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सार्वजनिक उद्यमों का विनिवेशीकरण

सामान्य

निजीकरण के माध्यम से जातिवादी एजेंडे को साधने की कोशिश

आर्थिक मंदी से उबरने का सरकार को जो सबसे आसान तरीका नजर आता है, वह है विनिवेशीकरण। नीति-आयोग की ऑनलाइन बैठक में प्रधानमंत्री ने कहा कि उद्योग-धंधे चलाना सरकार का काम नहीं है। वित्त-मंत्री भी बजटीय भाषण में विनिवेशीकरण का ऐलान कर चुकी हैं। फैसले की आलोचना कर रहे लोगों से प्रधानमंत्री का कहना है कि ‘निजी क्षेत्र की महत्ता से भली-भांति परिचित होने के बाद भी कुछ नेता, न केवल अप्रासंगिक हो चुके समाजवादी सोच से चिपके हुए हैं, बल्कि निजी क्षेत्र के उद्यमियों को खलनायक की तरह पेश करने का भी काम कर रहे हैं’1 पुनः 24 फरवरी को बजट पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा था कि सरकार द्वारा संचालित उद्यमों के सुनियोजित निनिवेशीकरण द्वारा नागरिकों के विकास एवं रोजगार हेतु नए संसाधन प्राप्त होंगे। उस भाषण में उन्होंने 100 सरकारी उद्यमों के विनिवेशीकरण द्वारा 2.5 लाख करोड़ की धनराशि जुटाने की बात कही थी।2 इस लेख का उद्देश्य पाठकों को  पूंजीवाद और समाजवाद की बहस पर उलझाना नहीं है। लेकिन यह याद दिलाना जरूरी है कि ‘संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य’ बनाने का संकल्प आज भी उस भारतीय संविधान की प्रस्तावना का हिस्सा है, जिसकी शपथ लेकर हमारे मंत्री और सांसद, संसद भवन की शोभा बनते आए हैं।

2014 में जब यह सरकार सत्ता में आई थी, तो विकास सबसे बड़ा मुद्दा था। विदेशी निवेशकों को रिझाने के लिए मोदीजी अगले दो वर्षों तक इस देश से उस देश तक घूमते रहे। उन वर्षों में उन्होंने जितनी विदेश यात्राएं की थीं, वह स्वयं एक रिकार्ड है। यह बात अलग है कि अपेक्षित तो क्या न्यूनतम सफलता भी उन्हें इस काम में नहीं मिल सकी। इसके लिए कोई और नहीं, भाजपा के अपने ही नेता जिम्मेदार थे। खासकर वे नेता जिनके लिए हिंदुत्व का मुद्दा, देशहित के किसी भी मुद्दे से बढ़कर था। जीत के साथ ही वे हिंदुत्व के एजेंडे को लागू करने में जुट गए थे। उससे समाज में अशांति और असुरक्षा का वातावरण पनपा, जिसकी क्रूर परिणति मुजफ्फरनगर दंगे के रूप में हुई। अर्थव्यवस्था की दृष्टि से सरकार का दूसरा ध्वंसात्मक कदम था─विमुद्रीकरण का फैसला। काले धन को बाहर निकालने के नाम पर उठाए गए उस कदम का वास्तविक उद्देश्य उत्तर प्रदेश चुनावों से ठीक पहले विपक्ष को धराशायी कर देना था। कालाधन तो बाहर नहीं आया, उल्टे पुराने नोटों के स्थान पर नए नोट छापने में देश को अरबों रुपयों का चूना लग गया। सामाजिक अविश्वास, अशांति, निरंतर बढ़ते ध्रुवीकरण तथा विमुद्रीकरण के फैसले ने छोटे-उद्योगों और व्यापारियों की कमर तोड़कर रख दी। उसके बाद तो लोग विकास की उम्मीद छोड़, जो था उसी को बचाने की फिक्र करने लगे। ऐसा वातावरण पूंजीवादी कंपनियों के लिए, जो निवेश से पहले नए ठिकाने की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों की भली-भांति पड़ताल करती हैं, उपयुक्त नहीं था। कोविड-19 के कारण फैली महामारी की शुरुआत में, चीन के निरंकुश आचरण से खिन्न बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने नए ठिकाने की तलाश शुरू कर दी थी। भारत उनके लिए वैकल्पिक ठिकाना हो सकता था। मगर बढ़ती सांप्रदायिकता के कारण, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की खराब होती छवि ने भारत को उन अवसरों का लाभ उठाने से वंचित रखा।

