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1857 के स्वाधीनता संग्राम का बहुजन पाठ

सामान्य

इतिहास की भूमिका किसी भी समाज के अतीत के दस्तावेजीकरण के लिए आवश्यक मानी गई है। परंतु उसमें दर्ज प्रत्येक शब्द सच नहीं होता। क्योंकि इतिहास लेखन प्रायः सत्ता की पसंद के अनुसार लिखा जाता है। उसमें सत्ता-केंद्र के करीबी लेखकों, बुद्धिजीवियों का योगदान अधिक होता है। इतिहास लेखक के निजी संस्कारों तथा बदलते राजनीतिक-सामाजिक परिवेश के अनुसार, ऐतिहासिक घटनाओं को देखने का नजरिया भी बदलता रहता है। इस तरह ऐतिहासिक प्रस्तुतियां वास्तविकता से भटकने लगती हैं। इतिहास की इस जालसाजी पर टिप्पणी करते हुए सुप्रसिद्ध तत्ववेत्ता और विकासवादी चिंतक हर्वर्ट स्पेंसर ने फ्रांस के बादशाह का हवाला दिया है। उसके अनुसार बादशाह का मन जब भी इतिहास की पुस्तक पढ़ने का होता, वह लायब्रेरियन को पुकारता थाᅳ‘जरा, मेरे झूठ बोलने वाले को ले आओ?’

अतिश्योक्तिपूर्ण लगने वाला यह किस्सा इतिहास पर सत्ता के दबदबे की ओर इषारा करता है। सत्ता द्वारा लाभान्वित वर्ग इतिहास का उपयोग खुद को उसका वास्तविक दावेदार सिद्ध करने तथा सत्ता-केंद्रों को कब्जाए रखने के लिए करते हैं। इससे जनसाधारण की इच्छा-आकांक्षाओं, संघर्षों और अधिकारों की उपेक्षा होने लगती है। इतिहास मुट्ठी-भर शासक वर्ग के हितों का संरक्षक बनकर रह जाता है। इतिहास की शीर्षोन्मुखी दृष्टि के कारण ही, अंत तक ‘अपनी’ झांसी को बचाने में जुटी रही लक्ष्मीबाई 1857 के स्वाधीनता संग्राम की प्रमुख नायिका मान ली जाती है। जबकि उसी स्वतंत्रता संग्राम की दूसरी नायिकाओं जैसे झलकारी बाई, काशी और मुंदरा जो रानी की सहेलियां भी थीं; तथा केवल और केवल रानी तथा झांसी की प्रतिष्ठा के लिए लड़ी थीं, जिनकी शौर्य-कथा रानी जितनी ही रोमांचक और प्रेरणास्पद हैᅳप्रतिष्ठा और मान-सम्मान के मामले में बहुत पीछे ढकेल दी जाती  हैं। अनेक इतिहास लेखक तो उनका नामोल्लेख भी नहीं करते।

1857 का ‘सैनिक विद्रोह’ एक तरह से जनविद्रोह था। उसमें समाज के लगभग सभी वर्गों की हिस्सेदारी थी। हिंदू-मुसलमान उसमें कंधे से कंधा मिलाकर लड़े थे। फिर भी जितने विवाद या मत-वैभिन्न्य उस घटना को लेकर हैं, उतने भारतीय इतिहास की किसी और घटना को लेकर नहीं हैं। सबसे पहला विवाद इसपर है कि उसे महज ‘सैनिक विद्रोह’ कहा जाए अथवा ‘भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम’? जान विलियम के, चार्ल्स बाल, कर्नल जी. बी. मेलीसन जैसे अधिकांश अंग्रेज इतिहासकार उसे ‘सैनिक विद्रोह’ से ज्यादा मानने को तैयार नहीं हैं। जबकि सुंदरलाल, विनायक दामोदर सावरकर आदि भारतीय इतिहासकारों की नजर में वह ‘भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम’ था। इस तरह भारतीय और पाश्चात्य इतिहासकारों में से कोई भी उस घटना को लेकर पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं है। फिर भी कुछ बातों को लेकर सामान्य सहमति है। पहला यह कि जहां-जहां वह युद्ध चला, उसमें भारत के कमोबेश सभी वर्गों की हिस्सेदारी थी। दूसरे युद्ध की असफलता का मूल कारण विपल्वियों के बीच तालमेल की कमी थी।     

भारतीय इतिहास का वह पहला युद्ध था, जिसमें अभूतपूर्व हिंदू-मुस्लिम एकता के दर्शन हुए थे। थॉमस लॉ के अनुसार 1857 में ‘शिशु-हत्या करने वाले राजपूत, धर्मांध ब्राह्मण….कट्टर, उन्मादी मुसलमान, तुंदियल, विलासी और महत्त्वाकांक्षी मराठाᅳउस लड़ाई में सब एक थे। गाय की पूजा करने वाले, गौ-मांस का भोजन करने वाले….सुअर को देखकर मुंह फेर लेने वाले, उसे खाने वाले….अल्लाह एक है, मुहम्मद उसके पैगंबर हैं….कहने वाले और ब्रह्म-नाम का रहस्यमय मंत्रोच्चारण करने वालेᅳउस विपल्व में सब साथ-साथ आ जुटे थे।’1 युद्ध के प्रमुख कारणों में अंग्रेजों की लगान नीति, राजे-रजबाड़ों पर गिद्ध-दृष्टि तथा मशीनीकरण के कारण भारतीय कामगारों की तबाही को माना जाता है। अंग्रेजों ने भू-प्रबंधन में भारी फेरबदल द्वारा, किसानों से जमीन का मालिकाना हक छीनकर कंपनी को उसका मालिक मान लिया था। उन्हें खेती के बदले मोटा लगान सरकार को देना पड़ता था। लगान-वसूली के नाम पर जमींदार और नबाव किसानों के साथ मनमाना दुर्व्यवहार करते थे। शिल्पकर्मियों और कामगारों ही हालत और भी बुरी थी। सतरहवीं शताब्दी के आरंभ तक निर्यात केंद्रित रही भारतीय अर्थव्यवस्था आयात प्रधान हो चुकी थी। ब्रिटेन में भारत से आयात होने वाले सामान पर तरह-तरह के कर थोपे जा रहे थे। चीन, भारत, पर्शिया में बुने गए रेशमी वस्त्रों पर प्रतिबंध लगाया जा चुका था। उनका इस्तेमाल करने पर 200 पाउंड तक का जुर्माना किया जा सकता था।2 ढाका जो महीन मलमल के लिए दुनिया भर में ख्यात था, 1827 से 1837 के भीतर उसके निर्यात में लगभग आठ गुना की गिरावट आई थी। कच्ची धातु के लिए जंगल कब्जाए जा रहे थे। इससे आदिवासियों में आक्रोश भरा था। प्रथम स्वाधीनता संग्राम से दो वर्ष पहले 1855 में आधुनिक झारखंड के संथाली विद्रोह का विद्रोह का बिगुल बजा चुके थे। उनके लक्ष्य कहीं व्यापक थे। 1857 के विद्रोह का घोषित लक्ष्य अंग्रेजों को इस देश से बाहर खदेड़ना था। उनके देख-निकाले के बाद सत्ता का स्वरूप कैसा होगा? अर्थव्यवस्था कैसी होगी? इस बारे में किसी की कोई योजना न थी। संथाल विद्रोह में राजनीतिक और आर्थिक स्वाधीनता दोनों अंतर्निहित थीं। 60000 संथाल आदिवासी अंग्रेजों और जमींदारों से एक साथ लड़े थे। परंपरागत हथियारों से जूझते हुए लगभग 15000 संथालों ने कुर्बानी दी थी। उस समय ‘कंपनी-बहादुर’ की ओर से लड़ने वाले अधिकांश सैनिक भारतीय ही थे। विपल्व के कारणों तथा उसकी व्याप्ति पर देशी-विदेशी इतिहासकारों ने खूब लिखा है।

विपल्व का प्रमुख कारण यह बताया जाता है कि 1857 से पहले अंग्रेजों ने चारों ओर लूट मचा रखी थी। समाज का कोई वर्ग ऐसा न था, जो उनके छल-प्रपंच का शिकार न हो। इस कारण नीचे से ऊपर तक सभी वर्गों में आक्रोश था, फिर भी एक सवाल अनुत्तरित रह जाता है। आखिर क्या कारण है कि 1757 में, प्रथम स्वाधीनता संग्राम से ठीक एक शताब्दी पहले प्लासी की लड़ाई में नबाव सिराजुद्दोला की पराजय का जश्न मनाने हिंदू, मुस्लिमों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई लड़ने को मजबूर हुए थे? यदि मामला सांप्रदायिक एकता का था तो उन्होंने सिखों को अपनी ओर मिलाने की कोशिश क्यों नहीं की थी? हमें ध्यान रखना होगा कि स्वतंत्रता समर के दौरान हिंदू-मुस्लिम एकता केवल राजनीतिक स्तर पर थी। धार्मिक और सामाजिक भेद-भाव में कोई बदलाव नहीं आया था। मार्च 1930 में हिंदुवादी संगठन ‘धर्म सभा’ के मुखपत्र ‘समाचार चंद्रिका’ ने एक विद्यार्थी पर द्वेषपूर्ण ढंग से हमला किया था। उसका दोष बस इतना था कि उसने एक मुस्लिम बेकरी वाले की दुकान से बिस्कुट खरीदकर खाने का दुस्साहस किया था। अखबार ने आरोप लगाया था कि वह युवक राजा राममोहन राय के प्रगतिशील खेमे का है। इसका उत्तर देते हुए राजा राममोहन राय समर्थक अखबार ‘संवाद कौमुदी’ ने लिखा था कि युवक का ‘ब्रह्मसमाज’ से कोई रिश्ता नहीं है। ‘संवाद कौमुदी’ के अनुसार युवक ने कुछ भी गलत नहीं किया था। अखबार ने ‘समाचार चंद्रिका’ पर आरोप लगाया था कि उसका कट्टरपंथी हिंदू संगठन से संबंध है। दूसरों पर आरोप लगाने से पहले उसे अपने गरेबां में झांककर देखना चाहिए।3 

