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संस्कृति और सामाजिक न्याय

सामान्य

प्रत्येक समाज अपनी संस्कृति से पहचाना जाता है. उसका प्रमुख कार्य समाज में एकता की अनुभूति जगाना पैदा करना है. इसके लिए जरूरी है कि वह सामाजिक संबंधों, नागरिकों के सामान्य व्यवहारों, सार्वकालिक जीवनमूल्यों और भविष्य के सपनों से अनुप्रेत हो. प्रायः धर्म एवं संस्कृति को एक मान लिया जाता है. जबकि आस्था और विश्वास को अपनी पीठ पर ढोने वाला धर्म विराट संस्कृति का अंग तो हो सकता है, उसका पर्याय नहीं. किसी समाज द्वारा धर्म की केंचुल से बाहर आने की छटपटाहट विवेकीकरण के प्रति उसकी उत्सुकता को दर्शाती है. जहां तक भारतीय संस्कृति का प्रश्न है, अधिकांश विद्वान इसे ‘विविधता की संस्कृति’ मानते तथा ‘सनातन संस्कृति’ कहकर इसका महिमामंडन करते हैं. इनमें से एक भी धारणा मूल्यबोधक नहीं हैं. सांस्कृतिक वैविध्य तभी सार्थक है जब वह मानवीय चेतना का स्वयंस्फूर्त विस्तार हो. साथ ही लोकतांत्रिक सोच को बढ़ावा देता हो. प्राचीनता कालसापेक्ष स्थिति है. वह केवल घटनाविशेष की ऐतिहासिकता को दर्शाती है. संस्कृति का असल बड़प्पन इसमें है कि अपने अनुयायियों के बीच न्याय, समानता और समरसता के वितरण को लेकर वह कितनी उदार है! कितने प्रयास उसने अपने अंतर्विरोधों के समाहार हेतु किए हैं. और इन सब के लिए वह लोकतंत्र के कितने करीब है. इस कसौटी पर भारतीय संस्कृति उतनी सफल सिद्ध नहीं होती, जितनी बताई जाती है.

सच तो यह है कि स्मृतिग्रंथों, पुराणों, महाकाव्यों आदि के माध्यम से जो संस्कृति हमारे जीवन में दाखिल होती हैय या एक अल्पसंख्यक अभिजन वर्ग द्वारा बहुसख्यक जनसमुदाय पर बरबस थोप दी जाती है, वह सामाजिक न्याय की अवरोधक तथा सामूहिक विवेक का क्षरण करने वाली है. सामान्य नैतिकता एवं लोकादर्शों को अमल में लाने के बजाय वह धर्म के हाथों में खेलती है; और खुद को बड़ी आसानी से उसकी सामंती वृत्तियों के अनुसार ढाल लेती है. वह लोगों से अपेक्षा रखती है कि वे क्या करें, क्या खाएं, क्या पियें, क्या पढ़ेलिखें, और किन लोगों से कैसे संबध बनाएं? न तो उसे मानवीय विवेक की परवाह रहती है, न उसकी रुचियों का परिष्कार. बावजूद इसके जीवन में अनावश्यक दखल देकर, वह समानता और स्वतंत्रता की भावना का हनन करती है. कभी धर्म, कभी समाज और कभी परंपरावैविध्य के बहाने, असमानता को मानवीय नियति घोषित करना उसकी मूल प्रवृत्ति रही है. वह असल में शासक संस्कृति है, जो व्यक्ति को जन्म के साथ ही बता देती कि उसका जन्म शासन करने के वास्ते हुआ है या शासित होने के लिए. जो लोग शासक वर्ग में जन्म लेते हैं, अभिजनोन्मुखी संस्कृति का रेशारेशा उनकी मदद में जुटा होता है. शासितों की कोटि में जन्मे व्यक्ति, यदि दुर्दशा से उबरना चाहें या इस तरह का सपना भी देखें तो वह लगातार अवरोध उत्पन्न कर, परिवर्तन की चाहत को ही मिटाने पर तुल जाती है. लोगों के सवाल करने की आदत को छुड़ाकर वह उनके निर्मानवीकरण को गति देती है. इससे सामूहिकताबोध, जो संस्कृति का प्रमुख उद्देश्य है, का हृास होता है. सांप्रदायिकता पनपती है; और जनशक्ति छोटेछोटे टुकड़ों में बंटकर निष्प्रभावी हो जाती है. इससे परिवर्तन का लक्ष्य निरंतर दूर खिसकता रहता है.

हम भारतीयों, विशेषकर जो लोग स्वयं को हिंदू मानते हैं, का जीवन जन्म से लेकर मृत्यु तक तरहतरह के कर्मकांडों से बंधा होता है. वे अनेक प्रकार के हो सकते हैं. एक समाज से दूसरे समाज, यहां तक कि एक जाति समूह से दूसरे जातिसमूह के बीच उनका रूप बदलता रहता है. कर्मकांडों का उद्देश्य होता है, किसी महाशक्ति को प्रसन्न करना. उनमें एक पक्ष दाता(जाहिर है काल्पनिक), दूसरा याचक की भूमिका में होता है. याचक अपने श्रेष्ठतम को समर्पित करने की भावना के साथ दाता के आगे नतशिर होता है. तत्क्षण खुद को दाता का प्रतिनिधि घोषित करते हुए पुरोहित बीच में आ टपकता है. याचक द्वारा दाता के नाम पर समर्पित सामग्री के अलावा वह दक्षिणा की भी दावेदारी करता है. कर्मकांडों को लोक की सामान्य स्वीकृति प्राप्त होने के कारण उनसे पैदा स्तरीकरण समाज में गहरी पैठ बना लेता है. तदनुसार जो दाता या उसके स्वयंघोषित प्रतिनिधि की इच्छा है, उसे उसी रूप में, बगैर किसी नानुकर के, स्वीकार कर लेना याचक की विवशता होती है. इसका लाभ शिखर पर बैठे लोग उठाते हैं. राज्य की कुल उत्पादकता में नगण्य योगदान के बावजूद वे किसी न किसी बहाने लाभ के नब्बे प्रतिशत को हड़पे रहते हैं. उसी के दम पर वे दाता की भूमिका निभाए जाते हैं. उनके नेतृत्व में पूरी संस्कृति कर्मकांडों में सिमटकर रह जाती है.

कर्मकांडों की व्याख्या जिन ग्रंथों में है, सब ब्राह्मणों द्वारा रचे गए हैं. उनकी समीक्षा अथवा संशोधनविस्तार का अधिकार ब्राह्मणेत्तर वर्गों को नहीं है. उनसे बस इतनी अपेक्षा होती है कि ब्राह्मणों द्वारा गढ़े गए लिखितअलिखित विधान का बगैर नानुकुर अनुसरण करें. उनपर किसी भी प्रकार का संदेह, आलोचना, समीक्षा पाप की कोटि में आती है. सांस्कृतिकसामाजिक असमानता का पोषण करने वाली इस संस्कृति के प्रति विरोध के स्वर आरंभ से ही उठते रहे हैं. उनके दस्तावेजीकरण का काम हमें अपेक्षाकृत उदार एवं समावेशी संस्कृति के करीब ला सकता है. उसे हम जनसंस्कृति अथवा मूल भारतवंशियों की संस्कृति भी कह सकते हंै.

सत्य यह भी है कि कोई भी संस्कृति स्वयं लक्ष्य नहीं होती. वह केवल मार्ग चुनने में मदद करती है. उसका काम मानवीय वृत्तियों को सुसंस्कृत करना है, किसी व्यक्ति या व्यक्तियों की रोजमर्रा की आदतों पर नियंत्रण करना नहीं. विडंबना है कि भारतीय संस्कृति की अधिकांश ऊर्जा नकारात्मक कार्यों में खपती आई है. वह बड़ी आसानी से उन लोगों के हाथों में खेलने लगती है, जिनका काम दूसरों के मूलभूत अधिकारों का हनन करना है. शिखरस्थ ब्राह्मण उसके विधान का निर्माता, व्याख्याता, पालकअनुपालक सब होता है. विशेष मामलों में, या यूं कहिए कि अपवादस्वरूप संस्कृति के विशिष्ट प्रवत्र्तकों को, जन्मना ब्राह्मण न हों तो भी उन्हें कर्मणा ब्राह्मण मान लिया जाता है. व्यास, वाल्मीकि, महीदास आदि शास्त्रीय परंपरा के ब्राह्मण नहीं हैं. फिर भी उन्हें ब्राह्मण माना गया है. क्योंकि वे उस संस्कृति के सिद्ध संहिताकार हैं, जो वर्णव्यवस्था को आदर्श तथा ब्राह्मणों को समाज का सर्वेसर्वा मानकर उन्हें अंतहीन अधिकार सौंप देती है. कुछ लोग इसे भारतीय संस्कृति की उदारता या उसका लचीलापन मानते हैं. असल में यह दूसरे वर्गों के बुद्धिजीवी, उनकी उपलब्धियों का श्रेय हड़प लेने की स्वार्थपूर्ण व्यवस्था है. इससे निम्न वर्गों की उच्च स्तरीय मेधा, उच्चस्थ वर्गों की स्वार्थसिद्धि में लगी रहती है.

इस प्रवृत्ति के दर्शन ऋग्वेद से लेकर आधुनिक साहित्य तक मौजूद हैं. गुरु उद्दालक के पास सत्यकाम जाबाल जब यह कहता है कि वह घरों में काम करने वाली दासी के गर्भ से जन्मा है और पिता का नाम पता नहीं है, तो महर्षि उसे यह कहकर कि ‘तूने सत्य कहा, ऐसा सत्यभाषी ब्राह्मण पुत्र ही हो सकता है.’-दीक्षा देने को तैयार हो जाते हैं. भारतीय संस्कृति के अध्येता इस उद्धरण को उसके उदात्त लक्षण के रूप में प्रस्तुत करते आए हैं. वस्तुतः यह बौद्धिक धूर्तता है, जिससे ब्राह्मणेत्तर वर्गों को एक ही झटके में ‘मिथ्याभाषी’ घोषित दिया जाता है. सत्यकाम जाबालि की भांति महीदास भी दासी पुत्र था. जन्म से शूद्र किंतु मनबुद्धि से ब्राह्मण संस्कृति का प्रतिभाशाली संहिताकार. ऋग्वेद शाखा के ‘ऐतरेय ब्राह्मण’, ‘ऐतरेय उपनिषद’ और ‘ऐतरेय आरण्यक’ का रचियता. इस संस्कृति ने महीदास को भी शूद्रों से झटक लिया. अपवादस्वरूप ही सही, ब्राह्मणेत्तर वर्ग के कुछ अतिप्रतिभाशाली बुद्धिजीवियों को अनुलोम परंपरा के अनुसार ब्राह्मण मान लिए जाने की नीति, प्रतिभाहीन ब्राह्मण पुत्रों के लिए शिखर का स्थान सुरक्षित रखती है. स्तर से ऊपर उठने के लिए ब्राह्मणेत्तर वर्ग के बुद्धिजीवियों को जहां विरलतम प्रतिभा, सर्जनात्मक मेधा एवं विभेदकारी ब्राह्मणसंस्कृति के प्रति अटूट निष्ठा का प्रदर्शन करना पड़ता है, वहीं ब्राह्मणसंतति को उसका स्वाभाविक उत्तराधिकारी मान लिया जाता है. प्रमुख प्रतिभाओं के पलायन के बाद निचले वर्ग आवश्यक बौद्धिक नेतृत्व से वंचित रह जाते हैं. दूसरे षब्दों में भारतीय संस्कृति, उसके नामित देवता, कर्मकांड, धर्मदर्शन आदि केवल ब्राह्मणों का सृजन नहीं हंै. उसमें ब्राह्मणेत्तर वर्गों का भी भरपूर योगदान रहा है. हालांकि लाभ सर्वाधिक ब्राह्मणों ने उठाया है.

ब्राह्मण संस्कृति के व्याख्याकारों की प्रशंसा करनी होगी कि वर्गीय श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए उन्होंने अपनी रचना का श्रेय स्वयं लेने के बजाय वर्गीय श्रेय को प्राथमिकता दी. ब्राह्मण होने के नाते व्यक्तिगत श्रेयसम्मान तो उन्हें आसानी से मिल ही जाता है. व्यास, याज्ञवल्क्य, वशिष्ट आदि किसी मनीषी के नहीं, गौत्र या परंपरा के नाम हैं. उनका उल्लेख स्मृतिग्रंथों से लेकर रामायण, महाभारत, पुराण यहां तक कि उत्तरवर्ती ग्रंथों में भी, मुख्य सिद्धांतकार के रूप में होता आया है. व्यक्तिगत श्रेय के आगे वर्गीय श्रेय को वरीयता दिए जाने का अच्छा उदाहरण ‘योग वशिष्ट’ है. लगभग एक हजार वर्ष पुराने, 29000 से अधिक पदों वाले तथा शताब्दियों के अंतराल में अनाम लेखकों द्वारा रचित, परिवर्धित इस विशद् ग्रंथ का रचनाकार होने का श्रेय आदि कवि वाल्मीकि को प्राप्त है, जबकि वाल्मीकि का नाम लगभग दो हजार वर्ष पुरानी कृति ‘पुलत्स्य वध’ जो निरंतर प्रक्षेपण के उपरांत ‘रामायण’ महाकाव्य के रूप में ख्यात हुआसे भी जुड़ा है. ज्ञान को परंपरा में ढाल देने का लाभ तो केवल ब्राह्मणों को जबकि नुकसान पूरे बहुजन समाज को उठाना पड़ा है. वर्णव्यवस्था के चलते पोंगा पंडितों को भी बौद्धिक नेतृत्व का अवसर मिलता रहा. पीढ़ीदरपीढ़ी एक ही धारा के लेखन से मौलिकता का हृास हुआ. चूंकि धर्मग्रंथों में प्रक्षेपण अलगअलग समय में हुआ था, इसलिए उनमें परस्पर विरोधी बातें भी शामिल होती गईं. जिस महाभारत(शांतिपर्व) कहा गया था, ‘वर्णविभाजन जैसी कोई चीज असलियत में नहीं है. यह पूरी सृष्टि ब्रह्म है, क्योंकि इसे ब्रह्मा ने बनाया है.’ उसी में द्रोणाचार्य द्वारा एकलव्य का अंगूठा मांग लेने के धत्तकर्म को भी ‘धर्म’ मान लिया गया.

उधर व्यवस्था से अनुकूलित गरीबविपन्न लोग निरंतर यह आस बांधे रहे कि जो पंडित लोग चैंसठ लाख योनियों का हिसाब रखते हैं, आदमी के ‘भाग्य’ का अगलापिछला सब बांच लेने का दावा करते हैं, वे उनका भी ‘हिसाब’ रखेंगे! यदि परमात्मा छोटेबड़े, गरीबअमीर, ब्राह्मण और शूद्र में भेद नहीं रखता तो वे भी नहीं रखेंगे. इस भरोसे के साथ वे अपने अधिकारों की ओर से, इतिहास की ओर से मुंह फेरे रहे. समय के दस्तावेजीकरण के प्रति निचले वर्गों की उदासीनता का लाभ ऊपर वालों ने खूब उठाया. उन्होंने कर्मफल का सिद्धांत पेश किया. उसके जरिये शोषित वर्गों को समझाया जाने लगा कि उनकी दुर्दशा के लिए कोई दूसरा नहीं, वे स्वयं जिम्मेदार हैं. संस्कृति के आवरण में उन्होंने पहले अवसर छीने, फिर मानसम्मान. अपने से नीचे के लोगों को बर्बर, असभ्य, गंवार, गलीच घोषित करके खुद इतिहास में तोड़मरोड़ करते रहे. उनके द्वारा रचे गए इतिहास में ‘भेड़ों’ और ‘मेमनों’ को जंगल में अव्यवस्था का दोषी बताया जाता रहा तथा ‘भेड़ियों’ और ‘लक्कड़बघ्घों’ को प्रत्येक अपराध से बरी रहने की व्यवस्था की गई. पंडित, देवता, करुणानिधान, अन्नदाता, रक्षक, सेठ, साहूकार जैसे सुशोभन विशेषण उन्होंने अपने लिए सुरक्षित कर लिए. पिछले दो हजार साल का सांस्कृतिक खेल उनकी चालों और समझौतापरस्ती से बना है. ऐसी संस्कृति में जनसाधारण के लिए न्याय की उम्मीद करना खुद को धोखा देना है.

सांस्कृतिक वर्चस्व’ बनाए रखने की कोशिश के समानांतर उससे उबरने की छटपटाहट भी मानवइतिहास का हिस्सा रही है. भारत में उसका पहला उदाहरण मक्खलि गोशाल के चिंतनकर्म में दिखाई पड़ता है. वह पहला विद्वान था जिसने श्रमशोषक, परजीवी ब्राह्मण संस्कृति के बरक्स समाज में मेहनतकशों, शिल्पकारों तथा उसके श्रमकौशल के सहारे आजीविका जुटाने वाले लोगों को संगठित कर आजीवक संप्रदाय की स्थापना की थी. मक्खलि की लोकप्रियता का अनुमान इससे भी लगाया जाता है कि उसके जीवनकाल में आजीवक संप्रदाय के अनुयायियों की संख्या बौद्ध अनुयायियों से अधिक थी. विद्वता के मामले में भी वह अद्वितीय था. सम्राट प्रसेनजित ने बुद्ध से कहा था कि वह गोशाल को उन(बुद्ध)से अधिक प्रतिभाशाली मानते हैं. बुद्ध की हिंसा तथा कर्मकांड विरोधी भौतिकवादी विचारधारा पर आजीवक संप्रदाय का ही प्रभाव था. मक्खलि तथा बुद्ध के अलावा निगंठ नागपुत्त, संजय वेठलिपुत्त, पूर्ण कस्सप, अजित केशकंबलि, कौत्स आदि विद्वान भी यज्ञों में दी जाने वाली बलि तथा कर्मकांड का विरोध कर रहे थे. निगंठ नागपुत्त आगे चलकर महावीर स्वामी के नाम से जैन दर्शन के प्रवर्त्तक माने गए. इनमें सर्वाधिक ख्याति मध्यमार्गी गौतम बुद्ध को मिली, जो उस समय की चर्चित दार्शनिक समस्याओं ‘आत्मा’, ‘परमात्मा’ आदि पर विमर्श करने के बजाय उन्हें टालने के पक्ष में थे. क्षत्रिय कुल में जन्म लेने के कारण बुद्ध और उनके विचारों को उन राजदरबारों में आसानी से प्रवेश मिलता गया, जो ब्राह्मण पुरोहितों के बढ़ते दबाव से तंग आ चुके थे. ‘आजीवक’ और ‘लोकायत’ धारा का प्रतिनिधि साहित्य आज अप्राप्य है. उनका छिटपुट उल्लेख ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन ग्रंथों में ही प्राप्त होता है. सभी में उनकी पड़ताल नकारात्मक दृष्टिकोण के साथ की गई है. संकेत साफ हैं कि विजेता संस्कृतियों ने, पराजित संस्कृति के ग्रंथों को मिटाने का काम पूर्णतः योजनाबद्ध ढंग से किया.

धर्म और संस्कृति का आधार कहे जाने वाले ग्रंथों में, लंबे प्रक्षेपण के बावजूद ऐसे अनेक तत्व हैं, जो वैकल्पिक जनसंस्कृति के प्रवत्र्तक और संवाहक रहे हैं. महिषासुर, बालि, पौराणिक सम्राट वेन के अलावा गणेश, शिव जैसे अनेक नाम मिथक भी हो सकते हैं और यथार्थ भी. लेकिन यदि इन्हें मिथक मान लिया जाए तो ब्राह्मण संस्कृति के प्रमुख संवाहक ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र, हनुमान तथा अन्य देवीदेवताओं को भी मिथक मानना पड़ेगा. क्योंकि उसका पूरा का पूरा भवन इन्हीं के कंधों पर टिका है. शिव भारत की आदिम जातियों के मुखिया रहे होंगे. उनके सहयोगी के रूप में भूत, पिशाच, प्रेत आदि हमें भारत के आदिम कबीलों की याद दिलाते हैं. आर्यों ने शिव को तो अपनाया. मगर उनके सहयोगी कबीलों की पूरी तरह उपेक्षा की. अप्रत्यक्ष रूप से बख्शा शिव को भी नहीं गया. उन्हें आक, धतूरा खाने और भभूत लगाकर रमने वाले अवधूत की तरह दर्शाते हुए सृष्टि चलाने(शासन करने) का अधिकार ‘ब्राह्मण ब्रह्मा’ तथा ‘क्षत्रिय विष्णु’ की बपौती मान लिया गया. गणेश का मिथक भी प्राचीन भारतीय गणतंत्रों के मुखिया की याद दिलाता है. गणतांत्रिक व्यवस्थाओं में मुखिया को प्रथम सम्मानेय माना जाता था. कालांतर में बड़े राज्यों का गठन होने लगा तो सभा का नेतृत्व करने वाले गणप्रमुख के चरित्र का भी विरूपण किया जाने लगा. बैठेबैठे सूंड लटक आना और लंबोदर जैसे प्रतीक गणप्रमुख पर कटाक्ष तथा उसे अपमानित करने के लिए रचे गए.

सामाजिक न्याय’ का सपना देखने वाले बुद्धिजीवियों की असली लड़ाई धार्मिक वर्चस्ववाद, विपन्नता और जड़ हो चुकी वर्णव्यवस्था से है. इस लक्ष्य की सिद्धि वर्चस्वकारी संस्कृति से मुक्ति के बिना असंभव है. ब्राह्मण संस्कृति ईश्वरीय न्याय में विश्वास करती है. न्याय का स्वरूप क्या हो? वंचित तबकों की उन्नति में वह किस भांति सहायक हो सकता हैयह नहीं बताती. ‘सामाजिक न्याय’ के पैरोकारों का प्रथम लक्ष्य ऐसी संस्कृति का पुनरुद्धार करना है, जिसमें संगठित धर्म का हस्तक्षेप न्यूनतम हो. जो पूरी तरह उदार एवं लोकतांत्रिक हो. इसके लिए आवश्यक है कि प्राचीन संस्कृति के उन प्रतीकों को रेखांकित किया जाए जो कभी ब्राह्मण संस्कृति के विरोध में या उसके समानांतर खड़े थे. क्या यह धर्म के भीतर एक और धर्म की खोज सिद्ध नहीं होगी? यह आशंका पूर्णतः निर्मूल नहीं है. ध्यान यह रखना होगा कि समानांतर संस्कृति के इन प्रतीकों, नायकों, मिथकों का योगदान दमितशोषित वर्गों के आत्मविश्वास को लौटाने तक सीमित हो. यह एहसास दिलाने के लिए हो कि वे हमेशा से ही ‘ऐसे’ नहीं थे. वे न केवल ‘वैसे’ बल्कि कई मायनों में उनसे भी बढ़कर थेरावण की लंका में विभीषण को अपनी आस्था और विश्वास के साथ ससम्मान जीने की स्वतंत्रता प्राप्त थी. रामराज्य में शंबूक से यह स्वतंत्रता छीन ली जाती है. इसी तरह राक्षससम्राट जलंधर अपनी विष्णुभक्त पत्नी वृंदा के साथ सुखी जीवन जीता है और उनके दांपत्य के बीच अविश्वास की किरच तक मौजूद नहीं है, जबकि सीता को रावण की अशोकवाटिका में रहने के लिए भी अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ता है. यह गरीबी तथा जातिभेद द्वारा पैदा की गई अन्यान्य विषमताओं के विरुद्ध जंग भी है. सदियों से जाति के आधार पर सुखसुविधा और सम्मान भोगते आए समूह, परिवर्तनकामी समूहों पर जातिभेद को बढ़ावा देने का आरोप लगा रहे हैं. दूसरी ओर जातीय उत्पीड़न का शिकार रहे वर्गों को लगता है कि लोकतांत्रिक माहौल का लाभ उठाकर वे अपने संघर्ष को आगे बढ़ा सकते हैं. इसलिए वे जाति को संगठनकारी ‘टूल’ की तरह इस्तेमाल कर रहे है. लेकिन जातिआधारित संगठनों की अपनी परेशानियां हैं. इस देश में हजारों जातियां हैं. अपनें दम पर कोई भी जाति परिवर्तनकारी ताकत बनने में अक्षम है. अतः लोग समझने लगे हैं कि सामाजिक न्याय के संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए समानांतर लड़ाई संस्कृति के मोर्चे पर भी लड़नी होगी. जीत उन्हीं की होगी जो संगठित रहने के साथसाथ सामूहिक विवेक से काम लेंगे.

