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बालक और उसका समयबोध

सामान्य

ओमप्रकाश कश्यप

इस लेख का उद्देश्य न तो बालक को समय-प्रबंधन के गुर सिखाना है. न उसे समय-संबंधी दार्शनिक जटिलताओं में उलझाना. हम बालक तथा उसके समयबोध को लेकर सामान्य चर्चा करेंगे. यह जानने की कोशिश करेंगे कि समय को लेकर बालक की जो प्रतीतियां हैं; स्कूल से लेकर घर तक, समय के बारे में उसे जितना और जैसा समझाया जाता है, क्या उसके समय-प्रबोधन का वही एकमात्र और सही तरीका है? बालक के व्यक्तित्व पर समय से संबंधित ऐसी प्रतीतियों और प्रज्ञप्तियों का जो तर्क एवं ज्ञान से परे, केवल सुनी-सुनाई बातों अथवा पूर्वाग्रहों पर आधारित हैं—क्या कोई दुप्रभाव पड़ता है? क्या वे बालक के स्वतंत्र विवेक की राह में बाधक हैं? आदिकाल से ही मानवमन में एक किस्सागो बैठा हुआ है, जो मनुष्य को अपने आसपास के परिवेश के बारे में झूठी-सच्ची कहानियां गढ़ने; तथा उनके साथ किसी न किसी रूप में अपना संबंध स्थापित करने को प्रेरित करता रहता है. आमतौर पर वे कहानियां संबंधित समाज की सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक मानी जाती हैं. धर्म, ईश्वर, किस्म-किस्म के देवी-देवता सब उसी मानस किस्सागो की कल्पना हैं. क्या समय भी मनुष्य की ऐसी ही रोचक परिकल्पना है?

स्पर्धा के इस युग में बालक को अन्य चुनौतियों के साथ-साथ समय की चुनौती से भी जूझना पड़ता है. जो लोग समय को अनादि, अनंत तथा सतत प्रवाहमान मानते हैं, वही उसकी कमी का हवाला देकर बालक को डराते रहते हैं. खुद को ‘बड़ा’ समझने वाला प्रत्येक व्यक्ति बालक को सावधान करता है—‘समय बरबाद मत करो. वह किसी की प्रतीक्षा नहीं करता. जरा-भी चूके तो हाथ से फिसल जाएगा….समय के साथ चलो, चलते रहो, नहीं तो पिछड़ जाओगे.’ ऐसे निर्देश बालक को अभिभावकों तथा अध्यापकों की ओर से निरंतर, इतनी बार तथा इतनी तरह से सुनने को मिलते हैं कि उसका आत्मविश्वास डगमगाने लगता है. अपनी सीमाओं में वह समय की चुनौतियों से निपटने की कोशिश भी करता है. उसके लिए समय-सारणी बनाता है. अपने अध्ययन-कार्य को छोटे-छोटे उपखंडों में बांटता है. घड़ी की टिक-टिक के साथ सामंजस्य बैठाने की कोशिश करता है. इसके बावजूद चुनौती बनी ही रहती है. क्योंकि खंडों-उपखंडों में समाहित प्रत्येक घटना बालक के अधिकार में नहीं होती. किसी न किसी रूप में दूसरे भी उससे जुड़े होते हैं.

नई शिक्षा व्यवस्था में सहयोग की अपेक्षा स्पर्धा पर ज्यादा जोर दिया जाता है. पर्याप्त सहयोग-समर्थन के अभाव में बालक अपनी ही बनाई समय-सारणी के हिसाब से पिछड़ने लगता है. बड़े टोकते हैं. बालक कोशिश करता है. कभी सफल होता है, कभी परिस्थितियां भारी पड़ जाती हैं. ऐसे में समय हाथ से निकल जाने की चिंता बालक का पीछा नहीं छोड़ती. धीरे-धीरे वह उसके आत्मविश्वास पर भारी पड़ने लगती है. ऐसा नहीं है कि केवल बालक ही समय के बारे में प्रचलित पूर्वाग्रहों से प्रभावित होता है. बड़े भी उससे मुक्त नहीं रह पाते. समय-संबंधी पूर्वाग्रह तो प्रायः बड़ों के माध्यम से ही बच्चों तक पहुंचाए जाते हैं. बालक उन्हें लंबे समय तक, कभी-कभी जीवन-भर विरासत के तौर पर संभाले रखता है.

सामान्य दिनचर्या में समय को ‘सर्वशक्तिमान’ के रूप में पेश किया जाता है. ऐसा महानायक जो कथित देवी-देवताओं से भी ऊपर, सीधे किसी पराशक्ति के अधीन है. जो दैवीय आदेशों से अनुशासित होता है. कभी बताया जाता है कि खुद ईश्वर भी समय के बंधन में बंधा है. भारतीय समाज की जो स्थिति है, उसमें किशोरावस्था तक पहुंचते-पहुंचते बालक अंध-श्रद्धा का शिकार हो चुका होता है. उसके बाद वह तर्क छोड़ आस्था की राह पकड़ लेता है; तथा दैवीय अनुकंपा को समस्त समस्याओं का एकमात्र समाधान मानने लगता है. ईश्वर का जिक्र हो तो वह सर्वशक्तिमान के रूप में सर्वप्रथम उसी की कल्पना करता है. किंतु अगले ही क्षण जब समय की चुनौती सामने होती है, तब वही उसे सर्वशक्तिमान नजर आने लगता है. समय और तथाकथित ईश्वर को लेकर गढ़ी गई कहानियां भी एक-दूसरे में गड्ड-मड्ड होती हैं. उनमें कहीं ईश्वर समय पर भारी पड़ता है तो कभी समय ईश्वर के सामने चुनौती बन जाता है. इससे बालक की उलझन सुलझने के बजाय और भी उलझ जाती है. भ्रांत बालमन समझ ही नहीं पाता कि पराशक्ति हो अथवा समय, दोनों में कोई एक ही सर्वशक्तिमान हो सकता है. ऊहापोह में वह किसी कार्य को तत्संबंधी घटनाओं के संबंध में देखने-समझने के बजाय, आस्था और पूर्वाग्रहों द्वारा नियंत्रित होने लगता है. यहीं से उसके विचलन का दौर आरंभ होता है, जो उसे वास्तविक और अन्वीक्षणात्मक ज्ञान के बजाय आभासी दुनिया में ले जाकर छोड़ देता है─जहां या तो निरे सपने होते या फिर परंपराओं का बोझ. जहाँ    

रोजमर्रा के कार्य के सिलसिले में बालक द्वारा घड़ी देखने का सिलसिला सुबह के साथ आरंभ हो जाता है. उसके बाद नहाने, नाश्ता करने, स्कूल जाने, स्कूल में टाइम-टेबिल के अनुसार विभिन्न विषयों का पाठ करने, लंच करने, खेलने, घर लौटने, आराम करने, होमवर्क निपटाने, टेलीविजन देखने, भोजन करने से लेकर रात को बिस्तर तक जाने के बीच अपने माता-पिता की भांति बालक भी समय के हिसाब-किताब में उलझा रहता है. उसके समस्त कार्यकलाप छोटे-छोटे टाइम-पॉकेट में बंधे होते हैं. हर पीरियड के साथ स्कूल की घड़ी बदले समय और चुनौती का एहसास कराती है. बीच-बीच में जब भी घटनाक्रम बदलता है, बालक की निगाहें घड़ी की सुइयों में उलझकर रह जाती हैं. उसके सामने चुनौती होती है कि वह न केवल समय के साथ अपनी दिन-चर्या को व्यवस्थित रखे साथ ही सहपाठी अथवा समवयस्क बच्चों, जिनके साथ उसकी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष स्पर्धा है─से जरूरी बढ़त भी बनाए रखे. दूसरों के बराबर रहने वाले को यहां औसत तथा पीछे रहने वाले को फिसड्डी मान लिया जाता है. समय और समवयस्क बच्चों के साथ स्पर्धा बालक को अनावश्यक रूप से तनावग्रस्त रखती है. इसके अलावा एक जैविक घड़ी भी होती है. उसके बारे में आवश्यक नहीं कि बड़े ही बालक को समझाएं. उसका एहसास प्रकृति स्वयं कराने लगती है. जैसे  समय होते ही भूख भोजन तथा थकान आराम की जरूरत की ओर संकेत करने लगती है.

