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बालक और उसका समयबोध

सामान्य

ओमप्रकाश कश्यप

इस लेख का उद्देश्य न तो बालक को समय-प्रबंधन के गुर सिखाना है. न उसे समय-संबंधी दार्शनिक जटिलताओं में उलझाना. हम बालक तथा उसके समयबोध को लेकर सामान्य चर्चा करेंगे. यह जानने की कोशिश करेंगे कि समय को लेकर बालक की जो प्रतीतियां हैं; स्कूल से लेकर घर तक, समय के बारे में उसे जितना और जैसा समझाया जाता है, क्या उसके समय-प्रबोधन का वही एकमात्र और सही तरीका है? बालक के व्यक्तित्व पर समय से संबंधित ऐसी प्रतीतियों और प्रज्ञप्तियों का जो तर्क एवं ज्ञान से परे, केवल सुनी-सुनाई बातों अथवा पूर्वाग्रहों पर आधारित हैं—क्या कोई दुप्रभाव पड़ता है? क्या वे बालक के स्वतंत्र विवेक की राह में बाधक हैं? आदिकाल से ही मानवमन में एक किस्सागो बैठा हुआ है, जो मनुष्य को अपने आसपास के परिवेश के बारे में झूठी-सच्ची कहानियां गढ़ने; तथा उनके साथ किसी न किसी रूप में अपना संबंध स्थापित करने को प्रेरित करता रहता है. आमतौर पर वे कहानियां संबंधित समाज की सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक मानी जाती हैं. धर्म, ईश्वर, किस्म-किस्म के देवी-देवता सब उसी मानस किस्सागो की कल्पना हैं. क्या समय भी मनुष्य की ऐसी ही रोचक परिकल्पना है?

स्पर्धा के इस युग में बालक को अन्य चुनौतियों के साथ-साथ समय की चुनौती से भी जूझना पड़ता है. जो लोग समय को अनादि, अनंत तथा सतत प्रवाहमान मानते हैं, वही उसकी कमी का हवाला देकर बालक को डराते रहते हैं. खुद को ‘बड़ा’ समझने वाला प्रत्येक व्यक्ति बालक को सावधान करता है—‘समय बरबाद मत करो. वह किसी की प्रतीक्षा नहीं करता. जरा-भी चूके तो हाथ से फिसल जाएगा….समय के साथ चलो, चलते रहो, नहीं तो पिछड़ जाओगे.’ ऐसे निर्देश बालक को अभिभावकों तथा अध्यापकों की ओर से निरंतर, इतनी बार तथा इतनी तरह से सुनने को मिलते हैं कि उसका आत्मविश्वास डगमगाने लगता है. अपनी सीमाओं में वह समय की चुनौतियों से निपटने की कोशिश भी करता है. उसके लिए समय-सारणी बनाता है. अपने अध्ययन-कार्य को छोटे-छोटे उपखंडों में बांटता है. घड़ी की टिक-टिक के साथ सामंजस्य बैठाने की कोशिश करता है. इसके बावजूद चुनौती बनी ही रहती है. क्योंकि खंडों-उपखंडों में समाहित प्रत्येक घटना बालक के अधिकार में नहीं होती. किसी न किसी रूप में दूसरे भी उससे जुड़े होते हैं.

नई शिक्षा व्यवस्था में सहयोग की अपेक्षा स्पर्धा पर ज्यादा जोर दिया जाता है. पर्याप्त सहयोग-समर्थन के अभाव में बालक अपनी ही बनाई समय-सारणी के हिसाब से पिछड़ने लगता है. बड़े टोकते हैं. बालक कोशिश करता है. कभी सफल होता है, कभी परिस्थितियां भारी पड़ जाती हैं. ऐसे में समय हाथ से निकल जाने की चिंता बालक का पीछा नहीं छोड़ती. धीरे-धीरे वह उसके आत्मविश्वास पर भारी पड़ने लगती है. ऐसा नहीं है कि केवल बालक ही समय के बारे में प्रचलित पूर्वाग्रहों से प्रभावित होता है. बड़े भी उससे मुक्त नहीं रह पाते. समय-संबंधी पूर्वाग्रह तो प्रायः बड़ों के माध्यम से ही बच्चों तक पहुंचाए जाते हैं. बालक उन्हें लंबे समय तक, कभी-कभी जीवन-भर विरासत के तौर पर संभाले रखता है.

सामान्य दिनचर्या में समय को ‘सर्वशक्तिमान’ के रूप में पेश किया जाता है. ऐसा महानायक जो कथित देवी-देवताओं से भी ऊपर, सीधे किसी पराशक्ति के अधीन है. जो दैवीय आदेशों से अनुशासित होता है. कभी बताया जाता है कि खुद ईश्वर भी समय के बंधन में बंधा है. भारतीय समाज की जो स्थिति है, उसमें किशोरावस्था तक पहुंचते-पहुंचते बालक अंध-श्रद्धा का शिकार हो चुका होता है. उसके बाद वह तर्क छोड़ आस्था की राह पकड़ लेता है; तथा दैवीय अनुकंपा को समस्त समस्याओं का एकमात्र समाधान मानने लगता है. ईश्वर का जिक्र हो तो वह सर्वशक्तिमान के रूप में सर्वप्रथम उसी की कल्पना करता है. किंतु अगले ही क्षण जब समय की चुनौती सामने होती है, तब वही उसे सर्वशक्तिमान नजर आने लगता है. समय और तथाकथित ईश्वर को लेकर गढ़ी गई कहानियां भी एक-दूसरे में गड्ड-मड्ड होती हैं. उनमें कहीं ईश्वर समय पर भारी पड़ता है तो कभी समय ईश्वर के सामने चुनौती बन जाता है. इससे बालक की उलझन सुलझने के बजाय और भी उलझ जाती है. भ्रांत बालमन समझ ही नहीं पाता कि पराशक्ति हो अथवा समय, दोनों में कोई एक ही सर्वशक्तिमान हो सकता है. ऊहापोह में वह किसी कार्य को तत्संबंधी घटनाओं के संबंध में देखने-समझने के बजाय, आस्था और पूर्वाग्रहों द्वारा नियंत्रित होने लगता है. यहीं से उसके विचलन का दौर आरंभ होता है, जो उसे वास्तविक और अन्वीक्षणात्मक ज्ञान के बजाय आभासी दुनिया में ले जाकर छोड़ देता है─जहां या तो निरे सपने होते या फिर परंपराओं का बोझ. जहाँ    

रोजमर्रा के कार्य के सिलसिले में बालक द्वारा घड़ी देखने का सिलसिला सुबह के साथ आरंभ हो जाता है. उसके बाद नहाने, नाश्ता करने, स्कूल जाने, स्कूल में टाइम-टेबिल के अनुसार विभिन्न विषयों का पाठ करने, लंच करने, खेलने, घर लौटने, आराम करने, होमवर्क निपटाने, टेलीविजन देखने, भोजन करने से लेकर रात को बिस्तर तक जाने के बीच अपने माता-पिता की भांति बालक भी समय के हिसाब-किताब में उलझा रहता है. उसके समस्त कार्यकलाप छोटे-छोटे टाइम-पॉकेट में बंधे होते हैं. हर पीरियड के साथ स्कूल की घड़ी बदले समय और चुनौती का एहसास कराती है. बीच-बीच में जब भी घटनाक्रम बदलता है, बालक की निगाहें घड़ी की सुइयों में उलझकर रह जाती हैं. उसके सामने चुनौती होती है कि वह न केवल समय के साथ अपनी दिन-चर्या को व्यवस्थित रखे साथ ही सहपाठी अथवा समवयस्क बच्चों, जिनके साथ उसकी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष स्पर्धा है─से जरूरी बढ़त भी बनाए रखे. दूसरों के बराबर रहने वाले को यहां औसत तथा पीछे रहने वाले को फिसड्डी मान लिया जाता है. समय और समवयस्क बच्चों के साथ स्पर्धा बालक को अनावश्यक रूप से तनावग्रस्त रखती है. इसके अलावा एक जैविक घड़ी भी होती है. उसके बारे में आवश्यक नहीं कि बड़े ही बालक को समझाएं. उसका एहसास प्रकृति स्वयं कराने लगती है. जैसे  समय होते ही भूख भोजन तथा थकान आराम की जरूरत की ओर संकेत करने लगती है.

सुबह से शाम तक अनगिनत बार घड़ी देखने से जो प्रथम प्रभाव बालक के मनो-मस्तिष्क पर पड़ता है, वह यह कि घड़ी की सुइयां ही समय हैं. कि अपनी महीन टिक-टिक के साथ घड़ी विराट समय को अपने भीतर समेटे है. घड़ी की सुइयां आगे बढ़ेंगी, तभी समय आगे खिसकेगा. बालक ही क्यों? घर में माता-पिता, स्कूल में अध्यापकगण, मित्र-हितैषी, सगे-संबंधी सभी सीधे घटनाओं पर नजर रखने, उन्हें नियंत्रित करने के बजाए—घड़ी की सुइयों से नियंत्रित होने लगते हैं. स्पर्धा में समय से पिछड़ जाने की आशंका बालक को अनावश्यक चिंता में डाल देती है. उसका आत्मविश्वास आहत होने लगता है. उस समय बालक को यह बताना आवश्यक है कि घड़ी की टिक-टिक समय नहीं है. वह स्वयं एक घटना है, सिर्फ घटना, जिसकी दो आवृतियों के बीच सुनिश्चित अंतराल होता है. घड़ी का कार्य किन्हीं दो घटनाओं के बीच का अंतराल बताना है. प्रत्येक घटना के समानांतर  और आगे-पीछे हजारों-हज़ार घटनाएँ अनंत ब्रह्मांड के भीतर और बाहर, लगातार घटती रहती हैं. जो लोग समय को घटनाओं के प्रवाह के रूप में देखते हैं, वे उनमें रमे रहकर भी अपना नियंत्रण बनाए रखते हैं. ऐसे लोगों के लिए समय चुनौती नहीं बनता. उनके साथ विलक्षण यात्रा का अनकहा रोमांच होता है.  

बालक को बताया जाना चाहिए कि समय घटनाओं की अन्विति से परे कुछ नहीं है. कि घटनाओं पर विजय पाना, उनके साथ सामंजस्य बनाकर चलना—कठिन भले हो, असंभव नहीं है. कि इस धरती पर ऐसे नरपुंगव भी हुए हैं जिन्होंने समय को न तो देवता माना, न उसकी कभी परवाह ही की. बिना परिस्थितियों से घबराए, चुनौतियों को स्वीकार करके ही वे इस दुनिया को अपनी इच्छानुसार चलाने में कामयाब होते आए हैं. ऐसा बोध बालक के आत्मविश्वास को बढ़ा सकता है. प्रायः ऐसा नहीं होता. क्योंकि समय को ‘नियति’ और ‘भाग्य’ के समकक्ष रखने वाले, दोनों को परस्पर पर्याय मानने वाले, बालक के माता-पिता समय को परम-नियंता और महाशक्तिशाली मान स्वयं उससे भयभीत रहते हैं.

भारतीय दर्शनों में समय पर विचार किया गया है, किंतु उनमें तत्वपरक सामग्री का अभाव है. उसे या तो दैवीय शक्ति के समकक्ष रखकर मनुष्य का भाग्य-नियंता बताया गया है; अथवा घटनाओं तथा उनके वेग के प्रतिफल के रूप में दर्शाया जाता है. भारतीय प्रज्ञा की कमजोरी है कि वह तर्क और विवेक से अधिक, आस्था और पूर्वाग्रहों से प्रेरणा ग्रहण करती है; और उससे बहुत कम बाहर निकल पाती है. समय को लेकर वस्तुनिष्ट चिंतन के अभाव का भी यही कारण है. पूर्वाग्रहों के दबाव में हम समय-संबंधी प्रज्ञप्तियों जिन्हें समयाभास भी कहा जा सकता है, को अपने आसपास घट रही घटनाओं के सापेक्षिक वेग, परिवर्तनशीलता, पदार्थ की विशेष अवस्था आदि के संदर्भ में देखने के बजाए स्वतंत्र सत्ता माने रहते हैं. यह ‘कार्य’ को ‘कारण’ मान लेने जैसी गंभीर चूक है, जिसके साधारण और विशेष सभी लोग शिकार होते आए हैं.  

आगे बढ़ने से पहले समय और समयबोध की ओर संकेत करना आवश्यक है. जैसा ऊपर संकेत किया गया है, समय को लेकर दो प्रकार की प्रज्ञप्तियां आमतौर पर प्रत्येक मनस् में होती हैं. ये एक साथ भी हो सकती हैं तथा एक-दूसरे से स्वतंत्र भी. पहली मान्यता के अनुसार समय कोई भागती हुई चीज है. नदी की मानिंद सतत प्रवाहमान. भूत-वर्तमान और भविष्य में निरूपित. एक के बाद एक गुजरते रात-दिन इसका उदाहरण हैं. जॉन मेकटेग्गार्ट ने इसे ‘ए’ श्रेणी माना है. यानी वह समय जिसे हम श्रेणीबद्ध रूप में अपने सामने से गुजरते हुए देखते हैं. उसका एक उदाहरण इतिहास लेखन भी है. हमारे समय और तत्संबंधी सामान्यबोध की शुरुआत ही सौर दिवस से होती है. आदमी रोजमर्रा के कार्यों को अपनी जरूरत, सुविधा अथवा दायित्व-भावना के आधार पर, छोटी-छोटी घटनाओं में बांट लेता है. उन घटनाओं की सापेक्षिक गति ही समयाभास का कारण बनती है. इस मान्यता के अनुसार समय दो संबद्ध घटनाओं के बीच का अंतराल है, जो उनके घटने की दर को दर्शाता है. उससे घटना की अनुभूति तथा उसकी सापेक्षिक गति का आकलन किया जा सकता है. समय पर विचार करते हुए इस तथ्य को प्रायः नजरंदाज कर दिया जाता है कि ब्रह्मांड में घट रही अनंत घटनाओं की भांति सौर दिवस भी प्राकृतिक घटना है. पृथ्वी का अपनी धुरी पर घूमना इस घटना को अंजाम देता है. दिन-रात को जन्म देने वाली यह घटना भी अपने आप में पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है. पृथ्वी अपने केंद्र पर घूमने के अलावा सूर्य की कक्षा में भी चक्कर काटती रहती है. इससे दिन-रात के कुल समय में भले ही ज्यादा अंतर न पड़ता हो, मगर उनकी अवधि घटती-बढ़ती रहती है. यह समय अथवा समयाभास की सापेक्षिकता का द्योतक है.

उपर्युक्त से निष्कर्ष निकलता है कि घटनाएं तथा उनका आधार यह सतत-परिवर्तनशील ब्रह्मांड—शाश्वत हैं. समय वह अंतराल है, जिसमें हम ब्रह्मांड की विभिन्न गतिविधियों के अंतराल का अनुभव करते हैं; तथा जिसके माध्यम से उनकी गति का आकलन किया जा सकता है. परिवर्तन को सृष्टि का मूल लक्षण बताने वाला यूनानी विचारक हेराक्लीट्स कहता है—‘प्रत्येक वस्तु गतिमान है. तुम किसी नदी में दुबारा हाथ नहीं डाल सकते.’ समय को सतत प्रवाह मानने वाली विचारधारा भी कहती है—‘बीता हुआ समय लौटकर नहीं आता. हम किसी क्षण को दुबारा नहीं जी सकते.’ समय की इस परम-भौतिकता को वैरागी भृर्तहरि अपनी तरह से अभिव्यक्त करता है—‘कालो न यातं वयमेव याताः’—‘समय नहीं गुजरता, हम गुजरते हैं.’1 अरस्तु समय को अवधि(अंतराल) के रूप में देखता था. उसके लिए समय किसी क्रिया की पूर्वकालिक एवं उत्तरकालिक अवस्था की आवधिक गणना है. वह लिखता है—

‘यदि आत्मा की सत्ता नहीं थी, उस अवस्था में समय की सत्ता रही होगी या नहीं—यह जिज्ञासा सीधे-सीधे एक प्रश्न पर ले आती है. जहां कोई गिनने वाला ही नहीं है, वहां ऐसी चीज भी नहीं हो सकती, जिसे गिना जा सके.’2 

इस तर्क को स्वीकारने में वही मुश्किल है, जो यह स्वीकार करने में है, कि गंगाधर और तिलक को बनारस जाना था, गंगाधर नहीं गया इसलिए तिलक भी नहीं गया.  समय का तारतम्यता वाला लक्षण बालक के लिए सदैव तनाव या चुनौतियां पेश करे, ऐसा नहीं होता. यह बालक को निश्चिंत भी करता है. बालक अथवा किशोर जब अपने माता-पिता या दादा-दादी, नाना-नानी को क्रमशः वृद्धावस्था और मृत्यु की ओर अग्रसर देखता है, तब उसके अवचेतन में सहज रूप से यह भाव उत्पन्न होता है कि उसके जीवन की तो अभी बस शुरुआत है. जीने के लिए बड़ा हिस्सा अभी शेष है; तथा सामाजिक जिम्मेदारियों का दौर लंबे अंतराल के पश्चात आरंभ होने वाला है. यह विश्वास बालक को अवसाद से बाहर रखने में मदद करता है. इससे बालक और समय अथवा समयाभास के बीच अनूठा संबंध बनता है, जो उम्मीदों से लबालब और सकारात्मक होता है. यह निश्चिंतता उसे नित-नवीन सपने देखने को प्रेरित करती है. छोटा बालक उमंगों से सराबोर रहता है. मनमानी शरारतें करता है. भविष्य के प्रति आशावान रहता है. उसकी कल्पना बड़ों की अपेक्षा ज्यादा रंगीन होती है. ये सब उसे अधपकी उम्र में जिम्मेदारियों से सीधे टकराने, टूटकर बिखर जाने से बचाते हैं.

सामान्य भौतिकी के लिए समय का प्रवाहशीलता वाला गुण विशेष काम का है. उसके माध्यम से पदार्थ की आंतरिक एवं बाहरी गतियों का अध्ययन किया जाता है. गति पदार्थ की विशेष अवस्था है. क्या पदार्थ की गतिहीन अवस्था में भी समय या समयाभास की कल्पना की जा सकती है? यदि हम वस्तु-विशेष के संदर्भ में देखें तो इस प्रश्न का उत्तर ‘हां’ में होगा. गति के लिए किसी पिंड अथवा कण का होना आवश्यक है. पिंड स्थिर हो और परिवेश परिवर्तनशील, तब भी पिंड तथा उसके परिवेश के बीच सापेक्षिक गति बनी रहेगी; और घटनाओं की एक के बाद एक आवृति हमारे समयाभास का कारण होगी. इसे समझने के लिए एक असंभव स्थिति की कल्पना करते हैं. मान लेते हैं कि एक व्यक्ति अंतरिक्ष में किसी अकेले पिंड पर खड़ा है. चारों और केवल शून्य पसरा है. उस अवस्था में यदि प्रेक्षक की आंखों पर ऐसा चश्मा चढ़ा दिया जाए, जिससे वह अपने पिंड की गतिविधियों के साथ-साथ अपनी शारीरिक गतिविधियों की ओर से भी निःसंवेद हो जाए, उस अवस्था में वह खुद को परिवर्तन-शून्य विश्व में पाएगा. ऐसी स्थिति में वह समय की अनुभूति नहीं कर पाएगा. जाहिर है, तब उसका समयबोध भी शून्य होगा.

समय संबंधी पहली प्रज्ञप्ति जिसके अनुसार समय को दो घटनाओं के अंतराल से मापा जाता है, का वर्णन हम ऊपर कर चुके है. दूसरी प्रज्ञप्ति जिसे जॉन मेकटेग्गार्ट ने ‘बी’ श्रेणी की संज्ञा दी है, के अनुसार समय अंतरिक्ष जैसी अंतहीन संरचना हैं, जिसमें सब कुछ निरंतर घटता रहता है. ब्रह्मांड की समस्त घटनाएं, ग्रह-पिंड सभी उसमें समाहित हैं. वह भूत-वर्तमान-भविष्य सभी का आधार तथा ब्रह्मांड की प्रत्येक घटना का साक्षी है. इस मान्यता के अनुसार सृष्टि की प्रत्येक घटना, अंतरिक्ष के साथ-साथ समय में भी घटित होती है. पहली मान्यता जहां समय को गतिशील मानती है, वहीं इस समानांतर मान्यता के अनुसार समय स्थिर होता है. स्थिर भाव से ही वह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष घटनाओं का लेखा रखता है. जिस प्रकर अंतरिक्ष में घटनाएं घटती रहती हें. वैसे ही अनंत समय के बीच भी घटनाओं का सिलसिला बना रहता है. अंतरिक्ष वस्तुजगत के भौतिक स्वरूप को वितान देता है. वस्तुहीनता की अवस्था में विराट आभासीय शून्य होगा; जिसमें समस्त गतियों, परिवर्तनशीलता का लोप हो चुका होगा, ऐसी स्थिति में भी समय की परिकल्पना असंभव होगी. आशय है कि परिवर्तन-शून्यता अथवा परम-स्थिर विश्व में समय की परिकल्पना अप्रासंगिक हो जाती है.  