ओमप्रकाश कश्यप

संस्कृति की लोकयात्रा : बरास्ता महिषासुर आंदोलन

सामान्य

संस्कृति’ शब्द ‘कृति’ के आगे ‘सम्’ उपसर्ग लगाने से बना है. ‘संस्कृति’ का अभिप्राय है, जिसे बनाने और आगे बढ़ाने में समाज के सभी वर्गों का योगदान बराबर हो. जिसमें सभी की समान सहभागिता हो. उसके लिए आवश्यक है कि समाज में सभी बराबर हों तथा प्रत्येक को अपना पक्ष प्रस्तुत करने की पूर्ण स्वतंत्रता हो. व्यक्ति की चारित्रिक विविधताओं का सम्मान करते हुए संस्कृति सदस्य इकाइयों के मन, विचार, रीतिरिवाज के सामंजस्यीकरण का काम करती है, ताकि आगंतुक पीढ़ियां समाज के आदर्श, रीतिरिवाज तथा ज्ञानानुभवों का लाभ उठा सकें. समाजशास्त्र की दृष्टि से ‘अनेकता में एकता’ की व्याप्ति समाज की उदारता का परिचायक होती है. वह समाजीकरण के उच्चतम स्तर की संकेतक है. उदार संस्कृति नैतिकता से सदैव सामंजस्य बनाए रखती है. दोनों के लक्ष्य में बहुत अधिक अंतर नहीं होता. नैतिकता जिन कसौटियों का निर्माण करती है, संस्कृति विभिन्न प्रतीकों, परंपराओं एवं संस्कारों के माध्यम से समाज में उन्हें लोगों के आचरण का हिस्सा बनाने के लिए प्रयत्नरत रहती है. समानता और स्वतंत्रता ऐसी ही कसौटियां हैं, जो न केवल समाजीकरण का आधार, अपितु उसकी सभ्यता का मापदंड भी हैं. मनुष्य उनसे प्यार करता है, यथासंभव उन्हें सुरक्षित रखना चाहता है. उन पर कोई आंच न आए, उसके लिए वह अपनी स्वतंत्रता के थोड़ेसे हिस्से का बलिदान कर समाज के अनुशासन में बंधने को स्वीकार होता है. इस उम्मीद के साथ कि समाज उसके साथ समानतापूर्ण व्यवहार करेगा. जिस सुख को वह अकेले प्राप्त करने में असमर्थ है, समाज में रहते हुए वह सुख आसानी से और लगातार प्राप्त होता रहेगा. समाज तथा उसे नियंत्रित करने वाले विधान, चाहे वह नैतिक हो या कानूनी—की चुनौती होती है कि वह मनुष्य की इन अपेक्षाओं पर खरा उतरकर उसके मानवीकरण के लिए उत्प्रेरक का काम करे.

अनेकता में एकता’ का दावा करने वाली भारतीय संस्कृति को इस कसौटी पर परखें तो बहुत उम्मीद नहीं बंधती. ऊपर से एक नजर आने या एक बताई जानी वाली इस संस्कृति के कई चेहरे, अनेक रंग तथा अनगिनत रूपविधान हैं. उनके बीच प्रतिद्विंद्वता बनी ही रहती है. कुछ ऐसे बिंदू भी हैं, जहां उसके दो मुख्य रूपाकारों को साथसाथ रखना, उनके अंतर्विरोधों पर पर्दा डालना न केवल कठिन, बल्कि असंभवसा हो जाता है. उस समय लगने लगता है कि सांस्कृतिक एकता का भारतीय रूपक मात्र एक छद्म, एक दिखावा है. सामाजिक असमानता, ऊंचनीच एवं भेदभाव को मान्यता देते हुए भारतीय संस्कृति समाज के मुट्ठीभर लोगों के हाथों में इतने अधिकार सौंप देती है, जिनसे वे बाकी जनसमूहों पर अपनी मर्जी लाद सकें. वे सदैव इस प्रयास में रहते हैं कि दमित वर्गों की सांस्कृतिक एकता का जो सूत्र उन वर्गों को सुदूर अतीत में जाकर जोड़ता तथा उनके बीच आत्मगौरव का संचार करता है, वह पूर्णतः छिन्नभिन्न हो जाए तथा अलगअलग टुकड़ों में बंटे या बांट दिए गए सामान्यजन, वर्चस्वकारी संस्कृति की अधीनता को चिरकाल तक स्वीकारने को विवश बने रहें. ‘अनेकता में एकता’ का नारा उनकी इसी प्रवृत्ति का परिचायक है. जाति और धर्म भारतीय संस्कृति के ऐसे ही औजार हैं. उनके दबाव में बहुसंख्यक लोग शोषण और असमानता को अपनी नियति मानने लगते हैं. ऐसे में ‘अनेकता में एकता की खोज’ का नारा उदात्त कल्पना से अधिक महत्त्व नहीं रखता. प्राकृतिक न्याय की भावना के विपरीत भारतीय संस्कृति कुछ लोगों को जन्म से विशेषाधिकार घोषित कर बाकी को उनका सेवादार बनाने का समर्थन करती है. मनुष्य की रुचि, स्वभाव, व्यक्तिगत योग्यता उसके लिए कोई महत्त्व नहीं रखती. अभिजन हितों के संरक्षण की सतत चाहत के दौरान स्वतंत्रता एवं समानता जैसे समाजीकरण के मूलभूत सिद्धांत बहुत पीछे छूट जाते हैं. चूंकि ब्राह्मण को धर्म और संस्कृति में शीर्ष स्थान पर रखा गया है, और नीतियां उसी की इच्छा और स्वार्थ के स्तर से तय होती हैं, इस कारण सांस्कृतिक वर्चस्ववाद को उसके आलोचकों द्वारा ‘ब्राह्मणवाद’ की संज्ञा दी गई है, जो उचित ही है.

सवाल है कि सबकुछ जानतेबूझते हुए भी बहुसंख्यक वर्ग सांस्कृतिकसामाजिक अधीनता को स्वीकार क्यों करता है? क्यों वह वर्ग स्वयं को उस समाज का हिस्सा माने रहता है जो स्वतंत्रता एवं समानता जैसी समाजीकरण की मूलभूत शर्तों पर ही खरा नहीं उतरता. सुदूर अतीत में क्यों उसने मुट्ठीभर वर्चस्वकारियों को बौद्धिक एवं सांस्कृतिक स्तर पर श्रेष्ठ मानकर अपने जीवन, यहां तक कि खानपान और रहनसहन जैसे रोजमर्रा के कार्यकलापों को भी उनके हवाले कर दिया था? क्या वह वर्ग बौद्धिक स्तर पर सचमुच इतना पिछड़ा हुआ था कि रोजमर्रा के सामान्य प्रश्नों का समाधान भी अपने बूते न खोज सके? असलियत ठीक इसके उलट है. दमित वर्गों में कमी न तो योग्यता की थी, न ही कार्यकौशल की. ये गुण तो उनमें भरपूर थे. समाज की समृद्धि तथा शिखर का वैभवविलास इन्हीं वर्गों के हुनरमंदों और मेहनतकशों के श्रमकौशल की देन था. कमी अपने बुद्धिचातुर्य और सृजनसामर्थ्य का उपयोग अपने और अपने जैसे दूसरे लोगों के लिए करने के बजाय, अपना निर्णयसामर्थ्य दूसरों के हक में बलिदान कर देने की थी. मेहनत को अपना धर्म और विपन्नता को नियति मान लेना उन्हें इतना महंगा पड़ा कि गुलामी का दौर पीढ़ीदरपीढ़ी चलता रहा.

यह सब उन्होंने अपनी मर्जी से नहीं किया था. बल्कि सब कुछ ब्राह्मणवादियों की सोचीसमझी कार्ययोजना का हिस्सा था. जब तक अर्थव्यवस्था पशुबल तथा जंगलों पर निर्भर थी, तब तक ब्राह्मणवाद को पनपने का अवसर नहीं मिल पाया था. अस्थिर जीवन में न तो स्थायी देवताओं के लिए गुंजाइश थी, न ही ईश्वर की. पशु, पक्षी, पेड़, पौधे आदि में से जिससे भी सामूहिक मन मिल जाए, उसी को कबीला अपना ‘टोटम’ मान लेता था. सो जब तक यायावरी जीवन रहा, तब तक ‘टोटमवाद’ भी समाज में जगह बनाए रहा. कालांतर में समाज ने जैसे ही कृषिआधारित अर्थव्यवस्था की ओर कदम रखा, कार्यविभाजन के नाम पर ब्राह्मण को समस्त संसाधनों का स्वामी तथा क्षत्रिय को उनका संरक्षक घोषित कर दिया गया. कहा यह गया कि कार्यविभाजन पूरी तरह से योग्यता पर आधारित होगा. कुछ समय के लिए विभिन्न वर्गों के बीच आवागमन चला. ब्राह्मण की संतान ने क्षत्रिय और वैश्य का धंधा अपनाया तो उसका उल्टा भी देखने को मिला. मगर कोई भी आसानी से प्राप्त सुविधाओं को छोड़ने को तैयार न था. धीरेधीरे वर्णाश्रम व्यवस्था रूढ़ होकर जाति में ढलने लगी. इसी के साथ समाज के कुल संसाधनों पर मुट्ठीभर लोगों का अधिपत्य होने लगा. आजीविका के लिए दूसरे वर्गों पर निर्भरता ही बहुसंख्यक वर्ग की लंबी दासता तथा उत्पीड़न का कारण बनी. वर्चस्व को स्थायी बनाने के लिए अभिजात शीर्षस्थों ने हर वह काम किया, जिसे वे कर सकते थे. उत्पादकता पर समाज के बाकी वर्गों का दावा न रहे, इसके लिए नियति को बीच में लाया गया. इस कार्य में धर्म उनका मददगार बना. उसकी सहायता से लोगों के दिमाग में यह भर दिया गया कि उनकी दुर्दशा उनके पूर्वजन्म के कर्मों की देन है. यदि वे समाज द्वारा तय मर्यादा का पालन नहीं करते हैं तो कर्मफल के रूप में त्रासदी का सिलसिला आगे भी चलता रहेगा.

आरंभ में सामाजिक विभाजन त्रिस्तरीय था. ब्राह्मण और क्षत्रिय के अलावा बाकी सब शूद्र थे. ढाई हजार वर्ष पहले बौद्ध धर्म के उद्भव के पश्चात, समाज में नए शिल्पकार वर्ग का उदय हुआ जो व्यापार के माध्यम से धनार्जन में निपुण था. धीरेधीरे अनुकूल अवसर मिलते ही वह वर्ग इतना सशक्त हो गया कि ऊपर के दोनों वर्गों द्वारा उनकी उपेक्षा करना संभव न रहा. तब त्रिस्तरीय वर्णाश्रम व्यवस्था के स्थान पर चातुर्वर्ण्य समाज को मान्यता देनी पड़ी. लोग असलियत को समझे बिना केवल परंपरापोषी तथा अनुगामी बने रहें, इसके लिए मनु के विधान में शिक्षा एवं संसाधनों पर कुछ वर्गों का विशेषाधिकार घोषित किया गया. ब्राह्मण व्यवस्था के शिखर पर था और समाजहित में सोचने तथा नियम बनाने का अधिकार केवल उसके पास था. उचित यही था कि वह समाज के विश्वास और सौंपे गए कर्तव्यों पर खरा उतरता. लेकिन संस्कृति के हर प्रतीक, रूपक, घटना और चरित्र की व्याख्या उसने केवल अपने स्वार्थ को केंद्र में रखकर की. बाकी दो वर्गों की मदद से उसने खुद को इतना शक्तिशाली बना लिया कि चौथा वर्ग जो संख्या में बाकी तीन वर्गों की कुल संख्या का कई गुना था, वह शक्ति एवं संसाधनों के मामले में निरंतर कमजोर पड़ता गया. धीरेधीरे लोग हालात से समझौता करने लगे. आज स्थिति यह है कि भारतीय संस्कृति में शोषित एवं शोषक दोनों के चेहरे एकदम साफ नजर आते हैं. पाखंडी पंडितों द्वारा दिया गया परलोक का प्रलोभन यथास्थितिवादियों के लिए इतना फला है कि लोग कल के मिथ्या सुख के बदले अपने आज का सुखचैन और कमाई खुशीखुशी अर्पण कर देते हैं.

अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए ब्राह्मणवाद धर्म और संस्कृति को औजार बनाता है. उनके माध्यम से वह लोगों के दिलोदिमाग पर कब्जा जमाता है, फिर निरंतर उनका भावनात्मक और शारीरिक शोषण करता है. फासीवाद लोगों के दिलोदिमाग में भय का संचार करता है. इतना भयभीत कर देता है कि जनसाधारण अपने विवेक से काम लेना छोड़, केवल आदेश को ही कर्तव्य समझने लगता है. ताकत का भय दिखाकर वह लोगों को उसकी मनमानियां सहने के लिए मजबूर कर देता है. फासीवाद की उम्र अपेक्षाकृत कम होती है. वह व्यक्ति के दिलोदिमाग पर कब्जा तो करता है, लेकिन ऐसा कोई माध्यम उसके पास नहीं होता, जो देर तक प्रभावशाली हो. सत्ता बदलते ही उसका स्वरूप बदल जाता है. नहीं तो जनता स्वयं खड़ी होकर राजनीति के उस खरपतवार को समाप्त कर देती है. संस्कृति व्यक्ति को समाज का प्रदाय होती है और राजनीति उसका अपना वरण. सामाजिक इकाई के रूप में मनुष्य शेष सामाजिक इकाइयों के सहयोगसमर्थन से अपने लिए राजनीतिक दर्शन का चयन कर सकता है, अथवा वर्तमान स्वरूप में आवश्यक बदलाव प्रस्तावित कर सकता है, जिन्हें वह अपने लिए तात्कालिक रूप से आवश्यक मानता है. संस्कृति में त्वरित परिवर्तन संभव नहीं होते.

निर्ब्राह्मणीकरण : क्यों और कैसे

संस्कृति के निर्ब्राह्मणीकरण जरूरत पर चर्चा करने से पहले आवश्यक है कि ब्राह्मणीकरण की प्रक्रिया को समझ लिया जाए. इसे तुलसी से बेहतर शायद हमें कोई नहीं समझा सकता. उनकी प्रमुख कृति ‘रामचरितमानस’ को साहित्य के रूप में पढ़नेपढ़ाने की परिपाटी रही है. विद्यालयों, महाविद्यालयों से लेकर शोध के उच्चतम स्तर तक उसे साहित्य के गौरव से नवाजा जाता है. लोकजीवन में भी ‘मानस’ की चौपाइयां रूढ़ि, परंपरा और भाग्यवाद से डरेसहमे लोगों के मार्गदर्शन के काम आती हैं. सवाल है कि क्या यह पुस्तक साहित्यकर्म को साधती हैं? क्या इसे ऐसी ही मंशा के साथ रचा गया था? क्या यह मनुष्य के मौलिक सोच को विस्तार देने, उसे प्रश्नाकुल बनाने का काम करती है? यदि धार्मिक आग्रहों से परे हटकर सोचा जाए तो क्या इस पुस्तक को साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है? हमारा आक्षेप तुलसी के काव्यसामर्थ्य पर नहीं है. उनमें भरपूर कवित्व रहा होगा. लेकिन वे कविधर्म को भी समझते थे, यह बात दावे के साथ नहीं कही जा सकती. यहां हम केवल उनकी काव्यरचना के मर्म तथा उद्देश्य पर विचार करने जा रहे हैं.

संस्कृत में साहित्य को परिभाषित करते हुए कहा गया है—‘सहितस्य भावः साहित्यम्.’ अर्थात जो सभी को साथ लेकर चले, जिसमें सभी के हितसाधन का भाव हो—वही ‘साहित्य’ है. साहित्य का विचारक्षेत्र न केवल संपूर्ण प्राणिजगत, अपितु जड़, चेतन और वह सबकुछ है, जिससे प्राणिमात्र का हित प्रत्यक्ष या परोक्ष किसी भी रूप में जुड़ा है. लेकिन तुलसी जब कहते हैं—‘पूजिये विप्र ज्ञानगुन हीना. पूजिये न शूद्र ज्ञान परवीना.’(ज्ञानगुण विहीन ब्राह्मण भी पूजनीय है. ज्ञान और गुण की खान होने के बावजूद शूद्र की पूजा नहीं की जानी चाहिए); अथवा जब वह लिखते हैं—‘शापत ताड़त परुष कहंता. विप्र पूजि अस गावहिं संता.’(संतजन कहते हैं कि शाप देने वाला, प्रताड़ित करने वाला, अपशब्द कहने वाला ब्राह्मण भी पूजा के योग्य है)—उस समय वे स्वयं को लोककवि के बजाय ‘द्विजजनों का चारण’ सिद्ध कर रहे होते हैं. संवेदना साहित्य की पूंजी होती है. सर्वहित की भावना उसे निष्पक्ष बने रहने को प्रेरित करती है. तुलसी का यह लिखना—‘अधम जाति में विद्या पाए. भयहु यथा अहि दूध पिलाए.’(अधम जाति में जन्मे व्यक्ति को शिक्षा देना विषधर को दूध पिलाने जैसा अपकर्म है)—भी घोर आपत्तिजनक है. साहित्यकार का कर्तव्य ऐतिहासिक तथ्यों को ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर देना नहीं है. वस्तुनिष्ठ विवेचन इतिहासकार के लिए जरूरी हो सकता है. साहित्यकार का काम प्रत्येक घटना और चरित्र पर मानवतावादी दृष्टि से विचार करना तथा उन्हें इस तरह प्रस्तुत करना है, ताकि वे मनुष्यता का अधिकतम हित साध सकें. ‘रसेन सहितं साहित्यम्’—यानी साहित्य वह है जिसमें रागात्मकता और सर्वहित का भाव हो.’ साहित्यत्व की कसौटी पर न केवल ‘रामचरितमानस’ बल्कि तुलसी का बाकी साहित्य भी कहीं नहीं टिकता. शंबूक की हत्या का प्रसंग हो या स्त्री और शूद्रों को लेकर तुलसी की दृष्टि, इन सबसे वे ब्राह्मणवाद के सबसे मुखर कवि नजर आते हैं. ऐसी विभेदकारी व्यवस्थाओं के बावजूद ‘रामचरितमानस’ को पंचम वेद के रूप में समाज में प्रचलित करना ही साहित्य और संस्कृति दोनों का ब्राह्मणीकरण है.

जो काम तुलसी ने ‘रामचरितमानस’ में किया, वही सूर तथा कृष्ण भक्ति परंपरा के अन्य कवियों ने कृष्ण को ब्राह्मणवादी परंपरा में ढालकर किया. ऋग्वेद के आठवें मंडल में इंद्रकृष्णासुर संग्राम का वर्णन है. ऋग्वैदिक कृष्ण यदु कबीले का मुखिया है. वह द्रुतगामी(तीव्रता से प्रयाण करने वाला), दस सहस्र सेनाओं का नायक, चतुर योद्धा, कुशल रणनीतिकार भी है जो अंशुमति (यमुना) नदी के तट पर दीप्तिमान होकर निर्भीक विचरण करता है(ऋग्वेद-8/96/13-15). ऋग्वेद में देवताओं के लिए ‘देव’ तथा ‘असुर’ दोनों प्रकार के संबोधन मिलते हैं. वहां असुर का अर्थ देवता और अनिष्ठ दूर करने वाला भी है. कुछ स्थानों पर ‘वरुण’ को भी ‘असुर’ कहा गया है. मित्र अर्थात सूर्य के लिए ‘सुर’ और ‘असुर’ दोनों प्रकार के संबोधन ऋग्वेद में प्राप्त होते हैं. इससे अनुमान लगाया जाता है कि आरंभिक ऋग्वैदिक काल में देवताओं के लिए ‘सुर’ संबोधन उतना रूढ़ नहीं हुआ था, जितना आगे चलकर देखने को मिला. ‘कृष्ण’ के प्रति ‘कृष्णासुर’ संबोधन को भी इसी रूप में लेना चाहिए. ऋग्वैदिक कृष्ण आर्यअनार्य संघर्ष में भील तथा दूसरी जनजातियों के साथ मिलकर इंद्र को टक्कर देता है. ऋग्वेद में ही दस गणराज्यों तथा सुदास के बीच घमासान युद्ध का भी उल्लेख है. उसमें सुदास देवताओं की मदद से विजयी होता है. सुदास आर्य सम्राट था. जबकि प्रतिपक्ष में आर्यअनार्य दोनों सम्मिलित थे. इससे संकेत मिलता है कि वर्चस्व की लड़ाई आर्य राजाओं के बीच भी थी. कृष्णासुरइंद्र संग्राम में भी आर्यों की विजय होती है. ये तथ्य ऋग्वैदिक कृष्ण को अनार्य नायक सिद्ध करते हैं.

कृष्ण का दैवीकरण उसके लगभग एक सहस्राब्दी बाद ही संभव हो सका. आर्यों से युद्ध में पराजित यदु, पुरू, यक्ष, अज आदि प्राचीन कबीले उत्तरपश्चिम की ओर प्रयाण कर जाते हैं. 1000-1500 ईसा पूर्व में गंगायमुना के दोआब में पुनः विकसित संस्कृति उभरती है. यदु कबीले के वंशजों ने मथुरा और उसके आसपास बड़े राज्यों की स्थापना की थी. उन्हें अब भी अपने महानायक कृष्ण में आस्था थी. ईसा पूर्व चौथी शताब्दी से ही भारत पर विदेशी आक्रमण होने लगे थे. तब ब्राह्मणवादी सत्ताओं को बड़े राज्य बनाने की सुध आई. यह कार्य यदुओं को, जो उस समय तक संगठित ताकत का रूप ले चुके थे, साथ लिए बिना संभव न था. सांस्कृतिक दूरियों को मिटाने के लिए यदुओं के आर्यकरण की शुरुआत हुई. उस समय तक वैदिक देवता इंद्र अपनी व्यभिचारी प्रवृत्ति के कारण काफी बदनाम हो चुका था, और उसके साथ यदुओं की अनेक कड़वी स्मृतियां जुड़ी थीं, इसलिए वह सम्मिलन इंद्र के प्रधान देवता पद पर रहते हुए असंभव था. अतः पुराने देवताओं विशेषकर इंद्र का मोह छोड़ते हुए आर्यों ने त्रिवेद(चौथे वर्ग की भांति चौथा वेद भी बहुत बाद में, ईस्वी संवत आरंभ होने के आसपास रचा गया) और त्रिवर्ण की युति के आधार पर त्रिदेवों ब्रह्मा, विष्णु और शिव जैसे नए देवताओं की कल्पना की. इस कल्पना में भी अनार्य जातियों को ब्राह्मणीकरण की परिसीमा में लाने के बंदोबस्त थे. देवत्रयी में ‘शिव’ शस्त्र संधान में पारंगत किरात, भील, यक्ष, शंबर आदि अनार्य जातियों के सर्वमान्य मुखिया और अजेय महानायक का प्रतिनिधित्व करते थे. उन्हें त्रिदेवों में ‘संहार का देवता’ घोषित किया गया है. ‘संहार का देवता’ ही क्यों? दरअसल देवत्रयी में शिव भारत की जिन आदिम जातियों का प्रतिनिधित्व करते थे, वे युद्धकला में निपुण थीं. शिव को नाराज करना संगठितशक्तिशालीयुद्धकला में पारंगत आदिमजातियों की शत्रुता मोल लेना था, जो विदेशी आक्रामकों का भय झेल रही सत्ताओं के लिए आसान नहीं था. यह तत्कालीन ब्राह्मणों के हृदय में आदिम जातियों के प्रति बैठे भय को भी दर्शाता है.

