Tag Archives: भारतीय दर्शन

रूढ़ियों के शिकार धर्म-दर्शन

सामान्य

आधुनिकता की ओर बढ़ती आज की दुनिया के आगे सर्वाधिक ज्वलंत प्रश्न है—क्या दुनिया को धर्म की सचमुच जरूरत है? क्या उसके बिना दुनिया का कारोबार एकदम थम जाएगा? धर्म के आलोचक आज भी कम नहीं हैं। धर्मानुयायी मानते हैं कि उनके आलोचक धर्म के मर्म को समझ ही नहीं पाते। यह बात अलग है कि स्वयं धर्म के अनुयायी भी उसे पूरी तरह समझने का दावा नहीं करते। धर्म की आलोचना, अन्वीक्षा से वे प्रायः यह कहकर पीछे हट जाते हैं कि उसे  समझना आसान नहीं है। इसके पीछे उनकी मंशा धर्म के नाम पर गुरुडम को थोपने तथा उसे ‘नेति-नेति’ कहते हुए इतना महान बना देने की होती है कि सामान्य आलोचना-समीक्षा को भी समाज और राष्ट्रीय भावना के विरुद्ध मान लिया जाता है। असल में वे तयशुदा सीमाओं से, उन सीमाओं से जो उन्होंने धर्म से बंधकर अपने लिए सहर्ष चुनी हैं, अथवा किसी न किसी बहाने उनपर थोप दी गई हैं, बाहर आना ही नहीं चाहते। न ही वे चाहते हैं कि उनका कोई अनुयायी उस सीमा रेखा को लांघने की हिमाकत करे। हम धर्म को ऐसी हवेली मान सकते हैं, जिसके अनेकानेक दावेदार हैं। कदाचित इसी कारण वह हजारों वर्षों से बंद है। ताजी हवा का प्रवेश उसमें निषिद्ध है। उसके भीतर झांकने की इजाजत तक किसी को नहीं है। यदि कोई उस हवेली के भीतर जाकर झाड़-पौंछ करना चाहे तो उसके दावेदार नाराज हो जाते हैं। डरते हैं कि हवेली साफ हुई तो उनकी सत्ता गई। बाहरी हस्तक्षेप को रोकने के लिए वे कई बार इतनी कुटिल चालें चलते हैं कि बड़े-बड़े प्रतिभाशाली उनके आगे घुटने टेक देते हैं। जनसाधारण को बस इतनी अनुमति होती है कि अपने विवेक को गिरवी रखकर उस हवेली के दूर से ही दर्शन कर सके।

ऐसा आज से नहीं, सैकड़ों वर्षों से है। मध्यकाल में इसका सटीक उदाहरण मीमांसक कुमारिल भट्ट हैं। अपने समय के विलक्षण प्रतिभाशाली कुमारिल भट्ट ने बौद्ध विद्वानों को शास्त्रार्थ में परास्त करने के लिए बौद्ध दर्शन का अध्ययन किया था। वे अपने मकसद में कामयाब भी हुए। बौद्ध पराजित हुए। लेकिन कुमारिल भट्ट अपनों से हार गए। प्रायश्चित स्वरूप उन्हें धीमी आंच में तपकर मृत्यु का वरण करना पड़ा। केवल इसलिए कि उन्होंने गुरु की अनुमति लिए बिना बौद्धमत का अध्ययन किया था। हिंदू धर्म में व्याप्त जड़ता, गुरुडम तथा नए और समकालीन ज्ञान-विज्ञान से जान-बूझकर बनाई गई दूरी को समझने के लिए यहाँ उनकी विशेष चर्चा प्रासंगिक है।

शंकराचार्य से एक पीढ़ी, लगभग 650 ईस्वी पूर्व जन्मे कुमारिल भट्ट वैदिक परंपरा में विश्वास रखते थे। तिब्बतीय बौद्ध ग्रंथों के हवाले से यह भी बताया गया है कि कुमारिल भट्ट के पास धान का विशाल खेत था, जिसमें 500 पुरुष और इतनी ही स्त्रियां दास के रूप में काम करते थे। उन दिनों भारत में बौद्ध दर्शन का बोलबाला था। कुमारिल भट्ट मानते थे कि बिना बौद्ध धर्म-दर्शन के पराभव के वैदिक परंपरा का पुनर्जीवन असंभव है। वैदिक धर्म को पुनःस्थापित करने की प्रेरणा उन्हें एक राजकुमारी से मिली थी। राजकुमारी बौद्ध दर्शन से घबराई हुई थी। बौद्ध दर्शन सनातन वर्ण-व्यवस्था और वंशगत अधिकारों का विरोध करता था। द्विज वर्ग की परंपरागत श्रेष्ठता के विचार को अस्वीकार करते हुए वह निर्वाण(मोक्ष) को सर्वसाधारण के लिए संभव बताता था। समानता आधारित दर्शन के कारण बौद्ध दर्शन का प्रभाव, भारत के अलावा आसपास के देशों पर भी था। राजकुमारी को डर था कि बौद्ध धर्म के प्रभाव के चलते उसके वंशगत अधिकार उससे छिन सकते हैं। अद्वितीय प्रतिभा के धनी कुमारिल भट्ट उन दिनों वैदिक परंपरा के ग्रंथों के अध्ययन-अनुशीलन में लगे थे। गुरुजन उनकी मेधा से अत्यंत प्रभावित थे। वंशानुगत अधिकारों के छिन जाने की आशंका से बुरी तरह घबराई राजकुमारी कुमारिल भट्ट से मिलते ही रो पड़ी। उसने रोते-रोते ही अपनी व्यथा प्रकट की—

‘क्या करूं, कहां जाऊं, वेदों का उद्धार कौन करेगा?’

‘हे सुकुमारे! रो मत!! वेदों का उद्धार कुमारिल भट्ट करेगा।’1 

राजकुमारी के आंसुओं से विगलित युवा कुमारिल भट्ट के मुख से सहसा निकला। कहते हैं कि कुमारिल भट्ट ने उसी दिन से बौद्ध धर्म-दर्शन की प्रतिष्ठा को कम करना अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। उन दिनों बिना गुरु की अनुमति के किसी और धर्म-दर्शन की शिक्षा लेना अपराध माना जाता था। लक्ष्य-सिद्धि हेतु कुमारिल भट्ट ने पहले तो बौद्ध धर्म का गहरा अध्ययन किया। तदनंतर, राजकुमारी को दिए गए वचन का निर्वहन करते हुए उन्होंने बौद्ध धर्म-दर्शन की जमकर आलोचना की। यहां तक कि नालंदा जाकर उस समय के प्रसिद्ध बौद्ध आचार्यों को शास्त्रार्थ में पराजित भी किया। लेकिन अपने गुरु से छिपकर बौद्ध दर्शन की शिक्षा लेने की ग्लानि उन्हें लगातार सालती रही। इसलिए प्रायश्चित स्वरूप उन्होंने खुद को धीमी अग्नि शिखाओं के समर्पित कर दिया। बौद्ध धर्म-दर्शन के पराभव के लिए उन्होंने जो जमीन तैयार की, उसी पर चलते हुए वेदांती शंकराचार्य ने अपनी कीर्ति-कथा लिखी। इस योगदान हेतु वैदिक परंपरा के अनुयायी कुमारिल भट्ट को पहला बलिदानी ब्राह्मण मानते हैं।

कहते हैं कि वेदांत की ध्वजा फहराने के लिए निकले शंकराचार्य काशी-मार्ग में कुमारिल भट्ट से भी मिले थे। अपने मत को स्थापित करने के लिए वे उनसे शास्त्रार्थ करना चाहते थे। जिस समय शंकराचार्य कुमारिल के पास पहुंचे, वे स्वयं को धीमी अग्नि युक्त चिता को समर्पित कर चुके थे। उनकी टांगें और शरीर का निचला हिस्सा जल चुका था। उस अवस्था में वे शंकराचार्य से शास्त्रार्थ नहीं कर सकते थे। अतः उन्होंने अपने शिष्य मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ करने का सुझाव दिया। कुमारिल भट्ट को अग्नि-शैय्या पर झुलसता हुआ छोड़, शंकराचार्य वहां से चल दिए। धार्मिक दृष्टिकोण से वह भले ही कुमारिल भट्ट का प्रायश्चित रहा हो, लेकिन व्यापक अर्थों में क्या वह अवसाद-जनित आत्महत्या नहीं थी? यदि ऐसा है तो शंकराचार्य का कुमारिल भट्ट को अग्नि-चिता पर छोड़कर जाना क्या उचित था? क्या उनका यह कर्तव्य नहीं था कि वे कुमारिल भट्ट से आत्महत्या का इरादा त्याग देने का निवेदन करते? उन्हें उस आत्म-ग्लानि से बाहर लाने की कोशिश करते, जिसने आत्महत्या जैसा घृणित कदम उठाने को विवश किया था? सामान्य नैतिकता कहती है कि आत्महत्या को उद्यत व्यक्ति को, वह चाहे जिस कारण से प्राणांत चाहता हो, किसी भी प्रकार से रोका जाए। लेकिन जिस दौर की यह घटना है, उसमें धार्मिक आग्रह हठधर्मी की सीमा तक प्रभावी होते थे। धार्मिक वाद-विवाद प्रायः जीवन-मरण का सवाल बन जाता था। ऐसे में व्यक्ति के साथ उसके विचार का अंत भी स्वाभाविक था। शंकराचार्य से हारकर मींमासक मंडन मिश्र, वेदांती सुरेश्वराचार्य बनकर उसके प्रचार-प्रसार में लग जाते हैं। उसके बाद मीमांसा दर्शन बौद्धिक विमर्श और जीवन दोनों से गायब हो जाता है।

इस प्रसंग के कुछ खास संकेत हैं। पहला प्राचीन गुरु नहीं चाहते थे कि उनका शिष्य ज्ञान और यश में उनसे आगे जाए। दूसरे प्राचीन ऋषियों के लिए बौद्धिक शास्त्रार्थ शारीरिक कुश्ती से भी गया-गुजरा था। कुश्ती में हारा हुआ पहलवान नई तैयारी और हौसले के साथ उसी पहलवान को दुबारा चुनौती दे सकता है। लेकिन शास्त्रार्थ में विजेता, पराजित व्यक्ति के तन और मन दोनों पर अधिकार जमा लेता था। व्यक्ति के साथ उसकी विचारधारा भी पराजित मान ली जाती थी। केवल विजेता का धर्म रह जाता है। कुल मिलाकर विचार को भी अखाड़े में उतर कर प्रतिद्विंद्वी विचारधारा को चुनौती देनी पड़ती थी।

2

जैन और बौद्ध धर्म-दर्शन इसके अपवाद थे। यहाँ जैन दर्शन की तो हमें खास तौर पर प्रशंसा करनी होगी। वैदिक हिंसा और गलाकाट बौद्धिक स्पर्धा के बीच उसने ‘स्याद्वाद’ का सिद्धांत सामने रखा था। वह विभिन्न विचारों को स्वतंत्र रूप से, एक-दूसरे के समानांतर बहने की अनुमति देने का उदारतापूर्ण विधान था। इसके अनुसार कोई भी विचार अंतिम सत्य नहीं है। प्रत्येक विचार अपने भीतर सत्य का कोई न कोई अंश छिपाए रखता है। वह पूरा सत्य हो ही नहीं सकता। चार अंधे एक ही बार में हाथी के पूर्ण रूप का बयान नहीं कर सकते। इसलिए उनमें से प्रत्येक द्वारा दिया गया विवरण, सत्य होने के बावजूद सत्य नहीं है। वह पूर्ण सत्य की एकांगी अथवा आंशिक अनुभूति है। ‘स्याद्वाद’ का दर्शन, वैदिक दर्शन की वैचारिक हिंसा के विरोध में उपजा था। लेकिन राजाओं के साम्राज्यवादी मनसूबे साधने के लिए युद्ध आवश्यक थे; और बगैर हिंसा के युद्ध लड़ना संभव ही नहीं था। ऐसे समाज में वैचारिक अहिंसा का कोई व्यावहारिक महत्व न था। अतः कालांतर में हिंसा को उसके स्थूल रूप; यानी केवल जैविक हिंसा तक सीमित मान लिया गया।

‘स्याद्वाद’ से पता चलता है कि जैन दर्शन में अहिंसा का अर्थ कहीं व्यापक था। उसकी कामना थी कि समाज में विभिन्न मतांतर वाले लोग, एक-दूसरे का सम्मान करते हुए जीवन जिएं। उनमें कोई द्वैष न हो। यदि वैचारिक लोकतंत्र होगा, तो लोग एक-दूसरे की भावनाओं का ख्याल रखेंगे, तभी समाज में वैचारिकता के प्रति अनुराग होगा। मगर केवल अपने विचारों को सर्वोपरि समझने, बताने की जिद के चलते, ‘स्याद्वाद’ का विचार समाज में गहरी जड़ें न जमा सका। यह बात भुला दी गई कि हिंसा प्रधान समाज में वैचारिक अहिंसा का टिके रहना असंभव है। वैचारिक लोकतंत्र के समर्थक, ‘स्याद्वाद’ जैसे दर्शन के कमजोर पड़ने का परिणाम यह हुआ कि ब्राह्मणों ने न केवल दूसरे विचारों की ओर से अपने आँख-नाक-कान बंद कर लिए, अपितु गैर-ब्राह्मण उनके धर्म-ग्रंथों के पढ़ न पाएँ, इसके लिए भी उनपर बड़े-बड़े प्रतिबंध थोप दिए।

हम पुनः कुमारिल भट्ट की कहानी पर लौटते हैं। हमने जाना कि कुमारिल भट्ट को अग्नि-शिखाओं पर आसीन देखकर भी शंकराचार्य का हृदय मोम न हुआ। शायद उनकी उत्कृष्ट मेधा का भय शंकराचार्य को रहा हो; यह आशंका कि कुमारिल भट्ट जैसे विद्वान को पराजित करना शायद उनके लिए संभव न हो! यह भी संभव है कि  वेदोक्त धर्म-दर्शन के शीर्ष-पुरुष बनने की महत्वाकांक्षा के साथ निकले शंकराचार्य, ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना चाहते हों, जिससे उनपर वैदिक परंपरा का दोषी होने का आरोप लगाया जा सके। इसलिए उन्होंने कुमारिल भट्ट को बचाने की कोई कोशिश न की। आज शंकराचार्य के समर्थक उस प्रसंग को गोल-मोल कर जाते हैं। हिंदू परंपराओं के जानकार के लिए इसमें कुछ भी अजूबा नहीं है। परंपरानुगामी भारतीय मेधा घटनाओं के निष्पक्ष विवेचन के बजाय श्रद्धा को महत्व देती है। उसकी कोशिश व्यक्तिगत श्रद्धा को सामूहिक श्रद्धा में बदल देने की रहती है। उस समय यदि शंकराचार्य कुमारिल भट्ट को चिता से उबार लेते तो वेदांत भले ही न जीतता, लेकिन इंसानियत अमर हो जाती।

3

यहां एक किस्सा याद आ रहा है। बताते हैं कि रामानुजाचार्य को उनके गुरु ने एक मंत्र दिया था। मंत्र देते समय उन्होंने शिष्य रामानुज के कान में कहा—

‘बहुत पवित्र मंत्र है। जिसे बताओगे वह तर जाएगा।’

‘जी….गुरु जी।’ रामानुज ने गुरु का धन्यबाद किया।

‘लेकिन एक शर्त है। इस मंत्र को किसी अपात्र के समक्ष कभी प्रकट मत करना।’

‘अपात्र कौन?’

‘शूद्र, अछूत, स्त्री….शास्त्रों में उनका उल्लेख है।’

‘यदि मैं ऐसा करूं तो….’

‘घोर पाप….घोर पाप। सीधे रौरव नर्क में जाओगे।’

गुरुजी को दंडवत कर रामानुज वहां से चल दिए। रास्ते में उन्हें जो भी पात्र व्यक्ति दिखाई दिया, सभी को मंत्र दिया। गुरु को जब पता चला कि रामानुजाचार्य पात्र-अपात्र का ध्यान रखे बिना ही दीक्षा दे रहे हैं तो उन्होंने उन्हें बुलवाया, बरजा। गुरु के आदेश का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। तब रामानुजाचार्य ने कहा—

‘आप ही ने कहा था कि जो भी व्यक्ति इस मंत्र का पाठ करेगा, उसका उद्धार होगा?’

‘मैंने यह भी कहा था कि अपात्र को इस मंत्र की दीक्षा दी तो तुम सीधे रौरव नर्क में जाओगे।’

‘यदि मुझ अकेले के नर्क में जाने से इतने सारे लोगों को मुक्ति मिलती है तो मुझे सौ-सौ जन्मों तक नर्क स्वीकार्य है।’ रामानुज का उत्तर था।

इसकी प्रतिक्रिया में रामानुज के गुरु ने क्या कहा होगा, मालूम नहीं। लेकिन उनके साथ अप्रत्यक्ष स्पर्धा में जीत शंकराचार्य की हुई थी। कैसे? रामानुज विशिष्टाद्वैत दर्शन के प्रवर्त्तक थे, और शंकराचार्य अद्वैत के। रामानुज मानते थे कि आत्मा और परमात्मा एक ही हैं, मगर संसार में आकर उनकी अलग-अलग प्रतीति होती है। शंकराचार्य आत्मा और परमात्मा को एक मानते थे। ब्राह्मणों ने घोषित रूप से शंकराचार्य के मत को स्वीकार किया। इस्लाम के सूफीवाद की और से मिल रही चुनौती से निपटने के लिए यह जरूरी था। किंतु आत्मा और परमात्मा एक हैं, इस आधार पर सभी मनुष्य बराबर हैं—इस सत्य को वे कभी गले से नहीं उतार पाए।  

हम यह नहीं कहते कि रामानुज का विशिष्टाद्वैत आदर्श दर्शन है। असल में न तो स्वर्ग होता है, न ही नर्क। मुक्ति स्वयं एक मिथ है। अतएव ऊपर दी गई कहानी को उसकी प्रतीकात्मकता, यानी सामाजिक संदर्भों में समझना चाहिए। कहानी बताती है कि किसी काम से यदि एक व्यक्ति को नुकसान, मगर अनेक को लाभ पहुंचता है तो वह कार्य करणीय हो सकता है, और व्यावहारिक नैतिकता के दायरे में आता है। पूर्ण नैतिकता तब होगी जब बाकी सब लोग, व्यक्ति विशेष को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई करने की ठान लें।

अपने मान-अपमान और आलोचनाओं की चिंता किए बिना शंकराचार्य कुमारिल भट्ट जैसे मनीषी की प्राण रक्षा को आगे आते; तो वे मनुष्यता के लिए आदर्श उदाहरण पेश करते। मगर परंपरा से भयभीत शंकराचार्य उस अवसर की जानबूझकर उपेक्षा कर जाते हैं। बहरहाल, बौद्ध दर्शन के अध्ययन हेतु प्रस्थान करते समय कुमारिल भट्ट की मनःस्थिति को लेखक और क्रांतिकारी यशपाल ने खूब समझा था। वे लिखते हैं—

‘कुमारिल भट्ट दो बातें खूब समझते थे। पहली बात यह कि बौद्ध दर्शन उनकी प्रतिपालक और रक्षक द्विज श्रेणी के हित और अधिकारों पर आघात कर रहा है; और दूसरी बात, द्विज श्रेणी के सामाजिक और आर्थिक शासन की वेदोक्त व्यवस्था….द्विज श्रेणी के शासन के अधिकारों का विरोध करने वाले बौद्ध दर्शन की सत्य, अहिंसा और न्याय की मांग—द्विज श्रेणी के अधिकारों की हिंसा करती है। अतः बौद्ध दर्शन से ‘फाइट’ करना आवश्यक है।’2 

कुमारिल भट्ट के प्रायश्चित की घटना द्वारा हम, न केवल उनकी मनोरचना, अपितु तत्कालीन समाज के मनोविज्ञान को  भी समझ सकते हैं। उन दिनों धर्म, दर्शन और विचार की प्रामाणिकता को परखने के उपाय कभी-कभी इतने विचित्र, अविचारी और अस्वाभाविक होते थे कि आज उनपर विश्वास करना कठिन जान पड़ता है। बताते हैं कि नालंदा में बौद्ध दर्शन के अध्ययन के लिए कुमारिल भट्ट ने छद्म नाम से प्रवेश लिया था। वहां के विद्यार्थियों को जब पता चला तो वे बहुत कुपित हुए। उन्होंने कुमारिल को सबक सिखाने की ठान ली। कुछ शरारती लड़कों ने उन्हें विश्वविद्यालय की छत से फैंकने का निश्चय किया।  बौद्ध विचारक वेदों को अप्रामाण्य और मानवकृत मानते थे। बौद्ध दर्शन को मिटाने के कुमारिल भट्ट के संकल्प के पीछे यही मुख्य वजह थी। जब वे लड़के उन्हें कुमारिल को ढकेलने जा रहे थे तब उन्होंने उन सभी को सुनाते हुए कहा था—‘यदि वेद प्रामाण्य हैं तो मुझे कोई भी चोट नहीं पहुंचेगी।’

संयोगवश वे सकुशल बच गए। उसी दिन से कुमारिल ने मान लिया कि वेद स्वतः प्रामाण्य हैं। वह विवेक पर  अंधश्रद्धा की जीत थी। आत्मदहन से पहले कुमारिल भट्ट ने विपुल वाङ्मय की रचना की थी। लेकिन विलक्षण मेधा के बावजूद वे मीमांसा दर्शन को वह सम्मान दिलाने में नाकाम रहे, जिसके वे आचार्य थे। जिसके लिए उन्होंने बौद्धों को पराजित करने की कामना के साथ गुरु-द्रोह किया था। मंडन मिश्र के पराजित होते ही मीमांसा दर्शन लगभग पूरी तरह उखड़ गया। बाद में ब्राह्मणों ने उनके प्रायश्चित का खूब महिमामंडन किया। उससे दर्शन में विचार को जो सम्मान मिलना चाहिए, वह लगातार कम होता गया। उसके स्थान पर कर्मकांड और रूढ़ियां अपनी पकड़ बनाते गए।

4

शब्द की कसौटी शब्द; और विचार की कसौटी केवल विचार बन सकता है। बावजूद इसके चमत्कारों और संयोगों के माध्यम से किसी विचार या वस्तु को प्रमाणित करने की प्रवृत्ति भारतीय समाज में बहुत पुरानी है। रूढ़ियों को विचारधारा का रूप देने तथा विरोधी विचारों से सीख लेने के बजाय उन्हें मिटा देने के उदाहरण भी कई हैं। कहीं पढ़ा था कि उज्जैन नगरी में एक ऐसा तालाब था, जिसका उपयोग शास्त्रीय ग्रंथों की जांच के लिए कहा जाता था। तरकीब निराली थी। यदि ग्रंथ तैर जाए तो उसको मौलिक और महत्वपूर्ण मानकर सम्मान मिलता था। अगर डूब जाए तो उसे स्थायी जल-समाधि के लिए छोड़ दिया जाता था। समझ सकते हैं कि वह गुणवत्ता जांच के नाम पर ग्रंथ को ही मिटा देने की बौद्धिक वर्ग की साजिश थी। लोकश्रुति के अनुसार उस तालाब में पांच हजार से अधिक ग्रंथों को इसी तरह डुबोया गया था। बाद में उस तालाब को पाट दिया गया। इस तरह न जाने कितनी बहुमूल्य पांडुलिपियां, केवल इसलिए कि उनमें व्यक्त विचार शासन और उसके चहेते बुद्धिजीवी वर्ग की विचारधारा से मेल नहीं खाते थे, हमेशा-हमेशा के लिए दफन कर दिए गए। बौद्ध काल में चार्वाक, लोकायत और आजीवक धर्म जैसी भौतिकवादी विचारधाराएं विमर्श में थीं। अजित केशकंबलि, मक्खलि घोषाल, पूर्ण कस्सप जैसे विचारक उनके पोषण में लगे थे। वैदिक परंपरा के पुरोहितों और आचार्यों से उनका शास्त्रार्थ चलता रहता था। इसके बावजूद इन विचारधाराओं से संबंधित स्वतंत्र ग्रंथ हमें प्राप्त नहीं होता। इसके पीछे तत्कालीन आचार्यों की विरोधी विचारधारा के प्रति असहिष्णुता रही है।

संवैधानिक व्यवस्थाओं और लोकतंत्र के इस दौर में होना तो यह चाहिए कि हम इतिहास से कुछ सबक लें, किंतु विचार के नाम पर जड़ता और धर्म-दर्शन के नाम पर असहिष्णुता निरंतर बढ़ती ही जा रही है। शायद ऐसी ही परिस्थितियां डॉ.  आंबेडकर की बहुचर्चित पुस्तक ‘हिंदू धर्म की पहेलियां’ लिखने की प्रेरणा बनी थीं।

ओमप्रकाश कश्यप 

1.   किं करोमि क्वगच्छामि को वेदानुधरिष्यति.

मा रुदसि बाले, कुमारिलभट्टोवेदानुद्धारिष्यति. —यशपाल द्वारा ‘अपने संपर्कों के प्रति मेरे देय’ से उद्धृत, यशपाल के निबंध, पृष्ठ 431.

