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न्याय की पाश्चात्य अवधारणा—चार

सामान्य

सुकरात, पेरामेनीडिस, हेराक्लाट्स, प्रोटेगोरस आदि

 

न्याय मानव—समाज का सदगुण है. (ऐसा बादल) जो जहां जितना सूखा है, वहां उतना ही ज्यादा बरसता है.—अरस्तु

आदर्श समाज की खोज मनुष्य का आरंभिक सपना है. यह सपना अकेले प्लेटो का नहीं था. किसी देवता, महामानव या अतिविलक्षण प्रतिभाशाली को भी इसका श्रेय नहीं दिया जा सकता. साधारण से साधारण मनुष्य यह कामना करता आया है कि जिस समाज में वह रहता है, उसे जितना कि वह आज है, उससे बेहतर होना चाहिए. भले ही वह यह न जानता हो कि परिवेश को किस प्रकार बेहतर बनाया जाए? या वे कौन से कारण हैं जो समाज की बेहतरी की राह के अवरोधक हैं? जिन्हें दूर किया जाना व्यक्ति और समाज दोनों के लिए जरूरी है. भारत में ऐसा सपना बुद्ध ने देखा था. मक्खलि गोशाल, पूर्ण कस्सप और महावीर स्वामी का सपना भी कुछ ऐसा ही था. यूनान में सुकरात, प्लेटो, अरस्तु, जेनोफीन, चीन में कन्फ्यूशियस, लाओ जू, चुआंग जू, बाओ जिंग्यान आदि का सपना भी कुछ इसी प्रकार का था. इनमें प्लेटो अतिरिक्त श्रेय का हकदार है. उसने न केवल आदर्श समाज का सपना देखा, बल्कि उस सपने के समर्थन में तर्क देते हुए, समाज को बेहतरी की ओर ले जाने के रास्ते भी बताए. भले ही उसके विचारों को अव्यावहारिक मानकर उसके शिष्य और अगली पीढ़ी के विचारक अरस्तु ने नजरंदाज कर दिया हो, उससे प्लेटो का महत्त्व कम नहीं हो जाता. वह अपने समय का विलक्षण प्रतिभासंपन्न, कविमना दार्शनिक था. अपनी पूरी जिंदगी वह इसी दिशा में प्रयत्न करता रहा. विपुल लेखन उसने किया. ‘रिपब्लिक’ और ‘दि लॉज’ जैसे बहुखंडी ग्रंथ जिन्हें ग्रंथमाला कहना उचित होगा—उसकी विलक्षण मेधा प्रमाण हैं. उससे पहले के समाज के मुकाबले व्यक्ति की हैसियत बहुत कम थी. माना जाता था कि अच्छे और बुरे दो किस्म के लोग होते हैं. अच्छे समाज के मित्र तथा बुरे सामाजिकता के द्रोही हैं. अतः केवल और केवल बुरों को दंडित करके समाज को बेहतर बनाया जा सकता है. एक तरह से यह मान लिया गया था कि दुष्टता दुष्ट व्यक्ति के स्वभाव का अभिन्न हिस्सा है. और जो अच्छे हैं, वे बुराई से सर्वथा मुक्त ‘देवतुल्य’ हैं. अतएव बुरों को दंड देकर अथवा शासन का डर दिखाकर बुराई से बचा जा सकता है. बुराई को मिटाने के नाम पर तुनकमिजाजी देवता शाप देते थे, राजा दंड. उस व्यवस्था में बुराई को मिटाने के नाम पर तथाकथित बुरे को ही मिटा दिया जाता था.

यूनान में इस सोच में बदलाव सुकरात के बाद नजर आता है. सुकरात ने सत्य को शुभ माना और समाज को शुभत्व की कर्मस्थली. प्लेटो को जितना विश्वास समाज पर था, उतना सामाजिक इकाई के रूप में मनुष्य पर भी था. उसका मानना था कि आदर्श समाज में दोनों में से किसी एक की उपेक्षा भी असंभव है. इसी विश्वास के साथ उसने आदर्श समाज का खाका तैयार किया था. अपने समय के उस विलक्षणतम दार्शनिक ने कालांतर में दार्शनिकों की ऐसी पीढ़ी विकसित की, जिसने आगामी शताब्दियों में राजनीतिक दर्शन की नई परिभाषाएं गढ़ीं. प्लेटो ने तो ‘रिपब्लिक’ तथा दूसरे ग्रंथों में आदर्श समाज सपने को इतना विस्तार दिया था कि दोनों एकदूसरे के पर्याय जैसे बन गए. आज भी आदर्श समाज का जिक्र हो तो प्लेटो की याद आना स्वाभाविक है. सतत चिंतनविमर्श के उपरांत वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि समाज के गठन का उद्देश्य अयाचित अथवा किसी कल्याणभाव से प्रेरित नहीं है. यह सीधेसीधे मानवकल्याण से जुड़ा मसला है. चूंकि अकेले मनुष्य के लिए जीवन की अनेक दुश्वारियां थीं, इसलिए उसने समूह में रहना सीखा. उसके लिए कुछ नियम बनाए. मानवसमूहों के बीच कुछ स्वीकृतियां हुईं. कालांतर में वही नियम तथा उनसे जुड़े रीतिरिवाज संस्कृति का हिस्सा बनते गए. कुल मिलाकर समाज मनुष्य की रचना है. जिसे उसने अपने सुख, सुरक्षा, एवं समृद्धि हेतु गढ़ा है. इसलिए समाज यदि मनमानी करता है, पात्रता के बावजूद किसी व्यक्ति को उसके अधिकारों से वंचित कर देता है तो दोष समाज है. दूसरी ओर यदि मनुष्य अपने कर्तव्य में कोताई बरतता है, या अपने किसी कार्य से दूसरे के सुख, सुरक्षा और समानता के अधिकार को बाधित करता है तो वह उस अनुबंध के साथ विश्वासघात करता है, जो उसके और समाज के बीच की महत्त्वपूर्ण कड़ी है.

आखिर ऐसे हालात क्यों बनते हैं. यदि कोई मनुष्य समाज के साथ किए गए अपने अनुबंध को तोड़ता है तो उसके लिए क्या केवल वही दोषी है? क्या दोषमुक्त होना केवल समाज का गुण है? और यदि कोई मनुष्य समाज के साथ अपने अनुबंध को तोड़ते हुए पाया जाता है तो उसका समाधान क्या केवल दंड है? इन प्रश्नों के उत्तर की खोज तथा सामाजिक विक्षोभ के कारणों को समझना आसान नहीं है. उसके लिए करीब पांच हजार वर्ष पहले सामाजिकसांस्कृतिक विकास के उस दौर में लौटना पड़ेगा जब मनुष्य यायावर जीवन छोड़ स्थायी प्रवास को अपनाने में लगा था. नागरीय सभ्यता अंगड़ाई लेने लगी थी. खेती के साथसाथ छोटेछोटे उद्योग और लोकशिल्प विकासमान अवस्था में थे. नौकाओं और भारी जलयानों की मदद से मनुष्य लंबी समुद्री यात्रओं पर निकलने लगा था. दुर्गम स्थानों की यात्र के लिए वह पशुओं की मदद लेता था. रास्ते में हिंस्र पशुओं और दस्युओं का खतरा था. इसलिए कुछ व्यापारी दस्युओं का सामना करने के लिए भाड़े के सैनिक रखने लगे. सैन्यबल और धनसंपदा दोनों ही ताकत का प्रतीक थे. व्यक्ति के पास जब इनका प्राचुर्य हुआ तो उसकी महत्त्वाकांक्षाएं अंगड़ाई लेने लगीं. पशु आधारित अर्थव्यवस्था में व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा अविकसित अवस्था में थी. अधिकृत पशुओं की संख्या से जनजातीय समूह की समृद्धि का आकलन किया जाता था. कृषि का विकास हुआ तो समृद्धि का मापदंड अधिकृत पशुओं की संख्या के बजाए अधिकृत भूक्षेत्र को मान लिया गया. फिर भी व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा के विकास में कई शताब्दियां गुजर गईं. जिन स्थानों से उसको वाणिज्यिक लाभ पहुंचता था, उन स्थानों पर सीधे अथवा सहयोगियों की सहायता से मनुष्य अपने उपनिवेश कायम करने लगा. फिर भी आरंभ में जो राज्य बने उनका क्षेत्रफल बहुत कम, नगरविशेष की सीमा तक होता था. निश्चितरूप से तत्कालीन नगरराज्य की स्थापना एक स्वतंत्र एवं आत्मनिर्भर आर्थिकराजनीतिक इकाई के रूप में की गई होगी. शीघ्र ही मनुष्य को लगने लगा था कि विकास की निरंतरता के लिए ऐसी कार्यकारी संस्थाओं की आवश्यकता है जिनके द्वारा संबंधों को मर्यादित और नियंत्रित किया जा सके. आदिम मानवीय जिज्ञासा केवल जीवन और प्रकृति के रहस्यों के अन्वेषण तक सीमित थी. समाज को व्यवस्थित करने की चाहत में नए राजनीतिक दर्शनों की खोज का सिलसिला आरंभ हुआ. बहुत शीघ्र मनुष्य को वे भी अपर्याप्त लगने लगे. कुछ लोगों ने महसूस किया कि केवल पराजागतिक कल्पनाओं से काम चलने वाला नहीं है. जीवन को अधिक सुविधासंपन्न बनाने तथा प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए प्रकृति को समझना भी अनिवार्य है. इसलिए बुद्धिजीवियों का ध्यान इहलौकिक सत्यों के अन्वेषण की ओर गया. उससे ज्ञानविज्ञान की खोज के नए रास्तों का विकास हुआ. आरंभिक विज्ञान प्रयोगों के बजाए मनुष्य सहजानुभवों पर आधारित था. उसमें एकरूपता का अभाव था. स्वाभाविक रूप से उसके कुछ अंतर्विरोध भी थे. जैसे खेती के विकास के लिए एक ओर तो औजारों का निर्माण करना, तटबंध बनाना तथा दूसरी ओर कभी वर्षा तो कभी अतिवृष्टिअनावृष्टि की मार से बचने के लिए कल्पनाधारित पराभौतिक शक्तियों को प्रसन्न रखने की कोशिश करना.

इस क्रांतिक परिवर्तन का श्रेय सुकरात को दिया जाता है. लेकिन विचारधारा को तर्कसम्मत बनाने में उससे पहले के विचारकों यथा पेरामेनडिस, एनेक्सीमेंडर, हेराक्लाइटस, डेमोक्रिटस का भी योगदान है. डेमोक्रिट्स की ईसा से 460(कुछ विद्वानों के अनुसार 490) वर्ष पहले जन्मे यूनानी दार्शनिक वैज्ञानिक डेमोक्रिटस ने लोकभ्रांतियों का खंडन करते हुए घोषणा की कि चंद्रमा पर दिखने वाली छाया वस्तुतः उसकी सतह पर बने ऊबड़खाबड़ पठार हैं. उसने नीहारिकाओं का रहस्योद्घाटन करते हुए बताया कि रात में आसमान में नजर आने वाली दूधिया नदी, वास्तव में तारों का प्रकाश है, जो अरबों की संख्या में विराट अंतरिक्ष में फैले हुए हैं. हालांकि लोकमानस सूर्य, चंद्र आदि ग्रहनक्षत्रों की भावनात्मक कहानियां आगे भी गढ़ता रहा, तो भी डेमोक्रिट्स के लेखन से आने वाले विचारकों को एक नई दिशा मिली. लोगों को लगा कि विश्वसमाज और उसकी उत्पत्ति की तह में जाने का एक तरीका यह भी हो सकता है, जो दूसरे की अपेक्षा कहीं अधिक वस्तुनिष्ठ और तर्कसम्मत है. इससे आगे चलकर विज्ञान के विकास को नई दिशा मिली. उस दौर में संवाद के साधन बेहद सीमित थे. ज्ञानविज्ञान का प्रचारप्रसार मुख्यतः मौखिक संवादन पर आधारित था. कमी यह रही कि डेमोक्रिट्स जैसे वैज्ञानिक सोच वाले दार्शनिक बहुत कम थे. वह दौर था जब आपसी झगड़ों के अतिरेक के कारण नगरराज्य की व्यवस्था असफल होने लगी थी; और व्यापारिक सफलता हेतु अपेक्षाकृत बड़े राज्यों की आवश्यकता महसूस की जाने लगी थी. चूंकि राज्य के विकास से जनसाधारण की उम्मीदें भी जुड़ी थीं, इसलिए बड़े राज्यों की सफलता किसी बड़े विभ्रम के बिना संभव न थी. विभ्रम तैयार करने का काम धर्म ने किया. जिसे तहत एक ‘ईश्वर’ की कल्पना की गई. लोगों को विश्वास दिलाया गया कि ‘सर्वशक्तिमान ईश्वर’ राजाओं का राजा है. और जो उपेक्षा या अनाचार लौकिक व्यवस्था के कारण सहना पड़ता है, ईश्वर के राज्य में उसकी संभावना दूरदूर तक नहीं है. वह सच्चा न्यायकर्ता है. जनजातीय समाजों में जहां गणतांत्रिक व्यवस्था थी, परिवार का वरिष्ठ सदस्य प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में राजनीति में हिस्सा लेता था. कृषि के उभार के साथ ऐसा वर्ग पनपा था जो अपेक्षाकृत आत्मनिर्भर था. जिसका राजनीति से सीधा संपर्क नहीं था. व्यवस्था से असंतोष अथवा अत्याचार के समय यह वर्ग शासन से अपनी दूरी के कारण स्वयं को असहाय एवं उपेक्षित महसूस करता था. ऐसे लोगों के लिए धर्म के नाम पर बनाया गया यह विभ्रम कि ‘सर्वशक्तिमान’ के राज्य में प्रत्येक मनुष्य की समान भागीदारी है, कोई भी सदस्य उपेक्षित नहीं हे, सर्वत्र खुशहाली और सुखों का प्राचुर्य है, वह सबके करीब और सच्चा न्यायकर्ता है—बड़ा कारगर सिद्ध हुआ. इस विभ्रम को लोकप्रतिष्ठित करने में पुरोहित वर्ग का विशेष योगदान था, सही मायनों में यह उसी के द्वारा निहित स्वार्थ हित रचा गया विभ्रम था. इसलिए जनाक्रोश से बचने तथा प्रशासनिक नाकामियों को छिपाने के लिए पुरोहितों को ऊंचे शासकीय पदों पर रखा जाने लगा. राज्य के कार्यों के निपटान के लिए उसकी राय का महत्त्व बढ़ता ही गया. चूंकि वह सिर्फ और विभ्रम था, इसलिए उसके प्रभावस्वरूप शिक्षा पर कम, आडंबरों पर ज्यादा जोर दिया जाने लगा. विभ्रम का प्रभाव इतना गहरा रहा कि शताब्दियों तक राजामहाराजाओं ने धर्मालय बनवाने पर प्रजा का बेशुमार धन खर्च किया10, परंतु शिक्षा की तरक्की की ओर से वे प्रायः आंख मूंदे रहे. इसके परिणामों को समझे बगैर बहुसंख्यक जनमानस उसी के आधार पर राजामहाराजाओं का महिमामंडन करता रहा. हालात में परिवर्तन उनीसवीं शताब्दी में अंग्रेजों के आगमन के बाद ही संभव हो सका.

धर्म और राजनीति के गठजोड़ के विरुद्ध विश्वव्यापी प्रतिक्रिया पूरी दुनिया में हुई, जिसने बौद्धिक क्रांति को जन्म दिया. यूनान में सोफिस्ट विचारकों की राज्यसंबंधी अवधारणा बहुत कुछ ब्राह्मणवादी विचारकों से मिलती थी. वैदिक परंपरा के आचार्यों की भांति वे भी राज्य को कृत्रिम व्यवस्था मानते थे. उनका मानना था कि राज्य की उत्पत्ति उन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हुई है, जिन्हें प्राकृतिक व्यवस्था में आसानी से प्राप्त नहीं किया जा सकता था. वैज्ञानिक के रूप में डेमोक्रिट्स का उल्लेख हमने पीछे किया. एक मानवतावादी विचारक के रूप में भी उसका योगदान कम नहीं है. सुकरात पूर्व दार्शनिकों के प्रतिनिधि के तौर पर उसने सोफिस्टों की सर्वसत्तावादी दृष्टि की आलोचना की, जो राजा को अपने स्वार्थ के अनुरूप सभी निर्णय लेने का अधिकार देती थी. उसने राज्य के नैतिक स्वरूप की आवश्यकता पर बल दिया था. डेमोक्रिट्स का विचार था कि गणतांत्रिक राज्य की गरीबी तानाशाही की अमीरी से बेहतर है. यह बात अलग है कि गणतांत्रिक राज्य के स्वरूप की ठोस परिकल्पना करने में वह असमर्थ रहा था. उसने कहा था—‘यह सहीसही तय कर पाना बड़ा ही कठिन है कि राज्य का कौनसा स्वरूप पूर्णतः गणतांत्रिक है.’ उसका मानना था कि राज्य का प्रबंधन किसी भी अन्य कार्य से अधिक महत्त्वपूर्ण और श्लाघनीय कर्म है. दासता को वह अपराधतुल्य मानता था. ‘समानता प्रत्येक अवस्था में सम्मानीय है’ कहकर उसने अपने उदार सोच का प्रदर्शन किया था. डेमोक्रिट्स के अनुसार राज्य की सफलता उसके नागरिकों की स्वेच्छिक सहभागिता पर निर्भर करती है—

जनता से जुड़ने का सर्वोत्तम रास्ता है कि सबकुछ इसी(राज्य)पर निर्भर हो. यदि राज्य की सुरक्षा हुई तो बाकी सब सुरक्षित रहेगा; और यदि राज्य को नष्ट किया गया तो शेष सभी नष्ट हो जाएगा.’11

समाज में राज्य की उत्तरोत्तर बढ़ती महत्ता को पहचानकर डेमोक्रिट्स ने सपना देखा था कि कोई तो होगा जो राज्य को अन्य सभी मामलों पर तजरीह देगा. कुछ इस तरह कि सबकुछ संतुलितसा लगे; तथा राजनीति समाज के प्रमुख विधेयात्मक कदम के रूप में स्थापित हो सके. ऐसा राज्य जो न तो वास्तविकता से बहुत परे, विवादपूर्ण हो, न ही किसी सार्वजनिक शुभ से इतर विषय पर जोर देता हो. डेमोक्रिट्सि का यह सोच कालांतर में प्लेटो, अरस्तु जैसे दार्शनिकों के राजनीतिक चिंतन की प्रेरणा बना. सुकरात ने डेमोक्रिट्स के नैतिकतावादी सूत्र को पकड़ा और राजनीतिकसामाजिक परमादर्श को समर्पित जीवन जीने पर जोर दिया. डेमोक्रिट्स को भी अंदाजा कदाचित नहीं था कि उससे मात्र पचास वर्ष बाद जन्मा प्लेटो आजीवन राजनीतिक दर्शन को समर्पित रहेगा. प्लेटो के बाद अरस्तु ने व्यवाहारिक नैतिकता को केंद्र मानकर राजनीतिक दर्शन के क्षेत्र में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया. प्लेटो की दृष्टि अपेक्षाकृत विशद थी. इसलिए अपने विश्लेषण में उसने प्रायः सभी उपलब्ध राजनीतिक दर्शनों की विवेचना की है. हालांकि सेबाइन आदि कुछ विद्वानों का विचार है कि प्लेटो ने जो भी लिखा, वे सभी विचार यूनानी समाज में पहले से ही मौजूद थे. उनके अनुसार प्लेटो का लेखन तत्कालीन समाज में प्रचलित राजनीतिक चिंतन का बेहतरीन संकलन है. उदाहरण के लिए स्त्रियों को आदर्श समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान दिए जाने का तर्क तथा विवाह संस्था का निषेध. सेबाइन ने संभावना व्यक्त की है कि प्लेटो ने यह विचार अरिस्टोफेंस के प्रहसन ‘एक्लेसियाजूसाइ’(महिलासंसद) से लिया था. उस नाटक में महिलाएं राजनीति के लिए आगे आती हैं. वे पुरुषों को राजनीति से बाहर कर देती हैं. विवाह संस्था का तिरष्कार किया जाता है. संतान को यह नहीं बताया जाता कि उसके मातापिता कौन हैं. बच्चे अपने से बड़ों को मातापिता का दर्जा देते हैं. बड़े भी उन्हें अपनी संतानतुल्य मानते हैं. श्रम केवल दासवर्ग के लिए सुरक्षित है. नाटक के अनुसार इस व्यवस्था के अच्छे परिणाम आते हैं. पुरुषों की नशे और जुआ की लत छूट जाती है. निरर्थक मुकदमेबाजी की घटनाएं कम होने लगती है. इस नाटक का ‘रिपब्लिक’ पर कितना प्रभाव पड़ा इस बारे में सेबाइन पूरी तरह आश्वस्त नहीं है, परंतु हमें जानना चाहिए कि ऐरिस्टोफेंस को प्राचीन यूनानी साहित्य में ‘कामेडी का पितामह’ माना गया है. ईसा से 390 वर्ष पूर्व जब यह नाटक लिखा गया, प्लेटो 37 वर्ष का मननशील युवा था. सुकरात के मृत्युदंड को लगभग एक दशक बीत चुका था. जिससे उसके मन में लोकतंत्र तथा एथेंस की राजनीति के प्रति गहरा क्षोभ था. इसलिए यह अरिस्टोफेंस के प्रहसन के प्रति आकर्षित होना स्वाभाविक था. प्लेटो राज्य की सफलता के लिए अनुशासन को अत्यावश्यक मानता था. उसका विचार था कि राज्य यदि बहुत अधिक उदार होगा तो उसके नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाह हो जाएंगे. जिससे उसको बिखरने में देर न लगेगी. यदि वह अत्यधिक मजबूत होगा तो देरसवेर सत्तामद में चूर उसके शासकगण तानाशाह बन जाएंगे. दोनों ही स्थितियों में वह उन उद्देश्यों से दूर चला जाएगा जिनके लिए उसका गठन किया गया है.

सुकरात से करीब 30 वर्ष छोटे प्लेटो ने एथेंस और स्पार्टा के बीच तीस वर्ष तक चलने वाले युद्ध को अपनी आंखों से देखा था. वह 429 ईस्वी पूर्व की एथेंस की प्लेग का भी साक्षी रहा था, जिसमें उसके महान योद्धा और राजनीतिज्ञ पेरीक्लीस समेत अनेक बहादुर सैनिकों को जान गंवानी पड़ी थी. 401 ईस्वी पूर्व में एथेंस की हार के बाद वहां के सम्राट को अपदस्थ कर विजयी स्पार्टा ने तीस सदस्यीय परिषद की स्थापना की थी. उसके बाद कुछ समय तक सबकुछ ठीकठाक चलता रहा. धीरेधीरे वहां भ्रष्टाचार और तानाशाही का बोलबाला हो गया. परिषद के सदस्य निजी अहं के शिकार होकर मनमानी करने लगे. गणतंत्र के नाम पर गठित व्यवस्था कुलीनतंत्र में ढल गई. इन सभी परिवर्तनों को प्लेटो ने बहुत करीब से देखा था. लोकतांत्रिक संस्थाओं की विफलता ने उसे दार्शनिक सम्राट की परिकल्पना को प्रेरित किया था. वह स्वयं अभिजात परिवार से था. एथेंस के राजपरिवार से उसका संबंध था, इस कारण वह स्वयं को एथेंस की राजनीति का उत्तराधिकारी भी मानता था. इसके बावजूद उसे सक्रिय राजनीति में योगदान देने का अवसर कभी न मिल सका, मगर राजनीति उसके दिलोदिमाग पर सदैव हावी रही. उसके जीवन में कई ऐसे अवसर आए जब उसे राजनीति या कहो कि विकृत राजनीति का शिकार होना पड़ा. ‘रिपब्लिक’ में जिस आदर्शलोक का सपना वह देखता है और उसके लिए जिस राजनीतिक दर्शन की परिकल्पना करता है, उसे कुछ विद्वान सक्रिय राजनीति में हिस्सा न ले पाने से उत्पन्न कुंठा की देन मानते हैं. मेरे विचार में प्लेटो के अपने जीवनानुभव ही ऐसे थे, जिससे प्रचलित राजनीतिक दर्शनों के प्रति निराशा का भाव पैदा होना स्वाभाविक था. उसका अपना जीवन राजतंत्रें की तानाशाही का शिकार रहा था. उन राजतंत्रें में उसे उत्पीड़न भोगना पड़ा था जो दार्शनिकों का सम्मान करने का दावा करते हुए दूसरों से श्रेष्ठ होने का दावा करते थे. जबकि उस समय के सर्वाधिक गर्वीले एथेंस के लोकतंत्र को प्लेटो अपने गुरु और मनीषी सुकरात की हत्या का दोषी मानता था.

प्लेटो की कल्पना ऐसे शक्तिशाली, पूर्णतः आत्मनिर्भर राज्य की थी, जिसके नागरिक राज्य के प्रति अपने कर्तव्यों से पूरी तरह सचेत हों. यह प्रेरणा उसे स्पार्टा के नागरिक जीवन से मिली थी. वहां के नागरिक वीरता, अनुशासन और सादा जीवनशैली के मामले में अद्वितीय थे. युद्ध उनके लिए खेल के समान था. दूसरी ओर एथेंसवासी प्रायः मननशील, साहित्यकला के अनुरागी, उदार एवं संवेदनशील थे. उन्हें अपने गणतंत्र पर गर्व था, परंतु शिखर पर बैठे लोग वहां भी आत्मश्लाघा तथा स्वार्थ भाव से आपूरित थे. उनमें राजनीतिक मतैक्य का अभाव था. एथेंस को स्पार्टा के हाथों मिली शर्मनाक पराजय के कारण भी वही थे. प्लेटो सुकरात को मृत्युदंड के लिए एथेंस की दोषपूर्ण राजनीति को जिम्मेदार मानता था. आदर्श राज्य में उसने स्पार्टा के अनुशासित नागरिक जीवन से प्रेरणा लेते हुए ऐसे समाज की कल्पना की थी, जिसके नागरिक वीर, जुझारू, निष्ठावान तथा सादा रहनसहन के आदी हों. प्लेटो स्पार्टा की कमजोरी भी समझता था. वहां राज्य के आगे नागरिक जीवन का महत्त्व गौण था. इसलिए आदर्श राज्य में उसने ऐसे समाज की कल्पना की है जहां राज्य और नागरिक दोनों के हित परस्पर जुड़े हों. व्यक्ति को वह सब मिले जो उसका अधिकार है. इस प्रेरणा के पीछे सुकरात के नैतिकतावादी दर्शन का बड़ा योगदान था. वह मानता था कि आदर्श राज्य एवं न्यायसिद्धांत एकदूसरे से जुड़े हैं. न्याय नागरिक और समाज दोनों की शुभत्व की यात्र को संभव बनाता है. एक के अभाव में दूसरे की उपस्थिति संभव ही नहीं है. नगरराज्यों में प्रचलित बुराइयों के निदान हेतु न्याय महत्त्वपूर्ण साधन है. इसलिए राज्य को न्यायआधारित राज्य में बदलना न केवल शासक, बल्कि जागरूक नागरिकों की भी जिम्मेदारी है.

यह सर्वविदित है कि बुद्ध की भांति सुकरात ने भी स्वयं कुछ नहीं लिखा. दोनों वाचिक परंपरा के विचारक थे. तथापि जैसे बुद्ध भारत में युगप्रवर्त्तक विचारक के रूप में प्रतिष्ठित हैं, यूनानी दर्शन में सुकरात की महत्ता भी युगप्रवर्त्तक विचारक की है. उसका जन्म शिल्पी परिवार में हुआ था. उसका यौवन पेरीक्लीज के महान युग में बीता था. एक नागरिक के रूप में उसने सभी विहित कर्तव्यों का पालन किया था. एथेंस के लिए उसने कई युद्धों में भाग लिया. डेलियम के सुप्रसिद्ध युद्ध में उसके धैर्य की काफी प्रशंसा हुई थी. राज्य के कानून में उसकी पूरी निष्ठा थी, जिसपर वह आजीवन अडिग बना रहा. उसने एथेंस के शासकवर्ग की आलोचना की. खुली आलोचना की. जिसके लिए उसपर नास्तिक होने के आरोप भी लगे. परंतु नगरराज्य के कानून के प्रति उसके सम्मान में कभी कमी नहीं आई. जब भी शासकवर्ग के स्वार्थ और कानून में द्वंद्व की स्थिति बनी, उसने सदैव कानून और संविधान का साथ दिया. इस कारण उसे नास्तिक तक कहा गया. एथेंस की संसद के कई सदस्य उससे हमेशाहमेशा के लिए नाराज हो गए. तमाम विरोधों के बावजूद वह अपने विचारों पर डटा रहा. उसे अपने देश के कानून से कितना प्यार था, इसके समर्थन में एक उदाहरण अकसर दिया जाता है. एथेंस की संसद द्वारा मृत्युदंड सुनाए जाने पर प्लेटो तथा उसके साथियों ने सुकरात को जेल से बाहर निकालने की योजना बनाई थी. गोपनीय तरीके से प्रस्ताव सुकरात तक पहुंचाया गया. लेकिन जान दाव पर लगी होने के बावजूद सुकरात ने कैद से भागने से यह कहकर इन्कार कर दिया था कि ऐसा करना कानून का उल्लंघन होगा. कानून के प्रति सुकरात की अनन्य निष्ठा को दर्शाने वाला यह अकेला उदाहरण नहीं है. जिन दिनों वह नागरिक परिषद का सदस्य था, उसके सामने नौसेनापतियों का मामला आया. उनपर आरोप था कि अरगिनुगाए के समुद्री युद्ध(405 ईस्वी) के दौरान उन्होंने डूबते हुए नागरिकों को बचाने के लिए कोई प्रयत्न नहीं किया था. कुछ विवरणों में बताया गया है कि परिषद की अध्यक्षता समिति का सदस्य होने के साथसाथ सुकरात उस दिन उसका सभापतित्व भी कर रहा था. इसलिए अपराधी सेनापतियों के दंडनिर्धारण के लिए परिषद में मतदान कराने की जिम्मेदारी उसी की थी. निचली अदालत सेनापतियों को एक मत के अंतर से दोषी घोषित कर चुकी थी. इसलिए यदि वह सचमुच आदेश सुना देता तो वह परिषद की सामान्य कार्रवाही मानी जाती. मगर सुकरात ने यह कहकर कि सामूहिक रूप से दंड निर्धारित करना एथेंस के संविधान के विरुद्ध है—फैसले के लिए मतदान कराने से इन्कार कर दिया था. परिषद में केवल सुकरात ऐसा था जिसने दंडनिर्धारण प्रक्रिया को दोषी माना और बाकी सदस्यों के दबाव डालने के बावजूद सुनवाई को टाल गया. उसके सालभर बाद की एक और घटना है. सुकरात तथा चार अन्य नागरिकों को 30 सदस्यों की संसद की ओर से एक अपराधी को गिरफ्तार करके लाने का आदेश दिया गया. उस व्यक्ति को एक मामले में मृत्युदंड सुनाया गया था. सुकरात ने आदेश को संविधान विरुद्ध मानते हुए उसके पालन से इन्कार कर दिया था. नागरिक कर्तव्यों के प्रति संपूर्ण निष्ठा, उनपर अटल रहते हुए उनका पालन तथा कानून की सीमाएं लांघने की दृढ़तापूर्वक अस्वीकृति—दो ऐसी विशेषताएं हैं, जो सुकरात को सामान्य से हटकर उसकी वैचारिक दृढ़ता को दर्शाती हैं.

महान व्यक्तित्व बहुप्रतिभाशाली होते हैं. कई बार परिस्थितियां भी उनके जीवन को नया मोड़ दे देती हैं. पिता मोरोपंत तांबे ने बेटी ‘मनु’ का विवाह अधेड़ गंगाधर राव से यह सोचकर किया था कि बेटी रानियों की तरह सुख भोगेगी. परंतु वीरांगना लक्ष्मी बाई ने अंग्रेजों को बगावती तेवर दिखाए और 1857 के स्वाधीनता संग्राम की नायिका सिद्ध हुईं. गांधी जी नाकाम वकील से कामयाब नेता बने. डॉ. आंबेडकर की रुचि अर्थशास्त्र में थी. वे कामयाब अर्थशास्त्री थे और उसी क्षेत्र में आगे काम करना चाहते थे. अगर वही करते तो सामाजिक न्याय के लिए उन्होंने जो संघर्ष किया, जिससे आगे चलकर दलितों के लिए कल्याण और अधिकारिता का मार्ग प्रशस्त हुआ, उसके लिए उन्हें किसी और मसीहा की प्रतीक्षा करनी पड़ती. अपने सामाजिक दायित्व को समझते हुए डॉ. आंबेडकर ने संघर्षमय राजनीति का रास्ता चुना. जीवन के आरंभ में सुकरात की रुचि भौतिक विज्ञान में थी. उसने अपने समय के लगभग सभी भौतिकवादी सिद्धांतों का अध्ययन किया था. परंतु उनसे उसे संतुष्टि न मिली थी. उसका मानना था कि भौतिक विज्ञान यह तो बताता है कि ‘चींजें कैसे बनीं?’ परंतु उनके बनने का औचित्य क्या है? कौनसी सत्ता उनके निर्माण के पीछे है? जैसे प्रश्नों का उत्तर वे नहीं दे पातीं. घिसेपिटे प्रश्नों और उत्तरों से उकताए सुकरात के लिए यही प्रश्न सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण थे. धीरेधीरे वह प्रकृतिविज्ञान और तत्वमीमांसा से जुड़े यांत्रिक प्रश्नों से उकताने लगा. अंततः क्रांतिक छलांग मारते हुए, उसने एनेक्सीमेंडर और हेराक्लाइटस की दुनिया छोड़, ज्ञानमीमांसा की ऐसी दुनिया में प्रवेश किया, जहां ज्ञान के साथसाथ, ज्ञान के निर्माण की विभिन्न पद्धतियों तथा उनकी विशेषताओं पर भी विचार किया जाता था. आगे चलकर उसे प्लेटो, जेनोफीन, इसोक्राइट्स जैसे विद्वान शिष्य और सहयोगी प्राप्त हुए. अपनी प्रतिभा और सूझबूझ के बल पर सुकरात ने अनूठी चिंतनशैली विकसित की, जिसमें प्रश्नोत्तर शैली में ज्ञानमीमांसा को आगे बढ़ाया जाता है. सुकरात राजनीति को श्रेष्ठ कला मानता था. उसने कहा था—

यदि श्रेय(शुभत्व) कला नहीं, बल्कि उससे ऊंची और उदार चीज है तो कम से कम राजनीति को तो कला मानना ही चाहिए. और राजनीतिज्ञ से भी यह अपेक्षा होनी चाहिए कि वह प्रशिक्षण प्राप्त करे और एक शिल्पी की भांति किसी उस्ताद की देखरेख में रहे. परंतु हमें राजनीतिज्ञ को तुरंत या एकदम शिल्पी से अभिन्न नहीं मान लेना चाहिए. जिन चीजों का संबंध न्याय एवं संयम से है, यदि उनका संरक्षण उसके जिम्मे है तो सबसे पहले आवश्यक है कि श्रेय के बारे में उसकी सच्ची और दार्शनिक धारणा हो….यह विषय ऐसा है जिसका संबंध कला के बजाय किसी उच्चतर वस्तु से है.’12

एक समय सुकरात की इच्छा नैतिक शिक्षक बनने की थी. प्लेटो के अनुसार सुकरात ने कई परिभाषाओं में समसामयिक नैतिकता के संदर्भों में संशोधन किया था. अतः उसके अनुसार वह नैतिक शिक्षक ही था. हमें उसे कामयाब शिक्षक मानना चाहिए. इसलिए भी कि अपनी कलम से एक भी शब्द लिखे बिना सुकरात की गिनती विश्व के सिरमौर दार्शनिकों में की जाती है. प्लेटो के विपुल लेखन में ऐसी एक भी पंक्ति नहीं है, जिसमें लेखक ने सुकरात का प्रभाव महसूस न किया हो. एक परमजिज्ञासु व्यक्तित्व के रूप में उसने अपने समय की दर्शनचिंतन परंपरा को प्रभावित किया. इसमें प्लेटो के योगदान की उपेक्षा असंभव है. आज हम सुकरात के बारे में जो भी जानते हैं, उसमें प्लेटो तथा उसके अन्य शिष्यों, समकालीनों का बहुत बड़ा योगदान है. यह सुकरात के सोच का अनूठापन ही था कि उसको प्लेटो जैसे विचारकों ने अपना गुरु माना. जिस समय सोफिस्ट विचारक कोरे तर्क के आधार पर वितंडा रच रहे थे—सुकरात ने जीवन और समाज में नैतिकता को सम्मान देने पर जोर दिया. उसके लिए ज्ञान और सद्गुण में कोई अंतर न था. न ही वह बौद्धिक चिंतन को भावना से सर्वथा निरपेक्ष मानता था. सुकरात के अनुसार बौद्धिक चिंतन कुछ ऐसी चीज है जो ‘भावना से अनुप्राणित’ है. जो न केवल ज्ञान को दिशादशा देता है, बल्कि मानवी ऐषणाओं को भी प्रभावितप्रेरित करताकराता है. उसका असर मनुष्य के व्यवहार और कार्यकलापों पर देखने पर मिलता है. इसपर बार्कर ने मेयर को उद्धृत किया है—

यदि हम ज्ञान तथा आचरण को एक ही मान सकें तो वह आचरण का स्थायी मापदंड बन जाता है. जिस ज्ञान का आचरण से कोई संबंध न हो, और जो ज्ञान केवल ज्ञान के लिए ही अर्जित किया जाए, तो ऐसे ज्ञान का इस यूनानी दार्शनिक की दृष्टि में कोई विशेष अर्थ नहीं था. ज्ञान केवल कुछ सूचनाओं का संकलनमात्र नहीं है. व्यक्ति के चरित्रनिर्माण के साथ उसका गहरा संबंध है. ज्ञान बुद्धि के माध्यम से ही समूचे व्यक्तित्व को प्रभावित करता है. यह इच्छाशक्ति और भावनाओं का निर्माण है. साहस, संयम, न्याय आदि सभी सद्गुणों की उत्पत्ति ज्ञान से ही होती है. साहसी वही व्यक्ति बन सकता है जो भय तथा निर्भीकता का ज्ञान रखता हो.’13

सुकरात के दर्शन में एक शब्द बारबार पढ़ने को मिलता है. वह शब्द है—सद्गुण. इसके पर्याय के रूप में प्लेटो ने ‘अरैती’ शब्द का उपयोग किया है, जिसका भाषिक अर्थ है—‘उत्कृष्टता.’ इस तरह सद्गुण का अभिप्राय है—सभी कर्मक्षेत्रों में उत्कृष्टता. उस गुण में प्रवीणता जिसके लिए उस वस्तु का आविष्कार हुआ है. जैसे कलम का गुण लिखना है, चाकू का गुण काटना. तो कलम की उत्कृष्टता का मापदंड होगा कि उससे कितना अच्छा या बुरा लिखा जा सकता है. ठीक इसी प्रकार चाकू की उत्कृष्टता भी उसके द्वारा किए गए कार्य की गुणवत्ता पर निर्भर होगी. मनुष्य के संदर्भ में उत्कृष्टता का आकलन उसमें मानवीय गुणों की उपस्थिति से आंकी जा सकती है. सुकरात के अनुसार मनुष्य की अच्छाई या बुराई दो प्रकार की होती है. पहली उसकी प्रवृत्ति को लेकर. जिसके आधार पर उसका दूसरे मनुष्यों के साथ व्यवहार का आकलन किया जा सकता है. दूसरी व्यवसाय या कौशल को लेकर. जो उसके उत्पादकता संबंधी गुणों का मापदंड है. समाज के लिए मनुष्य के दोनों ही गुण अभीष्ट हैं. इनमें एक का भी अभाव मनुष्य को समाज के लिए अनुपयोगी बना सकता है. कोई व्यक्ति अच्छा या बुरा चित्रकार, इंजीनियर, वकील, नेता, डॉक्टर, लेखक आदि हो सकता है. परंतु अच्छा वही मनुष्य हो सकता है, जिसमें मनुष्य की अच्छाई को दर्शाने वाले गुण प्रचुर मात्र में उपलब्ध हों. अच्छाई का मापदंड क्या है? सुकरात के अनुसार संयम, न्याय, साहस और विवेक, मनुष्य के श्रेष्ठत्व के स्तर को दर्शाते हैं. संयुक्त रूप से चारों गुण मानवीय उत्कृष्टता का मापदंड कहे जा सकते हैं. इनके अभाव में मनुष्यत्व पर संकट आ सकता है, जो प्रकारांतर में समाज के लिए भी हानिकारक है. सुकरात के आचरण की उत्कृष्टता के विचार की तुलना बुद्ध के ‘अष्टांग मार्ग’ से की जा सकती है. सुकरात से लगभग आधी शताब्दी पहले जन्मे बुद्ध ने भी आचरण की शुद्धता एवं उत्कृष्टता पर बल दिया था. उनका अष्टांगिक मार्ग—सम्यक दृष्टि, सम्यक कर्म, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक्, सम्यक स्मृति, सम्यक जीविका, सम्यक व्यायाम तथा सम्यक समाधि का समर्थन करता है. इन कर्तव्यों में पूर्णता व्यक्ति को निर्वाण की ओर ले जाती है. यह कहना तो अनुचित होगा कि सुकरात ने अपने विचार बुद्ध से लिए थे, परंतु दोनों के कर्मसिद्धांत में अनूठा साम्य मनुष्यता के इन दो हितचिंतकों के समान वैचारिक धरातल को दर्शाता है. सुकरात का विचार था कि डॉक्टरी, नौकासंचालन अथवा दूसरे उद्यमों की भांति राजनीति भी एक कला है. व्यक्ति राजनीति का ज्ञान अर्जित कर, शासनकार्य में निपुणता प्राप्त कर सकता है. परंतु श्रेष्ठ शासन के लिए व्यक्ति का उच्च नैतिक मूल्यों में विश्वास और कर्तव्यपरायणता आवश्यक है. सुकरात के जीवनदर्शन की ये विशेषताएं उसे सोफिस्टों से अलग कर, मनुष्यता के आदिचिंतक के रूप में स्थापित करती हैं.

