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बहुजन राजनीति : कामयाबी के लिए जरूरी हैं बड़े सामाजिक आंदोलन

सामान्य

देश इस समय दो प्रकार की ताकतों के प्रभाव में हैं। अपने-अपने स्वार्थ के लिए दोनों ही इसके भविष्य से खिलवाड़ कर रही हैं। पहली━हिंदुत्व समर्थक ताकतें, जो धर्म का इस्तेमाल राजनीतिक औजार की तरह करती हैं। उनका असल उद्देश्य जाति तथा उसके आधार पर सवर्णों को प्राप्त विशेषाधिकारों को सुरक्षित रखना है। भाजपा और आरएसएस जैसे संगठन इसके उदाहरण हैं। आज वे राष्ट्रवादी होने का दावा करते हैं, जबकि आजादी से पहले उनका बड़ा हिस्सा अंग्रेजों का पिट्ठू बना था। अंग्रेजी राज बना रहे, उससे प्राप्त सुविधाएं मिलती रहें━इसके लिए उन्होंने अंग्रेजों की हरसंभव मदद की थी। 

दूसरी पूंजीवादी ताकतें, जो ईस्ट इंडिया कंपनी के समय से ही अंग्रेजों के साथ थीं। विश्वयुद्धों के दौरान उन्होंने खूब चांदी काटी थी। बाद में देशभक्त होने का दावा करते हुए वे भी खुद को ‘राष्ट्रवादी’ कहने लगीं। मौका देख कुछ पूंजीपति अखबार और मीडिया के धंधे में घुस गए। उद्देश्य था सरकार और जनता दोनों पर अपनी पकड़ बनाए रखना। ताकि उसका उपयोग मनमाफिक सरकार चुनने; तथा निर्वाचित सरकार से मनमुताबिक काम लेने के लिए कर सकें। 

हिंदुत्व : जातिवाद का सुरक्षाकवच

जातिवादी ताकतों के लिए धर्म अध्यात्म-चेतना का स्वाभाविक विस्तार न होकर, शुद्ध राजनीति है। वे चाहती हैं कि भारत हिंदूवादी राष्ट्र बने। लेकिन वे हजारों वर्ष पुराने जाति-भेद को मिटाने की बात नहीं करतीं। उन जातियों को मिटाने की बात नहीं करतीं जिन्होंने पूरे समाज को ‘शासक’ और ‘शासित’ में बांट दिया है। यह कौन नहीं जानता कि बहुलांश शासित जातियां ही समाज की वास्तविक उत्पादक शाक्ति हैं। मगर देश और समाज के सुखोपभोग हेतु दिन-रात पसीना बहाने के बावजूद उन्हें अधिकार-विपन्न अवस्था में, अपमानित होकर जीना पड़ता है। इस विसंगति को मिटाने की उनकी पार्टी या सरकार के पास कोई योजना नहीं है। शिखर पर बने रहने की उनकी चाहत कभी मंडल बनाम कमंडल, कभी गुजरात मॉडल, कभी मंदिर-मस्जिद और कभी हिंदू-मुस्लिम के नाम से बाहर आती रहती है। जिस हिंदू राष्ट्र की बात वे करती हैं, उसमें संविधान के लिए कोई जगह नहीं है। उनका ‘आदर्शलोक’ मनुस्मृति के कथित ‘दिव्यादेशों’ को ही महत्व देता है।  

अपने स्वार्थपूर्ण गठजोड़ के बल पर ये शक्तियां आजादी के दौरान विकसित सामाजिक-सांप्रदायिक सौहार्द्र को कमजोर करने में कामयाब रही हैं। बहुजन समाज को उन्होंने इतने छोटे-छोटे गुटों में बांट दिया है कि अल्पसंख्यक अभिजन की संगठित ताकत की तुलना में उसकी प्रभावी शक्ति शून्य नजर आती है। इसके लिए केवल भाजपा या आरएसएस दोषी नहीं हैं। विपक्ष भी बराबर का जिम्मेदार है। वह भूल चुका है कोरी राजनीति से केवल सत्ता परिवर्तन संभव है। सामाजिक परिवर्तन की त्वरा को बनाए रखने के लिए वैचारिक प्रतिबद्धता आवश्यक है। बीसवीं शताब्दी में भारतीय समाज जिन परिवर्तनों से गुजरा है, उनके पीछे सामाजिक आंदोलनों की बड़ी भूमिका थी। उनके मूल में फुले, पेरियार, डॉ. आंबेडकर, रामस्वरूप वर्मा, बाबू जगदेवप्रसाद, राममनोहर लोहिया जैसे महापुरुषों की प्रेरणाएं थीं। आज उनकी विचारधाराएं भले ही पहले से कहीं परिपक्व अवस्था में मौजूद हों, मगर उनसे कट जाने तथा केवल सत्ता की राजनीति करने के कारण━आज पूरा विपक्ष हताश, निराश और किंकर्तव्यविमूढ़ नजर आता है।

हुजन हितों की कीमत पर राजनीति की बिसात

ऐसा नहीं है कि राजनीति और पूंजीवाद का गठजोड़ एकदम नया हो। आजादी के बाद से ही दोनों एक-दूसरे का सहारा बनते आए हैं। मगर भाजपा ने धर्म को भी इसमें शामिल कर लिया है। संविधान सम्मत धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर उस भरोसा नहीं है। इस कारण यह पहले से कहीं ज्यादा बेशर्म, कहीं अधिक विकृत रूप में हमारे सामने है। सात साल पहले विकास के नारे के साथ सत्ता में आई मोदी सरकार, बहुजन हितों की कीमत पर, अपने सांप्रदायिक एवं राजनीतिक हितों को साधने में लगी है। 

यह वही भाजपा है जो एक-डेढ़ दशक पहले तक स्वदेशी का राग अलापती थी। कांग्रेस की यह कहकर आलोचना करती थी कि उदारीकरण के नाम पर उसने विश्वबैंक सहित विदेशी आर्थिक शक्तियों के आगे समर्पण कर दिया है। मगर सत्ता में आने के बाद वह स्वदेशी की बात करना भूलकर, सार्वजनिक उद्यमों को ओने-पौने दाम बेचने पर तुली है। गौरतलब है कि धर्म, पूंजी और राजनीति के ऐसे ही बेशर्म गठजोड़ ने फ्रांसिसी क्रांति को जन्म दिया था। इस देश में समाजवाद तो कभी नहीं रहा। कुछ हिस्सों को छोड़कर वामपंथ को भी अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया है। किंतु पूंजीवादी ताकतों के आगे सर्वस्व समर्पण कर देने का साहस तो मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार का भी नहीं था━जिसे देश में उदार आर्थिक नीतियां लागू करने का श्रेय दिया जाता है।

विकास के आरंभिक दौर से ही पूंजीवाद व्यक्ति-स्वातंत्र्य का समर्थक रहा है। इसलिए नहीं कि उसे व्यक्ति-मात्र की आजादी से प्यार है। बल्कि इसलिए कि अर्थव्यवस्था के बाजारीकरण के लिए व्यक्ति-स्वातंत्र्य अपरिहार्य है। फिर भारत में पूंजीवाद तथा हिंदुत्व जैसी घोर सांप्रदायिक विचारधारा के गठजोड़ का कारण? गंभीरतापूर्वक विचार करें तो पता चलेगा कि भारत में यह पूंजीवाद की जरूरतों के चलते नहीं, बल्कि फासीवादी ताकतों की स्वार्थपरता के कारण संभव हुआ है।

यह भी कह सकते हैं कि स्वार्थ-सिद्धि की खातिर फासीवादी ताकतों ने पूंजीवाद के समक्ष खुद को समर्पित कर दिया है। रणनीति के रूप में पूंजीवाद ने भी इसे स्वीकार कर लिया है, ताकि वह मजबूर सरकार से मनचाहे फैसले करा सके। धर्म तथा पूंजीवाद के गठजोड़ की सफलता का कारण है कि ये दोनों ही, समाजार्थिक असमानता को नैसर्गिक मानते हैं। समानता, स्वाधीनता और न्याय जैसे मानवतावादी मूल्यों के लिए उनके यहां कोई जगह नहीं है। अपनी स्वार्थपरता पर पर्दा डालने के लिए दोनों ही दान-धर्म, पुण्यादि का बढ़-चढ़कर प्रचार करते हैं। इससे वे जन-असंतोष को कम करने में सफल हो जाते हैं। उनके निरंतर प्रचार-प्रसार से प्रभावित जनसाधारण, सरकार तथा दूसरी शीर्ष शक्तियों को अपना एकमात्र उद्धारक मानकर, समझौतावादी बन जाता है। 

षड्यंत्र को बहुजन भी समझते हैं

ऐसा नहीं है कि बहुजन धर्म, राजनीति और पूंजीवाद के स्वार्थपूर्ण गठजोड़ से सर्वथा अनजान हों। धर्म की आड़ में उत्तरोत्तर फलता-फूलता ब्राह्मणवाद उनकी नजरों से छिपा हो। मुश्किल यह है कि धर्म-राजनीति और पूंजीवाद के संगठित हमलों का सामना करने के लिए जो जमीनी संघर्ष तथा उसे दिशा देने वाले आंदोलन चाहिए━वे इन दिनों पूरी तरह नदारद हैं। ऐसा कोई सामाजिक-राजनीतिक संगठन नहीं है जिसकी पैठ पूरे देश में हो और जो सभी बहुजनों को स्वीकार्य हो। उसके अभाव में आक्रोश की परिणति कथित ‘सोशल मीडिया’ तक सिमटकर रह जाती है, जो किसी भी तरह से ‘सोशल’ नहीं है। वह लोगों को जिस सांगठनिक एकता की प्रतीति कराता है वह पूर्णतः आभासी है। इंटरनेट के माध्यम से मनुष्य विद्युतीय त्वरा के साथ अपने समूहों, मित्रों आदि से तत्क्षण संपर्क कर सकता है, इसलिए वह जमीनी माध्यमों जो आमने-सामने का संपर्क कराते हैं, तथा उनके द्वारा बने संगठनों की आवश्यकता से मुंह मोड़े रहता है।

‘सोशल मीडिया’ के हिसाब से देखा जाए तो पूंजीवाद और भाजपा सहित दूसरे फासीवादी संगठनों के विरुद्ध बहुजनों में आक्रोश उमड़ता हुआ दिखाई देगा। जबकि वास्तविकता इससे अलग है। असल में यह ऐसा माध्यम है जिसे पूंजीवादी तंत्र ने अपने मुनाफे तथा दीर्घकालिक स्वार्थों की सिद्धि हेतु खड़ा किया है। उसका उपयोग जो जितना ज्यादा शक्तिशाली है, वह उतने ही प्रभावशाली ढंग से कर सकता है। 

सोशल मीडिया ठेठ पूंजीवादी आयोजन है  

दरअसल जिसे ‘सोशल मीडिया’ कहा जाता है उसे पूंजीवादी शक्तियों ने जनाक्रोश के समयानुसार शमन हेतु खड़ा किया है। जैसे प्रेसर कुकर, समय-समय पर भाप को निकालकर, दबाव को एक सीमा से अधिक नहीं बढ़ने देता, यही काम ‘सोशल मीडिया’ कर रहा है। वह पूंजीवादी संस्थानों द्वारा अपने मुनाफे और बढ़ती आर्थिक-सामाजिक विषमताओं की ओर से ध्यान हटाने के लिए खड़ा किया गया, ठेठ पूंजीवादी आयोजन है। वह जनाक्रोश को स्वर तो देता है, किंतु एक विचार की दूसरे विचार पर इतनी तीव्र ‘ओवरलेपिंग’ करता है कि दिमाग चकराने लगता है। उसके माध्यम से विचारधाराओं के बोन्साई संस्करण, इतनी तेजी से संज्ञान में आते हैं कि पाठक को उन्हें आत्मसात करने, उनके साथ अपनी स्थिति का तादात्मय बिठाने तथा उन्हें आंदोलन का रूप देने के लिए समय ही नहीं मिल पाता। परिणामस्वरूप वैचारिक स्फुर्लिंग, जुगनुओं की तरह टिमटिमाकर अंधेरे में विलीन होते रहते हैं।

सोशल मीडिया का  उपयोग : सावधानी जरूरी है

यहां सोशल मीडिया की उपयोगिता और आवश्यकता को नकारने का हमारा कोई उद्देश्य नहीं है। खासकर ऐसे समय जब टेलीविजन और अखबार बड़े पूंजीपति घरानों के कमाऊ पूत बनकर रह गए हैं, विरोधी स्वरों को संगठित कर आगे बढ़ाने के लिए ‘सोशल मीडिया’ से जनमाध्यम का काम लिया जा सकता है। उसने आमजन को मुखर होना सिखाया है। यह अनायास नहीं है कि सरकार के चहेते पूंजीपतियों अंबानी और अडानी के विरुद्ध कथित ‘सोशल मीडिया’ पर आवाजें बुलंद हो रही हैं। कभी धीरूभाई अंबानी के आर्थिक साम्राज्य को खड़ा करने में मददगार रही कांग्रेस के नेता राहुल गांधी सार्वजनिक मंचों से सरकार को पूंजीपतियों की अवांछित मदद करने का आरोप लगा चुके हैं। ऐसा पहली बार हुआ है जब आक्रोशित किसानों ने रिलायंस के टावरों को उखाड़ फेंकने की कोशिश की हो, और अंबानी समूह को मदद के लिए सरकार के आगे गुहार लगानी पड़ी हो। यह भी पहली बार हो रहा है कि जनता के कोप से बचने के लिए पंजाब में रिलायंस के स्टोर महीनों से बंद पड़े हैं। इसलिए ऐसे समय में जब टेलीविजन, अखबार तथा संचार के अन्यान्य साधनों को पूंजीवादियों और राजनेताओं ने अपने कब्जे में कर लिया हो, यह कम से कम ऐसा मंच तो है जिसके माध्यम से समाज के एकदम निचले वर्ग के लोगों की भावनाएं सामने आ रही हैं। इसलिए जन-अभिव्यक्ति को स्वर देने वाले किसी भी माध्यम की उपयोगिता से इन्कार नहीं किया जा सकता। किंतु आवश्यक है कि उनका प्रयोग आंदोलन को एकजुट करने के लिए सहायक के तौर पर किया जाए, न कि निर्देशक शक्ति के रूप में। 

जनता के गुस्से को बदलाव का संवाहक बनाना जरूरी

धर्म-पूंजीवाद और राजनीति के विरुद्ध उमड़ा आक्रोश समाज में वास्तविक बदलाव का कारक नहीं बन पा रहा है। आखिर क्यों? यहां 2011 की घटनाओं को याद करने की कोशिश करें। टयुनीशिया से भड़के जनविद्रोह ने देखते ही देखते यमन, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात, लीबिया, इराक सहित यूरोप के भी कई देशों को अपनी चपेट में ले दिया था। विद्रोह इतना प्रबल था कि कई अरब देशों में निरंकुश सत्ताधीशों को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी थी। कुछ देशों में तो गृह-युद्ध जैसे हालात बन चुके थे। उसके पीछे सोशल मीडिया का बड़ा योगदान था। इतना कि आम भाषा में उसे ‘फेसबुकिया विद्रोह’ भी कह दिया जाता है। 

सोशल मीडिया के बल पर हुई वे आधी-अधूरी क्रांतियां, कुछेक देशों में तख्तापलट के बावजूद, अपेक्षित व्यवस्था-परिवर्तन करने में नाकाम सिद्ध हुई थीं। कारण वही जो हमने ऊपर गिनाए हैं। इंटरनेट पर विद्युतीय त्वरा से आ रही सूचनाएं, समाज के बड़े हिस्से को प्रभावित कर, केवल विद्रोह की मनःस्थिति पैदा कर सकती हैं, जमीनी चेतना के अभाव में वास्तविक परिवर्तन की संवाहक नहीं बन सकतीं। उसके लिए क्रांतिकारी विचारधाराओं को केवल जानना ही नहीं, उन्हें लोकमानस में उतारना पड़ता है। जबकि सोशल मीडिया पर एक के बाद एक तेजी से आ रहे विचार, सूचनाओं का रूप लेकर, विचारहीनता के हालात पैदा कर देते हैं। परिणामस्वरूप समाज भीड़ की तरह वर्ताब करने लगता है। 

सोशल मीडिया और पूंजीवाद

2011 की जनक्रांतियां भले ही नाकाम हुई हों, किंतु उनके माध्यम से पूंजीवादी ताकतें विभिन्न राजनीतिक दलों और सरकारों को यह समझाने में कामयाब हुई थीं कि वे जनता को बड़े पैमाने पर भड़काकर न केवल जनविद्रोह के हालात पैदा कर सकते हैं, बल्कि चाहें तो तख्तापलट भी करा सकते हैं। बिना उनकी मदद के सत्ता में बने रहना तो क्या, वहां तक पहुंचना भी संभव नहीं है। अप्रत्यक्ष रूप से वह सत्ता-लोलुप दलों के लिए एक संदेश भी था कि सोशल मीडिया और पूंजीपतियों के समर्थन से वे अपने सपनों को साकार कर सकते हैं। भारत में उन घटनाओं पर बहुत कम लिखा गया। संभवतः लिखने से जानबूझकर बचा गया। लेकिन उनसे सबक लेने वाले संगठन कम नहीं थे। उनमें प्रमुख थे आरएसएस, भाजपा तथा उनके अनुषंगी संगठन, जो आजादी के बाद से ही अपने जातिवादी एजेंडे को थोपने के लिए सत्ता में आने को लालायित थे। ‘आम आदमी पार्टी’ का उदय भी ऐसे ही आंदोलन से हुआ था। 

बदलाव के लिए जमीनी आंदोलन जरूरी

सोशल मीडिया की मदद से बहुजन बुद्धिजीवी अपने विचारों को तेजी से अपने समर्थकों और विरोधियों तक पहुंचा सकते हैं। उसके माध्यम से बहुजन समाज में जागरूकता भी पैदा कर सकते हैं। ब्राह्मणवाद की धूर्तताओं से अपने लोगों को परचाकर उन्हें बड़े आंदोलन के लिए तैयार भी कर सकते हैं। लेकिन क्रांतिधर्मा विचारधाराओं को आमूल परिवर्तन की संवाहक बनाने के लिए, जमीनी आंदोलनों की जरूरत हमेशा बनी रहेगी। 

दूसरे शब्दों में डॉ. आंबेडकर, पेरियार, डॉ. रामस्वरूप वर्मा, स्वामी अछूतानंद, गाडगे महाराज, ललई सिंह ‘पेरियार’, कांशीराम आदि महापुरुषों की विचारधाराओं से प्रेरणा लेने के साथ-साथ उनके द्वारा शुरू किए गए आंदोलनों को भी━नए समय और संदर्भों के साथ, नए रूप में आगे बढ़ाने की जरूरत आज भी पहले जितनी ही है। मार्क्स के शब्दों में कहें तो विचारधाराएँ अनेक हैं, समस्या उन्हें परिवर्तन का वाहक बनाने की है। इसलिए बहुजन हितैषियों को चाहिए कि वे परिवर्तनकारी विचारधाराओं को समझने के साथ-साथ, उन्हें जनांदोलन में बदलने के लिए भी काम करें।

ओमप्रकाश कश्यप

भारतीय नवजागरण के पुरोधा : स्वामी अछूतानंद

सामान्य

जातिवाद ने भारतीय समाज को पिछड़ा बनाया है। उसने सिवाय बरबादी के हमें कुछ नहीं दिया। लोगों की निगाह में हमें हीन,वंचित एवं विपन्न बनाने वाला भी जातिवाद है….शताब्दियों पुराने जाति-आधारित भेदभाव ने हिंदू समाज को अज्ञानता के अंधकूप में ढकेल दिया है। उसी ने हिंदुओं की चारित्रिक एकता और अखंडता को विरूपित किया है। जातीय ऊंच-नीच का हिंदू मानस पर इतना गहरा प्रभाव है कि उसने उसकी सामान्य बुद्धि को भी कुंठित कर दिया हैᅳपेरियार

 