1857 के कारणों की पड़ताल करते समय हिंदू समाज की आंतरिक बेचैनी की उपेक्षा कर दी जाती है। अंग्रेजों के प्रति समाज के प्रभुवर्गों का आक्रोश केवल इसलिए नहीं था कि उन्होंने इस देश में संसाधनों की लूट मचा रखी थी। अपितु राजनीतिक स्तर पर वे सुधार भी थे, जिन्होंने सवर्ण जातियों के शताब्दियों से चले आ रहे एकाधिकार को चुनौती दी थी। मुस्लिम इस देश में आक्रामक बनकर आए थे। उसके बाद शताब्दियों तक वे इस देश के शासक बने रहे। शूद्र और अतिशूद्र इसी देश के निवासी थे। मगर उनकी दासता हजारों वर्ष पुरानी थी। एक तरह से वे आजादी का सपना ही भूल चुके थे। उनीसवीं शताब्दी उनके लिए अवसर लेकर आई थी। बदलाव की पहली प्रेरणा अठारवीं शताब्दी की अमेरिकी क्रांति(1775-1778) से मिली थी। उन्हीं दिनों थॉमस जेफरसन के साथ अमेरिकी संविधान लिखने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले थॉमस पेन की पुस्तक ‘मनुष्य के अधिकार’ प्रकाशित हुई। उसने राज्य और उसके नागरिक को समान धरातल पर लाकर खड़ा कर दिया था। पेन का मानना था कि मनुष्य समाज की इकाई मात्र न होकर स्वतंत्र व्यक्तित्व का स्वामी होता है। यदि मनुष्य का कर्तव्य है कि समाज द्वारा निर्धारित नियमों और मर्यादाओं का पालन करे, तो समाज का भी कर्तव्य है कि वह मनुष्य के सुख, शांति और स्वतंत्रता में व्यवधान न आने दे। उससे पहले भारतीय राजनीति धर्म केंद्रित थी, जिसमें समाज के आगे इकाई का महत्त्व गौण होता था। ऊपर से जाति-आधारित विभाजन जिसमें एक वर्ग के पास अकूत अधिकारों के साथ तो दूसरा अधिकार विपन्न जीवन जीता था। 

अमेरिकी क्रांति के बाद देश के शूद्रों और अतिशूद्रों को लगा कि रंगभेद की तरह जाति-भेद को भी मिटाया जा सकता है। कि समानता और स्वतंत्रता केवल सपना नहीं, बल्कि जन्मसिद्ध अधिकार हैं, जिन्हें रंगभेद के शिकार अमेरीकियों की तरह वे भी हासिल कर सकते हैं। लेकिन यह काम दूसरों के भरोसे या उनकी अनुकंपा द्वारा संभव नहीं है। जाति और वर्ण-व्यवस्था का पुजारी रहा समाज अपने विशेषाधिकारों को आसानी से त्यागने वाला नहीं है। खासतौर पर धर्म-केंद्रित राजनीति में; जो मनुष्य को जन्म से ही अपने पाश में जकड़ लेती है। परिणाम यह हुआ कि दमित वर्गों में जैसे-जैसे चेतना विकसी, धर्म स्वाभाविक रूप से आलोचना के दायरे में आ गया। उसपर पहला प्रहार किया, ज्योतिराव फुले ने। उनका ‘तृतीय रतन’ नाटक 1855 में प्रकाशित हुआ था। नाटक गरीब किसान और उसकी पत्नी के जीवन पर आधारित था। फुले और एक उदारपंथी विदूषक उसमें सूत्रधार की भूमिका निभाते हैं। नाटक में एक पुरोहित किसान के घर आता है और उसकी गर्भवती पत्नी को विपरीत ग्रहदशा का भय दिखाता है। यह कहकर डराता है कि दुष्ट ग्रह उसके अजन्मे बच्चे को नुकसान पहुंचा सकते हैं। बचाव के लिए वह देवता मरुत की पूजा करने और ब्राह्मणों को भोज कराने की सलाह देता है। डरे हुए किसान दंपति ब्राह्मण की बात मान लेते हैं। एक बार चंगुल में फंस जाने के बाद पुरोहित तरह-तरह के कर्मकांडों के बहाने किसान को लूटता जाता है। अज्ञान और अशिक्षा में फंसे किसान दंपति उसके आगे बेबस हैं। लेकिन अंत में उन्हें बात समझ में आती है। उसके बाद वे पुजारी को बाहर का रास्ता दिखा देते हैं। फुले ने न केवल धर्म और जाति के माध्यम से हो रहे शोषण की ओर से आगाह किया, अपितु शिक्षा के महत्त्व से भी परचाया था। उन्होंने शूद्रों और अतिशूद्रों के लिए अलग से स्कूल खोले। लड़कियों के लिए शिक्षा की व्यवस्था की। यह चेतना शिक्षा की देन थी, जो नए कानूनी सुधारों के बाद संभव हो पाई थी।  

1857 के विपल्व की पृष्ठभूमि को समझने के लिए एक नजर उन कानूनी सुधारों पर भी डालनी होगी।  भारत को अपना उपनिवेश बनाने के लिए ब्रिटिश संसद ने चार्टर अधिनियम-1813 लागू किया था, जिसे ‘ब्लैक चार्टर’ भी कहा जाता है। उसके माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने ईस्ट इंडिया कंपनी के चाय और अफीम के व्यापार को छोड़कर बाकी क्षेत्रों में एकाधिकार को समाप्त कर दिया था। साथ ही भारत के संबंध में दो महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए थे। आने वाले समय में वे भारतीय समाज और राजनीति के लिए बड़े परिवर्तनकारी सिद्ध होने वाले थे। पहला था, ईसाई मिशनरियों को भारत आकर प्रचार कार्य करने की अनुमति। और दूसरा था, जाति, धर्म, वर्ग की सीमाओं से परे सभी वर्गों की शिक्षा के लिए कार्यक्रम चलाना। उसके लिए प्रतिवर्ष न्यूनतम एक लाख रुपये का प्रावधान किया गया था। धर्म प्रचार के लिए ईसाई मिशनरियों ने यहां जगह-जगह स्कूल खोले। उनमें उन वर्गों के लिए विशेष व्यवस्था की गई जिन्हें जातीय भेदभाव के कारण शिक्षा से वंचित रखा गया था। उससे पहले भारत में शिक्षा पारंपरिक संस्थानों के माध्यम से दी जाती थी। उनका स्वरूप विशुद्ध जातिवादी था। उसमें ब्राह्मण के लिए शिक्षा के सभी रास्ते खुले हुए थे। क्षत्रिय युद्ध-संबंधी और वैश्य केवल व्यापारिक कामकाज के लिए आवश्यक शिक्षा ग्रहण कर सकते थे। शूद्रों और अतिशूद्रों के लिए शिक्षा पूरी तरह निषिद्ध थी। इस कारण उनका मिशनरी स्कूलों की ओर आकृष्ट होना स्वाभाविक था। ज्योतिराव फुले के प्रयासों से आगे चलकर शूद्रों और अतिशूद्रों के लिए अलग स्कूल खोले गए। लेकिन कोई भी ब्राह्मण अध्यापक उनमें पढ़ाने को तैयार न था। फिर भी, तरह-तरह की परेशानियों के बीच कारवां जैसे-तैसे आगे बढ़ने लगा।

1813 में जिस समय चार्टर अधियिनम लागू किया गया, सुप्रसिद्ध उपयोगितावादी चिंतक जेम्स मिल, ईस्ट इंडिया कंपनी में अधिकारी था। उसने ‘ब्रिटिश भारत का इतिहास’ शीर्षक से बड़ी ग्रंथमाला की रचना की थी। अपनी यथार्थवादी दृष्टि के कारण, भारतीय बुद्धिजीवियों के बीच उसे खासी आलोचना का सामना करना पड़ा था। जेम्स मिल उपयोगितावादी चिंतक बैंथम का शिष्य था, जिसने धार्मिक नैतिकता केंद्रित राज्य के बजाय कानून के राज्य को वरीयता दी थी। जिससे आगे चलकर आधुनिक राज्य की नींव पड़ी। 1833 में ब्रिटिश सरकार ने नया चार्टर लागू किया। उस समय तक जेम्स मिल का बेटा जॉन स्टुअर्ट मिल कंपनी की सेवा में आ चुका था। छोटे मिल ने उपयोगितावाद का विचार अपने पिता से ग्रहण किया था। लेकिन अपने पिता के साथ-साथ उसपर रूसो का भी प्रभाव था। जॉन स्टुअर्ट मिल मानवीय स्वतंत्रता का प्रबल समर्थक था। ईस्ट इंडिया कंपनी की नौकरी में आते समय उसकी उम्र मात्र 17 वर्ष थी। कह सकते हैं कि भारत उसके लिए ऐसी जगह थी, जहां वह अपने विचारों को प्रयोग में बदल सकता था। निस्संदेह उसने ऐसा किया भी। इसका अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि 1833 के बाद जब भारत में रह रहे अंग्रेजों ने, इस देश की जनता पर लागू होने वाले कानूनों से बाहर रखने की अपील की तो मिल ने उसका जोरदार विरोध किया था।

1833 का चार्टर तैयार करने में जॉन स्टुअर्ट मिल की अहं भूमिका थी। उस अधिनियम द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक अधिकार समाप्त कर, उसे पूरी तरह प्रशासनिक कंपनी बना दिया गया। दूसरा बड़ा फैसला था, सभी कानूनों के दस्तावेजीकरण का। उसके लिए अधिनियम में ‘विधि आयोग’ बनाने की अनुंशसा की गई थी। तीसरा और बड़ा प्रावधान था, प्रशासनिक सेवाओं में भर्ती प्रक्रिया को पूरी तरह स्पर्धात्मक बना देना। तदनुसार उनमें जाति, धर्म, प्रजाति, क्षेत्रीयता की सीमाओं से परे, कोई भी व्यक्ति भाग ले सकता था। उसके फलस्वरूप सरकारी नौकरियों के रास्ते सभी वर्गों के लिए खुल गए। 1833 के चार्टर के क्रियान्वन में जो कानून बने, उन्होंने शताब्दियों से चले आ रहे मनुस्मृति के पक्षपातपूर्ण विधान को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। शूद्रों और अतिशूद्रों की दृष्टि से वह युगांतरकारी बदलाव था; जबकि बाकी के लिए उनके वर्षों से चले आ रहे विशेषाधिकारों पर कुठाराघात था।