देवत्रयी में दूसरा स्थान विष्णु को मिला. उन्हें सृष्टि का पालक देवता कहा गया. इस कार्य के लिए वे अवतार भी लेते हैं. अवतारवाद किसी सम्राट द्वारा सीधे अथवा दैवी व्यक्तित्व के नेतृत्व में बड़े राज्य की स्थापना तथा उसमें नई(धार्मिक) व्यवस्था लागू करने का प्रतीक है. ‘कृष्ण’ को देवत्व से नवाजने के लिए उन्हें विष्णु का अवतार घोषित किया गया. ब्रह्मा को सृष्टि का रचियता कहा गया. वह ब्राह्मण का प्रतीक था. चूंकि ब्राह्मण उत्पादकता से जुड़ा कोई कार्य नहीं करते इसलिए त्रिदेवों में सृष्टि रचना के बाद ब्रह्मा की भूमिका भी निष्क्रय रह जाती है. कृष्ण का आर्यकरण उनके चरित्र में आमूल परिवर्तन का वाहक बना. ‘महाभारत’ में कृष्ण का जो रूप मिलता है, वह लगभग एक ईस्वी पूर्व की ब्राह्मणवादी कल्पना है. चाणक्य बड़े राज्यों का समर्थक था. ‘अर्थशास्त्र’ में उसने गणराज्यों की आलोचना की. लिखा है कि गणराज्यों में युवा जुए के व्यसनी हो जाते हैं. कृष्ण की प्राचीन स्मृतियां गणराज्यों के मुखियापद से जोड़ती हैं. जबकि महाभारत में उसे चाणक्य की भांति ‘वृहद राष्ट्र्र’ का प्रबल समर्थक दर्शाया गया है. नए अवतार में कृष्ण से वह सब कराया जाता है, जिसके विरोध में उसने इंद्र से संघर्ष किया था. ‘महाभारत’ के युद्ध में भील योद्धा एकलव्य तथा असुर महायोद्धा बर्बरीक दोनों ही कौरवों के पक्ष में युद्ध करने को उद्धत थे. अवतरित कृष्ण एकलव्य की छलपूर्वक हत्या करता है, साथ ही अनार्य महायोद्धा बर्बरीक को भी आत्महत्या के लिए उकसाता है. कृष्ण का यह रूपांतरण यदुओं तथा अनार्य जातियों के बीच द्वेषभाव बढ़ाने के लिए आवश्यक था. आशय है कि यदुओं को कृष्ण के ब्राह्मणीकरण की कीमत चुकाने के लिए उन्हीं देवताओं की शरणागत होना पड़ा था, जिनके सेनापति इंद्र ने उनके पूर्वज कृष्णासुर की हत्या की थी; और जिसके कारण उन्हें अपने मूल स्थान को छोड़ उत्तरपश्चिम में प्रवजन करना पड़ा था.

कृष्ण का उदाहरण हमने ऊपर दिया. देखा कि ब्राह्मणीकरण की प्रक्रिया केवल घटनाओं के वर्गीय प्रस्तुतीकरण तक सीमित नहीं रहती. उसमें चरित्रों के साथ भी जमकर घालमेल किया जाता है. हर अच्छी बात का उत्स देवताओं को बताने की धुन में सत्य के साथ मनमाना व्यवहार किया जाता है. प्रायः दावा किया जाता है कि देवता सात्विक होते हैं. कि मनसावाचाकर्मणा सात्विकता के विभिन्न रूप देवताओं की प्रेरणा से ही बने हैं. कि शुभत्व का एकमात्र स्रोत देवगण हैं. सात्विकता देवताओं में है, इसी कारण वह संसार में भी है. ये बातें ऋग्वेद में वर्णित देवताओं के चरित्र तथा उत्तरवर्ती गं्रथों में देवसभा एवं अमरपुरी के वैभवपूर्ण उल्लेखों से मेल नहीं खाती. बावजूद इसके उदार एवं करुणामय मनुष्य को ‘देवता’ संबोधित करने की प्रथा प्राचीनकाल से चलती आई है. जबकि परंपरा में जो धत्तकर्म दैत्य के बताए जाते हैं, असलियत में वही कार्य ब्राह्मणवादियों के देवता भी करते हैं. उनके देवता कदमकदम पर छल करते हैं, दूसरों की स्त्रियों को बलत्कृत करते हैं. भेंटपूजा पाकर प्रसन्न होते हैं. यदि मनमाफिक चढ़ावा न मिले तो कुपित हो जाते हैं. तुलना करें तो उनके देवता और नकचढ़े सामंत में कोई अंतर ही नहीं है. क्या यह महज संयोग है कि बृहश्पति जो देवताओं के गुरु हैं, वही लोकायत दर्शन के प्रणेता भी हैं? देवसभाओं में अप्सराओं का नृत्यगायन, देवताओं की मौजमस्ती तथा सोमपान, चार्वाकों की ‘खाओपीओ मौज करो’ की विचारधारा को ही प्रतिबिंबित करता है. यानी ‘देवगुरु’ का दर्शन देवताओं की दिनचर्या से ही प्रेरित है. यह भी हो सकता है कि स्वयं देवता अपने गुरु के दर्शन के अनुगामी बने हों.

दूसरी ओर असुर गुरु शुक्राचार्य हैं, जिन्हें इतिहास, दंडनीति, नीतिशास्त्र का आदि व्याख्याकार बताया गया है. देवविधान में दंड की मात्रा पूर्णतः दंडाधिकारी की मनमानी पर निर्भर करती है. जबकि दंडविधान में अपराध की समीक्षा की संभावना भी निहित रहती है. जाहिर है सभ्यता के इन क्षेत्रों में भी असुर आर्यजनों से काफी आगे थे. लंका पहुंचे हनुमान को वहां एक भी दास दिखाई नहीं पड़ता. जबकि अयोध्या, मिथिला आदि में दासदासियों की भरमार है. अनार्यों की समृद्ध सभ्यता के बारे में ऋग्वेद में पर्याप्त वर्णन हैं. वे अपनी बढ़ीचढ़ी सभ्यता के साथ दुर्गों में रहते थे. उनके दुर्ग लोहे(2/58/8) के, पत्थर(4/30/20) के, लंबेचौड़े गौओं से भरे हुए(8/6/23) थे. सौ खंबों वाले(शतभुजी 1/16/8, (7/15/14) दुर्ग का उल्लेख भी ऋग्वेद में है. ‘महाभारत’ की ख्याति प्राचीन भारतीय राजनीतिक दर्शन पर गंभीर विमर्श के कारण भी है. हस्तिनापुर का राज्य संभालने से पहले युधिष्ठिर भीष्म के पास राजनीति का ज्ञान लेने जाता है. शुक्राचार्य के ज्ञान की महिमा इससे भी जानी जा सकती है कि युधिष्ठिर को राजनीति का पाठ पढ़ाने वाले भीष्म शुक्राचार्य के ही शिष्य हैं. उनके शिष्यों में दूसरा नाम पृथु का भी आता है, जिसे प्रथम निर्वाचित सम्राट वेन का पुत्र तथा पृथ्वी का प्रथम मनोनीत सम्राट कहा गया है. दूसरे किस्सेकहानियों की भांति शुक्राचार्य से जुड़ी कहानियां भी मिथ हो सकती हैं. कदाचित उनमें से अनेक हैं भी. फिर भी उनकी अपनी महत्ता है. क्योंकि भारत जैसे समाजों में जहां तर्कबोध, विज्ञानबोध की कमी हो, जनजीवन मिथों से ही प्रेरणा लेता है. बहरहाल आचार्य बृहश्पति तथा शुक्र के क्रमशः चार्वाक पंथ और दंडनीति का व्याख्याकार होने से क्या यह नहीं लगता कि ब्राह्मणवादी लेखकों ने अपने ग्रंथों में सुरों और असुरों की चारित्रिक विशेषताओं को पूरी तरह उल्टापल्टा है. कई बार तो ठीक 180 डिग्री का मोड़ देकर पेश किया है.

ऐसी उपलब्धियों के बावजूद असुरों को कामी, लोभी, लालची, व्यसनी और झगड़ालू दर्शाने वाले विवरण धर्मग्रंथों में भरे पड़े हैं. दुर्व्यसन के लिए ‘आसुरी वृत्ति’ लोकप्रचलित मुहावरा है. ‘सात्विक’ देवता चाहे जो दुराचरण करें, उनका देवत्व नष्ट नहीं होता. प्रायः उसे ‘लोककल्याण के निमित्त’, ‘धर्मसंस्थापनार्थायः’ मान लिया जाता है. असुर सम्राट जलंधर की भार्या वृंदा के साथ दुराचरण करने के बावजूद विष्णु का देवत्रयी में सम्मानजनक स्थान बना रहता है. ना ही ऋषिपत्नी अहिल्या के साथ बलात्कार करने पर इंद्र का देवत्व संकट में पड़ता है. उल्टे अहिल्या को ही शिलाखंड जैसा जीवन जीना पड़ता है. भाषा का खेल भी खूब खेला जाता है. देवता नशा करें तो ‘सोमपान’ और असुर करें तो मदिरापान. सोमपान से देवताओं की सात्विकता पर संकट नहीं आता, परंतु मदिरापान से असुर बदचलन और तिरस्कारयोग्य मान लिए जाते हैं. कारण समझने के लिए ज्यादा माथापच्ची की आवश्यकता नहीं है. समस्त धर्मग्रंथ ब्राह्मणों द्वारा रचे गए हैं. उनके अपने हित विभेदकारी व्यवस्था से जुड़े थे. इसलिए उनके द्वारा गढ़ी गई संस्कृति में समानता एवं सर्वसम्मति के अवसर बहुत कम हैं. जिधर देखो उधर उसका सर्वसत्तावादी रूप नजर आता है. यह सर्वसत्तावाद कदाचित अनार्य संस्कृति के अग्रपुरुषों को भी ललचाने लगा था. इसलिए जब आर्यों का आक्रमण हुआ तो अनेक अनार्य योद्धा भी उनके साथ मिल गए. सुदास और दस राजाओं का युद्ध आर्यों के बीच वर्चस्व की लड़ाई थी. उसमें सुदास का नेतृत्व वशिष्ट तथा दसराज्ञों का नेतृत्व विश्वामित्र द्वारा किया गया था. मगर दस राजाओं में अज, शिब्रु, शिम्यु, यदु, यक्षु आदि अनार्य कबीले भी सम्मिलित थे. इस तरह भारत को आर्यवर्त्त बनाने में अनार्य योद्धाओं का भी भरपूर योगदान था. हिरण्यकश्यपु पुत्र प्रहलाद भी इन्हीं में आता है. उसने विष्णु को अपना ईष्ट मानकर अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह में ब्राह्मणवादियों का साथ दिया था. विभीषण, हनुमान, जटायु जैसे पात्र महाकाव्यीन लेखकों की कल्पना की उपज रहे होंगे. संभव है उनसे मिलतेजुलते पात्र समाज में सचमुच रहे हों, जिन्होंने आर्यसंस्कृति से प्रभावित होकर उनके साथ मिलना स्वीकार किया हो. आर्यों की श्रेष्ठता को दर्शाने के लिए ऐसे मिथकीय पात्रों की कल्पना आवश्यक थी. जिसमें उन्हें भरपूर सफलता भी मिली थी. ब्राह्मणीकरण की यह प्रक्रिया बहुत धीमे, युगों तक चली थी. इसके लिए आर्यों को अनगिनत युद्ध लड़ने पड़े और समझौते भी करने पड़े.

स्वाभाविकसा प्रश्न है कि असुर सभ्यता यदि इतनी ही विकसित थी, तो उसका पतन कैसे हुआ? इसका एक कारण यह जान पड़ता है कि आर्यों के आगमन के पूर्व विभिन्न कबीलों के बीच गणतांत्रिक व्यवस्था थी. भूक्षेत्र समृद्ध था. इसलिए सभी अपनेअपने प्रांत में सुखपूर्वक रहते थे. खेती में वे पारंगत थे. हड़प्पा सभ्यता में मिले भंडारगृहों से संभावना जगती है कि किलों का उपयोग सामरिक उद्देश्यों के बजाय, बचे हुए अनाज के भंडारण हेतु किया जाता था. खुद को सुरक्षित मान वे प्रायः निश्चिंत रहा करते थे. इसलिए जब आर्यों की ओर से आक्रमण हुआ तो वे एकाएक स्वयं को संभाल न सके. कालांतर में आर्यों के संपर्क में आकर उनमें भी साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाएं पनपने लगी थीं. इसलिए आक्रामकों का एकजुट सामना करने के बजाए वे बंटकर अपने ही लोगों के विरुद्ध मोर्चा संभालने लगे. दुष्परिणाम यह हुआ कि उन्हें समृद्ध सिंधु प्रदेश छोड़, उत्तरपश्चिम और दक्षिण की ओर पलायन करना पड़ा. परास्त होकर या आर्यों के आक्रमण के भय से अनेक अनार्य जातियों ने समझौता कर लिया. धीरेधीरे वे ब्राह्मणीकरण के दायरे में सिमटने लगे. बावजूद इसके इतिहास में कभी ऐसा नहीं हुआ जब सभी ने ब्राह्मणीकरण के आगे हथियार डाल दिए हों. न ही कभी ऐसा हुआ जब किसी युद्ध में सारे आर्य या अनार्य किसी एक पक्ष में रहे हों. रावण, महिषासुर, हिरण्याक्ष, हिरण्यकश्यपु, बालि, बलि जैसे कुछ स्वाभिमानी अनार्य सम्राटों की लंबी कतार है, जो अपने मानसम्मान की खातिर आर्यों से आजीवन संघर्ष करते रहे. यदि उस संघर्ष का निष्पक्ष भाव से दस्तावेजीकरण किया गया होता तो भारतीय संस्कृति का स्वरूप कदाचित उतना विभेदकारी नहीं होता, जितना कि आज है.

अनार्य संस्कृति के पराभव का मूल कारण उसके राजाओं की सैन्य दुर्बलता न होकर, अपनी संस्कृति और इतिहास के दस्तावेजीकरण की ओर से उदासीन हो जाना था. जबकि आर्यगण जिन दिनों तक लेखनकला का विकास नहीं हुआ था, उन दिनों भी स्मृतिभरोसे इस कर्तव्य को निभाते रहे. लेखनकला का विस्तार होने के पश्चात उन्होंने प्रत्येक ऐतिहासिक प्रसंग का वर्णन अपने स्वार्थ को ध्यान में रखकर किया. यहां तक कि असुरों की उपलब्धियों और खोजों को भी अपने नाम करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी. उन्होंने संस्कृति को मूल माना और पीढ़ीदरपीढ़ी अनेकानेक प्रतिभाशाली लेखक अपने नाम से स्वतंत्र ग्रंथ रचने का मोह छोड़, बिना किसी यशलाभ की अपेक्षा के, पहले से उपलब्ध धर्मशास्त्रों में ही जोड़घटाव करते रहे. अनेक लोगों द्वारा, अलगअलग समय में लिखे जाने के कारण धर्मशास्त्रों में भारी दोहराव है. अंतर्विरोध और असंगतियां भी हैं. परंतु वे इन्हें कमजोरी नहीं मानते. तर्कशीलता के अभाव को ढांपने के लिए उन्होंने आस्था और विश्वास पर जोर दिया. धर्मशास्त्रों पर किसी भी प्रकार के अविश्वास को पाप मानते हुए वे शब्द के स्वयंप्रमाण होने की घोषणा करते रहे. इससे नए ज्ञान के अवसर कम हुए. मनुष्य की स्वाभाविक प्रश्नाकुलता पर भी विराम लगा. लेकिन ब्राह्मणवाद या जिस सर्वसत्तावादी ध्येय के निमित्त उन शास्त्रों की रचना हुई थी, उसमें उन्हें भरपूर कामयाबी मिली.

ब्राह्मणवाद : वर्चस्व की सनातनी परंपरा

संस्कृति मनुष्य की सामाजिक संरचना का आधार होती है. समाज में मनुष्य की पहचान संस्कृति के अलावा शिक्षा, उत्पादन के साधनों आदि से भी होती है. बावजूद इसके समाज का बड़ा हिस्सा अपनी सांस्कृतिक पहचान को ही वास्तविक पहचान माने रहता है. इसलिए वह सांस्कृतिक परिवर्तन के लिए एकाएक तैयार नहीं होता. यहां तक कि सांस्कृतिक अंतर्विरोधों, असमानताओं के आगे, उन्हें स्वाभाविक मान समर्पण किए रहता है. परिवर्तन संस्कृति में भी होते हैं. लेकिन वे कभी भी उस सीमा तक नहीं जा पाते कि समाज का तानाबाना ही छिन्नभिन्न हो जाए. चूंकि सांस्कृतिक प्रतीकों यहां तक कि विरोधाभासों, अंतर्विरोधों के प्रति भी मनुष्य का समर्पण स्वैच्छिक होता है, इसलिए सांस्कृतिक दासता राजनीतिक दासता की अपेक्षा कहीं अधिक टिकाऊ एवं प्रभावशाली होती है. लंबे समय तक केवल संस्कृतियां राज करती हैं. अतः दीर्घ काल तक राज करने की इच्छा रखनेवाला राजनीतिक हमलावर सबसे पहले विजित संस्कृति की उन विशेषताओं पर हमला बोलता है, जो उसे स्वतंत्र संस्कृति की मान्यता दे सकती हैं. यह कार्य आरंभ में बल प्रयोग द्वारा, बाद में सहमति तथा तरहतरह की कूटनीतिक चालों द्वारा किया जाता है. संस्कृति और मनुष्य का संबंध इतना गहरा होता है कि मनुष्य संस्कृति के अंतर्विरोधों को भी अपने व्यक्तित्व का हिस्सा मानकर आत्मसात कर लेता है. भारतीय संस्कृति का ब्राह्मणवाद के ढांचे में ढल जाना इसी प्रवृत्ति को दर्शाता है.

हिंदुत्व ब्राह्मणवाद का रुपहला पर्याय है. शानदार खिड़की जिसके पीछे वह अपने कुटिल चेहरे को छिपाए रखता है. इस हिंदुत्व को न्यायालय ने जीवनपद्धति भी माना है. दोष न्यायालय का नहीं है. लोकतंत्र में लोगों की इच्छा का महत्त्व होता है. यदि समाज का बहुसंख्यक वर्ग ब्राह्मणवाद की विभेदकारी व्यवस्थाओं के प्रति आंख मूंदकर, चाहेअनचाहे उसके रंग में रंगा हुआ है, तो न्यायालय इसमें क्या कर सकता है! उसका काम तो सिरों की गिनती करने से चल जाता है. अदालत के लिए वही सत्य होता है, जिसके पक्ष पर्याप्त साक्ष्य हों. गवाह बेमन से गवाही दे, या जानबूझकर गलतबयानी करे, चाहे सवाल को ढंग से समझे बिना सिर्फ हांहू करता जाए तो न्यायालय क्या करे! आदमी आलू भी खरीदने जाता है तो मंडी में चार जगह देखता है. मोलभाव और जांचपरख करता है. चाहे एक वक्त की खरीदारी हो या एक सप्ताह की—एकएक आलू को छांटकर खरीदता है. लेकिन धर्म जो उसके अपने और आने वाली पीढ़ियों के जीवन को प्रभावित करता है, उसके बारे में कभी कोई सवालजवाब नहीं करता. सवाल करना भी पाप समझता है. बात आ पड़े तो बिना सवालजवाब किए ही मरनेमारने पर उतारू हो जाता है, क्यों? कदमकदम पर एकदूसरे की आलोचना करने वाले, सर्वश्रेष्ठ होने का दावा करने वाले धर्मों में एक मुद्दे पर कमाल की सहमति होती है. मुद्दा है जन्म के साथ ही मनुष्य का धर्म तय कर दिया जाना. हर धर्म अपने समर्थकों के सिर गिनता है. सिर में मस्तिष्क भी हो, और मस्तिष्क अपना काम भी करे, इस ओर वह कभी ध्यान नहीं देता. जानता है कि इस ओर ध्यान देना शुरू किया तो चार दिन में सारी दुकानदारी बैठ जाएगी. इसलिए पुरानी शराब की भांति हर धर्म नशे के सामर्थ्य और उसके बहाने अपने कारोबार को बढ़ाता चला जाता है.

बहरहाल, बात हिंदुत्व और उसे जीवनपद्धति बताए जाने की हो रही थी. हिंदुत्व यदि जीवनपद्धति है तो मनुष्य को जो आजादी अपनी जीवनपद्धति को चुनने की होनी चाहिए, वैसी आजादी क्या यह धर्म देता है? कथित सनातनी हो या गैरसनातनी, हिंदू परिवारों की सामान्य जीवनचर्या मिलीजुली होती है. हर परिवार में कोई आला या कोना ‘मंदिर’ के नाम पर आरक्षित होता है. प्रत्येक घर में मूर्तियों को नहलाया जाता है. सुबहशाम की आरती, पूजाबंदन बिना नागा चलता है. जब तक पत्थर की मूर्ति से छुआ न लें, घर के सदस्य विशेषकर स्त्रियां अन्नजल तक ग्रहण नहीं करतीं. मंदिर में कागज, पत्थर, कांच, मिट्टी, लकड़ी या प्लास्टिक के आड़ेतिरछे, भांतिभांति के देवता आसन जमाए रखते हैं. हर घर में साल में एकदो बार ‘सत्यनारायण कथा’ कही जाती है. पंडित सारे कर्मकांड रचता है. परंतु कभी नहीं बताता कि बाबा ‘सत्यनारायण’ कौन हैं? उनका खानदान क्या है? किस हिंदू धर्मशास्त्र में उनका उल्लेख है? फिर भी डरीसहमी कुलललनाएं इस कथा के श्रवण से खुद को धन्य मानती रहती हैं. अब यह मत कहिए कि संकट के समय जरूरतमंद की मदद करना, सादा जीवन जीना, जीवमात्र पर दया करना, चोरीचकारी से परहेज रखना, सत्य वाचन, मातापिता का सम्मान करना और बुराइयों से दूर रहना हिंदुत्व हमें सिखाता है. ये सब बातें तो नैतिकता के हिस्से आती हैं. वही समाजीकरण का मुख्य आधार भी हैं. समाज के बीच जगह बनाने के लिए प्रत्येक धर्म चाहे वह मूर्तिपूजकों का हो या मूर्तिभंजकों का, इन सदाचारों को अपनाता है. इन्हें अपनाए बिना उसकी गति नहीं है. इसलिए अभिव्यक्ति का तरीका चाहे जो हो, हर धर्म में यही सदाचार सिखाए जाते हैं. इसे धर्म की धूर्त्तता कहें या बेईमानी, वह नैतिकता से उधार लिए इन सदाचारों को अपना बनाकर पेश करता है. इस तरह पेश करता है मानो धर्म है तो सदाचार हैं. असल में होता इसका उलटा है. मनुष्य धर्म को इसीलिए अपनाता है ताकि उसकी आने वाली पीड़ियां धर्म के साथ जुड़े शील और सदाचारों को अपनाएं. परंतु वह भूल जाता है कि शील और सदाचरण धर्म के बाहरी आवरण हैं. महज दिखावा, लोगों को प्रलोभन देने वाले. धर्म कोई भी हो. उसका मूल स्वरूप सामंतवादी होता है. समाजीकरण की अनिवार्यता धर्म नहीं, शील और सदाचरण हैं. यदि कहीं समाज है तो वहां धर्म भले ही न हो, समाजीकरण की प्रमुख शर्त के रूप में शील और सदाचरण रहेंगे ही. बिना धर्म के समाज गढ़ा जा सकता है, लेकिन बिना शील और सदाचार के उसका एक क्षण भी अस्तित्व में रहना मुश्किल है. आम हिंदू के लिए ‘हिंदुत्व’ नामक कथित ‘जीवनपद्धति’ का आशय मूर्तियों पर जल चढ़ाने, किसी न किसी देवता पर भरोसा करने, गाय को रोटी देने, व्रतउपवास रखने, पर्वत्योहार पर विधिसम्मत पूजनअर्चन करने जैसे कर्मकांडों तक सीमित है. ये सब ऐसे आयोजन हैं जिनमें ब्राह्मणों की प्रत्यक्ष या परोक्ष भूमिका बनी रहती है. दूसरे शब्दों में जिसे हिंदुत्व कहा जाता है, वह ब्राह्मणवाद का ही लौकिक विस्तार है. इसलिए हिंदुत्व का बने रहना, प्रकारांतर में ब्राह्मणवादी व्यवस्था का अस्तित्व में रहना है.

ब्राह्मणवाद’ को जीवित रखने के लिए उन्होंने अनेक षड्यंत्र रचे हैं. उनमें जनता द्वारा प्रथम निर्वाचित सम्राट वेन तथा महिषासुर की छलहत्या, एकलव्य का अंगूठा काट लेना, शंबूक की हत्या के बहाने उसके उत्तराधिकारियों को ज्ञान से वंचित कर देना जैसे उनके अनगिनत धत्तकर्म सम्मिलित हैं. चूंकि आरक्षण ने दलित एवं समाजार्थिक आधार पर पिछड़े वर्गों को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर दिया है, इसलिए वे उनके सबसे बड़े आलोचक हैं. जातिवाद को पीढ़ीदरपीढ़ी पोषते, उसके आधार पर अपने विशेषाधिकार गिनाते आए लोग आज उन वर्गों पर जातिवादी होने का आरोप लगा रहे हैं, जो शताब्दियों से जातीय उत्पीड़न का शिकार होकर इससे मुक्ति की कामना करते आए हैं. हिंदुत्व का उनका एजेंडा केवल धर्म तक सीमित नहीं है. इसे केवल धर्म से जोड़कर रखना परिवर्तनकामी शक्तियों की भारी भूल रही है. उनका असली एजेंडा संसाधनों पर मुट्ठीभर लोगों की इजारेदारी को मजबूत करना तथा उसे किसी भी चुनौती से बचाए रखना है. इसके लिए तरहतरह के टोटम, जादूटोने, पूजापाखंड समाज में लागू किए जाते हैं. जाति के आधार पर तीनचौथाई जनसंख्या को शूद्र या दलित बताकर जमीन तथा उत्पादन के अन्य संसाधनों से वंचित कर देने का अर्थ है—पंद्रहबीस प्रतिशत लोगों द्वारा समाज के कुल संसाधनों पर कब्जा. धर्म आधारित वर्चस्वकारी संस्कृति तथा जातिभेद के प्रति निरक्षर जनता का निःशर्त समर्पण उन्हें दीर्घजीवी बनाता है.

