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चलते-चलते : बचपन पर विमर्श

सामान्य
बालक के मनोविज्ञान को लेकर हमारी जानकारी सिर्फ अनुमान केंद्रित होती है. हम उसे जितना सहज-सरल मानते हैं, वह उतना ही जटिल होता है. हम बचपन की सोचते हैं, वह बचपन से दूर जाने की सोचता है. इसका मतलब यह नहीं है कि बालक के लिए बचपन जेल होता है. बचपन बालक के लिए खेल का मैदान है, जहां वह खुद कप्तानी करता है और चाहता है कि बड़े सिर्फ तमाशा देखें, हस्तक्षेप न करें.

 

किसी भी लेखक या साहित्यकार से पूछ लीजिए. खासकर उससे जो बच्चों के लिए लिखता और बालमनोविज्ञान का पारखी होने का दावा करता हो. हर कोई कहेगा कि बच्चों के लिए लिखना बहुत कठिन है. परकाया प्रवेश जैसा. एक तरह से दूसरे की मानसिकता को जीना, कथापात्र की मनोस्थिति में रमना, फिर लिखना. उनकी माने तो लेखक को इस काम के लिए बचपन की उस पृष्ठभूमि की ओर लौटना पड़ता है, जिसे वह उम्र के अंतराल में बहुत पीछे छोड़ आया है. यह प्रक्रिया जटिल बताई गई है, इसलिए बच्चों के लिए लिखना सामान्यतः मुश्किल मान लिया जाता है. यह सही है या गलत, पता नहीं. लेकिन बच्चों के लिए लिखने से पीछा छुड़ाने का यह अच्छा बहाना लगता है. बालसाहित्य लेखन को चुनौतीपूर्ण कहने वाले लेखकों में अधिकांश वे हैं, जो उसे ज्यादा तवज्जो नहीं देते. उन्हीं में से कुछ बालसाहित्य और बालसाहित्यकार दोनों को दोयम दर्जे का मानते हैं. एक ओर तो यह कहना कि बच्चों के लिए लिखना कठिन है. दूसरी ओर जो लिखने की हिम्मत जुटाएं उन्हें दोयम दर्जे के लेखक, साहित्यकार घोषित कर देना! इस विरोधाभास का शिकार केवल लेखक नहीं हैं. अध्यापन जगत से जुड़े विद्वान भी कुछ ऐसा ही मानते हैं. वहां भी बच्चों को पढ़ाने का काम कठिन माना जाता है. इसके बावजूद जो उस जिम्मेदारी को निभाते हैं, उन्हें ‘मास्टरजी’ कहकर हल्के में लिया जाता है. बच्चों को लेकर यह सोच जान-अनजाने समाज के सभी वर्गों में व्याप्त है. किसी न किसी रूप में हम सभी मान लेते हैं कि बालक वह है जो बड़ा नहीं है. और जो बड़ा नहीं है, उसे बड़ा बनाने के लिए अपने विचार, अपनी मान्यताएं, अपने सपने, आग्रह-दुराग्रह यहां तक कि अपनी कुंठाओं को भी उनपर लादने के अधिकार हमें प्राप्त हैं.

मेरे विचार में परामनोविज्ञान या पराकल्पना जिसके माध्यम से पीछे छूट चुके बचपन का वर्षों बाद पुनः अनुभव कर सकेंᅳकोई चीज नहीं होती. ऐसा भी नहीं है कि लेखक जो लिखता है, वह सत्य से सर्वथा परे, निरी मनोरचना होता है. श्रेष्ठ लेखक व्यक्तिगत सत्य या कार्य-कलापों से सार्वजनिक सत्य निकालने की कला में दक्ष होता है. यही उसका लेखकीय कौशल है. इसके लिए उसके पास कल्पना, संवेदनशीलता. अभिव्यक्ति कला जैसे कुछ विशेष उपकरण होते हैं. कल्पना उसे अपने कथापात्रों के मानस में झांकने, उससे अंतरंग होने में मदद करती है. उसके माध्यम से लेखक अपने कथापात्रों तथा कथावस्तु का सामान्यीकरण करता है. यह व्यैक्तिक सत्यों से सार्वभौम सत्य तक पहुंचने की यात्रा है, उसमें निपुण व्यक्ति ही साहित्यकार या विचारक होने का दावा कर सकता है. संवेदनशीलता लेखक को अपने कथापात्रों के मन में झांकने, उनसे अंतरंग होने तथा उसके अंतर्द्वन्द्वों को समझने का अवसर प्रदान करती है. अभिव्यक्ति कला पाठक को रचना के प्रवाह में बहा ले जाने का कौशल है. ये सब लेखक के अपने अनुभव एवं बौद्धिक सामर्थ्य पर भी निर्भर करते हैं. इसलिए खास विषयवस्तु को लेकर अलग-अलग लेखक की प्रस्तुतियों में अंतर होता है. दूसरे शब्दों में पराकल्पना या परामनोविज्ञान यानी दूसरे की मनस्थिति के अनुसार खुद का अंतरण कर लेना सिवाय परिकल्पना के कुछ नहीं है.

जिसे दूसरे की अवस्था में अंतरण यानी परकाया प्रवेश कहते हैं वह लेखक द्वारा अपने कथापात्र तथा उसकी परिवेश के साथ अंतरंग होना है. यह बड़ों की रचना के लिए भी उतना ही आवश्यक है, जितना बालसाहित्य की रचना के लिए. उसके अभाव में रचना प्रामाणिक हो ही नहीं सकती. यहां बालसाहित्यकार और मनोवैज्ञानिक की कार्यशैली के अंतर को समझा जा सकता है. बच्चों के लिए लिखने या बच्चों पर लिखने के लिए उनकी मनोभूमि को समझना जरूरी है. यह खुद को बालक के समानांतर रखकर संभव है. यह जानना भी जरूरी है कि दुनिया को समझने का बालक का अपना तरीका होता है. जिस वस्तु को उसे समझना हो, पहले वह उसे अपने व्यक्तित्व के समानांतर धरातल पर ले आता है. इसके अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं. अधिकांश बालक मिठाई खाना पसंद करते हैं. परंतु आवश्यक नहीं कि जिस मिठाई को बड़े चाव से खाते हों, बालक को उतनी ही पसंद हो. बालक का मन. महंगी मिठाइयों को नकार कर वह मामूली मीठी गोलियों से भी बहल सकता है. वे बालक को अपने व्यक्तित्व के अनुकूल लगती हैं. छोटेपन का एहसास तक नहीं होने देतीं. कह सकते हैं कि बालक का सबसे बड़ा बचपना यही है कि वह खुद को बालक नहीं समझता. बच्चों के लिए यह सोचकर लिखने वाले कि उसके लिए बालक की मनोभूमि को उसी के स्तर पर आकर समझना आवश्यक है, प्रकारांतर में अपने ही बचपन को याद करने लगते हैं. उस दौर में पहुंचने की कोशिश करते हैं, जब वे स्वयं बालक हुआ करते थे. उस समय वे अपनी उम्र के अंतर को भूल जाते हैं. उन सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तनों को भी भूल जाते हैं, जिनसे समाज उस अंतराल में गुजर चुका है. नतीजा यह होता है कि उनकी रचनाएं अतीतमोह की शिकार नजर आती हैं. बालसाहित्य की रचना को अनुभूति-सिद्ध बनाने का सही रास्ता यह है कि किसी बालक को देखते, उसके कार्यव्यवहार का सूक्ष्म निरीक्षण करते हुए यथार्थवादी लेखन किया जाए. यह काम कवि की संवेदना, वैज्ञानिक जैसी विवेचना, धीरज तथा पैनी नजर की मांग करता है. आम तौर पर लेखक इससे परहेज करते हैं. कई बार वैसा अवसर भी उनके पास नहीं होता. इसलिए बालसाहित्य के नाम पर लिखी जाने वाली अधिकांश रचनाएं बालमनोविज्ञान पर कसौटी पर खरी नहीं उतर पातीं.

 

कमोबेश सब मानते हैं कि बालक बौद्धिक स्तर पर अपरिपक्व होता है. या कम से कम वे बातें नहीं जानता जिन्हें ‘बड़े’ जानते हैं क्या वह व्यक्तित्व के स्तर पर भी छोटा होता है? लेख के अगले हिस्से में हम इसी पर विचार करेंगे. इसके लिए यह जानना आवश्यक है कि बालक किसे कहा जाए? बाकी प्राणियों की भांति बालक भी धीरे-धीरे बढ़ता हुआ भरपूर कद-काठी प्राप्त करता है. सुरक्षा और जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के लिए माता-पिता पर निर्भर होता है. उनसे सीखते, उनकी नकल करते हुए जीवन का पहला पाठ पढ़ता है. समय के साथ उसके मस्तिष्क का भी विकास होता है. अनुभव में वृद्धि होती है. फिर बड़ा होकर एक दिन स्वयं माता या पिता बनता है. बच्चे के अनेक गुण, आदतें उसे अपने माता-पिता की ओर से विरासत में प्राप्त होती हैं. इस आधार पर कुछ लोग बालक को बड़ों का लघु संस्करण मानते हैं. कुछ समय पहले तक पश्चिम में भी बालक को युवा-वयस्क(यंग एडल्ट) कहने का चलन रहा है. मध्यकाल तक दुनिया के प्रायः सभी देशों में ऐसा रहा है. लोग अपनी संतान से प्यार करते थे. उसे अगली पीढ़ी के रूप में तैयार करते थे. मगर उनके निर्णय अथवा विचार का कोई मोल नहीं था. आधुनिक विद्वान, खासकर मनोवैज्ञानिक इसे मानने को तैयार नहीं हैं. उनके अनुसार मनुष्य की विकास प्रक्रिया शेष जीव-जगत या वनस्पतियों के विकास से भिन्न है. मनुष्य को छोड़कर बाकी सब का विकास पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर होता है. उनमें न तो स्वतंत्र निर्णय लेने का सामर्थ्य होता है, न परिस्थितियों को बदल देने की इच्छाशक्ति. जबकि बालक ऊर्वर मस्तिष्क का स्वामी होता है. वह अपने फैसले स्वयं लेना पसंद करता है. उसमें नएपन के प्रति तीव्र आकर्षण होता है. रूसो के अनुसार बालक जिन तीन स्रोतों का ज्ञानार्जन की आधार-साम्रगी के रूप में इस्तेमाल करता है, उनमें समाज, प्रकृति और वस्तु जगत सम्मिलित हैं.

 

सृष्टि में मनुष्य अकेला विवेकशील प्राणी है. परंतु विवेक जन्मजात नहीं होता. जन्मजात जिज्ञासा होती है. कौतूहल होता है. शोध बताते हैं कि गर्भस्थ भ्रूण भी बाहर की हलचलों के प्रति संवेदनशील होता है. चार महीने का शिशु आहट पर चैंकने लगता है. छह महीने के बाद वह अपने स्वतंत्र एवं एकीकृत अस्तित्व को महसूस करने लगता है. धीरे-धीरे वही एहसास देहासक्ति में ढल जाता है. मां और अपने छोटे-भाई बहनों को देखकर बालक यह सोचने लगता है कि वह दूसरों से अलग है. यहां तक कि मां के साथ एकमेव न होकर अन्य है. इसी के साथ अपने-पराये की भावना भी जन्म ले लेती है. मां जब उसे शीशा दिखाती है तो उसका विश्वास और भी मजबूत हो जाता है. फ्रांसिसी मनोविज्ञानी जेकुइस लकां इसे आत्ममोह की शुरुआत का क्षण मानते हैं. वह मान लेता है कि जो दर्पण में है, वही वह है. लेकिन वह नहीं जान पाता कि छवि उसकी इयत्ता न हो कर केवल उसका प्रतिबिंब है. उस समय दर्पण में बालक की प्रतिछाया के साथ आसपास की वस्तुओं के प्रतिबिंब भी होते हैं. उनमें अपने प्रतिबिंब को देख बालक परिवेश के बीच अपनी उपस्थिति को महसूसता है. इससे उसकी मानसिक सक्रियता का अनुमान लगाया जा सकता है. इसी प्रकार की घटनाएं बालक के अहं के विकास का कारण बनती हैं. हालांकि उसकी नींव ऐसी समझ पर टिकी होती है, जो प्रतिबिंब होने के कारण यथार्थ से परे है.

जाहिर है, अनुभव के अलावा फंतासियां और कल्पनाएं भी बालक के प्रबोधीकरण में महत्त्चपूर्ण भूमिका निभाती हैं. आशय है कि विकास को केवल दैहिक परिवर्तन की कसौटी द्वारा तय नहीं किया जा सकता. दर्शन की निगाह में मस्तिष्क को देह से शक्तिशाली माना गया है. प्लेटो का विचार था कि ज्ञान कुछ और नहीं, मस्तिष्क में पहले से ही मौजूद प्रत्ययों का पुनःसंग्रहण है. दर्शन, गणित और विज्ञान में समान दखल रखने वाले रेने देकार्त की मान्यता भी लगभग मिली-जुली थी. ‘मोम की गैंद’ के साथ किए गए अपने चर्चित प्रयोग द्वारा वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि वस्तु-विशेष के बारे में हमारी निष्पत्तियां मस्तिष्क में पहले से ही मौजूद प्रत्ययों का उत्स होती हैं. देकार्त को आधुनिक पश्चिमी दर्शन का पितामह माना गया. तथापि बालक के बारे में सच्ची उत्सुकता पैदा करने वाला विचारक थाᅳजॉन लॉक. मस्तिष्क को ‘टेबुला रासा’(कोरी सलेट) बताकर लॉक ने प्लेटो और रेने देकार्त की अवधारणाओं को एकदम उलट दिया था. अपने लेख ‘एन ऐस्से कन्सर्निंग ह्यूमेन अंडरस्टेंडिंग’ में अपनी मूल अवधारणा कि जन्मजात बोध जैसा कुछ नहीं होता, का बचाव करते हुए उसने लिखा था कि बालक अपना बोध ‘अपने परिवेश, संवेदनशील वस्तुओं तथा परिजनों से ग्रहण करते हैं.’ उसका मानना था कि बालक उस समय तक किसी नए ज्ञान या व्यक्ति के प्रति आकर्षित नहीं होता, जब तक वह ऐसी किसी जानकारी या व्यक्ति संबद्ध न हो, जिससे वह पहले से ही परिचित है. लॉक का यह भी मानना था कि शिशु की ‘कोरी सलेट’ कोरी भले हो, निष्क्रिय नहीं होती.

‘मैं इससे इन्कार नहीं करता कि (जन्म के समय से ही) मानव-मस्तिष्क में कुछ नैसर्गिक प्रवृत्तियां मौजूद होती हैं. बेहद महत्त्वपूर्ण. उनमें से कुछ एक-दूसरे का समर्थन करती हैं. कुछ जोरदार विरोध. कुछ लंबे समय तक अड़ी रह सकती हैं. कुछ एकाएक उड़न-छू हो जाती हैं. परंतु वे अनुभूतियां मनुष्य के बोध अथवा बोधगम्यता की क्षमता को कतई प्रभावित नहीं करतीं.’1

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विज्ञान लेखन और नैतिकता के सवाल

सामान्य

इस लेख का उद्देश्य बच्चों के लिए विज्ञान साहित्य की उपयोगिता पर सवाल खड़े करना नहीं है. यह मानते हुए कि विज्ञान साहित्य की जितनी उपयोगिता बड़ों के लिए है, उतनी बच्चों के लिए भी है—हमारा ध्येय लिखे जा रहे विज्ञान साहित्य पर समीक्षादृष्टि डालना है. यह देखना है कि जो विज्ञान साहित्य इन दिनों लिखा जा रहा है, उसमें साहित्य जैसा क्या है? और यदि उसमें ‘साहित्यत्व’ का अभाव है, अथवा कहीं विचलन है, तो उसके कारण क्या हैं? साहित्यिक आचारसंहिता के नाते आलोचकों और समीक्षकों का यह दायित्व है कि रचना का अन्वीक्षण, उसकी नीरक्षीर विवेचना करते समय भाषा, शैली, व्याकरण, विषयवस्तु आदि के अलावा, रचना की अंतनिर्हित शुभता; यानी साहित्यत्व को भी कसौटी बनाएं. देखें कि रचना में ‘साहित्य’ अथवा ‘सर्वहितकारी’ जैसा क्या है? ऐसा कौनसा गुण है जो उस रचना को साहित्य की कोटि में ले आता है? दूसरे शब्दों में रचना का नैतिक पक्ष, जिसे उसका मूल्य भी कह सकते हैं, उसकी आलोचनाविवेचना की प्रथम कसौटी होना चाहिए. जबकि सामान्य आलोचना प्रायः बड़े नामों, भाषाशैली, प्रस्तुतीकरण और मनोरंजकता तक सीमित रह जाती हैं. मूल तथ्य जिससे रचना को साहित्य का दर्जा मिलता है, जिसके लिए कोई संवेदनशील रचनाकार कलम उठाता है, अथवा जो मुद्दा उसको कलम उठाने के लिए उद्वेलित करता है—उपेक्षित रह जाता है.

यहां हमारा आशय आलोचना के नैतिकतावादी पक्ष से है, जो किसी रचना को साहित्य की श्रेणी में लाने के लिए उसका अपरिहार्य गुण है. पर्याप्त नैतिक प्रेरणा के अभाव में लेखक केवल लिखने के लिए लिखते हैं. आलोचक नैमत्तिक कर्म की तरह आलोचना करते हैं. ऐसी कलावादी आलोचना समाज पर वैसा असर नहीं डाल पाती, जैसा अपेक्षित होता है. इससे कभीकभी रचनाकार के स्तर पर हताशा भी व्याप जाती है—‘कुछ नहीं बदलना’, ‘सब इसी तरह चलता रहेगा’—का नैराश्यभाव उसे स्थायी पलायन की मुद्रा में ले आता है. जबकि लेखन की सार्थकता जीवन और समाज में जो भी अच्छा है, सकारात्मक है, उसे बाहर लाने; तथा मनुष्य का उसकी मूलभूत अच्छाइयों में विश्वास जगाने में है. अच्छी रचना नैतिक मूल्यों की उत्प्रेरक होती है. वह पाठक और समाज के बीच जीवनमूल्यों की अबाध आवाजाही हेतु संबंधसेतुओं का निर्माण करती है. आधुनिक जीवन चूंकि विज्ञान और प्रौद्योगिकी से अत्यधिक प्रभावित है, अतएव आलोचना की नैतिकताकेंद्रित कसौटी को लेकर, विज्ञान लेखकोंसमीक्षकों से हमारी अपेक्षाएं और भी बढ़ जाती हैं. ‘साहित्यत्व’ की खोज विज्ञानलेखन के अलावा साहित्य की दूसरी धाराओं और विधाओं में भी की जा सकती है, की जानी चाहिए. मगर लेख की सीमाओं को ध्यान में रखते हुए फिलहाल हम अपनी बात विज्ञान साहित्य तक सीमित रखेंगे.

उपर्युक्त कसौटी पर हिंदी विज्ञान साहित्य की समीक्षा करें तो कुछ चीजें स्पष्ट रूप से सामने आने लगती हैं. प्रायः सभी रचनाओं में वैज्ञानिकों तथा उनके आविष्कारों को मनुष्यता के प्रति समर्पित और कल्याणकारी दिखाया जाता है. जहां ऐसा नहीं है, जिन रचनाओं में वैज्ञानिक अथवा उससे जुडे़ व्यक्तियों की निजी महत्त्वाकांक्षाएं लोकहित पर भारी पड़ें, वहां वैज्ञानिक के हृदयपरिवर्तन द्वारा उसे सही रास्ते पर लाने की कोशिश की जाती है; अन्यथा मनुष्यता की समर्थक शक्तियों के आगे उसे पराजित होना पड़ता है. पशुता पर मनुष्यता की विजय साहित्यत्व की पहली कसौटी है. उसके अभाव में रचना साहित्य बन ही नहीं सकती. विज्ञान सबके लिए है, उसके लाभ सभी तक पहुंचने चाहिए, मनुष्य समाज का ऋणी होता है, अतः उसके ज्ञानविज्ञान पर समाज का भी पूरापूरा अधिकार है—यह संदेश प्रत्येक विज्ञानरचना का मूलमंत्र होता है. इसके आधार पर विज्ञान लेखक साहित्यकर्म की कसौटी पर खरा उतरने का दावा कर सकते हैं.

आधुनिक विज्ञान का जन्म 15वीं शताब्दी की महत्त्वपूर्ण घटना है. पश्चिमी विज्ञान का पितामह कहा जाने वाला फ्रांसिस बेकन उसे लेकर बेहद आशान्वित था. ‘ज्ञान ही शक्ति है’—कहकर उसने ज्ञानविज्ञान आधारित समाज के गठन पर जोर दिया था. बेकन का मानना था कि विज्ञान मनुष्य को जानलेवा श्रम और व्याधियों से बचाकर उसका मुक्तिदाता सिद्ध होगा. बेकन राजसत्ता से जुड़ा था. सत्ता और शक्ति दोनों उसके पास थे. जानता था कि सत्ता के फैलाव के लिए बड़ी शक्ति चाहिए. बड़ी शक्ति यानी बड़ी सत्ता. और सत्ताएं आमतौर पर महत्त्वाकांक्षी होती हैं. अपने विस्तारवादी मनसूबों को साधने के लिए वे अपनी ताकत लगातार बढ़ाती रहती हैं. इसका दूसरा पहलू यह है कि किसी भी राष्ट्र की शक्तियां उसकी जनता और संसाधनों पर निर्भर करती हैं, जिनका कालखंड विशेष में एक सीमा तक ही दोहन संभव होता है. वैज्ञानिक होने के बावजूद बेकन को संभवतः याद नहीं था कि ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत व्यापक संदर्भों में, देश और समाज पर भी लागू होता है. उसका व्यावहारिक संदेश यह भी है कि यदि एक स्थान पर संसाधनों का अनावश्यक और अतिरिक्त दोहन हो तो उनका अन्यत्र अभाव अवश्यंभावी होता है.

औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप सतरहवींअठारहवीं शताब्दी में यूरोप ने इतनी तेजी से तरक्की की थी कि विज्ञान नई पीढ़ी का जीवनमंत्र जैसा बन गया. जो देश उससे वंचित थे, वे उसको पाने के लिए ललचाने लगे. पूरी दुनिया में उसके लिए होड़सी मच गई. बेकन का यह सोच गलत नहीं था कि विज्ञान मनुष्यता की अनेक समस्याओं का निदान करने में सक्षम है. विज्ञान खुद को ऐसा दर्शा भी चुका था. लेकिन ताकत की विशेषता है कि वह उसी का हित साधती है, जिसका उसपर अधिकार होता है. दूसरे शारीरिक शक्ति को छोड़कर बाकी किसी भी शक्ति का प्रबंधन जटिल कार्य होता है. जो व्यक्ति शक्तिप्रबंधन की कला से अनभिज्ञ है, अथवा उससे वंचित है, यह वंचना चाहे जिस कारण से भी हो—वह न केवल पिछड़ जाता है, बल्कि दूसरों के बराबर में आने के उसके अवसर भी तेजी से घटते चले जाते हैं. अपनी स्थिति का लाभ उठाकर शक्तिधारक(अथवा शक्ति प्रबंधक) व्यक्ति, शक्तिविपन्न व्यक्तियों के साथ मनमानीभरा वर्ताब करता है. परिणामस्वरूप शोषण बढ़ता है और असमानता में वृद्धि होती है. ऐसे समाजों में जहां जनता शिखरस्थ शक्तियों की गतिविधियों की ओर से उदासीन; अथवा उनकी ओर से आंखें मूंदे रहती है, वहां शीर्षस्थ लोग बड़ी चतुराई से अपनी शक्तियों को राज्य की अथवा राज्य समर्थित शक्तियों के रूप में प्रचारित करते हैं. धीरेधीरे वे राज्य के संसाधनों को अपने अथवा अपनी समर्थक शक्तियों के अधीन करते जाते हैं.

चूंकि किसी कालविशेष में, जब तक नए संसाधनों का दोहन न हो या उन्हें पहचाना न जाए—राज्य की कुल शक्तियां सीमित होती हैं, इसलिए शीर्ष वर्ग की शक्ति और समृद्धि शेष समाज की दुर्बलता और विपन्नता की कीमत पर आती है. अपनी उपलब्धियों को राज्य की उपलब्धि की भांति पेश करते हुए शिखरस्थ लोग, कभीकभी जनता की सहानुभूति भी बटोर लेते हैं. इस प्रकार वे स्वयं को उत्तरोत्तर शक्तिशाली बनाते जाते हैं, हालांकि वे दावा राष्ट्र के शक्तिशाली होने का ही करते हैं. उनके अनुसार राष्ट्रसशक्तीकरण का अभिप्राय है, जनता के हाथों से ताकत खिसककर शीर्ष पर मौजूद चंद लोगों के हाथों में सिमट जाना. विज्ञान की चलायमान प्रवृत्ति और उसकी शक्ति के दुरुपयोग की संभावना को सबसे पहले रूसो ने समझा था. उसका मानना था कि विज्ञान ने मनुष्य और प्रकृति के बीच दूरी पैदा की है. परिणामस्वरूप व्यक्ति प्रकृति को भोग्य वस्तु की भांति देखता है. इससे समाज में भौतिक सुखों के प्रति होड़ पैदा होती है. प्लेटो की भांति रूसो भी सामाजिक समस्याओं का निदान नैतिकता के अनुपालन में ढूंढता था. ‘एमाइल’ में उसने लिखा था—‘बालक को विज्ञान पढ़ाने की अपेक्षा अपने परिवेश से प्यार करने की शिक्षा देना, उसके बारे में जागरूक बनाना ज्यादा जरूरी है.’ इसी को कुछ भिन्न शब्दों में आइंस्टाइन ने भी स्वीकार किया है—‘अधिकांश लोग मानते हैं कि प्रतिभा महान वैज्ञानिक बनाती है. वे गलत हैं: असली चीज तो व्यक्तित्व है.’ रूसो और आइंस्टाइन दोनों ने ही विज्ञान का अंधानुकरण करने, उसको धर्म मान लेने की प्रवृत्ति का विरोध किया था. इसके लिए उसकी खूब आलोचना हुई. लेकिन वह अपने विचारों पर अडिग रहा. कालांतर में उसके समर्थक बढ़ते गए. उसके साथसाथ पूरी दुनिया में यथार्थवादी लेखकों की संख्या भी बढ़ती गई. साहित्य की अवधारणा भी संघर्ष के इसी दौर में पनपी.

यह निर्विवाद है कि विज्ञान ने आर्थिक समृद्धि की दर को गति प्रदान की है. मगर उससे समाजार्थिक विषमता भी तेजी से बढ़ी है. गरीबी पहले भी थी. सामाजिक असमानता पहले भी थी, लेकिन विज्ञान और प्रौद्योगिकी के वर्चस्व से पहले मानवीय कलाकौशल का महत्त्व था. न केवल मनुष्य बल्कि पूरा समाज अपने शिल्पकौशल पर गर्व करता था. विज्ञान और प्रौद्योगिकी का सबसे पहला हमला मानवीय अस्मिता के संरक्षक और प्रतीक मानेवाले इन्हीं मूल्यों पर हुआ. श्रम से मुक्ति तथा सघन उत्पादन के नाम पर मशीनें, मानवशिल्प और उससे आगे बढ़कर मानवीय अस्मिता पर कब्जा करती गईं. उससे उपभोक्ताकरण की राह आसान होनी ही थी. वही हुआ. नतीजा हमारे सामने है. आज मनुष्य के प्रत्येक निर्णय यहां तक कि संबंधों पर भी बाजार की छाया देखी जा सकती है.

चूंकि संसाधनों के दोहन तथा उन्हें लोकोपयोगी बनाने में विज्ञान का बड़ा योगदान होता है, अतएव वैज्ञानिकों एवं विज्ञान लेखकों से हमारी अपेक्षाएं बहुत बढ़ जाती हैं. उनसे उम्मीद की जाती है कि वे विज्ञान के ऐसे उपयोग की ओर सबका ध्यान आकृष्ट कराएं जिससे आर्थिक, सामाजिक सहित सभी प्रकार के लाभों की सिद्धि हो सके. वैज्ञानिक शोध अपने आप में खर्चीला उद्यम है. उसके लिए भारी निवेश की आवश्यकता पड़ती है. ऐसे में विज्ञान लेखक को दुहरी भूमिका निभानी पड़ती है. स्वचेता रचनाकार के रूप में पाठकों के प्रबोधन की, ताकि वे अपने आसपास की घटनाओं के बारे में बैज्ञानिक सूझबूझ के साथ निर्णय ले सकें. दूसरी भूमिका ज्ञानविज्ञान के सामाजिक लाभों के पक्ष में माहौल बनाने की होती है, ताकि नवीनतम आविष्कार और प्रौद्योगिकी केवल पूंजीपतियों के लाभ कमाने का जरिया बनकर न रह जाएं. वे अधिकतम लोगों के कल्याण का माध्यम बन सकें. प्रतिबद्धता की कमी के चलते अधिकांश विज्ञान लेखक दूसरी भूमिका में कमजोर, बल्कि कई बार तो पूंजीपतियों के हितरक्षक सिद्ध होते रहे हैं.

हिंदी में विज्ञान लेखन की परंपरा करीब सवा सौ वर्ष पुरानी है. बच्चों के लिए स्वतंत्र साहित्य सृजन की शुरुआत उससे लगभग एक दशक पहले हो चुकी थी. अंतर केवल इतना था कि आरंभिक बालसाहित्य जहां लोकसाहित्य, पुराण, उपनिषद्, जातक, कथासरित्सागर, पंचतंत्र आदि से प्रभावित था, वहीं परंपरा के अभाव में आरंभिक हिंदी विज्ञान कथाएं तथा उपन्यास पश्चिमी रचनाओं का अनुवाद अथवा उनकी पुनः प्रस्तुति मात्र थे. हिंदी में विज्ञान लेखन की शुरुआत, 1884 से 1888 के बीच ‘पीयूष प्रवाह’ में धारावाहिक रूप से प्रकाशित, अंबिकादत्त व्यास की रचना ‘आश्चर्यजनक वृतांत’ से मानी जाती है. यह कृति जूल बर्न के उपन्यास ‘जर्नी टू सेंटर आफ दि अर्थ’ का देसी संस्करण थी. केशव प्रसाद सिंह की चर्चित विज्ञान कथा ‘चंद्र लोक की यात्रा’(जून 1900) भी जूल बर्न की प्रसिद्ध रचना ‘फ्राम दि अर्थ टू दि मून’ पर आधारित थी। इन रचनाओं को मिली लोकप्रियता ने भारतीय लेखकों को भी उद्वेलित किया. इसके बावजूद हिंदी की प्रथम मौलिक विज्ञान कथा की रचना के लिए पाठकों को दो दशक लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ी. 1908 में प्रकाशित सत्यदेव परिव्राजक की कहानी ‘आश्चर्यजनक घंटी’ को हिंदी की प्रथम विज्ञान कथा होने का श्रेय प्राप्त है. उसके बाद तो प्रेमवल्लभ जोशी(छाया पुरुष 1915), अनादिधन बंधोपाध्याय(मंगल यात्रा, 1915-16), आचार्य चतुरसेन(खग्रास), नवल बिहारी मिश्र(अधूरा आविष्कार), ब्रजमोेहन गुप्त(दीवार कब गिरेगी) आदि लेखकों ने विज्ञान साहित्य को समृद्ध करने में योगदान दिया. अनादिधन वंधोपाध्याय ने अपनी विज्ञानकथा में पटरियों के ऊपर हवा में चलनेवाली रेलगाड़ी का वर्णन किया था. आज विकसित देशों में उच्च गति रेलगाड़ियों के संचालन हेतु विद्युतचुंबकीय ऊर्जा का भी उपयोग किया जाता है. जिसमें गाड़ी यात्रा के दौरान चुंबकीय प्रतिकर्षण बल के कारण पटरियों से मामूलीसी ऊपर उठकर यात्रा करती है.

