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दक्षिण भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के जन्मदाता : सिंगारवेलु चेट्टियार

सामान्य
जब भी कोई नया महापुरुष जन्मता है, मनुष्यता का भी पुनर्जन्म होता है। प्रत्येक महापुरुष अपने विचारों से, कर्मों से नई इबारत लिखता है। ऐसे कि लोग सम्मोहित होकर उसका उसका अनुसरण करने लगते हैं। फलस्वरूप जड़ और अप्रासंगिक हो चुकी विचारधाराएं पीछे छूटने लगती हैं। कुल मिलाकर बात इतनी-सी है कि जब भी किसी महापुरुष का जन्म होता है, इस दुनिया का भी पुनर्जन्म होता है।

आजकल लोग सवाल नहीं गूगल करते हैं। तो चलिए गूगल कर लेते हैं—‘भारत में मई दिवस मनाने की शुरुआत किसने की थी? वर्ग-क्रांति का प्रतीक लाल झंडा भारत में पहली बार किसने फहराया था? कौन था वह भारतीय जिसने खचाखच भरे सभागार में पहली बार ‘कामरेड’ शब्द का संबोधन किया था। जिसे सुनकर पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजने लगा था? भारत में मजदूर आंदोलनों का पितामह कौन था? कौन था, दक्षिण भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन का जन्मदाता? गूगल बाबा इन प्रश्नों का थोड़ा घुमा-फिराकर एक ही जवाब देंगे—‘सिंगारवेलु चेट्टियार। लोग उन्हें सम्मान से सिंगारवेलार कहते थे।

अब आप सिंगारवेलु को गूगल करना चाहेंगे। पर थोड़ा धीरज रखिए। पहले कुछ बातें ‘मई दिवस’ पर कर ली जाएं। मशीनीकरण के आरंभ में आदमी को भी मशीन मान लिया गया था। ‘कार्य-दिवस’ का अर्थ था, सूरज निकलने से दिन ढलने तक काम करना। मौसम के अनुसार दिन घटता-बढ़ता तो काम के घंटे भी बदल जाते। कामगार को प्रतिदिन 14 से 16 घंटे काम करना पड़ता था। कभी-कभी तो एक कार्यदिवस 18 घंटे तक पहुंच जाता था। अगस्त 1866 में ‘नेशनल लेबर यूनियन’ 8 घंटे की मांग का समर्थन किया।1 आंदोलन होने लगे। परंतु न सरकारें चेतीं न कारखाना मालिकों ने ही कोई ध्यान दिया। आखिरकार अमेरिकी मजदूरों ने 1 मई 1886 से देशव्यापी हड़ताल की घोषणा कर दी। तीन और चार मई, को प्रदर्शन के दौरान पुलिस और मजदूर संगठनों की भिड़ंत हुई। 4 मई को शिकागो के हेमार्किट चौक पर हुई घटना तो नरसंहार जैसी थी। उसी की याद में मई दिवस मनाया जाता है। मई की पहली तारीख का संबंध 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग तथा उसके लिए श्रमिकों द्वारा दी गई कुर्बानियों से है।

भारत में पहला मई उत्सव, 1 मई, 1923 को मद्रास में मनाया गया था। उसी दिन देश में पहले मजदूर संगठन का जन्म हुआ था, नाम था—‘हिंदुस्तान लेबर एंड किसान पार्टी’।2 उसी दिन लाल झंडा पहली बार फहराया गया था।3 आगे चलकर यह झंडा मजदूर आंदोलनों की पहचान बन गया। इन सबका श्रेय जाता है—सिंगारवेलु चेट्टियार को। भारत में ‘कामरेड’ शब्द का पहली बार इस्तेमाल उन्होंने ही, दिसंबर 1922 में कांग्रेस के गया अधिवेशन में किया था।4 यह जादुई शब्द आगे चलकर साम्यवादी चेतना की पहचान बन गया। गया सम्मेलन में सिंगारवेलु ने ही पहली बार भारत के लिए ‘संपूर्ण स्वराज’ की मांग रखी थी।5

जीवन परिचय

सिंगारवेलु  का जन्म 18 फरवरी, 1860 को एक मछुआरा परिवार में हुआ था। समुद्र किनारे जिस बस्ती में वे रहते थे, उसे वे ‘कप्पम’ कहते थे। बस्ती के प्रायः सभी पुरुष मछली पकड़ने का काम करते। बांस और तख्तों से बनी डोंगी से समुद्र की लहरों को चीरते हुए वे आगे बढ़ जाते। कभी समुद्र की बन आती। उसकी उन्मत्त लहरें, किनारे बसीं झुग्गियों को अपने साथ बहा ले जातीं। मगर कुछ दिनों बाद वे फिर उसी जगह उभर आती थीं। प्रकृति और पुरुष की डांडा-मेंडी….झुग्गियों का बनना-मिटना भी मानो लहरों जैसा हो। सिंगारवेलु के पिता का नाम था—वेंकटचलम चेट्टियार। मां थीं—वाल्लमई। बताया जाता है कि उनके दादा मामूली डोंगी के सहारे बर्मा के तटवर्ती क्षेत्रों तक चले जाते। वहां से चावल और इमारती लकड़ी मद्रास तक ले आते थे।6 कह सकते हैं कि धैर्य और दुस्साहस सिंगारवेलु को विरासत में प्राप्त हुए थे।

जिस जाति में सिंगारवेलु का जन्म हुआ था, उसमें पढ़ने-पढ़ाने की कोई परंपरा न थी। परंतु वेंकटचलम थोड़ा आधुनिक मिजाज थे। उन्होंने सिंगारवेलु को पढ़ाने का फैसला किया। खुद को प्रखर बुद्धि सिद्ध करते हुए सिंगारवेलु ने 1881 में मेट्रिक की परीक्षा पास की। 1884 में क्रिश्चन कॉलेज से एफए पास करने के पष्चात उन्होंने बीए के लिए प्रेसीडेंसी कॉलेज मद्रास में दाखिला ले लिया। आगे की पढ़ाई के लिए मद्रास लॉ कॉलेज से जुड़े। 1902 में कानून की डिग्री मिली। उसके बाद वे मद्रास उच्च न्यायालय में प्रक्टिश करने लगे। प्रतिभाषाली थे ही। सो वकालत के जमने में देर न लगी।7

1889 में उनका विवाह आंगम्मल से हुआ। वह अंतररजातीय विवाह था। दोनों के एकमात्र संतान, बेटी का जन्म हुआ। जिसका नाम उन्होंने कमला रखा था। 1932 में उन्होंने अपने धेवते, कमला के पुत्र सत्यकुमार को उन्होंने कानूनी तरीके से गोद ले लिया।

आरंभ में सिंगारवेलु व्यापार में हाथ आजमाना चाहते थे। इसलिए 1902 में वे चावल के व्यापार की संभावना तलाशने के लिए ब्रिटेन चले गए। सिंगारवेलु के लिए वह यात्रा बहुत परिवर्तनकारी सिद्ध हुई। वहां उन्हें नई-नई पुस्तकें पढ़ने का अवसर मिला। लंदन में उन्होंने बौद्ध अधिवेशन में हिस्सा लिया। उससे बौद्ध धर्म-दर्शन के प्रति ऐसा अनुराग बना कि मद्रास लौटने पर अपने घर पर ही ‘महाबोधि सोसाइटी’ की बैठकें आयोजित करने लगे।8 इससे प्रसन्न होकर उन्हें मद्रास महाबोधि सोसाइटी का अध्यक्ष भी मनोनीत कर दिया गया। उन्हीं दिनों समाज सेवा से लगाव हुआ। वे चाहते थे कि बस्ती के बच्चे पढ़-लिखकर आगे बढ़ें। इसके लिए वे बच्चों तथा उनके माता-पिता को प्रोत्साहित करने लगे। आवश्यकता पड़ने पर गरीब बच्चों को पुस्तक, स्टेशनरी, भोजन वगैरह देकर मदद भी करते। पढ़ने का शौक था। सो धर्म, दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्र आदि विषयों की नई से नई पुस्तकें अपने लिए जुटाते, पढ़ते। अपने पढ़े हुए पर दूसरों से बातचीत करते। सुब्रह्मयम भारती, वी. चक्करई चेट्टियार जैसे नेताओं के संपर्क में आने के बाद वे राजनीति की ओर मुड़ गए।

प्लेग के दौरान

1905 में रूसी क्रांति की खबरें मिलीं, जिससे पहली बार उनका कम्युनिस्म की ओर वे रुझान बढ़ा। इस बीच उनके कांग्रेस से अच्छे संबंध बन चुके थे। पार्टी में वे तिलक जैसे उग्रपंथी नेता माने जाते थे। वे मानते थे कि देश को आजाद कराने के लिए बल प्रयोग अपरिहार्य है। बिना उसके साम्राज्यवादी अंग्रेजों से मुक्ति असंभव होगी। 1914 में पहला विश्वयुद्ध छिड़ा तो सिंगारवेलु का ध्यान युद्ध की खबरों से ज्यादा जनसाधारण की बढ़ती समस्याओं की ओर गया। खासकर उन समस्याओं की ओर जो युद्ध की, पूंजीवादी लिप्साओं की देन थीं। उन्हीं दिनों एक बड़ी चुनौती सामने आ गई। मुंबई सहित पूरे महाराष्ट्र में तबाही मचाने वाली प्लेग 1898 में मद्रास तक आ पहुंची। वहां उसने ‘कुप्पम’ को भी अपनी चपेट में लिया। सब कुछ छोड़कर सिंगारवेलु जनसेवा में जुट गए। लोगों को भुखमरी से बचाने के लिए उन्होंने ‘सामुदायिक रसोई’ का संचालन किया। 1910 के बाद प्लेग से छुटकारा मिला तो मलेरिया ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। सिंगारवेलु जूझते रहे। इससे उन्हें गरीबी तथा उसके कारणों को समझने की दृष्टि मिली। वही उन्हें साम्यवाद की ओर ले गई।

राजनीति में दस्तक

13 अप्रैल 1919 भारतीय इतिहास का रक्त-रंजित दिन था। उस दिन जलियांवाला हत्याकांड 379 लोग मारे गए थे। लगभग 1500 हताहत हुए थे। क्षुब्ध जनता अंग्रेजों के विरुद्ध प्रदर्शन करने लगी। उत्तर से दक्षिण तक सब अंग्रेजों के खिलाफ थे। फिर सिंगारवेलु कैसे पीछे रह सकते थे! उन्होंने युवाओं को संगठित कर, कई शांतिपूर्ण प्रदर्शन किए। गांधी ने असहयोग आंदोलन का आह्वान किया। उससे प्रेरित होकर सिंगारवेलु ने भी एक जनसभा में अपने गाउन को अग्नि-समर्पित कर अदालत से नाता तोड़ने की घोषणा कर दी। मई 1921 में उन्होंने गांधी को लिखा—‘मैंने आज अपने वकालत के पेशे से मुक्ति पा ली है। देश-सेवा के लिए मैं भी आपका अनुसरण करूंगा।’9 इसी दौरान वे कांग्रेस के संपर्क में आए। जनमानस में अपनी पैठ, प्रतिभा और सरोकारों के चलते बहुत जल्दी प्रदेश कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में उनकी गिनती होने लगी।

हैलो कामरेड्स

दिसंबर 1922 में उन्हें कांग्रेस के गया अधिवेशन में शामिल होने का अवसर मिला। उस समय वे अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य भी थे। अधिवेशन में दिए गए भाषण में सिंगारवेलु का रंग एकदम निराला था। गए वे प्रदेश कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में थे, मगर भाषण में वे खुद को कुछ और ही बता रहे थे—‘अध्यक्ष, हाल में मौजूद कामरेड्स, साथी मजदूरो, प्रजाजनो, हिंदुस्तान के किसानो और हलवाहो….मैं आपके बीच आपके मजदूर साथी के रूप में बोलने आया हूं। मैं यहां पूरी दुनिया के लिए महा-कल्याणकारी, कम्युनिस्टों की दुनिया के प्रतिनिधि के रूप में पहुंचा हूं। मैं यहां उस महान संदेश को दोहराऊंगा, जिसे साम्यवाद दुनिया-भर के मजदूरों को देता आया है।’10 उन दिनों अंग्रेज ‘कम्युनिज्म’ शब्द से ही खार खाते थे। ऐसे में किसी प्रतिनिधि के मुंह से ‘कामरेड्स’ संबोधन सुनना, खुद को साम्यवादी जगत का प्रतिनिधि बताना, कामगारों, मजदूरों और किसानों की बात करना, वहां मौजूद सदस्यों के लिए यह एकदम अप्रत्याशित था। सो सिंगारवेलु की पहली पंक्ति के साथ ही सभागार तालियों से गूंजने लगा।

भाषण में सिंगारवेलु ने कहा था—‘हम स्वराज के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह लड़ाई हम अहिंसा और असहयोग जैसे हथियारों की मदद से लड़ रहे हैं। मेरा उनमें विश्वास है। मगर इन हथियारों से वर्गहीन समाज की रचना संभव नहीं है।’ उन्होंने कहा था—‘धनाढ्य संभल जाएं। ताकतवर ध्यान दें….दुनिया में जितनी भी अच्छी चीजें हैं, सब मेहनतकश लोगों ने ही तुम्हें दी हैं। तुमने उन्हीं को हाशिये पर ढकेल दिया। वे हमेशा तुम्हारी इच्छाओं के खटते रहते हैं। फिर भी तुम उनकी उपेक्षा करते हो….याद रखो, भारतीय मजदूर अब जाग चुके हैं। वे अपने अधिकारों को धीरे-धीरे समझने लगे हैं।’11 कांग्रेस के इतिहास में वह पहला अवसर था, जब उसके सम्मेलन में किसान और मजदूर वर्ग पर चर्चा हो रही थी। लोग कांग्रेस के कायाकल्प का श्रेय गांधी को देते हैं। लेकिन उस समय की परिस्थितियां ऐसी थीं कि उनसे समझौता किए बगैर कांग्रेस की राष्ट्रव्यापी स्वीकार्यता संभव ही नहीं थी। डॉ. आंबेडकर, रामासामी पेरियार और सिंगारवेलु जैसे नेताओं का दबाव कांग्रेस और गांधी दोनों को बदलने को विवश कर रहा था।

कांग्रेस का गया सम्मेलन सिंगारवेलु की राजनीति की दिशा तय कर चुका था। उनके भाषण ने देश-विदेश के लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था। देश-भर से पहुंचे प्रतिनिधियों ने मांग की कि सिंगारवेलु को कांग्रेस की श्रमिक मामलों की प्रस्तावित उपसमिति में स्थान दिया जाए। मानवेंद्रनाथ राय ने मजदूरों तथा आम जनता की समस्या की ओर कांग्रेस तथा सरकार का ध्यान आकर्षित कराने के लिए सिंगारवेलु की प्रशंसा की थी। अपनी उग्र कार्यशैली और साम्यवादी रुझान के कारण वे पहले ही अंग्रेजों की नजर में आ चुके थे। 1921 में पुलिस ने उनके घर पर दबिश दी थी। वह कथित रूप से ‘चुनौती’ शीर्षक से प्रकाशित पंपलेट्स की तलाशी लेने गई थी। लेकिन पुलिस को वहां से खाली हाथ लौटना पड़ा था।12

सिंगारवेलु और गांधी

अपने आरंभिक राजनीतिक जीवन में सिंगारवेलु गांधी से प्रभावित थे। परंतु उनकी कार्यशैली गांधी से अलग थी। प्रिंस ऑफ़ वाल्स भारत दौरे पर आए। शेष भारत की तरह दक्षिण में भी उनकी यात्रा का बहिष्कार किया गया। मद्रास में सिंगारवेलु के नेतृत्व में हड़ताल का आह्वान किया गया था। हड़ताल पूरी तरह कामयाब थी। बाद में पता चला कि हड़ताल में शामिल होने के लिए कुछ दुकानदारों पर दबाव बनाया गया था। कुछ कार्यकर्ताओं की शिकायत पर गांधी ने 9 फरवरी, 1922 के ‘यंग इंडिया’ में ‘सत्याग्रह की मूल भावना का पालन न करने पर’ सिंगारवेलु की आलोचना की थी।13

कम्युनिज्म की ओर

गया सम्मेलन में ही उनकी भेंट श्रीपाद अमृत डांगे से हुई। मानवेंद्रनाथ राय से उनका संपर्क पहले से ही था। अबनीनाथ मुखर्जी, जो अपने साथियों में अबनि मुखर्जी के नाम से पहचाने जाते थे, सिंगारवेलु से मिलने दो बार मद्रास पहुंचे थे। इस तरह सिंगारवेलु कांग्रेस में रहकर भी अपनी स्वतंत्र राजनीति कर रहे थे। पेरियार की तरह वे भी कांग्रेसी नेताओं की कथनी और करनी के अंतर को समझते थे। जानते थे कि कांग्रेस कभी भी मजदूरों और किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए सरकार से सीधे टकराव का खतरा मोल नहीं लेगी। इसलिए मद्रास लौटते ही उन्होंने अपने विचारों को कार्यरूप देने के लिए काम शुरू कर दिया था। उसके फलस्वरूप ‘हिंदुस्तान लेबर किसान पार्टी’ का गठन हुआ। वह कम्युनिस्ट विचारधारा पर आधारित पहला संगठन था। ध्यातव्य है कि मानवेंद्रनाथ राय, अबानी मुखर्जी, इवेलिना राय आदि नेता मिलकर 17 अक्टूबर, 1920 को ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया’(ताशकंद पार्टी) के गठन की घोषणा कर चुके थे, परंतु 25 दिसंबर 1925 को विधिवत गठन से पहले उसका अस्तित्व केवल अनौपचारिक था।

सिंगारवेलु  के नेतृत्व में पहली बार, 1 मई 1923 को भारत में मई दिवस का आयोजन किया गया। उसी दिन ‘हिंदुस्तान लेबर किसान पार्टी’ तथा उसके गठन के उद्देश्यों के बारे में लोगों को बताया गया था। मई दिवस का आयोजन सिंगारवेलु ने मद्रास में दो स्थानों पर किया था। पहला उच्च न्यायालय के आगे समुद्र तट पर। दूसरा ट्रिप्लीकेंस तट पर। पहली बैठक की अध्यक्षता स्वयं सिंगारवेलु ने की थी। दूसरे कार्यक्रम की अध्यक्षता एस. कृष्णास्वामी सरमा ने। उस अवसर पर सिंगारवेलु ने कहा था कि मई दिवस का आयोजन स्वयं मजदूरों द्वारा किया गया है। उन्होंने उम्मीद जाहिर की थी कि देश में शीघ्र ही मजदूरों की सत्ता स्थापित होगी, जो लोगों के विकास को गति देगी। ‘मद्रास मेल’ नामक अखबार ने ‘लेबर किसान पार्टी’ द्वारा मई दिवस की आलोचना का जवाब देते हुए कहा था कि केवल वास्तविक मजदूर ही इस उत्सव को मना रहे थे, इसलिए चिंता की कोई बात नहीं है। उस अवसर पर लाल-क्रांति का प्रतीक ‘लाल-झंडा’ भी फहराया गया था। सार्वजनिक कार्यक्रम में लाल झंडा फहराने की वह घटना, न केवल भारत, अपितु एशिया में भी पहली घटना थी। उस अवसर पर 2 मई 1923 के ‘दि हिंदू’ में छपा था—

‘लेबर किसान पार्टी ने मद्रास में मई दिवस उत्सव आरंभ किया है। कामरेड सिंगारवेलु ने उस बैठक की अध्यक्षता की थी। प्रदर्शन कामयाब था। मीटिंग में मई दिवस को सार्वजनिक अवकाश घोषित करने की मांग भी की गई। पार्टी अध्यक्ष ने पार्टी के अहिंसक सिद्धांतों के बारे में लोगों को बताया था। उसमें लोगों से आर्थिक मदद की अपील भी की गई। इस बात पर जोर दिया गया था कि भारतीय मजदूरों को दुनिया-भर के मजदूरों के साथ एकजुट हो जाना चाहिए।’14

दिसंबर 1923 में उन्होंने ‘दि लेबर किसान गजट’ शीर्षक से पाक्षिक की शुरुआत की। इसके साथ-साथ तमिल भाषा में ‘तोझीलालान’(कामगार) शीर्षक से साप्ताहिक भी निकाला था। ‘कामगार’ के एक अंक का मूल्य ‘आधा आना’ था। अंग्रेजों की सिंगारवेलु पर नजर थी। उनकी दृष्टि में ‘हिंदुस्तान लेबर किसान पार्टी’, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से कहीं अधिक खतरनाक थी। 1924 में ‘कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र’ मामले में सिंगारवेलु को उनके घर पर नजरबंद कर लिया गया। उन दिनों उनकी उम्र 64 वर्ष थी। बाद में उन्हें जमानत मिल गई।

1925 में कानपुर में पहले कम्युनिस्ट सम्मेलन का आयोजन किया गया था। उसकी अध्यक्षता सिंगारवेलु ने की। उस बैठक में ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया’ के गठन को स्वीकृति मिली थी। अपने अध्यक्षीय भाषण में सिंगारवेलु ने छूआछूत की समस्या की चर्चा भी की थी। उनका दृष्टिकोण साम्यवादी दृष्टिकोण से मेल खाता था,

‘हमें साफ तौर पर समझ लेना चाहिए कि साम्यवाद की नजर में छूआछूत पूरी तरह आर्थिक समस्या है। अछूतों को मंदिर प्रवेश, सार्वजनिक तालाबों और मार्गों पर चलने का अधिकार प्राप्त है अथवा नहीं, इन प्रश्नों का ‘स्वराज’ के संघर्ष से कोई संबंध नहीं है….कम्युनिस्टों की न तो कोई जाति होती है, न धर्म। व्यक्ति का हिंदू, मुसलमान या ईसाई होना उसका निजी मामला है….जैसे ही उन(अस्पृश्यों) की आर्थिक पराश्रितता खत्म होगी, छूआछूत की समस्या भी अपने आप समाप्त हो जाएगी।’15

उन दिनों पेरियार राजनीति में, गैर-ब्राह्मण जातियों को समुचित प्रतिनिधित्व न दिए जाने के कारण कांग्रेस से नाराज चल रहे थे। उन्होंने ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की स्थापना की थी। सिंगारवेलु की ख्याति उन दिनों शिखर पर थी। उसी दौरान दोनों नेता एक-दूसरे के करीब आए। सिंगारवेलु ने ही पेरियार को कांग्रेस छोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया था। पेरियार के मनस् में साम्यवाद का बीजारोपण करने वाले भी वही थे। सिंगारवेलु की सलाह पर ही पेरियार ने सोवियत संघ की यात्रा पर गए थे। लौटने के बाद पेरियार ने सोवियत संघ के अनुभवों के आधार पर ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की कार्यनीति में बदलाव करने का निर्णय लिया। पेरियार के आग्रह पर सिंगारवेलु ने ‘इरोद कार्यक्रम’ का ड्राफ्ट तैयार किया। ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ का एक सम्मेलन 4 मार्च 1934 को मन्नारगुडी, तमिलनाडु में हुआ था। सिंगारवेलु ने उसकी अध्यक्षता की थी। अपने भाषण में सिंगारवेलु ने भारतीय समाज के आर्थिक वैषम्य पर चिंता व्यक्त की थी—

‘देश की 40 प्रतिशत जनता को भरपेट भोजन भी नहीं मिलता। मृत्यदर दूसरे देशों से कहीं ज्यादा है। यह 1000 में 30 है। 100 में से 30 बच्चे एक साल का होते-होते मर जाते हैं। भारत में औसत आयु मात्र 20 है, जबकि इंग्लेंड में 53 साल है….लोग घोर दारिद्रय में जीते हैं, बावजूद इसके मंदिरों की घंटियां टनटनाती रहती हैं। मस्जिदों में नमाज और चर्च में प्रार्थनाएं चलती रहती रहती हैं। लोग जिसे ईश्वर समझकर पूजते हैं, उसके बारे में वे कुछ नहीं जानते। ईश्वर महज मनुष्य की रचना है।’16

उस भाषण में सिंगारवेलु ने अपने पूर्वजों को भी नहीं छोड़ा था—

‘मेरे अपने पूर्वजों ने ब्राह्मणों को भोजन कराने के लिए 1 लाख रुपये अलग रख दिए थे। लेकिन जब उनकी बस्ती के मछुआरे बीमार पड़े, वे केवल देवता को पूजा-अर्चना, प्रार्थना और बलि तक सीमित रहे। मेरी जाति की तरह और भी जातियां हैं। वे भी धर्मादे के लिए रकम एक ओर रख देती हैं और मुष्किल समय में प्रार्थनाओं और बलि देकर मन को तसल्ली देती रहती हैं।’17

पेरियार के मन में सिंगारवेलु के प्रति गहरा सम्मान था। खासकर उनकी वैज्ञानिक सोच पर। पेरियार के आग्रह पर ही सिंगारवेलु ने ‘कुदी अरासु’ में लिखना शुरू किया था। मगर उन दोनों के साथ आने से न तो कांग्रेस खुश थी, न ही अंग्रेज सरकार। अंग्रेजों का मानना था कि यह सिंगारवेलु ने ही पेरियार को ‘बिगाड़ा’ है। ब्रिटिश सरकार नहीं चाहती थी कि देश में कम्युनिस्ट आंदोलन को बढ़ावा मिले। उसे देखते हुए सिंगारवेलु ने ‘मजदूर एवं किसान’ जैसे शब्दों को अपनाया। मगर अपनी उग्र कार्यषैली के कारण वे सरकार और विरोधियों की आंखों में हमेशा ही खटकते रहे।

मजदूर नेता के रूप में  

बकिंघम एंड कार्नेटिक मिल, मद्रास की सबसे बड़ी कपड़ा मिल थी। उसका महत्त्व इसलिए भी है क्योंकि भारत की पहली लेबर यूनियन18, ‘मद्रास लेबर यूनियन’ का गठन अप्रैल 1918 में वहीं के मजदूरों ने मिलकर किया था। ब्रिटिश अधिकारी यूनियन के गठन का विरोध कर रहे थे। घटना की नींव 1920 में पड़ी थी। ब्रिटिश अधिकारी रिवाल्वर लिए मजदूरों को धमकाता फिर रहा था। एक मजदूर ने उसकी रिवाल्वर छीनकर पुलिस को सौंप दी। इसपर पुलिस ने गोलीबारी शुरू कर दी। बाबूराव और मुरुगन नामक दो युवा मजदूर उस गोलीबारी में मारे गए। मद्रास में श्रम आंदोलन में मरने वाले ये दोनों पहले थे। घटना से नाराज 13000 मजदूर हड़ताल पर उतर आए। बाद में पुलिस और कामगारों के बीच कई भिड़ंत हुईं, जिनमें दर्जनों मजदूरों को प्राण गंवाने पड़े। सिंगारवेलु ने न केवल हड़ताल के नेतृत्व में हिस्सा लिया, बल्कि लगातार लेख लिखकर मजदूरों के उत्पीड़़न के विरुद्ध आवाज उठाते रहे।

उन्हीं दिनों उत्तरी मद्रास में मैसी कंपनी के कामगार भी हड़ताल पर चले गए। वी. चक्करई और ओदीकेसवेलु नायकर जैसे मजदूर नेताओं के साथ सिंगारवेलु एक बार फिर मजदूरों के समर्थन में उतर गए। अपने आग उगलते भाषणों से इन तीनों नेताओं ने सरकार को हिला दिया था। 1927-28 उत्तरी-पश्चिमी रेलवे, बंगाल-नागपुर रेलवे तथा ईस्ट इंडियन रेलवे के कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर हड़ताल पर चले गए। रेलवे कर्मचारियों को समर्थन देने, उनका हौसला बढ़ाने के लिए सिंगारवेलु ने भोपाल, हावड़ा और बंगाल की यात्राएं कीं। हावड़ा और बंगाल में 30,000 मजदूर-कामगार हड़ताल पर थे। सिंगारवेलु ने अपने साथियों के साथ हड़ताल में हिस्सा लिया था। उत्तरी भारत की यात्रा से लौटे ही थे कि दूसरी हड़ताल की सूचना मिली। 1928 में दक्षिण भारतीय रेलवे के मजदूरों ने भी हड़ताल का ऐलान कर दिया। मजदूर उनकी योग्यता के नए सिरे से छंटनी का विरोध कर रहे थे। छंटनी के लिए प्रबंधकों ने कर्मचारियों की योग्यता के नए मानदंड तैयार किए थे, जो मजदूरों को स्वीकार्य नहीं थे। दूसरे रेलवे ने मजदूरों को अलग-अलग ठिकानों पर भेजने का निर्णय लिया था। मजदूर इनका विरोध कर रहे थे। मांगे न मानने पर मजदूर 19 जुलाई 1928 से हड़ताल पर चले गए। उनके समर्थन में बाकी मजदूरों और कामगारों ने भी हड़ताल की घोषणा कर दी। परिणामस्वरूप 21 जुलाई से रेलवे का चक्का जाम हो गया। वह हड़ताल आखिरकार नाकाम सिद्ध हुई। सिंगारवेलु को दस वर्षों की सजा हुई। लेकिन बाद में अपील पर, उनकी बीमारी और उम्र को देखते हुए सजा की अवधि 18 महीने कर दी गई।

1927 में ही जब हड़ताली मजदूर चाको और विंसेंट पुलिस की गोली से मारे गए। मद्रास तक जब वह समाचार पहुंचा तो सिंगारवेलु ने बिना कोई पल गंवाए उनकी स्मृति में शोक सभा का आयोजन किया। जिसमें पुलिस के दमन की निंदा की गई। मजदूर और कामगारों की समस्याओं के समाधान को लेकर वे इतने समर्पित थे कि जब भी, जहां से भी बुलावा मिलता, तुरंत पहुंच जाते थे।

सिंगारवेलु का निधन 11 फरवरी 1946 को हुआ। जब तक जिये तब तक उन्हें मजदूरों के हितों की चिंता सताती रही। जीवन के आखिरी दिनों में जब बढ़ी उम्र के कारण सक्रियता घट गई तो उन्होंने पेरियार की पत्रिकाओं, ‘कुदी अरासु’, ‘रिवोल्ट’ तथा अंग्रेजी दैनिक हिंदू में लेख आदि लिखकर संघर्ष की लौ को जलाए रखा। उनकी आंखों में समानता पर आधारित, वर्गहीन समाज का सपना बसता था। इस कसौटी पर कांग्रेस की ‘स्वराज’ की अवधारणा भी उन्हें अधूरी दिखाई पड़ती थी। उनका गांधी के नाम लिखा गया एक पत्र 24 मई 1922 को ‘नवशक्ति’ में प्रकाशित हुआ था। पत्र में उन्होंने लिखा था कि कि प्रत्येक परिवार को उतनी जमीन मिलनी चाहिए, जिससे वह अपनी जरूरत के लायक अन्न उपजा सके। अपना घर होना चाहिए, ताकि किसी को भी किराया न चुकाना पड़े। इसके अलावा मुफ्त शिक्षा, स्वास्थ्य की व्यवस्था भी सरकार की ओर से करनी चाहिए। जिस स्वराज में यह गारंटी न हो, उसका कोई मूल्य नहीं है। असली स्वराज केवल जनता द्वारा, और केवल जनता के लिए आएगा। वे बेहद पढ़ाकू थे। उनका पुस्तकालय मद्रास के सबसे बड़े निजी पुस्तकालयों में से था।

ओमप्रकाश कश्यप

 संदर्भ

  1.  अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग,दि हिस्ट्री ऑफ़ मे डे, इंटरनेशनल पंपलेट, 14,799 ब्रोडवे न्यू यार्क, पृष्ठ 3
  2.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम- सिंगारवेलु : फर्स्ट कम्युनिस्ट इन साउथ इंडिया, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, पृष्ठ-1
  3.  पी.मनोहरन, जेनेसिस एंड ग्रोथ ऑफ़ कम्युनिस्ट पार्टी इन इंडिया, पृष्ठ 191।
  4.  पी. मनोहरन, पृष्ठ-189
  5.  पी. मनोहरन, पृष्ठ-190
  6.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम, पृष्ठ-1
  7.  पी.वसंतकुमारन, गॉडफादर ऑफ़ इंडियन लेबर, एम. सिंगारवेलु, पूर्णिमा प्रकाशन, चैन्नई।
  8.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम, पृष्ठ-2
  9.  वसंतकुमारन, पूर्णिमा प्रकाशन, चैन्नई।
  10.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम, पृष्ठ 164-165
  11.  उपर्युक्त 165
  12.  पी. मनोहरन, पृष्ठ 183
  13.  दि कलैक्टिड वर्क्स ऑफ़महात्मा गांधी, खंड-26, पृष्ठ 132-134।
  14.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम, पृष्ठ-169
  15. उपर्युक्त पृष्ठ 203
  16.  उपर्युक्त पृष्ठ 221-22
  17.   उपर्युक्त पृष्ठ 222
  18.  पी. मनोहरन, पृष्ठ-11

मई दिवस : संघर्ष की याद और संकल्पों का दिन

सामान्य

मई दिवस पर विशेष

यदि तुम सोचते हो कि हमें फांसी पर लटकाकर तुम मजदूर आंदोलन को, गरीबी, बदहाली और विपन्नता में कमरतोड़ परिश्रम करने वाले लाखों लोगों के आंदोलन कोकुचल डालोगे….अगर तुम्हारी यही राय है तो हमें खुशीखुशी फांसी के तख्ते पर चढ़ा दो। किंतु याद रहे, आज तुम एक चिंगारी को कुचल रहे हो, कल यहांवहां, तुम्हारे आगेपीछे, प्रत्येक दिशा से लपटें उठेंगीं। यह जंगल की आग है। तुम इसे कभी भी बुझा नहीं पाओगे। एक दिन आएगा, जब हमारी खामोशी उन आवाजों से कहीं ज्यादा ताकतवर होगी, जिनका तुम आज गला घोंट रहे हो ऑगस्ट स्पाइस।

मई दिवस’ के साथ कोई खुशनुमा प्रसंग नहीं जुड़ा है। न यह मजदूरों के लिए उत्सव मनाने का दिन है। फिर भी हर मेहनतकश के लिए इस दिन का महत्त्व है। यह उन्हें संगठन की ताकत का एहसास दिलाता है। उस हौसले की याद दिलाता है जिसके बल पर उनके लाखों मजदूर भाई अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर आए थे। चार्ल्स. रथेनबर्ग के शब्दों में, ‘मई दिवस वह दिन है जो मजदूरों के दिलों में उम्मीद तथा पूंजीपतियों के मन में खौफ पैदा करता है।’ यह अकेला दिन है जिसे मजदूरों के नाम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाता है। मजदूरों के लिए यह याद रखने का दिन है। ठीक ऐसे ही जैसे कोई जीवंत समाज अपनी आजादी के महानायकों के किस्सों को सहेजकर रखता है।

मशीनीकरण के बाद का दौर पूंजी के केंद्रीकरण का था। उसमें आदमी को भी मशीन मान लिया गया था। फैक्ट्रियों में काम के घंटे निर्धारित नहीं थे। उनीसवीं शताब्दी के आरंभ तक ‘कार्यदिवस’ का अर्थ था, सूरज निकलने से सूरज छिपने तक काम करना।1 मौसम के अनुसार दिन घटताबढ़ता तो काम के घंटे भी घटबढ़ जाते। हर कामगार को प्रतिदिन 14 से 16 घंटे काम करना पड़ता था। कभीकभी तो एक कार्यदिवस 18 घंटे तक पहुंच जाता था।2 कार्यघंटों को लेकर महिलाओं और पुरुषों, बच्चों और बड़ों में कोई भेद नहीं थाइसके आलावा मजदूरी बहुत कम थी। 16 से 18 घंटों तक काम करने के बावजूद मजदूरों को इतनी मजदूरी नहीं मिलती थी, जिससे वे सामान्य जीवन भी जी सकें। ऊपर से बार-बार आने वाली मंदी के कारण मजदूरों को बेरोजगारी का सामना करना पड़ता था। आड़े वक्त में सरकार भी उद्यमियों और पूंजीपतियों का ही पक्ष लेती थी। 1834 में ‘वर्किंगमेन्स एडवोकेट’ नामक अखबार ने छापा था, ‘डबलरोटी के पैकेटों को लानेले जाने के काम में लगे मजदूरों की हालत मिस्र के बंधुआ मजदूरों से भी बुरी थी। उन्हें दिन के 24 घंटों में 18 से 20 घंटे काम करना पड़ता था।’ मजदूर उसे 10 घंटों तक सीमित करने की मांग करते आ रहे थे। 1791 में फिलाडेफिया के बढ़इयों ने 10 घंटे के कार्यदिवस के लिए हड़ताल की थी। उसके बाद 1827 में ‘मेकेनिक्स यूनियन ऑफ़ फिलाडेफिया’, जिसे विश्व का पहला मजदूर संगठन कहा जा सकता है, के नेतृत्व में निर्माण कार्य के मजदूरों ने, 10 घंटों के कार्यदिवस की मांग को लेकर हड़ताल की थी।3 उनके बैनरों पर लिखा होता था—‘छह से छह तक, दस घंटे काम के, दो घंटे आराम के।’ 1830-40 के बीच उनकी मांग में और भी तेजी आ गई। उसके फलस्वरूप 1860 तक लगभग सभी देशों ने कार्यदिवस के औसत घंटों को 12 से घटाकर, 11 कर दिया था

