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वायकम सत्याग्रह : अस्पृश्यता के विरुद्ध निर्याणक जंग

सामान्य

 (वायकम केरल का खूबसूरत नगर है। आजादी से पहले त्रावणकोर राज्य का हिस्सा था। और वहां राजा का शासन था। 1924 तक आधुनिक केरल, तमिलनाडु सहित दक्षिण के कई राज्यों में निचली जाति के सदस्यों को कुछ सार्वजनिक मार्गों पर चलने की आजादी नहीं थी। वायकम में शिव का प्राचीन मंदिर था। उससे जोड़ने वाली सड़कों पर चलना भी निचली जाति के शूद्रों और अस्पृश्यों  के लिए निषिद्ध था। माना जाता था कि उससे देवता और देवस्थान दोनों अपवित्र हो जाएंगे। सार्वजनिक मार्गों पर चलने के मानवतावादी अधिकार को लेकर जार्ज जोसेफ और उनके साथियों द्वारा आरंभ किया गया था। पहले चरण में सरकार आंदोलन को बलपूर्वक दबाने में सफल हो गई। हताशा की उस घड़ी में पेरियार को नेतृत्व के लिए आमंत्रित किया गया। उनके पहुंचते ही कार्यकर्ताओं में जान आ गई। आंदोलन के लिए पेरियार दो बार जेल गए। अंततः उनकी जीत हुई। पेरियार को ‘वायकम नायक’ की उपाधि मिली। 25-26 दिसंबर, 1958 को पेरियार ने अपने एक भाषण में उस घटना को याद किया था। उससे गांधी सहित तत्कालीन नेताओं और ब्राह्मणों की मानसिकता जाहिर होती है, अपितु संघर्ष की गंभीरता का भी अनुमान लगाया जा सकता है। भाषण का मूल तमिल ने अंग्रेजी अनुवाद ऐ. एस. वेणु ने किया है। हिंदी पाठ उसी का भाषांतर है)

आदरणीय अध्यक्ष महोदय,

 भाइयो और बहनो,

आपके साथियों की ओर से मुझे कन्याकुमारी जिले में आने का निमंत्रण कई बार दिया गया था। चूंकि मैं दूसरे जिलों के दौरों में व्यस्त था, इसलिए पहले नहीं आ सका था। जहां-जहां भी मैं गया, वहां मैंने देखा कि समाज में काफी जागृति आई है। हजारों की संख्या में लोग वहां जमा हुए थे। 

दस वर्ष पहले, यहां मार्तंडम में मैंने एक सभा को संबोधित किया था। उन दिनों आप स्थानीय राज्य के नागरिक थे। आपके ऊपर राजा का कानून चलता था, जबकि हम ब्रिटिश सरकार के नागरिक थे। बावजूद इसके आज भी हम सब ‘शूद्र’ हैं। हम द्रविड़ लोग अपमान-भरा जीवन जीते थे। यह हमारे साथ हुए धोखे का परिणाम  था। हमें आगे भी, हमेशा शूद्र बने रहना है। 

आज हम एक देश के नागरिक हैं। हम तमिलनाडु के तमिल हैं। आज हमें एक सूत्र में बांध दिया गया है।  हमारी एकता मजबूत हुई है। चूंकि हम सब एक ही देश के नागरिक हैं, इसलिए आज हम एक परिवार की तरह परस्पर जुड़े हुए हैं। हमें एक ही जाति माना गया है, अतएव अपने आदर्शों की प्राप्ति हेतु हम सभी को साथ-साथ, एकजुट होकर काम करना पड़ेगा।  

जहां तक मेरा संबंध है, 35 वर्ष पहले मैंने तमिलनाडु में एक आंदोलन का नेतृत्व किया था। उद्देश्य था, सामाजिक कुरीतियों, विशेषरूप से जातिभेद और घृणित छूआछूत को खत्म करना। हजारों वर्षों से हमें कुछ तयशुदा सार्वजनिक मार्गों पर चलने की अनुमति नहीं थी। जो लोग आज कम से कम पचास वर्ष के हैं, वे उन दिनों को याद कर सकते हैं। इस पीढ़ी के युवा अतीत की इन सच्चाईयों से अपरिचित हो सकते हैं।  

यदि उन दिनों आंदोलन नहीं हुआ होता, तो आज हममें से बहुत से लोग अनेक मार्गों पर चलने के अधिकार से वंचित होते। उन दिनों इस देश में बहुत बुरे हालात थे। सरकार कट्टरपंथी ब्राह्मणों के हाथों में थी। वर्णव्यवस्था अपने पूरे चरम पर थी। हमारे देश में, ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलनों के उभार द्वारा, गैर-ब्राह्मणों के अनेक अधिकारों की वापसी हुई है। ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलनों ने ब्राह्मण-आधिपत्य का सफलतापूर्वक मुकाबला किया है। गैर-ब्राह्मण आंदोलन को लोकप्रचलित रूप में ‘जस्टिस पार्टी’ के नाम से भी जाना जाता है, जिसका नामकरण उसकी पत्रिका ‘जस्टिस’ के आधार पर मिला था।  

ब्राह्मणों के भी अपने संगठन थे, जैसे कि ‘ब्राह्मण-समाज’ और ‘ब्राह्मण महासभा’। वे हमारे हितों के विरोध में काम करते थे; तथा वैध अधिकारों की प्राप्ति हेतु हमारे संघर्ष में बाधा बनकर खड़े थे। ब्राह्मण खुद को ‘सर्वोच्च  जाति’ का बताकर गर्व का अनुभव करते थे।  वे जोर देते थे कि उन्हें ‘ब्राह्मण’ संबोधित किया जाए। जबकि हम सभी को वे ‘शूद्र’ कहने पर अड़े रहते थे। ‘मनुस्मृति’ तथा दूसरे धर्मशास्त्रों में भी हमें केवल ‘शूद्र’ कहा गया है।  कितना अधिक अत्याचार और अपमान  हमें सहना पड़ता था! ऐसे विपरीत हालात ने हमारी प्रगति और जीवन दोनों को प्रभावित किया था।

यदि हमारे पास अपने संगठन के लिए ‘द्रविड़ कझ़गम’(द्रविड़ सभा) या ‘तमिल कझ़गम’ में से कोई एक चुनने का विकल्प न हो तो उसके लिए उपयुक्त नाम के रूप में केवल ‘शूद्र कझ़गम’(शूद्र पार्टी या शूद्र सभा) को चुनना होगा। यही कारण है, जिससे हमें ‘साउथ लिबरल फेडरेशन’ जिसे बाद में ‘जस्टिस पार्टी’ कहा जाता था—का नाम बदलकर ‘द्रविड़ कझ़गम’ रखना पड़ा था, ताकि हम दुनिया को बता सकें कि हम क्या हैं! हम द्रविड़ लोग गौरवशाली राष्ट्र हैं—यह दुनिया जानती है।  

वर्ष 1919 और 1920 में चले गैर-ब्राह्मणवाद आंदोलन(जस्टिस पार्टी) तथा मेरे प्रांत तमिलनाडु में हुए आंदोलनों के फलस्वरूप, सार्वजनिक मार्गों के उपयोग का अधिकार, बिना किसी जातिभेद के सभी नागरिकों को, न केवल तमिलनाडु, अपितु आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल में भी प्राप्त हो चुका है। 

‘जस्टिस पार्टी’ के हाथों में विहित शक्तियों के इस्तेमाल के फलस्वरूप सार्वजनिक मार्गों पर चलने का अधिकार भी सभी जातियों के लिए अमल में लाया गया था। यही नहीं, उन्हीं  दिनों ‘जस्टिस पार्टी’ द्वारा लाए गए एक विधेयक में तथाकथित निचली जातियों को ऐसे कुंओं से पानी लेने के अधिकार को भी शामिल किया गया था, जिन्हें उससे पहले विशेष रूप से ब्राह्मणों के इस्तेमाल के लिए आरक्षित रखा जाता था।  

ये सभी वे घटनाएं हैं जो गांधी के(भारतीय राजनीति में) सक्रिय होने से पहले ही घट चुकी थीं। यह कहना बेतुका और कपटपूर्ण है कि यह सब उपलब्धियां केवल गांधी की देन हैं। 

केवल इतना ही नहीं। ‘जस्टिस पार्टी’ के कार्यकर्ता ही वे लोग थे जिन्होंने, पंचायतों, नगर-निकायों, क्षेत्रीय मंडलों, जिला स्तरीय मंडलों तथा विधायिकाओं में, सभी जाति के लोगों प्रवेश हेतु, सर्वप्रथम रास्ता तैयार किया था। वह भी गांधी के भारतीय राजनीति में सक्रिय होने से बहुत पहले। उन्होंने ही, यहां तक कि  गांधी से भी पहले, तथाकथित निचली जातियों के प्रतिनिधियों को लगभग सभी निकायों में मनोनीत किया था। अतः यह कहना उचित नहीं है कि गांधी ने निचली जातियों जैसे कि पारिया के लिए, तथाकथित उच्च जातीय ब्राह्मणों के समकक्ष, विधायिकाओं में प्रवेश का अधिकार दिलाया था। सच तो यह है कि गांधी से भी बहुत पहले, तथाकथित निचली जातियां जैसे कि पारिया, चक्किलीस, पल्लार विधायिकाओं की सदस्य बन चुकी थीं। मैं चाहता हूं कि आप सब इस सत्य को भली-भांति आत्मसात कर लें।  

यह प्रमाणित सत्य है कि गांधी की योजना एकदम अलग थी। उच्च जातीय ब्राह्मणों की भांति वे भी सभी शूद्रों तथा अछूतों को, कुंओं और तालाबों से पानी लेने का समान अधिकार देने के पक्ष में नहीं थे। न ही वे अस्पृश्यों को उच्च जातियों की तरह मंदिर प्रवेश की अनुमति देने का समर्थन करते थे। सच तो यह है कि गांधी उच्च जातियों के विशेषाधिकारों को, आगे भी उन्हीं के अधीन रखने के पक्ष में थे। उन्होंने मनुस्मृति का समर्थन किया था। वे उच्च जातीय ब्राह्मणों तथा निम्न जातीय शूद्रों एवं अस्पृश्यों के लिए अलग-अलग मंदिर, तालाब, आवास तथा कुंए बनवाने के पक्ष में थे। यही गांधी की असली योजना थी।  मैं इसे जानता हूं। कोई मना करके दिखाए। आज गांधी के बारे में झूठा प्रचार किया जाता है। गांधीवाद और गांधी की जीवनशैली के बारे में तो बढ़-चढ़कर कहा गया है। 

मैं तमिलनाडु कांग्रेस समिति का सचिव था। अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की ओर से 48,000 रुपये की अनुदान राशि निचली जाति के शूद्रों यथा पारिया, चिक्कलीस, पल्लारों आदि के लिए अलग मंदिर और स्कूल बनवाने के लिए तमिलनाडु भेजी गई थी। इस बात का सख्त आदेश था कि ये अछूत लोग, उच्च जातिवाले हिंदुओं द्वारा विशेषरूप से इस्तेमाल किए जाने वाले स्थानों पर जाकर किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न न करें। 

उस समय तक जस्टिस पार्टी के नेता ऐसा आदेश लागू कर चुके थे, जो सभी वर्ग के विद्यार्थियों को, बगैर किसी जातीय पक्षपात के, सभी स्कूलों में अध्ययन करने का अधिकार देता था। उन्होंने सभी के एक साथ पढ़ने की व्यवस्था की थी। शिक्षा के क्षेत्र में जाति-आधारित प्रतिबंध बहुत पहले ही समाप्त किए जा चुके थे। इस सुधार को सख्ती से लागू किया गया था। ऐसा कानून बनाया गया था जो प्राइवेट स्कूलों को अपने यहां निश्चित अनुपात में शूद्र विद्यार्थियों को प्रवेश देने के लिए बाध्य करता था। ऐसा न करने पर स्कूल की सरकारी अनुदान की पात्रता समाप्त हो जाती थी।   

आदेश था कि निरीक्षण के समय अधिकारी स्कूल प्रशासन से पूछेंगे, ‘इस संस्था में कितने अछूत विद्यार्थी अध्ययन कर रहे हैं?’ यदि उत्तर नकारात्मक हो तो अधिकारी अगला सवाल करेगा, ‘क्यों?’ यदि कोई यह कहेगा कि संस्थान में प्रवेश के लिए किसी अछूत ने संपर्क नहीं किया है, तब अधिकारी कहेगा—‘तब तुम जाओ और कुछ अछूत विद्यार्थियों को अपने विद्यालय में भर्ती कराओ।’ मैं आपको उन व्यवस्थाओं के बारे में बता रहा हूं जो हमारे राज्य में, गांधी के आने से पहले ही लागू थीं। 

जिन दिनों तमिलवासी बहुत अधिक प्रगतिशील थे, आपके कन्याकुमारी जिले में स्थितियां बहुत खराब थीं। उच्च जाति वाले हिंदू निम्न जातीय अस्पृश्य हिंदुओं के अधिकारों को सह ही नहीं पाते थे। यहां तक कि उनकी छाया भी तथाकथित उच्चतम जाति के लोगों पर नहीं पड़ सकती थी।  यह आपके प्रांत की दर्दनाक त्रासदी थी। निचली जाति के शूद्रों को अपनी उपस्थिति और स्थान के बारे में, जहां वह छिपा होता था—दूर से ही चिल्लाकर बताना पड़ता था।  वे तो थिरु. नारायण सामी के अनथक और प्रशंसनीय प्रयास थे, जिससे शूद्रों में जागृति आई थी। वायकम आंदोलन के कारण हालात में बदलाव हुआ था। अछूतों को यहां काफी कुछ मिला है। यहां मौजूद युवा इन उपलब्धियों से अनजान हो सकते हैं। 

हमने छूआछूत के विरुद्ध, वायकम में हुए संघर्ष की कीमत चुकाई थी।  हम कई बार जेल भी गए थे। अनेक बार हमारी पिटाई हुई।  छूआछूत उन्मूलन के निमित्त हमारे बलिदानों के कारण हमें बदनाम भी किया गया।  

उन दिनों जेल में श्रेणियां नहीं होती थीं। उनके साथ बहुत बुरा वर्ताब होता था। अस्पृश्यता के कलंक को मिटाने के लिए वह सबकुछ हमने सहा; और आखिरकार परिवर्तन के वाहक बने। यह बदलाव कैसे संभव हुआ था? हमारी वर्तमान स्थिति क्या है? यदि आप इसपर विचार करेंगे, और सुधार की नई संभावना की तलाश करेंगे, तो आप निश्चित ही इस तथ्य को स्वीकार करेंगे कि जातिवाद तथा उसकी बुराइयों को मिटाने के लिए हमारी रफ्तार बहुत धीमी थी। हमें और अधिक ताकत, और तीव्र गति से आगे बढ़ना चाहिए। 

आपको वायकम आंदोलन के इतिहास की जानकारी होनी चाहिए। अत्यंत मामूली घटना वायकम आंदोलन की संवाहक बनी थी। 

कामरेड माधवन एक वकील थे। एक मुकदमे में उन्हें अपने मुव्वकिल की तरफ से माननीय न्यायाधीश के समक्ष पेश होना था। अदालत महाराजा त्रावणकोर के भवन परिसर में थी। उस समय महाराज के जन्मदिवस की तैयारियां चल रही थीं।  राजभवन का पूरा परिवेश ताड़ की पत्तियों द्वारा खूबसूरती के साथ आच्छादित था। ब्राह्मणों का मंत्रोच्चारण आरंभ हो चुका था। चूंकि कामरेड माधवन इझ़वा(नाडार) समुदाय से थे, इसलिए उन्हें भवन परिसर में प्रवेश करने या गुजरने; और अदालत पहुंचने की अनुमति नहीं मिली।  

उन्हीं दिनों जस्टिस पार्टी तमिलनाडु में जाति-प्रथा और छूआछूत उन्मूलन के लिए आंदोलन चला रही थी।  अंतर्जातीय विवाह के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया जा रहा था। स्कूलों को सभी जाति-वर्गों के लिए खोल दिया गया था। ‘अंतर्जातीय भोजन’ लोकप्रिय हो चुका था।  इस तरह के सुधारवादी कार्यक्रम जस्टिस पार्टी द्वारा पूरे तमिलनाडु में चलाए जा रहे थे। जब गांधी को जस्टिस पार्टी द्वारा तमिलनाडु में चलाए जा रहे कार्यक्रमों के बारे में पता चला, तब उन्होंने हमारी अन्य योजनाओं सहित उन कार्यक्रमों को भी अपने रचनात्मक आंदोलन में शामिल किया। 

उन दिनों जस्टिस पार्टी के कार्यक्रर्ताओं ने ब्राह्मणों के षड्यंत्रों को साहसपूर्वक उजागर किया था। परिणामस्वरूप वे सड़क पर अकेले चलते हुए भी घबराते थे। गैर-ब्राह्मण नेताओं जैसे कि डॉ. टी.  एम. नायर तथा सर पी. थियागराया ने शूद्रों और अस्पृश्यों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार हेतु लगातार, बड़े-बड़े कार्यक्रम चलाए, और राज्य में शक्तिशाली पदों पर आसीन हुए। ब्राह्मण जस्टिस पार्टी की सरकार के प्रति ज्यादा ईष्यालु थे। उन दिनों उनकी जमीन खिसकी हुई थी।  

उन दिनों ब्राह्मण धूर्ततापूर्वक एक ही बात बार-बार दोहराते थे—‘हम सत्ता के दलाल नहीं हैं’, ‘हम चुनावों का बहिष्कार करते हैं!’ इस तरह के झूठे और फरेबी नारों से वे लोगों को छलते रहे, निरंतर नई-नई साजिश रचते रहे। जस्टिस पार्टी की लोकप्रियता को देखते हुए गांधीजी ने छूआछूत की समस्या पर विचार करना आरंभ किया, क्योंकि तमिलनाडु में जस्टिस पार्टी को सत्ता से बाहर करने का वही एक तरीका था।  

उन दिनों मैं जस्टिस पार्टी के नेताओं से भली-भांति परिचित था।  अनेक पदों पर आसीन होने के कारण मेरे प्रति उनके मन में बड़ा सम्मान था। राजगोपालाचार्य मुझसे मिले थे और उन्होंने मुझे गांधी का अनुयायी बनने के लिए प्रवृत्त किया था। उनका कहना था कि गांधी अकेले अपरिहार्य सामाजिक सुधारों को आगे बढ़ाने में सक्षम हैं। मैंने इरोद नगर निगम से इस्तीफा दे दिया; और कांग्रेस में शामिल हो गया। कांग्रेस में मेरे प्रवेश से पहले किसी भी तमिलवासी को कांग्रेस पार्टी का सचिव या अध्यक्ष बनने का सम्मान नहीं मिला था।  तमिल कांग्रेस के इतिहास में मैं पहला तामिल था, जिसे तमिलनाडु कांग्रेस के इतिहास में इस पदों पर आसीन होने का अवसर मिला था। 

कामरेड टी. वी.  कल्याणसुंदरम्(थिरू वी. के.) स्कूल अध्यापक थे। डॉ.  पी.  वरदराजुलू(नायडू) ‘प्रापंच मित्रन’ के संपादक थे। बावजूद इसके ब्राह्मण उनपर विश्वास नहीं करते थे। कामरेड वी. ओ.  चिदंबरम(पिल्लई), अपने सभी संसाधनों को खर्च कर देने के बावजूद, कस्तूरी रंगा आयंगर पर आश्रित थे। 

इसलिए ब्राह्मणों ने उनका सम्मान नहीं करते थे।  वे मेरी उपेक्षा नहीं कर सकते थे, क्योंकि मैं पहले से ही बड़े पदों पर था और बड़े व्यापारिक समुदाय के बीच सम्मानित था। प्रत्येक मामले में, सभी तरह से राजगोपालाचार्य मुझपर भरोसा करते थे, और उनका मुझपर काफी विश्वास था। बदले में मैं भी उनपर विश्वास करता था और उस विश्वास की रक्षा को समर्पित था।  हम दोनों ने साथ-साथ काम किया था। मैंने एक सघन प्रचार कार्यक्रम चलाया था, परिणामस्वरूप ब्राह्मण एक बार पुनः सत्ता केंद्र पर लौट आए। अपने बुद्धिवादी विचारों की अभिव्यक्ति को लेकर मैं बहुत साहसी था। ईश्वर संबंधी अपने विचारों को मैंने खुलकर व्यक्त किया था, ‘यदि लोगों के स्पर्श मात्र से मूर्ति अपवित्र हो जाती है, तो ऐसी ईश्वर की हमें आवश्यकता नहीं है। ऐसी मूर्ति के टुकड़े-टुकड़े करके उसका इस्तेमाल अच्छी सड़कें बनाने के लिए किया जाना चाहिए।  नहीं तो उन्हें नदी किनारे रख देना चाहिए, जहां वे कपड़े धोने के काम आ सकें। मुझे प्रायः ब्राह्मणों द्वारा ही बोलने के लिए खड़ा किया जाता था, चूंकि मैं किसी शक्तिशाली पद या प्रतिष्ठा की दौड़ में नहीं था, ब्राह्मण उस समय चुप्पी साध लेते थे। 

ईश्वर, धर्म और जाति के बारे में मैं आज जो भी कहता हूं, ठीक वही मैं उन दिनों भी कहा करता था। मेरे भाषणों को सुनने के बाद राजगोपालाचार्य प्रायः मुझसे कहा कहते थे कि मैं बहुत सख्त भाषा का इस्तेमाल किया है। उत्तर में मैं उनसे अकसर यही कहता था कि जब तक लोग मूर्ख बने रहेंगे, तब तक आसान शब्दों में अपनी बात रखने का कोई औचित्य नहीं है।  मेरी बात सुनकर वे बस मुस्कुरा देते थे। इस तरह, हमने ब्राह्मणों के सत्ता केंद्रों पर आसीन होने की राह आसान की थी। 

एडवोकेट माधवन को अदालत जाते समय रोकने के बाद से ही इझ़वा समुदाय के नेता उसके विरुद्ध आंदोलन करना चाहते थे। केरल कांग्रेस समिति के अध्यक्ष के.  पी.  केशवमेनन, टी.  के.  महादेवन तथा दूसरे नेताओं ने मोर्चा संभाला। उन्होंने राजभवन में होने पूजा-पाठ के दिन विरोध प्रदर्शन की शुरुआत का निर्णय लिया। सर्वाधिक उपयुक्त स्थान के रूप में उन्होंने वायकम को चुना।  केवल वायकम ही ऐसा स्थान था, जहां चार प्रवेश-द्वारों वाला मंदिर था। चारों दरवाजों से एक-एक सड़क गुजरती थी। विरोध प्रदर्शन के लिए वह सर्वोपयुक्त स्थान था। इसलिए सत्याग्रह के निमित्त उन्होंने वायकम को चुना था।  

नियम यह था कि निम्न जाति के अछूत जैसे कि ‘’अवर्णस्थानांस’ तथा ‘अयीतक कर्णस’ उन सड़कों पर प्रवेश नहीं करेंगे। यदि कोई अछूत मंदिर की दूसरी दिशा में जाना चाहे तो उसे मंदिर से 400 से 600 मीटर की दूरी बनाकर चलना पड़ता था। इस तरह उसे डेढ़ किलोमीटर से अधिक रास्ता और तय करना पड़ता था। यहाँ तक कि ‘असारियों’, ‘वनियारों’ तथा जुलाहों को भी मंदिर के चारों ओर बनी सड़कों पर चलने की पाबंदी थी। दूसरे मंदिरों विशेषकर शचींद्रम पर भी यही नियम लागू था।  इस कानून का पालन पूरी शक्ति के साथ किया जाता  था।  

प्रमुख सरकारी कार्यालय, अदालत, पुलिस स्टेशन आदि वायकम मंदिर की दूसरी दिशा में, उसके प्रवेश द्वार के निकट थे। यहां तक कि सरकारी कर्मचारियों के स्थानांतरण के समय भी ध्यान रखा जाता था कि कोई अछूत कर्मचारी वहां स्थानांरित नहीं किया जाएगा, क्योंकि उन्हें मंदिर के आसपास बने रास्तों से गुजरने की अनुमति प्राप्त न थी।  यहां तक कि मजदूरों का दुकानों तक जाने के लिए भी, उन सड़कों से होकर गुजरना निषिद्ध था। 

जैसे ही वायकम सत्याग्रह आरंभ हुआ, राजा ने 19 नेताओं जिनमें एडवोकेट माधवन, बैरिस्टर केशव मेनन, टी. के. महादेवन, जार्ज जोसेफ आदि शामिल थे—को गिरफ्तार करने का आदेश सुना दिया। उन्हें विशिष्ट कैदी के रूप में रखा गया था। उन दिनों अंग्रेज अधिकारी पिट, पुलिस महानिदेशक के पद पर राजा के अधीन कार्यरत थे। उन्होंने आंदोलनकारियों से जुड़े मामलों को भली-भांति संभाल लिया था। 19 आंदोलनकारियों के जेल जाते ही वायकम आंदोलन पटरी से उतर चुका था। उन्हीं दिनों मुझे केशव मेनन तथा बैरिस्टर जार्ज जोसेफ की ओर से एक पत्र प्राप्त हुआ। 

‘आपको यहां आकर आंदोलन को नवजीवन देना चाहिए। अन्यथा हमारे पास राजा के सामने आत्मसमर्पण कर, उनसे क्षमा-याचना करने के अलावा दूसरा कोई उपाय न होगा। उस अवस्था में हमारा तो कोई नुकसान न होगा, परंतु एक महान कार्य अधूरा रह जाएगा। असल में वही हमारी चिंता का कारण है। इसलिए आप कृपया तत्काल पहुंचें और आंदोलन की जिम्मेदारी संभालें।’

यही बातें उन्होंने अपने पत्र में लिखीं थीं। उन्होंने मुझे स्वयं चुना था और मुझे पत्र लिखा था, क्योंकि उन दिनों मैं मुखर होकर छूआछूत के कलंक पर लगातार हमले कर रहा था। इसके अलावा न केवल उग्र प्रचारक अपितु सफल आंदोलनकारी के रूप में भी मैं जाना-पहचाना और स्थापित नाम था।  जब उन्होंने पत्र भेजा, मैं यात्रा पर निकला हुआ था।  पत्र इरोद से पुन:प्रेषित होकर मुझे मदुरै जिला के पन्नईपुरम स्थान पर प्राप्त हुआ। पत्र मिलते ही मैं वायकम जाने के लिए आगे की यात्रा स्थगित कर इरोद के लिए दौड़ा। एक पत्र लिखकर मैंने राजगोपालाचार्य से अनुरोध किया कि वे मेरे स्थान पर तमिलनाडु कांग्रेस के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाल  लें। अपने पत्र में मैंने वायकम सत्याग्रह की महत्ता के बारे में बताया था। मेरे लिए वह अच्छा अवसर था। इसलिए मैं उसे छोड़ना नहीं चाहता था। मैंने अपने दो साथियों के साथ वायकम के लिए प्रस्थान कर दिया। 

किसी तरह यह बात फैल गई कि मैं वायकम आंदोलन का नेतृत्व करने  के लिए आ रहा हूं। जब में नाव के रास्ते वायकम पहुंचा, पुलिस कमिश्नर और तहसीलदार ने हमारा स्वागत किया। 

हमें बताया गया कि राजा ने उन्हें हमारा स्वागत करने तथा हमारे ठहरने का प्रबंध करने का आदेश दिया है। मैं सचमुच बेहद अचंभित था। राजा मुझपर अत्यंत मेहरबान थे, क्योंकि जब भी उन्हें दिल्ली जाना होता था, वे इरोद में हमारे ही बंगले में ठहरते, जबकि उनके कर्मचारी हमारी सराय में आश्रय पाते थे। रेलगाड़ी पर सवार होने से पहले, जब तक वे इरोद में रहते, तब तक राजा तथा उनके कर्मचारियों का भरपूर स्वागत किया जाता था। वायकम में मुझे अप्रत्याशित आदर-सत्कार मिलने के पीछे यह कारण भी हो सकता था। जब वायकम के निवासियों को मेरे और राजा के संबंधों के बारे में पता चला, वे सभी अत्यंत प्रसन्न हुए।  

बावजूद इसके कि राजा ने मेरे साथ मेहमानों जैसा व्यवहार किया था, मैंने वायकम आंदोलन के समर्थन में अनेक सभाओं में हिस्सा लिया। मैंने छूआछूत जैसी घृणित प्रवृत्ति कि आलोचना की। मैंने कहा कि ऐसे  ईश्वर को जिसे लगता है कि वह अछूतों के स्पर्श-मात्र से अपवित्र हो जाएगा—मंदिर में रहने का अधिकार नहीं है। ऐसी मूर्ति को तुरंत हटा देना चाहिए और उसका इस्तेमाल कपड़े धोने के लिए किया जाना चाहिए। मेरे प्रचार के फलस्वरूप रोज नए-नए लोग आंदोलन से जुड़ने की इच्छा जताने लगे। प्रतिदिन नए-नए लोग आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए अलग-अलग स्थानों से आने लगे। उससे राजा की परेशानी बढ़ने लगी।  बावजूद इसके वह पांच-छह दिन शांत रहा।  मेरे भाषण को लेकर कई लोगों ने उससे शिकायत की। राजा मेरी और अधिक उपेक्षा नहीं कर सकता था। इसलिए, दस दिन के बाद उसने पुलिस अधिकारी को दंड संहिता की धारा 26 को, जो आज की धारा 144 जैसी ही थी, लागू करने की अनुमति दे दी।  

मेरे पास उस प्रतिबंध के उल्लंघन के अलावा अन्य कोई रास्ता नहीं था। तदनुसार मैंने प्रतिबंध का उल्लंघन कर, एक सभा को संबोधित किया। परिणामत: मुझे गिरफ्तार कर लिया गया। मेरे साथ मि. अय्युमुथु ने भी प्रतिबंध का उल्लंघन किया था। उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। हम सभी को एक महीने के कड़े दंड के साथ कारावास भेज दिया गया।  मुझे अरुविक्कुथ जेल में रखा गया। मेरे जेल चले जाने के बाद मेरी पत्नी नागम्मई, बहन एस. आर. कन्नमल तथा दूसरों ने मिलकर राज्य-भर में आंदोलन किया। जैसे ही मैं जेल से बाहर आया, एक बार फिर आंदोलन में कूद पड़ा। 

जब मैं जेल में था, आंदोलन में यकायक तेजी आ गई। अनेक लोगों ने अदालत से उन्हें जेल भेजने की फरियाद की। प्रचार-प्रसार में तेजी ने भी लोगों को वायकम सत्याग्रह में उतरने के लिए उत्साहित किया। दुश्मन उपद्रवों और गुंडागर्दी पर उतर आए थे। उपद्रवी तत्वों ने अफवाह फैलाकर हमारे आंदोलन को ठप्प कर देने के लिए अनेक चालें चलीं। उनके गंदे मनसूबों और कोशिशों का अंत नाकामी के रूप में सामने आया। यही नहीं जो लोग विदेशों में थे, उन्हें भी देश में जाति के नाम पर हो रहे दमन और अत्याचारों की जानकारी मिल गई। वे स्वेच्छापूर्वक दान देने लगे। प्रतिदिन ढेर सारे मनीआर्डर आने लगे। आंदोलनकारी स्वयंसेवकों के लिए बड़ा पंडाल बनवाया गया था। प्रतिदिन 300 से अधिक लोगों को भोजन खिलाया जाता था। अनेक किसान और प्रतिदिन सब्जियां और नारियल भेजते थे।  उन्हें एक साथ, एक साथ ढेर लगाकर रख दिया गया था। देखने में वह छोटी पहाड़ी जैसा नजर आता था।  पूरा स्थल वैवाहिक पंडाल जैसा दिखता था। 

उसी समय राजगोपालाचार्य ने मुझे एक पत्र लिखा।  आप हमारे देश को छोड़कर दूसरे राज्य में परेशानी खड़ी क्यों कर रहे हैं? आपके लिए इस तरह करना अनुचित है।  कृपया उसे छोड़कर, मुझसे अपना पद-भार वापस लेने के लिए तुरंत यहां पहुंचें। उस पत्र में यही बातें लिखी थीं। श्रीनिवास अय्यंगर मुझसे मिलने के लिए तमिलनाडु से आए थे। उन्होंने भी मुझसे वही सलाह दी जो राजगोपालाचार्य ने अपने पत्र में लिखी थीं। उस समय तक 1000 स्वयंसेवक वायकम आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए तैयार हो चुके थे। प्रतिदिन जगह-जगह बड़े-बड़े जुलूस, भजन-कीर्तन आदि होते थे।  आंदोलन गति पकड़ चुका था। 

समाचार पंजाब तक पहुंचा। वहां स्वामी श्रद्धानंद ने एक अपील की। उन्होंने लगभग 30 पंजाबियों को वायकम भेजा। उन्होंने आंदोलन के लिए 2000 रुपये की सहायता राशि का प्रस्ताव भेजा, साथ ही आंदोलन में हिस्सा ले रहे स्वयंसेवकों के भोजन के खर्च को वहन करने की सहमति जताई। यह देखकर ब्राह्मणों ने गांधी को लिखा। उन्होंने आरोप लगाया कि सिख हिंदुत्व के विरुद्ध युद्ध भड़का रहे हैं। गांधी के विचार भी सामने आए। उन्होंने कहा था कि मुस्लिम, सिख, ईसाई और बाकी लोग जो हिंदू नहीं हैं—वे आंदोलन में हिस्सा नहीं ले सकते। उनकी अपील के बाद मुस्लिम, ईसाई और सिखों ने खुद को आंदोलन से अलग कर लिया। राजगोपालाचार्य ने जोसफ जार्ज के नाम एक और पत्र भेजा। उसमें लिखा था कि उनके लिए हिंदुत्व से जुड़े मामले में हस्तक्षेप करना गलत है। लेकिन जोसेफ जार्ज ने राजगोपालाचार्य की सलाह पर कोई ध्यान नहीं दिया। जवाब में उन्होंने लिखा कि वे कांग्रेस से निष्कासन के लिए तैयार थे। उन्होंने जोरदार शब्दों में लिखा कि वे अपना आत्मसम्मान नहीं गंवाएंगे।  मिस्टर सेन, डाॅ. एम. ई. नायडु तथा दूसरे नेता  आंदोलनकारियों के साथ मजबूती से खड़े थे। लेकिन कुछ लोगों को भय था कि गांधी आंदोलन की निंदा करते हुए उसे मिल रहे दान, सहायता आदि पर रोक के लिए लिखेंगे। लेकिन उसी समय स्वामी श्रद्धानंद वायकम पहुंचे और उन्होंने वित्तीय सहायता का आश्वासन दिया।  

वायकम आंदोलन गांधी के विरोध के बावजूद शुरू किया गया था।  मुझे दुबारा गिरफ्तार करके छह महीने की सजा के लिए जेल भेज दिया गया था। कुछ नंबूदरी ब्राह्मणों तथा कट्टरपंथी हिंदुओं ने एकजुट होकर वायकम आंदोलन के विरोध करने की योजना बनाई। जिसे उन्होंने ‘शत्रु समाहार यज्ञ’(शत्रु मर्दन यज्ञ) का नाम दिया। काफी धनराशि खर्च करके उन्होंने यज्ञ किया। उसके बारे में मैंने कारावास में सुना। एक रात को अचानक मैंने गोलियों की आवाज सुनी। मैंने पहरा दे रहे सिपाही से पूछा, क्या जेल के निकट कोई उत्सव मनाया जा रहा है? उसने बताया कि राजा का निधन हो चुका है और उससे हुई हानि को दर्शाने के लिए बंदूकों की सलामी दी जा रही है। जब मुझे पता चला कि राजा का निधन हो चुका है, मेरा हृदय विषाद से भर गया। बाद में मुझे यह सोचकर प्रसन्नता हुई कि ब्राह्मणों और कट्टरपंथीं हिंदुओं द्वारा अपने दुश्मनों को नष्ट करने के लिए की गई प्रार्थना का असर महाराज की मृत्यु के रूप में सामने आया है। उनकी प्रार्थना ने वायकम आंदोलनकारियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है।  लोग भी खुश थे। उसके बाद, महाराजा के दाह-संस्कार के दिन हम सभी को रिहा कर दिया गया। हमारे दुश्मनों की चाल-ढाल और भाषा भी बदल गई। 

बाद में, महारानी ने आपसी बातचीत से समस्या का समाधान करने की इच्छा व्यक्त की।  वे समस्या पर मेरे साथ बातचीत करना चाहती थीं। लेकिन राज्य का दीवान, जो जाति से ब्राह्मण था—हमारी बातचीत के बीच में बाधक बन गया। बोला कि महारानी मुझसे सीधे बातचीत नहीं करेंगी। इसलिए उसने राजगोपालाचार्य को पत्र लिखा। राजाजी जानते थे कि प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा मेरे पक्ष में हैं, अतएव उसका श्रेय भी मुझी को प्राप्त होगा। इसलिए उन्होंने कपटपूर्ण ढंग से तय किया कि महारानी गांधी से बातचीत करेंगी। राजाजी की प्रपंच का ही परिणाम था कि गांधी का नाम वायकम सत्याग्रह के इतिहास में घसीट लिया गया। वायकम आंदोलन का श्रेय और प्रतिष्ठा किसे प्राप्त होती है, व्यक्तिगत रूप से मुझे इसकी चिंता नहीं थी। मैं निजी प्रशस्ति के लिए आंदोलन से नहीं जुड़ा था। मेरा एकमात्र उद्देश्य समस्या का सफल समाधान था।  

गांधी आए और उन्होंने महारानी से बातचीत भी की। महारानी निचली जाति के शूद्रों और अछूतों के लिए सभी मार्ग खोल देने को तैयार थीं। लेकिन, उन्होंने अपने डर के बारे में बताया। उन्हें लगता था कि मैं अछूतों के मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर आंदोलन को उसके बाद भी जारी रख सकता हूं। गांधी यात्री-भवन में पहुंचे, जहां मैं ठहरा हुआ था। उन्होंने मेरी राय जाननी चाही। मैंने कहा, ‘क्या अछूतों को सार्वजनिक मार्गों पर चलने का अधिकार प्राप्त होना बड़ी उपलब्धि नहीं है! यूं भी, क्या मंदिर प्रवेश कांग्रेस के आदर्शों में से एक नहीं है। जहां तक मेरी बात है, यह मेरे प्रमुख सरोकारों में से एक है। लेकिन, आप महारानी को खबर कर सकते हैं कि फिलहाल मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर आंदोलन खड़ा करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। मैं आगे क्या करूंगा, इसे तय करने से पहले माहौल शांत होने दीजिए। 

गांधी ने रानी को सूचना दी और उन्होंने मंदिर के चारों ओर बनी सड़कों के चलने का अधिकार, सभी वर्गों के लिए बहाल कर दिया। इस तरह निचली जाति के शूद्रों और अस्पृश्यों को, उच्च जातीय ब्राह्मणों और कट्टरपंथी हिंदुओं की तरह, सार्वजनिक मार्गों पर चलने के अधिकार की प्राप्ति हुई।  

मैं कुछ समय के लिए इरोद में देवस्थान समिति का अध्यक्ष था। जब मैं बाहर गया हुआ था, कामरेड एस. गुरुस्वामी, पोन्नंबलन तथा ईश्वरन ने मेरे कार्यालय में, दो आदि-द्रविड़ों को अपने माथे पर पवित्र राख(विभूति) मलने के लिए उकसाया। उसके बाद वे उन्हें मंदिर के भीतर ले गए। उन्हें देखते ही ब्राह्मण जोर-जोर से चिल्लाने लगे कि उन्होंने देवस्थान को अपवित्र कर दिया है। मजदूरों को वहीं बंद कर, उनके ऊपर मुकदमा दायर कर दिया गया। जिला न्यायालय में उन्हें दंडित किया गया। लेकिन एक अपील पर सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने उन्हें निर्दोष मानकर रिहा कर दिया। यह सब ब्रिटिश शासन के दौरान हुआ था।  

सुचिंद्रम(कन्याकुमारी, केरल) पहला स्थान था, जहां मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर पहला सार्वजनिक आंदोलन चलाया गया था। स्वाभिमान सम्मेलन का आयोजन भी मेरी अध्यक्षता में किया गया था। उसमें अनेक प्रस्ताव स्वीकृत किए गए थे, जिनमें जाति उन्मूलन तथा अस्पृश्यों के मंदिर प्रवेश के अधिकार को सुनिश्चित करने की मांग की गई थी।  

स्वाभिमान आंदोलन की अगली सभा का आयोजन इर्नाकुलम में हुआ था। उस सम्मेलन में जाति प्रथा की निंदा करते हुए हिंदुओं को सुझाव दिया गया था कि वे मुसलमान बन जाएं, क्योंकि इस्लाम में कोई जातिभेद नहीं है। कुछ और लोगों ने संशोधन प्रस्ताव के माध्यम से ईसाई बनने का सुझाव दिया था। अंत में लोगों को दोनों धर्मों में से किसी एक को अपनाने का विकल्प दिया गया।  

एक दिन लगभग 50 हिंदुओं(जो जाति से पुलायार थे) ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। यह सिलसिला  आगे बढ़ता गया, उसने रूढ़िवादी हिंदुओं और ब्राह्मणों को बुरी तरह डरा दिया था। 

एक दिन, अल्लेपी में इस्लाम अपना चुका एक व्यक्ति(जो पहले जाति से पुलायार था) नायर की दुकान से कुछ सामान खरीदने गया। वहां उसकी पिटाई कर दी गई। उस घटना की परिणति हिंदुओं और मुसलमानों के बीच बड़े टकराव के रूप में सामने आई। हिंदू-मुस्लिम दंगे हर जगह फैल गए। तत्कालीन दीवान, सर सी. आर. रामासामी अय्यर जो ब्राह्मण थे, ने उस  टकराव को बलपूर्वक दबा दिया था। बाद में राजा को बताया गया कि अधिकांश निचली जाति के अस्पृश्य हिंदू जैसे इझ़वा, पुलायार आदि मुसलमान बन रहे हैं। उन्हें यह सलाह भी दी गई कि इस भगदड़ से हिंदुत्व को बचाने का एकमात्र उपाय है कि सभी मंदिरों को अस्पृश्यों के प्रवेश के लिए खोल दिया जाए। उस दिन ब्राह्मण राजा की दीर्घायु के लिए यज्ञ कर रहे थे। उन दिनों यह परंपरा थी कि राजा अपने जन्मदिवस पर प्रजा के लिए कोई अच्छी घोषणा करता था। सो राजा ने अच्छे अवसर पर एक अच्छी घोषणा करने का निश्चय किया। उसने ऐलान किया कि उसके जन्मदिवस के अवसर पर सभी मंदिर सभी के लिए खोल दिए जाएंगे, जिनमें निचली जाति के हिंदू और अछूत भी शामिल हैं। संघर्ष का ऐसा ही इतिहास रहा है। इस तरह अछूतों को मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार प्राप्त हुआ। 

इतना सब हो जाने के बाद ही राजगोपालाचार्य और गांधी सामने आए और मंदिर प्रवेश के पक्ष में बयान दिया। यह कहना एकदम बकवास है कि ये बदलाव गांधी के कारण संभव हो पाए थे। सच तो यह है कि अछूतों के भले के लिए अणुमात्र काम भी गांधी ने नहीं किया। ये सब बातें आपको डाॅ. आंबेडकर द्वारा लिखित पुस्तक ‘कांग्रेस और गांधी ने अस्पृश्यों के लिए क्या किया है’ पढ़ने से ज्ञात हो जाएंगी।  

जिन दिनों में तमिलनाडु कांग्रेस का सचिव था, पार्टी फंड द्वारा चेरंमादेवी में गुरुकुलम(नि:शुल्क छात्रावास) का संचालन किया जाता था। सचिव के रूप में मैंने 10000 रुपये देने की अनुमति दी, और बतौर पहली किश्त 5000 रुपये का भुगतान भी कर दिया गया।  गुरुकुलम को चलाने की जिम्मेदारी वी. वी. एस.  अय्यर नामक एक ब्राह्मण की थी। उस गुरुकुलम में ब्राह्मण विद्यार्थियों की विशेष देखभाल की जाती थी। उन्हें अलग भोजन दिया जाता था। जबकि गैर-ब्राह्मण बच्चों को बाहर भोजन कराया जाता था। ब्राह्मण विद्यार्थियों को ‘उप्पम’ परोसा जाता था, जबकि अब्राह्मण बच्चों को केवल दलिया से संतोष करना पड़ता था। ये बातें मुझे ओमनदुर रामासामी रेडियार(मद्रास प्रांत के भूतपूर्व मुख्यमंत्री) के बेटे ने रोते-रोते बताई थीं।  मैंने राजगोपालाचार्य से इसकी शिकायत की। जब उन्होंने वी. वी. एस. अय्यर से मामले की तहकीकात की तो उसने आरोपों से न तो इन्कार किया, न ही खेद व्यक्त किया। बल्कि दृढ़ स्वर में सभी के साथ एक समान व्यवहार करने से इन्कार कर दिया। उसने कहा कि गुरुकुलम के आसपास कट्टरपंथी लोग रहते हैं, इसलिए वह कुछ नहीं कर सकता। इसपर मैंने कहा कि मैं बाकी 5000 तभी दूंगा जब गुरुकुलम में सुधार हो जाएगा। वह जंगली की तरह व्यवहार करने लगा। उसने रूखे शब्दों में मुझसे कहा, ‘क्या यही तुम्हारी राष्ट्रसेवा है?’ इस गंभीर मामले ने ही मुझे गैर-ब्राह्मणों(तमिलों) के लिए अलग से दल बनाने के लिए प्रोत्साहित किया था। 

इन दिनों भी आप देख सकते हैं कि कांग्रेस की सभाओं में केवल ब्राह्मणों को भोजन बनाने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है। जबकि उन्हीं दिनों जस्टिस पार्टी और स्वाभिमान आंदोलन के सम्मेलनों के लिए विरुदुनगर के नाडारों को भोजन बनाने के लिए नियुक्त किया गया था। 

मैं इन पुराने प्रसंगों को क्यों याद कर रहा हूं? आपको पता होना चाहिए कि जब तक हम इस तरह से आंदोलन नहीं करेंगे, तब तक हम समाज में व्याप्त असमानता को मिटाकर, उसे प्रगतिशील नहीं बना सकते।  

इसके अलावा, आप सभी को यह पता होना चाहिए कि किसी भी सामाजिक सुधार का श्रेय न तो कांग्रेस को जाता है, न ही गांधी को उसके लिए जिम्मेदार माना जाना चाहिए, हमारे पास इसके साक्ष्य हैं।  

आज भी, ‘द्रविड़यार कझ़गम’ के केवल हम ही वे लोग हैं जो सिर उठाकर पूछते हैं कि जब मेहनतकश किसानों और मजदूरों को निम्न जाति का समझा जाता है, तो आलसी ब्राह्मणों को ऊंची जाति का क्यों समझा जाना चाहिए। हमें ऐसे ईश्वर की आवश्यकता क्यों है जो शूद्रों की अवमानना करता है?

फिलहाल उन्होंने संविधान में जातिवाद के बचाव हेतु सभी सुरक्षा-उपाय कर लिए हैं। एक ब्राह्मण में इतना साहस है वह कहीं से भी यहां आता है और धृष्टतापूर्वक कुछ भी बोलकर, धमकी देकर चला जाता है। क्यों? इसलिए कि उनके हाथ में ताकत है।  

वे कहते हैं कि हम दब्बू रहकर सदैव शूद्र की तरह पेश आएं।  वे हमें जेल का डर दिखाकर आतंकित करते हैं। क्या किसी में उनसे सवाल करने की हिम्मत थी?

केवल हम वे लोग हैं निडर, निष्कपट और निर्बंध थे।  

यदि हमें हिंदुत्व हमें शूद्र मानता है तो सिवाय इसके कि हम हिंदू धर्म को ही नष्ट कर दें, दूसरा उपाय क्या है? हमारा ‘द्रविड़यार कझ़गम’ राजनीतिक संगठन नहीं है।  हम चुनावों में हिस्सा नहीं लेते।  हमें आपके मतों की आवश्यकता नहीं है। हम शासक वर्ग भी नहीं है। दूसरों को कुदाल को कुदाल कहने में संकोच हो सकता है? सत्ता चाहने वाले लोग निर्दोष मतदाताओं की चापलूसी कर सकते हैं। अपने स्वार्थ के लिए वे आपकी आंखों में धूल झोंक सकते हैं। किसी ताकत या पद-प्रतिष्ठा के लिए गांधी के नाम को बीच में घसीटकर मैं आपको धोखा नहीं दे सकता। मैं उस घृणित, निश्रेयस जीवन के लिए नहीं बना हूं। 

हमने अपने जीवन निर्वाह के लिए सार्वजनिक जीवन को पेशा या व्यापार नहीं बनाया है। फिर किसलिए, सोचो? आपके भीतर स्वाभिमान की भावना जगाने के लिए हम अपना भोजन खाते हैं, समय खर्च करते हैं, अपनी ऊर्जा खपाते हैं, क्यों?

1938 तक आपने देखा कि पूरी दुनिया में ज्ञान का बोलबाला था। परंतु यहां हम आज भी बर्बर लोगों की तरह हैं। हमारा ईश्वर, धर्म और धर्मशास्त्र हमें कूपमंडूकता से बाहर नहीं आने देते। सरकार स्वयं अविवेकी और असभ्य लोगों के हाथों में है। हमारे सिवाय किसी में भी सवाल उठाने हिम्मत नहीं है।  

ब्राह्मणों ने हमें वेश्यावृति द्वारा उत्पन्न संतान कहा था।  हमारी संतान को वेश्याओं की संतान क्यों कहा जाना चाहिए? इस अपमान के बारे में कोई नहीं सोचता। जो लोग राजनीति में सक्रिय हैं, इसकी परवाह नहीं करते। आंख मूंदकर वे वही सब करते और कहते हैं, जो ब्राह्मण उनसे कहते हैं। 

जब मैं वायकम सत्याग्रह का नेतृत्व कर रहा था, नीलांबन जमींदार के पुत्र, सेतुकुट्टी अकसर मुझसे मिलने और विचार-विमर्श के लिए आया करते थे। वे मुझे ‘नायकर सामी’ संबोधित करते थे। केवल यही नहीं, वे अपनी जाति को ऊंचा बताया करते थे, क्योंकि उनका जन्म नंबूदरी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे अकसर कहा करते थे कि मैं उन्हें नायर के जन्मा हुआ न समझ बैठूं। जबकि वे बीए तक पढ़े स्नातक थे। हमारे लोगों में इस मानसिकता की निंदा करने वाला कौन है?

पल-भर के लिए सोचिए कि इन अझ़वारों ने क्या किया था। उन्होंने अपनी पत्नियों से वेश्यावृति कराकर मोक्ष की कामना की थी। यह ‘भक्त विजयम’ पुराण में बताया गया है। 

एक शूद्र जो जाति से अझ़वार था, उसे अपनी पत्नी को वेश्यावृत्ति के पेशे की ओर प्रवृत्त होने की अनुमति देने के बाद स्वर्ग मिला था। नयांमारों ने अपनी पत्नियां ब्राह्मणों को भेंट की थीं। इन दिनों भी कट्टरपंथी लोग, बगैर किसी शर्म अथवा स्वाभिमान के, इन बातों का प्रचार-प्रसार करते हैं। जब मैं इन बातों की ओर इशारा करता हूं, तो मुझपर पुराणों(धर्मशास्त्रों) को ध्वस्त करने वाली बातें करने का आरोप लगाया जाता है। इनपर दूसरा कौन साहसपूर्वक बोलता है? इन पुराणों ने हमारी नैतिकता को नष्ट किया है। इसके अलावा हम और क्या कह सकते हैं?

इसके अतिरिक्त ब्राह्मण सरकारी पदों से भी चिपके हुए हैं। ब्रिटिश शासन से मुक्त होने के पश्चात समस्त शक्तियां ब्राह्मणों के हाथों में जा चुकी हैं। मैं इसके लिए गांधी को दोषी ठहराता हूं। हमें अनंतकाल तक शूद्र बनाए रखने के लिए बड़ी साजिश रची गई थी। आज(1958) सारी शक्तियां उनके अधीन हैं।  आज देश का राष्ट्रपति ब्राह्मण है। उपराष्ट्रपति ब्राह्मण है।  प्रधानमंत्री ब्राह्मण है। उपप्रधानमंत्री भी ब्राह्मण है।1 संसद का सभापति भी ब्राह्मण है। यह देखते हुए जब हम जाति-उन्मूलन के लिए गुहार लगाते हैं, तो वे हमे दोषी ठहराकर तीन वर्ष के लिए कारावास में भेज देते हैं। इन सबके लिए कौन चिंतातुर है? सार्वजनिक जीवन के अधिकांश शिखर व्यक्तित्व सरकार, जातिवाद, धर्मशास्त्रों, पुराणों, धर्म और ईश्वर की रक्षा करना चाहते हैं। वे जानते हैं कि अस्तित्व-रक्षा के लिए, उनके पास इसके अलावा  कोई और रास्ता नहीं है। 

कोई भी व्यक्ति जो वोट और भ्रष्टाचार के सहारे जिंदा है, वह धर्म, ईश्वर, सरकार और जाति के नाम पर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध आवाज नहीं उठाएगा। 

अंग्रेज हमें कम से कम बराबर अधिकार तो देते थे। आज सरकार ब्राह्मणों के हाथों में है, जो हमें वेश्या की संतान(शूद्र) कहते हैं। यही कारण है कि वे संवैधानिक व्यवस्था में भी स्वयं को आसानी से सुरक्षित पाते हैं। कानून के अनुसार वे लोग जो जाति को मिटाने की मांग करते हैं, उन्हें तीन वर्ष की सजा काटने के लिए तैयार रहना चाहिए। 

जातिप्रथा लाइलाज बीमारी है, जो हमारे समाज को शताब्दियों से खाए जा रही है। जिन दवाइयों का इस्तेमाल हम खाज-खुजली के इलाज के लिए करते हैं, उनसे केंसर का इलाज नहीं किया जा सकता। हमें शरीर का आपरेशन कर, उससे केंसर-प्रभावित हिस्से को अलग करना होगा। भिन्न बीमारियों के लिए इलाज भी अलग-अलग तरीके से होगा। हिंदू विधान के अनुसार हम 3000 वर्षों से अधिक से शूद्र हैं। 3000 वर्षों से हम वेश्या की संतान कहलाते आए हैं। हमारा संविधान इस बुराई को भरपूर संरक्षण देता है। 

हमें इस बुराई को जड़ से खत्म कर देना चाहिए। हमें इस उपहासजन्य स्थिति से बाहर निकाल आना चाहिए। यह सचमुच कठिनतम कार्य है। जब तक आप इसकी जड़ों पर उबलता हुआ पानी नहीं डालेंगे, तब तक इसका मिटना नामुमकिन है। सख्त कदम उठाए बिना हम जाति को नहीं मिटा सकते।  

न केवल तमिलनाडु, अपितु पूरे भारतवर्ष में और कोई ताकत नहीं है, जो हमारे बराबर हिम्मत जुटाकर अपनी आवाज बुलंद कर सके। जो लोग सत्ता के लालची हैं, वे कभी उसके विरोध का सपना नहीं देखेंगे। केवल वही लोग जो निःस्वार्थ और समर्पण भावना से जनता की सेवा में लगे हैं, अपने जीवन को जाति-व्यवस्था के उन्मूलन के लिए भी, दाव पर लगा सकते हैं। जो लोग विधायिकाओं में पहुंचे हैं, उन्होंने अभी तक क्या किया है? वे कुछ भी नहीं कर सकते? हम मामूली संदेश भेजकर भी जवाब प्राप्त कर सकते हैं।  बावजूद इसके हम तैयार नहीं हैं। 

कुछ दिन पहले नेहरू ने विधानसभाओं तथा दूसरे निर्वाचित संस्थानों पर एक दुखद टिप्पणी की थी। यहां तक कि उन्होंने धमकी दी थी कि वे रिटायर होकर संन्यास ग्रहण कर लेंगे। क्या हुआ? उन्होंने चुपचाप अपनी सारी टिप्पणियां पचा लीं और सत्ता से चिपके हुए हैं। यह महज लोकप्रियता हासिल करने के लिए पुरानी गांधीवादी चाल का प्रदर्शन था। हमारे साथ रहे ‘द्रविड़ मुनेत्र कझ़गम पार्टी के नेताओं ने भी, जब तक वे ‘द्रविड़यार कझ़गम’ में थे, विधानमंडलों में प्रवेश की निंदा की थी। यहां तक कि उन्होंने निर्वाचित प्रतिनिधियों और संस्थाओं पर हमला करने वाले लेख भी लिखे थे। बल्कि नेहरू और राजेंद्र प्रसाद ने तो विधायिकाओं के विरुद्ध बोला भी था। लेकिन आज उनके लिए वहां संभावनाएं हैं, इसलिए वे उनमें प्रवेश के अत्यंत इच्छुक हैं। वे अपने अतीत को भूल चुके हैं। अब वे साम-दाम-दंड-भेद द्वारा विधायिकाओं की शोभा बनना चाहते हैं। इसके लिए वे आंतरिक तोड़फोड़ से लेकर दूसरों का कच्चा चिट्ठा खोलने तक, किसी भी काम को तैयार हैं। किसी तरह, कैसे भी हर कोई ऊपर उठना चाहता है। कोई भी हमारी द्रविड़ अस्मिता के गौरव तथा उसकी युगों लंबी अवमानना को लेकर चिंतित नहीं है।  

पूरा देश पांच बीमारियों और तीन प्रेतों के जबड़ों में दबा हुआ है। मान लीजिए कि प्रेत वास्तव में नहीं होते; हमारा आशय है—

ईश्वर, जाति और लोकतंत्र—ये तीन प्रेत हैं। 

ब्राह्मण-समाचारपत्र-राजनीतिक दल-विधायिकाएं और सिनेमा—ये पांच बीमारियां हैं। ये बीमारियां मानव शरीर पर केंसर, कुष्ठ-रोग और मलेरिया की तरह धावा बोल रही हैं। यदि समाज को प्रगतिगामी बनाना है, तो इन बीमारियों से हमें जमकर संघर्ष करना; और इन्हें पूरी तरह नष्ट कर देना होगा। 

—ई.  वी. रामासामी पेरियार 

(हिंदी अनुवाद :  ओमप्रकाश कश्यप)

विदुथलाई, 8 ओर 9 जनवरी, 1959। इस भाषण का अंग्रेजी अनुवाद द्रड़ियार कझ़गम, चेन्नई द्वारा प्रकाशित ‘कलेक्टिड वर्क्स आफ पेरियार ईवीआर, 2005(तीसरा संस्करण) से लिया गया है। अंग्रेजी अनुवादक: ए. एस. वेणु।  

1. 1958 में जब यह भाषण दिया गया, उपप्रधानमंत्री पद खाली था। 

पेरियार और बुद्ध : धर्माडंबर और जाति-मुक्ति संघर्ष की 2500 वर्ष लंबी परंपरा

सामान्य
जाति-मद, अभिमान, लोभ, द्वैष तथा मूढ़ता ये सब अवगुण जहां हैं, वे इस देश में अच्छे स्थान नहीं हैं. जाति-मद, अभिमान, लोभ, द्वैष तथा मूढ़ता ये सब अवगुण जहां नहीं हैं, वे ही इस देश में अच्छे स्थान हैं.1—मातंग जातक(497).