हिंदी में विज्ञान लेखन की शुरुआत पुनर्जागरण के दौर में हुई थी. उस समय तक गल्प लेखन में तिलिस्म, जासूसी और ऐय्यारी से जुड़ी कहानियों का दबदबा था. देवकीनंदन खत्री, गोपाल राम गहमरी, किशोरी लाल गोस्वामी, विश्वेश्वर प्रसाद शर्मा आदि लेखकों ने तिलिस्म और जासूसी पर आधारित अनेक उपन्यास लिखे थे. उन उपन्यासों को खूब लोकप्रियता मिली. मगर जैसेजैसे साहित्य से अपेक्षाएं बढ़ीं, खासकर प्रेमचंद द्वारा यथार्थवादी साहित्य लेखन के बाद, वैसेवैसे तिलिस्म और जासूसी पर आधारित रचनाओं को दोयम दर्जे का समझा जाने लगा. उसकी जगह यथार्थवादी लेखन को बल मिला. चूंकि रहस्य, रोमांच, जासूसी और ऐयारी पर आधारित कथानकों की लोकप्रियता अक्षुण्ण थी, इसलिए वे विज्ञान गल्प का विषय बनने लगे. अथवा यूं कहो कि विज्ञान मंे रुचि रखने वाले लेखक उनमें नए प्रयोगों के साथ हाथ आजमाने लगे. यह स्वाभाविक भी था. अपनी मौलिकता के कारण अनेक वैज्ञानिक आविष्कार लोगों को चैंकाते थे. विशुद्ध वैज्ञानिक घटनाओं को जादू और चमत्कार बताकर जादूगर, तांत्रिक और तमाशेबाज शताब्दियों से जनता का मनोरंजन करते आए थे. लेकिन कोरा गल्प, चाहे उसमें वैज्ञानिक युक्तियों का प्रयोग हो अथवा तिलिस्म का, केवल गल्प माना जाएगा. इस कसौटी के मद्देनजर आरंभिक आलोचकों ने तथाकथित विज्ञानसाहित्य को भी नकारना आरंभ कर दिया. वे उसे दोयम दर्जे का लेखन कहने लगे. जूल बर्न जिसे उसके विज्ञानगल्प पर आधारित उपन्यासों और कहानियों के कारण पाठकों की भरपूर सराहना मिली थी—आलोचकों ने उसे साहित्यकार मानने से ही इन्कार कर दिया था. धीरेधीरे लोगों में विज्ञान के प्रति समझ पनपी. वैज्ञानिक प्रबोधन को आधुनिकता की अनिवार्यता माना जाने लगा. तब जाकर विज्ञान लेखन को साहित्य की मुख्यधारा के रूप में मान्यता मिलनी आरंभ हुई. यह कदाचित परंपरा का ही प्रभाव था कि हिंदी के आरंभिक विज्ञान गल्पकार यमुनादत्त वैष्णव ने अपनी औपन्यासिक कृतियों के जो शीर्षक(हिम सुंदरी, नियोगिता नारी, अपराधी वैज्ञानिक आदि) रखे, वे प्राचीन तिलिस्मी कृतियों के शीर्षकों से काफी मिलतेजुलते थे. यही कारण है कि भारतीय विज्ञान कथा लेखक, आलोचक भारतीय विज्ञान लेखन की नींव की खोज में तिलिस्मी और ऐय्यारी लेखन तक चले जाते हैं. इसके पीछे उनकी विवशता को समझा जा सकता है. जिस समाज में वैज्ञानिक प्रबोधन का अभाव हो, जो अज्ञान, अशिक्षा और रूढ़ियों के शताब्दियों लंबे दौर गुजरा हो, वहां नींव की तलाश के लिए ऐसे कच्चेभुरभुरे मैदानों से गुजरने की कोशिश स्वाभाविक कही जाएगी. हालात आज भी बहुत आश्वस्तकारी नहीं हैं. इसलिए आधुनिक विज्ञान लेखकों, आलोचकों द्वारा भारतीय विज्ञानकथा के मूल की खोज करते हुए तिलिस्मी साहित्य तक चले जाना स्वाभाविक माना जाएगा.

विज्ञानसाहित्य का एक उद्देश्य बच्चों का मानसिक प्रबोधन, उनमें तर्कसम्मत निर्णय लेने की क्षमता का विकास करना है. यह तभी संभव है जब विज्ञान लेखक का तार्किकता में भरोसा हो. वह उपलब्ध ज्ञानविज्ञान का वस्तुनिष्ठ विवेचन करने की योग्यता रखता हो. इन सबसे अधिक आवश्यक है कि वह जाति, वर्ग, धर्म और क्षेत्रीयता के प्रभावों और पूर्वाग्रहों से सर्वथा मुक्त हो. भारतीय परिवेश में पूर्वाग्रह मुक्त होना आसान नहीं है. सामान्य भारतीय विज्ञान लेखक बात तेइसवींचौबीसवीं शताब्दी की करेगा, किंतु उसकी मनोरचना अठारहवीं शताब्दी में ही चक्कर काटती नजर आएगी. शायद यही कारण है कि हिंदी विज्ञान साहित्य के लगभग सवा सौ साल पुराने इतिहास में पचास विज्ञानकथाएं भी ऐसी नहीं हैं, जिन्हें विश्व विज्ञानकथाओं की श्रेणी में रखा जा सके. कुछ और भी कारण हो सकते हैं. जैसे कि आरंभिक विज्ञान लेखकों में से अधिकांश समाज के अभिजात वर्ग से आए थे. उनके विचारों पर सांस्कृतिक जड़ता, वर्णभेद, जातिवाद आदि का प्रभाव था. यह वर्ग भारत के अतीत के गौरव की, जब देश में पुरोहितवाद का बोलवाला था, वापसी चाहता था. पूर्वाग्रहग्रसित होने के कारण इस वर्ग का लेखन विज्ञान की मूल भावना से काफी परे था. इस तरह का सोच रखने वाले विज्ञान लेखक आज भी बड़ी संख्या में हैं. दूसरे विज्ञानशिक्षा का माध्यम अंग्रेजी रहा है. अंग्रेजी माध्यम में पढ़ालिखा वर्ग हिंदी में अभिव्यक्त करने में अपनी हेठी मानता है. दूसरी ओर हिंदी का सामान्य लेखक पर्याप्त विज्ञानबोध के अभाव में कोरी फंतासी गढ़ता है. परिणामस्वरूप उसकी रचना वैज्ञानिक उपकरणों, सूचनाओं अथवा बेजान कल्पना तक सिमट जाती है.

साहित्यकार के रूप में विज्ञान लेखक सामान्यतः दो लक्ष्यों को साधता है. पहला विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हो रहे परिवर्तनों को सरल और पठनीय सामग्री के रूप में पाठक तक पहुंचाना. दूसरे उन कुरीतियों, रूढ़ियों, अंधविश्वासों और पाखंडों का पर्दाफाश करना जो अशिक्षा, अज्ञानता, धार्मिक आडंबरवाद और पोंगापंथी के कारण शताब्दियों से समाज में जगह बनाए हुए हैं. साथ ही पाठकों को तर्कसम्मत ढंग से सोचने की दृष्टि और विवेक देना, ताकि उनका आत्मविश्वास विकसित हो और वे जीवन की चुनौतियों का सामना विवेकपूर्ण ढंग से कर सकें. लेकिन किसी घटना के पीछे निहित वैज्ञानिक तथ्य को अकादमिक स्तर पर समझना एक बात है, व्यवहार में उसके अनुरूप ढलना, अपने आचरण को तर्कसंगत बनाना दूसरी बात. वैज्ञानिक प्रबोधन का काम तो विज्ञान की अकादमिक शिक्षा भी करती है. किंतु जब तक उसी अनुपात में सामाजिकसांस्कृतिक प्रबोधन न हो, तब तक समाज रूढ़ियों और जड़ परंपराओं को ढोते हुए अज्ञानता के अंधियार में जीने को विवश होता है. पुस्तकों में अर्से से पढ़ाया जा रहा है कि राहूकेतु किंवदंति हैं. ग्रहण सामान्य सौरमंडलीय घटना है. चेचक दैवी प्रकोप होने के बजाए महामारी है. भूतप्रेत केवल मन का बहम और कुछ ठग तांत्रिकों, ज्योतिषियों एवं पोंगापंथियों की चाल है….वगैरहवगैरह. इसके बावजूद यदि वे बड़े होकर मूर्तिपूजा में अपना श्रम और समय खपाते हैं, तांत्रिकों, ओझाओं और कलंदरों की शरण में जाते हैं, अंतरिक्ष अभियानों की सफलता के लिए कर्मकांड करते हैं, अथवा सांस्कृतिक दुराग्रहों के चलते उस तरह का नाटक करते हैं तो उसका कारण यह भी है कि जिस गंभीरता के साथ रूढ़िवादी लोग जनमानस में डर पैदा करने का काम करते हैं, उतनी ही गंभीरता के साथ विज्ञान लेखक और दूसरे समाजचेता लोग उस डर के निदान पर काम नहीं करते. इसे अतीतमोह कहिए या पूर्वाग्रह, विज्ञान लेखकों का एक वर्ग आज भी विज्ञान कथाओं के मूल की खोज को वैदिक युग तक खींच ले जाने को उद्यत है. इसके लिए दिए जानेवाले तर्क एकदम बचकाने हैं. किसी भी जाति या देश का अतीत प्रेरणादायी हो सकता है, वर्तमान पीढ़ियां उससे सीख भी ले सकती हैं, लेकिन व्यवहार में उसका महत्त्व एक गुजरे हुए सपने से बढ़कर नहीं होता. जीवन और समाज में सुधार के लिए अतीत के दबावों से मुक्त होना आवश्यक है.

बच्चों के लिए कैसा विज्ञान साहित्य रचा जाए इस बारे में हमारा मानना है कि ऐसा साहित्य जो बच्चों को न केवल वैज्ञानिक यंत्रों, सिद्धांतों से परचाए बल्कि उनमें पर्याप्त विज्ञानबोध भी विकसित करे. इस तरह पाठक का प्रबोधीकरण विज्ञानसाहित्य की पहली शर्त है. अच्छी विज्ञानकथा बिना वैज्ञानिक उपकरण, यंत्र, वैज्ञानिक सिद्धांत की उपस्थिति के भी लिखी जा सकती है, लेकिन बिना विज्ञान बोध के श्रेष्ठ विज्ञानसाहित्य रचना असंभव है. इसलिए अच्छी विज्ञानकथा वह है जो पाठक को ज्ञानविज्ञान की बारीकियों से परचाने के साथ साथसाथ उनमें पर्याप्त विज्ञानबोध का संचार; और यदि उसमें ये सब पहले से हैं तो उसमें इजाफा करती हो. आधुनिक जीवन शैली को बदलने या मनुष्य को आधुनिक बनाने में इस प्रौद्योगिकी का बड़ा योगदान रहा है. खासकर पिछले कुछ दशकों में बावजूद इसके इस क्षेत्र में नवीनतम शोध को लेकर जो खबरें आ रही हैं, उनसे लगता है कि भविष्य हमारे लिए विपुल संभावनाएं बचाए है. यह बात अलग है कि प्रौद्योगिकीय उपलब्धियों का जितना उपयोग सकारात्मक है, उतना नकारात्मक भी है. अपने मुनाफे के लिए पूंजीवादी उत्पादक प्रौद्योगिकी को प्रलोभनकारी उत्पादों के साथ पेश करते हैं. उसमें से अधिकांश का व्यक्ति के वास्तविक विकास से कोई लेनादेना नहीं होता. इसे देखते हुए बच्चों के लिए ऐसा विज्ञान साहित्य अपेक्षित है जो उनमें बाजार में मौजूद उत्पादों के प्रति आलोचकीय दृष्टि विकसित करे.

विडंबना है कि विज्ञान साहित्य के लेखन, अनुशीलन के समय लेखक और आलोचक प्रायः विज्ञान को श्रद्धाभाव से लेते हैं. वे मान लेते हैं कि साहित्य में विज्ञान के नाम पर जो हो रहा है, वह सही है. दूसरे शब्दों में वे मानते हैं कि विज्ञान साहित्य के नाम पर कुछ भी चल सकता है, जबकि विज्ञान के प्रति यह श्रद्धाभाव धार्मिक रूढ़िवाद से कम खतरनाक नहीं है. इसके चलते लेखक मिथक और यथार्थ में भेद नहीं कर पाते. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के दबाव में इस दिशा में तो आज मानो होड़सी मची है. अपनी पुस्तक ‘विज्ञान पत्रकारिता’ में डॉ. मनोज पटैरिया ने जयंत विष्णु नार्लीकर के एक व्याख्यान का हवाला दिया है. नार्लीकर द्वारा पत्रकारिता पर दिए गए व्याख्यान के बहाने से वे लिखते हैं—‘मैं देवर्षि नारद को पहला पत्रकार मानता हूं.’ नारद को आदि पत्रकार मानने वाले जयंत नार्लीकर अकेले नहीं हैं. पिछले कुछ वर्षों से नारद जयंती को इसी संदर्भ में मनाने का चलन बढ़ा है. यह मिथकों को सत्य मान लेने की गंभीर भूल है. इस तरह के मिथ्याख्यान, सांस्कृतिक श्रेष्ठता के दंभ के चलते, समाज को भ्रमित करने के लिए जानबूझकर गढ़े जाते हैं. उल्लेखनीय है कि ऐसे मिथक प्रत्येक समाज और संस्कृति में पाए जाते हैं. रोमन संस्कृति में ‘ओसा’(Ossa) अथवा ‘फेम’(Pheme) को पत्रकारिता तथा झूठ और अफवाह फैलाने वाली शक्ति के रूप में चित्रित किया गया है. होमर ने ‘ओडिसी’ एवं ‘इलियाड’ में कई स्थानों पर उसका उल्लेख किया है. भारतीय शास्त्रों में नारद की भूमिका भी उनसे मिलतीजुलती है.

भारतीय परंपरा में दूसरा उदाहरण महाभारत में संजय का है. धृतराष्ट्र की युद्ध का आंखों देखा हाल सुनने की इच्छा को देखते हुए व्यास ने संजय को दिव्यदृष्टि प्रदान की थी. उसके बारे में धृतराष्ट्र को बताते हुए वे कहते हैं—‘चक्षुषा संजयो राजन्दिव्यैनेष समन्वित कथष्यति ते युद्धं सर्वज्ञश्च भविष्यति. प्रकाशं वा रहस्यं वा रात्रौ वा यदि वा दिवा मनसा चिंततमपि सर्वं वेत्स्यति संजय. (भीष्मपर्व-6.2.10-11) ‘प्रकट हो अथवा गुप्त, दिन हो या रात, यहां तक कि मन में उठनेवाले विचारों को जानने की क्षमता भी संजय को प्राप्त है.’ संजय की कल्पना महाभारतकार की लेखकीय दक्षता को दर्शाती है. उल्लेखनीय है कि युद्ध में लंबेलंबे वर्णन वाल्मीकि रामायण में भी हैं. लेकिन वे वर्णनात्मक शैली में हैं. ऐसे वर्णन एक सीमा के पश्चात नीरस बन जाते हैं. उनमें दोहरावसा लगने लगता है. व्यास द्वारा दिव्यदृष्टा संजय की कल्पना युद्ध के दृश्यों को किस्सागोई के माध्यम से जीवंत बनाने के साथसाथ, धृतराष्ट्र के मानसिक उद्वेलन से पाठकों को परचाते रहने के लिए की गई थी. इस मौलिक कल्पना के लिए वे सराहना के पात्र हैं. ऐसे प्रसंग वैज्ञानिक परिकल्पना की पृष्ठभूमि तो बन सकते हैं, स्वयं विज्ञान या विज्ञानलेखन की कोटि में नहीं आते. संजय की दिव्यदृष्टि का प्रयोग सिवाय युद्ध के कहीं और देखने को नहीं मिलता. बावजूद इसके संस्कृतिवादी लोग मिथकीय पात्रों को वास्तविक मानने पर जोर देते रहते हैं. पटैरिया जी की पुस्तक से भी यही प्रकट होता है. वे इसे विश्वास में बदल देते हैं—‘यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि खाड़ी युद्ध में सीएनएन टेलीविजन ने जो करामातें दिखाईं, वे संजय ने महाभारत युद्ध में महाभारत युद्ध में प्रस्तुत की थीं.’ (विज्ञान पत्रकारिता, पृष्ठ-121). यह सच है कि खाड़ी युद्ध में कुछ टेलीविजन चैनलों ने युद्ध के जीवंत दृश्य पेश किए थे. मगर यह कोई नई बात नहीं. उससे पहले भी टेलीविजन ऐसा करता रहा है. क्रिकेट और दूसरे खेलों की कमेंटरी भी जीवंत होती है. ऐसे में सीएनएन के खाड़ी युद्ध वर्णन से महाभारत के संजय को जोड़ने के पीछे कहीं न कहीं यह दुराग्रह भी काम करता है कि आज दुनिया में विज्ञान के नाम पर जो भी हो रहा है, वह तो भारत में बहुत पहले से ही था. यह भ्रम हमारे प्रबोधीकरण की बहुत बड़ी बाधा है. चूंकि यह काम हिंदी के वरिष्ठ विज्ञान लेखकों द्वारा किया जा रहा है, इसलिए हालात और विचारणीय हो जाते हैं.

विज्ञान लेखन की एक कमजोरी यह भी है कि लेखकगण तकनीक के साथ जुड़ी कल्पना या फंतासी को ही विज्ञान लेखन समझ लेते हैं. वैज्ञानिक तथ्यों पर वे जराभी ध्यान नहीं देते. हिंदी के एक वरिष्ठ लेखक की कहानी है, जिसमें पेड़ आकाश में यात्रा करने लगता है. वह पेड़ बस दिखने में ही पेड़ है, क्योंकि उसमें पत्तियां और शाखाएं सब हैं. असल में वह एक यान है, जिसमें यात्रियों के बैठने के लिए सीट हैं, सीढ़ियां हैं, कार्बन डाईआक्साइड से कार्बन और आक्सीजन को अलग करने के लिए सयंत्र भी हैं. यह देखनेसुनने में अच्छी कल्पना लगती है. मगर वैज्ञानिक दृष्टि से इसमें कई लोच हैं. जब भी कोई चीज उड़ती है तो उसको वायुमंडल में मौजूद गैसों से टकराकर आगे बढ़ना होता है. इससे उसका सामना हवा की प्रतिकर्षण शक्ति से होता है. उड़नेवाली चीज की गति जितनी तेज तथा अग्रपृष्ठ का क्षेत्रफल जितना अधिक होगा, उसे उतने ही ज्यादा प्रतिरोधक बल का सामना करना पड़ेगा. लेकिन उक्त कहानी में पेड़ रूपी यान मात्र बैटरी की ऊर्जा से उड़ जाता है. बैटरी भी पूरे सप्ताह चलती है. विज्ञान को लेकर ऐसी कल्पना विचित्र भले दिखाईं, दें मगर असल में वे वैज्ञानिक विषयों के बारे में बालक को केवल भरमाती है. विज्ञान लेखकों से अपेक्षा की जाती है कि वे परीकथाओं और विज्ञानकथाओं की फंतासी के अंतर को समझें. समझें कि जो फंतासी परीकथाओं में चल सकती है, वह जरूरी नहीं कि विज्ञानकथाओं के लिए भी उपयुक्त हो. परीकथा का राजकुमार जादुई कंबल, जूतियां, पेड़, पहाड़, झोला या खटोला किसी के भी सहारे आसमान से उड़ सकता है. वहां कल्पना की मौलिकता देखी जाती है, उसकी प्रामाणिकता नहीं. लेकिन विज्ञान कथा के लेखक को ध्यान रखना होगा कि नायक को यदि आसमान की सैर करानी है तो वह उड़ान के सामान्य नियमों का पालन करे. पृथ्वी पर चलने की अपेक्षा हवा में उड़ने के लिए कम से कम दस गुना ज्यादा ऊर्जा की जरूरत पड़ती है. ऐसे में यदि कोई विज्ञान लेखक सिर्फ बैटरी के सहारे पेड़ के हवा में उड़ने की कल्पना करता है, बैटरी भी जिसे सप्ताह में केवल एक दिन चार्ज करना पड़े, और दावा करता है कि वह एक विज्ञान कथा है, तो वह विज्ञानकथा की मूलभूत अपेक्षाओं के विरुद्ध माना जाएगा.

विज्ञान’ का नैतिकतावादी पक्ष यह है कि वह पूरी मनुष्यता के लिए होता है. लुइस पाश्चर के शब्दों में—‘विज्ञान का कोई देश नहीं होता. क्योंकि ज्ञान का संबंध पूरी मनुष्यता से है. वही अपनी रोशनी से दुनिया को जगमगाता है. विज्ञान किसी राष्ट्र के सपनों को मूर्तिमान बनाने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम है, ज्ञानविज्ञान में आगे रहनेवाला राष्ट्र ही दूसरों को राह दिखा सकता है.’ विज्ञान का कोई देश भले न हो मगर पिछले कुछ दशकों से, जबसे पूंजीवाद ने पांव पसारे हैं, उसके घराने अवश्य होने लगे हैं. बौद्धिक संपदा का हवाला देकर पूंजीपति शोध के लाभ पर अपना एकाधिकार बनाए रखना चाहते हैं. इसके अच्छे और बुरे दोनों तरह के परिणाम हमारे सामने हैं. यह मानते हुए कि नए शोध का लाभ सीधे उन्हीं को मिलेगा, कारपोरेट घराने वैज्ञानिक शोध को निवेश का महत्त्वपूर्ण क्षेत्र मानते हैं. फलस्वरूप अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं स्थापित करने के लिए धन की कमी नहीं होती. नुकसान यह कि अपनी प्रयोगशालाओं में पूंजीपति उन्हीं क्षेत्रों में शोध को प्रमुखता देते हैं, जिनमें उन्हें लाभ की भरपूर संभावना हो. पिछले कुछ दशकों में संचारक्षेत्र में जितने शोध हुए हैं, उनका एक हिस्सा भी कृषि क्षेत्र में नहीं हो पाया है. बावजूद इसके ‘विज्ञान’ की मूल सैद्धांतिकी कि वह पूरी दुनिया के लिए है तथा उसके माध्यम से पूरी दुनिया या अधिकतम लोगों के अधिकतम कल्याण के कार्य किए जाने चाहिए—पर कोई फर्क नहीं पड़ा है. पंूजीपति संस्थान भी जो नए आविष्कारों के लिए पूंजी लगाते हैं, यह दावा नहीं कर सकते कि वे उस आविष्कार का केवल स्वार्थ हित उपयोग करेंगे. दूसरे शब्दों में वैज्ञानिक आविष्कारों के संपूर्ण लाभों को किसी व्यक्ति अथवा समूह तक सीमित रखना आज भी अनैतिक माना जाता है. बौद्धिक संपदा के रूप में आष्विकारक वैज्ञानिक या पूंजीपति घराना केवल लाभ पर दावेदारी कर सकता है. शोध का वास्तविक लाभ पूरे समाज को मिले, इस तरह की प्रतिबद्धता प्रत्येक वैज्ञानिक आविष्कार से जुड़ी होती है. उदाहरण के लिए मान लें कि कारपोरेट संस्थान द्वारा चलाई जा रही प्रयोगशाला में ऐसी तकनीक का आविष्कार होता है, जिससे मनुष्य के जीन में रोगों से लड़ने के लिए कुदरती प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाई जा सके. तो वह कारपोरेट संस्थान बौद्धिक संपदा कानून के तहत उस प्रौद्योगिकी द्वारा दूसरे औद्योगिक संस्थानों की कमाई के एक हिस्से पर दावा कर सकता है. लेकिन किसी भी कारण से—शेष समाज को उसके लाभों से वंचित नहीं कर सकता.

साहित्य तो वैसे भी कल्याणकारी उद्यम है. साहित्यकार उसे बिना किसी स्वार्थ भावना के अंजाम देता है. अतएव विज्ञान साहित्यकार से अपेक्षा की जाती है वह अपनी रचना को पूंजीवादी दबावों और प्रलोभनों से मुक्त रखे और विज्ञान के कल्याणकारी उपयोगों पर विचार करे. विज्ञान साहित्य का अभीष्ट लोगों के विज्ञानबोध को बढ़ाना है. केवल वैज्ञानिक उपकरणों, सिद्धांतों और संभावनाओं का विवरण दे देने अथवा उस सामग्री को सुंदर रचना में ढाल देने से रचना का उद्देश्य पूरा नहीं हो जाता. बल्कि यह भी देखना होता है कि उसका पाठकों पर अनुकूल प्रभाव पड़े. इसके बावजूद विज्ञान को अपना धर्म मान चुके, उसके प्रति श्रद्धावनत लेखक विज्ञान के नाम पर कुछ भी परोसने की जिद किए रहते हैं. इवान येफ्रेमोव रूस के ख्यातिनाम विज्ञान कथा लेखक रहे हैं. अपनी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने अनेक वैज्ञानिक आविष्कारों की पूर्वकल्पना की थी. अपनी ‘अतीत की परछाइयां’ शीर्षक कहानी में उन्होंने कल्पना की थी कि भविष्य के डॉक्टरी उपकरण गोली जितने सूक्ष्म आकर के बनेंगे. रोगी के शरीर में जाकर वह गोली अपने चारों को दिखने वाले अंगों का चित्र भेजेगी. जिससे डॉक्टर रोग के वास्तविक कारण का आसानी से पता लगा सकेंगे. आज यह तकनीक होलोग्राफी के नाम से प्रचलन में है. होलोग्राफी के आविष्कारक रूसी भौतिकविज्ञानी यूरी देनिस्युक ने अपने आविष्कार के पीछे येफ्रेमोव की उपर्युक्त कहानी के प्रभाव को स्वीकारा है. येफ्रेमोव का मानना था कि जीवन दृष्टि से रहित विज्ञान वैचारिक शून्यता को बढ़ावा देगा. विज्ञान के नाम पर कुछ भी चला देने पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा था—‘सारे संसार में वादविवाद की महामारी फैल गई है….बातेंबातेबातें. वर्तमान के डर की बातें….भविष्य की चिंता की बातें. डर और चिंता के बीच फंसा मनुष्य आगामी पीढ़ियों की खुशहाली के बहाने रेडिएशन बढ़ा रहा है, पानी गंदा कर रहा है, जंगल और उपजाऊ मिट्टी को नष्ट कर रहा है….आज की सभ्यता के तीन आधारस्तंभ हैं—ईर्ष्या, निरर्थक बातें और अनावश्यक वस्तुएं खरीदने की होड़….’ येफ्रेमोव की चिंता आज के प्रत्येक विज्ञानलेखक की चिंता होनी चाहिए.

स्पष्ट है कि विज्ञान ने जहां मानवजीवन को सुखसुविधामय बनाया है, वहीं अनेक चुनौतियां भी पैदा की हैं. उनसे निपटने का दायित्व वैज्ञानिकों, समाजविज्ञानियों के साथसाथ विज्ञान लेखकों का भी है. विज्ञान लेखक को कल्पनाशील होना चाहिए. तभी वह जान सकता है कि भविष्य में विज्ञान क्या रूप लेगा और उसका सामाजिक प्रभाव कैसा रहेगा. इसी तथ्य को वह वैज्ञानिक कथानक के माध्यम से समाज के सामने लाता है. यही दायित्व उसको विज्ञान के साधारण अध्येता और उसके विशेषज्ञों से अलग करता है. इसके लिए आवश्यक नहीं है कि लेखक विज्ञान के क्षेत्र में पारंगत हो; और वह उसकी जटिल गुत्थियों के बारे में सबकुछ जानता हो. अच्छी विश्लेषण क्षमता और तार्किकता से संपन्न कोई भी लेखक जिसे दसवीं तक के विज्ञान की जानकारी है, विज्ञान लेखन कर सकता है. बशर्ते उसको मनुष्यता पर भरोसा हो. विज्ञान के क्षेत्र में निरंतर हो रहे आविष्कारों के बारे में जानने की उत्कंठा हो. साथ में बेहतर भविष्य का सपना भी उसकी आंखों में हो, तभी वह विज्ञान को भविष्य के वरदान के रूप में देख सकता है.