जाति भारतीय समाज का ऐसा कोढ़ है, जिसे प्रत्येक हिंदू अपनी विशिष्ट पहचान के तौर पर अपनाता है। उसे विश्वास होता है कि समाज में कुछ लोग उससे ऊपर हैं। कि जातीय अनुक्रम में कुछ लोगों का ऊपर होना उनके किसी गुण-विशेष के कारण नहीं है। वे ऊपर सिर्फ इसलिए हैं, क्योंकि उन्होंने जाति-विशेष में जन्म लिया है। विचित्र यह है कि जाति के दम पर जबरन नीचे ढकेल दिए गए व्यक्ति के मन में इससे कोई स्थायी हीनताबोध नहीं पनपता। क्योंकि उसे विश्वास होता है कि समाज में अनेक लोग ऐसे भी हैं, जिनका जन्म उससे निचली जाति में हुआ है। यह कृत्रिम गर्वानुभूति जातिगत ऊंच-नीच से जन्मे हीनताबोध से उसकी रक्षा करती है। जातीय ऊंच-नीच के एहसास से दबा-सहमा व्यक्ति जब कथित ऊंची जातियों के संपर्क में आता है, तो खुद के कमतर होने का एहसास उसके मनस् पर छाया रहता है। लेकिन जैसे ही उसका सामना निचली जाति के व्यक्ति से होता है, उसकी झुकी गर्दन एकाएक तन जाती है। चेहरा गर्व से दमकने लगता है। मुश्किल उस व्यक्ति की होती है जिसका जन्म सबसे निचली जाति में हुआ है। कोई और रास्ता न देख वह धर्म की शरण लेता है। मान लेता है कि जो वह है, वही उसकी नियति है। इस जन्म में उससे त्राण असंभव है। उसे लगातार यह समझाया जाता है कि जाति की मर्यादाओं का पालन करने में ही उसकी भलाई है। यही देवताओं की इच्छा है। इसी में उसका कल्याण है। धीरे-धीरे वह मानने लगता है कि जाति-सिद्ध व्यवस्था से अनुकूलित होकर ही वह देवताओं की निगाह में ऊपर उठ सकता है। 

जहां-जहां हिंदू समाज है, वहां-वहां जाति है। जहां-जहां जाति है, वहां सामाजिक भेदभाव, धर्म के नाम पर कट्टरता, ऊंच-नीच, आर्थिक असमानता को साफ परखा जा सकता है। उत्तर प्रदेश भी इससे अछूता नहीं है। 1931 की जनगणना के अनुसार प्रदेश में अनुसूचित जातियों की संख्या 21 प्रतिशत, पिछड़े लगभग 41.9 तथा सवर्ण मात्र 22.1 प्रतिशत थे। यह हिंदुओं के दो बड़े अवतारों राम और कृष्ण की जन्म भूमि रहा है। काशी जैसी नगरी के अलावा कुछ वर्ष पहले तक हरिद्वार भी प्रदेश का हिस्सा था। ये विशेषताएं इस प्रदेश को बाकी प्रदेशों के मुकाबले खास बनाती हैं। हिंदू संस्कृति के निर्माण में इनकी बड़ी भूमिका है। इनके प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रभाव में लोग मानने लगते हैं कि धर्म को केंद्र में रखकर बनाए गए नियम ही श्रेष्ठतम हैं। वे विश्वास कर लेते हैं कि जाति दैवीय विधान है। इसलिए जिस जाति, समाज में वे हैंᅳवहां होना ही उनकी नियति है। यही कारण है कि उनीसवीं और बीसवीं शताब्दी के सामाजिक सुधार के लिए चलाए गए आंदोलनों से यह प्रदेश करीब-करीब अछूता रहा है। दक्षिण भारतीय राज्यों की तरह यहां न तो कोई बड़ा जाति-विरोधी आंदोलन पनपा, न महामना फुले, अय्यंकालि, डॉ. आंबेडकर या पेरियार जैसा बहुजन नेतृत्व उभर पाया। धर्म सामाजिक असमानता का किस तरह पालन-पोषण करता है। शास्त्र-सम्मत बताकर जनमानस को किस तरह उसके अनुसार ढाल लेता है, श्रद्धा और भक्ति व्यक्ति के आक्रोश, स्वाभिमान और आत्मगौरव को किस प्रकार निस्तेज कर देते हैंᅳउत्तर प्रदेश का हिंदू समाज इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। प्रदेश में दलितों और पिछड़ों की  हालत आज भी लगभग वैसी ही है, जैसा ‘सत्यशोधक समाज’ के नेता मुकुंदराव पाटिल ने वर्षों पहले लिखा थाᅳ

‘भारत एक विचित्र देश है जहां तरह-तरह के लोग रहते हैं, जो अपने धर्म, विचारों, व्यवहारों और समझ के आधार पर अनेक भागों में बंटे हुए हैं। लेकिन साफ-साफ कहा जाए तो केवल दो ही श्रेणियां हैंᅳबहुसंख्यक निचली जातियां, जिनसे उनके मनुष्य होने के सामान्य अधिकार भी छीन लिए गए हैं। दूसरी विशेषाधिकार प्राप्त ऊंची जातियां जो खुद को दूसरों से श्रेष्ठतर मानती हैं, और बहुसंख्यक जातियों के श्रम के बल पर समस्त सुख-सुविधाओं का आनंद लेती हैं। एक का सुख दूसरे के लिए मुसीबत है, यही उनका संबंध है।’1   

जाति, सामाजिक-सांस्कृतिक वर्चस्ववाद, धार्मिक पोंगापंथी के विरोध में पहली और निर्णायक आवाज महात्मा फुले की थी। उन्होंने शूद्रों-अतिशूद्रों को शिक्षा का महत्त्व समझाया, उनके लिए विशेष शिक्षा-संस्थान खोले, जाति को संरक्षण देने वाले हिंदू धर्म को सीधी चुनौती दी। अपनी पुस्तक ‘गुलामगिरी’ के माध्यम से उन्होंने हिंदू अवतारवाद के साथ-साथ उन मिथों की व्याख्या की, जो हिंदू मानस की संरचना का आधार रहे है। ब्राह्मण ग्रंथों में हिंदू धर्म को सनातन कहा गया है। फुले ने इतिहास और मिथ में अंतर करते हुए मूल-निवासी सिद्धांत को प्रस्तुत किया। जिसमें उन्होंने बताया कि शूद्र और अतिशूद्र इस देश के मूल निवासी हैं। आर्यों ने उनकी प्राचीन समृद्ध संस्कृति को तहस-नहस किया था। आर्य इस देश में बाहर से आए, इसकी पुष्टि ऋग्वेद करता था। पश्चिमी विद्वानों के अलावा तिलक भी यही मानते थे। इसलिए फुले द्वारा प्रस्तुत मूल-निवासी सिद्धांत शूद्रों और अतिशूद्रों के दिलो-दिमाग पर तेजी से असर दिखाने लगा। बहुत जल्दी उसका असर देश के बाकी हिस्सों में भी नजर आने लगा। बंगाल में यह ‘नामशूद्र, पंजाब में ‘आदि-धर्म’, आंध्र प्रदेश में ‘आदि आंध्र’, दक्षिण में द्रविड़ बनाम आर्य आंदोलन के रूप में नजर आया। तमिलनाडु में ई. वी. रामासामी पेरियार ‘द्रविड़ संस्कृति’ को भारत की मूल संस्कृति बताते हुए ‘आत्म-सम्मान’ आंदोलन का सूत्रपात किया। उन्होंने कहा कि द्रविड़ आर्यों से अलग और भारत के मूल निवासी हैं। इससे सवर्णों के आगे अल्पसंख्यक होने का खतरा मंडराने लगा। उससे पहले अपने श्रेष्ठता दंभ के चलते वे स्वयं शूद्रों और अतिशूद्रों धर्म-बाह्यः मानते आए थे। चौथे  वर्ण के रूप में स्वीकार करने के बावजूद शूद्रों के सामाजिक-आर्थिक योगदान को नकारा जाता था। अधिकांश मामलों में उसके साथ दास जैसा वर्ताब किया जाता था। 

शिक्षा क्रांति के साथ-साथ स्थानीय निकायों में भारतीयों को स्थान देने की शुरुआत उनीसवीं शताब्दी में ही हो चुकी थी। उसमें संख्याबल का महत्त्व था। इससे सवर्ण हिंदुओं के आगे अल्पसंख्यक हो जाने का खतरा मंडराने लगा। उन्हें लगने लगा था कि अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए शूद्रों और अतिशूद्रों को साथ रखना आवश्यक है। परिणामस्वरूप अनेक सामाजिक आंदोलनों का जन्म हुआ। इनमें दयानंद सरस्वती का ‘आर्य-समाज’ आंदोलन प्रमुख था। स्वामी दयानंद जाति का बहिष्कार करते थे, लेकिन वर्ण-व्यवस्था के समर्थक थे। उन्हें ब्राह्मण वर्चस्व से भी इन्कार न था। ‘आर्य-समाज’ असलियत में उदार ब्राह्मणवाद का सुरक्षा-कवच था। उसके बैनर तले कट्टरपंथी हिंदू उदार और प्रगतिशील होने का नाटक करने लगे थे। भारतीय समाज पर ‘आर्यसमाज’ का, विशेषकर उत्तर-पश्चिम भारत में, व्यापक असर पड़ा। पंजाब, गुजरात, हरियाणा, उत्तर-प्रदेश आदि प्रदेशों में निचली और मंझोली जातियां उसकी ओर आकर्षित होने लगीं। मगर आर्य-समाज में शामिल हुए पिछड़ों और अतिपिछड़ों को बहुत जल्दी समझ में आने लगा कि जातिवाद की आलोचना करने वाला आर्यसमाज संगठन के स्तर पर उससे मुक्त नहीं है। इसी बीच ‘हिंदू महासभा’ जैसे संगठन भी उभरे, जो नई शिक्षा प्रणाली का विरोध करते थे। संस्कृति और परंपराओं की दुहाई देकर वे हर परिवर्तन को रोके रखना चाहते थे। इस घेराबंदी का विरोध करने के लिए अनेक दलित नेता और सामाजिक कार्यकर्ता आगे आए। उन्हीं में से एक स्वामी अछूतानंद भी थे, जिन्होंने उत्तर प्रदेश में दलित-अस्मिता के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद की थी।  

 

स्वामी अछूतानंद : जीवन परिचय

अछूतानंद हरिहर का जन्म फर्रुखाबाद जिले के सौरिख गांव में 6 मई 1879; को चमार जाति में हुआ था। उनके पिता का नाम था, मोतीराम तथा मां थीं रामप्यारी। माता-पिता ने उनका नाम हीरालाल रखा था। सौरिख गांव में ब्राह्मणों तथा दूसरी सवर्ण जातियों का बोलबाला था। एक बार उनके पिता और चाचा का ब्राह्मणों से झगड़ा हुआ था। गांव वाले दलितों को किसी भी प्रकार की छूट देने को तैयार न थे। तंग आकर मोतीराम और उनके भाइयों ने सौरिख छोड़ दिया। पलायित होकर वे मैनपुरी जिले की तहसील सिरसागंज के उमरी गांव में आ बसे, जहां उनके सजातीय लोगों का संख्यानुपात अपेक्षाकृत अधिक था।2  ध्यातव्य है कि बीसवीं शताब्दी के आरंभ में मैनपुरी में चमार अहीरों के बाद सबसे बड़ी जाति थी। उनमें से कुछ अच्छे काश्तकार थे तो कुछ पारंपरिक धंधे को अपनाए हुए थे। जबकि कुछ मजदूरी करके अपना जीवनयापन करते थे। इस बीच कुछ शिक्षा प्राप्त कर, सरकारी पदों पर विराजमान थे। फलस्वरूप उनके समाज में नई महत्त्वाकांक्षाएं पनपने लगी थीं, जिससे सवर्णों के बीच ईर्ष्याभाव बढ़ता ही जा रहा था। हीरालाल के पिता ने उनका दाखिला उमरी की प्राथमिक पाठशाला में कराने का निर्णय लिया। जब वे हीरालाल को लेकर पाठशाला पहुंचे तो वहां मौजूद ब्राह्मण अध्यापक एक अछूत बालक को देखकर आनाकानी करने लगाᅳ

‘तुम्हारी जात वालों का काम-धंधा पहले से तय है। उसके लिए तुम्हें अपने बच्चे को पढ़ाना आवश्यक नहीं है। दूसरे एक अछूत बालक को दाखिला देकर मैं अपने विद्यालय की बदनामी नहीं करना चाहता।’

स्कूल मास्टर का व्यवहार अनोखा नहीं था। वह समाज में दलितों साथ होने वाले भेदभाव को ही दर्शाता था। बालक हीरालाल के मन पर वर्षों तक पड़ा रहा। पिता के निधन के बाद वे अपने अविवाहित चाचा मथुरा प्रसाद के साथ नसीराबाद, अजमेर में आकर रहने लगे, जो उन दिनों फौज में सूबेदार थे। उन दिनों ब्रिटिश सेना में कार्यरत दलितों के आश्रितों के लिए अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान था। और इस तरह मान सकते हैं कि ब्रिटिश सेना का दलितों के उद्धार में बड़ा योगदान रहा था। 

बालक हीरालाल के लिए गांव में रहते हुए शिक्षा के जो दरवाजे बंद थे, अजमेर आने के साथ एकाएक खुल गए। सेना के स्कूल में रहते हुए उन्होंने प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की। बुद्धि प्रखर थी, सो अल्पावधि में ही हिंदी के अलावा अंग्रेजी और उर्दू भाषा का ज्ञान भी हासिल कर लिया। हीरालाल के चाचा की आस्था कबीरपंथ में थी। उनके यहां रविदासियों और कबीरपंथियों का निरंतर आना-जाना लगा रहता था। हीरालाल के मन पर उसका गहरा प्रभाव पड़ा। किशोरावस्था में उनके भीतर निर्गुण भक्ति के प्रति अनुराग बढ़ने लगा। वे कबीर और रविदास के पद अपने चाचा को गाकर सुनाया करते थे। उस समय तक पिता की मृत्यु हो चुकी थी, जिसका उन्हें बहुत दुख था। कबीर और रविदास की निर्गुण भक्ति का असर और पिता के मृत्यु से जन्मे वैराग्य भाव ने एक दिन उन्हें घर छोड़ने पर विवश कर दिया। स्वामी हरिहरानंद बनकर वे सत्य की खोज में भटकने लगे। उनके लिए वह केवल आध्यात्मिक खोज की यात्रा न थी। कबीरपंथी साधुओं की मंडली के साथ देश की विभिन्न अछूत बस्तियों में यात्रा करते, वहां निर्गुण भक्ति का प्रचार करते। दलितों की दुरावस्था देखकर उनका मन आहत होता। 24 वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने हिंदी, उर्दू के अलावा संस्कृत, गुरमुखी, मराठी, गुजराती और बांग्ला भाषा का ज्ञान अर्जित कर लिया। युवावस्था में उनका विवाह इटावा जिले के पीधासर गांव की कन्या दुर्गाबाई से हो गया। उसके बाद पीधासर उनका अस्थायी ठिकाना बन गया। दुर्गाबाई से उन्होंने तीन बेटियों, विद्याबाई, शांतीबाई और सुशीलाबाई को जन्म दिया। दुर्गाबाई उनकी सच्ची जीवनसंगिनी सिद्ध हुईं। वे हरिहरानंद के साथ दलित बस्तियों की यात्रा करतीं। वहां दलित स्त्रियों को समझातीं। उन्हें अपने बच्चों को पढ़ाने की प्रेरणा देतीं। उनमें आत्मसम्मान की भावना जगातीं। धीरे-धीरे दलित बस्तियों में उनका प्रभाव बढ़ने लगा। लोग तन-मन-धन के साथ उनकी मदद को आगे आने लगे।  

 

आर्यसमाज की ओर

उन्हीं दिनों हरिहरानंद का संपर्क आर्यसमाजी स्वामी सच्चिदानंद से हुआ। आर्यसमाज जाति-प्रथा का विरोध और समाज के सभी वर्गों के लिए शिक्षा का समर्थन करता था। अछूतों के लिए हाॅस्टल बनवाने का आश्वासन भी देता था। इससे प्रभावित होकर हरिहरानंद ने 1905 में आर्यसमाज के अजमेर कार्यालय में विधिवत रूप से आर्यसमाजी के रूप में दीक्षा ग्रहण कर ली। उसके बाद उन्होंने वेदादि  ग्रन्थों का गंभीर अध्ययन किया। आर्यसमाजी के रूप में उनका जीवन बहुत सक्रिय रहा। आर्यसमाज के महत्त्वपूर्ण कार्यक्रमों में से एक शिक्षा का प्रसार भी था। वे अछूत बस्तियों में जाकर शिक्षा का प्रचार करने लगे। इसी बीच उन्होंने आगरा में ‘आल इंडिया जाटव महासभा’ की स्थापना की। आर्यसमाज के प्रचारक के रूप में उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों की यात्रा की। उससे समाज में व्याप्त जाति-व्यवस्था को एक नए दृष्टिकोण से जानने का अवसर मिला। 

धीरे-धीरे आर्यसमाजियों की कथनी और करनी का अंतर साफ नजर आने लगा। आर्यसमाज की स्थापना हिंदू धर्म में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने के लिए की गई थी। लेकिन उसका असली उद्देश्य हिंदुओं के धर्मांतरण पर रोक लगाना था। जातीय उत्पीड़न और भेदभाव से आहत शूद्र इस्लाम और ईसाई धर्म की ओर आकर्षित रहे थे। इससे सवर्ण हिंदुओं के आगे अल्पसंख्यक होने का खतरा मंडराने लगा था। आर्यसमाज धर्मांतरित हिंदुओं की वापसी के लिए शुद्धि कार्यक्रम चलाता था। लेकिन शुद्धि के बाद हिंदू धर्म में लौटे हिंदुओं के लिए उसकी कोई विशिष्ट नीति नहीं थी। धर्म में वापस आए हिंदुओं को पुनः उसी गलीच जाति-व्यवस्था के बीच लौटना पड़ता था, जिससे क्षुब्ध होकर उन्होंने या उनके पूर्वजों ने धर्मांतरण का सहारा लिया था। हिंदू धर्म में वापस लौटे व्यक्तियों को ससम्मान जीवन जीने के अवसर प्राप्त हों, इसकी ओर से वह पूर्णतः उदासीन था। 1920 के दशक में उसने हिदुंत्व की राह पकड़ ली। वह वेदादि के अलावा उन्हीं प्रतीकों का समर्थन करने लगा, जो जाति-व्यवस्था का समर्थन करते थे। धीरे-धीरे स्वामी अछूतानंद को आर्यसमाज की कमजोरियों का एहसास होने लगा। उन्हें लगने लगा कि आर्यसमाज असल में ब्राह्मणवाद की सुधरे हुए रूप में वापसी का उपक्रम हैं। सवर्ण हिंदू दलितों और पिछड़ों का उपयोग सांप्रदायिक संघर्ष की स्थिति में मुस्लिमों से सामना करने के लिए करना चाहते हैं। 

‘शुद्धि’ कार्यक्रम विशुद्ध राजनीतिक अभियान था। ब्रिटिश सरकार ने 1909 में जातीय प्रतिनिधित्व के कानून के आधार पर मुस्लिमों के प्रतिनिधि चुनने का अधिकार दे दिया था। उससे अगले ही वर्ष मुस्लिम लीग के प्रतिनिधि मंडल ने वायसराय से मिलकर यह अपील की थी कि जाति-बाह्यः दलितों और शूद्रों को जिन्हें यज्ञादि हिंदू कर्मकांडों का अधिकार प्राप्त नहीं है, हिंदू न माना जाए। इससे सवर्ण हिंदुओं के सामने अल्पसंख्यक हो जाने का खतरा और भी साफ हो गया था। अछूतों को यज्ञोपवीत संस्कार का समर्थन करने वाला शुद्धिकरण अभियान, उसी की प्रतिक्रिया में उपजा था। आरंभ में उसे बहुत प्रसिद्धि मिली थी। ‘शुद्धि’ की रस्म का उपयोग अछूतों के ‘शुद्धिकरण’ के लिए भी किया जाता था। प्रकारांतर में वह अछूतों को ‘प्रायश्चित’ के लिए प्रेरित करता था। उसका अर्थ था कि शुद्धिकरण से पहले अछूतों की स्थिति पापमय थी। शुद्धिकरण के लिए मुंडन, यज्ञ, जनेऊ धारण कराने जैसी रस्में थीं। गायत्री मंत्र का उच्चारण किया जाता था। परंतु यज्ञोपवीत के बावजूद अछूतों को बराबरी का अधिकार न मिलने से यह साफ हो गया था कि हिंदुओं के लिए जाति का मसला धर्म से बड़ा है।3 वे समझने लगे कि शुद्धिकरण के माध्यम से अछूतों को आर्यसमाजी बनाकर हिंदुओं के दायरे में लाना सिवाय नंबरों के खेल के और कुछ नहीं है। उससे अछूतों का वास्तविक उत्थान संभव नहीं है। 