2 .   यशपाल के निबंध, अपने संपर्कों के प्रति मेरे देय, 431।

ऋग्वेदकालीन भौतिकवादी चिंतन

सामान्य

अनीश्वरवादी चिंतन की भारतीय परंपरा―दो

हम भारतीय कालिदास को आदिकवि मानते हैं तथा ‘रामायण’ को आदिकाव्य. जबकि आदिग्रंथ होने का गौरव ‘ऋग्वेद’ को देते आए हैं. तो क्या ऋग्वेद की ऋचाएं काव्यरचनाएं नहीं हैं? ऋग्वेद को आदिकाव्य कहने में हमें संकोच क्यों होना चाहिए? उसकी ऋचाओं में कविता के लक्षण है, इस तथ्य को कोई नहीं नकारता. फिर भी लोग ऋग्वेद को आदिकाव्य कहने में संकोच करते हैं. यह कहकर कि वेदों के रचियता ‘मंत्रसृष्टा’ न होकर ‘मंत्रदृष्टा’ कवि थेउन्हें आलोचनाविमर्श के दायरे से बाहर निकालकर ‘आप्तग्रंथ’ घोषित कर दिया जाता है. कुछ ऐसा ही मुसलमान ‘कुरआन’ के बारे में दावा करते हैं. धर्मग्रंथों को दैवी ग्रंथ सिद्ध कर श्रद्धा का पात्र बना देने की परंपरा लगभग हर धर्म में रही है. अनुयायियों को लगता है कि धर्मग्रंथ को मानवीकृत कहने से उसका महत्त्व घट जाएगा. जबकि दैवीय कह देने से लोग उसके प्रति ऋद्धा के साथ पेश आएंगे. उनमें लिखी बातों का तन्मयता के साथ पालन करेंगे. धर्मग्रंथों के साथ ऐसा हमेशा होता आया है. ऐसा मान लेने से न केवल वह कृति आलोचनाविमर्श के दायरे से बाहर निकल जाती है, बल्कि उसके मौलिक विस्तार की संभावनाएं भी क्षीण हो जाती हैं. ऋग्वेद यदि आदि ग्रंथ है. उसकी ऋचाओं में कविता के लक्षण हैं तो स्वाभाविक रूप से उसके रचनाकार इस देश और अपनी भाषा के प्राचीनतम कवि भी हैं. साहित्यिक कृति के रूप में ऋग्वेद की सामग्री का मूल्यांकन न करने का नुकसान यह भी होता है कि वैदिक परंपरा के नाम पर रचे गए कथानकों में आए पात्रों, घटनाओं, चरित्रों आदि का मिथकीकरण करने का अवसर परंपरावादियों को मिल जाता है. ऋग्वेद इसी का शिकार होता आया है. बाद में लिखे गए तीनों वेद किसी न किसी रूप में ऋग्वेद के कर्मकांडीकरण की कोशिश है. कालांतर में यही प्रवृत्ति भारतीय मनीषा का संस्कार बनकर उभरती है, जिसमें बिना प्रतीकों और मिथकों का सहारा लिए विमर्श करना मुश्किल हो जाता है. वेदों को आप्तग्रंथ का गौरव भले ही मिला. परंतु ब्राह्मण मनीषियों के लिए वैदिक परंपरा वेदों से अधिक महत्त्वपूर्ण थी. इसलिए वेदों तथा वेदादि ग्रंथों के पाठ में उनके भाष्यकार के हिसाब से परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं. परंतु मूलभूत परंपरा में कोई अंतर नजर नहीं आता.

ब्राह्मणवादी दर्शनपरंपराएं वेदों से उपजी थीं. आरंभ में वे श्रुति की अवस्था में थीं. तथापि ब्राह्मणमनीषियों को उनपर इतना गुमान था कि उनके कारण खुद को विश्वसभ्यता में श्रेष्ठतम होने की दावेदारी करते थे. वेदों में सूत्र रूप में उपस्थित दार्शनिक विचारों को विस्तार देने से अधिक चिंता उन्हें उनके संरक्षण की थी. उसके लिए तरहतरह के आयोजन किए जा रहे थे. गैरब्राह्मणवादी विचारधाराएं आजीवक, लोकायत आदि जिन्हें भौतिकवादी चिंतनधारा भी कहा जा सकता हैके बारे में माना जाता है कि वे ब्राह्मणवादी दर्शनों के विरोध में जन्मीं, तथा उसके बहुत बाद की हैं. वैदिक परंपरा के समर्थक वेदों को भारतीय दर्शनचिंतन का आदिस्रोत तथा वैदिक युग को भारतीय दर्शन परंपरा का आदिचरण मानते हैं. इसे हम उनका पूर्वाग्रह कह सकते हैं. समकालीन दर्शनों को नकारने की प्रवृत्ति भी इसका कारण हो सकती है. सच तो यह है कि वेदों में जो प्रच्छन्न दार्शनिक सूत्र हैं, उनपर प्रकृतिवादी दर्शनों की गहरी छाया है. प्राचीन यायावर मनस्वियों के अनुभवों से उपजीं वे विचारधाराएं वेदों की रचना से बहुत पहले से समाज में निश्चय ही विद्यमान रही होंगी. वैदिक युग से भारतीय चिंतन परंपरा में क्रांतिक बदलाव की शुरुआत होती है. वह ऐसा मोड़ है जहां से अध्यात्मचिंतन में मिथक महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं. मौलिक चिंतन में गुरुडम की घुसपैठ होने लगती है. जीवन संबंधी सहजसामान्य दर्शन पर मिथक सवार हो जाते हैं. सत्तासमर्थन के सहारे ब्राह्मण ऋषियों का समूह बिना व्यक्तिगत यशलाभ की कामना के, उस परंपरा को इस तरह आगे बढ़ाता है कि उसमें परंपरामोह निर्णायक रूप ले लेता है. मौलिक चिंतन की महत्ता घटने लगती है. परिणामस्वरूप समकालीन चिंतनधाराएं, विशेषकर वे जो उस परंपरा के लिए चुनौती थींगौण मान ली जाती हैं. ज्ञान के कर्मकांडीकरण की वह परंपरा धीरेधीरे अपने समय के समूचे ज्ञानानुराग एवं सामाजिक विवेक को अपनी गिरफ्त में ले लेती है.

दर्शन की सर्वमान्य कसौटी है कि उसमें स्थायी विश्वास या निष्कर्ष जैसी कोई चीज नहीं होती. दार्शनिक सत्य शाश्वत न होकर चिर नूतन होता है. इसलिए उसकी खोज भी चिर नवीन बनी रहती है. जैसे ही कोई नया विचार सामने आता है, उसका प्रतिविचार तथा मिलेजुले विचारों की शृंखला साथ ही जन्म ले लेती है. विचारों के संलयन एवं विश्लेषण द्वारा पुनः नए विचारों की उत्पत्ति होती है. कल्पना का महत्त्व दर्शन के क्षेत्र में भी होता है. परंतु दार्शनिक कल्पना साहित्यकार की कल्पना से हटकर वैज्ञानिक परिकल्पना के निकट होती है. साहित्यिक कल्पना का वितान अंतहीन होता है. उसके लिए मानवीय मूल्य महत्त्वपूर्ण होते हैं, जबकि दर्शन में महत्त्व केवल और केवल सत्य का होता है. इसका आशय यह नहीं है कि दर्शन जीवनमूल्यों से निरपेक्ष होता है. साहित्य की भांति दर्शन का ध्येय भी जीवन को श्रेष्ठतम की ओर गतिमान रखना है. दर्शन स्वयं शुभत्व की शाश्वत खोज का सिलसिला है. साहित्यकार अपनी कल्पना को लोकपरलोक में कहीं भी लाले जा सकता है. दार्शनिक के लिए उसकी कल्पना सत्य की खोज को समर्पित होती है. इसलिए ज्ञात सत्य अथवा स्थापित तर्कपद्धति ही उसका आधार बनती है. कुल मिलाकर दार्शनिक परिकल्पना वैज्ञानिक परिकल्पना जैसी ही होती है. अंतर केवल इतना है कि दार्शनिक परिकल्पना का विषय मूर्त्तअमूर्त्त कुछ भी हो सकता है. जबकि वैज्ञानिक परिकल्पना किसी न किसी मूर्त्त विषय यानी ऐसे विषयों जिनका भौतिक आधार पर परीक्षणअवलोकन, सत्यापन आदि किया जा सकेसे संबद्ध रहती है. जब तक किसी परिकल्पना का पर्याप्त आधार न हो, दर्शन के क्षेत्र में उसका महत्त्व सहज प्रतीति जितना ही होता है. तर्क की कसौटी पर कमजोर परिकल्पना साहित्य का आधारस्रोत हो सकती है, दर्शन का नहीं.

वेदों में आर्यों का प्रच्छन्न इतिहास है. छिटपुट दर्शन भी है. परंतु उनमें प्रमुख हैयज्ञ संस्कृति. पुरोहितवाद. जिसके प्रभाव में प्रच्छन्न इतिहास मिथकीय रूप में सामने आता है. दार्शनिक अवधारणाओं पर भी मिथकों का प्रभाव है. अग्नि, सूर्य, उषा, इंद्र, सोम, मित्रवरुण, मरुत, द्यावा, पृथ्वी, अश्विन आदि देवता हैं. उनका सीधा संबंध प्रकृति से है. ‘विश्वदेव’ की भी परिकल्पना है जो विभिन्न देवताओं का सूत्रीकरण कर एकेश्वरवाद की ओर इशारा करता है. कुछ स्थानों पर भावनाओं और संवेगों को भी देवताओं में शामिल किया गया है, जैसे वाक्, ज्ञानम्, मनस्, काम इत्यादि. प्रत्येक देवता किसी न किसी प्राकृतिक शक्ति का स्वामी है. सवाल है कि अग्नि, आकाश, पृथ्वी, वायु आदि जीवनदायिनी प्राकृतिक शक्तियों को सीधेसीधे उनके भौतिक रूप में देवता मानने के बजाए, उनके नामानुरूप मिथकीकरण क्यों किया गया? क्यों उनके लिए सातवें आसमान के पार कथित स्वर्ग में मौजूद शक्तियों की कल्पना की गई? हमारा मानना है कि केवल सहूलियत के लिए. ऐसा करना मनुष्य को आसान लगा. हो सकता है आरंभ में केवल मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण ही प्रभावी रहा हो. क्योंकि अनुभवों के सामान्यीकरण के लिए उन्हें किस्सेकहानियों में ढालना जरूरी था. उसके फलस्वरूप पृथ्वी, सूरज, चंद्रमा, जल, आकाश आदि का पहले मानवीकरण किया गया. फिर वे विभिन्न प्रतीकों के रूप में संस्कृति का हिस्सा बनने लगे. वही प्रतीक कालांतर में पुरोहितवाद के हत्थे चढ़, देवता के रूप में पहचाने जाने लगे. जिन्हें वेद कहा जाता है, उनकी अधिकांश सामग्री काल्पनिक प्रतीकों के महिमामंडन तथा उनके नाम पर हुए कर्मकांडीकरण का परिणाम है. आप्त ग्रंथ बताकर कल्पना को प्रामाणिक बनाने की कोशिश ब्राह्मण ग्रंथों में लगातार दिखाई पड़ती है. वेदों को ‘आप्त ग्रंथ’ मानना धर्म की निगाह में महत्त्वपूर्ण हो सकता है. दर्शन की निगाह में यह तर्कबुद्धि को एक खूंटे से बांध देने जैसा विचारहीन कृत्य है. विडंबना यह कि कालांतर में निहित स्वार्थवश इसी को सर्वाधिक महत्त्व दिया जाने लगा. वेदों को धर्मग्रंथ मान लेने का परिणाम यह हुआ कि दर्शन की बाकी शाखाएं यानी न्याय और वैशेषिक जैसे दर्शन जो केवल तत्व चिंतन को प्राथमिकता देते हैं, लगातार उपेक्षित होते गए. जबकि इन्हीं दर्शनों से कुछ तत्व उधार लेकर कालांतर में जैन और बौद्ध दर्शन ने समाज के बड़े वर्ग को प्रभावित करने का काम किया.

वेदों को श्रुति कहा गया है. वे किसी एक कालखंड की रचना नहीं हैं. इसलिए उनमें विचार के अनेक रूप विद्यमान हैं. जिन मनीषियों के नाम से ऋचाओं का उल्लेख मिलता है, उनके जीवन के बारे हमारे पास नगण्य सूचनाएं हैं. कदाचित इसीलिए उनके रचियताओं के बारे में भिन्न स्रोतों से अलगअलग जानकारी प्राप्त होती है. ‘दीघनिकाय’ के ‘तेविज्जसुत्त’ में बुद्ध ने ब्राह्मण लेखकों तथा मूल वैदिक कवियों का वर्गीकरण किया है. उनके अनुसार वेदों के आदि रचियता ऋषियों की संख्या मात्र दस है―अट्टक, वामक, वामदेव, यमदग्नि, विश्वामित्र, कश्यप, भरद्वाज, भृगु, अंगिरस तथा वशिष्ट. आगे चलकर इस सूची में बदलाव होता है. मनुस्मृति(1/35) में जो नाम गिनाए गए हैं, वे हैं―भृगु, नारद, वशिष्ट, क्रतु, अत्री, अंगीरस, पुलत्स्य, पुलह, प्रचेतस और मैत्रेयी. कुछ जगह केवल ‘सप्त ऋषियों’ को ही वेदों का आदि रचियता होने का गौरव प्राप्त हैं. मनुस्मृति द्वारा गिनाए गए नाम वास्तविक हैं अथवा कुलपरंपरा? इस बारे में कुछ भी दावे के साथ नहीं कहा जा सकता. क्योंकि ‘नारदपुराण’ को विद्वान मात्र 1000 वर्ष पुरानी कृति मानते हैं. ब्राह्मण लेखकों की विशेषता यह रही कि उन्होंने व्यक्तिगत श्रेय के बजाय परंपरा को अधिक महत्त्व दिया है. महत्त्वपूर्ण ग्रंथलेखकों ने बिना यशनाम की चिंता किए, अपने मौलिक ग्रंथ केवल परंपरा को समर्पित कर दिए हैं. वेदों में जिन ऋषियों का नामोल्लेख है, वे महाकाव्यों और पुराणों में उपस्थिति बनाए हुए हैं. जबकि उनके रचनाकाल में शताब्दियों का अंतराल है. ‘दीघनिकाय’ और ‘मनुस्मृति’ में दी गई सूची की तुलना करने पर एक सच यह भी सामने आता है कि ‘मनुस्मृति’ में दर्शाए गए ऋषिगण बौद्धिक विमर्श से अधिक जोर कर्मकांड पर देते आए हैं. इससे यह निष्कर्ष भी सामने आता है कि मनु के लिए वेदों का कर्मकांडपक्ष उनके तात्विक चिंतन से अधिक महत्त्वपूर्ण था. उनके नेतृत्व में दार्शनिक विवेचन का कर्मकांडीकरण होना स्वाभाविक ही था. जनसाधारण वैदिक ऋषियों की कमजोरी को भलीभांति समझता था. इसलिए आजीविका के मामले में स्वतंत्र व्यक्ति ब्राह्मणवादी दर्शनों से दूर रहने में ही भलाई समझते थे.

ऋग्वेद के लिपिबद्ध होने से पहले ही पुरोहितवर्ग समाज में प्रभावशाली भूमिका प्राप्त कर चुका था. तत्कालीन बौद्धिक वर्ग का समर्थन उसे बिना किसी शर्त प्राप्त था. वेदों में या तो पुरोहित वर्ग का वर्णन है अथवा इंद्रादि देवताओं का जो वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार क्षत्रिय के प्रतिनिधि कहे जा सकते हैं. श्रमिक वर्ग और शिल्पकार वर्ग वेदों से नदारद है. स्त्रीचरित्र भी गिनेचुने हैं. इससे उन्हें तत्कालीन अभिजन समाज का प्रतिनिधि ग्रंथ भी कहा जा सकता है. इस कारण ब्राह्मणों ने न केवल उनकी सुरक्षा और विस्तार के लिए खुद को समर्पित किया, बल्कि स्वार्थ के हिसाब से लगातार उनकी स्वार्थानुरूप व्याख्याएं और फेरबदल करते रहे. ऐसा नहीं है कि उस समय वेदों और ब्राह्मणवादी परंपरा के आलोचक न थे. ब्राह्मणों तथा उनके कर्मकांडों की आलोचना करने वाले तब भी अधिसंख्यक समाज का हिस्सा थे. लेकिन ब्राह्मणों के ही हाथ लगी. वर्णव्यवस्था के सहारे वे समाज में अपना वर्चस्व स्थापित करने में सफल रहे. उनके द्वारा गढ़े गए मिथ किस्सेकहानियों और संस्कृति का हिस्सा बनकर लोकमेधा का अटूट हिस्सा मान लिए गए. आज भी भारतीय धर्मदर्शन का ककहरा न जानने वाला साधारण से साधारण व्यक्ति अग्नि, वरुण, आकाश, उषा, तमस, अनल पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा आदि की जीवनप्रदायिनी शक्ति के बारे में जानता है. रोजमर्रा के जीवन में प्रत्येक मनुष्य उन्हें उसी रूप में देखतासमझता; और इस तरह अपने बुद्धिविवेक के अनुसार दार्शनिक मान्यताएं गढ़ता है. अनुभवआधारित निष्कर्षों में पर्याप्त गतिशीलता होती है. परंतु जैसे ही व्यक्ति के धार्मिक आग्रह प्रबल होते हैं, उसकी वैचारिक गत्यात्मकता थमने लगती है. धारणा खूंटे से बंध जाती है. अपने ही विवेक पर उसका नियंत्रण नहीं रहता. स्थितियों का आकलन बंधेबंधाए ढर्रे के अनुसार करने लगता है. ब्राह्मण ग्रंथों की रचना कथित रूप से वेदों को सर्वग्राही बनाने के लिए की गई है. लेकिन ये ग्रंथ वेदों में अंतर्निहित दार्शनिक सूत्रों की न तो मौलिक गवेष्णा करते हैं, न ही कोई नया दर्शन प्रस्तावित करते हैं. वे केवल वेदों के कर्मकांड पक्ष पर सविस्तार टिप्पणी करते हैं, जिससे आगे चलकर पुरोहितवाद को बढ़ावा मिला.

वेदों और उत्तरवर्ती ग्रंथों में सृष्टि की प्रत्येक जीवनदायिनी शक्ति के लिए अधिष्ठाता शक्ति की कल्पना की गई है. निहित स्वार्थ हेतु पुरोहित कल्पना के मूर्त्तिकरण को वैध ठहराता है. उसपर संदेह करना उचित नहीं माना जाता. प्रकारांतर में वह संस्कृति पर सवार होकर पूरे समाज के आचारव्यवहार का अनिवार्य हिस्सा मान लिया है. इससे मौलिक सोच का हृस होने लगता है. यहीं से सत्य के मिथकीकरण की प्रक्रिया आरंभ होती है. स्वयं वेदादि ग्रंथ समकालीन बोध के मिथकीकरण का परिणाम हैं. वेदों को आप्त ग्रंथ मानना भी उन्हें मिथ मान लेने जैसा है. हालांकि वेदों में यत्रतत्र दार्शनिक प्रश्न भी आए हैं. समय के हिसाब से उनमें पर्याप्त मौलिकता भी है. लेकिन ऐसी ऋचाएं संख्या में नगण्य हैं. प्राकृतिक शक्तियों को सीधे जाननेसमझने के बजाय अधिकांश ऋचाएं उनके नाम पर गढ़े गए देवताओं का महिमामंडन करती हैं. इसे ‘अनुभवों का मिथकीकरण’ कहें अथवा ‘ज्ञान एवं कौतूहल का कर्मकांडीकरण’ जैसा नाम देंवैदिक मनीषियों के लिए वही ‘धर्म’ रहा है. ऋग्वेद भी इससे अछूता नहीं है

प्रज्वलित तपस्या से यज्ञ और सत्य उत्पन्न हुए. अनंतर दिन और रात उत्पन्न हुए. इसके अनंतर जल से पूर्ण समुद्र की उत्पत्ति हुई. जलपूर्ण समुद्र से संवत्सर उत्पन्न हुआ. ईश्वर दिनरात्रि को बनाते हैं. निमिष आदि वाले सारे संसार के वे स्वामी हैं. पूर्वकाल के अनुसार ही ईश्वर ने सूर्य, चंद्र, आनंददायी स्वर्ग, पृथ्वी एवं अंतरिक्ष का निर्माण किया.’ऋग्वेद, 10/190/1-3.

उपर्युक्त ऋचाओं के उद्गाता कवि अघमर्षण हैं. तीन ऋचाओं में पहली दो ऋचाएं सृष्टि के जन्म को लेकर दार्शनिक समस्याओं से दो चार होती हैं. इसमें समय की उत्पत्ति को लेकर भारतीय दृष्टिकोण को समझा जा सकता है. हालांकि उसमें काफी लोच है. इस उल्लेख में समय स्वतंत्र नहीं है. वह ईश्वर से जुड़ा है. यह बात अलग है कि ईश्वर अपने कृत्यों के लिए खुद समय से बंधा है. प्रत्येक वर्णन के बीच में ईश्वर को घसीट लाने की प्रवृत्ति, न केवल वेदों, बल्कि बाद के भारतीय विद्वानों यहां तक कि आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त जैसे गणितज्ञों में भी दिखाई पड़ती है. समय को लेकर चर्चा ऋग्वेद में अन्यत्र भी है. तैतीरीय ब्राह्मण में प्रजापति को संवत्सर कहा गया है. माना गया है कि वही संपूर्ण जीवजगत का निर्माता है(संवत्सरो वे प्रजापतिः. संवत्सरेणैवास्मे प्रजाः प्राजनयत.―तैतीरीय ब्राह्मण, 1.6.2.2). उससे आगे बढ़कर शतपथ ब्राह्मण(10/4/2/2) में प्रजापति और संवत्सर को एक माना गया है. उसके अनुसार प्रजापति चरअचर सहित समस्त वस्तुजगत का निर्माता है. यहां तक कि ईश्वर को भी प्रजापति/संवत्सर की रचना कहा गया है. इस आधार पर विचार किया जाए तो समय ही समस्त वस्तुजगत, देवताओं और चरअचर का निर्माता है. ‘अथर्ववेद’ में संवत्सर को लेकर परिपक्व चिंतन मिलता है. वहां समय या संवत्सर को काल के पर्याय के रूप में प्रस्तुत किया गया है. उसके अनुसार काल अंतहीन और चिरंतन है. अर्थववेद के अनुसार, ‘जगमगाता सूर्य ही समय के रूप में उपस्थित है. इसलिए सूर्य ही समय है. वह हजार आंखों का क्षरणविहीन है. वह सात घोड़ों के रथ पर सवार होकर निकलता है.’ ऋग्वेद के दशम् मंडल में महाविस्फोट को ‘ब्रह्मणस्फति’ का नाम दिया गया है. देवताओं की उत्पत्ति के बारे में कहा गया है कि उनका जन्म सृष्टि के बाद हुआ. सर्वप्रथम अविद्यमान यानी ‘असत्’ से ‘सत्’ की उत्पत्ति हुई, ‘ब्रह्मणस्फित ने कर्मकार के देवताओं को उत्पन्न किया. देवोत्पत्ति से पूर्व समय में असत् से सत् उत्पन्न हुआ. इसके अनंतर दिशाएं बनीं. दिशाओं से अनंतर वृक्ष उत्पन्न हुए….अदिति से दक्ष उत्पन्न हुए और दक्ष से अदिति. अदिति ने देवताओं को जन्म दिया. फिर वह अपने सात पुत्रों को लेकर स्वर्ग को प्रस्थान कर गई तथा जन्म और मृत्यु के लिए सूर्य को आसमान में रख दिया.’(10/72). अगली ऋचा में इंद्र के जन्म का उल्लेख मिलता है.

चूंकि ईश्वर का विचार अपने आप में संदिग्ध है. उसे बीच में लाने के बाद विश्वास गड़बड़ाने लगता है. अनेक प्रश्न पैदा हो जाते हैं. यदि ईश्वर ही एकमात्र कर्त्ता और परम शक्ति है तो उसे तपस्या की आवश्यकता क्यों पड़ी? कहा गया है कि तपस्या से ही सृष्टि बनी.(ऋग्वेद, 10/129-3). सवाल है कि ‘तप’ से ही क्यों? ‘तप’ के माध्यम से ईश्वर किसे प्रसन्न करना चाहता था? सृष्टि की रचना के लिए उसने एक कर्मकांड को ही माध्यम क्यों बनाया? पृथ्वी, सूर्य, चंद्र आदि ग्रहनक्षत्रों का निर्माण भी क्या समयहीनता के दौर में संपन्न हुआ था? ईश्वरीय समय यानी शून्य से सृष्टि निर्माण की अवधि क्या समयहीनता का अंतराल था? क्या सृष्टिध्वंस के साथ ही समयध्वंस भी हो जाता है? उपर्युक्त ऋचा के अनुसार ईश्वर के अस्तित्व को मान लिया जाए तो क्या ईश्वर की भांति काल भी सृष्टि का साक्षी होता है? क्या समय सीमित और काल असीमित है? क्या ब्रह्मांड का निर्माण और ध्वंस अंतहीन काल में तथा उसकी समस्त गतियां चलायमान समय में होती हैं? इस तरह के अनेक प्रश्न उपर्युक्त ऋचा को लेकर हो सकते हैं. दर्शन का जन्म ऐसी ही आशंकाओं से होता है. लेकिन शंका के लिए ‘स्पेस’ की आवश्यकता पड़ती है. यदि उसपर अंध आस्था और जड़ विश्वास का पर्दा डाल दिया जाए तो दर्शन का विकास थम जाता है. वैदिक मनीषा इसका शिकार होती आई है. जिज्ञासा और कौतूहल का आकस्मिक ठहराव कई अनसुलझे सवाल छोड़ जाता है. उदाहरण के लिए यदि तपस्या और तप से ही यज्ञ की उत्पत्ति हुई तो तपस्या की क्रिया क्या समयहीनता के दौर में संपन्न हुई थी? तपस्या करने वाला क्या स्वयं ईश्वर था? यदि ईश्वर था तो वह किसकी तपस्या कर रहा था? यदि ‘तप’ यहां सूर्य का स्थानापन्न है तो आलंकारिकता को छोड़ क्यों न सीधा और स्पष्ट शब्द ‘सूर्य’ को उसका स्थानापन्न कर दिया जाए? प्रश्नों का सिलसिला अंतहीन है. लेकिन तप को यदि उष्मा का पर्याय मान लिया जाए जो कदाचित सही भी है, तो उपर्युक्त ऋचा में सृष्टि की उत्पत्ति को लेकर आए विचार तत्संबंधी वैज्ञानिक परिकल्पना से मेल खाने लगते हैं. आधुनिक वैज्ञानिकों का बड़ा वर्ग सृष्टि का विकास ‘महाविस्फोट’ की घटना से मानता है. उसके अनुसार आंतरिक दबाव के कारण परम संपीडित ब्रह्मांड में महाविस्फोट हुआ और वह टुकड़ों में बदल गया. एक टुकड़ा सूरज बना. छोटेछोटे टुकड़े ग्रहादि बने. गुरुत्वबल के कारण छोटे पिंड बड़े ग्रहों का चक्कर लगाने लगे. धरती धीरेधीरे ठंडी हुई. गैंसे जमकर तरल में बदलने लगीं. उन्हीं से पानी बना. और जल से जीवन की उत्पत्ति हुई. अघमर्षण जहां तप यानी उष्म से सृष्टि की रचना मानते हैं, वहीं एक और दार्शनिक परमश्रेष्ठि ने जल को ‘तपस’ की संज्ञा देते हुए उसे सृष्टि का मूलाधार माना है,सृष्टि से पहले केवल अंधकार था. अंधकार ही अंधकार को ढांपे था. सभी अज्ञात और सभी जलमय था….तपस्या के प्रभाव से वहीं एक तत्व उत्पन्न हुआ’(ऋग्वेद 10/129/3). परमेष्ठि कदाचित पहला ऐसा भारतीय बुद्धिवादी चिंतक था, जिसने मानवीय मेधा को सूर्य की उपाधि दी. उसके अनुसार ‘काम’ विश्व की उत्प्रेरक शक्ति है. वही मानव मस्तिष्क को नियंत्रित करता है. वही सूर्य है, ‘जिसकी आंखें इस विश्व को नियंत्रित रखती हैं. वह इससे देखा जा सकता है कि सृष्टि निर्माण को लेकर भौतिक विचारधारा और वेदों के दर्शन में खास अंतर नहीं है. सिवाय इसके कि वेद बीच में ईश्वर या परमात्मा को ले आते हैं. भौतिकवादी विचारक ऐसी किसी भी शक्ति की उपस्थिति को नकारते आए हैं.