चार्टर 1813 ने शूद्रों और अतिशूद्रों को शिक्षा का अधिकार दिया था। जिससे उनके लिए ज्ञान के बंद दरवाजे खुलने लगे। 1833 के चार्टर ने उन्हें भरोसा दिलाया कि स्पर्धात्मक परीक्षाओं में पास होकर वे उच्च पदों तक पहुंच सकते हैं। 1853 जो चार्टर लागू हुआ उसमें सामुदायिक प्रतिनिधित्व को मान्यता दी गई थी। उसके फलस्वरूप शताब्दियों से शासित होते आए शूद्र-अतिशूद्र शासन-प्रशासन का हिस्सा बनने लगे। यह सही है कि शिक्षा में आगे होने के कारण ब्राह्मण उन दिनों शासन-प्रशासन द्वारा सर्वाधिक लाभान्वित वर्ग थे। दो-तिहाई पदों पर उन्हीं का बोलबाला था। फिर भी बदलाव की हवा उनके लिए चिंता का विषय बनी हुई थी। बहुत धीरे ही सही, मगर सत्ता उनकी मुटृठी से फिसलने लगी थी। यह उनकी सहनसीमा से बाहर था कि जिन लोगों को वे शताब्दियों से अपने पैरों के नीचे रौंदते आए हैं, वे स्थानीय निकायों में उनके बराबर बैठकर, अपने दमन और दुर्दशा के सीधे उन्हें जिम्मेदार ठहराकर बराबरी की मांग करें। लेकिन परिस्थितियां बदली हुई थीं। एक ओर अंग्रेज थे, जो खुद को आधुनिकतम सभ्यता का दावेदार बताकर, भारत में बने रहना चाहते थे। दूसरी ओर केंद्र में मुगल साम्राज्य अंतिम सांसें गिन रहा था। देश करीब छह सौ छोटी-बड़ी रियासतों में बंटा था, जिनके वैभवहीन, विलासी राजा और नबाव अंग्रेजों की चाटुकारिता में खुद को धन्य समझते थे। ऐसे में सीधे विरोध संभव न था। हताशा और नैराश्य के बीच उनका एकमात्र सपना था, धर्म-केंद्रित राज्य की वापसी का, ताकि उनके विशेषाधिकार सुरक्षित हों। इसके लिए वे साम-दाम-दंड-भेद, हर तरह से लगे रहते थे। 

संयोग से चर्बी वाले कारतूसों ने उन्हें जनता को भड़काने का अवसर दे दिया। उन कारतूसों को मुंह से खोलना पड़ता था। हालांकि अंग्रेज सैन्य अधिकारी कारतूसों में गाय और सुअर की चर्बी के इस्तेमाल से इन्कार कर रहे थे, लेकिन उनके पास कोई भरोसेमंद तरीका नहीं था, जिससे सैनिकों के दिल में घर कर गई धारणाओं से मुक्ति दिला सकें। तेज रफ्तार अफवाहों के बीच वे कुछ समझ ही नहीं पा रहे थे। मेजर जनरल हर्सी को लिखे गए पत्र में ‘रायफल अनुदेश विभाग’ के कप्तान राइट ने लिखा थाᅳ‘मैंने उन्हें(अपनी समझ के अनुसार) यह भरोसा दिलाने की कोशिश की थी कि कारतूसों में भेड़ की चर्बी और मोम का इस्तेमाल किया गया है।’4 इसपर सैनिकों का कहना था कि हम तो विश्वास कर लें, लेकिन गांव जाने पर लोग इसपर विश्वास नहीं करेंगे। उन्होंने कप्तान राइट से बाजार से इन वस्तुओं को खरीदकर प्रयोग करने को भी कहा था। 

बैरकपुर जहां विपल्व की नींव रखी गई, कोलकाता प्रेसीडेंसी का मुख्यालय था। वहां कंपनी की चार रेजीमेंट थीं। जॉन हर्सी उनका जनरल था। 24 जनवरी की 1857 को उसने अपने अधिकारियों को सूचित करते हुए लिखा थाᅳ‘सिपाहियों के दिमाग में इस तरह की गलतफहमी संभवतः ‘धर्म सभा’ की रिपोर्ट से पैदा हुई है। वह कोलकाता स्थित हिंदुओं का संगठन है। उसने लोगों को यह कहकर भड़काया है कि चर्बी वाले कारतूस असल में सिपाहियों को ईसाई बनाने का षड्यंत्र है।’5 उल्लेखनीय है कि 1813 के बाद भारत में ईसाई मिशनरियों को धर्म-प्रचार की अनुमति प्राप्त हो चुकी थी। धर्म-प्रचार के लिए वे सामान्य प्रलोभन से लेकर अशिक्षित जनता को डराने-धमकाने जैसा हर प्रोपेंगडा इस्तेमाल कर रही थीं। इसकी जानकारी ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों को भी थी। कुछ उससे नाखुश भी थे। 29 मई 1807 को सेंट जार्ज फोर्ट के गवर्नर को संबोधित एक पत्र में लार्ड मिंटो ने लिखा थाᅳ‘भारतीय उपनिवेश में कंपनी के शासन की जानी-पहचानी और घोषित नीति, विभिन्न धर्मों और मान्यताओं के बीच सामंजस्य बनाए रखने की है।’6 ईस्ट इंडिया कंपनी के अध्यक्ष को संबोधित एक अन्य पत्र में, ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्म-प्रचार के नाम पर बांटी जा रही सामग्री की आलोचना करते हुए उसने लिखा था कि प्रचार सामग्री मेंᅳ‘बगैर किसी तर्क या प्रमाण के, लोगों को उस धर्म के विरुद्ध भड़काया जा रहा है, जिसे उन्होंने अपने पूर्वजों से सीखा है।’7 पत्र में उसने मिशनरियों द्वारा चलाए जा रहे अभियान को कंपनी के उद्देश्यों के लिए हानिकारक माना था।

ईसाई मिशनरियों के धर्म प्रचार के अराजक तरीकों ने ‘धर्म सभा’ जैसे परंपरावादी संगठनों, जो हिंदुओं को किसी भी प्रकार के सुधार का विरोध करते थे, को जनभावनाओं को भड़काने का अवसर दिया था। प्रसंगवश बता दें कि ‘धर्म सभा’ की स्थापना गोपीमोहन देब नामक भद्र बंगाली ने 1830 में की थी। 1857 में गोपीमोहन देव के बेटे राधाकांत देब संस्था के प्रमुख प्रभारी थे। उनके परिवार की गिनती कोलकाता के धनाढ्य वर्ग में थी। उन्होंने अपनी समृद्धि अंग्रेजों के आने के बाद अर्जित की थी। राधाकांत देब बांग्ला, अंग्रेजी और संस्कृत के अच्छे धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलते थे। मगर थे ठेठ परंपरावादी। वे सती प्रथा को भारतीय समाज और संस्कृति की पहचान से जोड़ते थे। इसलिए सती प्रथा पर रोक के लिए राजा राममोहन राय के नेतृत्व में चलाए जा रहे आंदोलन के वे घोर विरोधी थे। सरकार को पत्र लिखकर उन्होंने सती प्रथा पर कोई रोक न लगाने की प्रार्थना की थी। 

धर्म आरंभ से ही राजनीति का बड़ा हथियार रहा है। बड़े-बड़े साम्राज्य मूल मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाने के लिए उसका उपयोग करते आए हैं। ऐसे राज्य जो लोगों की सामान्य जरूरतों का ध्यान रखने में विफल रहते हैं, जनता का ध्यान बांटने के लिए प्रायः धर्म और संस्कृति का राग अलापने लगते हैं। धर्म बड़े साम्राज्य गढ़ने की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं में हमेशा सहायक होता आया है। 1813 के चार्टर में ईसाई मिशनरियों को भारत आकर धर्म प्रचार करने की अनुमति देने के पीछे भी यही मंशा थी। ‘धर्म-सभा’ के माध्यम से बंगाली भद्रजन भी ऐसा ही करने की कोशिश कर रहे थे। केवल धर्म के सहारे ही वे अपने वर्गीय अधिकारों की सुरक्षा कर सकते थे। इससे सिपाहियों में, जिनमें से अधिकांश अशिक्षित या अल्पशिक्षित थे, और धर्म जिनकी चेतना को नियंत्रित करता थाᅳआक्रोश बढ़ना स्वाभाविक था। मंगल पांडे पर मुकदमे के दौरान गवाह के रूप में पेश हुए बिगुलवादक जान लेविस के अनुसार, मंगल पांडे ने दूसरे सिपाही मेहरलाल से कहा थाᅳ‘मैं यह धर्म के लिए कर रहा हूं।’8 

ध्यान देने की बात है कि जिन कारतूसों को निषिद्ध मानकर सिपाहियों ने विद्रोह की शुरुआत की थी, उनमें से अनेक ने आगे की लड़ाई उन्हीं कारतूसों के भरोसे लड़ी थी। स्वयं मंगल पांडे की 19वीं बटालियन में भी ऐसे हिंदू(ब्राह्मण) सिपाहियों की संख्या बहुतायत में थी, जो कभी न कभी चर्बी वाले कारतूसों का इस्तेमाल कर चुके थे। दूसरे विपल्व में हिस्सा लेने वाले सिपाहियों से कहीं अधिक भारतीय सिपाही ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में थे। उन्हीं की मदद से कंपनी विपल्व को दबाने में कामयाब हुई थी। वे सब कभी न कभी चिकनाईयुक्त कारतूसों का प्रयोग कर चुके थे। मगर ऐसा कोई रिकार्ड नहीं मिलता, जिससे पता चले कि पता चले कि चर्बी वाले कारतूसों के सेवन से इतने लोगों को अपने धर्म या जाति से हाथ धोना पड़ा था। ना ही किसी ने ऐसी मांग की थी। चिकनाई-युक्त कारतूसों के पीछे सच चाहे जो भी हो, बड़े पैमाने पर उनका प्रयोग हिंदू और मुसलमान सैनिकों को भड़काने के लिए किया गया था। दोनों को साथ इसलिए रखा गया था, क्योंकि बिना एक-दूसरे की मदद के सैन्य-विद्रोह असंभव था। 

उस लड़ाई में सिखों को, जिन्होंने अतीत में हिंदू धर्म, यहां तक कि गौ-रक्षा के लिए भी, अनेक लड़ाइयां लड़ी थीं, आश्चर्यजनक रूप से अलग कर दिया गया था। यहां तक कि अंग्रेज जो अफवाह फैला रहे थे, उनपर भी ध्यान नहीं दिया गया। क्या सिर्फ इसलिए कि सिख अल्पसंख्यक थे? हिंदुओं और मुसलमानों का ध्यान उस ओर भले ही न हो, मगर अंग्रेज़ सतर्क थे। सिखों को विपल्व से दूर रखने के लिए उन्होंने यह कहना शुरू कर दिया था कि अंग्रेज़ पराजित हुए तो उसका परिणाम मुस्लिम शासकों की वापसी के रूप में होगा। सिखों की नवें गुरु तेगबहादुर के बलिदान की यादें ताजा थीं। उनकी मानसिकता को देखते हुए पंजाब के तत्कालीन चीफ कमीश्नर जॉन लारेंस ने यह कहना शुरू कर दिया था कि यदि विपल्व सफल हुआ तो दिल्ली का बादशाह ‘सिख का सिर लाने वालों को पुरस्कृत करना आरंभ कर देगा।’9 फिर भी यह कहना अनुचित होगा कि विपल्व में सिखों की सहभागिता नगण्य थी। हालांकि पंजाब के अधिकांश रजबाड़े अंग्रेजों का साथ दे रहे थे। फिर भी दिल्ली से लेकर लखनऊ और इलाहाबाद तक, बड़ी संख्या में सिख सैनिक विपल्वियों के साथ थे। इस तथ्य की अनेक इतिहासकारों ने उपेक्षा केवल इसलिए की है, क्योंकि अंग्रेज इतिहासकारों ने पंजाब के रजबाड़ों के सहयोग के लिए उनका आभार माना था। इस कारण पंजाबी रजबाड़ों की सेनाओं को, जिनमें सभी धर्मों और जातियों के लोग शामिल थेᅳखालिस सिखों की सेना मान लिया जाता है।