वर्चस्वकारी संस्कृति का जिक्र हुआ तो बता दें कि वह समाज को दो तरह से अपनी जकड़ में लेती है. पहले बलप्रयोग द्वारा, जिसमें शक्ति का उपयोग कर समाज के अधिकतम संसाधनों पर अधिकार कर लिया जाता है. दूसरे अपनी बौद्धिक प्रखरता के बल पर. उसके द्वारा पोषित बुद्धिजीवी प्रत्येक परिस्थिति को अपने स्वार्थ के अनुकूल ढालने में प्रवीण होते हैं. अपने बुद्धिचातुर्य के बल पर वे शेष जनसमाज को विश्वास दिला देते हैं कि केवल वही उनके सबसे बड़े शुभेच्छु हैं और जो व्यवस्था उन्होंने चुनी है वह दुनिया की श्रेष्ठतम सामाजिकराजनीतिक व्यवस्था है. ऐसा नहीं है कि जनसाधारण में बुद्धिविवेक की कमी होती है. ग्राम्शी की माने तो प्रत्येक व्यक्ति दार्शनिक होता है. लेकिन प्रत्येक व्यक्ति परिस्थितियों को अपने पक्ष में परिभाषित करने में दक्ष नहीं होता. इस कारण वर्चस्वकारी संस्कृति के समर्थक बुद्धिजीवियों पर विश्वास करना, जनसाधारण की मजबूरी बन जाता है. कभी हताशा तो कभी अज्ञान के चलते वह अपने शोषकों को ही अपना सर्वाधिक हितैषी और मुक्तिदाता मानने लगता है. ऐसे में परिवर्तन उसी दिशा में होता है, जिसका वास्तविक लाभ पूंजीपति और दूसरे एकाधिकारवादी संस्थान उठा सकें. स्थितियों में आमूल परिवर्तन तभी संभव है, जब गैर अभिजन समाज के अपने बुद्धिजीवी हों, जो उसकी समस्याओं और हितों की उसके पक्ष में सहीसही पड़ताल कर, प्रतिबद्धता के साथ उसका मार्गदर्शन कर सकें.

वर्चस्ववादी ब्राह्मण संस्कृति के पुनरीक्षण की शुरुआत हालांकि मध्यकाल में कबीर, रैदास, नानक जैसे संतकवियों द्वारा हो चुकी थी. लेकिन उनकी चिंता के केंद्र में केवल धार्मिक आडंबरवाद, छुआछूत तथा अन्यान्य सामाजिक रूढ़ियां थीं. आर्थिक असमानता जो बाकी सभी बुराइयों की जड़ है, को वे कदाचित मनुष्य की नियति मान बैठे थे. कबीर जैसे विद्रोही कवि ने भी संतोष को परमधन कहकर रूखीसूखी खाने, दूसरे की चुपड़ी रोटी देखकर जी न ललचाने की सलाह दी थी. वह गरीबी का महिमामंडन, दैन्य को आभूषण मान लेने जैसी चूक थी. रैदास ने जरूर ‘बेगमपुर’ के बहाने समानता पर आधारित समाज की परिकल्पना की थी. वह क्रांतिकारी सपना था, अपने समय से बहुत आगे का सपना, मगर उसके लिए उनका समाज ही तैयार नहीं था. जिन लोगों के लिए वह सपना देखा था वह इतना हताश हो चुका था कि शीर्षस्थ वर्गों की कृपा में ही अपनी मुक्ति समझता था. उस समय तक पश्चिम में भी यही हालात थे. वहां रैदास से दो शताब्दी बाद थामस मूर ने ‘बेगमपुर’ से मेल खाती ‘यूटोपियाई’ परिकल्पना की थी, जिसपर उसे स्वयं ही विश्वास नहीं था. इसलिए अपनी कृति ‘यूटोपिया’ में उसने समानताआधारित समाज की परिकल्पना पर ही कटाक्ष किया था. आगे चलकर, यूरोपीय पुनर्जागरण के दौर में यही शब्द आमूल परिवर्तन का सपना देख रहे लेखकों, बुद्धिजीवियों, आंदोलनकारियों और जनसाधारण का लक्ष्य और प्रेरणास्रोत बन गया. जबकि सामाजिक अशिक्षा और आत्मविश्वास की कमी के कारण रैदास के ‘बेगमपुर’ की परिकल्पना सूनी आंखों के सपने से आगे न बढ़ सकी थी. कुछ दिनों बाद उन लोगों ने ही उसे भुला दिया, जिन्हें उसकी सर्वाधिक आवश्यकता थी.

शताब्दियों बाद उस परिकल्पना को आगे बढ़ाने का काम फुले और डॉ. अंबेडकर ने किया. ग्राम्शी ने बुद्धिजीवी की जो परिभाषा उद्धृत की है, उस पर ये दोनों महामानव एकदम खरे उतरते हैं. उनकी प्रेरणा तथा लोकतांत्रिक अवसरों का लाभ उठाते हुए दलित बुद्धिजीवियों का एक वर्ग उभरा, जिसने ब्राह्मणवाद के विरुद्ध आवाज बुलंद की. इसी के साथसाथ पिछड़े वर्गों में भी राजनीतिक चेतना का संचार हुए. आबादी के हिसाब से पिछड़े पचास प्रतिशत से अधिक थे. कदाचित उनके नेताओं को लगता था कि उन्हें किसी बौद्धिक नेतृत्व की आवश्यकता नहीं है. उनमें कुछ उन दबंग जातियों में से भी थे, जो सामंती दौर में विप्र जातियों के ‘लठैत’ का काम करते आए थे. अपने ‘लट्ठपन’ पर उन्हें खूब भरोसा था. कदाचित यह गुमान भी था कि ‘बेलेट’ ने बात बिगाड़ी तो ‘लाठी’ से संभाल लेंगे. 1937 के चुनावों में कांग्रेस से मात त्रिवेणी संघ के पिछड़ी जाति के नेताओं ने यही तो कहा था—‘वोट से हार गए तो क्या हुआ. हमारी लाठी तो हमारे हाथ में है.’ इन्हीं कमजोरियों के कारण दलित और पिछड़े नेताबुद्धिजीवी वास्तविक सहयोगियों की पहचान करने में चूकते रहे. इसी का लाभ उठाकर वर्चस्वकारी संस्कृति के पैरोकार, दलितों और पिछड़ों को उनकी जाति की याद दिलाकर अलगअलग समूहों में बांटते रहे. पर्याप्त संख्याबल का अभाव दलितों के स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति बनने की बाधा था. नतीजा यह हुआ कि वर्चस्वकारी संस्कृति के विरुद्ध शोषितउत्पीड़ित वर्गों का कोई सशक्त मोर्चा न बन सका.

आज स्थिति बदली हुई है. शिक्षा और लोकतांत्रिक अवसरों का लाभ उठाकर दलितों और पिछड़ों में नया बुद्धिजीवी वर्ग उभरा है, जो न केवल अपने शोषकों की सहीसही पहचान कर रहा है, बल्कि अपने बुद्धिविवेक के बल पर उन्हें उन्हीं के मैदान में चुनौती देने में सक्षम है. वह जानता है कि जाति, धर्म, संस्कृति, राष्ट्रवाद आदि वर्चस्वकारी संस्कृति के वे हथियार हैं जिनका उपयोग अभिजन संस्कृति के पैरोकार अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए करते आए हैं. वह यह भी समझ चुका है कि कोरा राजनीतिक परिवर्तन केवल सत्तापरिवर्तन को संभव बना सकता है. आमूल परिवर्तन के लिए संस्कृति के क्षेत्र में भी बदलाव आवश्यक है. जानता है कि दलित और पिछड़ों के सपने, दोनों की समस्याएं यहां तक कि चुनौतियां भी एक जैसी हैं. उनके समाधान के लिए संगठित विरोध अपरिहार्य है. इस बात को शिखरस्थ वर्ग भी भलीभांति जानता है कि दलित और पिछड़े वर्गों की सामाजिकसांस्कृतिक और राजनीतिक एकता उसे सत्ता से हमेशाहमेशा के लिए बेदखल कर सकती है. उच्चशिक्षण संस्थानों से निकले ओबीसी, आदिवासी एवं दलित युवाओं का यही युगबोध वर्चस्वकारी संस्कृति के पैरोकारों को चिंता में डाले हुए है.

निर्ब्राह्मणीकरण : समानता आधारित समाज का सपना—बरास्ता महिषासुर आंदोलन

समानता और स्वतंत्रता के लिए वर्चस्वकारी संस्कृति से मुक्ति आवश्यक है. भारतीय समाज सामाजिकसांस्कृतिक स्तर पर बंटा हुआ है. अद्विज आज भी असमानता का दंश झेल रहे हैं. कारण किसी से छिपे नहीं है. ब्राह्मणवादी व्यवस्था मनुष्य को जन्म के साथ ही जाति और धर्म के खानों में बांट देती है. स्वतंत्र भारत में संवैधानिक प्रावधानों द्वारा इस अंतर को मेटने की कोशिश तो हुई, मगर सामाजिकसांस्कृतिक जकड़बंदी इतनी मजबूत है कि आजादी के 69 वर्ष बाद भी लोग उससे उबर नहीं पाए हैं. लोकतांत्रिक परिवेश ने उत्पीड़न का शिकार रहे लोगों को इतना अवसर जरूर दिया है कि वे इतिहास को अपने ढंग से समझने के साथसाथ उन कारणों की भी समीक्षा कर सकें, जो उनके दमन और दासता के मूल में हैं. इस छटपटाहट से भारतीय संस्कृति के मुख्य प्रतीकों, घटनाओं, चरित्रों यहां तक कि मिथकों के विवेचन की शुरुआत हुई. धीरेधीरे ही सही मगर संस्कृति के विखंडनात्मक विवेचन की प्रक्रिया आगे बढ़ी है. उसके सूत्रधार दमितशोषित वर्गों में जन्मे वे बुद्धिजीवी हैं, जिन्हें जाति या किसी और कारण से बौद्धिक विमर्श से बाहर रखा गया था. अवसर मिलते ही वे न केवल सवाल उठाने लगे थे. बल्कि उसके जवाब भी अपने बौद्धिक सामर्थ्य के आधार पर स्वयं खोजने को उद्धत थे. उन लोगों के लिए जो अभी तक समाज के बड़े हिस्से को अपनी कूटनीतिक चालों के आधार पर नचाते आए थे, यह बहुत बड़ी चुनौती थी. ‘महिषासुर दिवस’ का आयोजन उसी क्रम में हालिया आंदोलन की एक कड़ी है. वह हमारे समय की महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक परिघटना है. शताब्दियों से जो वर्ग दूसरों की निगाह से खुद को देखता आया थाकृ‘महिषासुर दिवस’ के बहाने वह खुद को अपनी दृष्टि से देखनेसमझने की कोशिश में लगा है. यह देर से हुई अच्छी और क्रांतिकारी शुरुआत है.

जो लोग ‘महिषासुर मर्दिनी’ कहकर देवी का गुणगान करते आए थे, बदले परिवेश में वे महिषासुर को मिथ बताने लगे हैं. जल्दबाजी में वे भूल जाते हैं कि महिषासुर को यदि मिथ मान लिया गया तो देवी दुर्गा भी मिथ ही सिद्ध होगी. साथसाथ उन देवीदेवताओं को भी मिथ मानना पड़ेगा, जिनके कंधों पर कथित देवसंस्कृति की इमारत खड़ी है. ऐसे में यदि कोई राम और दुर्गा के बहाने अपनी संस्कृति थोप सकता है, उनके माध्यम से वर्चस्वकारी सत्ता के शिखर पर टिका रह सकता है, तो उसकी मुक्ति के प्रतीक के रूप में शंबूक और महिषासुर को भी नायक बनाया जाता है. इतिहास की कमजोरी है कि वह बहुत भरोसे की चीज नहीं होता. वह हमेशा विजेता संस्कृति की इच्छाओं और कामनाओं के अनुसार ढाला जाता है. विवेकवान समाज ऐसे इतिहास की परवाह नहीं करता. जानता है कि सुविधानुसार नायक चुनने की जो आजादी अन्य वर्गों को है, उतनी आजादी उसे भी है. ऐतिहासिक भूलों से सीख लेते हुए वह अपने नायक स्वयं चुनता है. ‘महिषासुर’ ऐतिहासिक चरित्र है—इसके समर्थन में उतने ही तर्क जुटाए जा सकते हैं, जितने उनके पास ‘राम’ या ‘रावण’ को इतिहासपुरुष सिद्ध करने के हैं. पूरा मामला तार्किकता से जुड़ा है. इसमें प्रायः वे असफल होते हैं. उस समय वे आस्था का मामला बताकर लोगों के विवेक और इतिहासबोध को ही प्रभावित करने लगते हैं.

धर्मग्रंथों के जरिये एक बात जो प्रामाणिक रूप से सामने आती है, वह है संस्कृतियों का द्वंद्व. जिसमें महिषासुर की उपस्थिति जनसंस्कृति के प्रभावशाली मुखिया के रूप में है. वह श्रमसंस्कृति में भरोसा रखने वाली, पशुचारण अर्थव्यवस्था से नागर सभ्यता की ओर बढ़ती, तेजी से विकासमान भारत की प्राचीनतम सभ्यता का महानायक था. वह उस संस्कृति का प्रतिकार करता था जो अनेकानेक असमानताओं, आडंबरों और भेदभाव से भरी थी. दूसरों के श्रम पर अधिकार जताने वाली बेईमान संस्कृति. उसके सर्वेसर्वा रहे देवता सागरमंथन में बरा बरी का हिस्सा देने के वायदे के साथ असुरों से सहयोग मांगते हैं. कार्य पूरा होने पर बेईमानी करते हुए ‘अमृत’ तथा बहुमूल्य रत्न खुद हड़प लेते हैं. इस आंदोलन का वे लोग विरोध कर रहे हैं जिनके मन में 1000—1500 वर्ष पुराना भारत बसता है, जब ऊंची जातियां अपने से निचली जातियों के साथ मनमाना व्यवहार करने को स्वतंत्र थीं. संस्कृति की पुनरीक्षा तथा उसके आधार पर न्याय की मांग को कुछ लोग देशद्रोह भी कह रहे हैं. उनके सोच पर तरस आता है. वे या तो देश और देशद्रोह की परिभाषा से अनभिज्ञ हैं, अथवा लोगों को अपने शब्दजाल में उलझाए रखना चाहते हैं. जैसा वे हजारों वर्षों से करते आए हैं.

देश कोई भूखंड नहीं होता. वह अपने नागरिकों के सपनों और स्वातंत्रयचेतना में बसता है. लाखोंकरोड़ों लोग जहां एकजुट हो जाएं, वहीं अपना देश बना लेते हैं. जिन लोगों में स्वातंत्रय चेतना नहीं होती, उनका कोई देश भी नहीं होता. ऐसे लोग देश में रहकर भी उपनिवेश की जिंदगी जीते हैं. भारत अर्से से ब्राह्मणवाद का उपनिवेश रहा है. आगे भी रहे, यह न तो आवश्यक है, न ही स्वीकार्य. यहां वही संस्कृति चलेगी जो इस देश के सवा सौ करोड़ लोगों की साझा संस्कृति होगी. जो सामाजिकसांस्कृतिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता तथा संसाधनों में सभी की निष्पक्ष और समान सहभागिता सुनिश्चित करती हो. वैसे भी मनुष्य की स्वतंत्रता किसी व्यक्ति, समाज या संस्कृति का देय नहीं होती. यह मनुष्य होने की पहली और अनिवार्य शर्त है. यह प्रकृति का ऐसा अनमोल उपहार है जो मनुष्य को उसके जन्म से ही, वह चाहे जिस जाति, धर्म, वर्ग, देश या समाज में जन्मा हो—जीवन की पहली सांस के साथ स्वतः प्राप्त हो जाता है. जिस देश की संस्कृति अपने तीनचौथाई नागरिकों को समाजार्थिक एवं बौद्धिक रूप से गुलाम बनाती हो, वह ‘राष्ट्र’ तो क्या भूखंड कहलाने लायक भी नहीं होता. इसे देशद्रोह कहने वाले असल में वे लोग हैं जिनका देश कुर्सियों में बसा होता है. जो जनता से प्राप्त शक्तियों का उपयोग उसे छलने और मूर्ख बनाने के लिए करते हैं. इसके लिए वे कभी राष्ट्रवाद, कभी धर्म तो कभी जाति को माध्यम बनाते हैं. यह सरकार और उसके आसपास घूमने वाले मुट्ठीभर समूहों को ही राष्ट्र घोषित करने की साजिश है, जिसके सर्वोत्तम रूप को भी टॉमस पेन ने आवश्यक बुराई माना है.

महिषासुर आंदोलन’ का विरोध कर रहे लोग या तो इस देश के प्राचीन इतिहास से अनभिज्ञ हैं, अथवा जानबूझकर अनभिज्ञ बने रहना चाहते हैं. उनके मानस में पुष्यमित्र शुंग के बाद का भारत बसता है. भौतिक और अधिभौतिक दोनों ही दृष्टियों से वह देश के पराभव का दौर था. विदेशी व्यापार सिमटने लगा था. उपनिषदों की जगह पुराण लिखे जा रहे थे. वैदिक धर्म छोटेछोटे संपद्रायों में सिमट चुका था. महाकाव्यों को उनका वर्तमान स्वरूप उन्हीं दिनों प्राप्त हुआ, जिसने चातुर्वर्ण्य समाज की अवधारणा को मजबूती से स्थापित किया था. वे प्राचीन भारत की संपन्नता का बखान करते हुए नहीं थकते. बारबार याद दिलाते हैं कि भारत कभी ‘सोने की चिड़िया’ कहलाता था. इतिहास बताता है कि भारत का सबसे समृद्धिशाली दौर ईसा के चारपांच सौ वर्ष पहले से लेकर इतनी ही अवधि बाद तक का रहा है. उस दौर के बड़े सम्राट या तो बौद्ध थे, अथवा जैन. दूसरे शब्दों में ब्राह्मणवाद के सबसे बुरे दिन देश की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे अच्छे दिन थे. डॉ. रमेश मजूमदार के अनुसार उस दौर में आजीवक, जैन एवं बौद्ध दर्शनों के प्रभामंडल में जातीय स्तरीकरण घटा था. सामाजिक भेदभाव तथा यज्ञबलियों में कमी आई थी. उसके फलस्वरूप परस्पर सहयोगाधारित व्यापारिक संगठन तेजी से पनपे. बौद्ध दर्शन ने भारतीय मेधा को विश्वस्तर पर स्थापित किया था. हर कोई भारतीय व्यापारियों के साथ व्यापार करने को उद्यत था. फलस्वरूप व्यापार बढ़ा तथा देश आर्थिक समृद्धि के शिखर की ओर बढ़ता चला गया.

ब्राह्मणवाद तभी तक जीवित है, जब तक लोग धर्म, जाति, और आडंबरों के मोहजाल में फंसे हैं. इसलिए वह किसी भी प्रकार के प्रबोधन से घबराता है. ‘महिषासुर शहादत दिवस’ का आयोजन भारतीय संस्कृति के इतिहास में न तो कोई नया पन्ना जोड़ता है, न ही कुछ गायब करता है. असल में वह ब्राह्मणवाद द्वारा थोपी गई स्थापनाओं से बाहर आने की छटपटाहट है. यह मनुष्य के विवेकीकरण को समर्पित, धर्म और संस्कृति की सनातनी व्याख्याओं के विरुद्ध विखंडनवादी चेतना है. जो अप्रासंगिक हो चुके विचार, धारणा, प्रतीक आदि को किनारे कर आगे निकल जाना चाहती है. इसमें पर्याप्त ऊर्जा और वैचारिक तेज है. जिसका डर सत्ताधारी अभिजन चेहरों पर पढ़ा जा सकता है. वे जानते हैं कि बहुजन दृष्टि से मिथकों की पुनर्व्याख्या का सिलसिला एक बार आरंभ हुआ तो आगे रुकेगा नहीं. ऐसा नहीं है कि ब्राह्मणवाद को इतिहास में इससे पहले कोई चुनौती नहीं मिली थी. उसे कई बार चुनौतियों से गुजरना पड़ा है. लेकिन तब से आज तक धरती न जाने कितनी परिक्रमाएं कर चुकी है. ज्ञान पर तो किसी का कब्जा न तब संभव था, न आज. लेकिन तब ब्राह्मणेत्तर वर्गों की प्रतिभाओं को उपेक्षित किया जाता था. आज यह संभव नहीं है. लोकतांत्रिक परिवेश में उनके विरोध को दबाया जाना आसान नहीं है. आज पूरा विश्व एक परिवार सदृश है. उपेक्षित प्रतिभाएं देशविदेश में कहीं भी यशसम्मान अर्जित कर सकती हैं. ऊपर से राष्ट्रीयअंतरराष्ट्रीय स्तर के मानवाधिकारवादी संगठन. ब्राह्मणवादी संगठनों को यही डर खाए जा रहा है. वे भलीभांति समझते हैं कि बहुत जल्दी दूसरे व्यक्तित्व, घटनाएं और मिथ भी पुनर्व्याख्या के दायरे में आएंगे. इससे ब्राह्मणीय सर्वोच्चता का वह मिथ भी भरभरा कर गिर पड़ेगा, जिसे बनाने में उन्हें सहस्राब्दियां लगी हैं.

महिषासुर दिवस का आयोजन मात्र पांच वर्ष पुरानी घटना है. मगर सांस्कृतिक वर्चस्व से मुक्ति के लिए उत्पीड़ित वर्ग के संघर्ष का सिलसिला नया नहीं है. एकदम हाल की बात करें तो साठ के दशक में बिहार से आरंभ हुए ‘अर्जक संघ’ को ले सकते हैं. जिसने मेहनतकश लोगों ने जीवन में किसी भी धर्म की भूमिका को मानने से इन्कार कर दिया था. मध्यकालीन भारत में रैदास, कबीर, नानक का नाम हमने ऊपर उद्धृत किया है. हालिया इतिहास में डॉ. अंबेडकर तथा फुले दंपति का नाम हमने ऊपर लिया. फुले ने ब्राह्मणवाद का विरोध करते हुए जनसंस्कृति के उभार पर जोर दिया था. यदि बौद्धकालीन भारत तक जाएं तो आजीवक संप्रदाय, जिसे आज बहुजन संस्कृति कहा जा रहा है, भी श्रमसंस्कृति के उन्नयन को समर्पित था. धर्मिक आडंबरवाद से मुक्ति और आर्थिक स्वावलंबन उसका केंद्र था. आजीवक श्रमजीवियों के अपने संगठन थे. उनके माध्यम से वे देशविदेश के व्यापारियों के साथ कारोबार करते थे. जातक कथाओं के हवाले से डॉ. रमेश मजूमदार ने बौद्धकालीन भारत में 31 प्रकार के सहयोगाधारित संगठनों का उल्लेख किया है. उनमें लुहार, बढ़ई, चर्मकार, पत्थरतराश, सुनार, तेली, बुनकर, रंगरेज, किसान, मत्स्य पालन करने वाले, आटा पीसने वाले, नाई, धोबी, माली, कुम्हार यहां तक कि चोरों के संगठन का भी जिक्र है. वे अपने आप में स्वायत्त थे. अपने फैसलों के लिए पूरी तरह स्वतंत्र. उनके अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप का अधिकार राज्य को भी नहीं था. सम्राट विशेष अवसरों पर उनसे परामर्श करना आवश्यक समझता था. खास बात यह है कि उन समूहों में श्रमकौशल और सहभागिता को महत्त्व दिया जाता था. केवल बुद्धि के नाम पर, जैसा ब्राह्मणवादी व्यवस्था में था, विशेषाधिकार का कोई प्रावधान उनमें नहीं था.

