवाद जिसके माध्यम से वह युधिष्श्ठिर को लोकनीति एवं व्यवहार की सीख देता है, अज्ञातवास के दौरान भीम का असुर हिडिंब से युद्ध तथा उसकी बहन हिडिंबा से विवाह; लाक्षागृह, खांडव वन जैसी अनेक घटनाएं तथा महाप्रयाण के समय कुत्ते द्वारा पांडवों के साथ हिमालयारोहण करना, परीकथाओं जैसा अजूबापन और रोमांच लिए हुए हैं. ये सभ कथाएं प्राचीन मनुष्य के कल्पनासामथ्र्य को दर्शाती हैं.

महाभारत जहां भारतीय समाज, राजनीति और जनजीवन का विस्तृत लेखा है, वहीं रामायण में कथानक मुख्यतः राम के इर्दगिर्द पसरा हुआ है. वहां आस्थाभाव प्रबल है. फिर भी उसमें नीतिकथाओं का यत्रतत्र समावेश है. कहानियों की लोकप्रियता इससे भी आंकी जाती है कि गौतम बुद्ध जैसा दार्शनिक विचारक अपने संदेशों को जनजन तक पहुंचाने के लिए कहानीकला की शरण लेता है. जातक कथाओं में गौतम बुद्ध के जीवनप्रसंगों के माध्यम से बौद्ध धर्म का नीतिसंबंधी चिंतन भी समाया हुआ है. जातक कथाओं का संकलन आरंभ ईसा से चार शताब्दी पहले हो चुका था. उनमें पशुपक्षी संबंधी पात्रों का विशेष स्थान मिला. उनका ध्येय था, पशुपक्षी जैसे लोकप्रिय कथापात्रों के माध्यम से बोधिसत्व की शिक्षाओं को जनजन तक पहुंचाना. इनमें हाथी, वानर, मृग, हंस आदि को पात्र बनाकर कथाएं रची गई हैं. पतंजलि(150 ईसा पूर्व) ने ‘कथासूचक लोकोक्तियों, अजाकृपाणीय, काकतालीय आदि तथा जन्म शत्रुता के उदाहरण रूप में अहिनकुलम्, काकोलूकीयम् जैसी नीति कथाओं का उल्लेख किया है.’ महाभाष्य, पणिनि के सूत्र 2/1/3/, 2/4/9 तथा 5/3/106 आदि, संस्कृत साहित्य का समीक्षात्मक इतिहास, डाॅ. कपिलदेव द्विवेदी, पृष्ठ 573. इन कथाओं की लोकप्रियता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि चीनी विश्वकोश(668) में 200 से अधिक बौद्धग्रंथों से चुनकर नीतिकथाएं प्रकाशित की गईं. भरहुत में ईसापूर्व तीसरी शताब्दी का बौद्धकालीन स्तूप प्राप्त हुआ है, उसपर उत्क्रीर्णित संदेश में पशुकथाओं का उल्लेख है. बौद्ध मतावलंबियों की देखादेखी जैन मतावलंबियों ने भी अपने संदेश को जनसाधारण तक पहुंचाने के लिए कहानीकला का सहारा लिया था. बौद्ध अनुयायियों की भांति उन्होंने भी पशुपक्षी को केंद्र बनाकर नीतिकथाएं रचीं. हरिषेण के बृहत्कथाकोश(992 ईस्वी) में जैन धर्मसंबंधी विचारों को नीतिकथाओं के माध्यम से समझाया गया है. गूढ़ विचारों की व्याख्या के लिए आवश्यकतानुसार एकाधिक नीतिकथाओं की भी सहायता ली गई है.

कहानी की ऐसी प्रतीकात्मकता, कथातत्व का ऐसा ही प्रस्फुटन परिवर्ती बौद्ध एवं जैन ग्रंथों, पंचतंत्र, कथासरित्सागर, जातक आदि में और भी निखरकर सामने आता है. उपनिषदों में भी गूढ़ विषयों को समझाने के लिए यत्रतत्र दृष्टांत रूप में कहानियों का सहारा लिया गया है. चूंकि वेदादि ग्रंथों, कथासरित्सागर, जातक, पंचतंत्र आदि में संग्रहीत कहानियां व्यक्तिविशेष की रचना न होकर लोकसमाज में पहले से ही प्रचलित कहानियां थीं. इसलिए कहानी के इतिहास को वेदों या उनके परिवर्ती ग्रंथों के लेखनकाल से जोड़ना अनुचित होगा. तत्कालीन मनस्वियों ने जीवनमूल्य को आधार देने के लिए समाज से ही कथानकों को चुना था. इसके माध्यम से उसका उद्देश्य रहा होगा, लोकविश्वासों को शास्त्रीयता में ढालना, शब्द को मानवीयकरण का हथियार बना देना. ऐसी कोशिशें प्रायः सभी संस्कृतियों में थोड़ेबहुत परिवेशगत अंतर के साथ जारी थीं. पृथ्वी पर अलगअलग समूहों में विचरने वाले कबीलों ने अलगअलग क्षेत्रों में भिन्न संस्कृतियों को जन्म दिया था. उनकी भौगोलिक परिस्थितियों में अंतर था, तथापि मनुष्य की सामान्य जिजीविषा, परिस्थितियों से जूझने की चाहत, विकास की लालसा कमोबेश एकसमान थी. इसलिए आरंभिक अभिव्यक्तियों में आंतरिक समानता है. तत्कालीन जीवन प्रकृति के नियंत्रण में था. मनुष्य खेती करना सीख चुका था. चूंकि कृषिकर्म पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर था, इसलिए प्रकृति और जीवन के बीच तालमेल बेहद आवश्यक था. चीन की एक लोककथा प्रकृति और मानवजीवन की अंतनिर्भरता और उनके संबंधों पर प्रकाश डालती है. कहानी शिकारी ‘ई’ की है

बहुत दिन पहले की बात है. चीन में एक नामीगिरामी शिकारी ‘ई’ रहता था. उसका निशाना अचूक था. भाला हो अथवा तीर, उसके हाथों से छूटकर सीधा निशाने पर जाकर लगता था. वह घोड़े पर सवार होकर शिकार करता. भाला फेंकने के साथ, बगैर कोई पल गंवाए वह तेजी से शिकार की ओर दौड़ पड़ता. उसको पक्का विश्वास होता कि उसकी कमान से छूटा हुआ तीर सीधे निशाने पर जाकर लगेगा. जब ऐसा विलक्षण तीरंदाज अपने पास हो तो लोगों को उससे उम्मीद भी होगी. एक बार की बात. चीन को एक विपत्ति ने आ घेरा. एक सुबह जब लोग जागे तो देखा कि आसमान में दसदस सूरज जगमगा रहे हैं. उनकी गर्मी से जनजीवन कुम्हलाने लगा. पेड़पौधे झुलसने लगे. जीवजंतु भूखप्यास से व्याकुल होकर इधरउधर भटकने लगे. इस उम्मीद में कि केवल शिकारी ‘ई’ उन्हें प्रकृति के कोप से बचा सकता है, लोग उसके पास फरियाद लेकर पहुंचने लगे.

हमारी मदद करो….आसमान यदि ऐसे ही आग उगलता रहा तो आदमी की जाति ही धरा से मिट जाएगी.’ शिकारी ‘ई’ चिंता में पड़ा था. वह समझता था कि यदि दसदस सूर्य आसमान में चमकते रहे तो प्राणी झुलस जाएंगे. वनवनस्पतियां स्वाह हो जाएंगी. लेकिन धरती को उन सूरजों से बचाया कैसे जाए? ‘ई’ सोचने लगा. इस बीच दसों सूरज सिर पर चढ़े आ रहे थे. उसने सूरजों को ललकारा. आवाज देकर उन्हें बाज आने की चेतावनी दी, लेकिन वे मनमानी पर उतारू थे. यह देख ‘ई’ का पारा चढ़ गया. गुस्से में उसने धनुषवाण उठाए. प्रत्यंचा चढ़ाई. एक साथ दस तीर कमान पर चढ़ाकर डोर को कान तक खींचा. निशाना साधकर तीर छोड़ दिए. दसों तीर तेजी से आसमान की ओर बढ़े. उनमें से नौ तीर अलगअलग दिशाओं में निकलकर नौ सूरजों से टकराए. जैसे सूरज न होकर हवा से भरे गुब्बारे हों. तीर लगने के साथ ही नौ सूरज देखते ही देखते धरती पर बिखर गए.

दसवां तीर निशाने से चूक गया. उधर नौ सूरजों को धराशायी होते देख दसवां सूरज बुरी तरह डर गया था. वह आसमान छोड़ भाग खड़ा हुआ. खुद को बचाने की जुगत में वह बैंसबाड़ी के पीछे जा छिपा. अब आसमान सूरजों से खाली था. इसी के साथ वहां अंधेरा छा गया. थोड़ी देर पहले जो जीवजंतु भीषण गर्मी से व्याकुल थे, अब उन्हें अंधेरा डराने लगा. सूरज न रहने से सर्दी बढ़ गई. जीवजंतु परेशान हो उठे. ‘ई’ को भी लगा कि उससे चूक हुई है. जीवजगत के लिए धूप और गरमी दोनों चाहिए. सूरज के बिना प्राणियों को ये चीजें कौन देगा! इसपर विचार किए बगैर ही उसने दस के दस सूरजों को निशाना बना लिया. एक सूरज बचा रहता तो चिंता की बात न होती. लेकिन अब? अब क्या होगा? ‘ई’ की चिंताओं का पारावार न था.