सुकरात ने जिस आदर्शवाद को केंद्र में रखते हुए उसने अपने दर्शन सिद्धांत गढ़े थे, प्लेटो ने उसी को आधार बनाकर आदर्श समाज की रूपरेखा तैयार की थी. यही कारण है कि प्लेटो का राजनीतिक दर्शन नैतिकता से आबद्ध है. सुकरात का उल्लेख उसने ऐसे तेजस्वी विद्वान के रूप में किया है, जो ‘शुभ’ को पहचानने तथा उसका अनुसरण करने की आवश्यकता पर जोर देता है. वह ईश्वर की परंपरागत अवधारणा से भिन्न, यद्यपि उसकी कुछ समानताएं लिए हुए है. प्लेटो को लगता था कि राजनीतिक पदों पर जिम्मेदारी का निर्वहन चुनौतीभरा काम होता है. महत्त्वपूर्ण कर्तव्यों के निष्पादन के लिए उपयुक्त व्यक्ति पर्याप्त संख्या में सर्वदा उपलब्ध हों, यह संभव भी नहीं होता. इसलिए किसी भी राज्य के सामने, जो नागरिक हितों को सर्वोपरि समझता है, बड़ी समस्या ईमानदार, दूरदृष्टा, साहसी और नीतिवान राजनीतिज्ञों के चयन की होती है. प्लेटो को विश्वास था कि शिक्षा के माध्यम से अच्छे राजनीतिज्ञ तैयार किए जा सकते हैं. ‘अकादमी’ की स्थापना उसने इसी उद्देश्य के निमित्त की गई थी. पलभर के लिए एकदम हाल के युग में लौटकर याद करने की कोशिश करें. कुशलनीतिवान राजनीतिज्ञों की उपलब्धता की समस्या को लेकर ब्रिटिश की तत्कालीन प्रधानमंत्री मारर्गेट थैचर ने भी अपने एक बयान में कहा था कि उन्हें राजकर्म के कुशल संपादन के लिए केवल छह व्यक्तियों की आवश्यकता है, जो निपुण एवं नीतिवान हों. पर ऐसे लोग इतनी संख्या में कभी एक साथ नहीं मिल पाते. हालांकि ऐसा सोच सर्वथा निरापद नहीं है. समाज में प्रतिभाशाली लोग हमेशा होते हैं. लेकिन प्रायः लोग विरोधी विचारधाराओं के प्रति लचीलेपन के अभाव में उनकी उपेक्षा कर जाते हैं. समन्वयसामर्थ्य की कमी भी इसका कारण होती है. शिखर पर बैठे लोग प्रायः यह सोचते हैं कि उनके सहयोगी या मातहत ठीक वैसा और उतना ही सोचेंकरें, जैसा वे स्वयं सोचतेचाहते हैं. मार्गेट थैचर जैसे नेता जब कुशल और समर्पित लोगों की कमी की बात करते हैं तो इसका आशय यह नहीं है कि समाज में उस तरह के लोगों की सचमुच कमी होती है. असलियत यह है कि प्रतिभा के साथसाथ जिस अंधसमर्पण की अपेक्षा सत्ताशीन वर्ग दूसरों से करते हैं, वैसा प्रायः नहीं हो पाता. जिसको ऐसे लोग मिल जाते हैं, वह हिटलर की भांति तानाशाह बन जाता है.

यही समस्या प्लेटो के सामने भी थी. इसलिए उसने शिक्षा के माध्यम से भावी राजनीतिज्ञों की पीढ़ी तैयार करने पर जोर दिया था. ‘रिपब्लिक’ की रचना में प्लेटो के गुरु सुकरात के अलावा उसके और कई समकालीन एवं पूर्ववर्त्ती दार्शनिकों का योगदान था. उनमें पाइथागोरेस के अनुयायी, पेरामेनीडिस, डेमोक्रिटिस, हेराक्लाटस आदि प्रमुख थे. प्लेटो पर सर्वाधिक प्रभाव, ईसा से पांच शताब्दी पहले जन्मे यूनानी दार्शनिक पेरामेनीडिस का पड़ा था. उसका विचार था कि ‘सत्य को सदैव अनतिंम तथा अपरिवर्तनीय होना चाहिए.’ पेरामेनीडिस शब्दों की ताकत पर भरोसा करता था. उसका विचार था कि यदि भाषा में अभिव्यक्तिसामर्थ्य है तो उसके द्वारा हम जिस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं, यानी लगातार विमर्श के माध्यम से जो ज्ञान हमें प्राप्त होता है, वह भी सच होना चाहिए. पेरामेनीडिस के दर्शन का स्रोत ‘दि नेचर’ शीर्षक से लिखी गई एक कविता है. कहा जाता है कि उस कविता में लगभग 3000 पद थे. उनमें से अधिकांश पद अब गायब हो चुके हैं. मूल कविता भी अनुपलब्ध है. उसका सिर्फ संदर्भ प्राप्त होता है. अपनी कविता में पेरामेनीडिस ने कहा था कि आप उस वस्तु के बारे में नहीं जान सकते जिसका कोई अस्तित्व ही न हो. इसका अभिप्राय है कि मनुष्य का ज्ञान केवल अस्तित्वमान प्रत्ययों की व्याख्याविश्लेषण तक संभव है. शुभत्व इस आधार पर अस्तित्ववान है क्योंकि वह मानवजीवन को नैतिकता की ओर अग्रसर करता है. दूसरी ओर नैतिकता इसलिए अस्तित्ववान है, क्योंकि वह मनुष्य की शुभत्व की यात्रा को सफल बनाती है. इस कसौटी के अनुसार पेरामेनीडिस को पहला तत्वविज्ञानी भी कहा जाता है. कालांतर में वही भौतिकवादी दर्शन की प्रेरणा बना.

पेरामेनीडिस के अलावा प्लेटो पर सर्वाधिक प्रभाव उससे कुछ ही वर्ष पहले जन्मे हेराक्लाट्स का पड़ा था. यूनानी दर्शन के पितामह थेल्स से प्रभावित हेराक्लाट्स जल को ही सृष्टि का मूलाधार मानता था. उसका मानना था कि सबकुछ गतिमान है. दो व्यक्ति यदि आगे पीछे जा रहे हैं तो पीछे मौजूद व्यक्ति कभी पहले को नहीं पकड़ पाएगा. इसलिए कि उनकी यात्र का भौतिक जगत के अलावा एक आयाम और भी है—वह है समय, जो सदैव गतिमान रहता है. जब तक पीछे चल रहा व्यक्ति आगे वाले के बराबर पहुंचेगा, तब तक आगे चल रहा व्यक्ति समय के प्रवाह में कुछ और आगे निकल चुका होगा. ग्रहनक्षत्र भी इसी नियम का पालन करते हैं. हेराक्लाइट्स के अनुसार रातदिन सूर्य चक्र के अनुसार बदलते हैं. हालांकि हर रोज एक ही सूरज दिखाई पड़ता है, किंतु हम एक ही समय में कभी नहीं लौटते. हर बार का सूरज कुछ नया होता है. हम उस अंतर को नहीं समझ पाते; क्योंकि हमारी दृष्टि अरबों वर्ष के अंतराल को परखने में समर्थ नहीं है. हेराक्लाइट्स का यह विचार आधुनिक वैज्ञानिक शोधों के निकट है. इसे पढ़ते हुए आइंस्टाइन की याद आना स्वाभाविक है. आइंस्टाइन ने भी समय को चौथा आयाम माना है. परंतु हमें याद रखना चाहिए कि हेराक्लाटस के शब्द आइंस्टाइन से लगभग 2400 वर्ष पहले के हैं. हेराक्लाइटस की प्रसिद्ध उक्ति है—‘सबकुछ प्रवाहमान है.’ किवदंति है कि यह वाक्य उसने नदी में खड़े होकर, उसके प्रवाह को देखते हुए कहा था. हेराक्लाइट्स के अनुसार—

यह विश्व, जो सभी के लिए एक समान है, इसमें जो कुछ है सभी सनातन है—वह न तो ईश्वरनिर्मित है, न ही मानवनिर्मित. जो कुछ आज है वह अखंड ज्योति के समान, परिवर्तनशीलता के बीच, हमेशाहमेशा के लिए रहने वाला है.’14

हेराक्लाइट्स के चिंतन में भौतिकवादी विचारधारा के बीजतत्व मौजूद हैं, जिन्होंने प्लेटो, अरस्तु समेत आने वाली पीढ़ी के अनेक दार्शनिकों को प्रभावित किया था. उसके बारे में यह बात भी चौंका सकती है कि वह युद्ध का समर्थक था. यहां तक कि न्याय की स्थापना के लिए भी वह युद्ध को अनिवार्य मानता था. युद्ध का जैसा दुराग्रही समर्थन हेराक्लाइट्स ने किया, वैसा शायद ही किसी और विचारक ने किया हो—

युद्ध आमखास, राजाओं तथा राजाओं के राजा का जनक है. युद्ध ने ही कुछ को भगवान, कुछ को इंसान, कुछ को दास तथा कुछ को स्वामी बनाया है. हमें मालूम होना चाहिए कि युद्ध से हम सभी का नाता है. विरोध न्याय का जन्मदाता है, प्रत्येक वस्तु संघर्ष से ही जन्मती तथा उसी से अंत को प्राप्त होती है.15

हेराक्लाइट्स तथा पारमेनीडिस के अलावा सुकरात पूर्व के दार्शनिकों में प्रोटेगोरस का नाम भी बड़े सम्मान के साथ के साथ लिया जाता है. उसके विचारों में हम आर्थिक उदारवाद की झलक देख सकते हैं. वह सोफिस्ट था और गर्व के साथ खुद को पुराने सोफिस्टों की भांति ‘मानवता का शिक्षक’ कहता था. यह बात अलग है कि उसके जीवनकाल में ही सोफिस्टों का सम्मान घटने लगा था. उसके पीछे सोफिस्टों की अपनी चूकों, जैसे कि ज्ञान को वितंडा का पर्याय मानना तथा शिक्षा का अभिप्रायः दूसरों को प्रभावित करने की कला बताना तथा सुकरात की बढ़ती ख्याति का बड़ा योगदान था. सुकरात के प्रभाव में ही प्लेटो भी सोफिस्टों से दूरी बनाए रहा. अपने मौलिक विचारों के कारण प्रोटेगोरस जैसे प्रतिभाशाली चिंतकों का महत्त्व बाद में भी बना रहा. वह प्राचीन क्लासिक किस्म के सोफिस्टों में से था जो प्रकृति और मनुष्य के संबंधों के बीच नएपन की खोज को समर्पित थे. उनीसवीं शताब्दी के उदारवादी विचारकों की भांति उसके दर्शन का केंद्र भी मनुष्य है. इस संबंध में प्रोटेगोरस का पहेलीनुमा कथन है—‘केवल मनुष्य सृष्टि की समस्त वस्तुओं का मापदंड है. ऐसी वस्तुओं का जो जैसी हैं, वैसा है. ऐसी वस्तुओं का जो जैसी नहीं हैं, वैसा नहीं है.’ इस कथन की अनेक व्याख्याएं हुई हैं. प्रकारांतर में वह बताता है कि न्याय अथवा कोई और ऐसी चीज जो समाज की भलाई की दावेदारी करती है, व्यक्तिनिरपेक्ष नहीं हो सकती. ऐसी वस्तुओं की उपयोगिता लोकहित साधते रहने में है. विवेचना को आगे बढ़ाते हुए उसने लिखा है कि, ‘प्रत्येक राज्य के लिए जो भी उचित एवं कल्याणकारी प्रतीत होता है, वह उसके लिए उस समय तक उचित एवं कल्याणकारी बना रहेगा, जब तक उसके विचारों में आमूल परिवर्तन नहीं होता.’ विचारों में परिवर्तन से प्लेटो का आशय समाज में वस्तु या व्यक्ति के प्रति धारणा है. उदाहरण के लिए ऐसे समाजों में जहां बहुपत्नीत्व अथवा बहुपतित्व जैसी प्रथाएं हैं, वहां क्रमशः एकाधिक पत्नी अथवा पति रखना अनुचित नहीं है. प्रथाएं समाज में उस समय तक सम्मानेय अथवा असम्मानेय बनी रहती हैं, जब तक कोई समाज उन्हें सम्मानेय अथवा असम्मानेय मानता है. प्रत्येक बदलाव मनुष्य की इच्छाशक्ति और बदलाव की उत्कंठा को दर्शाता है. अकसर यह कहा जाता है कि मनुष्य परिस्थितियों का दास होता है. घटनाएं उसके जीवन और विचारों को मनचाहा मोड़ देने में सक्षम होती हैं. परंतु इस सोच की सीमाएं हैं. कोई भी घटना मानवव्यवहार को तभी तक प्रभावित कर सकती हैं, जब उनमें व्यक्ति के आचरण से कुछ सीख लेने का गुण हो. कुल मिलाकर मनुष्य और उसके चारों और घट रही घटनाओं के बीच लेनदेन चलता रहता है. प्लेटो के अनुसार—

नगरराज्य से संबंधित मामलों में प्रत्येक नगर अच्छे और बुरे, उचित और अनुचित, न्यायसंगत और न्यायविरुद्ध, अनुकूल और प्रतिकूल निर्णय कर लेने के बाद उस निर्णय के अनुसार व्यवस्थाओं का गठन करता है, जो समान रूप से मान्य होती हैं. लेकिन इसका आशय यह नहीं कि कोई व्यक्ति अथवा नगर दूसरों के मुकाबले कम अथवा अधिक बुद्धिमान है. किसी नगरराज्य के लिए क्या उपयोगी और सुलभ होगा, इस बारे में मतभेद संभव हैं. परंतु नैतिकता से संबंधित मामलों में राज्य ही एकमात्र सत्ता है. राज्य का निर्णय सामूहिकता की देन होता है.’16

प्रोटेगोरस के अनुसार राज्य नैतिकता और कानून दोनों का आधार है. आदर्श राज्य प्रत्येक नागरिक को अपने मत पर बने रहने, अपने विचारों के साथ जीने की स्वतंत्रता देता है. साथ ही नागरिक इसके लिए भी बाध्य होता है कि वह राज्य द्वारा अनुमन्य सभी नियमों और कानूनों का पालन करेगा, ताकि उसके विचारों के कारण बाकी नागरिकों को जो उससे भिन्न राय रखते हैं किसी प्रकार की परेशानी न हो. स्मरणीय है कि प्रोटेगोरस के जीवनकाल में राज्य छोटेछोटे थे. समाज समुदायों में बंटा हुआ था. कुल जनसंख्या दास और गैर दास में बंटी थी. इसलिए उस समय तक समुदाय और समाज में बड़ा अंतर नहीं था. प्रायः समुदाय की इच्छा को ही समाज की इच्छा के रूप में अभिव्यक्त किया जाता था, हालांकि उसका प्रभाव क्षेत्र समुदाय विशेष तक ही सीमित रहता था. इसलिए प्रोटेगोरस ‘सामुदयिक इच्छा’ पर, जिससे समुदाय के अधिसंख्यक लोगों का भला हो, जोर देता है. समुदाय को बड़े समाज में बदलने की चाहत अरस्तु के बाद आरंभ होती है. अरस्तु सामाजिक नैतिकता का प्रश्न उठाता है और प्लेटो से हटकर सोचते हुए किसी खास राजनीति दर्शन के बजाय व्यक्ति और समाज की सामूहिक चेतना के विस्तार की मांग प्रस्तुत करता है. रूसो उसका उदात्तीकरण करते हुए उसे ‘सामान्य इच्छा’ में बदल देता है. यह अंतर दिखने में भले मामूली लगे, है अत्यंत महत्त्वपूर्ण. ‘सामुदायिक इच्छा’ का आशय ऐसी इच्छा से था, जिससे समाज में अधिसंख्यक लोगों का भला होता हो. ‘सामान्य इच्छा’ में भी बहुसंख्यक वर्ग का हित सुरक्षित है. लेकिन पहली में बहुसंख्यक वर्ग के हितों पर जोर देते हुए अल्पसंख्यक वर्ग के हितों की या तो उपेक्षा कर दी जाती है, अथवा उनके अहित को बहुसंख्यक के हित की अनिवार्यता मानकर उपेक्षित कर दिया जाता है. रूसो की ‘सामान्य इच्छा’ इस मायने में उदार है कि वह अल्पसंख्यक वर्ग की पसंदों को नजरंदाज करने के बजाय उन्हें राज्य की नैतिकता का प्रश्न बना देता है. तदनुसार उन इच्छाओं पर भी जोर दिया जाया जाता है, जिन्हें अल्प समूह की इच्छाएं मानकर प्रायः नजरंदाज किया जाता है. श्रेष्ठ समाज में ही श्रेष्ठ मनुष्य का वास होता है—कहते हुए अरस्तु बहुसंख्यक वर्ग से उम्मीद करता है कि वह अल्पसंख्यक वर्ग की पसंदों का भी ध्यान रखेगा; और राज्य जो प्रायः बहुसंख्यक वर्ग की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करता है, वह अल्पसंख्यक वर्ग के हितों, समानता और स्वतंत्रता को निर्बंध रखने के लिए समुचित कदम उठाएगा.

प्लेटो का विचार था कि आदर्श राज्य की स्थापना केवल समर्थन, सहयोग और परिवर्तनशील बने रहने से संभव नहीं है. इसे दृढ़, स्थायी, अपरिवर्तनीय राजनीतिक तंत्र के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है, जो सामाजिक परिवर्तनों को निरंतर नियंत्रितनिर्देशित करने में सक्षम हो. ‘रिपब्लिक’ और ‘लॉज’ में आदर्श समाज के लिए जिन विचारों को वह स्थान देता है, वे यूनानी समाज में छिटपुट रूप से उससे पहले भी मौजूद थीं. लेकिन प्लेटो का दर्शन इस मायने में विशिष्ट है कि राजनीति पर उस समय तक इतने व्यवस्थित उपयोग के बारे में किसी ने नहीं सोचा था. अतः राजनीतिक दर्शन के लिहाज से यह एक अद्भुत और विकासगामी सोच था. ‘आदर्श समाज’ की परिकल्पना के पीछे उसके कविहृदय का भी उतना ही योगदान था, जितना कि दार्शनिक मस्तिष्क का. इसलिए अपने आदर्श राज्य में उसने कानून के हस्तक्षेप को न्यूनतम रखते हुए आत्मानुशासन पर ज्यादा जोर दिया है. इस ग्रंथ को कुछ विद्वान प्लेटो की कुंठा की उपज भी मानते हैं, जो उनके अनुसार एथेंस की राजनीति में सक्रिय भूमिका न निभा पाने के कारण जनमी थी. प्लेटो स्वयं दार्शनिक था. सुकरात, डेमोक्रिटिस, हेराक्लाइट्स, पेरामेनीडिस समेत पाइथागोरस के अन्य अनुयायी आदि जिनसे वह प्रभावित था, वे सब भी दार्शनिक थे. उसने एथेंस में गणतंत्रीय शासन को कुलीनतंत्र की मनमानी में ढलते हुए देखा था. सायराकस के सम्राट डायोनिसियस प्रथम और द्वितीय की तानाशाही भी देखी थी. डायोनिसियस प्रथम अपने राज्य में विद्वानों और दार्शनिकों को रखता था. लेकिन उसकी मनमानी, सनकों और महत्त्वाकांक्षाओं पर रोक लगाने में वे सभी अक्षम थे. इसी कारण प्लेटो का राजतंत्र से विश्वास उठ चुका था. राजतंत्र को वह राजा तथा उसके आसपास जुटे अधिकारियों की तानाशाही कहता था. राज्य के मुखिया के रूप में वह ऐसे शासकों की कल्पना करता था, जो दूरदर्शी, वीर, साहसी, दृढ़निश्चयी, बुद्धिमान और किसी भी प्रकार से प्रलोभन से मुक्त हों. उसका मानना था कि ये गुण एकमात्र दार्शनिक में ही संभव हैं. इसलिए वह राज्य की बागडोर दार्शनिक के हाथों में सौंपने की अनुशंसा करता है. ‘रिपब्लिक’ में उसकी यही परिकल्पना विस्तार लेती दिखाई पड़ती है.

ध्यातव्य है कि ‘रिपब्लिक’ प्लेटो के प्रौढ जीवन की रचना है, हालांकि उसका लेखन वर्षां तक चलता रहा. कुछ खंड उसने अपने उत्तरवर्ती जीवन में पूरे किए थे. वे कदाचित उसके जीवन के हताशा भरे दिन थे. उसे लगने लगा था कि ‘रिपब्लिक’ के सपने को यथार्थ में साकार कर पाना सहज नहीं है. तो भी उसका ‘शुभ’ की अनिवार्यता तथा आदर्शों से मोह भंग नहीं हुआ था. अतएव अपने अंतिम दिनों की कृति ‘लॉज’ में वह उन व्यवस्थाओं की परिकल्पना करता है, जिनके द्वारा उस सपने को साकार किया जा सकता है. ‘रिपब्लिक’ की मुख्य स्थापना थी कि राज्य का मुखिया किसी दार्शनिक को होना चाहिए. वही चुनौतीपूर्ण स्थितियों में दृढ़ निश्चय लेकर राज्य का कल्याण कर सकता है. दार्शनिक सम्राट का प्रयोग प्लेटो से पहले भी यूनान के नगरराज्यों में हो चुका था. नगरराज्यों में विकास हेतु योजनाएं बनाने तथा शासन हेतु आचारसंहिता तैयार करने का दायित्व प्रायः दार्शनिकविचारक ही संभालते थे. लंबे अनुभव के आधार पर वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि दुर्बलताओं से बाहर निकालने के लिए व्यक्ति के स्वभाव में आमूल परिवर्तन अनिवार्य है. जाहिर है, मार्क्स की भांति प्लेटो भी दुनिया को समझने नहीं, बदलने में विश्वास करता था. यही कारण है कि वह सहस्राब्दियों से दार्शनिक विचारकों को प्रभावित करने में सक्षम रहा है.

राजनीतिक दर्शन को समर्पित प्लेटो की महान रचना ‘रिपब्लिक’ न तो किसी विशिष्ट राजनीतिक दर्शन की स्थापना करती है, न ही किसी खास राजनीतिक विचारधारा का पक्ष लेती है. उसकी स्थापनाएं यूनान के किसी भी नगरराज्य के बारे में सच हो सकती थीं. इसलिए कि वह किसी विशेष राजनीतिक प्रणाली पर जोर देने के बजाय समाज में आदर्शों की स्थापना पर जोर देता था. चूंकि आदर्श की स्थापना परोक्षतः न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना ही है, इसलिए इस ग्रंथ में वह न्याय को विभिन्न कोणों से परिभाषित करने का प्रयास करता है. न्याय की उसकी अवधारणा भी तत्संबंधी आधुनिक विचारधाराओं से भिन्न है. ‘जस्टिस’ के माध्यम से एक भयमुक्त, अपराधमुक्त, न्यायाधारित समाज की स्थापना का पक्ष लेने के बजाय वह नागरिकों में कर्तव्यबोध पैदा करने पर ज्यादा जोर देता है. उसकी निगाह में न्याय का अभिप्राय व्यक्ति और समाज के आचरण की स्वयंस्फूर्त पवित्रता से है. ‘न्याय’ हालांकि अपने आप में एक जटिल अवधारणा है. इसका संबंध व्यक्ति मात्र के सदाचरण तथा समाज में अनुशासन बनाए रखने से होता है. ‘रिपब्लिक’ के पहले खंड में प्लेटो ने सुकरात को अपने साथियों के साथ ‘न्याय’ की अवधारणा पर विस्तार से चर्चा करते हुए दर्शाया है. उस चर्चा के माध्यम से ‘न्याय’ की मुख्यतः चार परिभाषाएं हमें प्राप्त होती हैं. मगर उनमें से एक भी परिभाषा ऐसी नहीं है, जिसे सर्वमान्य और सर्वकालिक माना जा सके.

प्लेटो के अनुसार न्याय का उद्देश्य सार्वकालिकसार्वत्रिक शुभ और सर्वश्रेष्ठ न्यायिकराजनीतिक शासन की स्थापना करना है. वह न्याय के दो स्वरूप मानता है. पहला राज्य की कार्यप्रणाली के माध्यम से सामने आता है. जिसके द्वारा निहित स्वार्थ तथा कर्तव्यों के निष्पादन के लिए राज्य विभिन्न संस्थाओं का गठन करता है. न्याय का दूसरा चेहरा उसके नागरिकों के आचरण में दिखाई पड़ता है. उसे लोगों के साहस, कर्तव्यों के प्रति उत्साहभाव, नैतिक व्यवहार आदि के माध्यम से जाना जा सकता है. प्लेटो की मान्यता थी कि व्यक्ति की अपेक्षा बड़े तंत्र, जैसे राज्य के व्यवहार में न्याय की पहचान अपेक्षाकृत आसानी से की जा सकती है. लेकिन यदि प्रत्येक नागरिक न्याय की ओर से उदासीन हो जाए तो न्याय के राज्य का कोई अर्थ नहीं रह जाता. ऐसे में प्रत्येक व्यक्ति को मनमानी करने का अवसर मिल जाता है. इसलिए व्यक्तिमात्र का कर्तव्य है कि वह समाज को उस रूप में व्यवस्थित करने के बारे में सोचे और सहयोग करे जिस प्रकार वह स्वयं को व्यवस्थित करना चाहता है. किसी प्रकार के संदेह की गुंजाइश न रहे, इसके लिए वह न्याय को ऐसे चरित्रिक लक्षण के रूप में देखना चाहता है जिसकी व्याप्ति व्यक्ति और समाज दोनों जगह समानरूप से हो. चूंकि समाज सदैव दो से बड़ा होता है. अतः बड़ा होने के कारण समाज में न्याय की मौजूदगी उसी अनुपात में अधिक होनी चाहिए. सहजीवन और कठोर अनुशासित जीवनशैली के समर्थक प्लेटो का यह तर्क अजीब लग सकता है. परंतु इस बात में कोई संदेह नहीं कि वह राजनीतिक सत्ता को अधिक न्यायोन्मुखी, उदार, कर्तव्यपरायण और दायित्वभावना से युक्त देखना चाहता था. वह चाहता था कि प्रत्येक व्यक्ति यह सोचे कि—‘अपने समाज और राज्य की बेहतरी के लिए मैं क्या कर सकता हूं?’ ‘उसके प्रति मेरा कर्तव्य और जिम्मेदारियां क्या हैं?’ इसे कर्तव्यबोध कहें अथवा नागरिकबोध, प्लेटो के मन में ऐसा विचार यूनानवासियों, विशेषकर वहां के अभिजात्यवर्ग के चारित्रिक पतन की प्रतिक्रियास्वरूप उपजा था. परोक्ष रूप में समाज को बेहतर बनाने की चिंता ही ‘रिपब्लिक’ का प्रतिपाद्य विषय है, जो कभी ‘न्याय’ की लोकोन्मुखी अवधारणा और कभी ‘आदर्श राज्य’ की परिकल्पना के रूप में सामने आती है. उसकी निगाह में आदर्श राज्य की स्थापना तब तक असंभव है, जब तक वहां के नागरिक और शीर्षस्थ वर्ग के लोग ‘शुभत्व’ से भलीभांति परिचित न हों. ‘शुभत्व’ की संकल्पना सुकरात की देन थी, जिसको पाने की अभिलाषा प्लेटो के पूरे साहित्य में व्याप्त है. यही उसका आकर्षण है.

प्लेटो को पढ़ते हुए मार्क्स की याद आना स्वाभाविक है. दोनों ही भौतिकवादी थे. दोनों का ही मानना था कि कोई मनुष्य अपने आप में पूर्ण नहीं है. मानवमात्र की यही अपूर्णता सामाजिक गठन को अपरिहार्य बनाती है. परंतु एक सीमा के बाद मनुष्य और समाज के रिश्ते जटिल होने लगते हैं. उन्हें नियंत्रित करना अकेले समाज के लिए संभव नहीं होता. ऐसे में राज्य की अहमियत बढ़ जाती है. राज्य न केवल मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आवश्यक संसाधन जुटाने के लिए नीतियां बनाता है, अपति कल्याण के बंटवारे के लिए भी उसकी भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है. मनुष्य की भोजन, वस्त्र, आवास आदि ऐसी अनेक आवश्यकताएं हैं, जिन्हें उसकी मूलभूत आवश्यकताएं माना जाता है. इनके बगैर जीवन असंभव है. कुछ आवश्यकताएं विकास की देन होती हैं—जैसे सड़क, औजार, मशीनें, बिजली के उपकरण, यातायात के साधन इत्यादि. मनुष्य की सामान्य इच्छा होती है कि उसके जीवन में दूसरों का हस्तक्षेप न हो. सुरक्षा का पक्का भरोसा हो. यह काम मनुष्य आपस में एकदूसरे के साथ सहयोग करते हुए भी कर सकता है. अक्सर करता भी है. यह कार्य वह दूसरों के हितों को देखते हुए, राज्य और समाज के प्रति अपने कर्तव्य मानकर करे, यही सच्चा न्यायबोध है. यही वह ज्ञान है जिसके भरोसे राज्य के हस्तक्षेप अथवा उसकी नीतियों से स्वतंत्र रहकर भी मनुष्य अपना विकास कर सकता है.

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

10. जिस समाज में धार्मिक आग्रह प्रबल हों, वहां तानाशाही भी मूल्य मान ली जाती है. धर्म स्वयं तानाशाही प्रवृत्ति रखता है. ऐसे समाजों में या तो पुरोहित की मर्जी चलती है, अथवा उसके देवता की. उनपर सवाल उठाना उदंडता समझा जाता है. यहां तक कि यदि कोई शंबूक ज्ञान की चाहत में पढ़नालिखना भी चाहे तो उसे मृत्युदंड देना धर्मरक्षा मान लिया जाता है. धार्मिक संस्थाएं कितनी पूर्वाग्रह ग्रस्त होती हैं, इसके अनेक उदाहरण हैं. उनकी खूबी है कि वे लोगों के दिलोदिमाग में ज्ञानपिपासा जगाने के बजाय उसे अनुकूलित करने का काम करती हैं. विज्ञान हो या साहित्य अथवा कोई ऐतिहासिक प्रसंग हो, वे उन सभी की व्याख्या अपने स्वार्थ के अनुसार करती हैं. ऐसा ही एक उदाहरण मध्यकाल में रहीम को लेकर है. रहीम अकबर के सेनापति, बड़े कवि थे. उनकी दानशीलता के भी बड़े किस्से प्रचलित हैं. एक किस्सा गंग कवि को लेकर है, जो स्वयं अकबर के दरबारी कवि थे. कहते हैं कि गंग कवि ने रहीम की विनत दानशीलता से प्रभावित होकर एक दोहा लिखकर भेजा—

सीखे कहाँ नवाब जू, ऐसी दैनी दैन.

ज्योंज्यों कर ऊँचौं कियौं, त्योंत्यों नीचे नैन.

खानखाना ने उसका प्रत्युत्तर वैसी ही विनम्रता और कविकौशल के साथ दिया—

देनहार कोउ और है, देत रहत दिनरैन.

लोग भरम हम पै करें, तासों नीचे नैन.’

हम रहीम के दोहे में आए ‘देनहार’ शब्द पर चर्चा करेंगे. हालांकि यह कोई नया शब्द नहीं है. ‘दाता’ शब्द का उपयोग इसके पर्याय के रूप में हमेशा होता आया है. चूंकि दानकर्म को धर्म से जोड़ा जाता रहा है, इसलिए बिना एक पल गंवाए इसका अर्थ ‘ईश्वर’ या अल्लाह’ मान लिया जाता है. हमारे आस्थावादी दिमाग को यह न तो असंगत लगता है, न ही अनुचित. इसी के साथ रहीम और हर्ष जैसे दानदाताओं की उदारता का विराट आभामंडल हमारे मस्तिष्क में बनने लगता है. अब दान दो प्रकार से दिया जाता है. अपनी कमाई से देना. जैसे कोई गरीब धर्म के नाम पर मंदिरमस्जिद या पीरऔलिया की दरगाह पर देता है. दूसरा राजामहाराजा, जो जनता से खुशीखुशी, जबरन उगाए गए या लूटे हुए धन को दान के नाम बांटकर समाज के शीर्षस्थ वर्गों की ‘वाहवाह’ लूटते रहते थे. दोनों हालात में असल देनदार जनता है. किसान खेत में हल चलता है, मजदूर कारखानों में पसीना बहता है, उन्हीं की कमाई राजा से राजा का खजाना भरता है. राजा उसके एक हिस्से को दान के रूप में लौटाकर यशप्रतिष्ठा अर्जित करता है—यह हकीकत भूले से भी हमारे दिमाग में नहीं आती. अंधआस्था हमारे विवेक को हर लेती है. नतीजा यह होता है कि हम धर्म और ईश्वर के नाम पर सत्ताओं के प्रत्येक धत्त्कर्म को पचाते चले जाते हैं. तो क्यों न यह मान लिया जाए कि रहीम जैसे संवेदनशील कवि की गर्दन यह जानने के कारण नीची थी कि जिस धन को वे दान में लुटा रहे हैं, वह उनका नहीं उनकी प्रजा के गाढ़े पसीने की कमाई का है.

11. ‘One should think it of greater importance than anything else that the affairs of polis are conducted well is the best means to success: everything depends on this, and if this is preserved, everything is preserved and if this is destroyed everything is destroyed’.-Democritus.

12. अर्नेस्ट बार्कर, यूनानी राजनीतिकसिद्धांत, पृष्ठ—140, अनुवाद विश्वप्रकाश गुप्त.

13. पाश्चात्य राजनीतिक विचारों का इतिहास, डॉ. प्रभुदत्त शर्मा से उद्धृत.

14. This world, which is the same for all, no one of gods or men has made; but it was ever, is now,and ever shall be an ever-living Fire, with measures kindling and measures going out.from BERTRAND RUSSELL, A HISTORY OF WESTERN PHILOSOPHY And Its Connection with Political and Social Circumstances from the Earliest Times to the Present Day.

15. ‘War….is the father of all and the king of all; and some he has made gods and some men, some bond and some free…We must know that war is common to all and strife is justice, and that all things come into being and pass away through strife.’-Heraclitus, quoted by BERTRAND RUSSELL, A HISTORY OF WESTERN PHILOSOPHY.

16. यूनानी राजनीतिक विचारधारा, टी. . सिनक्लेयर, अनुवाद विष्णुदत्त मिश्र.

न्याय की पाश्चात्य अवधारणा—तीन

सामान्य

‘रिपब्लिक’ के चौथे खंड में सूत्रधार की भूमिका ग्लाकॉन और एडीमेंटस संभालते हैं. पहले खंड में जहां न्याय क्या नहीं है, जानने का प्रयत्न किया गया है, चौथे खंड में प्लेटो ‘न्याय क्या है’ यह बताने की कोशिश करता है. शुरुआत करते हुए ग्लाकॉन ‘शुभत्व’ को तीन हिस्सों में परिभाषित करता है. आंतरिक, जैसे कि सुख, आनंद, वस्तुनिष्ठ जैसे कि सुख-सुविधा के संसाधन, धन जिससे सुख-समृद्धि बटोरी जा सकती है. तीसरा आंतरिक और वस्तुनिष्ठ जैसे कि स्वास्थ्य. तीनों में से एक का भी अभाव मनुष्य को अपूर्णता का एहसास कराता है. ग्लाकॉन द्वारा यह पूछने पर कि तीनों में से कौन-सा शुभत्व न्याय है, सुकरात तीसरे का समर्थन करता है. सुकरात मानता है कि उससे न्याय को समग्रता में परखा जाता है. लेकिन वह अपने निर्णय के समर्थन में पर्याप्त तर्क देने में असमर्थ रहता है. ग्लाकॉन न्याय संबंधी अपनी अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहता है कि न्याय दूसरों को हानि पहुंचाने तथा जरूरतमंद की मदद के बीच संतुलन हेतु व्यक्तिमात्र की अपने प्रति प्रतिबद्धता है. ऐसा करते हुए वह स्वयं को समाज के प्रति उत्तरदायी बनाने का काम करता है. स्वार्थपरकता न्याय की राह में सबसे बड़ी बाधा है. वह व्यक्ति को व्यक्ति और समाज दोनों के प्रति गैर-जिम्मेदार बनाती है. मानव की स्वाभाविक कमजोरियों लालच, स्वार्थ आदि को स्वीकारते हुए ग्लाकॉन न्याय को उनसे दूर रहने तथा अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान बनाए रखने वाली प्रेरणाशक्ति के रूप में स्वीकारता है. उसके अनुसार न्यायशील व्यक्ति का अपने और समाज के प्रति ईमानदार रहना आवश्यक है. यदि ऐसा नहीं है. यदि कोई व्यक्ति यह भ्रम रखते हुए कि केवल वही न्याय के पथ पर है, दूसरों की आलोचना करता है तथा उनपर अपना स्वार्थ थोपने का प्रयास करता है. तो ऐसे कथित न्यायशील व्यक्ति की अपेक्षा अन्याय का समर्थन करना उचित है. उसके अनुसार न्याय की एकमात्र कसौटी वृहद सामाजिक हित में है.

ग्लाकॉन के अनुसार न्याय कृत्रिम चीज, रूढ़ियों की उपज है. इसके लिए उसके तर्क अपने साथियों से थोड़ा हटकर हैं. वह कहता है कि प्राकृतिक अवस्था में लोग अन्याय करते और सहते हैं. लेकिन अन्याय की मात्रा व्यक्ति की शक्ति पर निर्भर करती है. जो अधिक शक्तिशाली है, वह तदानुरूप अधिक अन्याय करने में सक्षम होता है. इसलिए जब कमजोर यह देखते हैं कि वे उतना अन्याय करने में अक्षम हैं, जितना उन्हें सहना पड़ता है, तब वे संगठन के विवश होते हैं. इस तरह न्याय सबल की नहीं, दुर्बल की आवश्यकता और इच्छा का परिणाम बन जाता है. उसके माध्यम से वह अपने से शक्तिशाली के व्यवहार को नियंत्रित करने का सपना देख सकता है. एक संविदा के तहत, जिसका आधार धर्म भी हो सकता है और संविधान भी, वे एक-दूसरे के प्रति अत्याचार न करने, न ही सहने के लिए वचनबद्ध होते हैं. धीरे-धीरे वह संविदा कानून का रूप ग्रहण कर लेती है. लेकिन मानव-प्रवृत्ति हमेशा एक जैसी नहीं रहती. जब उसको लगता है कि किसी कानून या बल के आधार पर उसे नियंत्रित करने की तैयारी हो रही है, तो वह विरोध पर उतर आता है. परिणामस्वरूप समाज में जिसका गठन सहअस्तित्व की भावना के साथ हुआ था, कुछ लोग बल की भाषा बोलने-समझने लगते हैं. इससे समाज के वर्ग के भीतर भय उमड़ने लगता है. उसी से न्याय की उत्पत्ति होती है. ग्लाकॉन के अनुसार, ‘न्याय सबसे अच्छे और सबसे बुरे के बीच का रास्ता, एक समझौता है. सर्वोत्तम यह है कि मनुष्य अन्याय से दूर रहे, ताकि दंड से बचा रहे और सबसे बुरा यह है कि अन्याय सहे और बदला न ले सके.’ निर्बल सबल से बदला कैसे ले सकता है? वह जानता है कि वह अकेला शक्तिशाली का सामना नहीं कर सकता. अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए वह अपने ही जैसे लोगों के साथ समझौते को बाध्य होता है. चूंकि समाज में कमजोरों की संख्या अधिक होती है, इसलिए बहुसंख्यक वर्ग की सम्मिलित शक्ति अल्पसंख्यक शक्तिशाली वर्ग से अधिक हो जाती है. शक्तिशाली वर्ग इस सत्य को भली-भांति समझता है. इसलिए वह निरंतर इस प्रयास में रहता है कि शक्ति-विपन्न वर्गों में फूट डालकर उन्हें एकजुट होने से रोक सके. अल्पसंख्यक शक्तिशाली समूहों की बहुसंख्यक शक्ति-विपन्न समूहों पर शासन करने की योग्यता, प्रायः इस बात पर निर्भर करती है कि वह उन्हें बांटे रखने में कितना सफल हो पाता है. धर्म, जाति, क्षेत्रीयता, रंग-भेद आदि ऐसे ही माध्यम हैं जो असल जिंदगी में अनुपयोगी होने के बावजूद बहुसंख्यक समाज को बांटे रखने में सहायक होते हैं.

थ्रेचाइमच्स ने ‘ताकतवर हमेशा सही’ कहते हुए न्याय को ‘शक्तिशाली का स्वार्थ’ माना है. जबकि गलाकॉन न्याय की उत्पत्ति भय से मानता है. दोनों न्याय तक पहुंचने के लिए धुर-विपरीत ध्रुवों से अपनी विचार-यात्रा की शुरुआत करते हैं. यह प्लेटो की विशिष्ट शैली है. इसके माध्यम से वह किसी दार्शनिक निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले अपने मंतव्य को प्रत्येक दृष्टिकोण से परख लेना चाहता है. ग्लाकॉन का विचार वृथा नहीं गया. मध्यकाल में हॉब्स जैसे विचारकों ने भी उसका समर्थन किया है. ग्लाकॉन के विचारों में हमें परंस्पर अंतर्विरोधी तत्व दिखाई पड़ते हैं. परंतु ये अंतर्विरोध अकेले  ग्लाकॉन के नहीं है. यह मनुष्य की प्रवृत्ति है कि वह आसन्न संकट पर विजय की क्षीण संभावनाएं देख समझौते पर उतर आता है. उसके लिए लिखित-अलिखित संविदा करता है. लेकिन धीरे-धीरे वह उस वातावरण से ऊबने लगता है. हालात अनुकूल देख के शक्तिशाली वर्गों की महत्त्वाकांक्षाएं पनपने लगती हैं. और वे उन शक्तियों की अवहेलना करने लगते हैं, जिन्होंने उनके अस्तित्व को संभव बनाया है. वे भी मानते हैं कि कि न्याय मनुष्य के अंतर्मन की वस्तु नहीं है. समाज उसका सृजन करता है और फिर राज्य-सत्ता के सहयोग द्वारा लागू करता है. समाज में न्यायी और अन्यायी दोनों प्रकार के लोग हो सकते हैं. लेकिन न्यायी और अन्यायी को तभी रेखांकित किया जा सकता है, जब समाज में बल-प्रयोग की शक्ति हो. ग्लाकॉन और हॉब्स दोनों इस तथ्य से करीब-करीब सहमत नजर आते हैं कि मनुष्य स्वाभाविक रूप से स्वार्थी होता है. साधारणतः वह स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ मानता है, और यह मानते हुए कि दूसरे उसके जितने श्रेष्ठ नहीं हैं, उसे अपनी श्रेष्ठता पर खतरा दिखाई पड़ता है. यह अंतर्विरोध या कि आत्मसंघर्ष मनुष्य को दूसरों से सहयोग और समझौते के लिए प्रेरित करता है. स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठतर सिद्ध करने की प्रवृत्ति मनुष्य की यशलिप्सा के रूप में प्रकट होती है. जाहिर है समाज में रहते हुए व्यक्ति को न केवल बाहरी बल्कि आंतरिक संघर्ष से भी गुजरना पड़ता है. यही द्वंद्व समाज में न्याय को प्रासंगिक बनाता है.

