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संस्कृति और सामाजिक न्याय

सामान्य

प्रत्येक समाज अपनी संस्कृति से पहचाना जाता है. उसका प्रमुख कार्य समाज में एकता की अनुभूति जगाना पैदा करना है. इसके लिए जरूरी है कि वह सामाजिक संबंधों, नागरिकों के सामान्य व्यवहारों, सार्वकालिक जीवन-मूल्यों और भविष्य के सपनों से अनुप्रेत हो. प्रायः धर्म एवं संस्कृति को एक मान लिया जाता है. जबकि आस्था और विश्वास को अपनी पीठ पर ढोने वाला धर्म विराट संस्कृति का अंग तो हो सकता है, उसका पर्याय नहीं. किसी समाज द्वारा धर्म की केंचुल से बाहर आने की छटपटाहट विवेकीकरण के प्रति उसकी उत्सुकता को दर्शाती है. जहां तक भारतीय संस्कृति का प्रश्न है, अधिकांश विद्वान इसे ‘विविधता की संस्कृति’ मानते तथा ‘सनातन संस्कृति’ कहकर इसका महिमा-मंडन करते हैं. इनमें से एक भी धारणा मूल्यबोधक नहीं हैं. सांस्कृतिक वैविध्य तभी सार्थक है जब वह मानवीय चेतना का स्वयं-स्फूर्त विस्तार हो. साथ ही लोकतांत्रिक सोच को बढ़ावा देता हो. प्राचीनता काल-सापेक्ष स्थिति है. वह केवल घटना-विशेष की ऐतिहासिकता को दर्शाती है. संस्कृति का असल बड़प्पन इसमें है कि अपने अनुयायियों के बीच न्याय, समानता और समरसता के वितरण को लेकर वह कितनी उदार है! कितने प्रयास उसने अपने अंतर्विरोधों के समाहार हेतु किए हैं. और इन सब के लिए वह लोकतंत्र के कितने करीब है. इस कसौटी पर भारतीय संस्कृति उतनी सफल सिद्ध नहीं होती, जितनी बताई जाती है.

सच तो यह है कि स्मृति-ग्रंथों, पुराणों, महाकाव्यों आदि के माध्यम से जो संस्कृति हमारे जीवन में दाखिल होती है, या एक अल्पसंख्यक अभिजन वर्ग द्वारा बहुसख्यक जनसमुदाय पर बरबस थोप दी जाती है, वह सामाजिक न्याय की अवरोधक तथा सामूहिक विवेक का क्षरण करने वाली है. सामान्य नैतिकता एवं लोकादर्शों को अमल में लाने के बजाय वह धर्म के हाथों में खेलती है; और खुद को बड़ी आसानी से उसकी सामंती वृत्तियों के अनुसार ढाल लेती है. वह लोगों से अपेक्षा रखती है कि वे क्या करें, क्या खाएं, क्या पियें, क्या पढ़े-लिखें, और किन लोगों से कैसे संबध बनाएं? न तो उसे मानवीय विवेक की परवाह रहती है, न उसकी रुचियों का परिष्कार. बावजूद इसके जीवन में अनावश्यक दखल देकर, वह समानता और स्वतंत्रता की भावना का हनन करती है. कभी धर्म, कभी समाज और कभी परंपरा-वैविध्य के बहाने, असमानता को मानवीय नियति घोषित करना उसकी मूल प्रवृत्ति रही है. वह असल में शासक संस्कृति है, जो व्यक्ति को जन्म के साथ ही बता देती कि उसका जन्म शासन करने के वास्ते हुआ है या शासित होने के लिए. जो लोग शासक वर्ग में जन्म लेते हैं, अभिजनोन्मुखी संस्कृति का रेशा-रेशा उनकी मदद में जुटा होता है. शासितों की कोटि में जन्मे व्यक्ति, यदि दुर्दशा से उबरना चाहें या इस तरह का सपना भी देखें तो वह लगातार अवरोध उत्पन्न कर, परिवर्तन की चाहत को ही मिटाने पर तुल जाती है. लोगों के सवाल करने की आदत को छुड़ाकर वह उनके निर्मानवीकरण को गति देती है. इससे सामूहिकताबोध, जो संस्कृति का प्रमुख उद्देश्य है, का हृास होता है. सांप्रदायिकता पनपती है; और जनशक्ति छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटकर निष्प्रभावी हो जाती है. इससे परिवर्तन का लक्ष्य निरंतर दूर खिसकता रहता है.

हम भारतीयों, विशेषकर जो लोग स्वयं को हिंदू मानते हैं, का जीवन जन्म से लेकर मृत्यु तक तरह-तरह के कर्मकांडों से बंधा होता है. वे अनेक प्रकार के हो सकते हैं. एक समाज से दूसरे समाज, यहां तक कि एक जाति समूह से दूसरे जाति-समूह के बीच उनका रूप बदलता रहता है. कर्मकांडों का उद्देश्य होता है, किसी महाशक्ति को प्रसन्न करना. उनमें एक पक्ष दाता(जाहिर है काल्पनिक), दूसरा याचक की भूमिका में होता है. याचक अपने श्रेष्ठतम को समर्पित करने की भावना के साथ दाता के आगे नतशिर होता है. तत्क्षण खुद को दाता का प्रतिनिधि घोषित करते हुए पुरोहित बीच में आ टपकता है. याचक द्वारा दाता के नाम पर समर्पित सामग्री के अलावा वह दक्षिणा की भी दावेदारी करता है. कर्मकांडों को लोक की सामान्य स्वीकृति प्राप्त होने के कारण उनसे पैदा स्तरीकरण समाज में गहरी पैठ बना लेता है. तदनुसार जो दाता या उसके स्वयं-घोषित प्रतिनिधि की इच्छा है, उसे उसी रूप में, बगैर किसी ना-नुकर के, स्वीकार कर लेना याचक की विवशता होती है. इसका लाभ शिखर पर बैठे लोग उठाते हैं. राज्य की कुल उत्पादकता में नगण्य योगदान के बावजूद वे किसी न किसी बहाने लाभ के नब्बे प्रतिशत को हड़पे रहते हैं. उसी के दम पर वे दाता की भूमिका निभाए जाते हैं. उनके नेतृत्व में पूरी संस्कृति कर्मकांडों में सिमटकर रह जाती है.

कर्मकांडों की व्याख्या जिन ग्रंथों में है, सब ब्राह्मणों द्वारा रचे गए हैं. उनकी समीक्षा अथवा संशोधन-विस्तार का अधिकार ब्राह्मणेत्तर वर्गों को नहीं है. उनसे बस इतनी अपेक्षा होती है कि ब्राह्मणों द्वारा गढ़े गए लिखित-अलिखित विधान का बगैर ना-नुकुर अनुसरण करें. उनपर किसी भी प्रकार का संदेह, आलोचना, समीक्षा पाप की कोटि में आती है. सांस्कृतिक-सामाजिक असमानता का पोषण करने वाली इस संस्कृति के प्रति विरोध के स्वर आरंभ से ही उठते रहे हैं. उनके दस्तावेजीकरण का काम हमें अपेक्षाकृत उदार एवं समावेशी संस्कृति के करीब ला सकता है. उसे हम जनसंस्कृति अथवा मूल भारतवंशियों की संस्कृति भी कह सकते हंै.

सत्य यह भी है कि कोई भी संस्कृति स्वयं लक्ष्य नहीं होती. वह केवल मार्ग चुनने में मदद करती है. उसका काम मानवीय वृत्तियों को सुसंस्कृत करना है, किसी व्यक्ति या व्यक्तियों की रोजमर्रा की आदतों पर नियंत्रण करना नहीं. विडंबना है कि भारतीय संस्कृति की अधिकांश ऊर्जा नकारात्मक कार्यों में खपती आई है. वह बड़ी आसानी से उन लोगों के हाथों में खेलने लगती है, जिनका काम दूसरों के मूल-भूत अधिकारों का हनन करना है. शिखरस्थ ब्राह्मण उसके विधान का निर्माता, व्याख्याता, पालक-अनुपालक सब होता है. विशेष मामलों में, या यूं कहिए कि अपवाद-स्वरूप संस्कृति के विशिष्ट प्रवत्र्तकों को, जन्मना ब्राह्मण न हों तो भी उन्हें कर्मणा ब्राह्मण मान लिया जाता है. व्यास, वाल्मीकि, महीदास आदि शास्त्रीय परंपरा के ब्राह्मण नहीं हैं. फिर भी उन्हें ब्राह्मण माना गया है. क्योंकि वे उस संस्कृति के सिद्ध संहिताकार हैं, जो वर्ण-व्यवस्था को आदर्श तथा ब्राह्मणों को समाज का सर्वेसर्वा मानकर उन्हें अंतहीन अधिकार सौंप देती है. कुछ लोग इसे भारतीय संस्कृति की उदारता या उसका लचीलापन मानते हैं. असल में यह दूसरे वर्गों के बुद्धिजीवी, उनकी उपलब्धियों का श्रेय हड़प लेने की स्वार्थ-पूर्ण व्यवस्था है. इससे निम्न वर्गों की उच्च स्तरीय मेधा, उच्चस्थ वर्गों की स्वार्थ-सिद्धि में लगी रहती है.

इस प्रवृत्ति के दर्शन ऋग्वेद से लेकर आधुनिक साहित्य तक मौजूद हैं. गुरु उद्दालक के पास सत्यकाम जाबाल जब यह कहता है कि वह घरों में काम करने वाली दासी के गर्भ से जन्मा है और पिता का नाम पता नहीं है, तो महर्षि उसे यह कहकर कि ‘तूने सत्य कहा, ऐसा सत्यभाषी ब्राह्मण पुत्र ही हो सकता है.’-दीक्षा देने को तैयार हो जाते हैं. भारतीय संस्कृति के अध्येता इस उद्धरण को उसके उदात्त लक्षण के रूप में प्रस्तुत करते आए हैं. वस्तुतः यह बौद्धिक धूर्तता है, जिससे ब्राह्मणेत्तर वर्गों को एक ही झटके में ‘मिथ्याभाषी’ घोषित दिया जाता है. सत्यकाम जाबालि की भांति महीदास भी दासी पुत्र था. जन्म से शूद्र किंतु मन-बुद्धि से ब्राह्मण संस्कृति का प्रतिभाशाली संहिताकार. ऋग्वेद शाखा के ‘ऐतरेय ब्राह्मण’, ‘ऐतरेय उपनिषद’ और ‘ऐतरेय आरण्यक’ का रचियता. इस संस्कृति ने महीदास को भी शूद्रों से झटक लिया. अपवादस्वरूप ही सही, ब्राह्मणेत्तर वर्ग के कुछ अतिप्रतिभाशाली बुद्धिजीवियों को अनुलोम परंपरा के अनुसार ब्राह्मण मान लिए जाने की नीति, प्रतिभाहीन ब्राह्मण पुत्रों के लिए शिखर का स्थान सुरक्षित रखती है. स्तर से ऊपर उठने के लिए ब्राह्मणेत्तर वर्ग के बुद्धिजीवियों को जहां विरलतम प्रतिभा, सर्जनात्मक मेधा एवं विभेदकारी ब्राह्मण-संस्कृति के प्रति अटूट निष्ठा का प्रदर्शन करना पड़ता है, वहीं ब्राह्मण-संतति को उसका स्वाभाविक उत्तराधिकारी मान लिया जाता है. प्रमुख प्रतिभाओं के पलायन के बाद निचले वर्ग आवश्यक बौद्धिक नेतृत्व से वंचित रह जाते हैं. दूसरे षब्दों में भारतीय संस्कृति, उसके नामित देवता, कर्मकांड, धर्म-दर्शन आदि केवल ब्राह्मणों का सृजन नहीं हंै. उसमें ब्राह्मणेत्तर वर्गों का भी भरपूर योगदान रहा है. हालांकि लाभ सर्वाधिक ब्राह्मणों ने उठाया है.

ब्राह्मण संस्कृति के व्याख्याकारों की प्रशंसा करनी होगी कि वर्गीय श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए उन्होंने अपनी रचना का श्रेय स्वयं लेने के बजाय वर्गीय श्रेय को प्राथमिकता दी. ब्राह्मण होने के नाते व्यक्तिगत श्रेय-सम्मान तो उन्हें आसानी से मिल ही जाता है. व्यास, याज्ञवल्क्य, वशिष्ट आदि किसी मनीषी के नहीं, गौत्र या परंपरा के नाम हैं. उनका उल्लेख स्मृतिग्रंथों से लेकर रामायण, महाभारत, पुराण यहां तक कि उत्तरवर्ती ग्रंथों में भी, मुख्य सिद्धांतकार के रूप में होता आया है. व्यक्तिगत श्रेय के आगे वर्गीय श्रेय को वरीयता दिए जाने का अच्छा उदाहरण ‘योग वशिष्ट’ है. लगभग एक हजार वर्ष पुराने, 29000 से अधिक पदों वाले तथा शताब्दियों के अंतराल में अनाम लेखकों द्वारा रचित, परिवर्धित इस विशद् ग्रंथ का रचनाकार होने का श्रेय आदि कवि वाल्मीकि को प्राप्त है, जबकि वाल्मीकि का नाम लगभग दो हजार वर्ष पुरानी कृति ‘पुलत्स्य वध’ जो निरंतर प्रक्षेपण के उपरांत ‘रामायण’ महाकाव्य के रूप में ख्यात हुआ-से भी जुड़ा है. ज्ञान को परंपरा में ढाल देने का लाभ तो केवल ब्राह्मणों को जबकि नुकसान पूरे बहुजन समाज को उठाना पड़ा है. वर्ण-व्यवस्था के चलते पोंगा पंडितों को भी बौद्धिक नेतृत्व का अवसर मिलता रहा. पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही धारा के लेखन से मौलिकता का हृास हुआ. चूंकि धर्म-ग्रंथों में प्रक्षेपण अलग-अलग समय में हुआ था, इसलिए उनमें परस्पर विरोधी बातें भी शामिल होती गईं. जिस महाभारत(शांतिपर्व) कहा गया था, ‘वर्ण-विभाजन जैसी कोई चीज असलियत में नहीं है. यह पूरी सृष्टि ब्रह्म है, क्योंकि इसे ब्रह्मा ने बनाया है.’ उसी में द्रोणाचार्य द्वारा एकलव्य का अंगूठा मांग लेने के धत्तकर्म को भी ‘धर्म’ मान लिया गया.