तभी उसे ध्यान आया कि उसने नौ सूरजों को तो गुब्बारे की तरह आसमान से गिरते देखा था. लेकिन दसवां सूरज! वह कहां गया? ‘ई’ ने इधरउधर नजर दौड़ाई. अचानक बैंसबाड़ी के पीछे छिपा दसवां सूरज उसको दिखाई पड़ गया. सूरज स्वयं बाहर आने को उत्सुक था. लेकिन जैसे ही वह ‘ई’ को देखता, भय से बैंसबाड़ी के पीछे दुबक जाता था. ‘ई’ सूरज की मनस्थिति को देख मुस्करा दिया. उसको खुशी थी कि एक सूरज बचा हुआ है. अपना धनुषवाण संभालकर वह अपने घर की ओर चल दिया. उसके जाते ही दसवां सूरज बैंसबाड़ी के पीछे से निकला और दुबारा आसमान पर छा गया. दुनिया फिर जगमगा उठी. लोग ‘ई’ की जयजयकार करने लगे. (सांस्कृतिक निबंध, भगवतशरण उपाध्याय से उद्धृत)

चीनी किवदंति है कि सूरज आज भी शिकारी ‘ई’ के भय से उबर नहीं पाया है. वह डरताडरता पूरब से उदय होता है. पहले केवल दिन ही दिन था. उस घटना के बाद से सूरज दिनभर पश्चिम की ओर भागते रहने के बाद शाम को पुनः बैंसबाड़ी के पीछे दुबक जाता है. इसी से दिनरात होते हैं. सूरज रात को छिप जाता है, इससे प्राणियों को सोने का अवसर मिल जाता है. इसके लिए चीनी लोग महान शिकारी ‘ई’ का आभार मानते हैं. यह कहानी जहां सृष्टि के विकास के बारे में एक चीनी मिथ को सामने रखती है, साथ में यह भी समझाती है कि गुस्सा महान व्यक्ति को भी चूक करने को बाध्य कर देता है. यह भी दर्शाती है कि उस समय तक विश्व के अनेक कोनों में कहानी कला का विस्तार हो चुका था. ग्रीक परंपरा में होमर प्रख्यात कथावाचक हैं. उसने महान ग्रंथ ‘इलियाड’ और ‘ओडिसी’ की रचना लोगों के बीच, उन्हें सुनाते हुए की थी. ईसा से आठ सौ वर्ष पहले जन्मा वह महाकवि लोकश्रुति के अनुसार जन्मांध था. वह लोगों को घूमघूम कर अपनी रची हुई कविताएं सुनाता था. जिसको होमर के प्रशंसक उसके शिष्य लिखते जाते थे. ईसा से ढाईतीन शताब्दी पहले जन्मे ईसप का नाम भी दुनिया के चर्चित किस्सागो में शामिल है. एक दास के रूप में जन्मा ईसप अपनी बोधकथाओं के माध्यम से चर्चित हुआ. उसके दृष्टांतों पर पंचतंत्र का प्रभाव साफ तौर पर नजर आता है. प्राचीन यूनान और भारत के बीच जिस प्रकार का अंतःसंबंध था, नियमित यात्राएं होती थीं, उसको देखते हुए लोककथाओं का सहजआदानप्रदान असंभव न था. यही कारण है कि यदि विश्व के अलगअलग देशों से वहां की बहुचर्चित लोककथाएं लेकर उनकी परस्पर तुलना की जाए तो पाएंगे कि उनके कथानक में असीमित समानता है. उनमें यदि कुछ अंतर है तो केवल परिवेश और भाषा का. लेकिन विचित्र पात्रों, काल्पनिक चरित्रों और कथानकों के आधार पर नीतिआख्यान गढ़ने में भारतीय मनीषियों का कोई सानी नहीं था. इस मामले में बाकी दुनिया के अपने समकालीन आचार्यों से वे बहुत आगे थे. भारत में कहन की कला की लोकप्रियता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि यहां बड़ेबड़े महाकाव्यों का प्रणयन किस्सागोई के माध्यम से हुआ है, जिनमें एक मिथ दूसरे मिथ का जन्मदाता है. इससे कहानी में तारतम्यता बनी रहती है. रामायण की कहानी के बारे में कहा जाता है कि इसको पहले शिव ने पार्वती को सुनाया था. फिर शिव के आदेश पर काकभुसुंडि उसको वाल्मीकि को सुनाते हैं. महाभारत भी कहन की परंपरा का एक ग्रंथ है, जिसको व्यास ने सूतजी के मुख से कहलवाया है. उपनिषद का तो अर्थ ही है, गुरु के आगे बैठकर बैठकर चिंतनमनन, श्रवणादि करना. लोकसाहित्य की तो पूरी की पूरी परंपरा कहन पर टिकी हुई है. आज भी किसी को कोई बात समझानी हो तो लोग किसी कहानी या दृष्टांत का उद्धरण देने लगते हैं.

भारतीय वाङमय में पशुपक्षियों को केंद्र बनाकर इतना ज्यादा साहित्य रचा गया है कि केवल इसी को आधार बनाकर उसका वर्गीकरण संभव है. पशुपक्षियों को केंद्र बनाकर रचे गए साहित्य में पंचतंत्र, हितोपदेश, शुकसप्तति आदि ग्रंथ हैं तो मनुष्य को पात्र बनाकर लिखे गए ग्रंथों में कथासरित्सागर, शिवदास कृत कथार्णव(1200 ईस्वी) जिसमें मूर्खों और चोरों की 35 कथाएं हैं, श्रीवीर कवि के ‘कथाकौतुक’(1451) तथा वल्लाल सेन के ‘भोजप्रबंध’(16वीं शती) का नाम लिया जा सकता है, जिनमें व्यवहार और नैतिकता के बीच अंतर को स्पष्ट करते हुए मनुष्य से नैतिक पथ पर बने रहने की अपेक्षा की गई है. इनके अतिरिक्त बड़ी संख्या ऐसे ग्रंथों की है जिनमें पशुओं और मनुष्यों को सम्मिलित पात्रों के रूप में प्रयुक्त किया गया था. ऐसे ग्रंथों में रामायण, महाभारत के अलावा जातक कथाएं, वैतालपचीसी, सिंहासन बतीसी आदि का नाम लिया जा सकता है. वैताल पचीसी और सिंहासन बतीसी में पुतलियों और वैताल को पात्र बनाकर कथानक में अद्भुत रस की सृष्टि की गई है. भारतीय समाज और परंपरा पर आधारित इन कहानियों की पठनीयता देखते ही बनती है. यह भी माना जाता रहा है कि विचित्र पात्रों की कल्पना का मुख्य ध्येय श्रोताओं का मनोरंजन करना था. लेकिन कहानियों की जैसी संरचना है, उससे स्पष्ट है कि उनका उद्देश्य मनोरंजन के साथसाथ समाज की तयशुदा व्यवस्था से अनुकूलित रखना भी था. इनमें सर्वाधिक लोकप्रियता पंचतंत्र, कथासरित्सागर और जातक कथाओं को मिली. शायद इसलिए कि उनकी रचनाओं के मूल कथासूत्र लोक से आए थे और रचनाकारों ने उनकी लोकप्रियता को देखते हुए ही, उन्हें अपनी विचारधारा के अनुरूप ग्रंथों में सम्मिलित किया था. इन कहानियों की एक अन्य खूबी उनकी किस्सागोई शैली है. शताब्दियों से सुनेसुनाए जाने के कारण इनके कथानक पाठक और श्रोता दोनों की जुबान पर चढ़े होते थे. ऐसे में किस्सागो द्वारा शैलीगत चमत्कार ही श्रोताओं के बीच उसकी लोकप्रियता और पैठ को बनाए रख सकता था. इसलिए प्रतिभाशाली किस्सागो प्रस्तुतीकरण के समय कथानक में आवश्यक फेरबदल करने के साथसाथ प्रस्तुति को आकर्षक बनाने का हरसंभव प्रयास करते थे. फलस्वरूप समाज में किस्सागो का महत्त्व बढ़ता गया. कालांतर में मनुष्य के आध्यात्मिक बोध में ठहराव आने लगा. जिज्ञासाएं विश्वास में ढलने लगीं. धर्म के प्रभाव के चलते ऐसे पात्रों और कथानकों की परिकल्पना की जाने लगी जो जीवन को सहजसरल बनाने में मददगार हों, या जिनके बारे में उसको भरोसा था कि आसन्न संकट की अवस्था में वे उसके मददगार सिद्ध हो सकते हैं. चूंकि साधारण पात्रों द्वारा असाधारण कार्य संभव न थे. अतएव असाधारण कार्यों के लिए असाधारण पात्रों और घटनाओं की परिकल्पना ने जोर पकड़ा. इस प्रवृत्ति का विस्तार हमें पौराणिक ग्रंथों में दिखाई पड़ता है.

परीकथाओं की संकल्पना तो बहुत बाद की उपज थी, किंतु जिस तरह के विचित्र पात्रों और चमत्कारी कथानकों के आधार पर परीकथाओं ने आगे चलकर लोकप्रियता के शिखर को छुआ, वैसी विचित्र परिकल्पनाएं इस दौर में होने लगी थीं. धार्मिक आस्था, विश्वास, कल्पना और मनोरंजन के दबाव में गढ़े गए ये अनूठे पात्र पहले लोककथाओं में स्थापित हुए, कालांतर में उन्हीं के एक हिस्से को जो कदाचित अधिक विचित्र, कल्पनाप्रधान और मनोरंजनपरक था, परीकथाओं के रूप में सहेजा जाने लगा. उस समय तक लेखन कला का विकास नहीं हुआ था. मानवीय बोध के आरंभ से लेकर उस समय तक जो रचा गया था, वह सब का सब श्रुति का हिस्सा था. इसलिए उस समय तक जो भी साहित्य रचा गया, सब लोक की धरोहर, लोकसाहित्य का हिस्सा था. उस समय तक परीकथाओं की श्रेणी तो नहीं बनी थी. जो साहित्य था, वह श्रुति के रूप में लोकसाहित्य का हिस्सा था. हम केवल इतना कह सकते हैं कि उस समय तक उस कालखंड तक कहानियों, रूपकों में वे पात्र कल्पित होने लगे थे, जो आगे चलकर परीकथाओं के रूप में पहचाने गए.