केफलस, पॉलीमार्क्स, थ्रेचाइमच्स और ग्लाकॉन सब न्याय को अपनी-अपनी तरह से परिभाषित करते हैं. उसके लिए वे अलग-अलग तर्क देते हैं. सुकरात को बीच में लाकर प्लेटो उनकी मान्यता के कमजोर पक्षों की ओर इशारा करता है. अलग-अलग दिखने वाले उन विचारों में प्लेटो को जो सामान्य बात नजर आती है, वह यह है कि चारों न्याय को बाहरी चीज मानते हैं. उनके अनुसार न्याय चूंकि बाहर की चीज है इसलिए किसी न किसी रूप में वे सभी मनुष्य की क्षमताओं, उसकी प्रवृत्तियों और संभावनाओं पर संदेह कर रहे होते हैं. चारों के दर्शन में प्लेटो को यही बात सर्वाधिक अखरती है. मन से कवि और विचारों से दार्शनिक प्लेटो मनुष्य और मनुष्यता में अपने विश्वास को कम नहीं होने देता. इसलिए वह यह सिद्ध करने में जुट जाता है कि न्याय बाहरी वस्तु न होकर मनुष्य के आंतरिक बल का परिचायक है. वह सिद्ध करने की कोशिश करता है कि न्याय न तो बाहरी सौगात है, न ही रूढ़ि न ही किसी अदृश्य सत्ता की ओर से उपहार. असल में वह मनुष्य की अपनी महिमा, उसका आंतरिक बल, ओज और तेज है. वह बताता है कि उसके साथी न्याय पर समग्रता से विचार करने के बजाय, उसके परिस्थितिगत लक्षणों पर विचार कर रहे हें. इसलिए न्याय को लेकर उनके विचार अधूरे और अपर्याप्त हैं. उसके अनुसार न्याय मानव प्रकृति की उच्चतम अवस्था है. समाज का अपना व्यक्तित्व होता है. सीमित संदर्भों में जहां न्याय मानव-मात्र की आंतरिक शुभता का परिणाम हैं, वहीं व्यापक संदर्भों में वह समाज की आंतरिक शुभता को भी दर्शाता है. इसकी विवेचना हेतु प्लेटो पुस्तक का उदाहरण देता है. मान लीजिए एक व्यक्ति के पास किसी पुस्तक की दो प्रतियां हैं. उनमें से एक बड़े अक्षरों में टाइप होने के कारण काफी मोटी है, दूसरी छोटे अक्षरों में, आकार में अपेक्षाकृत छोटी है. हालांकि दोनों प्रतियों की विषय-वस्तु में कोई अंतर नहीं है. फिर यदि किसी व्यक्ति को उन्हें पढ़ने को दिया जाए तो वह बड़े फांट की पुस्तक को पढ़ना पसंद करेगा. यही उसके लिए आसान भी होगा. भले ही बड़े अक्षरों वाली पुस्तक को लाना-ले-जाना उसके लिए कठिन हो. प्लेटो के अनुसार व्यक्तिगत न्याय और सामाजिक न्याय में यही अंतर है. दोनों मनुष्य की आंतरिक शुभता, उसके सदाचार और सद्गुणों की उत्पत्ति होता है. समाज में जाकर उसका रूप बड़ा हो जाता है. वह व्यक्ति से अधिक समाज को समझने पर जोर देता है. अपने दायरे के कुछ लोगों को वह दूसरों से अधिक जान पाता है तो इसलिए कि वे उसकी सामाजिकता के दायरे में हैं. आदर्श समाज में किसी नागरिक को जानने और समाज को जानने में अंतर नहीं होता. न्याय की इस विशेषता को समाज के प्रति सकारात्मक सोच और वृहद संदर्भों में ही परखा जा सकता है. इसके लिए प्लेटो स्पष्ट करता है कि कोई राज्य अपनी धन-संपदा या शक्ति के बल पर आदर्श नहीं बनता. आदर्श राज्य अपने नागरिकों के श्रेष्ठतम चरित्र से आकार लेता है.

चर्चा के अगले चरण में एडीमेंटस विमर्श में शामिल हो जाता है. न्याय की उसकी व्याख्या सामाजिक अनुभवों पर केंद्रित तथा आत्मपरक है. उसके अनुसार लोग अपने बच्चों को न्याय का समर्थन करना इसलिए नहीं सिखाते क्योंकि वह शुभता का प्रतीक है. बल्कि इसलिए सिखाते हैं कि बच्चे बड़े होकर उनका साथ दे सकें. प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि एडीमेंटस न्याय को पारिवारिक सुख तक सीमित रखकर, राज्य की उपेक्षा कर रहा है. लेकिन ऐडीमेंटस निरा परिवारवादी नहीं है. उसका समाज में भरोसा है. वह मानता है कि समाज कोई अमूर्त्त अवधारणा नहीं है. किसी भी व्यक्ति का समाज उसके आसपास के परिवेश से बनता है, जिसमें उसमें परिवार भी सम्मिलित होता है. इसलिए परिवार और परिवेश के प्रति निष्ठा प्रकारांतर में समाज के प्रति निष्ठा की परिचायक है. अतएव व्यक्ति को न्याय के प्रति अनुरक्त करने का सर्वात्तम रास्ता है कि उसके परिवेश में सुधार लाया जाए. ऐसे परिवेश का निर्माण किया जाए जिसमें उसे न्यूनतम अंतर्द्वंद्वों का सामना करना पड़े. समाज और सामाजिकता में विश्वास बनाए रखने का दायित्व व्यक्ति और समाज दोनों का है. ऐडीमेंटस आगे कहता है कि न्याय से लोगों को परचाने, उसके अनुपालन करने हेतु धार्मिक शिक्षा अपर्याप्त है. वह न्याय को राज्य एवं नागरिकों के बीच शुभता के आदान-प्रदान के रूप में प्रभावी करने के बजाए, उसे दैवीय बना देती है. धार्मिक व्यक्ति कहता है—यदि तुम दूसरों के साथ न्याय करोगे तो ईश्वर तुम्हारी मदद करेगा, तुम्हें उसका पारितोषिक देगा. और यदि तुम अन्याय करोगे तो ईश्वर की निगाह में दंड के भागी बनोगे. स्वर्ग-नर्क की अवधारणा, मोक्ष आदि न्याय के ऐसे ही भ्रांत स्वरूप हैं. ऐसे में व्यक्ति जो करता है, वह या तो डर के कारण, अथवा दूसरों के विवेक से अनुशासित होकर. कर्तव्य एवं न्याय-भावना को भुलाकर पूजापाठ, दान-पुण्य आदि के बहाने वह ईश्वर को खुश करने की कवायद में जुट जाता है. चूंकि ईश्वर का कोई अस्तित्व ही नहीं है, इसलिए धार्मिक व्यक्ति का न्यायबोध सिवाय भ्रांति के कुछ नहीं होता. यह भ्रांति न केवल उसके अपने लिए, बल्कि समाज के लिए भी हानिकारक है. इसके चलते ईश्वरीय न्याय को ही वास्तविक न्याय मानने का दावा करने वाले उसके नाम पर मनमानी करने में सफल हो जाते हैं. न्याय सामाजिक शुभता का दूसरा नाम है. अवास्तविक अथवा काल्पनिक पात्रों के सहारे समाज द्वारा उसकी सिद्धि असंभव है. न ही उसे भय फैलाकर प्राप्त किया जा सकता है. ईश्वर के नाम पर होने वाला न्याय पुरोहित तथा उसके चेले-चपाटों के बीच चढ़ावे की हिस्सेदारी में सिमटकर रह जाता है. धर्म को लेकर एंडीमेटस का दृष्टिकोण कई मायने में महत्त्वपूर्ण है. वह न्याय के बारे में आधुनिक विचारधाराओं से मेल खाता है. जान लॉक, रूसो, बैंथम, फायरबाख, कार्ल मार्क्स, से लेकर पीटर क्रोप्टोकिन तक सभी विचारक जीवन में धर्म के अतिरेकी विस्तार तथा उसे न्याय का पर्याय मानने वाली मानसिकता का विरोध करते आए हैं. इसी का प्रभाव है कि धर्म को आधुनिक राज्यों में नीति-निर्माण की प्रक्रिया से अलग-थलग कर दिया गया है.

वैसे भी धर्म और न्याय का कोई अंतःसंबंध नहीं है. आरंभ से ही धर्म अभिजन-हितों का समर्थक-साधक रहा है. इसके अनगिनत उदाहरण रोजमर्रा के जीवन में खोजे जा सकते हैं. महाभारत-युद्ध को प्रायः धर्म-युद्ध कहकर प्रचारित किया जाता है. युद्ध के प्रमुख सूत्रधार की भूमिका निभाता हुआ कृष्ण अठारह अक्षौहिणी सेना, जो उस समय विश्व की कुल जनसंख्या की एक-तिहाई थी, को एक-दूसरे से भिड़ाकर भगवान बन जाता है. उस युद्ध का प्राप्य क्या था? युधिष्ठिर को राज्य मिला. पर अठारह अक्षौहिणी सेना का हिस्सा बनकर लड़े सैनिकों या उनके परिजनों को क्या मिला? इसपर महाभारत या इतिहास की किसी पुस्तक में कोई उल्लेख नहीं है. आज भी इस पर कोई चर्चा नहीं करता. बस धर्म-युद्ध मानकर उसपर उठने वाले प्रत्येक सवाल पर पर्दा डाल दिया जाता है. युधिष्ठिर के धर्म-राज्य में प्रजा का क्या हाल था, पता नहीं. परंतु स्वयं महाभारत का संकेत है कि उस युद्ध ने एक परजीवी वर्ग को जन्म दिया था, जो इतना शक्तिशाली था कि नवनियुक्त सम्राट की आंखों के सामने किसी की भी हत्या कर सकता था. धर्मराज होने का दावा करने वाला युधिष्ठिर उसको देखकर भी चुप रहने को विवश था. यह उदाहरण महाभारत के शांतिपर्व से है—

‘कुरुक्षेत्र के महाभारत के बाद जब पांडव विजयी होकर लौटे तो प्रजा उनके स्वागत को उमड़ पड़ी थी. हजारों ब्राह्मण भी दान की अभिलाषा युधिष्ठिर को आशीर्वाद देने के नाम पर नगर-द्वार पर आ जुटे. जैसे ही युधिष्ठिर का रथ आता दिखाई पड़ा, प्रजा उसकी जय-जयकार करने लगी. नगर-द्वार पर जमा ब्राह्मण स्तुतिगान में लग गए. उस खुशनुमा माहौल में एक श्रमण साधुओं के बीच से अचानक निकला और युधिष्ठिर को देखकर कहने लगा—

‘हे युधिष्ठिर! तुमने अपने बंधुओं की हत्या की है. स्वजनों की हत्या और गुरुजनों का नरसंहार करके तुम्हें क्या मिला? तुम पापी हो. तुम्हें क्षोभ से मर जाना चाहिए.’

युधिष्ठिर स्तब्ध. लोगों को काटो तो खून नहीं. कुछ पलों के लिए ब्राह्मणों को भी मानो सांप सूंघ गया. अपराधबोध का मारा युधिष्ठिर सचमुच मर जाना चाहता था. अचानक ब्राह्मण दल को चेत हुआ. सारे के सारे ब्राह्मण एक-साथ चिल्लाने लगे—‘यह हमारा प्रतिनिधि नहीं है. हम ऐसा नहीं सोचते. यह पापी चार्वाक है. इस अधर्मी को जीने का कोई अधिकार नहीं है.’

यह कहकर सारे साधु उस श्रमण पर टूट पड़े. धर्मावतार युधिष्ठिर की आंखों के सामने उसे जीते-जी भस्म कर दिया गया.’

धर्म के नाम पर ऐसे ही अमानवीय न्याय का उदाहरण वेन की कहानी के रूप में आया है. पुराणों में वेन को विश्व का पहला निर्वाचित सम्राट बताया गया है. कहानी के अनुसार आर्यों ने जब कृषि की शुरुआत की और उसके लिए एक जगह टिककर रहना आरंभ किया तो सुरक्षा के लिए राजा चुनने का विचार सामने आया. ऐसा व्यक्ति जो जरूरत के समय उनका नेतृत्व कर सके. उस समय लोगों ने सर्वसम्मिति से वेन को अपना राजा निर्वाचित किया. वेन ने न्याय करते हुए जमीन का समुचित विभाजन किया. ब्राह्मण चूंकि शिक्षा का दायित्व संभाले हुए थे, उन्हें अनेक कर्मकांडों में लिप्त रहना पड़ता था, इसलिए उन्हें नदी किनारे की उपजाऊ जमीन दी गई. लोग खेती करने लगे. वेन के नेतृत्व में विश् तरक्की करने लगा. लेकिन खेती तो मौसम पर निर्भर थी. एक बार भयंकर अकाल पड़ा. पूरा विश् भूख की चपेट में आ गया. लोग तड़फ-तड़फकर मरने लगे. जब तक सुख देती थी, तब तक नई व्यवस्था लोगों को हितकारी लगती थी. मौसम की मार के साथ ही उसकी कमजोरी सामने आ गई. लोग वेन को दोष देने लगे. एक राजा का दायित्व निभाते हुए वेन ने विश् के लोगों की बैठक बुलाई. ब्राह्मणों को दी गई भूमि पर अब भी खेती हो रही थी. नदी किनारे होने का उसे लाभ मिला था. वेन उनसे आपद्धर्म के रूप में कृषि उपज को जरूरतमंदों के बीच बांटने का आग्रह किया. इसपर वे चिढ़ गए. लोगों को राजा के विरुद्ध भड़काने लगे. भूखे लोगों का दिलो-दिमाग सुन्न हो चुका था. आक्रोश जब सीमा पार कर गया तो भूखे से अकुलाए उग्र विश-वासियों ने राजा पर हमला कर दिया. इस तरह प्रथम निर्वाचत राजा अपने ही लोगों के हाथों मारा गया.

विमर्श के अगले चरण में प्लेटो इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि न्याय को उसकी लोकोन्मुखता तथा वृहद सामाजिक हितों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए. न कि उन व्यक्तियों के व्यवहार से जो न्याय प्रक्रिया में सम्मिलित होने की दावेदारी करते हैं. न्याय-संबंधी विमर्श में अनेक लोगों को सम्मिलित कर वह तत्कालीन समाज में प्रचलित न्याय के परंपरावादी, उग्रवादी एवं व्यवहारवादी स्वरूपों की समीक्षा करता है. अंततः उसका संवेदनशील कवि हृदय उसको आदर्शवाद के समर्थन में ले जाता है. सुकरात के माध्यम से वह स्पष्ट करता है कि न्याय मनुष्य की आंतरिक शुभता, उसका सदाचरण है—‘यदि कोई व्यक्ति अपने दायित्वों का समुचित वहन करता है, तो उसका आचरण ही उसकी न्याय-प्रियता का प्रमाण बन जाता है.’ वह मानता है कि न्याय प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में रहता है. मनुष्य द्वारा अपने कर्तव्य का समयानुसार पालन करना ही न्याय है. जाहिर है प्लेटो के लिए न्याय कोई सिद्धांत या विचारधारा न होकर आचरण की वस्तु है. क्या न्याय की शिक्षा दी जा सकती है? इसी से जुड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या शिक्षा व्यक्ति को अधिक न्यायशील बनाती है. प्लेटो शिक्षा की उपयोगिता से इन्कार नहीं करता. व्यक्तित्व विकास हेतु शिक्षा अनिवार्य है. तथापि उसके अनुसार शिक्षा साध्य नहीं है. वह केवल साधनमात्र है. उसका महत्त्व व्यक्ति को राज्य का योग्यतम सदस्य बनाने में मदद करना है. शिक्षा के अलावा अधिकार चेतना, जिसमें अपने साथ-साथ दूसरों के अधिकारों का बोध भी जरूरी है तथा कर्तव्य के प्रति जागरूकता और समर्पण का भाव व्यक्ति को श्रेष्ठ नागरिक बनाने में मदद करता है. ‘रिपब्लिक’ की शुरुआत वह व्यैक्तिक नैतिकता एवं न्याय-प्रिय व्यक्ति के न्याय-संगत जीवन की विशेषताओं से करता है, लेकिन आगे बढ़ते-बढ़ते स्थिति साफ होती जाती है. पता चलता है कि लेखक का उद्देश्य संपूर्ण समाज को न्याय एवं नैतिकता से बंधे हुए देखना है. वह मानता है कि न्याय समाज का विशिष्ट गुण है. यह गुण समाज में बाहर से नहीं आता. बल्कि उसके नागरिकगण अपने न्याय-संगत आचरण द्वारा उसे संभव बनाते हैं. न्याय तथा औचित्य अथवा अन्याय एवं अनौचित्य जिस प्रकार व्यक्ति के गुण-दोष हो सकते हैं, उसी प्रकार ये समाज के भी गुण-दोष हो सकते हैं. न्याय व्यक्ति एवं समाज को परस्पर अन्योन्याश्रित, पूरक एवं प्रेरक बनाता है.

आधुनिक विचारक जॉन रॉउल न्याय को सामाजिक संस्थाओं का विशेष लक्षण मानता है. उसके अनुसार—‘न्याय सामाजिक संस्थाओं का शुभत्व है. उसका वही महत्त्व है जो वैचारिक उद्यमों में सत्य का होता है.’8 प्लेटो के लिए न्याय एवं नैतिकता में कोई अंतर नहीं है. दोनों परस्पर पूरक और पर्याय हैं. आदर्श स्थिति वह है जब व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर न्याय में अंतर मिट जाता है. इसके लिए प्लेटो समाज को शासक, रक्षक और कृषक तीन हिस्सों में बांटता है. जैसे भारत में शूद्रों को वर्ण विभाजन में सबसे निचले स्तर पर रखा गया है और दासों को वर्ण विभाजन में स्थान ही नहीं दिया गया है, इसी प्रकार प्लेटो के आदर्श राज्य में भी दासों को कार्यविभाजन से बाहर रखा गया है. दोनों ही जगह उनकी स्थिति खरीदी गई वस्तु या संसाधन के समान है. बावजूद इसके दोनों में बड़ा अंतर है. प्लेटो का सिद्धांत पूरी तरह से सामाजिक जरूरतों और विकास के नजरिये पर आधारित है. वह किसी व्यक्ति को जन्म, लिंग अथवा उसकी पैत्रिक पहचान के आधार पर छोटा या बड़ा घोषित नहीं करता. व्यक्ति का चयन उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि से इतर, विशुद्ध योग्यता के आधार पर हो—इसके लिए वह बच्चों का पालन-पोषण सात वर्ष का होते ही—माता-पिता से दूर, उसकी पैत्रिक पहचान को छिपाकर करने की अनुशंसा करता है. ताकि बड़े होने पर उनमें जन्म के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव न किया जा सके. भारत में कार्यविभाजन इससे भिन्न था. वेदों, स्मृतियों तथा धर्म-सूत्रों में कार्यविभाजन के नाम पर समाज को चार वर्गां में बांटने का विधान रचा गया है. हालांकि दावा यह किया गया है कि वह विशुद्ध गुणों पर आधारित विभाजन हे और कोई मनुष्य अपने गुण एवं प्रतिभा के आधार पर वर्ग-अंतरण कर सकता है. परंतु वास्तविकता इससे अलग है. कर्म-गुण के आधार पर भारतीय समाज में वर्ग-अंतरण के उदाहरण इतने विरल हैं कि उन्हें अपवाद मानकर छोड़ा जा सकता है. भारतीय विशेषकर हिंदू समाज में जाति-व्यवस्था दास प्रथा की अपेक्षा कहीं अधिक निकृष्ट और भयावह थी. अपने स्वामी की अनुकंपा अथवा तय मूल्य-राशि का भुगतान करने के पश्चात दास अपनी स्वतंत्रता खरीद सकता था. जातिप्रथा में दबे शूद्रों को इस प्रकार के अवसर उपलब्ध न थे. जाति जन्म के साथ जीवन में प्रवेश करती और मरण तक देह और मन से चिपकी रहती थी. ‘रिपब्लिक’ में कार्य-विभाजन नीति-सम्मत है. प्लेटो व्यक्ति के गुण-दोष के अनुसार उसे उपयुक्त जिम्मेदारी सौंपने की सिफारिश करता है, ताकि उसकी योग्यता का समाज-हित में भरपूर इस्तेमाल किया जा सके. भारतीय, विशेषकर हिंदु समाज में जातीय विभाजन धर्म-सम्मत व्यवस्था है. जाति-व्यवस्था के लिए व्यक्ति की रुचि एवं योग्यता कोई मूल्य नहीं है. वह सबकुछ जन्म के आधार पर, बिना व्यक्ति की रुचि अथवा योग्यता देखे, काम सौंपने में विश्वास रखती है. इसलिए उसमें बदलाव सरल नहीं है. दूसरी ओर प्लेटो का कार्य-विभाजन अधिक वैज्ञानिक, निष्पक्ष और राज्य-कल्याण की भावना से भरा है.

‘रिपब्लिक’ मानवीय मेधा की अमूल्य धरोहर है. उसकी प्रशंसा करते हुए बार्कर ने लिखा है—न्याय रिपब्लिक की आधारशिला है. और रिपब्लिक न्याय की मूल अवधारणा का संस्थागत रूप है.’ ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो ने कहा है कि समाज के तीनों वर्गों को बिना एक-दूसरे के कार्य में व्यवधान उत्पन्न किए, काम करते रहना चाहिए. सब अपना-अपना कार्य मनोयोग से करेंगे तो सामाजिक शांति और सद्भाव बना रहेगा. राज्य आत्मनिर्भर बनेगा. अंतर्द्वंद्व घटेंगे और उनके समाधान में खप रही ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग लोककल्याण के निमित्त संभव हो सकेगा. सेबाइन ने प्लेटो के न्याय-सिद्धांत को सामाजिक न्याय के लिए आवश्यक माना है. उसके अनुसार—‘न्याय वह बंधन है जो मानव-समाज को एकता के सूत्र में पिरोता है. यह उन व्यक्तियों के सहयोग और समन्वय का नाम है जो अपनी शिक्षा-दीक्षा, योग्यता एवं रुचि के अनुसार अपने कर्तव्य का चयन करते हैं और फिर अपनी संपूर्ण निष्ठा से उसके अनुपालन में लगे रहते हैं. अपनी निष्ठा एवं समर्पण भावना से वे समाज को संपूर्ण एवं आत्मनिर्भर बनाते हैं. ऐसा समाज जो संपूर्ण मानव-मनस् की रचना हो, जिसमें हर कोई अपना प्रतिबिंब देख सके. सामाजिक जीवन के ऐसे ही मूलभूत, उदात्त रूप को प्लेटो ने न्याय की संज्ञा दी है. आचरण की शुभता पर जोर देते हुए वह ऐसे आदर्श समाज की परिकल्पना करता है, जिसमें मानव-व्यक्तित्व की उठान सामाजिक शुभता के परम-बिदु को छूने लगती हे. लक्ष्य आसान नहीं है. परंतु निजता को सर्वकल्याण को समर्पित करने के बाद मनुष्य उस अवस्था को प्राप्त कर सकता है.

प्लेटो न्याय और ज्ञान को परस्पर पूरक मानता है. उसके अनुसार ज्ञान मनुष्य को न्याय की पहचान कराता है. ज्ञान ही एकमात्र ऐसा उपकरण है जिससे मनुष्य शुभ-अशुभ, अच्छे-बुरे का बोध कराता है. ज्ञान न्याय की पूर्वापेक्षा और अनिवार्यता है. इसलिए ज्ञान एकमात्र शुभ है. सुकरात के माध्यम से प्लेटो द्वारा न्याय की खोज का सिलसिला आदर्श समाज की अवधारणा तक बढ़ जाता है. प्लेटो ने साहित्य की महत्त्वपूर्ण विधाओं, नाटक, कविता आदि की आलोचना की थी. वह उन्हें लोकरंजन के माध्यम से अधिक मानने को तैयार न था. नाटक एवं कविता को तो वह मानव-चरित्र को दुर्बल बनाने वाली विधाएं मानता था. लेकिन उसके दर्शन में कवि मन की संवेदनशीलता साफ-साफ झलकती है. ‘रिपब्लिक’ में न्याय की खोज का सिलसिला, संवेदनशील मन की कविता जैसा है, जिसे उसकी विद्वता महत्त्वपूर्ण बना देती है. प्लेटो की न्याय-संबंधी अवधारणा के कई बिंदू विचारणीय है. उनमें कुछ ऐसे भी हैं जिनसे उसकी कुंठा जाहिर होती है. ध्यातव्य है कि प्लेटो का संबंध एथेंस के शासक परिवार से था. वह स्वयं को एथेंस की सत्ता की सत्ता के प्रमुख दावेदारों में से एक मानता था. लेकिन सुकरात को मृत्युदंड दिए जाने के बाद से तत्कालीन राजनीति से उसका जी उचट गया था. प्लेटो से पहले यूनानी समाज में कोई खास कार्यविभाजन न था. न ही कार्य-विशेष के प्रति व्यक्ति की रुचि का कोई महत्त्व था. इसलिए माना जाता था कि कोई भी व्यक्ति कुछ भी कार्य कर सकता है. इसी धारणा के चलते एथेंस में गणतांत्रिक पदों पर नियुक्तियां लॉटरी के माध्यम से की जाती थीं. इसके चलते कई बार कार्य-विशेष के लिए अयोग्य व्यक्ति चुन लिए जाते थे. इस अविवेकी व्यवस्था ने एथेंस का गणतंत्र अयोग्य हाथों की कठपुतली बना हुआ था. सुकरात ने उस पर चोट की थी. खुद को गणतंत्र का समर्थक मानने वाले एथेंस की यह सबसे बड़ी त्रासदी थी. प्लेटो की आदर्श राज्य की परिकल्पना उसकी इसी छटपटाहट का सुफल कही जा सकती है. न्याय की विवेचना के रूप में यही छटपटाहट आदर्श राज्य की कल्पना में भी दिखाई पड़ती है. वह ऐसे राज्य की कल्पना पेश करता है, जहां लोग बजाए स्वार्थ-भाव के सर्वोदय भाव से जुड़े हों. जिनमें पारस्परिक कल्याण के प्रति एका और विश्वास हो. वह स्पष्ट करता है कि न्याय आदर्शोन्मुखी समाज की सहज-स्वाभाविक उपलब्धि है. वह कृत्रिम अथवा बाहरी शक्ति द्वारा थोपी गई व्यवस्था नहीं है. किसी भी समाज में न्याय का संरक्षण किसी भय या दबाव में न होकर उसके स्वयं स्फूर्त्त प्रयासों के माध्यम से होता हे. वह इसलिए भी आवश्यक है कि न्याय का कोई दूसरा या तीसरा पक्ष नहीं होता. न्याय या तो न्याय होता है, अथवा न्याय नहीं होता. उसे केवल वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में ही समझा जा सकता है. उसके लिए आवश्यक है कि समाज की इकाइयों में परस्पर सामंजस्य और एक-दूसरे के प्रति विश्वास का भाव हो.

‘रिपब्लिक’ के लिए प्लेटो को अपूर्व ख्याति प्राप्त हुई है. उसे ‘दार्शनिकों का दार्शनिक’ माना गया है. यह माना गया है कि जो प्लेटो के यहां नहीं है, दर्शन में वह कहीं भी नहीं है. बावजूद इसके प्लेटो को आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा है. कुछ विद्वानों ने उसके न्याय-संबंधी दर्शन को निष्क्रियता का दर्शन माना है. उनका कहना है कि प्लेटो का न्याय कल्पना की उड़ान, खूबसूरत सपने से अधिक कुछ नहीं है. न्याय को लेकर वह जो सपना देखता है, उसका सच हो पाना असंभव है. प्लेटो की भांति उसका न्याय भी इतना आत्मसंयमी और मर्यादित है कि उसे व्यवहार में उतार पाना बेहद कठिन है. बार्कर तो प्लेटो के न्याय को न्याय मानने के लिए ही तैयार नहीं है. उसके अनुसार प्लेटो का न्याय महज भावना या कवि मन की खूबसूरत परिकल्पना है. उसके अनुसार प्लेटो का न्याय-सिद्धांत एकतरफा है. वह केवल मनुष्य के कर्तव्यों को निर्धारित करता है और अधिकारों को तय करने का काम पूरी तरह समाज की मर्जी पर थोप देता है. यदि समाज सचमुच इतना ही उदार हो, जैसा कि प्लेटो सोचता है तो ऐसे समाज में न्याय का औचित्य ही समाप्त हो जाता है. वस्तुतः ईसापूर्व चौथी-पांचवीं शताब्दी के जिस समाज का जिक्र प्लेटो के ग्रंथों में मिलता है, उन दिनों यूनानी समाज युद्ध प्रिय समाज था. वहां छोटे-छोटे नगर राज्य थे, जिनके बीच युद्ध अकसर होते रहते थे. एथेंस स्पार्टा के हाथों पराजित हो चुका था. वह पराजय भी एथेंसवासियों के लिए कुंठा का कारण बनी थी. एथेंस जहां अपने दार्शनिक विचारों, कवियों और सुंदरियों के लिए प्रसिद्ध था, उसके पड़ोसी नगर-राज्य स्पार्टा की प्रतिष्ठा वहां के बहादुर सैनिकों के कारण थी. एक युद्ध में स्पार्टा के हाथों भीषण पराजय के बाद एथेंसवासियों के मन में ‘उस जैसा’ बनने की बड़ी कामना थी. आदर्श गणराज्य के रूप में प्लेटो ऐसे ही गणतंत्र की कामना करता है. सेबाइन ने भी माना है कि प्लेटो की ‘न्याय-संबंधी कल्पना जड़, आत्मपरक, निष्क्रिय, ठहराव-युक्त, अव्यावहारिक एवं अविश्वसनीय है.’ ‘न्याय’ की बात करता हुआ प्लेटो कहीं-कहीं ‘अन्याय’ का पक्ष लेता हुआ नजर आता है; यदि यह मान लिया जाए कि व्यक्ति या समूह अपनी किसी खास प्रवृति का दास होता है तो भी उसे यह बताने की क्या आवश्यकता है कि प्रत्येक मनुष्य केवल एक ही कार्य करे. या केवल समाज द्वारा निर्दिष्ट कार्यों को ही करे.

दरअसल न्याय की विवेचना करते हुए प्लेटो विषय को इतना व्यापक कर देता है कि अन्याय और न्याय के बीच भेद कर पाना असंभव-सा हो जाता है. इससे उसके विचारों में कहीं-कहीं असंगतियां और अंतर्विरोध भी दिखने लगता है. वह एक ओर तो दावा करता है कि आदर्श समाज में कोई व्यक्ति दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, दूसरी ओर राज्य को व्यक्ति के कर्तव्यों के निर्धारण का अधिकार देकर उसकी स्वतंत्रता छीन लेता है. प्लेटो के अनुसार समाज में संरक्षक वर्ग का कर्तव्य अपने बुद्धि-विवेक से समाज को अनुशासित और कर्तव्योन्मुखी बनाए रखना है, इसके लिए उन्हें व्यापक अधिकार प्राप्त होते हैं. लेकिन यदि ऐसे वर्ग का कोई व्यक्ति जो ‘संरक्षक’ या संरक्षक वर्ग से नहीं है, न ही उसकी योग्यता रखता है, जेसे दास, यदि ऐसा व्यक्ति बुद्धि-विवेक में ‘संरक्षक’ से आगे निकल जाता है, तो उसका क्या किया जाए? कैसे उसकी योग्यता का समाज के हित में उपयोग किया जाए? न्याय-भावना तो इसमें है कि ऐसे व्यक्ति को तत्काल संरक्षक वर्ग में सम्मिलित कर उसकी काबलियत का उपयोग लोक-हित में किया जाए. साथ ही संरक्षक वर्ग में सम्मिलित व्यक्ति जो बौद्धिक नेतृत्व करने में असमर्थ हैं, जो समाज-हित के बजाय जो केवल स्वार्थ को वरीयता देते हैं तथा नैतिक दृष्टि से भी पतनशील हैं—उचित होगा कि ऐसे दुराचारियों को पदावनत कर निचले वर्गों में ढकेल दिया जाए. समाज हित के लिए यह जरूरी भी है. प्लेटो उसकी कोई व्यवस्था नहीं करता. बजाए इसके वह दासप्रथा का समर्थन करता है और उसको बनाए रखने के लिए तर्क देता है. यहीं उसकी न्याय की अवधारणा ‘अन्याय’ में बदलती नजर आती है. चह दार्शनिक सम्राट को इतना अधिकार-संपन्न बना देता है कि वह निरंकुश नजर आने लगता है. कदाचित वह सोचता था कि जो ‘दार्शनिक सम्राट’ के लिए अपेक्षित स्तर को प्राप्त कर चुके व्यक्ति मनुष्य की सामान्य कमजोरियों से मुक्त होंगे. जबकि मानवीय प्रवृत्ति परिवर्तनशील है. ध्यातव्य है कि दासप्रथा का समर्थन करने वाला प्लेटो अकेला विचारक नहीं है, सुकरात, अरस्तु, जेनोफीन जैसे उसके समकालीन विचारक भी उससे सहमत हैं. दूसरे प्लेटो के आदर्श राज्य में जनसाधारण के लिए कोई स्थान नहीं है. उसका कवि-हृदय सपने की तरह केवल आदर्श बुनता है. नैतिकता चूंकि स्वयं एक आदर्श है, इसलिए उसके सपने की महत्ता से इंकार नहीं किया जा सकता.

प्लेटो ने स्वीकार किया था कि जन्म एवं शिक्षा में दूसरों से बेहतर होने के कारण संरक्षकों के बेटे-बेटियां समाज के शेष वर्गां की संतान की अपेक्षा लाभ की स्थिति में होंगे, जिससे समाज का शक्ति संतुलन एक वर्ग विशेष के पक्ष में खिसकता चला जाएगा. न्याय की व्याख्या के अगले चरण में वह ऐसे राज्य की परिकल्पना करता है जिसका संघटन पंरपरा अथवा किंचित आदर्शयुक्त पसंदों के आधार पर किया गया हो. आदर्श राज्य के रूप में प्लेटो की परिकल्पना में ऐसा राज्य था, जहां ‘न्याय’ कि सर्वत्र व्याप्ति हो. प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यपालन में तल्लीन रहता हो. वह प्रश्न उठाता है कि व्यक्ति के कर्तव्य को परिभाषित कैसे किया जाए? वह कौन-सा कार्य हो सकता है, जिसको करके कोई नागरिक आदर्श राज्य के निर्माण में अपना योगदान दे सकता है? प्राचीन यूनान, आमेर आदि राज्यों में पुत्र को वही कार्य करना पड़ता था, जो उसके पिता के लिए निर्धारित था. पीढ़ी-दर-पीढ़ी यही चलता रहता था. इस प्रणाली पर कभी कोई प्रश्न नहीं उठता था. मगर प्लेटो के राज्य में स्थिति दूसरी थी. ‘रिपब्लिक’ में उसने बच्चों का पालन-पोषण माता-पिता से दूर, इस प्रकार करने की अनुशंसा की है, जिसमें माता-पिता अथवा उनकी संतान एक-दूसरे को कभी पहचान ही सकें. उसके राज्य में व्यक्ति का कोई निजी अभिभावक नहीं था. वहां संबंधों के वर्ग थे, जिनके अनुसार पिता की उम्र के सभी व्यक्तियों को पिता का दर्जा प्राप्त था और पुत्र की उम्र के युवाओं को पुत्र का. यही स्थिति स्त्री के साथ थी. काम-संबंधों में पर्याप्त खुलापन था. प्लेटो ने विवाह संस्था का निषेध किया है. इसके दो कारण थे. पहला उसे लगता था कि पारिवारिक संबंध व्यक्ति के उद्देश्यों को सीमित बनाते हैं. दूसरा स्त्री को पुरुष के बराबर दर्जा देना. प्लेटो ने दांपत्य संबंधों में साम्यवाद का समर्थन किया है. एक-दूसरे की इच्छा पर कोई भी युगल परस्पर सहवास कर सकता था. संतानोपत्ति का मुख्य ध्येय युद्धप्रिय राज्य को श्रेष्ठ योद्धा उपलब्ध कराना था. संरक्षक स्त्री-पुरुषों के लिए नियम और भी कठोर थे. ‘रिपब्लिक’ में उसने लिखा है—

‘संरक्षक वर्ग के स्त्री-पुरुषों में से कोई भी अपना घर-परिवार नहीं बसाएगा. कोई भी किसी के साथ व्यक्तिगत रूप से सहवास नहीं करेगा. शासक स्त्रियां शासक वर्ग के सभी पुरुषों की समान रूप से पत्नियां होंगी. उनकी संतानें भी समान रूप से सभी की होंगी. न तो माता-पिता अपनी वास्तविक संतान के बारे में जान पाएंगे न ही संतान अपने वास्तविक जन्मदाता को जान सकेगी.’

ऐसी अवस्था में कार्यांतरण की प्राचीन यूनानी पद्धति वहां कारगर ही न थी. इसलिए व्यक्ति के कार्य का निर्धारण या तो राज्य की मर्जी से हो सकता था अथवा उसकी अपनी रुचि के आधार पर. परंतु वह भी आसान न था. यदि सबकुछ व्यक्ति की इच्छा पर छोड़ दिया जाए तो जो कार्य बहुत श्रम की अपेक्षा रखते हैं, जो बेहद हानिकर हैं, या जिनमें अप्रीतिकर हालात का सामना करना पड़ता है, उनका क्या होगा? बिना किसी प्रलोभन अथवा दबाव के समाज के लिए अनिवार्य होने के बावजूद, ऐसे कार्यों को भला कौन करना चाहेगा! चूंकि लोकहित के कार्यों को टाला नहीं जा सकता, बल्कि कुछ कार्य तो अत्यावश्यक, नैमत्तिक महत्त्व के होते हैं, स्पष्ट है कि ऐसे कार्यों के लिए सरकार को अलग से व्यवस्था करनी होगी.

प्लेटो स्वीकार करता है कि आदर्श राष्ट्र-राज्य में यह दायित्व सरकार को खुद संभालना चाहिए. परंतु कैसे? लोग अप्रीतिकर कार्यों को भी समाज के प्रति अपना दायित्व मानकर करें, यह प्लेटो के समक्ष बड़ी चुनौती थी. ऐसे कार्यों को करने के लिए कोई तो नियुक्त किया जाएगा. जिसे वे कार्य सौंपे जाएंगे, क्या वह उन्हें खुशी-खुशी करने को तैयार होगा? यदि नहीं जो जिसे वे कार्य बलपूर्वक सौंपे जाएंगे क्या वह उसके प्रति अन्याय नहीं होगा? क्या उसे राज्य की मनमानी नहीं माना जाएगा? विकसित देशों में मशीनीकरण के बाद से अप्रीतिकर अथवा खतरे की अधिक संभावना वाले कार्यों को मशीनों से लिया जाने लगा है. लेकिन प्लेटो के समय में ऐसे कार्यों को करने के लिए केवल दास थे. उनकी उपस्थिति राज्य की सुख-समृद्धि के लिए आवश्यक थी. परंतु जिनके अधिकारों की ओर किसी का ध्यान न था. उन्हें संपत्ति के अधिकार से वंचित रखा जाता था. राजनीति में उनकी कोई हिस्सेदारी न थी. दूसरी ओर एथेंस का हर वयस्क आम सभा का सदस्य होता था. बुद्धकालीन गणतंत्रों में भी एक समय ऐसा था, जब वहां का प्रत्येक नागरिक ‘मैं राजा हूं’, ‘मैं राजा हूं’ कहकर शासक होने का दावा करता था. सोफिस्टों के कार्यकाल में एथेंस का भी यही हाल था. ऐसे समाज में जहां प्रत्येक आदमी खुद को ‘मुखिया’ समझता हो, वहां नागरिकों को व्यक्तिगत एवं सामाजिक नैतिकता के प्रचार द्वारा प्रेरित किया जा सकता था. उसके लिए प्लेटो की सारी उम्मीद दार्शनिक सम्राट पर टिकी थी. उसका मानना था कि दार्शनिक सम्राट किसी भी प्रकार के लालच से परे, परमबुद्धिमान, व्यवहारकुशल, परम-प्रज्ञावान, वीर, तेजस्वी और परिश्रमी होंगे. लोग स्वयं उससे प्रेरणा ले सकेंगे. लेकिन महामानव की खोज आसान नहीं थी. इस बात को प्लेटो भी समझता था. ऐसी अवस्था में उसने दार्शनिकों के समूह को राज्य की बागडोर सौंपने की अनुशंसा की है. मुश्किल यह है कि केवल विचार के बल पर समाज नहीं चलता. विकास की गति को बनाए रखने के लिए नए आविष्कारों की भी जरूरत पड़ती है. राज्य में उत्पादन वृद्धि और तकनीकी शोध के लिए दार्शनिक सम्राट का क्या योगदान होगा? प्लेटो इस बारे में कोई सुझाव नहीं देता. न ही उसकी कल्पनाशीलता काम करती है. इसका कारण दास के रूप में उपलब्ध अतिरिक्त और सस्ता श्रम भी हो सकता है.

