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समाजवाद और सामाजिक न्याय

सामान्य

स्वाधीनता आंदोलन के दौरान तय था कि स्वतंत्र भारत का मूल चरित्र समाजवादी राज्य का होगा. गांधी घोषित रूप में समाजवादी नहीं थे, मगर अंत्योदय का उनका विचार समाजवाद और सामाजिक न्याय की आवश्यकता एवं उनके महत्त्व को रेखांकित करता है. आधुनिक भारत के निर्माताओं में अग्रणी डॉ. आंबेडकर मूलतः अर्थशास्त्री थे. उनके विचार और संविधान का स्वरूप कल्याण राज्य की अवधारणा का समर्थन करते हैं. आगे चलकर उन्होंने स्वयं को समाजवादी नेताओं तथा संगठनों से अलग रखा तो उसके इतर कारण थे. यूरोपीय जीवनशैली में पले-बढ़े जवाहरलाल नेहरू रूसी क्रांति से प्रभावित थे. उनके नेतृत्व में भारत मिश्रित अर्थव्यवस्था वाला देश बना.

समाजवादी चेतना और इंदिरा गांधी

इंदिरा गांधी द्वारा संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवाद’ शब्द जोड़ने को कुछ लोग राजनीति मानते हैं. राजे-रजबाड़ों के प्रिवी पर्स की समाप्ति, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, भूमि सुधार, महिलाओं के लिए समान वेतन जैसे कानून, देश को समाजवादी राज्य में ढालने की नीति का ही हिस्सा था. उन्हीं के कारण इंदिरा को सामंतों, राजे-रजबाड़ों और जमींदारों के आक्रोश का सामना करना पड़ा था. वे जनसंघ के बैनर तले उनके विरोध में संगठित होने लगे. बिहार सर्वाधिक भू-असमानता वाले प्रांतों में से था. वहां जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में शुरू हुआ ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन, ठेठ प्रतिक्रियावादी आंदोलन था. परिणामस्वरूप जनता पार्टी की सरकार बनी. जगजीवन राम के बजाय मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री मनोनीत किया गया, जो तत्कालीन नेताओं की दलित और पिछड़ा विरोधी मानसिकता को दर्शाता था.

‘जनता पार्टी’ का प्रयोग भले असफल रहा हो, ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन पूर्णतः निष्फल नहीं था. उससे पिछड़ी तथा निचले क्रम की जातियों में राजनीतिक चेतना का संचार हुआ था. भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल उसी के गर्भ से निकली हुई पार्टियां हैं. इनमें ‘भारतीय जनता पार्टी’ समाज के प्रभुवर्ग के हितों की रक्षा को समर्पित है. यह उसने पिछले पांच वर्षों के दौरान सिद्ध भी किया है.

त्रिवेणी संघ’ और लालू प्रसाद यादव

लालू यादव ने ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था. मीसा कानून के अंतर्गत जेल भी गए थे. परंतु जिस राजनीति के आधार पर कालांतर में उन्होंने सफलता प्राप्त की, आज भी बिहार की राजनीति में उनकी प्रतिष्ठा हैーउसकी जमीन ‘त्रिवेणी संघ’ द्वारा तैयार की गई थी. निचली-मंझोली जातियों को संगठन का महत्त्व समझाने के साथ-साथ पहली बार, त्रिवेणी संघ ने ही ब्राह्मणवाद से मुक्ति का नारा दिया था. उसने सामाजिक न्याय के पक्ष में भी आवाज उठाई थी. मगर राजनीतिक पटल पर ‘सामाजिक न्याय’ का प्रतिनिधित्व हुआ ‘बहुजन समाज पार्टी’ के उभार से, जिसका गठन मान्यवर कांशीराम द्वारा फुले और आंबेडकर के सपनों को साकार करने के लिए किया गया था.

साम्यवादी नेताओं की सवर्ण मानसिकता

भारत में अस्सी के दशक तक समाजवाद देश के सर्वाधिक लोकप्रिय शब्दों में से था, जबकि ‘सामाजिक न्याय’ का कोई नामलेवा न था. क्योंकि जिस वर्ग के लिए ‘सामाजिक न्याय’ अपेक्षित है, वह राजनीतिक समझ और अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की ओर से बेखबर था. समाजवाद के नाम पर जो भी नेता सत्ता में आए, किसी न किसी रूप में वे सभी पूंजीवाद और सामंतवाद का पोषण करते रहे. साम्यवादियों के आदर्श श्रीपाद अमृत डांगे(आदिम साम्यवाद) और करपात्री(मार्क्सवाद और रामराज्य) जैसे लेखक बने. डांगे यज्ञ को ‘आर्य साम्य-संघ की सामूहिक उत्पादन पद्धति’ मानते थे तो करपात्री के लिए रामराज्य, मार्क्सवाद से कहीं अधिक उन्नत राजनीतिक व्यवस्था थी. भारतीय साम्यवादी दलों पर आज भी इसी मानसिकता के नेताओं का कब्जा है.

समाजवाद की कमजोरी

संविधान की प्रस्तावना का हिस्सा बनने तथा लोहिया जैसे नेताओं के बावजूद भारत में यदि समाजवादी आंदोलन असफल रहा है तो उसके पर्याप्त कारण हैं. समाजवादी व्यवस्था में समस्त संसाधन राज्य के अधिकार में होते हैं. अपेक्षा की जाती है कि राज्य संसाधनों का प्रबंधन इस प्रकार करेगा कि उनका लाभ ऊपर से नीचे तक सभी नागरिकों को समानरूप से मिल सकेगा. विशेषकर उन्हें जो किसी न किसी कारण से वंचना का शिकार रहे हैं. समाजवाद की कमजोरी है कि वह संसाधनों को राज्य के अधिकार में पहुंचाने के बाद मौन हो जाता है. राज्य पर नियंत्रण करने वाली शक्तियां कौन-सी हैं? उनका मिजाज कैसा है? उनका आचरण निष्पक्ष है अथवा पक्षपातपूर्णーइसपर वह ध्यान नहीं देता. यदि उन संस्थाओं पर खास वर्गों का कब्जा हो, उनका जो सत्ता को अपना विशेषाधिकार मानते हैं, तो समाजवाद के सारे लाभ धरे के धरे रह जाते हैं. समाजवाद की ढुलमुल परिभाषा का लाभ उठाकर हिटलर जैसा तानाशाह भी समाजवादी होने का दावा करता था. चीनी राष्ट्रपति झी जिनपिंग अपनी साम्राज्यवादी नीतियों को ‘चीनी मिजाज का समाजवाद’ कहकर आगे बढ़ा रहे हैं.

समाजवाद और सामाजिक न्याय

समाजवादी राज्य के मायने क्या हैं, उसका कर्तव्य क्या होना चाहिए, संसाधनों के हाथ में आने के बाद कैसे उनका उपयोग न्यायसंगत और कल्याणकारी राज्य की मान्यताओं के अनुरूप होーयह दृष्टि सामाजिक न्याय समाजवाद को देता है. भारत जैसे देश में जहां समाज जाति और वर्ग के नाम पर बुरी तरह बंटा हो, वहां समाजवाद की सफलता सामाजिक न्याय संबंधी नीतियों के कार्यान्वन पर निर्भर करती है. सामाजिक न्याय अपेक्षाकृत आधुनिक विचार है. वह राज्य के कर्तव्य, उसकी न्यायभावना का संकेतक है और कसौटी भी. सामाजिक न्याय समाजवाद की दुर्बलताओं, उलझनों और असमंजसों के बीच अपनी जगह बनाता है. साथ ही राज्य को कल्याणोन्मुखीफैसले लेने में मदद करता है.

चाहें तो लोकतंत्र को भी इनमें जोड़ सकते हैं. अधिनायकवादी राज्य में संसाधनों का प्रयोग शासक वर्ग और उसके चहेतों के वैभव-विलास तक सिमट जाता है. ऐसे राज्य में न तो समाजवाद फल-फूल सकता है, न ही सामाजिक न्याय के लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है. फासीवादी तथा पूंजीवादी राज्यों में सामाजिक न्याय संभव ही नहीं है. कुल मिलाकर सामाजिक न्याय, समाजवाद और लोकतंत्र तीनों एक-दूसरे के पूरक और अस्तित्व की कसौटी हैं.

भारत में आर्थिक असमानता के अलावा जातीय असमानता जैसी विकृत और अमानवीय व्यवस्था भी है. समानता-आधारित समाज के लिए, जाति पर प्रहार करना आवश्यक है. ‘जाति का उच्छेद’ शीर्षक से तैयार किए गए ऐतिहासिक व्याख्यान में डॉ. आंबेडकर की हिंदुवादियों से यही अपेक्षा थी. उस समय उन्हें भाषण देने से रोक दिया गया था. आज भी जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त छद्म समाजवादी और साम्यवादी भारतीय राजनीति में भरे पड़े है. उनपर तथा ‘भारतीय जनता पार्टी’ जैसे दक्षिणपंथी दलों पर अंकुश रखने के समाजवादी तथा सामाजिक न्याय को समर्पित दलों की एकजुटता आवश्यक है. इसमें लोकतंत्र और संविधान का आदर करने वाले दल भी शामिल हो जाएं तो सोने पर सुहागा.

हाल के आम चुनावों में इस दिशा में कुछ कदम आगे बढ़े हैं. इसकी सफलता भारतीय राजनीति की अगली दिशा तय करेगी.

ओमप्रकाश कश्यप

डॉ. आंबेडकर का आर्थिक चिंतन

सामान्य

अर्थशास्त्री के रूप में डॉ. आंबेडकर के योगदान की ओर बहुत कम विद्वानों का ध्यान गया है. प्रायः लोग उन्हें संविधान निर्माता के रूप में जानते हैं. यह भी जानते हैं कि दलितों के उद्धार के लिए उन्होंने अनथक संघर्ष किया. उसके लिए अनेक समकालीन नेताओं की आलोचनाएं सहीं. वे अपने समय के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मगर विवादित नेताओं में रहे. उनकी विद्वता विरोधियों को पस्त करने वाली थी. वस्तुतः राजनीति और समाज सुधार के क्षेत्र में उनका योगदान इतना महान एवं युगांतरकारी है कि उनके जीवन के बाकी पहलुओं तक लोगों की नजर जा ही नहीं पाती. यहां तक कि दलित विद्वानों का लेखन भी उनके सामाजिकराजनीतिक क्षेत्रों में योगदान तक सिमटा रहा है. अर्थशास्त्री के रूप में आंबेडकर के योगदान को केवल एक लेख या लेखांश से आंकना असंभव है. अपने एक व्याख्यान में प्रख्यात अर्थशास्त्री श्रीनिवास अंबीराजन ने अर्थशास्त्र के क्षेत्र से राजनीति और कानून के क्षेत्र में अंतरण को अर्थशास्त्र की भारी क्षति बताया था. उनके अनुसार अगर वे राजनीति और समाज सुधार के क्षेत्र में नहीं आते तो दुनियाभर में दिग्गज अर्थशास्त्री के रूप में स्थान पाते. इस बात में काफी सचाई भी है. 1947 आतेआते राजनीतिक क्षेत्र में उनकी व्यस्तता काफी बढ़ चुकी थी. लेकिन उन दिनों भी उनका मन अर्थशास्त्र के क्षेत्र में छूटे हुए काम को आगे बढ़ाने का था. उसी वर्ष ‘प्रॉब्लम ऑफ रुपी’ के संशोधित संस्करण की भूमिका में उन्होंने अर्थशास्त्र के क्षेत्र में 1923 के बाद हुए बदलावों को लेकर पुस्तक का दूसरा खंड यथाशीघ्र तैयार करने का आश्वासन दिया था. मगर आजादी के बाद राजनीतिक जिम्मेदारियां बढ़ने की वजह से वे छूटे हुए कार्य को पूरा नहीं कर सके.

अर्थशास्त्र आंबेडकर का सर्वाधिक प्रिय विषय था. कोलंबिया विश्वविद्यालय में अध्ययन करते समय उनके पास कुल 29 विषय ऐसे थे, जिनका सीधा संबंध अर्थशास्त्र से था. वहां से उन्होंने ‘इवोल्यूशन ऑफ पब्लिक फाइनेंस इन ब्रिटिश इंडिया’ विषय में पीएचडी की डिग्री प्राप्त की थी. आगे चलकर लंदन स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स से उन्होंने ‘प्राब्लम ऑफ रुपया : इट्स ओरिजिन एंड इट्स सोल्यूशन’ विषय पर डीएससी की डिग्री हेतु शोध प्रबंध लिखा. उस ग्रंथ की भूमिका महान अर्थशास्त्री एडविन केनन ने लिखी थी. अर्थशास्त्र के क्षेत्र में उनकी विद्वता का अनुमान लगाने के लिए अमर्त्यसेन की टिप्पणी भी मददगार सिद्ध हो सकती है. 2007 में दिए गए एक व्याख्यान में अर्थशास्त्र के क्षेत्र में आंबेडकर की गुरुता को स्वीकारते हुए हमारे समय के इस महान अर्थशास्त्री ने कहा था—

आंबेडकर अर्थशास्त्र के क्षेत्र में मेरे जनक हैं. वे दलितोंशोषितों के सच्चे और जानेमाने महानायक हैं. उन्हें आजतक जो भी मानसम्मान मिला है वे उससे कहीं ज्यादा के अधिकारी हैं. भारत में वे अत्यधिक विवादित हैं. हालांकि उनके जीवन और व्यक्तित्व में विवाद योग्य कुछ भी नहीं है. जो उनकी आलोचना में कहा जाता है, वह वास्तविकता के एकदम परे है. अर्थशास्त्र के क्षेत्र में उनका योगदान बेहद शानदार है. उसके लिए उन्हें सदैव याद रखा जाएगा.’1

अर्थशास्त्र के क्षेत्र में आंबेडकर के योगदान की चर्चा करने से पहले इस विषय में उनकी प्रतिष्ठा को दर्शाने वाली एक और घटना का उल्लेख प्रासंगिक होगा. 1930 का दशक पूरे विश्व बाजार में भीषण मंदी लेकर आया था. ब्रिटिश सरकार के सामने भी गंभीर चुनौतियां थीं, खासकर उपनिवेशों में जहां आजादी की मांग जोड़ पकड़ती जा रही थी, वहां औपनिवेशिक सरकार की पकड़ को बनाए रखने के लिए स्थानीय समस्याओं का समाधान आवश्यक था. समस्याओं के मूल में कुछ वैश्विक मंदी का हाथ था और कुछ स्थानीय रोजगारों के उजड़ जाने से उत्पन्न मंदी का. इसलिए अगस्त 1925 में ब्रिटिश सरकार ने भारत की मुद्रा प्रणाली का अध्ययन करने के लिए ‘रॉयल कमीशन ऑन इंडियन करेंसी एंड फाइनेंस’ का गठन किया था. इस आयोग की बैठक में हिस्सा लेने के लिए जिन 40 विद्वानों को आमंत्रित किया गया था, उनमें आंबेडकर भी थे. वे जब आयोग के समक्ष उपस्थित हुए तो वहां मौजूद प्रत्येक सदस्य के हाथों में उनकी लिखी पुस्तक ‘इवोल्यूशन ऑफ पब्लिक फाइनेंस इन ब्रिटिश इंडिया’ की प्रतियां थीं. बात यहीं खत्म नहीं होती. उस आयोग ने अपनी रिपोर्ट 1926 में प्रकाशित की थी. उसकी अनुशंसाओं के आधार पर कुछ वर्षों बाद ‘भारतीय रिजर्व बैंक’ की स्थापना हुई. इस बैंक की अभिकल्पना नियमानुदेश, कार्यशैली और रूपरेखा आंबेडकर की शोध पुस्तक ‘प्राब्लम ऑफ रुपया’ पर आधारित है. उस समय तक उनका मुख्य लेखन अर्थशास्त्र जैसे गंभीर विषय को लेकर ही था. मात्र 27 वर्ष की उम्र में उन्हें मुंबई के एक कॉलिज में राजनीतिक अर्थशास्त्र के प्रोफेसर की नौकरी मिल चुकी थी. अध्यापन के अलावा वे विषय से संबंधित सैकड़ों लेख और व्याख्यान दे चुके थे. एक सभा में विद्यार्थियों के बीच पढ़े गए उनके लेख ‘रेस्पांसिबिल्टी ऑफ रेसपांसिबिल गवर्नमेंट’ की प्रशंसा उस समय के महान राजनीतिक विज्ञानी, चिंतक हेराल्ड लॉस्की ने भी की थी. लॉस्की का कहना था कि ‘लेख में आए आंबेडकर के विचार क्रांतिकारी स्वरूप’ के हैं.

अर्थशास्त्र के क्षेत्र में आंबेडकर के योगदान को और गहराई से समझने के लिए प्राचीन भारत की मुद्रा विनिमय प्रणाली के बारे में जानना आवश्यक है. 1893 तक भारत में केवल चांदी के सिक्कों का प्रयोग किया जाता था. 1841 में स्वर्ण मुद्रा का उपयोग भी होने लगा था. चांदी के सिक्के का मूल्य उसमें उपलब्ध चांदी के द्रव्यमान से आंका जाता था. इस तरह एक स्वर्णमुद्रा का मूल्य 15 चांदी के सिक्कों के बराबर था. 1853 में आस्ट्रेलिया और अमेरिका में स्वर्णभंडार मिलने से सोने की आमद बढ़ी. उसके बाद स्वर्णमुद्राओं में विनिमय का प्रचलन बढ़ने लगा. हालांकि उसका विधिवत चलन 1873 के बाद की संभव हो पाया. लगभग उसी समय चांदी के नए भंडार मिलने से उसकी आमद भी बढ़ने लगी, परंतु भारत में स्वर्ण उत्पादन में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पाई थी. परिणामस्वरूप स्वर्णमुद्रा के मुकाबले भारतीय रजतमुद्रा का निरंतर अवमूल्यन होने लगा. उस खाई को पाटने के लिए अधिक मात्रा में रजतमुद्राएं ढाली जाने लगीं. लेकिन वह समस्या का अस्थायी समाधान था. दूसरे उससे उन व्यक्तियों के लेनदेन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला था जो केवल रजत मुद्रा का इस्तेमाल करते थे. जनसामान्य के लिए वह प्रतिकूल स्थिति थी. मुद्रा का अवमूल्यन होने से महंगाई में वृद्धि हुई थी. जबकि आय ज्यों की त्यों बनी हुई थी. आंतरिक स्तर पर उससे प्रत्येक वर्ग को घाटा हो रहा था. 1872 से लेकर 1893 तक यही हालात बने रहे. आखिर 1893 में सरकार ने रजतमुद्रा ढालने का काम अपने नियंत्रण में ले लिया.

उस समय तक मुद्राओं का मूल्यांकन उनमें उपलब्ध धातु की मात्रा से आंका जाता था. 1899 में सरकार ने एक समिति का गठन किया, जिसने स्वर्णस्टेंडर्ड के स्थान पर स्वर्णमुद्रा के उपयोग की सलाह दी थी. तदनुसार मुद्रा का मूल्यांकन उसमें उपलब्ध धातुमूल्य के बजाए सरकार द्वारा अधिकृत मूल्य जितना आंका जाने लगा. सरकार ने रजतमुद्रा का मूल्य 1 शिलिंग, 4 पेंस के बराबर कर दिया. नए नियम के अनुसार स्वर्णमुद्रा का मूल्य लगभग स्थिर था. उसके मूल्यांकन का अधिकार सीधे ब्रिटिश सरकार के अधीन था, जबकि रजतमुद्रा के मूल्यनियंत्रण के लिए उस समय तक कोई व्यवस्था न थी. मुद्राओं के मूल्यांकन को लेकर आंबेडकर का दृष्टिकोण मानवीय था. कल्याणकारी अर्थशास्त्रियों से मिलता हुआ. उनका कहना था लोगों के लिए मुद्रा का वास्तविक मूल्य उसके बदले मिलने वाली आवश्यक वस्तुओं से तय होता है. सोना बेशकीमती हो सकता है. लेकिन वह आदमी की सामान्य जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता. वह न तो किसी भूखे का पेट भर सकता है, न ही उससे किसी नंगे तन को ढका जा सकता है. यदि एक रजत मुद्रा से उन्हें जरूरत की सभी चीजें प्राप्त हो जाती हैं, तो उन्हें स्वर्णमुद्रा की दरकार न होगी. इसके लिए मुद्रा का भरोसेमंद होने के साथसाथ विनिमय प्रणाली में स्थायित्व भी जरूरी है. मुद्रा के प्रति जनता का अविश्वास तथा उसकी मूल्यअस्थिरता आर्थिक संकट को जन्म देती है. रजतमुद्रा के उतारचढ़ाव को देखते हुए आंबेडकर ने स्वर्णमुद्रा को अपनाने का सुझाव दिया; तथा एक रजतमुद्रा का मूल्य एक शिलिंग तथा छह पैंस रखने की सलाह दी. उनकी अधिकांश अनुशंसाओं को सरकार ने ज्यों की त्यों अपना लिया था. उन्हीं के आधार पर आगे चलकर भारतीय रिजर्व बैंक की मूलभूत सैद्धांतिकी का विकास हुआ.

अपने अर्थशास्त्र संबंधी ज्ञान के आधार पर आंबेडकर एडम स्मिथ और डेविड रिकार्डो जैसे क्लासिकल अर्थशास्त्रियों की कतार में खड़े नजर आते हैं. आगे चलकर राजनीति और समाज सुधार के क्षेत्र में उन्होंने जो काम किया, उसके आधार पर हम उनके अर्थशास्त्र संबंधी सिद्धांतों की तुलना इटली के विचारक विलफर्ड परेतो से कर हैं. परेतो ने यूरोपीय समाज में व्याप्त असमानताओं का गहरा अध्ययन किया था. उसका मानना था कि शीर्ष पर मौजूद अल्पसंख्यक अभिजन समूह अपने बुद्धिचातुर्य द्वारा बहुसंख्यक समूह को छोटेछोटे समूहों में बांटे रखता है. इस तरह संगठित अल्पसंख्यक अभिजन के आगे असंगठित बहुजन की शक्ति नगण्य हो जाती है. ‘कल्याणकारी अर्थशास्त्र’ के क्षेत्र में ‘परेतो दक्षता तुल्यांक’ की चर्चा लगभग सभी आधुनिक अर्थशास्त्री करते आए हैं. परेतो को स्पर्धात्मक उत्पादन प्रणाली से कोई शिकायत न थी. लेकिन वह चाहता था कि सरकार समाजार्थिक समानता की स्थापना के दायित्व को समझे तथा उसके लिए समयानुसार आवश्यक कदम उठाती रहे. उसके अनुसार स्पर्धात्मक अर्थव्यवस्था में लाभार्जन की दर संतोषजनक बनी रहती है. न्यायभावना के साथ काम करने वाली सरकार उस लाभ का एक हिस्सा जरूरतमंदों तक पहुंचाकर असमानता की खाई को पाटते रहने का काम कर सकती है. परेतो के शब्दों में—‘समाज में किसी एक नागरिक के साथ निकृष्टतम किए बिना, कम से कम किसी एक नागरिक के साथ श्रेष्ठतम किया जा सकता है.’ आंबेडकर को भी मशीनों और स्पर्धात्मक उत्पादन व्यवस्था से कोई शिकायत न थे. लेकिन वे चाहते थे कि सभी प्रमुख और आधारभूत उद्योग सरकार के अधीन हों. वे मानते थे कि आर्थिक सुधार की कोई भी योजना बिना भूमि सुधार के असंभव है. इसके लिए उन्होंने बड़े भूस्वामियों की आय को आयकर के दायरे में लाने का सुझाव दिया था. 1946 में अखिल भारतीय स्तर पर भूमि सुधार की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि भूमि वितरण में असमानता के कारण समाज के बड़े हिस्से को बहुत छोटी जोतों से काम चलाना पड़ता है. परिणामस्वरूप एक ओर जहां श्रमशक्ति का दुरुपयोग होता है, वहीं बहुतसी श्रमशक्ति निष्क्रिय पड़ी रहती है. आवश्यकता से कई गुना भूमि के स्वामी बने जमींदार अपनी श्रमशक्ति का उपयोग इसलिए नहीं करते, क्योंकि उन्हें जरूरत से कई गुना श्रमशक्ति बेगार या मामूली मजदूरी पर उपलब्ध हो जाती है. यानी समाज का एक वर्ग संसाधनों के अभाव में अपनी श्रमशक्ति के लाभों से वंचित रह जाता है; जबकि दूसरा आवश्यकता से कहीं अधिक संसाधनों पर काबिज होने के कारण दूसरे के श्रम को कम मूल्य पर खरीदने में सफल हो जाता है. इस तरह न केवल श्रम का अवमूल्यन होता है, बल्कि समाज की बहुतसी श्रमशक्ति व्यर्थ चली जाती है. इसके लिए आंबेडकर कृषि, उद्योग, बीमा, बैंकादि का संपूर्ण राष्ट्रीयकरण चाहते थे. वे व्यापक भूमिसुधार के समर्थक थे. चाहते थे कि सरकार समस्त कृषियोग्य भूमि का अधिग्रहण कर उसे उचित आकार के फार्मों में विभाजित करे और उत्पाद का समुचित अनुपात में समाज के सभी सदस्यों के बीच संवितरण हो. समाजार्थिक समानता की स्थापना के लिए आंबेडकर का यह क्रांतिकारी सोच था.

आंबेडकर की विचारों पर हम समाजवादी चिंतन की छाया देख सकते हैं. लेकिन भारत में समाजवादी आंदोलन का जो स्वरूप रहा है, उस अर्थ में वे कतई समाजवादी न थे. हम उन्हें आमूल परिवर्तनवादी कह सकते हैं. चूंकि वे सामाजिक समानता के लक्ष्य को दलितों की वर्गीय चेतना, शैक्षणिकसामाजिक उन्नयन तथा लोकतांत्रिक परिवर्तन द्वारा प्राप्त करना चाहते थे, इसलिए उन्हें गणतांत्रिक समाजवादी कहना भी उपयुक्त होगा. वस्तुतः जिस समाज के लिए वे काम कर रहे थे, उसके कल्याण हेतु आर्थिक समरसता का विचार पर्याप्त न था. लाहौर में ‘जातपात तोड़क मंडल’ के वार्षिक अधिवेशन के लिए लिखे गए अपने लंबे भाषण ‘जाति का उन्मूलन’ में उन्होंने कई उदाहरण देकर बताया था कि आर्थिक समाधान कभी भी सामाजिक समाधान का विकल्प नहीं बन सकते. एक उदाहरण उन्होंने गुजरात के गांव का दिया था. वहां अछूत स्त्रियां घाट से पानी लाने के लिए मिट्टी के घड़ों का उपयोग करती थीं. जानूं गांव की खातेपीते दलित परिवारों की कुछ स्त्रियों ने पानी लाने के लिए पीतल के घड़ों का उपयोग करना चाहा तो सवर्ण लोगों की त्योरियां चढ़ गईं. उन्होंने विरोध किया. पूरे भारत में यही हालात थे. जयपुर रियासत के चकवारा की घटना के बारे में उन्होंने बताया कि एक रईस अछूत तीर्थ यात्रा पर गया. लौटा तो परंपरानुसार उसने मित्रोंरिश्तेदारों को भोज देने का फैसला किया. तय किया कि भोज के लिए सभी व्यंजन देशी घी में बनाए जाएंगे. सवर्णों को पता चला तो उबलने लगे. अछूत देशी घी से बने व्यंजनों का भोज दे, यह उन्हें सहन न हुआ. सो ऐन भोज के समय दर्जनों दबंग समारोह स्थल पर जा धमके. पलभर में सारा भोजन तहसनहस कर दिया. समाजवाद मुख्यतः आर्थिक समानता को अपना लक्ष्य मानता है. यही कारण है कि भारत में समाजवादी राजनीति कभी भी दलितों की मददगार नहीं बनी. न ही संसाधनों के संवितरण की न्यायपूर्ण मांग रखने वाले आंबेडकर को किसी ने समाजवादी विचारक के रूप में मान्यता दी.

आंबेडकर मार्क्स की आलोचना करते हुए बुद्ध को अपनाया था. अपने विचारों के कारण लगभग आधी दुनिया पर छाए रहने वाली विश्वइतिहास की इन महानतम हस्तियों में आपस में कोई स्पर्धा नहीं है. तो भी आंबेडकर के लिए बुद्ध इसलिए महत्त्वपूर्ण थे कि उन्होंने जाति पर सवालिया निशान लगाते हुए समानता आधारित समाज का सपना देखा था. साम्यवाद के रूप में समानता आधारित समाज का सपना मार्क्स का भी था. लेकिन मार्क्स की सीमा थी कि वे समानता को जीवन के आर्थिक पक्ष से आगे बढ़कर नहीं देख पाए थे. भारत के बारे में उन्होंने काफी लिखा था, तथापि वह जानकारी राजनीतिक और अखबारी सूचनाओं पर केंद्रित थी. जाति की भयावहता जिससे आंबेडकर का सीधा परिचय था और जिसकी विकृति को ढाई हजार वर्ष पहले जन्मे बुद्ध भी समझते थे, मार्क्स उतनी गहराई से नहीं समझ पाए थे. आंबेडकर मार्क्स की वर्गभेद की अवधारणा से सहमत थे. परंतु इस संशोधन के साथ कि भारतीय समाज में वर्गभेद मुख्यतः सामाजिकसांस्कृतिक रहा है. उनका मानना था कि जाति की समस्या के समाधान के बिना भारत में किसी भी सुधारवादी आंदोलन की सफलता संद्धिग्ध होगी. समाजार्थिक परिवर्तन के लक्ष्य को वे दलितों के प्रबोधीकरण द्वारा प्राप्त करना चाहते थे. इस रूप में वे अपने समय के किसी भी समाजवादी से बड़े और प्रतिबद्ध समाजवादी थे. भारतीय समाजवादी आंदोलन और राजनीति की यह विडंबना रही उसने आंबेडकर को मात्र दलितों का नेता मानकर उपेक्षित रखा. इसके लिए आंबेडकर को तो कोई नुकसान नहीं हुआ. परंतु जाति के सवालों की ओर से मुंह मोड़े रहने के कारण भारत का समाजवादी आंदोलन लगातार अपनी प्रासंगिकता खोता रहा.

आंबेडकर का पूरा जीवन एक महागाथा है. एक लेख या पुस्तक में उनके जीवनकर्म को नहीं समेटा जा सकता. वे अपने मानक आप हैं. इसलिए लेख का समापन हम उन्हीं की बात से करना चाहेंगे. यह दरअसल में एक चेतावनी है जो भारतीय संविधान को लोकार्पित करते हुए उन्होंने हम सबको दी थी. संविधान की प्रस्तावना की शुरुआत उन्होंने ‘हम भारत के लोग’ से की है. इसकी व्याख्या उनके भाषण में भी मिलती है —

‘‘मुझे याद है जब राजनीतिक रूप से सक्रिय हिंदुस्तानी ‘भारत के लोग’ कहने की अपेक्षा ‘भारतीय राष्ट्र’ कहना अधिक पसंद करते थे. मेरा विचार है कि ‘हम एक राष्ट्र हैं’ ऐसा मानकर हम एक बड़े भ्रम को बढ़ावा दे रहे हैं. हजारों जातियों में बंटे लोग भला एक राष्ट्र कैसे हो सकते हैं? सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक दृष्टि से हम अभी तक एक राष्ट्र नहीं हैं, इस बात को हम जितनी जल्दी समझ लें उतना ही हमारे लिए बेहतर होगा. तभी हम राष्ट्र बनने कि जरूरत को बेहतर समझ पाएंगे तथा इस लक्ष्य को हासिल करने के तरीकों और साधनों के बारे में बेहतर पाएंगे. (जातिप्रथा के रहते) इस उद्देश्य की प्राप्ति कठिन है….जातियां राष्ट्रविरोधी हैं. पहला कारण तो ये कि वे सामाजिक जीवन में अलगाव को बढ़ावा देती हैं. दूसरे वे एक जाति और दूसरी जाति के बीच ईर्ष्या और असहिष्णुता को ले आती हैं. अगर हम सच में राष्ट्र बनना चाहते हैं तो हमें इन सब मुश्किलों से मुक्ति पानी होगी. असली भाईचारा तभी कायम हो सकता है, जब राष्ट्र मौजूद हो—लेकिन बगैर बंधुत्व के समानता, स्वाधीनता और राष्ट्रीयता महज दिखावा ही होंगी.’’

ओमप्रकाश कश्यप

1. Ambedkar is my Father in Economics. He is true celebrated champion of the underprivileged. He deserves more than what he has achieved today. However he was highly controversial figure in his home country, though it was not the reality. His contribution in the field of economics is marvelous and will be remembered forever..!”

सहकार : आत्मनिर्भरता का दर्शन

सामान्य

उत्तरोत्तर कठिन होते जा रहे श्रमिक-जीवन की परेशानियों से मुक्ति का एक रास्ता समस्याओं के साथ-साथ जीवन से पलायन का हो सकता है. जैसा कि हमारे पूर्वज भी करते आए हैं. कभी संतोष के नाम तो कभी भाग्य के नाम पर. कभी धर्म तो कभी परलोक-सिद्धि के प्रलोभन से. कभी आत्मविश्वास गंवा जिंदगी से हार मानते हुए तो कभी शक्तिशाली के आतंक के चलते. यदि हमेशा यही होता तो जीवन में संभावनाओं की उपस्थिति और मानवीय जिजीविषा की चामत्कारिक देन से लोगों का भरोसा ही उठ जाता. परस्पर सहयोग और समर्पण की जादुई शक्ति को मनुष्य पहचान ही नहीं पाता. अमेरिका के शेकर साहचर्यवादियों के एक प्रसिद्ध गीत का गीत का भावार्थ  है—

जो भी सर्वोच्च शिखर तक पहुंचना चाहता है, उसको सर्वप्रथम समाज के सबसे निचले स्तर की ओर देखना चाहिए. तत्पश्चात सबसे नीचे मौजूद व्यक्ति को साथ लेकर सर्वोच्च शिखर तक पहंुचने के लिए चढ़ाई आरंभ कर देनी चाहिए.’

मनुष्य एवं सहकार का संबंध सहस्राब्दियों पुराना है. हड़प्पा और मोअ-जो-दड़ो की सभ्यता के अवशेष बताते हैं कि उन दिनों भारतीय व्यापारिक संगठन सुदूर रोम तक की यात्रा करते थे. प्राचीन चीन और जापान में ऐसे सहयोगी संगठन थे, जिनके सदस्य प्रतिमाह एक निश्चित रकम एक स्थान पर जमा करते रहते थे. धीरे-धीरे रकम बड़ी हो जाती, तो परस्पर बांट लिया जाता था. ऐसे सहयोगी संगठनों को चीन और जापान में क्रमशः यू हुई तथा तोनोमुशी कहा जाता था. भारतीय श्रेणि और यूरोपीय देशों में गिल्ड के बीच अच्छे व्यापारिक संबंध थे. आधुनिक सहकारिता आंदोलन की विधिवत शुरुआत रोशडेल पायनियर्स द्वारा 21 दिसंबर, 1844 को सहकारी उपभोक्ता भंडार की शुरुआत के साथ हुई थी.

सहकारिता को प्रेरित करने में सुप्रसिद्ध इतिहासकार चार्ल्स डिकेन्स की अद्वितीय प्रेरणा का योगदान भी कम नहीं है. 1843 की गर्मियों में चार्ल्स डिकेन्स, जो उन दिनों 31 वर्ष के सुदर्शन युवक थे, लंकाशायर की यात्रा पर निकले. उद्देश्य था अपनी नई पुस्तक के लिए जमीनी अनुभव बटोरना. देखना चाहते थे कि उत्तरी इंग्लेंड, जो उद्योग के क्षेत्र में विश्व-भर में नाम कमा रहा है, वहां पर आम जनजीवन कैसा है. उन्होंने मेनचेस्टर की मजदूर बस्तियों की यात्रा की, यह जानने के लिए कि अपने मालिकों के लिए साल में करोड़ों पाउंड का मुनाफा कमाने वाली कपड़ा मिलों के मजदूर किन परिस्थितियों में रहते हैं. डिकेन्स ने वहां जो देखा वह देह तो देह आत्मा तक को सुन्न कर देने वाला था. मजदूर बस्तियों में भूख, गरीबी और बीमारियों के नंगे नांच ने डिकेन्स को विचलित कर दिया. औद्योगिक क्रांति का हृदय-प्रदेश माने जाने वाले उस क्षेत्र में जीवन कितना मुश्किल और अमानवीय है. मानो पूरे इंग्लेंड को दो हिस्सों में बांट दिया गया हो. उसके एक ओर तो बड़े-बड़े धन्नासेठों, पूंजीपतियों, उद्योगपतियों और कमाऊ नौकरशाहों का इंग्लंेड है, तो दूसरे इंग्लेंड में भूखे, नंगे, विपन्न, शोषित-उत्पीड़ित और बीमार स्त्री-पुरुषों का बसेरा है. पूंजीवाद प्रेरित औद्योगिक क्रांति का कड़वा सच उसके सामने था. उसने जो देखा वह घोर अमानवीय, मनुष्यता को लांछित करने वाला था. अनियमितत मशीनीकरण के कारण प्रदूषण लगातार बढ़ता ही जा रहा था. नागरिक सुविधाएं पूरी तरह उजाड़ पड़ी थीं. वस्तुतः 1848 के आसपास रोशडेल में जीवन-संभाव्यता मात्र 21 वर्ष थी, जो उस समय इंग्लेंड की औसत जीवन-संभाव्यता से कहीं कम थी. औरतों के पास बदलने के लिए कपड़े तक नहीं होते थे. उनके गंदे और चिथड़े कपड़े बेहद बदबूदार होते थे. पलंग पर न तकिये होते थे, न चादर. बच्चे को जन्म देने के लिए औरतें प्रसूता के अगल-बगल, अपनी बाहों का सहारा देने के लिए खड़ी हो जाती थीं. भीषण दरिद्रता की यह अवस्था उन बुनकर परिवारों की साथ थी, जिनके बारे में यह दावा किया जाता था, कि वे पूरे विश्व के लिए कपड़ा तैयार करते हैं.

अगले ही दिन अथेनयिम क्लब में नौकरशाहों तथा कारखाना मालिकों की उपस्थिति में, वहां उपस्थित मजदूरों का आवाह्न करते हुए डिकेन्स ने कहा कि उन्हें अपनी इस अज्ञानता और अपराध-ग्रंथि से बाहर आ जाना चाहिए कि वे गरीबी और अपराध के बेबस जन्मदाता हैं. कि वे स्वयं कुछ भी करने में असमर्थ हैं, या उनका विकास दूसरे की दया-दृष्टि के बगैर संभव ही नहीं है. उन्हें इस भ्रम से भी बाहर आ जाना चाहिए कि एक दिन धनवान लोग अपनी आत्मा की आवाज से प्रेरित होकर आए आएंगे; और मिलकर उनकी समस्याओं का खोजेंगे. उन्होंने नौकरशाहों और कारखाना मालिकों से भी अपील की थी कि श्रमिकों की हालत में सुधार लाने के लिए वे आपसी कर्तव्यों तथा जिम्मेदारियों का परस्पर आदान-प्रदान करें. कि उनकी समृद्धि समाज की समृद्धि के बिना अधूरी और बेमानी है.

मजदूर बस्तियों में छायी गरीबी और बदहाली ने डिकेन्स को इतना व्यथित कर दिया था कि ट्रेन द्वारा लंदन वापस लौटते हुए उन्होंने अपनी नई पुस्तक ‘दि क्रिसमस कैरोल’ की अभिकल्पना की. एक सप्ताह बाद ही उन्होंने वह पुस्तक लिखनी प्रारंभ कर दी. उसके लगभग छह महीने के बाद 19 दिसंबर, 1843 को वह पुस्तक प्रकाशित होकर आई, जिसने पूरे इंग्लेंड के बुद्धिजीवियों को झकझोर कर रख दिया. लोग मजदूरों की स्थिति के बारे में सोचने को विवश हो उठे. क्रिसमस का उस जैसा उल्लास पहले कभी नहीं हुआ था— डेविड जे. थांपसन उस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए लिखा था कि लंदन लौटने के बाद चार्ल्स डिकेन्स ने अपने आंख, नाक तथा कान यह जानने पर लगा दिए थे कि मेनचेस्टर और लंकाशायर की मजदूर बस्तियों के उत्थान के लिए पूंजीपति और सरकार कितने चिंतित हैं; तथा मजदूर अपने शोषण एवं उत्पीड़न का कितना और किस तरह सकारात्मक विरोध कर पाते हैं.

चार्ल्स डिकेन्स की पुस्तक ‘दि क्रिसमल कैरोल’ लगभग जीवनी थी. एक मजदूर के संघर्षों और दुःखों की महागाथा. उसमें डिकेंस ने यह कल्पना कि थी एक पिता अपनी गरीबी से बेहद तंग आ चुका है. कर्ज न चुका पाने के कारण सजा काटते हुए भी वह अपने परिवार के प्रति चिंचित और परेशान है. उपन्यास का मुख्य पात्र बॉब क्रेस्टी नाम के अत्यंत गरीब मजदूर को बनाया गया था, जो अपने मालिक के लिए कमरतोड़ परिश्रम करने के बावजूद परिवार का भरण-पोषण कठिनाई-पूर्वक ही कर पाता है. उसका एक बेटा नन्हा टिम बीमार और चलने-फिरने में असमर्थ है. बॉब का मालिक स्क्रूज खूब धनवान मगर हद से ज्यादा कंजूस है. उसके जीवन का प्रमुख लक्ष्य अधिक से अधिक धन इकट्ठा करना है. स्क्रूज को उन भूखे-बीमार मजदूरों और उनके परिवारों की कतई फिक्र नहीं है, जिनके परिश्रम के दम पर उसके कारखाने सोना उगलते हैं.

पुस्तक के बहाने डिकेन्स द्वारा गढ़ा गया रूपक तेजी से बदलते ब्रिटिश समाज पर तीखा कटाक्ष था, जिसका एक सिरा बेहद चमकदार और चकाचौंध से युक्त था, उसपर मुट्ठी-भर लोगों का अधिपत्य था. जबकि दूसरे सिरे पर हजारों-लाखों उत्पीड़ित-शोषित जन थे, जीवन की मामूली सुविधाओं के लिए तरसते हुए. आगे चलकर इसी वर्ग को कार्ल माक्र्स ने सर्वहारा कहकर पुकारा था. कड़ी मेहनत के बावजूद उन्हें न भरपेट रोटी मिलती थी, न तन ढकने को जरूरत-भर कपड़ा. पुस्तक के बहाने लेखक ने मजदूर जीवन की विसंगतियों को पूरी दुनिया के सामने लाने का प्रयास किया था, जिसमें उन्हें भरपूर कामयाबी प्राप्त हुई. डिकेन्स की यह पुस्तक आगे चलकर यूरोप देशों के सामाजिक अध्ययन का प्रमुख दस्तावेज बनी. उससे लोग विकास को आलोचनात्मक दृष्टि से परखने के लिए विवश हो उठे. डिकेन्स द्वारा गढ़ा गया पात्र बॉब क्रेस्टी समाज के गरीब, ऋणग्रस्त, उत्पीड़ित और शोषित मजदूर का प्रतीक बन गया. कुटिल स्क्रूज को कंजूसी और शोषक पूंजीपति का पर्याय मान लिया गया. एक और मुख्य बात मजदूरों को यह समझ में आने लगी कि अपनी बेहाली और दुर्दशा के वे या उनका भाग्य जिम्मेदार नहीं हैं, असली जिम्मेदार वह व्यवस्था है, जो पूंजी को सीमित हाथों में कैद करने का अवसर देती है. वे समझने लगे कि इस अवस्था से उभरने के लिए उन्हें स्वयं ही प्रयास करने होंगे.