स्पष्ट है कि दर्शन का विकास भौतिकवाद से प्रत्ययवाद की ओर रहा है. आरंभ में ईश्वर या केंद्रीय शक्ति की कल्पना अलगअलग दिखने वाली विचारधाराओं में समन्वय की कोशिश का परिणाम थी. जिसे पुरोहितों ने अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए कर्मकांडों तक सीमित कर दिया. देवताकरण के जरिये ब्राह्मणवादी परंपरा के चिंतकों ने उन शक्तियों को अधिभौतिक मान लिया. इससे ज्ञान के वायवीकृत रूप को मान्यता मिलने लगी. निहित स्वार्थ के आधार पर प्राकृतिक शक्तियों के ईश्वरीकरण की प्रवृत्ति ब्राह्मणों के लिए इतनी फूलीफली कि कालांतर में उसी को दर्शन की मुख्य धारा का श्रेय दिया जाने लगा. आज भी यही स्थिति है. बौद्ध धर्म के उदय से पहले दर्शन की ये धाराएं समानांतर रूप में विद्यमान थीं. बुद्ध ने दोनों के बीच का रास्ता अपनाया. चूंकि प्रकृतिवादी विचारधाराएं सृष्टि के विकास को लेकर भौतिकवादी दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करती थीं, इसलिए पूर्ण कस्सप, मक्खलि गोशाल को भौतिकवादी धाराओं के प्रवर्त्तक मानना अधिक उचित होगा. भौतिकवादी धारा सृष्टि निर्माण के पीछे किसी भी अदृश्य शक्ति के योगदान को नकारती हैं. अधिभौतिक अथवा ईश्वर को महत्त्व देने वाली विचारधाराएं ईश्वर या परमात्मा को सर्वेसर्वा मानने के कारण ईश्वरवादी कहलाती हैं. ध्यातव्य है कि विगत ढाई हजार वर्षों में ब्राह्मण कभी खुशीखुशी सत्ता के हस्तांतरण को तैयार नहीं हुआ. सतयुग ब्राह्मण के लिए इसलिए आदर्श है, क्योंकि उसमें उसे चुनौती देने वाला कोई न था. जनसमाज कबीलों में बंटा था. उसके अपने रीतिरिवाज, परंपराएं और दर्शन थे. ब्राह्मणों के कर्मकांड से उसे उसे कोई लेनादेना न था. अर्थव्यवस्था पशुआधारित थी. इसलिए भूमिअधिकार का विचार पनपा ही नहीं था. राज्य छोटेछोटे थे, एकदम कबीलाई रूप था उनका. इसलिए सतयुग में केवल ब्राह्मण ही ब्राह्मण थे. वही शासक थे, वही नियम बनाने वाले. चारों ओर केवल उन्हीं की दुंदभि बजती थी. त्रेता में उन्हें क्षत्रियों साथ सत्ता का समझौता करना पड़ा. मनुस्मृति ने क्षत्रियों और ब्राह्मणों के बीच जो समझौता कराया था, त्रेता के रूप में उसी की अभिकल्पना की गई थी. द्वापर में थोड़ा और पतन हुआ. सतयुग में आर्यों के आक्रमण से पराजित शूद्रों ने खुद को संगठित कर लिया था. मजबूर होकर उन्हें शूद्र कृष्ण को अवतार स्वीकारना पड़ा. कलयुग में उनका नैतिक, राजनीतिक पराभव हो चुका है. केवल दंभ बाकी है.

अथर्ववेद की एक ऋचा में सृष्टि की उत्पत्ति का कारण ‘तपस’(उष्म) को बताया गया है. वह सूर्य का पर्याय भी है. सूर्य को सृष्टिकर्ता मानने का विचार अन्य धर्मों में भी है. जापान खुद को ‘उगते सूर्य का देश’ बताता है. चीनी भी सूर्य को आदि देवता मानने की परंपरा रही है. चीनी लोककथा1 वहां के सूर्य पूजक समाज के बारे में बताती है. भगवतशरण उपाध्याय ने मिस्र के सूर्यपूजक राजा अखनातून को आदि धर्मप्रवर्त्तक माना है.(सांस्कृतिक निबंध, प्राचीन मिस्र का शंकर अखनातून). ऋग्वेद(7/6-1) में भी सूर्य को समस्त चराचर का स्वामी बताया गया है. सूर्य को सृष्टि का स्रोत मानने का विचार भिन्नभिन्न संस्कृतियों में रहा है. वेदों में उसे समय का जनक माना गया है. हालांकि इससे इतर निष्पत्तियां भी हैं. एक ऋचा के अनुसार सूर्य से ब्रह्मांड की उत्पत्ति तथा जल से सृष्टि का विकास हुआ. तदनुसार ईश्वर को सृष्टि के निर्माण की इच्छा के साथ ईश्वर ने जल का सृजन किया. उससे तेजस बना. फिर उससे ग्रहनक्षत्र, सूर्य, चंद्रादि अस्तित्व में आए. ऋग्वेद को भारतीय दर्शन का आधारग्रंथ माना जाता है. कुछ संकेतों को छोड़ दिया जाए तो ऋग्वेद का भारतीय दर्शनपरंपरा से उतना गहरा संबंध नहीं है, जितना माना जाता है. सच तो यह है कि उसमें जो दार्शनिक तत्व हैं, जिन्हें प्रायः बहुदेववाद के नाम से जाना जाता है, असल में प्राकृतिक उसमें जो विचार सूत्र रूप में मौजूद हैं, उनके आधार पर वह भौतिकवादी दर्शन के अधिक निकट है. कल्पना के अतिरिक को देखते हुए उसे हम भारतीय मनीषा की कविता कह सकते हैं. वेद का नाम उन्हें बाद में दिया गया. आगे चलकर उसी के आधार पर औपनिषिदक दर्शन का विकास हुआ. भौतिकवादी विचारक मानवीय कौतूहल, संदेह और आशंकाओं को बचाए रखकर दार्शनिक गवेष्णाओं के लिए बड़ा मैदान तैयार कर रहे थे. उनका दर्शन मानवमात्र के रोजमर्रा के अनुभवों और जिज्ञासाओं पर टिका था. वे जानते थे कि प्रकृति की विशालता, विचित्रता और अनिश्चितता ने मनुष्य को उसके सामने श्रद्धावनत होने को विवश किया है. प्रकृति की चुनौतियों का सामना करने के लिए उसको समझना आवश्यक है. इसलिए उन्होंने अपने संदेह और उसके बहाने अनेकानेक संभावनाओं को बनाए रखा.

अपने समय में भी इस तरह का विचार रखने वाले वे अकेले न थे. जीवन में सहायक, उसे संभव बनाने वाली, प्राणदायिनी शक्तियों के प्रति सम्मान, समर्पण और श्रद्धावनत होने की संस्कृति प्रायः सभी प्राचीन सभ्यताओं में रही हैं. यही जीवन के प्रति भौतिकवादी दृष्टिकोण है. वेद भी इससे अछूते नहीं हैं. ऋग्वेद में अनेक स्थान पर ‘काम’ का महिमामंडन है. एक ऋचा(10/191/1) में अग्नि को ‘कामवर्षक’ कहते हुए उसे प्राणिमात्र का गुण बताया गया है. कामोद्दीपन के लिए सोमपान का आवाह्न है. उसके लिए रात्रि और उषा(सूर्य) का मानवीकरण करते हुए उन्हें यज्ञस्थल पर आमंत्रित किया गया है(ऋग्वेद 10/13/7). एक स्थान पर उषा को रात्रि की बहन बताया गया है. उषा को साधारण लड़कियों की भांति सजनेसंवरने का शौक है‘एक ही रंग के वस्त्र पहन, नर्तकी की भांति उपस्थित होती है. जैसे गाय दूध देती है. वह अपने स्थान तक पहुंचती है. और अपना उजला वक्ष खोल देती है. इसी के साथ अंधेरा छंट जाता है. रात्रि जो उसकी बहन है, भाग खड़ी होती है. एक अन्य ऋचा में लिखा है कि जैसे कोई खिलाड़ी पासा फेंकता है, उषा दिन का पासा फेंकती है. वह स्वर्ग की पुत्री है. उसके आगमन के साथ ही निशा भाग खड़ी होती है.’ वेदांत में शंकर ने संसार को माया कहा है. संसार को नकारा है. उनके अनुसार भोग आत्मा की मुक्ति की राह का रोड़ा है. वेदों से ऐसा प्रतीत नहीं होता. आर्यगण जीवन को संपूर्णता के साथ जीने के समर्थक थे. खुशी के क्षणों में वे सोम का पान करते थे. एक लड़ाकू जाति का इस तरह सुखामोद में लिप्त होना अनपेक्षित भी नहीं माना जा सकता. यह भी हो सकता है कि सुखामोद में जीने का स्वभाव उन्होंने प्राचीन जातियों से सीखा हो. कुल मिलाकर आर्य ऐसे हरगिज नहीं थे, जैसा शंकर ने कहा है. तैतीरीय उपनिषद में लिखा है कि प्राचीन आर्यजन वर्ष में तीन बार विशेष आयोजन के लिए एकत्र होते थे. उस अवसर पर युवतियां शृंगार कर आती थीं. पुरुष सोमपान करते थे. तत्कालीन समाज में प्रजनन दर को बनाए रखने के लिए ऐसे उत्सवों की महत्ता से इन्कार नहीं किया जा सकता. दरअसल ये उस दौर की ओर इशारा करती हैं, जब काम सामूहिकता का उत्सव हुआ करता था. प्राकृतिक जीवन कठिन था. चुनौतियों के बीच प्रजनन दर को बनाए रखना बहुत कठिन था. कामोद्दीपन के लिए विशेष अवसरों का सृजन प्रायः हर सभ्यता में किया गया. तैतरीय ब्राह्मण में बताया गया है कि देवता और मनुष्य वर्ष में तीन बार विशेष अवसर पर मिलते हैं. वसंतोत्सव जैसे त्योहारों की हर सभ्यता में उपस्थिति भी इसी ओर संकेत करती है.

© ओमप्रकाश कश्यप

1. बहुत दिन पहले की बात है. चीन में एक नामीगिरामी शिकारी ‘ई’ रहता था. उसका निशाना अचूक था. भाला हो अथवा तीर, उसके हाथों से छूटकर सीधा निशाने पर जाकर लगता था. वह घोड़े पर सवार होकर शिकार करता. भाला फेंकने के साथ, बगैर कोई पल गंवाए वह तेजी से शिकार की ओर दौड़ पड़ता. उसको पक्का विश्वास होता कि उसकी कमान से छूटा हुआ तीर सीधे निशाने पर जाकर लगेगा. जब ऐसा विलक्षण तीरंदाज अपने पास हो तो लोगों को उससे उम्मीद भी होगी. एक बार की बात. चीन को एक विपत्ति ने आ घेरा. एक सुबह जब लोग जागे तो देखा कि आसमान में दसदस सूरज जगमगा रहे हैं. उनकी गर्मी से जनजीवन कुम्हलाने लगा. पेड़पौधे झुलसने लगे. जीवजंतु भूखप्यास से व्याकुल होकर इधरउधर भटकने लगे. इस उम्मीद में कि केवल शिकारी ‘ई’ उन्हें प्रकृति के कोप से बचा सकता है, लोग उसके पास फरियाद लेकर पहुंचने लगे.

हमारी मदद करो….आसमान यदि ऐसे ही आग उगलता रहा तो आदमी की जाति ही धरा से मिट जाएगी.’ शिकारी ‘ई’ चिंता में पड़ा था. वह समझता था कि यदि दसदस सूर्य आसमान में चमकते रहे तो प्राणी झुलस जाएंगे. वनवनस्पतियां स्वाह हो जाएंगी. लेकिन धरती को उन सूरजों से बचाया कैसे जाए? ‘ई’ सोचने लगा. इस बीच दसों सूरज सिर पर चढ़े आ रहे थे. उसने सूरजों को ललकारा. आवाज देकर उन्हें बाज आने की चेतावनी दी, लेकिन वे मनमानी पर उतारू थे. यह देख ‘ई’ का पारा चढ़ गया. गुस्से में उसने धनुषवाण उठाए. प्रत्यंचा चढ़ाई. एक साथ दस तीर कमान पर चढ़ाकर डोर को कान तक खींचा. निशाना साधकर तीर छोड़ दिए. दसों तीर तेजी से आसमान की ओर बढ़े. उनमें से नौ तीर अलगअलग दिशाओं में निकलकर नौ सूरजों से टकराए. जैसे सूरज न होकर हवा से भरे गुब्बारे हों. तीर लगने के साथ ही नौ सूरज देखते ही देखते धरती पर बिखर गए.

दसवां तीर निशाने से चूक गया. उधर नौ सूरजों को धराशायी होते देख दसवां सूरज बुरी तरह डर गया था. वह आसमान छोड़ भाग खड़ा हुआ. खुद को बचाने की जुगत में वह बैंसबाड़ी के पीछे जा छिपा. अब आसमान सूरजों से खाली था. इसी के साथ वहां अंधेरा छा गया. थोड़ी देर पहले जो जीवजंतु भीषण गर्मी से व्याकुल थे, अब उन्हें अंधेरा डराने लगा. सूरज न रहने से सर्दी बढ़ गई. जीवजंतु परेशान हो उठे. ‘ई’ को भी लगा कि उससे चूक हुई है. जीवजगत के लिए धूप और गरमी दोनों चाहिए. सूरज के बिना प्राणियों को ये चीजें कौन देगा! इसपर विचार किए बगैर ही उसने दस के दस सूरजों को निशाना बना लिया. एक सूरज बचा रहता तो चिंता की बात न होती. लेकिन अब? अब क्या होगा? ‘ई’ की चिंताओं का पारावार न था.

तभी उसे ध्यान आया कि उसने नौ सूरजों को तो गुब्बारे की तरह आसमान से गिरते देखा था. लेकिन दसवां सूरज! वह कहां गया? ‘ई’ ने इधरउधर नजर दौड़ाई. अचानक बैंसबाड़ी के पीछे छिपा दसवां सूरज उसको दिखाई पड़ गया. सूरज स्वयं बाहर आने को उत्सुक था. लेकिन जैसे ही वह ‘ई’ को देखता, भय से बैंसबाड़ी के पीछे दुबक जाता था. ‘ई’ सूरज की मनस्थिति को देख मुस्करा दिया. उसको खुशी थी कि एक सूरज बचा हुआ है. अपना धनुषवाण संभालकर वह अपने घर की ओर चल दिया. उसके जाते ही दसवां सूरज बैंसबाड़ी के पीछे से निकला और दुबारा आसमान पर छा गया. दुनिया फिर जगमगा उठी. लोग ‘ई’ की जयजयकार करने लगे.

चीनी किवदंति है कि सूरज आज भी शिकारी ‘ई’ के भय से उबर नहीं पाया है. वह डरताडरता पूरब से उदय होता है. पहले केवल दिन ही दिन था. उस घटना के बाद से सूरज दिनभर पश्चिम की ओर भागते रहने के बाद शाम को पुनः बैंसबाड़ी के पीछे दुबक जाता है. इसी से दिनरात होते हैं. सूरज रात को छिप जाता है, इससे प्राणियों को सोने का अवसर मिल जाता है. इसके लिए चीनी लोग महान शिकारी ‘ई’ का आभार मानते हैं.

महाज्ञानी पूर्ण कस्सप

सामान्य

भारत के अनीश्वरवादी चिंतकएक

(पहला भाग)

बौद्ध ग्रंथ ‘दीघ निकाय’ में भी पूर्ण कस्सप को अहेतुवादी बताया गया है. यानी ऐसा व्यक्ति जो किसी कार्यकारण संबंध को नहीं मानता. तदनुसार ‘सृष्टि’ केवल स्वयं की सृष्टि है. उसके पीछे न तो कोई नियंता है, न किसी की सुनियोजित योजना. यानी वह न तो किसी का कार्य है, न ही कारण. यदि उसमें कुछ तारतम्य है, उसकी कुछ अर्थवत्ता है, तो वह स्वयं सृष्टि की कलाकारी है. जब कोई इतर कारण नहीं, कोई इतर उद्देश्य और योजना भी नहीं, तब अच्छा या बुरा, जो है वह स्वयं सृष्टि का कार्य है. उसके लिए स्वयं सृष्टि जिम्मेदार है. मनुष्य भी सृष्टि का उपहार है. अतएव सृष्टि की भांति वह भी अपने कर्म में स्वतंत्र है. वह न तो किसी दैवी सत्ता के अधीन है, न ही उससे अनुप्रेत. वह सीधीसादी अनीश्वरवादी विचारधारा थी, जो उस समय के प्रचलित ब्राह्मणवादी दर्शनों तथा तद्विषयक कर्मकांडों का पूरी तरह निषेध करती थी. चूंकि वह सृष्टिनिर्माण के पीछे किसी भी दैवी सत्ता का हाथ होने से इन्कार करती तथा पदार्थ को ही सबकुछ मानती थी, इसलिए उसे भौतिकवादी विचारधारा भी कहा जाता है. एकमात्र पूर्ण कस्सप उसके प्रवर्त्तक नहीं थे. भौतिकवादी विचारधारा इस देश की समृद्ध और विकासमान चितंन शैली रही है. एक समय था जब उसे पर्याप्त लोकसमर्थन प्राप्त था. बुद्ध पूर्व भारत में तो वह समानांतर चिंतन शैली थी, जिसने अपने समय की सभी प्रमुख विचारधाराओं को चुनौती दी. फलस्वरूप उसका प्रभाव आने वाले 1500 वर्षों तक बना रहा.

बावजूद इसके पूर्ण कस्सप को अहेतुवादी तक सीमित कर देना, मेरी राय में संकुचित दृष्टिकोण है. किसी चीज को समग्रता में जानने की कोशिश करने के बजाए टुकड़ेटुकड़े में जानना; या ज्ञानार्जन की अपनी सीमाओं को वस्तु की सीमा घोषित कर देने जैसा. ‘अहेतुवाद’ कार्यकारण संबंध को नकारता है. मानता है कि जीवन या वस्तु अपने आप में स्वतः प्रमाण है. हर कार्य का कोई कारण होता है, इस संबंध को वह स्वीकार नहीं करता. दूसरी ओर हेतुवादी मानता है कि हर चीज का कोई न कोई ‘हेतु’ होता है. आग है तो धुंआ होगा ही. या धुंआ है तो आग होगी ही. क्योंकि आग और धुंआ दोनों एकदूसरे के हेतु हैं. लेकिन ध्यान से देखा जाए तो यह जीवन या किसी और वस्तु के प्रति दृष्टि और सोच की सीमा को दर्शाते हैं. दृष्टि की सीमा होती है कि वह एक समय में किसी वस्तु के एक ही पक्ष को देख पाती है. हमारे सामने सिक्के का या तो ‘हेड’ होता है अथवा ‘टेल’. इसी तरह मेज, कुर्सी, पंखा, कूलर, गिलास, केतली यानी कोई भी वस्तु कभी भी पूरी की पूरी हमारे सामने नहीं होती. दूसरे पक्ष को देखते समय पहला पक्ष पीछे चला जाता है. वस्तु को पहचानने का बाकी काम मस्तिष्क को करना पड़ता है. दृष्टि की सीमा को वस्तु की सीमा नहीं माना जा सकता. बीज वृक्ष का कारण नहीं, विकास प्रक्रिया का आरंभिक पड़ाव है. इस आधार पर पूर्ण कस्सप को मैं आदि विकासवादी कहना पसंद करूंगा.

पूर्ण कस्सप ही क्यों, जो भी अनीश्वरवाद में विश्वास रखता है, मेरी राय में वह मूलतः विकासवादी है. इसका समर्थन वही कर सकता है, जिसे इस वस्तुजगत की वास्तविकता में भरोसा हो. जिसे सपने और संकल्प की दूरी को कम करने का हुनर आता हो. अधिकांश अनीश्वरवादी दार्शनिक समाज के उस वर्ग से आए थे, जिसे अपने श्रम पर भरोसा था. जो प्रकृति के साथ संतुलन बनाते हुए जीने का अभ्यासी था. खुद को कर्मकांडों में उलझाने की जिसे फुर्सत न थी. ब्राह्मण उसे धर्मशिक्षा के लिए अयोग्य मानता था. तो अपने श्रमकौशल पर गर्वाया, स्वाभिमान से भरपूर वह वर्ग भी यज्ञादि कर्मकांडों को आडंबर कहकर नकार देता था. उस समय के प्रमुख अनिश्वरवादी विचारकों में पूर्ण कस्सप के अलावा मक्खलि गोसाल, अजित केशकंबलि, पुकुद कात्यायन, संजय वेल्ठिपुत्त आदि सम्मिलित थे. सृष्टि के पीछे किसी भी प्रकार की परामानवीय सत्ता के अस्तित्व से इन्कार करने के कारण वे ब्राह्मणवादी पुरोहितों के अलावा जैन और बौद्ध परंपरा के विचारकों के भी निशाने पर थे. इसे भारतीय भौतिकवादी चिंतन की विडंबना ही कहा जा सकता है कि अपने समय की महत्त्वपूर्ण विचारधारा होने के बावजूद उस परंपरा का कोई स्वतंत्र ग्रंथ उपलब्ध नहीं है. उनके बारे में जानने के लिए हमें जैन और बौद्ध ग्रंथों पर ही निर्भर रहना पड़ता है.

बौद्ध ग्रंथों में पूर्ण कस्सप को संघ आचार्य, तीर्थंकर, अनुभवी विचारक, नए मत का संस्थापक आदि कहा गया है. ‘सामञ्ञफल सुत्त’ में अजातशत्रु और बुद्ध के बीच संवाद का उल्लेख है. संवाद जिस रूप में है, वह वास्तव में उसी रूप में हुआ होगा, यह दावा नहीं किया जा सकता. क्योंकि बौद्ध ग्रंथों में लगभग एक जैसे वार्तालाप को अलगअलग समय में भिन्नभिन्न व्यक्तियों के साथ हुआ बताया गया है. संवाद का ध्येय प्रचलित भौतिकवादी विचारधाराओं तथा बौद्ध दर्शन का तुलनात्मक अध्ययन नहीं है. न ही उसे किसी चर्चा को तर्कसम्मत ढंग से आगे बढ़ाने की नीयत से शुरू किया गया है. हर प्रसंग में एकतरफा निर्णय लेते हुए भौतिकवादी विचारधारा के सापेक्ष बौद्ध दर्शन को श्रेष्ठतर ठहरा दिया जाता है. इस तरह की चर्चा अलगअलग कालखंड में लिखे गए धर्मग्रंथों में प्राप्त होती है. उनमें जैन और बौद्ध दोनों ही धर्मों के ग्रंथ सम्मिलित हैं. उनमें चर्चा का स्वरूप तो बदलता है, परंतु अनीश्वरवादी दार्शनिक वही रहते हैं. इससे दो निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं. पहला उनकी ऐतिहासिकता को लेकर. यह कि भारत में भौतिकवादी चिंतन की समृद्ध परंपरा थी. और दूसरा निष्कर्ष यह कि लोगों पर उसका गहरा प्रभाव था. अच्छीखासी संख्या उनके समर्थकों की थी. इससे यह भी सिद्ध होता है कि बौद्ध एवं जैन दर्शन को अनिश्वरवादी विचारधारा की चुनौती लंबे समय तक झेलनी पड़ी थी. जिन अनीश्वरवादी दार्शनिकों का नामोल्लेख ऊपर किया है, सभी बुद्ध के समकालीन थे. मक्खलि गोसाल और पूर्ण कस्सप तो बुद्ध के बुद्धत्व प्राप्त करने से पहले ही पर्याप्त प्रतिष्ठा अर्जित कर चुके थे. जैन परंपरा में उसे ‘जिन्’ ऐसा महापुरुष जो अपनी इंद्रियों पर अनुशासन करता हो—बताया गया है. पूर्ण कस्सप के साथ जुड़ा ‘पूर्ण’ ज्ञान की संपूर्णता का संकेतक है. ‘दीघनिकाय’ के ‘सामञ्ञफल सुत्त’ के अनुसार मगध सम्राट अजातशत्रु पूर्ण कस्सप के विचारों तथा उनसे अपनी असंतुष्टि का जिक्र गौतम बुद्ध के समक्ष करता है. बदले स्थान तथा पात्रों के साथ अनिश्वरवादी धारा के विचारकों को लेकर इसी तरह की चर्चा ‘संयुत्तनिकाय’ में भी हैं. अंतर केवल इतना है कि ‘दीघ निकाय’ में संवाद अजातशत्रु और गौतम बुद्ध के बीच दिखाया गया है तो ‘संयुत्तनिकाय’ में गौतम बुद्ध और कोसलाधिपति पसेनदि के बीच चर्चा है. स्थान भी बदला हुआ है. तथापि मंतव्य वही है, जो ‘सामञ्ञफल सुत्त’ का है. इसी प्रकार का संवाद बुद्ध के निर्वाण प्राप्ति के करीब पांच सौ वर्ष बाद रचे गए बौद्ध ग्रंथ ‘मिलिंद प्रश्न’ में उद्धृत हुआ है. वहां चर्चा बौद्ध आचार्य नागसेन तथा सम्राट मिलिंद के बीच है. पांच शताब्दी बाद भी पूर्ण कस्सप आदि भौतिकवादी दार्शनिकों का नामोल्लेख दर्शाता है अनिश्वरवादी विचारधारा उस समय भी चुनौती की अवस्था में थी.