प्लेटो का न्याय-दर्शन एथेंस की राजनीति से प्रभावित था. एथेंसवासियों को गर्व था कि वे एक विकसित गणतंत्र के संचालक हैं. जबकि असल में वह भीड़तंत्र द्वारा शासित राज्य था. उसमें तीन प्रमुख दोष थे. पहला यह कि राजनीतिक अनुभवहीनता और अपर्याप्त ज्ञान के बावजूद एथेंस का प्रत्येक नागरिक राजनीति में हिस्सा लेता था. उससे गलत फैसले होते थे. सुकरात को मृत्युदंड का निर्णय ऐसा ही अनुचित निर्णय था. उस घटना के बाद प्लेटो का लोकतंत्र से विश्वास उठ-सा गया था. दूसरा दोष यह था कि प्रत्येक नागरिक खुद की निगाह में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण था. किसी का किसी में विश्वास न था. हर कोई अपने लिए अधिकतम सुख-सुविधाओं की अपेक्षा रखता था. भ्रष्टाचार और स्वार्थभाव चरम पर था. बिना इसकी चिंता किए कि उनके दुराचरण से राज्य का कितना अहित हो रहा है, एथेंस के नागरिक स्वार्थ-सिद्धि में लगे रहते थे. प्लेटो के आगे स्पार्टा का उदाहरण था, जहां के नागरिक राज्य को समर्पित थे. इसलिए उसने ‘रिपब्लिक’ में राज्य को व्यक्ति से बढ़कर माना है. वह व्यक्ति का राज्य में विलय कर देने जैसा था. तीसरा और महत्त्वपूर्ण यह कि उस समय एथेंस की राजनीति में दो गुट बने हुए थे. उनके अपने-अपने समर्थक थे. दोनों हमेशा एक-दूसरे को नीचा दिखाने पर लगे रहते थे. ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो विभिन्न प्रतिद्विंद्वी समूहों को राज्य के प्रति समर्पित होने को कहता है. उसके अनुसार राज्य किसी एक व्यक्ति, समूह या वर्ग का नहीं होता—‘उसपर सभी वर्गों का समानाधिकार है. इसलिए प्रत्येक वर्ग का यह स्वयंसिद्ध कर्तव्य है कि वह राज्य की अखंडता तथा बल-वैभव को बनाए रखने के लिए समर्पित भाव के साथ काम करे.’ दार्शनिक सम्राट की अवधारणा भी प्लेटो का पूर्वाग्रह था. राजनीति को अनुभवहीन लोगों के हाथों से निकालकर परिपक्व हाथों को समर्पित करने की कोशिश. परंतु उसमें वह इतना आगे बढ़ जाता है कि ‘रिपब्लिक’ का संदेश ही बिगड़ जाता है. तो फिर प्लेटो के ‘रिपब्लिक’ की देन क्या है? आधुनिक समाज उससे क्या ग्रहण कर सकता है? इस बारे में एक बीसवीं शताब्दी के महानतम दार्शनिकों में से एक बर्ट्रेंड रसेल की टिप्पणी है—

‘उत्तर है—गतिहीनता, ठहराव, एकरसता! इससे केवल युद्धकाल में सफल हुआ जा सकता है, वह भी तब, जब सामना करीब-करीब बराबरी का हो. यह केवल छोटे समूह की आजीविका को सुरक्षित रख सकता है. जड़ सोच और कठोर नियमों के कारण इस व्यवस्था में निश्चित रूप से, न तो विज्ञान का भला होगा, न ही कलाओं का.’9

स्पार्टा और वहां की राजनीति ने अपने समकालीन जिन विचारकों को प्रभावित किया था, प्लेटो भी उनमें से एक था. अपने जीवन में उसने कई उतार-चढ़ाव देखे थे, जिनमें उसके देश एथेंस की शर्मनाक पराजय तथा अकाल आदि सम्मिलित थे. इन सभी घटनाओं ने उसके संवेदनशील मन को गहराई से प्रभावित किया था. इसका स्पष्ट प्रभाव उसके राजनीतिक सोच पर देखने को मिलता है. वह मानता था राजनीतिज्ञों में सुधार के साथ इन आपदाओं से मुक्ति संभव है. कवि-हृदय प्लेटो का मनुष्यता में अटूट विश्वास था. उसके लेखन से सर्वत्र इसकी पुष्टि भी होती है. हालांकि वह या तो समझ नहीं पाया था अथवा स्वयं को जानबूझकर भुलावे में रखे था कि आदर्श सदैव व्यक्ति-सापेक्ष होता है. उसके बारे में चर्चा भी वही करते हैं, जो उसमें विश्वास रखते हैं. अधिकांश व्यक्ति निजी सुखों को ही अहमियत देते हैं. उन्हें अपने लिए बेहतर भोजन, अच्छा आवास तथा अन्य सुख-सुविधाएं चाहिए. तब आदर्श और सामान्य पसंदों के बीच अंतर कैसे किया जाए? वह कौन-सा गुण है जो व्यक्ति की सामान्य पसंदों को आदर्श पसंदों का रूप दे दे सकता है? प्लेटो के अनुसार व्यक्ति की इच्छाएं कहीं न कहीं उसके अहं से प्रेरित-प्रभावित होती हैं. अहं व्यक्ति को आत्मकेंद्रित एवं स्वार्थी बनाता है. इसलिए ‘आदर्श पसंदें’ वे पसंदें कही जा सकती हैं, जिनमें व्यक्ति के अहं का न्यूनतम प्रभाव हो—जो समाज की सामान्य इच्छाएं हों तथा व्यक्ति के निजत्व को सामान्यबोध की पहचान देकर उसे लोकोन्मुखी बनाती हों. समाज का हित है कि ऐसी पसंदों को प्राथमिकता दी जाए. जैसे किसी व्यक्ति की यह इच्छा कि प्रत्येक व्यक्ति के पास पर्याप्त भोजन हो अथवा यह सोच कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति के पास उत्तम आवास, वस्त्र तथा भोजन आदि की सुविधाएं पर्याप्त मात्रा में हों. इस प्रकार की इच्छा के साथ व्यक्ति का अहं तिरोहित हो जाता है. किंतु सभी मनुष्य तो एकसमान नहीं होते. उनकी रुचियों, स्वभाव और पसंदों में स्वाभाविक अंतर होता है. ऐसे में इच्छाओं का समाजीकरण कैसे हो? कैसे उनके आदर्श स्वरूप को कायम रखा जाए? ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो इसकी भी व्याख्या करता है. उसके अनुसार अहं के तिरोहण के पश्चात इच्छाओं का सहज समाजीकरण संभव है. उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति की दर्शन में रुचि है तो वह इच्छा कर सकता है कि समाज के सभी व्यक्तियों को दर्शन का भरपूर ज्ञान हो. ऐसे ही विज्ञान में रुचि रखने वाला व्यक्ति विज्ञान तथा कलाओं में रुचि रखने वाला व्यक्ति कलाओं के बारे में इच्छा व्यक्त कर सकता है. इस तरह इच्छाओं का समाजीकरण क्या मानव-स्वभाव से निरपेक्ष नहीं होता. प्लेटो का विश्वास था कि उदारतापूर्ण इच्छाएं अपने समन्वयीकरण की प्रक्रिया में समाज में अपनी ही जैसी इच्छाओं को बढ़ावा देंगी. इससे व्यक्ति के निजी स्वार्थ में कमी आएगी. समाज में निजी संपत्ति की अवधारणा कमजोर पड़ेगी. फलस्वरूप आर्थिक समानता के स्तर को बनाए रखना आसान होगा.

इच्छाओं और पसंदों का सामान्यीकरण जितना आसान दिखता है, उतना होता नहीं. यदि व्यक्ति का पालन-पोषण भिन्न परिस्थितियों में हुआ हो तो यह और भी कठिन हो जाता है. विकास की भिन्न स्थितियां तथा तज्जनित विषमताएं मतभेदों को जन्म देती हैं. मतभेद हों तो व्यक्तिगत इच्छाएं भी अहं से संचालित होने लगती हैं. जैसे राष्ट्रीय भावना से प्रेरित कोई व्यक्ति यह इच्छा रख सकता है कि सभी जर्मनवासी प्रसन्न हों. जबकि दूसरा व्यक्ति इसपर आपत्ति सकता है कि सिर्फ जर्मनवासी क्यों, दुनिया में जितने भी लोग हैं, सभी प्रसन्न रहने चाहिए. इसी तरह भारतीय राष्ट्रवादी का सामान्य सोच होगा कि भारत दुनिया में अन्य सभी देशों में अग्रणी हो. अतिश्रद्धालु व्यक्ति अपने धर्म को पूरी दुनिया पर छाये हुए देखना चाहेगा. जबकि मानवतावादी सपना होगा कि विश्व के सभी देश बराबर हों. किसी का किसी पर अधिकार न हो. लोग अपने-अपने विश्वास, मान्यताओं और परंपरा के साथ सुरक्षित रहें. सुख में सभी की समान साझेदारी हो. ऐसे परस्पर विरोधी विचारधाराओं वाले मनुष्य समाज में एक साथ होंगे तो उनके मतभेद उभरकर सामने आएंगे ही. फिर उनके बीच तालमेल कैसे संभव है? कैसे उन सभी की रचनात्मक क्षमताओं का इस्तेमाल समाज-हित में किया जाए? यह चुनौती प्लेटो के समय में थी. आज भी है. निजी स्वार्थ एवं मतभेदों के कारण वह एथेंस के गणतंत्र की दुर्दशा को देख चुका था. उसका मानना था कि व्यक्तिगत मतभेदों का समाहाहर केवल आदर्श समाज में संभव है. आदर्श समाज से उसका आशय था, ऐसा समाज जहां सभी को अपने-अपने कर्तव्य का एहसास हो और सभी उसके प्रति समर्पित होकर काम करें. बदले में राज्य बिना किसी पक्षपात के सभी को जीवनयापन के आवश्यक संसाधन उपलब्घ कराने की जिम्मेदारी ले.

अहं संवेदनाओं को कुचलता आया है. अहं के टकराव की समस्या प्लेटो के समय में भी रही होगी. इसलिए वह समाधान भी देता है. समाधान उसके इस विश्वास से जन्म लेता है कि मनुष्य मूलतः अच्छा प्राणी होता है. प्लेटो के अनुसार व्यक्ति का सामान्य मनोविज्ञान यह है कि वह व्यक्ति-विशेष अथवा कुछ व्यक्तियों के अप्रसन्न रहने की इच्छा तो कर सकता है, किंतु दुनिया के अधिकांश लोगों के अप्रसन्न होने की चाहत व्यक्ति के सामान्य मनोविज्ञान के विरुद्ध है. इसलिए ऊपर के उदाहरण में दूसरे व्यक्ति की इच्छा जो दुनिया-भर के लोगों के प्रसन्न होने की कामना करता है, पहले व्यक्ति, जो केवल किसी खास देश, धर्म अथवा संस्कृति को सबसे आगे निकलते देखने की इच्छा रखता है, पर मनोवैज्ञानिक दबाव बना सकती है. इच्छाओं के सार्वजनिक प्रकटीकरण के अवसर पर वह अपने अहं को आहत महसूस कर सकता है. यह उसको अपनी राष्ट्रभावना के विरुद्ध भी लग सकता है. इसके बावजूद सार्वजनिक रूप में उसको दूसरे व्यक्ति की भावनाओं का सम्मान करना पड़ेगा. सच यह भी है कि व्यवहार में निरपेक्ष आदर्श जैसा कुछ हो ही नहीं सकता. व्यक्ति की अभिप्रेरणाएं उसकी रुचियों, स्वभाव, सोच और परिस्थितियों द्वारा संचालित होती हैं. नीत्शे के महामानव की संकल्पना ईसाई परंपरा में संत की अवधारणा से एकदम भिन्न है. उसके बावजूद नीत्शे पर यह आरोप नहीं लगाया जा सकता कि इस संकल्पना के पीछे उसका कोई स्वार्थ था. सच तो यह है कि समाज की बेहतरी के लिए ईसाई परंपरा में संत जो काम करते हैं, विचारक के नाते नीत्शे ने महामानव की संकल्पना उसी कोटि की है. इसलिए नीत्शे के विचारों की आलोचना की जा सकती है, किंतु उसकी नीयत पर संदेह करना अथवा उसे निरंकुश राज्य का समर्थक मानना—सर्वथा अनुचित होगा. अज्ञानता के कारण ही सही प्राचीन भारत और विश्व में पशुबलि को मानवकल्याण के लिए जरूरी माना जाता रहा है. भारत में जब बौद्ध धर्म का उदय हुआ तो बुद्ध ने न केवल पशुबलि का जोरदार विरोध किया था, बल्कि आत्मा और परमात्मा जैसे विषयों पर चर्चा को भी अनावश्यक माना था. जबकि श्रमण परंपरा को छोड़कर बुद्ध से पहले का लगभग पूरा का पूरा भारतीय दर्शन उन्हीं विषयों पर केंद्रित था. चूंकि बौद्ध दर्शन वृहद जनसमाज के हितों का पक्ष लेता था तथा पशुबलि का निषेध लोगों के आर्थिक-सामाजिक विकास से भी जुड़ा था, इसलिए ऐसे लोगों ने बौद्ध धर्म को हाथों-हाथ अपनाया जो पिछली व्यवस्था में अभाव और उत्पीड़न झेलते आए थे. बौद्ध धर्म अपेक्षाकृत समानता पर जोर देता था. उनके प्रभाव के चलते समाज में जातीय वैमनस्य में कमी आई थी. उसके फलस्वरूप सामाजिक असंतोष भी घटा था.

प्लेटो के अनुसार इच्छाओं का पूर्ण सामान्यीकरण असंभव है. दो इच्छाओं के बीच चयन उस समय संभव नहीं है, जब तक व्यक्ति का किसी एक इच्छा की ओर विशेष झुकाव न हो. यदि उनमें से एक भी इच्छा से उसकी सहमति नहीं है तो वह उनका विरोध करेगा. इसके लिए व्यक्ति में नैतिक साहस का होना जरूरी है. जहां नैतिक सहमति-असहमति आसान न हो, वहां बल-प्रयोग की संभावना बनी ही रहती है. ‘रिपब्लिक’ में थ्रेचाइमच्स जब यह कहता है कि ‘न्याय ताकतवर के हितलाभ के सिवाय कुछ नहीं है,’ उस समय वह सुकरात सहित उन सभी साथियों से असहमति दर्शा रहा होता है, जो उसके मत के विरोध में हैं. न्याय को सबल का एकाधिकार कहने वाला थ्रेचाइमच्स अकेला व्यक्ति नहीं था. उसका मत न केवल सोफिस्ट विचारकों से प्रेरित था, बल्कि जनसाधारण के सामान्य सोच का भी प्रतिनिधित्व करता है. दुनिया में लगभग नब्बे प्रतिशत लोग आस्थावादी हैं. हर श्रद्धालु मानता है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है और वही सच्चा न्यायकर्ता भी है. भारत में धर्म को, जिसका पूरा कारोबार ईश्वर और डर पर टिका है, न्याय के रूप में थोपा जाता रहा है. इसका अर्थ यह नहीं है कि हर व्यक्ति दूसरों पर शासन करने का सपना देखता है; या अधिकांश लोग शासित होने को अपनी नियति माने रहते हैं. सच तो यह है कि सुख की कामना प्रत्येक व्यक्ति को होती है. सुख और सुरक्षा पर खतरा उसे प्रतिरोध के लिए उकसाता है. समाज को अंतर्द्वंद्वों और अनावश्यक विक्षोभों से बचाने के लिए आवश्यक है कि नागरिकों के बीच असमानता का स्तर न्यूनतम हो. उनमें यह भरोसा बना रहे कि राज्य न्याय के समर्थन और सुरक्षा में खड़ा है. इसलिए बात जब आदर्श समाज की होगी, तो लोकहित से जुड़े मुद्दों की समीक्षा की मांग भी उठेगी. सच यह भी है कि अधिकांश समाज न्याय की वस्तुनिष्ठ समीक्षा और उसकी व्याप्ति की ओर से उदासीन रहते हैं. सरकारें सत्ताधारी वर्ग के जो संख्या में अल्प हैं, हित साधने में लगी रहती हैं. इस कारण ‘न्याय’ की वस्तुनिष्ठ समीक्षा, उसकी संकल्पना पर गंभीर विमर्श संभव नहीं हो पाता. कारण यह भी है कि अधिकांश लोग न्याय के वृहत्तर संदर्भों से अपरिचित होते हैं. वे उसे किसी अदालती ‘फैसले’ के रूप में लेते हैं, जिसमें दो पक्षों के बीच तीसरा पक्ष जो घटना से पूरी तरह अनजान है, निर्णायक पक्ष की भूमिका निभाता है. तीसरा पक्ष हालांकि राज्य का प्रतिनिधित्व करता है. इसने भी न्यायविद्ों और राजनीति विज्ञानियों के लिए सदैव समस्याएं उत्पन्न की हैं. उनमें से एक बड़ी समस्या है कि ‘अच्छे’ और ‘बुरे’, ‘पाप’ और ‘पुण्य’ की तार्किक व्याख्या कैसे संभव हो? वे कौन से मानक हैं, जिनके आधार पर इनके बीच एक स्पष्ट विभाजनरेखा खींच पाना संभव है? यह समस्या प्लेटो के सामने भी थी. वह विविध स्थितियों की व्याख्या करता है, जिन्हें न्यायसंगत माना जा सकता है. बहस को प्रभावित करने के बजाय वह केवल दर्शक के रूप में मौजूद है. वह देखता है कि सुकरात जैसे विद्वान की उपस्थिति के बावजूद बहस के दौरान कोई न कोई पक्ष सदैव असंतुष्ट बना रहता है.

फिर विमर्श का समापन कहां पर हो? ‘आदर्श पसंदों’ का विचार इसी की परिणति था. ‘आदर्श पसंदों’ से उसका अभिप्राय ऐसी पसंदों से था, जिनकी अधिकांश लोग कामना करते हों. परोक्ष रूप में यह भी बहुमत की दादागिरी हुई, जिसे न्याय की दृष्टि से निरापद नहीं कहा जा सकता. लोकतंत्र को ‘बहुमत की दादागिरी’ बताकर प्रायः उसकी आलोचना की जाती है. दादागिरी या निरंकुश आचरण किसी का भी हो सकता है. राजशाही में अकसर उस व्यक्ति की दावेदारी चलती थी, जिसके हाथों में राजमुद्रा हो. धर्म को लोककल्याणकारी बताया जाता है. परंतु वह भक्त और भगवान दोनों की अतियों पर निर्भर करता है. भक्त समर्पण की उच्चतम सीमा तक समर्पित होता है. ईश्वर उच्चतम सीमा तक निरंकुश और तानाशाह, परिणामस्वरूप धर्म के नाम पर हुए धत्त्कर्म को जीवन के आदर्श की तरह थोपा जाता है. एक प्रकार से यह भी अति ही है. व्यावहारिक सोच यही है कि चयन जब ‘बहुमत की दादागिरी’ और ‘अल्पमत की दादागिरी’ के बीच हो तो न्याय को पहले के पक्ष में झुके हुए नजर आना चाहिए. आदर्शवादी प्लेटो को इस तरह का व्यावहारिक चलन नापसंद था. उसके अनुसार न्याय के लिए कोई बीच का रास्ता नहीं होता. न्याय या तो न्याय होता है, अथवा न्याय नहीं होता. उसके सामने अपने आदर्श नगर-राज्य की समृद्धि और सुरक्षा का मसला बहुत बड़ा था. लोकतंत्र की विकृतियों को वह देख-समझ सका था. इसलिए न्याय पर चर्चा करते हुए उसकी अन्यान्य स्थितियों पर चर्चा करता है तथा निर्णय पाठक के विमर्श के लिए छोड़ देता है. उसके लिए यह समीचीन भी था.

क्या न्याय को धर्म के आधार पर परिभाषित किया जा सकता है? जो समाज ईश्वर को हाजिर-नाजिर मानकर न्याय करने का दावा करते हैं, क्या उनकी वैचारिकी को आदर्श समाज की वैचारिकी के बराबर माना जा सकता है? प्लेटो इसपर विचार नहीं करता. एक सपाट-सी व्याख्या में वह कह देता है कि क्या अच्छा है और क्या बुरा—इसका निर्धारण ईश्वर करता है. इससे समस्या सुलझने के बजाय और भी उलझ जाती है. सब जानते हैं कि ईश्वर अपनी इच्छा के बारे में किसी से भी संवाद नहीं करता. उसका अपना अस्तित्व ही संद्धिग्ध है. वह अपने भक्तों के विश्वास से परे, जिसे वे अपना धर्म मानते हैं, कुछ भी नहीं है. बावजूद इसके धर्माचार्य दावा करते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति जो कथित ईश्वरेच्छा को अपनी इच्छा मान लेता है—वही सत्पुरुष है. उनके अनुसार ईश्वर परमकल्याणकर्ता है, अतएव उसकी इच्छा और कर्तव्यों को शुभ का आधार माना जा सकता है. पर ईश्वर की इच्छा जाहिर कैसे हो? यह कैसे तय हो कि ईश्वर यही चाहता है? क्या ऐसा भी रास्ता है, जिससे कथित ईश्वरेच्छा का सटीक अनुमान लगाया जा सके? दूसरे जिसे ईश्वरेच्छा होने का दावा किया जाता है, उसके प्रमाणन का सही रास्ता क्या हो? कैसे तय किया जाए कि जिसे ईश्वरेच्छा बताया जा रहा है, वही श्रेष्ठतम विकल्प है. चूंकि ऐसा कोई रास्ता व्यवहार में संभव नहीं है. ईश्वरेच्छा अपने आप में अप्रामाणिक है. इसलिए उसके अनुयायी उसे आस्था का विषय बनाकर पेश करते हैं. सच तो यह है कि जिसे ईश्वरेच्छा बताकर उसके अनुयायियों द्वारा आरोपित किया जाता है, वह वास्तव में उसके अनुयायियों की ही इच्छा होती है. धर्म और ईश्वरेच्छा के नाम पर ऐसे पाखंड पुरोहित वर्ग सहòाब्दियों से रचता आ रहा है. हो सकता है धर्मानुशासन से समाज का थोड़ा-बहुत भला होता हो. परंतु उसके माध्यम से होने वाला नुकसान उससे कहीं अधिक होता है. दरअसल ‘शुभ’, ‘अशुभ’, ‘पाप’, ‘पुण्य’ आदि अवधारणाएं व्यक्ति-सापेक्ष होती हैं. ‘वस्तुनिष्ठ सत्य’ जैसा कुछ नहीं है. हां, सीमित संदर्भों में व्यक्ति ‘सत्य’ अथवा ‘असत्य’ के बारे में अनुमान अवश्य लगा सकता है. ठीक ऐसे ही जैसे यह जान लेना कि ‘वर्फ’ सफेद है. यहां सफेद रंग वर्फ का प्रमुख लक्षण है, परंतु ‘सफेद’ कह देने-भर से वर्फ का बोध नहीं होता. बगुले का रंग भी सफेद होता है. यह संज्ञा मनुष्य की ओर से ही एक रंग विशेष के नाम की गई है. कोई व्यक्ति वर्फ के रंग का बयान कर सकता है. पर यदि कोई ऐसा व्यक्ति जिसने सफेद वर्फ कभी देखी ही न हो, वह वर्फ के रंग के बारे में दावे के साथ कोई बात नहीं कह सकता. तो भी सामान्य जानकारी में यह कहना कि वर्फ सफेद होती है, कि महात्मा गांधी की हत्या हुई थी, कि जवाहर लाल नेहरू इस देश के प्रथम प्रधानमंत्री थे, कि 1947 में भारत का विभाजन एक सच्ची ऐतिहासिक घटना है जैसी कुछ बातें हैं जो लोकसम्मति के आधार पर सच मान ली जाती हैं.

प्लेटो मानता था कि ‘शुभ’ की सत्ता है तथा उसको पहचाना जा सकता है. अपने आदर्शलोक में वह उन स्थितियों पर जोर डालता है, जिनके द्वारा मनुष्य के आचरण को नैतिक बनाए रखकर शुभ की संभावना को बढ़ाया जा सकता है. उसका मानना था कि आदर्श गणतंत्रात्मक राज्य भी अपने आप में ‘शुभ’ है. हालांकि गणतंत्र की कोई स्पष्ट परिभाषा वह नहीं देता. जिस आदर्शलोक की परिकल्पना वह ‘रिपब्लिक’ में करता है, उसमें जबरदस्त आर्थिक-सामाजिक स्तरीकरण है. निकृष्ट दासप्रथा है. सुकरातकालीन एथेंस की तीन लाख की आबादी में लगभग आधी दास और अर्धदास लोगों की थी, जिन्हें सामान्य जीवन जीने के लिए आवश्यक न्यूनतम अधिकारों से भी वंचित रखा गया था. प्लेटो की आलोचना का यह बड़ा आधार है. स्वयं प्लेटो के समय में भी उसके कई आलोचक और विरोधी थे. लेकिन प्लेटो के चिंतन का दायरा विशद है. उसकी आलोचना की जा सकती है. असहमत भी हुआ जा सकता है. स्वयं प्लेटो ने अपने साथियों के असमति के अधिकार की रक्षा की है. लेकिन उसके चिंतन को नकारा नहीं जा सकता. प्लेटो के दर्शन को लेकर थ्रेचाइमच्स की टिप्पणी सहस्राब्दियों बाद भी प्रासंगिक है. उसका कहना था—‘प्लेटो से सहमति अथवा असहमति का प्रश्न ही नहीं है. प्रश्न सिर्फ इतना है कि आप प्लेटो के आदर्शलोक की कल्पना से कितने और कहां तक सहमत हैं? यदि आप उससे सहमत हैं तो यह आपके लिए शुभ है; और यदि आप उससे असहमत हैं तो निश्चय ही यह आपके लिए बुरा है.’

कुल मिलाकर प्लेटो के दर्शन में ऐसा बहुत कुछ है, जो उससे असहमति से बावजूद बुद्धिजीवियों को प्रेरित और आकर्षित करता आया है. उसके आदर्शलोक की विशेषता यह भी है कि वह केवल बौद्धिक विमर्श और कागजों तक सीमित नहीं था, बल्कि उसकी स्थापना वास्तविक धरातल पर संभव हुई थी. उसके अनेक प्रावधान जिन्हें अव्यावहारिक माना जाता है, जैसे बच्चों को उनके माता-पिता से दूर रखकर उनकी पहचान को छिपाकर पालना-पोसना स्पार्टा से लिए गए थे. दार्शनिक सम्राट का प्रयोग भी अनेक राज्यों में आजमाया जा चुका था. अनेक सम्राट ऐसे थे जो अपने राज्यों में दार्शनिकों को उच्च स्थान पर रखते थे, यद्यपि ऐसे राज्यों की सफलता के बारे में सटीक टिप्पणी कर पाना संभव नहीं है. सही मायने में प्लेटो सबसे पहला दार्शनिक था, जिसने ऐसे समानता पर आधारित समाज का सपना देखा था. जहां संसाधनों का उपयोग संपूर्ण समाज के भले के लिए किया जाता हो. इसलिए उन सबके लिए वह आज भी सम्मानेय है, जो आमूल परिवर्तन का सपना अपनी आंखों में पाले हुए हैं.

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

9. The answer is rather humdrum. It will achieve success in wars against roughly equal populations, and it will secure a livelihood for a certain small number of people. It will almost certainly produce no art or science, because of its rigidity.-BERTRAND RUSSELL, A HISTORY OF WESTERN PHILOSOPHY, page 109.

 

न्याय की पाश्चात्य अवधारणा—दो

सामान्य

‘न्याय क्या है’ पर सबसे पहली प्रतिक्रिया केफलस की ओर से ही आती है. केफलस मैटिक(विदेशी) है. उसके विचार कुछ-कुछ परंपरागत किस्म के हैं. उसके अनुसार न्याय का अर्थ है—‘अपने कथन और कर्म में सच्चा रहना तथा मनुष्यों एवं देवताओं के प्रति ऋण चुकाना.’ सुकरात इस परिभाषा से संतुष्ट नहीं होता. उसके अनुसार सत्य सापेक्षिक होता है. यानी एक व्यक्ति के लिए जो सत्य है, आवश्यक नहीं कि दूसरे व्यक्ति की परिस्थितियों में भी ठीक वैसा ही सत्य स्वीकार्य हो. इसलिए केफलस के विचारों की आलोचना वह यह कहकर करता है कि विशेष परिस्थितियों में सत्य और समुचित व्यवहार को न्याय माना जा सकता है. परंतु उसे सार्वभौमिक सत्य के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. उधार को समय पर चुकाना अच्छी बात है. उसे मानव-चरित्र के विशिष्ट गुण के रूप में लिया जा सकता है. परंतु इस नियम की भी सीमा है. यह प्रत्येक परिस्थिति में निरापद नहीं है. केफलस के मत के विरोध में अपना तर्क प्रस्तुत करते समय सुकरात उदाहरण देता है—‘मान लीजिए आपके दोस्त ने अपना घातक हथियार आपके पास सुरक्षित रख छोड़ा है. उसे वह उस समय वापस मांगता है, जब वह अत्यंत क्रोधावस्था में है; तथा हथियार द्वारा किसी तीसरे व्यक्ति की हत्या करना चाहता है. उस क्षण हथियार लौटाकर ऋण-मुक्त होना क्या न्याय की परिसीमा में आएगा?’ इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर केफलस के पास नहीं है. परिस्थिति चाहे जो हो, शुभ यदि अशुभ का जन्मदाता अथवा उसे प्रोत्साहित करता है—तो वह न्याय नहीं माना जा सकता. न्याय की कसौटी उसकी सार्वभौमिकता में है. वही न्याय है जो अधिकतम व्यक्तियों को न्याय जंचे और अधिकतम परिस्थितियों में न्याय-संगत सिद्ध हो. समय पर उधार लौटाने का गुण व्यक्ति को जिम्मेदार तो दर्शाता है, परंतु वह न्याय की कसौटी नहीं बन सकता.

केफलस वयोवृद्ध है. उस पीढ़ी का प्रतीक जो सुकरात के समय बूढ़ी हो चली थी. उसका ज्ञान सुदीर्घ अनुभव पर आधारित है. उसकी पीढ़ी के लिए न्याय और नैतिकता के अर्थ बहुत सीमित थे. सत्य-भाषण एवं समय पर उधार चुकाने का मामला भी व्यावहारिक नैतिकता से जुड़ा था. लोगों में उधार लेन-देन चलता रहता था. उसके कारण झगड़े भी होते थे. प्रकारांतर में केफलस उस न्याय की ओर इशारा करता है, जिसके लिए न्यायालय या किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की आवश्यकता पड़ती है. जबकि सुकरात न्याय को उसके वृहद संदर्भों में देख रहा था. सबकुछ जानते-समझते हुए भी सुकरात केफलस के विचारों को पुराना मानकर उसका उपहास नहीं करता. अच्छे विमर्शकार की भांति वह धैर्यपूर्वक सुनता और बाद में विनयपूर्वक उसका प्रतिवाद करता है. इसके लिए सिसरो ने सुकरात की प्रशंसा की है—‘सुकरात का आचरण एक उदाहरण है, जिसे अरस्तु ने दर्शन के अध्येता के लिए अनुकरणीय बताया है.’ न्याय की दृष्टि से सुकरात ने केफलस को भले ही निरुत्तर कर दिया हो, परंतु उसके अनुभवों से हमें व्यावहारिक नैतिकता की झलक मिलती है. जिनका दर्शन की दृष्टि से भले ही बहुत ज्यादा महत्त्व न हो, परंतु समाज का समूचा कार्य-भार सामान्यतः उसी पर केंद्रित होता है. प्रकारांतर में वह सुकरात को चरित्र की महत्ता से परचाना चाहता है. वह बताना चाहता है कि गरीबी निश्चित रूप से मनुष्य के सुख में बाधक बनती है. जीवन में अनेक परेशानियां और दुश्वारियां धनाभाव के कारण पैदा होती हैं. बावजूद इसके यह मान लेना कि जो अमीर हैं, जिन्हें कोई अभाव नहीं है, वे पूरी तरह प्रसन्न हैं अनुचित होगा. मनुष्य के लिए उसका चरित्र ही सच्ची दौलत है—इस तरह का सोच लंबे अनुभव और समाज के साथ सतत संवाद के बाद ही पनप सकता है. इसलिए व्यावहारिक न्याय और नैतिकता को देखते हुए केफलस के विचार मायने रखते हैं, हालांकि न्याय की परिभाषा की दृष्टि से उनका खास महत्त्व नहीं है.

केफलस को निरुत्तर देख उसका बेटा पोलीमार्क बहस में कूद पड़ता है. पोलीमार्क की न्याय संबंधी अवधारणा सीधी-सरल है. वह सोफिस्ट विचारकों से प्रभावित है. एक तरह से वह अपने पिता के न्याय संबंधी सहज बोध को ही आगे बढाता है. उसके अनुसार, ‘न्याय का अभिप्राय है—मित्रों को लाभ पहुंचाना और दुश्मनों को हानि.’ इस प्रकार का भेदभाव न्याय की आधारभूत मान्यता के विपरीत है. उसके आधार पर न्याय की कसौटी का निर्माण असंभव है. गौरतलब है कि उन दिनों यूनान के छोटे-छोटे राज्य परस्पर युद्ध करते रहते थे. युद्धक संस्कृति पूरे यूनान पर बढ़त बनाए थी. मित्र राज्यों की मदद तथा दुश्मन राज्यों का विरोध करना उस संस्कृति का सामान्य लोकाचार था. मित्रों के प्रति अनुराग और शत्रु से राग-विराग प्राचीन यूनानी समाज की सामान्य नैतिकता का हिस्सा था. सोलन की कविताओं में मिलता है—‘मुझे अपने मित्रों के प्रति सुखद तथा शत्रुओं के प्रति उदार बना दो.’ इसी तरह ईसा पूर्व आठवीं शताब्दी के कवि हेसियाद ने एक जगह लिखा था—‘वे हमें देंगे तो हम भी देंगे. वे यदि नहीं देंगे तो हम भी नहीं देंगे.’ प्राचीन भारत में न्याय की यही स्थिति थी. देवताओं से कुछ प्राप्त करने के लिए उन्हें अर्घ्य, भेंट-पूजा चढ़ाना. एक चढ़ाकर दस लाख की उम्मीद न करना. नहीं तो देवता के कोप-भाजन बनने से भयभीत रहना. यही व्यवस्था तत्कालीन राजनीति के न्याय-सिद्धांत की मुख्य प्रेरणा थी. राजा प्रसन्न हो तो भेंट-सौगात से मालामाल कर देता था. राजा के अप्रसन्न होने पर दंड सुनिश्चित था. दंड की मात्रा भी राजा के कोप और उसकी मर्जी पर निर्भर करती थी. कोई लिखित विधान न था. बाद में धर्मसूत्रों में हालांकि दंड संबंधी व्यवस्था देखने को मिलती है. परंतु उसका अनुसरण आवश्यक न था. राजा की मर्जी ही दंड विधान था. उसके विरोध में कहीं, कोई सुनवाई न थी.

पोलीमार्क का तर्क भी उससे प्रभावित है. परम जिज्ञासु सुकरात उसके तर्कां से आश्वस्त नहीं है. वह बताता है कि निष्पक्षता न्याय की कसौटी है. यदि नैतिकता की दृष्टि से सभी मनुष्य बराबर हैं, तो समान परिस्थितियों में उनके साथ एक जैसा व्यवहार करना ही न्यायिक उत्कृष्टता की कसौटी है. यदि दो व्यक्ति समान अपराध में लिप्त हों तथा उनमें से एक शासक का मित्र तथा दूसरा उसका शत्रु हो तो दोनों के अपराध का दंड क्या अलग-अलग होना चाहिए? व्यक्ति मित्रों के प्रति सामान्यतः उदार होता है, जबकि अमित्रों तथा दुश्मनों के प्रति अनुदार. ऐसे में उसका निर्णय निजी धारणाओं से प्रभावित होगा, जो न्याय-भावना के विपरीत है. पूर्वाग्रहवश वह मित्रों का पक्ष लेगा. जो मित्र नहीं हैं, उनके प्रति उसके निर्णय उपेक्षा से भरे, पक्षपातपूर्ण होंगे. पक्षपात जहां किसी अपात्र को लाभ पहुंचाता है, वहीं किसी अन्य व्यक्ति से जो उसका न्यायपूर्ण अधिकारी है, उचित अवसर छीन लेता है. सुकरात के अनुसार किसी को नुकसान पहुंचाना अथवा उसका बुरा करना न्याय की मूल अवधारणा के विपरीत है. फिर मित्रता कोई स्थायी संबंध नहीं है. दो व्यक्तियों के बीच संबंधों में उतार-चढ़ाव आते ही रहते हैं. आज जो मित्र हैं, कल वही दुश्मन भी बन सकते हैं. तदनुसार एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्तियों के प्रति व्यवहार भिन्न परिस्थितियों में अलग-अलग हो सकता है. अपने मत के समर्थन में प्लेटो सुकरात के माध्यम से कई तर्क प्रस्तुत करता है.

न्याय को यदि अच्छाई और बुराई से अभिव्यक्त होने वाला गुण मान लिया जाए तो कोई भी व्यक्ति उसका मनमाना उपयोग करने को स्वतंत्र हो जाएगा. एक डॉक्टर जो अपने उपचार द्वारा किसी रोगी को सही कर सकता है, उपचार न करके या जानबूझकर गलत उपचार द्वारा उसे नुकसान भी पहुंचा सकता है. प्रत्येक अवस्था में वह अपेने ज्ञान का उपयोग कर रहा होगा, हालांकि उसके परिणाम भिन्न-भिन्न होंगे. मगर जानबूझकर नुकसान पहुंचाने अथवा उपचार में लापरवाही बरतने की अवस्था में रोगी के प्रति उसके व्यवहार को न्यायपूर्ण नहीं माना जाएगा. न्याय कला भी नहीं है. कोई भी कलाकार अपनी कृति को रूपाकार देने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होता है. जबकि न्याय का न तो मनचाहा उपयोग संभव है, न ही मनमाने ढंग से उसे तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है. कलाएं अनुभव के साथ-साथ निरंतर परिष्कृत होती जाती हैं. जबकि न्याय के साथ ऐसा नहीं है. किसी भी समाज में न्याय उसकी आदर्शोन्मुखता का प्रतिरूप होता है. उसे अनुभव के आधार पर परिष्कृत नहीं किया जा सकता. सुकरात के अनुसार न्याय का सीमित अर्थों एवं संदर्भों में प्रयोग निषिद्ध है. वह बृहत्तर ज्ञान का विषय है. पोलीमार्क्स के तर्क के विरोध में सुकरात की अनेक शंकाएं हैं. उसके अनुसार मित्र को लाभ पहुंचाने और शत्रु का अहित करने की बात करना जितना आसान है, वास्तविक मित्र और शत्रु की पहचान करना उतना ही कठिन है. मनुष्य का व्यवहार बदलता रहता है. कुछ मनुष्य इतने तेज-तर्रार होते हैं कि उनके व्यवहार से पता ही नहीं चलता कि वे मित्र हैं या शत्रु? ऐसे लोग सामने हितैषी होने का दावा करते हैं, परंतु पीठ पीछे वे नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं. ऐसे मनुष्य के प्रति कैसा व्यवहार न्यायोचित होगा—यह समझ पाना आसान नहीं होता. ऐसे व्यक्तियों के लिए जिनकी मैत्री केवल दिखावा है, हमेशा लाभ की बात करना उन लोगों के प्रति प्रति सरासर अन्याय होगा जिनका व्यवहार आपको पसंद नहीं है, परंतु उन्होंने आपको या किसी अन्य को कभी भी नुकसान पहुंचाने की कोशिश नहीं की है. ऐसे व्यक्ति के साथ जो मन से बुरा नहीं है, या परिस्थितिवश बुराई अपनाने को विवश हुआ है—यदि दुर्व्यवहार किया जाए तो समाज के प्रति उसके विश्वास में कमी आएगी. दूसरी ओर जो व्यक्ति सचमुच बुरा है, यदि उसके अहित को न्याय मान लिया जाए तो वह अपने पक्ष को ही न्यायपूर्ण मान लेगा. इस प्रकार उसके सुधार की समस्त संभावनाओं का अंत हो जाएगा. न्याय की पहली शर्त करने वाले और जिसके साथ न्याय किया जा रहा है, स्पष्टता है. उसमें समिष्ठि की भावना अंतनिर्हित होती है. न्याय परिस्थिति-निरपेक्ष, व्यक्ति निरपेक्ष और देश-काल निरपेक्ष होता है. सार्वदैशिकता उसका गुण होता है. देश-काल के अनुसार अपराध की प्रवृत्ति, परिभाषाएं और उनके अनुरूप दंड विधान बदल सकता है, न्याय नहीं. उसे तो पक्षपात रहित और इन सभी से ऊपर, सर्वकल्याणकारी होना चाहिए. इसलिए न्यायशील व्यक्ति मित्र या शत्रु का भेद किए बगैर सर्वकल्याण की भावना के साथ न्याय को अपनाएगा. अतएव मित्र को लाभान्वित करने तथा अमित्र को नुकसान पहुंचाने की भावना न्यायसंगत नहीं कही जा सकती. किसी भी प्रकार का भेदभाव न्याय की मूल-भावना के पूरी तरह विपरीत है. सुकरात के तर्कों के बाद पॉलीमार्क्स तर्क छोड़कर बहस से बाहर आ जाता है. उस तर्क-शृंखला का समापन प्लेटो यह कहकर करता है कि ‘मित्रों के भलाई और दुश्मन के साथ बुराई जैसी धारणा पेरियांडर जैसे निरंकुश सम्राट ने बनाई होगी. प्रसंगवश बता दें कि पेरियांडर की गिनती यूनान के सात प्रसिद्ध संतों में की जाती है. यह उन दिनों की बात है जब वहां दार्शनिक का राजा होना श्रेष्ठतर माना जाता था. पेरियांडर ने कोरिंथ पर ईसापूर्व 625 से 585 ईस्वीपूर्व तक शासन किया था. आरंभ में उसका शासन बहुत दयालुतापूर्ण था. लेकिन बाद में वह दमन का रास्ता अपनाने लगा था.