 

पेरियार और गौतम बुद्ध के बीच करीब ढाई हजार वर्षों का अंतराल है. जिन दिनों बुद्ध का जन्म हुआ था, वैदिक कर्मकांड और धर्माडंबर अपने चरम पर थे. यज्ञ, पूजा-पाठ आदि के नाम पर राजाओं से भरपूर समिधा हासिल करना, इन्कार करने या असमर्थता जताने पर शाप द्वारा लोक-परलोक बिगाड़ने की धमकी देना. मनोवांछित समिधा प्राप्त होते ही राजा के हर कुकर्म को सुकर्म घोषित कर देना, फिर हजारों पशुओं की बलि एक साथ चढ़ा देना—ब्राह्मण पुरोहितों के लिए बिलकुल सामान्य था. आतंक ऐसा था कि किसी भी सम्राट को वे धर्म के नाम पर मनमाने आचरण के लिए विवश कर सकते थे. धर्माडंबर और वर्णाश्रम व्यवस्था के समर्थन में बड़े-बड़े शास्त्र गढ़े जा रहे थे. उन्हें पढ़ने का अधिकार सिवाय ब्राह्मणों के किसी को न था. वे उनकी मनमानी व्याख्या करते थे. बावजूद इसके उन्हें तत्कालीन राजसत्ताओं का संरक्षण प्राप्त था. उनके धुर विरोधी के रूप में आजीवक और लोकायत जैसे भौतिकवादी चिंतक थे, जिनका संबंध समाज के मेहनतकश लोगों तथा शिल्पकार समूहों से था. यज्ञ के नाम पर बलि चढ़ाना, ईश्वर, आत्मा, परमात्मा जैसे वायवी विषयों पर बहस करना उन्हें नापसंद था.

बुद्ध राजसत्ता और परिवार का मोह त्यागकर युवावस्था में परिव्राजक बने थे. राजकुल से संबंधित होने के कारण उनका तत्कालीन राजाओं के बीच अतिरिक्त सम्मान था. बुद्धत्व प्राप्ति के बाद जब उन्होंने धर्मोपदेश देना आरंभ किया तो मगध, उज्जैनी सहित उस समय के सभी बड़े राज्यों एवं व्यापारिक वर्गों का भरपूर सहयोग एवं समर्थन उन्हें प्राप्त हुआ. बुद्ध के प्रति राजाओं के आकर्षण का कारण यह भी था कि अनेक राजा ब्राह्मण-ऋषियों द्वारा यज्ञादि के नाम पर पशुधन और दूसरे संसाधन ऐंठने से तंग आ चुके थे. यज्ञों से राज्य के खजाने पर अनावश्यक बोझ पड़ता था. बुद्ध ने यज्ञों का विरोध कर व्यावहारिक नैतिकता पर जोर दिया. उन्होंने वेदों को अपौरुषेय और आप्तग्रंथ मानने से भी इन्कार कर दिया. तत्कालीन बुद्धिजीवी समाज में बहस का बड़ा मुद्दा आत्मा, परमात्मा, ईश्वरादि को लेकर था. दर्शन की इन समस्याओं पर लोग शताब्दियों से बेनतीजा बहस करते आए थे. आत्मा-परमात्मा में विश्वास रखने वाले उनकी सत्ता को पूर्व-निष्पत्ति मान लेते थे. उस अवस्था में बहस उनके अस्तित्व तथा औचित्य के बजाय, स्वरूप और विस्तार को लेकर रह जाती थी. दूसरा वर्ग बुद्धिसंगत निर्णय लेने का समर्थन करता था. वह उनके अस्तित्व एवं औचित्य सहित हर पहलू पर विचार करना चाहता था. दोनों परस्पर विपरीत-ध्रुवी विचारधाराएं थीं. इतनी कि उनके बीच संवाद का कोई उदाहरण पूरे संस्कृत वाङ्मय में नहीं मिलता. बुद्ध ने उनके बीच का रास्ता अपनाया. आत्मा-परमात्मा, लोक-परलोक, पाप-पुण्य जैसी बहसों में उलझने के बजाए उन्होंने, व्यक्तिगत एवं सामाजिक शुचिता को अपने धर्म-दर्शन का केंद्र-बिंदू बनाया, जिसका उन दिनों सामाजिक जीवन से लोप हो चला था.

ढाई हजार वर्ष पहले यानी बुद्ध के जन्म के समय वर्ण जाति में ढलने लगे थे. परिणामस्वरूप पचासियों जातियां अस्तित्व में आ चुकी थीं. जन्म के आधार पर भेदभाव करने वाली उस व्यवस्था को बुद्ध ने अनैतिक, अनुचित तथा जीवन के उच्चतम लक्ष्यों की प्राप्ति में बाधक माना तथा उसकी आलोचना की. अभिजात वर्ग की भाषा संस्कृत के बजाए उन्होंने पालि में उपदेश दिए, जो उन दिनों जनसाधारण की भाषा थी. उस समय तक जातीय अभिमान के मारे ब्राह्मण स्वयं को आश्रमों तक सीमित रखते थे. शेष समाज से उनका संबंध दानादि ग्रहण करने तक सीमित था. बुद्ध अपने विचारों को लेकर सीधे आमजन के बीच गए. भिक्षु-संघ की स्थापना की तो उसके दरवाजे समाज के सभी वर्गों के लिए खोल दिए. जाति-आधारित भेदभाव को वे बौद्धिक, सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों की राह में बाधक मानते थे—

‘अंबट्ठ! जो भी जातिवाद में बंधे हैं, गोत्रवाद में बंधे हैं, (अभि)मानवाद में बंधे हैं, आवाह-विवाह में बंधे हैं, वे अनुपम विद्या-चरण-संपदा से दूर हैं. अंबट्ठ! जातिवाद बंधन छोड़कर, गोत्रवाद बंधन छोड़कर, मानवाद बंधन छोड़कर, आवाह-विवाह बंधन छोड़कर ही अनुपम विद्या-चरण-संपदा का साक्षात्कार किया जा सकता है.’2

वेदों को अपौरुषेय न मानने, आत्मा, परमात्मा, ईश्वर आदि विषयों पर मौन साध लेने के कारण बौद्ध दर्शन की गिनती नास्तिक दर्शन के रूप में की जाती है. इसके आधार पर कुछ विद्वान उसे आजीवक और लोकायत दर्शन की तरह ही, भौतिकवादी दर्शन मानते हैं. लेकिन वह उच्छ्रंखल भौतिकवाद न था. हम उसे आदर्शोन्मुखी व्यवहारवाद कह सकते हैं जिसमें सामाजिक समानता, शुचिता एवं आचरण की पवित्रता प्रमुख थी. बुद्ध के विचारों का इतना असर हुआ कि वैदिक कर्मकांडों से आमजन का विश्वास घटने लगा. यज्ञ और दानादि के नाम पर ऋषियों की मांगों और धमकियांे तंग आ चुके राजा बौद्ध एवं जैन धर्म से जुड़ने लगे. उसके फलस्वरूप ब्राह्मण धर्म कुछ शताब्दियों के लिए नेपथ्य में चला गया. जातीय भेदभाव कमजोर पड़ने लगा. अशोक के बाद मौर्य साम्राज्य कमजोर पड़ने से ब्राह्मणधर्म को पुनर्वापसी का अवसर मिला. इसी दौर में पुराणों एवं स्मृति-ग्रंथों की रचना हुई. उसके बाद इतिहास ने अनेक करवटें लीं. राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद ब्राह्मणवाद निरंतर मजबूत और निरंकुश होता चला गया.

बुद्ध पहले विचारक थे, जिन्होंने समाज को धर्म के आधार पर संगठित करने की कोशिश की थी. वैदिक धर्म के प्रस्तोता जातीय दंभ के शिकार थे. आत्ममुग्धता की पराकाष्ठा में वे बाकी जनसमाज से अलग-थलग जीते थे. जनसाधारण के सुख-दुख की उन्हें परवाह न थी. जाति और वर्ण के नाम पर उन्होंने समाज के बड़े हिस्से को मुख्यधारा से अलग किया हुआ था. अपने आश्रमों में बंद ऋषिगण धर्म और यज्ञादि के नाम पर क्या करते हैं? बलि चढ़ाने से उन्हें क्या हासिल होता है—जनसाधारण को इसकी बहुत परवाह भी नहीं थी. ब्राह्मण बुद्धिजीवियों की उपेक्षा की परवाह न करते हुए साधारण जन आजीवकों और लोकायतों पर विश्वास करते थे, जो उस समय भौतिकवादी दर्शन की प्रमुख शाखाएं थीं. वैदिक परंपरा संसार को नकारकर, काल्पनिक, भ्रममूलक देवलोक को परम-सत्य मानती थीं. आजीवकों और लोकायतों के लिए जीती-जागती, जीवनदायिनी प्रकृति ही सबकुछ थी. वे अपने श्रमकौशल के भरोसे जीवन-यापन करने वाले बहुसंख्यक लोग थे. चूंकि धर्म-केंद्रित समाज की रचना का संकल्प सामाजिक शुचिता के बगैर असंभव था. इसलिए बुद्ध ने आदर्शोन्मुखी नैतिकता पर जोर दिया. धार्मिक आडंबरों, यज्ञ-बलियों एवं जाति-प्रथा को अनावश्यक मानते हुए उन्होंने निस्पृह और कल्याणोन्मुखी जीवन जीने का उपदेश दिया. कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में पशु-धन का विशेष महत्त्व था. यज्ञादि कर्मकांडों के विरोध का सीधा-सा अभिप्राय था, उपयोगी पशुधन की जीवनरक्षा. इसके फलस्वरूप लोग उनके धर्म की ओर आकृष्ट होने लगे.

 

2

पेरियार के समय तक जाति-व्यवस्था उग्र रूप धारण कर चुकी थी. अछूतों का सार्वजनिक स्थलों पर प्रवेश निषिद्ध था. कथित ऊंची जाति के सदस्यों का स्पर्श तो दूर, अपनी छाया से भी उनको बचाना पड़ता था. शूद्रों को उनके कार्य के अनुसार थोड़ी छूट थी, परंतु वे भी एक सीमा तक ही उच्च जातियों के निकट जा सकते थे. कैथरीन मेयो ने अपनी पुस्तक ‘मदर इंडिया’ में भारतीय समाज में व्याप्त छूआछूत के बारे में वर्णन किया है. डू. बोइस के हवाले से वे उनीसवीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों में दक्षिण भारतीय समाज के बारे लिखती हैं—‘मालाबार तट पर रहने वाली ‘पुलाया’ जाति के सदस्यों को अपने लिए घर बनाने का अधिकार नहीं है. रहने के लिए वे लोग दरख्तों पर घौंसले की भांति, बांस-बल्लियों के सहारे, पत्तों की छत डाल सकते हैं.’ डू. बोइस के अनुसार, उन दिनों यदि कोई नैय्यर किसी पुलाया को सड़क पर देख लेता तो उसे वहीं मार देने का अधिकार था. बातचीत के दौरान दो व्यक्तियों के बीच दूरी से भी अस्पृश्यता के स्तर का अनुमान लगाया जा सकता था. पुलाया को नैय्यर जैसे उच्च जाति के हिंदुओं से 60 से 90 फुट की दूरी रखकर बात करनी पड़ती थी.

पेरियार ने बचपन से जाति-आधारित भेदभाव का अनुभव किया था. बड़े हुए तो उन्हें इसका कारण भी समझ में आने लगा. उनका जन्म धनाढ्य परिवार में हुआ था. शिक्षा के नाम पर वे बस दो-तीन वर्ष ही पाठशाला जा पाए थे. बाद में पिता के व्यवसाय से जुड़ गए. उन दिनों उनके घर में संन्यासियों, शैव-मतावलंबियों, वैष्णवों, पंडितों आदि का खूब आना-जाना था. किशोर पेरियार उन्हें अधिकाधिक दान-दक्षिणा के लिए तरह-तरह के बहाने बनाते हुए देखते. कभी-कभी वे उनका मजाक भी उड़ाते. बावजूद इसके अपनी युवावस्था तक ईश्वर में उनकी आस्था बनी रही. 1925 में उन्होंने संन्यासी के रूप में बनारस की यात्रा की. यात्रा के दौरान वे बनारस में जहां-जहां गए, वहां ब्राह्मणवाद का विकृत चेहरा, धर्म के नाम पर लूट-खसोट और वृथा आडंबरों से सामना हुआ. जातीय भेदभाव का अनुभव तो उन्हें बचपन से ही था. बनारस यात्रा के बाद उनका धर्म से भी विश्वास उठ गया. उसके बाद नए पेरियार का जन्म हुआ, जो तर्कवादी था. ज्ञान-विज्ञान पर जोर देता था. व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता, समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर विश्वास करता था. आस्था के आधार पर कुछ भी मान लेना उसे अस्वीकार्य था. हर स्थापित सत्य पर संदेह करना, उसे अपने विवेक की कसौटी पर कसना और खरा उतरने के बाद ही उसे स्वीकार करना, उसकी आदत में शुमार हो चुका था.

पेरियार ने आत्मा, परमात्मा, पाप-पुण्य, भाग्य आदि को सीधे नहीं नकारा. अपितु तर्क पर जोर दिया. इस मामले में बुद्ध उनके प्रेरणा-पुरुष रहे. प्राचीन भारत के इतिहास में बुद्ध कदाचित पहले शास्ता थे जिन्होंने वैचारिक स्वतंत्रता को आगे रखते हुए अपने शिष्यों से कहा था—‘अप्पदीपो भवः.’ दूसरों की बातों में आने के बजाय, सोच-विचारकर स्वयं निर्णय लो. धर्म-दर्शन और जाति पर दिए गए अपने व्याख्यानों में पेरियार भी आत्मा, परमात्मा, ईश्वर आदि को तर्क की कसौटी पर कसते हैं. उनके अस्तित्व पर ध्यान देने के बजाए औचित्य पर विचार करते हैं. 1947 में सलेम कॉलिज में ‘हिंदू दर्शन’ पर दिए गए अपने व्याख्यान में उन्होंने इन विषयों की वैज्ञानिक पड़ताल की थी. उन्होंने सिद्ध किया कि ये सभी मिथ समाज पर सोची-समझी नीति के तहत थोपे गए हैं. सहअस्तित्व, समानता, सहयोग, सद्भाव एवं निस्पृह जीवन जीने वाले व्यक्ति को इनकी कोई आवश्यकता नहीं पड़ती. उस व्याख्यान में वे बुद्ध का नाम नहीं लेते; परंतु उनका प्रत्येक निष्कर्ष उन्हें बुद्ध के करीब ले जाता है—

‘मनुष्य अपनी इच्छाओं के साथ जीता है. वह अपने लालच का दास का है. समाज में रहकर वह दूसरों के लिए या तो अच्छा कर सकता है अथवा बुरा. कर्म की महत्ता पर जोर देने के लिए ही जीवन और आत्मा जैसी काल्पनिक चीजों की रचना की गई है. मनुष्य को अच्छे कृत्यों की ओर प्रवृत्त करने हेतु, उसे यह विश्वास करना सिखाया गया है कि यदि वह बुरे कर्म करेगा तो मृत्यु के बाद उसकी आत्मा को भयावह दंडों से गुजरना पड़ेगा. यह भी एक मिथ मात्र ही है. तर्क-सम्मत ढंग से बातचीत करने वाले निस्पृह व्यक्ति के लिए जो न अच्छा करता है, न ही बुरा, ईश्वर का भय नहीं रहता. उसे स्वर्ग या नर्क की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है.’3

बुद्ध के ‘अपना दीपक स्वयं बनो’ की तरह पेरियार ने भी लोगों से बार-बार यह आग्रह किया—‘मैंने जो कहा वे मेरे व्यक्तिगत विचार हैं. जरूरी नहीं है कि आप भी इनपर विश्वास करें. इसलिए खूब सोचें और स्वयं सार्थक निर्णय तक पहुंचे.’

एक और सूत्र जो पेरियार को बुद्ध के करीब ले जाता है, वह है—जाति व्यवस्था को लेकर दोनों का समान दृष्टिकोण. बुद्ध का जन्म नागवंशीय शाक्य कुल में हुआ था. बाकी क्षत्रियों की अपेक्षा उसे कुछ हीन माना जाता था. अश्वघोष उनका संबंध इक्ष्वाकू वंश से जोड़ते हैं. बौद्ध साहित्य के गंभीर अध्येता कोसंबी के अनुसार शाक्य एक जनजाति थी. बुद्ध ने जातिगत भेदभाव का विरोध किया था. भिक्षु संघों के दरवाजे उन्होंने सभी जातियों के लिए खोले हुए थे. लेकिन ‘अंबट्ठसुत्त’(दीघनिकाय) में वे जिस तरह क्षत्रियों को ब्राह्मणों से श्रेष्ठ बताने के लिए तर्क देते हैं, उसका एक निष्कर्ष यह भी निकलता है कि उन्हें अपने क्षत्रीय कुलोत्पन्न होने पर गर्व था; या कम से कम वर्ण-व्यवस्था से उन्हें कोई शिकायत न थी. बुद्ध द्वारा धार्मिक कर्मकांडों, आडंबरों तथा जाति-प्रथा के विरोध का इतना असर अवश्य हुआ था कि बौद्ध धर्म को जनता ने अपना धर्म मान लिया. उसके फलस्वरूप समाज में जाति-आधारित कटुताओं में भी कमी आने लगी. परंतु जाति और उसके आधार पर हो रहे भेदभाव के विरोध में बड़ा आंदोलन न चलाने के कारण, जातिवादी शक्तियां भीतर ही भीतर सक्रिय बनी रहीं. लोगों को ब्राह्मण धर्म की ओर वापस मोड़ने के लिए ब्राह्मण बुद्धिजीवी पुराणों, स्मृतियों, महाकाव्यों आदि ग्रंथों की रचना में जुट गए. अशोक द्वारा उठाए गए कदमों के फलस्वरूप बौद्ध धर्म दुनिया के विभिन्न देशों में पहुंचा. मगर उसके तुरंत बाद, मौर्य वंश के कमजोर पड़ते ही, ब्राह्मणवाद पुनः जड़ जमाने लगा. ‘मनुस्मृति’ की रचना हुई. जातीय भेदभाव और दुराग्रह जो बुद्ध के प्रभाव दब-से गए थे, वे पुनः सामने आने लगे.

 

3

पेरियार के समय तक लगभग सभी धर्म अपनी प्रासंगिकता खो चुके थे. सतरहवीं-अठारहवीं शताब्दी में पश्चिम में हुई वैचारिक क्रांति के फलस्वरूप, भारत में भी मानव-मात्र की समानता और स्वतंत्रता की समर्थक नई विचार-चेतना का जन्म हुआ था. यह मानते हुए कि राजनीति सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बन सकती है, राजगोपालाचार्य के आग्रह पर पेरियार कांग्रेस में शामिल हुए थे. प्रदेश कांग्रेस के उच्च पदों पर रहते हुए उन्होंने नेताओं का मन बदलने की पूरी कोशिश की थी. मगर थोड़े ही समय में उन्हें विश्वास हो गया कि कांग्रेस के नेता अपने जातीय दुराग्रहों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं. उनकी कथनी और करनी में बड़ा अंतर है. खासतौर पर जातीय विषमता को मिटाने के लिए कांग्रेसी नेता कुछ नहीं करना चाहते. यहां तक कि गांधी भी जातीय पूर्वाग्रहों में फंसे हुए हैं. खिन्न होकर 1925 में उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया. लोगों में आत्माभिमान का भाव पैदा करने के लिए उन्होंने ‘स्वाभिमान आंदोलन’ की नींव रखी. उस समय तक धर्म को नैतिक मूल्यों का एकमात्र स्रोत माना जाता था. लोगों का विश्वास था कि केवल धर्म के सहारे समाज को एकसूत्र में बांधकर रखा जा सकता है. पेरियार किसी नए धर्म के बंधन में बंधना नहीं चाहते थे. तमिल जनता में अपनत्व एवं एकजुटता की भावना पैदा करने के लिए उन्होंने द्रविड़ संस्कृति को आधार बनाया. लोगों को समझाया कि समाजीकरण की बुनियाद पारस्परिक सहयोग और समर्पण पर टिकी होती है. पौराणिक ग्रंथों, महाकाव्यों आदि की रचना स्वार्थी ब्राह्मणों ने लोगों को भरमाने के लिए की है. जाति-व्यवस्था को दैवीय बताने वाले धर्मग्रंथों में शूद्रों और अस्पृश्यों के लिए अपमानजनक स्थितियां हैं—‘बौद्धों और जैनियों ने ब्राह्मणवाद द्वारा फैलाई गई कुरीतियों को कुछ समय के लिए समाप्त कर दिया था. उन्होंने बताया था कि सभी लोग बराबर हैं. आपसी प्रेम और भाईचारा ही असली ईश्वर हैं. ब्राह्मणों को वह स्वीकार नहीं हुआ. इसलिए उन्होंने उनके सभी कार्यों पर पानी फेर दिया.’4 लोगों को ब्राह्मणों द्वारा फैलाए गए भ्रमजाल से निकालकर मानवीय मूल्यों से जोड़ना, उनके भीतर सम्मानजनक जीवन जीने की चाहत पैदा करना पेरियार की प्रमुख चुनौती थी. फुले इसकी नींव बहुत पहले डाल चुके थे. ‘स्वाभिमान आंदोलन’ की शुरुआत का भी यही उद्देश्य था.

पेरियार आस्थावान व्यक्ति नहीं थे. उनका विश्वास ज्ञान-विज्ञान में था. अरस्तु की तरह वे भी मनुष्य को विवेकशील प्राणी मानते थे. बावजूद इसके उन्होंने धर्म की शक्ति को नकारा नहीं था. लेकिन उनका धर्म मानव-मात्र के कल्याण का उद्यम था, जिसमें किसी देवता या आत्मा-परमात्मा के लिए कोई स्थान नहीं था. आजीवन वे इस पर विचार करते रहे कि मनुष्य को धर्म और धर्मशास्त्रों के मकड़जाल से बाहर कैसे निकाला जाए! यह आसान काम नहीं था. क्योंकि मानव जीवन में धर्म की व्याप्ति केवल पूजा-पाठ या संस्कारों तक सीमित नहीं रहती. ऐसे लोग भी जो मंदिर नहीं जाते, पूजा-पाठ तथा दूसरे आडंबरों से दूर रहते हैं; और ऐसे भी जो अच्छे-खासे पढ़े-लिखे हैं—दिलो-दिमाग से दकियानूसी हो सकते हैं. लोकजीवन का हिस्सा बन चुके विभिन्न संस्कार, आचार-विचार और रूढि़यां, संस्कृति का अभिन्न हिस्सा मान लिए कर्मकांड यहां तक कि उनसे जुड़े किस्से-कहानियां भी—किसी न किसी रूप में धार्मिक जड़ता के संवाहक हैं. उनकी रचना जातिभेद और सामाजिक ऊंच-नीच को दैवीय सिद्ध करने के लिए की गई है. 2400 वर्ष पहले अरस्तु ने भी तो यही कहा था, ‘मनुष्य ने ही ईश्वर को रचा है. अपने रूपाकार में, और अपनी जीवनशैली के अनुरूप भी.’ ब्राह्मण खुद को सर्वोपरि मानते हैं. वे चाहते हैं कि शेष जनसमाज उनके इशारे पर नाचे. जो ऐसा नहीं करता उसे वे शाप देने की धमकी दिया करते थे. उनका गढ़ा हुआ ईश्वर भी खुद को भक्तों से ऊपर मानता था; जो उसकी चापलूसी(भक्ति) से आनाकानी करे, उसे वह दंड देने को उतावला रहता था.

बौद्ध धर्म के रास्ते सामाजिक शुचिता की वापसी का रास्ता पेरियार से पहले दक्षिण भारत में आइयोथि थास भी दिखा चुके थे. उनका मानना था कि दक्षिण की पेरियार जाति के लोग मूलतः बौद्ध हैं और वे दक्षिण के मूल निवासी हैं. आर्य हमलावरों ने उनके धर्म और संस्कृति को उनसे छीन लिया है. थॉस के प्रभाव में केरल की जाति इझ़वा अपना संबंध गौतम बुद्ध से वंश से जोड़ने लगी थी. मद्रास प्रेसीडेंसी का नाम द्रविड़नाडु करने की मांग के समय पेरियार ने भी कहा था कि मुस्लिम, ईसाई, आदि द्रविड़ और बौद्ध सभी द्राविड़ हैं.5 थॉस की भांति पेरियार भी ब्राह्मणवाद के कटु आलोचक थे. जातीय उत्पीड़न से मुक्ति के लिए उन्होंने तमिलवासियों से हिंदू धर्म को छोड़ने का आग्रह किया था. उसके पीछे भी बौद्ध धर्म की प्रेरणा थी. 13 जनवरी 1945 के ‘कुदी अरासु’ के अंक में उन्होंने लिखा था कि यदि अंग्रेजों ने हम पर शासन करने के लिए ‘बांटो और राज करो’ की नीति का अनुसरण किया था तो ठीक यही नीति आर्यों ने भी भारत के मूल निवासियों पर राज करने के लिए अपनायी थी. उन्होंने यहां के बहुसंख्यकों को पिछड़ों और अछूतों में बांट दिया. पेरियार का कहना था—‘विश्वासघातियों का शिकार मत बनिए….राम और कृष्ण जैसे नायक तथा गीता, रामायण जैसे धर्मग्रंथ, बौद्ध धर्म के प्रति हमारे विश्वास को मिटाने के रचे गए हैं.’ उन्होंने आगे कहा था—

‘आंबेडकर जब मद्रास आए थे तब मैंने उन्हें 1923 में भारी जनसभा के सामने दिए गए अपने भाषण के बारे में बताया था कि जब तक कोई रामायण का दहन नहीं करता, तब तक छूआछूत पर सार्थक प्रहार संभव नहीं है.’6 10 जनवरी 1947 को ‘कुदीअरासु’ में उन्होंने फिर लिखा था कि जैसे ‘बुद्ध और गुरुनानक वेदों को धर्मशास्त्रों को पूरी तरह मिथ्या बताते थे, केवल हम द्रविड़जन ही वैसा कहने का साहस कर पाते हैं.’7

27 मई 1953 को बुद्ध जयंती के अवसर पर पेरियार ने अपने अनुयायियों को उसे उत्सव की तरह मनाने का आवाह्न किया था. उन्होंने कहा था कि इस अवसर पर वे मूर्ति पूजा का बहिष्कार करें. विघ्नेश्वर, गणपति, गजपति, विनायक आदि कहे जाने वाले गणेश की मूर्तियों को तोड़कर बहा दें. बौद्ध जयंती वैदिक परंपरा के धुर विरोधी की जयंती है. इस देश में हजारों देवी-देवता है. इसलिए ऐसा व्यक्ति जो विवेक से काम लेता है, तर्क को महत्त्व देता है, जीवन के प्रति व्यावहारिक दृष्टिकोण रखता है तथा जिसे मनुष्यता में भरोसा है वह स्वयं ही बुद्ध कहलाने योग्य है. यह दिखाने के लिए कि मूर्ति केवल पत्थर का टुकड़ा है, उसमें कोई दैवी शक्ति नहीं है, पेरियार ने तमिलनाडु के कई शहरों में मूर्ति तोड़ो आंदोलन का नेतृत्व किया था. मूर्ति-पूजा और धार्मिक कर्मकांडों का बहिष्कार, सामाजिक कार्यक्रमों में ब्राह्मण पुरोहित की अनिवार्यता से मुक्ति, उनके ‘स्वाभिमान आंदोलन’ का महत्त्वपूर्ण हिस्सा था. ढाई हजार वर्ष पहले बुद्ध ने भी मूर्ति पूजा की निंदा की थी. धार्मिक कर्मकांडों, आडंबरों एवं जाति-आधारित भेदभाव की आलोचना करते हुए उन्होंने पंचशील और अष्ठांग मार्ग का प्रतिपादन किया जो व्यैक्तिक एवं सामाजिक जीवन की शुचिता पर जोर देता था. बुद्ध ने दिखाया था कि किसी भी समाज में शुभत्व की मौजूदगी, इसपर निर्भर करती है कि उसके सदस्य अपने जीवन में शुचिता एवं सौहार्द्र को लेकर कितने गंभीर हैं. उसके लिए किसी धर्माडंबर की आवश्यकता नहीं है. पेरियार के भाषणों का लोगों पर अनुकूल असर पड़ा. लोग धर्म के सम्मोहन से बाहर निकलने लगे. आंदोलनकारियों ने अपने-अपने घर से देवताओं की मूर्तियां निकाल फैंकी. तिरुचिरापल्ली के टाउन हॉल के सामने खुले मैदान में सैकड़ों लोगों ने मूर्तियों को तोड़ डाला.

धर्म के प्रति विशेष आस्था न होने के बावजूद पेरियार बुद्ध को अपने विचारों के करीब पाते थे. वे चाहते थे कि लोकमानस बुद्ध के विचारों को जाने-समझे. इसके लिए उन्होंने 23 जनवरी 1954 को इरोद में एक सम्मलेन का आयोजन किया था. सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए सीलोन विश्वविद्यालय, श्रीलंका के बौद्ध संस्कृति केंद्र के प्रोफेसर जी. पी. मल्लाल शेखर ने कहा था कि बुद्ध के विचारों के अनुसरण द्वारा अंतरराष्ट्रीय शांति की स्थापना की जा सकती है. उन्होंने पेरियार द्वारा समाज सुधार विशेषरूप से धार्मिक जकड़बंदी के प्रयासों से बाहर लाने के प्रयासों की सराहना की थी. उनका मानना था कि तमाम विरोधों एवं अवरोधों के बावजूद समाज सुधार का पेरियार का रास्ता बुद्ध के विचारों से मेल खाता है. सम्मेलन में जाति प्रथा पर भी चिंता व्यक्त की गई थी. ‘अखिल भारतीय शोषित जाति संघ के सचिव और सांसद राजभोज ने सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा था कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था में दलित, शूद्र और अन्य जातियां बहुसंख्यक होने के बावजूद तरह-तरह के शोषण की शिकार रही हैं. बौद्ध धर्म जाति-प्रथा को नकारता है. उसके अनुसार समाज में सभी बराबर हैं. जाति-व्यवस्था हिंदू धर्म का कलंक है. सबसे पहले बुद्ध ने ही जाति-प्रथा और धर्माडंबरों का विरोध करते हुए, सामाजिक कुरीतियों को दूर करने में सफलता प्राप्त की थी. केवल बौद्ध धर्म से ही इस समस्या का समाधान संभव है. सम्मेलन में पेरियार की प्रशंसा करते हुए कहा गया था कि उन्होंने ब्राह्मणवाद के खात्मे के लिए कई आंदोलन चलाए हैं. उनके कारण समाज में जाति-विरोधी चेतना का जन्म हुआ है—‘बुद्ध की नीतियां ही आपकी और ‘स्वाभिमान आंदोलन’ की नीतियां हैं.’8 उस अवसर पर बुद्ध की प्रतिमा का अनावरण किया गया था. हमेशा की तरह उस सम्मेलन में भी पेरियार ने हिंदू धर्म-दर्शन पर हमला बोलते हुए बौद्ध धर्म की प्रशंसा की थी—

‘हम जो मेहनती और कामगार लोग हैं, हमें नीची जाति में डाल दिया गया है. हम भुखमरी के शिकार हैं. हमारे पास पहनने के लिए वस्त्र नहीं हैं. हमारे पास रहने को घर भी नहीं हैं. लेकिन ब्राह्मण जो कोई काम नहीं करते, उन्हें सभी प्रकार के सुख और मान-सम्मान हासिल है.’9

सम्मेलन में लोगों को संबोधित करते हुए पेरियार ने कहा था—

‘‘केवल तुम्हीं वे लोग हो जिन्होंने ये मंदिर बनाए हैं. केवल तुम्हीं हो जिन्होंने इनके लिए दान दिया है. यदि ऐसा है तो क्या हम ईश्वर को जो हमें नीची जाति का और अछूत बताता है, ऐसे ही छोड़ सकते हैं? ‘कृतघ्न ईश्वर! केवल मैंने ही तेरे लिए मंदिर और तालाब बनवाए हैं. केवल मैंने ही तुझपर अपना पैसा बहाया है.’ क्या तुम यह नहीं पूछोगे कि तुम नीची जाति के क्यों हो? तुम्हें छूने में हर्ज क्या है? तुम केवल ब्राह्मण के कहे पर विश्वास करते हो कि यदि तुम ऐसे सवाल उठाओगे तो ईश्वर तुमसे नाराज हो जाएगा.’’10

इरोद सम्मेलन में गौतम बुद्ध के विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए एक प्रस्ताव स्वीकृत किया गया था. उसमें कहा गया था—‘आर्यों द्वारा हिंदू धर्मशास्त्रों, पुराणों, महाकाव्यों की रचना सांस्कृतिक वर्चस्व कायम रखने तथा द्रविड़ों के अपमान, अवमूल्यन तथा उन्हें भरमाए रखने के लिए की गई है, उनका सबका नाश होना चाहिए.’ उसी सम्मेलन में स्वीकृत एक अन्य प्रस्ताव में कहा गया था—‘बुद्ध का जीवन तथा उनके धर्मोपदेश ईश्वर, आत्मा, स्वर्ग-नर्क, भाग्यवाद, धार्मिक परंपराओं तथा उत्सवों की मिथ्याचार को उजागर करती हैं; तथा भेदभाव रहित, आपसी सहयोग और बराबरी पर आधारित सामाजिक संरचना का समर्थन करती हैं, तमिलनाडु के सभी लोगों, जनसंगठनों, संस्थाओं और समूहों को चाहिए कि वे उनके विचारों को, समस्त मानव-समुदाय तक पहुंचाने के लिए आगे आएं.’

पेरियार की बातों को सुनकर रोज नए-नए लोग उनके आंदोलन से जुड़ने लगे. धार्मिक आयोजनों, कर्मकांडों तथा धर्मशास्त्रों में कही गई बातों पर सवाल उठाए जाने लगे. इससे सनातनी हिंदुओं को डर सताने लगा था. वे जानते थे कि धर्म की नींव अज्ञात डर पर टिकी है. मूर्तियों के प्रति श्रद्धा भी उसी डर का विस्तार है. यदि वह डर ही नहीं रहा तो लोग धर्म की गिरफ्त से बाहर होने लगेंगे. पेरियार लगातार वैज्ञानिक सोच का प्रचार-प्रसार कर रहे थे. सनातनी हिंदुओं की निगाह में धर्मशास्त्रों आलोचना नास्तिकता थी. स्वाभिमान आंदोलन की राह में अवरोध पैदा करने के लिए उन्होंने एक संगठन का गठन किया था. उस संगठन ने पेरियार तथा उनके दो सहयोगियों टी. पी. वेदाचलम और एम. आर. राधा के विरुद्ध धारा 295 के अंतर्गत मुकदमा दायर कर दिया. वेदाचलम वरिष्ठ अधिवक्ता थे, जबकि एम. आर. राधा जाने-माने अंधविश्वास विरोधी कार्यकर्ता. पेरियार और उनके सहयोगियों पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने जनभावनाओं को आहत करने का काम किया है. मामले की पहली सुनवाई सत्र न्यायालय में हुई. अगली सुनवाई के लिए मुकदमा जिला सत्र न्यायालय में पहुंचा. दोनों अदालतों का निर्णय पेरियार के पक्ष में गया. मगर पेरियार के दुश्मन इतने से शांत होने वाले न थे. उन्होंने मद्रास उच्च न्यायालय में अपील दायर कर दी. अपील की सुनवाई के बाद, 13 अक्टूबर 1954 को न्यायमूर्ति एन. सोम सुंदरम ने उसे यह कहकर खारिज कर दिया कि वादी पक्ष की यह आशंका कि पेरियार तथा उनके सहयोगियों के कृत्य से जनभावनाएं आहत होती हैं—सही मानी जा सकती है. लेकिन पेरियार और उनके साथियों ने जो मूर्तियां तोड़ीं उन्हें उन्होंने या तो स्वयं बनाया था अथवा बाजार से खरीदा गया था. वे मंदिर में पूजी जाने वाली मूर्तियां नहीं थीं. ऐसी मूर्तियों को तोड़ना कानून अपराध नहीं है.

तमिल समाज में जागृति लाने, उसे रूढि़मुक्त करने तथा आत्माभिमान की भावना जागृत करने के लिए पेरियार ने ‘स्वाभिमान आंदोलन’ का सूत्रपात किया था. उसी के एक कार्यक्रम में जनवरी 31, 1954 को उन्होंने मद्रास(अब चैन्नई) में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा कि बुद्ध के विचार हमारे अपने विचारों को लागू करने, आगे बढ़ाने तथा समाज में बढ़ रही विकृतियों के शमन की दिशा में बहुत ही उपयोगी हैं. उसी वर्ष पेरियार अपनी पत्नी तथा कुछ मित्रों के साथ मलेषिया और मयामार गए थे. वहां मेंडले में बुद्ध की 2500वीं जयंती के अवसर पर उनकी भेंट डॉ. आंबेडकर से हुई थी. उस समय तक डॉ. आंबेडकर बौद्ध धर्म अपनाने का निर्णय ले चुके थे. उन्होंने पेरियार से भी वैसा ही करने को कहा था. इसपर पेरियार ने डॉ. आंबेडकर से आग्रह किया था कि वे धर्मांतरण से बचें. क्योंकि ऐसा करके वे हिंदू धर्म की आलोचना का अधिकार खो देंगे. जड़वादी हिंदू दावा करने लगेंगे कि किसी गैर हिंदू को उनके धर्म की आलोचना का अधिकार नहीं है. लोग भी उनकी बात पर आसानी से विश्वास कर लेंगे. अपने धर्मांतरण के बारे में पेरियार का कहना था कि वे धर्मांतरण के बजाए हिंदू धर्म के भीतर रहकर ही उसकी आलोचना करते रहेंगे. हिंदुओं के धर्मांतरण के बारे में उनकी स्पष्ट राय थी—

‘यदि कोई हिंदुओं द्वारा इस्लाम, ईसाई, बौद्ध, जैन धर्म की ओर धर्मांतरण के आंकड़ों का विश्लेषण करे तो उनमें सर्वाधिक संख्या दलितों की होगी. वे धर्मांतरण को इसलिए अपनाते हैं क्योंकि हिंदू धर्म उन्हें बहुत ही उत्पीड़क नजर आता है. धर्मांतरण द्वारा वे जातीय निरंकुशता से बाहर निकल जाना चाहते हैं. उनमें से बहुत से लोग मानते हैं कि आस्था के अंतरण द्वारा वे अपनी जीवनशैली और आर्थिक स्थिति में सुधार ला सकते हैं. दूसरे शब्दों में धर्मांतरण उन्हें घृणित कर्मवाद के दुश्चक्र से मुक्ति दिला सकता है. धर्मांतरण उनमें बेहतरी की उम्मीद जगाता है. उनके भीतर बेहतर पहचान और संपत्ति के बारे में नई चेतना का संचार करता है.’11

उन दिनों चैन्नई में ब्राह्मण अपने स्वामित्व वाले होटलों के आगे ‘ब्राह्मण होटल’ का बोर्ड लगाते थे. इससे लगता था कि ब्राह्मण बाकी जातियों से आगे हैं. पेरियार उस प्रवृत्ति को रोकना चाहते थे. इसलिए उन्होंने उसके विरुद्ध आंदोलन छेड़ दिया. 5 मई 1957 को एक ब्राह्मण होटल के सामने से प्रतीकात्मक आंदोलन की शुरुआत हुई. 22 मार्च 1958 तक उनका आंदोलन लगातार चलता रहा. पेरियार के साथ 1010 आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया. आखिरकार उनकी जीत हुई. पूरे राज्य में होटल मालिकों को अपने बोर्ड से ‘ब्राह्मण’ शब्द हटाना पड़ा.

फरवरी 1959 में पेरियार उत्तर भारत की यात्रा पर निकले. धार्मिक कूपमंडूकता के मामले में उत्तरी और दक्षिणी भारत में आज भी बहुत अंतर नहीं है. उत्तर भारत की यात्रा के दौरान पेरियार ने कानपुर, लखनऊ और दिल्ली में बड़ी जनसभाओं को संबोधित किया था. उस समय तक डॉ. आंबेडकर बौद्ध धर्म अपना चुके थे और जातीय उत्पीड़न और अनाचार से बचने के लिए दलित और पिछड़ी जातियों के काफी लोग बौद्ध धर्म को अपनाने लगे थे. पेरियार ने इसकी चर्चा भी अपने भाषण में की थी. उसके बारे में एक संक्षिप्त रिपोर्ट ‘विदुथलाई’ के 21 फरवरी 1959 के अंक में प्रकाशित हुई थी. उनका कहना था—

‘शूद्रों और पंचमों, जिन्हें आजकल पिछड़ी जाति और दलित कहा जाता है—के अवमूल्यन को रोकने के लिए हमें आर्यों द्वारा गढ़े गए धर्म, धर्मशास्त्रों एवं ईश्वर का बहिष्कार करना होगा. जब तक इनकी सत्ता रहेगी, हम जाति को नहीं मिटा सकते. इसी के लिए डॉ. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाया था. अपने अलावा उन्होंने और बहुत से लोगों को धर्मांतरण कराया था. इसलिए सभी हिंदू धर्म, ईश्वर और जाति से मुक्ति हेतु बौद्ध धर्म अपनाने के लिए आगे आना चाहिए.’

पेरियार के अनुसार केवल बुद्ध ही थे जिन्होंने समाज में व्याप्त तरह-तरह की ऊंच-नीच के विरोध में सवाल उठाए थे—

‘‘क्या (बुद्ध के अलावा) किसी और ने पूछा था कि समाज में लंबे समय से जातीय भेदभाव क्यों मौजूद है? बुद्ध ने यह सवाल उठाया था. वे राजा के बेटे थे. उन्होंने कई चीजों पर सवाल उठाए थे. उन्होंने पूछा—‘वह आदमी बूढ़ा क्यों है?’ ‘वह व्यक्ति नौकर क्यों था? वह अंधा क्यों है? बुद्ध ने पूछा था—‘वह आदमी नीच जाति का क्यों है?’ उन्होंने बताया—‘उसे भगवान ने ही ऐसा बनाया है?’ इसपर बुद्ध ने सवाल किया—‘वह ईश्वर कहां है जिसने इसे बनाया है?’ तब वे आत्मा का सिद्धांत बघारने लगे. तब बुद्ध ने पूछा—‘आत्मा क्या है? क्या किसी ने उसे देखा है?’….बुद्ध के मुख्य सिद्धांत हैं—

‘निहित सत्य को जानने के लिए प्रत्येक वस्तु का अपने विवेकानुसार भली-भांति विश्लेषण करो.’ तथा ‘यदि तुम्हारा विवेक उसे सच मानता है, तभी उसपर विश्वास करो.’ पेरियार ने आगे कहा था—‘ईश्वर, आत्मा, देवता, स्वर्ग, नर्क, ब्राह्मण, शूद्र, पंचम यदि ये बातें तुम्हारी समझ में नहीं आती हैं तो इनपर विश्वास मत करो. ये सब काल्पनिक शब्द हैं. कुछ भी स्वीकारने से पहले अपनी सहज बुद्धि का उपयोग करो. ईश्वर ने ऐसा कहा है, वेद ऐसा कहते हैं या मनुस्मृति में यह सब लिखा है—ऐसी बातों पर विश्वास वृथा है. जिसे तुम्हारी बुद्धि स्वीकारती है, केवल उसी पर भरोसा करो.’’12

पेरियार का विश्वास किसी भी धर्म में नहीं था. बावजूद इसके ऐसे कई अवसर आए जब उन्होंने बौद्ध धर्म की प्रशंसा की. अपनी मृत्यु से कुछ महीने पहले उन्होंने ‘ईश्वर और मनुष्य’ विषय पर सारगर्भित भाषण दिया था. भाषण में ईश्वर की अवधारणा को नकारा गया था, साथ ही विभिन्न धर्मों पर चर्चा की थी. उसमें बौद्ध धर्म की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा था—‘यदि हम बौद्ध धर्म को कोई और नाम देना चाहें तो हम उसे ‘बुद्धि’ यानी ‘ज्ञान का धर्म’ कह सकते हैं. बौद्ध धर्म को ‘ज्ञान का धर्म’ या ‘ज्ञानमय धर्म’ क्यों कहा जाएगा? क्योंकि बाकी जितने भी धर्म हैं, वे सभी ईश्वर केद्रित हैं, जबकि बौद्ध धर्म किसी ईश्वर को मान्यता नहीं देता. यह इसलिए है कि कोई भी ऐसा ‘ज्ञानमय धर्म’ या ‘ज्ञान का धर्म’ नहीं हो सकता जो ईश्वर पर विश्वास करता हो. यही कारण है कि बौद्ध धर्म को ‘विवेकशील धर्म’ कहा है. उस भाषण में पेरियार ने बौद्ध धर्मावलंबियों की यह कहकर आलोचना की थी कि वे भी बौद्ध धर्म को ‘ज्ञान के धर्म’ के रूप में अंगीकार करने में विफल रहे हैं. पेरियार ने ऐसा क्यों कहा था? इस बारे में उनका कहना था कि किसी भी सामान्य—‘धर्म को अपनी पहचान बनाने के ईश्वर में विश्वास करना आवश्यक है. इसके लिए उसके अनुयायियों को कुछ बकवास कहानियों, रीति-रिवाजों और कर्मकांडों पर विश्वास करने को कहा जाता है. बौद्ध धर्म कर्मकांडों को निरर्थक विश्वासों का खंडन करता है. बावजूद इसके अधिकांश बौद्ध मतावलंबी उसी जीवन-पद्धति को अपनाए हुए हैं. उनकी पूजा पद्धति भी उसी प्रकार की है.’ धर्म और जाति-व्यवस्था पर प्रहार करते हुए अपने 25-26 दिसंबर 1958 के भाषण में पेरियार ने पुनः दोहराया था कि ऐसा ईश्वर जिसे लगता है कि वह दलितों और शूद्रों के छूने भर से अपवित्र हो जाएगा, को मंदिर में रहने का कोई अधिकार नहीं है. ऐसी मूर्ति को तुरंत हटाकर नदी किनारे डाल देना चाहिए, ताकि लोग उसका इस्तेमाल कपड़े धोने के लिए कर सकें. एक अवसर पर उन्होंने कहा था—

कहा जाता है कि ईश्वर ने जाति की रचना की है. यदि यह सच है तो सबसे पहली जरूरत इस बात ही है कि ऐसे ईश्वर को ही नष्ट कर दिया जाए. यदि ईश्वर इस क्रूर प्रथा से अनभिज्ञ है तो उसे और भी जल्दी खत्म किया जाना चाहिए. यदि वह इस अन्याय से रक्षा करने या इसपर रोक लगाने में असमर्थ है तो इस दुनिया में बने रहने का उसे कोई अधिकार नहीं है.

4

पेरियार ने गौतम बुद्ध को विश्व के सबसे पहले क्रांतिधर्मा विचारक स्वीकार किया था. कारण था कि बुद्ध ने ईश्वर, आत्मा-परमात्मा जैसी अतार्किक मान्यताओं को चुनौती दी थी. उन्होंने कहा था—‘आमतौर पर ईश्वरीय विश्वास के आधार पर मनुष्यों को मूर्ख बनाया जाता है. मैं नहीं जानता कि मानवमात्र की इस अज्ञानता का पर्दाफाश करने के लिए अभी तक कोई विचारक आगे क्यों नहीं आया है? यहां तक कि सुशिक्षित बुद्धिजीवी भी इस मामले में आलसी रहे हैं. यदि हम दुनिया के पहले दार्शनिक की खोज करना चाहें तो हम कह सकते हैं कि वह एकमात्र गौतम ही बुद्ध थे. हमारा इतिहास भी यही बताता है. उनके बाद पश्चिम में जन्मा एकमात्र विचारक सुकरात था. उनके दार्शनिक विचारों को भली-भांति नहीं समझा गया.’13

उस ज्ञानमय धर्म या ‘बुद्धि के धर्म’ को नष्ट कर दिया गया. कैसे नष्ट कर दिया गया? पेरियार के शब्दों में, ‘उन्होंने(ब्राह्मणों ने) हिंसक रास्ते अपनाए. बौद्धों का कत्लेआम किया गया. उनके मठों को मिट्टी में मिला दिया गया.’14 पेरियार किसी भी प्रकार की व्यक्ति पूजा के विरोधी थे. मगर बुद्ध के विचार उनकी वैचारिक चेतना के करीब थे. उनके प्रचार-प्रसार के लिए वे बुद्ध जयंती मनाने के पक्ष में पक्ष थे. परंतु वे नहीं चाहते थे कि बुद्ध जयंती के नाम पर होने वाले उत्सव महज कर्मकांड बनकर रह जाएं. इसलिए ‘बुद्ध जयंति क्यों मनाई जाए? लोग बुद्ध के जन्म को उत्सव के रूप में क्यों लें? पेरियार इन सवालों पर भी विचार करते हैं. उनके अनुसार बुद्ध जयंती बनाने का आशय यह नहीं है कि लोग बुद्ध-प्रतिमा के आगे खड़े होकर कपूर, नारियल, फल-फूल वगैरह लेकर उसकी पूजा-अर्चना करें. उनके अनुसार—‘हम बुद्ध के जीवन से शिक्षा ले सकते हैं और उसे अपने जीवन में उतार सकते हैं. मैं उनसे नास्तिक के रूप में प्रेरणा लेता हूं. यदि नास्तिक का अभिप्रायः है वेदों, धर्मशास्त्रों और पुराणों में अविश्वास है, तो निश्चित रूप से मैं नास्तिक ही हूं.’ पेरियार को डर था कि बुद्ध जयंती के बहाने ऐसे व्यक्ति जो वेद, शास्त्र तथा पुराणों में आस्था रखते हों, अपनी बात को घुमा-फिराकर लोगों के सामने रख सकते हैं. पेरियार के अनुसार जातिभेद के आधार पर दूसरों को कमतर समझने वाला, निरंकुश आचरण का समर्थक व्यक्ति ही ऐसा कर सकता है.

पेरियार के अनुसार बुद्ध न तो संत थे, न ही महात्मा. असल में वे ऐसे बुद्धिवादी चिंतक थे जिन्होंने प्राचीनकाल में हिंदू ऋषियों का उनके अनर्गल कर्मकांडों और आडंबरों के आधार पर विरोध किया था. इसलिए बौद्ध धर्म प्रचलित अर्थों में धर्म नहीं है. जो लोग बौद्ध धर्म को धर्म मानते हैं, वे गलत हैं. धर्म के लिए उसके केंद्र में ईश्वर का होना आवश्यक है. इसके अलावा स्वर्ग, नर्क, मोक्ष, भाग्य, पाप-पुण्य आदि अवधारणाओं पर विश्वास भी आवश्यक है. बड़े धर्मों का काम किसी एक ईश्वर नहीं चलता. उनमें अनेक ईश्वर भी हो सकते हैं. उन ईश्वरों के घर-परिवार, आवास, आने-जाने के स्वतंत्र साधन, पत्नियां और बच्चे भी हो सकते हैं. भारतीय तो ऐसे ईश्वरों को ही पहचानते हैं. 1857 के सैनिक विद्रोह, जिसे कुछ लेखक भारत का पहला स्वाधीनता संग्राम मानते है, की जाति के संदर्भ में समीक्षा करते समय पेरियार ने बौद्ध धर्म के साथ-साथ जैन धर्म की प्रशंसा की थी—

‘इतिहास गवाह है कि जिन बौद्ध और जैन श्रमणों ने हमारे लोगों को सद्व्यवहार और ज्ञान की महत्ता की शिक्षा देनी चाही, तमिल राजाओं ने उनका उत्पीड़न किया गया. उन्हें तरह-तरह के मामलों में फंसाया गया और कत्लेआम किया गया. यह दर्शाता है कि हमारे देश पर निरंकुश और असभ्य शासकों का राज रहा है.’15

बुद्ध के अनुसार मनुष्य का ईश्वर के प्रति आकर्षित होना आवश्यक नहीं है. बौद्ध धर्म अपने मानवतावादी आचरण के लिए बाकी धर्मों से बेहतर सिद्ध होता है. बुद्ध चाहते थे कि मनुष्य केवल मनुष्य का ध्यान करे. बुद्ध ने न तो स्वर्ग का महिमा-मंडन किया, न ही नर्क से लोगों को डराया. उन्होंने मनुष्य के आचरण पर जोर दिया. उसके लिए अष्ठांग मार्ग प्रस्तुत किया, जिसे आगे चलकर लगभग सभी धर्मों ने धार्मिक शुचिता के नाम पर अपनाया. पेरियार बुद्ध की प्रशंसा करते हैं. लेकिन वे उनके सम्मोहन से ग्रस्त नहीं हैं. न ही आस्था के बदले वे अपने विवेक को गिरवी रखना चाहते हैं, जैसी कि ब्राह्मण धर्म के अनुयायी अपेक्षा रखते हैं. अपितु वे लिखते हैं कि कोई बात इसलिए मान्य नहीं होनी चाहिए कि उसे किसी महात्मा ने कहा है. या उसे बहुत से लोग मानने वाले हैं. अपितु मनुष्य को अपने विवेक की कसौटी पर जो खरा प्रतीत हो, उसी को स्वीकार करना चाहिए. उसके लिए आवश्यक है कि हर सत्य या अच्छी लगने वाले तथ्यों को वह अपनी कसौटी पर परखे. उनके अनुसार बुद्धिज्म केवल गौतम बुद्ध की जयंतियों को मनाना नहीं है. हमारे लिए बुद्ध होने का अभिप्राय बुद्धि, विवेक बुद्धि का साथ होना है. अपने तर्क-सामथ्र्य का साथ होना है. पेरियार के अनुसार—

‘बौद्ध धर्म किसी भी प्रकार के श्रेष्ठतावाद(ब्राह्मणवाद) के लिए एटमबम के समान है.’16

गौतम बुद्ध का जन्म करीब 2500 वर्ष पहले हुआ था. उस समय ब्राह्मण यद्यपि धर्म और सभ्यता के दावेदार बने हुए थे, मगर यज्ञादि में जिस प्रकार हजारों बलियां एक साथ वे चढ़ा देते थे, जाति के नाम पर अपने ही धर्म-बंधुओं के साथ दमन और अवमाननापूर्ण वर्ताब करते थे, उसे देखते हुए उनका आचरण असभ्य और जंगली प्राणियों जैसा था. बुद्ध ने उन सबका विरोध किया. बुद्ध का रास्ता आसान नहीं था. देखा जाए तो उन दिनों ज्ञान और तर्क का पक्ष लेने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए अपनी बात कह पाना आसान नहीं था. परंतु बुद्ध अपने बातों पर अडिग रहे. वैदिक हिंसा के स्थान पर उन्होंने मनसा-वाचा-कर्मणा अहिंसा का पक्ष लिया. पेरियार के अनुसार उनकी ताकत उनके शब्दों में थी. पेरियार की तरह बुद्ध को भी अपने जीवन में आलोचनाओं का सामने करना पड़ा था. बुद्ध के बाद उनके आलोचकों ने मुखर स्वर में उनकी आलोचना करना आरंभ कर दिया था. पुराणों के बहाने प्राचीन धर्म को पुनर्जीवित करने की कोशिश की जाने लगी थी. जाहिर है, बुद्ध के बाद उनकी आलोचना में वही लोग लगे थे जो धर्म के नाम पर कर्मकांड और तर्क के स्थान पर तंत्र-मंत्र की वापसी चाहते थे. ऐसे ही लोग पेरियार का विरोध करते आए हैं.