सामञ्ञफल सुत्त’(दीघनिकाय) में पूरा प्रसंग सिलसिलेवार दिया है. एक बार अजातशत्रु अपने दरबार में विराजमान थे. रात्रि का समय, पूर्णिमा की चांदनी दिगदिगंत तक फैली हुई थी. अचानक अजातशत्रु के मन में आया कि खाली समय का सदुपयोग तत्वचर्चा हेतु किया जाए. कुछ अंतरग दरबारी उस समय भी उनके साथ थे. वह वैचारिक क्रांति का युग था. जीवन और सृष्टि के रहस्यों को जानने के लिए पूरी दुनिया में उत्साह था. लोग अपनीअपनी तरह से सत्य तक पहुंचना चाहते थे. समाज में श्रमणों और यायावर मुनियों की प्रतिष्ठा थी. बड़े से बड़ा सम्राट उनकी अवज्ञा करने से घबराता था. तो अंतिम सत्य तक पहुंचने के नाम पर वैदिक परंपरा में मोक्ष की अवधारणा थी. मगर मोक्ष तभी संभव था, जब जीवन से मुक्ति हो. कुछ अपवाद छोड़ दिए जाएं तो जीवन चाहे जैसा भी हो, सभी को प्रिय होता है. बुद्ध द्वारा निर्वाण की संकल्पना जीवन की इच्छा और मुक्ति के बीच संतुलन की भावना को दर्शाती थी. वह मध्यम मार्ग था. जीवन(देह) को ही सबकुछ मानने वालों(अनीश्वरवादी) तथा जीवन को कुछ भी नहीं मानते हुए मोक्ष को महत्त्व देने वाले परंपरावादी पुरोहितों के बीच का रास्ता. बुद्ध पुनर्जन्म में विश्वास रखते थे. उनका मानना था कि जिस प्रकार भुना हुआ बीज अंकुरित नहीं होता, ऐसे ही सम्यक आचरण द्वारा मनुष्य इसी जन्म में दुख से हमेशा के लिए निवृत्ति प्राप्त कर सकता है. निर्वाण यानी विरक्ति का आनंद. संसार में रहते हुए उसके दुखक्लेश से सदासर्वदा के लिए निवृत्ति. ’सामञ्ञफल सुत्त’ में अजातशत्रु की जिज्ञासा निर्वाण को समझने की शुरुआती कड़ी है. अजातशत्रु की जिज्ञासा बहुत सरल है. वह जानना चाहता है कि जैसे शिल्पकार को कर्म का अवदान इसी जीवन में प्राप्त हो जाता है, क्या उसी प्रकार श्रामण्य जीवन का फल भी इसी जीवन में प्राप्त किया जा सकता है? जिज्ञासा के समाधान के लिए वह कई प्रतिष्ठित विचारकों से चर्चा कर चुका था, मगर उसे संतुष्टि न थी.

दरबारियों के बीच अजातशत्रु के यह पूछने पर कि तत्व चर्चा के लिए किसके पास चला जाए एक अमात्य ने छूटते ही कहा—‘‘महाराज पूर्ण कस्सप के पास चलिए. वह गणस्वामी, गणाध्यक्ष, यशस्वी, तीर्थंकर(मतसंस्थापक), प्रज्ञाशील, अनेकानेक शिष्यों वाला, वयोवृद्ध, चिरसाधक, सुगत और परम ज्ञानी है. उसके साथ अध्यात्मचर्चा से आपको अवश्य ही संतुष्टि मिलेगी.’’ अजातशत्रु उस सलाह को नजरंदाज कर देता है. उसके बाद बाकी अमात्य एकएक कर मक्खलि गोसाल, अजित केशकंबलि, पुकुद कात्यायन, संजय वेल्ठिपुत्त और निगंठ नाथपुत्त का नाम लेते हैं. निगंठ नाथपुत्त महावीर के लिए आया है. जो आगे चलकर जैन दर्शन के प्रवर्त्तक बने और 24वें तीर्थंकर कहलाए. जैसा हमने शुरू में ही कहा, यहां ‘दीघनिकाय’ के लेखक का ध्येय पूर्ण कस्सप के तत्वदर्शन के बारे में बताना नहीं है. उसका वास्तविक ध्येय तत्कालीन लोकप्रिय धर्मदर्शनों के बीच बुद्ध के दर्शन को प्रतिष्ठित करना है.

राजमंत्रियों की सलाह की उपेक्षा के पश्चात जीवक का नंबर आता है. उस समय गौतम बुद्ध राजवैद्य जीवक के जेतवन में अपने 1250 शिष्यों के साथ ठहरे हुए थे. जीवक अजातशत्रु को बुद्ध से मिलने की सलाह देता है. बुद्ध की प्रशस्ति करते हुए वह कहता है—‘‘वे सम्यक संबुद्ध, सुगत, लोकसिद्ध, सभी विद्याओं और सदाचरण से समृद्ध, अनुपम शास्ता, परमपज्ञ महात्मा हैं और इस समय मेरे ही आम्रकुंज में अपने शिष्यों के साथ विहार कर रहे हैं. उनकी कीर्ति और यशगाथा दिगदिगंत व्याप्त है. ऐसे परमप्रज्ञ महात्मा बुद्ध से तत्व चर्चा के उपरांत आपको अवश्य ही शंाति मिलेगी. आप उसी ओर प्रस्थान कीजिए.’’ जीवक की बात मानकर अजातशत्रु अपने हाथी पर सवार होकर दलबल के साथ बुद्ध से मिलने के लिए चल देता है. उसके साथ पांच सौ हथनियों पर सवार उसकी इतनी ही रानियां तथा पांच सौ सैनिकों का काफिला है.

यहां बौद्ध विद्वानों के लेखकीय कौशल की प्रशंसा करनी होगी. प्रसंग और प्रतीकों में अद्भुत तालमेल को बनाए रखते हैं. इतना कि दृश्यअदृश्य हर घटना से उनके लक्ष्य की पुष्टि होती है. श्रामण्य जीवन की सर्वोच्चता दर्शाने के लिए न केवल बुद्ध से आमनेसामने के संवाद की मदद ली जाती है, बल्कि परिस्थितियां भी ऐसी रची जाती हैं, जिनसे श्रामण्य जीवन के आगे राजसी वैभव महत्त्वहीन सिद्ध हो. ‘सामञ्ञफल सुत्त’ के अनुसार बुद्ध के पास जाते समय अजातशत्रु के साथ पांच सौ हथनियों पर सवार उसकी 500 पत्नियां के अलावा इतने ही सैंनिक साथ होते हैं. तत्वज्ञान के जिज्ञासु को इतने दलबल के साथ जाने का औचित्य? इससे दो चीजों की ओर संकेत किया गया है. पहला अजातशत्रु के मन में पैठा भय. उसने मगध की सत्ता अपने पिता से छीनी थी. मन में कहीं न कहीं यह आशंका भी छिपी होगी कि उसकी भांति कहीं उसका बेटा भी उसे पदच्युत करके सत्ता पर कब्जा न कर ले! कदाचित वह अपने बेटे की आंखों में मगध सत्ता के प्रति आकर्षण को पढ़ चुका था. इसलिए बेटे को सांसारिक रागविराग से मुक्त देखना चाहता था. जेतवन में अजातशत्रु जब, ‘निर्मल जलाशय के समान शांत, उदार, 1250 भिक्षुओं के बीच देदीप्यमान परम शास्ता को देखता है तो उसे तत्क्षण अपना बेटा याद आता है. यह भूलकर कि वह बुद्ध के पास अपनी जिज्ञासा के साथ आया है, वह अपने बजाए बेटे के लिए शांति की कामना करने लगता है—‘वाह! क्या बात है. क्या इसी प्रकार की शांति मेरे पुत्र उदयभद्र को भी प्राप्त हो सकती है?’ आगे उसे कामना करता हुए दिखाया गया है, ‘मेरा पुत्र उदयभद्र भी इसी शांति को प्राप्त करे.’ यह राजपरिवारों में पलने वाले भय और षड्यंत्रों से जन्मी कल्पना थी, जिनसे उसका सामना जन्म से ही होने लगा था. कहते हैं कि जब वह गर्भ में था, तब उसकी मां के मन में मानवमांस खाने की विचित्रसी इच्छा ने जन्म लिया था. इस बारे में जब ज्योतिषियों से विचार किया गया तो उन्होंने बताया कि जातक अपने पिता के लिए अशुभ होगा. ऐसे प्रसंग सच न भी हों तो भी रूढ़िवादी मान्यताओं के चलते जोड़ दिए जाते हैं. क्योंकि आगे चलकर अजातशत्रु ने पिता से मगध का राज्य हड़प लिया था. अब उसे भय था कि उसका बेटा भी उसके साथ वैसा ही व्यवहार कर सकता है, जैसा उसने अपने पिता के बिंबसार के साथ किया था. पुत्र उदयभद्र को बुद्ध की शरण में भेजने की अप्रत्यक्ष कामना उसी भय की ओर इशारा करती है.

इतिहास में अजातशत्रु की चर्चा वैभवशाली सम्राट के रूप में होती है. अपने पराक्रम द्वारा उसने काशी, कोशल, वैशाली तथा उसके आसपास बसे 36 गणराज्यों पर विजय प्राप्त की थी. इतने वैभवशाली सम्राट का 500 पत्नियों और सैनिकों के साथ बुद्ध से मिलने के इतर उद्देश्य भी हैं. अध्याय का शीर्षक ‘सामञ्ञफल सुत्त’(श्रमण जीवन का फल) है. जब वह बुद्ध से मिलने पहुंचता है तो उनके साथ 1250 शिष्यों की मंडली है. अजातशत्रु अशांत और संशयशील है. अनेक आशंकाएं और भय उसे घेरे हुए हैं. दूसरी ओर बुद्ध तथा उनके शिष्य ‘निर्मल जलाशय के समान शांत’ हैं. अपनी प्रतीकात्मकता में यह घटना धर्मसत्ता के आगे राजसी धनवैभव को गौण ठहराती है. इस अनुपात को ‘मिलिंद प्रश्न’ में भी कायम रखा गया है. समय के साथ बौद्ध जीवन की बढ़ी लोकप्रियता को अनुरूप ‘मिलिंद प्रश्न’ में भिक्षुओं की संख्या में उसी अनुपात में वृद्धि दर्शायी गई है. ‘दीघनिकाय’ और ‘मिलिंद प्रश्न’ में पांच शताब्दियों का अंतराल है. यह अंतराल मिलिंद और नागसेन के स्तर पर भी दिखता है. मिलिंद के साथ पांच सौ यवन सैनिकों के अतिरिक्त आवश्यक सैन्य बल है. जबकि नागसेन के साथ उसके 80000 शिष्य. परोक्ष रूप में यह भी राजसी जीवन के बरक्स श्रामण्य जीवन को श्रेष्ठता को दर्शाने का लेखकीय कौशल है. ऐसी प्रतीकात्मकता का ध्यान दूसरे प्रसंगों में भी रखा गया है.

पूर्ण कस्सप के तत्व दर्शन की झलक अजातशत्रु और बुद्ध की चर्चा के दौरान प्राप्त होती है. बुद्ध को अभिवादन करने के उपरांत अजातशत्रु परमशास्ता के समक्ष अपनी जिज्ञासा प्रकट करता है—वह जानना चाहता है कि जिस प्रकार विभिन्न प्रकार के शिल्पकर्मों, उद्यमों यथा लौहकर्म, काष्ठकला, अश्वारोहण, रंजक, बावर्ची, हज्जाम, मालाकार, योद्धा आदि को उनके कर्म का फल इसी जन्म में प्राप्त हो जाता है, क्या श्रमण जीवन के फल को भी इसी जीवन में प्राप्त किया जा सकता है? उत्तर देने से पूर्व बुद्ध इस बारे में बाकी आचार्यों के मत को जान लेना चाहते हैं—‘‘यदि आपको आपत्ति न हो तो बाकी श्रमणों ने जो उत्तर दिया, वह बताइए?’’

अजातशत्रु सबसे पहले पूर्ण कस्सप के बारे में बताता है—‘‘भंते! एक बार मैं पूर्ण कस्सप के पास गया. उनके पास जाकर मैंने अपना यही प्रश्न दोहराया कि जिस प्रकार विभिन्न प्रकार के शिल्पकर्मों, उद्यमों आदि का फल इसी जन्म में प्राप्त हो जाता है. उसी प्रकार क्या श्रामण्यजीवन का सुफल भी इसी जन्म में संभव है?’’ अजातशत्रु आगे बताता है—‘‘मेरे प्रश्न के उत्तर में पूर्ण कस्सप ने कहा—‘महाराज कार्य करतेकराते. छेदन करतेकराते, पकातेपकवाते, सैंध करतेकराते, गांव लूटते, चोरी करते, बटमारी करते, झूठ बोलते, परस्त्रीगमन करते, किसी की देह को तेज छुरे के प्रहार से टुकड़ाटुकड़ा करते, करवाते जैसे कर्मों से कभी भी पाप का आगमन नहीं होता. दूसरों पर घात करतेकराते, चोरी से दूसरों की फसल काटतेकटवाते गंगा के दक्षिण जाने पर भी पाप का आगमन नहीं होता. न ही दान देतेदिलाते, यज्ञ करतेकराते, गंगा के उत्तरवत्ती तट पर जाने से पुण्य की प्राप्ति होती है. दान, धर्म, सत्कर्म, परोपकार आदि में भी न तो पुण्य है, न ही पुण्य का आगम.’’ अंत में अजातशत्रु पूर्ण कस्सप के बारे में अपना निर्णय सुनाता है—‘‘इस तरह पूर्ण कस्सप ने मेरे प्रश्न का उत्तर घुमाफिराकर दिया. जैसे पूछा कटहल के बारे में जाए और कोई आम की विशेषताएं बताने लगे. कोई जामुन के बारे में सवाल करे और बताने वाला केले के गुणों का बखान करने लगे, ऐसा ही व्यवहार पूर्ण कस्सप ने किया. इसलिए बिना सहमति या असहमति दर्शाए, उन्हें प्रणाम कर मैं वहां से चुपचाप लौट आया.’’

आगे अजातशत्रु बारीबारी से अजित केशकंबलि, मक्खलि गोशाल, संजय वेल्ठिपुत्त, निगंठ नाथपुत्त तथा पुकुद कात्यायन से अपनी धम्म चर्चा के बारे में बताता है. प्रत्येक प्रसंग के बाद मिलेजुले शब्दों में वह अपनी निराशा को व्यक्त करता है. उस समय तक पाठक लेखक की मंशा को समझने लगता है. वह जान लेता है कि लेखक का उद्देश्य बौद्ध मत और भौतिकवादी विचारधाराओं के बीच संवाद करना नहीं है. वास्तविक उद्देश्य अजातशत्रु को बौद्ध धर्म से प्रभावित होते दर्शाना है. यथा राजा, तथा प्रजा—अजातशत्रु जैसा सम्राट बौद्ध धर्म को अपनाएगा, तो बाकी प्रजा भी उसकी ओर आकर्षित होगी. अपने धर्म और विचारधारा को जनजन तक पहुंचाने की कामना न जो अनुचित है, न ही असंभव. बल्कि आवश्यक भी है. इसी से विचारधाराओं के बीच संवाद की प्रक्रिया आगे बढ़ती है और नए रास्ते निकलते हैं. जो बातचीत हम कर रहे हैं, उसका रास्ता भी इसी तरह निकला है. इसके लिए हम बौद्ध और जैन विद्वानों के ऋणी हैं, क्योंकि इस बहाने हम उन अनीश्वरवादी दार्शनिकों के बारे में जान पाते हैं जिन्होंने उस दौर में ब्राह्मणवादी विचारधाराओं को चुनौती दी थी, जब वह कदाचित सबसे संगठित अवस्था में था. हालांकि उसके साथसाथ कुछ स्वाभाविक प्रश्न भी खड़े हो जाते हैं. बुद्ध ने वैदिक धर्म की परंपरा का भी विरोध किया था. वे कर्मकांड और आडंबरवाद को नकारते हैं. बलि प्रथा की उन्होंने कठोर शब्दों में निंदा की थी. ध्यातव्य है कि यज्ञों के दौरान बलिप्रथा का जोर इतना था कि एक साथ सैकड़ों पशुओं की बलि चढ़ा दी जाती थी. उस समय की अर्थव्यवस्था का आधार या तो खेती थी, या पशुधन. यज्ञबलि द्वारा पशुधन की हानि किसान तथा व्यापारी सभी को उठानी पड़ती थी. बुद्ध द्वारा बलि प्रथा के बहिष्कार द्वारा उनका प्रचार उन वर्गों में भी तेजी से हुआ, जिनकी अर्थव्यवस्था खेती या पशुधन से जुड़ी थी. यज्ञ आदि कर्मकांडों का बहिष्कार करने वालों में भी वही जातियां आगे थीं. अजित केशकंबलि का तो जन्म ही गोपालक परिवार में हुआ था. मक्खलि गोशाल का जन्म गोशाला में हुआ था. भौतिकवादी चिंतन के इतिहास में इन सबका प्रतीकात्मक महत्त्व है. ध्यान रखने वाली बात यह भी है कि कर्मकांड, आडंबरवाद और बलिप्रथा की आलोचना करते समय बुद्ध(बौद्ध ग्रंथों के अनुसार, जो उनके निर्वाण प्राप्ति के शताब्दियों बाद उनके अनुयायियों द्वारा रचे गए. जिनमें बुद्ध के ब्राह्मणीकरण का प्रयास साफ नजर आता है) एक भी ब्राह्मणवादी विचारकलेखक का नाम नहीं लेते. जबकि भौतिकवादी चिंतकों की आलोचना उनके नाम के साथ अनेक बौद्ध एवं जैन ग्रंथों में है. उस समय वे पूरी तरह व्यैक्तिक हो जाते हैं. आखिर क्यों? कारण कुछ भी हो सकता है. बल्कि एक नहीं कईकई कारण हो सकते हैं. यहां कुछ संभावनाओं पर हम विचार करेंगे—

ब्राह्मणवादी परंपरा के विचारकों का नाम न लेने के पीछे पहला कारण हो सकता कि बुद्ध के समय तक वह कोरे कर्मकांडों और आडंबरों में सिमट चुकी थी. कोई मौलिक दार्शनिक था ही नहीं. जो थे, वे सामाजिक हलचल से दूर, एकांत ज्ञानसाधना में लीन रहते थे. बाकी मुख्यतः पुरोहित वर्ग से आते थे, जिसका काम परंपरा की लकीर पीटना था. ध्यान से देखा जाए तो वैदिक मेधा का ढलान ऋग्वेद के बाद से ही आरंभ चुका था. ब्राह्मण आचार्यों को अपनी उस कृति पर गर्व था. इतना गर्व कि उसे सहेजने की चिंता उन्हें सताए रहती थी. चूंकि लेखन कला का पूरी तरह विकास नहीं हुआ था, इसलिए ज्ञान को सहेजने तथा उसे अगली पीढ़ियों तक अंतरित तरने का कार्य पूर्णतः स्मृतिकेंद्रित था. सामवेद की रचना ऋग्वेद की ऋचाओं को कंठस्थ करने तथा सस्वर गायन के उद्देश्य से की गई. ऋषिगण शिष्यों को ऋचाएं कंठस्थ कराते समय अग्नि के आसपास बैठते थे. मौसम की मार, भोजन की जरूरत तथा वन्य पशुओं से रक्षा करने में अग्नि उनकी मददगार थी. अलाव जलाकर बैठने के चलन से ही यज्ञ का विकास हुआ. प्रकारांतर में उसी से यजुर्वेद का. बुद्ध के समय कर्मकांडी धारा प्रबल थी. कदाचित उसे तत्कालीन वैदिक धर्मदर्शन की मुख्यधारा भी मान सकते हैं. दूसरे शब्दों में उन दिनों ब्राह्मणवादी परंपरा में सिवाय कर्मकांडों के ऐसा कुछ था ही नहीं, जिसकी सीधी आलोचना आवश्यक मानी जाती.

दूसरा कारण हो सकता है कि ब्राह्मणवादी परंपरा केवल पुरोहित वर्ग और उनके आश्रयदाता राजघरानों तक सीमित थी. समाज का बहुसंख्यक हिस्सा कमेरी जातियों से संबंधित था, जिन्हें ब्राह्मणवादी वैदिक ज्ञान के लिए अपात्र मानते थे. बुद्धकालीन भारत में जैसे ही व्यापार के अवसर बढ़े, कमेरी जातियां संगठित होने लगीं. उनमें बहुत अच्छे शिल्पकार और मेहनतकश लोग सम्मिलित थे. अपने श्रमकौशल के बल पर उन्होंने समाजार्थिक रूप से खुद को इतना सशक्त कर लिया था कि बाहरी मदद की उन्हें आवश्यकता ही न रही. ज्ञान पर एकाधिकार की कोशिश का कदाचित सबसे सार्थक और सटीक प्रतिकार यही हो सकता था. और यही उन्होंने किया भी था—‘यदि आपके ज्ञान, आपके कर्मकांडों में हमारी ससम्मान हिस्सेदारी संभव नहीं, तो हमें भी उनकी आवश्यकता नहीं है. प्रकृति ने हमें जीवन दिया है, इसलिए वही हमारे लिए सबकुछ है. स्वतंत्र मस्तिष्क दिया है, सो हम उस लकीर को भी नहीं पीटना चाहते, जिसे आप धर्म और परंपरा मानते हैं.’ सातआठ सौ वर्ष पहले कुछ ऐसा ही जवाब संतकवियों ने पुरोहितों और पंडितों को संतकाव्य के रूप में दिया था—‘यदि आपका देवता हमारे स्पर्शमात्र से अपवित्र हो जाता है. तो वह रहे मंदिर में, मूर्त्तियों का कैदी बनकर. सम्मान गंवाकर हम उससे मिलने नहीं आएंगे. हमारा साईं हमारे भीतर है. हम उससे कभी भी संवाद कर सकते हैं. दरअसल एकदूसरे के साथ सहकार और समर्थन ने आजीवकों को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाया था. भौतिकवादी दर्शनों का उभार इसी आत्मनिर्भरता की देन था. एक समय ऐसा भी था जब आजीवक मक्खलि गोशाल के समर्थकों की संख्या बुद्ध के अनुयायियों से अधिक थी. आजीवक संप्रदायी अपने संख्याबल आधार पर आगे भी बौद्ध एवं ब्राह्मणवादी चिंतकों के लिए चुनौती बने रहे. प्रमाण के लिए हम ह्वेनसांग का बनारस संबंधी विवरण देख सकते हैं. अपनी भारतयात्रा को याद को करते हुए वह लिखता है कि सातवीं शताब्दी के आसपास बनारस में 30 संघाराम थे. उनमें 3000 भिक्षु रहते थे. 100 महादेव मंदिर, उनमें 10000 पुजारियों का वास था. इतने सारे भिक्षुओं और साधुओं की नगरी होने के बावजूद बनारसवासी, मुख्यतः धनी व्यापारी वर्ग धर्म की गिरफ्त से बाहर था. ह्वेनसांग के अनुसार उनमें से कुछ बौद्ध मतावलंबी थे, जबकि अधिकांश अनीश्वरवादी. इससे यह संकेत भी मिलता है कि ब्राह्मणवर्ग का प्रभाव केवल समाज के संपन्न वर्गों तक, जो उनके कर्मकांड का बोझ उठा सकते थे—सीमित था. बाकी हिस्सा आजीवकों तथा नास्तिकों का था. उन्हीं का एक हिस्सा जैन और बौद्ध दर्शनों की ओर आकर्पित हो रहा था. बुद्ध के लिए संख्याबल महत्त्वपूर्ण था. अतएव भिक्षु संघों में अधिक से अधिक व्यक्तियों को सम्मिलित करने के लिए उन्होंने उन वर्गों पर विशेषरूप से जोर दिया, जिन्हें ब्राह्मणवादी चिंतन परंपरा में कोई स्थान प्राप्त न था.

तीसरा कारण भी महत्त्वपूर्ण है. ब्राह्मणवादी साहित्य सामूहिक प्रयासों की देन है. वहां व्यक्तिगत श्रेय के बजाए सामाजिक उद्देश्य के लिए काम करने पर जोर दिया जाता रहा है. उसकी पहचान उसकी समग्रता में है. अनगिनत ब्राह्मण आचार्य, मुनिगण बिना व्यक्तिगत नाम या यश की कामना के, सहस्राब्दियों तक केवल परंपरापोषण का काम करते रहे. ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ आरंभ में, क्रमशः ‘पुलत्स्य वध’ तथा ‘जय’ शीर्षक के अंतर्गत छोटीछोटी कृतियां थीं. उन्हें वर्तमान रूप में लाने में शताब्दियों का समय लगा है. अनेक मनीषियों का योगदान उन्हें मिला है. आज सिवाय ‘वाल्मीकि’ और ‘व्यास’ के किसी और का नाम उनके रचनाकार के रूप में नहीं जानते. नतीजा यह हुआ कि जो वाल्मीकि दो हजार वर्ष पहले ‘रामायण’ के लेखक के रूप में जाने जाते हैं, वही डेढ़ हजार वर्ष पहले लिखे गए महाग्रंथ ‘योगवशिष्ट’ के भी घोषित रचनाकार हैं. यही हाल उपनिषदों, पुराणों तथा अन्य ब्राह्मण ग्रंथों का है. व्यास को महाभारत, अठारह पुराण, श्रीमद्भागवत आदि का लेखक बताया जाता है. जबकि इन ग्रंथों की रचना शताब्दियों के अंतराल में हुई है. समय के साथसाथ उनमें संशोधनपरिवर्धन होते रहे हैं. यानी मौलिकता की कमी के चलते भी ब्राह्मणवादी विद्वानों का व्यक्तिगत संदर्भ अनावश्यक माना गया.

अनीश्वरवादी दार्शनिकों की भांति वैदिक परंपरा के लेखकोंआचार्यों की आलोचना उनके नामोल्लेख के साथ न करने के पीछे चौथा कारण यह हो सकता है कि ब्राह्मणवादी परंपरा के आचार्यों और पुरोहितों का तत्कालीन राजनीति और श्रेष्ठिवर्ग पर गहरा प्रभाव था. बुद्ध राजसत्ता और अर्थसत्ता के महत्त्व को भलीभांति समझते थे. जानते थे कि नए धर्म की सफलता समाज के शीर्षस्थ वर्गों के समर्थन के बिना असंभव है. इसलिए सीधे प्रहार से बचते हुए बुद्ध ने दूरंदेशी और कूटनीति से काम लिया. इसमें उन्हें सफलता भी मिली. यह ठीक है कि बौद्ध मठ समाज के सभी वर्गों के लिए खुले थे. किसी भी वर्ग का व्यक्ति उनमें प्रवेश पा सकता था. परंतु इसके आधार पर यह दावा करना कि बुद्ध वर्णव्यवस्था के भी विरोधी थे, अनुचित होगा. लेकिन यह बात विश्वास के साथ कही जा सकती है कि जाति और वर्ण को लेकर वे उतने कट्टर न थे, जितने ब्राह्मणवादी विचारक. अपने मत के प्रचारप्रसार के लिए बुद्ध ने समाज के सभी वर्गों का आवाह्न किया था. ब्राह्मणवादी परंपरा के आचार्यों और पुरोहितों का तत्कालीन राजनीति और श्रेष्ठिवर्ग पर गहरा प्रभाव था. वे राजदरबारियों में ऊंची हैसियत रखते थे. यह सोचते हुए कि ब्राह्मण परंपरा के आचार्यों पर सीधा प्रहार उनके आश्रयदाता सम्राटों को नाराज कर सकता है—उन्होंने परोक्ष आलोचना का मार्ग चुना और केवल कर्मकांड तथा यज्ञबलियों की आलोचना की. चूंकि ब्राह्मण पुरोहितों के यज्ञ खर्चीले होते थे और उनका भार राजाओं और सेठों को उठाना पड़ता था, इसलिए समाज के संपन्न वर्गों ने भी बुद्ध के विचारों का जी खोल कर समर्थन किया. यज्ञ बलियों से पशुहत्या में कमी आने लगी. उसका सीधा लाभ श्रेष्ठिवर्ग को पहुंचा. उसी की मदद से आगे चलकर देश की आर्थिक समृद्धि की नई कथा लिखी गई. राजाओं और श्रेष्ठिवर्ग से तालमेल के साथसाथ बुद्ध ने अद्विज वर्गों में भी अपने मत के प्रचारप्रसार पर जोर दिया, जिन्हें शूद्र कहकर किसी प्रकार के धार्मिक कार्यव्यवहार से अलग रखा गया था.