मजदूर कार्यदिवस को 10 घंटों तक सीमित करने की मांग पर अड़े थे। 1837 में अमेरिका में उसे लेकर चक्काजाम जैसी स्थिति बन गई। आखिरकार संयुक्त राष्ट्र के राष्ट्रपति वेन बुरान ने सरकारी दफ्तरों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए प्रतिदिन 10 घंटे करने का आदेश जारी कर दिया। उसकी देखादेखी कारखाना मजूदरों ने यह कहते हुए कि उनसे भी सरकारी कर्मचारियों के बराबर काम लिया जाए, आंदोलन को और तेज कर दिया4 1853 में नएनए बने कैलीफोर्निया राज्य ने कार्यघंटों को सीमित करने से संबंधित पहला, मगर आधाअधूरा कानून बनाया था। मूल प्रस्ताव में दस घंटे के वैध कार्यदिवस के साथ, उससे अधिक काम लेने वाले नियोक्ताओं को दंडित किए जाने का प्रावधान था। उसकी काफी चर्चा भी हुई थी। प्रस्ताव कानून की शक्ल ले, उससे पहले ही उद्यमियों ने सरकार पर जोर डालकर, उसे कमजोर करने का षड्यंत्र रच दिया। जो कानून बना उसमें कहा गया था कि ‘राज्य की किसी भी अदालत में 10 घंटों के श्रम को, एक कार्यदिवस का श्रम माना जाएगा।’5 इस तरह दस घंटों के कार्यदिवस की घोषणा महज कानूनी अवधारणा तक सीमित थी। वह नियोक्ताओं को न तो कोई निर्देश देता था, न उसमें क़ानून के उल्लंघन पर किसी तरह के दंड काप्रावधान था। कानून की कमजोरी का लाभ उठाकर नियोक्ता मजदूरों के साथ खूब सौदेबाजी करते थे। मजदूर संगठन उस कानून में आवश्यक संशोधन की मांग कर रहे थे।

10 घंटे के कार्यदिवस की मांग अभी चल ही रही थी कि श्रमिकों ने 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग तेज कर दी। इस बार वह मांग सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं थी। बल्कि जहां-जहां भी श्रमिक उत्पीड़न का शिकार थे, वहांवहां वे अपनी मांग के समर्थन में सरकार और उद्योगों पर दबाव बनाने में लगे थे। 1856 में आस्ट्रेलिया के निर्माण मजदूरों ने, 8 घंटे की मांग को लेकर नारा गढ़ा था—‘8 घंटे काम, 8 घंटे मनोरंजन और 8 घंटे आराम।’ इस मांग को तब बल मिला जब अगस्त 1866 में ‘नेशनल लेबर यूनियन’ ने 8 घंटे की मांग का समर्थन किया। वह अमेरिका का पहला मजदूर संगठन था। अपने स्थापना समारोह में ही 8 घंटे के कार्यदिवस की मांग के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाते हुए संगठन की ओर कहा गया था कि पूंजीवादी दासता से श्रमिकों की मुक्ति हेतु वर्तमान समय की सबसे पहली और बड़ी जरूरत है, अमेरिका के सभी राज्यों में 8 घंटे के कार्यदिवस को वैध माना जाए। सितंबर 1866 में फर्स्ट इंटरनेशनल द्वारा अपने जिनेवा सम्मेलन में 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग, घोषणा के साथ ही अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गईफर्स्ट इंटरनेशनल का निष्कर्ष था—

काम के घंटों की वैध सीमा तय होना आवश्यक है। इसके अभाव में कामगार वर्गों की स्थिति में सुधार तथा शोषण से मुक्ति का कोई भी प्रयास सफल नहीं हो सकता…..एक वैध कार्यदिवस के लिए यह सभा 8 घंटों की सीमा के प्रस्ताव को मंजूर करती है।’6

1867 में ‘पूंजी’ का प्रथम खंड प्रकाशित हो चुका था। उससे पहले माना जाता था कि उत्पादकता सांस्कृतिक उपादानों पर निर्भर करती है। मार्क्स ने शताब्दियों से चली आ रही इस धारणा का खंडन किया था। कहा था कि संस्कृति स्वयं उत्पादकता के साधनों द्वारा तय होती है। उस पुस्तक में मार्क्स ने श्रमिक शोषण की विशद विवेचना की थी। पूंजीवादी शोषण के लगभग सभी पक्ष उसमें शामिल थे। उसका विश्लेषण इतना गहन था कि श्रमिक शोषण से जुड़ी छोटी-सेछोटी बात भी उसकी पैनी नजर से बच नहीं पाई थीमार्क्स ने ‘नेशनल लेबर यूनियन’ के 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग का समर्थन किया था। कहा था कि श्रमिकों को रंग-भेद की भावना से ऊपर उठकर, अपने अधिकारों के पक्ष में आवाज उठानी चाहिए। उन दिनों अमेरिका में मजदूर को प्रति सप्ताह 63 घंटे काम करना पड़ता थामार्क्स चाहता था कि संयुक्त राष्ट्र अमेरिका श्रमिक अधिकारों के समर्थन में 8 घंटों के वैध कार्यदिवस की घोषणा करेपूंजीपतिवर्ग दूसरों को दास बनाकर रखने की मानसिकता से बाहर आए। उसने लिखा था—

जब तक दासता उसके गणतंत्र को विरुपित करती रहेगी, तब तक श्रमिक मुक्ति की दिशा में उठाया गया कोई भी कदम नाकाम सिद्ध होगा। जब तक काले श्रमिकों की पहचान उनके रंग के आधार पर होगी, तब तक श्वेत मजदूरों के लिए भी शोषणमुक्ति संभव नहीं है….24 घंटे के सामान्य दिन में मनुष्य अपनी कार्यशक्ति का भरपूर इस्तेमाल सीमित घंटों तक ही कर सकता है। यहां तक कि एक घोड़ा भी, प्रतिदिन अधिकतम 8 घंटे काम कर सकता है। दिन के बाकी घंटों में 8 घंटे कार्यशक्ति को आराम करना चाहिए, बाकी घंटे उन्हें अपने भौतिक आवश्यकताओं स्नान, भोजन आदि के लिए मिलने चाहिए।’7

8 घंटे के कार्यदिवस की मांग असामयिक नहीं थी। उसके पीछे भरा-पूरा वैचारिक दर्शन था। उसे जमीन दी थी, पीयरे जोसेफ प्रूधों, मार्क्स, मिखाइल बकुनिन, एंगेल्स जैसे विचारकों ने। वे अर्थव्यवस्था के समाजीकरण की मांग कर रहे थे। उसके पीछे समानता और स्वतंत्रता का दर्शन था। मान्यता थी कि यदि सब बराबर हैं, तो सभी को अपनी जरूरत के अनुसार भोग करने का भी अधिकार है। इसलिए मार्क्स का कहना था—‘प्रत्येक से उसकी योग्यता के अनुसार। प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुरूप।’ समाजवाद की दिशा में सबसे क्रांतिकारी पहल प्रूधों ने की थी। वह अराजकतावादी चिंतक था। मानता था कि व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा गुलामी जितनी ही घातक है। उसका कहना था—‘व्यक्तिगत संपत्ति चोरी है। संपत्तिधारक व्यक्ति चोर है।’ वह संपत्ति को सामाजिक दासता का कारक मानता था—

यदि मुझसे कोई यह पूछे कि गुलामी क्या है? तो मैं उसका एक ही शब्द में उत्तर दूंगा—‘गुलामी, हत्या है!’ मेरा मंतव्य पूरी तरह सरल और स्पष्ट है। उसके लिए किसी अतिरिक्त प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य की चेतना, उसके मस्तिष्क तथा व्यक्तित्व को छीन लेने की शक्ति—उसके जीवनमृत्यु का फैसला करने की शक्ति के समान हैं। यह मनुष्य को गुलाम बनाती है। यह उसकी हत्या है, क्यों? अब यदि कोई मुझसे पूछे—‘संपत्ति क्या है?’ क्या मुझे इसका वैसा ही उत्तर नहीं देना चाहिए! कहना चाहिए कि यह डकैती है!’ इसमें गलत समझे जाने की कतई गुंजाइश नहीं है। दूसरा निष्कर्ष निश्चित रूप से पहले का ही रूपांतरण है?8

प्रूधों की धारा का ही दूसरा विचारक था, मिखाइल बकुनिन। उसका राजनीतिक दर्शन नागरिक स्वतंत्रता, समाजवाद, संघवाद, नास्तिकता और भौतिकवाद से मिलकर बना था। बकुनिन का मानना था कि किसी समाज में व्यक्ति अथवा व्यक्ति समूह को दिए गए विशेषाधिकार उसके बुद्धि-विवेक एवं संवेदनशीलता को मार देते हैं। विशेषाधिकार चाहे राजनीतिक हों अथवा आर्थिक, वे मनुष्य के समाजीकरण की धारा को अवरुद्ध करते हैं। उसे स्वार्थी और आत्मपरक बनाते हैं। मनुष्य की अधिकतम स्वतंत्रता का समर्थक बकुनिन लोकतंत्र का भी आलोचक था। उसका कहना था कि जब जनता पर लाठियां बरसाई जा रही हों तो लोगों को यह जानकर कोई प्रसन्नता नहीं होगी कि वे लोकतंत्र की लाठियां हैं। बुद्धिजीवियों और दार्शनिकों से उसकी अपील थी—

हमें अपने सिद्धांतों का प्रचार शब्दों के माध्यम से नहीं, कार्यों के माध्यम से करना चाहिए। यही प्रचार का सबसे लोकप्रिय, शक्तिशाली और अनूठा तरीका है….दुनिया में क्रांतिकारी गतिविधियों को बढ़ावा देने में सत्तावादी क्रांतिकारियों का बहुत कम योगदान रहा है। इसलिए कि वे जनमानस को आड़ोलित कर, क्रांति की ओर उन्मुख करने के बजाय, मात्र अपने दम पर, अपनी योग्यता, सत्ता और विचारों के माध्यम से क्रांति लाना चाहते थे….उन्हें क्रांति के समर्थन में फरमान जारी करके नहीं, अपितु जनता को अपने लक्ष्यप्राप्ति की दिशा में प्रोत्साहित करके, क्रांति को बढ़ावा देना चाहिए।’9

मई दिवस के आंदोलन का चरित्र मूलतः ‘अराजकतावादी’ था। बता दें कि अराजकतावाद का आशय, जैसा प्रचार किया जाता है, राज्य तथा उसकी शक्तियों का लोप हो जाना नहीं है। उसके मूल में यह विचार है कि राज्य जनता का चयन है। उसका गठन जनता द्वारा अपने सुख एवं सुरक्षा के लिए किया जाता है। वह जनता के तभी हितकारी हो सकता है, जब उसपर जनता का अधिकाधिक नियंत्रण हो। अराजकतावाद में राज्य की अधिकतम शक्तियां जनता की ओर अंतरित हो जाती हैं। परिणामस्वरूप राज्य की शक्तियां प्रतीकात्मक होकर रह जाती हैं। सरकार की आवश्यकता नहीं रह जाती, यदि हो भी तो वह न्यूनतम अधिकारों के साथ न्यूनतम शासन करती है।

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प्रूधों और बकुनिन का उल्लेख यहां इसलिए प्रासंगिक समझा गया क्योंकि मई दिवस आंदोलन की बागडोर मुख्यतः अराजकतावादियों के हाथों में थी, जो किसी भी प्रकार के सत्तावाद का विरोध करते थे। ‘अंतरराष्ट्रीय वर्किंग मेन्स ऐसोशिएसन’ जिसे ‘प्रथम इंटरनेशनल’ के नाम से भी जाना जाता है, समाजवादी संगठन था। उसके पीछे सोच था कि मजदूर चाहे किसी देश का हो, उसकी मूलभूत समस्याएं और चुनौतियां एक जैसी होती हैं, इसलिए उसके विरोध में लड़ाई भी संगठित होकर लड़ी जानी चाहिए। वे समाजवाद के समर्थक थे, किंतु उसके लिए रास्ता क्या हो, इसे लेकर उनमें मतभेद थे। उसमें से कुछ राबर्ट ओवन के अनुयायी थे, कुछ लुइस ब्लेंक के। कुछ का भरोसा संघवाद में था, तो कुछ अपना तारणहार गणतंत्र को मानते थे। यह विभाजन ऊपर की श्रेणी के बुद्धिजीवियों में भी था। हीगेल से प्रभावित कार्ल मार्क्स द्वंद्ववादी विचारधारा का समर्थक था। उसका मानना था कि सत्ता प्रतिष्ठानों और उत्पादन केंद्रों पर श्रमिक वर्गों का नियंत्रण होना चाहिए। बकुनिन किसी भी प्रकार के सत्तावाद का विरोधी था। उसे वह मनुष्य की स्वतंत्रता में बाधक मानता था। दोनों गुटों के मतभेद इतने बढ़े कि इंटरनेशनल की छठी कांग्रेस के बाद, दोनों के बीच विभाजन हो गया। अराजकतावादी बकुनिन के नेतृत्व में अलग हुए टुकड़े को ‘एंटी-आथरटेरियन इंटरनेशनल’ का नाम दिया गया था। ‘एंटी-आथरटेरियन इंटरनेशनल’ के नेता मानते थे कि ‘हड़ताल का संघर्ष का बेशकीमती हथियार’ है। इसलिए श्रमिकों को ‘महान एवं अंतिम चुनौती’ के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए। अराजकतावादी नेताओं के मनस् में नई वर्गहीन, समाजवादी आदर्शों से युक्त और सभी प्रकार यहां तक राज्य के वर्चस्व से भी मुक्त नए समाज का सपना कौंधता रहता था। 8 घंटे के कार्यदिवस से जुड़ी हड़ताल में इसी गुट के नेता थे, जो ‘बेहतर समाजवादी दुनिया’ के सपने के साथ जूझ रहे थे

1872 में ‘प्रथम इंटरनेशनल’ का कार्यालय, लंदन से न्यू यार्क शिफ्ट कर दिया गया था। इससे उसकी गतिविधियों में व्यवधान आया था। प्रभाव भी घटने लगा था। लेकिन मजदूर 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग पर अडिग थे। उसके लिए धरना, प्रदर्शन, हड़ताल चलते ही रहते थे। 1877 में मार्टिंग्स वर्ग, पश्चिमी वर्जिनिया में रेलवे कर्मचारियों ने हड़ताल का ऐलान कर दिया। मामला इतना बढ़ा कि उसपर काबू करने के लिए सेना बुलानी पड़ी। बलप्रयोग के कारण हड़ताल तो दब गई, परंतु उससे जो चिंगारियां फूटीं उसने बहुत जल्दी वाल्टीमोर, ओहियो, पेनसिल्वेनिया जैसे शहरों की रेलवे कंपनियों को अपनी गिरफ्त में ले लिया। धीरे-धीरे दूसरे उद्यमों से जुड़े मजदूर भी हड़ताल पर उतर आए। पहली बार मजदूरों ने सरकार और पूंजीपतियों को अपनी विराट शक्ति का एहसास कराया था। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा था। वह ऐसा जनउभार था, जिसका असर राष्ट्रव्यापी था

1884 का वर्ष अंतरराष्ट्रीय मजदूर आंदोलनों के इतिहास में बड़ा परिवर्तनकारी सिद्ध हुआ। उसी वर्ष फेडरेशन ऑफ़ आर्गनाइज्ड ट्रेड एंड लेबर यूनियंस, जिसे बाद में ‘अमेरिकन फेडरेशन ऑफ़ लेबर’ के कूटनाम से भी जाना गया—का शिकागो में चौथा राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ। 7 अक्टूबर, 1884 को आयोजित उस सम्मेलन में निम्नलिखित प्रस्ताव को स्वीकृति मिली थी—

‘‘फेडरेशन ऑफ़ आर्गनाइज्ड ट्रेड एंड लेबर यूनियंस ऑफ़ दि यूनाइटिड स्टेट्स एंड कनाडा’ तय करती है कि पहली मई तथा उसके बाद से 8 कार्यघंटों का एक कार्यदिवस, वैध कार्यदिवस के रूप में जाना जाएगा। हम सभी श्रमिक संगठनों से अपील करते हैं कि वे अपने-अपने नियमों को इस प्रकार निर्धारित करें कि वे इस प्रस्ताव के अनुकूल हों10

अमेरिकन फेडरेशन ऑफ़ लेबर’ स्वैच्छिक और संघीय आधार पर बना था। फेडरेशन के राष्ट्रीय सम्मेलन के निर्णय सिर्फ उससे जुड़े श्रमिक संगठनों पर लागू होते थे; वह भी तब जब श्रमिक संगठन उन निर्णयों का विधिवत समर्थन करें। 8 घंटे के प्रस्तावित कार्यदिवस की घोषणा में हड़ताल का संकल्प भी छिपा था। चूंकि हड़ताल के दौरान श्रमिकों के पास अपनी आजीविका का कोई साधन नहीं होता, इसलिए हड़ताल लंबी खिंचने पर मजदूरों को संगठन की आर्थिक मदद की जरूरत पड़ सकती थी। परोक्ष रूप में फेडरेशन का संकेत बड़ी हड़ताल की ओर था। उसके लिए सदस्य श्रमिक संगठनों का समर्थन और सहभागिता आवश्यक थी। उस समय फेडरेशन के सदस्यों की संख्या लगभग 50000 थी। राष्ट्रीय स्तर पर यह बहुत ज्यादा भी नहीं थी। सरकारों पर दबाव बनाने की स्थिति में तो वह संगठन बिलकुल भी नहीं था

उस दिनों अमेरिका का श्रमिक आंदोलन तीन प्रमुख धाराओं में बंटा हुआ था। उसके सबसे बड़े मजदूर संगठन का नाम था—‘आर्डर ऑफ़ दि नाइट्स ऑफ़ लेबर’ यानी योद्धाओं का संगठन।’ 1886 में सदस्य संख्या की दृष्टि से वह सबसे बड़ा मजदूर संगठन था। उसके लगभग 7 लाख से अधिक सदस्य थे। उसमें कई महिलाएं भी शामिल थीं। टेरेंस वी. पोव्देर्ली उसका नेता था। यह संगठन 1878 में ही 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग करता हुआ आ रहा था। उसकी ख्याति एक जुझारू संगठन की थी। 1886 में उसकी लोकप्रियता शिखर पर थी। इस कारण उसके सदस्यों की संख्या भी बढ़ती जा रही थी। उसके प्रमुख नेता हड़ताल के बजाए सरकार के साथ सहयोग और बातचीत करते हुए, उसका हल निकालना चाहते थे। हालांकि उसका एक हिस्सा हड़ताल के लिए तैयार था। नाइट ऑफ़ लेबरने 1886 की 8 घंटों के कार्यदिवस हेतु ऐतिहासिक हड़ताल में हिस्सा न लेने का निर्णय लिया था।. नतीजा यह हुआ कि उसका प्रभाव कम पड़ने लगा।। उसके बाद जितनी तेजी से उसकी सदस्य संख्या बढ़ी थी, उतनी ही तेजी से उसकी सदस्य संख्या और प्रतिष्ठा कम होने लगी थी। दूसरी धारा अराजकतावादियों की थी। उन्होंने 1883 में ‘इंटरनेशनल वर्किंग पिपुल्स एसोशिएसन’ का गठन किया था। वे लोग न केवल कानून अपितु राज्य की सत्ता को ही श्रमिक हितों में बाधक मानते थे। इसलिए वे सहयोग या बातचीत के बजाए, मांग को लेकर जोरदार संघर्ष छेड़ने के पक्ष में थे। उसके लिए मारक हथियारों के प्रयोग से भी उन्हें आपत्ति नहीं थी।

तीसरा संगठन ‘अमेरिकन फेडरेशन ऑफ़ लेबर’ था। इस संगठन के कई सदस्य मार्क्सवादी विचारधारा के थे। यह संगठन शुरू से ही आठ घंटों के कार्यदिवस की मांग करता आया था। आरंभ में इसका तरीका भी संवाद और सहयोग पर आधारित था। उसमें एक गुट ऐसा भी था जिसे बातचीत के तरीके पर शुरू से ही विश्वास न था। यह गुट आगे चलकर न केवल फेडरेशन के बाकी सदस्यों को हड़ताल के लिए तैयार करने में सफल रहा, अपितु अपने अनुषंगी संगठनों के कुछ गुटों को हड़ताल के लिए अपने साथ लाने में सफल रहा था

यह दिखाने के लिए कि 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग केवल घोषणा नहीं है, श्रमिक संगठन उसके बारे में पूरी तरह से गंभीर हैं, ‘फेडरेशन ऑफ़ लेबर’ ने अपरोक्ष तैयारियां आरंभ कर दी थीं। आने वाले वर्ष में श्रमिक नेताओं की जगह-जगह सभाएं आयोजित की गईं। हर जगह 8 घंटों के कार्यदिवस के संकल्प को दोहराया गया। उसे सबसे सुधारवादी कदम बताया जा रहा था। कहा जा रहा था कि उससे ‘पूंजीवाद’ की जड़ पर प्रहार होगा। हालांकि कुछ अराजकतावादी अब भी यह मानकर चल रहे थे कि 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग से श्रमिकों की हालत में सुधार होने की संभावना बहुत कम है। श्रमिक नेताओं में ऑगस्ट स्पाइस जैसे उग्र अराजकतावादी भी थे, जो 8 कार्यघंटों की मांग से सहमत थे, मगर श्रमिकों के कल्याण के लिए उन्हें अपर्याप्त मानते थे। स्पाइस का विचार था कि—‘हमारी समस्याओं का वास्तविक समाधान बुराई की जड़ पर सीधा प्रहार किए बगैर संभव नहीं है।’11 एक और अराजकतावादी सेमुअल फील्डेन ने हेमार्किट नरसंहार से एक वर्ष पहले अराजकतावादी अखबार ‘दि अलार्म’ में लिखा था—‘‘कोई आदमी चाहे दिन में आठ घंटे काम करे या दस घंटे, वह गुलाम है, गुलाम रहेगा।’12 फील्डेन ने कहा था कि मजदूरों की समस्या का एकमात्र समाधान है, ‘निजी संपत्ति का खात्मा और प्रतिस्पर्धा का अंत।’

8 कार्यघंटों की मांग को श्रमिकों का चौतरफा समर्थन मिल रहा था। मजूदर संगठन भी अपनी-अपनी तरह से सक्रिय थे। ‘कारपेंटरर्स एंड सिगार मेकर्स’, ‘नाइट्स ऑफ़ लेबर’ की सदस्य संख्या में दिन दूनी, रात चौगुनी वृद्धि हो रही थी। इसका अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है, कि फेडरेशन की घोषणा के बाद, श्रमिक संगठन ‘नाइट्स ऑफ़ लेबर’(मजदूरों के शूरवीर) की सदस्य संख्या 1884 में 70000 से 1885 तक 200000 और फिर 1886 तक 700000 हो चुकी थी13 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग नाइट आफ लेबर के कार्यक्रम का हिस्सा थी। आरंभ में वह उस मुद्दे पर हड़ताल के लिए बाकी सदस्यों का साथ देने को तत्पर था. मगर बाद में, कदाचित मजदूर संगठनों पर अराजकतावादियों के प्रभाव के चलते, नाइट ऑफ़ लेबरके नेता हड़ताल से कटने लगे थे. स्वयं पोव्देर्ली, फेडरेशन से जुड़ी यूनियनों से हड़ताल में भाग लेने को कहने लगा था।

दूसरे कई संगठनों में भी बढ़ती सदस्य संख्या को देखकर उत्साह था। उसका असर किसी एक शहर तक सीमित नहीं था, बल्कि अमेरिका के विभिन्न शहरों के श्रमिक इस मांग को लेकर जोश से भरे हुए थे। मजदूरों को अंदाजा था कि 8 कार्यघंटों की मांग के लिए होने वाली हड़ताल लंबी खिंच सकती है। इसलिए कुछ सरकार पर दबाव बनाने के लिए निर्धारित तिथि से पहले अल्पावधिक हड़तालों का सिलसिला शुरू हो चुका था। उन हड़तालों में ‘कुशल और अकुशल, काले और गोरे, स्त्री और पुरुष, नेटिव और प्रवासी सभी शामिल होते थे

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मजूदर संघर्ष का केंद्र शिकागो बना था। क्या इसके पीछे कोई खास कारण था? बिलकुल। अमेरिकी गृहयुद्ध(1861-1865) के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था को जोरदार झटका लगा था। वह भयानक मंदी के दौर से गुजर रही थी। 1873 से 1879 के बीच 18000 कंपनियां दिवालिया घोषित हो चुकी थीं। 8 राज्य और सैकड़ों बैंक तबाह हो चुके थे14 मगर जैसे ही मंदी का दौर समाप्त हुआ, अमेरिका खासकर उसके शिकागो शहर में जो उन दिनों बड़ा औद्योगिक केंद्र था—बाहर से आने वाले मजदूरों की संख्या अचानक बढ़ चुकी गई। इससे शहर की समस्याएं भी बढ़ी थीं। उन दिनों अमेरिका में प्रति सप्ताह औसत 63 घंटे काम का प्रावधान था15 मंदी से उबरने की छटपटाहट में जहां उद्योगपति अधिक से अधिक मुनाफा कमाना चाहते थे। वहीं श्रमिक संगठन अपने लिए बेहतर मजदूरी की मांग कर रहे थे। कारण यह था कि मंदी के बाद जिस अनुपात में मंहगाई में वृद्धि हो रही थी, उस अनुपात में वेतनवृद्धि नहीं हो पा रही थीतनाव तब और बढ़ गया था जब बाल्टिमोर एंड ऑहियो रेलरोड ने मंदी के बहाने मजदूरों की पगार में 10 की कटौती की घोषणा की नतीजा यह हुआ की जुलाई 25, 1877 से मजदूरों ने हड़ताल कर दी देखते ही देखते उसने पूरे अमेरिका को अपनी चपेट में ले लिया स्थानीय पुलिस और सुरक्षा बल हड़ताल पर काबू पाने में नाकाम रहे तो सेना बुलानी पड़ी दो सप्ताह चलने वाली उस हड़ताल ने सैकड़ों की जान ली थी करोड़ों डॉलर की संपत्ति को नुकसान पहुंचा था जार्ज शिलिंग नाम के एक मजदूर नेता ने उसे ‘सामाजिक और औद्योगिक ग़दर’ की संज्ञा की थी

महत्त्वपूर्ण बात यह कि ‘गृह युद्ध की समाप्ति के एक दशक के भीतर ही उद्योगपति शिकागो पुलिस को गैरभरोसेमंद बताने लगे थे। उनका मानना था कि सरकारी सुरक्षाबल मजदूरों के प्रति उदारता बरतते हैं। ऐसा न हो, इसके लिए सुरक्षा बलों की जगह अपने खर्च पर पेशेवर संगठन बनाने की कोशिश जारी थी। 1870 और 1880 के दशक में उन्होंने प्राइवेट सशस्त्र बलों की भर्ती शुरू कर दी थी। निजी तथा सरकारी सशस्त्र बलों की सुरक्षा के लिए मजबूत हथियार-घर और किले बनाए जा रहे थे16 इसके साथसाथ मजदूर संगठनों पर लगाम लगाने के प्रयत्न भी जारी थे। वे मजदूरों को डराने, धमकाने, उनके संगठनों को काली सूची में डालने जैसे काम कर रहे थे। श्रमिक संगठनों में फूट डालने के लिए जासूसों, ठगों, निजी सुरक्षा बलों, और भेदियों की भरती की जा रही थी। सीधे-साधे गरीब मजदूरों को अनार्किस्ट और कम्युनिस्ट जैसे नाम देकर नौकरी से हटाया जा रहा था। मंदी के नाम पर मजदूरों के वेतन की कटौती की जा रही थी।

इसके बावजूद मुख्य धारा के अखबार पूंजीपतियों का समर्थन कर रहे थे। शिकागो ट्रिबून, दि टाइम्स, जैसे बड़े अखबारों का किसी न किसी रूप में राजनीतिकरण हो चुका था। मजदूरों की ओर ‘सोशलिष्ट’ और ‘अनार्किस्ट’ जैसे कुछ जनवादी तेवर के अखबार थे। लेकिन तुलनात्मक रूप से उनकी पहुंच बहुत छोटे समूह तक थी। उदाहरण के लिए 1890 के दशक में शिकागो डेली न्यूज की पाठकसंख्या जहां 2,00,000 थी, वहीं सोशलिष्ट और अनार्किस्ट जैसे प्रतिबद्ध विचारधारा के अखबारों की संयुक्त पाठक संख्या महज 30,000 थी17 जैसेजैसे मई का महीना करीब आ रहा था, मजदूरों का जोश भी बढ़ता जा रहा था। 1886 के आरंभ में, जहां जाओ वहां, 8 घंटे के कार्यदिवस, मजदूर एकता और पूंजीपतियों के शोषण पर चर्चा होती सुनाई पड़ती थी। सड़कों पर, सेलूनों और बाजारों में जोशीले गीत सुनाई पड़ते थे —

लाखों मेहनतकश, जागे हुए है

आओ उन्हें मार्च करते हुए देखें

उधर देखो, तानाशाह कांप रहे हैं,

अरे! उनकी ताकत खत्म होने लगी है

ओ श्रमयोद्धाओं किलों को उड़ा दो

अपने उद्देश्य की खातिर लड़ो

लड़ो, ताकि तुम्हें और तुम्हारे

सभी पड़ोसियों को बराबर का हक मिल सके

उठो, इन निरंकुश कानूनों को दफन कर दो

ऐसे गीतों ने श्रमिकों की आंखों में सपने रोपने का काम किया था। सपने बराबरी और एकता के। समानता और स्वतंत्रता के। फेडरेशन ऑफ़ लेबर की 8 कार्यघंटों को कानूनी घोषित करने की मांग के साथ ही श्रमिक संगठन उसके लिए तैयारियों में जुटने लगे थे। कामगारों का जुझारूपन, लक्ष्यप्राप्ति के लिए बलप्रयोग से न हिचकने का संकल्प श्रम आंदोलनों को विस्तार दे रहा था। अराजकतावादी नेताओं में से अल्बर्ट पार्सन्स, जोहान्न मोस्ट, ऑगस्ट स्पाइस, लुईस लिंग्ग जैसे नाम घरघर के जानेपहचाने नाम बन चुके थे। 1885 में ही हड़तालों का सिलसिला आरंभ हो चुका था। अपनी एकजुटता दर्शाने के लिए मजदूर बेंड-बाजे के साथ परेड के निकलते थे। 1881-1884 के बीच अमेरिका में हड़ताल और तालाबंदी की घटनाओं का वार्षिक औसत लगभग 500 था। उनमें करीब 1,50,000 श्रमिकों ने हिस्सा लिया था। मगर 1885 में हड़ताल और तालाबंदी की घटनाओं की संख्या 700 तक पहुंच चुकी थी। उनमें 2,50,000 मजदूरों की भागीदारी थी। उससे अगले साल यानी 1886 में हड़तालों तथा तालाबंदी की संख्या पिछले साल, यानी 1885 के मुकाबले दुगुनी से भी ज्यादा, 1572 थी। उनमें 6,00,000 श्रमिकों की हिस्सेदारी थी। 1885 में जहां 2467 औद्योगिक संस्थान हड़ताल और तालाबंदी से प्रभावित थे, वहीं उससे अगले वर्ष में 11562 कारखाने प्रभावित हुए थे। ‘नाइट्स ऑफ़ लेबर’ के नेताओं ने हालांकि हड़ताल में भाग न लेने का खुला ऐलान कर दिया था बावजूद इसके उसके लगभग 7,00,000 सदस्यों में से 5,00,000 कामगार हड़ताल में सीधे तौर पर शामिल थे18

आसन्न संकट को सामने देख सावधान हो जाना मनुष्य का प्राकृतिक लक्षण है। संकट जितना अधिक बड़ा हो, वह उतनी ही अधिक शक्ति से उसका सामना करता है। 1870 और 1880 के बीच श्रमिक संगठनों की भी यही हालत थी। इसलिए एक और जहां पूंजीपति और राज्य मिलकर मजदूर एकता और उनके संगठनों को कमजोर करने में लगे थे, उनसे निपटने की तैयारियां की जा रहीं थीं, वहीं श्रमिक भी 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग को लेकर एकजुट हो रहे थे। इस बीच श्रमिक संगठनों में ही कुछ ऐसे नेता भी थे, जो मजदूर एकता में खलल डालकर, हड़ताल की संभावना का टालने या उसे कमजोर करने में लगे थेउनमें ऐसे लोग भी थे जिन्हें पूंजीपतियों ने इस काम के लिए नियुक्त किया था। लेकिन मजदूरों में जोश था। 1 मई से ठीक पहले एक गुमनाम प्रकाशक की ओर से छपा पर्चा मजूदरों में बांटा गया, जिसमें अपील थी—

    • मजदूर हथियारों के लिए!

