वज्रसूची

विशेष रुप से प्रदर्शित

उपनिषद((सामवेद)

हिंदी अनुवादक : ओमप्रकाश कश्यप

[‘वज्रसूचि’ बौद्ध विद्वान अश्वघोष(50 ईस्वी पूर्व—50 ईस्वी) द्वारा विरचित लघु उपनिषद है. इसमें हिंदुओं की वर्ण-व्यवस्था पर प्रहार किया गया है. अश्वघोष की वर्ण-व्यवस्था के औचित्य के खंडन के लिए अश्वघोष ब्राह्मण ग्रंथों से ही उदाहरण देते हैं. उनके तर्क तीखे, कहीं-कहीं व्यंजना लिए हुए हैं. इस उपनिषद का पहला अंग्रेजी अनुवाद रॉयल एशियाटिक सोसाइटी के लिए बी.एच. हॉडग्सन द्वारा 1829 में किया था, जो लंदन से 1835 में प्रकाशित किया गया था. उससे पहले रॉयल सोसाइटी के सचिव के नाम 11 जुलाई 1929 को लिखे गए पत्र में हॉडग्सन ने लिखा था कि ‘वज्रसूची’ के अनुवाद में मदद करने के लिए उन्होंने ‘बनारस के एक पंडित’ को रखा था, लेकिन वह बीच में ही काम को अधूरा छोड़कर चला गया था. जैसे-तैसे उन्होंने अनुवाद कार्य को पूरा किया.

उपनिषद् के हिंदी अनुवाद हेतु सुजीत कुमार मुखोपाध्याय के अंग्रेजी अनुवाद की मदद ली गई है, जो विश्वभारती, शांतिनिकेतन द्वारा प्रकाशित 1849 में प्रकाशित हुआ था. अपने तीखे और विद्वतापूर्ण तर्कों के माध्यम से अश्वघोष जिस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं, वह कालातीत और चिर-प्रासंगिक है—

‘हे राजन्। मनुष्य की जाति नहीं देखी जाती। उसके गुण ही उसके श्रेष्ठत्व की पहचान हैं। सिर्फ वही महत्वपूर्ण हैं। ऐसा व्यक्ति जो परोपकारी जीवन जीता है, जो सदैव धैर्य-धृत्ति और क्षमा का अनुसरण करता है, ईश्वर की दृष्टि में वही श्रेष्ठ जन है।’]

पुस्तक की खूबी है कि तर्क पूर्ण विवेचना से अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने के बावजूद अश्वघोष अपनी ओर से कोई फैसला थोपते नहीं हैं, अपितु आगे का काम पाठकों के विवेक पर छोड़ देते हैं. यह गुण इसे दूसरे उपनिषदों से अलग करता है.

वज्रसूची का अर्थ है—हीरे की सुई. तो अब आप हीरे की सुई को पढ़िए, परखिए और काम लीजिए.

 

वज्रसूची

ओम नमो मञ्जुनाथाय।

मैं अश्वघोष सर्वप्रथम अपने गुरु मंजुनाथ को नमन करता हूं

जगद्गुरुं मञ्जुघोषं नत्वा वाक्कायचेतसा

अश्वघोषो वज्रसूचीं सूत्रयामी यथामतम्।1।

अपनी अंतरात्मा और पूरी शक्ति के साथ जगद्गुरु मंजुनाथ का नमन और स्मरण करने के पश्चात मैं शास्त्र के अनुसार वज्रसूची नामक इस ग्रंथ को लिखना आरंभ करता हूं।1।

वेदाः प्रमाणं स्मृतयः प्रमाणं धर्मार्थयुक्तं वचनं प्रमाणम्।

यस्य प्रमाणं न भवेत्प्रमाणं कस्तस्य कुर्याद्वचनं प्रमाणम्।2।

आपके वेद प्रमाण हैं, स्मृतियां प्रमाण हैं। धर्म-सम्मत आधार पर कहे गए वचन भी प्रमाण हैं। जो प्रमाण को प्रमाण के रूप में स्वीकारने से इन्कार करेगा, उसके कथन को प्रमाण के रूप  में भला कौन स्वीकार करेगा।

  1. इह भवता यदिष्टं सर्ववर्ण प्रधानं ब्राह्मणवर्णइति, वयमत्र ब्रूम: कोऽयं ब्राह्मणो नाम। किं जीवः किं जातिः किं शरीरं किं ज्ञानं, किमाचारः किं कर्म किं वेद इति।

आपके शास्त्रों के अनुसार सृष्टि में ब्राह्मण ही सर्वश्रेष्ठ हैं। यदि ऐसा है तो यह बताइए कि ब्राह्मण कौन हैं? किसे ब्राह्मण कहा जाए? क्या आत्मा को? अथवा शरीर को? मनुष्य ब्राह्मण कुल में जन्म लेने से ब्राह्मण होता है अथवा ज्ञान से? क्या व्यक्ति का आचार उसे ब्राह्मण बनाता है, अथवा उसका ज्ञान? किसी व्यक्ति के कर्म उसे ब्राह्मण बनाते हैं, अथवा वेद-शास्त्रों में प्रवीणता प्राप्त कर लेने के पश्चात वह ब्राह्मण बन पाता है?

  1. तत्र जीवस्तावद् ब्राह्मणो न भवति। कस्माद्। वेदस्य प्रामाण्याद्। उक्तं हि वेदेः।

यदि आप कहते हैं कि जीव ही ब्राह्मण है तो यह सच नहीं है। क्योंकि वेद जीव(आत्मा) को ब्राह्मण नहीं मानते।

  1. ओं सूर्यः पशुरासीत्, सोमः पशुरासीद्, इंद्र पशुरासीत्।

पश्वो देवाः। आद्यन्ते देवपशवः। श्वपाका अति देवा भवन्ति।।

  • ओं, वेदों के अनुसार पहले सूर्य पशु था, चंद्रमा पशु था और इंद्र भी पशु ही था। कुछ देवता पहले पशु थे, बाद में(जन्मांतर के पश्चात) वे देवता कहलाए। यहां तक कि कुत्ते का मांस खाने वाला भी बाद में देवता(ब्राह्मण) बन गया था।
  1. अतो वेदप्रामाण्यान्मन्यामहे जीवस्वाद् ब्राह्मणो न भवति।

भारत-प्रामाण्यादपि। उक्तं हि भारतेः।

  • वेदों के आधार पर प्रमाणित होता है कि जीव(आत्मा) ब्राह्मण नहीं है। इसे महाभारत भी पुनःप्रमाणित करता है।
  •  

सप्तव्याधा दशार्णेषु मृगाः कालञ्जरे गिरौ।

चक्रवाकाः शरद्वीपे हंसाः सरसि मानसे।3।

तेऽपि जाताः कुरुक्षेत्रे ब्राह्मणा  वेदपारगाः।4।

उसके अनुसार एक बार कलिंजर पहाड़ी के सात शिकारी, दस हरिण, मानस-सरोवर झील की एक बत्तख और शरद् द्वीप का चावक पक्षी—इन सभी का जन्म कुरुक्षेत्र में ब्राह्मण के रूप में हुआ था, आगे चलकर ये सभी वेद-पारंगत हुए।3-4।

  • अतो भारतप्रामाण्याद् व्याधमृगहंसचक्रवाकदर्शन सम्भवान्मन्यामहे जीवस्तादु ब्राह्मणो न भवति। मानवधर्मप्रामाण्यादपि। उक्तं हि मानवे धर्मेः।

अधीत्य चतुरो वेदान्सांगोपांगेन तत्त्वतः

शूद्रात्प्रतिग्रहग्राही ब्राह्मणो जायते खरः।5।

खरो द्वादशजन्मानि षष्टिजन्मानि सूकरः

श्वानः सप्ततिजन्मानि—इत्यमेवं मनुरब्रवीत्।6।

5. अतएव महाभारत के अनुसार, हम मानते हैं कि एक भेड़िया, एक हरिण, एक हंस, एक चक्रवाक पक्षी को भी ब्राह्मण के रूप में देखना(पुनर्जन्म लेना) संभव है। इसलिए जन्म लेने मात्र से ही कोई ब्राह्मण नहीं बनता है। यह मनुस्मृति से भी प्रमाणित है। उसमें कहा गया है—

“ब्राह्मण, वेद-वेदांगों के सांगोपांग अध्ययन द्वारा जो ग्रहण करता है, शूद्र से भिक्षा अथवा दान लेने पर वह नष्ट हो जाता है । मरणोपरांत वह गधे के रूप में जन्म लेता है।5 ।

बारह जन्मों तक गधे की योनि में जन्म लेने के बाद वह साठ जन्मों तक सूअर के रूप में जन्मता है. तदनंतर उसे लगातार सत्तर बार कुत्ते की योनि में जन्म लेना पड़ता है।6।   

  • अतो मानवधर्म प्रामाण्याज्जीवस्तावद् ब्राह्मणो न भवति।

6. अतएव मानवशास्त्र, श्रुति एवं स्मृति के आधार पर यह आत्मा ब्राह्मण नहीं हैं।

  • जातिरपि ब्राह्मणें न भवति। कस्मात्। स्मृति प्रामाण्याद्। उक्तहिं स्मृतौः

7. सिर्फ जन्म मात्र ही कोई मनुष्य ब्राह्मण नहीं हो जाता। क्यों? स्मृति में यही कहा गया है। स्मृति-ग्रंथों में लिखा है—

हस्तिन्यामचलो जात उलूक्यां केशपिंगलः

अगस्त्योऽगस्तिपुष्पाच्च कौशिकः कुशसम्भवः।7।

कपिलः कपिलाजातः शर गुल्माच्च गौतमः

द्रोणाचार्यस्तु कलशात्तित्तिरिस्तित्तिरीसुतः।8।

रेणुकाऽजनयद्राममृष्यशृंगमुनिं मृगी

कैवर्तिन्यजनयद् व्यासं कुशिकं चैव शूद्रिका।9।

विश्वामित्रं च चण्डाली वशिष्ठं चैव उर्वशी

न तेषां ब्राह्मणी माता लोकाचाराच्च ब्राह्मणाः।10।

अचल मुनि का जन्म हथिनी के गर्भ से, केशपिंगल ऋषि का उल्लू से, आगस्त्य मुनि का अगस्ति पुष्प से, कौशिक का जन्म कुश(घास) से हुआ था। पुनश्चः कपिल मुनि का जन्म कपिता(अग्नि, बंदर) से, और गौतम का चीटिंयों से, द्रोणाचार्य का कलश से, तैत्तिरीय मुनि का तीतरी के गर्भ से, परशुराम का रेणु(धूल) से, श्रृंगी ऋषि का हरिणी के गर्भ से, व्यासमुनि का जन्म एक मल्लाह स्त्री से, कौशिक मुनि का जन्म एक शूद्र स्त्री से, विश्वामित्र का जन्म चांडाल स्त्री के गर्भ से तथा वशिष्ट मुनि का जन्म उर्वशी नामक अप्सरा के गर्भ से हुआ था। इनमें से किसी की भी मां ब्राह्मणी नहीं थी। बावजूद इसके ये सभी शुद्ध ब्राह्मण के रूप में विख्यात हुए। इन्हें सिर्फ लोकाचार में ब्राह्मण का दर्जा दिया गया है, ग्रंथों के आधार इनके ब्राह्मणत्व की पुष्टि संभव नहीं है।7-10।

  • अतः स्मृतिप्रामाण्या न्मन्यामहे जातिस्तावद् ब्राह्मणो न भवति।

8. इस तरह स्मृति ग्रंथों द्वारा प्रमाणित होता है कि जन्म के आधार पर कोई भी व्यक्ति ब्राह्मण नहीं होता।

IX.  अथ मन्यसे माता वाऽब्राह्मणी भवेत्। तेषां पिता ब्राह्मण स्ततो ब्राह्मणो भवतीति। यद्येवं दासीपुत्रा अपि ब्राह्मणजनिता ब्राह्मणा भवेयुः। न चैतद्भवतामिष्ठम्।

9. अब यदि आप यह कहते हैं कि माता भले अब्राह्मणी हो, पिता यदि ब्राह्मण है तो संतान ब्राह्मण ही मानी जाएगी। यदि इसे मान लिया जाए तो ब्राह्मण द्वारा दासियों द्वारा उत्पन्न संतान को भी ब्राह्मण का ही दर्जा मिलना चाहिए। लेकिन आप इसे स्वीकार नहीं करेंगे।

  • किं च। यदि ब्राह्मणपुत्रो ब्राह्मणस्तर्हि ब्राह्मणाभावः प्राप्नोति। इदानीन्तानेषु ब्राह्मणेषु पितरि सन्देहाद्। गोत्रब्राह्मणमारभ्य ब्राह्मणीनां शूद्राभिगमनदर्शनाद्। अतो जातिर्ब्राह्मणो न भवति। मानवधर्मप्रामाण्यादपि। उक्तं हि मानवे धर्मेः।

10. क्या आप यह कहें कि ब्राह्मण की औरस संतान ही ब्राह्मण होती है। यदि आप उसी को शुद्ध और सच्चा ब्राह्मण मानते हैं तो मुझे उससे भी आपत्ति है। क्योंकि आज के युग के ब्राह्मण, ब्राह्मणों से ही उत्पन्न हैं, यह बात ही संदेहास्पद है। माना जाता है कि आरंभ से ही, यहां तक कि जब से ब्राह्मणत्व की संकल्पना जन्मी, ब्राह्मण गोत्र की स्त्रियों का संबंध शूद्रों से था; और आज भी है। यदि वास्तविक पिता ही शूद्र है तो उनकी संतान ब्राह्मण हो ही नहीं सकती। इसका मां के ब्राह्मण होने से कोई संबंध नहीं है। इसके आधार पर मैं कहना चाहता हूं कि ब्राह्मणत्व को सिर्फ जन्म के आधार पर सिद्ध नहीं किया जा सकता। मनुस्मृति से भी यही प्रमाणित होता है। उसमें कहा गया है—

सद्यः पतति मांसेन लाक्षया लवणेन च

त्याहाच्छूद्रश्च भवति ब्राह्मणः क्षीरविक्रयी।11।

आकाशगामिनो विप्राः पतन्ति मांसभक्षणात्

विप्राणां पतनं दृष्टा ततो मांसानि वर्जयेत्।12।

मनुस्मृति इस बात का प्रमाण है कि जो ब्राह्मण मांस भक्षण करता है, वह अपना ब्राह्मणत्व गंवा देता है। यही नहीं सोम, नमक या दूध का व्यापार करने वाला ब्राह्मण भी तीन दिनों के भीतर शूद्र हो जाता है। जो ब्राह्मण चमत्कारी शक्ति से आकाश-गमन करते हैं, यदि वे मांस भक्षण करें तो जमीन पर आ गिर पड़ते हैं। ऐसे पराभव की संभावना को टालने के लिए ब्राह्मणों के लिए मांस सेवन को वर्जित किया गया है।11-12।

XI. अतो मानवधर्मप्रामाण्याज्जातिस्तावद् ब्राह्मणो न भवति। यदि हि जातिर्ब्राह्मणः स्यात् तदा पतने शूद्रभावो नोपद्यते। किं खलु द्रुष्टोऽप्यश्वः सूकरो भवेत्। तस्माज्जातिरपि ब्राह्मणो न भवति।

11. स्पष्ट है कि मनु धर्म के प्रमाणनुसार ब्राह्मणत्व वह नहीं है जो  जन्म से प्राप्त होता है। यदि किसी को जन्म से ब्राह्मण दर्जा प्राप्त है तो कर्म के आधार पर उसे शूद्र माना ही नहीं जा सकता। क्या कभी किसी घोड़े को किसी दोष के कारण सूअर बनते देखा है! इससे स्पष्ट है कि जन्म से कोई भी व्यक्ति ब्राह्मण नहीं होता।

XII.  शरीरमपि ब्राह्मणो न भवति। कस्माद्। यदि शरीरं ब्राह्मणः स्यात् तर्हि पावकोऽपि ब्रह्महा स्याद्। ब्रह्महत्या च बंधूनां शरीरं दहनाद्भवेद्। ब्राह्मणशरीरनिस्यन्दजातश्च क्षत्रियवैश्यशूद्रा अपि ब्राह्मणा स्युः। न चैतदद्ष्टं। ब्राह्मणशरीविनाशाच्च यजनयाजनाध्ययनाध्यापनदान -प्रतिग्रहादीनां ब्राह्मण-शरीरजनितानां फलस्य विनाशः स्यात्। न चैतदिष्टम्। अतो मन्यामहे शरीरमपि ब्राह्मणो न भवति।

12. क्या आप कहते हैं कि यह शरीर ब्राह्मण है? तब भी आप गलत हैं। इसलिए कि यदि यह शरीर ही ब्राह्मण है तो मृत्योपरांत ब्राह्मण के शरीर को अग्नि के सुपुर्द करने वालों को ब्रह्म-हत्या का पापी समझा जाना चाहिए। यह दोष मृतक ब्राह्मण के सभी मित्रों-संबंधियों को जो अंतिम संस्कार के समय उपस्थित थे, लगना चाहिए।

फिर यदि शरीर ही ब्राह्मण है तो क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जो ब्राह्मण के शरीर से अथवा जो ब्राह्मण द्वारा क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रादि स्त्रियों के साथ संसर्ग द्वारा उत्पन्न हैं, उन्हें भी ब्राह्मण का दर्जा प्राप्त होना चाहिए। किंतु ऐसा नहीं होता।

पुनश्चः यदि शरीर ही ब्राह्मण है तो यज्ञादि कर्मकांडों में भाग लेना या दूसरों को उसके लिए प्रेरित करना, अध्ययन-अध्यापन, दान देना, दान लेना आदि ये सभी कृत्य शरीर द्वारा ही निष्पादित किए जाते हैं. जो उनको जो लोग मानते हैं, उनसे पूछना चाहिए कि क्या ब्राह्मण के शरीर के नष्ट हो जाने से इन सब कृत्यों के गुण-धर्म भी नष्ट हो जाते हैं? निश्चित रूप से ऐसा नहीं होता। सो स्पष्ट है कि यह शरीर ब्राह्मण नहीं है।

XIII.    ज्ञानमपि ब्राह्मणो न भवति। कुतः। ज्ञानबाहुल्याद्। ये ये ज्ञानवन्तः शूद्रास्ते सर्व एव ब्राह्मणाः स्युः। दृश्यन्ते च क्वचित शूद्रा अपि वेदव्याकरणमीमांसासांख्य-वैशेषिकलग्ना जीवकादिसर्वशास्त्रार्थ विदः। न चे ते ब्राह्मणाः स्युः। अतो मन्यामहे ज्ञानमपि ब्राह्मणो न भवति।

13. तो क्या आप मानते हैं कि ज्ञान व्यक्ति को ब्राह्मण बनाता है? यह भी गलत है। क्यों? इसलिए कि यदि यह सच होता तो अनेक शूद्र जिन्होंने अपने ज्ञान के बल पर बहुत-सा ज्ञान अर्जित किया है, जिन्हें प्रकांड पांडित्य हासिल है, उन्हें भी ब्राह्मण बन जाना चाहिए था। ऐसे अनेक शूद्रों को देखा गया है जो सभी वेद-वेदांगों, विद्याओं, धर्मशास्त्रों तथा उनकी शाखा-प्रशाखाओं, व्याकरण-मीमांसा-सांख्य-वैशेषिक-जैन धर्म, आजीवक दर्शन सहित ज्योतिष, तत्वज्ञान आदि समस्त विद्याओं में निष्णात हैं। लेकिन उनमें से कितनों को ब्राह्मणत्व हासिल हो पाया है?

इससे स्पष्ट है कि ज्ञान, अध्ययन-अध्यापन आदि भी ब्राह्मणत्व का लक्षण नहीं है। सिर्फ ज्ञानी होने से किसी को ब्राह्मणत्व से युक्त नहीं माना जा सकता।

XIV. आचारोऽपि ब्राह्मणो न भवति। कुतः यद्याचारो  ब्राह्मणः स्यात् तदा ये य आचारवन्तः शूद्रास्ते सर्वे ब्राह्मणाः स्युः। दृश्यन्ते च नटभटकैवर्तभण्डप्रभृतयः प्रचण्डतरविविधारवन्तो, न चे ते ब्राह्मणा भवन्ति। तस्मादाचारोऽपि ब्राह्मणो न भवति।

14.  आचार से भी मनुष्य को ब्राह्मण का दर्जा हासिल नहीं होता। यदि ऐसा होता तो जितने भी आचारवान शूद्र हैं, वे सब के सब कभी के ब्राह्मण बन गए होते। यह देखा भी जाता है कि अनेक नट, भाट, भांड, कैवर्त और अन्य लोग तरह-तरह के सदाचरण का बहुत गंभीरता से पालन करते हैं। उनका आचरण निर्मैल्य होता है। फिर भी वे ब्राह्मण नहीं बन जाते।

तदनुसार यह सिद्ध है कि आचार के आधार पर भी किसी मनुष्य को ब्राह्मण घोषित नहीं किया जा सकता।

XV. कर्मापि ब्राह्मणो न भवति। कुतः। दृश्यन्ते हि क्षत्रियवैश्य शूद्रा यजन-याजनाध्ययनाध्यापनदानप्रतिग्रह प्रसंग विविधानि कर्माणि कुर्वन्तो न च ते ब्राह्मणा भवतां सम्मताः। तस्मात्कर्मापि कर्माणि ब्राह्मणो न भवति।

15. व्यक्ति अपने कर्मों से भी ब्राह्मण नहीं बनता। न ही व्यक्ति की जीवनवृति उसे ब्राह्मण बनाती है। कैसे? अकसर देखा गया है कि क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रादि भी अध्ययन-अध्यापन, यज्ञादि कर्मकांड, दान-प्रतिग्रह, जिन्हें ब्राह्मणत्व का लक्षण माना गया है—करते पाए जाते हैं। उन सब कर्मों को करने के बाद भी कोई व्यक्ति ब्राह्मण न नहीं बन पाता है।

इससे सिद्ध है कि व्यक्ति की वृति उसे ब्राह्मण नहीं बनाती।

XVI.  वेदेनापि ब्राह्मणो न भवति। कस्माद्। रावणो नाम राक्षसोऽभूत्। तेनाधीताश्चत्वारो वेदाः। ऋग्वेदो, यजुर्वेद, सामवेदोऽथर्ववेदश्चेति। राक्षसानामपि गृहे-गृहे वेद-व्यवहारः प्रवर्तत एव। न चे ते ब्राह्मणः स्युः। अतो मान्यामहे वेदेनापि ब्राह्मणो न भवतीति।

16. तो क्या वेदाध्ययन के माध्य्यम  व्यक्ति ब्राह्मण बन पाता है? नहीं। वेदाध्ययन से भी व्यक्ति ब्राह्मण नहीं बन पाता। ऐसा क्यों होता है? रावण नामक राक्षस चारों वेदों यथा ऋक्, यजु, साम और अथर्ववेद का ज्ञाता था। राक्षसों के यहां हर घर में वेदानुरूप आचरण किया जाता था। तथापि वे ब्राह्मण नहीं होते थे।

स्पष्ट है कि वेदों में प्रवीणता ही किसी व्यक्ति के ब्राह्मण होने का प्रमाण नहीं है।

XVII.   कथं तर्हि ब्राह्मणत्वं भवति। उच्यते:

ब्राह्मणत्व न शास्त्रेण न संस्काररैर्न जातिभि:

न कुलेन, न वेदेन न कर्मणा भवेत्तत:।13।

17. तब ब्राह्मणत्व को प्राप्त कर पाना कैसे संभव है? खासकर तब जब यह कहा गया कि न तो शास्त्रों के अध्ययन-अध्यापन से, न आचारों के पालन से, न ही ब्राह्मणों के लिए निर्धारित आजीविका को अपनाकर ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया जा सकता है।

फिर ब्राह्मणत्व का आधार क्या है। कोई व्यक्ति कैसे ब्राह्मण बन सकता है?

XVIII. कुन्देन्दुधवलं हि ब्राह्मणत्वं नाम सर्वपापस्यापा करणमिति।

18. सभी प्रकार के प्रापों, दुष्कर्मों से विरत हो जाना ही ब्राह्मणत्व का लक्षण है, यह श्वेतकुंद पुष्प और धवल चंद्रमा जैसा निर्मेल्य हो जाना है।

XIX. उक्तं हि। ब्रततपोनियमोपवास दानदमशमसंयमो पचाराच्च। तथा चोक्तं वेदेः।

19. यह भी कहा गया है कि आचरण और शील के परिपालन द्वारा, तप, व्रत, दानादि कर्मो तथा आंतरिक और ब्राह्यः पर नियंत्रण हो जाने से ब्राह्मणत्व की अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है।

निर्ममो निरहंकारो निःसंगो निष्परिग्रहः

रागद्वेष विनिर्मुक्तस्तं देवा ब्राह्मण विदुः।14।

वह जो मोह-ममत्व से परे है, जिसने अहंकार को जीत लिया और जो निरासक्त तथा असंग्रही है। साथ ही जो व्यक्ति राग-द्वेष से रहित है, तथा विलासिता और घृणा से मुक्ति पा चुका है—देवताओं ने ऐसे व्यक्ति को ही ब्राह्मण का दर्जा दिया है।

सर्वशास्त्रेऽप्युक्तम् :

सत्य ब्रह्म तपो ब्रह्म ब्रह्म चेन्द्रियःनिग्रहः

सर्वभूते दया ब्रह्म एतद् ब्राह्मणलक्षणम्।15।

सत्यं नास्ति तपो नास्ति नास्ति चेन्द्रियनिग्रहः

सर्वभूते दया नास्ति एतच्चाण्डाललक्षणम्।16।

देवमानुष नारीणां तिर्यग्योनिगतेष्वपि

मैथुन नाधिगच्छन्ति ते विप्रास्ते च ब्राह्मणाः।इति।।17।

शुक्रेणाप्युक्तं

न जातिदृश्यते तावद् गुणाः कल्याणकारकाः

चाण्डालोऽपि हि तत्रस्थतं देवा ब्राह्मणं विदुः।18।

वेद-वेदांगों और शास्त्रों का कथन है कि

सत्य ही ब्राह्मणत्व है, तप ब्राह्मणत्व है, इंद्रियों पर नियंत्रण कर लेना भी ब्राह्मणत्व का लक्षण है। प्राणिमात्र के प्रति करुणा का भाव ब्राह्मणत्व है। ये सब ब्राह्मणत्व के लक्षण हैं।15।

दूसरी ओर,

मिथ्याभाषी और तपरहित हो जाना, इंद्रियों पर अधिकार न होना, प्राणिमात्र के प्रतिकरुणा का अभाव होना—ये सब चांडाल के लक्षण हैं।16।

देव, मनुष्य, स्त्रियों, पशु आदि में जो भी मनुष्य मैथुन कर्म से विरक्त  और शीलवान हैं, उन्हीं को ब्राह्मण बताया गया है।17।

शुक्राचार्य ने कहा था—

ईश्वर जाति नहीं देखता, किस कुल में जन्म लिया है यह भी नहीं देखता। बजाय इसके सुंदर, कल्याणोन्मुखी आचरण ही मनुष्यों के गुणों का आधार है। ये गुण यदि किसी चांडाल में भी मौजूद हैं तो देवता उसे भी ब्राह्मण ही मानते हैं।18।

XX. तस्मान्न जातिर्न जीवो न शरीरं न ज्ञानं नाचारो न कर्म न वेदो ब्राह्मण इति।

20. इससे निष्कर्ष निकलता है कि जन्म, आत्मा, शरीर,  ज्ञान, आचरण, कर्म और वेद-वेदांग मनुष्य को ब्राह्मण नहीं बनाते। इनमें से एक भी मनुष्य को ब्राह्मणत्व का दर्जा देने में सक्षम नहीं है।

XXI. अन्यच्च भवतोक्तम्। इह शूद्राणां प्रवज्या न विधीयते। ब्राह्मणशुश्रूषैव तेषां धर्मों विधीयते। चतुर्षु वर्णेष्वन्ते वचनात्तेनीचा इति।

21. अन्यत्र ऐसा भी कहा गया कि शूद्र मुक्ति के अधिकारी नहीं हैं। उन्हें प्रवज्या नहीं दी जा सकती। ब्राह्मणों की सेवा करना ही शूद्रों का एकल कर्तव्य बताया गया है। चारों वर्णों में जिस प्रकार शूद्र का नाम सबसे नीचे आया है, समाज में भी वे सबसे निचले स्तर पर आते हैं।

XXII. यद्येवमिन्द्रोऽपि नीचः स्यात्। ‘श्वयुवमघोनामतद्धिते’ इति सूत्रवचनात्। श्वा इति कुक्कुरः। युवा इति पुरुषः। मघवा इति सुरेंन्द्रः। तयोःश्वपुरुषयोरिन्द्र एव नीचः स्यात्। न चैतद् दृष्टं। किं हि वचनमात्रेण दोषो भवति। तथा च। उमामहेश्वरौ दन्तौष्ठमित्यपि लोके प्रयुज्जते। न च दन्ताः प्रागुत्पन्नाः उमा वा। केवलं वर्षसमासमात्रं क्रियते। ब्रह्मक्षत्र विट्शूद्रा इति। तस्माद्या भवदीय प्रतिज्ञा ब्राह्मणशूद्रश्रुषैव तेषां धर्मो, (सा) न भवति।

22. उक्त आधार पर यदि शूद्र सबसे नीचे हैं तो देवराज इंद्र भी नीच हैं। पाणिनी नें ‘श्वयुवमघोनामतद्धिते’ सूत्र का उल्लेख किया है, जिसमें श्वान का अर्थ है कुत्ता, युवा यानी पुरुष और मघवा या मेघ का अभिप्रायः इंद्र से है। यदि उक्त कसौटी को मान लिया जाए तो श्वान यानी कुत्ता जो इस सूत्र में सबसे पहले स्थान पर आया है, उसे इंद्र और पुरुष दोनों से श्रेष्ठतर होना चाहिए। अंत में स्थित होने के कारण इंद्र को सबसे नीच। लेकिन ऐसा तो नजर नहीं आता। क्या किसी को इसलिए नीच या कमतर  मान लेना उचित होगा कि उसका उल्लेख श्रेणीक्रम में सबसे बाद में आया है। प्रत्येक भाषा में संयुक्त और मिश्रित शब्द आते हैं। दंतोष्ट समास में दांत होठों से श्रेष्ठतर हैं। ‘उमा-महेश’ जैसे सामासिक शब्द का यह अभिप्रायः होगा कि पार्वती शिव से श्रेष्ठ है? ‘ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र’ तो शब्दक्रम मात्र है। इसके आधार पर किसी शूद्र को चाहे वह कितना ही सज्जन क्यों न हो, ब्राह्मण की तुलना में नीच और दुर्जन मान लेना क्या मूर्खता की हद नहीं है।

इसलिए यह दावा कि ‘ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र’ में शूद्र सबसे अंत में आया है, इसलिए उसका कर्तव्य ब्राह्मणों की सेवा करना हैं—उचित नहीं है।

XXIII. किं चानिश्तिऽयं ब्राह्मणप्रसंग। उक्तं हि मानवे धर्मः।

वृषलीफेनपीतस्य निःश्वासोपहतस्य च

तत्रैव च प्रसूतस्य निष्कृतिर्नोपलभ्यते।19।

शूद्रीहस्तेन यो भुंक्ते मासमेकं निरन्तरम्

जीवमानो भवेच्छूद्रो मृतः श्वानश्च जायते।20।

शूद्रीपरिवृतो विप्रः शूद्री च गृहमेधिनी

वर्जितः पितृदेवेन रीरवं सोऽधिगच्छति।21।

23. गंभीरतापूर्वक विचार किया जाए तो मनु के धर्मशास्त्र की कसौटी पर ब्राह्मणत्व टिकता ही नहीं है।

मनुस्मृति में लिखा है कि ब्राह्मण जो शूद्र स्त्री के साथ शयन करता है, उसे चूमता-आलिंगन करता है, उससे संतान उत्पन्न करता है—वह पतित हो जाता है। जिसका प्रायश्चित संभव ही नहीं है।19। और

वह जो शूद्र स्त्री के हाथों से बनाया गया भोजन  लगातार एक महीने तक खाता है, वह जीते-जी शूद्र हो जाता है। मृत्योपरांत उसे कुत्ते की योनि में जन्म मिलता है।20।

यही नहीं, कोई ब्राह्मण जो शूद्राओं से घिरा रहता है, जो शूद्र स्त्रियों का सान्निध्य ग्रहण करता है, शूद्रा के साथ विवाह करके उसे पत्नी या उपपत्नी(रखैल) के रूप में स्वीकार कर लेता है—वह पितरों और देवों की सेवा-भोग का अधिकार खो देता है। पितर और देवता उसके भोग को अस्वीकार कर देते हैं। ऐसा ब्राह्मण मृत्यु के बाद रौरव नर्क में जाकर कष्ट भोगता है।21।

XXIV.  अतोऽस्य वचनस्य प्रामाण्यादनियतोऽयं ब्राह्मण प्रसंगः।

24. मनुस्मृति से दिए गए इन सब प्रमाणों द्वारा स्पष्ट है कि किसी भी व्यक्ति या समूह को ब्राह्मणत्व से मंडित कर देना अथवा उन्हें ब्राह्मण का दर्जा दे देना उचित नहीं हैं।

XXV.   कि चान्यत्। शूद्रोऽपि ब्राह्मणों भवति। को हेतुः। इह हि मानवे धर्मेऽभिहितं:।

25. एक बात और भी। मनुस्मृति में कहा गया है कि धर्माचरण करते हुए कई शूद्र भी ब्राह्मणत्व को प्राप्त हो चुके हैं।

अरणी गर्भसम्भूतः कठो नाम महामुनिः

तपसा ब्राह्मणो जातस्तस्माज्जातिरकारणम्।22।

कैवर्तीगर्भसम्भूतो व्यासो नाम महामुनिः

तपसा ब्राह्मणो जातस्तस्माज्जातिरकारणम।23।

उर्वशीगर्भ सम्भूतो वसिष्ठोऽपि महामुनिः

तपसा ब्राह्मणो जातस्तस्माज्जातिरकारणम।24।

हरिणीगर्भ सम्भूत ऋष्यश्रृंगी महामुनिः

तपसा ब्राह्मणो जातस्तस्माज्जातिरकारणम।25।

चाण्डाली गर्भसम्भूतो विश्वामित्रो महामुनिः

तपसा ब्राह्मणो जातस्तस्माज्जातिरकारणम।26।

ताण्डूली गर्भसम्भूतो नारदो हि महामुनिः

तपसा ब्राह्मणो जातस्तस्माज्जातिरकारणम।27।

उदाहरण के लिए दो लकड़ियों की रगड़ से उत्पन्न काष्ठाग्नि से जन्मे कठ, अपने तप से ब्राह्मण बने और महान ऋषि कहलाए—इसलिए जन्म ब्राह्मणत्व का कारण नहीं है। मछुआरे की बेटी के गर्भ से पैदा हुए व्यास भी अपने तप और स्वाध्याय के बल पर मुनि कहलाए। इसलिए जन्म ब्राह्मणत्व का कारण नहीं है। उर्वशी नामक अप्सरा के गर्भ से जन्मे वशिष्ठ अपने तप के बल पर ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए। अतएव जन्म ब्राह्मणत्व का आधार नहीं है। हरिणी के गर्भ से जन्मे ऋंगी ऋषि अपने तप के बल पर ही महान ऋषि बने, वहां भी जाति बाधक नहीं हुई। इसलिए जन्म ब्राह्मणत्व का कारण नहीं। चांडाल स्त्री के गर्भ से उत्पन्न विश्वामित्र एक महान ऋषि की गरिमा को प्राप्त हुए। केवल अपने तप के बल पर। इसलिए जन्म ब्राह्मणत्व का आधार नहीं। चावल की मदिरा बेचने वाली स्त्री के गर्भ से उत्पन्न नारद अपने तप के बल पर ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए। महान ऋषि कहलाए। इससे भी सिद्ध है कि जन्म ब्राह्मणत्व का आधार नहीं होता।22-27।

जितात्मा निष्प्रतिद्वन्द्वः पञ्च जित्वा यतेन्द्रियः।

तपसा ब्राह्मणो  जातो ब्रह्मचर्येण ब्राह्मणः।28।

न च ते ब्राह्मणीपुत्रास्ते च लोकस्य ब्राह्मणाः

शीलशौचमयं ब्रह्म तस्मात्कुलम कारणम्।29।

शीलं प्रधानं न कुलं प्रधानं कुलेन किं शीलविवर्जितेन

बहवो नरा नीचकुल प्रसूताः स्वर्ग गताः शीलमुपेत्य धीराः।30।

क्या अब भी नहीं समझ पाए कि जन्म ब्राह्मणत्व का आधार नहीं है? लोकप्रसिद्ध है कि जिसने भी खुद को जीत लिया वह यति और जितेंद्रिय कहलाया। जिसने तपस्या की वह तापस की गरिमा को प्राप्त हुआ। ब्राह्मण की औरस संतान होने से कोई ब्राह्मण नहीं बनता। जिसने ब्रह्मचर्य का पालन किया, वह ब्राह्मण बना। इससे साफ है कि जिसका जीवन शुद्ध और पवित्र है, जो सहनशील और सदा खुश दिखने वाला है वही सच्चा  ब्राह्मण है। इसके लिए जाति-कुल का कोई भी संबंध नहीं है। सिर्फ मनुष्य का सदाचरण और नैतिकता ही देखी जाती है। जो मनुष्य नैतिक स्तर पर पतित है, जाति या वंश का गौरव उसे क्या दे सकता है! दूसरी ओर शील-सदाचार से युक्त नीतिवान मनुष्य नीच कुल से उत्पन्न होने के बावजूद ब्राह्मणत्व को प्राप्त कर स्वर्ग पहुंचे हैं। साफ है कि व्यक्ति का जन्म उसके ब्राह्मण होने का प्रमाण नहीं है।

XXVI. के पुनस्ते कठव्यासवसिष्ठ ऋष्यश्रृंगविश्वामित्र प्रभृतयो ब्रह्मर्षयो नीचकुल प्रसूतास्ते च लोकस्य  ब्राह्मणाः। तस्मादस्य वचनस्य प्रामाण्याद् प्यनियतोऽयं  ब्राह्मणप्रसंग इति, शूद्रकुलोऽपि  ब्राह्मणो भवति।

26. कठ, व्यास, वशिष्ठ, विश्वामित्र और ऋंगी  जैसे ऋषि यद्यपि शूद्रकुल में जन्मे थे। तथापि विश्व में उनकी ख्याति ब्राह्मण के रूप में ही है।  इन प्रमाणों के आधार पर सिर्फ ब्राह्मणकुलोत्पन्न व्यक्ति को ब्राह्मण मान लेना प्रमाणित नहीं है। शूद्र कुल या शूद्र माता-पिता की संतान होकर भी मनुष्य ब्राह्मणत्व को प्राप्त करता आया है।

XXVII. किं चाप्यन्द् भवदीय मतंः

मुखतो ब्राह्मणो जातो ब्राहुभ्यां क्षत्रियस्तस्था

ऊरुभ्यां वैश्यः संजातः पदुभ्यां शूद्रक एव च।31।

  • अतएव आपका यह मत कि ब्राह्मण का जन्म परमपुरुष ब्रह्मा के मुंह से हुआ, क्षत्रिय का भुजाओं, वैश्य का उदर से और शूद्र का पैरों से हुआ है—कहीं प्रमाणित नहीं होता।31।

XXVIII. अत्रोच्यते। ब्राह्मणा बहवो, न ज्ञायन्ते कुतो मुखतो जाता ब्राह्मणा इति। इह हि कैवर्तरजकचण्डालकुलेष्वपि ब्राह्मणाः सन्ति। तेषामपि चूडाकरणमुंञ्जदण्डकाष्ठादिभि संस्काराः क्रियन्ते। तेषामपि ब्राह्मणासंज्ञा क्रियते। तस्माद् ब्राह्मणघत्क्षत्रिया दयोऽपि। इति पश्याम एकवर्णो, नास्ति चातुर्वर्ण्यमिति।

28. हम देखते हैं कि ब्राह्मणों में अनेक भेद हैं। उनमें जो ब्राह्मण ब्रह्मा से मुख से जन्मे हैं, वे कहां है—यह पता ही नहीं चलता। यहां तक कि केवट, रजक, चंडाल कुलोत्पन्न ब्राह्मण भी यहां हैं। ब्राह्मणोचित पुण्यानुष्ठान यथा मूंज से आहूति देना, यज्ञोपवीत धारण कराना, इनके लिए भी संपन्न किए जाते हैं। उन सभी को ब्राह्मण का दर्जा प्राप्त है। यह क्षत्रिय तथा वैश्य के बारे में भी उतना ही सत्य है।

इससे प्रमाणित होता है कि मनुष्यों के चार वर्ण(जातियां) न होकर सिर्फ एक ही जाति है।

XXIX. अपि च। एकपुरुषोत्पन्नानां कथं चातुर्वर्ण्यम्। इह कश्चिद्देवदत्त एकस्यां स्त्रियां चतुरः पुत्राञ्जनयति। न च र्तेषां वणभेदोऽस्ति। अयं ब्राह्मणोऽयं क्षत्रियोऽयं, वैश्योऽयं शूद्र इति। कस्मात एकपितृकत्वाद्। एवं ब्राह्मणदीनां कथं चातुर्वर्ण्यम्।

29. पुनश्च! एक ही व्यक्ति(यथा ब्राह्मण) द्वारा उत्पन्न संतान की चार जातियां भला कैसे संभव हैं। एक व्यक्ति, मान लीजिए उसका नाम देवदत्त है की एक पत्नी से जन्मे चार पुत्र हैं। उन पुत्रों की अलग-अलग जातियां नहीं हो सकतीं। ऐसा नहीं है कि उन चारों में से आप एक को ब्राह्मण, दूसरे को क्षत्रिय, तीसरे को वैश्य और चौथे को शूद्र मान लें। क्यों? एक ही पिता की संतान होने के कारण क्या ऐसा विभाजन तर्कसंगत है। फिर एक ही कथित परमपुरुष(ब्राह्मण) से जन्मी संतानों की शारीरिक बनावट हाथ, पैर, नाक, कान आदि में कोई भेद न होने के कारण हम उनमें एक जैसी समानता पाते हैं। फिर उनमें ब्राह्मण, शूद्रादि वर्णभेद कैसे  संभव है।

XXX. इह हि गोहस्त्यश्वमृगसिंहव्याघ्रादीनां पदविशेषो दृष्टः। गोपदमिदं हस्तिपदमिदम्श्वपदमिदं सिंहपदमिदं व्याघ्रपदमिदमिति। न च ब्राह्मणादीनां ब्राह्मणपदमिदं क्षत्रियपदमिदं वैश्यपदमिदं शूद्रपदमिदमिति। अतः पदविशेषाभावादिपि पश्याम एक वर्गो, नास्ति चातुर्वर्ण्यमिति।

30. संसार में गाय, हाथी, मृग, घोड़े, सिंह, व्याघ्र आदि पशुओं के हाथ-पैर भिन्न-भिन्न होते हैं। इससे उनकी अलग जाति की पहचान सुनिश्चित हो जाती है। यथा गाय की बनावट अलग है, हाथी की अलग है, अश्व की इस प्रकार की है, हरिण की अमुक प्रकार की है, यह सिंह की हैं और वह अमुक पशु की प्रजाति की। इस भेद के आधार पर ही उनकी भिन्न पहचान संभव है। लेकिन ब्राह्मणादि चार वर्णों के बारे में यह बात सच नहीं है। वहां व्यक्ति के शरीर की बनावट से उसकी जाति का अनुमान लगा पाना असंभव है। न ही शरीर शारीरिक अंगों की बनावट के आधार पर मनुष्य को ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्रादि में बांटा जा सकता है।

इस तरह शरीर की बनावट के आधार पर, मानव शरीर के अवयवों नाक, कान, आंख आदि में अंतर न होने के कारण, हम मनुष्य में केवल एक ही जाति को पाते हैं, चार नहीं।

XXXI. इह गोमहिषाश्वकुञ्जरखरवानरछागैडकादीनां भगलिंगवर्णसंस्थानमलमूत्रगंधध्वनि विशेषो दृष्टः। न तु ब्राह्मणक्षत्रिया दीनाम् अतोऽप्यविशेषादेक एव वर्ण इति।

31. हम दुनिया में मौजूद गाय, भैंस, घोड़े, हाथी, गधा, बंदर, बकरी, भेड़ आदि की शारीरिक संरचना में भेद पाते हैं। शारीरिक अंगों के आधार पर उनकी प्रजाति सहित, नर और मादा की पहचान भी की जा सकती है। मल-मूत्र, आवाज का वैभिन्न्य को भी परखा जा सकता है। क्षत्रिय, ब्राह्मण, शूद्रादि के मामले में ऐसा भेद कहीं नहीं दिखा।  पशु-पक्षियों से अलग मनुष्य को एक ही चीज अलग करती है, वह है उसकी शारीरिक रचना, जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि के आधार पर कोई अंतर नहीं दिखता। तदनुसार मनुष्य की केवल एक ही जाति है।

XXXII. अपि च। यथा हंसपारावतशुककोकिलशिखण्डि प्रभृतीनां रूपवर्णलोमतुण्डविशेषो दृष्ट, न तथा ब्राह्मणादीनाम्। अतोप्यविशेषादेक एव वर्ण इति।

32.  और जैसे कि हम हंस, मोर, तोता, कोकिल, कबूतर आदि की शारीरिक संरचना, उनकी चौंच, पंखों आदि में भेद पाते हैं, इस तरह का कोई भी भेद ब्राह्मणादि चारों वर्णों के मनुष्यों में खोज पाना असंभव है। इस तरह का कोई भेद न होने के कारण भी मनुष्य की सिर्फ एक ही जाति है, वह है मनुष्य।

XXXIII. यथा वटबकुलपलाशाशोकतमालनागकेशर शिरीषचम्पकप्रभृतीदनां वृक्षाणां विशेषो दृश्यते, यदुत दण्डततश्च, पत्रततश्च, पुष्पततश्च, फलततश्च त्वगस्थिबीजरसगन्धतश्च, न तथा ब्राह्मणक्षत्रियविट्शूद्राणामंग, प्रत्यंगविशेषो न च त्वङ्प्रत्यङ्गविशेषो च त्वङमांसशोणितास्थिशुक्रमलवर्णसंस्थानविशेषणं नापि प्रसवविशेषो दृश्यते। ततोऽप्यविशेषादेक एव वर्णो भवति।

33. विभिन्न वृक्षों यथा वट, बकुल, पलाश, अशोक, तमाल, नागकेशर, शिरिस, चंपकादि वृक्ष, लता आदि के पत्तों, फलों, छिलकों, बीज, रस, गंध आदि में भेद होता है, वे सभी अलग-अलग प्रकार के हाते हैं—इस आधार पर उन सबको अलग-अलग प्रजाति का कहा जाना स्वाभाविक है। पर शूद्र, क्षत्रिय, वैश्यादि वर्णों के मनुष्यों में इस प्रकार का कोई भेद नहीं होता। फिर उन्हें अलग-अलग कहा जाना कैसे संभव है? ये चारों वर्णों के लोग अपनी आंतरिक और बाहरी शरीर रचना में एक ही प्रजाति के हैं। हड्डी, मांस, रक्त, शारीरिक अंग-उपांग, इंद्रियों तथा उनके उपयोग आदि लक्षणों के आधार पर उनमें कोई अंतर नहीं है। इसलिए उन्हें चार वर्णों में कैसे बांटा जा सकता है?