‘रिपब्लिक’ को पढ़ते हुए कभी-कभी यह लगता है कि उसके पात्र प्लेटो की कल्पना की उपज हैं. उनकी भूमिका किसी न किसी विचार के पक्ष-विपक्ष को आगे बढ़ाने तक सीमित है. सुकरात का योगदान कहीं सूत्रधार का है, कहीं महत्त्वपूर्ण वक्ता के रूप में तो कहीं विभिन्न विचारधाराओं में समन्वयक का. संवाद के बीच अनेक व्यक्तियों की सहभागिता का उद्देश्य है कि उनके माध्यम से प्लेटो, अंतिम निष्कर्ष से पहले किसी एक विचार या अवधारणा के यथासंभव सभी पक्षों पर खुलकर विचार कर लेना चाहता है. वह लगातार यह सिद्ध करने की कोशिश करता है कि न्याय को लेकर परंपरागत किस्म की धारणाएं व्यावहारिक दृष्टि के लिए उपयोगी कही जा सकती हैं. परंतु विशिष्ट परिस्थितियों में उनकी उपयोगिता सीमित तथा अलाभकारी हो जाती है. व्यापक परिदृश्य में उनके अंतर्विरोध और सीमाएं सामने आने लगती हैं. न्याय पर चर्चा करते हुए सुकरात केवल अपने साथियों की न्याय-संबंधी अवधारणा में खोट नहीं निकालता. परिचर्चा के दौरान वह खुद का भी अविकल परिमार्जन करता जाता है. ‘रिपब्लिक’ में हम प्लेटो न्याय-संबंधी प्रारंभिक संकल्पना में एक के बाद एक सुधार हुआ पाते हैं. न्याय की अवधारणा पर शुरू हुई बहस में तीसरे पात्र के रूप में थ्रेचाइमच्स का आगमन होता है. प्लेटो ने उसे वाग्मिता में निपुण ऐसा व्यक्ति बताया है तो श्रोताओं की वासनाओं को उत्तेजित करने में दक्ष था. शिक्षा का प्राथमिक ध्येय ज्ञानार्जन है. जबकि सोफिस्टों के लिए वह केवल वाक्-कौशल अथवा वाक्-चातुर्य तक सीमित था. तो भी सोफिस्टों की ग्रीक संस्कृति में महत्ता से इन्कार नहीं किया जा सकता. सुकरात और प्लेटो के आगमन से पहले सोफिस्ट ही थे, जिनसे ग्रीक संस्कृति का बोध होता था. वे अपनी विचारधारा और तर्क-सामर्थ्य के आधार पर जाने जाते थे. तर्क-नैपुण्य उनके लिए इतना महत्त्वपूर्ण था कि आगे चलकर उन्होंने उसी को अपना व्यवसाय बना लिया था. यूनानी समाज में उनकी हैसियत ठीक ऐसी ही थी जैसी भारत में पुरोहित वर्ग की. थ्रेचाइमच्स के विचार ‘सत्ता-सर्वेसर्वा’ का प्रतिनिधित्व करते हैं. बहस में उतरने के पश्चात वह दावा करता है कि शक्तिशाली की हित-सिद्धि ही न्याय है. उसके अनुसार—‘सबल सर्वदा सही होता है.’ ‘राजा जो करे वही न्याय’—ऐसी मान्यता भारत में भी रही है. तुलसी ने लिखा है, ‘समरथ को नहिं दोष गुसाईं.’ इसी से शायद यह कहावत भी बनी है—‘जिसकी लाठी उसकी भैंस.’ अपने मंतव्य को स्पष्ट करता हुआ थ्रेचाइमच्स कहता है—

‘विभिन्न प्रकार के राजदर्शनों यथा जनतंत्रात्मक, निरंकुश, कुलीनतंत्री आदि के आधार पर गठित सरकारें इस प्रकार के कानून बनाती हैं, जिनके द्वारा उनकी अपनी स्वार्थ-सिद्धि होती है. निहित स्वार्थ के लिए बनाए गए कानूनों को ही वे न्याय की संज्ञा देती हैं और चाहती हैं कि लोग बिना कोई प्रश्न उठाए उनका पालन करें. जो व्यक्ति उनके आदेश की अवहेलना करता है उसे वे कानून के उल्लंघन का तर्क देते हुए दंडित करती हैं. सभी राज्यों में न्याय का एकमात्र उद्देश्य है शासकीय वर्गों का हित. चूंकि राज्य अपने आप में शक्तिशाली तंत्र होता है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि न्याय सर्वत्र एक ही है, वह है—शासक वर्ग का हित और शक्तिशाली का स्वार्थ.’

थ्रेचाइमच्स के अनुसार न्याय शक्तिशाली का अधिकार है. जो शक्तिसंपन्न है, वह न्याय को अपने पक्ष में कर लेता है. शक्तिशाली हमेशा अपने पक्ष में कानून बनाता है. सवाल है शक्ति कैसी? देह की, मन की या किसी और प्रकार की? सुकरात प्रश्न करता है. थ्रेचाइमच्स इस बारे में स्पष्ट है. वह शारीरिक शक्ति से इन्कार करता है. भूल जाता है कि शारीरिक शक्तियों, जिनमें बौद्धिक सामर्थ्य भी सम्मिलित है, से इतर जितनी भी शक्तियां हैं, वे सभी व्यक्ति को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में समाज की ओर से प्राप्त होती हैं, भले ही समाज अपनी इस देन को गंभीरता से न लेता हो. उसमें व्यक्ति की अपनी प्रतिभा एवं परिश्रम का भी योगदान होता है, परंतु इतना नहीं कि समाज के योगदान की बराबरी कर सके. अध्ययन-अध्यापन, अनुभव आदि के माध्यम से मनुष्य जो ज्ञान अर्जित करता है, वह उसकी पूर्ववर्त्ती पीढ़ियों के अनुभवों का निचोड़ होता है. परंतु अहंभाव के चलते व्यक्ति समाज की देन को अपनी मान बैठता है. यह उसका अहंभाव है. अपने ज्ञान पर गर्व करने का अधिकार उसे है. लेकिन पूर्ववर्त्ती पीढ़ियों के योगदान को बिसरा देना भी अनैतिक कर्म है. थ्रेचाइमच्स नेतृत्व के अधिकार को शक्ति मानता है. उसके अनुसार जिसके पास कानून बनाने की शक्ति है, उसे दूसरों पर नियंत्रण का अधिकार और अवसर स्वतः प्राप्त हो जाते हैं. थ्रेचाइमच्स की कसौटी है कि जो शक्ति-संपन्न है, वह न्याय-संपन्न भी है. कानून-निर्माता होने के कारण शक्तिशाली सदैव लाभ की अवस्था में रहता है. उस गड़हरिया की भांति जो अपनी भेड़ों को इसलिए पालता है ताकि समय आने पर वह उनसे काम ले सके. जिसमें जरूरत पड़ने पर उसकी बलि भी शामिल है. थ्रेचाइमच्स का विचार प्राचीन राजनीति के बेहद करीब है. प्राचीन सम्राट अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के लिए प्रजा को कभी भी युद्ध में उतार सकते थे, लोगों से मनचाहा काम या बेगार ले सकते थे. थ्रेचाइमच्स के अनुसार जो लोग शासन से दूर हैं, जिन्हें कानून बनाने या बदलने का कोई अधिकार नहीं है, वे सामान्यतः नुकसान में रहते हैं. शिखर पर मौजूद व्यक्ति यदि जनता की भलाई के लिए काम भी करता है तो इसलिए कि उसके पीछे उसका कहीं बड़ा स्वार्थ निहित है. सुकरात को यह तर्क मंजूर नहीं है. उसके अनुसार ऐसा करना राज्य की नीयत को कठघरे में लाना तथा उसके औचित्य के आगे प्रश्न-चिह्न लगाना है, शिखर पर मौजूद लोग अपना स्वार्थ देखते हैं. परंतु वे ऐसा हमेशा करें, यह आवश्यक नहीं है. डॉक्टर अपनी प्रक्टिश केवल धन जुटाने के लिए नहीं करता. लोग सेवाभाव से भी चिकित्सक के पेशे को अपनाते आए हैं. यही बात शिक्षक पर भी लागू होती है. कलाकार भी लोक-कल्याण का भाव लेकर कला-साधना करता है.

सुकरात को विपरीत-कथन या व्याजोक्ति के लिए भी जाना जाता है. बहस के दौरान ऐसा ही विपरीत-कथन जैसा थ्रेचाइमच्स भी करता है. हालांकि वह अपने विचारों पर दृढ़ है और उसका यह कथन ‘शक्तिशाली सदा सही’ का ही विस्तार है. वह कहता है—‘अन्याय करना न्याय करने से बेहतर है.’ अपने तर्क को नई दिशा में बढ़ाता हुआ थ्रेचाइमच्स कहता है कि न्याय को शक्तिशाली की इच्छा या उसके लाभ तक सीमित कर देने से प्रत्येक व्यक्ति को उसका लाभ नहीं मिल पाएगा. बल्कि जो अन्यायी है वह अधिक प्रसन्न और संतुष्ट दिखाई पड़ेगा. इन परिस्थितियों में अन्याय अधिक सुखदायी और आश्वस्तिकारक हो सकता है. इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति केवल अपने स्वार्थानुरूप कार्य करेगा, जिसके लिए उसे अन्यायी मान लिया जाएगा. जबकि वह वही कर रहा है, जिसे करने में वह सक्षम है और जिसके द्वारा उसकी स्वार्थ-सिद्धि संभव है. कुल मिलाकर व्यक्ति का हित अन्यायी बनने में है. अपने तर्क की पुष्टि के लिए थ्रेचाइमच्स के पास अपने तर्क हैं. आप उन्हें कुतर्क सकते हैं; और चाहें तो वाग्जाल भी. लेकिन अन्य सोफिस्टों की भांति थ्रेचाइमच्स को भी अपनी इस कला पर गर्व था. अपने तर्क को आगे बढ़ाता हुआ वह कहता है—‘यदि न्यायी और अन्यायी दो व्यक्ति साथ-साथ व्यापार करें तो लाभ की गणना के समय यह कहना बहुत कठिन होगा कि न्यायी को अधिक लाभ हुआ हो. संभावना इसी की है जो अन्यायी है, उसने अधिक लाभ कमाया हो. व्यवहार में प्रायः देखा जाता है कि न्यायी व्यक्ति हमेशा घाटे में रहता है, जबकि अन्यायी ज्यादा ऐंठ ले जाता है. कराधान के समय भी अन्यायी कर-चोरी कर लाभ की अवस्था में रहता है. दूसरी ओर न्यायी व्यक्ति ईमानदारी बरतते हुए अधिक कराधान कर अपेक्षाकृत घाटे में रहता है. राज्य की ओर कोई सुविधा प्राप्त करनी हो तो अन्यायी आगे बढ़कर ज्यादा हाथ मार ले जाता है, जबकि न्यायी वहां भी पिछड़ जाता है. इन तर्कों से वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि न्यायी व्यक्ति से अन्यायी होना अच्छा है. थ्रेचाइमच्स के अनुसार, ‘न्याय बलवान का स्वार्थ’ अथवा ‘सबल की स्वार्थ दृष्टि है.’ जनसाधारण को न्याय सिवाय आत्मतुष्टि के, कुछ नहीं दे पाता. थ्रेचाइमच्स का तर्क यहीं समाप्त नहीं होता. वह आगे बढ़कर शासकीय पदों पर विराजमान व्यक्तियों की तुलना करते हुए कहता है कि अन्यायी व्यक्ति, न्यायी की अपेक्षा सदैव अधिक लाभ कमाते हैं. अन्यायी व्यक्ति न केवल अपने परिजनों को अधिक सुख दे पाता है, बल्कि न्यायी की अपेक्षा अधिक यश-लाभ का भी भागी बनता है. अन्याय जितना बड़ा हो, लाभ में रहने की संभावना भी उतनी ही बढ़ जाती है. छोटी-मोटी चोरी या लूट करने वाले चोर-डकैत कहे जाते हैं और समाज में अपमान और दंड के भागी बनते हैं. जबकि अपनी सेना और शक्ति के भरोसे यदि कोई नरेश दूसरे राज्य को लूटकर ले जाता है तो वह यश का भागी बनता है. चारणवृंद उसकी गौरव-गाथाएं लिखते हैं. इसलिए थ्रेचाइमच्स कहता है कि—‘हे सुकरात! पर्याप्त रूप से बड़े स्तर पर किया गया अन्याय, न्याय की अपेक्षा अधिक गौरवशाली, स्वच्छंद एवं यश-लाभ देने वाला कार्य है.’ उस समय थ्रेचाइमच्स न्याय के साथ-साथ लाभ को भी बहुत सीमित संदर्भों में ले रहा होता है. या यह कहें कि न्याय और लाभ को लेकर शक्तिशाली की जो दृष्टि है, वह उसी को आगे बढ़ाता है. आदर्श राज्य में लाभ का अभिप्रायः केवल मौद्रिक लाभ तक सीमित नहीं रहता. बल्कि उसके सारे कारोबार और संकल्प सामाजिक लाभ की दृष्टि के साथ रचे जाते हैं. राज्य व्यक्तियों से इतर संस्था नहीं है. वह अपने नागरिकों की सामूहिक इच्छा और संकल्पशक्ति का ही रूप है. राज्य की समस्त शक्तियां, संसाधन तथा लक्ष्य उसके नागरिकों के सामूहिक श्रम तथा इच्छा का सुफल होते हैं. इसलिए जो व्यक्ति ईमानदारी से अपना अपना काम करते हुए यथानिर्दिष्ट कराधान देता है, वह परोक्ष रूप में उन कार्यों को पूरा करने में भी सहभागी बनता है, जिनके लिए राज्य का गठन किया गया है. ऐसा व्यक्ति मौद्रिक अवदान के बदला सामाजिक लाभ के अपेक्षाकृत वृहत्तर संदर्भों में प्राप्त करता है.

थ्रेचाइमच्स का कथन सर्वथा गलत भी नहीं है. सामान्य धारणा यही है कि न्याय सदैव सबल का पक्ष लेता है. शक्तिशाली के आगे अदालतें भी झुक जाया करती हैं. रोजमर्रा के सामान्य अनुभवों से न्याय को लेकर एक दृष्टिकोण यह भी बनता है कि न्याय का जन्म दुर्बलों को शक्तिशाली वर्ग की लोभ, लालच और स्वार्थपरता से बचाने के लिए हुआ है. समाज में यदि सभी सबल हों अथवा सभी दुर्बल हो तो न्याय की कदाचित आवश्यकता ही न पड़े. इसलिए न्याय एक कृत्रिम व्यवस्था है, जो असमानताओं के अन्याय को पाटने के लिए जरूरी मानी गई है. उसे ‘भय की संतान’ या कमजोर का ‘रक्षाकवच’ भी कहा जा सकता है. प्रकृति में भी हम देखते हैं कि वहां जो शक्तिशाली है, वह सदैव लाभ की अवस्था में रहता है. इसलिए न्याय और कानून जैसी कृत्रिम व्यवस्थाएं कमजोर वर्ग की सुरक्षा और बेहतरी के लिए की गई हैं. वे शक्तिशाली वर्ग की मनमानी पर रोक लगाने तथा दुर्बल वर्ग को संरक्षण देने का काम करती हैं. ‘रिपब्लिक’ के अगले ‘संवाद’ में प्लेटो गलाकॉन के मुंह से कहलवाता है—‘जनसाधारण की मान्यता है कि न्याय को वास्तविक अच्छाई और शुभता का पर्याय कभी नहीं माना जा सकता. असल में वह ऐसी चीज है जिसको अन्याय न कर पाने की क्षमता के कारण स्वीकार्य माना जाता है.’ ग्लाकॉन के अनुसार न्याय की जरूरत कमजोर व्यक्ति की अन्याय न कर पाने की क्षमता तथा अन्यायी का सामना न करने की अक्षमता के कारण पड़ती है. दूसरे शब्दों में न्याय कमजोर की बैशाखी है, और शक्तिशाली की राह की बाधा. थ्रेचाइमच्स जहां न्याय को शक्तिशाली व्यक्तियों का हित स्वीकारता है, ग्लाकॉन उसे भय की भावना के कारण दुर्बल वर्ग के हित में बनाई कई अनिवार्यता की संज्ञा देता है. दोनों ही न्याय को बनावटी और दुर्बल वर्ग की रक्षा के लिए बनाई गई व्यवस्था स्वीकारते हैं. दोनों का मानना है कि न्याय को अपने आप में नैतिक या शाश्वत सिद्धांत नहीं माना जा सकता. अपने पक्ष को प्रस्तुत करते हुए थ्रेचाइमच्स कुतर्क की सीमा तक चला जाता है. उसके कहने का आशय है कि मनुष्य अपनी शक्ति के बल पर जितना समेट सकता है, उतना समेट लेने का उसे अधिकार है और यह काम उसे करते रहना चाहिए. इसी में उसका सुख है. वह संतोष को दुर्बल व्यक्ति द्वारा किया गया समझौता मानता है. लोकतंत्र में भी जनता यदि शासन की ओर से मुंह मोड़ ले, पूरी तरह निर्वाचित प्रतिनिधियों पर छोड़कर शासन की ओर से उदासीन हो जाए तो लोकतंत्र के अल्पतंत्र में बदलने में देर नहीं लगती. ऐसे राज्यों के कानून केवल अल्पतंत्र के हितों का ही रक्षण करते हैं. लोकतांत्रिक सरकारें निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा संचालित होती हैं. उनमें निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथों में जो संख्या में अत्यल्प होते हैं—कानून बनाने के अधिकार होते हैं. संयोग से अल्पतंत्र में भी कानून बनाने का अधिकार सीमित वर्ग के अधीन होता है. इसलिए जनता की उदासीनता अथवा जनमत के बंटा होने पर शासन-शिखर पर मौजूद लोगों को मनमानी का अधिकार मिल जाता है. परिणामतः जनतंत्र के अल्पतंत्र में बदलते देर नहीं लगती.

थ्रेचाइमच्स के अनुसार द्वारा ‘शक्तिशाली सदा सही’ कहना अनुभव-सिद्ध निर्णय था. जिस दौर में सोफिस्ट विचारधारा पनपी थी, उस दौर के शासकों के लिए शक्ति की सबकुछ थी. यूनान ही क्यों, प्राचीन सभी सभ्यताओं में लगभग वही स्थिति थी. भारत में इसे धर्म कहा गया है; और धर्म के नाम पर सत्ता के प्रत्येक धत्तकर्म को श्रेय की कोटि में रख दिया जाता था. राम जब शंबूक को मृत्युदंड देता है, निर्दोष पत्नी को वनवास की सजा सुनाता है अथवा बालि की छिपकर हत्या करता है, तो तत्कालीन विधान उसे दोष नहीं देता. उल्टे उसका महिमा-मंडन करता है. चूंकि राम वर्चस्वकारी संस्कृति का महानायक है, इसलिए उसके दोष पर पर्दा डालने के लिए समर्थन में तर्क गढ़ लिए जाते हैं. धर्म-विजय कहकर शक्तिशाली के वर्चस्व को अधिमान्य ठहराया जाता है. महाभारत युद्ध को जीतने के लिए कृष्ण कदम-कदम पर छल करता है. उसकी हर चतुराई और छल का भी धर्म बताकर महिमामंडन कर दिया जाता है. अपने स्तर पर यही काम संस्कृति भी करती है. इसे विजेता संस्कृति का दर्प भी कह सकते हैं, जो इतिहास और सांस्कृतिक प्रतीकों की व्याख्या अपने स्वार्थ के अनुरूप करती रहती है. प्लेटो का ध्येय न्याय संबंधी प्रचलित अवधारणाओं पर विचार करते हुए उसके वास्तविक रूप की पहचान करना है. थ्रेचाइमच्स का तर्क तत्कालीन यूनानी प्रभुवर्ग की सामान्य मानसिकता को दर्शाता है. चर्चा के दौरान सवाल करने पर वह कहता है—‘न्याय असल में दूसरों के कल्याण से ही संबंधित है. शासकवर्ग नियम बनाता है, इसलिए वह सदैव लाभ की अवस्था में रहता है.’ किसी न किसी रूप में वह उन्हीं नियमों को मान्यता देता है जो उसके लिए हितकारी हैं. जो व्यक्ति उन नियमों को एकतरफा मानकर उसका विरोध करता है, उन्हें वह दंडित करता है; अथवा उपेक्षित कर हाशिये पर ढकेल देता है.’ उस समय वह बड़ी चतुराई से संस्कृति, समाज तथा कानूनी प्रावधानों की अपने पक्ष में व्याख्या करता है. न्याय की यह अवधारणा सुकरात की निगाह में उचित नहीं है. यदि शक्तिशाली द्वारा मनमाने ढंग से, केवल अपने हितों में काम करने को न्याय मान लिया जाए तो उसकी मूल अवधारणा ही खतरे में पड़ जाएगी. न्याय को परखने के लिए वह तीन कसौटियां बनाता है—‘कौन-सा कार्य बुद्धिमत्तापूर्ण है?’ ‘सबसे सुरक्षित रास्ता क्या है?’ तथा ‘जीवन में शुभत्व की स्थापना किस प्रकार संभव है?’ सुकरात के लिए इनमें तीसरा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है.

‘रिपब्लिक’ की शैली में दार्शनिक गांभीर्य है. प्लेटो न तो व्यंजना का सहारा लेता है, न ही अनपेक्षित संवेदना को बीच में हालात है. ध्रेचाइमच्स के माध्यम से वह सोफिस्टों की न्याय-संबंधी अवधारणा को हमारे सामने लाता है. सोफिस्ट शक्ति का आराधन करने वाले थे. लेकिन उनके राज्य बड़े नहीं थे. जब चारों और शक्ति का बोलबाला हो और लोग समाज की समन्वित शक्ति के बजाय अपनी-अपनी शक्ति पर नाज करते हों तो संघर्ष की स्थितियां बनेंगी ही. सो उस समय तक राज्य नगरीय सीमाओं में सिमटे हुए थे. थ्रेचाइमच्स शक्ति के सर्वसत्तावादी दृष्टिकोण को हमारे सामने रखता है. सुकरात को माध्यम बनाकर प्लेटो उसका प्रतिवाद करता है. बताता है कि केवल शक्ति-आराधन से राज्य नहीं बनते. प्रत्येक समाज में ऐसे लोग होते हैं जो दूसरों के लिए समर्पण-भाव से जीना जानते हैं. डॉक्टर अपना पेशा दूसरों के भले के लिए चलाता है. अध्यापक ज्ञान बांटता है. दर्जी दूसरों के लिए वस्त्र सिलता है, कलाकर लोककल्याण की भावना के साथ चित्र बनाता है. ठीक है ये सब अपने-अपने कार्य के बदले में समाज से कुछ वसूलते हैं. डॉक्टर रोगी से फीस लेता है. अध्यापक को पढ़ाई के बदले वेतन मिलता है. इसी तरह दर्जी, कलाकार आदि भी अपने-अपने श्रम-कौशल के बदले समाज से कुछ न कुछ प्राप्त करते हैं. परंतु यह सब तो इसलिए आवश्यक है ताकि वे समाज को अपनी अनवरत सेवाएं प्रदान कर सकें. इससे उनके योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता. ‘रिपब्लिक’ में थ्रेचाइमच्स सुकरात के तर्कों के आगे शांत हो जाता है. परंतु जिस प्रकार वह शक्ति का पक्ष लेता है, उसके सर्वसत्तावादी दृष्टिकोण का समर्थन करता है, उसका प्रभाव पीढ़ियों तक बना रहता है. थ्रेचाइमच्स के दृष्टिकोण का विस्तार उनीसवीं शताब्दी में, नीत्शे के दर्शन में नजर आता है. प्लेटो ने जहां दार्शनिक सम्राट की परिकल्पन की थी, नीत्शे ने महामानव की परिकल्पना की, जो प्लेटो के दार्शनिक सम्राट जैसा ही सर्वगुणसंपन्न, विराट व्यक्त्वि का स्वामी है. अपनी पुस्तक The genealogy of morals में वह  ‘दास नैतिकता’ और ‘स्वामी नैतिकता’ की बात करता है. उसके अनुसार स्वामी के नैतिक मूल्य शक्ति, सदाचरण, सज्जनता, अच्छे और बुरे को परखने की दृष्टि से देखे जा सकते हैं, जो दास की नैतिकता ‘समर्पण’, दयालुता, मानवता, करुणा और संवेदना से परखी जा सकती है.

प्लेटो मानता है कि सृष्टि में पूर्ण समानता असंभव है. जितने भी प्राणी हैं उनमें परस्पर अनेक भिन्नताएं हैं. प्रकृति में देखा जाता है कि शक्तिशाली कमजोर पर राज्य करता है. उसपर अधिकार जमाकर किसी न किसी रूप में उसके अधिकारों का हनन करता है. ऐसे में राज्य की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है. राज्य प्राकृतिक असमानताओं की खाई को पाटते हुए लोगों को समान धरातल पर लाने का प्रयास करता है. यही उसके गठन का उद्देश्य भी है. साधारण सोच यही है कि शक्तिशाली को दुर्बल पर राज्य करना चाहिए. वृहद सामाजिक हितों के लिए यह अत्यावश्यक है. सोफिस्ट चिंतक यही मानते थे. ‘जार्जियस’ नामक संवाद में प्लेटो स्वयं यूनानी विचारक केलीक्लिस के विचारों से सहमत नजर आता है. वह स्वीकारता है कि प्राकृतिक आधार पर असमानताओं की भरपाई के लिए शक्तिशाली को समाज के कमजोर पक्षों का समर्थन, प्रोत्साहन करते हुए शासन करना चाहिए. इसी से प्राकृतिक स्तर पर गैरबराबरी को कम किया जा सकता है. सुकरात वहां भी प्रतिवादी के रूप में उपस्थित हो जाता है. वह उसी प्रश्न को दोहराता है, जो उसने थ्रेचाइमच्स से किया था कि श्रेष्ठतम के चयन की कसौटी क्या हो? शक्ति या फिर बुद्धिमत्ता? केवल ताकत के भरोसे शासन करना संभव नहीं है. जनता की सामूहिक शक्ति किसी भी शक्तिशाली शासक के कुल सैन्य-सामर्थ्य से अधिक होती है. प्रजा ही कभी समर्थन तो कभी निष्क्रिय रहकर राज्य के सर्वसत्तासंपन्न होने का भ्रम पैदा करती है. युद्ध तक में शारीरिक बल से अधिक बुद्धिबल की आवश्यकता पड़ती है. दूसरे शारीरिक बल को श्रेष्ठता का पर्याय मान लेना प्रकारांतर में प्राकृतिक न्याय को सामाजिक न्याय मान लेने जैसा ही है. यदि मान लिया जाए कि शक्ति ही सबकुछ है तो उसके आधार पर प्रतिफल की अपेक्षा से कौन रोक सकता है. सुकरात के अनुसार केलीकिल्स न्याय की मूल-भावना को पकड़ने में असमर्थ है. केवल शक्ति को न्याय का पर्याय बताकर वह अन्याय का पक्ष लेने की गलती कर जाता है. पहले चरण की बहस बेनतीजा समाप्त होती है. उससे हम यह तो जान लेते हैं कि ‘न्याय क्या नहीं है’, परंतु यह नहीं जान पाते कि ‘न्याय वास्तव में क्या है?’

© ओमप्रकाश कश्यप

न्याय की पाश्चात्य अवधारणा

सामान्य
न्यायमूलक भावना ही मनुष्यता के साथ प्रेम संबंधों का नैरन्तर्य है.1जॉन रॉल्स

न्याय बड़ा खूबसूरत शब्द है. साथ में सम्मानित भी. परंपरा में वह शब्दों का ‘अभिजन’ है. इसीलिए जो व्यक्ति ईमानदार और न्यायकर्ता है, जिसके पास न्याय करने का अधिकार है. किसी भी दबाव, विशेषकर सत्ता के दबावों से जो मुक्त है, ‘दूध को दूध और पानी को पानी’ सिद्ध करने की कला जिसे आती है—जनसाधारण उसकी ओर उम्मीद-भरी निगाह से देखता है. आवश्यकता पड़ने पर वह अपने जीवन में ऐसे ही न्याय की कामना करता है. किसी भी समाज में न्याय का स्तर उस समाज में मानवीय अधिकारों की पहुंच का भी संकेतक होता है. समृद्ध न्याय-बोध हेतु परिपक्व अधिकारबोध आवश्यक है. परंपरागत समाजों में मनुष्य का अधिकारबोध, सामूहिकताबोध के दबावों से मुक्त नहीं हो पाता था. सामूहिकता का दायरा परिवार, बस्ती, जाति-समूह, पंचायत वगैरह कुछ भी हो सकता था. साधारणजन उन्हीं के बीच रहते हुए प्रचलित सांस्कृतिक प्रतीकों, लोकगाथाओं, रूपकों और मिथों से अपने न्यायबोध का संस्कार करता था. हालात आज भी वही हैं. आज भी किस्से-कहानियां जनसाधारण के न्यायबोध को बनाते हैं. बचपन से ऐसे अनेकानेक किस्सों, मिथों, धार्मिक प्रतीकों और गाथाओं से उसका वास्ता पड़ता है, जो उसे न्याय की प्रतीति कराते हैं. या जिन्हें उसके समक्ष न्याय के मानक के रूप में पेश किया जाता है. ‘जहांगीर का न्याय’, ‘अकबर-बीरबल’, ‘खोजा-बादशाह’, ‘मुल्ला नसरुद्दीन’, उपनिषदों और महाकाव्यों की कहानियों के अलावा समाज में लोक-किस्सों की भरमार हैं. उलझनों के बीच वही हमारी प्रेरणा बनते हैं. वही हमारे लोकमानस को बनाते हैं. उन्हीं से हमारे भीतर न्याय का संस्कार बनता है. भारतीय धर्मग्रंथों में यमराज को भी न्याय-प्रिय बताया गया है. उसे लेकर अनेक कहानियां और मिथ समाज में विद्यमान हैं. चूंकि उनके मूल में मिथकीय अंश ज्यादा हैं, इसलिए वे न्यायबोध को निखारने के बजाय तयशुदा निष्पत्तियों को थोपने का ही काम करते हैं. अपने समग्र प्रभाव में वे व्यक्ति को न्याय की मूल अवधारणा से दूर ले जाते हैं. जिस न्याय पर हम फिलहाल विचार करने जा रहे हैं, उसका दायरा विस्तृत है. वह बादशाह, काजी, अदालत, यमराज या किसी दयालु सम्राट के परंपरागत न्याय-बोध से परे है. न्याय के विविध रूपों पर विचार करने से पहले दो किस्से, बतौर उद्धरण यहां प्रस्तुत हैं—

‘महमूद गजनबी का पिता सुबुक्तगीन गजनी के बादशाह का गुलाम था. कहते हैं कि प्रतिभा किसी की चेरी नहीं होती. गरीब के घर विद्वान जन्म ले सकता है, और तमाम इंतजामात के बावजूद बादशाह का बेटा निकम्मा, आलसी, दुर्व्यसनी और मंदबुद्धि हो सकता है. तुर्की मूल के गुलाम सुबुक्तगीन की प्रतिभा को देखते हुए गजनी के बादशाह ने उसे अपना दामाद बना लिया था. अवसर मिला तो सुबुक्तगीन की साम्राज्यवादी लालसाएं जोर मारने लगीं. उसने भारत पर आक्रमण कर कांधार पर कब्जा कर लिया और वहां अपनी छावनी बना दीं. सुबुक्तगीन भारतीय इतिहास में खुद तो ज्यादा हस्तक्षेप न कर सका. लेकिन उसके बेटे महमूद गजनवी ने भारत के बड़े हिस्से पर कब्जा कर अपनी सलनत कायम कर ली. महमूद गजनवी भले ही सुलतान हो, हजारों सैनिकों की फौज का बेड़ा रखता हो. परंतु यह बात वह भी भली-भांति जानता था कि राजा-महाराजाओं को तलवार के दम पर दबाया जा सकता है. परंतु प्रजा को तलवार के बल पर लंबे समय तक दबा पाना असंभव होता है. निहत्थी जनता यदि अपनी पर आ जाए तो बड़े-बड़े साम्राज्य भू-लुंठित होने लगते हैं. हां, उसे भुलावे में जरूर रखा जा सकता है. धर्म, परंपरा, संस्कृति, राष्ट्रवाद जनता को भुलावे में रखने के ही उद्यम हैं. निजी मंसूबों को साधने के लिए चालबाज लोग इन्हीं का सहारा लेते आए हैं. भारतीय राजाओं का इतिहास रहा है कि वे आपसी फूट द्वारा प्रतिपक्षी की विजय को खुद आसान बना देते थे. सुबुक्तगीन को इसी का लाभ मिला था. अपनी छोटी-सी सेना की मदद से उसने युद्ध में स्थानीय राजा जयपाल को बुरी तरह पराजित किया था. उस युद्ध में जयपाल ने एक लाख सैनिक उतारे थे. परंतु युद्ध कौशल का अभाव और आपस की फूट ने उसे हथियार डालने को विवश कर दिया था.

बड़ी सलतनत खड़ी करने और लंबे समय तक बनाए रखने के लिए प्रजा का भरोसा जीतना भी आवश्यक है. सो मोहम्मद गजनवी ने प्रजा को न्याय का भरोसा दिलाया. विश्वास दिलाया कि न्याय के आगे बादशाह हो या फकीर सब बराबर हैं. ‘मनुस्मृति’ के विधान के जरिये ऊंच-नीय और गैरबराबरी में जीने वाले भारतीय जनसमाज के लिए ‘इस्लाम का बराबरी का सिद्धांत’ बड़ा ही आकर्षक सिद्ध हुआ. वर्ण-व्यवस्था के सताए लोग इस्लाम में दीक्षित होने लगे. नए धर्म में शामिल होने के बाद उनके हालात में क्या सुधार हुआ, यह कहना कठिन है. परंतु यह बात सही है कि इस्लाम अपने साथ कई आकर्षक परंपराएं भी लेकर आया था. प्राचीन फारस में न्याय के लिए काजी नियुक्त करने की व्यवस्था थी. काजी उसे बनाया जाता था जो अनुभवी हो. निडर हो. राजा-प्रजा के भेद से जिसका न्याय प्रभावित न होता हो. महमूद का काजी था—मोहतसिब. वह सुलतान के किसी भी आदेश से बरी था. न्याय के लिए उसे किसी खास समय की दरकार न थी. इसलिए लोग उसे चलता-फिरता न्यायालय मानते थे. उसका देखा-सुना ही प्रमाण था. घटना का यदि वह स्वयं साक्षी हो तो बिना किसी औपचारिकता के घटना-स्थल पर अदालत लगा, मामले को वहीं निपटा देता था. राज्य में सामाजिक स्थलों पर शराब पीने या शराब पीकर बाहर निकलने पर पूरी पाबंदी थी. एक दिन सुलतान और उसके सरदार ने शराब पी. नशे से दोनों झूमने लगे. शराब पीने के बाद सरदार ने घर जाने की इच्छा जाहिर की. इस पर सुलतान ने उसे रोका. समझाया कि नशा उतरने के बाद बाहर निकलना. लेकिन सरदार न केवल शराब का बल्कि रुतबे का नशा भी सवार था. सो सुलतान की सलाह की परवाह किए बिना वहां से चल दिया. संयोग ऐसा कि उसी समय काजी मोहतसिब खाना खाने के बाद घूमने के लिए निकला था. उसने सरदार को डगमगाते कदमों से गुजरते देखा तो गुस्सा आ गया. तत्क्षण सरदार को गिरफ्तार कर कोड़े लगाने का दंड सुनाया गया. न्याय हुआ, स्वयं बादशाह अपने चहेते सरदार को बचा न सका.’

ऐसे किस्सों में कितना सच होता है कितना झूठ, यह ठीक-ठीक बता पाना आसान नहीं है. सभी राजा-महाराजा, बादशाह-सुलतान दरबार में भाटों को नियुक्त रखते थे. उनका काम ही था, राजा की महिमा का बखान करते रहना. ताकि जनता को अपने राजा पर भरोसा बना रहे. उस समय तक ‘राजा’ और ‘राज्य’ में बड़ा अंतर नहीं था. राजा एक व्यक्ति के साथ-साथ संस्था भी होता था. उसकी इच्छा ही न्याय होती थी. जाहिराना तौर पर उसका झुकाव राजा के करीबियों की ओर अधिक होता था. न्याय के दूसरे स्वरूप को जानने के लिए दूसरा किस्सा प्रस्तुत है. यह न्याय से जुड़े नैतिक पक्ष की ओर संकेत करता है. महाभारत के वनपर्व में राजा उशीनर के न्याय की कहानी आई हैं. कुछ पुराणों इस कहानी को महान असुरराज बलि की दानवीरता से भी जोड़ा गया है—

‘एक दिन उशीनर दरबार में बैठे हुए थे कि एक घबराया हुआ कबूतर उनकी गोद में आकर गिरा. पीछे-पीछे एक बाज भी वहां आ पहुंचा. शरणागत की रक्षा के लिए उशीनर ने तलवार उठा ली. इस पर बाज बोला—‘महाराज! यह मेरा भोजन है. इसपर मेरा अधिकार है.’ उशीनर ने कबूतर की आंखों में झांककर देखा, वहां भय ही भय था. उसे देख राजा ने कहा—‘यह मेरी शरण में आया है और शरणागत की रक्षा करना मेरा धर्म है.’ बाज इस प्रश्न के उत्तर के लिए तैयार था. बोला—‘आपकी दया और दानवीरता के अनेक किस्से मैं सुन चुका हूं. इस समय मैं भूख से व्याकुल हूं. अगर जल्द कुछ इंतजाम न हुआ तो मैं यहीं दरबार में सबके सामने अपने प्राण त्याग दूंगा. राज्य में भूख के कारण मेरी अकाल मृत्यु के जिम्मेदार एकमात्र आप होंगे.’

उशीनर पेशोपेश में पड़ गया. कबूतर भयभीत था. राज्य-धर्म कहता था, शरण में आए की रक्षा करना. दूसरी ओर बाज भी अपनी जगह सही है. सृष्टि में ऐसे अनेक प्राणी है जिनका आहार दूसरे जीव हैं. प्रकृति की इस व्यवस्था को भी नहीं बदला जा सकता. सहसा राजा ने निर्णय लिया. उसका दायां हाथ उठा. कटार चली. राजा ने जांघ पर प्रहार कर मांस का एक हिस्सा शरीर से अलग कर दिया—‘कबूतर के मांस के बराबर मेरा मांस लेकर तुम अपनी क्षुधा शांत कर सकते हो.’

पहले किस्से में न्याय का लोक-प्रचलित रूप है. न्याय को लेकर सामान्य धारणा इसी प्रकार की होती है. राज्य का कर्तव्य है कि वह प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की रक्षा करे. प्राणरक्षा करना कबूतर का भी अधिकार है. बाज के सामने जब वह खुद को बचा नहीं पाता तो राजा की शरण लेता है. तभी बाज अपने दावे के साथ उपस्थित हो जाता है. एक तरह से दोनों का जीवन दाव पर लगा है. बाज सोचता है कि भोजन नहीं मिला तो उसके प्राण चले जाएंगे. दूसरी ओर कबूतर भी जानता है कि यदि वह बाज के प्राकृतिक अधिकार के आगे झुका तो वह स्वयं अपने जीवन से हाथ धो बैठेगा. उशीनर कबूतर और बाज दोनों के जीवन के अधिकार का सम्मान करता हुआ, तीसरा जो अपेक्षाकृत निरापद रास्ता है, अपनाता है. कबूतर के भार के बराबर अपना मांस देकर वह बाज के जीवन की रक्षा करता है. यह न्याय की पराकाष्ठा है, जिसमें राज्य(उशीनर) किसी भी पक्ष को हानि पहुंचाए बिना उन्हें संतुष्ट कर देता है. यह अपेक्षाकृत दुर्बल प्राणियों के प्रति राज्य के कर्तव्य को दर्शाता है. ऐसी अवस्था में वकील, अदालत आदि की भूमिका अप्रासंगिक हो जाती है. पहले किस्म के न्याय का परिष्कृत रूप हम अदालतों में देखते हैं. न्याय के प्रति जनसाधारण का दृष्टिकोण न्यायालयों में होने वाले न्याय तक सीमित होता है. कई बार क्षोभ और हताशा में डूबा व्यक्ति पुकार उठता है—‘दुनिया से न्याय मानो उठ-सा गया है.’ उस समय उसकी शिकायत पूरे समाज, देश और व्यवस्था से होती है. दूसरी कहानी में न्याय का स्वरूप परिष्कृत है. वहां भौतिक संसाधनों की अपेक्षा अधिकार और कर्तव्य पर चर्चा होती है. न्याय करते हुए उशीनर सामान्य दंडाधिकारी से बहुत ऊपर उठ जाता है. वादी और प्रतिवादी में से किसी को कष्ट न हो, इसलिए वह स्वयं कष्ट-पीड़ा सहकर न्याय का संकल्प उठाता है. हालांकि न्याय की आधुनिक सैद्धांतिकी पर ऐसे उद्धरण पूरी तरह खरे नहीं उतरते.