इंग्लेंड के चार्टिस्ट आंदोलनकारियों को आम मताधिकार के लिए छेड़े गए लंबे संघर्ष के लिए जाना जाता है. मगर सहकारिता के क्षेत्र में भी उनका योगदान कम नहीं है. मजदूरों की आवास समस्या के समाधान के लिए चार्टिस्ट नेता ओ’काॅनर ने 1843 ईस्वी में ‘चार्टिस्ट को-आपरेटिव लेंड कंपनी’ नाम से एक सहकारी संस्था का गठन किया था. उसे आगे चलकर ‘नेशनल लेंड कंपनी’ का नाम दिया गया. उस संस्था का एक सम्मिलित कोष था. केवल मजूदर उसके सदस्य बन सकते थे. 1844 से 1848 के दौरान संस्था द्वारा पांच स्थानों पर विशाल भूखंडों पर आवासीय इकाइयों का निर्माण कर, उन्हें चुने हुए श्रमिकों में बांटा भी गया. तत्कालिक कानून के अनुसार भूमिहीनों को मताधिकार से वंचित रखा गया था. अतः श्रमिकों को भू-स्वामी बनाना, उस समय के नियमों के अनुसार श्रमिकों को मान-सम्मान दिलाना था. उससे भी पहले 1830 में आर्थिक आत्मनिर्भरता द्वारा जनसाधारण का सम्मान वापस लाने का प्रयास सहयोगी उद्यमों के माध्यम से हो चुका था. 1830 में चार्ल्स हावर्थ के प्रयासों से ‘रोशडेल फ्रेंडली कोआपरेटिव सोसाइटी’ का गठन किया गया था. उस समिति ने सहकारी उद्यम की शुरुआत उपभोक्ता भंडार के माध्यम से की थी. परंतु अनुभव की कमी, सहकारिता संबंधी जागरूकता के अभाव, व्यवस्थागत कमजोरियों तथा कानूनी शिथिलताओं के वह समिति असफलता का शिकार हुई थी. असफलता के अन्य कारणों में प्रमुख कारण थे, उधार बिक्री का प्रावधान तथा नियमों की अस्पष्टता. मजदूरों की दयनीय आर्थिक स्थिति को देखते हुए, समिति के विधान में की गई व्यवस्था के अनुसार सदस्यों को उसके उपभोक्ता भंडार से एक सप्ताह का उधार दिया जाता था. उनसे यह अपेक्षा की जाती थी कि सप्ताह के अंत में उधार की रकम का भुगतान कर देंगे. व्यावहारिक रूप में वह व्यवस्था बहुत दिनों तक नहीं चल सकी. सीमित वेतन तथा अन्य आकस्मिक खर्चों के कारण बहुत से मजदूर सप्ताहांत में रकम लौटाने में असमर्थ रहते थे. परिणाम यह हुआ कि समिति को व्यापार मेें घाटा होने लगा. चार्ल्स हावर्थ को व्यक्तिगत रूप में भी बहुत नुकसान उठाना पड़ा. कुछ ही दिनों पश्चात वह समिति भंग हो गई.

कोई और होता तो दो बड़ी असफलताओं के चलते टूट जाता. भारी नुकसान सहकर शायद ही अगला प्रयास करता. लेकिन मजदूरों के समक्ष ‘करो या मरो’ की स्थिति थी. बाजार में महंगाई बढ़ती जा रही थी, ऊपर से दुकानदार खाने-पीने के सामान में भारी मिलावट करते थे. उससे भी अधिक था उधार का बोझ, जो मजदूरों के जीवन की पहली सांस से आरंभ होकर अंतिम क्षणों तक बना रहता था. मजदूरों को यह बोध हो चला था कि अपनी समस्याओं का निदान स्वयं उनके हाथों में है. इसलिए बिना और विलंब किए उन्हें स्वयं आगे आना होगा. इनमें वे लोग लोग थे, जिनकी भविष्य पर निगाह थी. जिनका आशावाद अभी मरा नहीं था, जिनकी जनसंगठन और लोकशक्ति में प्रबल आस्था थी, जो जानते थे कि मनुष्यमात्र उतना बुरा नहीं, जितनी कि लोग उसके बारे में सामान्य धारणा बना लेते हैं. मनुष्य की सकारात्मक प्रवृत्तियों को उभारकर उसकी समस्याओं का निदान संभव है. मनुष्यता के ऐसे ही महान स्वप्नदृष्टाओं में से एक था, डॉ. विलियम किंग(1786-1865), जिसकी सहकार और सहयोगाधारित उपक्रमों में प्रबल आस्था थी. सहकारिता के विचार को जन-जन तक पहुंचाने के लिए डॉ. किंग ने एक समाचारपत्र भी निकाला था, नाम था—दि को-आॅपरेटर. अपने समाचारपत्र में उसने लिखा था—

‘बगैर संगठन के संख्या-बल निःशक्त है. जबकि विवेक बिना संगठन-शक्ति निरर्थक.’

डिकेन्स के मेनचेस्टर दौरे से पहले ही मजदूरों एक समूह वहां से मात्र सतरह किलोमीटर दूर रोशडेल में अपनी समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए निरंतर बैठकें करता आ रहा था. उन बैठकों में मजदूरों की समस्याओं तथा उनसे मुक्ति के बारे में विचार होता. ऐसी ही एक बैठक में जॉन कार्सव नामक एक मजदूर कार्यकर्ता ने सहकारी समिति के गठन का सुझाव दिया था. सहकारिता के पुराने प्रयोग असफल सिद्ध हो चुके थे. इसलिए उसके प्रस्ताव पर कुछ लोग चौंके. परंतु यदि सहकारिता नहीं तो क्या? दूसरे विकल्पों का सरासर अभाव था. अंततः उस सभा में सहकारी समिति बनाने के निर्णय को अनुमति मिल गई. उसका मुख्य उद्देश्य बनाया गया ग्राहकों को शुद्ध, पवित्र पूरे माल की आपूर्ति.

वह 15 अगस्त, 1844 का दिन था. बाकी दिनों से कहीं अधिक पवित्र और उम्मीदों से भरा हुआ, जब ‘रोशडेल पायनियर्स इक्वीट्वेल कोआॅपरेटिव सोसाइटी’ के गठन को सैद्धांतिक सहमति मिली, जिसने दुनिया-भर के सहकारिता आंदोलन को नई दिशा दी. रोशडेल पायनियर्स की संस्थापकों में कुल अठाइस सदस्य थे. सहकारी समिति की बात करना, उसके विचार को आगे चलाना अलग बात थी. उसके लिए पूंजी का प्रबंध करना अलग बात. मगर जहां चाह-वहां राह, और जहां राह-वहां हिम्मत और मंजिल भी. बैठक के दौरान मजदूरों ने निर्णय लिया कि प्रत्येक मजदूर को जो समिति का सदस्य बनना चाहता है, समिति के कोष में न्यूनतम एक पाउंड का निवेश करना होगा. एक-एक पेनी के लिए कमरतोड़ परिश्रम करने वाले मजदूरों के लिए एक पाउंड की रकम बहुत बड़ी थी. समस्या किसी एक की नहीं, अधिकांश मजदूरों की थी. तब सर्वसम्मिति से यह सुझाव आया कि इसके लिए कारखाना मालिकों से उधार लिया जाए. जो उधार देने में आनाकानी करें, उन्हें हड़ताल या धरना-प्रदर्शन के माध्यम से अग्रिम धनराशि देने के लिए विवश किया जाए. उस समय जो सदस्यगण काम करें, वे यह प्रयास भी करें कि हड़ताल पर गए सदस्यों के हिस्से के पेंस भी बचा सकें.

हड़ताल की धमकी मिलते ही कुछ कारखाना मालिक एडवांस देने को सहमत हो गए. यह संगठित शक्ति की पहली जीत थी. कुछ कारखाना मालिकों ने एकदम इंकार कर दिया. इसपर श्रमिकों का आक्रोश फूट पड़ा. उसके बाद मालिकों एवं मजदूरों के बीच संघर्ष भी हुआ. इसपर कुछ मजदूर निराश होकर समिति के प्रस्ताव से पीछे हटने लगे. कुछ अभी भी उम्मीद बांधे रहे. प्रत्येक सप्ताह दो पेंस की रकम उनके लक्ष्य को देखते हुए अपर्याप्त थी. हालांकि कुछ कारखाना मालिक उतनी रकम एडवांस के रूप में देने को तैयार थे, जबकि कुछ इस मांग को पूरी तरह नकार चुके थे. अततः मजदूरों तथा कारखाना मालिकों के बीच यह समझौता हुआ कि उतनी रकम मालिकों की ओर से मजदूर संगठन को एडवांस के रूप दी जाएगी. वहां से सदस्य उस राशि को उधार के रूप में ग्रहण कर सकते हैं.

 दो पेंस की रकम उस समय अधिकतर कामगारों की लगभग दो सप्ताह की मजदूरी के बराबर थी. कह सकते हैं कि उन बुनकरों के लिए यह रकम भी मामूली न थी. इसे उगाहने के लिए तीन व्यक्ति नियुक्त किए गए, जो प्रत्येक सोमवार सदस्यों से रकम लाकर खजांची के पास जमा कर देते थे. विषम स्थितियों में एक पाउंड की शेयर-निधि जुटाना भी कठिन प्रतीत हो रहा था. सदस्य प्रति सप्ताह दो पेंस जमा करने में भी नाकाम हो रहे थे. कई बार ऐसे भी अवसर आए जब सदस्यों पर निराशा हावी होने लगी थी. उस समय यह सुझाव दिया गया कि समिति के गठन का कार्य फिलहाल स्थगित कर दिया जाए तथा विकास के वैकल्पिक उपायों के बारे में सोचा जाए. साथ ही अभी तक जमा की गई रकम, संबंधित सदस्यों को लौटा दी जाए. भविष्य में जब भी हालात अनुकूल हों, तब संगठन के बारे में नए सिरे से विचार किया जाए. कुछ सदस्य तो हताश होकर उस समय तक जमा कराई गई शेयर-निधि वापस भी मांगने लगे थे.

यह प्रतिकूल स्थिति थी. लेकिन उम्मीदों एवं घनी निराशाओं के बीच मजदूरों का अभियान आगे बढ़ता रहा. इस बीच चार्ल्स हावर्थ बिना समय खोए तेजी से समिति के लिए विधान की रचना में लगा था. विपरीत स्थितियों और आस-निराश के बीच डोलते उस छोटे-से समूह के लिए पहला पड़ाव आया 24 अक्टूबर 1844 को, जब हावर्थ द्वारा बनाए गए नियमों को ‘रजिस्ट्रार आॅफ फैमिली सोसाइटीज’ द्वारा पंजीकृत कराके, नियमों की उस व्यवस्था को संसद के अधिनियम के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्था की पहचान दी गई. इस तरह ‘रोशडेल इक्वीटेवल पायनियर्स को-आपरेटिव संस्था’ की नींव रखी गई. एक सपना अंगड़ाई लेने को आंखों में उतर चुका था. पंछी उड़ान भरने को पर खोल चुके थे, और अब पूरा अंतरिक्ष उनके लिए खुला था.

सदस्यगण अपने बाकी खर्च में कटौती करके एक-एक पेनी जोड़ते रहे. अंततः दिसंबर तक रोशडेल पायनियर्स मिलकर प्रारंभिक 28 पाउंड की पूंजी जमा करने में कामयाब हो गए. अब समस्या ऐसे स्थान की थी जो व्यावसायिक दृष्टि से उपयुक्त हो, साथ में पर्याप्त सस्ता भी. थोड़ी तलाश के बाद वह स्थान भी मिल गया. रोशडेल के 21, टोड लेन पर एक पुरानी मिल वर्षों से बंद पड़ी थी. देखभाल न होने के कारण वह खंडहर में बदलती जा रही थी. उसके मालिक मिस्टर डनलप से बात की गई, लेकिन वे उसको किसी समिति के नाम किराये पर देने को तैयार न थे. अंततः एक उपाय निकाला गया. समिति के ही एक स्थायी सदस्य के नाम पर उस गोदाम के भू-तल स्थित 23 फुट चौड़े तथा 50 फुट लंबे स्थान को तीन वर्ष के लिए किराये पर लिखवा लिया गया. किराया तय हुआ—दस पाउंड प्रति वर्ष. उसी स्थान के अगले हिस्से के 23 फुट चौड़े तथा सतरह फुट लंबे स्थल को दुकान के रूप में प्रयोग में लाया गया. शेष स्थान को भंडार तथा मीटिंग आदि के उपयोग के छोड़ दिया गया.

तैयारियां पूरी हो चुकी थीं. आखिर वह दिन भी आ गया जिसकी उन्हें वर्षों से प्रतीक्षा थी. रात-दिन जिसका उन्होंने इंतजार किया था. हजारों-लाखों सपने संजोए थे. अठाइस पाउंड में से दस पाउंड किराये के नाम खर्च हो चुके थे. कुछ उस इमारत की मरम्मत और सफेदी के नाम चढ़ गए. बाकी पाउंड से उन्होंने रोजमर्रा में काम आने वाली चीजें खरीदीं. कुल इतना सामान जितना कि छोटी-सी ट्राली में समा सके. उपभोक्ता भंडार का सपना और जरा-सा सामान! यह कहकर रोशडेल पायनियर्स का उपहास भी किया गया. मगर उन्होंने धैर्य से काम लिया. बिना प्रतिक्रिया दिए वे अपने काम से लगे रहे. पूर्णतः अनुशसित और लक्ष्य-समर्पित. आखिर उसी स्थान से, वर्ष की सबसे लंबी रात अर्थात 21 दिसंबर, 1844 को, सायं आठ बजे किटकिटाती ठंड के बीच रोशडेल पायनियर्स द्वारा सहकारी उपभोक्ता भंडार की शुरुआत की गई. मानो घने अंधियारे के बीच एक टिमटिमाती-सी लौ जली हो, जो बढ़ते-बढ़ते विश्वव्यापी दीपमाल बन गई. कुछ ही समय बाद जब वह स्थान छोटा पड़ने लगा तो भंडार को नए स्थान पर ले जाया गया. उपभोक्ता भंडार से आरंभ हुआ सहकारिता का अभियान उत्पादन, विपणन, निर्माण, थोक आपूर्ति जैसे नए-नए क्षेत्रों में फैलता चला गया. रोशडेल नाम सहकारिता का पर्याय बन गया. जगह-जगह से लोग उस स्थान को देखने के लिए आने लगे. उस अभियान कामयाबी ने सहकारिता का मखौल उड़ाने वाले लोगों की आंखें चैंधियां दीं. इस भ्रम को भी दूर कर दिया कि सीमित पूंजी के दम पर कोई उद्यम आरंभ कर पाना असंभव है.

तब से आज तक लगभग 170 वर्ष की अवधि में सहकारी आंदोलन ने पूरी दुनिया में तरक्की के नए-नए सोपान प्राप्त किए हैं. यह उस मिथ का खंडन करता है जो मानता है कि व्यावसायिक सफलता केवल स्पर्धा के माध्यम से संभव है. इसके उलट आधुनिक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का तो संपूर्ण दर्शन ही स्पर्धा पर टिका हुआ है. एक-दूसरे को नीचा दिखाकर बाजार पर छा जाने का प्रयास; और प्रयास भी ऐसा जो षड्यंत्र तक जाता हो, करना—आधुनिक उद्योग-नीति का ही हिस्सा है. इसमें कोई संदेह नहीं कि स्पर्धा से उत्पादकता पर प्रभाव पड़ता है. एक-दूसरे से बेहतर बनने की चाहत, स्वयं में परिष्कार का बोध भी जगाती है. लेकिन स्पर्धा सदैव निरापद नहीं होती. वह अपने साथ अनेक चुनौतियां लिए चलती है, जिनमे जरा-सी चूक पिछली सभी सफलताओं पर भारी पड़ सकती है. सुदीर्घ यात्रा के दौरान सहकारिता के क्षेत्र में भी अनेक बदलाव आए हैं. उच्च तकनीक ने सहकारी उद्यमों में भी जगह बनाई है. बावजूद इसके मूल सिद्धांत लगभग वही हैं, जो रोशडेल पाॅयनियर्स द्वारा अपनाए गए थे. उनमें देशकाल और परिस्थितियों के अनुसार समय-समय पर संशोधन अवश्य होते रहते हैं. इंग्लेंड से शुरू हुआ सहकारिता आंदोलन बड़ी तेजी से फ्रांस, स्वीडन, चीन, इटली, जर्मनी, जापान, स्पेन, अमेरिका, भारत आदि देशों में फैलता चला गया. आखिर क्यों, इसे समझने के लिए एक पुराना प्रसंग—

अरस्तु जब वह मात्र इकीस वर्ष युवा था, एक दिन वह मेकदोलन के सम्राट फिलिप के दरबार में पहुंचा. वहां उसने सिकंदर को पढ़ाने की इच्छा व्यक्त की. प्लेटो के शिष्य रह चुके अरस्तु को भला कौन मना करता! अनुमति मिलते ही अरस्तु ने अध्यापन आरंभ कर दिया. सिकंदर उस समय ग्यारह वर्ष का किशोर था. बड़ा ही सुंदर और उससे कहीं ज्यादा मेधावी. एक दिन की बात. अरस्तु गणित पढ़ा रहे थे कि अचानक सिकंदर ने टोक दिया—‘गुरुजी, एक कितने होते हैं?’

सवाल बहुत आसान दिखता है. अरस्तु इसको दार्शनिक रूप देना चाहते तो कह सकते थे कि एक यानी एकता यानी एकेश्वर अर्थात परमशक्ति! वे गणित का खेल दिखाते हुए यह भी कह सकते थे कि एक यानी दो का आधा या एक बटा दो का दुगुना; अथवा चार का एक-चौथाई. चाहते तो कोई और भी पहेली की तरह जवाब सुझा सकते थे. लेकिन जवाब देने के बजाय अरस्तु ने कहा—

‘मुझे सोचना होगा?’ उसके बाद वे घर लौट आए.

अगले दिन वे वापस लौटे. सिंकदर उत्तर की प्रतीक्षा में था. तब अरस्तु ने कहा—‘एक बहुत अधिक से भी अधिक हो सकता है.’

बात स्पष्ट थी. हम सब अलग-अलग मिलकर यदि केवल भीड़ बनाते हैं तो हमारी शक्ति, अकेले इंसान की शक्ति से कुछ ही ज्यादा होगी है. लेकिन यदि हम एकजुट हो जाएं, हमारे मनोरथ आपस में मिल जाएं, यदि हम अपनी संकल्पशक्ति का साझा कर लें, तब हम एक-एक होकर भी बहुत अधिक से अधिक हो सकते हैं.

यही सहकारिता है. यही संगठन की ताकत, यही इस लेख का उद्देश्य भी है.

© ओमप्रकाश कश्यप

 

बेलगाम पूंजीवाद को लगाम

सामान्य

आलेख 

एक

 

बीसवीं शताब्दी का पूर्वार्ध पूंजीवाद के विकास का था. उस कालखंड में पूंजी का वर्चस्व पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ा; और मुनाफा जिसे कभी व्यावसायिक नैतिकता के अनुपालन में मर्यादित रखने की सलाह दी जाती थी, उसे आर्थिक विकास के नजरिये से देखा जाने लगा था. पूंजीवाद का अभीष्ट थाबाजार पर एकाधिकार और अधिकतम मुनाफा. यह कहीं न कहीं श्रम शोषण से जुड़ा मसला भी था. इतिहास की तह में जाकर देखें तो पता चलेगा कि श्रमशोषण की समस्या पूंजीवाद की पूर्ववर्ती अर्थव्यवस्थाओं में भी थी. सहयोगाधारित संगठनों को छोड़कर, जिनके बारे में 3000 वर्ष पहले तक की जानकारी उपलब्ध है—श्रमशोषण प्रायः हर युग की समस्या रही है. बल्कि लंबे युग तक इसे नियतिबद्ध मानते हुए गंभीरता से लिया ही नहीं गया. सहयोगाधिारित संगठनों ने इस समस्या का सार्थक समाधान खोजने की कोशिश की थी. उस समय तेली, रंगरेज, बुनकर, राजमिस्त्री, काष्ठकार जैसे दस्तकारों के प्रभावशाली संगठन थे. समाज में उनका खासा मानसम्मान था. हालांकि उसी युग में जिसे सहयोगाधारित संगठनों का स्वर्णकाल माना जाता है, समानांतर रूप में दासप्रथा भी कायम थी.े दास की निजी इच्छाओं का कोई महत्त्व न था. वह एकमात्र अपने स्वामी की इच्छा से नियंत्रित होता था. प्रकारांतर में उससे अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने के अधिकार छीन लिए जाते थे. कालांतर में जैसेजैसे छोटे राज्यों का विकास हुआ, श्रमिक संगठनों के लिए स्वतंत्र रूप में काम करना कठिन होता गया. अद्वितीय शिल्पी जो अपने कौशल के लिए दूरदूर तक जाने जाते थे, वे पूरी तरह राज्याश्रित होने लगे. स्वामी प्रसन्न तो इनामइकराम की भरमार, स्वामी अप्रसन्न तो मृत्युदंड तक की नौबत आ जाती थी. उसके विरुद्ध सुनवाई किसी अदालत में संभव न थी. संभव है सहयोगाधारित संगठन भी दासों की सेवाएं लेते हों. लेकिन शिल्पकार और पेशेवरों द्वारा गठित वे संगठन निजी लाभ के साथसाथ सामाजिक लाभ की वांछा से चलाए जाते थे. उनमें स्वामीश्रमिक संबंधों नहीं होते थे. समूह के अंदर कार्यों का सामान्य सहमति के आधार पर विभाजन और अन्योन्याश्रितता होती थी. श्रेणियों का यह गुण उन्हें समकालीन उत्पादक समूहों से श्रेष्ठतर और मानवीय सिद्ध करता है.

मशीनी क्रांति के आरंभ में श्रमिकों को उम्मीद थी कि पूंजीवाद का आगमन सामंती शक्तियों के पतन में सहायक होगा, फलस्वरूप श्रमिक को श्रम और शिल्पकार को उसके शिल्पकौशल का भरपूर प्रतिदेय प्राप्त होगा. वे अपने श्रमकौशल का मूल्यांकन करने को पूर्ण स्वतंत्र होंगे. इसमें कोई संदेह नहीं कि पूंजीवाद ने सामंतवाद की अनेक ज्यादतियों पर प्रहार किया. कठिन श्रम से मुक्ति दिलाने में भी नई प्रौद्योगिकी मनुष्य की मददगार बनी. औद्योगिक अर्थव्यवस्था ने बेगार जैसी कुप्रथाओं पर नियंत्रण लगाया था. श्रमिक को उसके श्रम के बदले नकद भुगतान किया जाने लगा. किंतु श्रम पर पूर्ण स्वत्वाधिकार; यानी श्रममूल्य के निर्धारण का अधिकार जो श्रमिक की पुरानी नीतिसम्मत मांग थी—पर पूंजीपतियों और सरमायेदारों का अधिकार यथावत था. वैज्ञानिक क्रांति ने उत्पादन वृद्धि के जो नए रास्ते ईजाद किए थे, उनका अधिकांश लाभ पूंजीपति के हिस्से आया था. कामगारों को तुलनात्मक रूप से बहुत कम, बल्कि नगण्य लाभ पहुंचा था. नई प्रौद्योगिकी समाज में आर्थिक असमानता की खाई को और गहरा करने में सहायक बनी, जिसके परिणामस्वरूप पूंजीवादी शोषण का दायरा लगातार बढ़ता गया.

नई अर्थव्यवस्था में व्यावसायिक और उत्पादक इकाइयों को प्रतिस्पर्धी बनने/बनाने की अपेक्षाओं के चलते मुनाफे को तय करने का अधिकार समाज एवं सरकार के हाथों से खिसककर, पूर्णतः पूंजीपति के हाथों में चला गया. कुछ अपवादों को छोड़कर पूंजीपतियों को मिला अधिकार असीमित था. विशेषकर श्रमिकसंबंधी विषयों को लेकर. श्रमअधिकारों के संरक्षण हेतु कुछ कानून अवश्य बनाए गए. लेकिन उनका रास्ता इतना लंबा, दुरूह और जटिलताओंभरा था कि साधारण श्रमिक द्वारा उनका लाभ उठाना तो दूर, समझना तक कठिन था. इस तरह प्रतिस्पर्धा का पहला शिकार बना था—श्रमिक. दूसरा वह शिल्पकर्मी जिसके पास सिवाय अपने शिल्पकर्म के उपार्जन का कोई और माध्यम नहीं था. नतीजा यह हुआ कि जो शिल्पकर्मी प्राचीन समाजों में अपने हुनर के लिए सराहे जाते थे, जिनका विशेष मानसम्मान था, वे बेरोजगारी का शिकार होने लगे. इससे उनका कलाकौशल भी दम तोड़ने लगा, जो उन्होंने पीढि़यों के संघर्ष के बूते प्राप्त किया था. उचित यही था कि जिस प्रकार उद्यमी अपने उत्पाद के मूल्यनिर्धारण को स्वतंत्र होता है, श्रमकौशल के मूल्यांकन की वैसी ही स्वतंत्रता श्रमिक और शिल्पकार को भी प्राप्त होती. व्यावसायिक और सामाजिक नैतिकता की दृष्टि से भी यही अपेक्षित था. परंतु प्रौद्योगिकीकरण ने श्रम और शिल्प दोनों के सक्षम और सस्ते विकल्प पेश किए थे. परिणामस्वरूप श्रमिक और कामगार वर्गाें के ऊपर बेरोजगारी की तलवार लटकने लगी थी. मशीनों ने मानवश्रम का विकल्प बनना शुरू किया तो बेरोजगारी संकट से घिरे, हतोत्साहित शिल्पकार और मजदूर पूंजीपतियों पर निर्भर होते चले गए. उनके शिल्प और श्रम के मूल्यांकन का अधिकार उन लोगों के हाथों में चला गया जो केवल और केवल अपने मुनाफे के लिए काम करते थे.यह पूंजी की सुदृढ़ता का पहला चरण था. दूसरे चरण की शुरुआत उपभोक्तावाद से होनी थी. जिसमें उत्पादन व्यक्ति की जरूरत के बजाय पूंजीवादी अर्थतंत्र की लाभकामना के निमित्त होता था. उसकी शुरुआत तो मशीनीकरण के साथ ही हो चुकी थी, मगर वास्तविक सफलता मध्य वर्ग के मजबूत आर्थिक शक्ति बनने के बाद संभव हो सकी.

स्वाधीन भारत में कल्याण राज्य की नींव रखी गई और आजादी का लाभ सभी वर्गों तक पहुंचाने के लिए मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया गया. सोचा गया कि राष्ट्रीय महत्त्व के जितने भी भारी उद्यम हैं, उनपर सरकार का अधिपत्य हो. इसके फलस्वरूप सार्वजनिक उद्यमों की स्थापना की गई थी. मगर कमजोर नेतृत्व, इच्छाशक्ति का अभाव, पूंजीपति और भ्रष्ट नौकरशाही के अनुचित गठजोड़ में फंसकर, वे लगातार घाटे का शिकार होने लगे. भारीभरकम पूंजी के आधार पर लगे सार्वजनिक उद्यमों पर पूंजीपतियों की कुदृष्टि थी. येनकेनप्रकारेण वे उनपर एकाधिकार चाहते थे. आजादी के तीसरे दशक बाद से राजनीति पर पूंजीपतियों का प्रभाव बढ़ने लगा था. इसलिए हुआ वही जो पूंजीपति तथा उनके चहेते भ्रष्ट नेता चाहते थे. बीसवीं शताब्दी के समाप्त होतेहोते यह मान लिया गया कि मिश्रित अर्थव्यवस्था के बूते दुनिया के साथ स्पर्धा कर पाना असंभव है. इसलिए उदारीकरण के बहाने भारतीय बाजारों को दुनियाभर के उद्यमों के लिए खोल दिया गया. इसी के साथ देशभर में प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित दोहन और शोषण की शुरुआत हो गई. पूंजीपतियों और वैश्विक कारपोरेट घरानों की गिद्धदृष्टि अर्से से इस देश के प्राकृतिक संसाधनों पर टिकी थी. उदारीकरण के साथ वे उन संसाधनों को औनेपौने दामों में खरीदने या जोड़तोड़ द्वारा हड़पने का स्वप्न देखने लगे. मिश्रित अर्थव्यवस्था के दौरान पिछले पचास वर्षों में जो बड़ेबड़े सार्वजनिक उद्यम खड़े किए गए थे, उनसे पीछा छुड़ाने के लिए विनिवेश पर खास जोर दिया गया. सरकार किसी भी दल की रही हो, अपनीअपनी तरह से सभी ने, कभी प्रकट रूप में तो कभी पिछले दरवाजे से, उदारवाद और विनिवेशीकरण को बढ़ावा दिया. यह अवधारणा बनी कि कारखाने चलाना सरकार का काम नहीं है. उसका काम केवल शासन और व्यवस्था संभालना है. नतीजा यह हुआ कि कुछ वोटबटोरू, लोकप्रिय योजनाओं को छोड़कर बाकी योजनाएं निजी हाथों की ओर खिसकने लगीं. यह काम पश्चिम की तर्ज पर किया गया, जिनकी पहचान विकसित देश के रूप में थी. जहां शिक्षा, भोजन, आवास और बेरोजगारी जैसी समस्याएं उतनी भयावह नहीं थीं, जितनी वे भारत सहित दूसरे विकासशील एवं अल्पविकसित देशों में. पिछली ढाई दशाब्दियों से तो पूरी अर्थव्यवस्था ही पूंजीवाद के नाम लिख जा चुकी है.

घोषित रूप से समाजवादी भारत में पूंजीवाद ने बड़े नाजुक अंदाज में, उदारवाद के नाम से प्रवेश किया था. चूंकि अर्थव्यवस्था के पूंजीकरण को लेकर समाज में अनेकानेक अंतर्विरोध थे पहला अंतर्विरोध यहां की जाति व्यवस्था के रूप में था, जिसमें व्यक्ति को अरुचि और अनिच्छा के बावजूद पैत्रिक पेशे की ओर ढकेल दिया जाता था. अंततः वह उसको अपनी नियति मानकर, परंपरा की लकीर पीटते हुए काम करता था. चूंकि उसके पास भविष्य को लेकर कोई बड़ा सपना नहीं होता था, इसलिए साधारणतः उसके काम में रचनात्मक कौशल और मौलिकता का अभाव रहता था. यह कमी कथित ऊंची जातियों में भी थी. ‘पंडिज्जी’ संबोधन सुन, फूलकर कुप्पा हो जानेवाले ब्राह्मणपुरोहित कथावाचन को ज्ञान, रटंत को शिक्षा और कर्मकांडों को सभ्यता एवं संस्कृति मानकर, एक पोथीपत्रा पढ़ते हुए ‘अंधों में काना सरदार’ वाली कहावत को चरितार्थ करते रहते थे. वास्तव में ज्ञान से उनका नाता केवल रटे हुए को रटाने तक सीमित था. उन अंतर्विरोधों को दूर करने, देश को बड़े परिवर्तन के लिए तैयार करने के बजाए आननफानन में उदारीकृत अर्थनीतियों को लागू किया था. उसका दुष्परिणाम यह हुआ कि भारत विश्वउत्पादकों के लिए मंडी बन गया. छोटेमोटे लाखों उद्यम, जिनसे देश के करोड़ों लोगों को रोजगार मिलता था, धीरेधीरे बंद होने लगे. सरकार किसी भी दल की रही हो, उसकी व्यापार नीति करीबकरीब एक समान और पूंजीपतियों की हितरक्षक रही है. आज ‘मेक इन इंडिया’ की हवा में भी लघु, कुटीर उद्यमों तथा छोटे व्यवसायों की सुध लेने वाला कोई नहीं है. अब तो इसे देखकर ऐसा लगता है कि वह खुद पर सवारी गांठ रहे सहसवार के नियंत्रण से भी बाहर जा चुका है.

पूंजीवाद को मिली इस अप्रत्याशित सफलता का राज? कौनसा विचार है जिसने नईपुरानी सभी पीढि़यों को अपने मोहपाश में जकड़ लिया है? जवाब है, कोई नहीं. पूंजीवाद की सफलता का एकमात्र रहस्य है कि वह अपने उपभोक्ताओं को विचारधाराओं के दबाव से मुक्त करता है. परंपरागत सामाजिक मूल्यों के के स्थान पर वह उत्पादकउपभोक्ता के संबंधों को ले आता हौ. ‘जिन चीजों से मनुष्य को सुख प्राप्त हो, उन्हें प्राप्त करने का उसे अधिकार है.’—यह धारणा पूंजीवाद का आदर्श है. यह धारणा मनुष्य और पशु के अंतर को मिटाती है. समाज को उत्पादक और उपभोक्ता में बांट देती है. उत्पादक का सुख अधिकतम मुनाफे में निहित होता है. इसलिए अपने सुख की तलाश में बाजार में पहुंचे उपभोक्ता, बहुसंख्यक होने के बावजूद, उत्पादक की अधिकतम लाभ में अपना सुख खोजने की मानसिकता के विरुद्ध कोई नैतिक दबाव नहीं बना पाते. 1751 में फ्रांस के अर्थशास्त्री फ्रांसिस केने ने पहली बार ‘लेजेज फेयर’ पद का उपयोग कर, उद्योगों को नियंत्रण मुक्त करने की सलाह दी थी. आगे चलकर एडम स्मिथ ने केने की इस मान्यता को तर्कसम्मत ढंग से आगे बढ़ाया. वे उद्योगों को नियंत्रण मुक्त करने की मांग कर रहे थे, क्योंकि उन्हें उद्यमों की स्वतंत्रता में ही राष्ट्र हित नजर आता था. वे भूल गए थे कि उत्पादकों को नियंत्रण मुक्त करने के पीछे एडम स्मिथ का ध्येय राष्ट्रीय उत्पादन में वृद्धि करना था, न कि अर्थव्यवस्था को कुछ पूंजीपतियों के हाथों में सौंप देना. इसलिए उसने ‘वैल्थ आ॓फ नेशन’ लिखा था, न कि ‘वैल्थ आ॓फ कैपीटलिस्ट’. नीतिनिर्माण की दृष्टि से तत्कालीन राजनीतिज्ञों की भूमिका किसी भी पूंजीपति की अपेक्षा अधिक सामथ्र्यशाली थी. वे राष्ट्रहित के अनुसार आवश्यक निर्णय लेने के लिए पूर्ण स्वतंत्र थे. मगर कुछ ही दिनों में औद्योगिक संस्थानों को दी गई स्वतंत्रता सरकार की सीमा बनने लगी. देशहित के निर्णय पूंजीवादी संस्थानों के निर्देश पर, उनके हितों को देखकर लिए जाने गले. भारत में यह आपाधापी के साथ, कतिपय भौंडे तरीके से हुआ.

हमारे नेतागण ‘मेक इन इंडिया’ का नारा लगाते हैं. 56 इंची सीने का दावा करते हैं, मगर इस तथ्य को नजरंदाज कर देते हैं कि भारतीय बाजार चीनी और दूसरे विदेशी उत्पादों से भरे पड़े हैं. इनमें चीन का तो इतना दबदबा है कि सस्ते खिलौने, इलेक्ट्रोनिक्स, मोबाइल, कंप्यूटर, टेलीविजन से लेकर छोटीछोटी चीजें जैसे दर्पण और बच्चों की काॅपी, कलम, पेंसिल, वर्कबुक तक चीन से आयात की जा रही हैं. मंडी में जाओ तो फल और सब्जियां तक आयातित मिल जाएंगी. उन्हें कौन बताए कि देशभक्ति हवा में नहीं तैरती, लोगों के व्यवहार में बसती है. वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं के इस दौर में जो देश बाजार में नहीं होता, उसकी हैसियत समाज में भी घट जाती है. ऐसा देश नागरिकों के आत्मसम्मान का सबब नहीं बन पाता. वैसे भी पुरानी कहावत है कि लोग जिसका खाते हैं, गुण भी उसी के गाते हैं. एक समय था जब देश में बाजार में जापान के उत्पाद छाये होते थे. उच्चगुणवत्ता युक्त वे उत्पाद भारतीयों के मन में जापानी प्रौद्योगिकी के बारे में एक सकारात्मक छवि का निर्माण करते थे. इसलिए जापानियों की कमर्ठता और अनुशासनप्रियता के किस्से उन दिनों आम हुआ करते थे. आजकल बाजार पर चीन का कब्जा है. इसलिए हम व्यवहार में देख सकते हैं कि जापान हमारे लिए एक भूला हुआ देश बनता जा रहा है. जनसाधारण तक चीन के जो उत्पाद पहुंचते हैं, वे घटिया गुणवत्ता के होते हैं. चीन के बारे में नागरिकों की राय भी एक गैर भरोसेमंद देश की है. दरअसल हम ऐसे राष्ट्रवादियों की सरकार के इकबाल में रह रहे हैं जहां बाजार में राष्ट्रीय उत्पादों का टोटा है. इसका नकारात्मक प्रभाव हमारे राष्ट्रीयताबोध पर पड़ा है. पिछले 14 वर्षों में देश से 61000 करोड़पतियों के पलायन की घटना भी इसी प्रवृत्ति की संकेतक है. ऐसी घटनाएं यदि सरकार की नींद खराब नहीं करतीं तो समझ लेना चाहिए कि वे सरकारें देश की होकर भी देश के लिए काम नहीं कर रही हैं. वे या तो अपने नेताओं के स्वार्थ के लिए काम कर रही हैं, अथवा उन पूंजीपतियों के लिए जो उन्हे सत्ताकेंद्र तक पहुंचाने में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं. इसके लिए वे अकेले जिम्मेदार भले न हों, लेकिन सुधार की कोशिश करने के बजाए इसे और आयातनिर्भर बना देना चाहते हैं. हमारी प्रथम दर्जे की प्रतिभाएं परराष्ट्रों के अर्थतंत्र को मजबूत करने के लिए नईनई योजनाएं बनाती हैं. और औसत दर्जे की प्रतिभाएं हैं, वे उनके लिए बाजार का काम देखती हैं. पिछले कुछ दशकों में भारतीय शिक्षा ने जितने सेल्समेन इस देश को दिए हैं, वह अपने आपमें विश्वरिकार्ड है.

वे दिन गए जब युद्ध सीमाओं पर लड़े जाते थे. दुनिया बदल चुकी है. इन दिनों राष्ट्र की भूमिकाएं अब राष्ट्राध्यक्ष तय नहीं करते. उन्हें मनमाफिक भूमिका निभाने के लिए पूंजीवादी कंपनियों की ओर से बाध्य किया जाता है. आदमी का मोल समाप्त हो चुका है. मोल संसाधनों का है. इसलिए नई युद्धनीतियां कूटनीतिपरक होती हैं. वे संसाधनों पर अधिकार को हड़पने के लिए बनाई जाती हैं. इस लड़ाई में चीन भारत से बहुत आगे है. हम भले ही सीमा पर चीन को उसकी गीदड़भभकियों से बाज आने की सलाह दे रहे हों, अर्थव्यवस्था के मैदान में वह हमारे घर में घुसकर हमें मात दे रहा है और हमारे नेता रेत में गर्दन दबाए शुतुरमुर्ग की भांति खुद को धोखा दिए जा रहे हैं. सतरहवीं शताब्दी में मानवमुक्ति के जितने भी शब्द, मुहावरे, उपकरण और औजार चुने गए थे, इस दैत्य के आगे, एकएक कर वे सभी बेअसर सिद्ध हो रहे हैं. कमी उन विचारों की नहीं, विचारहीनता को अपनी जीवनशैली बना चुके समाजों की थी. वे तार्किकता और उन निष्ठाओं से निरंतर परे हटते गए, जो उनके विकास की आधारशिला बनी थीं. इस संबंध में भारतीय विरोधाभास छिपे नहीं हैं. हमारे यहां पश्चिम से मशीनीकरण तो उधार लिया गया. लेकिन उन विचारों से पूरी तरह कन्नी काट ली, जो वहां मशीनीकरण की समस्याओं से जूझते हुए, उनके समाधान की चाहत में विकसित हुए थे. परिणामस्वरूप समाज तथा हमारे व्यवहार में विचारशून्यता पसरती गई, जो आगे चलकर उपभोक्तावाद के समाज में पैठ बनाने में मददगार बनी. मसलन जेरेमी बैंथम का उपयोगितावादी सिद्धांत निरे भोग का, कोरा उपभोक्तावादी दर्शन नहीं था. वह खुशियों पर खास वर्गों के एकाधिकार का विरोधी था. वह शताब्दियों से वंचित रहे समाज के अधिकारों का समर्थन करते हुए उसे मुख्य धारा में शामिल करने का पक्षधर था. उससे पहले राज्य धार्मिक आचारसंहिताओं से अनुशासित होते थे. बैंथम ने पहली बार विधि के न्याय का पक्ष लिया था. इसके लिए आधुनिक न्याय प्रणाली बैंथम की ऋणी है. सामाजिक न्याय की आधुनिक संकल्पना को हम बैंथम के उपयोगितावाद और विधि के दर्शन की अवधारणा के विकास के रूप में देख सकते हैं. उसका आदर्श कथन था—‘अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख.’ उपयोगितावादी विचारकों के अनुसार दुनिया में कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जिसका मानव कल्याण के हित में उपयोग वर्जित हो. जो है, जिसकी उपयोगिता है, उसपर समूची मनुष्यता का अधिकार है. न तो कोई व्यक्ति विशेष है, न ही तिरष्कृत. बाजार ने उपयोगितावाद को उपभोक्तावाद में बदल दिया, जिसमें ऐसा जताया जाता है कि जीवन का अभीष्ट केवल सर्वोत्तम का भोग करना है, उसके कोई और सरोकार नहीं हैं. विचार शून्यता के परिवेश में यह पूर्ण स्वाभाविक था.

बैंथम ने जनसाधारण तक सुख की समान उपलब्धता सुनिश्चित करने को राज्य का कर्तव्य बताया था. इसके लिए उसने कानून के राज्य का समर्थन किया. जिन दिनों पूरा यूरोप चर्च से अनुशासित होता था, कानून के राज्य की बात करना बहुत बड़ी बात थी. इसकी शुरुआत पूर्ववत्र्ती विचारकों द्वारा हो चुकी थी. बैंथम ने उसको विधिक आधार दिया, साथ ही लागू भी कराया. पूंजीवाद की मान्यता रही कि सुखसुविधाएं उसकी जिसकी जेब में पैसा है. जो उनके मूल्य का भुगतान कर सकता है. बैंथम के आदर्श था, ‘अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख.’ सिक्का शक्तिशाली पूंजीवाद का चला. बैंथम का सिद्धांत केवल अकादमिक क्षेत्रों तक सिमटकर रह गया. देखते ही देखते, ‘अधिकतम लोगों को अधिकतम सुख’ का विचार ‘संपन्नतम व्यक्तियों को अधिकतम वैभवविलास’ में बदल गया. पूंजी या धन को सुविधाओं के साथसाथ सुख को अर्जित करने का पैमाना मान लिया गया. सामाजिक लाभ की संकल्पना मौद्रिक लाभ तक सीमित होकर रह गई. इससे मानवसंबंधों पर पूंजी को वरीयता मिलने लगी. खुद की स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए पूंजीवाद ने समाज में जो भी, जब भी मिला, सभी का अपने स्वार्थानुकूल इस्तेमाल किया. कानून, न्याय, अदालत, व्यक्ति स्वातंत्रय, मानवाधिकार, उपभोक्ता अधिकार, लोकतंत्र सब पूंजीवाद के हितों के अनुकूल ढलते गए. उपयोगितावाद, सुखवाद और मानवतावाद जैसी विचारधाराएं उच्चमानवीय आदर्शों को केंद्र में रखकर गढ़ी गई थी. उनमें किसी भी प्रकार के वर्चस्ववाद को नकारने की सर्वसाधारणीय वांछा शुरू से ही स्पष्ट थी. पूंजीवाद एक और तो उपभोक्ता वस्तुओं की आधुनिकतम रेंज बाजार में उतारता रहा, संस्कृति के क्षेत्र में वह ‘प्राचीनतम को महानतम’ सिद्ध करने में सहायक बना. पोंगापंथी पुरोहित इस काम को लगातार अंजाम देते रहे. यंत्रों पर निर्भर समाज में भावुक और संवेदनशील होना अविवेकपूर्ण तथा दुर्बलता की निशानी कहा जाने लगा. मानवाधिकार, स्वतंत्रता, व्यक्तिस्वातंत्रय जैसी जितनी भी चेतनाप्रधान अभिव्यक्तियां थीं, उन सभी को पूंजीवाद ने अपनाया अवश्य, मगर पूरी तरह से निस्तेज कर, स्वार्थानुसार अनुकूलन करते हुए. ताकि वे अंधानुकरण और स्तुतिगान के अलावा कहीं और सहायक न हो सकें. मानवीकरण के इन माध्यमों का अपने पक्ष में अनुकूलन करते हुए पूंजीवादी अर्थतंत्र के लक्ष्य को मौद्रिक लाभ तक सीमित कर, केवल और केवल एक शब्द को स्थापित करता गया. उदारवादी अर्थतंत्र की दृष्टि में वह पवित्रतम, मार्गदर्शक, परमकल्याणकारी शब्द है—मुनाफा. आखिर ऐसा क्यों हुआ कि धर्मदर्शन, संस्कृति, परंपरा आदि मानवसभ्यता और जीवन को मर्यादित करने वाली जितनी भी संस्थाएं और संगठन थे, सब के सब पूंजी के आराधन में लग गए? यहां तक कि इसके लिए राष्ट्रीय हितों की बलि भी दी जाने लगी. इसके कारणों तक पहुंचने के लिए हमें भारतीय संस्कृति और सभ्यता की पड़ताल करनी पड़ेगी. विशेषकर डेढ़दो शताब्दी पहले के इतिहास में जाना होगा.

