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सच्ची रामायण का विरोध धार्मिक से कहीं ज्यादा राजनीतिक है

सामान्य

मैं मानव समाज का सुधारक हूँ. मैं देश, धर्म, ईश्वर, भाषा अथवा राज्य की परवाह नहीं करता. मुझे केवल मनुष्यता के विकास और उसके कल्याण की चिंता है—पेरियार

बाइबिल का परमात्मा पक्के तौर पर सर्वाधिक ईर्ष्यालु, सर्वाधिक नाकारा, सर्वाधिक क्रूर, सर्वाधिक अन्यायी, सर्वाधिक रक्त पिपासु, सबसे ज्यादा निरंकुश तथा मानवीय गरिमा एवं स्वतंत्रता का सबसे बड़ा शत्रु था. जबकि शैतान शाश्वत विद्रोही और पहला मुक्त चिंतक था—मिखाइल बकुनिन, ईश्वर और राज्य.

‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी.’ प्रथम दृष्टया लोकतांत्रिक लगने वाली ये पंक्तियां तुलसी की हैं. पढ़कर लगता है कि लिखने वाले का लोकतंत्र में अटूट विश्वास है. वह साधक को अपनी भावना के अनुसार साध्य गढ़ने की छूट देता है. मगर इनमें लोकतंत्र की व्याप्ति मान लेना वैसा ही संभ्रम है, जैसे यह कहना कि कण-कण में भगवान हैं, इसलिए चराचर जगत में सभी बराबर हैं, दुनिया में आदर्श समानता है. ऊंच-नीच, जात-पात, छोटा-बड़ा, छूत-अछूत जैसा कुछ भी नहीं है. असल में, धर्म का यह उदार चेहरा उतना ही बनावटी है, जितना किसी पुरोहित का दक्षिणा मिलते ही ‘कल्याणम् भव’ कह, निस्पृह भाव से आगे बढ़ जाना. भारतीय समाज छोटे-छोटे समुदायों, धार्मिक और सांप्रदायिक समूहों, गोत्रों-उपगोत्रों तथा जातियों-उपजातियों में हमेशा बंटा रहा. उनके बीच वर्चस्व को लेकर संघर्ष भी लगातार चलते रहे.

हालांकि एक सीमा तक तुलसी गलत भी नहीं थे. जिस दौर में वे रामचरितमानस लिख रहे थे, समाज में रामकथा के अलग-अलग रूप प्रचलित थे. प्रत्येक समूह अपनी रामकथा को असली मानता था. बावजूद इसके रामायण के भिन्न कथारूपों पर विश्वास करने वाले समूहों में परस्पर कोई द्वेष नहीं था. अकेले राम सभी के ‘भगवान’ नहीं थे, लेकिन कोई राम को सबसे बड़ा देवता और भगवान माने, इसपर उन्हें कोई आपत्ति न थी. आदिवासियों, जनजातियों, शूद्रों, अतिशूद्रों के अपने-अपने देवता थे, जो राम जैसे अवतारी, उतने ही पराक्रमी और चमत्कारी; कहीं-कहीं तो उनसे भी आगे थे. राम के देवत्व पर भरोसा कर अपना आराध्य मानने वालों ने भी, उन्हें अपनी परंपरा और संस्कृति के अनुसार ढालने के बाद ही स्वीकार किया था. यही कारण है कि उस जमाने में सीता को राम की बहन बताने वाली जैन रामायण ‘पउमचरिय’ उतनी ही लोकप्रिय और सम्मानीय मानी जाती रही, जितनी राम-सीता को पति-पत्नी बताने वाली वाल्मीकि रामायण.

विभिन्न रामायणों के मुख्य पात्र भले ही एक हों, किंतु उनके चरित्र में आधारभूत अंतर है. जैन रामायण में ब्राह्मणों पर रावण को बदनाम करने का आरोप लगाया गया है. जैन मान्यता के अनुसार रावण उनके 63 शलाकापुरुषों में से एक था. उसके अनुसार राम और रावण दोनों जैन थे. मृत्यु के बाद राम को कैवल्य; तथा लक्ष्मण को नर्क प्राप्त हुआ था. वाल्मीकि, तुलसी, विमलसूरि(पउमचरिय) द्वारा रचित रामायणों के अलावा भी रामकथा के सैंकड़ों रूप दुनिया-भर में प्रचलित हैं. फादर कामिल बुल्के ने देश-विदेश में प्रचलित रामकथाओं की गणना कर, उनकी संख्या को 300 माना था. अपने लेख ‘थ्री हंड्रेड रामायण’ में ए. के. रामानुजन रामकथा की विविधता को दर्शाने के लिए जिस लोकश्रुति का सहारा लेते हैं, उसके अनुसार रामकथा अनंत रूपों में, अनादिकालीन कथा है. फिर पेरियार ने ऐसा क्या लिखा था, जिससे उनकी लिखी ‘सच्ची रामायण’ का नाम सुनकर ब्राह्मणवादी लाल-पीले होने लगते हैं?

मुख्य कारण था, पेरियार का रामकथा के प्रति दृष्टिकोण. पेरियार स्वयं नास्तिक थे. जहां रामायण के अन्य प्रारूपों के साथ कोई न कोई धार्मिक दृष्टिकोण जुड़ा था, पेरियार उसे धार्मिक पुस्तक मानने से ही इन्कार करते थे. उनका कहना था कि रामायण एक राजनीतिक ग्रंथ है. उसकी रचना ब्राह्मणों ने द्रविड़ों पर अपना प्रभुत्व दर्शाने के लिए की गई है. वह द्रविड़ों के आत्मसम्मान की विरोधी, उनकी अस्मिता का हनन करने वाली है. ‘दि रामायण: एक ट्रू रीडिंग’ की भूमिका में वे लिखते हैं—

‘रामायण और बरधाम(महाभारत) काल्पनिक ग्रंथ हैं….इन्हें आर्यों ने द्रविड़ों को अपने जाल में फंसाने, उनके आत्मसम्मान को नष्ट करने, निर्णय सामथ्र्य को कुंद करने तथा उनकी इंसानियत को पथभ्रष्ट करने के लिए रचा है. इन दोनों कथाओं के नायक क्रमशः राम और कृष्ण हैं. जो कि आर्य हैं और बेहद साधारण व्यक्ति हैं. ये कथाएं इसलिए थोपी गईं हैं, ताकि इनके कथानायकों, उनके परिजनों एवं सहायकों को अलौकिक एवं अतिमानवीय मान लिया जाए; तथा उन्हें पूजनीय मानकर, जनसाधारण द्वारा उनकी पूजा-अभ्यर्थना की जाए.’ बावजूद इसके रामासामी पेरियार की पुस्तक ‘दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ जब तक तमिल और अंग्रेजी में थी, तब तक हिंदी पट्टी के ब्राह्मणवादियों को उससे कोई आपत्ति नहीं थी. इसलिए करीब 40 वर्षों तक उसके तमिल और अंग्रेजी में संस्करण पर संस्करण निकलते रहे.

पुस्तक को लेकर तूफान तब उठा जब कानपुर देहात के रहने वाले पेरियार ललई सिंह ने ‘सच्ची रामायण’ शीर्षक से उसका हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया. हिंदी अनुवाद दुलालपुर निवासी, राम आधार द्वारा किया गया था. उसे छापने के लिए उस समय कोई प्रकाशक तैयार नहीं था. इसलिए ललई सिंह ने उसे अपने प्रकाशन, ‘अशोक पुस्तकालय’ कानपुर से 1 अक्टूबर, 1968 को प्रकाशित किया था. मूल कृति ‘रामायण पादिरंगल’(रामायण के कथापात्र) शीर्षक से 1930 में प्रकाशित हुई थी. 1972 तक उसके दस संस्करण प्रकाशित हो चुके थे. पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद 1959 में आया था. उसके बाद दो और संस्करण क्रमशः 1972 और 1980 में प्रकाशित हुए. पुस्तक के हिंदी में आने की संभावना उसके अंग्रेजी अनुवाद के बाद ही बनी थी. ‘रामायण पादिरंगल’ की रचना से पहले पेरियार ने लगभग सभी उपलब्ध रामकथाओं यथा जैन, बौद्ध, कंब आदि का गहन अध्ययन किया था. विषय से संबंधित विद्वानों से बातचीत की थी.

रामकथा संबंधी उनके अध्ययन-चिंतन की सफल परिणति एक साथ दो पुस्तकों के रूप में हुई थी. दूसरी पुस्तक का नाम था—रामायण कुरीप्पुकल(रामायण के बारे में कुछ बातें). वह पहली की अपेक्षा अधिक गंभीर तथा कथानक की दृष्टि से मूल रामकथा के करीब थी. उनमें प्रसिद्धि मिली पहली पुस्तक को. अंग्रेजी में उसे मूल शीर्षक से थोड़ा हटकर, ‘दि रामायण: एक ट्रू रीडिंग’ शीर्षक से छापा गया. उसका हिंदी अनुवाद ‘सच्ची रामायण’ के रूप में सामने आया. हम सोच सकते हैं कि तमिल कृति ‘रामायण पादिरंगल’ यानी ‘रामायण के कथापात्र’ के हिंदी में ‘सच्ची रामायण’ के रूप में अनूदित होते-होते, शीर्षक के स्तर पर भी काफी अर्थ-परिवर्तन हो चुका था.

‘सच्ची रामायण’(रामायण पादिरंगल) की रचना विखंडनात्मक शैली में हुई है. वह रामकथा की स्थापित छवियों का खंडन करती थी. उसका उद्देश्य रामायण के कथापात्रों के चरित्र का वस्तुनिष्ट विवेचन है. जिस राम को तुलसी मर्यादापुरुषोत्तम कहकर ईश्वरतुल्य बना देते हैं, उसके बारे में पेरियार आरंभ में ही साफ कर देते हैं कि—‘राम कोई आदर्श व्यक्ति नहीं है.’ आगे वे विस्तार से राम के चरित्र को लेकर अपने विचार पेश करते हैं. शंबूक प्रसंग का उल्लेख करते हुए वे आगे लिखते हैं—

‘राम जिसने तपस्या कर रहे शंबूक की बगैर किसी गलती के, निर्दयतापूर्वक हत्या कर दी थी, उस राम को विष्णु का अवतार माना जाता है. अगर आज राम की तरह का कोई राजा होता तो उन लोगों की क्या दशा होती, जिन्हें शूद्र(जो गालीनुमा संबोधन है) कहा जाता है!’

ऐसी वैचारिक प्रखरता, प्रतिबद्धता और साफगोई के कारण वह उसकी लोकप्रियता उत्तरोत्तर बढ़ती गई.

पेरियार ललई सिंह ने न केवल ‘दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ का हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया था, अपितु ‘सच्ची रामायण’ में पेरियार के तर्कों की पुष्टि के लिए, विभिन्न रामकथाओं से कुछ संदर्भ भी दिए थे. जिसे उन्होंने ‘सच्ची रामायण की चाबी’ कहा था. पाठकों की सुविधा के लिए दोनों पुस्तकों को एक ही जिल्द में छापा गया था. उदाहरण के लिए पेरियार ने सीता का वर्णन करते हुए उसके चरित्र की दुर्बलताओं को उजागर किया था तो पेरियार ललई सिंह ने उसकी पुष्टि के लिए रामचंद्र शुक्ल की पुस्तक ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ से, ‘श्रीरामावतार भजन तरंगिनी’ से एक पद उद्धृत किया था. पद में यूं तो पति-पत्नी का सहज रति प्रसंग है. लेकिन एक ‘वनवासी मर्यादा पुरुषोत्तम’ के संदर्भ से जुड़कर वह अशालीन लगने लगता है. पद में सीता का कथन देखिए—

‘हमारे प्रिय ठाड़े सरजू तीर।।टेक।।

छोड़ लाजि मैं जाय मिली, जहां खड़े लखन के वीर

मृदु मुसुकाय पकरि कर मेरी खेच लियो तब चीर

झाऊ वृक्ष की झाड़ी भीतर करन लगे रति धीर.1

कह सकते हैं कि पेरियार द्वारा, ‘दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग’, के रूप में रामायण की विखंडनवादी अन्वीक्षा, ‘सच्ची रामायण’ में थोड़ी और मुखर, और अधिक व्यंजनात्मक हो चुकी थी. इसलिए ब्राह्मणवादियों के कान खड़े होना स्वाभाविक था. हिंदी में प्रकाशित होने के साथ पूरे हिंदी जगत में तूफान सा उठ गया. ललई सिंह पर मुकदमा ठोक दिया गया. यह कहकर कि पुस्तक हिंदुओं की भावनाओं को आहत कर, सामाजिक विद्वेष फैलाने वाली है, उसकी सभी प्रतियों को जब्त करने के आदेश सुना दिए गए. गौरतलब है कि प्रतिबंध और जब्ती के आदेश पुस्तक के केवल अंग्रेजी और हिंदी संस्करण के थे. तमिल तथा दूसरी दक्षिणी भारतीय भाषाओं में प्रकाशित पुस्तक की बिक्री पर कोई पाबंदी नहीं लगाई गई थी. गोया तमिलनाडु या दक्षिण भारत के दूसरे हिस्सों में हिंदू रहते ही नहीं थे. इससे पेरियार के कथन कि रामायण एक राजनीतिक ग्रंथ है—की पुष्टि होती है. सच तो यह है कि ‘सच्ची रामायण’ के माध्यम से ब्राह्मणवादी राजनीतिक ताकतें, अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक एवं राजनीतिक सत्ता की पुनर्वापसी को अंजाम देने में लगी थीं.

पुस्तक को प्रतिबंध मुक्त कराने के लिए ललई सिंह यादव को लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी. उसका समापन 16 सितंबर, 1976 के उच्चतम न्यायालय के फैसले से हुआ. शीर्षतम अदालत ने प्रतिबंध को गलत बताकर, पुस्तक की जब्त की गई प्रतियां लौटाने का आदेश दिया था. उच्चतम न्यायालय के आदेश के बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार औपचारिक आदेश जारी करने से बचती रही. 1995 में मायावती सरकार के दौरान पुस्तक प्रतिबंध-मुक्त हो सकी. उसके बाद से हिंदी पट्टी में ‘सच्ची रामायण’ की लोकप्रियता बढ़ती गई, मगर पोंगापंथी भी शांत न थे. वे विरोध के लिए नए सिरे से एकजुट होने लगे थे. नया दौर हिंदुओं का न होकर, हिंदुत्ववादियों का था. उनके भीतर पेरियार के प्रति नफरत कूट-कूट कर भरी थी. इसलिए नहीं कि पेरियार ने रामायण के पात्रों के चरित्र पर उंगलियां उठाई थीं. बल्कि इसलिए कि उन्होंने इन धर्मग्रंथों के पीछे छिपे ब्राह्मणवादियों के राजनीतिक मंसूबों को उजागर कर दिया था. पेरियार के प्रति उनके भीतर कितनी नफरत भरी थी, इस समझने के लिए एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा.

2002 में लखनऊ स्थित आंबेडकर पार्क जब बन रहा था तो उसमें योजनानुसार ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, शाहूजी महाराज, डॉ. आंबेडकर, बिरसा मुंडा, कांशीराम जैसी बहुजन शख्सियतों की मूर्तियां स्थापित की गईं. मायावती उसमें पेरियार की मूर्ति भी लगवाना चाहती थीं. कलाकार को मूर्ति-निर्माण का आदेश जारी हो चुका था. उस समय प्रदेश में भाजपा के सहयोग से बनी बहुजन समाज पार्टी की सरकार थी. पेरियार का नाम सुनते ही विश्वहिंदू परिषद, बजरंग दल, हिंदू महासभा जैसे उग्रपंथी संगठन भड़क उठे. विनय कटियार ने ऐलान किया कि पेरियार की मूर्ति लगाई गई तो वे उसे ढहा देंगे. भाजपा ने समर्थन वापस लेने की धमकी दे डाली. बसपा पेरियार को अपना ‘आइकन’ मानती थी. उसके हर कार्यक्रम में ज्योतिबा फुले, डॉ. आंबेडकर, शाहूजी महाराज के साथ-साथ पेरियार के चित्र भी लगे होते थे. उस समय मायावती चाहतीं तो सामाजिक न्याय समर्थित वैचारिकी को महत्व देकर, सरकार को दाव पर लगाने का खतरा उठा सकती थीं. लेकिन उन्होंने राजनीतिक सत्ता को बचाने का अवसरवादी विकल्प चुना. बयान दिया कि सरकार का पेरियार की मूर्ति लगाने का कोई इरादा नहीं है. जबकि मूर्ति तैयार होकर शिल्पकार के स्टूडियो में प्रतीक्षारत थी.

मंदिर आंदोलन की आड़ में प्रदेश में दक्षिणपंथी ताकतें दुबारा मजबूत हुई तो उच्चतम न्यायालय के फैसले के बावजूद पुस्तक पर नए सिरे से प्रतिबंध लगाने की मांग की जाने लगी. 2007 में प्रदेश में सुश्री मायावती की सरकार थी. उस समय भाजपा की प्रादेशिक इकाई ने आरोप लगाया कि ‘बहुजन समाज पार्टी’ सच्ची रामायण का प्रचार-प्रसार कर रही है. उसके संरक्षण में प्रदेश में बड़े पैमाने पर पुस्तक की बिक्री की जा रही है. भाजपा की प्रदेश इकाई ने, पुस्तक को हिंदुओं की भावनाओं को आहत करने वाली बताकर, उसपर तत्काल प्रतिबंध लगाने की मांग की थी. भाजपा विधान मंडल के तत्कालीन नेता ओमप्रकाश सिंह ने सरकार से मांग की थी कि—‘हिंदू देवी-देवताओं के विरोधी तथा द्रविड़िस्तान की मांग करने वाले, अलगाववादी पेरियार रामासामी की सरकार निंदा करे तथा उन्हें महापुरुषों की श्रेणी में स्थान न दे.’ भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी ने दावा किया था कि 9 अक्टूबर को बसपा की रैली में ‘सच्ची रामायण’ की 4000 प्रतियां बेची गई थीं. हैरानी की बात यह है कि सामाजिक न्याय की बात करने वाली समाजवादी पार्टी भी, ‘सच्ची रामायण’ के विरोध में भाजपा का साथ दे रही थी. विधानसभा में विपक्ष के नेता और समाजवादी पार्टी के सदस्य अहमद हसन ने ‘सच्ची रामायण’ के जरिये सरकार पर निशाना साधते हुए कहा था कि—

‘भगवान राम के प्रति अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना अच्छी बात नहीं है. पूरी दुनिया के मुसलमान स्वीडिश कार्टूनिस्ट द्वारा बनाए गए पैगंबर मोहम्मद के कार्टून की भर्त्सना कर रहे हैं. विवादित पुस्तक पर तत्काल प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए.2

इससे अनुमान लगाया जाता है कि मामला जब धर्म की आलोचना का हो तो समय-समय पर एक-दूसरे के प्रतिद्विंद्वी की भूमिका में उतरने वाले धर्मावलंबी भी एक-दूसरे के समर्थन पर उतर आते हैं.

देखा जाए तो भाजपा का आरोप सरकार पर न होकर, ‘बहुजन समाज पार्टी’ पर था. उस पार्टी पर जो पेरियार को अपना आदर्श मानती थी. अपनी वैचारिकी पर दृढ़ रहने के बजाए, मुख्यमंत्री मायावती ने एक बार फिर पीछे हटने का फैसला किया. उनकी ओर से वक्तव्य जारी हुआ—‘बसपा तथा सरकार का सच्ची रामायण की बिक्री से कोई लेना—देना नहीं है.’ मामले पर राजनीति करने के बजाय, पुस्तक पर प्रतिबंध की मांग कर रहे नेताओं को केंद्र सरकार से संपर्क करना चाहिए, जहां उनकी अपनी पार्टी की सरकार है.3

इस प्रसंग का सबसे रोचक पहलू यह है कि जिस ‘सच्ची रामायण’ के विरोध को लेकर भाजपा सरकार पर लगातार आरोप लगा रही थी, तथा बिना आगा-पीछा सोचे कांग्रेस और समाजवादी पार्टी उसका साथ दे रही थीं, उसकी प्रति न तो भाजपा के पास थी, न सपा, न कांग्रेस और न ही बसपा के पास. यहां तक कि बसपा के साहित्य के प्रकाशक ‘बहुजन चेतना मंडप’ के पास भी उस पुस्तक की प्रतियां उपलब्ध नहीं थी. जबकि लखनऊ के सबसे बड़े पुस्तक विक्रेता ‘यूनीवर्सल बुक सेलर’ का दावा था, ‘हमने वह पुस्तक कभी नहीं बेची, न ही वह पुस्तक फिलहाल हमारे पास है.’ उल्लेखनीय है कि भाजपा के लखनऊ मुख्यालय में ‘सच्ची रामायण’ को लेकर 27—28 अक्टूबर 2007 को एक बैठक हुई थी. उसमें पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह और नेता लालकृष्ण आडवाणी भी मौजूद थे. उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से प्रदेश भर में ‘सच्ची रामायण’ की बिक्री का विरोध करने को कहा था. जबकि जिस पुस्तक का बहिष्कार किया जाना था, उसकी एक भी प्रति उस बैठक में उपलब्ध नहीं थी.

भाजपा नेताओं द्वारा विधानसभा परिसर के आगे स्थित, अपने पार्टी मुख्यालय में ‘सच्ची रामायण’ की प्रतियों का दहन(का नाटक) किया था.4 भाजपा का ‘सच्ची रामायण’ के दहन का दावा कितना खरा था, इसे इंडियन एक्सप्रेस में अलका एस. पांडे की 7 नबंवर की रिपोर्ट से समझा जा सकता है. उसके अनुसार पार्टी ने जैसे-तैसे ‘सच्ची रामायण’ के कुछ पन्ने जुटाए थे. उन्हीं को जलाकर, पुस्तक के दहन का नाटक किया गया था. वे भूल गए कि किसी व्यक्ति को महापुरुष मानना या न मानना, सत्ता प्रतिष्ठानों द्वारा तय नहीं होता. थोपे गए महापुरुषों की कलई अल्पावधि में ही खुलने लगती है. उसके बाद जनता की निगाह में वे खलनायक सरीखे बन जाते हैं.

एक महत्वपूर्ण बात और भी है. रामायण को धार्मिक ग्रंथ न मानकर पेरियार ने उसे विशुद्ध राजनीतिक ग्रंथ माना है. पेरियार के आलोचक भी उनपर कुछ ऐसा ही आरोप लगाते हैं. उनके अनुसार पेरियार द्वारा हिंदू धर्म तथा उसके मिथकों की आलोचना पूर्णतः राजनीति से प्रेरित थी. पेरियार इससे इन्कार नहीं करते थे. अंतर सिर्फ इतना है कि ब्राह्मण कभी यह मानने को तैयार नहीं होते कि रामायण तथा रामकथा को हिंदू संस्कृति के केंद्र में रखने के पीछे उनकी राजनीति है. खुद को सबसे ऊपर, शिखर पर बनाए रखने की राजनीति. जबकि पेरियार अपनी मंशा को छिपाते नहीं हैं—

‘मैं अपने समाज के कुछ ऐसे पहलुओं पर प्रहार करता हूं, जो हमें नीचा दिखाते हैं. मेरा जोर इस बात पर है कि जब तक हिंदू धर्म, हिंदू देवताओं, हिंदू शास्त्रों, पुराणों, वेदों और इसके इतिहास पर हमारा विश्वास रहेगा, और जब तक हम इनका अनुसरण करते जाएंगे, तब तक हमारा दमन और शोषण जारी रहेगा. हम समाज की असमानताकारी स्थितियों से कभी उबर ही नहीं पाएंगे. इन सड़ी हुई स्थितियों से उबरने की कोशिश के बजाए, जो केवल इनका पालन करने में लगा रहेगा—वह चाहे जितनी बेहतर स्थिति में आ जाए, खुद को अपनी अवनति और अपमानजनक स्थितियों से कभी उबार नहीं पाएगा.’5

एक अन्य भाषण में उन्होंने कहा था—

‘मैं किसी को चाहे प्यार करूं अथवा घृणा; दोनों स्थितियों में मेरा सिद्धांत एक ही रहता है. वह सिद्धांत यह है कि मैं यह शिक्षा देता हूं कि धनी लोगों और प्रशासनिक अधिकारियों को गरीब लोगों का खून नहीं चूसना चाहिए.’6

पेरियार का मानना था कि बगैर हिंदू धर्म को मिटाए, जाति-भेद को मिटाना संभव नहीं है. वे धर्मांतरण के विरोधी थे. जाति-आधारित उत्पीड़न और अवमानना से बचने के लिए जिन लोगों ने धर्मांतरण का सहारा लिया था, उनकी सामाजिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया था. हिंदू धर्म में जो अछूत था, धर्मांतरण के बाद भी उसकी हैसियत अछूत जैसी ही रहती थी. इसलिए शूद्रों और अतिशूद्रों की राजनीतिक, सामाजिक भागीदारी को आवश्यक मानते थे. राजनीति में प्रवेश के साथ ही उन्होंने सभी वर्गों को उनकी संख्या के अनुपात में संरक्षण की मांग शुरू कर दी थी. उन दिनों अस्पृश्यों को मंदिरों में प्रवेश की स्वतंत्रता नहीं थी. पेरियार स्वयं नास्तिक थे. मगर मंदिर प्रवेश का मसला सामाजिक स्वतंत्रता से भी जुड़ा था. इसलिए तमिलनाडु कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बनने के तुरंत बाद उसके तिरुपुर सम्मेलन में उन्होंने एक प्रस्ताव पेश किया, जिसमें सभी अस्पृश्यों को मंदिरों में प्रवेश की इजाजत की मांग की गई थी. लेकिन कांग्रेस कमेटी के ब्राह्मण सदस्यों ने उस प्रस्ताव का जोरदार विरोध विरोध किया. नाराज पेरियार ने तत्काल घोषणा की कि वे मनुस्मृति, रामायण आदि पुस्तकों, जिनका उपयोग कुटिल ब्राह्मणों द्वारा धार्मिक हथियारों के रूप में किया जाता है—दहन करेंगे.