सुबह से शाम तक अनगिनत बार घड़ी देखने से जो प्रथम प्रभाव बालक के मनो-मस्तिष्क पर पड़ता है, वह यह कि घड़ी की सुइयां ही समय हैं. कि अपनी महीन टिक-टिक के साथ घड़ी विराट समय को अपने भीतर समेटे है. घड़ी की सुइयां आगे बढ़ेंगी, तभी समय आगे खिसकेगा. बालक ही क्यों? घर में माता-पिता, स्कूल में अध्यापकगण, मित्र-हितैषी, सगे-संबंधी सभी सीधे घटनाओं पर नजर रखने, उन्हें नियंत्रित करने के बजाए—घड़ी की सुइयों से नियंत्रित होने लगते हैं. स्पर्धा में समय से पिछड़ जाने की आशंका बालक को अनावश्यक चिंता में डाल देती है. उसका आत्मविश्वास आहत होने लगता है. उस समय बालक को यह बताना आवश्यक है कि घड़ी की टिक-टिक समय नहीं है. वह स्वयं एक घटना है, सिर्फ घटना, जिसकी दो आवृतियों के बीच सुनिश्चित अंतराल होता है. घड़ी का कार्य किन्हीं दो घटनाओं के बीच का अंतराल बताना है. प्रत्येक घटना के समानांतर  और आगे-पीछे हजारों-हज़ार घटनाएँ अनंत ब्रह्मांड के भीतर और बाहर, लगातार घटती रहती हैं. जो लोग समय को घटनाओं के प्रवाह के रूप में देखते हैं, वे उनमें रमे रहकर भी अपना नियंत्रण बनाए रखते हैं. ऐसे लोगों के लिए समय चुनौती नहीं बनता. उनके साथ विलक्षण यात्रा का अनकहा रोमांच होता है.  

बालक को बताया जाना चाहिए कि समय घटनाओं की अन्विति से परे कुछ नहीं है. कि घटनाओं पर विजय पाना, उनके साथ सामंजस्य बनाकर चलना—कठिन भले हो, असंभव नहीं है. कि इस धरती पर ऐसे नरपुंगव भी हुए हैं जिन्होंने समय को न तो देवता माना, न उसकी कभी परवाह ही की. बिना परिस्थितियों से घबराए, चुनौतियों को स्वीकार करके ही वे इस दुनिया को अपनी इच्छानुसार चलाने में कामयाब होते आए हैं. ऐसा बोध बालक के आत्मविश्वास को बढ़ा सकता है. प्रायः ऐसा नहीं होता. क्योंकि समय को ‘नियति’ और ‘भाग्य’ के समकक्ष रखने वाले, दोनों को परस्पर पर्याय मानने वाले, बालक के माता-पिता समय को परम-नियंता और महाशक्तिशाली मान स्वयं उससे भयभीत रहते हैं.

भारतीय दर्शनों में समय पर विचार किया गया है, किंतु उनमें तत्वपरक सामग्री का अभाव है. उसे या तो दैवीय शक्ति के समकक्ष रखकर मनुष्य का भाग्य-नियंता बताया गया है; अथवा घटनाओं तथा उनके वेग के प्रतिफल के रूप में दर्शाया जाता है. भारतीय प्रज्ञा की कमजोरी है कि वह तर्क और विवेक से अधिक, आस्था और पूर्वाग्रहों से प्रेरणा ग्रहण करती है; और उससे बहुत कम बाहर निकल पाती है. समय को लेकर वस्तुनिष्ट चिंतन के अभाव का भी यही कारण है. पूर्वाग्रहों के दबाव में हम समय-संबंधी प्रज्ञप्तियों जिन्हें समयाभास भी कहा जा सकता है, को अपने आसपास घट रही घटनाओं के सापेक्षिक वेग, परिवर्तनशीलता, पदार्थ की विशेष अवस्था आदि के संदर्भ में देखने के बजाए स्वतंत्र सत्ता माने रहते हैं. यह ‘कार्य’ को ‘कारण’ मान लेने जैसी गंभीर चूक है, जिसके साधारण और विशेष सभी लोग शिकार होते आए हैं.  

आगे बढ़ने से पहले समय और समयबोध की ओर संकेत करना आवश्यक है. जैसा ऊपर संकेत किया गया है, समय को लेकर दो प्रकार की प्रज्ञप्तियां आमतौर पर प्रत्येक मनस् में होती हैं. ये एक साथ भी हो सकती हैं तथा एक-दूसरे से स्वतंत्र भी. पहली मान्यता के अनुसार समय कोई भागती हुई चीज है. नदी की मानिंद सतत प्रवाहमान. भूत-वर्तमान और भविष्य में निरूपित. एक के बाद एक गुजरते रात-दिन इसका उदाहरण हैं. जॉन मेकटेग्गार्ट ने इसे ‘ए’ श्रेणी माना है. यानी वह समय जिसे हम श्रेणीबद्ध रूप में अपने सामने से गुजरते हुए देखते हैं. उसका एक उदाहरण इतिहास लेखन भी है. हमारे समय और तत्संबंधी सामान्यबोध की शुरुआत ही सौर दिवस से होती है. आदमी रोजमर्रा के कार्यों को अपनी जरूरत, सुविधा अथवा दायित्व-भावना के आधार पर, छोटी-छोटी घटनाओं में बांट लेता है. उन घटनाओं की सापेक्षिक गति ही समयाभास का कारण बनती है. इस मान्यता के अनुसार समय दो संबद्ध घटनाओं के बीच का अंतराल है, जो उनके घटने की दर को दर्शाता है. उससे घटना की अनुभूति तथा उसकी सापेक्षिक गति का आकलन किया जा सकता है. समय पर विचार करते हुए इस तथ्य को प्रायः नजरंदाज कर दिया जाता है कि ब्रह्मांड में घट रही अनंत घटनाओं की भांति सौर दिवस भी प्राकृतिक घटना है. पृथ्वी का अपनी धुरी पर घूमना इस घटना को अंजाम देता है. दिन-रात को जन्म देने वाली यह घटना भी अपने आप में पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है. पृथ्वी अपने केंद्र पर घूमने के अलावा सूर्य की कक्षा में भी चक्कर काटती रहती है. इससे दिन-रात के कुल समय में भले ही ज्यादा अंतर न पड़ता हो, मगर उनकी अवधि घटती-बढ़ती रहती है. यह समय अथवा समयाभास की सापेक्षिकता का द्योतक है.

उपर्युक्त से निष्कर्ष निकलता है कि घटनाएं तथा उनका आधार यह सतत-परिवर्तनशील ब्रह्मांड—शाश्वत हैं. समय वह अंतराल है, जिसमें हम ब्रह्मांड की विभिन्न गतिविधियों के अंतराल का अनुभव करते हैं; तथा जिसके माध्यम से उनकी गति का आकलन किया जा सकता है. परिवर्तन को सृष्टि का मूल लक्षण बताने वाला यूनानी विचारक हेराक्लीट्स कहता है—‘प्रत्येक वस्तु गतिमान है. तुम किसी नदी में दुबारा हाथ नहीं डाल सकते.’ समय को सतत प्रवाह मानने वाली विचारधारा भी कहती है—‘बीता हुआ समय लौटकर नहीं आता. हम किसी क्षण को दुबारा नहीं जी सकते.’ समय की इस परम-भौतिकता को वैरागी भृर्तहरि अपनी तरह से अभिव्यक्त करता है—‘कालो न यातं वयमेव याताः’—‘समय नहीं गुजरता, हम गुजरते हैं.’1 अरस्तु समय को अवधि(अंतराल) के रूप में देखता था. उसके लिए समय किसी क्रिया की पूर्वकालिक एवं उत्तरकालिक अवस्था की आवधिक गणना है. वह लिखता है—

‘यदि आत्मा की सत्ता नहीं थी, उस अवस्था में समय की सत्ता रही होगी या नहीं—यह जिज्ञासा सीधे-सीधे एक प्रश्न पर ले आती है. जहां कोई गिनने वाला ही नहीं है, वहां ऐसी चीज भी नहीं हो सकती, जिसे गिना जा सके.’2 

इस तर्क को स्वीकारने में वही मुश्किल है, जो यह स्वीकार करने में है, कि गंगाधर और तिलक को बनारस जाना था, गंगाधर नहीं गया इसलिए तिलक भी नहीं गया.  समय का तारतम्यता वाला लक्षण बालक के लिए सदैव तनाव या चुनौतियां पेश करे, ऐसा नहीं होता. यह बालक को निश्चिंत भी करता है. बालक अथवा किशोर जब अपने माता-पिता या दादा-दादी, नाना-नानी को क्रमशः वृद्धावस्था और मृत्यु की ओर अग्रसर देखता है, तब उसके अवचेतन में सहज रूप से यह भाव उत्पन्न होता है कि उसके जीवन की तो अभी बस शुरुआत है. जीने के लिए बड़ा हिस्सा अभी शेष है; तथा सामाजिक जिम्मेदारियों का दौर लंबे अंतराल के पश्चात आरंभ होने वाला है. यह विश्वास बालक को अवसाद से बाहर रखने में मदद करता है. इससे बालक और समय अथवा समयाभास के बीच अनूठा संबंध बनता है, जो उम्मीदों से लबालब और सकारात्मक होता है. यह निश्चिंतता उसे नित-नवीन सपने देखने को प्रेरित करती है. छोटा बालक उमंगों से सराबोर रहता है. मनमानी शरारतें करता है. भविष्य के प्रति आशावान रहता है. उसकी कल्पना बड़ों की अपेक्षा ज्यादा रंगीन होती है. ये सब उसे अधपकी उम्र में जिम्मेदारियों से सीधे टकराने, टूटकर बिखर जाने से बचाते हैं.