1857 के भारतीय स्वाधीनता संग्राम की बात करें. उस समय तक भारत लगभग 400 वर्ष पराधीनता में गुजार चुका था. प्रथम स्वाधीनता संग्राम के बाद भारत पर जब ब्रिटिश राज्य हुआ तथा मुस्लिमों के हाथ से सत्ता जाने पर भारतीय अभिजात वर्ग ने प्रशंसा व्यक्त की थी, जबकि शासक बदल जाने से भारतीयों की राजनीतिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था. वे पहले की तरह ही परतंत्र थे. वह परतंत्रता पहले से कहीं अधिक परेशान करने वाली इसलिए भी थी कि 1857 में लगभग 25 करोड़ भारतीयों पर मात्र कुछ हजार अंग्रेज शासन चला रहे थे. मुस्लिम शासकों के जमाने में यह बात नहीं थी. इसलिए कि इस्लामिक जिहादियों के भारत आक्रमण से पहले यहां सूफी संतों, औलियाओं के रूप में इस्लाम दस्तक दे चुका था. उसने जाति के आधार पर बुरी तरह से बंटे समाज के निचले वर्गों में काफी पैठ पैदा कर ली थी. उसके फलस्वरूप लोग इस्लाम के प्रति आकर्षित हो रहे थे. बाद में भी इस्लाम के शासकों ने भारतीय जनजीवन को प्रभावित करने की कोशिश नहीं की. चारपांच शताब्दी के इस्लामिक शासन में भारत का इलीट वर्ग राजनीतिक और आर्थिक लाभों के लिए मुस्लिम शासकों से जुड़ा था, जबकि जनसाधारण, विशेषकर समाज के निचले जातिवर्गों के लिए के लिए वह उनकी लुप्त अस्मिता की पहचान का मसला था, जिसे वे इस देश में जातीय विभाजन के कारण शताब्दियों से सहते आए थे. ब्राह्मण एवं पुरोहित वर्ग को केवल अपने धर्म एवं संस्कृति की चिंता थी. शासक का धर्म और चरित्र क्या है, इससे उन्हें कोई संबंध न था. मुगल शासकों के पराभव तथा उनके स्थान पर अंग्रेज शासकों के आने से इलीट वर्ग प्रसन्न था. इसलिए कि मुगल सभ्यता भारतीय सभ्यता के सापेक्ष पिछड़ी हुई थी, जबकि औद्योगिकीकरण के कारण यूरोपियन सभ्यता तीव्र गति से विकासमान थी. अंग्रेज इस देश में व्यापार के लिए आए थे. मगर उनके भारत आगमन से पहले ही यूरोपियन औद्योगिक क्रांति की खबरें शेष दुनिया को चमत्कृत कर रही थीं. भारत का अभिजात वर्ग उसके प्रति आकर्षित था और एक तरह से उस सभ्यता को अपनाने के लिए उतावला भी.

गौरतलब है कि भारत का प्राचीन गौरव कम न था. प्राचीन भारतीय सभ्यता अपनी समकालीन सभी सभ्यताओं के मुकाबले बहुत अधिक विकसित भले न हो, मगर उसे पिछड़ा हरगिज नहीं माना जा सकता. ढाईतीन हजार वर्ष पहले भारतीय मेधा ने विश्वमेधा को चमत्कृत करते हुए उसपर अपना प्रभाव छोड़ा था. लेकिन परतंत्रता के लंबे दौर में वह निरंतर क्षरणशील होकर अपना तेज खो चुकी थी. दूसरों को तो दूर उसे खुद अपनी वास्तविकता की पहचान तक न थी. अतः 1874 के आसपास जब यूरोपियनों ने अपनी सत्ता के स्थायित्व के लिए भारतीय सभ्यता और इतिहास को समझना आरंभ किया, तो सबसे ज्यादा चमत्कृत होने वालों में वे लोग थे, जिनपर इस सभ्यता के बौद्धिक नेतृत्व की जिम्मेदारी थी. इसलिए कि वे अपना कर्तव्य भुलाकर केवल चाटुकारिता को अपने आचरण में ढाल चुके थे; और सत्ता के इर्दगिर्द रहकर उसका लाभ उठाने में प्रवीण थे. उस समय तक दर्शन की जगह कर्मकांड छा चुका था. जातिवाद का बोलवाला था और रूढि़यों में जकड़ी सभ्यता अपने अतीत को पूरी तरह बिसराए हुए थी. पढ़ालिखा वर्ग अंग्रेजों की कृपा प्राप्त करने के लिए अपने ही देशवासियों पर जुल्म ढा रहा था. वह एक प्राचीन जाति और वर्ग में बंटी संस्कृति का अपेक्षाकृत विकसित संस्कृति के आगे समर्पण था. भारतीय समाज चूंकि छोटेछोटे जाति, वर्गों में बुरी तरह बंटा हुआ था. जाति व्यवस्था की जकड़ बहुत गहरी थी. इसलिए अंग्रेजों के आगमन पर खुश होने के विभिन्न वर्गों के अलगअलग कारण थे. अभिजात वर्ग अंग्रेजों की कृपा शासन के निकट रहने, उनके जैसी जीवनशैली प्राप्त करने के लिए चाहता था. औद्योगिकीकरण के बाद यूरोप की अर्थव्यवस्था का जादुई तेजी से विकास हुआ था. उच्च वर्गों की संपन्नता बहुत तेजी से बढ़ी थी. भारतीय सामंतवर्ग में उसके प्रति विशेष आकर्षण था. यूरोपीय उद्यमियों की भांति वे भी आननफानन में संपन्नता बटोर लेना चाहते थे; और इसके लिए कुछ भी करने को तैयार थे. समाज के पढ़ेलिखे वर्गों के एक तबके की श्रद्धा यूरोप में चले बौद्धिक आंदोलनों के कारण थी, जिसमें वे अपने मानसम्मान और अस्मिता की सुरक्षा का सपना देखते थे. नए विचारों की रोशनी में उत्पीडि़त वर्ग भी अपनी अस्मिता के संघर्ष को खड़ा करना चाहते थे. उसकी शुरुआत ज्योतिबा फुले महाराष्ट्र से कर ही चुके थे. उसके लिए अंग्रेजी शिक्षा नए विचारों के साथ मुक्तिसंदेश की वाहक बनी हुई थी.

लगभग दो शताब्दियों के ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय समाज को अपने भीतर झांकने का अवसर मिला था. हालांकि उस समय भी समाज का एक वर्ग परिवर्तनों के विरोध में अड़ा था. जबकि पढ़ालिखा वर्ग अंग्रेजों से प्रभावित था. ज्ञानविज्ञान की यूरोपियन शैली उसको आकर्षित करती थी. यह प्रभाव इतना गहरा था कि औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के लिए भारत में वही रास्ते अपनाए गए जो अंग्रेजों के थे. यह स्वाभाविक भी था. ब्रिटिश साम्राज्यवाद के मूल में आर्थिक साम्राज्यवाद की लालसा थी. वह एक ऐसा राजनीतिक तंत्र था जो जनता की विकास की आकांक्षा तथा पंूजीपतियों की अतिमहत्त्वाकांक्षाओं के योग से बना था. अलगअलग दिखने के बावजूद उसमें अन्योन्याश्रितता का भाव था. उसकी कमी थी कि उसमें उत्पादन में भागीदारी सभी वर्गों की थी, मगर लाभानुपात शीर्ष की ओर तेजी से बढ़ता जाता था. इससे मध्यक्रम और निचले वर्गों में भारी असंतोष था. उस असंतोष के फलस्वरूप उपजे विद्रोह ने ही पश्चिम में प्रतिरोध के नए हथियारों को जन्म दिया था. देशी सभ्यता और संस्कृतिसमर्थक गांधी ने भी अंग्रेजों से काफी ग्रहण किया. उन्होंने समय रहते ही समझ लिया था कि इस नए किस्म के साम्राज्यवाद को गैरपरंपरागत हथियारों से ही चुनौती दी जा सकती है. ‘सत्याग्रह’ नामक उनका औजार थोरो के ‘सिविल डिसओविडियंस’ का भारतीयकरण था. उसने लोगों को अपनी शक्ति का आकलन करने तथा आजादी के लिए एकजुट होने के लिए प्रेरित किया. फलस्वरूप देशभर की जनता स्वाधीनता की मांग लेकर घरों से निकल पड़ी.

अच्छा नेता जनता का मार्गदर्शन करता है. लेकिन सबसे अच्छा नेता वह होता है जो लोगों को उनके भीतर छिपी शक्तियों से परचाता है. उन शक्तियों को बाहर लाकर उपयुक्त प्रेरणा जगाता हे. गांधी ने यही जादू इस देश की जनता के साथ किया था. ज्ञात हो कि धर्म, जातपात में बंटा भारतीय समाज कोई जड़ समाज नहीं था. कभी रहा भी नहीं है. परिवर्तन की कामना विशेषकर उत्पीडि़त वर्ग में हमेशा से विद्यमान रही है. उसके लिए शीर्ष नेतृत्व आवश्यक नहीं था. बल्कि जनता के भीतर से ही नेतृत्वकारी शक्तियां स्वयंस्फूर्त्त भाव से निकल आती थीं. वैदिक कर्मकांड के विरोध में जैन और बौद्ध दर्शन के उदय से बहुत पहले ही पूर्ण कस्सप, निगंठ नागपुत्त, अजित केशकंबली, संजय वेल्ट्ठिपुत्त, कौत्स, मक्खलि घोषाल आदि के बौद्धिक अवदान स्वरूप भौतिकवादी परंपरा इस देश में पनप चुकी थी. उनसे प्रेरणाओं के आधार पर ही जैन और बौद्ध दर्शन का विकास हुआ. जैन दर्शन का प्रसिद्ध ‘स्याद्वाद’ का सिद्धांत जिसे आज कुछ विद्वान क्वांटम थ्योरी के निष्कर्ष ‘अनिश्चितता का सिद्धांत’(थ्योरी आ॓फ अनसर्टेनिटी) से जोड़ते हैं, की मूल अवधारणा संजय वेल्ट्ठिपुत्त से प्राप्त हुई थी. साधना के आरंभिक दौर में महावीर स्वामी और मक्खलि घोषाल साथसाथ थे. कालांतर में दोनों अलगअलग हुए तो मक्खलि ने आजीवक संप्रदाय और महावीर स्वामी ने जैन धर्म की नींव डाली थी. मक्खलि घोषाल और बाकी विचारकों के बारे में भारतीय साहित्य में अधिक प्रसंग प्राप्त नहीं होते. लेकिन इतना महत्त्वपूर्ण उल्लेख हमें प्राप्त होता है कि बौद्ध धर्म के आरंभिक दिनों में आजीवक संप्रदाय को चाहनेवालों की संख्या बौद्ध धर्म से कहीं अधिक थी. मक्खलि के बारे में प्रसेनजित ने बुद्ध से एक बार कहा था कि वह उसे(मक्खलि को) उनसे अधिक बुद्धिमान मानता है. क्या इसके पीछे कोई सामाजिक कारण थे? इसे प्रमाणसहित कह पाना तो कठिन है. भारतीय समाज में व्याप्त जातीय भेदभाव को देखते हुए कुछ आकलन अवश्य लगाए जा सकते हैं. महावीर स्वामी और बुद्ध दोनों ही क्षत्रिय कुलों से आए थे. उन दिनों बलि, धार्मिक भेदभाव, अनावश्यक निषेधों की वजह से क्षत्रिय और ब्राह्मणों के बीच मनमुटाव बढ़ने लगे थे. इसलिए जब महावीर स्वामी और बुद्ध ने धर्मदर्शन में रुचि खोजने की कोशिश की तो तत्कालीन क्षत्रिय सम्राट उनकी ओर आकर्षित होते गए. आशय है कि न केवल आज बल्कि सहस्राब्दियों से भारतीय जनसमाज में परिवर्तन की वांछा रही है. उसके लिए उसे जब भी, जो भी अवसर मिला, उसका उपयोग किया है. चाहे वह निराकार की भक्ति हो अथवा सूफी परंपरा, कबीर हों या गांधी, जयप्रकाश नारायण हों या कांशीराम अथवा विश्वनाथ प्रताप सिंह समाज की परिवर्तन की चाहत, अलगअलग स्वरों से गूंजती रही है. इतिहास जनविद्रोहों से भरा पड़ा है. लेकिन यह भी सच है कि भारतीय दमित वर्गों का वास्तविक संघर्ष बाहरी लोगों से कम, अपने लोगों से अधिक रहा है. भारतीय समाज की परिवर्तन की उत्कट अभिलाषा का सबसे सार्थक उपयोग गांधी ने सत्याग्रह के दौरान किया था. जबकि डा॓. अंबेडकर जनमानस के मुक्तिस्वरों को आवाज दे रहे थे.

परंपरा और संस्कृति का गुणगान करनेवाला भारतीय समाज का अभिजात तबका अंग्रेजी शिक्षा और नई प्रौद्योगिकी से के प्रति भी आकर्षित था. इसलिए 1947 तक आतेआते भारत में अंग्रेजी राज और अंग्रेजी शिक्षा के समर्थकों की बड़ी फौज खड़ी हो चुकी थी. जिसे अपने अंग्रेजी ज्ञान पर गर्व था, वह अंग्रेजी ज्ञान एवं आधुनिक सभ्यता से वंचित अपने ही भाईबहनों को वह हेय दृष्टि से देखता था. उनीसवीं शताब्दी के अंतिम अंतिम दशकों में मध्यम मार्गी कांगेस की स्थापना मुख्यतः पढ़ेलिखे वर्ग को अंग्रेजी शासन से जोड़ने और जनाक्रोश पर नियंत्रण रखने के लिए की गई थी. एक प्रकार से वह अंग्रेजी शैली का ही संगठन था. धीरेधीरे वक्त बदला और जनता के दबावों में कांग्रेस को स्वराज की मांग पर उतरना पड़ा. उल्लेखनीय है कि ‘स्वराज्य’ और ‘स्वराज’ के आधार पर कांग्रेस में भी दो दल बन चुके थे. स्वराज्य की मांग करनेवाले कम संख्या में थे. उनमें से बड़ी संख्या उन नेताओं की थी, जो किसी न किसी प्रकार से ग्रामीण क्षेत्रों से आए थे और जिनकी प्रतिबद्धता अपने लोगों के साथ थी. कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में से एक दादा भाई नौरोजी हालांकि कांग्रेस की नर्म राजनीति की धारा का प्रतिनिधित्व करते थे. किंतु उनकी लिखी पुस्तक ‘पावर्टी एंड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया’ ब्रिटिश भारत की त्रासदी को बयान करती थी. पुस्तक में उन्होंने ‘ड्रैन थ्योरी’ को स्थापित किया था, जिसके अनुसार अंग्रेजों द्वारा विभिन्न रास्तों से भारतीय संपदा के दोहन तथा उसको इंग्लेंड ले जाने की बात कही थी. इस पुस्तक ने ब्रिटिश शासन के विरोध को तार्किक आधार प्रदान किया था. वे देश की अंग्रेजों से पूर्ण आजादी चाहते थे. ‘स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है.’ कहनेवाले तिलक इस वर्ग के अग्रणी नेताओं में से थे. उनके सापेक्ष गांधी चतुर बनिये की तरह अपनी और भारतीय समाज की स्वाधीनता की वांछा को तौल रहे थे. 1942 से पहले तक उनकी मांग ‘स्वराज’ तक सीमित थी. संभवतः पूरी तैयारी के बिना अंग्रेजों से कोई टकराव मोल लेना नहीं चाहते थे. वे मानते थे कि अंग्रेज इस देश का समाजार्थिक शोषण कर रहे हैं. ‘हिंद स्वराज’ का पहला संस्करण गुजराती में ‘हिंद स्वराज्य’ के नाम पर लिखा गया था. परंतु जब अंग्रेजों ने उस उस संस्करण को प्रतिबंधित कर दिया तो गांधी ने तुरंत पुस्तक का शीर्षक बदलकर उसका अंग्रेजी अनुवाद ‘इंडियन होमरूल’ नाम से प्रकाशित कराया, ‘हिंद स्वराज’ के नाम से प्रकाशित किया, जो कांग्रेस की मांग से मिलतीजुलती थी.

बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशक विश्वराजनीति में हलचल भरे थे. सोवियत संघ, जर्मनी, इटली, फ्रांस, चीन आदि देशों में राजनीतिक परिवर्तन जारी थे. इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण था, सोवियत संघ का कम्युनिज्म के घेरे में चले जाना. चीन में भी साम्यवादी शक्तियां प्रभावी थीं. वहां माओ के नेतृत्व में साम्राज्यवादी शक्तियों से संघर्ष जारी था. उसकी लाल सेना चीन के बड़े हिस्से को अपने अधिकार में चुकी थी. भारतीय बुद्धिजीवियों खासकर पढ़ेलिखे वर्ग पर साम्यवादी आंदोलन का गहरा प्रभाव था. उन्हें उसमें ब्रिटिश साम्राज्यवाद का तोड़ नजर आता था. बंगाल, केरल, पंजाब आदि प्रांतों के युवक सोवियत संघ जाकर वहां की राजनीतिक जमीन को समझने में लगे थे. रूस के साम्यवादियों का भी भारतीयों को भरपूर समर्थन था. वे इसे साम्यवादी आंदोलन की पूर्णता के रूप में देखते थे. इससे पूंजीवादी ताकतों में इस बात की चिंता स्वाभाविक थी कि यदि भारत भी साम्यवादी झंडे के नीचे आ जाता है तो एशिया के छोटेछोटे देशों को भी उसके प्रभाव में आते देर न लगेगी. वह यूरोप के बाकी देशों के लिए बड़ा खतरा हो सकता है, जिसके उस समय पूरे आसार थे. भारतीय स्वाधीनता आंदोलनकारियों की पहली खेप साम्यवादी रूस से काफी प्रेरित थी. उस समय के सभी प्रमुख नेता और बुद्धिजीवी उससे प्रभावित थे. महान समाज सुधारक राजा राममोहन राय स्वयं कार्ल मार्क्स से प्रेरित थे. वे मार्क्स से मिलने इंग्लेंड भी गए थे. लेकिन उनकी मार्क्स से मुलाकात न हो सकी थी. उस समय के प्रमुख नेता डा॓. हरदयाल, करतार सिंह सराबा आदि क्रांतिकारी नेताविचारकों पर रूस के साम्यवादी आंदोलन का असर था. भारत के सैकड़ों युवा रूसी जमीन पर रहकर क्रांति की शिक्षा ले रहे थे. यहां तक कि पूरी तरह भारतीयता के रंग में रंगे विवेकानंद पर भी साम्यवादी विचारधारा का प्रभाव था.

दूसरी ओर भारत में लाल झंडा न फहरने पाए, इसके लिए देश और विदेश में बड़ेबड़े कूटनीतिज्ञ सक्रिय थे. लाला लाजपत राय, भगत सिंह, राजगुरु जैसे क्रांतिकारियों के देश के युवावर्ग पर प्रभावी होने से रोकने के लिए बड़ा खेल खेलने की तैयारी हो रही थी. 1857 का संग्राम हिंदुओं और मुस्लिमों ने मिलकर लड़ा था. उस समय तक देश में सांप्रदायिक विभाजन जैसी बात न थी. अंगेज चाहते थे कि भारतीय अंग्रेजी सीखें. कम से कम इतनी कि सरकारी कामकाज में उनकी मदद ली जा सके, लेकिन साम्यवाद जैसी विचारधाराओं से उन्हें चिढ़ थी. सामरिक दृष्टि से भी अंग्रेज भारत को रूसी साम्यवाद के प्रभाव से बचाए रखना चाहते थे. इसलिए अंग्रेजी के प्रति सम्मोहित, मगर प्राचीन भारतीय संस्कृति में गहरी आस्था रखने वाले गांधी और रवींद्रनाथ ठाकुर जैसे व्यक्तित्वों को अतिरिक्त रूप से बढ़ावा दिया गया. यही कारण है कि महात्मा गांधी ने जब सत्याग्रह की शुरुआत की तो उन्हें अपने समय के सभी प्रमुख उद्यमियों का साथ मिला था. जमनालाल बजाज, घनश्यामदास बिड़ला, खेतान जैसे उद्यमियों और व्यापारियों से गांधी जी के आत्मीय संबंध थे. उनकी समृद्धि का अधिकांश विश्वयुद्धों की देन था. दोनों विश्वयुद्धों के दौरान गांधी भी, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में साम्राज्यवादियों के साथ थे. उल्लेखनीय है कि रूस ने अपनी स्वतंत्रता हिंसक क्रांति के माध्यम से ग्रहण की थी. चीन भी उसी दिशा में बढ़ रहा था. ऐसे में गांधीजी का अहिंसा का विचार केवल जमीनी सचाइयों की देन न होकर भारत को रूसी एवं चीनी प्रभाव से बचाने की कोशिश भी था. दूसरे शब्दों में गांधी की अहिंसा केवल साम्राज्यवादी अंग्रेजों का रक्षाकवच नहीं थी. वह भारतीय नवपूंजीपतियों एवं जमींदारों को उस भय से बचाने में सहायक थी, जो रूस तथा दूसरे देशों के रास्ते आ रहा था. दूसरे शब्दों में गांधी जितना काम भारतीयों के लिए कर रहे थे, उतना ही काम अंग्रेजों के लिए भी कर रहे थे. और चाहेअनचाहे वैसा ही काम भारतीय नवपूंजीपति वर्ग की रक्षा के लिए भी कर रहे थे, जिनके लिए स्वतंत्रता के मायने पश्चिमी प्रौद्योगिकी से गठजोड़ तथा उसके माध्यम से भारत की अर्थसत्ता पर कब्जा करने तक सीमित था.

यहां एक प्रश्न स्वाभाविक है कि महात्मा गांधी जो बडे़ उद्यमों में कटौती के पक्ष में थे, हाथ के उद्यमों तथा दस्तकारों को आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे, आखिर क्यों बिड़ला और बजाज जैसे उद्यमी उनके पीछे लगे हुए थे. बड़ी पूंजी का निषेध करनेवाले गांधी को अपने कार्यक्रमों के लिए पूंजीपतियों की ओर से चंदा आता था. साध्य एवं साधन दोनों की पवित्रता के समर्थक गांधी को उससे कोई विरोध क्यों नहीं था? क्या वह पूंजीपतियों का राष्ट्रप्रेम था? गांधीजी द्वारा चलाए गए स्वदेशी अभियान का लाभ सीधे पूंजीपतियों को पहुंचा था. खादी का लाभ उठाने वालों में बिरला घराना सबसे आगे था. बदले में वह उनका लाभ भी उठा रहा था. उल्लेखनीय है कि गांधीजी ने खादी को बढ़ावा देने के लिए मिल से बुने कपड़े का बहिष्कार किया था. बाद में अपनी राय में संशोधित करते हुए भारतीय मिलों से बुने कपड़े को उपयोग में लाने की छूट दे दी थी. यह गांधी की नीति में बड़ा परिवर्तन था. वे यदि इसकी अनुमति न देते तो भी मशीनीकरण की ओर बढ़ते भारत के कदम रुकनेवाले नहीं थे. इसलिए पूंजीपति गांधी जी का उतना ही समर्थन चाहते थे, जो उनको व्यावसायिक दृष्टि से लाभकारी हो. दरअसल गत शताब्दी के दूसरे दशक में जब दक्षिण अफ्रीका में सफलता के झंडे गाढ़कर गांधीजी हिंदुस्तान पहुंचे उस समय दुनिया में माक्र्स के विचारों की धूम मची हुई थी. रूसी क्रांति सफल हो चुकी थी. चीन का बड़ा भूभाग माओत्से तुंग की लाल सेना के अधिकार में था. लेनिन के सिपहसालार ट्राटस्की भारत में भी साम्यवादी क्रांति को सफल देखना चाहते थे. भारत के सैकड़ों युवा उससे उत्साहित थे. अंग्रेज अब सर्वविजेता कौम नहीं नहीं रह गई थी. भगत सिंह, सुभाष, नेहरू आदि पर साम्यवादी विचारों की छाया थी. अमेरिका में बसे भारतीय समानता और व्यक्ति स्वातंत्रय का संदेश भारत तक पहुंचा रहे थे. अब्राह्म लिंकन के नेतृत्व में वहां जो स्वाधीनता संग्राम लड़ा गया था, उसका अगला सफलतापूर्ण चरण फ्रांस में पूरा हुआ था. टामस पेन, थामस जेफरसन आदि ने, ने व्यक्ति मात्र की समानता, समानता और अधिकारों को लेकर आवाज उठाई थी. भारत में वही काम ज्योतिबा फुले और बाद में चलकर उनके सशक्त उत्तराधिकारी डा॓. अंबेडकर द्वारा किया गया. यही कारण है कि घबराए हुए भारतीय पूंजीपतियों ने धर्म भीरू और परंपरावादी गांधी की लुकाटी को चमकाते रहने में ही अपनी भलाई समझी थी. चूंकि आर्थिक और सामाजिक समानता के सवालों को राजनीतिक स्वतंत्रता के उत्साह में दबाया जा सकता था, इसलिए कांग्रेस ने सामाजिकआर्थिक स्वतंत्रता के प्रश्न को कोई महत्त्व नहीं दिया गया था. गांधी की राजनेता और धार्मिक संत की तस्वीर साथसाथ गढ़ी गई. भारतीय हिंदूमन जो सात सौ वर्ष की दासता से गुजर चुका था, अपनी पहचान को सम्मान देना चाहता था. इसलिए राष्ट्रीय भावनाओं की धार्मिक आर्थिकसामाजिक समानता जैसे शाश्वत मूल्यों पर संप्रदायवाद की जीत हुई. इस बीच भारतीय जनमानस पर गांधी का प्रभाव उत्तरोत्तर बढ़ता गया. गांधी तथा अन्य परंपरापोषी नेताओं की छत्रछाया में भारतीय उद्योगपति अपना काम करते रहे. कुल मिलाकर भारतीयता की बात करनेवाले हमारे तत्कालीन बड़े नेता, पूंजीवाद के प्रवेश को रोकने के बजाय उसकी पैठ बनाने में सहायक सिद्ध हुए.

स्वातंत्रयोत्तर भारत में पूंजी का हस्तक्षेप आजादी के समय से ही रहा. महात्मा गांधी की सफलता में उन पूंजीवादी ताकतों का बड़ा योगदान था. गांधीजी के आयोजनों में खर्च सामंतों और पूंजीवादी ताकतों का ही लगता था. स्वाधीनता आंदोलन में उन्होंने खादी का समर्थन किया था. स्वदेशी का जोरदार समर्थन करते हुए वे आगे बढ़े. दरअसल खादी और स्वदेशी में अंतर है. खादी की अवधारणा गांधीजी की गांव के आर्थिक स्वावलंबन से जुड़ी थी, जबकि स्वदेशी की सीमा में भारतीय उद्योग भी आ जाते थे. ‘हिंद स्वराज’ में गांधी ने मशीनों की आलोचना की थी. खादी मानवीय श्रम का सम्मान करती है. वह मानवीय कौशल को हस्तशिल्प और यंत्रशिल्प की स्पर्धा में भी मरने नहीं देती. व्यक्ति को उसके श्रम का पूरापूरा मूल्य मिले, यह व्यवस्था गांधी दर्शन में कहीं नहीं है. गांधीजी ने जब खादी का दर्शन दुनिया को दिया, वे चरखे के बारे में जानते नहीं थे. हिंद स्वराज पर अपने साक्षात्कार के दौरान उन्होंने यह स्वयं स्वीकारा था. उस समय तक खादी को ग्रामीण अर्थव्यवस्था के आधार के रूप में प्रस्तुत करने में कोई बड़ी आर्थिक समझ नहीं हो सकती. स्वयं गांधी जी ने इसका कोई दावा नहीं किया था. लेकिन गांधी की व्यापक लोकप्रियता के चलते इसका बड़े उद्योगों पर इसका असर पड़ना स्वाभाविक था. कालांतर में पूंजीपतियों के आग्रह या दबाव में ‘हिंद स्वराज’ के मूल कथ्य में कोई परिवर्तन न करनेवाले, पुस्तक के प्रथम संस्करण में आदमी को अपने हाथ का कताबुना कपड़ा पहनने का आग्रह करने वाले गांधी, 1931 में ‘भारतीय मिलों का कताबुना’ पहनने की अनुशंसा कर चुके थे. यानी खादी का स्थान स्वदेशी ले चुकी थी. स्वदेशी का मतलब है देश में बना हुआ. यह अपने आप में भावुक अवधारणा है. उसे बनाने के, बनाने का कारखाना लगाने के लिए किसका पैसा लगा है, तकनीक कैसी है, उसपर जोर नहीं देती. यानी स्वदेशी का समर्थन करते समय गांधीजी मशीनों की आलोचना के बारे में अपने तर्क को बहुत पीछे छोड़ चुके थे. यदि लंकाशायर का कोई पूंजीपति सस्ते श्रम की चाहत में भारत में कोई कारखाना, अत्याधुनिक श्रमविरोधी मशीनों के साथ लगाए तो उसका बुना कपड़ा स्वदेशी है. तथा गांधीजी का उससे विरोध नहीं था. इसलिए वे खादी की अपनी अवधारणा में संशोधन कर, स्वदेश निर्मित वस्तुओं के पक्ष में तर्क देने लग जाते हैं. भले ही लंकाशायर का वह पूंजीपति अपने देश के मुकाबले यहां के श्रमिकों को बहुत कम वेतन पर रख रहा हो. गांधी जी जीवन को धार्मिक नजरिये से देखते हैं. आर्थिक दृष्टिकोण उनके लिए अधिक महत्त्व नहीं रखता. जो पूंजीपति गांधीजी के आगेपीछे लगे थे, उन्हें इससे मतलब भी नहीं था. बल्कि प्रकारांतर में धार्मिक जड़ता उनके लिए मददगार ही थी.

गांधी बारबार धार्मिक आजादी की बात करते रहे. आर्थिक स्वावलंबन के लिए उन्होंने ग्राम स्वराज, खादी एवं ग्रामोद्योग का नारा दिया. वैसे भी उन दिनों शिक्षा और शहरों से कटे भारतीय गांवों के मशीनीकरण की संभावना भी नहीं थी. भीषण गरीबी के कारण लोगों का क्रयसामथ्र्य अत्यधिक कम था. उनमें निवेश करने से पूंजीपतियों को कोई तात्कालिक लाभ होनेवाला नहीं था. इसलिए इस बात को खूब उछाला गया. गांधी ब्रिटेन के सम्राट के बुलाने पर गए तो एक लंगोटी में थे. इसके लिए उनकी प्रशंसा भी की जाती है. बात है भी प्रशंसा की. उन्होंने कहा था कि वे भारत की जनता के प्रतिनिधि हैं. एक नेता को ऐसा ही होना चाहिए. ऐसे सुनने में भी अच्छा लगता है. लेकिन क्या इससे यह जाहिर नहीं होता कि इससे गरीबी का महिमा मंडन होता है. क्या इससे यह नहीं लगता कि कि गांधीजी ने गरीब भारत की अभावग्रस्तता को चुनौती मानने के बजाय उसको उसी रूप में स्वीकार कर लिया था. वैसे भी उनके ऐजेंडा में राजनीतिक आजादी प्रमुख थी. समाजार्थिक आजादी के सवालों को वे स्वातंत्र्योत्तर भारत में सुलझाना चाहते थे. इसलिए गांधीजी की वह घटना एक गरीब देश के स्वाभिमान का प्रतीक तो बन सकती है, लेकिन उसके माध्यम से गरीबी के महिमा मंडन का जो संदेश जाता है, उससे आगे चलकर नुकसान ही हुआ. प्रकारांतर में यह नामक एक और हथियार मिल गया. आशय है कि गांधी और गांधीवाद, मशीनीकरण को रोकने और त्याज्य बताने के बावजूद पूंजीवाद पर नकेल कसने में नाकाम रहे हैं. पूंजीवाद को नाथने के लिए गांधी ने ट्रस्टीशिप का विचार रखा था. ऊपर से देखने पर यह आदर्श विचार प्रतीत होता है. मगर व्यवहार में यह आर्थिक विभाजन को न्यायसम्मत मान देती है. वह दान की व्याख्या को जन्म देता है. जिसके आधार पर समाज में परजीवी वर्ग को फलनेफूलने का अवसर मिलता है. जिस ग्रामस्वराज को वे ग्रामीण परिवेश में फलतेफूलते देखना चाहते हैं, उसकी परिणति सामंतवाद में होती रही है. पूंजीवाद चूंकि लोकतंत्र का पक्ष लेता है, जिसमें उसका अपना हित भी है. जबकि सामंतवाद में पूंजीपतियों पर नियंत्रण केवल मनमानी और बलप्रयोग द्वारा होता था. इसलिए पूंजीवाद की सफलता के लिए सामंतवाद को पुराना, दकियानूसी शासन पद्धति वाला और लोकतंत्र विरोधी कहकर बदनाम करने का काम किया गया. बहरहाल सामंतवाद जिन कमजोरियों का शिकार था, उसका पतन स्वाभाविक था.

पूंजीवाद को नाथने की कोशिश गत दो सौ वर्षों में होती रही है. निश्चय ही इसका केंद्र यूरोप था. मगर उसकी धमक दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों तक सुनाई पड़ी थी. पूंजीवाद को नाथने के लिए साहचर्य, अराजकतावाद, श्रमिक संघवाद, संगठनवाद, सहजीवितावाद जैसे विचार आए. उन सभी की विशेषता थी कि वे श्रम को महत्त्व दिए जाने पर जोर देते थे. सभी का आग्रह था कि पूंजीस्वामी को पूंजी के आधार पर अतिरिक्त लाभ का अधिकारी बनाने से रोका जाए और आपसी व्यवहार में मौद्रिक विनिमय को न्यूनतम किया जाए. संक्षेप में ये सभी धनबल के स्थान पर श्रमबल को खड़ा कर देना चाहते थे. संगठन में ताकत है. पूंजीवाद के सुरसई आतंक पर केवल संगठित जनशक्ति रोक लगा सकती है, ऐसा इस वर्ग का विश्वास था. इनके बीच एक समानता यह भी है कि वे लोकतंत्र और व्यक्तिमात्र की इच्छाओं का समर्थन करते हैं. व्यक्ति और समाज से उनकी अपेक्षा होती है कि वे एकदूसरे की इच्छाओं का सम्मान करते हुए उपलब्ध संसाधनों के न्यायपूर्ण बंटवारे से सभी वर्गों के लिए काम करें. वे मानते हैं कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति की राय महत्त्वपूर्ण है. इसलिए निर्णय में सभी की साझेदारी होनी चाहिए. व्यक्ति की अपनी आवश्यकता भी होती है. इसके लिए उसको अपने अलावा दूसरों के उत्पाद पर भी निर्भर रहना पड़ता है. विडंबना यह है कि सुख, व्यक्तिगत आकांक्षाओं और मानवाधिकार को लेकर, समाजवाद के आधुनिक प्रकल्पों तथा पूंजीवाद में बहुत अंतर नहीं है. व्यक्ति कल्याण के जिस लक्ष्य को लेकर समाजवाद आगे बढ़ता है, पूंजीवाद भी उन्हीं के आधार पर अपना औचित्य सिद्ध करने में लगा रहता है. समाजवाद की भांति पूंजीवाद भी व्यक्तिस्वातंत्र्य एवं मानवाधिकार का बढ़चढ़कर गुणगान करता है, किंतु उसकी कमजोरी है कि वह इसको सस्थाओं के माध्यम से लागू करना चाहता है. संस्थाओं की जटिलता और नियमादि उनकी कार्यप्रणाली को जटिल बनाते हैं जिससे जनसाधारण के लिए संस्थाओं का लाभ उठा पाना बहुत कठिन होता है. इससे विशेषज्ञ संस्कृति को बढ़ावा मिलता है. उसके फलस्वरूप समाज में बौद्धिक आधार पर विभाजन को स्वीकृति मिलने लगती है. यही समाज के आर्थिक आधार पर विभाजन का बुनियादी आधार है, जिसे पूंजीवाद निहित स्वार्थ के लिए पोषितपल्लवित करता है.

पूंजीवाद में मनुष्य की नैतिक प्रेरणाओं को जगाने के लिए कोई कोई तंत्र नहीं होता. न ही वह इस तरह का कोई प्रयास करता है. इसके उलट पूंजीवाद सुखसुविधाओं के नाम पर ऐसे उपकरण और संसाधन बाजार में उतार देता है जो मनुष्य के भीतर अकेलेपन को संपूर्णता के साथ जी लेने का भ्रम पैदा करते हैं. इससे समाज में संवाद के अवसर घटते जाते हैं. परिणामस्वरूप विभिन्न इकाइयों के बीच संदेह और अविश्वास को बढ़ावा मिलता है. व्यक्ति के अकेलेपन को बांटने, उसकी भरपाई के नाम पर पूंजीवाद बहुत चतुराई से बाह्यः संस्थाओं को ले आता है. जिससे समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संदेह और अविश्वास स्थायी रूप लेने लगता है. इससे सामाजिक विक्षोभ पैदा होते हैं. उस समय वह मध्यस्थता का नाटक करते हुए ऐसे रेफरी की भूमिका में होता जिसका टीमों की हारजीत से कोई नाता नहीं होता. उसकी नजर अपने मुनाफे और प्रोत्साहनलाभ पर टिकी होती है. इसके बावजूद पूंजीवाद के समर्थक शांत नहीं बैठते. वे मनुष्य के अकेलेपन को बढ़ाने, समाज में अविश्वास और संदेह पैदा करने के लिए चोरीचोरी हर समय, हर कालखंड में काम करते रहते हैं. इसलिए कि अकेलेपन की अनुभूति और समाज से डरे हुए व्यक्ति को पूंजीवाद के चंगुल में फंसाना बहुत आसान होता है. उसे पूंजीवाद द्वारा खड़ी की गई संस्थाओं के मोहपाश में आसानी से फंसाया जा सकता है. पूंजीवाद के लिए मुनाफा ही मोक्ष है. उसकी हर बहस लाभ पर आकर दम तोड़ लेती है. स्वयं को वैज्ञानिक सोच और नवीतम ज्ञान का समर्थक बताने वाला, नवीनतम शोध एवं प्रौद्योगिकी के आधार पर अहर्निंश काम करने वाला पूंजीवाद, मुनाफे के लिए बुरी नजर से बचाने वाले ‘नजर सुरक्षा कवच’ तथा ‘शनियंत्र’ आदि बेचता है. पाखंड के कारोबार को तरहतरह से बढ़ावा देता है. मुनाफे के लिए उसे मौत को प्रायोजित करने का अवसर मिले वह उसके लिए भी सहर्ष तैयार रहता है.

इसी स्वार्थपरता के कारण पूंजीवाद की आलोचना उसके उभार के दिनों में ही होने लगी थी. इसके बावजूद वह विकासमान रहा. इसका कारण है कि पूंजीवाद ने समाज में मध्यवर्ग पैदा किया था. उससे पहले समाज में अमीर और गरीब का विभाजन था. उसकी विडंबना थी कि जो अमीर था, उसके पास जरूरत से इतना अधिक था, उसको बनाए रखना ही उसके लिए बड़ी चुनौती थी. दूसरी ओर गरीब था जिसके पास इतने अभाव थे कि जीवन को बचाए रखना बड़ी चुनौती होती थी. एक को सपनों की जरूरत इसलिए नहीं थी क्योंकि उसकी हर ख्वाइश तत्काल पूरी हो जाती थी. दूसरे के पास कोई सपना नहीं था. इसलिए कि घोर अभावों के बीच सपना देखने की उसकी हिम्मत ही नहीं होती थी. मामला सीधेसीधे ‘होने’ या ‘न होने’ का था, इसलिए उसे आसानी से नियतिबद्ध किया जाता था. लोगों के दिलों में यह बात बिठाई जा चुकी थी कि जो विशिष्ट तथा सुखसुविधा संपन्न वर्ग है, उसपर ईश्वर की विशेष अनुकंपा है. मध्यवर्ग ने व्यक्ति की खुशहाली को नियतिबद्ध मानने वाली धारणा पर प्रहार किया था. उसके पास सपने थे और संकल्प भी. ऊपर से खूबी यह कि वह अपनी सीमाओं के अतिक्रमण के लिए निरंतर प्रयत्नरत रहता था. मशीनीकरण और पूंजीवाद की सफलता में इस वर्ग का योगदान किसी से छिपा नहीं था. इसका उसे लाभ भी मिला था. इस वर्ग का बड़ा हिस्सा पूंजीवाद को कामयाब बनाने के लिए सतत प्रयत्नशील रहता था. मगर एक हिस्सा असंतोष का शिकार भी था. उसे हमेशा यह लगता था कि मात्र पूंजी और अपने निष्क्रिय योगदान के बल पर पूंजीपति जितना लाभ कमाता है, उसका उसे कोई अधिकार नहीं है. यह वर्ग लाभ में अपनी सम्मानजनक हिस्सेदारी चाहता था. इस वर्ग के असंतोष के कारण पश्चिम में अनेक पूंजीवादी आंदोलनों और विचारधाराओं का जन्म हुआ था. उन आंदोलनों और विचारधाराओं को पूंजीवाद उत्पादन व्यवस्था से जुड़े अन्य वर्गों का समर्थन भी प्राप्त हुआ.

क्रमश:

ओमप्रकाश कश्यप

सापेक्षिक न्याय : राज्य और समाज का सदाचरण

सामान्य

धर्म और अभिजन संस्कृति — 14

 
ब्रह्मांड में ऐसा कोई सद्गुण नहीं है, जो सही मायने में इतना महान और ईश्वर-तुल्य हो, जितना न्याय….अतएव सर्वज्ञों और सर्वसत्तावादियों से प्रार्थना है कि वे समाज में न्याय की स्थापना हेतु यथासंभव प्रयत्न करें.’1— एडीसन.