    • महल के लिए युद्ध, झोपड़ी के लिए शांति, विलासितापूर्ण सुस्ती के लिए मौत

    • मजदूरी प्रथा दुनिया की बदहाली की एकमात्र वजह है। वह धनाढ्यों द्वारा समर्थित है। इसे नष्ट करने के लिए उन्हें या तो काम करना होगा, अथवा मरना होगा

    • एक पाउंड डायनामाइट, एक बुशेल मतदातापत्रों से बेहतर है!(बुशेल: 32 सेर या 25.4 किलोग्राम की माप)

    • पूंजीपति लकड़बघ्घों, पुलिस और लड़ाकुओं का समुचित सामना करने के लिए, अपने हाथों में हथियार लेकर, आठ घंटों की मांग उठाओ19

साफ है कि दोनों ओर से कमानें तन चुकी थीं। हड़ताल का केंद्र शिकागो था। लेकिन आंदोलन केवल वहीं तक सीमित नहीं था। न्यू यार्क, बाल्टीमोर, सिनसिनाटी, सेंट लुईस, वाशिंग्टन, डेट्रोइट, पिटसबर्ग, मिलवोकी, कैलीफोर्निया सहित दूसरे और भी कई शहरों में मजदूर भड़के हुए थे। अफवाहों का बाजार गर्म था। इतिहासकार और समाज-वैज्ञानिक एक और गृह युद्ध की संभावना जता रहे थे। पूंजीपतियों के प्रति घृणा चारों ओर पसरी हुई थी। मजदूर मान चुके थे कि कार्यघंटों को लेकर सरकार और कारखाना मालिकों ने उन्हें और रियायत मिलने वाली नहीं है। मैकार्मिक कंपनी ने अपने सैकड़ों कर्मचारियों को लॉकआउट के बहाने बाहर निकाल दिया था। बाहर किए गए कर्मचारी किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न न करें, इसके लिए 300 सुरक्षा कर्मियों को नियुक्त किया गया था। कंपनी के इस निर्णय को लेकर कर्मचारियों में खासी कड़वाहट थी। मैकार्मिक के लॉकआउट में ‘इंटरनेशनल कारपेंटरर्स यूनियन’ की बड़ी भूमिका था। उसके नेताओं में से एक लुइस लिंग्ग चरमपंथी था। वह निर्भीक और मुखर वक्ता था तथा जो डायनामाइट को ‘सच्चा औजार’ मानता था।

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आखिर वह दिन भी आ पहुंचा जिसके लिए दोनों ही वर्गों ने भरपूर तैयारी की थी। सबसे ज्यादा क्रांतिधर्मा श्रमिक संगठन शिकागो में ही जमा हुए थे। विभिन्न संगठनों के बीच तालमेल बनाए रखने के लिए ‘8-घंटा समिति’ का गठन किया गया था। दूसरी ओर उग्र वामपंथी मजदूर संगठनों ने हड़ताल का मोर्चा संभालने के लिए ‘सेंट्रल लेबर यूनियन’ का गठन किया था। समन्वय की व्यवस्था ‘8-घंटा समिति’ और ‘सेंट्रल लेबर यूनियन’ के बीच भी थी। उन्होंने हड़ताल के संचालन के लिए एक संयुक्त मोर्चा बनाया हुआ था। ‘सेंट्रल लेबर यूनियन’ ने अभ्यास के लिए 1 मई से पहले रविवार के दिन लामबंदी प्रदर्शन किया था। उसमें कई श्रमिक संगठनों के लगभग 25000 मजदूरों ने हिस्सा लिया था। उसके साथ नाइट्स ऑफ़ लेबर, सोशलिष्ट लेबर पार्टी भी थीं। लेकिन नाइट्स ऑफ़ लेबर ने, शिकागो में एकदम अंतिम क्षण में खुद को प्रस्तावित हड़ताल से अलग कर लिया20 इससे नाराज उसका एक गुट, हड़ताल के सक्रिय समर्थन में उतर आया था। 1 मई का ‘दि आर्बीटर जाइटुंग’ हड़ताल के आवाह्न के साथ पाठकों तक पहुंचा था—

बहादुरो आगे बढ़ो! संघर्ष शुरू हो चुका है….साथियो! इन शब्दों पर ध्यान रखना—कोई समझौता नहीं। कापुरुष पीछे चले जाएं, बहादुर आगे आ जाएं। अब हम पीछे नहीं हट सकते। यह मई की पहली तारीख है….अपनी बंदूकों को साफ करो, कारतूसों को संभालकर रखो। पूंजीपतियों द्वारा किराये पर बुलाए गए हत्यारे, पुलिस और सैन्यबल, हत्या के लिए तैयार हैं। इन दिनों कोई भी मजदूर खाली जेब घर से बाहर कदम नहीं रखेगा।’21

उद्योगपतियों और व्यापारियों ने अपनी सुरक्षा के लिए निजी सुरक्षा बलों का गठन किया था। दूसरी ओर मजदूर संगठन भी 8 घंटे कार्यदिवस की मांग को अपने जीवन और मरण का सवाल बना चुके थे। पूंजीपतियों के सुरक्षाबलों का जवाब देने के लिए जर्मन तथा बोहेमियन समाजवादियों की ओर से शिकागो में ‘लेहर अंड वेहर वीरीन’(शैक्षिक एवं सुरक्षा समिति) का गठन किया गया था22 उद्देश्य था कि राज्य यदि श्रमआंदोलनों को रोकने के लिए बल का इस्तेमाल करे तो उसका उत्तर बलपूर्वक उसी अंदाज में दिया जा सके। साथी मजदूरों से संवाद करने के लिए श्रमिक संगठनों के पास ‘अलार्म’ और ‘आर्बीटर जाइटुंग’ जैसे समाचारपत्र थे। उनका सर्कुलेशन मुख्यधारा के अखबारों के मुकाबले बहुत कम था। मगर मजदूरों पर उनका प्रभाव दूसरे अखबारों की अपेक्षा कहीं ज्यादा था। उनकी भाषा आह्वानकारी होती थी। इसे एक उदाहरण के जरिये समझना उपयुक्त होगा। नवंबर-1884 में ‘इंटरनेशनल एसोशिएसन ऑफ़ वर्किंगमेन’ ने, स्थानीय श्रमिक संगठनों और संस्थाओं की मदद से समाजवाद को परिभाषित करने की कोशिश की थी23

1. निष्ठुर क्रांति तथा अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों की मदद से वर्तमान वर्गीय वर्चस्व को समाप्त करना

2. साम्यवादी संगठनों अथवा उत्पादन को लेकर मुक्त समाज की रचना

3. उत्पादक संगठनों के माध्यम से, बगैर लार्भाजन तथा लूट के बराबर श्रममूल्य के आधार पर वस्तुओं का विनिमय।

4. ऐसा शिक्षातंत्र खड़ा जिसमें स्त्रीपुरुष सभी धर्मरहित, वैज्ञानिक सूझबूझ तथा बराबरी के सिद्धांत के अनुरूप शिक्षा ग्रहण कर सकें।

5. लिंग अथवा जातीय भेदभाव से परे, सभी के लिए समान अधिकार

6. जनता के आपसी कार्यकलापों को संघों एवं कम्यूनों के बीच समझौतों के माध्यम से नियंत्रित करना

इस समाचार को 3 नवंबर 1884 के ‘अलार्म’ ने निम्नलिखित टिप्पणी के साथ प्रकाशित किया गया था—

दुनियाभर के मजदूर भाइयो! एक हो जाओ। साथियो! इस महान लक्ष्य तक पहुंचने के लिए जो सबसे आवश्यक है, वह है हमारा संगठन और हमारी एकता…..सो एकजुट होने का दिन आ पहुंचा है। हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो जाओ। ड्रम बजाकर बेखटके युद्ध की मुद्रा में आ जाओ—दुनिया के मजदूरो एक हो जाओ। तुम्हारे पास खोने के लिए जंजीरों के अलावा कुछ भी नहीं है, जीतने के लिए दुनिया पड़ी है।’24

जैसे ही पहली मई का दिन आया, मजदूरों ने अपने औजार रख दिए। उनके चेहरों पर विश्वास था। हर कोई अपने अधिकारों के लिए लड़ने का उद्धत था। श्रमिक आंदोलनों के इतिहास का वह सबसे अविस्मरणीय दिन था। शिकागो मजदूर क्रांति का केंद्र था। वहां मेकार्मिक हार्वेस्टर नामक कंपनी थी, जो खेती के औजार, मशीनें और ट्रक बनाने का काम करती थी। उसके आधे कामगार पहले ही दिन सड़क पर उतर आए। अकेले शिकागो में लगभग 40000 मजदूर हड़ताल पर थे25 उनके चेहरों पर जोश था। होठों पर गगनभेदी नारे थे—‘‘8 घंटे काम के। आठ घंटे आराम के। 8 घंटे हमारी मर्जी के।’ काम के घंटे घटाओ-मजदूरी बढ़ाओ।’ हड़ताल में 11562 कारखानों के मजदूर शामिल हुए थे26 शिकागो के अलावा केलीर्फोनिया जैसे दूसरे बड़े शहर भी हड़ताल में शामिल थे। पूरे अमेरिका में पांच लाख से अधिक मजदूर सड़कों पर थे। नेतागण अपने भाषण द्वारा मजदूरों को प्रोत्साहित कर रहे थे। अल्बर्ट पार्सन्स, ऑगस्ट स्पाइस, जोहन्न मोस्ट, लुईस लिंग्ग, सेमुअल फील्डेन जैसे अराजकतावादी नेताओं के भाषण आग उगल रहे थे। हड़ताल के बारे में एक अखबार ने लिखा था—‘फैक्ट्रियों और मिलों की ऊंची-ऊंची चिमनियों से उस दिन धुंआ नहीं निकला था। लगता था, जैसे छुट्टी के दिन, सब कुछ ठहरा हुआ हो।’27 उल्लेखनीय स्तर पर शांत रही पहले दिन की हड़ताल ने अमेरिका के श्रम आंदोलन के इतिहास में बड़ा अध्याय जोड़ दिया था

3 मई को हड़ताली फिर सड़क पर थे। इस बार मैकार्मिक हार्वेस्टर कंपनी के अलावा ‘लंबर शोवर’ के 6000 कर्मचारी भी सड़क पर थे। गौरतलब है कि मैकार्मिक कंपनी में 16 फरवरी, 1886 से लॉकआउट चल रहा था। उसके कर्मचारी पिछले तीन महीनों से काम न मिलने के कारण क्षुब्ध थे। सच तो यह है कि वे हताश हो चुके थे। इसलिए उनमें दो वर्ग बन चुके थे। हड़ताली मजदूर मैकार्मिक हार्वेस्टर से थोड़ा हटकर जमा हुए थे। कुछ और हड़ताली वहां पहले से ही जमा थे। कुल लगभग 15000 हडताली वहां जमा थे। हड़ताल का नेतृत्व कर रहे नेताओं में से एक ऑगस्ट स्पाइस ने जोरदार भाषण दिया था। अपने भाषण में उसने पूंजीवादी दमन, उसकी क्रूरताओं और कुटिलताओं पर चर्चा की थी। कहा था कि मजदूरों की हालत गुलामों से भी बदतर है। उसने मजदूरों से अपील की थी कि एकजुट होकर खड़े रहें। अपने मालिकों और हड़ताल तोड़ने वालों को बीच में न घुसने दें। मजदूर सावधान थे। हड़ताली मजदूर सड़क पर आकार मार्च करने लगे। इस बीच उनके बीच कुछ भेदिये भी आ मिले थे, जिन्हें मजदूरों ने वापस लौटने को विवश कर दिया था। मजदूरों का जुलूस शांतिपूर्वक आगे बढ़ रहा था। चारों तरफ से जत्थे निकलकर उसमें शामिल हो रहे थे। तभी हड़तालियों पर पत्थरों, ईंटों और लाठीडंडों से मार पड़ने लगी। मजदूर समझ पाएं, तभी 200 पुलिसकर्मियों का जत्था उनके सामने पहुंच गया। बिना किसी चेतावनी के लिए उसने मजदूरों पर लाठियों और बंदूकों से हमला कर दिया। उसमें चार मजदूरों की मृत्यु हो गई। अनेक घायल हो गए।28

3 मई की घटना के बारे में शिलिंग नामक मजदूर ने पीटर आल्टगोल्ड के सामने इस प्रकार बयान दिया था—‘‘मैकार्मिक कारखाने पर आयोजित प्रदर्शन सिर्फ लंबर शोवर्स यूनियन का ही प्रदर्शन नहीं था, वहां पर मैकार्मिक कारखाने के भी एक हजार से अधिक हड़ताली मजदूर थे। हालांकि ऑगस्ट स्पाइस वहां बोला था, पर उसने गड़बड़ी करने का नारा नहीं दिया था। उसने एकता का आह्वान किया था….गड़बड़ी तो तब शुरू हुई जब हड़तालभेदिये कारखाने से बाहर जाने लगे। हड़तालियों ने उन्हें देख लिया और भला-बुरा कहना, गालियां देना शुरू कर दिया जो यहां दोहराने लायक नहीं हैं। उस दृश्य की कल्पना करो। दो यूनियनों के छह हजार हड़ताली मजदूर बाहर सभा कर रहे हैं और उनकी नजरों के सामने से हड़ताल भेदिये चले जा रहे हैं। मैंने देखा वहां क्या हुआ। मैकार्मिक के हड़ताली कारखाने की ओर बढ़ने लगे। किसी ने उनसे कहा नहीं था। किसी ने उन्हें उकसाया नहीं था। उन्होंने सुनना बंद कर दिया था और वे फाटकों की ओर बढ़ रहे थे। हो सकता है उन्होंने कुछ पत्थर उठा रखे हों, हो सकता है उन्होंने भद्दी बातें कही हों। लेकिन उनके कुछ कहने से पहले की कारखाने की पुलिस ने गोलियां चलानी शुरू कर दीं। हे भगवान लगता है, जैसे कोई युद्ध हो। हड़ताली निहत्थे और पुलिस मानो चांदमारी कर रही हो, पिस्तौलें हाथभर की दूरी पर थीं। रायफलें भी तनी हुई थीं—धांय, धांय, धांय…..मजदूर ऐसे गिर रहे थे, जैसे लड़ाई का मैदान हो। जब उन्होंने टिककर खड़े होने की कोशिश की तो पुलिस वाले चढ़ दौड़े और लाठियों से पीटकर उन्हें अलग कर दिया। जब वे तितर-बितर होकर दौड़े तो पुलिसवालों ने उनका पीछा किया। पीछे से लाठियां बरसाईं। देखा नहीं जाता था। वह क्रूरता थी। बहशीपन था। भाग जाने का मन कर रहा था। लगता था कै हो जाएगी। और यही किया मैंने.’29

ऊपर के विवरण से स्पष्ट है कि हड़तालियों पर पुलिस का हमला न केवल आकस्मिक, अपितु पूर्वनिर्धारित षड्यंत्र जैसा था। क्रोधित ऑगस्ट स्पाइस अराजकतावादी दैनिक आर्बीटर जाइटुंग के कार्यालय में पहुंचा था। वहां उसने हड़तालियों के नाम एक पोस्टर जारी किया। उसका शीर्षक था—‘बदला।’ घटना के कुछ ही घंटों बाद सड़कें उन पोस्टरों से पटी हुई थीं—

‘‘तुम्हारे मालिकों ने अपने शिकारी कुत्ते, पुलिस भेज दी है। इस दोपहर उन्होंने मैकार्मिक के पास तुम्हारे छह साथियों को मार गिराया है। उन्होंने उन गरीब दुखियारों को मार गिराया है, क्योंकि तुम्हारी तरह उन्होंने भी अपने मालिकों के आगे झुकने से इन्कार कर दिया था….तुम वर्षों से अंतहीन असमानता को झेलते आ रहे हो। तुम उनके लिए मृत्युपर्यंत काम करते हो। उनके लिए तुम अपनी इच्छाओं के साथसाथ, अपनी और अपने बच्चों की भूख को अनंतकाल से दबाते आए हो। यहां तक कि अपने बच्चों को भी तुमने अपने मालिकों के लिए कुर्बान कर दिया है। तुम हमेशा से दुखियारे और आज्ञाकारी गुलाम रहे हो। क्यों? अपने सुस्त और चोर मालिकों के अंतहीन लालच और उनकी तिजोरियों को भर देने के लिए….

यदि तुम इंसान हो, यदि तुम अपने उन पूर्वजों की संतान हो, जिन्होंने तुम्हें आजाद करने के लिए अपनी कुबार्नियां दी हैं, तो महाशक्तिशाली हरकुलिस की तरह उठो। और उन छिपे हुए राक्षसों का अंत कर दो, जो तुम्हें मिटा देना चाहते हैं। हथियार उठाओ….हम तुमसे कहते हैं….हथियार उठा लो।’’30

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4 मई की सुबह ‘दि आर्बीटर जाइटुंग’ के मुख्य पृष्ठ पर मोटे अक्षरों में छपा था—

खून! असंतुष्ट मजदूरों की सेवा के लिए सिर्फ गोली और बारूद….यह है कानून और पुलिस! वे महलों में महंगी शराब से अपने जाम भरकर कानून और पुलिस के खूनी दरिंदों के स्वास्थ्य की कसमें उठा रहे हैं। गरीब और दुखियारो, अपने आंसू पोंछ डालो। अपनी ताकत को पहचानकर उठे खड़े हो और इस बेईमान शासन को धूल में मिला दो।’31

रातभर में पोस्टरों और पर्चों की एक और खेप सड़कों पर आ चुकी थी। लिखा था—‘मजदूरो, हथियार बांध लो। पूरी ताकत के साथ मोर्चे पर डट जाओ।’ पूरा शहर अफवाहों से भरा हुआ था। दोपहर होते-होते हेमार्किट चौक पर भीड़ जुटने लगी। उपस्थित श्रमिकों में बहुत से बेरोजगार थे। भूख से व्याकुल थे। अनेक लोग ऐसे भी थे, जिनके पास सिर छिपाने के लिए कोई ठिकाना तक नहीं था। सैकड़ों ऐसे थे जिनके सिर पर महीनों से मंदी की तलवार लटकी हुई थी। ऐसा लग रहा था कि जो वे कर रहे या करने जा रहे हैं, खुद को और अपने परिवार को बचाए रखने के लिए, उसके अलावा उनके पास दूसरा कोई रास्ता ही नहीं है। उनके पूंजीपति मालिक उन्हें रोजगार देते हैं। लेकिन उनके सपने देखने के अधिकार को छीन लेना चाहते है। यदि कोई सपना बचता-बचाता कहीं से चला आए तो वे उसे नोंचने पर उतारू हो जाते हैं। उनके नेताओं ने उन्हें सपना देखना सिखाया है। अपने ऊपर विश्वास करना सिखाया है। बताया है कि अपनी तमाम लाचारी, बेकारी, हताशा, विपन्नता और दैन्य के बावजूद वे इन्सान हैं। सपने देखने का हक उन्हें भी है। संगठन उनके सपनों के पूरा होने का भरोसा दिलाता है। सपने पूरे हों न हों, लेकिन वे सपनों को छोड़ना नहीं चाहते। 8 घंटे का कार्यदिवस तो असल में बहाना है। हड़ताल तो सपनों को बचाने के लिए है। जीवन रहे या जाए, बस सपने बचे रहें

पूरा शहर दो हिस्सों में बंट चुका था। एक ओर मजदूर थे। भूख और बेरोजगारी के मारे हुए, ठंडे, गरीब और बदहाल। उन्हीं के सामने, उनकी ओर बंदूकें थामें, पुलिस के सिपाही और सुरक्षाबल थे। उनमें और मजदूरों में ज्यादा अंतर नहीं था। बल्कि उन्हीं के बीच से निकलकर आए थे। उन्हीं के भाई-बंधुपड़ोसीरिश्तेदार थे। मालिकों ने उन्हें बंदूकें और लाठियां थमायी थीं। उन हथियारों का असर था कि अब वे अपने ही भाई-बंधुपड़ोसी या रिश्तेदारों को पहचानने को भी तैयार न थे। मालिकों के इशारे पर वे कुछ भी कर सकते थे। दूसरी ओर बड़े-बड़े उद्योगपति, व्यापारी, पूंजीपति, राजनेता और व्यापारी थे। उनके पास धन था। ताकत थी। अखबार थे, जिनके मदद से वे अपने झूठ को भी सच बनाते आए थे। अपने वर्चस्व को बचाने के लिए वे कुछ भी करने को तैयार थे।

अचानक आसमान घिर आया। तेज हवाएं चलने लगीं। ऊपर काले बादलों की मोटी परत छा गई। फिर बूंदाबांदी होने लगी। मानो मौसम उन्हें सावधान कर देना चाहता हो। मैदान पर उस समय मात्र तीन हजार लोग थे। जिनमें स्त्री-पुरुष, बच्चेबड़े सभी शामिल थे। मजदूर नेता भाषण दे रहे थे। उनके भाषण में हिंसा की कोई बात नहीं थी। पार्संस ने अर्थव्यवस्था पर बात रखी थी। समानांतर से रूप से उसी समय कारखाना मालिकों की भी गुप्त बैठक चल रही थी। गोपनीय ढंग से आदेश आ-जा रहे थे। घटना स्थल से थोड़ी दूर पर पुलिस स्टेशन था। वहां पुलिस कप्तान पूरे दल-बल के साथ मौजूद था। इस बीच मौसम कुछ और खराब हुआ था। झील की ओर से आती तेज-ठंडी हवाएं चल रही थीं। उससे पहले कि तूफान आए लोग घर लौट जाना चाहते थे।

उस समय शिकागो के मेयर कार्टर एच. हरीसन थे। अपनी लोकप्रियता के दम पर चौथी बार मेयर चुना गया था। हरीसन झुकाव मजदूरों की ओर था। शिकागो को वह अपनी ‘दुल्हन’ मानता था। वह चाहता था कि मजदूर उसपर भरोसा करें—‘मैं चाहता हूं कि लोग यह जान लें कि उनका मेयर यहीं पर है।’32 कार्यघंटों के लिए चल रहे आंदोलन के दौरान उसने अपनी ओर से तनाव को कम करने की पूरी कोशिश की थी। उसने यह कहते हुए कि मजदूर भी शिकागो के नागरिक हैं, सुरक्षा बलों को बुलाने से इन्कार कर दिया था। लेकिन मेयर होने के बावजूद सब कुछ उसके नियंत्रण में नहीं था। अनजाना भय उसे खाए जा रहा था। घबराया मेयर कभी निकट के पुलिस स्टेशन पर जाता तो कभी हेमार्किट चौक पर लौट आता था। थाने में कुछ सिपाही तैयार बैठे थे। कुछ काली पोशाक पहले लोग भी वहां थे।33 बावजूद इसके मेयर के लिए मजदूरों की सभा ‘अनुशासित’ थी। उसके नेताओं के भाषण अहिंसक थे।

10 बजे, मेयर हरीसन अपने बुझे हुए सिगार को चबाता हुआ पुलिस स्टेशन पहुंचा। और वहां मौजूद पुलिस अधिकारी से बोला—‘ऐसा कुछ भी होने की संभावना नहीं है, जिससे हस्तक्षेप की जरूरत पड़े।’ इसके बाद वह घर चला गया। मानो सब मेयर के वहां से चले जाने की प्रतीक्षा में हों। उसके जाने के 15 मिनट के भीतर ही पुलिस इंस्पेक्टर ने अपने सहायक से सारी पुलिस को आगे बढ़ने को कहा। उसमें 176 अधिकारी थे। आदेश मिलने पर वे घटनास्थल की ओर बढ़ने लगे। पुलिस इंस्पेक्टर बोनाफाइड को संभवतः उसे किसी बड़े अधिकारी, कदाचित मेयर से भी ऊंचे अधिकारी, का आदेश मिला था, जो निस्संदेह दंगा कराना चाहता था34

उस समय फील्डेन का भाषण चल रहा था। हड़ताली घर वापसी की तैयारी कर रहे थे। बारिश के कारण अधिकांश जा भी चुके थे। मैदान पर अब केवल 500 लोग जमा थे। फील्डेन आखिरी वक्ता था। वह अपने भाषण को समेटना चाहता था। पुलिस इंस्पेक्टर को करीब आते देख उसने कहा—‘यहां सब कुछ शांतिपूर्वक है। बस कुछ मिनट दीजिए, हम सब जाने ही वाले हैं।’ उसके बाद वह वहां उपस्थित लोगों की ओर मुड़ा और अपने भाषण का समापन करते हुए कहने लगा, ‘और अंत में….तभी उसने पुलिस के दस्ते को आंदोलनकारियों की ओर बढ़ते हुए देखा। मंच से कुछ फुट दूर रहने पर इंस्पेक्टर ने सिपाहियों को रुकने का आदेश दिया ओर स्वयं मंच की ओर बढ़ा। फील्डेन के पास पहुंचकर उसने जोर से कहा—‘मैं तुम्हें गिरफ्तार करता हूं।’

मैं लोगों की ओर से तुम्हें अभी इसी क्षण यहां से शांतिपूर्वक हट जाने का आदेश देता हूं।’ उसकी बात सुनते ही वहां शांति पसर गई। अब केवल हवाओं का शोर था जो झील से होकर आ रही थीं। आसमान में बादल मंडरा रहे थे।

किसलिए कैप्टन, यहां सब शांतिपूर्वक चल रहा है।’ फील्डेन ने कहा। फील्डेन ने गलत नहीं कहा था। बैठक पिछले सात-आठ घंटों से शांतिपूर्वक जारी थी। किसी भी पक्ष ने शिकायत का अवसर नहीं दिया था। एक सफल बैठक के शांतिपूर्वक समापन के अवसर पर फील्डेन इसके अलावा कुछ और कह ही नहीं सकता था। बावजूद इसके पुलिस की ओर से जो फील्डेन का जो बयान अदालत के सामने पेश किया गया, वह उपर्युक्त बयान से पूर्णतः भिन्न था। पुलिस रिकार्ड के अनुसार फील्डेन के शब्द थे, ‘यहां कुछ शिकारी कुत्ते हैं! जाओ, अपना काम करो और मैं अपना काम करूंगा।’ फील्डेन के बयान के बाद वहां पुनः शांति छा गई। हालांकि भविष्य में क्या होने वाला है, कुछ लोग यह अवश्य जानते थे

और तब अचानक, एक भयानक विस्फोट हुआ। तेज रोशनी में कुछ चेहरे दमके, और वातावरण दुर्गंध से भर गया। पुलिस की टुकड़ी की दायीं ओर से फैंका गया, हवा में लहराता हुआ बम स्पीकर स्टेंड से कुछ फुट दूरी पर फटा था। इसी के साथ वहां अव्यवस्था फैल गई। क्या हुआ किसी की कुछ समझ में नहीं आया। बम किसी अराजकतावादी ने फैंका था अथवा किसी उपद्रवी ने, अथवा पूंजीपतियों ने मिलकर हड़ताली नेताओं के विरोध में साजिश रची थी। या किसी सिरफिरे का काम था—इस बारे में अंत तक कुछ पता नहीं चला। हड़बड़ी में पुलिस ने भी फायरिंग शुरू कर दी। उधर मजदूर भी गोलियां बरसाने लगे। बम का धुंआ फैलने से कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था। पुलिस मजदूरों के साथ अपने साथियों पर भी गोली चला रही थी। बदहवासी का वह आलम 2-3 मिनट में समाप्त हो गया। उसके बाद किसी की लाश जमीन पर पड़ी थी। कोई घायलों में अपने मित्र, परिचित या रिश्तेदार को खोज रहा था। कोई खुद घायल पड़ा कराह रहा था। कानून की तरफ से 7 पुलिसकर्मियों की मृत्यु हुई थी। 67 घायल हुए थे35 मजदूरों की ओर से मरने वालों तथा हताहतों की संख्या उससे कई गुना था। परंतु सचमुच कितनी थी, यह कभी पता नहीं चल सका। अगले दिन के अखबारों ने मुख्यपृष्ठ पर उस घटना को जगह दी थी। सभी ने अराजकतावाद को अमेरिकी लोकतंत्र के लिए खतरा बताया था।

आठ अराजकतावादी नेता, अल्बर्ट पार्संस, ऑगस्ट स्पाइस, सेमुअल फील्डेन, ऑस्कर नीबे, माइकल श्वाब, जार्ज एंजिल, एडोल्फ फिशर तथा लुईस लिंग्ग को गिरफ्तार कर दिया गया। आठों मामूली मजदूर और कारीगर थे। अल्बर्ट पार्संस, प्रिंटिंग प्रेस का मजदूर था; और ‘अलार्म’ नाम का अख़बार निकलता गस्ट स्पाइस फर्नीचर तैयार करने वाला बढ़ई। फिशर भी प्रिंटिंग प्रेस में काम करता था। जार्ज एंजिल खिलौने बेचता था। ऑस्कर नीबे के अनुसार, एंजिल मजदूर वर्ग के संघर्ष का एक बहादुर सिपाही था। वह मेहनतकशों की मुक्ति के लिए जीजान लड़ा देने वाला बागी था।’ सेमुअल फील्डेन कारखाने में सामान की ढुलाई करने वाला साधारण मजदूर था। वह कहा करता था, ‘लिखनेपढ़ने वालों के बीच से अगर कोई क्रांतिकारी बन जाए तो आमतौर पर उसे गुनाह नहीं माना जाता। लेकिन अगर कोई गरीब क्रांतिकारी बन जाए तो वह भयंकर गुनाह हो जाता है।’ लुईस लिंग्ग बढ़ई था। विचारों से अराजकतावादी लिंग्ग के क्रांति रग-रग में बसी थी। वह कहा करता था, ‘मजदूरों को दबाने के लिए ताकत का इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए उसका जवाब भी ताकत से ही दिया जाना चाहिए।’ माइकल श्वाब बुकबाइंडर था। ऑस्कर नीबे साधारण मजदूर संगठनकर्ता था। दिल का साफ और सरल। उसकी खमीर बेचने वाली एक दुकान में भागीदारी थी।

आठों पर हत्याओं का आरोप था। लेकिन एक को भी बम फैंकने का आरोपी नहीं बताया गया था। बम वास्तव में किसने फैंका था, यह कभी पता नहीं चल सका। साफ था कि अदालत को उन नेताओं के कारनामे से ज्यादा उनकी विचारधारा से चिढ़ थी। हालांकि केवल ऊपर दिए गए नामों में से मात्र 3 नेता ही घटनास्थल पर मौजूद थे। बावजूद इसके जज जोसेफ ई. गैरी की अध्यक्षता में जूरी का गठन किया गया था, जो एक प्रतिक्रियावादी राजनेता था। अदालत ने उन सभी को फांसी की सजा सुनाई। यह वही अमेरिका था जिसने अपने संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ससम्मान अपने संविधान में जगह दी थी, और उसके लिए अपनी पीठ थपथपाता था। उसी अमेरिका में 8 लोगों को फांसी की सजा इसलिए सुनाई गई थी, क्योंकि वे खास विचारधारा में विश्वास रखते थे। लोकतांत्रिक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सबसे बड़े दावेदार अमेरिका के लिए तो वह कलंक जैसा था यह हुआ क्योंकि वहां का लोकतंत्र पूंजीपतियों के कब्जे में जा चुका था। जूलिस ग्रिनेल्ल जिसकी राजनीतिक संपर्क किसी से छिपे न थे, को मुदकमे का एटोर्नी बनाया गया था। जूरी के सामने अपने तर्क का समापन उसने इन शब्दों में किया था—

यह कानून की परीक्षा है, अराजकता की परीक्षा है। इन लोगों को जिन्हें सामने लाया गया है, जिन्हें इस महान जूरी द्वारा अभियुक्त ठहराया गया है, और चिन्हित किया गया है, क्योंकि वही नेता थे। ये उन हजारों लोगों से बड़े अपराधी नहीं हैं जो इनका अनुसरण करते हैं। जूरी के माननीय सदस्यो, इन लोगों को दंडित करो। फांसी पर लटकाकर इन्हें दूसरों के लिए नजीर बनाओ, और हमारी संस्थाओं और हमारे समाज की रक्षा करो36

11 नवंबर 1887 को पार्सन्स, स्पाइस, जार्ज एंगेल्स और एडोल्फ फिशर को मृत्युदंड दे दिया गया। लुईस लिंग्ग ने जल्लाद को फांसी लगाने का मौका तक नहीं दिया। उसने अपने मुंह में विस्फोटक दबाकर खुद को उड़ा दिया था। विस्फोटक सिगार की आकृति में लाया गया था। लाने वाला लिंग्ग का करीबी दोस्त था। जिस दिन उन्हें दफनाया गया, उस दिन उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए 600000 लोग शिकागो की सड़कों पर थे। फील्डेन, नीबे और श्वाब की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया। पूंजीवादी मीडिया ने, जिसे बुद्धिजीवियों ने मुख्यधारा का मीडिया कहना आरंभ कर दिया था, अराजकतावाद, समाजवाद आदि की इतनी आलोचना की कि इन्हें अमेरिका के लिए निषिद्ध मान लिया गया। मुदकमें के दौरान आठों अभियुक्तों को अदालत को संबोधित करने का अवसर मिला था। फील्डेन ने तीन घंटे समाजवाद सहित मजदूरों की समस्या पर भाषण दिया था। उसने कहा था—

‘‘आज, ठंडी मनभावन हवाओं के साथ शरत्काल की रुपहली किरणें हर आजाद ख्याल इंसान के चेहरे को स्पर्श कर रही हैं। लेकिन मैं यहां अपने चेहरे को फिर कभी सूर्य-रश्मियों में स्नान न कराने के लिए खड़ा हूं। मैं अपने साथियों से प्यार करता हूं। मैं अपने आप से प्यार करता हूं। मैं धोखेबाजी, बेईमानी और अन्याय से नफरत करता हूं। यदि इससे कुछ भला होगा, तो मैं मुक्त भाव से इन्हें अपना लूंगा।’

स्पाइस का भाषण जोशीला था—

यदि तुम सोचते हो कि हमें फांसी पर चढ़ा देने से तुम मजदूर आंदोलन को दबा दोगे, तब बुलाओ अपने जल्लाद को….तुम इसे नहीं समझ सकते।’

नीबे;

ठीक है, यह सब अपराध था मैं मान लेता हूं: मैंने मजदूर आंदोलनों को संगठित किया था। मैं कार्यघंटों को सीमित कराने को, मजदूरों की शिक्षा को, श्रमिकों के अखबार दाई आर्बीटर जाइटुंग को नए सिरे से आरंभ करने को समर्पित था। इसका कोई प्रमाण नहीं है कि बम फेंकने से मेरा कोई संबंध है, या मैं उसके पास था, या मैंने कुछ वैसा किया था।’

फिशर;

इन मांगों के लिए जितने ज्यादा लोग फांसी पर चढ़ाए जाएंगे, विचार उतनी ही जल्दी हकीकत बन जाएंगे

पार्संस;

मैं उनमें से एक हूं, यद्यपि मैं वृत्तिकदास हूं, जो मानता है कि यह मेरे लिए अपराध है, मेरे पड़ोसी के लिए गलत है….मेरे लिए यह….गुलामी से पीछा छुड़ाने अपना स्वामी आप बनने के लिए था….अनंत आकाश के नीचे यह मेरा इकलौता अपराध है।

एंजिल;

मैं भी ऐसे बहुत कुछ ऐसे व्यक्ति की तरह हूं, वर्तमान से टकराने से बचने की सोचता है। प्रत्येक विचारशील व्यक्ति को ऐसी सत्ता से जूझना चाहिए तो एक आदमी को कुछ ही वर्षों में विलासी और जमाखोर बना देती है, दूसरी ओर हजारों बेरोजगार आवारा और भिखमंगे बना दिए जाते हैं।’

श्वाब ने अराजकतावाद को परिभाषित करते हुए कहा था—

ऐसे समाज में जिसमें केवल सरकार को नीतिसंगत कहा जाता हो, ऐसे समाज में(बदल देना) जिसमें सभी मनुष्य सामान्य हितों के लिए नीतिसंगत कार्य करें और ऐसी चीजों से घृणा करें जो सचमुच घृणा के योग्य हैं

लिंग्ग पूरी अदालती कार्रवाही के दौरान सबसे निर्भीक सबसे विद्रोही बनकर उभरा था। अपने दिलेर और तिरस्कारपूर्ण भाषण में उसने कहा था—

मैं फिर याद दिलाता हूं कि मैं आज के ‘कानून’ का दुश्मन हूं। और मैं फिर से यह दोहराता हूं कि जब तक भी मेरे शरीर में सांस रहेगी, अपनी पूरी शक्तियों के साथ में इससे जूझता रहूंगा। मैं साफ तौर पर, सबके सामने कहता हूं कि मैं बलप्रयोग का हिमायती था। मैंने कैप्टन स्काक से कहा था(जिसने उसे गिरफ्तार किया था) और मैं आज भी उसपर कायम हूं, ‘यदि तुम हम पर गोली चलाओगे, हम तुम्हें बम से उड़ा देंगे। ओह! तुम्हें हंसी आ रही है! शायद तुम सोचते हो, ‘तुम और ज्यादा बम नहीं फेंक सकते।’ परंतु मुझे यह विश्वास है कि मैं फांसी के फंदे पर पर भी इसी तरह खुशी-खुशी चढ़ जाऊंगा और मुझे आपको आश्वस्त करना चाहिए कि सैकड़ों, हजारों लोग ऐसे होंगे जो मेरे इन शब्दों को याद रखेंगे, वे बम फैंकना जारी रखेंगे। इस उम्मीद के साथ मैं आपको कहना चाहूंगा कि मैं आपसे घृणा करता हूं! आपके ‘आदेश’ आपके कानून, बलप्रयोग पर टिकी आपकी सत्ता से नफरत करता हूं। इसके लिए मुझे फांसी पर लटका दिया जाए।’

उन आठों ने अदालत के सामने जो कहा था, वह मुख्यधारा के अखबारों में ठीक उसी भावना के साथ भले ही न आया हो, लेकिन बाद में इश्तहारों, पर्चों और पोस्टरों के रूप में लोगों के बीच फैल गया आज भी उनके विचार लोगों को प्रभावित करते हैं दुख की बात यह नहीं है कि लाखों मजदूरों के समर में उतरने के बावजूद अमेरिका में 1 मई, 1886 की क्रांति की नाकाम क्यों रही थी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जिस अमेरिका ने अब्राह्मम लिंकन के नेतृत्व में दासता को शिकस्त दी थी जिसके पास थॉमस जेफरसन और मानव थॉमस पेन ने द्वारा तैयार किया गया आधुनिकतम संविधान था ऐसा संविधान जो नागरिक अधिकारों को राज्य के अधिकारों जितना ही महत्त्व देता था—वह सातआठ दशक के भीतर ही वह अप्रासंगिक क्यों होने लगा था क्यों उनके विरुद्ध मजदूरों को कामगारों को खड़ा होना पड़ा जो लोकतंत्र से सर्वाधिक उम्मीद पाले रहते हैं, और जिन्हें उसकी सर्वाधिक आवश्यकता पड़ती है—वहां अराजकतावाद को जमीन कैसे मिली इस प्रश्न का उत्तर कुछ जटिल हो सकता है लेकिन यदि हम इसका उत्तर खोज लें तो भारतीय समाज में उभर रहे असंतोष, जिसे कुछ लोग भीड़तंत्र भी कह रहे हैं, का जवाब मिल सकता है

इस बारे में हम अभी सिर्फ इतना कहना आवश्यक समझते हैं कि अराजकतावाद लोकतंत्र का पुरोगामी दर्शन हैं। लोकतंत्र को न संभाल सकने वाली जनता, अराजकतावादी समाज गढ़ ही नहीं सकती। उसे संभालने के लिए लोकतंत्र से कहीं अधिक प्रबुद्ध जनता चाहिए। उस अवस्था में सत्ता परिवर्तन के लिए हिंसा गैर जरूरी हो जाती है। दूसरे शब्दों में अराजकतावाद का रास्ता लोकतंत्र की बहुविध सफलता से निकल सकता है। ऐसे लोकतंत्र से जो अपने नागरिकों के प्रबोधीकरण को भी आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक विकास जितना ही महत्त्व देता है। अमेरिकी क्रांति की असफलता के पीछे भी उसमें हिस्सेदारी कर रहे नेताओं तथा उनके अनुयायियों की अधूरी समझ थी। वे राज्य की आवश्यकता को समाप्त करने के बजाय, राज्य को ही समाप्त कर देना चाहते हैं। जबकि अराजकतावाद में राज्य समाप्त नहीं होता, अपनी खूबियों के साथ वह नागरिकों के रोजमर्रा के व्यवहार का हिस्सा बन जाता है। वह नागरिकीकरण की उच्चतम अवस्था है। इस बात को शिकागो के भोले-भाले मजदूर समझ ही नहीं पाए थे। इसलिए पूंजीवाद के शिकंजे में जकड़े हुए अमेरिकी राज्य की शक्ति द्वारा कुचल किए गए। अच्छा जनतंत्र चलाने की जिम्मेदारी नेताओं से ज्यादा जनता की होती है। जो जनता नेताओं पर जितनी कम निर्भर होगी, वह उतनी ही लोकतांत्रिक बन सकेगी
अमेरिका में 8 घंटे के कार्यदिवस की मांग 1836 से आरंभ हुई थी। 1864 में वह अमेरिकी मजदूरों की प्रमुख मांग बन चुकी थी। आखिरकार 1916 एडमसन एक्ट के माध्यम से अमेरिका रेलरोड वर्कर्स के लिए पहली बार 8 घंटे का कार्यदिवस लागू किया गया। फैक्ट्री मजदूरों को यह अधिकार मिला, फेयर लेबर स्टेंडर्डस् एक्ट—1938 के लागू होने के बाद। इस तरह से देखा जाए तो 8 घंटे के कार्यदिवस के लिए मजदूरों को एक शताब्दी से भी लंबा संघर्ष करना पड़ा था। चलतेचलते एक अवांतरसी चर्चा अमेरिका में धर्मसंसद का आयोजन 1893 में किया गया था कहा यह गया था कि धर्मसंसद का आयोजन क्रिस्ठोफर कोलंबस के अमेरिकी महाद्वीप पर पहुंचने की 400वीं सालगिरह के तौर पर मनाया गया था लेकिन क्या यही एकमात्र कारण था? ध्यान रहे कि हेमार्केट नरसंहार के दौरान ज्यादा नुकसान मजदूर पक्ष को उठाना पड़ा था लेकिन उससे न तो मजदूर अपनी मांगों को लेकर पीछे हटे थे न वहां समाजवादी आंदोलन में कमी आई थी फिर 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग और धर्मसंसद का क्या संबंध? सही मायने में तो यह शोध का विषय है। लेकिन जो लोग धर्म के अभिजन चरित्र को जानते हैं, जिन्होंने वोलनी, मोसका और परेतो को पढ़ा है, उनके लिए इस पहेली को सुलझा पाना कठिन नहीं होगा। आखिर क्या कारण है कि जिस अमेरिका में 8 घंटे के कार्यदिवस की मांग के समर्थन में सबसे बड़ी वर्गक्रांति ने जन्म लिया था, उस देश में वह मांग 1937 में मानी गई, जबकि दुनिया के छोटेबड़े दर्जनों देश 191819 में ही इसे मान चुके थे?
© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

1. अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग, दि हिस्ट्री ऑफ़ मे डे, इंटरनेशनल पंपलेट, 14, 799 ब्रोडवे, न्यू यार्क, पृष्ठ 3

2. वही पृष्ठ 3

3. वही, पृष्ठ 3

4. वही, पृष्ठ 4

5. जे. डेविड सेकमेन, मे डे एंड दि स्ट्रगल फॉर दि एट आवर डे इन कैलीफोर्निया

6. अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग, दि हिस्ट्री ऑफ़ मे डे, इंटरनेशनल पंपलेट, 14, 799 ब्रोडवे, न्यू यार्क, पृष्ठ 6

7. कार्ल मार्क्स, पूंजी, अध्याय 10, प्रोग्रेस पब्लिशर, मास्को, 2015, पृष्ठ 162,

8. संपत्ति क्या है? पियरे जोसेफ प्रूधों

9. मिखाइल बकुनिन, लेटर टू फ्रेंचमेन, ऑन दि प्रजेंट क्राइसिस, 1870

10. अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग, दि हिस्ट्री ऑफ़ मे डे, इंटरनेशनल पंपलेट, पृष्ठ 8

11. पॉल एवरिच, दि हेमार्किट ट्रेजेडी, प्रिंस्टन यूनीवर्सिटी प्रेस, पृष्ठ 182

12. पॉल एवरिच, पृष्ठ 182

13 अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग, दि हिस्ट्री ऑफ़ मे डे, इंटरनेशनल पंपलेट, 14, 799 ब्रोडवे, न्यू यार्क। पृष्ठ 10

14 दि इकोनॉमिक्स पर्फोमेंस इंडेक्स, इंटरनेशनल मोनेटरी फंड, वादिम खरामोव एंड जॉन राइडिंग्स ली, अक्टूबर 2013

15. माइकल हुबरमेन, वर्किंग हावर्स ऑफ़ दि वर्ल्ड यूनाइट?, न्यू इंटरनेशनल एवीडेंस ऑन वर्कटाइम, 1870-1900, पृष्ठ-19

16. डेविड मोबर्ग, एंटीयूनियनिज्म, एन्साइक्लोपीडिया ऑफ़ शिकागो, http://www.encyclopedia.chicagohistory.org/pages/55.html

17. जेनिस एल. रीफ, प्रेस एंड लेबर इन 1880, एन्साइक्लोपीडिया ऑफ़ शिकागो, http://www.encyclopedia.chicagohistory.org/pages/11407.html

18. अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग, दि हिस्ट्री ऑफ़ मे डे, इंटरनेशनल पंपलेट, 14, 799 ब्रोडवे, न्यू यार्क, पृष्ठ 10-11.