विज्ञान लेखकों की सर्जनात्मक योग्यता और सदेच्छा पर संदेह करने का हमारा कोई इरादा नहीं है. फिर भी कुछ बातें हैं, जिनकी चर्चा हम यहां अत्यावश्यक मानते हैं. ये दिखाती हैं कि विज्ञान साहित्य की जो दिशादशा होनी चाहिए थी, विशेषकर भारतीय समाज और यहां की परिस्थितियों में, उस ओर पर्याप्त कार्य नहीं हो पाया है. इसके लिए दोषी केवल सरकार, वैज्ञानिक अथवा शोध का प्रबंधन करने वाली संस्थाएं नहीं हैं. साहित्यकार, बुद्धिजीवी, संस्कृतिकर्मी आदि वे सभी लोग हैं जो स्वयं को किसी न किसी रूप में समाज के नेतृत्व के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं. बचाव के लिए कह सकते हैं कि पश्चिम में भी यही हो रहा है. वहां भी विज्ञान कथा और विज्ञान फिल्मों के नाम पर बेसिरपैर की फंतासी परोसी जा रही है. लेकिन वहां परिस्थितियां भिन्न हैं. वे विकास की उस शिखर को छू चुके हैं, जहां से और ऊपर जाना शायद संभव न हो. वहां फूलाफैला वाणिज्यतंत्र है. ऐसे तंत्रों के लिए पुस्तक महज एक उत्पाद है. इसलिए उसे पाठक तक पहुंचाने हेतु बाजार के सभी छलछंद अपनाए जाते हैं. लेकिन विकासशील भारत की अपनी समस्याएं हैं. उनमें से अधिकांश बेलगाम पूंजीवाद में ढल चुके सामंती अवशेषों की देन हैं. इसलिए जब तक ये असंगतियां हैं, तब तक लिखे हुए शब्द और उसके रचनाकारों से अपेक्षाएं रहेंगी ही. अतएव हमें ध्यान रखना होगा कि पुस्तक उत्पाद तक सीमित न रह जाए. वह सामाजिक परिवर्तन की वाहक, उसकी वास्तविक उत्प्रेरक बने. ज्ञानविज्ञान का लाभ देश के सभी नागरिकों तक पहुंचे. इस कार्य में विज्ञान लेखकों की भूमिका जितनी चुनौतीपूर्ण पहले थी, उससे कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण आज है. जैसी स्थिति आज है, उससे तो लगता है कि भविष्य में चुनौती लगातार बढ़ती ही जाएगी.

© ओमप्रकाश कश्यप

डॉ. राष्ट्रबंधु : बालसाहित्य का यायावर

सामान्य

बहुत कम लेखक होते हैं जो किसी एक विधा से आजीवन अनुराग बनाए रखते हैं, बहुत कम लेखक होते हैं जो बच्चों के लिए लिखने के साथसाथ बालक जैसी निश्छलता रखते हैं, बहुत कम लेखक होते हैं जो जितना स्वयं लिखते हैं, उससे अधिक दूसरों से लिखवाते हैं : और बहुत कम लेखक होते हैं जो जितना पढ़ते हैं, उससे कहीं अधिक समय साहित्य और साहित्यकारों को गुननेसमझने में खर्च करते रहते हैं. परंतु डॉ. राष्ट्रबंधु ऐसे ही थे : अपनी तरह के अकेले, विरल, निष्काम और वीतरागी, बालसाहित्य के संभवतः इकलौते यायावर. उन्होंने बालसाहित्य की बांह एक बार थामी तो कसकर थामे रहे. नौकरी की. परिवार चलाया. जीवन के लिए जरूरी सभी संघर्ष किए. साहित्य सृजन को समय भी दिया. परंतु इन सबसे कहीं ज्यादा समय उन्होंने बालसाहित्य के प्रचारप्रसार और प्रोत्साहन में लगाया.

यह काम उन्होंने उस दौर में किया जब बालसाहित्य को एक विधा तक नहीं माना जाता था. लोग बच्चों के लेखन को बचकाना लेखन मानते थे. बालसाहित्यकार की हैसियत अदने लेखक जितनी ही थी. कुछ लोग तो बालसाहित्यकार को लेखक मानने तक को तैयार न थे. उस दौर में ‘डॉ. राष्ट्रबंधु’ आगे आए. निश्चय ही वे अकेले नहीं थे. मस्तराम कपूर, हरिकृष्ण देवसरे, श्रीप्रसाद जैसे साहित्यकार भी उनके साथ थे. सभी समान ऊर्जावान. जहूर बख्श, निरंकार देव सेवक, श्रीधर पाठक आदि पहले ही जमीन तैयार कर चुके थे. डॉ. राष्ट्रबंधु कानपुर में रहकर भी पूरे हिंदी प्रदेश में अपनी उपस्थिति बनाए रहे. बालसाहित्य की अस्मिता के संघर्ष में लेखकों को जोड़ने और तराशने का उनका प्रयास लगातार चलता रहा. इसके लिए उन्होंने ‘बालसाहित्य समीक्षा’ निकाली. श्रेष्ठ साहित्यकारों को प्रोत्साहन देने हेतु ‘भारतीय बालकल्याण संस्थान’ का गठन किया.

पत्रिका का मुख्य उद्देश्य बालसाहित्य समीक्षा की कमी को पूरा करना था. जबकि ‘भारतीय बालकल्याण संस्थान’ बालसाहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रतिवर्ष पुरस्कार बांटता था. ये सब काम उन्होंने बिना किसी दिखावे के, पूरी सादगी, विनम्रता और निष्पृहभाव से किए. ऐसे समय में जब लेखक बंधु अपने लिखे से ज्यादा गर्व मिले या जुटाए गए सम्मानपत्रों पर करते हैं. फेसबुक पर ‘सेल्फी’ चिपकाने को सर्जनात्मकता मानते हैं : डॉ. राष्ट्रबंधु उन सबसे अलग, निष्पृह भाव से बालसाहित्य के प्रचारप्रसार के काम में लगे रहते थे. कुर्तापाजामा पहन, ठेठ देहाती बाने में, झोला उठाए वे कहीं भी निकल जाते. फक्कड़ फकीर की निश्चिंत और निर्मैल्य. न पाने की खुशी, न खोने का गम. न आगत की चिंता, न विगत का क्लेश.

उनसे पहला परिचय कब हुआ था, पता नहीं. शायद 2002 के आसपास. बस इतना याद है कि ‘बालसाहित्य समीक्षा’ में मैं अपनी कहानियां भेजता था. छप भी जाती थीं. पत्रिका नियमित घर आती तो बालसाहित्य की समीक्षा विषयक कुछ आलेख पढ़ने को मिल जाते थे. आज जब बालसाहित्य समीक्षा पर सैकड़ों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, सैकड़ों शोध प्रबंध लिखे जा चुके हों, तब ‘बालसाहित्य समीक्षा’ जैसी अखबारी कागज पर निकलने वाली पतलीसी पत्रिका के महत्त्व का आकलन करना शायद मुश्किल हो. करना चाहें तो शायद ही पूरी तरह कामयाब हो पाएं. लेकिन उन दिनों जब कोई बालसाहित्य को स्वतंत्र विधा मानने को तैयार न था, हिंदी में बाल साहित्य को लेकर समीक्षा दृष्टि का अभाव था. शोधपत्रों की संख्या दोचार से अधिक न थीं : तब साहित्य की किसी धारा को स्वतंत्र विधा के रूप में पहचान दिलाने का स्वप्न देखना, फिर यह सोचकर कि बिना समीक्षा दृष्टि के यह असंभव होगा, बालसाहित्य की समीक्षा प्रधान पत्रिका निकालने का संकल्प लेना. उसे अकेले दम पर छतीससैंतीस वर्ष तक लगातार निकालते रहना. यह सब बगैर समर्पण, जिद्दी धुन और संकल्पसामथ्र्य के असंभव था.

पत्रिका निकली. कुछ उतारचढ़ाव भी आए. बावजूद इसके लगभग साढ़े तीन दशक तक वह बालसाहित्य समीक्षा को समर्पित इकलौती पत्रिका बनी रही. हालांकि पत्रिका के अंतिम वर्षाें में लेखों का स्तर घटा था. मैंने स्वयं रचनाएं भेजना बंद कर दिया था. इसमें डॉ. राष्ट्रबंधु का कोई दोष न था. तीनचौथाई शताब्दी जी चुका लेखक जैसेतैसे संसाधन उपलब्ध कराने के सिवाय और कर ही क्या सकता था! कमी हम लेखकों की थी, जो जहां से कुछ आमदनी न हो, वहां स्तरीय रचनाएं भेजने से कतराते हैं. बाजारवाद की आलोचना करतेकरते स्वयं बड़े व्यापारी बन जाते हैं.

सीधी मुलाकात गाजियाबाद में हुई थी. वे किसी कार्यक्रम में आए हुए थे. गाजियाबाद में पहली या शायद दूसरी मुलाकात में घर पर ठहराने का कार्यक्रम बना. यहां मुझे स्वीकार कर लेना चाहिए कि किसी भी बाहरी व्यक्ति के साथ, मैं सहज नहीं हो पाता हूं. अपनी एकाग्रता में अनायास दखल मुझे स्वीकार्य नहीं. उस समय भी थोड़ा तनाव में था. पर रात को सोने से पहले बातचीत का जो सिलसिला चला, वह देर तक चलता रहा. वे मानते थे कि मैं लंबी बालकहानियां लिखता हूं. इसलिए वे उन्हें सामान्य बालकहानियों से हटकर देखते थे. चाहते थे कि उनपर उसी ‘लंबी कहानी’ मानकर विचार किया जाए. कुछ महीने पहले नेशनल बुक ट्रस्ट के कार्यक्रम में आए तब भी उन्होंने लंबी बालकहानियों की चर्चा छेड़ी थी. मुझसे ‘बालसाहित्य में लंबी बालकहानियां’ विषय पर एक लेख लिखने का आग्रह भी किया था. उनकी इस राय से मैं शायद ही इत्तफाक रखता था. मैं गलत हो सकता हूं. परंतु व्यक्तिगत रूप से मुझे कभी लगा ही नहीं कि मैं ‘लंबी बालकहानियां’ लिखता हूं. ऐसे अवसर पर मुझे अपना बचपन अकसर याद आ जाता है. नानाजी अच्छे किस्सागो थे. वे घर आते तो हम बच्चे उन्हें घेर कर बैठ जाते. न केवल मैं बल्कि हम सब भाईबहन. आंखों में भले ही नींद भरी हो, परंतु छोटी कहानी शायद ही किसी को पसंद आती थी. लंबी कहानी, भले ही हम ‘हंुकारा’ भरतेभरते सो जाएं, प्रायः पसंद की जाती थी.

उन दिनों जो कहानियां अकसर सुनने को मिलती थीं, उन्हें ज्यों का त्यों लिखने को बैठो तो दोतीन हजार शब्दों से कम शायद ही कोई कहानी बन पाए. मैं मानता था और आज भी मेरा मानना है कि बालसाहित्य के नाम पर अधिकांश जो कहानियां लिखी जाती हैं, वे पत्रपत्रिकाओं की मांग के अनुरूप होती हैं. पत्रपत्रिकाओं ने बालसाहित्य के प्रचारप्रसार में में बड़ी भूमिका निभाई है. लेकिन नुकसान भी काफी किया है. इकीसवीं शताब्दी में भी अधिकांश संपादक मानते हैं कि बालक बड़ों का लघु संस्करण हैं. इसलिए वे बालक के व्यक्तित्व को छोटा मानकर बालसाहित्य को एक कोने से अधिक स्थान देने को तैयार नहीं होते. ‘बच्चों के लिए भी कुछ होना चाहिएइस नीयत के साथ वे बालसाहित्यकारों से लिखवाते हैं. लेखकों की मजबूरी हो जाती है कि वे उपलब्ध स्थान की सीमा को ध्यान में रखकर रचनाएं भेजें. चूंकि अखबारों में 1000-1500 से बड़ी बालकथा के लिए जगह नहीं होती, इसलिए यह धारणा बनी कि बालकहानी 1000-1500 शब्दों की होनी चाहिए. यही कारण है कि डॉ. राष्ट्रबंधु के दोतीन बार टोकने के बावजूद मैं उनके लिए लेख लिखने को तैयार न हो सका था.

बालसाहित्य समीक्षा’ की साहित्यकारों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर विशेषांक निकालने की परिपाटी बन चुकी थी. 2006 की घटना है. संभवतः मई या जून की. पत्रिका का अंक प्राप्त हुआ. उसमें कुछ विशेषांक निकालने की घोषणा थी. उनमें से एक विशेषांक ‘शिवकुमार गोयल’ के बालसाहित्य पर निकालने का प्रस्ताव था. घोषणा थी कि शिवकुमार गोयल के विशेषांक का संपादन ‘ओमप्रकाश कश्यप’ करेंगे. पढ़कर मैं बुरी तरह चैंका था. मैं बच्चों के लिए कहानीकविताएं लिख लेता था. हो सकता है इक्कादुक्का समीक्षात्मक लेख भी लिखा हो. बालकहानियां अवश्य छपी थीं, मगर ऐसा कुछ नहीं था कि मैं बालसाहित्य समीक्षा के विशेषांक का अतिथि संपादन कर सकूं. दूसरी समस्या शिवकुमार गोयल जी से अपरिचय की थी. हालांकि उनको पढ़ता अर्से से रहा था, मगर उनके बालसाहित्य से मेरा कोई परिचय नहीं था. तीसरी एक और समस्या थी. शिवकुमार जी की प्राचीन भारतीय संस्कृति और इतिहास में गहरी आस्था थी. उसी दृष्टि के साथ वे लेखन करते थे. जबकि मैं उसको संदेह की दृष्टि से देखता था. चैथे उम्र का अंतर. गोयल जी अग्रज पीढ़ी के रचनाकार थे. उनकी प्रतिष्ठा थी. ऐसे वरिष्ठ साहित्यकर्मी के बालसाहित्य पर मेरा जैसा अदना अनुभवहीन लेखक विशेषांक का संपादित करेयह उचित नहीं था. कोई संपादक ऐसा निर्णय कैसे ले सकता है? अवश्य कोई दूसरे ‘ओमप्रकाश कश्यप’ होंगे, यह सोचकर मैंने उस घोषणा को दिमागबाहर कर दिया था. लेकिन कुछ दिनों बाद ही डॉ. साहब का कानपुर से फोन आ गया. पता चला कि घंटी अपुन के गले में ही बांधी जानी है. बहरहाल मैंने उस विशेषांक का संपादन अपनी सोच के हिसाब से किया. राष्ट्रबंधु जी को लिख भी दिया कि वे जितना और जहां चाहें, संपादन कर सकते हैं. अंक आया और मैं देखकर हैरान था कि उसमें किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की गई थी.

अंक का विमोचन गोयल जी के आवास पर पिलखुवा में हुआ था. आयोजन में उपस्थित गणमान्यों की उपस्थिति में डॉ. राष्ट्रबंधु ने अपनी एक बालकविता सुनाई थी. ‘काले मेघा पानी दे. पानी दे गुड़धानी दे’ पूरी तरह डूबकर, मस्ती में खुले गले से गाई गई, लोकमन से उपजी इस कविता को सुनकर पूरी सभा स्तब्ध थी. बाद में श्रोताओं के आग्रह पर उन्होंने दूसरी कविता भी सुनाई थी. लेकिन मेरे मन पर पहली कविता की जो छाप पड़ी, उसका असर आज तक बाकी है. ऐसा नहीं है कि दूसरी कविता कमजोर थी. यदि साहित्यिक दृष्टिकोण से परखा जाए तो दूसरी कविता को शायद अधिक अंक दिए जाते. लेकिन पहली कविता की जो जमीन है, वहां जो मिट्टी की सौंधी गंध और अपनापन है, वह कहीं न कहीं डॉ. राष्ट्रबंधु की अपनी भी जमीन थी. इसलिए उस कविता में वे अपना पूरा व्यक्तित्व उंडेल पाए थे. एक श्रोता के रूप में वह मेरे जीवन की तो वह एकमात्र अविस्मरणीय बालकविता है ही.

उनका जन्म 1913 में हुआ था. साधारण परिवार में. पारिवारिक नाम था, कृष्णचंद्र तिवारी. बाद में पढ़ने से लेकर नौकरी करने तक संघर्ष की लंबी गाथा है. बताते हैं पेट भरने के लिए उन्होंने बूट पालिश और मजदूरी तक कह1960 से लेकर 1976 तक छतीसगढ़ के विद्यालयों में अंग्रेजी का अध्यापन किया. बच्चों के लिए दो दर्जन से अधिक पुस्तकें लिखीं. इसके अलावा ‘बालसाहित्य समीक्षा’ का नियमित प्रकाशन. ‘बालसाहित्य कल्याण संस्थान’ द्वारा बालसाहित्य संवर्धन में निरंतर योगदान देते रहे. वे खूब यात्रापसंद थे. बालसाहित्य के लिए जीनेवाले उस चिर यायावर के लिए इससे बड़ी बात क्या हो सकती है कि उसकी अंतिम सांस भी उस समय निकले जब वह बालसाहित्य के संवर्धन के लिए सफर में हो. डॉ. राष्ट्रबंधु ऐसे ही विरले इंसान थे…..

ओमप्रकाश कश्यप

opkaashyap@gmail.com

परीकथाओं का भविष्य : भविष्य की विज्ञानकथाएं

सामान्य

कल्पना की प्रवृत्ति आगे बढ़ना है, ठहरना अथवा पीछे हटना नहीं.

वाल्डो इमर्सन

अन्य कथारूपों की भांति परीकथाएं भी उत्पादकता के कारणों से प्रभावित होती है. आरंभ में जब जनजीवन प्रकृति आधारित था, जीवन आखेट और वनवनस्पतियों पर टिका था तो मानवअभिव्यक्ति का आकर्षण प्राकृतिक उपादान यथा पशुपक्षी, वनवनस्पति आदि होते थे. उन दिनों मनुष्य को अपनी बुद्धि पर गुमान नहीं था. वह स्वयं को पशुपक्षियों के परिवार का ही एक हिस्सा मानता था. इसलिए यह मानते हुए कि जड़चेतन किसी से भी सीखा जा सकता है, उसने पशुपक्षियों तथा प्राकृतिक उपादानों को केंद्र में रखकर अनगिनत कहानियां गढ़ीं. संगठन और संस्कृतिकरण की कोशिशों के रूप में धार्मिकसांस्कृतिक प्रतीकों को लेकर भी कहानियां रची गईं. कालांतर में मिथकों और पुराकथाओं के सृजन का सिलसिला इतनी तेजी से चला कि मनोरंजन और सांस्कृतिकरण की कोशिश के रूप में गढ़ी गई पशुपक्षियों की कहानियां भी पुराकथाओं का हिस्सा बनती गईं. दोनों का कोला॓ज सांस्कृतिकरण की प्रक्रिया में सहायक बना. आगे चलकर राज्य संगठित होने लगे. सुरक्षा हेतु सेनाएं रखी जाने लगीं. यूनान के नगरराज्यों के बीच निरंतर चलनेवाले युद्धों के कारण युद्धसंस्कृति का विस्तार हुआ तो युवाओं को युद्ध की ओर प्रवृत्त करने के लिए नायक प्रधान परीकथाएं गढ़ी जाने लगीं. धीरेधीरे राजनीति व्यक्तिकेंद्रित होने लगी. राजाओं की विलासिता बढ़ी. रनिवास में एक से अधिक स्त्रियों का होना शान का प्रतीक माना जाने लगा. मुंह लगे लोग राजा की पसंदीदा रानियों की सुंदरता का बखान ‘परी’, ‘हूर’, ‘अप्सरा’ आदि कहकर करने लगे. उससे पहले परियों को जादूगरनी, चुड़ैल वगैरह माना जाता था. मध्यकाल आतेआते उनकी छवि में सुधार हुआ. उन्हें मनुष्य की कामनापूर्ति में सहायक बताया जाने लगा. औद्योगिक क्रांति के दौर में वैचारिक आंदोलन चले. समाज का पुराना सामंतवादी ढांचा चरमरा उठा. उसका प्रभाव परीकथा साहित्य पर भी पड़ा. फलस्वरूप उनमें भी बदलाव की मांग की जाने लगी. किस्सा कोताह यह कि आरंभ में केवल व्यक्ति था, समाज अनुपस्थित. धीरेधीरे समाज अस्तित्व में आया और व्यक्ति पर हावी होता चला गया. कालांतर में कुछ व्यक्तिसमूह और भी उभरे, फिर कुलीनतावाद अस्तित्व में आया. आगे चलकर अलगअलग टुकड़ों में बंटे या बांट दिए गए समाज ने एकल सत्ता को स्वीकृति दी. प्रकारांतर में समाज को दरकिनार करते हुए उस व्यक्ति ने खुद को इतना मजबूत कर लिया कि वह पूरे समाज का सर्वेसर्वा बन गया. एक आदमी खुश तो सारा समाज खुश. वह दुखी तो संपूर्ण राज्य पर चिंताओं के काले बादल मंडराने लगते. विरोधों को बलपूर्वक कुचलने की नीति ने साम्राज्यवादी ताकतों को आगे बढ़ने का अवसर दिया. फिर समय ऐसा भी आया जब राज्य के सर्वस्ववादी आचरण के विरुद्ध लोक चेतना जगी. व्यक्ति को अपनी गुमशुदा अस्मिता की याद सताने लगी. विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास के साथसाथ ‘अस्मिता’ के सवाल सिर उठाने लगे. व्यक्ति एवं समाज के संबंध क्या हों? ‘स्वयं’ और ‘स्वयं से परे’ के बीच विभाजनरेखा कहां पर खींची जाए—विचारक ऐसे प्रश्नों के उत्तर में सिर खपाने लगे. इसके बावजूद चली उनकी जिनका सत्ता और संसाधनों पर कब्जा था.

साहित्य शब्द का पहला प्रयोग भर्तृहरि ने किया था—‘साहित्य, संगीत, कला विहीनः नरः. साक्षात पशु पुच्छ विषाण हीनः.’ उसका नजरिया हरेक दौर में समन्वयवादी का रहा. मौखिक और लिखित दोनों तरह से वह तनावों के शमन पर निरंतर जोर देता रहा. यदि हम प्राचीन परीकथाओं को देखें तो उनमें ऐसे लोक के दर्शन हमें होते हैं, जो सत्ताओं को सदैव उनकी सीमाओं की याद दिलाता रहता है. यह लोकसाहित्य की ताकत ही है कि उसमें एक किसान, बूढ़ी औरत या गरीब मजदूर भी राजा को उसके कर्तव्य की याद दिलाने से नहीं चूकता. इसका असर महाकाव्यों पर भी देखने को मिलता है. लोक ने राम को इसलिए ‘भगवान’ का दर्जा दिया क्योंकि वह सत्ता का मोह छोड़ कर्तव्यपथ की ओर बढ़ने में देर नहीं करते. युद्ध के पश्चात पांडव जब वन गमन करते है तो वे भी दर्शा रहे होते हैं कि अठारह अक्षौहिणी सेना की बलि चढ़ाकर भी सत्ता का शाश्वत भोग असंभव है. राजशाही की कमजोरी है कि वह सर्वप्रथम व्यक्ति के मूलभूत अधिकारों पर डाका डालती है, जबकि लोकथाओं एवं परीकथाओं में मानवाधिकारों तथा देश, समाज, संस्कृति और सभ्यता के गुणगान के साथसाथ व्यक्ति की नैसर्गिक स्वतंत्रता के प्रति सहानुभूति भी हमेशा बनी रही. विशेषकर स्त्रीपुरुष के भावनात्मक संबंधों को लेकर. तदनुरूप परीकथाओं में ऐसे विचारों को भी जगह मिली, जिन्हें व्यवहार में अनाचार अथवा समाजविरोधी माना जाता है. जैसे एक विवाहित पुरुष यदि विवाहित स्त्री से प्यार करने लगे तो समाज की निगाह में वह दुराचरण है. परीकथाओं में वह मनोरंजन के नाम पर खपा लिया जाता था. उसके माध्यम से परीकथाएं उन स्थितियों को सामने लाती हैं, जो समाज की तयशुदा आचारसंहिता के उल्लंघन का परिणाम हो सकती हैं. अपनी नैसर्गिक स्वच्छंदता का भोग करना, मनुष्य की जन्मजात चाहत होती है. लेकिन समाज में रहने के लिए उसे अपनी स्वच्छंदता के एक हिस्से का बलिदान करना पड़ता है. मानवप्रवृत्ति इस बलिदान को एकाएक स्वीकार नहीं करती. उसमें हमेशा ऐसी इच्छाएं अंगड़ाई लेती रहती हैं, जिन्हें समाज निषिद्ध मानता है. धीरेधीरे वे मनुष्य के अवचेतन का हिस्सा बन जाती हैं तथा अनुकूल अवसर पर कहानियों, परीकथाओं, सपनों आदि के माध्यम से प्रकट होती हैं. इसलिए कहानियों में वे प्रसंग जो दमित इच्छाओं की पूर्ति में सहायक हों, अथवा उनका समर्थन करते हों, पाठक की भावनाओं को छू लेते हैं. व्यावहारिक रूप में मान्य न होते हुए भी कहानियों/परीकथाओं में उनका आकर्षण लगातार बना रहता है. इस कारण परीकथाओं को साहित्य का ऐसा कोना मान सकते हैं, जहां व्यक्ति सामाजिक मर्यादाओं से परे, अपनी स्वच्छंदता का एहसास कर सकता है. इस तरह मानवमन में छिपे ज्ञातअज्ञात विकारों के उपचार हेतु परीकथाओं ने औषध का काम किया है.

मनुष्य की अद्वितीय कल्पनाशक्ति का विकास ब्रह्मांड के सापेक्ष बौनेपन की कुंठा तथा उसके समाहार की ललक से हुआ है. यह परीकथाओं और लोकसाहित्य में ही संभव था कि एक ‘कद्दू’ अपनी गरीब मां को सुखी देखने के लिए कमाई करने घर से निकले, राजदरबार में पहुंचकर अपने प्रतिभाकौशल से सभी को चमत्कृत करे और राजकुमारी को ब्याह कर घर ले आए. राजकुमारी की ओर देखनेभर से आंख निकलवा लेने वाली राजसत्ता उसका कुछ न बिगाड़ पाए. ऐसी कहानियां कोरी कल्पना की उड़ान न थीं. उनका लौकिक महत्त्व भी था. अतिसाधारण परिवार के किशोर बेटे का प्रतीक ‘कद्दू’ अपने बुद्धिचातुर्य से राजदरबार में सभी को चमत्कृत कर यह सिद्ध कर देता है कि बुद्धिविवेक, चपलता, तत्परता, साहस, वीरता और निडरता जैसे उदात्त गुण, केवल सत्ताशिखर पर विराजमान लोगों का एकाधिकार नहीं है. ब्राह्मण को मूर्ख, राजा को कमजोर और कायर तथा रानी को बदचलन दिखा पाना भी केवल कहानियों में संभव रहा. उनमें कौआ महान गाथाएं सुना सकता था, कुत्ता दर्शन बघार सकता था; और नदी का मामूली जीव कछुआ लोगों को राजनीति की शिक्षा दे सकता है. लोकमानस में स्वयंस्फूत्र्त जन्मी ये परीकथाएं उसे न केवल अपने अंधेरे कोनों से परचाती थीं, बल्कि सत्ता के दागधब्बों की ओर संकेत करते हुए, शीर्षस्थ वर्ग से भी समानता और सच्चरित्रता की मांग भी करती थीं. समाज का आईना होने के साथसाथ वे प्रजा की ओर से प्रस्तुत मांगपत्र जैसी थीं. दूसरी ओर ऐसी कहानियां और लोककथाएं भी रहीं, जिनमें राजा और उसके दरबारियों का महिमामंडन होता था. जो सामाजिक विभाजन को, ऊंचनींच, जातपात, धर्मभेद को शास्त्रसम्मत बताती थीं. जिनमें राजकुमारी को केवल उच्च कुल के राजकुमार से विवाह करने की छूट थी. जो कुलपरंपरा में छोटे हों, उन्हें राजकुमारी की ओर देखने तक का अधिकार नहीं था. दूसरे किस्म की कहानियां सामान्यतः मौखिक न होकर लिखित रूप में थीं. वे दरबारी लोगों द्वारा अपने आश्रयदाताओं के मनोरंजन हेतु, सुखसुविधाओं के बीच गढ़ी जाती थीं. जनसाधारण के बीच परीकथाओं की लोकप्रियता का कारण यह भी रहा क्योंकि वे चमत्कार के माध्यम से ही सही, पलक झपकते नाकुछ को सबकुछ बनाकर शीर्ष पर ले आती थीं. उनमें छोटेबड़े का भेद नहीं था. जिस अलाव के किनारे अस्सी वर्ष का दादा कहानी सुन सकता है, उसी के आगे, किशोर पोता भी कहानी का आनंद ले सकता है. इसलिए वे तीनतीन, चारपीढि़यों की ज्ञानसंपदा का वहन करने तथा उसे ऐच्छिक व्यक्ति अथवा व्यक्तिसमूहों तक पहुंचाने का कार्य लगातार करती रहीं.

समाज के छोटेसे छोटे व्यक्ति को केंद्र में आने का अवसर देने के कारण परीकथाएं समाज के वंचित वर्ग में विशेष लोकप्रिय रही हैं. यह समानता हालांकि कल्पना तक सीमित थी, इसके बावजूद वह व्यक्ति की कुंठाओं के समाहार में काफी मददगार सिद्ध होती थी. लोकसाहित्य की इसी ताकत और पैठ के आगे, समाज का प्रभु वर्ग, परीकथाओं को छोटे, वंचित लोगों का प्रलाप कहकर उपेक्षित करता रहा. तथापि परीकथाओं की लोकप्रियता पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा. प्रौद्योगिकीय क्रांति के दौरान उभरे मध्यवर्ग ने शिक्षा पर अधिकार कर प्रभुवर्ग के समक्ष अपनी शक्ति और पैठ का एहसास कराया था. यह एहसास भी कराया था कि प्रभुवर्ग का श्रेष्ठत्व, धनवैभव आदि उन्हीं अर्थात मध्य वर्ग के बुद्धिबल और श्रमबल की देन है. इसी वर्ग ने श्रुत परंपरा की परीकथाओं को लिखित रूप में पेश किया. शुरुआत फ्रांसिसी महिलाओं ने की, जो कुलीन परिवारों से संबद्ध होने के बावजूद लैंगिक भेदभाव का शिकार थीं. धीरेधीरे वे पूरे कुलीन समाज की पसंद में उतरने लगीं. दबाव में ही सही, शीर्षस्थ लोगों की निगाह में उपेक्षित रही देहाती और गंवईं कहानियां, प्रकारांतर में प्रभुवर्ग के बेडरूमों और दरबारों में भी दस्तक देने लगीं. परीकथाओं में नैतिक और भावनात्मक खजाने की खोज की जाने लगीं. इस तरह वे कहानियां दो भिन्न कार्यसंस्कृति और हैसियत वाले वर्गांे के बीच समन्वय हेतु पुल बनने में कामयाब रही हैं.