सवाल है कि विनिवेशीकरण के मुद्दे से इस सबका क्या संबंध है? क्यों हम सरकार की कमजोरियां गिना रहे हैं? वस्तुतः देश आज जिस आर्थिक मंदी का शिकार है, उसके पीछे सरकार की नीतियों का बड़ा योगदान है। एक ओर जहां सरकार और जनसाधारण को आर्थिक मोर्चे पर बुरी तरह जूझना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर इसी अवधि में देश के चुनींदा घरानों की पूंजी में बेइंतहा वृद्धि हुई है। मई 2014 में जब मोदी सरकार पहली बार सत्ता में आई थी, सेन्सेक्स 24,000 था। फ़िलहाल वह 50,000 के शिखर को पार कर नई ऊंचाइयों की ओर अग्रसर है। इसका मोटा-मोटा संकेत यह है कि सात वर्ष से भी कम समय में, देश के शीर्ष पूंजीपति घरानों के खजाने में दो गुने से ज्यादा की वृद्धि हुई है। दूसरी ओर मानव विकास सूचकांक की दृष्टि से भारत 189 देशों में 2014 में भी 131वें स्थान पर था, आज भी वहीं टिका है। साफ है सरकार की नीतियों का जितना लाभ पूंजीपतियों और सरमायेदारों को मिला, उतना छोटे-उद्यमियों, व्यापारियों और आम आदमी को नहीं मिल पाया है। साफ है पूंजी का निचले वर्गों से ऊपर की ओर प्रवाह हुआ है; और जो मंदी है वह पैदा की हुई है। यह अन्यथा नहीं है कि देश के शीर्ष उद्योगपति वर्तमान सरकार से ज्यादा आशान्वित हैं। वे चाहते हैं कि सरकार विनिवेशीकरण की प्रक्रिया में तेजी लाए।

सवाल उठता है कि सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम यदि लाभ नहीं कमा रहे हैं, सरकार के अनुसार उन्हें चलाए रखने के लिए हर वर्ष करीब 400 अरब रुपये का घाटा उठाना पड़ता है─तब उन्हें चलाए रखने का फायदा क्या है? पहली बात तो यह कि यह रकम उससे बहुत कम है जो सरकार को लगभग हर साल बैंकों के घटते एनपीए, कारपोरेट सेक्टर की कर्ज माफी/ब्याज माफी वगैरह के रूप में समायोजित करनी पड़ती है। दूसरा और महत्वपूर्ण प्रश्न, आखिर क्या कारण है कि जो उद्यम सरकार के नियंत्रण में रहते हुए लगातार घाटे में रहते हैं, वे निजी हाथों में जाते ही सोना उगलने लगते हैं? उदाहरण के लिए ‘भारत एल्युमिनियम कारर्पोरेशन लिमिटेड’(बाल्को) तथा ‘हिंदुस्तान जिंक’ जैसी कंपनियां जो कभी घाटे में थीं। निजी हाथों में जाने के बाद ही उनका कायापलट हो चुका है। इनमें से बाल्को की स्थापना 1965 में की गई थी। 2001 तक यह कंपनी शत-प्रतिशत स्वामित्व के साथ भारत सरकार के नियंत्रण में थी। कंपनी विशेष प्रकार के एलुमिनियम धातु का निर्माण करती है, जिसका उपयोग मध्यम और लंबी दूरी की मिसाइलों यथा अग्नि, पृथ्वी आदि के निर्माण के लिए किया जाता था। 2001 में उसकी 51 प्रतिशत साझेदारी वेदांता समूह को बेच दे दी गई। दूसरी कंपनी ‘हिंदुस्तान जिंक’ भी वेदांता के अधिकार में हैं। आज ये कंपनियां अपने मालिकों के लिए सालाना अरबों रुपये का मुनाफा कमाती हैं। इन्हीं के कारण वेदांता समूह के अध्यक्ष अनिल अग्रवाल को आजकल ‘मेटल टाइकून’ कहा जाता है। निजी हाथों में जाते समय कंपनी ने इनमें कोई छंटनी नहीं की थी। यानी कमी प्रबंधन के स्तर पर थी, जिसके लिए सरकार और नौकरशाही ज्यादा जिम्मेदार है। इस बात को देश का पूंजीपति वर्ग भी समझता है। वेदांता समूह के अनिल अग्रवाल विनिवेशीकरण की प्रक्रिया का लंबे इंतजार कर रहे उद्यमियों में से हैं। इसलिए अवसर मिलते ही वे न केवल सरकार को विनिवेशीकरण के फायदे गिनाने लगते हैं, बल्कि बीमार सार्वजनिक उद्यमों की खरीद पर, चरणबद्ध तरीके से लगभग 74,000 हजार रुपये के निवेश की घोषणा भी कर देते हैं।3