बुद्ध के आरंभिक शिष्यों में लगभग अस्सी प्रतिशत या तो ब्राह्मण थे, अथवा क्षत्रिय. चूंकि बौद्ध ग्रंथों की रचना बुद्ध के निर्वाण प्राप्ति के बाद संपन्न हुई थी. तो पांचवा और महत्त्वपूर्ण कारक यह भी संभव है कि बौद्ध लेखक वर्षों तक बुद्ध के सान्निध्य में रहने के बावजूद, अपने ब्राह्मणवादी संस्कारों को भुला नहीं पाए थे. इसलिए बुद्ध के निर्वाण प्राप्ति के पश्चात जैसे ही उन्हें अवसर मिला, उन्होंने बौद्ध परंपरा का ब्राह्मणीकरण करना आरंभ कर दिया. शुरुआत बुद्ध से ही की. अपने कुल को लेकर बुद्ध को अवश्य ही गर्व रहा होगा. लेकिन उनके जन्म को लेकर बाद में उनके शिष्यों ने जो लिखा, इस बारे में शायद ही उन्होंने कभी कुछ कहा होगा. ‘जातक निदान कथा’ में वर्णन आया है—

‘‘महापुरुष ने जन्म लेने के समय को विचारा….’’ फिर किस द्वीप में जन्म लिया जाए, यह सोचकर मध्य प्रदेश में जन्म लेने का निर्णय किया, ‘‘इसी प्रदेश में बुद्ध, प्रत्येक बुद्ध, श्रावक, अग्रश्रावक, महाश्रावक, चक्रवर्ती सम्राट तथा दूसरे महाप्रतापी ऐश्वर्यशाली क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य पैदा होते हैं….इसी में कपिलवस्तु नामक नगर है, जहां मुझे जन्म लेना है. फिर कुल का विचार करते हुए सोचा, ‘बुद्ध वैश्य या शूद्र कुल में उत्पन्न नहीं होते. लोकमान्य क्षत्रिय या ब्राह्मण इन्हीं दो कुलों में उत्पन्न होते हैं. आजकल क्षत्रिय ही लोकमान्य है. इसीलिए इसमें जन्म लूंगा….राजा शुद्धोधन मेरा पिता होगा.’’(बुद्धचरिय, राहुल सांकृत्यायन, पृष्ठ-1).

ऐसे वर्णन बौद्ध साहित्य में भरे पड़े हैं. ब्राह्मणवाद की छाया कहींकहीं तो इतनी गाढी है कि आप बिना संदर्भ के जान ही नहीं पाएंगे कि आप बौद्ध साहित्य पढ़ रहे हैं कि ब्राह्मण साहित्य—

‘‘इस तरह बौद्धि सत्व ने उत्तरापाद नक्षत्र में गर्भ में प्रवेश किया. दूसरे दिन….राजा ने गोबर लिपी, धान की खीलों आदि से मंगलाचार की हुई भूमि में….घी, मधु, शक्कर से बनी खीर से भरीं, सोने और चांदी की थालियों से ढंकी थालियां परोसीं (तथा) नए वस्त्र, कपिला गौ आदि से उन्हें संतर्पित किया.’’(बुद्धचरिय, राहुल सांकृत्यायन, पृष्ठ-2)

बुद्ध के प्रमुख शिष्यों में उपालि को छोड़कर बाकी सब ब्राह्मण या क्षत्रिय वर्गों से आए थे. उनके सोच पर ब्राह्मणवाद की छाया विद्यमान थी, वे ब्राह्मणवाद के आलोचक रहे होंगे, विरोधी नहीं.

छठा और महत्त्वपूर्ण कारक अनीश्वरवादियों की जाति थी. उनमें से कई समाज के उन वर्गों से आए थे, जो अपने श्रम के आधार पर जीविकोपार्जन करते थे. ब्राह्मणी व्यवस्था उन्हें शूद्र मानती थी. और शूद्र का कार्य अपने से श्रेष्ठ वर्गों की सेवा करना है, ज्ञान बघारना नहीं. ऐसी उन दिनों मान्यता थी. ऐसा नहीं है कि शूद्र वर्गों में मेधावी लोगों की कमी रही है. ब्राह्मणी व्यवस्था के अनेक ग्रंथों की रचना में शूद्र वर्ग के आचार्यों का योगदान रहा है. वेदों के संकलन कर्ता व्यास, प्रख्यात दार्शनिकों रैक्व, महीदास, सत्यकाम जाबाल उस समय की व्यवस्था के अनुसार शूद्र ही थे. रघुकुल के गुरु कहे जाने वाले वशिष्ट का जन्म दासी के गर्भ से हुआ था. एक और कारण यह भी संभव है कि भौतिकवादी विचारकों की पैठ अपने शिष्यों में इतनी गहरी थी कि उन वर्गों में अपनी पैठ बनाने के लिए उनपर सीधा प्रहार आवश्यक था. चूंकि अनिश्वरवादी विचारकांे को किसी भी प्रकार की सत्ता का समर्थन प्राप्त ही नहीं था. इसलिए सत्ता की गोदी में पलने वाले बौद्ध और जैन आचार्यों के लिए उनकी खुली आलोचना करना आसान बात थी.

पूर्ण कस्सप के जीवन और दर्शन पर चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले यह जान लेना भी आवश्यक है कि बुद्ध के समय तक धम्मप्रचार आमनेसामने के संवाद द्वारा किया जाता था. बुद्ध या महावीर ने अपने विचारों को लेकर स्वयं कोई ग्रंथ नहीं लिखा. बुद्ध के निर्वाण प्राप्ति के बाद अजातशत्रु के नेतृत्व में राजगीर में एक धर्मसंसद हुई थी जिसमें बुद्ध के प्रमुख शिष्यों से पांच सौ महाश्रमणों ने हिस्सा लिया था. सभी की अध्यक्षता महाकाश्यप ने की थी. उस समय तक बौद्ध दर्शन काफी प्रतिष्ठा अर्जित कर चुका था. बौद्ध के शिष्यों पर बड़ी जिम्मेदारी बुद्ध के विचारों तथा उपदेशों को बचाए रखने की थी. उनकी अपनी पदप्रतिष्ठा और भविष्य भी उससे जुड़ चुका था. इसलिए उस धर्मसंसद में बुद्ध के कृतित्व को सहेजने पर सभी की सहमति थी. उस दायित्व को बुद्ध के शिष्यों ने अच्छी तरह संभाला. लेकिन उनके शिष्यों में बड़ी संख्या द्विज वगों से आए बौद्धों की थी. जो अपने साथ वर्गीय संस्कार भी जाए थे. इसलिए बौद्ध ग्रंथों की अन्वीक्षा करने पर वे सब बातें बौद्ध ग्रंथों में, आई हैं, जिनका बुद्ध ने अपने जीवन में विरोध किया था. उदाहरण के लिए बुद्ध ने भिक्षुओं को जादू और चमत्कार दिखाने से दूर रहने को कहा था. ‘दीघनिकाय’ में ही इसके बारे में पर्याप्त चर्चा है. परंतु पूर्ण कस्सप के जीवन के बारे में चर्चा करते समय ही हम देखेंगे कि बाद के ग्रंथों में बौद्ध भिक्षु न केवल जादू और चमत्कार दिखाने लगे थे, बल्कि बुद्ध को भी चमत्कारी दिखाने से उन्हें परहेज न था.

क्रमशः….

© ओमप्रकाश कश्यप

भारतीय भौतिकवादी चिंतन : पुरोहितवाद के विरुद्ध पहला मोर्चा

सामान्य

नास्ति दत्तम् नास्ति हूतम् नास्ति परलोकम् इति।। मेधातिथि , लोकायत, 30

(प्रसाद चढ़ाना, यज्ञों में आहुतियां देना व्यर्थ है. परलोक जैसा कुछ भी नहीं है.)

.)

वैदिक संस्कृति के कर्मकांड, बलिप्रथा, पुरोहितवाद का उल्लेख जबजब होता है, उसके प्रतिरोधी स्वरों की खोज हमें सीधे बौद्ध दर्शन तक ले जाती है. हम वैदिक समाज की कुरीतियों का प्रतिकार बुद्ध के दर्शन में खोजने लगते हैं. भारतीय संस्कृति के इतिहास में बौद्ध दर्शन का उदय निश्चय ही युगांतरकारी घटना थी. जैन दर्शन की भांति उसका निकास भी श्रमण परंपरा से हुआ था. दोनों स्वतंत्रसमृद्ध दार्शनिक परंपरा से अनुप्रेत थे. ईश्वर, आत्मा, परमात्मा जैसी ध्यान भटकाने वाली अवधारणाएं दोनों को अस्वीकार थीं. बावजूद इसके ध्यान सीधे बौद्ध दर्शन की ओर जाता है तो इसलिए कि उसकी सफलता के अनुपात में उसके समकालीन दर्शनों को मिली सफलता नगण्य थी. स्वयं बुद्ध अपनी सफलता के प्रति आश्वस्त थे. कुछ अवसरों पर तो आत्ममुग्धता की हद तक. भिक्षुसंघ के प्रति उनका आत्मविश्वास देखते ही बनता था. महावीर के निधन के उपरांत उनके अनुयायियों के आपसी लड़ाईझगड़े का समाचार जब चुंड द्वारा उन्हें दिया गया तो उनका कहना था, ‘चुंड अब संसार में कितने उपदेशक हैं जिन्हें इतनी प्रतिष्ठा और मानसम्मान प्राप्त हुआ है, जितना मुझे? मुझे तो ऐसा कोई उपदेशक दिखाई नहीं पड़ता. हे चुंड! आज संसार में अनेक धार्मिक संघ हैं. लेकिन मुझे तो ऐसा कोई संघ दिखाई नहीं पड़ता जिसके भिक्षु संघ ने बौद्ध संघ के समान सफलता और लोकसिद्धि अर्जित की हो.’ यदि कोई व्यक्ति किसी धर्म को हर प्रकार से सफल, पूर्ण, त्रुटिहीन, सुगठित एवं सुस्थापित बताना चाहेगा, तो वह इसी संघ का उदाहरण देगा.’ अपनी विचारधारा, धर्म और संप्रदाय के प्रति इतना सघन विश्वास, अनपेक्षित नहीं है. बौद्ध संघ को मिली प्रतिष्ठा और लोकव्याप्ति की दृष्टि से बुद्ध को ऐसा सोचने का अधिकार भी था. यह बात अलग हैं कि बुद्ध के निर्वाण प्राप्ति के महज ढाई सौ वर्ष के भीतर बौद्ध धर्म भी 18 संप्रदायों में बंट चुका था. उसके विभिन्न धड़ों के बीच गहरे मतभेद थे.

बुद्ध को मध्यमार्गी कहा जाता है. माना जाता है कि यह बोध उन्होंने लोकपरंपरा से ग्रहण किया था. इस बारे में एक रोचक कहानी है. बोधप्राप्ति के लिए घर से निकलते समय दूसरे तापसों की भांति बुद्ध भी शरीर को मुक्तिमार्ग की सबसे बड़ी बाधा मानते थे. उन्होंने अराड़ मुनि को अपना गुरु माना और भद्रजित आदि के साथ छह वर्षों तक कठिन साधना करते रहे. उस दौरान उन्होंने भोजन, पानी, स्नानदान, फूलफल आदि सब त्याग दिया. लेकिन उस कठिन साधना का कोई अनुकूल परिणाम नहीं निकला. नतीजा यह हुआ कि देह सूखकर कांटा बन गई. एक दिन जब वे साधनारत थे तो गीत गाती स्त्रियों का दल उधर से गुजरा. गीत के बोल थेᅳ‘वीणा के तारों को साधे रहो/उन्हें न तो ढीला छोड़ो/न ज्यादा कसो/तार ढीले रहे तो स्वर नहीं निकलेंगे/अत्यधिक कसने पर वे टूट भी सकते हैं.’ गीत सुनते ही बुद्ध की आंखें खुल गईं. तपस्या छोड़कर वे उठ खड़े हुए. उन्हें लगा कि आत्मापरमात्मा के प्रश्न अंतहीन हैं. मनुष्य सहस्राब्दियों से उनपर तर्क करता आया है. आगे भी अनंतकाल तक करता रहेगा. उनके जरिए किसी सर्वसम्मत समाधान पर पहुंच पाना असंभव है. ऐसे प्रश्नों को छोड़ देने की अनुशंसा के साथसाथ बुद्ध ने आचरण की शुद्धता पर जोर दिया. कहा कि सच्चे संकल्प द्वारा मन के विकार मिट सकते हैं. अपने विचारों को लेकर संघ की स्थापना की. बुद्ध वैदिक संस्कृति के केंद्रीय विषयों, आत्मा और परमात्मा को नकारते नहीं हैं. केवल अंतहीन प्रश्न मानकर उन्हें किनारे कर देने को कहते हैं. सामान्य नैतिकता जिसे ब्राह्मण दर्शनों में पूरी तरह किताबी बना दिया गया था, जिसका निर्धारण शिखरस्थ वर्गों की मर्जी से, उनके स्वार्थानुसार किया जाता था उसे उन्होंने गणतांत्रिक स्वरूप देने की कोशिश की थी. खासकर भिक्षु संघों में ऐसी व्यवस्था की जिससे समाज में फैले जातिभेद की उनपर छाया तक न पड़े. वुद्ध विहारों को समाज के सभी वर्गों के लिए खोलते हुए उन्होंने समानता के विचार को महत्त्वपूर्ण माना. उस समय तक वर्ण जाति में ढलकर रूढ़ हो चुके थे. कुल मिलाकर बौद्ध दर्शन की महत्ता जीवन और दर्शन के केंद्र में मनुष्य को वापस ले आने में है. जिसे ब्राह्मणवादियों ने मायावाद के भ्रम में उपेक्षित कर रहा था. इससे वे लोग भी बौद्ध संघों से जुड़ने लगे जिन्हें वर्णव्यवस्था के चलते समानता, स्वतंत्रता एवं जीवन के मूलभूत अधिकारों से वंचित किया गया था. समय के हिसाब से वह क्रांतिकारी घटना थी. उसके थोड़ेसे अंतराल के पश्चात यही कार्य सुकरात ने यूनान में किया था.

बावजूद इसके पुरोहित संस्कृति का असल विरोध बौद्ध दर्शन में नहीं था. सवाल है बुद्ध को मध्यममार्गी माने तो पुरोहित संस्कृति का वास्तविक प्रतिपक्ष कौनसा दर्शन था? क्या अहिंसा पर असंभाव्य की सीमा तक जोर देने वाले जैन दर्शन को इसका श्रेय दिया जाए? बुद्ध की भांति महावीर भी भारत की प्राचीन श्रमण परंपरा की देन थे. वैदिकी हिंसा और कर्मकांडों के आलोचक. उन्होंने भी वेदों को अप्रामाण्य मानकर ईश्वरत्व को नकारा था. बावजूद इसके जैन दर्शन, वैदिक दर्शन का वास्तविक प्रतिपक्ष नहीं था. बौद्ध दर्शन की भांति वह भी मध्यमार्गी था. अहिंसा को लेकर वह अव्यावहारिक की सीमा तक चला जाता है. जबकि ‘स्याद्वाद’ की उसकी अवधारणा विरोधी विचारों के लिए भी पर्याप्त स्पेस रखती है. ब्राह्मणवादी दर्शन का असल विरोध भौतिकवादी विचारधारा में था, जिसके बुद्ध के जीवनकाल में कम से कम पांच प्रखर विचारक थे. मक्खलि गोसाल, अजित केशकंबलि, संजय वेलट्ठपुत्त, पूर्ण कस्सप और पुकुद कात्यायन. इस बात के पर्याप्त प्रमाण है कि बुद्ध को बोध प्राप्ति, या उनके प्रसिद्ध होने से बहुत पहले ही वे पांचों काफी प्रतिष्ठा और जनसमर्थन बटोर चुके थे. उनकी विद्वता की धाक उनके विरोधियों पर भी थी. इनके अलावा छठा नाम निगंठ नाथपुत्त का है. आगे चलकर वह जैन दर्शन के प्रवर्त्तक महावीर स्वामी के रूप में ख्यात हुए. विडंबना है कि निगंठ नाथपुत्त को छोड़कर किसी भी विद्वान का उसके जीवन और विचारों को लेकर कोई स्वतंत्र, मौलिक ग्रंथ उपलब्ध नहीं है. उनके जीवन और विचारों का संक्षिप्त परिचय हमें बौद्ध एवं जैन ग्रंथों से प्राप्त होता है. वह पूर्वाग्रहों से भरा पड़ा है. प्राप्त वर्णन में पर्याप्त भिन्नता है, किंतु इस बात से दोनों एकमत हैं कि वे भौतिकवादी दार्शनिक ब्राह्मण दर्शन के प्रबल विरोधी थे.

भौतिकवादी विचारकों को लेकर ‘दीघनिकाय’ के ‘समन्न्फल्सुत्र सुत्त’ में गौतम बुद्ध एवं अजातशत्रु के बीच लंबी चर्चा है, जिसमें उन्हें ‘संघ स्वामी’, ‘गणाध्यक्ष’, ‘बहुपूज्य’, ‘गणाचार्य’, ‘परमप्रज्ञ’, ‘अनुभवी विद्वान’, ‘साधु’, ‘मतसंस्थापक’, ‘तत्ववेत्ता’, ‘असंख्य समर्थकों वाला’ जैसे लगभग एक समान विशेषणों से संबोधित किया गया है. उसके लिए भूमिका कहानी के रूप में रची गई हैपूर्णमासी का दिन था. बुद्ध राजगृह में वैद्य जीवक के आम्रक्षुओं के साथ विश्राम कर रहे थे. उधर मगध का बलशाली सम्राट अजातशत्रु अपने मंत्रियों और दरबारियों के साथ उत्तम आसन पर विराजमान था. चारों ओर चांदनी छितराई हुई थी, ‘‘अहो, कैसी रमणीय चांदनी रात है! कैसी सुंदर चांदनी रात है!! कैसी दर्शनीय चांदनी रात है!!! कैसी प्रासादिक चांदनी रात है!!! कैसी लक्षणीय चांदनी रात है!!!’’(दीघ निकाय, अनुवादराहुल सांकृत्यायन एवं जगदीश काश्यप) संपूर्ण वातावरण उल्लासमय होने के बावजूद राजा अप्रसन्न है. उसका मन अवसाद से भरा है. वातावरण की रमणीयता, दरबारी वैभवविलास, सुख एवं सुरक्षा की भरपूर अनुभूति भी उसे संतुष्ट नहीं कर पाती. वह किसी विलक्षण मेधावी ‘श्रमण या ब्राह्मण के तत्वज्ञान द्वारा चित्त को प्रसन्न’ करना चाहता है. धर्म कबीलाई युग यानी उस समय की उपज है जब पराजित का जीवन, चाहे वह राजनीतिक हो या वैचारिक, विजेता के अधिकार में होता था. प्रत्येक धर्म की आधारशिला सांसारिक सुखोपभोग को हेय और निस्सार दिखाने पर टिकी होती है. इस कसौटी पर बौद्ध धर्म भी बाकी धर्मों से अलग नहीं रहा. ‘समन्न्फाफलसुत्त’ का ध्येय ‘श्रमण जीवन के फल’ को दर्शाते हुए सम्राट अजातशत्रु को धर्ममार्ग की ओर प्रवृत्त करना है. अंतर केवल इतना है कि ब्राह्मणवादी धर्मों में मोक्ष की अवधारणा मृत्यु पश्चात मुक्ति के लिए रची गई है. बौद्ध धर्म के अनुसार निर्वाण इसी जन्म में संभव है. आगे छह भौतिकवादी दार्शनिकों के मत का संक्षिप्त उल्लेख है, जिसे भौतिकवाद के सापेक्ष बुद्धमार्ग की श्रेष्ठता स्थापित करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है. संवाद की शुरुआत में विकल अजातशत्रु दरबारियों से प्रश्न करता हैᅳ‘क्या आप हमें ऐसे विद्वान का नाम बता सकते हैं जिसके पास बैठकर कुछ तत्व चर्चा की जा सके?’

उत्तर देते हुए एक राजदरबारी पूर्ण कस्सप का नाम लेता है, ‘महाराज! पूर्ण कस्सप, संघस्वामी, गणाध्यक्ष, गणप्रमुख, बहुसम्मानित, वयोवृद्ध, ज्ञानी, यशस्वी, मतसंस्थापक और बहुप्रज्ञ हैं. आप उन्हीं से ज्ञानचर्चा करें.’ अजातशत्रु के शांत रहने पर दूसरे दरबारी बारीबारी से मक्खलि गोसाल, पुकुद कात्यायन, अजित केशकंबलि, निगंठ नाथपुत्त तथा संजय वेलट्ठिपुत्त का नाम लेते हैं. अजातशत्रु उनसे प्रभावित होने के बजाय जीवक से पूछता है, ‘सौम्य जीवक तुम चुपचाप क्यों बैठे हो?’ उत्तर में जीवक अपने आम्रकुंज में ठहरे हुए गौतम बुद्ध के बारे में बताता है, ‘वह भगवान अर्हंत्, सम्यक संबुद्ध, विद्या एवं सदाचरण से युक्त, सुगत, सदोपदेशक, प्रबुद्ध और प्रज्ञावान हैं. उनके साथ धर्मचर्चा करके आपको शांति अवश्य प्राप्त होगी. सम्राट कोई प्रश्न या शंका जाहिर करने के बजाय आम्रकुंज तक चलने का आदेश देता है. तैयारी होते ही वह अपनी पांच सौ पत्नियों को हथिनियों पर बिठा, स्वयं राजसी हाथी पर सवार होकर, पूरे ठाठबाट के साथ बुद्ध से भेंट करने हेतु प्रस्थान कर देता है.

आम्रकुंज में संपूर्ण शांति देख अजातशत्रु के मन में संदेह उमड़ आता है. संदेह जिनसे मिलने जा रहा है उनके बुद्धत्व को लेकर नहीं है. उसका आधार वह सामान्य भय है जो हर व्यक्ति के मन में छिपा होता है. डर से मुक्ति के साधनों की खोज ही व्यक्ति को धर्म की ओर प्रवृत्त करती है. अजातशत्रु सम्राट है, इसलिए उसे राजनीतिक दुश्मनों का भी भय है, ‘सौम्य जीवक! कहीं तुम मुझसे छल तो नहीं कर रहे हो? कहीं इसके पीछे मेरे शत्रुओं की कोई चाल तो नहीं है? तुमने बताया कि शास्ता के साथ 1250 भिक्षु भी हैं. पर यहां तो गहन सन्नाटा है! जरासी हलचल तक नहीं है! कहीं मुझे धोखा तो नहीं दिया जा रहा?’ जीवक के आश्वासन देने पर सम्राट आम्रकुंज में प्रवेश करता है. फिर हाथी से उतरकर पैदल ही उस स्थान तक पहुंचता है, जहां बुद्ध अपने शिष्यों के साथ निर्मलशांत जलाशय के समान भिक्षुसंघ के बीच दिव्य कमल की भांति विराजमान हैं. पूरा वातावरण अजातशत्रु का मन मोह लेता है. वह सोचता हैᅳ‘यह भिक्षुसंघ जिस पवित्र शांति से युक्त है, क्या ऐसी ही शांति मेरे पुत्र उभयभद्र को भी प्राप्त हो सकती है?’ वह शास्ता को नमन करता है.

कुशलक्षेम जानने के पश्चात शास्ता गौतमबुद्ध उससे संबोधित होते हैं. अवसर मिलते ही अजातशत्रु प्रश्न करता है. उसकी जिज्ञासा एकदम स्पष्ट हैᅳ‘भंते जिस प्रकार विभिन्न प्रकार के शिल्प यथा हस्तिआरोहण, अश्वारोहण, धनुर्विद्या, रथिक तथा शिल्पकार जैसे कि युद्धध्वज धारक, उग्र योद्धा, महानाग(हाथी से युद्ध करने वाले), दास, कल्पक(नाई), नहापक(नहलाने वाले), काष्ठकार, चर्मकार, रजक, मालाकार, पेशकार, लौहकर्मी आदि अपनेअपने कर्तव्य द्वारा स्वयं को तृप्त करते हैं, उनका फल प्राप्त करते हैं, अपने सगेसंबंधियों, मित्रों, अमात्यों को भी लाभ पहुंचाते हैं, क्या वैसा ही फल इसी जन्म में श्रामण्य जीवन द्वारा भी संभव है?’ प्रश्न सुनकर बुद्ध के चेहरे का तेज बढ़ जाता है. सीधे उत्तर देने के बजाय वे राजा से प्रतिप्रश्न करते हैंᅳ‘क्या यही प्रश्न तुमने दूसरे श्रमणों के सम्मुख भी रखा है?’ अजातशत्रु के ‘हां’ कहने पर वे उनके उत्तर बताने को कहते हैं. आगे एकएक कर सभी छह प्रमुख मतावलंबियों के दर्शन पर चर्चा होती है. चर्चा का एकमात्र ध्येय समकालीन दर्शनों के सापेक्ष बुद्ध के दर्शन की श्रेष्ठता को स्थापित करना है.