XXXIV. अपि भो ब्राह्मण सुखदुःखएवजीवितबुद्धि व्यापार-व्यवहारमरणोत्पत्ति भयमैथुनोषचार समत्तया नास्त्येव विशेषो ब्राह्मणादीनाम्।

34. पुनश्चः मुझे बताओ कि क्या ब्राह्मण की सुख-दुख, हर्ष-शोक आदि अनुभव करने की क्षमता क्षत्रिय-वैश्य शूद्रादि से भिन्न होती है। क्या ब्राह्मण भी बाकी लोगों के समान जीवन नहीं जीते। क्या दूसरों की तरह वे भी मृत्यु को प्राप्त नहीं होते? क्या वे बुद्धि कर्म, अथवा उनके परिणामों से मुक्त होते हैं, जन्म के समय, भय, मैथुन, आशा से क्या वे भी ऐसे ही प्रभावित नहीं होते जैसे बाकी वर्णों के लोग। यदि इन सब मामलों में ब्राह्मण तथा शेष वर्णों में कोई अंतर नहीं है, तो मानना पड़ेगा कि वे सभी एक हैं।

XXXV.  इदं चावगभ्यतां। यथैकवृक्षोत्पन्नानां फलानां नास्ति वर्णभेद उदुम्बरपणसफलवद्। उदुम्बरस्य हि पणसस्य च फलानि कानिचित् शाखातो भवन्ति, कानिचिद् दण्डतः, कानिचित्स्कन्धतः, कानिचिन्मूलतः। न च तेषां भेदोऽस्तीदं ब्राह्मणाफलमिदं क्षत्रियफलमिदं वैश्यफलमिदं शूद्रफलमिति। एकवृक्षोत्पन्नत्वाद्। एवं नराणामपि नास्ति भेदः। एकपुरुषोत्पन्नत्वाद्।

35. जिस प्रकार गूलर और कटहल के वृक्षों की टहनी, तना, जोड़, जड़ आदि में फल लगते हैं।  वे फल चाहे टहनी पर लगें, तने पर लगें, या फिर जड़ और जोड़ पर लगें—अपने रंग, आकृति, स्पर्श  आदि की दृष्टि से सब एक समान होते हैं। उन फलों को एक वृक्ष का उत्पाद माना जाता है। उन्हें अलग-अलग जातियों की पहचान नहीं दी जाती। गूलर के वृक्ष के सभी हिस्सों पर फल लगता है। तो क्या जो फल टहनी पर लगा है उसे ब्राह्मण, तने पर लगने वाले को क्षत्रिय या वैश्य और सबसे नीचे लगने वाले फल को शूद्र गूलर कहना चाहिए। जैसे एक वृक्ष पर लगे सभी फल समान होते हैं, वैसे ही सभी मनुष्य भी समान होते हैं। एक पिता के पुत्रों की भांति उनमें कोई अंतर नहीं होता। अतएव  ब्राह्मण-शूद्रादि का भेद करना वृथा है।

XXXVI. अन्यच्च दूषणं भवति। यदि मुखतो जातो भवति ब्राह्मणो ब्राह्मण्याः कुत उत्पत्तिः? मुखादेवेति चेद्, हन्त तर्हि भवतां भगिनीप्रसंगस्यात्। तथा गम्यागम्यं त सम्भाव्यते। तच्च लोकेऽत्यन्तविरुद्धम् तस्मादनियतं  ब्राह्मण्यम्।

36. आपके इस कथन में एक और दोष है। यदि  ब्राह्मण की उत्पत्ति परमपुरुष के मुख से हुई थी तो  ब्राह्मणी की कहां से हुई? निस्संदेह वह भी मुख से ही होगी। अरे! यदि यही सत्य है तो दोनों भाई-बहन हुए।। ऐसे में क्या आप उनके बीच देह संबंध की वैधता-अवैधता पर विचार नहीं करेंगे! उनका संबंध लोकाचार के सर्वथा विरुद्ध माना जाएगा। अतएव किसी भी व्यक्ति का ब्राह्मणत्व अनिश्चित और असंभावित है।

XXXVII. क्रिया-विशेषेण खलु चतुर्वर्णव्यवस्था क्रियते। तथा च युधिष्ठिराध्येषितेन वैशम्पायनेनाभिहितं क्रियाविशेषतश्चातुर्वर्ण्यमितिः।

37. वर्ण-व्यवस्था का विधान कर्म के अनुसार किया गया है। युधिष्ठिर ने जब वैशम्पायन से पूछा तो उन्होंने भी यही उत्तर दिया था—‘‘वर्ण-व्यवस्था की रचना समाज में श्रम के बंटवारे की खातिर की गई थी.’’

पाण्डोस्तु विश्रतुः पुत्र: स व नाम्ना युधिष्ठिरः

वैशम्पायनमागम्य प्राञ्जलिः परिपृच्छति।32।

के च ते ब्राह्मणाः प्रोक्ताः किं वा ब्राह्मणलक्षणम्

एतदिच्छामि भी ज्ञातुं तद्भवान व्याकरोतु मे।33।

लोकप्रसिद्ध पांडुपुत्र युधिष्ठिर वैशम्पायन के पास पहुंचे। हाथ जोड़कर उनकी प्रणति की। तदनंतर बोले।32।

ब्राह्मण किसे कहते हैं? किन लक्षणों से कोई व्यक्ति  ब्राह्मण बनता है। यह मैं जानना चाहता हूं। कृपया मेरी जिज्ञासा को शांत करें।।33।

वैशम्पायन उवाच :

क्षान्त्यादिभिर्गुणैर्युक्तस्त्यक्त दण्डो निरामिषः

न हन्ति सर्वभूतानि प्रथमं ब्रह्मलक्षणम्।34।

यदा  सर्वं परद्रव्यं पथि वा यदि वा गृहे

अदत्तं नैव गृह्णाति द्वितीयं ब्रह्मलक्षणम्।35।

त्यक्तवा क्रूरस्वभावं तु निर्ममो निष्परिग्रहः

मुक्तश्चरति यो नित्य तृतीयं ब्रह्मलक्षणम्।36।

देवमानुष नारीणां तिर्यग्योनिगतेष्वपि

मैंथुनं हि सदा त्यक्तं चतुर्थ ब्रह्मलक्षणम्।37।

सत्यं शौचं दया शौचं शौचमिन्द्रियनिग्रहः

सर्वभूत दया शौचं तपः शौचञ्च पञ्चमम्।38।

पञ्चचलक्षणमसम्पन्नः ईदृशो यो भवेद् द्विजः

तमहं ब्राह्मणं ब्रूयां शेषाः शूद्रा युधिष्ठिर।39।

न कुलेन न जात्या वा क्रियाभिर्ब्राह्मणो भवेत्

चाण्डालोऽपि हि वृत्तस्थो ब्राह्मणः स युधिष्ठिर।40।

युधिष्ठिर का प्रश्न सुनने के पश्चात वैशम्पायन बोले—

हे युधिष्ठिर! ऐसा मनुष्य जो क्षमा-शांति से युक्त शीलवान और गुणवान है, जिसने शस्त्र का परित्याग कर दिया है, जो मांस भक्षण छोड़ चुका है। जो किसी की भी हत्या नहीं करता—यह ब्राह्मणत्व का पहला लक्षण है।34।

चाहे वह घर में हो या मार्ग में पड़ी हो, जो दूसरे की वस्तु किसी भी अवस्था में बिना दिए ग्रहण नहीं करता, यह ब्राह्मण होने का दूसरा लक्षण है।35।

वह जो निस्स्वार्थ है, किसी भी प्रकार की क्रूरता से सर्वथा मुक्त और दयावान है, जो निष्परिग्रही होकर सभी प्रकार के प्रलोभनों से मुक्त होकर विचरण करता है, उसे ब्राह्मणत्व के तीसरे लक्षण से युक्त मानना चाहिए। 36।

वह जो देव-मनुष्य-नारी किसी भी योनि में होते हुए, मैथुन की इच्छा से सर्वथा मुक्त हो चुका है, यह  ब्राह्मण होने का चौथा लक्षण है।37।

ऐसा मनुष्य जो सत्य को पवित्र मानता है, करुणा को पवित्र मानता है, जिसके लिए इंद्रिय संयम पवित्रता है, जिसके लिए प्राणिमात्र के प्रति करुणाभाव होना ही पवित्रता है, वह  ब्राह्मणत्व के पांचवे लक्षण से युक्त है।38।

हे युधिष्ठिर जिस व्यक्ति में भी ये पांचों लक्षण हैं, मैं बस उसी को  ब्राह्मण मानता हूं। मेरी दृष्टि में अन्य सभी शूद्र हैं।39।

जन्म से, कुल से, यज्ञादि कर्मकांडों के निष्पादन से कोई व्यक्ति ब्राह्मण नहीं बनता। यदि किसी चांडाल में भी उपर्युक्त पांचों विशेषताएं/लक्षण हैं, हे युधिष्ठिर उसे ब्राह्मण ही समझना चाहिए।40।

किं च भूयो वैशम्पायनेनोक्तम

एकवर्णमिदं पूर्वं विश्वमासीद् युधिष्ठिर

कर्म-क्रियाविशेषेण चातुर्वर्ण्यं प्रतिष्ठितम्।41।

सर्वे वै योनिजा मर्त्याः सर्वे मूत्रपुरीषिणः

एकेन्द्रियेन्द्रियार्थाश्च तस्माच्छीलगुणैर्द्विजाः।42।

शूद्रोपि शीलसम्पन्नो गुणवान ब्राह्मणो भवेत्

ब्राह्मणोऽपि क्रियाहीनः शूद्रात्प्रत्यवरो भवेत।43।

फिर वैशम्पायन ने इसकी व्याख्या करते हुए बताया—

‘हे युधिष्ठिर। प्राचीनकाल में समस्त संसार में मात्र एक ही वर्ण था। चार वर्णों की उत्पत्ति कर्मों और व्यवसायों की भिन्नता के कारण हुई है।41।

प्राणिमात्र की उत्पत्ति एक ही स्रोत से हुई है। सभी गर्भाशय से जन्मे हैं। सभी में मल-मूत्र जैसी गंदगियां हैं, सभी में समान इंद्रियां हैं उनका इंद्रिय-बोध भी एक जैसा होता है। ऐसे में कोई मनुष्य केवल श्रेष्ठ आचरण करके ही ब्राह्मणत्व प्राप्त कर सकता है।42।

यहां तक कि कोई शूद्र भी शील एवं सदाचार का अनुसरण करके  ब्राह्मण बन सकता है। यदि कोई  ब्राह्मण गुण-शील से हीन, स्वार्थी और परिग्रही है, जो क्रोधी, कामी और लालची है, वह शूद्र से भी गिरा हुआ है।43।

इदं च वैशम्पायन वाक्यम्

पञ्चेन्द्रियावर्णवं घोरं यदि शूद्रोऽपि तीर्णवान्

तस्मैं दानं प्रदातव्यमप्रमेयं युधिष्ठिर।44।

न जातिर्दृश्यते राजन गुणाः कल्याणकारकाः

जीवतं यस्यधर्मार्थे परार्थे यस्यजीवितम्

अहोरात्रं चरेत्क्षान्ति तं देवा ब्राह्मणं विदुः।45।

परित्यज्य गृहावासं ये स्थिता मोक्षकाङ् क्षिण:

कामेष्वसक्ताः कौन्तेय ब्राह्मणास्ते युधिष्ठिर।46।

अहिंसा निर्ममत्वं चा मतकृतस्य वर्जनम्

रागद्वेषनिवृत्तिश्च एतद् ब्राह्मणलक्षणम्।47।

क्षमा दया दमो दानं सत्यं शौचं स्मृतिर्घृणा

विद्याविज्ञानमास्तिक्यमेतद् ब्राह्मणलक्षणम्।48।

गायत्रीमात्र सारोऽपि वरं विप्रः सुयन्त्रितः

नायन्त्रितश्चतुर्वेदी सर्वाशी सर्वविक्रयी।49।

एकरात्रौषितस्यापि या गतिर्ब्रह्मचारिणः

न तत्क्रतुसहस्त्रेण प्राप्नुवन्ति युधिष्ठिरः।50।

पारगं सर्ववेदानां सर्वतीर्थाभिषेचनम्

मुक्तश्चरित यो धर्मं तमेव ब्राह्मणं विदुः।51।

यदा न कुरुते पापं सर्वभूतेषु दारुणम्

कायेन मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा।52।

अस्माभिरुक्तं यदिदं द्विजानां मोहं निहन्तुं हतबुद्धिकानाम्

गृह्रन्तु सन्तो यदिदं युक्तमेतन्मुञ्चन्त्वथायु क्तमिदं यदि स्यात्।53।

कृतिरियं सिद्धाचार्याश्वघोषणपादानामिति।शुभम्।

इससे आगे वैशम्पायन ने कहा है कि—

है युधिष्ठिर! यदि कोई शूद्र भी पांचों इंद्रियों के भीषण समुद्र को पार कर चुका है, अर्थात अपनी सभी इंद्रियों पर विजय हासिल कर चुका है तो उसे भी निस्सीम दानादि देकर सम्मानित करना चाहिए।44।

हे राजन्। मनुष्य की जाति नहीं देखी जाती। उसके गुण ही उसके श्रेष्ठत्व की पहचान हैं। सिर्फ वही महत्वपूर्ण हैं। ऐसा व्यक्ति जो परोपकारी जीवन जीता है, जो सदैव धैर्य-धृत्ति और क्षमा का अनुसरण करता है, ईश्वर की दृष्टि में वही श्रेष्ठ जन है।45।

हे कौन्तेय! जो सांसारिक आसक्ति से परे हो चुके हैं, जो सभी प्रकार के प्रलोभनों और तृष्णाओं से मुक्त होकर निर्वाण प्राप्ति की दिशा में अग्रसर हैं, वही ब्राह्मण कहलाने के अधिकारी हैं।46

पुनश्चः अहिंसा, स्वार्थरहित होना, शास्त्र-विरुद्ध कर्मों से सर्वथा विरत हो जाना, लालच, लोभ और घृणा से ऊपर उठ जाना ही ब्राह्मण की विशेषताएं हैं।47

सहिष्णुता, क्षमा, करुणा, इंद्रियनिग्रह, दान, सत्य, शुद्धता, पवित्रता को धारण करना, शास्त्र विरुद्ध आचरण न करना, ज्ञानवान होना—ये ब्राह्मण के लक्षण हैं।48।

यदि कोई व्यक्ति सिर्फ गायत्री मंत्र को ही आत्मसात् कर शील-संयम से युक्त जीवनयापन करता है, तो वह ब्राह्मण है। चारों वेदों का ज्ञाता होकर भी जो असंयमी, सर्वभक्षी, सर्वग्राही और प्रलोभनों में डूबा हुआ है—वह ब्राह्मण नहीं है।49।

कोई व्यक्ति ब्रह्मचारियों की गम्य अवस्था को इंद्रिय संयम द्वारा एक रात्रि के लिए भी प्राप्त कर लेता है तो उस अवस्था को यज्ञादि कर्म करते हुए, सहस्रों पशुओं की बलि देकर प्राप्त कर पाना भी संभव नहीं है।50।

ऐसा परमशील व्यक्ति जो सभी वेद-वेदांगों में प्रवीण है, जो अपने संभाषण द्वारा लोगों को पवित्र करने का सामर्थ्य रखता है, जो कर्मों से विरक्त न ही होता, लेकिन आसक्ति जिसे छू नहीं पाती, वही ब्राह्मण कहलाने योग्य है।51।

ऐसा परमशीलवान जो मन, वचन, कर्म से कभी भी हिंसा नहीं करता, वह ब्राह्मणत्व को प्राप्त कर पाता है।52।

हतबुद्धि और भटके हुए ब्राह्मणों के भ्रम को दूर करने के लिए हमने यहां जो भी कहा है, यदि वह मान्य और तर्कसम्मत है—तो सच्चरित व्यक्ति को चाहिए कि उसे स्वीकार करे। अन्यथा जाने दे।

सिद्धाचार्य अश्वघोष द्वारा विरचित। इति शुभम्।

कबीर और तुलसी : कौन ज्यादा प्रासंगिक

विशेष रुप से प्रदर्शित

डॉ. रामचंद्र शुक्ल का पूर्वाग्रह ही है जो उन्होंने ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में कबीर और तुलसी को एक ही समूह में रखा है। जबकि कबीर तुलसी, सूर, मीरा और रसखान जैसे व्यक्तिपरक भक्ति-भाव वाले कवि हरगिज नहीं हैं। उनकी अध्यात्म चेतना प्रखर है। वह सदैव नए सत्य की तलाश में रहती है। वे कहीं रहस्यवादी हैं, तो कहीं उच्छेदवादी। लोकहित की खातिर बड़ी से बड़ी सत्ता से टकरा जाने का साहस कबीर को अपने समय का विलक्षण कवि बनाता है। यही उन्हें अंतिम समय में काशी से मगहर प्रस्थान की हिम्मत देता है। शुक्लजी चाहते तो कबीर, तुलसी, पल्टूदास जैसे लोकवादी कवियों की अलग श्रेणी बना सकते थे। किंतु अव्वल तो लोकसत्ता को महत्व देना उनके संस्कार का हिस्सा नहीं है। दूसरे इससे उनके आदर्श कवि तुलसी की महिमा फीकी पड़ सकती थी। साहित्य का गुण मनोरंजन, संवेदनशीलता और सर्वकल्याण की भावना के अनुरूप पाठक के व्यक्तित्व का परिष्कार करना है। इसके अनुसार कबीर तुलसी की अपेक्षा बड़े सरोकारों वाले कवि हैं।  

अच्छी बात है कि अधिकांश विद्वान कबीर को तुलसी जैसा भक्त कवि न मानकर निर्गुण धारा का संत कवि मानते हैं। आखिर दोनों में अंतर क्या है? क्या इसी कसौटी पर दोनों के व्यक्तित्व की पड़ताल संभव है? भक्त हों या संत, दोनों ही अलौकिक शक्ति में भरोसा रखते हैं। दोनों मानते हैं कि सृष्टि का संचालन और नियंत्रण किसी परासत्ता के हाथों में हैं। संत कवि आमतौर पर उस शक्ति को निराकार मानते हैं, जबकि तुलसी सूर जैसे सगुण कवि साकार। अगर ऐसा है तो भी क्या फर्क पड़ता है? तुलसी ने तो उदारतापूर्वक कह भी दिया है, जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखि तिन तैसी। निर्गुण हो या सगुण, व्यक्ति का मन, जो पसंद को उसे पूजे! अपनाए!! साधना करे!!! पर क्या इतनी-सी ही बात है?

आगे बढ़ने से पहले उचित होगा कि ‘संत’ और ‘भक्त’ शब्दों के बारे में जान लिया जाए। दोनों ही शब्द संस्कृत साहित्य में आए हैं। प्रायः दोनों को समानधर्मा मान लिया जाता है। ‘भक्ति’ और ‘भजन’ दोनों शब्द ‘भज्’ धातु से बने हैं। इसका अर्थ है—‘सेवा करना’, ‘प्रेम के वशीभूत होकर अपने आराध्य के आगे समर्पित हो जाना’। उसके प्रति अटूट आस्था और विश्वास रखना। नारद भक्ति-सूत्र के अनुसार, ‘सा त्वस्मिन परमप्रेमरूपा’—‘भक्ति ईश्वर के प्रति प्रेमानुराग का प्रदर्शन करना’ है। श्रीमद्भागवद में नवधा भक्ति द्वारा उसके विभिन्न रूप या चरणों के बारे में बताया गया है, उसके अनुसार—

श्रवणं, कीर्तन, विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।

अर्चनं वंदनं, दास्यं, सख्यात्मानिवेदनम्।।

अर्थात श्रवण, कीर्तन, पूजा, नाम-स्मरण, पादसेवन, वंदन, अर्चन, दास्य-सख्य भाव से आत्मनिवेदन—इसी से भक्ति भाव सामने आ जाता है। भक्ति की पराकाष्ठा में भक्त अपने आराध्य को समर्पित हो जाता है। उसकी तलाश पूर्ण हो चुकी होती है। सिर्फ आराध्य को पाना शेष रह जाता है। भक्ति की पराकाष्टा में घर-परिवार, रिश्ते-नाते सब पीछे छूट जाते हैं। आस्था और विश्वास पर जोर दिया जाता है। तर्क अथवा संदेह के लिए उसमें कोई स्थान नहीं होता। इस तरह भक्ति ठेठ व्यक्तिपरक आयोजन है, जिसमें आत्मरति की भावना प्रधान होती है। जैसे-जैसे मनुष्य उसमें आगे बढ़ता है—सांसारिक रिश्ते-नाते, यहां तक कि लोक और लोककल्याण की भावना भी पीछे छूटती जाती है। जहां धर्म और उसके प्रति रूढ़ आस्था है, वहां भक्ति है। केवल हिंदू धर्म इसका अपवाद नहीं है। ईसाई धर्म में यीशु कहते हैं कि सभी को अपने पूरे दिल और दिमाग के साथ ईश्वर से प्यार करना चाहिए। यह सवाल करने पर पर कि हे स्वामी, धर्म में सबसे बड़ा विधान कौन-सा है? यीशु उत्तर देते हैं—‘अपने परमेश्वर यहोवा से, अपने सारे मन, प्राण और बुद्धि से प्रेम करना, यही सबसे बड़ी आज्ञा है।’(मत्ती 22/36/40)।

‘संत’ और ‘संतई’ में लोकोन्मुखता प्रधान होती है। ‘संत’ शब्द का प्रयोग सामान्यतः पवित्रात्मा, बुद्धिमान, परोपकारी, सज्जन और सदाचारी व्यक्ति के लिए किया जाता है। ऐसे व्यक्ति के लिए किया जाता है जो सांसारिक मोह-माया से परे, लोककल्याण में लीन रहता है। जो प्राणिमात्र का भला चाहता है। उसकी सारी साधना, तप परोपकार को ही समर्पित होते हैं। संत आत्ममुक्ति की साध तो रखता है, किंतु शेष दुनिया से संबंध तोड़कर नहीं। न ही उससे निर्लिप्त होकर रहता है। बल्कि संतई का स्तर के बढ़ने के साथ-साथ वह और अधिक उदार, और ज्यादा मानवीय तथा करुणामूलक होता जाता है। ‘संत’ का अंग्रेजी पर्याय, इसी से मिलता-जुलता शब्द Saint है, जिसका अर्थ है—पवित्र कर देना। संत के लिए आचरण पवित्र होता है। एक तरह से आदर्श की पराकाष्ठा पर स्थित माना जाता है, जिससे यह माना जाता कि उसमें वे  गुण और शक्तियां भी समा जाती हैं, जो ईश्वर में अभिकल्पित की जाती हैं। उसके पास आते ही मनुष्य का मन पवित्रताबोध से भर जाता है। पश्चिम में चमत्कार करने की शक्ति को संत का विशेष लक्षण माना गया है, तथापि यह आवश्यक नहीं है। कबीर के अनुसार जो निर्वैर और निष्कामी हो, विषय-वासनाओं से विरक्त रहता हो, वही संत है—‘निबैरी, निहकामता साईं सेती नेह। विशया सूं न्यारा रहे संतन का अंग सह।’

साफ है कि भक्ति में व्यक्तिपरक्ता है। प्रहलाद की भक्ति की प्रशंसा होती है। दृष्टांत के अनुसार रात-दिन की भक्ति के बाद वह अपने आराध्य को प्रसन्न करने में सफल होता है और ‘स्वर्ग में सबसे ऊंचा स्थान प्राप्त कर लेता है।’ ऐसी भक्ति से दुनिया को क्या मिला, इसकी न तो भक्त को चिंता होती है, न ही उसके आराध्य को है। भक्त आमतौर पर संसार को मोह-माया मानकर उसे अपने लक्ष्य में बाधक मानता है, इसलिए वह इसे सुधारने पर कोई ध्यान नहीं देता। वह अपना सारा ध्यान कथित ‘परमपद’ को प्राप्त करने पर लगाए रहता है, ताकि बाद में उसे दुनिया में आना ही न पड़े। इस अंधी-दौड़ से उसे सचमुच कुछ हासिल होता है या नहीं, इस सवाल को छोड़ देते हैं। दूसरी ओर संत का पूरा ध्यान लोककल्याण पर निहित होता है। इसके लिए उपदेश से ज्यादा वह अपने आचरण से प्रेरणा जगाता है। वह परोपकार, दया, करुणा, समानता, बंधुता का प्रचार करता है, ताकि यह दुनिया बेहतर हो सके। संत कवि की कल्पना में उसके आराध्य, लोक यहां तक कि मुक्ति की कामना भी निहित हो सकती है। लेकिन भक्त-कवि की तरह उसकी यात्रा अकेली नहीं होती। बल्कि शेष समाज को साथ लेकर चलने की होती है।

अब सवाल है कि इनमें साहित्य किसके करीब है? या इनमें से कौन साहित्य को उसकी संपूर्ण मूल्यवत्ता के साथ अभिव्यक्ति दे सकता है? ‘भक्त’ और ‘संत’ के अंतर को समझ लेने के बाद इस प्रश्न का उत्तर दे पाना मुश्किल नहीं रह जाता। चूंकि भक्त कवि के लिए उसका आराध्य ही सब कुछ होता है, इसलिए वह जो लिखेगा उसकी प्रशंसा में ही लिखेगा। उसकी कविता बहुत कुछ चारणगीत की तरह होगी, जिसमें दोहराव और अतिश्योक्तियां स्वाभाविक है। जैसे चारण और भाट अपने आश्रयदाताओं की प्रशस्ति में लिखते-गाते थे, भक्त कवि अपने अलौकिक आराध्य की प्रशस्ति में लेखन करेगा। तुलसी का संपूर्ण साहित्य, रामचरितमानस से लेकर, कवितावली और विनयपत्रिका तक इसके अलावा क्या है? चूंकि इन कृतियों का संबंध धर्म-विशेष से है इसलिए हम इन्हें ज्यादा से ज्यादा  प्रचार-साहित्य कह सकते हैं।

तुलसी और मानस के प्रशंसक उनकी प्रशंसा में अकसर कहते हैं कि तुलसी ने रामचरित मानस में सामाजिक आदर्श को सामने रखा है। कुछ इससे भी आगे बढ़कर राम को आदर्श राजा दर्जा देकर रामराज्य का गुणगान करने लगते हैं। रामायण के आदर्श क्या हैं? पूछो तो तत्काल कह दिया जाता है कि रामायण हमारे सामने लक्ष्मण जैसे आज्ञाकारी भाई, भरत जैसे त्यागी, राम जैसे पुत्र, कौशल्या जैसी मां और सीता जैसी पत्नी का आदर्श सामने रखती है। थोड़ा आगे बढ़ें तो हनुमान जैसे भक्त और विभीषण जैसे मित्र इस सूची को और आगे बढ़ा देते हैं। यहां हम इन पात्रों के चरित्र का स्वतंत्र विश्लेषण न भी करें, तो भी यह मानना ही पड़ेगा कि जिन्हें रामचरितमानस में ‘आदर्श’ के रूप में दर्शाया गया है, असल में वे पारिवारिक या दरबारी आदर्श हैं। समाज में मनुष्य की क्या भूमिका होनी चाहिए? और समाज का अपनी इकाइयों के प्रति कैसा व्यवहार होना चाहिए? यहां तक कि एक पड़ोसी का दूसरे पड़ोसी के प्रति कैसा व्यवहार होना चाहिए—इस बारे में ‘मानस’ हमें कुछ नहीं बताता। वह ‘रामराज’ को आदर्श कहकर महिमामंडित करता है। मगर प्रजा के अधिकारों, उसकी इच्छा को लेकर उसमें कोई टिप्पणी नहीं है। रामराज्य को कल्याणकारी मान भी लिया जाए, तो भी इतना साफ है कि उसमें कल्याण(यदि वह कहीं है तो) तो ऊपर से थोपा हुआ प्रतीत होता है। प्रजा क्या चाहती है, राजा की इच्छा, महत्वाकांक्षा या जिद के आगे आगे उसका कोई मूल्य नहीं होता। एक शंबूक अपनी मर्जी से पढ़ना चाहता है तो राजा राम की तलवार उसकी गर्दन तराश देती है। तुलसी की वर्गदृष्टि, शूद्रों और स्त्रियों के प्रति उनके हेय विचारों पर तो चर्चा होती ही रहती है।  

समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व जैसे आधुनिक मूल्यों की बात तो जाने ही दीजिए। आस्था और भक्ति में इन मूल्यों को गैर-जरूरी और अप्रासंगिक मान लिया जाता है। निःशर्त समर्पण की शर्त के कारण, आत्मसम्मान और स्वाभिमान जैसे उदात्त मानवीय मूल्य भी भक्ति-मार्ग में बाधक मान लिए जाते हैं। कह सकते हैं कि भक्ति की पराकाष्ठा व्यक्ति को नितांत आत्मपरक बना देती है। इतना कि अपनी समूची प्रतिभा के बावजूद ‘भक्त’ अपने दैन्य और दास्यबोध से मुक्त नहीं हो पाता। इसे हम तुलसी की कविता में जगह-जगह रेखांकित कर सकते हैं। उनके जीवन का दैन्य(विडंबना) ही  उनकी कविता में समाया हुआ है। राम के प्रति अनन्य आस्था भी इसे कम नहीं कर पाती—

अगुण-अलायक-आलसी जानि अधम अनेरो

स्वारथ के साथिन्ह तज्यो तिजराको-सो टोटक, औचट उलटि न हेरो।। विनयपत्रिका, 272

(‘मुझे गुणहीन, नालायक, आलसी, नीच अथवा निकम्मा समझकर, स्वार्थी लोगों ने तिजारी के टोटके की तरह त्याग दिया है और भूलकर भी मेरी ओर नहीं देखा’); अथवा

तनु जन्यो कुटिल कीट ज्यों तज्यो मातु-पिताहूं।

काहे को रोष-दोष काहि धौं मेरे ही अभाग मोसां सकुचत छुई सब छाहूं। विनयपत्रिका, 275

(जैसे कुटिल कीड़ा(सांप) अपनी देह से उत्पन्न हुई केंचुली को छोड़ देता है; वैसे ही मेरे मातापिता ने मुझे जन्मते ही त्याग दिया था। मैं किस पर क्रोध करूं, और किसे दोष दूं? मेरे ही अभाग से सब मेरी छाया छूने से भी  सकुचाते हैं।’)

रामचरितमानस को पारिवारिक आदर्श(!) तक सीमित कर देना, कदाचित तुलसी की निजी कुंठा की ही देन था। उनके माता-पिता अत्यंत गरीब थे। भीख मांगकर गुजारा करते थे। ऊपर से, प्रतिकूल(!) नक्षत्र में जन्म लेने के कारण उन्होंने तुलसी को बचपन में त्याग दिया था। सो उनका बचपन घोर विपन्नता के बीच, ही बीता था—

जायो कुल मंगन बधावो न बजायो सुनि, भयो परिताप पाप जननी-जनक को।

बारे तें ललात बिललात द्वार-द्वार दीन जानत हौं चारि फल चारि ही चनक को।(कवितावली, उत्तर कांड, 73)

(मैंने भिखमंगों के कुल में जन्म लिया। मेरा जन्म सुनकर बधावा नहीं बजाया गया, मेरे मातापिता को अपने पाप पा परिताप हुआ। मैं बचपन से ही भूख से व्याकुल होकर दरिद्रता के कारण अन्न के लिए द्वारद्वार बिललाता फिरता था।)

‘जाति के, सुजाति के, कुजाति के पेटागि-बस,

खाए टूक सबके विदित बात दुनी सो।कवितावली, 72  

(पेट की आग बुझाने के लिए मैंने जाति, सुजाति और कुजाति सबके टुकड़े खाए हैं। यह बात समूचा संसार जानता है।)

तुलसी के इस दैन्य का मुख्य कारण है श्रम से विलगाव। माता-पिता की ओर से मिला परजीविता का संस्कार, जिसे जाति-व्यवस्था में अपने अटूट विश्वास के चलते वे लांघ ही नहीं पाते। कवि होने के कारण बस इतना कर पाते हैं कि जो भौतिक जीवन में जो याचनाभाव लोक के प्रति है, कविता में वह आराध्य के प्रति मुखर होने लगता है। जिसे उन्हीं जैसा परजीवी समाज भक्ति का आदर्श बताने लगता है।

दूसरी ओर कबीर हैं। जन्म उनका भी अज्ञात कुल में हुआ था। माता-पिता हिंदू थे या मुसलमान, कभी इसे लेकर चिंता में नहीं पड़े।  पालन-पोषण एक श्रम-शील आजीवक परिवार में हुआ था। सो अपने ही श्रम के भरोसे जीना, मेहनत करके खाना, उन्हें संस्कार में मिला। एक मेहनतकश किसान, मजदूर या शिल्पकार की तरह कबीर का हृदय भी साफ है। आत्मविश्वास से भरा हुआ। वे करघा चलाते-चलाते कविता रचते थे। उनके चारों ओर अपना समाज था, जिसका वे भला चाहते थे। इसलिए उनकी कविता में न तो किसी प्रकार का दैन्य झलकता है न ही परिताप की भावना। भावना के वशीभूत होकर कभी-कभार खुद को राम की बहुरिया भी कह जाते हैं। लेकिन जब उनका स्वाभिमान हुंकारता है तो उसे भी आड़े हाथ लेने लगते हैं—

हम बहनोई राम मोर सारा, हमहिं बाप हरि पुत्र हमारा

कहै कबीर हरी के बूता, राम रमैतैं कुकरि के पूता—बीजक, 100

कबीर की कविता तुलसी की कविता जैसी  चारणगीत नहीं है। न ही वे भक्ति के नाम पर खुद को और समाज को पंगु बनाने का संदेश देते हैं। कबीर को खुद पर भरोसा है। इसलिए ईश्वर से कुछ अपेक्षा ही नहीं रखते। अपनी संतई में इतने निरपेक्ष हैं कि ईश्वर का नाम भी बिसर जाए तो खुशी मनाने लगाते हैं—भला हुआ हरि बिसरे मोरे सिर से टली बला।

सवाल यह है कि इतना कुछ होते हुए भी भक्ति को आदर्श क्यों मान लिया गया? कारण है—धर्मसत्ता और राजसत्ता का स्वार्थपूर्ण गठजोड़ और जातिप्रथा। स्वार्थ के कारण ये दोनों ही वर्ग नहीं चाहते थे कि निचले वर्ग के लोग सवाल करना सीखें। इसलिए भक्ति को महिमा-मंडित किया। इससे उन्हें तो लाभ हुआ, लेकिन उनके कहने पर भक्ति की राह पर चल पड़ा जनसमुदाय कब पत्थर की मूर्ति को अपना ईश्वर, ब्राह्मण को अपना देवता और नाम-पाठ को ही ज्ञान समझने लगा, यह वह समझ ही नहीं पाया। आस्था और विश्वास को ही सबकुछ मान लेने से वह जान ही नहीं पाया कि भक्ति का जन्म अज्ञानता और ज्ञान के टोटमीकरण की प्रक्रिया के दौरान हुआ है। नाम रटते-रटते भक्त नाम को ही सब-कुछ मानने लगता है, ठीक ऐसे ही जैसे मूर्ति को पूजते-पूजते व्यक्ति पत्थर को ही देवता मान बैठता है। खुद तुलसी इसी मानसिकता के शिकार नजर आते हैं—

राम नाम को कल्पतरु कलि कल्यान निवास

जो सुमिरत भयो भाग ते तुलसी तुलसीदास

कबीर नाम जप को सिवाय प्रदर्शन के कुछ नहीं मानते। ऐसे दिखावा करने वालों को वे आड़े हाथों लेते हैं—

राम कहे जो जगत गति पावै, खांड कहे मुख मीठा

पावक कहे पांव जो डाहै, जल कहे त्रिषा बुझाई

बिनु देखु बिनु अरस-परस बिनु नाम लिए का होई

धन के कहे धनिक जो होवै, निरधन रहै न कोई

कुल मिलाकर भक्ति के आवरण जहां तुलसी नाम रटने तक सीमित हो जाते हैं, वहीं, कबीर की संतई उन्हें ज्ञान के स्वागत को सदैव तत्पर रहती है—‘संतो भई आई ग्यांन की आंधी… ’

यह अनायास नहीं है कि बीती कुछ शताब्दियों में  ‘भगत’ और ‘भगतजी’ जैसे संबोधन दलित और पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित कर दिए गए हैं। जबकि ब्राह्मण ने अपने लिए ‘पंडिज्जी’ संबोधन को सुरक्षित रखा हुआ है। कबीर इस षड़यंत्र का जगह-जगह पर्दाफाश करते हैं। उनकी कविता का यही गुण उसे युगप्रवर्त्तक और कालातीत बताता है, जबकि राम-राम रटते-रटते तुलसी(और उनके भक्त) कब जड़ हो जाते हैं, इसे वे स्वयं भी नहीं जान पाते।

ओमप्रकाश कश्यप

दक्षिण भारतीय संस्कृति में ब्राह्मणवाद विरोधी चेतना और पेरियार

विशेष रुप से प्रदर्शित

[बताया गया है कि छूआछूत को बनाने वाला ईश्वर है। यदि यह बात  सही है तो हमें सबसे उस ईश्वर को ही नष्ट कर देना चाहिए। यदि ईश्वर इस परंपरा से अनजान है तो उसका और भी जल्दी उच्छेद होना चाहिए। यदि वह इस अन्याय को रोकने या इससे रक्षा करने में असमर्थ है तो इस दुनिया में उसका कोई कोई काम नहीं है—पेरियार, कुदी अरासू 17 फरवरी, 1929] 

चीजें किस प्रकार दिमाग में बैठतीं या बैठा दी जाती हैं—इस बारे में प्रायः हमें पता नहीं चलता। जैसे कि लोककथाओं का एक सबक जिसे जाने-अनजाने उनके आरंभ में ही जोड़ दिया जाता था। शिकार, नौकरी अथवा किसी और काम से ‘परदेस’ जाने वाले कथानायक को घर-परिवार के बुजुर्ग समझाते—‘बेटा पूरब जाना, पश्चिम जाना, उत्तर दिशा तो खुशी-खुशी जाना, मगर दक्षिण में हरगिज न जाना।’ कहानियों के अनुसार दक्षिण में या तो कोई राक्षस रहता था अथवा डायन। कोई ऐसी खूबसूरत राजकुमारी भी हो सकती थी, जिसे प्राप्त करना आग के दरिया को पार करने जैसा हो। कहानियों में जो डर जाते या असफल रहते वे सफर से वापस नहीं लौटते थे। या यूं कहो कि उनकी कहानियां ही नहीं बनती थीं। जो व्यक्ति तमाम हिदायतों और बंदिशों को लांघकर साहस के साथ निषिद्ध लक्ष्य की ओर प्रस्थान कर; वहां से सकुशल लौट आता—वह कथानायक कहलाता था। दक्षिण की यात्रा आपदाओं को चुनौती देने की यात्रा थी। नायक बनने या यूं कहो कि नायक गढ़ने की यात्रा थी।

आखिर कौन-से दबाव थे कि ऐसी कहानियों में प्रायः दक्षिण दिशा को ही निषिद्ध बताया जाता था? कुछ लोग कह सकते हैं कि इसके पीछे लेखक-किस्सागो का उद्देश्य कहानी को रहस्यपूर्ण और रोचक बनाना होता था। मना करने के बावजूद नायक का दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान, उसके साहसी होने का प्रमाण था। लेकिन यदि यही उद्देश्य होता तो किस्सागो—कथानायक के नाम, स्थान की तरह, दिशा में भी मनचाहा परिवर्तन कर सकता था। दक्षिण के अलावा वह पूरब, पश्चिम या उत्तर को भी निषिद्ध बता सकता था। हमेशा एक ही दिशा क्यों? कुछ चतुर-सुजान कहेंगे कि वास्तुशास्त्र के अनुसार दक्षिण में यमराज का अधिष्ठान है। अगर ऐसा है तब भी हमारा मूल प्रश्न कायम रहता है कि यमराज ने अपने लिए; अथवा वास्तुशास्त्रियों ने यमराज के लिए दक्षिण दिशा को ही क्यों चुना था?

इसके लिए हमें मिथ-निर्माण की प्रक्रिया को समझना पड़ेगा। मिथों के निर्माण में पूरे समाज की भूमिका होती है। मगर उसे विशिष्ट चरित्र प्रदान करने, खास अवसरों से जोड़ने और मनमाना इस्तेमाल करने का काम समाज का अभिजन समुदाय करता है। यह भी सच है कि मिथ में आमजन का भरोसा ही उसे अभिजन समुदाय की निगाह में महत्वपूर्ण बनाता है। इसके पीछे उसकी नीयत खुद को दूसरों से अलग और खास दिखाने के लिए होती है। वह चाहता है कि उसके द्वारा छलपूर्वक कब्जाए गए अभिजात्यपन तथा विशेषाधिकारों को, लोग दैवीय अनुकंपा मान लें। मान लें कि समाज में उसकी हैसियत किसी षड्यंत्र अथवा दुरभिसंधि का परिणाम न होकर, विशिष्ट ईश्वरीय अनुकंपा है। दक्षिण को यमराज का अधिष्ठान घोषित करना, इसी सांस्कृतिक कूटनीति का हिस्सा है। इसी से जुड़ा एक सच गांव-बस्तियों में अछूतों और शूद्रों को दक्षिण में बसाया जाना भी है।

सवाल है कि दक्षिण दिशा ही क्यों? आखिर क्यों दक्षिण को राक्षस-राक्षसियों की दिशा बताया गया? क्यों यमराज को टिकने के लिए वही दिशा दी गई थी? क्यों शूद्रों और दलितों को दक्षिण दिशा तक सीमित कर दिया जाता है?