सुंदरलाल और दूसरे भारतीय इतिहासकारों ने ईसाई मिशनरियों के अतिरेकी प्रचार-प्रचार के लिए उनकी आलोचना की है। लेकिन वे हिंदुओं, विशेषकर दमन और उत्पीड़न का शिकार रहीं निचली जातियों के ईसाई धर्म की ओर आकर्षित होने के मूल कारण के बारे में चुप्पी साध लेते हैं। गौरतलब है कि मनुस्मृति के आधार पर शूद्रों और अतिशूद्रों को शिक्षा के अधिकार से वंचित रखा गया था। उनीसवीं शताब्दी के आरंभ में इन वर्गों के मन में शिक्षा की ललक बढ़ी थी, लेकिन हिंदुओं के पारंपरिक शिक्षा सदनों में उनके प्रवेश की मनाही थी। ईसाई मिशनरियों ने भारत में आकर बड़ी संख्या में स्कूल खोले थे। उसके फलस्वरूप शूद्रों और अतिशूद्रों के लिए शिक्षा के रास्ते प्रशस्त हुए। वे अपने बच्चों को मिशनरियों द्वारा संचालित स्कूलों में पढ़ाने लगे। फिर भी ईसाई धर्म की ओर आकर्षित होने का यही कारण नहीं था। मनुस्मृति के अनुसार शूद्रों और अतिशूद्रों की पहचान सुनिश्चित करने के लिए उनके नामकरण को लेकर भी प्रतिबंध थे। तदनुसार वे अपने लिए सम्मानजनक नाम नहीं चुन सकते थे। वे वही नाम रख सकते थे जिनसे दैन्य और सेवाभाव झलकता हो। ईसाई धर्म में ऐसा कोई प्रतिबंध न था। इसलिए प्रायः होता यह था कि मिषनरी संचालित स्कूल में प्रवेश  करते समय अध्यापक स्वयं ईसाई धर्म की परंपरा के अनुसार नामकरण कर देते थे। इससे शूद्रों-अतिशूद्रों को समाज में उनकी विशिष्ट और अपमानजनक पहचान से मुक्ति मिल जाती थीᅳइस कारण वे विरोध भी नहीं कर पाते। ऐसे नामकरण का धर्मांतरण से कोई संबंध न था।

इस लेख का शी उद्देश्य  1857 के विद्रोह की महत्ता को नकाराना नहीं है। न ही उन सैनिकों और सेनानायकों की नीयत पर संदेह है जिन्होंने उस युद्ध में प्राण-प्रण से हिस्सा लिया था। लेकिन यह भी तय है कि विद्रोही सैनिकों की कोई योजना नहीं थी। और जो राजे-रजबाड़े उनके साथ थे, उनमें से अधिकांश के अपने क्षुद्र स्वार्थ थे। इसलिए जैसे ही युद्ध के विपरीत परिणाम आने शुरू हुए, उन्होंने अपने हाथ पीछे खींचने आरंभ कर दिए थे। विपल्व की असफलता का कारण यह भी था कि नबाव बख्त खान, नाना साहेब, तात्या टोपे, झांसी की रानी, कुंवर सिंह, फैजाबाद के मौलवी द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन महज अपने-अपने क्षेत्रों तक सीमित थे। उनके उद्देश्य सीमित थे।  देश के दूसरे विपल्वी संगठनों अथवा विपल्व के केंद्र के साथ उनका कोई तालमेल नहीं था। इसके विपरीत, जबकि ब्रिटिश शासन का प्रभाव क्षीण होता नजर आ रहा था, आम जनता और विपल्वी नेताओं के क्षेत्रीय एवं वर्गीय स्वार्थ सिर उठाने लगे थे, परिणामस्वरूप विपल्व की धार कुंद होने लगी थी। 

जिन सैनिकों ने विपल्व का बिगुल फूंका था, उनमें से अधिकांश का संबंध किसान परिवारों से था। विपल्व उनके लिए समाजार्थिक स्वतंत्रता की उम्मीद लेकर आया था। उधर जमींदारों और नबावों को लगता था कि विपल्व कामयाब हुआ तो उनके हाथों से जमीन जा सकती है। इस कारण अधिकांश जमींदार तो पहले से ही अंग्रेजों के साथ थे। विपल्व का सर्वाधिक लाभ भी उन्हीं को हुआ। उसके बाद अंग्रेज यह समझने लगे थे कि भारत के प्रभुवर्ग को अपने साथ लिए बिना उनका यहां लंबे समय तक टिके रह पाना संभव नहीं है। इसलिए भूमि सुधारों ने नाम पर उन्होंने बड़े रजबाड़ों और जमींदारों से जो जमीन हासिल की थी, धीरे-धीरे उसे वापस लौटाना आरंभ कर दिया था। 1858 में भारत को ब्रिटिश उपनिवेश बनाते समय महारानी विकटोरिया ने घोषणा की थीᅳ‘हम यह ऐलान करते हैं कि स्थानीय रजबाड़ों के साथ ईस्ट इंडिया कंपनी ने जो समझौते किए हैं, वे सभी ब्रिटेन की सरकार को मान्य हैं….हम भारतीय रजबाड़ों के अधिकार, मान-सम्मान और उनकी प्रभुसत्ता का सम्मान करते हैं….वे अपनी समृद्धि और उच्च सामाजिक हैसियत का लाभ उठा सकेंगे।’10 परिणाम यह हुआ कि देश की दो-तिहाई भू-संपदा फिर से बड़े जमींदारों के कब्जे में आ गई। इसी के साथ राजनीतिक-सामाजिक सुधारों का चक्र लगभग थम-सा गया।

सवाल है कि 1857 के विपल्व से इन बहुजनों को क्या हासिल हुआ? उत्तर हैᅳकुछ नहीं। देखा जाए तो उस समय बहुजन दो हिस्सों में बंटे थे। एक ओर वे थे जो सामाजिक स्वतंत्रता को राजनीतिक स्वतंत्रता जितना ही महत्त्वपूर्ण मानते थे। जिनका मानना था कि सदियों से अशिक्षा और दमन के शिकार रहे बहुजनों को, जिन्हें सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक सहभागिता से वंचित रखा गया है, राजनीतिक आजादी हासिल करने से पहले सामाजिक स्वतंत्रता अर्जित करनी होगी। चूंकि अंग्रेजों के आने के बाद ही उन्हें शिक्षा और राजनीतिक सहभागिता के अवसर मिलने आरंभ हुए थे, इसलिए वे उनके भारत में बने रहने का समर्थन करते थे और स्वाधीनता संग्राम से दूरी बनाए थे। दूसरा वर्ग उन उत्साही बहुजनों का था, जो विपल्वियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर युद्ध में हिस्सा ले रहे थे। उनमें झलकारी बाई और उनके पति पूरन कोरी, ऊदा देवी, लोचन मल्लाह, महावीरी देवी, नन्ही देवी, बांके चमार, नत्थू धोबी(जलियां वाला बाग), गंगू पहलवान, आदिवासी सिद्धो-कान्हू तथा उनकी बहनें फूलो-झानो, रानी दुर्गावती, रानी अबंतीबाई, रणवीरी देवी, आशा देवी जैसे हजारों बहुजन, आदिवासी शामिल थे, जिन्होंने विपल्व के दौरान अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन करते हुए, स्वाधीनता संग्राम में अपनी आहूति दी थी। 

1857 के बाद इस देश में बने रहने के लिए अंग्रेजों ने यहाँ के प्रभुवर्गों को ध्यान में रखकर जो समझौते किए थे, उनमें बहुजनों की उपेक्षा की थी। 1813 से 1853 तक अंग्रेजों ने इस देश में जो राजनीतिक सुधार किए थे, उनसे वे पीछे नहीं हट सकते थे, क्योंकि वे सब कानून उनकी औपनिवेशिक नीति का हिस्सा थे। 1857 के बाद जो कानून बने, उनमें बहुजनों की पूरी तरह से उपेक्षा की गई थी। भारत के प्राचीन साहित्य एवं संस्कृति के अध्ययन-अनुसंधान हेतु विलियम फोर्ट कालिज की स्थापना 1800 में हुई थी। लेकिन भारतीय साहित्य के अध्ययन और संग्रहण के काम में विशेष तेजी 1857 के बाद ही देखने में आई। इस दौर में संस्कृत साहित्य का भारी मात्रा में अनुवाद हुआ। अंग्रेज विद्वानों ने संस्कृत और दूसरी भाषाओं से खोज-खोजकर अंग्रेजी में प्रस्तुत किया। ‘सीक्रेड बुक्स आफ ईस्ट’ के अंतर्गत पचास से अधिक ग्रंथ प्रकाशित किए गए। बौद्ध, जैन और प्राकृत साहित्य को दुनिया के सामने लाने में अंग्रेजों की बड़ी भूमिका रही। वेद, उपनिषद, जातक साहित्य, व्याकरण, कथा साहित्य, महाकाव्य, गणित, ज्योतिष, इतिहास तथा आयुर्वेद के ग्रंथों का यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद हुआ। इतना काम एक साथ, कुछ ही वर्षों के बीच हुआ, जितना उससे पहले शताब्दियों में नहीं हो पाया था। लेकिन ऐसा करते समय अंग्रेजों की दृष्टि पूरी तरह निरपेक्ष बनी रही। भारतीय समाज और संस्कृति को लेकर जो अन्वेषणात्मक और आलोचकीय दृष्टि जेम्स मिल के ग्रंथों में थी, उसका अभाव बना रहा। फुले और उनके समकालीन लेखकों की ओर से यूरोपीय लेखक लगभग मुंह फेरे रहे। उनके लिए 1857 के समर का एकमात्र सबक था कि कुछ भी हो, इस देश के प्रभुवर्ग को नाराज नहीं करना है। उनके काम का बहुजनों को इतना लाभ तो हुआ कि संस्कृत के भाषायी ज्ञान के अभाव में जो भारत के प्राचीन ग्रंथों को पढ़ने में असमर्थ थे, अब वे उन्हें अनुवादों के माध्यम समझ सकते थे। लेकिन मानवीय दृष्टि से उन ग्रंथों की जैसी पड़ताल आवश्यक थी, उसके लिए उन्हें डॉ. आंबेडकर, पेरियार जैसे बहुजन बुद्धिजीवियों और नेताओं के उभार तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। 

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ :

1. Thomas Lowe, Central India: During the rebellion of 1857 and 1858: Longman, London, 1860, page 324, as quoted by Shamsul Islam in Sikhs and 1857 : Myths  & Facts.