सामान्य भौतिकी के लिए समय का प्रवाहशीलता वाला गुण विशेष काम का है. उसके माध्यम से पदार्थ की आंतरिक एवं बाहरी गतियों का अध्ययन किया जाता है. गति पदार्थ की विशेष अवस्था है. क्या पदार्थ की गतिहीन अवस्था में भी समय या समयाभास की कल्पना की जा सकती है? यदि हम वस्तु-विशेष के संदर्भ में देखें तो इस प्रश्न का उत्तर ‘हां’ में होगा. गति के लिए किसी पिंड अथवा कण का होना आवश्यक है. पिंड स्थिर हो और परिवेश परिवर्तनशील, तब भी पिंड तथा उसके परिवेश के बीच सापेक्षिक गति बनी रहेगी; और घटनाओं की एक के बाद एक आवृति हमारे समयाभास का कारण होगी. इसे समझने के लिए एक असंभव स्थिति की कल्पना करते हैं. मान लेते हैं कि एक व्यक्ति अंतरिक्ष में किसी अकेले पिंड पर खड़ा है. चारों और केवल शून्य पसरा है. उस अवस्था में यदि प्रेक्षक की आंखों पर ऐसा चश्मा चढ़ा दिया जाए, जिससे वह अपने पिंड की गतिविधियों के साथ-साथ अपनी शारीरिक गतिविधियों की ओर से भी निःसंवेद हो जाए, उस अवस्था में वह खुद को परिवर्तन-शून्य विश्व में पाएगा. ऐसी स्थिति में वह समय की अनुभूति नहीं कर पाएगा. जाहिर है, तब उसका समयबोध भी शून्य होगा.

समय संबंधी पहली प्रज्ञप्ति जिसके अनुसार समय को दो घटनाओं के अंतराल से मापा जाता है, का वर्णन हम ऊपर कर चुके है. दूसरी प्रज्ञप्ति जिसे जॉन मेकटेग्गार्ट ने ‘बी’ श्रेणी की संज्ञा दी है, के अनुसार समय अंतरिक्ष जैसी अंतहीन संरचना हैं, जिसमें सब कुछ निरंतर घटता रहता है. ब्रह्मांड की समस्त घटनाएं, ग्रह-पिंड सभी उसमें समाहित हैं. वह भूत-वर्तमान-भविष्य सभी का आधार तथा ब्रह्मांड की प्रत्येक घटना का साक्षी है. इस मान्यता के अनुसार सृष्टि की प्रत्येक घटना, अंतरिक्ष के साथ-साथ समय में भी घटित होती है. पहली मान्यता जहां समय को गतिशील मानती है, वहीं इस समानांतर मान्यता के अनुसार समय स्थिर होता है. स्थिर भाव से ही वह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष घटनाओं का लेखा रखता है. जिस प्रकर अंतरिक्ष में घटनाएं घटती रहती हें. वैसे ही अनंत समय के बीच भी घटनाओं का सिलसिला बना रहता है. अंतरिक्ष वस्तुजगत के भौतिक स्वरूप को वितान देता है. वस्तुहीनता की अवस्था में विराट आभासीय शून्य होगा; जिसमें समस्त गतियों, परिवर्तनशीलता का लोप हो चुका होगा, ऐसी स्थिति में भी समय की परिकल्पना असंभव होगी. आशय है कि परिवर्तन-शून्यता अथवा परम-स्थिर विश्व में समय की परिकल्पना अप्रासंगिक हो जाती है.  

एक मान्यता के अनुसार समय सृष्टि के प्रत्येक परिवर्तन का साक्षी है, मगर खुद परिवर्तनकारी शक्ति नहीं है. न उसका कोई साक्षी होता है. स्टीफन हाकिंग अपनी पुस्तक ‘समय का संक्षिप्त इतिहास’ में ब्रह्मांड की उत्पत्ति परम-विस्फोट से मानते हैं. हॉकिंग के अनुसार समय की उत्पत्ति का क्षण भी वही है. अपनी बहुचर्चित पुस्तक में ‘समय का इतिहास’ के बहाने वे ब्रह्मांड के इतिहास की ही चर्चा कर रहे होते हैं. उस अवस्था की चर्चा कर रहे होते हैं, जब अपनी पहली हलचल के साथ ब्रह्मांड परम-शून्य से परिवर्तन ओर अग्रसर होता है. हॉकिंग के अनुसार परम-विस्फोट से पहले ब्रह्मांड परम-संपीडन की अवस्था में था. वह परम-स्थिरता की अवस्था थी, जिसका उल्लेख हमने ऊपर किया है. चूंकि उस समय सर्वत्र गति-शून्यता थी, इसलिए उसमें समय अथवा समयाभास की कल्पना भी असंभव है. महाविस्फोट के पश्चात ग्रह-नक्षत्रों का आदि का जन्म हुआ, जिनमें हमारी पृथ्वी भी सम्मिलित हैं.

समयहीनता की कल्पना हमारे लिए उतनी ही दुष्कर है, जितनी कि ब्रह्मांड के लोप हो जाने की परिकल्पना. ब्रह्मांडहीनता की अवस्था में समयबोध का क्या होगा? उसकी पहचान किस तरह से की जाएगी? ऐसे प्रश्न हमारी कल्पना से बाहर है. सवाल है कि समय यदि ‘कुछ भी नहीं’ है, केवल आभास मात्र है, तो उसे व्यावहारिक जीवन में उसे सबकुछ क्यों दिखाया जाता है. कारण है कि ऐसे अवसरों पर हम सत्य की उपेक्षा कर, भ्रांत धारणाओं को ही सबकुछ माने रहते हैं. इसके बीजतत्व भी हमारी शिक्षा-संस्कृति में अंतनिर्हित हैं. हमारी जरूरत की सभी वस्तुएं पृथ्वी उपलब्ध कराती है. बिना उसके जीवन संभव ही नहीं है. मगर हम यह माने रहते हैं कि सातवें-आठवें आसमान पर बैठा कोई देवता है, जो हमें जीवन और पृथ्वी को उर्वरा शक्ति प्रदान करता है. इस तरह से सोचने की आदत ज्यादा से ज्यादा ढाई-तीन हजार वर्ष पुरानी है. लेकिन यही वह कालखंड है जब आदमी द्वारा आदमी पर शासन करने, आदमी द्वारा आदमी को गुलाम बनाने की शुरुआत हुई. धर्म, जाति, संप्रदाय के नाम पर असहिष्णुता और असमानता को व्यक्ति की पहचान जोड़ा जाने लगा. ऐसी व्यवस्था में जो भी ऊंचाई पर होता है, वह अपनी ऊंचाई को वैध बनाने के लिए अपने से भी ऊंचे का हवाला देता है. जैसे कि ब्राह्मणों ने अपने शीर्षस्व को वैध बनाने के लिए देवताओं की पूरी फौज की परिकल्पना कर डाली. इसलिए समय को और दूसरी चीजों को सही ढंग से जाना न केवल विज्ञान की दृष्टि से आवश्यक है, बल्कि संस्कृति के परिष्करण तथा मनुष्य के नैतिक प्रबोधन हेतु भी अपरिहार्य है.

© ओमप्रकाश कश्यप

कसौटी पर समय

सामान्य

 समय : सच या आभास

समय न तो गति के समरूप है, न ही उससे पूर्णतः स्वतंत्र. उसका कार्य दोनों के अंत:संबंध को दर्शाना है…..यहां एक प्रश्न जोड़ सकते हैं. जैसे जहां समय न हो, क्या वहां ‘पहले’ या ‘बाद में’ जैसा कुछ हो सकता है? या फिर जहां संपूर्ण गतिहीनता हो, क्या वहां समय की उपस्थिति की संभावना है? चूकि समय किसी गति से संबंधित संख्यामात्र है, अतएव यदि समय सार्वकालिक है तो गति को अनंत होना ही चाहिए—अरस्तु, फिजिक्स.