पेरियार के संघर्ष को समझने; या यूं कहो कि भारतीय समाज की जिस मानसिकता के विरुद्ध उन्हें संघर्ष करना पड़ा था; और जो इसकी अनेकानेक व्याधियों की वजह है—की पृष्ठभूमि को समझने के लिए—इन सबको जानना आवश्यक है। इसके लिए कुछ हजार वर्ष पहले के इतिहास में लौटना होगा। यह स्थापित तथ्य है कि करीब 12 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक में फैली सिंधु सभ्यता(3300-1750 ईस्वीपूर्व) अपनी समकालीन सभ्यताओं में सर्वाधिक उन्नत और समृद्ध नागरी सभ्यता थी। जलवायु परिवर्तन के कारण उस फली-फूली सभ्यता का अवसान काल आया तो उसके निवासी सुरक्षित ठिकानों की ओर पलायन करने लगे। 1500 ईस्वी पूर्व आर्य हमलावरों ने भारत में प्रवेश किया तो उसमें और भी तेजी आई। पलायन के दो प्रमुख रास्ते थे। पहला पंजाब के रास्ते मैदानी इलाकों में गंगा-यमुना के तराई क्षेत्र की ओर। इस ओर जो दल गए, उन्होंने तराई क्षेत्र में समृद्ध सभ्यता की नींव रखी जिसे गंगा-यमुनी सभ्यता कहते हैं। दूसरे दल राजस्थान, गुजरात, कोंकण प्रदेश से होते हुए दक्षिण दिशा में गए। और दक्षिण भारत में पहले से रह रहे आदिवासी कबीलों में घुल-मिल गए। कलाभ्र शासकों के सिक्कों पर प्राप्त लिपि संकेतों और सिंधु घाटी से प्राप्त लिपि संकेतों में गहरी समानता, दोनों को आपस में जोड़ती है।

कालांतर में गंगा-यमुना के तराई क्षेत्र की ओर गए सिंधुवासी कबीलों और आर्य कबीलों में समन्वय हुआ। वहां के अनार्य कबीलों ने आर्य संस्कृति के आगे करीब-करीब समर्पण कर दिया। जबकि दक्षिण जाकर बसे कबीलों ने अपनी पारंपरिक संस्कृति और उसके मूल्यों को बनाए रखा। उसके बाद लगभग एक सहस्राब्दी तक दक्षिण भारतीय सभ्यता, जो अपनी प्रकृति में अनार्य सभ्यता थी, और उत्तर-पश्चिमी सभ्यता एक-दूसरे से अनजान बनी रहीं। ईसा से छह-सात सौ वर्ष पहले, आर्यों को उस सभ्यता के बारे में पता तो उनकी पुरानी स्मृतियां ताजा होने लगीं। आर्यों की दृष्टि में वे वही अनार्य कबीले थे, जिन्होंने सिंधु उपत्यका में उनका मार्ग रोकने की कोशिश की थी। जो आर्य संस्कृति की श्रेष्ठता के मिथ को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं थे। इसी कुंठा और ईर्ष्या के चलते उन्होंने अपने गीतों में, अनार्य कबीलों को राक्षस, दैत्य, दानव आदि घोषित करना शुरू कर दिया। बाद में रचे संस्कृत ग्रंथों में भी यही प्रवृत्ति बनी रही।

ईसा-पूर्व चौथी-पांचवी शताब्दी में बौद्ध और जैन श्रमणों ने दक्षिण पहुंचना शुरू किया। व्यावहारिक नैतिकता पर आधारित इन दर्शनों का दक्षिण में खूब स्वागत किया गया। प्राचीन तमिल, बौद्ध एवं जैन दर्शन के समन्वय से वहां संगम साहित्य की नींव रखी गई। करीब दो सौ वर्ष बाद, बौद्ध धर्म-दर्शन के पराभव के दौर में ब्राह्मण भी वहां पहुंचे। अपने साथ वे जातीय भेदभाव से लबरेज अपनी संस्कृति को भी ले गए। वहां उन्होंने राजाओं और प्रभावशाली वर्गों को फुसलाना आरंभ कर दिया। नए-नए मिथकीय आख्यान गढ़कर उनका अवतारीकरण किया जाने लगा। अवतारीकरण की प्रक्रिया उन्हें राजसत्ता का नैसर्गिक उत्तराधिकारी बनाती थी। उसकी आड़ में मनमाने फैसले भी थोपे जा सकते थे। इस कारण लोग धीरे-धीरे उनके प्रभाव में आने लगे। ब्राह्मणों को खुश करने के लिए गांव के गांव दान किए जाने लगे। इससे उन लोगों के आगे आजीविका का संकट पैदा होने लगा, जो उन जमीनों पर खेती करते थे।

ब्राह्मणों का बढ़ता वर्चस्व, कभी मंदिर, यज्ञ तो कभी ब्राह्मणों को बसाने के लिए गांव के गांव दान देने से उपजा आक्रोश, महान कलाभ्र विद्रोह के रूप में सामने आया। कलाभ्र शूद्र-किसान और आदिवासी कबीले थे। तीसरी शताब्दी के आरंभ में उन्होंने पांड्य, चेर, पल्लव आदि ब्राह्मणवाद के रंग में रंग चुके शासकों पर हमला किया और उन्हें परास्त कर, कलाभ्र साम्राज्य की नींव डाली। पूरा तमिल प्रदेश, जिसमें आधुनिक केरल, तमिलनाडु के अलावा कर्नाटक और आंध्र प्रदेश का भी बड़ा हिस्सा शामिल था, कलाभ्र साम्राज्य की परिसीमा में आते थे। मंदिर, धर्मस्थान आदि के बहाने ब्राह्मणों को जो जमीनें दान में दी गई थीं, कलाभ्र शासकों ने उन्हें छीन लिया। राज्य के संरक्षण में होने वाले यज्ञ और बलिप्रथाएं समाप्त हो गईं। बौद्ध धर्म को पुनर्स्थापित किया गया।

कलाभ्र शासकों ने तीसरी शताब्दी से लेकर पांचवी शताब्दी तक दक्षिण पर राज्य किया। उतनी अवधि के बीच ब्राह्मणवाद वहां निस्तेज बना रहा। देखा जाए तो यही वह दौर था जब ब्राह्मण रामायण, महाभारत, गीता तथा पुराणादि ग्रंथों के लेखन-पुनर्लेखन में लगे थे। वेदों सहित सभी संस्कृत ग्रंथों में जमकर प्रक्षेपण किया जा रहा था। उत्तर भारत में राज्य के संरक्षण में ब्राह्मण धर्म खूब फलफूल रहा था। मनुस्मृति के विधान लागू होने के बाद शूद्रों-अतिशूद्रों से पढ़ने-लिखने सहित अन्यान्य का अधिकार छीन लिए गए थे। इससे ब्राह्मणों के वर्चस्व को चुनौती देने वाला कोई नहीं था। कलाभ्र शासकों के शासनकाल दक्षिण से ब्राह्मण धर्म के उखड़ने की प्रतिक्रिया, रामायण-महाभारत आदि के बहाने दक्षिण पर नकली विजयगीतों के रूप में हुई थी। चूंकि ब्राह्मण धर्म के दक्षिण प्रवेश से बहुत पहले बौद्ध और जैन धर्म वहां अपनी पैठ बना चुके थे, इसलिए रामायण जैसा काव्य जो उत्तर भारतीय संस्कृति की दक्षिण पर विजय दिखाता था, ब्राह्मणवादियों को मानसिक संतुष्टि देता था। रामायण और अन्यान्य पुराणों के माध्यम से, उन परिश्रमी और स्वाभिमानी लोगों को असुर, राक्षस आदि घोषित किया जा रहा था, जो दक्षिण में रहकर खुद को आर्य संस्कृति के प्रभाव से न केवल बचाए हुए थे, अपितु अच्छी-खासी, समृद्ध सभ्यता के निर्माता भी थे।

अनार्यों के प्रति आर्यों की नफरत के रामायण आदि ग्रंथों में कई आयाम हैं। जरा उस प्रसंग को याद कीजिए जब राम लंका जाने के लिए समुद्र से रास्ता मांगते हैं। समुद्र द्वारा अनसुनी करने पर अपना वाण तान लेते हैं। समुद्र हाजिर होकर वाण तूणीर में डालने की प्रार्थना करता है। राम के यह कहने पर कि संधान किया हुआ वाण वापस तूणीर में नहीं जा सकता, समुद्र वाण को उत्तर दिशा में द्रुमकुल्य की ओर छोड़ने का आग्रह करता है—

उत्तरेणावकाशोऽस्ति कश्चित् पुण्यतरो मम।

द्रुमकुल्य इति ख्यातो लोके ख्यातो यथा भवान्।।32।।

उग्रदर्शनं कर्माणो बहवस्तत्र दस्यवः।

आभीर प्रमुखाः पापाः पिवंति सलिलम् मम।।33।।

तैर्न तत्स्पर्शनं पापं सहेयं पाप कर्मभिः।

अमोघ क्रियतां रामोऽयं तत्र शरोत्तमः ।।34।।

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सागरस्य महात्मनः।

मुमोच तं शरं दीप्तं परं सागर दर्शनात्।।35।। वाल्मीकि रामायण, युद्धकांड, 22वां सर्ग।

गौर करने की बात यह है कि दक्षिण में रावण का ठिकाना है। हरण के बाद रावण सीता को वहीं लेकर गया है। वहां राक्षसों का वास है, समुद्र उनसे लंका की ओर शर-संधान करने का आग्रह नहीं करता, बल्कि उत्तर दिशा की ओर शर-संधान करने को कहता है, जहां आभीर, किरात, यवन आदि लोग रहते थे। बताता है कि ऐसे ‘पापी’ प्राणियों के स्पर्श से उसका जल अपवित्र हो जाता है। राम जैसे ब्राह्मण के कहने पर शंबूक की गर्दन तराश देते हैं, ठीक ऐसे ही बिना कुछ सोचे-समझे, समुद्र के कहने पर तीर को उसी की बताई दिशा में छोड़ देते हैं। ये अभीर, किरात वही लोग थे, जिन्होंने सिंधु घाटी में आर्यों को जोरदार टक्कर दी थी। ऋग्वेद में इस युद्ध को दासराज्ञ युद्ध; अर्थात दस राजाओं का युद्ध के रूप में दिखाया गया है। रामायण आदि ग्रंथों के माध्यम से, आर्यों-अनार्यों की राजनीतिक राजनीतिक प्रतिद्विंद्वता को, धार्मिक-सांस्कृतिक घृणा में बदल दिया जाता है। उपर्युक्त प्रसंग से यह भी पता चलता है कि छुआछूत की भावना, जिसके शूद्रों और अछूतों को सार्वजनिक तालाबों का जल पीने से रोक दिया जाता था, रामायण काल में ही पनप चुकी थी।

ईसापूर्व पहली-दूसरी शताब्दी में दक्षिण जाने वाले वैदिक संस्कृति के प्रचारक वहां के राजाओं और कुछ शीर्ष वर्गों को तो अपने प्रभाव में लेने में कामयाब रहे थे, लेकिन वहां की आम जनता, विशेष रूप से स्थानीय कबीले ब्राह्मण-संस्कृति के प्रभाव से मुक्त थे। उन्हें अपनी संस्कृति पर गर्व था। दोनों संस्कृतियों के संधि-स्थल, विंध्य के पठारों और जंगलों में, जब वे लोग मिलते तो टकराव की संभावनाएं बन ही जाती थीं। इस कारण दक्षिण को लेकर एक अजाना भय, ईर्ष्या उत्तर भारतीय संस्कृति के संरक्षक ब्राह्मणों के हृदय में समाया हुआ था। उत्तर भारत श्रेष्ठ है, दक्षिण भारत निकृष्ट, यह सोच तथा इससे उपजा डर लोककथाओं में दक्षिण-यात्रा के प्रति निषेधाज्ञा के रूप में सामने आया। चूंकि ब्राह्मणों के लिए असुरों, राक्षसों की तरह शूद्र और पंचम भी बाहरी थे, इसलिए गांव में उनके रहने के लिए दक्षिण दिशा सुनिश्चित की गई।

एक हजार ईस्वी के आसपास उत्तर भारत बाहरी हमलों का शिकार होने लगा। जबकि शंकराचार्य के नेतृत्व में दक्षिण, आठवीं शताब्दी में ही ब्राह्मण धर्म की केंद्र-स्थली बन चुका था। सो उत्तर भारत में भारी राजनीतिक उथल-पुथल के चलते, आने वाली शताब्दियों में दक्षिण, ब्राह्मण धर्म के लिए सुरक्षित ठिकाना बन गया। उस दौर में ब्राह्मणों को विशेषाधिकार दिए गए। वर्णाश्रम धर्म की पुनर्स्थापना की गई। राज्य की मदद से जाति-व्यवस्था को इतना मजबूत किया गया कि शूद्रातिशूद्र जातियां सांस तक न ले सकें। इसकी प्रतिक्रिया संत साहित्य के रूप में हुई। लेकिन कई कारणों से संत ब्राह्मण धर्म को वैसी चुनौती नहीं दे सके, जैसी उनसे अपेक्षित थी। उनके सारे सुधार कार्यक्रम धर्म के दायरे में थे, जो ब्राह्मणवादियों के सबसे सुरक्षित दायरा है।

ब्राह्मण धर्म को चुनौती उनीसवीं शताब्दी में उस समय मिलनी शुरू हुई जब औपनिवेशिक सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों के अंतर्गत शूद्रातिशूद्रों को पढ़ने-लिखने का अवसर मिला। तभी उन्हें अपनी सामाजिक परतंत्रता का अहसास हुआ। पता चला कि वे अंग्रेजों के अलावा ब्राह्मणों के भी गुलाम हैं। धर्म और जाति उन्हें परतंत्र रखने वाले ब्राह्मणी औजार हैं। वे छुआछूत के सुरक्षा-कवच भी हैं। आरंभ में सामाजिक मुक्ति की पहल के रूप में धर्मांतरण का सहारा लिया गया। लेकिन कुछ ही दशकों में यह साफ हो गया कि धर्म अपने आप में एक सत्ता है और किसी भी प्रकार की सत्ता के रहते, न तो मानवीय गरिमा की रक्षा हो सकती है। न मानव-मुक्ति के लक्ष्य को पाया जा सकता है। इस सोच के साथ दक्षिण की राजनीति में उभरे पेरियार ने सीधे ईश्वर की सत्ता को चुनौती दी। कहा कि सामाजिक आजादी प्राप्त करने के लिए द्रविड़ों को सबसे पहले ब्राह्मणों द्वारा गढ़े गए, ईश्वर और धर्म से मुक्त होना होगा। द्रविड़ों की समानता, स्वतंत्रता और आत्मसम्मान के लिए ऐसा करना जरूरी है।

1932 में वे श्रीलंका में बसे तमिलों के आमंत्रण पर वहां गए थे। वहां कोलंबो में दिए गए भाषण में उन्होंने कहा था कि आत्मसम्मान और मनुष्यता की स्थापना के लिए तमिलों को ईश्वर, धर्म और राष्ट्रवाद के मोह से बाहर निकल आना चाहिए(कुदी आरसु, 30 अक्टूबर, 1932)। उनका मानना था कि धर्म और ईश्वर मानव-प्रगति के सबसे बडे़ दुश्मन हैं। गौरतलब है कि ईश्वर और धर्म के औचित्य पर सवाल उठाने वाले, उन्हें मानव-मात्र की गरिमा, आत्मसम्मान, स्वतंत्रता और समानता के लिए हानिकारक मानने वाले पेरियार अकेले नहीं थे। पश्चिम में दो शताब्दी पहले ही ऐसे सवाल उठने लगे थे। धर्म की सत्ता शोषक की सत्ता है। वह शोषण को बढ़ावा देने वाली है, इस तथ्य को वहां बार-बार रेखांकित किया जा रहा था। मिखाइल बकुनिन का कहना था कि बाईबिल का ईश्वर—‘पक्के तौर पर सर्वाधिक ईर्ष्यालु, सबसे बकवास, सबसे ज्यादा क्रूर, सबसे अन्यायी, सबसे निरंकुश, सर्वाधिक खून का प्यासा, सबसे ईर्ष्यालु तथा मानवीय गरिमा एवं स्वतंत्रता के लिए सबसे डरावना और वैरभाव रखने वाला है। जबकि शैतान शाश्वत विद्रोही और पहला स्वतंत्र विचारक था।’(ईश्वर और राज्य, मिखाइल बकुनिन) 

हिंदू धर्म की आलोचना करते समय पेरियार रामायण, गीता और मनुस्मृति को निशाना बनाते हैं। राम, लक्ष्मण, सीता, दशरथ जैसे चरित्र जिन्हें हिंदू धर्म में ‘आदर्श’ के तौर पर पेश किया जाता रहा है, की चारित्रिक दुर्बलताओं को गिनाते हुए वे रावण को आदर्श चरित्र वाला और द्रविड़ों के महानायक के रूप में पेश करते हैं। वे एक-एक कर उन सभी हिंदू मिथों को निशाना बनाते हैं, जिनके माध्यम से ब्राह्मण हिंदू धर्म और उनकी आड़ में अपनी शताब्दियों से अपनी अधिसत्ता को बनाए हुए हैं। पेरियार की धर्म और जाति-संबंधी स्थापनाओं को पढ़ना, हिंदू धर्मशास्त्रों की विखंडनात्मक व्याख्या करने जैसा है। इसलिए वे धर्म की आड़ में राजनीति करने वालों को सबसे ज्यादा अखरते हैं।

2002 में उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री सुश्री मायावती आंबेडकर पार्क में पेरियार की मूर्ति की स्थापना कराना चाहती थीं। लेकिन भारतीय जनता पार्टी को यह कतई स्वीकार नहीं था। भाजपा के भारी विरोध के कारण उन्हें अपना इरादा बदलना पड़ा था। यही क्यों, 1980 में पेरियार के अपने राज्य तमिलनाडु के कांचीपुरम में पेरियार की मूर्ति की स्थापना की अनुमति देने से तत्कालीन मुख्यमंत्री एमजी रामाचंद्रन ने मना कर दिया था। उन्हें लगता था कि इससे कांची के शंकराचार्य नाराज हो सकते हैं। यह बात अलग है कि सरकार के फैसले के बाद विपक्षी दल द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने मद्रास उच्च न्यायालय में अपील की और अदालत की अनुमति के बाद, मूर्ति को स्थापित कर दिया गया। 

अच्छी बात यह है कि इन दिनों पेरियार के प्रति उत्तर भारतीयों का दृष्टिकोण बदल रहा है। उनकी स्वीकार्यता लगातार बढ़ती जा रही है। जो आने वाले वर्षों में बढ़ती ही जाएगी. विचारों को पकने, फैलने और और उन्हें क्रांति में ढलने में इतना समय तो लगता ही है.

ओमप्रकाश कश्यप

इंटरनेट लर्निंग : भारतीय परिदृश्य और नई शिक्षा नीति

विशेष रुप से प्रदर्शित

ओमप्रकाश कश्यप

‘दूर-शिक्षण’ यानी ‘ऑनलाइन शिक्षा’ अथवा ‘ई’लर्निंग’ प्रौद्योगिकीय विकास की देन है। एक लोकोपयोगी प्रौद्योगिकी में जितने गुण होने चाहिए, वे लगभग सभी इसमें मौजूद हैं। यह स्कूली शिक्षा से सस्ती हो सकती है। प्रयोगात्मक अवस्था में है, इसलिए हम इसके निरंतर बेहतर होने की उम्मीद कर सकते हैं। तकनीकी सुधार द्वारा इसे अधिकाधिक रचनात्मक, आकर्षक, संप्रेषणीय एवं प्रभावशाली बनाया जा सकता है। आज देश के विभिन्न हिस्सों में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रम में भारी अंतर है। यहां तक कि एक ही शहर में प्राइवेट तथा सरकारी स्कूलों में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रम का स्तर एक जैसा नहीं होता। शिक्षा  स्तर में यह अंतर प्रकारांतर में सामाजिक असमानता को बढ़ावा देता है। इसलिए शिक्षा-नीति-2020 में इस अंतर को पाटने का संकल्प लिया गया है. दूर-शिक्षण पद्धति पाठ्यक्रम के मानकीकरण में सरकार की मददगार सिद्ध हो सकती है। सरकार चाहे तो एनसीईआरटी तथा उसकी अनुषंगी संस्थाओं की मदद से दूर-शिक्षण सामग्री के वाक्-चित्रण(आडियो विजुलाइजेशन) का मानकीकरण भी कर सकती है। ऑनलाइन शिक्षा के सामुदायिकरण द्वारा हम वहां भी आसानी से पहुंच सकते हैं, जहां अभी तक स्कूली शिक्षा नहीं पहुंच पाई है। कुल मिलाकर, तात्कालिक मजबूरी में ही सही, ऑनलाइन शिक्षा को अपनाना घाटे का सौदा नहीं है। देखना यह है कि समाजार्थिक विषमता से भरपूर भारतीय परिदृश्य में वह कितनी और किस प्रकार उपयोगी हो सकती है!

भारत में ‘ऑनलाइन क्लासिस’ की दशा-दिशा पर बातचीत करने से पहले इसके इतिहास पर सरसरी नजर डाल लेना उचित होगा।

ऐतिहासिक विहंगावलोकन

‘ऑनलाइन क्लासिस’, दूर-शिक्षण(डिस्टेंस एजुकेशन) का आधुनिक संस्करण है। दूर-शिक्षण की संकल्पना उनीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में जन्मी थी। उद्देश्य था, जो लोग किसी कारणवश स्कूली शिक्षा से वंचित हैं—उनके लिए शिक्षा के वैकल्पिक माध्यम विकसित किए जाएं। 1833 में एक स्वीडिश अखबार में प्रकाशित एक विज्ञापन ने लोगों को चौंकाने का काम किया था। विज्ञापन में डाक के माध्यम से शिक्षा देने की सूचना थी। उस समय तक पत्राचार द्वारा शिक्षा की एकदम अवधारणा नई थी। इसलिए लोगों का ध्यान उसकी ओर कम ही गया। फिर भी विचार की नींव तो पड़ ही चुकी थी। सो उत्साही लोग ‘दूर-शिक्षण’ को कामयाब बनाने में जुट गए। इस बीच इंग्लेंड सरकार की ओर से पूरे देश के लिए एक समान डाक-नीति लागू करने की घोषणा की गई। उसका लाभ उठाते हुए 1840 में सर ईसाक पिटमेन(1813-1897) ने पोस्टकार्ड को पत्राचार की शिक्षा का माध्यम बनाया। प्रति पत्राचार एक पेनी की शुल्क पर वे दूरदराज के क्षेत्रों में रह रहे विद्यार्थियों को आशुलिपि सिखाने लगे। ये वही पिटमेन थे, जिन्हें ‘शार्टहेंड’ का जनक माना जाता है। उनके सम्मान में शार्टहेंड को ‘पिटमेन शार्टहेंड’ का नाम भी दिया गया है। पिटमेन साहब पोस्टकार्ड के माध्यम से अपने विद्यार्थियों को शार्टहेंड के बारे समझाते। लगे हाथ उन्हें ‘एक्सरसाइज’ के बारे में बता देते थे। विद्यार्थी भी पोस्टकार्ड के जरिए उनका हल भेजते और अपनी समस्याएं सामने रखते थे। प्रयोग इतना ज्यादा कामयाब हुआ कि मात्र 3 वर्ष के भीतर पिटमेन के नेतृत्व में ‘फोनोग्राफिक कोरसपोंडेंस सोसाइटी’ का गठन हुआ। उसके तत्वावधान में पत्राचार  कॉलेज की स्थापना हुई, जिसे दुनिया का पहला पत्राचार कॉलेज कह सकते हैं। 

एक कामयाब प्रयोग की देर थी। उसके बाद तो ‘दूर-शिक्षा’ का सिलसिला जोर पकड़ने लगा। 1891 तक अमेरिका में पत्राचार द्वारा डिग्री कोर्स कराने की सुविधा आरंभ हो चुकी थी। ग्रेट ब्रिटेन के बाद अमेरिका, जर्मनी आदि देशों में पत्राचार द्वारा शिक्षा के स्कूल खोले जाने लगे। सबसे बड़ी सफलता मिली, शिकागो विश्वविद्यालय को। वहां प्रतिवर्ष 125 अनुदेशक, 3000 विद्यार्थियों को पत्राचार द्वारा शिक्षा प्रदान करते थे। विश्वविद्यालय में पत्राचार शिक्षा के लिए 350 पाठ्यक्रम निर्धारित थे। कह सकते हैं कि वह शिक्षा-जगत की पहली क्रांति थी। रेडियो का प्रचलन हुआ तो विश्वविद्यालयों ने उसे भी दूर-शिक्षा का माध्यम बना लिया। 1920 के दशक में, अकेले अमेरिकी विश्वविद्यालयों ने दूर-शिक्षण के लिए 176 रेडियो स्टेशन स्थापित किए थे। फिर आया दूरदर्शन। आने के साथ ही उसने मनोरंजन उद्योग के साथ-साथ शिक्षा क्षेत्र को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया। गौरतलब है कि 1891 में ‘चलचित्र कैमरा’ का आविष्कार करते समय थॉमस अल्वा एडीसन ने कहा था कि चलती-फिरती तस्वीरें शिक्षाजगत में क्रांति का आगाज करेंगी। वे शिक्षा को और अधिक मनोरंजक, आकर्षक एवं रचनात्मक बनाएंगी। एड़ीसन के बाद जन्मे मार्शल मेक्लुहान ने ‘मीडिया ही संदेशवाहक’ कहते हुए उसे ‘मनुष्य के विस्तार’ के रूप देखा। आगे सबकुछ  एडिसन की भविष्यवाणी के अनुरूप हुआ। 1950 के दशक तक दुनिया के कई देश, दूरदर्शन को दूर-शिक्षा के उपयोगी माध्यम के रूप में अपना चुके थे। खासतौर पर दूरस्थ गांवों में शिक्षा देने के लिए दूरदर्शन विशेष मददगार सिद्ध हुआ। अमेरिका के अलास्का में, दूर-शिक्षण प्रविधि द्वारा गांव-गांव शिक्षा पहुंचाने के लिए 1980 में ‘लर्न अलास्का’ परियोजना आरंभ की गई। उसकी ओर से प्रतिदिन छह घंटे का शैक्षिक कार्यक्रम प्रसारित किया जाता था, जिसकी पहुंच कई सौ गांवों तक थी।

भारत में दूर शिक्षा की नींव 1962 में रखी गई। उसी वर्ष दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा ‘स्कूल ऑफ़ कॉरसपोडेंस कोर्सिस एंड कंटीन्युइंग एजुकेशन’ की शुरुआत की गई। उसका भरपूर स्वागत किया गया। मात्र एक दशक में कई और भी संस्थान दूर-शिक्षण प्रणाली को अपना चुके थे। 1982 में हैदराबाद में डॉ. भीमराव आंबेडकर मुक्त विश्वविद्यालय की स्थापना दूर शिक्षण की दिशा में क्रांतिकारी कदम थी। आज देश में 242 विश्वविद्यालय/संस्थान ऐसे हैं जो सामान्य कक्षाओं के साथ-साथ दूर शिक्षण के माध्यम से भी शिक्षा प्रदान करते हैं। 2009-10 में देश में उच्चतर शिक्षा के क्षेत्र में दूर शिक्षा संस्थानों का योगदान 23.38 प्रतिशत था। उसी वर्ष दूर-शिक्षा संस्थानों में पंजीकरण कराने वाले विद्यार्थियों की संख्या लगभग 40,00,000 थी।

जिसे आज हम ई’लर्निंग(इलेक्ट्रानिक्स लर्निंग) कहते हैं, उसकी शुरुआत 1980 के दशक से ही हो चुकी थी। आज लाखों की संख्या में बेवसाइटें किसी न किसी रूप में शिक्षा प्रदान करने या उसके प्रचार-प्रसार में जुटी हैं। इंटरनेट द्वारा शिक्षण के क्षेत्र में नई क्रांति का आगाज हुआ, ‘वेब-2’(वर्ल्ड वाईड वेब-2) के आविष्कार के बाद। वेब-1 का दौर 1980 से 2004 तक चला था। उसमें प्रयोक्ता की हैसियत महज उपभोक्ता जैसी थी। उस एकल-मार्गी माध्यम का उद्देश्य उपभोक्ता तक सूचनाएं पहुंचाना मात्र था। उपभोक्ता वेबसाइट पर मौजूद सामग्री को केवल देख सकता था। इंटरनेट की पहुंच सीमित थी। गति कम। इंटरनेट सामग्री निर्माता भी कम थे। उपभोक्ता की प्रतिक्रिया जानने के लिए ‘गेस्टबुक’ हुआ करती थी। जिसपर दी गई प्रतिक्रियाएं मुख्य सामग्री से अन्यत्र जमा होती थी। वेब-2 के आविष्कार इस क्षेत्र में क्रांति ने उपभोक्ता को भी ‘सामग्री उत्पादक’ की श्रेणी में ला दिया। उपभोक्ता को यह छूट दी जाने लगी कि वह उपलब्ध सामग्री में विषयगत संशोधन कर सके। फिर ऐसी बेवसाइटें भी बनने लगीं जिनमें सामग्री उत्पादक और उपभोक्ता के बीच कोई अंतर न था। प्रयोक्ता अपनी ओर से नई सामग्री जोड़ने तथा उसके मनचाहे प्रस्तुतीकरण के लिए स्वतंत्र था। आज लाखों बेवसाइट केवल उपभोक्ताओं द्वारा सृजित सामग्री के भरोसे चलती हैं। सामग्री उसकी अपनी या किसी और व्यक्ति/संस्था की हो सकती है। वेबसाइट निर्माताओं का काम केवल ‘सामग्री सर्जकों’ और ‘सामग्री प्रयोक्ताओं’ के बीच पुल बनाना है। उन्हें ‘सूचनाप्रदेश के वासी’ अथवा ‘डिजिटल नेटिव्स’ का नाम दिया। आज जिसे सोशल मीडिया कहते हैं, वह असल में इंटरनेट पर फैला ‘वैश्विक सूचनाप्रदेश’ है, जिसमें आमोखास सभी को दखलंदाजी करने का अधिकार प्राप्त है। ई’लर्निंग सूचना-प्रदेश की विस्मयकारी सफलताओं तथा उसके महाविस्तार का ही हिस्सा है।   

सवाल है कि इन सब खूबियों के बावजूद क्या ऑनलाइन शिक्षा, स्कूली शिक्षा का समानोपयोगी अथवा बेहतर विकल्प बन सकती है? प्रश्न यह भी हो सकता है कि क्या शिक्षा का माध्यम, उसकी गुणवत्ता को प्रभावित करता है। इस संबंध में दो अमेरिकी प्रोफेसरों, रिचर्ड एडवर्ड क्लार्क तथा राबर्ट बी। कोझमा के बीच लंबी बहस चली थी। 1983 में बहस की शुरुआत करते हुए क्लार्क ने कहा था—‘संज्ञानात्मक प्रक्रियाएं एवं रणनीतियां जो सीखने के लिए आवश्यक हैं, उनका उपयोग विद्यार्थी अपने लिए नहीं कर सकते। वे करेंगे भी नहीं।’1 क्लार्क के अनुसार मीडिया सूचनाओं एवं अनुदेशों को विद्यार्थी तक पहुंचाने का महज एक माध्यम है। इससे इतर उसकी और कोई भूमिका नहीं है। जैसे खाने-पीने की चीजों की पौष्टिकता, उन्हें ढोने वाले ट्रक के प्रभाव से बेअसर रहती है, इसी तरह शिक्षा भी मीडिया के प्रभाव से अछूती रहती है। एक तरह से क्लार्क ने मीडिया को महज सूचना-प्रदाता तथा विद्यार्थियों को सूचना-संग्राहक मात्र मान लिया था।

करीब एक दशक बाद, 1994 में कोझ़मा ने क्लार्क की आलोचना करते हुए कहा कि शिक्षा पर मीडिया के असर को समझने के लिए उन दोनों के संबंधों को समझना जरूरी है। कोझ़मा के अनुसार, क्लार्क की धारणा इन दोनों के अंतःसंबंध को सही-सही न समझ पाने के कारण बनी थी। उसका कहना था कि यदि माध्यम को तकनीक; तथा शिक्षा-अनुदेशों को अध्यापन प्रविधि मान लिया जाए तो मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए बाध्य हूं कि शिक्षण माध्यम से अधिक प्रविधि से प्रभावित होता है।2 कोझ़मा का तर्क एक तरह से क्लार्क के निष्कर्ष की ही पुष्टि करता था। बावजूद इसके कोझ़मा को नकार पाना संभव नहीं है। निरंतर शक्तिशाली होते इंटरनेट-मीडिया, खासकर तब जब उपभोक्ता को वेबसाइटों पर उपलब्ध सामग्री को संपादित करने की छूट प्राप्त हो, उससे निरपेक्ष सूचना-प्रदाता बने रहने की उम्मीद करना ही व्यर्थ है।

तकनीकी का मूल स्वभाव गतिशीलता है। प्रत्येक प्रौद्योगिकी अपने से बेहतर प्रौद्योगिकी की संभावनाएं लिए रहती है। वह न केवल स्वयं गतिशील रहती है, अपितु अपने प्रयोक्ता को भी गतिमान बनने के लिए उकसाती है। इसलिए वह शिक्षण की समग्र प्रक्रिया के साथ-साथ विद्यार्थी क्या सीखता है, कब सीखता है, कैसे सीखता है—को प्रभावित करती है। ई’लर्निंग की प्रक्रिया में विद्यार्थी केवल अपने अनुदेशक या शिक्षण संस्थान से जुड़ा नहीं होता। बल्कि इंटरनेट के जरिए लाखों जालपट्टों, इलेक्ट्रॉनिक सामग्री के प्रयोक्ताओं, सर्जकों, उत्पादकों तथा उनका व्यापार करने वालों से भी जुड़ा होता है। यदि यह मान लिया जाए कि प्रयोक्ता(विद्यार्थी) इंटरनेट पर उपलब्ध पाठेत्तर सामग्री के आकर्षण से खुद को बचाए रखता है, तब भी वहां मौजूद दर्जनों शब्दकोश, अनुवाद सुविधाएं, तरह-तरह के संदर्भ ग्रंथ, विश्वकोश, पूरक पाठ्य-सामग्री, अखबार, शोध पत्रिकाएं आदि से उसका निरपेक्ष रह पाना संभव नहीं है। इसलिए क्लार्क का कथन कि माध्यम का संबंध केवल सूचना के आवागमन तक सीमित रहता है, उचित नहीं है। गौरतलब है कि क्लार्क और कोझ़मा के बीच बहस उन दिनों हुई थी, जब तक वेब-2 का आविष्कार नहीं हो पाया था। अधिकतर वेब-सामग्री एकतरफा सूचना-प्रदाता माध्यमों पर सुरक्षित थी। यदि क्लार्क आधुनिक वेबसाइटों को देखते, ऐसी वेबसाइटों को देख पाते जिनपर वेबसाइट मालिकों की हैसियत महज सूचना प्रबंधक जैसी है—तब उनका निष्कर्ष अवश्य ही कुछ और होता।

     

इंटरनेट लर्निंग : भारतीय परिदृश्य और नई शिक्षा नीति

भारतीय संविधान में 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा को मौलिक अधिकार माना गया है। भारत में इस आयु-वर्ग में करीब 30 करोड़ विद्यार्थी हैं। 300 विश्वविद्यालय स्तरीय शिक्षण संस्थान हैं, जिनसे जुड़े कॉलेजों की संख्या 12,600 से अधिक है। उनमें 80 लाख विद्यार्थी हैं। देश में स्कूल अध्यापकों की संख्या लगभग 95 लाख है। इनमें से 4,00,000 कॉलेज स्तर की संस्थाओं में अध्यापन करते हैं। बावजूद इसके देश में साक्षरता अनुपात मात्र 56 प्रतिशत है। अनेक ऐसे ठिकाने हैं जहां औपचारिक शिक्षण संस्थाओं का बेहद अभाव है। कुछ, खासकर उच्चशिक्षण संस्थान, अत्यंत महंगे होने के कारण गरीब आदमी की पहुंच से बाहर हैं। इसे देखते हुए ऑनलाइन शिक्षा देश के लिए वरदान सिद्ध हो सकती है।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में शिक्षा को प्रतिस्पर्धी एवं सर्वसुलभ बनाने पर जोर दिया गया है। इसके लिए उसमें ‘ऑनलाइन शिक्षा’ को बढ़ावा देने तथा उसके लिए नवीनतम प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल का भी संकल्प है। कहा गया है कि ऐसे क्षेत्रों में जहां बालक को सीधे शिक्षा देना संभव नहीं है—वहां ऑनलाइन शिक्षा बेहतर विकल्प बन सकती है। इसके लिए मानव संसाधन मंत्रालय के तहत, एक सशक्त ढांचा खड़ा करने की योजना बनाई गई है। ऐसा ढांचा जो स्कूली स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक, ऑनलाइन अध्ययन-अध्यापन हेतु प्रभावशाली डिजीटल सामग्री और कारगर सिस्टम का निर्माण करेगा; तथा सरकार और शिक्षण संस्थानों के लिए मार्गदर्शक का काम करेगा।

नई शिक्षा नीति में शिक्षा-क्षेत्र में सुधार तथा उसके बहुआयामी विस्तार हेतु, नवीनतम प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल पर जोर दिया गया है। एक ‘राष्ट्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी फोरम’ बनाने का संकल्प लिया है। यह फोरम गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के विस्तार हेतु डिजीटल सामग्री के निर्माण, मूल्यांकन, योजना, प्रशासन, प्रबंधन आदि क्षेत्रों में नवीनतम प्रौद्योगिकी के प्रयोग के बारे में सलाह देगा। फोरम की सभी सेवाएं, स्कूल स्तर से लेकर उच्च शिक्षण संस्थानों तक, निःशुल्क उपलब्ध होंगी। फोरम क्लासरूम शिक्षा के क्षेत्र में नई तकनीकी के उपयोग के साथ-साथ, ऑनलाइन शिक्षा हेतु ई-सामग्री के निर्माण तथा अध्यापकों के प्रशिक्षण के क्षेत्र में नवीनतम तकनीक के उपयोग की संभावनाओं पर विचार कर, उनके कार्यान्वन हेतु भरोसेमंद मार्गदर्शक तंत्र का काम करेगा।

ऑनलाइन शिक्षा की समस्याएं

एक ओर जहां ऑनलाइन शिक्षा की उपयोगिता स्वयं-सिद्ध है, वहीं दूसरी ओर यह भी सच है कि भारत जैसे बड़े देश के भारी-भरकम और विविधतापूर्ण शिक्षातंत्र का संपूर्ण डिजिटलाइजेशन एकाएक संभव नहीं है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में प्राइमरी तथा प्री-प्राइमरी स्तर पर कुछ ऐसे स्कूल, शृंखलाबद्ध तरीके से खोले गए हैं, जिनमें अध्यापक की भूमिका कक्षा में अनुशासन बनाए रखने; अथवा विद्यार्थी की तात्कालिक जिज्ञासाओं के समाधान तक सीमित होती है। ऐसे स्कूलों में जोर केवल शिक्षण-सामग्री का डिजिटलाइजेशन पर होता है। बच्चे सामान्य तौर पर स्कूल आते हैं। कक्षा लगती हैं, किंतु दीवार पर ब्लैक बोर्ड के स्थान पर सिल्वर स्क्रीन या टेलीविजन सेट होता है। उसके द्वारा पूर्वनिर्धारित पाठ-सामग्री, स्रोत केंद्र से सीधे विद्यार्थियों तक पहुंचाई जाती है। अभी तक ऐसे स्कूल, नर्सरी और प्राईमरी स्तर तक हैं। अलग-अलग स्थान पर कक्षाएं चलाने के लिए बड़े कोचिंग संस्थान भी इस प्रौद्योगिकी का सहारा लेने लगे हैं।

कुछ महीनों से कोविड-19 की महामारी के दौरान शिक्षण को लेकर आ रही मुश्किलों के लिए परंपरागत स्कूलों ने भी ऑनलाइन कक्षाएं चलाना आरंभ किया है। यह मजबूरी में अपनाया गया रास्ता है। क्योंकि ऐसे स्कूलों द्वारा चलाई जा रही ऑनलाइन कक्षाओं में उपलब्ध प्रौद्योगिकी के दसवें हिस्से का भी उपयोग नहीं हो पा रहा है। लगभग सभी अध्यापक परंपरागत शिक्षा के माहौल से आए हैं। उनका समूचा अनुभव और ज्ञान, क्लासरूम शिक्षा तक सीमित है। सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी उनकी जानकारी बहुत सामान्य स्तर की है। ऑनलाइन शिक्षा के लिए जो आवश्यक उपकरण, लैब, डिजिटलीकृत पाठ-सामग्री आदि चाहिए, स्कूलों में उसका भी अभाव है। ऑनलाइन शिक्षा के नाम पर वे केवल भरपाई कर रहे हैं, ताकि स्कूलों के नाम पर चल रही उनकी दुकानें बंद न हों। विद्यार्थियों, खासकर प्राथमिक स्तर के बच्चों की हालत और भी बुरी है। उनमें से अधिकांश बच्चों की जानकारी कंप्यूटर खोलने और बंद करने तक सीमित है। इस हकीकत को उनके अभिभावक भी जानते हैं। लेकिन फिलहाल इसके अलावा उनके सामने कोई विकल्प भी नहीं है। विडंबना यह है कि यह आधी-अधूरी ऑनलाइन शिक्षा भी केवल एक-चौथाई बच्चों के लिए उपलब्ध है। देश में करीब 76 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं जो अन्यान्य कारणों से ऑनलाइन शिक्षा का लाभ उठाने से वंचित हैं। आंकड़े बताते हैं कि भारत के लगभग 22 फीसदी ग्रामीण घरों में आज भी बिजली की सप्लाई नहीं है। कुछ राज्यों में तो हालत और भी खराब है। ऑनलाइन शिक्षा का सारा दारोमदार इंटरनेट पर टिका है। देश में अभी कुल 31 प्रतिशत, लगभग 40 लोगों के पास इंटरनेट की आधी-अधूरी सुविधा उपलब्ध है। आंकड़े बताते हैं कि अगले कुछ वर्षों में इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या दो गुनी हो जाएगी। इसी आधार पर सरकार का इरादा 2025 तक, शिक्षा को ऑनलाइन मोड में लाने का है। संकल्प बुरा नहीं है, मगर चुनौतियां भी कम नहीं हैं।

डिजिटल माध्यम द्वारा पाठ को विद्यार्थी तक पहुंचाने के लिए चाहिए एक कंप्यूटिंग मशीन, निर्बाध इंटरनेट कनेक्शन, जरूरी साफ्टवेयर। इसके अलावा उसे चाहिए एकांत। ऐसी जगह जहां विद्यार्थी बगैर किसी व्यवधान के दूर-शिक्षण का लाभ उठा सके। मुश्किल यह है कि भारत जैसे विविधताओं वाले देश में जहां आमदनी के हिसाब से लोगों के बीच जमीन-आसमान का अंतर है। गांवों और शहरों में बड़ी संख्या उन लोगों की है जिनके पास एक कमरे के घर हैं। जहां एक ही छत के नीचे छह-सात लोग रहते हैं। उनमें से काफी लोगों के लिए ये संसाधन जुटाना मुश्किल काम है। करीब चार महीने के घोषित-अघोषित लॉकडाउन और उस दौरान कीर्तिमान रच चुकी बेरोजगारी के कारण, विद्यार्थियों के माता-पिता की हालत ऐसी नहीं है कि वे बच्चों के लिए कंप्यूटिंग मशीन, इंटरनेट आदि का इंतजाम कर सकें। एक समाचार के अनुसार बच्चे की ऑनलाइन शिक्षा के लिए असम के एक परिवार को गाय बेचना पड़ी.  इस तरह के समाचार पूरे देश से प्राप्त हो रहे हैं।