उधर व्यवस्था से अनुकूलित गरीब-विपन्न लोग निरंतर यह आस बांधे रहे कि जो पंडित लोग चैंसठ लाख योनियों का हिसाब रखते हैं, आदमी के ‘भाग्य’ का अगला-पिछला सब बांच लेने का दावा करते हैं, वे उनका भी ‘हिसाब’ रखेंगे! यदि परमात्मा छोटे-बड़े, गरीब-अमीर, ब्राह्मण और शूद्र में भेद नहीं रखता तो वे भी नहीं रखेंगे. इस भरोसे के साथ वे अपने अधिकारों की ओर से, इतिहास की ओर से मुंह फेरे रहे. समय के दस्तावेजीकरण के प्रति निचले वर्गों की उदासीनता का लाभ ऊपर वालों ने खूब उठाया. उन्होंने कर्मफल का सिद्धांत पेश किया. उसके जरिये शोषित वर्गों को समझाया जाने लगा कि उनकी दुर्दशा के लिए कोई दूसरा नहीं, वे स्वयं जिम्मेदार हैं. संस्कृति के आवरण में उन्होंने पहले अवसर छीने, फिर मान-सम्मान. अपने से नीचे के लोगों को बर्बर, असभ्य, गंवार, गलीच घोषित करके खुद इतिहास में तोड़-मरोड़ करते रहे. उनके द्वारा रचे गए इतिहास में ‘भेड़ों’ और ‘मेमनों’ को जंगल में अव्यवस्था का दोषी बताया जाता रहा तथा ‘भेड़ियों’ और ‘लक्कड़बघ्घों’ को प्रत्येक अपराध से बरी रहने की व्यवस्था की गई. पंडित, देवता, करुणानिधान, अन्नदाता, रक्षक, सेठ, साहूकार जैसे सुशोभन विशेषण उन्होंने अपने लिए सुरक्षित कर लिए. पिछले दो हजार साल का सांस्कृतिक खेल उनकी चालों और समझौतापरस्ती से बना है. ऐसी संस्कृति में जनसाधारण के लिए न्याय की उम्मीद करना खुद को धोखा देना है.

‘सांस्कृतिक वर्चस्व’ बनाए रखने की कोशिश के समानांतर उससे उबरने की छटपटाहट भी मानव-इतिहास का हिस्सा रही है. भारत में उसका पहला उदाहरण मक्खलि गोशाल के चिंतन-कर्म में दिखाई पड़ता है. वह पहला विद्वान था जिसने श्रम-शोषक, परजीवी ब्राह्मण संस्कृति के बरक्स समाज में मेहनतकशों, शिल्पकारों तथा उसके श्रम-कौशल के सहारे आजीविका जुटाने वाले लोगों को संगठित कर आजीवक संप्रदाय की स्थापना की थी. मक्खलि की लोकप्रियता का अनुमान इससे भी लगाया जाता है कि उसके जीवनकाल में आजीवक संप्रदाय के अनुयायियों की संख्या बौद्ध अनुयायियों से अधिक थी. विद्वता के मामले में भी वह अद्वितीय था. सम्राट प्रसेनजित ने बुद्ध से कहा था कि वह गोशाल को उन(बुद्ध)से अधिक प्रतिभाशाली मानते हैं. बुद्ध की हिंसा तथा कर्मकांड विरोधी भौतिकवादी विचारधारा पर आजीवक संप्रदाय का ही प्रभाव था. मक्खलि तथा बुद्ध के अलावा निगंठ नागपुत्त, संजय वेठलिपुत्त, पूर्ण कस्सप, अजित केशकंबलि, कौत्स आदि विद्वान भी यज्ञों में दी जाने वाली बलि तथा कर्मकांड का विरोध कर रहे थे. निगंठ नागपुत्त आगे चलकर महावीर स्वामी के नाम से जैन दर्शन के प्रवर्त्तक माने गए. इनमें सर्वाधिक ख्याति मध्यमार्गी गौतम बुद्ध को मिली, जो उस समय की चर्चित दार्शनिक समस्याओं ‘आत्मा’, ‘परमात्मा’ आदि पर विमर्श करने के बजाय उन्हें टालने के पक्ष में थे. क्षत्रिय कुल में जन्म लेने के कारण बुद्ध और उनके विचारों को उन राजदरबारों में आसानी से प्रवेश मिलता गया, जो ब्राह्मण पुरोहितों के बढ़ते दबाव से तंग आ चुके थे. ‘आजीवक’ और ‘लोकायत’ धारा का प्रतिनिधि साहित्य आज अप्राप्य है. उनका छिटपुट उल्लेख ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन ग्रंथों में ही प्राप्त होता है. सभी में उनकी पड़ताल नकारात्मक दृष्टिकोण के साथ की गई है. संकेत साफ हैं कि विजेता संस्कृतियों ने, पराजित संस्कृति के ग्रंथों को मिटाने का काम पूर्णतः योजनाबद्ध ढंग से किया.

धर्म और संस्कृति का आधार कहे जाने वाले ग्रंथों में, लंबे प्रक्षेपण के बावजूद ऐसे अनेक तत्व हैं, जो वैकल्पिक जनसंस्कृति के प्रवत्र्तक और संवाहक रहे हैं. महिषासुर, बालि, पौराणिक सम्राट वेन के अलावा गणेश, शिव जैसे अनेक नाम मिथक भी हो सकते हैं और यथार्थ भी. लेकिन यदि इन्हें मिथक मान लिया जाए तो ब्राह्मण संस्कृति के प्रमुख संवाहक ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र, हनुमान तथा अन्य देवी-देवताओं को भी मिथक मानना पड़ेगा. क्योंकि उसका पूरा का पूरा भवन इन्हीं के कंधों पर टिका है. शिव भारत की आदिम जातियों के मुखिया रहे होंगे. उनके सहयोगी के रूप में भूत, पिशाच, प्रेत आदि हमें भारत के आदिम कबीलों की याद दिलाते हैं. आर्यों ने शिव को तो अपनाया. मगर उनके सहयोगी कबीलों की पूरी तरह उपेक्षा की. अप्रत्यक्ष रूप से बख्शा शिव को भी नहीं गया. उन्हें आक, धतूरा खाने और भभूत लगाकर रमने वाले अवधूत की तरह दर्शाते हुए सृष्टि चलाने(शासन करने) का अधिकार ‘ब्राह्मण ब्रह्मा’ तथा ‘क्षत्रिय विष्णु’ की बपौती मान लिया गया. गणेश का मिथक भी प्राचीन भारतीय गणतंत्रों के मुखिया की याद दिलाता है. गणतांत्रिक व्यवस्थाओं में मुखिया को प्रथम सम्मानेय माना जाता था. कालांतर में बड़े राज्यों का गठन होने लगा तो सभा का नेतृत्व करने वाले गण-प्रमुख के चरित्र का भी विरूपण किया जाने लगा. बैठे-बैठे सूंड लटक आना और लंबोदर जैसे प्रतीक गण-प्रमुख पर कटाक्ष तथा उसे अपमानित करने के लिए रचे गए.

‘सामाजिक न्याय’ का सपना देखने वाले बुद्धिजीवियों की असली लड़ाई धार्मिक वर्चस्ववाद, विपन्नता और जड़ हो चुकी वर्ण-व्यवस्था से है. इस लक्ष्य की सिद्धि वर्चस्वकारी संस्कृति से मुक्ति के बिना असंभव है. ब्राह्मण संस्कृति ईश्वरीय न्याय में विश्वास करती है. न्याय का स्वरूप क्या हो? वंचित तबकों की उन्नति में वह किस भांति सहायक हो सकता है-यह नहीं बताती. ‘सामाजिक न्याय’ के पैरोकारों का प्रथम लक्ष्य ऐसी संस्कृति का पुनरुद्धार करना है, जिसमें संगठित धर्म का हस्तक्षेप न्यूनतम हो. जो पूरी तरह उदार एवं लोकतांत्रिक हो. इसके लिए आवश्यक है कि प्राचीन संस्कृति के उन प्रतीकों को रेखांकित किया जाए जो कभी ब्राह्मण संस्कृति के विरोध में या उसके समानांतर खड़े थे. क्या यह धर्म के भीतर एक और धर्म की खोज सिद्ध नहीं होगी? यह आशंका पूर्णतः निर्मूल नहीं है. ध्यान यह रखना होगा कि समानांतर संस्कृति के इन प्रतीकों, नायकों, मिथकों का योगदान दमित-शोषित वर्गों के आत्मविश्वास को लौटाने तक सीमित हो. यह एहसास दिलाने के लिए हो कि वे हमेशा से ही ‘ऐसे’ नहीं थे. वे न केवल ‘वैसे’ बल्कि कई मायनों में उनसे भी बढ़कर थे-रावण की लंका में विभीषण को अपनी आस्था और विश्वास के साथ ससम्मान जीने की स्वतंत्रता प्राप्त थी. रामराज्य में शंबूक से यह स्वतंत्रता छीन ली जाती है. इसी तरह राक्षस-सम्राट जलंधर अपनी विष्णु-भक्त पत्नी वृंदा के साथ सुखी जीवन जीता है और उनके दांपत्य के बीच अविश्वास की किरच तक मौजूद नहीं है, जबकि सीता को रावण की अशोकवाटिका में रहने के लिए भी अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ता है. यह गरीबी तथा जाति-भेद द्वारा पैदा की गई अन्यान्य विषमताओं के विरुद्ध जंग भी है. सदियों से जाति के आधार पर सुख-सुविधा और सम्मान भोगते आए समूह, परिवर्तनकामी समूहों पर जातिभेद को बढ़ावा देने का आरोप लगा रहे हैं. दूसरी ओर जातीय उत्पीड़न का शिकार रहे वर्गों को लगता है कि लोकतांत्रिक माहौल का लाभ उठाकर वे अपने संघर्ष को आगे बढ़ा सकते हैं. इसलिए वे जाति को संगठनकारी ‘टूल’ की तरह इस्तेमाल कर रहे है. लेकिन जाति-आधारित संगठनों की अपनी परेशानियां हैं. इस देश में हजारों जातियां हैं. अपनें दम पर कोई भी जाति परिवर्तनकारी ताकत बनने में अक्षम है. अतः लोग समझने लगे हैं कि सामाजिक न्याय के संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए समानांतर लड़ाई संस्कृति के मोर्चे पर भी लड़नी होगी. जीत उन्हीं की होगी जो संगठित रहने के साथ-साथ सामूहिक विवेक से काम लेंगे.

ओमप्रकाश कश्यप

असफलताओं का आर्थिक मोर्चा

सामान्य

उत्पादन क्षेत्र में अभूतपूर्व मंदी है. विदेशी मुद्रा-भंडार में कमी आई है. अर्थशास्त्रियों के अनुसार आर्थिक विकास-दर मात्र एक प्रतिशत रह जाने की उम्मीद है. देश की शाख को भी बट्टा लगा है. बड़ी संख्या में लघु और कुटीर उद्यम या तो बंद चुके हैं, अथवा मंदी के शिकार हैं. छोटे उद्यमियों, दस्तकारों तथा उनमें लगे मजदूरों, कामगारों और शिल्पकर्मियों की हालत पतली है. निर्माण-क्षेत्र में नई परियोजनाओं पर काम रुक-सा गया है. जिन उद्यमियों ने बैंक-ऋण तथा ग्राहकों की मदद से परियोजनाएं चालू रखी थीं, उनकी आगे की बिक्री कम है. घटी आमदनी के कारण किश्त समय पर न चुका पाने से ग्राहकों की चिंताएं बढ़ती जा रही हैं. निरंतर कमजोर पड़ती मांग से बड़े-बड़े उद्योग छंटनी पर मजबूर हैं. छत्तीसगढ़ में ‘अल्ट्राटेक’ सीमेंट बनाने वाली कंपनी के मजदूर प्रदर्शन कर रहे हैं. कंपनी ने कुछ मजदूरों को बाहर का रास्ता दिखाया है तो कुछ की दैनिक मजदूरी में कटौती की है. सबसे चिंताजनक है छोटे और लघु व्यापारियों में फैली हताशा. रोजगार की दृष्टि से इस क्षेत्र की उपयोगिता कारपोरेट सेक्टर से कहीं अधिक है. यहां पसरी हताशा भविष्य में बड़े समाजार्थिक संकट का कारण बन सकती है. सरकार चुनावों की वजह से हालात के प्रबंधन में लगी है, लेकिन उसका पूरा ध्यान असल समस्या से भटकाने का है. जातिवाद, सांप्रदायिकता, राममंदिर जैसे मुद्दे उछाले जा रहें हैं. ताकि किसी भी प्रकार सत्ता में बने रहकर जातिवादी मंसूबों को साधा जा सके.

2014 में सत्ता संभालते समय केंद्र सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’, ‘स्किल इंडिया’, ‘न्यू इंडिया’ जैसे सपने लोगों को दिखाए थे. आज वे सब हवा में हैं. क्यों? सरकार उससे जुड़े प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पा रही है. यदि कुछ नहीं बदला है तो मीडिया का सरकार के प्रति भक्ति-भाव. वह जैसे पहले सरकार की हवा बनाने में लगा था, आज भी वही हाल है. बात बढ़ती है तो ध्यान हटाने के लिए या तो आतंकवाद को बीच में ले आता है, अथवा पाकिस्तान को. कुछ नया दिखाना हो चीन के साथ डांडा-मेंडी की खबरें छा जाती हैं. एक ओर विकास के नाम पर छल है, दूसरी ओर धर्म, सांप्रदायिकता और निरंतर बढ़ती जातीय हिंसा. एक साथ कई पाटों के बीच पिसती जनता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है. उधर कारपोरेट सेक्टर की पो-बारह है. देश के सबसे बड़े 100 उद्योगपतियों की संपत्ति में औसतन 26 प्रतिशत का इजाफा हुआ है. जबकि मुकेश अंबानी तथा सरकार के करीबी माने जा रहे अडानी की कुल संपत्ति में 67 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है. इस वर्ष एक नया नाम उद्योगपतियों की कतार में बाबा रामदेव के सहयोगी आचार्य बालकृष्ण का शामिल हुआ है. कारोबार में 176 प्रतिशत वृद्धि-दर के साथ उन्होंने दिखा दिया है कि भारतीय उपभोक्ताओं के मानस पर भगवा रंग अन्य किसी भी रंग से अधिक प्रभावशाली है.