राज्य नागरिकों का सर्वसम्मत विधान है. उसका औचित्य सबका बना रहने में है. यह तभी संभव है, जब लोगों का उसमें विश्वास हो. यह विश्वास हो कि राज्य उनकी अपेक्षाओं की पूर्ति करने में सक्षम है. यह काम राज्य और नागरिकों के बीच दूरी अथवा दुराव के रहते संभव नहीं. यदि राज्य तथा नागरिकों के बीच दूरी होगी तो नागरिक अपने मनोभावों, सपनों और सचाइयों को खुद तक सीमित रखेंगे. उन्हें राज्य या उसके प्रतिनिधियों के समक्ष खुलकर रख ही नहीं पाएंगे. इससे प्रकारांतर में राज्य की गतिविधियों में उनकी रुचि का हृास होगा. अवसर का लाभ उठाकर राज्य का कामकाज संभाल रहे लोग, स्वयं को साधारणजन से ऊपर रखकर अपने लिए विशिष्ट सुख-साधनों की मांग करने लगेंगे. परिणामस्वरूप राज्य में समाजार्थिक स्तरीकरण बढ़ेगा, जन तथा अभिजन के अविश्वास में वृद्धि होगी. उसका दोनों के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. नागरिकों का राज्य में विश्वास अक्षुण्ण रहे. उसके साथ जुड़कर वे गर्व का अनुभव करें, इसके लिए राज्य की अपने कर्तव्यों एवं दायित्वों की ओर सतत प्रयत्नशीलता अत्यावश्यक है. साथ में जरूरी है समाज द्वारा समान, स्थिर समाजार्थिक विकास के साथ सामाजिक समरसता की ओर अग्रसर रहना. सामाजिक अतर्द्वद्वों को न्यूनतम रखने हेतु ध्यान रखना कि राज्य में जन और अभिजन जैसे टापू न बनने पाएं. यदि कुछ बनें भी तो उनमें आपसी विश्वास, लेन-देन और संचरण का रिश्ता हो. लेकिन राज्य एक जटिल संरचना है. उसके बहुत-से मामले होते हैं, जिनके संचालन हेतु विशेषज्ञ योग्यता आवश्यक होती है. विकास के लिए भी नए ज्ञान और प्रौद्योगिकी की जरूरत पड़ती है. इसलिए राज्य को यह छूट देनी होगी कि विकास और उत्पादन-स्तर बनाए रखने हेतु उसे जिस तरह की तकनीक और प्रौद्योगिकीय कौशल चाहिए, उसका सर्वकल्याण हेतु उत्पादन और उपयोग करे. आवश्यकतानुसार वैज्ञानिक शोध और आविष्कारों को बढ़ावा दे. इस सावधानी के साथ कि समाज, राजनीति, शिक्षा, प्रौद्योगिकी अथवा किसी अन्य किस्म की विशेषज्ञता के आधार पर नागरिकों के बीच किसी भी प्रकार का स्थायी भेदभाव अथवा स्तरीकरण न पनप सके. नागरिकों को उनकी आवश्यकता की वस्तुएं आसानी से उपलब्ध हों, ताकि समाज में कल्याण के न्यूनतम स्तर को बनाए रखना संभव हो. यह लक्ष्य समानता और समरसता के बगैर संभव नहीं. कई बार, विकास की चुनौतियों तथा निरंतर बढ़ती लोकेष्णाओं के बीच, राज्य के लिए एक ही समय में अपने सभी नागरिकों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति कर पाना असंभव-सा होता है. विशेषकर तब जब समाज में अलग-अलग सोच, रुचि एवं असमान बौद्धिक सामर्थ्य वाले लोग रहते हों. उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि अलग-अलग हो. ऐसे में राज्य के लिए अपने सभी नागरिकों के विकास के एक समान स्तर को बनाए रखना असंभव प्रतीत होने लगता है. उसमें से कुछ के लिए राज्य जिम्मेदार होता है. कुछ कारण उसके भी नियंत्रण से बाहर होते हैं. उनके समाहार हेतु राज्य केवल अनुकूल परिवेश का सृजन कर सकता है.

सामाजिक, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, संसाधनों की अतिरिक्त उपलब्धता, विरासत में प्राप्त शिल्प-कौशल, धन-संपदा आदि के आधार पर समाज में कुछ नागरिक दूसरों की अपेक्षा सदैव वरीयता की स्थिति में होते हैं. ऐसे में राज्य का समान, सर्वतोन्मुखी विकास सभी नागरिकों को बराबर संसाधन उपलब्ध करा देने-भर से संभव नहीं है. तदनुसार जो व्यक्ति संसाधन, शिल्प-कौशल, शिक्षा अथवा विशिष्ट पारिवारिक-सामाजिक पृष्ठभूमि, विरासत से प्राप्त संपदा-संसाधनों के मामले में दूसरों से आगे होंगे, अवसर मिलते ही वे उन्हें पीछे छोड़कर आगे निकल सकते हैं. उदाहरण के लिए उत्पादकता में सहायक योग्यताओं जैसे शिक्षा, संसाधन, पारिवारिक पृष्ठभूमि, तकनीक-कौशल, अनुभव आदि में से प्रत्येक को यदि एक-एक अंक दे दिया जाए तो ऊपरोल्लिखित पांचों गुणों से संपन्न व्यक्ति को पूरे पांच अंक प्राप्त होंगे. तब अनुभवहीन अथवा सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि से पिछड़े हुए व्यक्ति को उपर्युक्त सभी विशेषताओं से संपन्न व्यक्ति की अपेक्षा कम अंकों से समझौता करना पड़ेगा. यदि आरंभिक बिंदू को बलपूर्वक एकसमान कर दिया जाए? कोई अनुदार अथवा कट्टर समानतावादी राज्य लोगों को परिवार एवं विरासत के आधार पर मिलनेवाले वाले लाभों से वंचित करते हुए, समस्त संपत्ति को राज्य की घोषित कर व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा को ही समाप्त कर दे तब? प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ में अनुशंसा की है कि बालक को जन्म से ही परिवार से दूर रखकर राज्य के नियंत्रण में उनका पालन-पोषण किया जाए, संतान की पहचान को उसके माता-पिता से भी गोपनीय रखा जाए. उसी अवस्था में बच्चों को उनकी रुचि अनुसार अनुकूल शिक्षा के अलावा आवश्यक हस्त-कौशल की जानकारी दी जानी चाहिए. इस अतिसमानतावादी द्रष्टिकोण को अव्यावहारिक मानकर प्लेटो के शिष्य अरस्तु ने ही नजरंदाज कर दिया था. वह उचित भी था. इसलिए कि न्याय का उद्देश्य व्यक्ति को किसी भी प्रकार की दासता से बाहर लाकर मुक्ति का एहसास कराना है, ताकि समाज में रहकर वह अपनी योग्यता का भरपूर उपयोग कर सके तथा उसके माध्यम से अपनी उपयोगिता सिद्ध कर सके. प्लेटो के विचारों से राज्य की तानाशाही झलकती थी, व्यक्ति की निजी पसंदों और रुचियों को उसमें उपेक्षित रखा गया था. इसके बावजूद समाजार्थिक वैषम्य को कम करने के लिए व्यक्तिगत संपत्ति के उन्मूलन की मांग समानतावादी विचारकों की ओर से निरंतर उठती रही है. उनीसवीं शताब्दी में तो बड़े-बड़े समाजवादी दार्शनिकों द्वारा इसका समर्थन किया गया था. तब, समानतावादियों की मांग के चलते आज भी क्या यह उचित होगा कि प्रत्येक बालक को उसकी रुचि के अनुसार शिक्षण-प्रशिक्षण के समान अवसर दिए जाएं और वयस्कता की उम्र में प्रवेश करते ही उसे सुविधाओं और संसाधनों के पूर्वनिर्धारित पैकेट के साथ समाज में आगे बढ़ने के लिए छोड़ दिया जाए? समाज में समानता की स्थापना की दिशा में यह प्रथम दृष्टया आदर्श प्रणाली हो सकती है. मगर इससे शत-प्रतिशत समानता के लक्ष्य को प्राप्त करना असंभव ही होगा. उस अवस्था में व्यक्ति की रुचियां, अनुभव, सीखने की प्रवृत्ति, परिवेश, राजनीति तथा परिस्थितियां भविष्य में उसकी प्रगति की दिशा को तय करेंगी.

आशय है कि किसी भी ज्ञात प्रविधि द्वारा समानता के लक्ष्य को शत-प्रतिशत प्राप्त करना नामुमकिन है. लोगों की, भले ही वे संख्या में कितने कम क्यों न हों, मर्जी के बगैर समानता के नाम पर की गई अतिवादी कार्रवाही राज्य का निरंकुश आचरण माना जाएगा. उसका प्रतिकूल असर लोगों की उत्पादन क्षमता पर पड़ेगा. ऐसे में सामाजिक समानता तथा व्यक्ति की अधिकतम उत्पादकता के बीच समन्वय स्थापित करने के लिए राज्य का क्या कर्तव्य है? मनुष्य के व्यक्तिगत और सामाजिक कर्तव्य के बीच तालमेल कैसे संभव हो? कोई व्यक्ति तभी पूरी तरह स्वतंत्र कहा जा सकता है, जब उसका अपने श्रम पर अधिकार हो. सामाजिक नैतिकता भी यही कहती है कि अपने बुद्धि-कौशल तथा श्रम-सामर्थ्य से व्यक्ति जो अर्जित करता है, उसका लाभ उसे मिलना ही चाहिए. दूसरे शब्दों में यदि कोई व्यक्ति अपने पड़ोसी की अपेक्षा अधिक परिश्रमी और बुद्धिमान; तथा अपने श्रम और बुद्धि-कौशल द्वारा अतिरिक्त धनार्जन करने में सक्षम है—तब यह अनुचित होगा कि उसके द्वारा युक्तियुक्त ढंग से अर्जित की गई संपदा को ऐसे व्यक्तियों में बांट दिया जाए जो स्वभाव से ही कम परिश्रमी, आलसी तथा बुद्धि-कौशल में पिछड़े हुए हैं. यदि राज्य ऐसा करने का आदेश देता है, तो मानना होगा कि वह न केवल व्यक्ति-स्वातंत्रय की सीमाओं में अवांछित और अनैतिक हस्तक्षेप कर रहा है. साथ में व्यक्ति को अपने श्रम के लाभों से भी वंचित कर रहा है, जिनपर उसका नैतिक और सामाजिक अधिकार है. फिर भी आदर्श राज्य के लिए यह संभव नहीं कि सभी कुछ परिस्थितियों के हवाले कर दिया जाए. उस अवस्था में राज्य के संसाधन तथा विकास की बागडोर ऐसे लोगों तक सिमटने लगेगी, जो वरीयताक्रम में पहले से ही आगे हैं. यह न केवल राज्य के अस्तित्व की अवमानना होगी, बल्कि माना जाएगा कि राज्य व्यक्तिमात्र को विकास की धारा में दृढ़तापूर्वक बने रहने में सक्षम बनाने के अपने दायित्व को पूरा करने में भी असफल रहा है. तब ऐसी कौन-सी प्रेरणाएं हो सकती हैं, जो व्यक्ति को अपने और शेष समाज के हित में अधिकतम योगदान के लिए उत्सुक करें! इस तरह की सकारात्मक प्रेरणाओं की पहचान तथा उनका लोकहित में समयानुसार एवं न्यायपूर्ण ढंग से उपयोग, राज्य की सफलता को निर्धारित करता है. इसके लिए व्यक्ति तथा राज्य के बीच विश्वास और संबंधों की अंतरंगता आवश्यक है, जो राज्य की सत्ता पर आरूढ़ शक्तियों के अहंकार के कारण संभव नहीं हो पाती. प्रायः देखा जाता है कि व्यक्ति की अपने परिवार और समाज के साथ जैसी अंतरंगता होती है, वैसी निकटता राज्य के साथ नहीं बन पाती. लोग भूल जाते हैं कि राज्य समाज से पृथक न होकर, समाज की ही अधिरचना है. प्रबुद्ध नागरिक तथा जनसमाज आंतरिक-बाह्यः सुरक्षा, शांति, खुशहाली, विकास की निरंतरता तथा अंतरराष्ट्रीय संबंध हेतु राज्य का गठन करते हैं. व्यवस्था को बनाए रखने के लिए समाज राज्य को पर्याप्त मात्रा में कानून तथा संसाधनों के उपयोग का अधिकार प्रदान कर, सक्षम बनाता है. समाज की अनुमति से ही राज्य को कानून बनाने तथा उन्हें लागू करने के लिए आवश्यक संस्थाओं के गठन का अधिकार मिल जाता है. लोग सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकलापों को अपना समझकर उसमें हिस्सेदारी करते हैं, किंतु अज्ञानतावश यह मान लेते हैं कि राज्य का संचालन विशिष्ट लोगों का कार्य है. इसलिए वे राज्य के निर्णयों में हस्तक्षेप करने से उस समय तक दूर बने रहते हैं, जब तक कि उन्हें इसके लिए बार-बार आमंत्रित नहीं किया जाता. कई बार इसमें बहुत देर हो जाती है. अकसर धर्म के वायवी प्रलोभन व्यक्ति की प्राथमिकताओं को बदल देते हैं. उनमें फंसकर व्यक्ति राज्य के कार्यकलापों की ओर से उदासीन हो जाता है. जनसाधारण का राज्य की गतिविधियों का मूक दृष्टा बन जाना, सत्तारूढ़ शक्तियों को मनमानी का अवसर देता है. परिणामस्वरूप वे संस्थाएं जिनके गठन के लोककल्याण की प्रेरणा थी, अपने सरोकार भुलाकर स्वार्थी तत्वों की ख्वाबगाह बनने लगती हैं,

दरअसल हर समाज की विशिष्ट परंपरा और संस्कृति होती है. उन्हें वह किसी भी प्रकार के कानून और संविधान से अधिक महत्त्व देता है. निजी व्यवहार में वह उन्हीं से अनुशासित भी होता है. इसलिए राज्य की पैत्रिक संस्था होने के बावजूद समाज उसकी ओर से उदासीन बना रहता है. समाज के अंकुश, उपेक्षा अथवा अज्ञान के अभाव में राज्य स्वयं को स्वयंभू सत्ता समझने लगता है. भुला देता है कि वह समाज की ही संरचना है. व्यवहार में प्रत्येक व्यक्ति दो भिन्न संस्थाओं यथा राज्य एवं समाज से अनुशासित होने लगता है. चूंकि पुलिस, कानून, सैन्य-बल आदि राज्य के अधीन होते हैं, इसलिए प्रकारांतर में वह स्वयं को असीमित अधिकार संपन्न, समाज की अपेक्षा वरिष्ठ सत्ता मानने लगता है. चूंकि मनुष्य सामाजिक प्राणी है, अपने रोजमर्रा के जीवन में मनुष्य का वास्ता राज्य की अपेक्षा समाज से ज्यादा पड़ता है, जहां जाति, धर्म, समुदाय जैसे प्रलोभन तथा दैनिक जीवन की समस्याएं उसे उलझाए रखती हैं. इसलिए राज्य के अधिकार-क्षेत्र पर कोई सवालिया निशान लगाने के बजाय वह सामाजिकता के अपने दायरे में ही खुश रहता है. राज्य की गतिविधियों की ओर से स्वाभाविक-सी उदासीनता उसे घेरे रहती है. वह मान लेता है कि राजनीतिक निर्णय लेना सरकार तथा उसके चुने हुए प्रतिनिधियों का कार्य है, जिन्हें उसने यह जिम्मेदारी सौंपी है. अवसर का लाभ उठाकर राज्य ऐसे कानून बनाने में सफल हो जाता है, जो उसकी अधिसत्ता को और ज्यादा मजबूत तथा समाज-निरपेक्ष बनाते हों. चूंकि राज्य के कानून सत्ता पर विद्यमान लोगों, जो जनता की उदासीनता के चलते उसे अपना अधिकार समझने का भ्रम पाल बैठते हैं, द्वारा बनाए जाते हैं, इसलिए वे शक्तिशाली का समर्थन करते हुए नजर आते हैं. फिर जैसे-जैसे राज्य शक्तिशाली होता है, वह न्याय, नीति और निष्पक्षता की भावना से निरंतर दूर खिसकता जाता है.

निष्पक्षता दो प्रकार से संभव है. एक तो राज्य स्वयं अपने नागरिकों के साथ समानतावादी द्रष्टिकोण अपनाए, उनके लिए ऐसा वातावरण विरचित करे, जिसमें व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता का संपूर्ण अनुभव करते हुए अपने निर्बंध विकास की ओर अग्रसर हो सके. राज्य स्वयं व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए स्वयं प्रेरक सत्ता बना रहे. दूसरे उन कारकों का समाधान खोजे, जो परोक्ष रूप में व्यक्ति की उत्पादकता पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं, जैसे धर्म, जाति, संप्रदाय, क्षेत्रीयतावाद, भाई-भतीजावाद आदि—और इनका निराकरण करते हुए बगैर किसी भेदभाव के सर्वांगीण विकास हेतु कार्य करे. किंतु राज्य की निष्पक्षता एकदम वस्तुनिष्ट नहीं हो सकती. दो और दो चार का सीधा-सा गणित यहां उपयोगी नहीं होता. हम ऊपर भी देख चुके हैं कि निरा समानतावादी द्रष्टिकोण समाज में न्याय की स्थापना के लिए अपर्याप्त है. खासकर तब जब समाज में जाति, धर्म, आय-विभाजन तथा संसाधनों के वितरण में पहले से ही घोर असमानताएं हों. हमें यह समझना होगा कि समाज में व्याप्त असमानता, स्वार्थपरकता, अलगाववाद के लिए केवल व्यक्ति या समाज जिम्मेदार नहीं होते. वे विभेदकारी, सांप्रदायिक राजनीति के चलते कई बार ऊपर से भी थोप दिए जाते हैं. मनुष्य समाज में रहकर जो विचारदृष्टि ग्रहण करता है, उसमें राज-समाज का भी बड़ा योगदान होता है. दूसरे शब्दों में व्यक्ति के सोच में अलगाव पैदा करने, उसे स्वार्थी और शंकालु बनाने में राज्य भी बराबर का जिम्मेदार होता है. ‘यथा राजा, तथा प्रजा’ के मुहावरे के साथ हर कोई शिखरस्थ शक्तियों का अनुसरण करना चाहता है. बकौल पाउलो फ्रेरा परिवर्तन के आरंभिक चरण में उत्पीड़ित जन उत्पीड़क का अंधानुकरण करता है. जाहिर है व्यक्ति कुछ अपने अनुभव से सीखता है, कुछ बाहरी प्रेरणाओं से तथा कुछ राज्य के स्वार्थपूर्ण आचरण के प्रतिकारस्वरूप सोचने-करने को बाध्य होता है. शंकालु अवस्था में वह उचित-अनुचित का निर्णय कर पाने में असमर्थ रहता है. राज्य का दायित्वों की ओर से भटकाव प्रकारांतर में व्यक्ति को जिम्मेदारियों से पलायन को उकसाता है, जिससे अव्यवस्थाएं जन्म लेती हैं.

उपर्युक्त विवेचन द्वारा समाज में न्याय की स्थापना में व्यक्ति और राज्य की भूमिकाओं को समझा जा सकता है. तदनुसार राज्य का प्रथम दायित्व है कि लोकहित तथा नागरिक इच्छाओं में तालमेल बनाया जाए. यदि मनुष्य को लगता है कि धन के आधार पर उसके हितों को सुरक्षा मिल सकती है और उसके द्वारा कमाए गए धन पर केवल उसी का अधिकार होना चाहिए, तब समाज का कर्तव्य है कि उसके विश्वास की रक्षा करे. कम से कम उस सीमा तक जब तक उसको लगता है कि व्यक्ति का योगदान शेष समाज के लिए भी मंगलकारी है. यदि समाज यह मानता है कि धन के बजाय, विशिष्ट सुविधाओं का पैकेज व्यक्ति और समाज दोनों के लिए अधिक लाभकारी है, तो वह उन व्यक्तियों को भी विश्वास के दायरे में लाने का प्रयास करे, जो धन को अपने सुख-साधन के लिए जरूरी मानते हैं. यह कार्य धैर्यपूर्वक और लोगों को विश्वास में लेकर किया जाना चाहिए. इस बीच राज्य को सामाजिक समानता एवं समरसता की दिशा में प्रयास करते रहना चाहिए. यह तभी संभव है, जब राज्य की निर्णय-प्रक्रिया पारदर्शी हो; और व्यक्तिमात्र को यह विश्वास हो कि कुछ भी ऊपर से थोपा नहीं जा रहा है. नागरिकों का विश्वास अर्जित करने के लिए आवश्यक है कि राज्य, कल्याण के विभाजन में एकदम निष्पक्ष, निरपेक्ष, कार्यसक्षम और न्यायसंगत बना रहे.

न्याय जैसा कि हम जानते हैं राष्ट्र और नागरिकों को एक-दूसरे के प्रति विश्वसनीय और संवेदनशील बनाता है. वह राज्य और समाज के बीच स्नायुतंत्र की भांति काम करता है. किसी भी संवेदनशील राज्य से उसके नागरिकों की समस्याएं छिपी नहीं रहतीं. समस्याओं के समाधान को वह न्याय के रूप में लौटाता है. समाज में न्याय की पैठ का स्तर, उसकी आत्मनिर्भरता के स्तर को दर्शाता है. उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि राज्य अपने दायित्व पालन की ओर कितनी गंभीरता से अग्रसर है. यह अन्यत्र भी साफ कर चुके हैं कि मनुष्य समाज में बेहतर जीवन की उम्मीद के साथ सम्मिलित होता है. उस समय मनुष्य अपनी स्वतंत्रता के एक हिस्से की बलि यह सोचकर चढ़ाता है कि समाज के साथ रहते हुए वह अपनों के सान्निध्य सुख के साथ-साथ, अपनी अवशिष्ट स्वतंत्रता को भली-भांति भोग सकेगा. अर्जित संपत्ति पर उसका अपना नियंत्रण होगा और समाज उसके जीवन और संपत्ति की सुरक्षा करेगा. समाज उसके लिए ऐसा वातावरण भी बनाएगा, जहां वह अपनी उत्पादकता के आदान-प्रदान द्वारा अधिकतम सुख और स्वतंत्रता भोग सके. दूसरे शब्दों में उत्पादकता के लाभों पर अधिकार व्यक्ति का सबसे बड़ा प्रेरक-तत्व है. लेकिन समाज के अपने लक्ष्य होते हैं. प्रत्येक व्यक्ति को मनमाना आचरण करने की छूट समाज नहीं दे सकता. इसलिए भी कि वह जानता है कि प्रत्येक व्यक्ति की रुचियों और कार्यक्षमता में अंतर होता है. दूसरे समाज के लिए ऐसी वस्तुएं भी जरूरी होती हैं, जिनका निर्माण काफी श्रम-साध्य, अप्रीतिकर और अल्पलाभकारी हो. यदि सभी व्यक्तियों को मनमानी करने की छूट दे दी जाए तो ऐसे कार्यों में जहां अत्यधिक श्रम के बावजूद उत्पादकता न्यूनतम है उन्हें, जब तक कोई मजबूरी न हो, कम ही लोग अपनाने को उद्यत होंगे. वह स्थिति न केवल आर्थिक, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक असमानता का कारण भी बनेगी.

राज्य चूंकि नागरिकों का सर्वसम्मत विधान, उनकी सम्मिलित चेतना की अनुकृति है, इसलिए होना यह भी चाहिए कि उसकी व्याप्ति लोगों की संचेतना और भावभूमि का हिस्सा बने. राज्य के गठन के पीछे जो औचित्य है, उसका नागरिकों को भली-भांति बोध हो. ताकि स्पर्धा के बीच भी उनमें अविकल सहयोग की भावना बनी रहे. लोग दूसरों को पीछे ढकेलकर खुद आगे निकल जाने की कोशिश करने के बजाय, सभी को साथ लेकर चलने को प्रतिबद्ध हों. इस तरह की प्रेरणा, उत्प्रेरणा के लिए राज्य की आवश्यकता पड़ती है. इसके बावजूद राज्य का संचालन कर रहे लोग, अनेक अवसरों पर खुद को दूसरों से विशिष्ट मानकर उसके संसाधनों पर अधिकार जमाने लगते हैं. उनके विशिष्टताबोध अथवा अभिजात संस्कारों के चलते जीवन और समाज में राज्य की उपस्थिति केवल सरकार तथा उसके द्वारा गढ़े गए पुलिस, कानून, सुरक्षाबल आदि संस्थाओं में नजर आती है. चूंकि सरकार और उसके सभी विधान, चुने हुए लोगों द्वारा गढ़े जाते हैं तथा प्रतिनिधित्व के सिद्धांत के चलते उन्हें विशिष्ट महत्त्च प्राप्त होता है, अतएव समाज की सामूहिक चेतना का प्रतीक नजर आने के बजाए समस्त विधान तथा उनके आधार पर गठित संस्थाएं, जिनमें संसद और विधायिकाएं भी सम्मिलित हैं, शक्तिशाली समूह के हितों के संरक्षक नजर आते हैं. परिणामस्वरूप आमजन स्वयं को आहत और उपेक्षित समझने लगता है. प्रकारांतर में उसका राज्य की ओर से विश्वास घटने लगता है. धीरे-धीरे लोग भूलने लगते हैं कि राज्य उन्हीं का कार्य है. लोक-निगरानी घटने से सत्तारूढ़ शक्तियां निरंकुश आचरण करने लगती हैं, जिससे सामाजिक असंतोषों में वृद्धि होती है.

निष्पक्षतावाद या न्यायवाद कम से कम 2500 वर्ष पुराना विचार है. उसका आशय राज्य की सुख-समृद्धि तथा सुरक्षा के लिए नागरिक कर्तव्यों, अधिकारों तथा सामाजिक आचार-संहिताओं का समायोजन करना है. लेकिन जिस न्यायवाद पर हम यहां विचार करने जा रहे हैं, उसका सीधा-सा मंतव्य है कि न्याय कानूनी मर्यादाओं से आगे बढ़कर कार्य करे. उन लोगों के लिए कल्याण में भागीदारी सुनिश्चित करे जो जन्म, प्रकृति, धर्म, रंग-भेद या अन्य किसी कारण से विकास की धारा से बाहर हैं. यह अपने औचित्य में जनसाधारण का विश्वास लौटाने के लिए लिया गया राज्य का संकल्प है. उसके माध्यम से राज्य नागरिकों को यह विश्वास दिलाने का प्रयास करता है कि वह सभी का है तथा बिना किसी भेदभाव के, अपने संपूर्ण सामर्थ्य के साथ, सभी के विकास हेतु सतत तत्पर है. उसकी निगाह में सभी नागरिक बराबर हैं. जो कुछ उसके अधिकार में है, उसपर सभी नागरिकों का समानाधिकार है. साथ ही ऐसे सभी व्यक्तियों पर राज्य की विशेष संवेदन-दृष्टि है, जो जन्म अथवा अन्य किसी सामाजिक या प्रकृतिजन्य कारण से विकास की स्पर्धा में पिछड़ चुके हैं. वितरणात्मक न्याय का यह उदार चेहरा है, जो विकास के अंतिम छोर पर मौजूद नागरिकों को अतिरिक्त सहायता देने का आश्वासन देता है. इसके विचारक जॉन राउल्स हैं. ‘जस्टिस फा॓र फेयरनेस’ अर्थात ‘निष्पक्षता के लिए न्याय’ नाम से प्रसिद्ध राउल्स का यह सिद्धांत असल में उपयोगितावाद का ही संशोधित संस्करण है. गौरतलब है कि बैंथम के बाद से ही उपयोगितावाद न्यायवादी विचारकों का पंसदीदा दर्शन था. धीरे-धीरे इस विचारधारा की कमजोरियां सामने आने लगीं, जो सैद्धांतिक कम, व्यावहारिक ज्यादा थीं. बैंथम समेत अधिकांश उपयोगितावादी विचारकों के मतानुसार सुख का आशय, दूसरों के सुख में अपना सुख खोजने से था. उसके कथन, ‘अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख’ का यही निहितार्थ है. इसमें परोक्षतः सर्वकल्याण की भावना छिपी थी. कालांतर में पूंजीवादी होड़ के बीच व्यक्तिवादी दर्शन खूब पनपा, जिससे उपयोगितावादी मंतव्य दूसरों की चिंता से बेपरवाह, व्यक्तिगत सुख को महत्त्व देने वाली विचारधारा तक सिमटने लगा. यह मान लिया गया कि अगर उद्योग तथा आय के दूसरे साधन बढ़ेंगे तो उनका लाभ रिसकर निचले वर्गों तक भी पहुंचेगा. पूंजीवाद समर्थक अर्थशास्त्रियों ने इसका बढ़-चढ़कर प्रचार किया, जिसके चलते इसे पूर्णतः स्वाभाविक प्रक्रिया मान लिया गया. पूंजीपति उद्यमियों की मांग थी कि उत्पाद तथा उससे जुड़ी गतिविधियों पर सरकार का न्यूनतम हस्तक्षेप हो. इस विचार को अर्थशास्त्रियों ने मुहावरेदार भाषा में ‘लेजेज फेयर’ का नाम दिया. सरकार से कहा गया कि उसका उत्पादन तथा उससे जुड़ी गतिविधियों से दूर रहना ही श्रेयस्कर है. राजनीति अस्थिरता तथा राजसत्ताओं के शोषणकारी रवैये ने इसे खूब फैलाव दिया. भाड़े के बुद्धिजीवियों तथा अर्थशास्त्रियों की मदद से यह मुहावरा बीसवीं शताब्दी के दौरान लगातार चर्चा में बना रहा. उसका दुष्परिणाम यह हुआ कि उत्पादन जरूरत के बजाय लार्भाजन को ध्यान में रखकर किया जाने लगा. इससे ऊपरले वर्गों की ओर पूंजी के प्रवाह में तेजी आई. छोटे-छोटे उद्योग दम तोड़ने लगे और उत्पादन कुछ हाथों तक सिमटता गया. आगे चलकर पूरी दुनिया उत्पादक और उपभोक्ता नाम के दो वर्गों में बंटती चली गई.

उपयोगितावाद और सुखवाद जैसे दर्शन भले ही पुराने हों, मगर इन्हें वास्तविक सम्मान बीसवीं शताब्दी में मिला. उस समय जब तीव्र मशीनीकरण से उत्पादन व्यवस्था में तेजी आई थी. नए उत्पादों को खपाने के लिए नए बाजारों की जरूरत थी. यह काम पुरानी विचारधाराओं के चलते, जिनका जन्म सामंतवाद और साम्राज्यवादी विस्तार के दिनों में हुआ था—असंभव था. इसलिए औपनिवेशीकरण को बल मिला. वैचारिक संक्रमण के बीच व्यक्ति-स्वातंत्रय, मानवाधिकार, सुखवाद, उपयोगितावाद जैसी विचारधाराओं ने उनीसवीं शताब्दी में जन्म लिया, जिनका उस शती के मानस को बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा. सामंतवादी दौर में टकराव सीधा और स्पष्ट होता था. औपनिवेशीकरण के बीच टकराव के मायने ही बदल गए. वहां समर्थन और विरोध साथ-साथ थे. बाजार पर छाए रहने के लिए इतनी महीन और कूटनीतिक चालें चली जातीं कि उनकी स्वतंत्र पहचान करना, अलग-अलग हों तो वे कब गड्ड-मड्ड हो जाएं—इसका अनुमान लगाना, बहुत ही कठिन था. पूंजीवाद सीधे-सीधे मुनाफे की संस्कृति पर टिका था. वही उसका एकमात्र मंत्र था. उससे अलग उसका कोई विचार ही नहीं था. मुनाफे के लिए हर विचारधारा को अनुकूल मोड़ देना, उससे काम लेना उसे बाखूबी आता था. नतीजा यह हुआ कि पूंजीवाद समर्थक विचारकों ने व्यक्ति-स्वातंत्रय, मानवाधिकार, उपयोगितावाद को निरे व्यक्तिवाद में ढालने की कोशिश की. उसमें वे सफल भी हुए. इसलिए आधुनिक सभ्यता को औद्योगिक क्रांति का कर्जमंद कहा जा सकता है. इसमें कोई संदेह नहीं कि औद्योगिक क्रांति को सफल बनाने में पूंजीवाद की बड़ी भूमिका थी. लेकिन अधिक से अधिक लाभार्जन की लालसा ने पूंजीवाद को दुबारा उन्हीं सामंती संस्कारों के करीब ला दिया था, जिनसे मुक्ति की कामना, पूंजीवाद के समर्थन में उतरी आरंभिक प्रेरणाओं में से एक थी. स्मरणीय है कि पूंजीवाद के उठान को मशीनीकरण ने संभव बनाया था. उसके मूल में वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकीय क्रांति थी. वह स्वयं में वैचारिक क्रांति की देन थी. उसने यूरोप में अनेक सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों को जन्म दिया था. लेकिन राज्य-प्रमुखों की निजी महत्त्वाकांक्षा तथा विश्व-युद्धों के बीच मिले अवसर ने पूंजीवाद को अनपेक्षित सफलता दी. परिणामस्वरूप परिवर्तनकामी विचारधाराओं का प्रभाव घटने लगा. उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए चलाए गए प्रचार अभियान मनुष्य को विवेकवान बनाने के बजाय, उसे भरमाने वाले सिद्ध हुए. उनके उभार के फलस्वरूप बने राज्यों की संख्या घटने लगी. इस सफलता से उत्साहित पूंजीवाद के समर्थक अवधूत, बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ‘विचारधारा के अंत’ की भविष्यवाणी करने लगे थे.

जॉन स्टुअर्ट मिल जैसे बाद के सुखवादी विचारकों ने सुखवाद और नैतिकता के बीच की दूरी को पाटने की भरपूर कोशिश की. शासन समाज की स्वैच्छिक अनुशासन पद्धति है. लोकानुभव से संपन्न राजनीतिक संस्थाएं विराट सामाजिक संदर्भों का हिस्सा होती हैं, वही संदर्भ उन्हें अनुशासित करते हैं. इसलिए यदि व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करना है, साथ में यह तय करना है कि राज्य उसकी स्वतंत्रता में किसी प्रकार की बाधा न बने तो समाज में भी शांति, स्वतंत्रता और सहिष्णुता की भावना होनी चाहिए. मिल का मानना था कि उदारवादी शासन के पीछे उदारवादी समाज भी होना चाहिए. उसकी निगाह में स्वतंत्रता का महत्त्व इसलिए नहीं है कि वह मनुष्य के लिए सुखों को संभव बनाती है अथवा उसे भौतिक सिद्धियां अर्जित करने का अवसर देती है, बल्कि उसका महत्त्व इसलिए है कि वह उत्तरदायी मनुष्य की सहज और स्वाभाविक अवस्था है. लेकिन मिल की सामान्य उपभोग और सुख को नैतिकता से आबद्ध करने की तमाम कोशिशों के बावजूद, उपयोगितावाद और सामान्य नैतिकता के बीच उतनी ही दूरी बनी रही, जितनी व्यवहार और आदर्श के बीच होती है. इसकी संभावना मिल को भी थी. एक परिपक्व बुद्धिजीवी और संवेदनशील इंसान के रूप में वह व्यावहारिक राजनीति की समस्याओं से भी परिचित था. उसका मानना था कि समाज का लोकतंत्रीकरण, व्यक्तिगत गौरव के असंगत सिद्ध होगा. सत्ता-लोलुप समाजार्थिक, राजनीतिक शक्तियां व्यक्ति के विवेक को अपने स्वार्थ के अनुकूल मोड़ने की कोशिश करेंगी. आगे चलकर समाज में सत्ता, पूंजी और धर्म का जैसा गठजोड़ बना, उसने मिल की इस संभावना को पूरी तरह सच सिद्ध कर दिया. लोकतंत्र भीड़तंत्र में ढलते गए. उत्तरदायी राज्य का सपना धूमिल होता गया. यह औद्योगिक विकास की असफलता थी, जिसने ने बीसवीं शताब्दी में अनेक जनक्रांतियों को जन्म दिया. उनके स्वरूप भले अलग-अलग हों, ध्येय केवल एक था, समाज में न्याय की स्थापना. विकास से वंचित उसी से आगे चलकर वितरणात्मक न्याय की अवधारणा विकसित हुई. उसका ध्येय पूंजी और ताकत के इशारे पर नाचती राजसत्ताओं का नैतिक मार्गदर्शन करना था, उस सामाजिक नैतिकता को वापस लाना था जिसे साम्राज्यवाद के लंबे दौर में करीब-करीब बिसरा दिया गया था.

उपयोगितावादी न्याय के अनुसार समाज में सरकार की भूमिका व्यवस्थापक अथवा समन्वयक की होनी चाहिए. उसका दायित्व ऐसे परिवेश का निर्माण करना है, जिसमें सदस्य इकाइयां अपनी अधिकतम उत्पादकता को बनाए रख सकें. यह तभी संभव है जब सरकार कल्याण के वितरण हेतु संसाधनों को स्वयं खपाने के बजाय लोगों को उसके लिए प्रेरित-प्रोत्साहित करे. ऐसे प्रबंध करे ताकि लोग पूरे आत्मविश्वास के साथ समाज और संसाधनों के प्रबंधन के लिए आगे आएं; और स्वयं-स्फूत्र्त भाव से अधिकतम उत्पादकता के लिए कार्य करें. विकास ऊपर से आरोपित न होकर लोगों के स्वैच्छिक सहयोग, आपसी विश्वास और आकांक्षाओं सहित स्वयं-स्फूत्र्त हो. वह कदाचित ऐसे समाज में संभव है, जहां आदर्श स्तर की समानता हो. समाज में न केवल संसाधनों और अवसरों की बराबरी हो, बल्कि वे शिक्षा, अनुभव, योग्यता, रुचि, विकास आदि के मामले में भी परस्पर तालमेल रखते हों. जहां ज्ञान और अनुभव का वैविध्य प्रतिस्पर्धी होने के बजाय एक-दूसरे का सहयोगी और सहायक हो. विकास के समांगीकृत अथवा अधिकतम समांगीकृत स्तर को बनाए रखने की ये आवश्यक शर्तें हैं. व्यवहार में ऐसा संभव नहीं है. विशेषकर ऐसे समाजों में जो विभेदकारी सामाजिक-राजनीतिक नीतियों के शिकार रहे हों, वहां समांगीकृत विकास के लिए असमानता के कारणों की खोज तथा उनका समयानुसार निराकरण जरूरी है. यह काम कानूनों के जखीरे में कुछ नए कानून शामिल कर देने से संभव नहीं है. प्रत्येक कानून, ऊपर से वह चाहे जितना सुरक्षित नजर आता हो, अपने भीतर अनेक छेद लिए रहता है. चालाक लोग उन्हीं का लाभ उठाकर अपने लिए सुरक्षित गलियारे बना लेते हैं. वास्तविक परिवर्तन हेतु लोगों के सोच और जीवनशैली में बदलाव जरूरी है. उदार जनसंस्कृति के विकास द्वारा इस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है. यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि समाज की वास्तविक शोभा रुचि-वैभिन्न्य, चारित्रिक विविधताओं, संस्कृति तथा ज्ञान की अनेकानेक धाराओं को सहेजकर रखने में है. यही कारण है कि जीवंत समाजों में विकास की अनेक छटाएं विद्यमान होती हैं. व्यक्तिगत रुचियों के अलावा भौगोलिक और परिस्थितिगत कारण भी विकास की दर और दिशाओं को प्रभावित करते हैं. उस अवस्था में विकास को निरे उपयोगितावादी द्रष्टिकोण से परिभाषित करना, समाज की सतही या कहें कि निर्जीव व्याख्या करना है. इसलिए उपयोगितावादी विचारकों का जोर आमतौर पर आय के संसाधनों और अवसरों में समुचित तालमेल बनाए रखने तक सीमित रहता है. उन्हें लगता है कि न्यूनतम आय की सुनिश्चितता द्वारा समाज में अपेक्षित जीवन-स्तर को बनाए रखा जा सकता है. उनकी निगाह में प्रत्येक वस्तु जो मनुष्य के सुख में इजाफा करती है, उपभोग्य है. चूंकि वे मानते हैं निश्चित आय से सुख की निश्चित मात्रा या पैकेज खरीदा जा सकता है. इसलिए उनके अनुसार सुख के सातत्य हेतु उपयुक्त आय की निरंतरता अनिवार्य है. इस सिद्धांत का सामान्यीकरण करते हुए वे मान लेते हैं कि उपयुक्त आय होने पर आनुपातिक सुख की उपलब्धता भी बनी रहेगी. इससे हर कोई अधिकाधिक सुख की चाहत में अधिकाधिक आय के स्रोत तलाशने में जुट जाता है. इस तरह वे चाहे-अनचाहे समाज को अंतहीन स्पर्धा की ओर ढकेल देते हैं, जिसमें हर कोई सुख की दौड़ में दिखाई पड़ता है. वे आय को भी उपभोग्य इकाई के रूप में देखने लगते हैं. परिणामस्वरूप सहयोग, सहिष्णुता, उदारता, करुणा, संवेदना जैसे जीवनमूल्य गायब होने लगते हैं.