इसी बीच एक घटना ऐसी घटी जिससे उनका आर्यसमाज से मन उचट गया। अछूतों के बीच शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने अपने गृहनगर मैनपुरी में स्कूल खोलने का फैसला किया। उसके लिए समाज के सभी वर्गों की ओर से दान राशि प्राप्त हुई। उनकी पत्नी दुर्गाबाई के पास आभूषण के नाम पर एकमात्र अंगूठी थी। उन्होंने उसे भी स्कूल के लिए दान कर दिया था। स्कूल के उद्घाटन के अवसर पर वे मैनपुरी पहुंचे। 1912 का वर्ष था। कार्यक्रम का आयोजन स्थानीय आर्यसमाजी कार्यकर्ताओं की ओर से किया गया। समारोह स्थल पर उन्होंने जो देखा कि उससे वे हैरान रह गए। आर्यसमाज के प्रति मोह एकाएक भंग हो गया। उन्होंने देखा कि समारोह में ऊंची जाति के बच्चों के बैठने के लिए कालीन का इंतजाम था। जबकि अछूत बच्चों को सीधे जमीन पर बिठाया गया था। उसे देखकर अछूतानंद को आर्यसमाज के सिद्धांतों और व्यवहार में साफ अंतर नजर आने लगा। इससे स्वामी अछूतानंद का आर्यसमाज से मोह-भंग होना स्वाभाविक था। 1912 में ही उपर्युक्त घटना के बाद मेरठ में आयोजित एक सभा में उन्होंने लोगों को संबोधित करते हुए कहा थाᅳ

‘आर्यसमाज का शुद्धिकरण अभियान, वैदिक धर्म के नाम पर मुस्लिमों और ईसाइयों से ब्राह्मणवाद को बचाए रखने का प्रपंच मात्र है। उसका दर्शन और ‘शुद्धि’ अभियान अज्ञानी जनता को गुमराह करने वाले, कह सकते हैं ᅳशब्दों की बाजीगरी मात्र हैं। इस तरह आर्यसमाज न केवल इतिहास का दुश्मन है, अपितु सत्य का हत्यारा भी है। उसका एकमात्र उद्देश्य हिंदुओं, मुसलमानों और ईसाइयों के बीच वैर-भाव को बढ़ावा देना, प्रकारांतर में उन्हें(बहुसंख्यक गैरसवर्णों को) वेदों और ब्राह्मणों का गुलाम बनाए रखना है।’4 

अंततः यह कहते हुए कि ‘अभी तक हम सोचते थे कि आर्यसमाज जाति-आधारित भेदभाव से मुक्त है; यही कारण है कि हम अपनी पूरी शक्ति से उसके लिए काम कर रहे थे, लेकिन हम अंधेरे में थे। मैनपुरी की घटना हमें अपने पैरों पर खड़े होने तथा अपने समाज के भले के लिए काम करने की शक्ति दी है5ᅳ उन्होंने आर्यसमाज को अलविदा कह दिया। उसके बाद उन्होंने स्वयं को पूरी तरह से अछूतों और वंचितों के लिए समर्पित कर दिया। 

 

हरिहरानंद से अछूतानंद

उस समय तक आर्यसमाज से जुड़े दूसरे अछूत नेता भी समझने लगे थे कि उसका शुद्धि अभियान महज ब्राह्मणधर्म को बनाए रखने का षड्यंत्र है। वह हिंदुओं के शक्तिशाली वर्गों के प्रतिनिधि के रूप में काम कर रहा है, जिसका उद्देश्य जाति-व्यवस्था का उन्मूलन न होकर येन-केन-प्रकारेण ब्राह्मणों के वर्चस्व की रक्षा करना है। आर्यसमाज छोड़ने की घोषणा के साथ ही स्वामी अछूतानंद ने दलितों का आवाह्न किया कि वे आर्यसमाज द्वारा फैलाए जा रही भ्रांतियों से बाहर निकलें। उसके फलस्वरूप अस्पृश्यों के कई नेता, आर्यसमाज छोड़कर उनके समर्थन में आ गए। 1917 में उन्होंने दिल्ली में देवीदास, जानकीदास, जगतराम आदि नेताओं के साथ मिलकर ‘अखिल भारतीय अछूत महासभा’ की नींव रखी। उसी दौरान उन्होंने उन्होंने ‘अछूत’ शब्द की नई व्याख्या प्रस्तुत की। ब्राह्मणवादी ग्रंथों में अछूत को गंदा और अपवित्र बताते हुए अस्पृश्य कहा जाता था। स्वामी अछूतानंद ने कहा कि अछूत वे हैं जो किसी भी प्रकार की ‘छूत’ यानी अपवित्रता और गंदगी से मुक्त हैं। जो पूरी तरह पवित्र हैं। इसलिए उन्हें अपने भीतर किसी प्रकार की कुंठा या अपवित्रता की भावना रखने की आवश्यकता नहीं है। नैराश्य और हताशा से ऊपर उठकर उन्हें अपने ऊपर गर्व करना चाहिए। यह अछूतपन की एकदम नई व्याख्या थी, जिसके मूल में जातीय स्वाभिमान का भाव था। फलस्वरूप अस्पृश्य स्वामी अछूतानंद के पीछे संगठित होने लगे। 

स्वामी अछूतानंद का अगला लक्ष्य था, जाति का विनाश। वे समझ चुके थे हिंदू धर्म की परिधि में रहते हुए यह कार्य संभव नहीं है। इसलिए 1920 के दशक आरंभिक वर्षों में ही उन्होंने उत्तरप्रदेश में आदि-हिंदू आंदोलन की शुरुआत की थी। उल्लेखनीय है कि ‘आदि-हिंदू’ के ‘हिंदू’ का हिंदू धर्म से कोई संबंध नहीं है। यह भौगोलिक पद है, जिसे अरबी कबीलों ने सिंधु के इस पार रह रहे भारतीयों के लिए प्रयोग किया था। ‘आदि-हिंदू’ के मूल में भारत के ‘मूल निवासी’ का विचार था, जिसे सबसे पहले ज्योतिराव फुले ने प्रयोग किया था। उन्हीं से प्रेरणा लेकर भाग्यरेड्डी वर्मा ने 1913 में अस्पृश्यों के लिए ‘पंचम’ वर्ण की संज्ञा को नकारकर आदि-हिंदू की पहचान दी थी। उनके अनुसार ‘आदि-हिंदू’ आर्यों के आगमन से पहले से ही भारत में रह रहे, यहां के मूलनिवासी तथा समृद्ध सभ्यता के स्वामी थे। 

स्वामी अछूतानंद द्वारा आर्यसमाज पर किए जा रहे हमलों से उसके नेता परेशान थे। 1921 में स्वामी अछूतानंद को आर्यसमाज के प्रचारक पंडित अखिलानंद की ओर से शास्त्रार्थ की चुनौती मिली, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। उससे पहले वे ऋग्वेद सहित दूसरे ग्रंथों का अध्ययन कर चुके थे। 22 अक्टूबर 1921 को अखिलानंद और अछूतानंद के बीच शाहदरा दिल्ली की अनाजमंडी में शास्त्रार्थ हुआ। शास्त्रार्थ का मुख्य विषय आर्यों के मूल निवास स्थान को लेकर था। ऋग्वेद में इंद्र द्वारा दस्युओं के किलों के ध्वंस का उल्लेख अनेक स्थान पर हुआ है। अछूतानंद ने उन्हीं उद्धरणों के माध्यम से आसानी से अखिलानंद को परास्त कर दिया। शास्त्रार्थ के दौरान आर्यसमाजी प्रचारक पंडित रामचंद्र, नौबत सिंह, स्वामी दातानंद सहित आर्यसमाज की स्थानीय शाखा के कई प्रचारक और दलित नेता उपस्थित थे। शास्त्रार्थ में विजयी होने पर उन्हें ‘श्री-108’ की उपाधि प्रदान की गई, जिसका प्रस्ताव पंडित रामचंद्र की ओर से आया था। ‘श्री-108’ की उपाधि संत समाज में बड़ी सम्मानित मानी जाती थी। इस उपाधि के धारक व्यक्ति को पुण्यात्मा, दार्शनिक विषयों का पंडित और शास्त्रार्थ का धनी माना जाता था। किसी अछूत को यह उपाधि मिलना अपने आप में ऐतिहासिक उपलब्धि थी। उससे भी बड़ी बात थी कि अछूत व्यक्ति द्वारा उच्च जाति के ब्राह्मण को खुले शास्त्रार्थ में पराजित करना। उस घटना को व्यापक प्रसिद्धि मिलना स्वाभाविक था। अछूतानंद की विजय का समाचार श्री देवीदास द्वारा संपादित ‘प्राचीन भारत’ समाचार के मुख्य पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, आदि में उस विजय को लेकर पोस्टर बंटवाए गए। वह दलित मेधा को पहली सार्वजनिक स्वीकृति थी, वह भी वैदिक ज्ञान के क्षेत्र मेें जिसपर ब्राह्मण शताब्दियों से अपना दावा ठोकते आए थे। इस घटना के बाद ही स्वामी हरिहरानंद ने अपना नाम बदलकर स्वामी अछूतानंद रख लिया। इस नाम का प्रस्ताव शास्त्रार्थ की समाप्ति के बाद, जाटव समाज के नेताओं चौधरी जानकी दास, देवीदास और जगतराम की ओर से आया था। 

 

सामाजिक आंदोलन का राजनीतिक विस्तार  

1919 में ब्रिटिश सरकार ने भारत में ‘कम्यूनल अवार्ड’ लागू किया था। उसके अनुसार धार्मिक संप्रदायों की संख्या के आधार पर उन्हें राजनीतिक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व दिया जाना था। इसलिए हर संप्रदाय अपनी अधिक से अधिक संख्या बताने में लगा था। आर्यसमाज द्वारा चलाया जा रहा शुद्धि आंदोलन भी उसी से प्रेरित था। वह धार्मिक से ज्यादा राजनीतिक अभियान था। इस पर टिप्पणी करते हुए स्वामी अछूतानंद के सहयोगी रामचरन ने कहा थाᅳ‘1919 के सुधार लागू हो चुके थे….उसके अनुसार प्रत्येक धार्मिक समूह को उसकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जाना था। जिसकी जितनी बड़ी संख्या, उसे उतना ही बड़ा प्रतिनिधित्व। उसके बाद से ही जगह-जगह ‘अछूतोद्धार’ के नाम पर सम्मेलन आयोजित किए जा रहे थे।’6   इस तरह 1920 के दशक से ही आर्यसमाज का इस्तेमाल राजनीति के लिए होने लगा था। स्वामी अछूतानंद सहित पढ़े-लिखे अछूत नेताओं पर उसका सकारात्मक असर पड़ा था। वे संगठन की ताकत को समझने लगे थे। 

1923 तक आदि-हिंदू आंदोलन को औपनिवेशिक सरकार की मान्यता मिल चुकी थी। उसे देश में चल रहे दूसरे सुधारवादी कार्यक्रमों के समकक्ष मान लिया गया था। आंदोलन का मुख्य केंद्र कानपुर था। उसका निरंतर विस्तार हो रहा था। इसके साथ-साथ कांग्रेस और उसके नेताओं की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। वे अछूतों को हिंदू धर्म के दायरे में रखना चाहते थे। दूसरी ओर आदि-हिंदू के नेता अपने आप को इस देश की प्राचीनतम सभ्यता का उत्तराधिकारी बता रहे थे। उनके अनुसार ब्राह्मण बाहर से आए आर्यों के उत्तराधिकारी थे। उन्हीं दिनों गांधी के छोटे बेटे देवदास ने स्वामी अछूतानंद से हिंदू समाज तथा कांग्रेस की भलाई के नाम पर आंदोलन को रोक देने की अपील की। यही नहीं, उन्होंने स्वामी अछूतानंद को कुछ धन का प्रलोभन भी दिया। इस पर अछूतानंद ने ब्रेड के एक टुकड़े को दिखाते हुए कहा थाᅳ‘मेरे लिए यही पर्याप्त है।’ देवदास गांधी को यह अपमानजनक लगा। क्षुब्ध होकर उन्होंने स्वामी अछूतानंद को ‘जूतानंद स्वामी’ कहना आरंभ कर दिया।’7 गांधी जो लगभग अपने हर भाषण में मनसा-वाचा-कर्मणा अहिंसा का समर्थन करते थे, के बेटे का ऐसा व्यवहार पूर्णतः अशोभनीय था। लेकिन उसमें अलग कुछ न था। देवदास दलितों के प्रति सवर्ण हिंदुओं के सामान्य व्यवहार का अनुसरण कर रहे थे।

अक्टूबर 1921 में ‘वाल्स के राजकुमार’ एडवर्ड अष्टम, अपने पांच महीने लंबे दौर पर भारत पहुंचे थे। कांग्रेस उनका बहिष्कार कर रही थी। जबकि डॉ. आंबेडकर सहित लगभग सभी बड़े दलित नेता अपनी मांगों को ब्रिटिश सरकार तक पहुंचाने के लिए उसे अच्छा अवसर मान रहे थे। उनका मानना था कि कांग्रेस तथा दूसरे सवर्ण नेता ‘वाल्स के राजकुमार’ का विरोध निहित स्वार्थों के लिए कर रहे हैं। राजकुमार के स्वागत के लिए स्वामी अछूतानंद ने 1922 में दिल्ली में ‘विराट अछूत सम्मेलन’ का आयोजन किया, जिसमें उन्हें मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। सम्मेलन में देश के कोने-कोने से आए 25000 से अधिक दलित उपस्थित थे। राजकुमार के सम्मान में भाषण देते हुए स्वामी अछूतानंद ने ‘मुल्की हक’(राष्ट्रीय अधिकार) की आवाज उठाते हुए दलितों की दुर्दशा का मामला उठाया। अपने भाषण में दूर-दूर से आए दलितों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा थाᅳ

‘बाहर से आए आर्य हमलावरों ने हमें दबाया हुआ था। उन्होंने हमें गुलामी और छूआछूत की दहलीज पर पटक दिया था। अब हमें अपने दमन के विरुद्ध आवाज उठानी होगी। इस देश का मूल निवासी होने के कारण हमें अपने ‘मुल्की हक’ की मांग करनी होगी। हमें ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विद्रोह करने के बजाए, राजकुमार का स्वागत करना होगा।’8

‘मुल्की हक’ से स्वामी अछूतानंद का आशय था, वे सभी अधिकार जो किसी स्वयंभू देश के नागरिक को प्राप्त होते हैं। जो दलितों को आर्यों के आगमन से पहले स्वाभाविक तौर पर प्राप्त थे। उन्होंने ‘वाल्स के राजकुमार’ एडवर्ड के आगे लिखित प्रतिवेदन भी प्रस्तुत किया था, जिसमें दलितों की 17 मांगें शामिल थीं। उन मांगों का असर यह हुआ कि उसी वर्ष यानी 1922 में औपनिवेशिक सरकार ने दलितों को संयुक्त प्रांत में कहीं भी सभाएं करने का अधिकार दे दिया। सरकारी अधिकारियों को आदेश दिया गया था कि वे दलितों को समुचित सुरक्षा प्रदान करें। स्वामी अछूतानंद की वह एक और बड़ी जीत थी। ब्राह्मणों शताब्दियों से शूद्रों को ‘क्षुद्र’ कहकर तथा वर्णव्यवस्था से बाहर के लोगों को दास, दस्यु, राक्षस आदि कहकर अपने धर्म से बाहर मानते आए थे। पूरा संस्कृत वाङ्मय इस तरह के किस्सों से भरा पड़ा है। उन्होंने न केवल गैर सवर्णों के पढ़ने-लिखने पर पाबंदी लगाई थी, बल्कि उन्हें उनके सामान्य अधिकारों से भी वंचित किया हुआ था। बदले समय में पहली बार था, जब सवर्ण अल्पसंख्यक होने के भय से गैर सवर्णों को अपने साथ रखना चाहते थे। आर्यसमाज और दूसरे संगठन इसी कोशिश में लगे थे, जबकि दलित उनके साथ जाने को तैयार न थे। अपितु स्वयं को इस देश का मूल निवासी बताकर अपनी स्वतंत्र संस्कृति और सभ्यता के दावे कर रहे थे। बड़ी बात यह कि जिन धर्मग्रंथों को पढ़ने से दलितों को रोका जाता था, जिनके आधार पर ब्राह्मण पांडित्य का दावा करते आए थे, उन्हीं के आधार पर अछूत ब्राह्मणों को विदेशी मूल का ठहरा रहे थे। 

स्वामी अछूतानंद पर कबीर, रविदास सहित भारतीय संतों का गहरा प्रभाव था। किशोरावस्था में अपने कबीरपंथी चाचा मथुरादास को कबीर और रविदास के पद सुनाया करते थे। उन्हीं से उनकी मानस-रचना हुई थी, वह सभी मनुष्यों को एक समान मानती थी। जाति को कबीरादि संत कवियों ने निशाने पर लिया था और अब वह अछूतानंद के भी निशाने पर थी। बस एक अंतर था। प्राचीन संत दुनियादारी के प्रति आसक्त नहीं थे। इसलिए संतोष पर जोर देते थे। कबीर तो रूखी-सूखी खाकर संतोष करने और दूसरे की चुपड़ी रोटी देख जी न ललचाने की बात खुलेआम करते हैं। कुल मिलाकर संत कवियों के लिए आर्थिक असमानता कोई बड़ा मुद्दा न थी। कबीर ने ‘अमरपुरी’ और रविदास ने ‘बे-गमपुरा’ के बहाने सामाजार्थिक ऊंच-नीच और भेदभाव से मुक्त समाज का सपना जरूर देखा था, मगर तत्कालीन परिस्थितियों में वह महज सपना ही था। उनीसवीं-बीसवीं शताब्दी के दलित आंदोलनों की नींव व्यक्ति स्वातंत्र्य और सहभागिता पर रखी गई थी। इसलिए फुले से लेकर स्वामी अछूतानंद तक, दलित नेताओं की प्रमुख मांगें थींᅳछूआछूत का विरोध, दलितों के साथ सम्मान-भरा व्यवहार, समानता और सहभागिता।   

1927 तक आते-आते देश-भर के दलित अपने अधिकारों के लिए उठ खड़े हुए थे। महाराष्ट्र में डॉ.  आंबेडकर, तमिलनाडु में ई. वी. रामासामी पेरियार, केरल में पोयकाइल योहन्नान अपनी-अपनी तरह से दलितों की मांगों को आगे बढ़ाने में लगे थे। छूआछूत और दलित उत्पीड़न उन सभी के निशाने पर था। उत्तर प्रदेश में यह जिम्मेदारी स्वामी अछूतानंद संभाले हुए थे। कुल मिलाकर पूरे देश के दलित अपने अधिकारों के लिए उठ खड़े हुए थे। कांग्रेसी नेताओं का कहना था कि इस समय देश के लिए सबसे बड़ी जरूरत आजादी प्राप्त करना है। अछूतों और अंत्यजों के नेता भी आजादी चाहते थे। लेकिन आजादी की उनकी संकल्पना कांग्रेस और दूसरे सवर्ण नेताओं से भिन्न थी। उसी वर्ष कानपुर में हुए ‘आदि हिंदू सम्मेलन’ में स्वामी अछूतानंद ने आजादी की अपनी संकल्पना को प्रस्तुत करते हुए कहा था कि इस समय देश में, ‘आजादी के वास्तविक हकदार यदि कोई है तो वे अछूत हैं। क्योंकि उन्हें हजारों वर्षों से गुलामी में रखा गया है।’ कांग्रेस द्वारा आजादी की मांग की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा था कि कांग्रेस द्वारा आजादी की मांग केवल समाज के अभिजन तबके, जो पहले से ही विशेषाधिकार प्राप्त है, की स्वार्थपूर्ति तक सीमित है। अछूतों का उस आजादी से कोई संबंध नहीं है। दिसंबर 1927 में दलित जातियों के प्रतिनिधियों की विशेष बैठक हुई थी। उस समय तक साइमन कमीशन के आने की घोषणा हो चुकी थी। बैठक का साइमन कमीशन के सामने दलितों की मांगों तथा अगले सुधारवादी कार्यक्रमों पर चर्चा होनी थी। बैठक की अध्यक्षता एम. सी. राजा(मिलै चिन्ना थंबी पिल्लई राजा) ने की थी। स्वामी अछूतानंद स्वागत समिति के अध्यक्ष थे। उस सभा में दलित जातियों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र तथा विधायिकाओं में अधिक सीट सुरक्षित करने की मांग की गई थी।