2. Marx : Articles on India, quoted from The Great Rebellion, by Talmiz Khaldun, incorporated in Rebellion: A Symposium, Edited by P. C. Joshi, People’s Publishing House, 1957, page 6. 

3. Samachar Darpan, 13 March1830, SSK. i 136, quoted by By A. F. Salahuddin Ahmed, Aly Fouad Ahmed in Social Ideas and Social Change in Bengal 1818-1835

4. G. W. Forrest,  A History of Indian Mutiny-Vol. 1, William Blackwood and Sons, London, 1904 page 4.

5. The Great Rebellion, by Talmiz Khaldun, incorporated in Rebellion: A Symposium, Edited by P. C. Joshi, People’s Publishing House, 1957.

6. Ramsay Muir, The Making of British India-1756-1858, Longmans Green & Co. London, Page 251.

7. Ibid

8. G. W. Forrest, Selections Form The Letters Despatches and Other State Papers Preserved in The Military Department of The Government of India, Vol. 1, page 141.

9. Cave Browne, Punjab & Delhi in 1857(1861), Vol. 1, page 28-29 quoted by Talmiz Khaldun op. cit.   Page 33.

10. Ramsay Muir, op. cit, Page 382.

प्राचीन भारत में गणतंत्र

सामान्य

लोकतंत्र राजनीति का आधुनिक सिद्धांत है. यह, हालांकि राजनीतिक व्यवस्था को तय करनेवाली एक प्रणाली है, जो नागरिकों को अपनी अधिकार चेतना से समृद्ध करने, उनमें आवश्यक नागरिकताबोध पैदा करने का काम करती है. इसके द्वारा सत्ता पर जनता का अंकुश बना रहता है. व्यवस्था से असंतुष्ट जनता समय आने पर उसे बदलने में सक्षम सिद्ध होती है. लोकतंत्र में सत्ता धर्म, जाति, संप्रदाय, पूंजी आदि के बल पर प्राप्त करना संभव नहीं है. इसलिए इसे सर्वाधिक कल्याणकारी राजनीतिक प्रणाली भी माना जाता है. हालांकि लोकतांत्रिक समाजों में पूंजीपति वर्ग प्रकटतः नागरिकों के अधिकारों का पक्ष लेते दिखाई पड़ते हैं. बावजूद इसके जरूरी नहीं है कि यह सदैव उनकी सदिच्छा से ही प्रेरित हो. कई बार नागरिक अधिकारों की पक्षधरता के पीछे उनकी मंशा एक स्वतंत्र, अनियंत्रित, उपभोक्तावादी समाज को बढ़ावा देने की भी होती है. लोकतंत्र यदि नैतिकता से आवृत न हो तो पूंजीवाद की भांति वह भी व्यक्तिवाद को बढ़ावा देने वाला सिद्ध होता है. व्यवहार में अपनी जनोन्मुखता सिद्ध करने के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं कराधान के रूप में धनी व्यक्ति से अधिक राशि वसूल करती हैं. इस दावे के साथ कि उसके द्वारा जनसामान्य को लाभ पहुंचाने वाली योजनाओं का क्रियान्वन किया जाएगा.

वेदों में इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं, जो यह दर्शाते हैं कि तत्कालीन समाज बहुमत का सम्मान करता था. आश्रम-व्यवस्था ज्ञानाधारित समाज के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध थी, उसके लिए निर्णयों में पारदर्शिता होना आवश्यक था. उपनिषदों में छात्र गुरु के समक्ष मुक्त विमर्श करते हैं. ईसा पूर्व सातवीं शताब्दी में भारतीय गणतंत्र और भी मजबूत हुए थे और गणतांत्रिक राज्यों की स्थापना आम हो चुकी थी. यह मान लिया गया था कि समाज का बहुआयामी और सर्वतोन्मुखी विकास तभी संभव है जब योजनाओं के निर्माण एवं उनके कार्यान्वन में अधिकाधिक लोगों की सहमति एवं भागीदारी संभव हो. वौद्ध एवं जैनधर्म चूंकि समाज के जाति आधारित विभाजन का निषेध करते थे, अतएव उनके प्रभाव के चलते समाज में समानता आधारित तंत्र की स्थापना का काम सरल एवं व्यावहारिक था. किंतु यह मान लेना अनुचित होगा कि ब्राह्मण धर्म एकदम दम तोड़ चुका था. वस्तुतः वौद्ध धर्म की सफलता का एक कारण यह भी था कि उसने राजसत्ता के सहारे धार्मिक विजय का सपना देखा था. मौर्य कालीन चंद्रगुप्त से लेकर सम्राट अशोक आदि अनेक भारतीयता के प्रतीक हिंदु सम्राट वौद्धधर्म को मानने वाले थे. बल्कि अशोक ने तो वौद्धधर्म को राजधर्म घोषित करते हुए उसके प्रचार-प्रसार में अपने पुत्र एवं पुत्री को भी लगा दिया था. राजधर्म घोषित होने जाने के बाद बौद्धधर्म के विरोधी शिथिल जरूर पड़े, पूरी तरह शांत नहीं थे. परंपरागत ब्राह्मणधर्म की समर्थक प्रवृत्तियां अनुकूल अवसर की प्रतीक्षा में थीं. पुराणों और स्मृतियों की रचना द्वारा जनमानस को फुसलाने तथा बरगलाने की कोशिशें भी की जा रही थीं.

भारतीय दर्शन परंपरा की दृष्टि से वह युग कई मायने में अविस्मरणीय है. इस युग को भारतीय चेतना के नवोन्मेष का स्वर्णकाल भी कहा जाता रहा है. क्योंकि इस युग में तर्क एवं विज्ञानाधारित दर्शन को स्वीकार्यता मिलने लगी थी. बौद्धधर्म की ओर से चुनौती पेश होने पर प्राचीन वैदिक धर्म को भी आत्मावलोकन के लिए विवश होना पड़ा था, जिसके फलस्वरूप न्याय, वैशेषिक, चार्वाक जैसे भौतिकतावादी एवं तर्काधारित दर्शनों का उदय हुआ. विभिन्न मतावलंबियों के बीच शास्त्रार्थ, गोष्ठियों, परिचर्चा कार्यक्रमों ने भारतीय समाज को बौद्धिकता के ढांचे में ढालने का कार्य किया. जैन और बौद्ध धर्म ने अपने तात्विक एवं गूढ़ दार्शनिक विमर्श के माध्यम से पूरे समाज में संवाद और विमर्श की उस धारा को पुनर्जागरित करने का काम किया था, जो वैदिककाल के पश्चात रास्ता भटक चुकी थी. नए दार्शनिक विमर्श का पूरा आग्रह धर्म को अज्ञानता से मुक्त कर, उसे अधिकाधिक मानवीय स्वरूप प्रदान करने के प्रति था. इससे उसकी जनसामान्य के बीच स्वीकार्यता में बृद्धि हुई थी.

वौद्धिक आंदोलनों का प्रभाव तत्कालीन राजनीति पर पड़ना स्वाभाविक ही था. परिणामस्वरूप राजनीति को और अधिक लौकिक तथा मानवीय बनाने के प्रयास किए जाने लगे थे. परंतु इस कार्य में सफलता तभी संभव थी, जब निर्णय के स्तर पर ज्यादा से ज्यादा लोगों की सहभागिता हो. इसलिए शासन-प्रशासन के स्तर पर अधिकतम लोगों की हिस्सेदारी की जरूरत महसूस की जाने लगी. लिच्छवी और वैशाली जैसे गणतांत्रिक राज्यों का उदय इसी समय में हुआ. पालि, संस्कृत, ब्राह्मी लिपि में उपलब्ध साहित्य में ऐसे बहुसमर्थित राज्य के बारे अनेक संदर्भ मौजूद हैं. जनतांत्रिक पहचान वाले गण तथा संघ जैसे स्वतंत्र शब्द भारत में आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पहले ही प्रयोग होने लगे थे. महाभारत के शांतिपर्व में राज्यकार्य के निष्पादन के लिए बहुत से प्रजाजनों की भागीदारी का उल्लेख मिलता है, जो उस समय समाज में गणतंत्र के प्रति बढ़ते आकर्षण का संकेत देता है—

‘गणप्रमुख का सम्मान किया जाना चाहिए, इसलिए कि दुनियादारी के बहुत से कार्यों के लिए शेष समूह उसी के ऊपर निर्भर करता है. गुप्तचर विभाग और लोकपरिषद की कार्रवाहियों को आवश्यक गोपनीयता बनाए रखने का कार्य भी उसके ऊपर छोड़ देना चाहिए, क्योंकि यह बहुत अनुचित होगा कि पूरा संघ या कि समूह के सभी सदस्य उन रहस्यों के बारे में जान पाएं. संघ-प्रमुखों को चाहिए कि आवश्यक गोपनीयता की रक्षा करते हुए सदस्यों के सुख-समृद्धि के लिए सभी के साथ मिलकर, दायित्व भावना के साथ कार्य करें, अन्यथा समूह का धन-वैभव नष्ट होते देर नहीं लगेगी.1

सिकंदर के भारत अभियान को इतिहास में रूप में प्रस्तुत करने वाले डायडोरस सिक्युलस तथा का॓रसीयस रुफस ने भारत के सोमबस्ती नामक स्थान का उल्लेख करते हुए लिखा है कि वहां पर शासन की ‘गणतांत्रिक प्रणाली थी, न कि राजशाही.’2 ईसा पूर्व चौथी शताब्दी के दौरान गणतंत्र भारत में लोक प्रचलित शासन प्रणाली थी. डायडोरस सिक्युलस ने अपने ग्रंथ में भारत के उत्तर-पश्चिमी प्रांतों में अनेक गणतंत्रों की मौजूदगी का उल्लेख किया है. एक अन्य स्थान पर वह लिखता है कि—

‘अधिकांश नगरों (राज्यों) ने गणतांत्रिक शासन-व्यवस्था को अपना लिया था; और उसको बहुत वर्ष बीच चुके थे, यद्यपि कुछ राज्यों में भारत पर सिकंदर के आक्रमण के समय भी राजशाही कायम थी.3

ईसा पूर्व छठी शताब्दी तक भारत में गणतांत्रिक राज्यों का चलन आम हो चुका था. हालांकि ये राज्य राजशाही द्वारा नियंत्रित राज्यों की अपेक्षा आकार में छोटे थे. किंतु उनके वैभव एवं समृद्धि के कारण बड़े राज्य भी उनकी ओर सम्मान की दृष्टि से देखते थे. उन राज्यों में कृषि व्यवस्था उन्नत थी. प्रायः सभी राज्य उपजाऊ, शस्यश्यामला भूमि पर विकसित हुए थे. व्यापार एवं उद्योग-धंधों के मामले में वे आत्मनिर्भर थे. बौद्धधर्म ने समाज को उन बंधनों से मुक्त करने का काम किया था, जो वर्णव्यवस्था के कारण सामाजिक ऊंच-नीच का पर्याय बने हुए थे. प्रश्न किया जा सकता है साम्राज्यवादी व्यवस्था के दौर में जब बड़े राज्य छोटे राज्यों पर अपनी गिद्धदृष्टि जमाए रखते थे, अपेक्षाकृत छोटे गणतांत्रिक राज्य अपनी स्वतंत्रता एवं समृद्धि को कैसे सुरक्षित रख पाते थे?