वह अवसर 1956 में आया. पेरियार ने ऐलान किया कि 1 अगस्त 1956 को वे मद्रास के समुद्री तट पर राम की तस्वीरों की होली जलाएंगे. उत्तर भारत में दशहरे के अवसर पर हर वर्ष रावण के पुतले को आग लगाई जाती है. पेरियार रावण को आदर्श द्रविड़ राजा मानते थे. इसलिए उत्तर भारतीयों द्वारा रावण के पुतले को आग लगाने के विरोध में उन्होंने राम की तस्वीरों का दहन करने का ऐलान किया था. एक तरह से वह ब्राह्मणवादी संस्कृति का प्रतीकात्मक विरोध था. पेरियार की घोषणा के बाद तमिलनाडु के सभी नेताओं ने उनसे संपर्क कर, कार्यक्रम को टाल देने का अनुरोध किया. तमिलनाडु कांग्रेस के अध्यक्ष पी. काक्कन ने कहा कि राम की तस्वीरें जलाना ईश्वर के प्रति उस विश्वास की अवमानना होगी, जिसके भरोसे गांधी ने आजादी प्राप्त की है. उन्हें पेरियार के प्रस्तावित कदम को ‘असामाजिक कृत्य’ घोषित किया था. इसपर पेरियार ने अपने निश्चय पर दृढ़ रहते हुए जवाब दिया कि उनका यह कदम सामाजिक परिवर्तन के लिए अपरिहार्य है.

अगले ही दिन सुबह, घर से निकलने के साथ ही पुलिस उपायुक्त ने पेरियार को गिरफ्तार कर लिया. पेरियार इस स्थिति के लिए पहले से ही तैयार थे. घर से निकलते समय उनके पास माचिस की डिब्बियों, राम की तस्वीरों के अलावा एक बिस्तर भी था, जिसे वे जेलयात्रा की संभावना के कारण अपने साथ लेकर निकले थे. पेरियार के गिरफ्तार होते ही उनकी पत्नी समुद्र तट पर पहुंची जहां उनके समर्थक इकट्ठा थे. उन्होंने पेरियार की गिरफ्तारी की सूचना दी. इससे उनके समर्थक उग्र हो गए और साथ लाई राम की तस्वीरों को आग के हवाले करने लगे. उस समय तक पुलिस भी वहां पहुंच चुकी थी. करीब आधा घंटे तक पुलिस से बचने और गिरफ्तार होने का नाटक चलता रहा. लोग पिटते रहे, खुद को बचाने के लिए भागते भी रहे. भागते-भागते एक व्यक्ति रेत पर फिसल गया. पुलिस उसे गिरफ्तार करने को दौड़ी. लेकिन तब तक वह राम की तस्वीर को आग लगा चुका था. बाद में पेरियार सहित सभी को रिहा कर दिया गया. पेरियार का उद्देश्य पूरा हो चुका था.

पेरियार के जीवन से जाना जा सकता है कि उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था. वे जनता के बीच में खड़े होकर खुलेआम देवी-देवताओं का मखौल उड़ाते थे. धर्म और उसके प्रतीकों में आस्था और विश्वास को जनसाधारण की गरीबी और दैन्य के लिए जिम्मेदार मानते थे. कहते थे कि धर्म का मूल उद्देश्य, ईश्वर के गौरवगान की खातिर मनुष्यता का तिरष्कार करना है. इसपर धर्म भीरू लोग कहते कि पेरियार मूर्ख है. एक न एक दिन ईश्वर का कोप उनपर कहर टूटेगा. उस समय वह संभल नहीं पाएंगे. मगर पेरियार ने 94 वर्ष लंबा संघर्षमय जीवन जिया. अपनी मृत्यु से एक दिन पहले भी वे अपने मिशन को लेकर सतर्क थे. वे अंत तक कहते रहे कि यदि ईश्वर में जरा-भी शक्ति तो वह उन्हें दंड क्यों नहीं देता! उनसे उनका जीवन छीन क्यों नहीं लेता! खुद को ‘पंडित’ और धर्माधिकारी कहने वाले लोगों के पास पेरियार के इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं था. आस्था और धर्म के नाम पर दूसरों को मूर्ख बनाते आए लोगों के पास पेरियार के तार्किक प्रश्नों का उत्तर हो भी नहीं सकता था.

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ :

  1. सच्ची रामायण और सच्ची रामायण की चाबी, अंबेडकर प्रचार समिति, मोती कटरा आगरा, पृष्ठ 76
  2. वेब दुनियाhttps://news.webindia123.com/news/ar_showdetails.asp?id=711050918&cat=&n_date=20071105
  3. वेब दुनियाhttps://news.webindia123.com/news/articles/India/20071027/805535.html.
  4. वन इंडियाhttps://www.oneindia.com/2007/10/30/bjp—workers—burnt—copies—of—sacchi—ramayan—1193744742.html
  5. रिपब्लिक 19 जनवरी, 1945
  6. दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग के प्रथम संस्करण के प्रकाशकीय से उद्धृत, 1959

पेरियार और बुद्ध : धर्माडंबर और जाति-मुक्ति संघर्ष की 2500 वर्ष लंबी परंपरा

सामान्य
जाति-मद, अभिमान, लोभ, द्वैष तथा मूढ़ता ये सब अवगुण जहां हैं, वे इस देश में अच्छे स्थान नहीं हैं. जाति-मद, अभिमान, लोभ, द्वैष तथा मूढ़ता ये सब अवगुण जहां नहीं हैं, वे ही इस देश में अच्छे स्थान हैं.1—मातंग जातक(497).

 

पेरियार और गौतम बुद्ध के बीच करीब ढाई हजार वर्षों का अंतराल है. जिन दिनों बुद्ध का जन्म हुआ था, वैदिक कर्मकांड और धर्माडंबर अपने चरम पर थे. यज्ञ, पूजा-पाठ आदि के नाम पर राजाओं से भरपूर समिधा हासिल करना, इन्कार करने या असमर्थता जताने पर शाप द्वारा लोक-परलोक बिगाड़ने की धमकी देना. मनोवांछित समिधा प्राप्त होते ही राजा के हर कुकर्म को सुकर्म घोषित कर देना, फिर हजारों पशुओं की बलि एक साथ चढ़ा देना—ब्राह्मण पुरोहितों के लिए बिलकुल सामान्य था. आतंक ऐसा था कि किसी भी सम्राट को वे धर्म के नाम पर मनमाने आचरण के लिए विवश कर सकते थे. धर्माडंबर और वर्णाश्रम व्यवस्था के समर्थन में बड़े-बड़े शास्त्र गढ़े जा रहे थे. उन्हें पढ़ने का अधिकार सिवाय ब्राह्मणों के किसी को न था. वे उनकी मनमानी व्याख्या करते थे. बावजूद इसके उन्हें तत्कालीन राजसत्ताओं का संरक्षण प्राप्त था. उनके धुर विरोधी के रूप में आजीवक और लोकायत जैसे भौतिकवादी चिंतक थे, जिनका संबंध समाज के मेहनतकश लोगों तथा शिल्पकार समूहों से था. यज्ञ के नाम पर बलि चढ़ाना, ईश्वर, आत्मा, परमात्मा जैसे वायवी विषयों पर बहस करना उन्हें नापसंद था.

बुद्ध राजसत्ता और परिवार का मोह त्यागकर युवावस्था में परिव्राजक बने थे. राजकुल से संबंधित होने के कारण उनका तत्कालीन राजाओं के बीच अतिरिक्त सम्मान था. बुद्धत्व प्राप्ति के बाद जब उन्होंने धर्मोपदेश देना आरंभ किया तो मगध, उज्जैनी सहित उस समय के सभी बड़े राज्यों एवं व्यापारिक वर्गों का भरपूर सहयोग एवं समर्थन उन्हें प्राप्त हुआ. बुद्ध के प्रति राजाओं के आकर्षण का कारण यह भी था कि अनेक राजा ब्राह्मण-ऋषियों द्वारा यज्ञादि के नाम पर पशुधन और दूसरे संसाधन ऐंठने से तंग आ चुके थे. यज्ञों से राज्य के खजाने पर अनावश्यक बोझ पड़ता था. बुद्ध ने यज्ञों का विरोध कर व्यावहारिक नैतिकता पर जोर दिया. उन्होंने वेदों को अपौरुषेय और आप्तग्रंथ मानने से भी इन्कार कर दिया. तत्कालीन बुद्धिजीवी समाज में बहस का बड़ा मुद्दा आत्मा, परमात्मा, ईश्वरादि को लेकर था. दर्शन की इन समस्याओं पर लोग शताब्दियों से बेनतीजा बहस करते आए थे. आत्मा-परमात्मा में विश्वास रखने वाले उनकी सत्ता को पूर्व-निष्पत्ति मान लेते थे. उस अवस्था में बहस उनके अस्तित्व तथा औचित्य के बजाय, स्वरूप और विस्तार को लेकर रह जाती थी. दूसरा वर्ग बुद्धिसंगत निर्णय लेने का समर्थन करता था. वह उनके अस्तित्व एवं औचित्य सहित हर पहलू पर विचार करना चाहता था. दोनों परस्पर विपरीत-ध्रुवी विचारधाराएं थीं. इतनी कि उनके बीच संवाद का कोई उदाहरण पूरे संस्कृत वाङ्मय में नहीं मिलता. बुद्ध ने उनके बीच का रास्ता अपनाया. आत्मा-परमात्मा, लोक-परलोक, पाप-पुण्य जैसी बहसों में उलझने के बजाए उन्होंने, व्यक्तिगत एवं सामाजिक शुचिता को अपने धर्म-दर्शन का केंद्र-बिंदू बनाया, जिसका उन दिनों सामाजिक जीवन से लोप हो चला था.

ढाई हजार वर्ष पहले यानी बुद्ध के जन्म के समय वर्ण जाति में ढलने लगे थे. परिणामस्वरूप पचासियों जातियां अस्तित्व में आ चुकी थीं. जन्म के आधार पर भेदभाव करने वाली उस व्यवस्था को बुद्ध ने अनैतिक, अनुचित तथा जीवन के उच्चतम लक्ष्यों की प्राप्ति में बाधक माना तथा उसकी आलोचना की. अभिजात वर्ग की भाषा संस्कृत के बजाए उन्होंने पालि में उपदेश दिए, जो उन दिनों जनसाधारण की भाषा थी. उस समय तक जातीय अभिमान के मारे ब्राह्मण स्वयं को आश्रमों तक सीमित रखते थे. शेष समाज से उनका संबंध दानादि ग्रहण करने तक सीमित था. बुद्ध अपने विचारों को लेकर सीधे आमजन के बीच गए. भिक्षु-संघ की स्थापना की तो उसके दरवाजे समाज के सभी वर्गों के लिए खोल दिए. जाति-आधारित भेदभाव को वे बौद्धिक, सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों की राह में बाधक मानते थे—

‘अंबट्ठ! जो भी जातिवाद में बंधे हैं, गोत्रवाद में बंधे हैं, (अभि)मानवाद में बंधे हैं, आवाह-विवाह में बंधे हैं, वे अनुपम विद्या-चरण-संपदा से दूर हैं. अंबट्ठ! जातिवाद बंधन छोड़कर, गोत्रवाद बंधन छोड़कर, मानवाद बंधन छोड़कर, आवाह-विवाह बंधन छोड़कर ही अनुपम विद्या-चरण-संपदा का साक्षात्कार किया जा सकता है.’2

वेदों को अपौरुषेय न मानने, आत्मा, परमात्मा, ईश्वर आदि विषयों पर मौन साध लेने के कारण बौद्ध दर्शन की गिनती नास्तिक दर्शन के रूप में की जाती है. इसके आधार पर कुछ विद्वान उसे आजीवक और लोकायत दर्शन की तरह ही, भौतिकवादी दर्शन मानते हैं. लेकिन वह उच्छ्रंखल भौतिकवाद न था. हम उसे आदर्शोन्मुखी व्यवहारवाद कह सकते हैं जिसमें सामाजिक समानता, शुचिता एवं आचरण की पवित्रता प्रमुख थी. बुद्ध के विचारों का इतना असर हुआ कि वैदिक कर्मकांडों से आमजन का विश्वास घटने लगा. यज्ञ और दानादि के नाम पर ऋषियों की मांगों और धमकियांे तंग आ चुके राजा बौद्ध एवं जैन धर्म से जुड़ने लगे. उसके फलस्वरूप ब्राह्मण धर्म कुछ शताब्दियों के लिए नेपथ्य में चला गया. जातीय भेदभाव कमजोर पड़ने लगा. अशोक के बाद मौर्य साम्राज्य कमजोर पड़ने से ब्राह्मणधर्म को पुनर्वापसी का अवसर मिला. इसी दौर में पुराणों एवं स्मृति-ग्रंथों की रचना हुई. उसके बाद इतिहास ने अनेक करवटें लीं. राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद ब्राह्मणवाद निरंतर मजबूत और निरंकुश होता चला गया.

बुद्ध पहले विचारक थे, जिन्होंने समाज को धर्म के आधार पर संगठित करने की कोशिश की थी. वैदिक धर्म के प्रस्तोता जातीय दंभ के शिकार थे. आत्ममुग्धता की पराकाष्ठा में वे बाकी जनसमाज से अलग-थलग जीते थे. जनसाधारण के सुख-दुख की उन्हें परवाह न थी. जाति और वर्ण के नाम पर उन्होंने समाज के बड़े हिस्से को मुख्यधारा से अलग किया हुआ था. अपने आश्रमों में बंद ऋषिगण धर्म और यज्ञादि के नाम पर क्या करते हैं? बलि चढ़ाने से उन्हें क्या हासिल होता है—जनसाधारण को इसकी बहुत परवाह भी नहीं थी. ब्राह्मण बुद्धिजीवियों की उपेक्षा की परवाह न करते हुए साधारण जन आजीवकों और लोकायतों पर विश्वास करते थे, जो उस समय भौतिकवादी दर्शन की प्रमुख शाखाएं थीं. वैदिक परंपरा संसार को नकारकर, काल्पनिक, भ्रममूलक देवलोक को परम-सत्य मानती थीं. आजीवकों और लोकायतों के लिए जीती-जागती, जीवनदायिनी प्रकृति ही सबकुछ थी. वे अपने श्रमकौशल के भरोसे जीवन-यापन करने वाले बहुसंख्यक लोग थे. चूंकि धर्म-केंद्रित समाज की रचना का संकल्प सामाजिक शुचिता के बगैर असंभव था. इसलिए बुद्ध ने आदर्शोन्मुखी नैतिकता पर जोर दिया. धार्मिक आडंबरों, यज्ञ-बलियों एवं जाति-प्रथा को अनावश्यक मानते हुए उन्होंने निस्पृह और कल्याणोन्मुखी जीवन जीने का उपदेश दिया. कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में पशु-धन का विशेष महत्त्व था. यज्ञादि कर्मकांडों के विरोध का सीधा-सा अभिप्राय था, उपयोगी पशुधन की जीवनरक्षा. इसके फलस्वरूप लोग उनके धर्म की ओर आकृष्ट होने लगे.

 

2

पेरियार के समय तक जाति-व्यवस्था उग्र रूप धारण कर चुकी थी. अछूतों का सार्वजनिक स्थलों पर प्रवेश निषिद्ध था. कथित ऊंची जाति के सदस्यों का स्पर्श तो दूर, अपनी छाया से भी उनको बचाना पड़ता था. शूद्रों को उनके कार्य के अनुसार थोड़ी छूट थी, परंतु वे भी एक सीमा तक ही उच्च जातियों के निकट जा सकते थे. कैथरीन मेयो ने अपनी पुस्तक ‘मदर इंडिया’ में भारतीय समाज में व्याप्त छूआछूत के बारे में वर्णन किया है. डू. बोइस के हवाले से वे उनीसवीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों में दक्षिण भारतीय समाज के बारे लिखती हैं—‘मालाबार तट पर रहने वाली ‘पुलाया’ जाति के सदस्यों को अपने लिए घर बनाने का अधिकार नहीं है. रहने के लिए वे लोग दरख्तों पर घौंसले की भांति, बांस-बल्लियों के सहारे, पत्तों की छत डाल सकते हैं.’ डू. बोइस के अनुसार, उन दिनों यदि कोई नैय्यर किसी पुलाया को सड़क पर देख लेता तो उसे वहीं मार देने का अधिकार था. बातचीत के दौरान दो व्यक्तियों के बीच दूरी से भी अस्पृश्यता के स्तर का अनुमान लगाया जा सकता था. पुलाया को नैय्यर जैसे उच्च जाति के हिंदुओं से 60 से 90 फुट की दूरी रखकर बात करनी पड़ती थी.

पेरियार ने बचपन से जाति-आधारित भेदभाव का अनुभव किया था. बड़े हुए तो उन्हें इसका कारण भी समझ में आने लगा. उनका जन्म धनाढ्य परिवार में हुआ था. शिक्षा के नाम पर वे बस दो-तीन वर्ष ही पाठशाला जा पाए थे. बाद में पिता के व्यवसाय से जुड़ गए. उन दिनों उनके घर में संन्यासियों, शैव-मतावलंबियों, वैष्णवों, पंडितों आदि का खूब आना-जाना था. किशोर पेरियार उन्हें अधिकाधिक दान-दक्षिणा के लिए तरह-तरह के बहाने बनाते हुए देखते. कभी-कभी वे उनका मजाक भी उड़ाते. बावजूद इसके अपनी युवावस्था तक ईश्वर में उनकी आस्था बनी रही. 1925 में उन्होंने संन्यासी के रूप में बनारस की यात्रा की. यात्रा के दौरान वे बनारस में जहां-जहां गए, वहां ब्राह्मणवाद का विकृत चेहरा, धर्म के नाम पर लूट-खसोट और वृथा आडंबरों से सामना हुआ. जातीय भेदभाव का अनुभव तो उन्हें बचपन से ही था. बनारस यात्रा के बाद उनका धर्म से भी विश्वास उठ गया. उसके बाद नए पेरियार का जन्म हुआ, जो तर्कवादी था. ज्ञान-विज्ञान पर जोर देता था. व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता, समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर विश्वास करता था. आस्था के आधार पर कुछ भी मान लेना उसे अस्वीकार्य था. हर स्थापित सत्य पर संदेह करना, उसे अपने विवेक की कसौटी पर कसना और खरा उतरने के बाद ही उसे स्वीकार करना, उसकी आदत में शुमार हो चुका था.

पेरियार ने आत्मा, परमात्मा, पाप-पुण्य, भाग्य आदि को सीधे नहीं नकारा. अपितु तर्क पर जोर दिया. इस मामले में बुद्ध उनके प्रेरणा-पुरुष रहे. प्राचीन भारत के इतिहास में बुद्ध कदाचित पहले शास्ता थे जिन्होंने वैचारिक स्वतंत्रता को आगे रखते हुए अपने शिष्यों से कहा था—‘अप्पदीपो भवः.’ दूसरों की बातों में आने के बजाय, सोच-विचारकर स्वयं निर्णय लो. धर्म-दर्शन और जाति पर दिए गए अपने व्याख्यानों में पेरियार भी आत्मा, परमात्मा, ईश्वर आदि को तर्क की कसौटी पर कसते हैं. उनके अस्तित्व पर ध्यान देने के बजाए औचित्य पर विचार करते हैं. 1947 में सलेम कॉलिज में ‘हिंदू दर्शन’ पर दिए गए अपने व्याख्यान में उन्होंने इन विषयों की वैज्ञानिक पड़ताल की थी. उन्होंने सिद्ध किया कि ये सभी मिथ समाज पर सोची-समझी नीति के तहत थोपे गए हैं. सहअस्तित्व, समानता, सहयोग, सद्भाव एवं निस्पृह जीवन जीने वाले व्यक्ति को इनकी कोई आवश्यकता नहीं पड़ती. उस व्याख्यान में वे बुद्ध का नाम नहीं लेते; परंतु उनका प्रत्येक निष्कर्ष उन्हें बुद्ध के करीब ले जाता है—

‘मनुष्य अपनी इच्छाओं के साथ जीता है. वह अपने लालच का दास का है. समाज में रहकर वह दूसरों के लिए या तो अच्छा कर सकता है अथवा बुरा. कर्म की महत्ता पर जोर देने के लिए ही जीवन और आत्मा जैसी काल्पनिक चीजों की रचना की गई है. मनुष्य को अच्छे कृत्यों की ओर प्रवृत्त करने हेतु, उसे यह विश्वास करना सिखाया गया है कि यदि वह बुरे कर्म करेगा तो मृत्यु के बाद उसकी आत्मा को भयावह दंडों से गुजरना पड़ेगा. यह भी एक मिथ मात्र ही है. तर्क-सम्मत ढंग से बातचीत करने वाले निस्पृह व्यक्ति के लिए जो न अच्छा करता है, न ही बुरा, ईश्वर का भय नहीं रहता. उसे स्वर्ग या नर्क की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है.’3

बुद्ध के ‘अपना दीपक स्वयं बनो’ की तरह पेरियार ने भी लोगों से बार-बार यह आग्रह किया—‘मैंने जो कहा वे मेरे व्यक्तिगत विचार हैं. जरूरी नहीं है कि आप भी इनपर विश्वास करें. इसलिए खूब सोचें और स्वयं सार्थक निर्णय तक पहुंचे.’