इस लेख का उद्देश्य न तो बालक को समयप्रबंधन के गुर सिखाना है. न उसे समयसंबंधी दार्शनिक जटिलताओं में उलझाना. हम बालक तथा उसके समयबोध को लेकर सामान्य चर्चा करेंगे. यह जानने की कोशिश करेंगे कि बालक की जो समयसंबंधी प्रतीतियां हैं; समय के बारे में उसे जितना और जैसा समझाया जाता है, क्या उसके समयप्रबोधन का वही एकमात्र और सही तरीका है? बालक के व्यक्तित्व पर समय से संबंधित ऐसी प्रतीतियों और प्रज्ञप्तियों का जो तर्क एवं ज्ञान से परे, केवल सुनीसुनाई बातों अथवा पूर्वाग्रहों पर आधारित हैं—क्या कोई दुप्रभाव पड़ता है? क्या वे बालक के स्वतंत्र विवेक की राह में बाधक हैं? आदिकाल से ही मानवमन में एक किस्सागो बैठा हुआ है, जो मनुष्य को अपने आसपास के परिवेश के बारे में झूठीसच्ची कहानियां गढ़ने; तथा उनके साथ किसी न किसी रूप में अपना संबंध स्थापित करने को प्रेरित करता रहता है. आमतौर पर वे कहानियां संबंधित समाज की सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक मानी जाती हैं. धर्म, ईश्वर, किस्मकिस्म के देवीदेवता सब उसी मानस किस्सागो की कल्पना हैं. क्या समय भी मनुष्य की ऐसी ही रोचक परिकल्पना है?

स्पर्धा के इस युग में बालक को अन्य चुनौतियों के साथसाथ समय की चुनौती से भी जूझना पड़ता है. जो लोग समय को अनादि, अनंत तथा सतत प्रवाहमान मानते हैं, वही उसकी कमी का हवाला देकर बालक को डराते रहते हैं. खुद को ‘बड़ा’ समझने वाला प्रत्येक व्यक्ति बालक को सावधान करता है—‘समय बरबाद मत करो. वह किसी की प्रतीक्षा नहीं करता. जराभी चूके तो हाथ से फिसल जाएगा….समय के साथ चलो, चलते रहो, नहीं तो पिछड़ जाओगे.’ ऐसे निर्देश बालक को अभिभावकों तथा अध्यापकों की ओर से निरंतर, इतनी बार तथा इतनी तरह से सुनने को मिलते हैं कि उसका आत्मविश्वास डगमगाने लगता है. अपनी सीमाओं में वह समय की चुनौतियों से निपटने की कोशिश भी करता है. उसके लिए समयसारणी बनाता है. अपने अध्ययनकार्य को छोटेछोटे उपखंडों में बांटता है. घड़ी की टिकटिक के साथ सामंजस्य बैठाने की कोशिश करता है. इसके बावजूद चुनौती बनी ही रहती है. क्योंकि खंडोंउपखंडों में समाहित प्रत्येक घटना बालक के अधिकार में नहीं होती. किसी न किसी रूप में दूसरे भी उससे जुड़े होते हैं. नई शिक्षा व्यवस्था में सहयोग की अपेक्षा स्पर्धा पर ज्यादा जोर दिया जाता है. पर्याप्त सहयोगसमर्थन के अभाव में बालक अपनी ही बनाई समयसारणी के हिसाब से पिछड़ने लगता है. बड़े टोकते हैं. बालक कोशिश करता है. कभी सफल होता है, कभी परिस्थितियां भारी पड़ जाती हैं. ऐसे में समय हाथ से निकल जाने की चिंता बालक का पीछा नहीं छोड़ती. धीरेधीरे वह उसके आत्मविश्वास पर भारी पड़ने लगती है. ऐसा नहीं है कि केवल बालक ही समय के बारे में प्रचलित पूर्वाग्रहों से प्रभावित होता है. बड़े भी उससे मुक्त नहीं रह पाते. समयसंबंधी पूर्वाग्रह तो प्रायः बड़ों के माध्यम से ही बच्चों तक पहुंचाए जाते हैं. बालक उन्हें लंबे समय तक, कभीकभी जीवनभर विरासत के तौर पर संभाले रखता है.

सामान्य दिनचर्या में समय को ‘सर्वशक्तिमान’ के रूप में पेश किया जाता है. ऐसा महानायक जो देवीदेवताओं से भी ऊपर, सीधे ईश्वर के अधीन है. जो एकमात्र ईश्वर का आदेश मानता है. कभी बताया जाता है कि खुद ईश्वर भी समय के बंधन में बंधा है. भारतीय समाज की जो स्थिति है, उसमें किशोरावस्था तक पहुंचतेपहुंचते बालक अंधश्रद्धा का शिकार हो चुका होता है. उसके बाद वह तर्क छोड़ आस्था की राह पकड़ लेता है; तथा दैवीय अनुकंपा को समस्त समस्याओं का एकमात्र समाधान मानने लगता है. ईश्वर का जिक्र हो तो वह सर्वशक्तिमान के रूप में सर्वप्रथम उसी की कल्पना करता है. किंतु अगले ही क्षण जब समय की चुनौती सामने होती है, तब वही उसे सर्वशक्तिमान नजर आने लगता है. समय और ईश्वर को लेकर गढ़ी गई कहानियां भी एकदूसरे में गड्डमड्ड होती हैं. उनमें कहीं ईश्वर समय पर भारी पड़ता है तो कभी समय ईश्वर के सामने चुनौती बन जाता है. इससे बालक की उलझन सुलझने के बजाय और भी उलझ जाती है. भ्रांत बालमन समझ ही नहीं पाता कि ईश्वर हो अथवा समय, दोनों में कोई एक ही सर्वशक्तिमान हो सकता है. ऊहापोह में वह किसी कार्य को तत्संबंधी घटनाओं के संबंध में देखनेसमझने के बजाय, आस्था और पूर्वाग्रहों द्वारा नियंत्रित होने लगता है.

रोजमर्रा के कार्य के सिलसिले में बालक द्वारा घड़ी देखने का सिलसिला सुबह के साथ आरंभ हो जाता है. उसके बाद नहाने, नाश्ता करने, स्कूल जाने, स्कूल में टाइमटेबिल के अनुसार विभिन्न विषयों का पाठ करने, लंच करने, खेलने, घर लौटने, आराम करने, होमवर्क निपटाने, टेलीविजन देखने, भोजन करने से लेकर रात को बिस्तर तक जाने के बीच अपने मातापिता की भांति बालक भी समय के हिसाबकिताब में उलझा रहता है. उसके समस्त कार्यकलाप छोटेछोटे टाइमपॉकेट में बंधे होते हैं. हर पीरियड के साथ स्कूल की घड़ी बदले समय और चुनौती का एहसास कराती है. बीचबीच में जब भी घटनाक्रम बदलता है, बालक की निगाहें घड़ी की सुइयों में उलझकर रह जाती हैं. उसके सामने चुनौती होती है कि वह न केवल समय के साथ अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित रखे साथ ही सहपाठी अथवा समवयस्क बच्चों, जिनके साथ उसकी प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष स्पर्धा है, से जरूरी बढ़त भी बनाए रखे. दूसरों के बराबर रहने वाले को यहां औसत तथा पीछे रहने वाले को फिसड्डी मान लिया जाता है. समय और समवयस्क बच्चों के साथ स्पर्धा बालक को अनावश्यक रूप से तनावग्रस्त रखती है. इसके अलावा एक जैविक घड़ी भी होती है. उसके बारे में आवश्यक नहीं कि बड़े ही बालक को समझाएं. उसका एहसास प्रकृति स्वयं कराने लगती है. जैसी भूख भोजन तथा थकान आराम की जरूरत की ओर संकेत करने लगती है.

सुबह से शाम तक अनगिनत बार घड़ी देखने से जो प्रथम प्रभाव बालक के मनोमस्तिष्क पर पड़ता है, वह यह कि घड़ी की सुइयां ही समय हैं. कि अपनी महीन टिकटिक के साथ घड़ी विराट समय को अपने भीतर समेटे है. घड़ी की सुइयां आगे बढ़ेंगी, तभी समय आगे खिसकेगा. बालक ही क्यों? घर में मातापिता, स्कूल में अध्यापकगण, मित्रहितैषी, सगेसंबंधी सभी सीधे घटनाओं पर नजर रखने, उन्हें नियंत्रित करने के बजाए—घड़ी की सुइयों से नियंत्रित होने लगते हैं. स्पर्धा में समय से पिछड़ जाने की आशंका बालक को अनावश्यक चिंता में डाल देती है. उसका आत्मविश्वास आहत होने लगता है. उस समय बालक को यह बताना आवश्यक है कि घड़ी की टिकटिक समय नहीं है. वह स्वयं एक घटना है, सिर्फ घटना. उसका कार्य किन्हीं दो घटनाओं के बीच का अंतराल बताना है. उन अनेक घटनाओं में से एक, जो अनंत ब्रह्मांड के भीतर और बाहर, लगातार घटती रहती हैं. जो समय को घटनाओं के प्रवाह के रूप में देखते हैं, वे उनमें रमे रहकर भी अपना नियंत्रण बनाए रखते हैं. ऐसे लोगों के लिए समय चुनौती नहीं बनता. बालक को बताया जाना चाहिए कि समय घटनाओं की अन्विति से परे कुछ नहीं है. कि घटनाओं पर विजय पाना, उनके साथ सामंजस्य बनाकर चलना—कठिन भले हो, असंभव नहीं है. कि इस धरती पर ऐसे नरपुंगव भी हुए हैं जिन्होंने समय को न तो देवता माना, न उसकी कभी परवाह ही की. बिना परिस्थितियों से घबराए, चुनौतियों को स्वीकार करके ही वे इस दुनिया को अपनी इच्छानुसार चलाने में कामयाब होते आए हैं. ऐसा बोध बालक के आत्मविश्वास को बढ़ा सकता है. प्रायः ऐसा नहीं होता. क्योंकि समय को ‘नियति’ और ‘भाग्य’ के समकक्ष रखने वाले, दोनों को परस्पर पर्याय मानने वाले, बालक के मातापिता समय को परमनियंता और महाशक्तिशाली मान स्वयं उससे भयभीत रहते हैं.