उल्लेखनीय है कि कथित छोटे गणतांत्रिक राज्य सुख-समृद्धि के मामले में देश के बाकी राज्यों से कहीं आगे थे. वहां के नागरिकों को अपनी रुचि एवं कार्यक्षमता के अनुसार अपना व्यवसाय चुनने की आजादी थी. जिससे वहां का समाज अपेक्षाकृत अधिक खुला था. उसमें तनाव भी न्यूनतम थे. परिणामतः समाज की ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग संभव था. यही नहीं गणतांत्रिक राज्यों के पास बड़ी युद्धक सेना भी होती थी. किसी एक राज्य पर आए संकट के समय बाकी राज्य भी उसकी मदद के लिए तत्पर रहते थे. धन की कमी न होने के कारण जरूरत पड़ने पर भाड़े के सैनिकों की सेना खड़ा कर लेना भी असंभव न था. डायडोरस सिक्युलस ने साबरकी या सामबस्ती नामक एक गणतांत्रिक राज्य का उल्लेख किया है, जहां के नागरिक मुक्त और आत्मनिर्भर थे तथा जिसकी सेना में साठ हजार पैदल सैनिक, छह हजार घुड़सवार तथा छह सौ रथवान होते थे. वी. एस. अग्रवाल और ए. के. मजुमदार के हवाले से डाॅ. स्टीव मुलबर्गर लिखते हैं कि—

‘प्राचीन भारत में जनतांत्रिक ‘कार्यकलापों का स्वतंत्र रूप से संचालन करने वाले समूहों और उनकी विशेषताओं को अभिव्यक्त करने के लिए एक सुदीर्घ शब्दावली थी. निश्चित रूप से उसमें बहुत से शब्द ऐसे थे जो वीरता का गुणगान करते समय प्रयुक्त किए जाते थे, किंतु उनमें से अधिकांश का प्रयोग शांतिकाल में तथा आर्थिक समूहों और उनकी गतिविधियों की व्याख्या के लिए प्रयुक्त किया जाता था. जैसे कि किसी संगठन को उसके कार्य के आधर पर गण अथवा संघ का नाम दिया जा सकता था. उससे कम महत्त्वपूर्ण, केवल आर्थिक मामलों से जुड़े संगठनों को श्रेणि, पूग, व्रात, गण आदि नामों से पुकारा जाता था. इन संगठनों की प्रमुख विशेषता थी, इनके लक्ष्यों की एकता. छठी शताब्दी तक इन स्वशासित संगठनों-समितियों का चलन आम हो चला था. इनके सभी निर्णय आमसहमति के आधर पर लिए जाते थे. दूसरा वर्ग सर्वसम्मति अथवा आमसहमति के आधर पर शासन की जिम्मेदारी संभालता था. आधुनिक शब्दावली में इन संगठनों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त शब्द ‘गणतंत्र’ ही हो सकता है.’4

गणतांत्रिक भारत में संपन्नता और समृद्धि समाज के बहुसंख्यक वर्ग तक फैली हुई थी. हालांकि आर्थिक स्तर में विभिन्न समुदायों, व्यवसायकर्मियों के बीच भारी अंतर तब भी था. बावजूद इसके समाज में जागरूकता एवं अवसरों की समानता अधिक थी. इसी कारण छोटे-छोटे उद्यमियों/व्यापारियों ने अपने संगठन खडे़ कर लिए थे, जिनके माध्यम से वे संगठित व्यापार के लाभों में हिस्सेदारी की संभावना बढ़ाते थे. इस बात का प्रमाण उस समय के साहित्य तथा अन्य पुरातात्विक साक्ष्यों में उपलब्ध है. वैशाली और कौशांबी जैसे संपन्न राज्य और कुशावती जैसी संपन्न नगरी का वर्णन जातक कथाओं तथा पालि साहित्य में अनेक स्थान पर हुआ है. ये सभी राज्य गणतांत्रिक प्रणाली द्वारा शासित थे. जे. पी. शर्मा की पुस्तक ‘प्राचीन भारत में गणतंत्र’ के माध्यम से मुलबर्गर महोदय लिखते हैं कि—

‘छह सौ ईस्वी पूर्व से दो सौ ईस्वी बाद तक, भारत पर जिन दिनों बौद्ध धर्म की पकड़ थी, जनतंत्र आधारित राजनीति यहां बहुत लोकप्रचलित एवं बलवती थी. उस समय भारत में नागरीकरण की प्रक्रिया बहुत तीव्रता से चल रही थी. पालि साहित्य में उस समय की समृद्ध नगरी वैशाली का विवरण मिलता है. उसमें उपलब्ध विवरण के अनुसार वहां 7707 बहुमंजिला इमारतें, 7707 अट्टालिकाएं, 7707 ही उपवन तथा कमलसरोवर शोभायमान थे. इनके अतिरिक्त वहां पर लोगों का एक कार्यकारी संघ भी था, जिसपर वहां की शासन-व्यवस्था का अनुशासन चलता था. आम्रपाली जैसी अनिंद्ध सुंदरी, अद्वितीय नर्तकी थी, जिसकी सुंदरता और कला के चर्चे दूर-दूर तक फैले हुए थे. आम्रपाली न केवल वैशाली की समृद्धि का प्रतीक थी, बल्कि वहां का गौरव भी थी. वैशाली के अतिरिक्त कपिलवस्तु तथा कुशावती जैसे नगरों का विवरण भी बौद्ध साहित्य में ससम्मान उपलब्ध है, जो व्यापार, कला एवं संस्कृति के महान केंद्र थे. पांच सौ से हजार गाड़ियों तक के काफिले उन नगरों से व्यापार के सिलसिले में गुजरते रहते थे, जिसके कारण वहां पर किसी आधुनिक शहर जैसी भीड़-भाड़ तथा शोरगुल मचा रहता था. आवश्यकता पड़ने पर ये काफिले जहां भी पड़ाव डालते तो महीनों तक एक ही स्थान पर जमे रहते. चैमासे में तो यह अक्सर होता था. इन काफिलों के साथ-साथ धार्मिक संवाद, सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रचार-प्रसार का काम भी चलता रहता था.’5

ऐसा प्रतीत होता है कि 7707 की संख्या उन दिनों मानक अथवा शुभ मानी जाती थी. क्योंकि एक अन्य प्रसिद्ध जातककथा के अनुसार लिच्छवी गणराज्य की राजधानी वैशाली में 7707 राजा, 7707 राजदूत, 7707 सेनापति तथा 7707 खजांची मौजूद थे, जो किसी भी मसले पर निष्पक्ष और निर्भीक होकर अपना मत प्रस्तुत करते थे.6 यह विवरण प्रतीकात्मक भी हो सकता है. यह जनमानस के गणतांत्रिक सोच एवं समानताबोध का परिणाम था. सामूहिक आर्थिक कार्यक्रम, नागरिक प्रशासन में अधिकतम की सहभागिता तथा समान आधिकारिता के कारण यह संभव भी था. अपने प्रबल नागरिकताबोध के कारण लिच्छवियों को आलोचकों के व्यंग्य का सामना भी करना पड़ा था. ललितविस्तार जो कि एक व्यंग्य-प्रधान कृति है, में यह कहकर कटाक्ष किया गया है कि वैशाली में राजाओं की भरमार है, वहां हर कोई सोचता है—

‘मैं राजा हूं…मैं राजा हूं.’ और इस प्रकार वहां व्यक्ति के पद, आयु, अनुभव, मान-सम्मान को भुला दिया जाता है.’7

पाणिनी की अष्ठाध्यायी में जनपद शब्द का उल्लेख अनेक स्थानों पर किया गया है, जिनकी शासनव्यवस्था जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों के हाथों में रहती थी. एक और जातक कथा में पांच सौ लिच्छिवी राजाओं का उल्लेख किया गया है. यह विवरण भी प्रतीकात्मक अथवा अतिश्योक्तिपूर्ण हो सकता है. दरअसल इस तरह के आख्यान तत्कालीन राजनीति में तेजी से बढ़ते आर्थिक समूहों का परिणाम थे. आर्थिक रूप से समृद्ध समूह अपना स्वतंत्र राजनीतिक गठबंधन बना लेता था. आंतरिक प्रशासन के लिए वे सब स्वतंत्र समूह के रूप में काम करते थे, किंतु बाह्यः हमले के समय उनकी संगठित शक्ति दुश्मन का मुकाबला करने के काम आती थी. नए गणतंत्रों की स्थापना का कार्य भारत के किसी एक क्षेत्र तक ही सीमित नहीं था. बल्कि उसका असर पूरे देश में स्थान-स्थान पर नजर आ रहा था. पाणिनी साहित्य के अध्येता वी. एस. अग्रवाल के अनुसार— ‘उस समय देश-भर में नए-नए गणतंत्र स्थापित करने की जैसे होड़ मची हुई थी. विशेषकर उत्तर-पश्चिमी सीमा पर स्थित वाहीक देशों में नए गणतंत्रों की स्थापना का कार्य तो अपनी चरमस्थिति को प्राप्त कर चुका था, जहां केवल सौ परिवारों वाले गोष्ठ, स्वयं को एक स्वतंत्र गणतंत्र के रूप में स्थापित कर रहे थे.’8