एक और सूत्र जो पेरियार को बुद्ध के करीब ले जाता है, वह है—जाति व्यवस्था को लेकर दोनों का समान दृष्टिकोण. बुद्ध का जन्म नागवंशीय शाक्य कुल में हुआ था. बाकी क्षत्रियों की अपेक्षा उसे कुछ हीन माना जाता था. अश्वघोष उनका संबंध इक्ष्वाकू वंश से जोड़ते हैं. बौद्ध साहित्य के गंभीर अध्येता कोसंबी के अनुसार शाक्य एक जनजाति थी. बुद्ध ने जातिगत भेदभाव का विरोध किया था. भिक्षु संघों के दरवाजे उन्होंने सभी जातियों के लिए खोले हुए थे. लेकिन ‘अंबट्ठसुत्त’(दीघनिकाय) में वे जिस तरह क्षत्रियों को ब्राह्मणों से श्रेष्ठ बताने के लिए तर्क देते हैं, उसका एक निष्कर्ष यह भी निकलता है कि उन्हें अपने क्षत्रीय कुलोत्पन्न होने पर गर्व था; या कम से कम वर्ण-व्यवस्था से उन्हें कोई शिकायत न थी. बुद्ध द्वारा धार्मिक कर्मकांडों, आडंबरों तथा जाति-प्रथा के विरोध का इतना असर अवश्य हुआ था कि बौद्ध धर्म को जनता ने अपना धर्म मान लिया. उसके फलस्वरूप समाज में जाति-आधारित कटुताओं में भी कमी आने लगी. परंतु जाति और उसके आधार पर हो रहे भेदभाव के विरोध में बड़ा आंदोलन न चलाने के कारण, जातिवादी शक्तियां भीतर ही भीतर सक्रिय बनी रहीं. लोगों को ब्राह्मण धर्म की ओर वापस मोड़ने के लिए ब्राह्मण बुद्धिजीवी पुराणों, स्मृतियों, महाकाव्यों आदि ग्रंथों की रचना में जुट गए. अशोक द्वारा उठाए गए कदमों के फलस्वरूप बौद्ध धर्म दुनिया के विभिन्न देशों में पहुंचा. मगर उसके तुरंत बाद, मौर्य वंश के कमजोर पड़ते ही, ब्राह्मणवाद पुनः जड़ जमाने लगा. ‘मनुस्मृति’ की रचना हुई. जातीय भेदभाव और दुराग्रह जो बुद्ध के प्रभाव दब-से गए थे, वे पुनः सामने आने लगे.

 

3

पेरियार के समय तक लगभग सभी धर्म अपनी प्रासंगिकता खो चुके थे. सतरहवीं-अठारहवीं शताब्दी में पश्चिम में हुई वैचारिक क्रांति के फलस्वरूप, भारत में भी मानव-मात्र की समानता और स्वतंत्रता की समर्थक नई विचार-चेतना का जन्म हुआ था. यह मानते हुए कि राजनीति सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बन सकती है, राजगोपालाचार्य के आग्रह पर पेरियार कांग्रेस में शामिल हुए थे. प्रदेश कांग्रेस के उच्च पदों पर रहते हुए उन्होंने नेताओं का मन बदलने की पूरी कोशिश की थी. मगर थोड़े ही समय में उन्हें विश्वास हो गया कि कांग्रेस के नेता अपने जातीय दुराग्रहों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं. उनकी कथनी और करनी में बड़ा अंतर है. खासतौर पर जातीय विषमता को मिटाने के लिए कांग्रेसी नेता कुछ नहीं करना चाहते. यहां तक कि गांधी भी जातीय पूर्वाग्रहों में फंसे हुए हैं. खिन्न होकर 1925 में उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया. लोगों में आत्माभिमान का भाव पैदा करने के लिए उन्होंने ‘स्वाभिमान आंदोलन’ की नींव रखी. उस समय तक धर्म को नैतिक मूल्यों का एकमात्र स्रोत माना जाता था. लोगों का विश्वास था कि केवल धर्म के सहारे समाज को एकसूत्र में बांधकर रखा जा सकता है. पेरियार किसी नए धर्म के बंधन में बंधना नहीं चाहते थे. तमिल जनता में अपनत्व एवं एकजुटता की भावना पैदा करने के लिए उन्होंने द्रविड़ संस्कृति को आधार बनाया. लोगों को समझाया कि समाजीकरण की बुनियाद पारस्परिक सहयोग और समर्पण पर टिकी होती है. पौराणिक ग्रंथों, महाकाव्यों आदि की रचना स्वार्थी ब्राह्मणों ने लोगों को भरमाने के लिए की है. जाति-व्यवस्था को दैवीय बताने वाले धर्मग्रंथों में शूद्रों और अस्पृश्यों के लिए अपमानजनक स्थितियां हैं—‘बौद्धों और जैनियों ने ब्राह्मणवाद द्वारा फैलाई गई कुरीतियों को कुछ समय के लिए समाप्त कर दिया था. उन्होंने बताया था कि सभी लोग बराबर हैं. आपसी प्रेम और भाईचारा ही असली ईश्वर हैं. ब्राह्मणों को वह स्वीकार नहीं हुआ. इसलिए उन्होंने उनके सभी कार्यों पर पानी फेर दिया.’4 लोगों को ब्राह्मणों द्वारा फैलाए गए भ्रमजाल से निकालकर मानवीय मूल्यों से जोड़ना, उनके भीतर सम्मानजनक जीवन जीने की चाहत पैदा करना पेरियार की प्रमुख चुनौती थी. फुले इसकी नींव बहुत पहले डाल चुके थे. ‘स्वाभिमान आंदोलन’ की शुरुआत का भी यही उद्देश्य था.

पेरियार आस्थावान व्यक्ति नहीं थे. उनका विश्वास ज्ञान-विज्ञान में था. अरस्तु की तरह वे भी मनुष्य को विवेकशील प्राणी मानते थे. बावजूद इसके उन्होंने धर्म की शक्ति को नकारा नहीं था. लेकिन उनका धर्म मानव-मात्र के कल्याण का उद्यम था, जिसमें किसी देवता या आत्मा-परमात्मा के लिए कोई स्थान नहीं था. आजीवन वे इस पर विचार करते रहे कि मनुष्य को धर्म और धर्मशास्त्रों के मकड़जाल से बाहर कैसे निकाला जाए! यह आसान काम नहीं था. क्योंकि मानव जीवन में धर्म की व्याप्ति केवल पूजा-पाठ या संस्कारों तक सीमित नहीं रहती. ऐसे लोग भी जो मंदिर नहीं जाते, पूजा-पाठ तथा दूसरे आडंबरों से दूर रहते हैं; और ऐसे भी जो अच्छे-खासे पढ़े-लिखे हैं—दिलो-दिमाग से दकियानूसी हो सकते हैं. लोकजीवन का हिस्सा बन चुके विभिन्न संस्कार, आचार-विचार और रूढि़यां, संस्कृति का अभिन्न हिस्सा मान लिए कर्मकांड यहां तक कि उनसे जुड़े किस्से-कहानियां भी—किसी न किसी रूप में धार्मिक जड़ता के संवाहक हैं. उनकी रचना जातिभेद और सामाजिक ऊंच-नीच को दैवीय सिद्ध करने के लिए की गई है. 2400 वर्ष पहले अरस्तु ने भी तो यही कहा था, ‘मनुष्य ने ही ईश्वर को रचा है. अपने रूपाकार में, और अपनी जीवनशैली के अनुरूप भी.’ ब्राह्मण खुद को सर्वोपरि मानते हैं. वे चाहते हैं कि शेष जनसमाज उनके इशारे पर नाचे. जो ऐसा नहीं करता उसे वे शाप देने की धमकी दिया करते थे. उनका गढ़ा हुआ ईश्वर भी खुद को भक्तों से ऊपर मानता था; जो उसकी चापलूसी(भक्ति) से आनाकानी करे, उसे वह दंड देने को उतावला रहता था.

बौद्ध धर्म के रास्ते सामाजिक शुचिता की वापसी का रास्ता पेरियार से पहले दक्षिण भारत में आइयोथि थास भी दिखा चुके थे. उनका मानना था कि दक्षिण की पेरियार जाति के लोग मूलतः बौद्ध हैं और वे दक्षिण के मूल निवासी हैं. आर्य हमलावरों ने उनके धर्म और संस्कृति को उनसे छीन लिया है. थॉस के प्रभाव में केरल की जाति इझ़वा अपना संबंध गौतम बुद्ध से वंश से जोड़ने लगी थी. मद्रास प्रेसीडेंसी का नाम द्रविड़नाडु करने की मांग के समय पेरियार ने भी कहा था कि मुस्लिम, ईसाई, आदि द्रविड़ और बौद्ध सभी द्राविड़ हैं.5 थॉस की भांति पेरियार भी ब्राह्मणवाद के कटु आलोचक थे. जातीय उत्पीड़न से मुक्ति के लिए उन्होंने तमिलवासियों से हिंदू धर्म को छोड़ने का आग्रह किया था. उसके पीछे भी बौद्ध धर्म की प्रेरणा थी. 13 जनवरी 1945 के ‘कुदी अरासु’ के अंक में उन्होंने लिखा था कि यदि अंग्रेजों ने हम पर शासन करने के लिए ‘बांटो और राज करो’ की नीति का अनुसरण किया था तो ठीक यही नीति आर्यों ने भी भारत के मूल निवासियों पर राज करने के लिए अपनायी थी. उन्होंने यहां के बहुसंख्यकों को पिछड़ों और अछूतों में बांट दिया. पेरियार का कहना था—‘विश्वासघातियों का शिकार मत बनिए….राम और कृष्ण जैसे नायक तथा गीता, रामायण जैसे धर्मग्रंथ, बौद्ध धर्म के प्रति हमारे विश्वास को मिटाने के रचे गए हैं.’ उन्होंने आगे कहा था—

‘आंबेडकर जब मद्रास आए थे तब मैंने उन्हें 1923 में भारी जनसभा के सामने दिए गए अपने भाषण के बारे में बताया था कि जब तक कोई रामायण का दहन नहीं करता, तब तक छूआछूत पर सार्थक प्रहार संभव नहीं है.’6 10 जनवरी 1947 को ‘कुदीअरासु’ में उन्होंने फिर लिखा था कि जैसे ‘बुद्ध और गुरुनानक वेदों को धर्मशास्त्रों को पूरी तरह मिथ्या बताते थे, केवल हम द्रविड़जन ही वैसा कहने का साहस कर पाते हैं.’7

27 मई 1953 को बुद्ध जयंती के अवसर पर पेरियार ने अपने अनुयायियों को उसे उत्सव की तरह मनाने का आवाह्न किया था. उन्होंने कहा था कि इस अवसर पर वे मूर्ति पूजा का बहिष्कार करें. विघ्नेश्वर, गणपति, गजपति, विनायक आदि कहे जाने वाले गणेश की मूर्तियों को तोड़कर बहा दें. बौद्ध जयंती वैदिक परंपरा के धुर विरोधी की जयंती है. इस देश में हजारों देवी-देवता है. इसलिए ऐसा व्यक्ति जो विवेक से काम लेता है, तर्क को महत्त्व देता है, जीवन के प्रति व्यावहारिक दृष्टिकोण रखता है तथा जिसे मनुष्यता में भरोसा है वह स्वयं ही बुद्ध कहलाने योग्य है. यह दिखाने के लिए कि मूर्ति केवल पत्थर का टुकड़ा है, उसमें कोई दैवी शक्ति नहीं है, पेरियार ने तमिलनाडु के कई शहरों में मूर्ति तोड़ो आंदोलन का नेतृत्व किया था. मूर्ति-पूजा और धार्मिक कर्मकांडों का बहिष्कार, सामाजिक कार्यक्रमों में ब्राह्मण पुरोहित की अनिवार्यता से मुक्ति, उनके ‘स्वाभिमान आंदोलन’ का महत्त्वपूर्ण हिस्सा था. ढाई हजार वर्ष पहले बुद्ध ने भी मूर्ति पूजा की निंदा की थी. धार्मिक कर्मकांडों, आडंबरों एवं जाति-आधारित भेदभाव की आलोचना करते हुए उन्होंने पंचशील और अष्ठांग मार्ग का प्रतिपादन किया जो व्यैक्तिक एवं सामाजिक जीवन की शुचिता पर जोर देता था. बुद्ध ने दिखाया था कि किसी भी समाज में शुभत्व की मौजूदगी, इसपर निर्भर करती है कि उसके सदस्य अपने जीवन में शुचिता एवं सौहार्द्र को लेकर कितने गंभीर हैं. उसके लिए किसी धर्माडंबर की आवश्यकता नहीं है. पेरियार के भाषणों का लोगों पर अनुकूल असर पड़ा. लोग धर्म के सम्मोहन से बाहर निकलने लगे. आंदोलनकारियों ने अपने-अपने घर से देवताओं की मूर्तियां निकाल फैंकी. तिरुचिरापल्ली के टाउन हॉल के सामने खुले मैदान में सैकड़ों लोगों ने मूर्तियों को तोड़ डाला.

धर्म के प्रति विशेष आस्था न होने के बावजूद पेरियार बुद्ध को अपने विचारों के करीब पाते थे. वे चाहते थे कि लोकमानस बुद्ध के विचारों को जाने-समझे. इसके लिए उन्होंने 23 जनवरी 1954 को इरोद में एक सम्मलेन का आयोजन किया था. सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए सीलोन विश्वविद्यालय, श्रीलंका के बौद्ध संस्कृति केंद्र के प्रोफेसर जी. पी. मल्लाल शेखर ने कहा था कि बुद्ध के विचारों के अनुसरण द्वारा अंतरराष्ट्रीय शांति की स्थापना की जा सकती है. उन्होंने पेरियार द्वारा समाज सुधार विशेषरूप से धार्मिक जकड़बंदी के प्रयासों से बाहर लाने के प्रयासों की सराहना की थी. उनका मानना था कि तमाम विरोधों एवं अवरोधों के बावजूद समाज सुधार का पेरियार का रास्ता बुद्ध के विचारों से मेल खाता है. सम्मेलन में जाति प्रथा पर भी चिंता व्यक्त की गई थी. ‘अखिल भारतीय शोषित जाति संघ के सचिव और सांसद राजभोज ने सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा था कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था में दलित, शूद्र और अन्य जातियां बहुसंख्यक होने के बावजूद तरह-तरह के शोषण की शिकार रही हैं. बौद्ध धर्म जाति-प्रथा को नकारता है. उसके अनुसार समाज में सभी बराबर हैं. जाति-व्यवस्था हिंदू धर्म का कलंक है. सबसे पहले बुद्ध ने ही जाति-प्रथा और धर्माडंबरों का विरोध करते हुए, सामाजिक कुरीतियों को दूर करने में सफलता प्राप्त की थी. केवल बौद्ध धर्म से ही इस समस्या का समाधान संभव है. सम्मेलन में पेरियार की प्रशंसा करते हुए कहा गया था कि उन्होंने ब्राह्मणवाद के खात्मे के लिए कई आंदोलन चलाए हैं. उनके कारण समाज में जाति-विरोधी चेतना का जन्म हुआ है—‘बुद्ध की नीतियां ही आपकी और ‘स्वाभिमान आंदोलन’ की नीतियां हैं.’8 उस अवसर पर बुद्ध की प्रतिमा का अनावरण किया गया था. हमेशा की तरह उस सम्मेलन में भी पेरियार ने हिंदू धर्म-दर्शन पर हमला बोलते हुए बौद्ध धर्म की प्रशंसा की थी—

‘हम जो मेहनती और कामगार लोग हैं, हमें नीची जाति में डाल दिया गया है. हम भुखमरी के शिकार हैं. हमारे पास पहनने के लिए वस्त्र नहीं हैं. हमारे पास रहने को घर भी नहीं हैं. लेकिन ब्राह्मण जो कोई काम नहीं करते, उन्हें सभी प्रकार के सुख और मान-सम्मान हासिल है.’9

सम्मेलन में लोगों को संबोधित करते हुए पेरियार ने कहा था—

‘‘केवल तुम्हीं वे लोग हो जिन्होंने ये मंदिर बनाए हैं. केवल तुम्हीं हो जिन्होंने इनके लिए दान दिया है. यदि ऐसा है तो क्या हम ईश्वर को जो हमें नीची जाति का और अछूत बताता है, ऐसे ही छोड़ सकते हैं? ‘कृतघ्न ईश्वर! केवल मैंने ही तेरे लिए मंदिर और तालाब बनवाए हैं. केवल मैंने ही तुझपर अपना पैसा बहाया है.’ क्या तुम यह नहीं पूछोगे कि तुम नीची जाति के क्यों हो? तुम्हें छूने में हर्ज क्या है? तुम केवल ब्राह्मण के कहे पर विश्वास करते हो कि यदि तुम ऐसे सवाल उठाओगे तो ईश्वर तुमसे नाराज हो जाएगा.’’10

इरोद सम्मेलन में गौतम बुद्ध के विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए एक प्रस्ताव स्वीकृत किया गया था. उसमें कहा गया था—‘आर्यों द्वारा हिंदू धर्मशास्त्रों, पुराणों, महाकाव्यों की रचना सांस्कृतिक वर्चस्व कायम रखने तथा द्रविड़ों के अपमान, अवमूल्यन तथा उन्हें भरमाए रखने के लिए की गई है, उनका सबका नाश होना चाहिए.’ उसी सम्मेलन में स्वीकृत एक अन्य प्रस्ताव में कहा गया था—‘बुद्ध का जीवन तथा उनके धर्मोपदेश ईश्वर, आत्मा, स्वर्ग-नर्क, भाग्यवाद, धार्मिक परंपराओं तथा उत्सवों की मिथ्याचार को उजागर करती हैं; तथा भेदभाव रहित, आपसी सहयोग और बराबरी पर आधारित सामाजिक संरचना का समर्थन करती हैं, तमिलनाडु के सभी लोगों, जनसंगठनों, संस्थाओं और समूहों को चाहिए कि वे उनके विचारों को, समस्त मानव-समुदाय तक पहुंचाने के लिए आगे आएं.’

पेरियार की बातों को सुनकर रोज नए-नए लोग उनके आंदोलन से जुड़ने लगे. धार्मिक आयोजनों, कर्मकांडों तथा धर्मशास्त्रों में कही गई बातों पर सवाल उठाए जाने लगे. इससे सनातनी हिंदुओं को डर सताने लगा था. वे जानते थे कि धर्म की नींव अज्ञात डर पर टिकी है. मूर्तियों के प्रति श्रद्धा भी उसी डर का विस्तार है. यदि वह डर ही नहीं रहा तो लोग धर्म की गिरफ्त से बाहर होने लगेंगे. पेरियार लगातार वैज्ञानिक सोच का प्रचार-प्रसार कर रहे थे. सनातनी हिंदुओं की निगाह में धर्मशास्त्रों आलोचना नास्तिकता थी. स्वाभिमान आंदोलन की राह में अवरोध पैदा करने के लिए उन्होंने एक संगठन का गठन किया था. उस संगठन ने पेरियार तथा उनके दो सहयोगियों टी. पी. वेदाचलम और एम. आर. राधा के विरुद्ध धारा 295 के अंतर्गत मुकदमा दायर कर दिया. वेदाचलम वरिष्ठ अधिवक्ता थे, जबकि एम. आर. राधा जाने-माने अंधविश्वास विरोधी कार्यकर्ता. पेरियार और उनके सहयोगियों पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने जनभावनाओं को आहत करने का काम किया है. मामले की पहली सुनवाई सत्र न्यायालय में हुई. अगली सुनवाई के लिए मुकदमा जिला सत्र न्यायालय में पहुंचा. दोनों अदालतों का निर्णय पेरियार के पक्ष में गया. मगर पेरियार के दुश्मन इतने से शांत होने वाले न थे. उन्होंने मद्रास उच्च न्यायालय में अपील दायर कर दी. अपील की सुनवाई के बाद, 13 अक्टूबर 1954 को न्यायमूर्ति एन. सोम सुंदरम ने उसे यह कहकर खारिज कर दिया कि वादी पक्ष की यह आशंका कि पेरियार तथा उनके सहयोगियों के कृत्य से जनभावनाएं आहत होती हैं—सही मानी जा सकती है. लेकिन पेरियार और उनके साथियों ने जो मूर्तियां तोड़ीं उन्हें उन्होंने या तो स्वयं बनाया था अथवा बाजार से खरीदा गया था. वे मंदिर में पूजी जाने वाली मूर्तियां नहीं थीं. ऐसी मूर्तियों को तोड़ना कानून अपराध नहीं है.

तमिल समाज में जागृति लाने, उसे रूढि़मुक्त करने तथा आत्माभिमान की भावना जागृत करने के लिए पेरियार ने ‘स्वाभिमान आंदोलन’ का सूत्रपात किया था. उसी के एक कार्यक्रम में जनवरी 31, 1954 को उन्होंने मद्रास(अब चैन्नई) में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा कि बुद्ध के विचार हमारे अपने विचारों को लागू करने, आगे बढ़ाने तथा समाज में बढ़ रही विकृतियों के शमन की दिशा में बहुत ही उपयोगी हैं. उसी वर्ष पेरियार अपनी पत्नी तथा कुछ मित्रों के साथ मलेषिया और मयामार गए थे. वहां मेंडले में बुद्ध की 2500वीं जयंती के अवसर पर उनकी भेंट डॉ. आंबेडकर से हुई थी. उस समय तक डॉ. आंबेडकर बौद्ध धर्म अपनाने का निर्णय ले चुके थे. उन्होंने पेरियार से भी वैसा ही करने को कहा था. इसपर पेरियार ने डॉ. आंबेडकर से आग्रह किया था कि वे धर्मांतरण से बचें. क्योंकि ऐसा करके वे हिंदू धर्म की आलोचना का अधिकार खो देंगे. जड़वादी हिंदू दावा करने लगेंगे कि किसी गैर हिंदू को उनके धर्म की आलोचना का अधिकार नहीं है. लोग भी उनकी बात पर आसानी से विश्वास कर लेंगे. अपने धर्मांतरण के बारे में पेरियार का कहना था कि वे धर्मांतरण के बजाए हिंदू धर्म के भीतर रहकर ही उसकी आलोचना करते रहेंगे. हिंदुओं के धर्मांतरण के बारे में उनकी स्पष्ट राय थी—

‘यदि कोई हिंदुओं द्वारा इस्लाम, ईसाई, बौद्ध, जैन धर्म की ओर धर्मांतरण के आंकड़ों का विश्लेषण करे तो उनमें सर्वाधिक संख्या दलितों की होगी. वे धर्मांतरण को इसलिए अपनाते हैं क्योंकि हिंदू धर्म उन्हें बहुत ही उत्पीड़क नजर आता है. धर्मांतरण द्वारा वे जातीय निरंकुशता से बाहर निकल जाना चाहते हैं. उनमें से बहुत से लोग मानते हैं कि आस्था के अंतरण द्वारा वे अपनी जीवनशैली और आर्थिक स्थिति में सुधार ला सकते हैं. दूसरे शब्दों में धर्मांतरण उन्हें घृणित कर्मवाद के दुश्चक्र से मुक्ति दिला सकता है. धर्मांतरण उनमें बेहतरी की उम्मीद जगाता है. उनके भीतर बेहतर पहचान और संपत्ति के बारे में नई चेतना का संचार करता है.’11

उन दिनों चैन्नई में ब्राह्मण अपने स्वामित्व वाले होटलों के आगे ‘ब्राह्मण होटल’ का बोर्ड लगाते थे. इससे लगता था कि ब्राह्मण बाकी जातियों से आगे हैं. पेरियार उस प्रवृत्ति को रोकना चाहते थे. इसलिए उन्होंने उसके विरुद्ध आंदोलन छेड़ दिया. 5 मई 1957 को एक ब्राह्मण होटल के सामने से प्रतीकात्मक आंदोलन की शुरुआत हुई. 22 मार्च 1958 तक उनका आंदोलन लगातार चलता रहा. पेरियार के साथ 1010 आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया. आखिरकार उनकी जीत हुई. पूरे राज्य में होटल मालिकों को अपने बोर्ड से ‘ब्राह्मण’ शब्द हटाना पड़ा.

फरवरी 1959 में पेरियार उत्तर भारत की यात्रा पर निकले. धार्मिक कूपमंडूकता के मामले में उत्तरी और दक्षिणी भारत में आज भी बहुत अंतर नहीं है. उत्तर भारत की यात्रा के दौरान पेरियार ने कानपुर, लखनऊ और दिल्ली में बड़ी जनसभाओं को संबोधित किया था. उस समय तक डॉ. आंबेडकर बौद्ध धर्म अपना चुके थे और जातीय उत्पीड़न और अनाचार से बचने के लिए दलित और पिछड़ी जातियों के काफी लोग बौद्ध धर्म को अपनाने लगे थे. पेरियार ने इसकी चर्चा भी अपने भाषण में की थी. उसके बारे में एक संक्षिप्त रिपोर्ट ‘विदुथलाई’ के 21 फरवरी 1959 के अंक में प्रकाशित हुई थी. उनका कहना था—

‘शूद्रों और पंचमों, जिन्हें आजकल पिछड़ी जाति और दलित कहा जाता है—के अवमूल्यन को रोकने के लिए हमें आर्यों द्वारा गढ़े गए धर्म, धर्मशास्त्रों एवं ईश्वर का बहिष्कार करना होगा. जब तक इनकी सत्ता रहेगी, हम जाति को नहीं मिटा सकते. इसी के लिए डॉ. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाया था. अपने अलावा उन्होंने और बहुत से लोगों को धर्मांतरण कराया था. इसलिए सभी हिंदू धर्म, ईश्वर और जाति से मुक्ति हेतु बौद्ध धर्म अपनाने के लिए आगे आना चाहिए.’

