Tag Archives: सामाजिक न्याय

पेरियार ललई सिंह : प्रखर मानवतावादी एवं विद्रोही चेतना

सामान्य

राजनीतिक स्वतंत्रता की आवश्यकता इसलिए होती है कि मनुष्य को सामाजिक स्वतंत्रता हो। मनुष्य, दूसरों की स्वतंत्रता में बाधक न होकर स्वेच्छानुसार खा-पी सके, पहन-ओढ़ सके, चल-फिर सके, मिल-जुल और ब्याह-शादी कर सके। यदि सामाजिक स्वतंत्रता न तो राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं रह जाता…इसलिए सामाजिक समता और सामाजिक स्वतंत्रता ही हमारा मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। राजनीतिक स्वतंत्रता तो उसमें सहायक होने के कारण ही वांछनीय है।

संतराम बीए, ‘हमारा समाज’ से

कुछ नेता स्वाभाविक नेता होते हैं। समाज की कच्ची-खुरदरी जमीन पर हालात से संघर्ष करते हुए स्वयं उभरते हैं। विपरीत परिस्थितियों से जूझने की प्रवृत्ति उन्हें नेता बना देती है। दूसरे वे नेता होते हैं, जिन्हें थोप दिया जाता है। ऐसे नेता प्रायः मान लेते हैं कि राजनीति उनके खून में है, इसलिए सत्ता-केंद्र पर छाए रहना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। वे प्रायः परिवर्तन-विरोधी होते हैं। गांधी ऐसे ही नेता थे। 1917 में रूसी क्रांति से डरे हुए भारतीय उद्योगपतियों, जमींदारों यहां तक कि यूरोप को भी ऐसे नेता की आवश्यकता थी, जो इस देश के मानस को समझता हो। साथ में ठेठ परंपरावादी भी हो। जो परिवर्तन की इच्छा और संभावनाओं को धर्म की आड़ में दबा सके। इसलिए दक्षिण अफ्रीका से लौटकर आए गांधी को उन्होंने हाथों-हाथ लिया। गांधी ने भी उनकी उम्मीद से बढ़कर काम किया। गरीब जनता के दिल में जगह बनाने के लिए लंगोटी धारण कर ली। उसके बाद जो हुआ, सबके सामने है।

दूसरी श्रेणी के नेताओं की संख्या भी कम नहीं है। ऐसे महामनाओं में ज्योतिराव फुले, डाॅ. आंबेडकर, ई. वी. रामासामी पेरियार, स्वामी अछूतानंद जैसे क्रांतिकारी विचारकों का नाम आता है। पेरियार को छोड़ दें तो बाकी तीनों बहुत साधारण परिवारों से आए थे। परंतु अपने असाधारण सोच, सरोकार और संघर्ष के बल पर वे बड़े परिवर्तन के संवाहक बने। ये सब नए भारत के वास्तुकार हैं। संघर्ष में तपकर निकले नेताओं में ललई सिंह का नाम भी शामिल है। वे कानपुर देहात के छोटे-से गांव में जन्मे और विद्रोही चेतना के बल पर लोगों के दिलो-दिमाग पर छाये रहे। वर्षों लंबे संघर्ष के दौरान उन्होंने विरोधी भी बनाए और समर्थक भी। विरोधी मृत्यु के साथ ही उन्हें भुला चुके थे, जबकि समर्थकों की संख्या आज भी लगातार बढ़ती जा रही है। बड़े नेता और महत्त्वपूर्ण विचार की प्रासंगिकता समय के साथ-साथ निरंतर बढ़ती जाती है। ललई सिंह इस कसौटी पर एकदम खरे उतरते हैं।

ललई सिंह यादव का जन्म 1 सितंबर, 1911 को कानपुर देहात के गांव कठारा के किसान परिवार में हुआ था। पिता का नाम था गज्जू सिंह और मां थीं, मूला देवी। पिता गज्जू सिंह पक्के आर्यसमाजी थे। जाति-भेद उन्हें छू भी नहीं गया था। उनकी गिनती गांव के दबंग व्यक्तियों में होती थी। मां मूला देवी के पिता साधौ सिंह भी खुले विचारों के थे। समाज में उनकी प्रतिष्ठा थी। ललई सिंह के जुझारूपन के पीछे उनके माता-पिता के व्यक्तित्व का गहरा प्रभाव था।

ललई सिंह की प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई थी। उन दिनों दलितों और पिछड़ों में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ने लगी थी। हालांकि सवर्ण समाज का नजरिया अब भी नकारात्मक था। उन्हें यह डर नहीं था कि दलित और शूद्र पढ़-लिख गए तो उनके पेशों को कौन करेगा। असली डर यह था कि पढ़े-लिखे दलित-शूद्र उनके जातीय वर्चस्व को भी चुनौती देंगे। उन विशेषाधिकारों को चुनौती देंगे जिनके बल पर वे शताब्दियों से सत्ता-सुख भोगते आए हैं। इसलिए दलितों और पिछड़ों की शिक्षा से दूर रखने के लिए वह हरसंभव प्रयास करते थे। ऐसे चुनौतीपूर्ण परिवेश में ललई सिंह ने 1928 में आठवीं की परीक्षा पास की। उसी दौरान उन्होंने फारेस्ट गार्ड की भर्ती में हिस्सा लिया और चुन लिए गए। वह 1929 का समय था। 1931 में मात्र 20 वर्ष की अवस्था उनका विवाह सरदार सिंह की बेटी दुलारी देवी से हो गया। दुलारी देवी पढ़ी-लिखी महिला थीं। उन्होंने टाइप और शार्टहेंड का प्रशिक्षण प्राप्त किया था। ललई सिंह को फारेस्ट गार्ड की नौकरी से संतोष न था। सो 1933 में वे सशस्त्र पुलिस कंपनी में कनिष्ठ लिपिक बनकर चले गए। वहां उनकी पहली नियुक्ति भिंड मुरैना में हुई।

कानपुर देहात जहां ललई सिंह का जन्म हुआ था, से लेकर भिंड मुरैना तक का क्षेत्र विद्रोही चेतना के लिए विख्यात रहा है। उसका असर ललई सिंह के व्यक्तित्व पर भी पड़ा। उन दिनों गांव-देहात में पुलिस का रौव था, लेकिन स्वयं पुलिस-कर्मियों को अनेक विपरीत परिस्थितियों में काम करना पड़ता था। उनका वेतन भी मामूली था। जिसे लेकर उनके मन में आक्रोश था। ललई सिंह के रूप में उन्हें ऐसा साथी मिल चुका था, जो जुझारू होने के साथ-साथ ईमानदार भी था। पुलिसकर्मियों की समस्याओं के समाधान के लिए ललई सिंह ने एक संगठन बनाया। उसके माध्यम से वे सहकर्मियों की समस्याओं को लेकर आवाज उठाने लगे। परिणामस्वरूप अधिकारी वर्ग उनसे नाराज रहने लगा। फिर ऐसा अवसर आया जिससे ललई सिंह और उनके साथियों की अधिकारियों से ठन गई।

जहां उनकी कंपनी का ठिकाना था, वहां एक बावड़ी थी। सभी पुलिसकर्मी नहाने-धोने और पीने के पानी के लिए सीढ़ीदार बावड़ी पर निर्भर थे। नहाने-धोने के लिए सीढ़ियों का इस्तेमाल किया जाता। सो बचा हुआ पानी वापस बावड़ी में चला जाता था। वही पानी पीने के काम भी आता था। प्रदूषित पानी शरीर में जाकर अनेक बीमारियां पैदा करता। उसपर कंपनी कमांडर कुटिल प्रवृत्ति का था। पुलिसकर्मियों की बीमारी उसे बहाना लगती। उपचार के लिए अस्पताल भेजने में वह आनाकानी करता था। अपने साथियों को लेकर ललई सिंह उस अमानवीय व्यवस्था के विरोध में डट गए। अधिकारी पहले ही उनसे नाराज थे। सो जायज विरोध को भी अनुशासनहीनता का नाम देकर उन्होंने ललई सिंह को नौकरी से बर्खास्त कर दिया। ललई सिंह गांव-देहात से आए थे। बहुत अधिक पढ़े-लिखे भी न थे। लेकिन अधिकार चेतना उनमें खूब थी। सो यह दिखाते हुए कि आसानी से हार मान लेने वालों में से वे नहीं हैं, बर्खास्तगी के विरोध में उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने वस्तुस्थिति की समीक्षा की। ललई सिंह निर्दोष सिद्ध होकर, नौकरी में वापस आ गए।

ललई सिंह ससम्मान नौकरी पर वापस लौटे थे। मगर उनका मन सशस्त्र पुलिस बल की नौकरी से ऊब चुका था। वे समय निकालकर पढ़ाई करने लगे। इसका उन्हें फायदा भी हुआ। उन्हीं दिनों उन्होंने फौज की परीक्षा दी और उसमें भर्ती हो गए। फौज की नौकरी सशस्त्र पुलिस बल से अच्छी मानी जाती है। माना जाता है कि सरकार भी फौजियों पर पूरा ध्यान देती है। लेकिन अंदरूनी हालत इससे अलग थी। खासकर ललई सिंह जैसे जुझारू व्यक्ति के लिए। फौज में रहते हुए ललई सिंह ने सैनिक जीवन की विसंगतियों को समझा और उनके विरोध में आवाज उठाने लगे। 1946 में उन्होंने ‘नान-गजेटेड पुलिस मुलाजिमान एंड आर्मी संघ’ की स्थापना की तथा उसके अध्यक्ष चुन लिए गए।

एक और नौकरी की चुनौतियां और संघर्ष थे, दूसरी ओर व्यक्तिगत जीवन की त्रासदियां। ललई सिंह का पारिवारिक जीवन बहुत कष्टमय था। उनकी पत्नी जो उन्हें कदम-कदम पर प्रोत्साहित करती थीं, वे 1939 में ही चल बसी थीं। परिजनों ने उनपर दूसरे विवाह के लिए दबाव डाला, जिसके लिए वे कतई तैयार न थे। सात वर्ष पश्चात 1946 में उनकी एकमात्र संतान, उनकी बेटी शकुंतला का मात्र 11 वर्ष की अवस्था में निधन हो गया। कोई दूसरा होता तो कभी का टूट जाता। परंतु समय मानो बड़े संघर्ष के लिए उन्हें तैयार कर रहा था। निजी जीवन दुख-दर्द उन्हें समाज में व्याप्त दुख-दर्द से जोड़ रहे थे। उसी वर्ष उन्होंने ‘सिपाही की तबाही’ पुस्तक की रचना की। इस पुस्तक की प्रेरणा उन्हें लाला हरदयाल की पुस्तक ‘सोल्जर आफ दि वार’ से मिली थी। ‘सिपाही की तबाही’ छपी न सकी। भला कौन प्रकाशक ऐसी पुस्तक छापने को तैयार होता! सो ललई सिंह ने टाइप कराकर उसकी प्रतियां अपने साथियों में बंटवा दीं। पुस्तक लोक-सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाने वाले सिपाहियों के जीवन की त्रासदी पर आधारित थी। परोक्षरूप में वह व्यवस्था के नंगे सच पर कटाक्ष करती थी। पुस्तक में सिपाही और उसकी पत्नी के बीच बातचीत के माध्यम से घर की तंगहाली को दर्शाया गया था। पुस्तक का समापन करते हुए उन्होंने लिखा था—

‘वास्तव में पादरियों, मुल्ला-मौलवियों-पुरोहितों की अनदेखी कल्पना, स्वर्ग तथा नर्क नाम की बात बिल्कुल झूठ है। यह है आंखों देखी हुई, सब पर बीती हुई सच्ची नरक की व्यवस्था सिपाही के घर की। इस नर्क की व्यवस्था का कारण है—सिंधिया गवर्नमेंट की बदइंतजामी। अतः इसे प्रत्येक दशा में पलटना है, समाप्त करना है। ‘जनता पर जनता का शासन हो’, तब अपनी सब मांगें मन्जूर होंगी।’

पुस्तक में आजादी और लोकतंत्र दोनों की मांग ध्वनित थी। पुस्तक के सामने आते ही पुलिस विभाग में खलबली मच गई। सैन्य अधिकरियों को पता चला तो पुस्तक की प्रतियां तत्काल जब्त करने का आदेश जारी कर दिया। उस घटना के बाद ललई सिंह अपने साथियों के ‘हीरो’ बन गए। मार्च 1947 में जब आजादी कुछ ही महीने दूर थी, उन्होंने अपने साथियों को संगठित करके ‘‘नान-गजेटेड पुलिस मुलाजिमान एंड आर्मी संघ’ के बैनर तले हड़ताल करा दी। सरकार ने ‘सैनिक विद्रोह’ का मामला दर्ज कर, भारतीय दंड संहिता की धारा 131 के अंतर्गत मुकदमा दायर कर दिया। ललई सिंह को पांच वर्ष के सश्रम कारावास तथा 5 रुपये का अर्थदंड सुना दिया। वे जेल में चले गए। इस बीच देश आजाद हुआ। अन्य रजबाड़ों की तरह ग्वालियर स्टेट भी भारत गणराज्य का हिस्सा बन गया। 12 जनवरी को 1948 को लगभग 9 महीने की सजा काटने के बाद, ललई सिंह को कारावास से मुक्ति मिली। वे वापस सेना में चले गए। 1950 में सेना से सेवानिवृत्त होने के पश्चात उन्होंने अपने पैत्रिक गांव झींझक को स्थायी ठिकाना बना लिया। वैचारिक संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए वहीं उन्होंने ‘अशोक पुस्तकालय’ नामक संस्था गठित की। साथ ही ‘सस्ता प्रेस’ के नाम से प्रिंटिंग पे्रस भी आरंभ किया।

कारावास में बिताए नौ महीने ललई सिंह के नए व्यक्तित्व के निर्माण के थे। जेल में रहते हुए उन्होंने प्राचीन भारतीय ग्रंथों का अध्ययन किया। धीरे-धीरे हिंदू धर्म की कमजोरियां और ब्राह्मणवाद के षड्यंत्र सामने आने लगे। जिन दिनों उनका जन्म हुआ था, भारतीय जनता आजादी की कीमत समझने लगी थी। होश संभाला तो आजादी के आंदोलन को दो हिस्सों में बंटे पाया। पहली श्रेणी में अंग्रेजों को जल्दी से जल्दी बाहर का रास्ता दिखा देने वाले नेता थे। उन्हें लगता था वे राज करने में समर्थ हैं। उनमें से अधिकांश नेता उन वर्गों से थे जिनके पूर्वज इस देश में शताब्दियों से राज करते आए थे। लेकिन आपसी फूट, विलासिता और व्यक्तिगत ऐंठ के कारण वे पहले मुगलों और बाद में अंग्रेजों के हाथों सत्ता गंवा चुके थे। देश की आजादी से ज्यादा उनकी चाहत सत्ता में हिस्सेदारी की थी। वह चाहे अंग्रेजों के रहते मिले या उनके चले जाने के बाद। 1930 तक उनकी मांग ‘स्वराज’ की थी। ‘राज’ अपना होना चाहिए, ‘राज्य’ इंग्लेंड की महारानी का भले ही रहे। स्वयं गांधी जी ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ का शीर्षक पहले ‘हिंद स्वराज्य’ रखा था। बाद में उसे संशोधित कर, अंग्रेजी संस्करण में ‘हिंद स्वराज’ कर दिया था। ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’—नारे के माध्यम से तिलक की मांग भी यही थी। 1930, विशेषकर भगत सिंह की शहादत के बाद जब उन्हें पता चला कि जनता ‘स्वराज’ नहीं, ‘स्वराज्य’ चाहती है, तब उन्होंने अपनी मांग में संशोधन किया था। आगे चलकर जब उन्हें लगा कि औपनिवेशिक सत्ता के बस गिने-चुने दिन बाकी हैं, तो उन्होंने खुद को सत्ता दावेदार बताकर, संघर्ष को आजादी की लड़ाई का नाम दे दिया। अब वे चाहते थे कि अंग्रेज उनके हाथों में सत्ता सौंपकर जल्दी से जल्दी इस देश से चले जाएं।

दूसरी श्रेणी में वे नेता थे, जो सामाजिक आजादी को राजनीतिक आजादी से अधिक महत्त्व देते थे। मानते थे कि बिना सामाजिक स्वाधीनता के राजनीतिक स्वतंत्रता अर्थहीन है। कि राजनीतिक स्वतंत्रता से उन्हें कुछ हासिल होने वाला नहीं है। उनकी दासता और उसके कारण हजारों साल पुराने हैं। नई शिक्षा ने उनके भीतर स्वाभिमान की भावना जाग्रत की थी। उनकी लड़ाई अंग्रेजों से कम, अपने देश के नेताओं से अधिक थी। वे सामाजिक और राजनीतिक मोर्चे पर साथ-साथ जूझ रहे थे। महामना फुले, संतराम बी.ए., अय्यंकालि, डाॅ. आंबेडकर, पेरियार जैसे नेता इसी श्रेणी में आते हैं। स्वयं ललई सिंह इस श्रेणी से थे और जिस परिवेश से जूझते हुए वे निकले थे, उसमें अपना मोर्चा चुन लेना कोई मुश्किल बात न थी। भविष्य के संघर्ष की रूपरेखा क्या हो, इस बारे में वे सोच ही रहे थे कि 1953 में उनके पिता का भी निधन हो गया। ललई सिंह के लिए यह बड़ा आघात था। पिता उनके लिए प्रेरणाशक्ति थे। अपने अधिकारों के संघर्ष के संस्कार पिता की ही देन थे। एक-एक कर उनके सभी परिजन जा चुके थे। परिवार के नाम पर अब वे स्वयं थे, दूसरी ओर था पूरा देश। खासकर धार्मिक और जातीय बंधनों से आहत समाज। उनके अलावा चारों ओर पसरी चुनौतियां थीं। एक बड़ा कार्यक्षेत्र उनकी प्रतीक्षा कर रहा था।

विद्रोही चेतना का विस्तार

धर्मग्रंथों के निरंतर अध्ययन द्वारा उन्हें पता चला कि हिंदू धर्म असल में राजनीतिक षड्ंयत्र है। ब्राह्मण-पुरोहित उसके नीतिकार हैं। क्षत्रिय अपनी ताकत से लोगों को डराने-दबाने का काम करते हैं; और निहित स्वार्थ के लिए वैश्य इस व्यवस्था का आर्थिक पोषण करते हैं। भाग्य-कर्मफल, स्वर्ग-नर्क, पाप-पुण्य, छूत-अछूत में उलझे बहुजन इसे समझ ही नहीं पाते हैं। धर्मग्रंथों में ब्राह्मणों के अनर्गल बखान से ललई सिंह को इस षड्यंत्र की तह तक जाने में मदद मिली थी। वे समझ चुके थे कि हिंदू धर्म तथा उसके ग्रंथ सवर्णों की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं के औजार हैं। जेल में रहते हुए उन्होंने डाॅ. आंबेडकर के भाषणों को सुना था, जिन्होंने हिंदू धर्म को धर्म मानने से ही इन्कार कर दिया था। आंबेडकर स्वयं हिंदू धर्म तथा उसके ग्रंथों को राजनीति मानते थे। कांग्रेसी नेताओं के व्यवहार से यह सिद्ध भी हो रहा था। 1930 के आसपास दलितों और पिछड़ी जातियांें में राजनीतिक चेतना का संचार हुआ था। ‘त्रिवेणी संघ’ जैसे संगठन उसी का सुफल थे। उसकी काट के लिए कांग्रेस ने पार्टी में पिछड़ों के लिए अलग प्रकोष्ठ बना दिया था। उसका मुख्य उद्देश्य था, किसी न किसी बहाने पिछड़ों को उलझाए रखकर उनके वोट बैंक को कब्जाए रखना।

दूसरा कारण पिछड़ी जातियों में शिक्षा का बढ़ता स्तर तथा उसके फलस्वरूप उभरती बौद्धिक चेतना थी। उससे पहले पंडित अपने प्रत्येक स्वार्थ को ‘शास्त्रोक्त’ बताकर थोप दिया करते थे। बदले समय में बहुजन उन ग्रंथों को सीधे पढ़कर निष्कर्ष निकाल सकते थे। इसलिए महाकाव्य और पौराणिक कृतियां जिनका प्रयोग ब्राह्मणादि अल्पजन बहुजनों को फुसलाने के लिए करते थे, जिनमें बहुजनों के प्रति अन्याय और अपमान के किस्से भरे पड़े थे—वे अनायास ही आलोचना के केंद्र में आ गईं। हमें याद रखना चाहिए कि उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा आदि राज्यों में निर्णायक राजनीतिक शक्ति बन चुके यादवों को क्षत्रिय मानने पर ब्राह्मणादि अल्पजन आज भले ही मौन हों, मगर उससे पहले वे उनकी निगाह ‘क्षुद्र’ यानी शूद्र ही थे। महाभारत जिसमें कृष्ण को अवतार के रूप में प्रस्तुत किया गया है, उसमें भी ऐसे अनेक प्रसंग हैं जब कृष्ण का उसकी जाति के आधार पर मखौल उड़ाया जाता है। डी. आर. भंडारकर यादवों को भारतीय वर्ण-व्यवस्था से बाहर का गण-समूह यानी पंचम वर्ण का मानते हैं।

महाभारत और ऋग्वेद यदुओं को सरस्वती तट का रहने वाला बताते हैं। लेकिन रामायण जो हिंदुओं का सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है, में यदुओं का महासागर से पानी पीना भी अपराध मान लिया गया है। याद कीजिए लंका पर चढ़ाई करते समय राम समुद्र से रास्ता मांगता है। समुद्र के प्रसन्न न होने पर वह धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा लेता है। घबराया हुआ समुद्र उपस्थित होकर रास्ता देने को तैयार हो जाता है। वह राम से वाण को तूणीर में वापस रखने की प्रार्थना करता है। अब राम तो राम है, एक बार प्रत्यंचा चढ़ा वाण नीचे कैसे उतारे। सो समुद्री जीव-जंतुओं को बचाने के लिए वह समुद्र से ही रास्ता पूछता है। समुद्र जो उत्तर देता है, उससे लगता है कि यह पूरा प्रसंग बस इसी के निमित्त गढ़ा गया है—

उत्तरेणावकाशोऽस्ति कश्चित पुण्यतरो मम,

द्रुमकुल्य इति ख्यातो लोके ख्यातो यथा भवान

उग्रदर्शन कर्मणो बहवस्तत्र दस्यवः

आभीर प्रमुखाः पापाः पिबन्ति सलिलं मम

तैन तत्स्पर्शनं पापं सहेयं पापकर्मभिः

अमोधः क्रियतां राम अयं तत्र शरोत्तमः(रामायण, युद्धकांड, 22वां सर्ग)

”प्रभो! जैसे आप सर्वत्र विख्यात एवं पुण्यात्मा हैं, उसी प्रकार मेरे उत्तर की ओर ‘द्रुमकुल्य’ नाम से विख्यात एक बड़ा ही पवित्र देश है। वहाँ आभीर (अहीर, यादव) आदि जातियों के अनेकानेक मनुष्य निवास करते हैं। उनके रूप और रंग बड़े ही भयानक हैं। वे सब के सब पापी और लुटेरे हैं। वे लोग मेरा जल पीते हैं। उन पापचारियों का स्पर्श मुझे प्राप्त होता रहता है, इस पाप को मै नहीं सह सकता। हे, राम! आप अपने इस उत्तम बाण को वहीं सफल कीजिए।’

गोया रामायणकार को ‘राक्षस’ रावण से पहले यदुओं को ठिकाने लगा देने की जल्दी थी। राम का जैसा चरित्र गढ़ा है, उसके हिसाब से वह ऐसी सलाह को टाल ही नहीं सकता था। ‘महात्मा’ समुद्र की सलाह मानकर वह उसी दिशा में शर-संधान कर यदुओं सहित बाकी गणों का सफाया कर देता है। यदुओं के प्रति तत्कालीन समाज की नफरत को तुलसीदास ज्यों का त्यों आगे बढ़ा देते हैं। उनके अनुसार—‘आभीर, यवन, किरात, खस, स्वपचादि अति अधरूपजे’। अहीर, यवन(मुस्लिम), किरात, खस, स्वपच आदि जातियां अत्यंत अधम हैं। यदुओं के विनाश की कहानी को महाभारत में भी बढ़ाया गया है। परंतु थोड़े भिन्न तरीके से। ‘सभा-पर्व’ में यदुओं को सरस्वती नदी के तट बसने वाला बताया गया है।1 कृष्ण को भगवान का दर्जा प्राप्त है। मगर क्षत्रीय जैसे राम की वंश-परंपरा से जोड़ने को आजाद हैं, उस तरह की दावेदारी स्वयं को कृष्ण का वंशज बताकर यादव न करे—इसके लिए गांधारी के शाप को बहाना बनाया जाता है। उसके अनुसार सारे यदुवंशी अंतर्कलह से आपस में लड़-झगड़कर मर जाते हैं। आशय है कि यादवों की बढ़ी राजनीतिक शक्ति से भय खाकर ब्राह्मणों ने ‘कृष्ण’ को अवतार का दर्जा तो दिया, लेकिन उनके वंशजों को एक-दूसरे से लड़वाकर मरवा दिया। पहले ये प्रसंग या तो धर्म ग्रंथों में दबे-छिपे रह जाते थे, या ब्राह्मणों की व्याख्या में कुछ का कुछ बना दिए जाते थे, नई शिक्षा और ज्ञान की रोशनी में उनके वास्तविक पाठ सबके सामने थे। उन्हें पढ़कर यदु-वंशजों में आक्रोश उभरना तय था।

‘त्रिवेणी संघ’ की सिद्धांत पुस्तिका ‘त्रिवेणी संघ का बिगुल’ का प्रकाशन 1940 में हो चुका था, उसके लेखक थे—यदुनंदन प्रसाद मेहता संघ में यादव जाति का प्रतिनिधित्व करते थे।। धर्म के नाम पर हो रहे आडंबरों पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने उसमें लिखा था—

‘‘धार्मिक मंदिरों और मठों के बाहर साइन-बोर्ड टँगा हुआ है कि ‘जाति पाँति पूछै नहीं कोई, हरि के भजे से हरि का होई।’ लेकिन भीतर जाकर देखिए कि कैसी-कैसी करामातें हो रही हैं। पुजारी कौन हो सकता है? जो उसमें जाति का ब्राह्मण हो। चाहे वह नया हो, साधु या कम ही पढ़ा-लिखा क्यों न हो।भंडारी कौन हो सकता है? जो उसमें जाति का ब्राह्मण हो। चाहे उसे पाचन-कर्म का ज्ञान भले ही न हो। अमुक साधु अमुक जाति का है, इसलिए उसे अमुक काम दिया जाए। ब्राह्मण साधु दूसरी जाति के साधु का बनाया हुआ नहीं खा सकता। क्या यहां धर्म की ओट में धर्म का शिकार नहीं किया जाता? तो, त्रिवेणी संघ ऐसी धार्मिक धांधलियों, लूटों, अन्यायों, अत्याचारों, अंधेरों और स्वार्थों का अंत सदा के लिए कर देना चाहता है और उनके स्थान पर, धर्म का सच्चा रूप बताकर जनता को उजाले में ले जाना चाहता है।’’

यही चीजें ललई सिंह का मानस निर्माण कर रही थीं। देश को आजादी मिल चुकी थी, मगर जिस स्वाधीनता की कामना आजादी के साथ की गई थी, वे सपना ही थीं। विशेषरूप से सामाजिक आजादी का सपना। ललई सिंह समझ चुके थे कि यहां से आगे का रास्ता संघर्ष का है, जो उन्हें स्वयं तय करना है। वे ‘रिपब्लिक पार्टी आफ इंडिया’ के सदस्य बन गए। उनकी आवाज कड़क थी। एक सैनिक का जोश उसमें भरा होता था। बिहार में बाबू जगदेव प्रसाद कुशवाहा त्रिवेणी संघ के आंदोलन को आगे बढ़ाने में जुटे थे तो उत्तर प्रदेश में रामस्वरूप शर्मा ने ‘समाज दल’ की स्थापना कर, यथास्थितिवादी राजनीतिक दलों के विरुद्ध एक और मोर्चा खोल दिया था। उधर रिपब्लिकन पार्टी डाॅ. आंबेडकर के बाद बिखरने लगी थी। ललई सिंह उसे छोड़ रामस्वरूप वर्मा के साथ जुड़ गए। बाद में जगदेव प्रसाद कुशवाहा के ‘शोषित दल’ और रामस्वरूप वर्मा के ‘समाज दल’ का एकीकरण हुआ तो उनके लिए लड़ाई और भी आसान हो गई। वे इन दलों के सम्मिलन से बने ‘शोषित समाज दल’; तथा वैकल्पिक राजनीति के प्रचार में जी-जान से जुट गए। उन दिनांे ई। वी। रामासामी पेरियार अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए देश-विदेश की यात्राएं कर रहे थे। इसी सिलसिले में जब वे उत्तर प्रदेश आए तो संभवतः 1967 में, ललई सिंह का उनसे संपर्क हुआ। पहली मुलाकात में ही ललई सिंह उनके व्यक्तित्व से प्रभावित हो गए। रामस्वरूप वर्मा ने 1 जून 1968 को ‘अर्जक संघ’ की स्थापना की। ललई सिंह उसके साथ भी प्राण-प्रण से जुड़ गए।   

पेरियार से पहली मुलाकात के समय ही ललई सिंह ने उनकी पुस्तक ‘रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ को हिंदी में प्रकाशित करने का मन बना लिया था। इसके लिए उन्होंने पेरियार से चर्चा की। पेरियार उन उस पुस्तक के हिंदी अनुवाद की अनुमति चंद्रप्रकाश जिज्ञासु को दे चुके थे। कुछ ही महीने बाद जुलाई 1968 में ललई सिंह को ‘रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ का हिंदी संस्करण प्रकाशित करने की लेखकीय सहमति प्राप्त हो गई।

सहमति मिलना अलग बात थी। पुस्तक प्रकाशित होकर बाजार में आना दूसरी बात। कोई भी प्रकाशक हिंदी अनुवाद छापने को तैयार न था। ललई सिंह हार मानने वालों में से न थे। उन्होंने पुस्तक को अपनी ‘अशोक पुस्तकालय’ नामक संस्था से प्रकाशित करने का फैसला कर लिया। आगे चलकर यही संस्था ‘सच्ची रामायण’ सहित उनकी दूसरी पुस्तकों की प्रथम प्रकाशक बनी। ‘सच्ची रामायण’ का हिंदी अनुवाद राम अधार ने किया था। पुस्तक का पहला संस्करण जुलाई 1969 में आया। उसके आने के साथ ही हिंदी जगत में तहलका मच गया। पुस्तक को हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं आहत करने वाली बताकर, उसके विरोध में प्रदर्शन होने लगे। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी बिना देर किए, 8 दिसंबर 1969 को पुस्तक पर प्रतिबंध की घोषणा कर, प्रकाशित प्रतियों को अपने कब्जे में लेने का आदेश सुना दिया। सरकार का मानना था कि पुस्तक समुदाय विशेष की धार्मिक भावनाओं का अपमान करती है। इससे समाज में शांति-भंग खतरा है। यह भी कहा गया कि पुस्तक जानबूझकर समाज में अशांति फैलाने के ध्येय से लिखी गई है। प्रतिबंध केवल हिंदी संस्करण को लेकर था। अंग्रेजी संस्करण ‘रामायण : दि ट्रू रीडिंग’ के तमिल और अंग्रेजी संस्करण उन दिनों भी धड़ल्ले से बिक रहे थे।    

ललई सिंह सरकार के निर्णय से आहत थे। उन्हें लगा कि भारतीय समाज आज भी लोकतांत्रिक भावना से दूर है। उन्होंने प्रदेश सरकार के विरुद्ध अदालत में अपील कर दी। लेकिन मन हिंदू धर्म से खट्टा हो चुका था। वैसे भी ईश्वर, धर्म, आत्मा-परमात्मा, स्वर्ग-नर्क आदि में विश्वास वे पेरियार के संपर्क में आने से पहले ही खो चुके थे। अब उनका इरादा हिंदू धर्म को हमेशा के लिए छोड़ देने का था। इसके लिए उन्होंने विभिन्न धर्मों का अध्ययन करना आरंभ कर दिया। यहां डाॅ. आंबेडकर उनके प्रेरणा-पुरुष बने। बौद्ध धर्म उन्हें अपनी कसौटी पर खरा लगा। जैसे-जैसे उनका अध्ययन बढ़ रहा था, वैसे-वैसे ब्राह्मण धर्म के षड्यंत्र भी खुलकर सामने आ रहे थे। उन्हें यह लगा कि जातियां हिंदू समाज को बांटने का काम करती हैं। अपनी सत्ता को बचाए रखने के लिए ही ब्राह्मणों ने हजारों जातियों की रचना की है। यहां तक कि शोषितों के भी दो वर्ग बना दिए हैं। पहली श्रेणी में वे हैं जिन्हें स्पर्श करने से कोई अपवाद नहीं होता। दूसरी श्रेणी में वे हैं जिनकी छाया भी सवर्णों को अपवित्र कर देती है। ये चीजें जहां ललई सिंह को आहत करती थीं, वहीं संघर्ष में लगातार बने रहने की प्रेरणा भी देती थीं।

पुस्तक जब्ती के सरकारी आदेश के विरुद्ध उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दी। मामले की सुनवाई के लिए तीन सदस्यों की बैंच बनाई गई। ‘सच्ची रामायण’ का मामला अभी न्यायालय में विचारधीन ही था कि सरकार ने 1970 में ललई सिंह की पुस्तकों ‘सच्ची रामायण की चाबी’ और ‘सम्मान के लिए धर्म-परिवर्तन करें’ की जब्ती के आदेश जारी कर दिए। ‘सच्ची रामायण’ में पेरियार ने अपने तर्क तो प्रस्तुत किए थे, परंतु उनके संदर्भ वे नहीं दे पाए थे। ‘सच्ची रामायण की चाबी’ में ललई सिंह ने ‘सच्ची रामायण’ के तर्कों को पुख्ता बनाने वाले संदर्भ दिए थे। दूसरी पुस्तक डाॅ. आंबेडकर के भाषणों पर आधारित थी। इस जब्ती के मात्र छह महीनों के पश्चात 12 सितंबर 1970 को सरकार ने डाॅ. आंबेडकर की अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘जातिभेद का उच्छेद’ को भी प्रतिबंधित घोषित कर दिया गया। यह सरकार का तानाशाही-भरा आचरण था जो हर विरोधी विचारधारा को दबा देना चाहता था। रामस्वरूप वर्मा के प्रोत्साहन पर ललई सिंह ने डाॅ. आंबेडकर की पुस्तकों की जब्ती के आदेश के विरुद्ध अदालत में मुकदमा दायर कर दिया। परिणाम अनुकूल ही निकला। न्यायमूर्ति ए. कीर्ति ने 19 जनवरी 1971 को ‘सच्ची रामायण’ पर जब्ती के आदेश को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला मानते हुए रद्द कर दिया। फैसले में उन्होंने सरकार को निर्देश दिया था कि वह जब्त की गई पुस्तक को लौटाकर प्रकाशक को 300 रुपए का हर्जाना दे। सरकार भी ललई सिंह के पीछे पड़ी थी। उसने ललई सिंह की पुस्तक ‘आर्यों का नैतिक पोल प्रकाश’ के विरुद्ध मुकदमा दायर कर दिया। यह मुकदमा उनकी मृत्युपर्यंत अदालत में बना रहा।

ललई सिंह इन दबावों के आगे झुकने वाले न थे। बल्कि इन दबावों से उन्हें और अधिक लिखने की प्रेरणा मिलती थी। इस बीच उन्होंने पांच नाटकों की रचना की थी, उनमें अंगुलीमाल, शंबूक वध, संत माया बलिदान, एकलव्य शामिल थे। संत माया बलिदान का प्रथम लेखन स्वामी अछूतानंद ने किया था। लेकिन वह नाटक अनुपलब्ध था। ललई सिंह ने उसका पुनर्लेखन किया था। वे रामस्वरूप वर्मा और जगदेव प्रसाद सिंह कुशवाहा के साथ वंचना एवं षोषण के षिकार हर व्यक्ति के साथ थे। नाटकों के अलावा उन्होंने ‘शोषितों पर धार्मिक डकैती’, ‘शोषितों पर राजनीतिक डकैती’, तथा ‘सामाजिक विषमता कैसे समाप्त हो?’ जैसी पुस्तकों की रचना भी की। उनकी सभी पुस्तकें ब्राह्मणवादी वर्चस्व के विरुद्ध शंखनाद करने वाली थीं। साधारण प्रकाशक उनकी पुस्तकें छापने को तैयार न थे। इसलिए उन्होंने एक के बाद एक तीन प्रेस खरीदे। पुस्तकें छापने और उन्हें बांटने में उनकी काफी जमा रकम निकल गई। यह सोचकर कि मोटी पुस्तकों को खरीदना आम आदमी के लिए आसान नहीं है, उन्होंने छोटी प्रचारनुमा पुस्तकें लिखने को प्राथमिकता दी। वैसे भी उनका उद्देष्य अपने विचारों को अधिकतम लोगों तक पहुंचाना था। यदि ब्राह्मण बीस से चौबीस पृष्ठों की पोथी को पढ़कर ‘पंडित’ कहला सकता है और लोगों को मूर्ख बना सकता है, तो उतने ही आकार की पुस्तकों से लोगों में चेतना का संचार भी संभव है। इसलिए अपने विचारों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए उन्होंने छोटी पुस्तकों को प्राथमिकता दी।

‘सच्ची रामायण’ पर लगे प्रतिबंधों के विरुद्ध वे उच्च न्यायालय में मुकदमा जीत चुके थे। लेकिन उनके विरोधी षांत नहीं थे। उनके दबाव में सरकार ने उच्चतम न्यायालय में अपील कर दी। वहां मामला वरिष्ठ जजों की पीठ के सम्मुख पहुंचा। कोर्ट ने गंभीरतापूर्वक मामले की सुनवाई की। न्यायालय ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को केंद्र में रखकर निर्णय सुनाया, जो ललई सिंह के पक्ष में था। यही नहीं, ‘जातिवाद का उच्छेद’ तथा ‘सम्मान के लिए धर्म-परिवर्तन करें’ को भी न्यायालय ने प्रतिबंध से मुक्त कर दिया। अदालत के सामने पहुंचे इन मामलों में जीत ललई सिंह की हुई थी। लेकिन जिस तरह प्रतिक्रियावादी षक्तियां उनके पीछे पड़ी थीं, उससे हिंदू धर्म की ओर से उनका मोह-भंग होना स्वाभाविक था। डाॅ. आंबेडकर 1935 में ही हिंदू धर्म छोड़ने की घोषणा कर चुके थे। धर्मांतरण का कार्यक्रम बना 14 अक्टूबर, 1956 को। ललई सिंह अपने प्रेरणा पुरुष के साथ ही धर्मांतरण करना चाहते थे। लेकिन अचानक खून की उल्टी होने के कारण उन्हें अपना फैसला रोकना पड़ा। उन्होंने घोषणा की कि जिन महास्थिविर से डाॅ. आंबेडकर से दीक्षा ली थी, उन्हीं से वे भी दीक्षा ग्रहण करेंगे। इससे मामला थोड़े दिन टला। आखिरकार 21 जुलाई 1967 को उन्होंने महास्थविर चंद्रमणि के मार्गदर्शन में बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण कर ली।

उस समय वे बहुत आह्लादित थे। धर्मांतरण के बाद दिए गए अपने संक्षिप्त भाषण में उन्होंने न केवल स्वयं को बौद्ध माना था, अपितु अपने नाम के साथ जुड़ा जातिसूचक षब्द छोड़ने का ऐलान भी किया था। उनका कहना था, ‘आज से मैं मनुष्य हूं, मानवतावादी हूं, आज से मैं सिर्फ ललई हूं।’ किसी भी प्रकार के जातीय आग्रहों, मान्यताओं से संपूर्ण मुक्ति का ऐलान करते हुए उन्होंने भविष्य में कभी जातिसूचक शब्द या सामंती शब्दावली का प्रयोग न करने का ऐलान किया था। जुझारूपन उन्हें पिता से विरासत में प्राप्त हुआ था। रामस्वरूप वर्मा ने अपने संस्मरण में एक घटना का उल्लेख किया है—

‘वह हमारे चुनाव प्रचार में भूखे-प्यासे एक स्थान से दूसरे स्थान भागते। बोलने में कोई कसर नहीं रखते थे। उनके जैसा निर्भीक भी मैंने दूसरा नहीं देखा। एक बार चुनाव प्रचार से लौटे पैरियर ललई सिंह जी को मेरे साथी ट्रैक्टर ट्राली से लिए जा रहे थे। जैसे ही खटकर गाँव के समीप से ट्रैक्टर निकला, उन पर गोली चला दी गई। संकट का आभास पाते ही वह कुछ झुक गए, गोली कान के पास से निकल गई। लोगों ने गाँव में चलकर रुकने का दबाव डाला। किन्तु वह नहीं माने। निर्भीकता से उन्होंने कहा, ‘चलो जी, यह तो कट्टेबाजी है, मैंने तो तोपों की गड़गड़ाहट में रोटियां सेकीं हैं।’

24 दिसंबर 1973 को पेरियार का निधन हुआ। उनकी स्मृति में बड़ी सभा का आयोजन 30 दिसंबर 1974 को किया गया। उसमें विश्व-भर के बुद्धिजीवी, चिंतक और राजनेता पधारे हुए थे। ललई सिंह भी उसमें पहुंचे। उन्हें बोलने के लिए आमंत्रित किया गया तो ब्राह्मणवाद सहित हिंदू मिथों पर वैसा ही हमला किया जैसा पेरियार किया करते थे। अंतर केवल इतना था कि पेरियार नास्तिक थे और मनुष्य के लिए किसी भी धर्म को अनावश्यक मानते थे। जबकि डाॅ. आंबेडकर के प्रभाव में आकर ललई सिंह बौद्ध धर्म में शामिल हो चुके थे। अपने भाषण में ललई सिंह ने बौद्ध धर्म का ही पक्ष लिया। बौद्ध धर्म को श्रेष्ठतम बताते हुए उन्होंने कहा कि वह तर्क और मनुष्यता का समर्थन करता है। किसी भी प्रकार के आडंबरवाद के लिए बौद्ध धर्म में कोई गुंजाइश नहीं है। हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म की तुलना करते हुए उन्होंने पहले को ‘उधार का धर्म’ और दूसरे को ‘नकद का धर्म’ बताया। अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुए कहा कि बौद्ध धर्म मनुष्य को जन्म-मरण के चक्कर में नहीं उलझाता। उसमें मनुष्य जो भलाई करता है, उसका परिणाम इसी जन्म में स्वयं उसके आगे आता है, यानी—‘जा हाथ देब और वा हाथ लेव।’ जबकि हिंदू धर्म भलाई इस जन्म में करो, उसका फल अगले जन्म में प्राप्त होगा—कहकर लोगों को भरमाता रहता है।

वे स्पष्ट और निर्भीक वक्ता थे। घुमा-फिराकर बात करना उन्हें आता ही नहीं था। एक बार वे आगरा में एक सम्मेलन में हिस्सा लेने पहुंचे थे। मंच पर बौद्ध आचार्यों सहित अनेक विद्वान और कार्यकर्ता मौजूद थे। ललई सिंह के बोलने का नंबर आया तो उन्होंने मंचासीन लोगों पर कटाक्ष करते हुए कहा—‘मेरे पास जो लोग मंच पर बैठे हैं एवं जो लोग सामने बैठे हैं वह सब सहायताइष्ट, वजीफाइष्ट और रिजर्वेशनाइष्ट हैं, आप में से कोई भी बौद्धिष्ट व अम्बेडकराइष्ट नहीं है।’ इसपर कुछ मंचासीन हस्तियों ने आपत्ति की तो उन्होंने उत्तर दिया—‘जब तक आप बौद्धों में रोटी-बेटी का संबंध नहीं बनाएंगे, हिंदू रीति-रिवाजों और त्योहारों को मनाना नहीं छोड़ेंगे—तब तक तक आपका बौद्ध होना सिर्फ ढोंग ही रहेगा।’ उस बैठक के बाद ही उन्हें पेरियार की उपाधि मिली, जो स्वयं ललई सिंह के लिए गर्व की बात थी।

ललई सिंह सच्चे मानवतावादी थे। आस्था से अधिक महत्त्व वे तर्क को देते थे। सच्ची रामायण के प्रकाशन के पीछे उनका उद्देश्य हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को खारिज करना न होकर, मिथों की दुनिया से बाहर निकलकर जीवन-जगत के बारे तर्क संगत ढंग से सोचने और उसके बाद फैसला करने के लिए प्रेरित करना था। वे जाति-भेद और छूआछूत के विरुद्ध आजीवन संघर्षरत रहे। उनका एक ही ध्येय था, समाज को धार्मिक आंडबरों और जातिवाद जैसी रूढ़ियों से मुक्ति दिलाना। जीवन के अंतिम दिनों में वे आंखों की असाध्य बीमारी का शिकार था। अंततः सामाजिक क्रांति का वह अनन्य सेनानी, अनथक योद्धा 7 फरवरी 1993 को संघर्ष की लंबी विरासत छोड़कर हमारे बीच से उठ गया। गांव में लोग उन्हें ‘दीवानजी’ कहा करते थे। उनके संघर्ष के साक्षी रहे लोग आज भी उन्हें उसी मान-सम्मान और गर्व के साथ याद करते हैं।  

ओमप्रकाश कश्यप

1। गणानुत्सवसङ्केतान्वयजयत्पुरुषर्षभः

संदर्भ:

सिंधूकूलाश्रिता ये च ग्रामणेया महाबलाः

शूद्राभीरगणाश्चैव ये चाश्रित्य सरस्वतीम्

वर्तयंति चे ये मत्स्यैर्ये च पर्वतवासिन, सभापर्व, अध्याय 29, 8-9, महाभारत, भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट, संपादन: विष्णु एस। सकथांकर

आस्था और समाज

सामान्य

आस्था का सामान्य अर्थ दैवी शक्ति पर विश्वास से है। आमतौर पर वह सृष्टि या दृश्यमान जगत से परे होती है। उसका उलट नास्तिकता है। लेकिन इस लेख के माध्यम से हमारा मकसद पाठक को आस्तिक और नास्तिक की बहस में उलझाना नहीं है। इस कार्य को हम दार्शनिकों के लिए छोड़ देते हैं। हमारा उद्देश्य आस्था के सामाजिक पक्ष पर विचार करना है। यह देखना है कि जिस आस्था को जीवन के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और कल्याणकारी बताया जाता है, धर्म के हाथों में पड़कर वह मनुष्य को कैसे उसके वास्तविक लक्ष्यों से भटकाने का काम रखती है। जिस जाति-व्यवस्था को हिंदू समाज का कलंक बताया जाता है, उसे सहेजकर आगे बढ़ाने में भी आस्था का योगदान है। यह काम धर्म, समाज और पूर्वजों के प्रति आस्था के नाम पर किया जाता है। इसलिए इस लेख के बहुजन-संदर्भ भी हैं, जो लेख में यथा-स्थान सामने आ जाएंगे।
आस्थावान व्यक्ति आमतौर पर कार्य-कारण संबंधों पर विश्वास रखता है। मूल कारण को वह दृश्यमान जगत की हलचलों से मुक्त और सर्वोपरि मानता है। किंतु वह दृश्यमान जगत से सर्वथा परे हो, यह आवश्यक नहीं है। उसकी व्याप्ति दृश्यमान जगत के भीतर भी हो सकती है। कबीर इसे ‘चकमक में आग’ और वेदांती ‘सर्वखाल्विदं ब्रह्म’ कहते आए हैं। फिर भी आस्था के मूल केंद्र के रूप में मुख्य कार्यकारी शक्ति का दृश्यमान जगत से परे होना अनिवार्य है। इसका आशय यह नहीं है कि आस्था केवल परमानवीय शक्ति के प्रति संभव है। वह जीवित अथवा मृत व्यक्ति, वस्तु, विचार आदि किसी के भी प्रति हो सकती है। उस अवस्था में वह कहीं न कहीं स्थितियों अथवा व्यक्तियों का परामानवीकरण करती है। मानव-प्रवृत्ति के अनुसार आस्था के कई रूप हो सकते हैं। वह सामूहिक भी हो सकती है और व्यक्तिगत भी। प्रत्येक अवस्था में उसके गुण-दोष, हानि-लाभ करीब-करीब एक जैसे होते हैं।
नास्तिक के लिए दृश्यमान जगत कार्य भी है, कारण भी। वह प्रकृति को स्वतंत्र और सक्षम मानता है। वही जड़-चेतन सबकी जीवनदाता है। सृष्टि में पल-छिन घट रहीं असंख्य घटनाओं की भांति मानव-जीवन भी एक प्राकृतिक घटना है। इसलिए नास्तिक दृश्यमान जगत से इतर किसी पराशक्ति या कारक सत्ता पर विश्वास नहीं करता। वह मानता है कि जन्म से पहले मनुष्य प्रकृति का हिस्सा होता है। मृत्यु के बाद पुनः उसी में समा जाता है। अपने दार्शनिक मत को लेकर वह तर्क करने के लिए सदैव तैयार होता है। उसके तर्क अपेक्षाकृत वैज्ञानिक आधार लिए होते हैं। यही कारण है कि अठारवीं-उनीसवीं शताब्दी के बौद्धिक पुनर्जागरण के पश्चात जितने भी नए दर्शन सामने आए हैं, सभी के केंद्र में मनुष्य है। उनमें प्रत्ययवादी दर्शनों की संख्या, ऐसे दर्शनों की संख्या जो मानव जीवन की समस्याओं और उसकी जिज्ञासाओं का समाधान सृष्टि से परे, किसी काल्पनिक दुनिया में खोजने की कोशिश करते हैं—आनुपातिक रूप से बहुत कम, लगभग नगण्य है। इस कारण उनमें आस्था के लिए भी बहुत कम गुंजाइश है।
आस्तिक व्यक्ति सृष्टि की कारक सत्ता के रूप में अपने विश्वास या आस्था के अनुरूप केंद्रीय शक्ति की कल्पना करते हैं। जो स्वयं वैसी कल्पना नहीं कर सकते वे दूसरों द्वारा कल्पित कारक सत्ता पर विश्वास करने लगते हैं। जनसाधारण के लिए रोजमर्रा के जीवन की चुनौतियां ही इतनी विकट होती हैं, कि वह उनसे मुक्त होकर सोच ही नहीं पाता, इसलिए दूसरों द्वारा कल्पित या बताई गई कारक सत्ता पर विश्वास रखने वाले लोग ही ज्यादा होते हैं। हिंदू धर्म में जनसाधारण को थोपी गई आस्था के साथ-साथ, दूसरों के आदेश या सलाह के अनुसार काम करने का संस्कार जाति प्रथा से प्राप्त होता है—जो ब्राह्मण को शिखर पर रखकर, उसकी योग्यता के बारे में सवाल किए बगैर ही, समाज के नेतृत्व का अधिकार सौंप देती है। जनसाधारण की यह कमजोरी, जो प्रायः उसकी समाजार्थिक विवशता की देन होती है—समाज में धर्म के लिए जगह बनाकर जातिप्रथा को मजबूती प्रदान करती है। इस कमजोरी(या विवशता) का लाभ वे लोग उठाते हैं, जो कारक सत्ता का जानकार होने का दावा करते हैं। इसका शिकार वे लोग ज्यादा होते हैं, जो समाजार्थिक स्तर पर पिछड़े तथा अपनी आवश्यकताओं के लिए दूसरों पर आश्रित होते हैं। प्रकारांतर में आस्था, विशेषरूप से धार्मिक प्रतीकों से जुड़ी आस्था, सामाजिक अन्याय का पोषण करती है। असमानता को दैवीय बताकर, विषमता और अन्याय को स्वीकार्य बनाती है।
सृष्टि से परे कही जाने वाली, तथाकथित मूल कारक सत्ता का अस्तित्व कल्पना या अनुमान पर टिका होता है। तर्क के आधार पर उसे सिद्ध कर पाना संभव नहीं होता। इसलिए उसके समर्थक आस्था और विश्वास पर जोर देते हैं; तथा धर्म के नाम पर उसका मानकीकरण कर, उसे किसी भी प्रकार के तर्क और संदेह से परे मान लेते हैं। उनके तर्क बड़े ही कमजोर, ‘मानो तो देव या फिर मिट्टी का लेप’ या ‘मानो तो ईश्वर नहीं तो पत्थर’ जैसे होते हैं। यदि ईश्वर का अस्तित्व केवल व्यक्ति के मानने या न मानने पर टिका है, तो मान लेने की क्या जरूरत है? क्या जरूरत है पत्थर की शिला छाती पर रखकर कसरत का दिखावा करने की? इसके बावजूद अपने विश्वास को पुख्ता दिखाने के लिए वे तर्क का दमदार नाटक करते हैं। लोक-लुभावन किस्से-कहानियां गढ़कर प्रायः अपने समर्थक भी जुटा लेते हैं। परिणामस्वरूप नए संप्रदायों का जन्म होता है। ध्यानपूर्वक देखा जाए तो उनके तर्कों का मूलाधार उनकी आस्था होती है। वे प्रायः परंपरा की दुहाई देते हैं। ईश्वर या परमसत्ता को अनुभूति का विषय बताकर उन्हें तर्कातीत मान लेते हैं। तत्संबंधी अनुभवों का विवरण देने को कहा जाए तो सिवाय कल्पनाओं के, जिनके पीछे उनके पूर्वाग्रहों और संस्कारों का योगदान होता है—से आगे बढ़ ही नहीं पाते। उनके हर संदेह का समाधान परामानवीय होता है। वैसे भी धर्म तथा उससे जुड़ी परंपराएं मानवीय आस्था और विश्वास पर टिकी होती हैं। अपने-अपने आराध्य को बड़ा घोषित करने के लिए वैष्णव, शाक्त अथवा अन्य कोई धर्मावलंबी लंबे-लंबे तर्क दे सकते हैं। परंतु उनके तर्कों का मूलाधार उनकी आस्था ही होगी। उनके हर तर्क के साथ यह विश्वास जुड़ा होगा कि ‘मैं ऐसा सोचता हूं, इसलिए तुम भी इसपर विश्वास करो।’ वे संदेह को अज्ञान और विश्वास को ज्ञान का मूल मानते हैं। दूसरे शब्दों में उनके तर्क भी कल्पना या पूर्वानुमान पर आधारित होते हैं। गीता-रामायण पवित्र ग्रंथ हैं, यह घोषणा वे उन्हें बिना पढ़े ही कर सकते हैं। बिना यह समझे कि आस्था और पवित्रता दोनों मिथ हैं—वे उन्हें यत्नपूर्वक सहेजे रहते हैं।

दर्शनों का विकास मानवीय जिज्ञासा के भरोसे हुए है। मनुष्य अपने आसपास जो भी देखता है, उसको समझना भी चाहता है। इसलिए जिज्ञासा के मूल में अनुभव की महत्ता को नकारा नहीं जा सकता। यही कारण है कि प्रत्येक दर्शन के पीछे कहीं न कहीं भौतिकवादी प्रेरणा अंतनिर्हित होती है। इसे तथ्यों की मामूली पड़ताल से भी समझा जा सकता है। आरंभ में आसपास के जीवन में जो वस्तु जितनी अधिक महत्त्वपूर्ण और अपरिहार्य दिखाई पड़ती थी, उसी को जीवन का आधार मान लिया जाता था। ऋग्वैदिक मनीषी परमेष्ठिन को जब लगा कि बिना पानी के जीवन असंभव है तो उसने जल को सृष्ठि का मूल ठहरा दिया। ऐसे ही प्रकृतिवादी रैक्व ने वायु को सृष्टि का सारतत्व माना। परमेष्ठिन की भांति यूनानी दार्शनिक थेलीज भी जल को मूल तत्व मानता था। हेराक्लाइट्स का विचार था कि मूल-तत्व अग्नि है। हेराक्लाइट्स को दर्शन के क्षेत्र में अनिश्चिततावाद का समर्थक भी माना जाता है। नदी के उद्दाम प्रवाह के बीच उसे यह बोध हुआ था कि कुछ भी स्थिर नहीं है। हम एक ही नदी में दो बार स्नान नहीं कर सकते। विराट, पल-छिन परिवर्तनशील प्रकृति के सीधे सान्निध्य में रहने वाले मनुष्य के लिए इस प्रकार का बोध अस्वाभाविक नहीं था। बावजूद इसके देश-विदेश के दर्शनों में संदेहवाद खास जगह नहीं बना सका। मगर आज जब हम क्वांटम यांत्रिकी को पढ़ते हैं तो पता चलता है कि प्रकृति के सातत्य के पीछे संदेह और अनिश्चितता का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। उसे नकारा नहीं जा सकता। यह दर्शाता है कि ब्रह्मांड जितना दृश्यमान और ज्ञेय है, उतना अदृश्य और अज्ञेय भी है। कोरी आस्था के भरोसे उसे जानना संभव नहीं है। उसकी ओर से आंखें अवश्य मूंदी जा सकती हैं, जो मनुष्य के सहज जिज्ञासा-भाव के प्रतिकूल है। इसीलिए ब्रह्मांड की व्याख्या के नाम पर आस्थावादी जहां तरह-तरह की कहानियां गढ़कर मन बहलाते रहते हैं, वहीं अनास्थावादी ज्ञान-विज्ञान के रास्ते संदेहों के समाधान पर जोर देता है। ‘संदेह हमें जांच-पड़ताल तक ले जाते हैं। जांच-पड़ताल सत्य तक तक पहुंचने में हमारी मदद करती है’—मध्यकालीन विचारक पीटर अबेलार्ड का यह कथन उसका मार्गदर्शन करता है। उसके फलस्वरूप नए ज्ञान के रास्ते प्रशस्त होते हैं। समाज में नएपन का सम्मान बढ़ता है। यही कारण है कि आस्थावादी की अपेक्षा अनास्थावादी के तर्क ज्यादा ठोस और वस्तुनिष्ठ हो सकते हैं।
दुनिया में जितने भी धर्म-दर्शन हैं, कहीं न कहीं सब प्रकृतिवाद से पोषित और प्रभावित हैं। लगभग सभी सभ्यताओं में सूर्य को देवता माना गया है। चीन, इंडोनेशिया, जापान में सूर्य को सृष्टि का जन्मदाता मानने से जुड़ी अनेक कहानियां हैं। यूनानी पुराकथाओं का पात्र प्रोमेथियस सूर्य को सर्वेसर्वा मानता था। रामायण में आदिवासी समाज के संपाति का उल्लेख आया है। हम उसे भारतीय परंपरा के आदि-जिज्ञासुओं में से एक मान सकते हैं। संपाति को धूप-ताप उगलता सूर्य ललचाता था। वह उसे जानना-समझना चाहता था। इसलिए एक वैज्ञानिक की भांति, अंजाम की परवाह किए बगैर वह सूर्य की ओर बढ़ा था। सूर्य के करीब पहुंचने से पहले ही उसके पंख झुलस गए। संभव है भारत के लंबे सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास में संपाति जैसा कोई प्राणी रहा ही न हो। रामायण के दूसरे मिथों की भांति वह भी एक मिथ हो। इसके बावजूद संपाति की कथा का महत्त्व है। यह सूर्य के तेज पीछे निहित कारण को समझने की आदिम छटपटाहट की परिचायक है।
प्राचीन मिस्र का इख्नातून भी सूर्य से प्रभावित था। उसका विश्वास था कि सूर्य की अंतहीन ऊर्जा के पीछे कोई न कोई कारक सत्ता है। वही सूर्य के तेज की जन्मदाता है। इख्नातून ने सूर्य की अपेक्षा उसके पीछे अंतनिर्हित काल्पनिक शक्ति को पूजने पर जोर दिया जाता है। इसलिए कुछ विद्वान इख्नातून को धर्म के जन्मदाता के रूप में भी देखते हैं। कदाचित सूर्य से ही देवताओं के आकाश में स्थित होने की प्रेरणा जगी थी, लेकिन जब हम इख्नातून के उल्लेखों को देखते हैं, तो पाते हैं कि सूर्य की कारक सत्ता को पूजने के नाम पर असल में वह सूर्य की ही पूजा करता है। इख्नातून की सूर्य की प्रशस्ति में रची गई कविता प्राचीन साहित्य की धरोहर हैं—
डूब जाता है जब तू पश्चिमी आसमान के पीछे
मृत्यु समान कालिमा घेर लेती है, इस धरा को
सिंह निकल पड़ते हैं अपनी मांदों से
सांप बिलों से निकलकर डंसने लगते हैं
अंधकार का राज पसर जाता है,
सन्नाटा अपने पंजों में जकड़ लेता है धरती को

क्षितिज से निकलते ही दमक उठती है, धरा
अंधेरे का हो जाता है लोप
किरनें पसरते देख मुस्करा उठता है इंसान
जाग उठता है, अपने पैरों पर खड़ा हो जाता है,
तू ही उसे जगाता है
….. …..