मूलतः सुननेसुनाने की विधा रही कहानियों ने अपना लंबा समय किस्सागोई के साथ बिताया है. फलस्वरूप उसकी शैली और प्रस्तुतीकरण में सार्वजनिक बोध हमेशा ही रहा. आज भी जब कोई मंजा हुआ किस्सागो परीकथा सुनाते समय अलखाता है—‘एक बार की बात है….’, ‘एक बार एक बियावान जंगल में’ तब वह अपने श्रोताओं को स्वतः ही एक परंपरा से जोड़ लेता है. प्रकारांतर में वे कहानियां सामूहिकता का आयोजन बन जाती हैं. प्राचीन परीकथाओं में प्रायः एक राजकुमार होता है, जिसे अंत में राजकुमारी मिल जाती है. यह मनुष्य की नैसर्गिक स्वतंत्रता का प्रतीक, व्यक्ति का व्यक्ति से मिलन है. उसमें दोनों के व्यक्तित्व आमनेसामने होते हैं. दोनों की सक्रियता में अंतर के बावजूद उनके स्नेहबंधन को सामाजिक स्वीकृति प्राप्त होती है. राजकुमार का संघर्ष भले ही राजकुमारी के लिए हो, लेकिन अंततोगत्वा वह स्त्रीपुरुष के नैसर्गिक संबंध की ओर ही संकेत करता है. राज्य की चिंता छोड़ केवल राजकुमारी को पाने की सनक में निकले राजकुमार के आचरण को कोई भी स्वार्थपूर्ण नहीं कहता है. यह मानते हुए कि सामाजिकराजनीतिक कर्तव्य के बावजूद राजकुमार का अपना जीवन है, उसके कर्तव्य को निजी पुरुषार्थ की प्रस्तुति के रूप में सराहा जाता रहा है. यह व्यक्ति की नैसर्गिक स्वतंत्रता; यानी उन जीवनमूल्यों का सम्मान है जो देशकाल, धर्म, संस्कृति से परे, जन्म लेने के साथ ही उसे प्राप्त हो जाते हैं. यहां विवेकानंद का कथन स्मरणीय है. एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था—‘‘आप मुझे एक शिशु दीजिए. मैं उससे बारबार कहूंगा—‘तुम ब्रह्म हो….तुम्हीं ब्रह्म हो’, ‘तत्वं असि….तत्वं असि.’ साहित्य पाठक को उसकी अस्मिता और जीवनबोध से परचाने का कार्य पलछिन करता है. परीकथाओं की विशेषता है कि उनमें ‘पर’ के साथसाथ ‘अपर’ यानी ‘आत्म’ को भी सम्मान मिलता है. जबकि धार्मिक आख्यानों में ‘आत्म’ को ‘परमात्म’ का अंश कहकर गौण मान लिया जाता है. परीकथाओं में ‘आत्म’ की उपस्थिति को, जब तक शेष समाज को उससे कोई हानि न पहुंचे, सर्वत्र सराहा जाता है. जर्मन दार्शनिक मार्टिन बुबर(1878—1965) ने व्यक्तिपरकता की सामाजिक संदर्भ में व्याख्या की है. बुबर के अनुसार मनुष्य का आत्म सामान्यतः दो प्रकार से स्वयं को अभिव्यक्त करता है. पहला ‘मैं तू हूं’ और दूसरा ‘मैं, यह हूं’. ‘मैं तू हूं’ जहां स्वयं को दूसरे के व्यक्तित्व में विलीन कर देने की चाहत है. वहीं ‘मैं, यह हूं’ आत्मसंबोधि की अवस्था है. भारतीय परंपरा में इसे क्रमशः ‘तत्वं असि’(तुम ही ब्रह्म हो) तथा ‘अहं ब्रह्मास्मि’(मैं ब्रह्म हूं) कहा गया है. आशय है कि कहानियां जहां व्यक्ति को समाज से परचाती हैं, उसे पूरे परिवेश से जोड़कर विराट ब्रह्मांड का हिस्सा बना देती हैं, वहीं व्यक्ति के ‘आत्म’ की भी सुरक्षा करती हैं. इस प्रकार वे असीमित ‘पर’ और सीमित ‘अपर’ के बीच संतुलन और सौहार्द बनाए रखने में सहायक होती हैं. दूसरे शब्दों में ‘आत्म की पहचान’ के साथसाथ ‘विराट का बोध’ कराना ही साहित्य का उद्देश्य रहा है, ताकि व्यक्ति की गरिमा और समाज की मर्यादा, दोनों सुरक्षित रहें. यही साहित्यकर्म है. लोकसाहित्य इसे सहस्राब्दियों से निभाता आया है.

विज्ञान साहित्य किसी वस्तु अथवा प्राणी के अंतर्जगत एवं बाह्यः जगत दोनों को तर्कसंगत ढंग से जानने का माध्यम है. विज्ञान साहित्य अथवा साहित्यिक विज्ञान लेखन और अकादमिक विज्ञान लेखन में अंतर है. विज्ञान साहित्य में विज्ञान की तार्किकता को पाठकीय संवेदना और सामाजिक संदर्भों में उसकी उपयोगिता के आधार पर परखा जाता है. जबकि अकादमिक लेखन तथ्यों के वस्तुनिष्ठ विवेचन तक सीमित रहता है. साहित्य के सरोकार मानवीय होते हैं. साहित्य सोचता है—‘विज्ञान मानवमात्र के लिए’ है. इसी विचार को वह अपनी रचनाओं में उतारता है. कामना करता है कि उसके लाभ जनजन तक पहुंचें. वैज्ञानिक और विज्ञान के अकादमिक व्याख्याता, ‘विज्ञान विज्ञान के लिए’ जैसी निस्पृहता के साथ काम करते हैं. उनके कार्य की प्रकृति के अनुरूप निष्पृह रहना आवश्यक है. वैज्ञानिक ऐसी निस्पृहता न रखें तो उनका काम बड़ा मुश्किल हो जाए. आइंस्टाइन यदि सोचते कि उनके शोध के आधार पर भविष्य में परमाणु बम का निर्माण संभव होगा, जिससे हिरोशिमा और नागासाकी जैसी तबाही की कहानियां लिखी जाएंगी, तब क्या वे उस शोध के लिए उतनी ही तन्मयता के साथ काम कर पाते. वैज्ञानिक उपलब्धियों का लोकहित में प्रयोग हो, इसके लिए सामाजिक दबाव अनिवार्य हैं. उनके अभाव में महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक शोध पूंजीपतियों और व्यापारियों के अधिकार में चले जाते हैं, जिनका उपयोग वे निहित लाभ की वांछा के साथ करते हैं. ऐसे में उन लेखकों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है, जो विज्ञान को लोककल्याणकारी भूमिका में देखना चाहते हैं. आधुनिक विज्ञान लेखन ऐसे ही लेखकों की सर्जना का सुफल है. उसमें बहुत कुछ श्रेष्ठ है, लेकिन बहुत कुछ ऐसा भी है जो विज्ञान के नाम पर केवल पिष्टप्रेषण है. महज औपचारिकता, जिससे संबंधित लेखक की विज्ञान और विज्ञान साहित्य के प्रति कमसमझी को को परखा जा सकता है. विज्ञान के विशिष्ट ज्ञान की कमी तथा जातीय एवं धार्मिक पूर्वाग्रहों के कारण रचना विज्ञानबोध से वंचित रह जाती है. उसकी भरपाई वे कल्पना के अतिशय प्रयोग द्वारा करते हैं. परिणामस्वरूप वे विज्ञानकथा लिखने की यदि कोशिश करें भी तो रचना छिटककर विज्ञानगल्प के दायरे में चली जाती है. लेखक में विज्ञानबोध की कमी का परिणाम यह होता है कि कृति वैज्ञानिक आविष्कारों की पिछलग्गू बनी रहती है. यहां एक विवाद खड़ा हो सकता है. कुछ उत्साहित लेखक आपत्ति कर सकते हैं कि विज्ञान साहित्यकार मनुष्य के मंगल ग्रह पर पहुंचने की कल्पना कर चुके हैं. अपनी गल्पकथाओं में मनुष्य को आकाशगंगाओं और नीहारिकों में बसने वाले जीवन का सपना भी दिखा चुके हैं, जबकि वैज्ञानिक अभी तक मंगल के चक्कर ही काट रहे हैं. उत्तर स्पष्ट है, केवल विज्ञान और प्रौद्योगिकी का परिवेश बना देने से विज्ञानसाहित्य का उद्देश्य पूरा नहीं हो जाता. इससे तो यह संदेश जाता है कि वैज्ञानिक लक्ष्यों की सिद्धि केवल विशिष्ट परिवेश, खास उद्देश्यों हेतु संभव है. साधारण जीवन में उसका कोई काम नहीं है. श्रेष्ठ विज्ञान लेखक वैज्ञानिक उपकरणों, प्रविधियों के पीछे निहित वैज्ञानिक तथ्यों को अपनी रचनाओं का विषय बनाता है. उसकी निगाह विकास के नाम पर अग्रसर प्रवृत्तियों पर भी रहती है. कुल मिलाकर विज्ञानसाहित्य केवल ‘असंभाव्य को संभव’ दिखाने की कलाकारी नहीं है, उसके विमर्श का दायरा इससे कहीं अधिक विस्तृत है.

परीकथा और विज्ञानकथा का भविष्य व्यक्ति एवं समाज के भावी संबंधों द्वारा तय होगा. इस बात से होगा कि व्यक्ति और समाज, एकदूसरे की अस्मिता का सम्मान करते हुए पारस्परिक हितों की रक्षा हेतु कितना तालमेल कर पाते हैं. यद्यपि साहित्यकारों का बड़ा वर्ग आज भी समर्पित भाव से सार्थक परीकथाएं एवं विज्ञानगल्प लिखने में लगा है. न केवल पुरानी और वैश्विक लोकप्रियता हासिल कर चुकी परीकथाओं को नई युगदृष्टि के अनुकूल ढाला जा रहा है, बल्कि नए युगबोध के अनुसार नई रचनाएं लिखने में भी इस वर्ग ने सफलता प्राप्त की है. तथापि जितनी बड़ी अपेक्षाएं हैं, चुनौतियां भी उतनी ही कड़ी हैं. जनमानस के बड़े हिस्से को बाजार ने अपनी चकाचैंध से प्रभावित किया है. निहित स्वार्थ के लिए वह उपलब्ध कलारूपों का भी व्यवसायीकरण करने में लगा है. उसी दिशा में काम करते हुए हाल के वर्षों में बाजार ने परीकथाओं एवं विज्ञानगल्प दोनों को अपने स्वार्थ के अनुरूप ढाला है. उनका नया रूप इतना बनावटी और विरूपित है कि कभीकभी तो रचना की श्रेणी अर्थात वह ‘परीकथा है अथवा विज्ञानकथा’—तय कर पाना भी कठिन हो जाता है. अतः इन दोनों कथारूपों के भविष्य की दिशा इससे भी तय होगी कि आगे ये दोनों धाराएं अपने साहित्यिक लक्ष्य एवं बाजारवादी आग्रहों के बीच संतुलन रखते हुए सामाजिक गतिशीलता के पक्ष में कितना योगदान दे पाती हैं. उम्मीद कम है, फिर भी परीकथाओं और विज्ञानसाहित्य की आगामी दिशादशा इस पर भी निर्भर करेगी कि उत्पादकता के लाभों को जनसाधारण तक पहुंचाने के लिए अर्थव्यवस्वस्था ने खुद को कितना और किस दिशा में बदला है. ध्यातव्य है कि मुक्त बाजार की अवधारणा उत्पादनकेंद्रित अर्थव्यवस्था द्वारा, व्यक्तिमात्र को लाभ पहुंचाने के आश्वासन के साथ रखी गई है. मगर उसके लाभ मात्र कुछ हाथों तक सिमटकर रह जाते हैं. जिन्हें उनकी सचमुच जरूरत है, उन तक पहुंच ही नहीं पाते हैं. स्थिति सामंतवाद जैसी भले न हो, मगर इसके कई लक्षण उस व्यवस्था से पूरी तरह मेल खाते हैं. राजशाही और सामंती युग में समस्त अधिकार राजा के चहेते सामंतों और जमींदार वर्ग तक सीमित रह जाते हैं. नई व्यवस्था में पूंजीवादी शक्तियों के समर्थनसहयोग से बनी दायित्वहीन सरकारें स्वार्थसिद्धि हेतु उद्यमियों और शीर्षस्थ नौकरशाह का अत्यंत शक्तिशाली वर्ग खड़ी कर देती हें, जो धीरेधीरे समस्त सत्ताकेंद्रों पर कब्जा कर, मीडिया और अन्यान्य माध्यमों द्वारा लोगों को भरमाने लगता है. उस वर्ग की कोशिश रहती है कि उपलब्ध कलाएं अपने मूल सरोकारों से कटकर उसके प्रचारकतंत्र के रूप में कार्य करें. शक्तिकेंद्रों पर काबिज होने के कारण वह दूसरों पर अपनी इच्छाएं थोपने की स्थिति में भी होता है. या यूं कहें कि अपने स्वार्थ के अनुरूप कलाओं को मनचाहा रंग देकर उनसे सांस्कृतिक हथियार का काम लेता है. उसका प्रभाव विभिन्न कलारूपों पर भी पड़ता है. यदि बाजारवाद भविष्य में भी इसी तरह हावी रहता है, राजनीति जनता के प्रति अपने दायित्वों को भुलाकर केवल उद्योगपतियों और सरमायेदारों की हितरक्षक बनने में लगी रहती है, तो प्रसारण के बड़े माध्यमों यथा दूरदर्शन, सिनेमा आदि पर परीकथाओं और विज्ञानकथाओं से संवेदना और सामाजिकता के क्षरण की स्थिति ऐसी ही बनी रहेगी, जैसी अब है. कृत्रिम कथानकों में वृद्धि होगी. वे जनसरोकारों से दूर ‘कला केवल मुनाफे के लिए’ के निमित्त प्रयुक्त होकर अपनी सामाजिक भूमिका से पलायन करते हुए नजर आएंगे.

ऊपर जो आशंका हमने व्यक्त की है, वह सर्वथा निराधार नहीं हैं. कहीं न कहीं इसके बीजतत्व अतीत में भी छिपे हुए हैं. तीसरी औद्योगिक क्रांति से गुजर रही इकीसवीं शताब्दी में तकनीक स्वयं फंतासी का रूप ले चुकी है. कई जगह तो उसका आभामंडल इतना प्रभावी और सम्मोहक है कि खुद को अभिव्यक्त करने के लिए उसे किसी और कथामाध्यम की आवश्यकता ही महसूस नहीं होती. यही कारण है कि इंटरनेट, कंप्यूटर गेम, सिनेमा, दूरदर्शन आदि पर प्रसारित, प्रचारित कई ऐसे कार्यक्रम हैं जो कथानक की जरूरत को नकारने का दावा करते हैं. यह मान लिया गया है कि आपाधापी के दौर में एक ही स्थान पर टिककर कहानी सुनने, परीकथा का आनंद लेने का समय किसी के पास नहीं है. इस व्यस्तता, जिसका बड़ा हिस्सा बनावटी है, का लाभ उठाने के लिए बाजार ने नएनए उपकरण उतारे हैं, जो तकनीकी कौशल के आधार पर मनोरंजन की जरूरत की भरपाई कर सकते हैं. उसके बनाए मायाजाल के आगे साहित्य और कलाएं दम तोड़ती नजर आती हैं. इन माध्यमों का सबसे बड़ा हमला कहन की कला पर है, जिसकी खूबी है कि वह व्यक्ति को अकेला नहीं रहने देती. पाठकश्रोता के चाहेअनचाहे, किस्सेकहानी के रूप में, वास्तविक या आभासी समाज उसके चारों ओर बन जाता है, जो उसको अवसरानुकूल प्रेरणाएं देने में सक्षम होता है. कहानियां व्यक्ति को विश्वास दिलाती हैं कि उसका अस्तित्व शेष समाज के साथ ही सुरक्षित है. दूसरी ओर आधुनिक प्रौद्योगिकी मानवमात्र को उपभोक्ता मानते हुए उसके आंतरिक एवं बाह्यः संसार पर अधिपत्य जमा लेने में अपनी सफलता मानती है. उसके संपर्क में आने के बाद वह स्वयं को न केवल आत्मनिर्भर और स्वतंत्र महसूस करता है, बल्कि खुद को शक्तिशाली भी मान बैठता है. इसलिए वह उपलब्ध कथारूपों का उपयोग केवल अपने खालीपन को भरने के लिए, औपचारिकता की तरह करता है. चूंकि मनुष्य सामाजिक प्राणी है, वह स्वयं को बाहर की दुनिया से अलग कर ले फिर भी, उसके भीतर पैठा हुआ सामाजिक बोध उसे शेष समाज से जोड़े रखता है. इस कारण उसके साहित्य और कला की दुनिया की ओर वापस लौटने की संभावना सदैव बनी रहती है. मानवमन की इस प्रवृत्ति पर नियंत्रण रखने तथा कमाई हेतु आज्ञाकारी उपभोक्ता में ढालने के लिए नई तकनीक ने आभासी दुनिया सृजित करने में सक्षम अनेक अवतार सृजित किए हैं. उनमें मैत्री केवल तस्वीरों से और विचार कंप्यूटर स्क्रीनों के सामने व्यक्त किए जाते हैं. उसकी विडंबना है कि एक साथ कितनी ही कंप्यूटर स्क्रीन से छनकर विचार जब व्यक्ति तक पहुंचते हैं, तब वे एक रेला बन चुके होते हैं. कंप्यूटर स्क्रीन चूंकि प्रतिवाद नहीं करती, इसलिए उनके आगे बैठा प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को विचार प्रदाता मानता है. सीधे संवाद के अवसरों के अभाव में वह अपने विचारों को ही अंतिम और सर्वोत्तम मानने का भ्रम पाले रहता है. दूसरे के विचारों को ग्रहण करने, उन्हें आत्मसात् कर दूसरों तक पहुंचाने का धैर्य उसके पास नहीं होता. कंप्यूटर स्क्रीन से निकलकर आ रहे विचारों के रेले में से नीरक्षीर की विवेचना करने के बजाए वह अपनी आधीअधूरी मान्यताओं के साथ बने रहने में ही गर्व महसूस करता है. कुल मिलाकर विचारों के रेले के बीच वह सबकुछ पाता है, परंतु असल में कुछ भी नहीं पाता. परिणामस्वरूप विभिन्न विचारधाराओं के बीच सार्थक संवाद, फिर कुछ निष्कर्षों को लेकर संकल्प धारण करने की स्थिति बन ही नहीं पाती. चूंकि वे माध्यम शक्तिशाली और तीव्र गति होने के साथसाथ चमकदमक से भी भरे होते हैं, इसलिए उनके प्रति युवामन में दीवानगी का भाव रहता है. तकनीक का आकर्षण कई बार इतना गहरा होता है कि कविता, कहानी जैसी साहित्य की विभिन्न विधाओं में विशेष रुचि न होने के बावजूद युवावर्ग उनमें इसलिए रुचि दिखाता है, ताकि तकनीक का प्रयोग कर ‘जमाने के साथ चलने’ का भ्रम पाल सके.

आधुनिक विकास की अवधारणा इस सिद्धांत पर टिकी है कि उसने व्यक्ति के जीवन को कितना सुविधामय और आत्मनिर्भर बनाया है. विज्ञान यह दावा भी करता है कि उसने व्यक्ति को सामाजिक जकड़बंदी से बाहर निकालकर आत्मनिर्भर बनाने का काम किया है? क्या इस आत्मनिर्भरता को प्राकृतिक स्वतंत्रता का पर्याय माना जा सकता है? शायद नहीं, क्योंकि प्राकृतिक स्वतंत्रता व्यक्ति को मुक्त करती थी. जबकि प्रौद्योगिकी प्रदत्त आत्मनिर्भरता व्यक्ति को समाज से काटकर यंत्रों और उपकरणों के माध्यम से आभासी दुनिया में कैद कर देती है. इतना आश्रित बना लेती है कि यंत्रों और उपकरणों की दुनिया ही उसे वैज्ञानिक ज्ञानविज्ञान का पर्याय लगने लगती है. प्राकृतिक स्वतंत्रता में असंतोष नहीं होता, प्राणिमात्र को यह भरोसा होता है कि प्रकृति उसकी आवश्यकतानुसार वस्तुएं उत्पादित करने में सक्षम है, इसलिए उसकी जरूरत की वस्तुएं उसको आगे भी समयानुसार मिलती रहेंगी. यह तोष उसको सहजीवन में बने रहने की प्रेरणा देता है. इस कारण वहां स्पर्धा को महत्त्व नहीं दिया जाता. आधुनिक प्रौद्योगिकी द्वारा निर्देशित दुनिया में ऐसा नहीं है. वहां विज्ञान और प्रौद्योगिकी का जिस प्रकार सीमित हितों में उपयोग होता है, उसमें हर नया शोध मनुष्य की कामनाओं को भड़काता है. उसकी आवश्यकताएं निरंतर बढ़ती चली जाती हैं. परिणामस्वरूप अनावश्यक स्पर्धा पैदा होती है. मनुष्य को हर समय यह लगता है कि उसके सुख के लिए सिवाय उसके कोई और सोचने और सहयोग करने वाला नहीं है. इस धारणा के साथ ही वह स्पर्धा को अपरिहार्य मान लेता है. वह डरता है कि दूसरों के भरोसे छोड़ते ही सबकुछ उसके हाथ से छिटक जाएगा. इस अविश्वास का परिणाम यह होता है कि जो स्पर्धा पहले बाहर के लोगों के साथ होती थी, उसका निरंतर सिमटता हुआ दायरा परिवार को भी अपनी गिरफ्त में ले लेता है. इसका असर सुखसुविधाओं के लिए अपने ही परिजनों पर संदेह, अविश्वास, हताशा और कुंठा के रूप में नजर आता है. इससे सामाजिक संबंधों का हृास होता है.

संबंधों में आत्मीयता की खोज व्यक्ति को आभासी दुनिया में ले जाती है. चूंकि आभासी दुनिया के लोग उसकी सुखसुविधाओं के साथ सीधे स्पर्धा में नहीं होते, और उनके साथ संवाद करते हुए वह अपने अभावों को भी छिपा सकता है, इसलिए उस दुनिया में उसका मन रमने लगता है. धीरेधीरे उसे वह नकली और आभासी दुनिया ही असली प्रतीत होने लगती है. इसमें दोष विज्ञान और प्रौद्योगिकी का नहीं है, बल्कि उसके लाभों का सीमित हाथों में कैद हो जाने का है. ज्ञान पर कभी किसी एक व्यक्ति का अधिकार नहीं रहा. वह पूरे समाज का होता है. उसके अर्जन में प्रत्यक्ष या परोक्ष सभी वर्गों का योगदान होता है. बावजूद इसके सामान्यतः उसका लाभ समाज के मुट्ठीभर लोगों को मिलता रहा है. यही बात विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर भी खरी सिद्ध होती है. वैज्ञानिक आविष्कारों के पीछे भी किसी न किसी रूप में समाज के प्रत्येक वर्ग का योगदान होता है, मगर उसका अधिकांश लाभ वे लोग उठाते हैं, जो कुछ पूंजी लगा देने मात्र से प्रयोगशालाओं के मालिक मान लिए जाते हैं. इसकी प्रतिक्रिया समाज के दूसरे वर्गों पर भी होती है. विकास के लाभों से वंचित लोग यह सोचकर कि उन्हें विकास के लाभ से सोचीसमझी नीति के अंतर्गत दूर रखा गया है, विकासप्रक्रिया में भरपूर योगदान देने से जी चुराने लगते हैं; अथवा उसका योगदान स्वतःस्फूर्त्त न होकर कर्मकांड मात्र रह जाता है. इससे सामाजिक अविश्वास जन्म लेते हैं, अंत:संघर्षों का जन्म होता है. उत्पादक यहां भी लाभ की स्थिति में रहता है. श्रमिकों को समझाने, उनकी समस्याओं का निदान खोजने की अपेक्षा वह तकनीक के स्वचालीकरण पर जोर देता है. जिससे उसकी उत्पादकता बढ़ती है. मालिक श्रमिकहितों के साथ मनमानी करने की स्थिति में बना रहता है. इससे दोनों वर्गों के बीच की खाई निरंतर बढ़ती जाती है.

ऐसे में साहित्यकार क्या कर सकता है? इसका उत्तर एकदम साफ है. साहित्य केवल साहित्य बना रहे, साहित्यकार निष्ठापूर्वक अपनी भूमिका निभाए, इससे अधिक न तो साहित्यकार से अपेक्षाएं हैं, न ही उसकी कोई आवश्यकता है. साहित्यकार को भरोसा होना चाहिए कि साहित्य समाज का केवल दर्पण नहीं होता. यदि साहित्य की भूमिका को केवल दर्पण तक सीमित कर दिया जाए तो इस प्रकार का काम करनेवाली और भी कई चीजें मिल जाएंगी. हम सभी समाज में रहते, उसको देखतेभोगते हैं. हमारी टिप्पणियां या जीवन एक प्रकार से समाज की छोटीछोटी तस्वीरें ही होती हैं. साहित्यकार की भूमिका इतनी भर नहीं है कि वह समाज का रोजमर्रा का हिसाबकिताब लिखता फिरे. साहित्य की भूमिका विधेयात्मक होती है. साहित्य समाज को केवल आईना ही नहीं दिखाता. गुणदोष दिखाने के साथसाथ वह समाज को यह भी बताता है कि उसके लिए क्या और कैसा होना श्रेयस्कर है. इसके लिए उपलब्ध मार्गों की ओर संकेत करते चलना भी साहित्यिक विमर्श का हिस्सा होता है. इस हकीकत को पूंजीपति भी भलीभांति समझता है. मगर उसके पास हर वर्ग से निपटने का खास तरीका होताा है, वह राजनेताओं को फुसलाकर, लालच देकर अपने बस में करता है तो साहित्यकारों को किसी न किसी प्रकार भरमाने, उनका विश्वास जीतने में लगा रहता है. इसलिए चाहेअनचाहे साहित्यकार से भी चूक होती रही है.

अधिकांश लेखकों ने विज्ञान को धर्म की तरह देखा; तथा वैज्ञानिक को पुरोहित की भांति पवित्र मान लिया. मान लिया कि सरकार या पूंजीपति द्वारा वैज्ञानिक से जो ‘पौरोहित्य कर्म’ कराया जा रहा है, वह वैसा ही है, जैसा उसको होना चाहिए. ऐसी परिस्थितियों में विज्ञान लेखन का कर्मकांड में ढल जाना स्वाभाविक हो गया. इस बारे में आलोचकीय चुप्पी षड्यंत्र की तरह कायम रही. अपवाद को छोड़कर वह कभी सक्रिय नहीं रही. इस कारण आधुनिक विज्ञान लेखन में न केवल दोहराव है, बल्कि कुछ अर्थों में तो वह परंपरा का ही पुनःप्रस्तुतीकरण लगता है. यदि पिछली शताब्दी के विज्ञान लेखन को देखा जाए तो उसके नब्बे प्रतिशत में वैसी वैज्ञानिकीय यात्राएं हैं, जैसे पहले राजामहाराजा युद्ध अभियानों पर निकलते थे और किए नए राज्य को फतह करके लौट आते थे. उनमें दो विपरीत शक्तियों के बीच महत्त्वाकांक्षाओं का वैसा ही संघर्ष है, जैसा कभी देवता और राक्षसों के बीच रहता था. यह दुनिया को अच्छे और बुरे में बैठेठाले बांट देने का शगल है, जिसके पीछे कुल व्यवस्था को सुर और असुर में बांटकर देखने का चलन रहा है. इससे इतर भी वैज्ञानिक लेखन या विमर्श हो सकता है, इसपर शायद ही कभी सोचा ही नहीं गया. यदि ध्यान से देखा जाए तो इसी प्रकार का लेखन पारंपरिक परीकथाओं में भी है. बल्कि कुछ मायनों, विशेषकर जनभावनाओं से नैकट्य के आधार पर मैं लोकसाहित्य और परीकथाओं को विज्ञान लेखन से बेहतर स्थिति में मानता हूं. उनमें लोक की न केवल ससम्मान उपस्थिति रहती है, बल्कि अनुकूल अवसरों पर उसके असंतोष और विरोध का भी उल्लेख होता है, जिससे समाज की आंतरिक हलचलों को परखा जा सकता है. विज्ञानकथाओं में इसका अभाव है. इस कारण वे अभिजन संस्कृति के चहेते सपनों का आधुनिक आख्यान बनकर रह जाती हैं. इस अवैज्ञानिक धारणा को कम से कम विज्ञान लेखकों द्वारा सच मान लिया लगता है कि कुछ लोग ‘ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम हैं’ और ‘कुछ ज्ञान प्राप्त करने में पूर्णतः अक्षम.’ परोक्ष रूप में विज्ञानसाहित्य भी इसी को सच सिद्ध करता है, इसलिए वह मध्यवर्गी फंतासी तक सीमित रह जाता है. विज्ञान की सामाजिक भूमिका वाला भाव वहां अनुपस्थित बना रहता है.