पेरियार के अनुसार केवल बुद्ध ही थे जिन्होंने समाज में व्याप्त तरह-तरह की ऊंच-नीच के विरोध में सवाल उठाए थे—

‘‘क्या (बुद्ध के अलावा) किसी और ने पूछा था कि समाज में लंबे समय से जातीय भेदभाव क्यों मौजूद है? बुद्ध ने यह सवाल उठाया था. वे राजा के बेटे थे. उन्होंने कई चीजों पर सवाल उठाए थे. उन्होंने पूछा—‘वह आदमी बूढ़ा क्यों है?’ ‘वह व्यक्ति नौकर क्यों था? वह अंधा क्यों है? बुद्ध ने पूछा था—‘वह आदमी नीच जाति का क्यों है?’ उन्होंने बताया—‘उसे भगवान ने ही ऐसा बनाया है?’ इसपर बुद्ध ने सवाल किया—‘वह ईश्वर कहां है जिसने इसे बनाया है?’ तब वे आत्मा का सिद्धांत बघारने लगे. तब बुद्ध ने पूछा—‘आत्मा क्या है? क्या किसी ने उसे देखा है?’….बुद्ध के मुख्य सिद्धांत हैं—

‘निहित सत्य को जानने के लिए प्रत्येक वस्तु का अपने विवेकानुसार भली-भांति विश्लेषण करो.’ तथा ‘यदि तुम्हारा विवेक उसे सच मानता है, तभी उसपर विश्वास करो.’ पेरियार ने आगे कहा था—‘ईश्वर, आत्मा, देवता, स्वर्ग, नर्क, ब्राह्मण, शूद्र, पंचम यदि ये बातें तुम्हारी समझ में नहीं आती हैं तो इनपर विश्वास मत करो. ये सब काल्पनिक शब्द हैं. कुछ भी स्वीकारने से पहले अपनी सहज बुद्धि का उपयोग करो. ईश्वर ने ऐसा कहा है, वेद ऐसा कहते हैं या मनुस्मृति में यह सब लिखा है—ऐसी बातों पर विश्वास वृथा है. जिसे तुम्हारी बुद्धि स्वीकारती है, केवल उसी पर भरोसा करो.’’12

पेरियार का विश्वास किसी भी धर्म में नहीं था. बावजूद इसके ऐसे कई अवसर आए जब उन्होंने बौद्ध धर्म की प्रशंसा की. अपनी मृत्यु से कुछ महीने पहले उन्होंने ‘ईश्वर और मनुष्य’ विषय पर सारगर्भित भाषण दिया था. भाषण में ईश्वर की अवधारणा को नकारा गया था, साथ ही विभिन्न धर्मों पर चर्चा की थी. उसमें बौद्ध धर्म की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा था—‘यदि हम बौद्ध धर्म को कोई और नाम देना चाहें तो हम उसे ‘बुद्धि’ यानी ‘ज्ञान का धर्म’ कह सकते हैं. बौद्ध धर्म को ‘ज्ञान का धर्म’ या ‘ज्ञानमय धर्म’ क्यों कहा जाएगा? क्योंकि बाकी जितने भी धर्म हैं, वे सभी ईश्वर केद्रित हैं, जबकि बौद्ध धर्म किसी ईश्वर को मान्यता नहीं देता. यह इसलिए है कि कोई भी ऐसा ‘ज्ञानमय धर्म’ या ‘ज्ञान का धर्म’ नहीं हो सकता जो ईश्वर पर विश्वास करता हो. यही कारण है कि बौद्ध धर्म को ‘विवेकशील धर्म’ कहा है. उस भाषण में पेरियार ने बौद्ध धर्मावलंबियों की यह कहकर आलोचना की थी कि वे भी बौद्ध धर्म को ‘ज्ञान के धर्म’ के रूप में अंगीकार करने में विफल रहे हैं. पेरियार ने ऐसा क्यों कहा था? इस बारे में उनका कहना था कि किसी भी सामान्य—‘धर्म को अपनी पहचान बनाने के ईश्वर में विश्वास करना आवश्यक है. इसके लिए उसके अनुयायियों को कुछ बकवास कहानियों, रीति-रिवाजों और कर्मकांडों पर विश्वास करने को कहा जाता है. बौद्ध धर्म कर्मकांडों को निरर्थक विश्वासों का खंडन करता है. बावजूद इसके अधिकांश बौद्ध मतावलंबी उसी जीवन-पद्धति को अपनाए हुए हैं. उनकी पूजा पद्धति भी उसी प्रकार की है.’ धर्म और जाति-व्यवस्था पर प्रहार करते हुए अपने 25-26 दिसंबर 1958 के भाषण में पेरियार ने पुनः दोहराया था कि ऐसा ईश्वर जिसे लगता है कि वह दलितों और शूद्रों के छूने भर से अपवित्र हो जाएगा, को मंदिर में रहने का कोई अधिकार नहीं है. ऐसी मूर्ति को तुरंत हटाकर नदी किनारे डाल देना चाहिए, ताकि लोग उसका इस्तेमाल कपड़े धोने के लिए कर सकें. एक अवसर पर उन्होंने कहा था—

कहा जाता है कि ईश्वर ने जाति की रचना की है. यदि यह सच है तो सबसे पहली जरूरत इस बात ही है कि ऐसे ईश्वर को ही नष्ट कर दिया जाए. यदि ईश्वर इस क्रूर प्रथा से अनभिज्ञ है तो उसे और भी जल्दी खत्म किया जाना चाहिए. यदि वह इस अन्याय से रक्षा करने या इसपर रोक लगाने में असमर्थ है तो इस दुनिया में बने रहने का उसे कोई अधिकार नहीं है.

4

पेरियार ने गौतम बुद्ध को विश्व के सबसे पहले क्रांतिधर्मा विचारक स्वीकार किया था. कारण था कि बुद्ध ने ईश्वर, आत्मा-परमात्मा जैसी अतार्किक मान्यताओं को चुनौती दी थी. उन्होंने कहा था—‘आमतौर पर ईश्वरीय विश्वास के आधार पर मनुष्यों को मूर्ख बनाया जाता है. मैं नहीं जानता कि मानवमात्र की इस अज्ञानता का पर्दाफाश करने के लिए अभी तक कोई विचारक आगे क्यों नहीं आया है? यहां तक कि सुशिक्षित बुद्धिजीवी भी इस मामले में आलसी रहे हैं. यदि हम दुनिया के पहले दार्शनिक की खोज करना चाहें तो हम कह सकते हैं कि वह एकमात्र गौतम ही बुद्ध थे. हमारा इतिहास भी यही बताता है. उनके बाद पश्चिम में जन्मा एकमात्र विचारक सुकरात था. उनके दार्शनिक विचारों को भली-भांति नहीं समझा गया.’13

उस ज्ञानमय धर्म या ‘बुद्धि के धर्म’ को नष्ट कर दिया गया. कैसे नष्ट कर दिया गया? पेरियार के शब्दों में, ‘उन्होंने(ब्राह्मणों ने) हिंसक रास्ते अपनाए. बौद्धों का कत्लेआम किया गया. उनके मठों को मिट्टी में मिला दिया गया.’14 पेरियार किसी भी प्रकार की व्यक्ति पूजा के विरोधी थे. मगर बुद्ध के विचार उनकी वैचारिक चेतना के करीब थे. उनके प्रचार-प्रसार के लिए वे बुद्ध जयंती मनाने के पक्ष में पक्ष थे. परंतु वे नहीं चाहते थे कि बुद्ध जयंती के नाम पर होने वाले उत्सव महज कर्मकांड बनकर रह जाएं. इसलिए ‘बुद्ध जयंति क्यों मनाई जाए? लोग बुद्ध के जन्म को उत्सव के रूप में क्यों लें? पेरियार इन सवालों पर भी विचार करते हैं. उनके अनुसार बुद्ध जयंती बनाने का आशय यह नहीं है कि लोग बुद्ध-प्रतिमा के आगे खड़े होकर कपूर, नारियल, फल-फूल वगैरह लेकर उसकी पूजा-अर्चना करें. उनके अनुसार—‘हम बुद्ध के जीवन से शिक्षा ले सकते हैं और उसे अपने जीवन में उतार सकते हैं. मैं उनसे नास्तिक के रूप में प्रेरणा लेता हूं. यदि नास्तिक का अभिप्रायः है वेदों, धर्मशास्त्रों और पुराणों में अविश्वास है, तो निश्चित रूप से मैं नास्तिक ही हूं.’ पेरियार को डर था कि बुद्ध जयंती के बहाने ऐसे व्यक्ति जो वेद, शास्त्र तथा पुराणों में आस्था रखते हों, अपनी बात को घुमा-फिराकर लोगों के सामने रख सकते हैं. पेरियार के अनुसार जातिभेद के आधार पर दूसरों को कमतर समझने वाला, निरंकुश आचरण का समर्थक व्यक्ति ही ऐसा कर सकता है.

पेरियार के अनुसार बुद्ध न तो संत थे, न ही महात्मा. असल में वे ऐसे बुद्धिवादी चिंतक थे जिन्होंने प्राचीनकाल में हिंदू ऋषियों का उनके अनर्गल कर्मकांडों और आडंबरों के आधार पर विरोध किया था. इसलिए बौद्ध धर्म प्रचलित अर्थों में धर्म नहीं है. जो लोग बौद्ध धर्म को धर्म मानते हैं, वे गलत हैं. धर्म के लिए उसके केंद्र में ईश्वर का होना आवश्यक है. इसके अलावा स्वर्ग, नर्क, मोक्ष, भाग्य, पाप-पुण्य आदि अवधारणाओं पर विश्वास भी आवश्यक है. बड़े धर्मों का काम किसी एक ईश्वर नहीं चलता. उनमें अनेक ईश्वर भी हो सकते हैं. उन ईश्वरों के घर-परिवार, आवास, आने-जाने के स्वतंत्र साधन, पत्नियां और बच्चे भी हो सकते हैं. भारतीय तो ऐसे ईश्वरों को ही पहचानते हैं. 1857 के सैनिक विद्रोह, जिसे कुछ लेखक भारत का पहला स्वाधीनता संग्राम मानते है, की जाति के संदर्भ में समीक्षा करते समय पेरियार ने बौद्ध धर्म के साथ-साथ जैन धर्म की प्रशंसा की थी—

‘इतिहास गवाह है कि जिन बौद्ध और जैन श्रमणों ने हमारे लोगों को सद्व्यवहार और ज्ञान की महत्ता की शिक्षा देनी चाही, तमिल राजाओं ने उनका उत्पीड़न किया गया. उन्हें तरह-तरह के मामलों में फंसाया गया और कत्लेआम किया गया. यह दर्शाता है कि हमारे देश पर निरंकुश और असभ्य शासकों का राज रहा है.’15

बुद्ध के अनुसार मनुष्य का ईश्वर के प्रति आकर्षित होना आवश्यक नहीं है. बौद्ध धर्म अपने मानवतावादी आचरण के लिए बाकी धर्मों से बेहतर सिद्ध होता है. बुद्ध चाहते थे कि मनुष्य केवल मनुष्य का ध्यान करे. बुद्ध ने न तो स्वर्ग का महिमा-मंडन किया, न ही नर्क से लोगों को डराया. उन्होंने मनुष्य के आचरण पर जोर दिया. उसके लिए अष्ठांग मार्ग प्रस्तुत किया, जिसे आगे चलकर लगभग सभी धर्मों ने धार्मिक शुचिता के नाम पर अपनाया. पेरियार बुद्ध की प्रशंसा करते हैं. लेकिन वे उनके सम्मोहन से ग्रस्त नहीं हैं. न ही आस्था के बदले वे अपने विवेक को गिरवी रखना चाहते हैं, जैसी कि ब्राह्मण धर्म के अनुयायी अपेक्षा रखते हैं. अपितु वे लिखते हैं कि कोई बात इसलिए मान्य नहीं होनी चाहिए कि उसे किसी महात्मा ने कहा है. या उसे बहुत से लोग मानने वाले हैं. अपितु मनुष्य को अपने विवेक की कसौटी पर जो खरा प्रतीत हो, उसी को स्वीकार करना चाहिए. उसके लिए आवश्यक है कि हर सत्य या अच्छी लगने वाले तथ्यों को वह अपनी कसौटी पर परखे. उनके अनुसार बुद्धिज्म केवल गौतम बुद्ध की जयंतियों को मनाना नहीं है. हमारे लिए बुद्ध होने का अभिप्राय बुद्धि, विवेक बुद्धि का साथ होना है. अपने तर्क-सामथ्र्य का साथ होना है. पेरियार के अनुसार—

‘बौद्ध धर्म किसी भी प्रकार के श्रेष्ठतावाद(ब्राह्मणवाद) के लिए एटमबम के समान है.’16

गौतम बुद्ध का जन्म करीब 2500 वर्ष पहले हुआ था. उस समय ब्राह्मण यद्यपि धर्म और सभ्यता के दावेदार बने हुए थे, मगर यज्ञादि में जिस प्रकार हजारों बलियां एक साथ वे चढ़ा देते थे, जाति के नाम पर अपने ही धर्म-बंधुओं के साथ दमन और अवमाननापूर्ण वर्ताब करते थे, उसे देखते हुए उनका आचरण असभ्य और जंगली प्राणियों जैसा था. बुद्ध ने उन सबका विरोध किया. बुद्ध का रास्ता आसान नहीं था. देखा जाए तो उन दिनों ज्ञान और तर्क का पक्ष लेने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए अपनी बात कह पाना आसान नहीं था. परंतु बुद्ध अपने बातों पर अडिग रहे. वैदिक हिंसा के स्थान पर उन्होंने मनसा-वाचा-कर्मणा अहिंसा का पक्ष लिया. पेरियार के अनुसार उनकी ताकत उनके शब्दों में थी. पेरियार की तरह बुद्ध को भी अपने जीवन में आलोचनाओं का सामने करना पड़ा था. बुद्ध के बाद उनके आलोचकों ने मुखर स्वर में उनकी आलोचना करना आरंभ कर दिया था. पुराणों के बहाने प्राचीन धर्म को पुनर्जीवित करने की कोशिश की जाने लगी थी. जाहिर है, बुद्ध के बाद उनकी आलोचना में वही लोग लगे थे जो धर्म के नाम पर कर्मकांड और तर्क के स्थान पर तंत्र-मंत्र की वापसी चाहते थे. ऐसे ही लोग पेरियार का विरोध करते आए हैं.

रामायण को हिंदु नैतिक जीवन का पाठ पढ़ाने वाले ग्रंथ के रूप में देखते हैं. पेरियार के अनुसार रामायण की रचना बौद्ध धर्म के प्रभाव को मद्धिम करने के लिए, उसकी ख्याति से उबरने की कोशिश में की गई थी. बुद्ध का धर्म ताकत का धर्म नहीं था. धर्म के प्रचार-प्रसार का जिम्मा उन्होंने भिक्षुओं और श्रमणों को सौंपा हुआ था. लेकिन जातियों में बंटे हिंदू धर्म के लिए इस तरह के समर्पित धर्म-योद्धा मिलने संभव नहीं थे. जाति व्यवस्था के नाम पर ब्राह्मणों ने खुद ही निचली जातियों को धार्मिक कार्यों में सहभागिता से अलग-थलग किया हुआ था. ऐसे में शक्ति के माध्यम से ‘धर्म-विजय’ दिखना ही एकमात्र रास्ता था. रामायण यही काम करती है. अशोक ने अपने बेटे और बेटी को बौद्ध धर्म की ध्वजा फहराने के लिए श्रीलंका भेजा था. वाल्मीकि के राम आर्य अपनी पत्नी को छुड़ाने के बहाने आर्य-धर्म की पताका फहराने के लिए लंका-विजय करते हैं. बुद्ध और अशोक ने जो धम्मविजय की थी, उसका प्रमाण आज श्रीलंका में बौद्ध धर्म की उपस्थिति है. वहां 70 प्रतिशत लोग आज भी बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं. उसके अलावा चीन, जापान, तिब्बत जैसे देषों में बौद्ध धर्म आज भी कायम है. जबकि हिंदू धर्म भारत से बाहर अपनी छाप छोड़ पाने में असफल रहा. पेरियार के अनुसार—

‘बुद्ध के पहले राम-कथा छोटी-सी कहानी थी. बौद्ध धर्म की लोकप्रियता का सामना करने के लिए उसमें बाद में भारी जोड़-तोड़ की गई. बौद्धों और जैनियों को नास्तिक, हत्यारा, डाकू, वैदिक संस्कृति का दुश्मन आदि कहा गया. पेरियार के शब्दों में शैव शिव से प्रार्थना करते हैं कि वह उन्हें शक्ति दे ताकि वे बौद्धों की पत्नियों के साथ व्याभिचार कर सकें.’17

पेरियार के अनुसार 75 प्रतिशत से अधिक पुराणों का लेखनकाल बुद्ध से बाद का है. पाश्चात्य विद्वानों का भी यही मत रहा है. बुद्ध के तर्कसंगत उपदेशों का प्रतिवाद करने के लिए पुराण लेखकों ने जिन्हें ऋषि कहा जाता था, अवतारवाद की परिभाषा गढ़ी. उन्होंने कृष्ण को मुख्य देवता के रूप में चित्रित किया. उसका एक ही उद्देश्य था, लोगों को ब्राह्मणवाद की ओर आकर्षित करना. चमत्कारपूर्ण वर्णन जनसाधारण को हमेशा ही लुभाता आया है. गीता की रचना और भी बाद में हुई. उसके बाद ही उसे महाभारत में जोड़ा गया. लोकमानस में बुद्ध की प्रतिष्ठा को देखते हुए ब्राह्मणों ने मजबूरी में उनकी प्रषंसा की. अवतारवाद को संरक्षण देने के लिए बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित किया गया. उसके बहाने सनातनी हिंदू पुराणों के लेखनकाल को बुद्ध से बहुत पीछे तक ले जाते हैं. इस काम में संस्थाएं भी पीछे नहीं हैं—‘यह कहते हुए कि ब्रिटिश विद्वानों द्वारा लिखे गए इतिहास पर विश्वास नहीं किया जाना चाहिए, उत्तर भारत में भारतीय विद्या भवन ने मूर्खतापूर्ण धार्मिक आख्यानों और अजनतांत्रिक धर्मशास्त्रों पर पर लिखना जारी रखा. के. एम. मुंशी उसके अध्यक्ष थे. डॉ. राधाकृष्णन तथा अरबपति बिरला उसके सदस्य थे. उन्होंने ‘वैदिक युग’ को लेकर पुस्तक तैयार की, जिसमें के. एम. मुंशी का बड़ा योगदान था. उन्होंने भी माना था कि प्राचीन युग असभ्य था. पुराण और महाकाव्य आदि ग्रंथ इतिहास नहीं हैं….वह सब कल्पना की उपज है. ‘व्यास’ शब्द का अर्थ किस्सागो है. पुराणों ने लोगों के दिमाग पर कब्जा कर लिया और वे उनपर शासन करने लगे. हमारी समस्याओं का मूल कारण यही है.’

 

आजीवक दर्षनों के साथ-साथ बौद्ध, जैन दर्षन और सिख धर्म ने भी वेदों को प्रामाण्य मानने से इन्कार कर दिया था. ये धर्म-दर्षन किसी ईश्वर या आत्मा-परमात्मा पर विश्वास नहीं करते. इसलिए ब्राह्मण ग्रंथों में बौद्ध और जैन दोनों दर्शनों नास्तिक कहा गया है. एक स्थान पर पेरियार नास्तिक की परिभाषा करते हैं. उनके अनुसार बुद्ध सामान्य संज्ञा है. किसी भी व्यक्ति को जो बुद्धि का प्रयोग करता है, उसे बुद्ध कहा जा सकता है. ‘निश्चित रूप से मैं भी एक बुद्ध हूं. मैं ही क्यों, हम सभी जो तर्क और बुद्धि-विवेक के आधार पर फैसले करते हैं—बुद्ध हैं.’ इसी तरह सिद्ध वह व्यक्ति है जो अपनी ज्ञानेंद्रियों पर नियंत्रण रख सकता है. वैष्णव और शैव किसी न किसी देवता को मानते हैं. यही स्थिति दूसरे संपद्रायों की है, वे भी किसी न किसी देवता में श्रद्धा रखते हैं. जहां देवता नहीं हैं, वहां गुरु है जो परोक्ष रूप में साकार या निराकार देवता से मिलवाने का दावा करता है. केवल बौद्ध धर्म ऐसा है जिसमें कोई केंद्रीय देवता नहीं है. न ही वह जीवन से इतर किसी सुख की दावेदारी करता है. वह किसी भी प्रकार के ईश्वर, आत्मा, लोक-परलोक, मोक्ष अथवा सनातनवाद को नकारता है. नास्तिक शब्द भी इसके करीब है. नास्तिक वह है जो आत्मा परमात्मा के अस्तित्व को नकारता है; संसार और जीवन के बारे में बुद्धिसंगत निर्णय लेने का समर्थन करता है. ब्राह्मणवादी मूर्ति पूजा का विरोध करने वाले को भी नास्तिक कहकर धिक्कारने लगते हैं. पेरियार के अनुसार नास्तिक होना, सही मायने में मनुष्य होना है. ऐसा मनुष्य जो न केवल अपने ऊपर अपितु पूरी मनुष्यता पर विश्वास रखता है.

भारतीय समाज धर्म के अलावा जाति के शिकंजे में भी फंसा हुआ है. ये दोनों ही तर्क और मानवीय विवेक के विरोधी है. इनकी ताकत मनुष्य की अज्ञानता में निहित है. इसलिए घूम-फिरकर वे आस्था और विश्वास पर लौट आते हैं. तयशुदा मान्यताओं पर तर्क करने और सवाल उठाने से उन्हें परेशानी होती है. इसलिए वे चाहते हैं कि अपनी विवेक-बुद्धि को बिसराकर मनुष्य केवल उनके कहे का अनुसरण करे. वेद, पुराण, गीता, रामायण आदि धर्मग्रंथों में जो लिखा है, उनपर आंख मूंदकर विश्वास कर लिया जाए. यही अतीतोन्मुखी दृष्टि ब्राह्मणवाद है; जो बार-बार पीछे की ओर ले जाती है और मानव-बुद्धि की विकासयात्रा का निषेध करती है. पेरियार इससे आजन्म जूझते रहे. इसके लिए उन्होंने किसी धर्म, व्यक्ति या राष्ट्र की परवाह तक न की. खुलकर कहा कि—

‘मैं मानव-समाज का सुधारक हूं. मैं किसी देश, ईश्वर, धर्म, भाषा अथवा राज्य की परवाह नहीं करता. मेरे सरोकार केवल मानवमात्र के कल्याण एवं विकास को समर्पित हैं.’ यही संकल्प क्रांतिधर्मी पेरियार तथा उनके विचारों को समसामयिक और प्रासंगिक बनाता है.