कूटवणिज जातक’ में बनारस के दो व्यापारियों की कहानी दी है. उनमें एक ‘बुद्धिमान’ था ‘दूसरा अतिबुद्धिमान’. एक बार दोनों ने मिलजुलकर व्यापार करने का निर्णय लिया. उन्होंने बराबरबराबर निवेश कर पांच सौ छकड़े माल खरीदा. दोनों व्यापार के लिए साथ निकले और सारा माल बेचकर वापस लौट आए. उसके बाद दोनों मुनाफे के बंटवारे के लिए जमा हुए. ‘बुद्धिमान’ व्यक्ति ने पहल करते हुए लाभ को दो समान हिस्सों में बांट दिया. यह देख ‘अतिबुद्धिमान’ बोला—

मैं तुमसे दुगुना हिस्सा लूंगा.’ उसकी बात सुनकर बुद्धिमान चौंका. उसने पूछा—

दो गुना क्यों?’

इसलिए कि मैं अतिबुद्धिमान हूं.’

हमने व्यापार में बराबर धन लगाया है. मेहनत भी बराबरबराबर की है.’ ‘बुद्धिमान’ बोला.

तो क्या! सभी जानते हैं कि मैं तुमसे कहीं ज्यादा बुद्धिमान हूं. इसलिए मुझे लाभ में दुगुना हिस्सा मिलना चाहिए.’ कहते हुए दोनों व्यापारी आपस में झगड़ने लगे. न्याय के लिए अंततः वे बुद्ध की शरण में पहुंचे. बुद्ध ने दोनों का पक्ष सुना और अंत में लाभ को बराबरबराबर बांटने की सलाह दी. बाइबिल में भी एक कहानी है, जिसमें एक किसान खेतों में काम करने आए मजदूरों को बराबर मजदूरी देने की बात करता है. कहानी आमदनी को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का समर्थन करती है. लाभ के दुगने हिस्से पर अधिकार जताने वाले ‘अतिबुद्धिमान’ को बुद्ध ने ‘बेईमान व्यापारी’ कहा है.

वर्चस्वकारी व्यवस्था ऐसी बेईमानी कदमकदम पर करती है. वह श्रम के सापेक्ष बुद्धि को वरीयता देती है. उस व्यवस्था में ब्राह्मण का शारीरिक श्रम से कोई संबंध नहीं होता. वह दूसरों के श्रम पर परजीवी की भांति जीवनयापन करता है. कमोबेश यही हालत बाकी दो वर्गों की भी है. वर्णव्यवस्था में निचले पायदान पर मौजूद शूद्र को अधिकाधिक श्रम करना पड़ता है. लेकिन बात जब लाभ के बंटवारे की आती है तो उसे मामूली मजदूरी देकर टरका दिया जाता है. आय का बड़ा हिस्सा शीर्षस्थ वर्ग हड़प लेते हैं. कहानी के माध्यम से बुद्ध ने इस व्यवस्था को नकारा है. इससे उस बौद्धकालीन समाज में अपने श्रमकौशल के आधार पर जीवन जीने वालों की महत्ता का अनुमान लगाया जा सकता है. यह आदर्शोन्मुखी व्यवस्था थी, जिसे समय रहते रेखांकित करने की आवश्यकता थी. लेकिन इतिहास लेखन का काम ब्राह्मणों या ब्राह्मणवादी मानसिकता के लेखकों के अधीन रहने के कारण वह सदैव पूर्वाग्रहग्रस्त रहा है. उन्होंने इस देश की प्राचीनतम संस्कृति जिसे समानांतर संस्कृति, जनसंस्कृति या सर्बाल्टन संस्कृति कहा जाता है—के दस्तावेजीकरण के प्रति पूर्ण उपेक्षा बरती. उसके मानवतावादी मूल्यों को नकारा, जिसका खामियाजा विराट बहुजन समाज आज तक भुगत रहा है.

जबकि नैतिक मूल्यों को यदि निकाल दिया जाए तो धर्म में मिथकीय किस्सागोई और कोरे कर्मकांडों के अलावा कुछ नहीं बचता. चूंकि बाजारवादी अर्थतंत्र में नैतिक मूल्य धराशायी हो चुके हैं, और किस्सागोई का काम संचार माध्यम संभालने लगे हैं, ऐसे में धर्म के हिस्से कर्मकांडों के रहस्यमय पिटारे के अलावा कुछ नहीं बचता. स्वयंभू भगवानों के जरिये यदि कहीं कुछ धार्मिक मिथ बारबार कहेसुने जाते हैं तो उसके पीछे भी बाजार का ही योगदान है, जिसके चलते धर्म सस्ते मगर सबसे कमाऊ धंधे में बदल चुका है. ऐसे धर्म तथा धर्म को ही सबकुछ मानने वाली संस्कृति का प्रतिकार आवश्यक है. अतः लोगों को बारबार याद दिलाया जाना चाहिए कि जीवन और समाज धर्म से नहीं, मानवीय मूल्यों से चलते हैं, चलने चाहिए. समाज बदलते हैं, धर्म बदलता है मगर जीवन के शाश्वत मूल्य वही रहते हैं. इसलिए मिथकों की पुनर्व्याख्या की कसौटी समानता, स्वतंत्रता, सौहार्द्र, प्रेम, संवेदना, सामंजस्यभाव आदि को बनाया जाना चाहिए.

महिषासुर जैसे प्रतीकों की बहुजन व्याख्याएं हिंदुत्व की नींव पर प्रहार करती हैं. उस पतित संस्कृति का विरोध करती हैं जो बलात्कारी को ‘देवराज’ का दर्जा देती है. दलितबहुजन की नई बौद्धिक खेप का आदर्श राम नहीं है जो अपनी निर्दोष भार्या की शीलपरीक्षा लेता है, शंबूक को दंडित करता है. ‘महिषासुर शहादत दिवस’ जैसे आयोजन प्रकारांतर में एक सलाह भी है कि बहुजन, ब्राह्मणवादी नायकों को अपना नायक मान लेने की भूल न करें. यह चूक उन्होंने शताब्दियों पहले उनके पूर्वजों की ओर से हुई थी. जिसका दंड वे आज तक भुगत रहे हैं. इस काम में बड़ी सावधानी की जरूरत है. ‘महिषासुर’ एक सम्राट है. उस दौर का है जब यह दुनिया लोकतंत्र के बारे में जानती न थी. केवल तेजी से कुलीनतंत्र की ओर बढ़ता कबीलाई गणतंत्र था. आज जमाना लोकतंत्र का है. ‘महिषासुर’ जैसे प्रतीकों के माध्यम से वर्चस्वकारी संस्कृति पर हमला तो बोला जा सकता है. ऐसे हमलों से बचाव के लिए वह हमारी ढाल भी बन सकता है—लेकिन केवल उसके सहारे वर्चस्वकारी संस्कृति का रचनात्मक विकल्प दे पाना संभव नहीं है. अतएव आवश्यकता अनुकूल मिथकों के चयन के साथसाथ उन्हें लोकतांत्रिक परिवेश के अनुकूल ढालने की भी है. ताकि वे मिथक जो अभी तक वर्चस्वकारी संस्कृति के सुरक्षाकवच बने थे, प्रकारांतर में लोकतंत्र और सहजीवन का समर्थन करते नजर आएं.

संस्कृति की इमारत अनगिनत मिथों के सहारे खड़ी होती है. लेकिन मिथ की सीमा है कि वह अकेला किसी काम का नहीं होता है. वह समाज और सांस्कृतिक परंपरा के साथ जुड़कर कारगर होता है. किसी मिथ को कारगर और लोकप्रभावी बनाने के लिए अनगिनत मिथों की आवश्यकता पड़ती है. उनका समर्थन या विरोध करते हुए ही मिथ समाज में अपनी पहचान बनाए रखता है. मिथ प्रायः दीर्घजीवी होते हैं. मगर कोई भी मिथ जीवन में हर समय मार्गदर्शक नहीं रह सकता. अमावस्या की रात में दिये या एक स्फुर्लिंग की भांति वह केवल अवसरविशेष पर हमें राह दिखा सकता है. अनेक मिथों के साथ मिलकर वह मनुष्य की संपूर्ण सामाजिकसांस्कृतिक यात्रा का सहभागी बन जाता है. मिथों के उपयोग के लिए बहुत सावधानी की आवश्यकता होती है. किसी मिथ का उपयोग करने के लिए उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की जानकारी होना आवश्यक है. इसके अभाव में वह दोधारी तलवार की तरह काम करने लगता है. सही समय पर सटीक उपयोग न हो तो उसके मायने एकदम बदल जाते हैं. पिछले कुछ महीनों में ‘महिषासुर’ की पुनर्व्याख्या ने दलित, पिछड़ों एवं आदिवासियों को एकदूसरे के निकट लाने का काम किया है. लेकिन सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से लड़ाई में कोई एक मिथ कारगर नहीं हो सकता. उसके लिए अनेक मिथ तथा विखंडनवादी दृष्टिकोण चाहिए. लेकिन नए मिथ गढ़ना आसान नहीं होता. हां, पहले से ही प्रचलित मिथों को युगानुकूल संदर्भों के साथ पुनपर्रिभाषित अवश्य किया जाता है. अतः जो मिथ की ताकत को जानते हैं, जिन्हें अपने विवेक पर भरोसा है, और जो सचमुच बहुजन संस्कृति के विस्तार का सपना देखते हैं, उन्हें चाहिए कि वे महिषासुर जैसे दूसरे मिथकों को भी विमर्श के दायरे में लाएं. मिथकों को युगानुकूल संदर्भों में नए सिरे से परिभाषित करना. यह जितना कठिन कार्य है, उतनी ही अधिक उसकी आज हमें आवश्यकता है. जाहिर है यह एक चुनौती है. जिससे निपटने के लिए बहुजन समाज को लक्ष्यसमर्पित बुद्धिजीवियों की पूरी खेप तैयार करनी होगी.

ब्राह्मणवाद को सामान्यतः धर्म और संस्कृति से जोड़ा जाता है. यह उसकी सीमित व्याख्या है. असल में वह ‘सर्वसत्तावादी’ और ‘सर्वाधिकारवादी’ किले का पर्याय है, जहां से समस्त संसाधनों और विचारकेंद्रों को नियंत्रित किया जाता है. क्षत्रिय इस किले की रक्षा करते रहे हैं तो वैश्य उसके खजाने को समृद्ध करने का काम करते आए हैं. बदले में ब्राह्मणवाद कुछ सुविधाएं, मानसम्मान और संसाधनों के उपयोग का अवसर देकर उन्हें कृतार्थ करता आया है. इसे ब्राह्मणवादी वर्चस्व ही कहा जाएगा कि मामूली सुविधा, संसाधनों में सीमित हिस्सेदारी के बावजूद वे वर्ग लंबे समय से स्वयं को उस व्यवस्था का हिस्सा मानते आए हैं, जो उन्हें दूसरे या तीसरे दर्जे का नागरिक सिद्ध करती है. परिवर्तनकामी शक्तियों के लिए जितना आवश्यक ब्राह्मणवाद की कमजोरियों को समझना है, उतना ही आवश्यक समानांतर संस्कृति खड़ी करना भी है. ब्राह्मणवादी तंत्र में आमनेसामने की चुनौती नहीं होती, उसका एक कोना अपने घरपरिवार में भी मौजूद होता है. व्यवस्था से अनुकूलित लोग परिवर्तन की हर संभावना को निष्फल करने की कोशिश करते हैं. कुछ समय पहले तक धर्म और जाति उसके सुरक्षा कवच थे. बदली परिस्थितियों में उसने राष्ट्रवाद को अपनी बाड़ बनाया हुआ है. ‘महिषासुर’ जैसे मिथों की नवव्याख्या ने ब्राह्मणवाद के मर्मस्थल पर चोट की है. यह ज्ञान और तर्क की लड़ाई है. इतिहास में शताब्दियों बाद ऐसा हुआ है जब दलित और पिछड़े वर्ग के बुद्धिजीवी ब्राह्मणवाद को उसी के क्षेत्र में चुनौती दे रहे हैं. लेकिन यह शुरुआतभर है. संघर्ष यात्रा बहुत लंबी चलने वाली है. इसमें जो धैर्यवान होगा, सजग होगा और विवेक से काम लेगा, प्रलोभन जिसे डिगाएंगे नहीं, वही और केवल वही लंबे समय तक टिका रहेगा. अंतिम जीत उसी के हाथ रहेगी. जनसंस्कृतिकरण की यात्रा दुर्गम भले हो, असंभव नहीं है.

© ओमप्रकाश कश्यप

संस्कृति और न्याय

सामान्य

सृष्टि के आरंभ में सभी प्राणी एक पुनीत स्थल पर निवास करते थे. वे सुगंधित हवाओं का आनंद लेते. सुरम्य धरा पर मग्नमन नृत्य करते थे. तब उन्हें न तो भोजन की आवश्यकता थी, न वस्त्रों की, न निजी संपत्ति थी, न सरकार, न ही किसी प्रकार का कानून. धीरेधीरे सृष्टि के पतन का आरंभ हुआ. मनुष्य सुरम्य लोक से पतित होकर पृथ्वी पर आ गिरा. अब उसे भोजन और आवास की आवश्यकता महसूस होने लगी. मनुष्य की आरंभिक पवित्राता और कीर्ति धुल चुकी थी. वर्णव्यवस्था का आरंभ हुआ और लोगों ने एक दूसरे के साथ अनुबंध के आधार पर रहना आरंभ किया. परिवार और निजी संपत्ति उस अनुबंध का हिस्सा बने. इसी के साथ चोरी, हत्या, लूटमार, परस्त्राीगमन जैसे अपराध होने लगे. समस्या से मुक्ति पाने के लिए सब मनुष्य एक बार एकत्रा हुए, उन्होंने मिलजुलकर एक राजा चुना, जो उनकी फसल का वाजिब हिस्सा उन्हें बांट सके. अपने उस चयन को उन्होंने ‘अनेक द्वारा एक का चयन’ (महासामत्त) कहा. उस व्यक्ति से अनेक लोगों को खुशी प्राप्त हुई थी, इसलिए उन्होंने उसे ‘राजा’ कहना आरंभ कर दिया. उसी से ‘राजनीति’ का विकास हुआ.’- THE WONDER THAT WAS INDIA, A. L. Basham, page-82.

किसी भी समाज की पहचान उसकी संस्कृति से होती है. उसका काम समाज में एकता की अनुभूति जगाना तथा मानवीकरण को गति प्रदान करना है. इसके लिए आवश्यक है कि वह सामाजिक संबंधों, लोगों के सामान्य व्यवहारों, लोकजीवन के आदर्शों, सार्वकालिक जीवनमूल्यों और भविष्य के सपनों से अनुप्रेत हो. उसके मूल में न्याय की भावना हो. साथ ही समानता और बराबरी की गंध उसके हर प्रतीक में रचीबसी हो. इस आधार पर भारतीय संस्कृति को दो हिस्सों में वर्गीकृत किया जा सकता है. पहली जनसंस्कृति. जो समाज में आपसी संबंधों, जरूरतों और सपनों के आधार पर स्वयं विकसित होती है. दूसरी धर्मानुप्रेत अभिजन संस्कृति जो अनेक प्रकार के डरों, प्रतीकों और कर्मकांडों के जरिये जीवन में प्रवेश करती है. पहली संस्कृति स्वयंस्फूर्त्त होती है. बदलते समय और आवश्यकताओं के अनुसार वह स्वयं परिवर्तित होती रहती है. वह सहयोग और सहकार की संस्कृति है. दूसरी संस्कृति में परिवर्तन ऊपर से थोपे जाते हैं. उसके बदलाव की गति धीमी होती है. धर्मानुप्रेत समाजों में प्रायः दूसरी संस्कृति को ही वास्तविक एवं महत्त्वपूर्ण माना जाता है. जबकि पहली संस्कृति जो साथ में श्रमसंस्कृति भी है, की सतत उपेक्षा होती रहती है. चूंकि अधिकांश विमर्श पर उन लोगों का कब्जा होता है जो अभिजन संस्कृति से लाभान्वित होते हैं, इसीलिए येनकेनप्रकारेण उसी को विमर्श में बनाए रखते हैं. परिणामस्वरूप जनसंस्कृति केवल शब्दों एवं सपनों तक सिमटकर रह जाती है. वह अभिजात हितों की पैरोकार बनकर सामाजिक असमानता की मुख्य कारक एवं परिणाम के रूप में सामने आती है. चूंकि इस संस्कृति के मुख्य वास्तुकार ब्राह्मण रहे हैं, इस कारण आमचलन में इसे ब्राह्मण संस्कृति भी कहा जाता है. बहुप्रचलित होने के कारण इसी को भारतीय संस्कृति का पर्याय भी मान लिया जाता है.

सामान्य अर्थों में धर्म और संस्कृति को एक मान लिया जाता है. यह उचित नहीं है. आस्था और विश्वास को अपनी पीठ पर ढोने वाला परंपरानुगामी धर्म, विराट संस्कृति का हिस्सा तो हो सकता है, उसका पूरक अथवा पर्याय नहीं. बावजूद इसके अधिकांश लोग धर्म और संस्कृति में अंतर नहीं कर पाते. इस कारण सांस्कृतिक प्रतीकों की व्याख्या के लिए वे बारबार धर्म की शरण में चले जाते हैं. अपनी चतुर किस्सागोइयों के बल पर धर्म उन्हें लुभाता है. वह व्यक्ति के चारों ओर ऐसा जादुई आभामंडल खड़ा कर देता है, जिसके आकर्षण से बाहर निकल पाना आसान नहीं होता. उसके प्रभामंडल में हर किसी को विजेता होने का भ्रम बना रहता है. इस दौरान धर्म के विकार संस्कृति को भी दूषित करने लगते हैं. पुरोहित वर्ग जो धर्म और धार्मिक प्रतीकों का उपयोग धंधागिरी के लिए करता है, जानेअनजाने संस्कृति और धर्म को परस्पर गड्मड किए रहता है. इससे सामाजिक स्तरीकरण मजबूत होता है, सांस्कृतिक विकास में जड़ता आने लगती है. भारतीय संस्कृति इसी ठहराव का शिकार है. जिस तेजी से उसका इन दिनों राजनीतिकरण हुआ है, सांस्कृतिक विकास पश्चगामी रूप ले चुका है. भारतीय संस्कृति के अभिजन चरित्र को दर्शाने वाले कई उदाहरण हैं. एक उदाहरण हमारे दैनिक जीवन से जुड़ा है. सामान्य शिष्टाचार के नाते दो व्यक्ति जब मिलते हैं तो उनके बीच नमस्ते, प्रणाम, नमस्कार जैसे संबोधनों का आदानप्रदान होता है. अपने से बड़ों के चरणस्पर्श करने की भी परंपरा है. कोई व्यक्ति जब नमन करता था तो बड़े व्यक्ति के प्रति श्रद्धा भाव उसके व्यवहार से झलकता है. यह सीधेसीधे दो व्यक्तियों के बीच सम्मान और स्नेह का लेनदेन होता है. पहला प्रणामकर्ता, दूसरा वह जिसके सम्मान में प्रणतिनिवेदन किया गया है. तीसरी शक्ति का नाम या हस्तक्षेप बीच में नहीं होता. सहज मानवीय व्यवहार के बीच उसकी कदाचित आवश्यकता भी नहीं है. लेकिन कुछ शताब्दी पहले से संस्कृति के क्षेत्र में धार्मिक हस्तक्षेप के चलते ‘रामराम’, ‘राधेराधे’ जैसे संबोधनों को भी प्रणति निवेदन का पर्याय मान लिया गया. देवताओं के नाम को प्रणति निवेदन का हिस्सा बनाए जाने के उदाहरण शास्त्रों में भले न मिलते हों, किंतु लोकपरंपरा में खूब प्रचलित हैं.

प्रणति निवेदन के बीच देवता का प्रवेश केवल धर्म के प्रति अनुराग का मामला नहीं है. यह सामाजिक संबंधों को जो वास्तविक हैं तथा यथार्थ के धरातल पर विकसित होते हैं, अमूर्त्त और वायवी बना देने का षड्यंत्र है. मानवीय संबंधों को औपचारिक बनाने, उनके बीच संदेह पैदा करने में इनका परोक्ष योगदान है. अधिकांश धर्म इस संसार को ‘माया’ या ‘भ्रम’ बताते हैं. वे मानते हैं कि सांसारिक संबंध मनुष्य को भरमाकर मुक्ति की राह को कठिन बनाते हैं. वे यह भी बताते हैं कि संसार के सभी संबंध कोरा भ्रम या दिखावा हैं. एकमात्र ब्रह्म सत्य है, और कुछ नहीं(एकम अद्वितिया ब्रह्म‘) अथवा ब्रह्म सत्य, जगन्नमिथ्याजैसे कथन इसी को दर्शाते हैं. इस आधार पर मोक्ष के अभिलाषी मनुष्य को सांसारिक सुखों, संबंधों के प्रति गहनानुराग से बचने की सलाह दी जाती है. धर्माचार्य समझाते हैं कि मोक्ष की यात्रा में प्रत्येक मनुष्य अकेला होता है, केवल कर्म उसका साथ निभाते हैं. प्रणति निवेदन के साथ देवता का नाम लेने से व्यक्ति मान लेता है कि देवता उससे प्रसन्न होंगे. होते हैं या नहीं यह उसे अंत तक पता नहीं चल पाता. मगर इससे दो व्यक्तियों के स्नेह और सम्मान के आदानप्रदान के बीच अनायास एक व्यवधान आ जाता है. व्यक्ति विशेष के प्रति सम्मानस्नेह प्रदर्शित करने का सिलसिला देवताओं को प्रसन्न करने का आयोजन मान लिया जाता है. इस तरह प्रणति निवेदन का उद्देश्य जो पूरी तरह सामाजिक है, वह प्रतीकों और वायवी संबोधनों तक सीमित हो, केवल कर्मकांड में सिमट जाता है. इसका लाभ चरमपंथी आसानी से उठा लेते हैं. कुछ दशाब्दी पहले उग्र हिंदुत्व को बढ़ावा मिला तो ‘रामराम’ और ‘राधे कृष्ण’ की जगह ‘जयश्रीराम’ जैसे शब्दवाणों ने ले ली. प्रणाम जो विनय समर्पण एवं सम्मान को दर्शाता था, उसके नए प्रारूपों से बल की भावना साफ झलकने लगी. सामान्य व्यवहार में धर्म की घुसपैठ हुई तो धर्म खुद को और भी ताकतवर समझने लगा. यही नहीं परंपरानुसार छोटों द्वारा बड़ों का चरणस्पर्श आदर्श प्रणति निवेदन माना जाता है. इसकी प्रेरणा की खोज भारतीय समाज में व्याप्त वर्णव्यवस्था तक ले जाती है. उसमें शूद्रों को प्रजापति ब्रह्मा के पैर से उत्पन्न बताया गया है. ‘लोक परंपरा’ में भी ‘पायलागन’ संबोधन वर्णव्यवस्था के शिखर पुरुष ब्राह्मणों के लिए आरक्षित रहा है. बाद में वह इतर वर्गों के लिए भी प्रचलित होता गया. संभव है इससे धर्म मजबूत हुआ हो, उसका संगठन क्षेत्र भी बढ़ा हो, किंतु संस्कृति लगाातार आहत होती रही है.

भारतीय संस्कृति को अधिकांश विद्वान ‘विविधता की संस्कृति’ मानते हैं. वे ‘सनातन संस्कृति’ कहकर इसे महिमा मंडित करते हैं. जबकि इनमें से एक भी धारणा मूल्यबोधक नहीं हैं. सांस्कृतिक वैविध्य तभी तक सार्थक है जब वह मानवीय चेतना का स्वयंस्फूर्त्त विस्तार हो. साथ ही लोकतांत्रिक सोच को बढ़ावा देता हो. इसी प्रकार ‘विविधता में एकता’ की भावना भी तब उपयोगी हो सकती है, जब सदस्य इकाइयों के बीच स्वयंस्फूर्त्त एैक्यभाव हो. लोग अपने कर्म से, विचारों से स्वतंत्र होकर भी एकदूसरे के साथ अपनापन महसूस करते हों. भारतीय संस्कृति पर यह बात खरी उतरती है, ऐसा दावे के साथ नहीं कहा जा सकता. हमारे समाज में जाति और संप्रदाय के अनगिनत खाने हैं, अलगअलग पहचान के लिए जूझते हुए लोग हैं, भारी समाजार्थिक विषमताएं हैं. परिणामस्वरूप एक पक्ष, बाकी के लिए परिस्थिति चाहे जैसी हो, सदैव शिखर पर बना रहता है. जबकि दूसरा उसके दमन से बचने के लिए चुप्पी साधे रहता है. ऐसे समाज में सांस्कृतिक विविधता में एकता की दावेदारी, खुद को भरमाए रखने के लिए जानबूझकर की गई कवायद से अधिक नहीं लगती.