उपयोगितावादी मानते हैं कि समाज या व्यक्ति के अधीन उपभोग्य वस्तुओं की औसत मात्रा बढ़ने से सुख की समानुपातिक वृद्धि भी संभव है. चूंकि समाज का ध्येय सदस्य इकाइयों के लिए सुख-सुविधाओं के न्यूनतम स्तर को बनाए रखने के साथ-साथ उनके स्तर में निरंतर सुधार करना है, अतएव उनके सुख में वृद्धि के लिए वह सुविधाओं की आनुपातिक वृद्धि में जुटा रहता है. सुख को आय अथवा सुविधाओं के पैकेज पर आश्रित करते समय वे मान लेते हैं कि समाज की सभी इकाइयों में चाही-अनचाही एकरूपता है. लोग रुचियों, विचार-शक्ति, अनुभव, संसाधन, योग्यता आदि के मामले में एकसमान हैं. जबकि सचाई इसके ठीक उलट होती है. सुख एक अनुभूति है. कुछ खास सुविधाएं इस अनुभूति को उत्पे्ररित कर सकती हैं, किंतु सदैव ऐसा ही हो, यह असंभव है. यदि ऐसा होता तो समाज में असमानताओं के लिए खास जगह ही नहीं होती. उस अवस्था में संभव है, न्याय की आवश्यकता ही नहीं होती. ‘थ्योरी आ॓फ जस्टिस्स’ में जॉन राउल्स इसका कुछ यूं खुलासा करते हैं—

‘समाज में कुछ लोग बहुत जल्दी इस निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं कि उपयोगितावाद न्याय की सवार्धिक नीतिसंगत और तार्किक संकल्पना है. उदाहरण के लिए प्रत्येक मनुष्य चाहता है कि उसके हितों को किसी प्रकार का कोई नुकसान न पहुंचे. यदि उस कुछ खोना भी पड़े तो उसकी भरपाई के लिए वह बदले में कुछ न कुछ तत्काल प्राप्त कर लेना चाहता है. व्यक्तिगत-लाभ की दिशा में प्रयत्नरत मनुष्य किसी क्षण यदि कुछ त्याग भी करता है तो महज इसलिए कि वह सोचता है कि आगे चलकर उसकी भरपाई बहुत आसानी से कर सकेगा. देखा जाए तो मानव-मात्र की स्वार्थ की यह वांछा कहीं से भी अनुचित नहीं है. प्रत्येक मनुष्य को यह अधिकार है कि वह अपने अधिकतम हितों को आगे रखकर कार्य करे. दूसरे के हितों को आघात पहुंचाए बगैर जितनी भी संभव और तर्कपूर्ण है, उतनी सुख-सुविधाएं अपने लिए अर्जित करे. समाज व्यक्तियों से मिलकर बना है. उसका ध्येय भी अपनी सदस्य इकाइयों के कल्याण के स्तर को बढ़ाना है. इसलिए यदि व्यक्ति को अपने अधिकतम सुख की दिशा में प्रयत्न करने का अधिकार है तो समाज को भी यह अधिकार स्वतः प्राप्त है. जैसे मनुष्य के कल्याण का स्तर उसे अलग-अलग अवसरों पर, मिलने वाली आत्मतुष्टि, अथवा भोगे गए सुख-संसाधनों की मात्रा से आंकी जा सकती है. इसी तरह समाज के कल्याण का स्तर उसकी सदस्य-इकाइयों की सुखाकांक्षाओं तथा सम्मिलित सुख-साधनों की आपूर्ति से आंका जाता है. चूंकि अकेले व्यक्ति का लक्ष्य अपने कल्याण के उच्चतम स्तर को प्राप्त करना है, ठीक इसी प्रकार समाज का संगठित लक्ष्य सदस्य इकाइयों की कुल इच्छाओं, आकांक्षाओं को प्राप्त करना है. मानवमात्र अपने वर्तमान और भविष्य की प्राप्तियों एवं हानियों के बीच जिस प्रकार संतुलन बनाए रखना चाहता है, ठीक इसी प्रकार समाज भी अपने वर्तमान और भविष्य के लाभ-हानि के बीच संतुलन कायम करने को प्रतिबद्ध होता है. अंतर केवल इतना है कि व्यक्ति अकेला होता है. और समाज व्यक्तियों का समुच्चय. इसलिए समाज की इच्छा में उसकी सदस्य इकाइयों की इच्छा की अभिव्यक्ति होती है. समाज की तरह उसकी इच्छा भी अनेक व्यक्तियों की इच्छाओं का समुच्चय अथवा पैकेज होती है. सुख की नैसर्गिक लालसा व्यक्तिमात्र को अपनी रुचि के अनुरूप सुख-प्राप्ति के लिए प्रेरित करती है. ठीक इसी प्रकार एक समाज तभी संगठित और विकासरत रह सकता है, जब वह अपनी अपनी सदस्य इकाइयों की इच्छा-आकांक्षाओं तथा आत्मतुष्टि के बीच तालमेल कायम कर सके.’2

राउल्स के अनुसार व्यक्तिमात्र के सुख और समाज के सुख में केवल ‘एक’ और ‘अनेक’ का अंतर है. हम जानते हैं कि ‘अनेक’ में ‘एक’ भी समाया होता है. इसलिए यदि समाज की कोई एक इकाई भी सुख से वंचित रहती है, तो उससे ‘अनेक’ की मर्यादा पर असर पड़ता है. उसका कुल विकास, भले ही सीमित अंशों में हो, प्रभावित होता है. आदर्श समाज के लिए यह चुनौती कम नहीं होती. ‘एक’ की उपेक्षा ‘अनेक’ के आत्ममुग्ध और गैरजिम्मेदार होने की ओर संकेत करती है. साफ है कि व्यक्ति-स्वातंत्रय पर अतिरिक्त जोर देते हुए उपयोगितावादी विचारक समाज के कुल लक्ष्य को बिसरा देते हैं. समाज की व्यापकता और बहुलता से सम्मोहित हो, उसे बड़ी इकाई और वरीयता प्राप्त इकाई मानने लगते हैं तथा व्यक्ति और समाज के हितों को परस्पर पूरक की भांति प्रस्तुत करने के बजाय, ‘छोटी इकाई’ और ‘बड़ी इकाई’ के भिन्न-भिन्न हित के रूप में देखने लगते हैं. फलस्वरूप व्यक्ति और समाज के हित एक-दूसरे के पूरक, अन्योन्याश्रित लगने के बजाय, परस्पर प्रतिस्पर्धी नजर आने लगते हैं. इसका उपयोग कर स्वार्थी समाजार्थिक शक्तियां समाज और व्यक्ति को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने में कामयाब हो जाती है. धर्म इसमें मददगार की भूमिका निभाता है. परिणामस्वरूप दोनों के बीच अनबूझी प्रतिद्विंद्वता जन्म ले लेती है. उपयोगितावादी दर्शन की इस कमजोरी को जॉन राउल्स ने पकड़ा था. उसके अनुसार उपयोगितावाद की सीमा है कि वह मनुष्य के सुख का सबसे बड़ा हित-चिंतक होने का दावा करते-करते उसे, केवल सुख पैदा करने तथा भोगने की मशीन समझने लगता है. उसके ‘सिस्टम’ में मनुष्य भी पुर्जा बनकर रह जाता है. इस कोशिश में वह मानवीय उच्चादर्शों तथा लोकसंवेदनाओं से अकसर दूर खिसक जाता है, जिनका समाज में न्याय की व्याप्ति हेतु सुरक्षित रहना अत्यावश्यक होता है. राउल्स का निरपेक्ष न्याय का सिद्धांत व्यावहारिक रूप से सभी के सुख को केंद्र में रखते हुए राज्य समेत ऐसी संस्थाओं के गठन पर जोर देता है, जिनके माध्यम से अधिकाधिक लोगों को अधिकाधिक सुख पहुंचाया जा सके. चूंकि स्वतंत्रता, सुख-प्राप्ति एवं सुखोपभोग की प्रमुख अवस्था है, अतएव अधिक से अधिक व्यक्तियों को, अधिक से अधिक सुख पहुंचाने की नीति के चलते उपयोगितावादी अनुशासन के मामले में ढील देते जाते हैं. इससे राज्य में संपन्न, शीर्षस्थ अभिजात तथा सुविधा-साधन से वंचित जनसामान्य के बीच अघोषित स्पर्धा आरंभ हो जाती है. इस बेमेल स्पर्धा में जनसाधारण सदैव घाटे में रहते हैं. परिणामस्वरूप समाज में सुख-सुविधाओं के समान विभाजन के बजाय, उनके छोटे-बड़े टापू बनने लगते हैं. वर्चस्ववादी ताकतों के नेतृत्व में पल रहा राज्य चूंकि स्वयं सुख-सुविधा, वैभव विलास और शक्ति का अविचारी केंद्र होता है, इसलिए निहित स्वार्थों के लिए वह विषमता के प्रतीक उन टापूओं को संरक्षण प्रदान करता है. देखा यह भी जाता है कि पूरे समाज को सुखी बनाने की अपनी सिद्धांतनिष्ठा के चलते, उपयोगितावादी विचारक कुछ व्यक्तियों के साथ पक्षपातपूर्ण व्यवहार करने लगते हैं. सुख की उनकी अवधारणा आमजन एवं शिखरस्थ अभिजन के लिए अलग-अलग होती है. मनुष्य समाज के लिए उपयोगी है तो इसका परोक्ष अभिप्राय यह भी है कि उसकी उत्पादकता और कार्यकुशलता का लाभ समाज के प्रत्येक वर्ग को समान रूप से उपलब्ध होना चाहिए. दूसरे मानवमात्र की उत्पादकता और उत्साह बना रहे, इसके लिए समाज का अपनी प्रत्येक इकाई के साथ न्यायपूर्ण ढंग से पेश आना जरूरी है. उधर व्यक्तिमात्र को यह एहसास होना जरूरी है कि समाज और व्यक्ति का संबंध अन्योन्याश्रित है. समाज से कटे मनुष्य का आचरण पशुवत जान पड़ेगा तो मनुष्य के बगैर समाज मकड़ी के बहुत पुराने, धूल-अटे जाले की तरह बेजान दिखने लगेगा. इसलिए मनुष्यता का तकादा है कि प्रत्येक नागरिक अपने श्रम-कौशल एवं बुद्धि-सामर्थ्य का लाभ समाज के अधिकतम लोगों तक पहुंचाने के लिए कृतसंकल्प हो. दूसरी ओर समाज की जिम्मेदारी है कि वह व्यक्तिमात्र के सुखों और अधिकारों का ख्याल रखे तथा उन्हें अकेलेपन और उपेक्षा की अनुभूति न होने दे.

उपयोगितावादी विचारक उत्पादन और वितरण के सामान्य सिद्धांत को बिसराकर लोगों को अपने विकास के लिए प्रयत्नरत रहने की प्रेरणा देने से ज्यादा जोर इस बात पर देते हैं कि सरकार समाज में कल्याण के संवितरण पर ध्यान दे. इसके लिए वे सरकार से वस्तुनिष्ठ किस्म की तटस्थता की अपेक्षा करते हैं. परिणामस्वरूप उन लोगों के प्रति जो अतिरिक्तरूप से परिश्रमी तथा ईमानदार हैं, उत्पादकता के मामले में बाकी लोगों से बढ़कर हैं, किंतु जन्म, विरासत या किसी और कारण से विकास की धारा में पिछड़ चुके हैं—अन्याय होता है. उन्हें राज्य के विकास का पूरा लाभ मिल नहीं पाता. प्रायः उन्हें उन लोगों पर आश्रित रहना पड़ता है, जो उनके श्रम-कौशल का पूरा मूल्य चुकाए बगैर उनसे कार्य लेते हैं. नतीजा यह होता है कि पात्रता एवं विकास की जरूरतों के बावजूद वे विकास की मुख्यधारा में निरंतर पिछड़ते जाते हैं. राउल्स के अनुसार शासन को ऐसे लोगों पर विशेष ध्यान देना चाहिए जो जन्म के आधार पर ही सुविधा अथवा अवसरों से वंचित हैं. उदाहरण के लिए जो धनी परिवार में जन्म लेते हैं, उन्हें आगे बढ़ने के लिए संसाधनों की कमी नहीं झेलनी पड़ती. वे विकास की दौड़ में निर्धन परिवार में जन्मे व्यक्ति को आसानी से पछाड़ देते हैं. इसी तरह बचपन में बेहतर शैक्षिक वातावरण में पढ़े व्यक्ति उन लोगों को पीछे छोड़ देते हैं जिनके माता-पिता अनपढ़ हैं; या जिनमें शिक्षा के प्रति जागरूकता का अभाव है. शराब, जुए या ऐसी ही किसी लत से घिरे माता-पिता के बच्चों की भी यही दुर्दशा होती है. इस विसंगति को राउल्स उदाहरण के माध्यम से समझाने की कोशिश करता है. मान लीजिए उनमें से पहला अनुकूल परिस्थितियों में जन्म लेता है, जबकि दूसरे को जन्म से ही प्रतिकूल स्थितियों से जूझना पड़ा है. पहले को अच्छा भोजन, अच्छे वस्त्र और स्वास्थ्य के अनुकूल आवास मिलता है. परिवार की ओर से उसके लिए बेहतरीन शिक्षा की व्यवस्था भी कर दी जाती है. वह आजीविका की ओर से भी निश्चिंत होता है. अध्यापन पूरा होते ही उसके सक्षम माता-पिता उसकी सम्मानित आजीविका का प्रबंध कर देते हैं. दूसरी ओर वह गरीब है, जिसके माता-पिता अनपढ़ है. परिवार में शिक्षा का कोई माहौल नहीं है. न ही उसके माता-पिता अच्छी शिक्षा दे पाने की स्थिति में हैं. कष्टमय जीवन जीता हुआ वह आधी-अधूरी शिक्षा ही पूरी कर पाता है. आर्थिक समस्याओं के चलते पढ़ाई बीच में छोड़ जीविकोपार्जन के लिए जुटना पड़ता है. जाहिर है, कैरियर की स्पर्धा में पहले का आरंभ-बिंदू चूंकि दूसरे से बहुत आगे था, इसलिए वह शुरुआत से ही लाभ की स्थिति में होगा. वह न केवल बड़े सपने देखेगा, बल्कि उन्हें पाने की भरपूर कोशिश करेगा. समस्याओं से ग्रस्त दूसरा व्यक्ति स्पर्धा में उसके आगे टिक नहीं पाएगा. निष्कर्षतः दोनों के बीच का अंतर निरंतर बढ़ता जाएगा.

सत्ता और संसाधनों के आधार पर सामाजिक विभाजन की स्थिति को विल्फर्ड परेतो जॉन राउल्स से करीब एक शताब्दी पहले ही सिद्ध कर चुका था. अलग-अलग देशों के लगभग पांच सौ वर्ष के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए वह इस नतीजे पर पहुंचा था कि सभी युगों और लगभग सभी समाजों में 80 प्रतिशत आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक शक्ति केंद्रों पर 20 प्रतिशत अभिजनों का अधिकार रहा है. अभिजनेत्तर समुदाय अपनी स्थिति से उबरने के लिए निरंतर प्रयास करते रहते हैं, लेकिन जब तक वे विकास की एक सीढ़ी को पार करते हैं, उस अवधि में अभिजन समुदाय जो संख्या में उनसे कम तथा संसाधनों के मामले में कई गुना आगे है—उनसे बहुत ऊपर उठ चुका होता है. इस विश्लेषण के आधार पर ही परेतो इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि ‘जनतंत्र महज भ्रम है. शिखरस्थ सत्ताधारी अभिजन सदैव लाभ की स्थिति में रहता है. परेतो वस्तुस्थिति से कुछ ज्यादा ही निराश था. उसने तानाशाह मुसोलिनी के शासन का स्वागत इस उम्मीद के साथ किया था कि वह ‘वास्तविक उत्पादक शक्तियों’ यानी श्रमिक वर्ग की स्वतंत्रता को संभव कर सकेगा. परेतो का अनुमान गलत सिद्ध हुआ था. एक तानाशाह से लोककल्याण की वांछा रखना, यह सोचना कि वह समाज के अधिसंख्यक वर्ग की वास्तविक स्वतंत्रता और समानता को लौटा सकेगा, पूरी तरह गलत था. परेतो के बाद एक शताब्दी में बहुत कुछ बदला था. हाब्स, ग्रीन, जॉन स्टुअर्ट मिल, थाॅमस पेन, जेफरसन जैसे स्वतंत्रतावादी-मानवतावादी विचारकों ने लोकतंत्र की जड़ें मजबूत की थीं, जिससे कालांतर में मानवाधिकारवादी आंदोलनों को बल मिला. यह बात अलग है कि इस बीच पूंजीवाद ने भी तेजी से पंख पसारे तथा अपनी पूंजी एवं प्रलोभनकारी नीतियों के दम पर, तमाम किस्म के अवरोधों के बावजूद वह निरंतर फलता-फूलता रहा.

अपनी महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘ए थ्योरी आ॓फ जस्टिस’, जिसे न्याय-शास्त्र के क्षेत्र में रूसो के ग्रंथ ‘दि सोशल कांट्रेक्ट’ जैसी महत्ता प्राप्त है—में राउल्स दुर्भाग्यों की सीमारेखा को चिन्हित करता है. उसमें प्रथम छोर पर जन्म दुर्भाग्य हैं, जो जन्म से ही मनुष्य के साथ चिपक जाते हैं. जिनमें व्यक्ति का अपना कोई योगदान नहीं होता. उनसे मुक्ति दिलाना, राज्य का दायित्व है. दूसरे छोर पर ऐसे ‘दुर्भाग्य’ हो सकते हैं, जो व्यक्ति की अपनी लापरवाही अथवा कमजोरी के कारण जन्म लेते हैं. उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति अपने जीवन भर की कमाई को शराब या जुए की लत पर गंवा सकता है. ऐसे ‘दुर्भाग्य’ के प्रति राज्य की सीधी जिम्मेदारी नहीं होती. इसके बावजूद समाज का यह दायित्व होता है कि वह अपनी सदस्य इकाइयों को ऐसा वातावरण उपलब्ध कराए, जिसमें नकारात्मक वृत्तियों के उभार के लिए कम से कम अवसर हों. साथ में जरूरी है कि लोगों को सामाजिक बुराइयों के बारे में समयानुसार चेतावनी देता रहे. राउल्स के अनुसार जो पहली श्रेणी के ‘दुर्भाग्य’ हैं, वे समाज में व्याप्त असमानता से जन्मते हैं. एक तरह से वह समाज की मूल संरचना पर सवाल उठाते हैं. उदाहरण के लिए यदि किसी समाज में जाति अथवा रंग-भेद के नाम पर विभाजन है, तो उसका दुष्प्रभाव समाज में आर्थिक-सामाजिक विषमता और सामाजिक असंतोषों के रूप में देखने को मिलेगा. दूसरे श्रेणी के ‘दुर्भाग्य’ के लिए व्यक्ति और समाज दोनों जिम्मेदार होते हैं. व्यक्ति अपने चारित्रिक विचलनों और समय पर उचित निर्णय न ले पाने के कारण नुकसान उठाता है, तो समाज इस बहाने कि वे व्यक्ति-विशेष की कमजोरियों का नतीजा थे, अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता. इसलिए कि व्यक्ति की मनोरचना पर उसके परिवेश का भी प्रभाव पड़ता है. समाज में व्याप्त स्तरीकरण संवेदनशीन मनुष्य को उकसाता है. निरंतर उपेक्षा और उत्पीड़न से उसके मन में आक्रोश पनपने लगता है. उसी से दूसरी कमजोरियां और विकार जन्म लेते हैं. वही प्रकारांतर में व्यक्ति के ‘दुर्भाग्य’ का कारण बनते हैं. जन्माधारित अभावों और बुरे वातावरण का बालक के भावी जीवन पर असर न पड़े, यह सुनिश्चित करना सरकार का दायित्व है. सरकार का यह भी दायित्व है कि वह ऐसे व्यक्तियों से जो जन्म के आधार पर आगे हैं, जिनके पास संसाधनों का अतिरेक है, कुछ सुविधाएं समाज के पिछड़े वर्गों तथा सुविधा-वंचित लोगों तक पहुंचाए.

राउल्स की निगाह में सामाजिक असमानताएं भी स्वीकार्य हैं, बशर्ते उनका समायोजन इस प्रकार किया गया है कि समय आने पर वे सुविधा-साधन वंचित वर्गों के विकास में मददगार सिद्ध होंगी. आखिर वे कौन-सी वस्तुएं हैं जिनके आधार पर एक व्यक्ति विकास के मामले में दूसरे से आगे मान लिया जाता है. राउल्स ने समाजार्थिक वरीयता के कारकों को सूचीबद्ध करने की कोशिश की है तथा उन्हें ‘प्राथमिक सामाजिक वस्तुएं’ का नाम दिया है. इसमें वे वस्तु और अवसर सम्मिलित हैं, जिनके अभाव में कोई व्यक्ति स्वयं को पिछड़ा मानने को तैयार होता है. यह बात किसी को भी चैंका सकती है कि राउल्स प्राथमिक सामाजिक वस्तुओं की श्रेणी में ‘स्वाधीनता’ को सम्मिलित नहीं करता. जबकि लोकतंत्र में समानाधिकार और अवसरों की समानता का लक्ष्य पहले से ही निर्धारित होता है. संभवतः वह स्वाधीनता को लोकतंत्र में अंतनिर्हित मान लेता है. अपने न्याय सिद्धांत में वह जिस तरह व्यक्ति के अधिकारों को विस्तार देता है, उसमें इसपर कोई संदेह भी नहीं रह जाता कि राउल्स के लिए लोकतंत्र और स्वाधीनता अलग-अलग न होकर, न्याय की मूलभूत अपेक्षाएं हैं. उसका न्याय-संबंधी दर्शन इन्हीं अपेक्षाओं को संभव बनाने की बौद्धिक छटपटाहट का नतीजा है.

समाज में न्याय की स्थापना के लिए राउल्स सामाजिक संस्थाओं के वर्तमान ढांचे से कोई उम्मीद नहीं रखता. बजाय इसके उसे राजनीतिक संस्थाओं से काफी अपेक्षाएं हैं. सार्वत्रिक कल्याण और वंचितों को न्याय की मुख्यधारा में लाने के लिए वह समाज की सभी प्रमुख संस्थाओं के पुनर्मूल्यांकन का सुझाव देता है. इस प्रक्रिया में भी उसका पूरा आग्रह स्थानीय लोकतंत्र को मजबूत करने के साथ, प्रशासनिक प्रणाली को और अधिक चुस्त-दुरुस्त, उत्तरदायी एवं पारदर्शी बनाने पर रहता है, ताकि उन नागरिकों के प्रति जो जन्म, परिवार, समाज, धर्म, समाज या राजनीतिक कारणों से विकास की मुख्यदारा में पिछड़ चुके हैं, उन्हें आवश्यक प्रोत्साहन, समर्थन, सहायता आदि देकर मुख्यधारा का हिस्सा बनाया जा सके. राउल्स लोकतंत्र समर्थित आधुनिक राजनीतिक संस्थाओं को मनुष्य की स्वातंत्रय चेतना की परिणति मानता है. उसका विश्वास है कि ‘परिपक्व स्वातंत्रयबोध के साथ न्याय’ की अवधारणा विशुद्ध राजनीतिक है. उसको इसी रूप में बेहतर समझा जा सकता है. न्याय को धार्मिक और नैतिक प्रत्यय मान लेना राउल्स को स्वीकार न था. पुनश्चः वह कहना चाहता है कि न्याय की अवधारणा की सटीक व्याख्या केवल राजनीतिक मूल्यों के संदर्भ सहित संभव है. दूसरे शब्दों में राउल्स के लिए न्याय राज्य की विषयवस्तु है. लोकतंत्र-सम्मत, उदार राजनीतिक प्रणाली के माध्यम से उसको सर्वसुलभ बनाया जा सकता है. 1971 में प्रकाशित पुस्तक ‘दि थ्योरी आ॓फ जस्टिस’ में वह सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार, समान स्वतंत्रता, समान एवं पर्याप्त अवसर सहित, राज्य के निष्पक्ष आचरण पर जोर देता है. उसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपनी स्वाधीनता, मूलभूत अधिकार, भरण-पोषण हेतु पर्याप्त संसाधनों पर दावेदारी तथा उपयुक्त योजनाओं में हिस्सेदारी का पूरा अधिकार है. राज्य का दायित्व है कि जन्म, वर्ण, धर्म, संप्रदाय, कद-काठी, लिंग आदि के कारण जन्म लेने वाली सभी प्रकार की असमानताओं, चाहे वे कृत्रिम हों या प्रकृतिजन्य, जो पक्षपातपूर्ण आचरण के लिए जिम्मेदार हैं या उसका कारण बन सकती हैं—का निराकरण कर सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित करे.

राउल्स के लिए न्याय सांस्कृतिक और नैतिक से ज्यादा राजनीतिक लक्ष्य है. उसी रूप में वह उसका समाधान चाहता है. उल्लेखनीय है कि अतीत में न्याय को अधिदैविक, अधिभौतिक, नैतिक-व्युत्पत्ति कहकर राजनीतिक दर्शन से परे सिद्ध करने की कोशिश की जाती रही है. राउल्स का मानना था कि इस तरह की आध्यात्म-केंद्रित और नीतिवादी अवधारणाएं व्यक्ति एवं समाज दोनों को भटकाती हैं. इससे राज्य को अपने दायित्वों से बच निकलने, कर्तव्य से पलायन करने का अवसर मिल जाता है. इस सर्वमान्य तथ्य को भुलाकर कि राज्य जनता की सम्मिलित इच्छा की अनुकृति है—पुराने साम्राज्यवादी राज्य अपनी सत्ता को लोकेच्छा के बजाय ईश्वरीय इच्छा अथवा वरदान की परिणति मानते थे. राज्य के विस्तार और सुरक्षा के लिए वे हजारों-लाखों सैनिकों को जो सामान्य परिवारों से आते थे, और निस्संदेह बहुत साहसी और बहादुर भी होते थे, बिना उनका खास एहसान माने, अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की बलि चढ़ा देते थे. धर्म उनके पाखंडों का महिमामंडन करता था. चूंकि जनसाधारण धर्म के सम्मोहन में फंसा था, इसलिए राजकोष का बड़ा हिस्सा दैवी शक्तियों को प्रसन्न रखने में, उनकी अभ्यर्थना के नाम पर खर्च हो जाता था. उनकी देखा-देखी समाज का सुविधा-वंचित वर्ग भी अपने त्राण के लिए दैवीय कृपा की अपेक्षा रखने लगा. राज्य को दैवीय सत्ता तथा राजन्यों के वैभव-विलास को ईश्वरीय अनुकंपा मामने का कुफल ही था कि जनसाधारण की अपनी दुर्दशा के वास्तविक कारणों पर नजर ही नहीं जाती थी. अपनी दुश्वारियों के लिए भाग्य और परिस्थितियों को दोष देकर वह आजीवन कुढ़ता रहता था. दूसरी ओर कथित अधि-दैविक शक्तियों की कृपा से कल्याण के प्रबंधन का दावा करने वाला एक वर्ग ऐसा भी था, जो भौतिक सुख-सुविधाओं, वैभव और ताकत का भरपूर उपयोग करता था. धार्मिक शक्तियों का एक वर्ग न्याय को धार्मिक नैतिकता से जोड़कर देखता है. यद्यपि करुणा और दया जैसे मानवीय प्रत्यय धार्मिक नैतिकता से जुड़े हैं. दान, जकात, खैरात जैसे शब्द धार्मिक नैतिकता के चलते ही अस्तित्व में आए हैं. इनसे उपकार और करुणा की भावनाएं झलकती हैं, जो मानवीय उदारता का प्रतीक हैं. किंतु दान, जकात या खैरात के बहाने धार्मिक शक्तियां बड़ी चालाकी से समाजार्थिक असमानता, राजनीतिक-व्यापारिक लूट तथा उसके पीछे छिपे विभेदकारी सोच पर पर्दा डाल देती हैं. इसलिए धर्मसम्मत नैतिकता, जिसमें समाज का बड़ा वर्ग अपने विवेक को दूसरों के यहां गिरवी रख देता है, और अपने पुरुषार्थ के बजाय दूसरों की दया पर जीने का सपना पाल बैठता है, न्याय का प्रतीक नहीं कहा जा सकता.

समाज यदि मनुष्य का वरण है तो उसमें अधिकारों के आधार पर ऊंच-नीच या किसी और कारण से असमानता की भावना, अनैतिक और अप्राकृतिक मानी जाएगी. समानता के इस लक्ष्य को कोरी नैतिकता के सहारे प्राप्त कर पाना संभव नहीं है. उसके लिए समाज में पर्याप्त अधिकार चेतना भी चाहिए. न्याय को नैतिक, दार्शनिक अथवा धार्मिक मूल्यों से जोड़कर, उसका दैवीकरण करने से न्याय के जनसाधारण की पहुंच से दूर जाने की संभावना रहेगी. शताब्दियों से यही होता आ रहा है. ढाई-तीन हजार वर्ष पहले जब धर्म का उदय हुआ तो यह माना गया था कि धार्मिक आचार-संहिताएं, मनुष्य को अनुशासन तथा नैतिकता का पाठ पढ़ाती रहेंगी. परंतु आस्था, जिसे अंध-आस्था कहना भी अनुचित न होगा, पर टिका होने के कारण धर्म मनुष्य के विवेक को परिपक्व होने का अवसर ही नहीं देता. अंध-आस्था और जड़ विश्वासों से भ्रमित मनुष्य अनुसरण की वृत्ति अपना लेता है. अपने कर्तव्य और अधिकारों को बिसराकर वह भाग्य के भरोसे जीने लगता है. जाहिर है उसके परिणाम प्रतिगामी होते हैं, जिनकी निरंतरता राज्य को गुलामी को ढकेल देती है. भारत में इसका कुफल देश को लंबी गुलामी तथा सामंती संस्कारों के लंबे इतिहास के रूप में झेलना पड़ा था. आशय है कि न्याय की गहन दार्शनिक व्याख्याएं उसे आम आदमी के लिए दुरूह और जटिल बना देती हैं. इससे न्याय के रास्ते में आ रही अड़चनों से मुक्ति उसके लिए काफी कठिन होती है. समस्याओं के समाधान के लिए उसे ऐसे लोगों की शरण में जाना पड़ता है, जिनके अपने स्वार्थ प्रबल होते हैं. ऐसे लोग मदद करने या उचित राह दिखाने के बजाय स्थितियों की व्याख्या अपने स्वार्थ के अनुरूप करते हैं. उसी के आधार पर कालांतर में शोषण के नए-नए तरीके इंजाद कर लिए जाते हैं.

सुख की वांछा जितनी व्यक्ति में होती है, उतनी ही समाज में भी होती है. अंतर केवल इतना है कि व्यक्ति केवल निजी सुख तक सीमित होता है, अपनी सीमाओं में वह उन्हीं के लिए प्रयास करता है. जबकि समाज की इच्छा में उसकी सदस्य इकाइयों की इच्छा की अभिव्यक्ति होती है. इस तरह राउल्स व्यक्ति और समाज को, परिमाण की दृष्टि से नजरंदाज करते हुए, न्याय की दृष्टि करीब-करीब बराबर मान लेता है. उसका मंतव्य यहां व्यक्ति और समाज के द्वंद्व अथवा उसकी मूलभूत समानताओं को दर्शाना नहीं है. बल्कि एक बारीक अंतर की ओर इशारा करना है. उसके अनुसार अपने वर्तमान के लाभ-हानि के लिए प्रयत्नरत अकेला व्यक्ति केवल एक इकाई होता है. अपने हानि-लाभ के लिए वह स्वयं उत्तरदायी होता है. यदि उसके किसी निर्णय से हानि होती है, तो उसे हानि का सामना स्वयं करना पड़ेगा. और यदि लाभ होता है, तो खुशी-खुशी वह स्वयं लाभ को घर ले जा सकेगा. सामान्य परिस्थिति में उसे किसी तीसरे व्यक्ति को कोई नुकसान नहीं पहुंचता. लेकिन समाज के मामले में ऐसा नहीं है. समाज या सामाजिक समूहों में यह आवश्यक नहीं कि जो व्यक्ति किसी खास काम की शुरुआत करता है, उसकी सफलता या असफलता का लाभ या हानि उसी को हो. समाज व्यक्तियों का समुच्चय है. उसके प्रयास दीर्घायामी होते हैं. समाज के किसी निर्णय का लाभ या हानि तत्काल या कुछ समयांतराल से ऐसे लोगों को उठानी पड़ सकती है, जिनका उन निर्णय में कोई योगदान न हो.

यहां आकर उपयोगितावादी विचारधारा की सीमाएं स्पष्ट होने लगती है. जॉन राउल्स की खूबी थी कि उसने दर्शन और राजनीति विज्ञान दोनों को न्याय के पक्ष में खड़ा कर दिया था. उसके लिए न्याय का आशय कानून, अदालत और उस न्यायिक प्रक्रिया से एकदम भिन्न था, जिसे सामान्यतः समाज में न्याय के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. न्याय से उसका अभिप्राय सुख और शुभता की सर्वोपलब्धता एवं सर्वव्याप्ति से था. न्याय को कल्याण के पर्याय के रूप में देखने वाला राउल्स हालांकि पहला विचारक नहीं था. स्वयं प्लेटो ने ‘दि लाॅज’ नामक विशाल ग्रंथ में न्याय के इसी कल्याणकारी स्वरूप की व्याख्या की थी. उसके बाद अरस्तु ने यह कहकर कि ‘राजनीतिक विज्ञान मानवीय ज्ञान-विज्ञान की सभी धाराओं में सर्वोत्तम है, वही समाज को शुभता के उस शिखर तक ले जा सकता है, जिसे हम न्याय कहते हैं’—समाज में न्याय की महत्ता की ओर संकेत किया था. अरस्तु के बाद इटली के विधिवेत्ता इनेरियस(लगभग 1050—1130) ने भी वितरणात्मक न्याय का पक्ष लिया. उससे लगभग पांच शताब्दी बाद जन्मे जोसेफ एडीसन, जिसे यूरोप में ‘न्यायशास्त्र का दीपस्तंभ’ कहा जाता है, ने यह कहकर कि ‘न्याय जैसा कोई सद्गुण नहीं है’, समाज में पुनः एकजुट होने का आवाह्न किया था. तदनंतर डेनियल बेवस्टर, इमानुएल कांट, हाब्स, जोसेफ हीगेल, जॉन लाक, जॉन स्टुअर्ट मिल, था॓मस जेफरसन जैसे विचारकों की लंबी संख्या है. जिन्होंने समाज में वितरणात्मक न्याय को सम्मान सहित स्थापित करने की कोशिश की थी. डेनियल बेवस्टर का मानना था कि, ‘न्याय धरती पर मानवमात्र का सबसे बड़ा लक्ष्य है. यह अस्थि-मज्जा का वह ढांचा है जो सभ्य मनुष्य तथा सभ्य समाज को परस्पर निकट लाता है. जहां-जहां जब तक उसके मंदिर और उनका सम्मान रहेगा, वहां-वहां सामाजिक सुरक्षा एवं शांति, सुखामोद तथा आनेवाली पीढ़ियों के विकास की गारंटी रहेगी.’3

© ओमप्रकाश कश्यप

1. There is no virtue so truly great and godlike as justice…. Omniscience and omnipotence are requisites for the full exercise of it.”-Addison,
2. ….there is…a way of thinking of society which makes it very easy to suppose that the most rational conception of justice is utilitarian. For consider: each man in realizing his own interests is certainly free to balance his own losses against his own gains. We may impose a sacrifice on ourselves now for the sake of a greater advantage later. A person quite properly acts, at least when others are not affected, to achieve his own greatest good, to advance his rational ends as far as possible. Now why should not a society act on precisely the same principle applied to the group and therefore regard that [decision- making procedure] which is rational for one man as right for an association of men? Just as the well- being of a person is constructed from the series of satisfactions that are experienced at different moments in the course of his life, so in very much the same way the well-being of society is to be constructed from the fulfillment of the systems of desires of the many individuals who belong to it. Since the principle for an individual is to advance as far as possible his own welfare, his own system of desires, the principle for society is to advance as far as possible the welfare of the group, to realize to the greatest extent the comprehensive system of desire arrived at from the desires of its members. Just as an individual balances present and future gains against present and future losses, so a society may balance satisfactions and dissatisfaction between different individuals. And so by these reflections one reaches the principle of utility in a natural way: a society is properly arranged when its institutions maximize the net balance of satisfaction.- John Rawls in A Theory of Justice (Cambridge, MA: Harvard University Press, 1971), pp. 23-4.
3. “Justice is the great interest of man on earth. It is the ligament which holds civilized beings and civilized nations together. Wherever her temple stands and so long as it is duly honored, there is a foundation for social security, general happiness, and the improvement and progress of our race.” Daniel Webster

अहिंसा और इंसानियत के दो दावेदार

सामान्य

उन दोनों के देश अलग थे, धर्म अलग थे, भाषाएं और कार्यक्षेत्र अलगअलग थे. दोनों आमनेसामने कभी मिल भी न पाए थे. आपसी पत्रव्यवहार भी न के बराबर था. इसके बावजूद उनके मन में एकदूसरे के प्रति अगाध श्रद्धा थी. उनमें से एक विज्ञान के क्षेत्र की शिखरतम प्रतिभा था. नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर वह विश्व का विलक्षण मेधासंपन्न वैज्ञानिक माना गया. विज्ञान जगत उसकी अकूत मेधा और अद्वतीय कल्पनाशीलता से इतना अभिभूत था कि उसकी बौद्धिक विलक्षणता को समझने के लिए मरणोपरांत उसके मस्तिष्क को संरक्षित रखा गया. दूसरा पुरस्कारसम्मान से बहुत ऊपर था. इतना ऊपर कि हर सम्मान, पुरस्कार उसके नाम से जुड़कर सम्मानित होता था. दोनों ही विश्वशांति के समर्थक थे. एक के शोध को आधार बनाकर कुछ सिरफिरे वैज्ञानिकों ने परमाणु बम का निर्माण किया, जो दूसरे विश्वयुद्ध में तबाही का कारण बना. दूसरे की कथनीकरनी में एकता थी. वह आजीवन सत्य और अहिंसा की बात करता और उस पथ पर चलता रहा. फिर भी उसकी मृत्यु एक सिरफिरे राष्ट्रवादी की गोली से हुई. एक को नवगठित देश का राष्ट्रपति बनने का न्योता मिला. तब उसने यह कहकर कि वह राजनीति के लिए नहीं बना है—प्रस्ताव विनम्रतापूर्वक लौटा दिया. दूसरा बना ही राजनीति के लिए था. उसके लिए राजनीति समाजसेवा थी और समाजसेवा राजनीति. अतः आजादी के बाद जब उसके देश में अपनी सरकार बनी तो जनसेवा के प्रति अपनी संकल्पबद्धता दोहराकर वह सत्ता के प्रलोभन से हमेशा के लिए मुक्त हो गया. पहले की कल्पनाशक्ति जब मुक्ताकाश में डोलती तो उसमें हजारों ग्रहनक्षत्र और ब्रह्मांडीय स्फुर्लिंग ज्योतिवान हो उठते थे. दूसरा जिस दिशा में कदम बढ़ाता सैकड़ों लोग कतार बांधे उसका अनुसरण करने लगते. दोनों में अनेक समानताएं थीं और अंतर भी. उनमें से प्रत्येक ने अपने समय और समाज को गहराई से प्रभावित किया. बेशुमार ख्याति, मानसम्मान पाया. अपने जीवनआचरण में दोनों मनुष्यता के पक्षधर, पवित्रता, सादगी, नैतिकता की मिसाल और इंसानियत के दावेदार बने रहे.

 

इतने विवरण के बाद अपने समय की इन विरलतम प्रतिभाओं का नामोल्लेख आवश्यक नहीं है. पाठकगण जान चुके होंगे कि उनमें से एक का नाम था—मोहनदास करमचंद गांधी, दूसरे का—अल्बर्ट आइंस्टीन. आइंस्टीन का जन्म 1879 में हुआ था. गांधी के जन्म के दस वर्ष बाद. बचपन में दोनों ही संकोची थे. विद्यार्थी भी साधारण ही माने गए. आइंस्टीन को स्कूल में साथियों का उपहास सहना पड़ता था. गांधी पोरबंदर के दीवान के बेटे थे. इसलिए उनका वैसा उपहास तो नहीं होता था, मगर विद्यार्थी वे औसत ही थे. दोनों की शुरुआत साधारण थी. पढ़ाई पूरी करने के बाद आइंस्टीन ने पेटेंट कार्यालय में नौकरी कर ली. लंदन से बैरिस्टर बनकर लौटे अवश्य, किंतु वकालत के लिए जरूरी लंदफंद से दूर रहने के कारण आरंभ में असफलता ही उनके हिस्से आई. दोनों ने अपनी दुर्बलताओं को हथियार बनाया. आइंस्टीन कल्पनाजगत में डूबे रहने वाले विद्यार्थी थे. औपचारिक पढ़ाईलिखाई में उनका मन कम ही लगता था. सापेक्षिकता के सिद्धांत की खोज उनकी अद्वितीय कल्पनाशक्ति के बल पर संभव हो सकी थी. गांधी ने अपनी सहनशक्ति और त्याग को ताकत बनाया था. अपने आचरण से उन्होंने सिद्ध किया कि अहिंसा, सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा जैसे विचार केवल कागजी नहीं हैं. पर्याप्त नैतिक सामथ्र्य हो तो उन्हें आचरण में भी उतारा जा सकता है. दोनों को अपने ऊपर अटूट विश्वास था. आइंस्टीन ने सापेक्षिकता के सिद्धांत की परिकल्पना दुनिया के सामने रखी तो उनका खूब मजाक उड़ाया गया. अधिकांश वैज्ञानिकों का मानना था कि डॉप्लर प्रभाव जैसे ध्वनि पर असरकारक होता है, वैसे ही प्रकाश पर भी उसका असर पड़ता है. लेकिन आइंस्टीन अपनी धारणा पर अडिग रहे. खिल्ली उड़ाने वालों को उनका एक ही जवाब था—‘गलत सिद्ध करके दिखाओ?’ गांधी की अहिंसा को आलोचकों ने भीरूपन कहा था. मगर वे स्थिरमना अपने काम में लगे रहे. आखिर खुद को दुनिया की महाशक्ति समझने वाला ब्रिटिश साम्राज्य एक अधनंगे फकीर के आगे घुटने टेकने को मजबूर हो गया. आइंस्टीन विलक्षण की सीमा तक अंतर्मुखी थे. उनका मस्तिष्क गणित की पहेलियों को हल करने में उलझा रहता था. गांधी अपने अनूठे प्रयोगों, कथनीकरनी की एकता तथा आचरण की पवित्रता के दम पर, लोगों के चहेते थे.

 

गांधी के अहिंसावादी दृष्टिकोण, जीवन की सादगी, सत्य के प्रति अटूट निष्ठा, जनांदोलनों की गहरी समझ तथा लोगों के दिलों में पैठ बनाने के अकूत सामर्थ्य ने आइंस्टीन को प्रभावित किया था. संभवतः ऊर्जा के अजस्र, विराट स्रोत की खोज के रूप में दुनिया को परमाणु बम का आधारसिद्धांत देने वाला भावुक, संवेदनशील, मनुष्यता का हितचिंतक, नैतिकबोध से संपन्न सरलमना वैज्ञानिक अपने आविष्कार के दुरुपयोग की संभावनाओं की कल्पनामात्र से खुद को दोषी मान बैठा था. उल्लेखनीय है कि सापेक्षिकता के सिद्धांत की खोज के दौरान आइंस्टीन ने सिद्ध किया था कि ऊर्जा और पदार्थ परस्पर अंतपर्रिवर्तनीय हैं. इस प्रक्रिया में विपुल ऊर्जा उत्पन्न होती है. इसके बाद से ही परमाणु विखंडन द्वारा ऊर्जा के चिरंतन स्रोत को प्राप्त करने की कोशिशें तेज हो चली थीं. प्रथम विश्वयुद्ध में चोट खाए देश गुपचुप अपनी ताकत का विस्तार करने में लगे थे. राष्ट्रों के बीच हथियारों की अंधस्पर्धा तथा भीतर ही भीतर उमड़ता असंतोष, नए विश्वयुद्ध की भविष्यवाणी कर रहा था. अपनी दूरद्रष्टि से आइंस्टीन ने शायद यह भांप लिया था कि कोई सिरफिरा वैज्ञानिक परमाणु ऊर्जा संबंधी उनके शोध का दुरुपयोग कर, मनुष्यता के समक्ष भयावह संकट प्रस्तुत कर सकता है. इसीलिए गांधी, जो दक्षिणी अफ्रीका में सत्याग्रह का सफल प्रयोग कर चुके थे और भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का नेतृत्व करते समय भी अहिंसा पर पूर्णतः अडिग थे, का मानवतावादी द्रष्टिकोण उन्हें आकर्षित करता था. विश्वशांति की चाहत रखनेवाले आइंस्टीन निरस्त्रीकरण के सबसे मुखर समर्थकों में थे. उसके पीछे बर्ट्रेंड रसेल, रवींद्रनाथ ठाकुर के अलावा गांधी की प्रेरणा भी प्रमुख थी. विश्वशांति के प्रति आइंस्टीन की प्रतिबद्धता का एक और प्रमाण था—अनिवार्य सैन्यसेवा एवं युद्ध प्रशिक्षण के विरोध में जारी घोषणापत्र, जिसपर उनके और महात्मा गांधी के अलावा रवींद्रनाथ ठाकुर, सिगमंड फ्रायड, रोमन रोलेंड, एच. जी. वेल्स आदि के हस्ताक्षर थे.

 

आइंस्टीन का विज्ञान पर भरोसा था. वह मानते थे कि विज्ञान की मदद से विश्व की भीषण समस्याओं यथा गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा आदि का उपचार संभव है. अनियोजित मशीनीकरण की आलोचना करते हुए आइंस्टीन ने कहा था कि पूंजीवादी तंत्र के नेतृत्व में होने वाली प्रौद्योगिकीय क्रांति ने लोगों की गरीबी और अन्यान्य समस्याओं का समाधान करने के बजाय उन्हें बेरोजगारी की ओर ढकेला है. उसकी सबसे बड़ी बुराई है कि वह अपनी कीमत मनुष्य की कार्यक्षमता एवं कौशल से वसूलता है. अपने ही जैसे शोषितों, उत्पीड़ितों के साथ स्पर्धा और शोषणकारी स्थितियों से घिरा श्रमिक खुद को उनके आगे पंगु और लाचार अनुभव करता है. आपसी अविश्वास, कुंठा, हताशा, दैन्य और अवसाद जैसे अवगुण उसे घेर लेते हैं. पूंजीवादी समाज की ऐसी अनेकानेक नकारात्मक स्थितियों और संभावनाओं के बीच सर्वोदय, सादगी, अहिंसा, आर्थिक आत्मनिर्भरता तथा विश्वबंधुत्व को समर्पित गांधी के विचार, उनका समाज के प्रति सकारात्मक और नीतिसम्मत सोच आइंस्टीन को उम्मीद के ताजे झोंके की तरह लगता था.

 

आइंस्टीन के मन में गांधी के प्रति सम्मान भाव पहली बार जुलाई-1929 में ‘क्रिश्चन सेंच्युरी’ को दिए गए साक्षात्कार में प्रकट हुआ, जिसमें उन्होंने गांधी द्वारा अहिंसापूर्ण ढंग से चलाए जा रहे आंदोलन की सराहना की थी. दोनों के बीच इकलौते पत्रव्यवहार की शुरुआत आइंस्टीन की ओर से होती है. घटना 1931 की है. गांधी उस दिनों गोलमेज यात्रा के सिलसिले में लंदन की यात्रा पर थे. आइंस्टीन तब बर्लिन में थे. वहीं, उनके आवास पर गांधी का शिष्य सुंदरम उनसे मिला. उसके माध्यम से आइंस्टीन ने एक पत्र गांधी को भेजा था. 27 सितंबर, 1931 को लिखे उस पत्र में उन्होंने गांधी के प्रति अपनी श्रद्धा को बिना लागलपेट प्रस्तुत किया था—

 

परम आदरणीय गांधी जी,

इस पत्र को आप तक पहुंचाने के लिए मैंने आपके मित्र का सहारा लिया है, जो इस समय मेरे घर मेरे मेहमान हैं. अपने कार्यकलापों द्वारा आपने दिखा दिया कि उन सभी आदर्शों को जिनकी हम केवल कल्पना कर सकते हैं, हिंसा का सहारा लिए बिना भी प्राप्त किया जा सकता है और उन्हें जिनको हिंसा पर भरोसा है, अहिंसा के माध्यम से आसानी से जीता जा सकता है. हमें उम्मीद करनी चाहिए कि आपका संदेश आपके देश की सीमाओं के पार भी फैलेगा. उसके माध्यम से अंतरराष्ट्रीय मतभेदों का स्थायी समाधान संभव होगा. यही एकमात्र रास्ता है जो वैश्विक शांति एवं खुशहाली की ओर जाता है, जिससे हम अपने मतभेदों को आसानी से सुलझा सकते हैं. पुनश्चः! आपके प्रति अपनी हार्दिक श्रद्धा और सम्मानभाव के साथ मैं उम्मीद करता हूं कि बहुत जल्दी हम आमनेसामने होंगे.’