ऐसा क्यों हो रहा है. क्यों प्रधानमंत्री की वायदों और असलियत के बीच की दूरी कम नहीं हो पा रही है. इसे समझने के लिए वर्तमान सरकार की प्राथमिकताओं को समझना आवश्यक है. यह जानना आवश्यक है कि जिस विकास के नारे के साथ सरकार सत्ता में आई थी, क्या उसकी नीतियां उसके अनुरूप हैं? अपने चुनावी भाषणों में मोदी जी ने गुजरात को विकास के मॉडल के रूप में पेश किया था. तथाकथित गुजराती मॉडल की वास्तविकता पर बुद्धिजीवियों ने उन दिनों भी प्रश्न उठाए थे. तब कांग्रेस सहित दूसरे राजनीतिक दल उस मुद्दे पर चुप्पी साधे रहे. गत साढ़े तीन वर्ष के केंद्र सरकार के कार्यकलापों द्वारा समझा जा सकता है कि विकास का तथाकथित गुजराती मॉडल कुछ नहीं, असलियत में पूंजीवाद एवं सांप्रदायिकता का गहरा गठजोड़ था. केंद्र में भाजपा सरकार बनने के बाद वह और भी उग्र हुआ है. आमजन को जाति, धर्म और क्षेत्रवाद में उलझाकर देश की संपदा पूंजीपतियों के हवाले की जा रही है. धर्म और पूंजीवाद का यह गठजोड़ इतना शक्तिशाली है कि जो इसके साथ नहीं, वह बेबस और लाचार नजर आता है. धर्म और राजनीति का गठजोड़ वर्तमान सामाजिक उथल-पुथल का वास्तविक कारण है. अस्थिरता के ऐसे माहौल में विदेशी  निवेशक भला क्यों पूंजी लगाना चाहेंगे! इसलिए प्रधानमंत्री की 150 से अधिक देषों की यात्रा और वहां की हंगामाखेज बैठकों, व्यापक प्रचार-प्रसार के बावजूद विदेशी निवेशक भारत में पूंजी निवेश से कतरा रहे हैं. बड़ी स्पर्धा न होने के कारण देशी पूंजीपतियों की पौ-बारह है. वे जानते हैं कि बाहरी पूंजी को तरसती सरकार के आगे मनमानी शर्तें थोपी जा सकती हैं. इससे वे बेलगाम होकर आगे बढ़ रहे हैं. वैश्विक मंदी के दौर में भी रिलायंस-अडानी जैसे बड़े कारपोरेट घरानों की चामत्कारिक वृद्धि-दर सरकार और लोगों के मानस पर उनकी पकड़ को दर्शाती है.

अनायास नहीं है कि भयावह मंदी के इस दौर में अकेला मीडिया ऐसा क्षेत्र है, जिसपर कोई अंतर नहीं पड़ा है. बल्कि वह तेजी से समृद्धि की ओर अग्रसर है. कारपोरेट मुनाफे का बड़ा हिस्सा उसकी ओर जा रहा है. वह अपनी सामाजिक प्रतिबद्धताओं को बिसराकर, लोकहित के महत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर मिट्टी डालने का काम बहुत बेशर्मी से कर रहा है. कभी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो कभी खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ दर्शाते हुए वह अपने लिए विशिष्ट सुविधाओं तथा अधिकारों की मांग करता है. जबकि हाल के दिनों में उसका वास्तविक कार्य नागरिकों के मानस का उपभोक्ताकरण कर, पूंजीवाद के रास्ते को निष्कंटक करना है. समाज में भय, असुरक्षा, लालच और हताशा का वातावरण तैयार करना, धर्म के नाम पर तंत्र-मंत्र, जादू-टोना परोसना और रूढ़ियों का महिमा-मंडन करना—मीडिया की इसी सोची-समझी नीति का हिस्सा है. उसकी कोशिश है कि अपने एकाकीपन को बांटने की जद्दोजहद में लोग आभासी दुनिया में शरण लेने को विवश हो जाएं. राजनीतिक दल मीडिया की ताकत को समझते हैं. इसलिए चुनावों में लोगों तक पहुंचने के लिए वे उसका इस्तेमाल उसी की शर्तों पर करने को विवश होते हैं.

पूंजीवाद के समर्थन में ‘ट्रिकल डाउन थ्योरी’ यानी ‘रिसाव का सिद्धांत’ का तर्क अकसर दिया जाता है. अर्थशास्त्रियों के अनुसार समृद्धि का रिसाव ऊपर से नीचे की ओर होता है. तदनुसार पूंजीपति जितना कमाते हैं, उतना टेक्स देते हैं. बेखुदी जैसी हालत में सरकार माने रहती है कि जितना उनका मुनाफा बढेगा, उतना ज्यादा टेक्स आएगा. अनुभव बताते हैं, ऐसा होता नहीं है. पूंजीपति जितना टेक्स के रूप में सरकार को देते हैं, सारा जनता की जेब से जाता है. ऊपर से विभिन्न प्रकार की छूट के रूप में वे सरकार से इतना बटोर लेते हैं कि कराधान के रूप में दी गई राशि छोटी पड़ जाती है. पश्चिम में इस सिद्धांत की हकीकत को बहुत पहले समझ लिया गया था. अर्थशास्त्री जान केनिथ गिल्वर्थ ने ‘घोड़े और गौरैया’ की सैद्धांतिकी कहकर उसका मजाक उड़ाया था—घोड़ों को जितना अधिक दाना मिलेगा वे उतनी ज्यादा लीद देंगे. उसमें से बिना पचे दाने चुगकर ज्यादा गौरैया पेट भर सकेंगी.

यह जानते हुए भी कि कथित ‘ट्रिकल डाउन थ्योरी’ प्राय: उलटी चाल चलती है—भारत सरकार आज भी उसपर भरोसा करती है. इसके दुष्परिणाम सामने हैं. पूंजीवाद जितनी तेजी से भारतीय जनसमाज पर अपनी पकड़ बना रहा है, उतनी तेजी से समृद्धि निचले स्तर से ऊपर की ओर गतिमान है. आजादी के बाद के दशकों में कठिन परिश्रम द्वारा जनता ने जो थोड़ी-बहुत समृद्धि अर्जित की थी, धीरे-धीरे उसका साथ छोड़ रही है. बड़ी पूंजी तरह-तरह के प्रलोभन देकर उसे अपनी ओर खींच रही है. सरकार बेबस है. चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री द्वारा जनता के साथ किए गए वायदे एक-एक कर झूठे साबित हो रहे हैं. उनके मन की बात, जनता के मन की बात बन ही नहीं पा रही है. सांप्रदायिकता के बुरी तरह शिकार समाज में ‘धर्मनिरपेक्षता’ तथा ‘साम्यवाद’ जैसे शब्द गाली बन चुके हैं. जिन्हें समाजार्थिक समानता का सिद्धांत नापसंद है, वे वामपंथ का सीधे सामना करने के बजाए, धर्म की आड़ लेकर हमला करते हैं. घोर सांप्रदायिक, जातिवादी लोगों ने एक वर्ग का मानस इस तरह तैयार किया है कि वह मार्क्स, सेकुलर, साम्यवाद, धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्दों को सुनते ही बलबलाने लगता है. धर्म और पूंजीवाद का जैसा गठजोड़ इन दिनों भारत में है, वैसा दुनिया के अन्य देश में नहीं है. चैनल पूंजीवाद से खाद-पानी लेकर धर्मांधता परोस रहे हैं. जनसरोकार भुला चुका टेलीविजन गाय और गोबर पर बहसें कराता है. विकास के नाम पर ये सब पतनोन्मुखी समाज की भूमिका रच रहे हैं.

सरकार में बैठे लोग भी मान चुके हैं कि उद्योग जगत के हालात षीघ्र सुधरने वाले नहीं हैं. सरकार आय-वृद्धि हेतु नए-नए प्रकल्प आजमा रही है. सारा जोर सेवा क्षेत्र पर है. किसी भी राज्य की प्रगति-दर के आकलन का मापदंड यह भी है कि उसकी आय के स्रोत स्थायी हों. उनमें प्रमुख योगदान कृषि, उत्पादन और विनिर्माण क्षेत्र का हो. सेवा-क्षेत्र की भूमिका अर्थव्यवस्था के सहायक अथवा पूरक क्षेत्र के रूप में होनी चाहिए. भारत में हालात एकदम उलट हैं. यह पूंजीवाद के समक्ष राज्य के समर्पण को दर्शाता है. कहा जा सकता है कि मतलब तो राजस्व वृद्धि से है. वह चाहे सेवा क्षेत्र से हो या उत्पादन से, क्या अंतर पड़ता है? यहां मार्क्स के ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’ की याद आती है. मनुष्यता के इतिहास की गहन समीक्षा करने के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि उत्पादकता के साधन सभ्यता और संस्कृति के स्वरूप को निर्धारित करते हैं. कृषि-केंद्रित अर्थव्यवस्था तक भारतीय समाज उत्पादक समाज था. उत्पादन अन्योन्याश्रित था. लोग बजाय लाभ कामना के, एक-दूसरे की जरूरत के अनुरूप उत्पादन करते थे. मशीनीकरण के साथ-साथ उत्पादन का स्वरूप भी बदलता गया. सेवा क्षेत्र में तीव्र वृद्धि दर्शाती है कि हम तेजी से उपभोक्ता-समाज की ओर बढ़ रहे हैं. ऐसा समाज जिसमें परंपरागत संबंध कमजोर पड़ जाते हैं. यह स्थिति पूंजीपतियों के लाभदायक है. वे इसका लाभ भी उठा रहे हैं. उत्पादन के अलावा राजनीति, समाज और संस्कृति के सभी क्षेत्रों पर बाजार का कब्जा है. आज बाजार तय करता है कि लोग अपने त्योहारों को किस प्रकार मनाएं. मानवीय संबंधों का रूप कैसा हो. यहां तक कि हमारे दोस्त और दुश्मन तय करने की जिम्मेदारी भी मीडिया उठा रहा है.

आखिर ऐसा क्यों हुआ? आर्थिक मोर्चे पर सरकार के बुरी तरह विफल होने के कारण क्या हैं? सरकार जिस स्फूर्त्ति के साथ अरविंद पनगढ़िया को नीति आयोग का सर्वेसर्वा बनाकर लाई थी, वे सरकार को अधबीच छोड़कर जाने के लिए क्यों विवश हुए? कथित रूप से गुजरात में कामयाब होने वाला यह मॉडल बाकी देश  में असफल क्यों हो रहा है? सरकार के पास इस संकट से उबरने की क्या कोई योजना है? यदि हां, तो उसका स्वरूप और सफल होने की संभावना क्या है? ये प्रश्न किसी भी संवेदनशील मन को विचलित कर सकते हैं. उनपर अर्थशास्त्रियों और समाजशास्त्रियों द्वारा विचार किया जाना आवश्यक है. लेकिन या तो वे जान-बूझकर उपेक्षा कर रहे हैं, अथवा उनके मुंह बंद कर दिए गए हैं. या फिर आलोचक अर्थशास्त्रियों के विचारों को सेंसर किया जा रहा है.

सबसे पहले ‘गुजरात मॉडल’ पर चर्चा करते हैं. विकास के नाम पर जिस ‘गुजरात मॉडल’ को चुनाव के दौरान आर्थिक विकास के मानक के तौर पर पेश किया गया था, वह मनमोहन सिंह की उदार आर्थिक नीतियों के अतिरेकी, अनियोजित विस्तार के अतिरिक्त कुछ नहीं था. केवल एक चीज उसे शेष भारत से अलग करती थी. वह थी, उग्र हिंदुत्व अथवा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के साथ पूंजी का तालमेल. केंद्र में उन दिनों कांग्रेस की सरकार थी. मनमोहन सिंह थे, जिन्होंने देष को आर्थिक उदारवाद की राह दिखाई थी. उग्र हिंदुत्व के पैरोकार बने मोदी जी केवल गुजरात तक सीमित थे. जो मीडिया आज हिंदू धर्म-दर्शन के नाम पर कचरा परोस रहा है, वह दबे स्वर में उग्र हिंदुत्व की आलोचना में सरकार और बुद्धिजीवियों के साथ था. सांप्रदायिकता विद्वेष इतना नहीं गहराया था, जितना  आज. सरकार समझती थी कि विदेशी निवेशकों को केवल राजनीतिक कूटनीति के तहत आमंत्रित नहीं किया जा सकता. उनका पहला और अंतिम उद्देश्य निवेश के माध्यम से अधिकाधिक लाभार्जन रहता है. यदि उन्हें युद्ध से लाभ दिखता है तो हजारों-लाखों जान की परवाह किए बिना वे युद्ध का समर्थन करेंगे.  अधिकतम मुनाफे की संभावना बनाए रखने के लिए वे जोखिम से तब तक बचना चाहते हैं, जब तक बदले में अतिरिक्त मुनाफे की संभावना न हो.