प्राचीनता भी किसी व्यक्ति, वस्तु या विचार का स्वतंत्र गुण न होकर कालसापेक्ष स्थिति है, जो उसकी ऐतिहासिकता की ओर संकेत करती है. वह अपने आप में किसी भी प्रकार की श्रेष्ठता का मापदंड नहीं है. संस्कृति का असल बड़प्पन इसमें है कि अपने अनुयायियों के बीच न्याय एवं समानता के वितरण को लेकर वह कितनी उदार है! कितने प्रयास उसने अपने अंतर्विरोधों के समाहार हेतु किए हैं. सदस्य इकाइयों की स्वतंत्रता अक्षुण्ण रखने हेतु वह कितनी संकल्पबद्ध है. इस कसौटी पर भारतीय संस्कृति उतनी सफल सिद्ध नहीं होती, जितनी बताई जाती है. यहां वर्ण और जाति के अनगिनत खाने और ऊंचीनीची दीवारें हैं. उनमें विविधता किसी व्यक्ति का स्वतंत्र चयन न होकर, उनपर थोप दी जाती है. कैद की तरह, जिससे बाहर आने के लिए व्यक्ति निरंतर छटपटाता रहता है. चूंकि यह असंभवसा कार्य है, अतएव अधिकांश लोग इसी को अपनी नियति मानकर समझौतावादी बन जाते हैं. स्वतंत्रता और समानता के मानवीय लक्ष्यों को लेकर यहां वर्ण, जाति, संप्रदाय, धर्म आदि के नाम पर तरहतरह के मतभेद, बहुसंख्यक वर्ग के लिए बाध्यकारी बन जाते हैं. उस अवस्था में ‘विविधता में एकता’ के सभी दावे आडंबर में सिमट जाते हैं.

सच तो यह है कि स्मृतिग्रंथों, पुराणों, महाकाव्यों आदि के माध्यम से जो संस्कृति हमारे जीवन में दाखिल होती है; उसका चरित्र पूरी तरह अभिजनोन्मुखी होता है. वह सर्वहारा बहुसंख्यक के श्रम पर पलती है, साथ ही श्रम का तिरस्कार भी करती है. वहां देवता वे हैं जो चमत्कार प्रिय हैं. हथेली पर सरसों उगाते हैं. श्रम से जिनका दूर तक नाता नहीं होता. वे भक्तों के द्वारा चढ़ाए गए भोग के बल पर पलते तथा दाता कहे जाते हैं. इसमें मौलिकता के अवसर न्यूनतम होते हैं. जबकि कापालिकों, तांत्रिकों, पंडेपुजारियों तथा धर्म का धंधा करने वाले पुरोहित लाखोंकरोड़ों में खेलते हैं. कुल मिलाकर यह संस्कृति सामाजिक न्याय की अवरोधक तथा सामूहिक विवेक का क्षरण करने वाली है. सामान्य नैतिकता एवं लोकादर्शों को अमल में लाने के बजाय वह धर्म के हाथों में खेलती है; और बड़ी आसानी से खुद को उसकी सामंती वृत्तियों के अनुसार ढाल लेती है. वह लोगों से अपेक्षा रखती है कि वे क्या करें, क्या खाएं, क्या पियें, क्या पढ़ेलिखें, और किन लोगों से कैसे संबंध बनाएं? न तो उसे मानवीय विवेक की परवाह रहती है, न उसकी रुचियों की. इस तरह वह जीवन में अनावश्यक दखल देकर, समानता और स्वतंत्रता की भावना का हनन करती है. कभी धर्म, कभी समाज और कभी परंपरावैविध्य के बहाने, असमानता को मानवीय नियति घोषित करना उसकी मूल प्रवृत्ति रही है. वह असल में शासक संस्कृति है.

जाति व्यवस्था के रंग में रंगी वह संस्कृति व्यक्ति के जन्म के साथ ही घोषित कर देती कि उसका जन्म शासन करने के वास्ते हुआ है या शासित होने के लिए. जो लोग शासक वर्ग में जन्म लेते हैं, अभिजनोन्मुखी संस्कृति का रेशारेशा उनकी मदद में जुटा होता है. शासितों की कोटि में जन्मे व्यक्ति, यदि दुर्दशा से उबरना चाहें या इस तरह का सपना भी देखें तो वह लगातार अवरोध उत्पन्न कर, परिवर्तन की चाहत को ही मिटाने पर तुल जाती है. लोगों के सवाल करने की आदत को छुड़ाकर वह उनके निर्मानवीकरण को गति देती है. उससे सामूहिकता बोध, जो संस्कृतिकरण का प्रमुख उद्देश्य है, का हृास होता है. सांप्रदायिकता पनपती है. परिणामस्वरूप विपुल जनशक्ति छोटेछोटे टुकड़ों में बंटकर निष्प्रभावी हो जाती है. इसे नेतृत्व का अभाव कहें या पराश्रितता की भावनाबहुसंख्यक जनसमाज सांस्कृतिक विषमता के प्रतीकों को संस्कृति के अंग के रूप में अपनाए रखता है. यह समर्पण एक अवधि के उपरांत अनुकूलन का रूप ले लेता है. व्यवस्था से अनुकूलित व्यक्ति वास्तविक हित को भुलाकर उन प्रतीकों को अपने अस्तित्व का पर्याय समझने लगता है, जो उसकी दासता का कारण रहे हैं. उदाहरण के लिए अधिकांश हिंदू विवाहिताएं ‘सुहाग की निशानी’ के रूप में अपनी मांग में सिंदूर डालती हैं. भरी हुई मांग दर्शाती है कि स्त्री विवाहिता है. यह पुरुष सत्तात्मकता एवं योनि शुचिता से जुड़ा प्रतीक है. यह उन दिनों की याद दिलाता है जब कन्याएं रजस्वला होने के साथ ही दान में सौंप दी जाती थीं या यूं कहो कि धर्म के नाम पर दान में हड़प ली जाती थीं. अधिकांश स्त्रियां पढ़लिखकर भी इस तथ्य को नहीं समझतीं. जो समझती हैं, वे ‘वाचाल’ कहकर उपेक्षितअपमानित की जाती हैं. परिणामतः स्त्री की अस्मिता तथा उनके समूचे कार्यव्यवहार पर स्वाभाविक दासता पसरी रहती है.

हम भारतीयों, विशेषकर जो लोग स्वयं को हिंदू मानते हैं, का जीवन जन्म से लेकर मृत्यु तक तरहतरह के कर्मकांडों से बंधा होता है. कर्मकांड अनेक प्रकार के हो सकते हैं. एक समाज से दूसरे समाज, यहां तक कि एक जाति समूह से दूसरे जातिसमूह के बीच उनका रूप बदलता रहता है. सभी कर्मकांडों का उद्देश्य होता है, किसी बड़ी शक्ति को प्रसन्न करना. उनमें एक पक्ष दाता(जाहिर है काल्पनिक) तो दूसरा यजमान की भूमिका में होता है. यजमान अपने सर्वश्रेष्ठ को समर्पित करने की भावना के साथ दाता के आगे नतशिर होता है. उसी समय खुद को दाता का नुमाइंदा घोषित करते हुए पुरोहित बीच में आ टपकता है. यजमान द्वारा दाता के नाम अर्पित की गई सामग्री को समेट लेने के अलावा वह दक्षिणा की दावेदारी भी करता है. चूंकि कर्मकांडों को लोक की सामान्य स्वीकृति प्राप्त होती है, इसलिए उनसे पैदा स्तरीकरण समाज में अपनी पैठ बना लेता है. तदनुसार जो दाता या उसके स्वयंघोषित प्रतिनिधि की इच्छा है, उसे उसी रूप में बगैर किसी नानुकर के, स्वीकार कर लेना यजमान की विवशता होती है. इसका लाभ शिखर पर बैठे लोग उठाते हैं. राज्य की कुल उत्पादकता में उनका योगदान भले ही नगण्य हो, मगर लाभ के नब्बे प्रतिशत को किसी न किसी बहाने वे हड़प ही लेते हैं. फिर उसे अपनी ताकत बनाकर दाता की भूमिका निभाए जाते हैं. यह अनाज के बदले रेत की या शायद उससे भी बदतर सौदेबाजी है. इसमें यजमान पुरोहित को दक्षिणा देता है. कर्मकांडों के तामझाम पर भी अपनी आय का एक हिस्सा खर्च करता है. किंतु पुरोहित की ओर से सिवाय वायवी आश्वासनों के कुछ और प्राप्त नहीं होता. इस बात को यजमान के साथसाथ पुरोहित भी भलीभांति जानता है. लेकिन धर्म तथा उसकी रूढि़यों से गहरे जुड़ाव तथा उसकी कमजोरियों को न समझने की प्रवृत्ति मनुष्य से तर्कसम्मत ढंग से सोचने का अवसर छीन लेती है. इस तरह पूरी संस्कृति दिखावे और कर्मकांडों में ढल जाती है.

कर्मकांडों की व्याख्या जिन ग्रंथों में है, वे सब ब्राह्मणों द्वारा रचे गए हैं. उनकी समीक्षा, आलोचना अथवा किसी तरह के संशोधनविस्तार का अधिकार ब्राह्मणेत्तर वर्गों को नहीं है. उनसे केवल इतनी अपेक्षा होती है कि ब्राह्मणों द्वारा बनाए गए लिखितअलिखित विधान का बिना किसी नानुकुर के अनुसरण करें. उसपर किसी प्रकार का संदेह, आलोचना, समीक्षा पाप की कोटि में आता है. उसके लिए तरहतरह के दंडविधान पहले भी थे, आज भी हैं. समाजार्थिक असमानता का पोषण करने वाली संस्कृति के प्रति विरोध के स्वर आरंभ से ही उठते रहे हैं. जाहिर है, आक्रोश जनसंस्कृति के उन अनुयायियों की ओर से उभरता है जो विषमता और सांस्कृतिक अन्याय का शिकार होते आए हैं. यदि विकृतियों का समाधान कर लिया जाए तो अपेक्षाकृत उदार एवं समावेशी जनसंस्कृति हमारे सामने होगी, जिसमें वर्चस्व की भाषा नहीं चलती. सहकार और सहयोग पर टिकी उस संस्कृति के संवाहक निचले पायदान पर स्थित वे लोग हैं, जिन्हें शिखरस्थ वर्ग उपेक्षित और तिरष्कृत करते आए हैं. उनकी खूबी है कि वे सुखदुख को साझा करके जीते हैं. कबीर की तरह संतोष को धन समझते हैं. बहुत कम में जीवन बिता सकते हैं. अभावों को भी हंसतेगाते झेल जाना उनकी प्रवृत्ति रही है. भूख का उत्सव मनाकर जीने वाले ऐसे लोग देश में हर जगह हैं. वे इस देश के लाखोंकरोड़ों मेहनतकश लोग हैं, जो केवल अपने बाजुओं पर भरोसा रखते हैं. यही वे लोग हैं जो किसी भी संस्कृति के महात्म्य का कारण बन सकते हैं, इन्हीं को भुलावे में रखने के लिए विविधता में एकता के गीत गाए जाते हैं. उनके सपने इस देश और इस जन्म के नहीं होते. इस कारण वे शिखर पर विराजमान लोगों के लिए कभी खतरा नहीं बनते. इनमें से अधिकांश कदाचित ऐसे होंगे जो संस्कृति का अर्थ भी न जानते हों. इस उदासीनता का लाभ उठाकर दूसरे लोग उन्हें अपनी ही संस्कृति का अनुपालक घोषित करते आए हैं. जबकि अपने श्रमकौशल पर जीवन जीने वाले स्वाभिमानी मजदूरों, शिल्पकारों तथा दूसरों के श्रमकौशल पर मजे उड़ाने वाले परजीवी लोगों की संस्कृति एक हो ही नहीं सकती. यदि कहीं एकता दिखती है, तो वह पूरी तरह आभासी है. इस देश की असल संस्कृति को समझने के लिए उसपर पड़ी अभिजन संस्कृति की धूल को उठाना अत्यावश्यक है.

संस्कृति चाहे वह कितनी ही महत्त्वपूर्ण क्यों न हो, खुद लक्ष्य नहीं होती. वह केवल लक्ष्य की ओर संकेत करती है तथा उसके लिए उपयुक्त मार्ग चुनने में मदद करती है. उसका काम मानवीय वृत्तियों को सुसंस्कृत करना है, किसी व्यक्ति या व्यक्तियों की स्वतंत्रता को बाधित करने के बजाय वह मनुष्य की नैसर्गिक स्वतंत्रता को लौटाने के लिए प्रतिबद्ध होती है. विडंबना है कि भारतीय संस्कृति, जिसे कई बार उदार भी मान लिया जाता है, की अधिकांश ऊर्जा मनुष्य की रोजमर्रा की गतिविधियों को नियंत्रित करने में खपती आई है. कारण यह उन शक्तियों द्वारा अनुशासित होती है, जिनका काम दूसरों के मूलभूत अधिकारों का हनन करना है. शिखरस्थ ब्राह्मण उनके विधान का निर्माता, व्याख्याता, पालकअनुपालक सब होता है. विशेष मामलों में, या यूं कहिए कि अपवादस्वरूप संस्कृति के विशिष्ट प्रवर्तकों, जन्मना ब्राह्मण न भी हों तो उन्हें कर्मणा ब्राह्मण मान लिया जाता है. व्यास, वाल्मीकि, महीदास आदि शास्त्रीय परंपरा के ब्राह्मण नहीं हैं. फिर भी उन्हें ब्राह्मण माना गया है. क्योंकि वे उस संस्कृति के सिद्ध संहिताकार हैं, जो वर्णव्यवस्था को आदर्श तथा ब्राह्मणों को समाज का सर्वेसर्वा मानकर उन्हें अंतहीन अधिकार सौंप देती है. कुछ लोग इसे भी संस्कृति की उदारता या उसका लचीलापन मानते हैं. जबकि स्थिति एकदम विपरीत है. असल में यह दूसरे वर्गों के बुद्धिजीवी, उनकी उपलब्धियों का श्रेय हड़प लेने की स्वार्थपूर्ण व्यवस्था है. जिससे निम्नस्थ वर्गों की उच्च स्तरीय मेधा, उच्चस्थ वर्गों की स्वार्थसिद्धि में लगी रहती है. परिणामस्वरूप वे वर्ग स्वाभाविक कुंठा और हताशा से उबर ही नहीं पाते हैं.

इस प्रवृत्ति के प्रमाण ऋग्वेद से लेकर आधुनिक साहित्य तक उपलब्ध हैं. गुरु उद्दालक के पास सत्यकाम जाबाल जब यह कहता है कि वह घरों में काम करने वाली दासी के गर्भ से जन्मा है और पिता का नाम पता नहीं है, तो महर्षि उससे यह कहकर कि ‘तूने सत्य कहा, ऐसा सत्यभाषी ब्राह्मण पुत्र ही हो सकता है.’दीक्षा देने के लिए तैयार हो जाते हैं. भारतीय संस्कृति के अध्येता इस उद्धरण को उसके उदात्त लक्षण के रूप में प्रस्तुत करते आए हैं. यदि आरोपित सांस्कृतिक महानता के प्रभाव से परे होकर विचार किया जाए तो यह बौद्धिक धूत्र्तता है. इसके माध्यम से न केवल ब्राह्मणेत्तर वर्गों से उनके बुद्धिजीवी हड़प लिए जाते हैं, बल्कि एक ही झटके में उन्हें ‘मिथ्याभाषी’ घोषित कर दिया जाता है. महीदास की कहानी भी मिलतीजुलती है. सत्यकाम जाबालि की भांति वह भी दासी पुत्र था. जन्म से शूद्र किंतु मनबुद्धि से ब्राह्मण संस्कृति का प्रतिभाशाली संहिताकार. ऋग्वेद शाखा के ‘ऐतरेय ब्राह्मण’, ‘ऐतरेय उपनिषद’ और ‘ऐतरेय आरण्यक’ का रचियता. इस संस्कृति ने महीदास को भी शूद्रों से झटक लिया. अपवाद स्वरूप ही सही, ब्राह्मणेत्तर वर्ग के अतिप्रतिभाशाली बुद्धिजीवियों को अनुलोम परंपरा के अनुसार ब्राह्मण मान लिए जाने की नीति, प्रतिभाहीन ब्राह्मण पुत्रों के लिए शिखर का स्थान सुरक्षित रखती है. तथा थोपी गई असमानता को वैध बनाती है. इससे यह दुखदायी निष्कर्ष भी निकलता है कि भारतीय संस्कृति तथा उसके नामित देवता, कर्मकांड, धर्मग्रंथ आदि केवल ब्राह्मणों का सृजन नहीं हैं. उसमें ब्राह्मणेत्तर वर्गों का भी योगदान रहा है. हालांकि लाभ सर्वाधिक ब्राह्मणों ने उठाया है. क्योंकि ब्राह्मणेत्तर वर्गों से शिखरस्थ वर्ग में पहुंचे बुद्धिजीवी अंततः असमानताकारी संस्कृति का ही महिमामंडन करते हैं. इससे सामाजिकसांस्कृतिक वैषम्य को स्थायी एवं स्वाभाविक मान लिया जाता है.

वैषम्यकारी ब्राह्मण संस्कृति किसी एक व्यक्ति या व्यक्तिसमूह का उत्पाद नहीं है. इसे बनाने में ब्राह्मण पुरोहितों की सैकड़ों पीढि़यां खपी हैं. इस कठिन लक्ष्य तक पहुंचने के लिए ब्राह्मण बुद्धिजीवियों ने कम श्रम नहीं किया. कम से कम इस बात के लिए वे प्रशंसा के पात्र हैं कि अपनी सामाजिक श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए उन्होंने निजता के स्थान पर सामूहिकता को वरीयता दी. रचना का श्रेय स्वयं लेने के बजाय वर्गीय श्रेय हेतु आजन्म समर्पित रहे. अपनी विचारों को स्वतंत्र कृति के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय, पीढ़ीदरपीढ़ी परंपरा से प्राप्त ग्रंथों में ही संशोधनसंवर्धन करते रहे. वेद, उपनिषद, पुराण, महाकाव्य, स्मृतियां किसी एक व्यक्ति की रचना नहीं हैं. इन्हें लिखने के लिए ब्राह्मण बुद्धिजीवियों ने शताब्दियों तक बिना नाम या व्यक्तिगत श्रेय की आकांक्षा के श्रम किया है. शायद वे समझ चुके थे कि प्रतिभा के बल पर वे स्वयं सम्मान का पात्र माने जा सकते हैं. लेकिन यदि ब्राह्मणत्व को स्थापित कर वर्गीय श्रेष्ठता बनाए रखना है, और कुछ लोगों के श्रेय को उत्तराधिकार के रूप में पीढ़ीदरपीढ़ी अंतरित करना है, तो व्यक्तिगत श्रेय के आगे वर्गीय श्रेय को वरीयता देना आवश्यक है. व्यास, वशिष्ट, याज्ञवल्क्य, भरद्वाज, वाल्मीकि, ब्रहश्पति, शुक्राचार्य आदि किसी एक ऋषि अथवा आचार्य के नाम नहीं हैं, बल्कि उनके पीछे पूरी परंपरा निहित है. या शायद केवल परंम्परा है, और कुछ नहीं. कुछ उपनिषदों, पुराणों, स्मृतिग्रंथों के साथ उनके कथित रचनाकार का नाम जुड़ा है, लेकिन वे किसी एक मनीषी की रचना हैं—यह बात दावे के साथ नहीं कही जा सकती. रचने के बाद भी उनमें निरंतर प्रक्षेपण हुआ है. रामायण और महाभारत को ही ले. रामायण की आदि रचना वाल्मीकि ने ‘पुलत्स्य वध’ शीर्षक से की थी. उस समय वह सामान्य साहित्यिक रचना रही होगी. लेकिन ‘पुलत्स्य वध’ से ‘रामायण’ और आगे चलकर ‘रामचरित मानस’ में ढलने तक मूल रचना में निरंतर प्रक्षेपण हुआ है. इसी तरह मूल महाभारत भी ‘जय’ शीर्षक के अंतर्गत रची गई थी. मूल रचना अप्राप्य है. वह व्यास के अलावा किसी अन्य कवि की भी हो सकती है. महाभारत को उसका वर्तमान स्वरूप करीब 2200 वर्ष पहले, उस समय प्राप्त होता है, जब साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाओं का उदय हो चुका था. गणराज्यों को अपने में समाहित कर, वृहत्तर भारत की कल्पना को आकार दिया जा रहा था. सशक्त एकराष्ट्र की चाणक्य और कृष्ण की अवधारणाओं में विशेष अंतर नहीं है. ज्ञान को परंपरा में ढाल देने का लाभ जो हुआ सो हुआ, नुकसान कम नहीं हुआ. वर्णव्यवस्था के चलते पोंगा पंडितों को भी बौद्धिक नेतृत्व मिलता रहा. पीढ़ीदरपीढ़ी एक ही धारा के लेखन से मौलिकता का हृास हुआ तथा तंत्रमंत्र, पूजापाखंड में वृद्धि. चूंकि धर्म ग्रंथों में प्रक्षेपण अलगअलग समय में हुआ था, इसलिए उनमें परस्पर विरोधी बातें भी शामिल होती गईं. जिस महाभारत(शांतिपर्व) कहा गया,‘वर्णविभाजन जैसी कोई चीज असलियत में नहीं है. यह पूरी सृष्टि ब्रह्म है, क्योंकि इसे ब्रह्मा ने बनाया है.’ उसी में द्रोणाचार्य द्वारा एकलव्य का अंगूठा मांग लेने के धत्तकर्म को भी ‘धर्म’ की संज्ञा दी गई.

संस्कृतिकरण के लंबे अंतराल में व्यवस्था से अनुकूलित गरीबविपन्न लोग लगातार यह आस बांधे रहे कि जो पंडित लोग चौंसठ लाख योनियों का हिसाब रखते हैं, आदमी के ‘भाग्य’ का अगलापिछला सब बांच लेने का दावा करते हैं, वे उनका भी ‘हिसाब’ रखेंगे! यदि उनका परमात्मा छोटेबड़े, गरीबअमीर, ब्राह्मण और शूद्र में भेद नहीं रखता तो वे भी नहीं रखेंगे. इस भरोसे के साथ वे अपने अधिकारों की ओर से, इतिहास की ओर से मुंह फेरे रहे. समय के दस्तावेजीकरण के प्रति निचले वर्गों की उदासीनता का लाभ ऊपर वालों ने खूब उठाया. उन्होंने कर्मफल का सिद्धांत पेश किया. उसके जरिये शोषित वर्गों को समझाया जाने लगा कि उनकी दुर्दशा के लिए कोई दूसरा नहीं, वे स्वयं जिम्मेदार हैं. दुर्दशा का कारण उनके पूर्वजन्मों के कर्म हैं. इससे पीढ़ी दर पीढ़ी वे जातीय उत्पीड़न का शिकार होने लगे. संस्कृति के आवरण में उन्होंने पहले अवसर छीने, फिर मानसम्मान. अपने श्रमकौशल के बल पर स्वाभिमान युक्त जीवन जीने की चाहत रखने वाले मेहनतकश लोगों को बर्बर, असभ्य, गंवार, गलीच घोषित करके खुद इतिहास में तोड़मरोड़ करते रहे. उनके द्वारा रचे गए इतिहास में ‘भेड़ों’ और ‘मेमनों’ को जंगल में अव्यवस्था का दोषी बताकर दंडित किया जाता रहा. दूसरी ओर शेर और भेडि़यों के लिए प्रत्येक अपराध से बरी रहने की व्यवस्था की गई. पंडित, देवता, करुणानिधान, अन्नदाता, रक्षक, सेठ, साहूकार जैसे सुशोभन विशेषण उन्होंने अपने लिए सुरक्षित कर लिए. पिछले दो हजार साल का सांस्कृतिक खेल उनकी चालों और समझौतापरस्ती से बना है. ऐसी संस्कृति में सामाजिक न्याय की उम्मीद करना, मरुस्थल में भरेपूरे जलाशय की उम्मीद करने जैसा है.