एक मान्यता के अनुसार समय सृष्टि के प्रत्येक परिवर्तन का साक्षी है, मगर खुद परिवर्तनकारी शक्ति नहीं है. न उसका कोई साक्षी होता है. स्टीफन हाकिंग अपनी पुस्तक ‘समय का संक्षिप्त इतिहास’ में ब्रह्मांड की उत्पत्ति परम-विस्फोट से मानते हैं. हॉकिंग के अनुसार समय की उत्पत्ति का क्षण भी वही है. अपनी बहुचर्चित पुस्तक में ‘समय का इतिहास’ के बहाने वे ब्रह्मांड के इतिहास की ही चर्चा कर रहे होते हैं. उस अवस्था की चर्चा कर रहे होते हैं, जब अपनी पहली हलचल के साथ ब्रह्मांड परम-शून्य से परिवर्तन ओर अग्रसर होता है. हॉकिंग के अनुसार परम-विस्फोट से पहले ब्रह्मांड परम-संपीडन की अवस्था में था. वह परम-स्थिरता की अवस्था थी, जिसका उल्लेख हमने ऊपर किया है. चूंकि उस समय सर्वत्र गति-शून्यता थी, इसलिए उसमें समय अथवा समयाभास की कल्पना भी असंभव है. महाविस्फोट के पश्चात ग्रह-नक्षत्रों का आदि का जन्म हुआ, जिनमें हमारी पृथ्वी भी सम्मिलित हैं.

समयहीनता की कल्पना हमारे लिए उतनी ही दुष्कर है, जितनी कि ब्रह्मांड के लोप हो जाने की परिकल्पना. ब्रह्मांडहीनता की अवस्था में समयबोध का क्या होगा? उसकी पहचान किस तरह से की जाएगी? ऐसे प्रश्न हमारी कल्पना से बाहर है. सवाल है कि समय यदि ‘कुछ भी नहीं’ है, केवल आभास मात्र है, तो उसे व्यावहारिक जीवन में उसे सबकुछ क्यों दिखाया जाता है. कारण है कि ऐसे अवसरों पर हम सत्य की उपेक्षा कर, भ्रांत धारणाओं को ही सबकुछ माने रहते हैं. इसके बीजतत्व भी हमारी शिक्षा-संस्कृति में अंतनिर्हित हैं. हमारी जरूरत की सभी वस्तुएं पृथ्वी उपलब्ध कराती है. बिना उसके जीवन संभव ही नहीं है. मगर हम यह माने रहते हैं कि सातवें-आठवें आसमान पर बैठा कोई देवता है, जो हमें जीवन और पृथ्वी को उर्वरा शक्ति प्रदान करता है. इस तरह से सोचने की आदत ज्यादा से ज्यादा ढाई-तीन हजार वर्ष पुरानी है. लेकिन यही वह कालखंड है जब आदमी द्वारा आदमी पर शासन करने, आदमी द्वारा आदमी को गुलाम बनाने की शुरुआत हुई. धर्म, जाति, संप्रदाय के नाम पर असहिष्णुता और असमानता को व्यक्ति की पहचान जोड़ा जाने लगा. ऐसी व्यवस्था में जो भी ऊंचाई पर होता है, वह अपनी ऊंचाई को वैध बनाने के लिए अपने से भी ऊंचे का हवाला देता है. जैसे कि ब्राह्मणों ने अपने शीर्षस्व को वैध बनाने के लिए देवताओं की पूरी फौज की परिकल्पना कर डाली. इसलिए समय को और दूसरी चीजों को सही ढंग से जाना न केवल विज्ञान की दृष्टि से आवश्यक है, बल्कि संस्कृति के परिष्करण तथा मनुष्य के नैतिक प्रबोधन हेतु भी अपरिहार्य है.

© ओमप्रकाश कश्यप

कसौटी पर समय

सामान्य

 समय : सच या आभास

समय न तो गति के समरूप है, न ही उससे पूर्णतः स्वतंत्र. उसका कार्य दोनों के अंत:संबंध को दर्शाना है…..यहां एक प्रश्न जोड़ सकते हैं. जैसे जहां समय न हो, क्या वहां ‘पहले’ या ‘बाद में’ जैसा कुछ हो सकता है? या फिर जहां संपूर्ण गतिहीनता हो, क्या वहां समय की उपस्थिति की संभावना है? चूकि समय किसी गति से संबंधित संख्यामात्र है, अतएव यदि समय सार्वकालिक है तो गति को अनंत होना ही चाहिए—अरस्तु, फिजिक्स.

इस लेख का उद्देश्य न तो बालक को समयप्रबंधन के गुर सिखाना है. न उसे समयसंबंधी दार्शनिक जटिलताओं में उलझाना. हम बालक तथा उसके समयबोध को लेकर सामान्य चर्चा करेंगे. यह जानने की कोशिश करेंगे कि बालक की जो समयसंबंधी प्रतीतियां हैं; समय के बारे में उसे जितना और जैसा समझाया जाता है, क्या उसके समयप्रबोधन का वही एकमात्र और सही तरीका है? बालक के व्यक्तित्व पर समय से संबंधित ऐसी प्रतीतियों और प्रज्ञप्तियों का जो तर्क एवं ज्ञान से परे, केवल सुनीसुनाई बातों अथवा पूर्वाग्रहों पर आधारित हैं—क्या कोई दुप्रभाव पड़ता है? क्या वे बालक के स्वतंत्र विवेक की राह में बाधक हैं? आदिकाल से ही मानवमन में एक किस्सागो बैठा हुआ है, जो मनुष्य को अपने आसपास के परिवेश के बारे में झूठीसच्ची कहानियां गढ़ने; तथा उनके साथ किसी न किसी रूप में अपना संबंध स्थापित करने को प्रेरित करता रहता है. आमतौर पर वे कहानियां संबंधित समाज की सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक मानी जाती हैं. धर्म, ईश्वर, किस्मकिस्म के देवीदेवता सब उसी मानस किस्सागो की कल्पना हैं. क्या समय भी मनुष्य की ऐसी ही रोचक परिकल्पना है?

स्पर्धा के इस युग में बालक को अन्य चुनौतियों के साथसाथ समय की चुनौती से भी जूझना पड़ता है. जो लोग समय को अनादि, अनंत तथा सतत प्रवाहमान मानते हैं, वही उसकी कमी का हवाला देकर बालक को डराते रहते हैं. खुद को ‘बड़ा’ समझने वाला प्रत्येक व्यक्ति बालक को सावधान करता है—‘समय बरबाद मत करो. वह किसी की प्रतीक्षा नहीं करता. जराभी चूके तो हाथ से फिसल जाएगा….समय के साथ चलो, चलते रहो, नहीं तो पिछड़ जाओगे.’ ऐसे निर्देश बालक को अभिभावकों तथा अध्यापकों की ओर से निरंतर, इतनी बार तथा इतनी तरह से सुनने को मिलते हैं कि उसका आत्मविश्वास डगमगाने लगता है. अपनी सीमाओं में वह समय की चुनौतियों से निपटने की कोशिश भी करता है. उसके लिए समयसारणी बनाता है. अपने अध्ययनकार्य को छोटेछोटे उपखंडों में बांटता है. घड़ी की टिकटिक के साथ सामंजस्य बैठाने की कोशिश करता है. इसके बावजूद चुनौती बनी ही रहती है. क्योंकि खंडोंउपखंडों में समाहित प्रत्येक घटना बालक के अधिकार में नहीं होती. किसी न किसी रूप में दूसरे भी उससे जुड़े होते हैं. नई शिक्षा व्यवस्था में सहयोग की अपेक्षा स्पर्धा पर ज्यादा जोर दिया जाता है. पर्याप्त सहयोगसमर्थन के अभाव में बालक अपनी ही बनाई समयसारणी के हिसाब से पिछड़ने लगता है. बड़े टोकते हैं. बालक कोशिश करता है. कभी सफल होता है, कभी परिस्थितियां भारी पड़ जाती हैं. ऐसे में समय हाथ से निकल जाने की चिंता बालक का पीछा नहीं छोड़ती. धीरेधीरे वह उसके आत्मविश्वास पर भारी पड़ने लगती है. ऐसा नहीं है कि केवल बालक ही समय के बारे में प्रचलित पूर्वाग्रहों से प्रभावित होता है. बड़े भी उससे मुक्त नहीं रह पाते. समयसंबंधी पूर्वाग्रह तो प्रायः बड़ों के माध्यम से ही बच्चों तक पहुंचाए जाते हैं. बालक उन्हें लंबे समय तक, कभीकभी जीवनभर विरासत के तौर पर संभाले रखता है.

सामान्य दिनचर्या में समय को ‘सर्वशक्तिमान’ के रूप में पेश किया जाता है. ऐसा महानायक जो देवीदेवताओं से भी ऊपर, सीधे ईश्वर के अधीन है. जो एकमात्र ईश्वर का आदेश मानता है. कभी बताया जाता है कि खुद ईश्वर भी समय के बंधन में बंधा है. भारतीय समाज की जो स्थिति है, उसमें किशोरावस्था तक पहुंचतेपहुंचते बालक अंधश्रद्धा का शिकार हो चुका होता है. उसके बाद वह तर्क छोड़ आस्था की राह पकड़ लेता है; तथा दैवीय अनुकंपा को समस्त समस्याओं का एकमात्र समाधान मानने लगता है. ईश्वर का जिक्र हो तो वह सर्वशक्तिमान के रूप में सर्वप्रथम उसी की कल्पना करता है. किंतु अगले ही क्षण जब समय की चुनौती सामने होती है, तब वही उसे सर्वशक्तिमान नजर आने लगता है. समय और ईश्वर को लेकर गढ़ी गई कहानियां भी एकदूसरे में गड्डमड्ड होती हैं. उनमें कहीं ईश्वर समय पर भारी पड़ता है तो कभी समय ईश्वर के सामने चुनौती बन जाता है. इससे बालक की उलझन सुलझने के बजाय और भी उलझ जाती है. भ्रांत बालमन समझ ही नहीं पाता कि ईश्वर हो अथवा समय, दोनों में कोई एक ही सर्वशक्तिमान हो सकता है. ऊहापोह में वह किसी कार्य को तत्संबंधी घटनाओं के संबंध में देखनेसमझने के बजाय, आस्था और पूर्वाग्रहों द्वारा नियंत्रित होने लगता है.

रोजमर्रा के कार्य के सिलसिले में बालक द्वारा घड़ी देखने का सिलसिला सुबह के साथ आरंभ हो जाता है. उसके बाद नहाने, नाश्ता करने, स्कूल जाने, स्कूल में टाइमटेबिल के अनुसार विभिन्न विषयों का पाठ करने, लंच करने, खेलने, घर लौटने, आराम करने, होमवर्क निपटाने, टेलीविजन देखने, भोजन करने से लेकर रात को बिस्तर तक जाने के बीच अपने मातापिता की भांति बालक भी समय के हिसाबकिताब में उलझा रहता है. उसके समस्त कार्यकलाप छोटेछोटे टाइमपॉकेट में बंधे होते हैं. हर पीरियड के साथ स्कूल की घड़ी बदले समय और चुनौती का एहसास कराती है. बीचबीच में जब भी घटनाक्रम बदलता है, बालक की निगाहें घड़ी की सुइयों में उलझकर रह जाती हैं. उसके सामने चुनौती होती है कि वह न केवल समय के साथ अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित रखे साथ ही सहपाठी अथवा समवयस्क बच्चों, जिनके साथ उसकी प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष स्पर्धा है, से जरूरी बढ़त भी बनाए रखे. दूसरों के बराबर रहने वाले को यहां औसत तथा पीछे रहने वाले को फिसड्डी मान लिया जाता है. समय और समवयस्क बच्चों के साथ स्पर्धा बालक को अनावश्यक रूप से तनावग्रस्त रखती है. इसके अलावा एक जैविक घड़ी भी होती है. उसके बारे में आवश्यक नहीं कि बड़े ही बालक को समझाएं. उसका एहसास प्रकृति स्वयं कराने लगती है. जैसी भूख भोजन तथा थकान आराम की जरूरत की ओर संकेत करने लगती है.

सुबह से शाम तक अनगिनत बार घड़ी देखने से जो प्रथम प्रभाव बालक के मनोमस्तिष्क पर पड़ता है, वह यह कि घड़ी की सुइयां ही समय हैं. कि अपनी महीन टिकटिक के साथ घड़ी विराट समय को अपने भीतर समेटे है. घड़ी की सुइयां आगे बढ़ेंगी, तभी समय आगे खिसकेगा. बालक ही क्यों? घर में मातापिता, स्कूल में अध्यापकगण, मित्रहितैषी, सगेसंबंधी सभी सीधे घटनाओं पर नजर रखने, उन्हें नियंत्रित करने के बजाए—घड़ी की सुइयों से नियंत्रित होने लगते हैं. स्पर्धा में समय से पिछड़ जाने की आशंका बालक को अनावश्यक चिंता में डाल देती है. उसका आत्मविश्वास आहत होने लगता है. उस समय बालक को यह बताना आवश्यक है कि घड़ी की टिकटिक समय नहीं है. वह स्वयं एक घटना है, सिर्फ घटना. उसका कार्य किन्हीं दो घटनाओं के बीच का अंतराल बताना है. उन अनेक घटनाओं में से एक, जो अनंत ब्रह्मांड के भीतर और बाहर, लगातार घटती रहती हैं. जो समय को घटनाओं के प्रवाह के रूप में देखते हैं, वे उनमें रमे रहकर भी अपना नियंत्रण बनाए रखते हैं. ऐसे लोगों के लिए समय चुनौती नहीं बनता. बालक को बताया जाना चाहिए कि समय घटनाओं की अन्विति से परे कुछ नहीं है. कि घटनाओं पर विजय पाना, उनके साथ सामंजस्य बनाकर चलना—कठिन भले हो, असंभव नहीं है. कि इस धरती पर ऐसे नरपुंगव भी हुए हैं जिन्होंने समय को न तो देवता माना, न उसकी कभी परवाह ही की. बिना परिस्थितियों से घबराए, चुनौतियों को स्वीकार करके ही वे इस दुनिया को अपनी इच्छानुसार चलाने में कामयाब होते आए हैं. ऐसा बोध बालक के आत्मविश्वास को बढ़ा सकता है. प्रायः ऐसा नहीं होता. क्योंकि समय को ‘नियति’ और ‘भाग्य’ के समकक्ष रखने वाले, दोनों को परस्पर पर्याय मानने वाले, बालक के मातापिता समय को परमनियंता और महाशक्तिशाली मान स्वयं उससे भयभीत रहते हैं.

भारतीय दर्शनों में समय पर विचार किया गया है, किंतु उनमें तत्वपरक सामग्री का अभाव है. उसे या तो ईश्वरीय शक्ति के समकक्ष रखकर मनुष्य का भाग्यनियंता बताया गया है; अथवा घटनाओं तथा उनके वेग के प्रतिफल के रूप में दर्शाया जाता है. भारतीय प्रज्ञा की कमजोरी है कि वह तर्क और विवेक से अधिक, आस्था और पूर्वाग्रहों से प्रेरणा ग्रहण करती है; और उससे बहुत कम बाहर निकल पाती है. समय को लेकर वस्तुनिष्ट चिंतन के अभाव का भी यही कारण है. पूर्वाग्रहों के दबाव में हम समयसंबंधी प्रज्ञप्तियों जिन्हें समयाभास भी कहा जा सकता है, को अपने आसपास घट रही घटनाओं के सापेक्षिक वेग, परिवर्तनशीलता, पदार्थ की विशेष अवस्था आदि के संदर्भ में देखने के बजाए स्वतंत्र सत्ता माने रहते हैं. यह ‘कार्य’ को ‘कारण’ मान लेने जैसी गंभीर चूक है, जिसके साधारण और विशेष सभी लोग शिकार होते आए हैं.

आगे बढ़ने से पहले समय और समयबोध की ओर संकेत करना आवश्यक है. जैसा ऊपर संकेत किया गया है, समय को लेकर दो प्रकार की प्रज्ञप्तियां आमतौर पर प्रत्येक मनस् में होती हैं. ये एक साथ भी हो सकती हैं तथा एकदूसरे से स्वतंत्र भी. पहली मान्यता के अनुसार समय कोई भागती हुई चीज है. नदी की मानिंद सतत प्रवाहमान. भूतवर्तमान और भविष्य में निरूपित. एक के बाद एक गुजरते रातदिन इसका उदाहरण हैं. जॉन मेकटेग्गार्ट ने इसे ‘ए’ श्रेणी माना है. यानी वह समय जिसे हम श्रेणीबद्ध रूप में अपने सामने से गुजरते हुए देखते हैं. उसका एक उदाहरण इतिहास लेखन भी है. हमारे सामान्यबोध की शुरुआत ही सौर दिवस से होती है. आदमी रोजमर्रा के कार्यों को अपनी जरूरत, सुविधा अथवा दायित्वभावना के आधार पर, छोटीछोटी घटनाओं में बांट लेता है. उन घटनाओं की सापेक्षिक गति ही समयाभास का कारण बनती है. इस मान्यता के अनुसार समय दो संबद्ध घटनाओं के बीच का अंतराल है, जो उनके घटने की दर को दर्शाता है. उससे घटना की अनुभूति तथा उसकी सापेक्षिक गति का आकलन किया जा सकता है. समय पर विचार करते हुए इस तथ्य को प्रायः नजरंदाज कर दिया जाता है कि ब्रह्मांड में घट रही अनंत घटनाओं की भांति सौर दिवस भी प्राकृतिक घटना है. पृथ्वी का अपनी धुरी पर घूमना इस घटना को अंजाम देता है. दिनरात को जन्म देने वाली यह घटना भी अपने आप में पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है. पृथ्वी अपने केंद्र पर घूमने के अलावा सूर्य की कक्षा में भी चक्कर काटती रहती है. इससे दिनरात के कुल समय में भले ही ज्यादा अंतर न पड़ता हो, मगर उनकी अवधि घटतीबढ़ती रहती है. यह समय अथवा समयाभास की सापेक्षिकता का द्योतक है.