भारतीय दर्शनों में समय पर विचार किया गया है, किंतु उनमें तत्वपरक सामग्री का अभाव है. उसे या तो ईश्वरीय शक्ति के समकक्ष रखकर मनुष्य का भाग्यनियंता बताया गया है; अथवा घटनाओं तथा उनके वेग के प्रतिफल के रूप में दर्शाया जाता है. भारतीय प्रज्ञा की कमजोरी है कि वह तर्क और विवेक से अधिक, आस्था और पूर्वाग्रहों से प्रेरणा ग्रहण करती है; और उससे बहुत कम बाहर निकल पाती है. समय को लेकर वस्तुनिष्ट चिंतन के अभाव का भी यही कारण है. पूर्वाग्रहों के दबाव में हम समयसंबंधी प्रज्ञप्तियों जिन्हें समयाभास भी कहा जा सकता है, को अपने आसपास घट रही घटनाओं के सापेक्षिक वेग, परिवर्तनशीलता, पदार्थ की विशेष अवस्था आदि के संदर्भ में देखने के बजाए स्वतंत्र सत्ता माने रहते हैं. यह ‘कार्य’ को ‘कारण’ मान लेने जैसी गंभीर चूक है, जिसके साधारण और विशेष सभी लोग शिकार होते आए हैं.

आगे बढ़ने से पहले समय और समयबोध की ओर संकेत करना आवश्यक है. जैसा ऊपर संकेत किया गया है, समय को लेकर दो प्रकार की प्रज्ञप्तियां आमतौर पर प्रत्येक मनस् में होती हैं. ये एक साथ भी हो सकती हैं तथा एकदूसरे से स्वतंत्र भी. पहली मान्यता के अनुसार समय कोई भागती हुई चीज है. नदी की मानिंद सतत प्रवाहमान. भूतवर्तमान और भविष्य में निरूपित. एक के बाद एक गुजरते रातदिन इसका उदाहरण हैं. जॉन मेकटेग्गार्ट ने इसे ‘ए’ श्रेणी माना है. यानी वह समय जिसे हम श्रेणीबद्ध रूप में अपने सामने से गुजरते हुए देखते हैं. उसका एक उदाहरण इतिहास लेखन भी है. हमारे सामान्यबोध की शुरुआत ही सौर दिवस से होती है. आदमी रोजमर्रा के कार्यों को अपनी जरूरत, सुविधा अथवा दायित्वभावना के आधार पर, छोटीछोटी घटनाओं में बांट लेता है. उन घटनाओं की सापेक्षिक गति ही समयाभास का कारण बनती है. इस मान्यता के अनुसार समय दो संबद्ध घटनाओं के बीच का अंतराल है, जो उनके घटने की दर को दर्शाता है. उससे घटना की अनुभूति तथा उसकी सापेक्षिक गति का आकलन किया जा सकता है. समय पर विचार करते हुए इस तथ्य को प्रायः नजरंदाज कर दिया जाता है कि ब्रह्मांड में घट रही अनंत घटनाओं की भांति सौर दिवस भी प्राकृतिक घटना है. पृथ्वी का अपनी धुरी पर घूमना इस घटना को अंजाम देता है. दिनरात को जन्म देने वाली यह घटना भी अपने आप में पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है. पृथ्वी अपने केंद्र पर घूमने के अलावा सूर्य की कक्षा में भी चक्कर काटती रहती है. इससे दिनरात के कुल समय में भले ही ज्यादा अंतर न पड़ता हो, मगर उनकी अवधि घटतीबढ़ती रहती है. यह समय अथवा समयाभास की सापेक्षिकता का द्योतक है.

उपर्युक्त से निष्कर्ष निकलता है कि घटनाएं तथा उनका आधार यह सततपरिवर्तनशील ब्रह्मांड—शाश्वत हैं. समय वह अंतराल है, जिसमें हम ब्रह्मांड की विभिन्न गतिविधियों के अंतराल का अनुभव करते हैं; तथा जिसके माध्यम से उनकी गति का आकलन किया जा सकता है. परिवर्तन को सृष्टि का मूल लक्षण बताने वाला यूनानी विचारक हेराक्लीट्स कहता है—‘प्रत्येक वस्तु गतिमान है. तुम किसी नदी में दुबारा हाथ नहीं डाल सकते.’ समय को सतत प्रवाह मानने वाली विचारधारा भी कहती है—‘बीता हुआ समय लौटकर नहीं आता. हम किसी क्षण को दुबारा नहीं जी सकते.’ समय की इस परमभौतिकता को वैरागी भृर्तहरि अपनी तरह से अभिव्यक्त करता है—‘कालो न यातं वयमेव याताः’—‘समय नहीं गुजरता, हम गुजरते हैं.’1 अरस्तु समय को अवधि(अंतराल) के रूप में देखता था. उसके लिए समय किसी क्रिया की पूर्वकालिक एवं उत्तरकालिक अवस्था की आवधिक गणना है. वह लिखता है—

यदि आत्मा की सत्ता नहीं थी, उस अवस्था में समय की सत्ता रही होगी या नहीं—यह जिज्ञासा सीधेसीधे एक प्रश्न पर ले आती है. जहां कोई गिनने वाला ही नहीं है, वहां ऐसी चीज भी नहीं हो सकती, जिसे गिना जा सके.’2

समय का तारतम्यता वाला लक्षण बालक के लिए सदैव तनाव या चुनौतियां पेश करे, ऐसा नहीं होता. यह बालक को निश्चिंत भी करता है. बालक अथवा किशोर जब अपने मातापिता या दादादादी, नानानानी को क्रमशः वृद्धावस्था और मृत्यु की ओर अग्रसर देखता है, तब उसके अवचेतन में सहज रूप से यह भाव उत्पन्न होता है कि उसके जीवन की तो अभी बस शुरुआत है. जीने के लिए बड़ा हिस्सा अभी शेष है; तथा सामाजिक जिम्मेदारियों का दौर लंबे अंतराल के पश्चात आरंभ होने वाला है. यह विश्वास बालक को अवसाद से बाहर रखने में मदद करता है. इससे बालक और समय अथवा समयाभास के बीच अनूठा संबंध बनता है, जो उम्मीदों से लबालब और सकारात्मक होता है. यह निश्चिंतता उसे नितनवीन सपने देखने को प्रेरित करती है. छोटा बालक उमंगों से सराबोर रहता है. मनमानी शरारतें करता है. भविष्य के प्रति आशावान रहता है. उसकी कल्पना बड़ों की अपेक्षा ज्यादा रंगीन होती है. ये सब उसे अधपकी उम्र में जिम्मेदारियों से सीधे टकराने, टूटकर बिखर जाने से बचाते हैं.

सामान्य भौतिकी के लिए समय का प्रवाहशीलता वाला गुण विशेष काम का है. उसके माध्यम से पदार्थ की आंतरिक एवं बाहरी गतियों का अध्ययन किया जाता है. गति पदार्थ की विशेष अवस्था है. क्या पदार्थ की गतिहीन अवस्था में भी समय या समयाभास की कल्पना की जा सकती है? यदि हम वस्तुविशेष के संदर्भ में देखें तो इस प्रश्न का उत्तर ‘हां’ में होगा. गति के लिए किसी पिंड अथवा कण का होना आवश्यक है. पिंड स्थिर हो और परिवेश परिवर्तनशील, तब भी पिंड तथा उसके परिवेश के बीच सापेक्षिक गति बनी रहेगी; और घटनाओं की एक के बाद एक आवृति हमारे समयाभास का कारण होगी. इसे समझने के लिए एक असंभव स्थिति की कल्पना करते हैं. मान लेते हैं कि एक व्यक्ति अंतरिक्ष में किसी अकेले पिंड पर खड़ा है. चारों और केवल शून्य पसरा है. उस अवस्था में यदि प्रेक्षक की आंखों पर ऐसा चश्मा चढ़ा दिया जाए, जिससे वह अपने पिंड की गतिविधियों के साथसाथ अपनी शारीरिक गतिविधियों की ओर से भी निःसंवेद हो जाए, उस अवस्था में वह खुद को परिवर्तनशून्य विश्व में पाएगा. ऐसी स्थिति में वह समय की अनुभूति नहीं कर पाएगा. जाहिर है, तब उसका समयबोध भी शून्य होगा.