19. ऐरिक चेज द्वारा उद्धृत, दि ब्रीफ ओरीजिंस ऑफ़ मे डे, 1993

20. लुईस एडामिक, डायनामाइट : स्टोरी ऑफ़ क्लास वायलेंस इन अमेरिका, 1931, पृष्ठ-69

21. लुईस एडामिक, पृष्ठ-69

22. न्यू यार्क टाइम्स, 20 जुलाई 1886

23. पॉल एवरिच, दि हेमार्किट ट्रेजेडी, पृष्ठ 75

24. पॉल एवरिच, दि हेमार्किट ट्रेजेडी, पृष्ठ 75

25. ऐरिक चेज द्वारा उद्धृत, दि ब्रीफ ओरीजिंस ऑफ़ मे डे, 1993(कुछ स्थानों पर यह संख्या 400000 दी है)

26. अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग, पृष्ठ-11

27. मिशेल जे. स्काक, अनार्की एंड अनार्किस्ट, एफ. जे. स्कल्ट एंड कंपनी, न्यू यार्क, 1889, पृष्ठ-83

28. अनार्किस्ट ओरीजिन ऑफ़ मे डे, लीफलेट बाई वर्कर्स सोल्डरिटी मूवमेंट.

29. हॉवर्ड फ़ास्ट, शिकागो के शहीद मजदूर नेताओं की कहानी, राहुल फाउंडेशन, पृष्ठ-16

30. लुईस एडामिक, डायनामाइट : स्टोरी ऑफ़ क्लास वायलेंस इन अमेरिका, 1931, पृष्ठ-70

31. लुईस एडामिक, डायनामाइट, पृष्ठ-71

32. लुईस एडामिक, डायनामाइट, पृष्ठ-71

33. लुईस एडामिक, डायनामाइट, पृष्ठ-71

34. लुईस एडामिक, डायनामाइट, पृष्ठ-74

35. उपर्युक्त, पृष्ठ-74

36. उपर्युक्त, पृष्ठ-72

सभ्यता का विकास और कहानी

सामान्य

मनुष्य और किस्सागोई के नजदीकी संबंध के तीसचालीस हजार वर्ष पुराने पुख्ता प्रमाण आज मौजूद हैं. बावजूद इसके कहानी कला के उद्गम की खोज के लिए यह अवधि बहुत नई है. हिमयुग की दहलीज पर ही मनुष्य समय बिताने, अनुभव साझा करने तथा संघर्षपूर्ण जीवन में मनोरंजन की भरपाई के लिए किस्सेकहानियों का सहारा लेने लगा था. तब तक वह अक्षरज्ञान से अनभिज्ञ था. बाकी कलाएं भी अल्पविकास की अवस्था में थीं. खेती करना तक उसे नहीं आता था. पूरी तरह प्रकृतिआधारित जीवन में भोजन जुटाने का एकमात्र रास्ता थाशिकार करना. किसी कारण उसमें सफलता न मिले तो प्राकृतिक रूप से उपलब्ध भोजन यथा कंदमूलफल आदि पर निर्भर रहना. प्राकृतिक आपदाओं, वनैले जीवों से भरपूर घने जंगलों में जैसे भी संभव हो, अपनी सांगठनिक एकता एवं संघर्ष के बल पर खुद की रक्षा करना. अपने संगठनसामथ्र्य एवं परिस्थितिकीय सामंजस्य के हुनर के दम पर प्राचीन मनुष्य उन चुनौतियों से जूझता था. कभी सफल होता था, कभी असफल. प्राचीन वनाधारित यायावरी जीवन की वे सामान्य विशेषताएं थीं. उसमें जीतहार लगी ही रहती थी. जीवन का हर नया अनुभव उसे रोमांचित करता. यदाकदा हताशा के क्षण भी आते, किंतु मानवीय जिजीविषा के आगे उनका लंबे समय तक ठहर पाना संभव न था. या यूं कहो कि बुरे सपने की तरह उन्हें भुलाकर वह यायावर कर्मयोगी तुरंत आगे बढ़ जाता था. कठोर संघर्षमय जीवन तथा अनूठेपन से भरपूर अनिश्चितसी स्थितियां मानवीय कल्पनाओं के नित नए वितान तैयार करती थीं. उन्हें सहेजकर दूसरों तक पहुंचाने, उनके माध्यम से समूह का मनोरंजन करने की चाहत ने किस्सेकहानियों को जन्म दिया.

उस समय तक मनुष्य का स्थिर ठिकाना तो बना नहीं था. धरती का खुला अंचल और प्रकृति की हरियाली गोद उसे शरण देने को पर्याप्त थी. जंगल में शिकार का पीछा करते हुए आखेटी दल का यदाकदा दूर निकल जाना; अथवा लौटते समय रास्ता भटककर जंगलों में खो जाना बहुत सामान्य बात रही होगी. फिर भी आखेट के लिए गए लोगों के वापस लौटने तक उनके वे परिजन जो बीमारी, वृद्धावस्था अथवा किसी अन्य कारण से आखेट पर न जा पाए हों, उनकी प्रतीक्षा में परेशान रहते होंगे. आकुल मनस्थितियों में समय बिताने के लिए समूह के सदस्यों के साथ अनुभव बांटना, धीरेधीरे एक लोकप्रिय चलन बनता गया. मनोरंजन की उत्कट चाहत, जो उस संघर्षशील जीवन की अनिवार्यता थी, उत्पे्ररक का काम करती थी. आखेटी दल के लौटने पर समूह के बीच हर बार नए अनुभवों के साथ कुछ नए किस्से भी जुड़ जाते थे. अभियान सफल हो या असफल, आखेट से लौटे सदस्यों के पास अपने परिजनों को सुनाने के लिए भरपूर मसाला होता था. उनमें से कुछ वर्णन निश्चय ही दुख और हताशा से भरे होते होंगे, जिन्हें सुनकर समूह के सदस्यों की आंखें नम हो आती होंगी. फिर भी वे उनके यायावर जीवन का जरूरी हिस्सा थे और परिवार नामक संस्था के अभाव में, उन्हें एक होने की प्रतीति कराते थे. इसलिए शाम को भोजन के बाद अथवा फुर्सत के समय दिनभर के रोमांचक अनुभवों का पिटारा समूह के सदस्यों के आगे खोल दिया जाता. उन्हें सुनने के लिए बूढ़ोंबच्चों सभी में होड़ मच जाती होगी.

सुनाने के लिए शुरूशुरू में सीधेसपाट वर्णन का सहारा लिया जाता होगा. जैसेजैसे अनुभव बढ़ा, घटना को रोमांचक एवं मनोरंजनपूर्ण बनाने के लिए कल्पना का सहारा लिया जाने लगा. जो व्यक्ति घटनाओं को लुभावने अंदाज में सुनाने में सिद्ध होता, समूह उसकी बातें सुनने को उत्सुक रहता. उसको विशिष्ट सम्मान देता था. लंबे संघर्षपूर्ण जीवन के पश्चात, वृद्धावस्था को प्राप्त लोगों के लिए भी अपने पिछले जीवन के शौर्यपूर्ण किस्से सुनाना समय बिताने का एकमात्र जरिया रहा होगा. किस्सागोई की नींव ऐसे ही अनुभवसिद्ध लोगों द्वारा रखी गई. मनोरंजन की जरूरत के चलते लोग उनके पास आते. चूंकि उनके पास अनुभवों का विशाल खजाना होता था, इसलिए वे उनके साथ ससम्मान पेश आते थे. उस समय तक मनुष्य का जीवन स्वेच्छाचारी था. समाज का विधिवत गठन अभी नहीं हो पाया था. लेकिन किस्सेकहानी तथा दूसरी विकासमान कलाओं के प्रभाव में रागात्मक संबंध स्थायी रूप लेने लगे थे. इससे समूह की, बाद में जब समूह के सदस्यों की संख्या बढ़ने लगी तो परिवार की संकल्पना ने जन्म लिया. स्पष्ट है कि किस्सेकहानियां मनुष्य के समाजीकरण के न केवल साक्षी, बल्कि उत्पे्ररक और सहायक भी बने थे. फिर जैसेजैसे समाज बढ़ा, वैसेवैसे किस्सेकहानियों के रूपकलेवर में भी बदलाव आता गया. आरंभिक कहानियां व्यक्ति के रोजमर्रा के अनुभवों से उपजी सत्यकथाएं अथवा थोड़ीबहुत बढ़ाचढ़ाकर पेश की गईं कल्पकथाएं ही थीं. उनमें रहस्यरोमांच, हर्षविषाद, सुखदुख, करुणामैत्री, मिलनबिछोह, साहसउत्साह के साथसाथ मनुष्य की आदिम जिज्ञासाओं, प्रवृत्तियों, भावनाओं और कल्पनाशीलता की सहज और युगानुकूल अन्विति थी. कह सकते हैं कि कहानी कला दुनियाभर की उन आरंभिक कलाओं में से है जो सभ्यता के एकदम आदिम छोर पर, जीवन की धड़कनों के बीच स्वाभाविक तौर पर विकसी थीं. उसकी उत्पत्ति के मूल में यद्यपि मनोरंजन प्रमुख तत्व था, तथापि कहानी सहित विभिन्न कलाभिव्यक्तियों के विकास का एकमात्र वही अभिप्रेत नहीं था. उन कलारूपों के विकास के पीछे मनुष्य की ज्ञान की ललक, अपनी मौलिक कल्पना द्वारा उन्हें नए कलेवर में ढालकर अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की दृढ़ इच्छाशक्ति तथा उनसे कुछ सीखने, सिखाने एवं स्वयं को दैनंदिन के समर हेतु तैयार रखने की कामना सन्निहित थी

उनका नृत्य, जिसमें संभवतः कुछ लोग टोटम पशु की नकल उतारते थे, कुछ शिकारियों की, एक धर्मानुष्ठान के साथसाथ, आखेट का अभ्यास भी था. वह एक प्रकार से आखेट विधि की कवायद ही थी. इसी से कई हजार वर्ष पश्चात नृत्यनाट्य(वले) और नाटक का विकास होने वाला था. हिमयुग में जंगली पशुओं के जो हुबहू चित्र तैयार किए गए थे(फ्रांस एवं स्पेन की गुफाओं में) उन्हें अब अनुपम कलाकृतियां समझा जाता है. परंतु मूलतः ये चित्रकला की विशेष भावना से तैयार नहीं किए गए थे. जहां दिन का उजाला नहीं पहुंच सकता, ऐसी अंधेरी गुफाओं में ये चित्र चरबी से जलने वाले मंद दीपों या मशालों की रोशनी में तैयार किए गए थे. उत्कृष्ट पशु प्रतिमाओं का इस्तेमाल, जैसा कि इनपर भालों और तीरों से बने हुए छेदों से पता चलता है, लक्ष्यभेद के आनुष्ठानिक अभ्यास के लिए होता था.’

प्राकृतिक घटनाओं में एक नैरंतर्य एवं तारतम्यता रहती है. आरंभिक कहानियां उसी से अनुप्रेत थीं. प्रकृति की भांति कहानी के भी कई रंग थे. सुख हो या दुख, कहानी जीवन में प्रत्येक क्षण मनुष्य के साथ थी. उथलपुथल भरे उसके जीवन में नए किस्सेकहानी का बानक बन ही जाता था. घने जंगल तथा मौसम की विकट परिस्थतियों में, लंबे आखेट के उपरांत ठिकाने पर सकुशल लौट आना भी कम उत्सवधर्मी घटना न थी. हर्ष अथवा शोक के ऐसे समविषम क्षणों में आखेटकुशल पूर्वजों की वीरता, साहस, विपत्ति एवं त्रासदियों के किस्से खासे लोकप्रिय होते होंगे. स्वाभाविक रूप से ऐसे किस्सों को बारबार सुनासुनाया जाता होगा. सुनाते समय प्रत्येक व्यक्ति उन्हें अपनी तरह से प्रस्तुत करता. प्रस्तुतीकरण के दौरान वह श्रौत कथानक में अपनी रुचि के अनुसार कुछ न कुछ जोड़ताघटाता रहता था. फलस्वरूप समय के साथ उनमें कल्पना का पुट बढ़ता गया. कल्पना को गति देने में वातावरण एवं प्रकृति का योगदान कम न था. खुले, तारों से भरे आसमान, तरहतरह की वनवनस्पतियों, जंगली जानवरों, नदियों, पहाड़ों, झरनों आदि से भरे भूमांचल में बहुतसी बातें मनुष्य को प्रभावित करती थीं. आरंभिक कहानियां सत्यकथाओं के करीब थीं. रोजमर्रा के अनुभवों में मनुष्य को जो भी विचित्र लगता, उसे सहेजने के लिए वह कहानीकिस्सों में ढाल लेता था. उसको धीरेधीरे एहसास हुआ होगा कि सीधेसपाट ढंग से कहने की अपेक्षा प्रतीकों के रूप में बयान की गई घटना अधिक संप्रेषणीय होती है. उसका प्रभाव दीर्घकालिक होता है. उसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक, एक समाज से दूसरे भिन्न परिस्थितियों में रह रहे समाज तक, पहुचाने में आसानी रहती है. पात्रों एवं घटनाओं का प्रतीकीकरण इसलिए भी आवश्यक था, क्योंकि सुनिश्चित ठिकाने के अभाव, मौसम की मार और भोजन की जरूरत के चलते उसके यायावरी जीवन में प्रायः परिवर्तन होता रहता था. अतएव ऐसे पात्रों और घटनाओं का समावेश जरूरी था, जिनकी विभिन्न परिस्थितियों तथा कबीलाई समूहों के बीच अधिकतम स्वीकार्यता हो. इसके लिए नए कल्पनालोक गढ़े गए, ताकि मनुष्य के भौतिक आवत्र्तनप्रत्यावर्तन का उसके द्वारा गढ़े गए किस्सेकहानियों, जो तब तक उसकी जीवनसंस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन चुके थे, की विश्वसनीयता पर कोई संकट न पड़े. समाजीकरण के आरंभिक दौर में मनुष्य यह भी समझ चुका था कि समूह की एकता को बनाए रखने हेतु जीवनमूल्यों में स्थायित्व होना चाहिए. इसके लिए भी किस्सेकहानी मददगार बने. बढ़ते अनुभवों एवं कल्पनाशक्ति के फलस्वरूप मानवअभिव्यक्ति में प्रतीकात्मकता एवं गुणवत्ता में निखार आता गया. संघर्षपूर्ण जीवन में कल्पना और प्रतीकात्मकता से भरे किस्सों की अपनी उपयोगिता थी. प्रतीकों ने वर्णन को रोचक बनाया. उनके माध्यम से बात समझाना आसान था. एक कहानी के माध्यम से इसको आसानी से समझा जा सकता है

एक लकड़हारा था. बहुत ही चतुर और बुद्धिमान. उसके साथी उसकी अक्लमंदी का लोहा मानते थे. एक बार की बात लकड़हारा जंगल में लकड़ी काटने निकला. वहां एक सूखे पेड़ को देख उनकी बांछें खिल गईं. पेड़ बड़ा था. उसकी लकड़ी को अकेले घर ले जाना संभव न था. कुछ सोचकर उसने जंगल से ही कुछ मजदूर दिहाड़ी पर ले लिए. काम को जल्दी निपटाने के फेर में वह पेड़ पर चढ़ा और जल्दीजल्दी कुल्हाड़ी चलाने लगा. हड़बड़ी में कुल्हाड़ी का बेंट तने से टकराया और ‘खटाक्!’ कुल्हाड़ी हत्थे से अलग हो दूर जा गिरी.

उफ्!’ उसके मुंह से निकला, ‘काश! एक कुल्हाड़ी और ले आता.’ वह बड़बड़ाया. चेहरे पर परेशानी झलकने लगी

अब क्या करें उस्ताद?’ एक मजदूर ने इशारे में पूछा. लकड़हारा सोच में पड़ा था. वह खाली हाथ घर नहीं लौटना चाहता था. उपाय एक ही था, घर से नई कुल्हाड़ी मंगवाई जाए. कटी हुई लकड़ी को छोड़ वह खुद जाना न चाहता था. तब लकड़हारे ने निर्णय लिया कि किसी मजदूर को घर भेजकर कुल्हाड़ी मंगवा ली जाए. पर भेजा किसे जाए? नौकरों को उसकी भाषा आती न थी. और पत्नी थी अनपढ़. चैकाचूल्हे में रमी रहने वाली.

खूब सोचविचार के बाद उसने एक पत्थर मंगवाया. उसपर खडि़या मिट्टी से कुछ रेखाएं खींचीं और मजदूर को थमा दिया. मजदूर गया. लौटा तो उसके हाथ में नई कुल्हाड़ी थी. लकड़हारा तो काम में जुट गया. मगर साथ काम कर रहे मजदूरों की समझ में कुछ न आया. यह कैसे संभव हुआ कि लकड़हारे की पत्नी ने बिना कुछ पूछे नई कुल्हाड़ी उसके हाथ में थमा दी. जरूर वह कोई जादू जानता है. जबकि जादू जैसी कोई बात संभव ही नही है. लकड़हारे ने पत्थर पर कुल्हाड़ी का चित्र बनाकर मजदूर को दिया था. उस संकेत को समझकर उसकी पत्नी ने उसको कुल्हाड़ी थमा दी थी.

जाहिर है कि कहानीकला के विकास के साथ उसके स्थूल कथानक का महत्त्व घट रहा था. धीरेधीरे लोग यह समझने लगे थे कि कहानी के पात्रों और घटनाओं की महत्ता सामान्यतः मनोरंजन तत्व को विस्तार देने तक सीमित है, असली चीज वह संदेश है, जिसे लोककल्याण के वास्ते सहेजना जरूरी है. कालांतर में समाज में ऐसी कहानियों तथा प्रतीकों का महत्त्व बढ़ता ही गया. नएनए प्रतीकों को जोड़ने के लिए मनुष्य ने अपनी कहन की कला का विस्तार किया. मनुष्य की आदिम सहयोगी बनीं वे कहानियां इतनी उपयोगी और महत्त्वपूर्ण मानी गईं कि मनुष्य उन्हें न केवल सुनतासुनाता था, बल्कि उन्हें सहेजने का भी प्रयत्न करता था. फ्रांस और स्पेन की सीमा पर मौजूद लेस्काक्स की रहस्यमयी कंदराओं में बनीं अनूठी चित्रमालाओं से सिद्ध होता है कि अपने अनुभवों और कल्पनाओं को स्थायी बनाने के लिए प्राचीन मनुष्य कितना सजग था. उन चित्रमालाओं के अध्ययन से यह भी सामने आया है कि उन कलाभिव्यक्तियों का उद्देश्य केवल मनःरंजन तक सीमित नहीं था, बल्कि उनका उपयोग नवांतुक पीढ़ी को जंगल की परिस्थितियों का बोध कराने तथा किशोर शिकारियों को आखेटकला में प्रवीण बनाने के लिए भी किया जाता था. जिन दीवारों पर ये चित्रमालाएं हैं, वहां कुछ निशान भी पाए गए हैं, जो तीर, भाले अथवा किसी नुकीले हथियार के हो सकते हैं. उनसे प्रतीत होता है कि आदिमानव समूह के सदस्य उनका उपयोग निशाना साधने के लिए भी करते थे. आदिमानव द्वारा वे चित्र गुफाओं में, चट्टानों तथा ऐसे सुरक्षित एवं बहुगंतव्य ठिकानों पर बनाए गए, जिधर आदिमसमूहों का निरंतर आनाजाना था. उद्देश्य यही था कि कबीले के सदस्य तथा नवांतुक कबीले वहां ठहरकर मनःरंजन के साथसाथ आखेटकला की भी एकांतसाधना कर सकें. वन्य जीवों से भरे जंगल में, जहां कदमकदम पर खतरनाक स्थितियां और जीवन की चुनौतियां हों, आखेट हेतु निर्विघ्न अभ्यास के लिए ऐसे सुरक्षा प्रबंध अपरिहार्य थे. लेस्काॅक्स और आसपास की पहाडि़यों में बने पांच सौ से अधिक चित्रों से पता चलता है कि कभी वहां पर अलगअलग कालखंड के दौरान प्राचीन मनुष्य की अनेक टुकडि़यों ने बसेरा किया था. आखेट के अभ्यास के अलावा वे भित्तिचित्र उनके मनोरंजन की कमी को भी पूरा करते होंगे. शोध के अनुसार इन चित्रावलियों की रचना अलगअलग समय में की गई. इसी प्रकार की चित्रावलियां मध्यप्रदेश के विंध्यांचल और सतपुड़ा की पहाडि़यों में भी मिलती हैं. इनमें सबसे उल्लेखनीय नाम भीमबैठका का है. भोपाल से 40 किलोमीटर दक्षिण में स्थित भइयापुर गांव के आसपास मौजूद पहाडि़यां कभी आदिवासियों का ठिकाना थीं. यहां पहाडि़यों पर मनुष्य की प्राचीनतम कलाभिव्यक्तियों के निशान मौजूद हैं. इस विश्वधरोहर को दुनिया के सामने लाने का श्रेय विक्रम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विष्णु श्रीधर वाकणकर को जाता है. शोध बताते हैं कि प्रस्तर काल में यहां बड़ी संख्या में आदिम मनुष्यों का बसेरा था. एक पूरी बस्ती. लगभग 750 शैलआश्रयों में से 500 शैलआश्रयों में गेरुए, लाल, सफेद हरे, कहींकहीं पीले और हरे रंग में चिंत्रों की लंबी शृंखला है. जिनमें बाघ, शेर, घडि़याल, कुत्ते, हाथी, नीलगाय आदि जानवरों को चित्रित किया गया है. इन चित्रावलियों की सटीक उम्र का आकलन तो अभी बाकी है, किंतु अभी तक जो शोध हुए हैं, उनके अनुसार प्राचीन मनुष्य की अभिव्यक्ति कला के वे अवशेष 15000 से 35000 वर्ष तक पुराने हैं. भारत के अलावा फ्रांस, स्पेन, आस्ट्रेलिया आदि में भी इसी प्रकार के चित्र प्राप्त हुए हैं. ये सभ्यता के उभार के एकदम आरंभिक दौर को सामने लाते हैं, जब मनुष्य ने अपनी स्मृति और कलाओं को सहेजने के प्रयास संभवतः शुरू ही किए थे.

स्पष्ट है कि कहानीकला मनुष्य की प्राचीनतम खोज है. वह तब से मनुष्य के साथ है, जब तक मनुष्य किसी ज्ञात सभ्यता के प्रभाव से दूर था. वह मनुष्य के सभ्यताकरण की साक्षी, उसकी प्रेरक और अनुगामिनी रही है. कहानीकला को विस्तार देने, कहानियों को और अधिक रोचक एवं कल्पनाप्रधान बनाने की कोशिश में मनुष्य अपनी रचना के साथ नित नए प्रयोग करता गया. आरंभिक किस्सेकहानियों के पात्र मनुष्य के अनुभव जगत से सीधे जुड़े पशुपक्षी तथा वन्यप्राणी होते होंगे. उनमें भी ऐसे पशुपक्षियोंवन्य प्राणियों की संख्या अधिक रहती होगी, जो किसी न किसी प्रकार उनके सहयोगी थे अथवा जिनसे खतरे की संभावना होने के कारण बचाव की जरूरत थी. उस समय तक लिपि का आविष्कार नहीं हुआ था. अतएव तत्कालीन भावाभिव्यक्तियों के स्वरूप का सटीक अनुमान लगा पाना तो असंभव है, तथापि भित्तिचित्रों तथा उस समय की अन्य कलाभिव्यक्तियों द्वारा हम आसानी से इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि वे सब विपरीत परिस्थितियों में हिम्मत न हारने, चुनौतियों में साहस और धैर्य बनाए रखने, खुद पर भरोसा करने तथा सतत संघर्ष की प्रेरणा देने वाली रही होंगी. कुछ विद्वानों का मानना है कि अभिव्यक्ति के क्षेत्र में पद्य का आगमन गद्य की अपेक्षा पहले हुआ था. इसमें पूरी सचाई भले न हो, मगर एक बात पद्य के पक्ष में अवश्य जाती थी. जब तक लिपि का आविष्कार नहीं हुआ था, भाषाभिव्यक्तियों को सहेजने के लिए स्मृति ही एकमात्र माध्यम थी. भारत में वेदादि ग्रंथों को श्रुति ग्रंथ इसीलिए कहा जाता है. चूंकि पद्य को गद्य की अपेक्षा आसानी से याद किया जा सकता था, वह सुननेसुनाने में भी प्रिय लगता था और उसमें दूसरों को प्रभावित करने की क्षमता अधिक थी, अतएव कहानी का प्रथम सहेजा गया रूप पद्यात्मक हो सकता है. प्रख्यात अमेरिकी लेखिका रुथ साॅवयर इस बारे में सुनिश्चित हैं

कहानी गढ़ने का सर्वप्रथम प्रयास, आदिम समूहों द्वारा चक्की चलाते, किश्ती खेते, शिकार अथवा युद्ध के लिए हथियारों की धार चढ़ाते या पर्वउत्सव के बहाने समयसमय पर सामूहिक रूप से गएगुनगुनाए जा सकनेवाले गीतों के माध्यम से हुआ होगा. आदिगायक या किस्सागो अपनी अद्वितीय वीरता पर इतरानेवाला, आत्माभिमानी तथा विजयोल्लास में डूबकर स्वच्छंद आनंद मनानेवाला पहला इंसान रहा होगा. अपनी पुस्तक ‘दि वे आफ स्टोरीटेलिंग’ में सावयर ने कनाडा के तटीय क्षेत्र में बसने वाले आदिवासियों के एक प्राचीनतम गीत को उद्धृत किया है

मैं, कोको, मैने एक भालू का शिकार किया

होहोहो…..

बड़ा भालू….डरावना भालू

हेहेहे…..

उसको मैंने अपने बल से परास्त किया

हेहेहे….

मेरी बाजुओं में अपार शक्ति है

वे भाला फेंकने के लिए काफी मजबूत हैं

वे नाव खेने के लिए मजबूत हैं….मैं कोको

हे….हे….हे….हो….हो….हो.

यह कविता दर्शाती है कि प्रारंभिक अभिव्यक्तियां जीवन से जुड़ी थीं. उनमें कल्पना का योग कम से कम था. लेकिन इससे यह मान लेना कि आरंभिक अभिव्यक्तियां केवल पद्यात्मक रही होंगी, उचित न होगा. दिनभर जंगल की परिस्थितियों से जूझने के बाद शाम को घर लौटने वाले आदिम मनुष्य के लिए समूह के सदस्यों के साथ अपने अनुभव साझा करने के लिए यह संभव न था कि वह उन्हें पद्य में तत्काल अभिव्यक्त कर सके. क्योंकि अनुभवों के पद्य रूपांतरण के लिए ज्यादा समय और काव्यात्मक प्रतिभा की आवश्यक थी. दूसरे सीधेसरल गद्य का आनंद बच्चे भी ले सकते थे. इसलिए अधिकांश सदस्यों के लिए अनुभवों की सीधी गद्यात्मक प्रस्तुति आसान रहती होगी. उनमें वह आवश्यकतानुसार कल्पना का प्रयोग भी करता होगा. पद्य का विकास कदाचित फुर्सत और एकांत के क्षणों में, आगत की कल्पना, अनुभवों को सहेजने की लालसा अथवा समूह के सदस्यों का मनोरंजन करने की कामना के साथ हुआ होगा. आज इस बात के पुरातात्विक प्रमाण मौजूद हैं कि मानवसभ्यता का विकास पृथ्वी के अलगअलग हिस्सों में हुआ. सिंधु घाटी, मेसोपोटामिया(इराक), मिस्र, चीन, बेबीलोन, आदि क्षेत्रों में लगभग एक ही समय में अलगअलग संस्कृतियां पनपीं. समय के साथसाथ वे एकदूसरे के संपर्क में आईं. उनमें आर्थिकसामाजिक लेनदेन बढ़ा. आपसी व्यापार में तेजी के फलस्वरूप उनमें सांस्कृतिक आदानप्रदान की भी शुरुआत हुई. फलस्वरूप कला और संस्कृति के दूसरे उपकरणों के आदानप्रदान में तेजी आई. इसलिए यह भी संभव है कि अपनी भावाभियक्तियों को सहेजने के लिए अलगअलग सभ्यताओं ने अलगअलग पद्धतियों को खोजकर उन्हें अपनाया हो. लिपि के आविष्कार का श्रेय बेबीलोनवासियों का जाता है. उससे पहले कलाभिव्यक्तियों को सहेजने का एकमात्र आधार स्मृति थी. यद्यपि चित्रलिपि और प्रस्तर कला का आविष्कार बहुत पहले, हिम युग में ही हो चुका था, लेकिन उसको दूसरे स्थान पर ले जाना संभव न था. इसलिए आरंभिक चित्र गुफाओं में, ऐसे सुरक्षित ठिकानों पर बनाए गए, जहां जीवन अधिक सुरक्षित था और जिधर से मानवसमूहों का आनाजाना लगा रहता था. लिपि का आविष्कार होने के पश्चात कलाभिव्यक्तियों को नए प्रारूप में सहेजना संभव हुआ. आरंभिक यायावरी जीवन में मनुष्य एक स्थान से दूसरे स्थान तक विचरता रहता था. एकदूसरे से संपर्क के समय जहां संघर्ष की संभावना थी, वहीं व्यक्तिगत अनुभवों और कलारूपों को साझा करने के अवसर भी मिलते होंगे. इसलिए आरंभिक कलारूपों में वैविध्य के साथसाथ एक किस्म की एकरूपता भी नजर आती है.

भारतीय उपमहाद्वीप में कहानी लेखन की परंपरा बहुत पुरानी है. ऋग्वेद, जिसे संसार के सबसे पुराना ग्रंथ होने का गौरव प्राप्त है, में अनेक कहानियां आई हैं. प्रत्येक कहानी का कोई न कोई उद्देश्य है. उसके माध्यम से उद्गाता ऋषि पाठकोंश्रोताओं तक एक नैतिक संदेश पहुंचाना चाहता है. इससे उस समय कहानी कला के विकास का अनुमान लगाया जा सकता है. महाभारत में तो छोटीछोटी हजारों कहानियां मिलकर बड़े ग्रंथ का रूप ले लेती हैं. उन्हीं कहानियों के बल पर वह जीवन और समाज का समग्र दस्तावेज बन जाता है. वे उसकी ‘जय’ से ‘विजय’ फिर ‘भारत’ और अंततः ‘महाभारत’ तक की यात्रा का बानक बनी हैं. वेदों के अलावा उपनिषद्, रामायण, कथासरित्सागर, जातक कथाओं आदि में भी सैकड़ों कहानियां संकलित हैं. उन सभी में गजब की एकरूपता है. इससे अनुमान लगा सकते हंै, कि उन ग्रंथों में पंक्तिबद्ध होने से पूर्व वे कहानियां लोकसाहित्य के रूप में समाज में बहुत पहले से विद्यमान रही होंगी. लोकसाहित्य के रूप में ही वे धरती के एक छोर से दूसरे छोर तक की यात्रा करती रही हैं. विश्वसभ्यताओं में नागरीकरण की शुरुआत ईसा से सातआठ वर्ष हजार पहले हो चुकी थी. ईसापूर्व 3000 वर्ष पहले तक धरती के अलगअलग कोनों में विकसित संस्कृतियों के बीच व्यापारिक संबंध विकसित हो चुके थे. उनके बीच आर्थिक के साथसाथ सामाजिकसांस्कृतिक आदानप्रदान भी बढ़ा था. उनके आपसी संपर्क को प्रगाढ़ बनाने, संबंधों में आत्मीयता का विस्तार करने में इन कहानियों का बड़ा योगदान था. एक क्षेत्र की लोकप्रिय कहानियां दूसरे हिस्से में जाकर न केवल लोकप्रिय हुईं, बल्कि उनमें वहां के क्षेत्रवासियों ने अपनी रुचि एवं परिस्थितियांे के अनुसार आवश्यक परिवर्तन भी किया.

सभ्यताकरण की साक्षी रही कहानियों ने हर समाज, हर परिवेश में अपनी उपस्थिति बनाए रखी है. इसके बावजूद दुनिया के पहले किस्सागो और प्रथम कथालेखक का पता लगाना असंभव है. केवल यह कहा जा सकता है कि मनुष्य को जिन दिनों पहली बार भाषाज्ञान हुआ, जब उसे अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने की कला आई, तभी से वह अपनी कहानियां भी एकदूसरे के साथ साझा करने लगा था. कहानियों के माध्यम से वह मनोरंजन और शिक्षा दोनों उद्देश्यों को साधता था. कहानी द्वारा मनोरंजन का पहला लिखित प्रमाण 2560 ईस्वीपूर्व का है. मिस्र की पहाडि़यों से प्राप्त दस्तावेज के अनुसार प्रसिद्ध पिरामिड निर्माता यूनानी सम्राट खुपु के तीन पुत्र अपने यशस्वी पिता के मनोरंजन के लिए बारीबारी से रोमांचभरी कहानियां सुनाते हैं. लेखनकला का आविष्कार बेवीलोनवासियों ने किया. प्रथम महाकाव्य के लेखन का श्रेय भी उन्हीं को दिया जाता है. विश्व का पहला महाकाव्य होने का गौरव ‘गिलगमेश’ को प्राप्त है. विद्वानों के अनुसार गिलगमेश उरुक का राजा था, जिसने 3000 ईस्वीपूर्व दक्षिणी बाबुल पर राज किया था. उसी गिलगमेश की र्कीतिकथा इस महाकाव्य का आधार है. उसमें भरपूर कल्पना तत्व है. कथानायक गिलगमेश बहादुर सम्राट है. कहानी में मिट्टी और लार से बना अर्धमानव पशु एनकिडु है, जो कालांतर में गिलगमेश का दोस्त बन जाता है. इस कथा को लगभग 2000 वर्ष पहले कीलाक्षरों में लिपिबद्ध किया गया था. यह भी संभावना है कि लिपिबद्ध होने से पूर्व गिलगमेश की र्कीतिकथा भी शताब्दियों तक लोकसाहित्य में श्रुति रूप में प्रचलित रही हो. गिलगमेश की कहानी इतनी लोकप्रिय हुई कि बेबीलोन की कीलाक्षर लिपि जहांजहां भी गई, वहां यह कथा भी पहुंची. गिलगमेश वीररस से भरपूर कृति है, उसमें इतिहास और कल्पना दोनों का सम्मिश्रण हैं. यह कहानी दर्शाती है कि 5000 वर्ष पहले तक मनुष्य कल्पना के आधार पर पात्र गढ़ने लगा था. विशिष्ट वीरता का प्रदर्शन करने वाला व्यक्ति समूह के बीच सम्मान का पात्र माना जाता था.