वस्तुतः उस समय भारत में छोटे-छोटे गणतंत्रों के रूप में स्वतंत्र आर्थिक समूहों के उदय हो रहा था. वे आर्थिक समूह इतने शक्तिशाली थे कि जिस क्षेत्र में होते, वहां कि राजनीतिक सत्ता पर अपना अधिकार स्थापित कर लेते थे. हालांकि राजशाही की अपेक्षा वह एक मुक्त समाज था, जहां राजनीतिक निर्णय परस्पर सहमति और सम्मान के आधार पर लिए जाते थे. एक श्रेष्ठी वर्ग उस समाज में पनप रहा था, जिसके आर्थिक संबंध दूर-दराज के क्षेत्रों से बने थे. उन राज्यों के पास अपनी सेना थी और संकट का सामना वे सभी मिलकर पूरी ताकत और एकजुटता के साथ करते थे. वहां के श्रेष्ठीगण आवश्यकता के समय बड़े सम्राटों को ऋण देकर, समाजकल्याण के कार्यों के लिए मुक्त हस्त से दान लुटाकर समाज पर अपना प्रभुत्व जमाए रखते थे. उनकी एकता और समाज पर उनके प्रभाव के कारण बड़े-बड़े सम्राट उनपर हमला करने से बचते थे. धन-संपत्ति का बाहुल्य कई बार सामाजिक बुराइयों का कारण भी बन जाता है, इस दोष से वे भी अछूते नहीं थे. उन्हें न केवल अपनी आर्थिक समृद्धि का गुमान था, बल्कि उनमें दिखावे की प्रवृत्ति भी जोर पकड़ती जा रही थी. अपनी अकूत धन-संपदा को खर्च करने के लिए वहां के नवधनाढ्य वर्ग के बीच निरर्थक स्पर्धाएं अक्सर चलती रहती थीं. आम्रपाली जैसी नगरवधुओं का चलन तात्कालिक समाज में निरंतर बढ़ते उपभोक्तावादी कुसंस्कारों की ओर संकेत करता है. उन नगरवधुओं को राज्य का समर्थन और सरंक्षण प्राप्त था. नगरवधुओं के ठिकाने राज्य की कमाई के बहुत बड़े स्रोत थे, इससे समाज के बुद्धिजीवी वर्ग में उन गणतंत्रों के भविष्य को लेकर चिंता व्यापने लगी थी. वे अपने नागरिकों को समय-समय पर सावधान भी करते रहते थे. हालांकि मद और मदिरा में तेजी से डूबता जा रहा नवधनाढ्य वर्ग उसकी शायद की परवाह करता था. महात्मा गौतम बुद्ध स्वयं गणतांत्रिक राज्यों के उद्भव के पक्ष में थे.

बौद्ध साहित्य के अत्यंत महत्त्वपूर्ण ग्रंथ महापरिनिर्वाण सुत्तंत की एक कथा बहुत चर्चित है, जिसके अनुसार मगध-सम्राट अजातशत्रु वैशाली के सुख-समृद्धि से ईष्र्या करते हैं तथा उसे किसी भी तरह से अपने राज्य में मिलाना चाहते हैं. सम्राट की ओर से महामात्य वर्षकार लिच्छिवी गणराज्यों पर हमला करने से पहले परामर्श के लिए महात्मा बुद्ध के पास जाते हैं. यह जानने के लिए कि विजय के लिए यह युद्ध क्या उपयुक्त रहेगा? युद्ध हुआ तो विजयश्री किसका वरण करेगी. महामात्य वर्षकार विद्वान एवं कूटनीति थे. महात्मा बुद्ध आश्रम पहुंचे अतिथि का स्वागत करते हैं. किंतु आचार्य वर्षकार को खुलकर जवाब देने के बजाय वे अपने शिष्य आनंद के साथ एक रूपक की रचना करते हैं—

मगध-सम्राट अजातशत्रु की वैशाली तथा अन्य वज्जिऩ गणतंत्रों के धन-वैभव पर निगाह गढ़ी थी. वह उनपर बलात् अधिकार जमाना चाहता था. आक्रमण से पहले इस बारे में परामर्श करने के लिए उसने अपने महामात्य आचार्य वर्षकार को महात्मा बुद्ध के पास उनका आशीर्वाद लेने के लिए भेजा. आचार्य वर्षकार संशय में थे. वे गौतम बुद्ध के समक्ष उपस्थित हुए. उस समय महात्मा बुद्ध अपने शिष्यों के साथ थे. आचार्य वर्षकार ने वैशाली पर आक्रमण को लेकर सम्राट अजातशत्रु की इच्छा से महात्मा को अवगत कराया—

‘क्या उन्हें इस युद्ध में विजयश्री प्राप्त होगी?’ आचार्य वर्षकार ने प्रश्न किया.

आचार्य के प्रश्न का उत्तर देने के बजाय महात्मा बुद्ध ने शिष्य आनंद से सवाल किया—

‘तुमने सुना आनंद? आज भी वज्ज़िन गणसमूहों की बैठक पूरे उत्साह के साथ और निरंतर होती हैं? उनमें सभी गण स्वेच्छा और खुशी से हिस्सा लेते हैं?’

‘जी हां, मैंने भी यही सुना है!’ आनंद ने उत्तर दिया. तब महात्मा बुद्ध बोले, मानो आशीर्वाद दे रहे हों—

‘तो सुनो आनंद! जब तक वज्ज़िन गणतंत्र इसी प्रकार संगठित बने रहेंगे…जब तक वे अपने महत्त्वपूर्ण निर्णय लगातार मिलजुलकर, आपसी सहमति से लेते रहेंगे, तब तक आनंद उनके वैभव में कमी नहीं आएगी. वे निरंतर प्रगति की ओर अग्रसर रहेंगे…सुख और समृद्धि प्राप्त करेंगे.’ गणतंत्र के समर्थन में महात्मा बुद्ध यहीं नहीं रुक जाते. आनंद द्वारा किए गए प्रश्नों के उत्तर में वे उसे और उसके माध्यम से आचार्य वर्षकार को भिन्न-भिन्न तर्कों से संतुष्ट करने का प्रयास करते हैं—

‘इसलिए सुनो आनंद! वज्ज़िनगण जब तक सुसंगत ढंग से साथ-साथ उठते-बैठते, बातचीत करते रहेंगे, जब तक वे अपने महत्त्वपूर्ण निर्णय प्रेमपूर्वक मिल-जुलकर, बिना किसी ईर्ष्या-द्वेष के लेते रहेंगे…जब तक वे पूर्वस्थापित विधान का विरोध करने से बाज आएंगे…और पूर्वस्थापित सामंजस्यपूर्ण मान्यताओं-नियमों का निषेध करने के स्थान पर उनका विनयपूर्ण अनुसरण करते रहेंगे…जब तक वे वज्ज़िन गणतंत्रों द्वारा पूर्व स्थापित आदर्शों का पालन करते रहेंगे और दिए गए वचन का सम्मान करेंगे, उसपर डटे रहेंगे…तथा अपने वुजुर्गों और सनातन मर्यादाओं का अनुसरण करेंगे…जब तक वे अपने विचारों पर दृढ़ बने रहेंगे तथा अपने कर्तव्य के प्रति सचेत रहेंगे…और जब तक वे अपनी स्त्रियों का सम्मान करेंगे…उनके समूह की किसी महिला या बच्ची के साथ बलात् छेड़छाड़ नहीं होगी…जब तक वे अपने तीर्थस्थलों तथा पवित्र ग्रंथों में आस्था बनाए रखेंगे तथा उनका, चाहे वे नगर अथवा देश के किसी भी हिस्से में क्यों न हों, सम्मान करेंगे, सभी संस्कारों का विधि अनुसार निर्वाह करेंगे, साथ ही उसमें किसी प्रकार की जड़ता आने से बचाए रखेंगे…जब तक वे समाज में मौजूद गरीबों, वंचितों और उत्पीड़ितों के अधिकारों की सुरक्षा का खयाल रखेंगे…उनके लिए यथासंभव सहयोग करते रहेंगे, जिससे वे सुखी रह सकें, उनका इतना ध्यान रखेंगे कि उनके जैसे निर्धन-निर्बल, समाज के उत्पीड़ित लोग दूर-दूर से आकर उनके राज्य में सुखपूर्वक शरण पाते रहें, तब तक, हां तब तक आनंद! वज्ज़िनगणों के सुख और वैभव पर कोई आंच नहीं आ सकती…वे अजेय रहेंगे, उन्हें कोई नहीं हरा सकता, वे सुख और समृद्धि की ओर निरंतर अग्रसर रहेंगे.’

इसके बाद महात्मा बुद्ध ने आचार्य वर्षकार को संबोधित कर कहना शुरू किया—

‘महात्मन्! जिन दिनों मैं वैशाली के एक मंदिर में ठहरा हुआ था, उन्हीं दिनों मैंने वज्ज़िनगणों के जनकल्याणकारी नियमों का अध्ययन किया था. मुझे पूरा विश्वास है कि जब तक वे अपने बनाए विधान को अच्छी तरह समझते रहेंगे…जब तक वे इन अपने नियमों का मन-वचन कर्म से अनुसरण करते रहेंगे…अपनी परंपरा एवं कानूनों का अर्थ समझकर उनका पालन करते रहेंगे…तब तक मुझे पूरा विश्वास है कि वे उनको कोई परास्त नहीं कर सकता. तब तक उनका सुख और समृद्धि इसी तरह बने रहेंगे.’ महात्मा बुद्ध के वचनों से प्रभावित होकर आचार्य वर्षकार कुछ देर तक विचार मग्न रहे. फिर बोले,

‘मैं समझ गया देव! ऐसे वज्झिनगणों को सीधे युद्ध में, बिना कूटनीति या उनके संगठन को भंग मगध कभी नहीं हरा पाएगा.’

आत्मनिर्भर एवं आत्मनिर्णय का संस्कार. वज्जिन गणतंत्र के इन्हीं सदगुणों ने महात्मा बुद्ध को प्रभावित किया था. यही गणतांत्रिकता गिल्ड की सफलता का कारण थी. हम पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं गिल्ड अथवा श्रेणि प्राचीन भारत में समान उद्योग और/या व्यवसाय में लगे कारीगरों, शिल्पकारों, छोटे उद्यमियों तथा व्यापारियों के स्वैच्छिक संगठन थे, जिनका गठन आपसी हितों की सुरक्षा और सामूहिक कल्याण की भावना के साथ किया जाता था. प्रायः छोटे उद्यमी, कारीगर अथवा शिल्पकार स्वयं को स्पर्धा में बनाए रखने के लिए श्रेणि के रूप में संगठित होते थे. इससे उन्हें एक प्रकार की व्यावसायिक सुरक्षा की अनुभूति भी होती थी. परंपरागत भारतीय समाज जाति और वर्ग के आधार पर विभाजित था. लेकिन श्रेणियों में कार्यविभाजन का आधार आमतौर पर व्यक्तिगत दक्षता ही थी.