आधुनिक विद्वान पशुपक्षियों की कहानियों को भी परीकथाओं का हिस्सा मानते हैं. यह अन्यथा भी नहीं है. पशुपक्षी आदिकाल से ही मनुष्य के प्रथम सहयोगी रहे हैं. महाकाव्यों में ऐसे प्राणियों की परिकल्पना की गई है, जिनका शरीर ‘मनुष्य और पशु’ अथवा ‘मनुष्य एवं पक्षी’ का बना था. ये आदिम मनुष्य की प्रकृति से निकटता का प्रतीक है. प्राचीन मनुष्य ने जीवन में जो भी उसके आसपास था, उसे बिना किसी वरिष्ठताबोध, अपने अस्तित्व का हिस्सा बनाया था. उसकी वह छोटीसी दुनिया थी. उसमें न ज्यादा लंदफंद था, न जीवन की भागमभाग. प्रकृति से भोजन जुटाना और पशुपक्षियों की भांति उनके साथ, सभी को प्रकृति का हिस्सा मानकर रहना….रोज सुबह की किरण के साथ जागना तथा रात को भोजनोपरांत लंबी नींद लेनायही उसका जीवन था. लंबे अनुभव के उपरांत वह समझ चुका था कि पशुपक्षियों में कौनकौन उसके मित्र, सहयोगी हैं ; तथा किनसे उसके जीवन को खतरा हो सकता है. किस्सेकहानी पशुपक्षियों के स्वभाव, चारित्रिक विशेषताओं, खानपान तथा रहनसहन की आदतों से परचाने में सहायक थे. आने वाली पीढ़ी को जीवन की वास्तविकता से परिचित कराने में किस्सेकहानी सहायक थे. पीढ़ीदरपीढ़ी सुनेसुनाए जाने के कारण उनमें निरंतर निखार आता गया.

© ओमप्रकाश कश्यप

पुरस्कार वापसी विवाद : एक और गुगली

सामान्य

आलेख

 

तुम्हारा अध्ययन व्यर्थ होगा और विज्ञान बांझ, अगर यूं ही पढ़ते रहे….बिना समर्पित किए अपना ज्ञान, समूची मानवता कोब्रेख्त.

कुछ लेखक चर्चा में रहते हैं, लेकिन विवादों में नहीं पड़ते. नपातुला बोलते हैं. नजर सीधे लक्ष्य पर टिकाए रखते हैं. जिस समय बाकी लोग चर्चा और विवादों में ऊर्जा खपा रहे होते हैं, वे शांत मन से अपनी गोटियां सेट करने में लगे होते हैं. डॉ. रामदरश मिश्र विवादों से परे रहने वाले लेखक हैं. ऐसा कुछ साहित्यकार बंधु मानते हैं. कदाचित डॉ. मिश्र को भी इसका इलम है. वे गोटियां सेकने वाले लेखक भी हैं—ऐसा मैं भी नहीं मानता. मगर काव्यकृति ‘आग के आंसू’ के लिए ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ मिलने के अवसर पर ‘जनसत्ता’(19 दिसंबर, 2015) को दिए गए साक्षात्कार में जो बातें उन्होंने कही हैं, वे अनावश्यक हैं. कम से कम मैं तो उन्हें समीचीन नहीं मानता. न ही वे किसी परिपक्व लेखक की अभिव्यक्ति प्रतीत होती हैं. अखबार में प्रकाशित साक्षात्कारआधारित रिपोर्ट में उन्होंने साहित्य अकादेमी पुरस्कार लौटाने वाले साहित्यकारों को आड़े हाथ लिया है. हो सकता है पत्रकार ने जानबूझकर ये बातें उनसे उगलवाई हों. या रिपोर्ट लिखते समय बाकी बातों को एकदम छोड़ दिया गया हो. आम पाठक और साहित्य प्रेमी की रुचि तो पुरस्कृत कृति की कविताओं में झलकती, जिनके बारे में एक भी शब्द उस रिपोर्ट में नहीं है. पूरा साक्षात्कार पुरस्कार वापसी के मसले पर केंद्रित है. रिपोर्ट को मुख्य पृष्ठ के शीर्ष पर जिस प्रमुखता के साथ छापा गया है, उससे यह संभावना भी बलवती होती है कि अखबार ठंडे पड़ चुके विवाद में फिर जान फूंकने की कोशिश कर रहा है. यूं भी इन दिनों ‘जनसत्ता’ में सब उल्टापुल्टा हो रहा है. यह अखबार अपने जनवादी अतीत से जल्दी से जल्दी पीछा छुड़ाने पर उतारू है. अगर ऐसा न होता तो बात ‘आग की हंसी’ की कविताओं पर की जाती. कवि की उन अनुभूतियों पर की जाती जिनसे वे कविताएं उपजी हैं. तब वह अवसर के अनुकूल कही जाती. इससे पहले ‘जनसत्ता’ न तो सनसनी की चाहत रखने वाला अखबार रहा है, ना ही उसने इस तरह की इच्छा रखने वाले मीडिया का साथ दिया है. मुझे याद है अयोध्या में मस्जिद का ढांचा गिराए जाने के अवसर पर हिंदी समाचारपत्रों के सांप्रदायिक चरित्र पर तथा कुछ साल पहले ‘पेड न्यूज’ के मसले पर इस अखबार ने एक आंदोलनसा निर्मित किया था. वह आज भी अपने मूल्यों से प्रतिबद्ध पत्रकारिता का बेहतरीन उदाहरण है.

यह स्वाभाविक है कि जब दूसरे लेखक अकादेमी का पुरस्कार लौटा रहे हों, पुरस्कार ग्रहण करने का इच्छुक लेखक उनके समर्थन में टिप्पणी कर, उसका औचित्य सिद्ध करे. लेकिन इस अवसर पर दिए गए साक्षात्कार में जो भाषा डॉ. मिश्र ने इस्तेमाल की है, वह आपत्तिजनक है. विशेषकर तब जब विवाद पर धूल जमने लगी है. यह संभव है अकादेमी या ‘पुरस्कार वापसी’ का विरोध कर रहे लेखकों की ओर से ‘डेमेज कंट्रोल’ की कोशिश हो. या फिर पुरस्कार के बदले डॉ. मिश्र की ओर से अकादेमी के लिए आभारज्ञापन—जो भी हो, सामान्य नैतिकता इसका समर्थन नहीं करती. डॉ. मिश्र को यदि लग रहा था कि पुरस्कार वापसी अकादेमी के अध्यक्ष को बदनाम करने का षड्यंत्र है, तो यह उन्हें पहले कहना चाहिए था. दूसरे लोग जब यही बात दोहरा रहे थे, तब उनका समर्थन करना था. क्यों वे आग के ठंडी होने का इंतजार करते रहे. अब जब मामला करीबकरीब शांत पड़ चुका है तो वे एक झटके में न केवल पुरस्कार वापसी के लिए जुटे लेखकों से, बल्कि ‘मार्क्सवादियों’ से भी निपट लेना चाहते हैं.