उपर्युक्त उदाहरण में यदि मान लिया जाए कि प्रेक्षक अपने आंतरिक और बाह्य कार्यकलापों के प्रभाव से भी मुक्त है तो उस अवस्था में, उसका ध्यान केवल उस अकेली घटना पर केंद्रित रहेगा. चूंकि वह घटना नितांत शून्य में घट रही होंगी, इसलिए इस बात की पर्याप्त संभावना है कि वह केवल घटना के सातत्य को परखे और वह घटना ही उसे प्रकृति की सार्वभौम हलचल के रूप में नजर आए. स्थायित्व के अनुभव; तथा समानांतर घटनाओं के अभाव में वह एकल घटना की गति के साथ समय का संबंध जोड़ ही नहीं पाएगा. समयाभास की दृष्टि से वह लगभग गतिहीनता जैसा अनुभव होगा. उसका समयबोध करीबकरीब शून्य होगा. इससे एक सामान्य निष्कर्ष यह भी निकलता है कि समयबोध के समुचित विकास हेतु घटना बहुलता आवश्यक है. वैज्ञानिक दृष्टि से न केवल ब्रह्मांडहीनता असंभव कल्पना है, बल्कि ब्रह्मांड का पूरी तरह गतिविहीन हो जाना भी असंभव परिकल्पना है. समय वस्तु नहीं है. न ही ब्रह्मांडहीनता ही अवस्था में उसकी कल्पना की जा सकती है. कदाचित इसीलिए प्लेटो से लेकर स्टीफन हाकिंग तक समय और ब्रह्मांड की उत्पत्ति साथसाथ मानते हैं. प्लेटो का मानना था कि ब्रह्मांड की भांति समय की भी रचना हुई है. वह समय को स्वर्ग के समवयस्क मानता था. यह विश्लेषण दर्शाता है कि वस्तु समयाभास का केवल आधार है, उसका कारण नहीं है. किसी वस्तु, व्यक्ति अथवा घटना से जुड़ी सापेक्षिक परिवर्तनशीलता ही समयाभास का कारण है.

दूसरे शब्दों में समय अथवा समयाभास घटना अथवा घटनाचक्र तथा उसकी अनुभूति से परे, कुछ भी नहीं है. समयाभास का लोप केवल परम स्थिरता अथवा परम वेग(प्रकाशवेग अथवा उससे अधिक कोई भी संभव वेग) की अवस्था में ही है. परम वेग की अवस्था में परिवर्तन इतनी तीव्र गति से होगा कि हम उसे परख ही नहीं पाएंगे. दूसरी अवस्था में वस्तुविशेष यदि पूर्णतः जड़ अवस्था में है तथा शेष ब्रह्मांड बदलाव की ओर अग्रसर हैं तो सापेक्षिक परिवर्तन बना रहेगा. उससे समयाभास की स्थिति भी कायम रहेगी. उदाहरण के लिए कृष्णविवर में अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण के कारण सभी पदार्थ परमसंपीडित हो परमशून्य में ढल जाते हैं. परमसंपीडन की अवस्था में वहां समस्त गतियों का लोप हो जाता है, उस अवस्था में समय अथवा समयाभास की आवश्यकता भी समाप्त हो जाती है. वैज्ञानिक उस अवस्था को समयहीनता की अवस्था मानते हैं.

समय संबंधी पहली प्रज्ञप्ति जिसके अनुसार समय को दो घटनाओं के अंतराल से मापा जाता है, का वर्णन हम ऊपर कर चुके है. दूसरी प्रज्ञप्ति जिसे जॉन मेकटेग्गार्ट ने ‘बी’ श्रेणी की संज्ञा दी है, के अनुसार समय अंतरिक्ष जैसी अंतहीन संरचना हैं, जिसमें सब कुछ निरंतर घटता रहता है. ब्रह्मांड की समस्त घटनाएं, ग्रहपिंड सभी उसमें समाहित हैं. वह भूतवर्तमानभविष्य सभी का आधार तथा ब्रह्मांड की प्रत्येक घटना का साक्षी है. इस मान्यता के अनुसार सृष्टि की प्रत्येक घटना, अंतरिक्ष के साथसाथ समय में भी घटित होती है. पहली मान्यता जहां समय को गतिशील मानती है, वहीं इस समानांतर मान्यता के अनुसार समय स्थिर होता है. स्थिर भाव से ही वह प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष घटनाओं का लेखा रखता है. जिस प्रकर अंतरिक्ष में घटनाएं घटती रहती हें. वैसे ही अनंत समय के बीच भी घटनाओं का सिलसिला बना रहता है. अंतरिक्ष वस्तुजगत के भौतिक स्वरूप को वितान देता है. वस्तुहीनता की अवस्था में विराट आभासीय शून्य होगा; जिसमें समस्त गतियों, परिवर्तनशीलता का लोप हो चुका होगा, ऐसी स्थिति में भी समय की परिकल्पना असंभव होगी. आशय है कि परिवर्तनशून्यता अथवा परमस्थिर विश्व में समय की परिकल्पना अप्रासंगिक हो जाती है.

उपर्युक्त धारणा के अनुसार समय सृष्टि के प्रत्येक परिवर्तन का साक्षी है, मगर खुद परिवर्तनकारी शक्ति नहीं है. न उसका कोई साक्षी होता है. स्टीफन हाकिंग अपनी पुस्तक ‘समय का संक्षिप्त इतिहास’ में ब्रह्मांड की उत्पत्ति परमविस्फोट से मानते हैं. हॉकिंग के अनुसार समय की उत्पत्ति का क्षण भी वही है. अपनी बहुचर्चित पुस्तक में ‘समय का इतिहास’ के बहाने वे ब्रह्मांड के इतिहास की ही चर्चा कर रहे होते हैं. उस अवस्था की चर्चा कर रहे होते हैं, जब अपनी पहली हलचल के साथ ब्रह्मांड परमशून्य से परिवर्तन ओर अग्रसर होता है. हॉकिंग के अनुसार परमविस्फोट से पहले ब्रह्मांड परमसंपीडन की अवस्था में था. वह परमस्थिरता की अवस्था थी, जिसका उल्लेख हमने ऊपर किया है. चूंकि उस समय सर्वत्र गतिशून्यता थी, इसलिए उसमें समय अथवा समयाभास की कल्पना भी असंभव है. महाविस्फोट के पश्चात ग्रहनक्षत्रों का आदि का जन्म हुआ, जिनमें हमारी पृथ्वी भी सम्मिलित हैं.

महाविस्फोट से लेकर आज तक, किसी न किसी रूप में सभी ग्रहनक्षत्र सतत परिवर्तनशीलता से गुजर रहे हैं. अपने स्वरूप और सापेक्षिक परिवर्तनशीलता के माध्यम से वे हमें अपने होने की प्रतीति कराते हैं. उनकी समस्त गतिविधियां अंतहीन समय का हिस्सा हैं, जो सृष्टि के प्रत्येक परिवर्तन का दृष्टा है, मगर खुद अपरिवर्तनशील है. यहां सामान्यसा प्रश्न उठ खड़ा होता है. यदि समय निष्क्रिय दृष्टा है, अपने आसपास घट रही घटनाओं को प्रभावित करने या प्रभावित होने का गुण यदि उसमें नहीं है, तो उसे चैतन्य अथवा कार्यकारी शक्ति कैसे माना जा सकता है? यहां से समय की समस्या विज्ञान के दायरे से बाहर निकलकर दार्शनिक हो जाती है.

समय को लेकर कुछ मिलीजुली जिज्ञासाएं और भी हैं. जैसे कि जो घटनाएं हमारे अनुभव या दृष्टि सीमा से बाहर रह जाती हैं, उनका क्या होता है? क्या उनका समय हमारे समय से अलग होता है? क्या समय सचमुच सार्वभौम सत्ता है? क्या समय को लेकर गढ़े गए मानक किसी दूसरे ग्रह पर भी खरे उतरेंगे? ऐसे प्रश्न किसी भी विचारशील मनुष्य को परेशान कर सकते हैं. इस पर बातचीत करने से पहले हमें जान लेना चाहिए कि किसी चीज के बारे में न जानना उतना बुरा नहीं होता, जितना उसे गलत ढंग से जानना. न जानने वाले के भीतर सीखने की ललक होती है. जबकि गलत जानकारी रखने वाला हमेशा गलतफहमी का शिकार बना रहता है. अज्ञानता के कारण यदि कभी चुनौती पेश हो तो ऐसा व्यक्ति पूर्वाग्रहों से काम चलाता है. मिथों की मदद लेता है. धर्म सहित अन्यान्य पूर्वाग्रहों में फंसी भारतीय मेधा इसी कमजोरी का शिकार होती आई है. हालांकि बौद्ध, सांख्य, वैशेषिक आदि दर्शनों में समय को लेकर कहींकहीं वस्तुनिष्ट चिंतन की झलक देखने को मिलती है. लेकिन अधिकांश जगह उसे नियति अथवा ईश्वरीय शक्ति के पर्याय के रूप में प्रयुक्त किया जाता है. विज्ञान की बात की जाए तो समय को लेकर गढ़े गए मानक सामान्य परिस्थितियों तक ही प्रामाणिक हैं. यदि परिस्थितियां अत्यधिक असामान्य हों तो उसके मानक गड़बड़ाने लगते हैं.