वैसे भी सामाजिक न्याय भारतीय अवधारणा नहीं है. जाति और वर्ग को मानवनियति बताने वाली ब्राह्मण संस्कृति इसकी संभावनाओं को अपने उदय के साथ ही खत्म कर चुकी थी. यहां तक कि समाजार्थिक समानता और स्वतंत्रता के पक्ष में आवाज उठाने वाले गौतम बुद्ध, संत परंपरा के महान कवि रैदास, कबीर, ज्ञानेश्वर आदि की वाणी को भी अनसुना कर दिया गया था. अगर ऐसा होता तो सामाजिक न्याय की अवधारणा को विकसित होने के लिए 1840 तक की प्रतीक्षा न करनी पड़ती. इटली निवासी अध्यात्मशास्त्री लुईज डी’अंजेग्लो, जिसने इस शब्द का पहली बार प्रयोग किया था, मध्यकाल के चर्चित विचारक थामस एक्वीनस से प्रभावित था. वह मशीनीकरण द्वारा पैदा की गई समस्याओं का निदान धर्म के माध्यम से चाहता था. उसे लगता था कि ईसाई धर्म का करुणा और प्राणिमात्र के प्रति दया का सिद्धांत अनियोजित मशीनीकरण द्वारा उत्पन्न समस्याओं से मुक्ति दिला सकता है. भारत में हालात अलग थे. मशीनीकरण की शुरुआत यहां देर से हुई. सामंतवादी उत्पीड़न का शिकार रहे जिन वर्गों को ‘सामाजिक न्याय’ की जरूरत थी, वे औद्योगिकीकरण को एक उम्मीद के रूप में देख रहे थे. उसकी असल लड़ाई धार्मिक वर्चस्ववाद, घोर विपन्नता और जड़ हो चुकी वर्णव्यवस्था से थी. जिनके द्वारा उत्पन्न समस्याएं औद्योगिकीकरण की समस्याओं की अपेक्षा कहीं अधिक विकराल थी. माना यह गया था कि सामाजिक न्याय के लक्ष्य की प्राप्ति के बगैर वैकल्पिक संस्कृति का गढ़न असंभव है. किंतु रैदास, कबीर आदि प्रमुख संत कवि जिन वर्गों से आए थे, ब्राह्मणपरंपरा उनको बुद्धिजीवी मानना तो दूर, सामान्य मानवीय अधिकार देने से भी बचती थी. इसलिए संतकवियों की बातों को दबा दिया गया. उसके बाद तो दमन और उत्पीड़न की लंबी परंपरा है, जिसमें जातिवाद उत्तरोत्तर मजबूत होगा गया.

ब्राह्मण संस्कृति ईश्वरीय न्याय में विश्वास करती है. न्याय का स्वरूप क्या हो? वंचित तबकों की उन्नति में वह किस भांति सहायक हो सकता है—यह नहीं बताती. ईश्वरीय न्याय की अवधारणा की कमजोरियां किसी से भी छिपी नहीं हैं. वह व्यक्ति के सपनों और आवश्यकताओं पर केंद्रित न होकर अनुकंपा पर टिका होता है. व्यक्ति के मानसम्मान को सुरक्षित रखने की उसमें कोई व्यवस्था नहीं होती. सारा कारोबार डर के भरोसे चलता है. एक ही बात व्यक्ति के दिलोदिमाग में तरहतरह से बिठाई जाती है कि ईश्वर खुश तो उसकी अनुकंपा की कमी नहीं रहती. ईश्वर के नाम पर चढ़ावा मत चढ़ाओ, उसका नाम मत लो, उसके आगे मानसम्मान और स्वाभिमान की बातें करो तो वह नाराज होकर कुटिल सामंत से भी क्रूर भांति व्यवहार करने लगता है. सुनवाई का अवसर तक नहीं देता. यानी सवाल ईश्वर की नाक का है. और उसे अपनी नाक बेहद प्यारी है. वह नहीं चाहता कि किसी और की नाक उसकी नाक से ऊंची हो. ईश्वर का डर भक्त के डर से कहीं ज्यादा बड़ा है. लेकिन ईश्वर डरता क्यों है? और उसका डर कहां से आता है? इस प्रश्न के उत्तर में जनसमाज की अनेक समस्याओं का हल भी छिपा है. असल में यह वर्चस्ववादी शक्तियों का अपना भय है. जब कोई व्यक्ति बल या कूटनीति के सहारे दूसरों को दबाना चाहता है तो वह जानता है कि वह प्रकृतिविरुद्ध आचरण है. डरे हुए लोग कभी भी विद्रोह कर सकते हैं. उस समय डर का वह हिस्सा जिसे पर दूसरों पर आजमाना चाहता है, उसके अपने मनोमस्तिष्क पर भी छा जाता है. ऐसे में उनके द्वारा कल्पित ईश्वर भी उसके डर से मुक्त नहीं हो पाता. कह सकते हैं कि ईश्वर की परिकल्पना असल में वर्चस्ववादी परिकल्पना है. शिखर पर बैठे लोग अपनी कामनाओं के हिसाब से ईश्वर को गढ़ते हैं. उस समय उनके मन में समाये डर का एक हिस्सा उनके मनोमस्तिष्क पर छाया रहता है. यह बात शासक गण भी जानते हैं. बावजूद इसके संस्कृतिपुरुष उसे भक्तवत्सल, कृपानिधान, करुणागार जैसे सुशोभन संबोधनों से अलंकृत रखते हैं. दूसरी ओर दुनिया को ‘मायाजाल’ बताया जाता है. मानवीय संबंधों को ‘भ्रम’, ‘छलावा’, मोहममता आदि कहकर अवमूल्यित किया जाता है. लोगों को ऐसी स्पर्धा में जोत दिया जाता है, जो न केवल अंतहीन बल्कि अर्थहीन भी होती है. ऐसे स्वाभिमान रहित समाज में न्याय एवं कल्याण का लक्ष्य व्यक्तिगत मोक्ष की कामना तक सिमट जाता है.

सामाजिक न्याय’ के पैरोकारों का प्रथम लक्ष्य उस संस्कृति का पुनरुद्धार करना है, जिसमें संगठित धर्म का हस्तक्षेप न्यूनतम हो. जिसमें लोग एकदूसरे से सहयोग और सद्भाव के आधार पर जुड़े हों तथा एकदूसरे के हित के लिए काम करने में सुख का अनुभव करते हों. परस्पर सहयोग एवं सहभागिता पर आधारित संस्कृति की कल्पना भारत के लिए नई नहीं है. बाद के ग्रंथों में उसका बारबार विरूपण किया गया है. इस बात के भी पर्याप्त प्रमाण है कि वैदिक काल से लेकर गौतम बुद्ध तक और उसके बाद भी यज्ञ, कर्मकांड और वर्गभेद को बढ़ावा देने वाली ब्राह्मणसंस्कृति का विरोध लगातार होता रहा. किंतु उस धारा का प्रतिनिधि साहित्य आज अप्राप्य है. उनका छिटपुट उल्लेख ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन ग्रंथों में ही प्राप्त होता है. उसे भी ब्राह्मणवादी नजरिये से प्रस्तुत किया गया है. संकेत साफ हैं कि विजेता ब्राह्मण संस्कृति ने, पराजित संस्कृति के प्रमाणों एवं प्रतीकों को मिटाने का काम पूर्णतः योजनाबद्ध ढंग से किया. बौद्धिक गतिविधियों पर ब्राह्मण का एकाधिकार होने के बाद ब्राह्मण संस्कृति को ही भारतीय संस्कृति के रूप में पेश किया जाने लगा. अब तो कदाचित यह सवाल तक नहीं उठता कि क्या इस देश में कभी कोई वैकल्पिक संस्कृति भी थी?

भारत के संदर्भ में सामाजिक न्याय की लड़ाई गरीबी के साथसाथ जाति एवं वर्गभेद द्वारा पैदा की गई विषमताओं के विरुद्ध जंग भी है. उत्पीड़न का शिकार रहे वर्गों को लगता है कि लोकतांत्रिक माहौल का लाभ उठाकर वे अपने संघर्ष को आगे बढ़ा सकते हैं. इसलिए वे जाति को संगठनकारी ‘टूल’ की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन जातिआधारित संगठनों की अपनी परेशानी हैं. इस देश में हजारों जातियां हैं. अपने दम पर कोई भी जाति परिवर्तनकारी ताकत बनने में अक्षम है. इस लिए समान श्रेणी की जातियां को वर्ग के रूप में संगठित करने की कोशिशें चल रही हैं. परंतु दृष्टिकोण पूरी तरह अलग है. पहले जातियों को शीर्षस्थ शक्तियों के स्वार्थ के अनुसार बांटा जाता था. लोग उसमें कुढ़ते रहते थे. आज दमित वर्ग मान चुके हैं की बिना राजनीतिकआर्थिक ताकत हासिल किए सामाजिक समानता के लक्ष्य को प्राप्त करना असंभव है. और यह कार्य किसी की दया या चमत्कार भरोसे संभव नहीं है. उन्हें खुद इसके लिए प्रयास करने होंगे. इसलिए निम्न और मंझौले वर्ण की जातियां अपनेअपने हितों के लिए संगठित हो रही हैं. इस परिवर्तन की विडंबना है जो लोग जाति प्रथा के सताए हुए थे, उससे नफरत करते थे, उसे भारतीय समाजव्यवस्था का कलंक मानते थे, अब वे उसी का सहारा लेकर एक ताकत में ढलने की कोशिश में जुटे हैं. यह जहर को जहर से मारने, कांटे से कांटा निकालने की तरतीब है. इस तरह के खेल अभी तक अल्पसंख्यक अभिजन वर्ग के लोग ही खेलते आए थे. बल्कि यह उनका पसंदीदा खेल था. अब बाकी लोग भी उन्हीं गोटियों के साथ मैदान में हैं, जिनके सहारे अभी तक उन्हें छला गया है. लोग यह भी समझने लगे हैं कि सामाजिक न्याय के संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए समानांतर लड़ाई संस्कृति के मोर्चे पर भी लड़नी होगी. इसके लिए उस जनसंस्कृति को उभारना होगा, जो ब्राह्मण संस्कृति के उभार के बाद निरंतर हुई उपेक्षा के कारण बेअसर हो चुकी है.

ऐसे अनेक महापुरुष हैं, जो वैकल्पिक संस्कृति के संवाहक रहे हैं. महिषासुर, बालि, शिव पौराणिक सम्राट वेन के अलावा गणेश जैसे अनेक नाम हैं. वे मिथक भी हो सकते हैं और यथार्थ भी. यदि इन्हें मिथक माना जाए तो ब्राह्मण संस्कृति के अन्य संवाहकों को भी मिथक मानना पड़ेगा, क्योंकि उनका पूरा का पूरा इतिहास इनके कंधों पर खड़ा है. शिव भारत की आदिम जातियों के मुखिया थे. उनके सहयोगी के रूप में भूत, पिशाच, प्रेत आदि को हम भारत के आदिम कबीलों की याद दिलाते हैं. आर्यों ने शिव को तो अपनाया. मजबूरी में उन्हें आराध्य भी माना, किंतु उनके सहयोगी कबीलों की पूरी तरह उपेक्षा की. उन्हें असभ्य मानते हुए भूत, प्रेत, कापालिक आदि कहा गया. बख्शा शिव को भी नहीं गया. उन्हें आक, धतूरा खाने वाला, भभूत लगाकर रमने वाले अवधूत की तरह दर्शाया गया. इससे सृष्टि को चलाने की जिम्मेदारी ‘ब्राह्मण ब्रह्मा’ तथा ‘क्षत्रिय विष्णु’ पर आ गई. और एक बार वे सत्ताकेंद्र बने तो आगे चलकर सत्ता उन्हें रास आने लगी. परिणामस्वरूप सत्ता में बने रहने का उपक्रम खोजने लगे. इसके लिए जो भी लंदफंद उन्हें जरूरी वह किया भी. गणेश का मिथक भी प्राचीन भारतीय गणतंत्रों के मुखिया की याद दिलाता है. गणतांत्रिक व्यवस्थाओं में मुखिया का निर्णय सर्वोपरि होता है. उसे प्रथम पूज्य माना जाता है. ईसा की पहलीदूसरी शती के आसपास बड़े राज्यों का चलन बढ़ा तो सभा का नेतृत्व करने वाले गणप्रमुख के चरित्र का विरूपण किया गया. बैठेबैठे सूंड लटक आना, खातेखाते उदर बढ़ जाना जैसे प्रहसन गणप्रमुख को बदनाम करने के लिए रचे जाने लगे. ब्राह्मण संस्कृति के चंगुल से बहार निकलने के लिए जनसंस्कृति के इन प्रतीकों की पुनर्व्याख्या करना हम सब का युग धर्म है.

अब हम इस लेख के अंतिम चरण पर आते हैं. सामाजिक न्याय के संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक है, प्राचीन संस्कृति के उन प्रतीकों की पहचान की जाए जो कभी ब्राह्मण संस्कृति के विरोध में या उसके समानांतर खड़े थे. क्या यह धर्म के भीतर एक और धर्म की खोज सिद्ध नहीं होगी? ऐसी आशंका उठ सकती है. ध्यान यह रखना होगा कि समानांतर संस्कृति के इन प्रतीकों, नायकों, मिथकों का योगदान दमितशोषित वर्गों के आत्मविश्वास को लौटाने तक सीमित हो. यह एहसास दिलाने के लिए हो कि हम हमेशा से ही ‘ऐसे’ नहीं थे. हम न केवल ‘वैसे’, बल्कि कई मायनों में उनसे भी बहुतबहुत आगे थे. उनकी संस्कृति का महल हमारे ही महानायकों के कंधों पर खड़ा है. जिस दिन हम अपने महानायक उनसे वापस ले लेंगे, असमानताकारी ब्राह्मण संस्कृति का भवन भरभराकर गिर पड़ेगा. जिस दिन वैकल्पिक संस्कृति को उसकी पहचान वापस दिला पाएंगे, सामाजिक न्याय की गाड़ी अपने आप आगे बढ़ने लगेगी.

© ओमप्रकाश कश्यप

धर्म और अभिजन संस्कृति—दो

सामान्य

अभिजन संस्कृति के विकास में धर्म का योगदान

 

आधुनिक समाज की दृष्टि से देखा जाए तो उसमें पुरोहित, नौकरशाह, व्यापारी, राजनेता, सैन्याधिकारी, उच्च पेशेवर जैसे अभिजन समाज के कई उपवर्ग मिलेंगे. किंतु प्राचीन समाजों में जब संस्थाओं का इतना विस्तार नहीं हुआ था और सामाजिकव्यापारिक संबंध अपेक्षाकृत सरल होते थे, इनकी संख्या धार्मिक, आर्थिक एवं राजनीतिक अभिजन तक सीमित थी. इनमें से पहले किसका जन्म हुआ, यह सहीसही बता पाना संभव नहीं है. इतना तय है कि सामाजिक विकास के आरंभिक दौर में ये सब एक ही वर्ग से संबंधित थे. यह भी कह सकते हैं कि सरल समाजों में अकेला व्यक्ति धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाल लेता था. चूंकि संस्कृति सामूहिकता के बीच जन्म लेती है, अतएव सरल समाजों में अभिजन संस्कृति के विकास की कल्पना नहीं की सकती. फिर भी कुछ ऐसे विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्ति अवश्य रहे होंगे, जिन्हें एकल सत्ताकेंद्र का आशीर्वाद प्राप्त हो या जो उसके सन्निकट रहकर सुविधालाभ पाते हों. कालांतर में, निरंतर जटिल होते समाजार्थिक संबंधों के बीच, अकेले व्यक्ति द्वारा विभिन्न प्रकार की जिम्मेदारियों को संभाल पाना कठिन हो चला था. शांतिव्यवस्था के लिए चुनौती पेश करने वाले संकट आंतरिक और बाह्यः सभी प्रकार के थे. बस्तियों में एक साथ रह रहे लोगों के बीच मनमुटाव और छोटेछोटे झगड़ों का होना सामान्य बात थी. अतः जनजीवन को सामान्य बनाने, शांतिव्यवस्था कायम करने, संकट के समय समूह की रक्षा करने तथा विभिन्न गुटों के बीच वर्चस्व की लड़ाई के समय परस्पर विरोधी पक्षों के बीच तालमेल बनाए रखने हेतु ऐसे लोगों की आवश्यकता थी, जो नेतृत्वकुशल होने के साथसाथ दूरद्रष्टा, ईमानदार, कर्मठ, साहसी, व्यवहारकुशल तथा बुद्धिमान भी हों.

सर्वसम्मति से यह जिम्मेदारी ‘विश’ अथवा ग्रामणी को सौंपी जाने लगी. वह गांव का मुखिया होता था. आरंभ में उसका दायित्व अतिरिक्त अनाज का प्रबंधन करना तथा आवश्यकता के समय उसका समूह के सदस्यों में वितरण करना था. वह आवश्यकतानुसार बस्ती के छोटेमोटे झगड़ों को सुलझाकर विरोधी गुटों में संधिसुलह भी कराता था. उसके अलावा गांव में एक पद पुरोहित का था. उसका प्रमुख कार्य लोगों के धार्मिक मसलों में लोगों को नेतृत्व करना था. पदानुक्रम में उसे बाकी सभी पर वरिष्ठता प्राप्त थी. महत्त्वपूर्ण अवसरों पर उसका कथन निर्णायक माना जाता था. वहीं व्यवस्था का सर्वेसर्वा होता है. भारत की प्राचीनतम सभ्यता के अवशेष सिंधु घाटी से प्राप्त होते हैं. उनके विश्लेषण से पता चलता है कि उस समय तक नागर व्यवस्था पनप चुकी थी. कृषि के साथसाथ शिल्पकर्म का विकास हो चुका था. अंतर्महाद्वीपीय व्यापार में तेजी आई थी. सिंधु घाटी के उत्खनन से प्राप्त संकेतों में यद्यपि वहां की शासन व्यवस्था के बारे में सटीक अनुमान लगा पाना संभव नहीं है. लेकिन तत्कालीन मिस्र सहित पश्चिम के कई नगरराज्यों का प्रबंधन धार्मिक नेताओं तथा पुरोहितों के अधीन था. इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि उस समय धर्म प्रमुख ही नगरराज्य का वास्तविक कर्ताधर्ता होता था. उपजाऊ जमीन, समृद्ध वनसंपदा के कारण सिंधु सभ्यता के नगर अपने समकालीन नगरराज्यों की अपेक्षा अधिक सुरक्षित और शांत थे. लेकिन व्यवस्थित शासनप्रणाली का न उभर पाना उस सभ्यता की कमजोरी थी. संभवतः वही दुनिया की उस प्राचीनतम सभ्यताओं में एक के पतन का प्रमुख कारण बना था.

सिंधु घाटी के लोगों का आर्थिक जीवन मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर था. सिंधु सभ्यता के किसान गैहूं, जौ, राई, सरसों आदि की खेती करते थे. अन्नभंडारण के लिए बड़े गोदामों का उपयोग किया जाता था. यहां तक कि अनाज को पीसने के लिए भी सामूहिक प्रबंध थे. खेती के लिए औजारों का प्रचलन था. सिंधुवासियों ने सुदूर मिस्र, रोम, अरब तक व्यापार के अनुकूल जलमार्गों का अन्वेषण किया था. उनपर व्यापारिक दलों का आवागमन लगा ही रहता था. आरंभिक व्यापार असंगठित था. प्रारंभ में प्रायः कारीगर ही समूहबद्ध होकर व्यापार करते थे. उनके अलावा संभवतः एक श्रेष्ठि वर्ग भी पनप चुका था जो खुद तो निर्माण कार्य में दक्ष न था, परंतु उत्पाद को बेचने का हुनर उनके पास था. इस वर्ग ने कारीगरों से माल खरीदकर उसका दूरदराज के क्षेत्रों तक व्यापार करना आरंभ कर दिया. आर्थिक विकास की यह स्वाभाविक परिणति थी. असल में महीनों तक चलने वाली लंबी यात्राओं में व्यस्त रहने के कारण उत्पादक कर्म को स्वयं संभालना संभव भी नहीं था. इसलिए शिल्पकार वर्ग के लिए भी यही उपयुक्त था कि वह केवल उत्पादन पर ध्यान दे. दूरस्थ व्यापारकेंद्रों को बड़े व्यापारियों के लिए छोड़कर स्वयं केवल स्थानीय बाजारों में अपनी पैठ बनाए रखें. हालांकि कुछ ऐसे भी शिल्पकार संगठन अवश्य रहे होंगे जो उत्पादन और वितरण दोनों की जिम्मेदारी स्वयं संभालते थे.

इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि सिंधु घाटी की सभ्यता तक समाज में अभिजन मानसिकता जन्म ले चुकी थी. धर्म और अर्थ का नियंत्रण करने वाले शासक वर्ग का उदय हो चुका था. एक वर्ग था जो स्वयं को दूसरों से ऊपर मानता था. मोहनजोदड़ों और हड़प्पा के उत्खनन अवशेषों से सामान्य जन और अभिजन वर्ग के लिए बने अलगअलग आवासों का पता चलता है. सामान्य जनों के आवास जहां छोटे हैं, वहीं अभिजन वर्ग के आवास खासे बड़े हैं. छोटे घरों का आकार प्रायः 26 गुणा 30 फुट का है, वहीं विशिष्ट जनों के आवास उससे काफी बड़े, लगभग 242 फुट गुणा 112 फुट के थे. इसी प्रकार का भेद स्नानागार में मिला है. पुरोहित वर्ग के स्नानागार साधारण लोगों के स्नानागारों की अपेक्षा काफी बड़े हैं. इनसे जहां इन सभ्यताओं के वैभवशाली अतीत तथा सत्ता के आधार पर अभिजन और सामान्यजन में विभाजन का बोध होता है. एक निहितार्थ यह भी है कि सभ्यता और अभिजन वर्ग का उदय परस्पर, पूरक और अन्योन्याश्रित घटनाएं हैं. सांस्कृतिकसांस्कृतिक विकास की अनिवार्यता के रूप में दायित्वों के निर्वाह के लिए केंद्रीय सत्ताकेंद्रों की अभिकल्पना की गई. कालांतर में उन सत्ताकेंद्रों पर नियुक्त व्यक्तियों के भीतर विशिष्टताबोध पनपने लगा, जिसने अभिजन मानसिकता को जन्म दिया. आगे चलकर जब समाज का आर्थिक, सामाजिक विभाजन हुआ तो जनमानस ने भी उन सत्ताकेंद्रों को अपनी नियति की भांति स्वीकार कर लिया. इस बात की परिकल्पना की जा सकती है कि मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की सभ्यता के विकास तक समाज में आर्थिक, राजनीतिक वर्ग की अलगअलग श्रेणियां बन चुकी थीं. उनमें पुरोहित शीर्षस्थ स्थान पर था.

 

ईसा से करीब 2000 वर्ष पहले सिंधु घाटी की सभ्यता का पतन हुआ. अगले एक हजार वर्षों के दौरान गंगायमुना के दोआब में जो नई सभ्यता विकसित हुई, वह अपेक्षाकृत सुस्थिर थी. उस समय तक बड़े राज्यों की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी थी. राज्यों के प्रबंधन के लिए स्वतंत्र राजनीतिक समूह जन्म ले चुका था. लोग यह भी मानने लगे थे कि राज्य की सुरक्षा का मसला धार्मिक आग्रहों से इतर है. इससे समाज को कुल मिलाकर लाभ ही हुआ था. हालांकि लोकजीवन अब भी धर्म के निर्णायक प्रभाव में था. इस कारण धार्मिक अभिजन का प्रतीक पुरोहितवर्ग समाज में अभी तक महत्त्वपूर्ण भूमिका मेें बना हुआ था. उसी के नेतृत्व में महत्त्वाकांक्षी सम्राट चक्रवर्तित्व का सपना पालने लगे थे. यह अवसर आर्थिक गतिविधियों के लिए भी अनुकूल सिद्ध हुआ. बड़े राज्यों के गठन से व्यापारिक गतिविधियों के विस्तार को अवसर मिला. यातायात के साधनों में वृद्धि ने अंतर्महाद्वीपीय व्यापार को नई ऊंचाइयां दीं. इससे कुछ ठिकाने, विशेषकर तटवर्ती स्थल महत्त्वपूर्ण व्यापारिककेंद्रों के रूप में पनपने लगे. जिसका सुखद परिणाम तत्कालीन राज्यों की तीव्र आर्थिक समृद्धि के रूप में सामने आया था. बड़े राज्य के प्रबंधन के लिए राजा को अनेक कर्मचारियों, मंत्रियों और अधिकारियों की आवश्यकता थी, जो न केवल अलगअलग क्षेत्रों के विशेषज्ञ, बल्कि व्यवहारकुशल एवं भरोसेमंद भी हों. फलस्वरूप शिक्षा के नए क्षेत्रों का विकास हुआ, जिसने पुनः व्यापार के नवीनतम क्षेत्रों को जन्म दिया. उससे पहले दुर्गम रास्तों पर लुटेरों का भय बना ही रहता था. राज्यों की सीमा और चौकसी बढ़ने से वे अपेक्षाकृत अधिक दूर तक बिना कोई अतिरिक्त कर चुकाए व्यापार कर सकते थे. सुरक्षा और व्यापारिक कारणों से बड़े राज्यों में सत्ता के छोटेछोटे उपकेंद्र उभरने लगे. इससे व्यापारिक हित भी सधे और राजनीतिक अभिजन का दायरा भी विस्तृत होता गया.