इन दिनों हालात अलग हैं. केंद्र में हालांकि बहुमत की सरकार है. लेकिन वह लोगों की सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काकर सत्ता में आई है. अपनी सत्ता अक्षुण्ण रखने के लिए वह सामाजिक-सांप्रदायिक विभाजन की खाई को चौड़ा करने में लगी है. संविधान की सौगंध उठाकर संसद और विधायिकाओं में पहुंचे उसके नेता कभी बीफ, कभी गाय, कभी सांप्रदायिकता और कभी जाति के नाम पर लोगों को भड़काने में लगे रहते हैं. उन्होंने जो उथल-पुथल पैदा की है, उससे देश और समाज के बीच अविश्वास बढ़ा है. कुल मिलाकर देश के हालात ऐसे नहीं हैं जो विदेशी निवेशकों को आकर्षित कर सकें. ऊपर से सरकार द्वारा नोटबंदी के नाम पर मुद्रा-बदली का आत्मघाती फैसला. सरकार का दावा कि नोटबंदी से आतंकवाद की कमर टूट जाएगी, भ्रष्टाचार कम होगा और दबा हुआ कालाधन एक झटके में बाहर आ जाएगा—पूर्णतः निष्फल सिद्ध हुआ है. आर्थिक मुद्दों को लेकर दिशाहीनता ऐसी है कि साढ़े तीन वर्ष के कार्यकाल में सरकार अभी तक पिछली सरकार की योजनाओं को ही नाम बदल-बदलकर कार्यान्वित कर रही है. कुछ मुद्दे जैसे वीआई कल्चर पर नियंत्रण हेतु वाहनों से लाल-नीली बत्तियां हटवाना, चुनावों के दौरान घर-जाकर वोट मांगना—उसने ‘आम आदमी पार्टी’ से लिए हैं. जिन दो योजनाओं के साथ सरकार अपना नाम जोड़ सकती है, उनमें पहली नोटबंदी थी, जिसकी विफलता का उल्लेख ऊपर किया गया है. दूसरी योजना जीएसटी है. विपक्ष में रहते हुए भाजपा उसका विरोध किया करती थी. सरकार में आने के बाद उसे इतनी लापरवाही से लागू किया कि अर्थव्यवस्था पर उसका नकारात्मक असर पड़ा है. ऐसे में शरद यादव का हालिया बयान कि आने वाला चुनावों में बिगड़ती अर्थव्यवस्था बड़ा मुद्दा होगी, अनुचित नहीं लगता.

भारतीय गांवों में संचय की प्रवृत्ति बहुत पुरानी है. कभी अपने भविष्य के लिए, कभी अचानक आ पहुंचे पाहुन के नाम पर; और कभी किसी परिजन के शादी-विवाह या किसी और कारज के लिए, लोग संचय को गृहस्थ का पुनीत कर्म मानते आए हैं. यह प्रवृत्ति ग्रामीण संस्कृति से निकलकर शहर में आ बसे लोगों के उपभोक्ताकरण की सबसे बड़ी बाधा है. इसलिए भय, असुरक्षा, अविश्वास, अशांति आदि के बहाने वाक्-बहादुर चैनल रात-दिन लोगों की सामाजिकता पर प्रहार करते रहते हैं. बहाना कभी आंतकवाद बनता है, कभी पाकिस्तान तो कभी सांप्रदायिकता. भारत-चीन तनाव को युद्ध की दुंदभि में बदल देना भी उनकी इसी रणनीति का हिस्सा था. उन दिनों एक भी चैनल ने इस तथ्य पर चर्चा करना जरूरी नहीं समझा कि पचास के दशक में भारत और चीन के हालात करीब-करीब एक समान थे. चीन भारत के बाद आजाद हुआ. बावजूद इसके उसने अपने उद्योग क्षेत्र को जिस कुशलता के साथ संभाला, मानव-संसाधनों का सुनियोजित उपयोग किया, छोटे-छोटे खेतों को मिलाकर ‘कम्यून’ आधारित कृषि को बढ़ावा दिया—भारत में वैसा नहीं हो सका. भारत चीन से विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था का सबक ले सकता था. लेना चाहिए था. किंतु सत्ताकेंद्र पर विराजमान नेताओं की मुश्किल यह थी कि विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था का रास्ता वर्गहीन समाज की स्थापना की ओर जाता है. उसे न पहले की सरकार चाहती थीं, न आज की भाजपा प्रणीत सरकार.

पूरा दोष वर्तमान सरकार का भी नहीं है. आजादी के बाद से ही देश में विदेशी पूंजी पर आधारित विकास की परिकल्पना की गई थी. यहां मौजूद विपुल प्राकृतिक संसाधनों तथा मानव-संपदा का लोक-हित में उपयोग करने को लेकर सरकारों की न तो नीति रही, न वैसा संकल्प. पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से यूँ तो कई विकास कार्यक्रमों का संचालन किया गया. किंतु भ्रष्ट नौकरशाही और प्रशासनिक दिशाहीनता के कारण वे अपेक्षित परिणाम न दे सकीं. वर्तमान सरकार की सारी राजनीति उग्र हिंदुत्व पर टिकी है. जातिवादी अजेंडे के तहत राजनीति करने वाली भाजपा को यह डर हमेशा लगा रहता है कि यदि वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मुद्दे पर कमजोर पड़ी तो उसका सवर्ण मतदाता समूह, जो केवल उग्र हिंदुत्ववादी छवि के कारण उससे जुड़ा है, एक ही झटके में छिटक जाएगा. आर्थिक विकास को लेकर उचित दिशा-दृष्टि के अभाव में भी सरकार को वे सब कष्ट उठाने पड़ रहे हैं. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस ने उदारीकरण की शुरुआत की थी. वर्तमान सरकार उसे और भी खुले मन से आगे बढ़ा रही है. पूरा देश अंबानी, अडानी और टाटाओं के लिए चरागाह बना है. सभी ने अपने-अपने घोड़े छोड़ दिए हैं. जब तक सरकार है, जहां तक संभव हो कब्जा लेना चाहते हैं. जनसंघ और अटलबिहारी वाजपेयी के जमाने में भाजपा स्वदेशी की समर्थक थी. मोदी जी ने पासा पलट दिया है. ‘मेक इन इंडिया’, ‘स्किल इंडिया’ के बहाने वह अंबानी-अडानी को ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ की जगह देना चाहती है. विडंबना यह है कि ‘भाजपा मुक्त’ भारत की राजनीति करने वाले नेताओं के पास भी अर्थव्यवस्था को लेकर कोई सार्थक विकल्प नहीं है.

ओमप्रकाश कश्यप

जाति और सामाजिक गतिशीलता

सामान्य

जीवन सभी का होता है. इतिहास भी सभी का होता है. जो लोग अपने इतिहास के प्रति उदासीन होते हैं, वे लुटेरों और आक्रामकों के इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं. लेकिन तब उनकी भूमिकाएं बदल जाती हैं. लुटेरे और आक्रामक इतिहास में दयालु और देशभक्त बन जाते हैं. जबकि कमजोर और अपने इतिहास के प्रति उदासीन सीधेसादे लोग लुटेरे, बेईमान और संस्कृति के दुश्मन घोषित कर दिए जाते हैं. इसीलिए गुणीजन कहते हैं, अपना इतिहास स्वयं लिखने की आदत डालो. लिखेलिखाए इतिहास पर भरोसा मत करो. यदि उसे पढ़ना मजबूरी है तो उसके पात्रों की भूमिका को बदलकर पढ़ो. उपलब्ध इतिहास का सच जानना है तो उसकी भूमिकाएं बदलकर पढ़ो.

भारतीय समाज, विशेषकर हिंदुओं में जाति के प्रश्न बहुत पुराने हैं. यह ऐसी हकीकत है जिसके कारण हिंदू धर्म को अनेकानेक आलोचनाएं झेलनी पड़ी हैं. इसका सहारा लेकर कथित ऊंची जातियां शताब्दियों से निम्नस्थ जातियों का शोषण करती आई हैं. इस कारण कुछ आलोचक जातिप्रथा को भारतीय समाज का कलंक मानते हैं. वे गलत नहीं हैं. आज भी समाज में जो भारी असमानता और ऊंचनीच है, आदमीआदमी के बीच गहरा भेदभाव हैजाति उसका बड़ा कारण है. समाजार्थिक समानता के लक्ष्य की यह आज भी सबसे बड़ी बाधा है. जातीय उत्पीड़न के शिकार समाज के दोतिहाई से अधिक लोग, निरंतर इसकी जकड़बंदी से बाहर आने को छटपटाते रहे हैं. यदाकदा उन्हें आंशिक सफलता भी मिली है. मगर आत्मविश्वास की कमी और बौद्धिक दासता की मनःस्थिति उन्हें बारबार कथित ऊंची जातियों का वर्चस्व स्वीकारने को बाध्य करती रही है. भारतीय समाज में जातिविधान इतना अधिक प्रभावकारी है कि सिख और इस्लाम जैसे धर्म भी, जिनमें जाति के लिए सिद्धांततः कोई स्थान नहीं हैइसके प्रभाव से अछूते नहीं हैं. इनमें सिख धर्म का तो जन्म ही जाति और धर्म पर आधारित विषमताओं के प्रतिकारस्वरूप हुआ था, जबकि इस्लाम की बुनियाद बराबरी और भाईचारे पर रखी गई थी. भारत में आने के बाद इस्लाम पर भी जातिभेद का रंग चढ़ चुका है.

जाति आधारित विभाजन पूरी तरह अमानवीय है. यह मनुष्य की नैसर्गिक स्वतंत्रता में अवरोध उत्पन्न करता है. जाति और वर्ण की संकल्पना सामान्य मनोविज्ञान के भी विपरीत है, जिसके अनुसार जन्म के समय सभी शिशु एक समान होते हैं. उनका मस्तिष्क कोरी सलेट जैसा होता है. एकदम साफ. इबारत उसपर बाद में लिखी जाती है. ब्राह्मण और शूद्र के शिशुओं को यदि एक साथ, एक ही जंगल में छोड़ दिया जाए और उनसे किसी भी प्रकार का संपर्क न रखा जाए; तो समान अवधि के उपरांत दोनों की बौद्धिक परिपक्वता का स्तर लगभग एकसमान होगा. जो भी अंतर होगा, उसके पीछे उनकी देहयष्टि का योगदान होगा. लगभग वैसा ही विकास जैसा पशुओं और वन्य प्राणियों में दिखाई पड़ता है. जाहिर है मनुष्य अपने गुणकर्म और प्रवृत्तियां समाज में रहते हुए ग्रहण करता है. जातिव्यवस्था के अनुसार मान लिया जाता है कि फलां शिशु ‘पंडित’ के घर में जन्मा है, इसलिए उसमें जन्मजात पांडित्य है. जबकि शूद्र के घर में जन्म लेने वाले शिशु सामान्य बुद्धिविवेक से भी वंचित मान लिए जाते हैं. इसलिए उनका काम बताया जाता हैविप्र वर्ग की सेवा करना, उनकी चाकरी करते हुए जीवन बिताना. यह थोपी हुई दासता है, परंतु हिंदू परंपरा में इसे धर्म बताया गया है. बिना कोई शंका किए, चुपचाप परंपरानुसरण करते जाने को पुरुषार्थ की संज्ञा दी जाती रही है. इस तरह जो धर्म बुद्धिमत्तापूर्ण व्यवहार की अपेक्षा के साथ ब्राह्मण को शीर्ष पर रखता है, और प्रकांतर में मानवीय विवेक का सम्मान करता हैव्यवस्था बनते ही समाज के अस्सी प्रतिशत लोगों से बौद्धिक हस्तक्षेप और पसंदों का अधिकार छीनकर, पूरे समाज को नए ज्ञान का विरोधी बना देता है. हिंदू धर्म की यही विडंबना समयसमय पर उसके बौद्धिक एवं राजनीतिक पराभव का कारण बनी है. आज भी समाज में जो भारी असमानता और असंतोष है, उसके मूल में भी जाति ही है. जाति का लाभ उठा रहे वर्गों और जातीय उत्पीड़न का शिकार रहे लोगों के बीच अविश्वास की खाई इतनी गहरी है कि संस्कृति को लेकर जरासी बहस भी चले तो जनता का बड़ा हिस्सा उसपर संदेह करने लगता है. इससे कई बार धार्मिकसांस्कृतिक सुधारवादी आंदोलन भी खटाई में पड़ जाते हैं.

वैसे भी पांडित्य, चिंतनमनन और स्वाध्याय की उपलब्धि होता है. वह न तो बैठेठाले आ सकता है, न ही व्यक्ति का जन्मजात गुण हो सकता है. कथित दैवी अनुकंपा भी जड़बुद्धि व्यक्ति को पंडित नहीं बना सकती. दूसरी ओर जाति है कि उसके माध्यम से एक वर्ग जन्मजात पांडित्य के दावे के साथ हाजिर होता है तो दूसरा वर्ग ‘शासक’ के रूप में. फिर निहित स्वार्थ के लिए ये दोनों वर्ग संगठित होकर शेष समाज के लिए शोषक की भूमिका में आ जाते हैं. ‘पांडित्य’ को यदि ज्ञान का पर्याय भी मान लिया जाए तो वह स्वाभाविक रूप से व्यवहार का विषय होगा, अनुभव का विषय होगा, प्रदर्शन की वस्तु वह हरगिज नहीं हो सकता. यदि हम प्राचीन पुराणों और टीकाओं की बात करें तो उनमें दर्शित ज्ञान प्रदर्शन और महिमामंडन से आगे नहीं बढ़ पाता. पूरी की पूरी ब्राह्मण मेधा, कुछ अपवादों को छोड़कर, देवताओं के नखसिख वर्णन और उनके छलप्रपंच भरे काल्पनिक विजय अभियानों के बखान में लगी रहती है. मनुष्य का अस्तित्व, जिसने विषम परिस्थितियों से जूझकर, आपदाओं से निरंतर संघर्ष करते हुए इस धरती को रहने लायक बनाया है, इन ग्रंथों में बस एक दास जितना है. उपनिषदों में अवश्य कुछ श्रेष्ठ, श्रेष्ठतर और श्रेष्ठतम है, मगर उनमें भी जबरदस्त दोहराव है. बाकी सब आत्मरति और मनःरंजन का विषय तो हो सकता है. समाज का वास्तविक हित उससे सध ही नहीं सकता. इस वास्तविकता को जातिव्यवस्था के शीर्ष पर मौजूद लोग जानते जरूर थे, मगर निहित स्वार्थ की खातिर सत्य की ओर से मुंह फेरे रहते थे. उन्होंने शूद्रों के लिए धर्मग्रंथों का अध्ययन केवल इसलिए निषिद्ध नहीं किया कि वे उन्हें अपात्र मानते थे. डर यह भी था कि शूद्र यदि वेदादि धर्मग्रंथ पढे़ंगे तो उनमें दर्ज देवों की सत्ता लोलुपता, वासनाएं, साधारण सम्राट की तरह किए गए छलप्रपंच पर विमर्श करने का अधिकार भी उन्हें मिल जाएगा. क्योंकि धर्म और शास्त्र के नाम पर मनमानी तभी तक चल सकती है, जब तक सामनेवाला अनपढ़ हो, या उसे जानबूझकर अनपढ़ रखा गया हो. जब व्यक्ति जानने लगता है तो सवाल भी उठाने लगता है. संभवतः वे भूल गए थे कि नदी की तरह विचार भी निरंतर गतिशील रहने पर ही शुद्ध रह पाते हैं. ठहराव आते ही उनमें अशुद्धियां पनपने लगती हैं. आलोचना, विमर्श न हो तो परंपरा के नाम पर आडंबरों को खुली छूट मिल जाती है. जाति, धर्म और संस्कृति के नाम पर इस देश में यही हुआ. आड़ंबरपूर्ण शास्त्रीयता धीरेधीरे सभ्यता और संस्कृति के पाखंड में ढलती चली गई. ऐसा नहीं कि इसका विरोध नहीं हुआ. आडंबरवाद को प्रत्येक युग में लताड़ा गया, किंतु सत्ता के शिखर पर मौजूद लोग विरोध को हमेशा नजरंदाज करते रहे. विरोध में रचे गए साहित्य और कलाओं को पुराने जमाने के ‘गजनवियों’ द्वारा निमर्मतापूर्वक मिटाया जाता रहा.