धर्म-केंद्रित समाजों की सामान्य धारणा होती है कि केवल परमात्मा की कृपा और उसका डर मनुष्य को धर्म की ओर प्रवृत्त कर सकता है. इसलिए हर धर्म के साथ कुछ न कुछ सिद्ध-निषिद्ध जुड़े होते हैं. मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि जो सामाजिक रूप से अनुमन्य है, उसका पालन करे तथा जिन कार्यों को निषिद्ध घोषित किया गया है—उनसे अपेक्षित दूरी बनाए रखे. ये शिक्षाएं विभिन्न सांस्कृतिक कार्यकलापों, किस्से-कहानियों, गाथाओं और मिथकों के माध्यम से जनता तक पहुंचती हैं. उपर्युक्त दोनों कहानियां धर्म के न्यायशील पक्ष को दर्शाती हैं. दोनों राजशाही के दौर की हैं. जिस दौर की ये कहानियां हैं वहां असहमतियों के लिए बहुत कम गुंजाइश थी. इसलिए वर्षों-वर्ष राज्य की मर्जी को ही धर्म और न्याय कहकर महिमा-मंडित किया जाता रहा. प्रकारांतर में ये कहानियां न्याय के दो भिन्न रूपों की ओर हमारा ध्यानाकर्षित करती हैं. जैसा कि अध्याय के आरंभ में ही कहा गया है, इस तरह की कहानियां ही जनसाधारण की चेतना का निर्माण करती हैं. यदि यह सच है तो न्याय को धर्म का विस्तार अथवा उसका प्रतिफल मानने में संकोच कैसा? वैसे भी धर्म जनसाधारण के बीच न्याय की अपेक्षा कहीं लोकप्रिय शब्द है. धर्म का इतिहास भले ही खून-खराबे का रहा हो, पुरोहितों ने उसके सहारे अपना धंधा खूब चमकाया हो, परंतु उसे सामाजिकता का आधार बनाने वाले आरंभिक मनीषियों की नीयत पर संदेह नहीं किया जा सकता. यदि उन्होंने समाज की सुख-शांति के लिए डर को आवश्यक माना तथा समाज उसके कारण शताब्दियों तक अनुशासित रहा तो आगे भी उसका अनुसरण करने में बुराई क्या है! प्रश्न जितना आसान दीखता है, उत्तर उतना सरलीकृत नहीं है. धर्म-प्रधान राज्यों की न्याय व्यवस्था को देखकर इस वास्तविकता को समझा जा सकता है. अपना औचित्य सिद्ध करने के लिए प्रत्येक धर्म नैतिकता का समर्थन करता है. यह बात अलग है कि धर्म-प्रेरित नैतिकता स्वयं स्फूर्त्त नहीं होती. वहां ईश्वर या परमात्मा के रूप में तीसरी सत्ता अवश्य होती है. ऐसी सत्ता जो सर्वोपरि है. सर्वशक्तिमान भी है. जिसका स्वरूप अनिश्चित और अदृश्य है. सर्वोपरि और सर्वशक्तिमान बताकर उसका हर निर्णय अंतिम मान लिया जाता है. वहीं स्वरूप निश्चित न होने के कारण व्यक्ति को यह अवसर मिलता है, कि वह ईश्वर के नाम पर अपनी इच्छाएं थोप सके. धर्मप्राण मनुष्य के सद्कर्म और इच्छाएं बिना ईश्वर को बीच में लाए पूरी नहीं होतीं. परिणामस्वरूप उसके लिए जीवन और व्यक्ति दोनों का महत्त्व घट जाता है. वह अपने फैसले व्यक्ति और समाज की जरूरत के बजाय तीसरी शक्ति को प्रसन्न करने की चाहत के साथ लेने लगता है. ‘रिपब्लिक’ में सुकरात के साथ चर्चा करते हुए ग्लाकॉन नामक पात्र धर्माधारित न्याय की इसी कमजोरी की ओर इशारा करता है. इससे विकास के मायने और लक्ष्य दोनों बदल जाते हैं. प्राचीन सम्राट धर्मालयों के निर्माण पर जितना खर्च करते थे, लोकमहत्त्व के निर्माण यथा सड़क, चिकित्सालय, नहर, स्कूल आदि पर बहुत कम खर्च होता था. भारतीय राजाओं ने देश में जितनी बड़ी संख्या में मंदिर बनवाए, उसका दसवां हिस्सा भी यदि विद्यालय बनवाए होते तो समाज की हालत दूसरी होती. उन्होंने शिक्षा की जिम्मेदारी उस वर्ग को सौंपी हुई थी, जिसके वर्गीय स्वार्थ प्रबल थे. यही कारण है कि शिक्षा भारत में सदा ही धर्म का पूरक संस्कार बनी रही, उसके प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण कभी नहीं पनप सका. बावजूद इसके प्राचीन समाजों में जनविद्रोह की घटनाएं विरल हैं. यह भी संभव है कि जानबूझकर उनका उल्लेख करने से बचा गया हो. इतिहासकारों, लेखकों और कवियों ने उनके दस्तावेजीकरण में उपेक्षा बरती हो. क्योंकि उस दौर में सामाजिक-राजनीतिक घटनाओं को धर्म और सत्ता की दृष्टि से देखने का चलन था. धर्म का जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हस्तक्षेप था. यह जानते हुए भी कि जिसे धर्मानुशासन कहा जाता है, वह स्वयं-स्फूर्त्त नहीं होता. मनुष्य को उसकी कीमत अपने विवेक के रूप में चुकानी पड़ती है, जिससे अपने बुद्धि-विवेक से निर्णय लेने का अभ्यास निरंतर कम होता जाता है.

उपर्युक्त के बावजूद लंबे समय तक न्याय का धर्म-केंद्रित होना ही ‘श्रेष्ठतम न्याय’ माना जाता रहा. वैदिक युग से लेकर दो-ढाई सौ वर्ष पहले तक भारत में यही व्यवस्था काम करती रही. हालांकि ईश्वर को किसी ने देखा नहीं था, धर्म की परिभाषाएं आपस में गड्ड-मड्ड थी, फिर भी लोग एक-दूसरे को समझाते—‘दुनिया धर्म पर टिकी है. ईश्वर सच्चा न्यायकर्ता है.’ यह सोचते हुए वे अपने जीवन के महत्त्वपूर्ण निर्णय भी दूसरों के हवाले कर देते. बिना यह सोचे-विचारे कि ईश्वर के नाम पर स्वार्थ का सारा कारोबार उसके चेले-चपाटों ने कब्जाया हुआ है. चूंकि तीसरी शक्ति का कल्पना से बाहर कोई अस्तित्व नहीं है, इसलिए जनसाधारण ईश्वरेच्छा के नाम पर चंद लोगों की मनमानी का दास होकर रह जाता है, जिन्हें वह अपना गुरु अथवा अधीश्वर मानता है. उनके प्रभाव में न्याय व्यक्ति का अधिकार न रहकर शीर्ष पर बैठे लोगों की अनुकंपा मान लिया जाता है. इसी के साथ व्यक्ति से निर्णय की आलोचना का अधिकार छिन जाता है. कई बार तो न्याय की आलोचना या विरोध को दैवीय इच्छा का अपमान मान लिया जाता है. इस कोशिश में मानवीय अस्मिता को पीछे ढकेल दिया जाता है. मनुष्य के मान-सम्मान, आत्मगौरव, सहज विश्वास यहां तक कि स्वतंत्र पहचान को भी धर्म की राह में बाधक मान लिया जाता है. यह नजरंदाज कर दिया जाता है कि न्याय व्यक्ति का अधिकार, राज्य का अपने नागरिकों के प्रति पवित्रतम दायित्व है. उसे राज्य की अनुकंपा मानना समाजीकरण के उद्देश्यों पर पानी फेरने जैसा है. न्यायशीलता राज्य और राजा दोनों का अभीष्ट गुण है. यदि किसी धर्म में यह गुण मौजूद है तो निश्चित रूप से वह प्रशंसनीय है. फिर भी न्याय को धर्म का प्रतिफल मानना सर्वथा अनुचित होगा. उसे लोकचेतना का विस्तार अवश्य कहा जा सकता है. अरस्तु के शब्दों में न्याय, ‘समाज का शुभत्व है, वही राज्य को शुभत्व प्रदान करता है.’

अभी तक के विश्लेषण से न्याय की दो प्रवृत्तियां उभरती हैं. अदालतों में वकील, जज आदि के माध्यम से होने वाला न्याय. दूसरे अपने नागरिकों के प्रति राज्य के कर्तव्य के रूप में निरूपायित न्याय. भारतीय धर्मग्रंथों में न्याय के प्रथम रूप पर पर्याप्त चर्चा है. ब्राह्मण ग्रंथों, स्मृतियां और धर्मसूत्रों में इसपर खुलकर विचार किया गया है. उसे राज्य का कर्तव्य बताया गया है. परंतु न्याय के दूसरे पक्ष जो नागरिक-समाज के प्रति राज्य के दायित्व को दर्शाता है, को लेकर भारतीय वाङ्मय में गहरी चुप्पी पसरी है. अर्थशास्त्र में राजा के सामने हालांकि लोकहित का बड़ा आदर्श रखा गया है. जोर देकर कहा गया है—‘प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है. प्रजाहित में राजा का हित सन्निहित है.’2 ‘विष्णु धर्मसूत्र’ में भी इस भावना को विस्तार दिया गया है. तदनुसार—‘जो राजा प्रजा के सुख में सुखी, उसके दुख में दुखी हो जाता है. उसे संसार में अपनी कीर्ति बनाए रखने के लिए यज्ञ और तपादि की आवश्यकता नहीं है.’3 लेकिन यही ग्रंथ जब राजा को पृथ्वी का ईश्वर या देवता घोषित करते हैं, और उसके हाथ में सारे अधिकार सौंप देते हैं, और उत्तराधिकार में अंतरित राजन्य जब अयोग्य हाथों में पहुंचकर मनमानी का अवसर देता है, तब वह एक ऐसी निरंकुश शक्ति का प्रतीक बन जाता है, जिसका निर्णय समीक्षा और आलोचना से परे है. इन ग्रंथों के अनुसार राजा अकेला ही रक्षक, प्रजापालक, अन्नदाता, दंडाधिकारी वगैरह सबकुछ होता था. फैसले पर कोई सवाल न उठे, इसलिए उसके निर्णय को देववाणी घोषित कर दिया जाता था.

न्याय की दृष्टि से पश्चिमी दर्शन अपेक्षाकृत उदार रहे हैं. विशेषकर सुकरात और उसके बाद के यूनानी विचारक. मानव-केद्रित होने के कारण वे नियतिवाद से उतने प्रभावित नजर नहीं आते, जितने भारतीय धर्म-दर्शन. ऐसा नहीं है कि यूनानी साहित्य मिथकीय प्रभावों से सर्वथा मुक्त रहा है. इस आधार पर यूनानी दर्शनों को सुकरात पूर्व और सुकरात के बाद के दर्शनों में बांटा जा सकता है. सुकरात पूर्व के यूनानी दर्शनों पर मिथकीय चरित्रों का वैसा ही प्रभाव है, जैसा भारतीय धर्म-दर्शनों पर. कुछ अंशों में यह प्लेटो के विचारों पर भी बना रहता है. लेकिन प्लेटो उससे सिर्फ प्रेरणा लेता है. अपने विचारों को परंपरा से बांधता नहीं है. अरस्तु सहित उत्तरवर्ती विचारक उसे और भी विस्तार देते हैं. वस्तुतः ईसा पूर्व छठी शताब्दी का समय पूरी दुनिया में बौद्धिक क्रांति का था, जिसमें विश्वास को तर्क की कसौटी कसा जाने लगा था. भारत में उसके सूत्रधार थे— गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी तथा यूनान में सुकरात, प्लेटो, जेनोफीन, डेमीक्रिटिस आदि. भारत में जैन एवं बौद्ध दर्शन के अलावा अनीश्वरवादी विचारक यथा आजीवक, लोकायत, वैनायिक भी वैदिक परंपरा के धर्म-दर्शनों का तार्किक विरोध कर रहे थे. फिलहाल उनके पक्ष में शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध न होने के कारण कुछ भी कहना अनुचित होगा. बुद्ध और सुकरात दोनों ने अपने-अपने देश में ठेठ परंपरावाद, आडंबर और दिखावे का जोरदार विरोध किया था. दोनों ने दर्शन के क्षेत्र में व्यावहारिकता को समर्थन दिया. यूनान में सुकरात आदि के नेतृत्व में उभरे बौद्धिक आंदोलनों ने मिथकीय विश्वासों को दर्शन के क्षेत्र से करीब-करीब अलग-थलग कर दिया था. इससे न्याय के क्षेत्र में स्वतंत्र चिंतन को बल मिला.

एक प्रसिद्ध ग्रीक कहावत है—‘मनुष्य अपने लिए न्याय का दरवाजा स्वयं खोलता है.’ इसका मंतव्य एकदम स्पष्ट है. जब भी कोई मनुष्य अपने मित्रों, सगे-संबंधियों, पड़ोसियों तथा परिजनों के प्रति न्याय-भाव से परिपूर्ण आचरण करता है, तो उसके अपने लिए न्याय के रास्ते प्रशस्त हो जाते हैं. उसे न्याय के लिए भटकना नहीं पड़ता. आवश्यकता पड़ने पर न्याय स्वयं उस तक चला आता है. दूसरे शब्दों में ‘न्याय ही न्याय को कमाता है.’ कदाचित इसीलिए सुकरात ने कहा था—‘न्याय समाज का सद्गुण है. वह समाज में शुभत्व की उपस्थिति को दर्शाता है.’ सुकरात की यह अवधारणा न्याय की आधुनिक परिभाषा के काफी निकट है. हालांकि यूनान में सुकरात के पहले से ही न्याय को समझने की कोशिश होती रही है. सोलोन की कविता में कहा गया है कि ‘बिना कानून के राज्य को कानून एवं व्यवस्था के राज्य में बदल देना चाहिए.’4 यूनानी धर्मशास्त्रों में ‘दाइक’ को न्याय की देवी बताया गया है. हेसियद की कविता में ‘दाइक’ को ‘क्रूरता को समाप्त करने के लिए जीयस की ओर से उपहार’ बताया गया है. प्लेटो ने ‘दाइक’ को दंड के निषेध के रूप में, उदारता एवं विवेक से न्याय करने वाली पराशक्ति के रूप में परिभाषित किया है. ‘दाइक’ की प्रतिपक्षी के रूप में ‘अदाइका’ का उल्लेख है, जिसे यूनानी धर्मशास्त्रों में ‘अन्याय’ की देवी माना गया है. मिथकीय गाथा के अनुसार ‘दाइका’ अन्याय की देवी ‘अदाइका’ को छड़ी से पीटकर भगा देती है. रोमन धर्मशास्त्रों में ‘दाइक’ की समकक्ष देवी ‘जस्टीटिया’ है. दोनों अपने हाथ में न्याय के प्रतीक के रूप में ‘तराजू’ को उठाए रहती हैं. स्पष्ट है कि भारतीय धर्मशास्त्रों की भांति प्राचीन यूनानी एवं रोमन धर्मशास्त्रों में भी न्याय की आरंभिक अवधारणा रूढ़ ही रही है. उसमें बदलाव ईसा पूर्व छठी शताब्दी के बाद से दिखाई पड़ता है. सुकरात उसका प्रमुख सूत्रधार है.

उन दिनों का यूनानी समाज युद्ध-प्रिय समाज था. यूनानी द्वीप समूह पर छोटे-छोटे राज्य थे. उनके बीच आपस में युद्ध होता रहता था. स्पार्टा और एथेंस के बीच तो शताब्दियां पुराना वैर-भाव था. वहां का पूरा समाज युद्धक मानसिकता में जीता था. वास्तविक नायकों की पूजा के दौर में मिथकों का अप्रासंगिक हो जाना स्वाभाविक भी था. उस समय के सभी प्रमुख विचारकों हिरोटोडस, एनेक्सिमेंडर, पेरामेनीडिस, प्लेटो, जेनोफीन, हेराक्लाट्स आदि के विचार युद्धक भावनाओं से भरे हैं. एनेक्सिमेंडर(610—546 ईस्वीपूर्व), हेराक्लाइट्स जैसे विद्वान युद्ध को सकारात्मक अर्थ में देखते थे. वह न्याय को ऐसे ही अंत:संघर्षों का परिणाम मानता था. उसका मानना था, ‘युद्ध सामान्य बात है. न्याय दो पक्षों में विक्षोभ की परिणति है. उसके परिणाम विवाद की प्रवृत्ति और आवश्यकता के अनुसार बदलते रहते हैं.’ एनेक्सिमेंडर भी न्याय को व्यवहार की श्रेष्ठता के रूप में देखता था. उसके अनुसार मनुष्य का कर्तव्य है—‘परस्पर न्याय-भावना के साथ पेश आना और एक-दूसरे के अन्याय को भूलते चले जाना.’ उसके अनुसार न्याय को उस रूप में देखना चाहिए जिसके अनुसार वस्तुएं अपने स्वाभाविक रूप में आकार ग्रहण करती हैं तथा किसी समय विशेष में दूसरी वस्तुओं पर प्रभाव डालती हैं. उल्लेखनीय है कि एनेक्सिमेंडर की न्याय-संबंधी अवधारणा में समानता और स्वतंत्रता के लिए कोई जगह नहीं थी. उसका महत्त्व न्याय को दार्शनिक विवेचना की विषय-वस्तु बनाने के कारण है.

उस समय पूरे यूनान में दास प्रथा थी. अर्थव्यवस्था में दासों की संख्या का बड़ा योगदान था. सुकरात के समय एथेंस की कुल जनसंख्या लगभग तीन लाख थी. उसमें से 125000 दास तथा लगभग 25000 कृषिदास अथवा अर्धदास थे. कृषिदास मुख्यतः कृष्ट भूमि से जुड़े किसान थे. भू-अधिकार में परिवर्तन के साथ ही उनका स्वामित्व भी नए भू-स्वामी के हाथों में अंतरित हो जाता था. अर्धदासों में छोटे शिल्पकार और कारीगर भी आते थे. एथेंस और रोम की संपन्नता का सारा दारोमदार उन्हीं के कंधों पर था. इसलिए दर्शन के क्षेत्र में शुभत्व और सदगुण की मांग करने वाले सुकरात, प्लेटो और अरस्तु जैसे विचारक भी दास प्रथा के समर्थक थे. वे उसे समाज की आवश्यकता के रूप में देखते थे. अभिजात वर्ग में जन्मे विचारकों के लिए उस व्यवस्था का विरोध एकाएक संभव भी न था. न्याय संबंधी उनकी अवधारणा जीवन में सामान्य नैतिकता के अनुपालन तक सीमित थी. एनेक्सिमेंडर के लिए न्याय का सामान्य अर्थ था—व्यक्ति के संपत्ति-अधिकारों की सुरक्षा. उन दिनों यूनानी देशों की परंपरा थी कि यदि किसी कुलीन परिवार की स्त्री का पति मर जाता था, तो उसकी संपत्ति राज्य के अधीन मान ली जाती थी. इस कानून के विरोध में स्त्रियां मोर्चा निकाल चुकी थीं. एनेक्सिमेंडर जैसे कुछ विचारक कुलीन परिवार की विधवाओं को संपत्ति अधिकार देने के पक्ष में थे. दूसरे की संपत्ति पर अधिकार को अनैतिक माना जाने लगा था. सुकरात के समकालीन थियोगनिस की काव्य-पंक्तियों में तत्कालीन समाज में न्याय एवं कानून-व्यवस्था के प्रति क्षोभ समाया हुआ है—

‘उन्होंने हिंसा द्वारा संपत्ति कब्जा ली है. यह पूरे विश्व के लिए संकट की स्थिति है. वास्तविक न्याय अब संभव नहीं दिखता.’5

हेराक्लाइट्स(535—475 ईस्वीपूर्व) न्याय को उसके सामान्य अर्थों से बढ़कर मानता था. उसका मानना था कि न्याय ब्रह्मांड का सर्वाधिक क्रियाशील तत्व है. हेराक्लाइट्स की न्याय संबंधी अवधारणा को एनेक्सिमेंडर के विचारों के तत्वावधान में समझा जा सकता है. एनेक्सिमेंडर विश्व को दो ध्रुवी मानता था. उसका मानना था कि समय विशेष में दोनों ध्रुवों से कोई एक सक्रिय रहता है. उस दौरान दूसरा शांत बना रहता है. कभी-कभी दोनों में एक जीत की ओर अग्रसर रहता है तो दूसरा पराजित होता दिखाई पड़ता है. द्वंद्व के बीच ऐसा अवसर भी आता है जब दूसरे पक्ष की सहनशक्ति समाप्त हो जाती है. वह पलटकर प्रहार करता है. इससे परिवर्तन की स्थिति उत्पन्न होती है. इस धारा का विस्तार हीगेल के ‘द्वंद्ववाद’ तथा मार्क्स के सुप्रसिद्ध दर्शन ‘ऐतिहासिक भौतिकवाद’ में देखा जा सकता है. एनेक्सिमेंडर द्वंद्व को न्याय की स्वाभाविक अवस्था मानता था. उसके अनुसार विपरीत विचारधाराओं का द्वंद्व समाज को न्याय की ओर ले जाता है. उन्हें सार्थक परिणाम तक पहुंचाने में समय की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है. अपने मंतव्य को स्पष्ट करने के लिए वह धनुष का उदाहरण देता है. उसके अनुसार धनुष में खिंचाव उत्पन्न होने पर उसके दोनों सिरे डोर को अपनी-अपनी ओर खींचते हैं. उनके खिंचाव की दिशा परस्पर विरोधी होती है. खिंचाव से धनुष असामान्य अवस्था में आ जाता है. फिर भी धनुष ठीक से काम करे उसके लिए खिंचाव आवश्यक है. बगैर तन्यता के धनुष काम नहीं कर पाएगा. लक्ष्य भेदने के लिए खिंचाव की मात्रा तथा उसकी दिशा महत्त्वपूर्ण होती है.

हेराक्लाट्स के अनुसार विपरीतधर्मियों का द्वंद्व सदैव बाहर की ओर नहीं होता. मनुष्य के भीतर भी अंतर्द्वंद्व प्रभावी रहते हैं. अच्छे और बुरे का बोध मानवीकरण की प्रक्रिया का प्रथम चरण होता है. वही उस प्रक्रिया को आसान बनाता है. हेराक्लाइट्स के लिए द्वंद्व ही सृष्टि की समस्त गतियों का उत्प्रेरक है. द्वंद्वात्मकता का सबसे बड़ा प्रमाण है, सृष्टि में नर और मादा जैसे विपरीतलिंगी जीवधारियों की मौजूदगी. यदि यह नहीं तो दुनिया में सब कुछ थम-सा जाए. हेराक्लाइट्स यह मानने को तैयार नहीं था कि दुनिया में अन्याय है. बल्कि उसका मानना था कि यह न्याय ही है जो दुनिया की हर चीज को संवारे हुए है. उसके अनुसार संसार में द्वंद्व से मुक्ति असंभव है. द्वंद्व सृष्टि को संवारता तथा उसके विकास को गति देता है. उसका समकालीन पेरामेनीडिस न्याय को समाज के लिए उत्प्रेरक शक्ति के रूप में देखता था. न्याय-केंद्रित समाजों में मनुष्य को यह विश्वास होता है कि समाज में रहते हुए उसके हित सुरक्षित है. आवश्यकता पड़ने पर पूरा समाज मदद के लिए उसके साथ होगा. उसने न्याय को समाज की प्रमुख मार्गदर्शक शक्ति माना है. तदनुसार न्याय मनुष्य का समाज में विश्वास बढ़ाता है. उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है. एक कविता में उसने देवी के मुंह से कहलवाया है—

‘सुनो! बुराई तुम्हें आगे नहीं ले जाएगी. इस रास्ते पर मनुष्य को आगे बढ़ने से रोकने के लिए बाधाएं अनेक हैं. केवल न्याय और कानून ही तुम्हें राह दिखा सकते हैं.’6

एनेक्सिमेंडर, हेराक्लाट्स, पेरामेनिडस आदि जितने भी सुकरात पूर्व तथा उसके समकालीन यूनानी चिंतक हैं, सभी ने न्याय को अपनी-अपनी तरह से परिभाषित करने की कोशिश की थी. परंतु लगभग सुकरात पूर्व के सभी विचारक न्याय को ईश्वर के संदर्भ में देख रहे थे. उनके लिए न्याय या तो ईश्वर का उपहार था अथवा दैवीय विधान, जिसमें किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप अवांछनीय है. कह सकते हैं कि जिस तरह भारतीय चिंतक न्याय को धर्म के उपांग या उपहार के रूप में देखते थे, वैसे ही पश्चिम में भी न्याय ईश्वरीय प्रेरणा या उपहार तक सीमित था. इसके लिए वहां ‘न्याय की देवी’ जैसी मिथकीय कल्पना भी मौजूद है. हालात में परिवर्तन सुकरात के आगमन से होता है. सुकरात ने सत्य को सद्गुण और सद्गुणों को शुभत्व की यात्रा का पाथेय मानकर उसे सामाजिक नैतिकता का विषय बना दिया. भारत में व्यावहारिक नैतिकता पर जोर देने का काम सुकरात से थोड़ा पहले बुद्ध ने किया था. बुद्ध की न्याय-संबंधी अवधारणा व्यैक्तिक एवं सामूहिक हितों से मिलकर बनी थी. उनके अनुसार व्यक्तिमात्र की खुशी आत्मलाभ में होती है. यानी हर कोई अपनी खुशी चाहता है. यह मनुष्य की सामान्य प्रवृत्ति है. दूसरी ओर समाज का हित सामूहिक लाभ में होता है. चूंकि समाज व्यक्ति-सापेक्ष रचना है. उसमें व्यक्ति स्वयं समाहित हैं, इसलिए समाज-हित तभी संभव है जब उसमें व्यक्तिमात्र के हितों की सुरक्षा होती हो. इसलिए न्याय का अभिप्रायः ‘सामूहिक आत्मलाभ’ है. ऐसी व्यवस्था जिसमें समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने तथा बाकी सदस्यों के सुख एवं सुरक्षा के प्रति आश्वस्त हो.

प्लेटो का न्याय-दर्शन

प्लेटो के विपुल लेखन को देखते हुए विद्वानों की यह धारणा रही है कि जो प्लेटो के दर्शन में नहीं है, वह कहीं भी नहीं है. न्याय के बारे में भी सबसे पहले और विशद् विवरण प्लेटो के दर्शन में प्राप्त होता है. न्याय के पर्यायवाची के रूप में उसने ग्रीक भाषा के शब्द ‘दिकायसने’(Dikaisyne) का प्रयोग किया है, जिसका अभिप्राय है—‘नैतिकता’ अथवा ‘न्याय-परायणता’ से है. ग्रीक साहित्य में ‘दाइक’ मिथकीय कल्पना है, जिसे ‘न्याय’ की देवी’ कहा जाता रहा है. परंतु प्लेटो का ‘दिकायसने’ मिथकीय न होकर न्याय को समर्पित राज्य की आदर्श व्यवस्था है. वह न्याय को मनुष्य की संपूर्ण कर्तव्यपरायणता के रूप में देखता है. कर्तव्यपरायणता से उसका आशय उन सभी कार्यों से है, जिनसे कोई व्यक्ति अपने साथ-साथ दूसरों को भी प्रभावित करता है; अथवा जिनके परिणाम किसी न किसी रूप में समाज पर असर डालते हैं. उसके अनुसार व्यक्ति का चयन ऐसा होना चाहिए जिससे समाज में शुभत्व का विस्तार हो. वह न्याय को ‘आत्मा का विशिष्ट गुण’ मानता था.’ उसका मानना था कि सभी मनुष्य अपने-अपने कर्तव्य को समर्पित होंगे तो समाज स्वतः ही अपने दायित्वों के प्रति सजग रहेगा. अतएव न्याय व्यक्ति-मात्र की ऐसी नैतिक साधना है जिसमें वह उन सभी वस्तुओं से दूरी बनाने लगता है, जो उसके निर्णय सामर्थ्य को नितांत व्यक्तिगत बनाती हैं. यहां तक कि वह अपनी उन सभी इच्छाओं भी से दूरी बना लेता है, जो वृहद सामाजिक हितों का अवरोधक है तथा जिनमें स्वार्थपरता की गंध बसी हो. समाज को शुभत्व की ओर अग्रसर करने के लिए उसकी प्रत्येक इकाई का सहयोग अत्यावश्यक है. इस अवधारणा में ‘सोशल कांट्रेक्ट’ के बीजतत्व देखे जा सकते हैं, जिन्हें आगे चलकर हॉब्स और रूसो के लेखन में विस्तार मिला.

प्लेटो का न्याय इकतरफा नहीं है. न ही, उसके अनुसार न्याय के स्वत्व को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी केवल मनुष्य की है. समाज की भी जिम्मेदारी है कि अपनी नागरिक इकादयों को वह सब प्राप्त करने में मदद करे जो उनका अधिकार है. समाज और व्यक्ति दोनों का भला इसी में है कि व्यक्तिमात्र को वही कार्य सौंपा जाना चाहिए जिसके वह सर्वाधिक योग्य है.7 न्याय को परिभाषित करते हुए वह लिखता है—‘व्यक्ति को समाज में वह सब कुछ प्राप्त होना चाहिए, जो उसका प्राप्य है.’ अब व्यक्ति का ‘प्राप्य’ क्या है. यदि सभी मनुष्य केवल अपने प्राप्य का ध्यान केंद्रित कर लें तो समाज का क्या होगा? जार्ज हॉलेंड सेबाइन के अनुसार, ‘प्राप्य’ में कर्तव्य और दायित्व दोनों सन्निहित हैं. ‘हिस्ट्री ऑफ पॉलिटिकल थ्योरी’ में ‘प्राप्य’ की विवेचना करता है—‘व्यक्ति के लिए उसका प्राप्य क्या है?’ इससे प्लेटो का अभिप्राय है कि व्यक्ति के साथ उसकी योग्यता, रुचि, शिक्षा-दीक्षा और कार्यकुशलता के अनुसार व्यवहार किया जाना चाहिए. सेबाइन के अनुसार इसमें यह भी अंतर्निहित है कि व्यक्ति को उसकी योग्यता के अनुसार समाज की ओर से जो भी कर्तव्य सौंपे जाएंगे, उनका पालन वह अपनी संपूर्ण कार्यनिष्ठा, संकल्प और क्षमता के साथ करेगा.’ प्लेटो स्पष्ट करता है कि राज्य का दायित्व नागरिकों की सुरक्षा, शांति-व्यवस्था एवं स्वतंत्रता की रक्षा करने तक सीमित नहीं है. राज्य का यह भी कर्तव्य है कि अपने नागरिकों के सामाजिक-आर्थिक जीवन में सुधार के लिए वह वे सभी प्रयत्न करे, जो आवश्यक हैं और जिन्हें वह अपने सामर्थ्य के अनुसार करने में सक्षम है. लेकिन राज्य तो अमूर्त्त है. नागरिकों से इतर उसका कोई वजूद नहीं है. इसलिए प्लेटो के अनुसार राज्य के जो अधिकार एवं दायित्व हैं, वे अप्रत्यक्ष रूप से उसके नागरिकों के अधिकार एवं दायित्वों के आधार पर ही जाने जाते हैं. राज्य अपने नागरिकों की योग्यता एवं कार्यकुशलता को देखते हुए उनके लिए कर्तव्य विहित करता है, जिनका अनुपालन नागरिकों की जिम्मेदारी है. बदले में राज्य अपने नागरिकों के सुख, सुविधा, स्वतंत्रता एवं सुरक्षा के लिए वह सभी करने के लिए वचनबद्ध होता है, जिसे करने में वह सक्षम है.

प्लेटो का न्याय-दर्शन सुकरात की शुभता की अवधारणा से प्रभावित था, जिसने ज्ञान को सद्गुण की संज्ञा दी थी. सुकरात ने स्वयं कोई ग्रंथ नहीं लिखा. परंतु प्लेटो के दर्शन में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में हर जगह उसकी उपस्थिति है. इसलिए यह तय करना बड़ा ही कठिन है कि ‘रिपब्लिक’ आदि ग्रंथों में जो विचार सुकरात के हवाले से आए हैं, क्या वे सचमुच सुकरात के विचार हैं; अथवा प्लेटो ने अपने विचार, गुरु सुकरात को अतिरिक्त सम्मान देने के लिए, उसके माध्यम से व्यक्त किए हैं? समानांतर प्रश्न यह भी हो सकता है कि यदि वे विचार सुकरात के ही हैं, तो क्या प्लेटो ने उन्हें उसी रूप में, वस्तुनिष्ठ भाव से अभिव्यक्त किया है, अथवा अपनी ओर से उनमें कुछ फेर-बदल किया है. इस बारे में विश्वास के साथ कुछ भी कहना कठिन है. इतना अवश्य है कि प्लेटो अपने गुरु से बेहद प्रभावित था. उन दिनों एथेंस में गणतंत्र को आदर्श राजदर्शन के रूप में मान्यता प्राप्त थी. प्लेटो ने गणतंत्र को भीड़तंत्र में बदलते हुए भी देखा था. सुकरात को गणतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा ही मृत्युदंड दिया गया था. यह प्लेटो के लिए व्यक्तिगत रूप से बहुत भारी क्षति थी. इन घटनाओं का उसके व्यक्तित्व पर इतना अधिक प्रभाव पड़ा था कि सक्रिय राजनीति से ही अरुचि हो चली थी. उसके लेखन का बड़ा हिस्सा आदर्श राजदर्शन की खोज को समर्पित है. इसी क्रम में वह न्याय को अलग-अलग दृष्टि से परिभाषित करता है. न्याय को लेकर ‘रिपब्लिक’ का पहला और चौथा खंड तथा ‘दि लॉज’ जैसा विशद् ग्रंथ विशेषरूप से दृष्टव्य है. ‘दि लॉज’ प्लेटो द्वारा वृद्धावस्था में रचा गया ग्रंथ है, जब उसपर किंचित निराशा हावी होने लगी थी. ‘रिपब्लिक’ की गिनती राजनीतिक दर्शन के प्रमुखतम ग्रंथों में ही जाती है. ग्रंथ में प्लेटो जिस गंभीरता के साथ ‘न्याय’ पर विचार करता है, उससे स्पष्ट हो जाता है कि उसका मुख्य विषय ‘राजनीतिक दर्शन’ अथवा ‘गणतंत्र’ न होकर ‘न्याय’ है.

न्याय की पर्त-दर-पर्त व्याख्या करता हुआ प्लेटो स्पष्ट करता है कि राज्य की सफलता तभी सुनिश्चित है, जब उसके नागरिक निर्दिष्ट कर्तव्यों का संपूर्ण निष्ठा के साथ पालन करें. व्यापारी निष्ठापूर्ण ढंग से व्यापार करें, सेनाएं युद्ध में वीरता का प्रदर्शन कर राज्य की गरिमा को सुरक्षित रखें तथा संरक्षक वर्ग अपने दायित्वों का कुशलतापूर्वक निर्वाह करे. समाज के ये सभी वर्ग बिना दूसरे के काम में बाधा उत्पन्न किए अपने कर्तव्य का पालन करें, तभी राज्य की समृद्धि और सुरक्षा संभव है. इसके साथ-साथ वह यह भी कहता है कि यदि सभी नागरिक अपने-अपने कर्तव्य-पालन के प्रति सचेत हों तो ‘कानून’ और ‘न्याय’ जैसे मुद्दों का कोई अर्थ ही न रहे. जीवन में राज्य की भूमिका सिमट जाए. राज्य और नागरिकों के संबंधों की व्याख्या प्लेटो के लगभग 2100 वर्ष बाद जॉन लॉक, थॉमस हॉब्स और रूसो के दर्शन में देखने को मिलती है. रूसो का ग्रंथ ‘सोशल कांट्रेक्ट’ प्लेटो के दर्शन-चिंतन का विस्तार है. प्लेटो मानता था कि अज्ञानता और स्वार्थपरता के चलते लोग कर्तव्य-पालन में चूक करते रहते हैं. मानवीय कमजोरियां उसके कर्तव्यपालन में विचलन का कारण बनती हैं. वही समाज में शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बाहरी शक्तियों की आवश्यकता को जन्म देती हैं. इससे राज्य को शक्तिशाली होने का अवसर मिलता है. शक्तिशाली राज्य खुद को और शक्तिमान बनाने के लिए नागरिक अधिकारों का हनन करता है. इस समस्या के समाधान हेतु प्लेटो प्रचलित राज्य प्रणालियों पर विचार करता है और अंततः दार्शनिक सम्राट के विचार पर जाकर ठहरता है. उसके अनुसार केवल दार्शनिक ही सत्ता-मोह ने निर्लिप्त, निष्पक्ष, दूरदृष्टा और ईमानदार हो सकता है.

‘न्याय’ को राज्य की नैतिकता से जोड़ने वाला प्लेटो अकेला यूनानी चिंतक नहीं है. बल्कि उसे जमीन देने और आगे बढ़ाने वाले विचारकों की लंबी परंपरा है. आरंभिक यूनानी दर्शन के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति तथा वस्तु का पूर्व निर्धारित स्थान और कर्तव्य होता है. व्यक्ति अपने कर्तव्य को पूरे मनोयोग तथा विवेक सम्मत ढंग से करे, इसके लिए उसकी किसी भी पराभौतिक शक्ति के बंधन और तत्संबंधी पूर्वाग्रहों से मुक्ति अनिवार्य है. प्लेटो परमसत्ता को कर्मशील मानता था, जो अपने कर्तव्य से उसी प्रकार आबद्ध है, जैसे सृष्टि की बाकी वस्तुएं तथा प्राणी. इसलिए अपने दायित्व का निर्वहन करना समाज के प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह किसी भी पद अथवा प्रतिष्ठा से जुड़ा क्यों न हो, की जिम्मेदारी है. यह पराभौतिक शक्तियों पर भी, यदि वे हैं तो, उतनी ही गंभीरता से लागू होता है. समस्या तब उत्पन्न होती है, जब व्यक्ति शक्ति के उन्माद में अपने कर्तव्य की उपेक्षा करने लगता है. शक्ति की अनुभूति अथवा शक्तिकेंद्रों पर अल्पतम लोगों का अधिकतम नियंत्रण सत्तासीन वर्ग में श्रेष्ठता का दर्प पैदा करता है. यही दर्प उसको नियमों की अवहेलना के लिए उकसाता है. यह भ्रम पैदा करता है कि वह दूसरों पर शासन करने, नियम बनाने के लिए जन्मा है, न कि बंधे-बंधाए नियमों के अनुपालन हेतु. इसलिए जो व्यक्ति उस जैसे या उतने शक्ति-संपन्न नहीं हैं, उनका कर्तव्य है कि उसका आदेश मानें. श्रेष्ठता-दंभ का प्रभाव आंतरिक भी होता है. सामान्यतः मनुष्य विवेक से अधिक अहं से निर्देशित होते हैं. कभी-कभी ऐसा अवसर भी आता है जब शक्ति के उन्माद तथा घमंड में डूबा व्यक्ति अपने कर्तव्य से विमुख हो, मनमानी पर उतारू हो जाता है. परिणामस्वरूप समाज में अंतर्द्वंद्व पैदा होते हैं. किसी भी सत्ता की संपूर्ण शक्तियां समाज की समेकित शक्ति के सापेक्ष नगण्य होती हैं. इस कारण प्रत्येक सत्ता वह चाहे जितनी शक्तिशाली हो, दूसरों पर शासन चलाने के लिए उसकी शक्तियां लंबे समय तक कारगर नहीं होतीं. शिखर पर बने रहने के लिए उसे जनता के सामान्य समर्थन की जरूरत पड़ती है. शासन के किसी भी निर्णय, वह चाहे जितना महत्त्वपूर्ण क्यों न हो, की सफलता तब तक संद्धिग्ध रहती है, जब तक समाज के सभी वर्गों का उसे खुला समर्थन प्राप्त न हो. अतः यह कहना कि कानून राज्य बनाता है, और केवल राज्य के भरोसे वे कारगर सिद्ध होते हैं, सर्वथा अनुचित है. राज्य कानून बनाता है. लेकिन कानून बनाने की शक्ति उसे जनसमाज की ओर से प्राप्त होती है. इसलिए कानून की सफलता व्यापक जनसहयोग पर निर्भर करती है. धर्म और सांस्कृतिक प्रतीक तथा उनसे जन्मे संस्कार अधिकतम जनता द्वारा समर्थित होने के कारण ही लोकप्रिय बने रहते हैं. अतएव शिखर पर मौजूद लोगों का दायित्व है कि वे जनता, जो उनकी शक्तियों का एकमात्र स्रोत एवं वास्तविक अधिमान्य सत्ता है, के प्रति ईमानदार तथा कर्तव्यनिष्ठ रहें. परंतु व्यक्ति या समूह का दर्प उसे कानून या अनुशासन में बंधने से रोकता है. इसलिए प्राचीन यूनानी विधिशास्त्र में दर्प को कुचल डालने की अनुशंसा की गई है. यह माना गया है कि दूसरों से श्रेष्ठता का दर्प मनुष्य को कर्तव्य से विमुख होने तथा उनके कार्य में बाधा खड़ी करने के लिए उकसाता है. प्लेटो की ‘न्याय’ संबंधी अवधारणा इसी यूनानी चेतना से बनी थी. उसके लिए ‘न्याय’ का मतलब था—‘सामाजिक आदर्श का बोध तथा कर्तव्यपरायणता. वह मानता था कि आदर्श राज्य की परिकल्पना को साकार करने के लिए आंतरिक शुभता अपरिहार्य है. व्यापक स्तर पर यह कैसे संभव हो इसके लिए वह प्रचलित राजदर्शनों की विवेचना करता है.