सार्वजनिक क्षेत्र किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं। वे देश की आधारभूत संरचना को मजबूत करने के काम आते हैं। पूंजीवादी अर्थतंत्र की कमजोरी होती है कि एक अंतराल के बाद उसमें मंदी के दौर आते हैं। सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले, पूंजीवाद का आदर्श कहे जाने वाला अमेरिका 1785 से अब तक, यानी 240 वर्ष के इतिहास में कुल 47 आर्थिक मंदी के दौर झेल चुका है।4 भारत में औद्योगिकीकरण की शुरुआत बीसवीं शताब्दी के आरंभ की घटना है। बावजूद इसके आजादी के बाद इस देश में आर्थिक मंदी के 5 दौर आ चुके हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि इसी अवधि; यानी 1947 के बाद अमेरिका को मंदी के छोटे-बड़े 12 झटकों से गुजरना पड़ा है। मंदी से उबारने के लिए पूंजीवादी अर्थतंत्र को बाहरी मदद पहुंचानी पड़ती है। उस समय वे सरकार से करीब-करीब इतनी ही धनराशि ऐंठ लेते हैं, जितनी उन्होंने अपने अच्छे दिनों में कराधान आदि के रूप में सरकार को प्रदान की थी। कभी-कभी आर्थिक मंदी पूर्णतः कृत्रिम होती है। फिर भी मजबूर सरकारों को कर्ज लेकर भी, पूंजीवादी अर्थतंत्र को मदद पहुंचानी पड़ती है। 2008 से 2011 की भीषण आर्थिक मंदी के दौरान अमेरिका की अर्थव्यवस्था इतनी रसातल में पहुंच चुकी थी कि दिवालियापन से बचने से लिए उसे कर्ज लेना पड़ा था।

एक समय था जब किसी सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक मसलों पर क्षेत्र विशेष के विशेषज्ञों और विद्वानों की राय महत्वपूर्ण मानी जाती थी। समाचारपत्र-पत्रिकाएं गर्व के साथ समाजविज्ञानियों, अर्थशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों  को जगह देते थे। कथित सोशल मीडिया इस गंभीर कार्य को भी ग्लैमराइज्ड कर दिया है। सोशल मीडिया पर आए दिन कोई अभिनेता, अभिनेत्री, क्रिकेटर सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों की विवेचना करता हुआ नजर आता है। ट्विटर और फेसबुक के चलताऊ विमर्श के आधार पर सरकारें भी अपनी राय बनाती नजर आती हैं। ऐसे कृत्रिम बौद्धिकता के माहौल में समाजवाद को समय-बाह्यः मान लेना, न तो अस्वाभाविक है, न ही चौंकाने वाला। असलियत कुछ और ही है। 

एडीसन मेंगस की रिपोर्ट के अनुसार 1700 ईस्वी में जब भारत में औद्योगिकीकरण की हवा तक नहीं पहुंची थी, और पश्चिम में मशीनीकरण की धूमधाम के साथ शुरुआत हो चुकी थी─सकल वैश्विक उत्पादन में भारत और चीन का योगदान 24.4 प्रतिशत और 22.3 प्रतिशत था। इसमें गिरावट का दौर ईस्ट इंडिया कंपनी के आने के बाद शुरू हुआ। ये कंपनियां दोनों ही देशों में पहुंचीं। परिणामस्वरूप 1913 में भारत 7.5 प्रतिशत; तथा चीन 8.8 प्रतिशत पर सिमटकर रह गया। 1947 में भारत आजाद हुआ और चीन 1949 में साम्यवादी झंडे के नीचे चला गया। मगर 1950 तक चीन और भारत की अर्थव्यवस्था में बहुत अधिक अंतर नहीं था। उस समय वैश्विक सकल उत्पादन में भारत और चीन का योगदान क्रमश 4.2 प्रतिशत और 4.5 प्रतिशत था। यही नहीं, 1991 तक लोकतंत्रात्मक भारत, अपनी मिश्रित अर्थव्यवस्था के बल पर, चीन को टक्कर देता था। उस समय दोनों की वैश्विक उत्पादकता लगभग समान थी।5 इसमें परिवर्तन 1991 के बाद भारत, उस समय आया जब भारत ने अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के नाम पर अपने दरवाजे बहुराष्ट्रीय निगमों के लिए खोल दिए। दूसरी ओर चीन मिश्रित अर्थव्यवस्था की डगर पर आगे बढ़ गया। आज भारत और चीन की आर्थिक हैसियत में जमीन-आसमान का अंतर है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार 2019 में चीन का सकल घरेलू उत्पाद 14.34 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर था, जो भारत के 2.9 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर, से पांच गुना अधिक है।6