कुछ देर के लिए यदि मान भी लिया जाए कि वर्णविभाजन तत्कालीन समाज में कार्यविभाजन के लिए आवश्यक था. हमारे पूर्वजों ने समाज की आवश्यकताओं, सुख एवं संसाधनों की वृद्धि हेतु बड़े ही बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से उसे चार वर्णों में विभाजित किया था. उनका ध्येय समाज के संपूर्ण सुख एवं संसाधनों में वृद्धि करना था. दूसरे शब्दों में जाति और वर्ण को यदि कार्यविभाजन की बेहतरीन पद्धति मान लिया जाए तो उन्हें अर्थशास्त्र का विषय होना चाहिए था. धर्म और संस्कृति का हिस्सा बनाने का कोई औचित्य नहीं रह जाता. यदि यह कहा जाए कि प्राचीनकाल में सभी कुछ धर्म और संस्कृति का हिस्सा था….कि ‘अर्थशास्त्र’ में अर्थनीति, राजनीति, व्यवहारशास्त्र आदि सभी कुछ हैतो भी जातीयता की संकल्पना के चारपांच हजार वर्षों में उसपर कभी तो अर्थशास्त्रीय दृष्टिकोण से विचार किया जाना था? आकलन किया जाता कि कार्यविभाजन की उस परंपरागत भारतीय प्रणाली की समसामयिक उपयोगिता कैसी और कितनी है? निष्पक्ष समीक्षा के बाद ही उन्हें बनाए रखने या हटाने का निर्णय लेना चाहिए था. जैसे यूनान में हुआ था. प्लेटो ने मनुष्यों को स्वर्ण, रजत और लौह वर्गों में बांटा था. उसने जन्म को उसके लिए आधार नहीं बनाया था. उसके द्वारा किए गए वर्गीकरण का आधार व्यक्ति के अपने गुण और प्रवृत्तियां थीं. तो भी अरस्तु को अपने गुरु का यह विचार जमा नहीं. उसने यह मानते हुए कि मानवव्यक्तित्व जटिल रचना है, और उसका इस तरह सरलीकरण नहीं किया जाना चाहिए, प्लेटो द्वारा किए गए वर्गीकरण को अनुपयुक्त मानकर उसे आधी शताब्दी से भी कम समय में नकार दिया था. भारत में ऐसा नहीं हुआ. इसलिए नहीं हुआ क्योंकि उस अवैज्ञानिक कार्यविभाजन को शिखरस्थ वर्गों का समर्थन प्राप्त था. सत्ताधारी वर्गों के स्वार्थ उससे जुड़े थे. उसके बहाने वे समाज के अधिकांश संसाधनों पर कब्जा जमाए रखते थे. इसलिए एक के बाद एक स्मृतिग्रंथ वर्णव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए रचे गए. सांस्कृतिक वैविध्य के मुखौटे में जातीय भेदभाव को बचाया गया.

गौरतलब है कि कार्यविभाजन समाज की आवश्यकता है. मनुष्य की अनेकानेक भौतिकअभौतिक आवश्यकताएं उससे जुड़ी होती हैं. इसलिए वही कार्यविभाजन श्रेष्ठ माना जाता है, जो मनुष्य की अधिकतम उत्पादकता को सामने लाए और जरूरत पड़ने पर उसमें सुधार भी कर सके. उत्पादकता के आकलन के नियम आज के नहीं है. कम से कम दो शताब्दियों से तो उनपर खुलकर विचार किया जा रहा है. जातिव्यवस्था उनके आगे कहीं नहीं टिकती. इसलिए वह आधुनिक विमर्श से बाहर है. केवल चलन में है. वह भी इसलिए कि जो वर्ग इससे लाभान्वित हैं, वे इसे छोड़ना नहीं चाहते. प्रत्यक्ष या परोक्ष हठ के द्वारा इसे अपनाए हुए हैं. अच्छा होता जातिव्यवस्था का मूल्यांकन भी व्यक्ति की सामाजिकआर्थिक और भौतिक जरूरतों के आधार पर किया जाता. यदि ऐसा होता तो उसकी परिभाषाओं पर बहस होती. उसकी समाजेतिहासिकता को बहुत पहले विमर्श में शामिल किया जाता. तब उन विसंगतियों से बचा जा सकता था, जो वर्ण के जाति में रूढ़ होने के साथसाथ जन्मीं और लगातार बढ़ती गईं. मगर भारत में कार्य(वर्ण) विभाजन को सामाजिकसांस्कृतिक सवाल बनाकर जानबूझकर समीक्षा से काट दिया. नतीजा यह हुआ कि जाति और वर्ण को लेकर पूरा समाज दो हिस्सों में बंट गया. एक वे जो उसका समर्थन करते हैं, दूसरे वे जो शताब्दियों तक जातीय शोषण का शिकार रहने के बाद आज उससे नफरत करते हैं. संख्या जातिव्यवस्था के आलोचकों की अधिक और निर्णायक है. लोकतांत्रिक दौर में विचार बहुमत को प्रभावित ही नहीं करते, उससे प्रभावित भी होते हैं, इसलिए जातिसमर्थकों के स्वर दबेदबे होते हैं. चूंकि मन से वे जातिभेद के समर्थक हैं तथा किसी न किसी रूप में उससे लाभान्वित भी हैं, इसलिए उनका अपना जीवन और चिंतन अंतर्विरोधों से भरा होता है. समाज का यह वर्ग आज भी जाति को अपनी अस्मिता का पर्याय समझता है; और वह चाहता है कि दूसरे वर्ग भी जाति की मर्यादाओं को समझें, इसलिए उन वर्गों के पास जो जातिअनुक्रम में निचले स्तर पर हैं, सीधे विरोध के अलावा और कोई रास्ता रह ही नहीं जाता. यह विरोध कभी धर्मांतरण के रूप में सामने आता है तो कभी जातीय संघर्ष के रूप में.

सवाल है कि चौतरफा विरोध और आलोचनाओं के बावजूद जाति जीवित क्यों है? विरोधों में डटे रहने की खुराक उसे कहां से मिलती है? प्रश्न भले ही नए लगें, इनका उत्तर अनजाना नहीं है. जैसा ऊपर कहा गया है, जाति यदि सचमुच कार्यविभाजन की जरूरत होती तो वह अर्थशास्त्र के विमर्श का विषय भी होती; या देरसवेर अर्थशास्त्रीय दृष्टिकोण से उसकी समीक्षा की जाती. उस अवस्था में उसे बहुत पहले अप्रासंगिक मान लिया गया होता. मगर ऐसा कभी नहीं किया गया. इसलिए कि वह कार्यविभाजन की प्रणाली थी ही नहीं. असल में वह अभिजन हितों की सुरक्षा के लिए की गई असमानताकारी और स्वार्थपरक व्यवस्था थी, जिसमें शक्तिशाली वर्ग केवल अपनी जरूरतों के हिसाब से लोगों को अलगअलग पेशे में बांट रहे थे. फिर जैसेजैसे उस वर्ग की जरूरतें बढ़ी, जातियों की संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी होती गई. वह एक चालाकीभरा कदम था. उन अनेक कदमों में से एक जिन्हें अभिजन वर्ग शेष समाज पर अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए उठाता है. आर्थिकसामाजिक असमानता से ग्रस्त समाजों में मुट्ठीभर अभिजन सत्ताप्रतिष्ठानों पर कब्जा जमाए होते हैं. बाकी जनसमाज उनसे कहीं अधिक शक्तिशाली होने के बावजूद, बंटा होने के कारण अपनी वास्तविक शक्ति से अपरिचित होता है. शीर्षस्थ अभिजन उसे छोटेछोटे वर्गों में बांटकर उसकी प्रभावी शक्ति को कमजोर कर देते हैं, और उस बंटी हुई शक्ति को अपने हितों की सुरक्षा के लिए काम में लाते हैं. इससे गैरअभिजन वर्ग की शक्तियां अपने ही समूहों से टकराकर जाया होती रहती हैं. बंटा हुआ जनसमाज अपने ही सदस्यों पर संदेह करना है. चूंकि उत्पादकता के अधिकांश संसाधनों पर अभिजन समुदाय का अधिकार होता है, इसलिए रोजीरोटी की मजबूरियां भी गैरअभिजन समाज को अभिजनों के आदेशानुपालन हेतु विवश करती हैं. इस काम में धर्म और संस्कृति मददगार बनते हैं. अतः इस प्रश्न के उत्तर में कि जाति को विरोधों के बीच डटे रहने की खुराक कहां से मिलती है, विश्वासपूर्वक कहा जा सकता हैधर्म और संस्कृति से.

ऋग्वेद का पुरुषसूक्त जातिभेदवर्गभेद का बीजमंत्र है. उसमें लिखा है कि ब्राह्मण, ब्रह्मा के मुख से, क्षत्रिय भुजाओं से, वैश्य उदर से तथा शूद्र उसके पैरों से जन्मे हैंꟷ‘ब्राह्मणोऽस्य मुखामासीद्वाहू राजन्यः कृतः. ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत.’ ब्रह्मा यहां समाज का प्रतीक हैं. इसका लक्ष्यार्थ है कि समाज में ज्ञान, व्यापार तथा सेवाकर्म चार प्रमुख अंग होते हैं. रूपक के चयन में भी चतुराई देखी जा सकती है. यदि सीधेसीधे कार्यविभाजन किया जाता तो देरसवेर लोगों का ध्यान उसके औचित्य पर भी जाता. ऐसा न हो इसलिए अभिजन वैदिक मनीषियों ने उसे सांस्कृतिक रूपक के माध्यम से प्रस्तुत किया था. ताकि उसको आस्था और विश्वास की साम्रगी के रूप में देखा जाए. आलंकारिक भाषा केवल कविता में ही फबती है. बौद्धिक विमर्श को उससे दूर रखने की सलाह दी जाती है. दरअसल मिथकों और बिंबों की विशेषता होती है कि उन्हें सामान्य विवेक के सहारे मनचाहा आकार दिया जा सकता है. वे सर्वसाधाराण की चेतना का हिस्सा भले हों, मगर समयसमय पर उनकी ऐसी व्याख्याएं होती रहती हैं जो उनकी मूल संकल्पना से एकदम अलग होती हैं. जैसे इंद्र का मिथक. वह एक ओर देवराज है. दूसरी ओर देवताओं में ही सबसे बड़ा खलनायक. गिरे हुए चरित्र का स्वामी, जिसे अपने सिंहासन के खिसकने का भय हमेशा सताता रहता है. इसकी प्रतीकात्मकता को देखें तो सत्ता छिन जाने का भय केवल इंद्र का भय नहीं था. यह हर उस राजा का डर हो सकता है, जो प्रजा कल्याण से दूर, केवल भोगविलास में लिप्त रहता है. बावजूद इसके देवराज इंद्र के मिथक के जरिये उस ओर हमारा ध्यान नहीं जाता. इसलिए कि वह भौतिक जगत का न होकर, सांस्कृतिक विमर्श का हिस्सा है; और संस्कृति को प्रायः आस्था और विश्वास का विषय माना जाता है. इंद्र उन देवताओं का सम्राट है जिन्हें मत्र्य जीवन के कष्टों का सामना नहीं करना पड़ता. मिथकों के विरूपण या उनकी नवव्याख्याओं के पीछे सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही प्रकार के दृष्टिकोण हो सकते हैं. कुल मिलाकर मिथक उससे अपने परंपरागत संदर्भों से कट सकता है. अतएव मिथक को यथार्थ मानना, ‘ईश्वर की मूर्ति है, इसलिए ईश्वर भी है’जैसा ही भ्रांत धारणा है. इसके बावजूद परंपरावादियों का जातीय विभाजन को लेकर ब्रह्मा के मिथक में विश्वास आज भी बना हुआ है. गीता में कृष्ण स्वयं को विराट पुरुष के रूप में पेश कर, वर्णभेद की इसी संकल्पना को आगे बढ़ाते हैंꟷ‘चातुर्वर्णमरूपक मयास्रष्ठं गुणकर्म विभागभ्य’….‘मैंने चार प्रकार के मनुष्यों की रचना की है. उनके गुण, स्वभाव के आधार पर उन्हें वर्णों में विभाजित किया है.’ दबे स्वर में ही सही, परंपरावादी आज भी इन घिसेपिटे तर्कों को आगे बढ़ाकर असमानताकारी जातिव्यवस्था के पोषण में लगे रहते हैं.