हम यह भी कह सकते हैं कि श्रेणियां एक प्रकार से प्राचीनकाल से चली आ रही वर्णव्यवस्था के प्रति जनसमाज का सकारात्मक विद्रोह का परिणाम थीं. चूंकि बौद्धधर्म जाति एवं वर्ण के आधार पर समाज के विभाजन का विरोध करता था, अतएव उसके प्रभाव के चलते श्रेणियों को अपने विकास का भरपूर अवसर प्राप्त हुआ. ये श्रेणियां अपने समय के तकनीकी कौशल, ज्ञान, अनुभव तथा औद्योगिक संसाधनों को सहेजने तथा स्थानीय रूप से उपलब्ध कच्चेमाल के दोहन का कार्य भी करती थीं. आवश्यकता पड़ने पर श्रेणि मजदूर संगठन का काम भी कर सकती थी. उनके सदस्य अपने उद्यम के अकेले स्वामी तथा मुख्यकर्ता होते थे, व्यावसायिक नैतिकता के आधार पर वे एक-दूसरे के साथ व्यवहार करते थे तथा उनमें आंतरिक लोकतंत्र था. बावजूद इसके अधिकांश गिल्ड तत्कालीन मुख्य शासन-व्यवस्था अर्थात राजशाही के ही समर्थक थे. इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि सामाजिक मुद्दे पर किसी भी प्रकार के टकराव से बचते हुए वे स्वयं को केवल आर्थिक कार्यक्रमों तक समेटे रखना चाहते हों. क्योंकि वर्ण-विभाजन के अनुसार राज्य करना क्षत्रिय वर्ग का कार्य था. जबकि श्रेणियों के रूप में संगठित होने वाले व्यक्ति अधिकांशतः वैश्य एवं कामगार जातियों से आए हुए लोग थे. भारत में श्रेणि का प्रारंभ कब हुआ, इस बारे में कदाचित मतभेद हैं. कुछ विद्वानों का मानना है कि वैदिक समाज मुख्यतः पशुपालक समाज था, जो शनै-शनै कृषि आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा था. उद्योग-धंधे विकास की प्रारंभिक अवस्था में थे और उनका इतना विकास नहीं हुआ था कि उनमें लगे लोग अपने स्वतंत्र संगठन बना सकें. इस विचारधारा के समर्थक विद्वानों का विश्वास है कि श्रेणि आधारित अर्थव्यवस्था कालांतर में विकसित हुई. इसके विपरीत कुछ विद्वानों को भरोसा है कि वैदिक सभ्यता इतनी विकसित हो चुकी थी कि वहां पर श्रेणियों का गठन होने लगा था. इस मत के समर्थकों में से एक किरन कुमार थपलियाल का मानना है कि वैदिक सभ्यता में भारत में शिल्पकारों तथा व्यापारियों के संगठन बनने लगे थे तथा उनका वैदिक भारत की अर्थव्यवस्था की समृद्धि में बहुत बड़ा योगदान था. ये संगठन आंतरिक लोकतंत्र की भावना से समृद्ध थे.

थपलियाल के अनुसार वैदिक सभ्यता के जो भी साहित्यिक और ऐतिहासिक स्रोत आज उपलब्ध हैं, उनमें इस तथ्य का समर्थन करते पर्याप्त प्रमाण मौजूद हैं, जिनके अनुसार उस समय भी भारत के व्यावसायिक और औद्योगिक संगठन सुदूर देशों के साथ व्यापारिक संबंध बनाए हुए थे. कुछ विद्वान मोहान-जो-दारो तथा हड़प्पा की सभ्यता को वैदिक सभ्यता ही मानते हैं. हालांकि वे कोई स्पष्ट साक्ष्य देने में नाकाम रहे हैं. लेकिन यदि वैदिक सभ्यता तथा मोहान-जो-दारो सभ्यता का कार्यकाल एक ही है तो यह भी सत्य है कि मोहन-जो-दारो के लोगों के व्यापारिक रिश्ते चीन, मेसोपोटामियां, रोम आदि सुदूर देशों के साथ थे.

गणपति शब्द का प्रयोग वैदिक साहित्य में अनेक स्थानों पर हुआ है, जिसका एक अर्थ गण अर्थात नागरिक भी है. इस तरह गणपति यानी नागरिकों द्वारा परस्पर सहमति के आधार पर चुने गए प्रशासक से है. भारतीय परंपरा में गणपति को सभी देवताओं में अग्रणी, सर्वप्रथम पूज्य माना गया है. इस बात की प्रबल संभावना है कि इस शब्द की व्युत्पत्ति गणतांत्रिक राज्य में हुई हो. बाद में जब समाज में पांडित्य के नाम पर पोंगापन अपना असर जमाने लगा तब गणपति का अर्थ भी रूढ़ होकर हाथी की सूंड वाला प्राणी हो गया. लेकिन गणेश को देवता के रूप में मिलने वाला सम्मान, तथा उसे समृद्धि का प्रतीक मानना आज भी इस बात का द्योतक है कि गणपति का अभिप्राय आर्थिक समूह का नेतृत्व करने वाले व्यक्ति से ही था. व्यापार के सिलसिले में चलने वाले काफिलों में गणपति की स्थिति उनके संरक्षक के रूप में मान्य थी. जिसे पूरी श्रद्धा एवं सम्मान के साथ देखा जाता था.

भारतीय समाज के पिछड़ेपन के मुख्य कारणों में से एक इसकी जाति-व्यवस्था है, जिसने शताब्दियों से समाज के एक बड़े वर्ग को मौलिक अधिकारों से वंचित करने का कार्य किया है. इसी ने देश को पराधीनता की और ढकेला, परिणामतः शताब्दियों तक पराये लोग हमारे भाग्यविधाता बने रहे. इस समाज को पहली बार एकसूत्र में पिरोने में कामयाबी महात्मा गांधी ने हासिल की थी. स्वाधीनता संग्राम के दौरान भारत की जनता ने अपनी संगठित ताकत को पहचान. परिणाम यह हुआ कि हर वर्ग हर जाति का आदमी अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध के लिए खड़ा हो गया. देश ने संभवतः पहली बार एक राष्ट्र के रूप में स्वयं को अनुभव किया. आजादी मिली तो यह भी अनुभव किया जाने लगा कि समरस समाज सुदृढ़ राज्य की जरूरत है. इसलिए राष्ट्र की मजबूती के लिए धर्म, जाति एवं आर्थिक आधार जितने भी भेदभाव हैं, उन सभी को मिटाकर एक समानता पर आधारित समाज की स्थापना की जाएगी. लोकतांत्रिक व्यवस्था सोचे गए लक्ष्य के लिए वरदान सिद्ध हो सकती थी. इसलिए स्वाधीनता प्राप्ति के उपरांत देश में जाति एवं धर्म आधारित विभाजन को गैरजरूरी मानते हुए समरस समाज की स्थापना पर जोर दिया गया. गणतंत्र प्राचीन भारत में भी जाति-वर्ग के आधारित समाजों की कमी को पाटने की कोशिश करता रहा था, आजादी के बाद भी वह समाज को एकसूत्र में पिरोने के लिए भरसक प्रयासरत है, आवश्यकता गणतांत्रिक संस्थाओं को और अधिक सशक्त करने, तथा लोगों को इस बारे में जागरूक बनाने की है.

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भानुक्रमणिका

1. The gana leaders should be respected as the worldly affairs (of the ganas) depend to a great extent upon them…the spy (department) and the secrecy of counsel (should be left) to the chiefs, for it is not fit that the entire body of the gana should hear those secret matters. The chiefs of gana should carry out together, in secret, works leading to the prosperity of the gana , otherwise the wealth of the gana decays and it meets with danger. Mahabharata 12.107, trans. – by R.C. Majumdar, Corporate Life, 251 as quoted by by Steve Muhlberger in Democracy in Ancient India.

2. …the form of government was democratic and not regal. – Q. Curtius Rufus, History of Alexander the Great 9.8, Classical Accounts, p. 151; Diodorus Siculus, Bibliotheca Historica 17.104, Classical Accounts, p. 180.

3. At last, however, after many years had gone, most of the cities adopted the democratic form of government, though some retained the kingly until the invasion of the country by Alexander. – Diodorus Siculus 2.39, Classical Accounts, p. 236.

4. There was a complex vocabulary to describe the different types of groups that ran their own affairs. Some of these were obviously warrior bands; others more peaceful groups with economic goals; some religious brotherhoods. Such an organization, of whatever type, could be designated, almost indifferently, as a gana or a sangha; and similar though less important bodies were labeled with the terms sreni, puga, or vrata. Gana and sangha, the most important of these terms, originally meant “multitude.” By the sixth century B.C., these words meant both a self-governing multitude, in which decisions were made by the members working in common, and the style of government characteristic of such groups. In the case of the strongest of such groups, which acted as sovereign governments, the words are best translated as “republic.” by Steve Muhlberger, Democracy in Ancient India.

5. ‘Republican polities were most common and vigorous in the Buddhist period, 600 B.C.-A.D. 200. At this time, India was in the throes of urbanization. The Pali Canon gives a picturesque description of the city of Vesali in the fifth century B.C. as possessing 7707 storied buildings, 7707 pinnacled buildings, 7707 parks and lotus ponds, and a multitude of people, including the famous courtesan Ambapali, whose beauty and artistic achievements contributed mightily to the city’s prosperity and reputation. The cities of Kapilavatthu and Kusavati were likewise full of traffic and noise. Moving between these cities were great trading caravans of 500 or 1000 carts — figures that convey no precise measurement, but give a true feeling of scale: caravans that stopped for more than four months in a single place, as they often did because of the rainy season, were described as villages. Religion, too, was taking to the road.’ – by Steve Muhlberger, Democracy in Ancient India.

6. Furthermore, power in some republics was vested in a large number of individuals. In a well-known Jataka tale we are told that in the Licchavi capital of Vesali, there were 7707 kings (rajas), 7707 viceroys, 7707 generals, and 7707 treasurers.- Jataka 149, trans. in The Jataka, or Stories of the Buddha’s Former Births, ed. E.B. Cowell, tr. by Various Hands, 6 vols. (1895; reprint, London, 1957).

7. The Lalitavistara, in an obvious satirical jab, depicts Vesali as being full of Licchavi rajans, each one thinking, ‘I am king, I am king,” and thus a place where piety, age and rank were ignored.’ – Khanna.

8. .…there was “a craze for constituting new republics” which “had reached its climax in the Vahika country and north-west India where clans constituting of as many as one hundred families only organized themselves as Ganas.” By V.S. Agrawala, India as Known to Panini: A study of the cultural material in the Ashatadhyayi as quoted by Steve Muhlberger.