यदि वे कहते हैं कि ‘पुरस्कार वापसी विरोध जताने का सही तरीका नहीं’, तो यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है. उन्हें समाज में बढ़ती असहिष्णुता नहीं दिखती तो यह भी उनकी अपनी नजर है. आखिर हम सभी चीजों को अपनेअपने नजरिये से ही तो देखते हैं. लेकिन यह बात उस दौर में कही गई होती जब मुद्दा गरमाया हुआ था, तब ज्यादा प्रासंगिक होती. अब उनका यह कथन, ‘पुरस्कार वापसी कर यह मान लेना कि लड़ाई लड़ ली, महज एक भ्रम है’—अपने आप में ही अंतर्विरोधी है. जब देश में असहिष्णुता जैसी कोई समस्या ही नहीं है तो लड़ाई लड़ना पागलपन ही कहा जाएगा. वे कहते हैं—‘वे लोग भ्रमित हैं, जो पुरस्कार वापस कर मान रहे हैं कि उन्होंने असहिष्णुता के खिलाफ (लड़ाई)लड़ ली. विरोध और लड़ाई लड़ने के इससे कहीं बेहतर मार्ग हैं. जिनकी उपेक्षा की गई.’ इस टिप्पणी से कहीं नहीं लगता कि उन्हें विरोध प्रदर्शन से शिकायत है. वे केवल विरोध के माध्यम से असहमत हैं. यानी लेखकों को पुरस्कार वापसी से अलग कोई और मार्ग चुनना चाहिए था. यह आवेश में कही गई बात नहीं है. कोई संदेह न रहे, इसलिए वे दुबारा स्पष्ट कर देते हैं—‘मैं इनको बताना चाहता हूं कि पुरस्कार वापस करके अपनी पीठ खुद थपथपाकर खुद को हीरो समझने वाले असल लड़ाई से पीछे हट रहे हैं. उन्हें चाहिए था कि लड़ाई के और कारगर माध्यम चुनते.’ ये बातें न तो नई हैं, न अनसुनी. जिन दिनों विवाद शिखर पर था, पुरस्कार वापसी का विरोधी हर प्रतिक्रियावादी लेखक यही तर्क देता था. ‘फेसबुक’ पर ये शब्द हजारों बार दोहराए जा चुके हैं. लेकिन उन वाक्बहादुरों में से कोई भी वैकल्पिक माध्यम या बेहतर मार्ग का उल्लेख तक नहीं करता. यदि उन्हें पुरस्कार वापसी के अलावा दूसरे विकल्प दिए जाते तो वे बुरी तरह विभाजित मिलते. डॉ. मिश्र उस समय चुप्पी साधे रहे. यदि विरोध आवश्यक, मगर माध्यम अनुचित था, तो उन्हें अपनी ‘कलम’ के साथ, उचित माध्यम से स्वयं आगे आना चाहिए था. या दूसरों को वैसी सलाह देनी थी. फिर क्यों पहल करने से बचे रहे? दूसरों को विरोध के उचित माध्यमों के बारे में बताया क्यों नहीं? साहित्यकार केवल लगातार लिखने से नहीं बड़ा नहीं होता. जनसरोकारों से जुड़ाव उन्हें बड़ा बनाता है. सरोकार ही हैं जो ‘प्रेमचंद’ और ‘गुलशन नंदा’ में अंतर करने की प्रेरणा जगाते हैं. क्या वे अकादेमी पुरस्कार घोषित होने से पहले मुंह खोलने से बचना चाहते थे? सोचते थे कि यदि इस समय पुरस्कार वापसी का विरोध किया और पुरस्कार बाद में घोषित हुआ तो वह अकादेमी की ओर से ‘आभार ज्ञापन’ जैसा ही कुछ समझा जाएगा? अब यदि वे यह कहते हैं कि पुरस्कार के बारे में पहले कहां पता था? सारी प्रक्रिया गोपनीय रहती है तो उन्हें बहुत भोला माना जाएगा. मनोहर श्याम जोशी को अकादमी सम्मान देना था, देना ही था सो तब दिया गया था, जब वे चलाचली की कगार पर थे. जल्दबाजी में ऐसी पुस्तक पर थमा दिया गया, जो उनके दूसरे उपन्यासों के मुकाबले दूसरे या तीसरे स्तर की है. अकादमी पुरस्कार के लिए ‘आधा गांव’ के बरक्स ‘रागदरबारी’ को वरीयता दिए जाने की घटना पर तो पहले ही काफी लिखा जा चुका है. लेकिन इन घटनाओं के बावजूद किसी लेखक की क्षमताओं पर संदेह करना, उसे कमजोर लेखक बताना अनुचित ही माना जाएगा. इसलिए कि वे सब एक पूर्वनिर्धारित प्रक्रिया के तहत दिए गए हैं. पुरस्कारों की घोषणा के तत्काल बाद डॉ. मिश्र द्वारा अकादेमी के समर्थन में तर्क देना, अकादेमी तथा उसके अध्यक्ष के प्रति ‘आभार प्रदर्शन’ जैसा ही कुछ माना जाएगा. यह अकादेमी के अध्यक्ष के दामन पर लगे दागों को साफ करने जैसा भी है, जिनके बारे में विज्ञप्ति निकालकर वह अपनी चूक को स्वयं सार्वजनिक कर चुकी है.

रिपोर्ट में उन्हें ‘हमेशा किसी वाद या खेमे से दूर रहने वाले’ कहा गया है. मगर साक्षात्कार में जो बातें आती हैं, वे उन्हें विवादों से बचने वाला सावधान लेखक भले ही ठहराती हों, ‘वाद’ से दूर रहने वाला लेखक सिद्ध नहीं करतीं. वे कहते हैं—‘दरअसल अर्से से अकादेमी पर एक गिरोह का कब्जा था. लेकिन सत्ता परिवर्तन के साथ ही वह गिरोह छटपटाने लगा. अकादेमी जो महज कुछ लोगों का अड्डा थी वहां सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व मिलने लगा.’ ऐसी टिप्पणी कोई ‘फेसबुकिया’ करे तो बात समझ में आती है. क्योंकि बहुत गंभीर और तथ्यात्मक होने के लिए वहां कम गुंजाइश होती है. यह टिप्पणी पढ़कर यदि आप डॉ. मिश्र को ‘वाद’ और ‘विवाद’ से दूर रहने वाला लेखक मान लें तो आपकी समझ पर बलिहारी. उस विचारधारा से जिससे किसी कारणवश आप असहमत हैं, उसके समर्थक रचनाधर्मियों को ‘गिरोह’ कहना क्या विनम्र टिप्पणी माना जाएगा! यदि मिश्र जी यह मान रहे हैं कि अकादेमी कुछ खास विचारधारा के ‘गिरोह’ का अड्डा बन चुकी है, तो एक जागरूक लेखक की भांति आंदोलन, नहीं तो कलम से ही प्रतिकार करते. तब आगे आते जब उसकी जरूरत थी. केंद्र में अधिकांश समय कांग्रेस की सरकार रही है. स्वाभाविक रूप से अकादेमी द्वारा अधिकांश पुरस्कार उन्हीं लेखक मंडलों की मदद से घोषित किए गए, जो कांग्रेस के कार्यकाल में गठित किए गए थे. अकादेमी और पूर्व लेखकमंडलों पर डॉ. मिश्र ने इससे पहले कोई टिप्पणी की हो—मुझे याद नहीं आता. यानी डॉ. मिश्र ने तब विरोध नहीं किया, जब वह ‘गिरोह’ अकादेमी पर काबिज था. यदि तब नहीं किया तो अब ऐसा क्यों? ‘का वर्षा जब कृषि सुखानी….क्या वे केंद्र में सत्तापरिवर्तन का इंतजार कर रहे थे. जहां तक मुझे याद है उन्हें हिंदी अकादमी, दिल्ली का सबसे बड़ा ‘शलाका सम्मान’ तब मिला था, जब शीला दीक्षित दिल्ली की मुख्यमंत्री थीं और कांग्रेस केंद्र में. यदि उनकी कांग्रेस या उसके द्वारा गठित लेखक मंडलों से ऐसी ही वैचारिक असहमति थी, तो ‘शलाका सम्मान’ स्वीकार ही क्यों किया था?

उनका कहना है—‘मार्क्सवादी विचारधारा के लेखकों की रचनाओं में मार्क्सवादी चेतना की झलक मिलती है. जबकि दक्षिणपंथियों का रचनाकर्म रूढि़वादिता की ओर इंगित करता दिखाई देता है.’ काश! उनकी बात सच होती. यहां उनकी सारी बौद्धिक तटस्थता धरी की धरी रह जाती है. उनसे पूछा जाना चाहिए कि देश में मार्क्सवाद को आए तो सौसवा सौ वर्ष हुए हैं. उससे पहले तो यहां केवल दक्षिणपंथ राज करता था. जिसके चलते एक जाति या वर्ग के लोग ही पढ़ पाते थे. पिछले चारपांच हजार वर्ष का साथ वाङ्मय उनका और उनके समर्थकों का कियाधरा है. फिर इस देश में रूढि़वाद शताब्दियों तक कुंडली मारे क्यों बैठा रहा! यह जानते हुए भी कि वैचारिक रूढि़वाद, सामाजिक रूढि़वाद से कहीं अधिक खतरनाक होता है. तत्कालीन बुद्धिजीवियों ने उससे उबरने और दूसरों को उबारने का काम क्यों नहीं किया? हाल ही में आई फिल्म ‘बाजीराव मस्तानी’ के बहाने एक पेशवा किलेदार की कथित वीरता पर खूब चर्चा हो रही है. लेकिन उन पेशवाओं के राज में जनसाधारण, विशेषकर दलितों की जो दुर्दशा थी, उसपर किस ‘पंडित’ ने अपनी कलम चलाई थी. यदि पेशवा किलेदार अपनी प्रजा से प्यार करते, सबके साथ बराबरी का वर्ताब करते, दलितों को सामाजिक उत्पीड़न से बाहर लाने का प्रयास करते, क्या तब भी यह देश गुलाम होता? ये बातें बहसतलब हैं और बड़े शोध की मांग करती हैं. डॉ. मिश्र से अपेक्षा थी कि इन विषयों के बारे हम सबकी अज्ञानता की धूल को हटाते. भारतीय समाज और संस्कृति की विसंगतियों और विरोधाभासों पर यदि कोई विदेशी लेखक कुछ लिख दे जो उसे ये ‘पंडितजन’ खलनायक मान लेते हैं. जेम्स मिल जैसे विचारक के लेखन को भी ‘रिपोर्ट आधारित लेखन’ कहकर खारिज करने की कोशिश की जाती है. क्यों? आखिर मिल की पुस्तक ‘ब्रिटिश कालीन भारत का इतिहास’ और कैथरीन मेयो की ‘मदर इंडिया’ में कुछ तो सचाई है.