दूसरे शब्दों में हमारे विज्ञान लेखकों ने विज्ञानसाहित्य रचा अवश्य, लेकिन उनका संस्कार वही रहा, जो परीकथाओं में जमाने से चला आ रहा था. तो क्या हमारे विज्ञानसाहित्यकार विज्ञान लेखन के नाम पर परीकथाओं को ही नए कलेवर में ढालते आए हैं? यह सुनकर विचित्र लग सकता है. मगर सचाई यही है कि हमारा विज्ञान लेखन, विशेषकर विज्ञानकथाएं और विज्ञान गल्प, परीकथाओं के यदि एकदम आसपास नहीं, तो बहुत दूर भी नहीं है. कारण सिर्फ इतना है कि हमारे लेखकों ने अपनी रचनाओं में नवीनतम शोध और कल्पनाओं को तो भरपूर जगह दी, परंतु वे स्वयं विज्ञानबोध को वंचित रहे. समाज तो दूर वे उसे अपने जीवन में भी नहीं उतार पाए. अधिकांश विज्ञान लेखकों के लिए विज्ञान का अभिप्राय अंतरिक्षीय उड़ानों, हवाई जहाज, उपग्रह, प्रयोगशाला, अंतर्ग्रही युद्धों तक सीमित रहा. जबकि विज्ञान यंत्र अथवा उपकरण तक सीमित नहीं है. वह प्रयोगशाला भी नहीं है, जहां वैज्ञानिक लोग बड़ेबड़े शोध किया करते हैं. विज्ञान असल में पद्धति है. प्रणाली है ज्ञानार्जन की. उसकी नींव तार्किकता, जांचपरख और प्रयोगोंपरीक्षणों पर टिकी होती है. ऐसा विज्ञान लेखन वैज्ञानिक उपकरण, प्रयोगशाला आदि के बगैर भी लिखा जा सकता है. आदर्श विज्ञानगल्प तो वह है जिसमें वैज्ञानिक उपकरणों, प्रयोशाला और यंत्रों के उल्लेख के बिना भी भरपूर तार्किकता और विज्ञानबोध हो. क्योंकि ये सब विज्ञान साहित्य के साधन हो सकते हैं, साध्य नहीं. अधिकांश विज्ञान लेखक साध्य और साधन में अंतर नहीं कर पाते. इस कारण वे साधन को ही साध्य मानने की भूल कर बैठते हैं. वे विज्ञान की सामाजिक भूमिका को लेकर आश्वस्त नहीं हो पाते. बेकन ने विज्ञान को शक्ति माना था. ‘ज्ञान ही शक्ति है’ का नारा उसने दिया. वैज्ञानिकों के साथसाथ लेखकों ने भी उसी को मंत्र का दर्जा दे दे दिया. मुझे लगता है कि ज्ञानविज्ञान के साथ शक्ति के प्रत्यय को जोड़ देना सबसे बड़ी भूल रही, क्योंकि ‘शक्ति’ के साथ कहीं न कहीं ‘जंगल के न्याय’ की अवधारणा भी जुड़ी हुई है. शक्ति केवल विभाजन कर सकती है. छोटेबड़े का, गरीबअमीर का, काले और गोरे, स्त्री और पुरुष का वगैरह. यही हुआ भी है. शोध कार्य में डूबा हुआ वैज्ञानिक भले ही निर्लिप्तनिष्पक्ष रहे, विज्ञान की शक्ति जिसके हाथों में जाती है, चाहे उद्योगपति हो अथवा राजनेता, व्यापारी हो या अधिकारी, सभी उसका उपयोग प्रायः जंगल के न्याय की भावना के साथ करता है. यही होता आया है. बेकन के करीब साढ़े तीन शताब्दी बाद आइंस्टाइन ने जरूर कहा कि ‘ज्ञान सत्य है और सत्य का बोध आत्मा के लिए आवश्यक है.’ परंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी. दुनिया विज्ञान की ताकत से हिल चुकी थी. अतः यह अपेक्षा विज्ञान लेखकों से थी कि वे बेकन की उक्ति ‘ज्ञान ही शक्ति है’ को भक्तिभाव लेने के बजाय उसके निहितार्थ को समझते तथा उसमें तत्काल संशोधन करते. बेकन के कथन के विरोधाभास को समझते कि विज्ञान का विकास यदि लोगों को उनके कष्टों से मुक्ति दिलाने के लिए हुआ है तो वह कल्याणधर्मी है. इसलिए विज्ञान को शक्ति बताने के बजाय ‘विज्ञान से सर्वकल्याण’ का नारा अधिक समीचीन रहता. उचित होता कि वे साहित्यकार और समाजकर्मी एकजुट होकर विज्ञान के लोकोन्मुखी उपयोग पर जोर देते. तब शायद कहीं वे विज्ञान की आमद के साथ देखे गए सपनों को पूरा करने में अधिक सार्थक भूमिका को अंजाम दे पाते.

इसके लिए प्रेरणाएं बहुत थीं. पश्चिम में सुकरात ने ‘सदगुण को शुभ’ की संज्ञा दी थी. अरस्तु ने नैतिकता के मार्ग को ही सर्वोत्तम माना था. महाभारत में तो अरस्तु और सुकरात से शताब्दियों पहले लिखा जा चुका था, ‘न हि मानुषात् श्रेष्ठतरं हि किंचितः’ मनुष्य के लिए ‘मनुष्य से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है.’ विज्ञान को शक्ति का पर्याय मानने का ही परिणाम था कि आइंस्टाइन के आविष्कार के आगे अलेक्जेंडर फ्लेमिंग, एडबर्ड जेनर की उपलब्धियों की पर्याप्त चर्चा न हो सकती. जबकि फ्लेंमिग ने पेनसिलीन तथा जेनर ने चेचक की वैक्सीन का निर्माण कर दुनिया को जानलेवा महामारियों से बचाने में मदद की थी. करोड़ों लोगों को उससे लाभ मिला. आज भी वे दोनों आविष्कार करोड़ों लोगों को स्वाथ्यलाभ देते हैं. आइंस्टाइन को सर्वाधिक चर्चा शायद इसलिए मिली, क्योंकि उनका आविष्कार ‘बड़ा धमाका’ कर सकता था. लोग उसके आविष्कार से भय खाते थे. वह भय वश जन्मा अनुराग था. कदाचित सामंती संस्कार, जो शक्ति के न्याय को ही अंतिम मान लेता है. आइंस्टाइन का आविष्कार बेकन की स्थापना कि ‘ज्ञान ही शक्ति है’ के अधिक निकट था. क्या इसके पीछे कोई साहित्यिक चूक रही? क्या उन साहित्यकारों की कमी रही, जो बेकन की परिभाषा को अंतिम मानते हुए वैज्ञानिक शोधों के समाजशास्त्रीय विश्लेषण से किनारा करते रहे? क्या इसके पीछे लेखकों का परंपरा और संस्कृति के पीछे अत्यानुराग था? जो मनुष्यता और मानवकल्याण की भावनाओं को भी देश, संस्कृति और राज्य की सीमाओं के अनुसार परखता है. क्या इसी कारण वह आधुनिकता से प्राप्त ज्ञानविज्ञान के साधनों का समयानुसार लाभ उठाने में विफल रहा? दरअसल यही वह चुनौती है जिससे हमारे साहित्यकारों को जूझना है. फिर वे चाहे परीकथा लेखक हों अथवा विज्ञान लेखक. उन्हें मान लेना चाहिए कि वे पहले साहित्यकर्मी हैं, विधाओं और लेखन की धाराओं का अंतर बाद में आता है. इसलिए यदि कोई परीकथा लिखना चाहता है तो उसको चाहिए ऐसा लिखे कि उसकी रचना में पर्याप्त विज्ञानबोध हो; और यदि विज्ञानकथा लिखना चाहता है तो उसके लिए रचना को परंपरा, संस्कृति और संवेदना के साथसाथ मनुष्यता से जोड़े रखना बेहद जरूरी है.

परीकथा, विज्ञानकथा और विज्ञानगल्प में समानता है कि ये तीनों मनुष्य का स्वप्नलोक रचने में सहायक होते हैं. केवल उनकी प्रकृति का अंतर है. परीकथाएं उस दौर के समाज का प्रतिनिधित्व करती हैं जब सामाजिक आचारसंहिता पूरी तरह धर्म से नियंत्रित होती थी. धार्मिक मिथकों, परंपराओं से प्रेरित परीकथाएं जनसाधारण की भावनाओं, सपनों और आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करती हैं. एक तरह से वे धार्मिक विधान के भीतर ही अपने लिए स्वप्नलोक का निर्माण करना चाहती हैं. इस कोशिश में कहींकहीं वे धर्म के मायावाद का शिकार भी नजर आती हैं. चूंकि धर्म सामंतवादी समाज की खोज है, इसलिए परीकथाओं की संरचना पर सामंती प्रभाव स्पष्ट नजर आता है. उनमें हमें ऐसे समाज के दर्शन होते हैं, जिसमें आर्थिकसामाजिक और राजनीतिक वैषम्य को शास्त्रीय मान्यता प्राप्त थी. ऐसे में अधिकार वंचित वर्ग का स्वप्नलोक अपने लिए न्यूनतम आजादी, समानता और सुखसुविधाओं की अपेक्षा तक सीमित रह जाता है. समान नागरिक संहिता जैसा कोई सपना उस समाज का नहीं था, इसलिए समस्याओं के समाधान भी उसकी तय आचार संहिता के अनुसार ही प्राप्त होते थे. परीकथा में उदार एवं कृपालु परी की अनुकंपा नायक और नायिका पर अलगअलग होती थी. कथानायक यदि लड़का है तो परी उसे जादुई मदद द्वारा किसी छोटेमोटे राज्य का राजा बना देती थी. लड़की होने पर परी का काम कदाचित आसान था. राजकुमारी की सामान्य लालसा किसी सुंदर, सजीले, बहादुर राजकुमार की अर्धांगिनी बनने तक सीमित रहती थी. इसके लिए राजकुमार स्वयं प्रयासरत रहता था, इसलिए परी का काम राजकुमारी को प्रतीक्षारत छोड़कर अथवा उसके लिए सुंदर वस्त्रों, आभूषणों का प्रबंध कर देने मात्र से कार्य सध जाता था. पाठक इतने से संतुष्ट हो जाता था, हालांकि इसकी बहुत बड़ी कीमत स्त्री को अपनी स्वतंत्रता के रूप में चुकानी पड़ती थी.

जातीय आधार पर विभाजित समाज में सभी वर्गों की भूमिका तय थी. इसलिए परिवर्तन का सपना देखनेवाले साधारण पृष्ठभूमि को अपने महत्त्वाकांक्षाओं को साधने के लिए वर्गीय उत्क्रमण की प्रतीक्षा भी करनी पड़ती थी; और वह केवल चमत्कार में ही संभव था. दूसरे शब्दों में राजनीतिक अधिकारों के भोग हेतु नायक द्वारा आवश्यक शक्ति अथवा किसी चमत्कार के माध्यम से अपने वर्ग का उत्क्रमण कर, तत्कालीन राजनीतिक अधिकार संपन्न वर्ग में सम्मिलित होना आवश्यक था. उसके आसपास के लोगों को राजनीतिक अधिकारों में सीधी हिस्सेदारी के बजाए या तो अपनी नियति से समझौता करना पड़ता था, अथवा ऐसे ही किसी चमत्कार की प्रतीक्षा करती पड़ती थी जो उनका उत्क्रमण करा सके. नायकनायिका के सीधे हित अथवा उनके महिमामंडन के अवसरों से इतर, प्रजा का उल्लेख परीकथा में आवश्यक न था. उसकी कहानी नायकनायिका से आरंभ होकर उन्हीं पर समाप्त हो जाती थी. समाज में कार्यविभाजन का आधार जातिव्यवस्था थी. कृषि भूमि राज्याधीन. इसलिए किसान, मजदूर, छोटेमोटे दस्तकार और व्यापारियों की आय उतनी नहीं थी कि उसके आधार पर वे आर्थिक आत्मनिर्भरता का सपना देख सकें. इस कारण परीकथाओं में एक स्वप्नलोक आर्थिक आत्मनिर्भरता का भी था, जिसका रास्ता पुनः चमत्कारों के रास्ते जाता था. समस्या के निदान के लिए परी छड़ी हिलाकर खजाने के ढेर लगा देती अथवा किसी अन्य चमत्कार के बहाने कोई छिपा हुआ खजाना नायकनायिका के बदले वर्तमान और भविष्य की प्रतीति करा देता था. कह सकते हैं कि परीकथाएं जनसाधारण के रोजमर्रा सपनों की उड़ान हैं. उन्हें नाउम्मीद भरे वातावरण में, स्थितियों से समझौता कर चुके समाज की शरणस्थली भी कही जा सकती हैं.

विज्ञान का जन्म ही परंपरा के प्रति संदेह के साथ हुआ था. धर्म जहां जीवन की समस्याओं का अंतिम निदान मोक्ष में खोजता था, वहीं वैज्ञानिकों का परम लक्ष्य इस भौतिक संसार में ही, अपने पुरुषार्थ द्वारा मोक्ष जैसी स्थिति उत्पन्न कर संपूर्ण मनुष्यता का कल्याण करने का रहा है. विज्ञान मानता है कि सृष्टि में कुछ भी अनुपयोगी या अशुभ नहीं है. न ही कुछ ऐसा है जिसका उपयोग मनुष्य के लिए निषिद्ध हो. जिसकी अनुभूति होती है, उसका अस्तित्व भी है. जिसका अस्तित्व है, प्राणिमात्र की कल्याणभावना के साथ उसका उपयोग करना पुरुषार्थ है. जीवन को सुखी बनाना प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है. उसके लिए कोई भी कार्य जिससे दूसरों को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष किसी प्रकार की हानि न पहुंचे, करने की आजादी व्यक्तिमात्र को मिलनी चाहिए. उल्लेखनीय है कि विज्ञान का विकास उस दौर में हुआ, जब समाज में प्रसुप्त अस्मिताएं सिर उठाने लगी थीं. नए विचारों की रोशनी में समाज में बराबरी के सपने जगे, तब लगा कि विज्ञान भी चमत्कार कर सकता है. इसलिए कहानी में जो कार्य पहले जादू से किया जाता था, वह तकनीक की सहायता से किया जाने लगा. लोगों को जागरूक और चैतन्य बनाने के लिए भी विज्ञानलेखन की जरूरत महसूस की गई थी. उसके लिए अनेक प्रतिभाशाली लेखक आगे आए. विज्ञान ने उन लोगों को सपने देखने का अवसर दिया जो साधनविहीन थे. जिनकी पूंजी केवल उनका श्रम था; जो अभी तक दूसरों पर आश्रित जीवन जीते आए थे, जिन्हें धर्म, जाति अथवा किसी अन्य व्यवस्था में सीधे हस्तक्षेप तथा अन्य अवसरों से वंचित किया गया था, उनके समर्थन में अनेक उदारवादी चिंतक, लेखक और कार्यकर्ता थे. सभी की आंखों में समरस समाज का सपना था. उनका मानना था कि विज्ञान ने अपने आगमन के साथ जो सपने लोगों को दिखाए गए थे, एकएक कर वे सभी झूठे सिद्ध हुए हैं. यह वर्ग निराश अवश्य था, किंतु हताश नहीं हुआ था. विज्ञान और प्रौद्योगिकी के सहयोग से स्वप्नलोक बसाने का उसका सपना, धरती पर अथवा धरती से परे, ऐसे लोक का सपना था, जहां श्रम का सम्मान हो. सभी कष्टकारी कार्य तकनीक की सहायता से संपन्न होते हों. जीवन खुशहाल, सभी बराबर और निरोग हों. विज्ञान पर अत्यधिक निर्भरता प्राणिमात्र एवं पर्यावरण के लिए कितनी हानिकर हो सकती है—इस प्रकार की चिंताएं भी उनकी रचनाओं में जगह लेती थीं. विज्ञानकथाओं और विज्ञानगल्प को लोकप्रिय बनाने में इसी सपने का योगदान रहा. यह लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि विज्ञानगल्प को गल्प का पर्याय मान लिया गया. तकनीक के कंधे चढ़ा मौलिक और कल्पनाप्रधान विज्ञानगल्प, आधुनिक व्यावसायिक सिनेमा की पहचान बन गया.

आदर्श समाज की स्थापना का ऐसा ही सपना परीकथाओं का भी रहा है. अपने स्वप्नलोक की खोज की यात्रा विज्ञान कथाकार को पृथ्वी से इतर किसी अन्य गृह, नक्षत्र पर भी ले जा सकती है. परीकथाएं सामाजिक जीवन के अपेक्षाकृत निकट बनी रहती हैं.वे स्वस्थसंपन्न सामाजिकता में अपना सार्थक पाती हैं. जीवन के लिए अनुकूल स्थितियों की कल्पना करते हुए वे पाठक को परीलोक ले जाती हैं, जहां मानवीय कल्पना साकार होती है. चूंकि प्राचीनकाल में यह माना जाता था कि देवलोक देवताओं का ठिकाना है, वहां केवल देवानुकंपा से जाया जा सकता है. दूसरा पाताल लोक, वहां राक्षसों का साम्राज्य है. इस कारण वह भी मनुष्य के लिए अनुपयुक्त है. अतः मृत्य मानव के लिए केवल मृत्युलोक है. केवल पृथ्वी जहां अनेकानेक चुनौतियां हैं, उसका ठिकाना हो सकती है. इसलिए मनुष्य ने कल्पना की एक और दुनिया गढ़ी, परीलोक. पृथ्वी और स्वर्ग के बीच का खूबसूरत ठिकाना. और मनुष्य को वह कल्पना इतनी पसंद आई की पीढि़यों का सपना बन गई. हालांकि सब कुछ वायवी, सुंदर सपने की तरह होने के कारण परीलोक का महत्त्व सैरसपाटे से अधिक न था. परीकथा पूरी होते ही उसका स्वप्नलोक भी बिखरने लगता था. इसके बावजूद उस कल्पकृति का महत्त्व बना रहा. इसलिए कि संघर्ष से जूझते, निराश अथवा महत्त्वाकांक्षाओं के घोड़े पर सवार मनुष्य को भी, कल्पना की वह रम्यस्थली थोड़े आराम का अवसर दे देती थी. ताकि वहां कुछ पल गुजारकर वह जीवन के नए सफर की ओर नई ऊर्जा के साथ प्रयाण कर सके. परीकथा पूरी होते ही मनुष्य वापस अपनी दुनिया में लौट जाता है. कदाचित अपनी दुनिया को परीलोक जैसा सुंदरसार्थक बनाने का स्वप्न लेकर.

दूसरे लोक की यात्रा के प्रसंग पुराकथाओं में भी हैं. मर्त्य सम्राट देवताओं की मदद के लिए स्वर्ग यात्रा करते रहते थे. विज्ञानगल्प में इस सपने को विस्तार मिला कि पृथ्वी से इतर अंतरिक्ष में भी स्थायी बस्तियों का निर्माण संभव है. ऐसी बस्ती जहां सभी बराबर हों. जहां सभी सुविधाएं यंत्रों द्वारा संभव हों. नागरिकों में पर्याप्त सामाजिक बोध हो. पुलिस, कानून, अदालतों की जहां आवश्यकता ही न पड़ती हो. आशय है कि आदर्शलोक चाहे वह परीकथाओं के माध्यम से देखा गया सपना हो अथवा विज्ञान की मदद से, दोनों लगभग एकजैसे ही थे. अंतर केवल उस आदर्शलोक के सपने को साकार करने के माध्यम पर था. विज्ञानगल्प द्वारा कल्पित आदर्शलोक मनुष्य के अपने बुद्धिविवेक, पुरुषार्थ, मैत्री, वैज्ञानिक दक्षता और सहयोगभावना पर टिका हुआ था. जबकि परीलोक की व्यवस्था परामानवीय शक्तियों अथवा चामत्कारिक अनुकंपा पर टिकी थी. एक खूबसूरत सपने की भांति, परीलोक में जरूरत की सभी वस्तुएं सहज हासिल की जा सकती हैं. लेकिन वहां की व्यवस्था के केंद्र में परियों की रानी होती थी. एक तरह से परीलोक आदर्श, उदार राज्य की छवि प्रस्तुत करता है. विज्ञानलोक में आमतौर पर वैज्ञानिक सर्वेसर्वा होते हैं. प्रायः मान लिया जाता है कि यदि सभी खुशहाल होंगे, अवसरों में सब की समान भागीदारी होगी तो राज्य नामक संस्था की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. इसलिए विज्ञान के आदर्शलोक को ‘बिना राजा का राज्य’ भी मान सकते हैं. हालांकि नकारात्मक सोच लिए कोई वैज्ञानिक ऐसा लोक भी गढ़ सकता है, जहां एकदम विपरीत परिस्थितियां हों. उस लोक का सर्वेसर्वा विज्ञान की ताकत के बल पर पूरी दुनिया पर काबिज होने का सपना देखता हो. विज्ञानगल्पों में ऐसे वैज्ञानिक को खलनायक मान लिया जाता है. कह सकते हैं कि विज्ञान गल्प में अकेले व्यक्ति की अति महत्त्वाकांक्षाओं के स्थान पर, लोककल्याण के साथ देखे गए सपनों को वरीयता प्राप्त होती है. इस तरह विज्ञानलोक का आदर्श, वहां की लोकतांत्रिक अथवा ‘बिना राजा के राज्य’ जैसी व्यवस्था परीलोक के उदार राज्य की अपेक्षा आधुनिकता के निकट अनुभव होती है. परंतु क्या सचमुच ऐसा ही है? विज्ञानसाहित्य जिस प्रकार के आदर्शलोक का सपना हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है, क्या वह सचमुच लोकतांत्रिक अथवा अराजक है? इसके लिए हमें आधुनिक विज्ञान साहित्य के कुछ विशिष्ट पहलुओं पर विचार करना होगा.

दि टाइम मशीन’ जैसे चुंनीदा मौलिक विज्ञान उपन्यासों को छोड़कर अधिकतर के कथानक चंद स्थितियों के इर्दगिर्द घूमते हुए नजर आएंगे. अधिकांश से बेकन की आत्मा झांकती हुई नजर आएगी, लगभग नब्बे प्रतिशत विज्ञानगल्प या तो यात्रा अभियान हैं; अथवा किसी वैज्ञानिक महत्त्वाकांक्षा के दुष्परिणाम की कथायात्रा. यात्रा अभियान पृथ्वी के दुर्गम स्थानों के हो सकते हैं और अंत:ग्रही भी. वे किसी उदार वैज्ञानिक के प्रयोग के दुष्परिणाम भी हो सकते हैं, अथवा किसी दुष्ट वैज्ञानिक के दुनिया पर छा जाने के पागलपन के भी. इसकी नींव मेरी शैली की कृति ‘फ्रेंकेस्टीन’, जिसे प्रथम वैज्ञानिक उपन्यास का दर्जा दिया गया है, के साथ ही पड़ चुकी थी. फ्रेंकेस्टीन में एक वैज्ञानिक मरे हुए प्राणियों को पुनर्जीवित करने का फार्मूला खोज लेता है. ‘फ्रेंकेस्टीन’ ऐसी ही रचना है, जिसमें ‘राक्षसी ताकत’ है. विज्ञान लेखकों का दूसरा सबसे पसंदीदा विषय यात्राअभियान और उसमें भी अंतरिक्षीय अथवा अंतग्र्रही यात्राओं का रहा है. जूल बर्न के उपन्यासों से लेकर ‘आश्चर्य वृतांत’(अंबिकादत्त व्यास), ‘चंद्रलोक की यात्रा’(केशवप्रसाद सिंह), डा. हरिकृष्ण देवसरे के ‘लावेनी’, ‘राजू की मंगल यात्रा’, ‘लूशियन का रहस्य’ जैसे उपन्यास अंतरिक्ष यात्रा को लेकर लिखे गए हैं. आशय है कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो लगभग सारा का सारा वैज्ञानिक साहित्य विज्ञान को शक्ति का पर्याय सिद्ध करने की कोशिश करता है. परीकथाओं में जो कार्य जादू, टोने या राक्षसी वृत्ति द्वारा कियाकराया जाता था, विज्ञानकथाएं ऐसे असंभव दिखने वाले कार्य को ज्ञानविज्ञान के माध्यम से संभव होते हुए दिखाती हैं. वे ज्ञान का मिथकीकरण करने में योगदान करती हैं. दरअसल जब हम शक्ति, विशेषकर किसी व्यक्ति, प्राणी अथवा मशीन को लेकर अकूत शक्ति की बात करने लगते हैं तो समाज को अनायास ही शक्तिसंपन्न और शक्तिहीनों में बांट देते हैं. तब अनचाहे ही समाज में मोटी रक्षा खिंच जाती है. उसके एक ओर वे होते हैं, जो शक्ति संपन्न हैं, दूसरी ओर शक्ति से वंचित. दोनों का टकराव कथानक को आगे बढ़ाने के काम लाता है. और जब समाज बंटा हुआ हो, उसमें मोटी रेखाएं खिंची हुई हों, तो वह लोकतांत्रिक हो ही नहीं सकता. यानी विज्ञान साहित्य के नाम पर लिखित रचनाएं, रचनाओं में दर्ज उनके आदर्शलोक लोकतांत्रिक होने का दिखावा भले ही करें, उनका संदेश लोकतंत्र के आदर्श से दूर रह जाता है. हालांकि विज्ञान में लोकतांत्रिक होने की भरपूर संभावना होती है, मगर विज्ञान को धर्म मान लेने वाले साहित्यकार प्रायः विज्ञानबोध से कटे होते हैं. इसलिए वे साहित्य की आत्मा के साथ न्याय करने में असफल सिद्ध होते हैं. विज्ञान का रूप कल्याणकारी हो सकता है, ज्ञानविज्ञान को लेकर साधारण आदमी की दृष्टि से भी सोचा जा सकता है, या सोचा जाना चाहिए, उस ओर हमारे विज्ञान लेखकों की प्रायः दृष्टि ही नहीं जा पाती. लालच, विज्ञान के प्रति नासमझी, यशप्रतिष्ठा अथवा किसी ओर कारण से, विज्ञान साहित्य का जो स्वरूप इससे बनता है, वह परंपरागत परीकथा साहित्य से कतई भिन्न नहीं है. विज्ञान गल्प में लेखक उन लोगों को जो पृथ्वी से परे की यात्रा करने में सक्षम हैं, एक अलग काल्पनिक दुनिया बसा लेता है. मगर ऐसे आदर्शलोक का यात्री चाहे पाठक हो या कथापात्र, हमेशा यह याद रखता है कि एक पिछड़ी हुई, अवैज्ञानिक किस्म की दुनिया, धरती पर मौजूद है. इससे उसमें अभिजन संस्कार पनपने लगता है और वह स्वयं को जनसमाज से भिन्न, उससे श्रेष्ठ सिद्ध करने में जुटा रहता है. इस तरह विज्ञान का आदर्शलोक पीछे हमने जिसे ‘बिना राजा का राज्य कहा है, अभिजातों की रम्यस्थली बन जाता है.

बहरहाल, विज्ञान जिस तरह से पांव पसार रहा है, उससे इस बात की पर्याप्त संभावना है कि कल्पना की यात्रा आगे और भी तीव्र होने वाली है. यह विरूपित होगी या सही दिशा की ओर लौटेगी, यह लेखकों, समाजशास्त्रियों, साहित्यकारों और आलोचकों पर निर्भर करेगा. इस बात पर भी निर्भर करेगा कि वे स्थितियों की व्याख्या सत्ता द्वारा निर्धारित अथवा उनके अनुकूल दिखनेवाली कसौटियों के आधार पर करते हैं; अथवा उनकी दृष्टि समाजोन्मुखी, बहुसंख्यक के हित को समर्पित होगी. ऐसे में परीकथाओं का क्या होगा? प्रौद्योगिकीय आकर्षण ने विज्ञान लेखकों को भटकाया है तो परीकथाओं को विरूपित करने में भी उसने कोई कमी नहीं छोड़ी है. यह प्रवृत्ति आज की नहीं है. 1847—1848 में जब छायाकार जार्ज क्रुकशंक ने शराब के दुष्परिणामों को जनजन तक पहुंचाने के लिए, लोकप्रिय परीकथाओं के मुख्य चरित्रों का उपयोग शराब की बोतलों के लेवल डिजायन के लिए किया, तो उस शताब्दी के महान उपन्यासकार चाल्र्स डिकेंस ने उसका जोरदार विरोध करते हुए एक महत्त्वपूर्ण लेख ‘फ्रा॓ड आ॓न फेयरीटेल्स’ लिखा था. आगे चलकर वह लेख हेंस एंडरसन जैसे अनेक परीकथा लेखकों की प्रेरणा बना. ऐसे प्रसंग गिनेचुने होंगे. सच यही है कि विज्ञान और तकनीक को जो दिशा लेखकों, साहित्यकारों, वुद्धिजीवियों और समाजशास्त्रियों की ओर से मिली चाहिए थी, उसका अभाव रहा है. शायद इसलिए कि आधुनिक मनुष्य प्राचीनता एवं आधुनिकता के बीच तालमेल बनाने में असफल सिद्ध हुआ है. विकास का लालच नई प्रौद्योगिकी को आकर्षित करता है तो परंपरा और संस्कृति के दबाव उसको पीछे की ओर ढकेलते हैं. जिस कंप्यूटर से वह बड़ीबड़ी गणनाएं करता है, योजनाएं बनाता है, उसी कंप्यूटर का उपयोग ‘ज्योतिष’ और ‘कुंडली मिलान’ के लिए भी करता है. इनमें से पहले के लिए विज्ञान तर्क देता है, दूसरी के लिए आस्था. हालांकि ये व्यक्ति और समाज दोनों की स्वाभाविक गतियां हैं. विकास की प्रक्रिया दो कदम आगे और एक कदम पीछे हटते हुए आगे बढ़ती है. विकासधारा अवरुद्ध न हो, इसके लिए अनुकूल प्रेरणाओं की जरूरत हमेशा बनी रहती है.

आधुनिक विज्ञान लेखक माक्र्स को भले ही न मानें, मगर उसका ‘द्वंद्वात्मक भौतिकवाद’ किसी न किसी रूप में उनकी रचनाओं पर छाया रहता है. उनमें अच्छे और बुरे की बीच सपाट विभाजन होता है; यानी एक और सभी अच्छे मान लिए जाते हैं, दूसरी ओर सभी बुरे. उस व्यवस्था में न्याय की एक ही संभावना बनती है. अच्छे द्वारा बुरे का अंत. दोनों के बीच संवाद या समझौते की स्थितियां भी हो सकती हैं, किंतु उसपर आधुनिक विज्ञानलेखन विचार ही नहीं करता. कुछ ऐसा ही परंपरागत परीकथाओं में भी होता है. यद्यपि नए चलन की परीकथाएं इस आरोप से बाहर आने को उत्सुक हैं. उनमें नायक की सराहना इसलिए की जाती है, क्योंकि वह समाज द्वारा स्थापित मान्यताओं के समर्थन में रहता है. जबकि खलनायक सामाजिक नियमों, व्यवस्थाओं को कदमकदम पर चुनौती देता है. रचना में विचित्रता की चाहत विज्ञान लेखकों को कई बार परीकथाओं और मिथकीय पात्रों की ओर ले जाती है. इससे परीकथा और विज्ञानकथा की दूरी घटती जाती है. प्रथम विज्ञान उपन्यास ‘फ्रेंकिस्टीन’ से लेकर आधुनिक विज्ञानगल्पों तक यही स्थिति है. फिल्मों में भी ‘ही मेन’, ‘स्पाइडर मेन’, ‘शक्तिमान’, बैटमेन, ‘रावन’, ‘रोबोट’ जैसे चरित्र पुराकथाओं और/या परीकथाओं से चरित्रों का आयात करने के बाद ही गढ़े गए हैं. विज्ञान लेखक भले ही कहते फिरें कि आज का बालक समझदार है, परियों, बौने, भूतप्रेत, तंत्रमंत्र की हकीकत को जान चुका है. समझता है कि ये सब कल्पना की उड़ान हैं, लेकिन जब स्वयं चरित्र गढ़ने की बात आती है, तब उनकी कल्पना भी वहीं से प्रेरणा ग्रहण करती है, जिसे वे पुराना, पोंगापंथी और दकियानूसी बताते हैं. पुराकथाओं और परीकथाओं के चरित्र, बदले नामरूप में ‘असंभाव्य को संभव’ दिखाने के कथाकौशल के बीच, तथाकथित विज्ञानसाहित्य में आसानी से खपा लिए जाते हैं. परीकथा लेखक इस बारे में अपेक्षाकृत ईमानदारी बरतता है. उसका ध्यान केवल मनोरंजन तथा रचना द्वारा मिलनेवाले संदेश तक सीमित होता है. पात्रों की वास्तविकता का उसका कोई दावा नहीं होता. जबकि विज्ञानगल्प में पुराकथाओं के चरित्रों को इस रूप में प्रस्तुत किया जाता है कि ये आज भले ही काल्पनिक लगें, कल उन्हें प्रयोगशाला में गढ़ा जा सकता है. कई बार तो उन्हंे प्रयोगशालाओं में गढ़ा हुआ दिखाया भी जाता है. ‘डायनासोर’ नामक हालीवुड की फिल्म में वैज्ञानिकों को डायनासोर के जीवाश्म से प्राप्त डीएनए द्वारा सचमुच का डायनासोर गढ़ते हुए कल्पित किया गया है. परीकथाएं भी रक्तबीज जैसी कल्पनाओं को सहेजे रखती हैं. ऐसे पात्रों को वे राक्षस या ऐसा ही कोई नाम दे देती हैं. सामान्य विज्ञानबोध और तार्किकता के अभाव में विज्ञानगल्प, परीकथाओं के साथ उलझी हुई नजर आने लगती हैं. पात्रों की भिन्नता के बावजूद उनमें वास्तविक अंतर बहुत कम रह जाता है.