 

ओमप्रकाश कश्यप

 

संदर्भ:

1 जाति मदे च अतिमानिता च लोभो च, दोसो च मदो च मोहो

ऐते अवगुणा येसुब संति सब्बे तानीष खेत्तानि अयेसलानि

जाति मदो च अतिमानिता च लोभो च, दोसो च मदो च मोहो

ऐते अवगुणा येसुब न संति सब्बे तानीष खेत्तानि सुयेसलानि—मातंग जातक-497

  1.   अंबट्ठसुत्त, दीघनिकाय, 1/3
  2.   पेरियार, 1947 में सलेम कालिज में ‘हिंदू दर्शन’ पर दिया गया व्याख्यान
  3.   कुदी अरासु, 15 अगस्त 1926
  4.   कुदीअरासु, 2 दिसंबर, 1944
  5.   पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पृष्ठ-208.
  6.   पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पृष्ठ-227
  7. विदुथलाई, 14 मार्च 1954.
  8. विदुथलाई, 14 मार्च 1954, पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पृष्ठ-265
  9. विदुथलाई, 14 मार्च 1954, पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पृष्ठ-265
  10. छूआछूत पर पेरियार के विचार, मीना कंडास्वामी द्वारा तमिल से अंग्रेजी में अनूदित.
  11. विदुथलाई, 19 अप्रैल 1956,पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पेज-274-75
  12. कलेक्टिड वर्क्स आफ पेरियार, पृष्ठ-152
  13. कलेक्टिड वर्क्सआफ पेरियार, पृष्ठ-173
  14. विदुथलाई, 15 अगस्त 1957, पृष्ठ-300
  15. पेरियार आन बुद्धिज्म, रामास्वामी पेरियार, राम मनोहरन के आलेख ‘फ्रीडम फ्राम गाड: पेरियार एंड रिलीजन’ से उद्धृत
  16. कलेटिक्ट वर्क आफ पेरियार, पृष्ठ-306-307

 

 

ई. वी. रामासामी पेरियार का दर्शन : लोकप्रिय दार्शनिक मिथों की वैज्ञानिक पड़ताल

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1947 में . वी. रामासामी पेरियार को सलेम कॉलिज के दर्शन विभाग ने एक व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया था। विभागाध्यक्ष थिरू रामासामी ने उस कार्यक्रम की अध्यक्षता की थी। दर्शनशास्त्र पर दिए गए उस व्याख्यान में पेरियार ने हिंदू धर्म के लोकप्रिय तत्वों पर अपनी बात रखी थी। एक वैज्ञानिक भी भांति वे धर्म, ईश्वर, आत्मा आदि का विश्लेषण करते हैं। उनका कहना था कि परमात्मा और धर्म से जुड़े मुद्दों पर गंभीर अन्वेषण की आवश्यकता है। ठीक वैसे ही जैसे दूसरे वैज्ञानिक विषयों के बारे में जरूरी होता है। उन्होंने जोर देकर कहा था कि शोध और विचारविमर्श के दायरे से कुछ भी छूटना नहीं चाहिए।

उल्लेखनीय है कि पश्चिम में धर्म, ईश्वर आदि की ऐसी ही पड़ताल अठारवीं शताब्दी के विचारक रूसो ने भी की थी। पर पेरियार की चुनौती बड़ी थी। रूसो के सामने अनियंत्रित मशीनीकरण के कारण समाज में आ रही विकृतियां थीं। जबकि पेरियार के सामने हजारों साल पुरानी जाति की समस्या, ऊंच-नीच तथा भेदभाव थे। धर्म, दर्शन, ईश्वर आदि को लेकर पेरियार की कई स्थापनाएं हमें विचित्र लग सकती हैं। क्योंकि उस तरह से सोचने का हमें अभ्यास ही नहीं है। आमतौर पर धर्म-दर्शन की बात चलती है तो आस्था महत्त्वपूर्ण हो जाती है। यहां तक कि तटस्थता का दावा करने वाले विचारक भी, पूर्वाग्रहों के चलते, आस्था के अनकहे प्रभाव में आ जाते हैं। ऐसे में पेरियार का धर्म-दर्शन पर व्याख्यान, विशुद्ध दार्शनिक विमर्श है, जो हिंदू धर्म-दर्शन के प्रचलित मिथों को समझने की नई दृष्टि देता है। – अनुवादक

आज मुझे दर्शनशास्त्र पर अपनी बात कहने के लिए बुलाया गया है।

सलेम कॉलिज के इस प्रांगण में विद्यार्थियों, उनके अध्यापकों के अलावा और भी बहुत से लोग यहां उपस्थित हुए हैं। मैं नहीं मानता कि यहां, इतने गौरवशाली श्रोताओं को संबोधित करना मेरे लिए आसान बात होगी। मैं नहीं जानता कि मैं अपनी बातें कहां तक आप सबको समझा पाऊंगा, और आप मेरी बातों से संतुष्ट होंगे। इसके अतिरिक्त  यह कहीं ज्यादा आवश्यक है कि कुछ सबसे महत्त्वपूर्ण और अग्रणी दर्शन-सिद्धांतों पर आपसे चर्चा की जाए। मैं अनुभव करता हूं कि दर्शनों और स्थापित दार्शनिक मान्यताओं पर चर्चा करना मेरे लिए आसान नहीं होगा।

दार्शनिक बोध तथा दार्शनिक अभिव्यक्तियां सत्य होती हैं। उसकी पुनर्व्याख्या, उसे आगे तक पहुंचाने के लिए अपेक्षा की जाती है कि चीजों को उसी रूप में देखा जाए, जैसी कि वे हैं—और ठीक वैसा ही समझा जाए जैसा उनसे प्रत्याशित है। मोटे तौर पर कह सकते हैं कि ज्ञान प्रकृति से, हमारे सहजानुभवों से प्राप्त होता है।

हमारी मानस-रचना को प्रकृति और दर्शन को अलग-अलग संदर्भ में देखने के लिए ढाला गया है। हमारे लिए यह बड़ा ही मुश्किल है कि हम सत्य को उसी रूप में देखें जैसा वह है। और अत्यंत कठिन है वस्तुजगत के पीछे अंतनिर्हित उसकी वास्तविकता को समझना। इसे स्पष्ट करने के लिए मैं एक उदाहरण देना चाहूंगा। जब भी हम किसी व्यक्ति को देखते हैं, हम उसपर नजर डालते हैं तथा छवि के आधार पर उसका आकलन करते हैं। उस समय वह हमको वास्तविक मनुष्य, जैसा उसे प्रकृति ने गढ़ा है—दिखाई नहीं पड़ता। मनुष्य को उस रूप में देखना जैसा प्रकृति ने उसे ‘गढ़ा’ है, बिना कुछ बदले-छिपाए, नंगे मनुष्य के रूप में देखना है। उस तरह देखने को, हालांकि वही वास्तविकता है—आधुनिक जगत में अच्छा नहीं माना जाएगा। इसके अतिरिक्त वह जुगुप्सा और प्रतिकर्षण का स्रोत होगा, जो जीवन में ढेर सारी असुविधाओं का कारण बनेगा।

इसी प्रकार यदि आप कुछ दूसरी चीजों को यथारूप, उनके सच्चे तथा वास्तविक रूप में देखने का प्रयत्न करो तो वह घृणित, असुविधापूर्ण, असहज और अप्रिय प्रतीत होगा। इसलिए कुछ लोग कहते हैं कि दर्शनशास्त्र को समझने के लिए जीवन में एक स्तर तक परिपक्व होना पड़ता है।

यही कारण है जिससे मैंने बताया है कि दर्शनशास्त्र को लेकर मेरी विवेचनाएं अनेक लोगों के लिए अरुचिकर होंगी। एक प्रसिद्ध कहावत है कि जो व्यक्ति मिलावट रहित, खरी बात कहता है, वह अनेक लोगों के लिए कट्टर शत्रु बन जाता है। इसका आशय यह नहीं है कि सभी लोगों को झूठ बोलना चाहिए। इससे बस यही जाहिर होता है कि वास्तविक सत्य और दर्शनशास्त्र, समाज में अपनी प्रकृति और नाम से इतर रूप में प्रचलित हैं। हमें वे उस रूप में नजर नहीं आते, जैसे कि वे वास्तव में हैं। यही कारण है कि अनेक सत्य हमें उलझे हुए और अव्यक्त दिखाई पड़ते हैं।

स्वाभाविक रूप से, लोगों के आगे किसी भी दर्शन की विवेचना करना, कमोबेश बेहद नाजुक और कठिन कार्य है। ऊपर से इस सम्मेलन के अध्यक्ष मेरा परिचय देते समय पहले ही बता चुके हैं कि मैं एक नास्तिक, धर्मविरोधी यहां तक कि धर्म से घृणा करने वाला और राजनेताओं का प्रतिद्विंद्वी हूं। जबकि वस्तुत: मैं साधारण इंसान हूं। कुल मिलाकर मेरे जैसे आदमी के लिए दार्शनिक विचारधाराओं और सिद्धांतों में अंतर्निहित सत्य की विवेचना करना, अपेक्षाकृत कहीं जटिल कार्य है।

फिर भी, अपने आलोचकों के समक्ष विनम्र व्याख्या के रूप में, मैं अपनी ओर से दार्शनिक सत्यों की विवेचना का भरसक प्रयास करूंगा। जैसे कि मैं गंभीरतापूर्वक विचार कर रहा था कि इतने संभ्रांत और गरिमामय लोगों की उपस्थिति में मुझे क्या कहना चाहिए। अध्यक्ष महोदय ने मेरे बारे में कुछ विशेष विचार आपके समक्ष रखे हैं, और मैं यह मानता हूं कि अपने वक्तव्य को उनके विवेचन तक सीमित रखना ही पर्याप्त होगा।

साथियो! किसी भी वस्तु या विचार को नगण्य अथवा अत्यंत महत्त्वपूर्ण समझा जा सकता है। मैं आपको बताऊंगा, कैसे! जनसाधारण के लिए ईश्वर, धर्म या राजनीति बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। वे उनके पीछे अंतनिर्हित दार्शनिक सिद्धांतों की महत्त्व को जरूरी होने के बावजूद नजरंदाज कर जाते हैं। जबकि विद्वान लोगों के लिए वे अत्यंत महत्त्वपूर्ण होते हैं। इसलिए वे उन्हें समझने के लिए जरूरी कष्ट उठाते हैं, उनका सविस्तार ग्रंथीकरण के साथ प्रचार-प्रसार करते हैं।

हम देखते हैं कि महान संगीतकारों के गायन-वादन में सभी मनोवृत्तियों के दर्शक-श्रोता हिस्सा लेते हैं। जनसाधारण गीतों तथा उनके पीछे निहित विचारों को सुनता है, तथा उन्हें संगीत से अलग करके कहता है कि, ‘उसने ईश्वर की स्तुति में गाया था, अथवा उसने महिलाओं के बारे में गाया था। कार्यक्रम में संगीतकार की प्रस्तुति से जुड़कर वे आत्मतुष्टि का अनुभव करते हैं। परंतु जिन्हें संगीत-विज्ञान की समझ है, वे संगीत प्रस्तुति के प्रति अपेक्षाकृत अधिक उत्सुक होते हैं, वे उस सीमा तक गीत-संगीत की प्रस्तुति को समझना चाहते हैं, जिस सीमा तक उस गवैये/कलाकार ने अपनी संगीत कला में महारत हासिल की है। उनकी उपस्थिति के कारण गायक/प्रस्तोता अपनी गायन प्रस्तुति के समय अतिरिक्त रूप से सावधान रहता है। यही वह कारण है जिससे मैंने आरंभ में ही कह दिया था कि मैं जो भी कहूंगा, वह कुछ लोगों को बहुत ही तुच्छ और महत्त्वहीन लग सकता है, जबकि कुछ को बहुत उपयोगी और जोरदार।

ईश्वर

साथियो! अध्यक्ष महोदय ने ईश्वर के संदर्भ में बताया था कि वह सब कुछ करने में समर्थ है। कुछ भी उसकी सीमा से परे नहीं है। धर्म के संदर्भ में उन्होंने कहा था कि धर्म मनुष्य और ईश्वर को जोड़ने वाले पुल की तरह है। यह कोई धार्मिक सम्मेलन नहीं है। यह बैठक दर्शनशास्त्र पर सामान्य चर्चा के लिए आयोजित की गई है। हमें धर्म और ईश्वर के दर्शन पर विस्तारपूर्वक विचार करना होगा, और मैं इसका बहुत सूक्ष्म विश्लेषण करना चाहता हूं। मैं इन सभी विषयों को साफ-सुथरी तस्वीर के रूप में प्रस्तुत करना चाहता हूं।

कई लोगों की राय है कि मैं नास्तिक हूं, धर्म में विश्वास नहीं करता। कई लोगों ने इसपर खुलकर लिखा, बोला है। मैं सचमुच बहुत प्रसन्न होता, यदि नास्तिकों ने भी इतना ही खुलकर लिखा, बोला होता। यदि आस्तिक ऐसा महसूस करते हैं, तो मैं उनपर केवल तरस खा सकता हूं। बात यहीं तक सीमित नहीं है। ऐसे लोगों के बीच रहने पर मुझे सचमुच बहुत खेद होगा। इस सेमिनार में जिसे यहां दर्शनशास्त्र पर वस्तुनिष्ठ चिंतन के लिए आयोजित किया गया है, यदि मैं अपने विचारों को खुलकर व्यक्त करने में सकुचाता हूं, तो वह मुझसे वस्तुनिष्ट चिंतन की उम्मीद लगाए बैठे लोगों के साथ विश्वासघात करने जैसा होगा।

इसलिए मैं सीधे तौर पर बताना चाहूंगा कि आस्तिक अपनी अज्ञानता के कारण मुझे नास्तिक बताते हैं। बल्कि मैं तो कहना चाहूंगा कि इसके पीछे उनकी गैर-जिम्मेदारी अधिक है।

इसे और अधिक स्पष्ट करने हेतु मैं एक उदाहरण की मदद लूंगा—

एक ब्राह्मण जो कठिनाईपूर्वक जीवन व्यतीत करता था, अपने घर से चला और उस स्थान पर पहुंचा, जहां एक शुभ कार्यक्रम चल रहा था। वहां उसने भिक्षा मांगी। गृहस्वामी ने चार आना(25 पैसे) दिए। उतने ही जितने उसने दूसरे भिखारियों को दिए थे। इस पर ब्राह्मण ने उससे कहा—‘मैं उनमें से हूं जो दूसरों को दोष नहीं देता। मुझे धन का लालच नहीं है। मुझे किसी प्रकार का अभिमान भी नहीं है। मैं इन सबको कभी का त्याग चुका हूं। क्या तुम जानते हो कि मैंने चार वेद, छह शास्त्र और अठारह पुराणों का अध्ययन किया है? तुमने उन अशिक्षित गधों को भी चार आना दिए हैं। क्या यह न्याय-संगत है? क्या यही तुम्हारा धर्म है?’

इसी प्रकार ये आस्तिक लोग दूसरों पर नास्तिक होने का आरोप लगाते हैं। अब हम इस पर विचार करते हैं कि आस्तिक होने का दावा करने वाले लोग ईश्वर में कैसा विश्वास रखते हैं।

आस्थावादी कहते हैं कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है। वे कहते हैं कि वह सर्वव्यापी है। वे बताते हैं कि वह अनुपम, अद्वितीय है। वह यह भी कहते हैं कि सबकुछ उसकी इच्छा से संचालित होता है। यह मान लिया गया है कि मैं ऐसे ईश्वर के अस्तित्व को नकारता हूं, तो मैं कहता हूं कि यह ठीक वैसा ही है, जैसा ब्राह्मण कहते आए हैं। ब्राह्मण दावा करते हैं कि वे स्वार्थी नहीं हैं। दूसरी ओर वे दाता भी कहे जाते हैं। पुनश्च: वे अपनी विद्वता, वेद-शास्त्रों पर पकड़ का दावा भी करते हैं। इससे उनकी आत्ममुग्धता का पता चलता है।

पुनश्च: यह कहना (उचित नहीं है) कि वे दूसरों को गाली नहीं देते, न किसी से नफरत करते हैं। वे दूसरों को अशिक्षित और मूर्ख बताते हैं। उन्हें दूसरों को उनके बराबर चार आना भीख में देने से ईर्ष्या होती है।

इसके अलावा उनका यह दावा है कि वे सब कुछ त्याग चुके हैं; उन्हें धन के प्रति किसी प्रकार का लोभ-लालच नहीं है; फिर वे कहते हैं—‘तुमने मुझे केवल चार आना दिए!’

ये बातें साफतौर पर इशारा करती हैं कि ब्राह्मण अपने विचारों पर दृढ़ नहीं हैं। जिन गुणों के आधार पर ब्राह्मणों की श्रेष्ठता के दावे किए जाते हैं, उन्हें वे अपने ही कर्मों से झुठला रहे हैं। हमारी निगाह में वे सच्चे ब्राह्मण नहीं हो सकते। उनकी कथनी और करनी के बीच भारी अंतर है।

इसी तरह यदि मान लिया जाए कि ईश्वर सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ और सर्वव्यापी है तो कोई अकेला व्यक्ति उसे कैसे नकार सकता है। जब कोई साधारण व्यक्ति ईश्वर को नकार देता है, तो यह स्वयंसिद्ध है कि सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान ईश्वर जैसा कुछ भी नहीं है। दूसरे, सिद्ध हो चुका है कि ब्राह्मणों ने ईश्वर की जिन विशेषताओं का दावा किया है, वह बेतुकी और निराधार हैं। वे महज काल्पनिक और मनगढंत कहानियां है। यही सत्य है।

यह कहना कि जो ईश्वर के अस्तित्व को नकारते हैं, वे नास्तिक हैं—अज्ञानता पर आधारित है। किसी व्यक्ति को नास्तिक कहना सरासर मूर्खता है।

यदि ईश्वर सचमुच अस्तित्ववान है तो नास्तिक को उसे नकारने से भला क्या मिलेगा? यदि ईश्वर वास्तव में ही सर्वेसर्वा और सर्वशक्तिमान है तो साधारण व्यक्ति द्वारा उसकी सत्ता को झुठलाए जाने से उसका क्या बनेगा-बिगड़ेगा? इन स्थिति में यह प्रमाणित हो चुका है कि कोई भी व्यक्ति मूर्खता से ईश्वर की सत्ता को अस्वीकार नहीं करेगा। इसी तरह कोई भी ईश्वर किसी मनुष्य को नास्तिक के रूप में रचने का मूर्खतापूर्ण कृत्य नहीं करेगा।

आपको इन सब बातों पर विचार करना होगा। यदि आप इन बातों पर गंभीरतापूर्वक सोचेंगे तो ईश्वर में अनास्था, अविश्वास या नास्तिकता के लिए किसी व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है।

ये वे लोग हैं, जो परमात्मा को नहीं जानते। ऐसे ही लोग दूसरों को नास्तिक और अनास्थावादी कहते हैं। वह स्वयं-सिद्ध नास्तिकता है। ईश्वरवादियों ने ही अनीश्वरवादियों को बनाया है। उनके अज्ञान से ही नास्तिकता पनप रही है। जरा सोचो, यदि ईश्वर सचमुच मौजूद है तो क्या यह संभव है कि एक तुच्छ और साधारण इंसान उसे नकार सके? इससे हम इस स्वाभाविक निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि नास्तिकता और नास्तिक शब्द ब्राह्मण के अज्ञान की देन थे, या ऐसा होना चाहिए कि ब्राह्मणों ने ही उन्हें ईश्वर के नाम पर लाभ कमाने, अपने धंधे को आगे बढ़ाने के लिए रचा है। इसलिए ईश्वर उसी के लिए अस्तित्ववान है, जो उसके नाम का धंधा करते है। बाकी को ईश्वर के बारे में चिंता करने की कतई आवश्यकता नहीं है।

ईश्वर संबंधी दर्शन के विश्लेषण का वास्तविक अर्थ है, तत्संबंधी सभी मामलों का सविस्तार और संपूर्णता में विश्लेषण करना। ईश्वर से संबंधित सत्य को अनावृत करने के लिए हमें अनुसंधान करने होंगे। किसी वस्तु के बारे में शोध का मूलभूत सिद्धांत उस वस्तु के यथार्थ को पहचानना है। यह जानना है कि वह क्या है। उसके बाद में यह पता लगाना कि वह क्यों है, फिर यह जानना कि कैसे है, तदनंतर यह समझना कि वह कहां है और अंत में यह जानना कि वह अस्तित्व में कब से है। हमें इन जिज्ञासाओं को आगे रखकर उनके स्पष्ट उत्तर खोजने होंगे। हमें प्रश्नों से घबराने की आवश्यकता नहीं है। हमें बिना किसी अवरोध ओर बाधा के, निष्पक्ष तरीके से अध्ययन करना होगा। दार्शनिक रूप से सत्य होने का अभिप्राय है, मुद्दों को लेकर तार्किक होना। हमारे उद्देश्य को देखते हुए दोनों परस्पर संबद्ध हैं। इसलिए यह प्रमाणित करना कि ईश्वर निस्संदेह है, वह वास्तव में सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान है—असंभव होगा, यदि इन छह या सात प्रश्नों का उत्तर न खोजा जाए। इस प्रमाणन के लिए जितने भी तरीके जरूरी हों, उनका परीक्षण किया जाना आवश्यक है।

ईश्वर में अंधविश्वासी व्यक्ति इस तथ्य की उपेक्षा कर सकता है। वह सोच सकता है कि यह अनावश्यक और अयाचित है। लेकिन दार्शनिक अन्वेषक के लिए यह अत्यावश्यक है। ईश्वर अंध-आस्था से परे नहीं हो सकता। उसे केवल अज्ञानता या लापरवाही द्वारा नहीं पहचाना जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, विशेषरूप से सुधी शोधकर्ता ईश्वर को न तो महज पाखंड समझकर नकार समझ सकता है, न ही अज्ञानता या अंध-आस्था के आधार पर उसे स्वीकार कर सकता है।

ईश्वर क्या है?

ईश्वर क्यों है?

ईश्वर कैसा है?

ऐसे अध्येता के लिए जो दर्शनशास्त्र और ईश्वर का अन्वेषण करना चाहता है, उसके पास इन प्रश्नों का उत्तर, जिज्ञासाओं का संपूर्ण समाधान होना चाहिए। ऐसे ढंग से जो पर्याप्त आश्वस्तिकारक हो।

प्रत्येक मनुष्य तर्क करना जानता है। गहन चिंतन-मनन हेतु मनुष्य तर्कशक्ति से संपन्न होता है। तर्कशक्ति उचित परिप्रेक्ष्य के साथ उसे सत्य तक पहुंचाती है। कुल मिलाकर तर्क और तर्क सामर्थ्य से बचकर मनुष्य को जानवर के स्तर तक नीचे नहीं गिराना चाहिए। अंध-आस्था और छद्म विश्वास से उसे बचना चाहिए। अपने तर्क और विवेक का दुरुपयोग करके मनुष्य ने अपने लिए अनेक कठिनाइयां पैदा कर ली हैं। अपनी विकट समस्याओं से बचने के लिए उसने अनेकानेक परमात्माओं की सर्जना की है।

शासक और शासित आखिर क्या हैं?

लोग अमीर और गरीब क्यों हैं? 

ऊंची और नीची जातियां क्यों बनी हैं?

मजदूर मेहनतकश, उनके मालिक आलसी क्यों हैं?

दुनिया गुलामों और बादशाहों में क्यों बंटी है?

भिखारी और अन्नदाता का विभाजन किसलिए?

आप इन सभी प्रश्नों पर विचार कीजिए। ईश्वर किसके लिए है? क्या आप नहीं सोचते कि ईश्वर की रचना इन सबकी सुरक्षा, इस असमानता को बनाए रखने के लिए हुई है? इसके अतिरिक्त ईश्वर ने मनुष्य के लिए किया ही क्या है?  क्या ईश्वर ने मनुष्यता के कल्याण के लिए अभी तक कोई अच्छा कार्य किया है? क्या हमें ऐसे ईश्वर की आवश्यकता है जो बुराइयों को सरंक्षण देता, केवल उन्हीं का भला चाहता हो?

समाज में प्रेम, सुख, संतुष्टि और शांति के अभाव के लिए कौन जिम्मेदार है? अगर तर्क और विवेक बुद्धि से संपन्न व्यक्ति घृणा का पात्र बनते हैं, मृत्यु तक उन्हें चिंताएं घेरे रहती हैं तो कौन उनके लिए जिम्मेदार है? कहीं इसका कारण ईश्वर में घोर आस्था तो नहीं है?

यदि हम इसे मूर्खता कहकर टाल देते हैं, मानवीय अज्ञानता को इसका मूल कारण मान लेते हैं तो प्रकृति ने मनुष्य को बुद्धि की सौगात क्यों दी है? क्या यह कहा जाए कि मनुष्य को उसकी बुद्धि मूर्खतापूर्ण कार्यों के लिए दी गई है? क्या यह कहा जा सकता है कि मानवीय विवेक का काम मूर्खतापूर्ण विश्वासों के साथ जीना और मूर्खतापूर्ण कृत्यों पर अमल करना है?