उपर्युक्त विवरण से साफ है कि आर्थिक उदारीकरण के साथ देश ने जो सपने देखे थे, वे महज छलावा सिद्ध हुए हैं। बावजूद इसके पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के विरोध में कोई आवाज नहीं उठती। सत्ता में बने रहने के लिए भाजपा, मजदूरों और छोटे व्यापारियों की आवाज को दबाकर निजी क्षेत्र को मजबूत करने के लिए प्राण-प्रण के साथ जुटी है। खुद प्रधानमंत्री समाजवाद को समयबाह्य दर्शन कह जाते हैं। आखिर क्यों? हमें इसके पीछे निहित षड्यंत्र को समझना पड़ेगा। समझना पड़ेगा कि वे कौन से कारण हैं जिन्होंने कुछ वर्ष पहले तक ‘स्वदेशी’ के पैरोकार रही ‘भारतीय जनता पार्टी’ नेता अब उसका नाम तक लेना नहीं चाहते। निश्चय ही इसका तात्कालिक उद्देश्य येन-केन-प्रकारेण सत्ता में बने रहना है। साथ ही इसका एक दीर्घकालिक उद्देश्य भी है।

संविधान प्रदत्त अधिकारों का लाभ उठाकर, दलित और पिछड़ी जातियों के लोग सरकारी नौकरियों, उद्योगों और व्यापार में जगह बनाने लगे हैं। हालांकि शिखरस्थ जातियों की अपेक्षा उनकी भागीदारी, उनके जनसंख्या अनुपात  से अभी भी बहुत कम है। बावजूद इसके विप्र मानसिकता के लोगों को यह बहुत रास नहीं आ रहा है। येन-केन-प्रकारेण वे दलितों और पिछड़ों के सबलीकरण की प्रक्रिया को अवरुद्ध करना चाहते हैं। चूंकि संवैधानिक प्रावधानों के कारण वे सरकार में रहकर ज्यादा कुछ नहीं कर सकते, इसलिए निजी क्षेत्र को मजबूत किया जा रहा है, जहां पिछड़ों और दलितों की उपस्थिति नगण्य है। विनिवेशीकरण इसलिए किया जा रहा है ताकि आरक्षित वर्गों के सार्वजनिक प्रतिष्ठानों के रास्ते सरकारी नौकरियों में जाने के अवसर कम से कम हो जाएँ। अपने इस प्रयोग से वर्तमान सरकार इतनी खुश है कि प्रशासनिक सेवाओं के जिन पदों के लिए युवा घर-परिवार से अलग रहकर रात-दिन मेहनत करते हैं, उनपर भी निजी क्षेत्र से उधार लिए अधिकारियों को बैठाया जा रहा है। कुल मिलकर ‘2014 में सरकार बनाते समय मोदी जी द्वारा दिया गया नारा ‘सबका साथ-सबका विकास’, सरकार के जातिवादी एजेंडे पर चढ़कर, ‘सबका साथ अपनों का विकास’ बनकर रह गया है।

ओमप्रकाश कश्यप

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संदर्भ

1. जागरण संपादकीय, 21 फरवरी, 2021.

2. दि टाइम्स ऑफ इंडिया, 25 फरवरी, https://timesofindia.indiatimes.com/india/pm-sets-target-of-2-5l-cr-from-asset-monetisation/articleshow/81200196.cms

3. नवभारत टाइम्स, 19 दिसंबर, 2020 https://navbharattimes.indiatimes.com/business/business-news/anil-agarwal-vedanta-and-centricus-to-invest-10-billion-dollar-in-indian-companies/articleshow/79812797.cm

4. बिजनिस साइकिल्स: थ्योरी, हिस्ट्री, इंडीकेटर्स एंड फोरकास्टिंग, विक्टर जार्नोविट्ज, शिकागो यूनीवर्सिटी, शिकागो प्रेस, 221-226

5. डेवलपमेंट सेंटर स्टडीज दि वर्ल्ड इकॉनामी स्टेटीटिक्स, ओईसीडी, फ्रांस, पृष्ठ 261-262  

6. विश्वबैंक, वर्ल्ड डेवलपमेंट इंडीकेटर्स, 2 जुलाई 2020 https://en.wikipedia.org/wiki/List_of_countries_by_GDP_(nominal)