तू ही मां के गर्भ में शिशु को सिरजता है
आदमी में आदमी का बीज रखता है
गर्भस्थ शिशु रोये नहीं, इसलिए तू उसे प्यार से दुलराता है
धाय है तू कोख के बालक के लिए
तू ही उसे सिरजता, प्राण फूंकता है उसमें
गिरता है जब वह मां की कोख से धरा पर
उसके कंठ में आवाज भरता है तू ही।

भौतिकवादियों ने पृथ्वी जल, वायु और आकाश इन चार तत्वों को जीवन का स्रोत माना। याज्ञवल्क्य जैसे प्रत्ययवादियों ने इसमें आकाश को भी जोड़ दिया। फिर भी मौटे तौर पर देखा जाए तो अनीश्वरवादी भौतिकवादी दर्शनों तथा आस्तिक दर्शनों में बहुत अंतर नहीं है। भौतिकवादी प्राकृतिक शक्तियों से सीधे संबोधित होते हैं। उनके लिए प्रकृति अपने सहज निरपेक्ष भाव से क्रियाशील रहती है। वह आकर्षक और आत्मीय है तो वीभत्स और डरावनी भी है। उनके अनुसार अच्छा समाज केवल नैतिकता के भरोसे गढ़ा जा सकता है। बैंथम जैसे विचारक विधि शासित राज्य की अनुशंसा करते हैं। ऐसा समाज जो ‘अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख’ के सिद्धांत पर गढ़ा गया हो। जिसमें मनुष्य अपने साथ-साथ दूसरों के सुख का भी ख्याल रखे। दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करे, जैसा वह उनसे अपने प्रति चाहता है।
आस्तिक के लिए धर्म ही नैतिकता है और उसके द्वारा कल्पित देवता नैतिकता का स्रोत। जीवन की अनिवार्यता होने के कारण प्रकृति को नकार पाना उनके लिए भी संभव नहीं है। अंतर केवल इतना है कि वे प्राकृतिक शक्तियों पर सीधे विश्वास न करके, उनके पीछे की कारक सत्ता पर, जो किसी के लिए भी अनदेखी-अजानी है और कल्पना से परे जिसका कोई महत्त्व नहीं है—को ज्यादा महत्त्व देते हैं। चूंकि उन काल्पनिक शक्तियों को सीधे-सीधे नहीं समझा जा सकता, इसलिए वहां आस्था को अपरिहार्य मान लिया जाता है। ठीक ऐसे ही जैसे इख्नातून ने करीब 3300 वर्ष पहले किया था। हर आस्तिक की स्थिति इख्नातून जैसी होती है, जो सीधे नजर आ रही प्राकृतिक सत्ता के बजाय उसकी कारक सत्ता के रूप में काल्पनिक देवता को ले आता है। परिणामस्वरूप अग्नि का स्वामी अग्निदेव को मान लिया जाता है, वायु का मरुत। हिंदू धर्म में चराचर जगत में नजर आने वाली प्रत्येक वस्तु के लिए एक देवता कल्पित है। नास्तिक गंगा को महज नदी मानता है। आस्तिक गंगा में स्नान करता है, लेकिन पूजता किसी काल्पनिक ‘देवी’ को है। उसके आस्थालोक की नदी, कभी प्रदूषित नहीं होती। परंपरा और संस्कृति के नाम पर वह उसमें रोज अपशिष्ट बहाता है और धार्मिक होने का ढोंग पाले रहता है।
नास्तिक के लिए भौतिक पदार्थों की सत्ता स्वतः प्रामाणित होती है। उसके लिए जो दिखता है, वही सत्य है। आस्तिक दृश्यमान भौतिक जगत को माया कहता है। सांसारिक सुख उसे छलावा और भरमाने वाले लगते हैं। उनके प्रति अनुराग भव-प्रपंच में फंसना है। यह धारणा परिवेश के प्रति अलगाव को जन्म देती है। उससे मुक्ति के लिए वह अधिदैविक शक्तियों को खुश करने की कोशिश में लगा रहता है। इससे उसके श्रम और विवेक का बड़ा हिस्सा अनुत्पादक कार्यों में खर्च होने लगता है। नास्तिक के लिए मानवजीवन का उद्देश्य अपने और समाज के सुख के स्तर में वृद्धि करना है। इसके लिए समाज के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण आवष्यक है। वह आस्तिक की भांति माया कहकर संसार के अस्तित्व को नकारता नहीं है। उन्हें उसी रूप में स्वीकारता है, जैसे वे दिखाई पड़ते हैं। नास्तिक जल को जीवनोपयोगी तत्व मानता है। आस्तिक के लिए जल वरुणदेव की अनुकंपा है। उनकी कृपा बनी रहे, तो जल का अभाव न होगा। यह धारणा अनेक पर्यावरणीय समस्याओं को जन्म देती है। इस आस्था के साथ कि देवताओं की अनुकंपा जब तक है, सब मंगल होगा, आस्थावादी पर्यावरण संबंधी समस्याओं से मुंह फेरे रहते हैं। चूकि धर्म का राजनीतिक पक्ष भी है, इसलिए लोगों की नाराजगी से बचने के लिए सरकार भी धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करने से बचती है।
मनुष्य की पहुंच से परे, काल्पनिक सत्ता को सर्वेसर्वा मानते ही मनुष्य का जीवन के प्रति पूरा नजरिया बदल जाता है। वहां मनुष्य और उसके कर्तव्य के बीच तीसरी सत्ता के रूप में ईश्वर आ जाता है, मानव-समाज से ज्यादा देवता महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। अपने आसपास के लोगों को सुखी एवं संतुष्ट देखने के बजाए मनुष्य काल्पनिक शक्तियों को खुश करने में जुट जाता है। सामाजिक संबंध गौण होने लगते हैं। काल्पनिक सुखों की चाहत में वह छायाओं के पीछे भागने लगता है। संसार को माया समझकर, छाया के पीछे भागने की प्रवृत्ति मनुष्य को परिवेश के प्रति उदासीन और स्वार्थी बनाती है। रोज-रोज धर्म-कर्म, पूजा-पाठ में लीन रहने वाला आस्तिक शनैः-शनैः यह विश्वास करने लगता है कि उसपर उसके आराध्य की विशेष कृपा है। इस कारण वह बाकी लोगों से उत्तम और आराध्य के करीब है। धीरे-धीरे यह विशिष्टताबोध उसके व्यवहार का हिस्सा बन जाता है। धार्मिक आख्यानों में निष्कर्ष केवल थोपे जाते हैं। विपरीत विचारधारा से संवाद की उनमें कोई कोशिश नहीं होती, इसलिए खास किस्म की अलोकतांत्रिक जड़ता उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बनती चली जाती है। यदि जातिगत पूर्वाग्रह भी इसमें मिल जाएं तो स्थिति करेले और नीमचढ़े जैसी हो जाती है। उसके प्रभाव में समाज कुछ लोगों की मर्जी से चलने लगता है। बहुसंख्यक वर्ग के विवेक, इच्छाओं और सपनों की उपेक्षा होने लगती है। परिणामस्वरूप समाज में ऊंच-नीच का अनुपात बढ़ता ही जाता है। कालांतर में वह अनेक अंतर्द्वंद्वों को जन्म देता है। समाज में नए ज्ञान को आत्मसात करने की प्रवृत्ति कम होने से रूढ़ियों और आडंबरों में वृद्धि होने लगती है। सामाजिक विकास थम-सा जाता है।

इसका आशय यह नहीं है कि आस्था सदैव नकारात्मक होती है। जीवन में उसकी कोई भूमिका नहीं है। चूंकि मानव जीवन की सीमा है, इस कारण उसकी बुद्धि की भी सीमा है। प्रकारांतर में वही सीमा समाज की भी है। मनुष्य और समाज दोनों स्थायित्व चाहते हैं, इसके लिए कुछ मर्यादाओं का होना आवश्यक है। इसलिए प्रत्येक समाज अपने स्थायित्व और पहचान के लिए कुछ मूल्यों का निर्धारण करता है। चाहता है कि उसकी प्रत्येक इकाई उनमें विश्वास रखे, उनका पालन करे। समाज की सुख-शांति के लिए उन मूल्यों के प्रति सदस्य इकाइयों का विश्वास आवश्यक है। लेकिन अपनी आस्था को सर्वोपरि मान, दूसरे के विश्वासों का निरादर करना, सांप्रदायिक अस्थिरता पैदा करता है। इसलिए आवश्यक है कि मनुष्य अपनी आस्था के साथ दूसरों की आस्था का भी सम्मान करे। पारंपरिक धर्म इसकी इजाजत नहीं देते। क्योंकि लंबे समय में उनके बीच ऐसा वर्ग पनप चुका होता है जो यथास्थिति बनाए रखने में ही अपना स्वार्थ देखता है। हिंदू वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार यह ब्राह्मण है, जो वर्गीय स्वार्थों की सुरक्षा के लिए जातिवाद का समर्थन और पोषण करता है। वह धार्मिक आस्था और तत्संबंधी कर्मकांडों को किसी भी प्रकार के संदेह और संशोधन से परे मान लेता है। इस तथ्य को नजरंदाज कर देता है कि आस्था और विश्वास किसी वस्तु, विचार, प्रतीक, लौकिक या तथाकथित पारलौकिक शक्ति के प्रति संवेदनमात्र होते हैं, जो वस्तु-विशेष के प्रति कौतूहल तो जगा सकते हैं, स्वयं ज्ञान नहीं होते।
उदाहरण के लिए हिंदू धर्म में मूर्तियों के प्रति आस्था(संवेदन) को ज्ञान मान लिया जाता है। प्रकट में कहा जाता है कि मूर्ति देवता न होकर उसका प्रतीक मात्र होती है। मनुष्य अपने विवेक, कल्पनाशक्ति और अनुभवजन्य बोध से उस मूर्ति के पीछे निहित सत्य, जिसके प्रतीक स्वरूप उसे गढ़ा गया है—को प्राप्त कर सकता है। लेकिन यह केवल सैंद्धांतिक रह जाता है। व्यवहार में मूर्ति ही सबकुछ मान ली जाती है। पुजारी के लिए मूर्ति और मंदिर उसकी विशिष्ट सामाजिक प्रस्थिति, मान-सम्मान, प्रतिष्ठा के साथ-साथ आजीविका का आधार भी होते हैं। वह मूर्ति को नहलाता, धुलाता, भोग लगाता और समय-समय पर वे सभी काम करता है, जिन्हें वह तथाकथित देवता के नाम पर करना चाहता है। मूर्ति के अवमानना को वह देवता और प्रकारांतर में धर्म का अपमान समझता हैं। आडंबरों के चलते मूर्ति केवल प्रतीक नहीं रह पाती। चूंकि समाज में धर्म-शास्त्रों की व्याख्या उनके पठन-पाठन का अधिकार स्वयं ब्राह्मण ने कब्जाया हुआ है और मानव जीवन में जन्म से लेकर मृत्यु तक, कदम-कदम पर उसकी भूमिका है, इसलिए पुजारी के कथन और उसके सभी कर्मकांडों पर जनसाधारण आसानी से विश्वास कर लेता है।
आस्था के अतिरेक में, मूर्ति को देवता मान लेने से आस्था के प्रभाव और भी विकृत हो जाते हैं। विशेषरूप से उन लोगों के लिए जो विभिन्न प्रकार के समाजार्थिक शोषण का शिकार रहे हैं। इसका असर जातिवाद से प्रभावित वर्गों में देख सकते हैं। उनीसवीं और बीसवीं शताब्दी में दलितों और पिछड़ों में जागृति लाने में महामना ज्योतिराव फुले, डा. आंबेडकर, ई. वी. रामास्वामी नायकर आदि ने अनथक संघर्ष किया था। जातिवाद से मुक्ति के लिए इन सभी ने तंत्र-मंत्र, मूर्ति-पूजा जैसे ब्राह्मणवादी औजारों से मुक्ति को आवश्यक माना था। वे चाहते थे कि दलित और पिछड़े अधिकाधिक शिक्षा ग्रहण करें। ब्राह्मणवाद के चंगुल से बाहर आने के लिए उसके द्वारा थोपे गए सभी कर्मकांडों का बहिष्कार करें। शताब्दियों से ब्राह्मणवाद के दमन के चलते उनसे अनुकूलित हो चुकी चेतना का ही असर है कि दलितों और पिछड़ों में जातिभेद आज भी बरकार है। ब्राह्मणवाद से मुक्त दिखने के लिए वे फुले और आंबेडकर की मूर्तियां बस्तियों में लगा लेते हैं, और बजाय इन महापुरुषों के लिखे हुए को पढ़ने के, उनकी मूर्तियों की वैसी ही पूजा-अभ्र्यना करते हैं, जैसा पुजारी मंदिर में करता है। ब्राजील के शिक्षा शास्त्री पाब्लो फ्रेरा के अनुसार परिवर्तन के आरंभिक चरण में उत्पीड़ित, उत्पीड़क की भूमिका में आने की कोशिश करता है। वह उन्हीं गतिविधियों को दोहराता है, जिन्हें उत्पीड़क अपना वर्चस्व दर्शाने के लिए करता है. इससे परिवर्तन की गति धीमी पड़ने लगती है। प्रतिक्रियावादी शक्तियों को नए सिरे से, नई ताकत और रणनीतियों के साथ उभरने का अवसर मिल जाता है।
आमूल परिवर्तन के लिए आवश्यक है कि समाज विशेष के महापुरुषों की चेतना, उसके प्रत्येक नागरिक की चेतना का अनिवार्य हिस्सा बन जाए। यह कार्य डा. आंबेडकर, फुले, पेरियार जैसे महापुरुषों के प्रति कोरी आस्था द्वारा संभव नहीं है। उसके लिए आवश्यक कि उन्हें आदर्श मानने वाले लोग वैसी ही चेतना से लैस हों। कुछ लोग कह सकते हैं कि महापुरुष रोज-रोज पैदा नहीं होते। हर व्यक्ति उनके जैसा नहीं बन सकता। हम मान लेते हैं। पर इतना तो कोई भी कर सकता है कि दूसरों की नकल करने, उनके कहे अनुसार आचरण करने के बजाए, व्यक्ति अपने विवेक का अधिकाधिक इस्तेमाल करे। दूसरों की बातों में आने के बजाय खुद फैसला करने की आदत डाले। यदि किसी को गीता या रामचरितमानस में कोई आदर्श नजर आता है, तो बजाय पंडा-पुरोहित के बहकावे में आने के स्वयं पढ़कर उनके बारे में अपनी राय बनाए। साथ में वह सब भी पढ़े जो इन धर्मग्रंथों की आलोचना में महापुरुषों ने कहा था।
सारतः, आमूल परिवर्तन की इच्छा रखने वाले बहुजन समाज के लिए, जड़ आस्था चाहे वह खास मूल्यों के प्रति हो या महापुरुषों के प्रति—किसी काम की नहीं है।

ओमप्रकाश कश्यप

क्रांतिकारी कवि और उपदेशक : पोईकाइल योहन्नान

सामान्य

लेख

बीसवीं शताब्दी का दूसरा दशक। पूरा भारतवर्ष आजादी के संघर्ष में डूबा हुआ है। रविवार का दिन। दूर दक्षिण की त्रावणकोर रियासत में खपरैली छत की पुरानी इमारत प्रार्थना-संगीत से गूंज रही है। श्रद्धालु सफेद वस्त्र धारण किए, कच्चे फर्श पर विराजमान हैं। उनके आगे थोड़ा खाली स्थान है। उसके बाद चार फुट ऊंचा मिट्टी का बना चबूतरा। चबूतरे के बीचों-बीच दीपक झिलमिला रहा है। एक अधेड़, अधनंगा आदमी उसमें तेल डालने के लिए बार-बार उठकर आता है। दीपक के पीछे कोई दैवी प्रतीक है। उसका चेहरा एकदम खाली है। सिर के पीछे पीला प्रकाश फैला हुआ है। श्रद्धालुओं के आगे कुछ कुर्सियां और एक मेज हैं। एक बुजुर्ग आदमी कुर्सी के सहारे खड़ा होकर प्रवचन कर रहा है। सम्मोहित श्रद्धालु उसकी उपदेश गंगा में स्नान कर रहे हैं। बीच-बीच में वह अपनी आंखों में उतर आई नमी को साफ करता है। उपदेशक सीरियाई मारथोमा चर्च से छिटककर आया है। बाईबिल में इसलिए विश्वास नहीं करता, क्योंकि उसमें उसके लोगों और पूर्वजों के बारे में एक भी शब्द नहीं है। प्रवचन के बीच-बीच में वह उपस्थित श्रद्धालुओं को अपने दास पूर्वजों के बारे में बताता है। उनके साथ हुए जातीय और सामंती उत्पीड़न का जिक्र करता है। श्रद्धालुओं को उपदेशक की एक-एक बात पर विश्वास है। इसलिए कि जो वह बता रहा है, वे स्वयं उन्हीं हालात से गुजर रहे हैं। दास लोग हैं, उन्हें न खुलकर बोलने की आजादी है, न मनभाता खाने और पहनने की। सार्वजनिक स्थानों पर वे आ-जा नहीं सकते। अपने मालिक से बात करनी हो तो कम से कम पचास कदम की दूरी रखनी पड़ती है। कहीं देह की  छाया भी उनपर पड़ न जाए। ऊपर से बात-बात पर मार देने या बेच आने की धमकी। उपदेशक उन्हें उनके जीवन की त्रासदियों के साथ-साथ सपनों से भी परचाता है। प्रवचन में लीन श्रद्धालु कभी भाव-विभोर होकर झूमने लगते हैं, तो कभी उनकी आंखें छलछला जाती हैं। सारा देश अंग्रेजों से देश की आजादी चाहता है। वे लोग जातीय उत्पीड़न और अपने दासत्व से मुक्ति के लिए प्रार्थनारत हैं। मुक्ति-संदेश जब-जब आंखों में आजादी का बिंब बनकर उभरता है, झुर्राए चेहरों पर खुशी झिलमिलाने लगती है।

भारतीय इतिहास की कोई भी पुस्तक उठाकर देख लीजिए। इस तरह की घटनाओं का उल्लेख नहीं मिलेगा। क्योंकि इतिहासकारों को राजा-महाराजाओं की जय-पराजय, उनके वैभव-विलास और पर्दे के पीछे चलने वाले षड्यंत्रों को लिखने में मजा आता है। आम आदमी की समस्याएं, उसके सुख-दुख उनकी चिंता का विषय नहीं होते। ‘फलां राजा ने नहर बनवाई’─वे बस इतना लिखते हैं। नहर का पानी हर जरूरतमंद तक पहुंचा या नहीं, यह उनकी चिंता का विषय नहीं होता। उनीसवीं और बीसवीं शताब्दी को वे भारतीय समाज के नवजागरण का नाम देते हैं। लेकिन समाज सुधारकों का नाम पूछा जाए तो अधिकांश की सुई राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, दयानंद सरस्वती और विवेकानंद तक आते-आते अटक जाएगी। कुछ और खंगाला जाए तो संभव है, केशवचंद सेन, महादेव गोविंद रानाडे का नाम भी निकलकर सामने आ जाए। किसी पिछड़े या दलित समुदाय के समाज सुधारक का नाम जानने की कोशिश कीजिए? सवाल सुनते ही लोग कन्नी काटने लगेंगे। संभव है कुछ हंसने भी लग जाएं? कहें कि जो अपना भला नहीं कर सकते वे समाज का खाक सुधार करेंगे। इस तरह की टिप्पणी करने वालों पर आपको चाहे जितना गुस्सा आए, पर असल में उनका ज्यादा दोष नहीं है। शताब्दियों से उन्हें यही सिखाया गया है। यही उनकी मानस-रचना है। भारत का इतिहास, उसके धर्म-शास्त्र, नीति-शास्त्र सब समाज के खास लोगों द्वारा खास लोगों के लिए गढे़ गए हैं। इस तरह गढे़ गए हैं कि उनमें जो विरोधाभास और बड़बोलापन है, वह नजर ही नहीं आता। महाभारत के लिए नायक अवतारी कृष्ण हैं। परंतु धर्मराज का दर्जा पांडव-ज्येष्ठ को प्राप्त है। ये ‘धर्मराज’ एक बार 88000 ब्राह्मण स्नातकों को, प्रति स्नातक 30 के हिसाब से कुल 26,40,000 दासियां दान कर देते हैं(सभापर्व, शिशुपाल बध, भाग 48)। इतनी सारी दासियां कहां से जुटाई गईं? ब्राह्मण स्नातक इतनी दासियों का क्या करेंगे? ये सवाल दिमाग में आते ही नहीं हैं। क्योंकि सवाल करना उन धर्मग्रंथों के अनुसार पाप की श्रेणी में आता है।

यहां जो धर्म का लाभार्थी है, वह जाति का लाभार्थी भी है। जो इन दोनों का जितना बड़ा लाभार्थी है, समाज में उसका स्थान उतना ही ऊंचा है। जो इनका लाभार्थी नहीं है, उससे इस व्यवस्था में हस्तक्षेप करने का अधिकार ही छीना हुआ है। जातिवाद की पैठ इतनी गहरी है कि ईसाई और इस्लाम जैसे धर्म जिनकी मूल संरचना में जाति के लिए कोई स्थान नहीं था, भारत आकर वे भी जाति के प्रभाव से मुक्त न रह सके। हिंदू धर्म से राहत की उम्मीद लेकर दूसरे धर्मों में गए लोग, अपने साथ जाति ले जाना नहीं भूले─

एक के बाद एक नए-नए चर्च बनते गए

फिर भी जाति-भेद गया नहीं….

एक चर्च स्वामी की खातिर है

एक चर्च दास के लिए

एक चर्च पुलाया के लिए है

एक परायास के लिए

एक चर्च ‘मुराक्कन’

मछुआरे के लिए है।1

इस प्रवृत्ति का विरोध न हुआ हो, ऐसा भी नहीं है। उनीसवीं शताब्दी में दलितों और पिछड़ों को लेकर कई सुधारवादी आंदोलन समानांतर रूप से चले थे, जिनका नेतृत्व उन समाजों के महापुरुषों के हाथों में था। उनकी पहल करने वाले थे, ज्योतिराव फुले। महाराष्ट्र में ‘सत्यशोधक मंडल’ की स्थापना द्वारा उन्होंने सीधे ब्राह्मणवाद को चुनौती दी थी। पंजाब में जाति-भेद और ब्राह्मणवाद विरोधी चेतना ‘आदिधर्म आंदोलन’, मध्यप्रदेश में ‘आदि हिंदू आंदोलन’ और बंगाल में ‘नामशूद्र आंदोलन’ के रूप में विद्यमान थी। दक्षिण भारत भी अप्रभावित नहीं था। बल्कि कुछ मायनों में तो वह शेष भारत से भी आगे था। तमिलनाडु में पेरियार के नेतृत्व में ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के साथ वैकल्पिक राजनीति की मांग करते हुए धर्म तथा जाति से जुड़े सभी प्राचीन संस्थानों को चुनौती दे रहे थे। केरल में श्री नारायण गुरु, अय्यंकालि, तथा पोईकाइल योहन्नान के नेतृत्व में क्रमशः ‘श्री नारायण धर्म परिपालन योगम’, ‘साधु जन परिपालन संघम’ तथा ‘प्रत्यक्ष रक्षा दैव सभा’ ने भी शताब्दियों से व्याप्त जातीय असमानता के विरुद्ध लोगों को जागरूक करने का काम किया था। आधुनिक भारत के निर्माण में इन आंदोलनों की बड़ी भूमिका है। 

ऊपर जिस उपदेशक का जिक्र हुआ है, वे थे─पोईकाइल योहन्नान। जिस सभा का वर्णन किया गया है, वह थी पोईकाइल योहन्नान द्वारा स्थापित ‘प्रत्यक्ष रक्षा देव सभा’ की साप्ताहिक धर्म-गोष्ठी। आगे बढ़ने से पहले उचित होगा कि सरसरी निगाह केरल के तत्कालीन हालात पर भी डाल ली जाए। 19वीं शताब्दी का केरल तीन बड़े राज्यों─कोचीन, त्रावणकोर और मालाबार में बंटा हुआ था। ईसाई मिशनरियां वहां सक्रिय थीं। समाज मुख्यतः दो हिस्सों में विभाजित था। पहले में विशेषाधिकार प्राप्त जातियां थीं। नंबूदरी ब्राह्मण, जो स्थानीय ब्राह्मण थे। उनका दर्जा समाज में सबसे ऊंचा था। दूसरे स्थान पर बाहर से आए ब्राह्मण और क्षत्रिय थे। नैय्यर मुख्यतः जमींदार थे। मंदिरों की देखरेख का काम भी उन्हीं के अधीन था। सरकारी नौकरियों पर भी उनका अधिकार था। इनके अलावा चेट्यिार, मुस्लिम और ईसाई भी समाज के उच्च वर्गों में आते थे। निचले वर्गों में इझ़वा, पुलाया, परायास, चेनान जैसी जातियां शामिल थीं। इझ़वा पिछड़ी जाति में गिने जाते थे। उनकी कुल जनसंख्या लगभग 15 प्रतिशत थी।  इझ़वाओं की आर्थिक स्थिति दलितों से कुछ बेहतर थी; लेकिन सामाजिक स्तर पर वे भी भेदभाव का शिकार थे। पुलाया(पुलायार), परायास, चेन्नान जातियों  की स्थिति दास के समान थी। छूआछूत कायम थी। इझ़वा ब्राह्मण से 30 फुट दूर रखकर बात कर सकता था, जबकि नैय्यर के अधिकाधिक 12 फुट निकट जा सकता था। वहीं पुलाया को ब्राह्मण से 90 फुट तथा नैय्यर से 60 दूरी रखनी पड़ती थी। सब कुछ ब्राह्मणवादी व्यवस्था के अनुसार था।

दास प्रथा का चलन था। चांगनचेरी बड़ा बाजार था, जहां दासों की बड़े पैमाने पर खरीद-फरोख्त होती थी। अन्य बाजारों में तिरुअंकारा, अलेप्पी, कुनोल, अतिंग्गल, कायमकुलम जैसे बाजार थे। उनमें माता-पिता या सगे-संबंधी दास लड़के-लड़कियों को बिक्री के लिए लाते थे। एक दास युवक का मूल्य 6 से 18 रुपयों के बीच हो सकता था। डॉ। जेनफी के अनुसार अकेले त्रावणकोर में खरीदे गए दासों की संख्या 130000 थी। ईसाई मिशनरियां उनके बीच तेजी से पैठ बना रही थीं। धर्मांतरित पुलाया, परायास को ईसाई धर्म में स्वीकृति तो मिल जाती थी। परंतु उनकी सामाजिक स्थिति पर कोई अंतर नहीं पड़ता था। इझ़वा चूंकि समाज में बीच की हैसियत रखते थे, इसलिए तत्कालीन जातिप्रथा से उन्हें बहुत ज्यादा शिकायत नहीं थी। श्री नारायण गुरु ने इझ़वाओं को सड़क पर चलने और मंदिर प्रवेश की आजादी के लिए सफल आंदोलन किया था। जिसके लिए उन्हें पेरियार का समर्थन भी प्राप्त हुआ था, लेकिन पुलाया आंदोलन के नेता अय्यंकालि का, जिन्होंने दलित जातियों के आत्मसम्मान के लिए सवर्णों से सीधी लड़ाई लड़ी थी, श्रीनारायण गुरु ने कोई साथ नहीं दिया था। इससे तत्कालीन केरल की सामाजिक स्थिति को समझा जा सकता है। नारायण गुरु का नारा था─‘एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर।’ पेरियार और अय्यंकालि के सपने को उन आंदोलनों के साक्षी और सहभागी रहे, कवि सहोदरन अय्यपन(1889-1968) की कविता से समझा जा सकता है─

‘कोई धर्म नहीं, कोई जाति नहीं,

न कोई ईश्वर

केवल सदाचार, सदाचार….सदाचार

सबसे अच्छी तरह से,

और भी अच्छी तरह से’

पोईकाइल योहन्नान का जन्म 17 फरवरी 1879 को तत्कालीन त्रावणकोर राज्य तथा आधुनिक केरल के  पथानमथिट्टा जिले के इराबीपेरूर नामक गांव में हुआ था। पिता थे कंडन, मां केचि। माता-पिता ने उन्हें कोमारन नाम दिया था। ‘कोमारन’ कुमारन का अपभ्रंश है। जिस जाति, परायास में उनका जन्म हुआ था, समाज में उसकी हैसियत दास के समान थी। उन्हें शुद्ध संस्कृत नाम रखने की अनुमति न थी। हालांकि सरकार 1855 में कानून बनाकर दास प्रथा के उन्मूलन की घोषणा कर चुकी थी। बावजूद इसके दूर-दराज के क्षेत्रों हालात पहले जैसे ही थे। कुमारन के माता-पिता उसी गांव के जमींदार शंकरमंग्गलम के यहां दास थे। उस जाति के अधिकांश सदस्यों की हैसियत भू-दास के समान थी। जिस जमीन पर वे खेती करते थे, उसी के साथ उनका जीवन बंधा होता था। जमीन की खरीद-फरोख्त में आमतौर पर उससे जुड़े दास के स्वामी भी बदल जाते थे। ऐसा भी होता था कि दासों की खरीद-फरोख्त में उनका पूरा परिवार बिखर जाता था। नया मालिक केवल माता-पिता की कीमत लगाता, ऐसे में बच्चे अनाथ होकर रह जाते थे। कई बार माता-पिता अलग-अलग मालिकों की सेवा में चले जाते; और बच्चे बेसहारा होकर इधर-उधर भटकते रहते थे─

सुनो-सुनो

मेरे प्यारे भाइयो सुनो

हमारे पूर्वजों ने खूब झेला है

गुलामी में जीना

बिना रुके मालिक की मार सहना

कष्ट और अभावों से गुजरना

पिता एक बाजार में बिके

मां दूसरे में

बच्चे हुए अनाथ2

उन दिनों ईसाई मिशनरियां दलितों के बीच अपनी पैठ बनाने में लगी थीं। कुमारन जब पांच वर्ष का था, तभी उसका ‘बपत्सिमा’ कर दिया था। अपनी जाति के दूसरे किशोरों की भांति कुमारन को भी जमींदार के लिए काम करना पड़ता था। अपने मालिक के लिए वह जानवर चराता। हल जोतते समय यथासंभव मदद करता। इसके अलावा वह काम भी करता जो उसका मालिक उसे सौंपता था। दास के रूप में जन्म लेने के बावजूद कुमारन अपने हमउम्र बच्चों से अलग था। उसका मस्तिष्क सक्रिय था। अपनी सामाजिक स्थिति को देखकर उसके दिमाग में अनेक सवाल कौंधते रहते थे। जातीय ऊंच-नीच और छूआछूत के प्रति वह उद्धिग्न रहता था। घर में तरह-तरह के रीति-रिवाज देख वह चकित रह जाता था। 

परायास जाति का एक रिवाज था। बालक के शुद्धिकरण के नाम पर उसके कान में पानी डालना। कुमारन की मां जब उसका शुद्धिकरण करने चलीं तो उसने मां से सहज भाव से पूछा था─‘एक कान में पानी डालते समय, यदि दूसरे कान से गंदगी प्रवेश करेगी, तब तुम उसे कैसे रोकोगी?’3 भोली स्त्री को कोई जवाब न सूझा। वह बस बेटे के मुंह की ओर देखने लगी। कुमारन की व्यवस्था से विद्रोह, परंपराओं को लेकर सवाल खड़े करने की प्रवृत्ति, उम्र के साथ-साथ बढ़ती गई। उसकी जिज्ञासाएं व्यावहारिक होती थीं। उनका समाधान वह अपने रोजमर्रा के जीवन से ही खोजने की कोशिश करता था। निचली जातियों में तंत्र-मंत्र, झाड़-फूंक और काला जादू को लेकर अनेक भ्रांतियां व्याप्त थीं। एक जादूगर कौड़ियों और घंटी की मदद से काला-जादू दिखाया करता था। एक बार कुमारन ने खेल-खेल में उसकी कौड़ियां और घंटी चुरा लीं। जब वह तांत्रिक काला-जादू दिखाने लगा तो उसने इन चीजों को अपने झोले से गायब पाया। इसपर कुमारन ने उसे चुनौती दी, ‘यदि तुम्हारे काले जादू में सचमुच कोई शक्ति है तो उसकी मदद से उन चीजों को ढूंढकर दिखाओ।’ तांत्रिक बगलें झांकने लगा। कुमारन ने अपने दोस्तों को समझाया कि काला जादू जैसी कोई चीज नहीं होती─

‘यदि काला जादू ठीक उसी तरह काम करता, जैसा तांत्रिक का दावा है तो हम शताब्दियों से दास बनकर नहीं रह रहे होते।’4

इससे जहां कुमारन की सूझबूझ का पता चलता है, वहीं अंदाजा लगाया जा सकता है कि अपने दासत्व को लेकर वह बचपन में कितना सजग था। यही सजगता आगे चलकर जातीय शोषण और सामाजिक रूढ़ियों प्रति आक्रोश का रूप लेती गई। उन्हीं दिनों की एक घटना है। एक दिन कुमारन सामंत के खेतों में हल चला रहा था। उसकी जाति के कई और लड़के भी उसके साथ थे। खेत जोतते समय एकाएक नरकंकाल सामने आ गया। बाकी लड़के भी नरकंकाल को देखने के लिए आसपास सिमट आए। सभी के भीतर कंकाल के बारे में जानने की उत्सुकता थी। तब कुमारन ने अपने साथियों से कहा कि वह कंकाल उनके किसी पुरखे का भी हो सकता है, जो भूख-प्यास से व्याकुल काम करते-करते खेत में गिर पड़ा हो या मालिक ने मारकर यहां दफना दिया हो। सुनते ही उसके दोस्त सोच में पड़ गए। उन्होंने नरकंकाल के अवशेषों को संभालकर मिट्टी से उठाया और पूरे सम्मान के साथ पुनः जमीन में दफना दिया।

मालिक के यहां कुमारन को सुपारी के पत्तों पर खाना परोसा जाता था, जो उनके दासत्व को दर्शाता था। पोईकाइल नामकरण के पीछे भी एक कहानी है। कुमारन अपने अनुभव से जो सीखता था, उसे अपने दोस्तों को बता देता था। धीरे-धीरे दोस्तों के बीच उसकी इज्जत बढ़ने लगी। उसने ‘पोइका कूत्तर’(पोइका की सभा) नामक एक संगठन बनाया था, जिसमें वह अपने अनुभव द्वारा सीखी हुई बातें नियमित रूप से साथियों को बताता था। उसी से उसको ‘पोईकाइल’ उपनाम मिला। आगे चलकर वही उसकी मुख्य पहचान बन गया।  

ईसाई मिशनरियां दलितों में अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए कई तरह से प्रयास कर रही थीं। भयंकर जातिवाद के चलते सरकारी स्कूलों में दलित और निम्नतर जातियों को पढ़ाए जाने की सुविधा प्राप्त न थी। मिशनरियां ऐसी ही जातियों में पैठ बनाने की कोशिशा में लगी थीं। उनके लिए स्कूल खोले जा रहे थे। शिक्षा के नाम पर वहां केवल बाईबिल तथा ईसाई धर्म से जुड़े विश्वासों के बारे में सिखाया जाता था। विद्यालयों में प्रवेश के समय ही बच्चों को ईसाई परंपरा के अनुरूप नया नाम दिया जाता था। उसके बाद वे ईसाई समुदाय का हिस्सा मान लिए जाते थे, उसके लिए बपत्सिमा की रस्म, जो ईसाई धर्म का खास संस्कार है─आवश्यक नहीं थी। नए नाम या धार्मिक पहचान से जुड़ने का विद्यार्थी या उसके माता-पिता की सामाजिक हैसियत पर कोई अंतर नहीं पड़ता था, बावजूद इसके स्कूल प्रवेश के समय नया नाम देने की परंपरा बड़े पैमाने पर स्वीकार्य थी। इसका मुख्य कारण यह भी था कि हिंदू धर्म की मान्यताओं के चलते दास समुदाय अपने लिए अच्छे नाम चुन ही सकता था। बाकी स्कूलों के दरवाजे दलित समुदाय के लिए बंद थे। ऐसी स्थिति में मिशनरी स्कूल जो पहचान देते, वही मान ली जाती थी।

उन थेवरक्कुटू कोचकुंजु नाम का दलित अध्यापक बच्चों को ईसाई धर्म के अनुरूप शिक्षा देने के लिए पाठशाला चलाता था। कुमारन को उसी की पाठशाला में भर्ती कराया गया। वहीं रहकर उसने बाईबिल का अध्ययन किया। बाईबिल की कहानियों में पढ़ाया जाता था कि परमात्मा दुखी लोगों की मदद करता है। उनके लिए ईश्वर के दरवाजे सदैव खुले रहते हैं। इसपर वह सोचता कि यदि परमात्मा सचमुच ऐसा ही है तो वह दलितों और दासों के उद्धार के लिए कोई पहल क्यों नहीं करता? किसने उसे रोक रखा है? बाईबिल में किसी दास जाति का वर्णन क्यों नहीं है? यहीं से प्रचलित धर्म को लेकर उसके मन में शंकाएं पैदा होने लगीं। पर यह शुरुआत थी। शिक्षा के दौरान कुमारन ने स्वयं को अच्छा विद्यार्थी सिद्ध किया। बड़ा होने पर कुमारन की धर्म-संबंधी जिज्ञासाएं उसे चर्च की ओर ले गईं।

वे पोईकाइल के पोईकाइल योहन्नान बनने के लिए दिन थे। हालांकि माता-पिता और बस्ती वालों के लिए वह तब भी ‘कोमारन’ ही था। योहन्नान संत थॉमस द्वारा स्थापित मारथोमा चर्च में धर्म की शिक्षा देने लगे। चर्च का हिस्सा बनने के बावजूद योहन्नान के अपने समाज और जाति के प्रति सरोकार पूर्ववत थे। धीरे-धीरे उन्होंने खुलना आरंभ किया। दुनिया भर में बाईबिल को परमात्मा का संदेश खोजने के लिए पढ़ा जाता है। योहन्नान उसमें अपने समाज को खोजने लगे। उन्हें लगा कि बाईबिल के पात्रों की त्रासदी उनके अपने समाज के, त्रावणकोर के दास जीवन की त्रासदी से मेल खाती हैं। 

उन दिनों ईसाई धर्म की ओर आकर्षित होने वाले दो तरह के लोग थे। अंग्रेजों को अपना शासन चलाने के लिए अंग्रेजी के जानकार लोगों की आवश्यकता थी, ऐसे लोगों की आवश्यकता थी जो उनके भरोसेमंद रहकर सौंपी गई जिम्मेदारियों को निभा सकें। इससे आकर्षित होकर आरंभ में उच्च जाति के लोग बड़ी संख्या में ईसाई धर्म की ओर आकर्षित हुए थे। दूसरा वर्ग पुलाया, परायास जैसी दास जातियों का था, जो जातीय उत्पीड़न से तंग आकर या सरकारी स्कूलों में शिक्षा के अवसर न देखकर ईसाई मिशनरियों की शरण में चले जाते थे। वहां उन्हें, उनके चाहे-अनचाहे ईसाई पहचान से जोड़ दिया जाता था। उच्च जाति के ईसाई धर्म में शामिल हुए लोग अपने साथ अपने जातीय संस्कार भी ले जाते थे। इसलिए मूल ईसाई धर्म में जाति-आधारित विभाजन की भले ही कोई अनुमति न हो, परंतु भारतीय ईसाइयों में इस तरह का विभाजन सामान्य बात थी। इसी से योहन्नान के मन में ईसाई धर्म के प्रति शंकाएं उत्पन्न होने लगीं। उन्हें लगा कि ईसाई धर्मांतरित होकर आने वाले दलितों को कभी भी अपेक्षित मान-सम्मान देने वाले नहीं हैं। धर्म की सांगठनिक क्षमता का उपयोग करते हुए उन्होंने निचली जाति के लोगों को जोड़ना आरंभ किया।

लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए योहन्नान ने जो रास्ता अपनाया उसी में उनकी मौलिकता छिपी थी। दूसरे धर्मप्रचारक परमात्मा के साम्राज्य का महिमा-मंडन करते। इस संसार तो पाप और दुराचारों से भरपूर बताते थे। मानव-जीवन को वे अब्बा और ईव के दुराचार की देन मानते थे। योहन्नान का इस कहानी पर विश्वास नहीं था। जीवन चाहे जितना कष्टमय हो, पर है तो वह जीवन ही। जिस बाईबिल में यह कहानी है, वह उनके समाज की नहीं हो सकती। होगी किसी अदृश्य-अनाम समाज की। बाईबिल में जो स्थितियां हैं उनका देशकाल एकदम भिन्न है। उसमें एक भी अध्याय ऐसा नहीं है जो पुलायाओं और परायासों की कहानी कहता हो─

मैंने पढ़े हैं कई सभ्यताओं के इतिहास

खोजा है, देश-प्रदेश के प्रत्येक इतिहास में

कहीं, कुछ भी नहीं मिला मेरी जाति पर

पृथ्वी पर नहीं कोई ऐसा कलमकार

जो लिखे मेरी जाति का इतिहास

जिसे डुबा दिया गया है रसातल में

जो खो चुकी है

इतिहास की अतल गहराइयों में

यह एक प्रकार की राजनीति ही थी? शताब्दियों से लुटी-पिटी जातियों को न्याय दिलाने की राजनीति! या फिर पुराने धर्म को कठघरे में लाकर नया संप्रदाय चलाने की राजनीति! परंतु राजनीति कहां नहीं है? हिंदू धर्म स्वयं बड़ी राजनीति है जो जाति के नाम पर समाज का स्तरीकरण कर देता है। उसे ऊंच-नीच में बांट देता है। व्यवस्था ऐसी है कि जो इसमें सबसे ऊपर है, तमाम कमजोरियों के बावजूद वह वहीं बना रहता है। और जो नीचे है, वह कितना ही अच्छा करने का प्रयत्न करे, ऊपर जाने का उसका स्वप्न भी पाप मान लिया जाता है। यह ऐसी संस्कृति है जिसमें देवराज इंद्र चाहे जितने बलात्कार करें, उनका देवत्व कभी खंडित नहीं होता। अपवित्र और पतित मानी जाती हैं, बलत्कृत होने वाली स्त्रियां।

बाईबिल का स्वप्नलोक(यूटोपिया) यदि योहन्नान का स्वप्नलोक नहीं था तो फिर क्या था? कह सकते हैं कि योहन्नान ने अपना स्वप्नलोक बड़ी शाइस्तगी से गढ़ा था। वही द्रविड़ अस्मिता का यूटोपिया, जिसमें उसने बस थोड़ा-सा संशोधन किया था। ब्राह्मणों को विदेशी मूल का बताकर फुले ने अनार्य बहुजनों को इस देश का मूल निवासी घोषित किया था। मैक्समूलर से लेकर तिलक तक, सबकी यही मान्यता थी। यह दर्शाती थी कि दक्षिण भारत के निवासी ही इस देश के मूल निवासी हैं। ऐतिहासिक सिद्धांत के रूप में पेरियार ने इसी को आधार मानकर ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की रूपरेखा गढ़ी थी। योहन्नान ने इसका सीमित संदर्भों में, अपनी तरह से प्रयोग किया था। उसने पुलाया और परायास जातियों को समझाया कि उनके पूर्वज त्रावणकोर के वैभवशाली बाशिंदे थे। उसकी सुख-समृद्धि उनकी अपनी सुख-समृद्धि थी। आर्य उसे लूटकर खुद त्रावणकोर के वैभवशाली शासक बन बैठे। जो कभी स्वामी थे आज वे गुलामगिरी करने के लिए विवश हैं।

पुराने वैभव को प्राप्त करने के फुले बहुजनों को शिक्षित होने की सलाह देते हैं। पेरियार का तरीका लोकतांत्रिक था। वे चाहते थे कि धर्म और जाति का विनाश हो। लोग उनसे ऊपर उठकर सोचें। जातिवाद के संरक्षक ब्राह्मणवाद भी नाश हो। लोग लोकतांत्रिक तरीके से अपने अधिकारों के लिए संगठित हों। योहन्नान के लिए वही पुराना धर्म का रास्ता था। उद्धार के लिए मसीहा का इंतजार करना। कई बार वे स्वयं को ही मसीही दूत के रूप में पेश कर देते थे। रास्ता भले ही पुराना हो, सपना तो नया था। वह सपना ही लोगों को योहन्नान की ओर खींच रहा था। योहन्नान की धर्म-संबंधी व्याख्याएं चर्च के अधिकारियों को स्वीकार्य न थीं। भीतर ही भीतर उसके विरुद्ध माहौल बनता जा रहा था। लेकिन यह सोचकर कि लोग योहन्नान से प्रभावित हैं, उनकी सभाओं में भीड़ बढ़ती ही जा रही है, सब के सब अनुयायी ईसाई धर्म की निरंतर फूलती-फलती खेती हैं─वे आरंभ में उनके प्रति नर्म बने रहे।

उन्हीं दिनों एक घटना घटी जिससे योहन्नान को सीधे चर्च के विरोध में उतरना पड़ा। एक निम्न जातीय दलित को चर्च की कब्रगाह में दफनाया गया था। अधिकारियों को पता चला तो उन्होंने कब्र खोदकर उसका शव बाहर निकाल दिया। कहा कि उसे उसकी जाति की कब्रगाह में ले जाकर दफनाएं। योहन्नान के लिए यह सूचना हैरान कर देने वाली थी। उन्हें चर्च का व्यवहार पक्षपातपूर्ण लगा। विवाद बढ़ा तो योहन्नान ने सीरयाई चर्च को अलविदा कह दिया। बाद उन्होंने ‘चर्च मिशनरी सोसाइटी’ की सदस्यता ग्रहण कर ली। लोगों तक अपना संदेश पहुंचाने के लिए योहन्नान को खास ठिकाने की आवश्यकता नहीं थी। लोगों के बीच जाकर, जहां भी, जिस रूप में भी अपने विचार रखने का अवसर मिले, उन्हें स्वीकार था। वे चौराहों पर, सड़क किनारे, घरों और झोंपड़ियों के बीच कहीं भी उपयुक्त स्थान देख, लोगों को एकजुट कर, उपदेश देने लगते थे। बाईबिल की बातों को ज्यों का त्यों स्वीकारने के बजाए वे दलित दृष्टिकोण से उनकी व्याख्या करते। उनका मानना था कि बाईबिल ने स्वयं दमितों के साथ छल किया गया है। ये बातें चर्च की चारदीवारी में संभव नहीं थीं, इसलिए वे वहां से हटकर सभाएं करते। लोगों को समझाते कि उनकी सामाजिक हैसियत हमेशा से ऐसी न थी, अपितु त्रावणकोर के प्राचीन वैभव में उनका भी योगदान था। आर्यों ने उनपर हमला करके द्रविड़ों को अपना गुलाम बना लिया। वे लोगों को बताते कि प्राचीन द्रविड़ उदार सभ्यता के निर्माता थे। उनमें ऊंच-नीच की भावना नहीं थी। आर्यों ने न केवल उस सभ्यता को नष्ट किया, अपितु दास-पृथा भी लागू की। जिससे समाज में गुलाम और मालिक का चलन आरंभ हुआ। तभी से द्रविड़ों का जीवन नर्कमय बना हुआ है। योहन्नान के उपदेशों से प्रभावित होकर पुलायार और परायास जैसी दास जातियों के लोग उसके पीछे संगठित होने लगे। एक उपदेशक के रूप में उनका मान-सम्मान बढ़ता ही जा रहा था। योहन्नान ने बड़ी कुशलता से धर्म की ताकत को शताब्दियों से होते आ रहे शोषण से जोड़ा था। 

लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए वे कई कहानियों का सहारा लेते। कुछ मौखिक कहानियां भी दासों के बीच विद्यमान थी। उनमें से एक यह थी कि दास पृथा लागू होने से पहले खेती के लिए बैलों का उपयोग किया जाता था। दास पृथा लागू होने के बाद हल में बैलों के साथ-साथ दास भी जोते जाने लगे। उनकी साप्ताहिक बैठकों में एक किस्सा खूब चलता था, जिसमें एक कमजोर मरणासन्न दास को हल में बैल के साथ जुता हुआ दिखाया जाता। बताया जाता कि 1855 में दास-पृथा उन्मूलन से पहले प्रत्येक दास की पीठ पर सांड का निशान बना होता था, जो उसके दासत्व का प्रतीक था। उनके पुराने अनुयायी मानते थे कि वैसा ही निशान योहन्नान की पीठ पर भी था। साप्ताहिक सभाओं में योहन्नान अकसर यह गीत लोगों को सुनाया करते थे─

जंजीरों में जकड़े, तालों में कैद

रखा जाता था उन्हें बंदियों की तरह

पीठ पर बरसते कोड़े कर उन्हें देते थे अधमरा

जीवन उनका था जानवरों के समान

बैल के साथ हल में जोतकर

जुतवाए जाते थे खेत….

ये गीत दासों को उनके जीवन की त्रासदियों से परचाते थे। इसलिए लोग उन कहानियों पर सहज विश्वास कर लेते थे। योहन्नान उनके लिए न केवल उपदेशक थे, बल्कि मार्गदर्शक भी। अनुयायियों को लगता था कि केवल वही उनका उद्धार कर सकते हैं। 

उच्च जातियों में इसकी प्रतिक्रिया होनी स्वाभाविक थी। सो चर्च सहित तथाकथित उच्च जातियों का बड़ा वर्ग योहन्नान के विरोध में संगठित होने लगा। उसकी सभाओं पर हमले होने लगे। एक बड़ा हमला, 1905 में कडापरा में धर्मांतरित दलित ईसाई कुझीपरंबिल पैथ्रोस के घर पर हुआ। उस दिन योहन्नान ने एक गोपनीय बैठक बुलाई हुई थी। बैठक का विषय था, ‘अनैतिकता की संतान, ईश्वर की संतान तथा एशिया के सात चर्च’। उस बैठक में उनका व्याख्यान व्यंग्यात्मक था। दूसरा हमला जो पहले से भी बड़ा था, ‘ओथारा’ में हुआ। उस बैठक में भारी संख्या में लोग जमा थे। बैठक के लिए पंडाल का इंतजाम किया गया था। उपद्रवियों ने रोशनी के लिए लगाए गए लालटेनों की मदद से पंडाल को आग के हवाले कर दिया। दलितों को वहां से भागना पड़ा। योहन्नान को अपने अनुयायियों के साथ एक पेड़ के नीचे शरण लेने पड़ी। ऐसे ही एक बार जब हमलावर उनपर आक्रमण के उतारू थे, योहन्नान को भागकर नाले में छिपना पड़ा था। कोझुकुचिरा, वेलांदि, वैंकठनम, मंगलम् की सभाओं में भी व्यवधान उत्पन्न किया गया। वेत्तियादु की बैठक में उपद्रवियों के हमले में एक महिला की हत्या कर दी गई। एक बार जब वे प्रवचन कर रहे थे, उच्च जातियों का हमला हुआ। जान बचाने के लिए उन्हें स्त्रियों के बीच छिपना पड़ा।  

योहन्नान उच्च जाति के लोगों के साथ-साथ चर्च की निगाह में खटकने लगे थे। उसपर चर्च छोड़ने का दबाव बढ़ता ही जा रहा था। लोग किसी भी तरह योहन्नान को दंडित करना चाहते थे। दूसरी ओर लगातार हमलों से योहन्नान की प्रतिष्ठा बढ़ती ही जा रही थी। साथ ही बढ़ रहा था, उसका हौसला। एक अवसर ऐसा आया जब योहन्नान और चर्च एकदम आमने सामने थे। उन दिनों वे ‘ब्रेदरान मिशन’ के सदस्य थे। उस संप्रदाय के लोगों का विश्वास था कि यह संसार कपटपूर्ण लोगों का जमाबड़ा है। योहन्नान को वह कपट अपने चारों और नजर आता। उन्हीं दिनों योहन्नान ने बाईबिल को भी अपनी आलोचना के दायरे में शामिल कर लिया। उसके तर्क बहुत सीधे और लोगों के दिमाग में घर कर जाने वाले थे। जैसे कि उसका कहना था कि बाईबिल के धर्मादेश बाहरी लोगों के लिए हैं। नए धर्मादेश(न्यू टेस्टामेंट) के बारे में योहन्नान का कहना था कि उसमें संत पॉल और दूसरे लोगों के धर्म-संदेश उन लोगों, जैसे रोमन और कुरिंथवासियों के लिए हैं, जिन्हें वे संबोधित करना चाहते थे। उनमें त्रावणकोर के पुलायाओं के लिए एक भी धर्म-संदेश शामिल नहीं है। ईसाई धर्म कहता है कि स्वर्ग का राज्य उन लोगों के लिए है, जो शोषित और उत्पीड़ित हैं। यह सच के नाम पर मजाक है। वे लोगों को समझाते कि धरती से परे स्वर्ग कहीं नहीं है। पुलायाओं और परायासों का स्वर्ग कभी त्रावणकोर था। उसका वैभव उनका अपना वैभव था। उसकी समृद्धि उनके अपने जीवन से झलकती थी। कुछ कपटी लोगों के कारण उनका सुख-वैभव उनसे छिन चुका है। केवल बाईबिल के प्रति आस्था उसे नहीं लौटा सकती। उसे दुबारा प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए मृत्यु की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। मृत्यु बाद स्वर्ग का बाईबिल का दावा लोगों के साथ सिवाय छल के कुछ और नहीं है।

ध्यातव्य है कि पेरियार ने भी तमिलनाडु को द्रविड़ों की मूल भूमि घोषित करने के साथ-साथ ब्राह्मणों को बाहरी घोषित किया था। वे नास्तिक थे। किसी धर्म में विश्वास नहीं करते थे। योहन्नान आस्थावादी थे। उन्होंने अपना जीवन चर्च के उपदेशक से आरंभ किया था। लेकिन बाईबिल से उनका विश्वास हट चुका था। इस ईसाई मान्यता पर भी उनका विश्वास नहीं था कि परमात्मा सब देख रहा है। जितने भी दीन-दुखी हैं, अंत में सब उसकी शरण में होंगे। वह न्याय करेगा। योहन्नान ने स्वतंत्र रास्ता चुना था। ईसाई धर्म के प्रति उठते इन्हीं संदेहों के फलस्वरूप योहन्नान ने बहुप्रसिद्ध मेरामोन सम्मेलन का बहिष्कार कर दिया। उसके पहले वे वेकठनम की सभा में बाईबिल की आलोचना कर चुके थे। उनका कहना था कि दासों के लिए वह पुस्तक वृथा है। इसलिए उसे साथ लेकर चलना बेमानी है।

मेरामेन सम्मेलन के विरोध में मुथलपुरा में समानांतर सम्मेलन का आयोजन किया गया। उस समय तक योहन्नान अपने समर्थकों के हृदय में ईसाईधर्म और बाईबिल के प्रति आक्रोश पैदा कर चुके थे। मुथलपुरा सम्मेलन में उसका चरमोत्कर्ष देखने को मिला। उसके अनुयायी अपने हाथों में बाईबिल की प्रतियां लिए हुए थे। उत्साहित लोगों ने बड़ी वेदिका तैयार की। उसमें आग जलाई गई। देखते ही देखते लोग साथ लाई बाईबिल की प्रतियां उसमें फैंकने लगे। जो लोग बाईबिल को आग के हवाले करने से झिझक रहे थे, उन्हें दूसरे लोगों  द्वारा उकसाया गया। एक ही दिन में बाईबिल की हजारों प्रतियां आग के हवाले कर दी गईं।5 यह अप्रत्याशित था। योहन्नान के उस कदम से सारा ईसाई समुदाय सकते में आ गया। आनन-फानन में योहन्नान के कृत्य को धर्म-विरोधी घोषित कर दिया गया। जांच कमीशन बिठाया गया। योहन्नान को मारथोमा चर्च से निष्काषित कर दिया गया।

यह 1905 के आसपास की घटना है। उसके बाद वे ‘चर्च मिशनरी सोसाइटी’ से जुड़े। उसका नजरिया अपेक्षाकृत सुधारवादी था। उसका प्रभावक्षेत्र ऊंची जाति के लोगों में अधिक था। जाति-भेद के प्रति उसका नजरिया भी दूसरों से अलग न था। योहन्नान का बहुत जल्दी उससे भी मोह भंग हो गया। खिन्न होकर उन्होंने ‘चर्च मिशनरी सोसाइटी’ को छोड़ दिया। उसके बाद कुछ समय के लिए ‘ब्रोदरान मिशन’ में शामिल हुए। ये ईसाई धर्म की वे संस्थाएं थीं जो मानव-मात्र के बीच बराबरी का दावा करती थीं। लेकिन एक के बाद एक संस्था का अनुभव प्राप्त करने के बाद योहन्नान समझ चुके थे कि संस्थाओं का मूल चरित्र जो बताया जाता है, उससे बिलकुल अलग है। उनके साथ रहकर दासत्व और जातिभेद का समाधान तो दूर, उनके विरोध में आवाज उठाना भी संभव नहीं है। 1907 के आसपास उन्होंने ‘ब्रोदरान मिशन’ को भी छोड़ दिया और स्वतंत्र होकर काम करने लगे।

प्रत्यक्ष रक्षा दैव सभा

यह मानते हुए कि ईसाई धर्म में कपटी जातिवादी लोगों का जमाबड़ा है, बाईबिल दासों के लिए पूरी तरह अप्रासंगिक  है। वह दमित जातियों की समस्या का समाधान करने में अक्षम है─ योहन्नान ने 1909 में उन्होंने ‘प्रत्यक्ष रक्षा दैव सभा’ की स्थापना की। अब योहन्नान स्वतंत्र ‘उपदेशी’ थे। उनके सामने उनका समाज था, उसके दमन और शोषण की अंतहीन व्यथाएं थीं। अपने व्याख्यानों वे दास जातियों से साफ-सुथरा रहने को कहते। शिक्षा ग्रहण करने की सलाह देते और संगठित होने का आवाह्न करते। ‘प्रत्यक्ष रक्षा दैव सभा’ के मुख्य उद्देश्य थे─

1. ईसाई धर्म और हिंदुत्व दोनों का खंडन करना।

2. यह विश्वास करना कि ईश्वर दमित लोगों के उत्थान के लिए पुनः अवतरित होंगे।

3. समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व भाव में विश्वास रखना

4. सृष्टि रचियता के नाम पर प्रार्थना करना, लेकिन बलिप्रथा का परित्याग

5. चर्च से अलग, अपने मंदिर में प्रार्थना करना

‘प्रत्यक्ष रक्षा दैव सभा’ का एकमात्र स्वप्न था, दासत्व से मुक्ति उसका एकमात्र स्वप्न था। दास जातियों के पुराने वैभव को प्राप्त करना। हालांकि इसके लिए योहन्नान के पास सिवाय प्रार्थना के दूसरा कोई रास्ता न था। प्रत्यक्ष रक्षा दैव सभा का एक गीत6 जिसमें व्यंग्य भी झलकता है, इस प्रकार है─

ईश्वर को किसी ने नहीं सुना

देवदूतों को किसी ने भी देखा नहीं

मुक्ति की चाहत में प्रार्थना करने वाले

उसके सेवक भी दिखाई नहीं पड़ते

मैंने परमात्मा को नहीं देखा

मैंने जीसस को नहीं देखा

कोई देवदूत, कोई आत्मा

भी मेरी निगाह से नहीं गुजरी

…..