उपर्युक्त से निष्कर्ष निकलता है कि घटनाएं तथा उनका आधार यह सततपरिवर्तनशील ब्रह्मांड—शाश्वत हैं. समय वह अंतराल है, जिसमें हम ब्रह्मांड की विभिन्न गतिविधियों के अंतराल का अनुभव करते हैं; तथा जिसके माध्यम से उनकी गति का आकलन किया जा सकता है. परिवर्तन को सृष्टि का मूल लक्षण बताने वाला यूनानी विचारक हेराक्लीट्स कहता है—‘प्रत्येक वस्तु गतिमान है. तुम किसी नदी में दुबारा हाथ नहीं डाल सकते.’ समय को सतत प्रवाह मानने वाली विचारधारा भी कहती है—‘बीता हुआ समय लौटकर नहीं आता. हम किसी क्षण को दुबारा नहीं जी सकते.’ समय की इस परमभौतिकता को वैरागी भृर्तहरि अपनी तरह से अभिव्यक्त करता है—‘कालो न यातं वयमेव याताः’—‘समय नहीं गुजरता, हम गुजरते हैं.’1 अरस्तु समय को अवधि(अंतराल) के रूप में देखता था. उसके लिए समय किसी क्रिया की पूर्वकालिक एवं उत्तरकालिक अवस्था की आवधिक गणना है. वह लिखता है—

यदि आत्मा की सत्ता नहीं थी, उस अवस्था में समय की सत्ता रही होगी या नहीं—यह जिज्ञासा सीधेसीधे एक प्रश्न पर ले आती है. जहां कोई गिनने वाला ही नहीं है, वहां ऐसी चीज भी नहीं हो सकती, जिसे गिना जा सके.’2

समय का तारतम्यता वाला लक्षण बालक के लिए सदैव तनाव या चुनौतियां पेश करे, ऐसा नहीं होता. यह बालक को निश्चिंत भी करता है. बालक अथवा किशोर जब अपने मातापिता या दादादादी, नानानानी को क्रमशः वृद्धावस्था और मृत्यु की ओर अग्रसर देखता है, तब उसके अवचेतन में सहज रूप से यह भाव उत्पन्न होता है कि उसके जीवन की तो अभी बस शुरुआत है. जीने के लिए बड़ा हिस्सा अभी शेष है; तथा सामाजिक जिम्मेदारियों का दौर लंबे अंतराल के पश्चात आरंभ होने वाला है. यह विश्वास बालक को अवसाद से बाहर रखने में मदद करता है. इससे बालक और समय अथवा समयाभास के बीच अनूठा संबंध बनता है, जो उम्मीदों से लबालब और सकारात्मक होता है. यह निश्चिंतता उसे नितनवीन सपने देखने को प्रेरित करती है. छोटा बालक उमंगों से सराबोर रहता है. मनमानी शरारतें करता है. भविष्य के प्रति आशावान रहता है. उसकी कल्पना बड़ों की अपेक्षा ज्यादा रंगीन होती है. ये सब उसे अधपकी उम्र में जिम्मेदारियों से सीधे टकराने, टूटकर बिखर जाने से बचाते हैं.

सामान्य भौतिकी के लिए समय का प्रवाहशीलता वाला गुण विशेष काम का है. उसके माध्यम से पदार्थ की आंतरिक एवं बाहरी गतियों का अध्ययन किया जाता है. गति पदार्थ की विशेष अवस्था है. क्या पदार्थ की गतिहीन अवस्था में भी समय या समयाभास की कल्पना की जा सकती है? यदि हम वस्तुविशेष के संदर्भ में देखें तो इस प्रश्न का उत्तर ‘हां’ में होगा. गति के लिए किसी पिंड अथवा कण का होना आवश्यक है. पिंड स्थिर हो और परिवेश परिवर्तनशील, तब भी पिंड तथा उसके परिवेश के बीच सापेक्षिक गति बनी रहेगी; और घटनाओं की एक के बाद एक आवृति हमारे समयाभास का कारण होगी. इसे समझने के लिए एक असंभव स्थिति की कल्पना करते हैं. मान लेते हैं कि एक व्यक्ति अंतरिक्ष में किसी अकेले पिंड पर खड़ा है. चारों और केवल शून्य पसरा है. उस अवस्था में यदि प्रेक्षक की आंखों पर ऐसा चश्मा चढ़ा दिया जाए, जिससे वह अपने पिंड की गतिविधियों के साथसाथ अपनी शारीरिक गतिविधियों की ओर से भी निःसंवेद हो जाए, उस अवस्था में वह खुद को परिवर्तनशून्य विश्व में पाएगा. ऐसी स्थिति में वह समय की अनुभूति नहीं कर पाएगा. जाहिर है, तब उसका समयबोध भी शून्य होगा.

उपर्युक्त उदाहरण में यदि मान लिया जाए कि प्रेक्षक अपने आंतरिक और बाह्य कार्यकलापों के प्रभाव से भी मुक्त है तो उस अवस्था में, उसका ध्यान केवल उस अकेली घटना पर केंद्रित रहेगा. चूंकि वह घटना नितांत शून्य में घट रही होंगी, इसलिए इस बात की पर्याप्त संभावना है कि वह केवल घटना के सातत्य को परखे और वह घटना ही उसे प्रकृति की सार्वभौम हलचल के रूप में नजर आए. स्थायित्व के अनुभव; तथा समानांतर घटनाओं के अभाव में वह एकल घटना की गति के साथ समय का संबंध जोड़ ही नहीं पाएगा. समयाभास की दृष्टि से वह लगभग गतिहीनता जैसा अनुभव होगा. उसका समयबोध करीबकरीब शून्य होगा. इससे एक सामान्य निष्कर्ष यह भी निकलता है कि समयबोध के समुचित विकास हेतु घटना बहुलता आवश्यक है. वैज्ञानिक दृष्टि से न केवल ब्रह्मांडहीनता असंभव कल्पना है, बल्कि ब्रह्मांड का पूरी तरह गतिविहीन हो जाना भी असंभव परिकल्पना है. समय वस्तु नहीं है. न ही ब्रह्मांडहीनता ही अवस्था में उसकी कल्पना की जा सकती है. कदाचित इसीलिए प्लेटो से लेकर स्टीफन हाकिंग तक समय और ब्रह्मांड की उत्पत्ति साथसाथ मानते हैं. प्लेटो का मानना था कि ब्रह्मांड की भांति समय की भी रचना हुई है. वह समय को स्वर्ग के समवयस्क मानता था. यह विश्लेषण दर्शाता है कि वस्तु समयाभास का केवल आधार है, उसका कारण नहीं है. किसी वस्तु, व्यक्ति अथवा घटना से जुड़ी सापेक्षिक परिवर्तनशीलता ही समयाभास का कारण है.

दूसरे शब्दों में समय अथवा समयाभास घटना अथवा घटनाचक्र तथा उसकी अनुभूति से परे, कुछ भी नहीं है. समयाभास का लोप केवल परम स्थिरता अथवा परम वेग(प्रकाशवेग अथवा उससे अधिक कोई भी संभव वेग) की अवस्था में ही है. परम वेग की अवस्था में परिवर्तन इतनी तीव्र गति से होगा कि हम उसे परख ही नहीं पाएंगे. दूसरी अवस्था में वस्तुविशेष यदि पूर्णतः जड़ अवस्था में है तथा शेष ब्रह्मांड बदलाव की ओर अग्रसर हैं तो सापेक्षिक परिवर्तन बना रहेगा. उससे समयाभास की स्थिति भी कायम रहेगी. उदाहरण के लिए कृष्णविवर में अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण के कारण सभी पदार्थ परमसंपीडित हो परमशून्य में ढल जाते हैं. परमसंपीडन की अवस्था में वहां समस्त गतियों का लोप हो जाता है, उस अवस्था में समय अथवा समयाभास की आवश्यकता भी समाप्त हो जाती है. वैज्ञानिक उस अवस्था को समयहीनता की अवस्था मानते हैं.

समय संबंधी पहली प्रज्ञप्ति जिसके अनुसार समय को दो घटनाओं के अंतराल से मापा जाता है, का वर्णन हम ऊपर कर चुके है. दूसरी प्रज्ञप्ति जिसे जॉन मेकटेग्गार्ट ने ‘बी’ श्रेणी की संज्ञा दी है, के अनुसार समय अंतरिक्ष जैसी अंतहीन संरचना हैं, जिसमें सब कुछ निरंतर घटता रहता है. ब्रह्मांड की समस्त घटनाएं, ग्रहपिंड सभी उसमें समाहित हैं. वह भूतवर्तमानभविष्य सभी का आधार तथा ब्रह्मांड की प्रत्येक घटना का साक्षी है. इस मान्यता के अनुसार सृष्टि की प्रत्येक घटना, अंतरिक्ष के साथसाथ समय में भी घटित होती है. पहली मान्यता जहां समय को गतिशील मानती है, वहीं इस समानांतर मान्यता के अनुसार समय स्थिर होता है. स्थिर भाव से ही वह प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष घटनाओं का लेखा रखता है. जिस प्रकर अंतरिक्ष में घटनाएं घटती रहती हें. वैसे ही अनंत समय के बीच भी घटनाओं का सिलसिला बना रहता है. अंतरिक्ष वस्तुजगत के भौतिक स्वरूप को वितान देता है. वस्तुहीनता की अवस्था में विराट आभासीय शून्य होगा; जिसमें समस्त गतियों, परिवर्तनशीलता का लोप हो चुका होगा, ऐसी स्थिति में भी समय की परिकल्पना असंभव होगी. आशय है कि परिवर्तनशून्यता अथवा परमस्थिर विश्व में समय की परिकल्पना अप्रासंगिक हो जाती है.

उपर्युक्त धारणा के अनुसार समय सृष्टि के प्रत्येक परिवर्तन का साक्षी है, मगर खुद परिवर्तनकारी शक्ति नहीं है. न उसका कोई साक्षी होता है. स्टीफन हाकिंग अपनी पुस्तक ‘समय का संक्षिप्त इतिहास’ में ब्रह्मांड की उत्पत्ति परमविस्फोट से मानते हैं. हॉकिंग के अनुसार समय की उत्पत्ति का क्षण भी वही है. अपनी बहुचर्चित पुस्तक में ‘समय का इतिहास’ के बहाने वे ब्रह्मांड के इतिहास की ही चर्चा कर रहे होते हैं. उस अवस्था की चर्चा कर रहे होते हैं, जब अपनी पहली हलचल के साथ ब्रह्मांड परमशून्य से परिवर्तन ओर अग्रसर होता है. हॉकिंग के अनुसार परमविस्फोट से पहले ब्रह्मांड परमसंपीडन की अवस्था में था. वह परमस्थिरता की अवस्था थी, जिसका उल्लेख हमने ऊपर किया है. चूंकि उस समय सर्वत्र गतिशून्यता थी, इसलिए उसमें समय अथवा समयाभास की कल्पना भी असंभव है. महाविस्फोट के पश्चात ग्रहनक्षत्रों का आदि का जन्म हुआ, जिनमें हमारी पृथ्वी भी सम्मिलित हैं.

महाविस्फोट से लेकर आज तक, किसी न किसी रूप में सभी ग्रहनक्षत्र सतत परिवर्तनशीलता से गुजर रहे हैं. अपने स्वरूप और सापेक्षिक परिवर्तनशीलता के माध्यम से वे हमें अपने होने की प्रतीति कराते हैं. उनकी समस्त गतिविधियां अंतहीन समय का हिस्सा हैं, जो सृष्टि के प्रत्येक परिवर्तन का दृष्टा है, मगर खुद अपरिवर्तनशील है. यहां सामान्यसा प्रश्न उठ खड़ा होता है. यदि समय निष्क्रिय दृष्टा है, अपने आसपास घट रही घटनाओं को प्रभावित करने या प्रभावित होने का गुण यदि उसमें नहीं है, तो उसे चैतन्य अथवा कार्यकारी शक्ति कैसे माना जा सकता है? यहां से समय की समस्या विज्ञान के दायरे से बाहर निकलकर दार्शनिक हो जाती है.

समय को लेकर कुछ मिलीजुली जिज्ञासाएं और भी हैं. जैसे कि जो घटनाएं हमारे अनुभव या दृष्टि सीमा से बाहर रह जाती हैं, उनका क्या होता है? क्या उनका समय हमारे समय से अलग होता है? क्या समय सचमुच सार्वभौम सत्ता है? क्या समय को लेकर गढ़े गए मानक किसी दूसरे ग्रह पर भी खरे उतरेंगे? ऐसे प्रश्न किसी भी विचारशील मनुष्य को परेशान कर सकते हैं. इस पर बातचीत करने से पहले हमें जान लेना चाहिए कि किसी चीज के बारे में न जानना उतना बुरा नहीं होता, जितना उसे गलत ढंग से जानना. न जानने वाले के भीतर सीखने की ललक होती है. जबकि गलत जानकारी रखने वाला हमेशा गलतफहमी का शिकार बना रहता है. अज्ञानता के कारण यदि कभी चुनौती पेश हो तो ऐसा व्यक्ति पूर्वाग्रहों से काम चलाता है. मिथों की मदद लेता है. धर्म सहित अन्यान्य पूर्वाग्रहों में फंसी भारतीय मेधा इसी कमजोरी का शिकार होती आई है. हालांकि बौद्ध, सांख्य, वैशेषिक आदि दर्शनों में समय को लेकर कहींकहीं वस्तुनिष्ट चिंतन की झलक देखने को मिलती है. लेकिन अधिकांश जगह उसे नियति अथवा ईश्वरीय शक्ति के पर्याय के रूप में प्रयुक्त किया जाता है. विज्ञान की बात की जाए तो समय को लेकर गढ़े गए मानक सामान्य परिस्थितियों तक ही प्रामाणिक हैं. यदि परिस्थितियां अत्यधिक असामान्य हों तो उसके मानक गड़बड़ाने लगते हैं.

उदाहरण के लिए आइंस्टाइन ने बताया है कि अत्यंत उच्च वेगों पर समय का वेग मद्धिम पड़ने लगता है. उसने इसे समय की सिकुड़न माना है. आइंस्टाइन के निष्कर्षों आज के अधिकांश वैज्ञानिक सहमत हैं. हालांकि उनसे असहमत विद्वानों की संख्या भी कम नहीं है. प्रसिद्ध दार्शनिक हेनरी बर्गसां समय को ‘अवधि’ के माध्यम से व्याख्यायित करते थे. इस संबंध में उनकी आइंस्टाइन के साथ हुई रोचक बहस का उल्लेख यहां अप्रासंगिक न होगा. 1922 में आइंस्टाइन के ‘सापेक्षिकता के सिद्धांत’ की आलोचना करते हुए बर्गसां ने कहा था कि सापेक्षिकता के सिद्धांत का, ‘संबंध केवल ज्ञानमीमांसा से है, न कि भौतिक विज्ञान से.’ बर्गसां की आलोचना से बौद्धिक जगत में एक बहस छिड़ गई. मगर आइंस्टाइन अपने विचार पर दृढ़ थे. अपने अपने सिद्धांत का बचाव करते हुए उन्होंने कहा था—‘दार्शनिकों की दृष्टि में समय केवल भ्रांति है.’

घटनाओं की सापेक्ष गति, यानी दो स्वतंत्र अंतरालों से हमारा समयबोध विकसित होता है. लेकिन ब्रह्मांड की भांति हमारा बोध सर्वव्यापी नहीं है. उसकी सीमा है. मनुष्य विराट ब्रह्मांड में पलप्रतिपल हो रही अनंत हलचलों में से क्षणविशेष में मात्र कुछ घटनाओं का ही अवलोकन कर पाता है. विराट ब्रह्मांड के जो ग्रहनक्षत्र हमारे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष अवलोकन से परे हैं, अरबोंखरबों प्रकाशवर्ष की दूरी पर हैं, उनसे संबंधित समय की, अपने अनुभव के आधार पर, हम केवल कल्पना ही कर सकते हैं. ठीकठीक कुछ नहीं बता सकते. चूंकि घटनाओं की गति पिंडों के गुरुत्वाकर्षण बल से भी प्रभावित होती है, इसलिए समान घटना के लिए पृथ्वी तथा दूसरे ग्रहों पर होने वाले हमारे अनुभवों में अंतर हो सकता है. पिंड का आकार, घटनाओं का वेग तथा उनकी दिशा हमारे समयाभास को प्रभावित करती है. समय संबंधी हमारा बोध हमारे अनुभवों तथा तर्कों पर आधारित होता है. उन्हीं के आधार पर हम यह निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि घटना और अंतराल का संबंध शाश्वत है. दोनों परस्पर अन्योन्याश्रित हैं. हमारा साक्षात घटनाविशेष तथा उसकी गत्यात्मकता से होता है. उनका होना ही हमारे समयाभास का कारण बनती है.

इसके बावजूद समय के भौतिक अस्तित्व को नकारने, उसे केवल मानसिक प्रबोधन का हिस्सा मानने वाले विचारकों की संख्या भी कम नहीं है. विगत दो शताब्दियों में समय संबंधी मौलिक चिंतन में तेजी आई है. अधिकांश विद्वान उसके भौतिक स्वरूप को स्वीकारते हैं, लेकिन घटनाओं से परे, उसकी स्वतंत्र सत्ता से इंकार करते हैं. लाइबिनिज ने समय के भौतिक स्वरूप को नकारा है. उसके अनुसार समय और अंतरिक्ष दोनों का कोई अस्तित्व नहीं है. उसके अनुसार समय और अंतरिक्ष की अवधारणा वस्तुजगत के बारे में हमारे दृष्टिकोण को दर्शाती है. इमानुएल कांट लाइबिनिज के विचारों का समर्थन करता है. हालांकि वह उससे पूरी तरह सहमत नहीं है. वह लाइबिनिज की इस बात से तो सहमत है कि समय और अंतरिक्ष दोनों ही कल्पनाजन्य हैं. लेकिन उस तरह नहीं जिस तरह लाइबिनिज का विचार है. कांट के अनुसार दोनों मानसिक अवधारणा हैं, इस तरह कि वे हमारे मस्तिष्क पर निर्भर हैं. उनमें से पहला वस्तुओं और स्थितियों को सहेजता है, दूसरा उनकी सापेक्षिक हलचलों को दर्शाने एवं दर्ज करने के काम आता है.

समय की अधिसत्ता को लेकर कुछ दिलचस्प बहसें विद्वानों के रही हैं. थाॅमस एक्वीनस ने समय को दो भागों में बांटा था, वास्तविक समय तथा काल्पनिक समय. मगर पेशे से गणितज्ञ इसाक बैरो को यह विभाजन स्वीकार न था. ज्यामितीय पर दिए गए अपने वक्तव्य में बैरो ने एक्वीनस की मान्यता, जो अरस्तु की समयसंबंधी विचारों पर केंद्रित थी, को सिरे से खारिज कर दिया था. एक सभा में अपने ही प्रश्न कि क्या समय सृष्टि रचना से पहले भी मौजूद था, का स्वयं उत्तर देते हुए उसने कहा था—‘विश्वोत्पत्ति से पहले और उसके बाद में, यहां तक कि ब्रह्मांड से परे भी समय था, समय है.’ अरस्तु की मान्यता है कि समय घटनाओं पर निर्भर है; तथा घटनाओं की आवृत्ति के अनुसार वह आगे बढ़ता रहता है. उसका आशय था कि समय घटनासापेक्ष है. बैरो ने उसका खंडन करते हुए कहा था—

‘‘बाकी चीजों की भांति समय की भी कुछ विशेषताएं हैं, उसका मौलिक और सार्वत्रिक गुण है कि वह अपने व्यवहार पर सदैव दृढ़ रहता है. चाहे वस्तुएं गतिमान रहें या ठहर जाएं, हम चाहे जागें या सोएं, वह अपनी निर्धारित गति से बहता रहता है. कल्पना कीजिए समस्त तारागण अपने जन्म के समय से ही स्थिर रहें, उनकी स्थिरता चाहे जितने समय तक कायम रहे, समय का उससे कुछ नहीं बिगड़ने वाला, वह अपनी गति से आगे बढ़ता जाएगा.’’

बैरो न्यूटन का गुरु रह चुका था. आकादमिक जगत में उसका सम्मान था. जबकि उससे तीन शताब्दी पहले जन्मे थाॅमस एक्वीनस की भी विद्वत जगत में नवअरस्तुवादी दार्शनिक के रूप में प्रतिष्ठित था. प्रकृति से आध्यात्मिक बैरो न्यूटन से प्रभावित था. हालांकि समय को लेकर न्यूटन से उसके मतभेद थे. उसका विचार था कि समय अपने आप में स्वतंत्र है. वह सृष्टि की रचना से पहले भी मौजूद था. न्यूटन का विचार था कि वस्तुएं समय और अंतरिक्ष में दोनों में विस्तार पाती हैं. समय में उनकी व्याप्ति क्रमवार तथा अंतरिक्ष में स्थितिअनुसार रहती है. दूसरे शब्दों में न्यूटन समय को घटनाओं का प्रभाव मानता था. प्रकारांतर में समय को लेकर उसका दृष्टिकोण भौतिकवादी था. तदनुसार उसकी उत्पत्ति भी भौतिक जगत की उत्पत्ति से जुड़ी थी. उन दिनों धर्मसंस्थाएं बहुत शक्तिशाली थीं. राज्य पर चर्च की मजबूत पकड़ थी, जिसकी एकाएक उपेक्षा संभव न थी. उनके दबाव में अपने समय के महानतम वैज्ञानिक न्यूटन को संशोधित वक्तव्य के लिए मजबूर होना पड़ा. अंततः अपनी ही पुस्तक ‘प्रंसीपिया मैथेमेटिका’ में उसे जोड़ना पड़ा—‘ईश्वर अजरअमरअनंत है, उसने समय और अंतरिक्ष को इसलिए बनाया, ताकि वह हर जगह मौजूद रह सके.’