आशय है कि ईसा पूर्व दूसरी सहस्राब्दी तक कहानीकला काफी विकसित हो चुकी थी. उससे पहले तक कहानी या तो ठेठ अनुभवाधारित होती थी, अथवा अनुभव और कल्पना का सम्मिश्रण. आगे की कुछ शताब्दियों में इसमें परिवर्तन आया, फलस्वरूप कल्पना के आधार पर नएनए कथानक गढ़े जाने लगे. कहानी की बढ़ती लोकप्रियता को देखकर प्रतिभाशाली किस्सागो इस क्षेत्र से जुड़े थे, जो श्रोताओं की रुचि को समझते हुए कहानियां गढ़ने में माहिर थे. उन्हीं के फलस्वरूप कहानी में कल्पना का अनुपात बढ़ता गया. विशुद्ध कल्पना पर केंद्रित कथानक और कहानी कला की कसौटी पर सही पाए जानेवाली मिस्र की पुरानी ‘राजकुमार और उसके तीन नसीब’ (दि प्रिंस एंड दि थ्री फेट) का उल्लेख प्रायः होता है. इस कहानी में जहां लोककथा के भरपूर तत्व हैं, वहीं इसमें कल्पना का भी भरपूर इस्तेमाल किया गया है. इस कहानी का 1500 वर्ष पुराना लिखित प्रारूप उपलब्ध है. इस बात की भी प्रबल संभावना है कि लिखित रूप में आने से पहले यह कहानी लोकसाहित्य का हिस्सा रही होगी. अनूठी परिकल्पना और कथातत्व के आधार पर हम इसे विश्व की आदि परीकथा भी कह सकते हैं. इसमें कांचघर, बड़ी समुद्र जैसी नाव की अनूठी कल्पना है. कुछ विद्वान इसे कल्पना पर आधारित पहली कहानी मानते हैं. जो अस्वीकार्य है, क्योंकि वेदों, उपनिषदों तथा यूनानी ग्रंथों के अनुसार कल्पनाआधारित कहानियों के सृजन की शुरुआत 3000 वर्ष पहले ही हो चुकी थी.

भारतीय परंपरा में ऋग्वेद में, जो विश्व की पहली कृति है, अनेक उपकथाएं भी आई हैं. वे कल्पना के द्रष्टिकोण से भी अत्यंत विलक्षण हैं. निरे मनोरंजन के बजाय वे विशेष उद्देश्य को लेकर गढ़ी गई हैं, इसलिए कथारस के साथसाथ उनमें लक्ष्य की प्रधानता है. वस्तुतः ऋग्वेद के मनस्वी विद्वानों का ध्येय कहानी लिखना न होकर जीवनमूल्यों से भरपूर धार्मिकआध्यामिक संदेश को आनेवाली पीढि़यों के लिए सहेजना था. केवल मनोरंजन के लिए लेखन उनकी वृत्ति नहीं थी. इसलिए वेदों में आई प्रत्येक उपकथा का विशिष्ट उद्देश्य है. वहां कथातत्व मुखर न होकर प्रच्छन्न रूप में आया है. यहां ऋग्वेद से दो उदाहरण देना प्रासंगिक होगा. दो इसलिए क्योंकि आगे चलकर कहानी की जो यात्रा चलती है, दोनों कथासूत्र उसके आदिप्रतिनिधि अथवा दिशावाहक कहे जा सकते हैं. इनमें पहली कहानी जुआरी की है. उल्लेखनीय है कि जुआ वैदिक काल में ही एक बुराई के रूप में पनप चुका था. जुए की बुराई और उसके जुआरी के परिवार पर पड़नेवाले दुष्प्रभाव को दर्शाता हुआ एक अत्यंत मार्मिक कथासंकेत ऋग्वेद में आया है. उसके दशम मंडल का 34वां सूक्त जुआरी की मनोदशा का वर्णन करता है. स्थितियां यथार्थपरक और दिल को छू लेनेवाली हैं. कहानी के अनुसार एक जुआरी है. वह बारबार जुआ न खेलने की शपथ लेता है. लेकिन पासों की ध्वनि उसकी व्याकुलता को बढ़ा देती हैं. वह उसकी ओर खिंचा चला जाता है. निकट संबंधी उसकी आलोचना करते हैं. जुआरी के पिता, माता और भाई उससे दूरी बनाए रखते हैं, ‘हम उसको नहीं जानते, जुआरियो इसे पकड़कर ले जाओकहकर अपना पीछा छुड़ा लेते हैं.’ एकमात्र जुआरी की पत्नी उसको प्यार करती है. जुआरी भी उसको भरपूर प्रेम करता है. लेकिन जुए के अपने शौक के कारण एक दिन वह पत्नी को ही दांव पर लगा देता है. अपनी भार्या को दूसरों की बांहों में देखकर वह विगलित हो जाता है. इस दुर्दशा पर उसके अपने उसको दुत्कारते हैं. संपत्तिविहीन होते ही उसके साथी जुआरी भी उसको त्याग देते हैं. अपनी प्रिय भार्या को जीते हुए जुआरियों के अधीन देखकर वह बिलख उठता है. इसके बावजूद जुए का चस्का अपनी जगह है. सबकुछ गंवा देने के बावजूद जो बाकी है, वह है जीत की संभावना. सबकुछ खोकर पुनः सबकुछ पा लेने की भ्रांति. यह उम्मीद कि अगला दांव शायद सबकुछ वापस दिला दे उसको बारबार जुआघर ले जाती है. वहां पहुंचते ही हार की संभावना उसको डराने लगती है. वह लौट आना चाहता है. परंतु पासों की आवाज सुनकर उसका हृदय मचलने लगता है. वह रुक नहीं पाता और ‘जारिणी की भांति’ द्यूतस्थल की ओर दौड़ पड़ता है. उद्गाता ऋषि द्वारा जुआरी की मनोदशा का वर्णन देखिए

जुआरी द्यूतस्थल पर पहुंचता है. सबकुछ गंवा देने के बाद मन शंकाकुल है. तन में आग लगी है. पूछता हैᅳ‘क्या मैं जीतूंगा?’ पासे उसकी कामनाओं को भड़काते हैं. खुद पर उसका बस नहीं चलता. अपना बचाकुचा धन वह दांव पर लगा देता है. लेकिन ‘अक्ष, धन आदि से संयुक्त पासे उसको धोखा देते हैं. तपाते हैं, संताप जनते हैं. जुआरी को पहले थोड़ी जीत से लुभाकर अंततः उसका सबकुछ हर लेते हैं. वे जुआरी के श्रेष्ठतम धन द्वारा स्वयं अभिसिक्त होते हैं….जादू के अंगारों की भांति ढाले जाते हुए वे स्वयं तो शीतल हैं, पर दर्शकों के हृदय को जलाकर क्षार कर जाते हैं.’

कहानी के समापन पर उद्गाता ऋषि उसके आगे समर्पण कर, अपना सबकुछ गंवा चुके जुआरी को समझाता है, छोड़ दे जुआ, न खेल जुआ. धरती की ओर देख, खेतों को जोत. परिश्रम से जो प्राप्त होता है, उसी को पर्याप्त समझकर संतोष कर. उसी में खुश रहना सीख. अपने पसीने से कमा….वे तेरी गौए हैं, वह तेरी भार्या है….’’

उपर्युक्त कहानी या दृष्टांत के माध्यम से वैदिक ऋषि जुए की बुराइयों को सामने लाकर उसको व्यक्ति के लिए एक अभिशाप सिद्ध करना चाहता था. इसमें वह कामयाब भी हुआ है. वेदों को मुख्यतः आध्यात्मिक ग्रंथ के रूप में देखा जाता है. इसलिए उनमें सामाजिक संदेश युक्त कहानियों को अपेक्षित लोकप्रियता नहीं मिल पाई. कहानी में जुए के दुष्प्रभाव पर जोर दिया गया है. ऋग्वेद का जुआरी अपनी पत्नी को जुए में दांव पर लगाकर खिन्न है. इस कथानक का वास्तविक प्रस्फुटन महाभारत में देखने को मिलता है. वहां जुआरी स्वयं युधिष्ठर हैं, ज्येष्ठ पांडव पुत्र धर्मराज, जो जुआ खेलने की अपनी लत के कारण अपना राजपाटपत्नी सबकुछ गंवा देता है. वहां कहानी कला और नाटकीयता के संयोग से जो कथा निखरकर आती है, उसका प्रभाव शताब्दियों तक पाठकोंश्रोताओं के दिलोदिमाग पर बना बना रहता है. कहानियों की यह धारा आचारविचार, आचरण की शुद्धता और सामाजिक नैतिकता का पाठ पढ़ाती थी. इस धारा का विस्तार रामायण, महाभारत, कथासरित्सागर की कहानियों में खुलकर सामने आया. ऋग्वेदकाल में ही कहानियों की दूसरी धारा, जो कदाचित पहली से भी पुरानी थी, जन्म ले चुकी थी. इस धारा में पात्रों की उपस्थिति प्रतीकात्मक होती थी. इस धारा का प्रमुख उद्देश्य था, पशुपक्षी अथवा काल्पनिक पात्रों के माध्यम से पाठकों तक नैतिक संदेश पहुंचाना. पात्रों की प्रतीकात्मक उपस्थिति होने के कारण कहानी के समापन पर मनोमस्तिष्क पर उनका प्रभाव गौण हो जाता था. रह जाता केवल वह नीतिसंदेश, जिसे रचनाकार अपने पाठकों तक पहुंचाना चाहता है. ऋग्वेद में ऐसे भी प्रसंग हैं जहां मानवेतर जीवों को मनुष्यता के लिए कल्याणकारी कर्म करते हुए दिखाया गया है. अवसर आने पर वे रूढि़यों पर कटाक्ष करने से भी नहीं चूकते. सातवें अध्याय के 103वें सूक्त में तालाब में टर्राते हुए मेंढकों की तुलना वेदपाठ करते ब्राह्मणों से की गई है. दशम मंडल(108) में इंद्र की सरमा नामक कुतिया कृपण पणियों को उपदेश देती है. यह भी अपने आप में बहुत रोचक प्रसंग है

इंद्रगण, मैं इंद्र की दूत बनकर आई हूं. तुमने जो गौधन एकत्र किया है, उसको ग्रहण करने की मेरी बड़ी इच्छा है.’ पणि प्रत्युत्तर में सरमा को फुसलाते हैं

सरमा, जिस इंद्र की दूत बनकर तुम आई हो, वे कैसे हैं? उनका पराक्रम कितना है? उनकी सेना कैसी है? वे इंद्र आएं, हम उन्हें मित्र बनाने को तत्पर हैं….तुम स्वर्ग से चलकर आ रही हो. इतनी कठिन यात्रा के लिए तुम्हें जितनी गायें चाहिए, उतनी ले जा सकती हो. वरना बिना युद्ध के भला कौन गाय देता है!’

इसपर सरमा इंद्र के आयुधों की भीषण मारक क्षमता का बखान करती है. पणि सरमा से युद्ध का भय न दिखाने को कहते हैं

हमें डराओ मत, हमारे पास भी पर्याप्त सैन्यबल एवं तीक्ष्ण आयुध हैं.’ सरमा पुनः उन्हें इंद्र के बल से परचाने की कोशिश करती है

ये शरीर कहीं इंद्र के वाणों का लक्ष्य न हो जाएं. तुम्हारे यहां आने का जो मार्ग है, कहीं उसपर देवता लोग आक्रमण न कर बैंठंे! यदि तुम गाय नहीं दोगे तो आपदाएं सन्निकट हैं.’

सरमा, हमारी संपत्ति पर्वतों द्वारा रक्षित है. गायों, अश्वों तथा अन्यान्य धनों से परिपूर्ण है. रक्षाकार्य में समर्थ पणिसैनिक उसकी रखवाली करते हैं. गायों के शब्दों से अनुगूंजित इस स्थान पर तुम व्यर्थ ही चली आईं.’

सरमा पणियों को बारबार इंद्र के बल से परचाती है. उन्हें धमकी देती है. पणिगण सरमा को बहन मानकर उसका हिस्सा सौंपने का आश्वासन देते हैं. लेकिन सरमा इन्कार कर देती है. अंत में सरमा के साथ और भी आवाजें सम्मिलित हो जाती हैं. संदेश यह है कि गायें, अश्वादि पशु जिनपर पूरे समूह का जीवन निर्भर है, व्यापार की वस्तु नहीं है. देवगण पणियों से स्थान छोड़ जाने को कहते हैं.

वेदों को 35004000 वर्ष पुरानी रचना माना जाता है. उन्हें हिंदुओं के धार्मिक ग्रंथ होने का सम्मान प्राप्त है. विद्वानों का यह भी मानना है कि वेदादि ग्रंथों में वर्णित छोटीछोटी कहानियां, द्रष्टांत उनके रचनाकाल से भी कई शताब्दी पुराने हैं. श्रुति के रूप में वे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक अंतरित होते रहे हैं. निरुक्त में यास्क ‘इत्यैतिहासकाः’ कहकर इंद्र और वृत्रासुर संग्राम को कथारूप में ढालते हैं. ऐतरेय ब्राह्मण(713) में कथा के साथ नीतिसंबंधी आख्यान भी समाहित हैं. उपनिषदों में तो न जाने कितने दृष्टांत हैं जिनकी कहानियां लोकजीवन में भी प्रचलित रही हैं. छांदोग्योपनिषद में एक अद्भुत कहानी आई है जो उस समय की परंपरा से हटकर है. इसलिए कि गंभीर मानी जानेवाली संस्कृत में व्यंग्य की छटा कम ही देखने को मिलती है. मगर वह कहानी व्यंग्य में लिखी गई है. उसमें कुत्ते भोजन के लिए अपना एक नेता चुन लेते हैं. कहानी को पढ़ते समय आधुनिक राजनीति में व्याप्त अवसरवाद सहसा याद आने लगता है. रैक्व, सत्यकाम पुत्र जाबाल की सुप्रसिद्ध कहानियां भी इसी उपनिषद में हैं. एक कथा में बैल, हंस और मद्गु(जलचर पक्षी) ब्रह्मविद्या का उपदेश देते हैं. वैदिक कहानियों की खूबी उनकी प्रतीकात्मकता है. उनमें पशुपक्षियों को पात्र बनाकर बड़ी गंभीर बातें कही गई हैं. उनमें शेर, चूहा, बिल्ली, कबूतर, बैल, कुछआ आदि को पात्र बनाकर नैतिकता, आचारविचार एवं व्यवहार संबंधी संदेह दिया गया है. फलस्वरूप वे प्रत्येक वयस् के पाठक को उपयोगी जान पड़ती हैं. उनमें कथातत्व की अमूमन सभी विशेषताओं यथा कौतूहल, विनोद, हासपरिहास, रहस्य, उल्लासशोक आदि का उपयोग किया गया है. धर्म, नीति, सदाचार, व्यवहार, कूटनीति के प्रसंग उन कहानियांे में भरे पड़े हैं. जिससे वे कोरी कहानी न होकर दृष्टांत जान पड़ती हैं. इसलिए आवश्यकता पड़ने पर उन्हें उद्धरण की भांति उपयोग किया जाता रहा है.

महाभारत तक आतेआते भारत में कहानीकला काफी विकसित रूप ले चुकी थी. विशेषकर पशुपक्षी और प्रतीकों को केंद्र बनाकर कहानियां गढ़ने की कला. महाभारत में सोने के अंडे देने वाले पक्षी की कहानी है. धार्मिक बिल्ली की कहानी है जो चूहों को विश्वास दिलाकर उन्हें अपने काबू में कर लेती है. एक कथा चतुर शृगाल की है जो अपने मित्रों को भी धोखा देने से बाज नहीं आता. आदि पर्व में हाथी और कछुए की कथा, कुत्ते की कथा तथा वनपर्व में मनु और मत्स्य की कहानी है. तत्कालीन राजनीतिकव्यावहारिक दर्शन को समझाने के लिए शांतिपर्व में अनेक नीतिकथाएं हैंजो आगे चलकर भारतीय कथा साहित्य की प्रेरणा बनीं. कतिपय स्थलों पर यक्ष, गंदर्भ, अप्सरा, किन्नर जैसे विचित्र पात्र भी कहानियों में आए हैं, जो उस समय अभिव्यक्ति के क्षेत्र में नएनए काल्पनिक प्रयोगों की ओर इशारा करते हैं. यक्ष मनुष्य और देवता का मिलाजुला रूप हैं. पृथ्वी पर उनकी उपस्थिति कदाचित शापित देवता के रूप में है. गंदर्भ नृत्यगायनवादन आदि विभिन्न लोककलाओं में इतने प्रवीण थे कि सांस्कृतिक इतिहास में उनकी उपस्थिति चमत्कार के रूप में दर्ज है. महाभारत में यक्ष की परिकल्पना एवं संवाद जिसके माध्यम से वह युधिष्श्ठिर को लोकनीति एवं व्यवहार की सीख देता है, अज्ञातवास के दौरान भीम का असुर हिडिंब से युद्ध तथा उसकी बहन हिडिंबा से विवाह; लाक्षागृह, खांडव वन जैसी अनेक घटनाएं तथा महाप्रयाण के समय कुत्ते द्वारा पांडवों के साथ हिमालयारोहण करना, परीकथाओं जैसा अजूबापन और रोमांच लिए हुए हैं. ये सभ कथाएं प्राचीन मनुष्य के कल्पनासामथ्र्य को दर्शाती हैं.

महाभारत जहां भारतीय समाज, राजनीति और जनजीवन का विस्तृत लेखा है, वहीं रामायण में कथानक मुख्यतः राम के इर्दगिर्द पसरा हुआ है. वहां आस्थाभाव प्रबल है. फिर भी उसमें नीतिकथाओं का यत्रतत्र समावेश है. कहानियों की लोकप्रियता इससे भी आंकी जाती है कि गौतम बुद्ध जैसा दार्शनिक विचारक अपने संदेशों को जनजन तक पहुंचाने के लिए कहानीकला की शरण लेता है. जातक कथाओं में गौतम बुद्ध के जीवनप्रसंगों के माध्यम से बौद्ध धर्म का नीतिसंबंधी चिंतन भी समाया हुआ है. जातक कथाओं का संकलन आरंभ ईसा से चार शताब्दी पहले हो चुका था. उनमें पशुपक्षी संबंधी पात्रों का विशेष स्थान मिला. उनका ध्येय था, पशुपक्षी जैसे लोकप्रिय कथापात्रों के माध्यम से बोधिसत्व की शिक्षाओं को जनजन तक पहुंचाना. इनमें हाथी, वानर, मृग, हंस आदि को पात्र बनाकर कथाएं रची गई हैं. पतंजलि(150 ईसा पूर्व) ने ‘कथासूचक लोकोक्तियों, अजाकृपाणीय, काकतालीय आदि तथा जन्म शत्रुता के उदाहरण रूप में अहिनकुलम्, काकोलूकीयम् जैसी नीति कथाओं का उल्लेख किया है.’ महाभाष्य, पणिनि के सूत्र 2/1/3/, 2/4/9 तथा 5/3/106 आदि, संस्कृत साहित्य का समीक्षात्मक इतिहास, डाॅ. कपिलदेव द्विवेदी, पृष्ठ 573. इन कथाओं की लोकप्रियता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि चीनी विश्वकोश(668) में 200 से अधिक बौद्धग्रंथों से चुनकर नीतिकथाएं प्रकाशित की गईं. भरहुत में ईसापूर्व तीसरी शताब्दी का बौद्धकालीन स्तूप प्राप्त हुआ है, उसपर उत्क्रीर्णित संदेश में पशुकथाओं का उल्लेख है. बौद्ध मतावलंबियों की देखादेखी जैन मतावलंबियों ने भी अपने संदेश को जनसाधारण तक पहुंचाने के लिए कहानीकला का सहारा लिया था. बौद्ध अनुयायियों की भांति उन्होंने भी पशुपक्षी को केंद्र बनाकर नीतिकथाएं रचीं. हरिषेण के बृहत्कथाकोश(992 ईस्वी) में जैन धर्मसंबंधी विचारों को नीतिकथाओं के माध्यम से समझाया गया है. गूढ़ विचारों की व्याख्या के लिए आवश्यकतानुसार एकाधिक नीतिकथाओं की भी सहायता ली गई है.

कहानी की ऐसी प्रतीकात्मकता, कथातत्व का ऐसा ही प्रस्फुटन परिवर्ती बौद्ध एवं जैन ग्रंथों, पंचतंत्र, कथासरित्सागर, जातक आदि में और भी निखरकर सामने आता है. उपनिषदों में भी गूढ़ विषयों को समझाने के लिए यत्रतत्र दृष्टांत रूप में कहानियों का सहारा लिया गया है. चूंकि वेदादि ग्रंथों, कथासरित्सागर, जातक, पंचतंत्र आदि में संग्रहीत कहानियां व्यक्तिविशेष की रचना न होकर लोकसमाज में पहले से ही प्रचलित कहानियां थीं. इसलिए कहानी के इतिहास को वेदों या उनके परिवर्ती ग्रंथों के लेखनकाल से जोड़ना अनुचित होगा. तत्कालीन मनस्वियों ने जीवनमूल्य को आधार देने के लिए समाज से ही कथानकों को चुना था. इसके माध्यम से उसका उद्देश्य रहा होगा, लोकविश्वासों को शास्त्रीयता में ढालना, शब्द को मानवीयकरण का हथियार बना देना. ऐसी कोशिशें प्रायः सभी संस्कृतियों में थोड़ेबहुत परिवेशगत अंतर के साथ जारी थीं. पृथ्वी पर अलगअलग समूहों में विचरने वाले कबीलों ने अलगअलग क्षेत्रों में भिन्न संस्कृतियों को जन्म दिया था. उनकी भौगोलिक परिस्थितियों में अंतर था, तथापि मनुष्य की सामान्य जिजीविषा, परिस्थितियों से जूझने की चाहत, विकास की लालसा कमोबेश एकसमान थी. इसलिए आरंभिक अभिव्यक्तियों में आंतरिक समानता है. तत्कालीन जीवन प्रकृति के नियंत्रण में था. मनुष्य खेती करना सीख चुका था. चूंकि कृषिकर्म पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर था, इसलिए प्रकृति और जीवन के बीच तालमेल बेहद आवश्यक था. चीन की एक लोककथा प्रकृति और मानवजीवन की अंतनिर्भरता और उनके संबंधों पर प्रकाश डालती है. कहानी शिकारी ‘ई’ की है

बहुत दिन पहले की बात है. चीन में एक नामीगिरामी शिकारी ‘ई’ रहता था. उसका निशाना अचूक था. भाला हो अथवा तीर, उसके हाथों से छूटकर सीधा निशाने पर जाकर लगता था. वह घोड़े पर सवार होकर शिकार करता. भाला फेंकने के साथ, बगैर कोई पल गंवाए वह तेजी से शिकार की ओर दौड़ पड़ता. उसको पक्का विश्वास होता कि उसकी कमान से छूटा हुआ तीर सीधे निशाने पर जाकर लगेगा. जब ऐसा विलक्षण तीरंदाज अपने पास हो तो लोगों को उससे उम्मीद भी होगी. एक बार की बात. चीन को एक विपत्ति ने आ घेरा. एक सुबह जब लोग जागे तो देखा कि आसमान में दसदस सूरज जगमगा रहे हैं. उनकी गर्मी से जनजीवन कुम्हलाने लगा. पेड़पौधे झुलसने लगे. जीवजंतु भूखप्यास से व्याकुल होकर इधरउधर भटकने लगे. इस उम्मीद में कि केवल शिकारी ‘ई’ उन्हें प्रकृति के कोप से बचा सकता है, लोग उसके पास फरियाद लेकर पहुंचने लगे.

हमारी मदद करो….आसमान यदि ऐसे ही आग उगलता रहा तो आदमी की जाति ही धरा से मिट जाएगी.’ शिकारी ‘ई’ चिंता में पड़ा था. वह समझता था कि यदि दसदस सूर्य आसमान में चमकते रहे तो प्राणी झुलस जाएंगे. वनवनस्पतियां स्वाह हो जाएंगी. लेकिन धरती को उन सूरजों से बचाया कैसे जाए? ‘ई’ सोचने लगा. इस बीच दसों सूरज सिर पर चढ़े आ रहे थे. उसने सूरजों को ललकारा. आवाज देकर उन्हें बाज आने की चेतावनी दी, लेकिन वे मनमानी पर उतारू थे. यह देख ‘ई’ का पारा चढ़ गया. गुस्से में उसने धनुषवाण उठाए. प्रत्यंचा चढ़ाई. एक साथ दस तीर कमान पर चढ़ाकर डोर को कान तक खींचा. निशाना साधकर तीर छोड़ दिए. दसों तीर तेजी से आसमान की ओर बढ़े. उनमें से नौ तीर अलगअलग दिशाओं में निकलकर नौ सूरजों से टकराए. जैसे सूरज न होकर हवा से भरे गुब्बारे हों. तीर लगने के साथ ही नौ सूरज देखते ही देखते धरती पर बिखर गए.

दसवां तीर निशाने से चूक गया. उधर नौ सूरजों को धराशायी होते देख दसवां सूरज बुरी तरह डर गया था. वह आसमान छोड़ भाग खड़ा हुआ. खुद को बचाने की जुगत में वह बैंसबाड़ी के पीछे जा छिपा. अब आसमान सूरजों से खाली था. इसी के साथ वहां अंधेरा छा गया. थोड़ी देर पहले जो जीवजंतु भीषण गर्मी से व्याकुल थे, अब उन्हें अंधेरा डराने लगा. सूरज न रहने से सर्दी बढ़ गई. जीवजंतु परेशान हो उठे. ‘ई’ को भी लगा कि उससे चूक हुई है. जीवजगत के लिए धूप और गरमी दोनों चाहिए. सूरज के बिना प्राणियों को ये चीजें कौन देगा! इसपर विचार किए बगैर ही उसने दस के दस सूरजों को निशाना बना लिया. एक सूरज बचा रहता तो चिंता की बात न होती. लेकिन अब? अब क्या होगा? ‘ई’ की चिंताओं का पारावार न था.

तभी उसे ध्यान आया कि उसने नौ सूरजों को तो गुब्बारे की तरह आसमान से गिरते देखा था. लेकिन दसवां सूरज! वह कहां गया? ‘ई’ ने इधरउधर नजर दौड़ाई. अचानक बैंसबाड़ी के पीछे छिपा दसवां सूरज उसको दिखाई पड़ गया. सूरज स्वयं बाहर आने को उत्सुक था. लेकिन जैसे ही वह ‘ई’ को देखता, भय से बैंसबाड़ी के पीछे दुबक जाता था. ‘ई’ सूरज की मनस्थिति को देख मुस्करा दिया. उसको खुशी थी कि एक सूरज बचा हुआ है. अपना धनुषवाण संभालकर वह अपने घर की ओर चल दिया. उसके जाते ही दसवां सूरज बैंसबाड़ी के पीछे से निकला और दुबारा आसमान पर छा गया. दुनिया फिर जगमगा उठी. लोग ‘ई’ की जयजयकार करने लगे. (सांस्कृतिक निबंध, भगवतशरण उपाध्याय से उद्धृत)

चीनी किवदंति है कि सूरज आज भी शिकारी ‘ई’ के भय से उबर नहीं पाया है. वह डरताडरता पूरब से उदय होता है. पहले केवल दिन ही दिन था. उस घटना के बाद से सूरज दिनभर पश्चिम की ओर भागते रहने के बाद शाम को पुनः बैंसबाड़ी के पीछे दुबक जाता है. इसी से दिनरात होते हैं. सूरज रात को छिप जाता है, इससे प्राणियों को सोने का अवसर मिल जाता है. इसके लिए चीनी लोग महान शिकारी ‘ई’ का आभार मानते हैं. यह कहानी जहां सृष्टि के विकास के बारे में एक चीनी मिथ को सामने रखती है, साथ में यह भी समझाती है कि गुस्सा महान व्यक्ति को भी चूक करने को बाध्य कर देता है. यह भी दर्शाती है कि उस समय तक विश्व के अनेक कोनों में कहानी कला का विस्तार हो चुका था. ग्रीक परंपरा में होमर प्रख्यात कथावाचक हैं. उसने महान ग्रंथ ‘इलियाड’ और ‘ओडिसी’ की रचना लोगों के बीच, उन्हें सुनाते हुए की थी. ईसा से आठ सौ वर्ष पहले जन्मा वह महाकवि लोकश्रुति के अनुसार जन्मांध था. वह लोगों को घूमघूम कर अपनी रची हुई कविताएं सुनाता था. जिसको होमर के प्रशंसक उसके शिष्य लिखते जाते थे. ईसा से ढाईतीन शताब्दी पहले जन्मे ईसप का नाम भी दुनिया के चर्चित किस्सागो में शामिल है. एक दास के रूप में जन्मा ईसप अपनी बोधकथाओं के माध्यम से चर्चित हुआ. उसके दृष्टांतों पर पंचतंत्र का प्रभाव साफ तौर पर नजर आता है. प्राचीन यूनान और भारत के बीच जिस प्रकार का अंतःसंबंध था, नियमित यात्राएं होती थीं, उसको देखते हुए लोककथाओं का सहजआदानप्रदान असंभव न था. यही कारण है कि यदि विश्व के अलगअलग देशों से वहां की बहुचर्चित लोककथाएं लेकर उनकी परस्पर तुलना की जाए तो पाएंगे कि उनके कथानक में असीमित समानता है. उनमें यदि कुछ अंतर है तो केवल परिवेश और भाषा का. लेकिन विचित्र पात्रों, काल्पनिक चरित्रों और कथानकों के आधार पर नीतिआख्यान गढ़ने में भारतीय मनीषियों का कोई सानी नहीं था. इस मामले में बाकी दुनिया के अपने समकालीन आचार्यों से वे बहुत आगे थे. भारत में कहन की कला की लोकप्रियता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि यहां बड़ेबड़े महाकाव्यों का प्रणयन किस्सागोई के माध्यम से हुआ है, जिनमें एक मिथ दूसरे मिथ का जन्मदाता है. इससे कहानी में तारतम्यता बनी रहती है. रामायण की कहानी के बारे में कहा जाता है कि इसको पहले शिव ने पार्वती को सुनाया था. फिर शिव के आदेश पर काकभुसुंडि उसको वाल्मीकि को सुनाते हैं. महाभारत भी कहन की परंपरा का एक ग्रंथ है, जिसको व्यास ने सूतजी के मुख से कहलवाया है. उपनिषद का तो अर्थ ही है, गुरु के आगे बैठकर बैठकर चिंतनमनन, श्रवणादि करना. लोकसाहित्य की तो पूरी की पूरी परंपरा कहन पर टिकी हुई है. आज भी किसी को कोई बात समझानी हो तो लोग किसी कहानी या दृष्टांत का उद्धरण देने लगते हैं.

भारतीय वाङमय में पशुपक्षियों को केंद्र बनाकर इतना ज्यादा साहित्य रचा गया है कि केवल इसी को आधार बनाकर उसका वर्गीकरण संभव है. पशुपक्षियों को केंद्र बनाकर रचे गए साहित्य में पंचतंत्र, हितोपदेश, शुकसप्तति आदि ग्रंथ हैं तो मनुष्य को पात्र बनाकर लिखे गए ग्रंथों में कथासरित्सागर, शिवदास कृत कथार्णव(1200 ईस्वी) जिसमें मूर्खों और चोरों की 35 कथाएं हैं, श्रीवीर कवि के ‘कथाकौतुक’(1451) तथा वल्लाल सेन के ‘भोजप्रबंध’(16वीं शती) का नाम लिया जा सकता है, जिनमें व्यवहार और नैतिकता के बीच अंतर को स्पष्ट करते हुए मनुष्य से नैतिक पथ पर बने रहने की अपेक्षा की गई है. इनके अतिरिक्त बड़ी संख्या ऐसे ग्रंथों की है जिनमें पशुओं और मनुष्यों को सम्मिलित पात्रों के रूप में प्रयुक्त किया गया था. ऐसे ग्रंथों में रामायण, महाभारत के अलावा जातक कथाएं, वैतालपचीसी, सिंहासन बतीसी आदि का नाम लिया जा सकता है. वैताल पचीसी और सिंहासन बतीसी में पुतलियों और वैताल को पात्र बनाकर कथानक में अद्भुत रस की सृष्टि की गई है. भारतीय समाज और परंपरा पर आधारित इन कहानियों की पठनीयता देखते ही बनती है. यह भी माना जाता रहा है कि विचित्र पात्रों की कल्पना का मुख्य ध्येय श्रोताओं का मनोरंजन करना था. लेकिन कहानियों की जैसी संरचना है, उससे स्पष्ट है कि उनका उद्देश्य मनोरंजन के साथसाथ समाज की तयशुदा व्यवस्था से अनुकूलित रखना भी था. इनमें सर्वाधिक लोकप्रियता पंचतंत्र, कथासरित्सागर और जातक कथाओं को मिली. शायद इसलिए कि उनकी रचनाओं के मूल कथासूत्र लोक से आए थे और रचनाकारों ने उनकी लोकप्रियता को देखते हुए ही, उन्हें अपनी विचारधारा के अनुरूप ग्रंथों में सम्मिलित किया था. इन कहानियों की एक अन्य खूबी उनकी किस्सागोई शैली है. शताब्दियों से सुनेसुनाए जाने के कारण इनके कथानक पाठक और श्रोता दोनों की जुबान पर चढ़े होते थे. ऐसे में किस्सागो द्वारा शैलीगत चमत्कार ही श्रोताओं के बीच उसकी लोकप्रियता और पैठ को बनाए रख सकता था. इसलिए प्रतिभाशाली किस्सागो प्रस्तुतीकरण के समय कथानक में आवश्यक फेरबदल करने के साथसाथ प्रस्तुति को आकर्षक बनाने का हरसंभव प्रयास करते थे. फलस्वरूप समाज में किस्सागो का महत्त्व बढ़ता गया. कालांतर में मनुष्य के आध्यात्मिक बोध में ठहराव आने लगा. जिज्ञासाएं विश्वास में ढलने लगीं. धर्म के प्रभाव के चलते ऐसे पात्रों और कथानकों की परिकल्पना की जाने लगी जो जीवन को सहजसरल बनाने में मददगार हों, या जिनके बारे में उसको भरोसा था कि आसन्न संकट की अवस्था में वे उसके मददगार सिद्ध हो सकते हैं. चूंकि साधारण पात्रों द्वारा असाधारण कार्य संभव न थे. अतएव असाधारण कार्यों के लिए असाधारण पात्रों और घटनाओं की परिकल्पना ने जोर पकड़ा. इस प्रवृत्ति का विस्तार हमें पौराणिक ग्रंथों में दिखाई पड़ता है.

परीकथाओं की संकल्पना तो बहुत बाद की उपज थी, किंतु जिस तरह के विचित्र पात्रों और चमत्कारी कथानकों के आधार पर परीकथाओं ने आगे चलकर लोकप्रियता के शिखर को छुआ, वैसी विचित्र परिकल्पनाएं इस दौर में होने लगी थीं. धार्मिक आस्था, विश्वास, कल्पना और मनोरंजन के दबाव में गढ़े गए ये अनूठे पात्र पहले लोककथाओं में स्थापित हुए, कालांतर में उन्हीं के एक हिस्से को जो कदाचित अधिक विचित्र, कल्पनाप्रधान और मनोरंजनपरक था, परीकथाओं के रूप में सहेजा जाने लगा. उस समय तक लेखन कला का विकास नहीं हुआ था. मानवीय बोध के आरंभ से लेकर उस समय तक जो रचा गया था, वह सब का सब श्रुति का हिस्सा था. इसलिए उस समय तक जो भी साहित्य रचा गया, सब लोक की धरोहर, लोकसाहित्य का हिस्सा था. उस समय तक परीकथाओं की श्रेणी तो नहीं बनी थी. जो साहित्य था, वह श्रुति के रूप में लोकसाहित्य का हिस्सा था. हम केवल इतना कह सकते हैं कि उस समय तक उस कालखंड तक कहानियों, रूपकों में वे पात्र कल्पित होने लगे थे, जो आगे चलकर परीकथाओं के रूप में पहचाने गए.

आधुनिक विद्वान पशुपक्षियों की कहानियों को भी परीकथाओं का हिस्सा मानते हैं. यह अन्यथा भी नहीं है. पशुपक्षी आदिकाल से ही मनुष्य के प्रथम सहयोगी रहे हैं. महाकाव्यों में ऐसे प्राणियों की परिकल्पना की गई है, जिनका शरीर ‘मनुष्य और पशु’ अथवा ‘मनुष्य एवं पक्षी’ का बना था. ये आदिम मनुष्य की प्रकृति से निकटता का प्रतीक है. प्राचीन मनुष्य ने जीवन में जो भी उसके आसपास था, उसे बिना किसी वरिष्ठताबोध, अपने अस्तित्व का हिस्सा बनाया था. उसकी वह छोटीसी दुनिया थी. उसमें न ज्यादा लंदफंद था, न जीवन की भागमभाग. प्रकृति से भोजन जुटाना और पशुपक्षियों की भांति उनके साथ, सभी को प्रकृति का हिस्सा मानकर रहना….रोज सुबह की किरण के साथ जागना तथा रात को भोजनोपरांत लंबी नींद लेनायही उसका जीवन था. लंबे अनुभव के उपरांत वह समझ चुका था कि पशुपक्षियों में कौनकौन उसके मित्र, सहयोगी हैं ; तथा किनसे उसके जीवन को खतरा हो सकता है. किस्सेकहानी पशुपक्षियों के स्वभाव, चारित्रिक विशेषताओं, खानपान तथा रहनसहन की आदतों से परचाने में सहायक थे. आने वाली पीढ़ी को जीवन की वास्तविकता से परिचित कराने में किस्सेकहानी सहायक थे. पीढ़ीदरपीढ़ी सुनेसुनाए जाने के कारण उनमें निरंतर निखार आता गया.