उनसे जुड़ी दुखद अनुभूतियों

की चर्चा न कर पाने का मुझे खेद है।

पेरियार की भांति योहन्नान ने भी अपने अनुयायियों को ‘आदि द्रविड़’ कहकर संबोधित किया है। उसका मानना था कि दलित एक समृद्ध परंपरा के अनुगामी थे। लेकिन लंबी दासता के चलते वे अपने ही इतिहास को भुला चुके हैं। और जब तक उनमें दास-भाव है, तब तक वे अपनी समृद्ध परंपरा की ओर नहीं लौट सकते। उसका विश्वास था कि ‘परमात्मा गुलामों की मुक्ति के रूप में उसके रूप में अवतरित हुए हैं।’7 यह कहना एकदम गलत है कि ‘स्वर्ग’ और ‘मोक्ष’ की प्राप्ति केवल मृत्यु के बाद ही संभव है। परमात्मा अपनी मर्जी से समय-समय पर जन्म लेते हैं। इसलिए उनके नाम पर बनी परंपराएं और कर्मकांड वृथा हैं। मुथलपुरा की घटना की जांच के लिए समिति के सदस्यों में के। वी। सिमॉन नाम का सदस्य भी था। जन्म से दलित सिमॉन कवि, लेखक और उपदेशक भी थे। अपनी पुस्तक ‘दि वर्क आफ पोईकाइल योहन्नान एंड पीआरडीएस’ में उसने लिखा है─

‘योहन्नान और उसके साथियों का मुख्य लक्ष्य था, अपने अनुयायियों को जाति-आधारित भेदभाव से मुक्ति दिलाना….बाईबिल उस समय या उसकी पीढ़ी(जाति) के लिए उपयोगी नहीं थी। इस दुनिया में चर्च को धर्मदूतों(जीसस के प्रथम 12 अनुयायी) के साथ ही समाप्त हो जाना चाहिए था। तब से आज तक हजारों वर्ष के अंतराल में एक भी व्यक्ति की रक्षा नहीं हो सकी है….कोई दुबारा आने वाला नहीं है, कोई हजार वर्ष लंबा शासन नहीं है। इन(बाईबिल के) उपदेशों के फलस्वरूप जिन्होंने स्वयं को औपचारिक रूप से ‘सुरक्षित’ मान लिया था, वे एक बार फिर योहन्नान के हाथों में सुरक्षित हुए(उनमें से अधिकांश निचली जाति के लोग थे)। इन ‘सुरक्षित’ अनुयायियों को योहन्नान के उपदेशों और विचारों से परे किसी चीज की आवश्यकता नहीं थी। इसलिए उन्होंने बाईबिल को आग के हवाले कर दिया। उनके लिए योहन्नान के शब्द किसी भी धर्मादेश या कानून से बढ़कर थे।’7  

यह ठीक है कि योहन्नान दलितों को कोई स्पष्ट पहचान देने में असमर्थ रहे। उनका प्रभाव क्षेत्र भी सीमित था। फिर भी वे अकेले संत थे, जो ईसाई धर्म को मंदिरों और चर्च की दीवारों से बाहर निकालकर लोगों के बीच ले आए थे। उनके लिए मुक्ति का अभिप्राय मोक्ष नहीं था, बल्कि उस दासत्व से मुक्ति थी, जिसे उनके लोगों पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुलामी के रूप में भोगते आए थे। ऐसे लोग पचास-सौ या हजार नहीं, लाखों में हैं। योहन्नान के समकालीन कवि और समाज सुधारक सहोदरान अय्यपन ने अपनी कविता में इस ओर इशारा करते हुए कहा है─

अपने पसीने और जीवन-रक्त के साथ

इस वसुंधरा के धन-भंडार भरने वाले बहुजनो

श्रमजनो….याद रखो

जीर्ण-शीर्ण झोपड़ियों में,

भोजन और वस्त्रों के लिए तिल-तिल करतीं संघर्ष

गरीब, अभावग्रस्त─कच्चे नर्म फर्श पर बच्चे जनती स्त्रियां                                                                                                                                                                                                               

एक-दो नहीं लाखों में हैं

योहन्नान के योगदान को देखते हुए उन्हें त्रावणकोर की पहली विधायिका ‘श्री मूलम पोपुलर असेंबली’ का सदस्य चुना गया था। वे 1921 और 1931 में दो बार उस पद पर रहे। वे कदाचित अकेले सदस्य थे जिन्हें कई जातियों के प्रतिनिधि के रूप में चुना गया था। उस पद पर रहते हुए योहन्नान ने दास कही जाने वाली जातियों के लड़कों को शिक्षा में अतिरिक्त मदद देने का प्रस्ताव पेश किया था, ताकि वे दूसरी जाति के बच्चों के साथ स्पर्धा कर सकें। इसके अलावा उन्होंने सरकार निचली जाति की गरीबी दूर करने के लिए उनके बीच छोटे उद्यमों को बढ़ावा देने की मांग भी की थी , जिससे वे आत्मनिर्भर होकर आगे बढ़ सकें। अपने अनुयायियों के बीच वे पोईकाइल अप्पचन, कुमार देवा के नाम से भी जाने जाते हैं.

ओमप्रकाश कश्यप

1-      PRDS and Dalit Renaissance: An essay set by The Association of Kerala History Publication Committee, translated by P. M. Abraham, February 1996, Page 15.

1.      PRDS and Dalit Renaissance: An essay set by The Association of Kerala History Publication Committee, translated by P. M. Abraham, February 1996, Page 15.

2.           Songs of Poykayil Appachan 1905 to 1939, Edited by V V Swamy and E V Anil, Institute of PRDS Studies, Kottayam

3.            An Anti-Slavery Spiritual Revolution in Kerala — Prathyaksha Raksha Daiva Sabha, article written by Tharun T. Tharun

4.           As above

5.            PRDS and Dalit Renaissance: An essay set by The Association of Kerala History Publication Committee, translated by P. M. Abraham, February 1996, Page 12.

6.      Above, page 14-15.

7।       As above page 13

1-      PRDS and Dalit Renaissance: An essay set by The Association of Kerala History Publication Committee, translated       by P। M। Abraham, February 1996, Page 15।

2।            Songs of Poykayil Appachan 1905 to 1939, Edited by V V Swamy and E V Anil, Institute of PRDS Studies,        Kottayam।

3।            An Anti-Slavery Spiritual Revolution in Kerala — Prathyaksha Raksha Daiva Sabha, article written by Tharun T।             Tharun

4।            As above।

5।            PRDS and Dalit Renaissance: An essay set by The Association of Kerala History Publication Committee, translated       by P। M। Abraham, February 1996, Page 12।

6।       Above, page 14-15।

7।       As above page 13

महामना अय्यंकालि : सामाजिक क्रांति के अग्रदूत

सामान्य

मैंने पढ़े हैं कई सभ्यताओं के इतिहास

खोजा है, देश-प्रदेश के प्रत्येक इतिहास में

कहीं, कुछ भी नहीं मिला मेरी जाति पर

पृथ्वी पर नहीं कोई ऐसा कलमकार

जो लिखे मेरी जाति का इतिहास

जिसे डुबा दिया गया है रसातल में

जो खो चुकी है

इतिहास की अतल गहराइयों में

            पोईकायल योहान्न, मलयाली कवि

इतिहास सभ्यता का ऐसा दर्पण है, जो सिर्फ सतह से ऊपर देखता है। इसलिए उसमें राजा-महाराजों के ऐश्वर्य राग, लड़ाइयां, स्वामीभक्ति और बुजदिली के किस्से, रणनीति और राजनीति, षड्यंत्र और विश्वासघात—यही सब दिखाई पड़ते हैं। इतिहास उन स्वेद-बिंदुओं की गिनती याद नहीं रखता जो खेती करने वाले किसान, मजदूर इसलिए बहाते हैं, ताकि राजा-महाराजाओं के अन्न-भंडार भरे रहें। उनके मंत्रियों, सिपहसालारों के चेहरे दिपदिपाते रहें। वह देवताओं और पैगंबरों के किस्सों को सहेजता है। जाति, धर्म और सांप्रदायिकता के नाम पर हुए दमन के उन किस्सों को भूल जाता है, जो जमीन के लोगों के हिस्से आते हैं। इसलिए ऐरिक हॉब्सबाम ने सलाह दी थी कि इतिहास को केवल उन सवालों के माध्यम से याद करना चाहिए जो हम उसे लेकर उठा सकते हैं—‘उस रूप में, जिसपर हम इतिहासकारों का भरोसा हो। इतिहास का ऐसा वस्तुनिष्ट सत्य, जिसे सवालों के जरिये जांचा-परखा जा सके। ठीक उस तरह जैसे हम उसे परखना चाहते हैं।’

भारतीय इतिहास दृष्टि चीजों को शिखर से परखती है। शिखर के लोग ही उसमें शामिल होते आए हैं। जनसाधारण क्या सोचता है? अपने समय और इतिहास को लेकर उनकी अपनी दृष्टि क्या है? राजा-महाराजा, जमींदारों और सामंतों से परे जनता का सच भी हो सकता है? इस हकीकत को जानने की कभी कोशिश ही नहीं की गई। भारत में इतिहास के नाम पर पुराण रचे गए। उन्हें स्वयं-सिद्ध बताया जाता है। सवाल उठाने वालों को संस्कृति विरोधी मान लिया जाता है। इन दिनों तो उन्हें सीधे राष्ट्रद्रोही घोषित करने का चलन है। यही भारतीय और पाश्चात्य इतिहास-दृष्टि का अंतर है। इतिहास का संबंध यदि मनुष्य से है तो उसमें पूरा मानव-समाज प्रतिबिंबित होना चाहिए। उसे राजा-महाराजों के वैभव-विलास, राजनीतिक उठा-पटक और रनिवासों के षड्यंत्रों तक सीमित कर देना इतिहास की आड़ में चारण-कर्म है।

आजादी के बाद इसमें कुछ बदलाव आया। कुछ जमीनी लेखक शामिल हुए हैं। दामोदर धर्मानंद कोसंबी, देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय ने इस दिशा में गंभीर प्रयास किए हैं। फुले, आंबेडकर और पेरियार में से कोई भी घोषित रूप से इतिहासकार नहीं था। परंतु उन सभी के पास इतिहास को परखने की दृष्टि थी। वे भारतीय इतिहास और उसकी लेखन-पद्धति पर सवाल उठाते हैं। सांस्कृतिक अंतर्विरोधों की ओर संकेत करते हैं। आधुनिक मूल्यों के संदर्भ में उसे परखना चाहते हैं। यह परंपरावादी इतिहास लेखकों स्वीकार्य नहीं है। उनमें प्रगतिशील होने का दावा करने वाले साम्यवादी लेखक भी शामिल हैं, जिन्हें भारतीय समाज में जातीय विभाजन के आधार पर बनी द्वंद्वात्मक स्थितियां स्वीकार नहीं हैं। इसीलिए दलित और बहुजन लेखकों, जो छूआछूत, जातिगत भेदभाव की कसौटी पर भारतीय इतिहास और संस्कृति की विवेचना करते हैं, राजनीतिक स्वतंत्र के बजाय सामाजिक स्वतंत्रता पर जोर देते हैं—की लगातार उपेक्षा की जाती है। गाल-बजाऊ किस्म के लोग तो उन्हें राष्ट्र-विरोधी तक कह जाते हैं।

कुछ कथित विद्वान जो समानता और स्वतंत्रता का राग रात-दिन अलापते हैं, उन लोगों के योगदान को जिनका भारत को आधुनिक राष्ट्र-समाज बनाने में सर्वाधिक योगदान है—महज इसलिए बिसरा देते हैं, क्योंकि वे उनकी जाति या समाज के नहीं थे। उलटे उनसे टकराकर अपने लक्ष्य तक पहुंचे थे। ऐसे ही लोग फुले और आंबेडकर के योगदान की उपेक्षा करते हैं। पेरियार के नाम पर नाक-मुंह सिकोड़ते हैं। केरल के नवजागरण के अग्रदूत अय्यंकालि को तो लगभग भूल ही चुके हैं। जातीय दुराग्रहों के चलते, ‘केरल: मलयाली भाषियों की मातृभूमि’ जैसी पुस्तक लिखने वाले साम्यवादी ईएमएस नंबूदरीपाद ने न तो दलित महिलाओं पर लगने वाले ‘मुल्लकरम’(स्तन ढकने पर टैक्स) के बारे में कुछ लिखा न है, न वहां की दासप्रथा पर। न उन्हें केरलीय समाज के नवोत्थान में महात्मा अय्यंकालि का योगदान नजर आता है।  

प्रसंगवश बता दें कि केरल, जो पहले त्रावणकोर राज्य का हिस्सा था, में दलित महिलाओं को वक्ष ढकने का अधिकार नहीं था। दलितों की हैसियत दास के बराबर थी। कुछ अर्थों में पेशवाशाही के दलितों से भी बुरी। दलित स्त्रियों को गले में ग्रेनाइट पत्थर का हार पहनना पड़ता था। कांच और काले पत्थर के मनकों से बने कंठहार उन महिलाओं के गले में सांप जैसे दिखते थे। ये सब उनके दासत्व की निशानियां थीं। स्त्रियों में उस प्रथा के विरुद्ध आक्रोश था। त्रावणकोर के राजा द्वारा लगाए गए कर की वसूली हेतु अधिकारी जब एक गांव में पहुंचा तो वहां नंगेली नाम की स्त्री ने वक्ष-कर का भुगतान करने से इन्कार कर दिया। अधिकारी द्वारा जोर-जबरदस्ती करने से क्षुब्ध उस स्त्री ने गुस्से में आकर अपने दोनों स्तन काट, उन्हें केले के पत्ते पर रखकर, अधिकारी को सौंप दिए। अत्यधिक खून बहने से नंगेली की उसी दिन मृत्यु हो गई थी। नंगेली के बलिदान से केरल में जबरदस्त आक्रोश पैदा हुआ, जिसे मलयाली भाषा में ‘सन्नार लहाला’-उभोवस्त्र अधिकार विद्रोह(Channar Lahala—Upper Cloth Mutiny) कहा जाता है। नंगेली के सम्मान में उसके गांव को ‘मुलाचिपारांबु’ जिसका अर्थ ‘स्तन वाली महिला’ है—कहा जाता है। महिलाओं के वक्ष ढकने के अधिकार को लेकर एक कामयाब लड़ाई अय्यंकालि ने भी लड़ी थी। वह अय्यंकालि द्वारा आधुनिक केरल के नवनिर्माण, महिलाओं और दलितों के अधिकारों के लिए लड़ी गई कई लड़ाइयों में से एक थी। भारत को आधुनिक राष्ट्र-राज्य बनाने, दलितों और पिछड़ों में स्वाभिमान चेतना जगाने में महात्मा अय्यंकालि की भूमिका ठीक वैसी ही है, जैसी ज्योतिराव फुले, डॉ. भीमराव आंबेडकर, नारायण गुरु और ई. वी. रामासामी पेरियार की।

अय्यंकालि का जन्म तिरुवनंतपुरम् जनपद से 13 किलोमीटर दूर उत्तर में स्थित, छोटे से गांव वेंगनूर में 28 अगस्त 1863 को हुआ था। पिता अय्यन और मां माला की आठ संतानों में अय्यंकालि सबसे बड़े थे। माता-पिता ने उनका नाम ‘काली’ रखा था, जो पिता के नाम के साथ जुड़कर अय्यंकालि बन गया। उनकी जाति पुलायार(पुलाया) थी। वेंगनूर आगमन से पहले उनका परिवार पलावर थारावाड़ का रहने वाला था। अपने पैत्रिक गांव के नाम को अय्यन अपने नाम के साथ जोड़कर सम्मान से सहेजे हुए थे। वह उनकी पहचान का हिस्सा था। दक्षिण भारत में पुलायार अछूत जातियों में, सबसे नीचे की मानी जाती है। बीसवीं शताब्दी के आरंभ में उनकी हैसियत भू-दास के समान थी। जमींदार लोग, मुख्यतः नैय्यर अपनी मर्जी से किसी भी पुलायार को काम में झोंक देते थे। सुबह से शाम तक काम करने के बाद उन्हें मिलता था, बामुश्किल  600 ग्राम चावल। कभी-कभी वह भी बेकार….दूसरे दर्जे का।

अय्यन बहुत मेहनती थे। उन्हें एक जमींदार ने जंगल को साफ कर जमीन खेती योग्य बनाने का काम सौंपा हुआ था। जमींदार अपेक्षाकृत उदार था। अय्यन के काम से प्रसन्न होकर उसने उन्हें पांच एकड़ जमीन भेंट कर दी थी। पुलायार जाति के लिए यह बड़ी बात थी। अपने परिवार के साथ अय्यन उसी जमीन में खेती करते थे। इस तरह अय्यंकालि के परिवार की आर्थिक स्थिति उनके ‘जाति-बंधुओं’ की अपेक्षा बेहतर थी। बाकी पुलयारों की हैसियत उस समय भूदासों के समान थी। उन्हें बिना किसी मजदूरी के दूसरों के खेतों में काम करना पड़ता था। इस प्रथा को वहां ‘ऊझीयम वाला’(Oozhiyam vala—Labour Without Pay) कहा जाता था। पुलायारों की संख्या त्रावणकोर में अन्य अछूत जातियों की अपेक्षा कम ही थी। अकेले वे कोई संगठनकारी ताकत नहीं बनते थे। उनकी दयनीय अवस्था और शोषण के पीछे यह भी एक कारण था।  

तत्कालीन समाज जातिवाद और छूआछूत पर टिप्पणी करते हुए चार्ल्स एलेन ने एक ईसाई मिशनरी की पत्नी द्वारा 1860 में अपनी एक मित्र को लिखे गए पत्र का हवाला दिया है। त्रावणकोर में व्याप्त छूआछूत को समझने के लिए यह टिप्पणी बहुत प्रामाणिक है। नियम के अनुसार—

‘नैय्यर नंबूदरी ब्राह्मण1 से मिल सकता था, परंतु उसे छू नहीं सकता था। चोवन(इझवा) जाति के व्यक्ति के लिए नियम था कि वह नंबूरी ब्राह्मण से मिलते समय 36 कदम की दूरी बनाकर  रखेगा। पुलायार जिसकी स्थिति दास जैसी है, को नंबूदरी से 96 कदम दूर खड़े होकर बात करनी पड़ती थी। नैय्यर से मिलते समय चोवाल को बारह कदम दूर खड़े रहने का प्रावधान था। वहीं पुलायार को नैय्यर से 66 कदम की दूरी रखनी पड़ती थी। इसी तरह संत थामस चर्च में विश्वास रखने वाला ईसाई, नैय्यर को छू सकता था, लेकिन नैय्यर के साथ भोजन करने की अनुमति उसे नहीं थी।’2 

जातीय शुचिता के नाम पर अमानवीय व्यवहार का कुछ ऐसा ही उल्लेख कैथरीन मेयो ने ‘मदर इंडिया’ में भी किया है। इससे तत्कालीन केरल में जाति-भेद और छूआछूत की त्रासद स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है।

पुलयार जाति के बच्चों को स्कूल जाकर पढ़ने-लिखने की अनुमति नहीं थी। वे केवल मेहनत-मजदूरी कर सकते थे। अछूत होने के कारण अय्यंकालि को केवल अपनी जाति के बच्चों के साथ खेलने का अधिकार था। फिर भी अय्यंकालि का बचपन स्वजातीय बच्चों से अलग था। वे अपेक्षाकृत मुक्त पारिवारिक वातावरण में पले-बढ़े थे। पिता को कहीं बेगार करने नहीं जाना पड़ता था। इस कारण उनके दोस्तों में कुछ तथाकथित ऊंची जाति के भी थे। बचपन ठीक-ठाक बीत रहा था कि एक दिन अचानक जाति-व्यवस्था का क्रूरतम चेहरा उनके सामने आ गया। उस दिन अय्यंकालि बच्चों के साथ फुटबाल खेल रह थे। उन्होंने फुटबाल को ठोकर मारी, वह उछलती हुई दूर एक आंगन में जा गिरी। वह नैय्यर का घर था। गृहस्वामी गैंद को देखकर आग-बबूला हो गया। उसने अय्यंकालि को ऊंची जाति के बच्चों के साथ न खेलने की हिदायत दी। अपमान से आहत अय्यंकालि ने भविष्य में किसी सवर्ण से दोस्ती न करने की ठान ली। यह संकल्प आगे चलकर उनके और पुलायार समाज के लिए वरदान सिद्ध हुआ। उसके बाद अय्यंकालि ने अपनी जाति के लड़कों को जोड़ना शुरू किया। उन्हें एकजुट कर उनकी एक टीम तैयार की। इस तरह बचपन से ही नायकत्व की भावना उसके भीतर उभरती चली गई।

बचपन में ही एक और घटना घटी। झगड़े के दौरान अय्यंकालि ने ऊंची जाति के लड़के की पिटाई कर दी। वह पहला अवसर था जब एक पुलायार, जिसकी सामाजिक हैसियत गुलामों जैसी थी, ने ऊंची जाति के लड़के को पीटा था। माता-पिता घबरा गए। उन्हें डर था कि उच्च जाति के लोग अवश्य ही बदला लेंगे। ऐसा होना भी था, लेकिन तभी कुछ लोग आकर बीच-बचाव करने लगे। उससे बेपरवाह बालक अय्यंकालि यह कहते हुए बाहर निकल आया कि वे उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। घर पहुंचा तो माता-पिता ने उसकी जमकर पिटाई की। ‘दिकुओं’3 से फिर कभी न उलझने का निर्देश दिया। माता-पिता का गुस्सा भी अय्यंकालि के संकल्प को डिगा न सका। वे अपनी जाति की दुर्दशा को लेकर सवाल उठाने लगे। इसी के आगे चलकर मुक्ति का विचार उसके दिमाग में जन्मा।

किशोरावस्था में गाने-बजाने का शौक पैदा हुआ। लोकगीतों में रुचि बढ़ी। उसी से रचनात्मकता ने जन्म लिया। किशोरावस्था पार करते-करते देह निखरने लगी थी। लोग अय्यंकालि के शरीर-सौष्ठव की प्रशंसा करने लगे। शरीर के साथ-साथ दिमाग भी हृष्ट-पुष्ट था। मुक्त परिवेश और अच्छी देहयष्टि। दोनों बातें अय्यंकालि का आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए काफी थीं। लेकिन जिस जाति में उनका जन्म हुआ था, उसमें वे दुर्गुण समान थी। अछूतों के लिए ड्रेस कोड निर्धारित था। वे साफ कपड़े नहीं पहन सकते थे। सार्वजनिक मार्गों पर टहलना निषिद्ध था। ऊंची आवाज में बोलने को उदंडता माना जाता था। इस सबकी परवाह न करते हुए अय्यंकालि साफ कपड़े पहनता। दोस्तों के साथ निरुद्धिग्न टहलता। इस तरह वह मनुस्मृति के उस विधान का उल्लंघन करता था, जो शताब्दियों से शूद्रों और दासों पर शासन का कारण रहा था।

उम्र के साथ रचनात्मकता में भी निखार आ रहा था। अय्यंकालि लोकगीत गाने यहां तक कि रचने भी लगा था। अपने छोटे भाइयों गोपालन, चेतन तथा अपनी जाति के दूसरे किशोरों के साथ वह अपने रचे लोकगीत गाता, नाटक खेलता और उन्हें मनभाता आकार देता था। उसके मित्र उसे सम्मान के साथ उरपिल्लई(प्रिय) या मूथपिल्लई(ज्येष्ठ) कहते थे। अय्यंकालि के गीतों और नाटकों में सामाजिक व्यवस्था के प्रति आक्रोश समाया होता था। स्वाधीनता का आवाह्न किया जाता था। अय्यंकालि की भाषा तमिल मिश्रित मलयाली थी। इससे उसके गीतों और नाटकों का असर त्रावणकोर से आगे बढ़कर मालाबार ओर कोची तक फैलने लगा। गीतों और नाटकों के जरिये वह मुक्ति संदेश को फैलाता। जातीय आधार पर हो रहे शोषण से परचाता। अय्यंकालि के माता-पिता के मन में बेटे को लेकर चिंता सदैव बनी रहती थी। लेकिन जन्मजात विद्रोही अय्यंकालि को इसकी चिंता न थी। संगठन है तो कुछ अनुशासन, ताकत का उचित सदुपयोग करने का हुनर भी होना चाहिए। सो अय्यंकालि ने अपने दल के सदस्यों को मार्शल आर्ट की शिक्षा देने के लिए एक प्रशिक्षक रख लिया, जो बहुत दूर से चलकर आता था। अय्यंकालि की गतिविधियां दिकुओं को खटकती थीं। मगर उन्हें इसकी कतई परवाह नहीं थी।

उन दिनों दलितों को गांव में खुला घूमने और मुख्य मार्गों पर निकलने की आजादी नहीं थी। न ही वे साफ, धुला हुआ कपड़ा पहन सकते थे। अय्यंकालि को बनी-बनाई लीक पर चलने की आदत न थी। 25 वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते उन्होंने अपने ही जैसे युवाओं का मजबूत संगठन तैयार कर लिया था। उनके साथी  संकेत-मात्र से मरने-मारने को तैयार हो जाते थे। सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करते समय अय्यंकालि के सामने सबसे पहली चुनौती थी, पुलायारों को सार्वजनिक सड़कों पर चलने का अधिकार दिलाना। 1889 में ऐसी ही एक घटना घटी। कुछ दलित युवा सार्वजनिक रास्तों पर चलने के अधिकार को लेकर आंदोलनरत थे। उसी समय उनपर दिकुओं(सवर्णों) ने उनपर हमला कर दिया। दोनों पक्षों के बीच जमकर संघर्ष हुआ। सड़क खून से लाल हो गई। इसी तरह की घटनाएं मनाक्कदु, काझाकुट्टम, कनियापुरम् जैसे क्षेत्रों में देखने को आईं। सवर्ण आतंक पर उतर आए थे।

बैलगाड़ी से क्रांति

निडर, निर्भीक अय्यंकालि ने अंततः सीधे टकराने का फैसला कर लिया। 1893 की घटना है। अय्यंकालि ने दो हृष्ट-पुष्ट बैल खरीदे, एक गाड़ी। साथ में पीतल की दो बड़ी-बड़ी घंटियां। खुद को उन्होंने अपनी पारंपरिक पोशाक में सजाया हुआ था, जिससे उनकी धज अलग ही नजर आ रही थी। घंटियों को बैलों के गले में बांध, बैलगाड़ी पर सवार हो, अय्यंकालि ने बैलों को हांक लगाई। इशारा मिलते ही बैल गांव की सड़कों पर चल पड़े। मानो कोई योद्धा अपने विजय-अभियान पर अग्रसर हो। उन दिनों पुलायार के लिए बैलगाड़ी पर बैठना तो दूर, उसे खरीदना या पास रखना भी अपराध माना जाता था। अय्यंकालि का गाड़ी पर सवार होकर निकलना शताब्दियों पुरानी व्यवस्था को चुनौती थी। खुला ऐलान। बैलों के गलों में पड़ी घंटियां जोर-जोर से बज रही थीं। आवाज सुनकर दिकुओं में खलबली मच गई। दूसरी ओर अछूतों के दिल अनहोनी की आशंका से दहलने लगे। अय्यंकालि अपनी बैलगाड़ी से गुजर ही रहे थे, सहसा कुछ सवर्णों ने आकर उनका मार्ग रोक लिया। वे अय्यंकालि को ‘सबक’ सिखाना चाहते थे—

‘यह सब क्या है? तुम्हें चादर ओढ़ने की इजाजत किसने दी।’ अय्यंकालि को ऐसे विरोध की आशंका थी। वे उसके लिए तैयार थे। तभी कुछ सवर्ण आगे बैलगाड़ी की ओर बढ़े। एक पल की भी देर किए बिना अय्यंकालि थोड़ा झुके। इससे पहले कि उपद्रवी कुछ समझ पाएं, अय्यंकालि के हाथों में दरांत आ चुकी थी। उनका चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था। रास्ता रोके खड़े दिकुओं पर दरांत तान, धमकी-भरे अंदाज में अय्यंकालि ने कहा—

‘अगर किसी ने भी मेरा रास्ता रोकने की कोशिश की तो उसे मेरा यह हथियार मजा चखाएगा।’ एक पुलायार से जिसकी सामाजिक हैसियत दास के समान थी, जो गर्दन झुकाकर चुपचाप हुक्म बजाते आए थे, ऐसे विरोध की आशंका किसी को न थी। वे सहमकर पीछे हट गए। उसके बाद तो अय्यंकालि की बैलगाड़ी प्रतिदिन गांव की सड़कों से गुजरने लगी। इस घटना ने न केवल दिकुओं पर असर डाला, अपितु दलितों के बीच भी खलबली मच गई। हर कोई उसकी चर्चा अपनी-अपनी तरह से कर रहा था। उसके बाद अय्यंकालि का यश चारों ओर फैलने लगा। यह डॉ. आंबेडकर के सार्वजनिक राजनीति में प्रवेश से करीब 25 वर्ष पहले की घटना थी। जिसने अय्यंकालि को दमन के शिकार वर्गों का स्वाभाविक नेता बना दिया। 25 वर्ष की अवस्था में अय्यंकालि का विवाह कर दिया गया। उनकी पत्नी का नाम चेल्लमा था। आगे चलकर उस दंपति के यहां सात संतानों ने जन्म लिया।

लेकिन सफलता अभी अधूरी थी। अय्यंकालि अपेक्षाकृत संपन्न माता-पिता की संतान थे। उनमें इतना साहस था कि बैलगाड़ी पर घूम सकें। लेकिन उन्हीं की जाति के बाकी लोगों में सार्वजनिक मार्गों पर चलने की न तो हिम्मत थी, न दिकु उन्हें अनुमति देने को तैयार थे। अय्यंकालि का अगला लक्ष्य था, दमन के कारण विश्वास खो बैठे दलितों में आत्मविश्वास पैदा करना। इसके लिए अय्यंकालि ने अपने संगठन को तैयार किया। उनका अगला कदम था, तिरुवनंतपुरम् में दलित बस्ती से पुत्तन बाजार तक ‘आजादी के लिए जुलूस’ निकालना। यह आसान काम नहीं था। विरोधी घात लगाए बैठे थे। जैसे ही उनका काफिला सड़क पर पहुंचा, दिकुओं ने उसपर हमला कर दिया। अय्यंकालि के नेतृत्व में सैकड़ों दलित युवक निडर होकर विरोधियों से जूझ पड़े। सैकड़ों युवाओं को चोट आई। चेलियार में हुए उस संघर्ष से प्रेरित होकर दूसरे कस्बों और गांवों के दलित युवक भी सड़कों पर चलने की आजादी को लेकर निकल पड़े। मनक्कदु, काझाकोट्टम, कनियापुरम् सहित आसपास के इलाकों में जुलूस निकाले गए। सड़कें खून से लाल होने लगीं। दिकुओं का विरोध जितना बढ़ रहा था, उतना ही दलित युवा अपने अधिकारों को लेकर जाग्रत हो रहे थे। अय्यंकालि का प्रभाव और दलितों का विद्रोह बढ़ता ही जा रहा था। दूसरी दलित जातियां भी पुलायारों के साथ एकजुट होकर अधिकारों की मांग करने लगी थीं। संघर्ष गृहयुद्ध में बदलने लगा था।

पुलायार विद्रोह: शिक्षा क्रांति

उस संघर्ष से दलितों को दूसरे अधिकारों के लिए आवाज उठाने की प्रेरणा मिली। अय्यंकालि स्वयं अशिक्षित थे, लेकिन वे नहीं चाहते थे कि उनकी आने वाली पीढ़ियां भी शिक्षा से वंचित रहें। सरकार सभी के समान शिक्षा के दरवाजे वर्षों पहले खोल चुकी थी। मगर स्कूल प्रबंधन पर दिकुओं का अधिकार था। वे पुलायार और दूसरे दलित बच्चों के स्कूल प्रवेश से आनाकानी करते थे। 1904 में अय्यंकालि ने दलितों की शिक्षा के लिए आंदोलन आरंभ कर दिया। पुलायार और दूसरे अछूतों की शिक्षा के लिए उन्होंने उसी वर्ष वेंगनूर में पहला स्कूल खोला। वह केरल का पहला स्कूल था, जिसे केवल दलितों के अध्ययन के लिए खोला गया था। दलितों के लिए वह आशा की किरण जैसा था। परंतु सवर्णों से वह बर्दाश्त न हुआ। उन्होंने स्कूल पर हमला कर, उसे तहस-नहस कर दिया। अय्यंकालि के लिए वह बड़ा धक्का था। लेकिन निरंतर संघर्ष ने उनकी जिजीविषा को बढ़ा दिया था।

संघर्ष को सांस्थानिक रूप देने के लिए अय्यंकालि ने ‘साधु जन परिपालन संघम’ नामक संस्था का गठन किया। उसका उद्देश्य था, पुलायार तथा दूसरे दलितों को शिक्षा के लिए प्रेरित करना। औपनिवेशिक सरकार भी दलितों में शिक्षा के प्रसार के लिए प्रयासरत थी। उस समय मिशेल त्रावणकोर शिक्षा विभाग के निदेशक थे। दलितों के लिए शिक्षा को लेकर अय्यंकालि ने अपनी संस्था के माध्यम से कई पत्र त्रावणकोर के दीवान और शिक्षा निदेशक को लिखे। औपनिवेशिक सरकार की नीति के चलते दीवान ने दलितों की शिक्षा के लिए 1907 में आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए थे। लेकिन आदेशपत्र जारी होने को जानबूझकर रोका गया था। अय्यंकालि द्वारा लगातार लिखने पर मिशेल को उसकी जानकारी मिली। उन्होंने दीवान को उस आदेश पर तत्काल अमल करने का आग्रह किया। अंततः 1910 में आदेशपत्र जारी हुआ, परंतु स्कूल प्रबंधकों में जिनमें जमींदार सम्मिलित थे, उस आदेश पर अमल करने से इन्कार कर दिया।

इसपर अय्यंकालि 1 मार्च 1910 को पूजारी अय्यन की पांच वर्ष की बेटी पंचमी तथा अपने साथियों को लेकर उरूट अंबालम स्कूल, बलरामपुरम् में पहुंचे। वहां अय्यंकालि समर्थकों तथा दिकुओं जिनमें नैय्यरों की संख्या सबसे ज्यादा थी, के बीच जमकर संघर्ष हुआ। गुस्साए नैय्यरों ने पुलायारों की बस्ती पर हमला कर दिया। उनके घर तहस-नहस कर डाले। उपद्रवी नैय्यर पुलायारों की बकरियों, जानवरों तथा गाड़ियों को लूटकर ले गए। औरतों और आदमियों को बुरी तरह से पीटा गया। जिसने भी सामना करने की कोशिश की, उसे बुरी तरह से दबा दिया गया। झोपड़ियों में आग लगा दी गई। सात दिनों तक पुलायारों की बस्ती से धूल और धुआं उड़ता रहा। चीख-पुकार की आवाजें आती रहीं। उरूट अंबालम स्कूल, बलरामपुरम् से उभरी चिंगारी हालांकि कुछ दिनों बाद शांत हो गई। लेकिन आसपास के इलाकों में उससे जो ज्वाला भड़की उसने 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की याद दिला दी। उसने मार्यामुट्टम, वेंगनूर, पेरमबाझुथूर, कुनथकाल जैसे इलाकों को भी अपनी चपेट में ले लिया। केरल के मुख्य धारा के इतिहासकार उस घटना को ‘पुलायार-विद्रोह’ के नाम से पुकारते हैं। उस विद्रोह में दलितों को जन और दोनों की भारी हानि हुई थी। उनके आगे रोजगार का संकट भी खड़ा हो चुका था। बावजूद इसके आजादी की ललक ऐसी थी कि तमाम विरोधों और दबावों के बावजूद आंदोलन आगे बढ़ता गया।

‘पुलायार आंदोलन’ जातीय दमन के विरोध में उठी आवाज थी। साम्यवादी विचारक उसे वर्ग-संघर्ष की तयशुदा सैद्धांतिकी के अंतर्गत देखते आए हैं। तथाकथित राष्ट्रवादी लेखकों, पत्रकारों की पुलायार आंदोलन को लेकर क्या राय थी। यह के। रामकृष्ण पिल्लई की टिप्पणी से पता चल जाता है। पिल्लई ‘स्वदेशाभिमानी’ के संपादक थे। उन्हें कार्ल मार्क्स की जीवनी के अनुवाद का श्रेय भी दिया जाता है, जो मार्क्स  के बारे में किसी भी भारतीय भाषा में प्रकाशित पहली पुस्तक थी। दलित बच्चों को स्कूल में भर्ती कराने की अय्यंकालि तथा उनके सहयोगियों की मांग तथा उसे सरकार के समर्थन पर पिल्लई ने अपने समाचारपत्र ‘स्वदेशाभिमानी’ में जो लिखा वह ‘त्रिवेणी संघ’ के नेताओं पर कांग्रेसी नेताओं की टिप्पणी की याद दिलाता है। ‘त्रिवेणी संघ’ के नेता जब कांग्रेस के पास टिकट लेने गए तो उसके नेताओं ने न केवल इन्कार कर दिया, अपितु उनका उपहास उड़ाया गया। टिकट मांगने पर किसी को कहा जाता कि ‘वहां(संसद और विधानसभा) क्या साग-भंटा बोना है….किसी को कहा जाता कि वहां क्या भैंस दुहनी है? किसी को ताना मारा जाता कि वहां क्या भेड़ें चरानी हैं? किसी को यह कहकर फटकार दिया जाता कि वहां क्या नमक-तेल तौलना है।’ रामकृष्ण पिल्लई ने इतनी तीखी भाषा का प्रयोग तो नहीं किया, मगर वे सरकारी स्कूलों में दलित बच्चों के प्रवेश के सख्त विरोधी थे। अपने समाचारपत्र में उन्होंने लिखा था कि दलित बच्चों को सरकारी स्कूलों में भर्ती का आदेश अनपढ़-गंवार और पीढ़ियों से मेहनत-मजदूरी पर गुजर-बसर करते आए लोगों, ‘के बच्चों को उन बच्चों के साथ जोड़ देना है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने दिमाग को तराशते हुए आए हैं। यह घोड़े और भैंस को एक ही गाड़ी में जोत देने जैसा है।’5 

नया स्कूल खोलना जितना कठिन था, उससे कहीं अधिक कठिन था, उसमें पढ़ाई की व्यवस्था करना। उन दिनों में दलितों में कोई पढ़ा-लिखा था नहीं। अय्यंकालि अशिक्षित थे। समस्या थी कि पढ़ाए कौन? जो पढ़े-लिखे थे उनमें से कोई आगे नहीं आ रहा था। सरकार उस समय दलितों के स्कूल में पढ़ाने के लिए छह रुपये महीना देती थी। किसी को आगे न आते देख मासिक वृत्तिका को बढ़ाकर नौ रुपये कर दिया गया। तब, लंबी प्रतीक्षा और कोशिशों के बाद परमेश्वरन पिल्लई नाम का एक युवक पढ़ाने के लिए तैयार हुआ। परमेश्वरन तिरुवनंतपुरम के कैथमुक्कू गांव का रहने वाला था। जिन संस्कारों के बीच वह पला-बढ़ा था, वे अछूतों के संपर्क में आने की अनुमति नहीं देते थे। पहले दिन जब वह स्कूल पहुंचा तो इसी ऊहापोह से घिरा हुआ था। उस समय उसकी प्रगतिगामी मेधा और सामाजिक-सांस्कृतिक कुंठाओं के बीच द्वंद्व जारी था। उस घटना का उल्लेख ग्रीश्मा ग्रीश्मम ने अपने आलेख ‘डेस्टिनी चेंजिज’ में इस प्रकार किया है—

‘नए अध्यापक ने स्कूल में अनिच्छापूर्वक ऐसे प्रवेश किया, मानो वह किसी कूड़ाघर में जा रहा हो। उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक कुंठा तथा प्रगतिगामी के बीच द्वंद्व छिड़ा हुआ था। वह बहुत डरा हुआ था। स्थिति तनावपूर्ण थी। उसी क्षण स्कूल को चारों ओर से घेरे खड़े लोगों ने शोर मचाना आरंभ कर दिया। अय्यंकालि के समर्थक और विरोधी एक-दूसरे के आमने-सामने थे। अफरा-तफरी का माहौल था। तभी एक व्यक्ति अध्यापक की ओर बढ़ा, जो मारे भय के बुरी तरह कांप रहा था। जैसे-तैसे अध्यापक को कक्षा तक पहुंचाया गया। दिन में कक्षाएं चलीं। मगर रात होते ही सवर्णों का दल फिर आ पहुंचा। देखते ही देखते, स्कूल को उजाड़ दिया गया।’6

अय्यंकालि और उनके विरोधियों में मानो होड़ मची थी। बिना किसी विलंब के स्कूल का नया ढांचा खड़ा कर दिया गया। अध्यापक को सुरक्षित लाने-ले जाने के लिए रक्षक लगा दिए गए। तनाव और आशंकाओं के बीच स्कूल फिर चलने लगा।

जैसे-जैसे अय्यंकालि का आंदोलन तेज हो रहा था, वैसे-वैसे उनके विरोधी भी बढ़ते जा रहे थे। उसकी प्रतिक्रिया में दलितों के बीच स्वतंत्रता और समानता को लेकर चेतना भी जाग्रत हो रही थी। उनकी आंखें सपने देखने लगी थीं। इसके साथ-साथ अय्यंकालि की सामाजिक प्रतिष्ठा भी बढ़ रही थी। सामाजिक उत्थान की दिशा में उनके योगदान की उपेक्षा करना असंभव हो चला था। 1888 में त्रावणकोर में विधायिका परिषद की स्थापना की गई थी। उसके आठ सदस्य थे। उसके पीछे त्रावणकोर के राजा श्रीमूलमथिरुनाल रामवर्मा की प्रेरणा थी जो प्रशासन में जनप्रतिनिधियों को सम्मिलित करना चाहते थे। 1904 तक व्यापारी, जमींदार, ही ‘श्री मूलम पोपुलर असेंबली’ के सदस्य बन सकते थे। प्रत्येक जिला प्रमुख द्वारा दो सदस्यों का चयन किया जाता था। कोई भी जमींदार जो कम से कम 100 रुपये सालाना लगान देता हो, अथवा व्यापारी जिसकी सालाना आय 6000 रुपये से अधिक हो, वह चुना जा सकता था।

1912 में अय्यंकालि को ‘श्री मूलम पोपुलर असेंबली’ का सदस्य चुन लिया गया, उसके बाद वे मृत्युपर्यंत उस पद पर बने रहे। अय्यंकालि पहले दलित थे जिन्हें औपनिवेशिक भारत में राज्य विधायिका का सदस्य मनोनीत किया गया था। विधायिका के सत्र के दौरान, राजा और दीवान की उपस्थिति में अय्यंकालि ने जो भाषण दिया उसमें उन्होंने दलितों के संपत्ति अधिकार, शिक्षा, राज्य की नौकरियों में विशेष आरक्षण दिए जाने तथा बेगार से मुक्ति जैसे मसलों पर बात की थी। 4 मार्च 1912 को अय्यंकालि द्वारा राज्य की विधयिका में दिए गए भाषण का ऐतिहासिक महत्त्व है। वह सरकार के सामने दलित हितों को लेकर उठने वाली किसी दलित की पहली आवाज थी। उसमें अय्यंकालि ने कहा था—

‘‘पुलायारों के प्रतिनिधि के रूप में मैं सरकार को, हमारे बच्चों को वैंगनुर ऐलीमेंट्री स्कूल, दक्षिणी त्रावणकोर के विद्यालयों में प्रवेश के लेकर की गई मदद के लिए अपना आभार प्रकट करना चाहता हूँ। अभी तक पुलायार जाति के बच्चों के प्रवेश के केवल सात स्कूलों को अनुमति दी गई है। मैं चाहता हूं कि राज्य के सभी स्कूलों में हमारे बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त हो।

‘पुलायार अपने बच्चों को उन सभी स्कूलों में भर्ती करा सकते हैं, जिनमें इझवा जाति के बच्चों को प्रवेश की अनुमति है।’ दीवान ने टोका था। अय्यंकालि ने कहना जारी रखा।

‘नए बच्चों को फीस में में छूट दी जा सकती है। सरकार मुस्लिम बच्चों को फीस में छूट देती है, जो हमसे कहीं आगे हैं। पुलायार बच्चों को भी वैसी ही छूट मिलनी चाहिए।’

दीवान  : क्या पुलायारों के बच्चे मुस्लिमों की तरह फीस में छूट नहीं ले रहे हैं? मेरा मानना है कि ऐसा होना चाहिए।’

अय्यंकालि : पुलायारों को इंजीनियर, स्वास्थ तथा औषध विभाग में भर्ती किया जा सकता है। उनमें कई योग्य सदस्य हैं, जिन्हें शिक्षा विभाग में भर्ती किया जा सकता है। हालांकि पुलायारों को सड़कों पर चलने, कानून की मदद लेने, अदालत जाने के अधिकार के संबंध में शाही आदेश जारी हो चुका है, इसके बावजूद उन्हें रोका जा रहा है। कुछ लोग इसमें बाधा डाल रहे हैं। हमें राहत पहुंचाने के लिए जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए।’’

अय्यंकालि द्वारा पुलायार बच्चों की शिक्षा के क्षेत्र में आ रही परेशानियों को विधान परिषद में लगातार उठाए जाने से सरकार चेती। 1914 में सरकार ने शिक्षा-नीति पर कठोरता से पालन के आदेश दे दिए। शिक्षा निदेशक मिशेल स्वयं हालात का पता लगाने के लिए दौरे पर निकले। मिशेल के आने की खबर से अधिकारी सचेत हो गए। दलित विद्यार्थियों के प्रवेश को और अधिक लटकाना संभव न था। मिशेल की आगमन की खबर सुनकर जब स्कूल प्रशासन हरकत में आया। लेकिन दलित विद्यार्थियों को स्कूल में प्रवेश करते देख दिकुओं ने हंगामा कर दिया। उपद्रवी भीड़ ने मिशेल की जीप को आग लगा दी। बावजूद इसके वह अधिकारी सरकारी आदेश का पालन करने के लिए डटा रहा। उस दिन आठ पुलायार छात्रों को प्रवेश मिला। उनमें 16 वर्ष का एक किशोर भी था जो पहली कक्षा में प्रवेश के लिए आया था।

यह अय्यंकालि की जीत थी, परंतु समस्याओं का यही अंत नहीं था। दिकुओं ने अपने बच्चों के दिमाग में भी जहर घोला हुआ था। दलित बच्चे पढ़ाई के लिए जैसे ही कक्षा में प्रवेश करते, वे दूसरे दरवाजे से बाहर निकल जाते थे। इससे अध्यापकों को बहाना मिला। वे दलित छात्रों को प्रवेश देने से फिर आनाकानी करने लगे। इससे दलितों का आक्रोश भड़क पड़ा। वे स्कूल दिकुओं के विरोध में फिर सड़क पर उतर आए। अय्यंकालि उनका नेतृत्व कर रहे थे। झगड़े हुए। त्रावणकोर के कई शहरों में सांप्रदायिक दंगों जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई। अय्यंकालि ने सरकार के सामने मुद्दे को उठाया। कानून का हवाला दिया। उसके फलस्वरूप दिकुओं के हिंसक विरोध के बावजूद दलित विद्याथिर्यों की संख्या बढ़ती गई। 1913-16 के दौरान नैय्यर विद्यार्थियों की संख्या में कुल वृद्धि 45 प्रतिशत, ईसाई विद्यार्थियों की 50 प्रतिशत, मुस्लिमों की लगभग 100 प्रतिशत रही जबकि दलितों में परायस जाति के विद्यार्थियों की संख्या में 400 प्रतिशत और पुलायार विद्यार्थियों की संख्या में सीधे 600 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इससे अय्यंकालि के प्रभाव तथा उनके आंदोलन की गंभीरता को समझा जा सकता है।

साधु जन परिपालन संघम

अय्यंकालि ने दिकुओं से सीधे टकराव मोल लिया था। उनकी कार्यशैली आंख में आंख डालकर बात करने की थी। लेकिन यह सब आसान काम नहीं था। जनसंख्या की दृष्टि से पुलायार कोई बड़ी ताकत नहीं बनते थे। बावजूद इसके यदि अय्यंकालि को अपेक्षित कामयाबी मिली तो इसके पीछे उनकी दूरदृष्टि, कुशल नेतृत्व क्षमता और साहस का बड़ा योगदान था। उन दिनों सरकार और समाज के सभी महत्त्वपूर्ण पदों पर सवर्ण जातियों का वर्चस्व था। उनमें भी सर्वाधिक संख्या ब्राह्मणों की थी। ज्ञान के सभी महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों पर उनका अधिकार था। सवर्ण जातियां डरती थीं कि पढ़ने-लिखने का अधिकार मिलते ही उन्हें मुफ्त में मिलने वाले श्रम से हाथ धोना पड़ेगा। इसलिए वे एकजुट होकर दलित शिक्षा का विरोध करते थे। उन्हें शिक्षा से वंचित रखने के पीछे भी यही कारण था। जबकि सरकार सभी को समान शिक्षा का कानून उनीसवीं शताब्दी के आरंभ में ही पास कर चुकी थी। मगर कानून में अमल का काम जिन अधिकारियों के जिम्मे था, उनमें लगभग सभी सवर्ण होते थे। इसलिए दलित कल्याण से जुड़े कानून सिर्फ कानून बनकर रह जाते थे। अय्यंकालि जानते थे कि बड़ी कामयाबी दूसरों की दया पर नहीं आती। पुलायार यदि अपने बच्चों को शिक्षित करना चाहते हैं तो उन्हें विरोधियों से स्वयं निपटना होगा। इसलिए उन्होंने जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता तैयार किए थे, जो अय्यंकालि के कहने पर मरने-मारने को तैयार रहते थे। उनके मार्गदर्शन के लिए बड़े संगठन की आवश्यकता थी। उसके लिए अय्यंकालि ने 1907 में ‘साधु जन परिपालन संघम’ की स्थापना की थी। उस संगठन में उन सभी जातियों का स्वागत था जो जाति और वर्गभेद के आधार पर शताब्दियों दमन और शोषण का शिकार बनती आई थीं।

संस्था के गठन के साथ ही अय्यंकालि को ईसाई, आर्यसमाजी और हिंदू सुधारवादी संगठनों की ओर से बुलावा आने लगा। वे अय्यंकालि के प्रभाव का लाभ उठाकर पुलायार और दूसरी दलित जातियों में अपनी पैठ बनाना चाहते थे। अय्यंकालि यूं भारत की संत-परंपरा में विश्वास रखते थे। नारायण गुरु, स्वामी सदानंद जैसे सुधारवादी धर्मगुरुओं का उनपर प्रभाव था। बावजूद इसके वे अपने आंदोलन को धार्मिक होने से बचाना चाहते थे। उनका मुख्य ध्येय दलितों का सामाजिक-आर्थिक उत्थान था। उसके लिए शिक्षा सबसे जरूरी उपकरण थी। इसलिए उन्होंने धार्मिक संगठनों से दूरी बनाए रखी। वैसे भी वे संगठन को शक्ति के स्तर पर भी आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे, जो धार्मिक संगठनों और धर्माचार्यों की छत्रछाया में असंभव था। ‘साधु जन परिपालन संघम’ पर नारायण गुरु की संस्था ‘श्रीनारायण धर्मपरिपालन संघम’ का असर था। संस्था के संचालन की जिम्मेदारी थॉमस वाडियार को सौंपी गई थी। वह पेशे से अध्यापक तथा अय्यंकालि का रिश्तेदार और भरोसेमंद था। संघम की आरंभिक बैठकों में लिए गए फैसलों से अय्यंकालि के आधुनिक सोच का अनुमान लगाया जा सकता है। उस संस्था के प्रमुख संकल्प थे—

1.  प्रति सप्ताह कार्यदिवसों की संख्या 7 से घटाकर 6 पर सीमित करना।

2.  श्रमिकों को एक दिन का अवकाश तथा

3.  कार्य के दौरान मजूदरों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार से मुक्ति

‘साधु जन परिपालन संघम’ का मुख्य कार्यालय वैंगनूर में बनाया गया था। वहां एक कांन्फ्रेंस हाल और पुस्तकालय भी था। संघम की ओर से नियम बनाया गया था कि सभी सदस्य सप्ताह में एकदिन, अपनी समस्याओं पर विचार करने के लिए अवश्य जमा होंगे। मासिक सदस्यता शुल्क भी निर्धारित की गई थी। संस्था की स्थापना के साथ ही स्त्री-पुरुष दोनों उससे जुड़ने लगे। देखते ही देखते उसकी शाखाएं केरल और तमिलनाडु के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में खुलने लगीं। लोग उनकी बैठकों में नियमित रूप से आने लगे। संगठन में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी उत्साहवर्धक थी। इसका अनुमान उनके द्वारा किए गए सहयोग से भी लगाया जा सकता है। संघम को अपने दैनिक खर्चों के लिए धन की आवश्यकता थी। उसके लिए दलित स्त्रियां पिडीयारी(मुट्ठी-मुट्ठी भर चावल जुटाना) बेचकर संघम की मदद करने लगीं। इससे उसका प्रभावक्षेत्र और कार्यक्षेत्र दोनों बढ़ते गए।

संघम की पैठ जीवन के हर क्षेत्र में थी। उस समय तक अदालतें स्थापित हो चुकी थीं। परंतु अछूतों के अदालत का न्याय प्राप्त करना आसान न था।  अदलतों में काम करने वाले सभी उच्च जाति के थे। यदि कोई दलित अदालत जाने का साहस भी करता तो, वहां मौजूद लोग उसका भरपूर शोषण करते थे। अछूतों के बारे में बनी-बनाई धारणा थी, इसलिए सजा देते समय भी पक्षपात किया जाता था। अछूतों को वैकल्पिक न्यायतंत्र की आवश्यकता थी। उसे देखते हुए अय्यंकालि ने वो किया, जिसकी किसी अशिक्षित व्यक्ति से कम ही उम्मीद की जाती है। अछूतों के आपसी झगड़ों के समाधान के लिए अय्यंकालि ने सामुदायिक न्यायालयों ‘समुदाय कोदाथी’ की स्थापना की। उसका मुख्य केंद्र वेंगनूर में बनाया गया। केंद्रीय कार्यालय में पुस्तकालय और एक कोन्फ्रेंस हाल भी बनाया गया था, जहां नियमित बैठकों की व्यवस्था की गई थी। संघम के प्रत्येक कार्यालय में स्थानीय अदालतों का गठन किया गया। सामुदायिक न्यायालयों की संरचना एकदम औपचारिक न्यायालयों जैसी ही थी। वैसे ही वकील, जज, पुलिस, समन पहुंचाने के लिए बैलिफ, मुंशी वगैरह। यहां तक कि शाखा अदालत के निर्णय के विरुद्ध अपील की व्यवस्था भी थी। कोई भी पीड़ित सामुदायिक अदालत के मुख्य कार्यालय में जाकर, शाखा अदालतों के फैसले के विरुद्ध अपील कर सकता था। जहां स्वयं अय्यंकालि मुख्य न्यायाधीश के रूप में मौजूद रहते थे।

लोगों के मनोरंजन तथा सांस्कृतिक एकता को बढ़ाने के लिए ‘समाजं’ की स्थापना की गई थी। ‘समाजं’ में लोग इकट्टा होकर लोकनृत्य, गाना-बजाना करते थे। नाटक भी खेले जाते थे। उनके माध्यम अय्यंकालि सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध चेतना जगाने का काम करते थे। बाद में समाजं ने जरूरतमंद पुलायार विद्यार्थियों के लिए हाॅस्टल का निर्माण भी किया। ‘साधु जन परिपालिनी संघम’ ने केरल के दलितों के बीच चेतना फैलाने का काम किया। उसके प्रभाव में लोग सप्ताह में एक दिन अवकाश करने लगे। रविवार को अवकाश के दिन लोग मिलते-जुलते, समाजं की गतिविधियों में हिस्सा लेते और भविष्य के लिए कार्यक्रम बनाते थे।

पहली श्रमिक हड़ताल

अय्यंकालि दलितों की शिक्षा के लिए जी-तोड़ प्रयास कर रहे थे। कानून बन चुका था। सरकार साथ थी। मगर सवर्ण दिकुओं का विरोध जारी था। इस मुद्दे पर आमने-सामने के टकराव भी हो चुके थे। लगातार दबाव पड़ने से दिकु विवश हुए थे। पुलयारों सहित दूसरे दलितों को स्कूलों में प्रवेश मिलने लगा था। मगर वे इतनी जल्दी हार मानने को तैयार न थे। उन्होंने पुलायारों को काम के दौरान तंग करना शुरू कर दिया था। लेकिन अय्यंकालि आंदोलन को भटकने से रोकना चाहते थे। उनके सामने प्रमुख मुद्दे थे। अछूतों को शिक्षा, रोजगार और भूमि में हिस्सेदारी। विधान परिषद के सदस्य के रूप में वे इन मांगों को सरकार के सामने उठा चुके थे। उन्हें उम्मीद थी कि समय के साथ दलितों के प्रति सवर्णों के रुख में नर्मी आएगी। लेकिन सवर्णों के रवैये में कोई बदलाव न हुआ। आखिरकार अय्यंकालि को दबाव रणनीति अपनानी पड़ी।

यह 1907 की घटना है। रूस की बोल्शेविक क्रांति से भी एक दशक पहले की, जब श्रमिकों ने अपने श्रम का इस्तेमाल अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए किया था। त्रावणकोर राज्य में सर्वाधिक जमीन नैय्यरों के अधिकार में थी। पुलायार उन्हीं के खेतों में मेहनत-मजूदरी करते थे। एक तरह से बेगार, क्योंकि पूरे दिन की मजदूरी के बदले उन्हें मात्र छह सौ ग्राम चावल प्राप्त होता था, वह भी मालिक की मर्जी से। अछूत बच्चों की पढ़ाई में आ रही अड़चन को देखते हुए पुलायारों ने घोषणा कर दी कि वे खेतों में उस समय तक काम नहीं करेंगे, जब तक उनके बच्चों को स्कूलों में प्रवेश और बाकी अवसर नहीं दिए जाते। जमींदारों ने इसे हंसकर टाल दिया। उन्हें लगता ही नहीं था कि पुलायार हड़ताल के बारे में सोच भी सकते हैं। जिनके घर चूल्हा ही मजूदरी मिलने के बाद जलता हो, उनके बारे में ऐसा सोचना नाममुकिन भी नहीं था। सो कुछ लोग उपहास में उंगलियों पर हिसाब लगाने लगे कि पुलयारों के घर में उपलब्ध राशन के हिसाब से हड़ताल कितने दिन खिंच सकती है—एक दिन…दो दिन….ढाई दिन…..उसके बाद तो उन्हें सिर झुकाकर आना ही पड़ेगा।

उन दिनों आज की तरह न टेलीफोन थे, न रेडियो, न ही टेलीविजन। पचास-साठ किलोमीटर की बात हो आने-जाने में ही दो दिन लग जाते थे, जबकि वहां तो मामला सैंकड़ों किलोमीटर में फैला हुआ था, लेकिन पुलायारों की आंखों में भविष्य का सपना था और थी, उस सपने के लिए कुछ भी बलिदान करने की जिद। सो हड़ताल खिंचती चली गई, धीरे-धीरे उसमें दूसरी मांगें भी सम्मिलित होती चली गईं; जैसे कि—

    1. नौकरी को स्थायी किया जाए

    2. दंड या दुव्र्यवहार से पहले उचित जांच होनी चाहिए। केवल अनुमान या दूसरों के कहने पर दंड देने से बचा जाए।

    3. कामगारों को झूठे मुकदमों में फंसाने पर रोक।

    4. मजदूरों के साथ अनुचित मारपीट पर तात्कालिक रोक

    5. सार्वजनिक मार्गों पर चलने की स्वतंत्रता

    6. दलित बच्चों को विद्यालयों में प्रवेश

इसके अलावा एक और मांग थी, परती और खाली पड़ी जमीन को उपजाऊ बनाने वाले को उसका मालिकाना हक देने की। कुछ लोगों को दलितों का काम करने से इन्कार करना, हड़ताल पर जाना ही अनुचित लगा। वे लोग समूह बनाकर पुलायारों को डराने धमकाने भी लगे। मार-पीट की घटनाएं भी हुईं। इन सब घटनाओं का अय्यंकालि को पहले से ही अंदेशा था। इसलिए हालात से निपटने के लिए उन्होंने अपने समर्थकों को तैयार किया हुआ था। जमींदार के लोगों ने मजदूरों को डराना-धमकाना आरंभ किया तो संगठन के लोग बीच में आ गए। इससे झगड़े और मार-पीट की नौबत आ गई। उसमें ज्यादा नुकसान दलितों को हुआ, लेकिन वे हड़ताल पर डटे रहे।

वह चावल की रोपाई के दिन थे। देर होने से फसल कमजोर होने की संभावना थी। कुछ जमींदारों ने खुद सारा काम करने की कोशिश की। लेकिन उन्हें काम करने का अभ्यास नहीं था, इस कारण वे बीमार पड़ने लगे। जितने काम को कोई पुलायार अकेला कर देता था, उतना काम छह-छह नैय्यर मिलकर भी नहीं कर पाते थे। अगर वे मजदूर खोजने जाते तो मजदूर मुंह-मांगी मजदूरी मांगता था। नतीजा यह हुआ कि खेत जंगल में बदलने लगे। हड़ताल का लंबा खिंचना पुलायारों के लिए भी समस्या थी। अधिकांश लोग मजदूरी पर पलते थे। उनके घर में खाने की समस्या पैदा होने लगी। समाचार नैय्यरों तक पहुंचा तो वे बहुत खुश हुए। लगा कि एक-दो दिन से ज्यादा हड़ताल खिंच नहीं पाएगी। उसी समय अय्यंकालि ने अपना तुरुफ का इक्का चल दिया। वे विझिंजोम में समंदर से मछलियां पकड़ने वाले मछुआरों के पास गए। उनसे कहा कि वे एक-एक पुलायार को अपने साथ नाव पर रखें और बदले में अपनी आय का एक हिस्सा उसे दें।

मछुआरे स्वयं जातीय भेदभाव और शोषण का शिकार थे। उन्होंने अय्यंकालि के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। इससे क्षुब्ध जमींदारों ने पुलायारों की बस्ती में आग लगा दी। आंख में आंख डालकर बात करने वाले अय्यंकालि ने उसी अंदाज में उसका जवाब दिया। उनकी सेना ने जमींदारों के घरों में आग लगाना आरंभ कर दिया। गांव में जमींदार इक्का-दुक्का ही होते थे। जबकि दलितों की संख्या अधिक होती थी। एक बार बस्ती में आग लगा देने से उनका बड़ा नुकसान तो होता था, मगर बाद में जले हुए को समेटना बाकी रह जाता था। लेकिन जमींदारों पर हमले से उनका कहीं ज्यादा नुकसान होता था। यह डर भी लगा रहता था कि न जाने कहां ओर किधर से विद्रोही चले आएं। इससे उनमें भय का संचार होने लगा। अय्यंकालि चाहते थे कि जमींदार स्वयं समझौते के लिए आएं। वही हुआ भी। अंततः जमींदारों को ही समझौते के लिए बाध्य होना पड़ा। 1 मार्च 1910 को सरकार ने विद्यालयों में प्रवेश संबंधी कानून बनाकर पुलायार तथा दूसरे दलितों के लिए शिक्षा में प्रवेश का रास्ता साफ कर दिया। उसके अलावा मजदूरी में वृद्धि, सार्वजनिक मार्गों पर आने-जाने की आजादी जैसी मांगें भी मान ली गईं। वह भारतीय इतिहास में मजदूरों की प्रथम हड़ताल थी, बोल्शेविक क्रांति से पहले की, जिसने वहीं किया था, जिसकी मांग कभी कार्ल मार्क्स  ने की थी। ईएमएस नंबूदरीपाद ने अय्यंकालि के आंदोलन पर कुछ नहीं लिखा, लेकिन एक लेख में वे अय्यंकालि के इशारे पर बुलाई गई पहली श्रमिक हड़ताल की चर्चा करने से रोक नहीं पाते—

‘अय्यंकालि केवल दलितों के नेता नहीं थे। वे खेतिहर मजदूरों के भी नेता थे। उनके आंदोलन में धार्मिक अल्पसंख्यकों और दलितों के अलावा उच्च जातियों के लोग भी सम्मिलित थे। आधुनिक केरल के नवनिर्माण में अय्यंकालि का योगदान नारायण गुरु जितना ही है। दलित बहुजनों को संगठित कर, उनके हक की लड़ाई लड़ने वाले अय्यंकालि नारायण गुरु की परंपरा को आगे बढ़ाते हैं, जिन्होंने पिछड़ी जाति के इझ़वाओं को संगठित कर, उनके अधिकारों के लिए संघर्ष किया था….’