जेम्स मिल और कैथरीन मेयो तो विदेशी लेखक थे. मान लेते हैं कि उन्हें भारत और भारतीयता की पुख्ता जानकारी नहीं थी. या उन्होंने जो लिखा वह पूर्वाग्रहों से भरा पड़ा है. डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी तो अपनी हिंदी के ही थे. उनकी विद्वता पर तो किसी को संदेह नहीं है. क्या उनका लिखा भी डॉ. मिश्र की नजर से नहीं गुजरा? अपने एक लेख में वे लिखते हैं—‘दसवीं शताब्दी के बाद, बल्कि आठवीं शताब्दी के बाद ही, हमारे देश में टीका युग चलने लगा. यानी कोई मौलिक चिंतन, नए सिरे से सोचना संभव नहीं, बल्कि पुराने ग्रंथों में जो कुछ कहा गया है, उसका हम भाष्य कर सकते हैं, टीका कर सकते हैं, टीका की टीका, उसकी भी टीका, सातसात पुश्तों तक टीकाएं चलती रहीं. टीकाओं का युग आ गया. ज्ञान की धारा अवरुद्ध हो गई. यह टीका वाली प्रवृत्ति, गुरु नानक का जिस समय आविर्भाव हुआ था, उस समय अपनी चरम अवस्था में पर आई हुई थी. नतीजा यह हुआ कि हिंदू शास्त्रों के विपुल भंडार में से केवल तीन ग्रंथ चुन लिए गए. इनको प्रस्थानत्रयी कहते हैं. तीन ग्रंथ या ग्रंथ समूह. इनमें से एक है उपनिषद अथवा दस या ग्यारह उपनिषद, जिनपर आदि शंकराचार्य ने अपना भाष्य लिखा थाय अद्वैत मत के प्रतिपादन के लिए. दूसरी श्रीमद् भगवद्गीता, और तीसरा वेदांत सूत्र, बादरायाण का लिखा हुआ वेदांत सूत्र.’ (डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी, गुरुनानक: व्यक्तित्व और संदेश, ‘भारतीय जनजीवन: चिंतन के दर्पण में’, प्रकाशन विभाग, भारत सरकार, पृष्ठ 11-12, अक्टूबर 1993). इस लेख में डॉ. द्विवेदी आदि शंकराचार्य पर भी टिप्पणी कर रहे हैं, जिन्हें भारतीयता की खोज और पुनस्र्थापना का पर्याय माना जाता है. यदि विचार करके देखें तो उन्होंने केवल भाष्यों की रचना की है. इसलिए उनका लेखन भी मौलिकता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता. बावजूद इसके पिछले हजारबारह सौ वर्षों में पंडितजन उन्हीं को सबकुछ माने रहे हैं. शायद इसलिए कि ऐसा करना उन्हें विश्वगुरु होने की अनुभूति देता है. हालांकि बाहर भारत की प्रतिष्ठा गौतम बुद्ध की जन्मस्थली होने के कारण है. डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी जब तक रहे, तब तक गनीमत थी. भारतीयता की खोज के लिए कम से कम उपनिषद और वेदांत की चर्चा तो हो जाती थी. सत्ता परिवर्तन के बाद तो सारा बौद्धिक ज्ञान गाय, गोबर और रामचरितमानस तक सिमट चुका है. जो लोग कभी समुद्र पार जाने को पाप बताया करते थे, वे वेदों में वायुयान की तलाश कर रहे हैं. बौद्धिक विमर्श अशोक स्तंभ को ‘भीम की गदा’ मानने जैसी त्रासदी से गुजरता आया है.

अपने कथन में डॉ. मिश्र पूरे वामपंथ को ‘मार्क्सवाद में सिमेट देते हैं. जबकि ‘मार्क्सवाद’ जैसे संबोधन पर स्वयं मार्क्स को ही आपत्ति थी. क्या इतने अनुभवसिद्ध लेखक को यह बताने की आवश्यकता है कि वामपंथ कोरा ‘मार्क्सवाद’ नहीं है? वह मार्क्स से पहले भी था, मार्क्स के समय में भी और उसके बाद भी. उपनिषद काल में वह ‘बौद्ध’ और ‘आजीवक’ दर्शन के रूप में मौजूद था. ‘चार्वाक’ और ‘लोकायत’ मतावलंबी भी भौतिकवाद के बहाने ‘वामपंथ’ पर विचार कर रहे थे. मध्यकाल में संत कवियों का कहा भी वामपंथ की श्रेणी में ही आता है. गांधी ने अंत्योदय का नारा दिया और हमेशा हाशिये पर मौजूद लोगों की राजनीति की. इस दृष्टि से वे हमारे समय सबसे मुखर वामपंथी हैं. ‘मार्क्सवाद’, यदि वैसा कुछ है तो वह वामपंथ रूपी बूढ़े बरगद की वह मजबूत शाखा है, जो स्वयं अपनी जमीन पाकर विशाल बरगद का रूप ले चुकी है. क्या यह माना जाए कि डॉ. मिश्र जैसा सुविज्ञ, वयोवृद्ध साहित्यकार वामपंथ के इन अपररूपों से अनजान हैं? क्या उन्हें बताने की आवश्यकता है कि ‘साहित्य’ परंपरा का पिष्ठपे्रष्ण न होकर, उसका नवसंस्कार होता है? भर्तृहरि बहुत पहले साहित्य को परिभाषित कर गए हैं—‘रसेन सहितं साहित्य.’ यानी ‘जिसमें रागात्मकता के साथसाथ है, जिसमें सभी(या अधिकतम) की हितसिद्धि की कामना हो, वह साहित्य है. परंपरागत लेखन अपनी कृतियों में रागात्मकता पर तो पूरा ध्यान देता था. उसके लिए ‘वेद’ भी गढ़े जा चुके हैं. किंतु साहित्य की दूसरी कसौटी ‘सर्वहित’ की ओर उसका ध्यान नहीं जाता. ‘कला कला के लिए है’ कहकर वह बादशाहों और उनके मनसबदारों की जीहुजूरी में लगा रहा. जबकि भारत के पंडितजन दुनिया में विस्मृति के सबसे बड़े शिकार लोगों में से हैं. उन्हें बस ‘शास्त्र’ शब्द तो याद रहा. शास्त्र क्या हैं, उनका मूल स्वरूप क्या है? वर्तमान में उनकी प्रासंगिकता क्या है या कैसे उनका युगारूप नवोन्मेषण किया जाए, यह उन्हें नहीं रहा. उसके बारे में दुनिया को बताने के लिए यूरोपीय लोगों को यहां आना पड़ा. एक बात और—भारत में सभी लेखक मार्क्सवादी नहीं हैं. लेकिन अधिकांश लेखक वामपंथी हैं, क्योंकि साहित्यत्व का जो संस्कार या उसकी अपेक्षाएं होती हैं वह संवेदनशील रचनाकार को स्वतः वामपंथ की ओर ले जाती हैं. जिसके सरोकार मानवीय हैं, जो अपने साहित्य में सभी के हित की कामना करता है, जिसके चिंताएं समाज के विपन्न और कमजोर वर्गों से जुड़ी हैं, जो मानवमात्र के लिए अधिकतम स्वतंत्रता की कामना करता है; और समानता आधारित समाज का सपना जिसकी आंखों में है, वह वामपंथी ही है. इसके अलावा सब चारणपंथी हैं.

डॉ. मिश्र मानते हैं कि लेखक को जो भी कहना है कलम से कहना चाहिए. राजनीति उस विचारधारा का ‘एक्शन’ है. काश! लिखा हुआ शब्द उतना ही कारगर सिद्ध हो, जितना कोई लेखक अपनी रचना से उम्मीद रखता है. लेकिन हालात थोड़े अलग हैं. हम सब लोग जो शब्दों से किसी न किसी प्रकार का नाता रखते हैं, जिन्हें शब्दशक्ति पर भरोसा है—प्रायः शब्दों की निरर्थकता का रोना रोते रहते हैं. ऐसे कई लेखक हैं जो आजीवन शब्दों से बदलाव की अलख जगाते रहे. जब उन्हें लगा कि उनके शब्द वृथा जा रहे हैं तो अवसाद का शिकार हो गए. बहुतों ने तो लेखन से किनारा ही कर लिया, क्यों? शायद इसलिए कि हम कथनी और करनी के अंतर का शिकार होते हैं. हमारे लेखन की बड़ीबड़ी बातें सिर्फ दूसरों के लिए होती हैं. हमें जानना चाहिए कि ‘सामाजिक परिवर्तन की एक राह राजनीति से भी जाती है.’ कोई व्यक्ति अपने विचारों के समर्थन में लेखन करे, और राजनीति से एकदम कटा रहे, क्या यह स्वाभाविक माना जाएगा! ‘कथनी और करनी’ के अंतर के लिए क्या हम उसे दोषी नहीं मानेंगे! उस समय ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ की उक्ति क्या हमपर चरितार्थ नहीं होगी?

ठीक है, लेखक की अपनी सीमाएं होती हैं. अपने कृतियों में जिस तरह के समाज की वह कामना करता है, और उसके लिए जिस प्रकार की जनशक्ति उसे चाहिए, उसकी भरपाई वह अकेले नहीं करता. लेकिन इसका यह आशय नहीं कि जो उसकी सीमाओं में है, उससे भी मुंह मोड़कर बैठा रहे; या उसके सदाशयतापूर्ण प्रतिरोध को भी ‘राजनीति’ कहकर खारिज करने की कोशिश की जाए. अपने विचारों के साथ यदि लेखक ही प्रतिबद्ध न होगा तो उसकी अपेक्षा पाठकों से कैसे अपेक्षा कर सकता है! जबकि विचार और कर्म की युति सदैव कारगर सिद्ध हुई है. महाभारत में कृष्ण केवल गीतोपदेश नहीं देते. जब, जहां, जितनी जरूरत पड़ती है, उतनी राजनीति भी करते हैं. ज्यादा दूर न जाना चाहें तो गांधी का उदाहरण हमारे सामने है. वे खुद को साहित्यकार नहीं मानते थे. हम भी नहीं मानते. लेकिन उनका विपुल लेखन साहित्यिक सरोकारों से परे न था. अपने शब्दों के भरोसे जो कामयाबी गांधी को मिली, उतनी कामयाबी उनके समकालीन नेताओं में से शायद ही कोई पा सका. क्यों? इसलिए कि वे जो कहते थे, वे करते थे. उनके विचार ‘एक्शन’ से परे न थे. विनोबा का पूरा जीवन गांधी की छाया और गांधीवाद की व्याख्या में गुजरा. मगर देश के सामने उनका विराट उनका व्यक्तित्व तब उभरकर सामने आया जब वे भूदान के बहाने ‘एक्शन’ में आए. और पूरी दुनिया में जाने गए. फिर यदि अपने विचारों पर ‘एक्शन’ करना राजनीति है तो उसमें बुरा क्या है? क्या राजनीति बुरी चीज है? ठीक है, आज राजनीति बहुत बदनाम है. पर कोई सहृदय लेखक राजनीति के अच्छेपन की आस में कोई कदम उठाना चाहे तो उसके कदम को ‘राजनीति’ कहकर खारिज करने का हमें भला क्या अधिकार है.