इनका विरोध किया था—फ्रांसिसी वैज्ञानिकचिंतक लाइबिनिज ने. लाइबिनिज ने अध्यात्म और विज्ञान को एकमेव करने का काम किया था. उसका मानना था कि ईश्वर सर्वथा, संपूर्ण और किसी भी प्रकार के विक्षोभ से परे है. परंतु यह अकेले ईश्वर का गुण नहीं है. सृष्ठि छोटेछोटे परमबिंदुओं से बनी है, जो अपने गुण में ईश्वर की तरह ही है. अंतर बस इतना है कि वे बिखरे हुए हैं. जबकि ईश्वर संपूर्ण एकजुट सत्ता है. इन परमबिंदुओं को उसने ‘मोनाड’ का नाम दिया था. लाइबिनिज के अनुसार मोनाड ईश्वर की रचना है, लेकिन समय और अंतरिक्ष दोनों से स्वतंत्र हैं. आगे चलकर न्यूटन और बैरो के साथ तीसरा व्यक्ति भी उस बहस में शमिल हो गया. वह व्यक्ति था, सेमुअल क्लार्क. क्लार्क न्यूटन का शिष्य था.

लाइबिनिज द्वारा समय को स्वतंत्र सत्ता न मानने पर क्लार्क की प्रतिक्रिया थी—‘यदि तुम समय को स्वतंत्र स्वयंभू सत्ता मानने को तैयार नहीं हो, तब तुम्हें यह दावा नहीं कर सकते कि विश्व का निर्माण हुआ था. क्योंकि यदि तुम यह कहना चाहो कि ईश्वर ने इस सृष्टि की रचना की है तो तुम यह भी कह सकते हो कि ईश्वर ने दुनिया को उस क्षण से कुछ पहले रचा था, जिस क्षण उसने वास्तव में रचा था. इसका सीधा मतलब तो यही हुआ कि ईश्वर ने सृष्टि को उस क्षण से कुछ न कुछ पहले रचा था, जिस क्षण उसने वास्तव में उसे रचा था. यदि समय सृष्टि से स्वतंत्र नहीं है तो सृष्टि रचना की घटना ही पहली घटना हुई.’

सेमुअल क्लार्क और लाइबिनिज के बीच इसी प्रकार से तर्कों का आदानप्रदान होता रहा. अपने अगले पत्र में लाइबिनिज ने क्लार्क और एक्वीनस के विचारों पर टिप्पणी करते हुए लिखा—‘एक्वीनस और क्लार्क बड़ी दुविधा में हैं. ऐसी दुविधा जो किसी भी छोर पर स्पष्ट नहीं है.’ लाइबिनिज का उत्तर बहुत हल्काफुल्का था. इसपर क्लार्क ने लाइबिनिज विरोधाभासी होने का आक्षेप लगाते हुए लिखा कि लाइबिनिज के अनुसार समय की उत्पत्ति उससे तत्संबंधी घटनाएं अस्थायी तौर पर किसी तीसरे द्वारा प्रेरित हैं. इसका अभिप्राय है कि समय की उत्पत्ति से भी पहले कुछ घटा था, जो पूरी तरह असंगत और अविश्वसनीय है. समय को लेकर इस प्रकार की दुबिधा और तर्कविर्तक आगे भी चलते रहे. और आज लगभग चार सौ वर्ष बाद भी समय की उपस्थिति को लेकर विद्वानों के बीच उतने ही मतभेद हैं, जितने उस समय के दार्शनिकों के बीच विद्यमान थे.

कांट के अनुसार अंतरिक्ष के संबंध में दिए जाने वाले तर्क समय पर भी यथावत लागू होते हैं. लाइबिनिज पर टिप्पणी करते हुए वह लिखता है—‘काल और दिक् का अपनाअपना अथवा संयुक्त रूप से कोई अस्तित्व नहीं है. कुछ अर्थों में वे हमारी अभिव्यक्ति तक सीमित, उसके समुत्पाद की तरह हैं. वे अपरिवर्तनीय हैं, उन अर्थों में नहीं जिनमें लाइबिनिज उन्हें बताता है. अंतरिक्ष का अस्तित्व मानवमस्तिष्क पर निर्भर है.’ अंतरिक्ष कि काल्पनिकता को स्वीकारते हुए वह लिखता है कि कल्पना वही श्रेष्ठतम है, जिसे कोई कल्पना मानने को तैयार न हो. जो वास्तविकता का आभास कराती हो. मानवीय कल्पना का जैसा परिपूर्ण उदाहरण अंतरिक्ष है, वैसा अन्य कोई नहीं. वह हमारी संवेदनपरकता की कसौटी है. कांट इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि अंतरिक्ष बाहरी संवेदन का विषय नहीं है. बल्कि ऐसी अवधारणा है, जो बाकी वस्तुओं के रूपाकार एवं तत्संबंधी संवेदनपरकता पर निर्भर है. उसके अनुसार अनेक ऐसे तर्क जो अंतरिक्ष पर लागू होते हैं, वे समय पर भी लागू होते हैं.

कांट के अनुसार समय की सत्ता है, पर केवल इसलिए कि वह हमारी वास्तविक अंतश्चेतना का हिस्सा है. इसके बावजूद समयहीनता की कल्पना हमारे लिए उतनी ही दुष्कर है, जितनी कि ब्रह्मांड के लोप हो जाने की परिकल्पना. ब्रह्मांडहीनता की अवस्था में समयबोध का क्या होगा? उसकी पहचान किस तरह से की जाएगी? ऐसे प्रश्न हमारी कल्पना से बाहर है. सवाल है कि समय यदि ‘कुछ भी नहीं’ है, केवल आभास मात्र है, तो उसे व्यावहारिक जीवन में उसे सबकुछ क्यों दिखाया जाता है. कारण है कि ऐसे अवसरों पर हम सत्य की उपेक्षा कर, भ्रांत धारणाओं को ही सबकुछ माने रहते हैं. इसके बीजतत्व भी हमारी शिक्षासंस्कृति में अंतनिर्हित हैं. हमारी जरूरत की सभी वस्तुएं पृथ्वी उपलब्ध कराती है. बिना उसके जीवन संभव ही नहीं है. मगर हम यह माने रहते हैं कि सातवेंआठवें आसमान पर बैठा कोई देवता है, जो हमें जीवन और पृथ्वी को उर्वरा शक्ति प्रदान करता है. इस तरह से सोचने की आदत ज्यादा से ज्यादा ढाईतीन हजार वर्ष पुरानी है. लेकिन यही वह कालखंड है जब आदमी द्वारा आदमी पर शासन करने, आदमी द्वारा आदमी को गुलाम बनाने की शुरुआत हुई. धर्म, जाति, संप्रदाय के नाम पर असहिष्णुता और असमानता को व्यक्ति की पहचान जोड़ा जाने लगा. ऐसी व्यवस्था में जो भी ऊंचाई पर होता है, वह अपनी ऊंचाई को वैध बनाने के लिए अपने से भी ऊंचे का हवाला देता है. जैसे कि ब्राह्मणों ने अपने शीर्षस्व को वैध बनाने के लिए देवताओं की पूरी फौज की परिकल्पना कर डाली. इसलिए समय को और दूसरी चीजों को सही ढंग से जाना केवल विज्ञान की दृष्टि से आवश्यक है, बल्कि संस्कृति के परिष्करण तथा मनुष्य के नैतिक प्रबोधन हेतु भी अपरिहार्य है.

© ओमप्रकाश कश्यप

1. भृर्तहरि, वैराग्य शतक, 12/1045.

2. “Whether, if soul (mind) did not exist, time would exist or not, is a question that may fairly be asked; for if there cannot be someone to count there cannot be anything that can be counted…” (Physics, chapter 14).

3. time is neither identical with nor entirely independent of movement, and it remains for us to determine the relation between them….We may here interject the question: how, when there is no time, can there be any “before” and “after”; or how, when there is nothing going on, can there be time? Since time is a number belonging to a process … then,if there always is time, movement must be eternal also.—St. Thomas Aquinas, Commentary on Aristotle’s “Physics,” R. J. Blackwell, trs. (New Haven: Yale University Press, 1963).

4. The ideality of space is its mind-dependence: it is only a condition of sensibility…. Kant concluded …”absolute space is not an object of outer sensation; it is rather a fundamental concept which first of all makes possible all such outer sensation.”…Much of the argumentation pertaining to space is applicable, mutatis mutandis, to time, so I will not rehearse the arguments. As space is the form of outer intuition, so time is the form of inner intuition….Kant claimed that time is real, it is “the real form of inner intuition.”

भारतीय दर्शनों में समय की अवधारणा

सामान्य

समय का दर्शन : चार

समय को लेकर आज भले ही हम नियतिवादी द्रष्टिकोण से आगे कुछ न सोच पाते हों, परंतु हमेशा ऐसा नहीं था. मानवीय चेतना में विकास के साथ समयसंबंधी अवधारणा में भी परिवर्तन होते रहे हैं. वैदिक युग में जब मनुष्य प्रकृति के सान्निध्य में जीवनयापन करता था, अपने चारों ओर बिखरी विपुल प्राकृतिक संपदा नदियां, पहाड़, झरने, महासागर, फलफूल, वनवनस्पतियों को देखकर अभिभूत था….जीवनमृत्यु, दिनरात और ग्रहनक्षत्रों को देख चमत्कृत रह जाता था. तब समय को लेकर उसका सोच भी लगभग नियतिवादी था. वह मानता था जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी आदि जैसे दूसरे भौतिक पदार्थों का अस्तित्व है, वैसे ही समय का भी है. समय की सीधे प्रतीति भले न हो, परंतु दिनरात, धूपछांव, जीवनमृत्यु के अंतर से उसकी उपस्थिति का एहसास होता था. इतना स्वाभाविक कि यह मानकर भी कि परिवर्तन वस्तुओं की सहज प्रवृत्ति है, उसे लगता था कि वस्तुओं के अपने गुण के अलावा भी कुछ ऐसा है जो उन्हें नियंत्रित रखता है. उनके रूपाकार को बदलते हुए देखता है. इसी गुण को कभी ‘समय’ की संज्ञा दी गई, तो कभी ‘काल’ कहकर संबोधित किया गया. फिर घटनाओं की सटीक परख, आवृत्ति, अंतराल आदि की जांच के लिए समय के घंटा, मिनट, सैकंड, पल, अनुपल, वर्ष, संवत्सर जैसे मात्रक गढ़े गए. कालांतर में धूपवर्षाताप आदि के उपादान कारणों की भांति समय को भी देवता का दर्जा दिया गया था. यज्ञ में उसके नाम समिधा अर्पित की जाने लगी. उष्मा और प्रकाश बांटने वाले सूरज तथा परिवर्तन के प्रतीक ‘द्यौ’(दिन, उजास) की गिनती भी वैदिक देवताओं में होने लगी. उसको ‘प्रकृति पूजा की पहली श्रेणी का उपलक्ष्य’ माना गया. विकास की आरंभिक बेला में यह अप्रत्याशित भी नहीं था. दिनारंभ के साथ शरीर में नई स्फूर्ति आ जाती है. नवीन ऊर्जा से ओतप्रोत मनुष्य अपना काम शुरू कर देता है. उजास प्रकृति में नई चेतना भर लाता है. जीवजगत से लेकर जड़जंगम, वनस्पति आदि सभी पर उसका प्रभाव बहुआयामी होता है. यह सब बिना किसी दैवीसामर्थ्य के संभव नहीं. इसलिए वह देवता है. सभी को हर्षित, ऊर्जस्वित, उमंगित एवं आलोकित करनेवाला. प्राणिमात्र को नई स्फूर्ति एवं चेतना से भर देने वाला. पूरी तरह प्रकृतिआश्रित जीवन में यह विश्वास स्वाभाविक ही था. एक अन्य स्थान पर ऋग्वेद में समय को शक्तिरूप कहा गया है. ऐसी सचेतन शक्ति जो जीवनसंघर्षों, आपदाओं के बीच सबकी रक्षा करती है. जीवनचक्र को आगे बढ़ाती और उसका संवर्धननिर्देशन आदि करती है.

समय का प्रत्यय मानवीय बोध के साथ ही जन्म ले चुका था. उसको उतना ही पुराना माना गया, जितनी सृष्टि. हालांकि सृष्टि के विकास में समय का योगदान जल के बाद आंका गया. नासदीय सूक्त के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति जल से मानी गई है. वही आदिमहाभूत है. इस मान्यता के अनुसार सृष्टि निर्माण में सहायक बने पंचमहाभूतोंअग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश में जल सर्वप्रथम आया. उसी से बाकी तत्वों का विकास हुआ है. यह सीधेसीधे अनुभव से जन्मा दर्शन था. जल से प्रकृति हरियाती है. जीवन संभव हो पाता है. वह प्राणतत्व की पहली आवश्यकता है. ऋग्वेद में प्राकृतिक सत्ताओं के प्रति श्रद्धाभाव से विकसित बहुदेववाद है. मगर सृष्टि की प्रथम कारक सत्ता होने के कारण जल सबसे महत्त्वपूर्ण है. डॉ. राधाकृष्णन के अनुसार—‘ऋग्वेद की प्रवृत्ति एक सीधासादासरल यथार्थवाद है….(वह) केवल एक जल की ही परिकल्पना करता है. वही आदिमहाभूत है, जिससे धीरेधीरे दूसरे तत्वों का विकास हुआ.’ (भा. . पृष्ठ 83). लेकिन सृष्टि की रचना अकेले जल द्वारा संभव न थी. जल की अवस्था से आकाश, अग्नि, जल, वायु के विकास के बीच सुदीर्घ अंतराल है. नासदीय सूक्त के अनुसार आरंभ में न दिन था न रात. इसलिए समय का बोध कराने वाले भूतभविष्य आदि का भी लोप था. इस तरह महाशून्य अवस्था से दिनरात से भरपूर ब्रह्मांड में आने के बीच जो लाखों, करोड़ों वर्ष बीते, उनसे समय की उपस्थिति स्वतः सिद्ध है. कह सकते हैं कि सृष्टि के निर्माण में पंचतत्वों के सहयोग के अलावा समय का भी योगदान रहा. वैदिक ऋषियों को लगा होगा कि सतत परिवर्तनशील जगत की व्याख्या के लिए अंतरिक्ष अपर्याप्त है. उससे सृष्टि के विस्तार और व्याप्ति की परिकल्पना तो संभव है, मगर चराचर जगत की परिवर्तनशीलता एवं क्रमानुक्रम की व्याख्या के लिए, कुछ ऐसा भी होना चाहिए जो अंतरिक्ष जैसा अनादिअनंत होकर भी वस्तुजगत की गतिशीलता की परख करने में सक्षम हो. अंतरिक्षनुमा होकर भी उससे भिन्न हो. जिसमें वह अपने होने को सार्थक कर सके. अपनी चेतना को दर्शा सके. जिसके माध्यम से घटनाओं के क्रम तथा उनके वेग आदि की व्याख्या भी संभव हो. जो सकल ब्रह्मांड के चैतन्य का साक्षी, उसकी गतिशीलता का परिचायक एवं संवाहक हो.

अंतरिक्ष आभासी संरचना है. वह ग्रहनक्षत्रों तथा तरहतरह के गतिमान पिंडों को अपने भीतर समाए रहता है. कह सकते हैं कि गतिमान पिंडों की स्थिति तथा उनका अंतराल हमें अंतरिक्ष का आभास कराते हैं. तदनुसार अंतरिक्ष वह त्रिविमीय आभासी संरचना है जो विभिन्न प्रकार के छोटेबड़े पिंडों, कणों को अपने भीतर समाहित रखता है. उनके भीतरीबाहरी, भौतिक अथवा काल्पनिक अंतराल की प्रतीति कराता है. उनकी गतिशीलता के लिए पर्याप्त आकाश देता है. दूसरी ओर समय महज एक विमीय सरंचना है. उसका गुण है कि वह ब्रह्मांड में पलछिन घटने वाली कोटिक घटनाओं का साक्षी बन सके. वह दो या उससे अधिक घटनाओं के क्रमानुक्रम, बारंबारता, अंतराल तथा उनके आपसी संबंधों का बोध कराता है. यह भी कह सकते हैं कि घटनाओं का वेग, मानवमस्तिष्क द्वारा उन घटनाओं को सहेजने का क्रम तथा उनका अंतराल समयबोध का निर्माण करते हैं. व्यवहार में समय आभासी मगर सापेक्ष सत्ता है. दूसरी ओर समय की निरपेक्षता के समर्थन में भी अनेकानेक उल्लेख शास्त्रों में मौजूद हैं. यह माना जाता रहा कि समय बाह्यः प्रभावों, दृश्यअदृश्य घटनाओं से मुक्त है. वह घटनाओं पर नियंत्रण रखता है, मगर स्वयं किसी से प्रभावित नहीं होता. इसलिए उसकी गति सदैव एकसमान बनी रहती है. यह धारणा भी बनी रही कि चराचर जगत में जो कुछ बनतामिटता है, समय उसका साक्षी है. काल नहीं मिटता, हम ही बनतेमिटते हैं—कहकर समय की परमसत्ता को स्वीकृति दी गई. उसे अजेय माना गया. एकेश्वरवादी चिंतन में ईश्वर के अतिरिक्त समय या उस जैसी शाश्वत सत्ता की परिकल्पना, ईश्वर की सर्वोच्चता पर प्रश्नचिह्न लगाती थी. अतएव परमात्मा की सर्वोच्चता को दर्शाने के लिए गीता में श्रीकृष्ण के मुख से कहलवाया गया—कालोऽस्मि.’ ‘मैं ही समय हूं.’ यहां काल समस्त घटनाओं के आगार, विराट ब्रह्मांडीय विस्तार का द्योतक है. वह श्रीकृष्ण के मुख से उच्चारित हुआ है, इसलिए वह विराट शक्ति का भी बोध देता है. समय के साथ बीतना, गुजरने, घटित होने जैसी प्रतीतियां सहजरूप से जुड़ी हुई हैं. उसे परिवर्तनशील माना गया है. मगर परमसत्ता की महत्ता को रेखांकित करने के लिए यत्रतत्र उसको कालातीत भी कहा जाता है. सृष्टि निर्माण में समय के योगदान को स्वीकार करते हुए प्राचीन आचार्यों ने लिखा—‘जल की अवस्था से उन्नत होकर इस जगत का विकास समय, संवत्सर अथवा वर्ष, इच्छा या काम, एवं बुद्धिरूपी पुरुष तथा तप की शक्तियों से हुआ था.’ (भा. . पृष्ठ 83). इसमें समय तथा ‘संवत्सर अथवा वर्ष’ को अलगअलग लिखा हुआ है. जबकि व्यवहार में संवत्सर और वर्ष समय के ही मात्रक हैं.

उपर्युक्त से सिद्ध होता है कि समय को लेकर वैदिक आचार्यों की दो स्पष्ट प्रतीतियां थीं. पहली उसे अनंत, ब्रह्मांडनुमा सत्ता मानती थी. उसके अनुसार समय को स्थिर, विचलनहीन और अनंत विस्तारयुक्त सत्ता माना गया. जिसमें सबकुछ घटता रहता है. जो घटनाओं का क्रमानुक्रम मात्र न होकर अंतहीन त्रिविमीय फैलाव है. चराचर जगत का सहयात्री न होकर सर्वस्व द्रष्टा है. जिसका न आदि है न अंत. जो इतना विस्तृत है कि कोटिक कोटि ग्रहनक्षत्रनीहारिकाएं उसमें सतत गतिमान रहती हैं—या जो कोटिक घटनाओं, गतियों का एकमात्र द्रष्टा एवं साक्षी है. दूसरी प्रतीति के अनुसार समय भूत, वर्तमान तथा भविष्य के रूप में परिलक्षित होने वाली, नदीसम निरंतर प्रवाहशील एकविमीय संरचना है. घटनाओं के साथ घटते जाना उसका स्वभाव है. वह न केवल घटनाओं के क्रमानुक्रम का साक्षी है, बल्कि उनका हिसाब भी रखता है. मगर है आदिअंत से परे. उनकी न शुरुआत है न ही अंत. समय को लेकर ये दोनों ही धारणाएं कमोबेश आज भी उसी रूप में विद्यमान हैं. इस तरह यह संभवतः अकेली अवधारणा है जिसके बारे में मनुष्य के विचारों में शुरू से आज तक बहुत कम परिवर्तन हुआ है. इतना अवश्य है कि समय जब तक दर्शन का विषय था, तब तक उसे लेकर वस्तुनिष्ठ ढंग से विचार होता रहा. विशेषकर जैन और बौद्ध दर्शन में समय की सत्ता पर गंभीर चिंतन हुआ. कालांतर में समय के दार्शनिकवैज्ञानिक पक्ष पर विचार करने के बजाय केवल उसके व्यावहारिक पक्ष पर विमर्श होता रहा. आगे चलकर जीवन में स्पर्धा और सामाजिक विभाजनकारी स्थितियां बढ़ीं तो पोंगा पंडितों ने समय को प्रारब्ध से जोड़ दिया. एक निरपेक्ष सत्ता को नियामक सत्ता मान लिया गया. इससे मानवमन में समय के प्रति अतिरिक्त श्रद्धाभाव उमड़ने लगा. उसके पीछे समय को जानने की वांछा कम, डर और समर्पण का अंश कहीं अधिक था. समय के प्रति डर, अविश्वास एवं स्थूल चिंतन का दुष्प्रभाव यह हुआ कि उसे लेकर दार्शनिक चिंतन लगभग ठहरसा गया. इससे उन पोंगापंथियों को सहारा मिला जो समय को लेकर लोगों को डराते थे.