पुनः केरल के मुख्यमंत्री के रूप में अय्यंकालि तथा 1907 की श्रम-हड़ताल को याद करते हुए उन्होंने कहा था—‘1907 में अय्यंकालि ने खेतिहर मजदूरों की हड़ताल का नेतृत्व किया था, उन्होंने बिखरे हुए और असंगठित श्रमिकों को एकजुट कर, उन्हें संगठित ताकत में बदलने में कामयाबी हासिल की थी।’

महिलाओं के उभोवस्त्र-अधिकार के लिए संघर्ष

स्तन ढकने के अधिकार के विरोध में नंदेली द्वारा राज्य के अधिकारियों को अपने स्तन काटकर दे देने की घटना का उल्लेख पीछे किया जा चुका है। त्रावणकोर राज्य की दलित महिलाओं के साथ त्रासदी थी कि उन्हें अपना वक्ष ढकने का अधिकार प्राप्त नहीं था। केवल घुटने से कटि तक हिस्सा वे ढक सकती थीं। वक्ष के ऊपर के हिस्से पर वे केवल गहने पहनने की छूट थी। उन्हें सोने या चांदी के गहने धारण करने का अधिकार नहीं था। पत्थर का कंठहार उनके गुलाम होने की निशानी था। वह भी काले ग्रेनाइट पत्थर के। उल्लंघन करने पर उन्हें पेड़ से बांधकर कोड़े की सजा दी जाती थी। पत्थर के कंठहार वे चाहे जितने पहन सकती थीं। उसी तरह का ‘आभूषण’ उनकी कलाई पर भी बंधा रहता था। कानों के लिए लोहे की बालियां पहननी पड़ती थीं, जिन्हें ‘कुनुक्कु’ कहा जाता था। अय्यंकालि दलितों की सर्वांग मुक्ति चाहते थे। महिलाएं भी उनके मुक्ति आंदोलन का हिस्सा थीं।

गुलामी के प्रतीक उन आभूषणों से मुक्ति के लिए अय्यंकालि ने दक्षिणी त्रावणकोर के नियत्तिंकर नामक स्थान से आंदोलन की शुरुआत की। सभा में आई स्त्रियों से उन्होंने कहा कि वे दासता के प्रतीक इन आभूषणों को त्यागकर सामान्य ब्लाउज धारण करें। इसपर सवर्णों की तुरंत प्रतिक्रिया हुई। उन्होंने धमकी दी कि पुरानी परिपाटी को तोड़ने का अंजाम बुरा हो सकता है। लेकिन अय्यंकालि को शुरू से ही ऐसी चुनौतियों का सामना करने की आदत थी। उसके बाद दंगे शुरू हो गए। स्थिति उस समय और बिगड़ गई जब सेंट्रल त्रावणकोर के पुलायार नेता गोपालदास ने स्त्रियों की सभा बुलाकर पत्थर के आभूषणों को फेंक कर, सामान्य बलाउज पहनने का आवाह्न किया। उसकी परिणति त्रावणकोर के अलग-अलग क्षेत्रों में दंगों के रूप में हुई। दलित यहां तक कि औरतें भी पीछे हटने या समझौता करने को तैयार न थीं। दंगों में दोनों ही पक्षों को भारी नुकसान हुआ। दलित हार मानने को तैयार न थे। अंततः दोनों पक्षों को समझौते के लिए बाध्य होना पड़ा। जीत अय्यंकालि की ही हुई। सरकार, नैय्यर नेताओं और अय्यंकालि के बीच समझौता हुआ। उसके बाद क्यूलोन नामक कस्बे में दलित औरतों की बड़ी सभा बुलाई गई। उसमें अय्यंकालि तथा नैय्यर सुधारवादी नेता चेगंनाचेरी परमेश्वरन पिल्लई की उपस्थिति में सैंकड़ों दलित महिलाओं ने गुलामी के प्रतीक ग्रेनाइट के कंठहारों को उतार फेंका।

आदर्श जनप्रतिनिधि

एक जनप्रतिनिधि के रूप में भी अय्यंकालि पुलायारों तथा दलितों के अधिकार की लड़ाई लड़ते रहते थे। पुलायारों के पास न तो अपना घर होता था, न ही खेती योग्य जमीन। खेतिहार मजूदर के रूप में, बेगार की तरह अपनी सेवाएं प्रदान करते थे। भूस्वामी उन्हें कभी भी बाहर निकाल सकता था। ‘श्री मूलम् प्रजा सभा’ के सदस्य के रूप में उन्होंने पुलायारों की सामाजिक-आर्थिक हैसियत, उनकी गरीबी और उसके कारण हो रही दुर्दशा के बारे में उन्होंने कई बार मुद्दा बैठकों में उठाया था। उन्होंने मांग की थी कि पुलायारों को रहने के लिए आवास तथा खाली पड़ी जमीन उपलब्ध कराई जाए। स्थानीय अधिकारी उनके पुलायारों द्वारा खेती योग्य बनाई गई भूमि को पहले ही उन्हें आवंटित कर चुके थे। लेकिन जमींदार उसमें बाधा बने हुए थे। अय्यंकालि द्वारा निरंतर उठाई गई मांग का परिणाम यह हुआ कि वैंगनूर से 6 किलोमीटर दूर विलंपिंसला में 300 एकड़ कृषि भूमि पुलायारों को आवंटित कर दी। इसके अतिरिक्त निदंमनगाद क्षेत्र के वूझमल्लुकल गांव में 200 सौ एकड़ भूमि उन्हें और दी गई। कुल 500 एकड़ भूमि को 500 पुलायार परिवारों के बीच, एक एकड़ प्रति परिवार के हिसाब से बांट दिया गया। यह अय्यंकालि की बड़ी जीत थी। भू-दास के रूप में खेती करते आए पुलायार अब अपनी भूमि पर खेती कर, आजादी से रह सकते थे।

विधानपरिषद के सदस्य के रूप में अय्यंकालि ने पुलायारों की सरकारी नौकरियों में अनुपस्थिति और बेरोजगारी का मुद्दा उठाया था। उन्होंने कहा था कि जब तक पुलायार अपेक्षित योग्यता प्राप्त नहीं कर पाते, उन्हें निचले दर्जे की या मजूदरी के काम पर लगाया जाए। उसके फलस्वरूप अनेक पुलायार युवाओं को सरकारी नौकरी मिली। उन्होंने धर्म पर सीधा हमला नहीं किया। मगर वे पुलायारों को पुरोहितों और धार्मिक आडंबरों से बाहर आने, आचरण की पवित्रता पर जोर देने तथा संगठित रहने की निरंतर अपील करते रहे। उनके प्रयासों से पुलायारों तथा दूसरे दलितों को 1912 में प्रजा सभा में मनोनीत किया गया, जिससे दलितों की राजनीतिक भागीदारी का रास्ता प्रशस्त हुआ।

अय्यंकालि 1904 से ही दमे की बीमारी का शिकार थे। मगर स्वास्थ्य की चिंता न करते हुए वे अपने समाज के कल्याण, उसे न्याय दिलाने के लिए निरंतर जूझते रहते थे। इसके लिए उन्होंने पूरे त्रावणकोर की यात्राएं की थीं। अंततः 24 मई 1941 को उन्होंने पूरी तरह से बिस्तर पकड़ लिया। और 18 जून 1941 को मृत्यु की उस अनथक न्याय-योद्धा ने संसार छोड़ दिया। उम्र में अय्यंकालि ज्योतिराव फुले से 45 वर्ष छोटे थे, और पेरियार से 16 वर्ष बड़े। केरल में उन्होंने वही काम किया, जो फुले ने महाराष्ट्र और पेरियार ने तमिलनाडु में किया था। यह बात अलग है कि अय्यंकालि के योगदान की उपेक्षा हुई। आधुनिक केरल में स्त्रियां बाकी देश की अपेक्षा यदि ज्यादा साक्षर और जागरूक हैं तो उसका बहुत कुछ श्रेय अय्यंकालि को जाता है।

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

1.   नंबूदरी ब्राह्मणों के बारे में ‘दि त्रावणकोर स्टेट मैनुअल’ भाग-एक के हवाले से वी. नगम अइया ने उनकी विचित्र-सी परंपरा का उल्लेख किया है। तदनुसार नंबूदरी ब्राह्मण आमतौर पर संपन्न होते हैं और बड़े आरामदायक घरों में रहते हैं। उनकी स्त्रियों को बाकी लोगों की नजरों से बचाकर पूरी तरह नियंत्रण में रखा जाता है। जब वे घर से बाहर निकलती हैं तो उन्हें कपड़ों या छाते से ढककर रखा जाता है।  औरतों को उनकी सुंदरता के अनुसार सम्मान दिया जाता है, वे सोने के ब्रेसलेट पहनती हैं। परिवार में सबसे बड़े पुत्र को, वह भी केवल अपनी जाति में विवाह करने का अधिकार होता है। उसके छोटे भाई नैय्यर या निचली जाति की स्त्रियों के साथ, केवल अस्थायी विवाह कर सकते हैं। इसके लिए ‘संबंधम’ की प्रथा है। कई बार नंबूदरी ब्राह्मणों को अतिरिक्त सम्मान देने के लिए भी ‘संबंधम’ बनाए जाते थे। ऐसे संबंध से जन्मी संतान को न तो अपने पिता के नाम-गौत्र पर दावेदारी का अधिकार होता था, न ही उसकी संपत्ति पर। नैय्यर नेताओं के विरोध और लंबे आंदोलन के बाद यह प्रथा अब समाप्त हो चुकी है।

2. चार्ल्स अलेन, कोरोमंडल: एक पर्सनल हिस्ट्री आफ  इंडिया।

3. पुलायार सहित दूसरी अछूत और पिछड़ी जातियां, जनजातियां स्वयं को भारत का मूलनिवासी मानती थीं। नैय्यर, ब्राह्मण आदि कथित उच्च जातियों के लोग, उनकी निगाह में ‘दिकु’(बाहरी) थे। यह मान्यता आर्य-आव्रजन थियरी की पुष्टि करती थी।

4 त्रिवेणी संघ का बिगुल 

5. स्वेदशाभिमानी 2 मार्च 1910, ग्रीश्मा ग्रीश्मम द्वारा Mahathma Ayyankali : The Revolutionary, The Legend   में उद्धृत

6. ग्रीश्मा ग्रीश्मम, Destiny Changes, published in International Journal of Multidisciplinary and Current Research

आधुनिक भारत के निर्माता : महात्मा ज्योतिराव फुले और डा. भीमराव आंबेडकर

सामान्य


मैं मानव-मात्र की समानता में विश्वास करता हूं. मेरे हिसाब से धर्म का अभिप्रायः ऐसे कर्तव्यों का अनुपालन करना है, जिनसे न्याय की स्थापना हो. दिलों में एक-दूसरे के प्रति दया, ममता, करुणा तथा प्रेम का उजियारा हो, ऐसे कर्तव्य करना जिनसे हमारे आसपास के प्राणी अधिकाधिक सुखी रह सके—थॉमस पेन.      

तुम उस समय तक अच्छा समाज नहीं गढ़ सकते जब तक तुम्हें पर्याप्त राजनीतिक अधिकार न हों. न ही तुम उस समय तक अपने राजनीतिक संकल्पों तथा विशेषाधिकारों पर अमल कर सकते हो, जब तक तुम्हारा सामाजिक  तंत्र तर्क और न्याय-भावना पर केंद्रित न हो. तुम उस समय तक अच्छा आर्थिक ढांचा खड़ा नहीं कर सकते जब  तक सामाजिक ढांचा बेहतर न हो. यदि तुम्हारा धर्म नैतिक आधार पर कमजोर और भटकाव-युक्त है तो तुम स्त्री तथा अन्य वर्गों के लिए समानतायुक्त वातावरण नहीं बना सकते. अन्योन्याश्रितता महज दुर्घटना नहीं, कुदरत  का नियम है.—महादेव  गोविंद  रानाडे.

आज देश में लोकतंत्र है. चुनावों के दौरान करीब एक अरब नागरिक अलग-अलग और एक साथ अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं. उसके आधार पर हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश होने का दावा कर सकते हैं. हालांकि कुछ कमजोरियां भी हैं. हमारे यहां भूख है, गरीबी है, भीषण समाजार्थिक असमानता तथा बेरोजगारी है. नेता सब्जबाग दिखाते हैं. सरकारें बनती हैं. जनाकांक्षाओं को पूरा किए बगैर चली भी जाती हैं. उनका शिकार समाज के निम्न-मध्यम, गरीब और विपन्न लोगों को होना पड़ता है. फिर भी चुनावों के दौरान सर्वाधिक भागीदारी इन्हीं लोगों की रहती है. लोकतंत्र से सर्वाधिक उम्मीद भी इसी वर्ग को है. यह उम्मीद नहीं होती, सपने नहीं होते. सपनों को पहचानने, उन्हें पूरा करने की हसरत तथा संघर्ष करने का जज्बा नहीं होता—यदि महात्मा ज्योतिराव फुले और डॉ. आंबेडकर नहीं होते. भारत को आधुनिक राज्य बनाने में इन दो महापुरुषों का सर्वाधिक योगदान रहा है. दोनों अलग-अलग समय में जन्मे. जो फुले का समय है वह डॉ. आंबेडकर का नहीं है. जिस वर्ष आंबेडकर का जन्म हुआ, उससे कुछ महीने पहले फुले दुनिया छोड़ चुके थे. फिर भी लगता है जैसे सबकुछ योजनाबद्ध हो. ओलंपिक के उन खिलाड़ियों की भांति जिनमें एक पूरे संकल्प और इरादे के साथ मशाल लेकर दौड़ता है, फिर उसे आगे वाले खिलाड़ी के हाथों में सौंपकर अंर्तध्यान हो जाता है. दोनों का संघर्ष अपने समाज के अलावा समय के साथ भी है. अतएव बिना उनके इतिहास को जाने, बगैर उस समय की पड़ताल किए—उनके योगदान को समझ पाना असंभव है.

ज्योतिबा फुले द्वारा स्थापित पाठशाला में पढ़ने वाली एक लड़की ने प्रदेश में महार और मांग जातियों की दुर्दशा पर एक निबंध लिखा था. निबंध इतना मार्मिक था कि मराठी समाचारपत्र ‘ज्ञानोदय’ ने 15 फरवरी 1855 के अंक में उसपर एक समाचार प्रकाशित किया. इस घटना का उल्लेख धनंजय कीर ने ‘महात्मा ज्योतिबा फुले’ में किया है. उसमें पेशवाई के अन्याय के विरोध में आक्रोश है, तो अंग्रेजी शासन के प्रति सहानुभूति की झलक भी है. निबंध उस समय के शूद्र एवं अतिशूद्रों की मनोस्थिति का दस्तावेज है—

‘‘ब्राह्मण कहते हैं, वेदों पर उनका विशेषाधिकार है. केवल वही उनका अध्ययन कर सकते हैं. इससे पता चलता है कि हमारा कोई धर्मग्रंथ नहीं है. यदि वेद ब्राह्मणों की रचना है तो उनके अनुसार आचरण करना भी उन्हीं की जिम्मेदारी है. हमें धर्मग्रंथों को पढ़ने की स्वतंत्रता नहीं है. कहना पड़ेगा कि हमारा कोई धर्म नहीं है. हम बिना धर्म के हैं. हे ईश्वर! तू ही बता, तूने हमारे लिए कौन-सा धर्म बनाया है, जिससे ब्राह्मणों की तरह हम भी उसका पालन कर सकें

पहले हम इमारतों की नींव तले दफना दिए जाते थे. शिक्षा सदनों में जाने की हमें अनुमति नहीं थी. यदि कोई ऐसा करे तो उसकी गर्दन नाप दी जाती थी. आज बाजीराव द्वितीय आकर देखे कि अछूत और शूद्र लड़के-लड़कियां स्कूल जा रहे हैं तो ईर्ष्या और क्रोध से उसका दिमाग फट जाएगा—‘अरे! यदि महार और मांग पढ़-लिख जाएंगे तो क्या ब्राह्मण उनकी सेवा करेगा? क्या ब्राह्मण बच्चे उसके लिए बोझा ढोकर लाएंगे? परमात्मा ने हमें ब्रिटिश राज्य की सौगात दी है. आज हमारे कष्टों में कमी आई है. अब कोई हमें परेशान नहीं कर सकता. कोई हमें फांसी नहीं चढ़ा सकता. कोई हमें जिंदा नहीं जला सकता. हमारी संतान सुरक्षित है. हम अपना शरीर ढक सकते हैं. चादर ओढ़ सकते हैं. आज हर किसी को अपने ढंग से जीने की आजादी है. कोई बंधन नहीं, किसी प्रकार का अंकुश नहीं है. कोई प्रतिबंध भी नहीं हैं. यहां तक कि हमें बाजार जाने की भी आजादी है.’’

उसी अखबार ने आगे लिखा था—‘‘वे(अछूत) किसी न्यायालय के भीतर नहीं जा सकते. रोगी का इलाज कराने के लिए उन्हें अस्पताल में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है. किसी सराय में नहीं ठहर सकते. न ही प्रदेश की सार्वजनिक सड़कों पर आने-जाने की अनुमति उनको है. किसान-शिल्पकार की हैसियत से उन्हें सदैव घाटा उठाना पड़ता है, क्योंकि बाजार में दुकान की सीढ़ियां चढ़ने की अनुमति उन्हें नहीं है. मजबूरी में उन्हें अपना माल दलालों के हाथों ओने-पौने भाव बेचना पड़ता है. कुछ तो इतने पतित मान लिए गए हैं कि उनसे कुछ काम नहीं लिया जा सकता….वे केवल भिक्षा के सहारे जीते हैं. भीख मांगने के लिए भी वे सड़क का प्रयोग नहीं कर सकते. उन्हें सड़क से दूर, ऐसी जगह जहां से कोई देख न ले, खड़ा होना पड़ता है. लोगों को आते-जाते देख दूर खड़े-खड़े गुहार लगाते हैं. दया करके यदि कोई दूर से ही भीख उछाल देता है, तो वे उसपर झपट नहीं पड़ते. बल्कि वे वहीं खड़े-खड़े उस समय तक प्रतीक्षा करते हैं, जब तक भीख देने वाला आंखों से ओझल न हो जाए. उसके जाते ही भीख को उठाकर वहां से भाग जाते हैं.’’1

कदाचित वह पहला अवसर था जब कोई अछूत बालिका अपने कष्टों को शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्त कर रही थी; और समाचारपत्र उसकी पीड़ा को सार्वजनिक कर रहा था. उससे पहले शूद्र और अतिशूद्र अपने कष्टों के बारे में बताना तो दूर सोचना तक नहीं जानते थे. उनके लिए सबकुछ नियतिबद्ध, दैवी आदेश जैसा था. शोषण एवं दमन से मुक्ति के लिए ईश्वर की विशेष अनुकंपा की कामना की जाती थी. कहा जाता था कि ईश्वरीय अनुकंपा तभी संभव है जब वे उन कर्मों का निर्वाह पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ करें, जो उनके लिए वर्ण-व्यवस्था द्वारा निर्धारित किए गए हैं. इस तरह दमन और शोषण का सोचा-समझा विधान था. खासकर अश्पृश्यता को लेकर. देवेंद्र कुमार बेसंतरी ने केरल का उदाहरण दिया है—‘नंबूदरी ब्राह्मण नायर जैसे सवर्णों से 32 फुट की दूरी से, नायर इढ़वा लोगों से जो अगम्य थे, परंतु जिनका सामाजिक ढांचे में बहुत ऊंचा स्थान था, 64 फुट कर दूरी से और इढ़वा जाति के लोग अछूतों पुलवा, परेया से सौ फुट की दूरी पर ही अपवित्र हो जाते थे.’(संदर्भ-भारत के सामाजिक क्रांतिकारी, देवेंद्र कुमार बेसंतरी, पेज, 136). ऐसे परिवेश में शूद्र अपने लिए भला कैसे मान-सम्मान की उम्मीद करता! नाउम्मीदी के बीच वे अपना जीवन जीने को विवश थे. पुरोहित वर्ग इसे भाग्यदोष अथवा पूर्व कर्मों का फल कहकर भरमाए रखता था. उत्पीड़न से मुक्ति का एक रास्ता धर्म-परिवर्तन भी था. लेकिन वह भी निरापद न था. जाति प्रथा के विषाणु बाकी धर्मों में भी प्रवेश कर चुके थे. धर्मांतरित व्यक्ति को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता था. यह दुर्दशा क्यों हुई? इसपर फुले ने विचार किया है. शूद्रों-अतिशूद्रों की अशिक्षा का मामला उनके लिए कितना महत्त्वपूर्ण था, वह इससे भी पता चलता है कि ‘किसान का कोड़ा’ पुस्तिका की भूमिका की शुरुआत ही उन्होंने इन शब्दों से की है—‘विद्या न होने से बुद्धि न रही, बुद्धि के न रहने से नैतिकता का हृास हुआ, नैतिकता न रहने से गतिशीलता का लोप हुआ, गतिशीलता के अभाव में धन-दौलत दूर होते गए, धन-दौलत के न रहने से शूद्रों का पतन हुआ. इतना अनर्थ एक अविद्या के कारण हुआ.’ डॉ. आंबेडकर ने बुद्ध और कबीर के अलावा फुले को भी अपना गुरु माना. दलितों की दुर्दशा का मूल कारण अशिक्षा है. दलित युवाओं को शिक्षा का महत्त्व समझाते हुए उन्होंने लिखा—‘शिक्षा शेरनी का दूध है. जो भी पीता है, दहाड़ने लगता है.’ डॉ. आंबेडकर आजीवन दलितों को शिक्षित होने, संगठित रहने तथा अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने का आवाह्न करते रहे.

उस समय के सभी सुधारवादी अंग्रेजी शिक्षा से प्रेरित थे. नई ज्ञान-चेतना, जिसके मूल में जॉन लाक, वाल्तेयर, रूसो, बैंथम, मार्क्स, थॉमस पेन जैसे महान दार्शनिकों की प्रेरणाएं थीं—से लबरेज होकर उन्होंने भारतीय समाज की कुरीतियों को समझा तथा उनसे संघर्ष किया था. बदले में यथास्थितिवादियों का विरोध और उत्पीड़न सहा. अपने-अपने क्षेत्र में वे सब कमोबेश सफल भी रहे. लेकिन उनके कार्यक्षेत्र का दायरा सीमित था. डॉ. आंबेडकर के मतानुसार उनके प्रयास केवल परिवार-सुधार तक सीमित थे.2 

समाज सुधार की दिशा में बहुत आगे बढ़ने की इच्छाशक्ति उनमें नहीं थी. राजा राममोहनराय, ईश्वरचंद विद्यासागर, स्वामी दयानंद जैसे महापुरुषों द्वारा चलाए जा रहे सुधारवादी आंदोलनों का प्रभाव जनता पर पड़ा था. लेकिन सीमित अर्थों में. हेनरी वर्नर हंपटन ने ‘ब्रह्मसमाज’ के संस्थापक राजा राममोहनराय को भारत में सुधारवादी आंदोलन का शिखर पुरुष घोषित करने के साथ-साथ, उन सीमाओं का उल्लेख भी किया है, जिनके पीछे उनके जन्मगत संस्कार थे. हंपटन के अनुसार राजा राममोहनराय, ‘अपने समय से बहुत आगे थे. लेकिन जहां तक शूद्रों की शिक्षा का सवाल है उनका मानना था कि शिक्षा ऊपर से शुरू होकर नीचे तक जानी चाहिए. इस प्रकार आरंभ में धीरे-धीरे, आगे चलकर तेजी से वह जनसाधारण तक पहुंच जाएगी. इस मामले में वे अपने समय की प्रचलित मान्यताओं के समर्थक थे. प्रकारांतर में वे उन लोगों में से थे जो बहुत आशावादी थे.’3 हंपटन ने इसे फिल्ट्रेशन का सिद्धांत कहा है.

‘ब्रह्म समाज’ प्रकट में समाज के जाति-आधारित विभाजन की आलोचना करता था. वर्ण-विभाजन को लेकर उसे कोई शिकायत न थी. उसके द्वारा निर्धारित पूजा-विधानों में पुरोहित की भूमिका केवल ब्राह्मण निभा सकता था. जिसे ऊपर ‘फिल्ट्रेशन का सिद्धांत’ कहा गया है, अर्थशास्त्र की भाषा में उसे ‘ट्रिकिल डाउन थियरी’(रिसाव का सिद्धांत) कहा जाता है. उसके अनुसार समृद्धि ऊपर से नीचे की ओर निस्सरित होती है. गोया समाज को अपने स्वार्थ के अनुसार चलाते आए लोग सुधार को भी अपने स्वार्थानुसार नियंत्रित कर लेते हैं. इसकी सबसे अच्छी व्याख्या डॉ. आंबेडकर ने 1936 में ‘जात-पांत तोड़क मंडल’ के महाधिवेशन के लिए अपने दिए न जा सकने वाले अध्यक्षीय भाषण में की थी. विधवा विवाह, सती प्रथा उन्मूलन, बाल-विवाह की रोकथाम आदि भारतीय समाज की प्रमुख समस्याओं जिनसे भारतीय समाज उन दिनों जूझ रहा था, को उन्होंने ‘हिंदू परिवार का सुधार’ कार्यक्रमों तक सीमित माना था. उनका विश्वास था कि वास्तविक सुधार किसी मसीही कृपा द्वारा संभव नहीं है. उसकी पुनर्रचना केवल समाज के पुनर्गठन द्वारा संभव है(जातिप्रथा का उन्मूलन). वे जानते थे कि शिखर पर मौजूद लोग अपने विशेषाधिकारों को एकाएक छोड़ने को तैयार न होंगे. केवल संगठित शक्ति द्वारा उन्हें काबू में लाया जा सकता है. यह तभी संभव है जब लोग अपने कष्ट, शोक, विपन्नता के प्रति संवेदनशील हों. उनके पीछे निहित कारणों को समझते हों. ऐसे प्रश्नों की ओर लोगों का ध्यान न जाए, इसके लिए धर्म को बीच में लाया जाता है. इस साजिश को फुले ने सबसे पहले समझा था. यह मानते हुए कि दूसरों के भरोसे आदमी अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता, उन्होंने निचली जातियों के युवक-युवतियों की पढ़ाई के लिए स्कूल खोले. सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिए आंदोलन चलाए. धर्म के नाम पर आडंबर फैला रहे ब्राह्मण पुरोहितों को चुनौती दी.

फुले ने जो कहा और जितना लिखा, बहुत बड़ा हिस्सा केवल दो मुद्दों पर केंद्रित है. पहला धर्म के नाम पर ब्राह्मणों द्वारा फैलाए जा रहे आडंबरों का विरोध, दूसरा शूद्र-अतिशूद्र के लिए शिक्षा पर जोर. दोनों मुद्दे बेहद चुनौतीपूर्ण थे. व्यवस्था के शिखर पर कुंडली मारे बैठी शक्तियां खुद को बदलने के लिए तैयार न थीं. जिस ‘फिल्ट्रेशन थियरी’ पर राजा राममोहनराय तथा उनके सहयोगियों की उम्मीदें टिकी थीं, वह नाकाम सिद्ध हुई थी. भारतीय समाज में शिक्षा की स्थिति का आकलन करने के लिए 1882 में ‘इंडियन एजुकेशन मिशन’ की स्थापना की गई थी. अपने अध्ययन के दौरान मिशन ने पाया कि कस्बों और शहरों में शिक्षा में सुधार हुआ था. लेकिन गांवों में वैसे ही हालात थे. शहरों में भी शिक्षा का जितना लाभ ऊंची जातियों ने उठाया था, शूद्रों, अतिशूद्रों तक उतना लाभ नहीं पहुंच पाया था. शिक्षा  विभाग में अधिकांश अध्यापक ब्राह्मण थे. वे निचली जातियों के विद्यार्थियों के साथ भेदभाव बरतते थे. यह बात कमोबेश उस समय के प्रमुख सुधारवादियों पर भी लागू थी. उच्च वर्गों से आए सुधारवादी सुधार तो चाहते थे, लेकिन हिंदू धर्म की मूल संरचना में छेड़छाड़ का न तो उनमें साहस था, न वैसी इच्छाशक्ति. इसीलिए थोड़े अंतराल के पश्चात हिंदू समाज में वही विकृतियां दुबारा पनपने लगती थीं. सती प्रथा पर कानूनी रोक 1829 में ही लग चुकी थी, मगर समाज उस विकृति से पूर्णतः मुक्त नहीं हो पाया था. मुंबई के समाचारपत्र ‘टेलीग्राफ एंड कुरियर’ में नवंबर 1852 में भुज की एक घटना छपी थी—

‘एक स्त्री को बलात् सती के लिए ले जाया जा रहा था. वह बचने के लिए चीख-चिल्ला रही थी. अंग्रेज अधिकारियों ने उसे बचाने का प्रयत्न किया. लेकिन साथ जा रहे ब्राह्मणों ने उसे जबरदस्ती खींचकर पुनः चिता पर बिठा दिया. युवती आगे चीखे-चिल्लाए नहीं इसके लिए उन्होंने उसके सिर पर प्रहार कर उसे बेहोश कर दिया फिर उसी अवस्था में चिता पर लिटाकर आग जला दी गई.’4

विकृति केवल सती प्रथा तक सीमित नहीं थी. प्रसिद्ध उपयोगितावादी दार्शनिक जेम्स मिल ने ‘ब्रिटिश भारत का इतिहास’ तथा अमेरिकी लेखिका कैथरीन मेयो ने ‘मदर इंडिया’ में भारतीय समाज की दुर्दशा का वर्णन किया है. उसके अनुसार पूरा भारतीय समाज घोर जातिवाद और आडंबरों में फंसा था. अनगिनत अंधविश्वास थे. एक अंधविश्वास यह भी था कि गंगा किनारे मृत्यु होने पर मोक्ष प्राप्त होता है. इसलिए बीमार परिजनों को मरणासन्न अवस्था में गंगा किनारे छोड़ देना धार्मिक कर्तव्य माना जाता था. बंगाल में तो यह मान्य प्रथा बन चुकी थी. माना जाता था कि गंगा किनारे मृत्यु होने पर आत्मा सीधे स्वर्ग की ओर प्रयाण कर जाती है. उस समय ‘कलकत्ता रिव्यू’ में ऐसे अनेक समाचार प्रकाशित हुए थे, जिसमें रोगी से छुटकारा प्राप्त करने के लिए उसे मरने के लिए गंगाघाट भेज दिया जाता था. कुछ धर्म-भीरू वृद्धाएं गैहूं या चावल के दाने रात-दिन गिनती रहती थीं. एक लाख की गिनती पूरी होने पर उन्हें दान कर दिया जाता था. तरह-तरह बत्तियां बंटकर दान करने की भी प्रथा थी. कई बार यह मानते हुए कि गाय की सेवा ही मुक्ति दिला सकती है, गाय को अनाज खिलाया जाता. फिर उसके गोबर और मूत्र को श्रद्धापूर्वक ग्रहण किया जाता था. पुजारी वर्ग ऐसे पाखंडों को बढ़ावा देता था. सरकार उनकी अनेक कुरीतियों पर प्रतिबंध लगा चुकी थी. तथापि अशिक्षा  और रूढ़ियों में फंसा धर्मभीरू भारतीय समाज उनसे बाहर निकल ही नहीं पा रहा था.

महाराष्ट्र में 1827 तक एक प्रथा थी कि शंकराचार्य आगमन पर दक्षिणा के रूप जो भी मांग लें उसे देना यजमान का कर्तव्य बन जाता था. इस कुरीति के बारे में किसी ने पूना के कलेक्टर से शिकायत कर दी तो उसने तत्काल उसपर प्रतिबंध लगा दिया. दान का निर्णय शंकराचार्य की मर्जी के बजाय दानदाता की इच्छा पर छोड़ दिया गया. विधवाओं का मुंडन करना, उन्हें शुभ घोषित  कर घर के किसी अंधेरे कोने में रहने के लिए विवश कर देना. अच्छा खाने, पहनने और रहने पर प्रतिबंध लगा देना—उन दिनों के स्त्री जीवन की त्रासदी थी. अगर कोई विधवा गलती से परपुरुषगमन करते हुए पकड़ी जाए तो दोष जानलेवा हो जाता था. 1854 में ऐसे ही एक मामले का शंकराचार्य द्वारा फैसला करने का एक उदाहरण है. घटना के अनुसार मुंहमांगी दक्षिणा का भरोसा होने के पश्चात शंकराचार्य ने विधवा के शुद्धीकरण का आश्वासन दिया. शंकराचार्य के पैर का अंगूठा विधवा स्त्री के सिर पर रखकर उसे पंच-गव्य से स्नान कराया गया. इस बीच लड़की के पिता ने बताया कि उसकी बेटी गर्भवती है, शुद्धीकरण के दौरान इसका भी ध्यान रखा जाए. इसपर शंकराचार्य क्रोधित हो गए. पुरुष हजार बदचलनी करे. इंद्र और विष्णु जैसे देवता दूसरों की पत्नियों के साथ बलात्कार करते फिरें. उससे धर्म की हानि नहीं होती. यदि स्त्री भूलवश भी कुछ कर दे तो ‘वैकुंठलोक’ संकट में पड़ जाता है. अंतत मनोवांछित दक्षिणा की शर्त पर शंकराचार्य ने विधवा के ‘उद्धार’ की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली. उन्होंने युवती को खोखले पेड़ के तने में रखकर आग लगाने का विधान किया. लड़की के पिता से कहा कि ‘अग्निपरीक्षा’ के बाद भी यदि उसकी बेटी बच रहती है तो उसका सिर मुंडवाने तथा एक सहस्र  ब्राह्मणों को भोज कराने के उपरांत उसका शुद्धीकरण संभव है.

ऐसा नहीं कि इन घटनाओं का हिंदू समाज के भीतर कोई विरोध नहीं था. यहां तक कि सवर्णों में भी ऐसे लोग मौजूद थे जो सामाजिक विकृतियों का विरोध करते थे. लेकिन उन लोगों की संख्या बहुत कम थी. 94 प्रतिशत जनता अशिक्षित थी. बाकी 6 प्रतिशत किसी न किसी रूप में उस व्यवस्था से लाभान्वित थे. वे सरकार और समाज के शीर्षस्थ पदों पर थे. बेहद जटिल सामाजिक ताने-बाने में फंसा आम आदमी केवल कराह सकता था. आडंबरों का बोलबाला था. तरह-तरह के भय दिखाकर पंडे-पुरोहित उसे लूटते रहते थे—

‘प्रत्येक नागरिक राज्य को कर देने से ज्यादा ब्राह्मणों को दान करता है. जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत, वह भू-देवता ब्राह्मणों का पोषण करने में लगा रहता है. जातक के जन्म के समय ब्राह्मण को भोजन कराना जरूरी माना जाता है, नहीं तो बच्चे के आजीवन कंगाल बने रहने की संभावना रहती है. जन्म के सोलहवें दिन घर के शुद्धीकरण की रस्म मनाई जाती है, उसमें भी ब्राह्मण को दक्षिणा दी जाती है. कुछ दिन बाद बच्चे के नामकरण के नाम पर फिर ब्राह्मण को दक्षिणा. तीसरे महीने मुंडन की रस्म होती है, ब्राह्मण पुनः दक्षिणा लेने पहुंच जाता है. उसके बाद अन्नप्राशन संस्कार. शिशु जब पहली बार अन्न चखता है, तब भी ब्राह्मण को भुगतान किया जाता है. बालक चलने लगता है तो एक बार फिर ब्राह्मण को दक्षिणा दी जाती है. साल-भर बाद बालक का जन्मदिवस आ जाता है. ब्राह्मण को फिर भोग के लिए आमंत्रित किया जाता है. वह आता है और दक्षिणा के साथ वापस लौटता है. सात वर्ष का होने पर बालक का शिक्षा  संस्कार होता है. उस समय भी ब्राह्मण को  भोज और दक्षिणा के लिए आमंत्रित किया जाता है.’5

उपनयन के बाद भी अनेक संस्कार थे, जिनसे हिंदुओं को गुजरना पड़ता था. सामाजिक संबंध और मर्यादाओं के निर्वहन के लिए बहुत जरूरी था. ‘किसान का कोड़ा’ में फुले ऐसी कई स्थितियों का वर्णन करते हैं, जिनमें पुरोहित द्वारा यजमान को डराकर, प्रलोभन देकर तरह-तरह से धन ऐंठते रहते थे. अधिकांश के लिए वही जीवन है. धर्म, संस्कृति और परंपरा के नाम पर वे अत्याचार को चुपचाप सह लेते हैं. लोगों को धर्म और ईश्वर का भय दिखाना पंडित का पुश्तैनी धंधा है. उस को जमाए रखने के लिए वह नए-नए देवता गढ़ता है. कर्मकांड की अमर-बेलि चढ़ाता है. परंपराओं का मनमाना विश्लेषण तो आम बात है. हालात जो भी हों, धर्म लोगों के विवेक पर पर्दा डालता है. लोगों की अज्ञानता तथा धर्म के बहाने भीतर पैठाए गए डर की मदद से पंडित पूरे समाज पर राज करता आया है. जनसंख्या की दृष्टि से वह अल्पसंख्यक है. मगर संगठन के आधार पर सबसे ताकतवर. अनगिनत जातियों, उपजातियों में विभाजित शूद्र-अतिशूद्र संख्या-बहुल होकर भी शक्ति-विपन्न बने रहते थे. दूसरी ओर ब्राह्मण के मुंह से निकले प्रत्येक शब्द को ज्ञान मान लिया जाता था. लोकश्रुति के अनुसार रामानंद नहीं चाहते थे कि कबीर को दीक्षा दें. मगर धुन के पक्के कबीर बनारस के गंगा घाट की सीढ़ियों पर जाकर लेट गए. रामानंद का वहां से रोज आना-जाना था. उस दिन घाट की सीढ़ियों से गुजरते रामानंद का पैर कबीर से टकराया. मुंह से निकला—‘राम-राम.’ अनायास निकले उन शब्दों को ही कबीर ने गुरुमंत्र मान लिया. यह कहानी समाज की मानसिकता को दर्शाती है. भला कबीर जैसे औघड़ ज्ञानी को ब्राह्मण गुरु की क्या आवश्यकता थी! इसकी आवश्यकता तो उन चेले-चपाटों को थी, जिन्होंने कबीर को गुरु बनाकर मठ स्थापित किए थे. लोग मठों को पूजें, उनके शिष्यत्व को स्वीकारें इसके लिए कबीर को गुरु परंपरा के प्रति समर्पित दिखाना जरूरी था.

परिवर्तन की आहट उनीसवीं सदी के आरंभ में ही मिलने लगी थी. जून 1818 में पेशवा बाजीराव द्वितीय द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी के आगे आत्मसमर्पण के साथ पेशवाई का अंत हो चुका था. उस लड़ाई में अछूत सैनिकों की बड़ी भूमिका थी. उनके लिए वह अस्मिता और आत्मसम्मान की लड़ाई थी. इसलिए ईस्ट इंडिया कंपनी के मात्र आठ सौ सैनिक बाजीराव द्वितीय के लगभग 28000 सैनिकों पर भारी पड़े थे. उसके साथ ही देश का अधिकांश हिस्सा ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन हो चुका था. तीस करोड़ भारतीयों का कुछ हजार अंग्रेजों के अधीन हो जाना शर्म की बात थी. परंतु धर्म, जाति, क्षेत्रीयता के आधार पर बंटे समाज के लिए तो यह नियतिबद्ध जैसा था. उससे पहले भी कई बार ऐसा हो चुका था. सत्तापक्ष से असंतुष्ट लोग स्वार्थ के वशीभूत हो, विदेशी आक्रामकों का साथ देते आए थे. कुछ ऐसे लोग भी अंग्रेजों के समर्थन में थे, जो योरोप की औद्योगिक क्रांति से प्रभावित थे. उनमें से अधिकांश के वाणिज्यिक हित अंग्रेजों से जुड़े थे. उस समय तक भारतीय उद्योग असंगठित था. व्यापारी वर्ग उत्पादों को देश-देशांतर तक पहुंचाने का काम करता था. अंग्रेजों के आने से इस वर्ग की महत्त्वाकांक्षाएं बढ़ी थीं. व्यापारियों के कंपनी के समर्थन में आने का सीधा असर रजबाड़ों की अर्थव्यवस्था पर पड़ा था. वे विरोध का सामर्थ्य गंवा चुके थे. शूद्रों-अतिशूद्रों के लिए पेशवाई का पराभव मुक्ति-संदेश जैसा था. उधर ‘चार्टर अधिनियम-1813’ के अनुसार देश की बागडोर अप्रत्यक्ष रूप से इंग्लेंड के हाथों में जा चुकी थी. कंपनी के अधिकार घटे थे. चीन को चाय और अफीम आदि के निर्यात के अलावा बाकी मामलों में उसे ब्रिटिश संसद की मंजूरी लेनी पड़ती थी.

जन-सहानुभूति हासिल करने के लिए कंपनी ने चार्टर अधिनियम द्वारा जो व्यवस्था लागू की थी, वह भारतीय सभ्यता के तब तक के इतिहास में सबसे मौलिक एवं क्रांतिकारी थी. उसके दो प्रावधान शूद्रों तथा अतिशूद्रों के लिए विशेष महत्त्वपूर्ण थे. उनमें पहला था—सभी के लिए समान कानून, जिसने स्मृतियों की ब्राह्मणवादी व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया था. दूसरा था—सभी वर्गों के लिए समान शिक्षा. उसके लिए भारत से होने वाली आय में से न्यूनतम एक लाख रुपये आधुनिक शिक्षा पर खर्च करना. शूद्रों-अतिशूद्रों ने उनका जोरदार स्वागत किया था. उनके लिए वह परीकथाओं में दिखने वाले चमत्कार जैसा था. चेटरसन ने उसके बारे में लिखा है—‘महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि परीकथाओं में राक्षस होते हैं. महत्त्वपूर्ण यह जान लेना है कि राक्षस को पराजित किया जा सकता है.’ पेशवाओं की पराजय से उनका आत्मविश्वास बढ़ा था. लगने लगा था कि ब्राह्मणवाद अपराजेय नहीं है. उसे पराजित किया जा सकता है. आने वाला समय तो अवसरों के लाभ उठाने का था. समान शिक्षा और एक जैसा कानून भारतीय सभ्यता के ज्ञात इतिहास में अद्वितीय थे. युगांतरकारी बदलाव की नींव रखने वाले. अंग्रेजों से पहले इस देश में बड़े-बड़े सम्राट हुए. किसी ने भव्य मंदिर बनवाए, किसी ने किले. नाम चलाने के लिए किसी-किसी ने कुएं, बावड़ियां भी बनवाईं. यहां तक कि धर्मशाला और गौशाला के नाम पर भी खर्च किया जाता था. लेकिन शिक्षा  की जरूरत किसी ने भी नहीं समझी. नालंदा और तक्षशिला जैसे विद्यालयों के बारे में पढ़ना-सुनना किसी को भी रोमांचित कर सकता है. लेकिन वे उस कालखंड की निर्मितियां हैं, जब ब्राह्मण धर्म सबसे कमजोर था. ब्राह्मण वर्चस्व के दौर में शिक्षा  आश्रम-भरोसे बनी रही. आश्रमों में केवल उच्च वर्ग के विद्यार्थी प्रवेश पा सकते थे. क्षत्रियों और वैश्यों को भी उतना पढ़ाया जाता था जितना उनके काम के लिए आवश्यक हो. शूद्रातिशूद्रों के लिए शिक्षा  पर पूरा प्रतिबंध था. अगर वे पढ़ना चाहें तो उसके लिए दंड का घोषित विधान था. एकलव्य, कर्ण, शंबूक के किस्से आज भले ही ब्राह्मणवाद की आलोचना के काम आते हों, उन दिनों इनका उपयोग उसके महिमामंडन के लिए किया जाता था. अशिक्षित लोग मनमानी व्याख्याओं पर विश्वास भी कर लेते थे.

फुले कदम-कदम पर शिक्षा  की जरूरत पर बल देते हैं. बल्कि ऐसा कोई अवसर ही नहीं है जब शूद्र-अतिशूद्रों की अशिक्षा उनकी चिंता का विषय न रही हो. शूद्रों की अशिक्षा के लिए ब्राह्मण को ही जिम्मेदार माना है—

‘ऐसे दुष्ट लोगों को अध्यापक बनाते

बच्चे वे गैरों(सवर्णों) के ही पढ़ाते

स्वजाति के बच्चे(को) गलती करने पर बार-बार समझाते

शिक्षा  यत्नपूर्वक देते

परजाति के बच्चे गलती करते, थप्पड़-मुक्का मारते

जोर से कान ऐंठते

शूद्र बालक के मन को घायल करके भगा देते.’(पांवड़ा, शिक्षा  विभाग के ब्राह्मण अध्यापक)

नए कानून यथास्थितिवादियों की ओर से उसका भी विरोध भी हुआ. आरोप लगाया गया कि आधुनिक शिक्षा के नाम पर सरकार निचली जातियों का ईसाईकरण करना चाहती है. मगर सरकार को समाज के बहुसंख्यक वर्ग का समर्थन हासिल था. अंग्रेजी शासन को औचित्यपूर्ण सिद्ध करने के लिए उसे भारत के परंपरागत शासकों से अलग दिखना था. इसलिए सुधारवाद का सिलसिला आगे बढ़ता गया.

इन्हीं परिस्थितियों में फुले का जन्म हुआ. तारीख थी, 11 अप्रैल 1827. पिता फूलों के व्यवसायी थे. सुखी-समृद्ध परिवार था. मगर शूद्र के लिए आर्थिक समृद्धि सामाजिक मान-सम्मान का आधार नहीं बनती. फुले के पिता पारंपरिक विचारों के थे. अपने बुद्धि-विवेक से उन्होंने व्यापार को ऊंचाई तक पहुंचाया था. जो सहज प्राप्य था, वे उसी से खुश थे. किंतु बचपन से ही स्वाभिमानी फुले को उससे संतुष्टि न थी. फिर परिस्थितियां ऐसी बनती गईं कि उन्हें युग-निर्माण के ऐसे रास्तों पर उतरना पड़ा जहां पोंगापंथी ब्राह्मणों से सीधा टकराव था. एक घटना से फुले के सामने समाज में व्याप्त जाति-व्यवस्था का घिनौना रूप एकाएक सामने आ गया. पिता गोविंदराव की दुकान पर ब्राह्मण युवक मुंशीगिरी करता था. उसके साथ फुले की गहरी मित्रता थी. उसने फुले को अपने विवाह पर आमंत्रित किया. दूल्हे का मित्र होने के नाते विवाह के दौरान फुले हर आयोजन में उसके साथ थे. एक आयोजन में केवल ब्राह्मण हिस्सा ले सकते थे. यह बात न तो फुले को मालूम थी, न उनके मित्र ने बताया था. फुले सहज भाव से अपने मित्र का साथ दे रहे थे. इस बीच कोई देखते ही चिल्लाया—‘अरे! वह तो शूद्र है. उसे यहां किसने आने दिया?’ इसी के साथ चीख-पुकार मच गई. समाज का क्रूर जातिवादी चेहरा एकाएक सामने आ गया. किशोर ज्योतिबा को अपमानित होकर लौटना पड़ा. उस दिन उन्हें पता चला कि मनुष्य अपने बुद्धि-विवेक और परिश्रम से आर्थिक दैन्य को मिटा सकता है. लेकिन जाति का कलंक एक बार लग जाए तो उससे मुक्ति पाना असंभव है. जातिभेद का सामना डॉ. आंबेडकर को भी करना पड़ा था. उनके पिता सेना में सूबेदार थे. अछूत होने के कारण बालक आंबेडकर के साथ स्कूल में भेदभाव किया जाता था. यहां तक कि जब वे विदेश से खूब पढ़-लिखकर वापस लौटे तब भी मुंबई में उन्हें कोई कमरा देने वाला न था. एक पारसी महिला ने उन्हें कमरा दिया था. लेकिन जब उसे उनकी जाति के बारे में पता चला तो उसने तत्काल घर खाली करने का हुक्म सुना दिया. कार्यालय में चपरासी उन्हें पानी लाने में संकोच करता था. इन प्रसंगों के बारे में दलित साहित्य का विद्यार्थी भली-भांति जानता है. महसूस करता है. क्योंकि वे स्वयं ऐसे ही उत्पीड़न को झेलकर बड़े हुए हैं. जातीय भेदभाव की वह न तो पहली घटना थी, न ही आखिरी. लेकिन स्वाभिमानी फुले को जो उससे चोट पहुंची वह बड़ी थी. पेशवाई शासन की क्रूरता के बारे में सुनते आए थे. अब वह नहीं था. कानून की निगाह में अब सभी बराबर थे. लेकिन लोगों की मानसिकता ज्यों की त्यों थी. आखिर क्यों? फुले ने न केवल इसे समझा, बल्कि उसके समाधान के लिए आगे बढ़कर पहल भी की.

इसके अतर्निहित कारण को समझना बहुत मुश्किल भी नहीं था. अंग्रेज इस देश के शासक बन चुके थे. शासन कैसे चलाया जाएगा, मागदर्षक सिद्धांत कौन-से होंगे—इसकी लिखित व्यवस्था थी. अशिक्षित शूद्रों के लिए उन्हें समझना भी कठिन था. इसलिए वे उनके किसी काम के न थे, जब तक उसे समझ न सकें. ब्राह्मण पढ़-लिख सकते थे, इसलिए जोड़-तोड़ द्वारा स्वार्थ-सिद्धि का कोई न कोई उपाय वे खोज ही लेते थे. न हो तो शास्त्रों का हवाला देकर अपना उल्लू सीधा करते रहते थे. फुले समझ चुके थे कि दलितों की दुर्दशा का कारण गरीबी न होकर अशिक्षा  है. नए प्रावधानों का लाभ उठाते हुए उन्होंने स्कूल-कॉलेज खोले. मुश्किलें वहां भी थीं. स्कूल चलाने के लिए अध्यापकों की आवश्यकता थी. उस समय के अधिकांश अध्यापक ब्राह्मण थे. उनके लिए शूद्रों की शिक्षा-दीक्षा निषिद्ध और धर्म-विरुद्ध कर्म था. फुले द्वारा स्थापित स्कूलों में अध्यापन के लिए वे भला क्यों तैयार होते! कहते हैं, जहां चाह वहां राह. दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे बाधाएं सिर झुकाए मौन समर्पण कर देती हैं. फुले ने अपनी पत्नी को तैयार किया. सावित्री बाई फुले की देखा-देखी दूसरी महिलाओं में भी उत्साह जगा. दबंगों के भय से फुले के परिजनों ने उन्हें घर से निष्कासित कर दिया था. उस मुश्किल घड़ी में फातिमा शेख और उसके पति उस्मान शेख सामने आए. उन्होंने फुले दंपति को रहने के लिए आश्रय दिया. फातिमा शेख ने घर-घर जाकर माता-पिताओं को प्रोत्साहित किया कि वे अपनी लड़कियों को स्कूल भेजें. उसके लिए यथास्थितिवादियों का विरोध सहा. वैसे भी राष्ट्र निर्माण की राह आसान नहीं होती. समाज सुधार की दिशा में फुले द्वारा किए जा रहे कार्यों से यथास्थितिवादी बेहद नाराज थे. पेशवाई के पराभव से वे हताश  अवश्य थे, लेकिन पीठ पीछे हमला करने, नए-नए षड्यंत्र रचने में उनका कोई सानी न था. ऐसे ही षड्यंत्रकारियों ने एक बार फुले पर जानलेवा हमले की योजना बनाई थी. फुले सावधान थे. उस समय तक महार और मांग फुले के साथ आ चुके थे. विरोधियों के सामने पीछे हटने के अलावा दूसरा कोई रास्ता ही नहीं था.

धीरे-धीरे शिक्षा  के क्षेत्र में सफलता मिलने लगी. मगर दूसरी समस्याएं सिर उठाए थीं. सती-प्रथा दबे-छिपे रूप में जारी थी. बिना दांपत्य संबंधों के जन्मी संतान की देखभाल का भी मसला था. लोकलाज से बचने के लिए स्त्रियां ऐसे बच्चों को जन्म लेते ही मार देती थीं. आड़े वक्त में परिजन मदद से हाथ खींच लेते थे. समस्या को देखते हुए फुले ने प्रसूतिग्रहों की स्थापना की. सामाजिक दृष्टि से अवैध कहे जाने बच्चों की देखभाल के लिए शिशु सदन खोले. उनमें किसी भी धर्म, जाति की महिलाएं जा सकती थीं. लोकलाज के भय से नवजात शिशु को अपने साथ न ले जाना चाहे तो शिशु-सदन उसकी देखभाल करता था. अंतरजातीय विवाहों को बढ़ावा देना भी क्रांतिकारी कदम था. सबसे बड़ी समस्या रूढ़ियों की थीं. समाज धर्म के नाम पर तंत्र-मंत्र और कर्मकांडों में फंसा हुआ था. पुजारी लोगों को तरह-तरह से भरमाकर, लूटने में लगा रहता था. फुले ने अपने समाज को जाग्रत करना शुरू किया. धार्मिक कर्मकांडों की निस्सारता पर खुलकर लिखा. सभाएं कीं. इश्तहार निकाले. इससे ब्राह्मण समाज उनसे नाराज रहने लगा. यहां तक कि जानलेवा हमला भी उनपर किया गया. उस समय तक महार और मांग युवकों का संगठन फुले के समर्थन में आ चुका था. इससे षड्यंत्रकारियों के मनसूबे धरे के धरे रह गए.

समाज सुधार के क्षेत्र में फुले द्वारा किए जा रहे अनथक उपायों से प्रभावित होकर उच्च जातियों के उदारमना लोग भी उनके साथ समाज सुधार के क्षेत्र में आए थे. उनमें से कुछ को फुले ने अपनी स्कूल समितियों का सदस्य बनने का अवसर दिया था. इसे इरादों की कमजोरी कहिए या सामाजिक बहिष्कार की धमकी का डर, सवर्ण सदस्य बीच में ही अपनी राह बदल लेते थे. अक्टूबर 1853 के अंतिम सप्ताह में मुंबई में एक सभा का आयोजन किया था. उद्देश्य था हिंदू समाज की विकृतियों को दूर करना और उसके लिए आवश्यक सुधारवादी कार्यक्रम लागू करना. उसमें प्रगतिशील ब्राह्मणों को आमंत्रित किया गया था. सम्मेलन की अध्यक्षता के लिए पंडित गंगाधर आप्टे को चुना गया. जो उस समय सुधारवादियों में गिने जाते थे. आप्टे को ब्राह्मण समाज के विरोध का अनुमान था. इसलिए सभा में उपस्थित होने का आश्वासन देने के बावजूद वे नियत दिन गायब रहे. सम्मेलन की अध्यक्षता भवानी विश्वनाथ ने की. बैठक में परंपरावादी ब्राह्मणों ने सुधारवादी कार्यक्रमों का इतना जबरदस्त विरोध किया कि बैठक को बेनतीजा समाप्त करना पड़ा. यह अकेला उदाहरण नहीं है. ‘इन्हीलेशन आफ कास्ट’ में डॉ. आंबेडकर ने सवर्ण नेताओं की मानसिकता पर विस्तार से लिखा है. जाति-व्यवस्था के विरोध में फुले जहां सीधी बात कहते या संकेत-भर करते हैं, वहीं आंबेडकर अपनी मान्यताओं के समर्थन में अकाट्य तर्क जुटाते हैं. उन्हीं ग्रंथों से जिनके बल पर ब्राह्मण जनसाधारण को भरमाते आए थे. बावजूद इसके रचनात्मक कार्यों को देखा जाए तो फुले आंबेडकर के गुरु सिद्ध होते हैं.