परीकथाओं की आत्मा किस्सागोई में बसती है. इधर जीवन में दिनोंदिन बढ़ती व्यस्तता के बीच किस्से सुननेसुनाने की परंपरा लुप्तप्रायः हो चुकी है. तो क्या साहित्य की यह रेशमी, खूबसूरत विधा एक दिन दमतोड़ लेगी? अथवा जिस तरह विज्ञानगल्पों में सीधेसीधे या घुमाफिराकर मिथकों और परीकथाओं के चरित्रों का उपयोग किया जा रहा है तथा परीकथाओं में नएनए प्रयोगों का सिलसिला चल रहा है, उससे भविष्य में दोनों का अंतर और भी तेजी से कम होता जाएगा? यह सब तो भविष्य ही तय करेगा. लेकिन जिस प्रकार असमान विकास के कारण गांव और शहर के बीच खाई बढ़ती जा रही है. गरीबीअमीरी अनुपात में लगातार इजाफा हो रहा है—उससे इतनी उम्मीद तो बनती है कि एक वर्ग के लिए परीकथाएं आगे भी उसका स्वप्नलोक बनी रहेंगीं. चूंकि उपभोक्तावादी मानसिकता का दौर अभी लंबा खिंचना है, ग्रामीण और सुदूर अंचल में बसे जनसमाजों में अपनी पैठ बनाने के लिए सिनेमा, दूरदर्शन, इंटरनेट आदि उनकी कहानियों तथा अन्य कथाप्रतीकों का जमकर उपयोग करेंगे, इससे यह भी तय माना जा सकता है कि दोनों के चरित्र परस्पर गड्डमड्ड होते जाएंगे. चूंकि आधुनिकता के तमाम आग्रहों के बावजूद मनुष्य परंपरागत मिथकों से किसी न किसी रूप में जुड़ा रहता है, इसलिए जनसमाज में अपनी पैठ बनाने के लिए, व्यावसायिक कारणों से ही सही, विज्ञानगल्प आगे भी परीकथाओं के मिथकीय चरित्रों का बड़ा आयातक सिद्ध होगा. जिस तरह संचारक्रांति ने दूरियों को पाटा है. सिनेमा, दूरदर्शन के अलावा इंटरनेट, मोबाइल फोन, कंप्यूटर आदि संप्रेषण के माध्यम के रूप में उभर कर आए हैं, उससे कहानियां पढ़नेसुनने से अधिक देखने की चीज बनती जा रही हैं. बदले परिवेश में लेखकीय कौशल की महत्ता घटी है. कुछ दशकों पहले आई फंतासीनुमा फिल्मों ‘स्पाइडर मेन’, बैटमेन, रावन आदि के मुख्य पात्रों की कल्पना परीकथाओं से प्रेरित थी. मगर उनमें तकनीक का इतना प्रयोग किया गया कि उनमें कथानक की संवेदना, जो परीकथाओं की प्रमुख विशेषता और साहित्य का गुण है, लगभग समाप्तसी हो गई. अमिताभ बच्चन अभिनीत भूतनाथ शृंखला की फिल्म ‘भूतनाथ’ 2008 में आई थी. वह फिल्म आस्कर वाइल्ड की परीकथा ‘दि केंटरविले घोस्ट’ पर आधारित थी. उसकी अगली कड़ी ‘भूतनाथ रिटर्नस’ केवल फंतासी है. भूत उसमें भी है, मगर उसका चरित्र परिवर्तन किया गया है. फिल्म का भूत खलनायक न होकर नायक है. पृथ्वी पर पहुंचने के बाद वह भारत की राजनीति तथा सामाजिक जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार, लापरवाही को देखकर इतना उद्वेलित होता है कि अपने लोक वापस लौटने का इरादा छोड़कर स्वयं चुनाव लड़ने का निर्णय ले लेता है. निर्वाचन नियमों की खामी का लाभ उठाकर वह टिकट पाने में सफल भी हो जाता है. कहानी में भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति और अपने अधिकारों के प्रति सचेत जनता के स्वप्नलोक को गढ़ा गया है.

मुंबइया फिल्म ‘एंटरटेनमेंट’ भी लोकतत्व पर आधारित है. उसमें एक अमीर आदमी कुत्ते को अपना वारिस बनाकर मर जाता है. कुत्ता जिस तरह के कारनामे दिखाता है, उससे एक श्रेष्ठ गल्प की संभावना बनती है. हिंदी के एक युवा ब्लाॅगर ने पिछले दिनों विज्ञान गल्प के नाम पर एक धारावाहिक उपन्यास लिखा. उसमें एक ओर गणित की बारीकियां थीं, विज्ञान के आधुनिकतम उपकरणों और शोधों की ओर संकेत था, वहीं चैंकानेवाली चीज उसमें राक्षस की उपस्थिति थी, जो किसी परीकथा से निकलकर विज्ञानगल्प में जा बैठा था. बहरहाल, परीकथा और विज्ञानगल्प के बीच यह सामान्य किंतु अनपेक्षित लेनदेन है. सामान्य इसलिए क्योंकि मनुष्य अपने अतीत को भूल नहीं पाता. भविष्य के लिए योजनानिर्माण तथा वर्तमान की चुनौतियों से निपटने के लिए वह अपने ज्ञानानुभव के साथसाथ वह पीढ़ीदरपीढ़ी चले आ रहे संस्कारों भी प्रेरणा लेता है. इसलिए विज्ञानकथा और परीकथाओं के संलयन पर लेखकों और आलोचकों के चाहे जो विचार हों, इतना तय है कि दोनों कथाधाराओं के बीच लेनदेन की प्रवृृत्ति आगे भी बनी रहेगी. और जैसा कि संकेत किया गया है, इस आदानप्रदान में विज्ञानगल्प परीकथाओं की अपेक्षा बड़ा ग्राहक सिद्ध होगा. यद्यपि वह प्रायः उन्हीं चरित्रों को उधार लेने को उत्सुक होगा, जो परीकथाओं में पुराकथाओं से आयातित हैं तथा लोकप्रिय मिथक के रूप में समाज में उनकी पूर्वप्रतिष्ठा है. इसलिए मौलिक और युगानुकूल परीकथाएं(विज्ञानगल्प भी) लिखनेवालों के लिए संभावना और चुनौती आगे भी बराबर बनी रहेगी. इससे परीकथाओं की महत्ता को आसानी से समझा जाता है. परीकथाओं के भविष्य को लेकर ऐसी ही आश्वस्ति चाल्र्स डिकेंस के शब्दों(फ्रा॓ड आ॓न फेयरीज) से भी झलकती है—

करुणा, सहिष्णुता, निर्बल और विपन्न के प्रति करुणाभाव, जानवरों के प्रति ममता, प्रकृति से स्नेहानुराग, क्रूरता और आतंक के प्रति घृणा, नफरत जैसी अच्छी बातें बच्चे के हृदय में पहली बार परीकथाओं जैसी सशक्त विधा के माध्यम से ही प्रवेश करती हैं. सही मायने में वे हमें भटकाव के दौर में सही रास्ता दिखाती हैं, हमें अंधियारे रास्तों से बचाती हैं, और हमें उस सीधेसादे रास्ते पर ले आती हैं जहां हम बच्चों के साथ उनकी उमंग और प्रफुल्लता के साथ साझा करते हुए घूमफिर सकते हैं. उपयोगितावादी दौर और हरेक काल में, हमेशा इस बात पर जोर दिया गया है कि परीकथाओं का सम्मान किया जाना चाहिए. अतएव प्रत्येक मनुष्य जो इस विषय को भलीभांति समझता है, वह यह भी जानता है कि जहां तक सूरज की रोशनी जाती है वहां तक, बगैर किसी कल्पना, बगैर किसी रोमांस के कोई राष्ट्र पहले न तो कभी था, न हो सकता है, न ही होगा.’

परीकथाएं लोकानुभूतियों का दस्तावेज हैं. उसमें आमजन के सपनों, इच्छाओं, संघर्षों एवं पीड़ाओं की झलक मिलती है. बड़ी बात यह कि वे कठिन संघर्ष के बीच भी उम्मीद को बनाए रखती हैं. उनका यही गुण उन्हें मानवसभ्यता से जोड़कर जीवन में लगातार प्रासंगिक बनाए रहता है. परीकथाओं के इन गुणों को आत्मसात् कर आधुनिक विज्ञान लेखन अपनी सामाजिक उपादेयता सिद्ध कर सकता है. दूसरी ओर विज्ञानकथाओं की तार्किकता एवं आधुनिक मूल्यबोध को अपनाकर, परीकथाएं भी अपने ऊपर लगनेवाले आरोपों से मुक्ति पा सकती हैं.

बालसाहित्य का विकासयुग : साहित्य में बचपन की दस्तक

सामान्य

हिंदी बालसाहित्य : अतीत से आज तक—3

विश्व इतिहास में अठारवीं शताब्दी को विभिन्न वैचारिक आंदोलनों की जन्मदाता होने का श्रेय प्राप्त है. मगर भारत के संदर्भ में यह शताब्दी करीबकरीब ठहरा हुआ समय था. मुगल समाज पतनोन्मुखी था. रजबाड़ों में विलासिता का दौर जारी जारी था. भक्त कवियों ने जिस सामाजिक क्रांति का शुभारंभ किया था, वह कर्मकांडों और बौद्धिक हताशा के दौर में पड़कर दम तोड़ चुकी थी. यही कारण है कि इस कालखंड में जो विदेशी व्यापार कंपनियां भारत में आईं, स्थानीय राजाओं की आपसी फूट और राजसी लिप्साओं के कारण वे यहां बड़ी आसानी से राजनीतिक शक्ति बटोरती चली गईं. निहित स्वार्थ के लिए उन्होंने भारतीय साहित्य का अध्ययनशोधन करना आरंभ किया. कालांतर में उसका लाभ देशवासियों को भी हुआ. यूरोपीय ज्ञानविज्ञान और संस्कृतियों के लेनदेन के बीच नए विचारों ने देश में दस्तक दी. इससे साहित्यसंस्कृति में नया युग आरंभ हुआ. यूरोप के संदर्भ में यह पंद्रहवीं शताब्दी से शुरू होता है. उस संधिकाल का एक पक्ष वैज्ञानिक प्रबोधन की घटना से जुड़ा है, जब एक ओर मार्टिन लूथर, जान काल्विन जैसे सुधारवादी विचारक धर्म के नाम पर फैलाई जा रही जड़ता और पुरोहितवर्ग की लूटखसोट की ओर ध्यानाकर्षित करा रहे थे. दूसरी ओर वैज्ञानिकों और मौलिक विचारकों का वर्ग था जो लोगों को अज्ञानता के दलदल से निकालने की कोशिश कर रहे थे. वैज्ञानिकों में न्यूटन और कापरनिकस सबसे अग्रणी थे. उन्होंने अपने मौलिक खोजों द्वारा उन्होंने अर्से से चली आ रही अवैज्ञानिक मान्यताओं, रूढ़ियों तथा अज्ञानता के प्रतीकों पर जोरदार प्रहार किया था. प्रौद्योगिकीय क्रांति ने अनेक सामाजिक समस्याएं भी पैदा की थीं. जिसने दार्शनिकों, समाजविज्ञानियों को नए सिरे से सोचने को विवश कर दिया था. कालांतर में मानवाधिकार एवं स्वाधीनतावादी आंदोलनों ने समाज में एक नई चेतना प्रवाहित की. इसी दौर में स्त्रीस्वातंत्रय की बयार चली. प्रकारांतर में उसने बालकों के अधिकारों की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया.

साहित्य भूमि पर बचपन की दस्तक शब्दों में मासूमियत की दस्तक है. यह उस क्षण की खोज है जब से बालक की स्वतंत्र अस्मिता को पहचानने का चलन शुरू हुआ. उस अवसर की खोज है जब यह माना जाने लगा कि बालक स्वतंत्र नागरिक है तथा बच्चों की सक्रिय मौजूदगी के अभाव में कोई रचना उनपर थोपी हुई रचना कही जानी चाहिए. प्राचीन भारतीय वाङमय यथा स्मृतियों, ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों आदि में इसपर विस्तार से चर्चा है. उपनिषद का तो मतलब ही गुरु के आगे बैठकर ज्ञानार्जन करना है. वेदउपनिषदादि में एकलव्य, नचिकेता, उपमन्यु, ध्रुव, अभिमन्यु, आरुणि उद्दालक आदि उदात्त बालचरित्रों का वर्णन हैं. उनमें दर्शन है, गुरुभक्ति है, त्याग है, समर्पण है, प्रेम और श्रद्धा भी है. सूरदास ने कृष्ण की बाललीलाओं का ऐसा मनोरम वर्णन किया है जिसका उदाहरण अन्यत्र दुर्लभ है. लेकिन सब बड़ांे द्वारा, बड़ों के बड़े उद्देश्य साधने के निमित्त किया गया साहित्यिक आयोजन था. बचपन का मुक्त उल्लास वहां अनुपस्थित है. लेकिन यह भी स्मरण रखने योग्य है कि बच्चों की शिक्षा को लेकर तो मनुष्य सभ्यता के आरंभ से ही सजग था, परंतु बचपन पर वास्तविक विमर्श काफी विलंब से आरंभ हो सकता. यह वस्तुतः बीसवीं शताब्दी के मध्याह्न की घटना है. वह दूसरे विश्वयुद्ध के बाद शुरू हुई द्वितीय औद्योगिक क्रांति की सफलता का चमचमाता हुआ दौर था. दूसरा विश्वयुद्ध ही अपने आप में चुनौतीर्पूण समय था.

पश्चिम में स्वतंत्र बालसाहित्य की आवश्यकता पंद्रहवी शताब्दी में ही अनुभव की जाने लगी थी. यूनानी साहित्य में बचपन को महत्त्व दिए जाने का प्रथम प्रयास हमें प्लेटो के लेखन से दिखाई पड़ता है. सुकरात का अपना लिखा तो कुछ नहीं मिलता, लेकिन प्लेटो ने सुकरात के विचारों को अपनी संवाद पुस्तकों ‘सीता,’ पर जो लिखा लेकर जो लिखा है, उससे स्पष्ट है कि गुरुशिष्य दोनों ही बच्चों की शिक्षा को पर्याप्त महत्त्व देते थे. किंचित विरोधाभास के बावजूद प्लेटो का शिक्षादर्शन पर्याप्त आधुनिक और अभिनव संभावनाओं से युक्त है. वह पहला विचारक था जिसने स्त्रियों की शिक्षा पर बराबर जोर दिया, खासकर ऐसे समय में जब उसके समकालीन विचारकों में से अधिकांश स्त्रियों को घर की चारदीवारी से बाहर कोई जिम्मेदारी देने को तैयार न थे. उसने सुझाव दिया था कि पूरा शिक्षातंत्र किसी कुशल पर्यवेक्षक की देखरेख में संचालित होना चाहिए. ऐसा व्यक्ति जो शिक्षा से जुड़े समस्त मामलों की विशद जानकारी रखता हो तथा जो समाज के सभी वर्गों, स्त्री, पुरुष आदि के बीच बिना किसी भेदभाव के शिक्षा का प्रसार कर सके. उल्लेखनीय है लोकतांत्रिक पद्धति के आलोचक रहे प्लेटो ने राज्य की बागडोर दार्शनिक मंडल के हाथों में सौंपने का सुझाव दिया था. यह पूछे जाने पर शिक्षा का लाभ क्या है, प्लेटो संवाद पुस्तक ‘लाज’ में एक एथेंसवासी के माध्यम से स्पष्ट करता है—‘यदि तुम यह जानना चाहते हो कि शिक्षा का सामान्य लाभ क्या है, तो इसका उत्तर बहुत आसान है—शिक्षा मनुष्य को सद्गुणसंपन्न करती है; और सद्गुणसंपन्न व्यक्ति विनम्रतापूर्ण व्यवहार करता है. अपनी विनम्रता के बल पर वह युद्ध में अपने शत्रुओं का दिल भी जीत लेता है.’

शिक्षा के लिए विद्यार्थी की उम्र कितनी हो? इस बारे में वह लिखता है कि बालक की शिक्षा का शुभारंभ यथासंभव न्यूनतम उम्र से कर देना चाहिए. यदि संभव हो तो उसके जन्म से अथवा उसके पहले से ही. उसके अनुसार शिक्षा का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हिस्सा ही वह है, जो बचपन में सिखाया जाता है—इसलिए अभिभावक वर्ग का दायित्व है कि वह शिशु की शिक्षा का अनुकूल प्रबंध करे. ताकि बड़ा होने पर वह अपने कार्य में पूरी दक्षता प्राप्त कर सके. प्लेटो के अनुसार शिक्षा कभी समाप्त न होने वाला कर्म है. उसके लिए उम्र की कोई सीमा नहीं है. इसलिए बालक को जहां तक संभव हो, जन्म से ही शिक्षा के लिए तैयार किया जाना चाहिए. वह बच्चों को जन्म से ही राज्य के संरक्षण में रखने और पूर्व निर्धारित मापदंडों के अनुसार उनका पालनपोषण करने का सुझाव देता है. वह मानता है कि शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर तथा हृष्टपुष्ट बच्चों का लालनपालन अलगअलग समूहों में होना चाहिए. कठोर निर्णय लेते हुए वह अःशक्त एवं अपंग बच्चों को अज्ञात स्थान पर रखने का सुझाव देता है. वह मातापिता को अपने बच्चों के साथ संतुलित व्यवहार करने का परामर्श देता है. उपेक्षा एवं असंतुलित व्यवहार से बालक मानसिक रूप से कमजोर रह सकता है. वह लिखता है—

बच्चों की उपेक्षा उन्हें मानसिक रूप से चिड़चिड़ा, कमजोर तथा अधैर्यवान बना सकती है, उनके साथ दोषपूर्ण व्यवहार तथा अज्ञानतापूर्ण जोरजबरदस्ती, मारपीट उन्हें कठोर, चापलूस, संकोची एवं एकांतजीवी बनाएगी. प्रकारांतर में वे सामान्य पारिवारिक और नागरिक जीवन जीने के अयोग्य हो सकते हैं.’

प्लेटो के बाद अरस्तु ने भी बच्चों की शिक्षा पर जोर दिया. उसका कहना था कि शिक्षा मनुष्य लिए शिक्षा मनुष्य को नैतिक बनाए रखने के लिए अनिवार्य है. प्लेटो के अनुसार राजनीति प्रकटतः शिक्षा कार्यक्रम का हिस्सा थी. इसलिए उसने अकादमिक ज्ञान के बजाय व्यावहारिक ज्ञान पर ज्यादा जोर दिया, ‘पढ़नालिखना बच्चों को इसलिए नहीं सिखाया जाना चाहिए कि वह उपयोगी है, प्रत्युत इसलिए भी सिखाएं जाने चाहिए कि उसके द्वारा ज्ञान की अन्य बहुतसी शाखाएं प्राप्त करना संभव है….बच्चों को पढ़ाने के लिए विवेक से पहले अभ्यास का उपयोग करना चाहिए तथा बुद्धि से पहले शरीर को शिक्षित करना चाहिए.’3 अरस्तु के अनुसार शिक्षा का काम नागरिकों के मन में आवश्यक सद्गुणों का संचार करना है, ताकि वे समाज हित में आवश्यक कर्तव्यों को बेहतर ढंग से अंजाम दे सकें. प्लेटो और अरस्तु के शिक्षासंबंधी विचार शताब्दियों तक पश्चिमी समाज का नेतृत्व करते रहे. अरस्तु के करीब तेरह सौ वर्ष बाद उसके ज्ञानसिद्धांत को पहली चुनौती मिली पीटर अबेलार्ड के शब्दों में. उसने ज्ञान के आरंभिक लोकप्रचलित सिद्धांत कि ‘जो दिखता है, वह विश्वसनीय है’ सूत्रवाक्य को बदलते हुए उसने कहा कि ‘जो दिखता है, वह संद्धिग्ध है.’ उसका संकेत एकदम स्पष्ट था. अब तक चले आ रहे ज्ञान और उसपर विश्वास को एक झटके में धराशायी करते हुए ज्ञान की उपलब्ध विरासत पर संदेह करना और फिर पूरी तरह जांचपड़ताल के बाद सत्य का अवगाहन करना. वह अनूठा कविदार्शनिक था. संदेह से आगे बढ़ते ससंदेह को सम्मान देना. पीटर अबेलार्ड ने लिखा था—

संदेह होने पर हम जांचपड़ताल आरंभ करते हैं तथा जांचपड़ताल हमें सत्य तक पहंुचा देती है.’

पीटर अबलार्ड की इस उक्ति में जहां मानवीय जिज्ञासा को महत्त्व दिया गया था, वहीं मस्तिष्क की संभावनाओं और ज्ञान की शक्ति की ओर इशारा भी निहित था. इसमें एक आशावाद था. अबेलार्ड स्वयं आस्थावादी था. सत्य से उसका अभिप्राय ‘परमात्मा’ से ही था. तो भी परमात्मा की खोज के लिए संदेह को महत्त्व देकर उसने मानवीय जिज्ञासा की महत्ता को रेखांकित किया था. इसका परिणाम सोलहवीं और सतरहवीं शताब्दी में दो प्रमुख पुस्तकों के रूप में सामने आया, जो एक तरह से अबेलार्ड की संदेहवादी खोज का विस्तार थीं. ये पुस्तकें थीं ‘दि रिबोल्युनिबस आरबियम(1543)’ तथा ‘फिलास्फी नेचुरलिस प्रिंसिपिया मेथमैटिका(1687)’. लेखक थे क्रमशः निकोलस कापरनिकस और इसाक न्यूटन. महान खगोलविज्ञानी निकोलस कापरनिकस ने स्थापित किया था कि ब्रह्मांड का केंद्र पृथ्वी न होकर सूर्य है. उसने यह खोज अपने जीवन के आरंभिक दिनों में ही कर ली थी, लेकिन इस डर से कि उसकी खोज धार्मिक जगत में तहलका मचा सकती है, वह उसको वर्षों तक दबाए रखा था. अंततः जीवन के अंतिम दिनों में एक मित्र के आग्रह पर उसने पुस्तक की पांडुलिपि छपने को दे दी. पुस्तक जब बाजार में आई तब समाज में उसकी वही प्रतिक्रिया हुई, जैसा काॅपरनिकस ने कल्पना की थी. आखिरकार चर्च से क्षमाचायना करने के बाद ही बूढ़े काॅपरनिकस को जीवन के चंद दिन उधार मिल सके. न्यूटन ने काॅपरनिकस के निष्कर्षों से आगे बढ़ते हुए गुरुत्वबल की खोज की थी. उसके निष्कर्ष भी तत्कालीन धार्मिक मान्यताओं का विरुद्ध जाते थे, लेकिन उस समय तक यूरोपीय समाज काफी आगे आ चुका था. उसकी पुस्तक ‘प्रिंसिपिया मेथमैटिका’ को विज्ञान के क्षेत्र में अभी तक लिखी मौलिक पुस्तकों में श्रेष्ठतम का दर्जा दिया जाता है.

इन पुस्तकों का साहित्य से सीधा संबंध नहीं था. मनुष्य की शाश्वत ज्ञानपिपासा को रेखांकित करने वाली ये पुस्तकें मानवीय मेधा की अनूठी देन थीं. दर्शाती थीं कि केवल आध्यात्मिक जिज्ञासाएं नहीं, बल्कि भौतिक जगत को जाननेसमझने की ललक भी मनुष्य को अज्ञान के अंधेरे से बाहर ला सकती हैं. इन पुस्तकों के प्रकाशन के साथ ही समाज में नए ज्ञान की ललक पैदा हुई. जिससे वैज्ञानिक शोध को विस्तार मिला, जो कालांतर में औद्योगिक क्रांति का वाहक बना. वैज्ञानिक ज्ञान एवं औद्योगिकीकरण की ताकत को समय रहते पहचाना—फ्रांसिस बेकन ने. उसने लिखा कि आनेवाले दिनों में मनुष्यता का इतिहास मनुष्य की ज्ञान के प्रति ललक के आधार पर लिखा जाएगा. ‘ज्ञान ही शक्ति है’—बेकन का यह वाक्य वैज्ञानिक प्रबोधन की आधारशिला बन गया. हालांकि जड़ता में आकंठ डूबे समाज में उस समय भी ऐसे बहुत से लोग थे, जो नए ज्ञान के विरोध में जुटे थे. वे ज्ञान को अलौकिक और दिव्य मानते आए थे. उनका विचार था कि आध्यामिक जिज्ञासाएं ही मानवीय ज्ञान का मूल हैं. इसलिए बच्चों और बड़ों को दी जाने वाली शिक्षा केवल धर्म सीमित होती थी. इसी बोध के साथ बच्चों को धार्मिक प्रतीकों, कर्मकांडों, अवतारवाद, पूजापाठ और तंत्रमंत्र के बारे में अच्छी तरह रटा दिया जाता था. ज्ञान के नाम पर यह पोंगापंथी आचरण पीढ़ीदरपीढ़ी अंतरित होता था. उस व्यवस्था के साथ बालक का इस प्रकार अनुकूलन कर दिया जाता था कि वह उनपर शायद ही संदेह कर सके. सांस्कृतिकसामाजिक दबावों के बीच यही बोध पीढ़ीदरपीढ़ी अंतरित होता था. नए बोध के फलस्वरूप समाज के उपेक्षित वर्गों के बारे में नए सिरे से सोचा जाने लगा. अवसर का लाभ उठाते हुए स्त्रीस्वातंत्रयवादी आंदोलनों ने जोर पकड़ा, इसकी पहल का श्रेय फ्रांस को जाता है.

बच्चों के लिए विशेष रूप से लिखी गई पहली सचित्र पुस्तक जाॅन अमोस कामिनियस(1592—1670) की ‘आरिबस सेन्युलियम पिक्चस्(1657)’ थी, जिसका अभिप्राय है—‘चित्रों की दुनिया’. इस पुस्तक में बच्चों की रोजमर्रा की दुनिया की वस्तुओं को चित्रों के माध्यम से समझाने का प्रयास किया गया था. कामिनियस का मानना था कि मानवीय मस्तिष्क की सीमाएं अनंत होती हैं. उसने अरस्तु की इस बात से तो सहमति व्यक्त की थी कि मानवमस्तिष्क कोरी सलेट के समान होता है, जिसपर कुछ भी लिखा जा सकता है. मगर मस्तिष्क की सीमा को जड़ सलेट तक सीमित कर देने पर उसकी असहमति थी. मानवीय मस्तिष्क के विपुल सामर्थ्य का उल्लेख करते हुए अपनी पुस्तक ‘शिक्षण की संपूर्ण कला’ में उसने लिखा था—

यह ठीक है कि बच्चे का मस्तिष्क कोरी सलेट होता है, जिसपर हम मनचाही इबारत लिख सकते हैं. लेकिन एक अर्थ में यह उससे भी बढ़कर है. सलेट की सीमा होती है. हम उसपर उसके आकार से अधिक कोई इबारत लिख ही नहीं सकते. जबकि मानवमस्तिष्क अनंत क्षमतावान होता है. उसपर जितना चाहे लिखा जा सकता है, क्योंकि वह निस्सीम विस्तार है.’

कामिनयस का कहना था कि बच्चे स्वभावतः अच्छे होते हैं. इतने अच्छे कि उन्हें सद्गुणों की खान कहा जा सकता है. किंतु उनके व्यक्तित्व को निखारने के लिए शिक्षा अनिवार्य है. कामिनियस ने ये विचार उस समय और समाज में व्यक्त किए थे, जहां एक सर्वमान्य मान्यता थी कि पाप मनुष्य के साथ उसके जन्म से जुड़ा है. अतः पतित मनुष्य के त्राण हेतु शिक्षा (धार्मिक) अनिवार्य है. इस मान्यता के चलते तत्कालीन समाज में शिक्षा के नाम पर बलप्रयोग सामान्य बात थी. शिक्षाकर्म के जुड़े अधिकांश विचारक परंपरावादियों की ‘कर्मआचार संहिता’ से प्रभावित थे, जिसका संदेश था—‘कठिन परिश्रम, बुराई के विरुद्ध युद्ध में हथियार की तरह डटे रहना.’ इस खतरनाक और स्वार्थी अवधारणा के चलते अबोध बच्चों को तांबे और कोयला की खदानों, कारखानों, खेतों और कपड़ा मिलों में जोत दिया जाता था. उनसे ऐसे काम लिए जाते जिन्हें बड़े आदमी करने से कतराते थे. आर्थर वालेस काल्हों(1885—1979) ने अपनी पुस्तक ‘ए सोशल हिस्ट्री आफ अमेरिकन फेमिलीज’ में एक रोंगटे खड़े कर देने वाले तथ्य का खुलासा किया है. उसने लिखा है कि यूरोप से लेकर अमेरिका तक बालश्रम इतना आम था कि यूरोप से अपहृत बच्चों को कृषिमजदूर तथा उद्योग मजदूर के रूप में अमेरिका ले जाकर बेच दिया जाता था. वहां खतरनाक परिस्थितियों में बच्चों से अमानवीय परिस्थितियों में सोलहसतरह घंटे प्रतिदिन बिना किसी विश्राम के काम लिया जाता था. बदले में उन्हें मामूली मजदूरी दी जाती थी. बीमार होने पर उनके इलाज का भी कोई इंतजाम न था. भारत के हालात भी भिन्न न थे. यहां भी लोहे, तांबे और कोयले की खदानों में छोटेछोटे बच्चों से अमानवीय परिस्थितियों में काम लिया जाता था. बीमार होने पर उपचार की कोई व्यवस्था न थी. दम घुटने से होने वाली दुर्घटनाएं आम थीं.