स्वामी अछूतानंद और डॉ. आंबेडकर का लक्ष्य एक समान था। दोनों पिछड़ी और दमित जातियों के उत्थान के लिए सक्रिय थे। लेकिन दोनों की सीधी भेंट अभी तक नहीं हो पाई थी। यह अवसर 1928 में आया। अवसर था, मुंबई में होने वाला ‘आदि हिंदू सम्मेलन’। भेंट के दौरान दोनों ने एक-दूसरे के कार्यक्रमों की सराहना की। डॉ. आंबेडकर ने स्वामी अछूतानंद से साइमन कमीशन के आगे दलितों की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करने का आग्रह किया। दोनों का संबंध आगे भी बना रहा। 30 नवंबर 1930 को साइमन कमीशन कमीशन भारत आया तो स्वामी अछूतानंद ने अपने सहयोगी नेताओं तिलकचंद कुरील, गिरधारीलाल भगत, लक्षमण प्रसाद, किरोड़ीमल खटीक आदि के साथ कमीशन से लखनऊ में मुलाकात की। कांग्रेस साइमन कमीशन का बहिष्कार करने पर तुली हुई थी। स्वामी अछूतानंद ने आरोप लगाया कि कांग्रेस कमीशन के आगे दलितों और पिछड़ों की गलत तस्वीर पेश कर रही है। उन्होंने कांग्रेस पर दलित बस्तियों में नए कपड़े बांटने का आरोप भी लगाया। स्वामी अछूतानंद ने साइमन कमीशन के आगे दलितों के लिए स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्र की मांग की। उन्होंने कहा थाᅳ‘हमें ब्रिटिश सरकार की सहानुभूति की आवश्यकता नहीं है। हम केवल अपने लिए सम्मान और आदर-भाव की इच्छा रखते हैं।’ डॉ. आंबेडकर ने बहिष्कृत हितकारिणी सभा के अध्यक्ष के नाते साइमन कमीशन से मुलाकात की थी। उन्होंने सभा की ओर से एक मांगपत्र प्रस्तुत किया था, जिसमें दमित जातियों की दुर्दशा का विवरण तथा सभा की ओर से मांगें थीं। दलितों और पिछड़ों के उत्थान के लिए स्वामी अछूतानंद द्वारा किए जा रहे अनथक प्रयासों के कारण देश-विदेश में उनकी ख्याति बढ़ती ही जा रही थी। 

दलितों और पिछड़ों का आत्मविश्वास लौटाने के लिए आदि हिंदू अभियान लगातार अपना काम कर रहा था। स्वामी जी का कहना था कि दलित हमेशा ही दलित न थे। बल्कि वे समृद्ध संस्कृति के जन्मदाता रह चुके हैं। आर्यों के आगमन से पहले उनके भी किले थे। एक समृद्ध सभ्यता थी, जिसमें ऊंच-नीच का भेद न था। आर्यों ने न केवल उस सभ्यता को तहस-नहस किया है, अपितु उसके तथ्यों से भी छेड़छाड़ की है। इलाहाबाद में 17 सिंतबर 1930 को आयोजित आठवें ‘अखिल भारतीय आदि हिंदू सम्मेलन’ की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता पर जोर दिया था। 1930 में लंदन में होने वाली ‘राउंड टेबल कान्फ्रेंस’ में डॉ. आंबेडकर और रतनमालाई श्रीनिवासन को मिले आमंत्रण का समर्थन करते हुए सरकार को तार भेजे थे, जिसमें उन्होंने दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग का समर्थन किया था। उस टेलीग्राम में उन्होंने ‘राजा-मुंजे समझौता’ का विरोध भी किया था। यह समझौता अछूतों द्वारा अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग को देश की एकता के लिए खतरा मानता था। गांधी द्वारा दलितों को दिया गया ‘हरिजन’ नाम भी उन्हें स्वीकार्य न था।  

स्वामी अछूतानंद चाहते थे कि ब्रिटिश सरकार गोलमेज सम्मेलन में डॉ. आंबेडकर की बात को गंभीरता से ले। इसके लिए उन्होंने अपने समर्थकों से सरकार को पत्र लिखने का आग्रह किया। उनके संकेत मात्र पर हजारों पत्र डॉ. आंबेडकर के समर्थन में संबंधित अधिकारियों तक पहुंचे थे। उसके फलस्वरूप असर ब्रिटिश सरकार ने डॉ. आंबेडकर को शोषित जातियों का प्रतिनिधि मानकर 1932 में ‘कम्यूनल एवार्ड’ को स्वीकृति दी। उसके फलस्वरूप दलितों की अलग मतदान की मांग को स्वीकार लिया गया। यह दलित आंदोलन की ऐतिहासिक विजय और कांग्रेस की सबसे बड़ी पराजय थी। उसके लिए गांधी को आगे आना पड़ा। कांग्रेस का तर्क था कि दलितों के लिए स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्र घोषित होने से हिंदू समाज बंट जाएगा। इससे उसका हिंदू राष्ट्र बनने का स्वप्न भी जाता रहेगा। यह अनोखा तर्क था। कुछ दशक पहले तक ही सवर्ण निचली जातियों को अपने से अलग मानते आए थे। उनके बड़े हिस्से को वे हिंदू मानने से भी इन्कार कर देते थे। मगर बदली परिस्थिति में ऐसा कतई संभव न था।  

‘आदि हिंदू आंदोलन’ लगातार विस्तार ले रहा था। इसके साथ ही स्वामी अछूतानंद की ख्याति भी बढ़ती जा रही थी। उत्तर भारत में वे दलितों के डॉ. आंबेडकर के बाद सबसे बड़े नेता थे। चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु ‘आदि हिंदू आंदोलन’ को असली समाजवादी आंदोलन मानते थे। स्वामी अछूतानंद और आंबेडकर को वे क्रमशः कार्ल मार्क्स और लेनिन की संज्ञा देते थे। द्विज उनके लिए बुर्जुआ समुदाय था, जबकि आदि हिंदू सर्वहारा वर्ग के प्रतिनिधि। ‘आदि हिंदू आंदोलन’ और अछूतानंद की निरंतर बढ़ती ख्याति सवर्ण हिंदुओं, विशेषकर आर्य समाजियों के लिए सिरदर्द बन चुकी थी। इसलिए उन्होंने स्वामी अछूतानंद तथा उनके आंदोलन को बदनाम करने के लिए तरह-तरह की अफवाहें फैलाना आरंभ कर दिया था। कुछ कहते कि स्वामी अछूतानंद ईसाई बन चुके हैं। वे ईसाई संस्थाओं से पैसा लेते हैं। एक दिन वे अपने समर्थकों को भी ईसाई बना देंगे। कुछ आरोप लगाते कि स्वामी अछूतानंद मुस्लिमों के लिए काम कर रहे हैं। एक अफवाह यह भी फैलाई जा रही थी कि स्वामी अछूतानंद को आर्यसमाज विरोधी गतिविधियों के कारण उससे निकाल दिया था। उसी अपमान से आहत होकर वे आर्यसमाज और हिंदुओं को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन स्वामी अछूतानंद को उसकी कोेई परवाह न थी। वे केवल अपने काम में लगे थे। उनके लिए उनके आंदोलन का लक्ष्य व्यक्तिगत प्रतिष्ठा या बदनामी से कहीं बड़ा था। इसके लिए भूखे-प्यासे रहकर भी काम करना पड़े तो पीछे नहीं रहते थे। चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु ने उनके बारे में लिखा है कि आंदोलन की गतिविधियों को आगे बढ़ाने में इतने लिप्त रहते थे कि खाने-पीने की सुध न रहती थी। कभी चना-चबैना के भरोसे वक्त बिताना पड़ता तो कभी भूखे भी सोना पड़ता था। मिशन के काम के लिए मीलों पैदल चलने का तो उन्हें अभ्यास था। बावजूद इसके कभी कोई प्रलोभन, कोई सत्ता उन्हें डिगा नहीं पाती थी। अपने लक्ष्य के प्रति वे कितने सतर्क थे, इसे इस उदाहरण से भी समझा जा सकता हैᅳ

आदि हिंदू आंदोलन के प्रचार के सिलसिले में एक बार उन्हें कन्नौज जाना पड़ा। कन्नौज पुराना शहर है। तय किया गया था कि आदि हिंदू आंदोलन के तहत वहां बड़ा कार्यक्रम होगा। हजारों अस्पृश्य उसमें हिस्सा लेंगे। प्रजा की सहानुभूति बटोरने के लिए उन दिनों राजा-महाराजा भी ऐसे आंदोलनों को मदद पहुंचाया करते थे। हालांकि व्यवहार में वे पूरी तरह परंपरावादी होते थे। केवल पैसे के बल पर हर वर्ग पर अपनी धाक जमाना, प्रकारांतर में उसकी सहानुभूति बटोरना उनका मकसद होता था। कन्नौज के कार्यक्रम के लिए तिरवा के राजा की ओर से मदद का प्रस्ताव आया। वह टेंट और स्टेज पर होने वाले खर्च के लिए मोटी रकम देने को तैयार था। अगर राजा पैसे के दम पर दलित समुदायों की सहानुभूति और प्रशंसा अर्जित कर मसीहा बनना चाहता था तो दलितों में भी एक ऐसा वर्ग था जो सम्मेलन के बहाने राजा को खुश करना चाहता था। उस वर्ग ने प्रस्ताव रखा था कि सम्मेलन की अध्यक्षता राजा तिरवा द्वारा कराई जाए। समाचार अछूतानंद स्वामी तक पहुंचा तो मामला अड़ गया। अछूतों के सम्मेलन की अध्यक्षता कोई गैर-अछूत करे, यह उन्हें बिलकुल स्वीकार्य न था। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि सम्मेलन की अध्यक्षता किसी उपयुक्त अछूत से ही कराई जानी चाहिए। स्वामी जी के विरोध का सुफल यह हुआ कि राजा से सम्मेलन की अध्यक्षता कराने का प्रस्ताव टाल दिया गया। उसके बजाए अध्यक्षता के लिए वयोवृद्ध दलित नेता रामचरन कुरील को चुना गया।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                

28 अप्रैल 1930 को स्वामीजी ने ‘आदि हिंदू सामाजिक परिषद’ की अमरावती बरार में बैठक हुई। उस बैठक में उन्होंने खुलासा किया कि कुछ लोग उन्हें मारने की योजना बना रहे हैं। इससे पहले भी अखबारों में ऐसी सूचना प्रकाशित हो चुकी थी। आगरा की एक सभा में उनपर हमला हो चुका था, जिससे वे किसी तरह सुरक्षित बच निकलने में कामयाब रहे थे। लगातार बढ़ रहे हमले स्वामी अछूतानंद की बढ़ती लोकप्रियता और उनके आंदोलन की सफलता का प्रमाण थे। बड़ी बात यह थी कि स्वामी अछूतानंद ने दलित आंदोलन को बड़ा मोड़ दिया था। उससे पहले के दलित उद्धार से जुड़े कार्यक्रम मुख्यतः सामाजिक होते थे। डॉ. आंबेडकर और अछूतानंद के आने से उसमें राजनीतिक लक्ष्य भी जुड़ चुका था। उसका अर्थ था, राजनीति के क्षेत्र में सहभागिता। ‘आदि हिंदू आंदोलन’ के मूल में ही राजनीति थी। उसके अनुसार आदि हिंदू इस देश के पुराने शासक-संचालक थे। वह कांग्रेस को उसके स्वराज का जवाब था। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस स्वराज के माध्यम से राजनीतिक सहभागिता की मांग तो करती थी, लेकिन उसमें समाज के पिछड़े वर्गों की हिस्सेदारी भी सुनिश्चित हो, इसका कोई विचार न था। उन दिनों तक सत्ता के दो प्रमुख दावेदार थेᅳहिंदू और मुसलमान। मुस्लिमों का दावा था कि इस देश पर सात-आठ सौ वर्षों तक उनके पूर्वजों का राज्य रहा है। इसलिए अंग्रेजों को चाहिए कि देश को छोड़ते समय उन्हीं के हाथों में सत्ता सौंपकर जाएं, जिनसे उन्होंने सत्ता छीनी थी। हिंदुओं का दावा था कि वे बहुसंख्यक हैं। देश-दुनिया की प्राचीनतम संस्कृति के वारिस हैं। इस्लाम के आगमन से पहले हजारों वर्षों से देश उन्हीं के अधीन रहा है। इसलिए देश की सत्ता के वही वास्तविक उत्तराधिकारी हैं। 

उनके लिए हिंदुओं का आशय चंद ऊंची जातियों से था। अछूत और शूद्रों को सत्ता में भागीदारी के अयोग्य माना जाता था। मुस्लिमों के प्रतिनिधि मोहम्मद अली जिन्ना थे। गांधी ने दावा किया था कि वे हिंदुओं के एकमात्र प्रतिनिधि हैं। इसपर डॉ. आंबेडकर ने कहा कि अस्पृश्य हिंदू नहीं हैं। उन्होंने अछूतों के प्रतिनिधि के रूप में ही उन्होंने गोलमेज सम्मेलन में हिस्सा लेकर उनके लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों की मांग की थी। आर्यसमाज और कांग्रेस नहीं चाहते थे कि आंबेडकर की योजना सफल हो। ऐसे में स्वामी अछूतानंद ने न केवल खुले मन से डॉ. आंबेडकर का समर्थन किया था, अपितु अपने समर्थकों से कहकर हजारों पर ब्रिटिश सरकार को भिजवाए थे, जिनसे डॉ. आंबेडकर को दलितों का प्रतिनिधि बताया गया था। उसी के फलस्वरूप आंबेडकर की दावेदारी मजबूत हुई थी और गोलमेज सम्मेलन में ब्रिटिश सरकार उनकी मांग मानने को बाध्य हुई थी। गांधी जी जानते थे कि डॉ. आंबेडकर की पृथक निर्वाचन क्षेत्र की मांग के केवल राजनीतिक निहितार्थ नहीं है। यदि वह मान ली जाती है तो सवर्णों और गैरसवर्णों के बीच हमेशा के लिए गहरी खाई बन जाएगी। उससे डॉ. आंबेडकर की मान्यता जिससे वे अस्पृश्यों को हिंदू मानने से इन्कार करते थेᅳको बल मिलेगा। यह कहने पर कि इससे हिंदू राष्ट्र की संकल्पना ही समाप्त हो जाएगी, डॉ. आंबेडकर का गांधी को उत्तर थाᅳ‘सही मायने में तो भारतीयों का कोई राष्ट्र नहीं है। अभी उसका सृजन किया जाना है।’ उन्होंने आगे कहा था कि ‘राष्ट्र के सृजन का तरीका यह नहीं है कि किसी अलग और विशिष्ट समुदाय का दमन किया जाए। दूसरे अस्पृश्य यदि अस्पृश्य प्रतिनिधि का चयन करता है तो इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि निर्वाचित प्रतिनिधि उनका वास्तविक प्रतिनिधि होगा। यदि यही सही स्थिति है तो अलग निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था ही अस्पृश्यों के वास्तविक प्रतिनिधित्व की गारंटी हो सकती है।’ 18 मई 1932 को ‘अखिल भारतीय दलित वर्ग सम्मेलन’ उत्तरप्रदेश के कामठी में हुआ। सम्मेलन में देश के विभिन्न भागों से आए सौ से अधिक प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। जिसमें एक बार फिर दलितों के लिए स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्र की मांग पर जोर दिया गया।  

यह बात अलग है कि आगे चलकर गांधी की जिद और डॉ. आंबेडकर पर चौतरफा दबावों के बाद उन्हें पूना समझौते के लिए बाध्य होना पड़ा और उन्हें स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्र की अपनी मांग छोड़नी पड़ी थी। पूना समझौते के विरोध में स्वामी अछूतानंद ने सितंबर 1932 में कई प्रदर्शन किए थे। समझौते का विरोध करते हुए उन्होंने देश के विभिन्न भागों की यात्राएं की थीं। उन्हीं दिनों गांधी ने अछूतों को ‘हरिजन’ नाम दिया था। डॉ. आंबेडकर सहित विभिन्न दलित नेताओं और स्वामी अछूतानंद ने उसका तीखा विरोध किया। स्वामी अछूतानंद कवि थे। अपना विरोध दर्शाते हुए उन्हीं दिनों उन्होंने कविता लिखी थी। उस कविता में जहां अछूतों के अतीत के गौरव को याद दिलाया गया था, वहीं उसमें उनकी पीड़ा भी समाई हुई थीᅳ

कियौ हरिजन-पद हमैं प्रदान

अन्त्यज, पतित, बहिष्कृत, पादज, पंचम, शूद्र महान

संकर बरन और वर्णाधम पद अछूत-उपमान

                            ….

हम तो कहत हम आदि-निवासी, आदि-वंस संतान

भारत भुइयाँ-माता हमरी, जिनकौ लाल निशान

आर्य-वंश वारे-सारे तुम, लिये वेद कौ ज्ञान

पता नहीं कित तें इत आये, बांधत ऊँच मचान

….

हम हरिजन तौ तुम हूँ हरिजन कस न, कहौ श्रीमान?