सर्वप्रथम पूर्ण कस्सप के विचारों का जिक्र होता है. अजातशत्रु बताता है कि जब उसने पूर्ण कस्सप से यही प्रश्न किया तो उसका कहना थाᅳ‘कार्य करतेकराते हुए, छेदन करतेकराते, शोक करतेकराते, चलतेचलाते, परेशान करतेकराते, गांव लूटते, चोरीसैंधमारी करतेकराते, हत्या करतेकराते, गंगा के उत्तर या दक्षिण जाते, दान देतेदिलाते रहने से कभी कोई पाप नहीं होता. यहां तक कि यदि कोई व्यक्ति छुरे से किसी दूसरे व्यक्ति की गर्दन भी तराश दे, तब भी उससे कोई पाप नहीं होता. दान देने, दान लेने या सत्य बोलने से न पुण्य का आगम होता न ही पाप का….’ पूर्ण कस्सप के अनुसार जीवजगत की संपूर्ण हलचल सहित ब्रह्मांड की अनेकानेक क्रियाअभिक्रियाएं भौतिक घटनाएं मात्र हैं. उनसे मानव जीवन भौतिक स्तर पर भले प्रभावित हो, मगर उनका कोई नैतिक या दैवीय आधार नहीं होता. प्राकृतिक घटनाओं का कोई परोक्ष संदेश भी नहीं है. जो है, जैसा है वह स्वतः गतिमान है. पूर्ण कस्सप का संदेश संपूर्ण ‘अक्रियावाद’ में सिमटा हुआ है. उसके अनुसार मनुष्य स्वयं भौतिक परिवेश का हिस्साभर है और उसी के नियमों से पूरी तरह अनुशासित होता है. घटनाएं उसके नियंत्रण से बाहर होती हैं. इसलिए जो होता है उसका मनुष्य के नैतिक या पराभौतिक जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. पूर्ण कस्सप के विचारों से असंतुष्ट अजातशत्रु कहता है, ‘भंते जैसे कोई पूछे आम, जवाब मिले कटहल, और पूछे कटहल, जवाब मिले आम. ऐसे ही मैंने जो पूछा था, उसके स्थान पर पूर्ण कस्सप ने ‘अक्रियावाद’ का बखान किया. उनके कथन की मैंने न तो प्रशंसा की, न ही निंदा. मैंने न तो उनका अभिनंदन किया, न ही तिरस्कार. केवल शांतभाव से वहां से उठकर चला आया.’

पूर्ण कस्सप के पश्चात अगला नंबर मक्खलि गोसाल का आता है. अजातशत्रु पुनः अपने प्रश्न को उठाता है, ‘भंते अगले दिन मैं मक्खलि गोसाल के यहां गया. वहां कुशलक्षेम पूछने के पश्चात पूछा, ‘महाराज, जिस प्रकार दूसरे शिल्पों का लाभ व्यक्ति अपने इसी जन्म में प्राप्त करता है, क्या श्रामण्य जीवन का लाभ भी मनुष्य इसी जन्म में प्राप्त कर सकता है?’ मक्खलि गोसाल की ओर से जो उत्तर मिलता है, उसमें उनके जीवनदर्शन की झलक मिलती हैᅳ‘घटनाएं स्वतः घटती हैं. उनका न तो कोई कारण होता है, न ही कोई पूर्वनिर्धारित विधान. उनके क्लेश और शुद्धि का कोई हेतु नहीं है. प्रत्यय भी नहीं है. बिना हेतु और प्रत्यय के सत्व क्लेश और शुद्धि प्राप्त करते हैं. न तो कोई बल है, न ही वीर्य, न ही पराक्रम. सभी भूत जगत, प्राणिमात्र आदि परवश और नियति के अधीन हैं. निर्बल, निर्वीर्य भाग्य और संयोग के फेर से सब छह जातियों में उत्पन्न हो सुखदुख का भोग करते हैं…..संसार में सुख और दुख बराबर हैं. घटनाबढ़ना, उठनागिरना, उत्कर्षअपकर्ष जैसा कुछ नहीं होता. जैसे गेंद फेंकने पर उछलकर गिरती है और फिर शांत हो जाती है. वैसे ही ज्ञानी और मूर्ख सांसारिक कर्मों से गुजरते हुए अपने दुख का अंत करते रहते हैं.’ इस तरह ‘दीघनिकाय’ में मक्खलि गोसाल थोड़े ऐरफेर के साथ पूर्ण कस्सप के विचारों को ही दोहराता है. अजातशत्रु की प्रतिक्रिया पहले जैसी होती है. ‘भंते! जैसे किसी से आम के बारे में पूछा जाए और वह कटहल के बारे में बताने लगे और कटहल के बारे में पूछने पर आम का गुणगान करने लगे, ऐसे ही मैंने जो प्रश्न किया था, उसके उत्तर में मक्खलि गोसाल ने ‘दैववाद’ का बखान किया. मैं असंतुष्ट था. फिर भी बिना कोई प्रतिवाद किए वहां से चला आया.

अगले चरण में अजित केशकंबलि के विचारांे की झलक है. अजातशत्रु कहता है, ‘हे राजन! अजित केशकंबलि के समक्ष पहुँचकर मैंने वही प्रश्न किया जो मक्खलि गोसाल एवं पूर्ण कस्सप के समक्ष किया था. उत्तर में उसने बतायाᅳ‘महाराज! न दान है न यज्ञ है, न होम है न ही पापपुण्य. न लोक है, न ही परलोक है, न माता हैं न ही पिता. न तो अयोनिज सत्व हैं, न ही ज्ञानी पुरुष जो इस लोक को जानकर इसकी व्याख्या करेंगे. मानवमात्र चार तत्वों के योग से बना है. जब कोई मरता है तो पृथ्वी महापृथ्वी में, विलीन हो जाती है, जल, तेज, वायु आदि आकाश में विलीन हो जाते हैं. मृत देह को लोग खाट पर डालकर ले जाते हैं. उसकी निंदा या प्रशंसा की होती है. थोड़ी देर बार सबकुछ भस्म हो जाता है. हड्डियां उजली हो श्वेत कपोतों की भांति छितरा जाती हैं. न आत्मा है न ही परमात्मा. केवल मूर्ख लोग दान देते हैं, जिसका कोई फल नही होता. पंडित हो या मूर्ख, मरने के बाद सबकुछ नष्ट हो जाता है. कुछ भी शेष नहीं बचता.’ महाबोधि को संबोधित होकर अजातशत्रु फिर उसी प्रतिक्रिया पर लौट आता है, ‘भंते! जैसे कोई कटहल पूछने पर आम के बारे में बतावे और आम पूछने पर कटहल का वर्णन करने लगे, वैसा ही मुझे लगा. फिर भी बगैर कोई प्रतिवाद किए, शांतमन वहां से चला आया. अगले दिन मैं पुकुद कात्यायन के सान्निध्य में पहुंचा. उनसे भी वही प्रश्न किया.

पुकुद कात्यायन का मानना है कि संपूर्ण सृष्टि, ‘कुल सात पदार्थों से बनी है. उन्हें न तो बदला जाता है, न ही विकारग्रस्त किया जा सकता है. सातों पदार्थ एकदूसरे से स्वतंत्र और निरपेक्ष हैं. वे न तो एकदूसरे को हानि पहुंचाते हैं, न ही किसी और तरह से प्रभावित करते हैं. वे सात पदार्थ हैंपृथ्वी, अग्नि, वायु, आकाश, सुख, दुख एवं जीवन. मनुष्य को इन सातों को लेकर हर्षशोक से बचना चाहिए. सातों मूल पदार्थ हैं. वे अचल, अखंड, निरपेक्ष और अपरिवर्तनीय हैं. इस तरह वे पूरी तरह अजर, अमर, अविनाशी और अपरिवर्तनीय हैं. यदि कोई तेज धार के हथियार से किसी की गर्दन तराश देता है तब भी वह कोई अपराध नहीं करता. केवल अपने हथियार से शरीर के दो हिस्सों के बीच कुछ अंतराल बना देता है.’ पुकुद के विचारों के उल्लेख के पश्चात अजातशत्रु तथागत से कहता हैᅳ‘हे भंते! मैंने तो केवल श्रामण्य जीवन के फल के बारे में पूछा था. उत्तर में पकुद ने इधरउधर की बातें कीं. उसके अनुसार सृष्टि के बीच कोई अंतर्संबद्धता नहीं है. सबकुछ निरपेक्ष और स्वतंत्र है. ऐसा भला कैसे हो सकता है!’

इसके पश्चात वह निगंठ नाथपुत्त के विचारों पर टिप्पणी करता हैᅳ‘भंते! जब मैंने वही प्रश्न निगंठ नाथपुत्त से किया तो उसने चर्तुआयामी संवर(अवरोध) का उपदेश दिया. उसका कहना था, ‘निगंठ(निर्गंथ: जिसमें कोई गांठ न हो) चार प्रकार के संवरों से घिरा होता है. वे चार प्रकार के संवर क्या हैं? तो सुनिए, पहला वह जल की भांति व्यवहार करता है. दूसरे वह सभी प्रकार के पापों का वारण करता है. तीसरा, पापों का वारण करने के बावजूद वह निष्पाप होता है. चौथा, वह सभी पापों का वारण करने में लगा रहता है. चार संवरों से संवृत होने के कारण ही वह निर्गंठ, निष्पाप, अनिच्छुक, संयमी और स्थितात्मा कहलाता है.’

संजय वेलट्ठिपुत्त का उत्तर अनेक संशयों से भरा था. ‘महाराज यदि आप पूछें कि क्या इस लोक अलावा भी कहीं जीवन(मृत्यु पश्चात) है? यदि मैं यह सोचता भी हूं कि मृत्युपश्चात भी जीवन है. तो मैं आपको क्यों बताऊं! यदि मैं सोचता हूं कि परलोक है तो मैं आपको क्यों बताऊं कि परलोक है. इसलिए मैं ऐसा नहीं कहता. मैं वैसा भी नहीं कहता. मैं किसी और तरह से भी नहीं कहता. मैं ऐसा भी नहीं कहता कि यह नहीं है. मैं नहीं कहता कि नहीं, नहीं है. मैं नहीं कहता कि परलोक है. मैं नहीं कहता कि परलोक नहीं है. मैं नहीं कहता कि तथागत मरने के बाद भी होते हैं. मैं नहीं कहता कि तथागत मरणोपरांत नहीं होते हैं. कोई मुझसे पूछे कि क्या तथागत मरने के बाद होते हैं? तो मैं वैसा भी नहीं कहता.’ यानी संदेह ही संदेह. कुछ भी निश्चित नहीं. जिस संसार में हम रहते हैं, वहां जीवन को सुखी एवं सुरक्षित बनाने के लिए कुछ विश्वास भी करना पड़ता है. किंतु संजय वेलट्ठिपुत्त के विचार तो पूरी तरह संदेह में लिपटे थे.

इन विचारों का गंभीरतापूर्वक अध्ययन किया जाए तो कोई खास अंतर दिखाई नहीं पड़ता. लगता है कि सभी दार्शनिक एक ही बात को घुमाफिराकर कह रहे हैं. जहां कुछ अंतर है, वहां भी स्पष्टता का अभाव है. जिस कारण उनकी ओर से किसी परीपक्व दार्शनिक विचारधारा की तस्वीर नहीं बन पाती. दूसरा अंतर प्रवृत्ति को लेकर भी है. अजातशत्रु का प्रश्न श्रमण जीवन की उपयोगिता को लेकर है. वह जानना चाहता है कि जो लोग सश्रम आजीविका कमाकर लोकजीवन में अपना योगदान देते हैं, तथा वे लोग जो सांसारिक जीवन को त्यागकर निष्पृह, निर्लिप्त, असांसारिक और यायावर जीवन अपनाते हैंदोनों के फल में क्या अंतर है? लोकजीवन में सीधे सहयोग करने वालों का योगदान स्पष्ट दिखता है. जबकि श्रमण जीवन को अपनाने वाले लोगों का योगदानभले ही उनके अपने निमित्त हो अथवा कुल समाज के, नजर नहीं आता. अजातशत्रु की यह जिज्ञासा ही उसे छह दार्शनिकों तक ले जाती है. मगर उत्तर देने के बजाय वे सब अपनेअपने दार्शनिक विचारों का वर्णन करने लगते हैं. उनके उत्तर संवाद की काल्पनिकता की ओर संकेत करते हैं. क्योंकि निगंठ नाथपुत्त को छोड़कर जिन्होंने आगे चलकर जैन मत का प्रवत्र्तन किया, शेष पांचों दार्शनिकों के लिए श्रमण संस्कृति को लेकर खास उत्साह नहीं था. ‘दीघनिकाय’ में उन्हें ‘संघ प्रमुख’, गणाध्यक्ष, ज्ञानी, अनुभवी, यशस्वी, तीर्थंकर(मतसंस्थापक) आदि बताया गया है. यहां संघ प्रमुख से लेखक का आशय अनुयायियों के समुच्चय से है. नास्तिक दार्शनिकों में सृष्टि की उत्पत्ति को लेकर भले ही मतांतर हो, किंतु वे जीवन से भागने के बजाय उसे भोगने में विश्वास रखते थे. इस संबंध में वे सभी एकमत थे. सुख उनके लिए मायावी अथवा हेय वस्तु नहीं था. बल्कि वह तत्व था(और है भी), जो जीवन को उत्सव में ढालने के लिए आवश्यक होता हैᅳ‘दुख के डर से हमें उस सुख से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए, जिसे हमारी बुद्धि अपने लिए अनुकूल समझती है. पशुओं द्वारा चर लिए जाने के भय से लोग धान बोना बंद नहीं कर देते. न ही भिखारियों के भय से भोजन पकाना रोक देते हैं.(माधवाचार्य, सर्वदर्शन संग्रह, 9.3). धर्म और मोक्ष के नाम पर जब समस्त संसाधन ब्राह्मणों और क्षत्रियों ने बांट लिए हों, तथा अपने श्रमकौशल के आधार पर आजीविका कमाने वाले लोगों को दास का जीवन जीना पड़ता हो, अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए ब्राह्मण वर्ग उन्हें त्याग और मोह पाठ पढ़ाता हो तथा स्वयं यज्ञ और बलियों के नाम पर भोगविलास में लिप्त रहता हो, तब ऐसा सोच क्रांतिकारी ही कहा जाएगा.

आजीवक दार्शनिकों के बारे में गहन शोध करने वाले ए. एल बाशम का तो यहां तक मानना है कि निगंठ नाथपुत्त सहित सभी छह उपदेशक एक ही ‘उपदेश समवाय के अंश थे.’ जैन और बौद्ध लेखकों ने उनके विचारों को घुमाफिराकर प्रस्तुत किया है. पांचवी शताब्दी के बौद्ध विद्वान बुद्धघोष के अनुसार पूर्ण कस्सप दास थे. जिस स्वामी के यहां रहते थे, उसके पास पहले से ही 99 दास थे. कस्सप के शामिल होने के पश्चात संख्या बढ़कर 100 हो गई. इस संख्या को पूर्ण मानते हुए उनका नामकरण किया गया था. जैन परंपरा में बताया गया है कि वे संपूर्ण ज्ञानी होने के कारण ही वे ‘पूर्ण’ कहलाए. ‘कस्सप’ उपनाम को देखते हुए वेणीमाधव बरुआ उन्हें ब्राह्मण गौत्रीय बताते हैं. यह बात हजम नहीं होती. क्योंकि जिस काल में पूर्ण कस्सप का जन्म हुआ, उसमें ब्राह्मण को, वह चाहे जितना विपन्न हो, दास नहीं बनाया जा सकता था. दूसरे कस्सप गोत्रनाम के शूद्रों में भी होते हैं. मक्खलि का जन्म गोशाला में हुआ था. इसी से उनके नाम के साथ ‘गोसाल’ जुड़ा. जैन परंपरा के अनुसार ‘मक्खलि’ ‘मंख’ से बना है. मंख एक पिछड़ी जाति थी. जिसके सदस्य चारण या भाट जैसा जीवन यापन करते हैं. जैन साहित्य के अनुसार मक्खलि हाथ में मूर्ति लेकर भटका करता था. अजित केशकंबलि के बारे में बताया जाता है कि वह शरीर पर हमेशा मोटा कंबल लिपेटे रखता था. पुकुद कात्यायन और संजय वेलट्ठिपुत्त के बारे में अधिक पता नहीं है. बुद्धघोष ने पकुध को सनकी बताया है. उसके अनुसार वह हमेशा गर्म पानी ही ग्रहण करता था. नदीनाले को पार करना पाप समझता था. यदि करना ही पड़े तो बाद में प्रायश्चित करता था. यदि गर्म पानी न मिले तो वह नहाना छोड़ देता था. संजय वेलट्ठिपुत्र को कुछ विद्वान ‘संजय परिब्बाक’ कहते हैं. संजय के साथी जब अपने गुरु का साथ छोड़ देते हैं. इससे निराश होकर वह आत्महत्या कर लेता है. पूर्ण कस्सप भी बुद्ध से जादू के खेल में पराजित आत्महत्या का मार्ग चुनता है. कुछ विद्वानों का मानना है कि लोकायत दर्शन, जिसे वे अपनीअपनी तरह से परिभाषित करते हैं, का ईसा से 250-300 साल पहले तक एक विशिष्ट ग्रंथ था. इन दिनों उसका कोई अस्तित्व नहीं है. संभव है उसे नष्ट कर दिया गया हो. पोंगा पंथी पुरोहितों के लिए यह बहुत सामान्य बात थी.

हो सकता है अजातशत्रु और छह भौतिकवादी विचारकों की भंेट बौद्ध लेखकों की कल्पना की उपज हो. अपने विचारों को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए उन्होंने भौतिकवादी विचारकों का नाम जोड़ दिया हो. लेकिन छह नास्तिक विचारकों का उल्लेख जैन और बौद्ध दर्शनों में अनेक जगह हुआ है. इससे उन विचारकों को कल्पित नहीं कहा जा सकता. बल्कि इससे उनकी समाज में व्यापक स्वीकार्यता का पता चलता है. इसलिए कि अपने मत की संस्थापना के लिए बौद्ध दार्शनिकों को न केवल अपने पूर्ववत्र्ती दार्शनिकों के मत का खंडन अनिवार्य जान पड़ता है, बल्कि खंडन के लिए शक्तिशाली मगध सम्राट अजातशत्रु को बीच में लाना पड़ता है. वस्तुतः ‘दीघनिकाय’ के जिस अध्याय में छह भौतिकवादी नास्तिक दार्शनिकों का उल्लेख है, उसका ध्येय इन विचारकों के दर्शन का वर्णन या व्याख्या करना नहीं है, अपितु ‘श्रामण्य जीवन के फल’ की समीक्षा करते हुए बौद्ध धर्मदर्शन एवं भिक्षु संघ के प्रति सम्मानभाव उत्पन्न करना है. अपने धर्मसंप्रदाय के लिए दूसरे धर्मसंप्रदाय को कमतर आंकना, उनमें जानबूझकर खोट निकालना लोगों की पुरानी प्रवृत्ति रही है. बौद्ध विचारक भी इस प्रवृत्ति से मुक्त न थे. विडंबना है कि प्राचीन भौतिकवादी दर्शनों के अध्ययनमनन के लिए कोई स्वतंत्र ग्रंथ प्राप्त नहीं होता. विवश होकर हमें उन्हीं जैन और बौद्ध स्रोतों की ओर लौटना पड़ता है जिनके लेखक उनके प्रतिद्विंद्वी और आलोचक रहे हैं.

वस्तुतः ढाई हजार वर्ष पहले तक, वर्णव्यवस्था के चलते भारत में ब्राह्मणेत्तर वर्गों में पढ़नेलिखने के प्रति जागरूकता का अभाव था. स्वयं बुद्ध ने अपने विचारों के बारे में कुछ नहीं लिखा. वे आजीवन भिक्षु वेश में घूमघूमकर उपदेश देते रहे. अपने मत के प्रचार के लिए वे अनेक सम्राटों से भी मिले. शिष्यों, यहां तक कि अपने पुत्रपुत्रियों को भी उन्होंने धर्मप्रचार में लगा दिया. बुद्ध के विचारों से प्रभावित होकर अनेक क्षत्रिय सम्राट, विशेषकर वे जो यज्ञों में दी जाने वाली बलियों का विरोध कर रहे थे, संघ के समर्थन में आए. यह उनकी प्रतिष्ठा ही थी कि मगध जैसे बलशाली साम्राज्य का अधिपति अजातशत्रु, उनकी सहमति के अभाव में वज्जिसंघों पर आक्रमण का इरादा टाल देता है. बाद में भी सीधे आक्रमण करने के बजाय कूटनीति से काम लेता है. बुद्ध और उनके शिष्यों के प्रयास के फलस्वरूप भिक्षु संघ बुद्ध के जीवनकाल में ही इतना संगठित हो चुका था कि उनके जीवनकर्म को संकलित करना, उसके अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए आवश्यक था. लेकिन हमारी जिज्ञासा यहीं शांत नहीं होती. कुछ प्रश्न अब भी अनुत्तरित रह जाते हैं. क्योंकि ‘दीघनिकाय’ के अनुसार संघ तो नास्तिक दार्शनिकों के भी थे. ‘संयुत्त निकाय’(1/69) के एक प्रसंग के अनुसार कोशल सम्राट प्रसेनदि मक्खलि गोसाल तथा अन्य नास्तिक विचारकों की तुलना में गौतमबुद्ध को नौसीखिया मानता था. क्यों न हो, उस समय तक आजीवक धर्म के समर्थकों की संख्या बौद्ध के अनुयायियों से अधिक थी. बावजूद इसके अपने प्रवत्र्तक और शास्ता के जीवन संबंधी घटनाओं एवं विचारों को संग्रहीत करने का जो युगांतरकारी कार्य बुद्ध के शिष्यों ने किया, वैसा कार्य पूर्ण कस्सप, मक्खलि गोसाल, अजित केशकंबलि, पकुध आदि के शिष्यों ने क्यों नहीं किया? यह ऐसी पहेली है, जिसका समाधान हमें भारतीय समाज की अंतग्र्रंथियों को सुलझाने में मदद कर सकता है.

दीघनिकाय’ में जिन छह नास्तिक विचारकों का जिक्र हुआ है, उनमें केवल निगंठ नाथपुत्त ऐसे हैं जो आगे चलकर जैन दर्शन के प्रवत्र्तक महावीर स्वामी के रूप में ख्यात हुए. हालांकि उन्हें मिली सफलता बुद्ध की सफलता के आगे नगण्य थी. लेकिन जैन दर्शन को लेकर विपुल वाङ्मय आज उपलब्ध है. उसके माध्यम से महावीर के जीवन के बारे में हमें प्रामाणिक जानकारी प्राप्त है. बाकी के बारे में जैन, बौद्ध और तमिल ग्रंथों में यत्रतत्र उपलब्ध सामग्री के अलावा प्रामाणिक सूचनाओं का अभाव है. जो जानकारी मिलती है, उसमें भी अंतर हैं. उदाहरण के लिए ‘दीघनिकाय’ में पांचों नास्तिक विचारकों को बुद्ध का समकालीन बताया गया है. जबकि ‘महाबोधि जातक’ के अनुसार वे पांचों बुद्ध के पूर्ववर्ती थे. अपने पूर्वजन्मों में बुद्ध ने उन पांचों को अलगअलग परास्त किया था. नास्तिक दार्शनिकों का जिक्र ‘मिलिंद प्रश्न’ में भी हुआ है, जो ‘दीघनिकाय’ से 250-300 वर्ष बाद की रचना है. अंतर मात्र इतना है कि ‘दीघनिकाय’ में संवाद सम्राट अजातशत्रु और गौतम बुद्ध के बीच है, ‘मिलिंद प्रश्न’ में अजातशत्रु की जगह ग्रीक मूल का भारतीय सम्राट मिनांडर ले लेता है. दोनों की शब्दावलि एक समान है. मिनांडर ने भारत में ईसा पूर्व पहलीदूसरी शताब्दी के बीच राज्य किया था. ‘मिलिंद प्रश्न’ को तभी की रचना बताया जाता है. विषयवस्तु के आधार पर वह किसी अधपके लेखक की रचना लगती है. इसलिए उसकी मौलिकता पर संदेह है. मल्लशेखर, दुर्गाप्रसाद चट्टोपाध्याय आदि विद्वानों का मानना है कि मिलिंद प्रश्न का संबंधित प्रकरण ‘दीघनिकाय’ के समन्न्फल सुत्तकी सस्ती नकल है.

इस विवरण के बावजूद हमारा एक प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है. आखिर क्या कारण है कि पांचों नास्तिक दार्शनिकों के जीवन और कर्म के बारे में आवश्यक जानकारी का अभाव है? महाभारतकाल तक वर्णव्यवस्था जाति व्यवस्था के रूप में रूढ़ हो चुकी थी. ब्राह्मण समाज के शीर्ष पर आसीन थे. बिना उनकी सहमति के किसी भी निर्णय को लागू कर पाना असंभव था. निहित स्वार्थ के लिए वे नास्तिक विचारधारा को नापसंद करते थे. चूंकि नास्तिक विचारक न केवल ईश्वर और उसकी सत्ता, बल्कि सभी प्रकार के कर्मकांडों का, जिनके चलते ब्राह्मणों को विशेषाधिकार प्राप्त थे, विरोध करते थे. अतएव ब्राह्मणों द्वारा जो उस समय का पढ़ालिखा वर्ग थाउनकी उपेक्षा स्वाभाविक थी. यही कारण कि नास्तिक विचारकों के साथ ही उनके विचार भी इस तरह विला गए कि उनके कुछ अवधि बाद किसी ने उन्हें आगे बढ़ाने की आवश्यकता नहीं समझी. कुछ विद्वानों का मानना है कि लोकायत दर्शन, जिसे वे अपनीअपनी तरह से परिभाषित करते हैं, का ईसा से 250-300 साल पहले तक एक विशिष्ट ग्रंथ था. इन दिनों उस ग्रंथ का कोई अस्तित्व नहीं है. इसलिए नास्तिक दार्शनिकों के विचारों को लेकर अधिक जानकारी प्राप्त नहीं होती. फिर भी कुछ बातें हैं जो उनकी बौद्धिक पैठ और लोकप्रियता को दर्शाती हैं. जैसे कि गोसाल को महावीर से दो वर्ष पहले ही ‘जिन्’ की पदवी प्राप्त हो चुकी थी. और अपने समय में गोसाल के अनुयायियों की संख्या गौतम बुद्ध के समर्थकों से अधिक थी. जैन और बौद्ध ग्रंथों में उनके विचारों को तोड़मरोड़कर पूर्वाग्रह के साथ पेश किया गया है. कई जगह तो इतने हल्के तरीके से कि मामला सुलझने के बजाय और भी उलझता चला जाता है. इसका कारण भारतीय समाज की जातीय संरचना है, जो गैरद्विजों की बौद्धिक क्षमता को लेकर जानबूझकर संशयग्रस्त रही है.