‘इंडियन एक्सप्रेस’ में 27 जुलाई 2020 को प्रकाशित, हरियाणा की बडेशर तहसील के मोरनी गांव से जुड़े समाचार से ऑनलाइन शिक्षा की जमीनी हकीकत को समझा जा सकता है।3 उसके अनुसार गांव में गिने-चुने लोगों के पास स्मार्ट फोन हैं। जिनके पास हैं, वे ठीक-ठाक इंटरनेट सिग्नल न मिलने से परेशान रहते हैं। ऐसे में जिन विद्यार्थियों के पास स्मार्ट फोन नहीं है, उन्हें उन बच्चों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिनके पास फोन की सुविधा है। यह सुविधा उन्हें स्कूल समय में उपलब्ध नहीं हो पाती। उस समय जिसका फोन है, वह खुद ऑनलाइन क्लास से जुड़ा होता है। इसलिए बच्चे स्कूल समय के बाद उनके पास जाते हैं। ऐसे परिवार भी हैं, जिनके माता-पिता बच्चों को तत्काल मोबाइल फोन खरीदकर देने में असमर्थ हैं। गांव के एक किसान के ये शब्द पूरे भारत के मजदूर-किसानों की त्रासदी बयान करते हैं—‘मैंने कुछ रुपये बचाए थे। मगर लॉकडाउन के कारण सब घर-गृहस्थी की जरूरतों पर खर्च हो गए। अब सोच रहा हूं कि एक महीने में टमाटरों की फसल बिक जाएगी। उसके बाद मैं अपने बच्चों के लिए स्मार्ट फोन खरीद दूंगा।’ उस किसान की दो बेटियां हैं। छोटी पांचवी कक्षा में पढ़ती है, बड़ी सातवीं में। स्मार्टफोन न होने के कारण वे गांव के एक लड़के के घर जाती हैं। किसान के अनुसार—

‘मेरे पास साधारण फोन है, लेकिन यह बच्चों के किसी काम नहीं आ सकता। इसलिए जब तक टमाटरों की फसल उठ नहीं जाती, मैं अपनी बेटियों को उस लड़के के पास भेजने को विवश हूं, जिसके पास स्मार्ट फोन है। हमने कभी नहीं सोचा था कि पढ़ाई केवल टच फोन के सहारे ही संभव हो पाएगी।’

अखबार में स्थानीय पॉलिटेक्निक की छात्रा, देवी नामक लड़की का बयान भी छपा है। देवी के अनुसार, मोबाइल पर अपना काम निपटाने के बाद वह बच्चों को कापी-कलम के साथ अपने घर बुला लेती है—

‘शाम के समय उन सभी को अपने खेतों में काम करना पड़ता है। इसलिए वे दोपहर के बाद आते हैं और अध्यापक द्वारा भेजे गए नोट्स और वीडियो के पाठ को अपनी कापी में उतार लेते हैं।’

गौरतलब है कि पंचकुला जिले में शिवालिक की पहाड़ियों पर बसा मोरनी एक ऐतिहासिक गांव है। वह हरियाणा का टूरिस्ट स्थल भी है। यदि वहां के बच्चों की यह हालत है तो आप पूर्वी उत्तरप्रदेश, बिहार और उड़ीसा के गांवों के बच्चों के हालात का सहज अनुमान लगा सकते हैं।

ऑनलाइन शिक्षा की सफलता में भाषा की समस्या भी है। अभी तक जितने सॉफ्टवेयर बने हैं, वे सभी अंग्रेजी में है। यह ठीक है कि यूनीकोड ने कंप्यूटर पर भाषायी लेखन को आसान बनाया है। मगर उन बच्चों से जिन्होंने आपात-सुविधा के रूप में दूर-शिक्षण को अपनाया है, जो अंग्रेजी के की’बोर्ड को देखकर भी टाइप करना नहीं जानते, यह उम्मीद करना कि वे हिंदी अथवा अपनी मातृभाषा को यूनीकोड में टाइप करना सीखकर, कक्षा में सक्रिय भागीदार बन पाएंगे—एक दुष्कर कल्पना है। न केवल विद्यार्थी, अपितु अधिकांश अध्यापकों के आगे भी यह समस्या है। इस कमी को पेशेवर प्रोग्रामरों द्वारा तैयार ‘पाठ’ के माध्यम से काफी हद तक दूर किया जा सकता है। लेकिन वह खर्चीला उद्यम है, जिसे खानापूर्ति के नाम पर ऑनलाइन कक्षाएं चला रहे स्कूल शायद ही स्वीकार करें।

ऑनलाइन कक्षाओं के लिए जो साफ्टवेयर और पोर्टल, खासतौर पर भारत में इस्तेमाल किए जा रहे हैं, वे स्वयं विकास की प्रारंभिक अवस्था में हैं। ऐसे में लिखित उत्तर की अपेक्षा वाले प्रश्नों का उत्तर दे पाना विद्यार्थी के लिए, खासतौर पर छठी-सातवीं तक के बच्चों के लिए असंभव होगा। इस कमी को नजरंदाज करने के लिए स्कूल वस्तुनिष्ठ प्रश्नमालाओं के विकल्प को आजमा रहे हैं। उनके उत्तर कंप्यूटर या मोबाइल पर महज क्लिक के जरिए दिए जाते हैं। इससे विद्यार्थी की तात्कालिक समस्या का समाधान हो सकता है, परंतु लिखने का अभ्यास, खुद को अभिव्यक्त करने की कला, जो शिक्षा का अनिवार्यता है, वह ढंग से विकसित नहीं हो पाएगी।    

क्या ऑनलाइन शिक्षा स्कूली शिक्षा का विकल्प बन सकती है

क्या ऑनलाइन शिक्षा स्कूली शिक्षा का विकल्प बन सकती है? ऑनलाइन शिक्षा से समय अपना समय घर पर, अपने परिजनों के बीच अपेक्षाकृत आत्मीय माहौल में बिताने का अवसर मिलेगा। आने-जाने की थकान, रास्ते के प्रदूषण से उसका बचाव होगा। बावजूद इसके घर-बैठे ऑनलाइन शिक्षा, विशेषकर वर्तमान परिस्थितियों में, स्कूली शिक्षा का सार्थक विकल्प बन सकेगी—इसमें संदेह है। बालक जब स्कूल जाता था तो घर से निकलने के बाद उसका वास्ता तरह-तरह के लोगों से पड़ता था। अपने साथियों से मिलता-मिलाता था। अध्यापकों और स्कूल के बाकी स्टाफ से संपर्क में आता था। इससे स्कूली शिक्षा के साथ-साथ बालक के समाजीकरण का सिलसिला, जो पुस्तकीय शिक्षा से भी अधिक महत्वपूर्ण है—चलता रहता था। बालक को प्रबुद्ध नागरिक में ढालने के लिए उन अनुभवों की महत्ता से इन्कार नहीं किया जा सकता। ऑनलाइन क्लासिस के दौरान बालक का जीवन केवल परिवार के दायरे में सिमटकर रह गया है। एक बात और….सहपाठियों के साथ पढ़ते हुए बालक के मन में अनायास एक स्पर्धा जन्म ले लेती थी। उसमें थोड़ी-बहुत नकारात्मकता से इन्कार नहीं किया जा सकता। मगर उसका बड़ा हिस्सा सकारात्मक ही होता था। वह बालक को और अधिक परिश्रम करने, आगे बढ़ने की प्रेरणा देती थी। सहपाठियों के बीच रहकर बालक के बीच स्वतः मूल्यांकन की प्रक्रिया सतत चलती रहती थी। दूर-शिक्षण ने इन अवसरों को उनसे छीन लिया है।

बंद कमरे में दूर-शिक्षण के लिए कंप्यूटर स्क्रीन पर नजर गढ़ाए बैठा बालक पाठ सामग्री के रूप में केवल सूचनाएं समेट सकता है। सूचनाओं को ज्ञान में बदलने के लिए जो आपसी संवाद, परिचर्चाएं और अनुभव चाहिए, वे ऑनलाइन शिक्षा द्वारा संभव नहीं हैं। दूसरे शब्दों में ऑनलाइन शिक्षा ने सूचनाओं को ज्ञान में परिवर्तित करने, उसे अनुभवों के रूप में दोहराने का अवसर बच्चों से छीन लिया गया है। यदि महामारी के कारण, आधे-अधूरे संसाधनों पर टिकी वर्तमान दूर-शिक्षण प्रणाली लंबे समय तक अपनायी जाती है तो उससे बालक को शिक्षा के क्षेत्र में जो हानि होगी, उसकी अभी हम केवल कल्पना ही कर सकते हैं।

इन कमियों के बावजूद मानना पड़ेगा कि भविष्य आनलाइन शिक्षा के साथ है। जैसे-जैसे इंटरनेट और संचार प्रौद्योगिकी का विस्तार होगा, ऑनलाइन शिक्षा के क्षेत्र में आ रही मुश्किलें भी कम होती जाएंगीं। पहले चरण में कक्षाओं का डिजिटलीकरण होगा। वह दिन दूर नहीं जब आने वाले दशकों में ब्लैक बोर्ड बिलकुल गायब हो जाएंगे। उनकी जगह टेलीविजन स्क्रीन सेट ले लेंगे। अध्यापकों का काम स्कूलों में पढ़ाने के बजाए, पाठ्यसामग्री तैयार करने तथा उसे प्रयोगशाला से, इंटरनेट के माध्यम से छात्रों तक पहुंचाना भर रह जाएगा। राष्टीय शिक्षा नीति—2020 में सरकार ने, पाठ-सामग्री के निर्माण हेतु ‘स्वयं’, ‘दीक्षा’, ‘स्वयंप्रभा’ नाम से डिजिटलीकृत प्रयोगशालाएं बनाने पर जोर दिया है। ऑनलाइन परीक्षा के लिए भी ‘परख’ नाम से पोर्टल बनाने का सुझाव है। यदि इस दिशा में प्रभावशाली ढंग से आगे बढ़ा गया तो संभव है आने वाले चंद दशकों में ही औपचारिक कक्षाओं की जगह, वर्चुअल कक्षाएं छा जाएं और बड़े-बड़े स्कूल उसी तरह बेमानी लगने लगें जैसे आज सिनेमाघर दिखते हैं। तब हम ‘अपना देश, अपनी भाषा, सबको समान शिक्षा’ के लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ सकेंगे; और विद्यार्थियों को उनकी पसंद की शिक्षा उंनकी सुविधा अनुकूल समय पर उपलब्ध हो सकेगी।

ओमप्रकाश कश्यप

 संदर्भ : 

  1. Clark, R. E. (1994). Media will never influence learning. Educational, Technology Research and Development,  Page 5.
  2. Kozma, R. B. (1994). Will media influence learning? Reframing the debate. Educational Technology Research & Development,42(2), 7-19. Retrieved February 15, 2006, fromhttp://mmtserver.mmt.duq.edu/mm416-01/gedit704/articles/kozmaArticle.html
  3. इंडियन एक्सप्रेस, 27 जुलाई 2020,https://indianexpress.com/article/cities/chandigarh/haryana-struggling-to-study-at-remote-morni-village-students-travel-miles-to-access-a-smartphone-6524856/  

ईश्वर और धर्म से मुक्ति : पेरियार और धर्म 

विशेष रुप से प्रदर्शित

धर्म और राज्य में व्यावहारिक रूप में चाहे जितना अंतर नजर आता हो, उनकी उत्पत्ति का कारण समान है। वह कारण है—व्यक्ति का अहंबोध। यह मान लेना कि वही श्रेष्ठतम है….दूसरों को उसका आदेश मानना ही चाहिए। इन दोनों की अवधारणा उस क्षण जन्मी थी, जिस क्षण किसी व्यक्ति के मन में श्रेष्ठतम होने का एहसास जन्मा था।( यहाँ  धर्म और अध्यात्म को एक-दूसरे से अलग ही रखें तो अच्छा। अध्यात्म का संबंध मनुष्य की आंतरिक और बाह्य: जगत को लेकर उपजी जिज्ञासा और कौतूहल से है। उसमें नवीनता और वैभिन्न्य के लिए भरपूर गुंजाइश होती है। एक ही समूह के अलग-अलग व्यक्ति अपने स्वतंत्र अध्यात्मबोध के साथ जी सकते हैं। उनमें किसी एक का अध्यात्मबोध दूसरे के अध्यात्मबोध की राह में बाधक नहीं बनता। धर्म के साथ ऐसा नहीं है।) धर्म वर्चस्व की भावना एवं स्पर्धा को जन्म देता है। चूंकि राज्य और धर्म की उत्पत्ति का क्षण एक; तथा प्रवृत्ति लगभग समान है, इसलिए उनका इतिहास भी एक-दूसरे से मेल खाता है। अपने-अपने विस्तार के लिए दोनों ने खूब खून-खराबा किया है। चूंकि दोनों के स्वार्थ एक-दूसरे से जुड़े हैं, इसलिए जरूरत पड़ने पर राज्य यह कहकर कि उसने जो किया, धर्म के लिए किया….तथा धर्म यह दावा करते हुए कि उसने जो किया, वही देवेच्छा थी, इसी में सबका कल्याण है—दोनों एक-दूसरे का सुरक्षा-कवच बनते आए हैं। इस कोशिश में दोनों न केवल एक दूसरे की कमजोरियों पर पर्दा डालते हैं, अपितु मनमानी करने का अवसर भी देते हैं।  

समाज और संस्थाओं का स्तरीकरण धर्म की प्रवृत्ति है। वह खुद भी एक बहुस्तरीकृत संस्था है। अपने स्थायित्व के लिए वह पूरी सृष्टि को ‘देवता’ और ‘देवता नहीं हैं’ में बांट देता है। फिर ‘देवता नहीं हैं’ का एक छोटा-सा हिस्सा खुद को उससे अलग कर लेता है। वह स्वयं को ‘देवता’ का विशेषज्ञ और उसका जानकार होने का दावा करने लगता है। अपनी जानकारी के दावे के समर्थन में वह ‘देवता’ को लेकर कुछ चमत्कारयुक्त मिथ गढ़ लेता है। उन मिथों के सहारे ‘देवता’ से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष संबंध स्थापित कर, बचे हुए ‘देवता नहीं हैं’ वर्ग के आगे श्रेष्ठतर होने का दावा पेश कर देता है। चूंकि चमत्कार और मिथों से जुड़ी कहानियां सभी को लुभाती हैं, इसलिए आरंभ में केवल मनोरंजन और कौतूहल की वांछा से, ‘देवता नहीं है’ समूह के बाकी लोग उन्हें सहज भाव से अपना लेते हैं। धीरे-धीरे जब वे मिथ और चमत्कार, प्रतीकों, कलाओं, लिखित सामग्री, श्रुति आदि के रूप में अगली पीढ़ी तक, उत्तराधिकार के रूप में पहुँचते हैं, तो आगंतुक पीढ़ी उनके प्रति ठीक वैसी ही निरपेक्ष नहीं रह जाती, जैसी उससे पिछली पीढ़ी थी। नई पीढ़ी उन्हें पिछली पीढ़ी के ‘पवित्र’ अवदान के रूप में सहेजकर रखती है। उसके बाद तो हर नई पीढ़ी के साथ ‘पवित्रताबोध’ का अनुपात बढ़ता ही जाता है। किसी सामान्य घटना, विचार अथवा वस्तु के ‘धर्म’ अथवा ‘टोटम’ बनने के पीछे यही प्रवृत्ति काम करती है। इस बात को शासकवर्ग भी भली-भांति जानता था। वह धर्म की शक्ति का उपयोग अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए करता है। इसलिए यह अन्यथा नहीं है कि भारत में धर्मसत्ता के मजबूत होने का जो समय है, वही समय राजसत्ता के मजबूत होने का भी है। पहली बार गौतम बुद्ध ने दुनिया को संगठित धर्म की ताकत का अहसास कराया था। अशोक ने उसका उपयोग कलिंग युद्ध के बाद बिगड़ चुकी अपनी छवि के सुधार के लिए किया। इससे लोगों को पहली बार धर्म की सांगठनिक क्षमता के बारे पता चला। उसके बाद तो हर राजा अपने मंसूबे साधने के लिए धर्म की मदद लेने लगा। ईसा मसीह और मोहम्मद साहब दोनों को अपने क्रांतिधर्मा विचारों के कारण समाज में विरोध का सामना करना पड़ा था। लेकिन कुछ अरसे बाद जब जनता में उनके विचारों का प्रभाव बढ़ा और लोग उनके प्रति सम्मोहित नजर आने लगी तो राजाओं और राजसत्ता का सपना देखने वाले लोगों ने भी जनता को अपने प्रभाव में लेने के लिए उनके विचारों का इस्तेमाल करना आरंभ कर दिया। धर्म और राजनीति के गठजोड़ ने ही साम्राज्यवाद को संभव बनाया है। यही कारण है कि समानता और स्वतंत्रता को मनुष्य का मौलिक अधिकार मानने वाले, लगभग सभी आधुनिक विचारकों ने धर्म और उसके सहारे पलने वाले सांस्कृतिक वर्चस्व की आलोचना की है।

मिखाइल बकुनिन ने कहा था कि धर्म का खास गुण, ईश्वर के महिमामंडन द्वारा मनुष्यता का अनादर करना है। हिंदू धर्म की स्थिति थोड़ी अलग है। हिंदुओं में ब्राह्मण खुद को ईश्वर और धर्म का व्याख्याकार बताकर खुद को बाकी लोगों से अलग कर लेता है। बकौल ‘मनुस्मृति’ वह पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि बनकर रहता है। इसलिए हिंदू धर्म में मनुष्यता का अनादर मुख्यतः गैर-ब्राह्मणों तक, जो कुल आबादी का 90 प्रतिशत हैं, सीमित होकर रह जाता है। इसलिए धर्म और ईश्वर के प्रति चुनौती को ब्राह्मण, अपने अस्तित्व को चुनौती मान लेते हैं। ‘ईश्वर और राज्य’ में बकुनिन ने लिखा है कि ईश्वर, ‘मानवीय गरिमा तथा उसकी स्वतंत्रता के प्रति निश्चित रूप से सर्वाधिक ईर्ष्यालु, सर्वाधिक अहंकारी, सर्वाधिक क्रूर, सर्वाधिक अन्यायी, सर्वाधिक जालिम, सर्वाधिक निरंकुश और सबसे ज्यादा शत्रुतापूर्ण था।’ उसके बनिस्पत शैतान या राक्षस बकुनिन के शब्दों में—‘शाश्वत विद्रोही, प्रथम मुक्त चिंतक तथा मनुष्यता का मुक्तिदाता है। वह पहला प्राणी है जो मनुष्यता की समस्त बंधनों से मुक्ति का सपना देखता है।’ बकुनिन ने यह मुख्यतः बाईबिल के बारे में लिखा है। लेकिन हर धर्म के ‘ईश्वर’ की यही स्थिति है। हर ‘ईश्वर’ अपने पक्ष को अंतिम और सर्वोपरि मानता है। संवाद का अवसर दिए बिना, वह चाहता है कि लोग केवल उसका आदेश मानें। उल्लंघन करने पर दंड के लिए तैयार रहें। मनमानी करना सत्ता का लक्षण है। इसलिए दुनिया में जितने भी ‘ईश्वर’ हैं, वे सत्ता के समर्थन से ही ‘ईश्वर’ बने हैं। सत्ता ने उन्हें गढ़ा ही इसलिए कि ईश्वर के नाम पर वह अपनी मनमानियों को वैध बना सके। एक बार ‘ईश्वर’ स्थापित हो जाए तो सर्वसत्तावादियों का खेल आसान हो जाता है। अपने स्वार्थ को ईश्वरेच्छा बताकर वे अपनी इच्छाओं को अपने अनुयायियों पर थोपने लगते हैं। अनुयायी उनपर तथा उनके गढ़े हुए ईश्वर पर भरोसा करें, इसलिए उसके नाम पर चमत्कारों भरे आख्यान गढ़ लिए जाते हैं। जनता उन्हें धर्म, परंपरा और संस्कृति के नाम पर सहेजती जाती है। लोक-स्मृति से उन्हें मिटाना असंभव नहीं तो कठिन बहुत होता है। इसके लिए लंबा और सतत बुद्धिवादी संघर्ष अपेक्षित होता है।

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जनता के बीच धर्म का सीधा अर्थ आध्यात्मिक शक्ति पर विश्वास से है। लोगों को यही बताया भी जाता है वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार इसका अर्थ उन आध्यात्मिक एवं सांसारिक गतिविधियों से भी है, जिन्हें कोई व्यक्ति जाति-विशेष से संबद्ध होने के नाते करता है; अथवा वर्ण-विधान के आधार पर उससे ऐसा करने की अपेक्षा की जाती है। धर्म पर टिके इस जाति-विधान में ब्राह्मण का दर्जा सर्वोपरि है। वही धर्म का मुख्य कर्ता-धर्ता है। इस कारण उसके कुछ विशेषाधिकार भी हैं। जाति चूंकि मानवीय विवेक, चयन के नैसर्गिक अधिकार का निषेध करती है, इसलिए जब से बनी है, तभी से उसकी आलोचना होती आई है। लेकिन कुछ लोगों के लिए वह पवित्र विधान है। अत: जब भी उसपर संकट आता है, या बड़ी चुनौती खड़ी होती है, धर्म उसका सुरक्षा-कवच बन जाता है। धर्म ऐसा क्यों करता है? जाति तो उसकी अनिवार्यता नहीं है। हिंदू धर्म को छोड़ और किसी धर्म में समाज के जातीय विभाजन की अवधारणा नहीं है। हिंदू धर्म में इसलिए है क्योंकि इसका मुख्य कर्ता-धर्ता ब्राह्मण जातिक्रम में भी शिखर पर हैं। शीर्षस्थ शक्ति होने के कारण इस व्यवस्था में वह हमेशा लाभ की स्थिति में रहता है। जब भी जाति को चुनौती मिलती है, वह धर्म और संस्कृति के अपसंस्करण का मुद्दा खड़ा कर देता है। उन्हीं की आड़ में वह जाति को बचा ले जाता है। चुनौतियों के बीच यदि कुछ समजौते करने पड़ें तो करता है, लेकिन अपनी सामाजिक प्रस्थिति और विशेषाधिकारों पर कोई आंच नहीं आने देता। 

जाति-व्यवस्था और उसके सर्वाधिक विकृत रूप छूआछूत को चुनौती देने के लिए धर्म को आलोचना की जद में लाना आवश्यक था। ऐसा किसी न किसी रूप में जाति और धर्म की उत्पत्ति के समय से ही होता आया है। बीसवीं शताब्दी में यदि किसी ने जाति, धर्म और धार्मिक आडंबरवाद,  यहाँ  तक कि धर्म की शीर्षतम परिकल्पना ईश्वर को भी खुली चुनौती दी, तथा अपने स्वार्थ के लिए उनका प्रचार-प्रसार करने वाले पुरोहित वर्ग ब्राह्मणवाद के विरोध में खुलकर संघर्ष किया तो वे थे—ई. वी. रामासामी पेरियार। यद्यपि ज्योतिबा फुले और डॉ. आंबेडकर ने भी हिंदू धर्म में व्याप्त रूढि़यों और आडंबरों के लिए ब्राह्मणवाद को जिम्मेदार माना था। फुले तो उसके जन्मदाता ही थे। फुले ने ‘तृत्तीय रतन’, ‘किसान का कोड़ा’ और ‘गुलामगिरी’ जैसी पुस्तकों में ब्राह्मण पुरोहितों द्वारा जनसाधारण के शोषण के बारे में बताया है।  ‘गुलामगिरी’ हिंदू धर्म और संस्कृति का विखंडनात्मक पाठ है। डॉ. आंबेडकर ने ‘हिंदू धर्म की पहेलियां’, ‘जाति का उच्छेद’ जैसी पुस्तकें लिखकर हिंदूधर्म की विकृतियों की बारीकी से पड़ताल की थी। पेरियार ने जनसंवाद का रास्ता अपनाया। ब्राह्मणवाद की कटु आलोचना की; और द्रविड़ संस्कृति को उसके समानांतर लाकर, आमने-सामने की लड़ाई बना दिया था। धर्म और जाति के मामले में वे सीधे उच्छेदवादी थे। देखा जाए तो डॉ. आंबेडकर और पेरियार के बीच यही मामूली अंतर भी है। आंबेडकर जाति को लेकर पूरी तरह उच्छेदवादी हैं। जबकि धर्म के प्रति उनका दृष्टिकोण सुधारवादी था। आरंभ में उन्हें उम्मीद थी कि हिंदू धर्म अपने भीतर सुधार करेगा। ‘जाति का उच्छेद’ पुस्तक लिखकर उन्होंने हिंदू समाज के उस नासूर को सामने लाने का काम किया था, जिससे छुटकारा पाए बगैर हिंदू धर्म का स्वस्थ, मानवीय धर्म बन पाना असंभव था। हिंदू धर्म के नेता, धर्माचार्य उस विकृति का उपचार करेंगे, इसकी वे 20 वर्ष तक प्रतीक्षा करते रहे। इस बीच दूसरे धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन भी करते रहे। अंत में हिंदू धर्म और धर्माचार्यों की ओर से जन्मी निराशा ने उन्हें बौद्ध धर्म की ओर प्रवृत्त कर दिया।  

1920 से 1927 तक पेरियार भी जाति-व्यवस्था और छूआछूत के कारण हिंदू धर्म पर हमलावर रहते हैं। वे जातीय असमानता और धर्म दोनों की आलोचना करते हैं, परंतु धर्म-सत्ता पर पूरी तरह हमलावर नहीं होते। बदलाव उनकी विदेश यात्रा के बाद आता है। यूरोप और सोवियत संघ की प्रगति देखकर वे अचंभित होते हैं। समानता, सहयोग और सहअस्तित्व के आधार पर बनीं वहाँ की नई सामाजिक संरचना उन्हें लुभाती है। वहाँ से ठेठ बुद्धिवादी बनकर लौटते हैं। यात्रा से पहले केवल हिंदू धर्म उनके निशाने पर था। इसलिए कि वह जातिवाद और छूआछूत को प्रश्रय देता; और उन्हें दैवीय बताता था। धीरे-धीरे समूची धर्मसत्ता उनकी आलोचना की जद में आ जाती है। एक नए पेरियार का जन्म होता है, जो बुद्धिवाद का समर्थक है। तर्क और ज्ञान-विज्ञान को महत्व देता है। समाजवादी राज्य का सपना देखता है। मिजाज से नास्तिक है। धर्मसत्ता पर बगैर हिचके प्रहार करता है। 

इस दृष्टि से उनकी तुलना मिखाइल बकुनिन से की जा सकती है। मार्क्स का विचार था कि ‘शक्तिशाली वर्ग राज्य की मदद से शासन करता है’। ‘राज्य और ईश्वर’ में बकुनिन ने लिखा है कि ‘राज्य शक्तिशाली वर्ग की मदद से राज करता है।’ राज्य कुछ और नहीं, शक्तिशाली वर्ग की इच्छा की परिणति होता है। वह इस तरह छाया रहता है कि शक्तिशाली वर्ग की इच्छा ही राज्य की इच्छा मान ली जाती है। जनसाधारण राजनीति और पूँजीवाद के गठजोड़ को न समझ पाए, इसके लिए वह धर्म की मदद लेता है। इसलिए मार्क्स ने धर्म को अफीम की संज्ञा दी थी। बकुनिन धर्म के अभिजन चरित्र को उजागर करता है। कहता है कि राज्य और धर्म का अपवित्र गठबंधन कमजोरों और गरीबों की स्वतंत्रता की सबसे बड़ी बाधा है, अपने स्वार्थ के लिए दोनों उसे विपन्न बनाए रखते हैं। पेरियार मिजाज से अराजकतावादी थे। फिर भी राज्य के प्रति उतने सख्त नहीं थे। कारण यह है कि जिस वर्ग की लड़ाई वे लड़ रहे थे, उसके अधिकारों पर धार्मिक-सांस्कृतिक शक्तियों ने डाका डाला हुआ था। उनके विरुद्ध संघर्ष में राज्य कभी-कभी मददगार की भूमिका निभाने लगता था। उनकी असल लड़ाई ब्राह्मणों तथा उनके धर्म से थी। राज्य के प्रति आलोचक थे तो इसलिए थे कि अपने स्वार्थ के लिए वह पुरोहितवाद को संरक्षण देने लगता है। उनका कहना था कि शूद्रों को ‘वेश्या की संतान’ बनाए रखने के राज्य और ब्राह्मण दोनों मिलकर काम करते हैं। 

अज्ञात का डर समाज में धर्म के लिए जगह बनाता है। इसलिए शूद्रातिशूद्र धर्म की ओर आकर्षित होते हैं। बिना यह जाने कि वे सब व्यवस्थाएं ब्राह्मणों ने अपने वर्गीय हितों को सुरक्षित रखने के लिए बनाई हैं। यह शूद्रातिशूद्रों की अज्ञानता ही है कि उन्होंने अपनी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा मंदिरों में प्रवेश के लिए खपाया है। पेरियार के इस विषय में क्या विचार थे, इसे वायक्कम आंदोलन से समझ सकते हैं। नारायण गुरु ने वायक्कम मंदिर में प्रवेश के अधिकार के लिए शूद्रों के आंदोलन का नेतृत्व किया था। उन दिनों शूद्रों को चुनींदा मार्गों पर ही चलने का अधिकार था। वायक्कम मंदिर के आसपास से गुजरती सड़कों पर भी उन्हें चलने का अधिकार नहीं था। वायक्कम सत्याग्रह की शुरुआत के बाद एक समय ऐसा आया जब पेरियार को उसमें सहभागी बनने के लिए आमंत्रित किया गया। उनके लिए मंदिर प्रवेश कोई मुद्दा नहीं था। वे सत्याग्रह में शामिल हुए। जीत भी मिली, परंतु उनकी प्राथमिकता, अस्पृश्यों की सार्वजनिक मार्गों पर चलने की आजादी को लेकर थी। 25-26 दिसंबर, 1958 को पेरियार ने अपने एक भाषण में उस घटना को याद किया था—

”महारानी(त्रावणकोर) निचली जाति के शूद्रों और अछूतों के लिए सभी मार्ग खोल देने को तैयार थीं। लेकिन, उन्होंने अपने डर के बारे में बताया। उन्हें लगता था कि मैं अछूतों के मंदिर प्रवेश के अधिकार की खातिर आंदोलन को उसके बाद भी जारी रख सकता हूं। गाँधी यात्री-भवन में पहुँचे, जहां मैं ठहरा हुआ था। उन्होंने मेरी राय जाननी चाही। मैंने कहा, ‘क्या अछूतों को सार्वजनिक मार्गों पर चलने का अधिकार प्राप्त होना बड़ी उपलब्धि नहीं है! यूं भी, क्या मंदिर प्रवेश कांग्रेस के आदर्शों में से एक नहीं है। जहां तक मेरी बात है, यह मेरे प्रमुख सरोकारों में से एक है। लेकिन, आप महारानी को खबर कर सकते हैं कि फिलहाल मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर आंदोलन खड़ा करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। मैं आगे क्या करूंगा, इसे तय करने से पहले माहौल शांत होने दीजिए।”18 

पेरियार नास्तिक कैसे बने? क्यों बने? नास्तिक बनने की प्रेरणा उन्हें कहां से मिली? इसकी खोज करते हुए जी. अलोसियस औपनिवेशिक शासन के दौरान प्रशासनिक बदलावों की शुरुआत तक चले जाते हैं।19 उन्हीं के कारण गैर-ब्राह्मणों को शिक्षा के अवसर मिले। औद्योगिकीकरण से वैकल्पिक रोजगार के अवसर बढ़े। इन दोनों ने जाति-प्रथा को कमजोर करने का काम किया। पहले हिंदुओं के प्रमुख ग्रंथ संस्कृत में थे। उसे पढ़ने-लिखने का अधिकार भी केवल ब्राह्मणों तक सीमित था। इसलिए धर्म की व्याख्या के लिए ब्राह्मणेत्तर जातियां ब्राह्मणों पर निर्भर थीं। जैसा वे कहते वैसा मानना ही पड़ता था। बदले परिवेश में वे सभी ग्रंथ अँग्रेजी और दूसरी यूरोपीय भाषाओं में उपलब्ध होने लगे। धर्म-ग्रंथों को पढ़ने-लिखने से लेकर उनकी आलोचना तक का अधिकार समाज के सभी वर्गों को प्राप्त हो गया। पूर्व-स्थापित मान्यताओं का विश्लेषण कर, उनके नए अर्थ निकाले जाने लगे। इस बीच धार्मिक अंतरण के नए रास्ते खुले। धर्मों के बीच स्पर्धा बढ़ने से उनके काम में लगी शक्तियों को सुरक्षात्मक मुद्रा में आना पड़ा। इससे मनुष्य का आत्मविश्वास बढ़ा और वह मुक्ति के नए आयाम खोजने लगा।

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आधुनिक भारत में नास्तिकता को वापस लाने का श्रेय दक्षिण भारत को जाता है। 1878 में वहाँ ‘मद्रास सेकुलर सोसाइटी’ का गठन हुआ था। उसके सदस्य संख्या में कम, मगर सक्रियता के मामले में बहुत आगे थे। अगले दस वर्षों तक वे धर्मसत्ता और उसके विभिन्न अपररूपों पर लगातार प्रहार करते रहे। ‘असुर’, ‘राक्षस’ आदि जिन्हें हिंदू संस्कृति का खलपात्र माना गया है, की उन्होंने पुनर्व्याख्या की। आर्य-श्रेष्ठता के मिथ को चुनौती दी। धर्म के आलोचना पक्ष को मजबूत करने के लिए ‘दि थिंकर’ नाम का अखबार निकाला, जो नास्तिक विचारों का प्रचार करता था। उसके फलस्वरूप धर्म वैसी पवित्र गाय नहीं रह गया था, जैसा वह पहले था। धार्मिक सुधारों की मांग बढ़ रही थी। पेरियार के समय तक हिंदू धर्म के सुधारवादी और यथास्थितिवादी आमने-सामने आ चुके थे। एक वर्ग आधुनिक विचारों के तत्वावधान में उसका नवोन्मेषण चाहता था। दूसरे को उसकी स्वयं-घोषित महानता पर पूरा विश्वास था। इसलिए वह किसी भी प्रकार के बदलाव का विरोधी था। 

हिंदू धर्म की बढ़ती आलोचना और ब्राह्मणों के यथास्थितिवादी दृष्टिकोण ने असंतुष्टों को करीब एक हजार वर्ष पहले लुप्त हो चुके बौद्ध धर्म की खोज के लिए प्रेरित किया। उसकी शिक्षाओं को अपेक्षाकृत आधुनिक और लोकतांत्रिक मूल्यों के करीब माना गया। प्राचीन ‘संघम साहित्य’ एवं बौद्ध धर्म के अंतःसंबंधों की खोज से स्वतंत्र द्राविड़ अस्मिता की अवधारणा को बल मिला। इस क्षेत्र में पहल करने वाले थे—आयोथि थास। उन्हें दक्षिण भारतीय समाज में नवजागरण का अग्रदूत माना जाता है। दक्षिण भारत में प्रचलित जातिप्रथा तथा उसके प्रति लोगों के दुराग्रह पर टिप्पणी करते हुए, आयोथि थास ने कहा था कि द्रविडि़यन आर्यों की जाति-प्रथा को मानते हैं। इस तरह मानते हैं मानो वह उन्हीं का आविष्कार हो। जाति-प्रथा के चलते कृषि, उद्योग, व्यापार, शिक्षा आदि का विकास नहीं हो सकता। क्योंकि ब्राह्मण का उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन होता है। क्षत्रिय शासन करता है और व्यापारियों का काम लेन-देन तक सीमित होता है। केवल शूद्र वर्ग ऐसा है जो खेती और उत्पादन दोनों की जिम्मेदारी संभालता है। लेकिन उसे ज्ञानार्जन का अधिकार नहीं होता। उसके अभाव में वह परंपरागत तरीके से ही काम चलाता है। प्राचीन सभ्यताओं में यह निभ सकता था। क्योंकि उस समय मनुष्य की सीमित आवश्यकताओं की पूर्ति स्थानीय उत्पादक आसानी से कर सकते थे। परंतु वर्तमान में जब मनुष्य की जरूरतें बढ़ती जा रही हैं, परंपरागत ढंग की प्रणालियों से काम चलना आसान नहीं है। इसलिए शोषणकारी जातिप्रथा का उन्मूलन जितनी जल्दी संभव हो, हो जाना चाहिए।‘ थॉस ने अशिक्षित और गरीब जनता को लूटने वाले राजनेताओं को फटकार लगाई थीा उनका कहना था कि वे लोग जनता का हितैषी बनकर उसे लूटने का काम करते हैं। ब्राह्मण कहते हैं कि शूद्रों को वेदादि ग्रंथ पढ़ने का अधिकार नहीं है। इस तरह की भेदभावपूर्ण नीतियों को बनाने वाला ईश्वर हो ही नहीं सकता। वह कुटिल ब्राह्मण अथवा कोई निरंकुश ताकत हो सकता है. ऐसे ईश्वर के प्रति आस्था का प्रदर्शन करने से अच्छा है कि किसी महापुरुष की अभ्यर्थना कर ली  जाए।

आगे बढ़ने से पहले एक बात और। भारत में धार्मिक-सामाजिक सुधारवाद की शुरुआत का श्रेय बंगाल को देने की परंपरा रही है। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि राजाराममोहन राय, ईश्वरचंद विद्यासागर, केशवचंद सेन, देवेंद्रनाथ ठाकुर आदि भारत के आरंभिक सुधारवादियों का संबंध बंगाल से था। उनकी विशेषता, जिसे उनकी कमजोरी भी कहा जा सकता है, थी कि वे हिंदू धर्म की परिसीमा में रहते हुए, धार्मिक-सामाजिक सुधारों को अंजाम देना चाहते थे। धार्मिक-सामाजिक सुधारवाद की समानांतर लहर दक्षिण से भी चली थी, जो अपेक्षाकृत निर्णायक और अधिक परिवर्तनकामी थी। दक्षिण में जन्मे संत अय्यंकालि, आयोथि थास आदि ने वहाँ धार्मिक-सामाजिक सुधारवादी आंदोलनों का नेतृत्व किया था। उनमें और बंगाल के सुधारवादियों में मूल-भूत अंतर यह था कि बंगाल के सुधारवादी हिंदू धर्म के प्रति अधिक आशान्वित थे। मानते थे कि सुधारों के माध्यम से हिंदू धर्म को अधिक मानवीय बनाया जा सकता है। वहीं दक्षिण के सुधारवादी हिंदू धर्म को सुधार का अवसर देना चाहते थे। लेकिन यदि हिंदू धर्म अपेक्षित सुधारों के लिए तैयार नहीं होता है तो उन्हें उसे छोड़ देने से भी गुरेज नहीं था। एक और बड़ा अंतर जिसका संबंध पहले से ही है, वह यह है कि बंगाल और उत्तर भारत के सुधारवादियों का विश्वास था कि यदि हिंदू धर्म में ऊपर के वर्गों में सुधार होता है, तो सुधार की वह प्रक्रिया, प्रकारांतर में निचले वर्गों में भी अंतरित होगी। इसलिए धार्मिक सुधारवाद की पहल उन्होंने समाज के शीर्षस्थ वर्गों के साथ आरंभ की थी। जबकि संत अय्यंकालि, पेरियार जैसे दक्षिण भारतीयों ने अपना कार्यक्रम निचले वर्गों के बीच से शुरू किया था। ठीक ऐसे ही जैसे ज्योतिबा फुले ने महाराष्ट्र में किया था। वे निचले वर्गों को मजबूत करके, ऊपर के वर्गों को चुनौती देना चाहते थे कि धर्म, समाज और देश-हित में उन्हें आवश्यक सुधारों को स्वीकार लेना चाहिए। इसके बीजतत्व दक्षिण भारतीय साहित्य और संस्कृति में पहले से ही मौजूद थे। तमिल में तीसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व के संघम साहित्य से लेकर, संत तिरुवेलुवर तक साहित्य और संस्कृति की प्राचीनतम परंपरा थी, जो आर्य-संस्कृति की श्रेष्ठता के मिथ को नकारती थी। पेरियार के आत्मसम्मान आंदोलन की पृष्ठभूमि में वही विचारधारा थी। पांचवी शताब्दी का जैन काव्य ‘नीलकेसी’ तथा उसकी प्रतिक्रिया में रचा गया, बौद्ध काव्य ‘कुंडालकेसी’ वहाँ बौद्ध एवं जैन धर्म की न केवल उपस्थिति दर्शाता है। बल्कि जिस तरह ‘नीलकेसी’ की प्रतिक्रिया में बौद्ध आचार्य ‘कुडांलकेसी’ की रचना करते हैं, उससे लगता है कि उस समय भारतीय धर्म-दर्शन की ये दोनों शाखाएं दक्षिण में काफी जीवंत रूप में विद्यमान थीं। उनके बीच बहस होती रहती थी। इनके साथ-साथ मक्खलि गोशाल का ‘आजीवक’ संप्रदाय भी हर्षवर्धन के काल तक अपनी उपस्थिति बनाए हुए था। 

नास्तिकता, पेरियार के बचपन के अनुभवों का उपहार थी। उनके पिता की दुकान पर हिंदू साधु-संत आते थे। अधिकांश का मकसद होता था, दान-दक्षिणा के नाम पर कुछ न कुछ ऐंठ लेना। पेरियार ने इसे करीब से देखा था। ब्राह्मणों का लालच देखकर कभी-कभी वे उनका उपहास भी करने लगते थे। इसके अलावा, किशोरावस्था से ही पेरियार को जिन्होंने प्रभावित किया, उनमें से एक थे मुरुथैया पिल्लई। मरुथैया इरोड के ही रहने वाले थे। वे तमिल के प्रखर विद्वान, ओजस्वी वक्ता, जाति, परंपरावाद, धार्मिक आडंबरों और धर्म के कटु आलोचक थे। ब्राह्मण उनके सामने पड़ने से कतराते थे। पेरियार को आलोचना दृष्टि को समृद्ध करने वालों में दूसरा नाम था—कैवल्य सामियार का। मुरुथैया पिल्लई की भांति कैवल्य सामियार भी तर्कवादी और ब्राह्मणवाद के कट्टर आलोचकों में से थे। इन दोनों के जीवन के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। पेरियार के जीवनीकार और आत्मसम्मान आंदोलन के नेता चिदंबरानार के अनुसार, इन दोनों की पेरियार के चरित्र-निर्माण में बड़ी भूमिका थी। 

काशी यात्रा के दौरान उनका परिचय हिंदू धर्म की विकृतियों से हुआ था। 1933 में विदेश यात्रा के बाद तो उनका विश्वास धर्म नामक संस्था से बिलकुल उठ चुका था। मास्को पहुँचने पर उन्होंने ‘एंटी रिलीजियस प्रापेगेंडा ऑफिस में अपना पंजीकरण भी कराया था। उनका मानना था कि वर्गहीन समाज की रचना हेतु धर्म से मुक्ति आवश्यक है। सोवियत संघ की प्रगति, वहाँ की सामाजिक रचना से वे इतने प्रभावित थे कि वहाँ से लौटते ही उन्होंने आत्मसम्मान आंदोलन की वैचारिकी और संगठन में भारी फेरबदल करने का निर्णय किया था। बावजूद इसके सोवियत संघ की तरह सत्ता का सघन केंद्रीकरण, उसकी समस्त कार्यकारी शक्तियों का एक जगह जमा हो जाना—उन्हें स्वीकार न था। भारत के लिए वे उदार साम्यवाद की कल्पना करते थे। उनका मानना था कि ब्राह्मणों की धार्मिक-सामाजिक अधिसत्ता के रहते, भारत में सोवियत मॉडल को लागू कर पाना संभव नहीं है। 7 जून, 1931 के ‘कुदीआरसु’ में उन्होंने लिखा था कि गैर-ब्राह्मणों और अछूतों, गरीब और कामगार लोगों को यदि वे समानता और समाजवाद लाना चाहते हैं, तो सबसे पहले हिंदुत्व को खत्म करना होगा। सोवियत संघ से वे श्रीलंका के रास्ते भारत लौटे थे। वहाँ कोलंबों में दिए गए भाषण में उन्होंने एक बार फिर मनुष्यता, आत्मसम्मान और देश के लिए ईश्वर तथा धर्म का बहिष्कार करने का आग्रह किया था।20