रामायण को हिंदु नैतिक जीवन का पाठ पढ़ाने वाले ग्रंथ के रूप में देखते हैं. पेरियार के अनुसार रामायण की रचना बौद्ध धर्म के प्रभाव को मद्धिम करने के लिए, उसकी ख्याति से उबरने की कोशिश में की गई थी. बुद्ध का धर्म ताकत का धर्म नहीं था. धर्म के प्रचार-प्रसार का जिम्मा उन्होंने भिक्षुओं और श्रमणों को सौंपा हुआ था. लेकिन जातियों में बंटे हिंदू धर्म के लिए इस तरह के समर्पित धर्म-योद्धा मिलने संभव नहीं थे. जाति व्यवस्था के नाम पर ब्राह्मणों ने खुद ही निचली जातियों को धार्मिक कार्यों में सहभागिता से अलग-थलग किया हुआ था. ऐसे में शक्ति के माध्यम से ‘धर्म-विजय’ दिखना ही एकमात्र रास्ता था. रामायण यही काम करती है. अशोक ने अपने बेटे और बेटी को बौद्ध धर्म की ध्वजा फहराने के लिए श्रीलंका भेजा था. वाल्मीकि के राम आर्य अपनी पत्नी को छुड़ाने के बहाने आर्य-धर्म की पताका फहराने के लिए लंका-विजय करते हैं. बुद्ध और अशोक ने जो धम्मविजय की थी, उसका प्रमाण आज श्रीलंका में बौद्ध धर्म की उपस्थिति है. वहां 70 प्रतिशत लोग आज भी बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं. उसके अलावा चीन, जापान, तिब्बत जैसे देषों में बौद्ध धर्म आज भी कायम है. जबकि हिंदू धर्म भारत से बाहर अपनी छाप छोड़ पाने में असफल रहा. पेरियार के अनुसार—

‘बुद्ध के पहले राम-कथा छोटी-सी कहानी थी. बौद्ध धर्म की लोकप्रियता का सामना करने के लिए उसमें बाद में भारी जोड़-तोड़ की गई. बौद्धों और जैनियों को नास्तिक, हत्यारा, डाकू, वैदिक संस्कृति का दुश्मन आदि कहा गया. पेरियार के शब्दों में शैव शिव से प्रार्थना करते हैं कि वह उन्हें शक्ति दे ताकि वे बौद्धों की पत्नियों के साथ व्याभिचार कर सकें.’17

पेरियार के अनुसार 75 प्रतिशत से अधिक पुराणों का लेखनकाल बुद्ध से बाद का है. पाश्चात्य विद्वानों का भी यही मत रहा है. बुद्ध के तर्कसंगत उपदेशों का प्रतिवाद करने के लिए पुराण लेखकों ने जिन्हें ऋषि कहा जाता था, अवतारवाद की परिभाषा गढ़ी. उन्होंने कृष्ण को मुख्य देवता के रूप में चित्रित किया. उसका एक ही उद्देश्य था, लोगों को ब्राह्मणवाद की ओर आकर्षित करना. चमत्कारपूर्ण वर्णन जनसाधारण को हमेशा ही लुभाता आया है. गीता की रचना और भी बाद में हुई. उसके बाद ही उसे महाभारत में जोड़ा गया. लोकमानस में बुद्ध की प्रतिष्ठा को देखते हुए ब्राह्मणों ने मजबूरी में उनकी प्रषंसा की. अवतारवाद को संरक्षण देने के लिए बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित किया गया. उसके बहाने सनातनी हिंदू पुराणों के लेखनकाल को बुद्ध से बहुत पीछे तक ले जाते हैं. इस काम में संस्थाएं भी पीछे नहीं हैं—‘यह कहते हुए कि ब्रिटिश विद्वानों द्वारा लिखे गए इतिहास पर विश्वास नहीं किया जाना चाहिए, उत्तर भारत में भारतीय विद्या भवन ने मूर्खतापूर्ण धार्मिक आख्यानों और अजनतांत्रिक धर्मशास्त्रों पर पर लिखना जारी रखा. के. एम. मुंशी उसके अध्यक्ष थे. डॉ. राधाकृष्णन तथा अरबपति बिरला उसके सदस्य थे. उन्होंने ‘वैदिक युग’ को लेकर पुस्तक तैयार की, जिसमें के. एम. मुंशी का बड़ा योगदान था. उन्होंने भी माना था कि प्राचीन युग असभ्य था. पुराण और महाकाव्य आदि ग्रंथ इतिहास नहीं हैं….वह सब कल्पना की उपज है. ‘व्यास’ शब्द का अर्थ किस्सागो है. पुराणों ने लोगों के दिमाग पर कब्जा कर लिया और वे उनपर शासन करने लगे. हमारी समस्याओं का मूल कारण यही है.’

 

आजीवक दर्षनों के साथ-साथ बौद्ध, जैन दर्षन और सिख धर्म ने भी वेदों को प्रामाण्य मानने से इन्कार कर दिया था. ये धर्म-दर्षन किसी ईश्वर या आत्मा-परमात्मा पर विश्वास नहीं करते. इसलिए ब्राह्मण ग्रंथों में बौद्ध और जैन दोनों दर्शनों नास्तिक कहा गया है. एक स्थान पर पेरियार नास्तिक की परिभाषा करते हैं. उनके अनुसार बुद्ध सामान्य संज्ञा है. किसी भी व्यक्ति को जो बुद्धि का प्रयोग करता है, उसे बुद्ध कहा जा सकता है. ‘निश्चित रूप से मैं भी एक बुद्ध हूं. मैं ही क्यों, हम सभी जो तर्क और बुद्धि-विवेक के आधार पर फैसले करते हैं—बुद्ध हैं.’ इसी तरह सिद्ध वह व्यक्ति है जो अपनी ज्ञानेंद्रियों पर नियंत्रण रख सकता है. वैष्णव और शैव किसी न किसी देवता को मानते हैं. यही स्थिति दूसरे संपद्रायों की है, वे भी किसी न किसी देवता में श्रद्धा रखते हैं. जहां देवता नहीं हैं, वहां गुरु है जो परोक्ष रूप में साकार या निराकार देवता से मिलवाने का दावा करता है. केवल बौद्ध धर्म ऐसा है जिसमें कोई केंद्रीय देवता नहीं है. न ही वह जीवन से इतर किसी सुख की दावेदारी करता है. वह किसी भी प्रकार के ईश्वर, आत्मा, लोक-परलोक, मोक्ष अथवा सनातनवाद को नकारता है. नास्तिक शब्द भी इसके करीब है. नास्तिक वह है जो आत्मा परमात्मा के अस्तित्व को नकारता है; संसार और जीवन के बारे में बुद्धिसंगत निर्णय लेने का समर्थन करता है. ब्राह्मणवादी मूर्ति पूजा का विरोध करने वाले को भी नास्तिक कहकर धिक्कारने लगते हैं. पेरियार के अनुसार नास्तिक होना, सही मायने में मनुष्य होना है. ऐसा मनुष्य जो न केवल अपने ऊपर अपितु पूरी मनुष्यता पर विश्वास रखता है.

भारतीय समाज धर्म के अलावा जाति के शिकंजे में भी फंसा हुआ है. ये दोनों ही तर्क और मानवीय विवेक के विरोधी है. इनकी ताकत मनुष्य की अज्ञानता में निहित है. इसलिए घूम-फिरकर वे आस्था और विश्वास पर लौट आते हैं. तयशुदा मान्यताओं पर तर्क करने और सवाल उठाने से उन्हें परेशानी होती है. इसलिए वे चाहते हैं कि अपनी विवेक-बुद्धि को बिसराकर मनुष्य केवल उनके कहे का अनुसरण करे. वेद, पुराण, गीता, रामायण आदि धर्मग्रंथों में जो लिखा है, उनपर आंख मूंदकर विश्वास कर लिया जाए. यही अतीतोन्मुखी दृष्टि ब्राह्मणवाद है; जो बार-बार पीछे की ओर ले जाती है और मानव-बुद्धि की विकासयात्रा का निषेध करती है. पेरियार इससे आजन्म जूझते रहे. इसके लिए उन्होंने किसी धर्म, व्यक्ति या राष्ट्र की परवाह तक न की. खुलकर कहा कि—

‘मैं मानव-समाज का सुधारक हूं. मैं किसी देश, ईश्वर, धर्म, भाषा अथवा राज्य की परवाह नहीं करता. मेरे सरोकार केवल मानवमात्र के कल्याण एवं विकास को समर्पित हैं.’ यही संकल्प क्रांतिधर्मी पेरियार तथा उनके विचारों को समसामयिक और प्रासंगिक बनाता है.

 

ओमप्रकाश कश्यप

 

संदर्भ:

1 जाति मदे च अतिमानिता च लोभो च, दोसो च मदो च मोहो

ऐते अवगुणा येसुब संति सब्बे तानीष खेत्तानि अयेसलानि

जाति मदो च अतिमानिता च लोभो च, दोसो च मदो च मोहो

ऐते अवगुणा येसुब न संति सब्बे तानीष खेत्तानि सुयेसलानि—मातंग जातक-497

  1.   अंबट्ठसुत्त, दीघनिकाय, 1/3
  2.   पेरियार, 1947 में सलेम कालिज में ‘हिंदू दर्शन’ पर दिया गया व्याख्यान
  3.   कुदी अरासु, 15 अगस्त 1926
  4.   कुदीअरासु, 2 दिसंबर, 1944
  5.   पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पृष्ठ-208.
  6.   पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पृष्ठ-227
  7. विदुथलाई, 14 मार्च 1954.
  8. विदुथलाई, 14 मार्च 1954, पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पृष्ठ-265
  9. विदुथलाई, 14 मार्च 1954, पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पृष्ठ-265
  10. छूआछूत पर पेरियार के विचार, मीना कंडास्वामी द्वारा तमिल से अंग्रेजी में अनूदित.
  11. विदुथलाई, 19 अप्रैल 1956,पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पेज-274-75
  12. कलेक्टिड वर्क्स आफ पेरियार, पृष्ठ-152
  13. कलेक्टिड वर्क्सआफ पेरियार, पृष्ठ-173
  14. विदुथलाई, 15 अगस्त 1957, पृष्ठ-300
  15. पेरियार आन बुद्धिज्म, रामास्वामी पेरियार, राम मनोहरन के आलेख ‘फ्रीडम फ्राम गाड: पेरियार एंड रिलीजन’ से उद्धृत
  16. कलेटिक्ट वर्क आफ पेरियार, पृष्ठ-306-307

 

 

1857 के स्वाधीनता संग्राम का बहुजन पाठ

सामान्य

इतिहास की भूमिका किसी भी समाज के अतीत के दस्तावेजीकरण के लिए आवश्यक मानी गई है। परंतु उसमें दर्ज प्रत्येक शब्द सच नहीं होता। क्योंकि इतिहास लेखन प्रायः सत्ता की पसंद के अनुसार लिखा जाता है। उसमें सत्ता-केंद्र के करीबी लेखकों, बुद्धिजीवियों का योगदान अधिक होता है। इतिहास लेखक के निजी संस्कारों तथा बदलते राजनीतिक-सामाजिक परिवेश के अनुसार, ऐतिहासिक घटनाओं को देखने का नजरिया भी बदलता रहता है। इस तरह ऐतिहासिक प्रस्तुतियां वास्तविकता से भटकने लगती हैं। इतिहास की इस जालसाजी पर टिप्पणी करते हुए सुप्रसिद्ध तत्ववेत्ता और विकासवादी चिंतक हर्वर्ट स्पेंसर ने फ्रांस के बादशाह का हवाला दिया है। उसके अनुसार बादशाह का मन जब भी इतिहास की पुस्तक पढ़ने का होता, वह लायब्रेरियन को पुकारता थाᅳ‘जरा, मेरे झूठ बोलने वाले को ले आओ?’

अतिश्योक्तिपूर्ण लगने वाला यह किस्सा इतिहास पर सत्ता के दबदबे की ओर इषारा करता है। सत्ता द्वारा लाभान्वित वर्ग इतिहास का उपयोग खुद को उसका वास्तविक दावेदार सिद्ध करने तथा सत्ता-केंद्रों को कब्जाए रखने के लिए करते हैं। इससे जनसाधारण की इच्छा-आकांक्षाओं, संघर्षों और अधिकारों की उपेक्षा होने लगती है। इतिहास मुट्ठी-भर शासक वर्ग के हितों का संरक्षक बनकर रह जाता है। इतिहास की शीर्षोन्मुखी दृष्टि के कारण ही, अंत तक ‘अपनी’ झांसी को बचाने में जुटी रही लक्ष्मीबाई 1857 के स्वाधीनता संग्राम की प्रमुख नायिका मान ली जाती है। जबकि उसी स्वतंत्रता संग्राम की दूसरी नायिकाओं जैसे झलकारी बाई, काशी और मुंदरा जो रानी की सहेलियां भी थीं; तथा केवल और केवल रानी तथा झांसी की प्रतिष्ठा के लिए लड़ी थीं, जिनकी शौर्य-कथा रानी जितनी ही रोमांचक और प्रेरणास्पद हैᅳप्रतिष्ठा और मान-सम्मान के मामले में बहुत पीछे ढकेल दी जाती  हैं। अनेक इतिहास लेखक तो उनका नामोल्लेख भी नहीं करते।

1857 का ‘सैनिक विद्रोह’ एक तरह से जनविद्रोह था। उसमें समाज के लगभग सभी वर्गों की हिस्सेदारी थी। हिंदू-मुसलमान उसमें कंधे से कंधा मिलाकर लड़े थे। फिर भी जितने विवाद या मत-वैभिन्न्य उस घटना को लेकर हैं, उतने भारतीय इतिहास की किसी और घटना को लेकर नहीं हैं। सबसे पहला विवाद इसपर है कि उसे महज ‘सैनिक विद्रोह’ कहा जाए अथवा ‘भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम’? जान विलियम के, चार्ल्स बाल, कर्नल जी. बी. मेलीसन जैसे अधिकांश अंग्रेज इतिहासकार उसे ‘सैनिक विद्रोह’ से ज्यादा मानने को तैयार नहीं हैं। जबकि सुंदरलाल, विनायक दामोदर सावरकर आदि भारतीय इतिहासकारों की नजर में वह ‘भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम’ था। इस तरह भारतीय और पाश्चात्य इतिहासकारों में से कोई भी उस घटना को लेकर पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं है। फिर भी कुछ बातों को लेकर सामान्य सहमति है। पहला यह कि जहां-जहां वह युद्ध चला, उसमें भारत के कमोबेश सभी वर्गों की हिस्सेदारी थी। दूसरे युद्ध की असफलता का मूल कारण विपल्वियों के बीच तालमेल की कमी थी।     

भारतीय इतिहास का वह पहला युद्ध था, जिसमें अभूतपूर्व हिंदू-मुस्लिम एकता के दर्शन हुए थे। थॉमस लॉ के अनुसार 1857 में ‘शिशु-हत्या करने वाले राजपूत, धर्मांध ब्राह्मण….कट्टर, उन्मादी मुसलमान, तुंदियल, विलासी और महत्त्वाकांक्षी मराठाᅳउस लड़ाई में सब एक थे। गाय की पूजा करने वाले, गौ-मांस का भोजन करने वाले….सुअर को देखकर मुंह फेर लेने वाले, उसे खाने वाले….अल्लाह एक है, मुहम्मद उसके पैगंबर हैं….कहने वाले और ब्रह्म-नाम का रहस्यमय मंत्रोच्चारण करने वालेᅳउस विपल्व में सब साथ-साथ आ जुटे थे।’1 युद्ध के प्रमुख कारणों में अंग्रेजों की लगान नीति, राजे-रजबाड़ों पर गिद्ध-दृष्टि तथा मशीनीकरण के कारण भारतीय कामगारों की तबाही को माना जाता है। अंग्रेजों ने भू-प्रबंधन में भारी फेरबदल द्वारा, किसानों से जमीन का मालिकाना हक छीनकर कंपनी को उसका मालिक मान लिया था। उन्हें खेती के बदले मोटा लगान सरकार को देना पड़ता था। लगान-वसूली के नाम पर जमींदार और नबाव किसानों के साथ मनमाना दुर्व्यवहार करते थे। शिल्पकर्मियों और कामगारों ही हालत और भी बुरी थी। सतरहवीं शताब्दी के आरंभ तक निर्यात केंद्रित रही भारतीय अर्थव्यवस्था आयात प्रधान हो चुकी थी। ब्रिटेन में भारत से आयात होने वाले सामान पर तरह-तरह के कर थोपे जा रहे थे। चीन, भारत, पर्शिया में बुने गए रेशमी वस्त्रों पर प्रतिबंध लगाया जा चुका था। उनका इस्तेमाल करने पर 200 पाउंड तक का जुर्माना किया जा सकता था।2 ढाका जो महीन मलमल के लिए दुनिया भर में ख्यात था, 1827 से 1837 के भीतर उसके निर्यात में लगभग आठ गुना की गिरावट आई थी। कच्ची धातु के लिए जंगल कब्जाए जा रहे थे। इससे आदिवासियों में आक्रोश भरा था। प्रथम स्वाधीनता संग्राम से दो वर्ष पहले 1855 में आधुनिक झारखंड के संथाली विद्रोह का विद्रोह का बिगुल बजा चुके थे। उनके लक्ष्य कहीं व्यापक थे। 1857 के विद्रोह का घोषित लक्ष्य अंग्रेजों को इस देश से बाहर खदेड़ना था। उनके देख-निकाले के बाद सत्ता का स्वरूप कैसा होगा? अर्थव्यवस्था कैसी होगी? इस बारे में किसी की कोई योजना न थी। संथाल विद्रोह में राजनीतिक और आर्थिक स्वाधीनता दोनों अंतर्निहित थीं। 60000 संथाल आदिवासी अंग्रेजों और जमींदारों से एक साथ लड़े थे। परंपरागत हथियारों से जूझते हुए लगभग 15000 संथालों ने कुर्बानी दी थी। उस समय ‘कंपनी-बहादुर’ की ओर से लड़ने वाले अधिकांश सैनिक भारतीय ही थे। विपल्व के कारणों तथा उसकी व्याप्ति पर देशी-विदेशी इतिहासकारों ने खूब लिखा है।

विपल्व का प्रमुख कारण यह बताया जाता है कि 1857 से पहले अंग्रेजों ने चारों ओर लूट मचा रखी थी। समाज का कोई वर्ग ऐसा न था, जो उनके छल-प्रपंच का शिकार न हो। इस कारण नीचे से ऊपर तक सभी वर्गों में आक्रोश था, फिर भी एक सवाल अनुत्तरित रह जाता है। आखिर क्या कारण है कि 1757 में, प्रथम स्वाधीनता संग्राम से ठीक एक शताब्दी पहले प्लासी की लड़ाई में नबाव सिराजुद्दोला की पराजय का जश्न मनाने हिंदू, मुस्लिमों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई लड़ने को मजबूर हुए थे? यदि मामला सांप्रदायिक एकता का था तो उन्होंने सिखों को अपनी ओर मिलाने की कोशिश क्यों नहीं की थी? हमें ध्यान रखना होगा कि स्वतंत्रता समर के दौरान हिंदू-मुस्लिम एकता केवल राजनीतिक स्तर पर थी। धार्मिक और सामाजिक भेद-भाव में कोई बदलाव नहीं आया था। मार्च 1930 में हिंदुवादी संगठन ‘धर्म सभा’ के मुखपत्र ‘समाचार चंद्रिका’ ने एक विद्यार्थी पर द्वेषपूर्ण ढंग से हमला किया था। उसका दोष बस इतना था कि उसने एक मुस्लिम बेकरी वाले की दुकान से बिस्कुट खरीदकर खाने का दुस्साहस किया था। अखबार ने आरोप लगाया था कि वह युवक राजा राममोहन राय के प्रगतिशील खेमे का है। इसका उत्तर देते हुए राजा राममोहन राय समर्थक अखबार ‘संवाद कौमुदी’ ने लिखा था कि युवक का ‘ब्रह्मसमाज’ से कोई रिश्ता नहीं है। ‘संवाद कौमुदी’ के अनुसार युवक ने कुछ भी गलत नहीं किया था। अखबार ने ‘समाचार चंद्रिका’ पर आरोप लगाया था कि उसका कट्टरपंथी हिंदू संगठन से संबंध है। दूसरों पर आरोप लगाने से पहले उसे अपने गरेबां में झांककर देखना चाहिए।3 

1857 के कारणों की पड़ताल करते समय हिंदू समाज की आंतरिक बेचैनी की उपेक्षा कर दी जाती है। अंग्रेजों के प्रति समाज के प्रभुवर्गों का आक्रोश केवल इसलिए नहीं था कि उन्होंने इस देश में संसाधनों की लूट मचा रखी थी। अपितु राजनीतिक स्तर पर वे सुधार भी थे, जिन्होंने सवर्ण जातियों के शताब्दियों से चले आ रहे एकाधिकार को चुनौती दी थी। मुस्लिम इस देश में आक्रामक बनकर आए थे। उसके बाद शताब्दियों तक वे इस देश के शासक बने रहे। शूद्र और अतिशूद्र इसी देश के निवासी थे। मगर उनकी दासता हजारों वर्ष पुरानी थी। एक तरह से वे आजादी का सपना ही भूल चुके थे। उनीसवीं शताब्दी उनके लिए अवसर लेकर आई थी। बदलाव की पहली प्रेरणा अठारवीं शताब्दी की अमेरिकी क्रांति(1775-1778) से मिली थी। उन्हीं दिनों थॉमस जेफरसन के साथ अमेरिकी संविधान लिखने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले थॉमस पेन की पुस्तक ‘मनुष्य के अधिकार’ प्रकाशित हुई। उसने राज्य और उसके नागरिक को समान धरातल पर लाकर खड़ा कर दिया था। पेन का मानना था कि मनुष्य समाज की इकाई मात्र न होकर स्वतंत्र व्यक्तित्व का स्वामी होता है। यदि मनुष्य का कर्तव्य है कि समाज द्वारा निर्धारित नियमों और मर्यादाओं का पालन करे, तो समाज का भी कर्तव्य है कि वह मनुष्य के सुख, शांति और स्वतंत्रता में व्यवधान न आने दे। उससे पहले भारतीय राजनीति धर्म केंद्रित थी, जिसमें समाज के आगे इकाई का महत्त्व गौण होता था। ऊपर से जाति-आधारित विभाजन जिसमें एक वर्ग के पास अकूत अधिकारों के साथ तो दूसरा अधिकार विपन्न जीवन जीता था। 

अमेरिकी क्रांति के बाद देश के शूद्रों और अतिशूद्रों को लगा कि रंगभेद की तरह जाति-भेद को भी मिटाया जा सकता है। कि समानता और स्वतंत्रता केवल सपना नहीं, बल्कि जन्मसिद्ध अधिकार हैं, जिन्हें रंगभेद के शिकार अमेरीकियों की तरह वे भी हासिल कर सकते हैं। लेकिन यह काम दूसरों के भरोसे या उनकी अनुकंपा द्वारा संभव नहीं है। जाति और वर्ण-व्यवस्था का पुजारी रहा समाज अपने विशेषाधिकारों को आसानी से त्यागने वाला नहीं है। खासतौर पर धर्म-केंद्रित राजनीति में; जो मनुष्य को जन्म से ही अपने पाश में जकड़ लेती है। परिणाम यह हुआ कि दमित वर्गों में जैसे-जैसे चेतना विकसी, धर्म स्वाभाविक रूप से आलोचना के दायरे में आ गया। उसपर पहला प्रहार किया, ज्योतिराव फुले ने। उनका ‘तृतीय रतन’ नाटक 1855 में प्रकाशित हुआ था। नाटक गरीब किसान और उसकी पत्नी के जीवन पर आधारित था। फुले और एक उदारपंथी विदूषक उसमें सूत्रधार की भूमिका निभाते हैं। नाटक में एक पुरोहित किसान के घर आता है और उसकी गर्भवती पत्नी को विपरीत ग्रहदशा का भय दिखाता है। यह कहकर डराता है कि दुष्ट ग्रह उसके अजन्मे बच्चे को नुकसान पहुंचा सकते हैं। बचाव के लिए वह देवता मरुत की पूजा करने और ब्राह्मणों को भोज कराने की सलाह देता है। डरे हुए किसान दंपति ब्राह्मण की बात मान लेते हैं। एक बार चंगुल में फंस जाने के बाद पुरोहित तरह-तरह के कर्मकांडों के बहाने किसान को लूटता जाता है। अज्ञान और अशिक्षा में फंसे किसान दंपति उसके आगे बेबस हैं। लेकिन अंत में उन्हें बात समझ में आती है। उसके बाद वे पुजारी को बाहर का रास्ता दिखा देते हैं। फुले ने न केवल धर्म और जाति के माध्यम से हो रहे शोषण की ओर से आगाह किया, अपितु शिक्षा के महत्त्व से भी परचाया था। उन्होंने शूद्रों और अतिशूद्रों के लिए अलग से स्कूल खोले। लड़कियों के लिए शिक्षा की व्यवस्था की। यह चेतना शिक्षा की देन थी, जो नए कानूनी सुधारों के बाद संभव हो पाई थी।  

1857 के विपल्व की पृष्ठभूमि को समझने के लिए एक नजर उन कानूनी सुधारों पर भी डालनी होगी।  भारत को अपना उपनिवेश बनाने के लिए ब्रिटिश संसद ने चार्टर अधिनियम-1813 लागू किया था, जिसे ‘ब्लैक चार्टर’ भी कहा जाता है। उसके माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने ईस्ट इंडिया कंपनी के चाय और अफीम के व्यापार को छोड़कर बाकी क्षेत्रों में एकाधिकार को समाप्त कर दिया था। साथ ही भारत के संबंध में दो महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए थे। आने वाले समय में वे भारतीय समाज और राजनीति के लिए बड़े परिवर्तनकारी सिद्ध होने वाले थे। पहला था, ईसाई मिशनरियों को भारत आकर प्रचार कार्य करने की अनुमति। और दूसरा था, जाति, धर्म, वर्ग की सीमाओं से परे सभी वर्गों की शिक्षा के लिए कार्यक्रम चलाना। उसके लिए प्रतिवर्ष न्यूनतम एक लाख रुपये का प्रावधान किया गया था। धर्म प्रचार के लिए ईसाई मिशनरियों ने यहां जगह-जगह स्कूल खोले। उनमें उन वर्गों के लिए विशेष व्यवस्था की गई जिन्हें जातीय भेदभाव के कारण शिक्षा से वंचित रखा गया था। उससे पहले भारत में शिक्षा पारंपरिक संस्थानों के माध्यम से दी जाती थी। उनका स्वरूप विशुद्ध जातिवादी था। उसमें ब्राह्मण के लिए शिक्षा के सभी रास्ते खुले हुए थे। क्षत्रिय युद्ध-संबंधी और वैश्य केवल व्यापारिक कामकाज के लिए आवश्यक शिक्षा ग्रहण कर सकते थे। शूद्रों और अतिशूद्रों के लिए शिक्षा पूरी तरह निषिद्ध थी। इस कारण उनका मिशनरी स्कूलों की ओर आकृष्ट होना स्वाभाविक था। ज्योतिराव फुले के प्रयासों से आगे चलकर शूद्रों और अतिशूद्रों के लिए अलग स्कूल खोले गए। लेकिन कोई भी ब्राह्मण अध्यापक उनमें पढ़ाने को तैयार न था। फिर भी, तरह-तरह की परेशानियों के बीच कारवां जैसे-तैसे आगे बढ़ने लगा।

1813 में जिस समय चार्टर अधियिनम लागू किया गया, सुप्रसिद्ध उपयोगितावादी चिंतक जेम्स मिल, ईस्ट इंडिया कंपनी में अधिकारी था। उसने ‘ब्रिटिश भारत का इतिहास’ शीर्षक से बड़ी ग्रंथमाला की रचना की थी। अपनी यथार्थवादी दृष्टि के कारण, भारतीय बुद्धिजीवियों के बीच उसे खासी आलोचना का सामना करना पड़ा था। जेम्स मिल उपयोगितावादी चिंतक बैंथम का शिष्य था, जिसने धार्मिक नैतिकता केंद्रित राज्य के बजाय कानून के राज्य को वरीयता दी थी। जिससे आगे चलकर आधुनिक राज्य की नींव पड़ी। 1833 में ब्रिटिश सरकार ने नया चार्टर लागू किया। उस समय तक जेम्स मिल का बेटा जॉन स्टुअर्ट मिल कंपनी की सेवा में आ चुका था। छोटे मिल ने उपयोगितावाद का विचार अपने पिता से ग्रहण किया था। लेकिन अपने पिता के साथ-साथ उसपर रूसो का भी प्रभाव था। जॉन स्टुअर्ट मिल मानवीय स्वतंत्रता का प्रबल समर्थक था। ईस्ट इंडिया कंपनी की नौकरी में आते समय उसकी उम्र मात्र 17 वर्ष थी। कह सकते हैं कि भारत उसके लिए ऐसी जगह थी, जहां वह अपने विचारों को प्रयोग में बदल सकता था। निस्संदेह उसने ऐसा किया भी। इसका अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि 1833 के बाद जब भारत में रह रहे अंग्रेजों ने, इस देश की जनता पर लागू होने वाले कानूनों से बाहर रखने की अपील की तो मिल ने उसका जोरदार विरोध किया था।

1833 का चार्टर तैयार करने में जॉन स्टुअर्ट मिल की अहं भूमिका थी। उस अधिनियम द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक अधिकार समाप्त कर, उसे पूरी तरह प्रशासनिक कंपनी बना दिया गया। दूसरा बड़ा फैसला था, सभी कानूनों के दस्तावेजीकरण का। उसके लिए अधिनियम में ‘विधि आयोग’ बनाने की अनुंशसा की गई थी। तीसरा और बड़ा प्रावधान था, प्रशासनिक सेवाओं में भर्ती प्रक्रिया को पूरी तरह स्पर्धात्मक बना देना। तदनुसार उनमें जाति, धर्म, प्रजाति, क्षेत्रीयता की सीमाओं से परे, कोई भी व्यक्ति भाग ले सकता था। उसके फलस्वरूप सरकारी नौकरियों के रास्ते सभी वर्गों के लिए खुल गए। 1833 के चार्टर के क्रियान्वन में जो कानून बने, उन्होंने शताब्दियों से चले आ रहे मनुस्मृति के पक्षपातपूर्ण विधान को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। शूद्रों और अतिशूद्रों की दृष्टि से वह युगांतरकारी बदलाव था; जबकि बाकी के लिए उनके वर्षों से चले आ रहे विशेषाधिकारों पर कुठाराघात था।

चार्टर 1813 ने शूद्रों और अतिशूद्रों को शिक्षा का अधिकार दिया था। जिससे उनके लिए ज्ञान के बंद दरवाजे खुलने लगे। 1833 के चार्टर ने उन्हें भरोसा दिलाया कि स्पर्धात्मक परीक्षाओं में पास होकर वे उच्च पदों तक पहुंच सकते हैं। 1853 जो चार्टर लागू हुआ उसमें सामुदायिक प्रतिनिधित्व को मान्यता दी गई थी। उसके फलस्वरूप शताब्दियों से शासित होते आए शूद्र-अतिशूद्र शासन-प्रशासन का हिस्सा बनने लगे। यह सही है कि शिक्षा में आगे होने के कारण ब्राह्मण उन दिनों शासन-प्रशासन द्वारा सर्वाधिक लाभान्वित वर्ग थे। दो-तिहाई पदों पर उन्हीं का बोलबाला था। फिर भी बदलाव की हवा उनके लिए चिंता का विषय बनी हुई थी। बहुत धीरे ही सही, मगर सत्ता उनकी मुटृठी से फिसलने लगी थी। यह उनकी सहनसीमा से बाहर था कि जिन लोगों को वे शताब्दियों से अपने पैरों के नीचे रौंदते आए हैं, वे स्थानीय निकायों में उनके बराबर बैठकर, अपने दमन और दुर्दशा के सीधे उन्हें जिम्मेदार ठहराकर बराबरी की मांग करें। लेकिन परिस्थितियां बदली हुई थीं। एक ओर अंग्रेज थे, जो खुद को आधुनिकतम सभ्यता का दावेदार बताकर, भारत में बने रहना चाहते थे। दूसरी ओर केंद्र में मुगल साम्राज्य अंतिम सांसें गिन रहा था। देश करीब छह सौ छोटी-बड़ी रियासतों में बंटा था, जिनके वैभवहीन, विलासी राजा और नबाव अंग्रेजों की चाटुकारिता में खुद को धन्य समझते थे। ऐसे में सीधे विरोध संभव न था। हताशा और नैराश्य के बीच उनका एकमात्र सपना था, धर्म-केंद्रित राज्य की वापसी का, ताकि उनके विशेषाधिकार सुरक्षित हों। इसके लिए वे साम-दाम-दंड-भेद, हर तरह से लगे रहते थे। 

संयोग से चर्बी वाले कारतूसों ने उन्हें जनता को भड़काने का अवसर दे दिया। उन कारतूसों को मुंह से खोलना पड़ता था। हालांकि अंग्रेज सैन्य अधिकारी कारतूसों में गाय और सुअर की चर्बी के इस्तेमाल से इन्कार कर रहे थे, लेकिन उनके पास कोई भरोसेमंद तरीका नहीं था, जिससे सैनिकों के दिल में घर कर गई धारणाओं से मुक्ति दिला सकें। तेज रफ्तार अफवाहों के बीच वे कुछ समझ ही नहीं पा रहे थे। मेजर जनरल हर्सी को लिखे गए पत्र में ‘रायफल अनुदेश विभाग’ के कप्तान राइट ने लिखा थाᅳ‘मैंने उन्हें(अपनी समझ के अनुसार) यह भरोसा दिलाने की कोशिश की थी कि कारतूसों में भेड़ की चर्बी और मोम का इस्तेमाल किया गया है।’4 इसपर सैनिकों का कहना था कि हम तो विश्वास कर लें, लेकिन गांव जाने पर लोग इसपर विश्वास नहीं करेंगे। उन्होंने कप्तान राइट से बाजार से इन वस्तुओं को खरीदकर प्रयोग करने को भी कहा था। 

बैरकपुर जहां विपल्व की नींव रखी गई, कोलकाता प्रेसीडेंसी का मुख्यालय था। वहां कंपनी की चार रेजीमेंट थीं। जॉन हर्सी उनका जनरल था। 24 जनवरी की 1857 को उसने अपने अधिकारियों को सूचित करते हुए लिखा थाᅳ‘सिपाहियों के दिमाग में इस तरह की गलतफहमी संभवतः ‘धर्म सभा’ की रिपोर्ट से पैदा हुई है। वह कोलकाता स्थित हिंदुओं का संगठन है। उसने लोगों को यह कहकर भड़काया है कि चर्बी वाले कारतूस असल में सिपाहियों को ईसाई बनाने का षड्यंत्र है।’5 उल्लेखनीय है कि 1813 के बाद भारत में ईसाई मिशनरियों को धर्म-प्रचार की अनुमति प्राप्त हो चुकी थी। धर्म-प्रचार के लिए वे सामान्य प्रलोभन से लेकर अशिक्षित जनता को डराने-धमकाने जैसा हर प्रोपेंगडा इस्तेमाल कर रही थीं। इसकी जानकारी ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों को भी थी। कुछ उससे नाखुश भी थे। 29 मई 1807 को सेंट जार्ज फोर्ट के गवर्नर को संबोधित एक पत्र में लार्ड मिंटो ने लिखा थाᅳ‘भारतीय उपनिवेश में कंपनी के शासन की जानी-पहचानी और घोषित नीति, विभिन्न धर्मों और मान्यताओं के बीच सामंजस्य बनाए रखने की है।’6 ईस्ट इंडिया कंपनी के अध्यक्ष को संबोधित एक अन्य पत्र में, ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्म-प्रचार के नाम पर बांटी जा रही सामग्री की आलोचना करते हुए उसने लिखा था कि प्रचार सामग्री मेंᅳ‘बगैर किसी तर्क या प्रमाण के, लोगों को उस धर्म के विरुद्ध भड़काया जा रहा है, जिसे उन्होंने अपने पूर्वजों से सीखा है।’7 पत्र में उसने मिशनरियों द्वारा चलाए जा रहे अभियान को कंपनी के उद्देश्यों के लिए हानिकारक माना था।

ईसाई मिशनरियों के धर्म प्रचार के अराजक तरीकों ने ‘धर्म सभा’ जैसे परंपरावादी संगठनों, जो हिंदुओं को किसी भी प्रकार के सुधार का विरोध करते थे, को जनभावनाओं को भड़काने का अवसर दिया था। प्रसंगवश बता दें कि ‘धर्म सभा’ की स्थापना गोपीमोहन देब नामक भद्र बंगाली ने 1830 में की थी। 1857 में गोपीमोहन देव के बेटे राधाकांत देब संस्था के प्रमुख प्रभारी थे। उनके परिवार की गिनती कोलकाता के धनाढ्य वर्ग में थी। उन्होंने अपनी समृद्धि अंग्रेजों के आने के बाद अर्जित की थी। राधाकांत देब बांग्ला, अंग्रेजी और संस्कृत के अच्छे धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलते थे। मगर थे ठेठ परंपरावादी। वे सती प्रथा को भारतीय समाज और संस्कृति की पहचान से जोड़ते थे। इसलिए सती प्रथा पर रोक के लिए राजा राममोहन राय के नेतृत्व में चलाए जा रहे आंदोलन के वे घोर विरोधी थे। सरकार को पत्र लिखकर उन्होंने सती प्रथा पर कोई रोक न लगाने की प्रार्थना की थी। 

धर्म आरंभ से ही राजनीति का बड़ा हथियार रहा है। बड़े-बड़े साम्राज्य मूल मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाने के लिए उसका उपयोग करते आए हैं। ऐसे राज्य जो लोगों की सामान्य जरूरतों का ध्यान रखने में विफल रहते हैं, जनता का ध्यान बांटने के लिए प्रायः धर्म और संस्कृति का राग अलापने लगते हैं। धर्म बड़े साम्राज्य गढ़ने की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं में हमेशा सहायक होता आया है। 1813 के चार्टर में ईसाई मिशनरियों को भारत आकर धर्म प्रचार करने की अनुमति देने के पीछे भी यही मंशा थी। ‘धर्म-सभा’ के माध्यम से बंगाली भद्रजन भी ऐसा ही करने की कोशिश कर रहे थे। केवल धर्म के सहारे ही वे अपने वर्गीय अधिकारों की सुरक्षा कर सकते थे। इससे सिपाहियों में, जिनमें से अधिकांश अशिक्षित या अल्पशिक्षित थे, और धर्म जिनकी चेतना को नियंत्रित करता थाᅳआक्रोश बढ़ना स्वाभाविक था। मंगल पांडे पर मुकदमे के दौरान गवाह के रूप में पेश हुए बिगुलवादक जान लेविस के अनुसार, मंगल पांडे ने दूसरे सिपाही मेहरलाल से कहा थाᅳ‘मैं यह धर्म के लिए कर रहा हूं।’8 

ध्यान देने की बात है कि जिन कारतूसों को निषिद्ध मानकर सिपाहियों ने विद्रोह की शुरुआत की थी, उनमें से अनेक ने आगे की लड़ाई उन्हीं कारतूसों के भरोसे लड़ी थी। स्वयं मंगल पांडे की 19वीं बटालियन में भी ऐसे हिंदू(ब्राह्मण) सिपाहियों की संख्या बहुतायत में थी, जो कभी न कभी चर्बी वाले कारतूसों का इस्तेमाल कर चुके थे। दूसरे विपल्व में हिस्सा लेने वाले सिपाहियों से कहीं अधिक भारतीय सिपाही ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में थे। उन्हीं की मदद से कंपनी विपल्व को दबाने में कामयाब हुई थी। वे सब कभी न कभी चिकनाईयुक्त कारतूसों का प्रयोग कर चुके थे। मगर ऐसा कोई रिकार्ड नहीं मिलता, जिससे पता चले कि पता चले कि चर्बी वाले कारतूसों के सेवन से इतने लोगों को अपने धर्म या जाति से हाथ धोना पड़ा था। ना ही किसी ने ऐसी मांग की थी। चिकनाई-युक्त कारतूसों के पीछे सच चाहे जो भी हो, बड़े पैमाने पर उनका प्रयोग हिंदू और मुसलमान सैनिकों को भड़काने के लिए किया गया था। दोनों को साथ इसलिए रखा गया था, क्योंकि बिना एक-दूसरे की मदद के सैन्य-विद्रोह असंभव था। 

उस लड़ाई में सिखों को, जिन्होंने अतीत में हिंदू धर्म, यहां तक कि गौ-रक्षा के लिए भी, अनेक लड़ाइयां लड़ी थीं, आश्चर्यजनक रूप से अलग कर दिया गया था। यहां तक कि अंग्रेज जो अफवाह फैला रहे थे, उनपर भी ध्यान नहीं दिया गया। क्या सिर्फ इसलिए कि सिख अल्पसंख्यक थे? हिंदुओं और मुसलमानों का ध्यान उस ओर भले ही न हो, मगर अंग्रेज़ सतर्क थे। सिखों को विपल्व से दूर रखने के लिए उन्होंने यह कहना शुरू कर दिया था कि अंग्रेज़ पराजित हुए तो उसका परिणाम मुस्लिम शासकों की वापसी के रूप में होगा। सिखों की नवें गुरु तेगबहादुर के बलिदान की यादें ताजा थीं। उनकी मानसिकता को देखते हुए पंजाब के तत्कालीन चीफ कमीश्नर जॉन लारेंस ने यह कहना शुरू कर दिया था कि यदि विपल्व सफल हुआ तो दिल्ली का बादशाह ‘सिख का सिर लाने वालों को पुरस्कृत करना आरंभ कर देगा।’9 फिर भी यह कहना अनुचित होगा कि विपल्व में सिखों की सहभागिता नगण्य थी। हालांकि पंजाब के अधिकांश रजबाड़े अंग्रेजों का साथ दे रहे थे। फिर भी दिल्ली से लेकर लखनऊ और इलाहाबाद तक, बड़ी संख्या में सिख सैनिक विपल्वियों के साथ थे। इस तथ्य की अनेक इतिहासकारों ने उपेक्षा केवल इसलिए की है, क्योंकि अंग्रेज इतिहासकारों ने पंजाब के रजबाड़ों के सहयोग के लिए उनका आभार माना था। इस कारण पंजाबी रजबाड़ों की सेनाओं को, जिनमें सभी धर्मों और जातियों के लोग शामिल थेᅳखालिस सिखों की सेना मान लिया जाता है।

सुंदरलाल और दूसरे भारतीय इतिहासकारों ने ईसाई मिशनरियों के अतिरेकी प्रचार-प्रचार के लिए उनकी आलोचना की है। लेकिन वे हिंदुओं, विशेषकर दमन और उत्पीड़न का शिकार रहीं निचली जातियों के ईसाई धर्म की ओर आकर्षित होने के मूल कारण के बारे में चुप्पी साध लेते हैं। गौरतलब है कि मनुस्मृति के आधार पर शूद्रों और अतिशूद्रों को शिक्षा के अधिकार से वंचित रखा गया था। उनीसवीं शताब्दी के आरंभ में इन वर्गों के मन में शिक्षा की ललक बढ़ी थी, लेकिन हिंदुओं के पारंपरिक शिक्षा सदनों में उनके प्रवेश की मनाही थी। ईसाई मिशनरियों ने भारत में आकर बड़ी संख्या में स्कूल खोले थे। उसके फलस्वरूप शूद्रों और अतिशूद्रों के लिए शिक्षा के रास्ते प्रशस्त हुए। वे अपने बच्चों को मिशनरियों द्वारा संचालित स्कूलों में पढ़ाने लगे। फिर भी ईसाई धर्म की ओर आकर्षित होने का यही कारण नहीं था। मनुस्मृति के अनुसार शूद्रों और अतिशूद्रों की पहचान सुनिश्चित करने के लिए उनके नामकरण को लेकर भी प्रतिबंध थे। तदनुसार वे अपने लिए सम्मानजनक नाम नहीं चुन सकते थे। वे वही नाम रख सकते थे जिनसे दैन्य और सेवाभाव झलकता हो। ईसाई धर्म में ऐसा कोई प्रतिबंध न था। इसलिए प्रायः होता यह था कि मिषनरी संचालित स्कूल में प्रवेश  करते समय अध्यापक स्वयं ईसाई धर्म की परंपरा के अनुसार नामकरण कर देते थे। इससे शूद्रों-अतिशूद्रों को समाज में उनकी विशिष्ट और अपमानजनक पहचान से मुक्ति मिल जाती थीᅳइस कारण वे विरोध भी नहीं कर पाते। ऐसे नामकरण का धर्मांतरण से कोई संबंध न था।

इस लेख का शी उद्देश्य  1857 के विद्रोह की महत्ता को नकाराना नहीं है। न ही उन सैनिकों और सेनानायकों की नीयत पर संदेह है जिन्होंने उस युद्ध में प्राण-प्रण से हिस्सा लिया था। लेकिन यह भी तय है कि विद्रोही सैनिकों की कोई योजना नहीं थी। और जो राजे-रजबाड़े उनके साथ थे, उनमें से अधिकांश के अपने क्षुद्र स्वार्थ थे। इसलिए जैसे ही युद्ध के विपरीत परिणाम आने शुरू हुए, उन्होंने अपने हाथ पीछे खींचने आरंभ कर दिए थे। विपल्व की असफलता का कारण यह भी था कि नबाव बख्त खान, नाना साहेब, तात्या टोपे, झांसी की रानी, कुंवर सिंह, फैजाबाद के मौलवी द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन महज अपने-अपने क्षेत्रों तक सीमित थे। उनके उद्देश्य सीमित थे।  देश के दूसरे विपल्वी संगठनों अथवा विपल्व के केंद्र के साथ उनका कोई तालमेल नहीं था। इसके विपरीत, जबकि ब्रिटिश शासन का प्रभाव क्षीण होता नजर आ रहा था, आम जनता और विपल्वी नेताओं के क्षेत्रीय एवं वर्गीय स्वार्थ सिर उठाने लगे थे, परिणामस्वरूप विपल्व की धार कुंद होने लगी थी। 

जिन सैनिकों ने विपल्व का बिगुल फूंका था, उनमें से अधिकांश का संबंध किसान परिवारों से था। विपल्व उनके लिए समाजार्थिक स्वतंत्रता की उम्मीद लेकर आया था। उधर जमींदारों और नबावों को लगता था कि विपल्व कामयाब हुआ तो उनके हाथों से जमीन जा सकती है। इस कारण अधिकांश जमींदार तो पहले से ही अंग्रेजों के साथ थे। विपल्व का सर्वाधिक लाभ भी उन्हीं को हुआ। उसके बाद अंग्रेज यह समझने लगे थे कि भारत के प्रभुवर्ग को अपने साथ लिए बिना उनका यहां लंबे समय तक टिके रह पाना संभव नहीं है। इसलिए भूमि सुधारों ने नाम पर उन्होंने बड़े रजबाड़ों और जमींदारों से जो जमीन हासिल की थी, धीरे-धीरे उसे वापस लौटाना आरंभ कर दिया था। 1858 में भारत को ब्रिटिश उपनिवेश बनाते समय महारानी विकटोरिया ने घोषणा की थीᅳ‘हम यह ऐलान करते हैं कि स्थानीय रजबाड़ों के साथ ईस्ट इंडिया कंपनी ने जो समझौते किए हैं, वे सभी ब्रिटेन की सरकार को मान्य हैं….हम भारतीय रजबाड़ों के अधिकार, मान-सम्मान और उनकी प्रभुसत्ता का सम्मान करते हैं….वे अपनी समृद्धि और उच्च सामाजिक हैसियत का लाभ उठा सकेंगे।’10 परिणाम यह हुआ कि देश की दो-तिहाई भू-संपदा फिर से बड़े जमींदारों के कब्जे में आ गई। इसी के साथ राजनीतिक-सामाजिक सुधारों का चक्र लगभग थम-सा गया।

सवाल है कि 1857 के विपल्व से इन बहुजनों को क्या हासिल हुआ? उत्तर हैᅳकुछ नहीं। देखा जाए तो उस समय बहुजन दो हिस्सों में बंटे थे। एक ओर वे थे जो सामाजिक स्वतंत्रता को राजनीतिक स्वतंत्रता जितना ही महत्त्वपूर्ण मानते थे। जिनका मानना था कि सदियों से अशिक्षा और दमन के शिकार रहे बहुजनों को, जिन्हें सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक सहभागिता से वंचित रखा गया है, राजनीतिक आजादी हासिल करने से पहले सामाजिक स्वतंत्रता अर्जित करनी होगी। चूंकि अंग्रेजों के आने के बाद ही उन्हें शिक्षा और राजनीतिक सहभागिता के अवसर मिलने आरंभ हुए थे, इसलिए वे उनके भारत में बने रहने का समर्थन करते थे और स्वाधीनता संग्राम से दूरी बनाए थे। दूसरा वर्ग उन उत्साही बहुजनों का था, जो विपल्वियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर युद्ध में हिस्सा ले रहे थे। उनमें झलकारी बाई और उनके पति पूरन कोरी, ऊदा देवी, लोचन मल्लाह, महावीरी देवी, नन्ही देवी, बांके चमार, नत्थू धोबी(जलियां वाला बाग), गंगू पहलवान, आदिवासी सिद्धो-कान्हू तथा उनकी बहनें फूलो-झानो, रानी दुर्गावती, रानी अबंतीबाई, रणवीरी देवी, आशा देवी जैसे हजारों बहुजन, आदिवासी शामिल थे, जिन्होंने विपल्व के दौरान अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन करते हुए, स्वाधीनता संग्राम में अपनी आहूति दी थी। 

1857 के बाद इस देश में बने रहने के लिए अंग्रेजों ने यहाँ के प्रभुवर्गों को ध्यान में रखकर जो समझौते किए थे, उनमें बहुजनों की उपेक्षा की थी। 1813 से 1853 तक अंग्रेजों ने इस देश में जो राजनीतिक सुधार किए थे, उनसे वे पीछे नहीं हट सकते थे, क्योंकि वे सब कानून उनकी औपनिवेशिक नीति का हिस्सा थे। 1857 के बाद जो कानून बने, उनमें बहुजनों की पूरी तरह से उपेक्षा की गई थी। भारत के प्राचीन साहित्य एवं संस्कृति के अध्ययन-अनुसंधान हेतु विलियम फोर्ट कालिज की स्थापना 1800 में हुई थी। लेकिन भारतीय साहित्य के अध्ययन और संग्रहण के काम में विशेष तेजी 1857 के बाद ही देखने में आई। इस दौर में संस्कृत साहित्य का भारी मात्रा में अनुवाद हुआ। अंग्रेज विद्वानों ने संस्कृत और दूसरी भाषाओं से खोज-खोजकर अंग्रेजी में प्रस्तुत किया। ‘सीक्रेड बुक्स आफ ईस्ट’ के अंतर्गत पचास से अधिक ग्रंथ प्रकाशित किए गए। बौद्ध, जैन और प्राकृत साहित्य को दुनिया के सामने लाने में अंग्रेजों की बड़ी भूमिका रही। वेद, उपनिषद, जातक साहित्य, व्याकरण, कथा साहित्य, महाकाव्य, गणित, ज्योतिष, इतिहास तथा आयुर्वेद के ग्रंथों का यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद हुआ। इतना काम एक साथ, कुछ ही वर्षों के बीच हुआ, जितना उससे पहले शताब्दियों में नहीं हो पाया था। लेकिन ऐसा करते समय अंग्रेजों की दृष्टि पूरी तरह निरपेक्ष बनी रही। भारतीय समाज और संस्कृति को लेकर जो अन्वेषणात्मक और आलोचकीय दृष्टि जेम्स मिल के ग्रंथों में थी, उसका अभाव बना रहा। फुले और उनके समकालीन लेखकों की ओर से यूरोपीय लेखक लगभग मुंह फेरे रहे। उनके लिए 1857 के समर का एकमात्र सबक था कि कुछ भी हो, इस देश के प्रभुवर्ग को नाराज नहीं करना है। उनके काम का बहुजनों को इतना लाभ तो हुआ कि संस्कृत के भाषायी ज्ञान के अभाव में जो भारत के प्राचीन ग्रंथों को पढ़ने में असमर्थ थे, अब वे उन्हें अनुवादों के माध्यम समझ सकते थे। लेकिन मानवीय दृष्टि से उन ग्रंथों की जैसी पड़ताल आवश्यक थी, उसके लिए उन्हें डॉ. आंबेडकर, पेरियार जैसे बहुजन बुद्धिजीवियों और नेताओं के उभार तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। 

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ :

1. Thomas Lowe, Central India: During the rebellion of 1857 and 1858: Longman, London, 1860, page 324, as quoted by Shamsul Islam in Sikhs and 1857 : Myths  & Facts.

2. Marx : Articles on India, quoted from The Great Rebellion, by Talmiz Khaldun, incorporated in Rebellion: A Symposium, Edited by P. C. Joshi, People’s Publishing House, 1957, page 6. 

3. Samachar Darpan, 13 March1830, SSK. i 136, quoted by By A. F. Salahuddin Ahmed, Aly Fouad Ahmed in Social Ideas and Social Change in Bengal 1818-1835

4. G. W. Forrest,  A History of Indian Mutiny-Vol. 1, William Blackwood and Sons, London, 1904 page 4.

5. The Great Rebellion, by Talmiz Khaldun, incorporated in Rebellion: A Symposium, Edited by P. C. Joshi, People’s Publishing House, 1957.

6. Ramsay Muir, The Making of British India-1756-1858, Longmans Green & Co. London, Page 251.

7. Ibid

8. G. W. Forrest, Selections Form The Letters Despatches and Other State Papers Preserved in The Military Department of The Government of India, Vol. 1, page 141.