कुछ विद्वानों के अनुसार पुरुषसूक्त ऋग्वेद का प्रक्षेपित हिस्सा है. इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता. ऋग्वेद आर्यों की कई शताब्दियों की यादों को समेटे हुए है. उसका आरंभिक हिस्सा तब का है जब आर्य भारतभूमि पर पांव जमाने का प्रयास ही कर रहे थे. उस समय तक वर्णव्यवस्था इतनी जटिल नहीं हुई थी. वैसे भी ब्रह्मा प्राचीनतम देवता नहीं है. भारत में शिव और बाकी सभ्यताओं में सूर्य प्राचीनतम देवता रहे हैं. आरंभ में शूद्र राजन्य और ब्राह्मण केवल तीन वर्ण थे. इसके साथ ही ऋक्, यर्जु, साम तीन वेद. वेद त्रयी और वर्णत्रयी का साम्य था. कालांतर में जब शूद्रों के एक वर्ग ने स्वयं को आर्थिक रूप से संपन्न कर लिया तो उसकी उपेक्षा कर पाना असंभव हो गया. चौथे वर्ग की कल्पना करनी पड़ी. यजुर्वेद में वैश्य और क्षत्रियों को सजातीय कहा गया है. इसलिए जब तक वेद तीन रहे, तब तक तीन वर्ण भी मान्य रहे होंगे. कालांतर में चौथे वर्ण को मान्यता मिली तो अथर्ववेद के रूप में चौथे वेद को भी स्वीकार किया जाने लगा. हालांकि इनमें पहले क्या हुआ? पहले चौथे वर्ण को मान्यता मिली या चौथे वेद को यह शोध का विषय है. कल्पना की जा सकती है कि दोनों का समय आसपास का रहा होगा. ऐसे में परमपुरुष की अवधारणा; यानी पुरुष सूक्त की रचना ईसा से पांच से आठ सौ वर्ष पहले तक की हो सकती है.

आरंभ में वर्ण इतने रूढ नहीं थे. आरंभिक ग्रंथों में अनुलोम और विलोम दोनों ही प्रकार के अंतरण के उदाहरण मिलते हैं. यह अंतरण तत्कालीन परिस्थितियों में जब आर्य और मूल निवासी घुलनेमिलने की कोशिश में थे, स्वाभाविक था. आर्यों ने भारत भूमि पर आक्रामक के रूप में प्रवेश किया. वे यहां पहले से रह रहे मूल निवासियों की अपेक्षा निपुण लड़ाके, रणकौशल में पारंगत थे. उत्तरी एशिया से भारत तक पहुंचने में उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. उनकी अपेक्षा इस देश के मूल निवासी शांतिप्रिय और अपने संतोष के साथ जीवन जीने वाले थे. मूल निवासी अनेक कबीलों में बंटे थे, किंतु लंबे समय तक साथ रहने के बाद वे सहअस्तित्व की कला में निपुण होने लगे थे. धर्मशास्त्रों में देवासुर संग्राम के अनेक उल्लेख हैं, मगर ऐसा कोई उल्लेख नहीं है जो दैत्यों के आपसी वैमनस्य को दर्शाता हो. बहरहाल एक लंबी संघर्षपूर्ण यात्रा के अनुभव के बाद आर्यों का कुशल रणनीतिकार के रूप में उभरना स्वाभाविक था. बावजूद इसके भारत के मूल निवासियों को अपने साथ जोड़ना, उनपर अपना सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करना आसान नहीं था. हड़प्पा और मोनजोदाड़ो से प्राप्त अवशेष बताते हैं कि भारतीय मूल निवासी एक समृद्ध संस्कृति के वासी थे. कदाचित उनकी समृद्धि ही आर्यों को मध्यएशिया से भारत तक खींच कर लाई थी. यात्रा के दौरान आर्यों ने जहां आवश्यक समझा, वहां युद्ध किया. जहां लगा कि युद्ध के माध्यम से ऐच्छिक परिणाम तक पहुंचना असंभव है, वहां उन्होंने युद्धेत्तर नीतियों का सहारा लिया.

उदाहरण के लिए शिव भारत की आदिम जातियों के आराध्य थे. उनका सभी समूहों पर प्रभाव था. मूल निवासी कबीलों को प्रसन्न करने के लिए शिव को प्रसन्न करना अनिवार्य था. इसके लिए आर्यों ने उनके साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किए. उन्हें महादेव की पदवी दी. पार्वती आर्य सम्राट हिमवान की पुत्री थी. शिव को अपना जामाता बना लेने के बाद आर्यों की मुश्किलें आसान होने लगीं. शिव का स्थानीय कबीलों के सर्वमान्य मुखिया थे. मिलीजुली सभ्यता की खातिर उन्होंने आर्यों तथा प्राचीन कबीलों के मध्यस्थ का काम किया. शिव के सहयोगी के रूप में भूत, पिशाच, प्रेत आदि को हम भारत के आदिम कबीलों के प्रतीक के रूप में देख सकते हैं. चतुराईपूर्वक आर्यों ने शिव को तो अपनाया, उन्हें अपने आराध्य और ‘महादेव’ का दर्जा दिया. अपनी प्रवृत्ति के अनुसार उनसे हितसाधन किया. लेकिन शिव के सहयोगी भारत की प्राचीन कबीलों को, जिनके वे नेता और आराध्य थे, पूरी तरह उपेक्षा की. उन्हें असभ्य मानते हुए भूत, प्रेत, कापालिक आदि कहा गया. नतीजा यह हुआ कि शिव का तो दैवीकरण हुआ, किंतु उनके सहयोगी कबीलों की पूरी तरह उपेक्षा हुई. उन्हें ऐसा ही दर्शाया जैसा विकसित सभ्यता पर गर्वाए सत्ताधीश करते हैं. बख्शा शिव को भी नहीं गया. उन्हें आक, धतूरा खाने वाला, भभूत लगाकर रमने वाले अवधूत की तरह दर्शाया गया. इससे सृष्टि को चलाने की जिम्मेदारी ‘ब्राह्मण ब्रह्मा’ तथा उसके सहयोगी ‘क्षत्रिय विष्णु’ पर आ गई. इसके बावजूद एक डर उनके मन में हमेशा बना रहा. उस डर ने ही शिव को मृत्यु के देवता का पद देने को बाध्य किया. शिव की तीसरी आंख दरअसल जनसंस्कृति के वाहक उन कबीलों की सम्मिलित ताकत और विद्रोह शक्ति का प्रतीक है, जिन्हें भूत, प्रेत, कापालिक आदि कहा जाता है और जिनके मुखिया शिव थे. किसी भी राष्ट्र की शक्ति उसकी जनता में निहित होती है. राज्य केवल उसका प्रतीक होता है. जनता यदि कुपित हो जाए तो बड़ी से बड़ी सामरिक शक्ति को मिट्टी में मिला सकता है. चूंकि शिव के पीछे कबीलों की शक्ति थी, इसलिए उन्हें महादेव, मृत्यु का देवता जैसा पद दिया गया. उनकी तीसरी आंख खुलने का अभिप्राय था, समर्थक कबीलों के साथ विद्रोह पर उतर आना, जिनसे अल्पसंख्यक अभिजात तथा उनके कथित देवता भय खाते थे.

महाकाव्य काल में ही वर्ण जातियों में ढलने लगे थे. व्यक्ति के अपने कौशल का कोई महत्त्व नहीं रह गया था. कर्ण और एकलव्य ऐसे ही उदाहरण हैं. जो उस समय की व्यवस्था के अनुसार क्षत्रिय नहीं थे. लेकिन दोनों ने ही स्वयं को धनुर्विद्या में अत्यंत निपुण बना लिया था. महाभारत युद्ध में दुर्योधन के पक्ष में होने के बावजूद कर्ण को बारबार आहत और अपमानित होना पड़ता है. वहीं एकलव्य के वाणकौशल से विस्मित द्रोणाचार्य उसका अंगूठा ही मांग लेता है. हालांकि इस युग तक जाति को रूढ बनाने का विरोध भी जारी रहा. लोग जातिविहीन सभ्यता की याद भी दिलाते रहते थे, जैसे महाभारत के शांतिपर्व में कहा गयाꟷ‘असलियत में वर्णविभाजन जैसी कोई चीज नहीं है. यह पूरी सृष्टि ब्रह्म है, क्योंकि इसे ब्रह्मा ने बनाया है.’ इस प्रसंग की यदि एकलव्य और कर्ण के प्रकरण से तुलना की जाए तो उस सभ्यता के विरोधाभास सामने आने लगते हैं. लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि ‘जय’ से ‘विजय’, ‘विजय’ से ‘भारत’ और फिर ‘महाभारत’ तक की यात्रा अनेक विरोधाभासों से भरी है. इसलिए कि हर मनीषी ने सत्य को अपनी तरह से देखा और उसे प्रक्षेपण का हिस्सा बना दिया.

बाद के धर्मग्रंथों में रक्तशुद्धता एवं कुलीनता पर काफी जोर दिया गया, लेकिन आरंभ में ऐसा न था. आर्यों के आगमन के साथ ही उनका यहां रह रही प्राचीन जातियों के साथ सम्मिलन शुरू हो चुका था. भारत में आर्यों का आगमन एक समूह में नहीं रहा. वे अनेक बार टुकड़ोंटुकड़ों में आए थे. इस बात की प्रबल संभावना है कि जो आरंभिक कबीले भारत तक पहुंचे हों उनमें स्त्री सदस्यों की संख्या आनुपातिक रूप से कम रही हो; या हो सकता है कि लंबी यात्रा के पश्चात भारत तक पहुंचने में उनका लिंगानुपात गड़बड़ा गया हो. इसलिए आरंभ में ही हम अंतवर्गीय संबंधों की बहुलता देखते हैं. व्यवस्था की गई कि स्त्री किसी भी वर्ग की हो, उससे उत्पन्न संतान पिता के गौत्र की होगी. मनुस्मृति में कहा गया, ‘वैध दांपत्य में बंधने के बाद स्त्री अपने पति के वर्ण में सम्मिलित हो जाती है, ठीक ऐसे ही जैसे नदी सागर में मिलकर उसके गुणों को धारण कर लेती है.’(मनुस्मृति 9/22). उदाहरण कई हैं. वशिष्ट की पत्नी अक्षमाला निम्न जाति की स्त्री थी. इसी प्रकार सारंग मुनि की पत्नी भी निम्न वर्ण से आती थी. भविष्य पुराण के अनुसार शृंग ऋषि हरिणी के गर्भ से उत्पन्न थे. पराशर चांडाल स्त्री की संतान हैं, व्यास केवट पुत्री मत्स्यगंधा की. वशिष्ट वेश्या के गर्भ से जन्मते हैं. अपनी लग्न और प्रतिभा के बल पर वे ब्राह्मण बनते हैं. भिन्न वर्णों के बीच विवाह सामान्य थे. क्षत्रिय सम्राट ययाति की एक पत्नी देवयानी ब्राह्मणसुता थी, दूसरी असुर राज की बेटी. बाद में रक्त शुद्धता की अवधारणा विकसित होने पर, आर्यों ने प्राचीन अंतर्जातीय संबंधों को वैध बनाने अथवा चमत्कार सिद्ध करने के लिए उन्हें मिथकीय आख्यानों का हिस्सा बना लिया. लोग उन दिनों चमत्कार पर भरोसा भी खूब करते थे. यदि आकस्मिक रूप से कुछ हो जाए तो उसे दैवी कृपा मानकर चुपचाप स्वीकार कर लेते थे. इसके फलस्वरूप लोकमहत्त्व के विभिन्न मुद्दों को लेकर ब्राह्मणवादी नजरिये से कहानियां गढ़ी जाने लगीं.

अपनी प्रतिभा और लगन के बल पर दूसरे वर्ग में अंतरण के भी अनेक उदाहरण धर्मग्रंथों में उपलब्ध हैं. विश्वामित्र के क्षत्रिय कुल से ब्राह्मण वर्ग में दाखिल होने का किस्सा तो जानापहचाना है. क्षत्रिय दिवोदास का पुत्र मैत्रेय ब्राह्मण बनता है. हरिवंश पुराण के अनुसार वैश्य पुत्र नाभाग और अरिष्ट ब्राह्मण कुल में शामिल होते हैं. वर्णअंतरण को लेकर सत्यकाम जाबाल का किस्सा भी खूब चर्चित है. सत्यकाम दासीपुत्र था. उसने गुरु की शरण में जाकर शिक्षा लेने की इच्छा व्यक्त की तो गुरु ने उसका नाम, गौत्र आदि पूछा. सत्यकाम ने घर आकर यही प्रश्न अपनी मां से किया. तब मां ने बताया, ‘पुत्र, दासी होने के कारण मुझे अनेक घरों में काम के लिए जाना पड़ता है. एक घर से दूसरे घर की यात्रा के दौरान तू कब मेरे गर्भ में आ गया, मुझे नहीं पता. तू सत्यकाम है. मेरा नाम जाबाला है. सो तू सत्यकाम जाबाल हुआ.’ सत्यकाम यही बात गुरु से बता देता है. गुरु उसके सत्यवाचन से प्रसन्न होकर दीक्षा देने के लिए तैयार हो जाते हैं. यही सत्यकाम जाबाल आगे चलकर वेदमंत्रों के रचियता के रूप में उभरता है.