 

पत्र में गांधी के अहिंसावादी द्रष्टिकोण के प्रति एक उदारमना वैज्ञानिक के उद्गार थे. गांधी विश्वशांति हेतु आइंस्टीन के कार्यकलापों से परिचित थे. उनके प्रति मन में अगाध श्रद्धा भी थी. इसलिए पत्र का त्वरित प्रत्युत्तर देते हुए उन्होंने 18 अक्टूबर को आइंस्टीन को लिखा—

 ‘सुंदरम के हाथों आपका खूबसूरत पत्र मुझे मिला. मुझे यह जानकर अत्यधिक संतोष है कि आप मेरे कार्यों का समर्थन करते हैं. मेरी उत्कट अभिलाषा है कि हमारी आमनेसामने की भेंट हो और आप भारत में मेरे आश्रम का आतिथ्य ग्रहण करें.’

 आइंस्टीन गांधी के आमंत्रण पर भारत भले न आ सके, मगर गांधीजी द्वारा भारत में किए जा रहे सत्य एवं अहिंसा के प्रयोगों से निरंतर प्रेरणा लेते रहे. वे मूलतः वैज्ञानिक थे. विज्ञान के उपयोग को लेकर उनका मत ‘पश्चिमी विज्ञान का पितामह’ कहे जाने वाले दार्शनिक फ्रांसिस बेकन(1561—1626) से मेल खाता था. पंद्रहवीं शताब्दी की वैज्ञानिक क्रांति से उत्साहित बेकन का कहना था कि मशीनें मनुष्य को जानलेवा श्रम से मुक्ति दिलाकर उसके कल्याण की राह प्रशस्त करेंगी. बेकन के दिए ‘ज्ञान ही शक्ति है’ के नारे के साथ कालांतर में विज्ञान ने खूब तरक्की की. लेकिन उसके लोकोपकारी उपयोग को लेकर बेकन की भविष्यवाणी पूर्ण सच न हो सकी. खर्चीला उद्यम होने के नाते वैज्ञानिक शोधों की धारा उस दिशा में अग्रसर रही, जो केवल समाज के प्रभुवर्ग की स्वार्थानुरूप थी. इससे श्रमविरोधी मशीनों के विकास को बढ़ावा मिला. कालांतर में उससे समाजार्थिक स्तरीकरण और बेरोजगारी में वृद्धि हुई. पूंजी की मनमानी के फलस्वरूप हुए मशीनीकरण ने उन कारीगरों और शिल्पकर्मियों के समक्ष अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया था, जो परंपरागत अर्थव्यवस्था में, सामंतवादी दबावों के बावजूद अपने श्रम एवं कौशल के दम पर सम्मानित जीवन जीते आए थे. धीरेधीरे यह चुनौती और भी कठिन, कठिनतर होती गई. आगे चलकर इसी ने यूरोप के वैचारिक आंदोलनों के लिए नई जमीनें तैयार कीं.

 

गांधी के सत्य और अहिंसा के आदर्श के प्रति आइंस्टीन की अटूट श्रद्धा थी. उत्तरोत्तर बढ़ते वैश्विक तनाव तथा वैमनस्यकारी स्थितियों के बीच गांधी का रास्ता उनकी एकमात्र उम्मीद थी. बावजूद इस श्रद्धाभाव के कुछ मुद्दों को लेकर गांधी से उनका मतभेद था. ऐसा ही मुद्दा उत्पादन क्षेत्र में मशीनों के प्रयोग को लेकर है. पश्चिम के अनियोजित मशीनीकरण से क्षुब्ध गांधी ने ‘हिंद स्वराज’ में लिखा था—‘यंत्र का गुण तो मुझे एक भी याद नहीं आता, मगर उसके अवगुणों पर मैं पूरी किताब लिख सकता हूं.’ यहां साफ कर दें कि मशीनों की आलोचना करने वाले गांधी पहले व्यक्ति न थे. उनसे पहले रूसो, थोरो, एडबर्ड कारपेंटर, इमर्सन आदि प्रख्यात विचारकों ने जीवन में मशीनों के बढ़ते दखल को गैरजरूरी माना था. लोकहित में गांधी चाहते थे कि ‘वे(जमींदार और राजामहाराजा) अपने लोभ और संपत्ति के बावजूद उन लोगों के समकक्ष बन जाएं जो मेहनत करके रोटी कमाते हैं. मजदूरों को भी यह समझना होगा कि मजदूरों का काम करने की शक्ति पर जितना अधिकार है, मालदार आदमी का अपनी संपत्ति पर उससे भी कम है.’ (हरिजन सेवक 3 जून, 1939). गांधी पूंजीवाद की विकृतियों का समाधान संरक्षकता के सिद्धांत में खोजते थे. इसलिए उन्होंने पूंजीपतियों से अपील की थी वे खुद को संपत्ति का स्वामी मानने के बजाय उसका संरक्षक समझें और लोककल्याण के निमित्त उसका उपयोग करें. पूंजीपति अपनी संपत्ति स्वेच्छा से छोड़ने को तैयार हो जाएंगे, स्वयं गांधी को भी इसमें संदेह था. ऐसी स्थिति में वे व्यवस्था करते हैं—‘लोग स्वेच्छा से ट्रस्टियों की तरह व्यवहार करने लगें तो मुझे सचमुच बड़ी खुशी होगी. लेकिन यदि वे ऐसा न करें तो मेरा ख्याल है कि हमें राज्य के द्वारा भरसक कम हिंसा का सहारा लेकर उनसे उनकी संपत्ति (मुआवजा देकर अथवा मुआवजा दिए बगैर, जहां जैसा उचित हो) अपने हाथ में कर लेनी चाहिए.’

 

आर्थिक समानता का प्रश्न आइंस्टीन के लिए भी बड़ा था. वे अहिंसक समाजवाद के समर्थक थे. मानते थे कि समाजवाद का लक्ष्य समाज को नैतिक सामाजिक लक्ष्य की ओर अग्रसर करना है. जबकि पूंजीवादी केवल और उद्योगस्वामी के लाभ की स्वार्थाकांक्षा से संचालित होता है. उसमें बड़ी मछली छोटी को निगलती जाती है. आइंस्टीन का विश्वास था कि केवल विज्ञान की सहायता से सामाजिक समस्याओं का निदान खोजना अतिरेकी कामना है. समाजवाद व्यक्ति एवं समाज दोनों को सामाजिकनैतिक लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रयत्नरत रहता है. जबकि पूंजीवाद अपने एकमात्र लक्ष्य पूंजीस्वामी के लाभ पर जोर देता है. जिसमें लाभार्थी वर्ग निरंतर सिकुड़ता जाता है. आइंस्टीन के अनुसार यह जानना बहुत जरूरी है कि केवल नियोजित अर्थव्यवस्था समाजवाद का उद्दिष्ट नहीं है. समाजवाद का वास्तविक लक्ष्य मानवमात्र की मुक्ति है. ऐसा कहते हुए वे विचारदर्शन में गांधीवाद के करीब चले आते हैं. लेकिन मशीनों के प्रयोग को लेकर दोनों में स्पष्ट मतवैभिन्नय था. ‘ग्राफिक सर्वे’ के लिए दिए 1935 के एक इंटरव्यू में आइंस्टीन के माध्यम से उद्धृत किया गया है—

मैं गांधी से अत्यधिक प्रभावित हूं. मगर उनके कार्यक्रम में दो कमजोरियां मुझे एकदम साफ नजरआती हैं. असहयोग हालांकि अपने विरोधियों से निपटने का बुद्धिमानीभरा रास्ता है. लेकिन यह केवल आदर्श स्थितियों में ही संभव है. यह भारत में अंगे्रजों के विरुद्ध उपयोगी हो सकता है, लेकिन जर्मनी में नाजियों के विरुद्ध इसका कारगर प्रयोग संभव नहीं है. गांधी उस समय भी गलत है, जब वे आधुनिक सभ्य समाज में मशीनों के बहिष्कार अथवा उनको न्यूनतम बनाए रखने पर जोर देते हैं. मशीनें समाज की जरूरत बन चुकी हैं, यह उन्हें स्वीकार लेना चाहिए.’

 

गांधी के प्रति अपनी सम्मानभाव के बावजूद उनकी आलोचना आइंस्टीन की वैचारिक दृढ़ता की ओर इशारा करती है. गांधी की भांति आइंस्टीन का चिंतन भी बहुआयामी था. गांधी चाहते थे कि ग्राम स्वावलंबी हों. वहां के लोग आत्मनिर्भर बनें. ताकि अपनी सीमित अर्थक्षमता से सम्मानित जीवन जी सकें. यह आवश्यक भी है. इससे अर्थव्यवस्था और प्रकारांतर में सत्ता के विकेंद्रीकरण का स्वप्न सच होता है. आइंस्टीन की खूबी है कि वे समाजवाद का समर्थन करते हैं, मनुष्यमात्र के विकास के लिए उसे अपरिहार्य मानते हैं, मगर इसके लिए किसी भी प्रकार की हिंसा उन्हें अस्वीकार्य है. इस लक्ष्य को वे लोकतांत्रिक परिवर्तनों के माध्यम से साधना चाहते हैं. समाजवाद, बरास्ते अहिंसा—उनका स्वप्न है. उनकी निगाह में मनुष्य सर्वोपरि है. अपनी इस धारणा पर वे अडिग हैं. गांधी के लेखों में समाजवाद का जिक्र आता है. मगर समाजवादी लक्ष्य को वे अहिंसा, धर्म और परंपरा की सीमाओं में जितना संभव हो, तय कर लेना चाहते हैं. ध्यातव्य है समाजवाद की जड़ों की खोज के लिए धर्म की शरण में चले जाने वाले दार्शनिक विचारकों में गांधी अकेले न थे. जार्ज बनार्ड शॉ, विलियम मॉरिस, जॉन रस्किन, इमर्सन, एडवर्ड कारपेंटर आदि विद्वानों की समाजवाद प्रेरणाएं बाइबिल तथा अन्य ईसाई धर्मग्रंथों से ही निकली थीं. गांधी संसाधनों और अवसरों के समान वितरण पर उतना जोर नहीं देते जितने कल्याण के संवितरण पर—‘यदि समाजवाद बिना किसी हिंसा के आए तो हम उसका स्वागत करेंगे. क्योंकि तब मनुष्य किसी भी तरह की संपत्ति जनता के प्रतिनिधि की तरह और जनता के हित के लिए ही रखेगा; अन्यथा नहीं. करोड़पति के पास उसके करोड़ रहेंगे तो सही, लेकिन वह उन्हें अपने पास धरोहर के रूप में जनता के हित के लिए ही रखेगा.’ इस लक्ष्य को पाने के लिए गांधी अहिंसा और मानवीय प्रेम की तरफदारी करते हैं—‘मैं घृणा से नहीं अपतिु प्रेम की शक्ति से लोगों को अपनी बात समझाऊंगा और अहिंसा के द्वारा आर्थिक समानता पैदा करूंगा.’

 

आइंस्टीन के लिए परंपरा का महत्त्व तभी तक है जब तक वह तर्कसम्मत हो और विज्ञान की कसौटी पर खरी उतर सके. क्या समाजवाद से मानव जीवन की समस्याओं का समाधान संभव है? आइंस्टीन इससे आश्वस्त हैं, ‘इन गंभीर बुराइयों से बचाव का एकमात्र रास्ता है, लोकोन्मुखी शिक्षा प्रणाली की स्थापना तथा अर्थव्यवस्था का समाजवादी नजरिये के अनुरूप निर्धारण, जिसमें उत्पादन के साधन समुदाय के अधीन हों. उत्पादन का स्वरूप लोगों की आवश्यकता के अनुसार तय होना चाहिए और काम का विभाजन इस तरह से हो कि स्त्रीपुरुष, बच्चे जो भी काम कर सकते हैं, उन्हें काम मिले और किसी के सामने आजीविका संबंधी संकट न हो.’ आइंस्टीन ने समाजवाद का पक्ष लिया था. परंतु उसके नाम पर समाज में जो हो रहा है, उसके प्रति वे बहुत आश्वस्त नहीं थे. वे मान रहे थे कि समाज में समाजवाद को लेकर अत्यधिक अस्पष्टता है. सबसे बड़ा संकट ईमानदार विमर्श का है. उन्हें लगता था कि समाजवाद के नाम पर प्रचलित विभिन्न परिभाषाओं, अवधारणाओं तथा अर्थहीन बहसों ने उसको बहुत नुकसान पहुंचाया है. जिससे समाजवादी राज्य का सपना एक टोटम में सिमट चुका है. आइंस्टीन का आशय उदार और विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था से था, जिसमें राज्य की नियंत्रणकारी शक्तियां अधिक जिम्मेदार और लोकप्रतिबद्ध हों.

 

गांधी की भांति आइंस्टीन की करुणा भी मानव समाज तक सीमित न थी. उसमें प्राणिमात्र के प्रति करुणाभाव अंतर्निहित था. गांधी शाकाहार के समर्थक थे. इस संबंध में आइंस्टीन की भावनाएं गांधी से मेल खाती थीं. शाकाहार का समर्थन करते हुए उन्होंने लिखा था—‘मानवीय स्वास्थ्य एवं पृथ्वी पर जीवन की उत्तरजीविता के निमित्त कोई भी इतना सहायक नहीं है, जितना शाकाहार को बढ़ावा देना.’ इसलिए कि मनुष्यता की कसौटी वर्चस्व में न होकर सहयोगभावना में है. सबके साथ मिलजुलकर रहने में है. अपने साथसाथ दूसरे के अस्तित्व की रक्षा और मानसम्मान में है. न केवल मनुष्य, बल्कि प्राणिमात्र के प्रति करुणा की भावना से भरपूर यह नैतिक संदेश प्रायः हर संस्कृति का मूल स्वर रहा है. ‘सर्वे सुखिन भवंतु, सर्वे संतु निरामया’—गांधी इस औपनिषदिक कामना को राष्ट्रराज्य की प्रमुख पहचान के रूप देखना चाहते हैं. यह भावना गांधी द्वारा शाकाहार के समर्थन से भी अभिव्यक्त होती है—‘किसी राष्ट्र की महानता उसके द्वारा पशुओं के प्रति किए गए व्यवहार से आंकी जा सकती है.’ जीवदया के प्रति धार्मिक द्रष्टिकोण इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना करुणा का संस्कार. करुणा का यही संस्कार गांधीवाद की आत्मा है. यही वह गुण है जो आइंस्टीन को बारबार गांधी की ओर खींच लाता था. गांधी के प्रति अपनी श्रद्धा और सम्मान को आइंस्टीन ने कई अवसरों पर व्यक्त किया था. आ॓क्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्राध्यापक एस. राधाकृष्णन गांधी के सत्तरवें जन्मदिन पर एक पुस्तक संपादित करना चाहते थे. उन्होंने पत्र लिखकर आइंस्टीन से उसमें सहयोग देने को कहा. उस अवसर पर आइंस्टीन ने गांधी की प्रशस्ति में लिखा—

 राजनीतिक इतिहास के क्षेत्र में महात्मा गांधी का योगदान अन्यतम है. उन्होंने अपने देश के गरीब, वंचित एवं दमित लोगों की स्वतंत्रता हेतु एकदम नए और मानवीय औजार विकसित कर उनका प्रयोग अपनी संपूर्ण निष्ठा और कर्तव्यबोध के साथ किया है. दुनिया के आधुनिक सभ्य समाजों तथा उनके चिंतनधर्मा बुद्धिजीवियों पर उनका जो प्रभाव पड़ा है, वह तलवार के जोर पर की गई कार्रवाहियों की अपेक्षा कहीं अधिक गहरा और स्थायी है. इस कसौटी पर केवल उन्हीं राजनयिकों का योगदान सराहनीय हो सकता है जो शिक्षा, लोकचेतना तथा नैतिकता की स्थापना द्वारा अपने लोगों के लिए नैतिक राज्य की स्थापना कर सकते हैं. यह हम सभी के लिए अत्यंत प्रसन्नता और सम्मान का विषय है कि हम ऐसी महान, प्रतिभा संपन्न शख्सियत से सीधे संवाद करने में सक्षम हैं.’

 

गांधी की कथनी और करनी में अद्भुत एकता थी. उन्हें अपने ऊपर विश्वास था और खुद के निर्णयों पर वे इतने दृढ़ रहते थे कि उनके अपने ही साथी कभीकभी उन्हें हठी और दुराग्रही तक कह देते थे. अपवादस्वरूप ही सही परिस्थितियों के आगे गांधी को भी झुकना पड़ा और आइंस्टीन को भी. दूसरी ओर यह भी सच है कि जब भी इन महापुरुषों को समझौते के लिए बाध्य किया गया, उसका नुकसान पूरे समाज को झेलना पड़ा. गांधी देश के विभाजन के विरोधी थे. उन्होंने कहा था कि हिंदुस्तान का बंटवारा उनकी लाश से गुजरकर होगा. मगर तत्कालीन नेताओं के आगे उनकी एक न चली. जिन धनकुबेरों से वे उम्मीद रखते थे कि वे आजाद भारत में सरंक्षकतावाद के आदर्श को अपनाएंगे, खुद को संपत्ति का सरंक्षक मानकर व्यवहार करेंगे, वे अपने ही जैसे स्वार्थी नेताओं के संग मिलकर आजादी के बाद के माहौल को भुनाने में लग गए. इससे आजादी के बाद देश के वास्तविक निर्माण का जो सपना गांधी ने देखा था, और जिसकी कामना इस देश का आम नागरिक करता था, वह उत्तरोत्तर दूर होता चला गया. कुछ ऐसा ही आइंस्टीन के साथ हुआ. वे नहीं चाहते थे कि उनकी खोज का उपयोग परमाणु बम के लिए किया जाए. लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्थितियां इतनी तेजी से बदलीं कि उन्हें उसके लिए अनुमति देनी ही पड़ी. दूसरे विश्वयुद्ध की आहट के बीच अमेरिकी भौतिक विज्ञानी लियो सिजलाॅर्ड तथा यूजीन विगनर राष्ट्रपति रूजवेल्ट का संदेश लेकर आइंस्टीन से मिले थे. वे परमाणु बम निर्माण के लिए आइंस्टीन की सहमति चाहते थे. उनसे कहा गया था कि बम दुनिया में शक्ति संतुलन कायम करने के काम आएगा. आइंस्टीन उसके लिए भी तैयार न थे. लेकिन जब उनसे कहा गया कि यदि अवसर चूके तो हिटलर अमेरिका से पहले परमाणु बम बनाने में सफल हो जाएगा, तो वे सोच में पड़ गए. तानाशाह के हाथों में अकूत ताकत आने का मतलब है, ’दुनिया की तबाही’—आइंस्टीन का कुछ ऐसा ही सोचना था. असल में यह उनका खुद को दिया गया भरोसा था. यह आभास उन्हें था कि यदि हस्ताक्षर न भी करेंगे तो भी युद्धोन्मत्त शक्तियां एक न एक दिन बम का आविष्कार कर ही लेंगी. इसलिए पत्र पर हस्ताक्षर कर लौटा दिया. रूजवेल्ट को लिखे पत्र के बाद अमेरिका में मेनहट्टन परियोजना में गति आई. उस समय उन्होंने शायद ही यह कल्पना की हो कि उनकी खोज हिरोशिमा और नागसाकी की भीषण तबाही, मनुष्यता के कलंक का कारण बनेगी. आइंस्टीन को यह अपराधबोध आजीवन बना रहा. इसी ने उन्हें गांधी के करीब लाने का काम किया. उन्हें लगता था कि युद्धोन्मत्त राजसत्ताओं के बीच गांधी का अहिंसा रास्ता ही श्रेय की ओर ले जा सकता है.

 

जापान में बमबारी के वर्षों बाद वहां के एक दैनिक ‘कैजो’ ने आइंस्टीन से परमाणु बम के प्रयोग पर टिप्पणी करने को कहा. प्रत्युत्तर में पत्र संपादक के नाम 1952 में आइंस्टीन ने जो पत्र लिखा, उसमें एक बार फिर गांधी के प्रति आस्था और विश्वास झलकता था. हालांकि उस समय तक गांधी की हत्या को तीन वर्ष बीत चुके थे—‘गांधी, हमारे समय के महानतम राजनीतिज्ञ प्रतिभा ने हम सत्य और अहिंसा के उस रास्ते से परचाया है, जिसका हमें अनुसरण करना चाहिए. उन्होंने यह प्रमाणित कर दिया कि एक व्यक्ति के मन में सत्य के लिए उत्सर्ग की भावना हो तथा रास्ता सही हो तो वह कुछ भी प्राप्त कर सकता है. भारतीय स्वाधीनता के लिए उनका कार्य इस बात का स्वतः प्रमाण है कि अदम्य विश्वास से युक्त मनुष्य की दृढ़ इच्छाशक्ति अजेय समझी जाने वाली सैन्य ताकतों से कहीं अधिक ताकतवर है.’

 

डरा हुआ आदमी दूसरों को सावधान रहने की सलाह देता है. आइंस्टीन का आविष्कार लोगों को डराता था. परंतु यह डर खुद आइंस्टीन का भी था. उनका डर अकारण भी नहीं था. अल्फ्रेड नोबेल का उदाहरण उनके आगे था. प्रसंगवश बता दें कि मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मा अल्फ्रेड नोबेल बड़ा होकर अपने समय का सबसे बड़ा हथियार उत्पादक बना. विस्फोटक ‘डायनामाइट’ के अलावा करीब 350 जानलेवा हथियारों के पेटेंट उसके हाथ में थे. परंतु एक घटना ने उसका ऐसा हृदयपरिवर्तन किया कि उसका मकसद ही बदल गया. 1888 में अल्फ्रेड नोबेल का भाई लुडविग नोबेल फ्रांस में केंस की यात्रा पर निकला. वहीं उसका देहांत हो गया. एक फ्रांसिसी समाचारपत्र ने बगैर जांचपड़ताल के ही मोटे हरफों में छापा—‘मौत के सौदागर की मौत.’ वह समाचारपत्र नोबेल के हाथों तक पहुंचा तो उसे जबरदस्त धक्का लगा. मृत्योपरांत अपनी प्रतिष्ठा और मानसम्मान को बचाए रखने तथा समाज के बुद्धिजीवी वर्ग को अपने अधिकार में रखने के लिए उसने एक ट्रस्ट का गठन किया, उसके माध्यम से नोबेल पुरस्कारों की शुरुआत हुई. अल्फ्रेड नोबेल के साथ घटी इस घटना ने आइंस्टीन को भी प्रभावित किया. परमाणु शक्ति के आविष्कारक होने के कारण उनके आलोचक भी कम न थे. ऐसे लोग भी थे जो उनके शांति प्रस्तावों को दिखावा कहा करते थे. 1933 में मैकुले रेमंड ने उनका एक कार्टून बनाया था. जिसमें आइंस्टीन के हाथ में तलवार थी. और वे ताकत के मद में अपनी बांह चढ़ाते दिखाए गए हैं. वह आइंस्टीन के शांतिप्रस्तावों पर आलोचक की नजर थी. अपने आविष्कार के दुरुपयोग का डर उन्हें लगातार गांधी के करीब लाता रहा. उन्हें जब, जहां अवसर मिला, गांधी के प्रति अपने स्नेहसम्मान का मुक्तकंठी बयान किया. अपनी पुस्तक ‘आउट आ॓फ माई लेटर ईयर्स’ में गांधी पर प्रशंसात्मक टिप्पणी करते हुए उन्होंने लिखा है—

 

जनसाधारण का नेता, जिसको लगातार कमजोर पड़तीं औपनिवेशिक शक्तियों का समर्थन प्राप्त है. एक ऐसा जननेता जिसकी सफलता कूटनीति, राजनयिक चातुर्य अथवा दूसरों पर अधिकार जमाने के लिए छिछले राजनीतिक दांवपेंच पर निर्भर नहीं है. उसके पास केवल सच को अभिव्यक्त करने की कला है, एक काया है जिनमें इंसानियत और ज्ञान दोनों साथसाथ विद्यमान हैं. उसके हथियार संवेदना और सहिष्णुता हैं, जो उसने अपने समाज को सुरक्षित और सुदृढ़ बनाने के लिए गढ़े हैं. ऐसा इंसान जो आमजन का प्रतीक है. जिसने यूरोपीय नृशंसता और क्रूरता का सामना किया है, और जो जनसाधारण का मसीहा है. इस तरह उसका प्रभाव अमिट है….पीढ़ियों के बाद इस बात पर शायद ही कोई विश्वास करेगा कि इस प्रकार का सचमुच जीताजागता मनुष्य इस धरती पर था. इस तरह वह सार्वकालिक उदीयमान सितारा है.’

 गांधी नेता भी थे और सामाजिक कार्यकर्ता भी. लोकमानस से जुड़े मुद्दों पर उनकी कितनी गहरी पकड़ थी, वैसी शायद ही किसी और नेता की रही हो. उन्होंने कुशल राजनयिक की भांति सरकार और जनता से संवाद किया और एक दक्ष समाजविज्ञानी की भांति लोकहित से जुड़े विषयों पर बोलते रहे. गांधी के व्यक्तित्व की भांति उनकी शैली भी सरल है. चाहे भाषण हों या पत्रकारिता, हर जगह उनका कुशल शैलीकार छाया रहता है. उनकी बनिस्पत आइंस्टीन लेखनशैली विवेचनापरक है. उसमें गंभीरता है. वाक्य अपेक्षाकृत लंबे हैं, भाषा जटिल. इसके बावजूद एक प्रवाह उनकी शैली में है, जिससे वे पठनीय बने रहते हैं. गांधी एक मृदुल प्रवाह और ओज से साथ अपने विचारों में बहा ले जाते हैं. आइंस्टीन को विज्ञान और धर्म के सहसंबंध से बड़ी उम्मीद थी. ईश्वर उनके लिए रूढ़ विश्वास न होकर, आध्यात्मिक विवेचना का विषय था, जिसे वे अपने लेख ‘धर्म और विज्ञान’ में विस्तार देते हैं. उन्हें गांधी का अहिंसापथ स्वीकार्य है, मगर अर्थदर्शन को लेकर वे बर्ट्रेंड रसेल के करीब हैं. रसेल की पुस्तक ‘ए रोड टू फ्रीडम’ में जिस लोकतांत्रिक, विकेंद्रीकृत, समानताधारित और जनसहयोगात्मक अर्थव्यवस्था की ओर संकेत किया गया है, आइंस्टीन के लेखों में उसी चेतना का प्रवाह है. शांति और अहिंसा के अग्रदूत के रूप में गांधी उनके दिलोदिमाग पर कितने छाए हुए थे, इसका एक और उदाहरण नीचे दी गई टिप्पणी है. यूरोशलम की हिब्रू यूनीवर्सिटी के आइंस्टीन संग्रहालय से प्राप्त यह टिप्पणी जिस कागज पर है, उसके आधे से अधिक हिस्से पर वे गणित की पहेली को हल करने में जुटे हैं. निचले हिस्से पर एकदम अनौपचारिक और आकस्मिक ढंग से लिखी गई यह टिप्पणी है, मानो गणित में डूबा हुआ मन अचानक गांधी की ओर बढ़ चला हो. ऐसा तभी होता है, जब व्यक्ति अपने को आदर्श मान चुका हो. आइंस्टीन की गांधी के प्रति श्रद्धाभाव कुछ ऐसा ही था—

 

राजनीति के इतिहास में महात्मा गांधी की उपलब्धियां अद्वितीय हैं. उन्होंने एक पराधीन देश की स्वतंत्रता के लिए नए और इंसानियत से भरपूर रास्ते की खोज की. तथा उसपर अपनी निष्ठा और संपूर्ण आत्मविश्वास के साथ बढ़ते गए. मानवता पर उनके विचारों का प्रभाव हमारी कल्पना से, जो अन्यायी की ताकत का बढ़चढ़कर आंकने की अभ्यस्त है, से कहीं अधिक चिरस्थायी है. क्योंकि अंत तो केवल उस राजनेता का होगा जिसने अपने लोगों को अपनी शिक्षा और नैतिक आचरण से ऊपर उठाने की कोशिश की है. हमें इस बात के लिए खुश होना चाहिए कि उन्होंने जो नैतिक ऊंचाई हमें दी है, वह आने वाली पीढ़ियों को भी प्रभावित करेगी. उनके लिए आदर्श होगी.’

 

गांधी के प्रति आइंस्टीन का सम्मान इस मृत्युलेख से भी होता है, जो उन्होंने गांधी की हत्या के तीन सप्ताह बाद वाशिंगटन में आयोजित एक स्मृतिसभा के लिए लिखा था, ‘केवल सत्यानुयायी, अहिंसक और पवित्र समाजवादी ही दुनिया में या हिंदुस्तान में समाजवाद फैला सकता है. जहां तक मैं जानता हूं, दुनिया में ऐसा कोई देश नहीं है जो पूरी तरह समाजवादी हो. मेरे बताये हुए साधनों के बिना ऐसा समाज कायम करना असंभव है.’ आगे गांधी को सम्मानपूर्वक याद करते हुए आइंस्टीन लिखते हैं—‘हर वह इंसान जो मनुष्यता की बेहतरी का सपना देखता है, उसको गांधी की असामयिक, त्रासद हत्या ने हिला दिया है. उन्होंने अपने आदर्शों के लिए, अहिंसा के पक्ष में मृत्यु का वरण किया है, इसलिए उन्हें मार डाला गया. इसलिए भी कि देश में अशांति और अव्यवस्था के वातावरण के बावजूद वह किसी भी प्रकार की सुरक्षा लेने को तैयार न था. यह उसका अटूट विश्वास था कि ताकत का उपयोग अपने आप में ही बुराई है.’ आज न तो गांधी हैं न आइंस्टीन, परंतु आइंस्टीन की बौद्धिक प्रखरता और गांधी का सत्य को परखने और उसके लिए हर जोखिम उठाने का साहस हमें निरंतर कुछ नया सोचने, आगे बढ़ने और मनुष्यता में विश्वास बनाए रखने की प्रेरणा देता है.

 © ओमप्रकाश कश्यप

 

सद्य: प्रकाशित पुस्तक “समाजवादी चिंतन के विविध आयाम’” की भूमिका

सामान्य

एक समय था जब सभी स्वतंत्र थे. इतने स्वतंत्र कि स्वतंत्रता के कोई मायने ही नहीं थे. और इतने सुखी कि सुख क्या है, इसे शब्दों में शायद ही बता पाते. परिवार की भांति सब समूह-बद्ध होकर रहते. मिल-जुलकर शिकार करते. शिकार न मिलने पर प्रकृति-प्रदत्त कंद-मूल-फल से गुजारा कर लेते. मौसम सताता तो गुफाओं की शरण लेते. नहीं तो खुले अंचल में जीवन का उत्सव मनाते थे. प्रकृति की गोद में रहते हुए उन्होंने पृथ्वी की उर्वरा शक्ति को जाना. फलस्वरूप कृषि-योग्य ठिकानों पर बड़ी-बड़ी बस्तियां बसने लगीं. समय के साथ सभ्यता और सभ्यता के साथ समाज का दायरा बढ़ता चला गया. इसी के साथ उलझनें भी बढ़ी. सामाजिक जरूरतें आसानी से पूरी हों, इसके लिए श्रम-विभाजन को अपनाया गया. इस बीच अपनी स्थिति का लाभ उठाकर समाज का एक वर्ग संसाधनों पर अनैतिक अधिकार का दावा करते हुए मालिक बन बैठा. सभ्यता के नाम पर, संस्कृति के नाम पर, धर्म, राष्ट्र और कुल-परंपरा के नाम पर इस वर्ग ने नियमों, कानूनों और आचार संहिताओं का ऐसा पहाड़ खड़ा किया कि वह वर्ग जिसने पूरे समाज के भले के लिए श्रम-संस्कृति को अपनाया था, जो अपना पसीना बहाकर दूसरों का पेट भरता, उनके सुख और विलासिता की वस्तुएं पैदा करता था, वह भृत्य और मजदूर कहलाने लगा. उसका अपने मन-मस्तिष्क तो दूर श्रम तक पर अधिकार न था. दूसरी ओर जिसने प्राकृतिक संसाधनों पर अनैतिक कब्जा किया हुआ था, जो दूसरों के श्रम पर जीने वाला, परजीवी और परावलंबी था—वह खुद को स्वामी बताकर दूसरों के श्रम का मूल्यांकन करने लगा. धर्म, राजनीति, अर्थतंत्र सब उसके अधिकार में आ गए. समय-समय पर इसके विरुद्ध आवाज भी उठी. हर युग में ऐसे उदारचेता विचारक हुए जिन्होंने समाज के अनैतिक स्तरीकरण को धिक्कारा. मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को अप्राकृतिक और अमानवीय कहकर उसकी भर्तस्ना की. महाभारतकार ने कहा, ‘न हि मानुषात श्रेष्ठतरं हि किचिंत’—सृष्टि में मनुष्य से श्रेष्ठतर कुछ भी नहीं है.’ बौद्धकाल में सम्राट से अपेक्षा की जाती थी कि वह खुद प्रजा का योग्य पालनकर्ता, संरक्षक और निदेशक सिद्ध करे. उसका आचरण नियमों से आबद्ध हो. जातक कथा के अनुसार एक बार एक राजा की मुंह लगी पटरानी ने राजा से यह वर मांगा—

‘महाराज, मुझे राज्य पर अमर्यादित राज्य करने के अधिकार प्रदान किए जाएं.’ इसपर राजा ने महारानी को समझाया—
‘भद्रे राज्य के संपूर्ण निवासियों पर मेरा कोई भी अधिकार नहीं है. मैं उनका स्वामी नहीं हूं. मैं तो केवल उनका स्वामी हूं जो राजकीय कर्तव्यों का उल्लंघन करते हुए, न करने योग्य कार्य कर दूसरों के जीवन में व्यवधान खड़े करते हैं. अतः मैं तुम्हें राज्य के समस्त निवासियों पर स्वामित्व प्रदान करने में असमर्थ हूं.’

उस समय सारी संपत्ति राज्य की मानी जाती थी. राजा उसका एकमात्र कर्ता-धर्ता-स्वामी था, इसलिए उसे ‘भू-पति’, ‘भू-पालक’, ‘भूपेश’ आदि कहा जाता था. संपत्ति पर सामूहिक अधिकारिता का विचार, जो आरंभिक कबीलाई जीवन का गुण था, समाप्त हो चुका था. ऋषियों के आश्रम तक उनकी व्यक्तिगत संपदा कहे जाते थे. व्यक्तिगत संपत्ति का निषेध पहली बार बौद्ध दर्शन में देखने को मिलता है. बुद्ध ने जो बौद्ध विहार स्थापित किए, वे निजी अधिकारिता से बाहर थे. उन्होंने गणतांत्रिक पद्धति की भी सराहना की. हालांकि दुनिया के अन्यान्य हिस्सों की भांति, तत्कालीन भारतीय गणतंत्र एक प्रकार का कुलीनतंत्र ही था. उसमें केवल विशिष्ट लोग हिस्सा ले सकते थे. समाजवाद के बीजतत्व हमें प्लेटो के ‘रिपब्लिक’ में दिखाई पड़ते हैं. आदर्श राज्य की कल्पना करते हुए उसने राज्य का कार्य-भार दार्शनिकों के निर्वाचित मंडल को सौंपने का सुझाव दिया था. प्लेटो का आदर्श राज्य का सपना किताबी पन्नों से बाहर भले न आ सका, लेकिन परिवर्तन का सपना देखने वाले दार्शनिकों, बुद्धिजीवियों को प्रभावित हमेशा करता रहा. सत्ता की तानाशाही के विरुद्ध आवाज चीन में भी उठी थी. कन्फ्युशियस के समकालीन ताओ जू को समाज के आंतरिक सामथ्र्य पर पूरा भरोसा था. उसका मानना था कि सरकार को सरलतम और न्यूनतम होना चाहिए. सामाजिक मर्यादा और अनुशासन के नाम पर बने कानून और आचारसंहिताओं की आलोचना करते हुए उसने कहा था कि उनकी संख्या ‘बैल के शरीर के बालों से भी अधिक हैं.’ चूंकि शिक्षा और उत्पादन के वैकल्पिक संसाधनों का अभाव था और अर्थव्यवस्था के एकमात्र स्रोत कृषि-भूमि पर सामंत वर्ग अधिकार जमाए था. अतः उसकी मनमानी के चलते मानवीय स्वतंत्रता, मान-सम्मान और गरिमा को महत्त्व देने वाले विचार पुस्तकों से बाहर अपना स्थायी प्रभाव न छोड़ सके. इसके लिए उन्हें अठारवीं शताब्दी तक प्रतीक्षा करनी पड़ी जब औद्योगिक क्रांति ने बहुमुखी हस्तक्षेप द्वारा रोजगार के अवसर पैदा किए. फलस्वरूप हुनरमंद शिल्पकारों, पेशेवरों की मांग बढ़ी और वे सामंती चंगुल से बाहर आ सके. शिक्षा के विस्तार ने उनके भीतर आजादी की ललक पैदा की, जिसने परिवर्तनकामी आंदोलनों, विचारों को जन्म दिया.

साम्राज्यवादी परिवेश और सामंती सोच के दिनों में व्यक्ति का अस्तित्व गौण था. नए सोच में व्यक्ति-स्वातंत्र्य पर जोर दिया जाने लगा. थॉमस पेन ने लिखा कि मनुष्य ने समाज को अपने कल्याण के लिए चुना है. समाज की सर्वोच्चता तभी संभव है, जब निर्णय के समस्त अधिकार उसके अधीन हों. संसाधनों पर उसका कब्जा हो. हालांकि उसने माना कि समाज की संसाधनों पर अधिकारिता निःशर्त न होकर अनेक कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के साथ आती है. संसाधनों का उपयोग करते समय समाज को समझना चाहिए कि वह प्राकृतिक सत्ता नहीं है, बल्कि मनुष्यों द्वारा मनुष्य के कल्याण हेतु गठित किया गया है. मनुष्य समाज में इसलिए सम्मिलित होता है कि वह अपने सुख में वृद्धि कर सके. यदि ऐसा नहीं होता, समाज का कोई नागरिक मूल-भूत सुविधाओं से वंचित रह जाता है, तो समाज के गठन का औचित्य ही समाप्त हो जाता है. समाज का दायित्व है कि वह संसाधनों का उपयोग इस प्रकार करे ताकि उनका लाभ समाज के प्रत्येक नागरिक को प्राप्त हो सके. प्रत्येक नागरिक को यह विश्वास हो कि समाज उसकी इच्छाओं की पूर्ति करने में सक्षम है. जहां इच्छाओं का सर्वमान्य निर्धारण संभव न हो, वहां समाज इच्छाओं के सामान्यीकरण की नीति को अपना सकता है. इच्छाओं के चयन के लिए गणतांत्रिक प्रणाली उपयुक्त पाई जाती है, बशर्ते उसमें जन्म, भाषा, क्षेत्रीयता, धर्म, संप्रदाय आदि के नाम पर कोई विशेषाधिकार न हों. सर्वसम्मति के अभाव में समाज बहुमत के आधार पर इच्छाओं का सामान्यीकरण कर सकता है. उस समय भी यह ध्यान रखना होगा कि समाज में जन्म, वर्ण, रंग, कुल-परिवार, भाषा आदि के नाम पर किसी को विशेषाधिकार प्राप्त न हों. इच्छाओं के सामान्यीकरण अथवा सामान्य इच्छा के चयन के लिए गणतांत्रिक प्रणाली सर्वोपयुक्त पाई गई है. यह समाज या उसके किसी भी वर्ग को मनमानी का अधिकार नहीं देती. बल्कि निरंतर यह बोध कराती है कि उनमें से प्रत्येक के बस उतने ही अधिकार हैं जो समाज के किसी भी अन्य नागरिक को प्राप्त हैं. यह शीर्षस्थ सत्ताओं, को उनकी जिम्मेदारियों से आबद्ध करती है. उसकी सफलता के लिए आवश्यक है कि सदस्यों के बीच असहमति का साहस और सहमति का विवेक हो. लोग अपना पक्ष रखने और दूसरे की सुनने में जितने निपुण और धैर्यवान होंगे, उतने ही परिपक्व निर्णय ले पाएंगे.

समाजवादी के अनुसार राज्य सामूहिक इच्छा की अभिव्यक्ति है. उसका कर्तव्य राज्य-संपदा की सुरक्षा एवं संवर्धन द्वारा समाज को विकास की ओर अग्रसर करना है. इसके बावजूद यह विडंबना ही कही जाएगी कि बीसवीं शताब्दी के पूवार्ध में समाजवाद ने जितनी तेजी से पांव पसारे था, उत्तरार्ध में वह उतनी ही तेजी से सिकुड़ने लगा था. सोवियत संघ के पतन के बाद तो हालात पूरी तरह बदल चुके हैं. समाजवाद की चर्चा करना, सामान्य अर्थों में प्रतिक्रियावादी होना और दिवास्वप्नों में जीना रह गया है. आखिर क्यों? क्या कारण है कि साम्यवादी आदर्श, दर्जनों प्रभावकारी दर्शन और अपने समय के श्रेष्ठतम बुद्धिजीवियों के खुले समर्थन के बावजूद समाजवाद को पूंजीवाद से अपनी अधिकांश जंगे हारनी पड़ीं? दरअसल पूंजी-प्रेरित बाजार ने लोगों को ऐसी अंध-स्पर्धा की ओर ढकेल दिया है, जहां व्यक्ति अधिकाधिक अर्थोपार्जन से कुछ और सोच ही नहीं पाता. सामान्य नैतिकता केवल व्यावसायिक संबंधों तक सिमट जाती है. जनसाधारण में अपनी पैठ बनाने के लिए पूंजीवाद लोकप्रिय उपादानों का सहारा लेता है. फिर चाहे राजनीति हो या धर्म, वह सभी का सुविधानुसार उपयोग करता है. मानवाधिकार, व्यक्ति-स्वातंत्र्य जैसे नारों के साथ वह व्यक्तिगत सुखाकांक्षाओं को इस विनियोजित करता है मानो मनुष्य कोई समाज-निरपेक्ष प्राणी हो. उसके प्रभाव में व्यक्ति को केवल अपने अधिकार याद रहते हैं. भूल जाता है कि समाज के साथ उसका अनुबंध एकतरफा नहीं है. यह सही है कि व्यक्ति अपने सुख के लिए समाज में शामिल होता है. मगर उसको यह भी समझना होता है कि उसका सुख समाज के सम्मिलित आनंद से परे नहीं है. इसलिए समाज की ओर से उसके अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्य भी निर्धारित हैं. लोकप्रियता के आधार पर कामयाबी हथियाने की होड़ में पूंजीवादी मीडिया व्यक्ति को केवल उसके अधिकारों की याद दिलाता है, और उसकी दुरवस्था के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराता है. संचार माध्यमों की पीठ पर सवार पूंजीपति जनता को बड़ी आसानी से यह विश्वास दिला देते हैं कि उसे उसकी दुरावस्था और संकटों से बचाने की जिम्मेदारी सरकार की है. सरकार का दायित्व है कि कराधान के रूप में जुटाई गई धनराशि का उपयोग लोककल्याण के कार्यों में करे. यदि असफल रहती है तो लोगों को गुस्सा करने का पूरा अधिकार है. इससे वह जनाक्रोश के निशाने पर आ जाती है. विभिन्न प्रकार के दबावों से घिरी, अस्थिर, बौखलाई हुई सरकार से पूंजीपति मनमाने निर्णय कराने में सफल रहते हैं. स्वार्थी और नाकारा तत्वों की कमी सरकार में भी नहीं होती, लेकिन पूंजीवादी मीडिया के दबाव के चलते वे येन-केन-प्रकारेण सरकार में बने रहते हैं. हालात में वास्तविक परिवर्तन शायद ही आता है.