9. Cave Browne, Punjab & Delhi in 1857(1861), Vol. 1, page 28-29 quoted by Talmiz Khaldun op. cit.   Page 33.

10. Ramsay Muir, op. cit, Page 382.

महामना अय्यंकालि : सामाजिक क्रांति के अग्रदूत

सामान्य

मैंने पढ़े हैं कई सभ्यताओं के इतिहास

खोजा है, देश-प्रदेश के प्रत्येक इतिहास में

कहीं, कुछ भी नहीं मिला मेरी जाति पर

पृथ्वी पर नहीं कोई ऐसा कलमकार

जो लिखे मेरी जाति का इतिहास

जिसे डुबा दिया गया है रसातल में

जो खो चुकी है

इतिहास की अतल गहराइयों में

            पोईकायल योहान्न, मलयाली कवि

इतिहास सभ्यता का ऐसा दर्पण है, जो सिर्फ सतह से ऊपर देखता है। इसलिए उसमें राजा-महाराजों के ऐश्वर्य राग, लड़ाइयां, स्वामीभक्ति और बुजदिली के किस्से, रणनीति और राजनीति, षड्यंत्र और विश्वासघात—यही सब दिखाई पड़ते हैं। इतिहास उन स्वेद-बिंदुओं की गिनती याद नहीं रखता जो खेती करने वाले किसान, मजदूर इसलिए बहाते हैं, ताकि राजा-महाराजाओं के अन्न-भंडार भरे रहें। उनके मंत्रियों, सिपहसालारों के चेहरे दिपदिपाते रहें। वह देवताओं और पैगंबरों के किस्सों को सहेजता है। जाति, धर्म और सांप्रदायिकता के नाम पर हुए दमन के उन किस्सों को भूल जाता है, जो जमीन के लोगों के हिस्से आते हैं। इसलिए ऐरिक हॉब्सबाम ने सलाह दी थी कि इतिहास को केवल उन सवालों के माध्यम से याद करना चाहिए जो हम उसे लेकर उठा सकते हैं—‘उस रूप में, जिसपर हम इतिहासकारों का भरोसा हो। इतिहास का ऐसा वस्तुनिष्ट सत्य, जिसे सवालों के जरिये जांचा-परखा जा सके। ठीक उस तरह जैसे हम उसे परखना चाहते हैं।’

भारतीय इतिहास दृष्टि चीजों को शिखर से परखती है। शिखर के लोग ही उसमें शामिल होते आए हैं। जनसाधारण क्या सोचता है? अपने समय और इतिहास को लेकर उनकी अपनी दृष्टि क्या है? राजा-महाराजा, जमींदारों और सामंतों से परे जनता का सच भी हो सकता है? इस हकीकत को जानने की कभी कोशिश ही नहीं की गई। भारत में इतिहास के नाम पर पुराण रचे गए। उन्हें स्वयं-सिद्ध बताया जाता है। सवाल उठाने वालों को संस्कृति विरोधी मान लिया जाता है। इन दिनों तो उन्हें सीधे राष्ट्रद्रोही घोषित करने का चलन है। यही भारतीय और पाश्चात्य इतिहास-दृष्टि का अंतर है। इतिहास का संबंध यदि मनुष्य से है तो उसमें पूरा मानव-समाज प्रतिबिंबित होना चाहिए। उसे राजा-महाराजों के वैभव-विलास, राजनीतिक उठा-पटक और रनिवासों के षड्यंत्रों तक सीमित कर देना इतिहास की आड़ में चारण-कर्म है।

आजादी के बाद इसमें कुछ बदलाव आया। कुछ जमीनी लेखक शामिल हुए हैं। दामोदर धर्मानंद कोसंबी, देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय ने इस दिशा में गंभीर प्रयास किए हैं। फुले, आंबेडकर और पेरियार में से कोई भी घोषित रूप से इतिहासकार नहीं था। परंतु उन सभी के पास इतिहास को परखने की दृष्टि थी। वे भारतीय इतिहास और उसकी लेखन-पद्धति पर सवाल उठाते हैं। सांस्कृतिक अंतर्विरोधों की ओर संकेत करते हैं। आधुनिक मूल्यों के संदर्भ में उसे परखना चाहते हैं। यह परंपरावादी इतिहास लेखकों स्वीकार्य नहीं है। उनमें प्रगतिशील होने का दावा करने वाले साम्यवादी लेखक भी शामिल हैं, जिन्हें भारतीय समाज में जातीय विभाजन के आधार पर बनी द्वंद्वात्मक स्थितियां स्वीकार नहीं हैं। इसीलिए दलित और बहुजन लेखकों, जो छूआछूत, जातिगत भेदभाव की कसौटी पर भारतीय इतिहास और संस्कृति की विवेचना करते हैं, राजनीतिक स्वतंत्र के बजाय सामाजिक स्वतंत्रता पर जोर देते हैं—की लगातार उपेक्षा की जाती है। गाल-बजाऊ किस्म के लोग तो उन्हें राष्ट्र-विरोधी तक कह जाते हैं।

कुछ कथित विद्वान जो समानता और स्वतंत्रता का राग रात-दिन अलापते हैं, उन लोगों के योगदान को जिनका भारत को आधुनिक राष्ट्र-समाज बनाने में सर्वाधिक योगदान है—महज इसलिए बिसरा देते हैं, क्योंकि वे उनकी जाति या समाज के नहीं थे। उलटे उनसे टकराकर अपने लक्ष्य तक पहुंचे थे। ऐसे ही लोग फुले और आंबेडकर के योगदान की उपेक्षा करते हैं। पेरियार के नाम पर नाक-मुंह सिकोड़ते हैं। केरल के नवजागरण के अग्रदूत अय्यंकालि को तो लगभग भूल ही चुके हैं। जातीय दुराग्रहों के चलते, ‘केरल: मलयाली भाषियों की मातृभूमि’ जैसी पुस्तक लिखने वाले साम्यवादी ईएमएस नंबूदरीपाद ने न तो दलित महिलाओं पर लगने वाले ‘मुल्लकरम’(स्तन ढकने पर टैक्स) के बारे में कुछ लिखा न है, न वहां की दासप्रथा पर। न उन्हें केरलीय समाज के नवोत्थान में महात्मा अय्यंकालि का योगदान नजर आता है।  

प्रसंगवश बता दें कि केरल, जो पहले त्रावणकोर राज्य का हिस्सा था, में दलित महिलाओं को वक्ष ढकने का अधिकार नहीं था। दलितों की हैसियत दास के बराबर थी। कुछ अर्थों में पेशवाशाही के दलितों से भी बुरी। दलित स्त्रियों को गले में ग्रेनाइट पत्थर का हार पहनना पड़ता था। कांच और काले पत्थर के मनकों से बने कंठहार उन महिलाओं के गले में सांप जैसे दिखते थे। ये सब उनके दासत्व की निशानियां थीं। स्त्रियों में उस प्रथा के विरुद्ध आक्रोश था। त्रावणकोर के राजा द्वारा लगाए गए कर की वसूली हेतु अधिकारी जब एक गांव में पहुंचा तो वहां नंगेली नाम की स्त्री ने वक्ष-कर का भुगतान करने से इन्कार कर दिया। अधिकारी द्वारा जोर-जबरदस्ती करने से क्षुब्ध उस स्त्री ने गुस्से में आकर अपने दोनों स्तन काट, उन्हें केले के पत्ते पर रखकर, अधिकारी को सौंप दिए। अत्यधिक खून बहने से नंगेली की उसी दिन मृत्यु हो गई थी। नंगेली के बलिदान से केरल में जबरदस्त आक्रोश पैदा हुआ, जिसे मलयाली भाषा में ‘सन्नार लहाला’-उभोवस्त्र अधिकार विद्रोह(Channar Lahala—Upper Cloth Mutiny) कहा जाता है। नंगेली के सम्मान में उसके गांव को ‘मुलाचिपारांबु’ जिसका अर्थ ‘स्तन वाली महिला’ है—कहा जाता है। महिलाओं के वक्ष ढकने के अधिकार को लेकर एक कामयाब लड़ाई अय्यंकालि ने भी लड़ी थी। वह अय्यंकालि द्वारा आधुनिक केरल के नवनिर्माण, महिलाओं और दलितों के अधिकारों के लिए लड़ी गई कई लड़ाइयों में से एक थी। भारत को आधुनिक राष्ट्र-राज्य बनाने, दलितों और पिछड़ों में स्वाभिमान चेतना जगाने में महात्मा अय्यंकालि की भूमिका ठीक वैसी ही है, जैसी ज्योतिराव फुले, डॉ. भीमराव आंबेडकर, नारायण गुरु और ई. वी. रामासामी पेरियार की।

अय्यंकालि का जन्म तिरुवनंतपुरम् जनपद से 13 किलोमीटर दूर उत्तर में स्थित, छोटे से गांव वेंगनूर में 28 अगस्त 1863 को हुआ था। पिता अय्यन और मां माला की आठ संतानों में अय्यंकालि सबसे बड़े थे। माता-पिता ने उनका नाम ‘काली’ रखा था, जो पिता के नाम के साथ जुड़कर अय्यंकालि बन गया। उनकी जाति पुलायार(पुलाया) थी। वेंगनूर आगमन से पहले उनका परिवार पलावर थारावाड़ का रहने वाला था। अपने पैत्रिक गांव के नाम को अय्यन अपने नाम के साथ जोड़कर सम्मान से सहेजे हुए थे। वह उनकी पहचान का हिस्सा था। दक्षिण भारत में पुलायार अछूत जातियों में, सबसे नीचे की मानी जाती है। बीसवीं शताब्दी के आरंभ में उनकी हैसियत भू-दास के समान थी। जमींदार लोग, मुख्यतः नैय्यर अपनी मर्जी से किसी भी पुलायार को काम में झोंक देते थे। सुबह से शाम तक काम करने के बाद उन्हें मिलता था, बामुश्किल  600 ग्राम चावल। कभी-कभी वह भी बेकार….दूसरे दर्जे का।

अय्यन बहुत मेहनती थे। उन्हें एक जमींदार ने जंगल को साफ कर जमीन खेती योग्य बनाने का काम सौंपा हुआ था। जमींदार अपेक्षाकृत उदार था। अय्यन के काम से प्रसन्न होकर उसने उन्हें पांच एकड़ जमीन भेंट कर दी थी। पुलायार जाति के लिए यह बड़ी बात थी। अपने परिवार के साथ अय्यन उसी जमीन में खेती करते थे। इस तरह अय्यंकालि के परिवार की आर्थिक स्थिति उनके ‘जाति-बंधुओं’ की अपेक्षा बेहतर थी। बाकी पुलयारों की हैसियत उस समय भूदासों के समान थी। उन्हें बिना किसी मजदूरी के दूसरों के खेतों में काम करना पड़ता था। इस प्रथा को वहां ‘ऊझीयम वाला’(Oozhiyam vala—Labour Without Pay) कहा जाता था। पुलायारों की संख्या त्रावणकोर में अन्य अछूत जातियों की अपेक्षा कम ही थी। अकेले वे कोई संगठनकारी ताकत नहीं बनते थे। उनकी दयनीय अवस्था और शोषण के पीछे यह भी एक कारण था।  

तत्कालीन समाज जातिवाद और छूआछूत पर टिप्पणी करते हुए चार्ल्स एलेन ने एक ईसाई मिशनरी की पत्नी द्वारा 1860 में अपनी एक मित्र को लिखे गए पत्र का हवाला दिया है। त्रावणकोर में व्याप्त छूआछूत को समझने के लिए यह टिप्पणी बहुत प्रामाणिक है। नियम के अनुसार—

‘नैय्यर नंबूदरी ब्राह्मण1 से मिल सकता था, परंतु उसे छू नहीं सकता था। चोवन(इझवा) जाति के व्यक्ति के लिए नियम था कि वह नंबूरी ब्राह्मण से मिलते समय 36 कदम की दूरी बनाकर  रखेगा। पुलायार जिसकी स्थिति दास जैसी है, को नंबूदरी से 96 कदम दूर खड़े होकर बात करनी पड़ती थी। नैय्यर से मिलते समय चोवाल को बारह कदम दूर खड़े रहने का प्रावधान था। वहीं पुलायार को नैय्यर से 66 कदम की दूरी रखनी पड़ती थी। इसी तरह संत थामस चर्च में विश्वास रखने वाला ईसाई, नैय्यर को छू सकता था, लेकिन नैय्यर के साथ भोजन करने की अनुमति उसे नहीं थी।’2 

जातीय शुचिता के नाम पर अमानवीय व्यवहार का कुछ ऐसा ही उल्लेख कैथरीन मेयो ने ‘मदर इंडिया’ में भी किया है। इससे तत्कालीन केरल में जाति-भेद और छूआछूत की त्रासद स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है।

पुलयार जाति के बच्चों को स्कूल जाकर पढ़ने-लिखने की अनुमति नहीं थी। वे केवल मेहनत-मजदूरी कर सकते थे। अछूत होने के कारण अय्यंकालि को केवल अपनी जाति के बच्चों के साथ खेलने का अधिकार था। फिर भी अय्यंकालि का बचपन स्वजातीय बच्चों से अलग था। वे अपेक्षाकृत मुक्त पारिवारिक वातावरण में पले-बढ़े थे। पिता को कहीं बेगार करने नहीं जाना पड़ता था। इस कारण उनके दोस्तों में कुछ तथाकथित ऊंची जाति के भी थे। बचपन ठीक-ठाक बीत रहा था कि एक दिन अचानक जाति-व्यवस्था का क्रूरतम चेहरा उनके सामने आ गया। उस दिन अय्यंकालि बच्चों के साथ फुटबाल खेल रह थे। उन्होंने फुटबाल को ठोकर मारी, वह उछलती हुई दूर एक आंगन में जा गिरी। वह नैय्यर का घर था। गृहस्वामी गैंद को देखकर आग-बबूला हो गया। उसने अय्यंकालि को ऊंची जाति के बच्चों के साथ न खेलने की हिदायत दी। अपमान से आहत अय्यंकालि ने भविष्य में किसी सवर्ण से दोस्ती न करने की ठान ली। यह संकल्प आगे चलकर उनके और पुलायार समाज के लिए वरदान सिद्ध हुआ। उसके बाद अय्यंकालि ने अपनी जाति के लड़कों को जोड़ना शुरू किया। उन्हें एकजुट कर उनकी एक टीम तैयार की। इस तरह बचपन से ही नायकत्व की भावना उसके भीतर उभरती चली गई।

बचपन में ही एक और घटना घटी। झगड़े के दौरान अय्यंकालि ने ऊंची जाति के लड़के की पिटाई कर दी। वह पहला अवसर था जब एक पुलायार, जिसकी सामाजिक हैसियत गुलामों जैसी थी, ने ऊंची जाति के लड़के को पीटा था। माता-पिता घबरा गए। उन्हें डर था कि उच्च जाति के लोग अवश्य ही बदला लेंगे। ऐसा होना भी था, लेकिन तभी कुछ लोग आकर बीच-बचाव करने लगे। उससे बेपरवाह बालक अय्यंकालि यह कहते हुए बाहर निकल आया कि वे उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। घर पहुंचा तो माता-पिता ने उसकी जमकर पिटाई की। ‘दिकुओं’3 से फिर कभी न उलझने का निर्देश दिया। माता-पिता का गुस्सा भी अय्यंकालि के संकल्प को डिगा न सका। वे अपनी जाति की दुर्दशा को लेकर सवाल उठाने लगे। इसी के आगे चलकर मुक्ति का विचार उसके दिमाग में जन्मा।

किशोरावस्था में गाने-बजाने का शौक पैदा हुआ। लोकगीतों में रुचि बढ़ी। उसी से रचनात्मकता ने जन्म लिया। किशोरावस्था पार करते-करते देह निखरने लगी थी। लोग अय्यंकालि के शरीर-सौष्ठव की प्रशंसा करने लगे। शरीर के साथ-साथ दिमाग भी हृष्ट-पुष्ट था। मुक्त परिवेश और अच्छी देहयष्टि। दोनों बातें अय्यंकालि का आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए काफी थीं। लेकिन जिस जाति में उनका जन्म हुआ था, उसमें वे दुर्गुण समान थी। अछूतों के लिए ड्रेस कोड निर्धारित था। वे साफ कपड़े नहीं पहन सकते थे। सार्वजनिक मार्गों पर टहलना निषिद्ध था। ऊंची आवाज में बोलने को उदंडता माना जाता था। इस सबकी परवाह न करते हुए अय्यंकालि साफ कपड़े पहनता। दोस्तों के साथ निरुद्धिग्न टहलता। इस तरह वह मनुस्मृति के उस विधान का उल्लंघन करता था, जो शताब्दियों से शूद्रों और दासों पर शासन का कारण रहा था।

उम्र के साथ रचनात्मकता में भी निखार आ रहा था। अय्यंकालि लोकगीत गाने यहां तक कि रचने भी लगा था। अपने छोटे भाइयों गोपालन, चेतन तथा अपनी जाति के दूसरे किशोरों के साथ वह अपने रचे लोकगीत गाता, नाटक खेलता और उन्हें मनभाता आकार देता था। उसके मित्र उसे सम्मान के साथ उरपिल्लई(प्रिय) या मूथपिल्लई(ज्येष्ठ) कहते थे। अय्यंकालि के गीतों और नाटकों में सामाजिक व्यवस्था के प्रति आक्रोश समाया होता था। स्वाधीनता का आवाह्न किया जाता था। अय्यंकालि की भाषा तमिल मिश्रित मलयाली थी। इससे उसके गीतों और नाटकों का असर त्रावणकोर से आगे बढ़कर मालाबार ओर कोची तक फैलने लगा। गीतों और नाटकों के जरिये वह मुक्ति संदेश को फैलाता। जातीय आधार पर हो रहे शोषण से परचाता। अय्यंकालि के माता-पिता के मन में बेटे को लेकर चिंता सदैव बनी रहती थी। लेकिन जन्मजात विद्रोही अय्यंकालि को इसकी चिंता न थी। संगठन है तो कुछ अनुशासन, ताकत का उचित सदुपयोग करने का हुनर भी होना चाहिए। सो अय्यंकालि ने अपने दल के सदस्यों को मार्शल आर्ट की शिक्षा देने के लिए एक प्रशिक्षक रख लिया, जो बहुत दूर से चलकर आता था। अय्यंकालि की गतिविधियां दिकुओं को खटकती थीं। मगर उन्हें इसकी कतई परवाह नहीं थी।

उन दिनों दलितों को गांव में खुला घूमने और मुख्य मार्गों पर निकलने की आजादी नहीं थी। न ही वे साफ, धुला हुआ कपड़ा पहन सकते थे। अय्यंकालि को बनी-बनाई लीक पर चलने की आदत न थी। 25 वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते उन्होंने अपने ही जैसे युवाओं का मजबूत संगठन तैयार कर लिया था। उनके साथी  संकेत-मात्र से मरने-मारने को तैयार हो जाते थे। सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करते समय अय्यंकालि के सामने सबसे पहली चुनौती थी, पुलायारों को सार्वजनिक सड़कों पर चलने का अधिकार दिलाना। 1889 में ऐसी ही एक घटना घटी। कुछ दलित युवा सार्वजनिक रास्तों पर चलने के अधिकार को लेकर आंदोलनरत थे। उसी समय उनपर दिकुओं(सवर्णों) ने उनपर हमला कर दिया। दोनों पक्षों के बीच जमकर संघर्ष हुआ। सड़क खून से लाल हो गई। इसी तरह की घटनाएं मनाक्कदु, काझाकुट्टम, कनियापुरम् जैसे क्षेत्रों में देखने को आईं। सवर्ण आतंक पर उतर आए थे।

बैलगाड़ी से क्रांति

निडर, निर्भीक अय्यंकालि ने अंततः सीधे टकराने का फैसला कर लिया। 1893 की घटना है। अय्यंकालि ने दो हृष्ट-पुष्ट बैल खरीदे, एक गाड़ी। साथ में पीतल की दो बड़ी-बड़ी घंटियां। खुद को उन्होंने अपनी पारंपरिक पोशाक में सजाया हुआ था, जिससे उनकी धज अलग ही नजर आ रही थी। घंटियों को बैलों के गले में बांध, बैलगाड़ी पर सवार हो, अय्यंकालि ने बैलों को हांक लगाई। इशारा मिलते ही बैल गांव की सड़कों पर चल पड़े। मानो कोई योद्धा अपने विजय-अभियान पर अग्रसर हो। उन दिनों पुलायार के लिए बैलगाड़ी पर बैठना तो दूर, उसे खरीदना या पास रखना भी अपराध माना जाता था। अय्यंकालि का गाड़ी पर सवार होकर निकलना शताब्दियों पुरानी व्यवस्था को चुनौती थी। खुला ऐलान। बैलों के गलों में पड़ी घंटियां जोर-जोर से बज रही थीं। आवाज सुनकर दिकुओं में खलबली मच गई। दूसरी ओर अछूतों के दिल अनहोनी की आशंका से दहलने लगे। अय्यंकालि अपनी बैलगाड़ी से गुजर ही रहे थे, सहसा कुछ सवर्णों ने आकर उनका मार्ग रोक लिया। वे अय्यंकालि को ‘सबक’ सिखाना चाहते थे—

‘यह सब क्या है? तुम्हें चादर ओढ़ने की इजाजत किसने दी।’ अय्यंकालि को ऐसे विरोध की आशंका थी। वे उसके लिए तैयार थे। तभी कुछ सवर्ण आगे बैलगाड़ी की ओर बढ़े। एक पल की भी देर किए बिना अय्यंकालि थोड़ा झुके। इससे पहले कि उपद्रवी कुछ समझ पाएं, अय्यंकालि के हाथों में दरांत आ चुकी थी। उनका चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था। रास्ता रोके खड़े दिकुओं पर दरांत तान, धमकी-भरे अंदाज में अय्यंकालि ने कहा—

‘अगर किसी ने भी मेरा रास्ता रोकने की कोशिश की तो उसे मेरा यह हथियार मजा चखाएगा।’ एक पुलायार से जिसकी सामाजिक हैसियत दास के समान थी, जो गर्दन झुकाकर चुपचाप हुक्म बजाते आए थे, ऐसे विरोध की आशंका किसी को न थी। वे सहमकर पीछे हट गए। उसके बाद तो अय्यंकालि की बैलगाड़ी प्रतिदिन गांव की सड़कों से गुजरने लगी। इस घटना ने न केवल दिकुओं पर असर डाला, अपितु दलितों के बीच भी खलबली मच गई। हर कोई उसकी चर्चा अपनी-अपनी तरह से कर रहा था। उसके बाद अय्यंकालि का यश चारों ओर फैलने लगा। यह डॉ. आंबेडकर के सार्वजनिक राजनीति में प्रवेश से करीब 25 वर्ष पहले की घटना थी। जिसने अय्यंकालि को दमन के शिकार वर्गों का स्वाभाविक नेता बना दिया। 25 वर्ष की अवस्था में अय्यंकालि का विवाह कर दिया गया। उनकी पत्नी का नाम चेल्लमा था। आगे चलकर उस दंपति के यहां सात संतानों ने जन्म लिया।

लेकिन सफलता अभी अधूरी थी। अय्यंकालि अपेक्षाकृत संपन्न माता-पिता की संतान थे। उनमें इतना साहस था कि बैलगाड़ी पर घूम सकें। लेकिन उन्हीं की जाति के बाकी लोगों में सार्वजनिक मार्गों पर चलने की न तो हिम्मत थी, न दिकु उन्हें अनुमति देने को तैयार थे। अय्यंकालि का अगला लक्ष्य था, दमन के कारण विश्वास खो बैठे दलितों में आत्मविश्वास पैदा करना। इसके लिए अय्यंकालि ने अपने संगठन को तैयार किया। उनका अगला कदम था, तिरुवनंतपुरम् में दलित बस्ती से पुत्तन बाजार तक ‘आजादी के लिए जुलूस’ निकालना। यह आसान काम नहीं था। विरोधी घात लगाए बैठे थे। जैसे ही उनका काफिला सड़क पर पहुंचा, दिकुओं ने उसपर हमला कर दिया। अय्यंकालि के नेतृत्व में सैकड़ों दलित युवक निडर होकर विरोधियों से जूझ पड़े। सैकड़ों युवाओं को चोट आई। चेलियार में हुए उस संघर्ष से प्रेरित होकर दूसरे कस्बों और गांवों के दलित युवक भी सड़कों पर चलने की आजादी को लेकर निकल पड़े। मनक्कदु, काझाकोट्टम, कनियापुरम् सहित आसपास के इलाकों में जुलूस निकाले गए। सड़कें खून से लाल होने लगीं। दिकुओं का विरोध जितना बढ़ रहा था, उतना ही दलित युवा अपने अधिकारों को लेकर जाग्रत हो रहे थे। अय्यंकालि का प्रभाव और दलितों का विद्रोह बढ़ता ही जा रहा था। दूसरी दलित जातियां भी पुलायारों के साथ एकजुट होकर अधिकारों की मांग करने लगी थीं। संघर्ष गृहयुद्ध में बदलने लगा था।

पुलायार विद्रोह: शिक्षा क्रांति

उस संघर्ष से दलितों को दूसरे अधिकारों के लिए आवाज उठाने की प्रेरणा मिली। अय्यंकालि स्वयं अशिक्षित थे, लेकिन वे नहीं चाहते थे कि उनकी आने वाली पीढ़ियां भी शिक्षा से वंचित रहें। सरकार सभी के समान शिक्षा के दरवाजे वर्षों पहले खोल चुकी थी। मगर स्कूल प्रबंधन पर दिकुओं का अधिकार था। वे पुलायार और दूसरे दलित बच्चों के स्कूल प्रवेश से आनाकानी करते थे। 1904 में अय्यंकालि ने दलितों की शिक्षा के लिए आंदोलन आरंभ कर दिया। पुलायार और दूसरे अछूतों की शिक्षा के लिए उन्होंने उसी वर्ष वेंगनूर में पहला स्कूल खोला। वह केरल का पहला स्कूल था, जिसे केवल दलितों के अध्ययन के लिए खोला गया था। दलितों के लिए वह आशा की किरण जैसा था। परंतु सवर्णों से वह बर्दाश्त न हुआ। उन्होंने स्कूल पर हमला कर, उसे तहस-नहस कर दिया। अय्यंकालि के लिए वह बड़ा धक्का था। लेकिन निरंतर संघर्ष ने उनकी जिजीविषा को बढ़ा दिया था।

संघर्ष को सांस्थानिक रूप देने के लिए अय्यंकालि ने ‘साधु जन परिपालन संघम’ नामक संस्था का गठन किया। उसका उद्देश्य था, पुलायार तथा दूसरे दलितों को शिक्षा के लिए प्रेरित करना। औपनिवेशिक सरकार भी दलितों में शिक्षा के प्रसार के लिए प्रयासरत थी। उस समय मिशेल त्रावणकोर शिक्षा विभाग के निदेशक थे। दलितों के लिए शिक्षा को लेकर अय्यंकालि ने अपनी संस्था के माध्यम से कई पत्र त्रावणकोर के दीवान और शिक्षा निदेशक को लिखे। औपनिवेशिक सरकार की नीति के चलते दीवान ने दलितों की शिक्षा के लिए 1907 में आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए थे। लेकिन आदेशपत्र जारी होने को जानबूझकर रोका गया था। अय्यंकालि द्वारा लगातार लिखने पर मिशेल को उसकी जानकारी मिली। उन्होंने दीवान को उस आदेश पर तत्काल अमल करने का आग्रह किया। अंततः 1910 में आदेशपत्र जारी हुआ, परंतु स्कूल प्रबंधकों में जिनमें जमींदार सम्मिलित थे, उस आदेश पर अमल करने से इन्कार कर दिया।

इसपर अय्यंकालि 1 मार्च 1910 को पूजारी अय्यन की पांच वर्ष की बेटी पंचमी तथा अपने साथियों को लेकर उरूट अंबालम स्कूल, बलरामपुरम् में पहुंचे। वहां अय्यंकालि समर्थकों तथा दिकुओं जिनमें नैय्यरों की संख्या सबसे ज्यादा थी, के बीच जमकर संघर्ष हुआ। गुस्साए नैय्यरों ने पुलायारों की बस्ती पर हमला कर दिया। उनके घर तहस-नहस कर डाले। उपद्रवी नैय्यर पुलायारों की बकरियों, जानवरों तथा गाड़ियों को लूटकर ले गए। औरतों और आदमियों को बुरी तरह से पीटा गया। जिसने भी सामना करने की कोशिश की, उसे बुरी तरह से दबा दिया गया। झोपड़ियों में आग लगा दी गई। सात दिनों तक पुलायारों की बस्ती से धूल और धुआं उड़ता रहा। चीख-पुकार की आवाजें आती रहीं। उरूट अंबालम स्कूल, बलरामपुरम् से उभरी चिंगारी हालांकि कुछ दिनों बाद शांत हो गई। लेकिन आसपास के इलाकों में उससे जो ज्वाला भड़की उसने 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की याद दिला दी। उसने मार्यामुट्टम, वेंगनूर, पेरमबाझुथूर, कुनथकाल जैसे इलाकों को भी अपनी चपेट में ले लिया। केरल के मुख्य धारा के इतिहासकार उस घटना को ‘पुलायार-विद्रोह’ के नाम से पुकारते हैं। उस विद्रोह में दलितों को जन और दोनों की भारी हानि हुई थी। उनके आगे रोजगार का संकट भी खड़ा हो चुका था। बावजूद इसके आजादी की ललक ऐसी थी कि तमाम विरोधों और दबावों के बावजूद आंदोलन आगे बढ़ता गया।

‘पुलायार आंदोलन’ जातीय दमन के विरोध में उठी आवाज थी। साम्यवादी विचारक उसे वर्ग-संघर्ष की तयशुदा सैद्धांतिकी के अंतर्गत देखते आए हैं। तथाकथित राष्ट्रवादी लेखकों, पत्रकारों की पुलायार आंदोलन को लेकर क्या राय थी। यह के। रामकृष्ण पिल्लई की टिप्पणी से पता चल जाता है। पिल्लई ‘स्वदेशाभिमानी’ के संपादक थे। उन्हें कार्ल मार्क्स की जीवनी के अनुवाद का श्रेय भी दिया जाता है, जो मार्क्स  के बारे में किसी भी भारतीय भाषा में प्रकाशित पहली पुस्तक थी। दलित बच्चों को स्कूल में भर्ती कराने की अय्यंकालि तथा उनके सहयोगियों की मांग तथा उसे सरकार के समर्थन पर पिल्लई ने अपने समाचारपत्र ‘स्वदेशाभिमानी’ में जो लिखा वह ‘त्रिवेणी संघ’ के नेताओं पर कांग्रेसी नेताओं की टिप्पणी की याद दिलाता है। ‘त्रिवेणी संघ’ के नेता जब कांग्रेस के पास टिकट लेने गए तो उसके नेताओं ने न केवल इन्कार कर दिया, अपितु उनका उपहास उड़ाया गया। टिकट मांगने पर किसी को कहा जाता कि ‘वहां(संसद और विधानसभा) क्या साग-भंटा बोना है….किसी को कहा जाता कि वहां क्या भैंस दुहनी है? किसी को ताना मारा जाता कि वहां क्या भेड़ें चरानी हैं? किसी को यह कहकर फटकार दिया जाता कि वहां क्या नमक-तेल तौलना है।’ रामकृष्ण पिल्लई ने इतनी तीखी भाषा का प्रयोग तो नहीं किया, मगर वे सरकारी स्कूलों में दलित बच्चों के प्रवेश के सख्त विरोधी थे। अपने समाचारपत्र में उन्होंने लिखा था कि दलित बच्चों को सरकारी स्कूलों में भर्ती का आदेश अनपढ़-गंवार और पीढ़ियों से मेहनत-मजदूरी पर गुजर-बसर करते आए लोगों, ‘के बच्चों को उन बच्चों के साथ जोड़ देना है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने दिमाग को तराशते हुए आए हैं। यह घोड़े और भैंस को एक ही गाड़ी में जोत देने जैसा है।’5 

नया स्कूल खोलना जितना कठिन था, उससे कहीं अधिक कठिन था, उसमें पढ़ाई की व्यवस्था करना। उन दिनों में दलितों में कोई पढ़ा-लिखा था नहीं। अय्यंकालि अशिक्षित थे। समस्या थी कि पढ़ाए कौन? जो पढ़े-लिखे थे उनमें से कोई आगे नहीं आ रहा था। सरकार उस समय दलितों के स्कूल में पढ़ाने के लिए छह रुपये महीना देती थी। किसी को आगे न आते देख मासिक वृत्तिका को बढ़ाकर नौ रुपये कर दिया गया। तब, लंबी प्रतीक्षा और कोशिशों के बाद परमेश्वरन पिल्लई नाम का एक युवक पढ़ाने के लिए तैयार हुआ। परमेश्वरन तिरुवनंतपुरम के कैथमुक्कू गांव का रहने वाला था। जिन संस्कारों के बीच वह पला-बढ़ा था, वे अछूतों के संपर्क में आने की अनुमति नहीं देते थे। पहले दिन जब वह स्कूल पहुंचा तो इसी ऊहापोह से घिरा हुआ था। उस समय उसकी प्रगतिगामी मेधा और सामाजिक-सांस्कृतिक कुंठाओं के बीच द्वंद्व जारी था। उस घटना का उल्लेख ग्रीश्मा ग्रीश्मम ने अपने आलेख ‘डेस्टिनी चेंजिज’ में इस प्रकार किया है—

‘नए अध्यापक ने स्कूल में अनिच्छापूर्वक ऐसे प्रवेश किया, मानो वह किसी कूड़ाघर में जा रहा हो। उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक कुंठा तथा प्रगतिगामी के बीच द्वंद्व छिड़ा हुआ था। वह बहुत डरा हुआ था। स्थिति तनावपूर्ण थी। उसी क्षण स्कूल को चारों ओर से घेरे खड़े लोगों ने शोर मचाना आरंभ कर दिया। अय्यंकालि के समर्थक और विरोधी एक-दूसरे के आमने-सामने थे। अफरा-तफरी का माहौल था। तभी एक व्यक्ति अध्यापक की ओर बढ़ा, जो मारे भय के बुरी तरह कांप रहा था। जैसे-तैसे अध्यापक को कक्षा तक पहुंचाया गया। दिन में कक्षाएं चलीं। मगर रात होते ही सवर्णों का दल फिर आ पहुंचा। देखते ही देखते, स्कूल को उजाड़ दिया गया।’6

अय्यंकालि और उनके विरोधियों में मानो होड़ मची थी। बिना किसी विलंब के स्कूल का नया ढांचा खड़ा कर दिया गया। अध्यापक को सुरक्षित लाने-ले जाने के लिए रक्षक लगा दिए गए। तनाव और आशंकाओं के बीच स्कूल फिर चलने लगा।

जैसे-जैसे अय्यंकालि का आंदोलन तेज हो रहा था, वैसे-वैसे उनके विरोधी भी बढ़ते जा रहे थे। उसकी प्रतिक्रिया में दलितों के बीच स्वतंत्रता और समानता को लेकर चेतना भी जाग्रत हो रही थी। उनकी आंखें सपने देखने लगी थीं। इसके साथ-साथ अय्यंकालि की सामाजिक प्रतिष्ठा भी बढ़ रही थी। सामाजिक उत्थान की दिशा में उनके योगदान की उपेक्षा करना असंभव हो चला था। 1888 में त्रावणकोर में विधायिका परिषद की स्थापना की गई थी। उसके आठ सदस्य थे। उसके पीछे त्रावणकोर के राजा श्रीमूलमथिरुनाल रामवर्मा की प्रेरणा थी जो प्रशासन में जनप्रतिनिधियों को सम्मिलित करना चाहते थे। 1904 तक व्यापारी, जमींदार, ही ‘श्री मूलम पोपुलर असेंबली’ के सदस्य बन सकते थे। प्रत्येक जिला प्रमुख द्वारा दो सदस्यों का चयन किया जाता था। कोई भी जमींदार जो कम से कम 100 रुपये सालाना लगान देता हो, अथवा व्यापारी जिसकी सालाना आय 6000 रुपये से अधिक हो, वह चुना जा सकता था।

1912 में अय्यंकालि को ‘श्री मूलम पोपुलर असेंबली’ का सदस्य चुन लिया गया, उसके बाद वे मृत्युपर्यंत उस पद पर बने रहे। अय्यंकालि पहले दलित थे जिन्हें औपनिवेशिक भारत में राज्य विधायिका का सदस्य मनोनीत किया गया था। विधायिका के सत्र के दौरान, राजा और दीवान की उपस्थिति में अय्यंकालि ने जो भाषण दिया उसमें उन्होंने दलितों के संपत्ति अधिकार, शिक्षा, राज्य की नौकरियों में विशेष आरक्षण दिए जाने तथा बेगार से मुक्ति जैसे मसलों पर बात की थी। 4 मार्च 1912 को अय्यंकालि द्वारा राज्य की विधयिका में दिए गए भाषण का ऐतिहासिक महत्त्व है। वह सरकार के सामने दलित हितों को लेकर उठने वाली किसी दलित की पहली आवाज थी। उसमें अय्यंकालि ने कहा था—

‘‘पुलायारों के प्रतिनिधि के रूप में मैं सरकार को, हमारे बच्चों को वैंगनुर ऐलीमेंट्री स्कूल, दक्षिणी त्रावणकोर के विद्यालयों में प्रवेश के लेकर की गई मदद के लिए अपना आभार प्रकट करना चाहता हूँ। अभी तक पुलायार जाति के बच्चों के प्रवेश के केवल सात स्कूलों को अनुमति दी गई है। मैं चाहता हूं कि राज्य के सभी स्कूलों में हमारे बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त हो।

‘पुलायार अपने बच्चों को उन सभी स्कूलों में भर्ती करा सकते हैं, जिनमें इझवा जाति के बच्चों को प्रवेश की अनुमति है।’ दीवान ने टोका था। अय्यंकालि ने कहना जारी रखा।

‘नए बच्चों को फीस में में छूट दी जा सकती है। सरकार मुस्लिम बच्चों को फीस में छूट देती है, जो हमसे कहीं आगे हैं। पुलायार बच्चों को भी वैसी ही छूट मिलनी चाहिए।’

दीवान  : क्या पुलायारों के बच्चे मुस्लिमों की तरह फीस में छूट नहीं ले रहे हैं? मेरा मानना है कि ऐसा होना चाहिए।’

अय्यंकालि : पुलायारों को इंजीनियर, स्वास्थ तथा औषध विभाग में भर्ती किया जा सकता है। उनमें कई योग्य सदस्य हैं, जिन्हें शिक्षा विभाग में भर्ती किया जा सकता है। हालांकि पुलायारों को सड़कों पर चलने, कानून की मदद लेने, अदालत जाने के अधिकार के संबंध में शाही आदेश जारी हो चुका है, इसके बावजूद उन्हें रोका जा रहा है। कुछ लोग इसमें बाधा डाल रहे हैं। हमें राहत पहुंचाने के लिए जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए।’’

अय्यंकालि द्वारा पुलायार बच्चों की शिक्षा के क्षेत्र में आ रही परेशानियों को विधान परिषद में लगातार उठाए जाने से सरकार चेती। 1914 में सरकार ने शिक्षा-नीति पर कठोरता से पालन के आदेश दे दिए। शिक्षा निदेशक मिशेल स्वयं हालात का पता लगाने के लिए दौरे पर निकले। मिशेल के आने की खबर से अधिकारी सचेत हो गए। दलित विद्यार्थियों के प्रवेश को और अधिक लटकाना संभव न था। मिशेल की आगमन की खबर सुनकर जब स्कूल प्रशासन हरकत में आया। लेकिन दलित विद्यार्थियों को स्कूल में प्रवेश करते देख दिकुओं ने हंगामा कर दिया। उपद्रवी भीड़ ने मिशेल की जीप को आग लगा दी। बावजूद इसके वह अधिकारी सरकारी आदेश का पालन करने के लिए डटा रहा। उस दिन आठ पुलायार छात्रों को प्रवेश मिला। उनमें 16 वर्ष का एक किशोर भी था जो पहली कक्षा में प्रवेश के लिए आया था।

यह अय्यंकालि की जीत थी, परंतु समस्याओं का यही अंत नहीं था। दिकुओं ने अपने बच्चों के दिमाग में भी जहर घोला हुआ था। दलित बच्चे पढ़ाई के लिए जैसे ही कक्षा में प्रवेश करते, वे दूसरे दरवाजे से बाहर निकल जाते थे। इससे अध्यापकों को बहाना मिला। वे दलित छात्रों को प्रवेश देने से फिर आनाकानी करने लगे। इससे दलितों का आक्रोश भड़क पड़ा। वे स्कूल दिकुओं के विरोध में फिर सड़क पर उतर आए। अय्यंकालि उनका नेतृत्व कर रहे थे। झगड़े हुए। त्रावणकोर के कई शहरों में सांप्रदायिक दंगों जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई। अय्यंकालि ने सरकार के सामने मुद्दे को उठाया। कानून का हवाला दिया। उसके फलस्वरूप दिकुओं के हिंसक विरोध के बावजूद दलित विद्याथिर्यों की संख्या बढ़ती गई। 1913-16 के दौरान नैय्यर विद्यार्थियों की संख्या में कुल वृद्धि 45 प्रतिशत, ईसाई विद्यार्थियों की 50 प्रतिशत, मुस्लिमों की लगभग 100 प्रतिशत रही जबकि दलितों में परायस जाति के विद्यार्थियों की संख्या में 400 प्रतिशत और पुलायार विद्यार्थियों की संख्या में सीधे 600 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इससे अय्यंकालि के प्रभाव तथा उनके आंदोलन की गंभीरता को समझा जा सकता है।

साधु जन परिपालन संघम

अय्यंकालि ने दिकुओं से सीधे टकराव मोल लिया था। उनकी कार्यशैली आंख में आंख डालकर बात करने की थी। लेकिन यह सब आसान काम नहीं था। जनसंख्या की दृष्टि से पुलायार कोई बड़ी ताकत नहीं बनते थे। बावजूद इसके यदि अय्यंकालि को अपेक्षित कामयाबी मिली तो इसके पीछे उनकी दूरदृष्टि, कुशल नेतृत्व क्षमता और साहस का बड़ा योगदान था। उन दिनों सरकार और समाज के सभी महत्त्वपूर्ण पदों पर सवर्ण जातियों का वर्चस्व था। उनमें भी सर्वाधिक संख्या ब्राह्मणों की थी। ज्ञान के सभी महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों पर उनका अधिकार था। सवर्ण जातियां डरती थीं कि पढ़ने-लिखने का अधिकार मिलते ही उन्हें मुफ्त में मिलने वाले श्रम से हाथ धोना पड़ेगा। इसलिए वे एकजुट होकर दलित शिक्षा का विरोध करते थे। उन्हें शिक्षा से वंचित रखने के पीछे भी यही कारण था। जबकि सरकार सभी को समान शिक्षा का कानून उनीसवीं शताब्दी के आरंभ में ही पास कर चुकी थी। मगर कानून में अमल का काम जिन अधिकारियों के जिम्मे था, उनमें लगभग सभी सवर्ण होते थे। इसलिए दलित कल्याण से जुड़े कानून सिर्फ कानून बनकर रह जाते थे। अय्यंकालि जानते थे कि बड़ी कामयाबी दूसरों की दया पर नहीं आती। पुलायार यदि अपने बच्चों को शिक्षित करना चाहते हैं तो उन्हें विरोधियों से स्वयं निपटना होगा। इसलिए उन्होंने जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता तैयार किए थे, जो अय्यंकालि के कहने पर मरने-मारने को तैयार रहते थे। उनके मार्गदर्शन के लिए बड़े संगठन की आवश्यकता थी। उसके लिए अय्यंकालि ने 1907 में ‘साधु जन परिपालन संघम’ की स्थापना की थी। उस संगठन में उन सभी जातियों का स्वागत था जो जाति और वर्गभेद के आधार पर शताब्दियों दमन और शोषण का शिकार बनती आई थीं।

संस्था के गठन के साथ ही अय्यंकालि को ईसाई, आर्यसमाजी और हिंदू सुधारवादी संगठनों की ओर से बुलावा आने लगा। वे अय्यंकालि के प्रभाव का लाभ उठाकर पुलायार और दूसरी दलित जातियों में अपनी पैठ बनाना चाहते थे। अय्यंकालि यूं भारत की संत-परंपरा में विश्वास रखते थे। नारायण गुरु, स्वामी सदानंद जैसे सुधारवादी धर्मगुरुओं का उनपर प्रभाव था। बावजूद इसके वे अपने आंदोलन को धार्मिक होने से बचाना चाहते थे। उनका मुख्य ध्येय दलितों का सामाजिक-आर्थिक उत्थान था। उसके लिए शिक्षा सबसे जरूरी उपकरण थी। इसलिए उन्होंने धार्मिक संगठनों से दूरी बनाए रखी। वैसे भी वे संगठन को शक्ति के स्तर पर भी आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे, जो धार्मिक संगठनों और धर्माचार्यों की छत्रछाया में असंभव था। ‘साधु जन परिपालन संघम’ पर नारायण गुरु की संस्था ‘श्रीनारायण धर्मपरिपालन संघम’ का असर था। संस्था के संचालन की जिम्मेदारी थॉमस वाडियार को सौंपी गई थी। वह पेशे से अध्यापक तथा अय्यंकालि का रिश्तेदार और भरोसेमंद था। संघम की आरंभिक बैठकों में लिए गए फैसलों से अय्यंकालि के आधुनिक सोच का अनुमान लगाया जा सकता है। उस संस्था के प्रमुख संकल्प थे—

1.  प्रति सप्ताह कार्यदिवसों की संख्या 7 से घटाकर 6 पर सीमित करना।

2.  श्रमिकों को एक दिन का अवकाश तथा

3.  कार्य के दौरान मजूदरों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार से मुक्ति

‘साधु जन परिपालन संघम’ का मुख्य कार्यालय वैंगनूर में बनाया गया था। वहां एक कांन्फ्रेंस हाल और पुस्तकालय भी था। संघम की ओर से नियम बनाया गया था कि सभी सदस्य सप्ताह में एकदिन, अपनी समस्याओं पर विचार करने के लिए अवश्य जमा होंगे। मासिक सदस्यता शुल्क भी निर्धारित की गई थी। संस्था की स्थापना के साथ ही स्त्री-पुरुष दोनों उससे जुड़ने लगे। देखते ही देखते उसकी शाखाएं केरल और तमिलनाडु के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में खुलने लगीं। लोग उनकी बैठकों में नियमित रूप से आने लगे। संगठन में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी उत्साहवर्धक थी। इसका अनुमान उनके द्वारा किए गए सहयोग से भी लगाया जा सकता है। संघम को अपने दैनिक खर्चों के लिए धन की आवश्यकता थी। उसके लिए दलित स्त्रियां पिडीयारी(मुट्ठी-मुट्ठी भर चावल जुटाना) बेचकर संघम की मदद करने लगीं। इससे उसका प्रभावक्षेत्र और कार्यक्षेत्र दोनों बढ़ते गए।

संघम की पैठ जीवन के हर क्षेत्र में थी। उस समय तक अदालतें स्थापित हो चुकी थीं। परंतु अछूतों के अदालत का न्याय प्राप्त करना आसान न था।  अदलतों में काम करने वाले सभी उच्च जाति के थे। यदि कोई दलित अदालत जाने का साहस भी करता तो, वहां मौजूद लोग उसका भरपूर शोषण करते थे। अछूतों के बारे में बनी-बनाई धारणा थी, इसलिए सजा देते समय भी पक्षपात किया जाता था। अछूतों को वैकल्पिक न्यायतंत्र की आवश्यकता थी। उसे देखते हुए अय्यंकालि ने वो किया, जिसकी किसी अशिक्षित व्यक्ति से कम ही उम्मीद की जाती है। अछूतों के आपसी झगड़ों के समाधान के लिए अय्यंकालि ने सामुदायिक न्यायालयों ‘समुदाय कोदाथी’ की स्थापना की। उसका मुख्य केंद्र वेंगनूर में बनाया गया। केंद्रीय कार्यालय में पुस्तकालय और एक कोन्फ्रेंस हाल भी बनाया गया था, जहां नियमित बैठकों की व्यवस्था की गई थी। संघम के प्रत्येक कार्यालय में स्थानीय अदालतों का गठन किया गया। सामुदायिक न्यायालयों की संरचना एकदम औपचारिक न्यायालयों जैसी ही थी। वैसे ही वकील, जज, पुलिस, समन पहुंचाने के लिए बैलिफ, मुंशी वगैरह। यहां तक कि शाखा अदालत के निर्णय के विरुद्ध अपील की व्यवस्था भी थी। कोई भी पीड़ित सामुदायिक अदालत के मुख्य कार्यालय में जाकर, शाखा अदालतों के फैसले के विरुद्ध अपील कर सकता था। जहां स्वयं अय्यंकालि मुख्य न्यायाधीश के रूप में मौजूद रहते थे।

लोगों के मनोरंजन तथा सांस्कृतिक एकता को बढ़ाने के लिए ‘समाजं’ की स्थापना की गई थी। ‘समाजं’ में लोग इकट्टा होकर लोकनृत्य, गाना-बजाना करते थे। नाटक भी खेले जाते थे। उनके माध्यम अय्यंकालि सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध चेतना जगाने का काम करते थे। बाद में समाजं ने जरूरतमंद पुलायार विद्यार्थियों के लिए हाॅस्टल का निर्माण भी किया। ‘साधु जन परिपालिनी संघम’ ने केरल के दलितों के बीच चेतना फैलाने का काम किया। उसके प्रभाव में लोग सप्ताह में एक दिन अवकाश करने लगे। रविवार को अवकाश के दिन लोग मिलते-जुलते, समाजं की गतिविधियों में हिस्सा लेते और भविष्य के लिए कार्यक्रम बनाते थे।

पहली श्रमिक हड़ताल

अय्यंकालि दलितों की शिक्षा के लिए जी-तोड़ प्रयास कर रहे थे। कानून बन चुका था। सरकार साथ थी। मगर सवर्ण दिकुओं का विरोध जारी था। इस मुद्दे पर आमने-सामने के टकराव भी हो चुके थे। लगातार दबाव पड़ने से दिकु विवश हुए थे। पुलयारों सहित दूसरे दलितों को स्कूलों में प्रवेश मिलने लगा था। मगर वे इतनी जल्दी हार मानने को तैयार न थे। उन्होंने पुलायारों को काम के दौरान तंग करना शुरू कर दिया था। लेकिन अय्यंकालि आंदोलन को भटकने से रोकना चाहते थे। उनके सामने प्रमुख मुद्दे थे। अछूतों को शिक्षा, रोजगार और भूमि में हिस्सेदारी। विधान परिषद के सदस्य के रूप में वे इन मांगों को सरकार के सामने उठा चुके थे। उन्हें उम्मीद थी कि समय के साथ दलितों के प्रति सवर्णों के रुख में नर्मी आएगी। लेकिन सवर्णों के रवैये में कोई बदलाव न हुआ। आखिरकार अय्यंकालि को दबाव रणनीति अपनानी पड़ी।

यह 1907 की घटना है। रूस की बोल्शेविक क्रांति से भी एक दशक पहले की, जब श्रमिकों ने अपने श्रम का इस्तेमाल अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए किया था। त्रावणकोर राज्य में सर्वाधिक जमीन नैय्यरों के अधिकार में थी। पुलायार उन्हीं के खेतों में मेहनत-मजूदरी करते थे। एक तरह से बेगार, क्योंकि पूरे दिन की मजदूरी के बदले उन्हें मात्र छह सौ ग्राम चावल प्राप्त होता था, वह भी मालिक की मर्जी से। अछूत बच्चों की पढ़ाई में आ रही अड़चन को देखते हुए पुलायारों ने घोषणा कर दी कि वे खेतों में उस समय तक काम नहीं करेंगे, जब तक उनके बच्चों को स्कूलों में प्रवेश और बाकी अवसर नहीं दिए जाते। जमींदारों ने इसे हंसकर टाल दिया। उन्हें लगता ही नहीं था कि पुलायार हड़ताल के बारे में सोच भी सकते हैं। जिनके घर चूल्हा ही मजूदरी मिलने के बाद जलता हो, उनके बारे में ऐसा सोचना नाममुकिन भी नहीं था। सो कुछ लोग उपहास में उंगलियों पर हिसाब लगाने लगे कि पुलयारों के घर में उपलब्ध राशन के हिसाब से हड़ताल कितने दिन खिंच सकती है—एक दिन…दो दिन….ढाई दिन…..उसके बाद तो उन्हें सिर झुकाकर आना ही पड़ेगा।

उन दिनों आज की तरह न टेलीफोन थे, न रेडियो, न ही टेलीविजन। पचास-साठ किलोमीटर की बात हो आने-जाने में ही दो दिन लग जाते थे, जबकि वहां तो मामला सैंकड़ों किलोमीटर में फैला हुआ था, लेकिन पुलायारों की आंखों में भविष्य का सपना था और थी, उस सपने के लिए कुछ भी बलिदान करने की जिद। सो हड़ताल खिंचती चली गई, धीरे-धीरे उसमें दूसरी मांगें भी सम्मिलित होती चली गईं; जैसे कि—

    1. नौकरी को स्थायी किया जाए

    2. दंड या दुव्र्यवहार से पहले उचित जांच होनी चाहिए। केवल अनुमान या दूसरों के कहने पर दंड देने से बचा जाए।

    3. कामगारों को झूठे मुकदमों में फंसाने पर रोक।

    4. मजदूरों के साथ अनुचित मारपीट पर तात्कालिक रोक

    5. सार्वजनिक मार्गों पर चलने की स्वतंत्रता

    6. दलित बच्चों को विद्यालयों में प्रवेश

इसके अलावा एक और मांग थी, परती और खाली पड़ी जमीन को उपजाऊ बनाने वाले को उसका मालिकाना हक देने की। कुछ लोगों को दलितों का काम करने से इन्कार करना, हड़ताल पर जाना ही अनुचित लगा। वे लोग समूह बनाकर पुलायारों को डराने धमकाने भी लगे। मार-पीट की घटनाएं भी हुईं। इन सब घटनाओं का अय्यंकालि को पहले से ही अंदेशा था। इसलिए हालात से निपटने के लिए उन्होंने अपने समर्थकों को तैयार किया हुआ था। जमींदार के लोगों ने मजदूरों को डराना-धमकाना आरंभ किया तो संगठन के लोग बीच में आ गए। इससे झगड़े और मार-पीट की नौबत आ गई। उसमें ज्यादा नुकसान दलितों को हुआ, लेकिन वे हड़ताल पर डटे रहे।

वह चावल की रोपाई के दिन थे। देर होने से फसल कमजोर होने की संभावना थी। कुछ जमींदारों ने खुद सारा काम करने की कोशिश की। लेकिन उन्हें काम करने का अभ्यास नहीं था, इस कारण वे बीमार पड़ने लगे। जितने काम को कोई पुलायार अकेला कर देता था, उतना काम छह-छह नैय्यर मिलकर भी नहीं कर पाते थे। अगर वे मजदूर खोजने जाते तो मजदूर मुंह-मांगी मजदूरी मांगता था। नतीजा यह हुआ कि खेत जंगल में बदलने लगे। हड़ताल का लंबा खिंचना पुलायारों के लिए भी समस्या थी। अधिकांश लोग मजदूरी पर पलते थे। उनके घर में खाने की समस्या पैदा होने लगी। समाचार नैय्यरों तक पहुंचा तो वे बहुत खुश हुए। लगा कि एक-दो दिन से ज्यादा हड़ताल खिंच नहीं पाएगी। उसी समय अय्यंकालि ने अपना तुरुफ का इक्का चल दिया। वे विझिंजोम में समंदर से मछलियां पकड़ने वाले मछुआरों के पास गए। उनसे कहा कि वे एक-एक पुलायार को अपने साथ नाव पर रखें और बदले में अपनी आय का एक हिस्सा उसे दें।

मछुआरे स्वयं जातीय भेदभाव और शोषण का शिकार थे। उन्होंने अय्यंकालि के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। इससे क्षुब्ध जमींदारों ने पुलायारों की बस्ती में आग लगा दी। आंख में आंख डालकर बात करने वाले अय्यंकालि ने उसी अंदाज में उसका जवाब दिया। उनकी सेना ने जमींदारों के घरों में आग लगाना आरंभ कर दिया। गांव में जमींदार इक्का-दुक्का ही होते थे। जबकि दलितों की संख्या अधिक होती थी। एक बार बस्ती में आग लगा देने से उनका बड़ा नुकसान तो होता था, मगर बाद में जले हुए को समेटना बाकी रह जाता था। लेकिन जमींदारों पर हमले से उनका कहीं ज्यादा नुकसान होता था। यह डर भी लगा रहता था कि न जाने कहां ओर किधर से विद्रोही चले आएं। इससे उनमें भय का संचार होने लगा। अय्यंकालि चाहते थे कि जमींदार स्वयं समझौते के लिए आएं। वही हुआ भी। अंततः जमींदारों को ही समझौते के लिए बाध्य होना पड़ा। 1 मार्च 1910 को सरकार ने विद्यालयों में प्रवेश संबंधी कानून बनाकर पुलायार तथा दूसरे दलितों के लिए शिक्षा में प्रवेश का रास्ता साफ कर दिया। उसके अलावा मजदूरी में वृद्धि, सार्वजनिक मार्गों पर आने-जाने की आजादी जैसी मांगें भी मान ली गईं। वह भारतीय इतिहास में मजदूरों की प्रथम हड़ताल थी, बोल्शेविक क्रांति से पहले की, जिसने वहीं किया था, जिसकी मांग कभी कार्ल मार्क्स  ने की थी। ईएमएस नंबूदरीपाद ने अय्यंकालि के आंदोलन पर कुछ नहीं लिखा, लेकिन एक लेख में वे अय्यंकालि के इशारे पर बुलाई गई पहली श्रमिक हड़ताल की चर्चा करने से रोक नहीं पाते—

‘अय्यंकालि केवल दलितों के नेता नहीं थे। वे खेतिहर मजदूरों के भी नेता थे। उनके आंदोलन में धार्मिक अल्पसंख्यकों और दलितों के अलावा उच्च जातियों के लोग भी सम्मिलित थे। आधुनिक केरल के नवनिर्माण में अय्यंकालि का योगदान नारायण गुरु जितना ही है। दलित बहुजनों को संगठित कर, उनके हक की लड़ाई लड़ने वाले अय्यंकालि नारायण गुरु की परंपरा को आगे बढ़ाते हैं, जिन्होंने पिछड़ी जाति के इझ़वाओं को संगठित कर, उनके अधिकारों के लिए संघर्ष किया था….’