जाति प्रथा चलते ही यह संभव हुआ कि पंडित के घर पंडितजी जन्म लेने लगे. यदि सबकुछ बिना किए जन्म ही से प्राप्त है तो कुछ और पाने के लिए गुणवत्ता को क्यों बढ़ाया जाए! इसलिए तप और स्वाध्याय का अभिप्राय रामराम जपने तक सिमट गया और अध्यापन कर्मकांड तक. लोग सोलह पृष्ठ की पंजिका पढ़कर ‘पंडित’ कहलाने लगे. बिना ‘सत्य’ और ‘सत्यनारायण’ वाली ‘सत्यनारायण की कथा’ घरघर बंचीबंचवाई जाने लगी. उन कहानियों में आदमी की पहचान जाति से जुड़ी थी. जानते सब थे कि जन्म आधारित वर्गीकरण मनुष्य के मूल स्वभाव के विरुद्ध है. दो व्यक्ति कभीभी पूरी तरह से एक हो ही नहीं सकते. इसलिए किसी एक की परिस्थितियों पर विचार कर हूहू वही निर्णय दूसरे के लिए नहीं लिया जा सकता. चूंकि यह मनुष्य की प्रवृत्ति के विरुद्ध है, समाजीकरण की धारा के विरुद्ध है, इसलिए व्यक्ति केवल परंपराएं ढोता रहा. समाज जड़ और लोग यथास्थितिवादी बन गए. जाति ने लोगों से उनका विवेक, चयन का अधिकार छीनकर उन्हें एक नशा थमा दिया. बिना कुछ किएधरे खास होने का नशा. जाति आधारित विभाजन की खूबी है कि उसमें हर कोई खास होता है. हालांकि खासियत के लिए उसका अपना कोई योगदान नहीं होता. बस अपनी लकीर के बराबर में मनमाफिक थोड़ी छोटी लकीर खींच लेता है. इसलिए कि वह जातीय पायदान पर अपने से नीचे के किसी कम खास की उपस्थिति मानकर मन को तसल्ली देने लगता है. दूसरा चाहे उसका विरोध करे, और विरोध होता ही है, फिर भी वह खुद को ‘अपने मुंह मिंया मिट्ठू’ बनने से रोक नहीं पाता. चूंकि जाति पर उसका जोर नहीं चलता, इसलिए जिस जाति वर्ग में वह जन्म लेता है, उसे अपनी नियति मानकर जीवन से समझौता किए रहता है. इससे भाग्यवाद और नियतिवाद को बढ़ावा मिलता है, जो परिवर्तनकामी आंदोलनों की आंच पर राख डालते रहने का काम करता है.

विद्वानों ने जातिप्रथा की आलोचना की. कहा कि जाति ऐसी व्यवस्था है जिसमें व्यक्ति अपनी मर्जी से शामिल नहीं होता. जन्म व्यक्ति की जाति निर्धारित करता है, फिर मनुष्य मृत्युपर्यंत उसके चंगुल से निकल नहीं पाता. दूसरे शब्दों में जाति व्यक्ति की नैसर्गिक स्वतंत्रता का हनन करती है. यह कार्यविभाजन की असमानताकारी निकृष्ट शैली है. यह व्यक्ति के चयन के अधिकार को बाधित करती है. जन्मना जाति मनुष्य का कुदरत के नाम पर लगाया गया बदसूरत ठप्पा है, जो मनुष्यता का अवमूल्यन करता है. कहीं आनेजाने, पेशा बदल देने से व्यक्ति की जाति में कोई बदलाव नहीं आता. फिर भी कुछ विद्वान जाति के जड़ स्वभाव के कारण ही उसे पसंद करते रहे. जाति उनके द्वारा भारतीय समाज और संस्कृति के महिमामंडन का कारण बनी. उनमें प्रायः वही लोग थे, जो समाज के शीर्ष पर विराजमान, समस्त संसाधनों पर कुंडली मारे नजर आते हैं. समयसमय पर ऐसे कार्यकर्ता और विद्वान भी हुए हैं जिन्होंने जाति प्रथा का जमकर विरोध किया. जाति और जन्म के आधार पर पक्षपात करनेवालों को बुरी तरह से लताड़ा. समयसमय पर जातिविरोधी आंदोलन चले. कह सकते हैं जाति का जब से जन्म हुआ, जब से उसने समाज को जकड़ना आरंभ किया, तभी से उसपर हमले आरंभ हो चुके थे.

ज्ञात इतिहास में जाति प्रथा को सबसे पहली चुनौती गौतम बुद्ध ने दी थी. उन्होंने भिक्षु संघ की स्थापना की, जिसमें जाति संबंधी किसी भी प्रकार का पक्षपात न था. मध्यकाल में संत कवियों ने जाति को भारतीय समाज का कलंक मानते हुए जन्म के आधार पर आदमीआदमी में भेद करने वालों को धिक्कारा. तीखे शब्दों में उनकी आलोचना कीꟷ‘जो तू कहे बाहमन का जाया, और मार्ग ने क्यों न आया.’(कबीर). बावजूद इसके जाति का बाल भी बांका न हुआ. इसलिए कि बहुत पहले से इसे रोजीरोटी से जोड़ दिया गया था. उस व्यवस्था में समस्त संसाधनों पर कथित ऊंची जातियों का कब्जा था. क्षत्रिय को हथियार उठाने का अधिकार दिया गया था. ब्राह्मण को सलाह देने का. इन दोनों ने बाकी वर्गों को उभरने ही नहीं दिया. जिसने विरोध किया, उसको दंडित किया गया. धीरेधीरे ये जातियां व्यवस्था से अनुकूलित होती गईं. धर्म ने इसमें मदद की. पिछला जन्म किसी ने देखा नहीं था, न उसका कोई प्रमाण ही था. बावजूद इसके हिंदुओं में कर्मसिद्धांत की ऐसी आंधी चली कि अच्छेअच्छों के विवेक को उड़ाकर ले गईं. लोग लकीर पीटने के अभ्यासी होते चले गए. शताब्दियों तक ऐसा ही चलता रहा.

गौरतलब है कि गौतम बुद्ध ने जाति व्यवस्था के विरोध में सीधे कुछ नहीं कहा था. केवल भिक्षुसंघ में सभी जातिवर्ग के लोगों को प्रवेश देकर बराबरी का संदेश दिया था. लेकिन उसका चामत्कारिक असर हुआ. धार्मिक बंधन शिथिल पड़ने से लोग, विशेषकर कर्मकार जातियां भविष्य के बारे में नए सिरे से सोचने को उद्धत हुए. संसाधनों की कमी को उन्होंने अपने संगठनसामथ्र्य से पाटा. भारतीय शिल्पकार संगठन हालांकि पहले से ही अंतद्र्वीपीय बाजार में आगे थे. गौतम बुद्ध के समय में उसमें बहुत तेजी से वृद्धि हुई. तेली, चर्मकार, बुनकर, काष्ठकार, रंगरेज, राजमिस्त्री, गुड़ बनाने वाले, रथवाह आदि जितने भी शिल्पकार वर्ग थे, उन सबके अपनेअपने व्यावसायिक संगठन थे. वैदिक परंपरा में प्रतिवर्ष लाखों पशुओं की यज्ञों में दी जानेवाली बलियों के कारण तत्कालीन समाज की अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ा था. बौद्ध और जैन दर्शन के प्रभाव में बलि में कमी आई थी. बचा हुआ पशुधन किसानों और पशुपालन द्वारा आजीविका चलाने वाली जातियों के लिए आर्थिक रूप से बहुत मददगार सिद्ध हुआ था. इसका प्रभाव उस समय के व्यापार पर पड़ा था. उसमें तेजी आई. सहयोगाधारित उन व्यापारिक संगठनों को श्रेणि, पूग, गिल्ड, व्रात्य, संघ आदि कहा जाता था. चंद्रगुप्त मौर्य तक तो श्रेणियां खुद को प्रमुख आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित कर चुकी थीं. श्रेणियों की शक्ति का आकलन इससे भी किया जा सकता था कि कौटिल्य उनके संगठनों को राज्य पर संकट की संभावना के रूप में देखता है. इसलिए उसने श्रेणियों पर नजर रखने की अनुशंसा ‘अर्थशास्त्र’ में की थी. श्रेणियों की आर्थिक हैसियत ऊंची थी. वे जरूरतमंद राजाओं की आर्थिक मदद भी खूब करती थीं. ईसा पूर्व दोतीन सौ वर्ष के समय को अनेक विद्वान भारत का स्वर्णकाल मानते हैं. उसके पीछे शिल्पकार संगठनों का बड़ा योगदान था. अर्थव्यवस्था विकेंद्रीकृत थी. गांव संपन्न, आत्मनिर्भर इकाई. धीरेधीरे श्रेणियों का पतन होने लगा. दूसरीतीसरी शताब्दी में उनके कारोबार में मंदी आने लगी थी. इसका पहला कारण बौद्ध धर्म के कमजोर पड़ते ही जातिवादी बंधनों का एक बार फिर मजबूत हो जाना था. व्यापारी संगठन को चलाने के लिए अनेक प्रकार के शिल्पकारों की जरूरत पड़ती थी. पहले वे अपनी जातीय शुचिता को बिसराकर साथसाथ काम करते थे. जातीय अनुशासन मजबूत होने से एकजुट होकर काम करना कठिन हो गया. देश छोटेछोटे राज्यों में बंटने लगा था. खुलकर व्यापार करना कठिन होता गया. श्रेणियों के कारोबार में कमी आई. शिल्पकार संगठन बिखरने से लोग एक बार फिर अपनीअपनी जाति के दड़बों में लौटने लगे. इस तरह जातीयता के बंधनों के शिथिल पड़ने की जो शुरुआत बुद्ध के समय हुई थी, उसपर पानी फिरने लगा. आगे चलकर वर्णव्यवस्था और भी रूढ़ होने लगी. उससे नईनई जातियां बनने लगीं. जातीय शुचिता के नाम पर भेदभाव परोसा जाने लगा.

मध्यकाल में जाति विरोधी आंदोलन के सूत्रधार संतकवि थे. संत रैदास, कबीर, दादू, आदि समाज के निचले वर्गों से आए थे. जो जातीय उत्पीड़न का शिकार थे. इसलिए उन्होंने जातिआधारित ऊंचनीच को अपनी समानताधारित समाज की स्थापना के सपने का अवरोधक माना था. लेकिन समानता से उनका आशय बस इतना था कि गरीबगरीब रहे, अमीरअमीर और सब अपनेअपने संतोष के साथ जीना सीख लें. बावजूद इसके संत कवि जातीय उत्पीड़न का शिकार रहे लोगों की उम्मीद का केंद्र थे. इसलिए वे संत कवियों के आसपास जुटने लगे. जातिभेद को बढ़ावा देने के लिए संत कवियों ने ब्राह्मणों एवं जाति के पैरोकारों को ललकारा. लेकिन कुछ खास नहीं कर पाए. बहुत जल्दी उनके आंदोलन को संस्कृति का हिस्सा बनाकर हिंदू धर्म में समाहित कर लिया गया. सामंतवादी दौर में उनकी आर्त्त पुकार झोपडि़यों और चौराहों पर दम तोड़ने लगी. जाति को सामाजिक असमानता एवं अंतर्द्वंद्वों का कारण मानते हुए विवेकानंद, दयानंद आदि ने भी उसकी आलोचना की. लेकिन परिणाम लगभग शून्य ही निकला. उनकी असफलता के कारण एकदम स्पष्ट थे. वे विचारक चाहते थे कि कथित ऊंची जातियां अपने से निम्न जातियों के प्रति करुणाभाव लाएं और अपने मन से ऊंचनीच की भावना को निकाल फैंकें. प्रकारांतर में जाति उन्मूलन उनके लिए शीर्षस्थ जातियों की कृपा पर टिका ऐच्छिक प्रश्न था. विचारक शीर्ष जातियों से अपेक्षा करते थे कि वे अपना बड़प्पन दिखाते हुए जातीय भेदभाव को दिल से निकाल फेंकें और पिछड़े वर्गों के साथ करुणा के साथ पेश आएं. यह ठीक ऐसा ही था, जैसे ‘ट्रस्टीशिप’ के सहारे गांधी जी ने जमींदारों और पूंजीपतियों से दुर्बल और आर्थिक रूप से विपन्न लोगों के पक्ष में, अपने संपत्ति अधिकार समाज को सौंप देंने का आवाह्न किया था. जबकि मुफ्त में मिलने वाला सम्मान हो या सुविधाएं, शिखरस्थ वर्ग अपनी मर्जी से कुछ भी छोड़ने को तैयार न थे. अतएव इन महापुरुषों की सदेच्छाओं तथा वक्त की जरूरत होने के बावजूद जाति की सामाजिक सत्ता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा. फिर भी उन महापुरुषों के प्रयास निरर्थक नहीं गए. उनके अनथक प्रयत्नों के फलस्वरूप समाज में थोड़ी हलचल अवश्य मची. लोग धर्म और जाति के नाम पर होने पाखंड के प्रति एकजुट होने लगे. जिससे समाज सुधार के आंदोलनों को प्रेरणा मिली. उसके फलस्वरूप विचारकों का ध्यान निचले वर्गों समस्याओं की ओर गया.

जाति विरोधी प्रयासों की असफलता के कुछ कारण एकदम साफ थे. जातीय संरचना के संगठन से जुड़ी, उसके बनाए रखने की समर्थक जातियों की मूल प्रवृत्ति कछुए के समान थी. परिस्थितियां प्रतिकूल हों तो वे कछुए की भांति अपने अंगप्रत्यंगों को धर्म के कवच में ढक लेती थीं. परिस्थितियां अनुकूल होते ही अपने पैने नखदंतों के साथ वे अपने आलोचकों पर आक्रामक होकर जातीयता के बंधनों को और भी कसने लगती थीं. जैसा लगभग 1900 वर्ष पहले बौद्ध धर्म के अवसान के समय देखने को मिला. बुद्ध ने जाति का सीधे विरोध नहीं किया था. मगर उनके बौद्ध विहारों के दरबार सभी जातिवर्गों के लिए खुले थे. उन्होंने हिंदू धर्म में व्याप्त कुरीतियों और बलिप्रथा के माध्यम से उसपर गहरी चोट की. बावजूद इसके बौद्ध दर्शन ने जितनी चोट वैदिक धर्मदर्शन पर की थी, उतनी चोट जाति प्रथा पर नहीं कर सका. उनका विरोध मुख्यतः हिंदू धर्म में व्याप्त कर्मकांड तथा बलि प्रथा से था. जो सामाजिक असमानता को सांस्थानिक बनाते थे. इसलिए जाति उन्हें अपनी संघीय मान्यताओं की अवरोधक लगी. चूंकि बौद्ध दर्शन धर्म की अधीनता में जाति व्यवस्था का विरोध करता था, इसलिए उसका जाति पर वास्तविक प्रभाव बहुत ही कम पड़ा.