महावीर स्वामी और बुद्ध दोनों क्षत्रिय कुलोत्पन्न थे. समाज के शीर्ष वर्गों पर उनका प्रभाव था. बुद्ध के प्रमुख शिष्य आनंद, सारिपुत्र, मोदग्लायन आदि ब्राह्मण वर्ग से आए थे. बुद्ध जानते थे कि प्रजा अपने राजा का अनुसरण करती है. इसलिए वे सम्राटों और समाज के श्रेष्ठि वर्ग को अपने प्रभाव में लेने की सीधी कोशिश करते हैं. इसका लाभ भी उन्हें मिलता है. उनका धर्मदर्शन उनके जीवनकाल में ही काफी प्रतिष्ठा बटोर चुका था. इसलिए बुद्ध के निर्वाण प्राप्ति के तुरंत बाद उनके शिष्यों ने उनके विचारों और जीवनयात्रा को शब्दबद्ध करना आरंभ कर दिया था. बुद्ध ने अपने शिष्यों को धर्मप्रचार करने उन देशों में भी भेजा था, जिनमें जाति और वर्ण व्यवस्था का नामोनिशां न था.

बुद्ध द्वारा स्थापित भिक्षुसंघ दिखावे और कर्मकांड की संस्कृति से मुक्त था. सहजता के साथसाथ वह उस सामूहिकताबोध की भी रक्षा करता था, जो ब्राह्मण धर्म के नेतृत्व में वर्णव्यवस्था के मजबूत होने के साथसाथ छीजता जा रहा था. इसलिए जनसाधारण को जैसे ही बुद्ध मार्ग के रूप में पुरोहितवाद से मुक्ति का रास्ता दिखाई दिया, उसने ब्राह्मणवाद से किनारा करना आरंभ कर दिया. श्रेष्ठिवगण, शिल्पकार, श्रमिक वर्ग यज्ञादि आयोजनों तथा बलिप्रथा से होने वाले नुकसान से बचने के लिए पहले आजीवक धर्म की ओर मुड़े. मजदूर, शिल्पकार, नाई, धोबी, काष्ठकार, किसान, तेली, बुनकर जैसे किसानों, मजदूरों और शिल्पकारों के संगठनों ने खुलकर आजीवकों का साथ दिया. आगे चलकर बुद्ध के नेतृत्व में नए धर्मदर्शन का विकास हुआ तो वे उसकी ओर पलायन करने लगे. जातीय भेदभाव एवं पुरोहितवाद के सताए लोगों ने भी घोर नास्तिकतावाद तथा विशेषाधिकार संपन्न ब्राह्मणवाद के बीच मध्य मार्गी बौद्ध धर्म को अपनाना ही उचित समझा था. उसके फलस्वरूप जैन और बौद्ध दर्शन स्वयं को ब्राह्मण धर्म का विकल्प प्रस्तुत करने में सफल सिद्ध हुए. बावजूद इसके नास्तिक विचारकों की महत्ता से इन्कार नहीं किया जा सकता. क्योंकि बौद्ध और जैन धर्म के उदय से पहले नास्तिक विचारकों ने ही ब्राह्मणवादी दर्शनों के विरोध की जमीन तैयार की थी, जिसपर आगे चलकर उन दोनों दर्शनों ने अपनी सफलता की महागाथा लिखी और मानवतावादी दर्शन कहलाए. नास्तिक विचारकों के जीवन के बारे में अधिक जानकारी मौजूद नहीं है. लेकिन जितना मौजूद है, उससे भी पता चलता है कि नास्तिक विचारकों के लिए अपने आप को संगठित कर चुके ब्राह्मणवाद के किले में सैंध लगाना आसान नहीं था. यह धारा के विरुद्ध चलने जैसा चुनौतीपूर्ण कार्य था, जिसे उन्होंने अपनी अद्वितीय प्रतिभा और लोकसमर्थन के दम पर संपन्न किया था. उन विचारकों के बारे में जानना भारतीय सभ्यता, संस्कृति और दर्शन के सबसे परिवर्तनकारी दौर से संवाद करने जैसा है.

अजातशत्रु का द्वैध

आलेख के इस हिस्से में हम जो लिखने जा रहे हैं वह जिन स्रोतोंं पर आधारित है, उनमें एक ही घटना और पात्र को लेकर भिन्न प्रकार के संदर्भ मौजूद हैं. अतः हमारे इस प्रयास को सचाई की तहों में जाने की कोशिश समझना चाहिए. जिन स्रोतों पर यह आधारित है, उसके लेखकों और प्रस्तोताओं की मंशा, नास्तिक विचारकों तथा उनकी विचारधारा को लेकर ईमानदार विमर्श की थी ही नहीं. अगर वे ईमानदार होते तो उस विचारधारा को लेकर उनकी राय चाहे जो भी हो, सामग्री के आधारतथ्यों में पर्याप्त एकरूपता होती. उस अवस्था में वे उस विचारधारा के समानांतर लंबी लकीर खींच सकते थे. आखिरकार यह कतई आवश्यक नहीं कि अपनी लकीर को लंबा दिखाने के लिए पहले से मौजूद लकीर में कांटछांट की जाए. असली जीत तब है जब पहले से मौजूद लकीर की भलीभांति नापजोख कर, उसके समानांतर लंबी लकीर खींच दी जाए. परंतु, कदाचित विचारों के ढुलमुलपन अथवा आत्मविश्वास की कमी के चलते, उन्हें लगा होगा कि बिना लोकप्रियता की ऊंचाइयों को छू रही विचारधारा की ओर उंगली उठाए, उनकी अपनी विचारधारा की स्वीकार्यता असंभव है. वस्तुतः यह उनका युगसंस्कार था. राजनीति हो या विचार, उस दौर में विरोध को आत्मसात् करने के लिए बहुत सीमित आयाम थे. युद्ध में ‘जीत’ तभी मानी जाती थी जब दुश्मन को या तो कैद कर लिया जाए अथवा उसे मौत के घाट उतार दिया जाए. विरोधों और असहमतियों के साथ जीवन जीने के उस युग में बहुत सीमित अवसर थे. विचार भी राजनीति से अछूता न था. इसलिए नास्तिक दर्शन को लेकर बौद्ध एवं जैन स्रोतोंं से प्राप्त सामग्री में भारी अंतर है. क्योंकि वह उन विद्वानों द्वारा रची गई है, जो न केवल पहले से लोकमानस में जगह बना चुकी नास्तिक विचारधारा के, बल्कि आपस में भी वैचारिक प्रतिद्विंद्वी थे और मान चुके थे कि बगैर समानांतर विचारधाराओं को कठघरे में लाए, उनके विचारों की स्वीकार्यता असंभव है. मुश्किल यह भी कि हमारे पास ऐसा कोई जरिया नहीं है, जिससे हम नास्तिक विचारधारा के प्रमुख चिंतकों के जीवनकर्म के बारे में सहीसही जान सकें. साहित्य और संस्कृति के दस्तावेजीकरण का काम जब दूसरों को, खासकर उन्हें जिनकी उसमें कोई निष्ठा न हो, सौंप दिया जाए तो यही होता है. लिखने वाला अपने हितों और वर्गीय दृष्टिकोण को केंद्र में रखकर ही लिखता है. यानी इतिहास उसका होता है जो उसे लिखनालिखवाना जानता है. जो इतिहास की उपेक्षा करता है, वक्त उसे उपेक्षित छोड़कर आगे बढ़ जाता है. हमारी मुश्किल है कि ढाई हजार वर्ष पहले की उस बौद्धिक क्रांति के अतिमहत्त्वपूर्ण पक्ष की पड़ताल करने के लिए प्रामाणिक स्रोतों का सरासर अभाव है.

तमाम कमियों के बावजूद भारतीय नास्तिक दर्शनों की पहचान के कुछ चिह्न बाकी हैं तो इसका श्रेय भी बौद्ध एवं जैन ग्रंथों को जाता है. ठीक है, अपने दार्शनिक मतों को श्रेष्ठतर जताने के उन्होंने नास्तिक विचारों को तोड़मरोड़कर पेश किया था. लेकिन ब्राह्मणलेखकों की भांति उन्हें राक्षस, दैत्य, दानव, बेडौल, उच्छ्रंखल, विकारी और बुद्धिहीन बताकर उनके बौद्धिक सामथ्र्य को नकारने की कभी कोशिश भी नहीं की. आलोचना की, विचारों को आधाअधूरा पेश किया. तथापि विरोधी विचारधारा को बिसराया नहीं. आज यदि हम उनके नाम से परिचित हैं, पूर्वाग्रहों के साथ ही सही उनके विचारों की झलक प्राप्त कर सकते हैं, तो इसका श्रेय प्राचीन बौद्ध एवं जैन लेखकों को ही जाता है. यह ठीक है कि नास्तिक दार्शनिकों को लेकर अलगअलग ग्रंथों में प्राप्त जानकारी में भारी अंतर है. परंतु हमें याद रखना होगा कि ये ग्रंथ अलगअलग दौर में, विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमि के लेखकों द्वारा रचे गए हैं. इसमें श्रुति परंपरा का भी योगदान रहा है. इसलिए प्रस्तुतीकरण में विविधता का होना स्वाभाविक है. इन परिस्थितियों में लिखे से ज्यादा महत्त्व अनलिखे का होता है. पाठकीय विवेक महत्त्वपूर्ण हो जाता है. अपेक्षा की जाती है कि पढ़ते समय पाठक अपने दिमाग की खिड़कियों, रोशनदानों को पूरी तरह से खुला रखे. जो लिखा गया है उसपर तो ध्यान दे ही, जो नहीं लिखा गया है, वह क्यों नहीं लिखा जा सका, इसपर भी विचार करता चले. चिंतन की लंबी यात्रा बताती है कि जो ‘क्यों’ का उत्तर खोजने में सफल रहता है, देरसबेर ‘क्या’ के बारे में सटीक आकलन तक पहुंच ही जाता है.

अब हम अजातशत्रु की समस्या पर लौटते हैं. उस समस्या पर विचार करते हैं जो उसे पहले नास्तिक विचारकों तथा अंत में गौतम बुद्ध तक ले जाती है. हर जगह वह एक ही बात जानना चाहता हैᅳ‘जिस प्रकार विभिन्न प्रकार के शिल्प यथा हस्तिआरोहण, अश्वारोहण, धनुर्विद्या, रथिक तथा शिल्पकार जैसे कि युद्धध्वज धारक, उग्र योद्धा, महानाग, दास, कल्पक, नहापक, काष्ठकार, चर्मकार, रजक, मालाकार, पेशकार, लौहकर्मी आदि अपनेअपने कर्तव्य द्वारा स्वयं को तृप्त करते हैं, उनका फल प्राप्त करते हैं, अपने सगेसंबंधियों, मित्रों, अमात्यों को भी लाभ पहुंचाते हैं, क्या वही फल इस जन्म में श्रामण्य जीवन द्वारा संभव है?’ यह प्रश्न अपने आप में महत्त्वपूर्ण है. यह कोई बड़ी आध्यात्मिक समस्या खड़ी नहीं करता. अजातशत्रु श्रामण्य जीवन द्वारा उन्हीं फलों को प्राप्त करना चाहता है, जिन्हें साधारण शिल्पकार, योद्धा, महावत आदि सहज प्राप्त कर लेते हैं. बुद्ध को यदि सामान्य अर्थों में आध्यात्मिक व्यक्तित्व मान लिया जाए तो उनके आगे इस प्रश्न को उठाना विचित्र लग सकता है. लेकिन बुद्ध का अध्यात्मबोध परंपरा से हटकर था. वह लोककल्याण से विलग न था. लोककल्याण से जुड़ा होना, यानी नीतिसंगत होना बुद्ध के लिए इतना जरूरी था कि इसके लिए उन्होंने उन अनेेक आध्यात्मिक समस्याओं से भी किनारा कर लिया था, जो उन दिनों विभिन्न दार्शनिक संप्रदायों के बीच गर्मागरम बहस का माध्यम बनी हुई थीं. तब वे कौनसे दबाव हो सकते थे, जिन्होंने अजातशत्रु जैसे शक्तिशाली सम्राट को इसी जन्म में सुकून के लिए भटकने पर विवश कर दिया था. एक सम्राट होकर क्यों वह साधारण श्रमिकशिल्पकार, कृषक, कर्मकार आदि को मिलने वाली छोटीछोटी खुशियों के लिए आकुल है? यह ऐसी समस्या है जिसके समाधान से न केवल अजातशत्रु की आकुलता के कारण को समझा जा सकता है, बल्कि मक्खलि गोसाल सहित अन्यान्य आजीवकों को मिली व्यापक लोकस्वीकार्यता तथा उनके बरक्स बुद्ध को मिली आपेक्षिक सफलता पर भी रोशनी डाली जा सकती है.

उन दिनों बौद्ध दर्शन के उदय का आरंभिक चरण था. गौतम बुद्ध का हालांकि समकालीन सम्राटों और जनसाधारण पर प्रभाव था, लेकिन ब्राह्मण धर्म भी पूरी तरह मिटा नहीं था. ऋषिगण यज्ञों और दूसरे कर्मकांडों के जरिये लोगों को ‘कल्याण’ का पाठ पढ़ा रहे थे तो मुनिगण उपनिषदों, स्मृतियों, पुराणों तथा अन्यान्य ब्राह्मण ग्रंथों की रचना में व्यस्त थे. साधारण सम्राट के लिए यह संभव न था कि वह ब्राह्मण तथा उसके बताए मार्ग की उपेक्षा कर सके. मंत्री, अमात्य, पुरोहित, वैद्य, चिकित्सक, प्रशिक्षक, अध्यापक, ज्योतिषी जैसे शीर्ष पद केवल ब्राह्मण के लिए आरक्षित थे. क्षत्रिय का काम राजा के लिए युद्ध करना था. उनकी शिक्षादीक्षा युद्धकौशल तक सीमित रहती थी. युद्ध किससे हो? कब हो? पड़ोसी राज्यों को लेकर कैसी नीति अपनाई जाए? यह सब निर्णय लेना सामान्यतः ब्राह्मण पदाधिकारियों का काम था. इनके अलावा तीसरा वर्ग व्यापारियों का था, जिनका राजनीति से कोई संबंध न था. वे व्यापार करते और समयसमय पर सम्राट को कर, भेंट, उपहार आदि देकर राजा को प्रसन्न रखते थे. उनकी निष्ठा सिंहासन के प्रति रहती थी. उसपर बैठे व्यक्ति की ओर उनका ध्यान कम ही जाता था. चौैथा वर्ग दास, भृत्य, किसान, मजदूर, शिल्पकर्मी, छोटे व्यापारियों और साधारण योद्धाओं का था. उनका कार्य विभिन्न प्रकार की सेवाओं द्वारा शीर्षस्थ वर्गों को प्रसन्न रखना था.

अजातशत्रु का मंत्री चतुर ब्राह्मण वस्सकार था. कूटनीति में चाणक्य सरीखा. बुद्ध के मुंह से यह सुनकर कि वज्जि गणतंत्र जब तक संगठित हैं, उनको जीतना असंभव हैवह फूट डलवाकर अजातशत्रु की जीत को संभव बना देता है. बावजूद इसके अजातशत्रु ब्राह्मण पुरोहितों के फेर में नहीं पड़ता. यही उसका युगबोध है. उसके चरित्र की इन विशेषताओं के कारण उसे केंद्र में रखकर न जाने कितने ग्रंथ रचे गए हैं. उसे इसी जन्म में मोक्ष की तलाश है. ऐसा क्यों है? अजातशत्रु के जीवन में झांके तो इस रहस्य की पर्तें खुलती चली जाती हैं. मगध की सत्ता उसने अपने पिता की हत्या करके हथियाई थी. कहा जाता है कि पिता की हत्या के बाद अजातशत्रु को इतनी आत्मग्लानि हुई कि जीवनभर कभी ढंग से सो नहीं पाया था. अनजाना डर भीतर ही भीतर उसे कचोटता रहता था. जीवक के आम्रवन में बुद्ध से मिलने पहुंचा तो बुरी तरह घबराया हुआ था. भारतीय राजनीति के इतिहास में उसे अभिशप्त सम्राट भी माना जाता है. यह अभिशाप जन्म से ही उसके साथ जुड़ा था. उसके जन्म को लेकर जैन और बौद्ध ग्रंथों में अलगअलग कहानियां हैं. एकदूसरे से मिलतीजुलती. अजातशत्रु के पिता का नाम बिंबसार था. मां का नाम कोसल देवी, जिन्हें वैदेही भी कहा गया है. कहते हैं, रानी जब गर्भवती हुई तो उसकी इच्छा मनुष्य का मांस खाने की हुई. यह बहुत ही अनोखी, घिनौनी और पाशविक अनायास प्रकटी इच्छा थी. जिसने भी सुना सहम गया. फौरन ज्योतिषी को बुलवाया गया. कालगणना का दिखावा करने के बाद उसने बताया कि जातक पितृहंता होगा. एक दिन अपने ही जन्मदाता की मृत्यु का कारण बनेगा. घबराई रानी ने गर्भ को गिराने के कई उपाय किए. लेकिन सफलता नहीं मिली. इसी से उसका नामकरण हुआ, अजातशत्रु. अपने जन्मदाता का दुश्मन.

चाहे जितनी बुरी हो, पर मांस खाने की इच्छा मां के मन में कौंधी थी, फिर भी शिकार बना अबोध अजातशत्रु. हम उस व्यक्ति की मनस्थिति और यंत्रणा का अनुमान लगा पाने में असमर्थ हैं, जिसे जन्म के साथ ही कलंकित मान लिया गया हो. और जन्म के साथ ही जिसे मातापिता ने अपशकुनी मानकर कूड़े के ढेर पर फिंकवा दिया हो. मगध में सब कुछ चुपचाप हुआ था. किसी को खबर न होने दी थी. लेकिन अजातशत्रु की नियति तो मगधसम्राट बनना था. शिशु अजातशत्रु जब कूड़े में पड़ा था तो एक कौए ने उसकी कनिष्ठा अंगुली काट ली. पीड़ा से व्यथित शिशु जोरजोर से रोने लगा. पिता के कानों में आवाज पड़ी तो उसके हृदय में वात्सल्य उमड़ आया. राजा ने अबोध शिशु को गोदी में उठा लिया. घायल अंगुली से खून बहते देख सम्राट पिता ने उसे मुंह में डाल लिया और तब तक चूसता रहा, जब तक कि खून बहना बंद नहीं हो गया. उसके बाद अजातशत्रु का लालनपालन राजकुमार की तरह होने लगा. बड़ा होकर वह प्रतापी सम्राट बना. बहुत जल्दी उसने काशी, कोसल जैसे राज्यों को अपने राज्य में मिला लिया. उसकी नजर वज्जि गणतंत्रों पर थी. किंतु बुद्ध द्वारा मना किए जाने पर उसने तात्कालिक रूप से निर्णय टाल दिया. अजातशत्रु की मैत्री बुद्ध के फुफेरे भाई देवदत्त से थी. निहित स्वार्थ के लिए देवदत्त अजातशत्रु को सम्राट बनते देखना चाहता था. उसने अजातशत्रु को भड़काना आरंभ कर दिया. एक दिन देवदत्त की बातों में आकर उसने अपने पिता को कैद कर लिया और स्वयं मगधसम्राट बन बैठा. कुछ दिनों बाद बिंबसार की कारावास में ही मृत्यु हो गई.

एक महत्त्वाकांक्षी सम्राट जिसके नाम कई राजनीतिक सफलताएं थीं, वह अपने ही अपराधबोध के बीच जीने लगा. ब्राह्मण धर्म कर्मभोग के सिद्धांत पर टिका था. मानता था कि जो किया है उसका फल भोगना ही पड़ेगा. मगर इस जन्म में नहीं, अगले जन्म में. उनके अनुसार स्वर्गभोग या नर्कवास मृत्युपश्चात ही संभव है. अंतरपीड़ा से आकुल अजातशत्रु को संगठित ब्राह्मण धर्म से कोई उम्मीद न थी. उसके पास सबकुछ था. राजशाही ठाठबाट, सेवक, दासदासियां, विलासिता की सामग्री, सुरक्षा के लिए बेहद शक्तिशाली सेना. भोग के लिए पांच सौ से अधिक रानियां. मगर मन की शांति गायब थी. ग्लानिभाव उसे खाए जाता था. नास्तिक विचारक कार्यकारण संबंध पर विश्वास नहीं करते थे. उनके लिए सबकुछ नियतिबद्ध था. वे सबकुछ भुलाकर प्रकृस्थ हो जाने का उपदेश देते थे. यह दर्शन जनसाधारण के लिए कारगर था. उसका जीवन ही प्रकृति से बंधा था. लेकिन चारों ओर सुरक्षा सैनिकों के बीच असुरक्षा के एहसास के शिकार सम्राट को शांति प्रदान करने में वह अधिक कारगर न था. कदाचित ऐसे ही संतापग्रस्त लोगों के लिए बुद्ध निर्वाण के नाम से अपने समय का सबसे बड़ा संभ्रम रच रहे थे. ब्राह्मण दर्शनों में मोक्ष केवल मृत्योपरांत संभव था, बुद्ध उसे इसी जन्म में संभव बताते थे. सो ऐसे लोगों के लिए जिन्हें विलासवैभव के बीच भी मन की शांति नसीब न होती हो, निर्वाण बड़ा आकर्षण था.

कदाचित अजातशत्रु भी समझता था कि ब्राह्मण पुरोहित मोक्ष के नाम पर जो मायाजाल रचते हैं, वह दिखावा है. फिर उसे महावत, घुड़सवार, नाई, धोबी, जैसे पेशेवरों का ध्यान आता है जो अपने श्रम के बल पर जीवित रहते हैं; तथा शांति, सम्मान एवं आत्मनिर्भरता का जीवन जीते हैं. आखिर क्यों? बुद्धकालीन भारत के सामाजिकसांस्कृतिक इतिहास में इस प्रश्न का उत्तर खोजना मुश्किल नहीं है. बुद्ध पूर्व भारत में यज्ञ के नाम पर सैंकड़ों पशु बलि चढ़ा दिए जाते थे. कैथरीन मेयो ने अपनी पुस्तक ‘मदर इंडिया’ में कोलकाता के एक ऐसे मंदिर का उल्लेख किया है जहां प्रतिदिन 150200 मासूम जानवरों की बलि चढ़ाई जाती थी. प्राचीनकाल में हालात और भी बुरे थे. तेजी से बढ़ती कृषिनिर्भरता को देखते हुए उपयोगी पशुधन का सुरक्षित रहना बहुत बड़ी उपलब्धि थी. जैन और बौद्ध दर्शन अहिंसा पर केंद्रित थे. उनके बढ़ते प्रभाव से यज्ञों में दी जाने वाली बलियों तथा उनपर होने वाले अकूत खर्च में कमी आई थी. खानपान संबंधी शुचिता में भी ढील पड़ी थी. ब्राह्मणकाल में खानपान संबंधी नियम सख्त थे. उच्च जाति का व्यक्ति निचले वर्गों के व्यक्ति के साथ भोजन नहीं कर सकता था. इससे उनके धर्मखंडित होने का डर था. इससे बाहरी लोगों से उनका संपर्क कम ही हो पाता था. परिणामतः दूरदराज की संस्कृतियों के साथ व्यापार असंभव था. बुद्ध के आगमन के बाद जाति और खानपान भेद में भी कमी आई थी. इसका अनुकूल प्रभाव व्यापार पर पड़ा. लोग मिलजुलकर दूरदराज की संस्कृतियों के साथ व्यापार करने लगे. फलस्वरूप व्यापार में तेजी आई.

उन दिनों किसानों, व्यापारियों, शिल्पकारों जैसे बुनकर, रंगरेज, ब्याज पर उधार देने वालों, तेली, नाविक, किसान, सुनार, बढ़ई, कसाई यहां तक कि ठगों के भी अपने सहकारी संगठन थे. रमेश मजूमदार ने अपनी पुस्तक ‘कोआॅपरेटिव्स इन एन्शिएंट इंडिया’ में विभिन्न जातक कथाओं, उपनिषदों आदि के हवाले से 18 प्रकार के सहयोगी संगठनों का उल्लेख किया है और माना है कि यह संख्या अधिक भी हो सकती है. वे इतने मजबूत थे कि सम्राट भी आवश्यक मामलों में उनसे सलाह लिया करते थे. आवश्यकता पड़ने पर वे राजाओं को भी उधार दिया करते थे. आजीवक और चार्वाक मतावलंबियों द्वारा भौतिक सुखों को महत्ता देना, जहां उनके व्यापारिक हितों के अनुरूप था. जबकि जैन एवं बौद्ध दर्शन का अहिंसा का विचार उनके आर्थिकसामाजिक हितों की रक्षा करता था. इसलिए वे इन धर्मों की ओर तेजी से आकर्षित हुए थे. उसके फलस्वरूप 2500 वर्ष पहले तक देश में श्रमकौशल, शिल्प और संगठन के आधार जीविका कमाने वाले लोगों का एक खुशहाल वर्ग पनप चुका था. इसलिए यह हैरानी की बात नहीं कि अपनी ही आत्मग्लानि में डूबा, असुरक्षा के एहसास का मारा हुआ अजातशत्रु बुद्ध की सभा में पहुंचकर उनके जैसी शांति की कामना बुद्ध के आगे करता है. अंत तक वह न तो पूरी तरह बौद्ध बन पाता है, न ही जैन. हालांकि दोनों धर्मावलंबी अजातशत्रु के अपना समर्थक होने का दावा करते हैं. दोनों के धर्मग्रंथों में उसकी दानशीलता का बखान किया गया है.