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विदेश यात्रा से लौटने के बाद ‘कुदीआरसु’ में समाजवाद और नास्तिकता विषयक लेखों की संख्या बढ़ी थी। भगतसिंह के लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ का तमिल अनुवाद, ‘नान नाथिकन येन’ शीर्षक से पी. जीवानंदम् ने किया था। पी. जीवानंदम् ‘मद्रास प्रांत नास्तिक संगठन’ के सचिव, विचारों से साम्यवादी और पेरियार के सहयोगी थे। ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ का प्रथम पुस्तिकाकार प्रकाशन पेरियार द्वारा स्थापित ‘पहुथारिवु पब्लिशिंग हाउस लिमिटेड’ ने 1934 में किया था। तमिल शब्द ‘पहुथारिवु’ का अर्थ ‘तर्कशील’ है। पुस्तक में पेरियार द्वारा 29 मार्च 1931 को ‘कुदीआरसु’ में भगतसिंह की शहादत पर लिखित संपादकीय को भी शामिल किया गया था। भूमिका में प्रकाशक की ओर से लिखा गया था कि वे भगतसिंह की राजनीतिक विचारधारा से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। पुस्तिका का मूल उद्देश्य आम जनता, विशेषकर नास्तिकों तथा कांग्रेसजनों को भगतसिंह के ईश्वर-संबंधी विचारों से परचाना है। 46 पृष्ठों की पुस्तिका के पहले 40 पृष्ठों पर मूल लेख छपा था। बाद के 6 पृष्ठों में ‘कुदीआरसु’ के संपादकीय को जगह मिली थी। संपादकीय में पेरियार ने भगतसिंह तथा उनके साथियों के साहस और बलिदान की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। उसमें भगतसिंह द्वारा पंजाब के गवर्नर को लिखे गए पत्र के एक अंश को भी उद्धृत किया गया—

‘हमारी लड़ाई निश्चित रूप से उस समय तक चलती रहेगी, जब तक कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता में नहीं आ जाती और लोगों के स्तर में जो अंतर है, वह समाप्त नहीं हो जाता। यह युद्ध हमें मार देने से समाप्त नहीं होगा। प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप यह संघर्ष हमेशा जारी रहेगा।’

संपादकीय में गाँधी के साथ-साथ लार्ड इरविन की भी आलोचना थी। विचित्र बात यह है कि भगतसिंह द्वारा मूल अँग्रेजी में लिखे गए उस लेख में औपनिवेशिक सरकार को कुछ भी ‘निषिद्ध’ या ‘आपत्तिजनक’ नहीं लगा था। हालाँकि धर्माचायों की आंखों की किरकिरी वह आरंभ से ही था। पेरियार द्वारा तमिल अनुवाद के साथ पंजाब के गवर्नर को लिखे पत्र का संदर्भ जोड़ देने से वह औपनिवेशिक शासकों की दृष्टि में भी ‘अपराध’ बन चुका था। इसलिए पुस्तिका के छपते ही उसका संज्ञान लिया गया। अगस्त 1934 में ‘आपराधिक जांच विभाग’ की स्थानीय शाखा ने उसके बारे में सरकार को लिखा। बिना समय गंवाए सीआईडी ने पुस्तिका की प्रतियां सरकार को भिजवा दीं। मद्रास सरकार के मुख्य सचिव जी.टी.एच. ब्राकेन ने मद्रास सरकार के कार्यालय में कार्यरत तमिल अनुवादक एन. सरवण मुदलियार, से पूरी पुस्तिका का अनुवाद करने को कहा। मुदलियार ने आपत्तिजनक अंशों को हाईलाइट करते हुए, 16 अक्टूबर 1934 को अनुवाद की प्रति ब्राकेन को भेज दी गई। ब्राकेन ने 22 अक्टूबर, 1934 को भारतीय प्रेस(आपातकालीन शक्तियां) अधिनियम—1931 के अनुच्छेद 19(1) के अंतर्गत पुस्तिका और उससे जुड़ी सामग्री को जब्त करने के आदेश जारी कर दिए। आदेश में पुस्तिका की सामग्री को अधिनियम की धारा 4(1) के अंतर्गत आपत्तिजनक माना गया था। नोटिफिकेशन जारी होते ही, पुस्तिका की प्रतियां जब्त कर ली गईं। तब तक भगतसिंह के विचारों की चिंगारी वडवानल बन चुकी थी। पुस्तिका से प्रेरणा लेकर तरह-तरह के पंपलेट, पुस्तिकाएं, चित्र, कार्टून वगैरह भारी मात्रा में प्रकाशित हो चुके थे। न केवल तमिल, अपितु क्षेत्रीय भाषाओं मलयालम, तेलुगू, कन्नड़ आदि में भी भगतसिंह और उनके साथियों के समर्थन में विपुल सामग्री का प्रकाशन हुआ था। नतीजा यह हुआ कि सरकार द्वारा पुस्तक तथा संबंधित सामग्री, की जब्ती की कार्रवाही, 1938 तक चलती रही। कह सकते हैं कि दक्षिण तक भगत सिंह के विचारों को ले जाने तथा उन्हें लोकप्रिय बनाने में पेरियार की बड़ी भूमिका थी। यह कहना भी अन्यथा न होगा कि जिस परिवेश और परिस्थिति में पेरियार ने वह काम किया, वैसा करने का साहस भी उन दिनों किसी में नहीं था। 

भगतसिंह की पुस्तक के अलावा बर्ट्रेंड रसेल की ‘व्हाई आम एम नाट ए क्रिश्चन’, लेनिन की जीवनी, राबर्ट इंगरसोल की समाजवाद विषयक पुस्तकों के तमिल अनुवाद भी पेरियार के प्रकाशन द्वारा छापे गए थे। उनका मानना था कि ईश्वर, धर्म और उनसे जुड़े अनगिनत कर्मकांड प्रगतिशील समाज के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा हैं। लेकिन समाज में सभी के लिए नास्तिक बन पाना आसान नहीं है। खासकर तब जब कुछ अपवादस्वरूप लोगों को छोड़, लगभग सभी धर्मविहीन जीवन को असंभव मानते हों। इसलिए उन लोगों के लिए पेरियार ने, महज रणनीति के तौर, यह सोचकर कि दबाव में आने पर हिंदू धर्म संभवतः अपने पुनरावलोकन के लिए तैयार हो—उन्होंने इस्लाम और बौद्ध धर्म का समर्थन किया था। हालाँकि व्यक्तिगत जीवन में वे पूरी तरह नास्तिक थे। 1969 में उन्होंने कहा था—

‘मैं मनुष्यता का सुधारक हूं। मैं किसी देश, ईश्वर, धर्म, भाषा अथवा राज्य की परवाह नहीं करता। मेरे सरोकार केवल और केवल मानव समाज की उन्नत्ति और विकास तक सीमित हैं।’

तमिल नाडु में कम्युनिस्ट आंदोलन की नींव रखने का श्रेय सिंगरावेलु चेट्टियार, जिन्हें लोग सम्मान के साथ ‘सिंगरावेलु’ कहते थे—को जाता है। उन्होंने ही मद्रास में 1 मई 1923 को ‘लेबर किसान पार्टी ऑफ़ हिंदुस्तान’ की स्थापना की थी। उसी दिन भारत में ‘मई दिवस’ को उत्सव की तरह मनाने की शुरुआत हुई थी। सिंगरावेलु, पेरियार से बीस वर्ष बड़े थे। दोनों के प्रगाढ़ संबंध थे। धर्म और जाति के प्रति दोनों के विचारों में एकरूपता थी। सिंगरावेलु का कहना था, ‘प्रत्येक धर्म समाज के शिखर पर बैठे लोगों का समर्थन करता है। वह ‘सर्वसंपन्न’ एवं ‘सर्वविपन्न’ के भेद को स्थायी भाव देता है, असमानता को नियतिसिद्ध कहकर मनुष्य को जन्म के आधार पर छोटा-बड़ा मान लेता है। सभी भाई हैं, सभी का एक ईश्वर है, यदि हम अपने आसपास की दुनिया को देखें तो ये बातें एकदम मिथ्या और प्रपंच सिद्ध होती हैं, मगर समाज में इन्हीं पर घमासान छिड़ा रहता है।’

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सिंगरावेलु के संपर्क में आने के बाद पेरियार ने अपने साथियों को ‘कामरेड’ कहना आरंभ किया था। बावजूद इसके पेरियार का मार्क्सवाद, खासकर उसकी वर्ग-संघर्ष की वैचारिकी में ज्यादा विश्वास नहीं था। वे सिंगरावेलु के बुद्धिवादी सोच से प्रभावित थे। उनके आग्रह पर ही सिंगरावेलु ने ‘कुदीआरसु’ के लिए कई विज्ञान-केंद्रित लेख लिखे थे। ‘इरोड कार्यक्रम’ का ड्राफ्ट भी सिंगरावेलु ने ही तैयार किया था। उस समय सिंगरावेलु ने आत्मसम्मान आंदोलन के नाम को लेकर एक सवाल उठाया था। उनका कहना था कि इसे ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ कहना उचित होगा; अथवा ‘अवमानना आंदोलन’?21 इस प्रश्न के पीछे सिंगरावेलु के भीतर छिपा वर्ग-संघर्ष का योद्धा बोल रहा था। ‘अवमानना आंदोलन’ का आशय था, सामाजिक असमानता के लिए लिए जिम्मेदार ‘बुर्जुआ’ सोच वाली शक्तियों का तिरस्कार। उन्हें सीधी चुनौती, तथा उनकी सार्वजानिक भर्त्सना। पेरियार को सीधे टकराव से किसी प्रकार का संकोच नहीं था। भविष्य में ऐसे कई अवसर आए जब पेरियार तथा उनके विरोधी आमने-सामने थे; और पेरियार ने ‘न दैन्यम न पलायनम’ की भावना के साथ उनका सामना किया था। बावजूद इसके वे ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ का नाम बदलने को तैयार नहीं थे। सिंगारवेलार ने भले ही मजाक में नाम बदलने का सुझाव दिया हो, परंतु नाम न बदलकर पेरियार ने एक तरह से अच्छा ही किया था। क्योंकि आगे चलकर वे समाज को ‘ब्राह्मण बनाम गैर-ब्राह्मण’ और ‘आर्य बनाम द्रविड़’ में बांटने में सफल रहे थे। 

पेरियार का विश्वास साम्यवाद से ज्यादा समाजवाद में था। इसका एक कारण यह भी है कि नवगठित कम्युनिस्ट पार्टी में भी प्रमुख पदों पर ब्राह्मण छाने लगे थे। वर्ग-संघर्ष उनके लिए महज नारा था। एक तरह से कृत्रिम लड़ाई। जिन यूरोपीय देशों में जहां साम्यवाद को कामयाबी मिली थी, वहाँ मशीनीकरण काफी तरक्की कर चुका था। भारत में मशीनीकरण आरंभिक दौर में था। कहने को तो वर्ग-क्रांति के समय सोवियत संघ भी भारत की तरह औद्योगिक प्रगति में पिछड़ा हुआ था। परंतु वहाँ लेनिन और ट्रोट्स्की ने वर्ग-संघर्ष की वैचारिकी का स्थानीयकरण करते हुए, संयुक्त खेती का विचार रखा था। उसके फलस्वरूप वहाँ वोल्शैविक क्रांति की जमीन तैयार हुई। भारत में अधिकांश कृषि भूमि पर समाज की ऊंची जातियों का कब्जा था, उन्हीं से निकले नेता कम्युनिस्ट पार्टी तथा उसके सहायक संगठनों को कब्जाए हुए थे। सामूहिक खेती के विचार से उनके अपने हितों को नुकसान पहुँच सकता था। इसलिए उनकी राजनीति मजूदर आंदोलनों और हड़तालों से आगे न बढ़ सकी। दूसरे शब्दों में भारतीय कम्युनिस्ट संगठन ऐसे वर्ग के भरोसे वर्ग-संघर्ष का सपना देखते रहे, जो वास्तव में था ही नहीं। शताब्दियों पहले जो काम तुलसी, सूरदास, मीरा जैसे भक्त कवियों ने रैदास, कबीर, दादूदयाल आदि संत कवियों द्वारा शुरू की गई सामाजिक क्रांति को तेजहीन करके किया था, वही धत्त-कर्म भारत के साम्यवादी दलों ने कम्युनिस्ट विचारधारा के साथ किया था। 

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दुनिया भर में प्रचलित धर्मों में पेरियार यदि किसी धर्म के प्रति नर्म नजर आते हैं तो वह है, बौद्ध धर्म। हिंदू धर्म के अलावा उन्होंने यदि किसी धर्म पर लगातार चर्चा की है, तो वह बौद्ध धर्म की। हिंदू धर्म के प्रति उनकी दृष्टि आलोचनात्मक है, वहीं बौद्ध धर्म के प्रति हम उन्हें सहानुभूतिपरक पाते हैं। दोनों के बीच वे बौद्ध धर्म श्रेष्ठतर मानते थे। हिंदू धर्म में बढ़ती धर्मांतरण की घटनाओं के लिए ब्राह्मण ईसाई मिशनरियों को जिम्मेदार मानते थे। पेरियार का विचार था कि हिंदू धर्म ने ही भारत में ईसाई धर्म और इस्लाम की राह आसान की है—

‘जो दुष्टता वे(ब्राह्मण) गैर-ब्राह्मणों के साथ बरतते हैं, वह उस दुष्टता से कम है जो वे मुस्लिमों और ईसाइयों के साथ बरतते हैं। मगर अछूतों के साथ वे जिस निर्दयता के साथ पेश आते हैं, वह किसी भी अन्य अत्याचार से बढ़कर है। अपरोक्ष रूप में हिंदू धर्म ने ही इस्लाम और ईसाई धर्म के फलने-फूलने के लिए रास्ता तैयार किया है। हिंदू धर्म बाकी दोनों धर्मों के लिए लाभकारी सिद्ध हुआ है। अतएव हिंदू धर्म को नष्ट करना, गैर-ब्राह्मणों और अछूतों की सबसे बड़ी प्राथमिकता है।’22 

गौरतलब है कि दक्षिण भारत में हिंदू धर्म से इस्लाम और ईसाई धर्म की ओर अंतरण की प्रक्रिया बहुत पहले आरंभ हो चुकी थी। उनीसवीं शताब्दी में ईसाई मिशनरियों को भारत में प्रवेश की अनुमति मिलने के बाद उसमें और भी तेजी आई थी। ब्राह्मणों का मानना था कि ईसाई मिशनरियां निचली जातियों को तरह-तरह के प्रलोभन देकर उन्हें धर्मांतरण के लिए उकसाती हैं। मुगलों के शासनकाल में जहां बलपूर्वक कुछ लोग मुस्लिम बनाए गए, वहीं स्वेच्छा से इस्लाम में शामिल होने वालों की संख्या भी काफी थी। पेरियार के लिए धर्मातंरण का मुद्दा आस्था से ज्यादा सामाजिक महत्व का था। उनका मानना था कि हिंदू धर्म की आंतरिक संरचना, उसमें गैर-ब्राह्मणों एवं अछूतों की निम्नतम स्थिति उन्हें धर्मांतरण के लिए विवश करती है—

‘हमारे देश के एक करोड़ ईसाई कौन हैं? हमारे राष्ट्र में 7 करोड़ मुस्लिम कौन हैं? ब्राह्मणों एवं धार्मिक नेताओं के अत्याचारों के कारण वे धर्मांतरण के लिए बाध्य हुए थे। वे हमारे ही भाई हैं। वे यरोशलम या अरब से नहीं आए हैं।

हम 24 करोड़ लोग खुद को सम्मानित कैसे मान सकते हैं? मुस्लिम हमें ‘काफिर’ कहते हैं। ईसाई हमें ‘धार्मिक रूप से भटके हुए लोग’ बताते हैं। अँग्रेज हमें ‘कुली’ कहते हैं। ब्रिटेन हमें ‘असभ्य’ बताता है; और ब्राह्मण हमें ‘शूद्र’ कहते हैं। हम इन संबोधनों से अपमानित महसूस नहीं करते। धर्म के नाम पर चुनींदा सार्वजनिक मार्गों पर चलने से हमें आज भी रोका जाता है। वेदों में केवल चार जातियां हैं, लेकिन अब  यहाँ  4000 से अधिक जातियां हैं। ये जातियां भी अपनी पहचान बनाए रखने के लिए जूझती रहती हैं।’23 

पेरियार ने हिंदू धर्मग्रंथों की खुली आलोचना की थी। इतने तीखे स्वरों में कि विरोधी तिलमिला उठते थे। उनके निष्कर्ष तर्क केंद्रित होते थे। तार्किक विश्लेषण करते समय प्रायः वे निर्मम भी हो जाते थे। ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की पत्रिकाओं विदुथलाई, कुदीआरसु और रिवोल्ट में हिंदू धर्म की आलोचना से जुड़े सैंकड़ों आलेख प्रकाशित हुए थे। लेखकों में पेरियार के अलावा एस. गुरुसामी और रामानाथन शामिल थे। प्रकाशित लेखों में कुछ की शैली विवेचनात्मक है तो कुछ की व्यंग्य प्रधान। कल्पना कर सकते हैं कि जिन दिनों ‘हिंदू महासभा’ जैसे संगठन हिंदू धर्म के पुनरुद्धार में जुटे थे। जिनका सपना स्वतंत्र भारत को ‘हिंदू राज्य’ के रूप में देखना था, उन्हीं दिनों पेरियार अपने सहयोगियों के साथ हिंदू देवी-देवताओं तथा उनसे जुड़े मिथों की निरंतर पड़ताल में लगे थे। यदि हिंदू कट्टरपंथी, पेरियार की तीखी, तेज-तर्रार भाषा को सहने के लिए विवश थे तो इसलिए कि लगभग पूरा का पूरा गैर-ब्राह्मण समाज पेरियार के समर्थन में था। उनका मानना था कि मनुस्मृति, गीता, रामायण, महाभारत, पुराणादि ग्रंथ ब्राह्मणवाद को थोपने के लिए रचे हैं। उनमें वर्णित आख्यान विशुद्ध काल्पनिक हैं। उन्होंने लोकप्रिय हिंदू देवताओं, ब्रह्मा, विष्णु, महेश की त्रयी के अलावा इंद्र, कार्तिकेय, गणेश, राम और कृष्ण के चरित्र की बिना किसी झिझक या भय के आलोचना की थी। हमें ध्यान रखना चाहिए कि जिस समय गाँधी गीता और रामायण को भारत की राष्ट्रीय एकता का आधारग्रंथ घोषित कर रहे थे, राम को आदर्श पुरुष बताते हुए रामराज्य का सपना पूरे देश को दिखा रहे थे, उन्हीं दिनों पेरियार उनकी अन्वीक्षा में लगे थे। उपलब्ध रामकथाओं का विश्लेषण करते हुए उन्होंने ‘रामायण’ का पुनर्पाठ किया था, जो आगे चलकर ‘सच्ची  रामायण’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ विवाद का कारण बना। रावण को वे द्रविण संस्कृति के आदि संरक्षक के रूप में देखते थे। रामायण के बारे में उनका विचार था—

‘रामायण एक षड्यंत्रकारी कथा है, उसे केवल ब्राह्मणों ने वर्णाश्रम धर्म की रक्षा हेतु रचा था। उसके माध्यम से वे अपनी वैचारिकी को स्थापित करना चाहते हैं, कहते हैं कि विष्णु ने राम के रूप में अवतार लिया था।’

सीता को रावण की कैद से छुड़ाने के बाद राम राजगद्दी पर थे। तभी एक किशोर ब्राह्मण बालक मर गया। उसका पिता राम के पास जाकर बोला—‘तुम और तुम्हारे लोग धर्म के विरुद्ध काम कर रहे हैं, इसलिए आज मेरा बेटा मृत्यु को प्राप्त हुआ। एक ब्राह्मण को सौ वर्ष तक जीना चाहिए। ब्राह्मण पुत्र के अकाल मौत मरने का मतलब है कि उस देश का राजा शास्त्र-विरुद्ध काम कर रहा है।’24 ‘रामायण का अंत कैसे होता है? यह बताते हुए कि शूद्र ऋषि शंबूक की प्रार्थना करने पर ब्राह्मण पुत्र की मृत्यु हुई थी। राम द्वारा शंबूक की हत्या करते ही ब्राह्मण का मृत पुत्र जीवित हो उठता है। इससे वे लोगों को क्या समझाना चाहते हैं? यह कि शूद्र को ईश्वर की सीधे पूजा नहीं करनी चाहिए। वह केवल ब्राह्मण के माध्यम से पूजा कर सकता है।’25 वर्णाश्रम व्यवस्था में मनुष्य के लिए सौ वर्ष की आयु निर्धारित की गई। लेकिन, वाल्मीकि या तुलसी यह नहीं बताते कि उस समय गैर-ब्राह्मणों की औसत आयु और सामाजिक स्थिति क्या थी। गौरतलब है कि धर्म और जाति के आधार पर समाज का विभाजन प्रकारांतर में आर्थिक विभाजन को भी न्योता देता है। जनसाधारण का उस ओर ध्यान न जाए, इसलिए कर्म-सिद्धांत गढ़ा गया है। धर्म किस प्रकार आर्थिक विषमता को जायज बनाता है। इस बारे में पेरियार का विचार था—

‘इन दिनों भिक्षा मांगने वाला ब्राह्मण भी दिन में दो बार कॉफ़ी पी लेता है, परंतु एक किसान जो कड़ी धूप में दिन-भर श्रम करता है, उसे नमक मिले मांड से काम चलाना पड़ता है। जबकि मंदिर या होटल में काम करने वाला ब्राह्मण अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देकर कलेक्टर, जज, मंत्री, प्रधानमंत्री तक बना सकता है। दूसरी ओर मेहनतकश लोगों को निचले पदों से संतोष करना पड़ता है।’26 

अपने लेखों में पेरियार बार-बार धर्म और जाति की बात उठाते हैं। हर बार मांग करते हैं, कि जाति को आमूल नष्ट होना चाहिए। इसलिए कि जाति की मदद से समाज के बड़े हिस्से को मूलभूत सुख-सुविधाओं तथा जीवन के मामूली अधिकारों से भी वंचित किया गया है। 

7

सवाल है कि ब्राह्मणवाद को मजबूत करने में धर्म की भूमिका बड़ी है या जाति की। पेरियार का निष्कर्ष है, जाति की। ब्राह्मण जाति और धर्म दोनों के शिखर पर मौजूद है। अकेले धर्म की मदद से वह समाज के शिखर पर नहीं रह सकता। जाति ब्राह्मण के अधिकारों का संरक्षण करती है। वह न हो तो किसी भी जाति-वर्ग का व्यक्ति धार्मिक कर्मकांडों का संचालन कर सकता है। जैसा विदेशों में है। वहाँ मोची का बेटा चर्च में पादरी या बड़ा धर्म-पुरुष बन सकता है। हिंदू धर्म में ये पद केवल ब्राह्मणों के लिए आरक्षित हैं। इसलिए जाति की सुरक्षा के लिए ब्राह्मण कोई भी धत्तकर्म करने को तैयार रहता है। गौतम बुद्ध, महर्षि दयानंद, स्वामी विवेकानंद से लेकर गाँधी तक, जिन्होंने भी जाति-संबंधी नियमों को शिथिल करने की कोशिश की थी, सभी को अपने प्राणों से हाथ धोने पड़े थे। गाँधी की ह्त्या भी एक ब्राह्मण ने की थी। पेरियार के अनुसार गाँधी स्वयं जातिवाद के समर्थक थे—

‘‘महात्माओं में सबसे बड़े महात्मा(गाँधी) कहते हैं, दुनिया सदगुण-संपन्न है। क्या उन्होंने कभी यह मांग की कि जाति का उच्छेद होना चाहिए? उन्होंने बस इतना कहा है कि छूआछूत नहीं रहनी चाहिए। क्या उन्होंने एक शब्द भी इस बारे में कहा है कि जाति का नाश होना चाहिए? उन्होंने बस यही कहा है, ‘मैंने हिंदू धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष किया है। मैं वर्णाश्रम धर्म समर्थित समाज से हूं। मेरा प्रथम उद्देश्य रामराज्य की स्थापना करना है।’ बावजूद इसके गाँधी को छूआछूत उन्मूलन के कार्यक्रमों की कीमत अपने प्राण देकर चुकानी पड़ी थी।(इसका आशय है कि लोग गाँधी जितना उदार बनने या उनसे कुछ सीखने को भी तैयार नहीं हैं)। वर्णाश्रम व्यवस्था कहती है कि शूद्रों को पढ़ने का अधिकार नहीं है। परंतु गाँधी अपने समय के दबावों के चलते यह मानने को विवश थे कि शूद्रों को भी पढ़ने का अधिकार है। आखिर क्या हुआ?—‘उन्हें तीन गोलियों का शिकार बनना पड़ा….उन्हें एक ब्राह्मण द्वारा गोली मारी गई थी। गाँधी ने कहा था कि हिंदू धर्म और इस्लाम एक ही हैं(अल्लाह, ईश्वर सब एक ही परमशक्ति के नाम हैं), इसलिए उनकी हत्या कर दी गई।”27  

साफ है कि ब्राह्मण के लिए धर्म से ज्यादा जाति प्रिय है। यदि कुल जनसंख्या के मात्र 3 प्रतिशत ब्राह्मण अपने स्वार्थ के लिए संगठित होकर, धर्म और जाति का इस्तेमाल करते हैं, तो बाकी लोगों का भी दायित्व बनता है कि स्वयं को अमानवीय जातीय विषमता से बचाने के लिए उसका इस्तेमाल अपने संगठन को मजबूत करने के लिए करें । इसके लिए जरूरी है—

‘द्रविड़ जनता उन मंदिरों में न जाए, केवल ब्राह्मण पुरोहित पूजा कराते हैं। खासतौर पर उन मंदिरों का बहिष्कार करे, जहां यह नियम है कि केवल ब्राह्मण ही पुरोहित बनकर पूजा-पाठ करा सकते हैं। यदि वे ऐसे मंदिरों में जाते भी हैं तो उन्हें चाहिए कि ब्राह्मणों द्वारा संपन्न कराई जाने वाले पूजा-पाठ अथवा दूसरे कर्मकांडों में हिस्सा न लें।’28 

पेरियार बहुत पढ़े-लिखे भले न हों, मगर सत्ता और धर्म के गठजोड़ को भली-भांति समझते थे। जानते थे कि धर्म को चुनौती देने के लिए उन मिथों को संद्धिग्ध बनाना होगा, जिनके माध्यम से कोई धर्म जनमानस में पैठ बनाता है। इसलिए बिना कोई नर्मी दिखाए उन्होंने हिंदू धर्मशात्रों तथा उनके द्वारा स्थापित मिथों की आलोचना की थी। जैसे गाय और हनुमान का मिथ। शंकराचार्य का वेदांत दर्शन ईश्वास्योपनिषद के इस कथन पर विश्वास करता है—’सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शांत उपासीत’—यानी जो दृष्टिगोचर है, वह ब्रह्म है। लेकिन व्यवहार में तो मनुष्यों की भांति पशुओं के बीच भी रंग और प्रजाति के आधार पर भेदभाव किया जाता है। पेरियार इस तरह के अंधविश्वासों पर मुखर थे—

‘प्रत्येक संस्कृति में अंधविश्वास नकारात्मक सोच की तरह पैठा है। वह मानव-मस्तिष्क में वैज्ञानिक सोच और तर्कशीलता को ग्रस लेता है। सांपों के प्रति डर उन्हें पूजनीय बनाता है। यह सरासर अंधविश्वास है कि सांप को पूजने के बाद वह मनुष्य को नुकसान नहीं पहुँचाएगा। विद्वानों के अनुसार आधुनिक भारत में अंधविश्वास इतना शक्तिशाली है कि  यहाँ  बंदरों की पूजा भी हनुमान के रूप में की जाती है। जिसकी छोटी-छोटी मूर्तियां देश-भर में जगह-जगह लगी हैं। उनके अलावा राजमार्गों पर विशालकाय मूर्तियां भी नजर आती हैं। इसकी न तो कोई वैज्ञानिक तुक है, न ही कारण। हमारे देश में 21वीं शताब्दी का सबसे बड़ा अंधविश्वास है, बंदर की पूजा। हनुमान की 60 फुट ऊंची प्रतिमा की पूजा तमिल नाडु में होती है। इस मूर्खता पर कोई सवाल क्यों नहीं उठाता!

उसके अलावा गाय है, जिसे हिंदू पवित्र मानते हैं और जिसे सभी हिंदुओं की मां कहा जाता है….कुल मिलाकर, पवित्रता और अपवित्रता की अवधारणाएं महज धार्मिक टोटम हैं।’29 

गाय को लेकर एक जगह वे लिखते हैं, ‘शंकराचार्य कहते हैं, गौहत्या पाप है। वे सभी जानवरों की प्राण-रक्षा की मांग नहीं करते, केवल गाय की करते हैं।30 

पेरियार का मानना था कि विशेषाधिकार प्राप्त अभिजन ब्राह्मण, भारत में वर्गहीन, समानता पर आधारित समाज की स्थापना की सबसे बड़ी बाधा हैं। उन्होंने गैर-ब्राह्मणों, दलितों और स्त्रियों की अवमानना, उनके लिए निराशाजनक स्थितियों का निर्माण करने, आजादी की राह में मुश्किल खड़ी करने के लिए ब्राह्मणों को जिम्मेदार माना था। स्त्री-समानता पर उनके विचार अपने समकालीन नेताओं की अपेक्षा कहीं ज्यादा आधुनिक थे। वैदिक रीति से विवाह, जिसमें पंडित मंत्रोच्चार करता है, वर-वधु अग्नि की सप्तपदी लेते हैं, के वे घोर विरोधी थे। मानते थे कि स्त्री-पुरुष का विवाह स्वर्ग में बनी जोड़ियां नहीं हैं। वह दांपत्य सुख के लिए किया गया समझौता मात्र है, जिसमें लड़का और लड़की दोनों बराबर के सहभागी होते हैं। मातृत्व स्त्री का चयन होना चाहिए। कर्तव्य नहीं। यदि कोई स्त्री संतान नहीं चाहती, तो उसे संतानोत्पत्ति के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए। 

पेरियार ने ब्राह्मणों को विदेशी मूल के आर्यों का उत्तराधिकारी बताते हुए, द्रविड़ अस्मिता का मामला उठाया। मैक्समूलर से लेकर तिलक तक, सभी ने इस विषय पर खूब लिखा है। ‘गुलामगिरी’ और दूसरी कई पुस्तकों में फुले ने ब्राह्मणों को भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास में गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार ठहराया था। सो पेरियार का द्रविड़ अस्मितावादी आंदोलन जनता के दिल की आवाज बन गया। सांस्कृतिक वर्चस्व बनाए रखने में धर्म की भूमिका सर्वोपरि होती है। फुले ने इसे समझा था। उन्होंने धर्म और संस्कृति के आधार पर थोपे गए सांस्कृतिक प्रतीकों, मिथों की तार्किक स्तर पर पड़ताल की थी, जिसका समाज पर सकारात्मक असर पड़ा। उन्होंने धार्मिक और सांस्कृतिक शोषण को द्रविड़ अस्मिता से जोड़ा । समाज में नैतिकता और सदाचरण का पर्याय मान लिए गए धार्मिक प्रतीकों और मिथों की तार्किक व्याख्या की । रामायण की प्रतियों का दहन किया । लोगों से अपील की थी कि धर्म को धंधा बना देने वाले पंडे पुरोहितों के चक्कर में आने के बजाय स्वयं उनकी समीक्षा करें । तर्क-बुद्धि से काम लें ।     

उन दिनों देश में स्वाधीनता आंदोलन तेजी पर था। दक्षिण भी उससे अछूता न था। पेरियार के नेतृत्व में एक और समानांतर आंदोलन उभरने लगा, जिसका उद्देश्य सामाजिक-सांस्कृतिक आजादी प्राप्त करना था। इसी सिलसिले में पेरियार 1926 में बंगलुरू आए गाँधी से मिले। उन्होंने कहा कि वर्ण-व्यवस्था के उन्मूलन के बगैर छूआछूत पर काबू कर पाना मुश्किल है। गाँधी के सामने उन्होंने उस समय की तीन प्रमुख बुराइयों का उल्लेख करते हुए, उन्हें तत्काल मिटाने का आवश्यकता पर जोर दिया। पहला ब्राह्मणों के नियंत्रण वाली कांग्रेस पार्टी, दूसरा हिंदू धर्म और उसकी जाति पृथा तथा तीसरा समाज में ब्राह्मणों का वर्चस्व।

‘वायक्कम सत्याग्रह’ की सफलता के बाद पिछड़ों और अतिपिछड़ों का हौसला बढ़ा था। स्वयं पेरियार कांग्रेस से त्यागपत्र देने के बाद ब्राह्मणवाद विरोधी कार्यक्रमों में उतर चुके थे। ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ दक्षिण भारत में द्रविड़ अस्मिता की पहचान बनकर उभर रहा था। पेरियार छूआछूत विरोधी आंदोलन के प्रमुख नेतृत्वकर्ता थे। 10 फरवरी 1929 को छूआछूत उन्मूलन के मुद्दे पर बुलाई गई सभा में भाषण देते हुए उन्होंने कहा था—

‘वे कहते हैं कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है। ऊंच-नीच का भेद नहीं मानता। दूसरी ओर वे कहते हैं कि अछूतों पर हो रहे अत्याचारों के लिए एकमात्र ईश्वर जिम्मेदार है। यह कितने शर्म की बात है। यह भी कहा जाता है कि छूआछूत की रचना स्वयं ईश्वर ने की है। यदि यह सही है तो सर्वप्रथम हमें उस ईश्वर का बहिष्कार करना चाहिए। उसके बाद ही किसी और कार्यक्रम पर विचार किया जा सकता है। यदि ईश्वर छुआछूत के बारे में अनजान है तो भी जितना जल्दी हो सके, उसका बहिष्कार कर देना चाहिए। यदि ईश्वर इस अन्याय को मिटाने में असमर्थ है, यदि वह ब्राह्मण पुरोहितों पर नियंत्रण करने में नाकाम रहता है तो उसे दुनिया के किसी भी स्थान पर बसने का अधिकार नहीं है। ऐसे में जितनी जल्दी हो सके, उसे उखाड़ फेंकना ही न्यायसंगत होगा। 

यदि ऐसा कोई आधार है, जो यह बताता है कि ईश्वर या धर्म छूआछूत के लिए जिम्मेदार नहीं हैं, तो उसे भी जलाकर खाक कर देना चाहिए। बजाय यह जाने कि वह क्या है अथवा किसने कहा है?’31 

पेरियार का मानना था कि भारत में ऊंची जातियां समानता की राह की सबसे बड़ी बाधा हैं। वे धर्म का उपयोग अपनी वर्गीय श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए करती हैं। राज्य के अधिकांश निर्णायक पदों पर उन्हीं का वर्चस्व होता है। इसलिए राज्य भी उनके हितों का ज्यादा ख्याल रखता है। धार्मिक जड़ता का एक कारण धर्म का उत्तराधिकार के रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंपा जाना है। इससे एक तो ब्राह्मण की सर्वोच्चता का विचार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को अंतरित होता रहता है। दूसरे व्यक्ति बगैर धर्म की खूबियों और खामियों की पड़ताल के, उसे अपनाने को विवश होता है। उसे अपने जीवन में धर्म की समीक्षा करने का अवसर कभी मिल ही नहीं पाता। धर्माचार्य या पुरोहित भी नहीं चाहते कि लोग धर्म के चयन में अपने विवेक और तर्क-शक्ति का इस्तेमाल करें। उपलब्ध धर्मों के गुणों-अवगुणों का परस्पर निष्पक्ष और तुलनात्मक अध्ययन करने के बाद ही किसी एक धर्म को अपनाएं। ऐसे में धर्माचार्य हो अथवा धर्मानुयायी, सभी को धर्म के बाहरी प्रतीकों से अपना काम चलाना पड़ता है। कुल मिलाकर धर्म मनुष्य के विवेकीकरण में कोई मदद नहीं करता। इस कारण मानव-जीवन के लिए उसकी कोई उपयोगिता नहीं है। अछूतों, गैर-ब्राह्मणों और स्त्रियों का सामाजिक अवमूल्यन करने, उनकी मुक्ति की राह में अनावश्यक अड़चन पैदा करने के लिए पेरियार ने ब्राह्मणों तथा उनके धर्म की आलोचना की थी। पेरियार के अनुसार धर्म विवेकशील मनुष्य की उसके जीवन में कोई मदद नहीं करता। इसलिए वह अनावश्यक है।  फिर भी यदि कोई व्यक्ति खूब सोच-विचार के बाद किसी धर्म का स्वेच्छापूर्वक चयन करे—तब उन्हें कोई आपत्ति न थी। उनके अनुसार केवल भली-भांति सोचने के बाद स्वेच्छापूर्वक ढंग से अपनाया गया धर्म लोगों को मुक्त कर सकता है वही उनकी धार्मिक दासता को समाप्त कर सकता है। धर्म और मानवीय विवेक को परस्पर विरोधी बताते हुए पेरियार का कहना था कि केवल तर्क-सम्मत आधार पर, स्वेच्छापूर्वक अपनाया गया धर्म ही, जाति और धर्म की मदद से दास बनाए गए लोगों का आत्मसम्मान वापस दिला सकता है। 

पेरियार की नजर में ‘शुचिता’

विशेष रुप से प्रदर्शित

ई. वी. रामासामी पेरियार

[पेरियार की गिनती बीसवीं शताब्दी के महान विचारकों और समाज सुधारकों में की जाती है। उनका चिंतन बहुआयामी तथा अपने समय से बहुत आगे था। जहां अन्य समाज सुधारक सती प्रथा, विधवा विवाह, बाल विवाह जैसी कुरीतियों के समाधान में उलझे हुए थे, पेरियार स्त्री समानता, स्वाधीनता तथा उनके नागरिक अधिकारों के पक्ष में जोरदार तरीके से अभियान चला रहे थे। 1934 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘पेन्न यीन अदीमाई आनल’, स्त्री-विमर्श की दृष्टि से भारतीय भाषाओं की पहली मौलिक पुस्तक कही जा सकती है। चाहें तो हम इसे भारत में स्त्री-विमर्श का पहला ‘मेग्नाकार्टा’(अधिकारपत्र) भी कह सकते हैं। इस पुस्तक में पेरियार के, ‘कुदीआरसु’ में 1926 से 1931 के बीच प्रकाशित लेखों में से दस चुने हुए लेखों को शामिल किया गया था। पुस्तक के फ़्रांसिसी अनुवाद का विमोचन जुलाई 2005 में पेरिस में किया गया था। 

पुस्तक का मूल तमिल से अंग्रेजी में अनुवाद सुश्री मीना कंडासामी ने ‘व्हाई वूमेन वर इनस्लेव्ड'(स्त्रियों को गुलाम क्यों बनाया गया?) शीर्षक से किया है। प्रकाशक हैंㅡपेरियार सेल्फ रेस्पेक्ट प्रोपेगेंडा इंस्टीट्यूशन, चैन्नई। यह लेख उसी पुस्तक के 2019 में प्रकाशित तीसरे संस्करण के प्रथम लेख की हिंदी रूपांतर है। भारतीय मनीषा स्त्री की शुचिता पर जोर देती है। हिंदू धर्मशास्त्रों में पतिव्रता स्त्री का बड़ा महिमामंडन किया गया है। पेरियार इसे स्त्री की दासता का सबसे बड़ा कारण मानते हैं। लेख में वे शुचिता की जिस तरह तात्विक विवेचना करते हैं, वह अन्यत्र दुर्लभ है।]

यदि हम तमिल शब्द ‘कार्पू’(शुचिता) के घटक तत्वों के आधार पर इसकी विवेचना करें, तो पाएंगे कि मूल शब्द ‘काल’ से इसकी उत्पत्ति हुई है, जिसका अभिप्राय है—‘सीखने के लिए’। यदि हम इस शब्द को, जैसा कि यह ‘कार्पू येनप पदुवथु सोलथिरंबमई’ कहावत में प्रयुक्त हुआ है—पर नजर डालें तो पाएंगे कि ‘कार्पू’ शब्द का अभिप्राय, ‘किसी के वचन पर खरा उतरना’ है(यही इस कहावत के मायने हैं)। इस तरह इस शब्द में सत्यनिष्ठा, सचाई और समझौते की शर्तों पर ईमानदारी से टिके रहने की भावना समाविष्ट है।

यदि हम ‘कार्पू’ शब्द का उसकी समग्रता में विश्लेषण करें, तो इसे ‘मगालिर नीराई’(स्त्रियों के सद्गुणों) को दर्शाने के लिए प्रयुक्त किया जाता है। यहां हम यह समझने में असमर्थ हैं कि ‘नीराई’(सद्गुण) शब्द को विशेषतः स्त्रियों पर कब से थोप दिया गया। ‘नीराई’ शब्द का पर्याय—अभेद्यता(अविनाशिता), दृढ़ता अथवा शुचिता है। मगर किसी के लिए भी यह सिद्ध करना पूरी तरह सेअसंभव है कि ‘कार्पु’ सिर्फ स्त्रियों के संबंध में प्रासंगिक है। हम केवल उसके अर्थ खोज सकते हैं—‘अविनाशी’, मजबूत और टिकाऊ।

यदि हम ‘अविनाशी’ शब्द का समग्र विवेचन करें तो यहां उसका सही अर्थ है—शुद्ध,  अर्थात ‘अविकारित’ और अकलुषित। अंग्रेजी में भी ‘प्योर’(शुद्ध) शब्द का आशय किसी अविकारित वस्तु या विचार से है। ऐसी वस्तु से है जिसे खराब न किया गया हो। इस तरह अंग्रेजी शब्द ‘चेस्टिटी’(शुचिता) का अर्थ है—‘वर्जिनिटी’(कौमार्य)। यदि हम संदर्भ में समझा जाए तो, यह शब्द स्त्रियों तथा पुरुषों में से किसी एक के पक्ष में परिभाषित नहीं है। अपितु संपूर्ण मानव जाति को लक्षित है। और इसका अर्थ है—‘लिंग विशेष की सीमा से परे, परमशुद्धता की अवस्था।’ कुल मिलाकर ‘शुचिता’ का संबंध सिर्फ स्त्रियों से नहीं है। इसे इस तरह से भी देखा जा सकता है कि जब कोई पुरुष/स्त्री सहवास करता/कर चुका होता है, उन दोनों की अनुवर्ती पवित्रता के बावजूद, वह(चाहे स्त्री हो या पुरुष) अपनी शुचिता को गंवा देता है।

केवल ‘इंडो-आर्यन’ भाषा संस्कृत में ‘शुचिता’ को पतिव्रता(निष्ठावान पत्नीपन) के रूप में परिभाषित किया गया है। मैं समझता हूं कि यहीं, इसी जगह(इसी भाषा में) पराधीनता की अवधारणा को शुचिता शब्द में समाविष्ट कर दिया गया था। ‘पतिव्रता’ शब्द स्पष्ट रूप से स्त्री-पराधीनता की स्थिति को दर्शाता है। न केवल इसलिए कि इसका अभिप्राय ऐसी पत्नी से है जो, ‘अपने पति को भगवान का दर्जा देती है; पति की दासी बनकर रहने को ही जो अपना ‘संकल्प’(व्रत) मान लेती है, और अपने पति के अलावा वह किसी अन्य पुरुष का विचार तक नहीं रखती। इसलिए भी कि ‘पति’ शब्द का आशय ही स्वामी, रहनुमा और सर्वेसर्वा से है।

यद्यपि, तमिल शब्द ‘थलायवी’(नेतृत्व करने वाली महिला) अथवा ‘नायकी’(नायिका) पत्नी के ही बोधक हैं, किंतु इन शब्दों का उपयोग विशिष्ट अवस्था में तब किया जाता है जब कोई स्त्री प्रेम की अवस्था में हो। जैसे कि ‘थलायवी’ शब्द का प्रयोग उसके वास्तविक अर्थों में नहीं किया जाता, ऐसी स्त्री के संदर्भ में नहीं जो विनीत भाव से जीवन में तल्लीन हो। यही नहीं, उसके समकक्ष शब्दों ‘नायकन’(नायक) और ‘नायकी’(नायिका) का प्रयोग भी सिर्फ महाकाव्यों, कहानियों और विशेषरूप से ऐसी जगह मिलता है, जहां स्त्रियों और पुरुषों के मनोरथ पर जोर दिया गया हो। इसी तरह समानधर्मा शब्दों ‘नायकन-नायकी’(नायक-नायिका) तथा ‘थलायवन-थलायवी’ का प्रयोग प्रेम के विभिन्न चरणों तथा इच्छाओं को दर्शाने के लिए जाता है, जबकि शुचिता की अवस्था केवल स्त्रियों से संदर्भित  है, जिनसे कहा जाता है कि वे अपने-अपने पति को अपना स्वामी और भगवान समझें।

इस मामले में, तिरुवेल्लुवर के विचारों को लेकर मैं थोड़ा भ्रमित हूं। मैं महसूस करता हूं कि तिरुक्कुल के छठे अध्याय, ‘वाझकई थुनेईनलम’(जीवनसाथी का महत्त्व), 91वें अध्याय ‘पेन्नवझी चेराल’(स्त्रियों के नेतृत्व में) तथा कुछ अन्य स्वतंत्र दोहों में, स्त्री के संदर्भ में चरम दासता और घटियापन का वर्णन  किया गया है। यहां तक कह दिया गया है कि जो स्त्री देवताओं को पूजने के बजाय अपने पति की पूजा करती है, उसके आदेश पर बादल भी बरसने लगते हैं, स्त्री को हमेशा अपने पति की सेवा करनी चाहिए—इसी तरह के अनेक घटिया विचार उसमें मिलते हैं।

यदि कुछ लोग इससे असहमत हैं, तो मैं उनसे तिरुक्कुरल के छठे और 91वे अध्यायों का पढ़ने का आग्रह करूंगा, खासतौर पर इसके बीस दोहों(दोहे जैसा दो पंक्तियों का छंद) को, उनके मूल स्वरूप में पढ़ें। न कि उनकी टीकाओं के माध्यम से। सामने कोई भी आए, उनके चरम तर्कों की परवाह किए बिना, अंतत: मैं उनसे एक ही तथ्य पर ध्यान देने का आग्रह करूंगा कि, ‘यदि इन पदों की रचना करने वाले तिरुवेल्लुवर पुरुष न होकर कोई स्त्री रहे होते, क्या तभी वे इन्हीं विचारों का चित्रण कर रहे होते? इसी तरह यदि स्त्रियों ने ही, स्त्रियों के बारे में धर्मशास्त्रों सहित दूसरी पुस्तकें भी रची होतीं, अथवा स्त्रियों ने ‘शुचिता’ शब्द को परिभाषित किया होता, तब क्या वे भी ‘शुचिता’ को ‘पतिव्रता’ जैसा ही अर्थ देतीं?