विचार के क्षेत्र में लोकप्रियता की अपेक्षा दुराग्रहों की ओर ले जाती है और वैचारिक कठमुल्लापन अच्छे-खासे विचार को संकुचित कर देता है. कई बार अक्षम्य किस्म की गलतियां भी हो जाती हैं. उदाहरण के लिए एडम स्मिथ के मूल्यांकन को लें. अठारहवीं शताब्दी के इस प्रतिभाशाली अर्थशास्त्री को पूंजीवाद का आदि उत्प्रेरक माना जाता है. इसके लिए प्रायः ‘लेजेज फेयर’ के समर्थन का उदाहरण दिया जाता है. मंजे हुए अर्थशास्त्री के रूप में स्मिथ ने वही कहा या लिखा था जो समाज के आर्थिक विकास को गति देने में सक्षम हो. उपलब्ध संसाधनों को अधिकतम उत्पादन सक्षम कैसे बनाया जाए, यह उसके चिंतन का विषय था. एक वैज्ञानिक की दृष्टि और दार्शनिक जैसी वस्तुनिष्ठता से उसने इसपर विचार किया. फिर जो उसको जंचा वही अभिव्यक्त किया. उसने माना कि प्रत्येक मनुष्य पहले अपना सुख देखता है, ‘हमारा भोजन कसाई या पावरोटी बनाने वाले की सौगात नहीं है. उनकी गर्ज थी जो उन्होंने मीट बेचने या रोटी बनाने का धंधा चुना.’ इस उक्ति से उसके द्रष्टिकोण की व्यावहारिकता का अनुमान लगाया जा सकता है.

उपलब्ध संसाधनों द्वारा अधिकतम उत्पादकता की वांछा समाजवाद के लिए भी निषिद्ध नहीं है. अंतर बस इतना है कि समाजवादी की निगाह में सामाजिक लाभ महत्त्वपूर्ण होते हैं. मौद्रिक लाभ की कीमत पर सामाजिक लाभों की उपेक्षा वह नहीं कर पाता. इसके बरक्स पूंजीवाद का सारा तामझाम उद्योग स्वामी के अधिकतम लाभ को समर्पित होता है. वहां शिखर की ओर जाते हुए लाभानुपात निरंतर बढ़ता जाता है. जबकि लाभ के विभाजन हेतु समाजवाद ‘अधिकतम लोगों के लिए अधिकतम सुख’ की नीति अपनाता है. समस्त संपत्ति राज्य के अधीन होती है. ‘प्रत्येक को उसकी योग्यता के अनुसार काम, हरेक को उसकी जरूरत के बराबर दाम’—के अनुसार वह उसका उपयोग करता है. व्यक्तिगत संपत्ति के बारे में भी स्मिथ के विचार समाजवादी भावना के अनुरूप हैं—‘जैसे ही किसी राष्ट्र की भू-संपदा निजी संपत्ति ठहरा दी जाती है, भू-सामंत और सत्ता के अन्य ठेकेदार दूसरों की मेहनत की फसल काटने में जुट जाते हैं. स्वार्थ के वशीभूत हो वे प्राकृतिक संसाधनों को भी मंडी में उतार देते हैं.’ उत्पादन प्रविधियों की चर्चा के बाद वह उत्पादन प्रवृत्ति पर आता है. इस बारे में उसका सोच एकदम स्पष्ट है—‘यह सरासर अन्याय है कि पूरा का पूरा समाज उस दिशा में काम करने लग जाए, जिससे समाज के मुट्ठी-भर लोगों का भला होता है.’ उत्पादन का स्वरूप जनसाधारण की जरूरतों के अनुसार तय होना चाहिए. इसके लिए वह साफ शब्दों में कहता है—‘अनाज जरूरत है, चांदी विलासिता.’ उपयुक्त मूल्यांकन के अभाव में स्मिथ के अर्थदर्शन में अंतर्निहित नैतिकतावादी मूल्यों की उपेक्षा हुई. इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि पूंजी-केंद्रित अर्थतंत्र की नैतिक संभावनाओं की पड़ताल का काम भी पीछे छूट गया.

इसका मतलब यह नहीं कि पूंजीवाद सर्वथा निर्दोष प्रणाली है या वह समाजवाद जैसी ही कल्याणकारी व्यवस्था है. दरअसल विकासोन्मुखी एवं महत्त्वाकांक्षी समाजों में सरकार को लोगों की अपेक्षाओं पर जल्दी से जल्दी खरा उतरने के लिए त्वरित उत्पादन प्रणालियां अपनानी पड़ती हैं. नवीनतम प्रौद्योगिकी का लाभ समाज के अधिकांश लोगों तक कैसे पहुंचे? जिन लक्ष्यों को पूंजीवाद स्पर्धा के जरिये कैसे प्राप्त करता आया है, उन्हें सहयोग के आधार पर कैसे प्राप्त किया जाए? यानी पूंजीवादी उत्पादन त्वरा समाजवाद आदर्श के साथ कैसे संभव हो—बुद्धिजीवियों के समक्ष यह चुनौती हमेशा से रही है. उस दृष्टि से अपेक्षित काम न हो पाने का एक कारण तो पूंजीवाद पर मौलिक लेखन का अभाव है. बकौल अयन रेंड, ‘पूंजीवाद का कोई दार्शनिक आधार नहीं है.’ जबकि समाजवाद के समर्थन में लेखन गत दो शताब्दियों से निरंतर होता रहा है. हाल की शताब्दियों में मनुष्यता को किसी न किसी रूप में प्रभावित करने वाले जितने भी दार्शनिक, विचारक आदि हुए, उनमें से अधिकांश समाजवाद के समर्थक थे. दार्शनिकों के दुराव के कारण पूंजीवाद के समर्थन में जो लेखन मिलता है, वह समग्र अर्थदर्शन न होकर उत्पादन प्रविधियों का विश्लेषण है. उसका मूल विषय पूंजी के सफलतम उपयोग द्वारा अधिकतम उत्पादकता के लक्ष्य पर विचार करना है. चूंकि वह आर्थिक गतिविधियों की वस्तुनिष्ट व्याख्या करता है, इसलिए साधारणजन की हैसियत उसकी निगाह में उपभोक्ता तक सीमित रह जाती है. पूंजीवादी चाहता है कि उपभोक्ता उसका विनम्र अनुगामी बने. इसलिए वह जन-प्रबोधीकरण की राह में तरह-तरह के अवरोध, प्रलोभन आदि ले आता है. वह दिखावे के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन करता है. मगर प्रकट में चाहता है कि वह जैसा चाहे लोग वैसा सोचें, जो सपने वह दिखाना चाहे वैसे सपने देखें. संबंध औपचारिकताओं में तक सिमट जाएं. लोग मित्रों-रिश्तेदारों और पड़ोसियों के रहते खुद को असुरक्षित महसूस करें. इससे उत्पन्न शून्य को भरने के निमित्त उसका सारा कारोबार चलता है. स्वार्थपरता के कारण पूंजीवादी समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महज छलावा बनकर रह जाती है. मुक्त सोच को न तो तानाशाही स्वीकार करती है, न पूंजीवाद.

पिछली कुछ शताब्दियों में पूंजीवाद को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. इसके बावजूद यदि वह फलता-फूलता रहा है तो इसका कारण है कि अपने अभिजात्य समर्थन के बल पर वह प्रतिरोधी गुटों को छोटे-छोटे वर्गों में बांट देता है और विभाजित समूहों की आपसी स्पर्धा और द्वंद्व के बीच अपना वर्चस्व बनाए रखता है. इसके बावजूद समाजवाद समर्थकों, उसके लिए संघर्ष करनेवालों तथा पूंजीवाद के आलोचकों की फेहरिष्त बहुत लंबी है. बल्कि यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि पूंजीवाद जब-जब निरंकुश हुआ है, तब-तब उसे चुनौती देनेवाले पैदा हुए हैं. इटली का तानाशाह मुसोलिनी. अंतोनियो ग्राम्शी को कैद करके बहुत प्रसन्न था. उसे गुमान था कि उसने अपने सबसे बड़े विरोधी और प्रखरतम विचारक को काबू में कर लिया है. भरोसा था कि जेल की तंग कोठरी में ग्राम्शी का दिमाग भी बंधकर रह जाएगा. उसका दुनिया से कटना अपने आप से भी कट जाने जैसा होगा. परंतु हुआ एकदम उल्टा. जेल की अंधेरी दीवारों ने ग्राम्शी के दिलो-दिमाग को और भी रोशन कर दिया. उसकी सुतीक्ष्ण मेधा दमन के उन रूपों को भी देखने-समझने लगी, जो बाहर की भागम-भाग में संभव न थे. अंधेरे-बंद कमरों में भी उसने अपना लेखन जारी रखा. सरकार ने कागज-कलम पर नजर रखनी शुरू की तो वे चोरी-छिपे जेल में आने-जाने लगे. तानाशाह और उसके नौकरशाह उसके शब्दों से इतने घबराए कि सरकारी वकील को अदालत में अपील करनी पड़ी—‘हुजूर हमें इस आदमी के दिमाग पर बीस वर्ष के लिए रोक लगा देनी चाहिए.’

यह घटना 1928 की है. ग्राम्शी आगे बीस वर्ष जी न सका. क्योंकि जेल की सलाखों ने उसके स्वास्थ्य को बहुत नुकसान पहुंचाया था. परंतु जब तक जिया, तानाशाह की ताकत उसके दिमाग को कैद कर पाने में असमर्थ रही. जेल में रहकर उसने 2848 नोट्स लिखे. आगे चलकर वे साम्यवादी चिंतन के नए अध्याय सिद्ध हुए. लगे हाथ एक उदाहरण और. चे ग्वेरा का जन्म अर्जेंटाइना में हुआ था. प्रशिक्षित डाॅक्टर होने के नाते वह चाहता तो मजे की जिंदगी जी सकता था. मगर दक्षिण अमेरिकी देशों में पूंजी आधारित साम्राज्यवाद के कुरूप चेहरे से उसको ऐसी नफरत हुई कि उसने अपने जीवन का मकसद ही बदल दिया. अब उसका एकमात्र जुनून था, पूंजीवाद का समूल नाश. फिदेल कास्त्रो उसे पूंजीवाद के विरुद्ध लड़ाई में सर्वाधिक सशक्त नेता और योद्धा नजर आया तो वह उससे जुड़ गया. भले ही कास्त्रो की लड़ाई उनके अपने देश क्यूबा की आजादी के लिए थी. यह सोच कर कि एक भी देश यदि पूंजीवादी जबड़ों से बाहर निकलने में कामयाब हो जाता है तो वह समाजवाद की ही जीत होगी, उसने अपने देश से बाहर जाकर छापामार युद्ध का संचालन किया और क्यूबा की आजादी का सबसे जांबाज योद्धा बना. जीत के बाद कास्त्रो देश के नव-निर्माण में जुट गए. चे को भी मंत्रीपद सौंपा गया. मगर वह ठहरा समाजवादी योद्धा. पूंजी के साम्राज्य को उखाड़ फैंकने को उद्धत. सरकार में दूसरी स्थिति में होने के बावजूद एक दिन वह अचानक गायब हो गया. आखिर युद्ध-भूमि में उसने प्राण तजे.

ग्राम्शी ने साम्यवाद को अपना आदर्श माना था. मार्क्स से वह प्रभावित था, परंतु उसके विचारों को ज्यों का त्यों अपनाने के बजाय उसने उनकी नए सिरे से व्याख्या की. मार्क्स का कहना था कि पूंजीवादी समाजों में वर्ग-संघर्ष अपरिहार्य है. बीसवीं शताब्दी में विकसित देशों को पूंजीवाद के हाथों में खेलते देख मार्क्सवाद की यह आधारभूत अवधारणा गलत सिद्ध होने लगी थी. तो क्या मार्क्सवाद झूठ है? उसकी कोई प्रासंगिकता नहीं? ग्राम्शी ने इसी तथ्य से आगे विचार करना आरंभ किया था. आखिर वह इस नतीजे पर पहुंचा कि पूंजीवाद समाज की आर्थिक संपदा को ही कब्जे में नहीं ले लेता, वह लोगों के दिलोदिमाग पर भी अधिकार जमा लेता है. वह सभ्यता और विकसित संस्कृति का सपना लोगों के दिमागों में रोपता है. इससे उत्पीड़ित वर्ग में उत्पीड़क स्थितियों को समाप्त करने के बजाय उत्पीड़क की स्थिति में आने की होड़ मच जाती है. ग्राम्शी ने इसको सांस्कृतिक आधिपत्य का नाम दिया. उसने जोर देकर कहा था—‘आदमी तो सभी बुद्धिमान हैं, किंतु समाज में सभी का व्यवहार बुद्धिमानों जैसा नहीं होता. कारण है कि सत्तासीन अभिजात जनसाधारण के मस्तिष्क का अपने हितों के अनुरूप अनुकूलन कर लेता है. विपुल जनशक्ति को वह छोटे-छोटे समूहों में इस तरह बांट देता है कि विरोधी जनसमूह सदैव अल्पमत में होता है. इसका निदान क्या हो? सर्वहारा वर्ग को सांस्कृतिक आधिपत्य के चंगुल से बाहर कैसे लाया जाए? इसके लिए ग्राम्शी ने सुझाव दिया कि यदि शोषित वर्ग सचमुच अपनी मुक्ति चाहता है तो पहले उसे बुर्जुआ के सांस्कृतिक वर्चस्व से बाहर आना होगा. समाज के शीर्षस्थ लोग जिनमें राजनेता, पुरोहित, व्यापारी और नवधनाढ्य बुर्जुआ वर्ग सम्मिलित है, परस्पर संगठित हो निजी हितों की सुरक्षा हेतु अभिजन संस्कृति को जन्म देते हैं. उसके प्रति सर्वजन का आकर्षण अंततः उसकी आर्थिक-सामाजिक पराधीनता का कारण बनता है. वर्चस्व से मुक्ति समांतर श्रमसंस्कृति के विकास के बाद ही संभव है.

कार्ल मार्क्स की भांति मिखाइल बकुनिन भी अपने समय का चर्चित श्रमिक नेता था. पेरिस क्रांति के दौरान दोनों एक साथ थे, मगर ‘प्रथम इंटरनेशनल’ के दौरान उनके बीच वैचारिक दूरियां इतनी बढ़ीं कि रास्ते अलग करने पड़े. मार्क्स वर्ग-संघर्ष पर विश्वास करता था. उसका मानना था कि वर्गहीन समाज की स्थापना के लिए सर्वहारा क्रांति आवश्यक है. प्रूधों से प्रभावित बकुनिन ऐसे राज्य का सपना देखता था, जिसमें सत्ता पूरी तरह विकेंद्रीकृत, लोग संगठित, जागरूक एवं आत्मानुशासित हों. साथ में इतने प्रबुद्ध और अनुशासित कि राज्य की आवश्यकता ही न रहे. अ-राजकता यानी ‘बिना राजा का राज्य’ जैसी अवधारणा नई न होकर भी लोगों को असंभव जान पड़ती थी. शताब्दियों से शासित होते आए, राज्य के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दमन के अनुरूप अनुकूलन कर चुके लोगों का ऐसा विश्वास नामुमकिन भी नहीं था. इसलिए अराजकतावादी विचारधारा की ओर जनसाधारण का रुझान कम रहा. फिर मार्क्स के समर्थन में उसका विपुल लेखन था. ‘दि कैपीटल’ में उसने पूंजीवादी के शोषणकारी चरित्र और उसकी जटिल प्रविधियों की गहन विवेचना की थी. उसकी प्रखर मेधा से उसके आलोचक भी अचंभित थे. उसके दम पर मार्क्स को बकुनिन से कहीं अधिक प्रतिष्ठा मिली. दुनिया-भर में साम्यवाद के प्रति जबरदस्त रुझान के बावजूद अपने उच्चादर्शी स्वप्न के बल पर अराजकतावाद बुद्धिजीवियों को लुभाता रहा. बीसवीं शताब्दी में लियोन ट्राट्स्की, पीटर क्रोप्टोकिन, एम्मा गोल्डमेन ने अपने प्रखर लेखन द्वारा इस विचारधारा को आगे लाते हुए उसको साम्यवाद का विकल्प सिद्ध करने की कोशिश की. समकालीन बुद्धिजीवियों में ना॓म चा॓मस्की इसके समर्थक विद्वान हैं. अराजकतावाद के अलावा समिष्टवाद, सहजीवितावाद, श्रमिकसंघवाद, संघवाद आदि दर्शन समाजवाद के विकल्प के रूप में आए. मार्क्सवाद की अपेक्षा इन्हें थोड़ा सकारात्मक माना जा सकता है तो इसलिए कि ये शिखर को कमजोर कर बराबरी करने का नहीं सोचते, बल्कि धरातल को इतनी सुदृद्धता और उठान देने का सपना पालते हैं कि बुर्जुआ सत्ताएं अपना तेज गंवा इतिहास की चीज बन जाएं.

बीसवीं शताब्दी के मध्याह्न तक दुनिया में जो साम्यवादी-समाजवादी राज्य गठित हुए उनकी कमजोरी थी कि वह इच्छाओं के चयन की प्रणाली पर कोई ध्यान नहीं दिया गया. एकदलीय व्यवस्था में वहां लोककल्याण के नाम पर अल्पमत की इच्छाओं को थोपा जाता रहा है. इसको दलीय तानाशाही भी कहा जा सकता है. ऐसी व्यवस्था नागरिकों के बहुमुखी विकास को अवरुद्ध करती है. पूंजीवाद जनसाधारण को उपभोक्ता मानकर उनकी उपेक्षा करता है, दलगत तानाशाही उसको श्रम-इकाई तक सीमित कर देती है. माओ के कथन, ‘सत्ता बंदूक की गोली से निकलती है’—के पक्ष में ऐतिहासिक साक्ष्य हो सकते हैं, किंतु इतिहास इस बात का भी साक्षी है कि बलप्रयोग द्वारा समाज में वास्तविक परिवर्तन लाना सरासर असंभव है. उससे केवल मुखौटे बदले जा सकते हैं. एक को मारकर दूसरा गोलीबाज सत्ता पर सवार हो जाता है और समाज का ढांचा ज्यों का त्यों बना रहता है. ऐसे अतिकामी विचारों के महिमामंडन की चूक इतिहास भी करता आया है, इस कारण उसको ‘अभिजन वर्ग की कब्रगाह’ कहा गया है……

मेरा विश्वास है कि लेखन एक नैमत्तिक कर्म है. प्रत्येक लेखक अपने समाज और परिवेश से कच्चामाल उठाता है और अपनी कल्पना और सृजनात्मकता के साथ उसको रचना का रूप देकर वापस लौटा देता है. इस काम में उसे अपने मित्रों, परिजनों के अलावा उन लोगों से भी मदद मिलती है जिन्हें वह शायद जानता तक न हो….

आ नो भद्रा कृत्वो यन्तु विश्वतः!

ओमप्रकाश कश्यप
64वां गणतंत्र पर्व, 2013

‘समाजवादी चिंतन की पृष्ठभूमि’ पुस्तक की भूमिका

सामान्य

लगभग पांच वर्ष पुरानी यह घटना दिमाग से उतरती नहीं. अपनी पुस्तक ‘सहकारिता आंदोलन: उद्भव एवं विकास’ के प्रकाशन को लेकर राजधानी के जाने-माने प्रकाशक से संपर्क साधा था. संस्थान स्वामी का छूटते ही कहना था—‘आजकल सहकारिता को कौन पढ़ता है!’ मैंने सहकारिता को लेकर कुछ छिटपुट आलेख 1997 से लिखने आरंभ किए थे. कहा जा सकता है कि 2007 में तैयार हुई वह पांडुलिपि लगभग 10 वर्ष के स्वाध्याय और परिश्रम की देन थी. जबकि प्रकाशक महोदय वे थे जिन्होंने पूंजीवाद विरोधी विचारधारा पर केंद्रित विदेशी पुस्तकों के अनुवाद प्रकाशित कर खूब वाहवाही बटोरी थी. रूस के क्रांतिकारी साहित्य के अनुवाद के अलावा मार्क्स, लेनिन, रोजा लेक्समबर्ग, चे ग्वेरा जैसे क्रांतिकारी समाजवादियों पर केंद्रित उनकी कई पुस्तकें बाजार में थीं. उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा उन्हीं की बिक्री से आता था. वे बाजारवाद के विरोध में चल रही बहसों से बने बाजार को तो कब्जाए रखना चाहते थे, परंतु उसके सबसे सार्थक विकल्प पर उन्हें भरोसा न था. जिस सहकारिता आंदोलन से विश्व के अस्सी करोड़ नागरिक जुड़े हों. भारत के बीस और अमेरिका जैसे महापूंजीवादी देश के चालीस प्रतिशत नागरिकों का जिससे आत्मीय संबंध हो—उसके बारे में हिंदी प्रकाशक का व्यंग्यात्मक लहजे में बातें करना, सिर्फ उसका दिमागी खोखलापन नहीं, हिंदी प्रकाशन-जगत की विडंबना भी है. इसको एक प्रकाशक की बौद्धिक अल्पज्ञता मानकर भुला पाना आसान भी नहीं है. खासकर तब जबकि उदारवाद, भूमंडलीकरण, बाजारवाद, विनिवेशीकरण गत दो दशकों में सर्वाधिक चर्चित शब्द रहे हैं. इनके बनिस्पत सहकारिता, समाजवाद, सहजीवितावाद और समष्ठिवाद जैसे उपक्रमों, जो पूंजीवाद का सार्थक विकल्प रचने की क्षमता रखते हैं, की चर्चा मीडिया में ‘न’ के बराबर हुई है. सहकारिता का यदा-कदा उल्लेख होता भी है, तो उसके आधार पर गठित संगठनों में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर, उन्हें बदनाम करने के लिए. इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि हमारे अखबार, मीडियाकर्मी तथा उनके द्वारा पोषित, स्थापित बुद्धिजीवी सार्थक विकल्पों की चर्चा कम, प्याले में तूफान ज्यादा खड़ा करते हैं. इसलिए बाजारवाद, भूमंडलीकरण, आर्थिक उदारीकरण जैसे शब्द तथा इनके बहाने होने वाले विमर्श महज प्रतिक्रियावादी सिद्ध होते हैं और सार्थक विकल्पों की खोज बार-बार पटरी से उतरती रहती है.

प्रस्तुत पुस्तक की रचना के दौरान भी कई अनुभव हुए. उन दिनों प्रसंगवश जिससे भी इसका जिक्र किया, एकाध को छोड़कर प्रायः सभी ने भारतीय वाङमय का अध्ययन करने का परामर्श दिया. किसी ने कहा—वेदों का प्रणयन करो, वे समाजवादी प्रेरणा के आदिस्रोत हैं. किसी ने जैन और बौद्ध दर्शन के विशिष्ट अध्ययन की सलाह दी. खासकर उनकी नैतिक व्यवहार संबंधी मान्यताओं को लेकर. एक मित्र से तो जब भी मिला, हर बार उनके दिमाग की घड़ी की सुई शंकराचार्य पर अटकी हुई मिली—‘वेदांत से परे समाजवाद क्या है?’ कोई उनकी इस स्थापना की गहराई में जाने की कोशिश करे, उससे पहले ही वे आगे बढ़ जाते. बार-बार वही धुन, वही टेक, वही लगन—‘जिस दर्शन ने मान लिया कि कण-कण में भगवान हैं, उससे परे सोचने की गुंजाइश ही कहां रह जाती है….क्या बचा रह जाता है आगे सोचने को!’ वेदांत के प्रति इस सम्मोहन के शिकार वे अकेले नहीं हैं. परंपरा के प्रति जड़ आसक्ति ने भारत के मौलिक चिंतन को बहुत नुकसान पहुंचाया है. परिणामस्वरूप गत बारह सौ वर्षों में एक भी नया दर्शन नहीं जन्मा है. आखिर क्यों? इस पर उन्होंने शायद ही कभी विचार किया हो! अध्यात्म जैसे परम जिज्ञासु विषय को धर्म और परंपरा के नाम पर अतार्किक और कर्मकांडी बनाए रखने की स्वार्थपूर्ण कोशिश में ‘न्याय’ और ‘वैशेषिक’ जैसे दर्शन जो, ज्ञानार्जन को मोक्ष का माध्यम बताते थे, एक षड्यंत्र की भांति नेपथ्य में ढकेले जाते रहे. उस पर तुर्रा यह कि हम विश्वगुरु थे, विश्वगुरु हैं….मैं मानता हूं कि मित्र द्वारा भारतीय समाजवाद की मूल प्रेरणाओं की पड़ताल हेतु वेदों, उपनिषदों के अलावा जैन और बौद्ध साहित्य को पढ़ने की सलाह देना निस्संदेह सदाशयतापूर्ण था. मैंने उनकी सलाह के अनुसार बरतने की कोशिश भी है. भारतीय समाजवाद की पृष्ठभूमि पर केंद्रित पूरा एक खंड इस पुस्तकमाला में लाने की योजना है. हैरानी मात्र इस बात की है कि दो-ढाई वर्ष के अंतराल में जब तक इस पुस्तक की लेखन प्रक्रिया चली, किसी ने भी भारत के भक्ति आंदोलन की सामाजिकी के बारे में जानने की सलाह नहीं दी. किसी ने नहीं कहा कि समाजवादी आंदोलन को महज आर्थिक मुक्ति का आंदोलन समझ लेना भारी भूल होगी. समाजवाद मनुष्य की सर्वतोन्मुखी स्वाधीनता और समानता का संपूर्ण मानवतावादी दर्शन है. उसके साथ सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता भी जुड़ी हुई है. भारत में इसके स्वर पहली बार भक्त-कवियों की ओजपूर्ण वाणी में सुनाई पड़े थे.

पश्चिम में पंद्रहवीं शताब्दी में आरंभ हुए सुधारवादी आंदोलनों का लक्ष्य मनुष्य की राजनीतिक, सामाजिक आजादी को वापस लाना था. आर्थिक समानता का विचार उस समय तक अजन्मा था. धर्म को समस्त जीवनमूल्यों का आधार माना जाता था. उसका नियंत्रण उन शक्तियों के अधीन था, जो इस संसार और यहां उपलब्ध प्रत्येक सुख-सुविधा को मायाजाल बताकर जनसाधारण को पाप-पुण्य, लोक-परलोक की भ्रांत धारणाओं में उलझाए रखना चाहती थीं. उनमें अधिकांश बेहतर जीवन जीते थे और कुछ का जीवन तो अत्यंत विलासितापूर्ण था. निहित स्वार्थ के लिए धर्मसत्ता आततायी एवं विभेदकारी सामंती शक्तियों का समर्थन करती थी. इसलिए आरंभिक समानतावादी आंदोलनों का प्रमुख लक्ष्य मानवमात्र को पुरोहितवाद, आडंबरवाद और पोंगापंथी से मुक्ति दिलाना था. पश्चिम में उसकी शुरुआत मार्टिन लूथर द्वारा हुई, जिसे जॉन कॉल्विन, सरवाइंतिस, जियादार्नो ब्रूनो, संत साइमन, वाल्तेयर, रूसो आदि विचारकों ने गति दी. लगभग इसी कालखंड में धार्मिक सुधारवादी आंदोलन भारत में भी जन्मे, परंतु यहां की परिस्थितियों में वे उतने कारगर सिद्ध न हो सके. भारत में भक्ति आंदोलन का विकास एक क्रांतिकारी विचारधारा के रूप में हुआ था. आरंभिक दिनों में उसको यथास्थितिवादियों से टकराना भी पड़ा. परंतु संत कवियों का नैतिक आभामंडल, उनका उच्च मानवीय सरोकार जैसे कुछ कारण थे, जिनसे लोगों के बीच उनकी प्रतिष्ठा निरंतर बढ़ती गई. वह सही मायने में सामाजिक आंदोलन था. उसमें ऐसे लोग सम्मिलित थे, जिन्हें परंपरागत धर्मायोजनों में भाग लेने की मनाही थी. जिनके लिए वेदाध्ययन पाप था. मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने से जिन्हें रोक दिया जाता था. जो धर्म और जाति के नाम पर शताब्दियों से उत्पीड़न सहते आए थे.

भक्त कवियों ने धर्म के नाम पर व्याप्त कर्मकांड और बलिप्रथा को चुनौती दी. कहा कि परमात्मा निर्मल हृदय में निवास करता है. ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’. तब आदमी को मंदिर-मस्जिद जाने, तीरथ नहाने, दान-पुण्य का नाटक करने, व्यर्थ का चढ़ावा चढ़ाने के ढकोसलों की आवश्यकता ही क्या है! ‘एक नूर से सब जग उपज्या’ कहकर उन्होंने जाति के नाम पर भेदभाव करने वालों को ललकारा. उससे पहले जितने भी धर्म, संप्रदाय पनपे थे, सबके पीछे किसी न किसी राजा का समर्थन था. पुरोहितवर्ग सत्तावर्ग से हाथ मिलाए रहता था. आपद्कर्म के बहाने वह उनके हर धत्कर्म में न केवल सहयोगी बनता, बल्कि अपनी ऊल-जुलूल मान्यताओं, रूढ़ियों के आधार पर उसे बढ़ावा भी देता था. अकेले संतकवि ऐसे थे जो अपनी नैतिक सत्ता के बूते ‘कहा मोको सीकरी सौ काम’ कहकर बादशाह अकबर को भी ठेंगा दिखा सकते थे. बड़े-बड़े सरदारों, मुल्ला-मौलवी, पंडित ओझाओं को राजदरबार में सिर झुकाए देखने वाला जनसमाज संतकवियों के फक्कड़पन, वाणी के ओज, साफगोई भरी ललकार और सीधी-सरल भाषा में ज्ञान संप्रेषण की कला पर सम्मोहित था. उनकी बातें उलझाव से दूर, सीधी और व्यावहारिक होती थीं. आरंभिक भक्त कवि समाज की निचली जातियों से आए थे. वे निर्गुण के उपासक थे. मूर्तिपूजा, जातिभेद, कर्मकांड आदि का विरोध करते थे. भक्ति आंदोलन की उस आरंभिक सफलता ने काफी लोगों को आकर्षित किया. कबीर, दादू दयाल, रविदास, मलूका, पीपा जैसे संत कवियों की वाणियां घर-घर गूंजने लगीं. इन कवियों के लिए साहित्य जीवन का सार, लोकाचार का हिस्सा था. उनसे प्रभावित होकर दूसरे वर्ण के लोग भी भक्ति आंदोलन से जुड़ने लगे. वे अपने साथ अपने संस्कार भी लाए थे. परिणामस्वरूप निराकार अराधना साकार पूजा-पाठ में ढलने लगी. प्रकारांतर में उसने जातिवाद, धार्मिक आडंबरवाद के पोषण को बढ़ावा दिया. उसने भक्ति आंदोलन के समस्त क्रांतिकारी सोच पर पानी फेरने का काम किया, जिससे वह मठों और दरगाहों में सिमटने लगा. सतरहवीं-अठारवीं शताब्दी का वह समय जब पश्चिम में वाल्तेयर, रूसो, वोलेनी, मिल, बैंथम आदि जड़ रूढ़ियों और बंजर परंपराओं पर जमकर प्रहार कर रहे थे, भारतीय मेधा अपने पराभव के कदाचित अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही थी. इसलिए जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय शासकों की मदद से देश को धीरे-धीरे कब्जाना आरंभ किया तो उसकी चाल को भांप, उनके संगठित विरोध के लिए आवाज उठाने वाला एक भी सूरमा इस देश में नहीं था.

अभी तक समाज का सामान्यबोध धर्म से अनुशासित होता आया है. धर्म की नींव अध्यात्म पर आधारित होती है. जनसाधारण को अपने अनुभवों पर सर्वाधिक अविश्वास इसी क्षेत्र में होता है. यह उसकी दूसरों पर निर्भरता बढ़ाता है. चूंकि आध्यामिक प्रेरणाओं का कोई स्पष्ट रूप नहीं है, इसलिए इसके नाम पर आरंभ से खूब घालमेल होता रहा है. इस घालमेल को महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, अजित केशकंबलि आदि विचारकों ने समझा था. परंतु असली चुनौती मिली बौद्ध दर्शन की ओर से. उन्होंने धर्म और अध्यात्म के नाम पर यज्ञों के औचित्य पर सवाल उठाए. कर्मकांड, पशुबलि तथा पुरोहितवाद के रूप में समाज में व्याप्त एक वर्ग की मनमानी का विरोध करते हुए उन्होंने सबको साथ लेकर चलने की सलाह दी. गौतम बुद्ध ने मगध जैसे भारी-भरकम साम्राज्य के आगे वैशाली जैसे आकार में काफी छोटे राज्य को अजेय बताया. परिणाम यह हुआ था कि छोटे-छोटे व्यापारी, उद्यमी, दस्तकार और शिल्पी संगठित होकर देश-देशांतर तक व्यापार करने लगे. फलस्वरूप स्पर्धा के बजाय सहयोग और सहकार विकास के मूल-मंत्र बन गए. देश समृद्धि की ओर अग्रसर होने लगा. जिसे भारतीय इतिहास का स्वर्णकाल कहा जाता है, वह वही दौर था जब देश प्रपंची पुरोहितों तथा उनके द्वारा पोषित आडंबरवाद से मुक्त था. बाद में बौद्ध धर्म में भी वही विकृतियां आने लगीं, जो वैदिक धर्मों के पराभव का कारण बनी थीं. राजनीतिक अस्थिरता बढ़ने से राज्यों का आकर भी सिकुड़ने लगा था. राजनीतिक स्वार्थपरता इतनी बढ़ी कि अपने प्रतिद्वंद्वी को सिर नीचा दिखाने या खुन्नस मिटाने के लिए राजा-सामंत विदेशी आक्रामकों को न्योतने लगे. इस प्रवृत्ति ने मुगलों को जमीन दी थी. इसी से ईस्ट इंडिया कंपनी को पांव जमाने का अवसर मिला.

आखिर क्या कारण है कि पश्चिम के सुधारवादी आंदोलन कामयाब हुए और अठारहवीं शताब्दी तक आते-आते उसने स्वयं को पूरी तरह बदल डाला. यहां तक कि वह अपनी सहस्राब्दियों पुरानी दास प्रथा के कलंक से भी छुटकारा पाने में सफल हुआ. इस बीच भारत मुगलों की झोली से छिटककर अंग्रेजों की पॉकिट में समा गया. दो-चार को छोड़कर अधिकांश राजे-रजबाड़े चांदी की थाली में सजाकर अपना-अपना राज्य उनके सुपुर्द करते गए. इसका एक कारण तो भारतीय समाज की विशिष्ट जातीय संरचना थी, जो समाज के बड़े वर्ग को शिक्षा, संसाधन और निर्णय-प्रक्रिया से काट देती थी. दूसरा कारण भी कम महत्त्वपूर्ण न था. यूरोप में धार्मिक सुधारवाद औद्योगिक क्रांति के कंधों पर सवार होकर आया था. वैज्ञानिक चेतना उसकी बांह में बांह डाले साथ चल रही थी. सोलहवीं शताब्दी के दार्शनिक-वैज्ञानिक फ्रांसिस बेकन ने यह कहकर कि ‘ज्ञान ही शक्ति है….मशीनें आने वाले समय में मनुष्यता की उद्धारक सिद्ध होंगी’—प्रौद्योगिकी पर आधारित नई समाज-व्यवस्था का सपना लोगों की आंखों में भरा था. इसके फलस्वरूप वहां वैज्ञानिक शोधों को बढ़ावा मिला. मशीनें न केवल कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था का बेहतर विकल्प बनकर आई थीं, बल्कि उन्होंने कृषिक्षेत्र में भी अपनी महत्ता सिद्ध कर, श्रम पर लोगों की निर्भरता कम कर दी थी. हालांकि नई अर्थव्यवस्था की भी अपनी विसंगतियां थीं. उसके कारण समाज में बेरोजगारी बढ़ी थी. शिल्पकार वर्ग मशीनों के आने से पहले सम्मान का जीवन जीता आया था, उसको अब उद्योगपतियों की चाकरी करनी पड़ रही थी. सघन उत्पादन-क्षम मशीनों के आने के बाद उसके श्रम-कौशल की अवमानना का जो सिलसिला आरंभ हुआ था, वह बढ़ता ही जा रहा था. लेकिन नई अर्थव्यवस्था अपने साथ शिक्षा का उपहार लेकर आई थी. पढ़ा-लिखा मध्यवर्ग हालांकि अधिकांश मामलों में पूंजीपतियों के साथ था. उनके हर निर्णय को आप्त-वचन मानकर शिरोधार्य कर लेता था. परंतु उनके बीच कुछ दूरंदेश ऐसे भी थे, जिन्होंने पूंजीवाद के कुटिल चेहरे को समय रहते पहचान लिया था. अपने गुस्से का इजहार वे विभिन्न मंचों से करते थे. सामंतकालीन अर्थव्यवस्था में लोगों को मुंह खोलने की आजादी न के बराबर थी. नई अर्थव्यस्था से श्रमिकों-कामगारों को संतुष्टि भले न हो, फिर भी उसमें ऐसा बहुत कुछ था, जो लोगों को उससे समझौता करने को प्रेरित करता था. चैतरफा आलोचनाओं से घिरे पूंजीवाद का आकर्षण इतना गहरा था कि मन से कोई भी पुराने दौर में लौटने को तैयार न था. हालांकि संघर्ष और परिवर्तन का सिलसिला निरंतर बना हुआ था.

सवाल उठता है कि समाजवाद ही क्यों? यह प्रश्न सोवियत संघ के पराभव के बाद से और जोर देकर उठाया जाने लगा है. हाल में चीन का नाम भी यह कहकर जोड़ दिया जाता है कि उसने भी अपनी साम्यवादी निष्ठाओं को त्याग, अपने दरवाजे पूंजीवादी उद्यमों के लिए खोल दिए हैं. इसका उत्तर आसान है. समाजवाद केवल आर्थिक व्यवस्था नहीं है. उसका अभिप्राय सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक बराबरी को बढ़ावा देने वाले पूरी तरह लोकतांत्रिक-समानतावादी तंत्र से है. आर्थिक संसाधन किसी एक के हाथों में रहें अथवा सरकार के, उनका लोकोपकारी उपयोग तब तक असंभव है, जब तक लोक का उनपर वास्तविक नियंत्रण न हो. बहुसंख्यक के हितों की सुरक्षा का दायित्व किसी एक को सौंप देने के अनेक खतरे हैं. ऐसी व्यवस्था लंबे समय तक निरापद नहीं हो सकती. इसलिए चालीस वर्ष की उम्र में दार्शनिक सम्राट का समर्थन करने वाला प्लेटो पैंसठ का होते-होते दार्शनिकों के समूह को सत्ता सौंपने का समर्थन करने लगता है. व्यावहारिक रूप में यह असंभव है कि सभी लोग सभी दायित्वों का निर्वहन कर सकें. अतएव दायित्व-विभाजन अपरिहार्य हो जाता है, जिसके अंतर्गत शासन-व्यवस्था चुने हुए प्रतिनिधियों को सौंपने की अनुशंसा की जाती है. ऐसे निर्वाचित तंत्र की सफलता तभी तक संभव है, जब तक लोक यह न भूले कि वह अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से स्वयं शासित है तथा उसके प्रतिनिधि हर समय उसकी इच्छानुसार आचरण करने को बाध्य हैं. लोक को यह भी समझना चाहिए कि लोगों की इच्छाएं अस्थिर और परिवर्तनशील होती हैं. बदलती परिस्थितियों में उनमें परिवर्तन अवश्यंभावी है. समाज में समरसता और विकास की निरंतरता को बनाए रखने के लिए लोगों की इच्छाओं के बीच तालमेल की आवश्यकता प्रत्येक समाज में हर समय होती है. यह तभी संभव है जब वह सदैव जागरूक एवं चैतन्य बना रहे.

इस पुस्तक में एडम स्मिथ की मौजूदगी कुछ पाठकों को चौंका सकती है. लेकिन यहां उसे काफी सोच-विचार के बाद सम्मिलित किया गया है. यह तय है कि आधुनिक पूंजीवाद स्मिथ के विचारों से प्रेरणा लेकर खड़ा हुआ है. तो भी उसको पूंजीवाद का समर्थक नहीं कहा जा सकता. इस शब्द को जन्म ही स्मिथ के बाद हुआ. कुछ विद्वानों ने स्मिथ को पूंजीवाद के शब्द-मंत्र Laissez-faire का जन्मदाता माना है. यह शब्द भी उसकी पुस्तकों में सर्वथा अनुपस्थित है. बाजार और उत्पादकता के संबंधों की व्याख्या के लिए वह नए पद ‘अदृश्य हाथ’(इन्वीजिविल हेंड) का प्रयोग करता है. उसका मानना था कि बाजार में स्वतः अनुशासन की क्षमता होती है. बाजार की परमस्वातंत्रय की अवस्था उसे परमसमानता की ओर अग्रसर करती है. डेविड वार्समेन के साथ एक साक्षात्कार में नाम चाॅमस्की बड़े काम की बात कहता है—‘वह(एडम स्मिथ) अठारवीं शताब्दी के प्रबोधनयुग का महत्त्वपूर्ण विचारक है. उस समय तक पूंजीवाद का जन्म ही नहीं हुआ था. जिसे आज हम पूंजीवाद कहते हैं, सही मायने में उसने उसका तिरष्कार ही किया था.’ नोम चॉमस्की के अनुसार, ‘लोग स्मिथ को लेकर स्कूलों-कॉलेजों में पढ़ाई जाने वाली बातों को लेकर राय बना लेते हैं. हर कोई ‘दि वेल्थ आ॓फ नेशन्स्’ के आरंभिक पैराग्राफ को पढ़कर निष्कर्ष निकाल लेता है, जिसमें उसने श्रम विभाजन को चामत्कारिक रूप से लाभकारी बताया है. जबकि इसी पुस्तक में आगे वह श्रम-विभाजन के पूंजीवादी सिद्धांत की आलोचना करता है. वह लिखता है कि श्रम-विभाजन मनुष्यता के लिए नुकसानदेह है. वह लोगों को इतना ज्यादा मूर्ख और लापरवाह बना सकता है, जितने वे बन सकते हैं. इसलिए किसी भी सभ्य समाज में सरकार को श्रम-विभाजन को एक सीमा तक ही मान्यता देनी चाहिए.’

पूंजीवाद ने आरंभ से प्रत्येक उपलब्ध ज्ञान, उसके हरेक अनुशासन का उपयोग निहित स्वार्थ के हित किया है. कभी वह विरोधी विचारों को अपना बनाकर प्रस्तुत करता है, तो कभी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उनके समर्थन में उतर आता है. यह कार्य वह लोगों का व्यवस्था से अनुकूलन करने, उनके मन में यह विश्वास जाग्रत करने के लिए करता है कि वही सर्वाधिक हितैषी है. ध्यान रहे नियंत्रण-मुक्त उत्पादन अकेले पूंजीवादी उद्यमों की मांग नहीं है. सहकारी समितियां भी यही मांग करती रही हैं. छोटे से छोटा कारीगर भी उम्मीद करता है कि उसके काम में अड़चन न डाली जाए. उत्पादकता के हक में यह शर्त मान भी ली जाती है. फिर पूंजीवादी उत्पादन और समाजवादी उत्पादन तंत्र में क्या भेद है? अधिकतम लाभ के लिए पूंजीवादी उत्पादन श्रमिक से लेकर उपभोक्ता तक सभी का अवमूल्यन करता है. उसके लिए सामाजिक लाभ गौण होते हैं. दूसरी ओर समाजवादी संस्थान सामाजिक लाभों को भी पूंजीगत लाभ जितनी महत्ता देते हैं. उनके लिए उपभोक्ता की इच्छा का महत्त्व होता है, इसलिए उत्पाद और उत्पाद का चयन समाज की मूलभूत आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया जाता है.