पुनः केरल के मुख्यमंत्री के रूप में अय्यंकालि तथा 1907 की श्रम-हड़ताल को याद करते हुए उन्होंने कहा था—‘1907 में अय्यंकालि ने खेतिहर मजदूरों की हड़ताल का नेतृत्व किया था, उन्होंने बिखरे हुए और असंगठित श्रमिकों को एकजुट कर, उन्हें संगठित ताकत में बदलने में कामयाबी हासिल की थी।’

महिलाओं के उभोवस्त्र-अधिकार के लिए संघर्ष

स्तन ढकने के अधिकार के विरोध में नंदेली द्वारा राज्य के अधिकारियों को अपने स्तन काटकर दे देने की घटना का उल्लेख पीछे किया जा चुका है। त्रावणकोर राज्य की दलित महिलाओं के साथ त्रासदी थी कि उन्हें अपना वक्ष ढकने का अधिकार प्राप्त नहीं था। केवल घुटने से कटि तक हिस्सा वे ढक सकती थीं। वक्ष के ऊपर के हिस्से पर वे केवल गहने पहनने की छूट थी। उन्हें सोने या चांदी के गहने धारण करने का अधिकार नहीं था। पत्थर का कंठहार उनके गुलाम होने की निशानी था। वह भी काले ग्रेनाइट पत्थर के। उल्लंघन करने पर उन्हें पेड़ से बांधकर कोड़े की सजा दी जाती थी। पत्थर के कंठहार वे चाहे जितने पहन सकती थीं। उसी तरह का ‘आभूषण’ उनकी कलाई पर भी बंधा रहता था। कानों के लिए लोहे की बालियां पहननी पड़ती थीं, जिन्हें ‘कुनुक्कु’ कहा जाता था। अय्यंकालि दलितों की सर्वांग मुक्ति चाहते थे। महिलाएं भी उनके मुक्ति आंदोलन का हिस्सा थीं।

गुलामी के प्रतीक उन आभूषणों से मुक्ति के लिए अय्यंकालि ने दक्षिणी त्रावणकोर के नियत्तिंकर नामक स्थान से आंदोलन की शुरुआत की। सभा में आई स्त्रियों से उन्होंने कहा कि वे दासता के प्रतीक इन आभूषणों को त्यागकर सामान्य ब्लाउज धारण करें। इसपर सवर्णों की तुरंत प्रतिक्रिया हुई। उन्होंने धमकी दी कि पुरानी परिपाटी को तोड़ने का अंजाम बुरा हो सकता है। लेकिन अय्यंकालि को शुरू से ही ऐसी चुनौतियों का सामना करने की आदत थी। उसके बाद दंगे शुरू हो गए। स्थिति उस समय और बिगड़ गई जब सेंट्रल त्रावणकोर के पुलायार नेता गोपालदास ने स्त्रियों की सभा बुलाकर पत्थर के आभूषणों को फेंक कर, सामान्य बलाउज पहनने का आवाह्न किया। उसकी परिणति त्रावणकोर के अलग-अलग क्षेत्रों में दंगों के रूप में हुई। दलित यहां तक कि औरतें भी पीछे हटने या समझौता करने को तैयार न थीं। दंगों में दोनों ही पक्षों को भारी नुकसान हुआ। दलित हार मानने को तैयार न थे। अंततः दोनों पक्षों को समझौते के लिए बाध्य होना पड़ा। जीत अय्यंकालि की ही हुई। सरकार, नैय्यर नेताओं और अय्यंकालि के बीच समझौता हुआ। उसके बाद क्यूलोन नामक कस्बे में दलित औरतों की बड़ी सभा बुलाई गई। उसमें अय्यंकालि तथा नैय्यर सुधारवादी नेता चेगंनाचेरी परमेश्वरन पिल्लई की उपस्थिति में सैंकड़ों दलित महिलाओं ने गुलामी के प्रतीक ग्रेनाइट के कंठहारों को उतार फेंका।

आदर्श जनप्रतिनिधि

एक जनप्रतिनिधि के रूप में भी अय्यंकालि पुलायारों तथा दलितों के अधिकार की लड़ाई लड़ते रहते थे। पुलायारों के पास न तो अपना घर होता था, न ही खेती योग्य जमीन। खेतिहार मजूदर के रूप में, बेगार की तरह अपनी सेवाएं प्रदान करते थे। भूस्वामी उन्हें कभी भी बाहर निकाल सकता था। ‘श्री मूलम् प्रजा सभा’ के सदस्य के रूप में उन्होंने पुलायारों की सामाजिक-आर्थिक हैसियत, उनकी गरीबी और उसके कारण हो रही दुर्दशा के बारे में उन्होंने कई बार मुद्दा बैठकों में उठाया था। उन्होंने मांग की थी कि पुलायारों को रहने के लिए आवास तथा खाली पड़ी जमीन उपलब्ध कराई जाए। स्थानीय अधिकारी उनके पुलायारों द्वारा खेती योग्य बनाई गई भूमि को पहले ही उन्हें आवंटित कर चुके थे। लेकिन जमींदार उसमें बाधा बने हुए थे। अय्यंकालि द्वारा निरंतर उठाई गई मांग का परिणाम यह हुआ कि वैंगनूर से 6 किलोमीटर दूर विलंपिंसला में 300 एकड़ कृषि भूमि पुलायारों को आवंटित कर दी। इसके अतिरिक्त निदंमनगाद क्षेत्र के वूझमल्लुकल गांव में 200 सौ एकड़ भूमि उन्हें और दी गई। कुल 500 एकड़ भूमि को 500 पुलायार परिवारों के बीच, एक एकड़ प्रति परिवार के हिसाब से बांट दिया गया। यह अय्यंकालि की बड़ी जीत थी। भू-दास के रूप में खेती करते आए पुलायार अब अपनी भूमि पर खेती कर, आजादी से रह सकते थे।

विधानपरिषद के सदस्य के रूप में अय्यंकालि ने पुलायारों की सरकारी नौकरियों में अनुपस्थिति और बेरोजगारी का मुद्दा उठाया था। उन्होंने कहा था कि जब तक पुलायार अपेक्षित योग्यता प्राप्त नहीं कर पाते, उन्हें निचले दर्जे की या मजूदरी के काम पर लगाया जाए। उसके फलस्वरूप अनेक पुलायार युवाओं को सरकारी नौकरी मिली। उन्होंने धर्म पर सीधा हमला नहीं किया। मगर वे पुलायारों को पुरोहितों और धार्मिक आडंबरों से बाहर आने, आचरण की पवित्रता पर जोर देने तथा संगठित रहने की निरंतर अपील करते रहे। उनके प्रयासों से पुलायारों तथा दूसरे दलितों को 1912 में प्रजा सभा में मनोनीत किया गया, जिससे दलितों की राजनीतिक भागीदारी का रास्ता प्रशस्त हुआ।

अय्यंकालि 1904 से ही दमे की बीमारी का शिकार थे। मगर स्वास्थ्य की चिंता न करते हुए वे अपने समाज के कल्याण, उसे न्याय दिलाने के लिए निरंतर जूझते रहते थे। इसके लिए उन्होंने पूरे त्रावणकोर की यात्राएं की थीं। अंततः 24 मई 1941 को उन्होंने पूरी तरह से बिस्तर पकड़ लिया। और 18 जून 1941 को मृत्यु की उस अनथक न्याय-योद्धा ने संसार छोड़ दिया। उम्र में अय्यंकालि ज्योतिराव फुले से 45 वर्ष छोटे थे, और पेरियार से 16 वर्ष बड़े। केरल में उन्होंने वही काम किया, जो फुले ने महाराष्ट्र और पेरियार ने तमिलनाडु में किया था। यह बात अलग है कि अय्यंकालि के योगदान की उपेक्षा हुई। आधुनिक केरल में स्त्रियां बाकी देश की अपेक्षा यदि ज्यादा साक्षर और जागरूक हैं तो उसका बहुत कुछ श्रेय अय्यंकालि को जाता है।

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

1.   नंबूदरी ब्राह्मणों के बारे में ‘दि त्रावणकोर स्टेट मैनुअल’ भाग-एक के हवाले से वी. नगम अइया ने उनकी विचित्र-सी परंपरा का उल्लेख किया है। तदनुसार नंबूदरी ब्राह्मण आमतौर पर संपन्न होते हैं और बड़े आरामदायक घरों में रहते हैं। उनकी स्त्रियों को बाकी लोगों की नजरों से बचाकर पूरी तरह नियंत्रण में रखा जाता है। जब वे घर से बाहर निकलती हैं तो उन्हें कपड़ों या छाते से ढककर रखा जाता है।  औरतों को उनकी सुंदरता के अनुसार सम्मान दिया जाता है, वे सोने के ब्रेसलेट पहनती हैं। परिवार में सबसे बड़े पुत्र को, वह भी केवल अपनी जाति में विवाह करने का अधिकार होता है। उसके छोटे भाई नैय्यर या निचली जाति की स्त्रियों के साथ, केवल अस्थायी विवाह कर सकते हैं। इसके लिए ‘संबंधम’ की प्रथा है। कई बार नंबूदरी ब्राह्मणों को अतिरिक्त सम्मान देने के लिए भी ‘संबंधम’ बनाए जाते थे। ऐसे संबंध से जन्मी संतान को न तो अपने पिता के नाम-गौत्र पर दावेदारी का अधिकार होता था, न ही उसकी संपत्ति पर। नैय्यर नेताओं के विरोध और लंबे आंदोलन के बाद यह प्रथा अब समाप्त हो चुकी है।

2. चार्ल्स अलेन, कोरोमंडल: एक पर्सनल हिस्ट्री आफ  इंडिया।

3. पुलायार सहित दूसरी अछूत और पिछड़ी जातियां, जनजातियां स्वयं को भारत का मूलनिवासी मानती थीं। नैय्यर, ब्राह्मण आदि कथित उच्च जातियों के लोग, उनकी निगाह में ‘दिकु’(बाहरी) थे। यह मान्यता आर्य-आव्रजन थियरी की पुष्टि करती थी।

4 त्रिवेणी संघ का बिगुल 

5. स्वेदशाभिमानी 2 मार्च 1910, ग्रीश्मा ग्रीश्मम द्वारा Mahathma Ayyankali : The Revolutionary, The Legend   में उद्धृत

6. ग्रीश्मा ग्रीश्मम, Destiny Changes, published in International Journal of Multidisciplinary and Current Research

समाजवाद और सामाजिक न्याय

सामान्य

स्वाधीनता आंदोलन के दौरान तय था कि स्वतंत्र भारत का मूल चरित्र समाजवादी राज्य का होगा. गांधी घोषित रूप में समाजवादी नहीं थे, मगर अंत्योदय का उनका विचार समाजवाद और सामाजिक न्याय की आवश्यकता एवं उनके महत्त्व को रेखांकित करता है. आधुनिक भारत के निर्माताओं में अग्रणी डॉ. आंबेडकर मूलतः अर्थशास्त्री थे. उनके विचार और संविधान का स्वरूप कल्याण राज्य की अवधारणा का समर्थन करते हैं. आगे चलकर उन्होंने स्वयं को समाजवादी नेताओं तथा संगठनों से अलग रखा तो उसके इतर कारण थे. यूरोपीय जीवनशैली में पले-बढ़े जवाहरलाल नेहरू रूसी क्रांति से प्रभावित थे. उनके नेतृत्व में भारत मिश्रित अर्थव्यवस्था वाला देश बना.

समाजवादी चेतना और इंदिरा गांधी

इंदिरा गांधी द्वारा संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवाद’ शब्द जोड़ने को कुछ लोग राजनीति मानते हैं. राजे-रजबाड़ों के प्रिवी पर्स की समाप्ति, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, भूमि सुधार, महिलाओं के लिए समान वेतन जैसे कानून, देश को समाजवादी राज्य में ढालने की नीति का ही हिस्सा था. उन्हीं के कारण इंदिरा को सामंतों, राजे-रजबाड़ों और जमींदारों के आक्रोश का सामना करना पड़ा था. वे जनसंघ के बैनर तले उनके विरोध में संगठित होने लगे. बिहार सर्वाधिक भू-असमानता वाले प्रांतों में से था. वहां जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में शुरू हुआ ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन, ठेठ प्रतिक्रियावादी आंदोलन था. परिणामस्वरूप जनता पार्टी की सरकार बनी. जगजीवन राम के बजाय मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री मनोनीत किया गया, जो तत्कालीन नेताओं की दलित और पिछड़ा विरोधी मानसिकता को दर्शाता था.

‘जनता पार्टी’ का प्रयोग भले असफल रहा हो, ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन पूर्णतः निष्फल नहीं था. उससे पिछड़ी तथा निचले क्रम की जातियों में राजनीतिक चेतना का संचार हुआ था. भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल उसी के गर्भ से निकली हुई पार्टियां हैं. इनमें ‘भारतीय जनता पार्टी’ समाज के प्रभुवर्ग के हितों की रक्षा को समर्पित है. यह उसने पिछले पांच वर्षों के दौरान सिद्ध भी किया है.

त्रिवेणी संघ’ और लालू प्रसाद यादव

लालू यादव ने ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था. मीसा कानून के अंतर्गत जेल भी गए थे. परंतु जिस राजनीति के आधार पर कालांतर में उन्होंने सफलता प्राप्त की, आज भी बिहार की राजनीति में उनकी प्रतिष्ठा हैーउसकी जमीन ‘त्रिवेणी संघ’ द्वारा तैयार की गई थी. निचली-मंझोली जातियों को संगठन का महत्त्व समझाने के साथ-साथ पहली बार, त्रिवेणी संघ ने ही ब्राह्मणवाद से मुक्ति का नारा दिया था. उसने सामाजिक न्याय के पक्ष में भी आवाज उठाई थी. मगर राजनीतिक पटल पर ‘सामाजिक न्याय’ का प्रतिनिधित्व हुआ ‘बहुजन समाज पार्टी’ के उभार से, जिसका गठन मान्यवर कांशीराम द्वारा फुले और आंबेडकर के सपनों को साकार करने के लिए किया गया था.

साम्यवादी नेताओं की सवर्ण मानसिकता

भारत में अस्सी के दशक तक समाजवाद देश के सर्वाधिक लोकप्रिय शब्दों में से था, जबकि ‘सामाजिक न्याय’ का कोई नामलेवा न था. क्योंकि जिस वर्ग के लिए ‘सामाजिक न्याय’ अपेक्षित है, वह राजनीतिक समझ और अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की ओर से बेखबर था. समाजवाद के नाम पर जो भी नेता सत्ता में आए, किसी न किसी रूप में वे सभी पूंजीवाद और सामंतवाद का पोषण करते रहे. साम्यवादियों के आदर्श श्रीपाद अमृत डांगे(आदिम साम्यवाद) और करपात्री(मार्क्सवाद और रामराज्य) जैसे लेखक बने. डांगे यज्ञ को ‘आर्य साम्य-संघ की सामूहिक उत्पादन पद्धति’ मानते थे तो करपात्री के लिए रामराज्य, मार्क्सवाद से कहीं अधिक उन्नत राजनीतिक व्यवस्था थी. भारतीय साम्यवादी दलों पर आज भी इसी मानसिकता के नेताओं का कब्जा है.

समाजवाद की कमजोरी

संविधान की प्रस्तावना का हिस्सा बनने तथा लोहिया जैसे नेताओं के बावजूद भारत में यदि समाजवादी आंदोलन असफल रहा है तो उसके पर्याप्त कारण हैं. समाजवादी व्यवस्था में समस्त संसाधन राज्य के अधिकार में होते हैं. अपेक्षा की जाती है कि राज्य संसाधनों का प्रबंधन इस प्रकार करेगा कि उनका लाभ ऊपर से नीचे तक सभी नागरिकों को समानरूप से मिल सकेगा. विशेषकर उन्हें जो किसी न किसी कारण से वंचना का शिकार रहे हैं. समाजवाद की कमजोरी है कि वह संसाधनों को राज्य के अधिकार में पहुंचाने के बाद मौन हो जाता है. राज्य पर नियंत्रण करने वाली शक्तियां कौन-सी हैं? उनका मिजाज कैसा है? उनका आचरण निष्पक्ष है अथवा पक्षपातपूर्णーइसपर वह ध्यान नहीं देता. यदि उन संस्थाओं पर खास वर्गों का कब्जा हो, उनका जो सत्ता को अपना विशेषाधिकार मानते हैं, तो समाजवाद के सारे लाभ धरे के धरे रह जाते हैं. समाजवाद की ढुलमुल परिभाषा का लाभ उठाकर हिटलर जैसा तानाशाह भी समाजवादी होने का दावा करता था. चीनी राष्ट्रपति झी जिनपिंग अपनी साम्राज्यवादी नीतियों को ‘चीनी मिजाज का समाजवाद’ कहकर आगे बढ़ा रहे हैं.

समाजवाद और सामाजिक न्याय

समाजवादी राज्य के मायने क्या हैं, उसका कर्तव्य क्या होना चाहिए, संसाधनों के हाथ में आने के बाद कैसे उनका उपयोग न्यायसंगत और कल्याणकारी राज्य की मान्यताओं के अनुरूप होーयह दृष्टि सामाजिक न्याय समाजवाद को देता है. भारत जैसे देश में जहां समाज जाति और वर्ग के नाम पर बुरी तरह बंटा हो, वहां समाजवाद की सफलता सामाजिक न्याय संबंधी नीतियों के कार्यान्वन पर निर्भर करती है. सामाजिक न्याय अपेक्षाकृत आधुनिक विचार है. वह राज्य के कर्तव्य, उसकी न्यायभावना का संकेतक है और कसौटी भी. सामाजिक न्याय समाजवाद की दुर्बलताओं, उलझनों और असमंजसों के बीच अपनी जगह बनाता है. साथ ही राज्य को कल्याणोन्मुखीफैसले लेने में मदद करता है.

चाहें तो लोकतंत्र को भी इनमें जोड़ सकते हैं. अधिनायकवादी राज्य में संसाधनों का प्रयोग शासक वर्ग और उसके चहेतों के वैभव-विलास तक सिमट जाता है. ऐसे राज्य में न तो समाजवाद फल-फूल सकता है, न ही सामाजिक न्याय के लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है. फासीवादी तथा पूंजीवादी राज्यों में सामाजिक न्याय संभव ही नहीं है. कुल मिलाकर सामाजिक न्याय, समाजवाद और लोकतंत्र तीनों एक-दूसरे के पूरक और अस्तित्व की कसौटी हैं.

भारत में आर्थिक असमानता के अलावा जातीय असमानता जैसी विकृत और अमानवीय व्यवस्था भी है. समानता-आधारित समाज के लिए, जाति पर प्रहार करना आवश्यक है. ‘जाति का उच्छेद’ शीर्षक से तैयार किए गए ऐतिहासिक व्याख्यान में डॉ. आंबेडकर की हिंदुवादियों से यही अपेक्षा थी. उस समय उन्हें भाषण देने से रोक दिया गया था. आज भी जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त छद्म समाजवादी और साम्यवादी भारतीय राजनीति में भरे पड़े है. उनपर तथा ‘भारतीय जनता पार्टी’ जैसे दक्षिणपंथी दलों पर अंकुश रखने के समाजवादी तथा सामाजिक न्याय को समर्पित दलों की एकजुटता आवश्यक है. इसमें लोकतंत्र और संविधान का आदर करने वाले दल भी शामिल हो जाएं तो सोने पर सुहागा.

हाल के आम चुनावों में इस दिशा में कुछ कदम आगे बढ़े हैं. इसकी सफलता भारतीय राजनीति की अगली दिशा तय करेगी.

ओमप्रकाश कश्यप

अरस्तु का न्याय-दर्शन

सामान्य
समानता का आशय यह नहीं है कि व्यक्ति की पसंदों का ध्यान न रखा जाए. न्याय इसमें है कि प्रत्येक नागरिक को विकास के समान अवसर प्राप्त हों. इसके लिए अवसरों की समानता तथा किसी कारणवश विकास में पिछड़ चुके हैं नागरिकों को विशेष प्रोत्साहन देकर मुख्यधारा में लाने की कोशिश करते रहनान्याय और समाजीकरण दोनों की प्रथम कसौटी है.

न्याय की व्याख्या करते हुए अरस्तु उसके दोनों रूपों पर विचार करता है. पहला वह जिसके बारे में सामान्यजन सोचता है कि न्याय कानून के तत्वावधान में अदालतों के जरिये प्राप्त होता है. इसके साथसाथ वह मनुष्य के आचरण एवं व्यवहार की व्याख्या करता है. न्याय का यह रूप नागरिक और राष्ट्रराज्य के कानून के अंतर्संबंध को दर्शाता है. उन अनुबंधों की ओर इशारा करता है, जिनसे कोई नागरिक सभ्य समाज का नागरिक होने के नाते जन्म के साथ ही जुड़ जाता है. प्रकारांतर में वह बताता हे कि आदर्शोंन्मुखी समाज में मनुष्य का आचरण एवं कर्तव्य किस प्रकार के होने चाहिए, ताकि समाज में शांति, सुशासन और आदर्शोन्मुखता बनी रहे. प्रायः सभी समाजों में कानून को नकारात्मक ढंग से लिया जाता है. बातबात पर कानून का हवाला देने वालीं, उसके अनुपालन में लगी शक्तियां प्रायः यह मान लेती हैं कि बुराई मानवस्वभाव का स्थायी लक्षण है. जो बुरा है, उसे केवल दंड के माध्यम से बस में रखा जा सकता है. कि मानवव्यक्तित्व पर आज भी अपने उन पूर्वजों के लक्षण शेष हैं जो कभी जंगलों में जानवरों के बीच रहा करते थे. कुछ व्यक्तियों में पाशविक वृत्ति ज्यादा प्रभावी होती है. ऐसे लोगों पर बलप्रयोग उन्हें अनुशासित रखने का एकमात्र उपाय है. इसलिए सभ्यताकरण के आरंभ से ही दंडविधान की व्यवस्था प्रत्येक समाज और संस्कृति में रही है. इसे पुष्ट करने के लिए धर्म और संस्कृति से जुड़े ऐसे अनेक किस्से हैं, जिनसे हमारा संस्कार बनता है. स्वर्गनर्क की कल्पना भी इसी का हिस्सा है. उनमें से अधिकांश पर विजेता संस्कृति का प्रभाव है. आधुनिक संदर्भों में वह भले ही लोकतंत्र और मानवस्वातंत्र्य का विरोधी हो, प्राचीन इतिहास, धर्म और संस्कृति का हिस्सा होने के कारण उसे धरोहर के रूप में सहेजा जाता है.

प्राचीनकाल में जब अदालतें नहीं थीं, तब न्याय करने की जिम्मेदारी बस्ती के मुखिया या समूह के वरिष्ठ सदस्य जिसकी निष्पक्षता असंद्धिग्ध होकी होती थी. इस्लामी शासन के दौरान यह जिम्मेदारी काजी के कंधों पर आ पड़ी. राजशाही में राजा को सर्वेसर्वा माना जाता था. दरबार में आए मामलों की सुनवाई के लिए न्यायाधिकारी और दंडाधिकारी दोनों की जिम्मेदारियां वही संभालता था. दंडविधान का आधार परंपरागत अथवा लिखितअलिखित विधिसंहिताओं को बनाया जाता था. किसी न किसी रूप में वे सभी धार्मिक उपादानों द्वारा शासितअनुशासित होती थीं. उसका लाभ धार्मिक कार्यकलापों में लिप्त ‘धंधेबाज’ उठाते थे. उदाहरण के लिए भारत में एक जैसे अपराध के लिए ब्राह्मणों तथा शूद्रों के लिए अलगअलग दंडविधान था. ब्राह्मणों को मृत्युदंड निषिद्ध था, जबकि ब्राह्मणेत्तर वर्गों के लिए इस तरह की कोई पाबंदी न थी. चूंकि दिए गए दंड के विरुद्ध अपील के बहुत कम अवसर थे, इसलिए जनसाधारण मजबूरी में दैवीय न्याय की उम्मीद करने लगता था. आज भी ऐसे लोग कम नहीं हैं. उनका मानना है कि एकमात्र ईश्वर सच्चा न्यायकर्ता है. जिन्हें अपराधी होने के बावजूद इस जन्म में दंड नहीं मिला, वे ईश्वर के दरबार में अवश्य ही दंडित किए जाएंगेइस विश्वास के साथ साधारणजन बड़े से बड़े अनाचार को पचाते चले जाते थे. आधुनिक समाजों में न्याय की जिम्मेदारी अदालतों पर होती है. उनका आचरण संवैधानिक मर्यादाओं से आबद्ध रहता है. इसलिए यह व्यवस्था न्याय के अपेक्षाकृत अनुकूल है. इसके अनुसार राज्य अपने नागरिकों से अपेक्षा करता है कि वे कानून सम्मत व्यवहार करें, ताकि राज्य को उनके जीवन में हस्तक्षेप की आवश्यकता ही न पड़े. जो व्यक्ति अपने आचरण द्वारा दूसरे व्यक्ति के जीवन में अमर्यादित हस्तक्षेप करता है, वह राज्य को अपने जीवन में हस्तक्षेप करने का अधिकार दे देता है. दूसरों के जीवन में अवांछित और अमर्यादित हस्तक्षेप को राज्य अपराध मानता है. दूसरों के जीवन में अवांछित हस्तक्षेप करने वाला व्यक्ति अपनी निजता का अधिकार भी गंवा देता है. तदनुसार राज्य को समाज द्वारा प्राप्त शक्तियों के बल पर उस व्यक्ति के जीवन में हस्तक्षेप करने का अधिकार स्वतः हासिल हो जाता है. चूंकि राज्य पर समाज में शांति और अनुशासन बनाए रखने की जिम्मेदारी भी होती है, इसलिए वह अपराधी के विरुद्ध दंडनीति के तयशुदा प्रावधानों के अनुसार कार्रवाही करता है. न्याय का यह लोकप्रचलित रूप व्यक्ति के कर्तव्य पालन से जुड़ा है, जिसमें विचलन होते ही दंडनीति प्रभावी हो जाती है. प्रायः इसे सभ्यताकरण की अनिवार्यता के रूप में अपनाया जाता है. जनसाधारण न्याय के इसी रूप से सर्वाधिक प्रभावित होता है.

न्याय का दूसरा रूप कानून और अदालतों से प्राप्त होने वाले न्याय से अलग है. पहला जहां राज्य के अधिकारपक्ष के निकट है, दूसरा उसके कर्तव्य पक्ष की महत्ता एवं कार्यक्षेत्र को व्यापकता दर्शाता है. सिसरो के अनुसार राज्य जनता का सर्वाधिकार है. चूंकि राज्य का गठन लोगों द्वारा सामान्य हितों की पूर्ति हेतु किया जाता है, अतएव उसका वही कृत्य न्यायपूर्ण कहा जाएगा, जो उसके द्वारा संपूर्ण विवेक, निष्पक्षता, समानता और सर्वजन के विकास की चाहत के साथ उठाया जाता है. वह राज्य की नैतिकता तथा उसके गठन के औचित्य को दर्शाता है. अरस्तु इसे और भी स्पष्ट कर देता है. उसके अनुसार अन्याय केवल दूसरों के जीवन में अवांछित हस्तक्षेप, उसका प्रताड़न; अथवा मान्य कानूनों का उल्लंघन करने तक सीमित नहीं है. बल्कि दूसरों के अधिकारों का हनन करना, उन्हें उनके अधिकारों से वंचित कर देना, जो नागरिकों के प्रति राज्य का कर्तव्य भी हैंअन्याय की सीमा में आता है. आखिर मनुष्य के अधिकारों की पहचान कैसे हो? इस बात में कैसे अंतर किया जाए कि जो अधिकार किसी एक व्यक्ति का है, वह दूसरे का भी है अथवा नहीं है? तथा उनके आकलन की कसौटी क्या है?

सवाल और भी हैं. जब हम कहते हैं कि भरपेट भोजन प्राप्त करना मनुष्य का अधिकार है? सभ्य समाज में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं प्रत्येक व्यक्ति को आसानी से प्राप्त होनी चाहिए, तो इस तर्क का आधार क्या होता है? क्यों न मान लिया जाए कि जो व्यक्ति जीवन में अतिरिक्त रूप से सफल होते हैं, उसके पीछे उनकी अपनी मेहनत और प्रतिभा का भी कमाल होता है. लोकहित में आवश्यक है कि समाज के सभी सदस्य एकदूसरे के हितों का ध्यान रखें. लेकिन यह भी जरूरी है कि योग्य व्यक्ति को उसकी योग्यता का लाभ खुद भी प्राप्त हो. परंतु इतनेभर से समस्या का समाधान नहीं हो जाता. मान लीजिए, दो मजूदर किसी कारखाने में काम करते हैं. उनमें एक की क्षमता दस नग प्रतिदिन तैयार करने की है. दूसरा उतने ही समय में बीस नग बना देता है. तो जो कारीगर बीस नग प्रतिदिन बनाता है, उसके उत्पादन क्षमता का लाभ दस नग प्रतिदिन बनाने वाले के साथ बांट देना क्या उसके प्रति अन्याय नहीं होगा? यदि किसी व्यक्ति को लगे कि उसके उत्पादन का लाभ उसे नहीं मिल रहा है, तो क्या वह अपनी पूर्ण क्षमता के साथ लगातार काम कर पाएगा? अपने लाभ को दूसरों में बंटते देख क्या वह हतोत्साहित नहीं होगा? चलताऊ ढंग से सोचें तो बात एकदम सच जान पड़ेगी. पूंजीवादी अर्थतंत्र कहता है, श्रमिक को उसके श्रम का पूरा लाभ मिले. दावा करता है कि केवल वही है जो श्रमिक को उसके श्रम का पूरा लाभ दिला सकता है. लाभ का आकलन केवल भौतिक मुद्रा के आधार पर करने वाले पूंजीवाद की निगाह में यही न्याय है. ऐसे ही तर्क देकर वह श्रमिकों को बांटे रखता है. वहां इसे स्पर्धा का नाम दिया जाता है. परिणाम यह होता है कि जो मजदूर बीस नग प्रतिदिन बनाता है, वह निरंतर आगे निकलता जाता है. जबकि दस नग बनाने वाला कारीगर स्पर्धा में पिछड़ता चला जाता है. वृहद संदर्भों में यह स्पर्धा दो कारखानों के बीच भी देखी जा सकती है. चूंकि समाज में विशिष्ट लोगों की संख्या बहुत कम होती है, अधिकांश दस नग प्रतिदिन बनाने वाले कामगार जितने ही कार्यक्षम होते हैं. इसलिए अपने उत्पाद का सारा लाभ खुद रखने वाला कामगार स्पर्धा में निरंतर आगे निकलता चला जाता है. इससे समाज में आर्थिक विभाजन बढ़ता चला जाता है. इसका समाधान क्या है? अरस्तु इतना उदार नहीं है कि वह बीस नग बनाने वाले के श्रमलाभों वाले कामगार के लाभ को दस नग प्रतिदिन बनाने वाले श्रमिकों के बीच बांटने पर सहमत हो जाए. इस असमानता को वह प्राकृतिक मानता है. अरस्तु के समय में मौद्रिक लाभ की अवधारणा इतनी पुष्ट नहीं थी, जैसी वह आज है. इसलिए उसका समाधान भी आज के संदर्भों में ही खोजना पड़ेगा.

ऊपर के उदाहरण में मान लिया गया है कि बीस नग प्रतिदिन बनाने वाले कारीगर की उत्पादन क्षमता केवल उसकी अपनी उपलब्धि है. यहां व्यक्ति के कौशलनिर्माण में उसके परिवेश के प्रभाव जो एक तरह से उसका योगदान ही है, बिसरा दिया गया है. मनुष्य और उसके समाज के बीच का संबंध आपसी लेनदेन का होता है. जो समाज को अधिक लौटाते हैं, या जिनसे समाज को अधिकाधिक लौटाने की अपेक्षा की जाती है, वे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में समाज से अधिक ग्रहण भी करते हैं. यदि किसी विद्वान की बात करें तो पहले वह पीढ़ियों से अर्जित ज्ञान का अध्ययनमनन करता है, तदनंतर अपने विचारों को सामने लाता है. इस तरह से वह अपने पूर्ववर्ती विद्वानों का कर्जदार होता है. अतएव जो व्यक्ति समाज से जितना अधिक ग्रहण करता है, समाज को उसी अनुपात में वापस लौटाना उसका कर्तव्य भी है. इसमें मौद्रिक लेनदेन आवश्यक नहीं है. इसलिए इसका समाधान भी अकेले मौद्रिक लेनदेन द्वारा संभव नहीं है. उचित यही है कि मौद्रिक लाभ के स्थान पर सामाजिक लाभ की अवधारणा को स्थापित किया जाए. शांति और खुशहाली के लिए आवश्यक है कि समाज में आर्थिक विभाजन न्यूनतम हो. कुशल कामगार को यह समझाया जाए कि उसकी उपलब्धियां केवल उस अकेले की नहीं हैं. उनमें उसके परिवेश जिसमें उसके मित्र, संबंधी, पड़ोसी यहां तक कि दुश्मन भी सम्मिलित हैं, सभी का साझा है. इसी तरह धनपति को मालूम होना चाहिए कि उसके लाभ पर सिर्फ उसका अधिकार नहीं है, उन श्रमिकों और कारीगरों का भी योगदान है, जो रातदिन मेहनत करने अपने मालिक की समृद्धि को संभव बनाते हैं. अरस्तु राज्य से अपेक्षा रखता है कि दस नग बनाने वाले को निरंतर प्रोत्साहित करता रहे. और बीस नग प्रतिदिन बनाने वाले कामगार को इस बात के लिए राजी करे कि वह मौद्रिक लाभों के बजाए सामाजिक लाभों पर भी ध्यान दे, ताकि दो भिन्न उत्पादनक्षमता वाले कामगारों के बीच अधिकतम समानता संभव हो सके.

समाजीकरण मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है. यदि केवल किसी एक व्यक्ति के सुखदुख, गुणदोष का मामला हो तो समाजीकरण की आवश्यकता ही न पड़े. समाज न तो विशिष्ट व्यक्ति की चयन है, न ही व्यक्तियों की विशिष्ट पसंद. मनुष्यों की सामूहिक सृष्टि है. उसका सृजन सामूहिक रूप से सर्वकल्याण के उद्देश्य से किया जाता है. समाज की जरूरत उस व्यक्ति को भी पड़ती है, जिसकी आवश्यकता व्यक्ति के अस्तित्व से जुड़ी है. इसकी इच्छा वह व्यक्ति भी करता है, जो अतिरिक्त रूप से गुणी और संपन्न है. इसके कारणों में मामूली अंतर हो सकते हैं. जो व्यक्ति जीवन में अतिरिक्त रूप से कामयाब होते हैं, वे अपनी सफलता से दूसरों को प्रभावित करना चाहते हैं. प्रजा न हो तो राजा का होना अर्थहीन हो जाए. इसी तरह अमीर को अपनी अमीरी का प्रदर्शन करने के लिए गरीब की जरूरत पड़ती है. कह सकते हैं कि मनुष्य की किसी भी उपलब्धि का महत्त्व दूसरों के साथ, उन सबके सापेक्ष है. असफलता सफलता की पहली और निर्णायक कसौटी है. असफल व्यक्ति जितने अधिक संख्या में होंगे, सफलता का मूल्य उतना ही अधिक आंका जाएगा. यही प्रवृत्ति न्याय की जरूरत पर बल देती है.

ऊपर संकेत किया गया है कि किसी व्यक्ति की सफलता केवल उसके गुणों पर निर्भर नहीं करती. इस बात पर भी निर्भर करती है कि उस व्यक्ति को जीवन में कामयाबी दर्ज कराने के लिए कितने अवसर और संसाधन प्राप्त थे. तुलना यदि प्राकृतिक स्तर पर हो तो सफल और असफल व्यक्तियों में बहुत अंतर नहीं होता. युद्ध में किसी राजा की जीत केवल इसपर निर्भर नहीं करती कि वह स्वयं कितना बहादुर है, बल्कि उसकी ओर से लड़ रहे सैनिकों की संख्या तथा राजा के प्रति उनकी निष्ठा पर भी निर्भर करती है. इसलिए अपनी सत्ता की सुरक्षा और स्थायित्व के लिए शासक वर्ग स्वामीभक्ति को महिमामंडित करता रहता है. युद्ध में सैनिक और उनके अस्त्रशस्त्र राजा के लिए संसाधन होते हैं. वे राजा को केवल उसकी निजी योग्यता के आधार पर प्राप्त नहीं होते. उनमें से अधिकांश उत्तराधिकार में प्राप्त होते हैं. यदि राजा केवल अपने दम पर, आमनेसामने की लड़ाई करे तो उसकी सफलता की संभावना बहुत सीमित स्तर की होगी. कारखानेदार के मामले में सैनिकों का स्थान पूंजी ले लेती है. संभव है उसमें से पूंजी का बड़ा हिस्सा उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त हुआ हो. यदि यह न भी हो और किसी उद्यमी ने अपने जीवन में ही बेशुमार प्रगति की है तो इसका कारण केवल यह है कि व्यवस्था के चलते उसके कारखानों में कार्यरत श्रमिकों ने अपना श्रमोत्पाद, मामूली वृत्तिका के बदले कारखानेदार को समर्पित किया है. जैसे सैनिकों द्वारा जान की बाजी लगा देना किसी राजा के साम्राज्यवादी मनसूबों को साकार बनाता है. वैसे ही न्यूनतम मजदूरी के बदले अधिकतम श्रमोत्पाद पर कारखानेदार का अधिकार मान लेना और स्वयं मामूली वृत्तिका से संतुष्ट होकर रातदिन काम में जुटे रहना, पूंजीपति को कामयाबी दिलाता है. उद्यमी की सफलता का स्तर बताता है कि श्रमिकों ने उसके उत्पादनस्तर को शिखर तक पहुंचाने के लिए जीजान से काम किया है. यहां त्याग का अर्थ न्यूनतम वृत्तिका के बदले मालिक को अधिकतम मुनाफा कमाकर संतुष्टि प्राप्त कर लेना है. जाहिर है सफलता चाहे राजा की हो या व्यापारी की, उसमें क्रमशः प्रजा अथवा श्रमिकों का योगदान होता है. यहां पूंजी और राष्ट्रवाद दोनों ही वर्चस्वकारी शक्तियों के स्वार्थ से जुड़ै होते हैं. दोनों की प्रवृत्ति मानवविवेक पर कब्जा कर लेने की होती है. अंतर केवल इतना है कि पूंजीवाद अपनी चमकदमक और भौतिक सुखों का प्रलोभन देकर लोगों को आकर्षित करता है. राष्ट्रवाद के पास उग्र राष्ट्रप्रेम के सिवाय नागरिकों को देने के लिए कुछ नहीं होता. इसलिए वह भावुक प्रतीकों के माध्यम से लोगों को लुभाने का प्रयास करता है.

अमीरगरीब, राजाप्रजा के इस कृत्रिम विभाजन से बाहर निकलकर देखें तो प्राकृतिक स्तर पर उनके बीच कोई मौलिक अंतर नजर नहीं आता. राजाप्रजा, अमीरगरीब सभी को एकसमान जीवनचक्र से गुजरना पड़ता है. धूपवर्षाशीत सभी को लुभाते हैं. सभी को भूखप्यास लगती है. यह ठीक है कि मनुष्य में प्राकृतिक स्तर पर अंतर होता है. एक मनुष्य शक्तिशाली हो सकता है और दूसरा शक्तिविपन्न. परंतु प्राकृतिक स्तर पर शक्तिशाली और शक्तिविपन्न व्यक्ति में अंतर का अनुपात उतना नहीं होता, जितना सामाजिक स्तर पर अमीरगरीब, शक्तिशाली एवं शक्तिविपन्न के बीच होता है. न प्रकृति अपने स्तर पर किसी प्रकार का भेदभाव करती है. चूंकि समाजीकरण की मूलभूत अवधारणा समानता के सिद्धांत पर गढ़ी होती है, राज्य भी इसी दावेदारी के साथ जनसमर्थन प्राप्त करता है कि वह धनीनिर्धन, शक्तिसंपन्न एवं शक्तिविपन्न के बीच बहुत अंधिक अंतर नहीं करेगाइसलिए यदि किसी राज्य में ऐसा है तो समझ लेना चाहिए कि वह अपने गठन के मूलभूत उद्देश्यों से भटका हुआ है. दूसरे शब्दों मे समानता का आशय किसी व्यक्ति से राजा या पूंजीपति बनने के अवसर छीन लेना नहीं है. बल्कि जनसाधारण को इस आधार पर होने वाले भेदभाव से मुक्ति दिलाना है. सफलता सदैव सापेक्षिक होती है, परंतु न्याय निरपेक्ष. इस आधार पर अरस्तु न्याय पर विमर्श के आरंभ में ही उसकी दो कसौटियां बना लेता है. पहली के अनुसार तयशुदा कानून की मर्यादा में रहना न्याय है. जिन कार्यों को राज्य की विधिसंहिता स्वीकारे उनका अनुपालन न्याय है. जिनसे राज्यसमाज में शांतिसुव्यवस्था स्थापित होती हो, वह न्याय है. न्याय का दूसरा रूप अपने साथ बाकी लोगों की स्वतंत्रता और समानता का सम्मान करना है. जबकि अन्याय वह है जो कानून के विरुद्ध है. जिससे दूसरों के अधिकारों का हनन होता है. जिससे किसी व्यक्ति को उसके विधिसम्मत देय से वंचित कर दिया जाता है.

समानता का आशय यह नहीं है कि व्यक्ति की पसंदों का ध्यान न रखा जाए. न्याय इसमें है कि प्रत्येक नागरिक को विकास के समान अवसर प्राप्त हों. इसके लिए अवसरों की समानता तथा किसी कारणवश विकास में पिछड़ चुके हैं नागरिकों को विशेष प्रोत्साहन देकर मुख्यधारा में लाने की कोशिश करते रहनान्याय और समाजीकरण दोनों की प्रथम कसौटी है. अरस्तु ने न्याय को सर्वसाधारण के सामान्य हित की संज्ञा दी है. उसके अनुसार न्याय के दो पक्ष होते हैं. पहला व्यक्ति पक्ष और दूसरा वस्तु पक्ष. व्यक्ति का संबंध भी प्रकारांतर में वस्तुओं से होता है. उसके अनुसार न्याय का तकादा है कि सभी मनुष्यों को समान वस्तुएं निर्दिष्ट की जानी चाहिए. पर कैसे? यहां एक पेंच है जिससे समानता की हमारी सार्वत्रिक अवधारणा संकट में पड़ जाती है. समानता का विचार न तो रूढ़ है न ही व्यक्तिनिरपेक्ष. सभी व्यक्तियों को सभी अवसर दिए जाने का अभिप्राय यह नहीं है कि कोई व्यक्ति अपनी रुचि या अन्यान्य कारण से किसी पद के अयोग्य है तो समानता के सिद्धांत के अनुसार उसे उस पद की जिम्मेदारी सौंप देनी चाहिए. समानता की सीधीसी अवधारणा है कि सभी व्यक्तियों को सभी अवसर प्राप्त हों. तदनुसार प्रत्येक नागरिक को यह अवसर मिलना चाहिए कि यदि वह स्वयं को राजपद के योग्य बना सके, तो वह पद उसकी पहुंच से दूर नहीं है. राज्य का हित भी इसमें है कि नागरिकों को यथायोग्य पद प्राप्त हों. राजा उसी को चुना जाए जो राजा बनने के योग्य है. अरस्तु के अनुसार व्यक्ति के अधिकार उसकी योग्यता पर निर्भर करते हैं. तदनुसार राजा बनने का अधिकार उसी को मिलना चाहिए जो राजपद के योग्य है. श्रेष्ठ राज्य अपने लिए कसौटियां स्वयं तय करता है, जिनके माध्यम से वह स्वयं को नियंत्रित एवं विकासरत रख सकता है. वीरता, व्यक्तित्व, व्यवहार कुशलता, दूरदर्शिता, बुद्धिमानी जैसे उदात्त चारित्रिक गुण यदि राजा बनने के लिए अपरिहार्य हैंतो समानता के सिद्धांत के अनुसार जिस व्यक्ति में ये सभी गुण पर्याप्त मात्रा में मौजूद हों, उसे राजा बनने का अधिकार मिलना चाहिए. इसपर उसके परिवार अथवा उन गुणों को जिनका राजा के लिए अपेक्षित गुणों से कोई संबंध नहीं है, कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए. ‘पॉलिटिक्स’ के तीसरे खंड के 12वें अध्याय में अरस्तु बासुंरीवादक का उदाहरण देता है

यदि बहुत से व्यक्ति बासुंरी वादन की कला में निपुण हों तो उनमें से किसी व्यक्ति को सिर्फ इस कारण अच्छी या अधिक बांसुरियां नहीं दी जानी चाहिए, कि उसका संबंध किसी उच्च कुल से है.’

आगे वह स्पष्ट करता है

बासुंरीवादन एक कला है, जिसका व्यक्ति के कुल से कोई संबंध नहीं है. इसी तरह यदि कोई व्यक्ति बासुंरी वादन की कला में पीछे है, मगर कुल और सुंदरता के मामले में बाकी प्रतिस्पर्धियों से आगे तो भी अच्छी अथवा सर्वाधिक बासुंरिया किसी वाद्यकला में निपुण व्यक्तियों को ही दी जानी चाहिए….कुलपरिवार की सदस्यता के आधार पर भी व्यक्ति अच्छी बांसुरियों की दावेदारी कर सकता है, परंतु उसमें उन गुणों की प्रधानता अपरिहार्य है, जो बांसुरी वादन की कला के लिए अत्यावश्यक हैं.’

आशय है कि श्रेष्ठ वस्तुएं यथायोग्य व्यक्तियों को प्राप्त हों. उन्हें प्राप्त हों, जिन्हें उनकी आवश्यकता है और जो उनका श्रेष्ठतम उपयोग करने में सक्षम हैं. परंतु योग्यता का मापदंड क्या हो? प्रत्येक व्यक्ति अपनी दृष्टि में योग्यतम होता है. फिर जो अधिकतम की दृष्टि में श्रेष्ठतम है, उसके भी आलोचक हो सकते हैं. इसे ‘एथिक्स’ में समझाया गया है. अरस्तु की यह पुस्तक नीतिशास्त्र की श्रेष्ठतम कृतियों में से है. सर्वथा मौलिक. इसके माध्यम से अरस्तु ने नैतिकता को उस दौर में परिभाषित किया, जब राज्य पर धर्म का नियंत्रण था. उत्तराधिकार में जो भी प्राप्त हो, उसे बचाए रखने और उसके माध्यम से अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को शिखर तक ले जाने के लिए सारे उद्यम किए जाते थे; फिर उन्हें धर्म का नाम दे दिया जाता था. अरस्तु के अनुसार न्याय ज्ञानविज्ञान की विभिन्न शाखाओं का अंतिम और वास्तविक लक्ष्य है. मनुष्य जो ज्ञानार्जन करता है, वह तब तक अनुयोगी या अल्पउपयोगी माना जाएगा, जब तक उससे किसी न किसी रूप में न्याय की पुष्टि न होती है. ताकि प्रत्येक नागरिक को यह विश्वास हो जाए कि जो उसका प्राप्य है, वह उसको यथासमय प्राप्त होता रहेगा. आखिर यह कैसे सुनिश्चित हो कि व्यक्ति को जो अधिकार है, वह उसे प्राप्त हैं. यहां राज्य की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है. राज्य का कर्तव्य है कि वह यह सुनिश्चित करे कि उसके राज्य में किसी भी नागरिक के अधिकार बाधित न हों. न ही किसी के साथ कोई पक्षपात हो. यह ध्यान रखते हुए कि समानता न्याय का उद्देश्य है, लेकिन एकमात्र समानता को भी न्याय का पर्याय मान लेना अनुचित होगा. उदाहरण के लिए दो भिन्न व्यक्तियों की कल्पना कीजिए, जिन्हें खराद मशीन पर कोई पुर्जा बनाने को दिया जाता है. मान लीजिए उनमें से पहला दस नगों का उत्पादन करता है और दूसरा उतनी ही अवधि में बीस नगों का. चूंकि व्यक्ति का अपने श्रम पर अधिकार होता है, इसलिए कानून और नैतिकता दोनों दृष्टि में यह उचित माना जाएगा कि जिस व्यक्ति ने अधिक उत्पादन किया है, उसकी अतिरिक्त लाभ में आनुपातिक साझेदारी हो. पूंजीवादी व्यवस्था इसी को न्याय मानती है. उसके अनुसार इससे समाज में स्पर्धा बढ़ती है. चीजें सस्ती होती जाती हैं. उसकी भरपाई के लिए उत्पादक उत्पादनवृद्धि का सहारा लेता है. उससे रोजाकर के अवसर बढ़ते हैं. उसके फलस्वरूप हुई उत्पादन वृद्धि का लाभ पूरे समाज को पहुंचता है. पूंजीवादी राज्यों की सरकारें भी कमोबेश वही सोचती हैं. परंतु राज्य की मजबूरी है कि उसे समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संतुलन बनाकर रखना पड़ता है. उसके लिए वे अधिक आय वाले व्यक्तियों पर कराधान की सीमा बढ़ाकर बाकी लोगों को संतुष्ट करने का प्रयास करती हैं. यह केवल दिखावा ही होता है, क्योंकि एक ओर जहां अधिक करउगाही का का नाटक किया जाता है, वहीं दूसरी ओर पूंजीपतियों को विभिन्न प्रकार की छूट देकर, ओनेपौने दाम में राज्य के संसाधन लुटाकर प्रसन्न रखा जाता है.

यदि शतप्रतिशत ऐसा हो जाए कि व्यक्ति को ठीक उतना ही प्राप्त हो, जितनी उसकी क्षमता है, तो सोचिए क्या यह जंगल के न्याय जैसी व्यवस्था न होगी? जंगल में भी प्राणी अपने सामर्थ्य के अनुसार शिकार करते हैं. चिड़िया मामूली कीड़ेमकोड़ों का शिकार करके पेट भरती है. शेर और चीता भारीभरकम सांड को भी अपना शिकार बन सकते हैं. जानवर के लिए उसका शिकार एक तरह से उसका उत्पाद ही है. अतः न्याय दृष्टि से समानता व्यक्ति और समाजनिरपेक्ष नहीं होती. उसमें परिस्थिति अनुसार बदलाव होते रहते हैं. लेकिन समानता ऐसी पहेली भी नहीं है, जिसे समझा न जा सके. आखिर समानता किसकी और कैसे? सामान्य सिद्धांत के अनुसार असमान व्यक्तियों का हिस्सा समान नहीं हो सकता. समानता की न्यूनतम शर्त नागरिकों को न्याय की अबाध प्रतीति है. यह ठीक है जन्म के आधार पर, स्थितियों के आधार पर लोगों की कार्यक्षमता में अंतर होता है. राज्य और समाज का गठन का उद्देश्य भी यही है कि व्यक्तिमात्र की इन दुर्बलताओं का असर उसकी खुशियों पर न पड़े. जहां कोई नियम या व्यवस्था न हो. दूसरों के सुखदुख की परवाह किए बिना सभी मनमानी पर उतारू रहते हों. वहां राज्य की भूमिका नगण्य मानी जाएगी. यह नियम कि व्यक्ति को ठीक उतना ही प्राप्त हो, जितना उसका सामर्थ्य हैप्रकारांतर में समाज को इस स्वार्थी सोच की प्रेरणा बन सकता है. इससे समाजीकरण का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा. अतः राज्य का कर्तव्य है कि वह उस नागरिकों को जो किसी कारण पिछड़े हुए हैं, विशेष प्रोत्साहन देकर दूसरों के बराबर लाने का प्रयास करे. साथ में यह विश्वास भी बनाए रखे की समाज की एकता, किसी भी व्यक्तिगत उपलब्धि से बड़ी है.

अरस्तु न्याय के पर्याय के रूप में सद्गुण को स्थापित करता है. राज्य के संदर्भ में ‘न्याय राज्य का सद्गुण’ है. उसकी व्याप्ति राज्य और उसके नागरिकों के आचरण से आंकी जानी चाहिए. न्याय वह है जिसे सभी नागरिक सही मानें. जिसकी श्रेष्ठतम के रूप में प्रत्येक नागरिक अपने जीवन में कामना करे. ठीक इसी तरह अन्याय वह है जो अधिकतम नागरिकों को नियमविरुद्ध और अनुचित प्रतीत होता हो. किंतु न्याय और अन्याय, उचित और अनुचित की यह बहुत सरलीकृत व्याख्या है. यह दोनों को एक दूसरे का विरोधी दर्शाती है. सामान्यतः यह सही भी दिखता है. न्यायालय का कोई फैसला यदि बहुसंख्यक वर्ग को अनुचित और अन्यायपूर्ण लगता है तो वह उचित और न्यायपूर्ण हो ही नहीं सकता. लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि न्याय और अन्याय, उचित और अनुचित को लेकर सभी नागरिकों की एकसमान राय हो. लोगों का न्यायबोध उनकी संस्कृति और मानसिक प्रशिक्षण पर भी निर्भर करता है. राजशाही में राजा और उसके परिवार की सुरक्षा शेष जनसमाज की सुरक्षा से महत्त्वपूर्ण मानी जाती थी. उसके लिए अनेकानेक सैनिक की बलि दे देना राजधर्म माना जाता था. अधिकांश युद्ध राजाओं के व्यक्तिगत अहं और राजलिप्सा का परिणाम होते थे. अपने समग्र परिणाम में वे प्रजा के लिए अहितकारी होते थे. बावजूद इसके प्रजा अपने राजा और उसकी व्यवस्था को सराहती थी. क्योंकि उसका मानसिक प्रशिक्षण इसी तरह का होता था. जनतांत्रिक समाजों में नागरिकों का सोच स्वतंत्र होता है. निर्णयविशेष को कुछ लोग उचित मान सकते हैं और कुछ अनुचित. कुछ ऐसे नागरिक भी हो सकते हैं जिन्हें वह निर्णय आंशिक अनुचित और अन्यायपूर्ण अथवा आंशिक उचित और न्यायपूर्ण लगता हो. इस तरह लोगों की दृष्टि के अनुसार न्याय और अन्याय के अनेक रूप संभव हैं. लेकिन राज्य की दृष्टि में न्याय का केवल एक रूप होता है. सभी नागरिकों के साथ समान वर्ताब और समाज में कल्याण विस्तार. ऐसे समाजों में कर्तव्यपरायण मनुष्य, न्यायसंगत बने रहने के लिए वही करता है जो समाज की निगाह में उचित है. वैसा ही सोचता है, जिसे न्यायसंगत माना जा सके.

वे कौनसी स्थितियां हैं, जब मनुष्य के कर्म को न्यायपूर्ण नहीं माना जा सकता? इसे समझना मुश्किल नहीं हैं. उपर्युक्त विवरण के आधार पर देखें तो दो मुख्य स्थितियां हैं जिनके आधार पर मनुष्य के कृत्य को अनुचित या अन्यायपूर्ण कहा जा सकता है. पहला जब वह कानून तोड़ता है. ऐसे काम करता है जो राज्य तथा समाज की निगाह में अनुचित हैं. दूसरी स्वार्थपरता. समाज में रहते हुए उससे अधिक ग्रहण करना जितना अधिकार है. अपने अलावा दूसरों की आवश्यकता पर विचार ही न करना. बल्कि जिसपर दूसरों का अधिकार है, उसे भी हड़प कर जाना. अरस्तु के अनुसार उचित होने के लिए कानून सम्मत और निस्वार्थ होना आवश्यक है. जो कानूनसम्मत नहीं है. जो अपने आचरण में निष्ठावान तथा दूसरों के प्रति ईमानदार नहीं है, इसलिए वह उचित भी नहीं है. उचित की बहुमान्य परिभाषा उपलब्ध संसाधनों, अवसरों और कर्तव्यों में न्यायपूर्ण हिस्सेदारी है. ऐसी सहभागिता जिससे दूसरों के अधिकार निर्बंध रहें. सच यह भी है कि समाज में रहते हुए अपने हिस्से से अधिक लेना हमेशा अन्यायपूर्ण नहीं होता. कई बार अपने हिस्से को छोड़ देना या दूसरों का हिस्सा भी हड़प जाना प्रशंसा का पात्र बना देता है. जब कोई भूखा व्यक्ति अपने आगे रखी थाली, ज्यों की त्यों दूसरे भूखे प्राणी को सौंप देता है तो उसकी नैतिकता हमें भावाकुल कर देती है. ठंड से ठिठुरते किसी व्यक्ति को अपने वस्त्र उतारकर दे देना मानवचरित्र की उदात्तता से परचाता है. इसी प्रकार सारे के सारे दुर्योग को, जिससे बहुतसे लोगों के अनिष्ट की संभावना हो, अपने हिस्से समेट लेना भी उचित और सराहनीय माना जाएगा. ऐसी कई कहानियां हैं, जिनमें अपनी दोषी संतान को बचाने के लिए पिता उनके सारे अपराध अपने सिर ले लेते हैं. समुद्रमंथन की मिथकथा के अनुसार शिव सबके हिस्से का विषपान करके ही नीलकंठ कहलाए थे. किसी व्यक्ति में कम बुराइयां हों, यह भी अच्छी बात है. अब सवाल है कि कानून क्या है? उससे व्यक्ति का हित सधता है या राज्य का. अथवा व्यक्ति और राज्य दोनों का?कुछ विद्वानों का मानना है कि श्रेष्ठ नागरिक आत्मानुशासित होता है. उसे अपने और दूसरों के सुखदुख की चिंता होती है. इसलिए वह किसी के जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करता. ऐसे व्यक्ति को कानून की आवश्यकता नहीं पड़ती. यह बात सही हो सकती है. परंतु हमेशा सही हो आवश्यक नहीं है. कानून अदालती प्रक्रिया मात्र नहीं है. कानून का पलड़ा हालांकि समाज के शीर्षस्थ वर्गों की ओर झुका होता है. फिर भी उसमें कई ऐसी खूबियां होती हैं, जिनकी अनुपस्थिति समाज की एकता और अखंडता के लिए खतरा बन सकती है. उनके अभाव में प्रत्येक नागरिक ‘श्रेष्ठ आचरण’ की परिभाषा अपने हिसाब से करेगा. प्रकारांतर में सब मनमानी उतर आएंगे. परिणामस्वरूप समाज के गठन का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाएगा. इसलिए कानून के रूप में सुनिश्चित आचारसंहिता का होना आवश्यक है.

अरस्तु के अनुसार कानून विधायी व्यवस्था है. राज्य यदि नागरिकों के प्रति उदार है तो कानून नागरिकअधिकारों के पक्ष में झुका पाएगा और मानवमात्र के अधिकारों का ध्यान रखेगा. यदि कानून का गठन कुछ लोगों की मर्जी से, स्वार्थभावना के साथ हुआ है तो उसका झुकाव शिखर पर मौजूद अल्पतंत्र अथवा कुलीनतंत्र के पक्ष में नजर आएगा. केवल उन्हीं लोगों के भले की सोचेगा है जो किसी न किसी रूप से सत्ता से जुड़े हों. निरंकुशता की भावना से गठित कानून केवल तानाशाह की मर्जी से संचालित होंगे. सही मायने में तो वे तानाशाह के स्वार्थ से इतर कुछ हो ही नहीं सकते. इससे हम राज्य में न्याय की मौजूदगी को परखने के लिए कुछ मापदंड बना सकते हैं. ऐसे कानून जिनसे राज्य की उदारता झलकती हो, जो समाज के अधिक से अधिक लोगों के कल्याण की भावना से बनाए गए हों, वे कानून न्यायसंगत माने जाएंगे. जबकि ऐसे कानून जिनसे अल्पसंख्यक वर्गों की स्वार्थसिद्धि होती हो, अथवा जिनका गठन तानाशाह की इच्छाओं को दूसरों पर लादने के लिए हुआ हो, उन्हें न्यायसंगत मानने में हमें संकोच होगा. जिस राज्य में पहली कसौटी का पालन होगा, वह कल्याणराज्य के मापदंडों के अनुरूप होगा. उसमें शुभ की व्याप्ति होगी. तदनुसार न्यायकारी शक्तियों का सत्ताप्रेम अथवा उनपर शासक वर्गों का नियंत्रण शासन की निरंकुशता का परिचायक होता है.