चूंकि ‘शुचिता’ को ‘पतिव्रता’ के रूप में परिभाषित किया गया है और चूंकि धन-संपत्ति, आमदनी और शारीरिक बल की दृष्टि से पुरुष को स्त्री की अपेक्षा अधिक बलशाली बनाया गया है, सो इसने ऐसी परिस्थितियों को जन्म दिया है, जो स्त्री पराधीनता को बनाये रखने के पक्ष में हैं। दूसरी ओर मनुष्य यह सोचकर मूर्ख बना रहता है कि ‘शुचिता’ से संबंधित कोई भी अवधारणा उसके ऊपर लागू नहीं होती। पुनश्चः, पितृसत्तात्मकता ही एकमात्र कारण है जिससे ऐसे शब्द जो दिखाएं कि शुचिता पुरुष के लिए भी उतनी ही अभीष्ट है, हमारी भाषाओं से गायब कर दिए गए है।

यह नहीं कहा जा सकता कि किसी देश, धर्म अथवा समाज ने इस विषय को लेकर ईमानदारी से काम किया है। केवल रूस(सोवियत भूमि) इसका अपवाद है। उदाहरण के लिए, हालांकि ऐसा प्रतीत होता है कि यूरोपियन स्त्रियों को ढेर सारी स्वाधीनता है, बावजूद इसके श्रेष्ठत्व और हेयत्व का बोध वहां ‘पति’ और ‘पत्नी’ के पर्यायवाची के रूप में निर्दिष्ट किए गए शब्दों में साफ नजर आता है। यहां तक कि वहां का कानून भी स्त्री को पुरुष की आज्ञाकारिणी बने रहने को आवश्यक मानता है। 

पुनश्चः कुछ समाजों में परदे की प्रथा लागू है। वहां स्त्रियों की घर की चौखट पार करने की आजादी नहीं होती। यदि जाना ही हो तो उन्हें मुंह को ढंककर जाता निकलना पड़ता है। वहां एक पुरुष अनेक स्त्रियों से विवाह कर सकता है, जबकि स्त्री को एक से अधिक पुरुषों से विवाह करने की अनुमति नहीं होती। और अपने देश में, हमारे यहां तो स्त्री पर अनेकानेक प्रतिबंध हैं। एक बार पुरुष की विवाहिता बन जाने के बाद मृत्युपर्यंत, स्त्री से उसकी स्वाधीनता छिन जाती है। उसका पति अनेक स्त्रियों से विवाह कर, उसके सामने घर में रह सकता है,  और यदि पत्नी अपने पति के घर में हो, तब भी आपसी विश्वासहीनता के कारण वह अपने पति से केवल भोजन की अपेक्षा कर सकती है। पति पर अपनी कामेच्छाओं की संतुष्टि हेतु दबाव डालने का उसे कोई अधिकार नहीं है।

यह कहना मुश्किल है कि केवल कानून और धर्म ही इसके लिए जिम्मेदार हैं। चूंकि स्त्रियों ने हालात से खुद समझौता कर लिया है, इस कारण स्थिति दुस्संशोध्य/दीर्घस्थायी हो चुकी है। ठीक ऐसे ही जैसे शताब्दियों पुरानी परंपरा के चलते उन लोगों ने जिन्हें नीची जाति का घोषित किया गया था, मान लिया था कि वे सचमुच नीच जाति के हैं। इस कारण उनमें सिर झुकाने, छिपने या दूर हटकर सवर्णों के लिए रास्ता खाली करने की होड़-सी मच जाती है। इसी तरह, स्त्रियां भी सोचती हैं कि वे पुरुष की संपत्ति हैं। इसके मायने हैं कि उन्हें पुरुष के अधीन रहना चाहिए और मनुष्य के गुस्से का पात्र नहीं बनना चाहिए। इस कारण वे अपनी स्वाधीनता की भी चिंता नहीं करतीं।

यदि स्त्रियां वास्तव में अपनी आजादी चाहती हैं, तो शुचिता की अवधारणा को जो लिंग के आधार पर स्त्री और पुरुष के लिए अलग-अलग न्याय का प्रावधान करती है—को तत्काल नष्ट कर देना चाहिए। उसके स्थान पर स्त्री-पुरुष दोनों के लिए एकसमान, स्वःशासित शुचिता की अवधारणा विकसित होनी चाहिए। बलात विवाह, जिसमें बिना किसी प्रेम-भाव के, सिर्फ शुचिता की रक्षा के नाम पर, लोगों को एक-दूसरे के साथ दांपत्य जीवन में बांध दिया जाता है—का नाश हो जाना चाहिए।

निर्दयी धर्म और कानून, जो शुचिता/पातिव्रत धर्म के नाम पर स्त्रियों को पति की पशुवत हरकतों को भी सहते जाने का आदेश देते हैं—उन्हें नष्ट हो जाना चाहिए।

यही नहीं, समाज की क्रूर व्यवस्थाएं, जो यह अपेक्षाएं करती हैं कि शुचिता और पवित्रता के नाम पर हृदय में उमड़ते प्रेम और अनुराग को दबाकर, ऐसे व्यक्ति के साथ रहना चाहिए जिसके साथ न प्रेम हो न ही अनुराग—तत्क्षण बंद हो जाना चाहिए।

इसलिए, कोई व्यक्ति समाज में तभी वास्तविक शुचिता, प्राकृतिक शुचिता, एवं संपूर्ण स्वाधीन शुचिता के दर्शन कर सकता है, जब इन क्रूरताओं का अंत हो जाए। ऐसा जोर-जबरदस्ती से कभी नहीं होगा, न ही विभिन्न लिंगों के लिए अलग-अलग कानून बना देने से होगा, न ही यह शक्तिशाली वर्ग द्वारा कमजोरों के लिए कलमबद्ध निर्देशों के दम पर यह संभव है, इससे केवल दासवत और थोपी गई शुचिता ही संभव है।

मैं तो यहां तक कहूंगा कि इसकी तुलना में समाज में दूसरा और कोई घिनौना कृत्य ही  नहीं है।

कुदीआरसु

8 जनवरी, 1928

अनुवाद : ओमप्रकाश कश्यप

अय्यंकाली : सामाजिक क्रांति का महानायक

विशेष रुप से प्रदर्शित

सुनो, सुनो, सुनो—गीत मेरा सुनो

विपन्न, निढाल गरीबी में घिसटते हुए लोगो सुनो 

‘यहां से जाएं, तो कहां जाएं?’

वे रो रहे हैं, बिलख रहे हैं, आंसू बहा रहे हैं

हमारा न कोई घर है, न देश

न ही सिर छिपाने को जंगल

दिन के उजाले में जंगलों की सफाई करना

रात्रि को वहीं निढाल पड़ जाना

बीज बोने के बाद

पेड़ जब देने लगते हैं फल

मालिक आकर कब्जा लेता है उन्हें

हमारे पास अब केवल रोना ही बचा है

हमारे हिस्से है श्रम, केवल श्रम

ढेर सारा, बल्कि सारे का सारा श्रम

हम सड़कों पर चल नहीं सकते

बाजार में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है हमें

लेकिन हम बढ़ेंगे….बढ़ेंगे

बढ़ते रहेंगे, बढ़ते ही रहेंगे।

ऊपर दिया गया गीत करीब 100 वर्ष पुराना है। अय्यंकाली द्वारा स्थापित ‘साधुजन परिपालन संघम’ की बैठकों में गाया जाने वाला गीत। केरल के दलितों और आदिद्रविड़ों में आधुनिक भावबोध जगाने में इस गीत का बड़ा योगदान है। चक्कोला कुरुंबम दीविथन इसे गाया करते थे। ऐसे मार्मिक स्वर में कि श्रोतागणों की आंखें डबडबा जाती थीं। इस बारे में आगे चर्चा करने से पहले अय्यंकाली के जीवन से दो शब्द चित्र—

बैलगाड़ी से क्रांति

वर्ष 1891(कुछ विद्वान इसे 1893 मानते हैं)। करीब 30 वर्ष का एक हृष्ट-पुष्ट और सुदर्शन युवक। एकदम नई बैलगाड़ी, जोतने के लिए एक जोड़ी युवा-छरहरे, सफेद बैल। एक जोड़ी पीतल की बड़ी-बड़ी घंटियां—सब उसने आज ही के लिए खरीदे हैं। इनके अलावा अपने लिए चमकीला अंगवस्त्र, शानदार पगड़ी और रौवदार जूतियां। मानो अपने अनूठे बाने से काल के कपाल पर सुनहरी इबारत टांकने को आतुर हो। बैलों को गाड़ी में जोतने से पहले वह उन्हें प्यार से सहलाता है। फिर उनके गले में घंटियां बांधकर बैलगाड़ी में जोत देता है। उसके बाद पूरी शान से बैलगाड़ी में सवार होता है। सधे बैल इशारा पाते ही आगे बढ़ने लगते हैं। ‘टनश्टन’ बजती घंटियां पचासियों मीटर दूर से उसके आने का पता दे देती हैं। लोग घंटियों की आवाज सुनकर बाहर निकल आते हैं। स्त्रियां और बच्चे खिड़कियों-दरवज्जों से झांकने लगते हैं। 

युवक जिस जाति से आता है, उसे न तो बैलगाड़ी पर सवार होने का अधिकार है। न अंगवस्त्र धारण करने का। न ही उन मार्गों पर चलने का जिनपर उसके बैल हाथियों जैसी मस्त चाल से आगे बढ़े जा रहे हैं। उसकी शान देखकर उसके अपने लोगों का सीना शान से चौड़ा हो जाता है। कुछ को ईर्ष्या होती है। कुछ की आंखों की अंगार फूटने लगते हैं। वे घरों से लाठियां, डंडे वगैरह निकालकर बैलगाड़ी के रास्ता रोक लेते हैं। जो हो रहा है, इसकी उसे उम्मीद थी। इसलिए वह तैयार होकर आया है। रोज-रोज अपमान सहते रहने से अच्छा है, उसका प्रतिकार किया जाए। फैसला इस पार हो या उस पार। विरोधियों को तना देख वह अपनी खुखरी निकाल लेता है। उसका रौद्र रूप देख रास्ता रोकने वाले भयभीत हो जाते हैं। जीत का जश्न मनाती हुई बैलगाड़ी आगे बढ़ जाती है। 

दुनिया में अनेक महापुरुष हुए। सामाजिक परिवर्तन के लिए उन्होंने बड़ी-बड़ी लड़ाइयां लड़ीं, परंतु बैलगाड़ी पर चढ़कर क्रांति का शंखनाद करने वाले वे अकेले ही थे। 

बाजार जाने की आजादी

भारत में जाति से बड़ा कलंक दूसरा नहीं। यह जन्म के आधार पर आदमी-आदमी में फर्क करना सिखाती है। ‘द्विज’ कहकर मुट्ठी-भर लोगों के हाथों में अकूत अधिकार थमा देती है। दूसरी ओर समाज के बड़े हिस्से को शूद्र और अछूत बताकर उनसे उनका मान-सम्मान, सुख-सुविधा और मामूली खुशियां तक छीन लेती है। केरल सहित पूरे दक्षिण भारत में वह और भी विकृत अवस्था में थी। इसलिए 1892 में केरल यात्रा के दौरान, विवेकानंद ने उसे ‘जातियों का पागलखाना’1 तक कह दिया था। बीसवीं शताब्दी में वहां के सवर्ण पुलाया, पारया, कुरुवा जैसी जातियों की छाया से भी बचते थे। दलितों का उत्पीड़न आम बात थी। उन्हें न सार्वजानिक मार्गों पर चलने की स्वतंत्रता थी, न बाजार जाने की। न ही अच्छे वस्त्र पहनने की। गुलामों जैसा जीवन था उनका। बैलगाड़ी पर चढ़कर सार्वजनिक मार्गों पर चलने की आजादी छीन लेने वाला हमारा महानायक, 1898 में उनके मान-सम्मान की खातिर एक बार फिर नए जोश के साथ उठ खड़ा हुआ। इस बार संघर्ष बाजार जाने की आजादी को लेकर था।   

उसने अपने साथियों को इकट्ठा किया। इरादा आरालुम्मुद बाजार में प्रवेश करने का था। अपने साथियों को लेकर उसने पठानकाडा से आगे बढ़ना शुरू किया। सभी जोश में थे। इस डर से कि विरोधी कभी भी, किसी भी दिशा से हमला कर सकते हैं, वे सावधानी से आगे बढ़ रहे थे। जैसे ही उनका कारवां चेट्टियार स्ट्रीट, बलरामपुर पहुंचा—हथियारों से लैस ऊंची जातियों के लड़ाके उनके रास्ते में अड़ गए।2 दोनों ओर से घात-प्रतिघात होने लगा। संघर्ष बढ़ा तो बढ़ता ही गया। दलितों के लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न था। देखते ही देखते मनाक्कुडु, नेय्याट्टिंकर, नेमोन, अमरविला, परसाला, कोझाकुट्टम, कनियापुरम आदि इलाकों में विद्रोह की चिंगारियां फूटने लगीं। जो अछूत सवर्णों को देख कई हाथ पहले ठिठक जाया करते थे—वे अब नई चेतना और आत्मविश्वास से भरे थे। अपने नेता के इशारे पर कुछ भी करने को सनद्ध। पूरे त्रावणकोर में गृहयुद्ध की स्थिति बन चुकी थी। विद्वान 1857 के विद्रोह को प्रथम स्वाधीनता संग्राम कहते हैं। लेकिन स्वाधीनता की असली लड़ाई तो वे दलित और आदिद्रविड़ लड़ रहे थे। एक सप्ताह बाद हालात सामान्य हुए। तब तक इतिहास उस घटना को ‘चलियार विद्रोह’ के नाम से अपने भीतर टांक चुका था। 

केरल को आधुनिक राज्य बनाने में इन आंदोलनों की बड़ी भूमिका है। वहां अय्यंकाली का उतना ही योगदान है, जितना ज्योतिराव फुले और डॉ. आंबेडकर का महाराष्ट्र में, पेरियार का तमिलनाडु में है। अय्यंकाली का जन्म 28 अगस्त 1863 को त्रावणकोर जिले में, त्रिरुवनंतपुरम् से 13 किलोमीटर उत्तर दिशा में स्थित वेंगनूर नामक गांव में हुआ था। आठ भाई-बहनों में वे सबसे बड़े थे। जाति थी पुलाया। उस जाति के लोग आमतौर पर गुलामों की तरह काम करते थे। अय्यंकाली के पिता अय्यन भी एक जमींदार के गुलाम थे। उनकी मेहनत और वफादारी से प्रसन्न होकर जमींदार ने उन्हें पांच एकड़ जमीन उपहार में दे दी थी। इसलिए अपनी जाति के लोगों में अय्यंकाली के परिवार की हैसियत काफी अच्छी थी। पिता अय्यन पुलाया बस्ती के मुखिया थे।

उस समय समाज पूरी तरह जाति में जकड़ा हुआ था। उस परिवेश से गुजरने वाले बच्चों को समाज में जो उत्पीड़न, उलाहने और तिरष्कार सहना पड़ता है, वैसा अय्यंकाली के साथ भी हुआ था। बचपन से ही वे सुंदर थे। शरीर गठीला और स्वस्थ था। उनका व्यक्तित्व अलग ही छाप छोड़ता था। फुटबाल खेलने का शौक था। एक बार फुटबाल नैय्यर के घर में जा गिरी। वे बॉल लेने पहुंचे तो नैय्यर ने उनका अपमान कर दिया। हिदायत दी कि भविष्य में बॉल उसके घर न आने पाए। उस अपमान ने अय्यंकाली को आहत कर दिया। फुटबाल खेलते समय कुछ सवर्ण लड़के भी उनके साथ शामिल हो जाते थे। अय्यंकाली की जाति के बारे में पता चलते ही उन्होंने आना छोड़ दिया। अय्यंकाली को यह बहुत अखरा। उन्होंने भविष्य में उन बच्चों के साथ कभी न खेलने का फैसला किया। 

अय्यंकाली बचपन से ही रचनात्मक प्रवृत्ति के थे। गाने-बजाने का शौक था। अपनी जाति के बच्चों को इकट्ठा कर उन्होंने एक नाटक मंडली की शुरुआत की। आरंभ में वे परंपरागत नाटक खेलते थे। धीरे-धीरे अपने रचे नाटक भी खेलने लगे। उनके नाटकों में एक संदेश होता था। फलस्वरूप लोग तेजी से उनकी ओर आकर्षित होने लगे। बचपन से ही वे निडर और साहसी थे। इस कारण किसी न किसी मुद्दे को लेकर सवर्णों ने उनका अकसर टकराव होता रहता था। उससे निपटने के लिए विद्रोही अय्यंकाली ने अपने साथियों को संगठित करना आरंभ किया। उन्हें कुश्ती और लाठीबाजी का प्रशिक्षण दिलवाया। इसके लिए कलारी असान नामक प्रशिक्षक को बाहर से बुलवाया गया। इससे पलाया युवकों के भीतर आत्मसम्मान की भावना बढ़ने लगी। चूंकि इस बदलाव के मूल में अय्यंकाली की प्रेरणा और श्रम था, इसलिए प्रशंसक उन्हें सम्मान के साथ ‘उरपिल्लई’ या ‘मूथापिल्लई’ कहते थे। 1888 में उनका विवाह चेल्लमा से हो गया। पति-पत्नी के बीच अगाध प्रेम था। दोनों के सात बच्चे हुए। अय्यंकाली खुद को अच्छा गृहस्थ सिद्ध कर चुके थे। लेकिन उनकी मंजिल वहीं तक सीमित नहीं थी। अछूत होने के कारण उनपर कई प्रकार के बंधन थे। उनसे निपटने के लिए 1893 में बैलगाड़ी पर सवार अय्यंकाली ने वह कर दिखाया, जैसा उनसे पहले किसी न सोचा तक न था। 

शिक्षा हेतु संघर्ष

मैकाले की सलाह पर आगे बढ़ते हुए तत्कालीन वायसराय विलियम बैंटिक 7 मार्च 1835 को एक संकल्पपत्र प्रस्तुत किया था। उद्देश्य था समाज के निचले वर्गों तक शिक्षा का विस्तार। हजारों वर्षों से ज्ञान के नाम पसरे शूण्य की भरपाई करना। लेकिन कानून बनना एक बात है, जरूरतमंदों तक उसका लाभ पहुंचना दूसरी बात। अधिकांश स्कूलों का प्रबंधन द्विज जातियों के हाथ में था। कानून बन जाने बावजूद वे उसकी अवहेलना करती आ रही थीं। फुले का विचार था कि बदहाली से मुक्त होने के लिए शूद्र-अतिशूद्रों को स्वयं प्रयास होंगे, समाज को जगाना होगा। नेतृत्व हेतु प्रभावशाली नेता भी अपने ही भीतर से पैदा करने होंगे। यह सब बिना शिक्षा के असंभव है। अतएव 1848 से ही वे  शूद्रों-अतिशूद्रों के लिए अलग स्कूलों की स्थापना में जुट गए थे। आने वाले 3 वर्षों में 18 स्कूलों की स्थापना कर उन्होंने एक तरह से कीर्तिमान रचा था। 

उसी दिशा में आगे बढ़ते हुए अय्यंकाली ने 1904 में वेंगनूर में पहले स्कूल ‘कुदी पल्लिकूदम’ की नींव रखी। लेकिन सवर्णों से यह सहन न हुआ। निर्माण कार्य शुरू होने के पहले ही दिन उन्होंने अय्यंकाली के स्कूल में आग लगा दी। लोगों के सहयोग से, उन्होंने बिना देर किए नए सिरे से निर्माण शुरू कर दिया। परंतु विद्रोही बाज आने वाले न थे। उन्होंने स्कूल को दूसरी बार भी वही किया। कोई और होता तो कदाचित हार मान लेता। मगर बचपन से ही जुझारू रहे अय्यंकाली के नेतृत्व में निर्माण कार्य चलता रहा। आखिरकार स्कूल बना। बच्चे वहां जाने लगे। वह केरल में किसी दलित द्वारा, दलित बच्चों की शिक्षा के स्थापित पहला स्कूल था। 

अछूत जातियों से जुड़े बच्चों को सरकारी स्कूलों में भर्ती करने नियम 1907 में ही बन चुका था। परंतु उसपर अमल दूर था। सवर्णों के दबाव में त्रावणकोर के दीवान ने उस आदेश को दबा लिया था। अपने संगठन के माध्यम से अय्यंकाली उसके लिए निरंतर प्रयत्नरत थे। आखिरकार, सवर्णों के रवैये से निराश होकर उन्होंने आर-पार की लड़ाई लड़ने का फैसला कर लिया। उन्होंने अछूतों से कहा कि जब तक उनके बच्चों को स्कूल में प्रवेश नहीं मिलता है, तब तक वे नैय्यरों के खेतों में काम करना छोड़ दें। यही हुआ। पुलायाओं ने हड़ताल की घोषणा कर दी। शुरू-शुरू में नैय्यरों ने इसे गीदड़ भभकी माना। सोचा कि भूख से बेहाल, गरीब पुलाया, कुरुवा आदि अछूत, बहुत जल्दी खेतों में लौटने को मजबूर हो जाएंगे। लेकिन अछूतों की आंखों में रोपा गया सपना, उनकी भूख से कहीं ज्यादा बड़ा था। सो हड़ताल खिंचती चली गई। सवर्णों ने अछूतों को डराना-धमकाना शुरू कर दिया। अय्यंकाली और उनके साथियों ने उसका भी सामना किया। 

बुबाई का मौसम आया तो कुछ नैय्यरों ने खुद ही अपने खेतों में धान रोपने की कोशिश की। परंतु दूसरों के श्रम पर जीवन जीते-जीते आलसी हो चुके नैय्यरों के लिए वह काम आसान नहीं था। एक पुलाया जितना काम एक दिन में कर लेता था, उतना काम करने में उन्हें पांच-छह दिन लगते थे। हड़ताल खिंचने से गरीब पुलायाओं के आगे भोजन का संकट उत्पन्न होने लगा। उस समय अय्यंकाली ने बुद्धिमानी से काम लिया। उन्होंने मछुआरों से समझौता किया कि हर मछुआरा मछली पकड़ने के लिए अपने साथ एक पुलाया को साथ ले जाएगा। यह फार्मूला कामयाब रहा। इससे विरोधी बुरी तरह चिढ़ गए। उधर हड़ताल का दायरा बढ़ाने के लिए अय्यंकाली ने कुछ नई मांगे जोड़ दीं। उनमें मजदूरों को स्थायी करने, झूठे आरोपों में फंसाकर दंडित करने तथा कोड़ों से प्रहार करने पर रोक, सार्वजनिक मार्गों पर आने-जाने की आजादी, सप्ताह में एक दिन अवकाश जैसी नई मांगें शामिल थीं। 

अय्यंकाली के नेतृत्व का ही जादू था कि शताब्दियों से बैल की तरह सर झुकाए श्रम करते आए अछूत पहली बार जमींदारों के आगे तने खड़े थे। हालात बिगड़ते जा रहे थे। अछूतों के आगे भोजन का संकट था। वहीं जमींदारों की हालत अच्छी न थी। क्षुब्ध होकर उन्होंने पुलायाओं की झोंपड़ियों में आग लगा दी। बदले में अय्यंकाली के हरावल दस्ते ने जमींदारों के मकानों को आग के हवाले कर दिया। इससे उनके गुस्से का ठिकाना न रहा। यह सोचते हुए कि सारे मामले के पीछे अय्यंकाली है, नीचता की हद तक जाते हुए उन्होंने उन्हें मरवाने का फैसला कर लिया। उसके लिए मुंबई के एक गुंडे को नियुक्त किया गया। अय्यंकाली को जीवित लाने पर 2000 रुपये तथा मृत लाने पर 1000 रुपये का ईनाम देने की घोषणा कर दी गई।4 

धमकियों और खून-खराबे के बावजूद अय्यंकाली अपने साथियों के साथ डटे हुए थे। नैय्यरों ने अय्यंकाली तथा उनके अंगरक्षक याकूब के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी। याकूब को गिरफ्तार कर लिया। अय्यंकाली तत्काल पुलिस स्टेशन पहुंचे। वहां तब तक डटे रहे, जब तक पुलिस ने याकूब को रिहा न कर दिया। हड़ताल करीब एक वर्ष(1907-08) तक चली। इस बीच शिक्षा निदेशक मिशेल ने त्रावणकोर के दीवान को 1907 के नीतिगत आदेश पर तुरंत अमल करने की सलाह दी। चौतरफा दबाव के बीच त्रावणकोर के दीवान की ओर से 1910 में अछूत बच्चों को सरकारी स्कूलों में प्रवेश संबंधी आदेश जारी कर दिए गए। उस समय के कई बुद्धिजीवियों की ओर से उसका विरोध किया गया था। उनमें से एक खुद को प्रगतिशील बताने वाले ‘स्वदेशाभिमानी’ के संपादक रामकृष्ण पिल्लई भी थे। अछूतों बच्चों को सरकारी स्कूल में प्रवेश पर उन्होंने लिखा था कि यह आदेश—

‘पीढ़ियों से ज्ञान-विज्ञान की खेती करते आए लोगों के बच्चों को, उनके खेतों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी मजदूरी करते आए लोगों के बच्चों के साथ रखना—घोड़े और भैंस को एक साथ जोत देने जैसा है।’5 

आदेश का जमीनी असर देखने के लिए अय्यंकाली पूजारी अय्यपन की 8 वर्ष की बेटी पंजामी को लेकर ऊरुट्टमबलम गवर्नमेंट गर्ल्स स्कूल पहुंचे। उनके पास डाइरेक्टर ऑफ़ पब्लिक इंस्ट्रक्शन मिशेल के विशेष आदेश थे। प्रधानाचार्य ने बच्ची का दाखिला करने में अपनी असमर्थता जाहिर की। अय्यंकाली द्वारा विशेष आदेश दिखाने के बाद वह पंजामी को कक्षा के अंदर बिठाने के लिए तैयार हो गया। परंतु उस बच्ची के कक्षा में बैठते ही, नैय्यर विद्यार्थियों ने कक्षा का बहिष्कार कर दिया।6 प्रधान अध्यापक हालात को संभालने की कोशिश कर ही रहे थे कि कंडाल गांव के कुछ नैय्यर वहां जा धमके। वे लाठी-डंडों से लैस थे। अय्यंकाली के साथ भी उनके साथी थे। विवाद बढ़ता गया। गांवों से शुरू हुए उस संघर्ष ने शीघ्र ही आसपास के जिलों को अपनी चपेट में ले लिया। यहां तक कि दक्षिणी त्रावणकोर भी उस आंदोलन के असर से बच न सका। दलितों के प्रवेश को लेकर नैय्यर इतने विध्वंसात्मक थे कि उन्होंने उन दो स्कूलों में आग लगा दी, जिनमें अय्यंकाली ने अपने समाज के बच्चों का दाखिला कराने के उद्देश्य से पहुंचे थे।

साधुजन परिपालन संघम

भूख, अभाव, विपन्नता और दास जैसा जीवन जीने वाले लोगों को अय्यंकाली ने नया नाम दिया था—‘साधु जन’। अपने आंदोलन को सांस्थानिक रूप देने के लिए उन्होंने 1904 में ‘साधु जन परिपालन संघ’(गरीब रक्षार्थ संघ) की स्थापना की थी। उनके कुछ जीवनीकारों के अनुसार इस संस्था का गठन 1907 में हुआ था। संस्था का ‘कनक्कन’(महासचिव) अय्यंकाली को बनाया गया। अन्य सदस्यों में मूलायिल कालि, थॉमस वाडयार, गोपालन आदि शामिल थे। उसकी सदस्यता सभी अछूत जातियों के लिए खुली थी। उसका प्रमुख उद्देश्य था पुलाया सहित सभी अछूत जातियों को अपने अधिकारों पक्ष में संगठित करना। उन्हें अंधविश्वास, गुलामी, अशिक्षा, गरीबी और सवर्णों के आतंक से मुक्ति दिलाना। संस्था के प्रचार-प्रसार के लिए स्थानीय सभाओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सहारा लिया जाता था। सवर्ण उस संस्था के गठन से नाराज थे। इसलिए आरंभ में उसकी बैठक, बस्ती से दूर पेड़ों की ओट में या पहाड़ी के पीछे किसी गोपनीय स्थान पर की जाती थी। धीरे-धीरे लोगों के मन से यह डर निकलने लगा। ‘साधु जन’ का उद्देश्य पुलायाओं, पारयाओं जैसी अछूत जातियों का उत्थान था। बावजूद इसके उन्होंने अपनी संस्था को ‘धर्म एवं जाति’ संबंधी दुराग्रहों से परे रखा था। इससे उन्हें इन जातियों के राजनीतिकरण में मदद मिली। 

संस्था का प्रबंधन बड़े ही सुनियोजित तरीके से किया जाता था। आमतौर पर हर गांव में उसकी शाखा थी। संस्था का वार्षिक सम्मेलन त्रिरुवनंतपुरम के ‘विक्टोरिया जुबली हाल’ में किया जाता था। उसमें केरल के अलग-अलग गांवों और शहरों से आए लोग हिस्सा लेते थे। सम्मेलन के दिन त्रिरुवनंतपुरम की सड़कें, काली चमड़ी वाले अछूतों से पट जाती थीं। उसमें संस्था के सदस्यों और अधिकारियों के अलावा विभिन्न सरकारी और राजकीय अधिकारियों को भी आमंत्रित किया जाता था। संस्था के महासचिव के रूप में उसके कार्यक्रमों, उपलब्धियों और मांगों को सभा के सम्मुख पेश करने का दायित्व अय्यंकाली का था। वे अनपढ़ थे। लेकिन संस्था का संचालन इस प्रकार करते थे कि लोग उनकी प्रबंधन क्षमता के कायल हो जाते थे। ‘साधु जन परिपालन संघ’ के कार्यक्रमों को लोगों तक पहुंचाने के लिए ‘साधु जन परिपालिनी’ नामक मासिक पत्रिका की शुरुआत भी की गई। कालि कोदिक्कुरुप्पन को उसका संपादक नियुक्त किया गया। आने वाले 30 वर्षों तक यह संस्था सुचारू रूप से काम करती रही। 

नेदमंगादु विद्रोह

चालियार विद्रोह के बाद कई बाजारों में पुलायाओं को आने-जाने की आजादी प्राप्त हो चुकी थी। बावजूद इसके कुछ बाजारों में अभी भी उनका आना प्रतिबंधित था। जो पुलाया अपना सामान बेचने के लिए आते थे, उन्हें भी मुख्य बाजार में आने से रोका जाता था। सवर्णों ने उन्हें अलग स्थान दिया था। 1912 में अय्यंकाली ने एक बार फिर अपने साथियों को इकट्ठा किया। इस बार उनके अभियान में स्त्रियां और बच्चे भी शामिल थे। जैसे-जैसे पुलायाओं का दल आगे बढ़ा, उनका साथ देने और हौसला बढ़ाने के लिए दूसरी जातियों के लोग भी उनके साथ आ मिले। उन्होंने अपना अभियान त्रिवेंद्रम से आरंभ किया। नेदमंगाडु तक पहुंचने के लिए उन्होंने जंगल का रास्ता चुना था। मगर बाजार तक पहुंचने से पहले ही सवर्णों ने उनपर हमला बोल दिया। दोनों पक्ष पक्के इरादे से आए थे। विवाद एक बार फिर संघर्ष में बदल गया। एक रणनीति के तहत अय्यंकाली ने पुलायाओं के एक हिस्से को दूसरी दिशा से बाजार में प्रवेश के लिए भेज दिया। घने जंगलों के रास्ते, चुनौतियों से जूझता हुआ हुआ वह जत्था आखिरकार नेदमंगाडु बाजार में प्रवेश करने में कामयाब हो गया।

श्री मूलम प्रजा सभा की सदस्यता

अय्यंकाली के सघर्ष और उनकी ख्याति सरकार तक पहुंच चुकी थी। लोग उनसे प्रभावित थे। इसके फलस्वरूप 1912 में उन्हें ‘श्री मूलम् प्रजा सभा’ का सदस्य मनोनीत कर दिया गया। सभा के समक्ष उनका प्रथम संबोधन छोटा, किंतु प्रभावशाली था। अपने भाषण में उन्होंने पुलायाओं की गरीबी, अशिक्षा के अलावा उन्हें आवास एवं खेती हेतु जमीन दिए जाने की मांग की थी। उनका नारा था, ‘खेत उनके लिए जो जोतें’। अपनी पहली सभा में ही सरकारी अधिकारियों की मनमानी की ओर ध्यान आकर्षित कराते हुए उन्होंने कहा था—

‘हमारे कई परिवारों को धनवान जमींदारों ने इस आश्वासन के साथ उनके घर से निकाल दिया था कि उन्हें वे घर बनाने के लिए अलग से जमीन देंगे। अब वन-विभाग के कर्मचारी, जमींदारों से मिलकर मेरे लोगों पर उन घरों को खाली करने के लिए दबाव डाल रहे हैं। इसके साथ-साथ ये अधिकारी जमींदारों को उनकी भूमि पर कब्जा करने में मदद कर रहे है। मैं इस समस्या के निराकरण की प्रार्थना करता हूं।’

अय्यंकाली की अपील पर दीवान ने पुलायाओं को यथासंभव मदद का भरोसा दिलाया। दीवान के मन में उनके प्रति कितना सम्मान था, यह इस घटना से भी जाहिर होता है—

‘एक बार अय्यंकाली प्रजा सभा के सदस्य की हैसियत से, दीवान से मिलने उनके कार्यालय में पहुंचे। वहां तैनात दरबानों ने उन्हें भीतर जाने से रोक दिया। उन्होंने अय्यंकाली के साथ अभद्रतापूर्ण व्यवहार भी किया। उनका नाम लेकर पुकारा। अय्यंकाली वहां से चले गए। बाहर जाकर उन्होंने तार भेजकर दीवान को सारी घटना से अवगत करा दिया। दीवान ने तुरंत अय्यंकाली को अपने कार्यालय बुला भेजा। वे जब दीवान के कार्यालय में पहुंचे तो दोनों दरबान भी वहां मौजूद थे—

‘मिस्टर अय्यंकाली, अपने साथ किए गए दुर्व्यवहार के लिए आप इन्हें क्या दंड देना चाहेंगे?’ दीवान ने पूछा। यह सुनकर वे दंग रह गए। कुछ पल सोचने के बाद उन्होंने कहा—

‘इन्होंने जो किया, लापरवाही के कारण किया। इन्हें माफ कर दिया जाए।’

दीवान अय्यंकाली से प्रभावित हुआ। आखिरकार दोनों दरबानों को अय्यंकाली के पैर छूकर माफी मांगने के बाद छोड़ दिया गया। 

कोचु कली : अय्यंकाली के वक्ष-कर विरोधी आंदोलन की नायिका

उनीसवीं शताब्दी के त्रावणकोर में सभी जातियों के लिए ड्रेसकोड लागू था। तदनुसार निचली जाति की स्त्रियों को वक्ष ढकने की आजादी नहीं थी। दलित स्त्री-पुरुष दोनों को टैक्स देना पड़ता था। पुरुषों का मूंछें रखना, छाता लेकर चलना निषिद्ध था। ये सब नियम ब्राह्मणों द्वारा अपनी जातीय श्रेष्ठता के नाम पर बनाए गए थे। खुले वक्ष को ऊंची जातियों के प्रति सम्मान माना जाता था। इसलिए उन स्त्रियों को भी, जिन्हें जाति के आधार पर वक्ष ढकने का अधिकार प्राप्त था, ऊंची जाति के पुरुष के समक्ष पहुंचने पर अपना ऊपरी वस्त्र हटा देना पड़ता था।

जब स्त्री का वक्ष ही उसका दुश्मन था

स्त्री का अपना वक्ष ही उसका दुश्मन था। अनेक कहानियां उसे लेकर समाज में प्रचलित थीं। एक कहानी नंगेली नामक आदिवासी स्त्री की थी। 1803 में वक्ष-कर न दे पाने की मजबूरी में उसने अपना स्तन काटकर अधिकारी को भेंट कर दिया था। एक लोककथा के अनुसार निचली जाति की एक स्त्री रानी के पास अपना वक्ष इसलिए ढककर पहुंची थी, ताकि  रानी नाराज होकर उसके स्तनों को काटने का आदेश सुना दे। 1859 के सन्नार विद्रोह तथा उसके बाद चले लंबे सघर्ष के फलस्वरूप नडार स्त्रियों को वक्ष ढकने का अधिकार प्राप्त हो चुका था। लेकिन इझ़वा, पुलाया, कुरुवा आदि पिछड़ी और अछूत जाति की स्त्रियों को यह अधिकार 1915 तक भी प्राप्त नहीं था। 

सोने-चांदी के गहने पहनने पर प्रतिबंध  

अछूतों को सोने और चांदी के आभूषण पहनने का भी अधिकार नहीं था। वे केवल पत्थर अथवा कांच के मनकों की ‘कल्लामाला’(कंठमाला) पहन सकती थीं। कान में लोहे का छल्ला जिसे ‘कुन्नकु’ कहा जाता था, पहनने की अनुमति थी। इसलिए युवा स्त्रियां अपने वक्ष को यथासंभव ढकने की कोशिश में पत्थर और कांच के मनकों की कई-कई मालाएं पहने रहती थीं। ‘कल्लामाला’ उनके दासत्व का प्रतीक थी। वक्ष कर के विरोध में कई आंदोलन चल चुके थे, परंतु उसके ताबूत में अंतिम कील ठोकने का काम किया था अय्यंकाली ने।

कौन थी कोचु कली

उस आंदोलन में अय्यंकाली को आदिवासी स्त्रियों का पूरा सहयोग मिला। उनमें से एक का नाम था—कोचु कली। कोचु कली आदि द्रविड़ समाज से थी। तांबई रंग और लंबे कद के कारण उसे दूर से ही पहचाना जा सकता था। उसका जन्म उनीसवीं शताब्दी  के अंतिम दशक में, इरनाकुलम जिले के एलुवा नामक गांव में हुआ था। पिता का नाम था, पींगन। मां पल्ली कुरुंबा कीझनाद गांव की रहने वाली थी। सात भाई-बहनों में कोचु तीसरे नंबर की थी। 21 वर्ष की उम्र में उसका विवाह, परंबू हाउस बंगले में काम करने वाले पल्ली के साथ कर दिया गया। विवाह के तीन वर्ष पश्चात दोनों के घर एक पुत्री का जन्म हुआ।

उस समय तक केरल में वक्ष-कर विरोधी आंदोलन जोर पकड़ चुका था। जगह-जगह उसके समर्थक और विरोधी आमने-सामने थे। उन्हीं दिनों अपनी संस्था ‘साधुजन परिपालन संघ’ के एक कार्यक्रम के दौरान अय्यंकाली पारंबू हाउस में ठहरे थे। वे एक सभा के सिलसिले में वहां पधारे थे। वक्ष-कर विरोध को लेकर चल रहे प्रदेश-व्यापी संघर्ष के बीच वह सभा कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण थी। सभा में शिरकत के लिए अय्यंकाली ने कुछ उदार नैय्यर नेताओं को भी आमंत्रित किया था। 

दासता के प्रतीकों का बहिष्कार

सभा में सभी नेताओं ने वक्ष कर का विरोध किया। अय्यंकाली का नंबर आया तो उन्होंने भी उसकी तीव्र आलोचना की। भाषण के दौरान उन्होंने दो स्त्रियों को मंच पर आमंत्रित किया। उनमें से एक  कोचु कली थी। उस समय वह 24 वर्ष की थी। दोनों स्त्रियां सकुचाती हुई मंच पर पहुंचीं। अय्यंकाली ने उन्हें बताया कि यहां बैठक में मौजूद सभी लोग गुलामी की प्रतीक ‘कल्लामालाओं’ को उतार फैंकने की सहमति दे चुके हैं। उसके बाद उन्होंने चाकू से, उन स्त्रियों के गले में पड़ी ‘कल्लामालाओं’ को काट फैंका। इसके साथ ही उन्होंने उनके तोड़ा(कान में पहने जाने वाला पत्थर का पारंपरिक आभूषण) को तोड़ दिया—

‘आगे से तुम इन्हें कभी मत पहनना। बजाय इसके तुम ‘धोती और ब्लाउज’ पहना करना।’ अय्यंकाली ने कहा। उन्होंने उन स्त्रियों को कपड़े खरीदने के लिए कुछ पैसे भी दिए। उसके बाद कोचु कली वक्ष-कर विरोधी आंदोलन के स्त्री दस्ते की नेता बन गई। 1915 में उसके नेतृत्व में वक्ष-कर विरोधी कई प्रदर्शन हुए। उनमे सबसे महत्वपूर्ण कोल्लम जिले के पेरिनाड में दलित-आदिवासी स्त्रियों का आंदोलन था। उस ऐतिहासिक कार्यक्रम में स्त्रियों ने गले में पहनी कल्लामालाओं को खुद उतार फेंका था।