कि तुम हौ उनके जन, जिनको जगत कहत शैतान

स्वामी अछूतानंद भारत के नवजागरण के प्रतीक और सच्चे समाज सुधारक थे। मृत्यु से कुछ महीने पहले उन्होंने ग्वालियर में ‘विराट आदि-हिंदू सम्मेलन’ में भी हिस्सा लिया था, जहां उन्होंने स्त्रियों के शोषण के विरुद्ध आवाज बुलंद की थी। उन्होंने कहा था कि आदि-हिंदू संस्कृति में स्त्री का सम्मान होता आया है। विधवा विवाह पर रोकथाम, बाल-विवाह हिंदुत्व की कुरीतियां हैं। आदि हिंदूओं में इन बुराइयों के लिए कोई स्थान नहीं था। उन्होंने जोर देकर कहा था कि आर्यों के आगमन से पहले महिलाओं का समाज में सम्मान होता था। उन्हें शिक्षा दी जाती थी। सम्मेलन में उन्होंने महिलाओं, बच्चों और अछूतों पर अत्याचार करने वाले जमींदारों का सम्मान करने के लिए सरकार की आलोचना भी की थी। पूना समझौते का असर उनके मन-मस्तिष्क पर था। ग्वालियर सम्मेलन के बाद वे बीमार पड़ गए। शरीर लगातार क्षीण पड़ने लगा। अंततः 22 जुलाई 1933 को कानपुर में उन्होंने देह-त्याग निर्वाण का रास्ता पकड़ लिया। उस समय उनकी उम्र मात्र 54 वर्ष की थी। मृत्यु से कुछ दिन पहले जब ‘पूना समझौता’ पर उनकी राय जाननी चाही तो उनका कहना थाᅳ

‘जो हुआ, वह भी काफी अच्छा है। इसे स्वीकार कर लेने में ही बुद्धिमानी है। इससे एक ओर तो महात्मा गांधी के प्राणों की रक्षा हुई, और हम कलंक से बच गए, दूसरे हम अपने बड़े भइयों(हिंदुओं) से मेल-जोल बना रहा। देखना है, अब हिंदू किस तरह अपना प्रायश्चित और आत्मशुद्धि करते हैं। किंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि इस समझौते से हमारा सामाजिक और धार्मिक आंदोलन बंद हो जाएगा। उसे तो और जोरों से चलना चलना चाहिए। हमें हिंदुओं के मंदिर में जाने की जरूरत नहीं है। हमारे आत्मदेव का मंदिर समस्त विश्व है और प्रत्येक घट मंदिर है। यह जो कुछ हुआ है, सब हमारे ‘आदि-हिंदू आंदोलन’ का ही फल है।’9  

फुले और आंबेडकर की भांति स्वामी अछूतानंद भी अछूतों और पिछड़ी जातियों के संगठन की कामना करते थे। उनका कहना था कि यदि ये वर्ग एकजुट हो जाएं तो अपने आप में बड़ा समूह होंगे। उन्हें राजनीतिक रूप से परास्त करना असंभव होगा। वे अपनी सरकार स्वयं बना सकेंगे। पिछड़ों और अतिपिछड़ों को फुले की तरह वे भी ‘बहुजन समाज’ कहकर पुकारते थे। जो आज भी प्रासंगिक है। जिसमें भविष्य की सामाजिक न्याय की राजनीति के बीजतत्व छिपे हुए हैं। नेता और मार्गदर्शक के अलावा स्वामी अछूतानंद अच्छे कवि, लेखक और नाटककार भी थे। उनकी छह पुस्तकों में राजा राम न्याय(नाटक), मायानंद बलिदान(जीवनी), पाखंड खंडिनी, अछूत पुकार(दोनों कविता संग्रह) आदि शामिल हैं। शोषित जातियों में जागरूकता लाने के लिए उन्होंने दिल्ली से ‘अछूत’ मासिक पत्र की शुरुआत की थी। पत्रिका ज्यादा दिन न चल सकी। उसके तुरंत बाद उन्होंने ‘प्राचीन हिंदू’ शीर्षक से पत्रिका का आरंभ किया। संयोगवश वह अखबार भी एक वर्ष ही निकल पाया। उसके बाद उन्होंने कानपुर से ‘आदि हिंदू जर्नल’ की शुरुआत की। अपने भाषण के बीच-बीच वे कविता का उपयोग करते थे। लेख के समापन पर उनकी कविता के कुछ पद प्रस्तुत हैं, जिसे उन्होंने 1927 में ‘उत्तर प्रदेश आदि सभा सम्मेलन’ के समापन पर पढ़ा थाᅳ

निसिदिन मनुस्मृति ये हमको जला रही है,

उपर न उठने देती नीचे गिरा रही है

हमको बिना मजूरी, बैलों के संग जोते,

गाली व मार उस पर हमको दिला रही है

लेते बेगार, खाना तक पेट भर न देते,

बच्चे तड़पते भूखे, क्या जुल्म ढा रही है

….

ब्राह्मण व क्षत्रियों को सबका बनाया अफसर

हमको ‘पुराने उतरन पहनो’ बता रही है

दौलत कभी न जोड़े, गर हो तो छीन लें वह

फिर ‘नीच’ कह हमारा, दिल भी दुखा रही है

कुत्ते व बिल्ली, मक्खी, से भी बना के नीचा

हा शोक! ग्राम बाहर, हमको बसा रही है

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

1. एम. पाटिल, जून-1913, दीनमित्र, गेल ओमवेड ‘कल्चर रिवोल्ट इन कोलोनियल सोसाइटी : नाॅन ब्राह्मन मूवमेंट इन  वेस्टर्न इंडिया, 1873ᅳ1930, पुणे साइंटिफिक सोशलिष्ट एजुकेशन ट्रस्ट’ में उद्धृत पृष्ठ -157.
2. ई. आर. नीव द्वारा संपादित और संकलित, मैनपुरी गजैटियर, संयुक्त प्रांत जिला आगरा और अवध, खंड-10, इलाहाबाद : सुपरिटेंडेंट, गवर्नमेंट प्रेस, उ.प्र. 1910, पृष्ठ 89.
3. केनिथ डब्ल्यू जोन्स, आर्यधर्म : हिंदू काॅसियशनेस इन नाइनटीथ सेन्चुरी पंजाब, नई दिल्ली, मनोहर पब्लिकेशन, 1976, पृष्ठ 310
4. डॉ. अमरजीत द्वारा ‘स्वामी अछूतानंद एंड राइज आफ दलित कानशियसनेस’ लेख से उद्धृत।  
5. उपर्युक्त, मूलतः गुरुप्रसाद मदान: स्वामी अछूतानंद हरिहर : जीवन और कृतित्व, अप्रकाशित पांडुलिपि 1969,
6. अछूतानंद स्वामी जी, इंजीनियर हेमराज फोंसा का आलेख, दलित विजन: http://dalitvision.blogspot.com/2017/06/achhutanand-swami-ji-1879-to-1933-his.html 
7. नंदिनी गोप्तू, दि पाॅलिटिक्स आफ अर्बन पूअर इन अर्ली ट्वंटीथ सेन्चुरी इंडिया, पृष्ठ-157
8. चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु, भारतीय मौलिक समाजवाद : सृष्टि और मानव समाज का विकास, आदिहिंदू ज्ञान प्रसारक ब्यूरो, 1941, पृष्ठ 271-272, से डॉ.अमरदीप द्वारा उद्धृत 
9. कंवल भारती, ‘स्वामी अछूतानंद ‘हरिहर’ का जीवनवृत’ से उद्धृत :
https://www.forwardpress.in/2019/01/swami-acchutanad-harihari-profile-story-hindi/#_ftn23

भविष्यलोक : एक नास्तिक का स्वप्न

सामान्य

(आज रामास्वामी पेरियार का जन्मदिवस है, भारत को आधुनिक राज्य बनाने में जितनी भूमिका डॉ. आंबेडकर की है, उतनी ही पेरियार की भी है. अपनी—अपनी भूमिका में दोनों महान हैं. डॉ. आंबेडकर साधारण परिवार से आए थे, अपने श्रम, स्वाध्याय, विद्वता, त्याग और विवेक के बल पर वे इस देश के निर्माता बने. समाज के बड़े वर्ग को जगाने का काम किया. पेरियार के पिता धनी व्यापारी थे. जीवन के आरंभिक वर्षों में धन उन्होंने भी खूब कमाया. धीरे—धीरे उसकी ओर से निस्पृह होते चले गए. आगे चलकर कांग्रेस से जुड़े. बहुत जल्दी समझ में आ गया कि कांग्रेस के सुधार की एक सीमा है. वह समाज के निचले हिस्सों के भले के लिए उतना की कर सकती है, जितना उपकार—भाव के साथ संभव है. पेरियार ने राजनीति को छोड़ा और केवल जनता पर भरोसा किया. खुद को जनांदोलनों के लिए समर्पित कर दिया. राजनीति से दूर रहते हुए बड़े आंदोलन चलाना, जिनसे आगे चलकर पूरे देश की राजनीति प्रभावित हुई, पेरियार जैसी हस्ती के लिए ही संभव था.

आदर्श समाज को लेकर हर महापुरुष का एक सपना रहा है. पश्चिम में प्लेटो से लेकर थॉमस मूर और आल्डोस हक्सले तक. भारत में संत रविदास ने भी समानता, सहयोग और स्वतंत्रता पर आधारित सपना देखा था, जिसे हम बेगमपुराके नाम से जानते हैं. आने वाली दुनियामें रामास्वामी पेरियार भी इसी प्रकार का सपना देखते हैं. यह आलेख उनके भाषण के अंग्रेजी अनुवाद(प्रो. ए. एस. वेणु)  का अनुवाद है, जो उन्होंने आत्मसम्मान आंदोलनके एक कार्यक्रम दिया था. वैज्ञानिक सोच के प्रसारक ईवी रामास्वामी इसमें ऐसे अनेक आष्विकारों की कल्पना करते हैं, जो आज हमारे सामने हैं. इससे उनकी दूरंदेशी का अनुमान लगाया जा सकता है. ओजस्वी विचारकों के कारण पेरियार को यूनेस्को ने दक्षिण एशिया का सुकरातकहा तो कुछ विद्वानों ने उन्हें भारत का वाल्तेयरमाना है. कुछ विद्वान उनकी तुलना रूसो से करते हैं. यह भाषण पुस्तकाकार भी प्रकाशित हुआ, जिसकी समीक्षा सुप्रसिद्ध अंग्रेजी दैनिक दि हिंदूमें छपी थी, जहां उनकी तुलना बीसवीं ताब्दी का एच.जी.वेल्स कहा गया था. लेख में गांधी का नाम नहीं है. उनकी ओर संकेत-भर है. परंतु इससे गांधी और पेरियार के सोच का अंतर पूरी तरह सामने आ जाता है.

यह लेख एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित हुआ था. पेरियार की भूमिका के साथ, जो लेख जितनी ही महत्त्वपूर्ण है.  परियार के जन्मदिन पर उन्हें याद करते हुए उन्हीं के लेख का अनुवाद प्रस्तुत कर रहे हैंओमप्रका कश्यप)

 

प्राक्कथन

कल की दुनिया कैसी थी? आज की दुनिया कैसी है? आने वाले कल की दुनिया कैसी होगी? समय के साथ-साथ, शताब्दियों के अंतराल में कौन-कौन से परिवर्तन होंगे? केवल तर्कवादी इन बातों को सही-सही समझ सकता है. धर्माचार्य के लिए इन्हें समझना अत्यंत कठिन है. यह बात मैं किस आधार पर कह रहा हूं?

धर्माचार्य मात्र उतना जानते हैं, जितना उन्होंने धर्मशास्त्रों और ऊटपटांग पौराणिक साहित्य को रट्टा लगाते हुए समझा है. उन सब चीजों से जाना है, जो ज्ञान और तर्क की कसौटी पर कहीं नहीं ठहरतीं. उनमें से कुछ केवल भावनाओं में बहकर सीखते-समझते हैं. दिमाग के बजाए दिल से सोचते हैं. अंध-श्रद्धालु की तरह मान लेते हैं कि उन्होंने जो सीखा है, वही एकमात्र सत्य है. बुद्धिवादियों का यह तरीका नहीं है. वे ज्ञानार्जन को महत्त्व देते हैं. अनुभवों से काम लेते हैं. उन सब वस्तुओं से सीखते हैं, जो उनकी नजर से गुजर चुकी हैं. प्रकृति में निरंतर हो रहे परिवर्तनों, जीव-जगत की विकास-प्रक्रिया से भी वे ज्ञान अर्जित करते हें. इसके साथ-साथ वैज्ञानिक शोधों, महापुरुषों के ज्ञान, व्यक्तिगत खोजबीन, उपलब्ध शोधकर्म को भी वे आवश्यकतानुसार और विना किसी पूर्वाग्रह के ग्रहण करते हैं.

धर्माचार्य सोचता है कि परंपरा-प्रदत्त ज्ञान ही एकमात्र ज्ञान है. उसमें कोई भी सुधार संभव नहीं है. अतीत को लेकर जो पूर्वाग्रह और धारणाएं प्रचलित हैं, वे उसमें किसी भी प्रकार के बदलाव के लिए तैयार नहीं होते. दूसरी ओर तर्कवादी मानता है कि यह संसार प्रतिक्षण आगे की ओर गतिमान है. सबकुछ तेजी से बदल रहा है. इसलिए वह अधुनातन और श्रेष्ठतर के स्वागत को सदैव तत्पर रहता है. मेरा आशय यह नहीं है कि दुनिया-भर के सभी धर्माचार्य एक जैसे हैं. लेकिन जहां तक ब्राह्मणों का सवाल है, वे सब के सब  बुद्धिवाद का विरोध करते हैं. परंपरा नएपन की उपेक्षा करती है. वह लोगों को तर्क और मुक्त चिंतन की अनुमति नहीं देती. न ही शिक्षा-तंत्र और परीक्षा-विधि को उन्नत करने में उन्हें कोई मदद पहुंचाती है. उलटे वह लोगों के पूर्वाग्रह रहित चिंतन में बाधा उत्पन्न करती है. यह जानते हुए भी परंपरा-पोषक धर्माचार्य अज्ञानता के दलदल में बुरी तरह धंसे हैं, पुराणों के दुर्गंधयुक्त कीचड़ में वे आकंठ लिप्त हैं. अंधविश्वाश और अवैज्ञानिक विचारों ने उन्हें खतरनाक विषधर बना दिया है.

हमारे धार्मिक नेता, विशेषकर हिंदू धर्म के अनुयायी धर्माचार्यों से भी गए-गुजरे हैं. यदि धर्माचार्य लोगों को 1000 वर्ष पीछे लौटने की सलाह देता है, तो नेता उन्हें हजारों वर्ष पीछे ढकेलने की कोशिश में लगे रहते हैं. ये जनता को सदियों पीछे ढकेल भी चुके हैं. बुद्धिवाद न तो धर्माचार्यों को रास आता है, न ही हमारे हिंदू नेताओं को. उन्हें केवल अवैज्ञानिक, मूर्खतापूर्ण और बुद्धिहीन वस्तुओं से लगाव है.

अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं, ये लोग नई दुनिया में भी उम्मीद लगाए रहते हैं कि आने वाला समय उन जैसे असभ्य और गंवारों का होगा. ‘स्वर्णिम अतीत’(ओल्ड इज गोल्ड) की परिकल्पना पर वही व्यक्ति विश्वास कर सकता है, जिसने नए परिवर्तन को न तो समझा हो, न उसकी कभी सराहना की हो. केवल अकल के अंधे लोग उनका अनुसरण कर सकते हैं.

हम जैसे तर्कवादी लोग पुरातन को पूर्णतः खारिज नहीं करते. उसमें जो अच्छा है, हम उसका स्वागत करते हैं. उसे अपनाने के लिए भी अच्छाई और नएपन में विश्वास करना अत्यावश्यक है. तभी हम नए और अधुनातन सत्य की खोज कर सकते हैं. समाज तभी प्रगति कर सकता है, जब हम नए और बेहतर समाज की रचना के लिए नवीनतम परिवर्तनों के स्वागत को तत्पर हों.

लोग चाहे वे किसी भी देश  अथवा संस्कृति के क्यों न हों, पुरातन से संतुष्ट कभी नहीं थे. उनकी दृष्टि सदैव अधुनातन ज्ञान एवं प्रगति पर केंद्रित रही हैं. वे जिज्ञासु और निष्पक्ष थे. इसी कारण वे विस्मयकारी वस्तुओं की खोज कर पाए. आज दुनिया के हर कोने के लोग मानवोपयोगी आविष्कारों का लाभ उठा रहे हैं. इसलिए यह आलेख केवल उन लोगों के लिए है जो सत्य को अनुभव करना जानते हैं. उसे आत्मसात् करने को तत्पर हैं. ऐसे ही लोग शताब्दियों आगे के परिवर्तनों की कल्पना कर सकते हैं.  

 

भविष्यलोक : एक नास्तिक का स्वप्न

अतीत के विहंगावलोकन और महान इतिहासकारों की राय से पता चलता है कि आने वाले समय में राजशाही का अंत हो जाएगा. बहुमूल्य सोना-चांदी, हीरे-जवाहरात प्रभु वर्ग का विशेषाधिकार नहीं रह पाएंगे. उस दुनिया में न तो शासक की आवश्यकता होगी, न शासन की. न राजा होगा, न ही राज्य. लोगों की आजीविका और सुख-शान्ति पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं होगा, जैसा आजकल का चलन है. आज रोजी-रोटी के लिए किया जाने वाला श्रम अत्यधिक है, अपनी ही मेहनत का सुख प्राप्त करने के अवसर अपेक्षाकृत अत्यंत सीमित. जबकि हमारे पास खेती-किसानी और सुखामोद, यहां तक कि वैभव-सामग्री जुटाने के विपुल संसाधन हैं. दूसरी ओर भूख, गरीबी और दैन्य के सताए लोग बड़ी संख्या में हैं. ऐसे लोगों के पास सामान्य सुविधाओं का अभाव हमेशा बना रहता है. उनके पास न तो भरपेट भोजन है, न ही जीवन का कोई सुख. हालांकि दुनिया में अवसरों की भरमार है. उनसे कोई भी व्यक्ति अपनी रुचि के अनुसार जीवन के लक्ष्य निर्धारित कर सकता है, अपने आप को ऊंचा उठा सकता है. फिर भी ऐसे लोग बहुत कम हैं जो उन सबका आनंद उठा पाते हैं. कच्चे माल और उत्पादन के क्षेत्र तेजी से विकास की ओर अग्रसर हैं. दूसरी ओर ऐसे लोग भी अनगिनत हैं जो मामूली संसाधनों के साथ गुजारा करने को विवश हैं. समाज में जीवन की मूलभूत अनिवार्यताएं होती हैं. उनके अभाव में जीवन बहुत कठिन हो जाता है. बहुत-से लोग न्यूनतम सुविधाओं के लिए तरसते हैं. बड़ी कठिनाई में वे जीवनयापन कर पाते हैं. हमारे पास कृषि भूमि की कमी नहीं. बाकी संसाधन भी पर्याप्त मात्रा में है. मगर ऐसे लोग भी हैं जिनके पास जमीन का एक टुकड़ा तक नहीं है. ऐसी दुनिया में एक ओर सुख-पूर्वक जीवनयापन के भरपूर संसाधन मौजूद हैं, दूसरी ओर भुखमरी गरीबी, और दुश्चिंताओं की भरमार है. उनके कारण समाज में चुनौतियां ही चुनौतियां हैं.

क्या इन सबके और ईश्वर के बीच कोई संबंध है?

क्या इन सबके और मनुष्य के बीच कोई तालमेल है?

ऐसे लोग भी हैं जो सांसारिक कार्यकलापों को ईश्वर से जोड़ते हैं. परंतु हमें ऐसा कोई नहीं मिलता जो दुनिया की बुराइयों के लिए ईश्वर को जिम्मेदार ठहराता हो. तो क्या यह मान लिया जाए कि आदमी नासमझ है, उसमें इन बुराइयों से निपटने का सामर्थ्य ही नहीं है?

प्राणीमात्र के बीच मनुष्य सर्वाधिक बुद्धिमान है. यह आदमी ही है, जिसने ईश्वर, धर्म, दर्शन, अध्यात्म को गढ़ा है. कहा यह भी जाता है कि असाधारण मनुष्य ईश्वर का साक्षात्कार करने में सफल हुए थे. कुछ लोगों के बारे में तो यह दावा भी किया जाता है कि वे ईश्वर में इतने आत्मलीन थे कि स्वयं भगवान बन चुके थे. मैं बड़ी हिम्मत के साथ पूछता हूं—आखिर क्यों ऐसे महान व्यक्तित्व भी दुनिया में व्याप्त तमाम मूर्खताओं को उखाड़ फेंकने में नाकाम रहे? क्या इससे स्पष्ट नहीं होता कि लोग अपने सामान्य बोध से यह नहीं समझ पाए कि सांसारिक चीजों का ईश्वर, धर्म, आध्यात्मिक निर्देश, न्याय, मर्यादा, शासन आदि से कोई संबंध नहीं है. ये सिर्फ इसलिए हैं क्योंकि अधिकांश लोग स्वतंत्र रूप से सोचने तथा निर्णय लेने में अक्षम हैं?

पश्चिमी देशों में अनेक विद्वानों ने बुद्धि को महत्त्व देते हुए तर्कसंगत ढंग से सोचना आरंभ किया. उन विचारों की मदद से उन्होंने विलक्षण ज्ञान के साथ-साथ चामत्कारिक आविष्कार किए हैं. उसके फलस्वरूप वे अपनी आध्यात्मिकता के परिष्कार के साथ-साथ, अंधविश्वासों और आत्म-वंचनाओं का समाधान खोजने में भी कामयाब रहे. अंततः वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि प्राचीन ढकोसले ज्यादा दिन टिकने वाले नहीं हैं. यही कारण है कि उन्होंने नए युग पर ध्यान-केंद्रित करना आरंभ कर दिया है.