इस विवेचन से न्याय को समझा जा सकता है. न्याय हमेशा दूसरों के प्रति होता है. लेकिन मनुष्य दूसरों के प्रति तभी न्याय कर सकता है, जब उसे अपने प्रति न्याय की उम्मीद हो. इस तरह न्याय सद्गुण है. व्यक्ति का समाज और समाज का अपने नागरिकों के प्रति कल्याणभाव जिससे झलकता हो, वह सद्गुण है. समाज में सद्गुण से श्रेष्ठ कुछ नहीं होता. वह निर्मेल्य होता है. अरस्तु के अनुसार ‘न्याय कुल मिलाकर संपूर्ण सद्गुण या सद्गुणों का समुच्चय है. वह इसलिए सद्गुण है, क्योंकि वह व्यक्ति का अपने पड़ोसियों, अपने मित्र, हितैषी यहां तक कि आलोचकों के प्रति न्यायभाव को दर्शाता है. कुल मिलाकर सद्गुण किसी भी समाज की श्रेष्ठतम उपलब्धि हैं. यदि कोई व्यक्ति केवल अपने मित्रों और सगेसंबंधियों के प्रति न्यायपूर्ण आचरण करता है और बाकी समाज के प्रति वैसा करने से बचता है, तो उसका आचरण न्याय की कसौटी पर स्वार्थपूर्ण माना जाएगा. दूसरे शब्दों में न्याय सद्गुण है और सद्गुण वह है, जिसे कोई व्यक्ति दूसरों के प्रति कल्याणभाव के साथ करता है. न्यायपूर्ण व्यक्ति वह है जो दूसरों की हितसिद्धि के लिए बिना किसी स्वार्थभाव से प्रयासरत रहता है. और ऐसा व्यक्ति जो केवल स्वार्थसिद्धि में लीन रहता है, दूसरों को किसी प्रकार का कष्ट पहुंचाता है अथवा उन वस्तुओं पर कब्जा करता है, जो किसी दूसरे का अधिकार हैं, अन्यायी की श्रेणी में आएगा.

मनुष्य क्या है? कैसा है, इसकी पहचान सभा में की जाती है. अकेले मनुष्य की अच्छाई या बुराई किसी काम की नहीं होती. सामाजिक प्राणी होने के नाते, ‘सभा ही मनुष्य के चरित्र का दर्पण है.’ अच्छाई व्यक्तिमात्र का आंतरिक गुण है. मगर इसकी तब तक कोई उपयोगिता नहीं है जब तक उसका कोई सार्वजनिक प्रयोजन न हो. कह सकते हैं कि मानवचरित्र की कसौटी दूसरों के प्रति उसका व्यवहार है. तदनुसार जो केवल अपना हित चाहता है, दूसरों के लाभालाभ से जिसे कोई सरोकार नहीं है, जिसे दूसरों के कष्ट द्रवित नहीं करते, वह अश्रेष्ठ है. वह नागरिक धर्म का पालन नहीं कर पाता. इसलिए किसी न किसी रूप में वह कानून का उल्लंघन करता है. दूसरी ओर जो सभी के साथ समभाव से पेश आता है. उदारता जिसका स्वभाव है. जो अपने अधिकारों के साथसाथ दूसरों के अधिकारों का भी ध्यान रखता है. वह श्रेष्ठता का प्रतीक है. अश्रेष्ठ और श्रेष्ठ के व्यवहार में जो अंतर है, वह अन्याय और न्याय, गैरकानूनी और कानूनी में भी है. न्याय और सद्गुण के अंतर को स्पष्ट करने के लिए अरस्तु की व्याख्या बहुत सरल है. उसके अनुसार न्याय और सदगुण को व्यक्ति के आचरण द्वारा परखा जा सकता है. व्यक्ति दूसरे के संदर्भ में सदाचरण करे, उसकी अच्छाइयां जो लोककल्याण के निमित्त उद्घाटित हों, जो दूसरों के साथ कल्याणभाव से पेश आए वह न्याय प्रिय है. और उसका आचरण न्यायोचित कहा जाएगा. जिनसे मनुष्य के चरित्र आदर्श बने, वह सद्गुण हैं. इसी तरह जब कोई मनुष्य दूसरों पर बुरी नीयत के साथ हमला करता है, उसे नुकसान पहुंचाता है. दूसरे के साथ बदसलूकी करता है या उसके न्यायपूर्ण हिस्से को अपना कहकर छीन लेता है, तो उससे मनुष्य के चरित्र की बुराई लक्षित होती है. और उसका व्यवहार गैरकानूनी तथा अन्यायपूर्ण माना जाएगा. अन्याय और बुराई परस्पर जुड़े होते हैं. अरस्तु यहां व्यक्ति और समाज के अथवा व्यक्ति और शेष जनसमाज के संबंधों के आधार पर न्याय और अन्याय की तुलना करता है. राज्य को बीच में नहीं लाता. उसके अनुसार राज्य समाज का सत्कर्म है, जिसे वह नागरिकों के कल्याण के लिए अपनाता है. समाज की भांति राज्य भी मनुष्य की रचना है. राज्य मनुष्य के राजनीतिक बोध की निर्मिति है. इस कसौटी के अनुसार न्याय सद्गुण का कोई हिस्सा न होकर संपूर्ण सद्गुण है. बिना सद्गुणों के न्याय की अभिकल्पना संभव भी नहीं है.

प्रश्न है कि क्या न्याय और सद्गुण परस्पर पर्यायवाची हैं? यदि ‘हां’ तो उनकी अलगअलग पहचान कैसे संभव है? यदि नहीं तो क्या उन्हें एकदूसरे से जोड़कर, पारस्परिक संबंधों में परखा जा सकता है? अरस्तु के अनुसार न्याय संपूर्ण सद्गुण है. जहां न्याय है, वहां सद्गुण हैं. वह समाज में शुभत्व की मौजूदगी के लिए पूरी तरह जिम्मेदार हैं. शुभत्व माने जड़चेतन सभी के प्रति समान रूप से कल्याण का भाव. फिर उसी के अनुरूप कार्य करने की चेष्ठा. इसी तरह अन्याय या अनाचार विचारों, कर्तव्यों या भावनाओं का वह हिस्सा है जो व्यक्ति और समाज में दुर्गुणों की उपस्थिति और/या दुराचरण के स्तर को दर्शाता है. लेकिन जैसे सद्गुण की संकल्पना तय है, उसी प्रकार सदाचरण की संकल्पना भी सभी के लिए एक समान हो, आवश्यक नहीं है. कल्पना कीजिए दो व्यक्ति हैं. उनमें से एक बदचलनी या भ्रष्टाचरण करता है, और उससे धनार्जन करता है. दूसरा व्यक्ति बदचलनी के नाम पर अपना धन लुटाता है तो उनमें से दूसरे को भ्रष्टाचरण का दोषी माना जाएगा. चूंकि पहला व्यक्ति अपनी गांठ से धन लुटाकर भ्रष्टाचरण करता है, इसलिए उसे कंजूस शायद ही कोई मानेगा. हालांकि सामाजिक नैतिकता की दृष्टि से दोनों ही समान रूप से दोषी माने जाएंगे. परस्त्रीगमन विशिष्ट किस्म का दोष है. उसे मानवमन का विकार या व्यक्ति का समाज के प्रति अनाचार समझकर क्षमा भी किया जा सकता है. लेकिन यदि बदलचनी के दौरान वह अपने साथी को नुकसान करता है, उसको किसी प्रकार की चोट पहुंचाता है या उससे समाज को किसी प्रकार की हानि पहुंचती तो वह सीधे तौर पर उस व्यक्ति या समाज के प्रति अन्याय माना जाएगा.

बुद्ध ने मध्यम मार्ग की अनुशंसा की थी. अरस्तु ने भी मध्यम मार्ग को ही श्रेष्ठ माना है. ऐसा मार्ग जिसमें राज्य और नागरिक सब मिलकर अपनेअपने अधिकारों का भोग करते हों. जिसमें नागरिक समाज इतना शक्तिशाली हो कि सत्ताओं की मनमानी पर अंकुश लगा सके. इतना विवेक उसमें हो कि शासकवर्ग की नाकामियों को समझकर उनका समाधान खोज सके. क्या अकेला नागरिक ऐसा कर सकता है? इस प्रश्न का उत्तर इस तरह भी खोजा जा सकता है कि क्या कोई व्यक्ति केवल अपने हित को राज्य का हित मानता है? यदि वह ऐसा नहीं करता. यदि वह संपूर्ण समाज के या समाज के अधिसंख्यक वर्ग के हित में अपना हित देखता है, तो ऐसे नागरिक के सामने अकेले पड़ जाने की समस्या नहीं झेलनी पड़ती. समाज इतना अनुदार कभी नहीं होता कि अपना हित साधने वाले का अहित कर सके. हां, स्वार्थी शक्तियों के हाथों में झूल रहा राज्य यह कर सकता है. ऐसे राज्य का सामना जनता की सामूहिक शक्ति के साथ किया जाना चाहिए. ठीक हे कि राज्य के पास कानून की ताकत होती है. अकेले नागरिक के सापेक्ष राज्य बहुत बड़ी शक्ति है. लेकिन नागरिकों को यह समझना चाहिए कि राज्य को उसकी शक्तियां जनता की ओर से प्राप्त होती हैं. जनसमर्थन ही राज्य की ताकत को वैधता प्रदान करता है. अतः आवश्यक है कि राज्य जनता की इच्छा और हित को देखते हुए अपनी शक्तियों का प्रयोग करे. निरंकुश राज्य के हाथों में शक्तियां का केंद्रित हो जाना जनता के लिए हानिकारक होता है.

आशय है कि राज्य को अधिकारसंपन्न बनाने वाली ताकत का मूलस्रोत जनता होती है. परंतु जनता आमतौर पर यह माने रहती है कि राज करना उसका काम नहीं हैं. वह यह भी मान लेती है कि जो राज करते हैं वे विशिष्ट गुणों से संपन्न होते हैं. कि राज करना विलक्षण गुण है, जो जन्मजात या कुछ खास लोगों में ही होता है. कुछ मनोवैज्ञानिक भी इसका समर्थन करते हैं. परंतु हमें यह समझना चाहिए कि मनोवैज्ञानिक धरती से परे के जीव नहीं होते. वे समाज के बीच रहकर, समाज से ही अपने निष्कर्ष ग्रहण करते हैं. कल्पना के घोड़ों की बागडोर अनुभव के हाथों में होती है. मनुष्य अपने अनुभवों की परिधि से बाहर बहुत लंबा नहीं झांक सकता. यदि किसी मनोवैज्ञानिक को ऐसे राज्य में छोड़ दिया जाए जहां सभी बराबर हों, लोग शांतिपूर्ण जीवन जीते हों, उनके बीच किसी प्रकार की स्पर्धा न हो, तो उसका एकमात्र यही निष्कर्ष होगा कि मानव मन बहुत सरल और सहजगम्य है. कुल मिलाकर जनता की यह भ्रांति कि राज्य उससे स्वतंत्र सत्ता है, राज्य को निरंकुश बनने का अवसर देती है. शिखर पर मौजूद लोग स्वयं को सामान्य से हटकर मानने लगते हैं. चूंकि अकेले व्यक्ति के पास इतनी शक्ति नहीं होती कि शिखर पर बैठे लोगों को उनकी चूकों की ओर आगाह कर सके, इसलिए वह हालात से समझौता किए रहता हे. उसे केवल संगठन के बल पर चुनौती दी जा सकती है. परंतु उसके लिए आवश्यक है कि लोग सामान्य हितों को पहचानकर बड़ी संख्या में संगठित हां. उनमें पर्याप्त अधिकार चेतना हो, जिससे वह शासन की मनमानियों के विरोध में खड़े हो सकें. अरस्तु के अनुसार न्याय संपूर्ण सद्गुण है. इसलिए सीमित संदभो्र्रं में न्याय सद्गण का ही हिस्सा है. अरस्तु ने समानता को न्याय का पूरक बताया है. जहां असमानता है, वहां न्याय संभव नहीं है. परंतु समानता को परिभाषित करना भी सरल नहीं है. समानता कैसी और किसकी? अरस्तु के अनुसार व्यक्तियों तथा वस्तुओं के वितरण का अनुपात न्यायसंगत होना चाहिए. तदनुसार यदि व्यक्ति एकसमान नहीं हैं, तो उनको मिलने वस्तुएं भी असमान होंगी. लेकिन इसमें दो प्रकार की स्थितियां संभव हैं. पहली दो व्यक्ति जो समान हैं, उन्हें एक समान वस्तुओं की प्राप्ति न हो. दूसरी व्यक्ति असमान हों और उन्हें समान मात्रा में वस्तुएं प्राप्त हों. यह ऐसी उलझन है जिसका निपटारा आसान नहीं है. इसके समाधान के लिए प्रायः कह दिया जाता है कि लोगों में वस्तुओं का वितरण ‘प्राथमिकता के आधार’ पर हो. परंतु प्राथमिकता का भी सर्वमान्य मानक नहीं है. राज्यों की प्रकृति और परिस्थिति के अनुसार प्राथमिकता के मायने बदलते रहते हैं. लोकतांत्रिक समाजों में जन्म के आधार पर ही नवजात के नागरिक अधिकार सुरक्षित मान लिए जाते हैं. भले ही वह उनके बारे में कुछ भी जानता हो. जहां अल्पतंत्र अथवा कुलीनतंत्र है, वहां संसाधनों का बंटवारा कुलीनों की संख्या को आधार बनाकर किया जाता है. जनसाधारण की जरूरतों पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता. इसी प्रकार निरंकुश राज्य में संसाधनों के विभाजन का कोई नियम नहीं होता. सबकुछ तानाशाह की इच्छा से निर्धारित होता है. तो भी इससे यह नियम खारिज नहीं होता कि न्याय की कसौटी के अनुसार वस्तुओं का विभाजन आनुपातिक होना चाहिए. यानी व्यक्ति को यह लगना चाहिए कि समाज और राज्य उसकी रुचि एवं जरूरतों का ख्याल रखने में सक्षम हैं. और उनका प्रत्येक प्रयास इसी दिशा में जाता है.

अरस्तु को विज्ञान का संस्कार बचपन से प्राप्त था. न्यायसिद्धांत की व्याख्या करते हुए वह आवश्यकतानुसार गणित की मदद भी लेता है. असमानता समाज में स्तरीकरण करती है. दो व्यक्तियों के बीच की असमानता यदि उसी अनुपात में आगे बढ़े तो किन्हीं दो जोड़ों के बीच अधिकतम और न्यूनतम आय के बीच कम से कम चार गुने का अंतर होगा. उदाहरण के लिए ‘क’, ‘ख’, ‘ग’ और ‘घ’ के बीच यदि ‘क’ के पास ‘ख’ से दो गुनी संपदा है तथा ‘ग’ के पास ‘घ’ से दो गुनी, तो ‘क’ के पास ‘घ’ से न्यूनतम चार गुनी समृद्धि होगी. इस तरह समृद्धि अनुपात बढ़ने से आर्थिक असमानता, विशेषकर अधिकतम और न्यूनतम के बीच का अंतर बहुत तेजी से बढ़ता है. इसलिए सभी व्यक्तियों को समान आंकना, उन्हें समान अवसर देना और आय में किसी प्रकार का पक्षपात न बरतना ही न्याय है. इस उदाहरण में यदि ‘क’ और ‘ग’ को जोड़ दिया जाए तो उनकी संपत्ति लगभग ‘ख’ के बराबर हो जाएगी. अरस्तु ने इसे ‘वितरणात्मक न्याय’ कहा है. हालांकि उदार लोकतांत्रिक सरकारों में जहां सबको साथ लेकर चलने की प्रवृत्ति होती है, यह कार्य संभव नहीं है. हालांकि समानता की ओर प्रतिबद्धता के साथ आगे बढ़ना उनकी जरूरत होती है.

क्रमश:

© ओमप्रकाश कश्यप

डॉ. आंबेडकर : आधुनिक भारत के असली वास्तुकार

सामान्य

भारत में भक्ति या नायकपूजा ने, दुनिया के किसी और हिस्से के बरअक्स, राजनीति में कहीं ज्यादा बड़ी भूमिका निभाई है. धर्म के हिस्से के रूप में भक्ति आत्मा की मुक्ति की राह भले हो सकती है. परंतु राजनीति में, भक्ति अथवा नायकपूजा देश में लोकतंत्र के अवसान और तानाशाही की ओर ही ले जाएगी.’—डॉ. भीमराव आंबेडकर, संविधान सभा में दिए गए भाषण का अंश. 

आंबेडकर और गांधी

बीसवीं शताब्दी भारत के इतिहास में बेहद महत्त्वपूर्ण है. उसमें भारत न केवल आजाद हुआ, बल्कि विश्व-पटल पर स्वतंत्र-स्वयंभू गण-राज्य के रूप में भी उभरा. उस शताब्दी ने भारत को दो महानायक दिए. पहले डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर जिन्हें लोग प्यार और सम्मान से ‘बाबा आंबेडकर’ कहते हैं. उन्होंने सामाजिक उत्पीड़न और वंचना के शिकार लोगों के लिए आजीवन संघर्ष किया. वे अपने समय के सर्वाधिक विद्वान और सुविज्ञ नेताओं में से थे. जीवन में तरह-तरह के अपमान, उपेक्षा और उलाहने सहते हुए वे आगे बढ़े. उन लोगों को आवाज दी जिन्हें दमन सहते-सहते चुप्पी साधने की आदत पड़ चुकी थी. वे सही मायने में ‘मूकनायक’ बने. वंचितों के हित में सतत संघर्ष कर जननायक कहलाए. वे अपने जीवन में ही किंवदंति बन चुके थे. नेहरू उन्हें ‘विद्रोह का प्रतीक’ मानते थे. जबकि उनके समकालीन नेता उन्हें ‘पथ-प्रदर्शक’ का सम्मान देते थे. उन्होंने भारतीय समाज को समानता, सद्भाव. न्याय एवं बंधुता के रास्ते पर लाने के लिए सतत संघर्ष किया. दूसरे गांधी, जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम का लंबे समय तक सफल नेतृत्व किया. अहिंसा और सत्याग्रह जिनके बारे में पहले केवल आकादमिक जगत में चर्चा होती थी—को वे राजनीति में लाए तथा सचाई, शुचिता और सेवाभाव के कारण लंबे समय तक भारतीय राजनीति की धुरी बने रहे. कांग्रेस को उसके अभिजात चरित्र से छुटकारा दिलाकर उसे जनसाधारण तक लेकर गए. नतीजा यह हुआ कि आजादी की मांग जो पहले उच्चवर्गीय नेताओं की नरम-गरम राजनीति का हिस्सा थी, जनसाधारण की अस्मिता के संघर्ष में ढलने लगी. अंततः देश आजाद हुआ. गांधी अपने प्रशंसकों के बीच महात्मा कहलाए. आंबेडकर और गांधी, अपने समय में दोनों ही लोकप्रियता की सीमाओं को पार कर देने वाले नेता थे. गांधी यदि ‘राष्ट्र पिता’ थे, तो डॉ. आंबेडकर ‘राष्ट्र निर्माता’, युग-प्रवर्त्तक, ‘आधुनिक भारत का वास्तुकार’ कहलाने के सर्वथा योग्य हैं. यहां आंबेडकर को पहले स्थान पर रखा गया है. उन्हें यह सम्मान देने का पर्याप्त आधार है. स्वतंत्रता संग्राम भले ही गांधी के नेतृत्व में लड़ा गया हो, भारत को आधुनिक राष्ट्र-राज्य के रूप में ढालने में आंबेडकर का योगदान गांधी से कहीं ज्यादा है. जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे, जान जाएंगे.

डॉ. आंबेडकर उन लोगों के नेता थे जो एक साथ दो गुलामियां झेल रहे थे. राजनीतिक गुलामी के अलावा सामाजिक दासता, जिनके शिकार वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी होते आए थे. ऐसे लोगों के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अर्थहीन थी, जब तक सामाजिक दासता से मुक्ति न हो. ऐसे ही सामाजिक-सांस्कृतिक दलन का शिकार रहे लोगों के मान-सम्मान और आजादी के निमित्त उन्होंने अपना जीवन समर्पित किया. इसके लिए उन्हें दो मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ा. पहला मोर्चा देश की आजादी का था. दूसरा अपने लोगों के सामाजिक मान-सम्मान, सुरक्षा और स्वतंत्रता का. उनके लिए सामाजिक आजादी राजनीतिक स्वतंत्रता से ज्यादा महत्त्वपूर्ण थी. उनका पूरा आंदोलन सामाजिक स्वतंत्रता एवं समानता पर केंद्रित था. कोरी राजनीतिक स्वतंत्रता को वे वास्तविक स्वतंत्रता मानने को तैयार ही नहीं थे. इस मुद्दे पर गांधी सहित समकालीन नेताओं से उनका मतभेद हमेशा बना रहा. यह आंबेडकर से छिपा भी न था. अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के लिए उन्होंने तरह-तरह की लांछनाएं सहीं. यहां तक कि अंग्रेजों के पिठ्ठू भी कहलाए. अंततः संविधान के माध्यम से उनके लिए ऐसी राह तैयार की जिससे वे सम्मानजनक जीवन का सपना देख सकें. इतिहास को प्रभावित करने करने वाले नेता से इतिहास बदल देने वाला नेता हमेशा बड़ा होता है. उस समय के पूंजीपति, सामंत और बड़े-बड़े सरमायेदार गांधी के समर्थन में थे. गाँधी उन्हें कई डरों से बचाते थे. मगर गांधी के जाते ही उन्हें बिसरा दिया गया. जैसे टूटी हुई ढाल कबाड़घर में शरण पाती है, गांधी भी संग्रहालयों की शोभा बढ़ाने लगे. इन दिनों केवल उनकी ऐनक बाकी है. उसका उपयोग सफाई अभियान के पोस्टरों को सजाने के लिए किया जाता है.

 

आंबेडकर इतिहास बदल देने वाले नेता थे. सामंती सोच में ढले हिंदू समाज को उन्होंने आधुनिक मूल्यों से समृद्ध करने की भरपूर कोशिश की. उनीसवीं शताब्दी की बौद्धिक क्रांति में जिन मानवतावादी विचारों ने पूरे यूरोप में उथल-पुथल मचाई थी, उनका जिस शिद्दत, शालीनता और ईमानदारी के साथ डॉ. आंबेडकर ने भारतीय राजनीति में उपयोग किया, वैसा उनके समकालीन किसी नेता ने नहीं किया. स्वतंत्रता संघर्ष में अहिंसा, सत्याग्रह जैसे मौलिक प्रयोगों का श्रेय यदि गांधी को दिया जा सकता है तो लोकतंत्र, समानता, बंधुता, सामाजिक न्याय, व्यक्ति-स्वातंत्र्य जैसे बुनियादी विचारों को आजादी के दौरान और बाद में संविधान के माध्यम से, भारतीय राष्ट्र-राज्य का हिस्सा बनाने का श्रेय डॉ. आंबेडकर को जाता है. यदि यह माना जाए कि बिना अंहिंसा और सत्याग्रह जैसे गांधीवादी औजारों के भारत की आज़ादी असंभव थी, तो यह बात भी स्वत; सिद्ध है कि बिना आंबेडकर के भारत को आधुनिक राज्य बनाना कतई संभव न था. अवश्य ही कुछ दूसरे नेता भी थे. देश को स्वतंत्र कराने में उनका योगदान भी कम नहीं रहा. तथापि देश को वास्तविक स्वतंत्रता दिलाने, विशेषकर सामाजिक न्याय के क्षेत्र में आंबेडकर का योगदान उन सबसे अधिक है. भारत में यदि लोकतंत्र है, समानता और बंधुत्व को उच्च जीवन-मूल्यों के रूप में मान्यता प्राप्त है, यदि दमितों और उत्पीड़ितों की आंखों में सुंदर भविष्य का सपना हिलोर मारता है तो इसका एकमात्र श्रेय आंबेडकर को जाता है. वे हमारे सभ्यताकरण के अप्रतिम महानायक हैं. इस कारण उनकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है. बल्कि बढ़ती ही जा रही है.

 

गांधी भारतीय होने से पहले ‘हिंदू’ थे—आंबेडकर हिंदू होने से पहले भारतीय. आधुनिक जीवन-मूल्यों के सच्चे पोषक. सभी धर्मों का आदर करने वाले गांधी आजीवन सर्व-धर्म-समभाव को समर्पित रहे. ‘ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम’ कहकर देश में सांप्रदायिक एकता की अलख जगाते रहे. परंतु उनका सर्वधर्म समभाव हिंदू धर्म की चौहद्दी तक सीमित था. उनके असली आराध्य ‘रघु(कुल) पति’, ‘राघव’, ‘राजा राम’ थे. ‘ईश्वर-अल्लाह’ उनके लिए ‘राजा राम’ के ही उपनाम थे. जीवन के अंतिम क्षण तक वे ‘राम’ की शरणागत बने रहे. उन्होंने वर्ण-व्यवस्था को आदर्श भले न माना, मगर उसे कभी चुनौती भी नहीं दी. धर्म की आड़ में वे उसे लगातार संरक्षण देते रहे. आंबेडकर के लिए जाति की समस्या सामाजिक थी. मानते थे कि समस्या का निदान केवल समाजार्थिक बराबरी द्वारा संभव है. यह केवल कानून के रास्ते संभव है. गांधी के लिए जाति की समस्या ईश्वरीय विधान थी. समाज को छुआछूत से मुक्ति दिलाने के लिए उन्होंने हालांकि कई टोटके किए. निजी स्तर पर और कांग्रेस की मदद से अनेक कार्यक्रम भी चलाए. दिखावे के लिए सवर्णों को दलितों के प्रति अत्याचार के लिए डांटा भी था. परंतु जैसा कि आंबेडकर भली-भांति समझते थे, गांधी के सारे प्रयत्न एक राजनीतिक कार्यक्रम से अधिक न थे. दलितों को ‘हरिजन’ घोषित करने के पीछे भी परंपरावादी मन ईश्वरीय विधान और अस्पृश्यों के प्रति हेय-भाव से ग्रस्त था.

उपनिषदों में कहा गया है—‘सर्व खाल्विदं ब्रह्म.’ यह सारा जगत ही ब्रह्म है….कण-कण में परमात्मा है….प्रत्येक आत्मा परमात्मा का रूप है. फिर दलितों और अतिशूद्रों के लिए ही ‘हरिजन’ संबोधन क्यों? ब्राह्मणों और क्षत्रियों के लिए क्यों नहीं? क्या यह दलितों और अतिशूद्रों के प्रति उपकार-भाव की परिणति था? जैसे पुराने जमाने के राजा-महाराजा अपने यहां बेगार करने वाले नौकरों और सेवादारों को उनकी हाड़तोड़ मेहनत के बदले कभी-कभार रुपया-अठन्नी देकर बहला दिया करते थे, ऐसा ही कुछ? गांधी ने यह संबोधन केवल उछाल दिया था. जातीय दलन के शिकार लोग ‘हरिजन’ क्यों हैं? इसका कभी खुलासा नहीं किया. विरोध हुआ तो कह दिया, जो इसे अपनाना चाहते हैं, अपनाएं. दलितों ने कभी इस संबोधन को मन से नहीं लिया. परंतु दिखावे की उदारता के नाम पर कुछ सवर्ण जरूर ‘हरिजन’ प्रेमी हो गए, ताकि उनकी सहानुभूति जीतकर लोकतंत्र का दरिया पार कर सकें. इतना तो सब मानते हैं कि गांधी बिना सोचे-समझे कुछ भी करने वाले न थे. सवाल है कि ‘हरिजन’ की गांधीवादी व्याख्या क्या हो सकती है? और दलित जब इस संबोधन पर आपत्ति कर रहे थे तो गांधी के पास क्या इसका कोई भी विकल्प नहीं था? उत्तर है—बिलकुल था; और बहुत पहले से था. याद कीजिए—‘वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीर पराई जाने रे…’ गांधी-सभा में नियमित गाया जाने वाला भजन. इसमें एक शब्द आता है, ‘वैष्णव जन’. ‘हरि’ को विष्णु का उपनाम माना जाता है. ‘हरिजन’ और ‘वैष्णव जन’ का भावार्थ भी एक है. दोनों ही नरसी मेहता के पदों से लिए गए हैं. उनमें से एक का उल्लेख ऊपर किया जा चुका है. फिर गांधी ने जातीय दलन का शिकार रहे लोगों को ‘वैष्णव जन’ संबोधन क्यों नहीं दिया? क्यों वे केवल ‘हरिजन’ पर अड़े रहे? यदि गांधी सचमुच वर्ण एवं जाति के विरोधी होते तो और वही कहना चाहते जो उन्होंने ‘हरिजन’ के बारे में बताया है तो ‘वैष्णव जन’ से बेहतर और सम्मानजनक शब्द दूसरा हो ही नहीं सकता था. जरूरी नहीं है कि दलन का शिकार लोगों को ‘वैष्णव जन’ जैसा संबोधन भी स्वीकार होता. परंतु तब वे पक्षपात से बच सकते थे. गांधी ने ऐसा नहीं किया. इसके दो कारण हो सकते हैं. पहला वे बहुत जिद्दी थे. एक बार मुंह से जो निकला उसपर पुनर्विचार करना उनके महात्मापन को स्वीकार न था. उनकी मंशा नहीं थी कि दलितों को ‘वैष्णवजन’ जैसा ‘पवित्र’ नाम या उपाधि दी जाए. ब्राह्मण-ग्रंथों में दलितों के नामकरण को लेकर भी निर्देश हैं. उनके अनुसार दैन्य दलित के नाम से झलकना चाहिए. ‘हरिजन’ में जैसा दैन्य-भाव है, वैसा दैन्य-भाव ‘वैष्णवजन’ में नहीं है. यानी गांधी की सवर्ण-मानसिकता दलितों को ऐसा कोई नाम देना नहीं चाहती थी, जो समाज में सम्मानित हो. जबकि इन्हीं हरिजनों के एक संतपुरुष रैदास ने, ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’—कहकर अपने समय के पुरोहितों और पाखंडी पंडितों की बोलती बंद कर दी थी. कह सकते हैं कि गांधी को सामाजिक परिवर्तन वहीं तक स्वीकार्य था, जहां तक वह हिंदू वर्णव्यवस्था को चोट न पहुंचाता हो. एक सीमा के बाद उनकी उदारता जिद में ढल जाती थी. उस समय वे या तो ‘राम-राज्य’ की प्रशंसा करने लगते; या फिर ‘पंचायती राज्य’ के नक्श में भारत का भविष्य तलाशने लगते थे. यह जानते हुए भी कि ‘राम-राज्य’ के माथे ‘शंबूक-हत्या’ तथा स्त्री-विरोधी होने का कलंक लगा है; और पंचायती राज्य का चेहरा जाति-व्यवस्था के कलंक के चलते बेदाग नहीं रह सकता—वे उन्हें आदर्श लगते थे. आंबेडकर गांवों को जाति और सामंती संस्कारों का सबसे सुरक्षित ठिकाना मानते थे. गांधी गांव को आत्मनिर्भर इकाई बनाने का सपना देखते थे. जानते थे कि नई प्रौद्योगिकी नए विचार भी लाएगी, मशीनें प्राचीनतम वर्णव्यवस्था को चुनौती देंगी. इसलिए वे मशीनों को पूरे भारत के लिए खतरा मानते थे. आंबेडकर को नई तकनीक से परहेज नहीं था. वे उन्हें विकास के लिए आवश्यक मानते थे. लेकिन चाहते थे कि बड़े कारखाने सरकार के सीधे नियंत्रण में हों. इस मामले में वे तथाकथित समाजवादियों से भी बड़े समाजवादी थे.

‘हिंद स्वराज’ में गांधी ने वकीलों और जजों के पेशे को निकृष्ट बताया है. वह भी तब जब वे स्वयं विलायत से वकालत करके आए थे. वही क्यों, कांग्रेस के कई बड़े नेताओं ने भी वकालत के रास्ते राजनीति में कदम रखा था. अजीब-सी स्थापना थी उनकी—‘सत्ता की मुख्य कुंजी उनकी अदालतें हैं और अदालतों की कुंजी वकील हैं. अगर वकील वकालत करना छोड़ दें और वह पेशा वेश्या के पेशे जैसा नीच माना जाए तो अंग्रेजी राज एक दिन में टूट जाए’(हिंदुस्तान की दशा—4, हिंद स्वराज). आखिर अदालतों से क्या रोष था उनका? क्यों उन्होंने वकील के पेशे की तुलना वेश्या से की है? आखिर क्यों? कारण जानने के लिए गांधी की मनोरचना को समझना होगा. वे वर्ण-व्यवस्था के समर्थक थे. उनके हिसाब से वह आदर्श व्यवस्था थी. उसके पोषकों की निगाह में ‘मनुस्मृति’ भारत का आदर्श विधिग्रंथ था, जिसके अनुसार ब्राह्मण का बड़े से बड़ा अपराध क्षम्य था. दूसरी ओर शूद्रों को छोटे-से-छोटे अपराध के लिए दंड करने का अधिकार उसके स्वामी को प्राप्त था. उसकी सुनवाई किसी भी अदालत में नहीं थी. इसे देखते हुए 1834 में ईस्ट इंडिया कंपनी के मुलाजिम लार्ड मैकाले ने ‘बेहतर प्रशासन’ के लिए ‘विधि आयोग’ की स्थापना की थी. उसके बाद मैकाले भारतीय लेखकों की निगाहों में खलनायक बन गया. ठीक वैसा ही खलनायक जैसा ‘ब्रिटिश भारत का इतिहास’ के लेखक जेम्स मिल को माना गया था. मिल ने अपनी बृहद् ग्रंथमाला में जहां भी आवश्यक समझा हिंदू धर्म और समाज में व्याप्त रूढ़ियों की जमकर आलोचना की है. 1853 में दूसरा विधि आयोग बनाया गया, जिसने 1861 में आपराधिक मामलों की सुनवाई के लिए कानून बनाए. उसकी 25वीं धारा में लिखा था कि आपराधिक कानून सभी पर समान रूप से लागू होगा. उसने ‘मनुस्मृति’ की विधि-संहिता को किनारे कर दिया. शताब्दियों से चले आ रहे ब्राह्मणों के विशेषाधिकार एक झटके में समाप्त हो गए. अदालतें, वकील और अधिकारी विधि-संहिता के अनुसार काम करने लगे. दलितों और अस्पृश्यों के बीच जो वर्षों से दबा-ढका था, वह एकाएक बाहर आने लगा. सवर्णों के विशेषाधिकारों को चुनौती मिलने लगी. ज्योतिबा फुले, आंबेडकर, रामास्वामी पेरियार जैसे क्रांतिधर्मा नेताओं और विचारकों का जन्म इसी के फलस्वरूप हुआ. यह बदलाव ब्राह्मणवादी मानसिकता के लोगों के लिए असह् था. गांधी भी अपवाद न थे. जिन दिनों उन्होंने वकालत की थी, संभव है तब तक उन्हें भारतीय समाज की हकीकत का पूरा अंदाजा न रहा हो. परंतु राजनिति में आने के बाद आधुनिक विधि संहिता उन्हें वर्णव्यवस्था के प्रतिकूल दिखने लगी थी. इसलिए वे वकीलों के पेशे को वेश्या के पेशे से नीच मानने की सलाह दे जाते हैं. गांधी आधुनिक शिक्षा के भी विरोधी थे जिसने वर्णव्यस्था की पीठ पर प्रहार किया था. कानून के विद्यार्थी होने के बावजूद वे व्यवस्था को धर्म की सहायता से चलाना चाहते थे. पूरी दुनिया जब धर्म को नकार रही थी, गांधी ने अपने लिए उसकी मर्यादा को आदर्श माना तथा आजीवन भारत को धर्मोन्मुखी राज्य बनाने की सलाह देते रहे. उनके लिए हर समस्या का समाधान धर्म में अंतर्निहित था. धर्म और राजनीति को अलग-अलग देखने वाली पश्चिमी सभ्यता उन्हें शैतान-सभ्यता लगती थी. जबकि स्वयं गांधी और उस समय के प्रमुख नेता इंग्लेंड से पढ़-लिखकर आए थे. दक्षिणी अफ्रीका में तथा वहां से लौटने के बाद भारत में, अंग्रेज सरकार को चुनौती देने के लिए बार-बार अंग्रेजी कानून ही उनके मददगार सिद्ध होते थे.

भक्ति-भाव में गांधी इस बात को नजरंदाज कर जाते थे कि धर्म शक्तिशाली के वर्चस्व को औचित्यपूर्ण ठहराने का सुविचारित तंत्र है. विजेता संस्कृतियों की यह सामान्य खूबी होती है कि वे लंबे और स्थायी शासन हेतु, अपने नायकों को ईश्वर या उसके प्रतिनिधि और उनके फैसलों को ईश्वरीय-न्याय के रूप में पेश करती हैं. उनके निरंतर दबाव के बीच जनसामान्य निर्णय-प्रक्रिया से कटने लगता है. परिणामस्वरूप बहुसंख्यक के विवेक का लोकहित में उपयोग हो ही नहीं पाता. यहीं से उसके संकटों की वास्तविक शुरुआत होती है. दूसरों के आसरे अपने फैसले लेने का अभ्यस्त समाज प्रकारांतर में अपनी खुशी, अपनी स्वतंत्रता, यहां तक कि समानता की चाहत को भी उनके आगे गिरवी रख देता है. पीटर ऑल्टजिल्ड के शब्दों में—

‘शक्तिशाली सदैव सही होता है—इस विचार ने दुनिया को अथाह दुख दिए हैं. यह विचार न केवल कमजोर को कुचलता है, बल्कि ताकतवर को भी नष्ट कर देता है. क्योंकि प्रत्येक झूठ, प्रत्येक छल-कपट और प्रत्येक चूक आगे-पीछे उसके स्वामी को ही नुकसान पहुंचाती है. न्याय समाज के नैतिक स्वास्थ्य को दर्शाता है, खुशियां लाता है, जबकि अन्याय नैतिकता का लोप है, मनुष्य को जीते-जी मार देता है.’

एक दृष्टांत के माध्यम से महाभारत में बताया गया है, ‘जो सबका होता है, वह किसी का नहीं होता.’ गांधी ने सबका बनने की कोशिश की, आजादी के बाद लोगों के मोहभंग की शुरुआत हुई तो सबसे पहले गांधी को किनारे किया गया. उन लोगों ने किनारे किया जिनके लिए वे आजीवन काम करते आए थे. जबकि समय के साथ आंबेडकर की प्रासंगिकता लगातार बढ़ती गई. वे दलितों और वंचितों के मसीहा मान लिए गए. आजादी से पहले देश-भर में गांधी का नाम गूंजता था. धीरे-धीरे उनकी लोकप्रियता का ग्राफ गिरने लगा. गांधी दर्शन हवा में बिला गया. दूसरी ओर आंबेडकर-दर्शन में विश्वास रखने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही है. लोग उनके विचारों के आधार पर संगठित हो रहे हैं. कह सकते हैं कि गांधी नेता बने थे. आंबेडकर को लोगों ने अपना नेता, अपना मार्गदर्शक और उद्धारक स्वत: स्वीकार किया. आजादी के बाद जितनी मूर्तियां आंबेडकर की लगीं, शायद ही किसी और नेता की लगी होंगी. गांधी को प्यार करने वालों के मन में उनके प्रति भावुकता भरा लगाव है. गांधीवाद को बिना भावुकता और अतीतमोह के लागू ही नहीं किया जा सकता. आंबेडकर के अनुयायी उन्हें अधिकार चेतना जगाने तथा ‘अप्पदीपो भव’ की भावना जगाने के लिए याद करते हैं. इसीलिए याद करते हैं क्योंकि उनकी बातों में तार्किकता का समावेश रहता था. गांधी तर्क की कसौटी पर कमजोर पड़ते ही अनशन पर उतर आते थे. उन्हें राष्ट्रपिता की पदवी ओढ़ाई गई थी. आंबेडकर को उनके श्रद्धावनत अनुयायियों ने खुशी-खुशी अपना ‘बाबा’ मान लिया. इन स्थापनाओं पर कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है. परंतु थोड़ी देर के लिए यदि वे अपने पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर सोचें, आधुनिकता का मंतव्य समझ लेने के बाद आंबेडकर के कार्यों की महत्ता का आकलन करना आसान हो जाएगा.

 

आधुनिकता को सामान्यतः फैशन से लिया जाता है. दूर-दराज के गांवों में धोती-कुर्ता के स्थान पर सूट-बूटेड लड़के को तुरंत ‘मार्डन’ मान लिया जाता है. कोई उसका प्रतिवाद नहीं करता. विद्वान आधुनिकता को प्रौद्योगिकीय विकास से जोड़ते हैं. उनकी निगाह में बुलेट ट्रेन, सुपरसोनिक हवाई जहाज, संचार-क्रांति के क्षेत्र में हुए तीव्र बदलाव—सब आधुनिकता की निशानियां हैं. इस आधार पर देखा जाए तो कलम-दवात छोड़कर फाउंटेन पेन पर आना, फिर फाउंटेन पेन छोड़ कंप्यूटर और लेपटाप की शरणागत होता—आधुनिकीकरण की ही मिसाल है. पर क्या यही आधुनिकता है? असल में ये आधुनिकता के आवरण हैं. ज्यादा से ज्यादा उसका समुत्पाद. मगर कई बार वे मानवीय गरिमा के प्रतिकूल आचरण करते दिखाई पड़ते हैं. उदाहरण के लिए ‘स्मार्टफोन’ को लें. उसमें तकनीक के स्तर पर जो स्मार्टनेस है, वह उसके उपभोक्ता में नहीं आ पाती. बल्कि उपभोक्ता अपनी स्मार्टनेस का इस्तेमाल न करे, जितना करता है उसका अभ्यास भी जाता रहे, इसलिए भी तकनीक को स्मार्ट बनाया जाता है. सुविधा के नाम पर ये फोन मानव-स्मृति और उसकी सामाजिकता पर जैसा हमला करते हैं, उसकी भरपाई किसी अन्य आधुनिक उपकरण द्वारा असंभव है. वे व्यक्ति के अकेलेपन का लाभ उठाते हैं तथा उसे और अधिक बढ़ावा देते हैं. जिससे उसका आत्मविश्वास घटता है. परिणामस्वरूप उनके निर्णय विवेक के बजाय भीड़ की मानसिकता से संचालित होने लगते हैं.

आधुनिकता का अभिप्राय वर्तमान और भूतकाल अथवा निकट-भूतकाल के बीच आए बदलाव से है. वह समाजेतिहासिक घटना है, जिसपर अपने समय के वैचारिक और प्रौद्योगिकीय आंदोलनों का प्रभाव पड़ता है. वह समय-सापेक्ष होने के साथ-साथ व्यक्ति-सापेक्ष भी होती है. यानी आधुनिकता के मायने सभी के लिए अलग-अलग हो सकते हैं. किसी फैशनपरस्त युवक के लिए जिसका वैचारिक आंदोलनों से कोई नजदीकी संबंध नहीं है, आधुनिकता का अभिप्रायः महज फैशन की दुनिया में आए बदलावों और उपभोक्ता वस्तुओं की नवीनतम खेप तक सीमित होगा. लेकिन जिसकी विचारों की दुनिया में रुचि है उसके लिए आधुनिकता के मायने कहीं व्यापक होंगे. वह उपभोक्ता बाजार, सभ्यता और संस्कृति के हालिया बदलावों के साथ-साथ उन कारकों पर भी विचार करेगा, जो उन बदलावों के मूल में हैं. ऐसे व्यक्ति के लिए आधुनिकता आंशिक नहीं हो सकती. वह ऐसी आधुनिकता को नकार देगा जिसमें व्यक्ति अत्याधुनिक डिजायन के कपड़े पहने, आधुनिकतम उपकरणों से लैस रहे, परंतु विचारों में पूरी तरह दकियानूसी हो जाएं. यह आवश्यक नहीं है कि केवल नए और मौलिक विचार ही आधुनिकता की श्रेणी में आएं. पुराने विचारों का नवीकरण अथवा नव-प्रस्तुतीकरण भी आधुनिकता की परिसीमा में आता है. आधुनिकता समग्रता में कैसे फलीभूत होती है. इसे जानने के लिए आधुनिक शब्द की उत्पत्ति पर विचार किया जाना आवश्यक है—

आधुनिक शब्द संस्कृत के अद्यः का विस्तार है. जिसका अर्थ है—आज, आजतक. अद्य से ही अद्यतन, अधुनातन शब्द बने हैं, जो आधुनिकता से ही संबंधित हैं. इस तरह आधुनिकता में वे सभी परिवर्तन, विकास-प्रक्रियाएं सम्मिलित हैं, जिन्हें कोई समाज अपने अधिकतम सदस्यों की शुभता हेतु अपनाता है. आधुनिकता का अंग्रेजी पर्यायवाची modern प्राचीन लेटिन के शब्द modo से बना है. उसका अर्थ है—आज, आजतक, वर्तमानकालीन या समकालीन आदि. modo से ही उत्तरवर्ती लैटिन के शब्द modernus शब्द की उत्पत्ति हुई. जिससे modern  शब्द बना है. इसका भावार्थ है, नएपन का सम्मान. कुछ विद्वान आधुनिकता को अठारहवीं शताब्दी के यूरोपीय पुनर्जागरण से जोड़ते हैं. यह वह समय था पश्चिम में नित-नए विचार आ रहे थे. लोकतंत्र, मानवाधिकार, व्यक्ति-स्वातंत्र्य, बराबरी, सामाजिक न्याय जैसे विचारों ने सामंतवाद, पौरोहित्यवाद आदि को अप्रासंगिक बना दिया था. नए विचारों ने मानव-मेधा को समृद्ध किया, वहीं लोगों में यह विश्वास पैदा किया कि दूसरों की आस्था का सम्मान करके ही अपने विश्वासों की रक्षा संभव है. कुल मिलाकर समानता और सहिष्णुता आधुनिकता की मान्य कसौटियां हैं. सभी के लिए न्याय और सामाजिक-आर्थिक राजनीतिक बराबरी. यदि समाज इन्हें मानने से इन्कार करता है, तो राज्य का कर्तव्य है कि इन मूल्यों की स्थापना के लिए आवश्यक विधान बनाए, ताकि असमानता और वर्ग भेद को मिटाया जा सके.

 

आधुनिकता की कसौटी पर आंबेडकर गांधी से आगे हैं. हालांकि थोरो, ऑस्कर वाइल्ड, एडबर्ड कारपेंटर के विचारों के प्रभाव में गांधी ने भारतीय राजनीति में अनेक प्रयोग किए. परंतु उनका परंपरावादी मन बार-बार उन्हें पीछे लौटने को बाध्य करता रहा. विशेषकर जाति और धर्म के सवालों को लेकर. उनके सापेक्ष आंबेडकर लोकतंत्र, समानता मानवाधिकार आदि का समर्थन करते हुए आधुनिकता की दौड़ में गांधी से आगे निकल जाते हैं. दोनों की चुनौतियां भी अलग-अलग थीं. गांधी को बस एक मोर्चे पर जूझना था. वह मोर्चा था, आजादी का. उनके लिए सुधारवादी आंदोलन राजनीतिक गतिविधियों हेतु समर्थन जुटाने के औजार थे. आंबेडकर के लिए सामाजिक आजादी का लक्ष्य स्वाधीनता के लक्ष्य से बड़ा था. गांधी भारतीय राजनीति में  दृढ़ता और शालीनता के प्रतीक थे. आंबेडकर जिस वर्ग से आते थे, वह भारत में सहस्राब्दियों से उत्पीड़न का शिकार होता आया था. इस कारण उनके विचारों में स्वाभाविक उग्रता थी. धर्म  और संस्कृति को लेकर तीखा विरोध भी था. लेकिन उसका स्तर कहीं पर भी अशालीन नहीं था. भारतीय राजनीति में डॉ. भीमराव आंबेडकर का उदय युगांतरकारी घटना है. इसलिए उस युग को हम भारतीय राजनीति का प्रबोधनकाल भी कह सकते हैं. उस समय के जितने भी बड़े नेता थे, उनमें कदाचित आंबेडकर ही ऐसे थे, जो नए राजनीतिक दर्शनों से इत्तफाक रखते थे और बिना किसी हिचक के उन्हें स्वतंत्र भारत में अपनाना चाहते थे. उनका अध्ययन विशद् था. हालांकि उन्हें आरंभिक प्रसिद्धि सामाजिक न्याय के हित में किए गए आंदोलनों के कारण मिली. उन कार्यक्रमों की वजह से मिली, जो उन्होंने दलितों और अस्पृश्यों को समाज की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए चलाए थे. वही उनकी  प्राथमिकता भी थी. उसके पीछे उनके जीवन के कटु अनुभव भी थे. उच्च-शिक्षित होने के बावजूद उन्हें जाति के कारण अनेक दुर्व्यवहारों का सामना करना पड़ा था. वे समझ चुके थे कि यदि उन जैसे पढ़े-लिखे व्यक्ति को जातिवाद का कलंक इतना त्रास दे सकता है तो गरीब, विपन्न दलितों के साथ सवर्णों के दुर्व्यवहार की तो केवल कल्पना ही की जा सकती है. इसलिए पढ़ाई पूरी कर, भारत लौटते ही उन्होंने दलितों में सामाजिक चेतना जगाने को अपना लक्ष्य मान लिया था.

आंबेडकर पर विदेशी विचारकों के साथ-साथ भारतीय चिंतकों का भी प्रभाव था. कबीर, रैदास, ज्योतिबा फुले की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने धर्म की पुनरीक्षा के काम को संभाला और हिंदू धर्म की दुर्बलताओं को तरह-तरह से सामने लाए. इस तरह उन्होंने वह काम किया जो फ्रांस में वाल्तेयर ने किया था. उन्होंने लोगों को समझाया कि हिंदू धर्म और जातिवाद का नाभिनाल का संबंध है. दोनों एक-दूसरे को पूजते-पोषते हैं. इसलिए जातिवाद की समस्या से मुक्ति प्राप्त करनी है तो हिंदूधर्म से मुक्ति अत्यावश्यक है. राजनीतिज्ञ धर्म और जाति दोनों को पोषते हैं. ताकि वे अपनी नीयत और शासन की असफलताओं को ईश्वरीय विधान की आड़ में छिपा सकें. धर्म और जाति के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण के कारण वे सवर्णों के निशाने पर भी रहे. परंतु आंबेडकर के पांडित्य को देखते हुए किसी की हिम्मत उनपर सीधा प्रहार करने की न थी. वे जान चुके थे कि आंबेडकर को केवल समझौते से ही रोका जा सकता है. ब्राह्मणों-पुरोहितों के लिए यह कोई नया काम न था. वे अवसरानुकूल अपनी नीतियों में फेरबदल करने के माहिर रहे हैं. स्थितियां प्रतिकूल हों तो अपने अंग-प्रत्यंगों को कछुए की भांति समेटकर शांत पड़े रहना फिर अनुकूल हालात देखते ही भेड़िये की भांति आक्रामक दिखना उनकी पुरानी चाल रही है. लेकिन जिस समय वे शांत दिखते हैं, उस समय भी पूरी तरह शांत नहीं होते. बल्कि शांत रहकर हालात को अपनी ओर मोड़ने की कोशिश कर रहे होते हैं. आंबेडकर की प्रतिष्ठा और सम्मान को देखते हुए उन्होंने समझौते के प्रयास शुरू कर दिए थे. ‘जाति-पांत तोड़क मंडल की सभा की अध्यक्षता के लिए डॉ. आंबेडकर को आमंत्रित करने के पीछे उनकी यही चाल थी. वह सम्मेलन कभी हो न सका. आयोजकों ने उसे हमेशा के लिए स्थगित कर दिया था. वे चाहते थे कि आंबेडकर अध्यक्ष पद से जाति प्रथा पर भले ही सवाल उठाएं परंतु वेदों के आगे कोई प्रश्न-चिह्न न लगाएं. आंबेडकर का मानना था कि यदि ऋग्वेद को वर्ण-व्यवस्था का प्राचीनतम स्रोत माना जाता रहेगा, तो उसपर सवाल उठाए जाने लाजिमी हैं. उस अवसर पर आंबेडकर ने जो भाषण तैयार किया था, वह संशोधित रूप में प्रकाशित हुआ. अपने लेख में डॉ. आंबेडकर में जातिप्रथा के संपूर्ण उन्मूलन का समर्थन किया था. वह लेख ‘जातिप्रथा का उच्छेद’ नाम से ख्यात है. भारतीय जाति-व्यवस्था के अध्ययन हेतु वस्तुनिष्ट प्रयत्न तो अनेक हुए हैं, परंतु उसकी विकृति को समझाने वाली आंबेडकर की पुस्तक इकलौती और सबसे प्रामाणिक है.

पुस्तक में उन्होंने माना है कि जाति-व्यवस्था का मूल हिंदू धर्म में पसरा हुआ है. इसलिए यदि जाति-व्यवस्था का उच्छेद करना है तो धर्म का उच्छेद भी लाजिमी है. आंबेडकर चाहते थे कि दलित राजनीति में अधिक से अधिक हिस्सा लें, ताकि उनमें अधिकार चेतना और संघर्ष की भावना उत्पन्न हो सके. गांधी और समकालीन नेताओं तथा आंबेडकर के कार्यों में मूलभूत अंतर भी यही है. गांधी, नेहरू, पटेल सहित उस समय के सभी प्रमुख नेताओं के लिए राजनीति प्रमुख थी. वे शासक जातियों से आए थे. और अंग्रेजों द्वारा सत्ता हस्तांतरण की स्थिति में स्वयं को उसका स्वाभाविक दावेदार मानते थे. गांधी अवश्य सामाजिक सरोकारों की बात करते थे. इसलिए उन्होंने कांग्रेसी नेताओं को चुनाव के उपरांत कांग्रेस को भंग करने की सलाह दी थी. उस समय गांधी या तो खुद भुलावे में थे, अथवा दूसरों को भुलावे में रखना चाहते थे. जबकि आंबेडकर ने 1936 में ही कह दिया था—

‘भारत में समाज सुधार का मार्ग स्वर्ग के समान दुरूह है. इस कार्य में अनेक कठिनाइयां हैं. भारत में समाज सुधार के कार्य में सहायक मित्र कम और आलोचक अधिक हैं. आलोचकों के दो स्पष्ट वर्ग हैं. एक वर्ग राजनीतिक सुधारकों का है. दूसरे में समाज सुधारक शामिल हैं.’