सामाजिक न्याय के पक्ष में बढ़ते दबाव को देख कांग्रेस ने ‘सोशल कांफ्रेंस’ नामक संगठन का गठन किया था. वह संगठन केवल दिखावे के लिए था. सवर्ण नेता राजनीति में तो रुचि लेते थे, लेकिन सामाजिक परिवर्तन की ओर से मुंह मोड़े रहते थे. इसलिए कांग्रेस के अधिवेशनों में जहां नेताओं की भीड़ उमड़ पड़ती थी, वहीं ‘सोशल कांफ्रेस’ के पंडाल खाली रह जाते थे—‘जनता की उदासीनता देख नेताओं ने ‘सामाजिक सम्मेलन’ का विरोध करना आरंभ कर दिया. ‘सामाजिक सम्मेलन’ के अधिवेशन कांग्रेस के पंडाल में हुआ करते थे. मगर तिलक के विरोध के पश्चात कांग्रेस ने अपना पंडाल देना बंद कर दिया. दोनों के बीच नफरत इस कदर बढ़ी कि ‘सोशल कांफ्रेस’ ने जब अपना अलग पंडाल लगाना चाहा तो दूसरे पक्ष के नेताओं ने उसे जलाने की धमकी दे डाली. धीरे-धीरे ‘सोशल कांफ्रेस’ कमजोर पड़कर समाप्त हो गई.’(इन्हीलेशन आफ कास्ट : डॉ. आंबेडकर). 1892 में हुए ‘सोशल कांफ्रेस’ के अंतिम सम्मेलन में अध्यक्ष पद से बोलते हुए डब्ल्यू. सी. बनर्जी ने जो कहा, उससे कांग्रेसी नेताओं की मानसिकता को समझने में मदद मिल सकती है. कांग्रेस की भविष्य की राजनीति की झलक भी उसमें है, जिसे गांधी सहित उस समय के सभी बड़े नेता अपने आचरण और भाषणों में दोहराते रहते थे. बनर्जी ने कहा था—‘मैं उन लोगों से सहमत नहीं हूं जो कहते हैं कि जब तक हम सामाजिक पद्धति में सुधार नहीं कर लेते, तब तक हम राजनीतिक सुधार के योग्य नहीं हो सकते. मुझे इन दोनों के बीच कोई संबंध नहीं दीखता. क्या हम राजनीतिक सुधार के योग्य इसलिए नहीं हैं क्योंकि हमारी विधवाओं का पुनर्विवाह नहीं होता. और दूसरे देशों के सापेक्ष हमारी लड़कियां कम उम्र में ब्याह दी जाती हैं. या हमारी पत्नियां और पुत्रियां हमारे साथ मोटरगाड़ी में बैठकर हमारे मित्रों से मिलने नहीं जातीं? या इसलिए कि हम अपनी बेटियों को आक्सफोर्ड और कैंब्रिज नहीं भेजते.’(इन्हीलेशन आफ कास्ट : डॉ. आंबेडकर). वह परिवर्तन विरोधी वक्तव्य था, जो तत्कालीन कांग्रेसी नेताओं की मानसिकता को दर्षाता है. प्रकारांतर में वह सामाजिक न्याय की मांग को दबाए रखने का प्रयास था. अंग्रेजों द्वारा सामाजिक सुधार के लिए उठाए गए कदमों से भारतीय समाज का सवर्ण तबका खासा आहत था. उसके लिए देश की स्वयंप्रभुता इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं थी, जितनी सामाजिक यथास्थिति बनाए रखने की चाहत. इस संबंध में हमें 1942 में गांधी द्वारा ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ आंदोलन के समय दिए गए ऐतिहासिक भाषण को याद करना चाहिए. उस समय तक कांग्रेस यह मान चुकी थी कि अंग्रेज भारत छोड़ने वाले हैं. सुरक्षित खेल खेलने के अभ्यस्त गांधी ने अपने ‘करेंगे या मरेंगे’ भाषण में अंग्रेजों से भारत को जैसा है उसी हालत में छोड़कर चले जाने का आवाह्न किया था. ताकि शूद्रों और अतिशूद्रों की समाज-सुधार की मांग को, जिसे आरंभ से ही अंग्रेजों की सहानुभूति प्राप्त थी, किसी न किसी बहाने हमेशा-हमेशा के लिए टाला जा सके. जबकि फुले, आंबेडकर, पेरियार जैसे नेता आरंभ से ही जानते थे कि एक न एक दिन अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना पड़ेगा. इसलिए जब तक वे देश में हैं, तब तक सामाजिक परिवर्तन के लिए सबसे अनुकूल समय है. दलितों और शूद्रों को उसका लाभ उठाना चाहिए. उस समय तक भारत आधुनिकीकरण की ओर बढ़ चुका था. जनता सांप्रदायिक द्वेष को बिसराकर राष्ट्रीय हितों के लिए एक हो चुकी थी. ‘तृतीय रत्न’ नाटक का सूत्रधार फुले की इन्हीं भावनाओं को अभिव्यक्त करता है—

‘ब्राह्मणों ने शूद्र-अतिशूद्रों पर जो शिक्षा बंदी लगाई थी, उसको समाप्त करके, उनको शिक्षा का मौका प्रदान करके होशियार बनाने के लिए भगवान ने इस देश में अंग्रेजों को भेजा है. शूद्र-अतिशूद्र पढ़-लिखकर होशियार होने पर वे लोग अंग्रेजों का अहसान नहीं भूलेंगे. फिर वे लोग पेशबाई से भी सौ गुना ज्यादा अंग्रेजों को पसंद करेंगे. आगे यदि मुगलों की भांति अंग्रेज लोग भी इस देश की प्रजा का उत्पीड़न करेंगे तो शिक्षा प्राप्त  बुद्धिमान शूद्र-अतिशूद्र पहले जमाने में हुए जवांमर्द शिवाजी की भांति अपने शूद्र-अतिशूद्र राज्य की स्थापना करेंगे और अमेरिकी लोगों की तरह अपनी सत्ता खुद चलाएंगे. लेकिन ब्राह्मण-पंडों की दुष्ट और भ्रष्ट पेशवाई को आगे कभी आने नहीं देंगे. यह बात जोशी-पंडों को भली-भांति समझ लेनी चाहिए.’6 

नई शिक्षा ने अनेक सुधारवादी आंदोलनों को जन्म दिया था. फुले को धर्म से गुरेज न था. यहां तक कि कर्मकांड में भी हिस्सा ले सकते थे. बशर्ते उसमें पुरोहित की भूमिका कोई गैर-ब्राह्मण निभा रहा हो. सत्यशोधक की नियमावलि में इस बात पर जोर दिया गया था कि शूद्र-अतिशूद्र रूढ़ियों और कर्मकांडों का बहिष्कार करें. जिन कर्मकांडों को वे परंपरासम्मत और आवश्यक मानते हैं, उनमें ब्राह्मण पुरोहित की अनिवार्यता न हो. धर्म के नाम पर आंबेडकर की भी यही नीति थी. फुले को उम्मीद थी कि नई ज्ञान-चेतना से सराबोर हो शूद्र-अतिशूद्र पुरोहितों की चालबाजियों को समझेंगे और धर्म को किनारे कर देंगे. इसलिए उन्होंने हिंदू धर्म की आलोचना तो की लेकिन उससे बाहर आने का आवाह्न नहीं किया. बल्कि उस समय के सभी बड़े हिंदू नेताओं जिनमें तिलक भी थे, के साथ मिलकर काम करते रहे. आंबेडकर मान चुके थे कि हिंदू धर्म का बदलना नामुमकिन है. क्योंकि जैसे-जैसे स्वतंत्रता निकट आ रही थी, सांप्रदायिक शक्तियां निरंतर उग्र हो रही थीं. धार्मिक कूपमंडूकता में भी वृद्धि हो रही थी. फिर भी हिंदू धर्म में सुधार के लिए उन्होंने लंबी प्रतीक्षा की थी. पूरी तरह निराश होने के बाद ही बौद्ध धर्म स्वीकार किया था. उस समय तक राजा राममोहन राय और केशवचंद सेन के आंदोलन को 130 वर्ष गुजर चुके थे. इसके बावजूद सवर्ण नेताओं की मानसिकता में बहुत अधिक बदलाव नहीं आया था. उनका चिंतन अतीतोन्मुखी था. भारत के प्राचीन गौरव के नाम पर वे उन दिनों की बार-बार याद दिलाते थे, जो उनके हिसाब से ब्राह्मणवाद के चरमोत्कर्ष के दिन थे. ताकि उनके माध्यम से निरंतर कमजोर पड़ती जा रही वर्ण-व्यवस्था को पुनर्स्थापित किया जा सके. जबकि फुले और आंबेडकर के प्रयासों से शूद्रों एवं अतिशूद्रों के बड़े वर्ग में जागरूकता आ चुकी थी. डॉ. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म स्वीकार करके एक तरह से हिंदू धर्म का ही भला किया था. उस समय तक धर्मांतरण के माध्यम से समाजार्थिक स्वतंत्रता की चाहत रखने वालों के लिए इस्लाम और ईसाई धर्म सबसे लोकप्रिय हुआ करते थे. डॉ. आंबेडकर के धर्मांतरण के पश्चात इस्लाम और ईसाई धर्म की ओर अंतरण लगभग रुक-सा गया. हिंदू धर्म से उत्पीड़ित-हताश लोग बौद्ध धर्म को अपनाने लगे. फलस्वरूप भारतीय बौद्ध धर्म जो मूल का था, चलन में आ गया.

फुले का जिक्र हो तथा उनकी पुस्तकों ‘गुलामगिरी’ तथा ‘किसान का कोड़ा’ उल्लेख से वंचित रह जाए—यह नामुमकिन है. यूं तो उनकी सभी पुस्तकें बेमिसाल हैं. वे उनके चिंतन और रचनात्मक कार्यों की एकता को दर्शाती हैं. इनमें वे अपने विचारों को एकीकृत रूप में प्रस्तुत करते हैं. लेकिन ये दोनों पुस्तकें उनके चिंतन और कर्म का प्रतिनिधि संग्रह कही जा सकती हैं. पांच छोटे-छोटे अध्यायों में फैली ‘किसान का कोड़ा’ में उन्होंने व्यापारियों द्वारा किसान और शिल्पकार वर्ग के बहुविध शोषण का खुलासा किया है. उनमें धर्म और संस्कृति के नाम पर ब्राह्मणों द्वारा शोषण तो शामिल है ही, मंडी में बिचैलियों द्वारा किसानों की ठगी पर भी उनकी नजर गई है. इस पुस्तक में फुले ने अंग्रेजी राज्य की खुलकर प्रशंसा की है. उसे पेशवाई शासन से श्रेेष्ठ बताया है. इसके साथ-साथ ही उन अंग्रेज अधिकारियों की आलोचना भी की है जो अपनी काहिली या ब्राह्मणों के प्रभाव में आकर अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़े रहते हैं. योरोप की औद्योगिक क्रांति की प्रशंसा करते हुए उन्होंने अंग्रेजों की यह कहकर आलोचना की है कि वे भारतीय प्रजा से धन ऐंठकर अपने मुल्क पहुंचाने में लगे रहते हैं. इस विषय पर दादा भाई नौरोजी ने भी लिखा है. उनका प्रसिद्ध भाषण ‘पावर्टी इन इंडिया’ 1876 का है, जबकि ‘किसान का कोड़ा’ 1882 में लिखी गई. फुले पर नौरोजी का कितना प्रभाव था, यह बता पाना तो कठिन है, लेकिन इससे इतना साफ हो जाता है कि उस समय तक अंग्रेजों की व्यापार नीति की आलोचना होने लगी थी. ‘किसान का कोड़ा’ में फुले उसे अपनी शैली में प्रस्तुत करते हैं. नौरोजी की पुस्तक जहां अर्थशास्त्रीय महत्त्व रखती है, वहीं फुले अंग्रेजों द्वारा देश के आर्थिक शोषण के साथ-साथ वर्गीय शोषण को भी उठाते हैं. इसलिए ‘किसान का कोड़ा’ का अर्थशास्त्र के साथ-साथ समाज-वैज्ञानिक महत्त्व भी है. पुस्तक से फुले की व्यापक दृष्टि का भी पता चलता है. खेती के विकास के लिए वे बांध बनाने, नए बीज अपनाने, बिचौलिए दुकानदारों पर पाबंदी लगाने, यहां तक कि किसानों के प्रशिक्षण की मांग भी सरकार से करते हैं. वे बौद्ध धर्म तथा उसके अनुयायियों की प्रशंसा करते हैं.

व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता की मांग करते हुए मार्टिन लूथर किंग ने कहा था—‘मैं मानता हूं कि सभी मनुष्य एक समान हैं. मेरा एकमात्र सपना है कि मेरे छोटे-छोटे बच्चे एक दिन ऐसे राष्ट्र के नागरिक होंगे जहां उनकी पहचान चमड़ी के रंग के बजाय उनके चारित्रिक गुणों के आधार पर तय की जाएगी.’ कुछ ऐसा ही सपना फुले का भी था. ‘गुलामगिरी’ और ‘किसान का कोड़ा’ दोनों में उन्होंने गणतंत्र की प्रशंसा की है. जूलिस सीजर की वे यह कहकर आलोचना करते हैं कि उसने अपने देश में गणतंत्र को कुचलकर सत्ता हासिल की थी. थाॅमस पेन का प्रभाव भी उनपर था. आगे चलकर आंबेडकर ने भी हिंदू प्रतीकों और मिथों की आलोचना की. काफी सोचने-समझने के बाद उन्होंने बौद्ध धर्म को स्वीकार किया. संविधान के माध्यम से वे भारत में गणतंत्र के प्रस्तोता बने. ‘किसान का कोड़ा’ में फुले ने बौद्ध धर्म तथा गणतंत्र की जैसी प्रशंसा की है, उससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि अपने-अपने समय के इन दोनों महामानवों के बीच विचार और कर्म की दृष्टि से कितना ज्यादा साम्य था.

‘किसान का कोड़ा’ को पढ़ते हुए यह बात भी सामने आती है कि शूद्रों-अतिशूद्रों की मुख्य समस्या गरीबी नहीं है. असली समस्या गरीबी के कारण को न समझ पाने की है. समाज के प्रमुख उत्पादक शिल्पकार और किसान हैं. लेकिन अपनी आय को अपनी मर्जी से खर्च करने का सत्साहस उनमें नहीं है. उनकी आय का बड़ा हिस्सा धार्मिक-सामाजिक कर्मकांडों पर खर्च होता है. आड़े समय पर किसानों को कर्ज लेना पड़ता है. फसल के समय महाजन और बिचैलिए उनकी फसल का बड़ा हिस्सा हड़प लेते हैं. जो बचता है, उसे भी अपनी मर्जी से, अपने विकास के लिए खर्च करना, उनके लिए संभव नहीं होता. शादी-विवाह, श्राद्ध, मुंडन, उपनयन जैसे अनेक संस्कार हैं, जो बेहद खर्चीले, मगर पूरी तरह अनुत्पादक हैं. वे लोगों की आर्थिक विपन्नता और बौद्धिक विकलांगता दोनों को बढ़ाते हैं. सामाजिक व्यवस्था ऐसी है कि व्यक्ति इनके चंगुल से निकल ही नहीं पाता. शिक्षा के अभाव में आम आदमी वही करता है, जो पुरोहित उन्हें बताता है. उसकी मानसिक संरचना पष्चगामी है. ‘तृतीय रतन’ नाटक में ब्राह्मण पुरोहित द्वारा अशिक्षित जनता के बहुआयामी शोषण को दर्शाया गया है. यह नाटक बताता है कि ब्राह्मण पुरोहित अशिक्षित जनता को कदम-कदम पर किस तरह भरमाते हैं. धर्म और अनीति का भय दिखाकर उनका धन लूटने में लगे रहते हैं. कोई ऐसा सामाजिक अनुष्ठान नहीं है जिसमें ब्राह्मण की मौजूदगी और उसके द्वारा दान-दक्षिणा के नाम पर गरीब जनता से धन न ऐंठा जाता हो. धर्म के नाम पर उन्हें इतना डराया जाता है कि कर्ज लेकर भी कर्मकांडों में लिप्त रहते हैं. इस उम्मीद से कि अंततः देवता उनपर कृपा करेगा. फिर उनके सारे दलिद्दर नष्ट हो जाएंगे. होता इसका उलटा है. दुख-दलिद्दर तो मिटना तो दूर, महाजन का कर्ज सिर पर चढ़ जाता है. उसे चुकाने के लिए वे जमींदार के घर बेगार करते रहते हैं. संक्षेप में ‘किसान का कोड़ा’ भारतीय किसान और मजदूर के जीवन का सबसे प्रामाणिक दस्तावेज है.

फुले की दूसरी महत्त्वपूर्ण पुस्तक का पूरा शीर्षक है—‘गुलामगिरी’ (ब्राह्मणधर्म की आड़ में होने वाली). छोटी-सी पुस्तिका को उन्होंने ‘संयुक्तराष्ट्र के सदाचारी जनों को जिन्होंने गुलामों को दासता से मुक्त करने के कार्य में उदारता, निष्पक्षता और परोपकार वृत्ति का प्रदर्शन किया था, के लिए सम्मानार्थ समर्पित’ किया गया है. भारत में इसे अपने विषय की इकलौती पुस्तक; जिसे आधार पुस्तक भी कहा जा सकता है. ‘सांस्कृतिक वर्चस्ववाद’ के विरुद्ध संघर्ष के इतिहास में इस पुस्तक का ठीक वही स्थान है, जो दुनिया-भर के मजदूर आंदोलनों के इतिहास में ‘कम्यूनिस्ट मेनीफेस्टो’ का है. धर्म के नाम पर फैलाए गए आडंबरों तथा निरर्थक कर्मकांडों का विरोध संत रविदास और कबीर ने भी किया था. उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए फुले ‘गुलामगिरी’ के माध्यम से उन मिथों पर सीधे प्रहार करते हैं, जो शताब्दियों से जनसमाज की बौद्धिक विकलांगता का कारण बने थे. जो छोटी-छोटी बात पर शूद्रों, अतिशूद्रों को ब्राह्मणों पर निर्भर बनाते थे. उनकी मदद से ब्राह्मण शिखर की दावेदारी करते हुए शेष तीनों वर्गों को अपना दासानुदास बनाए रखता था. वर्ण-व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण इस पृथ्वी के समस्त सुख-साधनों का एकमात्र स्वामी-संरक्षक है. क्षत्रिय का कर्तव्य उसकी रक्षा करना, वैश्य का धर्म कमा कर देना है. शूद्र-अतिशूद्रों के लिए मात्र ‘निष्काम सेवा’ निर्धारित है. पूजा-पाठ जैसे अनुत्पादक कार्यों के लिए मुंह-मांगी दक्षिणा लेना ब्राह्मण का एकाधिकार मान लिया जाता है. मजदूर अपने श्रम का मूल्यांकन स्वयं करना चाहे तो शास्त्र-विरुद्ध कहकर उसकी मांग को दबा दिया जाता है. क्षत्रिय और वैश्य ब्राह्मण के शीर्षत्व को स्वीकार करके संपत्ति के संरक्षक-संग्राहक बन सकते हैं. परंतु चौथे वर्ण को संपत्ति रखने का भी अधिकार नहीं है. इस वर्ग को जिसमें किसान, शिल्पकार, मजदूर आदि आते हैं, जिन्हें मार्क्स ने प्रमुख उत्पादक शक्ति माना है. बुद्धकालीन भारत में उनका यह स्थान और अपेक्षित मान-सम्मान सुरक्षित था. ब्राह्मण प्रभुत्व वाला तंत्र उन्हें न केवल वर्ण-विशेष के दायरे में कैद कर देता है, अपितु आजीविका के चयन के अधिकार के साथ-साथ उनसे श्रम और श्रमोत्पाद संबंधी समस्त अधिकार छीन लेता है. उत्पादक वर्ग विरोध न करे, उसके लिए जन्म-पुनर्जन्म, कर्मफल और पाप-पुण्य जैसी पश्चगामी व्यवस्थाएं हैं. ‘अवतारवाद’ की सैद्धांतिकी इन्हें पुष्ट करने के लिए ही गढ़ी गई है. ‘गुलामगिरी’ के माध्यम से फुले इसी पर प्रहार करते हैं.

‘गुलामगिरी’ संवाद की शैली में लिखी गई पुस्तक है. यह उन दिनों की प्रचलित शैली थी. यह जानते हुए कि अनपढ़ जनता प्रतीकों और मिथों से ही प्रेरणा लेती है, उन्हीं का हवाला देकर ब्राह्मणादि सवर्ण खुद को देव-सभ्यता का उत्तराधिकारी मानते आए हैं; तथा कुछ गिने-चुने मिथ शूद्रों-अतिशूद्रों की शारीरिक-मानसिक दासता का कारण हैं—फुले उनकी जड़ पर प्रहार करते हैं. आर्य बाहर से आए थे. यह उन दिनों स्थापित सत्य था. मैक्समूलर, विंसेंट स्मिथ, रिस डेविस, जॉन मार्शल जैसे विद्वानों का यही विचार था. इस दृष्टि से ब्राह्मणों को विदेशी मूल का बताना फुले की मौलिक स्थापना नहीं थी. मौलिक था, वाराह, कच्छप, नरसिंह जैसे कथित अवतारों के विवेचन से उस ऐतिहासिकता की खोज करना जिसके पीछे आर्य-अनार्य संघर्ष की अनेक कहानियां छिपी हैं. मिथों में उलझकर उनका वास्तविक इतिहास कहीं लुप्त चुका है. अनेकानेक मिथों पर टिकी प्राचीन भारतीय संस्कृति की आलोचना करते हुए फुले उस इतिहास की झलक दिखाते हैं, जिसकी कालावधि के बारे में ठोस जानकारी भले ही न हो, मगर वह सत्य के अपेक्षाकृत करीब है. यह असल में कांटे से कांटा निकालने की कोशिश है. जो सच हो न हो, मगर अपने सरोकारों के आधार पर सच के बहुत करीब दिखता है. देरिदा को ‘विखंडनवाद’ का आदि व्याख्याता माना जाता है. फुले उसका प्रयोग ‘गुलामगिरी’ में देरिदा से लगभग एक शताब्दी पहले करते हैं. उसी को अपना प्रस्थान-बिंदू बनाकर डॉ. आंबेडकर हिंदू धर्म की जटिल पहेलियों की विवेचना करते हैं. दोनों के निष्कर्ष आधुनिक दलित-बहुजन विमर्श की आधार सामग्री हैं. भारतीय संदर्भ में ‘गुलामगिरी’ ‘सांस्कृतिक विखंडनवाद’ की पहली पुस्तक है; तथा फुले ब्राह्मणों के ‘सांस्कृतिक आधिपत्य’ को चुनौती देने वाले पहले बहुजन नेता. दक्षिण भारत में उनकी प्रेरणा द्रविड़ आंदोलन के रूप में फलीभूत होती है. पेरियार उनके संघर्ष को नई ऊर्जा और वैचारिक चेतना के साथ आगे बढ़ाते हैं. ‘गुलामगिरी’ में फुले ने हिंदुओं की अवतारवादी धारणा का जोरदार खंडन किया है. पुस्तक का महत्त्व इससे भी आंका जा सकता है कि ब्राह्मणवाद के विरोध में जिन सांस्कृतिक प्रतीकों तत्वों का हवाला दिया जाता है, लगभग वे सभी इसमें मौजूद हैं. कुल मिलाकर बहुजन दृष्टि से फुले भारत के पहले और मौलिक इतिहासकार हैं. इस पुस्तक के प्रथम संस्करण का मूल्य 12 आना था. निर्धन तथा शूद्रातिशूद्रों के लिए उसकी कीमत मात्र छह आना रखी गई थी. इसके पीछे भी फुले की दूरदृष्टि थी. उद्देश्य यही था कि जो गरीब तथा शूद्र-अतिशूद्र ‘गुलामगिरी’ को पढ़ना चाहते हैं, पैसे की कमी उसमें बाधा न बने.

फुले के समय तक सिंधु सभ्यता के बारे में जानकारी उजागर नहीं हुई थी. संस्कृत ग्रंथों से केवल यही तथ्य सामने आता है कि बाहर से आने वाली प्रजाति, जिसने स्वयं को ‘आर्य’ घोषित किया था, का स्थानीय प्रजातियों से जोरदार संघर्ष हुआ था. समुद्र और पहाड़ियों द्वारा सुरक्षित अनार्य अपेक्षाकृत सुख और शांतिपूर्ण जीवन जीने के अभ्यस्त थे. इसके प्रमाण सिंधू सभ्यता से प्राप्त हो चुके हैं. लाखों वर्ग किलोमीटर में फैली सिंधू सभ्यता के उत्खनन से पुरात्वविदों को भंडारगृह, बर्तन, सौंदर्य प्रसाधन सामग्री, मूर्तियां, मुद्राएं, अनाज, मापन यंत्र आदि प्राप्त हुए हैं, लेकिन हथियार के बारे में कोई प्रमाण नहीं मिला है. उस सभ्यता का पराभव 1750 ईस्वी पूर्व के आसपास प्राकृतिक कारणों से हुआ था. आर्यों के भारत पहुंचने(1500 ईस्वी पूर्व) तक वह नष्टप्रायः अवस्था में थी. बचे-कुुचे सिंधुवासी हतोत्साहित होकर जंगलों में बिखर चुके थे. असंगठित और  शांतिप्रिय अनार्यों को पराजित करना आसान था. अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए आर्यों ने स्थानीय निवासियों के दिमाग को कब्जाना शुरू कर दिया था. उन्होंने काल्पनिक नायक इंद्र को केंद्र बनाकर मंत्र रचे. उसे उन पुरों का विनाशक घोषित किया, जो उनके आगमन से शताब्दियों पहले खंडहरों में बदलने लगे थे. सिंधू सभ्यता के आरंभिक अध्येता सुप्रसिद्ध पुरातत्वविद् जॉन मार्शल ने अपनी पुस्तक ‘मोहनजोदड़ो एंड इंड्स सिविलाइजेशन’(1931) में एक अध्याय सिंधुवासियों की धार्मिक मान्यताओं पर शामिल किया है. मार्शल का शोध उस सभ्यता को भारत की जनसंस्कृति के करीब रखता है, जो निश्चय ही ब्राह्मणेत्तर संस्कृति थी. ये तथ्य यदि फुले के सामने होते तो वे उनका उपयोग निश्चित रूप से वर्चस्वकारी ब्राह्मण संस्कृति के विखंडन हेतु करते. जातीय श्रेष्ठता का दंभ आर्यों से तीन हजार वर्ष बाद आने वाले अंग्रेजों में भी था, लेकिन उसके मूल में योरोपीय पुनर्जागरण की बेमिसाल उपलब्धियां थीं. जिसमें मानवीय गरिमा और मान-सम्मान पर जोर दिया गया था. मशीन-केंद्रित उत्पादन प्रणाली सामंतवाद के अत्याचारों से मुक्ति का भरोसा दिलाती थी. इसलिए शताब्दियों से आर्थिक-सामाजिक विषमता का दंश झेल रही जातियों ने उनका स्वागत किया था. फुले अंग्रेजी शासन की प्रशंसा करते हैं. वहीं, आर्थिक-सामाजिक शोषण के शिकार वर्गों की स्वतंत्रता के लिए पर्याप्त कदम न उठाने के कारण वे उसकी आलोचना भी करते हैं.

फुले की रचनाएं सीधे संवाद करती हैं. उनकी भाषा किसान-मजदूर की खरखरी भाषा है. मराठी में प्रशस्ति काव्य को पावड़ा कहा गया है. फुले ने कई पावड़े लिखे हैं. लेकिन वे निरे प्रशस्ति काव्य नहीं है. उनके सरोकार मानवीय हैं और सामाजिक न्याय की भावना पर खरे उतरते हैं. शिवाजी की गौरवगाथा को याद दिलाता एक पावड़ा है. एक अन्य पावड़े में वे निर्माण विभाग के अधिकारी की रिश्वत के बारे में बात करते हैं. ब्राह्मण अध्यापक अछूत विद्यार्थियों के साथ पक्षपात करते हैं. उन्हें पढ़ाने से बचते हैं. फुले इसकी पोल खोलते हुए शिक्षा अधिकारी से निवेदन करते हैं कि वह शिक्षा विभाग में शूद्र और अतिशूद्र विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए इसी वर्ग के अध्यापकों की नियुक्ति करे. किसान की उपज का बड़ा हिस्सा मंडी में दलाल खा जाते हैं. इसलिए एक पावड़ा उसकी दुर्दशा की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए भी है. ‘गुलामगिरी’ में परिशिष्ट के रूप में ‘ब्राह्मण कर्मचारी इंजीनियरिंग विभाग में किस प्रकार धांधली मचाते हैं’—इस विषय पर एक पांवड़ा दिया गया है, जिसमें उन्होंने ब्राह्मण कर्मचारियों की स्वार्थपरता और काहिली के साथ-साथ अंग्रेज अधिकारियों पर भी तंज कसा है—

‘ब्राह्मण बड़ी चतुराई करते. लिखने में कौशल दिखलाते. कुनबी को दिन-दहाड़े लूटते. हाजिरी-बही ले फैल(कार्यस्थल) पर जाते….फैल में जो हों शूद्र औरतें उनसे बरतन मंजवाते. बेगारी मजदूरों से फिर अपना बिस्तर हैं लगवाते. पागल से कुन्बी को पाकर उससे अपने पैर दबवाते. खूब मजे से खुर्राटे भरते. अपनी जात के बाम्हन को फैल पर काम को हैं ले जाते….किसान का लहू चूस-चूसकर मोटे-ताजे हैं बन जाते. जितना ये घी-शक्कर हैं उड़ाते, सब किसान के ऊपर.’

भाषा और अध्ययन की दृष्टि से डॉ. आंबेडकर फुले की अपेक्षा समृद्ध हैं. उनकी भाषा एक दार्शनिक और वैज्ञानिक की भाषा है. जो तर्क करती है; तथा उनके समर्थन में जरूरी प्रमाण भी देती है. फुले की भाषा की भांति उनके तर्क भी सीधे-सपाट हैं. डॉ. आंबेडकर का लेखन उनके विशद् अध्ययन का स्वतः प्रमाण है. ब्राह्मणवाद के विरुद्ध पिछड़े और दलित वर्गों में चेतना जगाने में फुले के लेखन का बड़ा योगदान है. उससे प्रेरणा लेकर दलित और पिछड़े समुदायों के सैकड़ों बुद्धिजीवी आगे आए. उन्होंने अनेकानेक आंदोलनों को जन्म दिया. सांस्कृतिक वर्चस्व से मुक्ति हेतु ग्राम्शी ने सर्वहारावर्ग से अपने बुद्धिजीवी पैदा करने का आवाह्न किया है. ऐसे चिंतक जिनकी मेधा स्वतंत्र हो, जो अभिजन बुद्धिजीवियों के मानसिक दास न हों. अपने विचार-कर्म से फुले, ग्राम्शी से आधी शती पहले ही इसे चरितार्थ करते नजर आते हैं. एक किसान की तरह वे भविष्य के दलित आंदोलन के लिए जमीन तैयार करते हैं.

फुले के समय भारतीयों, विशेषकर शूद्रों के लिए राजनीति में आने के अवसर कम थे. स्वयं फुले ने भी उस दिशा में कभी प्रयास नहीं किया. वे राजनीतिज्ञों यहां तक कि अंग्रेजों से भी दूरी बनाए रहे. निष्पक्ष बुद्धिजीवी की तरह जब आवश्यक समझा, तब अंग्रेजी शासन की प्रशंसा की और जहां कुछ आपत्तिजनक नजर आया, तत्काल आलोचना से भी बाज नहीं आए. राजनीति से प्रत्यक्ष संबंध न रखने के बावजूद शूद्रातिशूद्रों में संगठन और संघर्ष की प्रेरणा जगाने में फुले का योगदान अपने समकालीन किसी भी नेता से कहीं अधिक है. अच्छा शिष्य गुरु की शिक्षा  को ज्यों का त्यों नहीं अपनाता, बल्कि उसको निरंतर परिवर्धित-परिमार्जित करता जाता है. जिस आंदोलन को फुले खड़ा करते हैं, डॉ. आंबेडकर उसे और अधिक मजबूती, साहस, ईमानदारी और संकल्प के साथ आगे बढ़ाते हैं. अंततः अपनी अप्रतिम मेधा, अनथक संघर्ष तथा प्रतिबद्धता के बल पर उसे एक अंजाम तक पहुंचाने में सफल सिद्ध होते हैं. डॉ. आंबेडकर राजनीति की महत्ता को समझते थे. उन्होंने दलितों का आवाह्न किया कि अपने अधिकारों के लिए राजनीति में खुलकर हिस्सा लें. फुले के समय तक अस्मितावादी राजनीति का वातावरण नहीं बना था. वक्त की नजर और समाज की जरूरतों को पहचानते हुए उन्होंने खुद को सामाजिक सुधार तक सीमित रखा था. पहले पंद्रह वर्ष वे मुख्यतः शिक्षा-सुधार को समर्पित रहे. शूद्रातिशूद्र विद्यार्थियों के लिए स्कूल खोले. लेकिन राजनीति से दूरी बनाए रखी. डॉ. आंबेडकर राजनीति की ताकत तथा जरूरत को समझते थे. उनकी सक्रियता समाज और राजनीति, दोनों क्षेत्रों बराबर बनी रही.

अच्छा नागरिक के लिए अच्छे समाज का होना आवश्यक है; और एक अच्छा समाज ही अच्छे राज्य का गठन कर सकता है.  इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य का विवेक स्वतंत्र हो. प्रत्येक मनुष्य को अपने निर्णय खुद लेने की स्वतंत्रता हो. उसके लिए शिक्षा भी चाहिए और सहयोगपूर्ण वातावरण भी. इसी सपने के साथ फुले अपने आंदोलन की शुरुआत करते हैं. जिसे डॉ. आंबेडकर उसी निष्ठा एवं समर्पण के साथ आगे बढ़ाते हैं. आधुनिक भारत के निर्माण में दोनों की भूमिका अद्वितीय है. प्रतिक्रियावाद के इस दौर में जो लोग इन दोनों के योगदान को नकारने की कोशिश में हैं, उन्हें फ्रैड्रिक डगलस की यह चेतावनी याद रखनी चाहिए—‘जहां न्याय की अवमानना होती है, जहां जहालत और गरीबी है, जहां कोई भी समुदाय यह महसूस करे कि समाज सिवाय उसके दमन, लूट तथा अवमानना के संगठित षड्यंत्र के सिवाय कुछ नहीं है—वहां न तो मनुष्य सुरक्षित रह सकते हैं, न ही संपत्ति.’

ओमप्रकाश कश्यप

 संदर्भ:

1. Dhanajay Keer in Mahatama Jyotiba Phule

2.   इनहिलेशन आॅफ कास्ट, संतराम बीए द्वारा अनूदित, पृष्ठ 8.

3. Henry Verner Hampton in Biographical Studies of Education in India.

4. Dhanajay Keer in Mahatama Jyotiba Phule

5. Katherine Mayo, Mother India(1937), page 64.

6. तृतीय रत्न, नाटक, फुले, ज्योतिराव फुले रचनावली, अनुवाद डॉ. एल. जी. मेश्राम ‘विमलकीर्ति’ पेज—47

साम्यवाद, सामाजिक न्याय और राज्यᅳदो

सामान्य

साम्यवाद, सामाजिक न्याय और संस्कृति

 

न्याय एक वर्ग संख्या हैपाइथागोरस

मार्क्स ने मुख्यतः पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की विसंगतियों का विश्लेषण किया है. उसमें एक सिरे पर अनियोजित मशीनीकरण का शिकार श्रमिक वर्ग है, दूसरे पर पूंजीपति उत्पादक. उन दिनों चीन, रूस, ब्राजील आदि देशों की अर्थव्यवस्था की भांति भारतीय अर्थव्यवस्था भी कृषिकेंद्रित थी. इन सभी देशों ने वर्गसंघर्ष के सिद्धांत का प्रयोग स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार किया. जहां आवश्यक लगा, वहां संशोधन भी किया. भारत में ऐसा नहीं हो सका. जबकि मार्क्स तथा उसके वर्गसंघर्ष की सूचना यहां बहुत पहले पहुंच चुकी थी. बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में युवा क्रांतिकारी आजाद भारत के लिए वर्गसंघर्ष की अनिवार्यता को समझते थे. सोवियत संघ की ओर से उन्हें भरपूर मदद भी मिल रही थी. स्वामी विवेकानंद, डॉ. हरदयाल, रासबिहारी बोस, करतार सिंह सराबा, सोहन सिंह भखना आदि पर साम्यवादी विचारधारा का प्रभाव था. भगत सिंह तो लेनिन को अपना आदर्श मानते ही थे. आधुनिक भारत के निर्माताओं में प्रमुखतम स्थान रखने वाले डॉ. आंबेडकर की आरंभिक चेतना भी समाजवादी थी. दक्षिण में रामास्वामी पेरियार ने अपनी राजनीति साम्यवादी संगठनों के सक्रिय सदस्य के रूप में आरंभ की थी. उन दिनों सैकड़ों उत्साही युवा वर्गक्रांति का सपना देखते थे. उनमें से कुछ ने साम्यवाद को समझने के लिए सोवियतसंघ की यात्रा तक थी. उसकी तरफ से साम्यवादीक्रांति की कोशिश में जुटे युवाओं को आर्थिक मदद भी प्राप्त होती थी. देश में साम्यवाद के नाम पर राजनीतिक दल भी बने, लेकिन वे सभी प्रयास केवल राजनीतिक सत्ता हथियाने तक सीमित थे. परिणामस्वरूप हमारे यहां वर्गसंघर्ष की वैसी स्थिति कभी नहीं बन सकीं, जिस तरह बाकी देशों में, जिनका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है. जिन प्रांतों में वर्षों तक साम्यवादी दलों की सरकारें रहीं, वहां भी न तो धर्म को राजनीति से पूरी तरह अलग किया गया, न जाति को किसी प्रकार की चुनौती पेश की गई. न ही वर्गहीन समाज की स्थापना के विशेष प्रयास किए गए. परिणामतः जातिधर्म के चक्रब्यूह में बुरी तरह फंसा भारतीय ‘सर्वहारा’, वर्गचेतना से दूर बना रहा. वह वर्चस्वकारी संस्कृति से इतना अनुकूलित रहा कि उससे बाहर निकलने के विचारमात्र से उसे अपने अस्तित्व पर संकट नजर आने लगता था.

जातिव्यवस्था के शिखर पर ब्राह्मण और उसके आजूबाजू क्षत्रिय और वैश्य रहे हैं. चौथे यानी अंतिम पायदान पर शूद्र. उनकी स्थिति उन मजदूरों से भी कहीं अधिक दयनीय थी, जिन्हें मार्क्स ने अपने विशद ग्रंथ पूंजी में ‘सर्वहारा’ से संबोधित किया था. ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने श्रमिकोंमजदूरों और मेहनतकश जिंदगी जीने वाले छोटेकिसानों, शिल्पकर्मियों को छोटेछोटे जातिसमूहों में बांट दिया है. शूद्र को उसकी सेवा का वास्तविक मूल्य देने के बजाय, स्वर्गादि के प्रलोभन से बहला दिया जाता है. इसलिए संख्या में प्रथम तीन वर्गों से चार गुना होने के बावजूद वे कोई परिवर्तनकारी शक्ति नहीं बन पाते. उनके हित पहले भी एकदूसरे से टकराते थे, आज भी टकराते हैं. परिणामस्वरूप उनकी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा आंतरिक संघर्ष में खपता रहता है. इसका एकमात्र समाधान था कि शूद्रों में वर्गीय चेतना का विस्तार किया जाए. मगर गांधी सहित लगभग सभी कांग्रेसी नेता शूद्रों में वर्गीय चेतना उभारने के बजाय उन्हें हालात से संतोष करने की सलाह देते थे. सामाजिक मोर्चे पर गांधी का समूचा आंदोलन यथास्थिति बनाए रखने तक सीमित था. व्यवस्था परिवर्तन की यदि कोई मांग भी करे तो वे तत्क्षण विरोध पर उतर आते थे. गांधी के अनुसार पाखाना साफ करने का काम दैवीय अनुभव था. ठीक यही बात हमारे आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी पुस्तक ‘कर्मयोग’(2007) में दोहरा चुके हैं. कुल मिलाकर मार्क्स ने जिन परिस्थितियों को वर्गसंघर्ष के लिए जरूरी माना है, उसकी जो कसौटियां तय कीं हैं, भारत में उससे कहीं त्रासद हालात होने के बावजूद यहां क्रांति की बात करना, दिवास्वप्न बना रहा. निम्नस्थ वर्गों में वर्गीय चेतना की कमी, शीर्षस्थ वर्गों के उत्पीड़न और अत्याचारों को स्थायी बनाती है. उसके अभाव में बहुसंख्यक वर्ग छोटेछोटे टुकड़ों में बंटकर अपनी प्रभावी क्षमता को नष्ट करता रहता है.

ऊपर से सत्तासीन अभिजन द्वारा यथास्थिति बनाए रखने की कूटनीतिक चालें. जो कभी दान, कभी सहयोग, तो कभी न्याय के नाम पर अपनी आय का एक हिस्सा उन कार्यों पर खर्च करता है, जिनके माध्यम से बहुजन को निरंतर भुलावे में रख सके. उन्हें लगे कि वर्तमान व्यवस्था ही उनके लिए सर्वाधिक हितकारी और श्रेयस्कर है. यथास्थिति बनाए रखने के लिए शक्तिशाली अभिजन अनेक रणनीतियां अपनाता है. भारतीय संस्कृति के संदर्भ में उसका भावप्रवण नारा हैᅳ‘अनेकता में एकता.’ जनाक्रोश से बचने के लिए अल्पसंख्यक अभिजन प्रायः इस तर्क के माध्यम से भारतीय संस्कृति का महिमामंडन करता है कि तमाम भिन्नताओं के बावजूद भारतीय संस्कृति में एकता के तत्व समाहित हैं. स्कूलों में बच्चों को यह पाठ शुरुआत से ही पढ़ाया जाता है. इस नारे के साथ भारतीय समाज के अंतर्विरोधों तथा उस उत्पीड़न की ओर से आंखें मूंद ली जाती हैं, जिसका सामना बहुजन समूह शताब्दियों से करते आए हैं. प्रकारांतर में ‘अनेकता में एकता’ का मिथ सांस्कृतिक शोषण का शिकार रहे लोगों के लिए बोझ बन जाता है. चूंकि सांस्कृतिक प्रतीक आस्था और विश्वास के रास्ते जीवन में जगह बनाते हैं, उन्हें तर्क और संशय से प्रायः परे रखा जाता हैइस कारण उनसे निपटना आसान नहीं होता. दूसरी ओर अल्पसंख्यक अभिजन यथास्थिति बनाए रखने के लिए हर समय यथाशक्ति प्रयत्नशील रहते हैं. संस्कृति के शोषणकारी तत्वों का वे मिथों के माध्यम से निरंतर महिमामंडन करते रहते हैं. आवश्यकता पड़ने पर नए मिथ गढ़ना अथवा लोकप्रचलित मिथों की स्वार्थानुकूल व्याख्या करना उनकी पुरानी आदत है. वौद्धिक स्तर पर शीर्षस्थ जातियों पर पूरी तरह निर्भर बहुजन समुदाय, इन चालाकियां को समय रहते समझ नहीं पाता; और अपनी अज्ञानता के कारण ‘अनेकता में एकता’ की भ्रांति को सच माने रहता है.

वर्गचेतना, वर्गसंघर्ष की प्रथम और अनिवार्य शर्त है. जातिभेद का शिकार रहे, दैवीयअनुकंपा की आस में जीने वाले तथा शोषण को अपनी नियति मान चुके भारतीय समाज में शुरू से ही इसका अभाव रहा है. सांस्कृतिक एकता की दुहाई भजनकीर्तन, पूजापाठ जैसे अनुत्पादक तरीकों, त्योहारों तथा उन सामान्य रीतिरिवाजों के माध्यम से दी जाती है, जो विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच एकदूसरे के साथ रहते, साथसाथ काम करते हुए स्वाभाविक रूप से एकदूसरे समूह के बीच चले आते हैं. इसके बहाने अल्पसंख्यक अभिजन आसानी से उन प्रतीकों को थोपने में सफल हो जाता है, जो वर्गीय असमानता तथा अल्पसंख्यक शीर्षस्थ अभिजन की सामाजिकसांस्कृतिक श्रेष्ठता के मिथ को, बहुजन के मानस पर स्थापित करते हैं. गांवों में दिवाली से चार दिन पहले कुम्हार घरघर दिये पहुंचाता है. यत्न से दीपक बनाने, घरघर पहुंचाने के बावजूद कीमत वही मिलती है, जो यजमान तय करता है. अपने ही श्रमोत्पाद का मूल्यांकन करने का अधिकार कुम्हार को नहीं होता. होली को समसरता का त्योहार माना जाता है. कहा जाता है कि सारे वर्गभेद होली के रंगों में बह जाते हैं. असल में ऐसा नहीं है. उस दिन भी पुजारी पूजापाठ करता है, बढ़ई लकड़ियां चीरता है और कुम्हार हमेशा की तरह घरघर मिट्टी के बर्तन सप्लाई करता है. यही स्थिति बाकी त्योहारों की भी है. इन विसंगतियों को प्रायः सहजीवन और समरसता, जिन्हें समाज में समानता के पूरक के रूप में पेश किया जाताके नाम पर पचा लिया जाता है. जाहिर है भारतीय संस्कृति को लेकर ‘अनेकता में एकता’ का मिथ भ्रम अथवा भावुक अवधारणा से इतर कुछ भी नहीं है. जाति और वर्ण के आधार पर असमानता को नैसर्गिक मान लेने वाली भारतीय संस्कृति, मूलतः वर्चस्वकारी संस्कृति है. उसे मुट्ठीभर लोगों की मर्जी से, उन्हीं के द्वारा, उन्हीं की स्वार्थसिद्धि के लिए कायम रखा गया है. सांस्कृतिक अंतर्विरोधों एवं तज्जनित असंतोषों को नकारने की बात, मूलतः सामाजिक यथास्थिति बनाए रखने की चाहत है. यह काम वही लोग करते हैं, जिन्हें इस संस्कृति ने असीमित विशेषाधिकार देकर अपने सिर पर सवार रखा है. बहुजन समूहों की अज्ञानता, आपसी स्पर्धा और दूसरों के लिए श्रम करने की प्रवृत्ति ने उन्हें शक्तिशाली बनाया हुआ है.

अनेकता में एकता’ की दावेदार भारतीय संस्कृति में अंतर्विरोधों की भरमार है. इसलिए उसमें अंतर्संघर्ष भी हैं. वैदिक काल में उसे आजीवकों, लोकायतियों, वैनायिकों, चार्वाकों जैसे भौतिकवादी चिंतकों की ओर से चुनौती मिलती थी. कालांतर में श्रमणसाधकों ने आश्रमों में पनपने वाली कर्मकांड संस्कृति को चुनौती पेश की और मध्यमार्गी तत्वदर्शन के भरोसे ऐसी कामयाबी हासिल की कि कर्मकांड केंद्रित वैदिक धर्मदर्शनों को, आने वाली कई शताब्दियों तक पुनः आश्रमों और कंदराओं में शरण लेने को विवश होना पड़ा. बौद्ध दर्शन के पराभव की शुरुआत हुई तो पुरोहित स्तर के धर्माचार्यों ने स्मृति, पुराण जैसे ग्रंथों के माध्यम से धार्मिक कर्मकांडों, पाखंडों को नए सिरे से थोपना आरंभ कर दिया. उस दौर में भी उसका सामना श्रमणों और भौतिकवादी दार्शनिकों द्वारा किया गया. उसके कुछ अर्से बाद यहां इस्लाम का आगमन हुआ. तैंतीस करोड़ देवीदेवताओं के बोझ से दबे हिंदू धर्म को इस्लाम के एकेश्वरवाद की ओर से चुनौती मिली. उसमें जीत एकेश्वरवाद की हुई. जातीय भेदभाव झेल रही जातियों में इस्लाम के प्रति आकर्षण बढ़ने लगा. धर्मांतरण की बढ़ती घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए शंकराचार्य को वेदांत में अद्वैतवाद के समर्थन में आना पड़ा. मध्यकाल में धर्म के नाम पर तंत्रमंत्र, ऊंचनीच और पाखंड बढ़े तो संतकवि आड़े आ गए. तुकाराम, रैदास, कबीर, दादू आदि ने धार्मिक पाखंडियों को खूब ललकारा. औपनिवेशिक भारत में हालात बदले. अठारवींउनीसवीं शताब्दी के वैचारिक आंदोलनों से अनुप्रेत अंग्रेज अपेक्षाकृत विकसित संस्कृति अनुगामी थे. उनके समक्ष ब्राह्मण संस्कृति की अतीतोन्मुखी महानता कारगर न थी. दूसरे उन्हें योरोप के जनांदोलनों का अनुभव था. इसलिए विपुल जनशक्ति की अवहेलना उनके लिए संभव न थी. इसलिए उन्होंने यहां विधि के शासन को लागू किया.

ये उदाहरण जहां भारतीय संस्कृति के असमानताकारी रूप को सामने लाते हैं, वहीं दिखाते हैं कि भारतीय समाज में द्वंद्वात्मकता के लक्षण आरंभ से ही रहे हैं. वे काफी विस्तृत हैं. इस वर्गभेद को आर्यअनार्य, सवर्णअवर्ण, ब्राह्मणअब्राह्मण, तथाकथित ऊंची जाति वाले, नीची जाति वाले जैसा कुछ भी कहा जा सकता है. भारतीय समाज के आंतरिक विभाजन को दर्शाने वाला एक महत्त्वपूर्ण आधार और भी है. ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य अनुत्पादक वर्ग हैं. तीनों ही दूसरों के श्रम पर आश्रित रहते हैं. इसके बावजूद उन्हें ‘सवर्ण’ होने का गुमान रहता है. वर्णश्रेष्ठता का यह दंभ, श्रम और समानता दोनों का सिद्धांततः विरोधी है. जो संस्कृति इस दंभ को शरण देती है, वह शारीरिक श्रम को बौद्धिक श्रम से हेय मानती है. परिणामस्वरूप यहां जो हुनरमंद है, जो परिश्रम करता है, अपने शिल्पकौशल के भरोसे समाज को संवारता हैउसके हिस्से आजीवन तिरष्कार और उपेक्षा ही आती है. आर्थिक दृष्टिकोण से भारतीय संस्कृति मूलतः अनुत्पादक संस्कृति सिद्ध होती है, जो उत्पादनकर्म में लगे श्रमिकों तथा कामगारों को, बौद्धिक कर्म का दिखावा करने वाले वर्गों से हेय माने रहती है.

इस तरह भारतीय समाज अनायास ही दो हिस्सों, उत्पादक और अनुत्पादक समूहों में बंट जाता है. संख्या में उत्पादक समूह अपने प्रतिद्विंद्वी से लगभग चार गुना होता है. मगर समाज और संस्कृति की संरचना ऐसी है कि इस अधिसंख्यक वर्ग के हाथों में न्यूनतम संसाधन और नाकुछ अधिकार आते हैं. जिस अल्पसंख्यक अभिजन को यह संस्कृति विशेषाधिकार सौंपकर अत्यंत शक्तिशाली बनाती है, वह मुख्यतः अपने स्वार्थ के लिए काम करता है. दिखने में ब्राह्मणक्षत्रियवैश्य तीन अलगअलग वर्ण हैं, जो क्रमशः धर्म, राजनीति और अर्थसंपदा का प्रबंधन करते हैं. बहुजन मुख्यतः सेवाप्रदाता वर्ग है. वह वर्णव्यवस्था में सबसे निचला या उससे बाहर का हिस्सा है. दोनों ही स्थितियों में उसका दायित्व शीर्षस्थ वर्गों की सेवा करना है. उसे न तो अपने श्रमोत्पाद पर अधिकार होता है, न ही संपत्ति अर्जित करने का अधिकार उसे है. उसका कर्तव्य है सेवाश्रम के बदले जो मिले उसे अनुकंपाभाव से ग्रहण करना. वह अनेक जातियों, वर्गों, उपवर्गों और पेशों में बंटी, संख्याबहुल और प्रभावी जनशक्ति है. प्रत्येक का पेशा ही उसकी पहचान है. इनके सपने छोटे होते हैं, संघर्ष बड़े. छोटीछोटी जरूरतों की खातिर इन्हें एकदूसरे के साथ स्पर्धा करनी पड़ती है. अनेक जातियों, वर्गों, उपवर्गों में बंटा होने के कारण इस वर्ग की प्रभावी शक्ति क्षीण हो जाती है. दूसरी ओर सामान्य हित उच्चस्थ वर्णों को आपस में जोड़े रखते हैं. प्रतिस्पर्धा उच्चस्थ वर्गों में भी रही है. किंतु उसका आधार जीवन के मूलभूत प्रश्नों, समस्याओं से प्रभावित नहीं होता. उदाहरण के लिए परशुराम द्वारा पृथ्वी को 21 बार क्षत्रियविहीन करने का मिथ क्षत्रियों के विशेष रोष का कारण नहीं बन पाता. यह जानते हुए कि जो संस्कृति ब्राह्मण को श्रेष्ठतम ठहराती है, वह क्षत्रियों को राजकर्म का अधिकार भी देती है. इसलिए वर्णव्यवस्था के आगे जब भी कोई चुनौती आती है; अथवा उनमें से किसी एक वर्ण के अधिकारों पर हमला होता हैतीनों एकजुट भाव से उसका सामना करते हैं. इससे संख्या में कम होने के बावजूद पहला वर्ग शक्तिशाली बनकर, खुद को समाज का नियामक और वास्तविक कर्ता सिद्ध करने में सफल हो जाता है.

व्यवस्था में आमूल परिवर्तन हेतु आवश्यक है कि उत्पीड़ित लोगों की वर्गचेतना को उभारा जाए. लोगों को बताया जाए कि ‘अनेकता में एकता’ का मिथ संस्कृति के वर्चस्वकारी स्वरूप को बनाए रखने का उद्यम हैं. सामाजिक क्रांति को सफल बनाने के लिए आवश्यक है कि उत्पीड़न के शिकार वर्गों को उनकी स्थिति और अधिकारों से परचाया जाए. बताया जाए कि उनके हित साझे है. जो संस्कृति उन्हें भेद करना सिखाती है, समाज को जन्म और पेशों के आधार पर अलगअलग जातियों में बांटती है, जो श्रम की अवमानना करती हैवह उनकी संस्कृति हो ही नहीं सकती. इसकी शुरुआत ज्योतिराव फुले द्वारा की गई. फुले ने उन मिथकों का पुनर्पाठ किया, जिनसे भारतीय संस्कृति की पहचान निर्धारित की जाती है. जिनके सहारे सवर्ण जातियां शताब्दियों से अपना श्रेष्ठत्व गैरसवर्ण समूहों पर थोपती आई थीं. अवसर अनुकूल था. शिक्षा के द्वार सभी वर्गों के लिए खुल चुके थे. ‘मनुस्मृति’ की जगह ‘कानून के राज्य’ ने ले ली थी. नए कानून के आगे सभी नागरिक बराबर थे. ज्योतिराव फुले ने निर्भय होकर हिंदू मिथों के बारे में लिखा. धर्मग्रंथों का पुनर्पाठ प्रस्तुत किया. शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए, अपनी पत्नी के साथ मिलकर जगहजगह स्कूल खोले. स्त्रियों की पढ़ाईलिखाई को जरूरी माना. धीरेधीरे लोगों को यह एहसास होने लगा कि जिस धर्म और संस्कृति की वे अभी तक पूजा करते आए हैं, असल में वह एक षड्यंत्र, उन्हें बरसोंबरस गुलाम बनाए रखने का प्रलोभनकारी माध्यम है. जिन मिथकीय प्रतीकों, स्वार्थी विधान के भरोसे वे अभी तक शासित होते आए हैं, वे अंतिम या परमसत्य नहीं हैं. बल्कि शक्तिशाली जातीय समूहों द्वारा उन्हें मानसिकशारीरिक रूप से दास बनाए रखने के लिए की गई सोचीसमझी साजिश हैं. उनके सहारे शीर्षस्थ जातियां शताब्दियों से उनपर राज करती आई हैं. फुले के प्रयासों से पिछड़े और अंतज्य समाजों में वर्गचेतना पनपने लगी.

फुले के बाद परिवर्तनकारी राजनीति की बागडोर उत्तर में डॉ. आंबेडकर के हाथों में आ गई. वे अपने समय के नेताओं में सर्वाधिक पढ़ेलिखे, बुद्धिमान, व्यवहारकुशल, दूरदृष्टा और लक्ष्य के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध नेता थे. जिस वर्ष फुले का निधन हुआ, उसी वर्ष उनका जन्म हुआ था. मानो समय खुद बदलाव के लिए आमादा था. इसलिए एक जिम्मेदार और समर्पित नेता द्वारा शुरू किए गए आंदोलन की कमान संभालने के लिए उसने वैसे ही जिम्मेदार, समर्पित, बुद्धिमान और संघर्षधर्मी व्यक्तित्व को समयपटल पर आगे कर दिया था. डॉ. आंबेडकर के आंदोलन का दायरा व्यापक था. उन्होंने बहुजन अस्मिता के प्रश्न को उठाया. फुले का अनुसरण करते हुए धार्मिक प्रतीकों की अधुनातन व्याख्या को अपने हाथ में लिया. उन मिथों को आड़े हाथों लिया जो सामाजिकसांस्कृतिक शोषण का माध्यम बने थे. उनका सबसे बड़ा काम जातिव्यवस्था पर हमला था, जिसने तथाकथित सवर्णों को तिलमिलाने को विवश कर दिया. जिस जाति के आधार पर वे बहुजन का शोषण करते आए थे, डॉ. आंबेडकर ने उसी के संगठनसामर्थ्य का सहारा लेकर दलितों और पिछड़ों को एकजुट करने में कामयाबी हासिल की थी. इससे शीर्षस्थ जातियों की चिंता बढ़ना स्वाभाविक था. वे डॉ. आंबेडकर के वर्गशत्रु बन गए. मगर डॉ. आंबेडकर के बौद्धिक तेज के आगे उनकी एक न चली.

देश के उत्तरपश्चिम में जिस संकल्प के साथ डॉ. आंबेडकर आगे बढ़ रहे थे, दक्षिण भारत में वही जिम्मेदारी, उतनी ही शिद्दत के साथ रामास्वामी पेरियार संभाले हुए थे. दोनों के व्यक्तित्व और विचारों में अंतर था, परंतु लक्ष्य एक ही था, जिसे लेकर वे पूरी तरह स्पष्ट और ईमानदार थे. आरंभ में पेरियार पर साम्यवाद का असर था. गांधी दक्षिण अफ्रीका से लौटे तो पेरियार उनसे प्रभावित होकर कांग्रेस में शामिल हो गए. गांधी के आवाह्न पर उन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार कार्यक्रमों में हिस्सा लिया. असहयोग आंदोलन में लाठियां खाईं. लेकिन बहुत जल्दी उनका कांग्रेस तथा उसके नेताओं से मोह भंग हो गया. उसके बाद सक्रिय राजनीति से संन्यास लेकर उन्होंने खुद को सामाजिक आंदोलनों के समर्पित कर दिया. ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के माध्यम से उन्होंने बहुजन समूहों के बीच वर्गीय चेतना फैलाने का काम किया. उन्हें अपेक्षित सफलता भी मिली. भारत को आधुनिक राज्य बनाने में डॉ. आंबेडकर और पेरियार का लगभग बराबर का योगदान है.

डॉ. आंबेडकर और पेरियार के प्रयासों से दलितों और शोषितों में वर्गचेतना का संचार हुआ था. सवाल है यदि उन सभी का मकसद समानताआधारित समाज की रचना करना, भेदभावों को मिटाना था, तो उसके लिए ‘मार्क्सवाद’ या ‘साम्यवाद’ की प्रचलित सैद्धांतिकी को क्यों नहीं अपनाया गया? यह सवाल उन साम्यवादियों से भी है जो वर्गहीन समाज की स्थापना को लेकर राजनीति में आए थे; और समस्त वर्गभेदों का उन्मूलन कर समताआधारित समाज का सपना देखते थे. प्रथम दृष्टया इसे हम भारतीय वामपंथ तथा सामाजिक न्याय के पक्ष में चलने वाले आंदोलनों की कमजोरी मान सकते हैं. इसके कारणों को भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की मामूली पड़ताल से समझा जा सकता है. यहां उनका वर्णन विषयांतर होगा. इतना कह सकते हैं कि भारत में वर्गक्रांति की शुरुआत ‘सामाजिक न्याय’ की मांग के तहत हुई थी. हालांकि वर्गसंघर्ष की अवधारणा को ‘सामाजिकन्याय’ की भावना तक सीमित कर देना कभी निरापद नहीं रहा. इससे बहुजन समाज की एकता प्रभावित हुई. इसे समझने के लिए ‘सामाजिक न्याय’ की सैद्धांतिकी तथा उन परिस्थितियों को समझना होगा, जिनके कारण ‘सामाजिक न्याय’ को अधिकांश अस्मितावादी आंदोलनों का लक्ष्य मान लिया गया था.