उदाहरण के लिए आइंस्टाइन ने बताया है कि अत्यंत उच्च वेगों पर समय का वेग मद्धिम पड़ने लगता है. उसने इसे समय की सिकुड़न माना है. आइंस्टाइन के निष्कर्षों आज के अधिकांश वैज्ञानिक सहमत हैं. हालांकि उनसे असहमत विद्वानों की संख्या भी कम नहीं है. प्रसिद्ध दार्शनिक हेनरी बर्गसां समय को ‘अवधि’ के माध्यम से व्याख्यायित करते थे. इस संबंध में उनकी आइंस्टाइन के साथ हुई रोचक बहस का उल्लेख यहां अप्रासंगिक न होगा. 1922 में आइंस्टाइन के ‘सापेक्षिकता के सिद्धांत’ की आलोचना करते हुए बर्गसां ने कहा था कि सापेक्षिकता के सिद्धांत का, ‘संबंध केवल ज्ञानमीमांसा से है, न कि भौतिक विज्ञान से.’ बर्गसां की आलोचना से बौद्धिक जगत में एक बहस छिड़ गई. मगर आइंस्टाइन अपने विचार पर दृढ़ थे. अपने अपने सिद्धांत का बचाव करते हुए उन्होंने कहा था—‘दार्शनिकों की दृष्टि में समय केवल भ्रांति है.’

घटनाओं की सापेक्ष गति, यानी दो स्वतंत्र अंतरालों से हमारा समयबोध विकसित होता है. लेकिन ब्रह्मांड की भांति हमारा बोध सर्वव्यापी नहीं है. उसकी सीमा है. मनुष्य विराट ब्रह्मांड में पलप्रतिपल हो रही अनंत हलचलों में से क्षणविशेष में मात्र कुछ घटनाओं का ही अवलोकन कर पाता है. विराट ब्रह्मांड के जो ग्रहनक्षत्र हमारे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष अवलोकन से परे हैं, अरबोंखरबों प्रकाशवर्ष की दूरी पर हैं, उनसे संबंधित समय की, अपने अनुभव के आधार पर, हम केवल कल्पना ही कर सकते हैं. ठीकठीक कुछ नहीं बता सकते. चूंकि घटनाओं की गति पिंडों के गुरुत्वाकर्षण बल से भी प्रभावित होती है, इसलिए समान घटना के लिए पृथ्वी तथा दूसरे ग्रहों पर होने वाले हमारे अनुभवों में अंतर हो सकता है. पिंड का आकार, घटनाओं का वेग तथा उनकी दिशा हमारे समयाभास को प्रभावित करती है. समय संबंधी हमारा बोध हमारे अनुभवों तथा तर्कों पर आधारित होता है. उन्हीं के आधार पर हम यह निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि घटना और अंतराल का संबंध शाश्वत है. दोनों परस्पर अन्योन्याश्रित हैं. हमारा साक्षात घटनाविशेष तथा उसकी गत्यात्मकता से होता है. उनका होना ही हमारे समयाभास का कारण बनती है.

इसके बावजूद समय के भौतिक अस्तित्व को नकारने, उसे केवल मानसिक प्रबोधन का हिस्सा मानने वाले विचारकों की संख्या भी कम नहीं है. विगत दो शताब्दियों में समय संबंधी मौलिक चिंतन में तेजी आई है. अधिकांश विद्वान उसके भौतिक स्वरूप को स्वीकारते हैं, लेकिन घटनाओं से परे, उसकी स्वतंत्र सत्ता से इंकार करते हैं. लाइबिनिज ने समय के भौतिक स्वरूप को नकारा है. उसके अनुसार समय और अंतरिक्ष दोनों का कोई अस्तित्व नहीं है. उसके अनुसार समय और अंतरिक्ष की अवधारणा वस्तुजगत के बारे में हमारे दृष्टिकोण को दर्शाती है. इमानुएल कांट लाइबिनिज के विचारों का समर्थन करता है. हालांकि वह उससे पूरी तरह सहमत नहीं है. वह लाइबिनिज की इस बात से तो सहमत है कि समय और अंतरिक्ष दोनों ही कल्पनाजन्य हैं. लेकिन उस तरह नहीं जिस तरह लाइबिनिज का विचार है. कांट के अनुसार दोनों मानसिक अवधारणा हैं, इस तरह कि वे हमारे मस्तिष्क पर निर्भर हैं. उनमें से पहला वस्तुओं और स्थितियों को सहेजता है, दूसरा उनकी सापेक्षिक हलचलों को दर्शाने एवं दर्ज करने के काम आता है.

समय की अधिसत्ता को लेकर कुछ दिलचस्प बहसें विद्वानों के रही हैं. थाॅमस एक्वीनस ने समय को दो भागों में बांटा था, वास्तविक समय तथा काल्पनिक समय. मगर पेशे से गणितज्ञ इसाक बैरो को यह विभाजन स्वीकार न था. ज्यामितीय पर दिए गए अपने वक्तव्य में बैरो ने एक्वीनस की मान्यता, जो अरस्तु की समयसंबंधी विचारों पर केंद्रित थी, को सिरे से खारिज कर दिया था. एक सभा में अपने ही प्रश्न कि क्या समय सृष्टि रचना से पहले भी मौजूद था, का स्वयं उत्तर देते हुए उसने कहा था—‘विश्वोत्पत्ति से पहले और उसके बाद में, यहां तक कि ब्रह्मांड से परे भी समय था, समय है.’ अरस्तु की मान्यता है कि समय घटनाओं पर निर्भर है; तथा घटनाओं की आवृत्ति के अनुसार वह आगे बढ़ता रहता है. उसका आशय था कि समय घटनासापेक्ष है. बैरो ने उसका खंडन करते हुए कहा था—

‘‘बाकी चीजों की भांति समय की भी कुछ विशेषताएं हैं, उसका मौलिक और सार्वत्रिक गुण है कि वह अपने व्यवहार पर सदैव दृढ़ रहता है. चाहे वस्तुएं गतिमान रहें या ठहर जाएं, हम चाहे जागें या सोएं, वह अपनी निर्धारित गति से बहता रहता है. कल्पना कीजिए समस्त तारागण अपने जन्म के समय से ही स्थिर रहें, उनकी स्थिरता चाहे जितने समय तक कायम रहे, समय का उससे कुछ नहीं बिगड़ने वाला, वह अपनी गति से आगे बढ़ता जाएगा.’’

बैरो न्यूटन का गुरु रह चुका था. आकादमिक जगत में उसका सम्मान था. जबकि उससे तीन शताब्दी पहले जन्मे थाॅमस एक्वीनस की भी विद्वत जगत में नवअरस्तुवादी दार्शनिक के रूप में प्रतिष्ठित था. प्रकृति से आध्यात्मिक बैरो न्यूटन से प्रभावित था. हालांकि समय को लेकर न्यूटन से उसके मतभेद थे. उसका विचार था कि समय अपने आप में स्वतंत्र है. वह सृष्टि की रचना से पहले भी मौजूद था. न्यूटन का विचार था कि वस्तुएं समय और अंतरिक्ष में दोनों में विस्तार पाती हैं. समय में उनकी व्याप्ति क्रमवार तथा अंतरिक्ष में स्थितिअनुसार रहती है. दूसरे शब्दों में न्यूटन समय को घटनाओं का प्रभाव मानता था. प्रकारांतर में समय को लेकर उसका दृष्टिकोण भौतिकवादी था. तदनुसार उसकी उत्पत्ति भी भौतिक जगत की उत्पत्ति से जुड़ी थी. उन दिनों धर्मसंस्थाएं बहुत शक्तिशाली थीं. राज्य पर चर्च की मजबूत पकड़ थी, जिसकी एकाएक उपेक्षा संभव न थी. उनके दबाव में अपने समय के महानतम वैज्ञानिक न्यूटन को संशोधित वक्तव्य के लिए मजबूर होना पड़ा. अंततः अपनी ही पुस्तक ‘प्रंसीपिया मैथेमेटिका’ में उसे जोड़ना पड़ा—‘ईश्वर अजरअमरअनंत है, उसने समय और अंतरिक्ष को इसलिए बनाया, ताकि वह हर जगह मौजूद रह सके.’