जाति और सामाजिक गतिशीलता

जाति हिंदू धर्म की मानस रचना है. उसका पूरा कारोबार धर्म के सहारे चलता है. हिंदू धर्म मजबूत, तो जाति मजबूत. हिंदू धर्म शिथिल तो जाति बंधन शिथिल. बौद्ध धर्म ने हिंदू धर्म को पाश्र्व में ढकेला तो जाति भी नेपथ्य में जाने लगी थी. अठारहवीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य के कमजोर होने के साथ हिंदू धर्म ने अपनी जड़ें दुबारा मजबूत कीं तो जाति भी सिर उठाने लगी. महाराष्ट्र, दक्षिण भारत, बंगाल यानी जहांजहां हिंदू धर्म पुनर्जागरण की ओर बढ़ा, वहांवहां जाति भी पांव पसारने लगी. हिंदू धर्माचार्यों में से अनेक आज भी जाति को हिंदू धर्म का आभूषण समझते हैं. उन्हें आज भी लगता है कि जाति के न रहने पर धर्म संकट में पड़ सकता है. इसलिए आजादी के सातवें दशक में भी दलितों को मंदिर की चौखट पर देख उन्हें अपना धर्म संकट में नजर आने लगता है. विषम परिस्थितियों में भी वे शांत नहीं बैठते. जबतब जाति विरोधी आंदोलन होते हैं, जब उनमें लगे लोगों को लगता है कि वे बस जीतने ही वाले हैं, जाति का जनाजा अब उठा कि बस अब उठा; तब तब वे ऐसी चाल चलते हैं कि परिवर्तन और सुधार की सारी संभावनाओं पर पानी फिर जाता है. जाति समर्थक लोग धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीयता की आड़ में, बहुत तसल्ली के साथ जाति को तरहतरह से मजबूत कर, सामाजिक व्यवहार के केंद्र में बनाए रखने हेतु जुटे होते हैं. उनके प्रयास बहुत ही महीन, आसानी से न समझ में आनेवाले होते हैं. जिन दिनों बौद्ध धर्म प्रभाव में था, उन दिनों पुराणों और स्मृतियों के लेखन में तेजी आई थी. मध्यकाल में किस्सेकहानियों के माध्यम से ब्राह्मणवाद में जान फूंकी गई तो भक्ति साहित्य में जाति को बचाए रखने का काम तुलसी, सूरदास, मीरा, हरिदास जैसे भक्त कवियों ने किया. इन दिनों कानून के दखल से जाति संबंधी आचारविचार शिथिल पड़े हैं तो जातिवादी संगठन उसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का कवच पहनाने की तैयारी में लगे हैं. धर्म और जाति के इस नाभिनाल संबंध को सर्वप्रथम महामना ज्योतिबा फुले ने समझा था. इसलिए उन्होंने जाति के मूल यानी धर्म की विकृतियों पर प्रहार किया. उनके आंदोलन को जमीन शाहू जी महाराज ने दी. दलितोंशोषित वर्गों को आत्मविश्वास से लैस करने, अपने अधिकारों के लिए खड़े होने तथा दलित आंदोलन को सही दिशा देकर नई युगचेतना लाने का सबसे महत्त्वपूर्ण काम डॉ. अंबेडकर ने किया. फलस्वरूप अस्मितावादी आंदोलनों को जमीन मिली. दबेकुचले लोग अपने अधिकारों के लिए आगे आने लगे.

पहले जाति प्रथा की आलोचना वे लोग करते थे जो खुद जातीय उत्पीड़न और असमानता का शिकार थे. तब उत्पीडि़त वर्ग जाति का उच्छेद चाहता था. उसके लिए ‘जातितोड़क’ आंदोलन चलाए गए थे. स्वयं डॉ. अंबेडकर ने ‘जाति का उच्छेद’ पुस्तक लिखकर जाति और जातिवादी शोषण दोनों को कठघरे में खड़ा कर दिया था. अब हालात बदले हुए हैं. जातीय शोषण का शिकार रहे वर्ग अब जाति को ही हथियार बना रहे हैं. ऐसा नहीं है कि जातिआधारित शोषण समाप्त हो चुका है? या उन्होंने उन्होंने जाति के नाम पर सामाजिक ऊंचनीच से समझौता कर लिया है. जातीय आधार पर ऊंचनीच की भावना तो आज भी बरकार है. लेकिन वह केवल सामाजिक संबंधों तक सीमित है. लोकतंत्र ने जाति आधारित भेदभाव को सिद्धांततः समाप्त किया है. अस्पृश्यता आज एक कानूनी अपराध है, भले ही सामाजिक स्तर पर उसके अवशेष आज चिंता का विषय हों. कानून हालांकि बराबरी का अधिकार देता है, लेकिन सामाजिक और आर्थिक स्तर पर भेदभाव पूरी तरह बना हुआ है. इसलिए नए परिवेश में जातीय शोषण का शिकार रहे वर्गों को अपनी रणनीतियों में संशोधन करना पड़ा है. दलितों और पिछड़ों की समझ में आ चुका है कि केवल कानूनी प्रावधान होने से समानता के लक्ष्य को प्राप्त कर पाना असंभव है. कल्याण राज्य की अवधारणा के चलते सरकार से कुछ उम्मीद की जा सकती है, लेकिन अपनी पैठ और राजनीतिक हैसियत का लाभ उठाकर सत्ता में बारीबारी से वही लोग आते रहते हैं, जो जातीय शोषण के लिए जिम्मेदार हैं. ऐसी परिस्थितियों में शोषित वर्ग का नया संघर्ष आनुपातिक हिस्सेदारी को लेकर है. दलित और पिछड़े वर्ग अब संसाधनों और अवसरों में आनुपातिक हिस्सेदारी की मांग कर रहे हैं. चूंकि यह मांग न्याय सम्मत है, इसलिए संवैधानिक स्थितियां भी उनके पक्ष में हैं. इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा है. जाति को लेकर हीनताबोध समाप्त हो चुका है. दबीकुचली जातियां पहले सरकार और शीर्षस्थ वर्गों से अपनी जरूरतों की भरपाई की उम्मीद करती थीं, दैन्य दिखाती थीं, उनसे विकास के समुचित अवसरों की मांग करती थीं. अब उन्हें लगता है कि दैन्य दिखाने, गिड़गिड़ाने की अपेक्षा संगठित संघर्ष द्वारा, अपने अधिकारों को ससम्मान प्राप्त किया जा सकता है.

पेशागत आधार पर भी जातीय विभाजन बेमानी सिद्ध हो रहा है. ब्राह्मण चमड़े का काम करने लगे हैं. जबकि चर्मकार जाति के होनहार पढ़लिखकर दूसरों को पढ़ाने लगे हैं. दूसरी दबीकुचली जातियां भी मुख्यधारा की ओर बढ़ रही हैं. गति बहुत धीमी है, मगर जैसेजैसे लोग शिक्षित हो रहे हैं, उनमें अपने अधिकारों के प्रति चेतना भी बढ़ती जा रही है. यदि आधुनिक समाज में परिवर्तन की ललक है और कुछ समूह तेजी से विकास की ओर अग्रसर हैं तो इसका एक कारण यह भी है कि वे लोग जो शताब्दियों तक शोषितउत्पीडि़त होते आए थे, जिन्होंने पीढ़ीदरपीढ़ी जातीय आधार पर भेदभाव, उत्पीड़न, और असमानता का दंश सहा है, जिन्हें जाति के आधार पर विकास के अवसरों से वंचित रखा गया थाअब संगठित होकर विकास में साझेदारी चाहते हैं. प्रौद्योगिकी के अलावा जाति आज सामाजिक गतिशीलता की सबसे बड़ी उत्पेरक है. कुछ मामलों में तो यह प्रौद्योगिकी से अधिक प्रभावशाली है. आधुनिक प्रौद्योगिकी की क्षमताएं अनंत हैं. मगर पूंजीपतियों के नियंत्रण के कारण वह फैशन का हिस्सा बन चुकी है. वह मनुष्य को तकनीक के स्तर पर समृद्ध, किंतु मनोभौतिक स्तर पर बौद्धिकविपन्न बना रही है. एक तरह से जीतेजागते मनुष्यों को मशीन में तबदील कर रही है. दूसरी ओर जाति नएनए विमर्श छेड़कर मानवसमाज को नए विचारों से लैस कर रही है. जाति के पीछे कोई कल्याणकारी विचारधारा नहीं है. हो भी नहीं सकती. किंतु जाति के माध्यम से संघर्षरत आंदोलनकारियों को लगता है कि केवल संगठित प्रतिकार ही उन्हें समाजार्थिक शोषण से मुक्ति दिला सकता है. कुछ लोग जाति के उभार से खिन्न हैं. वे लगातार आरोप लगा रहे हैं कि जातिवादी आंदोलन देश को शताब्दियों पीछे ले जाने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसा सोचने वालों में वही लोग हैं जिन्हें अस्मितावादी आंदोलनों से खतरा है. जो जाति के नाम पर संगठित होते युवाओं को संस्कृति और राष्ट्र के वास्ते जाति से अलग होने को उपदेश दे रहे हैं. जबकि जाति स्वयं उनके आचारव्यवहार का हिस्सा है. समाचारपत्रों में छपने वाले वैवाहिक विज्ञापनों से उनकी मनस्थिति और द्वैध को आसानी से समझा जा सकता है. कुल मिलाकर जातीय शोषण का शिकार रहे वर्गों के लिए आज जाति ही सबसे बड़ा हथियार है. वे कांटे से कांटा निकालना चाहते हैं. जाति उन्हें संगठित होने में मदद करती है. इसलिए कार्यविभाजन की अवैज्ञानिक शैली होने के बावजूद अधिकांश मानवसमूह जाति को संगठनकारी औजार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं.

इन दिनों एक ओर तो विभिन्न जातियों के बीच अस्मिता की पहचान को लेकर होड़ मची हुई है. दूसरी ओर आरएसएस जैसे संगठन धर्म और संस्कृति को रोपने में लगे हुए हैं. इसलिए जो लोग भारतीय समाज को जातिमुक्त देखना चाहते हैं, उन्हें धर्म की संकल्पना में आमूलचूल बदलाव करना पड़ेगा. जो समझते हैं कि हिंदू धर्म अपने वर्तमान स्वरूप में, लुंजपुंज देवताओं की फौज के रूप में रहे और जाति चली जाए? वे या तो बहुत भोले हैं या जाति व्यवस्था के उन्मूलन के प्रति अगंभीर हैं. बहुजन राजनीति के पैरोकार इस तथ्य को बाखूबी समझते हैं. इसलिए वे इस बार जाति के सवालों को सीधे नहीं उठा रहे हैं. देखा जाए तो उठा ही नहीं रहे हैं. शताब्दियों से जो जाति के औचित्य पर सवाल उठाते थे, अब उन्होंने इसे भारतीय समाज की हकीकत के रूप में, भले ही अस्थायी तौर पर, स्वीकार कर लिया है. इसलिए जाति के आधार पर सवाल उठाने के बजाय उसके आधार पर हुए समाजार्थिक शोषण और गैरबराबरी पर सवाल उठाए जा रहे हैं. जाति का सहारा लेकर शोषित और वंचित वर्गों को संगठित किया जा रहा है. लंबे अर्से के बाद यह समझ लिया है कि लोकतंत्र में राजनीतिक सहभागिता सामाजिक अन्याय को मेटने वाले प्रमुख उपकरणों में से है. इससे आर्थिक समानता के उस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है, जो मनुष्यता का अभीष्ट है. इस विभेदकारी समस्या के निदान के लिए शिक्षा और संसाधनों में साझेदारी की आवाज बुलंद की जा रही है. चूंकि इस बार जाति भी समानता के संघर्ष का एक हथियार है, इसलिए उससे सबसे अधिक तखलीफ उन लोगों को हो रही है, जो अभी तक जाति प्रथा का लाभ उठाते आए हैं. और जिसका सहारा लेकर उन्होंने बहुसंख्यक समाज को अपना आश्रित बनाए रखा है.

एक समय था जब आर्थिक सुदृढ़ीकरण देश के विकास की धुरी था. विशेषकर देश की आजादी के समय. तब आर्थिक उन्नति को लेकर नईनई योजनाएं बनाई जा रही थीं. इन दिनों सामाजिक न्याय जैसी समसामयिक अवधारणा विकास के साथ जुड़ चुकी है. विकास हो और उसका लाभ देश के सभी वर्गों तक पहुंचेꟷ˹ऐसी अपेक्षा की जाती है. सामाजिक न्याय के संघर्ष में जाति एक तात्कालिक माध्यम बन सकती है. लेकिन यह एकदम आसान भी नहीं है. जाति की अवधारणा ही अपने आप में नकारात्मक है. अतएव जाति को औजार की तरह इस्तेमाल कर रहे वर्गों और समूहों को समझना चाहिए कि औजार केवल माध्यम होता है. वह लक्ष्य को अपेक्षाकृत सुगम तो बनाता है, लेकिन स्वयं लक्ष्य नहीं होता. इसलिए अस्मितावादी आंदोलनों की मूल प्रवृत्ति छोटे जातिसमूहों को बड़े जाति समूहों में ढालने, जन से बहुजन और बहुजन से सर्वजन की ओर ले जाने वाली होनी चाहिए. ऐसा होगा, तभी जाति के कलंक से मुक्ति पाई जा सकती है. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का सामना वैकल्पिक जनसंस्कृति और श्रमसंस्कृति के उभार द्वारा आसानी से किया जा सकता है. वह ऐसी संस्कृति होगी जिसमें लोग धर्म के आधार पर नहीं हितों की समानता के आधार पर एकजुट होंगे तथा परस्पर सहयोग करते हुए आगे बढ़ेंगे. उस समय धर्म और उसपर टिकी विभेदक संस्कृति उनके रास्ते के सबसे बड़े अवरोधक होंगे. तब यह याद रखना उन्हें विशेष बल देगा कि प्रकृति ने अधिकार तो सभी को दिए हैं, बराबर दिए हैं, मगर विशेषाधिकार संपन्न किसी को भी नहीं बनाया है.

© ओमप्रकाश कश्यप