हम क्यों जन्मे हैं? आम आदमी को आज भी रोजी-रोटी के लिए संघर्ष क्यों करना पड़ता है? क्यों लोग भूख और गरीबी के कारण अकाल मौत मरते हैं? जबकि दुनिया में संसाधनों का प्राचुर्य है. ये मानव-मस्तिष्क को स्तब्ध कर देने वाले प्रश्न हैं. आज हालात बदल रहे हैं. आजकल बुद्धिवादी तरीके से अनेक चीजों का वास्तविक रूप हमारे सामने है. कालांतर में यही तरीका न केवल परिवर्तन का वाहक बनेगा, बल्कि सामाजिक क्रांति को भी जन्म देगा. एक समय ऐसा आएगा जब धन-संपदा को सिक्कों में नहीं आंका जाएगा. न सरकार की जरूरत रहेगी. किसी भी मनुष्य को जीने के लिए कठोर परिश्रम नहीं करना पड़ेगा. ऐसा कोई काम नहीं होगा जिसे ओछा माना जाए; या जिसके कारण व्यक्ति को हेय दृष्टि से देखा जाए. आज सरकार के पास असीमित अधिकार हैं. किंतु भविष्य में ऐसी कोई सरकार नहीं होगी, जिसके पास अंतहीन अधिकार हों. दास प्रथा का नामोनिशान नहीं बचेगा. जीवनयापन हेतु कोई दूसरों पर आश्रित नहीं रहेगा. महिलाएं आत्मनिर्भर होंगी. उन्हें विशेष संरक्षण, सुरक्षा और सहयोग की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी.

आने वाली दुनिया में मनुष्य को सुख-पूर्वक जीवन-यापन करने के लिए एक अथवा दो घंटे का समय पर्याप्त होगा. उससे वह उतना ही वैभवशाली जीवन जी सकेगा, जैसा संत-महात्मा, जमींदार, शोषण करने वाले धर्मगुरु और तत्वज्ञानी जीते आए हैं. सामान्य सुख-सुविधाओं तथा समस्त आनंदोपभोग के लिए मात्र दो घंटे का श्रम पर्याप्त होगा. मनुष्य के सामान्य रोग जैसे पैरों का दर्द, कान, नाक, पेट, हड्डी आदि के विकार तथा अन्यान्य रोग सहन नहीं किए जाएंगे. आने वाली नई दुनिया में अकेले मनुष्य की दुश्चिंताएं और कठिनाइयाँ समाज द्वारा सही नहीं जाएंगीं. उस दुनिया में समाज एकता और सहयोग के आधार पर गठित होगा.

युद्ध जो इन दिनों आम हैं, भविष्य में उनके लिए कोई जगह नहीं होगी. लोगों को युद्ध में जान देने के लिए मजूबर नहीं किया जा सकेगा. हत्या और लूटमार की घटनाओं में उल्लेखनीय गिरावट होगी. कोई बेरोजगार नहीं रहेगा. न कहीं भोजन और आजीविका के लिए मारामारी होगी. लोग काम की तलाश अपने आप को सुखी और स्वस्थ रखने के लिए करेंगे. बहुमूल्य वस्तुएं, मनोरम स्थल, मनभावन दृश्य और दमदार प्रदर्शनियां, जहां लोग मिल-जुलकर जीवन का आनंद ले सकें—सभी को समान रूप से सदैव उपलब्ध होंगी. आने वाली दुनिया में साहूकार, निजी व्यापारी, उद्योगपति और पूंजीपतियों के अधीन चल रही संस्थाओं के लिए कोई जगह नहीं होगी. केवल लाभ की कामना के साथ करने वाला कोई एजेंट, ब्रोकर या दलाल आने वाली दुनिया में नजर नहीं आएगा.

सहयोगाधारित विश्व-राज्य में जल, थल और वायुसेना बीते जमाने की चीजें बन जाएंगी. बस्तियों को तबाह कर देने वाले युद्धक जहाज और हथियार खुद नष्ट कर दिए जाएंगे. आजीविका के लिए रोजगार की तलाश आसान और मानव-मात्र की पहुंच में होगी. सुखामोद में चौतरफा वृद्धि होगी. ज्ञान-विज्ञान की मदद से मनुष्य की औसत आयु में बढ़ोत्तरी होगी. जनसंख्या बृद्धि की चाहे जो रफ्तार हो, आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता तथा उन्हें जुटाने में लगने वाला श्रम मूल्य न्यूनतम स्तर पर होगा. मशीनी-क्रांति उसे सहज-संभव कर दिखाएगी.

मिसाल के तौर पर, कभी वे दिन थे जब एक कारीगर एक मिनट में औसतन 150 धागे बुन पाता था. आज ऐसी मशीनें हैं जो किस्म-किस्म के कपड़े 45,000 धागे प्रति मिनट की रफ्तार से आसानी से बुन लेती हैं. इसी तरह पहले कारीगर के लिए प्रति मिनट 2-3 सिगरेट बनाना भी मुश्किल हो जाता था. आज एक मशीन प्रति मिनट में ढाई हजार सिगरेट बना देती है. आज मशीन के डेशबोर्ड पर केवल तंबाकू की पत्तियां, कागज आदि रखने की जरूरत होती है. सिगरेट बनाने से लेकर उनके पैकेट बनाने, फिर पैक करने तक का काम मशीनें करती हैं. वहां से उन्हें आसानी से बाहर भेजा जा सकता है. इसके अलावा खराब सिगरेटों को अलग करने से लेकर नष्ट करने तक का काम मशीनें स्वत: कर लेती हैं. आज जीवन के सभी क्षेत्रों में मशीनों के जरिये आसानी से काम हो रहा है. प्रौद्योगिकी विषयक ज्ञान में तीव्र वृद्धि हो रही है. तकनीक की मदद से आने वाली दुनिया में ऐसा संभव होगा जब कोई आदमी सप्ताह में मात्र दो श्रम करके साल-भर के लिए जरूरी वस्तुओं का उपार्जन कर सकेगा.

इस बात से डरने की जरूरत नहीं है कि लोग इससे सुस्त और आराम पसंद हो जाएंगे. इस तरह की चिंता किसी को भी नहीं करनी चाहिए. यही नहीं जैसे-जैसे जीवनोपयोगी वस्तुएं के उपार्जन के तरीकों और संसाधनों का विकास होगा, और जैसे-जैसे सुख-सुविधाओं की मांग बढ़ेगी, स्वाभाविक रूप से मनुष्य के श्रम और क्षमताओं का लोकहित में पूरे वर्ष उपयोग करने के लिए आवश्यक कदम भी उठते रहेंगे. ऐसी योजनाएं बनाई जाएंगी जिससे मनुष्य के खाली समय का सार्थक सदुपयोग संभव हो सके. आधुनिकतम मानवोपयोगी आविष्कारों की कोई सीमा नहीं होगी. सभी लोगों को काम मिलेगा, विशेषरूप से गुणी, प्रतिभाशाली और मनुष्यता के हित में आधुनिक सोच से काम लेने वालों के लिए काम की कोई कमी नहीं होगी. मजदूर केवल मजदूरी के लिए काम नहीं करेगा, बल्कि वह अपने मानसिक विकास के लिए भी काम को समर्पित होगा. उससे प्रत्येक व्यक्ति व्यस्त रहेगा. केवल लार्भाजन के लिए कोई उत्पादन नहीं किया जाएगा.

अपने से बड़ों को काम करते देख छोटे भी समाज हित में बहुउपयोगी योगदान देने को आश्चर्यजनक रूप से तत्पर होंगे. ठीक है, कुछ लोग सोच सकते हैं कि उनके कुछ उत्तराधिकारी सुस्त और आराम-पसंद होंगे. मैं ऐसा नहीं मानता. यह सोचते हुए कि कुछ लोग आलसी और निकम्मे हो सकते हैं, वे समाज के लिए बोझ नहीं रहेंगे. समाज की प्रगति पर उनसे न्यूनतम प्रभाव पड़ेगा. यदि कोई जानबूझकर सुस्त रहने की जिद ठाने रहता है, तो वह उसके लिए नुकसानदेह होगा, न कि पूरे समाज के लिए. सच तो यह है कि आने वाले समय में कोई भी खुद को आलसी और सुस्त कहलवाने में लज्जित महसूस करेगा. लोगों में समाज के लिए कुछ न कुछ उपयोगी करने की स्पर्धा बनी रहेगी. उनके लिए अपेक्षाकृत अधिक काम होगा. और किसी काम को करने वाले हाथों की कमी नहीं रहेगी. कोई किसी काम को पूरा न करने का दोष अपने सिर नहीं लेना चाहेगा.

आप पूछ सकते हैं कि क्या कुछ आदमी ऐसे भी होंगे जिन्हें ओछे और गंदे कार्यों पर लगाया जाएगा? अभी तक गंदे और खराब कार्यों से हमारा जो मतलब रहा है, आने वाली दुनिया में उन्हें ऐसा नहीं माना जाएगा. न उनके कारण किसी को हेय दृष्टि से देखा जा सकेगा. आनी वाले समय में झाडू़ लगाना, मैला उठाना, झूठे बर्तन धोने, कप-प्लेट धोने जैसे कार्यों के लिए मशीनों की मदद ली जाएगी. आदमी से उम्मीद की जाएगी कि तकनीकी कौशल प्राप्त कर, मषीनों का उपयोग करना सीखे. सिर पर भारी बोझा ढोने, खींचने या गड्ढा खोदने के लिए मानव-श्रम की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. किसी भी कार्य को असम्मानजनक नहीं माना जाएगा. कवियों, कलाकारों, कलमकारों और मूर्तिकारों के बीच नई दुनिया गढ़ने के लिए स्पर्धा रहेगी. अच्छे आदमियों को अच्छे काम सौंपे जाएंगे, ताकि वे नाम और नामा दोनों कमा सकें.

कोई भी व्यक्ति आत्मगौरव, चरित्र और मान-मर्यादा से शून्य नहीं होगा. चूंकि व्यक्तिगत लाभ के सभी रास्ते बंद कर दिए जाएंगे, इसलिए कोई भी आदमी गलत चाल-चलन में नहीं पड़ेगा. ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होगा जिसका झुकाव अनुचित और अनैतिक कार्य की ओर हो. ये शर्तें प्रत्येक व्यक्ति को उच्च नैतिक मापदंडों के अनुसरण की प्रेरणा देंगीं. उसे अधिक सुसभ्य और संवेदनशील बनाएंगी. यदि कहीं ऊंच-नीच, विशेषाधिकार और अधिकारविहीनता दिखेगी, वहां घृणा, जुगुप्सा, और विरक्ति के कारण भी मौजूद होंगे—और जहां ये चीजें अनुपस्थित होंगी, वहां अनैतिकता के लिए कोई स्थान न होगा. नए विश्व में किसी को कुछ भी चुराने या हड़पने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी. पवित्र नदियों जैसे कि गंगा के किनारे रहने वाले लोग उसके पानी की चोरी नहीं करेंगे. वे केवल उतना ही पानी लेंगे, जितना उनके लिए आवश्यक है. भविष्य के उपयोग के लिए वे पानी को दूसरों से छिपाकर नहीं रखेंगे. यदि किसी के पास उसकी आवश्यकता की वस्तुएं प्रचुर मात्रा में होंगी, वह चोरी की सोचेगा तक नहीं. इसी प्रकार किसी को झूठ बोलने, धोखा देने या मक्कारी करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, क्योंकि उससे उसे कोई प्राप्ति नहीं हो सकेगी. नशीले पेय किसी को नुकसान नहीं पहुंचाएंगे. न कोई किसी की हत्या करने का ख्याल दिल में लाएगा. बक्त बिताने के नाम पर जुआ खेलने, शर्त लगाने जैसे दुर्व्यसन समाप्त हो जाएंगे. उनके कारण किसी को आर्थिक बरबादी नहीं झेलनी पड़ेगी.

पैसे की खातिर अथवा मजबूरी में किसी को वेष्यावृत्ति के लिए विवश नहीं होना पड़ेगा. स्वाभिमानी समाज में कोई भी दूसरे पर शासन नहीं कर पाएगा. कोई किसी से पक्षपात की उम्मीद नहीं करेगा. ऐसे समाज में जीवन और काम-संबंधों को लेकर लोगों का दृष्टिकोण उदार एवं मानवीय होगा. वे अपने स्वास्थ्य की देखभाल करेंगे. प्रत्येक व्यक्ति में आत्मसम्मान की भावना होगी. स्त्री-पुरुष दोनों एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करेंगे और किसी का प्रेम बलात् हासिल करने की कोशिश नहीं की जाएगी. स्त्री-दासता के लिए कोई जगह नहीं होगी. पुरुष सत्तात्मकता मिटेगी. दोनों में कोई भी एक-दूसरे पर बल-प्रयोग नहीं करेगा. आने वाले समाज में कहीं कोई वेष्यावृत्ति नहीं रहेगी.

मानसिक अपंगता के शिकार लोगों को विशेषरूप से देखभाल की जरूरत पड़ सकती है. बावजूद इसके ऐसे व्यक्तियों को तभी बंद किया जा सकेगा, जब वे दूसरे लोगों के लिए परेशानियां खड़ी कर रहे हों. स्त्री-पुरुष दोनों पर किसी प्रकार के प्रतिबंध लागू करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. क्योंकि वे दोनों ही संबंधों की अच्छाई-बुराई की ओर से सावधान रहेंगे.

यातायात के साधन मुख्यतः हवाई होंगे और वे तीव्र से काम करेंगे. संप्रेषण प्रणाली बिना तार की होगी. सबके लिए उपलब्ध होगी और लोग उसे अपनी जेब में उठाए फिरेंगे. रेडियो प्रत्येक के हेट में लगा हो सकता है. छवियां संप्रेषित करने वाले उपकरण व्यापक रूप से प्रचलन में होंगे. दूर-संवाद अत्यंत सरल हो जाएगा और लोग ऐसे बातचीत कर सकेंगे मानो आमने-सामने बैठे हों. आदमी किसी से भी कहीं भी और कभी भी तुरंत संवाद कर सकेगा. शिक्षा का तेजी से और दूर-दूर तक प्रसार करना संभव होगा. एक सप्ताह तक की जरूरत का स्वास्थ्यकर भोजन संभवतः एक केप्सूल में समा जाएगा जो सभी को सहज उपलब्ध होंगे

मनुष्य की आयु सौ वर्ष अथवा उससे भी दो गुनी हो चुकी होगी.

नपुंसक स्त्री या पुरुष को संतान के लिए संभोग करने की जरूरत नहीं पड़ेगी. यही नहीं पषुओं की उन्नत नस्ल के लिए ताकतवर और सुदृढ़ सांड विशेषरूप से लाए जाएंगे, स्वस्थ्य और बुद्धिमान पुरुषों को वीर्य-दान के लिए तैयार किया जाएगा, तथा उसे वैज्ञानिक ढंग से स्त्री के गर्भाशय में स्थापित किया जाएगा. वह ऐसा रास्ता होगा जिससे आने वाली संतान शारीरिक एवं मानसिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ एवं तेजवंत होगी. बच्चे के जन्म की प्रक्रिया सरल होगी, जिसके लिए दंपति को संभोग की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. जनता के इच्छा और सहयोग से जनसंख्या-नियंत्रण का काम आसान हो जाएगा.

दैनिक उपभोग की वस्तुएं जैसी वे आज हैं, भविष्य में उससे अलग हांगीं. उदाहरण के लिए वाहनों का भार उल्लेखनीय रूप से कम हो जाएगा. उससे पैट्रोल की खपत में कमी आएगी. भविष्य की कारें बिजली अथवा दुबारा चार्ज होने वाली बैटरियों से चल सकेंगी. बिजली का उपयोग इस प्रकार किया जाएगा ताकि प्रत्येक व्यक्ति उसका लाभ उठा सके. वह मनुष्यता के लिए बहुउपयोगी होगी. इस तरह के अनेक वैज्ञानिक सुधार देखने में आएंगे. विज्ञान का बड़ी तेजी से विकास होगा, उसके माध्यम से नए-नए और उपयोगी आविष्कार सामने आएंगे.

उस दुनिया में आविष्कारों के दुरुपयोग के लिए कोई गुंजाइष नहीं होगी. आजकल संपत्ति, कानून और व्यवस्था की देखभाल, न्याय, प्रशासन, शिक्षा आदि के सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार संभालती है. इसके लिए सरकार के अलग-अलग विभाग हैं. आगे चलकर ये सब माध्यम अनावश्यक और अप्रचलित हो जाएंगे. इन कार्यों के लिए आजकल प्रचलित प्रणालियां कालांतर में अर्थहीन लगने लगेंगी.

संभव है आने वाली दुनिया में भी कोई व्यक्ति ईश्वर को समझने की चाहत रखे.

ईश्वर की संकल्पना स्वतः और स्वाभाविक रूप से नहीं जन्मी है. यह विश्वास की प्रक्रिया है, जो बड़ों द्वारा छोटों में अंतरित और उपदेशित की जाती है. आने वाली दुनिया में ईश्वर की चर्चा तथा कर्मकांड करने वाले लोग नगण्य होंगे. यही नहीं ईश्वर के नाम पर जितने चमत्कारों का दावा किया जाता है, कालांतर में वे लुप्त हो जाएंगे. मनुष्य ईश्वर की चर्चा करेगा किंतु बिना किसी अलौकिताबोध के. आज आदमी यह सोचकर ईश्वर को याद करता है, क्योंकि उसे उसकी आवश्यकता बताई जाती है. यदि हम काम करते समय अचानक बीच में आ जाने वाली बाधाओं के रहस्य को समझ लें, यदि मनुष्य की सामान्य जरूरतें उसकी आवश्यकता के अनुसार समय रहते आसानी से पूरी हो जाएं, तब उसे ईश्वर और सृष्टि की परिकल्पना की आवश्यकता ही न पड़े. स्वर्ग की परिकल्पना अवैज्ञानिक और अप्रामाणिक है. यदि मानव-मात्र के लिए धरती पर ही स्वर्ग जैसा वातावरण उपलब्ध हो जाए, तब उसे स्वर्ग जैसी आधारहीन कल्पना की आवश्यकता ही नहीं पड़े. न ही स्वर्ग मिलने की चाहत उसे परेशान करे. यही मानवीय बोध की चरमसीमा है. ज्ञान-विज्ञान और विकास के क्षेत्र में ईश्वर के लिए कोई स्थान नहीं है.

यदि व्यक्ति में खुद को जानने की योग्यता हो तो उसे ईश्वर की जरूरत ही नहीं है. यदि मनुष्य इस दुनिया को ही अपने लिए स्वर्ग मान ले तो वह स्वर्ग के आकाश में; तथा नर्क के पाताल में स्थित होने की जैसी भ्रामक बातों पर विश्वास ही नहीं करेगा. जागरूक और विवेकवान व्यक्ति इत तरह के अतार्किक सोच को तत्क्षण नकार देगा. जहां व्यक्तिगत इच्छाओं का लोप हो जाता है, वहां ईश्वर भी मर जाता है. जहां विज्ञान जिंदा हो, वहां ईश्वर को दफना दिया जाता है.

सामान्य धारणा में अपरिवर्तनीयता या अनश्वरता के बारे ठोस परिकल्पनाएं संभव हैं. इसका आशय क्या है? इसमें भ्रम पैदा करने वाले कारक कौन से हैं? अनश्वरता को लोग ईश्वर के पर्याय और गुण के रूप में देखते आए हैं. वैज्ञानिकों की दृष्टि में इस तरह का अर्थ निकालना मूर्खता है. हम अपने निजी अनुभवों को दूसरों को बताने में प्रायः संकोची रहे हैं. इसलिए दूसरों के अनुभव और विचार हमारे मस्तिष्क पर प्रभावी हो जाते हैं. हम अपनी अज्ञानता का प्रदर्शन करते हैं, जो प्रायः हमारी नहीं होती. जबकि वे दुनिया के जन्म और उसकी ऐतिहासिक सहनशीलता को समझने का आदर्श माध्यम हो सकती है. इन हालात में जबकि दुनिया के अनेक रहस्य हमें अभी तक अज्ञात हैं, आभार ज्ञापन के बहाने ही सही, कोई भी बुद्धिवादी ईष्वर की पूजा नहीं करेगा.

कोई भी व्यक्ति ज्ञानार्जन द्वारा अपने जीवन में सुधार ला सकता है. यही दुनिया का नियम है. जब कोई तर्कबुद्धि से घटनाओं की सही व्याख्या नहीं कर पाता, तब वह चुपचाप अज्ञानता के वृक्ष के नीचे शरण लेकर ईश्वर को पुकारने लगता है. इस तरह के अबौद्धिक कार्यकलाप आने वाले समय में सर्वथा अनुपयुक्त माने जाएंगे.