 

 

समय का बोध मानवीय बोध के साथ जन्मा और उतना ही पुराना है. सवाल है कि समय की उत्पत्ति कब हुई? क्या समयबोध के साथ? अथवा उससे पहले? इस मामले में वैदिक ऋषि और वैज्ञानिक दोनों एकमत थे कि समय का जन्म सृष्टि के जन्म के साथ हुआ. उससे पहले समय की कोई सत्ता नहीं थी. हालांकि दोनों की मान्यताओं का आधार अलगअलग है. स्वाभाविक रूप से वैज्ञानिक इसकी व्याख्या तार्किक आधार पर करना चाहते हैं, जबकि वैदिक आचार्यों का द्रष्टिकोण अध्यात्मप्रेरित था. अंतरिक्षीय महाविस्फोट द्वारा सृष्टिरचना के सिद्धांत में विश्वास रखने वाले वैज्ञानिक मानते हैं कि उससे पहले ब्रह्मांड अतिउच्च संपीडन की अवस्था में था. इस तरह विज्ञान की दृष्टि में ब्रह्मांड और समय दोनों एक ही घटना का उत्स हैं, जिसे वैज्ञानिक महाविस्फोट का नाम देते हैं. इसलिए ‘समय का संक्षिप्त इतिहास’ लिखने के बहाने स्टीफन हाकिंग जैसे वैज्ञानिक प्रकारांतर में इस ब्रह्मांड का ही इतिहास लिख रहे होते हैं. ब्रह्मांड के जन्म की घटना से पहले समय की उपस्थिति को नकारना वैज्ञानिकों की मजबूरी थी. क्योंकि उससे पहले समय की उपस्थिति स्वीकार करने के लिए उनके पास कोई तार्किक आधार नहीं था. समय ही प्रतीति ‘घटित होने’ से जुड़ी हुई है और उच्च संपीडन की अवस्था में घटना का आधार ही गायब था. ऐसा कोई कारण नहीं था जिससे समय की उपस्थिति प्रमाणित हो सके. समय के बारे में एक महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक द्रष्टिकोण आइंस्टाइन के शोध में मिलता है. सापेक्षिकता के सिद्धांत की खोज के बाद घटना विशेष के संदर्भ में दिक् और काल को अपरिवर्तनशील एवं निरपेक्ष मानना संभव नहीं रह गया था. वे प्रभावशाली मात्राएं बन गई थीं, जिनका स्वरूप पदार्थ और ऊर्जा पर निर्भर था. सापेक्षिकता का सिद्धांत महाविस्फोट से पहले समय की संभावना को नकारता है. उसके अनुसार समय और दिक् की परिकल्पना केवल ब्रह्मांड के भीतर रहकर संभव है. उससे पहले चूंकि घटनाओं के बारे में कुछ भी दावे के साथ नहीं कहा सकता, अतएव यह माना गया कि समय की परिकल्पना केवल ब्रह्मांड की संभावनाओं में संभव है. इसके बावजूद समय की निरपेक्ष तस्वीर कुछ वैज्ञानिकों को आज भी लुभाती है. हालांकि 1915 में आइंस्टीन द्वारा ‘जनरल थ्योरी आफ रिलेटिविटी’ का क्रांतिकारी सिद्धांत पेश होने के बाद उसपर दृढ़ रहना आसान नहीं रह गया था. सापेक्षिकता के सिद्धांत को स्वीकृति मिलने के बाद स्पेस और टाइम किसी घटना के स्थिर आधार जैसे अपरिवर्तनशील और निरपेक्ष नहीं रह गए. बल्कि वे बेहद प्रभावशाली मात्राएं बन गईं, जिनकी रूपरेखा पदार्थ और ऊर्जा से तय होती है. यह मान लिया गया कि दिक्, काल की व्याख्या केवल ब्रह्मांडीय सीमाओं में संभव है. तदनुसार ब्रह्मांड के जन्म से पहले दिक्, काल की परिकल्पना करना बिल्कुल बेमानी हो गया. इस निरीश्वरवादी परिकल्पना थी, जिसके समर्थक जैन और बौद्ध दर्शन थे.

वैदिक मनीषियों का द्रष्टिकोण सर्वथा भिन्न था. समय और सृष्टि की उत्पत्ति को एकदूसरे से जोड़ना उनके आस्थावादी मन के लिए जरूरी था. जहां वैज्ञानिक महाविस्फोट से पहले समय की परिकल्पना करने से इसलिए हिचकते हैं कि उसके लिए उनके पास उपर्युक्त तर्कों का अभाव है, और उसको सिद्ध कर पाना फिलहाल असंभव, वहीं आस्थावादी दार्शनिकों की समस्या थी कि समय को पूर्व अथवा समानांतर सत्ता मान लेने से उसकी सर्वेश्वरवादी व्याख्याएं संकट में पड़ने लगती हैं. सर्वशक्तिमान परमात्मा की परिकल्पना तो असंभव हो जाती है. इसलिए ऋग्वेद में कहा गया, ‘वह काल की, देश की, आयु, मृत्यु और अमरता आदि सबकी पहुंच के बाहर और उनसे परे है. हम इसकी ठीकठीक व्याख्या नहीं कर सकते, सिवाय इसके कि यह अस्तित्व रखती है.’(. . पृष्ठ – 81). यह एक प्रकार का रहस्यवाद ही था. इस संकट से उबरने की कोशिश बौद्ध दर्शन में दिखाई पड़ती है. उसके अनुसार समय चिरंतन है. मनुष्य की भांति वस्तुजगत का भी समय निर्धारित है. समय के सुदीर्घ अंतराल में ब्रह्मांड भी बनतेमिटते रहे हैं.

नासदीय सूक्त में उद्गाता ऋषि ब्रह्मांड की उत्पत्ति की कल्पना शून्य से करता है—नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्, किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीन्दहनं गभीरम्.’ इसका सरल पद्यात्मक अनुवाद यशदेव शल्य द्वारा किया गया है. लेकिन हम मैक्समूलर द्वारा किए गए अनुवाद को लेना चाहेंगे, जिसे डॉ. राधाकृष्णन ने ‘भारतीय दर्शन’ खंड—एक में उद्धृत किया है. उसके अनुसार—‘उस समय न तो सत था, न ही असत्. न आकाश विद्यमान था, न ही उसके ऊपर अंतरिक्ष. तब किसने उसे आवृत कर रखा था. वह कहां था? किसके आश्रय में रखता था? क्या वह आदिकालीन गहनगंभीर जल था? जिसमें समाहित था सबकुछ. मृत्यु का अभाव था. इस कारण अमरताबोध अजन्मा ही था. जिसके माध्यम से दिन और रात का होना निश्चित किया जा सके. केवल और केवल ब्रह्म था, बिना श्वांसप्रश्वांस की प्रक्रिया के जीवित रहने वाला. बाकी था अंधकार, घोर अंधकार….तब फिर कौन जानता है कि सृष्टि कहां से हुई? जिससे इस सृष्टि का प्रादुर्भाव हुआ, उसने इस सृष्टि को बनाया या नहीं बनाया, ऊंचे से ऊंचे अंतरिक्षलोक लोक में, ऊंचे से ऊंचा देखने वाला, वही यथार्थरूप में जानता है, अथवा क्या वह भी नहीं जानता?’(भा. . पृष्ठ 81). सृष्टि के उत्स को जानने के बहाने असल में यह निराकार ब्रह्म की कल्पना थी, जो बहुदेववाद की आलोचनाओं के बीच आवश्यक हो चुकी थी. परमात्मा सृष्टि की कारक सत्ता है. इसलिए वह उससे पहले है. किसी को कोई संदेह न हो, इसलिए ऋग्वेद में यह नासदीय सूक्त से पहले, हिरण्यगर्भ सूक्त के माध्यम से स्पष्ट कर दी जाती है. हिरण्यगर्भ सूक्त में उद्गाता मुनि ब्रह्मांड की उत्पत्ति से पहले की स्थिति की कल्पना करते हुए लिखता है—हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्. स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय् हविषा विधेम.’ वह था. परंतु क्या था? किस रूप में था? इस बारे में दावे के साथ कुछ भी नहीं कहा जा सकता….हम उसकी अभ्यर्थना करते हैं. यह भी एकेश्वरवाद की ओर संकेत रहस्यवादी कल्पना है. उद्गाता ऋषि कल्पना की उड़ान भरतेभरते विराट शून्य में तल्लीनसा प्रतीत होता है और अव्याख्येय को परमात्मा का नाम देकर तसल्ली कर लेता है.

वैदिक साहित्य में समय को लेकर जो आस्थावादी द्रष्टिकोण बना, वह सहòाब्दियों तक बना रहा. उपनिषदों में समय को लेकर चर्चा हुई, परंतु उसी समर्पण भाव के साथ. समय की सत्ता को स्वीकारते हुए. ब्रहदारण्यक उपनिषद में याज्ञव्ल्क्य भी समय के बारे में वैदिक द्रष्टिकोण को ही आगे रखते हैं—‘‘हे गार्गी! वह जो अंतरिक्ष से ऊपर है, और वह जो पृथ्वी के भी नीचे है, वह जिसे मनुष्य भूत, वर्तमान और भविष्य कहते हैं, उस सबकी रचना अंदर और बाहर देश के अंतर्गत है. किंतु फिर इस देश की रचना भीतर और बाहर किसके अंदर हुई? हे गार्गी! सत्य के अंदर, इस अविनाशी के अंदर, सब देश के अंदर और बाहर गुंथा हुआ है’’ बृहदारण्यक 3-6-7). एक अन्य स्थान पर ऋग्वेद में ब्रह्म का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि वह काल की मर्यादा से स्वतंत्र है. अर्थात वह अनित्य है, जिसका न आदि है न अंत. अथवा वह एक तात्कालिक अवधि है जिसे एक नियमित कालव्यवधान की आवश्यकता नहीं है. वह भूत् और भविष्यत् के विचार से मुक्त है(भा. . 142). वेदादि धर्म ग्रंथों में अनादि, अनश्वर, कालातीत, अमर जैसे विशेषण बारबार आते हैं. उसके पीछे एकमात्र कारण था, मृत्यु का भय. इसलिए आस्थावादी दर्शन का बड़ा हिस्सा मृत्यु के चंगुल से बाहर निकल जाने की कोशिश तक सिमटा हुआ है. साफ है कि ‘अमरताबोध’ जैसी परिकल्पना के पीछे भी मृत्युभय निहित था. मृत्यु तथा आकस्मिक रूप से आ धमकने वाली आपदाओं ने ही समय के प्रति डर को जन्म दिया था. अमरत्व की कल्पना का एकमात्र आशय था, समय के साथ अनंतकाल तक बने रहने की सुविधा; या फिर समय की पकड़ के बाहर आकर अनंत में बने रहने की प्रतीति. लेकिन जब आप मृत्यु अथवा उसके पार जाने के लिए कथित अमरता की कल्पना कर रहे होते हैं, तो प्रकारांतर में अंतहीन समय की परिकल्पना कर, उसे भी अमरत्व प्रदान कर रहे होते हैं. आस्थावादी दार्शनिकों के लिए यह कोई समस्या ही नहीं थी. इसलिए ऐसी कल्पनाएं प्रायः हर धर्म ग्रंथ का हिस्सा बनी हैं. श्वेताश्वरोपनिषद कतिपय बाद की रचना है. मगर उसमें भी समय को लेकर इसी प्रकार का आस्थावादी द्रष्टिकोण सामने आता है. परमसत्ता की स्थिति की कल्पना करते हुए उपनिषदकार लिखता है—‘वहां फिर न दिन रहता है, न रात रहती है, न कोई अस्तित्व रहता है, और न कोई अनस्तित्व रहता है—केवल ईश्वर रहता है.’(भा. . 160). इसका भी सीधा सा अर्थ है कि ईश्वर पर समय का कोई असर नहीं पड़ता. वह उसकी पकड़ से बाहर है.

दरअसल समय पर निरपेक्ष सत्ता के रूप में विचार करना वैदिक ऋषियों की प्राथमिकता था भी नहीं. गंभीरतापूर्वक विचार करने पर हम पाएंगे कि वैदिक काल में दर्शन का स्तर अपेक्षाकृत स्थूल था. भारतीय दर्शनों में समय को लेकर थोड़ाबहुत वस्तुनिष्ट चिंतन मिलता भी है तो केवल बौद्ध और जैन दर्शन में. जैन दर्शन में संसार की समस्त वस्तुओं को ‘जीव’ और ‘अजीव’ दो श्रेणियों में रखा गया है. ‘जीव’ में समस्त प्राणी समुदाय आता है. ‘अजीव’ वर्ग में आकाश, पुद्गल, धर्म, अधर्म के अलावा ‘काल’ को भी सम्मिलित किया गया है. ‘अजीव’ को कहींकहीं अर्धद्रव्य की से भी संबोधित किया गया है. तदनुसार ‘काल’ भी अर्धद्रव्य है, ‘यह विश्व की वह सर्वव्यापक आकृति है, जिसके द्वारा संसार की समस्त गतियां सूत्रबद्ध हैं. यह एक व्यवधानपूर्ण परिवर्तनों की शृंखलाओं का केवल जोड़मात्र नहीं है, किंतु स्थिरता की एक प्रक्रिया है—भूत् एवं वर्तमान काल को चिरस्थायी बनाना है(भा. . 256).’ इसमें समय संबंधी दोनों धारणाओं का सम्मिलन दिखाई पड़ता है. सर्वदर्शन संग्रह में अंतरिक्ष और काल को समानधर्मा माना गया है. उसके अनुसार अंतरिक्ष और काल दोनों सर्वव्यापी हैं. इसके बावजूद दोनों में अंतर है. अंतरिक्ष चतुर्विमीय संरचना है. जबकि काल एकपक्षीय विस्तार. सर्वदर्शन संग्रह के अनुसार काल का अस्तित्व तो है, किंतु उसमें कायत्व अथवा विशालता का अभाव है. एक पक्षीय होने के कारण इसमें विस्तार नहीं है.(भा. . 256) जैन ग्रंथ ‘पंचास्तिकारसमयसार’ में समय को लेकर गहन चिंतन मिलता है. देखा जाए तो यही वह ग्रंथ है जिसमें समय के बारे में आधुनिक चिंतन की सच्ची झलक मौजूद है. पंचास्तिकारसमयसार समय को नित्यकाल और सापेक्षकाल में बांटता है. नित्य काल निराकार एवं आदिअंत से सर्वथा मुक्त है. जबकि सापेक्षकाल समय के प्रति व्यावहारिक दृष्टिकोण. नित्यकाल का न आदि है न ही अंत. दूसरी ओर सापेक्षकाल का आदि भी है तथा अंत भी. सुविधा के लिए उसको घंटे, मिनट आदि में भी विभाजन किया जा सकता है, ‘नित्यरूप काल को हम ‘काल’ के नाम से एवं सापेक्षकाल को ‘समय’ के नाम से पुकारते हैं. काल समय का महत्त्वपूर्ण कारण है. वर्तन अथवा परिवर्तनों की निरंतरता परिणाम द्वारा अनुमान की जाती है. (पंचास्तिकायसमयसार-89) सापेक्ष समय का निर्णय परिवर्तनों अथवा वस्तुओं के अंदर गति के द्वारा होता है. यह परिवर्तन अपने आपमें निरपेक्षकाल के कार्य हैं. (पंचास्तिकायसमयसार-107-108). काल को चक्र अथवा पहिया या घूमने वाला कहा जाता है. चूंकि काल की गति से सब पदार्थों की आकृति का विलयन संभव होता है, नई आकृतियां जन्म ले पाती हैं—अतएव काल को संहारकर्ता भी कहा गया है. बौद्ध मतावलंबी भी समय को अंतविहीन मानते हैं. बौद्ध विद्वान धर्मकीर्ति के अनुसार संसार सतत प्रवाह है. इसका न आदि है न ही अंत. इसलिए समय का भी न आदि है न अंत.

 

 

प्रकट में, अपनेअपने आग्रहों के फलस्वरूप विज्ञान और दर्शन दोनों ही सृष्टि पूर्व समय की उपस्थिति को नकारते हैं. विज्ञान मानता है महाविस्फोट से पहले समय का कोई अस्तित्व नहीं था. ब्रह्मांड अतिउच्च संपीडन की अवस्था में. रातदिन का अस्तित्व ही नहीं था. महाविस्फोट के साथ ब्रह्मांड का जन्म हुआ और अगले ही क्षण वह तेजी से फैलने लगा. सेकंड के बेहद सूक्ष्म हिस्से के भीतर ब्रह्मांड का आकार दोगुना हो गया. उसके बाद तो यह और भी तीव्र गति से फैलने लगा. आगे चलकर आकाशगंगाएं बनीं. सौरमंडल अस्तित्व में आया. लेकिन वैज्ञानिक भी इतना तो मानते ही हैं कि महाविस्फोट से पहले ब्रह्मांड उच्च संपीडित अवस्था में था. भले ही इतनी सघनावस्था में कि दिनरात आदि का अस्तित्व ही संभव न हो. परंतु महाविस्फोट से पहले भी कुछ था. भले ही वह उच्च संपीडित अवस्था में, बिंदुरूप में हो. वैज्ञानिक यह जानने के लिए सिर नहीं खपाते कि उच्चतम संपीडन की अवस्था कब से थी? क्यों थी? इस बारे में उनकी परिकल्पनाएं मौन दिखाई पड़ती हैं. असल में ब्रह्मांड के अस्तित्व से पहले समय को ले जाने की कठिनाई है कि तब हमें एक और ब्रह्मांड की कल्पना करनी पड़ेगी, भले ही उसका आकार लघुत्तम अथवा बिंदुसम क्यों न रहा हो. जैसा कि बौद्ध दर्शन में किया गया है. वह ब्रह्मांड की नश्वरता के सिद्धांत पर विश्वास रखता है. बौद्ध दर्शन के लिए यह आसान है. इसलिए कि वह आत्मा और ईश्वर के अस्तित्व पर मौन रहने की सलाह देता है. ब्रह्मांड के सातत्य का सिद्धांत उसके लिए कोई मुश्किल खड़ी हीं करता. मगर सर्वेश्वरवादियों के लिए यह संभव नहीं है.