मनुष्य को विवेकशील प्राणी माना गया है, बावजूद इसके सभी दुर्गुण उसके भीतर हैं। उसका चेहरा चिंताओं से ढका रहता है, उसमें समस्त दोष और दुर्बलताएं हैं। उसके भीतर दूसरों के प्रति घृणा भरी रहती है। गद्दारी केवल मनुष्यों का लक्षण है, बाकी प्राणियों में वह नहीं पाई जाती, जिन्हें आमतौर पर बुद्धि-विवेक से रहित माना जाता है। 

विवेकवान मनुष्य आखिर वे दुर्गुण क्यों दिखाई पड़ते हैं, जो जंगली जानवरों तक में नहीं पाए जाते? क्या इसके पीछे ईश्वर की रचना और विश्वास है? क्या ऐसा इसलिए कि परमेश्वर की महान विशेषताओं संबंधी उसकी कल्पना अनुचित और पाखंड है। यदि हम यह समझने और पता लगाने में असमर्थ रहते हैं कि इस दुरावस्था के वास्तविक कारण क्या हैं, यदि हम उसके समाधान के लिए उपयुक्त सुझाव नहीं दे पाते—फिर हमारे विवेक की उपयोगिता ही क्या है? 

इस भगवान के लिए क्या करें? क्या मनुष्य ने ईश्वर की खोज किसी प्राकृतिक विधि-विधान से की है? क्या दूसरे प्राणियों ने मनुष्य को ईश्वर को पहचानना तथा उसमें विश्वास करना सिखाया? यदि ईश्वर का निर्माण दूसरे प्राणियों ने नहीं किया था तो यह कैसे संभव हुआ कि वह केवल मनुष्य को दिखेगा, महसूस होगा। वह दूसरों को क्यों दिखाई नहीं देता? यहां तक कि वे लोग जो ईश्वर को पहचानने का दावा करते हैं, उन्हें वह अलग-अलग रूपाकारों में क्यों दिखाई पड़ता है? ईश्वर के कार्य, उसकी शक्तियां और व्यवहारों में इतने ज्यादा विरोधाभास क्यों हैं?

यदि ईश्वर एक निर्मिति था तो उस निर्मिति का उद्देश्य क्या था? उसे बनाने के कारण क्या थे? क्या ईश्वर के निर्माता अपने प्रयासों में सफल हुए थे? क्या ईश्वर ने इस समस्या का समाधान दिया और अपने सृजन के उद्देश्य पर खरा उतरा था  ?

क्या ईश्वर अपनी निर्मिति आप था? अथवा दूसरों के द्वारा उसे गढ़ा गया था? यह कैसे संभव होता है कि लोग उसकी इच्छाओं एवं निर्देशों से विरुद्ध जाने में सफल हो जाते हैं?

ईश्वर को सर्वशक्तिमान बताया जाता है। दावा किया जाता है कि वह सर्वव्यापी और सर्वज्ञ है; और दुनिया में कुछ भी और सब कुछ नियंत्रित करने में सक्षम है। यदि यह सब सत्य है तो मुझे ऐसा कुछ भी बताइए जो ईश्वर ने अब तक किया है? यह मनुष्य ही है जिसने ईश्वर के नाम पर सब कुछ किया है। इतना ही नहीं, मनुष्य ईश्वर का अनादर और उपेक्षा करने में सक्षम है। बावजूद इसके उसने कई काम किए हैं। जो चीजें मनुष्य के हितों के लिए हानिकारक हैं, वे घटित हो रही हैं। जो चीजें समाज के लिए उपयोगी और सहायक नहीं हैं, वे भी सामने आ रही हैं। हम यह देखने में सक्षम नहीं कि प्रत्येक वस्तु को उसकी संपूर्णता और समग्रता में बनाया गया है। वह एक व्यक्ति से लेकर संपूर्ण समाज को संतुष्ट कर सकती है। ऐसा कुछ भी नहीं है जो मानवीय प्रयासों के बिना संभव हुआ हो। जीवन में ऐसा भी कुछ नहीं है जिससे हम ईश्वर पर गर्व कर सकें। सब कुछ मनुष्य के कठिन परिश्रम की देन है, वही सराहनीय वस्तुओं का निर्माण करने में सक्षम है। अगर दुनिया सुरक्षित है और मानवता की गूंज चारों ओर है तो उसका श्रेय भी मनुष्य के प्रयासों को जाता है। सब कुछ केवल मनुष्य के प्रयासों द्वारा संरक्षित और सुरक्षित है। बल्कि हम तो यहां तक कह सकते हैं कि स्वयं देवतागण भी मनुष्य के प्रयासों के कारण सुरक्षित हैं।

धर्म

अब हमें धर्म पर विचार करना चाहिए।

इन दिनों, लोगों की राय है कि सभी धर्मों की रचना मनुष्यों द्वारा की गई है। समाज में आपको अच्छे मनुष्य मिलेंगे तो बुरे आदमी भी साथ-साथ मिल जाएंगे। इसी तरह तुम समाज को दो श्रेणियों में बांट सकते हो। पहले वे जो समाज की सेवा करते हैं, और दूसरे वे जो स्वार्थी हैं। समाज को दैवी शक्तियों और दैवी-शक्ति विहीन लोगों की श्रेणी में बांट पाना संभव नहीं है। उस तरह का विभाजन इसलिए संभव नहीं है, क्योंकि लोगों को ज्ञान, अनुभव आदि के आधार पर वर्गीकृत करने का कोई ठोस आधार नहीं है। अतएव आप कोई भी धर्म चुनें, मगर यह दावा नहीं करते कि वह धर्म दैवीय शक्ति के कारण अस्तित्व में आया है। आप केवल इस निष्कर्ष पर पहुँच  सकते हैं कि धर्म कुछ पढ़़े-लिखे लोगों द्वारा गढ़ा गया था। उनके सरोकार बेहतर समाज की रचना से जुड़े थे। धर्म के रचनाकार को लेकर यही वह सत्य है जिसे दर्शनशास्त्र का अध्येता प्राप्त कर सकता है। दार्शनिक अनुसंधान का वास्तविक अभिप्राय क्या है?

एक विद्वान जिन्होंने तमिल ग्रंथ ‘कुरल’(पूरा नाम ‘तिरुक्कुरल’ है। यह तमिल साहित्य की महानतम रचनाओं में से है। उसके रचनाकार तिरुवल्लूवर हैं, जिन्हें जैन रचनाकार माना जाता है। ग्रंथ का रचनाकाल 300 ईस्वी पूर्व से छह सौ ईस्वी तक फैला हुआ है। नीतिशास्त्र विषयक इस ग्रंथ के 1330 मुक्तक जीवन के सभी पक्षों का संस्पर्श करते हैं) की टीका-पुस्तक की प्रस्तावना में लिखा है कि ‘मिथ्या’ मिथ्या हो चुका है। जबकि असत्य से रहित सत्य आज भी सच्चाइयों के रूप में शेष है। आशय है कि कोई भी चीज जो मिथ्या है, वह एक न एक दिन अवश्य ही गायब हो जानी है। जबकि सत्य की पहचान सत्य के रूप में ही रहेगी। अन्यथा यह वैज्ञानिक शोध एवं अनुसंधान के लिए अपमानजनक होगा। शोध  का एकमात्र उद्देश्य है, सत्य तक पहुंचना। यदि आप इससे भटक जाते हैं, और  दार्शनिक अनुसंधान के नाम पर असत्य को सत्य घोषित करने का प्रयास करते हैं, तो आपका शोध केवल और केवल झूठ की छवि ही प्रस्तुत कर पाएगा। यदि  दर्शनशास्त्र का कोई भी शोध किसी झूठ को स्थापित करता है, तो वह मनुष्य की तर्कशक्ति और विवेक-बुद्धि, यानी सीधे मनुष्यत्व की अवमानना होगी।

जब भी आप धर्म पर विचार करते हैं, और यह जानना चाहते हैं कि मनुष्य के लिए धर्म की सर्जना के उद्देश्य क्या हैं, तो धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों का उत्तर होता है कि धर्म की आवश्यकता मनुष्य को ईश्वर से जोड़ने तथा अंततः उसे देवलोक तक पहुंचाने के लिए पड़ती है। उनके अनुसार धर्म की रचना दिव्य मनुष्यों द्वारा की गई थी। यही बात इस सम्मेलन के अध्यक्ष ने अपने वक्तव्य में भी कही थी। क्या यह धारणा दार्शनिक शोध और वैज्ञानिक अनुसंधान की दृष्टि से स्वीकार्य है? यदि यह मान लिया जाए कि धर्म की रचना दिव्य शक्तियों ने मनुष्य और धर्म(ईश्वर) के बीच संबंध बनाने के लिए की थी, तो यह केवल और केवल ईश्वर की दुर्बलता को दर्शाता है। यह उस ईश्वर की दुर्बलता है, जिसे सर्वशक्तिमान माना गया है। मनुष्य को ईश्वर से संपर्क साधने के लिए किसी दूसरे मनुष्य अथवा दिव्य मनुष्य की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे संबंध का आखिर मतलब ही क्या है?

यदि यह सत्य है कि ईश्वर सर्वत्र है और वह अतिमानवीय शक्तियों से संपन्न है, और यदि यह सत्य है कि केवल वही संसार की समस्त गतिविधियों का संचालक, नियंत्रक और कर्ता-धर्ता है, तो उसके तथा मनुष्य के बीच संबंध स्थापित करने के लिए किसी मध्यस्थ का औचित्य ही क्या है? वह क्यों होना चाहिए? ऐसे रिश्ते की जरूरत भी क्या है? इसके अलावा मैं यह भी जानना चाहूंगा कि वह कौन है जो पेड़-पौधों, कीड़े-मकोड़ों, पक्षियों और जीवाणुओं के अस्तित्व को ईश्वर के साथ जोड़ता है। साथ ही किसी एक को, जिसके पीछे किसी प्रकार का तर्क भी नहीं है, उन सभी जीवधारियों और ईश्वर से संबद्ध करने की आवश्यकता ही क्यों पड़ती है? जबकि उन्हें किसी प्रकार के ईश्वर की आवश्यकता ही नहीं है! वे(मनुष्येत्तर प्राणी) ईश्वर के बारे में सर्वथा अनभिज्ञ हैं। उन्हें न तो किसी मध्यस्थ की जरूरत है, न ही धर्म की। जबकि,  मनुष्य जो विवेकवान और तर्कशक्ति से संपन्न है, को दिव्यात्माओं और धर्म की, ईश्वर से संबंध स्थापित करने हेतु आवश्यकता अनिवार्य रूप से पड़ती है। अपने ईश्वरीय संबंधों के लिए मनुष्य को उन पर निर्भर रहना ही पड़ता है। आप इस बारे में क्या सोचते हैं? क्या ऐसा करना तर्कशक्ति संपन्न प्रतिभाओं और दर्शनशास्त्र के गंभीर शोधकर्ता को स्वीकार्य होना चाहिए?

जैसा कि मैंने पहले भी कहा है, आप समाज को अच्छे लोगों, विद्वान लोगों और जनसाधारण में बांट सकते हैं। लेकिन कुछ लोगों को दैवीय मान लेना, यह कहना कि केवल वही ईश्वर की रचना हैं, अन्यायपूर्ण और अविश्वसनीय होगा। यदि यह कहा जाए कि केवल दिव्य मनुष्यों की रचना ईश्वर ने की है, तो मैं पूछना चाहूंगा कि बाकी लोगों की रचना किसने की है। यदि ईश्वर संपूर्ण मनुष्यता का रचियता है, वह करोड़ों लोगों को साधारण इंसान के रूप में तथा मुट्ठी-भर को दैवी मनुष्य के रूप में, ताकि उनसे संबंध बनाए रख सके—क्यों रचेगा? क्या उसके लिए ऐसा करना आवश्यक है? मनुष्यता की रचना के लिए वह बार-बार इतना कठिन परिश्रम क्यों करेगा? क्या वह एक सरल और एकसमान तरीके से इस काम को अंजाम नहीं सकता?

कहा जा सकता है कि इसी में ईश्वर की खुशी और उसका आनंद है। कुछ लोग इसे आंख मूंदकर स्वीकार भी कर सकते हैं। लेकिन आज हम यहां दर्शन पर चर्चा करने के लिए जमा हुए हैं। हम किसी भी शक्ति या वस्तु को शोध और संदेह से मुक्त नहीं कर सकते। हमें प्रत्येक विषय की गहनतम पड़ताल करनी चाहिए। इसके अतिरिक्त हम यहां दर्शन पर चर्चा कर रहे हैं, इसलिए हमें न केवल प्रत्येक वस्तु, अपितु हर विषय-वस्तु पर सवाल खड़े का अधिकार है। हमारा कर्तव्य है कि हम ईश्वर, धर्म तथा उनसे जुड़े प्रत्येक दर्शन की जांच-पड़ताल करें। धर्म और ईश्वर दार्शनिक विवेचनाओं का विषय रहे हैं। हम उन्हें बिना सवाल उठाए नहीं छोड़ सकते। बाकी विषयों के बारे में हमें अधिक पूछताछ करने की आवश्यकता नहीं है। उनमें से अधिकांश अपने आप में स्पष्ट हैं। हमें सोना, चांदी, तांबा तथा अन्य धातुओं पर शोध के लिए ज्यादा परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि हम धातुओं को बिना स्पर्श या परीक्षण के प्रयोग में नहीं लाते। चूंकि आज हमने ईश्वर और धर्म के दर्शन को विमर्श के लिए चुना है, ये अनुसंधान की दृष्टि से कठिन विषय हैं, इसलिए हमें इनपर बहुत अधिक सोच-विचार और तर्क-सामर्थ्य की जरूरत है। हमें उनसे जुड़े सत्य की खोज करनी होगी। इस मामले में यदि मनुष्य के सोचने-समझने और तर्क करने के गुण को वर्जित मान लिया गया तो हम ईश्वर और धर्म की वास्तविकता को कभी महसूस नहीं कर पाएंगे। इसका परिणाम मिथ्या धर्मों के लिए अनंत जीवन बलिदान करने जैसा होगा। ईश्वर और धर्म हमेशा मनुष्य की अंध-आस्था के उपकरण-मात्र बने रहेंगे। इसीलिए मैं आपसे इन विषयों पर विचार करने की अपील करता हूं। आप सोचें कि ईश्वर का साक्षात करने के लिए किसी मध्यस्थ की क्या सचमुच आवश्यकता है।

पुनश्चः, यदि यह सत्य है कि ईश्वर का साक्षात तथा उसकी प्राप्ति केवल धर्म के माध्यम से संभव है तो उसके लिए इतने सारे धर्म क्यों होने चाहिए? क्या धार्मिक और दिव्यात्मा मनुष्यों की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए? मनुष्यों और तथाकथित दिव्यात्माओं द्वारा निर्मित धर्मों के बीच इतने विवाद, अनियमितताएं और विरोधाभास क्यों हैं? धार्मिक युद्धों का औचित्य क्या है? धर्म के नाम पर इतने नरसंहार क्यों होते हैं? धर्म के नाम पर मनुष्यता को इतने सारे कष्ट और पीड़ाएं क्यों झेलनी पड़ती हैं? यह कहा जा सकता है कि ये किसी दैवी शक्ति की देन न होकर मनुष्य की अज्ञानता के कारण उत्पन्न हुई हैं। लेकिन यह तर्क दमदार नहीं है। यदि कोई बुद्धिमान और तर्कशक्ति से संपन्न इसका रहस्य समझने में असमर्थ है तो बाकी मनुष्य इसे समझ ही नहीं पाएंगे। यदि कोई विवेकशील, भला मनुष्य दंगों और झगड़ों में दुर्भावनाओं और घृणा का शिकार हो सकता है, तो किसी भले इंसान के लिए कैसे संभव है कि वह ऐसे ईश्वर की मदद मांगने जाए जिसका वह साक्षात नहीं कर सकता। यही नहीं, कहा जाता है कि ईश्वर साधारण मनुष्य की दृष्टि और समझ से परे है। तब मनुष्य के लिए उसे पहचान पाना कैसे संभव है? कृपया इन सब बातों पर विचार कीजिए। विभिन्न धर्मों के रचियताओं को हम दिव्यात्मा कैसे मान सकते हैं, जब समाज में इतने सारे झगड़े, असमानताएं, मारपीट, दंगे और तोड़-फोड़ उनके द्वारा रचित धर्म के नाम पर होते हैं। आपको इन सब प्रश्नों पर गंभीरता से सोचना होगा।

संसार में बढ़ते भेदभाव, मनमुटाव तथा एकता के अभाव के लिए क्या धर्म जिम्मेदार नहीं है? क्या धर्म को समाज में नफरत फैलाने के लिए जिम्मेदार नहीं कहा जाना चाहिए? क्या धर्म मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण, उत्पीड़न तथा अभावों के लिए जिम्मेदार नहीं है?

हम यह कैसे मान सकते हैं कि सभी धर्म दिव्य शक्तियों से युक्त महापुरुषों द्वारा बनाए गए हैं। हमें इन सब मुद्दों पर गहन चिंतन करना होगा। इसलिए कि धर्म-प्रवर्तकों को दिव्यात्मा होने का श्रेय दिया जाता है। उनमें से अनेक आगे चलकर दिव्य महापुरुष के रूप में पूजनीय माने गए हैं। ऐसे पूजनीय दिव्यात्मा, धर्म-प्रवर्तकों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। किसी को इस पर सोच-विचार करने की परवाह ही नहीं है। बुद्ध, ईसा, मोहम्मद, नयानारों, अलवारों, स्वामीजियों, महात्माओं और अनगिनत लोग समय-समय पर स्वयं को दिव्य पुरुष घोषित करते आए हैं। उनके बारे में अनगिनत वाद-विवाद, लड़ाई-झगडे़, मत-मतांतर तथा विरोधाभासी किस्से हैं।

बुद्धिवाद के प्रचार-प्रसार के फलस्वरूप समाज में जागृति आती है। आज, समाज का बड़ा हिस्सा अपने सोचने-समझने की क्षमताओं का निष्पक्ष तरीके से प्रयोग करने में सक्षम है। यही कारण है कि आज तथाकथित दिव्यात्माओं की संख्या घटने लगी है। शताब्दियों पहले अलवारों, नयनारों और दासारों का जन्म तक नहीं हुआ था। जनसाधारण की मुक्ति के लिए इन दिव्य जनों ने क्या योग्यता हासिल की है? उनमें से कितनों ने ईश्वर का पता लगाया, उसके बारे में जांच-पड़ताल की और अपनी प्रार्थनाओं के बल पर उस तक पहुंचने में सक्षम हुए? आज जो स्थिति है उसमें लोग सभी अध्येताओं को दिव्यात्मा स्वीकाने के लिए तैयार नहीं हैं। यहां-वहां, इक्का-दुक्का मनुष्यों को ही दिव्य विभूति के रूप में घोषित करने की कोशिश करते हुए पाते हैं। यही नहीं, इस तरह की दिव्यात्माएं, देशी जमीन में विदेशी पौधे की भांति बहुत जल्दी मुरझाने लगती हैं। जैसे-जैसे तुम ईश्वर और धर्म के बारे में सत्य के करीब जाओगे, उसे महसूस करने लगोगे, ये छलावे की तरह तुमसे दूर भाग जाएंगे।

ईश्वर और धर्म के बारे में मेरी विचारधारा कदाचित तुम्हें चौंका सकती है। मेरे कुछ विचार तुम्हारे विचारों से भिन्न हो सकते हैं।

धर्म और ईश्वर को लेकर इतने सारे संभ्रम और भ्रांतियां भला क्यों होनी चाहिए कि वे हमें, मनुष्यता के लिए महत्त्वपूर्ण और अपरिहार्य होने के लिए बाध्य करने लगें। अनेक लोग ऐसे हैं जिन्होंने इन संभ्रमों को सत्य और मानव-मात्र के लिए परमावश्यक माना है। सच तो यह है कि उनमें से अनेक लोग इन भ्रांतियों और संभ्रमों में इसलिए उलझे हुए हैं, क्योंकि इन्हें उन्होंने मानव जीवन में धर्म और ईश्वर की महत्ता और गहन प्रभावशीलता के परिणामस्वरूप ग्रहण किया है। आज भी, आखिर क्यों इन दिव्यात्माओं द्वारा ईश्वर और धर्म को लोगों के दिलो-दिमाग में  बैठाने के लिए सुनियोजित प्रचार-प्रसार किया जा रहा है? इसकी एकाएक जरूरत कैसे पैदा हो जाती है? उसका प्राप्तव्य क्या है? कौन उसका लाभ उठा रहा है? 

सबसे बड़ी और महत्त्वपूर्ण बात, क्या हम यह सोचते हैं कि यीशु और मोहम्मद जो पूरी तरह निःस्वार्थ थे, जिन्होंने मनुष्यता के लिए बड़े-बड़े त्याग किए थे, वे भी ईश्वर और धर्म में अंतनिर्हित वास्तविक दर्शन को, जैसे उनके बारे में आज उपदेशों में बताया जाता है, उसी तरह से समझ ही नहीं पाए थे?

दोस्तो! मनुष्य ईश्वर को प्रत्यक्ष और स्वतंत्र रूप से देखने या महसूस करने में अक्षम है, भले ही ईश्वर को दुनिया में सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी और सर्वनियंता कहा जाता हो। इसके लिए वह आज भी दूसरों पर, जिन्हें दिव्यात्माएं कहा जाता है—निर्भर है। ईश्वर को ईश्वर दूसरों ने घोषित किया है। इसी तरह धर्म स्वयं, अपनी मर्जी से नहीं उपजे हैं। उन्हें मनुष्यों द्वारा गढ़ा गया है। मनुष्य को धर्म तथा उसके नियमों के अनुसार आचरण करने के लिए विवश किया जाता है। 

इसका तर्क-सम्मत समाधान क्या है?