ठीक है, आधुनिक राजनीति में अनेक कमियां हैं. अधिकांश को यह दलदल नजर आती है. अच्छे लोग इसमें आने से बचते हैं. इसके बावजूद राजनीति धर्म से लाख दर्जा उत्तम और लोकोपकारी है. आज यदि समाज के वंचितदमित करोड़ों लोग बदलाव का सपना देख रहे हैं, उसके लिए एकजुट हो रहे हैं तो वह केवल राजनीति के कारण संभव हो पाया. आप कहेंगे कि राजनीति तो पहले भी थी. इसका उदाहरण देते हुए बड़ी आसानी से आप रामायण और महाभारत की याद दिलाने लगेंगे. लेकिन सब जानते हैं कि रामायण और महाभारत में राजनीति धर्म की चेरी थी. धर्म की कमजोरी है कि वह समाज को बड़ी आसानी से भीड़ में बदल देता है. उस समय मनुष्य को सिवाय अपने स्वार्थ, क्षुद्र स्वार्थों के कुछ याद नहीं रहता. जबकि कथनीकरनी का कोई भेद न होना ही राजनीति का आदर्श है. बहरहाल, डॉ. मिश्र की इस बात में दम है कि इस देश में असहिष्णुता की आंधी नहीं चल रही. खासकर सांप्रदायिक असहिष्णुता की. उनका कहना कि ‘पहले भी देश में धार्मिक त्योहारों के समय तनाव हो जाता था.’ बिलकुल सही बात है. इसके लिए हमें भारतीय मीडिया की आलोचना करनी चाहिए जो सामान्य घटनाओं को भी बढ़ाचढ़ाकर पेश करता है. मगर बात यहीं तक सीमित नहीं है. हम जानते हैं कि सांप्रदायिकता धर्म का विकार है. अपने अनुयायियों की संख्या के बल पर जब कोई संगठित धर्म खुद को शक्तिशाली समझने लगता है तो समाज में सांप्रदायिकता पनपने लगती है. चूंकि धर्म कहीं न कहीं शक्ति से जुड़ा है. किसी धर्मानुयायी में शक्ति भले न हो, मगर हर धर्मानुयायी अपने आराध्य को दूसरे धर्मानुयायियों के आराध्यों से अधिक शक्तिशाली मानता है. इसलिए जो लोग धार्मिक होते हैं, वे कम या ज्यादा सांप्रदायिक भी होते हैं. यह बात भी अपनी जगह ठीक है कि इससे पहले भी धार्मिक पर्वों और उत्सवों में सांप्रदायिक तनाव पैदा हो जाता था. मगर उस समय केंद्र या राज्य का कोई जनप्रतिनिधि यह कहने नहीं आता था कि यदि फलां धर्म वालों को पाकिस्तान चले जाना चाहिए. न ही कोई ‘आर्यपुत्र’ धर्म के आधार पर नसबंदी को जायज ठहराता था. न ही लाखों लोग केवल इस कारण किसी अभिनेता के चेहरे पर कालिख पोतने पर उतारू हो जाते थे, क्योंकि उसने वह कहा जो हम सुनने को तैयार नहीं हैं.

डॉ. मिश्र को पुरस्कार वापसी की घटना पर क्षोभ है. अब जब मुंह खोला है तो कहीअनकही सब कह जाते हैं. परोक्ष रूप में वे उन अनेक फेसबुकियाओं का समर्थन कर रहे हैं, जो लिखते थे कि जिन्होंने पुरस्कार लौटाया, वे उसके अधिकारी ही नहीं थे. बस दौड़भाग करके किसी तरह से पुरस्कार हथिया लिया था. रिपोर्ट में उनके नाम से छपा है—‘दौड़भाग के सदके हो सकता है कि अतीत में काफी कमजोर लोगों को भी यह पुरस्कार मिल गया हो.’ आशय स्पष्ट है. अतीत में भले ही कुछ कमजोर लेखकों को अकादेमी सम्मान मिला हो, अब उनके रूप में एक ‘मजबूत’ लेखक सामने है. मिश्र जी वयोवृद्ध हैं. वरिष्ठतम भी हैं. उनका लेखकीय सामर्थ्य संदेह से परे है. इसलिए उनके प्रति स्वाभाविक सम्मान के साथ और यह मानते हुए कि लेखकों में कोई छोटाबड़ा नहीं होता, प्रत्येक लेखक अपने आप में विशिष्ट होता है—मैं यह कहना चाहूंगा कि अकादेमी पुरस्कार लौटाने वाले हिंदी लेखकों उदयप्रकाश, कृष्णा सोबती, मंगलेश डबराल, राजेश जोशी में से कौन है जिसकी लेखन क्षमताओं पर संदेह किया जा सकता है! ये सब उतने पायेदार लेखक तो हैं ही जितने स्वयं मिश्र जी हैं. कुल 35 लेखकों ने अकादेमी पुरस्कार लौटाए हैं. उनमें दूसरी भाषाओं के लेखक भी हैं. जिनके बारे में टिप्पणी करने से मैं बचना चाहूंगा. लेकिन अपनी भाषा में कुछ तो ऐसा सार्थक किया होगा, जिसका नोटिस लेना अकादेमी ने आवश्यक समझा था.

यह बात पहले भी उठी थी कि पुरस्कार वापस कर रहे साहित्यकार, अकादेमी के वर्तमान अध्यक्ष की कुर्सी अस्थिर करना चाहते हैं. डॉ. मिश्र भी उसे आगे बढ़ाते हैं—‘जिन लोगों ने अकादेमी पर एकाधिकार बनाया था, वही एकजुट हो गए और तिवारी जी पर हमला बोल दिया….इस गिरोह को लग रहा होगा कि नए अध्यक्ष के आने से उनके हित आहत हुए हैं.’ तो क्या तिवारी जी इतने कमजोर हैं, कि अपना पक्ष भी नहीं रख सकते. क्यों उन्हें कुर्सी का मोह सताता रहता है. क्या तिवारी सचमुच इतने कमजोर है? ऐसा तो तभी हो सकता है जब अध्यक्ष पद उन्हें खैरात में मिला हो. या फिर जोड़जुगाड़ से प्राप्त किया हो. लेकिन यदि वह उनकी अपनी उपलब्धि है. यदि उन्हें ऐसा लगता है कि सरकार या किसी और संस्था ने अकादमी अध्यक्ष का पद उन्हें खैरात में नहीं दिया है, खुलकर सामने आना चाहिए. यह विडंबना ही है कि जब देखभर के लेखक किसी मुद्दे को लेकर उद्वेलित हो रहे थे तब अकादेमी अध्यक्ष को अपनी कुर्सी की चिंता सता रही थी. और एक लेखक को जब अपनी पुरस्कृत कृति के बारे में चर्चा करनी चाहिए, वह दबी राख को कुरेदने में लगा हुआ है. होचीमिन्ह की एक कविता याद आती है—

प्राचीन कवि सौंदर्य के गीत गाना पसंद करते थे

वर्फ और फूलों के, चंद्रमा और हवा के, कुहरे के

पहाड़ों के और नदियों के

आज की मांग है कि हम लोहे और इस्पात को

कविता के असबाब में शमिल करें

और कवि यह समझदारी भी हासिल करे कि एक

जवाबी कार्रवाही की अगुआई कैसे की जाए

(प्रसंगवश: वामपंथ हालांकि मार्क्सवाद, साम्यवाद या समाजवाद का पर्याय नहीं है. पहली बार इस शब्द को कौन चलन में लाया यह भी मैं नहीं जानता. बावजूद इसके मैं उस व्यक्ति के मौलिक सोच के आगे नतशिर हूं, जिसने सत्ताअभिमुखी और सत्तावंचित लोगों के लिए ‘दक्षिणपंथ’ और ‘वामपंथ’ की शब्दयुति की खोज की. मनुष्य का दाहिना हाथ अधिक सक्रिय होता है. माना जाता है कि सारी पहल वही करता है. वह वामहस्त की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली होता है, ऐसा भी लोग मानते हैं. वास्तव में ऐसा भले न हो, फिर भी पूजाविधानों, कर्मकांडों और महत्त्वपूर्ण कार्यों में वरीयता दाहिने हाथ को ही मिलती है. बाएं हाथ से भोजन करना ठीक नहीं माना जाता. यदि कोई अबोध बालक ऐसा करने लगे तो हम फौरन टोक देते हैं. कह सकते हैं कि कहीं न कहीं हम सब शक्ति के पुजारी हैं. हमें ऐसा करने की ही शिक्षा दी जाती है. तदनुसार वामपक्षी वे लोग हुए जो शक्तिवंचित हैं; या बराबर योगदान होने के बावजूद उन्हें शक्तिवंचित मान लिया जाता है. स्त्री को पुरुष से कमजोर माना जाता है, इसलिए उसे पुरुष के वामांग बिठाया जाता है. अब स्त्री चाहे जितने दावे करे कि वह पुरुष से किसी मायने में कम नहीं है, धर्म और संस्कृति में उसकी नियति केवल वामांगी बनना है. इस आधार पर वामपंथी वे लोग हुए जो समाज के दबेकुचले लोगों का पक्ष लेते हैं और समानता की बात करते हैं. साहित्य दमित वर्गों से सहानुभूति रखता है. वंचित वर्गों का पक्ष लेता है, उनके लिए समानता का नारा बुलंद करता है. इसलिए वामपंथी होना उसकी नियति है. ऐसा होते हुए भी कुछ लोग ‘वामपंथ’ को एक गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं, क्या ऐसे लोगों को साहित्यकार माना जा सकता है. कम से कम मैं तो नहीं मानता.)