आस्थावादी ब्रह्मांड की उत्पत्ति से पहले परमात्मा की सत्ता को स्वीकारते हैं. उनके अनुसार समय की कोई बाहरी प्रतीति नहीं है. वह परमात्मा का ही गुण है, उसके भीतर समाया हुआ—‘यह सब भूत और भविष्यत् जगत् पुरुष ही है.’(10/90/2). ऐसे में समय की सत्ता को चुनौती देना, उसके ऊपर सवाल खड़े कर देता है—स्वयं परमात्मा की सत्ता के ऊपर सवाल खड़े करता है. सर्वेश्वरवादी तो परमात्मा को ही सब कुछ मानते हैं. उनके अनुसार यह चराचर जगत, दृश्यअदृश्य सभी सत्ताएं ईश्वरीय चेतना का ही विस्तार हैं. परमात्मा उनके लिए वह अनंत शुभ का पर्याय है. यह सृष्टि उसका अनंत विस्तार है. सीमित ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से मनुष्य इसको समझने का प्रयत्नमात्र कर सकता है. इसी को विस्तार देते हुए ऋग्वेद में आगे लिखा गया है—‘हमारे भौतिक विभाग केवल इंद्रियगम्य भौतिक जगत की व्याख्या देश, काल और कारणों से आबद्ध आकृतियों के रूप में कर सकते हैं. किंतु यथार्थ सत्ता इस सबसे परे है. देश को वह अपने अंदर धारण करते हुए भी स्वयं काल की सीमा में बद्ध नहीं, यह काल से ऊपर है. ’ (भा. . – पृष्ठ 142). समय की स्वतंत्र सत्ता सर्वेश्वरवादी मान्यताओं के आगे प्रश्नचिह्न लगा देती है. ईश्वर यदि समय है, अथवा समय ईश्वर की विशिष्टता है तो क्या समय की भांति ईश्वर भी बीतता है? ईश्वर का बीतना अथवा उसकी परिवर्तनकारी अवस्था प्रकारांतर में उसमें विक्षोभ की ओर इशारा करती है. इससे बचने के लिए परमात्मा को मृत्यु और काल की सीमाओं से परे माना गया.

हालांकि समय पूर्व परमात्मा की उपस्थिति अथवा परमात्मा में समय को स्थित मानकर अध्यात्मवादी अपने ही तर्कों के जाल में फंसे नजर आते हैं. होना अपने आप में घटना का प्रतीक है. आस्थावादियों के अनुसार यदि सृष्टि की कारक सत्ता के रूप में ईश्वर पहले से ही अस्तित्व में था तो उसके होने की क्रिया स्वयं सिद्ध है. चाहे वह ईश्वरीय सत्ता के विस्तार के रूप में हो अथवा उसके समानांतर एक स्वतंत्र सत्ता. दूसरे शब्दों यदि सृष्टि से पहले परमात्मा की सत्ता को स्वीकार कर लेते हैं और उससे समस्त घटनाओं की अन्विति मान लेते हैं तो परमात्मा के एक गुण के रूप में अथवा उसके समानांतर, भले ही कितनी ही अवधि के लिए क्यों न हो, समय की उपस्थिति को भी स्वीकार करना पड़ेगा. उस अवस्था में नए सवालों का सिलसिला शुरू हो जाता है. सृष्टि से पहले परमात्मा यदि परमशांत अवस्था था, जैसा कि अध्यात्मवादी स्वीकार करते हैं, तो उसके कथित निष्क्रिय अवस्था से सक्रिय अवस्था में आने तक कुछ न कुछ अंतराल अवश्य रहा होगा. यदि वह निरपेक्ष निष्क्रिय सत्ता के रूप में मौजूद था, तो भी उसके होने की क्रिया अपने आप में स्वयं एक घटना है. आशय है कि दोनों अवस्थाओं में चाहे वह महाविस्फोट से पहले अंतरिक्ष के उच्च संपीडन की अवस्था हो अथवा सृष्टि की प्रमुख कारक शक्ति परमात्मा के रूप में—व्यावहारिक समय की मौजूदगी से इन्कार नहीं किया जा सकता. क्योंकि ऐसी अनेकानेक वस्तुएं हैं जिनके होने की क्रिया से हमारा सीधा परिचय नहीं है. इसके बावजूद हम उनके होने को स्वीकार करते हैं. जैसे अंतरिक्ष.

उस अवस्था में विकास की अभी तक ज्ञात समस्त परिकल्पनाएं सवालों के घेरे में आ जाती हैं. इससे बचाव का दूसरा उपाय भी है कि यह कि समय की सत्ता और उसके अस्तित्व को ही चुनौती दी जाए. यह मान लिया जाए कि अंतरिक्ष की भांति वह भी एक भ्रांति है. घटनाओं की क्रमिकता और मानवस्मृति के योग से बना एक एहसास मात्र है. प्रत्येक घटना अपनी विशिष्ट गति से संपन्न होती है. उसके अनुसार हमारे मनस् पर स्मृति के योग से बना प्रभाव समयांतराल की प्रतीति देता है. यहां एक सामान्यसा प्रश्न उठाया जा सकता है कि घटनाओं के प्रभाव, क्रमानुक्रम अथवा उनकी अन्वति से परे समय क्या है? यदि यह माना जाए कि समय भूतभविष्य, वर्तमान आदि न होकर अंतरिक्षसम संचरना है और घटनाएं उसके भीतर घटती रहती हैं, तो घटनाओं की आवृत्ति, क्रमानुक्रम से परे भी क्या समय की प्रतीति संभव है? यदि हां, तो तब समय की प्रतीति और अंतरिक्ष की प्रतीति के बीच भेद कैसे संभव होगा. वैज्ञानिकों के अनुसार ब्रह्मांड के जन्म से पहले उच्च संपीडन की अवस्था तथा अध्यामवादियों की दृष्टि में ब्रह्मांड से पहले परमात्मा की मौजूदगी अपने आप में स्वयं एक घटना थी. तदनुसार किसी न किसी रूप में सृष्टिपूर्व समय की उपस्थिति भी अवश्य रही होगी, भले ही अपनी सीमाओं में हमारा मस्तिष्क उसकी कल्पना कर पाने में असमर्थ हो. समय की सत्ता को मान्यता प्रदान करना, ऐसी ही उलझनों से दोचार होना है. दर्शन का कार्य ऐसी ही चुनौतियों से संवाद करते रहना है.

समय को लेकर मौलिक चिंतन पश्चिम में इमानुएल कांट के दर्शन में प्राप्त होता है. विशेषकर समय और ब्रह्मांड की उत्पत्ति के बारे में. क्या ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई? अथवा यह हमेशा ऐसा ही था? इमानुएल कांट के लिए यह विवेचना का विषय था. कांट जीवन में नैतिक मूल्यों को महत्त्व देता था और विचारों से उसका द्रष्टिकोण समन्वयवादी था. उसको लगता कि समय के प्रति लोगों के मन में समाया डर अनेक नैतिक समस्याएं खड़ी कर देता है. भयभीत मनुष्य दूसरों को भूलकर केवल अपनी चिंता करने लगता है. इसलिए समय और ब्रह्मांड के अस्तित्व को लेकर तत्कालीन चिंताएं उसके दर्शन का हिस्सा भी बनीं. दोनों पर विचार करने के बाद उसको लगा कि दोनों ही विचारधाराओं में न केवल अंतर्विरोध हैं, बल्कि वे अतिवादी भी हैं. यदि यह माना जाए कि किसी बिंदू पर ब्रह्मांड की शुरुआत हुई तो फिर कर्ता ने शुरुआत के लिए अनंतकाल तक प्रतीक्षा क्यों की? आखिर क्या कमी थी, जो अपने संरचना को लंबे समय तक दबाए रखा. और यदि यह मान लिया जाए कि ब्रह्मांड अनंतकालीन सत्ता है, उसमें बस परिवर्तन होते रहते हैं हैं तो ब्रह्मांड ने अपनी पुरानी स्थिति से, इसको बिग बैंग कहें या कुछ और, वर्तमान अवस्था तक आने में इतना लंबा समय क्यों लिया? कांट ने इन दोनों धारणाओं को क्रमशः ‘थीसिस’ और ‘एंटीथीसिस’ का नाम दिया. लेकिन समय को लेकर वह किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सका.

कांट के समय तक भी अधिकांश दार्शनिकों का विचार था कि समय निरपेक्ष और अपरिवर्तनशील सत्ता है. वह अनंत भूतकाल से अनंत भविष्य की ओर अग्रसर है. महाविस्फोट(बिग बैंग) सैद्धांतिकी ने भले ही समय को ब्रह्मांड की उत्पत्ति से पहले मानने से इन्कार कर दिया था, मगर अधिकांश दार्शनिकों का कहना था कि समय अनंत भूतकाल से अनंत भविष्य की ओर अग्रसर है. वह इससे अप्रभावित है कि उसकी पृष्ठभूमि में किसी ब्रह्मांड का अस्तित्व है या नहीं? इन्हीं चुनौतियों ने आइंस्टाइन को समय को चौथा आयाम स्वीकारने के लिए प्रेरित किया था. प्रयोगों के आधार पर आइंस्टाइन ने सिद्ध किया कि समय पर भी ब्रह्मांड की दूसरी गतिविधियों का प्रभाव पड़ता है. समय संबंधी उसके दो प्रयोग चौंकानेवाले थे—पहला यह कि यदि स्रोत और प्रेक्षक दोनों के बीच वेग की स्थिति है और विस्थापन बढ़ रहा है, उस अवस्था में यदि स्रोत टार्च का प्रकार प्रेक्षक पर डालकर देखता है, तो स्रोत और प्रेक्षक के बीच वेग की चाहे जो स्थिति हो, प्रकाशवेग दोनों के लिए एकसमान रहेगा. दूसरा समय की सिकुड़न का विचार था. आइंस्टाइन से पहले माना जाता था कि समय का वेग हर स्थिति में एक ही होता है. मगर आंइस्टान ने अपने सापेक्षिकता के सिद्धांत द्वारा सिद्ध किया था कि यदि अलगअलग पिंडों पर मौजूद दो व्यक्ति समय का आकलन करते हैं और उनमें से एक अतिउच्च वेग, प्रकाशवेग के बराबर से गमितान है तो गतिशील पिंड पर मौजूद प्रेक्षक के लिए समय ठहरा हुआ प्रतीत होगा. यह मानते हुए कि प्रकाश वेग से उच्च वेग असंभव हैं और समय के वेग को प्रकाशवेग से कम आंकने पर दूसरी समस्याएं खड़ी हो सकती हैं, आइंस्टाइन ने समय के वेग को प्रकाशवेग के बराबर माना.

आइंस्टाइन के शोध से आगे बढ़ते हुए पेनरोज और स्टीफन हाकिंग इस नतीजे पर पहुंचे थे कि यदि सापेक्षिकता का सिद्धांत सही है तो ‘परमबिंदू’(सिंगुलैरिटी) की अवस्था भी होनी चाहिए, जिसमें उन्होंने अनंत घनत्व और दिक्काल कर्वेचर वाले ऐसे बिंदू की कल्पना की थी, जहां से समय की शुरुआत होती है. यदि हम समय को प्रकाश जैसा वेगवान मान लेते हैं या फिर हाकिंग के शब्दों में परमबिंदू की कल्पना करने लगते हैं तो, प्रकाश की ही भांति समय भी भौतिक पदार्थ सिद्ध हो जाता है. जैसा निरीश्वरवादी जैन दर्शन मानता है. उसमें समय को अर्धद्रव्य माना गया है. मगर इससे भी शंकाओं का समाधान नहीं हो पाता. क्योंकि द्रव्य हो या अर्धद्रव्य, दोनों ही नश्वर हैं. उस अवस्था में समय को भी एक न एक दिन नष्ट हो जाना चाहिए. परंतु समय ऐसी कोई प्रतीति नहीं देता. वह हमारे चारों और घट रही घटनाओं के रूप में निरंतर अपने होने का एहसास कराता है. यदि ध्यानपूर्वक देखें तो हाकिंग द्वारा प्रस्तुत परमबिंदू की अवस्था घटनाओं की परमशून्यता की स्थिति भी है, जहां समय की परख के लिए संभावनाएं ही समाप्त हो जाती हैं. कुल मिलाकर समय एक पहेली के रूप में हमारे सामने आता है. सुलझाने के लिए यदि हम पीछे की ओर लौटते हैं तो उसकी पैठ सुदूर अतीत में दिखाई पड़ती है. यदि भविष्य की ओर झांकते हैं तो वह हम सबसे कहीं आगे चल रहा मुसाफिर जान पड़ता है.

क्रमशः….

© ओमप्रकाश कश्यप

opkaashyap@gmail.com

समय का दर्शन-दो

सामान्य

कालसैद्धांतिकी

समय को लेकर उपर्युक्त दोनों मान्यताएं प्रेक्षक के सोच और उसकी मनोरचना पर निर्भर हैं. हमारी दृष्टि प्रायः अपने परिवेश की सामान्य गतिविधियों तक सीमित रहती है. समाज, संस्कृति अथवा रोजमर्रा के कार्यकलापों पर चर्चा के दौरान समय के प्रत्यय का जिक्र घटनाचक्र को सहेजने वाले उपकरण के रूप में किया जाता है. उस समय मान लिया जाता है कि रेलगाड़ी के डिब्बों की भांति वह भी प्रखंडों में प्रवाहमान है. सामान्य शब्दावलि इन प्रखंडों को भूत, वर्तमान और भविष्य के रूप में बांचती है, जबकि दर्शन इसे समय की कालसैद्धांतिकी(Tense Theory) कहता आया है. कालसैद्धांतिकी की संकल्पना मनुष्य की व्यावहारिक जरूरत है. यह प्रेक्षकसापेक्ष होती है. जैसे इतिहास के सामान्य अध्ययन के आधार पर हम कह सकते हैं कि 1857 का स्वाधीनता संग्राम तात्या टोपे के लिए उसका ‘वर्तमान’ था. हमारे लिए वह अतीत यानी ‘भूतकाल’ का हिस्सा है. जनसाधारण का समयबोध इसी आधार पर विकसित होता है. अधिकांश बुद्धिजीवी भी यही मानते हैं. लेकिन व्यवहार से परे कालसैद्धांतिकी की क्या प्रामाणिकता है? क्या भूत, वर्तमान और भविष्य की सत्ता वास्तविक है, यह असली प्रश्न है. दूसरे शब्दों में जिसे हम ‘वर्तमान’ कहकर संबोधित करते हैं, क्या वह सचमुच वर्तमान होता है? क्या हम घटनाओं को ठीक उसी क्षण ग्रहण कर पाते हैं, जब वे घटित होती हैं? प्रयोगों की बात करें तो ऐसा संभव नहीं है. घटनाओं के जन्म तथा उनके बोध में प्रयोगसिद्ध अंतर होता है. घटनाओं के प्रेक्षण की हमारी योग्यता ध्वनि, प्रकाश, स्पर्श आदि किसी न किसी माध्यम पर निर्भर होती है. किसी घटना का आकलन दो स्वतंत्र प्रेक्षकों में से एक यदि ध्वनि को आधार मानकर करे, दूसरा प्रकाश कोतो उन दोनों के निष्कर्षों में परस्पर इतना अंतर होगा कि उनपर विश्वास करना कठिन हो जाएगा. हालांकि अपनेअपने निष्कर्ष में दोनों ही सही होंगे. हम कह सकते हैं कि ध्वनि और समय के वेग के तुलनात्मक अध्ययन और गणना के समायोजन से घटना का वास्तविक कालबिंदू तय किया जा सकता है. परंतु क्या इतने भर से काम चल जाएगा? और उसके बाद जो निष्कर्ष प्राप्त होगा, क्या वह पूरी तरह सही होगा? शायद नहीं! इसलिए कि घटनाओं के सामान्य प्रेक्षण के दौरान तीसरे आयाम को प्रायः पूरी तरह भुला दिया जाता है. वह तीसरा आयाम प्रेक्षक का है. जो घटना को देखकर, छूकर अथवा सुनकर उसका अनुभव करता और तदनुसार निर्णय लेता है.

       जिसको हम वर्तमान कहते हैं, समय को लेकर क्या वह ठीक वैसा ही साक्ष्य है जैसा हमें प्रतीत होता है. जिसे हम साधारणतः मान भी लेते हैं? वर्तमान हमारी हालिया अनुभूति से गुजर रही घटनाएं हैं. वे प्रत्यक्ष भी हो सकती हैं और परोक्ष भी. का॓फी हाउस में चाय का आनंद ले रहे व्यक्ति के लिए वहां की अंदरूनी हलचलों के अलावा, वहां लगे टेलीविजन सेट पर राष्ट्रपति के अभिभाषण का सजीव प्रसारण वर्तमान है. मैं इस लेख को कंप्यूटर पर टाइप कर रहा हूं, यह मेरा वर्तमान है, और इसको लेकर संदेह की गुंजाइश नहीं है. समस्या वर्तमान के सटीक आकलन को लेकर है, जो वर्तमान के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े कर देती है. कदाचित आश्चर्यजनक मगर विज्ञानसम्मत तथ्य है कि वर्तमान जैसी कोई चीज नहीं होती. हम सदैव भूतकाल में वास करते हैं. मान लीजिए कि कोई व्यक्ति एक साथ अपने दाएं हाथ से अपनी कान एवं बाएं हाथ द्वारा पैर के अंगूठे का स्पर्श करता है. वह सामान्यतः यही दावा करेगा कि उसने दोनों कार्य एक साथ, एक ही क्षण में किए हैं. कान और पैर के अंगूठे दोनों को एक साथ छुआ है. उसकी गतिविधि पर नजर रख रहा पर्यवेक्षक इसकी पुष्टि आसानी से कर सकता है. संभव है उस व्यक्ति ने कान और पैर दोनों को सचमुच एक ही कालबिंदू पर छुआ हो. लेकिन छूने का बोध हमारे वास्तविक संवेदनतंत्र यानी मस्तिष्क की निर्णय प्रक्रिया पर निर्भर करता है. दोनों घटनाएं भले ही किसी एक क्षण में घटी होंलेकिन हमारा मस्तिष्क, यदि वह सूक्ष्मतम अंतराल को पकड़ लेने में सक्षम हो तो, उन्हें अलगअलग क्षणों में घटी घटना बताएगा. आखिर क्यों? इसलिए कि स्पर्श और उसकी अनुभूति दोनों भिन्न घटनाएं हैं. स्पर्श का संबंध हमारे हाथ अथवा शरीर के उस हिस्से से है, जो किसी वस्तु के संपर्क में आता है. जबकि अनुभूति उस स्पर्श की तरंगों के मस्तिष्क तक पहुंचने के बाद वहां हुई हलचल है. अतः उपर्युक्त घटना में प्रेक्षक को भले ही लगे कि दोनों हाथों द्वारा किया गया स्पर्श किसी क्षणविशेष में घटी घटनाएं हैं. इसके बावजूद मस्तिष्क जो निर्णय देगा वह वास्तविकता से परे होगा. इस कारण कि कान मस्तिष्क के निकट है. अतः उसके स्पर्श से बने संकेत को मस्तिष्क तक पहुंचने में पैर के स्पर्श से बने संकेत की अपेक्षा कम समय लगता है. इसलिए मस्तिष्क कान के स्पर्श को प्रारंभ में घटी घटना बताएगा. दोनों के बीच लगभग 80 मिली सैकिंड का अंतराल होगा. यह अंतराल प्रयोगों द्वारा प्रमाणित है. स्वतंत्र पर्यवेक्षक इन घटनाओं का अवलोकन प्रकाश के माध्यम से करेगा. उसकी अनुभूति घटनास्थल से उसकी भौतिक दूरी पर भी निर्भर करेगी.