एक अर्थशास्त्री के रूप में अधिकतम उत्पादकता के हक में स्मिथ ने जैसा सोचा, वैसा ही लिखा है. साथ में कार्य-विभाजन के खतरे भी गिनाए हैं. कुशल अर्थविज्ञानी की भांति वह उत्पादन तंत्र की कार्यकुशलता को बढ़ाने के लिए सुझाव देता है. वह अर्थविज्ञानी है. न कि राजनयिक, जो सभी को संतुष्ट दिखने का नाटक रचा सके. अधिकतम उत्पादकता की अर्थ-वैज्ञानिकी का उपयोग जितना पूंजीवादी तंत्र के लिए जरूरी है, उतना समाजवादी उत्पादन तंत्र के लिए भी है. यह सरकार चलाने वालों की जिम्मेदारी है कि वे अधिकतम उत्पादकता और स्पर्धा के नाम पर उत्पादन एवं विपणन के क्षेत्र में एकाधिकार एवं अंध-स्पर्धा न पनपने दें. वे उत्पादकों को विवश करें कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कच्चे माल के शोधन के लिए अनुकूल तकनीक विकसित करें. लोगों की कार्यकुशलता में सुधार के लिए प्रशिक्षण दिलवाएं. जो सरकारें चलाते हैं, उनकी जिम्मेदारी दूसरों से कहीं बड़ी होती है. उनकी दायित्व है कि वे पूंजीपतियों से कहें कि वे कच्चेमाल, श्रम, तकनीक आदि का उपयोग ‘अधिकतम लोगों को अधिकतम सुख’ की कामना के साथ करें. सरकार चलाने वाले केवल—‘ज्ञान ही शक्ति है’ पर न ठहर जाएं.बेकन ने इसके अलावा जो कहा था उसपर भी ध्यान दें—‘ज्ञान-विज्ञान और तकनीक का उपयोग जनसाधारण के कल्याण, उसके कष्टों को दूर करने के लिए किया जाना चाहिए.’ सरकार को ब्लैंक का वह कथन भी याद रखना होगा, जिसके अनुसार सरकार का कर्तव्य है—‘हर व्यक्ति से उसकी क्षमता के अनुरूप काम ले और उसकी जरूरत के अनुसार भुगतान करे.’ इसलिए उसे चाहिए कि जीवन की सामान्य आवश्यकताओं तथा श्रम के बीच स्पर्धा हरगिज न पनपने दे. सरकार का यह भी कर्तव्य है कि वह जेफरसन और थामस पेन की सुने और मानवाधिकारों की रक्षा करे. कुछ ऐसा करें जिससे मनुष्य अपनी स्वतंत्रता में स्वच्छंदता का आनंद ले सके. शासन-प्रणाली को इतनी भारी-भरकम न बनाए कि वह मनुष्य के मूल-भूत अधिकारों का ही हनन करने लगे. यहां थोरो उसका मार्गदर्शक बन सकता है—‘सरकार वही भली है जो शासन बिलकुल न करे’.

लियोनार्दो दा विंसी को लेकर भी कुछ विद्वान आपत्ति कर सकते हैं, किंतु हमें याद रखना चाहिए कि समाजवादी विचारधारा का विकास एक साथ नहीं हुआ है. यदि सामंतकालीन व्यवस्थाओं की बात करें तो उसमें समाज के सुख-संसाधनों पर मुट्ठी-भर लोगों का अधिकार होता था. शेष लोगों को भाग्य के भरोसे जीने के लिए विवश कर दिया जाता था. स्वयं सुख-संपन्नता में आकंठ डूबे मुट्ठी-भर लोग दूसरों को त्याग का उपदेश देते रहते थे. भौतिक सुखों को लेकर लोगों के मन में अजीब किस्म की कुंठा समाई होती थी. इसलिए सुधारवादी आंदोलनों का आरंभिक ध्येय था, धार्मिक-सामाजिक-सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से सर्वथा मुक्ति तथा सुख में साधारणजन की हिस्सेदारी बढ़ाते हुए उसको लेकर समाज में व्याप्त भ्रांत धारणाओं का समाधान करना था. लियोनार्दो ने यह कार्य एक कलाकार के रूप में किया. जिस समय कला का काम केवल देवालयों तथा राजदरबारों और सामंतों की हवेलियों की शोभा बनना था, लियोनार्दो ने ‘मोनालिसा’, दि बैपटिस्ट’ जैसे दर्जनों चित्र बनाए. उनमें अतिसाधारण चरित्रों को लाकर विंसी ने लोगों की इस भ्रांति को तोड़ा. आमजन के प्रति उसकी संवेदना उसकी रचनाओं से झलकती है, जो संख्या में कम होने के बावजूद महत्त्वपूर्ण हैं…..

अंत में बाबा चाणक्य के कथन को दोहराते हुए कि शास्त्र अनंत हैं, विद्याएं ढेरी सारी, समय अल्प और विघ्न हजार. ऐसे में जो सारभूत है वही वरेण्य है. जैसे हंस दूध को पानी से अलग करके पी जाता है.

अनन्तशास्त्रं, बहुलाश्च विद्याः, अल्पश्च कालो बहुविघ्नता च।
यद्सारभूतं तदुपासनीयम्, हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्।।

ओमप्रकाश कश्यप

सहविधान और अर्थनीति : असमान संपत्ति वितरण की समस्याएं और विकल्प

सामान्य

धर्म और अभिजन संस्कृति—8

राज्य का ध्येय होना चाहिएराष्ट्रीय समर्थताओं का विकास. राष्ट्रीय जीवन का परिमार्जन तथा अंत में उसकी पूर्णता. किंतु नैतिक एवं राजनीतिक गति का मानवनियति से विरोध न हो. ब्लंट्श्ली, ’थ्योरी आ॓फ दि स्टेट’.

आधुनिक समाज की अधिकांश समस्याएं आर्थिकसामाजिक विषमताओं की देन हैं. और समाजार्थिक विषमताएं! वे किसकी देन हैं? गौरतलब है कि समाज में आर्थिकसामाजिक वैषम्य केवल आर्थिकसामाजिक कारणों से पैदा नहीं होता. उनके गढ़न में उस समाज की संस्कृति और भौगोलिक परिस्थितियां भी बड़ी भूमिका निभाती हैं. संसाधनों की उपलब्धता, भौगोलिक परिवेश, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, लोकाचार आदि सब मिलकर समाज की आर्थिक संरचनाओं को प्रभावित करते हैं. वे एकाएक पैदा नहीं हो जातीं. किसी मुक्त वनचारी सरल सभ्यता को आधुनिक प्रौद्योगिकीकुशल सभ्यता की ऊंचाइयों तक पहुंचने में सहस्राब्दियां लग जाती हैं. इस परिवर्तन यात्रा के दौरान विकासरत समाज को सभ्यता और संस्कृति के लंबे द्वंद्व से गुजरना पड़ता है. विकास की चेष्ठा में हुई ज्ञानविज्ञान की हर नई पहल का प्रथम सामना धार्मिकसांस्कृतिक शक्तियों होता है. वे परिवर्तन की प्रत्येक धारा को आसन्न संकट के रूप में देखती हैं. चूंकि विकासोन्मुखी धारा में समाज के अधिकांश लोग सम्मिलित होते हैं, वे भी जो धर्म एवं संस्कृति के पैरोकार होने का दावा करते हैं, इसलिए परिवर्तन के विरुद्ध उनका दिखावटी प्रतिरोध लंबा नहीं खिंच पाता. विरोध की अवधि का उपयोग वे परिवर्तन का वाहक बने हर नए व्यक्ति, विचार, आविष्कार आदि को अपने अनुकूल ढालने अथवा उसकी काट के लिए परंपरा और संस्कृति में से स्वार्थानुरूप तर्क खोजने; और यदि बस न चले तो उससे अनुकूलन के लिए करते हैं. उनके साथ समाज के प्रतिभाशाली और समर्थक बुद्धिजीवियों की टीम होती है. उनकी सहायता द्वारा अंततः वे अपने लक्ष्य में सफल भी हो जाते हैं.

उदाहरण के लिए कंप्यूटर के आविष्कार को लें. हर नए आविष्कार की भांति आरंभ में उसे भी यथास्थितिवादियों का खुला विरोध झेलना पड़ा था. परंपरा से जुड़े लोगों को लगता था कि उनकी प्राचीन कार्यशैली कंप्यूटर के अकूत सामर्थ्य के आगे असफल सिद्ध होगी. कुछ अन्य का मानना था कि उससे मानवीय श्रम की अवमानना होगी; तथा उत्पादनक्षेत्र में मानवश्रम की महत्ता और भी कम हो जाएगी. कंप्यूटर के आने के बाद उसकी कार्यक्षमता ने लोगों को चैंकाया भी. मगर जैसे ही उसने आमजन के बीच पैठ बनानी आरंभ की, जैसे ही उसकी उपयोगिता को परखा गया, पढ़ेलिखे लोगों में अपनी पैठ बनाने के इच्छुक ज्योतिषी आधुनिक होने का दावा करते हुए, कंप्यूटर द्वारा जन्मकुंडली बनाने लगे. ब्रह्मांडीय हलचलों के अध्ययन के लिए गढ़ा गया विषय ज्योतिष जो उससे पहले ‘शास्त्र’ कहलाता था, उसे अकारण ही ‘विज्ञान’ कहा जाने लगा. परिणाम सामने है. देश में अंतरराष्ट्रीय स्तर के खगोल वैज्ञानिक हाथ में उंगलियों की संख्या से भी कम होंगे, जबकि मोटी दक्षिणा के बदले पाखंड का सौदा करने वाले ज्योतिषियों की संख्या हजारों में है. प्रत्येक छोटेबड़े अवसर को अपने मुनाफे तब्दील कर लेने के अभ्यस्त पूंजीपति भी भला क्यों पीछे रहते. यथासंभव उन्होंने भी इस काम में मदद की. उनके दिए दान से कथावाचक किस्म के स्वयंभू महात्मा अपने प्रवचन के वीडियो बनवाकर बांटने लगे. धंधा बढ़ा तो उन्होंने अपने लिए टेलीविजन के चौनल ही खरीद लिए. कुल मिलाकर ज्ञानविज्ञान और आधुनिक क्रांति के संदेश के साथ विकसित एक तकनीक के प्रभाव को यथास्थितिवादियों ने भौंथरा कर दिया.

केवल कंप्यूटर के आविष्कार के साथ ऐसा हुआ हो, यह भी नहीं है. लिपि का आविष्कार कबीलाई संस्कृति की असाधारण प्रतिभाओं की देन था. अभिव्यक्ति, प्रशिक्षण, संप्रेषण आदि के लिए पहले प्रस्तर चित्रों को उपयोग में लाया जाता था. कालांतर में मनुष्य का बौद्धिक विकास हुआ तो अभिव्यक्तियों में प्रतीकात्मकता बढ़ने लगी. संकेतों द्वारा संप्रेषण की कला कीलाक्षर लिपि के रूप में विकसित हुई. दुनिया की अधिकांश लिपियां उसी कीलाक्षर लिपि का संशोधित संस्करण हैं. लिपि के विकास के उपरांत आदर्श स्थिति तो यह होती कि उसमें ऐसा काम होता, जिससे ज्ञानविज्ञान का पोषण हो सके. ताकि समाज का बहुमुखी विकास संभव हो, जो ज्ञानानुभवों की परंपरा को सहेजकर समाज के वास्तविक विकास को गति दे सके. जिसकी मदद से ज्ञान, विज्ञान और तकनीक का लाभ सीधे आमजन तक पहुंचाया जा सके. लेकिन हुआ क्या? ज्ञान को सहेजने की प्रक्रिया में भारत में सबसे पहली कृति सामने आई—ऋग्वेद. वह धार्मिक दृष्टिकोण से लिखा गया, भारत का सांस्कृतिक दस्तावेज था. उसका वर्णित प्रच्छन्न इतिहास आर्य लड़ाकों का महिमामंडन करता था. वह सीधेसीधे विजेता के द्रष्टिकोण से, उसे प्रसन्न रखने के लिए किया गया स्तुतिकर्म था. कालांतर में उसकी धार्मिकदार्शनिक ग्रंथ के रूप में प्रतिष्ठा हुई.

ऋग्वेद ने तत्कालीन धर्माचार्यों को इतना सम्मोहित किया कि कालांतर में उसकी प्रतिष्ठा हेतु साम और यजुर्वेद नामक संहिताओं की रचना की गई, जिनमें साम् ऋक् की ऋचाओं के गायन तथा यजुर्वेद उसके याज्ञिक कर्मकांड के निरूपण से संबंधित थी. आशय है कि ज्ञान और परंपरा के संहिताकरण की शुरुआत ही कर्मकांडीकरण से हुई. इसके बावजूद ऋग्वेद के आगे ही संकरी हो चली इस धारा को ‘वेद(ज्ञान)’ कहा गया. कालांतर में यजु, साम और अथर्व को भी उसकी श्रेणी में रख लिया गया. वेद नाम की संज्ञा ज्ञान के पर्याय के रूप में रूढ़ होती गई. शताब्दियों तक भारतीयों की चिंतनधारा वेदों को आप्तवाक्य मानने अथवा न मानने की बहसों में उलझी रही. वेदों का पठनपाठन पुनीत कर्तव्य माना गया, उनमें विश्वास विद्वता की निशानी. आलोचकीय दृष्टि से दूर रखने के लिए समाज के बड़े वर्ग पर उनके पठनपाठन पर पाबंदी लगा दी गई. यह मनुष्य की स्वाभाविक जिज्ञासा का आस्थाकरण था, जिसने आने वाली सहस्राब्दियों को प्रभावित किया था.

भारत ही क्यों, पूरी दुनिया में, लिपि का सर्वप्रथम उपयोग समाज की धार्मिक मान्यताओं, रीतिरिवाजों और कर्मकांडों को सहेजने के लिए किया गया. इसका यह अर्थ नहीं है कि सांस्कृतिकरण की सभी कोशिशें मानवीय स्वार्थ से प्रेरित थीं. दरअसल धर्मप्रेरित आरंभिक सभ्यताकरण का इतिहास व्यक्तिगत स्वार्थ और लोककल्याण, दोनों ही भावनाओं से बना है. प्राचीन आचार्यों ने धार्मिक आचारविचार के साथ तत्कालीन नैतिक मूल्यों को भी समान स्थान दिया गया था. तदनुसार यह कहना उचित होगा कि आरंभिक समाजीकरण की कोशिशों के मूल में कदाचित लोककल्याण की भावना भी थी. किंतु धर्म नामक जिस संस्था के बूते तत्कालीन आचार्य समाज को संगठित करना चाहते थे, उसकी नींव पलायनवाद पर टिकी थी. इहलोक से ज्यादा उसका आग्रह परलोक के प्रति था. सांसारिक सुखसुविधाओं को वह दोयम दर्जे का मानता है. अर्थधर्मकाम और मोक्ष में स्वार्थवश चौथे पुरुषार्थ मोक्ष पर ज्यादा जोर दिया गया था. उसका आकर्षण इतना प्रबल था कि दुनियादारी के संघर्ष में नाकाम रहे; अथवा बलपूर्वक पीछे ढकेल दिए गए लोग आसानी से उसकी ओर मुड़ जाते हैं. धार्मिक सम्मोहन में फंसकर वे स्वयं को परिस्थितियों के हवाले कर देते हैं. यह प्रवृत्ति समाज के बड़े वर्ग को विकास की दौड़ से अनायास ही बाहर कर देती है. कुल मिलाकर इस प्रवृत्ति ने पूर्ण समाजीकरण की कोशिशों को अवमंदित करने का काम किया.

आरंभिक जीवन पूरी तरह प्रकृतिआधारित था. अनिश्चित और संघर्षपूर्ण. उसकी निरंतर परिवर्तनशील स्थितियां मनुष्य के लिए जहां चुनौती थीं, वहीं प्रेरक का काम भी करती थीं. प्राकृतिक शक्तियों के उपादान कारण के रूप में मनुष्य ने अनेक देवताओं की परिकल्पना की. फिर उनके कोप का डर दिखाकर समाज को नियंत्रित करने की कोशिश भी. हालांकि यह कहना बड़ा मुश्किल है कि भारतीय समाज में समाजार्थिकवैषम्य पहले आया अथवा उसे नियति बना देने की चालें लोगों के दिमाग में पहले आईं, किंतु इतना तय है कि पूरी तरह प्रकृतिआश्रित समाज में धर्म के पालक, संरक्षक, संवर्धक तथा व्याख्याकार के रूप में जो वर्ग सामने आया, उसमें अधिकांश लोग लालची और विशिष्टताबोध का शिकार थे. बगैर किसी श्रम के वे अपनी सामाजिक हैसियत को बनाए रखना चाहते थे. अपनी पैठ का अनुचित लाभ उठाते हुए उन्होंने जनसाधारण के मन में लौकिक सुखसुविधाओं के प्रति विरक्ति का भाव पैदा करना आरंभ कर दिया, जबकि उनका अपना जीवन उनकी खुद की स्थापित मान्यताओं के विपरीत था. समाज के शीर्षस्थ वर्ग के दोहरे चरित्र का असर बाकी लोगों पर भी पड़ा. उससे शारीरिक श्रम को लेकर हेय भाव लोगों के मनस् में घर करता गया. धीरेधीरे निर्णय के सारे अधिकार समाज के शीर्षस्थ बुद्धिजीवी वर्ग के हाथों में समाते गए. ऐसे लोग जो केवल शारीरिक श्रम पर निर्भर थे, वे श्रम के मूल्यांकन का अधिकार दूरे वर्ग के अधीन होने के कारण जीवनसमर में निरंतार पिछड़ते गए.

राजसत्ता इस विसंगति का समाधान कर सकती थी. यह उसके गठन का मूल उद्देश्य भी था. लोगों ने राज्य के अधीन रहना स्वीकार ही इसलिए किया था कि वह शांति एवं व्यवस्था बनाए रखने के साथ सभी को जीवन के समान अधिकार प्रदान करेगा. न्यूनतम बलप्रयोग द्वारा शोषणकारी शक्तियों का शमन कर वह ऐसी न्यायपूर्ण एवं कल्याणकारी व्यवस्था स्थापित करेगा, जिसमें सभी को विकास के समान अवसर प्राप्त हों. विडंबना ही कहिए कि राज्य अपने मूल उद्देश्य से प्रायः विमुख ही रहा. उसके इतिहास में ऐसे अवसर बहुत कम आए जब वह अपने आदर्श के करीब पहुंच सका हो. सामान्यतः वह अपने उद्देश्य को पूरा करने में नाकाम ही रहा है. इसके बावजूद आमजन के कल्याण की कीमत पर राज्य की स्तुति, उसे अतिरिक्त सामर्थ्यशाली बनाने के प्रयास महाभारतकाल में ही नजर आने लगे थे. चाटुकारिता की परंपरा में राज्य सभी प्रकार के धर्मों, विद्या एवं शक्तियों का भंडार कहा जाने लगा था. सुशासन के लिए दंडनीति को आवश्यक मानते हुए राज्य को अतिरिक्त अधिकार दिए गए

जिस समय दंडनीति निर्जीव हो जाती है, उस समय तीनों वेद डूब जाते हैं. सभ्यता और संस्कृति के आधार सभी धर्म, चाहे वे कितने ही उन्नत क्यों न हों, पूर्णतः नष्ट हो जाते हैं. जब प्राचीन राजधर्म का त्याग कर दिया जाता है, तब व्यैक्तिक आश्रम धर्म के आधार भी शेष नहीं बचते. इस प्रकार समस्त प्रकार के त्याग राजधर्म में ही दिखाई पड़ते हैं और समस्त प्रकार की दीक्षाएं राजधर्म में ही युक्त हैं. सब प्रकार की विद्याएं राजधर्म में ही सम्मिलित हैं और समस्त लोक राजधर्म के अंतर्गत हैं.’1

स्पष्ट है महाभारतकाल तक राज्यसत्ता और धर्मसत्ता का गठबंधन काफी मजबूत हो चुका था. वर्चस्व कायम रखने, यथास्थिति पर आंच न आने देने तथा खुद को शीर्ष पर रखने के लिए कूटनीतिक चालें चलने के मामले में धर्मसत्ता और राजसत्ता दोनों एक थे. कालांतर में तीसरा वर्ग भी उनमें आ मिला. यह तीसरा वर्ग अर्थसत्ता का प्रतीक था. जिसने विभिन्न समाजों, संस्कृतियों और राज्यों के बीच बढ़ते व्यापार का लाभ उठाकर अकूत संपदा बटोरी थी. अपने बुद्धिचातुर्य और संगठन सामर्थ्य के बल पर वास्तविक उत्पादक वर्ग को अपदस्थ कर वह अर्थसत्ता के शीर्ष पर जा विराजा था. पशुचारण अर्थव्यवस्था तक संपत्ति पूरे समाज की मानी जाती थी. कृषि ने जीवन में स्थायित्व तथा भूमि को स्थायी संपदा के रूप में पहचान दी थी. उपज बढ़ने से लोगों की आय भी बढ़ती जा रही थी. साथ में जरूरतें भी. उनकी भरपाई के लिए आरंभ में समाज का शिल्पकार वर्ग संगठित होकर व्यापार करने लगा. इससे उसकी सामाजिक प्रस्थिति में सुधार हुआ. सभ्यताकरण के दौर में जैसेजैसे मार्ग एवं परिवहनसंबंधी सुविधाए बढ़ीं, शिल्पकार संगठनों का व्यापार भी बढ़ता गया. चूंकि उन दिनों लंबी यात्राएं करना खतरनाक था. मार्ग में लुटेरे, डाकुओं का भय बना रहता था. राज्य की सुरक्षा सेवाएं सब जगह उपलब्ध नहीं थीं. विशेषकर दूसरे राज्यों तथा दुर्गम जंगलों से गुजरते समय. इसलिए लंबी दूरी के व्यापारी अपने माल की सुरक्षा के लिए हथियारबंद दस्ता रखने लगे. धीरेधीरे शिल्पकार वर्ग की दो कोटियां बनती चली गईं. एक वह जो अपने शिल्प एवं श्रम की सहायता से उत्पादन करता था. दूसरे उत्पाद को ग्राहकों तक पहुंचाता था. छोटे उत्पादकों के लिए यह संभव न रहा होगा कि उत्पादन कार्य को छोड़कर माल की बिक्री के लिए लंबी दुर्गम यात्राओं पर निकल सकें. इसलिए एक कोटि उन शिल्पकारों की बनी, जो केवल उत्पादन करते थे. बिक्री के लिए उन्हें स्थानीय ग्राहकों तथा व्यापारिक संगठनों पर निर्भर रहना पड़ता था. जैसेजैसे व्यापार बढ़ा, तीसरा यानी व्यापारी वर्ग और भी मजबूत होता गया. ऋग्वेद में ‘पण’ शब्द की आवृत्ति हुई है, जो सहयोगाधारित व्यापारिक संगठनों का पर्यायवाची है. महाभारत में यह वर्ग इतना शक्तिशाली हो चुका था कि उसकी उपेक्षा कर पाना संभव न रहा.

तीसरे वर्ग के सत्ताकेंद्र से मिल जाने के बाद आम जन को सत्ता और संसाधनों से बेदखल करना आसान हो गया. हालांकि राज्य के अधीन धनबल, राज्यबल, जनबल और बुद्धिबल सभी कुछ था, किंतु जनाक्रोश के आग के आगे वे कभी भी खाक हो सकते हैं, इस हकीकत का एहसास शीर्षस्थ शक्तियों को था. अपनी हैसियत को बचाए रखने का उनके पास एकमात्र उपाय था—जनशक्ति को भुलावे में रखकर जनाक्रोश की संभावनाओं को न्यूनतम किया जाए. उल्लेखनीय है कि आरंभ में कृषियेतर आर्थिक गतिविधियों की बागडोर शिल्पकार वर्ग के हाथों में थी. जैसेजैसे व्यापार कर्म का विस्तार हुआ, बाजार पर व्यापारी वर्ग की पकड़ बढ़ती गई. शिल्पकार वर्ग का आर्थिक स्तर निरंतर गिरता गया. उसके लिए यह संभव न था कि उत्पादन और व्यापार दोनों को एक साथ संभाल सके. वास्तविक क्रेता तक पहुंच व्यापारी की थी. इसलिए वह उत्पादक शिल्पकारों से मनमाना दाम वसूलने की स्थिति में था. दूसरे शब्दों में सभ्यताकरण के आरंभिक दौर में ही समाज में दो ताकतवर वर्ग पनप चुके थे. धर्मसत्ता आदमी और ईश्वर के बीच दलाली के नाम पर अपना उल्लू सीधा करती थी, तो अर्थसत्ता वास्तविक उत्पादक और उपभोक्ता के बीच.

सामाजिक असंतोष की मार से खुद को बचाने के लिए राजसत्ता ने सर्वकल्याणकारी, मुक्तिदाता, जीवन का परम लक्ष्य कहते हुए धर्म को न केवल खुद अपनाया, बल्कि लोगों को भी उसके लिए बाध्य किया. उसने दान, प्रलोभन, लालच के सहारे पुरोहित वर्ग को अपने समर्थन में ला खड़ा किया. राजसत्ता से निकटता और सामंजस्य बनाए रखने के लिए पुरोहित वर्ग ने भी ऊंचनीच, पापपुण्य, धर्मअधर्म के किले बनाए, जिनमें जनसाधारण को मानसिक गुलामी के लिए कैद किया जाने लगा. लोगों के मन में विद्रोह की भावना जन्मे ही नहीं, इसके लिए कर्मवाद का सहारा लिया गया. राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि घोषित कर, उसके हर अच्छेबुरे निर्णय को महिमामंडित करने की कोशिश की गई. सत्ता पर विराजमान लोगों के भोगविलास को औचित्यपूर्ण ठहराने के शास्त्रीय उपक्रम रचे गए. यही नहीं, उनके प्रत्येक निर्णय को ईश्वरीय कहकर हर गलतसही फैसले का समर्थन किया गया. आशय यह है कि जिसे सभ्यताकरण कहा जाता है, वह समाज के अभिजनवर्ग के उदय और निरंतर शक्तिशाली होते जाने की यात्रा है.

परिणाम यह हुआ कि समाज के संसाधन, जिनके भरोसे कुल समाज के विकास का दावा सच हो सकता था, सभी समाज के प्रभुवर्ग के अधीन होते चले गए. जब फैसले विवेक और तर्क के बजाय आस्था और कुलपरंपरा के नाम पर होने लगें तो समाज में न्याय का पलड़ा स्वतः ही शिखर की ओर झुक जाता है. उसी का सहारा लेकर शिखरस्थ वर्ग खुद को किसी भी प्रकार के न्याय, आलोचना, समीक्षा, विमर्श आदि से ऊपर समझने लगता है. सभ्यताकरण का यह कौतुक दुनिया के किसी एक कोने या समाज में नहीं, कुछेक कबीलाई संगठनों को छोड़कर, प्रायः सभी समाजों में रचा गया. उम्मीद थी कि विज्ञान के आगमन के पश्चात नई शिक्षा और ज्ञान की रोशनी में आम आदमी अभिजन के इस षड्यंत्र को समझ सकेगा. लेकिन विवेकवान जनसमाज या जनसमाज का विवेकीकरण को, प्रौद्योगिकीकरण के सहारे सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहा पूंजीवाद भी अपने लिए अहितकारी समझता था. उसकी जरूरत जनसमाज नहीं उपभोक्ता समाज की रचना करना था. मशीनों का आविष्कार व्यापारी वर्ग के लिए वरदान सरीखा था, जिसने शिल्पकार वर्ग पर उसकी निर्भरता को न्यूनतम कर दिया. उसके लिए पूरी दुनिया महज उपभोक्ता थी. पूंजीवाद एक प्रकार का नया धर्म था, जो उपभोक्ताओं के लिए इसी जन्म में स्वर्ग गढ़ने का दावा करता था. आम आदमी अपने स्वर्ग को अपनी मर्जी से गढ़े. उसमें उसकी भावनाओं की भी कद्र हो, इसकी अनुमति न परंपरागत धर्म देता है, न पूंजीवाद प्रेरित प्रौद्योगिकीयधर्म. जब सबकुछ ऊपर से थोपा जाने लगे तो न्याय का पलड़ा उसी ओर झुक जाना स्वाभाविक था. यह हुआ और धूमधाम से विकास के नारों के बीच हुआ. गत दो दशकों में उसमें परिवर्तन के लिए कितने ही विचार आए, संघर्षकारी स्थितियां बनीं, सत्तापरिवर्तन हुए, किंतु जनसाधारण के लिए स्थिति लगभग वैसी ही रही, जैसी पहले थी.

क्या सहविधान समाज में व्याप्त आर्थिक विषमता का समाधान कर सकेगा? इसका सहीसही उत्तर तो इसको अपनाने वालों की निष्ठा पर होगा. इस बात से तय होगा कि सहविधान को अपना विधान बनाने वाला समाज उसके प्रति कितना गंभीर है. कितनी निष्ठा के साथ उसे अपनाना चाहता है. इतना सुनिश्चित है कि वह आरोपित व्यवस्था नहीं होगी. सहविधान लोगों का स्वैच्छिक वरण होगा. इसकी सफलता लागू करनेवालों पर नहीं, अपनाने वालों पर निर्भर होगी. यह लोगों को निर्देशित नहीं अनुशासित करने पर जोर देगा. इसकी उपस्थिति दस्तावेजी न होकर नागरिकसंकल्प के रूप में होगी. समाज में उसकी उपस्थिति कानून न होकर नैतिक बल के रूप में होगी.

सहविधान के अनुसार संपत्ति पर व्यक्ति की अधिकारिता दो प्रकार से तय होगी—सामूहिक और व्यक्तिगत. बिना किसी पूर्वाग्रह अथवा भेदभाव के समाज यह प्रबंध करेगा कि व्यक्ति की सामान्य जरूरतें पूरी होती रहें. दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उसको किसी का भी सहारा न लेना पड़े. वह ऐसी उत्पादन प्रणाली को अपनाने पर जोर देगा जिसके माध्यम से व्यक्ति अपने उत्पादनसामर्थ्य, शिल्पकौशल की रक्षा कर सके और समाज के विकास में अपनी भूमिका निभा सके. नागरिकों को अपने अधीन संपत्ति के ऐच्छिक उपयोग की अनुमति होगी. व्यक्ति की जरूरतें क्या हैं, इसका निर्धारण मिलबैठकर, आपसी विचारविमर्श के बाद किया जाएगा और इसके लिए समानता और न्याय के सिद्धांत का पालन किया जाएगा. साथ में यह भी ध्यान में रखना होगा कि सदस्य इकाइयां अपनी रुचि, प्रकृति, मनोविज्ञान में अलग हो सकती हैं. यह भी कि व्यक्तिगत रुचियों, रुझानों, पसंदों, सोच और सामान्य आवश्यकताओं के मामले में समाज की ओर से अनावश्यक दखल मनुष्य की नैसर्गिक स्वतंत्रता को बाधित कर सकता है. यदि ऐसा हुआ तो सहविधान की स्थापना का उद्देश्य ही व्यर्थ चला जाएगा. मनुष्य की नैसर्गिक स्वतंत्रता, विचारवैविध्य और मानवीय गरिमा बनी रहे इसके लिए उसकी सामान्य निजता और रुचियों का भी ध्यान रखा जाएगा. इस सावधानी के साथ कि समाज की कोई भी इकाई स्वयं को उपेक्षित अनुभव न करे. प्रत्येक को यह विश्वास रहे कि समाज के विकास में उसका भी योगदान है. उसकी महत्ता है और समाज को उसकी उतनी ही आवश्यकता है, जितनी कि उसको समाज की.

इकाई विशेष की जरूरतों को तय करने का एक मापदंड यह भी हो सकता है कि समाज की कुल संपत्ति को उसकी सदस्यसंख्या के अनुपात में बांट दिया जाए. फिर प्रत्येक इकाई के हिस्से में जितनी संपत्ति आती है, औसतरूप में उतनी संपत्ति पर व्यक्तिगत अधिकारिता की सीमा तय कर दी जाए. उसी के आधार पर व्यक्ति को अपनी आवश्यकताओं को तय करने की आजादी हो. सहविधान में मनुष्य की सुखसुविधाओं में बढ़ोत्तरी के लिए समाज की कुल आय, संपदा में वृद्धि अपरिहार्य होगी. किसी कारणवश यदि प्रगतिचक्र धीमा पड़ जाए, अर्थव्यवस्था को मंदी का सामना करना पड़े अथवा उसपर अनावश्यक संकट आन पड़े तब? क्या मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं में कटौती की जाएगी? हरगिज नहीं. मूलभूत आवश्यकताएं मनुष्य के अस्तित्व से जुड़ी अनिवार्यताएं हैं. यह समाज का दायित्व है कि उनमें कमी यथासंभव न होने दे. यदि ऐसी कोई विपत्ति आन पड़े तो उसकी भरपाई अपने बाकी खर्चों में कटौती करके पूरा करने की करे. यदि फिर भी काम न बने तो नागरिकों से उसकी भरपाई के लिए अतिरिक्त योगदान का आग्रह करे. परस्पर आत्मीय व्यवहार, संगठन, सहानुभूति और लक्ष्य के प्रति समर्पण से समस्या का समाधान संभव है.

यदि कोई दावा करे कि समाज के विकास के लिए उसका योगदान दूसरों से कहीं अधिक है. इसलिए उसको अपनी इच्छाओं के विस्तार तथा उन्हें पूरा करने की अनुमति मिलनी ही चाहिए, तब समाज को चाहिए कि ऐसी नैतिक व्यवस्था करे ताकि दूसरों से विशिष्ट दिखने जैसा व्यक्तिवादी विचार नागरिकों के मन में पनपने ही न पाए. यदि किसी नागरिक के मन में ऐसा विचार आता है तो मान लेना चाहिए कि उससे अपने नागरिकों के सहविधान की भावना के अनुरूप शिक्षणप्रशिक्षण में चूक हुई है. व्यक्ति को भी समझना चाहिए कि प्रकृति के कुल ज्ञानविज्ञान और कर्मकौशल के समक्ष उसके द्वारा अर्जित ज्ञान नगण्य हैं. और जो भी ज्ञानकौशल उसने अर्जित किया है, वह वही है जिसको समाज पीढ़ीदरपीढ़ी सहेजता आया है. ज्ञान के इस अनुदान के लिए व्यक्ति समाज का ऋणी है. समाज से अलग रहकर वह उसका एकांश भी शायद ही अर्जित कर पाता. समाज की ज्ञानराशि अपनी सभी सदस्य इकाइयों के लिए खुली होती हैं और अर्जित ज्ञानसंपदा का अपनी तरह से विश्लेषण करने का अधिकार वह अपने प्रत्येक नागरिक को देता है. अतः यदि कुछ मामलों में वह दूसरे व्यक्तियों से बढ़कर है तो बाकी मामलों में अन्य लोग उससे काफी आगे हो सकते हैं. यह एहसास व्यक्ति को उसके विशिष्टताबोध से बाहर निकलने में कामयाब रहेगा.

दूसरी ओर समाज को भी समझना चाहिए कि किसी व्यक्ति ने यदि कुछ अतिरिक्त अर्जित किया है तो उसमें उसकी योग्यता एवं परिश्रम का भी योगदान है. ऐसे किसी व्यक्ति को उसके उत्कृष्ट योगदान के बदले जो सामाजिक लाभ मिलना चाहिए था, यदि वह नहीं मिला है, तो उसका आक्रोश तर्कसम्मत माना जाएगा. उस स्थिति में समाज को चाहिए कि समय रहते अपनी भूल स्वीकार कर ले और उस व्यक्ति को उसके अतिरिक्त योगदान के लिए लाभान्वित करे. यह लाभ पुरस्कार, सम्मान के माध्यम से भी किया जा सकता है. अथवा इसके लिए लोग आपस में मिलबैठकर ऐसी योजना बना सकते हैं, जो व्यक्ति को उसकी अधिकतम सेवाओं के लिए प्रोत्साहित कर सके. जिससे वह हताश हुए बगैर अपने योगदान को जारी रख सके. यह काम समाज में अभिजन मानसिकता के चलते नहीं हो सकता. इसके लिए विराट जनसंस्कृति को बढ़ावा देना जरूरी होगा. यह विश्वास रखना होगा कि पराजित सत्ताएं होती हैं, जनता नहीं. जनता को तो पराजय का एहसास कराया जाता है.

उत्पादकता को लेकर सामान्य धारणा यह भी है कि व्यक्ति तभी अतिरिक्त कार्य करने को उत्सुक होता है, जब उसको अतिरिक्त प्राप्तियों की संभावना हो. प्रायः कहा जाता है कि कुछ समाजवादी व्यवस्थाएं इसलिए ढह गईं कि श्रम पर सीधे लाभ मिलने की कोई उम्मीद न देख नागरिक अपने दायित्वों के प्रति उदासीन होने लगे थे. उत्पादन को लेकर अतिरिक्त उत्सुकता दिखाने, अपने श्रमकौशल के उपयोग से वृहद सामाजिक उद्देश्य की प्राप्ति हेतु स्वयंस्फूत्र्त निर्णय लेना और उत्पादन व्यवस्था में अभीष्ट बदलाव लाने की प्रवृत्ति जो नए शोधों को बढ़ावा देती है—पीछे छूटने लगी थी. परिणाम यह हुआ कि सहजीवितावादी द्रष्टिकोण को गठित वे अर्थव्यवस्थाएं—सीधे और तात्कालिक लाभ पहुंचाने वाली पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले निरंतर पिछड़ती चली गईं.

इस दावे में किंचित सचाई हो सकती है. लेकिन एकाएक यह मान लेना कि मनुष्य केवल सम्मान, पुरस्कार अथवा अतिरिक्त भौतिक सुखसुविधाओं के लिए काम करता है, भारत की उदार श्रमसंस्कृति की अवमानना करने जैसा है. ‘आदमी तभी काम करेगा, जब उसको सीधा लाभ होगा’यह सोच मुनाफे की संस्कृति की उपज है. इतिहास साक्षी है, सर्वहारा श्रमिक वर्ग तो हमेशा से ही न्यूनतम प्राप्तियों के बदले अधिकतम उत्पादन देता आया है. सच्चे कलाकार की भांति वे अपने हुनर की बोली नहीं लगाते. बल्कि उसे तराशने का अवसर तलाशते रहते हैं. लाभ का मनोविज्ञान न तो उनकी ईजाद है, न ही यह उनको सुहाता है. अधिकाधिक उत्पादकता के लिए स्पर्धा का सिद्धांत पूंजीवाद की देन है. शिल्पकर्मी और सर्वहारा मजदूर तो हमेशा अपने लिए सही अवसर और कद्रदान की तलाश में रहते हैं, ताकि अपने हुनर को पेश कर सकें. जिन समाजवादी राज्यों के असमय ढह जाने का उदाहरण दिया जाता है. कहा जा सकता है कि वे इसलिए नहीं ढही थीं कि वहां श्रमिक, सर्वहारा, शिल्पकर्मी अपने लिए अतिरिक्त सुविधाओं की मांग करने लगे थे. जिन्हें पूरा करना राज्य के बस से बाहर था. बल्कि इस कारण असमय कालकवलित हुईं कि जिन वादों, जो आश्वासन आमजन को सत्तापरिवर्तन के समय दिए गए थे, समय आने पर राष्ट्र उनसे मुंह मोड़ने लगा था. सोवियत संघ का उदाहरण दिया जा सकता है. सब जानते हैं कि वह मार्क्सवादी विचारों के आधार पर पहला प्रयोग था. बोल्शेविकों ने लेनिन का साथ इसलिए दिया था कि नवगठित राज्य में सत्ता प्राप्ति के पश्चात वर्गहीन समाज की स्थापना की ओर तेजी से बढ़ा पाएगा. समाजवाद उसका परमलक्ष्य होगा. लेकिन सत्ता प्राप्ति के बाद साम्यवादी सरकार की प्राथमिकताएं बदल चुकी थीं. वह सहयोग के बजाय स्पर्धा और प्रतिस्पर्धा की बातें करने लगी. शीतयुद्ध के बहाने देश को हथियारों की अंधस्पर्धा में झोंक दिया गया था. इससे उन लोगों का सपना चकनाचूर हुआ जो नए शासन से जीवन में बदलाव की उम्मीद लगाए थे. उल्लेखनीय है कि सोवियत क्रांति की सफलता में आमनागरिक का भी काफी योगदान था. क्रांति के लिए वहां के स्त्रीपुरुषों, मजदूरों और कारीगरों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था. जिस नेतृत्व को उन्होंने अपने लिए चुना था, वही अब साम्यवाद के नाम पर उनके साथ छल कर रहा था. इसलिए उसके मन में असंतोष स्वाभाविक था. सोवियत शासन का रवैया संघीय राज्य की स्थापना के मूल सिद्धांत के एकदम उलट था. यह विचलन ही उसके पतन का कारण बना था. इसलिए सोवियत संघ के पतन को समाजवाद या साम्यवाद की आलोचना का आधार नहीं बनाया जा सकता. न इससे यह सिद्ध होता है कि उत्पादकता केवल व्यक्तिगत स्वार्थ से अनुप्रेत होती है?

यदि अपवादस्वरूप ऐसा कहीं हुआ है तो इसके लिए सारा दोष श्रमिकवर्ग का नहीं है. उसका दोष मात्र इतना है कि वह हालात से अनुकूलन कर चुका है. शताब्दियों तक अभिजन समुदाय के नेतृत्व में काम करने के कारण यह अस्वाभाविक भी नहीं है. इसलिए अपनी मुक्ति का खयाल तक उसके दिमाग में नहीं आता. शोषणकारी शक्तियों का प्रभाव उसके दिल पर इतना गहरा है कि वह अपनी मुक्ति, शोषित वर्ग से बाहर शोषकवर्ग की श्रेणी में शामिल होने में देखता है. औपनिवेशिक शोषण का शिकार रहे देशों में तो अकसर ऐसा होता है. आवश्यकता इसी मनोस्थिति को बदलने की है. लक्ष्य साफ है, लेकिन डगर कठिन है. सहविधान की कामयाबी के लिए स्पर्धा के स्थान पर सहयोग की अवधारणा को स्थान देना होगा. स्पर्धा मुनाफे की संस्कृति की उपज है. सहयोग सहअस्तिव की अनिवार्यता. सहविधान की कामयाबी के लिए लाभ की वर्तमान परिभाषा को संशोधित कर बताना होगा कि आदर्श लाभ वह है जिसमें व्यक्तिगत लाभ और सामाजिक लाभ के बीच की दूरी न्यूनतम हो. दोनों में ऐसी निकटता हो कि उनकी स्वतंत्र पहचान कर पाना कठिन हो जाए.

चलिए कुछ देर के लिए मान लेते हैं कि सीधे और तात्कालिक लाभ की संभावना व्यक्ति को अतिरिक्त श्रम की प्रेरणा देती हैं. लेकिन ऐसा वहीं होता है जहां व्यक्ति अपने साथी कारीगर, मजदूर से ही नहीं, समाज में अपने भाई, रिश्तेदार, पड़ोसी से भी स्पर्धा करने लगता है. उस समय वह भूल जाता है कि वह अपने साथी, परिजनों, पड़ोसियों से नहीं, अपने आप से भी स्पर्धा कर रहा होता है. इसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगते हैं. मान लीजिए कारखाने में एक काम के लिए न्यूनतम चार घंटे का समय निर्धारित है. इस अवधि काफी सोचविचार और कार्यअध्ययन के बाद तय की गई है. इससे मालिक भी संतुष्ट है. अब यदि कोई कामगार मालिक को प्रसन्न करने या अतिरिक्त आय के लिए उस काम को साढ़े तीन घंटे में करने का दावा करता है, तो निश्चित रूप से उसका व्यक्तिगत कौशल सराहनीय होगा, लेकिन उस समय वह किसी अजाने ही किसी अन्य कामगार को स्पर्धा के लिए तैयार कर रहा होता है. मालिक को भले ही ऐसी कोई अपेक्षा न हो, किंतु संभव है कुछ दिन बाद कारखाना कोई और मजदूर उसके आगे पहुंचकर उस कार्य को केवल तीन घंटे में निपटाने का दावा करे. मालिक तो खुश होकर उसको काम का न्योता दे देगा. श्रम की यह स्पर्धा उसके लिए लाभकारी है. जिस काम के लिए पहले चार घंटे लगाने पड़ते थे, अब वह तीन घंटों में पूरा हो रहा है, 25 प्रतिशत श्रमघंटों की सीधी बचत. उत्पादकता के लिहाज से यह बुरा नहीं है.

मुनाफे की संस्कृति के अनुयायी इसका पक्ष लेंगे. आप किसका पक्ष लेते हैं, इस निर्णय के लिए मैं इस उदाहरण को थोड़ा और आगे बढ़ाता हूं. श्रम का सीधा मूल्यांकन उसे उत्पाद बना देना है. स्वाभाविक रूप से बाजार में उपलब्ध श्रेष्ठ उत्पाद कम श्रेष्ठ अथवा निकृष्ट उत्पाद को चलनबाह्यः कर देता है. उपर्युक्त उदाहरण में भी वे कामगार जो किसी कारणवश त्वरित उत्पादन करने में अक्षम हैं, स्पर्धा से बाहर चले जाते हैं. उनके समक्ष बेरोजगारी का संकट मंडराने लगता है. यानी स्पर्धा से कारखाना माल