© ओमप्रकाश कश्यप

न्याय की अवधारणा

सामान्य

धर्म और अभिजन संस्कृति—9

न्याय की मूल भावना मनुष्यता के साथ प्रेमसंबंधों का नैरंतर्य है.’1

जॉन रॉल्स

न्याय बड़ा खूबसूरत शब्द है. साथ में सम्मानित भी. इसीलिए आम आदमी उसकी ओर उम्मीदभरी निगाह से देखता है. उसका कृपापात्र बनने की कामना करता है. लेकिन ऐंठ में डूबा हुआ न्याय उसकी ओर से मुंह फेरे रहता है. यह उसका सांस्कृतिक दर्प है. ‘न्याय’ को हम शब्दों का ‘अभिजन’ भी कह सकते हैं. कारण, बात जैसेजैसे आगे बढ़ेगी, आप स्वयं समझते जाएंगे. न्याय की आधारशिला इस विश्वास पर टिकी होती है कि मनुष्यों में अच्छे भी हैं और बुरे भी. सभी समाज में साथसाथ रहते हैं. यह बात भी किसी से छिपी नहीं कि अच्छाई और बुराई सापेक्षिक स्थितियां हैं. ‘क’ के लिए जो अच्छा है, वह ‘ख’ के संदर्भ में बुरा हो सकता है. कह सकते हैं कि न्याय संभाव्यता के सिद्धांत के आधार पर काम करता है. यानी जो साधारणतः अच्छा और तर्कसम्मत है, वही न्यायसम्मत भी है—ऐसा मान लिया जाता है. इसमें चूक होने की पर्याप्त संभावना होती है. न्यायिक एवं तर्कसम्मत के आकलन का पैमाना न्याय का अपना होता है. इसे प्रायः वे लोग बनाते हैं, जो न्याय का मनमाना उपयोग करने में पारंगत होते हैं. समर्थन के लिए स्याह को सफेद और सफेद को स्याह सिद्ध करना बाखूबी जानते हैं. इसके लिए विशेषज्ञों की पूरी टीम उनके साथ होती है. उनकी भाषा और कार्यशैली आम आदमी की समझ से सर्वथा परे होती है. जरूरत पड़ने पर त्राण की उम्मीद में उसे अंततः उन्हीं लोगों की शरण में जाना पड़ता है, जो न्याय के बारे में उसके अल्पज्ञान का लाभ उठाने के लिए अपनी गिद्धदृष्टि उसपर जमाए होते हैं. वे न केवल उसकी अज्ञानता का लाभ उठाते हैं, बल्कि येनकेनप्रकारेण यह विश्वास भी उसके दिलोदिमाग में बसा देते हैं कि संसार में केवल वही उसके सबसे बड़े शुभेच्छु एवं हितचिंतक हैं. उनके बौद्धिक वर्चस्व को स्वीकार कर चुका व्यक्ति उनपर आसानी से विश्वास कर लेता है. यह प्रवृत्ति उसे देरसवेर समझौतावादी प्रगतिविरोधी बना देती है.

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार व्यक्ति में नकारात्मक और सकारात्मक दोनों प्रकार की प्रवृत्तियां मौजूद रहती हैं. समाज में शांति और व्यवस्था के लिए आवश्यक है नकारात्मक प्रवृत्तियों का शमन तथा सकारात्मक वृत्तियों की अभिरक्षा एवं प्रोत्साहन. ‘परित्राणाय साधूनाम—विनाशाय च दुष्कृताम्’—महाभारत में अपने आगमन का औचित्य सिद्ध करने के लिए कृष्ण ने यही कहा है. इसको अन्यथा भी नहीं कहा जा सकता. ‘सज्जनों का कल्याण तथा दुर्जनों का विनाश’—यह किसी भी न्यायव्यवस्था का आदर्श हो सकता है, किंतु धर्मानुप्रेत परंपरागत न्याय प्रणाली यहीं तक सीमित नहीं रहती. इसके पीछे उसकी कुछ दूसरी ही मंशा होती है. धर्मानुग्राही न्यायप्रणाली का सहारा लेकर इस देश का अभिजन सहस्राब्दियों समाज के शीर्ष पर विराजमान रहा है. महाभारत में वह कृष्ण के बहाने धर्म को बीच में ले आता है—‘यदायदा हि धर्मस्य ग्लार्निभवति भारतः…’ आम आदमी हालांकि खुद को धार्मिक मानता है. हर चीज को वह आस्था के नजरिये से देखता है, किंतु धर्म और न्याय की युति को समझ पाना उसके सामान्य बुद्धिविवेक से बाहर होता है. आस्था की आंच पर रोटियां सेंकने वाली धार्मिक शक्तियां जनविवेकीकरण के लिए कोई प्रयास भी नहीं करतीं. उनकी स्वार्थकेंद्रित दृष्टि स्थितियों की मनमानी व्याख्या में जुटी होती है. धर्म आमजन के भावुक, भक्तिआकुल मन को देखनेसुनने में खूबसूरत लगता है. उसपर वह आंख मूंदकर भरोसा भी कर लेता है. नतीजन न्याय सीधीसादी लीक से उतरकर, आम आदमी की पहुंच से बाहर निकल जाता है. धर्म के सामंती परिवेश में रंगा न्याय बनावटी एवं ऊपर से थोपा हुआ प्रतीत होता है. धार्मिक अभिजन इसकी कतई परवाह नहीं करता. वह आम आदमी के दुखसंत्रास, घुटन और अभावों को उसकी नियति बताकर अपना उल्लू सीधा करने में लगा रहता है. महाभारत की व्याख्या कि कृष्ण न्याय के पक्ष में है, इसी से निकली है.

कुछ सीधे आपराधिक मामलों को छोड़ दें तो न्याय और अन्याय की पहचान का मामला बड़ा जटिल है. कई बार तो उलझन खड़ी हो जाती है. जो बात किसी खास संदर्भ में न्याय लगती है, संदर्भ बदलते ही वह अन्याय प्रतीत होने लगती है. ऊहापोह के दौरान शीर्षस्थ शक्तियां चतुराईपूर्वक अपने स्वार्थ को बीच में ले आती हैं. महाभारत में कृष्ण का पक्ष कहीं न कहीं राजसत्ता का पक्ष भी है, जिसमें विजेता का समर्थन करने के लिए अनुकूल तर्क अपने आप गढ़ लिए जाते हैं. वहां कृष्ण ही दंडपाशक हैं, वे ही न्यायाधीश. महाभारतकार को भी कृष्ण का पक्ष न्याय का पक्ष लगता है. बाकी कथापात्र तो उसकी कलम की कठपुतलियां हैं. कृष्ण के किसी निर्णय पर उंगली न उठे इसलिए उन्हें ‘भगवान’ की तरह पेश किया जाता है. दुर्योधन इसलिए दुश्मन क्योंकि वह कृष्ण के रिश्तेदार पांडवों को उनका हिस्सा देने से इन्कार कर देता है. कुपित कृष्ण युद्ध को अपरिहार्य मान लेते हैं. अंततः अठारह अक्षौहिणी सेनाएं कुरुक्षेत्र के मैदान में उतरती हैं और ‘भगवान’ के देखते ही देखते सब मटियामेट हो जाती हैं. राजशाही के अनुसार के पांडवों का हस्तिनापुर की संपत्ति में वैध हिस्सा था. किंतु उसी कानून के अनुसार राज्य का एक हिस्सेदार तो दुर्योधन भी था. ठीक है, दंभी दुर्योधन(महाभारतकार ने ऐसा ही चित्रित किया है) पांडवों को पांच गांव तक देने के लिए तैयार नहीं था. उसका निर्णय अन्यायपूर्ण था. युद्ध में जीत के बहाने दुर्योधन के संपत्तिअधिकार का हनन क्या कम अन्यायपूर्ण था! पांडवों से परास्त हो जाने के बाद भी हस्तिनापुर के राज्य में दुर्योधन की हिस्सेदारी समाप्त नहीं हो जाती. राजसत्ता यहां मनमाने तर्क के सहारे खड़ी नजर आती है. उसके न्यायतंत्र में युद्ध हारने के बाद व्यक्ति को न केवल संपत्ति, बल्कि जीवन के अधिकार से भी वंचित किया जा सकता था. महाभारतकार व्यास कृष्ण से वही निर्णय लिवाते हैं, जो तत्कालीन धर्मव्यवस्था चाहती थी. कृष्ण यदि सामान्य से हटकर निर्णय लेते, दुर्योधन को युद्ध में परास्त करने के बाद उसका हिस्सा दिलवाने को तैयार हो जाते, तब वह वास्तविक और नैतिक न्याय कहा जाता. परास्त दुर्याेधन के आगे उसे स्वीकारने के अलावा दूसरा रास्ता भी नहीं होता. तब वे महावीर और गौतम बुद्ध की श्रेणी के उदामना दार्शनिक गिने जाते. भगवान शायद ही बन पाते. महाभारतकार के कथानायक कृष्ण कौरवों को पराजित करने के लिए पांडवों का साथ निभाते हैं. आर्य संस्कृति को खतरा न हो, इसलिए वन्य संस्कृति के रक्षक महावीर एकलव्य का वध करवा देते है. वीर एकलव्य गुरु से छला जाता है और ‘भगवान से भी.

उस न्याय प्रणाली की खूबी थी कि उसके सारे तर्क विजेता के द्रष्टिकोण से गढ़े जाते थे. उन्हीं के आधार पर उसकी समीक्षा होती है. ‘यतो कृष्ण ततो जय’—कृष्ण का पथ न्याय का पथ है. धर्म की शरण में न्याय की खोज करने वालों द्वारा आज भी यह बढ़चढ़कर प्रचारित किया जाता है. राम के लिए रावण और शंबूक में कोई अंतर नहीं है. एक से उन्हें राजनीतिक चुनौती मिलती है, दूसरे से सांस्कृतिक. वे दोनों ही को मृत्युदंड देते हैं. केवल शक्तिशाली को शासन करने का अधिकार है. शक्तिहीन की स्वतंत्रता शक्तिसंपन्न की दया पर निर्भर है—इस तर्क को कभी धर्म तो कभी सत्ता के बल के सिद्धांत के आधार पर समझाया जाता है. लोकतंत्र के दौर में भी लोग कहते फिरते हैं कि राज्य इकबाल से चलता है, जो राजा ढीलाढाला हो, उसके राज्य सबकुछ अस्तव्यस्त रहता है. इकबाल बुलंद हो तो चोर, डाकू, लुटेरे मुंह छिपाए रहते हैं. ऐसा सोचने वालों की दृष्टि में जनता का अपना विवेक, आत्मानुशासन, मेलमिलाप और भाईचारा कुछ भी नहीं है. एक प्रकार से यह भी शक्तिशाली के न्याय को समाज पर थोप देने की चाल है. यह सोच फासीवादी कहलाता है. दोटूक अंदाज में कहा जाए तो जंगल का न्याय. इस कारण उदारमना चिंतक उसकी आलोचना भी करते हैं. मगर उस न्यायप्रणाली का मानना था पृथ्वी पर मौजूद सुखसंपदा समाज के खास वर्गों के लिए है. आमजन की नियति खास वर्ग में आने वाले लोगों की दासता और उच्छिष्ट पर जीवनयापन करना है. मानवनिर्मित असमानता और ऊंचनीच को नियति की तरह थोपने वाली उस व्यवस्था में पहला हस्तक्षेप भारत में गौतम बुद्ध और पश्चिम में सुकरात के आगमन के बाद होता है. करीबकरीब उन्हीं दिनों चीन में कन्फ्यूशियस की दस्तक सुनाई पड़ती है. उन्हें न जो सत्ता का भय था, न ही लालच. तीनों दार्शनिक ‘शुभ’ और ‘सदगुण’ पर जोर देते हैं. संभवतः पहली बार जीवन और समाज में नैतिकता की मांग उठती है.

आजकल दुनिया के अनेक देशों में लोकतंत्र है. अपनी मूल प्रवृत्ति में वह समानता और समानाधिकार की बात करता है. इसके बावजूद राज्य की न्यायसंबंधी अवधारणा में खास बदलाव नहीं आया है. सैद्धांतिक व्यवस्थाएं चाहे जो हों, किंतु व्यवहार में आज भी न्याय के नाम पर वही सहस्राब्दियों पुराना हंटर फटकारा जाता है. यदि कोई राज्य से टकराने की कोशिश करे तो राज्य उसे सुरक्षाव्यवस्था के लिए खतरा मानकर मृत्युदंड भी दे सकता है. हालांकि राज्य अभी तक किसी को भी जीवन देने में सक्षम नहीं है. इस तरह कुपित राज्य व्यक्ति से वह हड़प सकता है, जिसे देना उसके सामथ्र्य से परे है. उस समय राज्य यह भुला देता है कि व्यक्ति को गढ़ने में, चाहे वह अच्छा है या बुरा, उसका और समाज का योगदान कम नहीं होता. जन्म के समय तो हर बालक मासूम, सरलमना, निर्दोष और निस्वार्थ होता है. अनुभव के नाम पर कोरी सलेट. उसकी आवश्यकताएं प्राकृतिक होती हैं. दूध का कटोरा मिट्टी का है या सोने का, इससे उसपर कोई फर्क नहीं पड़ता. बड़ा होतेहोते वह यथार्थ से परिचित होता है. इस दौरान जो व्यक्तित्व वह प्राप्त करता है, उसके निर्माण में समाज का भी पूरापूरा योगदान होता है. इस बीच वह सामाजिक विसंगतियों से दोचार होता है. यदि वह बिगड़ता है तो उसे बिगाड़ने की नैतिक जिम्मेदारी से, चाहे पूरी हो या आंशिक, राज्य को अलग नहीं किया जा सकता. किंतु राज्य न्याय करते समय व्यक्ति को पूरी तरह अकेला छोड़ देता है. उस समय समाज शक्तिशाली के न्याय के सिद्धांत का ही अनुसरण कर रहा होता है. वह भूल जाता है कि बड़ी ताकत बड़ी जिम्मेदारी भी लाती है. समाज बड़ी इकाई है. इसलिए उसकी जिम्मेदारी भी अधिक है. समाज भले ही अल्पसंख्यक अभिजन के दिशानिर्देश के अनुसार चलता हो, मगर अल्पसंख्यक अभिजनों को भी अपनी ताकत, कार्यकारी ऊर्जा एवं प्रतिष्ठा समाज की ओर से ही प्राप्त होती हैं. अपनी प्रभुता को बनाए रखने के लिए समाज का अल्पसंख्यक अभिजन अपने बहुत से निर्णय बहुसंख्यक सर्वजन को अंधेरे में रखकर लेता है. इस कारण न्याय के ऊपर पर्दा पड़ा रहता है. जाॅन राॅल्स ने ठीक ही कहा है—

न्याय की सैद्धांतिकी लापरवाही के पर्दे के पीछे गढ़ी जाती है.’2

आप कहेंगे कि राज्य या समाज का न्याय सभी के लिए बराबर होता है. सर्वकल्याण के प्रति उनकी निष्ठा असंद्धिग्ध होती है. दो सगे भाइयों में से यदि एक साधु बनता है, दूसरा शैतान निकल आता है तो मातापिता का क्या दोष! दोष तो उस शैतान का है जिसने साधु बनने का अवसर गंवाकर शैतानी की राह पकड़ी. प्रत्येक मनुष्य स्वतंत्र मस्तिष्क का स्वामी होता है. स्थितियों के चयन की उसको छूट होती है. लोकहित में उचित यही है कि वह ऐसे रास्तों का चयन करे, जिससे समाज में दूसरों को नुकसान न हो. प्रथम दृष्टया यह तर्क उचित ही लगता है. आखिर समाज एक दिन में तो बना नहीं है. उसके पीछे हजारों वर्षों का परिश्रम, मानवीय संकल्प, सद्भाव तथा विद्वानों की सदेच्छाएं रही हैं. ऐसे में समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी है कि ऐसे व्यक्ति को दंडित किया जाए जो उसके लिए खतरा बन चुका है. सवाल है कि व्यक्ति क्या इतना ही स्वतंत्र होता है, जितना समाज में उसके न्यायिक हस्तक्षेप के लिए जरूरी है. इसका उत्तर नकारात्मक ही होगा. भारत जैसे परंपरागत समाजों में व्यक्ति की निर्णय क्षमता धर्म, जाति, परंपरा आदि से निर्धारित होती है. इसके अलावा आर्थिक विषमताएं भी हैं. अधिकांश मामलों में विपन्नता के शिकार व्यक्ति को अपने जीवनसंबंधी महत्त्वपूर्ण निर्णयों के लिए दूसरों पर आश्रित रहना पड़ता है. समाज उसके सोच का अपने स्वार्थ से अनुकूलन कर लेता है. दंडविधान का सहारा लेकर वह व्यक्ति को समाज से स्थायी अथवा अस्थायी रूप में काट देता है. इस कार्य को राज्य लोककल्याण, न्याय एवं व्यवस्था के नाम पर करता है. उल्लेखनीय है कि मनुष्य के व्यक्तित्व निर्माण में उसके परिवेश का योगदान सर्वाधिक होता है.

अपराध एक सामाजिक व्याधि है. वह न धर्म देखता है न जाति. अपकर्म की ओर प्रवृत्त होने वाला व्यक्ति कहीं न कहीं अपने परिवेश तथा अपने आसपास रहने वाले व्यक्तियों से असंतुष्ट होता है. व्यक्ति के असंतोष का कारण उसका अतिशय लालच अथवा अतिमहत्त्वाकांक्षाएं हो सकती हैं. दूसरा कारण संभव है कि समाज के एक वर्ग की ओर से उसका उत्पीड़न अथवा असमानतापूर्ण व्यवहार. अपराधी आत्मविश्वास, अभ्यास एवं संयम के कमी के चलते अपने आक्रोश पर नियंत्रण नहीं रख पाता. और समस्या का निदान उग्रता के रास्ते तलाशना चाहता है. उसका दोष होता है कि अपने असंतोष को समाज के समक्ष धैर्यपूर्वक रखने, अपने लालच पर काबू करने के बजाय वह समस्या का समाधान छल अथवा बल के रास्ते करना चाहता है. उस समय वह भूल जाता है कि उसकी शक्ति और बुद्धिबल की अपेक्षा समाज की संयुक्त शक्ति और बुद्धिबल कहीं अधिक है. समाज उससे कई गुना सामर्थ्यवान है तथा उससे टकराव के दौरान उसकी पराजय सुनिश्चित है. कई बार घमंड भी व्यक्ति के विवेक पर पर्दा डाले रहता है. समाज का दोष होता है कि वह अपनी ईकाई के भीतर अपेक्षित विश्वास एवं धैर्य पैदा करने में विफल रहता है. तथा समाज को स्थायी समाधान की अपेक्षा उस अकेले व्यक्ति को दंडित कर, वास्तविक समस्या की ओर से आंख मूंद लेता है. इसे मूल समस्या की ओर से समाज का पलायन कह सकते हैं. मां यदि दुर्बल और रोगग्रस्त है तो स्वस्थ संतान की उम्मीद कम हो जाती है. उसकी देह के विकार स्वाभाविक रूप से संतान में चले आते हैं. इसलिए व्यक्ति के विचलन के लिए केवल उसे दोष देने से पहले यह भी सोचना चाहिए कि जो मनुष्य पारिवारिक संबंधों को लेकर अतिरेक की सीमा तक संवेदनशील होता है, रिश्तों की मानमर्यादा का ख्याल रखता है—देश और समाज को लेकर वह अचानक व्यावहारिक क्यों हो जाता है? इसका कारण यह भी हो सकता है कि समाज भी ऐसे व्यक्तियों के साथ उदारमना संरक्षक की भांति पेश आने के बजाय सौदागर जैसा व्यवहार करने लगता है. एक जिम्मेदार अभिभावक की भूमिका निभाने की अपेक्षा वह दरोगा की तरह पेश आता है. जिन समाजों में सामाजिकसांस्कृतिक स्तर पर भयानक स्तरीकरण हो, वहां न्याय को लेकर राज्य की चुनौतियां और भी बढ़ जाती है. इसलिए कि सामाजिकसांस्कृतिक विश्वासों की जड़ें बहुत गहरी होती हैं. परंपरा और संस्कार के रूप में वे पीढ़ीदरपीढ़ी गहराती जाती हैं. उनमें बदलाव करना आसान नहीं होता. निरंतर संवाद, सदस्यों के बीच आपसी विश्वास, वैज्ञानिक सोच, भविष्य के प्रति सुस्पष्ट दृष्टि तथा ठोस कार्ययोजना से सामाजिकसांस्कृतिक असमानताओं की खाई को पाटने के लिए पहल अवश्य की जा सकती है. इसके लिए राज्य का कर्तव्य होता है कि आपसी संवाद और न्याय के संवितरण की प्रणालियों को मजबूत बनाए तथा उन असमानताओं को दूर करने का भरसक प्रयास करे जो धर्म, संस्कृति, परंपरा, जाति, वर्ग अथवा ऐसे ही किसी कारण द्वारा पैदा हुई हैं.

ऊपर हमने न्याय के लिए साधु और शैतान का उदाहरण दिया. समाज की निगाह में साधु वह है जो उसकी व्यवस्था में जरा भी खलल नहीं डालता. जैसी भी है उसे शिरोधार्य कर लेता है. वह सामाजिक स्थितियों से समझौता कर चुका अथवा उनकी ओर से मुंह फेर चुका व्यक्ति हो सकता है. ऐसा व्यक्ति समाज के लिए चुनौती नहीं बनता, बल्कि उसकी हर स्याहसफेद व्यवस्था का समर्थक बनकर आत्मलीन जीवन जीता चला जाता है. अपने परिवेश की ओर से वह इतना उदासीन हो जाता है कि समाज उसकी गतिविधियों को नजरंदाज कर देता है. दूसरी ओर अपराधी प्रायः अपने असंतोष के साथ जीता है. वह कहीं न कहीं अपने परिवेश से असंतुष्ट होता है. बदलाव की प्रबल कामना भले ही वह उसके निजी स्वार्थ के लिए क्यों न हो, उसे अवरोधों से टकराने के लिए उकसाती है. इस असंतोष के अनेक कारण हो सकते हैं. उसके पीछे अपराधी की स्वार्थलिप्सा हो सकती है और समाज के कुछ वर्गों द्वारा किया गया उत्पीड़न भी. लेकिन इतना तय है कि उसके अपराधकर्म की समीक्षा शिखरस्थ शक्तियां अपने नफानुकसान को ध्यान में रखकर करती हैं. उनकी स्वार्थपरता के कारण समस्या के असली कारणों को पहचानकर उसके स्थायी समाधान पर काम बहुत कम हो पाता है. ‘परित्राणाय साधूनाम्, विनाशाय च दुष्कृताम्’ भी सत्तासीन अभिजन के तानाशाहीपूर्ण आचरण की ओर संकेत करता है. उसमें न्याय ऊपर से थोपा जाता है. व्यक्ति या तो न्याय को सहता है अथवा उससे समझौता कर लेता है. न्याय की चालू अवधारणा अथवा केंद्राभिमुखी शासन में आज भी ऐसा ही होता है. उसमें न्याय की पड़ताल अपनीअपनी स्वार्थदृष्टि से की जाती है. उदाहरण के लिए 1857 की घटना ईस्ट इंडिया कंपनी और उसकी आका इंग्लेंड सरकार के लिए ‘सिपाहियों की बगावत’ थी, जबकि भारतीयों के लिए स्वाधीनता संग्राम. इसलिए केंद्र में बदलाव के साथ ही प्रायः अपराध के मायने बदल जाते हैं. आजकल भी ऐसे अनेक किस्से सुनने में आते हैं जब एक सरकार किसी भ्रष्ट अधिकारी को जेल में डालती है, किंतु सत्ता परिवर्तन के बाद वह व्यक्ति अपनी संरक्षक सरकार के आने पर, पुनः महत्त्वपूर्ण पदों पर आसीन हो जाता है. आशय है कि व्यक्ति का अपने कर्तव्य से विचलन समाज के लिए आत्मावलोकन का अवसर होता है. फिर भी यह कह देना कि व्यक्ति के अनाचार के लिए केवल समाज जिम्मेदार होता है, समस्या का एकाएक सरलीकरण कर देना है.

मानव समाज सहस्राब्दियों से धर्म द्वारा अनुशासित होता आया है. अपना औचित्य सिद्ध करने के लिए प्रत्येक धर्म ने अपनीअपनी आचारसंहिता गढ़ी है. भारत में यह कार्य न्यायसूत्रों, स्मृतियों, ब्राह्मणग्रंथों तथा संहिताओं के माध्यम से किया जाता था. इस्लाम में इसके लिए शरीयत की व्यवस्था है. ईसाइयों में सोलोमान के उपदेश और चर्च. इनके आधार पर धर्मपरायण लोग निर्णय लेते रहे रहे हैं. कुछ लोग तो आज भी यह दावा करते हैं समाज को अन्य कानूनों की अपेक्षा धर्म की सहायता से आसानी से अनुशासित किया जा सकता है. इस्लाम के अनुयायी तो शरीयत से परे कुछ सोचना भी नहीं चाहते. उनके अंधानुकरण में कट्टरपंथी हिंदू भी स्मृतियों तथा अन्य ब्राह्मण ग्रंथों की दुहाई देने लगते हैं. सवाल है कि धर्म का राज्य क्या न्याय के राज्य का विकल्प बन सकता है? क्या धर्म व्यक्ति को इतनी आजादी देता है कि वह परंपरा और संस्कृति की सीमारेखा से बाहर आकर वस्तुनिष्ट ढंग से कुछ सोच सके? इन मुद्दों को लेकर बहसें प्रायः होती ही रहती हैं. छिटपुट विचार इस लेख में भी आ चुके हैं. धर्म का संबंध आस्था और विश्वास से होता है. इसलिए वह पूर्वाग्रह मुक्त कभी हो ही नहीं पाता. अपनी मूल प्रवृत्ति में वह पूरी तरह अलोकतांत्रिक होता है. व्यवहार में अपने लुभावने अंदाज में वह भले ही दया, करुणा, मैत्री, दान, मानवप्रेम और परोपकार की दुहाई दे, उसका वास्तविक रुझान शीर्ष की ओर होता है. इसलिए येनकेनप्रकारेण वह समाज के शीर्षस्थ वर्गों का हितचिंतक सिद्ध होता है. शिखर पर बने रहने के लिए हर जायजनाजायज कोशिश के दौरान वह मनुष्य से उसके परिष्कार का अवसर छीन लेता है. यह कहकर कि आततायी को दंडित करने की जिम्मेदारी दैवीय सत्ता की है, और व्यक्ति को अपनी अच्छाई और बलिदान का पुरस्कार इस जन्म में न सही अगले जन्म में मिल ही जाना है, वह मनुष्य को पलायनवादी बना देता है. असमानता के कारणों का प्रतिकार करने, अन्याय के विरुद्ध जंग छेड़ने के बजाय वह सहते रहने का आग्रह करता है. परिणामस्वरूप मनुष्य दुनिया को बदलने की कोशिश करने के बजाय, परिस्थितियों से समझौता करने लगता है. यह कहकर कि ईश्वर सब देखता है, वही एकमात्र नियंता और न्यायकर्ता है, वह ऐसी ख्याली दुनिया में जीने लगता है, जिसमें उसके अपने दुख और अभावों के अलावा बाकी सब सपना होता है. इसलिए धर्मप्रेरित न्याय, नीति संगत भी हो यह जरूरी नहीं है. चूंकि समाज में धर्म और नैतिकता को परस्पर पर्याय के रूप में पेश किया जाता है, इसलिए जनसाधारण धर्म को श्रद्धा के अतिरेक के साथ देखतासमझता है. ऐसे में उसका इकहरा, अभिजातीय चेहरा आमजन के सामने बहुत कम आ पाता है.

मानवव्यवहार में सकारात्मक एवं नकारात्मक वृत्तियों की खोज करते हुए मनोवैज्ञानिक प्रायः शताब्दियों पीछे चले जाते हैं. जब मनुष्य जंगल में रहता था. जंगली पशुओं से उसका वास्ता पड़ता था. मनोवैज्ञानिकों के अनुसार वनचारी जीवन की कुछ छाप, उसके कुछ अवशेष मानवचरित्र पर आज भी बाकी हैं. मनुष्य की नकारात्मक वृत्ति के लिए उसके अतीत को दोषी ठहराने वाले मनोवैज्ञानिक अरस्तु की परिभाषा को भूल जाते हैं. जिसने मनुष्य को विवेकशील प्राणी माना है. यह ठीक है कि आदि मानव के जन्म के दस लाख वर्षों के मुकाबले मानव सभ्यता का चालीसपचास हजार वर्ष का समय बहुत कम है. लेकिन इस अवधि में ऐसा अनेक बार हुआ है जब मनुष्य ने खुद को नैतिकता की खोज का सबसे बड़ा हिमायती सिद्ध किया है. बिना नैतिकता का हिमायती बने, विकास की इतनी लंबी यात्रा संभव ही नहीं थी. लेकिन जब कानून की चर्चा होती है तो मनुष्य के नैतिकता के इतिहास को एकदम भुला दिया जाता है. पेशेवर मनोवैज्ञानिक इस बात पर विचार नहीं करते कि वे कौनसी परिस्थितियां हैं, जो मनुष्य की नकारात्मक वृत्तियों के हावी हो जाने का कारण बनती हैं. कानून अपनी किताबों में लिखे प्रावधानों के अनुसार सजा सुनाकर अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री कर लेता है. मनोवैज्ञानिक समाज और परिस्थितियों का विश्लेषण करने की जिम्मेदारी समाज वैज्ञानिक या किसी तीसरे के कंधों पर डालकर शांत हो जाते हैं. यह यह मान लिया जाए कि मनुष्य में नकारात्मक प्रवृत्तियां सदैव सक्रिय रहती हैं, कि उसमें अपने पूर्वजों के जंगली जीवन के कुछ प्रभाव अब भी अवशेष हैं. हालांकि वे यह नहीं बता पाते कि मनुष्य की नकारात्मक वृत्तियों के समाहार के लिए उन्होंने क्या इंतजाम किए हैं? यदि मनुष्य में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रवृत्तियां सक्रिय हैं तो सहस्राब्दियों से मानव समाज तरक्की क्यों करता रहा है? हम सब विकास चाहते हैं. तरक्की कर आगे निकल जाना चाहते हैं, किंतु जितनी तेजी से मनुष्य बाहरी परिवर्तनों को अपनाता है, आंतरिक परिवर्तनों को आत्मसात करने की गति बहुत धीमी होती है. इसलिए कि हर परंपरागत समाज अपने भीतर कुछ न कुछ पूर्वाग्रह बचाए रहता है, जो कदमकदम पर उसके लिए अवरोधक का काम करते हैं. जिन्हें वह कभी धर्म, कभी संस्कृति तो कभी कानून के नाम पर समाज पर लागू रखना चाहता है.

समानता और न्याय के संवितरण का उद्देश्य उन असमानताओं का उन्मूलन भी है जो विशेष परिवार, जाति या धर्म में जन्म लेने से पैदा होती हैं. परंपरागत समाजों में बालक का भविष्य उसके मातापिता तथा परिवार के सामाजार्थिक स्तर से तय होता है. संपन्न परिवार में जन्मे व्यक्ति को धनवैभव के साथ सामाजिक प्रतिष्ठा भी बिना कुछ अतिरिक्त श्रम किए हासिल हो जाती है. दूसरी और विपन्न परिवारों में जन्मे व्यक्ति को पहले अपने अस्तित्व के संकट से जूझना पड़ता है, तदनंतर वह विकास की बात सोच पाता है. इस तरह संपन्न परिवार में जन्मे व्यक्ति के बराबर में आने के लिए सामान्य व्यक्ति को उससे कहीं अधिक लंबी दूरी पार करनी पड़ती है. संपन्न परिवार में जन्मा व्यक्ति यदि कुछ न भी करें तो भी उच्च सामाजिक स्थिति, पदप्रतिष्ठा का लाभ उसे मिलता है. जिसके सहारे वह आगे बढ़ता जाता है. दूसरी ओर साधारणजन को विकास की मुख्यधारा में सम्मिलित होने के लिए अपनी वर्तमान स्थिति को बचाने हेतु प्रयत्न के अलावा उन बाधाओं से भी जूझना पड़ता है जो उसकी दुर्दशा को बनाए रखना चाहती हैं. दूसरे शब्दों में विकास की दौड़ में बने रहने के लिए संपन्न व्यक्ति का काम केवल समानांतर यात्रा से चल जाता है, वहीं विकास की धारा में शामिल होने के लिए विपन्न वर्ग को उध्र्वाधर यात्रा करनी पड़ती है, जो समानांतर यात्रा की अपेक्षा कहीं अधिक कठिन होती है. संसाधनों और राज्य के समर्थन के अभाव में जनसाधारण की विकास यात्रा और भी कठिन हो जाती है. जाॅन राॅल्स के शब्दों में—

न्याय मनुष्यता का परम सत्य, सामाजिक संस्थाओं का प्रमुख सद्लक्षण है.’3

रॉल्स के अनुसार शब्दों में संवितरणात्मक न्याय ऐसे ही सामाजिक, राजनीतिक कारणों से वंचित रह गए लोगों को अतिरिक्त सहारा देकर उन्हें विकास की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए जरूरी है. राज्य तथा उसकी सहायक संस्थाओं का यह दायित्व है कि जन्म अथवा सामाजिक स्तरीकरण के कारण विकास की स्पर्धा में पिछड़ गए लोगों के कल्याण के लिए अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध कराए. उनमें यह विश्वास उत्पन्न करे कि समाज जीवन की प्रत्येक चुनौती में उसके साथ है. उसे चाहिए कि व्यक्ति के चरित्र निर्माण का उपयुक्त माहौल पैदा करे. जिसमें उसके विकास के भी भरपूर अवसर हों. बजाय इसके समाज कानून का जखीरा खड़ा कर देता है. समाज के अनुसार मनुष्य की नकारात्मक वृत्तियां दूसरों को नुकसान न पहुंचाए इसके लिए कानून की जरूरत पड़ती है. विवाद की स्थिति में वे उचितअनुचित में से उचित का चिह्नन कर, उसको संरक्षण प्रदान करती हैं. अनुचित के लिए रोकथाम और दंड की व्यवस्था भी. लेकिन अपनी शीर्षोन्मुखता में न्याय सामाजिक स्तरीकरण को बढ़ावा देने वाला सिद्ध होता है, जिससे उसका उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है.

आम आदमी न्याय के प्रायः एक पक्ष जिससे राज्य की अधिसत्ता प्रकट होती है, जिससे वह अकसर शक्तिप्रदर्शन करता है, को जानतासमझता है. उसके अंतर्गत कानून, अदालतें, पुलिस, सैन्यबल आदि आते हैं. न्याय का दूसरा एवं महत्त्वपूर्ण पक्ष है, नागरिकों के बीच अधिकतम समानता की स्थापना; अर्थात सुखसंसाधनों का समाज के सदस्यों के बीच संवितरण. यदि न्याय के पहले पक्ष को राज्य का अधिकार तथा उसके शक्ति प्रदर्शन का जरिया माने तो उसका दूसरा पक्ष राज्य के कर्तव्यपालन और नैतिक दायित्वों से जुड़ा हुआ है. न्याय को लेकर समस्या तभी खड़ी होती है, जब समाज अपने कर्तव्यपालन से चूक जाता है. अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए वह कानून के उपयोग द्वारा बलप्रयोग पर उतर आता है. संवितरणात्मक न्याय के सटीक पर्याय के रूप में ‘सामाजिक न्याय’ जैसा सुंदरसार्थक शब्दयुग्म हमारे पास है. पिछले कुछ वर्षों में इस शब्दयुग्म का राजनीतिक प्रलोभनों के रूप में यद्यपि खूब दुरुपयोग हुआ है. इसके बावजूद इसका आकर्षण मिटा नहीं है. अपने पुनीत निहितार्थ के रूप में यह समाज के गठन के औचित्य की ओर संकेत करता है. दूसरे शब्दों में सामाजिक न्याय राज्य का वह लक्ष्य है जिसकी प्राप्ति उसके औचित्य की कसौटी तथा उसके नैतिक आचरण का मापदंड है. किसी भी राज्य की अधिसत्ता उसके कानून, पुलिस बल, राजनीति, आर्थिक आदि संस्थाओं द्वारा तय होती है. यही संस्थाएं आम आदमी के जीवनस्तर तथा उसके सोच का निर्धारण करती हैं.

संवितरणात्मक न्याय का आशय है कि इन सभी संस्थाओं के लाभों, कर्तव्यों तथा सुखसुविधाओं का उसके नागरिकों के बीच पक्षपातरहित समान संवितरण. जीवनोपयोगी आवश्यक वस्तुओं का एकसमान बंटवारा. इस दृष्टि से संवितरणात्मक न्याय प्राकृतिक न्याय के नजदीक आ जाता है. दूसरे शब्दों में यह मनुष्यता की कसौटी है. जैसे प्रकृति की निगाह में सभी प्राणी बराबर होते हैं. नदी का जल सभी के लिए उपलब्ध होता है. ठीक इसी प्रकार धूप, हवा, जल भी लोगों के बीच पक्षपात नहीं करते. लेकिन व्यक्तित्व के स्तर पर समाज में सभी व्यक्ति एकसमान नहीं होते. उनमें न केवल स्वभावगत अंतर होता है, बल्कि उनकी कार्यक्षमता भी भिन्नभिन्न होती है. इसलिए कल्याण सरकार का दायित्व है कि सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक कारण से सुविधाओं के मामले में पिछड़ गए लोगों को भी जीवनोपयोगी वस्तुओं की आपूर्ति में समानता को बनाए रखे. यह उस अवधारणा की काट करती है जो मानती है कि मनुष्यों में कुछ विशेष योग्य होते हैं. कुछ कम योग्य और कुछ अयोग्य. इसलिए जो विशेष योग्य हैं वे सामाजिक आय में से अधिकतम के स्वाभाविक अधिकारी हैं, कम योग्य उनसे कम और अयोग्य सबसे कम. चूंकि योग्यता के मापदंड विकसित करना और उन्हें बदलती हुई सामजिक मांगों, अपेक्षाओं के अनुरूप ढालते रहना चुनौतीभरा काम होता है, इसके चलते विशेष योग्यता की कसौटी शिखरस्थ परिवार अथवा ऐसे ही समूह में जन्म लेना मान लिया जाता है. धीरेधीरे यही रूढ़ बनता चला जाता है. ऐसे में वे लोग जो शिखरस्थ समूह में जन्म लेने से वंचित रहे हैं, जिन्हें किसी प्रकार का शक्तिसंरक्षण अप्राप्य है, जो बुद्धिचातुर्य और छलछंद से बचे हुए हैं, वे सामान्य सुविधाओं तथा अधिकारों से वंचित कर दिए जाते हैं. संवितरणात्मक न्याय इसी की भरपाई हेतु राज्य के नैतिक कर्तव्य की ओर संकेत करता है. उसका पहला और आधारभूत सिद्धांत है कि समाज में सभी मनुष्य बराबर हैं. जो है वह सभी का है. इसलिए उसकी सबसे पहली मांग होती है, संपूर्ण समानता तथा सुख का संवितरण. सभी के लिए अवसरों की समानता, ताकि उनका विकास दर अबाधित रहे.