       चूंकि प्रकाश एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने में समय लेता है, इसलिए जिस समय घटना का संदेश प्रकाश के जरिये पर्यवेक्षक तक पहुंचेगा, घटना उससे कुछ क्षण पहले ही संपन्न हो चुकी होगी. घटनास्थल से अलगअलग दूरी पर खड़े दो पर्यवेक्षक यदि उसका अवलोकन करें तो दोनों द्वारा अभिव्यक्त घटना का ‘वर्तमान’ अलगअलग होगा. वह घटना के वास्तविक समय से पूरी तरह भिन्न होगा. चूंकि हम बहुत छोटे कालखंडों का हिसाबकिताब रखने में प्रवीण नहीं हैं, इसलिए प्रायः ऐसे अंतराल हमारे मस्तिष्क की पकड़ में नहीं आते. खासकर प्रकाश वेग जैसे उच्चतम वेग. परिणामस्वरूप हम उनकी अनजाने ही उपेक्षा करते जाते हैं. आम जीवन में इससे कुछ बिगड़ता भी नहीं है. पर यदि घटनास्थल और प्रेक्षक के बीच की बहुत लंबी दूरी हो, अरबोंखरबांे किलोमीटर का अंतराल हो तो वर्तमान की संद्धिग्धता एकदम साफ नजर आने लगती है. खगोल वैज्ञानिक बताते हैं जिन तारों को देखकर हम उनके अस्तित्व का आकलन करते हैं, संभव है वे आज जीवित ही न हों. सैकड़ोंहजारों वर्ष पहले ही नष्ट हो चुके हों. उस समय उनसे निकला प्रकाश हम तक पहुंचने में सैकड़ोंहजारों वर्ष बाद पहुंचा हो. इसलिए घटना के प्रेक्षण के लिए आइंस्टाइन ने समय को चौथे आयाम के रूप में स्वीकार किया है, जिसके अनुसार वह घटनाओं के आकलन के लिए समय को ध्यान में रखने का सुझाव देता है. वही आइंस्टाइन मानते हैं कि वर्तमान जैसी कोई चीज नहीं होती. हम भूतकाल में जीते हैं. इसे यों भी कह सकते हैं कि जब तक वर्तमान का अनुभव करते हैं, वह भूतकाल में ढल चुका होता है. प्रेक्षण को अभिव्यक्ति की अवस्था तक आतेआते हमारे मस्तिष्क और उसकी निर्णय प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है. उस अवस्था में जिसे हम वर्तमान मानते हैं, वह भूत में बदल जाता है. जीवन और प्रकृति को लेकर यह अनिश्चितावादी द्रष्टिकोण ईसा पूर्व पांचवी शताब्दी के दार्शनिक हेराक्लाइट्स के विचारों से मिलताजुलता है. वह पानी को परमतत्व मानता था. नदी के प्रवाह को देखकर जो अनुभूति उसके मनस में कौंधी, उसने माना कि संसार सबकुछ परिवर्तनशील है. कुछ भी निश्चित नहीं है. जल की भांति प्रवाहमान है. हम एक ही नदी में दूसरी वार पांव नहीं रख सकते. हेराक्लाटस तत्ववादी विचारक था, जिसने सृष्टि की विराटता से प्रभावित हुए बिना उसके सूक्ष्म रूप की चंचलता को पहचाना तथा उसके भीतर मौजूद अस्थिरता पर कटाक्ष किया था. आधुनिक विज्ञान की क्वांटम थ्योरी पदार्थ के इस अस्थिरतावादी गुण पर वैज्ञानिकता की मुहर लगाती है. उसके अनुसार परमाणु की कक्षा में दौड़ रहे इलेक्ट्रान का किसी एक क्षण में उसके सुनिश्चित ठिकाने का पता लगाना असंभव है, केवल उसके संभावित क्षेत्र का आकलन किया जा सकता है. यह संदेह समय के मापन से लेकर उसके अस्तित्व तक बना रहता है.

        प्रश्न उठता है कि जब वर्तमान की सत्ता नहीं है तो भविष्य और भूतकाल की सत्ता कैसे संभव है? उपर्युक्त विश्लेषण से एक सामान्य निष्कर्ष यह निकलता है कि हमारा समयबोध घटनाओं के प्रेक्षण से बनता है. जिन घटनाओं का अनुभव हम स्वयं नहीं कर पाते, उनके लिए दूसरों के अनुभव अथवा बोध का लाभ उठाते हैं. इतिहास जिसे हम विगत का दस्तावेज कहते हैं, वह दूसरों के समयबोध का संकलनमात्र है. पुस्तकें दूसरों के समयबोध से परचाने का बेहतरीन माध्यम हैं. अपने अनुभवअन्वीक्षण की सीमाओं के चलते हम किन्हीं घटनाओं के अंतराल को ही पकड़ पाते हैं. दो घटनाओं के बीच के अंतराल के मापन की प्रत्येक समाज की अपनी प्रविधियां और पैमाने होते हैं. घटनाओं की आवृति तथा उनके क्रम के निर्धारण हेतु अंतराल की परख अनिवार्य होती है. इस अंतराल का अंकन स्मृति एवं संदर्भों द्वारा घटनाओं को उनके सही क्रम में सहेजने के लिए किया जाता है. यह वस्तुतः दो स्वतंत्र घटनाओं के बीच की अवधि है. अपने चारों ओर घट रही दृश्यअदृश्य सहस्रों किस्म की घटनाओं के क्रम को पहचानने एवं उनके आकलन के लिए हम इसे भाषासंकेत भी कह सकते हैं. संक्षेप में दो घटनाओं के बीच का अंतराल ठीक ऐसी ही आभासी रचना है जैसे बाग में खड़े दो वृक्षों के बीच आकाश. जिसका महत्त्व केवल घटनाओं की स्वतंत्र पहचान तक सीमित है.

       अगर समय की सत्ता ही संद्धिग्ध है तो समयबोध क्या है? यह बोध जन्म कैसे लेता है? इसको समझने के लिए आप घटनाओं की शृंखला की कल्पना कीजिए. उनमें कुछ घटनाएं भूतकाल की होंगी, बहुत पीछे गुजर चुकी घटनाएं. कुछ हाल के भूतकाल की होंगी, जो अभीअभी गुजरी हैं. कुछ घटनाएं ऐसी होंगी जो वर्तमान में भी जारी हैं. परंतु उनका एक हिस्सा भूतकाल में प्रवेश कर चुका है. और दूसरा हिस्सा अभी भविष्य का गिरफ्त में है. ये सब घटनाएं हमारे ही अंतरिक्ष में घट रही हैं. उसी अंतरिक्ष में मौजूद हम उनके दृष्टा या भोक्ता हैं. जो घटना सुदूर अतीत में बीत चुकी है, वह हमारे मनस् पर सूचना अथवा स्मृतिप्रभाव के रूप में विद्यमान है. वे हमारे किसी पूर्वज अथवा पूर्वज के पूर्वजों के अनुभव का हिस्सा भी हो सकती है, जो संचरण के किसी मान्य तरीके से हम तक पहुंची हो. हमारा मस्तिष्क किसी भी प्रसंग, घटना, वस्तु या विचार के संपर्क में आने के साथ ही सक्रिय हो उठता है. स्वाभाविक रूप से वह उन्हें दूसरी घटनाओं, प्रसंगों आदि के साथ संयोजित करता है तथा उनके बीच संबंध सेतु बनाने की कोशिश करता है. आवश्यकता पड़ने पर वह उन्हें सुदूर अतीत, कुछ देर पहले अतीत और हाल के अतीत की घटनाओं के क्रम में लौटाता है. उससे हम जान जाते हैं कि कोई घटना किसी अन्य घटना से कितनी आगे अथवा पीछे घटी थी. यह बोध मन में समय नाम के काल्पनिक आकाश का निर्माण करता है, जिसमें विभिन्न घटनाएं विशिष्ट अनुक्रम से बंधी होती है. इस अनुक्रम को हम समयांतराल से बांटते हैं, वह विभिन्न घटनाओं, प्रसंगों के बीच वह रिक्त अंतराल है, जिसे मस्तिष्क उन घटनाओं, प्रसंगों को एक दूसरे से अलग, विशिष्ट और उनका क्रमानुक्रम दर्शाने के लिए बनाता है. भूतकाल के बारे में हम वहीं तक कल्पना कर पाते हैं, जहां तक हमारी स्मृति में घटनाओं का सिलसिला जाता है. दूसरे शब्दों में घटनाओं के अनुक्रम अथवा उनकी ऐतिहासिकता से परे हमारे लिए समय का कोई बोध नहीं होता. उदाहरण के लिए अंतरिक्ष विस्फोट, सृष्टि का विकास, मानव सभ्यता का जन्म आदि हमारे लिए केवल सूचनाओं का संकलन है. चूंकि हमारा मस्तिष्क उन घटनाओं से अब तक की अरबोंखरबों घटनाओं को याद रखने, उनकी विशेषताओं को सहेजने तथा उनके बीच तारतम्यता बनाने में अक्षम है, इसलिए इतनी बहुत लंबी अवधियों को लेकर हमारा समय(अथवा अंतराल)बोध शून्य होता है. इसके बरक्स किसी वस्तु या व्यक्ति का घंटे भर का अंतराल हमें भारी पड़ने लगता है. इसलिए कि प्रतीक्षा के दौरान हमारा मस्तिष्क आसपास के परिवेश एवं घटनाओं के प्रति तुलनात्मक रूप में अधिक सक्रिय होता है. इसलिए उसको लेकर हमारा समयबोध भी सघन होता है. इस तरह जिसको हम अतीत अथवा भूतकाल कहते हैं, वह हमारी स्मृति की व्यापकता और उसकी सीमाओं को दर्शाता है. तदनुसार समय स्वतंत्र सत्ता न होकर केवल हमारी मनोरचना है.

       समयबोध को समझने के लिए एक और उदाहरण देखते हैं. मान लीजिए एक व्यक्ति को नीचे तहखाने में एकसमान परिस्थितियों के बीच रखा गया है. बाहरी संसार से उसका संपर्क कटा हुआ है. कमरे में सदैव एक जैसी तीव्रता का प्रकाश बना रहता है. व्यक्ति की अपनी गतिविधियां भी शून्य हैं. आसपास का परिवेश भी आदर्श की अवस्था तक स्थिर है. इससे उसकी शारीरिक मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य पर जो नकारात्मक असर पड़ेगा, उसे हम भुलाए देते हैं. लेकिन एक जैसी परिस्थिति में रहने के बावजूद व्यक्ति का समयबोध सुरक्षित रहेगा. भले ही वह दिनरात का अनुमान लगा पाने में अक्षम हो. उस अवस्था में उसका समयबोध उसकी धड़कनों तथा उन शारीरिक क्रियाओं से निर्मित होगा, जिनसे उसका जीवन आबद्ध है. इस बारे में कम से एक बात तो विश्वास के साथ कही जा सकती है कि घटनाएं समय की प्रतीति का माध्यम हैं. उनके बिना समय की अनुभूति असंभव है. वैज्ञानिक समय को मापने के लिए घटनाओं के वेग को आधार बनाते हैं. अब जैसे गति के नियम को देखिए. उसके अनुसार किसी कालखंड विशेष में किसी वस्तु ने जो दूरी तय उसको उसके वेग से भाग कर दिया जाए तो समय आ जाता है. यह तो हुई वेगवान वस्तु के समय के आकलन के बारे में. परंतु यदि कोई वस्तु स्थिर है तो समय का आकलन उसके आसपास घट रही घटनाओं के वेग से निर्धारित होता है.

      हमने देखा कि सटीक वर्तमान एक संद्धिग्ध अवधारणा है, हम केवल भूतकाल में जीते हैं और भूतकाल वह प्रभाव है जिसे मानवस्मृति विभिन्न घटनाओं की प्रवृत्ति, आवृति तथा उनके अन्यान्य लक्षणों के आधार पर उन्हें मस्तिष्क में सहेजकर रखती है, ताकि उसमें दर्ज घटनाओं का क्रम और उनका अंतराल जाना जा सके. बीतने के बाद घटना स्मृति का हिस्सा बन जाती है. मगर जो घटना अभी तक घटी ही नहीं है, जो अभी अवतरित होनी है, यानी भविष्य उसके बारे केवल कल्पना ही की जा सकती है. सृष्टि में घटनाएं सामान्यतः चक्रीय क्रम में घटती हैं. जैसे सूरज का उदयअस्त होना, बीज का वृक्ष बनना और पुनः बीज बन जाना. ग्रहनक्षत्रों की यात्रावलियां. प्रत्येक घटना अपने आप को दोहराती है. पुनरावृत्ति के इस सिद्धांत की सहायता से हम भविष्य की घटनाओं का कल्पना सकते हैं, अनुभव के आधार पर उनके सच होने का दावा भी कर सकते हैं, लेकिन कोई घटना हमेशा पूर्वनिर्धारित क्रम में ही होगी, ऐसा दावा करना किसी भी घटना, किसी भी व्यक्ति के लिए असंभव होगा. किसी घटना के सच होने की संभावना पर्याप्त हो सकती है. इसके बावजूद दावे के साथ यह कोई नहीं कह सकता कि भविष्य की घटना का वही रूप होगा, जैसा वह अब तक देखने में आया है. इस तरह भविष्य केवल हमारी कल्पना की चीज बनकर रह जाता है. हम भविष्य की कल्पना घटनाओं से सिलसिले से बाहर नहीं कर पाते. इसके प्रतिवाद में यह कहा जा सकता है कि सूर्य प्रतिदिन निकलता है, करोड़ों वर्ष से यही होता आ रहा है. इसलिए यह संभावना व्यक्त की जा सकती है कि निकट भविष्य में कुछ बदलने वाला नहीं है. कोई भी यह दावा कर सकता है कि सूरज अगले दिन भी पूर्व दिशा से ही निकलेगा. ठीक है यह दावा कुछ क्षण के लिए स्वीकारा जा सकता है, मगर ऐसा हमेशा, युगयुगांतर तक होता रहेगा, यह कहना मूर्खता ही होगी. किसान धान की लहलहाती हुई फसल को देखकर अनुमान लगाता है कि इतने महीने या दिन के बाद फसल पककर उसके खलिहान में होगी. उसका यह बोध उसके अनुभव के आधार पर बनता है. इसलिए भूतकाल यदि मस्तिष्क का अतीत में स्मृति वितान है तो भविष्य की परिकल्पना मनुष्य की कल्पनावीथि है. जिसके पीछे मनुष्य के अनुभवों का योगदान होता है.

       यदि समय का अस्तित्व ही संद्धिग्ध है तो समयबोध की अनुभूति का कारण? व्यवहार में हम देखते हैं कि रोज सूरज प्रातः एक ही क्रम में उपस्थित होकर दस्तक देता है. फूल एक अवधि के बाद खिल जाते हैं. रात होते ही तारे झिलमिलाने लगते हैं. यानी हम हम पल यह एहसास बना रहता है कि कुछ बीत रहा है. इस अनुभूति से हम कभी मुक्त नहीं हो पाते. यदि यह मान लंे कि कुछ है जो बीत रहा तो वह बीतने वाली चीज यदि समय नहीं तो क्या है? क्या वह महज हमारी मानस रचना है? यह एक जटिल सवाल है? यह प्रश्न तब जन्म लेता है जब हम स्वयं को प्रकृति से अलग मानकर स्वतंत्र प्रेक्षक की भांति उनका अवलोकन करते हैं. घटनाओं की शृंखला हमारी स्मृति पर जो अनुक्रम अंकित करती है, उसको हमारी बुद्धि अपने विवेक से अलगअलग संयोजित रखती है. अरस्तु का मानना था कि मनुष्य अपने परिवेश से निर्मित है. मनुष्य अपने वातावरण से जो सीखता है. जो वह देखताभोगता है वह स्मृति के माध्यम से उसके मस्तिष्क में सुरक्षित हो जाता है. मस्तिष्क इसी अनुभव सामग्री का संश्लेषण विश्लेषण कर मस्तिष्क निर्णय लेता है. कभीकभी कल्पनाएं भी अपना खेल खेलती हैं. तब मनुष्य अपने मस्तिष्क द्वारा घटनाओं की शृंखला अभिकल्पित करता है. घटनाओं का वेग, उनकी तारतम्यता, घटने के सिलसिले का अनुभव करते हुए हम जिस प्रभाव से गुजरते हैं, वह समय कहलाता है, जो पूरी तरह घटनाओं की स्मृति, उनके प्रभाव पर निर्भर करता है. यदि यह स्मृति न हो तो समयबोध बनने का आधार ही न रहे. लंबा जीवन जी चुके व्यक्ति को अपना बचपन कल की बात लगने लगती है, इसलिए कि जीवन के प्रवाह में वह उन अनेक घटनाओं को विस्मृत कर चुका होता है, जो उसके समयबोध का कारण थीं. अंतरिक्ष विस्फोट, पृथ्वी का जन्म, पुरापाषाण काल, प्रस्तर युग हमारे लिए केवल सूचनाएं हैं. इसलिए कि हमारी स्मृति इन घटनाओं के प्रभाव से अछूती है. सुप्तावस्था में हम समयबोध की जन्मदाता घटनाओं से कट जाते हैं. इसलिए शरद ऋतु की सुदीर्घ रात्रियां एक झटके में बीत जाने की अनुभूति देती हैं. लेकिन यदि हम किसी की व्यग्र प्रतीक्षा में तो समय का हर पल हमें छूकर जाता है. पलपल की घटनाओं पर हमारी नजर होती है. तब समय की अनुभूति हमारे लिए लंबी हो जाती है. यदि समय हमारी अनुभूति से बाहर की चीज है, यदि वह निरपेक्ष सत्ता है तो उसकी अनुभूति हमारे परिवेश से एकदम स्वतंत्र होनी चाहिए. घटनाओं को उनके स्वतंत्ररूप में पहचानने का सामथ्र्य पशुओं में भी होता है. परंतु उनकी स्मृति उतनी जोरदार नहीं होती कि वह घटनाओं को उनकी संपूर्ण विविधताओं के साथ अलगअलग, लंबे समय तक सहेजकर रख सके. इसलिए उनका समयबोध उनकी रोजमर्रा की चेतना से अधिक नहीं होता. टोगार्ट के अनुसार समय के स्वतंत्र अस्तित्व के लिए घटनाओं से समय की प्रतीति होने के बजाय समय से घटनाओं की प्रतीति होना आवश्यक है. लेकिन समय से घटनाओं की प्रतीति का कोई प्रमाण हमारे पास नहीं है. यदि हम यह माने कि घटनाएं समय की अनंतता में घटित होती हैं, तो हमें ब्रह्मांड के भीतर एक और ब्रह्मांड की असंभवसी परिकल्पना करनी होगी. समय और ब्रह्मांड दोनों के अस्तित्व को समान महत्त्व दिए जाने से कई बारे हमारे निष्कर्ष गड्डमड्ड हो जाते हैं. उस अवस्था में हमें एक अनंत के बीच दूसरे अनंत की कल्पना करती पड़ती है. लेकिन किस ‘अनंत’ में कौनसा ‘अनंत’ समाया हुआ है, कौन आगे है कौन पीछे, यह निर्णय हम कभी नहीं कर पाते. संक्षेप में समय की परिकल्पना उसकी प्रतीति की मूलाधार घटनाओं की परिकल्पना के बगैर असंभव है. इसलिए स्टीफन हाकिंग जैसे वैज्ञानिक समय का इतिहास लिखते समय दरअसल ब्रह्मांड का इतिहास ही बता रहे होते हैं.

क्रमश…..

© ओमप्रकाश कश्यप

समय का दर्शन

सामान्य

[समय की सत्ता को लेकर करीब आठदस वर्ष पहले दिमाग में कुछ सवाल उमड़े थे. उनका आग्रह इतना प्रबल था कि तत्काल ‘समय की असत्ता’ शीर्षक से लेख लिखा था. लेख लंबा था. दार्शनिक विषयों पर लिखे लेखों के लिए समाचारपत्रों में स्थान का वैसे ही अभाव होता है, इसलिए वह वर्षों तक पड़ा रहा. इस बीच जब भी लेख की पांडुलिपि पर नजर पड़ती, मन में उसको दुबारा पढ़कर उपयुक्त स्थान पर छपवाने का लालच उमड़ने लगता. पर कभी एकाग्रता की कमी तो कभी अन्य व्यस्तताएं, पढ़ना, संशोधन करना संभव न हो पाता था. इस तरह समय वर्ष दर वर्ष खिसकता गया. अब यह मन हुआ है कि इसको ‘आखरमाला’ के माध्यम से अपने पाठकों के साथ बांट सकूं. इसलिए इस लेख को धारावाहिक रूप में दिया जा रहा है. हमारे यहां विशुद्ध दार्शनिक बहसों की गुंजाइश कम ही है. इंटरनेट पर तो इसके अवसर और भी कम हैं. पर यदि ऐसा हुआ तो मेरा मनोबल बढेगा. उम्मीद है कि लोग इसे पढ़कर अपने विचारों से अवगत कराएंगेलेखक]


समय: पारंपरिक दृष्टिकोण

समय सबसे बड़ा छलिया होता है. मेहरबान हो तो दुनियाभर की सल्तनत बख्श दे. रूठ जाए तो चैहद्दी के राजपाट समेत डुबा दे. इस जैसा न तो कोई दयालु, न बेहरम. न इससे असरदार कोई मरहम. न इससे धारदार कोई हथियार….

समयसा कोई करीबी नहीं!

समय से बड़ा बहरूपिया भी नहीं.

समय से कभी मत लड़ना.

समय को चुनौती मत देना.

समय पर कभी भरोसा न करना.