साम्यवाद बनाम सामाजिक न्याय

साम्यवाद की मुश्किल यह रही है कि बीसवीं शताब्दी के आरंभ में जब बड़े साम्राज्यवादी राज्यों का गठन आरंभ हुआ, और जिन दिनों पूरी दुनिया को साम्यवाद की परिधि में शामिल करने का स्वप्न देखा जा रहा था, उन्हीं दिनों दुनिया को दो विश्वयुद्धों का सामना करना पड़ा. वे युद्ध केवल राजनीतिक उद्देश्य के लिए नहीं लड़े गए थे. उनके पीछे पूंजीपति वर्ग की महत्त्वाकांक्षाएं भी शामिल थीं. प्रौद्योगिकीय क्रांति के दौर में हथियार निर्माण के क्षेत्र में भारी निवेश हुआ था. उत्पाद की खपत के लिए हथियारनिर्माता कंपनियों को नए बाजारों की जरूरत थी. उनका हित इसी में था कि दुनिया पर युद्ध का खतरा मंडराता रहे. देश एकदूसरे से लड़तेझगड़ते रहें. इस उद्देश्य में वे कामयाब भी रहीं. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा बेहद जरूरी मुद्दा बन गया. आंतरिक और बाहरी सुरक्षा के नाम पर हथियारों की अधिकाधिक खरीद की जाने लगी. इनमें भारत जैसे विकासशील देश भी पीछे न थे, जिनका कथित रूप से अहिंसा में विश्वास था और जिन्होंने अपनी आधीअधूरी स्वाधीनता अहिंसक तरीकों से अर्जित की थी. 1930 में दुनियाभर में आर्थिक मंदी पैठी हुई थी. हालांकि मंदी के जो मापदंड निर्धारित किए गए थे, वे स्वयं संदेह से परे न थे. राजनीति और पूंजीपतियों के गठजोड़ के चलते उस समय तक अर्थव्यवस्था की रफ्तार का आकलन करने के पैमाने बदल चुके थे. चुनिंदा कंपनियों की विश्वबाजार में स्थिति से मंदी या तेजी का आकलन किया जाने लगा था. आभासी मंदी से इतर जनता की दुर्दशा का असली कारण यह था कि सरकारों ने अपने समस्त संसाधन युद्ध और युद्ध की तैयारियों पर झोंक दिए थे. साम्यवादी देश भी इसमें पीछे न थे. इस कारण वहां जनअसंतोष पनपने लगा था. उसे दबाने तथा प्रतिस्पर्धी पूंजीवादी देशों के साथ विकास की दौड़ में बने रहने की जरूरत ने स्टालिन जैसे कट्टर साम्यवादी नेताओं को जगह दी.

प्रथम विश्वयुद्ध दुनिया में भारी तबाही का कारण बना था. और जैसा कि बताया गया है, युद्ध की परिस्थितियां बनाने में अतिमहत्त्वाकांक्षी नेताओं तथा पूंजीपतियों का समान योगदान था. लेकिन जब युद्ध के परिणाम आने लगे तो आर्थिक घराने बड़ी चतुराई से खुद को उनसे अलग करने में कामयाब हो गए. इस कारण युद्ध के बाद उत्पन्न समस्याओं तथा उनसे उपजे जनाक्रोश का सामना संबंधित देशों की सरकारों को करना पड़ा. युद्ध के मोर्चे पर सारे संसाधन झोंक चुके राष्ट्रप्रमुखों के लिए उस समय एकमात्र रास्ता था कि आर्थिक विपन्नता से घिर चुके राज्य के विकास; तथा जनाक्रोश से बचने के लिए पूंजीपतियों को आमंत्रित किया जाए. यही हुआ भी. दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति के पश्चात, पुनर्निर्माण के नाम पर सारे ठेके, बड़ीबड़ी पूंजीप्रधान कंपनियों को सौंप दिए गए. आर्थिक विकास के नाम पर उन्हें तरहतरह की छूट दी जाने लगी. वह विचित्र संयोग था. जब तीसरी दुनिया के देश तेजी से योरोप और अमेरिका की औपनिवेशिक दासता से बाहर आ रहे थे, तभी बड़ीबड़ी पूंजीवादी कंपनियां, तीसरी दुनिया के देशों में पहुंचकर वहां आर्थिक औपनिवेशीकरण की शुरुआत कर रही थीं. अर्थसत्ता का उत्तरोत्तर सबलीकरण राजसत्ता को कमजोर कर रहा था. उसका प्रभाव दुनिया के प्रायः सभी देशों पर था. चूंकि तीसरी दुनिया के अल्पविकसित और विकासशील देश स्थानीय समस्याओं और समाज की उत्तरोत्तर बढ़ती महत्त्वाकांक्षाओं के लिए पूंजीवाद पर आश्रित हो चुके थे, इसलिए वे आर्थिक औपनिवेशीकरण के सर्वाधिक शिकार थे.

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पूंजीवाद ने भी खुद को बदला था. सामाजिक भेदभाव और भारी आर्थिक विषमता से गुजर रहे देशों में वर्गसंघर्ष की स्थिति दुबारा न बने, इसके लिए जनसाधारण में यह विश्वास जगाना अत्यावश्यक था कि वह पूंजीवाद के विस्तार में ही अपना भला समझे. इसके लिए वह सरकार के साथ मिलकर लोगों की मनोरचना बदलने में लगा था. लोगों की प्रशंसा तथा सहानुभूति बटोरने के लिए उसने सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, उपभोक्ता अधिकार जैसे कई मुखौटे पहने हुए थे. पूंजीवादी कंपनियों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा, खेती जैसे बुनियादी क्षेत्रों में सुधारवादी कार्यक्रमों में हिस्सेदारी आरंभ कर दी थी. इसी दौर में मान लिया गया कि जनसमस्याओं का समाधान अकेले सरकार द्वारा संभव नहीं है. विकासकार्यक्रमों में सरकार की मदद हेतु गैरसरकारी संस्थाओं को बढ़ावा दिया जाने लगा था. उन संस्थाओं के संचालन का दायित्व पढ़ेलिखे, समाज के प्रबुद्ध हिस्से के अधीन था, जिसकी जनता पर पकड़ थी. उसे लुभाने के लिए बड़े कारपोरेट घरानों ने अपनी आय का एक हिस्सा, जाहिर है बहुत मामूली हिस्सा, चंदे तथा अनुदान के रूप में गैरसरकारी संस्थाओं को देना आरंभ कर दिया. एक तरह से वह जनता का ही पैसा था. गैरसरकारी संस्थाओं को दिए गए चंदे को लोककल्याण की मद में किया गया खर्च दिखाकर, पूंजीवादी कंपनियां टैक्स के रूप में दी जाने वाली धनराशि में कटौती कर लेती थीं. चूंकि पूंजीपति घरानों की ओर से यह पैसा सीधे गैरसरकारी संस्थाओं को जाता था, इसलिए परोक्ष रूप में वे जनता के पढ़ेलिखे वर्गों की, उन लोगों की जिन्हें जनता की समस्याओं की समझ थी और जो समाज के भीतर रहकर काम करने का अनुभव रखते थेसहानुभूति बटोर रहे थे. इन संस्थाओं में प्रायः वही मध्यमवर्ग शामिल था, जिसकी पिछली पीढ़ियां अमेरिका और योरोपीय देशों मेंआम मताधिकार, न्यूनतम मजदूरी तथा लोकतंत्र, समाजवाद, साम्यवाद, अराजकतावाद जैसे राजनीतिक दर्शनों के समर्थन में सड़कों पर उतरी थीं; जिनकी बौद्धिक चेतना ने अनेक नए राजनीतिक दर्शनों को जन्म दिया था. परिणामस्वरूप पूरी दुनिया में पूंजीवाद के समर्थन में माहौल बन रहा था. साम्यवाद, समाजवाद जैसे दर्शन जिन्हें कभी आधुनिक और उदार समाज की पहचान से जोड़ा गया था, की प्रतिष्ठा निरंतर घट रही थी. युवा पीढ़ी तो उन्हें समयबाह्यः मान चुकी थी.

गैरसरकारी संस्थाएं समाज में पूंजीवाद के लिए अनुकूल माहौल बनाने का काम कर रही थीं. यह कार्य समाजकल्याण, सामाजिक न्याय, कला, साहित्य एवं संस्कृति के प्रचारप्रसार के नाम पर किया जा रहा था. सरकारों को भी इससे लाभ था. योजनाओं के कार्यान्वन की जिम्मेदारी स्वयंसेवी जनसंस्थाओं के कंधों पर डालकर वे सीधी जिम्मेदारी से बचने लगी थीं. इससे साम्यवाद के उभार के दिनों में पूंजीवाद के प्रति जो आक्रोश पनपा था, वह धीरेधीरे घटने लगा. इसलिए वह अकारण नहीं है कि 1930 का दशक जो वैश्विक मंदी का दशक भी थाᅳ‘सामाजिक न्याय’ के राज्यों की कल्याण नीति का प्रमुख हिस्सा बनने का भी दशक बना. उसके बाद यह शब्दयुग्म, विशेषकर लोकतांत्रिक राज्यों में इस तरह प्रचलित हुआ कि उसे उत्तरदायी सरकार के प्रमुख लक्षण के रूप में गिना जाने लगा. उससे लोगों की मनोरचना में ऐसा बदलाव आया, जो पूंजीवादी विस्तार के अनुकूल था. उपभोक्तावाद के पक्ष में माहौल बनाने के लिए लोकतंत्र, सामाजिक न्याय तथा व्यक्तिस्वातन्त्र्य जैसी आधुनिक विचारधाराओं को अपनाया गया. फिर जैसेजैसे पूंजीवाद का विस्तार हुआ, राज्य के प्रमुख उद्देश्य के रूप में ‘सामाजिक न्याय’ की महत्ता लगातार बढ़ती गई.

उससे पहले की व्यवस्थाओं में धर्म व्यक्ति, समाज और राज्य तीनों की मार्गदर्शक शक्ति हुआ करता था. राजा खुद को ईश्वरीय प्रतिनिधि बताकर जनता पर अपनी इच्छाएं थोपता था. उस व्यवस्था में ‘कल्याण’ धर्म और ईश्वर के नाम पर, दान अथवा राज्य की अनुकंपा के रूप में निचले तथा जरूरतमंद वर्गों को अंतरित होता था. आजकल वह ‘सामाजिक न्याय’ जैसा आकर्षक से जाना जाता है. उसमें न्याय नागरिक का अधिकार न होकर सहायता, अनुदान, प्रोत्साहननिधि जैसे नामों से जनता की ओर अंतरित होता है. यह पूंजीवाद की कार्यशैली के अनुरूप है. ‘ट्रिकल डाउन थियरी’ जिसे ‘रिसाव का सिद्धांत’ कहा जाता है, में समृद्धि नीचे की ओर धीरेधीरे रिसकर पहुंचती है. कुछ विद्वान इसी आधार पर पूंजीवाद की प्रशंसा करते हैं. किंतु ‘रिसाव का सिद्धांत’ सामान्यतः तब कारगर होता है, जब ऊपर के स्तर पर ‘बफर’ समृद्धि हो. चूंकि पूंजीपति अपनी आमदनी को खर्च करने के बजाय पुनर्लाभ हेतु उसका निवेश करना पसंद करता हैइसलिए पूंजीवादी व्यवस्था में असमानता का अनुपात निरंतर बढ़ता जाता है. ऐसे देश जो लोकतांत्रिक होने का दावा करते हैं, किसी न किसी रूप में वे सभी ‘सामाजिक न्याय’ के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते रहते हैं. वे इस बात को बढ़ाचढ़ाकर जनता के बीच लाते हैं कि सामाजिक न्याय को लेकर उनकी योजनाएं जनता की सामान्य सहमति के आधार पर चलाई जाती हैं. उनका उद्देश्य समाज में व्याप्त गैरबराबरी को समाप्त करना नहीं होता. न ही वे उन समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश करते हैं जो सामाजिक विषमताएं पैदा कर, कमजोर वर्गों के लिए ‘सामाजिक न्याय’ को प्रासंगिक बनाती हैं. परिणामस्वरूप न्याय के नाम पर बनीं योजनाएं राज्य की अनुकंपा, अनुदान जैसी वे धर्मप्रधान राजतंत्र में होती हैंलौकतांत्रिक राज्यों में भी बनी रहती हैं.

देखनेसुनने में ‘सामाजिकन्याय’ बड़ा रुपहला शब्द है. अधिकांश समाजों में उसे मनुष्यता के पर्याय, राज्य के पुनीत कर्तव्य के रूप में लिया जाता है. दूसरी ओर यह भी सच है कि उसका लक्ष्य गैरबराबरी को समाप्त करना नहीं होता. न ही वह उन समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश करता है जो सामाजिक विषमताएं पैदा कर, कमजोर वर्गों के लिए ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर विशेष कार्यक्रम चलाने की जरूरत पैदा करती हैं. उल्टे परंपरा, संस्कृति तथा निजी पहचान के नाम पर अन्याय एवं असमानताकारी संस्थाओं का संरक्षण किया जाता है. ‘सामाजिक न्याय’ के तहत बनाई जाने वाली अधिकांश योजनाएं प्रायः सस्ते भोजन, सामान्य शिक्षा, सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं तथा इतिहास एवं संस्कृति के सरंक्षण संबंधी कार्यक्रमों तक सीमित रहती हैं. इसलिए वे कमजोर वर्गों का ज्यादा भला नहीं कर पातीं. यही कारण है कि सरकार द्वारा लोकतंत्र और कल्याण राज्य की दावेदारी के बावजूद, राज्यों की केंद्राभिमुखता में कोई कमी नहीं आ पाती. पहले वे पुरोहितों और सामंतों के संरक्षण तथा उन्हीं के नेतृत्व में चलाई जाती थीं. नए विधान में उनका कार्यान्वन विशेषज्ञों के नेतृत्व में किया जाता है, जो उन्हीं वर्गों से आते हैं, जिनके हित असमानताकारी संस्कृति से जुड़े होते हैं. अपनेअपने स्वार्थ के लिए पूंजीपति और शीर्षस्थ राजनीतिज्ञ उनका संरक्षण करते हैं. कल्याणकार्यक्रमों में जनसहभागिता का अभाव, लोगों के आत्मविश्वास को कमजोर कर, उन्हें पराश्रित बनाए रखता है. इससे उन योजनाओं का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है.

सवाल है कि यदि केंद्र उतना ही शक्तिशाली है बना जितना वह धर्मकेंद्रित व्यवस्थाओं में था और आमजन की हालत वैसी की वैसी थी, तो धर्म के स्थान पर, ‘सामाजिक न्याय’ जैसी नई अवधारणाओं को लाने से शीर्षस्थ वर्गां की कौनसी स्वार्थसिद्धि हो रही थी? इसके लिए धर्म के मनोविज्ञान को समझना आवश्यक है. दुनिया के जितने भी धर्म हैं, कमोबेश सभी इस संसार और सांसारिक सुखों के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं. लगभग सभी इसपर सहमत हैं कि सांसारिक सुख जीवन के अंतिम उद्देश्यों की प्राप्ति में बाधक हैं. शंकर का मायावाद, विभिन्न नामों और मिलेजुले सिद्धांतों के आधार पर कमोबेश हर धर्म का हिस्सा है. किसी न किसी रूप में वे सभी सांसारिक सुखों को हेय मानते हैं. यह सोच मुक्त उपभोग को बढ़ावा देने की सबसे बड़ी बाधा है. दुनियावी सुखों के प्रति नकारात्मक सोच के चलते उपभोक्तावाद, जिसके भरोसे पूंजीवाद ने अपनी विस्तारवादी नीतियों को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है, उस तरह से पनप ही नहीं सकता था, जिस तरह से वह आज है. इसलिए पूंजीवादी तंत्र के लिए धर्म गैरजरूरी संस्था है. हां, सांप्रदायिकता पूंजीवाद का खूब भला करती है. बढ़ती सांप्रदायिकता लोगों के अंतर्मन में भ्रम की सृष्टि करती है. उससे एकदूसरे के प्रति संदेह, स्पर्धा तथा जीवन के प्रति अनिश्चितता बढ़ती है. प्रकारांतर में वह उपभोग की संस्कृति को बढ़ावा देती है.

हमारा आशय लोकतंत्र, सामाजिक न्याय जैसी आधुनिक विचारधाराओं की महत्ता को नकारना नहीं है. मगर इनकी सफलता तभी संभव है जब जनता अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो. वह तर्कसम्मत निर्णय लेने की अभ्यस्त हो चुकी हो. भारत जैसे समाजों में जहां मनुष्य कदमकदम पर जाति, धर्म और वर्गभेद से प्रेरणा लेती हो, उन्हें अपनी सामाजिक पहचान का जरूरी हिस्सा मानती हो, वहां लोकतंत्र और व्यक्तिस्वातं×य जैसी विचारधाराएं अधिक कारगर नहीं हो पातीं. पर्याप्त अधिकारबोध के अभाव में नागरिक सरकार पर आवश्यक दबाव बनाने के बजाए, आपस में ही एकदूसरे के साथ स्पर्धा करते रहते हैं. इससे चुने गए प्रतिनिधि लोकहित के बजाए अपने स्वार्थ के लिए काम करने लगते हैं. जनता द्वारा निर्वाचित सरकारें जब लोकतांत्रिक उद्देश्यों की प्राप्ति में नाकाम सिद्ध होती हैं, तब जनाक्रोश से बचने के लिए वे ‘सामाजिक न्याय’ को ढाल बनाती हैं. जागरूकता के अभाव में लोकतंत्र भीड़तंत्र में तथा ‘सामाजिक न्याय’ गैरबराबरी को पोषण करने वाली व्यवस्था का रक्षाकवच बन जाता है.

साम्यवाद और बहुजन

जाति हमारे यहां ‘सामाजिक न्याय’ और ‘साम्यवाद’ दोनों के गले की फांस रही है. यह व्यक्ति को जन्म के आधार पर छोटाबड़ा बनाकर, मनुष्य से उसकी स्वतंत्रता तथा जीवन के मूलभूत अधिकार छीन लेती है. भारतीय समाज में निचली जातियों के शोषण और उत्पीड़न का इतिहास उतना ही पुराना है, जितना सभ्यता का. उनका संत्रास इतना बड़ा है कि भीषण आर्थिक विपन्नता के बावजूद उन्हें जातिवाद से मुक्ति ही बड़ी और न्यायपूर्ण उपलब्धि जान पड़ती है. जातिव्यवस्था के कारण ही भारत में राजनीति सवर्णों का विषेषाधिकार रही है. जातिवादी सोच से साम्यवादी दल भी उससे मुक्त नहीं है. अधिकांश सवर्ण वामपंथी वर्णव्यवस्था के प्रश्न पर मौन साधते आए हैं. जातिसंबंधी प्रश्न तथा उसके नाम पर होने वाले अत्याचार उन्हें उद्वेलित नहीं करते. वे उन्हें भारत की सांस्कृतिक पहचान के रूप में सहेजे रखना चाहते हैं. इस कारण दलितों और पिछड़ों के मन में, जो भारतीय समाज का सबसे बड़ा हिस्सा है, मार्क्स की भाषा में जिसे सर्वहारा कहा जा सकता हैसाम्यवाद को लेकर कभी कोई उत्साह नहीं रहा. एकाध अवसर पर उन्होंने साम्यवाद को अपनाने की कोशिश भी की. कुछ ऐसे संकेत दिए, जिनपर ध्यान दिया जाता तो देश में साम्यवाद की सफलता की कहानी लिखी जा सकती थी. यहां एक घटना का वर्णन प्रासंगिक होगा. इसका उल्लेख डॉ. धर्मवीर ने अपने लेख ‘दलितों ने क्या चाहा था’ में किया है

दलितों ने कम्यूनिस्ट शब्द का अपनी देशी जबान में तद्भव बनाकर ‘कौमनष्ट’ के रूप में अर्थ लिया था. उस जमाने में कम्यूनिस्ट पार्टी के शांति त्यागी अपने समर्थकों के साथ मेरे गांव में चमारों की तरफ वोट मांगने आए. हम सब दादा हरिया के ओसारे के नीचे थे. धूलधूप में शांति त्यागी(मेरठ के कम्यूनिस्ट नेता) ने आते ही दादा से पानी मांगा. दादा हरिया ने घड़े से गिलास में ठंडा पानी निकाला और शांति त्यागी ने वहीं वह सबके सामने पिया. उनके जाने के बाद चमारों में वोट के बारे में मंत्रणा हुई. सारे चमारों का वोट एकमुश्त एक तरफ जा रहा था, पर दादा हरिया ने कह दिया, मेरा वोट शांति त्यागी को जाएगा, क्योंकि उसने मेरे हाथ का पानी पिया है. चमारों में से केवल वही एक वोट शांति त्यागी को मिला था .3

कम्यूनिस्ट’ को ‘कौमनष्ट’ मान लेना दलितों और पिछड़ों की एकतरफा अपेक्षा थी. नई, मूल्य आधारित राजनीति से उनके जुड़ने का कारण ही यह उम्मीद थी कि उससे सामाजिकसांस्कृतिक दासता से मुक्ति की राह प्रशस्त होगी. उसमें समानताआधारित समाज की उनकी पुरानी आकांक्षा भी अंतनिर्हित थी. लेकिन उसकी चिंता न तो कांग्रेसी नेताओं को थी, न ही साम्यवाद के तत्कालीन कर्णधारों को. भारतीय साम्यवादियों में अधिकतर उच्चस्थ जातियों से आए थे. वे अपने जातीय पूर्वाग्रहों से बाहर निकलने को कतई तैयार न थे. उनके लिए साम्यवाद सामाजिक पुनर्निर्माण का लक्ष्य न होकर महज राजनीति थी. ऐसे नेताओं के मार्गदर्शन में साम्यवादी दलों ने जातिव्यवस्था के उन्मूलन के लिए न तो कोई कार्यक्रम बनाया, न इस मांग के समर्थन में वे डॉ. आंबेडकर जैसे नेताओं के साथ आए. दलितों और पिछड़ों को साम्यवाद से ज्यादा उम्मीद अंग्रेजों द्वारा लागू किए गए विधि के शासन से थी, जिसने उन्हें मनुस्मृति के सहस्राब्दियों पुराने विधान से मुक्ति दिलाकर, कानूनी तौर पर ही सही, बराबरी के एहसास के साथ जीने का अवसर दिया था. हालांकि सामाजिक समानता का लक्ष्य अभी बहुत दूर था. दलितों द्वारा यह मजबूरी में किया गया समझौता था. इसका नुकसान न केवल भारतीय साम्यवादी आंदोलन, अपितु दलितों को भी उठाना पड़ा.

भेदभाव से परे, समानता पर आधारित वर्गहीन समाज की रचना यदि बहुजन का सपना है तो उसने इस लक्ष्य की दिशा में अपने भरोसे बढ़ने की कोषिष क्यों नहीं की? वे संख्याबहुल थे. अगर जातिविहीन समाज की दिशा में स्वयं आगे बढ़ते तो अपने मकसद में सफल हो सकते थे. संभवतः अंग्रेजों का साथ भी उन्हें मिलता. बहुजन ने इसके लिए स्वयं पहल क्यों नहीं की? इस तरह की जिज्ञासाएं स्वाभाविक हैं. किंतु हमें याद रखना होगा कि सांस्कृतिक दासता से मुक्ति की राह बेहद कठिन होती है. राजनीति में शासक और षासित आमनेसामने होते हैं. अवसर मिलने पर शासक को पराजित कर शासित, राजनीतिक दासता से मुक्त हो सकता है. सांस्कृतिक दासता से उबरने के लिए व्यक्ति को अपने साथसाथ, आसपास के लोगों से भी, जो उसकी सामाजिक पहचान का हिस्सा हो सकते हैंजूझना पड़ता है. उसका अपना समाज भी आड़े आता है. इसलिए सांस्कृतिक परिवर्तन की लड़ाई बेहद कठिन और लंबी होती है. उसके लिए व्यक्ति को अपनों के ही विरोध का सामना करना पड़ता है. जाति के आधार पर हजारों वर्षों से शोषण एवं उत्पीड़न का षिकार रहा बहुजन स्वयं हजारों प्रकार की जातियों, उपजातियां में बंटा था. धर्म और क्षेत्रीयता की दीवारें भी थीं. उन सबकी अपनीअपनी सामाजिकसांस्कृतिक विविधताएं, संघर्ष और अंतर्द्वंद्व थे. इस कारण वह कभी ऐसी सामाजिक षक्ति नहीं बन सका, जो उसे सांस्कृतिक वर्चस्व से मुक्ति दिला सके. उसकी इस कमजोरी का लाभ जिससे जैसे भी बन पड़ा, उसने वैसे ही उठाया.

अंग्रेजों ने भारत में पुराने धर्मसम्मत राज्य को विधिशासित राज्य में बदलने का बड़ा काम किया. हालांकि इसके पीछे उनका न तो कोई उदारवादी नजरिया था, न ही ‘सामाजिक न्याय’ जैसा बड़ा उद्देश्य. उनके स्वार्थ उनके कद से कहीं ज्यादा बड़े थे. भारत आने के बाद उन्होंने अपनी न्यायप्रियता का बढ़चढ़कर बखान किया, मगर सामाजिक अन्याय के निवारण हेतु सार्थक कार्यक्रम की शुरुआत उन्होंने कभी नहीं की. वे इस देश में शासक बनकर रहना चाहते थे. और हमेशा रहे भी. विधिसम्मत शासनव्यवस्था लागू करने के पीछे उनका एकमात्र उद्देश्य खुद को परिष्कृत सभ्यता का अनुगामी सिद्ध कर जनसाधारण की सहानुभूति और समर्थन प्राप्त करना था. इसका उन्हें लाभ भी मिला. समाज का बड़ा हिस्सा जो धर्मकेंद्रित शासनव्यवस्था में उपेक्षा, उत्पीड़न और जातीय शोषण का शिकार था, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में वह नए शासन का समर्थन करने लगा.

अपनी न्यायप्रियता का बढ़चढ़कर बखान करने के बावजूद अंग्रेजों ने न तो जातिव्यवस्था के उन्मूलन के लिए कोई कानून बनाया, न तत्संबंधी किसी सुधार कार्यक्रम का कभी समर्थन किया. जबकि भारत में जड़ जमाने के साथ ही वे भारतीय जातिव्यवस्था तथा उसकी कमजोरियों को भलीभांति समझ चुके थे. वे ब्राह्मणों और क्षत्रियों की सामाजिक हैसियत और समाज पर उनकी पकड़ को समझते थे. जानते थे कि इन वर्गों की मदद से, शेष समाज को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है. ब्राह्मण तथा दूसरे सवर्ण सोचते थे कि अंग्रेज उनके निजी मामलों में दखल न देने की नीति पर अटल हैं. मुगल शासकों से भी उनकी यही अपेक्षा थी. इसलिए ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि उनके मुगलकाल में भी शीर्ष पदों पर थे. इस प्रवृत्ति के चलते देश को एक हजार से अधिक वर्ष विदेशी शासकों के अधीन काटने पड़े. यही कारण रहा जो मुट्ठीभर अंग्रेज, अपने देश से आठ हजार किलोमीटर दूर आकर भारत पर करीब दो सौ वर्षों तक राज करते रहे. हजार वर्षों के पराधीनताकाल में ब्राह्मणों की सामाजिक हैसियत पर कोई अंतर नहीं पड़ा. ब्राह्मणों के लिए उनका धर्म और कर्मकांड की सबकुछ थे. वे बचे रहें, देशप्रेम तथा राष्ट्रीयता की भावना से उनका कोई सरोकार न था.

अवर्णों को भी औपनिवेशिक शासन से खास आपत्ति न थी. अंग्रेजों ने उन्हें ‘मनुस्मृति’ के चंगुल से आजाद कराया था. शिक्षा जो पुरानी व्यवस्था में अपराध थी, उसके दरवाजे शूद्रों और दलितों के लिए खोल दिए गए थे. दलितों और पिछड़ों के लिए यह बड़ी उपलब्धि थी. यही कारण है कि स्वाधीनता संग्राम का समर्थन करने के बावजूद दलित और पिछड़े वर्ग के नेता, सामाजिक आजादी की मांग बराबर दोहराते रहे. पेरियार ने तो सक्रिय राजनीति से 1925 में ही किनारा कर लिया था. उसके बाद उन्होंने स्वयं को ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ को समर्पित कर दिया था, जो सामाजिक न्याय को समर्पित बड़ा, वर्षों लंबा चलने वाला सफल आंदोलन था.

सामाजिकन्याय’ की अवधारणा ने भारत में पश्चिम के रास्ते प्रवेश किया था. स्वाधीनता आंदोलन में अपनी सक्रियता और चरमसफलता के दिनों में भी कांग्रेस ने, जो खुद को भारतीयों की एकमात्र प्रतिनिधि पार्टी होने का दावा करती थी, सामाजिक न्याय की कभी मांग नहीं की. देश की राजनीति में उसे आजादी के बाद ही जगह मिल सकी. उस समय तक दलित और पिछड़ी जातियां राजनीतिक चेतना से लैस हो चुकी थीं. स्वाधीनता संग्राम में उन्होंने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया था. बदले परिवेश में उनकी उपेक्षा असंभव थी. इसलिए कांग्रेस तथा दूसरे अभिजन नेताओं द्वारा तमाम चालाकी बरतने के बावजूद अंतत उन्हें ‘सामाजिक न्याय’ को अपने राजनीतिक कार्यक्रम का हिस्सा बनाना ही पड़ा. आजाद भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपना गया. चूंकि लोकतंत्र में संख्याबल बड़ी भूमिका होती है, इसलिए दलितों और पिछड़ों को साथ लेकर चलना सभी दलों की मजबूरी बन गई. दलितों को फुसलाने के लिए फिर सामाजिक न्याय का प्रलोभन दिया जाने लगा. इस बीच ऐसा वर्ग भी रहा जिसका मानना था कि समानता और न्याय के लक्ष्य को हासिल करने के लिए विदेशों से विचारधारा उधार लेने की आवश्यकता नहीं है.

ऐसे लोगों ने ‘सामाजिक न्याय’ के विकल्प के तौर पर ‘रामराज्य’ को आगे किया. प्रकारांतर में उनकी कोशिश प्राचीन धर्मकेंद्रित शासन को वापस लाने की थी. वे अपने उन स्वार्थों को विशेषाधिकार बनाना चाहते थे, जिन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था में लगातार चुनौती मिल रही थी. जिनकी सुरक्षा हेतु दलितों और पिछड़ों का सांस्कृतिकरण या यूं कि कहें कि वर्चस्वकारी संस्कृति के प्रति समर्पण आवश्यक था. 2014 में सत्तापरिवर्तन के बाद वे शक्तियां केंद्र तक पहुंच चुकी हैं. उनका नया नारा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का है. ‘रामराज्य’ उनके लिए सांस्कृतिक वर्चस्ववाद का टोटम, ऐसा औजार है जिसके माध्यम से वे सांस्कृतिक वर्चस्व को बनाए रखना चाहते हैं. अपने समर्थक बुद्धिजीवियों के माध्यम से वे उसे जनता के बीच लगातार प्रचारित करते हैं. जरूरत पड़ने पर इतिहास में मनमाना हस्तक्षेप तक करते हैं. भूल जाते हैं कि राज्य जब वास्तविक न्याय की ओर से तटस्थ हो जाता है, तो वह वर्गीय तानाशाही का शिकार होने लगता है. उस समय धर्म स्वतः उसकी कार्यशैली में हस्तक्षेप करने लगता है. ऐसा राज्य अपने निर्णय न्याय और नागरिकों की सामान्य इच्छा, जरूरतों के आधार पर लेने के बजाय आस्था, विश्वास और परंपरा के अनुसार लेने लगता है. प्रकारांतर में राज्य का औचित्य ही समाप्त हो जाता है. उसकी बनावटी निष्पक्षता, शीर्षस्थ वर्गों की आत्ममुग्धता का रूप ले लेती है.

रामराज्य’ का जिक्र हुआ है तो उसपर थोड़ी चर्चा और. कल्याण राज्य की पहचान उसकी उदारता और न्यायभावना से की जाती है. इस बात से होती है कि उसका मनुष्यता में कितना विश्वास है. राजा के रूप में राम की कोई न्यायसंहिता नहीं है. राम को धर्मसंस्थापक माना गया है. उसकी कथित महानता ब्राह्मणवाद को सर्वोपरि मान उसे ‘धर्म’ के नाम से प्रतिस्थापित करना है. इस कारण वह न तो अपनी पत्नी के साथ न्याय कर पाता है, न शंबूक के साथ. निर्दोष पत्नी को धोबी के मिथ्या आक्षेप पर देशनिकाला दे देता है तो शंबूक को चंट ब्राह्मणों के बहकावे में आकर मौत के घाट उतार देता है. ऐसे न्याय से एक ही वर्ग लाभान्वित हो सकता है. वह जिसके हाथों में धर्म का नियंत्रण है. चूंकि सामाजिक न्याय की अवधारणा अपने आप में अस्पष्ट अवधारणा है, उसकी कार्यशैली स्पष्ट नहीं है, इसलिए उसके नाम पर मनमानी करने का अवसर स्वार्थी राज्यप्रतिनिधियों को आसानी से मिल जाता है. ‘रामराज्य’ जैसी पुराकथाओं के माध्यम से वे जनसाधारण का सतत भावनात्मक दोहन करते हैं.

यदि ‘सामाजिक न्याय’ नहीं तो और क्या? क्या सामाजिक उत्पीड़न तथा भेदभाव का शिकार रहे लोगों के लिए ‘सामाजिक न्याय’ पूर्णतः अप्रासंगिक और अनपेक्षित है? क्या जाति, धर्म, वर्ण आदि के नाम पर शोषण और अन्याय का शिकार होते आए बहुजनों द्वारा ‘सामाजिक न्याय’ की मांग निरर्थक है? क्या बहुजन को ‘सामाजिक न्याय’ की मांग तक सीमित रह जाना चाहिए? अथवा ‘साम्यवाद’ की मांग करते हुए वर्गहीन समाज की संरचना हेतु अग्रसर होना चाहिए? ‘साम्यवाद’ और ‘सामाजिक न्याय’ की मूलभूत विशेषताओं का अभी तक जो विवेचन किया गया है, उससे यह द्वंद्व स्पष्ट हो जाता है. उपसंहार के रूप में हमें केवल इतना जोड़ना है कि ‘सामाजिक न्याय’ समानता का समर्थन नहीं करता. वह असमानता के शिकार लोगों को थोड़ी राहत की मांग करते हुए यथास्थिति बनाए रखना चाहता है. शासक और शासित, दाता और याचक के बीच जो अंतर है, उसे मिटाने के बजाए वह उन्हें अपरोक्ष समर्थन देता है. वैसे भी ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर न्यायसंबंधी अधिकांश योजनाएं जनता की जरूरत के बजाय संसाधनों की उपलब्धता के आधार पर बनाई जाती हैं. युद्ध, महंगाई, आर्थिक मंदी, प्राकृतिक आपदा आदि से अर्थव्यवस्था पर आकस्मिक दबाव उत्पन्न हो तो उसकी भरपाई ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर बनी संस्थाओं के बजट से की जाती है. सरकार ऐसी योजनाओं को औपचारिक भाव से कार्यान्वित करती है. प्रतिबद्धता के अभाव में वे योजनाएं आसानी से भ्रष्टाचार का शिकार हो जाती हैं.

राज्य और सरकार दोनों नागरिक का कार्य हैं. उनका गठन सामाजिक सुरक्षा एवं ऐसे लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु किया जाता है, जिससे उन सुखों को आसानी से प्राप्त किया जा सके, जो किसी अकेले व्यक्ति के लिए संभव नहीं है. जैसे राज्य और सरकार नागरिक का कार्य है, ऐसे ही सामाजिक न्याय राज्य का दायित्व है, जिसे वह नागरिकों के प्रति अपने दायित्वों की पूर्ति हेतु अपनाता है. बावजूद इसके जनता द्वारा निर्वाचित सरकारें चाहे वे किसी भी तरह की क्यों न हों, नागरिकों के श्रम और पैसे से चलने के बावजूदकालांतर में अपने दायित्वों से मुंह मोड़ने लगती हैं. वे ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर विपन्नताग्रस्त वर्गों को मामूली राहत पहुंचाकर कल्याणकारी होने का दम भरती रहती हैं. प्रकारांतर में वे ऐसी संस्कृति का पोषणपल्लवन करती हैं, जो समाज को श्रेष्ठतम और साधारण, शासक और शासित में बांटे रखती हैं. जनता की उदासीनता के चलते, वे येनकेनप्रकारेण नागरिकों को यह विश्वास दिलाने में कामयाब होती हैं कि श्रेष्ठतम की शासकीय भूमिका और साधारण का शासित होना नियतिसिद्ध है. साम्यवाद इस तरह के वर्गभेद को नकारता है. वह सांस्कृतिक वर्चस्व के मूलाधार धर्म को राज्य के कामकाज से एकदम अलग रखने पर जोर देता है. धर्मकेंद्रित संस्कृति के स्थान पर वह श्रमकेंद्रित संस्कृति को बढ़ावा देता है. जिससे शारीरिक और बौद्धिक श्रम के बीच का अंतर मिटने लगता है. ऐसा ही समाज बहुजन का सपना और आदर्श हो सकता है.

तो क्या आमूल परिवर्तन की मांग को टालने, यथास्थिति बनाए रखने के लिए ‘सामाजिक न्याय’ महज राजनीतिक स्टंट है? ‘सामाजिक न्याय’ के उद्देश्य को देखते हुए उसकी सीधे आलोचना भले ही अनुचित लगे, परंतु जब तक जनता अपने हितों एवं अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं होगी हालात में सुधार के लिए जब तक खुद को दूसरों पर आश्रित मानती रहेंगीतब तक ‘सामाजिक न्याय’ अपने उद्देश्य में विफल बना रहेगा. हालात उसी ओर संकेत कर रहे हैं. हाल के वर्षों में राजनीति व्यापार तथा चुनाव मतप्रबंधन में बदल चुका है. दलित और पिछड़े मतदाताओं को लुभाने के चुनावी प्रयासों के लिए इधर एक नया शब्द निकलकर आया हैᅳ‘सोशल इंजीनियरिंग. उसका सामाजिक न्याय से कोई संबंध नहीं है. यह उसके नाम पर मतदाताओं को लुभाने जातीय समीकरणों को अपने पक्ष में साधने की चुनावी तकनीक है, जिसे अवसरवादी दल अकेले या दूसरे दलों के साथ गठजोड़ करके अमल में लाते हैं. सामाजिक न्याय का संबंध राज्य के स्वरूप से न होकर, उसके उत्तरदायी आचरण से है; और राज्य तभी अपने दायित्वों के प्रति सजग रह सकता है, जब जनता जागरूक तथा अपने अधिकारों के प्रति सजग हो.

संक्षेप में सामाजिक न्याय धर्म की प्रभुता में, मानवीय मूल्यों को साथ लेकर चलने की कला है. जबकि साम्यवाद धर्म को किनारे कर, विधायी तरीकों से न्याय की अपेक्षा करता है. अभी तक साम्यवाद के लिए वर्गक्रांति को अनिवार्य माना गया है. किंतु वर्गक्रांति केवल हिंसा के बल पर फलीभूत हो, यह आवश्यक नहीं है. देखा यही गया है कि जिन देशों में हिंसक वर्गक्रांति के बल पर सत्ता परिवर्तन हुआ, वहां वर्गहीन समाज की रचना का स्वप्न पूरा होने से पहले ही सर्वहारा शक्तियां अपने अंतर्द्वंद्वों के कारण बिखराब का शिकार होती गईं. कारण है कि हिंसा की मदद से सत्तापरिवर्तन का लक्ष्य पाने वाले राज्य आगे भी उसके पैरोकार बने रहते हैं. इससे चाहेअनचाहे वे अपने चारों और फैली बुर्जुआ ताकतों के बीच शक्तिसंतुलन बनाने की होड़ में जुट जाते हैं. नतीजा यह होता है कि उनके संसाधनों का बड़ा हिस्सा अनुत्पादक कार्यों पर खर्च होने लगता है, जो प्रकारातंर में सामाजिक असंतोष में वृद्धि करता है. वर्गहीन समाज की रचना तभी संभव है जब जनता के सभी समूह उसके लिए प्रतिबद्ध हों. यह कैसे संभव हो? समानता, समरसता, न्याय और स्वतंत्रता का सपना देखने वालों के लिए हमारे समय की यही सबसे बड़ी चुनौती है.

© ओमप्रकाश कश्यप

1. The best safeguard against fascism is to establish social Justice to the maximum possible extent. Arnold Toynbee, 1876

2. Justice is first virtue of social institutions, as truth is of system of thought. A theory however elegant and economical must be rejected or revised if it is untrue; likewise laws and institutions no matter how efficient and well arranged must be reformed or abolished. -John Rowls(1971)

3. http://janadesh.in/InnerPage.aspx?Story_ID=5525

बहुजन संस्कृति और सामाजिक न्याय

सामान्य
भारत के पास अनगिनत आख्यान हैं, इतिहास नहीं है.—हेनरी बर

 

‘संस्कृति’ समाजशास्त्र के सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाले शब्दों में से है. प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसके अलग-अलग संदर्भ होते हैं. कई बार परंपरा को संस्कृति समझ लिया जाता है. जबकि अनेक बार लोग संस्कृति और सामान्य व्यवहार के बीच अंतर नहीं कर पाते. जनसामान्य ‘संस्कृति’ को सलीके से परिभाषित भले ही न कर पाए, लेकिन यदि किसी व्यक्ति से उसके सामान्य व्यवहार, कार्यकलापों, सामाजिक-पारिवारिक जीवन की प्रेरणाओं के बारे में प्रश्न किया जाए तो बिना झिझके उसका एक ही उत्तर होगा—‘यही मेरी संस्कृति है.’ संस्कृति मनुष्य और समाज के संबंधों को न केवल व्याख्यायित करती है, अपितु उन्हें सफल एवं सार्थक भी बनाती है. संस्कृति के स्वरूप, उसकी अवधारणा, परिभाषा आदि को लेकर समाजविज्ञानियों के बीच मतभेद रहे हैं. कई बार लोग संस्कृति को मनुष्य के सामान्य व्यवहार से जोड़ने लगते हैं तो कई बार उसे सभ्यता के साथ गड्मड कर दिया जाता है. किसी व्यक्ति अथवा समाज के संदर्भ में संस्कृति उसके समग्र ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, कला, रोजमर्रा के व्यवहारों, संबंधों, रीति-रिवाजों, परंपराओं आदि का समुच्चय होती है.

संस्कृति का कोई एक स्रोत नहीं होता. मनुष्य संस्कृति के तत्व माता-पिता, गांव-पड़ोस, रीति-रिवाज, किस्से-कहानियों, साहित्य-कला, ज्ञान-विज्ञान आदि विविध स्रोतों से ग्रहण करता है तथा उन्हें अपनी अस्मिता और पहचान के रूप में सहेजकर रखता है. इस तरह कि वे उसके रोजमर्रा के व्यवहार, ज्ञान, सामाजिक संबंधों और मर्यादाओं का आधार बन जाते हैं. दूसरे शब्दों में संस्कृति उत्तराधिकार का विषय है. व्यक्ति अथवा समाज जिन आदतों को यत्नपूर्वक अपनी विरासत के तौर पर संभाले रहता है, जिनसे उसकी विशिष्ट पहचान बनती है, उनका समन्वित, समावेशी और लोकोपकारी रूप संस्कृति कहा जा सकता है. उनमें कला, साहित्य, अर्जित ज्ञान, रीति-रिवाज, परंपराएं, सामूहिक प्रवृत्तियां, खान-पान, आचार-व्यवहार आदि सब सम्मिलित होते हैं. इसके अलावा उसमें वे आदर्श और नियम भी समाहित होते हैं, जिन्हें कोई समाज खुद को दूसरों से अलग और बेहतर दिखाने तथा स्थायित्व की भावना के साथ अपनाता है. मनुष्य की भौगोलिक और परिस्थितिकीय विशेषताएं भी उसकी संस्कृति को प्रभावित करती हैं.

‘संस्कृति’ शब्द ‘सम्’ और ‘कृति’ की संधि से बना है. उसका आशय ऐसी अमूर्त्त सामाजिक संरचना से है, जिसमें सभी का साझा हो. संस्कृति और सभ्यता को प्रायः एक-दूसरे के पर्यायवाची के रूप में देखा जाता है. लेकिन दोनों में अंतर है. सभ्यता की कसौटी भौतिक जगत की उपलब्धियां तथा उनके फलस्वरूप जीवन में आए परिवर्तन को माना जाता है. सभ्यता संस्कृति से प्रभावित होती है, एक तरह से उसका हिस्सा भी है, लेकिन वह स्वयं संस्कृति नहीं होती. ऐसे ही जैसे भाषा ज्ञान की वाहक होती है, स्वयं ज्ञान नहीं होती. हां, भाषा का ज्ञान हो सकता है, जो मनुष्य की संपूर्ण ज्ञान-संपदा का मामूली हिस्सा है. इसी तरह मनुष्य अथवा समाज की भौतिक उपलब्धियां संस्कृति नहीं होतीं. सभ्यता को आमतौर पर संस्कृति का उत्पाद माना जाता है. लेकिन यह बात पूरी तरह सत्य नहीं है. सभ्यता और संस्कृति का संबंध अन्योन्याश्रित होता है, जिनमें संस्कृति का स्थान अपेक्षाकृत ऊपर माना जाता है. अपनी हर उपलब्धि के लिए सभ्यता संस्कृति की ऋणी रहती है. उसे हम संस्कृति का आवरण भी कह सकते हैं. परोक्षतः दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं. किसी समूह अथवा समाज की सभ्यता को उसकी संस्कृति अथवा संस्कृतियों का समुत्पाद भी कहा जा सकता है.

संस्कृति और व्यवहार में भी अंतर है. लोग संस्कृति को रोजमर्रा के आचरण के रूप में देखने की भूल कर बैठते हैं. यह गलत है. मनुष्य का नैमत्तिक व्यवहार कानून, समाज, बाजार आदि से प्रभावित हो सकता है. उसका अध्ययन मानव-व्यवहार के अंतर्गत आता है. इस तरह वह मनोविज्ञान की विषय-वस्तु है. संस्कृति व्यवहार भी नहीं होती. उसे व्यवहार की नियंत्रक शक्ति अवश्य कहा जा सकता है. कोई भी सामाजिक अथवा व्यक्तिगत व्यवहार संस्कृति का हिस्सा हो सकता है, उसे संस्कृति नहीं माना जा सकता. कारण यह कि व्यवहार मूर्त्त होता है, संस्कृति अमूर्त्त. होली के पर्व पर एक-दूसरे पर रंग डालना अथवा रक्षाबंधन के अवसर पर बहन द्वारा भाई को राखी बांधना, सहज सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवहार का हिस्सा हैं, स्वयं संस्कृति नहीं है. संस्कृति उनमें अंतर्निहित प्रेरणा है. ऐसी अंतश्चेतना जो मनुष्य को अधिकाधिक सभ्य तथा प्राणिमात्र के प्रति अधिकतम उपयोगी होने का उत्साह जगाती है. मनुष्य ऐसी प्रेरणाओं को अपनी-अपनी तरह से परिभाषित कर सकता है. उनके स्वरूप में थोड़ा-बहुत परिवर्तन ला सकता है, किंतु सामाजिक पहचान से जुड़े होने के कारण उन्हें पूर्णतः नकार नहीं सकता. कुल मिलाकर समाज अथवा व्यक्ति-विशेष के संदर्भ में संस्कृति को हम उसकी सामूहिक आदतों, स्वभाव, ज्ञान-विज्ञान, कला, साहित्य आदि के समुच्चय के रूप में देख सकते हैं.

अपने मूल विषय ‘बहुजन संस्कृति’ लौटने से पहले आवश्यक है कि ‘बहुजन’ की अवधारणा तय कर ली जाए. ‘बहुजन’ का अभिधार्थ ‘बहुसंख्यक जन’ अवश्य है, लेकिन इसका आधार मात्र संख्याबल नहीं है. संख्या के माध्यम से बहुजन को परिभाषित करने के अनेक खतरे हैं. इससे ‘बहुजन’ को संख्याबल समझ लिए जाने की संभावना बराबर बनी रहेगी. वह भीड़ को समाज का दर्जा देने के बराबर होगा. प्रकारांतर में वह अनेक भ्रांतियों को जन्म देगा. पुनश्चः ‘बहुजन’ और ‘बहुसंख्यक जन’ दोनों को एक मान लिया गया तो अल्पसंख्यक मुस्लिमों के मुकाबले हिंदू बहुजन होंगे तथा दलितों के सापेक्ष पिछड़ी जातियों के लोग. इस कसौटी पर आदिवासियों के मुकाबले गैर आदिवासी ‘बहुजन’ माने जाएंगे. यह विभाजन आगे भी बढ़ता जाएगा. एक समय ऐसा भी आ सकता है जब बहुजन की संकल्पना का आधार और उद्देश्य दोनों समाप्त हो जाएं. जैसे ‘बहुजन’ को ‘बहुसंख्यकजन’ नहीं कहा सकता, ऐसे ही ‘बहुजन’ के आधार पर ‘बहुजनवाद’ जैसी भी संकल्पना भी अनुचित कही जाएगी. उससे उसके ‘बहुसंख्यकवाद’ में बदलने की संभावना बनी रहेगी. अतएव ‘बहुजन’ की अवधारणा तय करने के लिए संख्या-तत्व को नजरंदाज करना ही उचित होगा.

फिर ‘बहुजन’ किसे माना जाए? इस शब्द का प्रथम उपयोग बौद्ध दर्शन में प्राप्त होता है. बुद्ध इसे परिभाषित नहीं करते, किंतु जिस संदर्भ में वे इसका प्रयोग करते हैं, उससे ‘बहुजन’ की अवधारणा साफ होने लगती है. भिक्षु संघ को संबोधित करते हुए वे कहते हैं—‘चरथ भिक्खवे चारिकम्-बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय.’ ‘हे भिक्षु! बहुजन कल्याण और बहुजन-हित के लिए निरंतर प्रयाण करते रहो.’ बुद्ध राज-परिवार में जन्मे थे. समकालीन राजाओं, विशेषकर श्रेष्ठिवर्ग पर उनका प्रभाव था. फिर भी वे भिक्षुसंघ से ‘बहुजन’ के कल्याण हेतु निरंतर प्रयत्नशील रहने की कामना करते हैं. आखिर क्यों? तत्कालीन सामाजिक स्थितियों को देखते हुए इसे समझ पाना कठिन नहीं है. उस समय तक वर्ण-व्यवस्था कट्टर रूप ले चुकी थी. कर्मकांड शिखर पर था. लोग जाति देखकर व्यवहार करते थे. इस मामले में सर्वाधिक मुखर ब्राह्मण थे. उनका दावा था कि उन पर सृष्टि-रचियता ब्रह्मा की विशेष कृपा है. जिसने उन्हें अपने मुख से पैदा किया है. निहित स्वार्थ के लिए उन्होंने प्राकृतिक शक्तियों अग्नि, वायु, आकाश, जल, पृथ्वी आदि का देवताकरण किया था और लगातार यह प्रचारित करते रहते कि वे यज्ञों के माध्यम से देवताओं के संपर्क में रहते हैं. दूसरा वर्ग क्षत्रियों का था, जिसे समाज की रक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. देवताओं की दुहाई देते-देते ब्राह्मण खुद देवता होने का गुमान करने लगे थे, जबकि क्षत्रिय राज्य के रखवाले से उसका स्वामी बन बैठे थे. स्वार्थ के लिए ब्राह्मण क्षत्रिय का महिमामंडन करता था, क्षत्रिय ब्राह्मण के पांव पखारता था.

तीसरा व्यापारी वर्ग था. पहले दो वर्गों की तरह अनुत्पादक वर्ग. उसका कार्य दूसरों के उत्पाद बेचकर मुनाफा कमाना था. मुनाफे का एक हिस्सा ब्राह्मण और क्षत्रिय को भेंट कर वह मस्त रहता था. शेष जनसमाज यानी चौथे वर्ग में किसान, मजदूर, शिल्पकार आदि सभी आते थे. उनपर समाज के विकास की जिम्मेदारी थी, परंतु थे सब दूसरों की मर्जी के दास. किसी को अपनी रुचि और हितों के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता न थी. किसान खेत में पसीना बहाता था, मगर फसल पर उसका अधिकार न था. वह राजा और सामंत की मान ली जाती थी. शिल्पकार अपनी कला से संस्कृति और सभ्यता को संवारने का काम करते थे, किंतु अपने ही श्रम-कौशल पर उनका अधिकार न था. उनके श्रमोत्पाद के मूल्यांकन का अधिकार व्यापारी वर्ग के पास था. शूद्र का कर्तव्य था राज्य के लिए कर और ब्राह्मण के लिए दान देना. वफादार रहना तथा उनके प्रत्येक आदेश  को कृपा-भाव के साथ ग्रहण करते हुए दासत्व का धर्म निभाना. इसी में उसकी मुक्ति है—ऐसा कहा जाता था.

संख्याबल में ऊपर के तीनों वर्ग शेष जनसमाज के सापेक्ष बहुत कम थे. कुल जनसंख्या का बमुश्किल पांचवा हिस्सा. लेकिन समाज के कुल संसाधनों पर उनका अधिकार था. इसलिए संख्या-बहुल होने के बावजूद निचले वर्ण के लोग ऊपर के तीन वर्गों की मनमानी सहने के लिए विवश थे. कार्य-विभाजन के नाम पर ब्राह्मणों ने समाज के बहुसंख्यक हिस्से को छोटी-छोटी जातियों और वर्गों में बांट दिया था. बहुजन के पास बुद्धि थी, हस्तकौशल था, अनथक परिश्रम करने का हौसला तथा ईमानदारी भी थी. नहीं था तो आत्मविश्वास और सपने जो जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं. ये सब सेवा-भाव की भेंट चढ़ चुके थे. निरंतर बढ़ते सामाजिक दबावों तथा यह भ्रम कि ईश्वर एकमात्र और सच्चा न्यायकर्ता है, कि इस जीवन में उन्हें जो खोना पड़ रहा है वह मृत्योपंरात जीवन में सहज प्राप्त होगा—के चलते वे पूर्णतः नियतिवादी हो चुके थे. अपने सामान्य हितों के बारे में निर्णय लेने के लिए भी वे समाज के शीर्षस्थ वर्गों पर निर्भर थे; तथा उन्हें अपना स्वामी, सर्वेसर्वा एवं मुक्तिदाता मानते थे. हालात ऐसे थे कि अपने प्रत्येक कार्य में स्वार्थ को आगे रखने वाले तीनों शीर्षस्थ वर्गों के बीच अभूतपूर्व एकता थी, जबकि चौथा और बहु-संख्यक वर्ग सामान्य हितों के लिए एक-दूसरे के साथ स्पर्धा करता हुआ, अपनी प्रभावी ताकत खो चुका था. ‘दिमाग’ और ‘हाथों’ की उस अघोषित-अवांछित स्पर्धा में लाखों हाथ, कुछ सौ या हजार दिमागों की मनमानी के समक्ष बेबस थे. ‘बहुजन’ से बुद्ध का आषय ऐसे ही लोगों से था, जो समाज के प्रमुख कर्ता और उत्पादक वर्ग का हिस्सा होने के बावजूद उपेक्षित, तिरष्कृत, उत्पीड़ित और इस कारण विपन्नता का जीवन जीने को विवश थे. अपने जीवन संबंधी महत्त्वपूर्ण निर्णयों के लिए वे ऐसे लोगों पर निर्भर थे जो उन्हीं के प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष समर्थन से शक्तिशाली होकर बहुजन-हितों के विपरीत कार्य करते थे.

कदाचित अब हम ‘बहुजन’ की अवधारणा तय करने की स्थिति में आ चुके हैं. अभी तक के विवरण जो छवि बनती है, उसके अनुसार ‘बहुजन’ समाज का प्रमुख उत्पादक वर्ग है, जो कभी जाति तो कभी धर्म के नाम पर आरंभ से ही अन्याय, असमानता और शोषण का शिकार रहा है. मानव सभ्यता उसके स्वेद-बिंदुओं की ऋणी है, फिर भी उसे किसी न किसी रूप में, उसके श्रम-लाभों से वंचित रखा गया है. वह खेतों में काम करने वाला मजदूर हो सकता है; और गली-नुक्कड़ पर जूते गांठने वाला मोची भी. स्त्री भी हो सकता है, पुरुष भी. आजीविका उसका धर्म है. वही उसका भरोसा भी. इसी कारण बुद्ध पूर्व भारत में वह आजीवक कहलाता था. उन दिनों प्रकृति पर उसे भरोसा था. वही उसकी श्रद्धा का पात्र भी थी. प्रकृति के प्रति सम्मान-भाव के साथ जिस दर्शन की रचना उसने की थी, विद्वत जगत में वह लोकायत के रूप में ख्यात हुआ. उसकी सहायता से शताब्दियों तक वे लोग आंडबर और याज्ञिक कर्मकांडों पर टिके वैदिक धर्म-दर्शन को चुनौती देता रहा. इस तरह बहुजन की अवधारणा हमें सामाजिक न्याय की भावना से जोड़ती है. अपने साथ-साथ दूसरों के कल्याण के लिए जिम्मेदार बनाती है. यही उसका उद्देश्य है और यही अभीष्ट भी है. हालांकि सामाजिक न्याय की अवधारणा को लेकर मत-वैभिन्न्य हो सकते हैं.

मार्क्स ने पूंजीवादी तंत्र में उत्पीड़ित वर्ग को ‘सर्वहारा’ का नाम दिया था. ‘सर्वहारा’ और ‘बहुजन’ की आर्थिक अवस्था में अधिक अंतर नहीं होता. दोनों ही शोषण का शिकार होते हैं. उनमें से किसी को भी अपने श्रम के मूल्यांकन का अधिकार नहीं होता. फिर भी दोनों की सामाजिक स्थिति में अंतर है. मार्क्स का जन्म ऐसे समाज में हुआ था जहां जाति, वर्ण और धर्म के आधार पर विभाजन न था. अतएव सर्वहारा की उसकी परिकल्पना ठेठ पूंजीवादी समाज में आर्थिक विपन्नता के शिकार श्रमिक-वर्ग के शोषण तथा उसके सामाजिक-सांस्कृतिक दुष्परिणामों तक सीमित थी. बहुजन की समस्याओं का मूल सामाजिक-सांस्कृतिक भेदभाव होते हैं. प्रकारांतर में वही उसकी समाजार्थिक दुरावस्था का कारण बनते हैं. मुख्यधारा से जुड़ने के लिए सर्वहारा को आर्थिक बाधाएं पार करनी पड़ती हैं. जबकि बहुजन को आर्थिक के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक समस्याओं से भी जूझना पड़ता है. चूंकि सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव की गति अत्यंत मंथर होती है, इसलिए बहुजन-कल्याण की राह हमेशा अनेकानेक चुनौतियों से भरी होती है. लोकतांत्रिक परिवेश का लाभ उठाकर सर्वहारा अपनी स्थिति में सुधार ला सकता है. पश्चिमी देशों में ऐसा हुआ भी है. जाति के संबंध में लोकतांत्रिक सरकारें भी अपेक्षानुरूप सफल नहीं हो पातीं. प्रतिगामी शक्तियां जाति को व्यक्ति का निजी मामला बताकर सामाजिक परिवर्तन को टालती रहती हैं. सामाजिक-सांस्कृतिक भेदभाव तथा अवसरों की कमी के कारण बहुजन के लिए आर्थिक विषमताओं के चक्रव्यूह को भेद पाना आसान नहीं होता. जटिल जाति-व्यवस्था तथा उसके साथ धर्म का चिरस्थायी गठजोड़, बहुजन के संघर्ष को कई गुना बढ़ा देते हैं.