 ओमप्रकाश कश्यप

विज्ञान लेखन और नैतिकता के सवाल

सामान्य

इस लेख का उद्देश्य बच्चों के लिए विज्ञान साहित्य की उपयोगिता पर सवाल खड़े करना नहीं है. यह मानते हुए कि विज्ञान साहित्य की जितनी उपयोगिता बड़ों के लिए है, उतनी बच्चों के लिए भी है—हमारा ध्येय लिखे जा रहे विज्ञान साहित्य पर समीक्षादृष्टि डालना है. यह देखना है कि जो विज्ञान साहित्य इन दिनों लिखा जा रहा है, उसमें साहित्य जैसा क्या है? और यदि उसमें ‘साहित्यत्व’ का अभाव है, अथवा कहीं विचलन है, तो उसके कारण क्या हैं? साहित्यिक आचारसंहिता के नाते आलोचकों और समीक्षकों का यह दायित्व है कि रचना का अन्वीक्षण, उसकी नीरक्षीर विवेचना करते समय भाषा, शैली, व्याकरण, विषयवस्तु आदि के अलावा, रचना की अंतनिर्हित शुभता; यानी साहित्यत्व को भी कसौटी बनाएं. देखें कि रचना में ‘साहित्य’ अथवा ‘सर्वहितकारी’ जैसा क्या है? ऐसा कौनसा गुण है जो उस रचना को साहित्य की कोटि में ले आता है? दूसरे शब्दों में रचना का नैतिक पक्ष, जिसे उसका मूल्य भी कह सकते हैं, उसकी आलोचनाविवेचना की प्रथम कसौटी होना चाहिए. जबकि सामान्य आलोचना प्रायः बड़े नामों, भाषाशैली, प्रस्तुतीकरण और मनोरंजकता तक सीमित रह जाती हैं. मूल तथ्य जिससे रचना को साहित्य का दर्जा मिलता है, जिसके लिए कोई संवेदनशील रचनाकार कलम उठाता है, अथवा जो मुद्दा उसको कलम उठाने के लिए उद्वेलित करता है—उपेक्षित रह जाता है.

यहां हमारा आशय आलोचना के नैतिकतावादी पक्ष से है, जो किसी रचना को साहित्य की श्रेणी में लाने के लिए उसका अपरिहार्य गुण है. पर्याप्त नैतिक प्रेरणा के अभाव में लेखक केवल लिखने के लिए लिखते हैं. आलोचक नैमत्तिक कर्म की तरह आलोचना करते हैं. ऐसी कलावादी आलोचना समाज पर वैसा असर नहीं डाल पाती, जैसा अपेक्षित होता है. इससे कभीकभी रचनाकार के स्तर पर हताशा भी व्याप जाती है—‘कुछ नहीं बदलना’, ‘सब इसी तरह चलता रहेगा’—का नैराश्यभाव उसे स्थायी पलायन की मुद्रा में ले आता है. जबकि लेखन की सार्थकता जीवन और समाज में जो भी अच्छा है, सकारात्मक है, उसे बाहर लाने; तथा मनुष्य का उसकी मूलभूत अच्छाइयों में विश्वास जगाने में है. अच्छी रचना नैतिक मूल्यों की उत्प्रेरक होती है. वह पाठक और समाज के बीच जीवनमूल्यों की अबाध आवाजाही हेतु संबंधसेतुओं का निर्माण करती है. आधुनिक जीवन चूंकि विज्ञान और प्रौद्योगिकी से अत्यधिक प्रभावित है, अतएव आलोचना की नैतिकताकेंद्रित कसौटी को लेकर, विज्ञान लेखकोंसमीक्षकों से हमारी अपेक्षाएं और भी बढ़ जाती हैं. ‘साहित्यत्व’ की खोज विज्ञानलेखन के अलावा साहित्य की दूसरी धाराओं और विधाओं में भी की जा सकती है, की जानी चाहिए. मगर लेख की सीमाओं को ध्यान में रखते हुए फिलहाल हम अपनी बात विज्ञान साहित्य तक सीमित रखेंगे.

उपर्युक्त कसौटी पर हिंदी विज्ञान साहित्य की समीक्षा करें तो कुछ चीजें स्पष्ट रूप से सामने आने लगती हैं. प्रायः सभी रचनाओं में वैज्ञानिकों तथा उनके आविष्कारों को मनुष्यता के प्रति समर्पित और कल्याणकारी दिखाया जाता है. जहां ऐसा नहीं है, जिन रचनाओं में वैज्ञानिक अथवा उससे जुडे़ व्यक्तियों की निजी महत्त्वाकांक्षाएं लोकहित पर भारी पड़ें, वहां वैज्ञानिक के हृदयपरिवर्तन द्वारा उसे सही रास्ते पर लाने की कोशिश की जाती है; अन्यथा मनुष्यता की समर्थक शक्तियों के आगे उसे पराजित होना पड़ता है. पशुता पर मनुष्यता की विजय साहित्यत्व की पहली कसौटी है. उसके अभाव में रचना साहित्य बन ही नहीं सकती. विज्ञान सबके लिए है, उसके लाभ सभी तक पहुंचने चाहिए, मनुष्य समाज का ऋणी होता है, अतः उसके ज्ञानविज्ञान पर समाज का भी पूरापूरा अधिकार है—यह संदेश प्रत्येक विज्ञानरचना का मूलमंत्र होता है. इसके आधार पर विज्ञान लेखक साहित्यकर्म की कसौटी पर खरा उतरने का दावा कर सकते हैं.

आधुनिक विज्ञान का जन्म 15वीं शताब्दी की महत्त्वपूर्ण घटना है. पश्चिमी विज्ञान का पितामह कहा जाने वाला फ्रांसिस बेकन उसे लेकर बेहद आशान्वित था. ‘ज्ञान ही शक्ति है’—कहकर उसने ज्ञानविज्ञान आधारित समाज के गठन पर जोर दिया था. बेकन का मानना था कि विज्ञान मनुष्य को जानलेवा श्रम और व्याधियों से बचाकर उसका मुक्तिदाता सिद्ध होगा. बेकन राजसत्ता से जुड़ा था. सत्ता और शक्ति दोनों उसके पास थे. जानता था कि सत्ता के फैलाव के लिए बड़ी शक्ति चाहिए. बड़ी शक्ति यानी बड़ी सत्ता. और सत्ताएं आमतौर पर महत्त्वाकांक्षी होती हैं. अपने विस्तारवादी मनसूबों को साधने के लिए वे अपनी ताकत लगातार बढ़ाती रहती हैं. इसका दूसरा पहलू यह है कि किसी भी राष्ट्र की शक्तियां उसकी जनता और संसाधनों पर निर्भर करती हैं, जिनका कालखंड विशेष में एक सीमा तक ही दोहन संभव होता है. वैज्ञानिक होने के बावजूद बेकन को संभवतः याद नहीं था कि ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत व्यापक संदर्भों में, देश और समाज पर भी लागू होता है. उसका व्यावहारिक संदेश यह भी है कि यदि एक स्थान पर संसाधनों का अनावश्यक और अतिरिक्त दोहन हो तो उनका अन्यत्र अभाव अवश्यंभावी होता है.

औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप सतरहवींअठारहवीं शताब्दी में यूरोप ने इतनी तेजी से तरक्की की थी कि विज्ञान नई पीढ़ी का जीवनमंत्र जैसा बन गया. जो देश उससे वंचित थे, वे उसको पाने के लिए ललचाने लगे. पूरी दुनिया में उसके लिए होड़सी मच गई. बेकन का यह सोच गलत नहीं था कि विज्ञान मनुष्यता की अनेक समस्याओं का निदान करने में सक्षम है. विज्ञान खुद को ऐसा दर्शा भी चुका था. लेकिन ताकत की विशेषता है कि वह उसी का हित साधती है, जिसका उसपर अधिकार होता है. दूसरे शारीरिक शक्ति को छोड़कर बाकी किसी भी शक्ति का प्रबंधन जटिल कार्य होता है. जो व्यक्ति शक्तिप्रबंधन की कला से अनभिज्ञ है, अथवा उससे वंचित है, यह वंचना चाहे जिस कारण से भी हो—वह न केवल पिछड़ जाता है, बल्कि दूसरों के बराबर में आने के उसके अवसर भी तेजी से घटते चले जाते हैं. अपनी स्थिति का लाभ उठाकर शक्तिधारक(अथवा शक्ति प्रबंधक) व्यक्ति, शक्तिविपन्न व्यक्तियों के साथ मनमानीभरा वर्ताब करता है. परिणामस्वरूप शोषण बढ़ता है और असमानता में वृद्धि होती है. ऐसे समाजों में जहां जनता शिखरस्थ शक्तियों की गतिविधियों की ओर से उदासीन; अथवा उनकी ओर से आंखें मूंदे रहती है, वहां शीर्षस्थ लोग बड़ी चतुराई से अपनी शक्तियों को राज्य की अथवा राज्य समर्थित शक्तियों के रूप में प्रचारित करते हैं. धीरेधीरे वे राज्य के संसाधनों को अपने अथवा अपनी समर्थक शक्तियों के अधीन करते जाते हैं.