कामिनियस ने जोर देकर कहा था कि न केवल अमीर और ताकतवर वर्ग के बच्चों, बल्कि गांवों, कस्बों, शहरों में रहने वाले अभिजात्य और सामान्य, गरीब और अमीर, झोपड़ियों और अट्टालिकाओं में रहने वाले सभी लड़केलड़कियों को शिक्षा के लिए अनिवार्यतः स्कूल जाना चाहिए. ये विचार तत्कालीन यूरोपीय समाज में क्रांतिकारी थे. ‘डाइडेक्टि मेग्ना’ को चतुर्दिक सराहना मिली और प्रायः सभी यूरोपीय भाषाओं में उसका अनुवाद किया गया. यह पुस्तक वर्षों तक कई यूरोपीय भाषाओं में सर्वाधिक बिकने वाली बनी रही. बच्चों के बीच शिक्षा को सरल एवं ग्राह्यः बनाने के लिए उसने सचित्र पुस्तक, आरबिस सेंसुलियम पिक्चस् (1658), जिसका अर्थ है—चित्रों की दुनिया, भी तैयार भी की थी. वह पुस्तक वास्तव में एक लघु ज्ञानकोश थी, जिसमें बच्चों के काम की जानकारी चित्रों के साथ प्रकाशित की गई थी. ‘आरबिस सेंसुलियम पिक्चस्’ को विश्व की पहली सचित्र पुस्तक होने का गौरव प्राप्त है. काॅमिनियस द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में दिए गए योगदान के लिए यूरोपवासी उसको सम्मान के साथ ‘आधुनिक शिक्षा का पितामह’ कहकर बुलाते हैं. उसने जोर देकर कहा था कि शिक्षा पर हर बच्चे का अधिकार है, इसलिए यह राज्य का धर्म है कि वह प्रत्येक बच्चे के लिए शिक्षण की समुचित व्यवस्था करे—

न केवल संपन्न और शक्तिशाली वर्ग के बच्चों के लिए, बल्कि हर वर्ग के बच्चों को जैसे की लड़का और लड़की, गरीब और अमीर, सभ्रांत और असभ्रांत, शहर और कस्बे, गांव और बस्ती प्रत्येक बच्चे को शिक्षार्जन के लिए अनिवार्य रूप से स्कूल भेजा जाना चाहिए.’

बचपन के मनोविज्ञान को समझने की वास्तविक शुरुआत हुई सतरहवीं शताब्दी में. इसका श्रेय अनुभववादी दार्शनिक जान लाक(1632—1704) तथा स्वतंत्रतावादी विचारक रूसो को जाता है. अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘एन ऐस्से आन ह्युमैन अंडरस्टेंडिंग’ में लाक ने प्लेटो की उस धारणा को चुनौती दी, जिसमें उसने कहा था कि पढ़ना असल में दिमाग में पहले से ही विद्यमान ज्ञानसंपदा को तरोताजा करने की प्रक्रिया है. इस बारे में अरस्तु का समर्थन करते हुए लाक ने बच्चों के मस्तिष्क को ‘कोरा कागज’ बताया और माना कि मनुष्य का ज्ञान उसके अनुभव की देन है. उसने बच्चों में पुस्तकपाठन की रुचि बढ़ाने के लिए सुझाव देते हुए कहा था कि बच्चों के लिए ऐसी पुस्तकें प्रकाशित की जाएं जो उनकी बौद्धिक क्षमता और वयस् के अनुकूल हों. जिनमें उनका बचपन झलकता हो. जो उनके मनोविज्ञान और रुचि को प्राथमिकता दें. जिनमें भरपूर कल्पनाशीलता हो, साथ में रोचकता भी. अरस्तु परीकथाओं को बच्चों के लिए गैरजरूरी मानता था, जबकि लोककथाओं और नीतिकथाओं का यह मानते हुए पक्ष लिया था कि उनमें यदाकदा नैतिकता से भरपूर सामग्री होती है, जो कि बच्चों में सामाजिक बोध जगाने के लिए आवश्यक है. यही नहीं लाॅक ने रेनार्ड दि फाक्स(1481) ईसप की बोधकथाओं(1484) की प्रशंसा की थी. साथ में यह भी कहा था कि ‘यदि ईसप अपनी अपनी कहानियों में चित्रों का संयोजन भी करते तो वह और भी अधिक उपयोगी हो सकती थीं.’

बच्चों की पुस्तकें कैसी हों, इस बारे में सुझाव देते हुए लाॅक ने कहा था कि बच्चों की पुस्तकें उनके लिए—‘‘उपयोगी और आनंददायक हों, जिन्हें पढ़ाते समय शिक्षक को और पढ़ते समय विद्यार्थी को आनंद आए.’ यह बचपन को समझने की पहली गंभीर कोशिश थी. लाॅक के विचारों का प्रभाव आगे आने पीढ़ियों पर भी पड़ा. उसकी मृत्यु के लगभग मात्र आठ वर्ष बाद जन्मे रूसो ने बचपन को लघु अभ्यारण्य की अवधि माना. अपनी पुस्तक ‘एमाइल’ में वह प्रश्न करता है—‘आखिर वह कौनसी अवस्था है जिसकी सामान्य गतिविधियां करुणा और परोपकार से भी बढ़कर हैं?’ उत्तर वह स्वयं देता है—‘बचपन!’ अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए वह लिखता है—‘बचपन को प्यार करो. उसके साथ खेल खेलो. उसके सुखामोद में शामिल होकर उसकी मनोरम प्रकृति में डूब जाओ.कृबचपन के आनंदमय दिनों को छीनो मत, ये बहुत जल्दी गुजर जाने वाले हैं.’ इसी पुस्तक में संत पियरे की बात को आगे बढ़ाता हुआ वह लिखता है—‘संत पियरे ने व्यक्ति को बड़ा बालक कहा है. हम चाहें तो बालक को छोटा व्यक्ति भी कह सकते हैं.’ ‘एमाइल’ पहली बार फ्रांसिसी भाषा में 1762 में प्रकाशित हुई थी, उसका तत्काल अंग्रेजी में अनुवाद हुआ. पुस्तक में रूसो ने शुद्धतावादियों की ‘मूल अपराध’ की विचारधारा का खंडन किया था, जो सृष्टि के उद्भव को आदम और हव्वा के ‘प्रथम अपराध’ से जोड़ती थी. उल्लेखनीय है कि उस समय तक शुद्धतावादियों के दबाव में बच्चों को उपदेशक साहित्य ही पढ़ने को दिया जाता था. उसमें बच्चों को पढ़ाया जाता थाआदम के पाप मेंहम सब अपराधी.’

जान लाक के तर्क को विस्तार देते हुए रूसो ने ‘एमाइल’ में लिखा—‘बच्चे निर्दोष जन्मते हैं, बाद में समाज उन्हें बिगाड़ देता है.’ रूसो की एक और मान्यता थी कि बच्चे पढ़ने के बजाय अनुभवों से गुजरते हुए सीखते हैं. उसका मानना था कि बच्चों की शिक्षा की शुरुआत बारह वर्ष की उम्र से होनी चाहिए. आरंभ के लिए डेनियल डिफोई की राबिन्सन क्रूसो(1719) की पुस्तक पर्याप्त है. हालांकि आगे चलकर रूसो के विचारों को अपरिपक्व मानते हुए करीबकरीब छोड़ दिया गया, तो भी उस समय रूसो के विचारों को मौलिक और क्रांतिकारी माना गया. बालसाहित्य के क्षेत्र में उसके विचार नए लेखन और प्रयोगों का माध्यम बने. उसकी प्रेरणा पर थाॅमस डे ने ‘हिस्ट्री आॅफ स्टेंडफोर्डेंड मार्टन(1783-1789) की रचना की. तीन खंडों में लिखी गई इस पुस्तक में गरीब किसान के सद्गुण संपन्न बेटे हेरी सेंडफोर्ड तथा एक धनी सौदागर के बिगडैल बेटे टामी मार्टन की कहानी थी.

स्टेंडफोर्ड अपने किसान पिता के साथ खेतों पर खेलतेकूदते बड़ा होता है. उसका गरीब पिता उसकी शिक्षा की व्यवस्था भी ढंग से नहीं कर पाता. दूसरी ओर मार्टिन का पिता अपने बेटे के लिए बेहतरीन शिक्षण की व्यवस्था करता है. वह उसको अच्छी पाठशाला में भेजता है, जहां उसको नियमित नैतिक शिक्षा दी जाती है. बावजूद इसके मार्टन बिगड़ जाता है. इस कहानी का शिक्षा थी कि केवल महंगी शिक्षा की पर्याप्त नहीं है, बल्कि बालक के संपूर्ण चारित्रिक विकास के लिए अनुकूल वातावरण भी जरूरी है. यह बालसाहित्य के क्षेत्र में यथार्थवादी लेखन का शुभारंभ था. निस्संदेह उसका श्रेय रूसो को ही जाता है. उसके पश्चात तो यूरोपीय साहित्य में ऐसे कथानकों की बाढ़सी आ गई. बालकों की मनोरचना को समझकर उनके अनुरूप मनोरंजक और उद्देश्यपूर्ण बालसाहित्य की रचना की मांग जोर पकड़ने लगी. 1744 में जान लाक और रूसो से प्रभावित एक समर्पित प्रकाशक जान न्यूबेरी आगे आया. ‘एक छोटीसुंदर पाकेट बुक’ के नारे के अंतर्गत प्रकाशित न्यूबेरी की चित्रात्मक पुस्तकें असल में बालोपयोगी सूचनाओं का कोष थीं. उनमें अक्षरों, कहावतों, लोकोक्तियों को ईसप की कहानियों के साथ चित्रों के साथ प्रकाशित किया जाता था. उसको आधुनिक रचनात्मक बालसाहित्य की प्रारंभिक पुस्तक कहा जाता है. अपनी पुस्तकों को लोकप्रिय बनाने के लिए न्यूबेरी ने कुशल विपणन तकनीक अपनाई थी. ग्राहक यदि लड़का हो तो प्रत्येक पुस्तक के साथ एक गेंद और लड़की हो तो उसे एक पिनकुशन भेंट में दिया जाता था. न्यूबेरी द्वारा प्रकाशित पुस्तकमाला को इंग्लेंड में व्यापक लोकप्रियता मिली.

न्यूबेरी द्वारा बच्चों के लिए पुस्तकों का प्रकाशन किसी भी पुस्तक विक्रेता द्वारा मौलिक एवं सुरुचिपूर्ण बालसाहित्य के प्रकाशन के क्षेत्र में किया गया पहला गंभीर प्रयास था. न्यूबेरी से पहले बच्चों के लिए उपलब्ध पुस्तकों के कथानक किसी लोकनायक अथवा मिथकीय पात्र पर निर्भर करते थे. इसी क्रम में विलियम के केक्सटन ने ‘रेनार्ड दि फाक्स’(1481) तथा फ्रांसिसी से अनूदित ‘ईसप की बोधकथाओं’(1484), थामस मलोरी की ‘मोर्ट डार्थर’(1485) के कई संस्करण प्रकाशित किए थे. उसके बाद वाइकिन दि वार्ड ने ‘राबिन हुड के कारनामे’(गेस्ट आफ राबिनहुड, 1510) का प्रकाशन किया. साहसी और बहादुर नायकों की कथा के रूप में किंग आर्थर तथा लोकगाथाओं के नायक डिक व्हीटिंग्टन की कहानियों लोगों के बीच पहुंचने लगीं. सोलहवीं शताब्दी में ये पुस्तकें छोटे दुकानदारों और फेरी वालों के माध्यम से गांवगांव पहुंचाई जातीं, जहां वे कुछ पेंस में बेची जाती थीं. सोलह से चैबीस पृष्ठ संख्या वाली पुस्तकों को आकर्षक बनाने के लिए उनमें लकड़ी के ब्लाॅक की सहायता से चित्र बनाए जाते थे. ये पुस्तकें हालांकि ‘विशेषरूप से बच्चों के लिए’ जैसी श्रेणी में प्रकाशित नहीं हुई थी, उनपर धार्मिक शिक्षा का गहरा प्रभाव था. तो भी ये बच्चों में पुस्तकपाठन संस्कृति की आधारशिला रखने में सहायक बनीं. बच्चों के बीच इन्हें खूब पसंद किया जाता था.

न्यूबेरी ने अंग्रेजी बालसाहित्य को जो दिशा दी, वही कालांतर में बच्चों के लिए मौलिक साहित्यलेखन का प्रस्थान बिंदु बन गई. तदनंतर बालसाहित्य के नाम पर नीति, धर्म, अध्यात्म आदि के नाम पर छापे जा रहे ‘उपदेशक साहित्य’ का प्रकाशन घटने लगा. उसके स्थान पर बच्चों की रुचि, मनोरंजन एवं उपयोगिता को केंद्र में रखकर लिखी गई पुस्तकें बाजार में छाने लगीं. उन पुस्तकों का लक्ष्य बच्चों को केवल कहानियोंं सुनाना या उनका मनोरंजन मात्र न था, उनके माध्यम से लेखक की कोशिश होती थी कि बालक अपने व्यक्तित्व का संपूर्ण विकास करे, ताकि भविष्य की चुनौतियों से आसानी से निपट सके. बच्चों के मनोविज्ञान को नए सिरे समझने का गंभीर प्रयास भी किया गया, जो अंततोगत्वा मौलिक बालसाहित्य की आवश्यकता को स्थापित करने में सहायक बना. उस समय पुस्तकों की उपलब्धता धनी और उच्च मध्यमवर्गीय परिवारों तक ही सीमित थी. गरीब परिवारों में व्यक्तिगत संबंधों और आपसी अनुराग, शिक्षा आदि का महत्त्व आर्थिक भरणपोषण के बाद था. गरीब परिवारों में जन्मे बच्चे अपने मातापिता के साथ श्रम करते थे. पठनपाठन की सुविधा उनमें से गिनेचुने बच्चों को ही मिल पाती थी. हां, माताएं घर लौटने पर अपने बच्चों के मनोरंजन के लिए किस्सेकहानियोंं अवश्य सुनाती थीं. निर्धन बच्चों के लिए, विशुद्ध बालसाहित्य की कोटि में रखे जाने योग्य पुस्तकों की संख्या नगण्य थी. इसके स्थान पर उपदेशक और प्रचारात्मक पुस्तकों की भरमार थी. इस स्थिति ने अपने समय के कई महान लेखकों जैसे डेनियल डेफो(राबिन्सन क्रूसो, 1719), जोनाथन स्फिट(गुलीवर की यात्राएं, 1726), लेविस केरौल(ऐलिस इन वंडरलें, 1865 लुकिंग ग्लास, 1871), मेरी शेरवुड(हिस्ट्री आॅफ दि फेयरचाइल्ड फैमिली, 1818), मार्क ट्वेन(दि एडवेंचर आफ दि टाम सायर), चाल्र्स डिकेन्स जैसे महान बालसाहित्यकारों को जन्म दिया. सतरहवींअठारवीं शताब्दी के यूरोपीय पुनर्जागरण का असर देर से ही सही, भारत पर भी पड़ा. स्वाभाविक रूप से इसमें ईस्ट इंडिया कंपनी तथा अन्य यूरोपवासियों की भी भूमिका रही, जो मुगल शासन के अवसान के दिनों में भारत आए और यहां की राजनीतिक अस्थिरता देख अपने पांव जमाने की कोशिश करने में लगे थे.

अंग्रेज भारत में व्यापार के सिलसिले में आए थे. सतरहवीं शताब्दी में वहां आरंभ हुई औद्योगिक क्रांति ने उत्पादन में तीव्र बढ़ोत्तरी की थी. उत्पादित माल की बिक्री के लिए अब उन्हें नए बाजारों की तलाश थी. उनके लिए भारत आदर्श बाजार हो सकता था. पराधीनता के बावजूद यहां की जनता अपने प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों के दम पर पूरी दुनिया में अपनी ललचाती थीं. अंग्रेजों ने अपने ठिकाने समुद्र के किनारे बसाए थे. जहां से उन्हें माल लानेले जाने में आसानी रहे. शासन व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए लिए उन्हें अंग्रेजी पढ़ेलिखे लोगों की आवश्यकता थी. इसके लिए लार्ड मैकाले ने औपनिवेशिक भारत की शिक्षानीति में कंपनी के स्वार्थानुरूप बदलाव किया, जिसका भारतीय बुद्धिजीवियों द्वारा व्यापक विरोध भी हुआ. उस समय तक भारत में लोकचेतना की लहर व्याप चुकी थी. राष्ट्रीय अस्मिता का संघर्ष दो स्तरों पर जारी था. एक ओर तो धार्मिकसामाजिक सुधारवादी के रूप में स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, महर्षि अरविंद, राजा राममोहनराय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, दयानंद सरस्वती जैसे विचारक थे, जो देश को रूढ़ियों और परतंत्रता से मुक्ति दिलाकर उसका पुराना गौरव लौटाने को प्रतिबद्ध थे. दूसरी ओर देश की राजनीतिकसामाजिक अस्मिता की लड़ाई भी जोर पकड़ने लगी थी. इसके उत्प्रेरकों में राष्ट्रवादी लेखक, पत्रकार, साहित्यकर्मी आदि थे.

भारत में छापाखाना 1694 में स्थापित हुआ. लेकिन देश को भारतीय अस्मिता से परचानेवाला एक और महान व्यक्ति इसी दौर में अवतरित हुआ था, जो भारतीय नहीं था. मगर उसने भारतीयता का अनुसंधान इतनी लगन, गहन निष्ठा और परिश्रम के साथ किया था कि उसके द्वारा भारत के बारे में, अपने बारे में जानकार भारतीय विद्वान भी चौंक पड़े थे. उन्हें पहली बार अनुभव हुआ था कि शताब्दियों लंबी दासता के दौरान वे अपने आपको, अपनी पहचान को कितना पीछे छोड़ आए हैं. वह विद्वान था—मैक्समूलर. जर्मन के इस भारतअनुरागी विद्वान ने विलुप्तप्रायः संस्कृत वाङमय से न केवल पूरी दुनिया, बल्कि भारत का भी परिचय कराया था. मैक्समूलर के अध्ययन का प्रभाव यूरोपीय देशों पर भी पड़ा. इसके फलस्वरूप भारतीय दर्शन और साहित्य को लेकर बड़े पैमाने पर शोधकार्य आरंभ हुआ. पश्चिम में उन दिनों सुधारवादी आंदोलनों की बाढ़ आई हुई थी. फ्रांसिसी क्रांति सफल हो चुकी थी. उसका असर भारतीय जनमानस पर पड़ना स्वाभाविक ही था. वे सभी कारण भारतीय अस्मिता के उभार के दिन थे, जो आगे चलकर राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन की प्रेरणा बने.

सतरहवीं शताब्दी में जब पश्चिम में वैचारिक आंदोलन जोर पकड़ रहा था, भारत में मुगल साम्राज्य का सूरज अस्ताचलगामी था. अपनी रूढ़ धार्मिक परंपराओं और विरल शैक्षिक रुझान के कारण मुगलों में धर्मेत्तर पुस्तकों को पढ़ने की परंपरा क्षीण थी. लंबी दासता से हिंदी मनीषा का आत्मविश्वास डिगा हुआ था. विद्वान देश पर छाए राजनीतिक संकट को धार्मिक संकट के रूप में देखते थे. अंग्रेज सरकार धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप छोड़कर राजनीतिक निर्णय चाहे जो ले, भारत के शिखरस्थ वर्ग की यह सामान्य नीति थी. इसलिए उनका अधिकांश लेखन प्रतिक्रियावादी था. सामंतवादी सोच एवं जातीय पूर्वाग्रहों के बीच विद्वानों से क्रांतिकारी सोच की अपेक्षा कम ही थी. लार्ड मैकाले ने तत्कालीन शिक्षा प्रणाली पर धर्म के वर्चस्व को लेकर बेहतर टिप्पणी की है. हिंदू एवं मुस्लिम शिक्षा प्रणाली पर आलोचनात्मक टिप्पणी करते हुए उसने लिखा था—

हिंदुओं और मुसलमानों की शिक्षापद्धति में काफी समानता थी. वे उस भाषा में शिक्षा देते थे जो जनता की भाषा नहीं थी. उनकी शिक्षा का मूलस्रोत धर्म था और उसकी आप्तता अपरिवर्तनीय थी. वे नए अभिनिवेश और परिवर्तन के विरुद्ध थे….’

दरअसल उनीसवीं शताब्दी में हिंदू और मुस्लिम दोनों को मानने वाले कट्टरता में डूबे हुए थे. मुस्लिमों की अपेक्षा हिंदू धर्म अपेक्षाकृत अधिक सहिष्णु रहा है, लेकिन निरंतर बाहरी आक्रमणों के बीच इस प्रकार की शिक्षा पद्धति धर्म के प्रति कट्टरता की भावना ही पैदा कर सकती थी. इसके द्वारा स्वतंत्र व्यक्तित्व और विवेक सम्मत(रेशनल) वैज्ञानिक दृष्टिकोण का निर्माण संभव नहीं था. इकीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ईस्ट इंडिया कंपनी के अंग्रेज अधिकारियों ने भारतीय संस्कृति और साहित्य को समझने के गंभीर प्रयास आरंभ कर दिए. कंपनी की ओर से जार्ज प्रिंसेप, विलियम जोन्स, गियर्सन जैसे विद्वानों को नियुक्त किया था. उन्होंने भारतीय साहित्य का दस्तवेजीकरण कर उसका यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद किया, इससे भारत की परंपरागत छवि जो जेम्स मिल जैसे दार्शनिकइतिहासकारों की अधूरी और एकांगी समझ द्वारा बनी थी, में बदलाव होने लगा. इससे विदेशी विद्वानों का ध्यान भारतीय संस्कृति और साहित्य की ओर गया.

ईस्ट इंडिया कंपनी ने सुखवादी विचारक जेम्स मिल को भारतीय इतिहास के अध्ययन के लिए नियुक्त किया था. मिल भारत आने से पहले ही उपयोगितावादी दार्शनिक के रूप में पर्याप्त ख्याति अर्जित कर चुका था. ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारी की हैसियत से उसने ‘हिस्ट्री आॅफ ब्रिटिश इंडिया’ नामक ग्रंथ की रचना की. पुस्तक में भारतीय समाज के जातीय विभाजन, धर्म और परंपरा के नाम पर फैली घोर रूढ़िवादिता तथा आडंबर, राजनीति की जगह घोर अवसरवाद, छोटेछोटे रजबाड़ों के आपसी वैमनस्य, अकारण युद्ध और मारकाट जैसी बुराइयों का, जो भारत की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक दुर्दशा का कारण बन चुकी थीं, प्रामाणिक और तथ्यपरक चित्रण किया था. छह खंडों की इस पुस्तक को पूरा करने में मिल को बारह वर्ष लगे थे. इस पुस्तक को भारी सफलता प्राप्त हुई. हालांकि इसके कारण उसकी आलोचना भी खूब हुई. अपने महत्त्वपूर्ण उपयोगितावादी दर्शन के कारण मिल की जैसी प्रतिष्ठा इंग्लेंड तथा अन्य यूरोपीय देशों पर सवार थी. भारत में वह प्रतिष्ठा कभी हासिल न हो सकी. अपने एकतरफा आकलन में साम्राज्यवादी दृष्टिकोण अपनाते हुए मिल ने भारत के बारे कटु टिप्पणियां की थीं, साथ ही भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का समर्थन किया था. ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा किए गए कार्यों की सराहना करते हुए उसने लिखा था—

‘‘ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत को सभ्य बनाने, उसका नागरीकरण करने में मदद की थी. अंग्रेजों के आने से पहले भारत एक बर्बर युग से बाहर आने के लिए छटपटा रहा था.’ हालांकि बाद में मिल ने अपने ही कथन का उलट करते हुए भारत में ब्रिटिश राज को ‘समाज के संपन्न तबके के लिए बाहरी मदद उपलब्ध कराने वाला व्यापक तंत्र’’ कहकर ब्रिटिश राज्य की वास्तविक खामियों की ओर इशारा भी किया था.’’

पुस्तक में मिल ने एक तरह से तत्कालीन ब्रिटिश सरकार का बचाव ही किया था.उसकी पुस्तक ब्रिटिश सरकार उपनिवेशवादी सोच को मान्यता प्रदान करती थी. वह अंग्रेजों के इस दुष्प्रचार का समर्थन करती थी कि भारतीय समाज के नागरीकरण तथा उनमें एकराष्ट्र की भावना पैदा करने के लिए अंगे्रजों का इस देश में टिके रहना आवश्यक है. मिल को उसका लाभ भी मिला. पुस्तक लिखने के साथ ही मिल को इंडिया हाउस में नियुक्ति मिल गई. उसके बाद तो उसने विभिन्न राजनीतिक पदों पर रहते हुए खूब प्रतिष्ठा एवं मानसम्मान अर्जित किया. इसमें कोई संदेह नहीं कि मिल का विश्लेषण औपनिवेशिक दृष्टि से परिपूर्ण था. बावजूद इसके पुस्तक में उसने कई स्थानों पर भारतीय समाज की कटु सचाइयों को बेनकाब भी किया था, जो उसकी राजनीतिकआर्थिक और सामाजिक दुरवस्था का कारण थीं. इसलिए भारत में उस पुस्तक की आलोचना होना स्वाभाविक ही था. मिल के कई निष्कर्ष भारतीय विद्वानों, खासकर ब्राह्मणों की स्वार्थपरता और उनकी शोषणवादी प्रवृत्तियों पर सीधे चोट करते थे. पुस्तक के दूसरे खंड में उसने लिखा था—

हिंदू शासनव्यवस्था का अध्ययन करते समय हम पहले ही देख चुके हैं कि राजशाही के रूप में एक चालू किस्म की शासकीय निरंकुशता, नितांत अकलात्मक यानी बड़े ही रूढ़ तरीके से भारत में स्थापित हुई, जिसको (निहित स्वार्थों के लिए) दैवीसत्ता के रूप में मान्यता दी जाती रही. भारतीय समाज का जातीय आधार पर विभाजन, हयुक्त तथा घृणास्पद विचारों का कुफल था, जिसने हिंदूसमाज का बेहद ओछा और हानिकारक स्तरीकरण किया था. यही नहीं, स्वार्थी तत्वों द्वारा इस जातीय विभाजन को दुनिया के किसी भी अन्य समाज की अपेक्षा कहीं अधिक विध्वंसात्मक महत्ता प्रदान की गई; और हम देखते हैं कि अत्यंत हानिकारक अंधविश्वासों पर टिकी उस उत्पीड़क और ताकतवर धर्मसत्ता ने मनुष्यता की ऐसी अवमानना की जिसकी मिसाल किसी भी अन्य राष्ट्रसमाज में मिलनी मुश्किल है. उनके दिमाग उनके शरीरों से कहीं अधिक असहिष्णु थे. संक्षेप में निरंकुश राजशाही तथा धर्मसत्ता की सम्मिलित शक्ति ने हिंदुओ के दिलोदिमाग पर कब्जा कर उन्हें मानवसमाज के सबसे दाससमूह में बदल दिया था.’

इससे आगे वह सर विलियम जोन्स द्वारा मनुस्मृति के अनुवाद की भूमिका से उद्धरण देते हुए लिखता है—

वैधानिक रूप से मान्य राजनीतिक निरंकुशता तथा धर्मसत्ता का वह मिलाजुला तंत्र आपसी सहमति के सिद्धांत के आधार पर समाज में अपनी जगह बनाए था. वह अज्ञात दिव्य सत्ता के नियम द्वारा संचालित तथा उसी के द्वारा नियंत्रित होता था. हमने देखा कि समाज के जातीय बंटवारे तथा ब्राह्मणों के पूर्वाग्रहयुक्त, विभेदनकारी सोच ने हिंदुओं में ऊंचनीच की घोर हानिकारक प्रथा को जन्म दिया. इस प्रकार का जाति आधारित विध्वंसकारी विभाजन जैसा भारत में देखने को मिला, वैसा अन्यत्र कहीं न था. हमने देखा कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था के घृणित, पीड़ादायी और अमानवीय विभाजन ने समाज के बड़े वर्ग का निरंतर उत्पीड़न किया है. इतनी बुरी तरह से कि लोगों के दिमाग उनके शरीर से बड़े गुलाम बन चुके हैं. संक्षेप में धार्मिकराजनीतिक निरंकुशता एवं पुरोहितवाद ने मिलकर हिंदुओं के दिलोदिमाग को मानवीय सभ्यता का सबसे बड़ा दास बनाने का काम किया है.’

एक ओर व्यक्तिस्वातंत्रय और जनवादी विचारधारा का पक्ष लेना तथा दूसरी ओर एक औपनिवेशिक सत्ता के समर्थन में भारीभरकम तर्क गढ़ना, ये जेम्स मिल के जीवन के अंतर्विरोध हैं. ब्रिटिश कालीन भारत का इतिहास लिखते समय अपनी लेखकीय ईमानदारी का प्रदर्शन करते हुए वह यह तो लिखता है कि उसने भारत नहीं देखा और उसका समस्त ज्ञान भारत संबंधी पुस्तकों, संदर्भ ग्रंथों और छुटपुट आलेखों तक सीमित है, मगर अपनी पुस्तक को प्रामाणिक बनाने के लिए वह भारतीय सभ्यता और संस्कृति को लेकर वैसा शोध नहीं कर पाता, जो विलियम जोन्स, मैक्समूलर जैसे विद्वानों ने खुले मन से बिना किसी पूर्वाग्रह के किया, जिससे प्राचीन भारत की बौद्धिक संपदा को लेकर वे दरवाजे खुले जिनके बारे में अधिकांश भारतीय बुद्धिजीवी भी अनजान थे. इसके बावजूद हमें मानना पड़ेगा कि अपनी पुस्तक में जेम्स मिल ने भारतीय समाज के बारे में कटु वास्तविकताओं की ओर संकेत किया था, जो यहां जातीय विभाजन के रूप में शताब्दियों से चली आ रही थीं. उनकी जकड़ इतनी मजबूत थी कि जातिव्यवस्था के निचले पायदान पर मौजूद लोगों ने जातीय शोषण को अपनी नियति मान लिया था. उल्लेखनीय है कि सतरहवींअठारहवीं शताब्दी में यूरोपीय देशों में प्राचीनकाल से चली आ रही दासप्रथा के उन्मूलन के लिए आंदोलन जोरों पर थे; और जेम्स मिल उन विचारकों में से था जो घृणित दासप्रथा को तत्काल समाप्त किए जाने के पक्ष में थे. इसलिए भारतीय समाज के जातीय विभाजन तथा उसके आधार पर एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग की शारीरिकमानसिक गुलामी के बारे में सुनने के बाद उसका क्षुब्ध होना स्वाभाविक ही था.