 आने वाले समय में न तो स्वर्ग होगा, न नर्क. क्योंकि उसमें सनातन पाप या पुण्य के लिए के लिए कोई स्थान नहीं होगा. किसी को किसी की मदद की जरूरत नहीं पड़ेगी. सिवाय पागल के कोई दूसरों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहेगा. इसलिए स्वर्ग और नर्क की परिकल्पना भविष्य में मनुष्यता के लिए अर्थहीन मान ली जाएगी.

इस तरह की आदर्श दुनिया अचानक नहीं गढ़ी जा सकती. धीर-धीरे, कदम-दर कदम आगे बढ़ते हुए मेहनती लोगों द्वारा, क्रमिक परिवर्तन के बाद, लंबे अंतराल में इस तरह की दुनिया अवश्य बनाई जा सकती है. समाज की विभिन्न समस्याओं के समाधान तथा मानवमात्र के बेहतर जीवन के लिए, नई दुनिया की संरचना के लिए यह रास्ता आदर्श होगा.

उस समाज में कोई यह नहीं पूछेगा, ‘हम क्या करें? जब सबकुछ ईश्वर की मर्जी से संचालित है.’ मनुष्यता की जो भी कमियां सामने आएंगी, लोग उनपर शांत नहीं बैठेंगे. लक्ष्य तक पहुंचने के लिए वे उनका समाधान अवश्य करेंगे. नियति और दुर्भाग्य की कोई बात नहीं होगी. प्रत्येक कार्य संपूर्ण आत्मविश्वास के साथ किया जाएगा. समाज में जो भी बुराइयां सामने आएंगी, बेहतर समाज की रचना के लिए उनका निदान तत्क्षण और निपुणता के साथ किया जाएगा.

प्राचीन रीति-रिवाजों और पंरपराओं में अंध-आस्था ने लोगों के सोचने समझने, तर्क-बुद्धि से काम लेने की प्रवृत्ति का लोप कर दिया है. ये चीजें दुनिया की प्रगति में बाधक बनी हुई हैं. कुछ लोगों के स्वार्थ इनसे जुड़े हैं. निहित स्वार्थ के लिए वही लोग, जो इन पुरानी और बकवास चीजों से ही कमाई करते रहते हैं. ऐसे लोग ही नई दुनिया की संरचना का विरोध करते हैं. उस दुनिया का विरोध करते हैं जिसमें खुशियों की, सुख-शांति की भरमार होगी. लोगों के विकास की प्रचुर संभावनाएं भी रहेंगी. बावजूद इसके जो मनुष्य के अज्ञान तथा कुछ लोगों के स्वार्थ के विरुद्ध खुलकर खड़े होंगे, वही नई दुनिया की रचना करने में समर्थ होंगे. नई दुनिया के निर्माताओं को मजबूत करते के लिए हमें उनके साथ, उनकी कतार में शामिल हो जाना चाहिए. युवाओं और बुद्धिवादियों के लिए उचित अवसर है कि वे नए विश्व की रचना हेतु अपने प्रयासों को अपने विचार, ऊर्जा और सपनों को समर्पित कर दें.

ई वी रामास्वामी पेरियार(1944)

बहुजन साहित्य : अभिजन बनाम बहुजन दृष्टि

सामान्य
चरथ भिक्खवे चारिकम् बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय. लोकानुकम्पाय, अत्थाय हिताय, सुखाय देव मनुस्सानं—गौतम बुद्ध.
(भिक्षुओ! बहुजन के हित के लिए, बहुजन के सुख के लिए. लोक-कल्याण, देवताओं एवं मानव-मात्र के सुख के लिए चलते रहो….चलते रहो)

 

अभिजन बनाम बहुजन दृष्टि

कहावत है—‘दृष्टि ही सृष्टि है.’ आंखें जो देखती हैं, ठीक वही प्रतीति मस्तिष्क को कराती हैं. यह शत-प्रतिशत सत्य नहीं है. दृष्टि-बिंब मस्तिष्क में पहले से मौजूद सूचनाओं के साथ अंत:क्रिया करते हैं. उनसे प्रभावित होते तथा सामर्थ्य-अनुसार उनको प्रभावित भी करते हैं. मस्तिष्क में पूर्वाग्रह के रूप में दर्ज प्रतीतियां भविष्य के लिए कसौटी बन जाती हैं. अंतर्मन में मौजूद धारणाओं के आधार पर ही मस्तिष्क नई प्रज्ञप्तियों का आकलन करता है. दर्ज विचारधाराएं यदि पीढ़ियों लंबे संस्कारों की देन हैं , तो वह नई सूचनाओं को स्वीकारने में जल्दी नहीं दिखाता. कम से कम उस समय तक किनारे रखता है, जब तक उनकी एक के बाद एक पुनरावृत्ति न हो; अथवा अधिक प्रामाणिकता के साथ मस्तिष्क को प्रभावित करने लायक न बन जाएं. मनुष्य की सामाजिक-सांस्कृतिक मनोभूमि, आर्थिक-राजनीतिक प्रस्थितियां भी उसके निष्कर्षों को अपनी-अपनी तरह से प्रभावित करती हैं. उस अवस्था में उसके निष्कर्ष तटस्थ नहीं रह पाते. यही कारण है कि एक ही समय में किसी घटना के एकाधिक प्रेक्षकों के निष्कर्ष परस्पर भिन्न होते हैं.

शूद्रों की सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति को लेकर अधिकांश अध्ययन विद्वानों की इसी मनोरचना को दर्शाते हैं. प्राचीन ग्रंथों के आधार पर शूद्रों की समाजार्थिक स्थिति का अध्ययन करने वालों को दो वर्गों में बांटा जा सकता है. पहले में परंपरागत बुद्धिजीवी यानी ब्राह्मण अथवा ब्राह्मणवादी मानसिकता के लेखक आते हैं. नई शिक्षा, सभ्यता, लोकतांत्रिक समझ और वंचित समुदायों में उभरती चेतना के दबाव में उन्होंने प्राचीन वर्ण-व्यवस्था का स्वतंत्र रूप से अध्ययन करना शुरू किया. किंतु उनका कृतित्व उत्तराधिकार में मिले वर्णवादी संस्कारों से मुक्त न रह सका. अपने लेखन में वे जाति और वर्ण-भेद जैसी समस्याओं का उल्लेख तो करते हैं, किंतु इन व्यवस्थाओं को लागू करने वालों के मनोविज्ञान तथा उनके दुष्परिणामों से कन्नी काट लेते हैं. दूसरे वर्ग के विमर्शकारों में वे हैं जिन्होंने शूद्र और दलित समुदायों में जन्म लिया. जिन्हें इन समुदायों की पीड़ा, उत्पीड़न, जाति-आधारित भेदभाव और अभावपूर्ण जीवन का प्रत्यक्ष अनुभव था. इस वर्ग के विद्वानों को पुनः दो उपवर्गों में रखा जा सकता है. पहले वे, जिनकी हिंदू धर्म में प्रगाढ़ आस्था थी. जिनका मानना था कि अपने मूल में यह धर्म बाकी धर्मों से श्रेष्ठतर है. इसकी विकृतियां बाद के स्वार्थी पुरोहित वर्ग की देन हैं, जिन्हें आपसी तालमेल द्वारा सुधारा जा सकता है. वे हिंदू धर्म के सुधारवादी आंदोलनों से प्रभावित तथा किसी न किसी रूप में उनसे जुड़े थे. इस वर्ग के सुधारवादियों में संतराम बीए, केशवचंद सेन, महात्मा मुंशीराम विज(स्वामी श्रद्धानंद) आदि प्रमुख हैं. उन्होंने हिंदू धर्म में रहते हुए या किसी आंदोलन के माध्यम से सुधार आंदोलनों का नेतृत्व किया; और कमोबेश सफलता भी प्राप्त की.

दूसरे उपवर्ग में वे विद्वान आते हैं, जो जाति को हिंदू धर्म की असाध्य व्याधि मानते थे. जिनका विचार था कि जाति के रहते उसमें सुधार की कोई संभावना नहीं है. इसके लिए वे ब्राह्मणवाद को दोषी मानते थे. इस वर्ग के विद्वानों में ब्राह्मणों को विदेशी मूल का मानने पर लगभग सहमति रही है. उनके अनुसार अपनी वर्गीय श्रेष्ठता को बनाए रखने के लिए ब्राह्मण हर समय, हर किस्म की सत्ता से समझौता कर, निचले वर्गों के उत्पीड़न का कारण बनता आया है. उससे मुक्ति के लिए जाति का आमूल उच्छेद आवश्यक है. चूंकि हिंदू धर्म और जाति परस्पर अंतर्गुंफित हैं, इसलिए जाति का उच्छेद हिंदू धर्म से मुक्ति के बिना असंभव है. इस विचारधारा के आदि प्रवर्त्तक महामना ज्योतिराव फुले हैं. द्वंद्ववाद को दार्शनिक आधार पर हीगेल ने स्थापित किया था. मार्क्स ने उसका उपयोग राजनीतिक दर्शन के रूप में किया. साम्यवादी समाज की रचना हेतु सर्वहारा तथा पूंजीपति के संघर्ष को अनिवार्य मानते हुए उसने सर्वहारा का संगठित विद्रोह के लिए आवाह्न किया. भारत में हालात भिन्न थे. भारतीय समाज केवल आर्थिक असमानता का षिकार नहीं रहा. उससे कहीं भयानक जाति नाम की व्याधि, मनुष्य को जन्म से ऊंच-नीच के खाने में बांटती आई है. इस बेमेलकारी व्यवस्था की खूबी है कि इसमें जो शिखर पर है, उसे अंतहीन अधिकार प्राप्त होते हैं. जबकि सबसे निचले स्तर पर मौजूद व्यक्तियों को, बहुसंख्यक होने के बावजूद अधिकार-विपन्नता के बीच जीना पड़ता है. इससे वर्ग-संघर्ष की स्थिति बनती रहती है. धर्म उसके लिए सुरक्षा-कवच काम करता है. वह नागरिकों का बेमेलकारी संस्कृति से अनुकूलन कराता है, परिणामस्वरूप प्रतिरोध की संभावना निरंतर विरल होती जाती है. फुले ने धर्म-ग्रंथों के पुनर्पाठ के अलावा दमित जातियों की शिक्षा और संगठन पर जोर दिया. उनका विचार था कि निकट भविष्य में ब्राह्मण एवं शूद्र के बीच संघर्ष अपरिहार्य है. नए समाज की राह उसी ने निकलेगी. उत्तरवर्ती विद्वानों में डॉ. आंबेडकर, पी वी रामास्वामी पेरियार, रामस्वरूप वर्मा आदि प्रमुख हैं. आंबेडकर ने धर्मांतरण के माध्यम से हिंदू धर्म को चुनौती दी तो पेरियार और रामस्वरूप वर्मा ने समानता एवं तर्कसम्मत समाज की स्थापना के लिए ईश्वर और धर्म से मुक्ति को आवश्यक माना. उन्होंने वैज्ञानिक प्रबोधन से युक्त समाज की स्थापना पर जोर दिया.

प्राचीन भारत में शूद्रों की स्थिति को लेकर पहला विशिष्ट अध्ययन ‘शूद्र इन एन्शीएंट इंडिया’(1956) डॉ. रामशरण शर्मा का है, जो उनके ‘लंदन विश्वविद्यालय’ में अतिथि प्रोफेसर के रूप में किए गए शोध पर केंद्रित है. उन्होंने ऋग्वैदिक काल से 500 ईस्वी पश्चात तक के ग्रंथों को अध्ययन की विषय-वस्तु बनाया है. इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद राजकमल द्वारा ‘शूद्रों का इतिहास’ शीर्षक से प्रकाशित है. कुछ ग्रंथों में शूद्रों के पक्षपातपूर्ण उल्लेख, जिनके लेखक शूद्रों को साधारण मनुष्य का दर्जा देने तक को तैयार न थे, जिनमें उनका उल्लेख अपमानजनक ढंग से किया गया है, तथा जिनमें उन्हें मनुष्य के नाते प्राप्त सहज-सुलभ अधिकारों के हनन की सांस्थानिक व्यवस्था है—के आधार पर किए गए अध्ययन को ‘शूद्रों का इतिहास’ कैसे माना जा सकता है? इस पर अनुवादक और प्रकाशक ने विचार नहीं किया है. चूंकि उसे लेखक की भूमिका के साथ छापा गया है, इसलिए कहा जा सकता है कि नए शीर्षक के प्रति लेखकीय सहमति भी है. हिंदी में इस प्रकार की बेइमानियां आम हैं.

डॉ. रामशरण शर्मा के अनुसार ‘शूद्र’ को लेकर पहला निबंध इसी शीर्षक के साथ पंडित विधुशेखर भट्टाचार्य का प्राप्त होता है(दि इंडियन एंटीक्वेरी, जुलाई 1922, पृष्ठ 137-138). बादरायण के वेदांत सूत्र(1.3.4) का संदर्भ देते हुए ‘शूद्र’ शब्द की विवेचना वे ‘दुःआप्लावित’ या ‘दुख में डूबा हुआ’ कहकर करते हैं(शुभस्य तदनादरश्रवणात् तदाद्रवणत्सूच्यते). यह ठीक ऐसे ही है जैसे पहले तो मनुष्य पर इतने अत्याचार करो कि वह दर्द से, पीड़ा और अत्याचारों से छटपटाने लगे. फिर यदि कोई उसका परिचय जानना चाहे तो कह दो कि यह वही है जो बहुत अधिक रोता, कराहता, बिलबिलाता है. लेख का बाकी हिस्सा वे शूद्र को संस्कृत शब्द ‘क्षुद्र’ का अपभ्रंश सिद्ध करने में खपा देते हैं. इस तरह भाषा-विज्ञान का सहारा लेते हुए, ‘शूद्र’ की ब्राह्मणवादी अवधारणा, समाज के बहुसंख्यक श्रमजीवी और सर्वहारा वर्ग के ऊपर थोप दी जाती है. वे उसे मान भी लेते हैं. क्योंकि जाने-अनजाने सोचने-समझने की जिम्मेदारी ब्राह्मण को सौंपी जा चुकी है.

‘शूद्र’ की विवेचना को लेकर दूसरा लेख भी विधुशेखर भट्टाचार्य का ही है. यह रवींद्रनाथ ठाकुर द्वारा प्रकाशित त्रैमासिक जरनल ‘विश्वभारती’ के अक्टूबर 1923 के अंक में प्राप्त होता है. अंग्रेजी में लिखे इस लेख का शीर्षक है—‘दि स्टेटस आफ दि शूद्र’. लेख इस मायने में मौलिक कहा जाना चाहिए कि वह संस्कृत ग्रंथों में शूद्रों की उपस्थिति की पड़ताल करता है. कमी यही है कि वह शूद्रों की विपन्नता तथा उनके कष्टों के लिए सामाजिक स्तर पर किसी को जिम्मेदार न ठहराकर, परोक्षतः उसे नियतिबद्ध मान लेता है. विवेचना का प्रमुख आधार शूद्रों की यज्ञों में सहभागिता के अधिकार को बनाया गया है. मीमांसा-सूत्र का हवाला देते हुए लेखक बताता है कि कुछ ग्रंथों में शूद्रों को यज्ञों में सहभागिता के अधिकार प्राप्त थे. मानो यज्ञ और तत्संबंधी अन्य कर्मकांड ही सब कुछ हों. शूद्रों के बारे में जी. एफ. इलिन का उल्लेख भी पुस्तक में है. इलिन का अध्ययन भी संस्कृत ग्रंथों के आस-पास घूमता है, लेकिन उसका निष्कर्ष भिन्न है. इलिन का मानना था कि शूद्र गुलाम नहीं थे. इसके समर्थन हेतु ऋग्वेद में सैकड़ों उदाहरण मौजूद हैं. वहां अनेक स्थानों पर जगह आया है कि शूद्र, जिन्हें वहां असुर के रूप में दर्शाया गया है, समृद्ध संस्कृति के वाहक थे. आर्यों के कर्मकांड में उनकी रुचि न थी. ऋग्वेद में उनके धन को छीनकर उसका यज्ञादि में उपयोग करने का आवाह्न किया गया है. सातवें मंडल में दास और आर्यों के मध्य युद्ध; तथा इंद्र एवं विष्णु द्वारा संयुक्त रूप से शंबर नामक दास की 99 पुरियों को ध्वस्त करने का उल्लेख है.1 एक अन्य स्थान पर इंद्र द्वारा 1000 दासों को युद्धबंदी बनाने का उल्लेख है.2 ऐसे ही एक वर्णन में कहा गया है कि इंद्र ने 30000 दासों को युद्ध में अपनी माया से बेहोश कर दिया था.3 इस तरह के और भी कई उल्लेख हैं जो दर्शाते हैं कि शूद्र यानी दास अनार्य सैनिक थे. जिन्होंने इंद्र को कई बार चुनौती दी है. इंद्र के नेतृत्व में विजेता आर्य दासों के कब्जे वाले गढ़ों, पशुओं तथा ठिकानों पर कब्जा कर लेते थे. जब ‘शूद्र’ दुर्गपति और दलपति तक थे तो उन्हें ‘शोक में डूबा हुआ’ कैसे माना जा सकता है? पुस्तक में इसपर कोई विचार नहीं किया गया है.

आर्थर एंथनी मेक्डोनल का विचार था कि पुरावैदिककाल के इन अनार्य बाशिंदों के लिए नौकर, दास, दस्यु जैसे संबोधन उत्तर वैदिक काल की संस्कृत में शामिल हुए हैं.4 ‘वैदिक माइथोलाजी’(पृष्ठ 162) में मेक्डोनल ने ऋग्वेद के आधार पर शुष्ण, शंबर, पिप्रु, निमुची, धुनी, चुमुरी, वर्चिन, वाला, द्रभिक, रुधिक्र आदि दास योद्धाओं तथा दुर्गपतियों का उल्लेख किया है. ‘महाभारत’ की ख्याति प्राचीन भारतीय राजनीतिक दर्शन पर गंभीर विमर्श के कारण भी है. उसमें शूद्रों को कहीं दास तो कहीं असुर कहकर संबोधित किया गया है. ध्यातव्य है कि ऋग्वैदिक काल तक ‘शूद्र’ और ‘असुर’ संज्ञाएं केवल नकारात्मक चरित्रों की द्योतक नहीं थीं. दास की उत्पत्ति ‘दश’ धातु से हुई है, जिसका अभिप्रायः दान देने से है. ऋग्वेद में ‘असुर’ का उपयोग भी देवता तथा देवेत्तर शक्तियों के निमित्त किया गया है. हैरानी की बात है कि भारतीय लेखक शूद्र अथवा दास के बारे में इन ऋग्वैदिक साक्ष्यों को भुलाकर उन अर्थों पर रूढ़ हो जाते हैं, जिन्हें मेक्डोलन आदि विद्वान उत्तरवर्ती काल का और प्रक्षेपित मानते हैं.

प्राचीन भारत में शूद्रों की सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक प्रस्थिति की व्याख्या जैन एवं बौद्ध ग्रंथों की मदद के बिना असंभव है. इन ग्रंथों में आजीवक, लोकायत, चार्वाक, वैमानिक आदि भौतिकवादी विचारधाराओं का उल्लेख हुआ है. बौद्ध एवं जैन दर्शनों की भांति ये दर्शन भी ब्राह्मणवाद की प्रतिक्रिया-स्वरूप जन्मे थे; और अपने समय में ब्राह्मणवाद का सटीक और सशक्त प्रतिपक्ष रचते थे. बौद्ध ग्रंथों के अनुसार विभिन्न प्रकार के शिल्पकर्मी, श्रम के बल पर जीविकोपार्जन करने वाले सामान्य मजदूर—मक्खलि गोशाल के ‘आजीवक’ संप्रदाय के अनुयायी थे. काशी के आसपास इस दर्शन का विशेष प्रभाव था. ये तथ्य विशेष अध्ययन की मांग करते हैं. चूंकि वैदिक संस्कृति से इतर शूद्र-अस्मिता की खोज समानांतर संस्कृति को प्रासंगिक बना सकती है, जिसे उनके पूर्वाग्रह कभी स्वीकार नहीं करने देंगे. कदाचित इसी भय के कारण प्राचीन भारत में शूद्रों की स्थिति की पड़ताल के लिए डॉ. रामशरण शर्मा जैसा साम्यवादी चेतना का विद्वान भी बौद्ध एवं जैन साहित्य में शूद्रों की उपस्थिति को अध्ययन का विषय नहीं बनाता, जिनमें उनका अपेक्षाकृत सम्मानपूर्ण उल्लेख है. उनका विश्लेषण केवल संस्कृत वाङ्मय तक सीमित रहता है. यही उसकी सीमा है.