‘बहुजन’ का प्रथम उल्लेख भले ही बौद्ध दर्शन में हुआ हो, इसकी भूमिका वैदिक संस्कृति की स्थापना के साथ ही बन चुकी थी. लगभग 1500 ईस्वी पूर्व मध्य एशिया से भारत पहुंचे पशुचारी कबीलों ने खुद को ‘आर्य’ कहा था. इसका अर्थ बताया जाता है—‘श्रेष्ठ’ अथवा ‘श्रेष्ठजन.’ इस संबोधन का आशय था—मूल भारतवासी अथवा उनसे हजारों वर्ष पहले से इस देश में बस चुके जनसमूहों की संस्कृति को हेय मान लेना. भारत के मूल निवासी कौन थे? विद्वान दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं में अग्रणी सिंधू सभ्यता को अनार्य सभ्यता मानते हैं. डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी अपने ग्रंथ ‘हिंदू सभ्यता’(राजकमल प्रकाशन, पांचवा संस्करण, 1975, पृष्ठ 46) में मोहनजोदड़ो से प्राप्त नरकंकालों के आधार पर सिंधू सभ्यता के निर्माताओं को चार नस्लों में बांटते हैं—आद्य-निषाद, भूमध्य सागर से संबंधित जन, अल्पाइन तथा मंगोल, किरात. आगे वे लिखते हैं कि आद्य-निषाद भारत महाद्वीप के निवासी थे. भूमध्यसागरीय लोग दक्षिण एशिया से आए थे. अल्पाइन पश्चिमी एशिया तथा मंगोल, किरात वर्ण के लोग पूर्वी एशिया से पलायन कर लंबी यात्रा के उपरांत भारत पहुंचे थे. इनके अलावा  अलग-अलग नस्ल के संसर्ग से जन्मीं संकर नस्लें भी थीं. ऋग्वेदादि ग्रंथों में आर्यजनों ने इन्हीं नस्लों के सापेक्ष जो उनसे सहस्राब्दियों पहले इस प्रायद्वीप पर आकर बस चुकी थीं; तथा अपने श्रम-कौशल के बल पर समृद्ध सभ्यता की स्वामिनी थीं—अपनी वर्ण-श्रेष्ठता का दावा किया है. यदि उनके दावे को स्वीकार कर लिया जाए तो समकालीन बाकी नस्लें जिनका उल्लेख ऊपर किया गया है, तुलनात्मक रूप से अश्रेष्ठ अथवा निकृष्ट सिद्ध होती हैं, लेकिन पुरातात्विक साक्ष्य इसे वैदिक ब्राह्मणों की आत्ममुग्धता से अधिक मानने को तैयार नहीं है. आज यह प्रमाणित है कि सिंधू घाटी की सभ्यता ऋग्वैदिक सभ्यता की अपेक्षा 1500-2000 पुरानी तथा उससे कहीं अधिक समृद्ध और सुव्यवस्थित थी. पुरातत्ववेत्ता सिंधू सभ्यता की शुरुआत 3200 ईस्वी पूर्व से मानते हैं. 2300 ईस्वी पूर्व से 1750 ईस्वी पूर्व तक वह सभ्यता अपने वैभव के शिखर पर थी. उसके बाद उसके पराभव का दौर शुरू हुआ. 1500 ईस्वी पूर्व में जब आर्यों ने जब भारत में प्रवेश किया, उस समय वह सभ्यता करीब-करीब मिट चुकी थी. उसके अवशेष हड़प्पा, मोहनजोदड़ो’, कालीबंगा, लोथल, मेहरगढ़ जैसे दर्जनों स्थानों पर आज भी सुरक्षित हैं. सिंधुवासियों को दुनिया की सबसे पुरानी और समृद्ध नागरिक सभ्यता की नींव रखने वाला बताया जाता है. पुरातत्ववेत्ता इस बात पर सहमत हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता का कुल क्षेत्रफल आधुनिक पाकिस्तान के क्षेत्रफल से भी अधिक था.

भारतीय इतिहास के संदर्भ में 1500 ईस्वी पूर्व से 700 ईस्वी पूर्व तक के समय को विद्वान ‘अंधकार युग’ मानते हैं. इसलिए कि उस कालखंड के बारे में हमें प्रामाणिक तौर पर कुछ भी ज्ञात नहीं है. विद्वानों के अनुसार ऋग्वेदादि श्रुति ग्रंथों का रचनाकाल भी यही कालखंड है. लेकिन ये ग्रंथ 700 ईस्वी पूर्व में भी लिखित रूप में मौजूद थे, यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता. दूसरी ओर यह प्रमाणित तथ्य है कि सिंधू सभ्यता के निर्माताओं को न केवल लिपि बल्कि संख्याओं, वास्तविक और प्रतीक मुद्रा तथा उनके अनुप्रयोगों की भी पर्याप्त जानकारी थी. उनके खेती के तरीके विकसित थे. इतने विकसित कि भारत में बीसवीं शताब्दी के आरंभ तक भी उनमें खास परिवर्तन नहीं हो पाया था. उनके पास सुनियोजित व्यापार-तंत्र और ऐसी भाषा थी, जिसके माध्यम से वे समकालीन सभ्यताओं से संवाद करने में सक्षम थे. जबकि आर्यजन महज घुमंतु पशुचारी कबीले थे. सभ्यता की दृष्टि से सिंधुवासियों से लगभग हजार साल पिछड़े हुए. इसके बावजूद यदि उन्होंने स्वयं को ‘आर्य’ यानी ‘श्रेष्ठजन’ कहा, तो इसके दो प्रमुख कारण हो सकते हैं. पहला या तो वे सिंधू घाटी की सभ्यता के प्राचीन वैभव तथा उसके महत्त्व से अपरिचित थे. अथवा यह संबोधन उन्होंने बहुत बाद में अनार्यजनों पर अपनी सांस्कृतिक विजय, वैदिक संस्कृति की स्थापना के समय चुना था. वे जानते थे कि अपनी संस्कृति को श्रेष्ठ बताए बिना जीत को स्थायी बनाना और मूल-भारतवासियों पर ‘आर्यत्व’ को थोप पाना असंभव है. ईसा पूर्व चौथी-पांचवी शताब्दी तक वह लक्ष्य ही बना रहा. यह भी संभव है कि ‘आर्य’ संबोधन मध्य एशिया से प्रयाण से पहले ही उनके साथ जुड़ा हो और उसका अभिप्राय ‘श्रेष्ठजन’ न होकर कुछ और हो. ऋग्वेद को प्राचीनतम वेद, हिंदुओं का पवित्रतम ग्रंथ, जिसकी रचना ब्राह्मणों द्वारा ब्राह्मणों के लिए की गई है—माना जाता है. उसके आरंभिक उद्गाता ऋषियों में सभी वर्णों के रचनाकार सम्मिलित हैं.

वेदादि ग्रंथों को ‘ब्राह्मण-ग्रंथ’ कहने की प्रवृत्ति बहुत बाद में, कदाचित यजुर्वेद की रचना के समय हुई. उस समय तक उस समय तक ‘पुरोहित’, ‘राजा’, सम्राट जैसे पदों का सांस्थानीकरण हो चुका था. धर्म और राजनीति दोनों ही व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति का माध्यम बन चुके थे. वैदिक कर्मकांड जो उससे पहले तक मुख्यतः आश्रमों तक सीमित थे, वे राजा-महाराजाओं तथा धनी व्यापारियों के घर-आंगन तक पहुंचकर वैभव-प्रदर्शन के काम आने लगे थे. ब्राह्मणों की पूरी मेधा यज्ञादि कर्मकांडों को विस्तार देने में जुटी थी. चतुर्भुजी ब्रह्मा के हाथ में ‘ऋग्वेद’ के बजाय ‘यजुर्वेद’ की प्रति का होना, वैदिक धर्म-दर्शन की परपंरा में कर्मकांडों के बढ़ते महत्त्व को दर्शाता है. ऐसे में ज्ञान की परंपरा का अवरुद्ध होना स्वाभाविक था. वही हुआ भी. उसके तुरंत बाद पौराणिक लेखन की बाढ़-सी आ गई, जिसने उस समय तक उपलब्ध ज्ञान-विज्ञान और ऐतिहासिक तत्वों का मिथकीकरण करने का काम किया.

ऋग्वेद में अनार्य पुरों के ध्वंस का जगह-जगह वर्णन है. लेकिन ऋग्वेद की रचना का जो काल है, उस समय तक सिंधु सभ्यता का पराभव हो चुका था. इसलिए संभावना यही बनती है कि ऋग्वैदिक आर्यों ने सिंधु-घाटी के उन नगरों और पुरों पर हमला किया था, जो प्रकृति की मार के चलते पहले से ही निष्प्रभ हो चुके थे. पराजित अनार्यों में से कुछ यहां-वहां छिटक गए. जो बचे उन्हें लेकर ब्राह्मणों ने चातुर्वर्ण्य समाज की नींव रखी. चातुर्वर्ण्य समाज की अवधारणा कदाचित आर्यों की प्राचीन स्मृति का हिस्सा थी. गौरतलब है कि प्राचीन मिस्र तथा पर्शिया में भी चातुर्वर्ण्य वर्ण-व्यवस्था प्रचलित थी. अवेस्ता(यसना, 19/17, फ्रे) में जिन चार वर्णों का उल्लेख मिलता है, वे हैं—असर्वण(पुरोहित वर्ग), अर्तेशत्रण(क्षत्रिय), डबेरियन(वैश्य) तथा वास्त्रोषण(शूद्र). ध्वनि के आधार पर आर्य शब्द ‘असर्वण’ के अपेक्षाकृत निकट है. अवेस्ता में ‘असर्वण’ को वर्ण-क्रम में पहला स्थान पर रखा गया है. संभव है ‘आर्य’ शब्द की उत्पत्ति पार्शियन ‘असर्वण’ से हुई हो; या फिर ‘आर्य’ की अवधारणा के मूल में इस शब्द का प्रभाव रहा हो. ‘अवेस्ता’ के अनुसार ‘अहुरमज्द’ एक प्रमुख देवता है. उसे सृष्टि निर्माता और उसका पालक माना गया है. मान्यतानुसार उसने कई द्वीपों की रचना की थी. भारत में प्रवेश के बाद ‘अहुरमज्द’ का ‘अहुर’ ही प्रकारांतर में ‘असुर का रूप ले लेता है. इससे एक संभावना यह भी बनती है कि भारत पहुंचे आर्य कबीले अपने मूल प्रदेश की संस्कृति का प्रतिपक्ष थे. ‘अहुरमज्द’ को सर्वोच्च पद का दिया जाना, उन्हें स्वीकार न था. इसलिए भारत पहुंचकर उन्हें जैसे ही अवसर मिला, ‘अहुरमज्द’ को नकारात्मक शक्तियों के प्रतीक असुर में ढाल दिया गया. भारत में आर्यों का आगमन अलग-अलग समय में टुकड़ियों के रूप में हुआ था. उधर ऋग्वेद में ‘असुर’ का प्रयोग अच्छे और बुरे दोनों अर्थों में हुआ है. इससे एक संभावना यह भी है कि अलग-अलग समय में आने वाली आर्य-टोलियां भिन्न समाज और संस्कृतियों से संबंधित थीं. यह भी संभव है कि ‘असुर’ शब्द का प्रयोग पहले ‘अच्छे’ के संदर्भ में होता हो, उसे ‘बुरे’ का प्रतीक और आर्यों का दुश्मन बाद में माना गया हो. मानव-संस्कृति के इतिहास में ऐसे बदलाव स्वाभाविक कहे जा सकते हैं. उन्हें हम समाज में निरंतर बदलते शक्ति-केंद्रों का परिणाम भी कह सकते हैं. आरंभ में गणेश को ‘विघ्नकर्ता’ देवता माना जाता था. प्राचीनतम उल्लेखों में उन्हें कर्मकांड और आडंबरों का विरोधी दर्शाया गया है. आगे चलकर वे हिंदुओं के प्रमुख देवता के रूप में प्रतिष्ठित होकर, ‘विघ्नहर्ता’ मान लिए जाते हैं. ऐसे ही शिव जो पहले अनार्यों के लोकनायक के रूप में प्रतिष्ठित थे, उन्हें देवताओं की तिकड़ी में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया.

शिव को संहार का देवता माना जाता है. यह मिथ शिव की अनार्य समूहों के बीच महत्ता को दर्शाता है. भारत में आर्यों का आगमन भले ही उस युग में हुआ हो जब प्राचीन सिंधु सभ्यता का वैभव लुट चुका था. तो भी भारत पहुंचने के बाद उनके लिए यहां के निवासियों पर जीत हासिल करना आसान नहीं रहा होगा. शिव पूरे सिंधु प्रदेश के प्रतिष्ठित लोकनायक थे. उस समय के सभी अनार्य समूहों पर उनका प्रभाव था. इसलिए भारत आने के साथ ही आर्यों को शिव के समर्थकों से जूझना पड़ा होगा. संस्कृत ग्रंथों में इस बात के प्रमाण हैं कि अनार्यों के साथ आरंभिक युद्धों में आर्यों को पराजय का सामना करना पड़ा था. बल्कि लंबे समय तक जीत उनके लिए सपना ही बनी थी. मजबूरी में आर्यों से सहमति और समझौते से काम लिया. वह समझौता था, अनार्य महानायक शिव को आर्य देवताओं के बराबर का दर्जा देना. उनके साथ वैवाहिक संबंध स्थापित करना. चूंकि वे शिव के पीछे निहित अनार्य कबीलों की जनशक्ति से परिचित हो चुके थे, और परोक्ष रूप में उसका डर भी उनके मनो-मस्तिष्क पर सवार रहता था, कदाचित उसी भय ने उन्हें शिव को संहार का देवता मानने के लिए विवश किया था. आदिवासी आज भी खुद को हिंदू धर्म से अलग मानते हैं. कहते हैं कि उनके पूर्वज वैदिक कर्मकांडों के कटु आलोचक; तथा ‘वर्ण-श्रेष्ठता की सैद्धांतिकी’ का विरोध करते थे.

यहां कुछ प्रश्न एकाएक खड़े हो जाते हैं. पहला यह कि सभ्यताकरण की अनिवार्यता के रूप में कार्य-विभाजन तो दूसरे देशों भी हुआ था. सभ्यताकरण की शुरुआत भी लगभग साथ-साथ हुई थी. अपने आदर्श समाज में प्लेटो ने भी लोगों को तीन वर्गों—स्वर्ण, रजत तथा कांस्य में बांटने की अनुशंसा की थी. भारत की भांति जापान, कोरिया, स्पेन तथा पुर्तगाल के लैटिन अमेरिकी उपनिवेशों, अफ्रीका आदि देशों में भी जातिप्रथा का प्रभाव था. जापान के ‘बराकुमिन’(burakumin) तथा कोरिया के ‘बीकजियोंग’(baekjeong) के हालात भारत के दलितों के समान ही थे. यमन में अल-अखदम(al-Akhdham, Khadem) की स्थिति भारतीय शूद्रां जैसी थी. उन्हें भी जाति-आधारित भेदभाव का सामना करना पड़ता था. इनके अलावा पाकिस्तान, चीन, नेपाल, बांग्लादेश, इंडोनेशिया आदि देशों का समाज भी छोटी-छोटी जातियों और वर्गों में विभाजित था. विभिन्न जातियों के बीच ऊंच-नीच की भावना भी प्रबल थी. फिर बाकी देशों विशेषकर पश्चिमी देशों के सभ्यताकरण तथा भारत के सभ्यताकरण के परिणामों के बीच भारी अंतर क्यों मिलता है?

इस रहस्य को सभ्यताओं के विकास की सामान्य पड़ताल द्वारा समझा जा सकता है. सुकरात ने जीवन और समाज में नैतिकता की व्याप्ति पर जोर दिया था. गुरु सुकरात के सपने को लेकर प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ में आदर्श समाज की परिकल्पना की थी. उसने किशोरावस्था के आरंभ से ही बच्चों को माता-पिता से दूर, उनकी पैत्रिक को पहचान छिपाकर, राज्य के संरक्षण में रखने की सिफारिश की थी. उसके आदर्श राज्य में बच्चों के पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा की संपूर्ण जिम्मेदारी राज्य की थी. एक उम्र तक शिक्षा का स्वरूप भी एक समान था. जबकि भारत में शिक्षा का स्वरूप वर्णानुसार परिवर्तनशील था. वैदिक ज्ञान केवल ब्राह्मण की संतान के लिए सुलभ था. क्षत्रिय और वैश्य की संतान को क्रमशः युद्ध-कौशल और व्यापारिक हिसाब-किताब से संबंधित शिक्षा देने का विधान था. शूद्र के लिए ज्ञान और शिक्षा के अवसर सर्वथा वर्ज्य थे. व्यक्ति की इच्छा और स्वतंत्रता का कोई महत्त्व नहीं था. पुत्र पिता की आजीविका को अपनाने के लिए बाध्य था. जबकि प्राचीन यूनान में सभी के लिए सैन्य शिक्षा एवं सेवा अनिवार्य थीं. तदोपरांत व्यक्ति की योग्यता तथा चारित्रिक विशेषताओं के अनुसार जिम्मेदारी सौंपी जाती थी. व्यक्ति को जन्म के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव न झेलना पड़े, इसके लिए प्लेटो ने साहसपूर्वक परिवार संस्था की भी उपेक्षा की थी. उसके बाद आए अरस्तु ने हालांकि प्लेटो की आदर्श राज्य संबंधी अनुशंसाओं को नकार दिया, परंतु जीवन और समाज में न्याय एवं नैतिकता के महत्त्व से उसे भी इन्कार न था. ‘श्रेष्ठ प्रजा ही श्रेष्ठ राज्य’ बना सकती है, कहकर उसने जीवन व्यक्तिमात्र के महत्त्व को स्थापित किया था. जिसे आधुनिक लोकतंत्र की आरंभिक प्रेरणा भी मान सकते हैं.

सच यह भी है कि सुकरात से लेकर अरस्तु तक सभी प्रमुख दार्शनिक दास प्रथा के समर्थक थे. और उसे उत्पादकता के स्तर को बनाए रखने के आवश्यक मानते थे. अरस्तु जैसा वैज्ञानिक सोच वाला विचारक जिसने प्राकृतिक विज्ञान के क्षेत्र में अद्भुत शोध किए थे, उत्पादकता में सुधार के लिए विज्ञान और तकनीक के प्रयोग हेतु कोई सुझाव नहीं देता. चूंकि दास के रूप में सस्ता श्रम आसानी से उपलब्ध था, जिसे वे विकास हेतु अपरिहार्य मान चुके थे—इस कारण उत्पादन वृद्धि हेतु विज्ञान और तकनीक के प्रयोग की ओर उनका ध्यान ही नहीं जाता. कुल मिलाकर विश्व के इन महानतम विचारकों द्वारा दास-पृथा को समर्थन, आगे चलकर में मानव-सभ्यता के विकास का अवरोधक सिद्ध हुआ. इस कमी के बावजूद प्राचीन यूनानी दर्शन में कुछ ऐसा अवश्य था, जो विचारकों की आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहा. वह था—मनुष्य को सभ्यता और संस्कृति के केंद्र में रखकर सोचना, तथा जीवन में नैतिकता को अत्यधिक महत्त्व देना, यही विशेषताएं आगे चलकर आधुनिक मानवतावादी दर्शनों की प्रेरणा बनी.

भारत में नैतिकता धर्म का उत्पाद उसका एक लक्षण मानी गई है. अधिकांश मामलों में तो धर्म और नैतिकता में कोई अंतर ही नहीं किया जाता. इसमें कोई बुराई भी नहीं है. एक प्रकार से धर्म भी मनुष्य की वैचारिक और आचरण की प्रतिबद्धता को दर्शाता है. बुराई तब उत्पन्न होती है जब उसकी प्रेरणा का आधार मानवेत्तर शक्तियों को मान लिया जाता है; तथा धर्म की आड़ लेकर कुछ लोग स्वार्थवश देवताओं को, जिनकी हैसियत मिथकीय पात्रों जैसी होती है—मनुष्य के सापेक्ष अतिरिक्त महत्त्व देने लगते हैं. कहने को प्रत्येक धर्म समानता के दावे के साथ जीवन में अपनी जगह बनाता है. परंतु उसकी समानता आभासी होती है. तरह-तरह की असमानताओं से जूझ रहे लोगों को फुसलाने के लिए धर्म ईश्वर के दरबार में बराबरी का भरोसा देता है. उसका वास्तविक जीवन में कोई महत्त्व ही नहीं है. वह जीवन और समाज में कुछ व्यक्ति अथवा व्यक्ति-समूहों के विशेषाधिकार को भी वैध ठहराता है. उसके प्रभाव में कुछ व्यक्तियों को सर्वेसर्वा और खास; जबकि बहुसंख्यक वर्ग को नगण्य एवं उपेक्षित मान लिया जाता है. भारतीय समाज की पहचान बन चुकी इस कुवृत्ति का दुष्परिणाम यह हुआ है कि जो कार्य अतिरिक्त श्रम की अपेक्षा रखते थे, उन्हें पूरी तरह शूद्रों तथा दासों के हवाले कर दिया गया. चूंकि संख्याबल में यह वर्ग तीनों शीर्षस्थ वर्गों की अपेक्षा अधिक था, समाज की जरूरत का उत्पादन उपलब्ध श्रम-शक्ति से आसानी से हो जाता था. इसलिए उत्पादन को बढ़ाने या उत्पादन प्रक्रिया को सरलीकृत करने का कार्य लंबे समय तक टलता रहा.

आने वाली शताब्दियों में यूनान का प्राचीन वैभव लुट-सा गया. प्लेटो का आदर्श राज्य चर्च के अधीन होकर धर्म के कुचक्र में हांफता हुआ नजर आया. इसके बावजूद वहां समय-समय पर स्वतंत्र मेधा का धनी ऐसे विचारक हुए जो प्राचीन चिंतकों से प्रेरणा लेकर राज्य को उसकी सीमा और कर्तव्य का एहसास कराते रहे. पंद्रहवीं शताब्दी की वैज्ञानिक क्रांति ने उत्पादन के वैकल्पिक साधनों का विकास किया. उससे पुरानी विचारधाराओं का नवोन्मेष हुआ, उसके साथ-साथ नए विचारों के सृजन में भी तेजी आई. मानव-मुक्ति के प्रश्न नए सिरे से अंगड़ाई लेने लगे. फलस्वरूप राज्य को चर्च के चंगुल से आजाद कराने लायक माहौल बना. नई वैचारिक चेतना ने सामंती व्यवस्था के सभी लक्षणों को जिनमें जाति भी शामिल थी, कठघरे में लाकर खड़ा कर दिया. जापान, कोरिया जैसे देशों में जहां जातिप्रथा अपने विकृत रूप में उपस्थित थी, वहां उसके संपूर्ण उन्मूलन के लिए सघन कार्यक्रम चलाए गए, जिन्हें वहां के राज्य का पूरा समर्थन मिला. अमेरिकी और फ्रांसिसी क्रांति की सफलता के पश्चात पश्चिम में व्यक्ति-स्वाधीनता की मांग जोर पकड़ने लगी थी. उसका असर उनके उपनिवेशों पर भी पड़ा. फलस्वरूप उन देशों में जाति का संपूर्ण उच्छेद संभव हो सका.

भारत में ऐसा नहीं हो सका. इसलिए कि यहां ज्ञान-विज्ञान को धर्म का अनुचर बना दिया गया था. ऊपर से धर्म की परिकल्पना इतनी अस्पष्ट थी कि हर कोई अपने स्वार्थ को धर्म का नाम दे सकता था. ‘महाभारत’ में कुरुक्षेत्र का भीषण युद्ध, एकलव्य का अंगूठा काट लेना और बाद में छल से उसकी हत्या कर देना जैसे अनेक धत्त्कर्म धर्म के नाम पर ही किए जाते हैं. पश्चिम, विशेषकर प्राचीन यूनानी दर्शन सुकरात और प्लेटो के नैतिकतावादी दर्शनों से प्रभावित था. इन दार्शनिकों ने नैतिकता को मनुष्यता के आदर्श के रूप में सामने रखा था. जबकि भारत में सबकुछ धर्म के अधीन था; और धर्म की संरचना ऐसी थी कि उसे सामंतवाद से अलग देख पाना असंभव था. जाति और धर्म ने एक-दूसरे के समर्थन से भारतीय समाज में जो विकृतियां पैदा की हैं, उनका समाधान आज तक नहीं हो पाया है. भारत में पिछले 2500 वर्षों से ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों पर शीर्षस्थ वर्गों का एकाधिकार रहा है. उत्पादक कर्म से दूर रहने के बावजूद उन्होंने अर्थव्यवस्था को अपने स्वार्थ के अनुरूप ढाला हुआ था. बदली वैश्विक परिस्थितियों के फलस्वरूप समाज के निचले वर्गों को आजादी तो मिली, मगर वह आधी-अधूरी थी. जातीय आधार पर थोपे गए बंधन उसकी स्वतंत्रता की बाधा बने थे. आर्थिक आवश्यकताओं के लिए वे शीर्षस्थ वर्गों पर निर्भर थे. यह उत्तरोत्तर बढ़ती समाजार्थिक विषमता का प्रमुख कारण बना.

इस संबंध में बड़ा रोचक विश्लेषण डॉ. देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय की पुस्तक ‘साइंस एंड टेक्नालॉजी इन एनशिएंट इंडिया’ में मिलता है. जार्डन क्लिड के लेख ‘दि अर्बन रिवोल्युशन’ का अध्ययन करते हुए वे लिखते हैं कि तीन प्रमुख प्राचीनतम सभ्यताओं भारत, मेसापोटामिया, मिस्र में लगभग 6000 से 3000 वर्ष पहले तक मानवीय अनुभव-कौशल के आधार पर प्राकृतिक विज्ञानों यथा रसायन, भौतिकी, जीवविज्ञान, वनस्पति विज्ञान का प्रयोग खूब प्रचलित था. कारीगर लोग चांदी और तांबे के अयस्क को पिघलाकर धातु-शोधन की कला में दक्ष थे. वे वायु की गति का अनुप्रयोग जानते थे. उनके द्वारा बनाए गए जहाज सुदूर सभ्यताओं तक निरंतर यात्रा करते रहते थे. बैलगाड़ी के उपयोग से यातायात सुलभ हुआ था. इससे खाद्यान्न को एक स्थान पर पहुंचाने और उसे सुरक्षित रखना संभव हुआ. सिंधु सभ्यता में 800 वर्गमीटर क्षेत्र में फैले अन्न भंडारगृह का पता चला है. मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की अनूठी भवन-संरचाएं तथा उनके लिए जिस प्रकार की पकी इंर्टों का उपयोग किया गया था, वह न केवल समकालीन सभ्यताओं में बेजोड़ था, बल्कि उसके पराभव के पश्चात एक हजार वर्षों बाद भी, जिसे उन्होंने सभ्यता के ‘अंधकार युग’ की संज्ञा दी है—संभव नहीं पाया था. कमियां उस सभ्यता में भी थीं. चट्टोपाध्याय साफ करते हैं कि प्राकृतिक विज्ञान के क्षेत्र में इतनी उपलब्धियों के बावजूद, तत्कालीन शासक वर्ग की विज्ञान-संबंधी प्राथमिकताएं प्रायोगिक गणित एवं ज्योतिष तक सीमित थीं. गणित का उपयोग उत्पादों के संवितरण, कराधान, भवन और भवन-सामग्री का निर्माण आदि के लिए किया जाता था, जबकि ज्योतिष की मदद मौसम पर नजर रखने और उसके अनुसार फसल-उत्पादन के लिए ली जाती थी. प्राकृतिक विज्ञान यथा जीवविज्ञान, वनस्पति विज्ञान, भौतिकी, रसायन आदि के अनुप्रयोग तथा उसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी केवल शिल्पकर्मियों की थी.

वैदिक मेधा भी इस अपसंस्करण का शिकार थी. आरंभिक भारत में बीजगणित का जितना उपयोग यज्ञ-वेदियों के निर्माण के लिए होता था, उतना ही उपयोग नौकाएं बनाने के लिए भी किया जाता था. हवा की गति को पहचानते हुए, महासागर के बीच हजारों किलोमीटर की लंबी यात्राएं करने वाली नौकाओं का निर्माण तथा उनके नाविकों द्वारा सफल यात्राएं बिना बीजगणित, सामुद्रिक विज्ञान, वनस्पतिशास्त्र और गतिज भौतिकी के ज्ञान के असंभव थीं. मगर व्यावहारिक ज्ञान के प्रति कृपणता दिखाते हुए ब्राह्मणों ने ज्ञान-विज्ञान और तकनीक की उन अनेक धाराओं में से केवल गणित को सहेजने का कार्य किया. वह भी सीमित अर्थों में, यज्ञ-वेदियों के निर्माण जैसे अनुत्पादक कार्य के लिए. बाकी का ज्ञान कर्मकारों पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी अंतरण के लिए छोड़ दिया गया. संस्कृत साहित्य में बुनकर, तंतुकार, कुंभकार, नाविक, हलवाह, रथवाह, धातुकर्मी जैसे पेशेवरों का उल्लेख मिलता है. उनका ज्ञान मुख्यतः अनुभव आधारित था. लंबे विश्लेषण के बाद चट्टोपाध्याय जोर देकर कहते हैं कि उस समय की सामाजिक-आर्थिक नीतियों में कुछ न कुछ ऐसा अवश्य था, जो प्राकृतिक विज्ञानों की उपेक्षा कारण बना था. इसके निहितार्थ को समझना कठिन नहीं है.

आर्य इस देश में प्रवासी थे. संभव है, भारत आने के बाद अनेक वर्षों तक खुद को दूसरे देश का मानते रहे हों. प्रवासी को अपनी मूल-संस्कृति से बेहद लगाव होता है. यह लगाव तब और बढ़ जाता है जब उन्हें ऐसे लोगों के बीच रहना पड़े जो उनसे कहीं विकसित सभ्यता के स्वामी हों. इसे उस समूह की हीनता-ग्रंथि भी कह सकते हैं. परंतु यह किसी भी व्यक्ति अथवा समूह के बारे में सच हो सकता है. भारत में यायावर कबीलों के रूप में आए आर्यों के साथ भी कदाचित ऐसा ही था. उनकी अर्थव्यवस्था का मुख्य स्रोत पशुपालन था. खेती करना उन्होंने द्रविड़ों से सीखा. बावजूद इसके उत्पादकता के अपने परंपरागत संसाधनों के प्रति उनका आकर्षण बना रहा. वैदिक ऋषियों की जीवनचर्या आश्रम-केंद्रित थी. सभी प्रमुख वनवासी ऋषियों के अपने-अपने आश्रम थे. उनकी आय का प्रमुख स्रोत पशु-संपदा थी. उसके लिए परस्पर झगड़े भी होते थे. मात्र एक गाय की खातिर वशिष्ट और विश्वामित्र के बीच हुआ लंबा संघर्ष तो जग-जाहिर है. स्वर्ग के रूप में ऐसी समानांतर परिकल्पना भी मिलती है, जहां दुधारू गाय, भरपूर संख्या में उपलब्ध हों, उसे गोलोक कहा गया है. मान्यता थी कि अच्छी दुधारू गाय समस्त कामनाओं की पूर्ति कर सकती है—‘कामधेनु’ का प्रतीक इसी सोच और पशु-केंद्रित अर्थव्यवस्था के महत्त्व को दर्शाता है. द्रविड़ों के संपर्क में आने के बाद आर्यों ने खेती करना सीखा. फिर भी पशु-पालन के प्रति आकर्षण एवं कृषि-कर्म के प्रति दुराव बना रहा. वर्ण-व्यवस्था कृषि-कर्म में लिप्त लोगों को शूद्र का दर्जा देकर तीसरे पायदान पर ढकेल देती है. उनकी अपेक्षा द्रविड़ क्रमवार विकास करते हुए कृषि-केंद्रित अर्थव्यवस्था को अपना चुके थे. वे उन लोगों के वंशज थे, जो सिंधु सभ्यता के पराभव के उपरांत यहां-वहां बिखर चुके थे. वे कृषि-कर्म में दक्ष थे. पुरातत्व से जुड़ी खोजें सिद्ध करती हैं कि सिंधु सभ्यता नागरीकरण के उन शिखरों तक पहुंच चुकी थी, जहां पहुंचने के लिए वैदिक जनों को आगे के एक हजार वर्ष खपाने पड़े. सिंधु सभ्यता की समृद्धि का प्रमुख संबल वहां के शिल्पकर्मी थे. अपने अनूठे शिल्पकर्म के बल पर वे, वैदिक सभ्यता के उभार के दौर में भी, अपनी आर्थिक-सामाजिक स्वतंत्रता को बचाए रखने में सफल हुए थे.

सिंधु सभ्यता के उत्खनन से चीनी के बर्तन प्राप्त हुए हैं. उनका उपयोग धातु-शोधन के कार्य हेतु किया जाता था. आज धातु-अयस्क को पिघलाने का काम बड़े-बड़े पूंजीपतियों के अधिकार में जा चुका है. खनिज-संपदा पर कब्जा करने के लिए पूंजीपतियों के बीच होड़ मची रहती है. उसके लिए आदिवासियों को निर्लज्जतापूर्ण ढंग से विस्थापित किया जा रहा है. जिस समय तक ये कारखाने नहीं लगे थे, उन दिनों धातु-शोधन करना मुख्यतः आदिवासियों तथा उन लोगों का कार्य था, जिन्हें बाद में निचली जाति का मान लिया गया. उनके द्वारा शोधित धातुओं(तांबा) से हल की फाल भी बनाई जाती थी, औजार भी. किंतु उनके हुनर और प्राकृतिक विज्ञानों के क्षेत्र में उनकी अनुभव-सिद्ध जानकारी का—वैदिक जनों की दृष्टि में कोई महत्त्व नहीं था. न ही उस परिवेश से निकलकर आए आधुनिक ब्राह्मणवादी बुद्धिजीवियों का ध्यान उस ओर गया. इसका दुष्परिणाम भारतीय समाज में ज्ञान-विज्ञान की निरंतर उपेक्षा के रूप में सामने आया. विशेषकर नए ज्ञान और शोध को लेकर. धर्म का स्वभाव होता है, वर्तमान और भविष्य की दुहाई देते हुए, अतीत की ओर बार-बार झांकना. उसपर हम भारतीय धर्म को कुछ ज्यादा ही अहमियत देते आए हैं, इसलिए हर नई समस्या का समाधान हमें अतीत की खोह में ले जाता है. समस्या सुलझने के बजाए और जटिल हो जाती है. इसका नुकसान बहुजनों को उठाना पड़ता है. अपनी विशिष्ट स्थिति का लाभ उठाकर अभिजन समूह हालात को अपने स्वार्थ के अनुरूप मोड़ने में कामयाब हो जाते हैं.

भारतीय संस्कृति में शूद्रों की उपस्थिति को लेकर जितने भी शोध सामने आए हैं, उनमें से अधिकांश वेदाध्ययन के अधिकार को शूद्रत्व की कसौटी मानते हैं. एक वर्ग कहता है कि शूद्रों को वेदाध्ययन और यज्ञादि कर्मकांडों में हिस्सेदारी का अधिकार था. दूसरा इससे इन्कार करता है. अपने-अपने मत के समर्थन में दोनों अपने तर्क लगभग एक जैसे ग्रंथों से जुटाते हैं. उन ग्रंथों से जो ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण से उसका महिमामंडन करते हुए रचे गए हैं. जिनका येन-केन-प्रकारेण उद्देश्य जाति-और वर्ण-व्यवस्था को बनाए रखना है, ताकि कुछ लोगों के विशेषाधिकार बने रहें. वेदाध्ययन और कर्मकांडों को लेकर स्वयं शूद्रों की दृष्टि क्या थी? क्या उन्हें वेदाध्ययन और कर्मकांडों से वंचित किए जाने बहुत क्षोभ था? क्या इनसे वंचित किए जाने का उनकी उत्पादकता पर कोई प्रभाव पड़ा था? अथवा वे किसी स्वतंत्र धर्म-दर्शन के अनुयायी थे तथा वैदिक कर्मकांडों को निरर्थक मानकर स्वयं ही उनसे सुरक्षित दूरी बनाए हुए थे? इस प्रकार के प्रश्नों को लेकर उनमें कोई बेचैनी नजर नहीं आती. कदाचित उनके लिए यह समस्या ही नहीं थी. उनमें से अधिकांश भारत के अतीत में सिवाय वैदिक सभ्यता और संस्कृति के कुछ ओर दिखाई ही नहीं देता. जो जानते-समझते हैं, वे इस सत्य पर पर्दा डाले रहते हैं. उन्हें डर लगा रहता है कि खुलते ही विशेषाधिकार छीने जा सकते हैं. जिन ग्रंथों के आधार वे इस निष्कर्ष तक पहुंचे हैं, उन्हीं के स्वतंत्र विवेचन द्वारा हम बड़ी आसानी से समझ सकते हैं कि समाज का बड़ा वर्ग, वैदिक कर्मकांडों की निरर्थकता को पहचानकर, स्वयं उनसे दूरी बनाए हुए था. उसमें वही लोग थे, जो अपने श्रम-कौशल के आधार पर जीविकोपार्जन करते थे. धर्म उनके लिए जीवनदायिनी प्रकृति के प्रति निजी आस्था और विश्वास  का मसला था. उस तरह दिखावे का नहीं जैसा वैदिक धर्म के अनुयायी कर रहे थे.

संस्कृत वाङ्मय के आधार पर अनार्यों की स्थिति का वर्णन करते हुए एक बात अकसर भुला दी जाती है, वह है उनकी आर्थिक स्वतंत्रता. समय के साथ हालांकि उसमें उतार-चढ़ाव आते रहते थे. बावजूद इसके अपने श्रम-कौशल के दम पर उनका बड़ा हिस्सा अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने में सफल हुआ था. एक तरह से प्राकृतिक विज्ञानों के अनुप्रयोग की जिम्मेदारी उन्हीं की थी. हालांकि ज्ञान-विज्ञान का अंतरण मुख्यतः अनुभव आधारित था. शिल्पकार वर्ग अपने पुत्र या उत्तराधिकारी को शिल्पकर्म से जुड़ी जानकारी देकर उऋण हो लेता था.़ अनुभवों की वंशानुगत अंतरण पद्धति में ज्ञान का लंबे समय तक संरक्षण और उसमें क्रमागत विकास असंभव था. ऊपर से निचले वर्गां में शिक्षा का अभाव, जिसने उन्हें अपने ही ज्ञान के प्रति उदासीन बना दिया था. फिर भी अपने संगठन-सामर्थ्य एवं बाहरी स्पर्धा के बल पर, शिल्पकार समूह अपनी आर्थिक स्वतंत्रता को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में सफल रहे थे. उस समय तक उत्पादन आवश्यकता केंद्रित था. मुनाफे की अवधारणा जन्मी नहीं थी. उत्पादक और उपभोक्ता के बीच सीधा संबंध था. उनके उत्पादों की स्थानीय और सुदूर बाजारों में बराबर मांग थी—इस कारण उनकी उपेक्षा असंभव थी. अनुकूल परिस्थितियां के चलते शिल्पकार वर्ग ने ईसा पूर्व चौथी-पांचवी शताब्दी तक अपनी समाजार्थिक स्वतंत्रता बनाए रखी. किंतु ‘मनुस्मृति’ तथा ‘अर्थशास्त्र’ की रचना के बाद समाज के चार्तुवर्ण्य विभाजन को राज्यों का समर्थन मिलने लगा था. चाणक्य शिल्पकार समूहों की स्वायत्तता को राज्य के लिए हानिकारक मानता था. ‘अर्थशास्त्र’ की रचना के बाद सहयोगाधारित व्यापारिक संघों पर तरह-तरह के प्रतिबंध थोपे जाने लगे. उसके चलते उत्पादक एवं उपभोक्ता के बीच एक नए व्यापारी वर्ग का उदय हुआ, जिसका प्रमुख कार्य उत्पादों को उसके उपभोक्ता-वर्ग तक पहुंचाना और बदले में अच्छा-खासा मुनाफा अपने लिए सुरक्षित रख लेना था. उससे मुनाफे की अवधारणा विकसित हुई. राज्य के संरक्षण में पनपे व्यापारी वर्ग ने कर्मकार वर्गों से उनके उत्पाद के मूल्यांकन का अधिकार छीन लिया. कालांतर में वह उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक दुर्दशा का कारण बना.

चाणक्य केंद्रीय सत्ता का समर्थक था. उसकी प्रमुख कृति ‘अर्थशास्त्र’ में किसी नए अर्थशास्त्रीय सिद्धांत की विवेचना नहीं है. वह विशुद्ध रूप से राजनीति का ग्रंथ है. पुस्तक के आरंभ के कई अध्याय राजा की सुरक्षा से संबंधित हैं. इसके लिए वह तरह-तरह के कूटनीतिक उपाय बताता है. राजनीति षड्यंत्रों के समय रहते पर्दाफाश तथा उनसे राज्य और राजा दोनों की सुरक्षा के लिए वह पूर्ववर्ती आचार्यों नारद, बृहश्पति, शुक्राचार्य आदि के ग्रंथों से उद्धरण प्रस्तुत करता है. इस कारण अर्थशास्त्र को ‘आन्वीक्षकी’ भी कहा गया है. सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य वंश का संस्थापक तथा अपने समय का सर्वाधिक शक्तिशाली सम्राट था. उसके पास पांच लाख से अधिक का सैन्यबल था. फिर चाणक्य को डर किस बात का था? क्यों राजा की सुरक्षा की चिंता करते हुए उसे अपनी पुस्तक के कई अध्याय ‘आन्वीक्षकी’ के नाम करने पड़े. सवाल यह भी है कि अर्थनीति विषयक साधारण जानकारी के बावजूद उस पुस्तक को ‘अर्थशास्त्र’ जैसा शीर्षक क्यों दिया गया? क्या महज इसलिए कि अरस्तु की ‘पॉलिटिक्स’ नामक पुस्तक उससे पहले आ चुकी थी; और वह भारत विजय का सपना लेकर निकले सिकंदर का गुरु था? अगर नहीं तो राजनीति-शास्त्र की पुस्तक के अवांतर नामकरण के लिए चाणक्य की जो आलोचना अपेक्षित थी, उससे आगे के विद्वान क्यों बचते रहे? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनके उत्तर भारतीय संस्कृति और इतिहास में नदारद हैं. लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों के निष्पक्ष विवेचन द्वारा उनके उत्तर खोजे जा सकते हैं.

सिंकदर का आक्रमण देश पर पहला सुगठित हमला था, जिसके पीछे आक्रमणकारी के साम्राज्यवादी मंसूबे एकदम साफ थे. चंद्रगुप्त के रण-कौशल से वह हमला नाकाम हो चुका था. उसके बहाने सत्ताधारी समूह जनता को यह समझाने में कामयाब रहे थे कि बाहरी आक्रमणों से सुरक्षा के लिए बड़े राज्यों का गठन अपरिहार्य है. लेकिन बड़े राज्यों की सफलता केंद्रोन्मुखी अर्थव्यवस्था के बिना संभव न थी. चंद्रगुप्त की सेना किसी भी तत्कालीन सम्राट से बड़ी थी. इतनी बड़ी सेना और राज्य के प्रबंधन हेतु भारी-भरकम मशीनरी का इंतजाम तभी संभव था, जब उत्पादन और वितरण के स्रोतों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में राज्य के सीधे नियंत्रण, अथवा उसके भरोसेमंद लोगों के अधीन लाया जाए. चाणक्य ने यही किया था. डॉ. रमेश मजूमदार ने अपनी पुस्तक ‘कॉआपरेटिव्स इन एन्शीएंट इंडिया’ में लगभग तीस प्रकार के सहयोगाधारित उत्पादक संगठनों का उल्लेख किया है. वे संगठन पूर्णतः स्वायत्त थे. यहां तक कि राजा को भी उनकी कार्यशैली में दखल देने का अधिकार न था. संगठन के मुखिया को राज-दरबार में सम्मानजनक स्थान प्राप्त होता था. आवश्यकता पड़ने पर राजा भी उनसे मदद लेता था. ऋग्वेद में भी ‘पणि’ का उल्लेख हुआ है, जो सहयोगाधारित व्यापारिक संगठनों की प्राचीनतम उपस्थिति को दर्शाता है. पणि पशुओं के व्यापारी थे. सहयोगाधारित व्यापार की यह परंपरा सिंधु सभ्यता की देन थी. उसके व्यापारिक काफिले बेबीलोन, मिस्र आदि देशों की निर्बाध यात्रा करते रहते थे. मामूली संसाधनों के भरोसे लंबी व्यापारिक यात्राएं करना बिना आपसी सहयोग के संभव ही नहीं था. सिंधु सभ्यता से लेकर मेसापोटामिया, मिस्र, ईरान आदि में मिली लगभग एक समान मुहरों से इन सभ्यताओं की बीच आपसी लेन-देन की बात पुष्ट होती है.

चाणक्य ने गौ-अध्यक्ष, नाव-अध्यक्ष, रथाध्यक्ष, सीताध्यक्ष जैसे पदों का विधान किया. उससे पहले गोपालक, नाविक, रथवाह, बुनकर, सार्थवाह, तैलिक आदि के अपने-अपने स्वतंत्र संगठन थे. चाणक्य ने नए पदों के सृजन द्वारा उनकी स्वायत्तता को मर्यादित कर, उन्हें  प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में राज्य के अधीन कर लिया गया था. इस तरह सोची-समझी नीति के तहत व्यापारी वर्ग को बढ़ावा दिया गया. ब्राह्मण धर्मसत्ता को संभाले था, जबकि क्षत्रिय का राजसत्ता पर कब्जा था. राज्य के समर्थन और संरक्षण में पनपे तीसरे व्यापारी वर्ग ने जो शेष दो वर्णों, ब्राह्मण एवं क्षत्रिय की भांति अनुत्पादक वर्ग था—उत्पादकता के स्रोतों पर अधिकार कर, अर्थसत्ता को भी अपने अधीन कर लिया गया. राजनीतिशास्त्र की कृति का ‘अर्थशास्त्र’ नामकरण वस्तुतः समाज के उत्पादक वर्गों की स्वायत्तता को, राजनीतिक तंत्र के अधीन लाने की कूटनीतिक चाल थी. उससे स्वतंत्र पेशे जाति का रूप लेने लगे. शिल्पकारों से अपनी मर्जी के उत्पादन तथा उत्पाद का मूल्यांकन का अधिकार छीन लिया गया. उत्पीड़न के शिकार लोग कभी भी विद्रोह कर, राज्य और राजा दोनों के लिए खतरा बन सकते हैं, चाणक्य को इसका अंदेशा कदाचित ज्यादा ही था. इसलिए वह एक ओर आन्वीक्षकी के तरह-तरह उपाय बताता है, कराधान प्रणाली को मजबूत करने के सुझाव देता है, साथ ही राजा की सुरक्षा और अनुशासन के नाम पर कठोर दंडविधान की अनुशंसा भी करता है. चाणक्य के अर्थशास्त्र में साधारण नागरिक की महत्ता राज्य के प्रति उसकी उपयोगिता से आंकी जाती थी. जो राज्य का नहीं है, वह कहीं का नहीं है.

अरस्तु चाणक्य का समकालीन था. उससे कुछ बड़ा. चाणक्य ने चंद्रगुप्त को शिक्षित किया था तो अरस्तु सिकंदर का गुरु था. दोनों के बीच यह मामूली समानता है. लेकिन दोनों के राजनीति विषयक चिंतन में जमीन-आसमान का अंतर है. चाणक्य के नजरों में राजा सर्वेसर्वा है, जबकि अरस्तु की ‘पॉलिटिक्स’ के केंद्र में मनुष्य है. नैतिकता को राज्य के गठन की आधारशिला मानने वाले अरस्तु का विचार था—‘श्रेष्ठ प्रजा ही श्रेष्ठ शासन को जन्म दे सकती है.’ ‘अर्थशास्त्र’ का मूल संदेश सर्वसत्तावादी है. चाणक्य को राजा के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता. उसकी निगाह में प्रजा और बाकी दरबारीगण केवल इसलिए आवश्यक हैं, क्योंकि वे राजा के होने को प्रासंगिक बनाते हैं. दूसरी ओर अरस्तु का दर्शन ‘न्याय’ का दर्शन है. उसके अनुसार प्रजा-कल्याण हेतु समर्पित भाव से काम करना, राजा का कर्तव्य है. वही राज्य के गठन का औचित्य भी है. ‘अर्थशास्त्र’ में प्रजा कल्याण राजा का कर्तव्य न होकर, ‘कृपाभाव’ है. बहरहाल, भारत में देशज कृति ‘अर्थशास्त्र’ को सराहा गया. वैसे भी दुनिया में हो रही ज्ञान-संबंधी हलचलों की ओर से आंखें मूंदे रहना ब्राह्मणों का स्वभाव रहा है. उनकी आत्ममुग्धता भी कमाल की थी. सिवाय खुद के कुछ देख ही नहीं पाती थी. ज्ञान के क्षेत्र में जो सर्वात्तम है, वह भारतीय है. और भारत में जो श्रेष्ठतम विचार है वह किसी न किसी ब्राह्मण के दिमाग की उपज है—इस भ्रांत धारणा ने उन्हें विदेशी ज्ञान-विज्ञान के प्रति सदैव उदासीन बनाए रखा. दुनिया में ऐसे अनेक यायावर जिज्ञासु रहे हैं, जिन्होंने अपना जीवन और श्रम दूसरे देशों और सभ्यताओं के बीच जाकर ज्ञान को सहेजने में लगाया है. मेगस्थनीज, ह्वेनसांग, फाह्यान, अल-बरूनी, इब्नबतूता, अल-मसूदी, अल-बरूनी जैसे सैकड़ों विद्वान थे, जो ज्ञान-विज्ञान की खोज के लिए हजारों मील की यात्रा करके भारत पहुंचे थे. लेकिन भारत का बुद्धिजीवी वर्ग इतना आत्ममुग्ध रहा कि उसने बाहरी देशों में चल रही ज्ञान की हलचलों की ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया. ब्राह्मणों की मेधा स्मृतियों, पुराणों और आरण्यकों की गुलाम रही. जबकि उनका श्रम वर्ण-व्यवस्था को चिरस्थायी बनाने में लगा रहा. परिणामस्वरूप देश में धर्म और जाति का ऐसा गठजोड़ बना कि सुधारवादी आंदोलनों की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा उनसे जूझने में खपता रहा. चूंकि उन आंदोलनों का नेतृत्व उच्च जाति के लोगों के पास था, जिनके अपने स्वार्थ जाति को सुरक्षित रखने में थे, इसलिए परिवर्तनकारी आंदोलनों के प्रति उनमें से अधिकांश का रवैया ढुलमुल ही रहा. प्राचीन संस्कृत वाङ्मय में शायद ही कोई उदाहरण हो जिसमें किसी पिता ने वर्णोचित गुणों के अभाव में अपनी संतान के वर्ण के अवमूल्यन की शिकायत की हो. जबकि जातिवाद को प्रश्रय देने, अयोग्य पुत्र को उत्तराधिकार के रूप में विरासत सौंपने के यहां अनगिनत उदाहरण हैं.

यह ठीक है कि अपने जन्म के साथ ही जाति-प्रथा को भारी आलोचना का सामना करना पड़ा था. कई बार ऐसे अवसर भी आए जब लगा कि इस व्यवस्था के दिन लद चुके हैं. समाज सुधार के क्षेत्र में समय-समय चलाए गए आंदोलनों से उसे कुछ समय के लिए धक्का अवश्य लगा, परंतु धर्म के समर्थन तथा लंबे जाति-आधारित स्तरीकरण के कारण, जो हर जाति को किसी न किसी जाति से ऊपर होने का भरोसा देता है—ऐसा कभी नहीं हुआ कि उसका अस्तित्व सचमुच खतरे में पड़ा हो. सामंती लक्षणों से युक्त जाति हमेशा ही भारतीय समाज का कलंक बनी रही. जाति और धर्म की जकड़न में आत्मविश्वास गंवा चुके भारतीय समाज ने विकास की ऐसी उल्टी चाल चली कि समकालीन सभ्यताओं में सर्वाधिक विकसित सिंधु सभ्यता का जनक और ज्ञान, विज्ञान, इंजीनियरिंग, गणित, ज्योतिष, स्थापत्य आदि क्षेत्रों में बाकी देशों के मुकाबले अग्रणी स्थान रखने वाला भारत लगातार पिछड़ने लगा. शताब्दियों से जाति और धर्म के सहारे विशेष सुख-सुविधाओं से लाभान्वित रहा वर्ग, आज भी जाति को भारतीय संस्कृति की उत्कृष्ट देन मानता है; और तमाम आलोचनाओं-विरोधों के बावजूद  उसे किसी न किसी रूप में सुरक्षित रखना चाहता है. उनमें सबसे बड़ी संख्या ब्राह्मणों की ही है. आखिर जाति का उत्स क्या है?

प्रायः यह प्रश्न उठाया जाता है कि जातीय शोषण के विरुद्ध निरंतर संघर्ष के बावजूद भारतीय समाज उसकी जकड़न से बाहर आने में क्यों असमर्थ रहा. संख्या में कई गुना होने के बावजूद बहुजन समाज अल्प-संख्यक अभिजनों की समाजार्थिक दासता में बने रहने के लिए विवश क्यों हुआ? इस धारणा को चिरस्थायी बनाए रखने के लिए जाति-व्यवस्था के विरोधी भी कम जिम्मेदार नहीं हैं. अभी तक जातीयता के उपकार एवं अपकार के अध्ययन हेतु आदि स्रोत के रूप में ऋग्वेद को लेने की मान्यता रही है. ऋग्वेद जो ब्राह्मण मनीषा का आदि ग्रंथ है, उसे भारतीय प्रायद्वीप के बौद्धिक उठान का आदि ग्रंथ भी मान लिया जाता है. ऐसा करके हम आर्यों के आगमन से पूर्व के भारत के इतिहास को पूरी तरह उपेक्षित कर जाते हैं. जबकि मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, कालीबंगा, लोथल आदि स्थानों के उत्खन्न के पश्चात हम एक समृद्ध अनार्य सभ्यता से परिचित हो चुके हैं. उसपर प्रामाणिक लेखन और ऐसे साक्ष्य मौजूद हैं, जिनसे हम समानांतर सभ्यता का चिह्नन कर सकते हैं. ऋग्वेद को भारतीय मनीषा का आदि ग्रंथ मानने का दूसरा बड़ा नुकसान यह होता है कि वर्णाश्रम व्यवस्था का अध्ययन शूद्रों को यज्ञादि का अधिकार होने या न होने में सिमट जाता है. इस तरह हम आलोचना की ब्राह्मणवादी दृष्टि से बाहर नहीं निकल पाते. उदाहरण के लिए ‘शूद्र’ शब्द की व्याख्या को ले सकते हैं. अपने लेखों में विधुशेखर भट्टाचार्य इस शब्द को ‘क्षुद्र’ से व्युत्पत्तित बताते हैं. उनकी पूर्वाग्रहों में रची-बसी दृष्टि शूद्रों की सामाजिक अधिकारिता को वैदिक कर्मकांडों में हिस्सेदारी तक सीमित कर देती है. डॉ. रामशरण शर्मा ने संस्कृत गं्रथों में शूद्र की स्थिति को लेकर गहन अध्ययन किया है. उन्हें वामपंथी सोच का प्रगतिशील लेखक माना जाता है. परंतु शूद्र को लेकर वे भी जातीय पूर्वाग्रहों से बाहर नहीं निकल पाते. ‘शूद्र इन एन्शीएंट इंडिया’ में वे इसी सोच को विस्तार देते हैं.

ब्राह्मणवाद के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए अधिकांश विद्वान बौद्ध धर्म को प्रस्थान बिंदू मानते हैं. यह धारणा कदाचित डॉ. आंबेडकर द्वारा हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाने से बनी है. बौद्ध धर्म को ब्राह्मणवाद के विरोध का प्रस्थान बिंदू मानने वाले विद्वान प्रायः यह भूल जाते हैं कि बुद्ध का विरोध वर्ण-व्यवस्था से नहीं था. न ही वे जाति को अनावश्यक मानते थे. जाति और वर्ण-व्यवस्था के विरोध में उन्होंने कोई आंदोलन भी नहीं किया था. वे सिर्फ जाति-आधारित भेदभाव से मुक्ति चाहते थे. बुद्ध के पांच प्रमुख शिष्यों में से एक उपालि नाई जाति से था. कुछ भिक्षु निचली जाति इस कारण उनका उपहास भी उड़ाते थे. बुद्ध तक जब यह बात पहुंची तो उन्होंने उपालि की जाति पर कुछ नहीं कहा. न ही जाति को अनावश्यक माना. केवल जाति के आधार पर किसी को छोटा-बड़ा न मानने, भेदभाव न करने का उपदेश दिया. कुछ स्थानों पर तो वे वर्ण-व्यवस्था के पक्ष में खड़े होते दिखाई पड़ते हैं.

ईसा से पांच-छह से वर्ष पहले का समय, मनुष्यता के इतिहास का वह कालखंड है, जिसे मानवीय बुद्धि के विस्फोट के रूप में देखा जाता है. उस दौर में भारत में बुद्ध, महावीर स्वामी, चीन में कन्फ्यूशियस, बेबीलोन में सायरस, पर्शिया में जरथ्रुस्त तथा यूनान में सुकरात जैसे दार्शनिक पैदा हुए. उन सबने जीवन में नैतिकता को महत्त्व दिया. जबकि भारत की सभ्यता का विकास ब्राह्मणवाद की अधीनता तथा उसके वर्चस्व तले हुआ था. ब्राह्मण को नैतिकता, सामाजिक सौहार्द, बराबरी तथा न्याय-परंपरा में कभी विश्वास नहीं रहा. आरंभ से ही वह आधुनिकता विरोधी और धर्मसत्ता के प्रति दुराग्रहशील रहा है. आलोचना से बचने के लिए ब्राह्मणों ने असमानता को दैवीय घोषित किया. ऐसी स्थितियां रचीं कि जो दैवीय है, उसे न्यायसंगत भी मान लिया जाए. यह काम अकेले धर्म के भरोसे संभव नहीं था. इसलिए राजसत्ता को अपने पक्ष में लिया गया. भारत के सांस्कृतिक इतिहास में धर्म की विभिन्न धाराओं के बीच संघर्ष के सैकड़ों उदाहरण हैं. राजनीति के क्षेत्र में भी लोगों की महत्त्वाकांक्षाएं एक-दूसरे से टकराती रही हैं. परंतु धर्म और राजनीति का संघर्ष, विशेषकर राजनीति द्वारा धर्म से आजादी के संघर्ष का यहां कोई उदाहरण नहीं है. दधिचि का महिमामंडन उनकी दानशीलता के लिए किया जाता है. कहा जाता है कि उन्होंने धर्म के लिए जीवन की परवाह नहीं की और देवासुर संग्राम में देवताओं की जीत के लिए, जीते-जी अपनी हड्डियां तक दान कर दीं. लेकिन उस कथित त्रिकाल-दृष्टा महर्षि ने भी प्राणोत्सर्ग से पहले देवासुर संग्राम के औचित्य पर कोई सवाल नहीं किया था. न यह पूछा कि उस संग्राम में न्याय किस ओर है. जाहिर है, दधिचि का दान एक बूढ़े-मरणासन्न ब्राह्मण द्वारा ब्राह्मणवाद को बचाए रखने के लिए किया गया बलिदान था. धर्म उनके लिए राजनीति थी. ऐसा टोटम जिसपर बिना बुद्धि-विवेक के विश्वास कर लिया जाता है. भावनाओं में बहकर बहुजन भी वज्र के लिए देह गलाने वाले दधिचि के निर्णय को न्याय-अन्याय की कसौटी पर कस नहीं पाते. दधिचि के लिए देवताओं का पक्ष ही न्याय का पक्ष है. और जो देवताओं का पक्ष है, असलियत में वह ब्राह्मण का ही पक्ष है. पुराणों और उपनिषदों में भरे ऐसे आख्यान, वर्ण-व्यवस्था के लिए खाद-पानी का काम करते हैं.