‘रिपब्लिक’ के माध्यम से हमारा सामना प्लेटो की बड़ी समस्या से होता है. सुकरात को एथेंस की न्याय प्रणाली के आधार पर दंडित किया गया था. जूरी के सदस्यों के चयन हेतु कोई विधि-सम्मत प्रक्रिया न थी. उसमें व्यक्ति की आर्थिक समृद्धि का बड़ा योगदान था. वाक्-चातुर्य और दूसरों को प्रभावित करने की कला उसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थी. जिस जूरी ने सुकरात को मृत्युदंड सुनाया था, उसके सदस्यों अपने दुराग्रह प्रबल थे. उनमें से अधिकांश सुकरात की साफगोई के कारण उससे ईर्ष्या करते थे. सुकरात के विचार उनके लिए चुनौती बने थे. इसलिए सुकरात पर चलाए जा रहे मुकदमे का वास्तविक उद्देश्य उसकी अवमानना या उसे दंडित करने से अधिक उस वैचारिकी को परास्त होते देखना था, जो उनके वर्चस्व के लिए चुनौती बन चुकी थी. सारा तमाशा आधी-अधूरी गणतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से, न्याय के नाम पर हुआ था. यहीं से प्लेटो के मन में सवाल उठा था कि ‘न्याय क्या है?’ क्या जिसे बहुत से लोग मान लें वह न्याय है. अथवा जिसे राज्य अपनी शक्ति के बल पर लागू करे, वह न्याय है? इस समस्या को वह सुकरात के माध्यम से ‘रिपब्लिक’ में उठाता है. अपने स्वभाव के अनुरूप सुकरात अपनी शिष्य-मंडली के बीच प्रश्न उठाता है. चर्चा के पहले चरण में सुकरात के अलावा केफलस, पोलीमार्क, थ्रेचाइमच्स, लीसियस और केल्सीडॉन प्रमुख सहभागी बनते हैं. चर्चा-स्थल केफलस का आवास है. उन सबको केफलस की ओर से एक उत्सव में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित किया गया है. मित्रों के आगमन पर बूढ़ा केफलस स्वयं उनका स्वागत करता है. प्रकारांतर में चर्चा का मुख्य सूत्रधार भी वही बनता है. अपने लंबे जीवनानुभवों को याद करते हुए वह ग्रीक कवि पिंडोरयस को उद्धृत करता है, जिसका आशय है—‘जब कोई मनुष्य अपना जीवन न्याय एवं श्रद्धा के साथ व्यतीत करता है तो उसके जीवन को आह्लादित करने तथा वृद्धावस्था में उसको सहारा देने के लिए ‘आशा’ जीवन-संगिनी की भांति सदैव उसके साथ रहना चाहती है.’ इसपर परम जिज्ञासु सुकरात प्रश्न करता है—‘क्या यही न्याय है?’ सुकरात का यही कौतूहल ‘रिपब्लिक’ की चर्चा का केंद्रीय विषय बन जाता है. उससे पहले तक न्याय को व्यक्ति और राज्य के व्यवहार और अंतर्संबंधों के अनुसार देखने की प्रथा थी, जिसमें राज्य की इच्छा और उसका अधिकार पक्ष प्रबल रहता था. चर्चा बढ़ती है तो न्याय पर नए-नए विचार आते चले जाते हैं.

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

  1. The sense of justice is continuous with the love of mankind.-Rowls.
  2. प्रजासुखे सुख राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्। नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्।। — अर्थशास्त्र-1/19
  3. प्रजासुखे सुखी राजा. तद्दुःखे यश्च दुःखित। सः कीर्तियुक्तो लोकेस्मिन् प्रेत्य यस्य महीस्यते।।— विष्णुधर्मसूत्र 3,
  4. A-nomia, lawlessness, must be replaced by eunomia, law and order-The Greek Concept of Justice, Eric A. Havelock, page 298.
  5. they seize property by violence; kosmos has perished

Equitable distribution no longer obtains.-Theognis, as quoted by Andrew    Gregory    in  Anaximander: A Re-assessment, Page 77

  1. Welcome! for it is no evil fate [trzoira] that escorted you forth to travel along this way: for indeed it lies [estin] far outside of the treading of men.

No, it was the law [themis] and justice [dike].-Parmenides, from The Greek Concept      of Justice, page 269.

  1. every member of the community must be assigned to the class for which he finds himself best fitted. Plato, The Republic.

 

 

प्लेटो : स्वप्नदृष्टा दार्शनिक-दो

सामान्य

शिक्षा

बचपन से ही प्लेटो ने दिखा दिया था कि वह अतुलनीय मेधावी और असामान्य तीक्ष्ण बुद्धि से संपन्न है. बचपन में ही उसने प्राचीन यूनानी कवियों होमर, हेसोद आदि की रचनाओं का अध्ययन किया था. अनेक रचनाएं तो उसको पूरी तरह कंठस्थ हो चुकी थीं, जो युवावस्था में उसके काव्यानुराग की प्रेरणा बनीं. हालांकि सुकरात से मुलाकात के बाद उसने न केवल कविताओं से अपना पीछा छुड़ा लिया, बल्कि अपनी उस समय तक की रचनाओं को भी आग के हवाले कर दिया. उन दिनों एथेंस में सार्वजनिक विद्यालय नहीं थे. अध्यापन का कार्य सोफिस्टों के जिम्मे था, वे निजी विद्यालयों में गणित, दर्शन, व्याख्यान विद्या और व्यावहारिक विज्ञान की शिक्षा देते थे. उन विद्यालयों में केवल अभिजात्य वर्ग के विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त कर पाते थे. प्लेटो ने ऐसे ही एक विद्यालय में प्रवेश लिया था. उसको पाठशाला तक लाने-ले जाने के लिए एक दास नियुक्त था, जिसको ‘ट्यूटर’ कहा जाता था. उस समय यूनान में स्त्रियों की शिक्षा के प्रति जागरूकता का अभाव था. प्लेटो को जहां निजी विद्यालय में अध्ययन के लिए भेजा गया था, वहीं उसकी बहन को घर पर रहकर शिक्षा दिलाने का प्रबंध किया गया था. शिक्षा के मामले में स्त्री-पुरुष के बीच भेदभाव को प्लेटो ने गहराई से अनुभव किया था. इसलिए अपने आदर्श राज्य की संकल्पना में उसने दोनों के लिए एकसमान शिक्षा पर जोर दिया है. अस्तु, उस विद्यालय में प्लेटो ने अंकगणित की शिक्षा प्राप्त की. उन दिनों प्राचीन यूनानी काव्य में पारंगत होना विशेष योग्यता मानी जाती थी. अपनी तीक्ष्ण बुद्धि का परिचय देते हुए प्लेटो ने उपलब्ध यूनानी काव्य का गहरा अध्ययन किया. होमर के साहित्य को पूरा कंठस्थ कर उसने अपने गुरुजनों को हैरत में डाल दिया था. प्लेटो के जीवनीकार डायोजिनिस ने उसको मेहनती और पढ़ने-लिखने में मन लगाने वाला विद्यार्थी कहा है. उसके अनुसार प्लेटो अद्भुत प्रतिभाशाली था. उसको ईश्वरीय वरदान प्राप्त था, उसी के फलस्वरूप उसकी मेधा विलक्षण थी. वह पाठ को बहुत जल्दी याद कर लेता था. उसका गला भी सुंदर था. प्राचीन कवियों की रचनाओं को सस्वर गाकर वह सबको हैरत में डाल देता था. प्लेटो की कविता और गायन कला पर पकड़ उसकी संवाद-पुस्तक ‘प्रोटेगोरस’ में दिखाई पड़ती है. उसकी यह मान्यता थी कि बच्चों के मस्तिष्क को छोटी और सुरीली कविताओं से समृद्ध किया जाना चाहिए. ताकि वे संवेदनशील बनें और समाज में रहकर बाकी लोगों से अच्छा तालमेल बना सकें. राजपरिवार से संबंध होने के कारण शारीरिक सौष्ठव और व्यायाम का प्रशिक्षण भी अनिवार्य था. इसके लिए वह नियमित रूप से व्यायामशाला जाता था. नियमित व्यायाम को उसने शिक्षा के अनिवार्य हिस्से के रूप में उल्लिखित किया है. अपनी पुस्तक ‘लाज’ में उसने लिखा है कि किशोरावस्था में कदम रखने के साथ ही बालक को एक कुशल स्वास्थ्य प्रशीक्षक के सुपुर्द कर देना चाहिए.

प्लेटो का विश्वास था कि केवल दार्शनिक ही अच्छे शासक हो सकते हैं. मगर उनके लिए भी शिक्षा अनिवार्य है. किसी भी अन्य बालक की भांति किशोर दार्शनिक को भी मानसिक और शारीरिक रूप से परिपुष्ट होना चाहिए. इसके लिए उसको योग्य अध्यापकों के निर्देशन में व्याकरण जिसमें लिखना और पढ़ना सम्मिलित है, चित्रकला तथा शारीरिक व्यायाम के बारे में बताया जाना चाहिए. स्वयं प्लेटो नियमित रूप से जमकर व्यायाम करता था. वह कई खेलों में पारंगत था और अपने समकालीन युवाओं को छका देता था. सुकरात से मिलने से पहले प्लेटो दर्शनशास्त्र की नियमित कक्षाओं में हिस्सा ले सकता था. सबसे पहले वह उस समय के महान दर्शनशास्त्री क्रेटीलस के संपर्क में आया, जो हेराक्लाटस का शिष्य था. हेराक्लाइटस की गिनती सुकरात से पहले के महान यूनानी दार्शनिकों में होती है. क्रेटीलस ने उसको उस समय तक प्रचलित दार्शनिक विचारधाराओं का बोध कराया, जिसमें प्लेटो ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए अल्प समय में ही विशेषज्ञता प्राप्त कर ली. प्लेटो की रचनात्मक प्रतिभा के दर्शन उसकी किशोरावस्था से ही होने लगे थे. यूनान के प्रतिभाशाली व्यक्तियों की तरह उसने अध्ययन के दौरान ही कविताएं लिखना आरंभ कर दिया था. युवावस्था के दिनों में उसने कविताएं, गीत, धार्मिक कविताएं आदि खूब रचीं. एक नाटक पुस्तक की रचना भी की. मगर सुकरात से भेंट के बाद उसके परंपरागत लेखन पर विराम लग गया. सुकरात से उसकी मुलाकात मानो उसके कायाकल्प की घटना थी, जिसने दुनिया को एक अप्रतिम आदर्शवादी विचारक, दर्शनशास्त्री प्लेटो को जन्म दिया. सुकरात के विचारों से प्रभावित होकर उसने अपनी सारी कविताएं, नाटक आदि आग के हवाले कर दिए तथा स्वयं को दर्शनशास्त्र के अध्ययन-लेखन तक सीमित कर दिया. प्रसंगवश बता दें कि उन दिनों दर्शनशास्त्र का विषयक्षेत्र बहुत व्यापक था. राजनीति, विज्ञान, अर्थशास्त्र, कानून, समाज, तत्वविज्ञान, अध्यात्म आदि उसी का हिस्सा माने जाते थे. सुकरात और प्लेटो की पहली मुलाकात को लेकर एक दंतकथा यह भी है कि सुकरात ने प्लेटो से मिलते ही कहा था कि एक हंस उसकी शरण में आया है. कुछ अनाम कवियों ने उस अवसर को महिमामंडित करते हुए कविताएं भी लिखी हैं. किंतु उनकी ऐतिहासिकता को लेकर सटीक टिप्पणी संभव नहीं है. आधुनिक विद्वानों का मानना है कि जिन दिनों प्लेटो की सुकरात से पहली भेंट हुई, वह युवा था. उस समय तक सुकरात सोफिस्टों की व्यंग्यात्मक आलोचना के कारण काफी ख्याति बटोर चुका था. उसकी वक्रोक्तियां लोगों की जुबान पर चढ़ी थीं. प्लेटो का एक चाचा चारमिंडस तथा उसका एक और संबंधी क्राइटिइस सुकरात के निकट मित्रों में थे. इस तथ्य की ऐतिहासिकता पर सटीक टिप्पणी करना इसलिए कठिन है, क्योंकि सुकरात ने स्वयं कुछ नहीं लिखा. उसके बारे में जो भी लिखित सामग्री है, वह प्लेटो तथा उसके अन्य शिष्यों द्वारा लिखी गई है. सुकरात से भेंट के पश्चात प्लेटो ने स्वयं को अध्ययन और लेखन तक सीमित कर दिया. यद्यपि उसके परिवार की आर्थिक-राजनीतिक हैसियत को देखते हुए उसके पास एथेंस की राजनीति में जगह बनाने के भरपूर अवसर थे. यदि ऐसा हो जाता तो महान दार्शनिक सुकरात का वह मेधावी शिष्य अधिक से अधिक रोम के विलासी सम्राटों-शासकों में अपना नाम लिखवाने में कामयाब हो जाता, किंतु उसने तो अपने लिए स्वतंत्र मार्ग चुना था. निश्चित रूप से इस चयन के पीछे प्रेरणा सुकरात की ही थी.

सिसली की यात्रा
सुकरात को दंडित किए जाने की घटना ने प्लेटो को आहत कर दिया था. उसे राजनीति से ऊब होने लगी थी. एथेंस की हवा में उसका दम घुटने लगा था. इसलिए कुछ समय के लिए उसने बाहर जाने का निर्णय किया और एक लंबी यात्रा पर प्रस्थान कर गया. यात्रा के लिए कोई पूर्वनिर्धारित गंतव्य नहीं था. केवल मन में एथेंस के राजनीतिक परिदृश्य से जन्मी आकुलता थी, वही उसे एथेंस के जड़-परिवेश से दूर निकलने के लिए उकसा रही थी. कालांतर में वही वैकल्पिक राजनीतिक दर्शन की खोज की प्रेरणा बनने वाली थी. उस यात्रा से, संभवतः वह अपने मन के उस खालीपन को भी भरना चाहता था, जो गुरु सुकरात को अचानक मृत्युदंड दिए जाने से उत्पन्न हुआ था. यात्रा के पहले पड़ाव के रूप में उसने मेगरा को चुना. वहां उन दिनों यूक्लिड की धूम मची थी. गणित प्लेटो की रुचि का विषय था. मेगरा में रहते हुए उसने यूक्लिडीय ज्यामिति का गहरा अध्ययन किया. पर उसका अशांत मन वहां बहुत दिनों तक विश्राम न पा सका. कुछ दिन वहां प्रवास करने के उपरांत वह दक्षिणी इटली की ओर प्रस्थान कर गया. मेग्ना ग्रेशिया उन दिनों यूनान के सबसे बड़े व्यापारिक केंद्र के रूप में ख्यात था. असल में वह दक्षिणी इटली के समुद्र तटीय इलाके में बसा छोटे-छोटे नगरों का समुच्चय था, जिसको व्यापारिक गतिविधियों ने जोड़ा हुआ था. व्यापारिक केंद्र होने के साथ वह गणितज्ञों और वैज्ञानिकों का ठिकाना भी था. मेग्ना ग्रेशिया प्रवास के दौरान प्लेटो पाइथागोरेस के अनुयायियों से मिला, जिनका उसपर गहरा असर पड़ा. इसी से उसके मन में अंकगणित के प्रति अनुराग का जन्म हुआ जो जीवनपर्यंत बना रहा. वह टेरेंटम में रह रहे, उस समय के प्रख्यात वैज्ञानिक आक्रिटस के संपर्क में भी आया. मेग्ना ग्रेशिया व्यापारिक केंद्र के रूप में विख्याता महानगर था, वहां की आबोहवा भी दिलकश थी. लेकिन वह भी प्लेटो के अशांत मन को लंबे समय तक बांधने में असमर्थ रही. उसका अगला पड़ाव सिसली था. उन दिनों सिसली पर डायोनिसियस प्रथम का अधिकार था. वह निरंकुश सम्राट था. उसका खास शौक था, प्रतिभाशाली लोगों को अपने दरबार में रखना. इसलिए नहीं कि उनके ज्ञान और अनुभव का लाभ उठाया जा सके, बल्कि इसलिए कि उसके माध्यम से अन्य राजाओं पर अपनी बुद्धिमत्ता की धाक जमाई जा सके. उसके दरबार में अनेक वैज्ञानिक, दर्शनशास्त्री, कवि, साहित्यकार, संगीतज्ञ आदि नियुक्त थे. सिसली प्रवास के दौरान प्लेटो की धारणा बनी कि शासन का दायित्व दर्शनशात्री को सौंपा जाना चाहिए. उसका विश्वास था कि दार्शनिक अधिक धैर्यवान, करुणाशील एवं शांतिप्रिय होते हैं. इसलिए उनसे अपेक्षा की जा सकती है कि वे व्यक्तिगत हित से ऊपर उठकर प्रजा-कल्याण के लिए अधिक कारगर नीतियांे पर काम करेंगे. उसका मानना था कि राजा को निजी महत्त्वाकांक्षाओं, भोगविलासों, बहादुरी के दंभ-भरे कारनामों का बखान करने के बजाय स्वयं को नैतिक मूल्यों के विकास के प्रति समर्पित कर देना चाहिए. प्लेटो की उस सलाह पर किसी ने ध्यान नहीं दिया.

प्लेटो की रचनाओं में मिस्र के प्राचीन नगरों का भी उल्लेख हुआ है. इसलिए यह संभावना भी व्यक्त की जाती है कि उस यात्रा के दौरान उसने मिस्र के प्रख्यात नगर हेलियोपोलिस का भी भ्रमण किया था. प्लेटो ने लिए वह यात्रा नए अनुभव बटोरने की थी. उस समय वह अपनी वयस् के चालीसवें वर्ष से गुजर रहा था. यात्रा के दौरान उसकी लेखनी अनवरत-अविराम चल रही थी. लोग भी उसको पहचानने लगे थे. अंततः बारह वर्ष तक विभिन्न देशों की अनवरत यात्रा के बाद वह एथेंस वापस लौट आया.

सायराकस प्रवास के दौरान वह डायोन के संपर्क में आया था, जो वहां के निरंकुश सम्राट डायोनिसियस प्रथम का निकट का रिश्तेदार था. अपुष्ट òोतों के अनुसार उसने डाओन को शिक्षा भी दी. प्लेटो के एथेंस वापस लौटने के कुछ ही वर्षों पश्चात डायोनिसियस प्रथम की मृत्यु हो गई. प्लेटो को डीओन की ओर डायोनिसियस द्वितीय की शिक्षा के लिए निमंत्रण प्राप्त हुआ. उस समय तक वह सुकरात की छाया से बाहर आ चुका था. हालांकि अपने गुरु के प्रति उसके सम्मान में किंचित कमी नहीं आई थी. अब उसको लगने लगा था कि राजनीति, दर्शन, कानून आदि को लेकर उसके जो विचार हैं, उन्हें स्वतंत्र रूप में भी प्रकट किया जा सकता है. डीओन के आमंत्रण को स्वीकार कर वह साइराकस के लिए रवाना हो गया. वहां पहुंचने पर उसका जोरदार स्वागत किया गया. गणित प्लेटो का प्रिय विषय था. उसको वह कुशल दर्शनशास्त्री बनने की पहली सीढ़ी मानता था. डीओन स्वयं भी गणित और दर्शनशास्त्र में रुचि रखता था. उसने सम्राट के दुर्ग को ज्यामितीय रचनाओं के अनुसार तैयार करवाया था, जो अपने समय का अनोखी और विशिष्ट वास्तुरचना थी. डीओन के जीवनीकार प्लूटार्क ने उस दुर्ग का वर्णन किया है. उसने लिखा है कि दुर्ग में बुरादे का चबूतरे बनवाकर उनके ऊपर त्रिभुज, वृत आदि विभिन्न ज्यामितीय रचनाओं को दर्शाया गया था. पाइथागोरेस की प्रमेय का चित्रण भी एक स्थान पर था. उस समय जब अधिकांश सम्राट शिकार करने, अपने महलों में सुंदर स्त्रियों की भरमार करने के लिए राज्य का अधिकांश श्रमबल और ताकत झोंक देते थे, डीओन की कल्पना पर निर्मित वह दुर्ग गणितीय आकृतियों पर आधारित विशिष्ट रचना थी. प्लेटो कुशल अध्यापक था, किंतु उसका युवा शिष्य डायोनिसियस द्वितीय उतना प्रतिभाशाली न था. वह पढ़ते हुए बहुत जल्दी थक जाता था. उसका मन शिकार खेलने जैसे विलासितापूर्ण कार्यों में अधिक लगता था. डीओन से उसको ईष्र्या थी, इसलिए वह उसको पहले ही निष्कासित कर चुका था. अपने श्रम का कोई लाभ न देख प्लूटो वहां से ऊब गया और एथेंस वापस लौट आया. वापस लौटकर उसने शिक्षा केंद्र के रूप में अपनी महत्त्वाकांक्षी परियोजना के अंतर्गत ‘अकादमी’ की स्थापना की और खुद को अकादमी की सफलता के प्रति समर्पित कर दिया.

प्लेटो के प्रयासों से अकादमी की प्रतिष्ठा दिनोंदिन बढ़ रही थी. तभी उसको सायराकस से तीसरा निमंत्रण प्राप्त हुआ. उस समय वह वृद्धावस्था की ओर बढ़ चला था. एक सफल लेखक, विचारक और दार्शनिक के रूप में भी उसकी प्रतिष्ठा लगातार बढ़ती ही जा रही थी. हालांकि सायराकस के तीसरे दौरे के लिए प्लूटो पहले ही अपनी सहमति दे चुका था. मगर वह यात्रा उसके लिए विशेष कष्टकारी सिद्ध हुई. उसके पहुंचने के एक महीने के अंदर ही डायोनिसियस द्वितीय ने प्लूटो के मित्र और शुभचिंतक डीओन को देश-निकाले की सजा सुना दी. यही नहीं प्लूटो को डीओन का मित्र और समर्थक मानते हुए तानाशाह सम्राट ने नजरबंद बना लिया गया. आखिर बुलावे पर सायराकस लौट आने का वचन देने पर सम्राट ने उसको मुक्त किया. इस घटना का उल्लेख प्लूटो ने अपनी 7’वीं पत्र-रचना में किया है. अपुष्ट स्रोत यह भी बताते हैं कि डायोनिसियस द्वितीय प्लेटो से नाराज हो गया था तथा उसने प्लेटो को दास के रूप में बेचने का पूरा इंतजाम भी कर दिया था. उस समय आक्रिटस ने उसकी मदद की, जिसके फलस्वरूप वह एथेंस वापस लौटने में सफल हो सका. कुछ दिन पश्चात निर्वासन की सजा काट रहा डीओन भी एथेंस पहुंच गया. दोनों की मुलाकात अकादमी परिसर में हुई. डीओन प्लेटो की अकादमी को देखकर बहुत प्रसन्न था. उसके बाद वह चार वर्षों(465—361 ईसा पूर्व) तक एथेंस में ही रहा. इस बीच उसको तानाशाह डायोनिसियस की ओर से एक और निमंत्रण मिला. इस बार प्लेटो ने उस निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया. इस घटना को एक वर्ष नहीं बीता था कि प्लेटो को डायोनिसियस की ओर से एक और बुलावा आया. इस बार उसने प्लेटो के मित्र एक्रेडेमस को जहाज पर प्लेटो को लिवाने के लिए भेजा था. डायोनिसियस द्वितीय की धूर्तता को समझते हुए प्लेटो चैथी बार सायराकस जाने के लिए कतई तैयार न था, किंतु उसके मित्र डीओन ने एक योजना के तहत उसको आमंत्रण स्वीकार कर लेने की सलाह दी. डीओन के आग्रह पर प्लेटो सायराकस की चैथी यात्रा को तैयार हो गया. मगर स्थितियां फिर उसके प्रतिकूल थीं. डायोनिसियस ने विश्वासघात करते हुए उसको एक बार फिर कारावास में डाल दिया. इस बार प्लेटो के कुछ मित्रों ने उसकी मदद की, तभी वह कारागार से मुक्त हो सका.

इस बीच डीओन ने भाड़े के सैनिकों को जुटाकर एक सेना तैयार की और अपनी मातृभूमि पर धावा बोल दिया. युद्ध में उसको सफलता मिली और सिसली उसके कब्जे में आ गई. किंतु उसको मिली सफलता अल्पकालिक सिद्ध हुई. वह कुछ ही दिन राज कर पाया था कि एक विश्वासघाती ने उसकी हत्या कर दी. सिसली में एक बार फिर अराजकता का छा गई. इस घटना ने प्लेटो को बुरी तरह आहत कर दिया. वह निराशा से भर उठा. उसकी हताशा और अवसाद का एक कारण यह भी था कि डीओन की हत्या कर, राजसत्ता पर कब्जा कर लेने वाला विश्वासघाती उसका अपना ही शिष्य केलीप्पस था. इस घटना से प्लेटो का राजनीति से ही विश्वास हट गया था. इसलिए सायराकस को अलविदा कहकर वह वापस अपनी अकादमी में लौट आया. उस समय वह बूढ़ा हो चला था. अपने जीवन के शेष तेरह वर्ष उसने अकादमी में रहकर बिताए. 347(कुछ विद्वानों के अनुसार 348) ईसा पूर्व जब उसकी मृत्यु हुई, उस समय उसकी उम्र लगभग 80 वर्ष थी. इतिहासविद् डायोजिनिस के अनुसार उसको अकादमी के परिसर में ही दफनाया गया था, यद्यपि उसके मकबरे की खोज अभी तक नहीं की जा सकी है.

प्लेटो पर अपने समकालीन जिन लेखकों का प्रभाव पड़ा था, उनमें हेराक्लिीटस, पेरामेंडिस, जीनो तथा सुकरात प्रमुख हैं. इनके अलावा वह, स्पार्टा के राजनीतिक परिवेश, वहां की नीतियों तथा पाइथागोरेस के अनुयायियों से भी प्रभावित-प्रेरित था. प्लेटो के तत्वदर्शन पर पेरामेंडिस का प्रभाव है. जबकि जीनों से वह इतना प्रभावित था कि उसको अपनी एक संवादिका में स्थान दिया है. सुकरात तो प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में प्लेटो का नायक है ही. उसका लेखनकाल पचास वर्ष से अधिक विस्तृत है. इस अवधि में कभी ऐसा नहीं हुआ कि उसने सुकरात को विस्मृत किया हो, या उसकी उपेक्षा की हो. केवल एक पुस्तक को छोड़कर सुकरात उसकी सभी पुस्तकों में महत्त्वपूर्ण पात्र के रूप में उपस्थित है, जो उसकी अपने गुरु के प्रति निष्ठा को दर्शाता है. उसके राजनीतिक विचारों पर हेराक्लाइटस सहित पाइथागोरेस के अन्य अनुयायियों का प्रभाव है. उन्हीं को पढ़ते हुए प्लेटो के मन में गणित के प्रति विशेषानुराग पैदा हुआ था. हालांकि गुरु सुकरात की भांति प्लेटो भी कविता और कवियों को नापसंद करता था. उसके अनुसार कवि बात को आलंकारिक भाषा में बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करते हैं. उनका जोर सत्य को यथातथ्य प्रस्तुत करने के बजाय उसको चामत्कारिक बनाने पर होता है. इस कारण कविता अपना असर खो देती है. इसके बावजूद परोक्षरूप में ही सही उसके लेखन पर प्राचीन यूनानी कवियों होमर और हेसोद का भी प्रभाव भी है. प्लेटो के लेखन में जो अद्भुत तरलता एवं लालित्य है, वह बिना संवेदनशील मनस् के संभव ही नहीं है.

प्लेटो का योगदान

प्लेटो के दर्शन को यदि किसी एक शब्द में अभिव्यक्त करने को कहा जाए तो उसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त शब्द होगा—आदर्श. दूसरा एक शब्द जो इसके विकल्प के रूप में संभव है, वह है—नैतिकता. वस्तुतः प्लेटो ने जिस आदर्श समाज का सपना देखा था, वह तभी संभव है, जब उसके शासकगण अपने आचरण को नैतिकता की कसौटी पर कसते रहें. उनमें आत्मावलोकन का गुण हो. वे पर्याप्त संवेदनशील तथा अपने कर्तव्य को समझने वाले हों. जो विलासिता से दूर सादगीपूर्ण जीवन पसंद करते हों. उनमें अपना पक्ष प्रस्तुत करने का सलीका हो तथा विरोधी की बात सुनने का धैर्य. प्लेटो स्वयं एक भावुक एवं संवेदनशील इंसान था. मन का सच्चा और खरा. गुरु सुकरात का मानना था कि सृष्टि में कोई ऐसा प्राणी नहीं जो बुराई की कामना करता हो. मूलतः सभी शुभत्व के समर्थक हैं. शुभत्व केवल सद्गुण द्वारा संभव है, जो वास्तविक ज्ञान से जन्म लेता है. गुरु सुकरात की भांति प्लेटो ने भी आदर्श समाज का सपना देखा था. जहां कानून का राज हो. मगर कानून का कर्तव्य अपने नागरिकों को अनुशासन में बांधने तक सीमित नहीं है. बलप्रयोग से जेलखाना तो चलाया जा सकता है, समाज नहीं. समाज को चलाने के लिए नैतिक बल की जरूरत पड़ती है. उसके लिए कोरी ताकत किसी काम की नहीं होती. यह तभी संभव है, जब कर्तव्य और अनुशासन की भावना नागरिकों के अंतर्मन से उमड़े. उनका अपने शासकों पर पूरा-पूरा विश्वास हो. इसकी संभावना तभी है जब शासकगण अपने कर्तव्यों को समझकर उनका पालन करने के लिए प्रतिबद्ध हों…उनका अपना जीवन किसी भी प्रकार की विलासिता अथवा वैभव प्रदर्शन से मुक्त हो. जब राज्य की संपत्ति का विभाजन इस प्रकार हो कि उसका लाभ वहां के प्रत्येक नागरिक को मिल सके. प्लेटो ने दास प्रथा का समर्थन किया था. स्मरण रहे कि यह उस समय की घटना है, जब रोम की लगभग आधी आबादी दासों से मिलकर बनी थी. कुछ हालांकि ऐसे भी दास थे, जो स्वयं को स्वतंत्र करा चुके थे, किंतु उन्हें भी नागरिकों जितने अधिकार न थे. स्वतंत्र हो जाने के बावजूद समाज में उनकी हालत दूसरे दर्जे के नागरिक जैसी थी. जो दास थे, वे पशु की तरह व्यवहृत होते, खरीदे-बेचे जाते थे. समाज के संसाधनों पर अभिजात्य वर्ग का अधिकार था. दास भी संसाधनों का अनिवार्य हिस्सा थे. उनका कर्तव्य था अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करना. प्लेटो के माता-पिता की आर्थिक स्थिति भले ही दूसरे अभिजात्य परिवारों, राजकुल के सदस्यों जितनी सुदृढ़ भले न थी, किंतु उसके परिवार का पूरा का पूरा परिवेश अभिजात्य परिवारों जैसा था. गुरु सुकरात भी दासप्रथा को जरूरी मानते थे. प्लेटो ने भी इस कुप्रथा का उत्पादन के स्तर को बनाए रखने के लिए समर्थन किया. अपने लेखन विशेषकर अपनी महान कृति ‘रिपब्लिक’ में उसने जिस आदर्श समाज का सपना देखा था, उसमें समानता और बंधुत्व की जो कल्पना की गई थी, वह केवल समतामूलक समाज में ही संभव है. अगले चरण में अरस्तु ने भी विकासदर के स्थायित्व एवं गतिशीलता के लिए दास प्रथा का समर्थन किया था.

प्लेटो ने अपना लेखन कवि के रूप में आरंभ किया था. प्राचीन ग्रीक साहित्य से प्रभावित होकर प्रारंभ में उसने दुखांत रचनाएं लिखीं. मगर जिस दार्शनिक प्लेटो को दुनिया जानती है, उसका वास्तविक जन्म प्लेटो और सुकरात की भेंट के पश्चात ही संभव हो सका था. प्लेटो उस समय बीस वर्ष का स्वप्नदृष्टा युवा था, उसकी आंखों में रूमानी सपने थे. गंभीर और अंतर्मुखी वह बचपन से ही था. इसलिए बचपन से युवावस्था तक आते-आते वह प्राचीन यूनानी साहित्य का अध्ययन कर चुका था. सुकरात उस समय वयस् के साठवें वर्ष में प्रवेश कर चुका था, मगर उसकी ख्याति पूरे एथेंस में फैली हुई थी. खासकर नवयुवकों पर उसका जादुई प्रभाव था. सुकरात के संपर्क में आने के पश्चात प्लेटो को अपना उस समय तक रचा सब व्यर्थ लगने लगा. उसको कविता से अरुचि हो गई. एक दिन उद्धिग्न होकर उसने अपनी समस्त काव्य रचनाएं आग के हवाले कर दीं. उनमें वह नाटक भी था, जिसको उसने एक प्रतियोगिता के लिए विशेषरूप से रचा था. तदोपरांत उसने स्वयं को दर्शन, राजनीति, गणित, विज्ञान और खगोलविज्ञान के अध्ययन तक सीमित कर दिया. उल्लेखनीय है कि राजपरिवार से संबद्ध होने के कारण प्लेटो के पास एथेंस की राजनीति में स्थान बनाने के भरपूर अवसर थे. यदि वह सुकरात से न मिला होता तो अवश्य की उसकी गिनती एथेंस के महत्त्वपूर्ण राजनयिकों में होती. किंतु सुकरात की प्रेरणा पर उसने परंपरागत राजनीति को आगे बढ़ाने की अपेक्षा नए समाज का सपना देखा, नई राजनीतिक प्रणालियों की खोज के काम को वरीयता दी, जिसके लिए गहन साधना और त्याग की आवश्यकता थी.

सुकरात से प्रभावित प्लेटो ने अपने विचारों की अभिव्यक्ति के लिए विपुल वाङ्मय की रचना की. हालांकि उसके द्वारा लिखे गए ग्रंथों की कुल संख्या को लेकर विद्वानों के बीच मतभेद है. संवाद-शैली पर आधारित होने के कारण प्लेटो द्वारा रचित पुस्तकें ‘डायलाग्स’ कही जाती हैं. इन पुस्तकों में उसने सुकरात की संवाद-शैली का प्रयोग किया था, जिसे ‘सुकरातीय शैली’ के नाम से भी जाना जाता है. उसने कुल मिलाकर 46 संवादों(डायलाग्स) की रचना की. इनमें शिक्षा, राजनीति, कानून, दर्शन, नैतिकता, तत्वज्ञान आदि पर विस्तृत विचार-विमर्श प्रस्तुत किया गया है. अधिकांश विद्वानों का मानना है कि प्लूटो द्वारा रचे गए संवादों की संख्या मात्र 24 है. कुछ विद्वान इस संख्या को 28 तक ले जाते हैं. बाकी रचनाएं बाद में उसके नाम से जोड़ दी गई हैं. प्लेटो द्वारा रचित प्रमुख ‘संवादों’ में ‘रिपब्लिक’, ‘दि अपोला॓जी’, ‘फीडो’, ‘प्रोटागोरेस’, ‘चारमेंडिस’, ला॓ज आदि प्रमुख हैं. इनमें कर्तव्य, साहस, सद्गुण, न्याय, प्रेम, सौंदर्य, विज्ञान, प्रकृति, कानून, रीति-रिवाज, नैतिकता, शुभता, परंपरा, उत्तराधिकार, मेल-मिलाप, ज्ञान आदि विभिन्न विषयों को बड़े विद्वतापूर्ण ढंग से समेटा गया है, जिसके कारण ये पुस्तकें गत 2400 वर्षों से विद्वानों और शोधकर्ताओं को प्रभावित करती आ रही हैं. प्लेटो की रचनाओं में अब भी वे तत्व मौजूद हैं, जिनके आधार पर काम करते हुए उन अनेक समस्याओं का हल खोजा जा सकता है, जो पूंजीवाद अथवा सांस्कृतिक अपसंस्करण की देन हैं.

संवादों के अतिरिक्त उसने 13 पुस्तकें(लेटरर्स) पत्र-शैली में रची हैं. इनमें यूनान के तत्कालीन इतिहास और प्लेटो के जीवन की झलक देखी जा सकती है. प्लेटो के जीवनी-लेखकों के लिए तो उसकी पत्र-शैली की रचनाएं प्रामाणिक òोत हैं हीं. ‘संवादों’ की भांति पत्र-शैली में रची गई पुस्तकों की प्रामाणिकता पर भी कुछ विद्वान आपत्ति करते हैं. अधिकांश का मानना है कि प्लेटो के नाम से उपलब्ध पत्र-शैली की 13 पुस्तकों में से मात्र छठी, सातवीं और आठवीं रचनाओं को ही उसकी वास्तविक कृति माना जा सकता है. शेष रचनाएं परिवर्ती लेखकों द्वारा प्लेटो के नाम पर थोप दी हैं. पहले अकसर ऐसा होता था. जब किसी विचारक का नाम अथवा पुस्तक अधिक प्रचलित हो जाती तो उनके समर्थक-अनुयायी उसमें अपनी ओर से भी विस्तार करते जाते थे. कभी यह काम उस ग्रंथ के प्रति समर्पण भाव दर्शाते हुए भावातिरेक में कर दिया जाता था तो कभी-कभी, आत्मविश्वास की कमी के कारण, अपने विचारों को भी ग्रंथ-विशेष में यह सोचकर समाहित कर लिया जाता था, इससे वे अधिक मान्य होकर जनता में प्रचलित हो सकें. उदाहरणार्थ भारत में भी वेदों, महाकाव्यों, स्मृतियों, पुराणों में ऐसे प्रक्षेपण लगातार होते रहे हैं. प्लेटो द्वारा रचित सभी संवादों में मनुष्यता की चिंताएं तथा उसकी स्थापना के प्रति तीव्र आग्रहशीलता है. ‘ला॓ज’ उसका अंतिम संवाद है, जिसमें वह शिक्षा की अनिवार्यता तथा उसकी सर्वोपलब्धता पर जोर देता है. स्मरणीय है कि प्लेटो पहला विचारक था जिसने आदर्श समाज की स्थापना के लिए बच्चों की वैज्ञानिक तरीके से शिक्षा को जरूरी माना था. उससे पहले शिक्षा का मुख्य उद्देश्य धार्मिक प्रतीकों, आस्थाकेंद्रों के बारे में बताना और अध्यात्म-जिज्ञासा को बनाए रखना होता था. उनसे अलग हो चुके सोफिस्ट विचारक भी थे, जो केवल अभिजात्य वर्ग अध्यापन करते थे. उनकी दृष्टि में शिक्षण का प्रमुख उद्देश्य व्यावहारिक निपुणता प्राप्त करना था. बदले में वे मोटी शुल्क वसूलते थे. उन दिनों एथेंस का कानून ही ऐसा था कि तीस वर्ष से अधिक वयस् का कोई भी नागरिक राजनीति में हिस्सा ले सकता था. राजनीतिक गतिविधियां प्रायः खुले में संपन्न होती थीं. वहां अनुकूल निर्णय के लिए दूसरे सदस्यों को प्रभावित करना अत्यावश्यक था. इसलिए वाक्-निपुण होना अतिरिक्त योग्यता मानी जाती थी. असल में वह गणतंत्र के नाम पर भीड़तंत्र था. जिसमें वाक्निपुण व्यक्ति के विकास के अतिरिक्त अवसर थे.

पश्चिमी जगत में सुकरात को बौद्धिक संत की गरिमा प्राप्त है. वही सुकरात प्लेटो के संवादों में प्रत्यक्ष अथवा परोक्षरूप में नायक के रूप में उपस्थित है, जबकि स्वयं प्लेटो सिवाय ‘अपोला॓जी’ के किसी भी संवादिका में उपस्थित नहीं है. इस संवाद में सुकरात के अंतिम दिनों का वर्णन है. यहां उल्लेख करना प्रासंगिक हो सकता है कि सुकरात ने स्वयं कुछ नहीं लिखा था, सिवाय कुछ धार्मिक गीतों के अनुवाद के, जो उसने अपनी मृत्यु से पहले, कारागार में अपने अंतिम दिन बिताते हुए लिखे थे. उनके अलावा वह सिर्फ संवाद में हिस्सा लेता रहा. वहां भी उसकी उपस्थिति एक प्रश्नवाचक जिज्ञासु की होती थी. ‘मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि मैं कुछ नहीं जानता….मुझे अपने अज्ञान का ज्ञान है.’—यह उसकी प्रसिद्ध उक्ति थी. इसके विपरीत सोफिस्ट विचारक थे, जो अपने ज्ञान के अहंकार से तने-तने रहते थे. जिनका ज्ञान केवल समाज के उच्च वर्ग के काम की चीज था. दूसरी ओर सुकरात के शिष्यों में अधिकांश नवयुवक थे, जिनके मन में कहीं न कहीं एथेंस की राजनीतिक के प्रति असंतोष था. सुकरात द्वारा लिखी गई किसी पुस्तक का उल्लेख नहीं मिलता. जिस सुकरात को दुनिया जानती और सम्मान करती है, उसके बारे में अधिकांश विवरण प्लेटो तथा जेनोफीन की रचनाओं से ही प्राप्त होता है. इसलिए यह कहना बहुत कठिन है कि प्लेटो के विचारों में कितना मौलिक और कितना गुरु सुकरात से आयातित है. लेकिन यह सप्रमाण कहा जा सकता है कि गुरु-शिष्य के विचारों में काफी समानता थी, प्लेटो ने अपनी रचनाओं में जहां भी उसे अवसर मिला, मौलिक दृष्टि के साथ गुरु के विचारों को ही विस्तार दिया है. अतएव प्लेटो के संवादों के भाषाशास्त्रीय वर्गीकरण-विश्लेषण तथा जेनोफीन, प्रोटेगोरेस आदि की समकालीन लेखकों की कृतियों के तुलनात्मक अध्ययन द्वारा सुकरात के विचारों को जानने की कोशिश की जाती रही है. इनमें जेनोफीन और प्रोटेगोरस प्लेटो के समकालीन थे.