हर आदमी यही कहता है. चाहता है कि समय से बचकर रहे. उसे कभी अनदेखा न करे. बूढ़ी होती पीढ़ी कामना करती है कि उसका समय ज्यों का त्यों बना रहे….आने वाली पीढ़ियों पर समय की सदा मेहरबानी रहे. समय पर सब काम पूरे हों. समय का सब लाभ उठाएं.

आने वाला समझता है कि जाने वाली पीढ़ी अपने हिस्से का समय इस्तेमाल कर चुकी. अब उसकी बारी है.

जाने वाला सोचता है कि उसकी यादें और समय ज्यों का त्यों उसके बाद भी बना रहे.

बड़ेबड़े मनीषी कह गए हैं—

समय को समझना आसान नहीं!

फिर भी कोशिश है कि कभी थमती ही नहीं….

आदमी समय से डरता, साथसाथ बढ़ता है. समय क्या है, कोई नहीं जानता. समय है यह सब मानते हैं. आदमी भगवान पर भरोसा भले कर ले, समय पर कभी विश्वास नहीं लाता. डरता है, वह जाने कब, किस ओर पलटनिया खा जाए.

समय की अवधारणा

समय को लेकर कुछ ऐसी ही अवधारणा, ऐसे ही विचार जनमानस में व्याप्त हैं. कुछ लोग समय को इतिहास कहकर संतुष्ट हो जाते हैं, कुछ के लिए वह निस्सीम विस्तार है. ग्रह, नक्षत्र, चांदसितारे, धरतीअंबर और न जाने कितने ब्रह्मांड उसमें समाए हुए हैं. कुछ ऐसे भी हैं जो समय को बहती धारा मानते हैं. भूतवर्तमान और भविष्य की चिरतरंगिणी. अदृश्य प्रवाह जो ब्रह्मांड की समस्त हलचलों, ग्रहनक्षत्र, नीहारिकाओं, नदियों, महासागरों के साथसाथ गतिमान है. वैज्ञानिकों और वुद्धिजीवियों की बात अलग है. वे समय को लेकर गुणाभाग करते रहते हैं. आम आदमी का उससे संबंध भावनात्मक ही होता है. उसमें उसका डर भी समाया होता है. उम्मीदें होती हैं तो वे भी डरीसहमी.

समय की अवधारणा कब जन्मी, यह ठीकठीक बता पाना संभव नहीं. सिर्फ कल्पना की जा सकती है कि आदमी ने जब सूरज को समय पर उगते और डूबते देखा. तारामंडल की उदयअस्त होती कलाबाजियां देखीं. बालक को जन्मते, बड़ा होते, फिर बूढ़ा होकर मौत के गाल में समाते हुए पाया. तब उसने माना कि कुछ है जो कभी उसके साथ चलता है, तो कभी उसको पीछे ढकेल आगे निकल जाता है. जो अंतरिक्ष की तरह सर्वव्यापी, नदी की तरह पलपल प्रवाहमान है. जिसका कोई ओर है न छोर. इस अनुभूति को उसने समय का नाम दिया. यह संज्ञा इतनी मनोहारी थी कि आगे जो भी दार्शनिक और विचारक आए, सभी ने उसकी पुष्टि की. वैज्ञानिकों तक की हिम्मत न हुई कि समय की परिकल्पना को चुनौती दे सकें. दार्शनिकों ने समय के बारे में तरहतरह की परिकल्पनाएं प्रस्तुत कीं. आस्थावान लोगों ने उसे परमतत्व का विस्तार मानकर उसका भांतिभांति से महिमा मंडन किया. दार्शनिकों ने उसके आधार पर जीवनरहस्यों की व्याख्या की, तो कुछ कथित भौतिकवादी दर्शनों ने उसकी सत्ता को ही चुनौती दे डाली. इन परस्पर विरोधी विचारधारों के बीच कुछ प्रश्न लगातार सिर उठाए रहे—माना कि समय है, उसकी प्रतीति है….पर वह है क्या? कब उसका जन्म हुआ? ब्रह्मांड के साथ अथवा उससे पहले? यदि पहले तो कितना? समय क्या घड़ी की टिकटिक, नदी की कलकल की भांति आगे बढ़ने वाला प्रवाह है? अथवा ऐसी निस्सीम सत्ता जिसमें घड़ी की टिकटिक, नदी की कलकल, चांद, सितारे, सूरज, ग्रहउपग्रह जैसी ब्रह्मांड के कोटिक कोटि पिंड समाए हुए हैं? समय की प्रतीति घटनाओं के माध्यम से होती है, तो क्या वह घटनाओं की अन्वति मात्र है? घटनाएं समय में बीतती हैं या घटनाओं में समय की उलटबांसी चलती है? अगर वह घटना नहीं है तो उसकी प्रतीति का आधार क्या है? क्या घटनाओं से बाहर समय की अनुभूति संभव है? समय और समयबोध में अंतर क्या है? क्या समय और समयबोध दोनों साथसाथ जन्मे? यदि नहीं तो उनके बीच अंतराल कितना है? दोनों में पहले कौन जन्मा? मानवमन में हजारों वर्ष पहले कौंधे ये प्रश्न आज तक उसी तरह बने हुए हैं. संतोष है तो बस इतना है कि प्रश्न का होना भी कम नहीं होता. समस्या हो तो मानवीय जिज्ञासा समाधान कभीकभी खोज ही लेती है.

समय की कथित व्युत्पत्ति को लेकर वैज्ञानिकों के अलगअलग विचार हैं. स्टीफन हाकिंग समय की उत्पत्ति को ब्रह्मांड के जन्म से जोड़ते हैं. शायद इसलिए कि ब्रह्मांड से पहले समय की परिकल्पना का कोई ठोस आधार उन्हें नजर नहीं आता. यदि समय की व्युत्पत्ति को पहले मान लिया जाए तब एक और ब्रह्मांड की परिकल्पना करनी पड़ेगी. फिर यह सिलसिला अनंत तक चलता जाएगा. इसलिए समय के इतिहास के बहाने वे दरअसल ब्रह्मांड का इतिहास ही बता रहे होते हैं. ब्रह्मांड की व्याख्या के लिए समय की अवधारणा क्यों जरूरी है? यह प्रश्न मन में कौंधता है. जानना अपेक्षित भी है. मगर वे इस बारे में कुछ नहीं कहते. इससे यह सामान्य निष्कर्ष तो निकाला ही जा सकता है कि समय की प्रतीति घटनाओं से जुड़ी है. घटनाएं न हों तो समय की कोई जरूरत ही न रहे. मनुष्य होश संभालते ही घटनाओं के प्रवाह में स्वयं को पाता है. उन्हीं का अवलोकन करते, हिसाबकिताब रखते हुए समय का प्रत्यय उसके अवचेतन में अनायास पैठ जाता है. इतना गहरा और स्थायी कि उसके प्रभावक्षेत्र से बाहर आ पाना जनसाधारण तो क्या अच्छेअच्छों के लिए संभव नहीं होता. कह सकते हैं कि समय की प्रतीति प्राणी चेतना के आरंभिक बिंदू से जुड़कर अंत तक बनी रहती है.

समयबोध ने ही जीवन की नश्वरता के विचार को जन्म दिया. आदमी को लगा कि कुछ है जिसमें सब कुछ बीत रहा है. यहां तक कि उसका जीवन भी. जो इतना शक्तिशाली है कि बड़े से बड़े पहलवान को एक ही झटके में धूल चटा दे. और इतना व्यापक भी कि ब्रह्मांड की एक भी घटना उससे बाहर नहीं. समय की अनिश्चितता के बोध ने डर को जन्म दिया. डर ने अमरत्व की कल्पना को. जरामरण से घबराए इंसान ने समय को ताकतवर सत्ता मान लिया गया. समय की मेहरबानी बनी रहे इसके लिए मनौतियां मांगी जाने लगीं. भयभीत मनुष्य समय से दोस्ती गांठने, उसके साथ सातत्य बनाए रखने की कोशिश करने लगा. समय के साथ बने रहने की चाहत ने पुनर्जन्म की कल्पना को जन्म दिया. उसके चंगुल से पार छिटक जाने की चाहत का नाम मोक्ष पड़ा. वह अमरत्व की ऐसी कल्पना थी, जिसपर समय की मार बेअसर थी. समय के साथ बने रहना. उसको दौड़ में मात दे देना पुरुषार्थ का प्रतीक मान लिया गया. उसके साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ने वाले निष्प्रह पुरुषार्थी को कर्मयोगी कहा गया. चूंकि समय के संग दौड़ में बने रहना, सभी के लिए सदैव संभव नहीं होता, इसलिए स्वार्थी पंडाओं ने भाग्य, प्रारब्ध, कपालरेख, नियतिचक्र जैसे भ्रमों की परिकल्पना की. फलित ज्योतिष का गूदा स्वयं खाकर गुठलियां वे जनसाधारण में बांटने लगे. निराशा से उबरने के आदमी जबतब उनकी शरण लेने लगा. भाग्य कर्महीनों की शरणस्थली बना, पुरुषार्थ कर्मयोगियों की पहचान.

समय दोनों के लिए अबूझ पहेली बना रहा.

मानव जीवन समय से अनुशासित है. तो क्या समय की संकल्पना मनुष्य की सामाजिकता का निकष् है? क्या अकेले व्यक्ति का भी कोई समय होता है? शायद नहीं; या शायद हां. अकेले व्यक्ति के लिए भी घटनाएं होंगी. उन्हें देखकर उसको अपने आसपास गतिशीलता का आभास होगा. इससे वह वर्तमान को अपने सामने से गुजरते हुए देखेगा. लेकिन अकेले व्यक्ति को स्मृति की जरूरत शायद ही पड़े. स्मृति न रही तो घटनाओं की तारतम्यता का बारीक हिसाबकिताब वह किसके लिए रखेगा! यदि रखेगा भी तो सबकुछ गड़बड़ा भी सकता है. इसलिए कि उसके निर्णय और बोध को चुनौती देने वाला कोई न होगा. अकेले व्यक्ति का समयबोध हुआ भी तो वह सामूहिक समयबोध से काफी भिन्न और सीमित होगा. वह कुछ ऐसा होगा जैसी पशुपक्षियों की अंतश्चेतना, जो अपनी जैविक आवश्यकताओं के आधार पर सौर दिवस में प्रकृतिचक्र से तालमेल बनाए रखते हैं. दिन की पहली झलक के साथ जिन्हें भोजन की चिंता सताने लगती है. प्रकृति के निरंतर साहचर्य में रहते हुए वे अपनी जैविक आवश्यकताओं और परिवेश के बीच सामंजस्य स्थापित कर लेते हैं. अंबर से उतरता उजाला देखते ही चिड़ियाओं में उड़ान भरने का हौसला आ जाता है. पशु अपनेअपने काम की ओर निकल जाते हैं.

समयबोध को बनाए रखने में मानव स्मृति का कम योगदान नहीं है. स्मृति घटनाओं को सहेजने का दायित्व निभाती है. मनुष्य के आसपास जो घटनाएं घटती हैं, स्मृति उन्हें एकएक कर दर्ज करती जाती है. मानवमस्तिष्क में वे अपने स्वरूप एवं क्रमानुक्रम के साथ दर्ज होती जाती हैं. यह क्रमानुक्रमता ही समयबोध के रूप में विकसित होती है. बातचीत के दौरान सामने वाला व्यक्ति उन घटनाओं को उसी क्रमानुक्रम में ग्रहण करता है. इसलिए घटना के साथ उससे जुड़ा समयबोध भी बड़ी आसानी से दूसरे के मनमस्तिष्क पर छा जाता है. अकेलेपन की अवस्था में ऐसा समयबोध अस्थायी होगा. तब व्यक्ति घटनाओं का प्रेक्षक भर होता. क्योंकि उपयोग न होने के कारण उसकी स्मृति शायद ही विकसित हो. तो क्या यह मान लिया जाए कि मनुष्य का समयबोध उसकी सामाजिकता की उपज है? अपने अनुभवों को दूसरे पर प्रामाणिकता से सौंपने के लिए मनुष्य समयबोध की सहायता लेता है. अथवा जैसे सिनेमा अलगअलग चित्र अपनी क्रमानुक्रमता में एक कहानी का प्रभाव पैदा करते हैं, समय वैसी ही कल्पना है? समय का सामाजिक बोध की उपज होना उसकी व्यावहारिकता को सिद्ध करता है. और व्यवहार से परे? समय के बारे में पहला वस्तुनिष्ठ चिंतन बौद्ध दर्शन में मिलता है. पश्चिम विचारकों में संदेहवादी दार्शनिक भी हुए जिन्होंने प्रकारांतर उसके अस्तित्व पर सवाल उठाए, लेकिन समय के बारे में पहली बार सुनिश्चित चिंतन बीसवीं शताब्दी में आरंभिक दशकों में आया. उसके पीछे आइंस्टाइन के सापेक्षिकतावाद की प्रेरणा थी. ध्यातव्य है कि आइंस्टाइन ने समय को चैथा आयाम मानते हुए उसकी शाश्वत सत्ता में विश्वास प्रकट किया था.

समय के बारे गंभीर चिंतन बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दर्शनों में सामने आया. सर्वप्रथम जिस दार्शनिक ने इसपर वस्तुनिष्ठ ढंग से विचार किया उसका नाम था—जान इलिस मेक टोगार्ट. हीगेल से प्रभावित टोगार्ट ने समय की सत्ता पर सवाल उठाए. अपने लेख ‘अनरीयल्टी आफ टाइम’ में एक के बाद एक, अकाट्य तर्क देते हुए टोगार्ट ने उसकी मौजूदगी को नकारा. समय के बारे में समाज में प्रचलित धारणाओं के आधार पर समयबोध को उसने दो श्रेणियों में बांटा. जिसको उसने ‘ए’ थ्योरी और ‘बी’ थ्योरी का नाम दिया. ‘ए’ थ्योरी का दूसरा नाम ‘काल सैद्धांतिकी’ भी है. इसके अनुसार समय बहता हुआ प्रवाह है. नदी के समान अनवरत, बिना रुके, बगैर थके….भूत, वर्तमान और भविष्य में विभाजित. आदिमानव पत्थरों को रगड़कर आग जलाता था. गौतम बुद्ध ने वैशाली की गणिका आम्रपाली को दीक्षा दी. गुरु नानक ने सिख धर्म की नींव रखी थी. यानी जो बीत चुका है, और जो उससे भी पहले बीत चुका है. या जो अभीअभी बीतकर अतीत का हिस्सा बना है, जो अब लौटकर आने वाला नहीं, उसको भूतकाल माना गया. वर्तमान वह जो आंखों के सामने से गुजर रहा है. मैं समय को लेकर कागज काले कर रहा हूं. डेढ़ वर्ष का ईशान आंगन में ‘दादूदादू’ की रट लगा रहा है. ट्रांजिस्टर पर सलमा आगा द्वारा गाई सदाबहार गजल ‘दिल के अरमां आसुंओं में बह गए….’ आ रही है. अर्थात प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष वे सब घटनाएं जो हमारे साथ तारतम्यता में बनी हैं, जिन्हें हम अपने आसपास गुजरता हुआ महसूस कर रहे हैं, जिनसे हमारा आज और अब का नाता है, भले ही वे किसी और अंतरिक्ष में घट रही हों—सब वर्तमान का हिस्सा हैं. लेख पूरा होने पर किसी पत्र अथवा पत्रिका में प्रकाशित होगा. ईशान बड़ा होने पर स्कूल जाने लगेगा. मेरी नई पुस्तक प्रकाशित होकर अगले महीने बाजार में आ जाएगी, यानी कुछ ऐसी घटनाएं जो अभी घटने की प्रतीक्षा में हैं, जिनका साक्षात होना है, जो अभी तक केवल अनुमान अथवा कल्पना का विषय हैं—वे सब भविष्य का हिस्सा हैं. हाॅब्स ने भविष्य को कपोलकल्पना माना है. आने वाला समय न जाने कैसा हो? भविष्य की कल्पना कभीकभी अच्छेअच्छों की रातों की नींद उड़ा देती है. ‘ए’ थ्योरी के अनुसार प्रत्येक घटना का अपना समय होता है. वह भूतवर्तमान अथवा भविष्य कुछ भी हो सकता है. बहती नदी के समान वह गुजरता जाता है. मिनट, सैकिंड, पलअनुपल, घड़ीप्रहर की तारतम्यता में. सिनेमा के पर्दे पर गुजर रहे दृश्यों की भांति. समय को लेकर आम धारणा यही है. इसी के आधार पर इतिहासकार बड़ेबड़े ग्रंथ रच डालते हैं. समय की यही तारतम्यता व्यक्ति को डराती है. मिनट सैकिंड, पलअनुपल, वर्ष आदि इस मान्यता के अनुसार वे निश्चित अवधियां हैं, जो कालविभाजन को लेकर मनुष्य ने अपनी सुविधा की दृष्टि से तय की हैं. लोकमानस में समय को लेकर यही विचार मौजूद रहता है.

अनेक विद्वान समय की प्रवाहशीलता के विचार से सहमत नहीं हैं. समय को मिनट, सैकिंड, पलअनुपल में बांटने का विचार उन्हें स्वीकार नहीं है. उनके अनुसार समय से ऐसा भौतिक आचरण अनपेक्षित है. समय उनके लिए अनुभूति का विषय है. उसकी ब्रह्मांड सदृश विराटता को केवल अनुभव किया जा सकता है. ‘बी’ थ्योरी समय की शाश्वतता और उसकी निस्सीम मौजूदगी का बयान करती है. उसके अनुसार समय ब्रह्मांडीय विस्तार जैसा ही निस्सीम और शाश्वत है, जिसमें सबकुछ घटता है. ऐसा कुछ भी नहीं जो समय की व्याप्ति से परे हो. ब्रह्मांड की प्रत्येक हलचल उसमें समाई है. इस मान्यता के अनुसार समय का आकलन संभव नहीं. इंसान केवल उसकी निस्सीमता का अनुभव कर सकता है. घटनाएं उसके अनंत महासागरीय विस्तार में आतीजाती क्षुद्र डांेगियों के समान हैं. भूत, वर्तमान और भविष्य का कालविभाजन यद्यपि इस मान्यता में भी है. इसलिए नहीं कि वह समय की विशेषता है. बल्कि इसलिए कि वह मनुष्य की व्यावहारिक जरूरत है. सांत मानवेंद्रियों द्वारा अनंत समय से तालमेल बनाए रखने की चेष्ठा! इसलिए भूतवर्तमानभविष्य आदि समय के स्वतंत्र प्रखंड न होकर उसकी निस्सीमता में समाहित हैं. प्राचीन समय में आदिमानव आग जलाने के लिए पत्थर के टुकड़ों को रगड़ता था. गौतम बुद्ध ने गणिका आम्रपाली को धर्मोपदेश दिया था. गुरु नानक ने सिख धर्म की नींव रखी. सभी समय के निस्सीमवितान में घटी घटनाएं हैं. आगेपीछे की अनुभूति इतिहास तय करता है, जिसे मनुष्य अपनी स्मृतियों को सहेजने के लिए लिखता है. रात्रि के दस बजे हैं और मैं अपने लेख को पूरा करने के लिए कलम घसीट रहा हूं, अमेरिका में सुबह दस्तक दे चुकी है. चांदनी रात का मजा लेने के लिए कुछ लोग इंडियागेट पर घूम रहे हैं. समय की निस्सीमता में घट रहीं अथवा घट चुकीं ये घटनाएं ऐसी हैं, जिनका कोई न कोई साक्षी रहा है. तदनुसार समय ब्रह्मांडतुल्य रचना है. सृष्टि की समस्त हलचल को अपने भीतर समेटे हुए. इसमें सभी घटनाएं जो समय के विभिन्न कालखंडों में घटी, उनके अलावा कोटिक अन्य दृश्यअदृश्य घटनाएं भी रही होंगी—स्वतः समाहित हैं. दूरदर्शन पर प्रसारित लोकप्रिय धारावाहिक ‘महाभारत’ में उद्घोषक हरीश भिमाणी की गूंजती हुई आवाज ‘मैं समय हूं’ समय की इसी निस्सीमता का बखान करती थी. इस सैद्धांतिकी में कालविभाजन अमान्य है. यह समय की चिंरतनवादी अवधारणा है. पहली ने इतिहास को जन्म दिया. दूसरी ने दार्शनिक चिंतना को. लेखक

क्रमशः…..

© ओमप्रकाश कश्यप