सामाजिक न्याय का अभिप्राय समाज के कुल संसाधनों, वस्तुओं का उनकी जनसंख्या के आधार पर बांटकर विभाजन रेखा खींच देना नहीं है. प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र मस्तिष्क रखता है. वह केवल जैविक इकाई नहीं है. इसलिए सुख को लेकर हर व्यक्ति का विशिष्ट सोच एवं आग्रह होता है. कोई एक वस्तु सभी व्यक्तियों के लिए समान सुखकारी नहीं हो सकती. दूसरे शब्दों वस्तुओं के समान वितरण को सुख अथवा कल्याण का संवितरण मान लेना अनुचित होगा. उदाहरण के लिए एक व्यक्ति केवल दो केलों से काम चला सकता है. इससे अधिक केले उसके स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं. जबकि दूसरा व्यक्ति एक दर्जन केलों को आसानी से पचा सकता है. इन दोनों के अलावा तीसरा व्यक्ति ऐसा भी हो सकता है कि जिसको केले जराभी पसंद न हों. इसलिए ऐसे व्यक्ति को जिसे केले पसंद नहीं हैं, उसके लिए केलों की आपूर्ति सुनिश्चित करना अथवा जिसे दो केलों की आवश्यकता है, उसको उससे अधिक केलों के लिए बाध्य करना, अनावश्यक माना जाएगा. यानी कल्याण का संवितरण व्यक्ति के मनोविज्ञान तथा रुचियों से भी जुड़ा है. तदनुसार वस्तुओं की पक्षपात रहित, न्यायसंगत आपूर्ति के अलावा यह देखना भी आवश्यक है कि वे वस्तुएं विशिष्ट परिस्थितियों में रह रहे उस व्यक्ति को अधिकतम संतुष्ट करने के साथसाथ उसके विकास को स्वाभाविक गति देती हैं या नहीं! दूसरे शब्दों में उन्हें मनुष्य के लिए अधिकतम आत्मतुष्टिकारक तथा उसके कल्याण के स्तर में बढ़ाने वाला होना चाहिए. समाज के गठन का आधार भी यही है. मनुष्य के समाज में सम्मिलित होने का उद्देश्य भी यही रहा है कि अग्रज की भूमिका में समाज उसके संरक्षण के साथसाथ उसके हितों की रक्षा भी करेगा. उसके सान्निध्य में मनुष्य वांछित सुखों की अधिकतम प्राप्ति कर सकेगा. पूर्ण समाजीकरण ही वह रास्ता है जिससे राज्य तथा उसकी अन्य संस्थाएं, सामाजिक सहयोग के साथ मानवाधिकारों का संरक्षण कर सकती हैं. मानवाधिकारों की बात यहां इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि विभिन्न संस्कृतियों, समाजों में जन्मे व्यक्ति की भिन्न अपेक्षाएं होती हैं. सामाजिक न्याय की सफलता इसमें है कि समाज में सुविधाओं और शक्तियों के भिन्नभिन्न टापू न पनपने दे. जॉन रॉल्स तो अपनी पुस्तक ही इस वाक्य से करता है—

जिस प्रकार विवेकवान समाज की स्थापना का आधार सत्य है, ऐसे ही न्याय की स्थापना सामाजिक संस्थाओं का पुनीत कर्तव्य है.’4

न्याय की स्थापना के लिए जरूरी है कि कल्याण कार्यक्रमों की रूपरेखा बनाते समय राज्य यह ध्यान रखे कि उनका लाभ उसके सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के प्राप्त हो सके. उनमें इतना लचीलापन भी हो कि कल्याण के संवितरण हेतु, प्राकृतिकसामाजिक कारणों से जिन नागरिकों को दूसरे नागरिकों से अधिक मदद की आवश्यकता है, वह उन्हें आसानी से, बगैर किसी आंतरिक विक्षोभ के प्राप्त हो सके. इस मदद का, न्याय के संवितरण का लक्ष्य नागरिकों के बीच कल्याण के बंटवारे तक सीमित नहीं है. बल्कि उन्हें इस योग्य बनाना है कि जो नागरिक परिस्थितियों की विपन्नता के चलते राष्ट्रनिर्माण में अपना श्रेष्ठतम योगदान देने में असमर्थ हैं, मदद के बाद उनके आत्मविश्वास और इरादों में वृद्धि हो, ताकि वे स्वयं को समाज के लिए अधिकाधिक उपयोगी सिद्ध कर सकें. साथ में उन मूल्यों की भी रक्षा हो, जो समाज के गठन का आदर्श रहे हैं. इसलिए कि कोई भी विधान, वह चाहे जितना पवित्र क्यों न हो, उसने रचने वाले महानतम में श्रेष्ठतम श्रेणी के परममेधावी क्यों न हों. यदि वह मानवीय स्वतंत्रता को किसी भी प्रकार से हानि पहुंचाता है, उसको अवरुद्ध करता है, तो वह अनैतिक है. यहां स्वत्रंतता के मायने केवल राजनीति तक सीमित नहीं है. वह आर्थिक, समाजिक, राजनीतिक तक व्यापक हैं. और समाज का अर्थ केवल मनुष्यों का समूह नहीं है, बल्कि एकदूसरे के कल्याण को समर्पित विवेकवान इकाइयों का जीवंत समूह हैं जिसके सदस्य अपने सुख और दूसरे के कल्याण के प्रति चैतन्य हैं.

सहविधान में न्याय

क्या कानून का राज्य ‘न्यायपूर्ण’ राज्य हो सकता है? इस प्रश्न को इस प्रकार भी पूछा जा सकता है कि क्या कानून और न्याय एक दूसरे के पूरक और अनुवर्ती हैं? कई दशक पहले पढ़ी किसी यूरोपीय लेखक की एक उक्ति यहां याद आती है. कानून की अप्रासंगिकता पर टिप्पणी करते हुए उसने कहा था—‘दुनिया के सभी कानून व्यर्थ हैं. इसलिए कि भले आदमी को कानून की जरूरत नहीं होती. जबकि बुरा आदमी उससे सुधारा नहीं जा सकता. आज देश में छोटेबड़े न्यायालयों की जितनी शाखाएं हैं, समाज में उनकी जैसी हैसियत और पैठ है, उसे देखकर भला कौन इस उक्ति पर विश्वास करेगा! अधिकांश तो इसका समर्थन ही करेंगे. इसे लेखक का पागलपन कहकर वे तत्काल खंडन पर उतर आएंगे, ‘कानून तो आधुनिक सभ्यता की आंख, सुशासन की अनिवार्यता है. इससे सरकार और समाज दोनों को दृष्टि मिलती है.’ किंतु इस कड़वी हकीकत को देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित अधिवक्ता राम जेठमलानी जब इन शब्दों में बयान करते हैं—‘दुनिया के श्रेष्ठतम कानून, निकृष्टतम अपराधियों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं.’ तब उपर्युक्त उक्ति की सचाई पर भरोसा होने लगता है. ध्यानपूर्वक देखा जाए तो कानून आधुनिकता की अभिजातीय नकाब है. सभ्यता का चमकीला आवरण. यह उन लोगों के लिए ढाल हैं, जो इसे समझतेबूझते हैं. पर जो रोजीरोटी में उलझे हैं, उनके लिए कानून की जटिल धाराएं अवसर आने पर फांसी का फंदा बन जाती हैं. प्रकारांतर में कानून अच्छाई के प्रोत्साहन के लिए नहीं, बल्कि बुराई की रोकथाम के लिए बनाए जाते हैं. सवाल है कि बुरे आदमी क्या उससे सुधर पाते हैं? कानून का एक लक्ष्य चरित्रनिर्माण भी है. इस मकसद में वह कामयाब रहता है, यह तो कानून का बड़े से बड़ा समर्थक नहीं कह पाता. ऊपर से समाज में जिस तेजी से रोज नएनए कानून बनाए जाते हैं, सरकार भारीभरकम और खर्चीली संस्थाओं का गठन करती जाती है, उससे यह संकेत भी मिलता है कि इतने सारे कानून मिलकर भी बुराई पर अंकुश लगाने में नाकाम रहे हैं.

दरअसल कानून की प्रकृति निषेधात्मक होती है. ‘फलां कार्य राजसमाज के लिए अहितकारी है. इसके करने पर फलां दंड का प्रावधान है.’ कानून की व्याख्याएं प्रायः इसी प्रकार नकारात्मक तत्व लिए होती हैं. सरकार जितनी तेजी से नए कानून बनाती है, उनके अनुपालन पर जितना ज्यादा खर्च करती है, उसका एकचौथाई हिस्सा भी आमजन को कानून और कानूनी प्रक्रिया से परचाने पर खर्च नहीं करती. पर्याप्त जानकारी के अभाव में आम आदमी उपलब्ध कानूनों का संरक्षण प्राप्त करने, उनसे लाभ उठाने में पीछे रह जाता है. दूसरे कानूनी प्रक्रिया के अंतर्गत न्याय व्यक्ति को स्वयं के प्रयत्न पर निर्भर करता है. राज्य और समाज दोनों सिवाय कुछ औपचारिक घोषणाओं के उसकी मदद के लिए नहीं आते. जबकि न्यायप्रधान व्यवस्था की कसौटी है कि उसमें न्याय व्यक्ति तक स्वयं और सहजरूप में, बगैर किसी विलंब के पहुंचना चाहिए. यदि आवश्यक हो तो उसमें मनुष्य का न्यूनतम श्रम, अर्थ और समय खर्च होना चाहिए. आधुनिक न्यायतंत्र में प्रायः इसके उलट दिखाई पड़ता है. अदालतों में प्रायः देखा जाता है कि वहां अपराधी और निर्दोष आमनेसामने खड़े होते हैं. जज महोदय का ध्यान अपराध की प्रकृति और परिस्थितियों पर विचार करने से ज्यादा कानून की उन धाराओं को समझने में जुटा होता है, जिनके तहत मुकदमा दायर किया गया है; अथवा जिसके अंतर्गत सुनवाई होनी है. उस समय कानून दोनों से समान व्यवहार का दावा करता है. किंतु आरोपमुक्त सिद्ध होने तक निर्दोष को भी उतनी ही बदनामी और मानसिक यंत्रणा का सामना करना पड़ता है, जितना असली अपराधी को. न्याय के राज्य में निर्दोष का ऐसा उत्पीड़न अक्षम्य होता है. जबकि कानून के राज्य में ऐसी स्थितियां न्यायप्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा मान ली जाती हैं.

साफ है केवल कानूनआधारित होने से ही राज्य, न्याय का राज्य नहीं हो सकता. वह शिखर पर विराजमान अभिजन का, अभिजन के लिए, अभिजन द्वारा शासन अवश्य कहा जा सकता है. कानून के राज्य को बहुत से विद्वान आधुनिक सभ्यता की निशानी मानते हैं. इसके बहाने जिस सभ्यता की ओर उनका इशारा होता है, उनमें ऊपर से लेकर नीचे तक शीर्षस्थ वर्गों की इजारेदारी चलती है. सैद्धांतिक रूप से कानून का राज्य वहीं संभव है जब साधारणजन को उस कानून की पूरीपूरी जानकारी हो, ताकि वह आवश्यकता पड़ने पर न्यायालय में अपना मुकदमा स्वयं बिना किसी बाहरी मदद के लड़ सके. चूंकि व्यवहार में ऐसा होना तो दूर करने की कोशिश तक नहीं की जाती. इस कारण जनसाधारण के लिए कानून का राज्य महज छलावा सिद्ध होता है. कानूनों के लंबेचैड़े जखीरे के बीच अधिकांश बहसें यह तय करने के लिए चलाई जाती हैं कि निर्णय प्रक्रिया को कानून की किस धारा के तहत चलाया जाए. जो कार्य सुविज्ञ न्यायाधीशों द्वारा प्रथम द्रष्टया, यानी मामले के अदालत के सम्मुख आते ही तय हो जाना चाहिए, मगर इसको अधिवक्ताओं के भरोसे छोड़ दिया जाता है, जो न्याय की मंड के सबसे चालबाज सौदागर होते हैं. उसके लिए कईकई वर्ष तक मुकदमे चलते रहते हैं. इससे जो संपन्न है, पहुंचवाला है, वह कानून को मनमाफिक मोड़ देने में या कार्रवाही को टालते रहने में सफल हो जाता है. न्याय में अनावश्यक और अवांछित विलंब अन्याय को पनपने का अवसर देता है. इसके चलते तो कई बार कानूनों का अनुपालन न चाहते हुए भी पक्षपातपूर्ण हो जाता है.

न्याय की सैद्धांतिकी

आधुनिक समाज में न्याय को सामान्यतः कानून के नजरिये से देखासमझा जाता है. इसलिए हमने कानून के राज्य की स्थिति पर विचार किया और मौटे तौर पर निष्कर्ष पर पहुंचे कि केवल कानून का राज्य न्याय का राज्य नहीं हो सकता. इसलिए कि कानून की जटिलताओं को समझना सामान्य बुद्धिविवेक के बाहर होता है, इस कमजोरी के चलते वह ताकतवर के साथ लड़ाई में लंबे समय तक टिक नहीं पाता. इसके एकाधिक अपवाद हो सकते हैं. इसके बावजूद कानूनी पेचीदगियों के आगे आम आदमी आसानी से कानूनी जटिलताओं में उलझ कर रह जाता है. परिणामस्वरूप वास्तविक न्याय उसकी पहुंच से निरंतर दूर होता जाता है. यदि ऐसा है तो न्याय की व्याख्या कैसे की जाए? कैसे माना जाए कि न्याय हुआ है? उसको तय करने के मापदंड क्या हों? उसकी प्रणाली क्या हो, आदि आदि. ऐसे सवाल अनायास ही दिमाग में उभरने लगते हैं. यहां प्रूधों के विचार हमारा मार्गदर्शन करते हैं—

मुक्त समाज में—कानून बनाने, नई संस्थाएं गठित करने, उनका संविधान रचने, स्थापना एवं प्रशासनिक ढांचा खड़ा करने से लेकर कार्यारंभ तक सरकार की भूमिका न्यूनतम, इतनी कम जितनी कि संभव हो—होनी चाहिए. राज्य कोई उद्यम नहीं है. मशीन, संयंत्र आदि की स्थापना तथा कार्यारंभ होने के बाद उद्यम से सरकार को स्वयं अलग होकर, उसे स्थानीय प्राधिकरणों तथा नागरिक संस्थाओं के सुपुर्द कर देना चाहिए.’5

मौटे तौर पर न्याय की चार विशेषताएं होती हैं; या यूं कहें कि न्यायपथ पर होने का दावा करने वाले राज्य में निम्नलिखित खूबियां होनी चाहिए—

1. सुख और समानता का संरक्षक

2. मानवीय स्वाधीनता का संरक्षक और प्रस्तोता

3. सर्वविकासोन्मुखी दृष्टि

3. न्यायिक प्रक्रिया में भरोसा, न्याय की प्रतीति,

क्रमशः

© ओमप्रकाश कश्यप

1. The sense of justice is continuous with the love of mankind.” A THEORY OF JUSTICE- JOHN RAWLS

2 The principles of justice are chosen behind a veil of ignorance.” Ibid

3. Justice is the first virtue of social institutions, as truth is of systems of thought.-Ibid.

4. Justice is the first virtue of social institutions, as truth is of systems of thought.- Ibid

5. In a free society, the role of the government is essentially that of legislating, instituting, creating, beginning, establishing, as little as possible should it be executive…The state is not an entrepreneur…Once a beginning has been made, the machinery established, the state withdraws, leaving the execution of the task to local authorities and citizens.-Proudhon’s Federal Principle, p. 45, from Proudhon and Anarchism: Proudhon’s Libertarian Thought and the Anarchist Movement by L. Gambone, Red Lion Press, 1996.

सहविधान और अर्थनीति : असमान संपत्ति वितरण की समस्याएं और विकल्प

सामान्य

धर्म और अभिजन संस्कृति—8

राज्य का ध्येय होना चाहिएराष्ट्रीय समर्थताओं का विकास. राष्ट्रीय जीवन का परिमार्जन तथा अंत में उसकी पूर्णता. किंतु नैतिक एवं राजनीतिक गति का मानवनियति से विरोध न हो. ब्लंट्श्ली, ’थ्योरी आ॓फ दि स्टेट’.

आधुनिक समाज की अधिकांश समस्याएं आर्थिकसामाजिक विषमताओं की देन हैं. और समाजार्थिक विषमताएं! वे किसकी देन हैं? गौरतलब है कि समाज में आर्थिकसामाजिक वैषम्य केवल आर्थिकसामाजिक कारणों से पैदा नहीं होता. उनके गढ़न में उस समाज की संस्कृति और भौगोलिक परिस्थितियां भी बड़ी भूमिका निभाती हैं. संसाधनों की उपलब्धता, भौगोलिक परिवेश, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, लोकाचार आदि सब मिलकर समाज की आर्थिक संरचनाओं को प्रभावित करते हैं. वे एकाएक पैदा नहीं हो जातीं. किसी मुक्त वनचारी सरल सभ्यता को आधुनिक प्रौद्योगिकीकुशल सभ्यता की ऊंचाइयों तक पहुंचने में सहस्राब्दियां लग जाती हैं. इस परिवर्तन यात्रा के दौरान विकासरत समाज को सभ्यता और संस्कृति के लंबे द्वंद्व से गुजरना पड़ता है. विकास की चेष्ठा में हुई ज्ञानविज्ञान की हर नई पहल का प्रथम सामना धार्मिकसांस्कृतिक शक्तियों होता है. वे परिवर्तन की प्रत्येक धारा को आसन्न संकट के रूप में देखती हैं. चूंकि विकासोन्मुखी धारा में समाज के अधिकांश लोग सम्मिलित होते हैं, वे भी जो धर्म एवं संस्कृति के पैरोकार होने का दावा करते हैं, इसलिए परिवर्तन के विरुद्ध उनका दिखावटी प्रतिरोध लंबा नहीं खिंच पाता. विरोध की अवधि का उपयोग वे परिवर्तन का वाहक बने हर नए व्यक्ति, विचार, आविष्कार आदि को अपने अनुकूल ढालने अथवा उसकी काट के लिए परंपरा और संस्कृति में से स्वार्थानुरूप तर्क खोजने; और यदि बस न चले तो उससे अनुकूलन के लिए करते हैं. उनके साथ समाज के प्रतिभाशाली और समर्थक बुद्धिजीवियों की टीम होती है. उनकी सहायता द्वारा अंततः वे अपने लक्ष्य में सफल भी हो जाते हैं.

उदाहरण के लिए कंप्यूटर के आविष्कार को लें. हर नए आविष्कार की भांति आरंभ में उसे भी यथास्थितिवादियों का खुला विरोध झेलना पड़ा था. परंपरा से जुड़े लोगों को लगता था कि उनकी प्राचीन कार्यशैली कंप्यूटर के अकूत सामर्थ्य के आगे असफल सिद्ध होगी. कुछ अन्य का मानना था कि उससे मानवीय श्रम की अवमानना होगी; तथा उत्पादनक्षेत्र में मानवश्रम की महत्ता और भी कम हो जाएगी. कंप्यूटर के आने के बाद उसकी कार्यक्षमता ने लोगों को चैंकाया भी. मगर जैसे ही उसने आमजन के बीच पैठ बनानी आरंभ की, जैसे ही उसकी उपयोगिता को परखा गया, पढ़ेलिखे लोगों में अपनी पैठ बनाने के इच्छुक ज्योतिषी आधुनिक होने का दावा करते हुए, कंप्यूटर द्वारा जन्मकुंडली बनाने लगे. ब्रह्मांडीय हलचलों के अध्ययन के लिए गढ़ा गया विषय ज्योतिष जो उससे पहले ‘शास्त्र’ कहलाता था, उसे अकारण ही ‘विज्ञान’ कहा जाने लगा. परिणाम सामने है. देश में अंतरराष्ट्रीय स्तर के खगोल वैज्ञानिक हाथ में उंगलियों की संख्या से भी कम होंगे, जबकि मोटी दक्षिणा के बदले पाखंड का सौदा करने वाले ज्योतिषियों की संख्या हजारों में है. प्रत्येक छोटेबड़े अवसर को अपने मुनाफे तब्दील कर लेने के अभ्यस्त पूंजीपति भी भला क्यों पीछे रहते. यथासंभव उन्होंने भी इस काम में मदद की. उनके दिए दान से कथावाचक किस्म के स्वयंभू महात्मा अपने प्रवचन के वीडियो बनवाकर बांटने लगे. धंधा बढ़ा तो उन्होंने अपने लिए टेलीविजन के चौनल ही खरीद लिए. कुल मिलाकर ज्ञानविज्ञान और आधुनिक क्रांति के संदेश के साथ विकसित एक तकनीक के प्रभाव को यथास्थितिवादियों ने भौंथरा कर दिया.

केवल कंप्यूटर के आविष्कार के साथ ऐसा हुआ हो, यह भी नहीं है. लिपि का आविष्कार कबीलाई संस्कृति की असाधारण प्रतिभाओं की देन था. अभिव्यक्ति, प्रशिक्षण, संप्रेषण आदि के लिए पहले प्रस्तर चित्रों को उपयोग में लाया जाता था. कालांतर में मनुष्य का बौद्धिक विकास हुआ तो अभिव्यक्तियों में प्रतीकात्मकता बढ़ने लगी. संकेतों द्वारा संप्रेषण की कला कीलाक्षर लिपि के रूप में विकसित हुई. दुनिया की अधिकांश लिपियां उसी कीलाक्षर लिपि का संशोधित संस्करण हैं. लिपि के विकास के उपरांत आदर्श स्थिति तो यह होती कि उसमें ऐसा काम होता, जिससे ज्ञानविज्ञान का पोषण हो सके. ताकि समाज का बहुमुखी विकास संभव हो, जो ज्ञानानुभवों की परंपरा को सहेजकर समाज के वास्तविक विकास को गति दे सके. जिसकी मदद से ज्ञान, विज्ञान और तकनीक का लाभ सीधे आमजन तक पहुंचाया जा सके. लेकिन हुआ क्या? ज्ञान को सहेजने की प्रक्रिया में भारत में सबसे पहली कृति सामने आई—ऋग्वेद. वह धार्मिक दृष्टिकोण से लिखा गया, भारत का सांस्कृतिक दस्तावेज था. उसका वर्णित प्रच्छन्न इतिहास आर्य लड़ाकों का महिमामंडन करता था. वह सीधेसीधे विजेता के द्रष्टिकोण से, उसे प्रसन्न रखने के लिए किया गया स्तुतिकर्म था. कालांतर में उसकी धार्मिकदार्शनिक ग्रंथ के रूप में प्रतिष्ठा हुई.

ऋग्वेद ने तत्कालीन धर्माचार्यों को इतना सम्मोहित किया कि कालांतर में उसकी प्रतिष्ठा हेतु साम और यजुर्वेद नामक संहिताओं की रचना की गई, जिनमें साम् ऋक् की ऋचाओं के गायन तथा यजुर्वेद उसके याज्ञिक कर्मकांड के निरूपण से संबंधित थी. आशय है कि ज्ञान और परंपरा के संहिताकरण की शुरुआत ही कर्मकांडीकरण से हुई. इसके बावजूद ऋग्वेद के आगे ही संकरी हो चली इस धारा को ‘वेद(ज्ञान)’ कहा गया. कालांतर में यजु, साम और अथर्व को भी उसकी श्रेणी में रख लिया गया. वेद नाम की संज्ञा ज्ञान के पर्याय के रूप में रूढ़ होती गई. शताब्दियों तक भारतीयों की चिंतनधारा वेदों को आप्तवाक्य मानने अथवा न मानने की बहसों में उलझी रही. वेदों का पठनपाठन पुनीत कर्तव्य माना गया, उनमें विश्वास विद्वता की निशानी. आलोचकीय दृष्टि से दूर रखने के लिए समाज के बड़े वर्ग पर उनके पठनपाठन पर पाबंदी लगा दी गई. यह मनुष्य की स्वाभाविक जिज्ञासा का आस्थाकरण था, जिसने आने वाली सहस्राब्दियों को प्रभावित किया था.

भारत ही क्यों, पूरी दुनिया में, लिपि का सर्वप्रथम उपयोग समाज की धार्मिक मान्यताओं, रीतिरिवाजों और कर्मकांडों को सहेजने के लिए किया गया. इसका यह अर्थ नहीं है कि सांस्कृतिकरण की सभी कोशिशें मानवीय स्वार्थ से प्रेरित थीं. दरअसल धर्मप्रेरित आरंभिक सभ्यताकरण का इतिहास व्यक्तिगत स्वार्थ और लोककल्याण, दोनों ही भावनाओं से बना है. प्राचीन आचार्यों ने धार्मिक आचारविचार के साथ तत्कालीन नैतिक मूल्यों को भी समान स्थान दिया गया था. तदनुसार यह कहना उचित होगा कि आरंभिक समाजीकरण की कोशिशों के मूल में कदाचित लोककल्याण की भावना भी थी. किंतु धर्म नामक जिस संस्था के बूते तत्कालीन आचार्य समाज को संगठित करना चाहते थे, उसकी नींव पलायनवाद पर टिकी थी. इहलोक से ज्यादा उसका आग्रह परलोक के प्रति था. सांसारिक सुखसुविधाओं को वह दोयम दर्जे का मानता है. अर्थधर्मकाम और मोक्ष में स्वार्थवश चौथे पुरुषार्थ मोक्ष पर ज्यादा जोर दिया गया था. उसका आकर्षण इतना प्रबल था कि दुनियादारी के संघर्ष में नाकाम रहे; अथवा बलपूर्वक पीछे ढकेल दिए गए लोग आसानी से उसकी ओर मुड़ जाते हैं. धार्मिक सम्मोहन में फंसकर वे स्वयं को परिस्थितियों के हवाले कर देते हैं. यह प्रवृत्ति समाज के बड़े वर्ग को विकास की दौड़ से अनायास ही बाहर कर देती है. कुल मिलाकर इस प्रवृत्ति ने पूर्ण समाजीकरण की कोशिशों को अवमंदित करने का काम किया.

आरंभिक जीवन पूरी तरह प्रकृतिआधारित था. अनिश्चित और संघर्षपूर्ण. उसकी निरंतर परिवर्तनशील स्थितियां मनुष्य के लिए जहां चुनौती थीं, वहीं प्रेरक का काम भी करती थीं. प्राकृतिक शक्तियों के उपादान कारण के रूप में मनुष्य ने अनेक देवताओं की परिकल्पना की. फिर उनके कोप का डर दिखाकर समाज को नियंत्रित करने की कोशिश भी. हालांकि यह कहना बड़ा मुश्किल है कि भारतीय समाज में समाजार्थिकवैषम्य पहले आया अथवा उसे नियति बना देने की चालें लोगों के दिमाग में पहले आईं, किंतु इतना तय है कि पूरी तरह प्रकृतिआश्रित समाज में धर्म के पालक, संरक्षक, संवर्धक तथा व्याख्याकार के रूप में जो वर्ग सामने आया, उसमें अधिकांश लोग लालची और विशिष्टताबोध का शिकार थे. बगैर किसी श्रम के वे अपनी सामाजिक हैसियत को बनाए रखना चाहते थे. अपनी पैठ का अनुचित लाभ उठाते हुए उन्होंने जनसाधारण के मन में लौकिक सुखसुविधाओं के प्रति विरक्ति का भाव पैदा करना आरंभ कर दिया, जबकि उनका अपना जीवन उनकी खुद की स्थापित मान्यताओं के विपरीत था. समाज के शीर्षस्थ वर्ग के दोहरे चरित्र का असर बाकी लोगों पर भी पड़ा. उससे शारीरिक श्रम को लेकर हेय भाव लोगों के मनस् में घर करता गया. धीरेधीरे निर्णय के सारे अधिकार समाज के शीर्षस्थ बुद्धिजीवी वर्ग के हाथों में समाते गए. ऐसे लोग जो केवल शारीरिक श्रम पर निर्भर थे, वे श्रम के मूल्यांकन का अधिकार दूरे वर्ग के अधीन होने के कारण जीवनसमर में निरंतार पिछड़ते गए.

राजसत्ता इस विसंगति का समाधान कर सकती थी. यह उसके गठन का मूल उद्देश्य भी था. लोगों ने राज्य के अधीन रहना स्वीकार ही इसलिए किया था कि वह शांति एवं व्यवस्था बनाए रखने के साथ सभी को जीवन के समान अधिकार प्रदान करेगा. न्यूनतम बलप्रयोग द्वारा शोषणकारी शक्तियों का शमन कर वह ऐसी न्यायपूर्ण एवं कल्याणकारी व्यवस्था स्थापित करेगा, जिसमें सभी को विकास के समान अवसर प्राप्त हों. विडंबना ही कहिए कि राज्य अपने मूल उद्देश्य से प्रायः विमुख ही रहा. उसके इतिहास में ऐसे अवसर बहुत कम आए जब वह अपने आदर्श के करीब पहुंच सका हो. सामान्यतः वह अपने उद्देश्य को पूरा करने में नाकाम ही रहा है. इसके बावजूद आमजन के कल्याण की कीमत पर राज्य की स्तुति, उसे अतिरिक्त सामर्थ्यशाली बनाने के प्रयास महाभारतकाल में ही नजर आने लगे थे. चाटुकारिता की परंपरा में राज्य सभी प्रकार के धर्मों, विद्या एवं शक्तियों का भंडार कहा जाने लगा था. सुशासन के लिए दंडनीति को आवश्यक मानते हुए राज्य को अतिरिक्त अधिकार दिए गए

जिस समय दंडनीति निर्जीव हो जाती है, उस समय तीनों वेद डूब जाते हैं. सभ्यता और संस्कृति के आधार सभी धर्म, चाहे वे कितने ही उन्नत क्यों न हों, पूर्णतः नष्ट हो जाते हैं. जब प्राचीन राजधर्म का त्याग कर दिया जाता है, तब व्यैक्तिक आश्रम धर्म के आधार भी शेष नहीं बचते. इस प्रकार समस्त प्रकार के त्याग राजधर्म में ही दिखाई पड़ते हैं और समस्त प्रकार की दीक्षाएं राजधर्म में ही युक्त हैं. सब प्रकार की विद्याएं राजधर्म में ही सम्मिलित हैं और समस्त लोक राजधर्म के अंतर्गत हैं.’1

स्पष्ट है महाभारतकाल तक राज्यसत्ता और धर्मसत्ता का गठबंधन काफी मजबूत हो चुका था. वर्चस्व कायम रखने, यथास्थिति पर आंच न आने देने तथा खुद को शीर्ष पर रखने के लिए कूटनीतिक चालें चलने के मामले में धर्मसत्ता और राजसत्ता दोनों एक थे. कालांतर में तीसरा वर्ग भी उनमें आ मिला. यह तीसरा वर्ग अर्थसत्ता का प्रतीक था. जिसने विभिन्न समाजों, संस्कृतियों और राज्यों के बीच बढ़ते व्यापार का लाभ उठाकर अकूत संपदा बटोरी थी. अपने बुद्धिचातुर्य और संगठन सामर्थ्य के बल पर वास्तविक उत्पादक वर्ग को अपदस्थ कर वह अर्थसत्ता के शीर्ष पर जा विराजा था. पशुचारण अर्थव्यवस्था तक संपत्ति पूरे समाज की मानी जाती थी. कृषि ने जीवन में स्थायित्व तथा भूमि को स्थायी संपदा के रूप में पहचान दी थी. उपज बढ़ने से लोगों की आय भी बढ़ती जा रही थी. साथ में जरूरतें भी. उनकी भरपाई के लिए आरंभ में समाज का शिल्पकार वर्ग संगठित होकर व्यापार करने लगा. इससे उसकी सामाजिक प्रस्थिति में सुधार हुआ. सभ्यताकरण के दौर में जैसेजैसे मार्ग एवं परिवहनसंबंधी सुविधाए बढ़ीं, शिल्पकार संगठनों का व्यापार भी बढ़ता गया. चूंकि उन दिनों लंबी यात्राएं करना खतरनाक था. मार्ग में लुटेरे, डाकुओं का भय बना रहता था. राज्य की सुरक्षा सेवाएं सब जगह उपलब्ध नहीं थीं. विशेषकर दूसरे राज्यों तथा दुर्गम जंगलों से गुजरते समय. इसलिए लंबी दूरी के व्यापारी अपने माल की सुरक्षा के लिए हथियारबंद दस्ता रखने लगे. धीरेधीरे शिल्पकार वर्ग की दो कोटियां बनती चली गईं. एक वह जो अपने शिल्प एवं श्रम की सहायता से उत्पादन करता था. दूसरे उत्पाद को ग्राहकों तक पहुंचाता था. छोटे उत्पादकों के लिए यह संभव न रहा होगा कि उत्पादन कार्य को छोड़कर माल की बिक्री के लिए लंबी दुर्गम यात्राओं पर निकल सकें. इसलिए एक कोटि उन शिल्पकारों की बनी, जो केवल उत्पादन करते थे. बिक्री के लिए उन्हें स्थानीय ग्राहकों तथा व्यापारिक संगठनों पर निर्भर रहना पड़ता था. जैसेजैसे व्यापार बढ़ा, तीसरा यानी व्यापारी वर्ग और भी मजबूत होता गया. ऋग्वेद में ‘पण’ शब्द की आवृत्ति हुई है, जो सहयोगाधारित व्यापारिक संगठनों का पर्यायवाची है. महाभारत में यह वर्ग इतना शक्तिशाली हो चुका था कि उसकी उपेक्षा कर पाना संभव न रहा.

तीसरे वर्ग के सत्ताकेंद्र से मिल जाने के बाद आम जन को सत्ता और संसाधनों से बेदखल करना आसान हो गया. हालांकि राज्य के अधीन धनबल, राज्यबल, जनबल और बुद्धिबल सभी कुछ था, किंतु जनाक्रोश के आग के आगे वे कभी भी खाक हो सकते हैं, इस हकीकत का एहसास शीर्षस्थ शक्तियों को था. अपनी हैसियत को बचाए रखने का उनके पास एकमात्र उपाय था—जनशक्ति को भुलावे में रखकर जनाक्रोश की संभावनाओं को न्यूनतम किया जाए. उल्लेखनीय है कि आरंभ में कृषियेतर आर्थिक गतिविधियों की बागडोर शिल्पकार वर्ग के हाथों में थी. जैसेजैसे व्यापार कर्म का विस्तार हुआ, बाजार पर व्यापारी वर्ग की पकड़ बढ़ती गई. शिल्पकार वर्ग का आर्थिक स्तर निरंतर गिरता गया. उसके लिए यह संभव न था कि उत्पादन और व्यापार दोनों को एक साथ संभाल सके. वास्तविक क्रेता तक पहुंच व्यापारी की थी. इसलिए वह उत्पादक शिल्पकारों से मनमाना दाम वसूलने की स्थिति में था. दूसरे शब्दों में सभ्यताकरण के आरंभिक दौर में ही समाज में दो ताकतवर वर्ग पनप चुके थे. धर्मसत्ता आदमी और ईश्वर के बीच दलाली के नाम पर अपना उल्लू सीधा करती थी, तो अर्थसत्ता वास्तविक उत्पादक और उपभोक्ता के बीच.

सामाजिक असंतोष की मार से खुद को बचाने के लिए राजसत्ता ने सर्वकल्याणकारी, मुक्तिदाता, जीवन का परम लक्ष्य कहते हुए धर्म को न केवल खुद अपनाया, बल्कि लोगों को भी उसके लिए बाध्य किया. उसने दान, प्रलोभन, लालच के सहारे पुरोहित वर्ग को अपने समर्थन में ला खड़ा किया. राजसत्ता से निकटता और सामंजस्य बनाए रखने के लिए पुरोहित वर्ग ने भी ऊंचनीच, पापपुण्य, धर्मअधर्म के किले बनाए, जिनमें जनसाधारण को मानसिक गुलामी के लिए कैद किया जाने लगा. लोगों के मन में विद्रोह की भावना जन्मे ही नहीं, इसके लिए कर्मवाद का सहारा लिया गया. राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि घोषित कर, उसके हर अच्छेबुरे निर्णय को महिमामंडित करने की कोशिश की गई. सत्ता पर विराजमान लोगों के भोगविलास को औचित्यपूर्ण ठहराने के शास्त्रीय उपक्रम रचे गए. यही नहीं, उनके प्रत्येक निर्णय को ईश्वरीय कहकर हर गलतसही फैसले का समर्थन किया गया. आशय यह है कि जिसे सभ्यताकरण कहा जाता है, वह समाज के अभिजनवर्ग के उदय और निरंतर शक्तिशाली होते जाने की यात्रा है.