इनका विरोध किया था—फ्रांसिसी वैज्ञानिकचिंतक लाइबिनिज ने. लाइबिनिज ने अध्यात्म और विज्ञान को एकमेव करने का काम किया था. उसका मानना था कि ईश्वर सर्वथा, संपूर्ण और किसी भी प्रकार के विक्षोभ से परे है. परंतु यह अकेले ईश्वर का गुण नहीं है. सृष्ठि छोटेछोटे परमबिंदुओं से बनी है, जो अपने गुण में ईश्वर की तरह ही है. अंतर बस इतना है कि वे बिखरे हुए हैं. जबकि ईश्वर संपूर्ण एकजुट सत्ता है. इन परमबिंदुओं को उसने ‘मोनाड’ का नाम दिया था. लाइबिनिज के अनुसार मोनाड ईश्वर की रचना है, लेकिन समय और अंतरिक्ष दोनों से स्वतंत्र हैं. आगे चलकर न्यूटन और बैरो के साथ तीसरा व्यक्ति भी उस बहस में शमिल हो गया. वह व्यक्ति था, सेमुअल क्लार्क. क्लार्क न्यूटन का शिष्य था.

लाइबिनिज द्वारा समय को स्वतंत्र सत्ता न मानने पर क्लार्क की प्रतिक्रिया थी—‘यदि तुम समय को स्वतंत्र स्वयंभू सत्ता मानने को तैयार नहीं हो, तब तुम्हें यह दावा नहीं कर सकते कि विश्व का निर्माण हुआ था. क्योंकि यदि तुम यह कहना चाहो कि ईश्वर ने इस सृष्टि की रचना की है तो तुम यह भी कह सकते हो कि ईश्वर ने दुनिया को उस क्षण से कुछ पहले रचा था, जिस क्षण उसने वास्तव में रचा था. इसका सीधा मतलब तो यही हुआ कि ईश्वर ने सृष्टि को उस क्षण से कुछ न कुछ पहले रचा था, जिस क्षण उसने वास्तव में उसे रचा था. यदि समय सृष्टि से स्वतंत्र नहीं है तो सृष्टि रचना की घटना ही पहली घटना हुई.’

सेमुअल क्लार्क और लाइबिनिज के बीच इसी प्रकार से तर्कों का आदानप्रदान होता रहा. अपने अगले पत्र में लाइबिनिज ने क्लार्क और एक्वीनस के विचारों पर टिप्पणी करते हुए लिखा—‘एक्वीनस और क्लार्क बड़ी दुविधा में हैं. ऐसी दुविधा जो किसी भी छोर पर स्पष्ट नहीं है.’ लाइबिनिज का उत्तर बहुत हल्काफुल्का था. इसपर क्लार्क ने लाइबिनिज विरोधाभासी होने का आक्षेप लगाते हुए लिखा कि लाइबिनिज के अनुसार समय की उत्पत्ति उससे तत्संबंधी घटनाएं अस्थायी तौर पर किसी तीसरे द्वारा प्रेरित हैं. इसका अभिप्राय है कि समय की उत्पत्ति से भी पहले कुछ घटा था, जो पूरी तरह असंगत और अविश्वसनीय है. समय को लेकर इस प्रकार की दुबिधा और तर्कविर्तक आगे भी चलते रहे. और आज लगभग चार सौ वर्ष बाद भी समय की उपस्थिति को लेकर विद्वानों के बीच उतने ही मतभेद हैं, जितने उस समय के दार्शनिकों के बीच विद्यमान थे.

कांट के अनुसार अंतरिक्ष के संबंध में दिए जाने वाले तर्क समय पर भी यथावत लागू होते हैं. लाइबिनिज पर टिप्पणी करते हुए वह लिखता है—‘काल और दिक् का अपनाअपना अथवा संयुक्त रूप से कोई अस्तित्व नहीं है. कुछ अर्थों में वे हमारी अभिव्यक्ति तक सीमित, उसके समुत्पाद की तरह हैं. वे अपरिवर्तनीय हैं, उन अर्थों में नहीं जिनमें लाइबिनिज उन्हें बताता है. अंतरिक्ष का अस्तित्व मानवमस्तिष्क पर निर्भर है.’ अंतरिक्ष कि काल्पनिकता को स्वीकारते हुए वह लिखता है कि कल्पना वही श्रेष्ठतम है, जिसे कोई कल्पना मानने को तैयार न हो. जो वास्तविकता का आभास कराती हो. मानवीय कल्पना का जैसा परिपूर्ण उदाहरण अंतरिक्ष है, वैसा अन्य कोई नहीं. वह हमारी संवेदनपरकता की कसौटी है. कांट इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि अंतरिक्ष बाहरी संवेदन का विषय नहीं है. बल्कि ऐसी अवधारणा है, जो बाकी वस्तुओं के रूपाकार एवं तत्संबंधी संवेदनपरकता पर निर्भर है. उसके अनुसार अनेक ऐसे तर्क जो अंतरिक्ष पर लागू होते हैं, वे समय पर भी लागू होते हैं.

कांट के अनुसार समय की सत्ता है, पर केवल इसलिए कि वह हमारी वास्तविक अंतश्चेतना का हिस्सा है. इसके बावजूद समयहीनता की कल्पना हमारे लिए उतनी ही दुष्कर है, जितनी कि ब्रह्मांड के लोप हो जाने की परिकल्पना. ब्रह्मांडहीनता की अवस्था में समयबोध का क्या होगा? उसकी पहचान किस तरह से की जाएगी? ऐसे प्रश्न हमारी कल्पना से बाहर है. सवाल है कि समय यदि ‘कुछ भी नहीं’ है, केवल आभास मात्र है, तो उसे व्यावहारिक जीवन में उसे सबकुछ क्यों दिखाया जाता है. कारण है कि ऐसे अवसरों पर हम सत्य की उपेक्षा कर, भ्रांत धारणाओं को ही सबकुछ माने रहते हैं. इसके बीजतत्व भी हमारी शिक्षासंस्कृति में अंतनिर्हित हैं. हमारी जरूरत की सभी वस्तुएं पृथ्वी उपलब्ध कराती है. बिना उसके जीवन संभव ही नहीं है. मगर हम यह माने रहते हैं कि सातवेंआठवें आसमान पर बैठा कोई देवता है, जो हमें जीवन और पृथ्वी को उर्वरा शक्ति प्रदान करता है. इस तरह से सोचने की आदत ज्यादा से ज्यादा ढाईतीन हजार वर्ष पुरानी है. लेकिन यही वह कालखंड है जब आदमी द्वारा आदमी पर शासन करने, आदमी द्वारा आदमी को गुलाम बनाने की शुरुआत हुई. धर्म, जाति, संप्रदाय के नाम पर असहिष्णुता और असमानता को व्यक्ति की पहचान जोड़ा जाने लगा. ऐसी व्यवस्था में जो भी ऊंचाई पर होता है, वह अपनी ऊंचाई को वैध बनाने के लिए अपने से भी ऊंचे का हवाला देता है. जैसे कि ब्राह्मणों ने अपने शीर्षस्व को वैध बनाने के लिए देवताओं की पूरी फौज की परिकल्पना कर डाली. इसलिए समय को और दूसरी चीजों को सही ढंग से जाना केवल विज्ञान की दृष्टि से आवश्यक है, बल्कि संस्कृति के परिष्करण तथा मनुष्य के नैतिक प्रबोधन हेतु भी अपरिहार्य है.

© ओमप्रकाश कश्यप

1. भृर्तहरि, वैराग्य शतक, 12/1045.

2. “Whether, if soul (mind) did not exist, time would exist or not, is a question that may fairly be asked; for if there cannot be someone to count there cannot be anything that can be counted…” (Physics, chapter 14).

3. time is neither identical with nor entirely independent of movement, and it remains for us to determine the relation between them….We may here interject the question: how, when there is no time, can there be any “before” and “after”; or how, when there is nothing going on, can there be time? Since time is a number belonging to a process … then,if there always is time, movement must be eternal also.—St. Thomas Aquinas, Commentary on Aristotle’s “Physics,” R. J. Blackwell, trs. (New Haven: Yale University Press, 1963).

4. The ideality of space is its mind-dependence: it is only a condition of sensibility…. Kant concluded …”absolute space is not an object of outer sensation; it is rather a fundamental concept which first of all makes possible all such outer sensation.”…Much of the argumentation pertaining to space is applicable, mutatis mutandis, to time, so I will not rehearse the arguments. As space is the form of outer intuition, so time is the form of inner intuition….Kant claimed that time is real, it is “the real form of inner intuition.”