दूसरी ओर पश्चिम में नैतिकता और मानवादर्शों के लिए आत्मबलिदान के अनेक उदाहरण हैं. प्लेटो का संबंध एथेंस के राज-परिवार से था. इस आधार पर वह स्वयं को राज्य का  उत्तराधिकारी भी मानता था. बावजूद उसने अपने गुरु सुकरात का अनुसरण करते हुए उसने सत्ता के आगे समर्पण करने के बजाए अपने विवेक और नैतिकता को हमेशा आगे रखा. उसके जीवन में एक या दो ऐसे अवसर आए जब उसे राजसत्ता के कोप से बचने के लिए भागना पड़ा. अरस्तु ग्रीक सेनानी सिकंदर का गुरु था. सिकंदर उसका सम्मान करता था. अरस्तु द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय तथा प्रयोगशालाओं के लिए सिकंदर की ओर से आवश्यक मदद प्राप्त होती थी. इसके बावजूद अरस्तु ने शक्तिशाली राज्य के बजाए नीति-केंद्रित राज्य का समर्थन किया था. अपनी स्वतंत्र लेखनी के कारण एक बार वह सिकंदर को भी जब वह युद्ध अभियान पर निकला हुआ था—नाराज कर बैठा था. जिससे सिकंदर ने उसे मृत्युदंड देने की ठान ली थी. यदि भारत से लौटते समय सिंकदर की असाममियक मृत्यु नहीं होती तो अरस्तु को दंडित किया जाना तय था.

यहां एक और सवाल खड़ा होता है. वर्ण-व्यवस्था के दबाव के चलते यदि शूद्रों को स्वतंत्र रूप से सोचने, अपनी कला को निखारने का यदि अधिकार ही नहीं था, तो उन्हें सभ्यता का वास्तविक निर्माता कैसे कहा जा सकता है. यदि उनका दिलो-दिमाग ब्राह्मणों तथा दूसरी शीर्ष जातियों के पूरी तरह अधीन था तो वे शिल्पकर्म के अद्भुत चितेरे, अनूठी स्थापत्य कला के धनी, कुशल आविष्कारक भला कैसे कहा जा सकता है? यह आशंका उन ग्रंथों को पढ़ते हुए विश्वास में बदलने लगती है, जिन्हें भारतीय मेधा के चमत्कार के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. जिन्हें विद्वान प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति की पड़ताल के लिए उदाहरण के रूप में पेश करते आए हैं. उनमें सर्वपल्ली राधाकृष्णन, राधाकुमुद मुखर्जी, डॉ. रामशरण शर्मा जैसे विद्वान भी शमिल हैं. उनके अध्ययन की एकमात्र विशेषता, जो वस्तुतः उनकी बौद्धिक दुर्बलता है, वह यह है कि वे सभी स्वनामधन्य विद्वान भारतीय सभ्यताकरण की शुरुआत वेदों से करते हैं. ऋग्वेद उनके लिए भारतीयता की पहचान का आदि-ग्रंथ है. वैदिक संस्कृति के व्यामोह में फंसकर वे उन तथ्यों की एकदम उपेक्षा कर जाते हैं, जो हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, लोथल जैसे प्राचीनतम स्थलों के उत्खन्न से प्राप्त हुए हैं.

ऊपर के विश्लेषण से हम एक और सामान्य निष्कर्ष निकाल सकते हैं. यह कि संस्कृति की पहचान प्रायः उन लोगों से होती है, जो किसी न किसी रूप में उसका मूल्य वसूलने में लगे रहते हैं. न कि उन लोगों से जो उसे बनाने से लेकर सहेज कर रखने में भारी भूमिका निभाते हैं. शिखर पर विराजमान लोग सांस्कृतिक उपादानों का संरक्षण इस प्रकार करते हैं कि संस्कृति निर्माण में बाकी लोगों की भूमिका गौण मान ली जाती है. भारत की प्राचीन संस्कृति जिसे वैदिक संस्कृति भी कहा जाता है, का नाम आते ही बड़े-बड़े आश्रमों में रहने वाले ऋषिकुलों, मंत्रोच्चार करते साधुओं यज्ञ-वेदि के समक्ष गूंजती ऋचाओं का ध्यान आ जाता है. उस समय का बाकी समाज कैसा था? उसकी रोजमर्रा की गतिविधियों, जीवनशैली, कला-कौशल और समाज की बेहतरी हेतु बहाए गए स्वेद-बिंदुओं की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता. हम उन राजाओं के बारे में जानते हैं, जिनके शासनकाल में सोमनाथ और खुजराहो जैसे मंदिर बने. ताजमहल, लालकिला, कुतुबमीनार जैसी इमारतें बनाने वाले शासकों के नाम भी इतिहास में दर्ज हैं. यह सब कहीं न कहीं हमारी संस्कृति का हिस्सा भी हैं. लेकिन सोमनाथ और खुजराहो के मंदिरों के असल रचनाकार कौन थे? लालकिले के लिए पत्थर तराशने  वाले, ताजमहल में प्राण-प्रतिष्ठा करने वालां के नाम तक नहीं जानते. शताब्दियों की बौद्धिक गुलामी ने हमारी मानसिक सरंचना ऐसी कर दी है कि हमारा मस्तिष्क, अपने ही इतिहास को उन लोगों की निगाह से देखने लगा है, जो हमारी दासता का कारण रहे हैं. ऋग्वेद में दर्जनों मंत्रों में इंद्र द्वारा असुरों के पुरों का ध्वंस करने का उल्लेख है. उसे पुरंदर की उपाधि भी असुर-नगरों को नष्ट करने के कारण प्राप्त होती है. लेकिन उन दुर्गों का वास्तविक निर्माता, वहां के निवासियों के लिए हथियार और आवश्यक सुख-साधन जुटाने वाले शिल्पकार वर्ग के बारे में यह ग्रंथ मौन रह जाता है.

बहुजन संस्कृति इन्हीं प्रच्छन्न दस्तावेजों की खोज का एक सिलसिला है.

© ओमप्रकाश कश्यप

 

बहुजन साहित्य : अभिजन बनाम बहुजन दृष्टि

सामान्य
चरथ भिक्खवे चारिकम् बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय. लोकानुकम्पाय, अत्थाय हिताय, सुखाय देव मनुस्सानं—गौतम बुद्ध.
(भिक्षुओ! बहुजन के हित के लिए, बहुजन के सुख के लिए. लोक-कल्याण, देवताओं एवं मानव-मात्र के सुख के लिए चलते रहो….चलते रहो)

 

अभिजन बनाम बहुजन दृष्टि

कहावत है—‘दृष्टि ही सृष्टि है.’ आंखें जो देखती हैं, ठीक वही प्रतीति मस्तिष्क को कराती हैं. यह शत-प्रतिशत सत्य नहीं है. दृष्टि-बिंब मस्तिष्क में पहले से मौजूद सूचनाओं के साथ अंत:क्रिया करते हैं. उनसे प्रभावित होते तथा सामर्थ्य-अनुसार उनको प्रभावित भी करते हैं. मस्तिष्क में पूर्वाग्रह के रूप में दर्ज प्रतीतियां भविष्य के लिए कसौटी बन जाती हैं. अंतर्मन में मौजूद धारणाओं के आधार पर ही मस्तिष्क नई प्रज्ञप्तियों का आकलन करता है. दर्ज विचारधाराएं यदि पीढ़ियों लंबे संस्कारों की देन हैं , तो वह नई सूचनाओं को स्वीकारने में जल्दी नहीं दिखाता. कम से कम उस समय तक किनारे रखता है, जब तक उनकी एक के बाद एक पुनरावृत्ति न हो; अथवा अधिक प्रामाणिकता के साथ मस्तिष्क को प्रभावित करने लायक न बन जाएं. मनुष्य की सामाजिक-सांस्कृतिक मनोभूमि, आर्थिक-राजनीतिक प्रस्थितियां भी उसके निष्कर्षों को अपनी-अपनी तरह से प्रभावित करती हैं. उस अवस्था में उसके निष्कर्ष तटस्थ नहीं रह पाते. यही कारण है कि एक ही समय में किसी घटना के एकाधिक प्रेक्षकों के निष्कर्ष परस्पर भिन्न होते हैं.

शूद्रों की सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति को लेकर अधिकांश अध्ययन विद्वानों की इसी मनोरचना को दर्शाते हैं. प्राचीन ग्रंथों के आधार पर शूद्रों की समाजार्थिक स्थिति का अध्ययन करने वालों को दो वर्गों में बांटा जा सकता है. पहले में परंपरागत बुद्धिजीवी यानी ब्राह्मण अथवा ब्राह्मणवादी मानसिकता के लेखक आते हैं. नई शिक्षा, सभ्यता, लोकतांत्रिक समझ और वंचित समुदायों में उभरती चेतना के दबाव में उन्होंने प्राचीन वर्ण-व्यवस्था का स्वतंत्र रूप से अध्ययन करना शुरू किया. किंतु उनका कृतित्व उत्तराधिकार में मिले वर्णवादी संस्कारों से मुक्त न रह सका. अपने लेखन में वे जाति और वर्ण-भेद जैसी समस्याओं का उल्लेख तो करते हैं, किंतु इन व्यवस्थाओं को लागू करने वालों के मनोविज्ञान तथा उनके दुष्परिणामों से कन्नी काट लेते हैं. दूसरे वर्ग के विमर्शकारों में वे हैं जिन्होंने शूद्र और दलित समुदायों में जन्म लिया. जिन्हें इन समुदायों की पीड़ा, उत्पीड़न, जाति-आधारित भेदभाव और अभावपूर्ण जीवन का प्रत्यक्ष अनुभव था. इस वर्ग के विद्वानों को पुनः दो उपवर्गों में रखा जा सकता है. पहले वे, जिनकी हिंदू धर्म में प्रगाढ़ आस्था थी. जिनका मानना था कि अपने मूल में यह धर्म बाकी धर्मों से श्रेष्ठतर है. इसकी विकृतियां बाद के स्वार्थी पुरोहित वर्ग की देन हैं, जिन्हें आपसी तालमेल द्वारा सुधारा जा सकता है. वे हिंदू धर्म के सुधारवादी आंदोलनों से प्रभावित तथा किसी न किसी रूप में उनसे जुड़े थे. इस वर्ग के सुधारवादियों में संतराम बीए, केशवचंद सेन, महात्मा मुंशीराम विज(स्वामी श्रद्धानंद) आदि प्रमुख हैं. उन्होंने हिंदू धर्म में रहते हुए या किसी आंदोलन के माध्यम से सुधार आंदोलनों का नेतृत्व किया; और कमोबेश सफलता भी प्राप्त की.

दूसरे उपवर्ग में वे विद्वान आते हैं, जो जाति को हिंदू धर्म की असाध्य व्याधि मानते थे. जिनका विचार था कि जाति के रहते उसमें सुधार की कोई संभावना नहीं है. इसके लिए वे ब्राह्मणवाद को दोषी मानते थे. इस वर्ग के विद्वानों में ब्राह्मणों को विदेशी मूल का मानने पर लगभग सहमति रही है. उनके अनुसार अपनी वर्गीय श्रेष्ठता को बनाए रखने के लिए ब्राह्मण हर समय, हर किस्म की सत्ता से समझौता कर, निचले वर्गों के उत्पीड़न का कारण बनता आया है. उससे मुक्ति के लिए जाति का आमूल उच्छेद आवश्यक है. चूंकि हिंदू धर्म और जाति परस्पर अंतर्गुंफित हैं, इसलिए जाति का उच्छेद हिंदू धर्म से मुक्ति के बिना असंभव है. इस विचारधारा के आदि प्रवर्त्तक महामना ज्योतिराव फुले हैं. द्वंद्ववाद को दार्शनिक आधार पर हीगेल ने स्थापित किया था. मार्क्स ने उसका उपयोग राजनीतिक दर्शन के रूप में किया. साम्यवादी समाज की रचना हेतु सर्वहारा तथा पूंजीपति के संघर्ष को अनिवार्य मानते हुए उसने सर्वहारा का संगठित विद्रोह के लिए आवाह्न किया. भारत में हालात भिन्न थे. भारतीय समाज केवल आर्थिक असमानता का षिकार नहीं रहा. उससे कहीं भयानक जाति नाम की व्याधि, मनुष्य को जन्म से ऊंच-नीच के खाने में बांटती आई है. इस बेमेलकारी व्यवस्था की खूबी है कि इसमें जो शिखर पर है, उसे अंतहीन अधिकार प्राप्त होते हैं. जबकि सबसे निचले स्तर पर मौजूद व्यक्तियों को, बहुसंख्यक होने के बावजूद अधिकार-विपन्नता के बीच जीना पड़ता है. इससे वर्ग-संघर्ष की स्थिति बनती रहती है. धर्म उसके लिए सुरक्षा-कवच काम करता है. वह नागरिकों का बेमेलकारी संस्कृति से अनुकूलन कराता है, परिणामस्वरूप प्रतिरोध की संभावना निरंतर विरल होती जाती है. फुले ने धर्म-ग्रंथों के पुनर्पाठ के अलावा दमित जातियों की शिक्षा और संगठन पर जोर दिया. उनका विचार था कि निकट भविष्य में ब्राह्मण एवं शूद्र के बीच संघर्ष अपरिहार्य है. नए समाज की राह उसी ने निकलेगी. उत्तरवर्ती विद्वानों में डॉ. आंबेडकर, पी वी रामास्वामी पेरियार, रामस्वरूप वर्मा आदि प्रमुख हैं. आंबेडकर ने धर्मांतरण के माध्यम से हिंदू धर्म को चुनौती दी तो पेरियार और रामस्वरूप वर्मा ने समानता एवं तर्कसम्मत समाज की स्थापना के लिए ईश्वर और धर्म से मुक्ति को आवश्यक माना. उन्होंने वैज्ञानिक प्रबोधन से युक्त समाज की स्थापना पर जोर दिया.

प्राचीन भारत में शूद्रों की स्थिति को लेकर पहला विशिष्ट अध्ययन ‘शूद्र इन एन्शीएंट इंडिया’(1956) डॉ. रामशरण शर्मा का है, जो उनके ‘लंदन विश्वविद्यालय’ में अतिथि प्रोफेसर के रूप में किए गए शोध पर केंद्रित है. उन्होंने ऋग्वैदिक काल से 500 ईस्वी पश्चात तक के ग्रंथों को अध्ययन की विषय-वस्तु बनाया है. इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद राजकमल द्वारा ‘शूद्रों का इतिहास’ शीर्षक से प्रकाशित है. कुछ ग्रंथों में शूद्रों के पक्षपातपूर्ण उल्लेख, जिनके लेखक शूद्रों को साधारण मनुष्य का दर्जा देने तक को तैयार न थे, जिनमें उनका उल्लेख अपमानजनक ढंग से किया गया है, तथा जिनमें उन्हें मनुष्य के नाते प्राप्त सहज-सुलभ अधिकारों के हनन की सांस्थानिक व्यवस्था है—के आधार पर किए गए अध्ययन को ‘शूद्रों का इतिहास’ कैसे माना जा सकता है? इस पर अनुवादक और प्रकाशक ने विचार नहीं किया है. चूंकि उसे लेखक की भूमिका के साथ छापा गया है, इसलिए कहा जा सकता है कि नए शीर्षक के प्रति लेखकीय सहमति भी है. हिंदी में इस प्रकार की बेइमानियां आम हैं.

डॉ. रामशरण शर्मा के अनुसार ‘शूद्र’ को लेकर पहला निबंध इसी शीर्षक के साथ पंडित विधुशेखर भट्टाचार्य का प्राप्त होता है(दि इंडियन एंटीक्वेरी, जुलाई 1922, पृष्ठ 137-138). बादरायण के वेदांत सूत्र(1.3.4) का संदर्भ देते हुए ‘शूद्र’ शब्द की विवेचना वे ‘दुःआप्लावित’ या ‘दुख में डूबा हुआ’ कहकर करते हैं(शुभस्य तदनादरश्रवणात् तदाद्रवणत्सूच्यते). यह ठीक ऐसे ही है जैसे पहले तो मनुष्य पर इतने अत्याचार करो कि वह दर्द से, पीड़ा और अत्याचारों से छटपटाने लगे. फिर यदि कोई उसका परिचय जानना चाहे तो कह दो कि यह वही है जो बहुत अधिक रोता, कराहता, बिलबिलाता है. लेख का बाकी हिस्सा वे शूद्र को संस्कृत शब्द ‘क्षुद्र’ का अपभ्रंश सिद्ध करने में खपा देते हैं. इस तरह भाषा-विज्ञान का सहारा लेते हुए, ‘शूद्र’ की ब्राह्मणवादी अवधारणा, समाज के बहुसंख्यक श्रमजीवी और सर्वहारा वर्ग के ऊपर थोप दी जाती है. वे उसे मान भी लेते हैं. क्योंकि जाने-अनजाने सोचने-समझने की जिम्मेदारी ब्राह्मण को सौंपी जा चुकी है.

‘शूद्र’ की विवेचना को लेकर दूसरा लेख भी विधुशेखर भट्टाचार्य का ही है. यह रवींद्रनाथ ठाकुर द्वारा प्रकाशित त्रैमासिक जरनल ‘विश्वभारती’ के अक्टूबर 1923 के अंक में प्राप्त होता है. अंग्रेजी में लिखे इस लेख का शीर्षक है—‘दि स्टेटस आफ दि शूद्र’. लेख इस मायने में मौलिक कहा जाना चाहिए कि वह संस्कृत ग्रंथों में शूद्रों की उपस्थिति की पड़ताल करता है. कमी यही है कि वह शूद्रों की विपन्नता तथा उनके कष्टों के लिए सामाजिक स्तर पर किसी को जिम्मेदार न ठहराकर, परोक्षतः उसे नियतिबद्ध मान लेता है. विवेचना का प्रमुख आधार शूद्रों की यज्ञों में सहभागिता के अधिकार को बनाया गया है. मीमांसा-सूत्र का हवाला देते हुए लेखक बताता है कि कुछ ग्रंथों में शूद्रों को यज्ञों में सहभागिता के अधिकार प्राप्त थे. मानो यज्ञ और तत्संबंधी अन्य कर्मकांड ही सब कुछ हों. शूद्रों के बारे में जी. एफ. इलिन का उल्लेख भी पुस्तक में है. इलिन का अध्ययन भी संस्कृत ग्रंथों के आस-पास घूमता है, लेकिन उसका निष्कर्ष भिन्न है. इलिन का मानना था कि शूद्र गुलाम नहीं थे. इसके समर्थन हेतु ऋग्वेद में सैकड़ों उदाहरण मौजूद हैं. वहां अनेक स्थानों पर जगह आया है कि शूद्र, जिन्हें वहां असुर के रूप में दर्शाया गया है, समृद्ध संस्कृति के वाहक थे. आर्यों के कर्मकांड में उनकी रुचि न थी. ऋग्वेद में उनके धन को छीनकर उसका यज्ञादि में उपयोग करने का आवाह्न किया गया है. सातवें मंडल में दास और आर्यों के मध्य युद्ध; तथा इंद्र एवं विष्णु द्वारा संयुक्त रूप से शंबर नामक दास की 99 पुरियों को ध्वस्त करने का उल्लेख है.1 एक अन्य स्थान पर इंद्र द्वारा 1000 दासों को युद्धबंदी बनाने का उल्लेख है.2 ऐसे ही एक वर्णन में कहा गया है कि इंद्र ने 30000 दासों को युद्ध में अपनी माया से बेहोश कर दिया था.3 इस तरह के और भी कई उल्लेख हैं जो दर्शाते हैं कि शूद्र यानी दास अनार्य सैनिक थे. जिन्होंने इंद्र को कई बार चुनौती दी है. इंद्र के नेतृत्व में विजेता आर्य दासों के कब्जे वाले गढ़ों, पशुओं तथा ठिकानों पर कब्जा कर लेते थे. जब ‘शूद्र’ दुर्गपति और दलपति तक थे तो उन्हें ‘शोक में डूबा हुआ’ कैसे माना जा सकता है? पुस्तक में इसपर कोई विचार नहीं किया गया है.

आर्थर एंथनी मेक्डोनल का विचार था कि पुरावैदिककाल के इन अनार्य बाशिंदों के लिए नौकर, दास, दस्यु जैसे संबोधन उत्तर वैदिक काल की संस्कृत में शामिल हुए हैं.4 ‘वैदिक माइथोलाजी’(पृष्ठ 162) में मेक्डोनल ने ऋग्वेद के आधार पर शुष्ण, शंबर, पिप्रु, निमुची, धुनी, चुमुरी, वर्चिन, वाला, द्रभिक, रुधिक्र आदि दास योद्धाओं तथा दुर्गपतियों का उल्लेख किया है. ‘महाभारत’ की ख्याति प्राचीन भारतीय राजनीतिक दर्शन पर गंभीर विमर्श के कारण भी है. उसमें शूद्रों को कहीं दास तो कहीं असुर कहकर संबोधित किया गया है. ध्यातव्य है कि ऋग्वैदिक काल तक ‘शूद्र’ और ‘असुर’ संज्ञाएं केवल नकारात्मक चरित्रों की द्योतक नहीं थीं. दास की उत्पत्ति ‘दश’ धातु से हुई है, जिसका अभिप्रायः दान देने से है. ऋग्वेद में ‘असुर’ का उपयोग भी देवता तथा देवेत्तर शक्तियों के निमित्त किया गया है. हैरानी की बात है कि भारतीय लेखक शूद्र अथवा दास के बारे में इन ऋग्वैदिक साक्ष्यों को भुलाकर उन अर्थों पर रूढ़ हो जाते हैं, जिन्हें मेक्डोलन आदि विद्वान उत्तरवर्ती काल का और प्रक्षेपित मानते हैं.

प्राचीन भारत में शूद्रों की सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक प्रस्थिति की व्याख्या जैन एवं बौद्ध ग्रंथों की मदद के बिना असंभव है. इन ग्रंथों में आजीवक, लोकायत, चार्वाक, वैमानिक आदि भौतिकवादी विचारधाराओं का उल्लेख हुआ है. बौद्ध एवं जैन दर्शनों की भांति ये दर्शन भी ब्राह्मणवाद की प्रतिक्रिया-स्वरूप जन्मे थे; और अपने समय में ब्राह्मणवाद का सटीक और सशक्त प्रतिपक्ष रचते थे. बौद्ध ग्रंथों के अनुसार विभिन्न प्रकार के शिल्पकर्मी, श्रम के बल पर जीविकोपार्जन करने वाले सामान्य मजदूर—मक्खलि गोशाल के ‘आजीवक’ संप्रदाय के अनुयायी थे. काशी के आसपास इस दर्शन का विशेष प्रभाव था. ये तथ्य विशेष अध्ययन की मांग करते हैं. चूंकि वैदिक संस्कृति से इतर शूद्र-अस्मिता की खोज समानांतर संस्कृति को प्रासंगिक बना सकती है, जिसे उनके पूर्वाग्रह कभी स्वीकार नहीं करने देंगे. कदाचित इसी भय के कारण प्राचीन भारत में शूद्रों की स्थिति की पड़ताल के लिए डॉ. रामशरण शर्मा जैसा साम्यवादी चेतना का विद्वान भी बौद्ध एवं जैन साहित्य में शूद्रों की उपस्थिति को अध्ययन का विषय नहीं बनाता, जिनमें उनका अपेक्षाकृत सम्मानपूर्ण उल्लेख है. उनका विश्लेषण केवल संस्कृत वाङ्मय तक सीमित रहता है. यही उसकी सीमा है.

डॉ. शर्मा विधुशेखर भट्टाचार्य की लीक पकड़कर चलते हैं. उसी दिशा में आगे बढ़ते हुए वे वेदादि ग्रंथों, स्मृतियों के अलावा अर्थशास्त्र, मनुस्मृति आदि को अध्ययन-सामग्री बनाते हैं. उनमें शूद्रों के लिए क्या विधान है, इसकी विवेचना करते हैं. शूद्रों का वैदिक कर्मकांडों के प्रति क्या सोच था? ब्राह्मणों द्वारा कर्मकांडों से वंचित किए जाने का क्या उन्हें बहुत अधिक संताप था? अथवा जीवन-जगत के बारे में व्यावहारिक दृष्टिकोण होने के कारण वे कर्मकांडों से स्वतः दूरी बनाए हुए थे? प्राचीन भारत में आर्येत्तर सभ्यता, संस्कृति और यहां के जन-जीवन का आकलन करने के लिए ये जरूरी मुद्दे हैं, जिनपर पुस्तक में कोई चर्चा नहीं मिलती. इस हकीकत को पूर्णतः नजरंदाज किया जाता रहा है कि वैदिक वाङ्मय में जिन्हें शूद्र कहा गया है, उनमें किसान, शिल्पकार, श्रमिक, छोटे उद्यमी, व्यापारी तथा दस्तकार सहित वे लोग आते थे, जो अपने श्रम-कौशल से अपना और बाकी जनसमाज का भरण-पोषण करते थे. समाज के लिए उत्पादन-स्तर बनाए रखना उनकी जिम्मेदारी थी. धार्मिक सवालों में उलझना, कर्मकांडों के लिए अधिक समय निकालना उनके लिए संभव न था. खेती और दूसरे कार्यों में सहायक पशु-धन की बलि सीधे तौर पर उनकी अर्थव्यवस्था के स्रोतों पर हमला था. यज्ञादि आडंबरों से दूर रहने, उनकी आलोचना के पीछे यह महत्त्वपूर्ण कारण था.

ऋग्वेद के अनुसार अनार्य अपेक्षाकृत समृद्ध नागरी संस्कृति के उत्तराधिकारी थे. उनके जीवन में स्थायित्व और आत्मनिर्भरता थी. अपनी बढ़ी-चढ़ी सभ्यता के साथ वे दुर्गों में रहते थे. वे कृषिकला में पारंगत थे. उनके शिल्पकर्मी कुशल, दूर-दराज तक व्यापार करने वाले थे. उनके दुर्ग लोहे(2/58/8) के, पत्थर(4/30/20) के, लंबे-चौड़े गौओं से भरे हुए(8/6/23) तथा सौ-सौ खंबों वाले(शतभुजी 1/16/8, 7/15/14) थे. उनकी सेना सधी हुई थी. युद्धकला में वे आर्यों से कहीं ज्यादा निपुण थे. अपने रण-कौशल के बल पर उन्होंने आरंभिक युद्धों में आर्यों को अनेक बार पराजित किया था. दूसरी ओर आर्यों का जीवन यायावरी था. उनका एक जगह ठिकाना न था. सभ्यता की दृष्टि से वे अनार्यों से पिछड़े हुए थे. भारत प्रवेश के बाद, उन्होंने स्वयं को धीरे-धीरे व्यवस्थित करना आरंभ किया. पैर जमाने के लिए अनार्य समूहों से रक्त-संबंध बनाए. ब्राह्मणवाद के बीजतत्व वे संभवतः अपने मूल-स्थान से लाए थे. दूसरों से अलग दिखने के लिए उन्होंने वन-प्रांतरों में आश्रम बनाए. कर्मकांडों को बढ़ावा दिया. यज्ञादि कर्मकांडों के माध्यम से अंततः वे लोगों के दिलो-दिमाग में यह भ्रम पैदा करने में सफल रहे कि वे प्राकृतिक शक्तियों से साक्षात और संवाद कर सकते हैं. इससे जनसाधारण का उनकी ओर सम्मोहित होना स्वाभाविक था. आगे चलकर जब बड़े राज्यों की आवश्यकता महसूस की जाने लगी तो जनता को नियंत्रण में रखने के लिए धर्म को जरूरी उपकरण मान लिया गया. ध्यातव्य है कि प्राचीन काल में सैनिकों को वृत्तिका देने का कोई रिवाज न था. युद्ध में भागीदारी के बदले सैनिकों को लूट के माल से संतोष करना पड़ता था. जीत के बाद बड़े सैन्य अधिकारियों को छोटी-मोटी रियासत सौंपकर संतुष्ट कर दिया जाता था. धर्म की मदद से निजी महत्त्वाकांक्षाओं के लिए छेड़े गए युद्धों को भी औचित्यपूर्ण ठहराया जा सकता था. बड़े राज्यों की चुनौतियां भी बड़ी होती थीं. इसलिए साम्राज्यवादी भावनाओं के प्रसार के साथ आसंजक के रूप धर्म राजनीति के साथ घुलमिल गया. कभी कोरी आस्था, कभी पुरोहित वर्ग को प्रसन्न रखने तो कभी लंबे राजनीतिक मंसूबों को साधने के लिए राजाओं ने बड़े-बड़े मंदिर, देवालय आदि बनवाए. नतीजा यह हुआ कि धर्म सभ्यता और संस्कृति का अनिवार्य हिस्सा बनता चला गया.

खुद को ओरों से अलग दिखाने के लिए ब्राह्मणों ने वर्णभेद का सहारा लिया. अभिजन संस्कृति की नींव रखी. उसका उतना तीव्र विरोध भी हुआ. ब्राह्मणवाद को नकारते हुए शूद्रों का बड़ा वर्ग प्राचीनतम भौतिकवादी चिंतन परंपराओं यथा आजीवक, लोकायत, वैनायिक आदि समुदायों से जुड़ा चला गया. जिनके प्रवर्त्तक वैदिक कर्मकांड का विरोध करते हुए, उनके रचियताओं को ‘भांड, धूर्त्त और निशाचर’ मानते थे. जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण भौतिकवादी था. उनके बीच बड़े-बड़े विद्वान और तत्वज्ञानी हुए. कौत्स, मक्खलि गोशाल, सति, अजय केशकंबलि, पुकुद कात्यायन, संजय वेलठिपुत्त, पूर्ण कस्सप, जाबालि जैसे प्रखर बुद्धिवादी ब्राह्मणवादियों के लिए हमेशा चुनौती बने रहे. ब्राह्मणवाद के उत्कर्ष के दौर में वे उसका सशक्त प्रतिपक्ष बने. अपनी सुरक्षा तथा यज्ञ-संबंधी आवश्यकताओं के लिए ब्राह्मण पुरोहित वर्ग राजाओं पर आश्रित था. जबकि अनार्य अपने शिल्प-कौशल पर जीने वाले श्रमजीवी लोग थे. उनके शिल्पकर्म की दूर-दूर तक मांग थी. इसलिए वे अपनी आर्थिक स्वतंत्रता की रक्षा करने में समर्थ थे. हालांकि शूद्रों का एक वर्ग ऐसा अवश्य रहा होगा, जो दूसरों की सेवा करके अपना जीवनयापन करता था. मगर बौद्धकाल तक, जब राज्य अपेक्षाकृत छोटे थे, शिल्पकार वर्ग अपनी आर्थिक आत्मनिर्भरता के साथ-साथ बौद्धिक स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने कामयाब रहा. इसीलिए ब्राह्मणों द्वारा फैलाए जा रहे वर्णवादी प्रपंच का उन्होंने विरोध भी नहीं किया था. तथाकथित शूद्र यानी शिल्पकार वर्ग की आर्थिक-सामाजिक स्वतंत्रता का प्रमाण यह भी है कि गौतम बुद्ध ने जब बौद्ध धर्म की नींव रखी तो शूद्रों का छोटा-सा वर्ग ही उसकी ओर आकर्षित हुआ. बाकी उससे दूरी बनाए रहे. बौद्ध धर्म के उभार के दिनों में मक्खलि गोशाल का आजीवक धर्म प्रचलन में था. उसके अनुयायियों की संख्या बौद्ध धर्म के समर्थकों से अधिक थी. कदाचित इसलिए भी कि जातीय समानता की बात करने वाले बौद्ध और जैन दोनों दर्शनों को चातुर्वर्ण्य विभाजन से कोई आपत्ति न थी. वर्ण-व्यवस्था को लेकर जैन दर्शन अपेक्षाकृत कठोर था. इसलिए प्राचीन भारत में शूद्रों की स्थिति के अध्ययन के लिए जैन एवं बौद्ध ग्रंथ अधिक प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध करा सकते हैं, जिनकी ओर डॉ. रामशरण शर्मा ने कोई ध्यान नहीं दिया है. शूद्र-अस्मिता की खोज से जुड़े डॉ. आंबेडकर के महत्त्वपूर्ण अध्ययन, जो ‘शूद्र कौन थे’ शीर्षक से प्रकाशित महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है, को वे यह कहकर खारिज करने की कोशिश करते हैं कि उनका अध्ययन अनुवाद पर आधारित है—

‘लेखक(डॉ. आंबेडकर) ने पूरी सामग्री अनुवादों से जुटाई है और इससे भी बुरी बात यह है कि उनके लेखन से यह आभास मिलता है कि उन्होंने शूद्रों को उच्च वंश का सिद्ध करने का लक्ष्य लेकर यह पुस्तक लिखी है. यह उस मनोवृत्ति का परिचायक है जो हाल में नीची जाति के लोगों में उत्पन्न हुई है.’5

गौरतलब है कि ज्योतिबा फुले की पुस्तक ‘गुलामगिरी’ डॉ. रामशरण शर्मा की पुस्तक के लिखे जाने के लगभग 75 वर्ष पहले आ चुकी थी. मगर इस पुस्तक का कोई हवाला वे अपने अध्ययन में नहीं देते. जबकि डॉ. आंबेडकर के विशद अध्ययन को वे अनुवाद-आधारित कहकर नकार देते हैं. अनुवाद एक भाषा की कृति को दूसरी भाषा में लाने का माध्यम है. हम किसी व्यक्ति के निष्कर्षों को केवल यह कहकर खारिज नहीं कर सकते कि उसने आधार-सामग्री के रूप में अनूदित ग्रंथों का अध्ययन किया है. विशेषकर जब तक उन अनुवादों की प्रामाणिकता पर सवाल न उठाए गए हों. दरअसल ब्राह्मणवादी चिंतक आरंभ से ही इस आत्मुग्धता का शिकार रहे हैं कि वेदादि ग्रंथों की सटीक समझ ब्राह्मणेत्तर वर्गों को हो ही नहीं सकती. जबकि वेद-रचियता ऋषियों में अनेक मनीषी ब्राह्मणेत्तर वर्गों से ही आते हैं. शूद्रों के संबंध में वेदादि ग्रंथों के पठन-पाठन संबंधी निषेध का वास्तविक ध्येय इन ग्रंथों को आलोचना-प्रत्यालोचना से दूर रखकर केवल पूजा की चीज बनाए रखना था; ताकि उनके भरोसे सहस्राब्दियों से चले आ रहे सांस्कृतिक-सामाजिक वर्चस्व को किसी प्रकार की चुनौती पेश न हो.

फुले और डॉ. आंबेडकर का संघर्ष सामाजिक न्याय को समर्पित था. उनके लिए शूद्रों के अधिकार महत्त्वपूर्ण थे. इसलिए वे राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ, कभी-कभी उसे किनारे करते हुए भी, सामाजिक स्वतंत्रता की मांग को निरंतर आगे बढ़ाते रहे. डॉ. शर्मा का आरोप है कि डॉ. आंबेडकर ने अपनी पुस्तक में शूद्रों को उच्च जाति का सिद्ध करने के लिए श्रम खपाया है. उनके इस आरोप में कोई दम नहीं है. आंबेडकर महार जाति के थे. उनके पिता महार रेजिमेंट में थे, जिसकी वीरता से अंग्रेज भी प्रभावित थे. उनकी आरंभिक पढ़ाई सैनिक स्कूल में हुई थी. संभव है, शूद्रों को क्षत्रीय सिद्ध करने के पीछे उनकी पारिवारिक स्थितियों का अप्रत्यक्ष प्रभाव रहा हो. लेकिन यह केवल एक संभावना है. शूद्रों को पराजित सैनिक मानने वाले वे अकेले नहीं हैं. ऋग्वेद में दसियों स्थान पर उल्लेख है कि दास समृद्ध सभ्यता के रचियता थे. उनके बड़े, विशालकाय दुर्ग थे. अनगिनत गाएं और विपुल पशु-संपदा थी. उनके साथ युद्ध में आर्यों को अनेक बार पराजय का सामना करना पड़ा था. हालांकि कूटनीतिक लड़ाई में वे आर्यों से पराजित होते रहे. मैक्डोलन का उल्लेख हम ऊपर कर चुके हैं. उसके अलावा दर्जनों विद्वान हैं जिनका मानना है कि शूद्र पराजित अनार्य सैनिक थे. उपर्युक्त उद्धरण में डॉ. शर्मा ने ‘नीची जाति के लोगों’ शब्दों का प्रयोग किया है. इससे प्रतीत होता है कि घोषित मार्क्सवादी होने के बावजूद जातिवादी संस्कार उनके अवचेतन में सुरक्षित थे. यह उस मनोवृत्ति का परिचायक है जिसके सवर्ण समुदाय से आने वाले वामपंथी आरंभ से ही शिकार होते आए हैं. इस देश में वामपंथ की असफलता की सबसे बड़ी बाधा भी यही है.

ऋग्वेद में अनार्य सम्राट सुदास के पिता दिवोदास को जिसने युद्ध में इंद्र की मदद की थी, अतिथि-सत्कार करने वाला बताया है. यह दर्शाता है कि अनार्यों पर विजय के पश्चात आत्ममुग्धता के शिकार आर्यों ने उन्हें वर्णव्यवस्था में सबसे निचले क्रम पर रखा था. यह मानना उचित ही है कि शूद्र का अनार्यों से गहरा संबंध था. वे समानांतर और अपेक्षाकृत विकसित संस्कृति के उत्तराधिकारी थे. चूंकि डॉ. रामशरण शर्मा अपने निष्कर्षों के लिए संस्कृत ग्रंथों तक सीमित रहे हैं, इसलिए उपर्युक्त पुस्तक को ‘संस्कृत ग्रंथों में शूद्र’ तक सीमित कहा जाना चाहिए, न कि प्राचीन भारत में शूद्र. उल्लेखनीय है कि संस्कृत ग्रंथ जिस रूप में हमें इन दिनों प्राप्त हैं, वे ईसा से अधिकाधिक दो-तीन शताब्दी पुरानी रचनाएं हैं. उससे पहले वे स्मृति का हिस्सा थे. संकलित किए जाने के बाद भी उनमें निरंतर पाठांतर होता रहा है. शूद्रों की ऐतिहासिक उपस्थिति की पड़ताल हेतु जैन और बौद्ध ग्रंथ भी प्रामाणिक साक्ष्य हो सकते हैं, जिन्हें डॉ. रामशरण शर्मा ने अपने अध्ययन में छोड़ दिया है. वेदेत्तर ग्रंथों पर वे कोई विचार नहीं करते. यह तब है जब वे बडे़ गर्व के साथ खुद को ए. एल. बेशाम का शिष्य मानते हैं, जिन्होंने भारत के निर्वासित ‘आजीवक’ दर्शन का गंभीर अध्ययन किया था. बेशाम की पुस्तक ‘हिस्ट्री एंड डाक्ट्रीन आफ आजीवक’ अपने विषय की सबसे प्रामाणिक शोधपरक कृति है. इन कमियों के बावजूद ‘शूद्रों का इतिहास’ महत्त्वपूर्ण पुस्तक है. शर्त यह है कि इसे देरिदा के ‘विखंडनवाद’ की समझ के साथ पढ़ा जाए.

बहुजन और भारतीय भौतिकवादी चिंतन

वैदिक साहित्य का अध्ययन करने से पता चलता है कि तत्कालीन वैदिक समाज जिसे ब्राह्मण समाज कहना समीचीन होगा, असल में आत्ममुग्ध समाज था. उस समय के जितने भी ग्रंथ हैं, वे ब्राह्मणों द्वारा ब्राह्मणों के लिए लिखी गई रचनाएं हैं. उनमें बाकी जनसमाज, विशेषकर शूद्रों की न तो खास झलक है, न ही उनके साथ किसी प्रकार के संवाद की कोशिश है. उनका उल्लेख भी अपमानजनक ढंग से हुआ है. शूद्रों को कहीं अयोग्य तो कहीं वैदिक परंपरा के विरोधी के रूप में दर्शाया गया है. अपने समकालीनों के प्रति ब्राह्मण लेखकों का जैसा व्यवहार था, उसे देखते हुए यह चौंकाने वाली बात भी नहीं है. जो वैदिक कर्मकांडों की महत्ता को अस्वीकारता है, उनके लिए वह निकृष्ट एवं हेय है. इसलिए वैदिक वाङ्मय में अनार्यों का उल्लेख दैत्य, असुर, वेद-निंदक जैसे अवमाननापूर्ण संबोधन के साथ किया गया है. क्या इसे भी ब्राह्मण लेखकों की कुंठा का कारण माना जाए? माना जाए कि सभ्यता के स्तर पर पिछड़ा होने के कारण वैदिक ऋषियों ने अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए यज्ञादि कर्मकांडों को माध्यम बनाया था? यह ठीक है, वैदिक परंपरा के लेखकों के संस्कृति और सभ्यता संबंधी अपने मापदंड थे. उसी के आधार पर उन्होंने अनार्यों का वर्णन अपने धर्मग्रंथों में किया था. अनार्यों में जाति और वर्ण के आधार पर स्तरीकरण की कोई प्रथा नहीं थी. किंतु ब्राह्मणों द्वारा वर्ण-विभाजन लागू करने के बाद, अनार्यों के शक्तिशाली तबके के एक हिस्से का समर्थन उन्हें अवश्य मिला होगा. इससे उनकी सांस्कृतिक लड़ाई आसान होती गई.

लगभग 2500 वर्ष पहले जब धर्मग्रंथों का लेखन आरंभ हुआ, उस समय तक ब्राह्मण संस्कृति समाज की अभिजन संस्कृति का हिस्सा बन चुकी थी. तत्कालीन सत्ता पर उसका प्रभाव था. उसमें असहमति के लिए कोई गुंजाइश नहीं थी. वेदों में हालांकि संघ, सभा, समिति, गण, पुग, निगम जैसे शब्द मिलते हैं. उनके आधार पर काशीप्रसाद जायसवाल, राधाकुमुद मुखर्जी आदि विद्वान वेदकालीन भारत में गणतंत्र की मौजूदगी का दावा करते रहे हैं. लेकिन वह आधुनिक गणतंत्रात्मक प्रणाली से पूर्णतः भिन्न था. जैसा था, उसका श्रेय भी ब्राह्मण मनीषियों को देना उचित न होगा. असल में वे प्राचीन अनार्य सभ्यता के अवशेष थे. उस कबीलाई संस्कृति की देन, जब गांव और परिवार के बीच कोई स्पष्ट विभाजन रेखा न थी. संपत्ति, संसाधन और उससे होने वाली आय साझा मानी जाती थी. मुखिया गांव की संपत्ति और संसाधनों का संरक्षक होता था. वही उत्पाद को सदस्यों के बीच उनकी आवश्यकता के अनुसार बांटने की जिम्मेदारी निभाता था. सदस्यों के बीच कार्य-विभाजन उनकी योग्यता के आधार पर किया जाता था. चूंकि पूरा कबीला एक परिवार की तरह होता था, इसलिए जन्म के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव की परंपरा न थी. वहां सुख-दुख में पूरे समूह का साझा होता था. ब्राह्मणों के बारे में जहां कहीं सेवा, साहचर्य, सुख और समानता की कामना की जाती है, उसकी व्याप्ति केवल ब्राह्मणों तक है. ऋग्वेद के दशम मंडल में आई ऋचाएं, जिनके आधार पर प्राचीन भारत में सामूहिकता, साहचर्य और संगठन की उपस्थिति के तर्क दिए जाते हैं, असल में ब्राह्मणों द्वारा, ब्राह्मणों के हित के लिए ब्राह्मण होताओं के एकजुट रहने का आवाह्न मात्र हैं.

वेदों को ब्राह्मण परंपरा में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है. उनके आधार पर भारतीय दर्शन परंपरा को शताब्दियों पहले दो हिस्सों में बांट दिया था. पहले वर्ग में वे दर्शन थे जो वेदों को आप्त ग्रंथ मानते थे. दूसरे वे दर्शन जो वेदों को आप्त ग्रंथ मानने से इन्कार करते थे. जैन और बौद्ध वेदों को स्वतः प्रामाण्य मानने को तैयार न थे, इस कारण उन्हें नास्तिक दर्शन की संज्ञा दी गई. बुद्ध पूर्व भारत में भौतिकवादी दर्शन प्रचलित थे. उन विचारधाराओं के बारे में विस्तार से यहां कुछ भी कह पाना संभव नहीं है. इसके दो प्रमुख कारण है. पहला बुद्ध के समय तक उपदेशों को कलमबद्ध करने की परंपरा न थी. स्वयं बुद्ध ने अपने उपदेश मौखिक रूप में दिए थे. उनके उपदेशों को उनकी मृत्यु के पश्चात अजातशत्रु की पहल के बाद संकलित किया गया. बुद्ध क्षत्रिय थे. उस समय का शक्तिशाली सम्राट अजातशत्रु उनके प्रशंसकों में से था. इसलिए बुद्ध के विचारों को सहेज पाना संभव हो सका. आजीवक, लोकायत, वैमानिक चार्वाक संप्रदाय के प्रवर्त्तक जो मुख्यतः शूद्र अथवा शिल्पकार वर्ग से थे, निम्न वर्ग का होने के कारण मक्खलि गोशाल आदि को यह सुविधा प्राप्त न थी. परिणामस्वरूप उनके विचार विलुप्त होते गए. उनके दर्शन के कुछ सूत्र जैन और बौद्ध ग्रंथों में देखे जा सकते हैं.

विद्वान बौद्ध एवं जैन दर्शनों को मध्यमार्गी मानते हैं. इस कारण जनसाधारण भी उनकी ओर आकर्षित हुआ था. दोनों में बौद्ध दर्शन अपेक्षाकृत अधिक लोकतांत्रिक और उदार था. इसलिए जैन दर्शन की अपेक्षा उसे अधिक ख्याति मिली. इन दर्शनों को मध्यमार्गी कहने का आधार क्या है? यदि पहला मार्ग वैदिक दर्शन का था, तो दूसरा मार्ग कौन-सा था? किन दर्शनों के साथ सामंजस्य बिठाने की कोशिश जैन और बौद्ध दर्शनों ने की थी, जिसके लिए उन्हें मध्यमार्गी माना गया? इस सत्य का बोध हमें अनेक उलझनों से बचा सकता है. उसके माध्यम से हम उन समानांतर विचारधाराओं का अनुमान लगा सकते हैं, जिन्हें ब्राह्मणों द्वारा जानबूझकर उपेक्षित किया गया. कदाचित इसलिए कि वे वैदिक परंपरा के आलोचकों में से थे. किंतु वैदिक परपंरा का विरोध तो जैन और बौद्ध दर्शन ने भी किया था. फिर क्या कारण हो सकता है? दूसरा और महत्त्वपूर्ण कारण हो सकता है, आजीवक चिंतकों की जाति. मक्खलि गोशाल, अजित केशकंबलि, पूरण कस्सप, सति, कौत्स आदि के बारे में उपलब्ध जानकारी के अनुसार वे अद्विज वर्गों से आए थे. ब्राह्मणों द्वारा उनके विचारों की उपेक्षा का बड़ा कारण यह भी था. उनके बारे में समझने के लिए बौद्ध एवं जैन साहित्य की शरण में जाना पड़ता है. क्योंकि वैदिक परंपरा के विरोध के लिए अनेक तर्क उन्होंने वेद-विरोधी लोकायत और आजीवक दार्शनिकों से लिए थे.

ऋग्वेद से लेकर महाकाव्यों और पुराणों तक चलने वाला लंबा संघर्ष दर्शाता है कि तत्कालीन समाज का बड़ा हिस्सा वैदिक कर्मकांडों का बहिष्कार करता था. यह विरोध निरा प्रतिक्रियावादी नहीं था. सब जानते हैं, प्रतिक्रियावाद की उम्र छोटी होती है. ठोस विचारधारा के समर्थन के अभाव में उसे शताब्दियों लंबे संघर्ष में बदला भी नहीं जा सकता था. ‘ब्रह्मजाल सुत्त’(दीघ निकाय) के अनुसार बुद्ध के समय भारत में भौतिकवादी, प्रकृतिवादी, शाश्वतवादी, क्रियावादी, अक्रियावादी आदि 64 दार्शनिक मत प्रचलित थे. ऐसे में वैदिक चिंतनधारा जिसे आज प्राचीन भारत की मूल-चिंतनधारा और भारतीय मनीषा का इकलौता उपहार माना जाता है, बुद्धपूर्व भारत में बहुत छोटे समूह तक सीमित रही होगी. बहुसंख्यक वर्ग को या तो उससे दूर रखा जाता था, अथवा घोर आडंबरवाद के कारण स्वयं बहुसंख्यक उससे दूरी बनाए रखता था. इसके माध्यम से एक और निष्कर्ष आसानी से निकाला जा सकता है. यह कि ब्राह्मणों द्वारा शूद्रों को वेदादि ग्रंथों के पठन-पाठन से अनाधिकृत घोषित करना, केवल जातिवादी सोच तक सीमित नहीं था. बल्कि उसे तीव्र आलोचनाओं से बचाना भी था. यह तार्किक आधार पर असंभव था. इसलिए अपने उभार के साथ ही वह विरोधों का शिकार होने लगी थी. बचाव के लिए वैदिक वाङ्मय तथा उसमें आए प्रतीकों को आस्था का विषय बनाने की कोशिश लगातार होती रही. उसके लिए उन्होंने राजनीति का सहारा लिया. प्राकृतिक शक्तियों का जमकर परामानवीकरण किया. बावजूद इसके अनेकानेक टोटमों, मिथों तथा कल्पित आख्यानों के माध्यम से कालांतर में वे ब्राह्मणों की वर्गीय श्रेष्ठता का मिथ जनमानस में स्थापित करने में कामयाब भी हुए. कर्मकांड इस उद्देश्य की पूर्ति में उनके सहायक बने. संस्कृत ग्रंथों में असुरों का उल्लेख इतनी चतुराई से किया गया है कि आर्य-संस्कृति का विरोधी होने के बावजूद वे उनके महिमा-मंडन में सहायक बनते हैं. आख्यानों में देवताओं का महिमामंडन है. वे सद्गुणों की खान हैं. जबकि असुर दुरात्माएं हैं. अपवाद-स्वरूप किसी असुर में सद्गुण हैं भी तो उन्हें प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में किसी देवता का अवदान घोषित कर दिया जाता है. ध्यातव्य है कि बुद्ध से पहले तक भारत में धर्मग्रंथों को लिखने की कोई परंपरा न थी. वैदिक ऋचाएं, उपनिषद आदि भले ही रचे जा चुके हों, किंतु उनका स्वरूप मौखिक ही था. इसलिए वैदादि ग्रंथों को श्रुति कहने की परंपरा है. उस समय ऋषिगण यज्ञवेदिका के पास बैठकर शिष्यों को ऋचाओं का पाठ कराते थे. ऋचाओं को शब्द-बद्ध करने का चलन बुद्ध के बाद ही संभव हो पाया. स्वयं बुद्ध के उपदेश उनकी मृत्यु के करीब 90 वर्ष पश्चात कलमबद्ध किए गए थे. यही समय वेदादि ग्रंथों के लिखित रूप में अस्तित्व में आने का भी है. इसलिए ऋग्वेद आदि ग्रंथों के अलग-अलग पाठ हमें प्राप्त होते हैं.

यह हम क्यों कह रहे हैं? इसका हमारे विषय से क्या संबंध है? वेदादि ग्रंथों को भारतीय दर्शन परंपरा का प्रमुख ग्रंथ माना जाता है. संस्कृत वाङ्मय की तो शुरुआत ही ऋग्वेद से मानी गई है. वैदिक परंपरा के अनुयायी इसपर गर्व भी करते हैं. उनकी पूर्वाग्रह-ग्रस्त दृष्टि मान लेती है कि वैदिक परंपरा के विरोधियों की कोई स्वतंत्र, वैकल्पिक विचारधारा नहीं थी. असल में ऐसा नहीं है. वैदिक परंपरा के विरोधी निरे प्रतिक्रियावादी न होकर, सशक्त दर्शन-परंपरा के संवाहक थे. उनके अनेक दर्शन सिद्धांतों को ब्राह्मणवादी विचारकों ने ज्यों का त्यों अथवा थोड़े-बहुत संशोधन के साथ ग्रहण किया है. ‘दीघ निकाय’ में पूर्ण कस्सप का वर्णन बुद्ध के समकालीन छह प्रमुख तीर्थंकरों के साथ किया जाता है. उसकी प्रशस्ति में लिखा गया है—‘पूर्ण कस्सप, संघ-स्वामी, गण-अध्यक्ष, ज्ञानी, यशस्वी, गणाचार्य, तीर्थंकर, बहुत से लोगों द्वारा सम्मानित, चिरकाल का साधु, अनुभवी और वयोवृद्ध है.’(सामञ्ञफलसुत्त, दीघनिकाय). पूर्ण कस्सप को विद्वान ‘अक्रियावादी’ मानते हैं. अजातशत्रु के पूछने पर उसने अपने अकर्म-सिद्धांत का वर्णन इस प्रकार किया—

‘महाराज! छेदन करते-कराते, पकाते-पकवाते, शोक करते, परेशान होते, परेशान कराते, चलते-चलाते, प्राण हनन करते, बिना दिया लेते, सैंध मारते, गांव लूटते, चोरी करते, बटमारी करते, परस्त्रीगमन और झूठ बोलते हुए भी पाप नहीं किया जाता. छुरे से तेज चक्र द्वारा जो इस पृथ्वी के प्राणियों का मांस का ढेर बना दे, तो इसके कारण उसे पाप का आगम नहीं होता….दान-दम-संयम से, सत्य बोलने से न पुण्य है, न पाप का आगम है.’(सामञ्ञफल सुत्त, दीघनिकाय).

इसकी तुलना गीता के कर्म-सिद्धांत से की जा सकती है. आत्मा की अनश्वरता का बखान करते हुए कृष्ण अर्जुन से कहते हैं—‘आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती. जल गला नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकता.’ पूर्ण कस्सप का दृष्टिकोण प्रकृतिवादी है. उसके कहने का आशय है कि इस संसार से बाहर, परामानवीय या अतिमानवीय जैसा कुछ नहीं है. देह जिन तत्वों से बनती है, मृत्यु पश्चात पुनः उन्हीं में समाहित हो जाती है. भौतिक जगत में न कुछ घटता है, न ही बढ़ता है. कमोबेश गीता का भी यही दृष्टिकोण है. अंतर बस इतना है कि गीता मनुष्य और प्रकृति के मध्य अतिमानवीय सत्ता यानी परमात्मा को ले आती है. यह सब मनुष्य की अस्मिता मान-सम्मान और गरिमा के विरुद्ध होता है. असुरों का वैदिक परंपरा से विरोध ऋषियों द्वारा यज्ञादि के माध्यम से ज्ञान के कर्मकांडीकरण के प्रति भी था. हमारी समस्या है कि हम वैदिक परंपरा की धुर-विरोधी, उसकी समकालीन भौतिकवादी विचारधाराओं से ज्यादा परिचित नहीं हैं. ब्राह्मण ग्रंथों में तो उनकी पूरी तरह उपेक्षा की गई है. कुछ सूत्र जैन एवं बौद्ध ग्रंथों से प्राप्त होते हैं. ऐसे में सत्य जानने के लिए एकमात्र देरिदा की पद्धति कामयाबी की ओर ले जा सकती है. वह है उपलब्ध ज्ञान पर संदेह करते हुए उसकी इतनी गहन अन्वीक्षा करना कि उसका वर्तमान स्वरूप विखंडित हो जाए. यह दही मथकर मक्खन निकालने जैसा श्रम-साध्य कर्म है.

बहुजन साहित्य की रूपरेखा

अभी तक इस आलेख में जो आया, वह महज पृष्ठभूमि है. बहुजन साहित्य की अवधारणा इससे स्पष्ट नहीं होती. कुछ स्थितियां हैं जो इसकी आवश्यकता को चिन्हित करती करती हैं. वैसे ‘बहुजन’ शब्द हमारे लिए नया नहीं है. पहली बार यह बौद्ध साहित्य में नजर आता है. श्रमण-संस्कृति को बढ़ावा देते हुए बुद्ध भिक्षुओं को बहुजन के सुख और जगति-कल्याण के लिए निरंतर भ्रमणशील रहने की शिक्षा देते हैं. उनके यहां जाति, वर्ण आधारित ऊंच-नीच का विचार नहीं है. यज्ञादि के नाम पर हिंसा और आडंबर भी नहीं हैं. इसलिए सीधा-सादा जीवन जीने के इच्छुक, असमानता के शिकार लोग उनकी ओर आकर्षित होते हैं. सामाजिक निषेधों में कमी आने से आर्थिक विकास को गति मिलती है. फलस्वरूप बौद्ध दर्शन समकालीन ब्राह्मणवादी दर्शनों, जो मुख्यतः ब्राह्मणों द्वारा ब्राह्मणों के निमित्त रचे जा रहे थे—को चुनौती देने में कामयाब होता है. अपनी व्यावहारिक सोच के चलते उसे भारत के साथ-साथ विदेशों में भी प्रतिष्ठा प्राप्त होती है. फिर भी कुछ प्रश्न अनायास सामने आ जाते हैं. सर्वहित की कामना साहित्य का मूल तत्व तथा उसका परम-उद्देश्य मानी जाती है. ऐसे में ‘सर्वहित’ को ‘बहुजन हित’ अथवा ‘अधिसंख्यक के हित’ तक सीमित कर देना क्या साहित्यत्व का अवमूल्यन नहीं है? कुछ विद्वान इसी आधार पर बहुजन साहित्य को संदेह की दृष्टि से देखते हैं. उनमें अधिकांश वे हैं जो दलित साहित्य, नारीवादी साहित्य जैसी अस्मितावादी साहित्य-धाराओं को अनावश्यक ठहराते हैं. उनका तर्क है कि इससे जातिवाद बढ़ेगा(मानो अभी जातिवाद कम हो और उसे बनाने-बचाने के लिए केवल दलित और बहुजन जिम्मेदार हों). यह पहली बार भी नहीं हो रहा है. दमित अस्मिताएं जब अपना संघर्ष आरंभ करती हैं तो पहला औजार साहित्य को ही बनाती हैं. यही कारण है कि धर्म, भाषा, क्षेत्र, लिंग, समुदाय आदि के आधार पर साहित्य की नई धाराएं सदैव उभरती रही हैं. ये सब साहित्य के विराट कुनबे के सदस्य जैसी हैं. उनके माध्यम से संबंधित समाज की गतिशीलता, उसकी आकांक्षाओं तथा अंतर्द्वंद्वों को समझा जा सकता है. वे सामाजिक परिवर्तन की दिषा को सुनिश्चित करने में सहभागी बनती हैं.

प्रकारांतर में बहुजन साहित्यकार का काम उस अनलिखे की खोज करना है, जिसे उस समय के कलमकारों ने या तो छोड़ दिया है, अथवा उसे तोड़-मरोड़कर पेश करते आए हैं. यह काम आसान नहीं है. अभी तक यह छबि बनाई गई कि ब्राह्मणों द्वारा समय-समय रचा गया साहित्य ही मुख्यधारा का साहित्य है. इसमें बौद्ध और जैन दर्शन की उपस्थिति अपवाद कही जा सकती है. यह धारणा साहित्य की आरंभिक कसौटी पर ही खरी नहीं उतरती. साहित्य-सृजन मात्र लेखकीय सृजन नहीं है. उसका दूसरा चरण पाठक-श्रोता के मानस में संपन्न होता है. बिना पाठकीय अनुक्रिया के किसी भी विचार के साहित्यकरण की प्रक्रिया पूरी नहीं होती. अतः ऐसा लेखन जिसका पाठन-श्रवण समाज के बड़े हिस्से के लिए प्रतिबंधित हो, प्रतिबंध के लंघन पर कठोरतम दंड का शास्त्रीय प्रावधान हो—उसकी कृति चाहे जितनी महत्त्वपूर्ण क्यों न हो, अपने लेखक अथवा समुदाय की उत्कृष्ट रचना तो हो सकती है—साहित्य नहीं बन सकती. बहुजन साहित्य वही रच सकता है, जिसकी न्याय और लोकतंत्र में अटूट आस्था हो. जो दृश्यमान से संतोष न करके, उसके पीछे निहित सत्य को परखने का हौसला रखता हो. दूसरे शब्दों में बहुजन साहित्य के लिए बहुजन दृष्टि का साथ अनिवार्य है. यह बहुजन दृष्टि क्या है? बहुजन दृष्टि वह है जो जीवन-जगत में विश्वास रखे. जिसे मिथों से अधिक भरोसा इंसानियत में हो. जो समतावादी हो और श्रम का सम्मान करती हो. जिसे मानव-मात्र की स्वतंत्रता की कद्र हो. आवश्यकता पड़ने पर जो संघर्ष का हौसला रखती हो. जो विश्वास-मूलक न होकर संदेह-मूलक हो. यथास्थितिवादी न होकर अन्वेषणात्मक हो. ऐसी खोजक दृष्टि ही उपलब्ध वाङ्मय से काम की चीजें निकाल सकती है. वह निषेधों की नहीं जीवन के सम्मिलित उत्सव की दृष