परिणाम यह हुआ कि समाज के संसाधन, जिनके भरोसे कुल समाज के विकास का दावा सच हो सकता था, सभी समाज के प्रभुवर्ग के अधीन होते चले गए. जब फैसले विवेक और तर्क के बजाय आस्था और कुलपरंपरा के नाम पर होने लगें तो समाज में न्याय का पलड़ा स्वतः ही शिखर की ओर झुक जाता है. उसी का सहारा लेकर शिखरस्थ वर्ग खुद को किसी भी प्रकार के न्याय, आलोचना, समीक्षा, विमर्श आदि से ऊपर समझने लगता है. सभ्यताकरण का यह कौतुक दुनिया के किसी एक कोने या समाज में नहीं, कुछेक कबीलाई संगठनों को छोड़कर, प्रायः सभी समाजों में रचा गया. उम्मीद थी कि विज्ञान के आगमन के पश्चात नई शिक्षा और ज्ञान की रोशनी में आम आदमी अभिजन के इस षड्यंत्र को समझ सकेगा. लेकिन विवेकवान जनसमाज या जनसमाज का विवेकीकरण को, प्रौद्योगिकीकरण के सहारे सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहा पूंजीवाद भी अपने लिए अहितकारी समझता था. उसकी जरूरत जनसमाज नहीं उपभोक्ता समाज की रचना करना था. मशीनों का आविष्कार व्यापारी वर्ग के लिए वरदान सरीखा था, जिसने शिल्पकार वर्ग पर उसकी निर्भरता को न्यूनतम कर दिया. उसके लिए पूरी दुनिया महज उपभोक्ता थी. पूंजीवाद एक प्रकार का नया धर्म था, जो उपभोक्ताओं के लिए इसी जन्म में स्वर्ग गढ़ने का दावा करता था. आम आदमी अपने स्वर्ग को अपनी मर्जी से गढ़े. उसमें उसकी भावनाओं की भी कद्र हो, इसकी अनुमति न परंपरागत धर्म देता है, न पूंजीवाद प्रेरित प्रौद्योगिकीयधर्म. जब सबकुछ ऊपर से थोपा जाने लगे तो न्याय का पलड़ा उसी ओर झुक जाना स्वाभाविक था. यह हुआ और धूमधाम से विकास के नारों के बीच हुआ. गत दो दशकों में उसमें परिवर्तन के लिए कितने ही विचार आए, संघर्षकारी स्थितियां बनीं, सत्तापरिवर्तन हुए, किंतु जनसाधारण के लिए स्थिति लगभग वैसी ही रही, जैसी पहले थी.

क्या सहविधान समाज में व्याप्त आर्थिक विषमता का समाधान कर सकेगा? इसका सहीसही उत्तर तो इसको अपनाने वालों की निष्ठा पर होगा. इस बात से तय होगा कि सहविधान को अपना विधान बनाने वाला समाज उसके प्रति कितना गंभीर है. कितनी निष्ठा के साथ उसे अपनाना चाहता है. इतना सुनिश्चित है कि वह आरोपित व्यवस्था नहीं होगी. सहविधान लोगों का स्वैच्छिक वरण होगा. इसकी सफलता लागू करनेवालों पर नहीं, अपनाने वालों पर निर्भर होगी. यह लोगों को निर्देशित नहीं अनुशासित करने पर जोर देगा. इसकी उपस्थिति दस्तावेजी न होकर नागरिकसंकल्प के रूप में होगी. समाज में उसकी उपस्थिति कानून न होकर नैतिक बल के रूप में होगी.

सहविधान के अनुसार संपत्ति पर व्यक्ति की अधिकारिता दो प्रकार से तय होगी—सामूहिक और व्यक्तिगत. बिना किसी पूर्वाग्रह अथवा भेदभाव के समाज यह प्रबंध करेगा कि व्यक्ति की सामान्य जरूरतें पूरी होती रहें. दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उसको किसी का भी सहारा न लेना पड़े. वह ऐसी उत्पादन प्रणाली को अपनाने पर जोर देगा जिसके माध्यम से व्यक्ति अपने उत्पादनसामर्थ्य, शिल्पकौशल की रक्षा कर सके और समाज के विकास में अपनी भूमिका निभा सके. नागरिकों को अपने अधीन संपत्ति के ऐच्छिक उपयोग की अनुमति होगी. व्यक्ति की जरूरतें क्या हैं, इसका निर्धारण मिलबैठकर, आपसी विचारविमर्श के बाद किया जाएगा और इसके लिए समानता और न्याय के सिद्धांत का पालन किया जाएगा. साथ में यह भी ध्यान में रखना होगा कि सदस्य इकाइयां अपनी रुचि, प्रकृति, मनोविज्ञान में अलग हो सकती हैं. यह भी कि व्यक्तिगत रुचियों, रुझानों, पसंदों, सोच और सामान्य आवश्यकताओं के मामले में समाज की ओर से अनावश्यक दखल मनुष्य की नैसर्गिक स्वतंत्रता को बाधित कर सकता है. यदि ऐसा हुआ तो सहविधान की स्थापना का उद्देश्य ही व्यर्थ चला जाएगा. मनुष्य की नैसर्गिक स्वतंत्रता, विचारवैविध्य और मानवीय गरिमा बनी रहे इसके लिए उसकी सामान्य निजता और रुचियों का भी ध्यान रखा जाएगा. इस सावधानी के साथ कि समाज की कोई भी इकाई स्वयं को उपेक्षित अनुभव न करे. प्रत्येक को यह विश्वास रहे कि समाज के विकास में उसका भी योगदान है. उसकी महत्ता है और समाज को उसकी उतनी ही आवश्यकता है, जितनी कि उसको समाज की.

इकाई विशेष की जरूरतों को तय करने का एक मापदंड यह भी हो सकता है कि समाज की कुल संपत्ति को उसकी सदस्यसंख्या के अनुपात में बांट दिया जाए. फिर प्रत्येक इकाई के हिस्से में जितनी संपत्ति आती है, औसतरूप में उतनी संपत्ति पर व्यक्तिगत अधिकारिता की सीमा तय कर दी जाए. उसी के आधार पर व्यक्ति को अपनी आवश्यकताओं को तय करने की आजादी हो. सहविधान में मनुष्य की सुखसुविधाओं में बढ़ोत्तरी के लिए समाज की कुल आय, संपदा में वृद्धि अपरिहार्य होगी. किसी कारणवश यदि प्रगतिचक्र धीमा पड़ जाए, अर्थव्यवस्था को मंदी का सामना करना पड़े अथवा उसपर अनावश्यक संकट आन पड़े तब? क्या मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं में कटौती की जाएगी? हरगिज नहीं. मूलभूत आवश्यकताएं मनुष्य के अस्तित्व से जुड़ी अनिवार्यताएं हैं. यह समाज का दायित्व है कि उनमें कमी यथासंभव न होने दे. यदि ऐसी कोई विपत्ति आन पड़े तो उसकी भरपाई अपने बाकी खर्चों में कटौती करके पूरा करने की करे. यदि फिर भी काम न बने तो नागरिकों से उसकी भरपाई के लिए अतिरिक्त योगदान का आग्रह करे. परस्पर आत्मीय व्यवहार, संगठन, सहानुभूति और लक्ष्य के प्रति समर्पण से समस्या का समाधान संभव है.

यदि कोई दावा करे कि समाज के विकास के लिए उसका योगदान दूसरों से कहीं अधिक है. इसलिए उसको अपनी इच्छाओं के विस्तार तथा उन्हें पूरा करने की अनुमति मिलनी ही चाहिए, तब समाज को चाहिए कि ऐसी नैतिक व्यवस्था करे ताकि दूसरों से विशिष्ट दिखने जैसा व्यक्तिवादी विचार नागरिकों के मन में पनपने ही न पाए. यदि किसी नागरिक के मन में ऐसा विचार आता है तो मान लेना चाहिए कि उससे अपने नागरिकों के सहविधान की भावना के अनुरूप शिक्षणप्रशिक्षण में चूक हुई है. व्यक्ति को भी समझना चाहिए कि प्रकृति के कुल ज्ञानविज्ञान और कर्मकौशल के समक्ष उसके द्वारा अर्जित ज्ञान नगण्य हैं. और जो भी ज्ञानकौशल उसने अर्जित किया है, वह वही है जिसको समाज पीढ़ीदरपीढ़ी सहेजता आया है. ज्ञान के इस अनुदान के लिए व्यक्ति समाज का ऋणी है. समाज से अलग रहकर वह उसका एकांश भी शायद ही अर्जित कर पाता. समाज की ज्ञानराशि अपनी सभी सदस्य इकाइयों के लिए खुली होती हैं और अर्जित ज्ञानसंपदा का अपनी तरह से विश्लेषण करने का अधिकार वह अपने प्रत्येक नागरिक को देता है. अतः यदि कुछ मामलों में वह दूसरे व्यक्तियों से बढ़कर है तो बाकी मामलों में अन्य लोग उससे काफी आगे हो सकते हैं. यह एहसास व्यक्ति को उसके विशिष्टताबोध से बाहर निकलने में कामयाब रहेगा.

दूसरी ओर समाज को भी समझना चाहिए कि किसी व्यक्ति ने यदि कुछ अतिरिक्त अर्जित किया है तो उसमें उसकी योग्यता एवं परिश्रम का भी योगदान है. ऐसे किसी व्यक्ति को उसके उत्कृष्ट योगदान के बदले जो सामाजिक लाभ मिलना चाहिए था, यदि वह नहीं मिला है, तो उसका आक्रोश तर्कसम्मत माना जाएगा. उस स्थिति में समाज को चाहिए कि समय रहते अपनी भूल स्वीकार कर ले और उस व्यक्ति को उसके अतिरिक्त योगदान के लिए लाभान्वित करे. यह लाभ पुरस्कार, सम्मान के माध्यम से भी किया जा सकता है. अथवा इसके लिए लोग आपस में मिलबैठकर ऐसी योजना बना सकते हैं, जो व्यक्ति को उसकी अधिकतम सेवाओं के लिए प्रोत्साहित कर सके. जिससे वह हताश हुए बगैर अपने योगदान को जारी रख सके. यह काम समाज में अभिजन मानसिकता के चलते नहीं हो सकता. इसके लिए विराट जनसंस्कृति को बढ़ावा देना जरूरी होगा. यह विश्वास रखना होगा कि पराजित सत्ताएं होती हैं, जनता नहीं. जनता को तो पराजय का एहसास कराया जाता है.

उत्पादकता को लेकर सामान्य धारणा यह भी है कि व्यक्ति तभी अतिरिक्त कार्य करने को उत्सुक होता है, जब उसको अतिरिक्त प्राप्तियों की संभावना हो. प्रायः कहा जाता है कि कुछ समाजवादी व्यवस्थाएं इसलिए ढह गईं कि श्रम पर सीधे लाभ मिलने की कोई उम्मीद न देख नागरिक अपने दायित्वों के प्रति उदासीन होने लगे थे. उत्पादन को लेकर अतिरिक्त उत्सुकता दिखाने, अपने श्रमकौशल के उपयोग से वृहद सामाजिक उद्देश्य की प्राप्ति हेतु स्वयंस्फूत्र्त निर्णय लेना और उत्पादन व्यवस्था में अभीष्ट बदलाव लाने की प्रवृत्ति जो नए शोधों को बढ़ावा देती है—पीछे छूटने लगी थी. परिणाम यह हुआ कि सहजीवितावादी द्रष्टिकोण को गठित वे अर्थव्यवस्थाएं—सीधे और तात्कालिक लाभ पहुंचाने वाली पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले निरंतर पिछड़ती चली गईं.

इस दावे में किंचित सचाई हो सकती है. लेकिन एकाएक यह मान लेना कि मनुष्य केवल सम्मान, पुरस्कार अथवा अतिरिक्त भौतिक सुखसुविधाओं के लिए काम करता है, भारत की उदार श्रमसंस्कृति की अवमानना करने जैसा है. ‘आदमी तभी काम करेगा, जब उसको सीधा लाभ होगा’यह सोच मुनाफे की संस्कृति की उपज है. इतिहास साक्षी है, सर्वहारा श्रमिक वर्ग तो हमेशा से ही न्यूनतम प्राप्तियों के बदले अधिकतम उत्पादन देता आया है. सच्चे कलाकार की भांति वे अपने हुनर की बोली नहीं लगाते. बल्कि उसे तराशने का अवसर तलाशते रहते हैं. लाभ का मनोविज्ञान न तो उनकी ईजाद है, न ही यह उनको सुहाता है. अधिकाधिक उत्पादकता के लिए स्पर्धा का सिद्धांत पूंजीवाद की देन है. शिल्पकर्मी और सर्वहारा मजदूर तो हमेशा अपने लिए सही अवसर और कद्रदान की तलाश में रहते हैं, ताकि अपने हुनर को पेश कर सकें. जिन समाजवादी राज्यों के असमय ढह जाने का उदाहरण दिया जाता है. कहा जा सकता है कि वे इसलिए नहीं ढही थीं कि वहां श्रमिक, सर्वहारा, शिल्पकर्मी अपने लिए अतिरिक्त सुविधाओं की मांग करने लगे थे. जिन्हें पूरा करना राज्य के बस से बाहर था. बल्कि इस कारण असमय कालकवलित हुईं कि जिन वादों, जो आश्वासन आमजन को सत्तापरिवर्तन के समय दिए गए थे, समय आने पर राष्ट्र उनसे मुंह मोड़ने लगा था. सोवियत संघ का उदाहरण दिया जा सकता है. सब जानते हैं कि वह मार्क्सवादी विचारों के आधार पर पहला प्रयोग था. बोल्शेविकों ने लेनिन का साथ इसलिए दिया था कि नवगठित राज्य में सत्ता प्राप्ति के पश्चात वर्गहीन समाज की स्थापना की ओर तेजी से बढ़ा पाएगा. समाजवाद उसका परमलक्ष्य होगा. लेकिन सत्ता प्राप्ति के बाद साम्यवादी सरकार की प्राथमिकताएं बदल चुकी थीं. वह सहयोग के बजाय स्पर्धा और प्रतिस्पर्धा की बातें करने लगी. शीतयुद्ध के बहाने देश को हथियारों की अंधस्पर्धा में झोंक दिया गया था. इससे उन लोगों का सपना चकनाचूर हुआ जो नए शासन से जीवन में बदलाव की उम्मीद लगाए थे. उल्लेखनीय है कि सोवियत क्रांति की सफलता में आमनागरिक का भी काफी योगदान था. क्रांति के लिए वहां के स्त्रीपुरुषों, मजदूरों और कारीगरों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था. जिस नेतृत्व को उन्होंने अपने लिए चुना था, वही अब साम्यवाद के नाम पर उनके साथ छल कर रहा था. इसलिए उसके मन में असंतोष स्वाभाविक था. सोवियत शासन का रवैया संघीय राज्य की स्थापना के मूल सिद्धांत के एकदम उलट था. यह विचलन ही उसके पतन का कारण बना था. इसलिए सोवियत संघ के पतन को समाजवाद या साम्यवाद की आलोचना का आधार नहीं बनाया जा सकता. न इससे यह सिद्ध होता है कि उत्पादकता केवल व्यक्तिगत स्वार्थ से अनुप्रेत होती है?

यदि अपवादस्वरूप ऐसा कहीं हुआ है तो इसके लिए सारा दोष श्रमिकवर्ग का नहीं है. उसका दोष मात्र इतना है कि वह हालात से अनुकूलन कर चुका है. शताब्दियों तक अभिजन समुदाय के नेतृत्व में काम करने के कारण यह अस्वाभाविक भी नहीं है. इसलिए अपनी मुक्ति का खयाल तक उसके दिमाग में नहीं आता. शोषणकारी शक्तियों का प्रभाव उसके दिल पर इतना गहरा है कि वह अपनी मुक्ति, शोषित वर्ग से बाहर शोषकवर्ग की श्रेणी में शामिल होने में देखता है. औपनिवेशिक शोषण का शिकार रहे देशों में तो अकसर ऐसा होता है. आवश्यकता इसी मनोस्थिति को बदलने की है. लक्ष्य साफ है, लेकिन डगर कठिन है. सहविधान की कामयाबी के लिए स्पर्धा के स्थान पर सहयोग की अवधारणा को स्थान देना होगा. स्पर्धा मुनाफे की संस्कृति की उपज है. सहयोग सहअस्तिव की अनिवार्यता. सहविधान की कामयाबी के लिए लाभ की वर्तमान परिभाषा को संशोधित कर बताना होगा कि आदर्श लाभ वह है जिसमें व्यक्तिगत लाभ और सामाजिक लाभ के बीच की दूरी न्यूनतम हो. दोनों में ऐसी निकटता हो कि उनकी स्वतंत्र पहचान कर पाना कठिन हो जाए.

चलिए कुछ देर के लिए मान लेते हैं कि सीधे और तात्कालिक लाभ की संभावना व्यक्ति को अतिरिक्त श्रम की प्रेरणा देती हैं. लेकिन ऐसा वहीं होता है जहां व्यक्ति अपने साथी कारीगर, मजदूर से ही नहीं, समाज में अपने भाई, रिश्तेदार, पड़ोसी से भी स्पर्धा करने लगता है. उस समय वह भूल जाता है कि वह अपने साथी, परिजनों, पड़ोसियों से नहीं, अपने आप से भी स्पर्धा कर रहा होता है. इसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगते हैं. मान लीजिए कारखाने में एक काम के लिए न्यूनतम चार घंटे का समय निर्धारित है. इस अवधि काफी सोचविचार और कार्यअध्ययन के बाद तय की गई है. इससे मालिक भी संतुष्ट है. अब यदि कोई कामगार मालिक को प्रसन्न करने या अतिरिक्त आय के लिए उस काम को साढ़े तीन घंटे में करने का दावा करता है, तो निश्चित रूप से उसका व्यक्तिगत कौशल सराहनीय होगा, लेकिन उस समय वह किसी अजाने ही किसी अन्य कामगार को स्पर्धा के लिए तैयार कर रहा होता है. मालिक को भले ही ऐसी कोई अपेक्षा न हो, किंतु संभव है कुछ दिन बाद कारखाना कोई और मजदूर उसके आगे पहुंचकर उस कार्य को केवल तीन घंटे में निपटाने का दावा करे. मालिक तो खुश होकर उसको काम का न्योता दे देगा. श्रम की यह स्पर्धा उसके लिए लाभकारी है. जिस काम के लिए पहले चार घंटे लगाने पड़ते थे, अब वह तीन घंटों में पूरा हो रहा है, 25 प्रतिशत श्रमघंटों की सीधी बचत. उत्पादकता के लिहाज से यह बुरा नहीं है.

मुनाफे की संस्कृति के अनुयायी इसका पक्ष लेंगे. आप किसका पक्ष लेते हैं, इस निर्णय के लिए मैं इस उदाहरण को थोड़ा और आगे बढ़ाता हूं. श्रम का सीधा मूल्यांकन उसे उत्पाद बना देना है. स्वाभाविक रूप से बाजार में उपलब्ध श्रेष्ठ उत्पाद कम श्रेष्ठ अथवा निकृष्ट उत्पाद को चलनबाह्यः कर देता है. उपर्युक्त उदाहरण में भी वे कामगार जो किसी कारणवश त्वरित उत्पादन करने में अक्षम हैं, स्पर्धा से बाहर चले जाते हैं. उनके समक्ष बेरोजगारी का संकट मंडराने लगता है. यानी स्पर्धा से कारखाना मालिक और उत्पादन कुशल कामगार को तो लाभ है. दोनों को अतिरिक्त आमदनी होती है. किंतु अपनी समग्रता में यह स्थिति शेष समाज के लिए नुकसानदेह सिद्ध होती है. देखा जाए तो उत्पादनकुशल कामगार भी हमेशा लाभ की स्थिति में नहीं रहता. काम को त्वरित स्तर पर निटपाने के लिए वह उत्पादन के कुछ ऐसे चरणों, अनुदेशों की उपेक्षा करता है, जिनका उत्पादन से सीधे स्तर प्रभावित नहीं करते, किंतु स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए उनका पालन अनिवार्य है. जाहिर है उत्पादनकुशल कामगार मानक स्तर से अधिक उत्पादन अपनी सेहत और सुरक्षा की कीमत पर ही कर पाता है. दूसरे उसे डर होता है कि कोई तीसरा व्यक्ति कभी भी उसको चुनौती दे सकता है; या अपनी अतिरिक्त कार्यक्षमता जिसके लिए अतिरिक्त कौशल की आवश्यकता है, को वह लंबे समय तक स्थिर नहीं रख पाएगा. इससे एक असुरक्षाबोध उसके दिलोदिमाग में समा जाता है. इस असुरक्षाबोध के कारण वह अपने आसपास के हर व्यक्ति पर संदेह करने लगता है. कदमकदम पर उसे भ्रांति होती है कि उसके पड़ोसी, रिश्तेदार सभी उसकी तरक्की से ईर्ष्या करते हैं. मौका पड़ते ही वे सुख को हड़पने जाने वाले हैं. अपनों के प्रति उसके अविश्वास और डांवाडोल मनःस्थिति का लाभ उठाने के लिए धर्माचार्य आगे आ जाते हैं. इस अवसर का लाभ वे दुनिया को मायाजाल, आदमी को स्वाभाविक रूप से छलीप्रपंची सिद्ध करने में लगा देते हैं. नतीजा यह होता है कि व्यक्ति समाज में रहकर भी वह स्वयं को पराया समझने लगता है. नियति नाम की अदृश्य छाया का पीछा करने लगता है. उसके परिणामस्वरूप समाज और व्यक्ति दोनों के लिए यह स्थिति अलाभकारी होती है. इस डर का लाभ उठाने में कारखाना मालिक भी पीछे नहीं रखता. मौका देखकर वह अपने लाभानुपात को बढ़ा देता है.

इसका यह निष्कर्ष नहीं है कि उत्पादकता को बढ़ाने की कोशिश ही बेकार है. ऐसे कामगार को जो चार घंटे के मानक कार्य को केवल तीन घंटे में पूरा कर देता है, हमेशा खलनायक की देखा जाना चाहिए! उसकी तत्परता और उत्पादनकौशल असम्मानेय है! आगे बढ़ते समाज की जरूरतें भी बढ़ती जाती हैं. समाज के सतत विकास हेतु उत्पादकतावृद्धि अपरिहार्य है. लेकिन उत्पादन वृद्धि श्रमिक की सेहत या उसके जीवन को दांव पर लगाकर हासिल नहीं की जानी चाहिए. इससे तात्कालिक लाभ भले हों, व्यापक परिप्रेक्ष्य में यह स्थिति व्यक्ति एवं समाज दोनों के लिए हानिकारक होती है. उत्पादनवृद्धि के लिए प्रौद्योगिकी में सुधार की कोशिश की जानी चाहिए. ऐसी प्रौद्योगिकी के विकास पर जोर देना चाहिए जो कामगार के शिल्पकौशल तथा श्रमसंस्कृति का सम्मान करती हो.जो कामगार चार घंटे के कार्य को तीन घंटे में पूरा करने में सक्षम है, उसकी कार्यशैली का अध्ययन कर सामान्य निष्कर्ष निकाले जाने चाहिए, ताकि बाकी मजदूरों को भी, उनके जीवन या सेहत पर विपरीत प्रभाव के बिना अपनाया जा सके.

अधिकतम उत्पादकता के सिद्धांत का समर्थन पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का समर्थन करना नहीं है. इसका आशय श्रमसंस्कृति का सम्मान करने वाली ऐसी जनोन्मुखी उत्पादनशैली से है जो न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन के लक्ष्य को पूरा कर सके. इस संशोधन के साथ कि विनिर्मित उत्पाद समाज के अधिकतम लोगों के लिए कल्याणकारी हो तथा उसके उत्पादन का लाभ पूरे समाज तक पहुंचता हो. पूंजी आधारित अर्थव्यवस्थाओं में स्पर्धा और निजी लाभ का बोलबाला होता है. वहां उत्पाद और उत्पादन प्रणाली का चयन व्यक्ति और समाज की मूलभूत आवश्यकताओं के बजाय पूंजीपति के मुनाफे के आधार किया जाता है. अधिकतम लाभ और स्पर्धा की दौड़ में आगे निकलने के लिए वहां पूंजीपति उत्पादन के नए क्षेत्र तलाशने पर जोर देता है. भले ही वे व्यक्ति मूल आवश्यकता से परे हों. पूंजीवादी अर्थतंत्र बड़ी चतुराई से व्यक्ति की पहचान और प्रतिष्ठा को विलासितापूर्ण उत्पादों से जोड़ देता है. परिणामस्वरूप समाज में निरर्थक होड़ पैदा होती है और विकास के मायने ही बदल जाते हैं. वहां सभ्यताकरण का अभिप्राय मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा और अधिकतम लोगों को अधिकतम सुख के बजाय ‘सर्वाधिक सक्षम को अधिकतम सुख’ तक सिमट जाता है.

सहविधान के अंतर्गत उत्पादन का आधार मुनाफा न होकर व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताएं होंगी. विकास के साथ आवश्यकताओं में वृद्धि संभव है—इस तथ्य की उपेक्षा नहीं की जा सकती. इसलिए सहविधान सम्मत राज्य में नागरिकों की बढ़ी हुई जरूरतों का भी ध्यान रखा जाएगा. इस शर्त के साथ कि उनका प्रयोग केवल प्रतिष्ठा, प्रदर्शन अथवा विलासिता तक सीमित न हो. वे मनुष्य और मानवीय गरिमा का सम्मान करती हों, समाज के अधिकांश लोगों की सीधी पहुंच में हों तथा उनका उत्पादन किसी व्यक्ति या समूह विशेष को लाभ पहुंचाने के बजाय कुल समाज के विकास को ध्यान में रखकर किया जाता हो. सहविधान सम्मत राज्य में व्यक्ति की अधिकतम उत्पादकता को बनाए रखने के लिए समाज ऐसे साधनों की खोज करेगा, जो उसको अतिरिक्त श्रम के लिए उत्पे्ररित करते हों. इसके लिए मुद्रा का योगदान कम से कम होगा. दरअसल पूंजीवादी अर्थतंत्र बहुसंख्यक समाज को छोटेछोटे हिस्सों में बांटकर उन्हें एकदूसरे से इस प्रकार अलग कर देता है कि वे स्वयं को एकदूसरे के प्रतिस्पर्धी मानने लगते हैं. इससे सहयोग, समर्पण एवं त्याग जैसे जीवनमूल्य जो किसी भी समाज में सुख, शांति, समृद्धि और सदाचार का मूलाधार होते हैं, वे पीछे छूटने लगते हैं. लोग अजाने ही एकदूसरे की जड़ें खोखली करने पर जुट जाते हैं. सहविधान की नींव स्वैच्छिक सहभागिता, सहयोग और सर्वकल्याण की पुनीत भावना पर टिकी होगी. इसलिए लोगों को अतिरिक्त श्रम के लिए प्रोत्साहित करने हेतु ऐसे उत्पादनतंत्र को अपनाया जाएगा जो व्यक्ति को मौद्रिक लाभ के स्थान पर सामाजिक लाभ को महत्त्व देना सिखाते हों. यह ध्यान रखते हुए कि समस्त सुख मनुष्य के लिए हैं. मनुष्य यदि उपभोक्ता वस्तुओं को ही सुख का पर्याय मान लेगा तो उन्हीं का दास बनकर रह जाएगा. वास्तविक सुख को भोग ही नहीं सकेगा. इस स्थिति में वह अपने ही बंधुबांधवों से ईष्र्या करने लगेगा, जो अंततः पूरे समाज के लिए चुनौती का सबब बनेगी.

विनिमय

समाज के विकास में वहां की विनिमय प्रणाली का भी बड़ा योगदान होता है. किसी राष्ट्र के पास खाद्य वस्तुओं का बफर स्टाक हो, दवाइयां हों, सुगम यातायात के भरपूर संसाधन और सुखी जीवन हेतु व्यापक इंतजाम हों, यदि वहां की वस्तुविनिमय प्रणाली अक्षम है, यदि समाज समय रहते जरूरतमंद व्यक्ति तक आवश्यक वस्तु पहुंचाने में नाकाम रहता है, तो उस राष्ट्र की तरक्की और विकास के कोई मायने नहीं हैं. पहले उत्पादन प्रणाली सरल थी. उतना ही सरल था वस्तु विनिमय. किसान को मिट्टी के बर्तन की जरूरत पड़ती तो वह कुम्हार से ले लेता था. औजारों की जरूरत पड़ती तो लुहार या बढ़ई की सेवाएं लेता था. लुहार, बढ़ई और कुम्हार अपनी अनाजसंबंधी जरूरतों के लिए किसान पर निर्भर थे. फसल आने के साथ ही अनाज की पूर्वनिर्धारित मात्रा उन्हें प्राप्त हो जाती थी. कालांतर में व्यापार बढ़ा तो नईनई वस्तुएं मनुष्य के उपयोग में जुड़ती गईं. उन सभी का स्थानीय उत्पादन संभव न था, न ही आपसी आदानप्रदान पर आधारित वस्तुविनिमय संभव था. विकल्प रूप में महंगी धातुओं, सोनेचांदी को विनिमय का आधार बनाया गया. कालांतर में मुद्राओं का चलन हुआ. आधुनिक सभ्यता में मुद्रा ही विनिमय का सीधा, सरल और सबसे कारगर उपाय है. इससे विनिमय न केवल आसान और तात्कालिक हो जाता है, बल्कि उसके माध्यम से वस्तु का सटीक मूल्यांकन भी संभव है, जो दूसरी विनिमय प्रणालियों में कदाचित बेहद असहज और कठिन है. इसलिए मुद्राआधारित विनिमय प्रणाली का चलन इन दिनों पूरी दुनिया में है. विभिन्न देशों के बीच करार आधारित विनिमय का भी चलन है, जिसमें वस्तुओं का मूल्यांकन मुद्रा अथवा महंगी धातुओं के रूप में होता है. सभी देशों की अपनीअपनी मुद्राएं हैं. उनका मूल्यांकन आपसी सहमति के आधार पर तय होता है, जिसमें संबंधित देश की अर्थव्यवस्था भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है.

मुद्राआधारित विनिमय ने बाजार को विकास की नई जमीन दी है. वह हमारे अभ्यास का अभिन्न हिस्सा बन चुका है. मुद्राआधारित विनिमय के हम इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि बिना उसके जीवन की कल्पना तक नहीं कर सकते. परिणामस्वरूप उससे होने वाले नुकसान की ओर हमारा कभी ध्यान ही नहीं जाता. अंतरराष्ट्रीय व्यापार और जटिल व्यापारिक कार्यकलापों की तो उसके अभाव में कल्पना भी संभव नहीं लगती. पूंजीवादी तंत्र के इशारे पर काम करने वाले, उसके द्वारा उपकृत उद्योगपति, अधिकारी, अर्थशास्त्री, राजनेता मौद्रिक विनिमिय के विकल्पों पर विचार तक नहीं करते. यही नहीं यदि कोई व्यक्ति, संस्था उस दिशा में काम करना चाहे, नई शुरुआत करे तो उसको पुराना, समयबाह्यः आदि कहकर अपमानित करने की कोशिश की जाती है.

इसमें कोई संदेह नहीं कि संचारक्रांति के दौर में जब विश्वग्राम की संकल्पना साकार होने लगी है, मौद्रिक विनिमय प्रणाली की सहजता एवं उपयोगिता लगभग विकल्पहीन है. हालांकि यह प्रणाली सर्वथा निरापद नहीं है. इसकी सबसे बड़ी कमजोरी है कि इससे संबंधों में निरर्थक किस्म की व्यावसायिकता जन्म लेने लगती है. आदमी एकएक पाई का हिसाब रखने में अपना कौशल समझने लगता है. ‘हिसाब तो बापबेटे का’ जैसा मुहावरा इसी असामान्य किस्म की व्यावसायिकता के चलते बना है. इसके चलते सहज मानवीय संबंध और सामान्य नैतिकताएं भी मौद्रिक व्यवहार का रूप ले लेती हैं. मनुष्य हर कार्य का आकलन मौद्रिक लाभ की दृष्टि से करने लगता है. यह व्यावसायिकरण का जीवन में अवांछित हस्तक्षेप है. आदर्श अवस्था तो यह होगी कि आदमी की रोजमर्रा की जरूरत में काम आने वाली वस्तुएं, सामान्य सेवाएं आदि बगैर किसी मौद्रिक व्यवहार के प्राप्त हो. विनिमय प्रणाली के अंतर्गत वस्तुओं के आदानप्रदान में लगने वाले श्रम को श्रमघंटों में बांटा दिया जाए. किसी सेवा या वस्तु का विनिमय उसके निर्माण में लगे औसत कार्यघंटों के भुगतान के साथ किया जाता सकता है.

तदनुसार सहविधान में सदस्य इकाइयां इस बात के लिए सहमत और सदैव तत्पर होंगी की समुदाय के भीतर, जहां तक संभव हो मुद्रा आधारित विनिमय को नियंत्रित किया जाए. समूह के भीतर रोजमर्रा के व्यवहार हेतु ऐसे विकल्प आजमाए जाएं जिनमें मुद्रा का प्रयोग न्यूनतम हो. विशेषकर सेवाआधारित उद्यमों में. प्रायः हर समूह के भीतर बिजली मिस्त्री, लौहार, बढ़ई, नाई, प्लंबर, कंप्यूटर मैकेनिक, हलवाई आदि विभिन्न पेशे वाले लोग एक साथ रहते हैं. वे एकदूसरे से सेवाओं का आदानप्रदान करते हैं. सेवाओं के भुगतान हेतु मुद्रा का प्रयोग किया जाता है. यह एक विडंबना ही कही जाएगी कि एक ही समाज में, एक साथ रहते हुए जब उन्हें एकदूसरे की आवश्यकता पड़ती है, तो मंजे हुए व्यवसायी की भांति संपर्क में आते हैं. धर्म, जाति, आसपड़ोस, भाईचार कुछ काम नहीं आता. ऐसी अनावश्यक व्यावसायिकता, जिससे जीवन में पूंजी को अनावश्यक महत्त्व मिलता हो, बचा जा सकता है. यह चलन न तो समाज की एकता और अखंडता के हित है न ही मानवीय मूल्यों के. समाजीकरण के हित में इससे दूर रहना ही श्रेयस्कर है.

सहविधान में मुद्राआधारित विनिमय को नियंत्रित करने के लिए लोगों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा कि वे सेवाओं का आदानप्रदान आपसी सहयोग और समझौते के आधार पर करें. मुद्रा के प्रयोग को न्यूनतम बनाए रखने के लिए श्रम मुद्रा के चलन को बढ़ावा दिया जाएगा. इसके लिए आवश्यक वस्तुओं एवं सेवाओं में लगने वाले श्रम की गणना कर, उसका श्रमघंटों के आधार पर मूल्यांकन किया जाएगा. उदाहरण के लिए यदि विद्युत चलित ब्लेंडर की मरम्मत करने में दो घंटे लगते हैं, तो उसका श्रम मूल्यांकन दो श्रमघंटे होगा. ऐसे ही यदि नापित द्वारा किसी व्यक्ति की हजामत बनाने में आधा घंटा लगता है तो उसकी सेवा का मूल्य आधी श्रममुद्रा माना जाएगा. अब यदि किसी नापित को ब्लेंडर की मदद के लिए इलेक्ट्रीशियन की आवश्यकता है तो उसके मरम्मत के बाद इलेक्ट्रशियन की दो श्रममुद्राएं उसकी ओर उधार हो जाएंगी. जिन्हें वह अपने चार बार सेवाविनिमय द्वारा वापस कर सकता है. यदि किन्हीं कारणवश इलेक्ट्रीशियन नाई से उसकी सेवाओं से निपटान नहीं करना चाहता तो उस व्यक्ति के दो श्रममुद्रा के बदले नाई किसी तीसरे व्यक्ति से श्रममुद्रा विनिमय के आधार पर सेवाओं का समायोजन कर सकता है, और तीसरा किसी चौथे व्यक्ति के साथ. चूंकि यह व्यवस्था मान्य नियमों के तहत होगी और समाज को बीच में लाने की जरूरत ही न पड़ेगी, न ही औपचारिक मुद्रा की आवश्यकता होगी. यहां एक समस्या खड़ी हो सकती है. जो लोग सेवा उद्योग के दायरे के बाहर हैं, वे इस व्यवस्था में कैसे हिस्सा लेंगे. सो इसमें कोई मुश्किल नहीं है. थोड़े से प्रयास से उन्हें भी इसमें सम्मिलित किया जा सकता है. पढ़ेलिखे व्यक्ति सामाजिक सेवाओं को प्राप्त करने के लिए आवश्यक कार्यघंटे ट्यूशन या लिखापढ़ी के दूसरे कार्यों के जरिये जमा कर सकते हैं.

उल्लेखनीय है कि पूंजीवादी अर्थतंत्र में वस्तुओं का मूल्यांकन प्रचलित मुद्रा के माध्यम से किया जाता है. जो अपेक्षाकृत आसान है और यह मानने में भी कोई गुरेज नहीं है कि व्यक्ति ने लंबे अंतराल में उसको विकसित किया है. लेकिन उसकी कमी है कि इससे प्रत्येक वस्तुओं के खरीदयोग्य होने का भ्रम पैदा होता है. कई बार यह भ्रम जानबूझकर पैदा किया जाता है. सेवाओं के विनिमय या स्वैच्छिक आदानप्रदान की व्यवस्था एक बार लोगों को भा जाए तो उसके बाद इसका प्रयोग एकदम सहज लगने लगेगा. श्रमघंटों का हिसाबकिताब रखने के लिए स्थानीय सामाजिक इकाइयां रजिस्टर रख सकती हैं. या कोई और सर्वस्वीकार्य प्रणाली आविष्कृत कर सकती हैं. इस बात की भी काफी संभावना है कि यह प्रणाली आरंभ में बहुत दुष्कर नजर आए.