व्यापारिक गतिविधियों के विस्तार से दो भिन्न संस्कृतियों को परस्पर करीब आने का अवसर मिला. अलगअलग समूहों के देवता, धर्म, रीतिरिवाज और परंपराएं भिन्न होती थीं. इसके बावजूद उनके आर्थिक, सामाजिक हित उन्हें परस्पर जोड़े रखते थे. उससे पहले केवल धर्म था, वही दो समूहों के बीच एैक्य अथवा प्राथक्य का भाव पैदा करता था. बदले हुए हालात में दो भिन्न समूहों में सहयोग या स्पर्धा दर्शाने के लिए व्यापार और राजनीति महत्त्वपूर्ण माध्यम के रूप में उभरे थे. अनुत्पादक पुरोहित कर्म में कोई अंदरूनी स्पर्धा नहीं थी. इसलिए पुरोहित वर्ग के आगे आंतरिक एवं बाह्यः चुनौतियां न्यूनतम थीं. लेकिन व्यापारी और राजनीतिक अभिजन को न केवल बाहरी बल्कि आंतरिक चुनौतियों का सामना भी करना पड़ता था. यूं तो भारत में राजनीतिक और आर्थिक कार्य भी विशिष्ट जातिवर्ग के लिए निर्धारित थे. परंतु स्पर्धा में बने रहने के लिए एक व्यापारी को अपने ही सदस्यों के साथ स्पर्धा करनी पड़ सकती थी. पेशागत चुनौतियों के कारण उसका जीवन अपेक्षाकृत उथलपुथल भरा था. इसका उसको लाभ भी मिलता था. अपनी कार्यकुशलता में सुधार के जरिये वह न केवल अपने, बल्कि दूसरे समूहों को भी प्रभावित करने में सफल होता था. चूंकि अलगअलग समूहों के भिन्न देवता और कर्मकांड रहे होंगे. अतः कर्मकांडों के अंतर एवं बहुदेववादी धारणाओं के चलते एक समूह का पुरोहित दूसरे समूह में न तो उतना सम्मानेय था, न ही जरूरी. इससे धार्मिक अभिजन की सीमाएं साफ नजर आने लगी थीं. पुरोहितवर्ग का प्रभाव केवल अपने समूह तक सिमटने लगा. किंतु समूह के भीतर बीच उसका प्रभाव स्थायी तथा इतना गहरा था कि उसकी अनुशंसा के बगैर दूसरे का वहां दखल दे पाना नामुमकिन जैसा था. विशेष लोगों की जीवनचर्या तथा अन्य सामाजिक मसलों को लेकर. पुरोहित को इससे भी संतुष्टि थी. धर्म को संगठित ताकत के रूप में बदलने के लिए ऐसी ही सघन प्रभावोत्पादकता जरूरी थी. यह तभी संभव तब जनसाधारण को कर्मकांडों में इतनी बुरी तरह से उलझा दिया जाए कि वह चाहकर भी उनकी किलेबंदी को तोड़ न सके. इसके लिए पापपुण्य, स्वर्गनर्क, पुनर्जन्म आदि का मायाजाल खड़ा किया गया. ऐसे शास्त्रों की रचना की गई जो व्यक्ति के मुक्त सोच को अवरुद्ध कर उसे अनुसरण का पाठ पढ़ाते हों. जैसेजैसे समाज का विकास हुआ, धर्म के नाम पर मानवीय विवेक की किलेबंदी बढ़ती ही गई. पंद्रहवी शताब्दी में पश्चिम में वैज्ञानिक प्रस्फुटन हुआ तो पुरोहित वर्ग को अपने अस्तित्व के ऊपर खतरा नजर आने लगा. तब बड़ी चतुराई से उसने धर्म को विज्ञानसम्मत बताने का प्रोपगेंडा आरंभ कर दिया. चूंकि विज्ञान के आगमन के साथ समाज में आर्थिक विभाजन भी बढ़ा था. जो मुख्यतः उत्पादक आर्थिक अभिजन द्वारा मुनाफे के बड़े हिस्से पर अधिकार कर लेने से बढ़ा था. जिसे राजनीतिक समर्थन प्राप्त था. उस समय उत्पादक वर्ग का समर्थन करते हुए पुरोहित वर्ग ने जनसाधारण को तरहतरह से फुसलाना आरंभ कर दिया. धार्मिकराजनीतिकआर्थिक अभिजन की शीर्ष तिकड़ी के आगे जनसाधारण ने अपनी दुरवस्था को अपनी नियति मानने लगा.

 

धर्म की उत्पत्ति मूलतः आध्यात्मिक जिज्ञासा से प्रेरित थी. वह मानवीय विवेक एवं चिंतन सामथ्र्य से अनुप्रेत होती थी. मनुष्य की विचारणा उसके अनुभव और विवेक के अनुसार नित नए रूप धरती थी. इसलिए धर्म का ताकत के स्रोत में उस समय तक बदलना संभव न था, जब तक उसकी धारणाओं में स्थायित्व न हो. समूह पर दीर्घगामी पकड़ के लिए आवश्यक था कि लोग पुरोहित पर आंख मूंद कर विश्वास करें. उसके कहे को आप्त वचन का सम्मान दें. यहां तक कि उनकी निर्णय क्षमता भी पुरोहित के दिए गए दिशानिर्देशों से अनुशासित हो. इसके लिए कर्मकांडों की अंतहीन और जीवन बहुव्यापी शृंखला बनाई गई. उनका संहिताकरण किया गया. फिर संहिताओं को दैवीय बताकर उनमें संकलित तथ्यों को तरहतरह से जनता पर थोपा जाने लगा. पुराणों, स्मृतियों और महाकाव्यों के जरिये अवतारवाद का गुणगान किया गया. मौलिक ज्ञान की जगह पाखंड को दे दी गई. इससे धर्म के आस्थाकरण को बल मिला. आस्था के दायरे में कैद जनशक्ति राजनेता के काम थी. वह उससे जो चाहे वह काम ले सकता था, अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं के लिए किसी भी युद्ध में झोंक सकता था. वह आर्थिक अभिजन के भी काम की थी. अपने उत्पादों की बिक्री के लिए उसको भी बाजार की आवश्यकता थी. इस प्रकार धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक अभिजन का स्वार्थी गठबंधन दिनोंदिन मजबूत होता गया. धार्मिक अभिजन ने आध्यात्मिक जिज्ञासा को आस्था में ढालने की भरपूर कोशिश की थी तो राजनीतिक और आर्थिक शक्तियों ने आस्था को अंधआस्था तथा श्रद्धा को अंधश्रद्धा में ढालने के साजिशाना काम में अपना पूरापूरा सहयोग दिया.

धर्म की अवधारणा के पीछे आरंभिक सोच शायद इतनी बुरी न थी. अकेले मनुष्य और जानवर में कोई अंतर न था. समाज उसको संस्कारित करता, संरक्षण देता था. इस कारण समाज मनुष्य की जरूरत थी, तो समाज की जरूरत थी, सबकी शांति और खुशहाली. पर सभी लोगों को समूहबद्ध रखना, शांतिव्यवस्था और भाईचारा कायम रखना. सभी को एकसाथ आगे बढ़ते देखना, विकास की निरंतरता को बनाए रखना—आसान बात न थी. ऊपर से आदमी के अपने लोभ, लालच, झूठ और दुर्बलताओं पर काबू रखना, कुछ ऐसा करना जिससे व्यक्तिमात्र की अच्छाइयों का लाभ सबको मिले और बुराइयां उसके भीतर से कभी बाहर ही न आ सकें. बल्कि मनुष्य स्वयं ही उन बुराइयों से जूझता रहे. समाज में लोकोपकारी जीवनमूल्यों करुणा, त्याग, परोपकार, अपरिग्रह, अस्तेय, सत्य, सहयोग आदि का बोलबाला हो. लोगों में एकता और विश्वास की भावना हो. इसके लिए उस समय समाज का भला चाहने वाले मनीषियों को संभवतः एक ही रास्ता समझ में आया—मनुष्य की आदि जिज्ञासा और शाश्वत नैतिक मूल्यों को एकदूसरे से जोड़ देना. मनुष्य की आदि जिज्ञासा थी, अपने जीवनरहस्य को समझना. सूरज, चांद, सितारे, पृथ्वी, अन्यान्य ग्रहनक्षत्रों तथा जीवजगत के सर्जनकर्ता के बारे में जानना. और तब उन मनीषियों ने ईश्वर की परिकल्पना की और जो नैतिकमूल्य उन्हें समाजसृष्टि के कुशल संचालन के लिए जरूरी लगते थे, उन्हें ईश्वरीय विधान बनाकर जीवन की कड़ी मान लिया. आदमी उन्हें माने, उनपर विश्वास करे, उन्हें अपने आचरण में ढाल ले, इसके लिए उन्होंने उन्हें उन नैतिक मूल्यों को परमात्मा द्वारा सृजित बताया. चूंकि समाज को स्थायित्व देने योग्य नैतिक मूल्य पूरी दुनिया में एक जैसे थे तथा व्यक्ति के आध्यात्मिक विश्वास उसकी भौगोलिक, व्यावहारिक परिस्थितियों की देन. इसलिए दुनिया में जितने भी धर्मों की परिकल्पना हुई उनके नैतिक मूल्य हर जगह एक समान थे. अंतर केवल आध्यात्मिक अनुभवों और विश्वास का था. उन उदारचेता मनीषियों ने शायद ही सोचा होगा कि जिस धर्म को मनुष्य की आदि जिज्ञासा के समाधान के नाम पर समाज में उतार रहे हैं, वह एक दिन उसकी जिज्ञासा को ही ग्रहण लगा देगा. स्वार्थी पुरोहित निजी स्वार्थ के लिए कर्मकांडों का इतना बड़ा जखीरा खड़ा कर देंगे कि धर्म के प्राणतत्व नैतिक मूल्यों के लिए उसमें जगह ही नही बचेगी. जिस धर्म के बारे में सोचा गया था कि वह मनुष्यता को परिभाषित करने में सक्षम होगा, एक दिन वही उसके गले की हड्डी बन जाएगा! स्वार्थी, प्रपंची, लोभी, लालची, विलासिता को धर्म और शोषण को पुरुषार्थ मानने वाले लोग, गरीबी का महिमामंडन करेंगे और परलोकसुख का वास्ता देकर जनसाधारण से जीवन के मामूली सुखसुविधाएं भी छीन लेंगे!

आम आदमी के लिए धर्म का प्रलोभन बड़े काम का सिद्ध हुआ. इसलिए कि जीवन में चारों दिशाओं से समस्याओं से घिरे, जीवन की दौड़ में पिछड़ गए व्यक्ति के लिए वह एक अंतिम सहारा था. जो दौड़ में बने रहने की अनुभूति देता था. धर्म की संरचना ही इस प्रकार की गई थी कि जिसमें आदमी अपने हुनर अपनी बुद्धिमत्ता का कोई योग न था. बल्कि कुछ न होने और सबकुछ छोड़ देने की प्रवृत्ति को वह ‘मुक्ति’ का नाम देकर महिमामंडित करता था. प्रकट में वह गरीब आदमी द्वारा अमीरियत के सपने को धिक्कारता था. धनवान आदमी का स्वर्ग के दरवाजे को पार करना उतना ही असंभव है, जितना हाथी द्वारा सुई की नोंक से पारगमन—ईसामसीह के इस कथन का दूसरे धर्मावलंबियों के बीच भी तरहतरह से बखान किया गया. मृत्योपरांत आनंद की प्राप्ति के लिए इहलौकिक कष्टों को मूक सहना तथा दुर्दशा के लिए भी तथाकथित ईश्वर का आभार मानना, यह बात स्वार्थी धर्मावलिंबियों द्वारा जनसाधारण के दिल में बिठा दी गई थी. किन परिस्थितियों में कही गई थी, इस तथ्य को एकदम भुला दिया गया. धर्म के नाम पर होते आए षड्यंत्र को समझने के लिए इसकी तह तक जाना आवश्यक है. यूनान की घृणित दास प्रथा के विरोध में हथियार उठाने वाला रणबांकुरा योद्धा था, वीर स्पार्टकस. उसने दासों को एकजुट कर रोम की सत्ता के विरुद्ध युद्ध छेड़ा था. स्पार्टकस की वीरता और कुशल रणनीति के कारण रोम की करारी मात हुई थी. दासों को विश्वास हो गया कि आगे दासता का कलंक उन्हें और न ढोना पड़ेगा. उनकी जो संतान जन्म लेंगी वे आजाद होंगी. अपनी मर्जी की मालिक. इसके लिए वे स्पार्टकस के साथ थे. उसको अपना मसीहा मान रहे थे. लेकिन साम्राज्यवादी चुप कहां बैठने वाले थे. दासों के विरोध में यूनान के समस्त साम्राज्यवादी राज्य एकजुट होकर स्पार्टकस की सेना पर टूट पड़े. वह बड़ी वीरता से लड़ा और शहीद हुआ. साम्राज्यवादी शासकों ने पराजित दास सेना के छह हजार योद्धाओं को सामूहिक सूलियों पर चढ़ा दिया गया. दासों के लिए यह बहुत बड़ा आघात था. यदि स्पार्टकस जैसा महानतम योद्धा उनकी मुक्ति के रास्ते नहीं खोल सका तो आगे भी असंभव है. निराशा हताशा में ढल गई. स्पार्टकस की मृत्यु के करीब 70 वर्ष बाद जब ईसामसीह का जन्म हुआ, दास पूरी तरह से हताशा में डूबे हुए थे. स्पार्टकस के शहीद होने के बाद अपने उद्धार की उम्मीद बिलकुल छोड़ चुके थे. ऐसे में ईसामसीह से उन्हें मुक्ति का सपना अलग तरीके से परमात्मा के नाम पर दिखाया तो अंधेरे में डूबे उन दाससमाज ने उसपर आसानी से भरोसा कर लिया. वे ईसामसीह के आसपास एकजुट होने लगे. इस जन्म में मुक्ति संभव नहीं तो अगले जन्म में ही सही. ईसा मसीह का कथन उन्हें दौड़ में बने रहने की उम्मीद जगाता था. रोम का राज्य न सही, ईश्वर का राज्य उनके लिए सुरक्षित है. इस भरोसे वे वर्तमान की पीड़ाओं, अभावों और नाकामियों को भुलाकर जीने लगे. साम्राज्यवादियों को यह बड़ा अच्छा लगा. दासों को हमेशाहमेशा के लिए दास बनाए रखने के लिए एक नया हथियार उनके हाथ आ लगा था, वह हथियार था—धर्म का. उसके बाद यह हथियार पूरी दुनिया में आजमाया जाने लगा. आज तक उसका उपयोग जारी है.

 

धर्म अभिजन वर्ग की सत्ता, संसाधनों पर एकाधिकार को शास्त्रीय मान्यता प्रदान करता है. इस अनुचित अधिकारिता को वह जनसामान्य तक इतनी बार और इतनी तरह से ले जाता है कि जनसाधारण अपनी दुरवस्था को ही अपनी नियति मान लेता है. यह अनुकूलन इतना प्रभावी हो जाता है कि जिन स्थितियों में साधारणजन प्रतिदिन रहता है, उनमें किसी अभिजन को यदि एक दिन भी गुजरना भी पड़े तो उसको दारुण दुख होता है. रामायण में राम का वनगमन एक राजपरिवार के सत्ता के सघर्ष का मसला है. ऐसे संषर्घ उस समय राजपरिवारों में होते रहते थे. इसके लिए राजपरिवारों का उजड़ना और बसना सामान्य बात थी. लेकिन कैकयी जब दशरथ से वरदान मांगकर राम को वनगमन के लिए विवश कर देती है तो इस प्रसंग को नाटक अथवा रामलीला के जरिये देखना, सुनना, राम और सीता का वल्कल वेश में वनगमन करते हुए देखना जनता को उदास बना देता है. अभिजन वर्ग का सत्ता लोलुप स्वार्थपूर्ण चेहरा सामने न आए, उनके अंदरूनी झगड़े, बड़ों का तथाकथित बड़प्पन बना रहे, इसके लिए रामायणकार अपने ही वर्ग की स्त्री मंथरा को दोषी ठहराता है. यह जानते हुए भी कि चतुर दासियां वही कहा करती थीं, जो उनकी स्वामिनी या स्वामी सुनना चाहते थे. परोक्षरूप में वे अपने स्वामी अथवा स्वामिनी की इच्छा की अभिव्यक्ति ही करते थे. तभी वे अपने आश्रयदाता के परमप्रिय और विश्वसनीय होने का उपहार पाते थे. इसलिए मंथरा ने कैकयी से यदि कुछ कहा भी तो एक प्रकार से कैकयी की इच्छा की अभिव्यक्ति ही की थी. फिर भी कैकयी की करनी का दोष जनसामान्य के सहजबोध को कुंठित करने के लिए मंथरा को दिया जाता गया. युधिष्ठिर के जुआ खेलने को बड़े लोगों का स्वाभाविक खेल मानकर शास्त्रकार उसको कोई दोष नहीं देता, यहां तक कि अपनी पत्नी को दांव पर लगाकर हार आने से भी युधिष्ठिर के ‘धर्मराज’ होने पर कोई फर्क नहीं पड़ता. जबकि दुर्योधन द्वारा पांच गांव न देने की जिद उसको खलनायक बना देती है, जिसका समापन उसकी मृत्यु के बाद ही हो पाता है.

निहित स्वार्थ के लिए अभिजन समाज धर्म को पोसता है. धार्मिक मान्यताओं को लेकर उसकी अपनी निष्ठा कितनी प्रामाणिक है, इस अनुच्छेद में इसी को लेकर चर्चा करेंगे. हमारी कोशिश यह देखने की होगी कि अभिजन वर्ग व्यवहार में जिस तरह धर्म को बढ़ावा देता है, जनभावनाओं के नाम पर जिस प्रकार उसका महिमामंडन करता है, उसके प्रति वह स्वयं कितना गंभीर होता है. उदाहरण के लिए एक कारखानेदार विशाल फैक्ट्री का निर्माण करता है. अरबोंखरबों रुपये खर्च करके मशीनें लगाता है. उसके बाद उत्पादन शुरू करता है. धर्म के प्रति अपनी आस्था को दर्शाते, हुए वह फैक्ट्री के प्रांगण में ही एक मंदिर बनवा देता है. उसकी देखभाल के लिए पुजारी भी नियुक्त कर देता है. जिसको कारखाने की ओर से पगार मिलती है. समयसमय पर दक्षिणादि भी. मंदिर की दीवारों पर सांसारिक मोहमाया, लौकिक सुख की निस्सारता, जीवन की क्षणभंगुरता और संतोष की सार्थकता जताने वाली बातें सूक्तियां लिखी होती हैं. मंदिर की देखभाल, आयोजनों आदि पर कारखाने की मद से खर्च होता है. आप कहेंगे कि इसमें बुरा क्या है? आदमी की आस्था का मामला है. कारखानेदार यदि अपनी आस्था को जताना चाहता है, तो उसकी आलोचना क्यों? वैसे भी धर्मग्रंथों में लिखा है कि आदमी को अपनी आमदनी का दसवां या बारहवां हिस्सा धर्म की राह पर खर्च करना चाहिए. यही वह करता है. इस बहाने ईश्वर ने जो उसको सुखसमृद्धि प्रदान की है, उसका धन्यबाद ज्ञापन पर देता है. सवाल अन्यथा नहीं है. यह सुनने में भी न्यायसंगत लगता है. पर बात क्या बस इतनी ही है? कणकण में भगवान, आत्मा को परमात्मा का स्वरूप बताने वाले धर्म का कारखाने में ही मंदिर बनाकर प्रचार करने वाला मालिक जरूरत के समय मजदूर को सौपचास रुपये का एडवांस देने पर देने पर नाकमुंह सिकोड़ लेता है. श्रमकल्याण के नाम पर अपनी मुट्ठी बंद कर लेता है. बातबात पर मजदूर को धमकाता है और जरासे नुकसान पर आगबबूला हो उठता है. वही मालिक, मंदिर और चढ़ावे जैसे अनुत्पादक कार्यों पर अनापशनाप खर्च के लिए तैयार हो जाता है. धार्मिक कर्मकांडों में पानी की तरह पैसा बहाने वाला पूंजीपति स्कूल के लिए कुछ हजार रुपये का चंदा देते समय भी कंजूसी करता है. आखिर क्यों? इसलिए कि धर्म के नाम पर मामूली निवेश उसके मोटे लाभ के रास्ते खोल देता है. मान लीजिए एक कारखाने को सौ मजदूर मिलकर चलाते हैं. इसका सीधासा मतलब है कि उस कारखाने से होने वाला मुनाफा उन सौ मजदूरों के गाढ़े पसीने की कमाई है. नैतिकता की दृष्टि से उस मुनाफे में उन मजदूरों का बराबर का हिस्सा है. लेकिन बात जब मुनाफे के वितरण की आती है तो कारखानेदार अपने विशेषाधिकार के साथ सारी बागडोर अपने हाथों में ले लेता है. उसकी मनमानी के चलते श्रमिक के हाथ में बस इतना आ पाता है कि अगले दिन कारखाने में सही वक्त पर पहुंचकर उत्पादन को आगे बढ़ा सके. इस तरह श्रमिकसमाज कारखानेदार की समृद्धि के लिए दिनप्रतिदिन अपने जीवन को दांव पर लगाता है. धर्म और राजनीति इसमें उसके मददगार सिद्ध होते हैं.

धर्म के प्रति कारखाने मालिक की आस्था मापनी हो तो कुल फैक्ट्री और मंदिर के क्षेत्रफल के अनुपात को देख लीजिए. दसबीस हजार वर्ग मीटर की फैक्ट्री में मंदिर के नाम आठदस मीटर का कोना छिका होगा. वह भी वहां जहां गाड़ियां खड़ी की जाती हैं. मालिक विशिष्ट अवसर के सिवाय शायद ही कभी उस ओर झांकता है. उसकी अपनी आस्था घर पर बने मंदिर में पूजाअर्चन से संपन्न हो जाती है. फिर कारखाने में मंदिर किसके लिए हैं? मजदूरों और कामगारों के लिए? पर उनके लिए तो वे हर बस्ती, सड़क किनारे सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कर खड़े कर दिए जाते हैं. फिर कारखाने में बनाए गए मंदिर की उपयोगिता? अब आप इसका अभिप्राय समझने लगे होंगे. धर्म और अभिजन वर्ग के स्वार्थ संबंधों को समझने के लिए एक और उदाहरण लेते हैं. आप की किसी गांव, कस्बे, शहर से गुजरिये, रास्ते के किनारे, चैराहों पर बड़ेबड़े होर्डिंग्स और बैनर दिखाई पड़ेंगे, कोई राजयोग लिखता मिलेगा, कोई हठयोग. कोई सहजयोगी होगा तो कोई निखालिस योगी. कोई रामामृत बांटता नजर आएगा तो कोई कृष्णामृत का पान कराता हुआ. देवियों और साध्वियों की संख्या भी कम नहीं है. जीवन में और कहीं हो न हो, मगर धर्म के नाम पर, स्वयं घोषित भगवानों के बीच किसी नई ‘देवी’ का उभर आना एकदम स्वाभाविक है. लैंगिक भेद के बावजूद उनकी दुकानदारी भी जमी रहती है. पिछले दशक में दो देवता नए चर्चित हुए हैं. शनि महाराज और साईंनाथ. खाली पड़ी जमीन पर इनके मंदिर रातोंरात खड़े कर दिए जाते हैं. अगले दिन से ही भक्तों का तांता भी बंध जाता है. इन मंदिरों का खर्च तो उनके कुछ भक्तों के चढ़ावे से सध जाता है. कि पुजारी के लखपति से करोड़पति होते देर नहीं लगती. चढ़ावे की रकम को बांटने के लिए झगड़े होते रहते हैं. साफ है कि धर्म के नाम पर होने वाला खर्च केवल उसकी आस्था से प्रभावित नहीं होता. बल्कि उसकी मंशा दूसरों को इस खेल में लगाए रखने की होती है. उत्पादन को प्रभावित किए बिना न्यूनतम खर्च में कारखाने को चालू रखने की यह भी एक युक्ति है. एक ऐसा गणित जिसमें पुरोहितवर्ग को दी गई मामूली दक्षिणा से न्यूनतम मजदूरी में भरपूर काम को तैयार मजदूरों की फौज तैयार होती है. एक ऐसा टूल जो मेहनतकश वर्ग के लिए सपने और अपने मालिक के लिए समृद्धि उगलता है. संक्षेप में धर्म ऐसा विधान है जो आदमी अगले जन्म के भरपेट भोजन की आस में व्यक्ति इस जन्म की भूखप्यास से समझौता किए रहता है.

क्रमश:….

© ओमप्रकाश कश्यप

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