भारत में भौतिकवादी दर्शन की परंपरा बहुत पुरानी है. वह अध्यात्मवादी दर्शनों से भी पहले से चली आ रही है. ‘चार्वाक’, ‘लोकायत’ और ‘आजीवक’ इसी परंपरा के दर्शन हैं. इनमें लोकायत दर्शन को आचार्य बृहश्पति से जोड़ा जाता है. उन्हें ‘बृहश्पति सूत्र’ का रचियता भी माना जाता है. मूल ‘बृहश्पति सूत्र’ आज अनुपलब्ध है. उसके नाम से जिस कृति के फुटकर अंश हमें प्राप्त हैं, विद्वानों के अनुसार वह छठी शताब्दी की रचना है. ‘बृहश्पति सूत्र’ में लोकायत दर्शन की प्राचीनता का समर्थन करते हुए लिखा गया हैᅳ‘आरंभ में जब मनुष्य ने अन्न जुटाना आरंभ ही किया था, तब यह संपूर्ण ब्रह्मांड लोकायती था.’(सर्वथा लौकायतिकमेव शास्त्रमर्थसाधनकाले, बृहश्पति सूत्र 2/5). भारत में कृषिकला का विस्तार लगभग 8000-10000 वर्ष पहले ही हो चुका था. इससे देश में भौतिकवादी विचारधारा को कम से कम 8000 वर्ष पुराना कहा जा सकता है. मक्खलि गोसाल ने भी इसका समर्थन किया है. उसने स्वयं को आजीवक परंपरा का 24वां तीर्थंकर माना है. देवताओं में सोमरस को ऊर्जा और स्फूत्र्ति दायक कहा गया है. वह नशीला मगर बहुप्रचलित पेय था. ‘बृहश्पति सूत्र’ उसे ‘सुरा’ कहा गया है. चूंकि विष्णु आदि देवता सोमरस का सेवन करते हैं, इसलिए आचार्य बृहश्पति ने मद्यपान के कारण उन्हें भी ‘लोकायती’ माना है. (विष्णवादायः सुरापानिन इति कापालिकाः। बृहश्पति सूत्र 2/21). सोमदेव सूरि तथा उसके टीकाकार श्रुतसागर सूरि ने बृहश्पति को चार्वाक संप्रदाय का आदि प्रवत्र्तक बताया है. बृहश्पति को अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र और लोकव्यवहार का ज्ञाता तथा लोकायत परपंरा का विद्वान भी बताया गया है. यहां ध्यान रखना चाहिए कि ‘बार्हस्पत्य सूत्र’ में जो सूत्र प्राप्त होते हैं, वे अलगअलग समय की रचनाएं हैं.

बृहश्पति को देवताओं का गुरु भी बताया गया है. देवगुरु के पद पर रहते हुए लोकायत परंपरा का लेखन संभव नहीं है. देवराज इंद्र के दरबार में निरंतर नृत्य, संगीत, सुरापान, अप्सराओं के नृत्य आदि के किस्से चलते हैं. हो सकता है है उसी से प्रेरित होकर बाद में किसी लेखक ने ‘बृहश्पति सूत्र’ लिखकर लेखक के रूप में कथित देवगुरु का नाम दे दिया हो. वैसे भी ब्राह्मण लेखकों के यहां लेखक न होकर लेखकीय परंपरा होती है, जिसमें बिना नामोल्लेख किए अपनी ओर से कुछ जोड़ दिया जाता है. व्यास, वाल्मीकि, वशिष्ट, भरद्वाज, शुक्राचार्य, आचार्य बृहश्पति आदि इसी लेखकीय परंपरा के नाम हैं.

भारतीय वाङ्मय में नास्तिक दार्शनिकों की मौजूदगी को लेकर तो इतने प्रमाण मौजूद हैं, कि उनके अस्तित्व और वैचारिकता के इतिहास में उनकी उपस्थिति को लेकरसंदेह नहीं किया जा सकता. वे थे और समाज में भरपूर मानसम्मान, अपनी खूबियों, कमजोरियों के साथ थे. यह भी कि उनका ज्ञान, संप्रेषण का माध्यम उस युग की रवायत से कुछ ज्यादा ही श्रुतिआधारित रहा होगा. उनमें से अधिकांश समाज के उन वर्गों से थे जिनके जीवन की सिद्धि सेवाकर्म में मानी जाती थी. जिनका कर्तव्य उपदेश सुनना और उनका पालन करना था, उपदेश देना नहीं. जिनका पेशा जन्म लेने से पहले ही निर्धारित कर दिया जाता था. जिनके लिए पढ़नालिखना आवश्यक नहीं था. या उतना जरूरी माना जाता था, जिससे वे उच्चस्थ जातियों का सेवाकर्म बिना किसी शिकायत का अवसर दिए पूरा कर सकें. इस कारण उनका ज्ञान शास्त्रसम्मत होने के बजाय अनुभवसिद्ध अधिक होता था. लेकिन अपने स्वार्थ के लिए समाज चाहे जैसी व्यवस्थाएं चुन ले. मनुष्य की जन्मजात प्रतिभा और सपनों पर अंकुश लगा पाना उसके बस में नहीं होता. मौलिकता दिमाग की उर्वरा शक्ति को पहचानती है, उसकी जात नहीं देखती. नास्तिक विचारधारा के प्रवत्र्तक दार्शनिक उन वर्गों से थे, जिनके बारे में माना जाता है कि सोचनेसमझने से उनका कोई संबंध नहीं होता. पांच नास्तिक विचारकों में से संजय वेलट्ठपुत्त और पुकुद कात्यायन के जीवन के बारे में ठोस जानकारी अनुपलब्ध है. बाकी तीन यानी पूर्ण कस्सप, मक्खलि गोसाल और अजित केशकंबलि के बारे में उपलब्ध विवरण के आधार पर पता चलता है कि उनका संबंध समाज के निचले वर्गों से था. पेट खाली हो तो दिमाग परमात्मा के नहीं, रोटी के बारे में सोचता है. उसे अर्जित कैसे किया जाए, इस बारे में सोचता है. इन परिस्थितियों में जनसाधारण केवल अपनी भूख के बारे में सोचते हैं. लेकिन जो अपने पूरे समाज के भूख और संघर्ष को अनुभव करते हैं वे पूरे समाज यहां तक कि आने वाली पीढि़यों के दुख से निजात के बारे में सोचते हैं. इसलिए भौतिकवादी दर्शन रूमानियत के चक्कर नहीं काटता. बल्कि जीवन की ठोस सच्चाइयों के आधार पर खड़ा होता है.

क्रमशः

© ओमप्रकाश कश्यप

धर्मसत्ता और राजनीतिक अभिजन

सामान्य

धर्म एवं अभिजन संस्कृति5

मनुष्य धार्मिक पशु है. वह एकमात्र धार्मिक पशु है. वह एकमात्र पशु है जिसके पास, उन सबका एक सच्चा धर्म है….वह एकमात्र ऐसा पशु है जो अपने पड़ोसी से उतना ही प्यार करता है, जितना खुद से; और यदि उसकी धार्मिक आस्था उससे मेल नहीं खाती तो उसका गला भी काट देता है.मार्क ट्वेन.1

महाभारत के शांतिपर्व में भीष्म युधिष्ठिर को समझाते हैं‘नैव राज्यं न राजाऽऽसीन्न च दण्डो न दाण्डिकः। धर्मेणैव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम्।। (12-58-14).—पहले न तो राज्य था, न ही राजा. न दंड था, न ही दंडाधिकारी. लोग एकजुट होकर रहते; तथा मिलजुलकर अपनी रक्षा करते थे. इसमें न तो कविमन की उड़ान है, न अतिश्योक्ति—बल्कि अक्षरशः सत्य है. प्रश्न उठता है कि जब न राजा था, न राज्य. न दंड था, न दंडाधिकारी, तो अचानक ये सब कैसे आ गए? जो लोग अपनी रक्षा स्वयं करने में समर्थ थे. इतने आत्मनिर्भर थे कि अपने जीवन को लेकर स्वयं निर्णय ले सकें, उन्होंने खुद को राज्य द्वारा शासित होने के लिए समर्पण क्यों कर दिया? राज्य में कौनसी खूबी थी कि अपनी आजादी खोकर भी लोगों ने, उसके अधीन रहना पसंद किया? इसपर चर्चा करने से पहले यह जान लेना आवश्यक होगा कि अन्य प्राणियों की भांति मनुष्य भी प्रकृति से स्वच्छंद होता है. उसने समाज का हिस्सा इसलिए बनना स्वीकार किया था ताकि वह अपने सुख में स्थायित्व ला सके. उसे बढ़ा सके और वह अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित भी महसूस करे. दूसरे प्राणियों से इतर मनुष्य के पास सपना था. भविष्य को खूबसूरत बनाने का सपना. मनुष्येत्तर प्राणी पेट भरने पर बचा हुआ भोजन को छोड़ आगे बढ़ जाते हैं. मनुष्य ऐसा नहीं था. वह विवेकवान था. उसके पास भविष्य को लेकर एक दृष्टि थी. दूसरे प्राणियों की भांति उसने स्वयं को भोजन जुटाने तक सीमित नहीं रखा. वह अतिरिक्त भोजन को संग्रहीत करने लगा. न केवल अपने लिए, बल्कि समूह के बाकी सदस्यों के लिए भी. इसलिए कि वह जानता था कि अकेले व्यक्ति की उपलब्धियों का कोई मूल्य नहीं है. उसकी प्रतिष्ठा दूसरों के साथ जुड़े रहने में है. इसलिए वह समाज रचने, उसे बनाए रहने को उत्सुक हुआ. दूसरे शब्दों में मनुष्य समाज का वरण नहीं था, बल्कि समाज मनुष्य का चयन था, जिसे व्यक्ति ने अपनी सुखशांति के लिए चुना था और समूह ने व्यक्ति और समूह के हितों के लिए जरूरी माना था. यह बात अलग है कि कालांतर में समाज उत्तरोत्तर जटिल और शक्तिशाली होता गया. इसलिए कि मनुष्यों के ही एक समूह ने पक्षपातपूर्ण विधान रचकर समाज की निर्णय प्रक्रिया को हथिया लिया था. परिणामस्वरूप समाज में बहुसंख्यक वर्ग के लिए सार्थक हस्तक्षेप करना निरंतर मुश्किल होता गया. इसे गहराई से समझने के लिए उचित होगा कि थोड़ी तांकझांक सभ्यता के इतिहास में भी कर ली जाए.

मानव सभ्यता की नींव लगभग 12000 वर्ष रखी गई. वह लंबे हिम युग से बाहर आने की घड़ी थी. कृषि का विकास अभी दूर था. मनुष्य शिकार के भरोसे जीवनयापन करता था. धीरेधीरे उसका प्रकृति से रिश्ता बढ़ा. भोजन के लिए वह शिकार के अलावा खेती को अपनाने लगा. फिर भी आदिम अहेरी अवस्था से पशुपालन और तदनंतर कृषिकर्म का विकास होने में चार हजार वर्ष लग गए. आठ हजार वर्ष पहले तक मनुष्य कृषि में दक्षता प्राप्त कर चुका था. उससे अतिरिक्त भोजन का उत्पादन संभव हुआ. कृषि उत्पादों को अपेक्षाकृत लंबे समय तक संरक्षित रखा जा सकता था. भोजन की चिंता घटी तो मनुष्य ने दूसरे क्षेत्रों के बारे में सोचना आरंभ किया. फलस्वरूप विकास के नए पथ प्रशस्त हुए. भौगोलिक परिस्थितियों तथा उनके आधार पर छोटेमोटे अंतर को छोड़ दिया जाए तो चार हजार वर्ष पहले तक दुनिया के सभी समाजों में कमोबेश यही स्थिति थी. हालांकि थोड़ाबहुत स्तरीकरण तो तब भी रहा होगा. कुशल प्रबंधन के लिए कुछ लोगों को विशेषाधिकार उन दिनों भी दिए जाते होंगे. यह स्वाभाविक था, किंतु आरंभिक दायित्वविभाजन प्राकृतिक था. उसे समूह अथवा परिवार के मुखिया के स्तर पर निपटा लिया जाता था. पुरावशेषों से यह भी पता चलता है कि सिंधु सभ्यता यानी ईसा से 3000—4000 वर्ष पहले तक राज्य के विधिवत गठन की शुरुआत हो चुकी थी. आरंभिक राज्य छोटे और प्रायः नगरविशेष तक सीमित होते थे. उनकी देखरेख एवं संचालन का दायित्व जो व्यक्ति संभालता, सामान्यतः वही धार्मिक मामलों का मुखिया होता था. सुमेरियन और सिंधु सभ्यता दोनों से जो प्रमाण मिले हैं, उनसे साफ हो जाता है कि उस समय तक राजनीति धर्म का हिस्सा थी और धर्म राजनीति का प्रमुख निदेशक तत्व. नगरराज्य का प्रबंधन उसकी विशिष्ट संस्कृति, रीतिरिवाज एवं परंपराओं के आधार पर किया जाता था.

धर्म के राजनीति का निदेशक तत्व बनने के पर्याप्त कारण थे. वह प्रकृति की विराटता, अनिश्चितता तथा उसके संपर्क के फलस्वरूप जन्मी आध्यात्मिक प्रेरणाओं की देन था. संस्कृति के मुख्य उपादान कारण के रूप में वह जीवन को नियंत्रित एवं मर्यादित करता था. वह मानवीय बोध के विकास के साथ उसके आरंभिक क्षण से ही जुड़ चुका था. आदिमानव प्रकृति के अंचल में रहता था. बाढ़, तूफान, वर्षा, गर्मी, शीत आदि को झेलता, तथापि प्रकृति की विराटता के समक्ष उसे अपनी सीमाएं साफ नजर आती थीं. इसलिए उसके प्रति श्रद्धाभाव और डर स्वाभाविक थे. तेजी से होते प्राकृतिक बदलाव भी इसका कारण रहे होंगे. हिम युग के ढलते ही धरती के आंचल का वनवनस्पतियों से महमहा उठना दैवी अनुकंपा की प्रतीति कराता था. प्राकृतिक विचित्रताओं एवं जीवनसत्य को समझने की ललक ने मानवमन में अध्यात्मचेतना को जन्म दिया. सुखी, सुरक्षित एवं वैभवशाली जीवन के लिए वह दैवी शक्तियों को मनाने, उनकी कृपा प्राप्त करने का अनुग्रह रचने लगा. तुर्की के दक्षिणपूर्वी इलाके में ऐतिहासिक नगर ‘उरफ’ के पास गोबेली टेप (Gobekli Tepe) नामक पठारी क्षेत्र है. स्थानीय लोग उसे ‘बेली हिल’ कहते हैं. उसके उत्खनन से विशाल संरचनाएं मिली हैं. उनके विश्लेषण के आधार पर पुरावेत्ताओं ने गोबेली टेप को अब तक प्राप्त विश्व का प्राचीनतम पूजास्थल स्वीकार किया है. वहां मिलीं बीस गोलाकार संरचनाओं में से चार को छोड़ बाकी खंडहर में तब्दील हो चुकी हैं. वहां अंग्रेजी के अक्षर ‘टी’ के आकार के स्तंभ प्राप्त हुए हैं, जिनपर खरगोश, छिपकली, सांप, शेर, गधा, लोमड़ी, सांड आदि जीवजंतुओं की आकृतियां उकेरी गई हैं. कार्बन रेटिंग के आधार पर गोबेली टेप से प्राप्त संचरनाओं की आयु ग्यारह हजार वर्ष आंकी गई है. बाइस एकड़ में फैले उस स्थल पर अभी मात्र एक एकड़ की खुदाई हो पाई है. उत्खनन के दौरान नग्न स्त्री और कामोदीप्त पुरुष की मूर्तियां भी मिली हैं. उल्लेखनीय है कि मोनजोदारो और सुमेरियन सभ्यताओं के अन्वेषण से भी नग्न स्त्री की मूर्तियां प्राप्त हुई हैं, जिनसे तत्कालीन समाज के मातृसत्तात्मक होने का संकेत मिलता है, लेकिन यही बात गोबेली टेप को रचने वाली सभ्यता के बारे में कह पाना कठिन है. उल्लेखनीय है कि गोबेली टेप की सभ्यता की अपेक्षा सिंधु एवं सुमेरियन सभ्यताएं लगभग छह हजार वर्ष बाद की हैं. इसके बावजूद दोनों सभ्यताओं के मूर्तिशिल्पों के बीच सुस्पष्ट भावसाम्य है. ये प्रतीक आरंभिक जीवन में विकास की अत्यंत धीमी गति की ओर संकेत करते हैं. साथ में यह भी दर्शाते हैं कि जीवनोत्पत्ति को समझने की लोकजिज्ञासा, मानवीय बोध के एकदम आरंभिक बिंदू से जुड़ी है. वही आगे चलकर विभिन्न दार्शनिक सिद्धांतों और सांस्कृतिक विकास का कारण बनी. गोबेली टेप से प्राप्त अवशेषों ने स्थापित पुरातात्विक धारणाओं का भी खंडन किया है. यह मान्यता कि स्थापत्य कला का आविष्कार कृषि के विकास के बाद संभव हो पाया था, नवीनतम अनुसंधान के बाद गलत सिद्ध हुई है. नई खोजों से साफ हुआ है कि कृषि के विकास से बहुत पहले मनुष्य अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूजास्थलों का निर्माण करने लगा था. उसे वह जीवन और प्रकृति की एकात्मकता के लिए जरूरी मानता था.

तुर्की की इस प्राचीन सभ्यता के बारे में पर्याप्त जानकारी न मिलने के कारण तत्कालीन समाज में अभिजनवर्ग की उपस्थिति पर ठीकठीक कुछ कह पाना असंभवसा है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि सुमेर, सिंधु, चीन, भारत आदि क्षेत्रों में कालांतर में जो सभ्यताएं विकसित हुई, तब तक समाज के एक वर्ग में दूसरों से श्रेष्ठ दिखने की प्रवृत्ति जन्म ले चुकी थी. प्राचीन यूनान में यह विभाजन भूमिपति एवं दास के रूप में देखने को मिलता है, जबकि ऋग्वैदिक समाज आर्य एवं आर्येत्तर लोगों में बंटा था. जो आर्य है, वह श्रेष्ठ हैं, शासन के अधिकारी हैं. जो अनार्य हैं, वे दास हैं. अनार्यों के शासक आर्यों के शत्रु हैं, ऋग्वैदिक समाज मोटे तौर पर इसी तरह विभाजित है. विभिन्न वर्गों के बीच ऊंचनीच की भावना भी पनपने लगी थी. डा॓. रामविलास शर्मा इसे और भी स्पष्ट कर देते हैं—‘ऋग्वेद से इस विषय में संदेह नहीं रह जाता कि राजा केवल आदिम कबीलों का नेता नहीं है, वरन उसका स्थान ऊंचा है और जानबूझकर इस तरह से शेष जनता से उसकी विभिन्नता दिखाई गई है.’2यह विभिन्नता आर्यों के बीच एक सीढ़ी ऊपर थी. ब्राह्मण और राजन्य खुद को दूसरों से न केवल ऊपर मानते थे, बल्कि अनार्यों को दास बनाकर उनके श्रम से लाभ भी उठाने लगे थे. व्यक्तिगत संपत्ति में पशुओं, आभूषणों एवं कृष्ठ भूमि के अलावा दास भी गिने जाते थे. तत्कालीन समाज में वर्गभेद को जमीन देता हुआ ऋग्वेद में एक और शब्द आता है—उपास्ति. जिसकी तुलना प्राचीन यूनान के ‘हैलोत’ से की जा सकती है. उपास्ति सेवक अथवा आश्रित व्यक्ति का द्योतक था—‘उपास्ति वे लोग थे जो शेष प्रजा से भिन्न थे और राजा के विशेषरूप से आश्रित थे.’3राजा चाहे तो उन्हें किसी को भेंट कर सकता था. आगे चलकर उपास्ति का अर्थ देवोपासक तक सीमित कर दिया गया. ईसा से छह सौ वर्ष पहले स्पार्टा और एथेंस में हैलोत लोगों की संख्या वहां की कुल जनसंख्या की एक तिहाई थी. ‘उपास्ति’ की भांति ‘हैलोत’ की सामाजिक स्थिति भी ‘दास’ और ‘शीर्षजन’ के बीच की थी. अंतर बस इतना था कि उपास्ति जहां विशेषरूप से राजा पर आश्रित थे, वहीं हैलोत खेती करते थे और बदले में लगान अपने स्वामी को देते थे. कुछ हैलोत खेती से जुड़े उद्यम चलाते थे और अपनी सेवा या कराधान द्वारा स्वामी को प्रसन्न रखते थे. इन कृषिदासों जमीन से अलग करके खरीदनाबेचना संभव न था. दासों की स्थिति उनसे निम्नतर थी. ऋग्वेद(8, 56, 3) में दान की अन्य वस्तुओं के साथ दासों का भी उल्लेख हुआ है. ऐतरेय ब्राह्मण(39, 8) में सम्राट अपने चहेते पुरोहित को दस हजार दासियां दानस्वरूप प्रदान करता है.

वेदोत्तर साहित्य और वेदों में एक अंतर अवश्य है. वैदिक देवता प्राकृतिक शक्तियों के अधिष्ठाता हैं. अग्नि, वायु, वरुण, इंद्रादि देवतागण जीवनदाता शक्तियों के स्वामी हैं. लेकिन उनमें कहीं न कहीं मनुष्यत्व है. वे मनुष्य जैसे, उसके आसपास की दिखते हैं. युद्ध करने के लिए देवताओं को खुद चलकर आना पड़ता है. आगे चलकर जब राजा का स्तर ईश्वर के तुल्य मान लिया गया तो उनका वैभव जताने के लिए चारण आश्रयदाता सम्राट को देवताओं के मददगार के रूप में स्वर्ग में भेजना आरंभ कर दिया. के युद्ध में उन्हें युद्ध में उन्हें आगे चलकर राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाने लगा. ऋग्वेद में इसकी शुरुआत तो नहीं हुई, मगर नींव जरूर रखी जा चुकी थी. देवता ऋग्वेदकालीन अभिजन हैं. वेदादि ग्रंथ उनकी महिमा के बखान से भरे पड़े हैं—‘हे इंद्र और वायु, दोनों अन्न लेकर आओ, सोमरस तैयार है, यह तुम दोनों की अभिलाषा करता है.’(1/1/2/5)—जैसी स्तुतियां तत्कालीन अभिजनसमाज की उच्च समाजार्थिक हैसियत एवं विशिष्ट अभिरुचियों का प्रदर्शन करती हैं. ऋग्वेद में इंद्रादि देवताओं का चित्रण राजनीतिकधार्मिक शक्तियों के रूप में हुआ है. हालांकि जिस तरह उन्हें अनार्यों पर प्रहार करते, उनके दुर्गों का ध्वंस करते तथा उनके संसाधनों को बलात् हस्तगत करते उल्लिखित किया गया है, उससे एकाएक यह निर्णय कर पाना कठिन है कि वे पहले राजसत्ता के प्रतीक हैं अथवा धर्मसत्ता के. यह काम इसलिए भी कठिन है क्योंकि तत्कालीन समाज में धार्मिकराजनीतिक अभिजन के बीच बहुत अंतर न था. ऋग्वैदिक समाज में पुरोहित, राजनीतिज्ञ के अलावा व्यापारी वर्ग के पनपने के स्पष्ट संकेत हैं. धर्मसत्ता, राजसत्ता और अर्थसत्ता के प्रतीक ये तीनों वर्ग राज्य की शक्ति एवं संसाधनों का अपनीअपनी तरह से भोग करते थे. मगर जैसा कि ऊपर कहा गया है, उनमें धर्म की भूमिका सर्वोपरि थी.

सभ्यता के इतिहास में मानवी मेधा का विस्फोट लगभग तीन हजार वर्ष पहले की घटना है. ईसा से लगभग एक हजार वर्ष पहले तक यूनान, मिस्र, भारत, चीन आदि में विकसित सभ्यता आकार ले चुकी थी. सिंधु सभ्यता के पराभव के उपरांत भारत में नई सभ्यता गंगायमुना के मैदानी इलाकों में विकसित हुई. आसपास की उपजाऊ भूमि के संपर्क में आने के बाद वह कुछ ही शताब्दियों में अतिसमृद्ध होकर सामने आई. रामायण और महाभारत इसी सभ्यता की देन हैं. इन महाकाव्यों की लोकप्रसिद्धि के आधार पर अधिकांश विद्वान इस कालखंड, 800 ईस्वी पूर्व से 1500 ईस्वी पूर्व, को ‘महाकाव्यों का युग’ भी कहते हैं. इनके प्रणयन से तत्कालीन समाज के विकासक्रम को भी परखा जा सकता है. रामायण काल में धर्म अधिक रूढ़ और शक्तिशाली हो चला था. किसी सम्राट में इतना साहस न था कि वह किसी तापस या ऋषि के आग्रह की अवहेलना कर सके. विश्वामित्र जब राम और लक्ष्मण को लेने जाते हैं तो वृद्ध दशरथ उन्हें मना नहीं कर पाते. छांदोग्योपनिषद में रैक्व को मनाने के लिए राजा जानश्रुति सबसे प्रिय वस्तु के रूप में अपनी पुत्री उन्हें दान कर देते हैं. इसके अलावा भी ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं, जो राजसत्ता पर धर्मसत्ता की श्रेष्ठता को दर्शाते हैं.

महाभारत काल तक आतेआते धर्म का वैभव क्षीण पड़ने लगा था. सम्राटों में राजनीतिक स्वार्थ के अनुसार निर्णय लेने की प्रवृत्ति बढ़ रही थी. महाभारत का युद्ध धर्मसत्ता द्वारा राजसत्ता पर वर्चस्व वापस लौटाने की कशमकश को दिखाता है. कृष्ण आदि भले ही यह दावा करें कि धर्म पांडवों के पक्ष में है, महाभारत युद्ध में हिस्सा लेने के लिए जब सेनाओं का जमाबड़ा होता है तो अधिकांश सेनाध्यक्ष सत्तापक्ष यानी दुर्योधन के साथ खड़े नजर आते हैं. यह उनका अपने सामाजिकराजनीतिक हितों में ध्यान में रखकर लिया गया विशुद्ध राजनीतिक फैसला था. ‘धर्मो रक्षति रक्षतः का मुहावरा वहां काम नहीं आता. फलस्वरूप दुर्योधन के पक्ष में ग्यारह अक्षोहिणी सेना आती है और पांडवों के पक्ष में केवल सात, लेकिन महाभारत युद्ध में हुई भीषण जनहानि ने संभवतः तत्कालीन अभिजनों को भी हतोत्साहित कर दिया था. इसी ग्लानिभाव में वे युद्ध के बाद बिखरी शक्तियों को समेटने का कोई प्रयास नहीं करते. पांडव बंधु अभिशप्त मृत्यु का वरण करते हैं. स्वयं कृष्ण यादवकुल के अंतःकलह और उसमें उन्हें लड़तेमिटते देख मौन बने रहते हैं. उसे उनकी नियति मान लिया जाता है. इनमें कृष्ण जिन्हें ईश्वरत्व महाभारतकाल में प्रदान किया गया, सर्वाधिक द्विधाग्रस्त नजर आते हैं. एक युगदृष्टा नायक की भांति वे अपने समाज को आगे ले जाना चाहते हैं. लेकिन बाकी समाज, जिन लोगों को वे तथाकथित धर्म के रास्ते पर लाना चाहते हैं, अथवा वे आदर्श जिन्हें महाभारतकार अपने ग्रंथ के माध्यम से स्थापित करना चाहता है, कृष्ण के कर्मविचार से मेल नहीं खाते. देखा जाए तो यह कृष्ण की नीतियों की असफलता नहीं थी. बल्कि महाभारतकार द्वारा आर्य