चूंकि किसी कालविशेष में, जब तक नए संसाधनों का दोहन न हो या उन्हें पहचाना न जाए—राज्य की कुल शक्तियां सीमित होती हैं, इसलिए शीर्ष वर्ग की शक्ति और समृद्धि शेष समाज की दुर्बलता और विपन्नता की कीमत पर आती है. अपनी उपलब्धियों को राज्य की उपलब्धि की भांति पेश करते हुए शिखरस्थ लोग, कभीकभी जनता की सहानुभूति भी बटोर लेते हैं. इस प्रकार वे स्वयं को उत्तरोत्तर शक्तिशाली बनाते जाते हैं, हालांकि वे दावा राष्ट्र के शक्तिशाली होने का ही करते हैं. उनके अनुसार राष्ट्रसशक्तीकरण का अभिप्राय है, जनता के हाथों से ताकत खिसककर शीर्ष पर मौजूद चंद लोगों के हाथों में सिमट जाना. विज्ञान की चलायमान प्रवृत्ति और उसकी शक्ति के दुरुपयोग की संभावना को सबसे पहले रूसो ने समझा था. उसका मानना था कि विज्ञान ने मनुष्य और प्रकृति के बीच दूरी पैदा की है. परिणामस्वरूप व्यक्ति प्रकृति को भोग्य वस्तु की भांति देखता है. इससे समाज में भौतिक सुखों के प्रति होड़ पैदा होती है. प्लेटो की भांति रूसो भी सामाजिक समस्याओं का निदान नैतिकता के अनुपालन में ढूंढता था. ‘एमाइल’ में उसने लिखा था—‘बालक को विज्ञान पढ़ाने की अपेक्षा अपने परिवेश से प्यार करने की शिक्षा देना, उसके बारे में जागरूक बनाना ज्यादा जरूरी है.’ इसी को कुछ भिन्न शब्दों में आइंस्टाइन ने भी स्वीकार किया है—‘अधिकांश लोग मानते हैं कि प्रतिभा महान वैज्ञानिक बनाती है. वे गलत हैं: असली चीज तो व्यक्तित्व है.’ रूसो और आइंस्टाइन दोनों ने ही विज्ञान का अंधानुकरण करने, उसको धर्म मान लेने की प्रवृत्ति का विरोध किया था. इसके लिए उसकी खूब आलोचना हुई. लेकिन वह अपने विचारों पर अडिग रहा. कालांतर में उसके समर्थक बढ़ते गए. उसके साथसाथ पूरी दुनिया में यथार्थवादी लेखकों की संख्या भी बढ़ती गई. साहित्य की अवधारणा भी संघर्ष के इसी दौर में पनपी.

यह निर्विवाद है कि विज्ञान ने आर्थिक समृद्धि की दर को गति प्रदान की है. मगर उससे समाजार्थिक विषमता भी तेजी से बढ़ी है. गरीबी पहले भी थी. सामाजिक असमानता पहले भी थी, लेकिन विज्ञान और प्रौद्योगिकी के वर्चस्व से पहले मानवीय कलाकौशल का महत्त्व था. न केवल मनुष्य बल्कि पूरा समाज अपने शिल्पकौशल पर गर्व करता था. विज्ञान और प्रौद्योगिकी का सबसे पहला हमला मानवीय अस्मिता के संरक्षक और प्रतीक मानेवाले इन्हीं मूल्यों पर हुआ. श्रम से मुक्ति तथा सघन उत्पादन के नाम पर मशीनें, मानवशिल्प और उससे आगे बढ़कर मानवीय अस्मिता पर कब्जा करती गईं. उससे उपभोक्ताकरण की राह आसान होनी ही थी. वही हुआ. नतीजा हमारे सामने है. आज मनुष्य के प्रत्येक निर्णय यहां तक कि संबंधों पर भी बाजार की छाया देखी जा सकती है.

चूंकि संसाधनों के दोहन तथा उन्हें लोकोपयोगी बनाने में विज्ञान का बड़ा योगदान होता है, अतएव वैज्ञानिकों एवं विज्ञान लेखकों से हमारी अपेक्षाएं बहुत बढ़ जाती हैं. उनसे उम्मीद की जाती है कि वे विज्ञान के ऐसे उपयोग की ओर सबका ध्यान आकृष्ट कराएं जिससे आर्थिक, सामाजिक सहित सभी प्रकार के लाभों की सिद्धि हो सके. वैज्ञानिक शोध अपने आप में खर्चीला उद्यम है. उसके लिए भारी निवेश की आवश्यकता पड़ती है. ऐसे में विज्ञान लेखक को दुहरी भूमिका निभानी पड़ती है. स्वचेता रचनाकार के रूप में पाठकों के प्रबोधन की, ताकि वे अपने आसपास की घटनाओं के बारे में बैज्ञानिक सूझबूझ के साथ निर्णय ले सकें. दूसरी भूमिका ज्ञानविज्ञान के सामाजिक लाभों के पक्ष में माहौल बनाने की होती है, ताकि नवीनतम आविष्कार और प्रौद्योगिकी केवल पूंजीपतियों के लाभ कमाने का जरिया बनकर न रह जाएं. वे अधिकतम लोगों के कल्याण का माध्यम बन सकें. प्रतिबद्धता की कमी के चलते अधिकांश विज्ञान लेखक दूसरी भूमिका में कमजोर, बल्कि कई बार तो पूंजीपतियों के हितरक्षक सिद्ध होते रहे हैं.

हिंदी में विज्ञान लेखन की परंपरा करीब सवा सौ वर्ष पुरानी है. बच्चों के लिए स्वतंत्र साहित्य सृजन की शुरुआत उससे लगभग एक दशक पहले हो चुकी थी. अंतर केवल इतना था कि आरंभिक बालसाहित्य जहां लोकसाहित्य, पुराण, उपनिषद्, जातक, कथासरित्सागर, पंचतंत्र आदि से प्रभावित था, वहीं परंपरा के अभाव में आरंभिक हिंदी विज्ञान कथाएं तथा उपन्यास पश्चिमी रचनाओं का अनुवाद अथवा उनकी पुनः प्रस्तुति मात्र थे. हिंदी में विज्ञान लेखन की शुरुआत, 1884 से 1888 के बीच ‘पीयूष प्रवाह’ में धारावाहिक रूप से प्रकाशित, अंबिकादत्त व्यास की रचना ‘आश्चर्यजनक वृतांत’ से मानी जाती है. यह कृति जूल बर्न के उपन्यास ‘जर्नी टू सेंटर आफ दि अर्थ’ का देसी संस्करण थी. केशव प्रसाद सिंह की चर्चित विज्ञान कथा ‘चंद्र लोक की यात्रा’(जून 1900) भी जूल बर्न की प्रसिद्ध रचना ‘फ्राम दि अर्थ टू दि मून’ पर आधारित थी। इन रचनाओं को मिली लोकप्रियता ने भारतीय लेखकों को भी उद्वेलित किया. इसके बावजूद हिंदी की प्रथम मौलिक विज्ञान कथा की रचना के लिए पाठकों को दो दशक लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ी. 1908 में प्रकाशित सत्यदेव परिव्राजक की कहानी ‘आश्चर्यजनक घंटी’ को हिंदी की प्रथम विज्ञान कथा होने का श्रेय प्राप्त है. उसके बाद तो प्रेमवल्लभ जोशी(छाया पुरुष 1915), अनादिधन बंधोपाध्याय(मंगल यात्रा, 1915-16), आचार्य चतुरसेन(खग्रास), नवल बिहारी मिश्र(अधूरा आविष्कार), ब्रजमोेहन गुप्त(दीवार कब गिरेगी) आदि लेखकों ने विज्ञान साहित्य को समृद्ध करने में योगदान दिया. अनादिधन वंधोपाध्याय ने अपनी विज्ञानकथा में पटरियों के ऊपर हवा में चलनेवाली रेलगाड़ी का वर्णन किया था. आज विकसित देशों में उच्च गति रेलगाड़ियों के संचालन हेतु विद्युतचुंबकीय ऊर्जा का भी उपयोग किया जाता है. जिसमें गाड़ी यात्रा के दौरान चुंबकीय प्रतिकर्षण बल के कारण पटरियों से मामूलीसी ऊपर उठकर यात्रा करती है.

हिंदी में विज्ञान लेखन की शुरुआत पुनर्जागरण के दौर में हुई थी. उस समय तक गल्प लेखन में तिलिस्म, जासूसी और ऐय्यारी से जुड़ी कहानियों का दबदबा था. देवकीनंदन खत्री, गोपाल राम गहमरी, किशोरी लाल गोस्वामी, विश्वेश्वर प्रसाद शर्मा आदि लेखकों ने तिलिस्म और जासूसी पर आधारित अनेक उपन्यास लिखे थे. उन उपन्यासों को खूब लोकप्रियता मिली. मगर जैसेजैसे साहित्य से अपेक्षाएं बढ़ीं, खासकर प्रेमचंद द्वारा यथार्थवादी साहित्य लेखन के बाद, वैसेवैसे तिलिस्म और जासूसी पर आधारित रचनाओं को दोयम दर्जे का समझा जाने लगा. उसकी जगह यथार्थवादी लेखन को बल मिला. चूंकि रहस्य, रोमांच, जासूसी और ऐयारी पर आधारित कथानकों की लोकप्रियता अक्षुण्ण थी, इसलिए वे विज्ञान गल्प का विषय बनने लगे. अथवा यूं कहो कि विज्ञान मंे रुचि रखने वाले लेखक उनमें नए प्रयोगों के साथ हाथ आजमाने लगे.