बहरहाल, भारतीय इतिहास और संस्कृति को लेकर अंग्रेजों की कोशिश का परिणाम यह हुआ कि जिस देश का इतिहास एक हजार वर्ष पहले तक खोजे नहीं मिलता था, उसको ग्रियर्सन और विलियम जोन्स, जार्ज प्रिंसेप की टीम ने न केवल ढाई हजार वर्ष पहले तक पहुंचा दिया, बल्कि भारतीय संस्कृति की विविधता एवं विशालता को लेकर ऐसे तथ्य भी उजागर किए जो लंबी गुलामी और समाज में व्याप्त अशिक्षा, धार्मिकजातीय वैमनस्य के कारण लुप्तप्रायः थे. लगभग यही वह दौर था, जब मैक्समूलर ने वेदों का जर्मन अनुवाद किया और भारत का वह रूप दुनिया के सामने आया, जिसके आधार पर वह ढाई हजार वर्ष पहले विश्वगुरु का दर्जा हासिल कर चुका था. मैक्समूलर की प्रेरणा से यूरोपीय विद्वानों के बीच भारतीय साहित्य के अध्ययनविश्लेषण को लेकर मानो होड़सी व्याप गई. आर्थर एंथोनी मैक्डानल, मौरिस विंटरनिट्ज, जे. गोंडा, कीथ आदि विद्वानों ने भारतीय साहित्य का विशद् अध्ययन द्वारा उसे संयोजित, विश्लेषित करने का युगांतरकारी कार्य किया. इन प्रयासों द्वारा भारतीय जनता का खोया हुआ आत्मविश्वास वापस लाने में मदद मिली, जो शताब्दियों की दासता में लगभग गायब हो चुका था. जर्मनी के अलावा फ्रांस तथा इंग्लेंड के विद्वान भी आगे आए, जिसके फलस्वरूप भारत को समझने के लिए पाश्चात्य विद्वानों को साहित्यिक सामग्री उन्हीं की भाषा में उपलब्ध हो सकी.

अंग्रेज अपने साथ एक आर्थिक व्यवस्था भी लाए थे, जो मशीनों द्वारा उत्पादन पर टिकी थी. उन्होंने भारत का वैसा औद्योगिकीकरण नहीं किया, जैसा इंग्लेंड में हो चुका था. व्यापारी अंग्रेजों की इसके पीछे भी एक चाल थी. उनका इरादा अपने अन्य उपनिवेशों की भांति भारत को भी कच्चे माल के òोत के रूप में इस्तेमाल करने का था. उन्होंने भारत में सिर्फ वही कारखाने या उद्यम स्थापित किए जिनकी या तो यहां प्रशासनिक दृष्टि से अनिवार्यता थी अथवा वे जिन्हें पर्यावरण की दृष्टि से इंग्लेंड में लगाया जाना उचित न था. पहली श्रेणी में रेल यातायात और छापाखाना आते हैं, जबकि दूसरी में नील और अफीम की खेती जैसे विनाशकारी उद्यम, जो कालांतर भारत में अंग्रेजों के प्रति आक्रोश को बढ़ावा देने और उनकी शोषणकारी वृत्ति को सामने लाने में सहायक बने. ये चेताएं समाज को औपनिवेशिक शोषण के विरुद्ध एकजुट कर रही थीं. लगभग पूरी दुनिया में चल रहे सुधारवादी आंदोलनों का प्रभाव भारत पर भी पड़ रहा था. इससे वे प्रसुप्त अस्मिताएं भी सिर उठा रही थीं, जिन्हें अभी तक जाति, धर्म, सामंतवाद आदि के कारण उपेक्षा का शिकार होना पड़ा था. अंग्रेजी शिक्षा के बढ़ते चलन के कारण परंपरागत शिक्षा तक सीमित रहना अब जरूरी नहीं रह गया था. नई शिक्षा के लिए आधुनिक भावबोध से भरपूर पुस्तकों की आवश्यकता थी. इसलिए अन्य देशों की भांति भारत में भी बच्चों के लिए पुस्तक लेखन का सिलसिला पाठ्य पुस्तकें तैयार करने से आरंभ हुआ, फिर जैसे ही बच्चों में पढ़ने की ललक जन्मी, उनके लिए साहित्यकारों ने बहुउपयोगी पुस्तकें रचना आरंभ कर दिया.

हिंदी बालसाहित्य की मुख्य प्रेरणाएं

पहले भी कहा गया कि भारत में बालक कभी उपेक्षित नहीं रहा. धर्मग्रंथों में भी उदात्त बालचरित्रों का वर्णन जगहजगह हुआ है. हमारे यहां नचिकेताओं की परंपरा रही है, जो बचपन से ही मृत्यु जैसे गंभीर सवालों से दो चार होते रहे हैं. ध्रुव, प्रहृलाद, आरुणि उद्दालक, एकलव्य, सत्यकाम जाबालि जैसे बच्चों की कहानियोंं भले ही धार्मिकसामाजिक जरूरतों के आधार पर गढ़ी गई हों, मगर वे यह दर्शाती हैं कि भारतीय परिवारों में बालक चेतना के केंद्र में रहा है. उन्हें देश की आध्यात्मिक चेतना का उत्तराधिकारी और सूत्रधार भी बताया गया था. बावजूद इसके चाहे वह कठोपनिषद हो अथवा कोई और, बच्चों के माध्यम से जो विषय विमर्श के केंद्र में लाए गए हैं, उनका संबंध बड़ों से था, या कह सकते हैं कि वे बच्चों को बड़ीबड़ी बातें, बड़ों की भाषा और संस्कार के साथ पढ़ातेसुनाते थे. बालसाहित्य की आधुनिक अवधारणा से जो अभिप्रेत है, उसके उन दिनों तक विकास ही नहीं हो पाया था. प्राचीन ग्रीक, यूनानी, मिश्र, अरब देशों आदि की भांति भारत में भी साहित्य का प्रथम लक्ष्य धर्म का प्रसारप्रचार रहा है. अन्य सभ्यताओं की भांति भारत में भी अक्षर के आविष्कार को मनुष्य की आध्यात्मिक चेतना का विचार माना गया. हालांकि वह विस्तार संपूर्ण मानवीय चेतना का था, जिसका अध्यात्मिक चेतना केवल एक अंग है. संभव है कि समाज के कुछ वर्गों ने निहित स्वार्थों के लिए जानबूझकर ऐसा किया हो. तो भी लेखनपाठन लंबे समय तक धर्मदर्शन और अध्यात्म तक सिमटा रहा. इसके अलावा जो पढ़ना पड़ता था, वह वर्गीय शिक्षा थी. जैसे क्षत्रिय बालक को गुरु से हथियार चलाने की शिक्षा लेना अनिवार्य था. वैश्य बालक को गणित के बारे में सिखाना जरूरी माना जाता था, ताकि वह अपने पैत्रिक व्यवसाय को आगे बढ़ा सके. इसका अभिप्राय यह नहीं है कि भारतीय परंपरा में बालक को सर्वथा उपेक्षित माना जाता था. वैदिक साहित्य की वाचिक परंपरा में गुरु बच्चे को अपने समक्ष बिठाकर पाठ सिखाता था. उस समय लेखनवाचन को समान महत्त्व दिया जाता था. वेदों में ऐसी कई रचनाएं हैं जिन्हें बच्चों के नैतिक विकास के लिए अनिवार्य माना जाता है. भारतीय वाङमय में बच्चों के लिए उपयोगी साहित्य के रूप मे वड्डकथा, कथासरित्सागर, जातक कथाएं, पंचतंत्र, हितोपदेश आदि पुस्तकों की चर्चा समयसमय पर होती रहती है. इनमें कथासरित्सागर और हितोपदेश मौलिक न होकर क्रमशः वड्डकथा(बृहत्कथा) और पंचतंत्र का पुनर्लेखन हैं. वड्डकथा की रचनाकाल 495 ईस्वीपूर्व माना जाता है. उसके रचनाकार गुणादय सातवाहन के राज्य में मंत्री थे. कहा जाता है कि प्राकृत भाषा में लिखी गई ‘वड्डकथा’ में सात लाख सूक्त थे, लेकिन उसका कोई भी हिस्सा आज उपलब्ध नहीं है. कश्मीरी पंडित सोमदेव ने ‘वड्डकथा’ को संस्कृत में लिखा और नाम दिया ‘कथासरित्सागर’. सोमदेव कश्मीर सम्राट अनंत के आश्रित थे. कथासरित्सागर की रचना उन्होंने रानी सूर्यमती के मनोरंजन के निमित्त की थी.

पंचतंत्र’ को न केवल भारत बल्कि दुनियाभर के बालसाहित्य का स्रोत कहा सकता है. इस कृति का मूल रचनाकार विष्णु शर्मा को माना गया है, जो महिलारोप्य नामक नगर के सम्राट अमरशक्ति के आश्रित थे. राजा के तीन उद्दंड बेटों बहुशक्ति, उग्रशक्ति और मंदशक्ति को सही रास्ते पर लाने के लिए विष्णु शर्मा ने उन्हें एकएक कर कई कहानियों सुनाई थीं, वही पंचतंत्र के रूप में संकलित हैं. कुछ विद्वानों के अनुसार विष्णुशर्मा और कोई नहीं चंद्रगुप्त मौर्य के मंत्री विष्णुगुप्त चाणक्य हैं. उन्होंने ही छद्म नाम से इस पुस्तक की रचना की है. उल्लेखनीय है कि प्राचीन भारतीय वाङमय में महिलारोप्य नाम के किसी राज्य का उल्लेख नहीं है. इससे लगता है कि यह पंचतंत्रकार की एक कल्पना थी. दूसरी बात यह कि जिस कूटनीति की शिक्षा पंचतंत्र की कहानियों देती हैं, वे चाणक्य की नीति से बहुत मेल खाती है. जो हो इतना तो साफ है कि व्यावहारिक राजनीति के बारे में पंचतंत्रकार और चाणक्य की नीति एकदूसरे से बहुत मेल खाती थी. इस आधार पर पंचतंत्र ईसा से करीब 350 वर्ष पुरानी रचना है. जबकि हटेल ‘पंचतंत्र’ को 200 ईस्वीपूर्व की रचना मानता है. कहते हैं कि पुस्तक के लेखक ने उसकी रचना 80 वर्ष की परिपक्व अवस्था में की थी. इसलिए ‘पंचतंत्र’ में उस समय की कूटनीति और व्यवहारशास्त्र का निचोड़ है. यह उस समय की रचना है जब भारत में गणतांत्रिक राज्य अपनी प्रासंगिकता खो चुके थे तथा साम्राज्यवाद की धारणा जोर पकड़ने लगी थी. ‘पंचतंत्र’ का अनुवाद और पुनर्लेखन भारतीय और विदेशी भाषाओं में लगातार होता रहा है. भारतीय दर्शन के विशेषज्ञ, गीता, पंचतंत्र जैसी पुस्तकों का सीधे संस्कृत से अंग्रेजी में अनुवाद, संस्कृत व्याकरण तथा उसका शब्दकोश तैयार करने वाले फ्रैंकलिन एडगर्टन(1885—1963) ने पंचतंत्र के अनुवादों की विशद्ता का उल्लेख करते हुए लिखा है कि उसके—

पचास से अधिक भाषाओं में दो सौ से अधिक अलगअलग अनुवाद हुए है. इनमें से तीनचैथाई भाषाएं भारत से बाहर की हैं. यह ग्रंथ अनुवाद के माध्यम से ग्यारहवीं शताब्दी के आरंभ में ही यूरोप में दस्तक दे चुका था. सोलवीं शती में उसकी गूंज यूनान, लैटिन, स्पेन, इटली, जर्मनी, अंग्रेजी, स्लोवाकिया, चेक गणराज्य सहित स्लोवाकिया की अन्यान्य भाषाओं में सुनाई पड़ने लगी थी. उसकी पहुंच जावा से लेकर दक्षिणी ध्रुव तक बनी थी. (भारत में भी)…पंचतंत्र का निरंतर लेखनपुनर्लेखन चलता रहा. इसका विस्तार, संक्षेपीकरण, टीकाकरण जैसे कार्य लगातार होते रहे. भारतीय में भी पंचतंत्र की रचनाओं के पद्यानुवाद तथा गद्य लेखनरूपातंरण होते रहे. संस्कृत में पुनर्लेखन सहित इसका मध्यकालीन लोकभाषाओं में भी अनुवाद किया गया. किस्साकहानी के दीवाने भारतीयों ने पंचतंत्र की अनेक कहानियों को लोककथाओं के रूप में पिरोया और शताब्दियों तक लगातार सुनतेसुनाते रहे. फिर आधुनिक लेखकों ने लोककथाओं में अनेक रूप में सुनीसुनाई जाने वाली पंत्रतंत्र की कथाओं का अनेक बार पुनर्प्रस्तुतिकरण भी किया.’

भारत में पंचतंत्र के विभिन्न भाषाओं में 25 से अधिक रूप मिलते हैं. जिनमें एक संस्कृत में लिखी तंत्रआख्यायिका भी है. पारसी भाषाओं में इसका अनुवाद 570 ईस्वी में बोर्जुया द्वारा किया गया. वहां से वह सीरियाई भाषाओं में ‘कलिलग तथा दमनग’ के शीर्षक के अंतर्गत अनूदित किया गया. अरबी में इसका अनुवाद पारसी विद्वान अब्दुल्ला इब्न अलमुकाफा द्वारा ‘कलिला वा दिमनाह’ शीर्षक से किया गया. अरबी अनुवाद के आधार पर पंचतंत्र पारसी भाषा में ‘अनवारेसोहेली’ के रूप में सामने आया. यूरोप में पंचतंत्र के आरंभिक अनुवाद अरबी भाषा से हुए, जहां पंचतंत्र की कहानियों ‘बिदपई(कुछ यूरोपीय देशों में पिलपई) की परीकथाओं’ के रूप में प्रसिद्ध हैं. बिदपई का उल्लेख कुछ स्थानों पर सूफी संत के रूप में हुआ है. संभव है यह पंचतंत्रकार विष्णु शर्मा के नाम का अरबी संस्करण हो, जो बोलीभाषा की सहजता के कारण बदलकर ‘बिदपई’ हो गया हो. जबकि कुछ विद्वान इसे मध्यकाल के लेखक विद्यापति का अपभ्रंश बताते हैं. डोरिस लेसिंग ने अपने एक निबंध में बिदपई को एक सूफी संत के रूप में दर्शाया है. लेकिन सभी में बिदपई का कार्यकाल पंचतंत्रकार के मुकाबले बहुत बाद का है. यहां डोरिस लेसिंग ने एक निबंध में बिदपई को लेकर एक कहानी का उल्लेख किया है. कहानी में बिदपई एक सूफी संत के रूप में दर्शित है. वह लोककथाओं का जादूगर तथा अनूठा किस्सागो है. कहानी कुछ इस प्रकार है—

बात उन दिनों की है जब सम्राट सिकंदर भारत छोड़कर जा रहा था. भारत में विजित राज्यों की देखभाल के लिए उसने अपने प्रतिनिधि नियुक्त किए थे. उनमें एक राजा बहुत ही उदंड एवं आततायी था. प्रजा के सुखदुख से उसे कोई मतलब ही न था. उस समय एक साधु आगे आया, नाम था बिदपई. उसने अपनी पत्नी से कहा कि मैं राजा को डपटने समझाने जा रहा हूं. इसपर पत्नी रोनेझींकने लगी तो बिदपई ने उसको समझाया और प्रस्थान कर गया. जब वह सम्राट के दरबार में पहुंचा तो उस समय रात हो चुकी थी. इसपर पत्नी रोनेझींकने लगी. उसको समझाकर बिदपई प्रस्थान कर गया. जिस समय वह सम्राट की नगरी में पहुंचा अंधेरा हो चुका था. राजभवन की छत पर बैठा सम्राट खुले आसमान में तारे देख रहा था. विस्तीर्ण अनंताकाश में टिमटिमाते अनगिनत तारों को देख अचानक राजा को अपने अस्तित्व की लघुता का बोध होने लगा. उसका लगा कि अनंताकाश के समक्ष वह कितना तुच्छ है. ये तारे हजारोंलाखों वर्षों से इसी प्रकार टिमटिमाते आ रहे हैं. इन्हें देखते हुए उसका जीवन कितना लघु है. देखते ही देखते सम्राट का नगण्यताबोध अवसाद में ढल गया. उसे अपना जीवन तुच्छ लगने लगा.

उसी क्षण सम्राट ने एक भव्य आकृति को अपने समक्ष पाया. वह हरे वस्त्रों पहने थी, जिनपर अनेक कहानियों छपी हुई थीं. सम्राट की मनःस्थिति को पहचानते हुए भव्य आकृति बोली—‘चूंकि तुमने पहली बार अपने वैभव और महत्त्वाकांक्षाओं से परे हटकर जीवन के सत्य के बारे में सोचा है, इसलिए मैं तुम्हें एक वरदान देना चाह रहा हूं. यदि तुम कल प्रातःकाल मेरी बताई गई दिशा में प्रस्थान करोगे तो वहां तुम्हें अनमोल खजाना प्राप्त होगा.’

राजा वैभव से उकता चुका था. साधु की बात मान अगले दिन उसने राज्य छोड़ दिया और साधु द्वारा बताई दिशा में प्रस्थान कर गया. चलतेचलते अचानक उसकी निगाह एक फटेहाल व्यक्ति पर पड़ी. राजा उसके पास पहुंचा. पूछने पर थकान से चूर राजा ने कहा—‘मित्र कल रात मुझसे कहा गया था कि यहां पहुंचने पर मुझे खजाना मिलेगा, मैं उसी की तलाश में हूं.’

क्या तुम सम्राट देवशलीन हो!’

हां, मैं सम्राट देवशलीन ही हूं.’

तब तो उस गुफा में खजाना तुम्हारी प्रतीक्षा में है. चलकर देखो.’ मंत्रमुग्धसा सम्राट उसके पीछे चल दिया. गुफा के भीतर पहुंचते ही सम्राट की आंखें चौंधियां गईं. वहां सोने और हीरेजवाहरात का ढेर लगा था. सम्राट उसको फटीफटी आंखों से मग्न मन कुछ देर तो देखता रहा, थोड़ी देर बाद बोला—‘अरे, यह सब तो मेरे पास पहले ही बहुत सारा है. और मुझे भला क्यों चाहिए?’

तभी उसकी निगाह एक पुस्तक पर पड़ी. उसने जतन से उसको उठाया और खोलकर देखा. लेकिन उसकी कुछ समझ में न आया. हीरेजवाहरात के ढेर को वहीं छोड़ सम्राट उस पुस्तक को ले राजमहल लौट आया. लेकिन पुस्तक में कही गई पहेलीनुमा बातें उसकी समझ में न आ सकीं. उसने उकताकर पुस्तक को नाली में फेंक दिया. अचानक वह हरे वस्त्रधारी साधु वहां उपस्थित हुआ. उसने पुस्तक को निकाला. साफ किया. राजा उसको हैरानी से देखता रहा—

क्या तुम इस पुस्तक के बारे में बता सकते हो?’ उसने साधु से फरियाद की.

अवश्य.’ साधु ने कहा. वह साधु बिदपई था.’

पंचतंत्र की कहानियों की अरब यात्रा के साथ अनेकानेक कहानियों के साथ यह कहानी भी जन्मी और उनके साथसाथ अरब देशों के लोकसमाज का हिस्सा बन गई.

भारत में हितोपदेश के रूप में पंचतंत्र का पुनर्लेखन नारायण पंडित ने संवत 1393(12वीं शताब्दी) में किया था. नारायण पंडित बंगाल के राजा धवलचंद के आश्रित थे. हितोपदेश की कहानियों के संकलन के पीछे उनका उद्देश्य था युवाओं को व्यावहारिक जीवनदर्शन से परचाना, ताकि बड़े होकर वे जिम्मेदार नागरिक बन सकें. पंचतंत्र और हितोपदेश की कई कहानियोंं जातक कथाओं से भी मिलती हैं. ऐतिहासिक दृष्टि से जातक कथाएं इन सबमें पुरानी हैं. जातक कथाओं के रूप में लगभग तीनहजार रचनाएं प्राप्त होती हैं. उनका लेखनकाल ईसापूर्व तीसरीचैथी शताब्दी है. इस वर्ग में धर्म, नीति और आचारशास्त्र पर अलगअलग कहानियोंं प्राप्त होती हैं. प्रत्येक कहानी में नैतिक संदेश छिपा हुआ है. इन कहानियों को बुद्ध के पूर्वजन्म की कथाएं कहकर प्रचलित किया गया है. लगभग इसी दौर में रचे गए महाकाव्यों, शताधिक पुराणों, स्मृतियों और आरण्यकों में भी ऐसी कई कहानियों और दृष्टांत आए हैं, जिन्हें बच्चों के लिए उपयोगी माना जा सकता है. हालांकि उस समय के अधिक साहित्य की भांति इन सबकी रचना भी बड़ों की जरूरत और पसंद को केंद्र में रखकर की गई थी.

मध्यकाल में भी ऐसी कई कृतियों की रचना इस देश में हुई जिन्हें बच्चे चाव से पढ़ते हैं. इनमें अकबरबीरबल के चुटुकले, तेनाली राम के किस्से, देवन मिसर, गोनू झा की कहानियों, वैताल पचीसी, सिंहासन बतीसी आदि सम्मिलित हैं. कुछ रचनाएं मुगलों और इस्लाम के अनुयाइयों के सौजन्य से भी इस देश में पहुंची थीं, जिनमें ‘हजार रातें उर्फ आलिफ लैला’, हातिम ताई, मुल्ला नसीरुद्दीन, गुलबकाबली आदि किस्से सम्मिलित हैं. बीरबल सम्राट अकबर का समकालीन और उसका दरबारी था. जबकि तेनाली राम विजयनगर सम्राट महाराज कृष्णदेव के दरबार में रहता था. गोनू झा मिथिलांचल में चैदहवीं शताब्दी में जन्मे थे. उनके वुद्धि चातुर्य और सूझबूझ का परिचय देते छोटेछोटे किस्से हैं, उनमें गजब की पठनीयता है. ‘वैताल पचीसी’ और ‘सिंहासन बतीसी’ वस्तुतः कथासरित्सागर की कुछ कहानियों का ही पुनर्लेखन है. लेकिन कथासरित्सागर की कहानियों में जहां नैतिकताबोध प्रबल है, वहीं ‘वैताल पचीसी’ और ‘सिहांसन बतीसी’ की कहानियों में कर्मकांड की प्रचुरता है. ‘वैताल पचीसी’ के रचनाकार या प्रस्तोता वैताल भट्ट बताए जाते हैं, जो न्याय और वीरता के लिए प्रसिद्ध सम्राट विक्रमादित्य के दरबार में मंत्री थी. ‘वैताल पचीसी’ की भांति ‘सिंहासन बतीसी’ भी सम्राट विक्रमादित्य की न्यायप्रियता और बहादुरी का बखान करती है. ‘सिंहासन बत्तीसी’ का प्रस्तोता मुनि क्षेमेंद्र हैं. इन कहानियों का प्रस्तुतीकरण दक्षिण भारत और बंगाल में भी अलगअलग समय हुआ. दक्षिण में ये कहानियों ‘विक्रमचरित’ के नाम से विख्यात हुईं. बंगाल में इनके प्रस्तोता वररुचि थे. वर्षों तक यह कहानियों जनसमाज के बीच किस्सेकहानियों के रूप में सुनीसुनाई जाती रहीं. घरों में पंचतंत्र और हितापदेश की कहानियों के लौकिक संस्करण भी परिजनों द्वारा बच्चों को सुनाए जाते रहे. इनमें पंचतंत्र को छोड़कर जिसके बारे में सभी जानते हैं कि उसकी रचना उदंड राजकुमारों को व्यावहारिक ज्ञान की शिक्षा देने के ध्येय से की गई था. जबकि वैताल पचीसी, कथासरितसागर और सिंहासन बतीसी आदि की रचनाओं का मुख्य ध्येय बड़ों का मनोरंजन करना, उन्हें कुछ नैतिकव्यावहारिक सीख देना था. उनकी रचना भी बड़ों को केंद्र में रखकर की गई थी. मध्ययुग के कथाचरित्र पर लोक और सामंतवाद की छाया है. अधिकांश जनजीवन चूंकि ग्राम्याश्रित था, जहां मनोरंजन के कम साधन थे, इसलिए कहानीकिस्से सुननासुनाना लोगों के मनोरंजन का प्रमुख साधन था. गोनू झा, बीरबल, तेनाली राम आदि सभी किसी न किसी सम्राट के आश्रित थे. इसलिए उनकी कहानियों पर सामंतवाद की छाया है. यह भारतीय इतिहास का वह कालखंड है जब राजनीति तेजविहीन हो चुकी थी. वर्णव्यवस्था, जातिवाद और कर्मकांडों से ग्रस्त भारतीय मनीषा की धार कुंद थी. उम्मीद थी तो बस लोक से. उन लेखकों, कवियों से जो स्वयं को राजसत्ता के बजाय लोक के अधिक निकट पाते थे. गोनू झा उन्हीं में से थे. वे लोक को बिसराते नहीं है. समयसमय पर हंसीमजाक के जरिये ही सही, जहां सम्राट को उसके कर्तव्य की याद दिलाते हैं, वहीं लोक के विचलन पर उसको भी आवश्यक चेतावनी दे जाते हैं. गोनू झा की कहानियों लोक के अधिक करीब, सीधे लोकसाहित्य का हिस्सा जान पड़ती हैं. मध्ययुग के कथासाहित्य की बानगी के तौर पर उनकी एक कहानी का आनंद लेते हैं—

गोनू झा की मां बीमार थी. मरणासन्न अवस्था. बचने की कोई उम्मीद न थी. कुदरत का कमाल. उस बरस गोनू झा के खेतों में गन्ने की फसल खूब लहलहाई थी. जो भी देखता उसकी प्रशंसा किए बिना न रहता. गोनू झा ने मां का काफी उपचार कराया, पर जराजर्जर काया प्राणों को अधिक दिन संभाल न सकी. वृद्धा के देहांत का समाचार इलाके के पंडितों और गांववालों को मिला तो जोरदार भोज की उम्मीद में सबने गोनू झा को घेर लिया—

गरीब आदमी हूं, पांच ब्राह्मणों से अधिक नहीं जिमा सकता.’ गोनू झा ने कहा.

आप और गरीब, इस पर कौन विश्वास करेगा? कम से कम पचीस गांवों का भोज जमना चाहिए.’

पचीस गांव! यह तो ज्यादती है. इतने लोगों को जिमाने के लिए धन कहां से लाऊंगा!’

वह केवल आपकी नहीं, हमारी भी मां थी. इसलिए हम सब इसमें सहयोग करने को तैयार हैं. आपको जितने धन की आवश्यकता हो मांग लीजिए. उधार रहेगा, धीरेधीरे चुकाते रहना.’

कर्ज लेकर भोज कराना क्या की समझदारी है!’

इसमें गलत क्या है. मां आखिर रोजरोज तो मरती नहीं. और हां, भोज में शुद्ध मिष्ठान चलना चाहिए.’ गोनू झा ने गांववालों को काफी समझाने की कोशिश की. परंतु वे जिद ठाने रहे. निर्णय के लिए एक दिन का समय लेकर गोनू झा घर लौट गए. बेहद चिंतित. समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें! गांव में जो घटा, उसकी खबर पत्नी को भी मिल चुकी थी. गांववालों के व्यवहार से वह गुस्से में थी. गोनू झा घर पहुंचे तो बोली—

उन्हें भोज ही चाहिए तो पत्तल पर एकएक ढेली गुड़ की रख दीजिए.’

त्वरित बुद्धि गोनू झा ने झट से निर्णय ले लिया. अगले दिन गांव में लोग जुटे तो उन्होंने पचीस गांवों को भोज देने की स्वीकृति दे दी.

भोज में शुद्ध मिष्ठान्न होना चाहिए.’

अवश्य!’ गोनू झा ने कहा.

आपने गांव वालों की बात रखी तो हम भी पीछे नहीं रहेंगे. पचीस गांवों की दावत है. बड़ा खर्च होगा. आप चिंता छोड़कर बता दीजिए….जितना उधार चाहेंगे मिल जाएगा.’ गांव के महाजन आगे आए. पर गोनू झा ने मना कर दिया—

रहने दीजिए, यदि आवश्यकता पड़ी तो मांग लूंगा.’

देखा हम कहते थे न, यह गोनू झा हैं. मालमत्ते की कोई कमी थोड़े ही है इन पर. वो तो बस दावत से बचना चाहते थे.’ एक बार फिर शुद्ध मिष्ठान्न की याद दिलाकर गांववाले अपनेअपने घर लौट गए. आखिर दावत का दिन करीब आया. एक दिन पहले ही गोनू झा ने अपनी ईख कटवा दी. गन्नों को साफ कर उसके छोटेछोटे टुकड़े कराकर रख लिए. अगले दिन दावत थी. सुबह से ही भोज के लिए गांववालों का आना शुरू हो गया.

मिष्ठान्न की महक नहीं आ रही.’ एक पंडित ने बोला.

आप बैठिए तो सही, मिठाई बस आने ही वाली है.’

भीतर हवेली में हलवाई जुटे होंगे. आखिर गोनू झा ठहरे. कोई ऐसेवैसे आदमी थोड़े ही हैं.’

पंडित कतारबद्ध होकर बैठने लगे. उनके बैठते ही गोनू झा सिर पर टोकरा रखकर मिष्ठान्न परोसने निकले. सब ललचाई निगाहों से टोकरे की ओर देखने लगे. गोनू झा ने परोसना आरंभ किया. पर यह क्या! पत्तल पर मिठाई के स्थान पर गन्ने का टुकड़ा देख पंडित लोग चैंक पड़े.

क्या यही खिलाने लिए आपने हमें यहां बुलवाया है?’

क्यों इसमें क्या बुराई है. मिठाई है. शुद्ध है. यही तो मैंने कहा था.’

पर क्या गन्ना भी दावत में परोसा जाता है.’

क्यों नहीं. दावत तो गृहस्थ की मर्जी से होती है. <