 

आंबेडकर ने विपुल साहित्य लेखन किया. उनकी पुस्तकें ‘जाति का उन्मूलन’ तथा ‘शूद्र कौन थे’ भारतीय सभ्यता और संस्कृति पर सवाल खड़े करती हैं. इन पुस्तकों के माध्यम से वे हिंदू समाज की विकृतियों को सामने लाते हैं. दर्शाते हैं कि वर्ण-श्रेष्ठता का दावा करते हुए शिखर पर मौजूद आठ-दस प्रतिशत लोग किस प्रकार बाकी लोगों के मूल-भूत अधिकारों का हनन करते आए हैं. कैसे शोषण को शौर्य की संज्ञा देकर उन्होंने बाकी जनसमाज का लगातार उत्पीड़न किया है. इसके पीछे हिंदू समाज का अलोकतांत्रिक रवैया है. उसकी बुराइयों से सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक लोकतंत्र के माध्यम से निपटा जा सकता है. आंबेडकर उन लोगों में से थे जो गणतंत्र की तमाम कमजोरियों के बावजूद उसे दुनिया-भर की ज्ञात राजनीतिक प्रणालियों में सर्वोत्तम मानते आए हैं. इसलिए संविधान बनाते समय उन्होंने गणतंत्र को ही स्वतंत्र भारत के राजदर्शन के रूप में चुना. गांधी तथा गांधीवाद के प्रमुख सिद्धांतकारों को बहुमत का विचार ही अटपटा लगता था. विनोबा को यह जानकर विचित्र लगता था कि संविधान में नेहरू और उनके खानसामा दोनों के लिए एक ही वोट का प्रावधान है. ‘हिंद स्वराज’ जिसे प्रभाष जोशी पूर्वाग्रहवश रूसो के ‘सोशल कांट्रेक्ट’ तथा मार्क्स के ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ जैसी क्रांतिकारी पुस्तक बताते थे, असल में प्रतिगामी दर्शन का दस्तावेज है, जिसे गांधी के समकालीनों ने ही नकार दिया था. इस पुस्तक में गांधी इंग्लेंड की संसद को ‘बांझ और बेसवा’ कहकर संसदीय लोकतंत्र पर सवाल उठाते हैं. बहुमत का निर्णय उन्हें ‘अनीश्वरी बात’ लगता है—‘ज्यादा लोग जो कहें उसे थोड़े लोगों को मान लेना चाहिए यह तो अनीश्वरी बात है. एक वहम है.’ ‘हिंद स्वराज’ को पढ़कर कोई भी यह समझ सकता है कि गांधी के लिए ‘न्याय’ और ‘समानता’ कोई मूल्य न थे. वे बीसवीं शताब्दी में भारत का नेतृत्व कर रहे थे, परंतु उनका सोच अठारवीं शताब्दी के सुधारवादियों से अलग न था. वे समाज को शासक और शासित के रूप में बांटकर देखने के अभ्यस्त थे. इसलिए उन्हें सदैव किसी उद्धारक की तलाश रहती थी—‘जितना समय और पैसा पार्लियामेंट खर्च करती है, उतना समय और पैसा अच्छे लोगों को मिले तो प्रजा का उद्धार हो जाए.’ गांधी के अनुसार निगाह में ‘अच्छे लोग’ वही हैं, जिनका पीढ़ी-दर-पीढ़ी सत्ता और संसाधनों पर कब्जा रहा है. जो कभी धर्म तो कभी जाति के नाम पर जनसाधारण को बरगलाते आए हैं. यह एक प्रकार का कुलीनतावाद है जो कुछ लोगों को जन्म के आधार पर, धर्म के आधार पर विशेषाधिकार संपन्न बनाता है. आंबेडकर इसी से दलितों और पिछड़ों की मुक्ति चाहते थे, जबकि गांधी वर्ग-भेद और वर्ण-भेद दोनों के समर्थक थे. उन्हें ईश्वरीय मानकर किसी न किसी रूप में बचाए रखना थे. आंबेडकर का लोकतंत्र में विश्वास था. वे मानते थे कि समाज में जैसे-जैसे लोकतांत्रिक चेतना का विकास होगा, शताब्दियों से धर्म और सामंती संस्कारों में बंधे लोग उसके चंगुल से बाहर आने लगेंगे. उन्होंने जोर देकर कहा था—

‘लोकतंत्र ऐसी शासन पद्धति है, जिसमें लोगों के सामाजिक-आर्थिक जीवन में खून की एक बूंद बहाए बिना भी क्रांतिकारी परिवर्तन लाया जा सकता है.’1

लोकतंत्र की खूबी उसके बहुआयामी होने में है. राजनीति के क्षेत्र में वह तभी कामयाब हो सकता है, जब उनकी समान उपस्थिति आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में भी हो. इस बारे में आंबेडकर हेराल्ड लॉस्की के प्रशंसक थे. उसका कहना था कि बिना नैतिकता के आश्रय के लोकतंत्र अधूरा है. लॉस्की न्याय और नैतिकता को परस्पर पर्यायवाची मानता था. उसके अनुसार सत्ता से दूर रहने वाले या उसके महत्त्व को किसी भी रूप में नजरंदाज करने वाले लोग, स्वभावतः दूसरों के अनुगामी बन जाते हैं. इससे निर्णय लेने की उनकी योग्यता का हृस होता है. नतीजन वे दूसरों के अनुसरण को ही अपना कर्तव्य मान बैठते हैं. आगे चलकर वे न केवल अपनी क्षमताओं का आकलन करने में गलती करने लगते हैं, बल्कि उन्हें अपनी शक्ति और अच्छाइयों को लेकर भी संदेह होने लगता है. जनसाधारण की सत्ता-विमुखता का परिणाम यह होता है कि शिखर पर विराजमान लोग सत्ता-भोग को अपना अधिकार मान, वहीं बने रहने के लिए ऊल-जुलूल तर्कों का सहारा लेने लगते हैं. समाज में न्याय की उपस्थिति के लिए आवश्यक है कि सरकार उन लोगों को जो समाज में किसी भी प्रकार की उपेक्षा या वंचना का शिकार हैं, विशेष प्रोत्साहन देकर आगे लाए. ऐसा वातावरण उत्पन्न करे जिसमें उनकी अधिकतम उत्पादकता और मान-रक्षा संभव हो सके. राज्य की स्थापना का उद्देश्य भी यही है—

‘साधारण मनुष्य के व्यक्तित्व को रचनात्मक बनाने के लिए आवश्यक है कि ऐसी परिस्थितियां पैदा की जाएं जिनमें नागरिकों की रचनात्मकता का अधिकतम उपयोग हो सके. यह तभी संभव है जब साधारण से साधारण व्यक्ति यह अनुभव करे कि समाज में उसकी कुछ सार्थकता है. इसे स्वतंत्रता और समानता की अनुपस्थिति में प्राप्त करने की आशा हम नहीं कर सकते.’ (राजनीति के मूल तत्व—हेरॉल्ड लॉस्की)

सामाजिक न्याय एवं समानता के लक्ष्य की सिद्धि केवल सहभागी लोकतंत्र द्वारा संभव है. आंबेडकर के अनुसार लोकतंत्र कोरी राजनीतिक प्रणाली नहीं है. वह जीवन-पद्धति है. वह तभी सफल हो सकता है, जब लोग उसे अपने आचरण का हिस्सा बना लें. तभी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक शुचिता के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है. आंबेडकर का मानवतावादी सोच उन्हें बेहतर इंसान और बड़ा नेता बनाता है. वे मुख्यतः जिन लोगों के नेता थे, उनमें लगभग सभी अशिक्षित थे. गरीबी और बदहाली के शिकार. इतने बदहाल कि उनके लिए अवसरों की समानता का विचार भी महत्त्वहीन था. आंबेडकर जानते थे कि चमत्कारवश यदि भारत में सभी को बराबर मान लिया गया तो भी समाजार्थिक आधार पर पिछड़ चुके लोग, पिछड़े ही रहेंगे. इसलिए सामाजिक न्याय की भावना के अनुसार उन्होंने दलितों और पिछड़ों के लिए विशेष अवसरों की मांग रखी. सदियों से दमन का शिकार लोगों को उन्होंने समझाया—‘शिक्षा शेरनी का दूध है. जो भी पीता है, दहाड़ने लगता है’—इसलिए शिक्षित बनो. लोकतंत्र में संख्याबल महत्त्वपूर्ण होता है. सरकारें जनता की इच्छानुसार बनती-बिगड़ती हैं. उसके लिए लोगों का संगठित रहना आवश्यक है. शताब्दियों से दूसरों के अधिकारों पर कुंडली मारे शीर्षस्थ अभिजन, संसाधनों में हिस्सेदारी के लिए आसानी से तैयार नहीं होंगे. अपना दैन्य दूसरों के टाले नहीं टलता. मुक्ति के लिए खुद प्रयत्न करना पड़ता है. अतएव अपने अधिकारों के लिए, मान-सम्मान और अस्मिता के लिए, अपनी और आने वाली पीढ़ियों की खुशहाली के लिए—संघर्ष करो. उनके अनुयायियों ने भी ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो.’ को अपना जीवन-मंत्र मान लिया. गांधी-दर्शन में व्यक्ति-स्वातंत्र्य और समानता के लिए कोई स्थान नहीं है. समाज को ऊंच-नीच में बांटने वाला वर्ण-विधान ही उनके लिए सर्वोच्च है. असमानता से गांधी को तब तक कोई शिकायत न थी, जब तक शिखर पर बैठे लोग अनुदार न हों. इसलिए वे सवर्णों से कथित ‘हरिजनों’ के प्रति सदय होने की अपेक्षा रखते हैं. प्रकारांतर में वे दीन को भी बनाए रखना चाहते थे और दीनानाथ को भी. उससे अल्पावधि सुधार के अलावा हालात में बहुत अंतर पड़ने वाला नहीं था. कदाचित इसीलिए 26 जनवरी 1929 को ‘संघ और स्वाधीनता’ विषय पर दिए गए भाषण में आंबेडकर ने गांधी युग को भारतीय इतिहास का ‘काला अध्याय’ घोषित किया था—

‘मुझे इस बात में कतई संदेह नहीं है कि गांधीयुग भारत के इतिहास का काला अध्याय है. यह वह समय है जब भारत की जनता अपने आदर्श, अपने भविष्य की ओर देखने के बजाए बार-बार पीछे मुड़कर अतीत में झांकने लगती है.’2

आंबेडकर का कहा आज सच दिख रहा है. गांधी के नेतृत्व और परिस्थितियों के चलते देश को राजनीतिक स्वतंत्रता मिली. किंतु जिस सामाजिक स्वतंत्रता की मांग आंबेडकर आजीवन करते रहे, वह आज भी स्वप्न है. भारतीय समाज का वह हिस्सा जो वर्ण-व्यवस्था से लाभान्वित होता आया है, येन-केन-प्रकारेण उसे बनाए रखना चाहता है. यूं तो गांधी ने भी सामाजिक एकता और समरसता के लिए कार्यक्रम चलाए. सांप्रदायिक एकता के क्षेत्र में तो उन्हें पर्याप्त सफलता भी मिली. लेकिन आंबेडकर की प्राथमिकताएं और सोचने का ढंग उनसे अलग था. इस अंतर को धर्म की कसौटी पर भी परखा जा सकता है. गांधी के लिए धर्म पहले था. मनुष्य बाद में. उनके लिए इंसानियत धर्म से परे कुछ न थी. व्यक्त तौर पर वे सभी धर्मों का सम्मान करते थे. लेकिन कुछ भी होने से पहले वे एक हिंदू थे. हिंदू धर्म और जाति-व्यवस्था दोनों अस्थि-मज्जा की तरह एक-दूसरे पर निर्भर है, संकट के समय दोनों एक-दूसरे को साधते हैं—इस तथ्य को जानकर भी वे अनजान बने रहते थे. जबकि जाति आंबेडकर के लिए हिंदू धर्म की विकृति थी. ऐसी विकृति जो उसके उद्भव से ही उससे चिपकी हुई है. इस कारण वे उसकी खुली आलोचना करते थे. उनके लिए मनुष्य पहले था. धर्म का नंबर इंसानियत के बाद आता था. धर्म का ध्येय इंसानियत का पोषण करना है. इसलिए जो धर्म समानता, स्वतंत्रता और सौहार्द का समर्थन न करे, उसे वे मानने से इन्कार करते थे. वे चाहते थे कि दमित वर्ग किसी भी प्रकार के अंधानुकरण से बचे. धर्म और सांस्कृतिक प्रतिमानों के प्रति आलोचनात्मक रवैया अपनाए. चालबाज पंडितों के बहकावे में आने के बजाय अपने निर्णय स्वयं लेना सीखे. धर्म और आडंबर में फर्क को समझे. दलितों का आवाह्न करते हुए उन्होंने कहा था—

‘तुम्हारी मुक्ति का मार्ग न तो धर्मशास्त्र हैं, न ही मंदिर. तुम्हारा वास्तविक उद्धार उच्च शिक्षा, ऐसे रोजगार जो तुम्हें उद्यमशील बनाएं, श्रेष्ठ आचरण एवं नैतिकता में निहित है. इसलिए तीर्थयात्रा, व्रत-पूजा, ध्यान-आराधन, आडंबरों और कर्मकांडों में अपना बहुमूल्य समय व्यर्थ मत जाने दो. धर्मग्रंथों का अखंड पाठ करने, यज्ञाहुति देने तथा मंदिरों में माथा टेकने से तुम्हारी दासता दूर नही होगी. न गले में पड़ी तुलसी-माल तुम्हारे लिए विपन्नता से मुक्ति का सुख-संदेश लेकर आएगी. और काल्पनिक देवी-देवताओं की मूर्तियों के आगे नाक रगड़ने से भुखमरी, दुख-दैन्य एवं दासता से भी तुम्हारा पीछा छूटने वाला नहीं है. इसलिए अपने पुरखों की देखा-देखी चिथड़े मत लपेटो. दड़बे जैसे घरों में मत रहो. मत इलाज के अभाव में तड़फ-तड़फ कर जान गंवाओ. भाग्य और दैव-भरोसे रहने की आदत से बाज आओ. तुम्हारे अलावा कोई तुम्हारा उद्धारक नहीं है. खुद तुम्हें अपना उद्धारक बनना है. धर्म मनुष्य के लिए है. मनुष्य धर्म के लिए नही है. जो धर्म तुम्हें मनुष्य मानने से इन्कार करता है, वह अधर्म है. धर्म के नाम पर कलंक है. जो ऊंच-नीच की व्यवस्था का समर्थन करे, आदमी-आदमी के बीच भेदभाव को बढ़ावा दे, वह धर्म हो ही नहीं सकता. असल में वह तुम्हें गुलाम बनाए रखने का षड्यंत्र है.’

हिंदू धर्म से पूरी तरह निराश आंबेडकर ने बौद्ध धर्म को विकल्प के रूप में चुना था. कदाचित यह उनकी मजबूरी थी. रूसो, वाल्तेयर, बैंथम, थामस पेन, जॉन स्टुअर्ट मिल, लॉस्की आदि जिन विचारकों से वे प्रभावित थे, वे या तो धर्म को अनावश्यक मानते थे, अथवा धर्म उनके लिए केवल व्यक्तिगत आस्था का विषय था! आंबेडकर के लिए धर्म किसी आध्यात्मिक जिज्ञासा की पूर्ति तक सीमित नहीं था. वे धर्म के संगठन-सामर्थ्य को समझते थे तथा उसे नागरिक समाज की नींव मानते थे. बर्क को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा था—‘सच्चा धर्म समाज की नींव है, जिसपर सब नागरिक सरकारें टिकी हुई हैं’(जाति का उन्मूलन, डॉ. भीमराव आंबेडकर). वस्तुतः जिन लोगों का वे नेतृत्व करते थे उनके जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धर्म का किसी न किसी प्रकार का हस्तक्षेप था. धर्म-विहीन जीवन की कल्पना भी उनके लिए असंभव थी. आंबेडकर के सामने बड़ा सवाल था कि हिंदू धर्म नहीं तो क्या? बौद्ध धर्म को अपनाने से पहले उन्होंने लगभग सभी लोकप्रिय धर्मों पर विचार किया था. वे समझते थे कि कोई भी धर्म विकृतियों से अछूता नहीं है. प्रत्येक की शुरुआत सामान्य शुभता से होती है. समाज की भलाई के लिए कुछ नियम बनाए जाते हैं. यह मानते हुए कि उन नियमों के अनुपालन में ही सबका कल्याण है, सदस्यों की सामान्य सहमति के बाद उन्हें सामाजिक आचार-संहिता का हिस्सा बना दिया जाता है. लोकभाषा में वही धर्म कहलाता है. कालांतर में उसके साथ दूसरे मिथ, प्रतीकादि जुड़ते चले जाते हैं. सामाजिक आचार-संहिता का पालन सभी लोग समान निष्ठा के साथ करें, यह आवश्यक होने पर भी संभव नहीं हो पाता. इसलिए समय के साथ प्रत्येक धर्म में क्षरण का दौर आता है. उसके लिए सामाजिक असमानता का तरह-तरह से पोषण करने वाले शीर्षस्थ प्रवर्त्तक ज्यादा जिम्मेदार होते हैं. वे धर्म के नाम पर अपने लिए विशेषाधिकारों की मांग रखते हैं. परिणामस्वरूप जिन समतावादी मूल्यों के निमित्त धर्म का जन्म होता है, वह धूमिल पड़ने लगता है. प्रकारांतर में वह दिखावे की वस्तु बनकर रह जाता है.

बावजूद इसके यह मान लिया गया है कि धर्म मानव जीवन के लिए अपरिहार्य है. बिना उसके जीवन संभव ही नहीं है. मनुष्य को सामान्य नैतिकता के रास्ते पर बनाए रखने के लिए धर्म आवश्यक है. लेकिन धर्म यदि मनुष्य के लिए परिस्थितिजन्य अनिवार्यता है तो उसे ऐसा धर्म चुनना चाहिए जिसमें अधिकतम गत्यात्मकता हो. जो परंपरा और रूढ़ियों के जाल में कम से कम फंसा हो. जिसमें नएपन को अपनाने की अधिकतम छूट हो. जो मनुष्य को अपने निर्णय-सामर्थ्य का स्वागत करता हो. जो दूसरे धर्मों के प्रति उदार हो. इस कसौटी पर हिंदू धर्म आंबेडकर को पूरी तरह निराश करता था. इसलिए 1935 में ही उन्होंने हिंदू धर्म के त्याग की घोषणा कर दी थी. उस घोषणा के पीछे उनका व्यक्तिगत दर्द भी छिपा था. पंढरपुर स्थित ‘विठोबा’ के मंदिर की पूरे महाराष्ट्र में मान्यता थी. आंबेडकर की पहली पत्नी रमाबाई अकसर बीमार रहती थीं. वे पंढरपुर जाकर विठोबा के दर्शन करना चाहती थीं. लेकिन पवित्रता के ढकोसले के चलते मंदिर में अछूतों का प्रवेश वर्जित था. आंबेडकर अपनी पत्नी की यह इच्छा पूरी न कर सके. पत्नी की मृत्यु के पश्चात नासिक जिले के यावला नामक कस्बे में दिए गए अपने ऐतिहासिक भाषण में उन्होंने कहा था—‘मेरा जन्म हिंदू के रूप में हुआ है. परंतु मैं हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं.’ परोक्ष रूप में वह एक संकल्प था—एक ऐसा पंढरपुर बसाने का जहां झूठी आस्था और पाखंड के स्थान पर ज्ञान, तर्क और मनुष्यता का साम्राज्य हो.

 

आंबेडकर और बौद्ध धर्म

हिंदू धर्म से बौद्ध धर्म की यात्रा में आंबेडकर ने पूरे 21 वर्ष का समय लिया. इस बीच उन्होंने विभिन्न धर्मों का अध्ययन किया. उस दौरान विभिन्न धर्मों के आचार्यो की ओर से अनेक प्रलोभन भी आए. लगभग सभी लोकप्रिय धर्मों की विवेचना के उपरांत उन्होंने अंततः बौद्ध धर्म का चयन किया. मृत्यु से मात्र दो महीने पहले. क्या यह धर्मांतरण आवश्यक था? क्या एक धर्म से दूसरे धर्म के बीच की यात्रा तथा नए धर्म को ठोक-बजाकर देखने-परखने के लिए यह अवधि स्वाभाविक मानी जाएगी? ठीक है, धर्मांतरण या धर्म का चयन मनुष्य का निजी मसला है. परंतु आंबेडकर के संदर्भ में वह महज आस्था का विषय नहीं था. हम जानते हैं—वे जीवन-भर एक मिशनरी की तरह काम करते रहे. सरकार में रहकर और बाहर, स्वास्थ्य की परवाह न करते हुए उन्होंने रात-दिन अनथक मेहनत की, ताकि दलितों और पिछड़ों को उनकी दुर्दशा से मुक्ति दिला सकें. ऐसे में अपने बारे में निर्णय लेने का उन्हें समय कहां था? तो क्या धर्मांतरण उनके लिए बाकी कार्यों की अपेक्षा कम महत्त्वपूर्ण मसला था? इतना कि उसे 21 वर्षों तक टाला जा सके. या फिर वे हिंदू धर्म को सुधार के लिए पर्याप्त समय देना चाहते थे? जब उन्हें लगा कि संविधान लागू होने के छह वर्ष बाद भी हिंदू धर्म की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है, न ही उसमें सुधार की कोई संभावना है तो निराश होकर 1956 में नागपुर में उन्होंने लाखों समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली. वे धर्म के संगठन-सामर्थ्य का उपयोग दलितों को संगठित करने के लिए करना चाहते थे. इस तरह धर्मांतरण का निर्णय उनके लिए निजी आस्था और विश्वास का मामला कम, हिंदू धर्म पर निर्णायक चोट करने तथा अपने समाज को, उस समाज को जो बिना धर्म के सांस लेना भी असंभव मानता था, एक बेहतर विकल्प की ओर ले जाने की छटपटाहट का नतीजा था.

आंबेडकर के विचारों पर हम कबीर और फुले के अलावा थॉमस पेन, मिल, वाल्तेयर, रूसो, बर्ट्रेंड रसेल, लॉस्की, बैंथम जैसे विचारकों का प्रभाव देखते हैं. इन विचारकों में से अधिकांश परंपरागत धर्म के चंगुल से बाहर थे. मानते थे कि धर्म अल्पज्ञों की बैशाखी है. जिन्हें खुद पर भरोसा नहीं होता वही धर्म की शरणागत होते हैं. धर्म उनकी बौद्धिक पंगुता को कम करने के बजाय उसका लाभ उठाता है. उसका नशा इतना गहरा होता है कि मनुष्य को अपनी निरंतर पांव पसारती पंगुता का एहसास तक नहीं होता. आंबेडकर विद्वता के उच्चतम स्तर को प्राप्त कर चुके नेता, विचारक और समाज सुधारक थे. व्यक्तिगत स्तर पर उन्हें धर्मनुमा बैशाखी की आवश्यकता ही नहीं थी. लेकिन जिस समाज के लिए वे काम कर रहे थे, वह बहुत पिछड़ा हुआ था. शताब्दियों से धर्म के आश्रय में रहते हुए वह उसका अभ्यस्त हो चुका था. धर्म और जीवन को एक-दूसरे का पर्याय मानता था. उन्हीं की खातिर आंबेडकर को एक धर्म से दूसरे धर्म तक की यात्रा करनी पड़ी थी.

सवाल है बौद्ध धर्म ही क्यों? क्या इसलिए कि वह मध्यमार्गी था. उसकी नींव निरीश्वरवाद पर टिकी हुई थी? लेकिन बुद्ध के समय में निरीश्वरवादी विचारक तो और भी कई थे. अजित केशकंबलि, मक्खलि गोशाल, पूर्ण कस्सप, पुकुद कात्यायन, संजय वेलट्ठिपुत्त और कौत्स. वे सब अपने-अपने मत के आचार्य, विद्वान और विचारक थे. बुद्ध से पहले ही वे ब्राह्मण धर्म पर हमला कर समानांतर दर्शनों की स्थापना कर चुके थे. ईश्वर, आत्मा, परमात्मा जैसे विषयों पर उन्हें भरोसा नहीं था. वैदिक कर्मकांडों का वे मजाक उड़ाते थे. पाणिनी शिष्य व्याकरणाचार्य कौत्स ने वेदों को ‘अर्थहीन और निस्सार’ माना था. बौद्ध ग्रंथ इस बात की भी गवाही देते हैं कि अपने समय में मक्खलि गोशाल के आजीवक संप्रदाय के अनुयायियों की संख्या बौद्ध मतावलंबियों से अधिक थी. हालांकि उनके बारे में अधिक जानकारी नहीं मिलती. वे प्रकृति के साहचर्य में रहने वाले सीधे-सादे लोग थे. जैसा देखते-सोचते, वही लोगों को समझाते थे. उन्होंने कभी सोचा नहीं कि धर्म जो व्यक्तिगत आस्था का विषय है, कभी राजनीति का दायां हाथ बन जाएगा. वस्तुतः बुद्ध के जीवनकाल तक विचारों का आदान-प्रदान मौखिक किया जाता था. धर्म-दर्शन के संहिताकरण की कोई व्यवस्था नहीं थी. स्वयं बुद्ध ने अपने सारे उपदेश मौखिक ही दिए थे. उनके निर्वाण के नब्बे दिन बाद पहली धर्म-संसद हुई. उसमें बुद्ध के जीवन तथा दर्शन के संहिताकरण का संकल्प लिया गया. धर्म-संसद को मगध सम्राट अजातशत्रु का पूरा समर्थन प्राप्त था. निरीश्वरवादी विचारकों तथा उनके विचारों को कलमबद्ध करने के लिए न तो उस समय के बुद्धिजीवी उनके साथ थे न ही अजातशत्रु जैसे सम्राट का उन्हें समर्थन था. इस कारण वह परंपरा लंबे समय तक मौखिक ही बनी रही.

उस समय तक राजाओं की साम्राज्यवादी लालसाएं उमड़ने लगी थीं. धर्म इस कार्य में सहायक था. इस बीच ब्राह्मणों और क्षत्रियों के बीच शताब्दियों तक चले संघर्ष में कमी आने लगी थी. बुद्ध और महावीर ने धर्म-दर्शन के क्षेत्र में ब्राह्मणों के एकाधिकार को तोड़ा था. लोगों तक यह संदेश गया था कि ब्राह्मणों को उन्हीं के क्षेत्र में चुनौती देना संभव है. इसलिए वे समझौतावादी रवैया अपनाने को बाध्य हुए थे. मनुस्मृति इन दोनों वर्गों के बीच हुए समझौते का भी दस्तावेजीकरण है, जिसके माध्यम से शीर्ष के दोनों पद ब्राह्मण और क्षत्रियों ने कब्जा लिए थे. बौद्ध धर्म-दर्शन के संहिताकरण का काम उन्हीं लोगों को सौंपा गया जो या तो शीर्षस्थ वर्णां यानी ब्राह्मण और क्षत्रिय से थे अथवा उनके वर्चस्व का बिना शर्त समर्थन करते थे. राजाओं और श्रेष्ठि वर्ग का समर्थन होने से भी बुद्ध और महावीर को अपने धर्म-दर्शन के प्रसार में मदद मिली. शूद्र होने के कारण निरीश्वरवादी विचारकों—मक्खलि गोशाल, अजित केशकंबलि, पूर्ण कस्सप आदि को ऐसा कोई समर्थन प्राप्त नहीं था. इसलिए उनके विचार मौखिक परंपरा से बाहर न आ सके. उनके बारे में छिटपुट जानकारी हमें बौद्ध एवं जैन ग्रंथों से ही प्राप्त होती है. तदनुसार वे तर्क और ज्ञान पर आधारित भौतिकवादी विचारधाराएं थीं. इन सबको पढ़ते-समझते हुए आंबेडकर ने बौद्ध धर्म को वरीयता दी. कदाचित उन्हें लगता था कि ठेठ निरीश्वरवादी विचारधारा को उनका अशिक्षित समाज एकाएक स्वीकार नहीं कर पाएगा. समाज को संगठित रखने के लिए वे कोई भी समझौता करने को तैयार थे. बौद्ध धर्म की खूबी है कि वह धुर भौतिकवादी और ठेठ ब्राह्मणवादी दर्शनों के बीच जगह बनाता है. चार्वाकों, लोकायतों और आजीवकों की भांति वह ईश्वर, आत्मा आदि को नकारता नहीं, बस उन्हें किनारे कर जीवन के व्यावहारिक पक्ष पर ध्यान देता है. पहली बार नैतिकता को धर्म-दर्शन का हिस्सा बनाने का श्रेय भी बुद्ध को ही जाता है. बौद्ध धर्म की ये विशेषताएं आंबेडकर के विचारों के अनुकूल थीं. यही बौद्ध धर्म की ओर उनके आकर्षण की वजह बनी थीं. फिर भी एक सवाल बाकी रह जाता है. धर्मांतरण के लिए बौद्ध धर्म को चुनने के पीछे क्या यही एकमात्र कारण था?

ध्यातव्य है कि बौद्ध धर्म का पराभव उसकी अपनी ही विकृतियों के कारण हुआ था. अपने लेखों और पुस्तकों में आंबेडकर ने इस तथ्य की विस्तृत समीक्षा की है. ईसाई, इस्लाम और सिख धर्म में भी जाति के लिए कोई जगह नहीं है, तो भी वहां समानता का अभाव है. बौद्धकालीन भिक्षु संघों के दरवाजे समाज के सभी वर्गों के लिए खुले थे. जातीय स्तरीकरण, बलि, आडंबर, यज्ञादि कर्मकांडों के लिए उसमें कोई स्थान न था. बुद्ध के समय में वर्ण जाति के रूप में रूढ़ होने लगे थे. धर्म-सूत्रों के लिखने की शुरुआत हो चुकी थी. बावजूद इसके विपुल बौद्ध साहित्य में जाति का उल्लेख नहीं है. न ही उसके आधार पर ऊंच-नीच या भेद-भाव है. पेशों का उल्लेख अवश्य है, जिसे स्वाभाविक माना जाएगा. आंबेडकर द्वारा बौद्ध धर्मों को वरीयता देने का प्रमुख कारण भी यही था. उनका मानना था कि हिंदू धर्म की अपेक्षा बौद्ध धर्म में न्याय, नैतिकता और बराबरी के अधिक अवसर हैं. यह बात अलग है; स्वयं डॉ. आंबेडकर ने भी माना है कि भिक्षु संघों में कथित निचली जाति के सदस्यों की संख्या केवल 8.5 प्रतिशत तक सीमित थी, जबकि ब्राह्मणेत्तर जातियों की संख्या उस समय भी देश की कुल जनसंख्या की तीन-चौथाई रही होंगी. इतनी जनसंख्या होने के बावजूद ब्राह्मणेत्तर वर्ग बौद्ध धर्म की ओर से क्यों उदासीन थे? क्यों 75 प्रतिशत ब्राह्मणेत्तर जातियों को गौतम बुद्ध का प्रभा-मंडल आकर्षित नहीं कर पाया था? इन प्रश्नों पर कदाचित आंबेडकर कर ध्यान नहीं गया. न ही बाद में किसी इतिहासकार ने इनपर विचार किया है. फिलहाल इसे शोध का विषय कह सकते हैं. हो सकता है तत्कालीन सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश पर विचार करते हुए कुछ तथ्य सामने आ जाएं.

ब्राह्मणेत्तर वर्ग में मुख्यतः कर्मकार जातियां सम्मिलित थीं. उनके सदस्य छोटे-मोटे उद्यमी, शिल्पकार अथवा श्रमिक थे. परिवार के मुखिया या वरिष्ठ सदस्य के लिए यह बहुत कठिन था कि अपनी जिम्मेदारियों से पलायन कर संन्यास ले; अथवा बौद्ध संघ में सम्म्मिलित होकर श्रमण परंपरा का अनुपालन करे. दूसरा कारण अपेक्षाकृत महत्त्वपूर्ण है. दरअसल बौद्ध धर्म के उभार से पहले भारत में धर्म उतना संगठित एवं शक्तिशाली नहीं था, जितना बाद के वर्षों में देखने को मिला. आश्रमों और गोत्रों की परंपरा थी. सबके अपने-अपने मुखिया और विश्वास थे, जिन्हें वे अपनी-अपनी तरह से सहेजने और आगे बढ़ाने में लगे रहते थे. आश्रम संचालकों का शेष समाज से संबंध दानादि तक सीमित था. यज्ञ के लिए अधिक धन की आवश्यकता हो तो राजा अथवा धनी व्यक्ति की मदद ली जाती थी. शूद्रों का काम मुख्यतः सेवा करना था. उन्हें धार्मिक कर्मकांड में हिस्सा लेने की अनुमति न थी. धार्मिक कर्मकांडों का आयोजन खर्चीला उद्यम था. यह मानते हुए कि शूद्र उसका खर्च उठाने में अक्षम हैं, ब्राह्मणों ने खुद उन्हें यज्ञ के अधिकार से वंचित किया हुआ था. इसके लिए महाभारत में युधिष्ठिर के मुख से कहलवाया गया है—‘कोई गरीब आदमी यज्ञ नहीं कर सकता, क्योंकि यज्ञ के लिए विभिन्न प्रकार की सामग्री प्रचुर मात्रा में इकट्ठी करनी पड़ती है. आगे उसने यह भी कहा है कि यज्ञ करने की योग्यता राजाओं और राजकुमारों को हो सकती है, न कि अकिंचनों और असहायों को.’3 इससे स्पष्ट है कि धार्मिक सरोकार, विशेषकर याज्ञिक कर्मकांड मुख्यतः ब्राह्मणों और क्षत्रियों तक सीमित थे. एकाधिकार की भावना इतनी प्रबल थी कि बाकी वर्गों के निकट आने की भी मनाही थी. राज्य छोटे-छोटे, नगर-राज्य की सीमाओं में कैद थे. उनके आश्रय में पलने वाला पुरोहित वर्ग खुद को आमजन से ऊपर मानता था. बाहरी चुनौती न होने के कारण अधिकाधिक लोगों को धर्म से जोड़ने की उन्हें चिंता भी नहीं थी. कुल मिलाकर धार्मिक विश्वास ताल-तलैया में भरे जल की भांति उथले थे. बावजूद इसके हर वर्ग अपने विश्वास को ही सर्वोत्तम, विशिष्ट और पवित्रतम मानता था. ब्राह्मणों और क्षत्रियों के संबंध भी सहज न थे. उनके बीच वर्चस्व का संघर्ष प्राचीनकाल से चला आ रहा था. लेकिन शेष जाति-वर्गां को लेकर दोनों का व्यवहार एक जैसा था. मनुस्मृति की आलोचना वर्ण-व्यवस्था को शास्त्रीयता का जामा पहनाने के लिए की जाती है. असल में वह शीर्षस्थ वर्गां के बीच समझौते तथा संसाधनों के असमान बंटवारे को ईश्वरीय घोषित करने की चाल थी, ताकि शेष जनसमाज दुरावस्था को ही अपनी नियति मानकर जीता रहे. तदनुसार समाज का बामुश्किल दस प्रतिशत हिस्सा उसके संपूर्ण संसाधनों पर कब्जा जमाए रहता था. धर्म ब्राह्मण के लिए आज भी धंधा है, तब भी धंधा था. बाकी धंधे भौतिक लाभ-हानि के सिद्धांत पर चलाए जाते थे, उसका धंधा पवित्रता और अध्यात्म के नाम पर फलता-फूलता था. रक्षक होने का दावा करते हुए क्षत्रिय भी उसका भोग करता था.

 

शीर्षस्थ वर्गों की सेवा में लगे शूद्रों के अलावा उनका एक वर्ग ऐसा भी है जो अपने शिल्प-कौशल के कारण अपेक्षाकृत स्वतंत्र था. उसमें किसान, धातुकर्मी, बढ़ई, रथ-कार, चर्मकार, बुनकर, रंगरेज, राज-मिस्त्री, तैलिक आदि लोग आते थे. शीर्षस्थ वर्गों को उनकी सेवाओं की जरूरत थी. अपने शिल्प-कौशल के कारण वे आर्थिक स्तर पर अपेक्षाकृत आत्मनिर्भर समूह थे. ब्राह्मण उन्हें शूद्र कहकर वैदिक कर्मकांडों से अलग रखते थे तो उन्हें भी उनके कार्यक्रमों पर विश्वास न था. वे केवल अपने काम में लिप्त रहते थे. कृषि और पशुपालन दोनों अर्थव्यवस्थाओं में पशुधन की महत्ता थी, उसे बलि के बहाने गंवा देना आर्थिक दृष्टि से भी नुकसानदेह था. इस कारण ब्राह्मणेत्तर जातियों का बड़ा हिस्सा आजीवक विचारधारा का समर्थक था, जो यज्ञादि कर्मकांडों को ढकोसला, पोंगापंथी ब्राह्मणों की चाल मानते थे. महावीर और बुद्ध पहले ऐसे विचारक थे जिन्होंने धर्म के आधार पर समाज को संगठित करने की कोशिश की थी. उस समय उनका ध्यान स्वाभाविक रूप से उन वर्गों की ओर गया जिन्हें ब्राह्मणों ने धार्मिक कर्मकांड के दायरे से बाहर रखा था. उनमें भी अधिक सफलता बुद्ध को मिली. माना जाता है कि अहिंसा पर अतिरिक्त जोर देने के कारण जैन धर्म लोगों को अव्यावहारिक लगता था. परंतु बौद्ध धर्म की अपेक्षा उसके पिछड़ जाने का एकमात्र यही कारण नहीं था. असली कारण जैन धर्म द्वारा वर्ण-व्यवस्था को ज्यों का त्यों स्वीकार लेना था. वर्ण-व्यवस्था को लेकर ब्राह्मण-धर्म और जैन धर्म की विचारधाराएं परस्पर मेल खाती थीं. अंतर केवल इतना है कि ब्राह्मण-संस्कृति में वर्ण-व्यवस्था के उत्स की खोज हमें ऋग्वेद तक जाती है, जैन धर्मावलंबियों के अनुसार उसकी शुरुआत आदि तीर्थंकर द्वारा की गई थी.

हमारा मूल प्रश्न अभी तक अनुत्तरित है. आखिर क्या कारण है कि आंबेडकर ने अपने समय के लोकप्रिय धर्मों को छोड़कर बौद्ध धर्म का समर्थन किया था? ऐसा कौन-सा आकर्षण था उनके मन में बौद्ध धर्म के प्रति? जैसा कि ऊपर कहा गया है, बुद्ध के समय आजीवक संप्रदाय की काफी प्रतिष्ठा थी. आंबेडकर आजीवकों के बारे में मौन रह जाते हैं. कदाचित वे सोचते थे कि अपढ़-अशिक्षित जनसमाज बौद्धिक रूप से इतना परिपक्व नहीं है कि किसी नास्तिक दर्शन को अपना सके. दूसरे आजीवकों के बारे में ऐतिहासिक साक्ष्य बहुत प्रच्छन्न हैं. जो हैं वे केवल सूत्र रूप में प्राप्त होते हैं. उनमें भी भारी दोहराव है. एक मुश्किल यह भी है कि व्यक्ति से उसका विश्वास एकाएक छीन पाना संभव नहीं होता. उसकी या तो किसी बड़े विश्वास के साथ अदला-बदली की जा सकती है, अथवा विवेक द्वारा धीरे-धीरे समाहार हो सकता है. दलित समाज संत परंपरा का अनुयायी था. कबीर, रैदास, पल्टू जैसे संतकवियों को अपना गुरु मानता था. उन सभी ने तंत्र-मंत्र, कर्मकांड आदि का तो विरोध किया, किंतु किसी न किसी रूप में आत्मा-परमात्मा के अस्तित्व का समर्थन करते थे. स्वयं आंबेडकर के पिता कबीरपंथी थे. ‘मानुष होना कठिन हया, तू साधू कैसे होया’ जैसे कबीरपंथी पदों को सुनते हुए उन्होंने मानवतावाद का पहला पाठ पढ़ा था. वे देशी-विदेशी साहित्य के अध्येता तथा प्रकांड विद्वान थे. ऐसा व्यक्ति बने-बनाए रास्तों का अनुसरण नहीं करता. अपने तथा दूसरे लोगों के लिए नए रास्ते बनाता है. आंबेडकर का पूरा जीवन इसी की मिसाल है.

आंबेडकर का मुख्य ध्येय दलितों में आत्मविश्वास पैदा करना था. वह केवल शिक्षा और राजनीति द्वारा ही संभव था. इसलिए वे एक ओर तो सवर्णों से पर्याप्त सामाजिक-सांस्कृतिक लोकतंत्र की मांग करते रहे, दूसरी ओर दलितों के राजनीतिकरण, शिक्षा और संगठन पर जोर देते रहे. ताकि त्वरित परिवर्तनशील माहौल में वे अपनी जगह बना सकें. संभव है इसके पीछे उनके अपने जीवनानुभवों का भी योगदान रहा हो. उनके पिता सेना में थे. महारों ने अंग्रेजों की सेना में रहते हुए कई निर्णायक युद्धों में भाग लिया था. कोरेगांव के युद्ध में उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी का साथ देते हुए पेशवा छत्रपतियों को पराजित किया था. आंबेडकर ने कोरेगांव युद्ध में शहीद महार सैनिकों का स्मारक बनवाने की पहल की थी. प्रत्येक वर्ष जनवरी में वे वहां शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि देने जाते थे. प्राचीन भारतीय समाज और संस्कृति के बारे में उन्होंने जितना लिखा है, उसमें बौद्ध धर्म के अलावा क्षत्रियों और ब्राह्मण के संघर्ष को ही अधिक स्थान मिला है. इससे पता चलता है कि उनके मन में क्षत्रियत्व के प्रति विशेष आकर्षण था. शूद्रों की उत्पत्ति को लेकर आंबेडकर की सामान्य धारणा थी कि वे पराजित सैनिक, युद्ध-बंदी क्षत्रिय थे. इतिहास का यह पक्ष किसी न किसी रूप में उनके अवचेतन पर आरंभ से ही छाया हुआ था. धर्म-दर्शन के क्षेत्र में ब्राह्मणों का वर्चस्व सर्वमान्य था. बुद्ध ने पहली बार ब्राह्मणों को न केवल धर्म-दर्शन के क्षेत्र में चुनौती दी थी, बल्कि ब्राह्मण-श्रेष्ठत्व के मिथ का भी सटीक प्रत्युत्तर दिया था. ‘अंबट्ठसुत्त’ में वे अनेक तर्क देकर क्षत्रियों को ब्राह्मणों से उच्चतर सिद्ध करते हैं. उससे पहले आजीवक, लोकायत आदि विद्वान् वर्ण व्यवस्था को ही नकारते थे, परंतु वर्ण व्यवस्था के भीतर रहते हुए ब्राह्मणों के श्रेष्ठत्व को चुनौती देने का काम सबसे पहले बुद्ध ने किया था. हालांकि उस समय वे वर्णव्यवस्था का समर्थन करते हुए नजर आते हैं. इस बारे में कुछ और प्रमाण भी दिए जा सकते है. एक प्रवचन के दौरान वे कहते हैं—‘बुद्धिमान व्यक्ति को यह जानकारी होनी चाहिए कि उसकी प्रियतमा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र वर्णों में से किस वर्ण की है.’4 तथापि बुद्ध का वर्ण-सिद्धांत विशुद्ध कर्म के सिद्धांत पर आधारित था. उसमें किसी को भी विशेषाधिकार प्राप्त नहीं थे.

इससे यह निष्कर्ष निकालना कि भिक्षु-संघ जातीय भेदभाव से सर्वथा परे थे, जल्दबाजी होगी. उनमें शामिल होने वाले लोग आखिर थे तो समाज का ही हिस्सा. उस समाज का हिस्सा जिसमें जाति-आधारित भेदभाव बहुत आम था. भिक्षु-संघ में आने के बाद भी उनके व्यवहार में एकाएक बदलाव नहीं हो पाता था. बुद्ध के शिष्यों में उपालि का नाम भी आता है. वह जाति से नाई था और प्रवज्या लेकर संघ में सम्मिलित हुआ था. बुद्ध के पांच करीबी शिष्यों में उसका नाम था. बावजूद इसके भिक्षुणियां उपालि की जाति को लेकर प्रायः उसपर कटाक्ष करती रहती थीं. बुद्ध इस विकृति से परिचित थे. जाति को लेकर संघ में किसी प्रकार का द्वेष न फैले इसलिए उन्होंने निर्देश जारी किए थे कि ‘संघ में कोई भी भिक्षुओं की पूर्व जाति, कम्म आदि के बहाने किसी को अपमानित न करें. न ही इस प्रकार का कोई भेद-भाव करें.’(विनयपिटक, 4/4/11). उनके अनुसार अपने पुरुषार्थ से शूद्र यदि आर्थिक रूप में सक्षम हो तो वह ‘अपने सेवक के रूप में न केवल दूसरे शूद्र को, बल्कि ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य किसी को भी नियुक्त कर सकता था.’(मज्झिम निकाय-II पृष्ठ 84-85, डॉ. रामशरण शर्मा, शूद्रां का प्राचीन इतिहास से उद्धृत). इसी विज्ञानवादी दृष्टिकोण से प्रभावित होकर आंबेडकर ने बौद्ध धर्म का वरण किया था. बुद्ध ने उस दौर में समानता का पक्ष लिया था जब प्रायः सभी प्रमुख दर्शन अभिजात मानसिकता के अनुरूप जनसाधारण से दूरी बनाए थे. आंबेडकर को लगता था कि बौद्ध धर्म को अपनाकर ब्राह्मणवाद पर निर्णायक चोट की जा सकती है, जिसके फलस्वरूप जातिविहीन समाज की स्थापना भी संभव है. वे धर्म के संगठन सामर्थ्य से परिचित थे. उन्हें लगता था कि धर्म-विमुख विचारधारा को दलित समाज एकाएक आत्मसात नहीं कर पाएगा. कदाचित वे सोचते थे कि ईश्वराधारित धर्मों की अपेक्षा ईश्वर को किनारे रखकर जीवन के व्यावहारिक पक्ष पर ध्यान देने वाला धर्म, अपने श्रम-कौशल पर जीवनयापन करने वाले लोगों के लिए अधिक उपयोगी होगा; तथा उसके माध्यम से दलितों को एकजुट रखकर देश की राजनीति में निर्णायक हस्तक्षेप कर पाना संभव होगा. वे चाहते थे कि समाज आत्मा-परमात्मा की निरर्थक वितंडा से बाहर निकलकर रोजमर्रा की परेशानियों के बारे में सोचे. इस दृष्टि से प्रचलित धर्मों की अपेक्षा बौद्ध धर्म अधिक मुफीद था. देरिदा की मदद लेते हुए कहा जा सकता है कि वे ब्राह्मणों द्वारा गढ़े इतिहास, धर्म और संस्कृति का संपूर्ण विखंडन कर नए, आधुनिकताबोध से अनुप्रेत समाज की नींव रखना चाहते थे. उसके लिए बौद्ध धर्म जरूरी औजार जैसा था.

 

ईश्वरीय विधान बनाम कानून का राज

 जाति के कारण आंबेडकर को अनेक अवसरों पर हिंदू कट्टरपंथियों द्वारा अपमान का सामना करना पड़ा था. बचपन से बड़े होने तक वे ऐसे ही हालात से गुजरते रहे. पूरे देश का बुरा हाल था. छूआछूत और भेदभाव की भावना बच्चों के दिमाग में ठूंस-ठूंस कर भर दी जाती थी. यह घटना तब की है जब वे सतारा स्कूल में पढ़ने जाते थे. जैसा चलन था, बच्चे अपना टिफिन ब्लैकबोर्ड के पीछे रखते थे. एक दिन की बात, अध्यापक ने भीमराव से ब्लैकबोर्ड पर आकर गणित का सवाल हल करने को कहा. आंबेडकर उठें, उससे पहले ही पूरी कक्षा में हड़कंप मच गया. बच्चे बदहवास होकर दौड़ पड़े. गिरते-पड़ते, एक दूसरे से टकराते हुए सब ब्लैकबोर्ड तक पहुंचे. भीमराव वहां पहुंचें उससे पहले ही सबने अपना-अपना टिफिन उठा लिया. वे बुरी तरह घबराए हुए थे. कुछ बच्चे चीखे जा रहे थे. मानो भूचाल आ गया हो. प्रत्येक को डर था कि अछूत भीमा के ब्लैकबोर्ड तक पहुंचते ही उसके पीछे रखा भोजन अपवित्र हो जाएगा. बालक भीमराव के दिल पर क्या गुजरेगी, इसका उन्हें भान न था. न ही उन्हें ऐसा कुछ सिखाया गया था. ऐसे ही दर्जनों उदाहरण हैं. आंबेडकर जीवन-भर इस तरह के अपमान झेलते रहे. अंततः उन्होंने अपने लाखों समर्थकों के साथ हिंदू धर्म को छोड़ने का निर्णय लिया था. वह उनकी प्रतीकात्मक कार्रवाही थी. जातिवादियों के नाम संदेश देते हुए एक बार उन्होंने कहा था—हिंदू धर्म स्वयं नहीं बदला तो उसे बहुत जल्दी मिटने के लिए तैयार रहना पड़ेगा.

वे यह भी जानते थे कि धर्मांतरण समस्या का एकमात्र समाधान नहीं है. दलितों की दुर्दशा का अंत तब तक असंभव है, जबतक राज्य और कानून उनके अधिकारों के समर्थन में न हों. यह केवल विधि-शासित राज्य में ही संभव है. मगर कानून का राज्य भी तभी सफल हो सकता है जब नागरिक अपने अधिकारों को लेकर जागरूक हों. इसके समाधान हेतु वे लोकतंत्र का सामाजिक-सांस्कृतिक परिक्षेत्रों में विस्तार चाहते थे. उनका विचार था कि अपनी मांगों को राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित रखने वाले नेता, बहुसंख्यक समाज को वास्तविक स्वतंत्रता से दूर रखना चाहते हैं. बिना सामाजिक स्वतंत्रता के राजनीतिक-आर्थिक स्वतंत्रता निरर्थक है—ऐसा उनका मानना था. स्वाधीनता संग्राम के दौरान तिलक जैसे हिंदू नेताओं का नारा था—‘वेदों की ओर वापसी.’ अप्रत्यक्ष रूप में यह प्राचीन वर्णाश्रम व्यवस्था की पुनर्वापसी का ब्राह्मणवादी षड्यंत्र था. उसका उन सपनों से कोई वास्ता न था, जिन्हें उत्पीड़ित समाज आजादी के साथ साकार करना चाहता था. आंबेडकर जानते थे कि भीषण असमानता, शोषण एवं उपेक्षा के शिकार दलितों के लिए जिन्हें आरंभ से ही शिक्षा से वंचित रखा गया है, ऐसे नारे निरर्थक और प्रतिगामी हैं. वे उसी समाज में अपनी स्वतंत्रता का लाभ उठा सकते हैं, जहां पर्याप्त समानता, स्वतंत्रता और भाईचारा हो. तिलक के एक और प्रसिद्ध नारे के उत्तर में उनका कहना था—‘तिलक यदि अछूत परिवार में जन्मे होते तो बजाय यह कहने के कि ‘स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है,’ कहते—‘अश्पृश्यता उन्मूलन मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है.’5 उनका कहना था कि सरकार यदि तिलक की स्वतंत्रता की मांग को तत्काल मान लेती है, तो वह केवल ब्राह्मणों की आजादी होगी. उसका लाभ समाज के बहुत छोटे-से समूह को प्राप्त होगा, जो समाज में पहले से ही लाभ की अवस्था में रहा है. दलितों और पिछड़ों के हालात में उससे कोई सुधार होने वाला नहीं है. उन्होंने लिखा था कि समाज की शक्तियों और अधिकारों का सीमित हाथों में सिमट जाना सर्वथा अलोकतांत्रिक है. अतएव सामाजिक स्वतंत्रता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग करना या केवल राजनीतिक स्वतंत्रता से संतुष्ट होकर रह जाना, पूर्णतः अलोकतांत्रिक कदम होगा. इस विचार को वे अपने विभिन्न लेखों में तरह-तरह से उठाते हैं. उन्हीं के शब्दों में—

‘लोकतांत्रिक शासन के लिए लोकतांत्रिक समाज का होना बहुत आवश्यक है. लोकतंत्र के औपचारिक ढांचे का, यदि उसमें सामाजिक लोकतंत्र का अभाव है, तो कोई महत्त्व नहीं है. यदि सामाजिक लोकतंत्र नहीं है तो राजनीतिक लोकतंत्र भी अपूर्ण एवं अनुपयुक्त होगा. वस्तुतः राजनीति से जुड़े लोगों ने यह कभी महसूस नहीं किया कि लोकतंत्र केवल शासन तंत्र नहीं है. वह वास्तव में सामाजिकता का तंत्र है. लोकतांत्रिक समाज के लिए यह आवश्यक नहीं है कि उसमें एकता, सामुदायिक उद्देश्य, लोकहित के प्रति निष्ठा तथा पारस्परिक सहानुभूति जैसी विशेषताएं हों. उसके लिए दो बातें साफ तौर पर आवश्यक होती हैं. पहली है—उदार मनोवृत्ति. अपने साथियों के प्रति सम्मान और समानता का भाव. दूसरी है—एक सामाजिक संगठन जो कठोर सामाजिक बंधनों से सर्वथा मुक्त हो. लोकतंत्र की सदस्यों के अलगाव या अकेलेपन के साथ संगति नहीं होती. ये चीजें समाज में सुविधा-संपन्न एवं सुविधा-वंचित लोगों के बीच दरार पैदा करती हैं.’ (डॉ. आंबेडकर, रानाडे, गांधी और जिन्ना).

भारतीय समाज में व्याप्त भारी असमानता का एक कारण यह है कि वह उन धर्म-ग्रंथों से प्रेरणाएं लेता आया है, जिनमें समानता, स्वतंत्रता, भाईचारे और सहिष्णुता को उपेक्षित रखा गया है. जो अपने महत्त्वपूर्ण निर्णय उन अदृश्य शक्तियों के नाम पर लेता है, जिनके आगे मनुष्य का अस्तित्व बिलकुल गौण मान लिया जाता है. चूंकि वे ग्रंथ मानवीय अस्मिता और अधिकारों की अवहेलना करते हैं, इसलिए उनमें मानवीय विवेक को उपेक्षित रखा जाता है. सहज प्रश्नाकुलता को दबाए रखने के लिए विचार-स्वातंत्र्य को भी विद्रोह मान लिया जाता है. दूसरों के श्रम पर पलने वाले अभिजन समूहों को बहुसंख्यक जनसमाज पर शासन करने की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है; तथा श्रम से दूर, दूसरों के अर्घ्य के सहारे सांस लेने वालों को देवता का दर्जा देकर पूज्य और पूरे समाज के लिए मानक बना दिया जाता है. धर्म के नाम पर बने वे संगठन इतने शक्तिशाली होते हैं कि बड़े-बड़े भूपति उनके आगे घुटने टेकते आए हैं.

सम्राट वेन का किस्सा अनेक पुराणों में आया है. यह कहानी उन दिनों की याद दिलाती है जब जनता अपना राजा स्वयं चुनती थी. वेन को जनता द्वारा चुना गया प्रथम सम्राट माना गया है. निर्वाचित राजा होने के कारण वेन खुद को जनता के प्रति उत्तरदायी समझता था. जबकि धर्म और राजनीति के माध्यम से समाज पर काबू गांठने को आतुर पुरोहित वर्ग चाहता था कि राजा उसके हितों को प्रमुखता दे. ब्राह्मणों की सर्वोच्चता को स्वीकार करे. वेन को यह स्वीकार न हुआ तो उन्होंने लोगों को उसके विरुद्ध भड़काना आरंभ कर दिया. पुराणों में यह कहानी अपने विकृत रूप में है. ठीक ऐसे ही प्रस्तुत की गई है जैसी ब्राह्मणवाद को बढ़ावा देने वाली दूसरी कहानियां और मिथ उनमें आए हैं. ब्राह्मणों के बहकावे में आकर उग्र भीड़ वेन की हत्या कर देती है. इस तरह ब्राह्मणों के शब्दों में ‘अन्यायी’ वेन का अंत हो जाता है. पुराणों में दर्ज कथा को पढ़कर आप उससे इतर निष्कर्ष निकाल ही नहीं सकते. परंतु जब हम कहानी के पृथु वाले हिस्से पर जाते हैं तो तस्वीर पूरी तरह साफ नजर आने लगती है. वेन के बाद ब्राह्मण उसके पुत्र पृथु को राजा बनाते हैं. राजा बनते समय पृथु प्रजा के प्रति ईमानदार और कर्मनिष्ठ रहने की शपथ नहीं लेता. उसे शपथ दिलाई जाती है, ब्राह्मणों की सर्वोच्चता को स्वीकारने की. उनके कहे अनुसार चलने की. कभी उनकी अवज्ञा न करने तथा सदैव उन्हें अपना पूज्य मानने की. पृथु द्वारा शपथ लेते ही प्रकरण का पटाक्षेप नहीं होता. बताया जाता है कि पृथ्वी का नामकरण भी उसी ब्राह्मण-भक्त सम्राट के नाम पर हुआ है. यह दर्शाने के लिए कि पूरी पृथ्वी ब्राह्मणों के अनुशासन में है. वही सबके स्वामी, सर्वेसर्वा और पथ-प्रदर्शक हैं.

सवाल है कि धर्म को इतनी शक्ति मिलती कहां से है? क्या देवताओं से? परंतु उसका तो कोई प्रमाण नहीं है. उनका अस्तित्व वायवी है. धर्म को वास्तविक ताकत उसके अनुयायियों की ओर से मिलती है. केवल जनसमाज धर्म को, राजनीति को और व्यापार को सफल और शक्तिशाली बनाता है. उन्हें सत्ता के रूप में न केवल पालता-पोसता है बल्कि अपने व्यक्तित्व को उनके आगे तुच्छ मानकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी उनके लिए खपता चला जाता है. अतीत में जाकर इसकी पुष्टि भी संभव है. करीब ढाई हजार वर्ष पहले तक समाज के स्तर पर पर्याप्त लोकतांत्रिकता थी. नागरिकगण स्वयं स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी संभालते थे. महत्त्वपूर्ण निर्णय परस्पर विचार-विमर्श द्वारा मिल-जुलकर लिए जाते थे. राज्य भी उतने शक्तिशाली न थे. न ही आर्थिक और सामाजिक स्तर पर आज जितना वैषम्य था. धीरे-धीरे धर्म का प्रसार हुआ. उसने लोगों के दिलो-दिमाग को अपने बस में करना आरंभ कर दिया. कहने को धर्म सामूहिकता का उद्यम है. असल में उसकी सामूहिकता दिखावे के लिए होती है. जो चालाक लोग हैं वे इस रहस्य को समझते हैं. इसलिए धर्म का उपयोग अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए करते हैं. परंतु जो ऐसे नहीं हैं. जो दूसरों के साथ विश्वास भरा जीवन जीना चाहते हैं, वे प्रकारांतर में इहलौकिक सुखों को ओर से मुंह मोड़ जानबूझकर छाया के पीछे भागने लगते हैं. जिनके वे अधिकारी हैं, वे सुख भी छीन लिए जाएं तब भी उफ् नहीं करते. हालात को नियति मानकर स्वीकार लेते हैं. धर्म का नशा उनके सहज विवेक को कुंठित किए रहता है. ऐसे लोगों का शोषण आसान होता है. दुख की बात यह है कि ऐसे लोग बहुतायत में होते हैं. धर्मसत्ता, राजसत्ता और अर्थसत्ता की प्रगति इन्हीं के कंधों पर टिकी होती है. धर्माचार्य उनकी संख्याबल के आधार पर आवश्यकतानुसार राजसत्ता पर दबाव बनाए रहता है. व्यापारी उनकी सदाशयता का लाभ उठाते हुए उनसे उनके श्रम के मूल्यांकन के अधिकार हर लेता है. राजसत्ता अपने मददगार पुरोहितों को बढ़ावा तथा व्यापारी की बेईमानियों को संरक्षण देती है. बदले में व्यापारी राजसत्ता को भेंट, सौगात कर आदि देकर अपनी ओर मिलाए रखता है. तीनों वर्ग भली-भांति जानते हैं कि वे जनता की शक्ति और संसाधनों का उपयोग करते हैं. केवल जनता उस ओर से अनजान होती है. अतएव जनता को उसकी शक्तियों का बोध कराना तथा अधिकारों से परचाना, परिवर्तनकारी आंदोलनों की पहली मांग होती है.