सवर्णों की हिंसा

वक्ष कर विरोधी आंदोलन में स्त्रियों की भागीदारी ने सवर्णों को हिलाकर रख दिया था। वे मनमानी पर उतर आये थे। मलयालम पत्रिका ‘मीतावदी’ के जनवरी 1916 के अंक के अनुसार एक पुलाया स्त्री ने अय्यंकाली से मुलाकात के बाद ‘कल्लामाला’ पहनना छोड़ दिया था। एक दिन वह अपने काम पर जा रही थी। अचानक एक आदमी उसके पास पहुंचा और ‘कल्लामाला’ के बारे में पूछा। स्त्री के यह कहने पर कि वह उसे उतार कर फ़ेंक चुकी है, उस आदमी को इतना गुस्सा आया कि उसने तत्काल उस स्त्री के कान काट लिए।

अय्यंकाली की यादों के साथ काटी जिंदगी   

आधुनिक केरल के प्रमुख वास्तुकार अय्यंकाली से जुड़ी जादुई यादों का ही असर था, जिससे कोचु कली ने लंबी उम्र प्राप्त की थी। उनका निधन, 115 वर्ष की अवस्था में 2013 में हुआ था। अय्यंकाली को याद करते समय कोचु कली का चेहरा दमकने लगता था। गर्दन अभिमान से कुछ और तन जाती थी। एक साक्षात्कार में उसने बताया था कि अय्यंकाली के शब्द आज भी उनके कानों में घंटी की तरह गूंजते हैं। उसके अनुसार अय्यंकाली तीन दिन और तीन रात ‘परंबू हाउस’ में ठहरे थे। भोजन में उन्हें चावल और सूखी झींगा मछली की कढ़ी परोसी गई थी। कोचु कली उस दिन को याद करके गर्व से भर जाती थी, जब उसने ‘धोती और ब्लाउज’ को पहली बार पहना था—

‘धोती और ब्लाउज पहनते समय मैं बहुत डरी हुई थी। सोचती थी कि सवर्ण डंडों से हमारी पिटाई करेंगे। लेकिन जब अय्यंकाली ने हमसे बात की, हमारा सारा डर गायब हो गया।’

28 अगस्त 2020 को अय्यंकाली का 157वां जन्मदिवस है। यह अवसर अय्यंकाली के साथ-साथ कोचु कली के संघर्ष को याद करने का भी है।

वक्ष-कर का विरोध

अय्यंकालि द्वारा चलाए गए महत्वपूर्ण आंदोलनों में से एक था—वक्ष-कर के विरोध में चलाया गया आंदोलन। वह ऐसा अभियान था, जो उन्हें अपने समकालीन और पूर्ववर्ती कई समाज-सुधारकों से आगे खड़ा सिद्ध कर देता है। उनीसवीं शताब्दी के त्रावणकोर में सभी जातियों के लिए ड्रेसकोड लागू था। उसमें सर्वाधिक प्रताड़ना स्त्रियों को झेलनी पड़ती थी। तदनुसार निचली जाति की स्त्रियों को वक्ष ढकने की आजादी नहीं थी। यदि कोई स्त्री अपना वक्ष ढकना चाहे तो बदले में उसे सरकार को कर देना पड़ता था। कर की मात्रा वक्ष के आकार के अनुरूप तय की जाती थी। जितना बड़ा वक्ष, उतना ज्यादा टैक्स। उसकी उगाही के लिए एक अधिकारी नियुक्त था। वक्ष-कर लगाने वाले ब्राह्मण थे। खुले वक्ष को ऊंची जातियों के प्रति सम्मान माना जाता था। तदनुसार नैय्यर स्त्रियों को नंबूदरी ब्राह्मणों के समक्ष अपना वक्ष ढकने की स्वतंत्रता नहीं थी। जबकि ब्राह्मण अपना वक्ष केवल मंदिर में देवताओं के समक्ष खुला रखता था। यहां तक उन स्त्रियों को भी, जिन्हें जाति के आधार पर वक्ष ढकने का अधिकार प्राप्त था, ऊंची जाति के पुरुष के समक्ष पहुंचने पर अपना ऊपरी वस्त्र हटा देना पड़ता था।

स्त्री का अपना वक्ष ही उसका दुश्मन था। अनेक कहानियां उसे लेकर समाज में प्रचलित थीं। एक कहानी नंगेली नामक आदिवासी स्त्री की थी। वक्ष-कर न दे पाने की मजबूरी में उसने अपना स्तन काटकर अधिकारी को भेंट कर दिया था। एक लोककथा केरलीय समाज में लंबे समय से प्रचलित थी। उसमें निचली जाति की एक स्त्री रानी के पास अपना वक्ष केवल इसलिए ढककर पहुंचती है कि वह नाराज होकर उसके स्तनों को काटने का आदेश सुना दे। ताकि इस ‘आफत’ से  उसे हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाए। 1859 में शुरू हुए सन्नार विद्रोह तथा उसके बाद चले लंबे सघर्ष के फलस्वरूप नडार स्त्रियों को अपना वक्ष ढकने की आजादी प्राप्त हो गई। लेकिन इझ़वा, पुलाया आदि पिछड़ी और अछूत जाति की स्त्रियों को 1915 तक वक्ष ढकने का अधिकार प्राप्त नहीं था। 

अछूतों को सोने और चांदी के आभूषण पहनने का भी अधिकार नहीं था। वे केवल पत्थर अथवा कांच के मनकों की ‘कल्लु माला’(कंठ माला) पहन सकती थीं। कान में केवल लोहे का छल्ला जिसे ‘कुन्नकु’ कहा जाता था, पहनने की अनुमति थी। इसलिए युवा स्त्रियां अपने वक्ष को यथासंभव ढकने की कोशिश में पत्थर और कांच के मनकों की कई-कई मालाएं पहने रहती थीं। ‘कल्लुमाला’ उनके दास होने की निशानी भी थी। 1915 में एक सभा के दौरान अय्यंकाली ने अछूत स्त्रियों से कहा था कि वे दासता के प्रतीक उन आभूषणों को हमेशा के लिए उतार फेंके। उनके स्थान पर धोती और ब्लाउज जैसे वस्त्र पहनें। उनके आवाह्न पर पेरीनाड की हजारों दलित स्त्रियों ने पत्थर की कंठमालाओं को उतारकर ऊपरी वस्त्र पहनना आरंभ कर दिया। यह देखकर शीर्ष जातियों में खलबली मच गई। उन्होंने इसे स्थापित समाज-व्यवस्था का उल्लंघन माना। ‘अपमान’ का बदला लेने के लिए वे दलितों पर हमलावर होने लगे। वक्ष ढकने के कारण कई दलित स्त्रियों के स्तन काट डाले गए। कइयों के घरों को आग के हवाले कर दिया गया। परिजनों पर जानलेवा हमले किए गए। अनेक स्त्रियों के पति, भाई और माता-पिता को मौत के हवाले कर दिया गया। उस आंदोलन में अय्यंकाली को आदिवासी स्त्रियों का पूरा सहयोग मिला। उन जुझारू स्त्रियों में से एक का नाम था—कोचु कली। वह पहली स्त्री थी जिसके गले में पड़ी ‘कल्लुमाला’ को अय्यंकाली ने अपने हाथों से काटा था।

अय्यंकाली के सभी चित्रों में हम उन्हें कोट पहने हुए देखते हैं। वह भेषभूषा भी उन्होंने, ब्राह्मणों द्वारा निर्धारित ड्रेस कोड को चुनौती देने के लिए अपनाई थी। जिस जाति में उनका जन्म हुआ था, उसकी सामाजिक हैसियत गुलामों जैसी थी। एक पुलाया अपने शरीर पर केवल पुराना, लंगोटीनुमा वस्त्र लिपेट सकता था। अय्यंकाली उससे विद्रोह करना चाहते थे। लेकिन सोचते थे कि कोट पहनने का अधिकार केवल पढ़े-लिखे लोगों को है, जबकि वे पूरी तरह अनपढ़ थे। कुन्नुकुझी एस. मणि के अनुसार, श्री मूलम प्रजा सभा का सदस्य मनोनीत किए जाने पर, जॉन हेनरी नामक एक यूरोपियन ने उन्हें एक कोट भेंट किया था। प्रजा सभा के अगले सत्र में वे उसी कोट को पहनकर उपस्थित हुए थे। अगले सत्र के लिए वे कुछ और कोट सिलवाना चाहते थे। मगर उन दिनों त्रिरुवनतपुरम् में ऐसा कोई दर्जी नहीं था, जो कोट की सिलाई कर सके। इसलिए उन्होंने कोट्टयम के एक दर्जी को दो कोट सीने का आर्डर दिया। श्रीमूलम पोपुलर असेंबली के अगले सत्र में उन्होंने अपने सिलवाए कोट पहनकर हिस्सा लिया था। नैय्यर उसे देखकर जल-भुन रहे थे। लेकिन अब कुछ भी कर पाना उनके बस से बाहर था। 

केरल के इतिहास में अस्पृश्यता, अशिक्षा और दासता को सबसे जोरदार चोट देने वाला वह पुरोधा, 18 जून, 1941 को सघर्ष चिरनिद्रा में लीन हो गया। एक अवसर पर एक पत्रकार ने उनसे पूछा था—‘आपकी दिली तमन्ना क्या है?’ इस पर अय्यंकाली का उत्तर था—‘आंख मूंदने से पहल मैं अपने समाज के दस-बारह विद्यार्थियों को ग्रेजुएट बने देखना चाहता हूं…बस।’ एक कविता के जरिये  मलयाली कवि पी. जी. बिनॉय उन्हें इस तरह याद करते हैं—

तुम्हीं ने जलाया था प्रथम ज्ञानदीप

बैलगाड़ी पर सवार हो

गुजरते हुए प्रतिबंधित रास्तों पर

अपनी देह की यंत्रशक्ति से

पलट दिया था, कालचक्र को

ओमप्रकाश कश्यप

1. एम. निसार, मीना कंडासामी—अय्यंकाली : ए दलित लीडर ऑफ़ आर्गेनिक प्रोटेस्ट, पृष्ठ 15.

2. एम. वेलकुमार, ट्रांसफार्मेशन फ्राम अनटचेबल टू टचेबल: एक स्टडी ऑफ़ अयंकाली कंटीब्यूशन टू दि रेनेसां ऑफ़ ट्रावणकोर दलितस, 2018

3. जेटिंल टी. वर्गिस, दि कंन्सट्रक्शन ऑफ़ साधुजनम्: अय्यंकालि एंड दि स्ट्रगल ऑफ़ दि स्लेव कॉस्ट्स फॉर ए न्यू आइडेंटिटी-1884-1941, (2016), पेज 72

4. Ayyankali, dalit e-forum, dalits@ambedkar.org,

5. Ayyankali, dalit e-forum, dalits@ambedkar.org,

6.  कन्नुकुझी मणि, महात्मा अय्यंकलि, डी.सी.बुक्स, कोट्यम, 2008, जेटिंल टी. वर्गिस, पृष्ठ 81

7. कोचु कली, दि हिस्ट्री ऑफ़ इंडियन स्लेव वूमेन, http://dravidagallery.blogspot.com/2013/06/?m=0

8. एम. वेलकुमार, पृष्ठ-197-198

संस्कृति और सामाजिक न्याय

विशेष रुप से प्रदर्शित

प्रत्येक समाज अपनी संस्कृति से पहचाना जाता है. उसका प्रमुख कार्य समाज में एकता की अनुभूति जगाना पैदा करना है. इसके लिए जरूरी है कि वह सामाजिक संबंधों, नागरिकों के सामान्य व्यवहारों, सार्वकालिक जीवन-मूल्यों और भविष्य के सपनों से अनुप्रेत हो. प्रायः धर्म एवं संस्कृति को एक मान लिया जाता है. जबकि आस्था और विश्वास को अपनी पीठ पर ढोने वाला धर्म विराट संस्कृति का अंग तो हो सकता है, उसका पर्याय नहीं. किसी समाज द्वारा धर्म की केंचुल से बाहर आने की छटपटाहट विवेकीकरण के प्रति उसकी उत्सुकता को दर्शाती है. जहां तक भारतीय संस्कृति का प्रश्न है, अधिकांश विद्वान इसे ‘विविधता की संस्कृति’ मानते तथा ‘सनातन संस्कृति’ कहकर इसका महिमा-मंडन करते हैं. इनमें से एक भी धारणा मूल्यबोधक नहीं हैं. सांस्कृतिक वैविध्य तभी सार्थक है जब वह मानवीय चेतना का स्वयं-स्फूर्त विस्तार हो. साथ ही लोकतांत्रिक सोच को बढ़ावा देता हो. प्राचीनता काल-सापेक्ष स्थिति है. वह केवल घटना-विशेष की ऐतिहासिकता को दर्शाती है. संस्कृति का असल बड़प्पन इसमें है कि अपने अनुयायियों के बीच न्याय, समानता और समरसता के वितरण को लेकर वह कितनी उदार है! कितने प्रयास उसने अपने अंतर्विरोधों के समाहार हेतु किए हैं. और इन सब के लिए वह लोकतंत्र के कितने करीब है. इस कसौटी पर भारतीय संस्कृति उतनी सफल सिद्ध नहीं होती, जितनी बताई जाती है.

सच तो यह है कि स्मृति-ग्रंथों, पुराणों, महाकाव्यों आदि के माध्यम से जो संस्कृति हमारे जीवन में दाखिल होती है, या एक अल्पसंख्यक अभिजन वर्ग द्वारा बहुसख्यक जनसमुदाय पर बरबस थोप दी जाती है, वह सामाजिक न्याय की अवरोधक तथा सामूहिक विवेक का क्षरण करने वाली है. सामान्य नैतिकता एवं लोकादर्शों को अमल में लाने के बजाय वह धर्म के हाथों में खेलती है; और खुद को बड़ी आसानी से उसकी सामंती वृत्तियों के अनुसार ढाल लेती है. वह लोगों से अपेक्षा रखती है कि वे क्या करें, क्या खाएं, क्या पियें, क्या पढ़े-लिखें, और किन लोगों से कैसे संबध बनाएं? न तो उसे मानवीय विवेक की परवाह रहती है, न उसकी रुचियों का परिष्कार. बावजूद इसके जीवन में अनावश्यक दखल देकर, वह समानता और स्वतंत्रता की भावना का हनन करती है. कभी धर्म, कभी समाज और कभी परंपरा-वैविध्य के बहाने, असमानता को मानवीय नियति घोषित करना उसकी मूल प्रवृत्ति रही है. वह असल में शासक संस्कृति है, जो व्यक्ति को जन्म के साथ ही बता देती कि उसका जन्म शासन करने के वास्ते हुआ है या शासित होने के लिए. जो लोग शासक वर्ग में जन्म लेते हैं, अभिजनोन्मुखी संस्कृति का रेशा-रेशा उनकी मदद में जुटा होता है. शासितों की कोटि में जन्मे व्यक्ति, यदि दुर्दशा से उबरना चाहें या इस तरह का सपना भी देखें तो वह लगातार अवरोध उत्पन्न कर, परिवर्तन की चाहत को ही मिटाने पर तुल जाती है. लोगों के सवाल करने की आदत को छुड़ाकर वह उनके निर्मानवीकरण को गति देती है. इससे सामूहिकताबोध, जो संस्कृति का प्रमुख उद्देश्य है, का हृास होता है. सांप्रदायिकता पनपती है; और जनशक्ति छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटकर निष्प्रभावी हो जाती है. इससे परिवर्तन का लक्ष्य निरंतर दूर खिसकता रहता है.

हम भारतीयों, विशेषकर जो लोग स्वयं को हिंदू मानते हैं, का जीवन जन्म से लेकर मृत्यु तक तरह-तरह के कर्मकांडों से बंधा होता है. वे अनेक प्रकार के हो सकते हैं. एक समाज से दूसरे समाज, यहां तक कि एक जाति समूह से दूसरे जाति-समूह के बीच उनका रूप बदलता रहता है. कर्मकांडों का उद्देश्य होता है, किसी महाशक्ति को प्रसन्न करना. उनमें एक पक्ष दाता(जाहिर है काल्पनिक), दूसरा याचक की भूमिका में होता है. याचक अपने श्रेष्ठतम को समर्पित करने की भावना के साथ दाता के आगे नतशिर होता है. तत्क्षण खुद को दाता का प्रतिनिधि घोषित करते हुए पुरोहित बीच में आ टपकता है. याचक द्वारा दाता के नाम पर समर्पित सामग्री के अलावा वह दक्षिणा की भी दावेदारी करता है. कर्मकांडों को लोक की सामान्य स्वीकृति प्राप्त होने के कारण उनसे पैदा स्तरीकरण समाज में गहरी पैठ बना लेता है. तदनुसार जो दाता या उसके स्वयं-घोषित प्रतिनिधि की इच्छा है, उसे उसी रूप में, बगैर किसी ना-नुकर के, स्वीकार कर लेना याचक की विवशता होती है. इसका लाभ शिखर पर बैठे लोग उठाते हैं. राज्य की कुल उत्पादकता में नगण्य योगदान के बावजूद वे किसी न किसी बहाने लाभ के नब्बे प्रतिशत को हड़पे रहते हैं. उसी के दम पर वे दाता की भूमिका निभाए जाते हैं. उनके नेतृत्व में पूरी संस्कृति कर्मकांडों में सिमटकर रह जाती है.

कर्मकांडों की व्याख्या जिन ग्रंथों में है, सब ब्राह्मणों द्वारा रचे गए हैं. उनकी समीक्षा अथवा संशोधन-विस्तार का अधिकार ब्राह्मणेत्तर वर्गों को नहीं है. उनसे बस इतनी अपेक्षा होती है कि ब्राह्मणों द्वारा गढ़े गए लिखित-अलिखित विधान का बगैर ना-नुकुर अनुसरण करें. उनपर किसी भी प्रकार का संदेह, आलोचना, समीक्षा पाप की कोटि में आती है. सांस्कृतिक-सामाजिक असमानता का पोषण करने वाली इस संस्कृति के प्रति विरोध के स्वर आरंभ से ही उठते रहे हैं. उनके दस्तावेजीकरण का काम हमें अपेक्षाकृत उदार एवं समावेशी संस्कृति के करीब ला सकता है. उसे हम जनसंस्कृति अथवा मूल भारतवंशियों की संस्कृति भी कह सकते हंै.

सत्य यह भी है कि कोई भी संस्कृति स्वयं लक्ष्य नहीं होती. वह केवल मार्ग चुनने में मदद करती है. उसका काम मानवीय वृत्तियों को सुसंस्कृत करना है, किसी व्यक्ति या व्यक्तियों की रोजमर्रा की आदतों पर नियंत्रण करना नहीं. विडंबना है कि भारतीय संस्कृति की अधिकांश ऊर्जा नकारात्मक कार्यों में खपती आई है. वह बड़ी आसानी से उन लोगों के हाथों में खेलने लगती है, जिनका काम दूसरों के मूल-भूत अधिकारों का हनन करना है. शिखरस्थ ब्राह्मण उसके विधान का निर्माता, व्याख्याता, पालक-अनुपालक सब होता है. विशेष मामलों में, या यूं कहिए कि अपवाद-स्वरूप संस्कृति के विशिष्ट प्रवत्र्तकों को, जन्मना ब्राह्मण न हों तो भी उन्हें कर्मणा ब्राह्मण मान लिया जाता है. व्यास, वाल्मीकि, महीदास आदि शास्त्रीय परंपरा के ब्राह्मण नहीं हैं. फिर भी उन्हें ब्राह्मण माना गया है. क्योंकि वे उस संस्कृति के सिद्ध संहिताकार हैं, जो वर्ण-व्यवस्था को आदर्श तथा ब्राह्मणों को समाज का सर्वेसर्वा मानकर उन्हें अंतहीन अधिकार सौंप देती है. कुछ लोग इसे भारतीय संस्कृति की उदारता या उसका लचीलापन मानते हैं. असल में यह दूसरे वर्गों के बुद्धिजीवी, उनकी उपलब्धियों का श्रेय हड़प लेने की स्वार्थ-पूर्ण व्यवस्था है. इससे निम्न वर्गों की उच्च स्तरीय मेधा, उच्चस्थ वर्गों की स्वार्थ-सिद्धि में लगी रहती है.

इस प्रवृत्ति के दर्शन ऋग्वेद से लेकर आधुनिक साहित्य तक मौजूद हैं. गुरु उद्दालक के पास सत्यकाम जाबाल जब यह कहता है कि वह घरों में काम करने वाली दासी के गर्भ से जन्मा है और पिता का नाम पता नहीं है, तो महर्षि उसे यह कहकर कि ‘तूने सत्य कहा, ऐसा सत्यभाषी ब्राह्मण पुत्र ही हो सकता है.’-दीक्षा देने को तैयार हो जाते हैं. भारतीय संस्कृति के अध्येता इस उद्धरण को उसके उदात्त लक्षण के रूप में प्रस्तुत करते आए हैं. वस्तुतः यह बौद्धिक धूर्तता है, जिससे ब्राह्मणेत्तर वर्गों को एक ही झटके में ‘मिथ्याभाषी’ घोषित दिया जाता है. सत्यकाम जाबालि की भांति महीदास भी दासी पुत्र था. जन्म से शूद्र किंतु मन-बुद्धि से ब्राह्मण संस्कृति का प्रतिभाशाली संहिताकार. ऋग्वेद शाखा के ‘ऐतरेय ब्राह्मण’, ‘ऐतरेय उपनिषद’ और ‘ऐतरेय आरण्यक’ का रचियता. इस संस्कृति ने महीदास को भी शूद्रों से झटक लिया. अपवादस्वरूप ही सही, ब्राह्मणेत्तर वर्ग के कुछ अतिप्रतिभाशाली बुद्धिजीवियों को अनुलोम परंपरा के अनुसार ब्राह्मण मान लिए जाने की नीति, प्रतिभाहीन ब्राह्मण पुत्रों के लिए शिखर का स्थान सुरक्षित रखती है. स्तर से ऊपर उठने के लिए ब्राह्मणेत्तर वर्ग के बुद्धिजीवियों को जहां विरलतम प्रतिभा, सर्जनात्मक मेधा एवं विभेदकारी ब्राह्मण-संस्कृति के प्रति अटूट निष्ठा का प्रदर्शन करना पड़ता है, वहीं ब्राह्मण-संतति को उसका स्वाभाविक उत्तराधिकारी मान लिया जाता है. प्रमुख प्रतिभाओं के पलायन के बाद निचले वर्ग आवश्यक बौद्धिक नेतृत्व से वंचित रह जाते हैं. दूसरे षब्दों में भारतीय संस्कृति, उसके नामित देवता, कर्मकांड, धर्म-दर्शन आदि केवल ब्राह्मणों का सृजन नहीं हंै. उसमें ब्राह्मणेत्तर वर्गों का भी भरपूर योगदान रहा है. हालांकि लाभ सर्वाधिक ब्राह्मणों ने उठाया है.

ब्राह्मण संस्कृति के व्याख्याकारों की प्रशंसा करनी होगी कि वर्गीय श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए उन्होंने अपनी रचना का श्रेय स्वयं लेने के बजाय वर्गीय श्रेय को प्राथमिकता दी. ब्राह्मण होने के नाते व्यक्तिगत श्रेय-सम्मान तो उन्हें आसानी से मिल ही जाता है. व्यास, याज्ञवल्क्य, वशिष्ट आदि किसी मनीषी के नहीं, गौत्र या परंपरा के नाम हैं. उनका उल्लेख स्मृतिग्रंथों से लेकर रामायण, महाभारत, पुराण यहां तक कि उत्तरवर्ती ग्रंथों में भी, मुख्य सिद्धांतकार के रूप में होता आया है. व्यक्तिगत श्रेय के आगे वर्गीय श्रेय को वरीयता दिए जाने का अच्छा उदाहरण ‘योग वशिष्ट’ है. लगभग एक हजार वर्ष पुराने, 29000 से अधिक पदों वाले तथा शताब्दियों के अंतराल में अनाम लेखकों द्वारा रचित, परिवर्धित इस विशद् ग्रंथ का रचनाकार होने का श्रेय आदि कवि वाल्मीकि को प्राप्त है, जबकि वाल्मीकि का नाम लगभग दो हजार वर्ष पुरानी कृति ‘पुलत्स्य वध’ जो निरंतर प्रक्षेपण के उपरांत ‘रामायण’ महाकाव्य के रूप में ख्यात हुआ-से भी जुड़ा है. ज्ञान को परंपरा में ढाल देने का लाभ तो केवल ब्राह्मणों को जबकि नुकसान पूरे बहुजन समाज को उठाना पड़ा है. वर्ण-व्यवस्था के चलते पोंगा पंडितों को भी बौद्धिक नेतृत्व का अवसर मिलता रहा. पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही धारा के लेखन से मौलिकता का हृास हुआ. चूंकि धर्म-ग्रंथों में प्रक्षेपण अलग-अलग समय में हुआ था, इसलिए उनमें परस्पर विरोधी बातें भी शामिल होती गईं. जिस महाभारत(शांतिपर्व) कहा गया था, ‘वर्ण-विभाजन जैसी कोई चीज असलियत में नहीं है. यह पूरी सृष्टि ब्रह्म है, क्योंकि इसे ब्रह्मा ने बनाया है.’ उसी में द्रोणाचार्य द्वारा एकलव्य का अंगूठा मांग लेने के धत्तकर्म को भी ‘धर्म’ मान लिया गया.

उधर व्यवस्था से अनुकूलित गरीब-विपन्न लोग निरंतर यह आस बांधे रहे कि जो पंडित लोग चैंसठ लाख योनियों का हिसाब रखते हैं, आदमी के ‘भाग्य’ का अगला-पिछला सब बांच लेने का दावा करते हैं, वे उनका भी ‘हिसाब’ रखेंगे! यदि परमात्मा छोटे-बड़े, गरीब-अमीर, ब्राह्मण और शूद्र में भेद नहीं रखता तो वे भी नहीं रखेंगे. इस भरोसे के साथ वे अपने अधिकारों की ओर से, इतिहास की ओर से मुंह फेरे रहे. समय के दस्तावेजीकरण के प्रति निचले वर्गों की उदासीनता का लाभ ऊपर वालों ने खूब उठाया. उन्होंने कर्मफल का सिद्धांत पेश किया. उसके जरिये शोषित वर्गों को समझाया जाने लगा कि उनकी दुर्दशा के लिए कोई दूसरा नहीं, वे स्वयं जिम्मेदार हैं. संस्कृति के आवरण में उन्होंने पहले अवसर छीने, फिर मान-सम्मान. अपने से नीचे के लोगों को बर्बर, असभ्य, गंवार, गलीच घोषित करके खुद इतिहास में तोड़-मरोड़ करते रहे. उनके द्वारा रचे गए इतिहास में ‘भेड़ों’ और ‘मेमनों’ को जंगल में अव्यवस्था का दोषी बताया जाता रहा तथा ‘भेड़ियों’ और ‘लक्कड़बघ्घों’ को प्रत्येक अपराध से बरी रहने की व्यवस्था की गई. पंडित, देवता, करुणानिधान, अन्नदाता, रक्षक, सेठ, साहूकार जैसे सुशोभन विशेषण उन्होंने अपने लिए सुरक्षित कर लिए. पिछले दो हजार साल का सांस्कृतिक खेल उनकी चालों और समझौतापरस्ती से बना है. ऐसी संस्कृति में जनसाधारण के लिए न्याय की उम्मीद करना खुद को धोखा देना है.

‘सांस्कृतिक वर्चस्व’ बनाए रखने की कोशिश के समानांतर उससे उबरने की छटपटाहट भी मानव-इतिहास का हिस्सा रही है. भारत में उसका पहला उदाहरण मक्खलि गोशाल के चिंतन-कर्म में दिखाई पड़ता है. वह पहला विद्वान था जिसने श्रम-शोषक, परजीवी ब्राह्मण संस्कृति के बरक्स समाज में मेहनतकशों, शिल्पकारों तथा उसके श्रम-कौशल के सहारे आजीविका जुटाने वाले लोगों को संगठित कर आजीवक संप्रदाय की स्थापना की थी. मक्खलि की लोकप्रियता का अनुमान इससे भी लगाया जाता है कि उसके जीवनकाल में आजीवक संप्रदाय के अनुयायियों की संख्या बौद्ध अनुयायियों से अधिक थी. विद्वता के मामले में भी वह अद्वितीय था. सम्राट प्रसेनजित ने बुद्ध से कहा था कि वह गोशाल को उन(बुद्ध)से अधिक प्रतिभाशाली मानते हैं. बुद्ध की हिंसा तथा कर्मकांड विरोधी भौतिकवादी विचारधारा पर आजीवक संप्रदाय का ही प्रभाव था. मक्खलि तथा बुद्ध के अलावा निगंठ नागपुत्त, संजय वेठलिपुत्त, पूर्ण कस्सप, अजित केशकंबलि, कौत्स आदि विद्वान भी यज्ञों में दी जाने वाली बलि तथा कर्मकांड का विरोध कर रहे थे. निगंठ नागपुत्त आगे चलकर महावीर स्वामी के नाम से जैन दर्शन के प्रवर्त्तक माने गए. इनमें सर्वाधिक ख्याति मध्यमार्गी गौतम बुद्ध को मिली, जो उस समय की चर्चित दार्शनिक समस्याओं ‘आत्मा’, ‘परमात्मा’ आदि पर विमर्श करने के बजाय उन्हें टालने के पक्ष में थे. क्षत्रिय कुल में जन्म लेने के कारण बुद्ध और उनके विचारों को उन राजदरबारों में आसानी से प्रवेश मिलता गया, जो ब्राह्मण पुरोहितों के बढ़ते दबाव से तंग आ चुके थे. ‘आजीवक’ और ‘लोकायत’ धारा का प्रतिनिधि साहित्य आज अप्राप्य है. उनका छिटपुट उल्लेख ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन ग्रंथों में ही प्राप्त होता है. सभी में उनकी पड़ताल नकारात्मक दृष्टिकोण के साथ की गई है. संकेत साफ हैं कि विजेता संस्कृतियों ने, पराजित संस्कृति के ग्रंथों को मिटाने का काम पूर्णतः योजनाबद्ध ढंग से किया.

धर्म और संस्कृति का आधार कहे जाने वाले ग्रंथों में, लंबे प्रक्षेपण के बावजूद ऐसे अनेक तत्व हैं, जो वैकल्पिक जनसंस्कृति के प्रवत्र्तक और संवाहक रहे हैं. महिषासुर, बालि, पौराणिक सम्राट वेन के अलावा गणेश, शिव जैसे अनेक नाम मिथक भी हो सकते हैं और यथार्थ भी. लेकिन यदि इन्हें मिथक मान लिया जाए तो ब्राह्मण संस्कृति के प्रमुख संवाहक ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र, हनुमान तथा अन्य देवी-देवताओं को भी मिथक मानना पड़ेगा. क्योंकि उसका पूरा का पूरा भवन इन्हीं के कंधों पर टिका है. शिव भारत की आदिम जातियों के मुखिया रहे होंगे. उनके सहयोगी के रूप में भूत, पिशाच, प्रेत आदि हमें भारत के आदिम कबीलों की याद दिलाते हैं. आर्यों ने शिव को तो अपनाया. मगर उनके सहयोगी कबीलों की पूरी तरह उपेक्षा की. अप्रत्यक्ष रूप से बख्शा शिव को भी नहीं गया. उन्हें आक, धतूरा खाने और भभूत लगाकर रमने वाले अवधूत की तरह दर्शाते हुए सृष्टि चलाने(शासन करने) का अधिकार ‘ब्राह्मण ब्रह्मा’ तथा ‘क्षत्रिय विष्णु’ की बपौती मान लिया गया. गणेश का मिथक भी प्राचीन भारतीय गणतंत्रों के मुखिया की याद दिलाता है. गणतांत्रिक व्यवस्थाओं में मुखिया को प्रथम सम्मानेय माना जाता था. कालांतर में बड़े राज्यों का गठन होने लगा तो सभा का नेतृत्व करने वाले गण-प्रमुख के चरित्र का भी विरूपण किया जाने लगा. बैठे-बैठे सूंड लटक आना और लंबोदर जैसे प्रतीक गण-प्रमुख पर कटाक्ष तथा उसे अपमानित करने के लिए रचे गए.

‘सामाजिक न्याय’ का सपना देखने वाले बुद्धिजीवियों की असली लड़ाई धार्मिक वर्चस्ववाद, विपन्नता और जड़ हो चुकी वर्ण-व्यवस्था से है. इस लक्ष्य की सिद्धि वर्चस्वकारी संस्कृति से मुक्ति के बिना असंभव है. ब्राह्मण संस्कृति ईश्वरीय न्याय में विश्वास करती है. न्याय का स्वरूप क्या हो? वंचित तबकों की उन्नति में वह किस भांति सहायक हो सकता है-यह नहीं बताती. ‘सामाजिक न्याय’ के पैरोकारों का प्रथम लक्ष्य ऐसी संस्कृति का पुनरुद्धार करना है, जिसमें संगठित धर्म का हस्तक्षेप न्यूनतम हो. जो पूरी तरह उदार एवं लोकतांत्रिक हो. इसके लिए आवश्यक है कि प्राचीन संस्कृति के उन प्रतीकों को रेखांकित किया जाए जो कभी ब्राह्मण संस्कृति के विरोध में या उसके समानांतर खड़े थे. क्या यह धर्म के भीतर एक और धर्म की खोज सिद्ध नहीं होगी? यह आशंका पूर्णतः निर्मूल नहीं है. ध्यान यह रखना होगा कि समानांतर संस्कृति के इन प्रतीकों, नायकों, मिथकों का योगदान दमित-शोषित वर्गों के आत्मविश्वास को लौटाने तक सीमित हो. यह एहसास दिलाने के लिए हो कि वे हमेशा से ही ‘ऐसे’ नहीं थे. वे न केवल ‘वैसे’ बल्कि कई मायनों में उनसे भी बढ़कर थे-रावण की लंका में विभीषण को अपनी आस्था और विश्वास के साथ ससम्मान जीने की स्वतंत्रता प्राप्त थी. रामराज्य में शंबूक से यह स्वतंत्रता छीन ली जाती है. इसी तरह राक्षस-सम्राट जलंधर अपनी विष्णु-भक्त पत्नी वृंदा के साथ सुखी जीवन जीता है और उनके दांपत्य के बीच अविश्वास की किरच तक मौजूद नहीं है, जबकि सीता को रावण की अशोकवाटिका में रहने के लिए भी अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ता है. यह गरीबी तथा जाति-भेद द्वारा पैदा की गई अन्यान्य विषमताओं के विरुद्ध जंग भी है. सदियों से जाति के आधार पर सुख-सुविधा और सम्मान भोगते आए समूह, परिवर्तनकामी समूहों पर जातिभेद को बढ़ावा देने का आरोप लगा रहे हैं. दूसरी ओर जातीय उत्पीड़न का शिकार रहे वर्गों को लगता है कि लोकतांत्रिक माहौल का लाभ उठाकर वे अपने संघर्ष को आगे बढ़ा सकते हैं. इसलिए वे जाति को संगठनकारी ‘टूल’ की तरह इस्तेमाल कर रहे है. लेकिन जाति-आधारित संगठनों की अपनी परेशानियां हैं. इस देश में हजारों जातियां हैं. अपनें दम पर कोई भी जाति परिवर्तनकारी ताकत बनने में अक्षम है. अतः लोग समझने लगे हैं कि सामाजिक न्याय के संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए समानांतर लड़ाई संस्कृति के मोर्चे पर भी लड़नी होगी. जीत उन्हीं की होगी जो संगठित रहने के साथ-साथ सामूहिक विवेक से काम लेंगे.

ओमप्रकाश कश्यप

गुलामगिरी : ब्राह्मणवाद विरोधी चेतना का बीज-ग्रंथ

जहां न्याय की अवमानना होती है, जहां जहालत और गरीबी है, जहां कोई भी समुदाय यह महसूस करे कि समाज सिवाय उसके दमन, लूट तथा अवमानना के संगठित षड्यंत्र के सिवाय कुछ नहीं है—वहां न तो मनुष्य सुरक्षित रह सकते हैं, न ही संपत्ति.— फ्रैड्रिक डगलस

गुणीजन कहते आए हैं, जवाब से सवाल ज्यादा मुश्किल होता है. सवाल समझ में आ जाए तो जवाब खोजने में देर नहीं लगती. दो सौ साल पहले बहुजनों का सांस्कृतिक-सामाजिक शोषण आज के मुकाबले कहीं अधिक था. किंतु उसके विरोध में न कोई चेतना थी, न आवाज. न अपने हालात को लेकर सवाल उनके दिमाग में उठते थे. वे शोषण-उत्पीड़न के साथ जीना सीख चुके दीन, दलित, सर्वहारा थे. मानते थे कि वे वैसे ही हैं, जैसा उन्हें होना चाहिए था. उन्हें समाज से कोई शिकायत न थी. शिकायत थी तो ब्राह्मणों द्वारा थोपे गए ईश्वर से, जिसे वे भ्रमवश अपना मान बैठे थे. जीवन की तमाम हताशाओं के बीच ईश्वर नामक काल्पनिक सत्ता ही उनकी एकमात्र उम्मीद थी. वे इस बात से अनजान थे कि धर्म और ईश्वर उन्हें गुलाम बनाए रखने का षड्यंत्र हैं.

बावजूद इसके कि मेहनत-मशक्कत के सारे काम उनके जिम्मे थे, बदले में नकद मजदूरी तो दूर, मेहनत का पैसा तक नहीं मिलता था. अनेक को तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी बेगार करनी पड़ती थी. बावजूद इसके 1848 में मार्क्स ने ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ जरिए जब यह आह्वान किया कि ‘दुनिया के मजदूरो एक हो जाओ’ तो भारत के शूद्रों-अतिशूद्रों, छूत-अछूत में उसकी कोई प्रतिक्रिया न हुई. उस समय उन्होंने मान लिया कि वे मजदूर थोड़े ही हैं. वे तो लुहार, बढ़ई, चमार, कुम्हार, तेली, तमोली, धोबी, मल्लाह बगैरह हैं. 11 वर्ष बाद, 1859 में जॉन स्टुअर्ट मिल ने ‘ऑन लिबर्टी’ लिखकर मनुष्य को उसकी स्वाधीनता का मोल समझाने की कोशिश की. उसने लिखा—‘राज्य-व्यवस्था चाहे जैसी क्यों न हो, जिस समाज और लोक समुदाय में स्वाधीनता का आदर नहीं है, उसे स्वाधीन नहीं कहा जा सकता.’ शूद्र-अतिशूद्र उस संदेश को समझने में भी नाकाम रहे.

फिर आए फुले. आरंभ में उन्हें लगा कि शूद्रों-अतिशूद्रों की असली समस्या उनकी अशिक्षा है. शिक्षा उन्हें अज्ञानता के गर्त से बाहर निकाल सकती है. मात्र 21 वर्ष की अवस्था में उन्होंने शूद्रों-अतिशूद्रों की शिक्षा के लिए अभियान छेड़ दिया. एक के बाद एक, मात्र 3 वर्षों में 18 स्कूल खड़े कर दिए. 1848 में पहला स्कूल खोलने से अगले 25 वर्षों तक शिक्षा के जरिये अज्ञान के अंधकार को मिटाने में लगे रहे. उन्होंने जातिवाद को संरक्षण देने, धर्म के नाम तंत्र-मंत्र, जादू-टोना, पाखंड और पापाचार फैलाने के लिए ब्राह्मणों को धिक्कारा. कहा कि ‘नकली धर्मग्रंथों के माध्यम से ब्राह्मणों ने यह दिखाने की चेष्टा की है कि उन्हें प्राप्त विशेषाधिकार ईश्वरीय देन हैं.’ पुरोहित वर्ग के आडंबरों और प्रपंचों पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने ‘तृतीय रतन’(1855) नाटक लिखा. निचली जातियों में आत्मसम्मान का भाव पैदा करने के लिए ‘पंवाड़ा : छत्रपति शिवाजी भौंसले का’(1869) की रचना की. 1869 में ही ‘ब्राह्मणों की चालाकी’ तथा ‘पंवाड़ा : शिक्षा विभाग के अध्यापक का’ का प्रकाशन हुआ. पहली कृति ब्राह्मणवादी षड्यंत्रों पर मुक्त बयान जैसी थी. दूसरी पुस्तक में शूद्रों और अतिशूद्रों को पढ़ाने में ब्राह्मण अध्यापकों की आनाकानी तथा शिक्षा विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार पर प्रहार किया गया था. ये सभी कार्य महत्त्वपूर्ण होने के बावजूद एक बड़े आंदोलन की पूर्वपीठिका जैसे थे.

1973 तक शूद्रों-अतिशूद्रों की शिक्षा के लिए शुरू किए गए अभियान को 25 वर्ष पूरे हो चुके थे. उनके स्कूलों से निकले शूद्र-अतिशूद्र विद्यार्थी सामाजिक जीवन में आने लगे थे. उस पीढ़ी के सदस्य तर्क करते थे. स्वतंत्र दिलो-दिमाग से काम लेते थे. अब फुले को लगने लगा था कि ब्राह्मणों के सांस्कृतिक प्रभुत्व के विरुद्ध बड़ा आंदोलन खड़ा करने का समय आ चुका है. जातिप्रथा के कलंक से मुक्ति के लिए शूद्रों-अतिशूद्रों को उनके प्राचीन अतीत के बारे में बताया जाना आवश्यक है. यह बताया जाना आवश्यक है कि पुराणों, महाकाव्यों और दूसरे धर्मग्रंथों के माध्यम से ब्राह्मणों ने उनके इतिहास और संस्कृति का विरूपण किया है. कि उनके पूर्वज भी एक गौरवशाली अतीत के स्वामी रहे हैं. उस एहसास को जीने के लिए ब्राह्मण संस्कृति के चंगुल से बाहर आना आवश्यक है. उन धर्म-ग्रंथों, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक प्रतीकों को नकारना आवश्यक है जो उन्हें दूसरे या तीसरे दर्जे का नागरिक समझते हैं. बगैर उनके बौद्धिक-सांस्कृतिक अधिपत्य के बाहर आए, उनकी समाजार्थिक स्वतंत्रता असंभव है. ‘सांस्कृतिक अधिपत्य’ का विचार मार्क्स की ओर से आया था. उसे विस्तार दिया था—अंतोनियों ग्राम्शी ने. उसका कहना था कि मनुष्य को बौद्धिक दास बनाए रखने के लिए सांस्कृतिक प्रतीकों, मिथों आदि को जिस प्रकार मनुष्यता की संपूर्ण पहचान के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, उसकी काट समानांतर संस्कृति के निर्माण एवं विकास द्वारा ही संभव है.’ ‘गुलामगिरी’(1873) के माध्यम से फुले ने यही किया था. वह भी ग्राम्शी से करीब चार दशक पहले. अपने विचारों और कार्य को सशक्त आंदोलन का रूप देने के लिए, 1873 में ही उन्होंने ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की थी.

ब्राह्मणवादी धर्म की आड़ में : गुलामगिरी 

‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ की तरह ‘गुलामगिरी’ भी छोटी-सी पुस्तक है. इससे अनुमान लगाया जाता है कि दुनिया को बदलने के लिए भारी-भरकम महाकाव्यों की जरूरत नहीं पड़ती. नीयत अच्छी हो तो चंद शब्द भी असरकारी बन जाते हैं. ‘गुलामगिरी’ को उन्होंने ‘संयुक्त राष्ट्र के सदाचारी जनों, जिन्होंने गुलामों को दासता से मुक्त करने के कार्य में उदारता, निष्पक्षता और परोपकार वृत्ति का प्रदर्शन किया था, को सम्मानार्थ समर्पित’ किया था. भारत में ‘सांस्कृतिक आधिपत्य’ विरोधी संघर्ष के इतिहास में इस पुस्तक का ठीक वही स्थान है, जो दुनिया-भर के मजदूर आंदोलनों के इतिहास में ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ का है. मराठी में लिखी गई इस पुस्तक के प्रथम संस्करण का मूल्य 12 आना था. मगर निर्धनों तथा शूद्रातिशूद्रों को यह पुस्तक मात्र आधी कीमत पर उपलब्ध कराई जाती थी. इसके पीछे ज्योतिबा फुले की दूरदृष्टि थी. उद्देश्य था कि जो गरीब तथा शूद्र-अतिशूद्र ‘गुलामगिरी’ को पढ़ना चाहते हैं, उनके लिए पैसे की कमी बाधा न बने.