धर्म और ईश्वर समाज को भरमा रहे हैं। उन्हें मनुष्यता पर किसी और के द्वारा थोपा गया है। वे अपने अस्तित्व को स्वयं-प्रमाणित करने में असमर्थ हैं। इस काम के लिए भी उन्हें दूसरों की आवश्यकता है। उन्हें आज भी मजबूत प्रचारतंत्र की आवश्यकता है। इस तथ्य को हम भली-भांति समझ चुके हैं।

जो भी हो, हम तथाकथित सभी दिव्यात्माओं की पूरी तरह निंदा नहीं कर सकते। न ही हम उनके सभी कार्यों पर संदेह कर सकते हैं। जीसस और मोहम्मद इसी श्रेणी में आते हैं। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि उनके द्वारा कहा गया प्रत्येक शब्द, हर विचार बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं है। परंतु हम दावा भी नहीं कर सकते कि वे सभी स्वार्थी थे।

चूंकि ईश्वर और धर्म विशेषरूप से बुद्धिमान और तार्किक मनुष्यों के लिए रचे गए हैं, इसलिए बाकी प्राणियों के लिए न तो कोई धर्म रचा गया है, न ही ईश्वर। इससे हम इस विश्वास तक पहुंचते हैं कि उन्हें केवल मनुष्यता के कल्याण हेतु गढ़ा गया है।

ऐसी आवश्यकता केवल इस तथ्य के कारण उत्पन्न होती है कि समस्त जीवधारियों में केवल मनुष्य ही है, जो साथ-साथ रहने के लिए, समाज का गठन करता है।

आमतौर पर सभी मनुष्येत्तर प्राणी अपनी देखभाल स्वयं करते हैं। वे अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए उत्सुक रहते हैं। वे दूसरे के सुख-साधनों की चिंता नहीं करते। यह उनकी स्वाभाविक वृत्ति है।

अन्य जीवधारियों की तुलना में मनुष्य अपेक्षाकृत ज्यादा बुद्धिमान है। यदि वह असीमित स्वार्थ की तरफ बढ़ा तो उससे दूसरों के हित खतरे में पड़ सकते हैं। परिणामस्वरूप समाज को खतरा उत्पन्न हो सकता है। यही  अवधारणा ईश्वर और धर्म की रचना को औचित्यपूर्ण ठहराती है। लेकिन ऐसे मनुष्य के लिए जो समाज से पूरी तरह अलग-थलग, निरपेक्ष है—उसे ईश्वर या धर्म की कोई आवश्यकता नहीं है। परंतु ऐसे व्यक्ति पर जो दूसरों के साथ रहता है, बड़े समाज का हिस्सा है, उसपर कुछ प्रतिबंध, जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में लगाए गए हैं। इससे उसका जीवन अप्राकृतिक रास्ते पर बढ़ने लगता है। समाज की आवश्यकता उसके अस्तित्व की शर्त भी यही है। अन्यथा आप समाज में मनुष्यों को जानवरों जैसा व्यवहार करते हुए पाएंगे। व्यक्ति में प्रकृति-विरुद्ध जीवन जीने का सामर्थ्य पैदा करने के लिए ही  हमारे विद्वान पूर्वजों को ईश्वर और धर्म की रचना उसके उपदेश के लिए प्रेरित किया था।

इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया विचार कीजिए कि राज्य, सरकार, कानून और दंड जैसी संस्थाएं किसलिए बनीं। यदि राज्य की कृपा, न्याय, कानून और दंड नहीं होगा तो शांति नहीं होगी। पर्याप्त सुरक्षा का अभाव रहेगा। किसी प्रकार की व्यवस्था नहीं होगी। राज्य, कानून एवं दंड के रूप में व्यवस्था के कारण ही हम जीवन को चलाने में सक्षम हैं। ये व्यवस्थाएं लोगों के एक साथ, शांतिपूर्ण ढंग से जीवनयापन रहने के लिए निस्संदेह उपयोगी हैं। बावजूद इसके हम यह नहीं कह सकते कि इतना पर्याप्त है। हमें कुछ और नहीं चाहिए। समाज को पूरी तरह से शांतिमय बनाने के लिए अब भी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। कोई मनुष्य अपने सहवासी मनुष्यों को किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचाए, इसके लिए अभी और प्रयास करने होंगे। केवल कानून की मदद, उसके प्रवर्तन द्वारा जीवन के सभी लक्ष्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकता। जरूरत के समय दूसरों की मदद हासिल करने के लिए समाज में आपसी प्रेम और भाईचारा आवश्यक है। इसके लिए आवश्यक है सभी लोगों के बीच अनुशासन की, प्रेम की, सहानुभूति की, ईमानदारी की और एक-दूसरे के प्रति आभार प्रदर्शन की। समाज में रहते हुए मनुष्य को अच्छी चीजों को ग्रहण करना चाहिए, जो खराब है, उसका विरोध करना चाहिए। किसी को भी दूसरे की वस्तुओं की चाहत या लालच में नहीं पड़ना चाहिए।

ये और इस तरह की दूसरी चीजों को केवल कानून के बल पर प्राप्त नहीं किया जा सकता। संक्षेप में यदि मनुष्य को अपनी प्राकृतिक स्वतंत्रता के साथ जीने की अनुमति दी जाए तो उसे अनुशासित नहीं किया जा सकता। उसे दूसरों को हानि पहुंचाने से रोकना असंभव होगा। इसलिए कायदे-कानून और सामाजिक मर्यादाएं अपरिहार्य मानी जाती हैं। सामाजिक मर्यादाओं को केवल कानून के सहारे मनुष्यता पर नहीं थोपा जा सकता। ईश्वर को इसलिए रचा गया है, ताकि सामाजिक कायदे-कानूनों को लोगों पर बलपूर्वक लागू किया जा सके। इस तरह ईश्वर और धर्म की अभिरचना का उद्देश्य लोगों को विशिष्ट तरीके से सोचने और कार्य करने के लिए प्रवृत्त करना है। क्या ऐसी रचनाओं का कोई और भी उद्देश्य है? ईश्वर और धर्म लोगों को यह बताने के लिए भी थोपे गए हैं, कि स्वर्ग जाने का अधिकार और अवसर केवल उनके निर्देशों अनुपालन से ही संभव है। ईश्वर के नाम पर इस तरह के दुष्प्रचार में फंसकर भोले-भाले जन उसके आशीर्वाद हेतु निरंतर प्रार्थनारत रहते हैं। मनुष्य का लालच और उसका डर, ये दो बातें हैं, जिनका उपयोग, शासकीय कानूनों एवं दंड विधान से अधिक शक्तिशाली हथियार के रूप में किया जाता है। इस रूप में ईश्वर और धर्म समाज के सहायक की भूमिका निभाते हैं।

यहां एक और महत्वपूर्ण मुद्दे पर मैं चर्चा करना चाहता हूं। उन्नत वैज्ञानिक प्रबोधन और प्रौद्योगिकीय विकास के इस युग में, बढ़ते धार्मिक प्रचार-प्रसार को देखकर, आप पूछ सकते हैं कि ऐसा क्यों है? संक्षेप में अधिक धार्मिक प्रचार-प्रसार की आवश्यकता को तेजी से महसूस किया जाने लगा है। इसके कई कारण हैं। व्यक्तिगत संपत्ति रखने का अप्राकृतिक अधिकार बढ़ता ही जा रहा है। पूरा समाज सांप्रदायिकता के चंगुल में है। ऊंच-नीच और भेदभाव बढ़ने के चिह्न बढ़ते ही जा रहे हैं। दूसरी ओर शोषण और वर्चस्ववाद के विरोध का भी प्राबल्य है। न्याय और समानता की मांग उत्तरोत्तर बढ़ रही है। केवल कानून के भरोसे इनमें कटौती संभव नहीं है। एक गंभीर स्थिति तेजी से विकसित हो रही है। भले ही सारे कानून उच्च जातियों के मुखियाओं द्वारा बनाए गए हों, आसन्न खतरे को देखते हुए वर्तमान कानूनी प्रावधानों के साथ कोई शासक वर्ग आराम नहीं कर सकता। जो लोग कानून की अवहेलना करते हैं, उनसे कानून की मदद से, सख्ती के साथ निपटा जा सकता है। लेकिन यदि गरीब और निम्नतर श्रेणी के लोगों का विद्रोह बढ़ता है, तो कोई शासक उनके आगे टिक नहीं पाएगा। भारी उथल-पुथल और अव्यवस्था में कानून काम नहीं कर सकते। उस समय  किसी को सजा का भय नहीं रहता। यदि ऐसी अप्राकृतिक स्थितियां बनती हैं, तो उसके लिए पर्याप्त सुरक्षा प्रबंध भी आवश्यक होंगे। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए ही ईश्वर और धर्म को आवश्यक माना गया है। मगर, जहां ईश्वर नहीं है, वहां अमीर और गरीब नहीं हो सकते। इसी तरह यदि कहीं धर्म नहीं है, तो वहां जाति आधारित ऊंच-नीच और भेदभावों के लिए भी कोई जगह न होगी।

इससे हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि अमीर लोगों, शोषकों, उच्च जाति के लोगों, तथाकथित महापुरुषों के निहित स्वार्थों और हितों की रक्षा के लिए ही ईश्वर और धर्म की रचना की गई है। शासकवर्ग उसके कानून तथा अन्य दंडविधान, ईश्वर और धर्म के कारण ही सुरक्षित होते आए हैं। क्या इसकी वजह यह है कि समाज को ईश्वर और धर्म के नाम पर ज्यादा बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकता था? जिसे कानून के द्वारा निषिद्ध नहीं किया जा सकता, उसे धर्म के सहारे आसानी से आसानी से निषिद्ध ठहराया जा सकता है।

और भी मुखर होते हुए मैं कहना चाहूंगा कि ईश्वर और धर्म, उन समस्याओं का समाधान करने के लिए आवश्यक हैं, जो प्रकृति के विरुद्ध हैं। दैवी शक्तियां चाहती हैं कि मनुष्य अप्राकृतिक परिवेश और परिस्थितियों में रहे। यही कारण है कि वे अधिकाधिक ईश्वरों और धर्मों की रचना के प्रति सतत आग्रहशील रहती हैं।

यदि हम शासक-वर्ग, जाति और विषमताओं को मिटाने में सफल हो जाएं तो ये सभी ईश्वर और धर्म गुमनामी में जाकर नगण्य बन जाएंगे। दर्शनशास्त्र में ईश्वर और धर्म बस इतना ही महत्त्व है, यही हमारे अभी तक के विमर्श का निचोड़ है।

मनुष्य की प्रकृति

आइए, अब हम देखते हैं कि ईश्वर और धर्म की रचना का उद्देश्य क्या था? वे किसके लाभ के लिए बनाए गए थे। कथित दिव्यात्माओं का उनकी रचना के पीछे मूल उद्देश्य क्या था? यह सब इसलिए हुआ कि समस्त प्राणियों में केवल मनुष्य ही विवेक-बुद्धि से संपन्न था।

यही नहीं, जनसाधारण के लिए तो ईश्वर और धर्म का दर्शन ही अस्पष्ट और अलभ्य है। इसके अतिरिक्त उन देव-पुरुषों की एक और रचना भी है। जिसे आप न तो छू सकते हैं, न महसूस कर सकते हैं। वे उसे आत्मा कहते हैं। अब हमें उसकी दार्शनिक अवधारणा पर विचार करेंगे।

मनुष्य क्या है और आत्मा क्या है? इस दुनिया में पाए जाने वाले अनेक प्राणियों में मनुष्य भी एक है। दुनिया में पाए जाने वाली बहुत-सी वस्तुओं में से कुछ चेतन हैं, कुछ अचेतन। दूसरे शब्दों में वे क्रमशः जीवित प्राणी और निर्जीव प्राणी कहे जाते हैं। ये सब विभिन्न चीजों के सम्मिलन का परिणाम हैं। उन्हें उनकी विशिष्ट आकृति और रूपरेखा के अनुसार नाम दिए गए हैं। यदि आप उनमें से किसी एक अंश को अलग करते हो, तो वह वस्तु वह नहीं रहती जो वह है। इसलिए वह अपना नाम खो देती है। उससे अलग हुआ हिस्सा भिन्न नाम से पुकारा जाता है। अंततः उसकी मूल संरचना और आकृति नष्ट जाती है। मनुष्य को भी उन्हीं में से एक माना जाता है।

अब मनुष्य पर आते हैं। उसकी देहयष्टि किसी आदमी से ही मिलती-जुलती है। आप उसकी देह के किसी अंग का स्पर्श करते हैं। प्रत्येक अंग का अलग और विशिष्ट नाम है, जैसे सिर, हाथ, टांग, छाती….वगैरह। लेकिन मान लीजिए आपसे अपने सिर को छूने के लिए कहा जाता है, आप अपने बाल या चेहरे या गर्दन को भी स्पर्श कर सकते हैं। यही बात दूसरी वस्तुओं जैसे कि नली, लेंप, पानी, कुर्सी, जूते, झाडू, बर्तन, गाड़ी, जहाज आदि पर भी लागू होती है। इससे हमें पता चलता है कि कोई भी वस्तु या सामान दूसरी कई वस्तुओं का समुच्च्य मात्र है। इसका आशय है कि विभिन्न वस्तुओं का उन सबके अलग-अलग गुणों के साथ समायोजन। परस्पर सम्मिलित विभिन्न वस्तुएं अलग रूपाकार में ढलती हैं और इस प्रकार वे नया नाम ग्रहण कर लेती हैं।

बढ़ई लकड़ी की अनेक वस्तुएं बनाता है। अपने कार्य हेतु जरूरत पड़ने पर वह लोहे की भी मदद लेता है। बढ़ई द्वारा बनाई गई वस्तुएं विभिन्न नामों से जानी जाती हैं, जैसे कि कुर्सी, बैंच, बॉक्स, चारपाई, अलमारी, गाड़ी, जहाज, ट्रेन आदि आदि। केवल लकड़ी और लोहे जैसे कच्चेमाल के सहारे वह हजारों प्रकार की वस्तुएं, जिनका अलग-अलग प्रयोग हो सकता है, बना देता है। अब आदमी पर आते हैं। दूसरी वस्तुओं की भांति विविध प्रकार के कच्चे माल से बनी मानव-देह भी एक वस्तु है। मनुष्य चल-फिर सकता है। जोर भी लगा सकता है। पशु जैसे कि गाय, सांड, सुअर, गधा, घोड़ा, हाथी, शेर, चीता, लोमड़ी, सांप, बिच्छू, पक्षी, कीड़े-मकोड़े तथा अन्य जीव-जंतु भी अनेक प्रकार के कच्चेमाल के संयोजन से बने हैं। दूसरे प्राणियों की भांति मनुष्य भी जीव है। क्यों? यह इसलिए कि मनुष्य बातचीत कर सकता है और अपनी भावनाओं को स्पष्ट तौर पर अभिव्यक्त कर सकता है। यही मनुष्य की महानता का आधार है। लेकिन आप देखते हैं कि पक्षी आसमान में बहुत ऊंचा उड़ जाते हैं और दिखाते हैं कि इस मामले में वे दूसरे जीव-जंतुओं से श्रेष्ठतर हैं।

सरसरी तौर यदि हम देखते तो मनुष्य में कुछ भी खास या दूसरों से बढ़कर नजर नहीं आता। हम बस इतना ही कह सकते हैं कि चिंतन, अभिव्यक्ति और अकेले काम करने की योग्यता के बल पर वह दूसरे जीवधारियों से तेजी से आगे निकलने में सक्षम होता है।

हमें बिना झिझक यह बात स्वीकार कर लेनी चाहिए कि बुद्धि-विवेक और चिंतन-सामर्थ्य अधिक मात्रा में केवल मनुष्य में पाए जाते हैं। मनुष्य का यह गुण सर्वस्वीकार्य और निर्णायक है, हालांकि हम कुछ प्राणियों को मनुष्य की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली पाते हैं। मनुष्य में उनकी शक्ति नहीं होती। लेकिन हमें विचार करना होगा कि कुछ विशिष्ट शक्तिशाली जानवरों की ताकत किसी अन्य तरीके से दूसरे जीवधारियों या मनुष्य के लिए मददगार है? ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य तर्कसंगत ढंग से सोच सकता है, जीवन को विनियमित करने के लिए उसने ईश्वर और धर्म की सृष्टि की है। ऐसे मनुष्य के बारे में ईश्वर और धर्म के प्रवर्तक कहते हैं कि वह उनकी मदद के बिना आगे नहीं बढ़ पाएगा।

मैं इस तथ्य की ओर संकेत करना चाहूंगा कि मनुष्य की विवेकशीलता ने उसे अधिक चिंताकुल बनाया है। उसकी इच्छाओं का कोई अंत नहीं है। वह दूसरों के प्रति ईष्र्या और शत्रुभाव पाले रहता है।

मनुष्य के चिंतन-सामर्थ्य ने उसे दूसरों का शोषण, अवमानना, घृणा करना और धोखा देना सिखाया है।

आप यह नहीं कह सकते कि तर्कशक्ति और चिंतन-सामर्थ्य से संपन्न व्यक्ति, दूसरे जीव-जंतुओं की भांति कोई भी बुरा काम नहीं करता। हिंस्र पशु दूसरे जीव-जंतुओं को नुकसान पहुंचाते हैं, उनकी पीड़ा का कारण बनते हैं। लेकिन आदमी क्या करता है? क्या तुम कह सकते हो कि मनुष्य दूसरों को हानि नहीं पहुंचाता, या उनके कष्ट का कारण नहीं बनता। नहीं! क्या फिर भी हम कह सकते हैं कि मनुष्य विवेक-बुद्धि और चिंतन-सामर्थ्य से संपन्न है।

कुछ व्यक्ति स्वयं को दूसरों से महान समझते हैं। इस आधार पर कि वे चित्र बना सकते हैं, अथवा कविता की रचना कर सकते हैं, या सोना जमा कर सकते अथवा एक ही दिन में लंदन से लौट-फेर कर सकते हैं। क्या वे सचमुच महान हैं? कृपया इसपर विचार कीजिए। ठीक ऐसे ही जैसे दूसरे प्राणियों में कुछ खास गुण होते हैं, मनुष्य में भी विशेषताएं होती हैं। क्या हम किसी व्यक्ति को केवल इसलिए महान कह सकते हैं कि वह जीवित है, अभी तक उसने मृत्यु का सामना नहीं किया है? क्या हम किसी व्यक्ति को इसलिए महान कह सकते हैं कि वह दूसरों को धोखा देने में माहिर है?

हम देखते हैं कि सभी जीव-जंतुओं का लगभग एक जैसा चरित्र होता है। उनका सोचने और कार्य करने का ढंग भी एक समान होता है। प्राकृतिक रूप से वे लगभग एक जैसे हैं। यहां तक कि जन्म, उत्तरजीविता तथा मृत्यु को लेकर भी जैविक प्राणियों में अद्भुत साम्य होता है। लेकिन समाज में रहते मनुष्य स्वयं को स्वतंत्र इकाई मानता है।

हम अलग-अलग व्यक्तियों में अलग-अलग गुण-धर्म महसूस करते हैं। कुछ को अच्छा व्यक्ति कहते हैं। कुछ को हम बुरे आदमियों के रूप में नापसंद करते हैं। कुछ को हम स्वभाव से असभ्य और जंगली मानते हैं। जबकि कुछ को साधु, करुणामय, कंजूस, ईमानदार, निरंकुश, कृतज्ञ, विश्वासघाती, बुद्धिमान, मूर्ख और जिज्ञासु के रूप में पाते हैं। क्या कारण है जो हम विभिन्न व्यक्तियों पर विभिन्न विशेषताएं लाद देते हैं। ऐसे मतभेदों का कारण क्या है? क्या अपने चरित्र वह चाहे जैसा भी हो, के लिए क्या वे स्वयं जिम्मेदार हैं? अथवा उनका रूपाकार, शारीरिक अंगों का समुच्च्य उनकी प्रकृति तथा कर्मों के लिए जिम्मेदार है? इस विषय पर गहराई से विचार करना चाहिए।

आप एक कुत्ते में क्या देखना चाहते हैं? उसे कृतज्ञ होना चाहिए, उसे घर की पहरेदारी करनी चाहिए। उसे अपने स्वामी का विश्वसनीय होना चाहिए।

आप लोमड़ी को देखते हैं जो दिखने में लगभग कुत्ते जैसी ही है। लेकिन उसका व्यवहार? आपको उसमें एकदम विपरीत लक्षण दिखाई देंगे। इसके पीछे कारण क्या है?

यहां तक कि कुत्तों में भी, कुछ कुत्ते कटकने होते हैं। कुछ कुत्ते बिलकुल नहीं काटते। कुछ भोजन चुरा लेते हैं। कुछ अपने स्वामी के हमेशा निकट रहते हैं। कुछ उस समय तक अपने मालिक के पास नहीं आते जब तक बुलाया न जाए। कुछ कुत्ते बहुत बुद्धिमान होते हैं। कुछ कुत्ते पूरी तरह नासमझ होते हैं। स्वभाव के इस अंतर के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या यह प्राकृतिक है? क्या हमें यह मान लेना चाहिए कि यह जन्म से ही, शरीर में भिन्न प्रकार की तत्व सामग्री के कारण है?

कुछ सांड आदमी को देखते ही उसे अपने सींगों से घायल कर देते हैं। कुछ कोई प्रतिक्रिया नहीं करते, भले ही आप उनकी पिटाई करते रहें।

एक हाथी महावत को ले जाने से मना कर, उसे मार देता है। दूसरा अपने महावत के आदेशानुसार शांतिपूर्वक काम करता रहता है। नरमी से पेश आता है।

अपने व्यवहार के लिए क्या जानवर स्वयं जिम्मेदार हैं? क्या वे प्रकृति से ही ऐसे हैं। क्या उन्होंने अपनी विशेषताएं जन्म से आत्मसात की हैं? क्या हम कहते सकते हैं कि उनके व्यवहार के अंतर के लिए उनकी शरीर रचना में काम आए पदार्थ जिम्मेदार हैं? इन प्रश्नों पर विचार कीजिए।

अब हम मनुष्य पर आते हैं। उसके आचरण को देखिए। कुछ लोग आखिर चोर क्यों हैं? क्यों कुछ लोग सदैव अकृतज्ञ, निष्ठुर, घमंडी और स्वार्थी होते हैं? क्यों कुछ लोग रात-दिन झूठ बक्कारते रहते रहते हैं? क्यों कुछ लोग विश्वासघाती और ईर्ष्यालु होते हैं? मनुष्य का व्यवहार, उसकी प्रकृति तथा उसके कार्यों का संबंध उसके शरीर में मौजूद तत्वों से होता है।

आप एक वाद्ययंत्र को जानते हैं, जिसे बांसुरी कहा जाता है। वह सिर्फ एक वस्तु है। संगीतकार भी एकल व्यक्ति है। बांसुरी के जिस छिद्र पर वह मुंह रखता है, वह भी एक ही है। फिर वह अनेक ध्वनियां कैसे पैदा कर लेता है? वह इसलिए कि बांसुरी में अनेक छिद्र होते हैं, जिनपर संगीतकार की उंगलियां नर्तन करती रहती हैं। इसी प्रकार जीवित प्राणियों, विशेषकर मनुष्यों में मनुष्य का व्यवहार तथा उसकी गतिविधियां—उसकी देह के विभिन्न अंगों-उपांगों से जैसे दिमाग, स्नायुतंत्र, शरीर आदि से संबंधित होती हैं। कुल मिलाकर मनुष्य बहुव्यापी अंतर के लिए जिम्मेदार नहीं है। उसके शरीर में कुछ तत्व है, वही जिम्मेदार हैं।

तर्क सामर्थ्य से संपन्न व्यक्ति इस संबंध को समझने तथा उसके अनुसार आचरण करने में असफल हो चुका था। वह केवल आदमी को दोष देता है, जो न तो वांछित और प्रशंसा योग्य है, न ही विधि-सम्मत। मनुष्य को मानव प्रकृति को पूरी तरह से समझने की संभावनाओं को ही नकार दिया गया था।

यहां तक कि जैसे देखना महज दृष्टि-प्रभाव है, सुनने की अनुभूति कर्ण-संवेदना है, उसी प्रकार आप पाएंगे कि ज्ञान, मैत्री, आविष्कार और शोध-सामर्थ्य तथा अन्य गुणों जैसे कि क्रोध, हंसी, प्यार और प्रतिशोध—कोशिकाओं, नसों, रक्त-कणिकाओं आदि जो मानव-शरीर में समाए हुए हैं—के सम्मिलित प्रभाव हैं।

मैं इस बारे में विस्तार से चर्चा करूंगा, इस तथ्य पर जोर देने के लिए कि मनुष्य सीधे-सीधे और पूरी तौर पर इन सब अभिक्रियाओं और गतिविधियों के लिए जिम्मेदार नहीं है।

आप देखते हैं कि कुत्ता मालिक का भरोसेमंद होता है, बिल्ली चोरी-चकारी करती है। उल्लू रात्रि में देख सकता है। बाज अपने लक्ष्य को बहुत दूर से पहचान सकता है। ये सब संभव हैं और ये प्राणी-विशेष की कोशिकाओं तथा शरीर के दूसरे अंगों के तालमेल की प्रवृत्ति पर निर्भर होते हैं। किसी भी प्राणी की गतिविधि उसके शारीरिक अंगों की व्यवस्था, तथा उसके अवयवों की प्रकृति, जिनसे उनका शरीर बना है—पर आधारित होती है। इसलिए मुझे एक चोर को ईश्वर, धर्म अथवा शास्त्र या कानून के आधार पर दंडित करने का औचित्य प्रतीत नहीं होता।

आप किसी मुर्गी को कीड़े-मकोड़े खाने के लिए कैसे दंडित कर सकते हैं। चूहे खाने पर बिल्ली को कैसे सजा सुनवा सकते हैं। ईश्वर किसी बाज को, कौओ और मुर्गियों पर झपटृा मारकर ले जाने के लिए दंडित कैसे कर सकता है? यदि ईश्वर इन सभी को दंडित करने में सक्षम है, तो वह दीमक को भी सजा सुनाने का सामर्थ्य रखता होगा जो लकड़ी से बने साज-सामान को खाकर नष्ट कर देती है। ईश्वर में उस कीचड़ को दंड देने का सामर्थ्य भी होना चाहिए, जो लोहे से बनी वस्तुओं के जंग का कारण बनता है।

अब मुझे विश्वास है कि मैं मानव शरीर की संरचना तथा उसके विभिन्न अंगों-उपांगों  के कार्यों के बारे में स्पष्ट चर्चा कर चुका हूं। आगे मैं आत्मा पर बातचीत करूंगा।