आंबेडकर इस सच को भली-भांति समझते थे उनकी लड़ाई भारतीय समाज में व्याप्त जातिवाद की विषबेलि, अशिक्षा, अज्ञानता और आडंबरवाद से थी. समाज और कानून के क्षेत्र में अपने उल्लेखनीय योगदान के आधार पर हम उन्हें आधुनिक सभ्यता का वास्तुकार भी कह सकते हैं. हम जानते हैं कि आधुनिकता केवल फैशन का पर्याय नही हैं. फैशन तो उसका बाहरी आवरण है. आधुनिकता बदलते समाजार्थिक मूल्यों को आत्मसात् करते हुए, वर्तमान के साथ अद्यतन रहने की कला है. जिसे हम, आप आधुनिक होना कहते हैं, उसकी नींव मानव-अधिकार, समानता और स्वतंत्रता पर टिकी है. प्रौद्योगिकीय क्रांति के फलस्वरूप आज बाजार में ऐसे अनेक उपकरण हैं, जिनके चलते परिवार और समाज पर मनुष्य की निर्भरता घटी है. आधुनिक सभ्यता के आकलन की व्यावहारिक कसौटी भी यही है. वास्तविक आधुनिकता तर्क, ज्ञान, सहज मानवीय विश्वास पर केंद्रित नए जीवन-मूल्यों को आत्मसात् कर लेने में है. इसका आशय यह नहीं है कि आधुनिकता मनुष्य और समाज के अंतर्संबंधों पर भारी पड़ती है. मनुष्य को समाज की जितनी जरूरत पहले थी, उतनी आज भी है और आगे भी रहेगी. आधुनिकता एक ओर समाज में मनुष्य की महत्ता को भी चिह्नित करती है, दूसरी ओर उसे समाज के प्रति ज्यादा जिम्मेदार भी बनाती है. मनुष्य की कमजोरी है कि केवल किसी वस्तु के आने से उसकी अहं-तुष्टि नहीं होती. वस्तु के बारे में दूसरों को बताना भी उसे जरूरी लगता है. इसलिए प्रौद्योगिकीय विकास द्वारा मनुष्य और समाज के संबंधों में स्वाभाविक परिवर्तन आता रहता है. आधुनिकता का अभिप्राय उन संबंधों के लोकोपकारी स्वरूप को समयानुसार मान्यता देते रहना है.

इस दृष्टि से देखें तो समकालीन नेताओं के बीच कदाचित आंबेडकर अकेले थे, जो आधुनिकता और मनुष्यता के अंतर्संबंधों से भली-भांति परिचित थे. इसलिए वे समाज में निरंतर उन मूल्यों का समर्थन करते रहे, जिनसे सभ्यता का परिष्कार हो सके. वे प्रखर लेखक थे, प्रकांड विद्वान. उन्होंने विपुल लेखन किया. उनके लेखन में सघन प्रतिबद्धता है. उनका लिखा एक-एक शब्द आंदोलनधर्मी है. उसका एकमात्र ध्येय था—समाज के दमित-शोषित वर्गों की समस्याओं को केंद्र में लाना, उनके लिए न्याय सुनिश्चित करना तथा अशिक्षा और अज्ञानता के अंधकार में डूबे लोगों को उनके शोषण और शोषणकारी परिस्थितियों से परचाना. रूसो का कहना था कि मनुष्य आजाद जन्मता है. लेकिन हर जगह बेड़ियों में रहता है. वे बेड़ियां कहां से आती हैं. इसका उत्तर रूसो का समकालीन वाल्तेयर हमें देता है. वह ईश्वर को खूंटा और धर्म को रस्सा मानता था. उसके अनुसार धार्मिक अंधता का शिकार मनुष्य ईश्वर नामक खूंटे के चारों ओर चक्कर काटता रहता है. यूरोपीय पुनर्जागरण के दिनों में लॉक, वाल्तेयर और रूसो ने धर्म और उपलब्ध ज्ञान के प्रति मनुष्य की आलोचनात्मक सोच को पुख्ता किया था. लॉक ने ज्ञानार्जन में अनुभव की महत्ता पर जोर देते हुए मानव-मस्तिष्क की अंतहीन सीमाओं की ओर संकेत किया था. वह स्थापित ज्ञान को ज्यों का त्यों मानने की अपेक्षा उन्हें तर्कसम्मत ढंग से अपनाने का पक्षधर था. वाल्तेयर और रूसो ने धर्म के मकड़जाल को भेदने के लिए अनेक जीवनमंत्र दिए थे. रूसो मानवमात्र की स्वतंत्रता का समर्थक था. उनके क्रांतिधर्मा सोच ने ही फ्रांसिसी क्रांति की नींव रखी थी. भारत के संदर्भ में आंबेडकर वाल्तेयर और रूसो दोनों की भूमिका का साथ-साथ निर्वाह करते हैं. उनका कहना था—

‘गुलाम को उसकी गुलामी का एहसास करा दो, वह क्रांति कर देगा.’

यहां अरस्तु भी याद आते हैं. सुकरात, प्लेटो और अरस्तु तीनों के विचारों में बड़ा अंतर है. परंतु समाज, संस्कृति और राजनीति के प्रति नैतिकतावादी दृष्टिकोण के मामले में वे एक-दूसरे का पूरी तरह समर्थन करते थे. तीनों विचारक शुभत्व को समाज का मूलाधार मानते थे. सुकरात का मानना था कि मानव जीवन का एकमात्र ध्येय शुभत्व की प्राप्ति है. वह केवल नैतिक आचरण द्वारा संभव है. नैतिकता की खूबी है कि वह प्रत्येक परिस्थिति में लक्ष्य बनी रहती है. मनुष्य जब तक व्यक्तित्व उठान के एक स्तर तक पहुंचता है, नैतिकता का स्तर कुछ और ऊपर उठ चुका होता है. सुकरात का आग्रह था कि मनुष्य को शुभत्व प्राप्ति के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहना चाहिए. प्लेटो ऐसे आदर्श समाज का स्वप्न देखता था, जहां नागरिकों के हित परस्पर आबद्ध हों. समाज के सुख-दुख में प्रत्येक नागरिक की समान साझेदारी हो. प्लेटो के अनुसार यह केवल दार्शनिक राजा के शासनकाल में संभव है. अरस्तु अपने पूर्ववर्ती विचारकों की अपेक्षा व्यावहारिक था. जानता था कि दार्शनिक सम्राट की कल्पना आदर्श स्वप्न से परे कुछ नहीं है. आवश्यक नहीं कि विद्वता के शिखर-पुरुष राजनीति में भी उतने ही सफल सिद्ध हों. वैसे भी वह समय पूरी दुनिया में बौद्धिक क्रांति का था. भारत में बुद्ध, महावीर, चीन में कन्फ्युशियस, ला-ओत्जे, यूनान में सुकरात, प्लेटो जैसे नैतिकतावादी विचारकों का बोलबाला था. उन सबका अपना-अपना तत्व दर्शन था. राजाओं के बीच खुद को विद्वान सिद्ध करने की होड़ मची रहती थी. राजा-महाराजा अपने दरबारों में दार्शनिकों और विद्वानों को उच्च पदों पर रखते थे. इसके बावजूद उनके बीच वर्चस्व की लड़ाइयों का अंत न था. समाज में नैतिक पराभव की स्थिति आम बात थी. ऐसे हालात में अरस्तु की व्यावहारिक सलाह बहुत काम की थी. उसका कहना था कि यदि समाज सामान्य नैतिकता से दूर है तो राजनीति में भी उसका लोप स्वाभाविक है. आंबेडकर का पूरा जीवन सामाजिक शुद्धीकरण को समर्पित रहा. वे एक तो समाज के सवर्णों से समानता, समरसता तथा दलितों के प्रति न्याय-सम्मत व्यवहार की मांग करते रहे, वहीं उन्होंने दलितों का आवाह्न किया कि वे शताब्दियों पुरानी बौद्धिक जड़ता, अज्ञानता के दलदल, रूढ़ियों के मकड़जाल, हताशा और दैन्य से बाहर निकलें. नए ज्ञान का स्वागत करें और अपने अधिकारों के लिए एकजुट होकर संघर्ष करें. समझ लें कि उनके हालात को सिवाय उनके अपने कोई बदलने वाला नहीं है. आंबेडकर की निजी उपलब्धियां उनके अपने संघर्ष और स्वाध्याय की दें थीं.

आंबेडकर ने लोगों को समझाया कि मनुष्य अपनी परतंत्रता, दैन्यादि के लिए खुद भी जिम्मेदार होता है. दुरावस्था के कारणों को समझने, उनका विरोध करने की अपेक्षा वह उन्हें सह लेने में अपनी भलाई समझता है. ‘जेहि विध राखे राम तेहि विध रहिए’—जैसी भाग्यवादी मान्यताएं उसे हालात से बच निकलने को प्रेरित करती हैं. शिखर पर विराजमान लोग जनसाधारण की इन दुर्बलताओं को भलीभांति समझते हैं. वे शासन चलाना भले ही न जानें, स्वार्थ-सिद्धि हेतु शिखर पर बने रहना उन्हें भली-भांति आता है. अवसरवादी चालों के बीच उनकी कोशिश किसी भी तरह अपना वर्चस्व बनाए रखने की होती है. वे निरंतर इस प्रयास में रहते हैं कि जनता को वास्तविक मुद्दों से हटाकर जाति, धर्म जैसे नकारात्मक और वायवी मुद्दों में उलझा दिया जाए. इससे उसका ध्यान समस्या के असली कारण के बजाए उस ओर चला जाता है, जिधर वे ले जाना चाहते हैं. धर्म, जाति, क्षेत्रीयता ऐसे ही औजार हैं. उन्हें ईश्वरीय आदेश बताकर दलितों एवं पिछड़ों को शताब्दियों से दास बनाया जाता रहा है. आंबेडकर इस समस्या को भली-भांति समझते थे. इसलिए वे लगातार इस प्रवृत्ति का विरोध करते रहे. दलितों और पिछड़ों के निरंतर पराभव का एक कारण यह भी था कि वे मान चुके थे कि शासक होना जन्मजात गुण होता है; और उनमें इस गुण का अभाव है. इसलिए शासित रहना उनकी नियति है. उन्हें इस भ्रांति से निकालने के लिए आंबेडकर उनके राजनीतिकरण हेतु सतत प्रयत्नशील रहे.

राजनीति से जुड़ाव तथा परिवर्तनकारी राजनीति करना दोनों अलग-अलग बातें हैं. परिवर्तनकामी राजनीति के लिए समाज में परिवर्तन की इच्छा का होना आवश्यक है. और परिवर्तन को अनुकूल दिशा देने के लिए आवश्यक है कि राजनीतिक संस्थाएं लोकतांत्रिक चेतना से भरपूर सामाजिक संस्थाओं के नियंत्रण में कार्य करें. यदि सामाजिक स्तर पर लोकतंत्र का अभाव है तो राजनीतिक क्षेत्र में भी लोकतंत्र अधिक समय तक टिक नहीं पाएगा. आंबेडकर पश्चिमी पुनर्जागरण से प्रेरित थे. रूसो, वाल्तेयर, थामस पेन, बैंथम आदि के विचार उनके चिंतनकर्म पर छाए रहते थे, जिन्होंने उनके सामाजिक न्याय संबंधी विचारों को धार दी थी. उन्होंने दलितों और शोषितों को समझाया कि मनुष्य होने के नाते उन्हें वही अधिकार प्राप्त हैं, जो समाज के किसी भी दूसरे व्यक्ति को प्राप्त हैं. दलित और शोषित वर्ग जो आज शोषण और दैन्य को अपनी नियति स्वीकार बैठा है, उसके पूर्वजों ने ज्ञान के शिखर क्षेत्रों में दखलंदाजी बनाए रखी है. मनु का विधान केवल आलसी और मानसिक दुबर्लता के शिकार लोगों पर पूरी तरह लागू हो पाया है. जिन्होंने उसे नकारने का साहस किया, उसने अपने क्षेत्र में जोरदार उपस्थिति दर्ज की है. प्राचीनकाल में भी ईश्वरवादी और निरीश्वरवादी विचारधाराओं के बीच सदैव संतुलन रहा है. जिन दिनों ब्राह्मण लोग वेद-वेदांग रचने में जुटे थे, उन्हीं दिनों समानांतर रूप से अनीश्वरवादी चिंतक अपनी सशक्त उपस्थिति समाज में बनाए हुए थे.

आंबेडकर का विचार था कि समानता, स्वतंत्रता और सौहार्द की स्थापना के लिए धर्म की भूमिका केवल सहायक की होती है. अधिकारों की रक्षा केवल विधिसम्मत राज्य में ही संभव है. इसके लिए लोगों में सामाजिक एवं नैतिक चेतना की व्याप्ति अपरिहार्य है. यदि सामाजिक चेतना ऐसी है कि वह उन अधिकारों की रक्षा करने में भी सक्षम है, जिसके लिए कानून बनाए जाते हैं, तो उसके सदस्यों के अधिकार सुरक्षित बने रहते हैं. यदि समाज व्यक्ति के मूलभत अधिकारों के प्रति उदासीन है, अथवा उनका विरोध करता है तो कोई कानून, न्यायपालिका या दूसरी वैधानिक व्यवस्था उनका संरक्षण नहीं कर सकती. धर्म और जाति के आधार पर बंटे, असमानता के शिकार समाजों में यह काम प्रभुवर्ग की इच्छा से नहीं हो सकता. जैसा कि गांधी चाहते थे. इसके लिए आवश्यक है कि शिखरस्थ वर्ग अपने सोच में बदलाव लाएं. समानांतर रूप से उत्पीड़ित वर्गों में भी चेतना का संचार हो, ताकि वह शोषण तथा उसके कारणों का तत्क्षण विरोध कर सके. बलात् धर्मांतरण को छोड़ दें तो भी हिंदुओं के बीच धर्मांतरण नई घटना नहीं है. उसके पीछे जो प्रेरणाएं काम करती हैं उनमें पहली सत्ता के निकट, सुख-साधनों और शक्ति से लैस रहने की कामना है. जैसा मुगलों के राज्य में होता था. धर्मांतरण की ऐसी प्रवृत्ति मुख्यतः सवर्ण लोगों में रही है. उनमें से कुछ शक्ति-केंद्र से सटे रहने का मोह छोड़ नहीं पाते. ऐसे लोग सत्ता-परिवर्तन के समय धर्म-परिवर्तन द्वारा भी उसके करीब रहने में ही बुद्धिमानी समझते हैं. धर्मांतरण का दूसरा कारण दूसरा सामाजिक शोषण और उत्पीड़न से बचाव के लिए अपेक्षाकृत उदार धर्म को अपनाना है. जैसा भारत में दलितों ने किया है. धर्मांतरण का तीसरा कारण आध्यात्मिक भी चेतना हो सकती है. व्यक्ति किसी धर्म विशेष के देवता या दर्शन से प्रेरित होकर उसकी ओर आकर्पित होता है. यह धर्मांतरण की श्रेष्ठतम वजह कही जा सकती है. हालांकि ऐसे मामले नगण्य होते हैं. आंबेडकर के लिए धर्मांतरण न तो सत्ता से निकटता बनाए रखने का माध्यम था, न ही आस्था का. वे तो अपने समाज को सामंतवादी लक्षणों से युक्त हिंदू धर्म के चंगुल से बाहर निकालना चाहते थे. ताकि दलित वर्ग अपने संगठन सामर्थ्य को समझे और उसके माध्यम से अपने अधिकारों की लड़ाई के लिए तैयार रहे. अप्रत्यक्ष रूप से आंबेडकर के धर्मांतरण का लाभ हिंदू धर्म को भी हुआ. उनके द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण करने से पहले दलितों का पलायन आमतौर पर ईसाई और इस्लाम की ओर होता था. बाद में दलितों का झुकाव भारतीय मूल के बौद्ध धर्म की ओर हो गया.

आंबेडकर मानते थे कि दलितों को मान-सम्मान की प्राप्ति तभी संभव है जब उन्हें राज्य स्वतंत्र नागरिक का सम्मान दे. नागरिक के रूप में स्वीकारे. कम से कम संवैधानिक स्तर पर उनके साथ कोई भेदभाव न हो. इसके लिए ‘मनुस्मृति’ के ईश्वर-केंद्रित विधान को संविधान-समर्थित विधान में बदलना आवश्यक था. रूसो, बैंथम, लॉस्की जैसे विद्वानों का भी मत था कि राज्य को ईश्वरीय विधान या नैतिकता के बजाय कानून के द्वारा चलना चाहिए. ईश्वरीय विधान के अनुसार काम करने वाले समाजों के लिए बार-बार अतीत में झांकना सामान्य बात है. भारत जैसे देश के लिए जहां एक वर्ग आज भी इस खुशफहमी में जीता है कि कभी यह धरती चलते-फिरते देवताओं की बस्ती थी. जिसके एक अवतार का दावा है कि दुर्जनों को ताड़ने और सज्जनों की रक्षा हेतु वह पुनः-पुनः जन्म लेता रहेगा. ऐसे समाज में समस्याओं से जूझने के बजाय उनसे पलायन नागरिक-स्वभाव का हिस्सा स्वतः बन जाता है. आधुनिक समाजों में जो सामाजिक न्याय, समानता एवं मानवाधिकारवादी जीवनमूल्यों के अनुसार संचालित हों, इस प्रवृत्ति को प्रगति-विरोधी, प्रतिगामी और सामंतवाद का पोषक माना जाता है, जिसमें एक वर्ग को दूसरे वर्ग पर शासन करने का अधिकार मिल जाता है. मोसका के अनुसार ऐसे समाजों में असंगठित बहुसंख्यक वर्ग पर संगठित अल्पसंख्यक वर्ग राज करता है. लोग अपनी दुर्दशा को समझ न पाएं इसलिए, चुनौती सामने देख वह दैवी विधान को बीच में ले आता है. आंबेडकर का सपना समानताधारित समाज का था. जिसका रास्ता दलितों और पिछड़ों के सबलीकरण की ओर से जाता था. उनका विचार था कि दलित वर्ग बौद्धिक दैन्य से बाहर आए. ताकि उन्हें किसी दीनानाथ की प्रतीक्षा में जीवन न बिताना पड़े. उन्होंने दलितों और शोषितों का ज्ञान के क्षेत्र में आगे आने के लिए आवाह्न किया, ताकि संस्कृति के आधार पर होने वाले शोषण को समझकर उससे मुक्ति के उपाय सोचे जा सकें.

 

डॉ. आंबेडकर का आर्थिक चिंतन

अर्थशास्त्री के रूप में डॉ. आंबेडकर के महती योगदान की ओर बहुत कम विद्वानों का ध्यान गया है. प्रायः लोग उन्हें संविधान निर्माता के रूप में जानते हैं. यह भी जानते हैं कि दलितों के उद्धार के लिए उन्होंने अनथक संघर्ष किया. उसके लिए समकालीन नेताओं की अनगिनत आलोचनाएं सहीं. वे अपने समय के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मगर विवादित नेताओं में रहे. उनकी विद्वता विरोधियों को पस्त करने वाली थी. लेकिन अर्थशास्त्री के रूप में उनके योगदान की प्राय: उपेक्षा ही की गई. वस्तुतः राजनीति और समाज सुधार के क्षेत्र में डॉ. आंबेडकर का योगदान इतना महान एवं युगांतरकारी है कि उनके जीवन के बाकी पहलुओं तक लोगों की नजर जा ही नहीं पाती. यहां तक कि दलित विद्वानों का लेखन भी उनके सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्रों में योगदान तक सिमटा रहा है. अर्थशास्त्री के रूप में आंबेडकर के योगदान को केवल एक लेख या लेखांश से आंकना असंभव है. अपने एक व्याख्यान में प्रख्यात अर्थशास्त्री श्रीनिवास अंबीराजन ने अर्थशास्त्र के क्षेत्र से राजनीति और कानून के क्षेत्र में अंतरण को अर्थशास्त्र की भारी क्षति बताया था. उनके अनुसार अगर वे राजनीति और समाज सुधार के क्षेत्र में नहीं आते तो दुनिया-भर में दिग्गज अर्थशास्त्री के रूप में स्थान पाते. इस बात में काफी सचाई भी है. लंबे समय तक आंबेडकर का मन अर्थशास्त्र में रमा रहा. 1947 आते-आते राजनीतिक क्षेत्र में उनकी व्यस्तता काफी बढ़ चुकी थी. लेकिन उन दिनों भी उनकी इच्छा  अर्थशास्त्र के क्षेत्र में छूटे हुए काम को आगे बढ़ाने की थी. उसी वर्ष प्रकाशित ‘प्रॉब्लम ऑफ रुपी’ के संशोधित संस्करण की भूमिका में उन्होंने अर्थशास्त्र के क्षेत्र में, 1923 के बाद हुए बदलावों को लेकर पुस्तक का दूसरा खंड यथाशीघ्र तैयार करने का आश्वासन दिया था. मगर आजादी के बाद राजनीतिक जिम्मेदारियां अत्यधिक बढ़ जाने के कारण वे छूटे हुए कार्य को पूरा नहीं कर सके.

अर्थशास्त्र आंबेडकर का सर्वाधिक प्रिय विषय था. कोलंबिया विश्वविद्यालय में अध्ययन करते समय उनके पास कुल 29 विषय ऐसे थे, जिनका सीधा संबंध अर्थशास्त्र से था. वहां से उन्होंने ‘इवोल्यूशन ऑफ पब्लिक फाइनेंस इन ब्रिटिश इंडिया’ विषय में पीएचडी की डिग्री प्राप्त की थी. आगे चलकर लंदन स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स से उन्होंने ‘प्रॉब्लम ऑफ रुपी : इट्स ओरिजिन एंड इट्स सोल्यूशन’ विषय पर डीएससी की डिग्री हेतु शोध प्रबंध लिखा. उस ग्रंथ की भूमिका महान अर्थशास्त्री एडविन केनन ने लिखी थी. अर्थशास्त्र के क्षेत्र में आंबेडकर की विद्वता का अनुमान लगाने के लिए अमर्त्यसेन की टिप्पणी भी मददगार सिद्ध हो सकती है. 2007 में दिए गए एक व्याख्यान में आंबेडकर के अर्थशात्रीय ज्ञान की गुरुता को स्वीकारते हुए हमारे समय के इस महान अर्थशास्त्री ने कहा था—

‘आंबेडकर अर्थशास्त्र के क्षेत्र में मेरे जनक हैं. वे दलितों-शोषितों के सच्चे और जाने-माने महानायक हैं. उन्हें आजतक जो भी मान-सम्मान मिला है वे उससे कहीं ज्यादा के अधिकारी हैं. भारत में वे अत्यधिक विवादित हैं. हालांकि उनके जीवन और व्यक्तित्व में विवाद योग्य कुछ भी नहीं है. जो उनकी आलोचना में कहा जाता है, वह वास्तविकता के एकदम परे है. अर्थशास्त्र के क्षेत्र में उनका योगदान बेहद शानदार है. उसके लिए उन्हें सदैव याद रखा जाएगा.’6

अर्थशास्त्र के क्षेत्र में आंबेडकर के योगदान की चर्चा करने से पहले इस विषय में उनकी प्रतिष्ठा को दर्शाने वाली एक और घटना का उल्लेख प्रासंगिक होगा. 1930 का दशक पूरे विश्व बाजार में भीषण मंदी लेकर आया था. ब्रिटिश सरकार के सामने भी गंभीर चुनौतियां थीं, खासकर उपनिवेशों में जहां आजादी की मांग जोड़ पकड़ती जा रही थी, वहां औपनिवेशिक सरकार की पकड़ को बनाए रखने के लिए स्थानीय समस्याओं का समाधान आवश्यक था. समस्याओं के मूल में कुछ वैश्विक मंदी का हाथ था और कुछ स्थानीय रोजगारों के उजड़ जाने से उत्पन्न मंदी का. इसलिए अगस्त 1925 में ब्रिटिश सरकार ने भारत की मुद्रा प्रणाली का अध्ययन करने के लिए ‘रॉयल कमीशन ऑन इंडियन करेंसी एंड फाइनेंस’ का गठन किया था. इस आयोग की बैठक में हिस्सा लेने के लिए जिन 40 विद्वानों को आमंत्रित किया गया था, उनमें आंबेडकर भी थे. वे जब आयोग के समक्ष उपस्थित हुए तो वहां मौजूद प्रत्येक सदस्य के हाथों में उनकी लिखी पुस्तक ‘इवोल्यूशन ऑफ पब्लिक फाइनेंस इन ब्रिटिश इंडिया’ की प्रतियां थीं.

 

बात यहीं खत्म नहीं होती. ‘रॉयल कमीशन’ ने अपनी रिपोर्ट 1926 में प्रकाशित की थी. उसकी अनुशंसाओं के आधार पर कुछ वर्षों बाद ‘भारतीय रिजर्व बैंक’ की स्थापना हुई. इस बैंक की अभिकल्पना नियमानुदेश, कार्यशैली और रूपरेखा आंबेडकर की शोध पुस्तक ‘प्राब्लम ऑफ रुपी’ पर आधारित है. उस समय तक उनका मुख्य लेखन अर्थशास्त्र जैसे गंभीर विषय को लेकर ही था. मात्र 27 वर्ष की उम्र में उन्हें मुंबई के एक कॉलिज में राजनीतिक अर्थशास्त्र के प्रोफेसर की नौकरी मिल चुकी थी. अध्यापन के अलावा वे विषय से संबंधित सैकड़ों लेख और व्याख्यान दे चुके थे. एक सभा में विद्यार्थियों के बीच पढ़े गए उनके लेख ‘रेस्पांसिबिल्टी ऑफ रेसपांसिबिल गवर्नमेंट’ की प्रशंसा उस समय के महान राजनीतिक विज्ञानी, चिंतक हेराल्ड लॉस्की ने भी की थी. लॉस्की का कहना था कि ‘लेख में आए आंबेडकर के विचार क्रांतिकारी स्वरूप’ के हैं.

अर्थशास्त्र के क्षेत्र में आंबेडकर के योगदान को और गहराई से समझने के लिए प्राचीन भारत की मुद्रा विनिमय प्रणाली के बारे में जानना आवश्यक है. 1893 तक भारत में केवल चांदी के सिक्कों का प्रयोग किया जाता था. 1841 में स्वर्ण मुद्रा का उपयोग भी होने लगा था. चांदी के सिक्के का मूल्य उसमें उपलब्ध चांदी के द्रव्यमान से आंका जाता था. इस तरह एक स्वर्णमुद्रा का मूल्य 15 चांदी के सिक्कों के बराबर था. 1853 में आस्ट्रेलिया और अमेरिका में स्वर्ण-भंडार मिलने से सोने की आमद बढ़ी. उसके बाद स्वर्ण-मुद्राओं में विनिमय का प्रचलन बढ़ने लगा. हालांकि उसका विधिवत चलन 1873 के बाद की संभव हो पाया. लगभग उसी समय चांदी के नए भंडार मिलने से उसकी आमद भी बढ़ने लगी, परंतु भारत में स्वर्ण उत्पादन में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पाई थी. परिणामस्वरूप स्वर्ण-मुद्रा के मुकाबले भारतीय रजत-मुद्रा का निरंतर अवमूल्यन होने लगा. उस खाई को पाटने के लिए अधिक मात्रा में रजत-मुद्राएं ढाली जाने लगीं. लेकिन वह समस्या का अस्थायी समाधान था. दूसरे उससे उन व्यक्तियों के लेन-देन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला था जो केवल रजत मुद्रा का इस्तेमाल करते थे. जनसामान्य के लिए वह प्रतिकूल स्थिति थी. मुद्रा का अवमूल्यन होने से महंगाई में वृद्धि हुई थी. जबकि आय ज्यों की त्यों बनी हुई थी. आंतरिक स्तर पर उससे प्रत्येक वर्ग को घाटा हो रहा था. 1872 से लेकर 1893 तक यही हालात बने रहे. मूल्य संतुलन के लिए अंतत: सरकार ने 1893 में रजत-मुद्रा ढालने का काम अपने नियंत्रण में ले लिया.

उस समय तक मुद्राओं का मूल्यांकन उनमें उपलब्ध धातु की मात्रा से आंका जाता था. 1899 में सरकार ने एक समिति का गठन किया, जिसने स्वर्ण-स्टेंडर्ड के स्थान पर स्वर्ण-मुद्रा के उपयोग की सलाह दी थी. तदनुसार मुद्रा का मूल्यांकन उसमें उपलब्ध धातु-मूल्य के बजाए सरकार द्वारा अधिकृत मूल्य जितना आंका जाने लगा. सरकार ने रजत-मुद्रा का मूल्य 1 शिलिंग, 4 पेंस के बराबर कर दिया. नए नियम के अनुसार स्वर्ण-मुद्रा का मूल्य लगभग स्थिर था. उसके मूल्यांकन का अधिकार सीधे ब्रिटिश सरकार के अधीन था, जबकि रजत-मुद्रा के मूल्य-नियंत्रण के लिए उस समय तक कोई व्यवस्था न थी. मुद्राओं के मूल्यांकन को लेकर आंबेडकर का दृष्टिकोण मानवीय था. कल्याणकारी अर्थशास्त्रियों से मिलता हुआ. उनका कहना था लोगों के लिए मुद्रा का वास्तविक मूल्य उसके बदले मिलने वाली आवश्यक वस्तुओं से तय होता है. सोना बेशकीमती हो सकता है. लेकिन वह आदमी की सामान्य जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता. वह न तो किसी भूखे का पेट भर सकता है, न ही उससे किसी नंगे तन को ढका जा सकता है. यदि एक रजत मुद्रा से उन्हें जरूरत की सभी चीजें प्राप्त हो जाती हैं, तो उन्हें स्वर्णमुद्रा की दरकार न होगी. इसके लिए मुद्रा का भरोसेमंद होने के साथ-साथ विनिमय प्रणाली में स्थायित्व भी जरूरी है. मुद्रा के प्रति जनता का अविश्वास तथा उसकी मूल्य-अस्थिरता आर्थिक संकट को जन्म देती है. रजत-मुद्रा के उतार-चढ़ाव को देखते हुए आंबेडकर ने स्वर्ण-मुद्रा को अपनाने का सुझाव दिया; तथा एक रजत-मुद्रा का मूल्य एक शिलिंग तथा छह पैंस रखने की सलाह दी. उनकी अधिकांश अनुशंसाओं को सरकार ने ज्यों की त्यों अपना लिया था. उन्हीं के आधार पर आगे चलकर भारतीय रिजर्व बैंक की मूलभूत सैद्धांतिकी का विकास हुआ.

अपने अर्थशास्त्र संबंधी ज्ञान के आधार पर आंबेडकर एडम स्मिथ और डेविड रिकार्डो जैसे क्लासिकल अर्थशास्त्रियों की कतार में खड़े नजर आते हैं. आगे चलकर राजनीति और समाज सुधार के क्षेत्र में उन्होंने जो काम किया, उसके आधार पर हम उनके अर्थशास्त्र संबंधी सिद्धांतों की तुलना इटली के विचारक विलफर्ड परेतो से भी कर सकते हैं. परेतो ने यूरोपीय समाज में व्याप्त असमानताओं का गहरा अध्ययन किया था. उसका मानना था कि शीर्ष पर मौजूद अल्पसंख्यक अभिजन समूह अपने बुद्धि-चातुर्य द्वारा बहुसंख्यक समूह को छोटे-छोटे समूहों में बांटे रखता है. इस तरह संगठित अल्पसंख्यक अभिजन के आगे असंगठित बहुजन की शक्ति नगण्य हो जाती है. ‘कल्याणकारी अर्थशास्त्र’ के क्षेत्र में ‘परेतो दक्षता तुल्यांक’ की चर्चा लगभग सभी आधुनिक अर्थशास्त्री करते आए हैं. परेतो को स्पर्धात्मक उत्पादन प्रणाली से कोई शिकायत न थी. लेकिन वह चाहता था कि सरकार समाजार्थिक समानता की स्थापना के दायित्व को समझे तथा उसके लिए समयानुसार आवश्यक कदम उठाती रहे. उसके अनुसार स्पर्धात्मक अर्थव्यवस्था में लाभार्जन की दर संतोषजनक बनी रहती है. न्याय-भावना के साथ काम करने वाली सरकार उस लाभ का एक हिस्सा जरूरतमंदों तक पहुंचाकर असमानता की खाई को पाटते रहने का काम कर सकती है. परेतो के शब्दों में आर्थिक असंतुलन कम करने के लिए—‘समाज में किसी एक नागरिक के साथ निकृष्टतम किए बिना, कम से कम किसी एक नागरिक के साथ श्रेष्ठतम किया जा सकता है.’ आंबेडकर को भी मशीनों और स्पर्धात्मक उत्पादन व्यवस्था से कोई शिकायत न थी. लेकिन वे चाहते थे कि सभी प्रमुख और आधारभूत उद्योग सरकार के अधीन हों. वे मानते थे कि आर्थिक सुधार की कोई भी योजना बिना भूमि सुधार के असंभव है. इसके लिए उन्होंने बड़े भू-स्वामियों की आय को आयकर के दायरे में लाने का सुझाव दिया था. 1946 में अखिल भारतीय स्तर पर भूमि सुधार की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि भूमि वितरण में असमानता के कारण समाज के बड़े हिस्से को बहुत छोटी जोतों से काम चलाना पड़ता है. परिणामस्वरूप एक ओर जहां श्रमशक्ति का दुरुपयोग होता है, वहीं बहुत-सी श्रम-शक्ति निष्क्रिय पड़ी रहती है. आवश्यकता से कई गुना भूमि के स्वामी बने जमींदार अपनी श्रम-शक्ति का उपयोग इसलिए नहीं करते, क्योंकि उन्हें जरूरत से कई गुना श्रमशक्ति बेगार या मामूली मजदूरी पर उपलब्ध हो जाती है. यानी समाज का एक वर्ग संसाधनों के अभाव में अपनी श्रमशक्ति के लाभों से वंचित रह जाता है; जबकि दूसरा आवश्यकता से कहीं अधिक संसाधनों पर काबिज होने के कारण दूसरे के श्रम को कम मूल्य पर खरीदने में सफल हो जाता है. इस तरह न केवल श्रम का अवमूल्यन होता है, बल्कि समाज की बहुत-सी श्रमशक्ति व्यर्थ चली जाती है. इसके लिए आंबेडकर कृषि, उद्योग, बीमा, बैंकादि का संपूर्ण राष्ट्रीयकरण चाहते थे. वे व्यापक भूमि-सुधार के समर्थक थे. चाहते थे कि सरकार समस्त कृषि-योग्य भूमि का अधिग्रहण कर उसे उचित आकार के फार्मों में विभाजित करे और उत्पाद का समुचित अनुपात में समाज के सभी सदस्यों के बीच संवितरण हो. समाजार्थिक समानता की स्थापना के लिए आंबेडकर का यह क्रांतिकारी सोच था.

आंबेडकर की विचारों पर हम समाजवादी चिंतन की छाया देख सकते हैं. लेकिन भारत में समाजवादी आंदोलन का जो स्वरूप रहा है, उस अर्थ में वे कतई समाजवादी न थे. हम उन्हें आमूल परिवर्तनवादी कह सकते हैं. चूंकि वे सामाजिक समानता के लक्ष्य को दलितों की वर्गीय चेतना, शैक्षणिक-सामाजिक उन्नयन तथा लोकतांत्रिक परिवर्तन द्वारा प्राप्त करना चाहते थे, इसलिए उन्हें गणतांत्रिक समाजवादी कहना भी उपयुक्त होगा. वस्तुतः जिस समाज के लिए वे काम कर रहे थे, उसके कल्याण हेतु आर्थिक समरसता का विचार पर्याप्त न था. लाहौर में ‘जात-पात तोड़क मंडल’ के वार्षिक अधिवेशन के लिए लिखे गए अपने लंबे भाषण ‘जाति का उन्मूलन’ में उन्होंने कई उदाहरण देकर बताया था कि आर्थिक समाधान कभी भी सामाजिक समाधान का विकल्प नहीं बन सकते. एक उदाहरण उन्होंने गुजरात के गांव का दिया था. वहां अछूत स्त्रियां घाट से पानी लाने के लिए मिट्टी के घड़ों का उपयोग करती थीं. जानूं गांव की खाते-पीते दलित परिवारों की कुछ स्त्रियों ने पानी लाने के लिए पीतल के घड़ों का उपयोग करना चाहा तो सवर्ण लोगों की त्योरियां चढ़ गईं. उन्होंने विरोध किया. पूरे भारत में यही हालात थे. जयपुर रियासत के चकवारा की घटना के बारे में उन्होंने बताया कि एक रईस अछूत तीर्थ यात्रा पर गया. लौटा तो परंपरानुसार उसने मित्रों-रिश्तेदारों को भोज देने का फैसला किया. तय किया कि भोज के लिए सभी व्यंजन देशी घी में बनाए जाएंगे. सवर्णों को पता चला तो उबलने लगे. अछूत देशी घी से बने व्यंजनों का भोज दे, यह उन्हें सहन न हुआ. सो ऐन भोज के समय दर्जनों दबंग समारोह स्थल पर जा धमके. पल-भर में सारा भोजन तहस-नहस कर दिया. समाजवाद मुख्यतः आर्थिक समानता को अपना लक्ष्य मानता है. जाति संबंधी प्रश्नों से बचने के कारण भारत में समाजवादी राजनीति कभी भी दलितों की मददगार नहीं बन सकी. न ही सामाजिक न्याय और  संसाधनों के संवितरण की न्यायपूर्ण मांग रखने वाले आंबेडकर को किसी ने समाजवादी विचारक के रूप में मान्यता दी.

आंबेडकर ने मार्क्स की आलोचना करते हुए बुद्ध को अपनाया था. अपने विचारों के कारण लगभग आधी दुनिया पर छाए रहने वाली विश्व-इतिहास की इन महानतम हस्तियों में आपस में कोई स्पर्धा नहीं है. तो भी आंबेडकर के लिए बुद्ध महत्त्वपूर्ण थे. इसलिए कि उन्होंने जाति पर सवालिया निशान लगाते हुए समानता आधारित समाज का सपना देखा था. साम्यवाद के रूप में समानता आधारित समाज का सपना मार्क्स का भी था. लेकिन मार्क्स की सीमा थी कि वे समानता को जीवन के आर्थिक पक्ष से आगे बढ़कर नहीं देख पाए थे. भारत के बारे में उन्होंने काफी लिखा था, तथापि वह जानकारी राजनीतिक और अखबारी सूचनाओं पर केंद्रित थी. जाति की भयावहता जिससे आंबेडकर का सीधा परिचय था और जिसकी विकृति को ढाई हजार वर्ष पहले जन्मे बुद्ध भी समझते थे, मार्क्स का उस समस्या से सीधा कोई संबंध न था. उनके लिए  समस्या को उतनी गहराई से समझना मुमकिन भी नहीं था.

 

आंबेडकर मार्क्स की वर्ग-भेद की अवधारणा से सहमत थे. परंतु इस संशोधन के साथ कि भारतीय समाज में वर्गभेद मुख्यतः सामाजिक-सांस्कृतिक रहा है. उनका मानना था कि जाति की समस्या के समाधान के बिना भारत में किसी भी सुधारवादी आंदोलन की सफलता संद्धिग्ध होगी. समाजार्थिक परिवर्तन के लक्ष्य को वे दलितों के प्रबोधीकरण द्वारा प्राप्त करना चाहते थे. इस रूप में वे अपने समय के किसी भी समाजवादी से बड़े और प्रतिबद्ध समाजवादी थे. भारतीय समाजवादी आंदोलन और राजनीति की यह विडंबना रही उसने आंबेडकर को मात्र दलितों का नेता मानकर उपेक्षित रखा. इसके लिए आंबेडकर को तो कोई नुकसान नहीं हुआ. परंतु जाति के सवालों की ओर से मुंह मोड़े रहने के कारण भारत का समाजवादी आंदोलन लगातार अपनी प्रासंगिकता खोता रहा.

 

आंबेडकर का पूरा जीवन एक महागाथा है. एक लेख या पुस्तक में उनके जीवनकर्म को नहीं समेटा जा सकता. वे अपने मानक आप हैं. इसलिए लेख का समापन हम उन्हीं की बात से करना चाहेंगे. यह दरअसल में एक चेतावनी है जो भारतीय संविधान को लोकार्पित करते हुए उन्होंने हम सबको दी थी. संविधान की प्रस्तावना की शुरुआत उन्होंने ‘हम भारत के लोग’ से की है. इसकी व्याख्या उनके भाषण में भी मिलती है —‘‘मुझे याद है जब राजनीतिक रूप से सक्रिय हिंदुस्तानी ‘भारत के लोग’ कहने की अपेक्षा ‘भारतीय राष्ट्र’ कहना अधिक पसंद करते थे. मेरा विचार है कि ‘हम एक राष्ट्र हैं’ ऐसा मानकर हम एक बड़े भ्रम को बढ़ावा दे रहे हैं. हजारों जातियों में बंटे लोग भला एक राष्ट्र कैसे हो सकते हैं? सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक दृष्टि से हम अभी तक एक राष्ट्र नहीं हैं, इस बात को हम जितनी जल्दी समझ लें उतना ही हमारे लिए बेहतर होगा. तभी हम राष्ट्र बनने कि जरूरत को बेहतर समझ पाएंगे तथा इस लक्ष्य को हासिल करने के तरीकों और साधनों के बारे में बेहतर पाएंगे. (जाति-प्रथा के रहते) इस उद्देश्य की प्राप्ति कठिन है….जातियां राष्ट्र-विरोधी हैं. पहला कारण तो ये कि वे सामाजिक जीवन में अलगाव को बढ़ावा देती हैं. दूसरे वे एक जाति और दूसरी जाति के बीच ईर्ष्या और असहिष्णुता को ले आती हैं. अगर हम सच में राष्ट्र बनना चाहते हैं तो हमें इन सब मुश्किलों से मुक्ति पानी होगी. असली भाईचारा तभी कायम हो सकता है, जब राष्ट्र मौजूद हो—लेकिन बगैर बंधुत्व के समानता, स्वाधीनता और राष्ट्रीयता महज दिखावा ही होंगी.’’

© ओमप्रकाश कश्यप

  1. ‘a form and a method of government whereby revolutionary changes in the economic and social life of the people are brought about without bloodshed.’B. R. Ambedkar- Space, condition, precedent for the successful working of Democracy, Before the Poona District Library(1952).
  2. To my mind there is no doubt that this Gandhi age isthe dark age of India. It is anage in which people instead of looking for their ideals in the future are returning to antiquity.It is an age in which people have ceased to think for themselves and as they have ceased to think they have ceased to read and examine the facts of their lives.— Address delivered on 29th January 1939 at t he Annual Function, of the Gokhale Institute of Politics and Economics held in the Gokhale Hall, Poona.
  3. The doctrine that might makes right has covered the earth with misery. While it crushes the weak, it also destroys the strong. Every deceit, every cruelty, every wrong, reaches back sooner or later and crushes its author. Justice is moral health, bringing happiness, wrong is moral disease, bringing mortal death.” —John Peter Altgeld
  4.     न ते शक्या दरिद्रेण यज्ञा प्राप्त पितामह बहूपकरणा यज्ञा नाना सम्भारविस्तरा                                                                                                       राजपुत्रोवां शक्या प्राप्तुपितामह नार्थन्यूनैरवगुणैरेकात्मभिरसहतै. महाभारत. 164(23).
  1.   दीघनिकाय-1/193, मज्झिम निकाय 32 और 40, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, डॉ. रामशरण शर्मा, पृष्ठ 91 से उद्धृत.’
  2. If Tilak had been born amongst the Untouchables, he would not have raised the slogan, “Swaraj is my birthright”, but the slogan would have been: “Annihilation of untouchability is my birthright”-Gupta D, editor. “Caste and Politics: Identity Over System” Annual Review of Anthropology.2005;21:409–27.
  3. 6. Ambedkar is my Father in Economics. He is true celebrated champion of the He deserves more than what he has achieved today. However he was highly controversial figure in his home country, though it was not the reality. His contribution in the field of economics is marvelous and will be remembered forever..!” Dr. Amartya Sen, Economist.

 

राजनीतिक के साथ सांस्कृतिक समर भी है उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव

सामान्य

[यह पत्र एक खास संदर्भ में लिखा गया है. जिन्हें संबोधित है, वे भाजपा से जुड़े हैं. संघ जिसकी आत्मा है. इसके अलावा वे वर्षों से कश्यप, कहार, महार, बिंद, मल्लाह आदि जातियों को अनुसूचित जातियों की परिभाषा में लाने के लिए आंदोलन करते हैं. उनका आंदोलन लंबा है, और इस कारण वे सम्मानीय हैं. लोकसभा के चुनावों में और हाल के चुनावों में भी, उपुर्यक्त जातियों का बड़ा हिस्सा भाजपा के पक्ष में गया था. विधानसभा चुनावों में भी यही दिशादशा दिखती है. मगर इन जातियों का भाजपा समर्थन के मायने केवल राजनीति तक सीमित नहीं हैं. उनका बड़ा संदर्भ सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से भी है. इधर संघ नेता मनमोहन वैद्य ने चुनाव से ऐन पहले आरक्षण खत्म करने की मांग दोहराई है. उनका मानना है कि आरक्षण अलगाव बढ़ाता है.(गोया मनु की संहिता समाज को जोड़ती थी) उनके अनुसार आरक्षण अनुसूचित जातियों और जनजातियों के कारण लाया गया है. जिन्हें लंबे समय से सुविधाओं से वंचित रखा गया है. संघ के नेताओं की यह मांग नई नहीं है. न ही इसमें कुछ अलग से जोड़ा गया है. संघ की चलती तो आरक्षण को एक दशक से भी आगे चलाना कठिन हो जाता. इसके बावजूद कुछ जातियां हैं जो भाजपा से आरक्षण बढ़ाने या उसमें फेरबदल करने का सपना पाले हुए हैं. जबकि सामाजिक न्याय को केंद्रीय मुद्दा बनाकर आई बिहार सरकार ने न्यायपालिकाओं को आरक्षण के दायरे में लाकर क्रांतिकारी कदम उठाया है…..

पत्र की भाषा निजी है. संदर्भ समसामयिक. अतः जिन सज्जन को संबोधित है उन्हें सीधे न लिखकर सार्वजनिक कर रहा हूं, ताकि सनद रहे. लेख में कुछ जातियों का नामोल्लेख जरूर है, प्रकारांतर में वे समाज के उस समूह का हिस्सा हैं, जिसे आज बहुजन कहा जाता है. यह सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के मकड़जाल को समझने की कोशिश भर है. इसलिए कि उत्तरप्रदेश के चुनावों के परिणाम केवल राजनीतिक परिवर्तन तक सीमित नहीं रहने वाले. उनका महत्त्व सांस्कृतिक क्षेत्र में कहीं ज्यादा होगा. पत्र है इसलिए इसकी भाषा में काफी कुछ व्यक्तिगत भी है. लेख को उसी भाव के साथ पढ़ा जाना चाहिए.]

आदरणीय…..!

आपका पत्र प्राप्त हुआ. साथ में चैक भी. आभार व्यक्त नहीं कर सकता. क्योंकि जिस उद्देश्य के लिए यह तुच्छ सहभागिता थी, वहीं इसका उपयोग सार्थक था. कारण जो बताया गया है, वह उचित ही है. सूबे में भाजपा या कांग्रेस की सरकार होती तथा सपा, बसपा जैसे दल ऐसा आयोजन करना चाहते, जिसमें किसी राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष की सहभागिता होतब भी यही हालात होते. असल में जिस जातिसमूह की ओर से यह आयोजन प्रस्तावित था, वह राजनीतिक दलों के लिए महज वोट बैंक रहा है. 2014 के चुनावों में इनका बड़ा हिस्सा भाजपा के समर्थन में उतरा था, जिससे उसे सूबे में 73 सीटें मिलीं. उससे पहले ये जातियां कभी सपा तो कभी बसपा की झोली में जाती रही हैं.

इस सम्मेलन के रद्द होने की मुझे न तो खुशी है न ही दुख. जिस सम्मेलन के विशिष्ट अतिथि ‘शाह’ और ‘मौर्य’ जैसे व्यक्ति होंवह कश्यप, महार, धींवर, तुरैहा, कहार, मल्लाह, निषाद आदि का सम्मेलन हो ही नहीं सकता था. यह सीधासीधा राजनीतिक सम्मेलन था. जिसे सूबे की सरकार ने अपना राजनीतिक स्वार्थ देते हुए मंजूरी देने से इंकार कर दिया. हम लोग जैसे अभी तक विभिन्न दलों की राजनीति में पिसते आए थे, इस बार भी ऐसा ही हुआ. इसमें आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं है. वैसे भी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा प्रदेश अध्यक्ष के सान्निध्य में हुआ यह सम्मेलन भाजपा का सम्मेलन ही कहलाता. जातिबंधु जैसे अब तक दूसरे दलों को कंधों पर साधते आए हैं, इस बार वे भाजपा को उठा रहे होते. मुझे तो यह भी लगता है कि अमित शाह और उनके प्रदेश अध्यक्ष स्वयं इस सम्मेलन को लेकर गंभीर नहीं थे. अगर चाहते तो वे प्रदेश सरकार पर दबाव डाल सकते हैं. अनुमति के लिए कलेक्ट्रेट के आगे प्रदर्शन कर सकते थे. धरने के माध्यम से भी आवाज उठाई जा सकती थी. परंतु उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया. कदाचित उन्हें विश्वास रहा कि सम्मेलन हो या नहीं, बंटे हुए जातिसमूह के जितने वोट उन्हें अपेक्षित हैं, वे कहीं नहीं जाने वाले. यह भाजपा की नीति है, जो गत चुनावों में पूरी तरह कारगर रही थी. कारण जो भी हों, सम्मेलन के टलने पर व्यक्तिगत रूप से मुझे खुशी है. सच तो यह है कि मैं इस देश के उन 69 प्रतिशत सक्रिय मतदाताओं में से हूं जिन्होंने 2014 में भाजपा के विरोध में मतदान किया था. जो अलगअलग दलों में बंटने के कारण निष्फल सिद्ध हुआ था.

मैं अपनी सपाटबयानी के लिए क्षमा चाहता हूं. आप जैसे वयोवृद्ध, सक्रिय, सतत चेतनशील व्यक्ति के समक्ष ऐसी साफगोई धृष्टता भी मानी जा सकती है. परंतु आप जैसे व्यक्तित्व के आगे जो समाज में निरंतर सक्रिय और लंबे समय तक बहुतसे जातिबंधुओं का पथप्रदर्शक रहा हो, अपने विचारों को झूठ के आवरण में पेश करना अवमानना जैसा ही होगा. आपके प्रति मेरे मन में भरपूर सम्मानभाव है, जिसपर झूठ का लांछन लगाना मैं नहीं चाहता. रामस्वरूप वर्मा तथा अन्य लोगों से कश्यपबंधुओं को एकसूत्र में बांधने के लिए आपके अनथक योगदान का परिचय मुझे बहुत पहले मिल चुका था. ……..को दिल्ली विधानसभा में पहुंचाने तथा उनकी राजनीतिक पहचान बनाने का श्रेय भी आप को जाता है. सीमित संसाधनों से साधारण नौकरीपेशा आदमी जितना कर सकता है, उससे कई गुना संघर्ष आपने किया है. इसलिए मैं आपके समक्ष न केवल विनीत हूं, बल्कि सम्मानभाव से भरा हुआ हूं.

आप कहेंगे, कश्यप, तुरैहा, बाथम, मल्लाह, कहार, धींवर आदि जातियां तो हमेशा से ही राजनीतिक दलों के हाथों में झूलती आई हैं. सपा, बसपा आदि सभी दलों के लिए भी तो हम महज वोट बैंक हैं. भाजपा भी उन्हें वोट बैंक की भांति इस्तेमाल करती है, तो इसमें बुरा क्या है? कभी कांग्रेस भी यही करती थी. उस समय तक इस समाज में राजनीतिक चेतना का वैसा उभार नहीं था, जैसा आज दिखाई पड़ता है. हालांकि मतों का बिखराब और दिशाहीनता जैसी तब थी, वैसी आज भी है. दिशाहीनता का शिकार हमारे नेतागण भी हैं. एक सामान्य सोच सभी के भीतर पनपा हुआ हैᅳ‘जब सभी के लिए हम वोट बैंक हैं प्रत्येक दल हमारी ओर बाहें फैलाए खड़ा है तो जहां अवसर मिले, वहां ‘शरण लेने’ में बुराई क्या है. इस ‘समझदारी’ के चलते हम अपने ही प्रतिद्विंद्वी बने हैं. लोकतंत्र में जितना बुरा किसी नागरिक समूह को वोटबैंक मानना है, उतना ही बुरा उसका मूक/अमूक प्रतिनिधि बनकर, बिना किसी भविष्य योजना के किसी दल की शरण में जाना और फिर दलीय विचारधारा का प्रतिनिधि बनकर समाज में वोट मांगने आना है. संभव है इससे कुछ व्यक्ति नेता के रूप में प्रसिद्ध हो जाएं. यह भी संभव है कि वे निर्वाचित होकर संसद और विधान मंडलों की शोभा बढ़ाने लगें. वे जानते हैं की उनके पीछे समाज की वास्तविक ताकत नहीं है. राजनीतिक दल की बैशाखी थामकर वे सत्ता में पहुंचे हैं, इस कारण वे हमेशा अविश्वास से भरे रहते हैं. उन्हें अपने ऊपर भरोसा ही नहीं होता. इसलिए समाज को उनका कोई लाभ नहीं मिल पाता. इससे लोगों का आत्मविश्वास भी घटता है और समाज अपने लक्ष्य के प्रति एकमत नहीं रह पाता. बंटा हुआ जनमत बड़ा नेतृत्व उभरने की राह में भी बाधक होता है.

यहां प्रतिवाद का अवसर उपलब्ध है. कहा जा सकता है कि विभिन्न दलों को हमारे नेताओं की आवश्यकता है तो उसका लाभ उठाने में क्या बुराई है. इसी के बूते संसद और विधायिकाओं में ‘कश्यप’, ‘मांझी’ और ‘निषाद’ जैसे टाइटिल दिखने लगे हैं. बात बिलकुल सही है. मगर मैं जानना चाहूंगा कि संसद और विधानमंडलों में समाज के जो नेता विभिन्न दलों में उनकी जरूरत बनकर जाते हैं. क्या वे वहां वास्तव में अपनी उपस्थिति दर्शा पाते हैं? अभी तक तो यही देखा गया है कि हमारे प्रतिनिधि समाज से ज्यादा दलीय जरूरतों को पूरा करने का काम करते हैं. ‘पार्टीलाइन’ पर बने रहना उनकी बाध्यता होती है. जिस प्रकार चुनावों में हमारा समाज वोट बैंक बना रहता है, उसी तरह हमारे ‘प्रतिनिधि’ संसद और विधायिकाओं में ‘संख्या’ बनकर रह जाते हैं. समाज की आवाज बनते हुए उन्हें कम ही देखा गया है.

ठीक है, अपने लोग जिस विपन्नता, सामाजिक अवरोधों को पार करके आते हैं, उनका उभरकर आना तथा चुनौतीपूर्ण चुनावी प्रक्रिया से गुजरकर संसद और विधायिकाओं में जाना ही बड़ी बात है. मैं इससे इन्कार नहीं करूंगा. लेकिन फिर भी कहूंगा कि हमारे प्रतिनिधि उतना नहीं कर पाते, जितना वे कर सकते हैं. या उन्हें करना चाहिए. एक उदाहरण मैं देना चाहूंगा, गाजियाबाद के ही एक पूर्व सांसद हैं. कभी वे बसपा प्रमुख के करीबियों में जाने जाते थे. ताजा खबर के अनुसार वे भाजपा के हो चुके हैं. यह उनका चयन है. इस लिहाज से इसमें कोई बुराई नहीं है. मेरा बस इतना कहना है कि वे जब तक बसपा में थे, अपनी जातियों को अनुसूचित जातियों में शामिल कराने के लिए कुछ नहीं किया. परिस्थितिवश बसपा से बाहर आना पड़ा. जिस आरक्षण के लिए बसपा में रहकर कुछ न कर सके, उसके लिए बाहर आकर आंदोलन किया और अब आरक्षण की सिद्धांतत: विरोधी, केवल राजनीतिक मज़बूरी के तहत उसका समर्थन करने वाली, भाजपा में शामिल होकर उसके लिए वोट मांग रहे हैं. उनकी हालत देख मुझे उदितराज(रामराज) की याद आती है