देरिदा को ‘विखंडनवाद’ का आदि व्याख्याता माना जाता है. फुले इस पद्धति का प्रयोग ‘गुलामगिरी’ में देरिदा से लगभग एक शताब्दी पहले करते हैं. जिन पौराणिक आख्यानों को उस समय तक श्रद्धापूर्वक पढ़ने की परंपरा थी. जिनपर संदेह करना पाप समझा जाता था, फुले ने उनका पुनर्पाठ करते हुए, समानांतर इतिहास की पृष्ठभूमि तैयार की. ‘गुलामगिरी’ में ब्राह्मणों को विदेशी मूल का बताना फुले की मौलिक स्थापना नहीं थी. मैक्समूलर, विंसेंट स्मिथ, रिस डेविस जैसे विद्वानों का यही विचार था. और तो और तिलक जैसे दक्षिणपंथी लेखक भी यही मानते थे. फुले ने मत्स्य, वाराह, कच्छ, नरसिंह, परशुराम आदि अवतारों को आर्य-नायक के रूप में प्रस्तुत किया. हिरण्यगर्भ, हिरण्यकश्यप, बलि, वाणासुर जैसे अनार्य राजाओं जिन्हें पुराणों और धर्मग्रंथों में राक्षस, असुर, दैत्य, दानव जैसे नामों से संबोधित किया गया है, को उन्होंने वीर योद्धा और भारत का मूल शासक घोषित किया. बलि को उन्होंने आदर्श, न्यायशील और प्रतापी राजा के रूप में चित्रित किया है. बताया कि उनके अधीन आधुनिक महाराष्ट्र, कोंकण प्रदेश से लेकर अयोध्या और काशी के आसपास के क्षेत्र शामिल थे.

गौरतलब है कि ब्राह्मण भी देवताओं और राक्षसों के संघर्ष की वास्तविकता पर भरोसा करते हैं. लेकिन उनके वर्णन इतने ज्यादा वायवी हैं, कि वे किसी और दुनिया के जीव लगने लगते हैं. फुले मिथकीय आख्यानों में निहित आर्य-अनार्य संघर्ष का मानवीकरण करते हैं. चमत्कारों और मिथों पर टिकी प्राचीन भारतीय संस्कृति की आलोचना करते हुए वे पाठक को उस इतिहास की झलक दिखाने का प्रयत्न करते हैं, जिसकी कालावधि के बारे में ठोस जानकारी भले ही न हो, मगर वह सत्य के अपेक्षाकृत करीब है. इसे कांटे से कांटा निकालने की कोशिश भी कह सकते हैं, जो सच भले न हो, मगर अपने सरोकारों के आधार पर वह कहीं ज्यादा मानवीय और तर्कपूर्ण है. फुले के समय तक सिंधु सभ्यता के बारे में जानकारी उजागर नहीं हुई थी. 1930 में हुई उस खोज से पता चला कि आर्यों के भारत आगमन के हजारों वर्ष पहले से सिंधु घाटी की उपत्यकाओं में महान नागरी सभ्यता अस्तित्ववान थी. उस सभ्यता के प्रमुख नगरों में से एक राखीगढ़ी से प्राप्त हालिया सबूत, उसे अनार्य सभ्यता घोषित करते हैं.

‘गुलामगिरी’ संवाद शैली में लिखी गई पुस्तक है. यह उन दिनों की प्रचलित शैली थी. संवाद के एक छोर पर स्वयं लेखक है, दूसरे पर धोंडीराव. पुस्तक का आरंभ आरंभ उन्होंने महान ग्रीक कवि होमर की इस पंक्ति से किया था—‘मनुष्य जिस दिन गुलाम बनता है, वह अपने आधे सद्गुण खो देता है.’ हिंदु धर्मग्रंथों में दशावतार की संकल्पना के आधार पर फुले भारत के प्राचीन इतिहास की क्रमबद्ध रूपरेखा तैयार करते हैं. बीच-बीच में ब्राह्मण षड्यंत्रों, चालाकियों तथा उन वितंडाओं का वर्णन भी करते हैं, जिनका सत्य और वास्तविकता से कोई नाता नहीं है. उदाहरण के लिए मत्स्यावतार के जन्म की घटना. भागवत पुराण के अनुसार मत्स्यावतार का जन्म मछली के गर्भ से हुआ था. उस कथा पर कटाक्ष करते हुए पुस्तक के दूसरे परिच्छेद में फुले लिखते हैं कि मछली के—‘जिस अंडे में मत्स्य बालक था, उसको उसने पानी से बाहर निकालकर फोड़ा होगा, तब उस अंडे से उसने मत्स्य बालक को बाहर निकाला होगा. यदि यह कहा जाए तो उस मछली की जान पानी से बाहर कैसे बची होगी? शायद उसने पानी में ही उस अंडे को फोड़कर उस मत्स्य बालक को बाहर निकाला होगा. यदि यह मान लिया जाए तो उस मत्स्य जैसे बालक की जान पानी में कैसे बची होगी?’ ऐसा नहीं है कि हिंदू धर्मग्रंथों में व्याप्त ऐसे अनर्गल आख्यानों पर फुले से पहले किसी ने विचार नहीं किया था. प्राचीनकाल में आजीवक और चार्वाक विचारक ऐसी ही ऊल-जुलूल बातों के कारण ब्राह्मणग्रंथों का मजाक उड़ाते थे. लेकिन उन्हें पुस्तक के रूप में लेकर आना बड़े साहस का काम था.

पुस्तक का पहला अध्याय ब्रह्मा, सरस्वती और आर्यों पर केंद्रित है. मनुस्मृति तथा ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में ब्राह्मणों की उत्पत्ति के बारे में बताया गया है, जिसके अनुसार ब्राह्मणों का जन्म ब्रह्मा के मुख से हुआ है. फुले के अनुसार ‘परमपुरुष’ यानी ब्रह्मा के मिथ की परिकल्पना ब्राह्मणों ने अपनी सर्वश्रेष्ठता और सर्वोच्चता को दर्शाने के लिए की थी—‘फिर मनु महाराज जैसे (ब्राह्मण)अधिकारी हुए….उसने ब्रह्मा के बारे में तरह-तरह की कल्पनाएं फैलाईं. फिर उसने इस तरह के विचार उन गुलामों के दिलो-दिमाग में ठूंस-ठूंस कर भर दिए कि ये सब बातें ईश्वर की इच्छा से हुई हैं.’2 दूसरे अध्याय में मत्स्यावतार का उल्लेख है. उसके समानांतर वे अनार्य योद्धा शंखासुर को रखते हैं. फुले के अनुसार मत्स्य आर्य जत्थे का नायक था. उसका अनार्य क्षेत्रपति शंखासुर से युद्ध हुआ. जिसमें शंखासुर को पराजित करके उसने उसके राज्य पर कब्जा कर लिया. बाद में शंखासुर के उत्तराधिकारियों ने राज्य वापस लेने के लिए मत्स्य पर हमला किया. उस हमले में मत्स्य को अपनी जान बचाकर भागना पड़ा. तीसरा परिच्छेद ‘कच्छ’ के बारे में है. मत्स्यावतार के बाद आर्यों के दूसरे कबीले ने भारत भूमि पर प्रवेश किया, उसका नायक ‘कच्छ’ था. कच्छ ने फिर शंखासुर के कबीले पर अपना कब्जा कर लिया. उसके बाद आर्यों के जिस कबीले ने भारत भूमि में प्रवेश किया, उसके मुखिया का नाम कश्यप था. कश्यप को पराजित भारत के मूल निवासियों का साथ मिला. कुछ अर्से तक कश्यप और कच्छ के बीच युद्ध चलता रहा. अगले परिच्छेदों में वाराह, हिरण्यगर्भ, नरसिंह, वामन आदि अवतारों की चर्चा करते हैं. फिर उनके समानांतर प्राचीन अनार्य योद्धाओं को रखते हैं. छठवें परिच्छेद में अनार्यों के प्रमुख सम्राट बलिराजा का वर्णन उन्होंने अतिरिक्त सम्मान के साथ किया है.

गुलामगिरी में जाति-विमर्श

सोलह परिच्छेदों में बंटी गुलामगिरी के सातवें परिच्छेद से फुले जातियों के निर्माण पर आते हैं. वे ‘महार’ जाति की व्युत्पत्ति ‘महाअरि’ से करते हैं. ‘बाद में परशुराम ने उन महाअरि क्षत्रियों को अतिशूद्र, महार, अछूत, मातंग और चांडाल आदि नामों से पुकारने की प्रथा प्रचलित की.’ महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि जातियों की उत्पत्ति संबंधी फुले के तर्क कितने स्वीकार्य हैं. महत्त्वपूर्ण यह जानना है कि जिन मिथकीय आख्यानों के आधार पर ब्राह्मण अपनी सर्वोच्चता और सर्वश्रेष्ठता का दावा करते आए थे, उनके विवेचन से कोई सर्वस्वीकार्य निष्कर्ष संभव ही नहीं था. फुले ‘परमपुरुष’ की मिथकीय संकल्पना तथा चातुर्वर्ण्य सिद्धांत दोनों को नकारते हैं. तथ्यों की विवेचना के समय वे जगह-जगह उग्र और आशालीन नजर आते हैं. जिसके लिए विष्णुशास्त्री चिपलूनकर ने यह कहकर कि ‘उन्हें किसी ऐसे विषय में दखल देने की आवश्यकता नहीं है, जो भाषाविदों का क्षेत्र हो’—कहकर उनकी आलोचना भी की थी. क्या यह माना जाए कि ‘गुलामगिरी’ की रचना उन्होंने अधैर्य की अवस्था में की थी. यदि हम गुलामगिरी को फुले द्वारा समाज सुधार की दिशा में किए गए कार्यों के तत्वावधान में परखने की कोशिश करें तो उनके शब्दों में छिपी तलखाहट की वजह को पहचान हैं. कल्पना कीजिए, एक 21 वर्ष का युवक समाज को बदलने की चाहत में सार्वजनिक जीवन अपनाता है. अगले 25 वर्षों तक वह लगातार समाज सुधार की दिशा में काम करता है. उसके बावजूद पाता है कि शूद्रों की किसी को परवाह नहीं है. उनकी व्यथा ‘गुलामगिरी’ के आसपास रचे गए एक ‘अभंग’ देखी जा सकती है, जिसमें एक वे एक  किसान का वर्णन करते हैं—

‘उसके मैले-कुचैले कपड़े/नंगा-धड़ंगा वह बंब लंगोटी बहादुर/ चिथेड़ियाँ सर पर/ धुस्से भी….ज्वार की दलिया भरपेट/सुख कुछ भी नहीं मिलता हमारे किसानों को.’ 

आज के दौर में गुलामगिरी की क्या महत्त्व है, इस बारे में स्वयं फुले ने  ‘गुलामगिरी’ की भूमिका में लिखा था—

‘प्रत्येक व्यक्ति को आजाद होना चाहिए. यही उसकी बुनियादी आवश्यकता है. जब व्यक्ति आजाद होता है, तब उसे अपने विचारों को दूसरों के समक्ष स्पष्ट रूप से दूसरों के सामने अभिव्यक्त करने का अवसर मिलता है. लेकिन जब उसे आजादी नहीं होती तब वह उन्हीं महत्त्वपूर्ण विचारों को जनहित में आवश्यक होने के बावजूद दूसरों के सामने प्रकट नहीं कर पाता. समय गुजर जाने पर वे विचार लुप्त हो जाते हैं.’

ओमप्रकाश कश्यप

नोट : सभी उद्धरण ‘गुलामगिरी’, महात्मा फुले रचनावली, डॉ. एल.जी.मेश्राम ‘विमलकीर्ति’, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली से.

दक्षिण भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के जन्मदाता : सिंगारवेलु चेट्टियार

विशेष रुप से प्रदर्शित

जब भी कोई नया महापुरुष जन्मता है, मनुष्यता का भी पुनर्जन्म होता है। प्रत्येक महापुरुष अपने विचारों से, कर्मों से नई इबारत लिखता है। ऐसे कि लोग सम्मोहित होकर उसका उसका अनुसरण करने लगते हैं। फलस्वरूप जड़ और अप्रासंगिक हो चुकी विचारधाराएं पीछे छूटने लगती हैं। कुल मिलाकर बात इतनी-सी है कि जब भी किसी महापुरुष का जन्म होता है, इस दुनिया का भी पुनर्जन्म होता है।

आजकल लोग सवाल नहीं गूगल करते हैं। तो चलिए गूगल कर लेते हैं—‘भारत में मई दिवस मनाने की शुरुआत किसने की थी? वर्ग-क्रांति का प्रतीक लाल झंडा भारत में पहली बार किसने फहराया था? कौन था वह भारतीय जिसने खचाखच भरे सभागार में पहली बार ‘कामरेड’ शब्द का संबोधन किया था। जिसे सुनकर पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजने लगा था? भारत में मजदूर आंदोलनों का पितामह कौन था? कौन था, दक्षिण भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन का जन्मदाता? गूगल बाबा इन प्रश्नों का थोड़ा घुमा-फिराकर एक ही जवाब देंगे—‘सिंगारवेलु चेट्टियार। लोग उन्हें सम्मान से सिंगारवेलार कहते थे।

अब आप सिंगारवेलु को गूगल करना चाहेंगे। पर थोड़ा धीरज रखिए। पहले कुछ बातें ‘मई दिवस’ पर कर ली जाएं। मशीनीकरण के आरंभ में आदमी को भी मशीन मान लिया गया था। ‘कार्य-दिवस’ का अर्थ था, सूरज निकलने से दिन ढलने तक काम करना। मौसम के अनुसार दिन घटता-बढ़ता तो काम के घंटे भी बदल जाते। कामगार को प्रतिदिन 14 से 16 घंटे काम करना पड़ता था। कभी-कभी तो एक कार्यदिवस 18 घंटे तक पहुंच जाता था। अगस्त 1866 में ‘नेशनल लेबर यूनियन’ 8 घंटे की मांग का समर्थन किया।1 आंदोलन होने लगे। परंतु न सरकारें चेतीं न कारखाना मालिकों ने ही कोई ध्यान दिया। आखिरकार अमेरिकी मजदूरों ने 1 मई 1886 से देशव्यापी हड़ताल की घोषणा कर दी। तीन और चार मई, को प्रदर्शन के दौरान पुलिस और मजदूर संगठनों की भिड़ंत हुई। 4 मई को शिकागो के हेमार्किट चौक पर हुई घटना तो नरसंहार जैसी थी। उसी की याद में मई दिवस मनाया जाता है। मई की पहली तारीख का संबंध 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग तथा उसके लिए श्रमिकों द्वारा दी गई कुर्बानियों से है।

भारत में पहला मई उत्सव, 1 मई, 1923 को मद्रास में मनाया गया था। उसी दिन देश में पहले मजदूर संगठन का जन्म हुआ था, नाम था—‘हिंदुस्तान लेबर एंड किसान पार्टी’।2 उसी दिन लाल झंडा पहली बार फहराया गया था।3 आगे चलकर यह झंडा मजदूर आंदोलनों की पहचान बन गया। इन सबका श्रेय जाता है—सिंगारवेलु चेट्टियार को। भारत में ‘कामरेड’ शब्द का पहली बार इस्तेमाल उन्होंने ही, दिसंबर 1922 में कांग्रेस के गया अधिवेशन में किया था।4 यह जादुई शब्द आगे चलकर साम्यवादी चेतना की पहचान बन गया। गया सम्मेलन में सिंगारवेलु ने ही पहली बार भारत के लिए ‘संपूर्ण स्वराज’ की मांग रखी थी।5

जीवन परिचय

सिंगारवेलु  का जन्म 18 फरवरी, 1860 को एक मछुआरा परिवार में हुआ था। समुद्र किनारे जिस बस्ती में वे रहते थे, उसे वे ‘कप्पम’ कहते थे। बस्ती के प्रायः सभी पुरुष मछली पकड़ने का काम करते। बांस और तख्तों से बनी डोंगी से समुद्र की लहरों को चीरते हुए वे आगे बढ़ जाते। कभी समुद्र की बन आती। उसकी उन्मत्त लहरें, किनारे बसीं झुग्गियों को अपने साथ बहा ले जातीं। मगर कुछ दिनों बाद वे फिर उसी जगह उभर आती थीं। प्रकृति और पुरुष की डांडा-मेंडी….झुग्गियों का बनना-मिटना भी मानो लहरों जैसा हो। सिंगारवेलु के पिता का नाम था—वेंकटचलम चेट्टियार। मां थीं—वाल्लमई। बताया जाता है कि उनके दादा मामूली डोंगी के सहारे बर्मा के तटवर्ती क्षेत्रों तक चले जाते। वहां से चावल और इमारती लकड़ी मद्रास तक ले आते थे।6 कह सकते हैं कि धैर्य और दुस्साहस सिंगारवेलु को विरासत में प्राप्त हुए थे।

जिस जाति में सिंगारवेलु का जन्म हुआ था, उसमें पढ़ने-पढ़ाने की कोई परंपरा न थी। परंतु वेंकटचलम थोड़ा आधुनिक मिजाज थे। उन्होंने सिंगारवेलु को पढ़ाने का फैसला किया। खुद को प्रखर बुद्धि सिद्ध करते हुए सिंगारवेलु ने 1881 में मेट्रिक की परीक्षा पास की। 1884 में क्रिश्चन कॉलेज से एफए पास करने के पष्चात उन्होंने बीए के लिए प्रेसीडेंसी कॉलेज मद्रास में दाखिला ले लिया। आगे की पढ़ाई के लिए मद्रास लॉ कॉलेज से जुड़े। 1902 में कानून की डिग्री मिली। उसके बाद वे मद्रास उच्च न्यायालय में प्रक्टिश करने लगे। प्रतिभाषाली थे ही। सो वकालत के जमने में देर न लगी।7

1889 में उनका विवाह आंगम्मल से हुआ। वह अंतररजातीय विवाह था। दोनों के एकमात्र संतान, बेटी का जन्म हुआ। जिसका नाम उन्होंने कमला रखा था। 1932 में उन्होंने अपने धेवते, कमला के पुत्र सत्यकुमार को उन्होंने कानूनी तरीके से गोद ले लिया।

आरंभ में सिंगारवेलु व्यापार में हाथ आजमाना चाहते थे। इसलिए 1902 में वे चावल के व्यापार की संभावना तलाशने के लिए ब्रिटेन चले गए। सिंगारवेलु के लिए वह यात्रा बहुत परिवर्तनकारी सिद्ध हुई। वहां उन्हें नई-नई पुस्तकें पढ़ने का अवसर मिला। लंदन में उन्होंने बौद्ध अधिवेशन में हिस्सा लिया। उससे बौद्ध धर्म-दर्शन के प्रति ऐसा अनुराग बना कि मद्रास लौटने पर अपने घर पर ही ‘महाबोधि सोसाइटी’ की बैठकें आयोजित करने लगे।8 इससे प्रसन्न होकर उन्हें मद्रास महाबोधि सोसाइटी का अध्यक्ष भी मनोनीत कर दिया गया। उन्हीं दिनों समाज सेवा से लगाव हुआ। वे चाहते थे कि बस्ती के बच्चे पढ़-लिखकर आगे बढ़ें। इसके लिए वे बच्चों तथा उनके माता-पिता को प्रोत्साहित करने लगे। आवश्यकता पड़ने पर गरीब बच्चों को पुस्तक, स्टेशनरी, भोजन वगैरह देकर मदद भी करते। पढ़ने का शौक था। सो धर्म, दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्र आदि विषयों की नई से नई पुस्तकें अपने लिए जुटाते, पढ़ते। अपने पढ़े हुए पर दूसरों से बातचीत करते। सुब्रह्मयम भारती, वी. चक्करई चेट्टियार जैसे नेताओं के संपर्क में आने के बाद वे राजनीति की ओर मुड़ गए।

प्लेग के दौरान

1905 में रूसी क्रांति की खबरें मिलीं, जिससे पहली बार उनका कम्युनिस्म की ओर वे रुझान बढ़ा। इस बीच उनके कांग्रेस से अच्छे संबंध बन चुके थे। पार्टी में वे तिलक जैसे उग्रपंथी नेता माने जाते थे। वे मानते थे कि देश को आजाद कराने के लिए बल प्रयोग अपरिहार्य है। बिना उसके साम्राज्यवादी अंग्रेजों से मुक्ति असंभव होगी। 1914 में पहला विश्वयुद्ध छिड़ा तो सिंगारवेलु का ध्यान युद्ध की खबरों से ज्यादा जनसाधारण की बढ़ती समस्याओं की ओर गया। खासकर उन समस्याओं की ओर जो युद्ध की, पूंजीवादी लिप्साओं की देन थीं। उन्हीं दिनों एक बड़ी चुनौती सामने आ गई। मुंबई सहित पूरे महाराष्ट्र में तबाही मचाने वाली प्लेग 1898 में मद्रास तक आ पहुंची। वहां उसने ‘कुप्पम’ को भी अपनी चपेट में लिया। सब कुछ छोड़कर सिंगारवेलु जनसेवा में जुट गए। लोगों को भुखमरी से बचाने के लिए उन्होंने ‘सामुदायिक रसोई’ का संचालन किया। 1910 के बाद प्लेग से छुटकारा मिला तो मलेरिया ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। सिंगारवेलु जूझते रहे। इससे उन्हें गरीबी तथा उसके कारणों को समझने की दृष्टि मिली। वही उन्हें साम्यवाद की ओर ले गई।

राजनीति में दस्तक

13 अप्रैल 1919 भारतीय इतिहास का रक्त-रंजित दिन था। उस दिन जलियांवाला हत्याकांड 379 लोग मारे गए थे। लगभग 1500 हताहत हुए थे। क्षुब्ध जनता अंग्रेजों के विरुद्ध प्रदर्शन करने लगी। उत्तर से दक्षिण तक सब अंग्रेजों के खिलाफ थे। फिर सिंगारवेलु कैसे पीछे रह सकते थे! उन्होंने युवाओं को संगठित कर, कई शांतिपूर्ण प्रदर्शन किए। गांधी ने असहयोग आंदोलन का आह्वान किया। उससे प्रेरित होकर सिंगारवेलु ने भी एक जनसभा में अपने गाउन को अग्नि-समर्पित कर अदालत से नाता तोड़ने की घोषणा कर दी। मई 1921 में उन्होंने गांधी को लिखा—‘मैंने आज अपने वकालत के पेशे से मुक्ति पा ली है। देश-सेवा के लिए मैं भी आपका अनुसरण करूंगा।’9 इसी दौरान वे कांग्रेस के संपर्क में आए। जनमानस में अपनी पैठ, प्रतिभा और सरोकारों के चलते बहुत जल्दी प्रदेश कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में उनकी गिनती होने लगी।

हैलो कामरेड्स

दिसंबर 1922 में उन्हें कांग्रेस के गया अधिवेशन में शामिल होने का अवसर मिला। उस समय वे अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य भी थे। अधिवेशन में दिए गए भाषण में सिंगारवेलु का रंग एकदम निराला था। गए वे प्रदेश कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में थे, मगर भाषण में वे खुद को कुछ और ही बता रहे थे—‘अध्यक्ष, हाल में मौजूद कामरेड्स, साथी मजदूरो, प्रजाजनो, हिंदुस्तान के किसानो और हलवाहो….मैं आपके बीच आपके मजदूर साथी के रूप में बोलने आया हूं। मैं यहां पूरी दुनिया के लिए महा-कल्याणकारी, कम्युनिस्टों की दुनिया के प्रतिनिधि के रूप में पहुंचा हूं। मैं यहां उस महान संदेश को दोहराऊंगा, जिसे साम्यवाद दुनिया-भर के मजदूरों को देता आया है।’10 उन दिनों अंग्रेज ‘कम्युनिज्म’ शब्द से ही खार खाते थे। ऐसे में किसी प्रतिनिधि के मुंह से ‘कामरेड्स’ संबोधन सुनना, खुद को साम्यवादी जगत का प्रतिनिधि बताना, कामगारों, मजदूरों और किसानों की बात करना, वहां मौजूद सदस्यों के लिए यह एकदम अप्रत्याशित था। सो सिंगारवेलु की पहली पंक्ति के साथ ही सभागार तालियों से गूंजने लगा।

भाषण में सिंगारवेलु ने कहा था—‘हम स्वराज के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह लड़ाई हम अहिंसा और असहयोग जैसे हथियारों की मदद से लड़ रहे हैं। मेरा उनमें विश्वास है। मगर इन हथियारों से वर्गहीन समाज की रचना संभव नहीं है।’ उन्होंने कहा था—‘धनाढ्य संभल जाएं। ताकतवर ध्यान दें….दुनिया में जितनी भी अच्छी चीजें हैं, सब मेहनतकश लोगों ने ही तुम्हें दी हैं। तुमने उन्हीं को हाशिये पर ढकेल दिया। वे हमेशा तुम्हारी इच्छाओं के खटते रहते हैं। फिर भी तुम उनकी उपेक्षा करते हो….याद रखो, भारतीय मजदूर अब जाग चुके हैं। वे अपने अधिकारों को धीरे-धीरे समझने लगे हैं।’11 कांग्रेस के इतिहास में वह पहला अवसर था, जब उसके सम्मेलन में किसान और मजदूर वर्ग पर चर्चा हो रही थी। लोग कांग्रेस के कायाकल्प का श्रेय गांधी को देते हैं। लेकिन उस समय की परिस्थितियां ऐसी थीं कि उनसे समझौता किए बगैर कांग्रेस की राष्ट्रव्यापी स्वीकार्यता संभव ही नहीं थी। डॉ. आंबेडकर, रामासामी पेरियार और सिंगारवेलु जैसे नेताओं का दबाव कांग्रेस और गांधी दोनों को बदलने को विवश कर रहा था।

कांग्रेस का गया सम्मेलन सिंगारवेलु की राजनीति की दिशा तय कर चुका था। उनके भाषण ने देश-विदेश के लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था। देश-भर से पहुंचे प्रतिनिधियों ने मांग की कि सिंगारवेलु को कांग्रेस की श्रमिक मामलों की प्रस्तावित उपसमिति में स्थान दिया जाए। मानवेंद्रनाथ राय ने मजदूरों तथा आम जनता की समस्या की ओर कांग्रेस तथा सरकार का ध्यान आकर्षित कराने के लिए सिंगारवेलु की प्रशंसा की थी। अपनी उग्र कार्यशैली और साम्यवादी रुझान के कारण वे पहले ही अंग्रेजों की नजर में आ चुके थे। 1921 में पुलिस ने उनके घर पर दबिश दी थी। वह कथित रूप से ‘चुनौती’ शीर्षक से प्रकाशित पंपलेट्स की तलाशी लेने गई थी। लेकिन पुलिस को वहां से खाली हाथ लौटना पड़ा था।12

सिंगारवेलु और गांधी

अपने आरंभिक राजनीतिक जीवन में सिंगारवेलु गांधी से प्रभावित थे। परंतु उनकी कार्यशैली गांधी से अलग थी। प्रिंस ऑफ़ वाल्स भारत दौरे पर आए। शेष भारत की तरह दक्षिण में भी उनकी यात्रा का बहिष्कार किया गया। मद्रास में सिंगारवेलु के नेतृत्व में हड़ताल का आह्वान किया गया था। हड़ताल पूरी तरह कामयाब थी। बाद में पता चला कि हड़ताल में शामिल होने के लिए कुछ दुकानदारों पर दबाव बनाया गया था। कुछ कार्यकर्ताओं की शिकायत पर गांधी ने 9 फरवरी, 1922 के ‘यंग इंडिया’ में ‘सत्याग्रह की मूल भावना का पालन न करने पर’ सिंगारवेलु की आलोचना की थी।13

कम्युनिज्म की ओर

गया सम्मेलन में ही उनकी भेंट श्रीपाद अमृत डांगे से हुई। मानवेंद्रनाथ राय से उनका संपर्क पहले से ही था। अबनीनाथ मुखर्जी, जो अपने साथियों में अबनि मुखर्जी के नाम से पहचाने जाते थे, सिंगारवेलु से मिलने दो बार मद्रास पहुंचे थे। इस तरह सिंगारवेलु कांग्रेस में रहकर भी अपनी स्वतंत्र राजनीति कर रहे थे। पेरियार की तरह वे भी कांग्रेसी नेताओं की कथनी और करनी के अंतर को समझते थे। जानते थे कि कांग्रेस कभी भी मजदूरों और किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए सरकार से सीधे टकराव का खतरा मोल नहीं लेगी। इसलिए मद्रास लौटते ही उन्होंने अपने विचारों को कार्यरूप देने के लिए काम शुरू कर दिया था। उसके फलस्वरूप ‘हिंदुस्तान लेबर किसान पार्टी’ का गठन हुआ। वह कम्युनिस्ट विचारधारा पर आधारित पहला संगठन था। ध्यातव्य है कि मानवेंद्रनाथ राय, अबानी मुखर्जी, इवेलिना राय आदि नेता मिलकर 17 अक्टूबर, 1920 को ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया’(ताशकंद पार्टी) के गठन की घोषणा कर चुके थे, परंतु 25 दिसंबर 1925 को विधिवत गठन से पहले उसका अस्तित्व केवल अनौपचारिक था।

सिंगारवेलु  के नेतृत्व में पहली बार, 1 मई 1923 को भारत में मई दिवस का आयोजन किया गया। उसी दिन ‘हिंदुस्तान लेबर किसान पार्टी’ तथा उसके गठन के उद्देश्यों के बारे में लोगों को बताया गया था। मई दिवस का आयोजन सिंगारवेलु ने मद्रास में दो स्थानों पर किया था। पहला उच्च न्यायालय के आगे समुद्र तट पर। दूसरा ट्रिप्लीकेंस तट पर। पहली बैठक की अध्यक्षता स्वयं सिंगारवेलु ने की थी। दूसरे कार्यक्रम की अध्यक्षता एस. कृष्णास्वामी सरमा ने। उस अवसर पर सिंगारवेलु ने कहा था कि मई दिवस का आयोजन स्वयं मजदूरों द्वारा किया गया है। उन्होंने उम्मीद जाहिर की थी कि देश में शीघ्र ही मजदूरों की सत्ता स्थापित होगी, जो लोगों के विकास को गति देगी। ‘मद्रास मेल’ नामक अखबार ने ‘लेबर किसान पार्टी’ द्वारा मई दिवस की आलोचना का जवाब देते हुए कहा था कि केवल वास्तविक मजदूर ही इस उत्सव को मना रहे थे, इसलिए चिंता की कोई बात नहीं है। उस अवसर पर लाल-क्रांति का प्रतीक ‘लाल-झंडा’ भी फहराया गया था। सार्वजनिक कार्यक्रम में लाल झंडा फहराने की वह घटना, न केवल भारत, अपितु एशिया में भी पहली घटना थी। उस अवसर पर 2 मई 1923 के ‘दि हिंदू’ में छपा था—

‘लेबर किसान पार्टी ने मद्रास में मई दिवस उत्सव आरंभ किया है। कामरेड सिंगारवेलु ने उस बैठक की अध्यक्षता की थी। प्रदर्शन कामयाब था। मीटिंग में मई दिवस को सार्वजनिक अवकाश घोषित करने की मांग भी की गई। पार्टी अध्यक्ष ने पार्टी के अहिंसक सिद्धांतों के बारे में लोगों को बताया था। उसमें लोगों से आर्थिक मदद की अपील भी की गई। इस बात पर जोर दिया गया था कि भारतीय मजदूरों को दुनिया-भर के मजदूरों के साथ एकजुट हो जाना चाहिए।’14

दिसंबर 1923 में उन्होंने ‘दि लेबर किसान गजट’ शीर्षक से पाक्षिक की शुरुआत की। इसके साथ-साथ तमिल भाषा में ‘तोझीलालान’(कामगार) शीर्षक से साप्ताहिक भी निकाला था। ‘कामगार’ के एक अंक का मूल्य ‘आधा आना’ था। अंग्रेजों की सिंगारवेलु पर नजर थी। उनकी दृष्टि में ‘हिंदुस्तान लेबर किसान पार्टी’, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से कहीं अधिक खतरनाक थी। 1924 में ‘कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र’ मामले में सिंगारवेलु को उनके घर पर नजरबंद कर लिया गया। उन दिनों उनकी उम्र 64 वर्ष थी। बाद में उन्हें जमानत मिल गई।

1925 में कानपुर में पहले कम्युनिस्ट सम्मेलन का आयोजन किया गया था। उसकी अध्यक्षता सिंगारवेलु ने की। उस बैठक में ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया’ के गठन को स्वीकृति मिली थी। अपने अध्यक्षीय भाषण में सिंगारवेलु ने छूआछूत की समस्या की चर्चा भी की थी। उनका दृष्टिकोण साम्यवादी दृष्टिकोण से मेल खाता था,

‘हमें साफ तौर पर समझ लेना चाहिए कि साम्यवाद की नजर में छूआछूत पूरी तरह आर्थिक समस्या है। अछूतों को मंदिर प्रवेश, सार्वजनिक तालाबों और मार्गों पर चलने का अधिकार प्राप्त है अथवा नहीं, इन प्रश्नों का ‘स्वराज’ के संघर्ष से कोई संबंध नहीं है….कम्युनिस्टों की न तो कोई जाति होती है, न धर्म। व्यक्ति का हिंदू, मुसलमान या ईसाई होना उसका निजी मामला है….जैसे ही उन(अस्पृश्यों) की आर्थिक पराश्रितता खत्म होगी, छूआछूत की समस्या भी अपने आप समाप्त हो जाएगी।’15

उन दिनों पेरियार राजनीति में, गैर-ब्राह्मण जातियों को समुचित प्रतिनिधित्व न दिए जाने के कारण कांग्रेस से नाराज चल रहे थे। उन्होंने ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की स्थापना की थी। सिंगारवेलु की ख्याति उन दिनों शिखर पर थी। उसी दौरान दोनों नेता एक-दूसरे के करीब आए। सिंगारवेलु ने ही पेरियार को कांग्रेस छोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया था। पेरियार के मनस् में साम्यवाद का बीजारोपण करने वाले भी वही थे। सिंगारवेलु की सलाह पर ही पेरियार ने सोवियत संघ की यात्रा पर गए थे। लौटने के बाद पेरियार ने सोवियत संघ के अनुभवों के आधार पर ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की कार्यनीति में बदलाव करने का निर्णय लिया। पेरियार के आग्रह पर सिंगारवेलु ने ‘इरोद कार्यक्रम’ का ड्राफ्ट तैयार किया। ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ का एक सम्मेलन 4 मार्च 1934 को मन्नारगुडी, तमिलनाडु में हुआ था। सिंगारवेलु ने उसकी अध्यक्षता की थी। अपने भाषण में सिंगारवेलु ने भारतीय समाज के आर्थिक वैषम्य पर चिंता व्यक्त की थी—

‘देश की 40 प्रतिशत जनता को भरपेट भोजन भी नहीं मिलता। मृत्यदर दूसरे देशों से कहीं ज्यादा है। यह 1000 में 30 है। 100 में से 30 बच्चे एक साल का होते-होते मर जाते हैं। भारत में औसत आयु मात्र 20 है, जबकि इंग्लेंड में 53 साल है….लोग घोर दारिद्रय में जीते हैं, बावजूद इसके मंदिरों की घंटियां टनटनाती रहती हैं। मस्जिदों में नमाज और चर्च में प्रार्थनाएं चलती रहती रहती हैं। लोग जिसे ईश्वर समझकर पूजते हैं, उसके बारे में वे कुछ नहीं जानते। ईश्वर महज मनुष्य की रचना है।’16

उस भाषण में सिंगारवेलु ने अपने पूर्वजों को भी नहीं छोड़ा था—

‘मेरे अपने पूर्वजों ने ब्राह्मणों को भोजन कराने के लिए 1 लाख रुपये अलग रख दिए थे। लेकिन जब उनकी बस्ती के मछुआरे बीमार पड़े, वे केवल देवता को पूजा-अर्चना, प्रार्थना और बलि तक सीमित रहे। मेरी जाति की तरह और भी जातियां हैं। वे भी धर्मादे के लिए रकम एक ओर रख देती हैं और मुष्किल समय में प्रार्थनाओं और बलि देकर मन को तसल्ली देती रहती हैं।’17

पेरियार के मन में सिंगारवेलु के प्रति गहरा सम्मान था। खासकर उनकी वैज्ञानिक सोच पर। पेरियार के आग्रह पर ही सिंगारवेलु ने ‘कुदी अरासु’ में लिखना शुरू किया था। मगर उन दोनों के साथ आने से न तो कांग्रेस खुश थी, न ही अंग्रेज सरकार। अंग्रेजों का मानना था कि यह सिंगारवेलु ने ही पेरियार को ‘बिगाड़ा’ है। ब्रिटिश सरकार नहीं चाहती थी कि देश में कम्युनिस्ट आंदोलन को बढ़ावा मिले। उसे देखते हुए सिंगारवेलु ने ‘मजदूर एवं किसान’ जैसे शब्दों को अपनाया। मगर अपनी उग्र कार्यषैली के कारण वे सरकार और विरोधियों की आंखों में हमेशा ही खटकते रहे।

मजदूर नेता के रूप में  

बकिंघम एंड कार्नेटिक मिल, मद्रास की सबसे बड़ी कपड़ा मिल थी। उसका महत्त्व इसलिए भी है क्योंकि भारत की पहली लेबर यूनियन18, ‘मद्रास लेबर यूनियन’ का गठन अप्रैल 1918 में वहीं के मजदूरों ने मिलकर किया था। ब्रिटिश अधिकारी यूनियन के गठन का विरोध कर रहे थे। घटना की नींव 1920 में पड़ी थी। ब्रिटिश अधिकारी रिवाल्वर लिए मजदूरों को धमकाता फिर रहा था। एक मजदूर ने उसकी रिवाल्वर छीनकर पुलिस को सौंप दी। इसपर पुलिस ने गोलीबारी शुरू कर दी। बाबूराव और मुरुगन नामक दो युवा मजदूर उस गोलीबारी में मारे गए। मद्रास में श्रम आंदोलन में मरने वाले ये दोनों पहले थे। घटना से नाराज 13000 मजदूर हड़ताल पर उतर आए। बाद में पुलिस और कामगारों के बीच कई भिड़ंत हुईं, जिनमें दर्जनों मजदूरों को प्राण गंवाने पड़े। सिंगारवेलु ने न केवल हड़ताल के नेतृत्व में हिस्सा लिया, बल्कि लगातार लेख लिखकर मजदूरों के उत्पीड़़न के विरुद्ध आवाज उठाते रहे।

उन्हीं दिनों उत्तरी मद्रास में मैसी कंपनी के कामगार भी हड़ताल पर चले गए। वी. चक्करई और ओदीकेसवेलु नायकर जैसे मजदूर नेताओं के साथ सिंगारवेलु एक बार फिर मजदूरों के समर्थन में उतर गए। अपने आग उगलते भाषणों से इन तीनों नेताओं ने सरकार को हिला दिया था। 1927-28 उत्तरी-पश्चिमी रेलवे, बंगाल-नागपुर रेलवे तथा ईस्ट इंडियन रेलवे के कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर हड़ताल पर चले गए। रेलवे कर्मचारियों को समर्थन देने, उनका हौसला बढ़ाने के लिए सिंगारवेलु ने भोपाल, हावड़ा और बंगाल की यात्राएं कीं। हावड़ा और बंगाल में 30,000 मजदूर-कामगार हड़ताल पर थे। सिंगारवेलु ने अपने साथियों के साथ हड़ताल में हिस्सा लिया था। उत्तरी भारत की यात्रा से लौटे ही थे कि दूसरी हड़ताल की सूचना मिली। 1928 में दक्षिण भारतीय रेलवे के मजदूरों ने भी हड़ताल का ऐलान कर दिया। मजदूर उनकी योग्यता के नए सिरे से छंटनी का विरोध कर रहे थे। छंटनी के लिए प्रबंधकों ने कर्मचारियों की योग्यता के नए मानदंड तैयार किए थे, जो मजदूरों को स्वीकार्य नहीं थे। दूसरे रेलवे ने मजदूरों को अलग-अलग ठिकानों पर भेजने का निर्णय लिया था। मजदूर इनका विरोध कर रहे थे। मांगे न मानने पर मजदूर 19 जुलाई 1928 से हड़ताल पर चले गए। उनके समर्थन में बाकी मजदूरों और कामगारों ने भी हड़ताल की घोषणा कर दी। परिणामस्वरूप 21 जुलाई से रेलवे का चक्का जाम हो गया। वह हड़ताल आखिरकार नाकाम सिद्ध हुई। सिंगारवेलु को दस वर्षों की सजा हुई। लेकिन बाद में अपील पर, उनकी बीमारी और उम्र को देखते हुए सजा की अवधि 18 महीने कर दी गई।

1927 में ही जब हड़ताली मजदूर चाको और विंसेंट पुलिस की गोली से मारे गए। मद्रास तक जब वह समाचार पहुंचा तो सिंगारवेलु ने बिना कोई पल गंवाए उनकी स्मृति में शोक सभा का आयोजन किया। जिसमें पुलिस के दमन की निंदा की गई। मजदूर और कामगारों की समस्याओं के समाधान को लेकर वे इतने समर्पित थे कि जब भी, जहां से भी बुलावा मिलता, तुरंत पहुंच जाते थे।

सिंगारवेलु का निधन 11 फरवरी 1946 को हुआ। जब तक जिये तब तक उन्हें मजदूरों के हितों की चिंता सताती रही। जीवन के आखिरी दिनों में जब बढ़ी उम्र के कारण सक्रियता घट गई तो उन्होंने पेरियार की पत्रिकाओं, ‘कुदी अरासु’, ‘रिवोल्ट’ तथा अंग्रेजी दैनिक हिंदू में लेख आदि लिखकर संघर्ष की लौ को जलाए रखा। उनकी आंखों में समानता पर आधारित, वर्गहीन समाज का सपना बसता था। इस कसौटी पर कांग्रेस की ‘स्वराज’ की अवधारणा भी उन्हें अधूरी दिखाई पड़ती थी। उनका गांधी के नाम लिखा गया एक पत्र 24 मई 1922 को ‘नवशक्ति’ में प्रकाशित हुआ था। पत्र में उन्होंने लिखा था कि कि प्रत्येक परिवार को उतनी जमीन मिलनी चाहिए, जिससे वह अपनी जरूरत के लायक अन्न उपजा सके। अपना घर होना चाहिए, ताकि किसी को भी किराया न चुकाना पड़े। इसके अलावा मुफ्त शिक्षा, स्वास्थ्य की व्यवस्था भी सरकार की ओर से करनी चाहिए। जिस स्वराज में यह गारंटी न हो, उसका कोई मूल्य नहीं है। असली स्वराज केवल जनता द्वारा, और केवल जनता के लिए आएगा। वे बेहद पढ़ाकू थे। उनका पुस्तकालय मद्रास के सबसे बड़े निजी पुस्तकालयों में से था।

ओमप्रकाश कश्यप

 संदर्भ

  1.  अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग,दि हिस्ट्री ऑफ़ मे डे, इंटरनेशनल पंपलेट, 14,799 ब्रोडवे न्यू यार्क, पृष्ठ 3
  2.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम- सिंगारवेलु : फर्स्ट कम्युनिस्ट इन साउथ इंडिया, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, पृष्ठ-1
  3.  पी.मनोहरन, जेनेसिस एंड ग्रोथ ऑफ़ कम्युनिस्ट पार्टी इन इंडिया, पृष्ठ 191।
  4.  पी. मनोहरन, पृष्ठ-189
  5.  पी. मनोहरन, पृष्ठ-190
  6.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम, पृष्ठ-1
  7.  पी.वसंतकुमारन, गॉडफादर ऑफ़ इंडियन लेबर, एम. सिंगारवेलु, पूर्णिमा प्रकाशन, चैन्नई।
  8.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम, पृष्ठ-2
  9.  वसंतकुमारन, पूर्णिमा प्रकाशन, चैन्नई।
  10.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम, पृष्ठ 164-165
  11.  उपर्युक्त 165
  12.  पी. मनोहरन, पृष्ठ 183
  13.  दि कलैक्टिड वर्क्स ऑफ़महात्मा गांधी, खंड-26, पृष्ठ 132-134।
  14.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम, पृष्ठ-169
  15. उपर्युक्त पृष्ठ 203
  16.  उपर्युक्त पृष्ठ 221-22
  17.   उपर्युक्त पृष्ठ 222
  18.  पी. मनोहरन, पृष्ठ-11