आत्मा

मनुष्य के शरीर तथा उसके अंगों के बारे में चर्चा करते समय, आपने देखा कि उसमें आत्मा के उल्लेख की कतई आवश्यकता नहीं है। मानव शरीर में जो भी पाया गया था, उसके बारे में बताया जा चुका है। शरीर के अंगों को देखा और अनुभव किया जा सकता है। शरीर के बारे में भली-भांति जानने-समझने में हमारे अनुभव ने हमारी मदद की थी। प्राप्त निष्कर्ष हमारी विवेक-बुद्धि को भी स्वीकार्य थे।

परंतु जब हम आत्मा पर विचार करने बैठते हैं, तो उसे हम न देख पाते हैं, न ही छू सकते हैं। हमें उसका कोई अनुभव नहीं है। इसलिए जहां तक ज्ञान का संबंध है, हम आत्मा के बारे में कुछ भी जुटाने में नाकाम सिद्ध होते हैं।

सीधे तौर पर ‘आत्मा’ का अस्तित्व अंध-आस्था और जड़-विचारशीलता पर निर्भर है। मानवीय विवेक अथवा उसके अनुभव का आत्मा के बारे में कोई योगदान नहीं है। फिर आत्मा क्या है? वह उतनी ही काल्पनिक रचना है, जितना कि ईश्वर। ईश्वर की न तो कोई आकृति है, न ही छवि। आत्मा भी ऐसी ही है। ईश्वर न तो दृश्यमान है, न उसे स्पर्श किया जा सकता है। आत्मा के बारे में भी यही सच है। ईश्वर की कोई निश्चित देहयष्टि या अंग अथवा अवयव जैसे कि आंखें, नाक, कान, मुंह, हाथ आदि नहीं हैं। आत्मा की भी यही स्थिति है। व्यक्ति न तो ईश्वर तक पहुंच सकता हैं, न ही उसे जान सकता है। आप न तो उसकी शक्तियों का आकलन कर सकते हैं, न उसके कार्यों का अवलोकन। कोई भी व्यक्ति ईश्वरीय सत्ता को तर्कशक्ति और भरोसेमंद तरीके से प्रमाणित करने में सक्षम नहीं है। ईश्वर की भांति आत्मा का अस्तित्व भी अप्रमाणित है। फिर हमें आत्मा की आवश्यकता क्यों पड़ती है? उसकी रचना किसलिए हुई है। किसने इन्हें रचा है। इसका लाभ कौन उठा रहा है? आप किसी भी स्रोत से इन प्रश्नों का उत्तर नहीं जान सकते। आपको सीधे तौर पर यह विश्वास करना होगा कि ऐसा कुछ नहीं है, जिसे ‘आत्मा’ की संज्ञा दी जा सके। ‘आत्मा’ कुछ ऐसी चीज है जिसका न तो परीक्षण किया जा सकता है, न ही जांचा-परखा जा सकता है।

लेकिन, ‘आत्मा’ के अस्तित्व को स्वीकारा गया है। ठीक ऐसे ही जैसे अधिकांश लोग ईश्वर और धर्म के अस्तित्व को, विशेष परिस्थितियों के कारण, स्वीकार कर लेते हैं। बाकी लोग जिनका न तो ईश्वर में विश्वास है, न ही धर्म में, जो विवेकवान हैं और जिन्हें तर्क करने का प्रशिक्षण मिला है, उन्हें आत्मा न तो आत्मा से कोई मतलब है, न ही उसे मानने की जरूरत है। आत्मा के दर्शन के बारे विचार करना आवश्यक है।

शरीर(स्पर्श), मुंह, नाक, कान तथा आंखों को पंच-इंद्रियां कहा जाता है। सोचना, बोलना तथा अन्य क्रियाएं ‘मुकारनम’ कही जाती हैं। यदि कोई वस्तु मानवीय संचेतना की इन कसौटियों पर खरी नहीं उतरती है, उसके वास्तविक अस्तित्व को नहीं स्वीकारा जा सकता। कुछ ऐसे लोग भी हैं जो कहते हैं कि ईश्वर किसी भी प्रकार की जांच अथवा साक्ष्य से परे है। लेकिन यह कहना कि सत्य तक पहुंचने के लिए कुछ भी और सभी कुछ परीक्षण से परे है, ‘सत्य’ शब्द को शब्दकोश से मिटाने की कोशिश करने  जैसा है।

‘आत्मा’ शब्द तमिल भाषा का शब्द नहीं है। इससे स्पष्ट है कि द्रविड़ प्रजाति के तमिलवासी, पुख्ता तौर पर आत्मा के दर्शन से अनभिज्ञ थे। आप ‘आत्मा’ का वर्णन केवल उत्तर की भारतीय भाषा संस्कृत में पा सकते हैं। अंग्रेजी शब्द Soul का अर्थ तथा उसकी व्याख्याएं ब्राह्मणों द्वारा की गई ‘आत्मा’ की परिभाषा और व्याख्या से मेल नहीं खाती।

आप मानव-शरीर में ऐसा कोई स्थान नहीं खोज सकते जो आत्मा के लिए निश्चित या निर्धारित हो। ‘आत्मा’ ऐसा कोई कार्य नहीं करती जिसका मनुष्य अथवा उसके शरीर से संबंध हो। मनुष्य के सभी अंग अपना-अपना काम करते हैं। जबकि आत्मा का शरीर में कोई कार्य नहीं है। हमारी इंद्रियां हमें अपने परिवेश को पहचानने का सामर्थ्य देती हैं। वह सब कुछ प्राकृतिक लगता है। परंतु ‘आत्मा’ के बारे में? वह क्या है? कहां रहती है? उसका कार्य क्या है?

‘आत्मा’ मानव शरीर के लिए अप्राकृतिक, अनैच्छिक और असंबद्ध वस्तु है।

कोई मशीन कैसे काम करती है? क्योंकि उसके सभी पुर्जे एक-साथ भली-भांति समायोजित किए गए हैं। घड़ी पर नजर डालिए। वह समय बताती है। अलार्म बजाकर वह मनुष्य को जगा देती है। इसके लिए घड़ी के भीतर तरह-तरह के पुर्जे लगे हैं। उन्हीं के अनुसार वह अनेक प्रकार के कार्य करती है।

यदि हम उसकी आगे जांच करने लगें तो हमें यह तथ्य स्वीकारना पड़ेगा कि वह घड़ी है, जिसमें अनेक पुर्जें यत्नपूर्वक और विशेषक्रम में जोड़े गए हैं, ताकि वह विशेष रूप से निर्धारित कार्यों को कर सके। इसके अलावा भला और क्या कहा जा सकता है? इस बात पर कौन विश्वास करेगा कि घड़ी के भीतर एक चमत्कारी भूत या वस्तु निवास करती है, वही घड़ी को उसके अलग-अलग कार्य करने के योग्य बनाती है। क्या इसपर कोई आंख मूंद कर विश्वास कर लेगा?

एक बार, आज से करीब पचास वर्ष पहले, एक ग्रामीण हमारी दुकान पर आया। उसने दीवार पर टंगी बड़े आकार की घड़ी की ओर देखा। उसने देखा कि घड़ी का पेंडुलम आगे-पीछे डोल रहा है। उसने घंटी की आवाज को सुना। वह आश्चर्य में पड़ गया। उसने पूछा वह आदमी कहां है जो घड़ी के पेंडुलम को हिला रहा है? वह जानना चाहता था कि वह आदमी कहां है जो घंटी बजाकर आवाज निकाल रहा है। मैंने मजाक में कहा कि दीवार के पीछे मौजूद एक आदमी ही सबकुछ कर रहा है। मेरी बात पर विश्वास कर वह मेरी प्रशंसा करने लगा—‘आप भगवान हैं! बड़े महाराज! आप अनेक लोगों को नौकरी पर रख सकते हैं।’

उस ग्रामीण को मैं भला क्या जवाब देता? यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि केवल वही लोग जिनकी मनोरचना उस ग्रामीण जैसी है—ईश्वर, धर्म और आत्मा पर भरोसा कर सकते हैं। इसके अलावा उनपर विश्वास करने का कोई और ठोस कारण नहीं है। आप ऐसी अनेक मशीनों को देखते हैं, जो आश्चर्यजनक कार्य कर रही हैं, जिन्हें करना मनुष्य के सामर्थ्य से परे हैं। उन मशीनों में ऐसी आत्मा जैसी कोई वस्तु नहीं है, जिसे मनुष्य की गौरवशाली संपदा माना जाता है।

इस्लाम और ईसाई धर्म किसी आत्मा को नहीं मानते। बौद्ध धर्मावलंबी उसके अस्तित्व को नकारते हैं। मूल द्रविड़ों का भी ‘आत्मा के दर्शन पर विश्वास नहीं था। यह कैसे हुआ कि आज यह हमपर पूरी तरह से छाया हुआ है। इस तरह की काल्पनिक और अविश्वसीय वस्तु की रचना के पीछे क्या कोई वास्तविक तर्क है? आत्मा के बारे में जो बताया जाता है, क्या उसपर विश्वास किया जा सकता है? आत्मा का दर्शन केवल धर्म-विशेष पर लागू होता है। दूसरे शब्दों में आत्मा के बिना हिंदू दर्शन शून्य है।

‘आत्मा’ सत्य नहीं है। इसकी रचना केवल धर्म-विशेष की रक्षा हेतु की गई है। एक झूठ को ढकने के लिए, अनेक झूठों की आवश्यकता पड़ती है। इसी तरह एक मिथ्या धर्म और ईश्वर की रक्षा हेतु मिथ्या आत्मा की रचना की गई है। आधारहीन हिंदू दर्शन को स्थापित करने के लिए, ब्राह्मणों द्वारा अनेक आधारहीन दार्शनिक प्रत्ययों यथा आत्मा, स्वर्ग, नर्क, भाग्य, कर्म की रचना की गई है।

हम मनुष्य के बारे में क्या पाते हैं? वह जन्म लेता है। बड़ा होता है। अपने शारीरिक एवं बौद्धिक सामर्थ्य के अनुसार काम करता है। तदनंतर मर जाता है। मृत्यु पश्चात उसे या तो जला दिया जाता है, अथवा दफना दिया जाता है। उसके बाद दुनिया से उसका संबंध टूट जाता है। यही सत्य है जिसे हम मानव जीवन में घटते हुए देखते हैं। इसके अतिरिक्त अनावश्यक रूप से अंधे होकर किसी दूसरे दर्शन पर भरोसा करने की क्या आवश्यकता है?

आत्मा की अवधारणा के सर्जक ने इतनी जहमत क्यों उठाई। आत्मा को एक परमाणु से भी छोटा बताया जाता है। बताया जाता है कि वह बहुत महीन, संवेदनशील मगर अदृश्य वस्तु है, जिसे अनुभव नहीं किया जा सकता। आत्मा का कार्य मनुष्य के विचारों और कार्यों का चयन करते हुए, उसमें से अच्छे कार्यों को अलग करते हुए मनुष्य को अच्छे पदार्थों तथा कार्यों की ओर प्रवृत्त करना है। इसके मायने क्या हैं? क्या आप कुछ भी समझ पा रहे हैं?

हम कुछ ऐसा कहने जा रहे हैं कि एक आदमी जो न तो जन्मा है, न कि किसी स्थान पर पाया गया है, को दुष्कर्मों के लिए अविश्वसनीय दंड से गुजरना होता है। उन दुष्कर्मों के लिए जो वास्तव में उसने किए ही नहीं हैं। आप इस तुलना से क्या समझते हैं।

मान लीजिए घड़ी सही समय नहीं बताती है, इसमें दोष किसका है? उस आदमी का हो सकता है जिसने घड़ी को बनाया है। इसके पीछे उस आदमी की लापरवाही भी हो सकती है, जिसे उस घड़ी की देखभाल के लिए नियुक्त किया गया है। यह उस आदमी की चूक हो सकती है, जिसने समय देखा था। इन सब आदमियों को छोड़कर जिनका घड़ी से कोई न कोई संबंध है, यदि कोई घड़ी की ‘आत्मा’ पर सारा आरोप मढ़ देता है, और बाद में यह भी नहीं बताता कि आत्मा क्या है, आत्मा कहां है—ऐसे में किसी भी गड़बड़ी के लिए आत्मा को सीधे-सीधे दोषी ठहराना और दंड निर्धारित कर देना, कहां तक उचित होगा? क्या आप नहीं सोचते कि यह बड़ी धोखादड़ी है? इसी प्रकार, किसी आदमी द्वारा किए गए कृत्य को आत्मा से जोड़ देना और आत्मा के ऊपर दंड थोप देना—इससे भी बड़ी धोखादड़ी है।

किसी व्यक्ति के लिए आत्मा का महत्त्व कितना है? एक जीवित प्राणी की जिम्मेदारियां और कर्तव्य क्या हैं? हरे-भरे वृक्षों यहां तक पौधों और झाड़ियों को भी इनमें शामिल कर लीजिए। कोई भी वस्तु या जीव जो जन्म लेता है, अंततः नष्ट हो जाता है। किसी भी चीज को जन्मते हुए देखिए। वह कुछ समय तक रहेगा, अंततः मर जाएगा। किसी भी जीवित प्राणी का जीवन तथा उसके द्वारा किए गए कार्य उसके शरीर की संरचना तथा प्रकृति पर निर्भर होते हैं। जीवित प्राणी, वह चाहे जो भी हो, अपने जीवन में अपने कार्यों तथा जीवन जीने के तरीकों के लिए सीधे-सीधे जिम्मेदार नहीं हैं।

हम मानते हैं कि मनुष्य के आचरण में कुछ अच्छाइयां होती हैं, तो कुछ बुराइयां भी होती हैं। ऐसे में आत्मा को अच्छी राह बताने और भटकाने के लिए क्यों रचा जाना चाहिए? हम केवल कुछ कार्यों को अच्छा कैसे ठहरा सकते हैं? अच्छे या बुरे कार्यों को निर्धारित करने का क्या कोई सार्वभौमिक मानक या सर्वस्वीकार्य पैमाना है? फिर हम कैसे कहें कि हमारी आत्माओं को मृत्योपरांत अच्छे कार्यों के लिए अच्छी चीजें प्राप्त होती हैं। हम इस पर कैसे विश्वास कर सकते हैं कि मृत्यु के बाद आत्मा को बुरे कार्यों के लिए दंड से गुजरना पड़ता है। ये सब कितनी मजेदार बातें हैं। कृपया इन पर विचार कीजिए। इन सबका प्रमाण कहां है? हम ‘आत्मा’ और उसके कार्यों पर भला कैसे विश्वास कर सकते हैं। हम यह कैसे मान सकते हैं कि ‘आत्मा’ केवल अपने अच्छे कार्यों के कारण ‘मोक्ष’ प्राप्त करती है? क्या इसे कोई भी, किसी भी तरीके से प्रमाणित कर सकता है? इसलिए मैं सोचता हूं कि अब आप यह समझ चुके हैं कि आत्मा का दर्शन झूठा और ऊटपटांग है। आप किसी भी रास्ते से सोचिए, आत्मा की रचना का कोई औचित्य नहीं है।

संक्षेप में आत्मा हवा में खड़ा किया गया महल है।

व्यक्ति अपनी वस्तुओं की पहचान के लिए सीधे-सरल तरीके से यह ‘मेरी’, ‘मेरी अपनी’ और ‘मुझसे संबंधित है—कहता है। यदि वह कहे, ‘मेरी आत्मा’ इसलिए क्योंकि वह बिना जाने कि आत्मा क्या है, खुद को पहचानने की सुविधा प्रदान करती है। वास्तव में ‘मेरी आत्मा’ यह कहना ही अर्थहीन है।

जीवन आखिर क्या है? यह स्वयं एक विचारमात्र है। असल में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे जीवन कहा जाए। कुछ कहते हैं, जीवन आत्मा है। दूसरे कहते हैं आत्मा ही जीवन है। कुछ विद्वान कहते हैं जीवन कुछ भी नहीं है। कुछ मानते हैं कि जीवन कुछ ऐसा है जो आत्मनिर्भर होकर कार्य करता है।

जीवन

जीवन कोई वस्तु नहीं है। यदि यह वस्तु होता तो इसमें गति हो सकती थी। हम इसकी तुलना उस मशीन से कर सकते हैं, जो काम करती है। उसके चलने से बाकी हिस्से भी काम करते हैं। इसी तरह जीवन का कार्य है, शरीर के दूसरे सभी हिस्सों को संबंधित, कार्यों की ओर प्रवृत्त करना। यदि जीवन ऊर्जा है जो लोगों को काम करने के लिए चाहिए, यह(शरीर) भोजन के समान है, जो शरीर को क्रियाशील बनाए रखने के लिए अत्यावश्यक है। शरीर तथा उसके अंगों के निर्माण का चाहे जो उद्देश्य हो, यदि भोजन न मिले तो उनमें से कोई अंग काम नहीं कर पाएगा। इसलिए हम कह सकते हैं कि जीवन उस भोजन की देन है, जिसे हम ग्रहण करते हैं।

यदि शरीर के अंगों को किसी प्रकार की क्षति पहुंचे तो जीवन ठहर जाता है। यदि भोजन न मिले, तब भी जीवन ठहर जाएगा। शरीर की सारी गतिविधियां शांत हो जाएंगी। इसलिए जहां चेतना है, उसे हम मनुष्य कहते हैं। कह सकते हैं कि वही जीवन है। जब मनुष्य की गतिविधि थम जाएगी, वह लाश बनकर रह जाएगा। उस समय वह मनुष्य नहीं रहता। मृत्यु से क्या अभिप्राय है? यदि शरीर में सांस लेने और सांस छोड़ने की ताकत न रहे, तो कहा जाता है कि फेफड़े कमजोर पड़ चुके हैं। जब फेफड़े काम करने के लायक नहीं रहते, मनुष्य सांस लेने के काबिल नहीं रहता।

चूंकि मनुष्य का जीवन ही ऐसा है, वह व्यक्तिगत रूप से अपने सामान के बारे में बताने तथा उसकी ओर इंगित करने के योग्य होता है। दूसरे प्राणी भी अपने बारे में समझने की योग्यता रखते हैं।

यदि आपके पास कुत्ता है, जिसका नाम ‘गुलाब’ है, तो जब भी आप उसके नाम से पुकारेंगे, वह आपकी ओर चला आएगा। अनेक कुत्ते वैसी ही हरकतें करते हैं, जैसी हमें पसंद हैं। वे हमारे आदेश को समझते तथा उसपर अमल करते हैं। दूसरे प्राणी भी अपनी चीजों की समझ रखते हैं। वे अपने घौंसलों, बाड़ों और अपने बच्चों की जानकारी रखते हैं। यदि आप किसी आदमी से पूछें कि उसके लिए जीवन या आत्मा के क्या मायने हैं, वह वर्णन नहीं कर पाएगा। क्यों? इसलिए कि वे उससे संबंधित वस्तु विशेष; अथवा उसके शरीर का कोई हिस्सा नहीं हैं। वह उन रासायनिक अभिक्रियाओं से अनजान है, जो उसके भीतर बदलाव का कारण बनती हैं, तथा उसे वस्तु-जगत का अनुभव कराती हैं। यदि केसर और चूना को मिला दिया जाए, तो लाल रंग बन जाता है। नीला और पीला रंग मिलने पर हरा रंग बनाते हैं। आक्सीजन और हाइड्रोजन का यौगिक जल कहलाता है। इसी तरह जहर भी विशिष्ट तत्वों से मिलकर बनता है। कुछ रसायनों में उबाल आता है। उबलने के बाद कुछ चीजें कठोर हो जाती हैं।  गर्म किए जाने पर कुछ पदार्थों का वाष्पीकरण होने लगता है।

इसलिए जब हम कुछ पदार्थों को मिलते हुए देखते हैं, उस समय उनमें अनेक परिवर्तन होते हैं। यही परिवर्तन का प्राकृतिक नियम है, जिसे लोग भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते हैं। उदाहरण के लिए आप किसी संगीत-बॉक्स(रेडियो, ट्रांजिस्टर) को देखिए। नॉब को घुमाने भर से उससे विभिन्न प्रकार के राग और गीत फूटने लगते हैं। जब हम उसकी आवाज सुनते हैं, तभी हम उसकी धुनों, रागों आदि को पहचानने में सक्षम होते हैं। आपने गीतों के पल्लवी, अनुपल्लवी और चरणम् को सुना होगा। वे कैसे लगते हैं। संगीत-बॉक्स को जरूरी उपकरणों के साथ इन सब कार्यों के लिए सक्षम बनाया जाता है। हालांकि वह गीत-संगीतादि को स्वयं अनुभव नहीं कर पाता।

इसी प्रकार शरीर में विभिन्न अंगों के माध्यम से मनुष्य बोलने, सोचने, देखने, सुनने, निर्देश देने, हंसने, चीखने, कूदने, झगड़ने, मारने-पीटने और खोजबीन के कार्य के योग्य होता है। मानव-शरीर में पाए जाने वाले ऐसे प्रबंध मनुष्य को विभिन्न कार्यों को मिलकर करने का सामर्थ्य प्रदान करते हैं। यदि हम इसे समझ लें, हम जीवन या आत्मा को इतर वस्तु मानने से इन्कार कर देंगे। वह महज अनुचित अवधारणा और अंध-आस्था का परिणाम है।

यदि हम आत्मा की उत्पत्ति की खोज के लिए आगे बढ़ें तो आप पाएंगे कि वह धर्म तथा ईश्वर में विश्वास द्वारा गढ़ी गई है।

सामान्यतः आत्मा का संबंध केवल मनुष्यता से बताया जाता है, किसी अन्य प्राणी से नहीं। वेदांती, जो वेदों के अध्येता विद्वान हैं, वे भी मानते हैं कि ईश्वर, आत्मा, जीवन तथा अन्य जीवित प्राणी मात्र एक अनुभूति हैं। यही कारण है कि दर्शनशास्त्र को वेदांत के समान बताया जाता है। सामान्य तौर पर वेदांती मानते हैं कि जो पहले स्वयं को जान लेता है, वह ईश्वर को समझने की योग्यता प्राप्त कर लेता है। उनके इस कथन का अभिप्राय क्या है? यदि मनुष्य यह जान ले कि खुद को समझने का अर्थ क्या है, उसकी अहमन्यता ईश्वर को समझने की योग्यता प्राप्त कर लेता है।

मनुष्य अपनी इच्छाओं के साथ जीता है। वह अपने लालच का दास का है। समाज में वह दूसरों के लिए अच्छा करता है या बुरा। कर्म की महत्ता पर जोर देने के लिए ही जीवन और आत्मा जैसी काल्पनिक चीजों की रचना की गई है। मनुष्य को अच्छे कृत्यों की ओर प्रवृत्त करने हेतु, उसे यह विश्वास करना सिखाया गया है कि यदि वह बुरे कर्म करेगा तो मृत्यु के बाद उसकी आत्मा को भयावह दंडों से गुजरना पड़ेगा। यह भी एक मिथ मात्र ही है। तर्क-सम्मत ढंग से बातचीत करने वाले निस्पृह व्यक्ति के लिए जो न अच्छा करता है, न ही बुरा, ईश्वर का भय नहीं रहता। उसे स्वर्ग या नर्क की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।

मनुष्य अच्छे और बुरे दोनों कर्मों से बंधा हुआ है। जब तक वह जीवित है, तब तक उसके कर्म शरीर के विभिन्न अंगों के काम करने के ढंग पर आधारित होते हैं। इस तरह उसके कर्म अच्छे हो सकते हैं, या फिर बुरे। इसके अलावा कोई कार्य जो किसी के लिए बुरा लगता है, वह दूसरों के लिए अच्छा हो सकता है।

ईश्वर, धर्म और आत्मा की खोज मानव जीवन को नियमित करने के लिए हुई है, इसके पीछे मनुष्य की सदेच्छा छिपी है।

उनके अस्तित्व को वास्तविक मानने वाले लोग स्वार्थी और शोषक लोग हैं।

अपने वक्तव्य के समापन से पूर्व मैं मनुष्य द्वारा निःस्वार्थ जीवन जीने की महत्ता पर जोर देना चाहूंगा।

मैंने जो भी कहा, वे मेरे निजी विचार हैं। मैं नहीं कहता कि आप मैने जो भी कहा, उस पर विश्वास करें।

बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय तक पहुंचना अब आपके ऊपर है।

कृपया इन सब बातों पर विचार कीजिए

आप सभी का धन्यवाद….

अंग्रेजी से अनुवाद : ओमप्रकाश कश्यप