सुकरात और प्लेटो दोनों ही परंपरा के नाम पर रूढ़ियों को थोपे जाने के विरुद्ध थे. दोनों ही सोफिस्टों के तर्कों, मिथ्या व्याख्यानों को व्यर्थ का वितंडा मानते थे. दोनों ही का मानना था कि ज्ञार्नाजन ही मनुष्य का पहला लक्ष्य है. वही शुभत्व की प्राप्ति का एकमात्र मार्ग है. अतएव ‘न तो कोई इच्छा पाप है, न इच्छा करना कोई अपराध है. सभी सदगुण ज्ञान का प्रतीक हैं’—सुकरात का मानना था. केवल सद्गुण द्वारा ही परमशुभ को जाना जा सकता है और सद्गुण की पहचान के लिए ज्ञान परमावश्यक है. इसलिए प्लेटो ने अपनी संवादों में शिक्षा पर पूरा जोर दिया था. समाज के रूप में उसने ऐसी व्यवस्था की संकल्पना की थी, जिसके द्वारा सभी को ज्ञानार्जन का पर्याप्त अवसर मिल सके. वह सुकरात के आदर्शों को अपने चिंतन में न केवल महत्त्वपूर्ण स्थान देता है, बल्कि ऐसी व्यवस्थाओं की परिकल्पना भी करता है, जिनसे इस लक्ष्य को सुगम बनाया जा सके. जो मानवोत्कर्ष के सपने को सच करने में सहायक हों. देखा जाए तो प्लेटो का पूरा लेखन मनुष्य के बहुआयामी उत्थान को समर्पित है. उसकी संवादिकाओं में सुकरात की उपस्थिति एक प्रखर-बुद्धि, निस्पृह, आदर्शवादी विचारक, मौलिक चिंतक और भौतिक प्रलोभनों से मुक्त मानवतावादी शिक्षक की है. जिसके संपूर्ण चेष्ठाएं मनुष्यता की स्थापना को समर्पित हैं, और जिसके पास मनुष्यता की सर्वश्रेष्ठता को स्थापित करने वाले असंख्य तर्क हैं. जिसकी ज्ञान प्राप्ति की ललक वरेण्य है. जो हर पल कुछ सीखने को छटपटाता रहता है तथा किसी भी प्रकार के भौतिक प्रलोभनों और लालसाओं से परे है. जो तर्क के माध्यम से अपनी बात मनवाना चाहता है. लेकिन तर्क उसके लिए दूसरों को बौद्धिक रूप से परास्त करने, उनपर अपनी बौद्धिक श्रेष्ठता सिद्ध करने अथवा विमर्श के नाम पर फिजूल का वाग्जाल खड़ा करने का माध्यम नहीं है. सुकरात के लिए तर्क सत्य की खोज का माध्यम है, जिसके द्वारा सद्गुणों की स्थापना संभव है. उसके पास मनुष्यता की हर समस्या का समाधान, उससे उबरने की युक्ति है, वह ज्ञानार्जन को अपने जीवन का लक्ष्य मानता है, और बौद्धिक जड़ता को मनुष्यता के लिए अभिशाप.

प्लेटो के लेखन-चिंतन का दायरा व्यापक था. पत्र-शैली में रचित उसकी पुस्तकों द्वारा उसके अपने जीवन तथा तत्कालीन इतिहास के बारे में प्रामाणिक जानकारी मिलती है. चूंकि सुकरात इन सभी में किसी न किसी रूप में मौजूद है इसलिए कुछ विद्वान उन्हें ‘सुकरातीय संवाद’ भी कहते हैं. प्लेटो ने सुदीर्घ जीवन जिया और भरपूर लेखन किया था. उसके विपुल वाङमय में हर सोच-समझ के व्यक्ति को सीखने, पे्ररणा लेने के लिए कुछ न कुछ मिल जाता है. यह आधार पर यह दावा भी किया जाता है कि पश्चिम का कोई दर्शन ऐसा नहीं है, जिसके बीजतत्व प्लेटो के लेखन में उपलब्ध न हों. गत 2400 वर्ष के कालखंड में अनेक विचारकों ने अपने सोच और विचारधारा के अनुरूप उसके लेखन को वर्गीकृत-विश्लेषित करने का प्रयास किया है. सबसे पहले लुइस केंपबेल ने, उनीसवीं शताब्दी में शैली-वैज्ञानिक अध्ययन द्वारा प्लेटो की संवादों को भिन्न-भिन्न वर्गों में बांटने का काम किया था. अपने अध्ययन के उपरांत केंपबेल इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि क्रिटिअस, टाइमियस, लाॅज, फिलेबस तथा स्टेटसमेन प्लेटो की अपेक्षाकृत परिवर्ती रचनाएं हैं. बावजूद इसके प्लेटो विभिन्न पुस्तकों के रचनाकाल को लेकर विवाद अकसर उठते ही रहते हैं. तो भी मोटे तौर पर उसकी पुस्तकों के रचनाकाल को तीन वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है. आरंभिक संवाद-पुस्तकों का लेखनकाल 400 ईस्वी पूर्व से 387 ईस्वी पूर्व है. इस वर्ग के संवादों में सुकरात की शत-प्रतिशत उपस्थिति है. यह सुकरात के जीवन और दर्शन के बारे में सवार्धिक प्रामाणिक स्रोत हैं. विश्व-समाज में व्यक्ति और विचारक के रूप में सुकरात की जो छवि है, उसका आधार यही पुस्तकें हैं. इनमें एक ओर जहां प्राचीन यूनान के सामाजिक-राजनीतिक परिवेश की झलक मिलती है, वहीं प्लेटो और सुकरात की अंतरंगता का भी बोध होता है. इनपर प्लेटो की युवावस्था के अनुभव और चिंतन की छाप है. सुकरात की इनमें मौजूदगी इस सीमा तक है कि इस कारण कुछ विद्वान इन्हें ‘सुकरातीय संवाद’ भी कहते हैं. इनमें मनुष्यता और प्रेम का दर्शन है. अपोलाॅजी, चारमिंडिस, क्रीटो, यूथाइफ्रो, आयोन, लेसर हिप्पीयास, मेनेक्जीनियस, लाइसस, प्रोटेगोरस, लेस आदि इसी वर्ग में आती हैं. इनके अतिरिक्त यूथाइडेमस, मेनो तथा जोर्जिया को भी प्लेटो के प्रारंभिक संवादों में गिना जाता है. इन पुस्तकों के माध्यम से हमें सुकरात की वक्तृत्वकला का साक्षात होता है तथा उसका मानवताप्रेमी, निर्भीक, स्पष्टवक्ता का रूप सामने आता है. इन सभी संवादिकाओं में एक और विशेषता है कि इनमें सुकरात विनम्रतापूर्वक प्रश्न उठाता है. उसके उत्तर की अपेक्षा वह प्रतिपक्षी से रखता है. वार्तालाप के बीच वह गजब का धैर्य दिखलाता है. यदि सामनेवाला नाराज हो तो भी वह उद्धिग्न नहीं होता. बल्कि शांतिपूर्वक संवाद की निरंतरता को बनाए रखता है. वह साभिमान इस बात को कहता है कि उसको अपने अज्ञान का ज्ञान है. उसकी यह विनम्रता ही उसको उच्चकोटि का जिज्ञासु और विचारक सिद्ध करती है.

दूसरी श्रेणी में प्लेटो के उन संवादों को रखा जाता है, जो उसने सुकरात की मृत्यु के बाद, 386 ईसा पूर्व से लेकर 367 ईसा पूर्व के बीच लिखे थे. उल्लेखनीय है कि सुकरात की मृत्यु से खिन्न प्लेटो एथेंस को छोड़कर सिसली की सुदीर्घ यात्रा पर निकल चुका था. दस वर्ष लंबी उस यात्रा में उसने सिसली के अलावा अनेक निकटवर्ती राज्यों का भ्रमण दिया. सायराकस के निरंकुश सम्राट डायोनिसियस के उत्थान और पतन का साक्षी बना. कहा जा सकता है कि जीवन में व्यावहारिक अनुभव बटोरते हुए प्लेटो ने इन संवादों की रचना की थी, जिनकी छाप इन पर है. सुकरात की मौजूदगी इनमें भी है, किंतु उसके स्वभाव में किंचित अंतर आ चुका है. अब वह सिर्फ जिज्ञासा ही प्रकट नहीं करता, साथ-साथ समस्या का समाधान भी देता है. उसके समाधान उसके मानवतावादी दृष्टिकोण के ही अनुरूप हैं. इन रचनाओं में हमारा साक्षात प्लेटो की बौद्धिक परिपक्वता से भी होने लगता है. हालांकि यह अंतर कर पाना बड़ा कठिन है कि इन संवाद-पुस्तकों में उल्लिखित विचारों में कितने प्लेटो के हैं और कितने गुरु सुकरात से आयातित. ‘केवल शुभत्व का बोध ही ज्ञान है, प्राणीमात्र शुभ की कामना करता है. जानबूझकर कोई भी पाप का भागी नहीं बनना चाहता.’—यही सुकरात के दर्शन का मूल तत्व है, जो प्लेटो के मध्यकालीन संवादों में निखरकर आता है. ‘पदार्थ के शुद्ध-सात्विक स्वरूप को पहचान लेना, उसको उसकी पवित्रता के साथ अनुभव करना ज्ञान का प्रमुख मार्ग है. मानवजीवन का लक्ष्य ऐसी ही अनुभूतियों की खोज है, जिससे वह सृष्टि के रहस्यों की सही-सही व्याख्या कर सके.’ ये विचार प्लेटो के थे, जो उसकी रचनाओं में अलग-अलग तर्कों के साथ अभिव्यक्त होते हैं. ‘सिंपोजियम’ और ‘रिपब्लिक’ इस दौर में लिखी गई प्रमुख संवाद-पुस्तकें हैं. जिनमें वह आत्मा की अमरता के साथ न्याय, सत्य, सौंदर्य, शुभत्व, ज्ञान आदि को लेकर अपना विशिष्ट चिंतन प्रस्तुत करता है. ‘पेरामेंडिस’ तथा ‘थिटेट्स’ इस काल के अंतिम दौर में रची गई पुस्तकें हैं. इस दौर के संवादों में क्रिटेलस, पेरामेंडिस, फीडिया, फीडरस, रिपब्लिक, सिंपोजियम, थीटेट्स आदि आती हैं. इन रचनाओं से प्लेटो का राजनीति और धर्म के प्रति रुझान भी प्रकट होता है.

परिवर्ती जीवनकाल की संवाद-पुस्तकों का लेखनकाल 366 ईसा पूर्व से 348 ईसा पूर्व तक है. उस समय तक प्लेटो राजनीति से उकता चुका था. एथेंस वापस लौटकर उसने खुद को अध्ययन-अध्यापन को समर्पित कर दिया था. ‘अकादमी’ में रहते हुए उसने विपुल साहित्य की रचना की थी. प्लेटो के अधिकांश महत्त्वपूर्ण संवाद इसी दौर में रचे गए. ‘ला॓ज’, ‘सोफिस्ट’, ‘फिलेबस’, ‘स्टे्टसमेन’ तथा ‘टाइमियस’ इस कालखंड की अतिमहत्त्वपूर्ण संवादिकाएं हैं. इनमें प्लेटो लगभग अपने गुरु की गहन छाया से उबर चुका था, इसलिए इन संवादों में वह या तो नदारद है, अथवा न्यून भूमिका लिए हुए है. इनमें हम प्लेटो को मौलिक दार्शनिक और चिंतक के रूप में पाते हैं. ‘टाइमियस’ में वह वस्तुओं के वर्गीकरण पर चर्चा करता है. इस समय तक प्लेटो की संवादशैली भी काफी निखर चुकी थी. वह नए तर्कों के साथ बात को आगे बढ़ाता है. वार्तालाप में भाग ले रहा प्रतिपक्षी किसी वस्तु अथवा विचार के वर्णन के लिए अन्य वस्तुओं से उसकी समानता और असमानताओं का विश्लेषण करता है, ताकि उनको उनके यथार्थरूप में जाना जा सके. ‘सोफिस्ट’ में प्लेटो इस अवधारणा के साथ प्रस्तुत होता है कि दर्शन का मूल स्वरूप, जानने की शाश्वत प्रक्रिया में निहित है. यानी मनुष्य की जिज्ञासा है, तो दर्शन है. किसी वस्तु को जान लेने के बाद भी उसके बारे में बहुत कुछ जानना शेष रह जाता है. इसलिए दर्शन की भूमिका कभी समाप्त नहीं होती. इन संवादों में प्लेटो बहुत-से नए मुद्दे भी उठाता है. मगर कई बार वह उन बिंदुओं को भी पुनःविमर्श के केंद्र में लाता है, जिनपर वह अपने पूर्ववर्ती संवादों में विचार कर चुका था. नए निष्कर्ष उसके पिछले चिंतन को आगे बढ़ाने का काम करते हैं. परिपक्व और सधे हुए चिंतन के कारण ये संवाद प्लेटो की पिछली संवाद-पुस्तकों की अपेक्षा अधिक गंभीर और विषय-केंद्रित बन पड़े हैं.

जैसा कि पहले भी कहा गया है कि इन संवादों में प्लेटो स्वयं अनुपस्थित है. सिवाय ‘अपोला॓जी’ के वह किसी भी संवाद में नजर नहीं आता. उद्घोषक की उपस्थिति भी चर्चा को मूल विषय तक लाने तक सीमित है. हालांकि अनेक ऐसे संवाद जैसे मेनो, जोर्जियास, फीड्रस, क्रीटो, यूथाइफ्रो हैं जो सीधे वार्तालाप से आरंभ हैं. कुछ संवादों में उद्घोषक की भूमिका स्वयं सुकरात ने निभाई है, जिनमें वह प्रथम पुरुष में सीधे संवाद करता है. ऐसी रचनाओं में लाइसिस, चार्मिंडिस, रिपब्लिक आदि हैं. संवाद-पुस्तक ‘प्रोटेगोरस’ का आरंभ सीधे वार्तालाप से होता है, मगर कुछ देर बाद ही सुकरात उसमें उद्घोषक की भूमिका में उपस्थित हो जाता है. इसी प्रकार फीडो और सिंपोजियम की शुरुआत संवादों के माध्यम से होती है, मगर इनमें थोड़ी देर बाद सुकरात के शिष्य उपस्थित होकर उसको नया मोड़ दे देते हैं. आशय यह है कि प्लेटो ने अपनी संवादिकाओं में विषय प्रस्तुतीकरण के लिए विभिन्न पात्रों, स्थितियों और शैलियों का सहारा लिया है, हालांकि उसका ध्येय नाटकीयता प्रस्तुत करना हरगिज नहीं था. न ही वह अपनी रचनात्मक क्षमता द्वारा विद्वानों को प्रभावित करना चाहता था. न ही उसका लक्ष्य प्राचीन और समकालीन यूनानी साहित्यकारों की भांति प्रसिद्ध यूनानी चरित्रों का महिमामंडन करना था. ये संवाद मूलतः दार्शनिक चर्चा हैं, इसलिए इनमें वार्तालाप में हिस्सा ले रहे व्यक्तियों की संख्या बहुत कम है. उनमें से कुछ ऐतिहासिक चरित्र भी हैं. चर्चा को अवरोध से बचाए रखने के लिए प्लेटो उनमें नए-नए पात्रों को लाता है. वे पात्र साधारण व्यक्ति भी हो सकते हैं. जैसे ‘सोफिस्ट’ और ‘स्टेटसमेन’ नामक संवादों में दक्षिणी इटली से आया एक अजनबी यात्री चर्चा को आगे बढ़ाता है. इसी प्रकार ‘लाॅज’ में एथेंस के दो नागरिक स्पार्टा तथा क्रीट से आए सैलानियों से चर्चा करते हैं. लिखते समय प्लेटो न केवल अपने पाठकों से संवाद में सहभागिता की अपेक्षा रखता है, बल्कि वह वार्तालापियों के व्यवहार, चरित्र, वातावरण आदि पर भी अपनी आलोचनात्मक दृष्टि बनाए रखता है. रूढ़ चरित्रों पर सूक्ष्म कटाक्ष के माध्यम से वह उनकी अस्वाभाविकता को निशाने पर लाता है. प्रोटागोरस, जोर्जियास, यूथाडेमस आदि संवादों में यह शैली खुलकर सामने आई है. इसका सुखद परिणाम यह रहा है कि वह गूढ़-गंभीर विषय को भी सहज-संप्रेषणीय रूप में व्यक्त करने में सफल रहा है, जो विषय को रोचक एवं ग्राह्यः बनाए रखने के लिए अत्यावश्यक था.

प्लेटो आदर्शवादी विचारक तथा दक्ष लेखक था. वह विचारों के आधार पर आदर्शवादी था, जिसकी निगाह में समाज का स्तर व्यक्ति से ऊपर है. बाद की संवाद-पुस्तकों में ‘रिपब्लिक’ सर्वाधिक लोकप्रिय है. आजकल ‘रिपब्लिक’ शब्द को गणतंत्र के पर्याय के रूप में लिया जाता है. मगर गणतंत्र की आधुनिक अवधारणा से यह पुस्तक कोसों दूर है. इसको राजनीति से अधिक नीतिशास्त्र की पुस्तक मानना उपयुक्त होगा, जिसमें वह राज्य एवं उसके नागरिक के कर्तव्यों का निष्पादन करता है तथा अपेक्षा करता है कि प्रत्येक नागरिक स्वयं-स्फूर्त भाव से उनका पालन करे. ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो के आदर्श समाज की संकल्पना की झलक देखी जा सकती है. इस पुस्तक में यह विचार भी सामने आया है कि राज्य की बागडोर एक दार्शनिक को सौंपी जानी चाहिए. प्लेटो का मानना था कि दार्शनिक स्वाभाविक रूप से विवेकवान, दूरदृष्टा, ईमानदार, संवेदनशील, उदार तथा धैर्यवान होते हैं. वे भौतिक प्रलोभनों से दूर होते हैं. उनके नेतृत्व में समाज का बहुआयामी और समरस विकास संभव है. प्लेटो की इस अवधारणा के पीछे कुछ विद्वान उसकी कुंठा की झलक भी पाते हैं. उसका संबंध एथेंस के राजवंश से था. मगर वह कभी एथेंस की राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका नहीं निभा सका. दार्शनिक और प्रखर बुद्धिमान होने के बावजूद उसे सुकरात के मुकदमे में मतदान से मात्र इसलिए वंचित रखा गया था कि उसकी वय मतदान के लिए निर्धारित न्यूनतम वय से मात्र दो वर्ष कम थी. एक संभावना यह भी हो सकती है कि 401 ईस्वी तक इतिहास प्रसिद्ध पेलोपोनिशयन युद्ध में स्पार्टा के हाथों करारी मात के बाद एथेंस का शासन अभिजात्य वर्ग के हाथों में आ चुका था. महान सोलोन और वीर पेरिक्लीस के एथेंस पर उन लोगों का शासन था जो अदूरदर्शी, निकम्मे और विलासी थे. मात्र आठ महीने में उस समूह का आचरण तानाशाहीपूर्ण हो चला था. एथेंस जो कभी समृद्धि के शिखर पर था, वह लगातार चलने वाले युद्धों, अभिजात्य वर्ग की मनमानी तथा उनकी विलासितापूर्ण हरकतों के कारण पतन के कगार तक पहुंच चुका था. प्लेटो ने अपनी आंखों के सामने राजसत्ता को उखड़ते और क्रमशः एक तानाशाही व्यवस्था में ढलते हुए देखा था. अभिजात्यों की तानाशाही ने ही सुकरात को मृत्युदंड दिया था. इस कारण प्लेटो का उस व्यवस्था से स्वप्नभंग होना स्वाभाविक था. ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो ने अपने सपनों के राज्य की परिकल्पना की थी, यद्यपि वह इतनी अव्यावहारिक थी कि उसके शिष्य अरस्तु ने ही इसे स्वीकारने से इंकार कर दिया था. तथापि उसकी महत्ता से इंकार नहीं किया जा सकता. क्योंकि शताब्दियों से प्लेटो के लेखन को आधार मानकर ही वैकल्पिक दर्शन की खोज की जाती रही है. अठारहवीं शताब्दी तथा उसके बाद के प्रमुख दार्शनिकों हीगेल, नीत्शे, कार्ल मार्क्स, ऐंगल्स आदि पर प्लेटो का प्रभाव था.

‘रिपब्लिक’ में वह अपनी कल्पना के अनुरूप आदर्श समाज का सपना देखता है. उसके सपने की विशेषता है कि उसको किसी भी आदर्शवादी शासन-व्यवस्था के माध्यम से संभव किया जा सकता है. उसके दूसरे संवाद ‘लाॅज’ के बारे में भी सच है. यह संवाद भी कानून के प्रबंधन अथवा कानून के आधार पर प्रबंधन के बारे बहुत चर्चा नहीं करता. अपराधियों की नाक में नकेल डालने की व्यवस्था करना भी ‘ला॓ज’ का उद्देश्य नहीं है. इसका मूल विषय है मानव समाज की समुन्नत व्यवस्था और विवेकीकरण की प्रक्रिया को ऊर्जस्वित करना, ताकि लोगों में कर्तव्यबोध जाग्रत हो. अपना मंतव्य स्पष्ट करने के लिए प्लेटो एक सूत्र का सहारा लेता है. उसकी स्थापना उस समाज को चौंका सकती है जो स्वयं कानूनी आधार पर व्यवस्थित होने का दावा करता है. उल्लेखनीय है कि वह कानून के नाम पर किसी बाहरी शक्ति को थोपने पर उतना जोर नहीं देता, जितना कि वह व्यक्ति को नैतिक और सामाजिक रूप से मर्यादित देखना चाहता है. कानून उसके लिए न्याय की स्थापना का माध्यम नहीं है, बल्कि मानवीय बोध और आत्मानुशासन की उच्चतम अवस्था का प्रतीक है. यहां हम प्लेटो और सुकरात के विचारों के साम्य को परख सकते हैं. सुकरात ज्ञान को सत्य और सत्य को परमशुभ की संज्ञा देता था. उसके अनुसार व्यक्ति का कर्तव्य है, शुभत्व की प्राप्ति के लिए अविरत प्रयास करना और दूसरों को अपने इस लक्ष्य में सहयोग करना. संवाद-पुस्तक ‘ला॓ज’ में प्लेटो भी यही कामना करता है. किंतु इसके लिए वह किसी बाह्यः शक्ति के बजाय व्यक्ति के नैतिक उत्थान और आत्मानुशासन को अनिवार्य मानता है. तो प्लेटो का समीकरण है कि किसी राज्य में न्याय की मौजूदगी, वहां के नागरिकों के आचरण में मौजूद न्याय की भावना से आंकी जा सकती है. उसका मानना था कि जनसाधारण के व्यवहार में न्याय की भावना जाग्रत करने के लिए हमें समाज को इस प्रकार व्यवस्थित करना चाहिए, जिस प्रकार हम खुद को रखना चाहते हैं. प्लेटो व्यक्ति को अपूर्ण इकाई मानता था. इसके बावजूद उसको विश्वास था कि आदर्श समाज की स्थापना का लक्ष्य व्यक्तिमात्र के सहयोग और समर्पण के बगैर संभव नहीं है. नैतिकता की इस उच्चतम स्थिति का विस्तार आगे चलकर कांट के दर्शन में देखने को मिलता है—

‘हमें न्याय के रूप में ऐसे सदगुण की कल्पना करनी चाहिए जो पूरे समाज में उसी प्रकार मौजूद है, जैसे कि उसकी इकाई-विशेष में, और समाज सदैव दो से अधिक से मिलकर बनता है. इससे इस बात की संभावना बढ़ेगी कि हम न्याय को अधिक मात्रा में प्राप्त कर सकते हैं, उसकी स्थापना कर सकते हैं…’

प्लेटो अपने विचारों के मामले में जड़ अथवा एकीभूत नहीं था, बल्कि उसकी मान्यताओं में समय के साथ परिवर्तन भी देखने को मिलते हैं. उसके लेखन की एक अन्य विशेषता थी कि वह कृति के प्रकाशित होने के बाद भी उसमें निरंतर सुधार करता रहता था. ‘रिपब्लिक’ जैसी महान कृति में भी उसने एकाधिक बार संशोधन किया था. विद्वानों के अनुसार यह ग्रंथ चार या पांच बार लिखा गया. वर्षों तक यह ‘प्रोटो रिपब्लिक’ के शीर्षक के अंतर्गत पढ़ाया जाता रहा. इस बात के भी प्रमाण हैं कि प्लेटो द्वारा स्थापित ‘अकादमी’ के सदस्य भी उसकी कृतियों की लोकप्रियता को बनाए रखने के लिए उनमें समयानुसार संशोधन-परिवर्धन करते रहते थे. यह दावा भी किया जाता है प्लेटो की कुछ संवाद-पुस्तकें ‘अकादमी’ के सदस्यों के सहयोग से रची गई थीं. विशेषतः ‘ला॓ज’ शीर्षक से रचा गया संवाद, जो उसकी अंतिम पुस्तकों में से एक है, के बारे में संभावना व्यक्त की जाती है कि यह प्लेटो के शिष्यों ने, उसके द्वारा दी गई रूपरेखा के आधार पर रचा था. तथापि इस बात से प्लेटो की प्रतिभा पर संदेह करना सर्वथा अनुपयुक्त होगा. इसलिए कि ‘डायलाग्स’ अथवा संवाद-पुस्तकों के अतिरिक्त भी विविध विधाओं में लिखित विपुल सामग्री हमें प्लेटो के नाम से प्राप्त होती है. उसके अध्ययन-मनन का क्षेत्र अत्यंत व्यापक था. अपनी सुदीर्घ आयु का अधिकांश हिस्सा उसने अपने अध्ययन-मनन को समर्पित किया था, जिसमें उसने राजनीति, नीतिशास्त्र, दर्शन, कानून, शिक्षा के मानवीयकरण के लिए लगातार लेखन किया. यही कारण है कि लगभग 2400 वर्षों से वह दुनिया-भर के विचारकों को अलग-अलग तरह से प्रभावित करता रहा है. उसी के दम पर प्लेटो के प्रशंसक यह दावा भी करते हैं—
‘पश्चिम के जितने भी दर्शन हैं, वे वस्तुतः प्लेटो के दर्शन पर की गई पाद-टिप्पणियां हैं.’

किसी भी विचारक के लिए इससे बड़ी बात भला और क्या हो सकती है.

अकादमी की स्थापना

सायराकस में डायोनिसियस द्वितीय के अध्यापन के समय प्लेटो को लगने लगा था कि उसके पास शिक्षा, दर्शनशास्त्र, विज्ञान, राजनीति, कानून आदि को लेकर कुछ नए विचार हैं. उनके माध्यम से शिक्षा और शिक्षा पद्धति में बदलाव संभव है. जैसा कि पहले भी कहा गया है, उस समय शिक्षा समाज के अभिजात्य वर्ग तक सीमित थी. शिक्षण का प्रमुख लक्ष्य विद्यार्थी को व्यवहार-कुशल, व्याख्यान कला में पारंगत तथा तर्क-वितर्क में निपुण बनाना था. उन्हें वे अभिजात्यीय संस्कार देना था, जिनपर एथेंस का तत्कालीन अभिजात्य-वर्ग गर्व करता था. उस समय तक शासन के स्तर पर शिक्षण की कोई व्यवस्था न थी. अधिकांश विद्यालय निजी थे, जिनका संचालन सोफिस्टों के अधीन था, जो केवल समाज के प्रभावशाली वर्ग को शिक्षा देते और बदले में मोटी शुल्क वसूलते थे. तत्कालीन कानून और व्यवस्था के अंतर्गत दासों का कर्तव्य केवल अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करना था, अतएव उनके शिक्षण का कोई प्रावधान न था. अभिजात्य वर्ग और दासों के अलावा तीसरा वर्ग ‘मेटिक्स’ का था, जिनकी हैसियत मुक्त दास जैसी थी. मेटिक्स कृषि, उत्पादन और व्यापार को संभालते थे. दासों की भांति मेटिक्स को भी नागरिकता के अधिकार से वंचित रखा गया था. न वे एथेंस की राजनीति में सक्रिय भाग ले सकते थे, किंतु उन्हें व्यापार एवं उत्पादन-कर्म करने की पूर्ण स्वतंत्रता थी. इसलिए एथेंस के समाज में अल्पसंख्यक होने के बावजूद उनकी हैसियत ऊंची थी. प्लेटो का समाज को लेकर एक सपना था. वह चाहता था कि व्यक्ति का नैतिक स्तर इतना ऊंचा हो कि समाज में अनुशासन और व्यवस्था बनाए रखने के लिए कानून की आवश्यकता ही नहीं पड़े. चरित्र-निर्माण में शिक्षा की महत्ता को समझते हुए वह बच्चों को बहुआयामी शिक्षा दिए जाने के पक्ष में था, ताकि उनका बहुमुखी विकास हो सके. वह चाहता था कि बच्चों को गीत-संगीत की शिक्षा मिले, ताकि उनमें थोड़ी संवेदनशीलता हो और वे सुहृदय नागरिक की भांति व्यवहार कर सकें. शरीर को चुस्त-दुरुस्त बनाने के लिए उनको व्यायाम की भी शिक्षा दी जाए. इसके साथ-साथ गणित और विज्ञान की शिक्षा भी अनिवार्यतः दी जानी चाहिए, ताकि वे प्रकृति में होने वाले बदलावों को भली-भांति समझ सकें.

प्लेटो की अत्यंत महत्त्वाकांक्षी परियोजना ‘अकादमी’ की स्थापना का विचार सायराकस दूसरी यात्रा के दौरान जन्मा था. उन दिनों वह डायोनिसियस द्वितीय के शिक्षण में रत था, जिसके लिए पढ़ाई-लिखाई का कोई महत्त्व न था. वह हमेशा स्वयं को सायराकस के भावी सम्राट के रूप में सोचता था कि वह आने वाले दिनों का सम्राट है. अपने उस विद्यार्थी को पढ़ाने में प्लेटो को विशेष परिश्रम करना पड़ता था, फिर भी परिणाम लगभग शून्य था. वह समझ रहा था कि राजनीति के जिन आदर्शों की वह कल्पना करता है, उनमें से एक भी डायोनिसियस प्रथम और द्वितीय में नहीं है. तभी सायराकस की राजनीति करवट लेने लगी. तानाशाह सम्राट को मृत्यु ने आ दबोचा. पिता की मृत्यु के बाद शासन की जिम्मेदारी डायोनिसियस द्वितीय के कंधों पर आ गई. अपने पिता की भांति वह भी निरंकुश सम्राट सिद्ध हुआ. बदलते घटनाक्रम के बीच डायोनिसियस द्वितीय अचानक डिओन से नाराज हो गया. चूंकि प्लेटो डीओन का मित्र था. उसी के निमंत्रण पर सायराकस पहुंचा था. इसलिए डायोनिसियस प्लेटो का भी दुश्मन बन गया. प्लेटो बड़ी मुश्किल से खुद को बचाते हुए एथेंस लौटने में कामयाब हो पाया. उस समय उसका मन खिन्न था. राजनीति से उसका मन उचाट हो चुका था. वह कुछ ऐसा करना चाहता था, जिससे मन को तसल्ली मिले. वह ईसा से लगभग 385(अथवा 387) ईस्वी पूर्व का समय था. प्लेटो अपनी वयस् के चालीसवें वर्ष से गुजर रहा था. उसके मन में नया करने का संकल्प था. आंखों में कुछ अलग गढ़ने की बेचैनी. उसको इसका अवसर भी शीघ्र मिल गया.

एथेंस से लगभग एक किलोमीटर दूर उत्तर में एक पवित्र स्थान था. ईसा पूर्व पांचवी शताब्दी में उस स्थान को यूनानी महायोद्धा ‘अकादमस’ के नाम पर ‘अकादमिया’ कहा जाता था. प्राचीन यूनानी ग्रंथों में ‘अकादमस’ को ‘हेकादमस’ भी कहा गया है. वह अत्यंत प्राचीन स्थल था, जो यूनान की ज्ञान की देवी एथेना के वास-स्थल के नाम से प्रसिद्ध था. वहां लौंग के महमहाते वृक्ष थे. चारों और हरियाली. एथेंसवासियों के लिए वह स्थल बहुत ही खास था. ईसापूर्व पांचवी शताब्दी में एथेंस के साम्राज्य के स्थापकों में से एक सीमोन ने उस स्थान पर एक अहाता बनवा दिया था. समय के अंतराल में वह स्थल हालांकि खंडहर में ढल चुका था. तो भी स्थल की ऐतिहासिकता को दर्शाने वाले कई मूर्तिशिल्प, धर्म-स्थल वहां थे. उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण थी, एथेंसवासियों की ज्ञान की देवी ‘एथेना’ के पवित्रस्थल के रूप में, उस स्थान के प्रति गहन ऋद्धा, जिसके चलते वे एथेंस का अजेय नगर-राज्य मानते थे. हरे-भरे वृक्षों से घिरे उस स्थान का उपयोग नगर के युवजन खेलकूद और व्यायाम के लिए करते थे. उस स्थान का एक हिस्सा प्लेटो को पैत्रिक संपत्ति के रूप में मिला था. वहां छोटा-सा बाग था. उसी पवित्र और ऐतिहासिक स्थल पर ‘अकादमी’ की स्थापना की गई थी. एक प्रकार का खुला विश्वविद्यालय, जिसकी तुलना हम भारतीय उपनिषदों में व्यक्त आश्रमों से कर सकते हैं. कुछ विद्वान प्लेटो द्वारा स्थापित उस विश्वविद्यालय को दुनिया का पहला विश्वविद्यालय मानते हैं. मेग्ना ग्रेशिया की यात्रा के दौरान प्लेटो पाइथागोरस के अनुयायियों के संपर्क में आया था, जो गणित एवं विज्ञान के क्षेत्र में शोधरत रहते थे. उस विश्वविद्यालय का ढांचा उन्हीं की प्रेरणा से तैयार किया गया था. पाठ्यक्रम में गणित, धर्म, दर्शन, विज्ञान, राजनीति, ज्योतिष, कानून आदि को सम्मिलित किया गया था. इनके अलावा बच्चों को शारीरिक व्यायाम की शिक्षा भी नियमित रूप से दी जाती थी. प्लेटो ने अपनी ‘अकादमी’ यूनानी देवता मूस को समर्पित की थी. ज्ञानार्जन के लिए वहां आपसी तर्क-वितर्क और संवाद-पद्धति को अपनाया जाता था, जो सुकरात की सर्वप्रिय शैली थी. ‘अकादमी’ का परिसर घने, छायादार वृक्षों से घिरा था, जो लौंग की गंध से महमहाता रहता था. पूरा वातावरण शांत और सौहार्दपूर्ण था. कुछ ही अवधि में अकादमी ने स्वयं को एथेंस के प्रमुख शिक्षा-केंद्र के रूप में स्थापित कर लिया. आसपास के नगर-राज्यों के विद्यार्थी और जिज्ञासु वहां आने लगे.

ऐसे अभिलेख भी मिले हैं, जिनके अनुसार विश्वविद्यालय के मुख्यद्वार पर एक प्रस्तर आलेख खुदा था, जिसके अनुसार विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए ज्यामिती का ज्ञान अनिवार्य था. कुछ विद्वानों का मत है कि प्लेटो की गणित के बारे में रुचि पाइथागोरस के समर्थकों के संपर्क में आने के बाद पैदा हुई थी. वह स्वयं गणित में प्रवीण था. ‘अकादमी’ में पढ़ाए जाने विषयों के स्पष्ट पाठ्यक्रम का अभाव था, किंतु वरिष्ठताक्रम का पूरा ध्यान रखा जाता था. अध्यापन के लिए उस समय के प्रसिद्ध आचार्यों को नियुक्त किया गया था. आवश्यकता पड़ने पर वह बाहर से भी जाने-माने अध्यापकों और विद्वानों को आमंत्रित करता रहता था. वहां पढ़ाने वालों में गणितज्ञ, ज्योतिष-विज्ञानी, भूवेत्ता, चिकित्सक, वैज्ञानिक यूडोक्सस भी था. प्लेटो स्वयं दर्शन, तत्वविज्ञान, नीतिशास्त्र आदि विषय पढ़ाता था. वह विद्यार्थियों और विद्वानों को नए-नए विषयों पर विचार-विमर्श के लिए आमंत्रित करता था. अकादमी में वैज्ञानिक शोध की भी व्यवस्था थी. प्लेटो के ‘टाइमियस’ जो प्रकृति-विज्ञान के अध्ययन और तत्संबंधी प्रयोगों को लेकर प्रमुख ग्रंथ है, अकादमी में हुए शोध का ही निक्ष है. वहां की अध्यापन की शैली विचित्र थी. प्रतिदिन कक्षा आरंभ होने से पहले विद्यार्थियों को एक विषय दे दिया जाता था, जिसपर सब खुले मन से चर्चा करते थे. उस विमर्श से निकलने वाला निष्कर्ष भी अंतिम नहीं था. शंका होने पर कोई भी उसपर अगले दिन नए सिरे से चर्चा की शुरुआत कर सकता था. वहां पढ़ाए जाने वाले विषयों में ‘राजनीति’ प्रधान विषय था, जिसका नियमित अध्यापन होता था. ‘अकादमी’ का पुस्तकालय बेहद समृद्ध था. उसमें विभिन्न देशों के लिखित संविधान की प्रतिलिपियां, विद्वानों, राजनेताओं के ग्रंथ, पांडुलिपियां, आलेख, लिखित भाषण आदि भारी संख्या में उपलब्ध थे. उन्हें जुटाने के लिए प्लेटो को अथक प्रयास करना पड़ा था, जिसमें उसके अर्जित धन का बड़ा हिस्सा भी खर्च हुआ था. अकादमी में संविधान और कानून की पढ़ाई मुख्यरूप से होती थी. कुछ ही समय में अकादमी की चर्चा दूर-दूर तक होने लगी थी. अकादमी में अध्ययन करने वाले प्रतिष्ठित लोगों की लंबी सूची है.

जीवन में नैतिकता एवं उच्चादर्शों को सर्वाधिक महत्त्व देने वाला प्लेटो दासप्र्रथा का समर्थक था. वह इस तथ्य से भी प्रमाणित होता है कि अकादमी में जनसाधारण के लिए शिक्षा की अनुमति न थी. वहां केवल अभिजातवर्ग के सदस्य शिक्षा ग्रहण कर सकते थे. प्लेटो ने हालांकि सोफिस्टों की आलोचना की है. किंतु उसने अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित प्लेटो का लक्ष्य था कि अकादमी के द्वारा भावी राजनीतिज्ञों को दर्शन, विज्ञान, राजनीति, कानून आदि की शिक्षा दी जाए. ‘रिपब्लिक’ तथा ‘स्टेटसमेन’ में वह पहले ही लिख चुका था कि केवल दार्शनिक ही श्रेष्ठतर सम्राट सिद्ध हो सकते हैं. शायद इसीलिए अकादमी में दर्शन को प्रमुख विषय के रूप में पढ़ाया जाता था. प्लेटो और उसके साथियों को इसपर गर्व भी था. सुकरात का असर वहां पढ़ाए जाने वाले दर्शनशास्त्र के पाठ्यक्रम पर स्पष्ट था. उसके अलावा जिस दार्शनिक का अकादमी के पाठ्यक्रम पर गहरा प्रभाव पड़ा, वह था पाइथागोरस. प्लेटो स्वयं दर्शनशास्त्र का अध्यापन करता था. कुछ विद्वानों के अनुसार प्लेटो ‘अकादमी’ के माध्यम से अपनी उन मान्यताओं को साकार करना चाहता था, जो उसने ‘रिपब्लिक’ में व्यक्त की थीं. जबकि अन्य का विचार है कि प्लेटो अपने आदर्श समाज के सपने को आगे बढ़ाना चाहता था, जिसमें नागरिक स्वयं प्रबुद्ध एवं अनुशासित हों, इसलिए वहां औपचारिक पाठ्यक्रम के बजाय अध्यापन के लिए संवाद-शैली का प्रयोग किया जाता था. विद्यार्थी अपनी समस्या समूह के बीच रखते. तदनंतर सभी उसपर मुक्त चर्चा में हिस्सा लेते थे. प्लेटो हालांकि पांचवी शताब्दी के यूनानी दार्शनिक डेमोक्रिटिस की स्थापनाओं से असहमत था, जिसे परमाणुवाद का जनक माना जाता है, लेकिन वैज्ञानिक शोध में उसको पूरा विश्वास था. इसलिए अकादमी परिसर में वैज्ञानिक शोध पर भी नियमित काम चलता था. भावी राजनीतिज्ञों के लिए तो वह मानो तीर्थस्थली थी.

प्लेटो की मृत्यु के उपरांत अकादमी का दायित्व क्रमशः स्पीसिप्पस(347—314 ईस्वी पूर्व), जेनोक्रेट्स (339—314 ईस्वी पूर्व), पोलेमा(314—269 ईस्वी पूर्व) से होता हेगेसीनस (160 ईस्वी पूर्व) तक जाता है. उसके सम्मानित सदस्यों में अरस्तु, हेराक्लाडस, यूडोसस, फिलीप्पस, क्रेंटर जैसे महान दार्शनिक रहे हैं. लगभग तीन सौ वर्ष तक अपने उत्थान-पतन के अनेक दौर देखने के बावजूद ‘अकादमी’ अपना काम करती रही. उसके पतन का दौर 88 ईस्वी पूर्व शुरू हुआ, जब रोमन कमांडर लुइस कोरनिलयस सूला ने भारी दलबल के साथ एथेंस पर हमला कर उसको युद्ध में पराजित किया. सूला तानाशाह प्रवृत्ति का था. उसका लक्ष्य पारेअस पर कब्जा जमाना था, जो एथेंस विजय के बिना संभव न था. इसलिए भारी-भरकम सेनाओं के दम पर उसने पूरे एथेंस की नाकेबंदी कर दी. सूला को युद्धक हथियारों के लिए भारी मात्रा में लकड़ी की जरूरत थी. उसके आदेश पर अकादमी परिसर, जो एथेंस का सर्वाधिक हरा-भरा क्षेत्र था, के सभी वृक्ष काट डाले गए. कुछ ही घंटों में पूरी अकादमी उजाड़ दी गई. अकादमी के तत्कालीन प्रधान आचार्य फिलो आ॓फ लेरिसा को परिसर छोड़ना पड़ा. सुकरात की वार्तालाप शैली को समर्पित प्लेटो, हेराक्लाइट्स, यूडोसस, फिलीप्पस, केंटर जैसे महान दार्शनिकों की अध्यापन-स्थली एक सनकी तानाशाह की महत्त्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़कर वीराने में बदल गई. उसके करीब दस वर्ष बाद सिसरो ने अकादमी स्थल का भ्रमण किया तो वहां सिवाय उजाड़ मैदान के कुछ नहीं था. एक तानाशाह शासक ने महान प्लेटो के सपने को मिट्टी में मिला दिया. पर सच में जो मिटा वह प्लेटो की स्मृति का भौतिक अवशेष था. क्योंकि प्लेटो तो अपने वृहत लेखन और अपने उन समर्थकों में जीवित था, जो ज्ञान के आगे किसी भी अन्य प्रलोभन के आगे झुकने को तैयार न थे.
क्रमशः….

ओमप्रकाश कश्यप
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