डॉ. शर्मा विधुशेखर भट्टाचार्य की लीक पकड़कर चलते हैं. उसी दिशा में आगे बढ़ते हुए वे वेदादि ग्रंथों, स्मृतियों के अलावा अर्थशास्त्र, मनुस्मृति आदि को अध्ययन-सामग्री बनाते हैं. उनमें शूद्रों के लिए क्या विधान है, इसकी विवेचना करते हैं. शूद्रों का वैदिक कर्मकांडों के प्रति क्या सोच था? ब्राह्मणों द्वारा कर्मकांडों से वंचित किए जाने का क्या उन्हें बहुत अधिक संताप था? अथवा जीवन-जगत के बारे में व्यावहारिक दृष्टिकोण होने के कारण वे कर्मकांडों से स्वतः दूरी बनाए हुए थे? प्राचीन भारत में आर्येत्तर सभ्यता, संस्कृति और यहां के जन-जीवन का आकलन करने के लिए ये जरूरी मुद्दे हैं, जिनपर पुस्तक में कोई चर्चा नहीं मिलती. इस हकीकत को पूर्णतः नजरंदाज किया जाता रहा है कि वैदिक वाङ्मय में जिन्हें शूद्र कहा गया है, उनमें किसान, शिल्पकार, श्रमिक, छोटे उद्यमी, व्यापारी तथा दस्तकार सहित वे लोग आते थे, जो अपने श्रम-कौशल से अपना और बाकी जनसमाज का भरण-पोषण करते थे. समाज के लिए उत्पादन-स्तर बनाए रखना उनकी जिम्मेदारी थी. धार्मिक सवालों में उलझना, कर्मकांडों के लिए अधिक समय निकालना उनके लिए संभव न था. खेती और दूसरे कार्यों में सहायक पशु-धन की बलि सीधे तौर पर उनकी अर्थव्यवस्था के स्रोतों पर हमला था. यज्ञादि आडंबरों से दूर रहने, उनकी आलोचना के पीछे यह महत्त्वपूर्ण कारण था.

ऋग्वेद के अनुसार अनार्य अपेक्षाकृत समृद्ध नागरी संस्कृति के उत्तराधिकारी थे. उनके जीवन में स्थायित्व और आत्मनिर्भरता थी. अपनी बढ़ी-चढ़ी सभ्यता के साथ वे दुर्गों में रहते थे. वे कृषिकला में पारंगत थे. उनके शिल्पकर्मी कुशल, दूर-दराज तक व्यापार करने वाले थे. उनके दुर्ग लोहे(2/58/8) के, पत्थर(4/30/20) के, लंबे-चौड़े गौओं से भरे हुए(8/6/23) तथा सौ-सौ खंबों वाले(शतभुजी 1/16/8, 7/15/14) थे. उनकी सेना सधी हुई थी. युद्धकला में वे आर्यों से कहीं ज्यादा निपुण थे. अपने रण-कौशल के बल पर उन्होंने आरंभिक युद्धों में आर्यों को अनेक बार पराजित किया था. दूसरी ओर आर्यों का जीवन यायावरी था. उनका एक जगह ठिकाना न था. सभ्यता की दृष्टि से वे अनार्यों से पिछड़े हुए थे. भारत प्रवेश के बाद, उन्होंने स्वयं को धीरे-धीरे व्यवस्थित करना आरंभ किया. पैर जमाने के लिए अनार्य समूहों से रक्त-संबंध बनाए. ब्राह्मणवाद के बीजतत्व वे संभवतः अपने मूल-स्थान से लाए थे. दूसरों से अलग दिखने के लिए उन्होंने वन-प्रांतरों में आश्रम बनाए. कर्मकांडों को बढ़ावा दिया. यज्ञादि कर्मकांडों के माध्यम से अंततः वे लोगों के दिलो-दिमाग में यह भ्रम पैदा करने में सफल रहे कि वे प्राकृतिक शक्तियों से साक्षात और संवाद कर सकते हैं. इससे जनसाधारण का उनकी ओर सम्मोहित होना स्वाभाविक था. आगे चलकर जब बड़े राज्यों की आवश्यकता महसूस की जाने लगी तो जनता को नियंत्रण में रखने के लिए धर्म को जरूरी उपकरण मान लिया गया. ध्यातव्य है कि प्राचीन काल में सैनिकों को वृत्तिका देने का कोई रिवाज न था. युद्ध में भागीदारी के बदले सैनिकों को लूट के माल से संतोष करना पड़ता था. जीत के बाद बड़े सैन्य अधिकारियों को छोटी-मोटी रियासत सौंपकर संतुष्ट कर दिया जाता था. धर्म की मदद से निजी महत्त्वाकांक्षाओं के लिए छेड़े गए युद्धों को भी औचित्यपूर्ण ठहराया जा सकता था. बड़े राज्यों की चुनौतियां भी बड़ी होती थीं. इसलिए साम्राज्यवादी भावनाओं के प्रसार के साथ आसंजक के रूप धर्म राजनीति के साथ घुलमिल गया. कभी कोरी आस्था, कभी पुरोहित वर्ग को प्रसन्न रखने तो कभी लंबे राजनीतिक मंसूबों को साधने के लिए राजाओं ने बड़े-बड़े मंदिर, देवालय आदि बनवाए. नतीजा यह हुआ कि धर्म सभ्यता और संस्कृति का अनिवार्य हिस्सा बनता चला गया.

खुद को ओरों से अलग दिखाने के लिए ब्राह्मणों ने वर्णभेद का सहारा लिया. अभिजन संस्कृति की नींव रखी. उसका उतना तीव्र विरोध भी हुआ. ब्राह्मणवाद को नकारते हुए शूद्रों का बड़ा वर्ग प्राचीनतम भौतिकवादी चिंतन परंपराओं यथा आजीवक, लोकायत, वैनायिक आदि समुदायों से जुड़ा चला गया. जिनके प्रवर्त्तक वैदिक कर्मकांड का विरोध करते हुए, उनके रचियताओं को ‘भांड, धूर्त्त और निशाचर’ मानते थे. जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण भौतिकवादी था. उनके बीच बड़े-बड़े विद्वान और तत्वज्ञानी हुए. कौत्स, मक्खलि गोशाल, सति, अजय केशकंबलि, पुकुद कात्यायन, संजय वेलठिपुत्त, पूर्ण कस्सप, जाबालि जैसे प्रखर बुद्धिवादी ब्राह्मणवादियों के लिए हमेशा चुनौती बने रहे. ब्राह्मणवाद के उत्कर्ष के दौर में वे उसका सशक्त प्रतिपक्ष बने. अपनी सुरक्षा तथा यज्ञ-संबंधी आवश्यकताओं के लिए ब्राह्मण पुरोहित वर्ग राजाओं पर आश्रित था. जबकि अनार्य अपने शिल्प-कौशल पर जीने वाले श्रमजीवी लोग थे. उनके शिल्पकर्म की दूर-दूर तक मांग थी. इसलिए वे अपनी आर्थिक स्वतंत्रता की रक्षा करने में समर्थ थे. हालांकि शूद्रों का एक वर्ग ऐसा अवश्य रहा होगा, जो दूसरों की सेवा करके अपना जीवनयापन करता था. मगर बौद्धकाल तक, जब राज्य अपेक्षाकृत छोटे थे, शिल्पकार वर्ग अपनी आर्थिक आत्मनिर्भरता के साथ-साथ बौद्धिक स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने कामयाब रहा. इसीलिए ब्राह्मणों द्वारा फैलाए जा रहे वर्णवादी प्रपंच का उन्होंने विरोध भी नहीं किया था. तथाकथित शूद्र यानी शिल्पकार वर्ग की आर्थिक-सामाजिक स्वतंत्रता का प्रमाण यह भी है कि गौतम बुद्ध ने जब बौद्ध धर्म की नींव रखी तो शूद्रों का छोटा-सा वर्ग ही उसकी ओर आकर्षित हुआ. बाकी उससे दूरी बनाए रहे. बौद्ध धर्म के उभार के दिनों में मक्खलि गोशाल का आजीवक धर्म प्रचलन में था. उसके अनुयायियों की संख्या बौद्ध धर्म के समर्थकों से अधिक थी. कदाचित इसलिए भी कि जातीय समानता की बात करने वाले बौद्ध और जैन दोनों दर्शनों को चातुर्वर्ण्य विभाजन से कोई आपत्ति न थी. वर्ण-व्यवस्था को लेकर जैन दर्शन अपेक्षाकृत कठोर था. इसलिए प्राचीन भारत में शूद्रों की स्थिति के अध्ययन के लिए जैन एवं बौद्ध ग्रंथ अधिक प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध करा सकते हैं, जिनकी ओर डॉ. रामशरण शर्मा ने कोई ध्यान नहीं दिया है. शूद्र-अस्मिता की खोज से जुड़े डॉ. आंबेडकर के महत्त्वपूर्ण अध्ययन, जो ‘शूद्र कौन थे’ शीर्षक से प्रकाशित महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है, को वे यह कहकर खारिज करने की कोशिश करते हैं कि उनका अध्ययन अनुवाद पर आधारित है—

‘लेखक(डॉ. आंबेडकर) ने पूरी सामग्री अनुवादों से जुटाई है और इससे भी बुरी बात यह है कि उनके लेखन से यह आभास मिलता है कि उन्होंने शूद्रों को उच्च वंश का सिद्ध करने का लक्ष्य लेकर यह पुस्तक लिखी है. यह उस मनोवृत्ति का परिचायक है जो हाल में नीची जाति के लोगों में उत्पन्न हुई है.’5

गौरतलब है कि ज्योतिबा फुले की पुस्तक ‘गुलामगिरी’ डॉ. रामशरण शर्मा की पुस्तक के लिखे जाने के लगभग 75 वर्ष पहले आ चुकी थी. मगर इस पुस्तक का कोई हवाला वे अपने अध्ययन में नहीं देते. जबकि डॉ. आंबेडकर के विशद अध्ययन को वे अनुवाद-आधारित कहकर नकार देते हैं. अनुवाद एक भाषा की कृति को दूसरी भाषा में लाने का माध्यम है. हम किसी व्यक्ति के निष्कर्षों को केवल यह कहकर खारिज नहीं कर सकते कि उसने आधार-सामग्री के रूप में अनूदित ग्रंथों का अध्ययन किया है. विशेषकर जब तक उन अनुवादों की प्रामाणिकता पर सवाल न उठाए गए हों. दरअसल ब्राह्मणवादी चिंतक आरंभ से ही इस आत्मुग्धता का शिकार रहे हैं कि वेदादि ग्रंथों की सटीक समझ ब्राह्मणेत्तर वर्गों को हो ही नहीं सकती. जबकि वेद-रचियता ऋषियों में अनेक मनीषी ब्राह्मणेत्तर वर्गों से ही आते हैं. शूद्रों के संबंध में वेदादि ग्रंथों के पठन-पाठन संबंधी निषेध का वास्तविक ध्येय इन ग्रंथों को आलोचना-प्रत्यालोचना से दूर रखकर केवल पूजा की चीज बनाए रखना था; ताकि उनके भरोसे सहस्राब्दियों से चले आ रहे सांस्कृतिक-सामाजिक वर्चस्व को किसी प्रकार की चुनौती पेश न हो.

फुले और डॉ. आंबेडकर का संघर्ष सामाजिक न्याय को समर्पित था. उनके लिए शूद्रों के अधिकार महत्त्वपूर्ण थे. इसलिए वे राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ, कभी-कभी उसे किनारे करते हुए भी, सामाजिक स्वतंत्रता की मांग को निरंतर आगे बढ़ाते रहे. डॉ. शर्मा का आरोप है कि डॉ. आंबेडकर ने अपनी पुस्तक में शूद्रों को उच्च जाति का सिद्ध करने के लिए श्रम खपाया है. उनके इस आरोप में कोई दम नहीं है. आंबेडकर महार जाति के थे. उनके पिता महार रेजिमेंट में थे, जिसकी वीरता से अंग्रेज भी प्रभावित थे. उनकी आरंभिक पढ़ाई सैनिक स्कूल में हुई थी. संभव है, शूद्रों को क्षत्रीय सिद्ध करने के पीछे उनकी पारिवारिक स्थितियों का अप्रत्यक्ष प्रभाव रहा हो. लेकिन यह केवल एक संभावना है. शूद्रों को पराजित सैनिक मानने वाले वे अकेले नहीं हैं. ऋग्वेद में दसियों स्थान पर उल्लेख है कि दास समृद्ध सभ्यता के रचियता थे. उनके बड़े, विशालकाय दुर्ग थे. अनगिनत गाएं और विपुल पशु-संपदा थी. उनके साथ युद्ध में आर्यों को अनेक बार पराजय का सामना करना पड़ा था. हालांकि कूटनीतिक लड़ाई में वे आर्यों से पराजित होते रहे. मैक्डोलन का उल्लेख हम ऊपर कर चुके हैं. उसके अलावा दर्जनों विद्वान हैं जिनका मानना है कि शूद्र पराजित अनार्य सैनिक थे. उपर्युक्त उद्धरण में डॉ. शर्मा ने ‘नीची जाति के लोगों’ शब्दों का प्रयोग किया है. इससे प्रतीत होता है कि घोषित मार्क्सवादी होने के बावजूद जातिवादी संस्कार उनके अवचेतन में सुरक्षित थे. यह उस मनोवृत्ति का परिचायक है जिसके सवर्ण समुदाय से आने वाले वामपंथी आरंभ से ही शिकार होते आए हैं. इस देश में वामपंथ की असफलता की सबसे बड़ी बाधा भी यही है.

ऋग्वेद में अनार्य सम्राट सुदास के पिता दिवोदास को जिसने युद्ध में इंद्र की मदद की थी, अतिथि-सत्कार करने वाला बताया है. यह दर्शाता है कि अनार्यों पर विजय के पश्चात आत्ममुग्धता के शिकार आर्यों ने उन्हें वर्णव्यवस्था में सबसे निचले क्रम पर रखा था. यह मानना उचित ही है कि शूद्र का अनार्यों से गहरा संबंध था. वे समानांतर और अपेक्षाकृत विकसित संस्कृति के उत्तराधिकारी थे. चूंकि डॉ. रामशरण शर्मा अपने निष्कर्षों के लिए संस्कृत ग्रंथों तक सीमित रहे हैं, इसलिए उपर्युक्त पुस्तक को ‘संस्कृत ग्रंथों में शूद्र’ तक सीमित कहा जाना चाहिए, न कि प्राचीन भारत में शूद्र. उल्लेखनीय है कि संस्कृत ग्रंथ जिस रूप में हमें इन दिनों प्राप्त हैं, वे ईसा से अधिकाधिक दो-तीन शताब्दी पुरानी रचनाएं हैं. उससे पहले वे स्मृति का हिस्सा थे. संकलित किए जाने के बाद भी उनमें निरंतर पाठांतर होता रहा है. शूद्रों की ऐतिहासिक उपस्थिति की पड़ताल हेतु जैन और बौद्ध ग्रंथ भी प्रामाणिक साक्ष्य हो सकते हैं, जिन्हें डॉ. रामशरण शर्मा ने अपने अध्ययन में छोड़ दिया है. वेदेत्तर ग्रंथों पर वे कोई विचार नहीं करते. यह तब है जब वे बडे़ गर्व के साथ खुद को ए. एल. बेशाम का शिष्य मानते हैं, जिन्होंने भारत के निर्वासित ‘आजीवक’ दर्शन का गंभीर अध्ययन किया था. बेशाम की पुस्तक ‘हिस्ट्री एंड डाक्ट्रीन आफ आजीवक’ अपने विषय की सबसे प्रामाणिक शोधपरक कृति है. इन कमियों के बावजूद ‘शूद्रों का इतिहास’ महत्त्वपूर्ण पुस्तक है. शर्त यह है कि इसे देरिदा के ‘विखंडनवाद’ की समझ के साथ पढ़ा जाए.

बहुजन और भारतीय भौतिकवादी चिंतन

वैदिक साहित्य का अध्ययन करने से पता चलता है कि तत्कालीन वैदिक समाज जिसे ब्राह्मण समाज कहना समीचीन होगा, असल में आत्ममुग्ध समाज था. उस समय के जितने भी ग्रंथ हैं, वे ब्राह्मणों द्वारा ब्राह्मणों के लिए लिखी गई रचनाएं हैं. उनमें बाकी जनसमाज, विशेषकर शूद्रों की न तो खास झलक है, न ही उनके साथ किसी प्रकार के संवाद की कोशिश है. उनका उल्लेख भी अपमानजनक ढंग से हुआ है. शूद्रों को कहीं अयोग्य तो कहीं वैदिक परंपरा के विरोधी के रूप में दर्शाया गया है. अपने समकालीनों के प्रति ब्राह्मण लेखकों का जैसा व्यवहार था, उसे देखते हुए यह चौंकाने वाली बात भी नहीं है. जो वैदिक कर्मकांडों की महत्ता को अस्वीकारता है, उनके लिए वह निकृष्ट एवं हेय है. इसलिए वैदिक वाङ्मय में अनार्यों का उल्लेख दैत्य, असुर, वेद-निंदक जैसे अवमाननापूर्ण संबोधन के साथ किया गया है. क्या इसे भी ब्राह्मण लेखकों की कुंठा का कारण माना जाए? माना जाए कि सभ्यता के स्तर पर पिछड़ा होने के कारण वैदिक ऋषियों ने अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए यज्ञादि कर्मकांडों को माध्यम बनाया था? यह ठीक है, वैदिक परंपरा के लेखकों के संस्कृति और सभ्यता संबंधी अपने मापदंड थे. उसी के आधार पर उन्होंने अनार्यों का वर्णन अपने धर्मग्रंथों में किया था. अनार्यों में जाति और वर्ण के आधार पर स्तरीकरण की कोई प्रथा नहीं थी. किंतु ब्राह्मणों द्वारा वर्ण-विभाजन लागू करने के बाद, अनार्यों के शक्तिशाली तबके के एक हिस्से का समर्थन उन्हें अवश्य मिला होगा. इससे उनकी सांस्कृतिक लड़ाई आसान होती गई.

लगभग 2500 वर्ष पहले जब धर्मग्रंथों का लेखन आरंभ हुआ, उस समय तक ब्राह्मण संस्कृति समाज की अभिजन संस्कृति का हिस्सा बन चुकी थी. तत्कालीन सत्ता पर उसका प्रभाव था. उसमें असहमति के लिए कोई गुंजाइश नहीं थी. वेदों में हालांकि संघ, सभा, समिति, गण, पुग, निगम जैसे शब्द मिलते हैं. उनके आधार पर काशीप्रसाद जायसवाल, राधाकुमुद मुखर्जी आदि विद्वान वेदकालीन भारत में गणतंत्र की मौजूदगी का दावा करते रहे हैं. लेकिन वह आधुनिक गणतंत्रात्मक प्रणाली से पूर्णतः भिन्न था. जैसा था, उसका श्रेय भी ब्राह्मण मनीषियों को देना उचित न होगा. असल में वे प्राचीन अनार्य सभ्यता के अवशेष थे. उस कबीलाई संस्कृति की देन, जब गांव और परिवार के बीच कोई स्पष्ट विभाजन रेखा न थी. संपत्ति, संसाधन और उससे होने वाली आय साझा मानी जाती थी. मुखिया गांव की संपत्ति और संसाधनों का संरक्षक होता था. वही उत्पाद को सदस्यों के बीच उनकी आवश्यकता के अनुसार बांटने की जिम्मेदारी निभाता था. सदस्यों के बीच कार्य-विभाजन उनकी योग्यता के आधार पर किया जाता था. चूंकि पूरा कबीला एक परिवार की तरह होता था, इसलिए जन्म के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव की परंपरा न थी. वहां सुख-दुख में पूरे समूह का साझा होता था. ब्राह्मणों के बारे में जहां कहीं सेवा, साहचर्य, सुख और समानता की कामना की जाती है, उसकी व्याप्ति केवल ब्राह्मणों तक है. ऋग्वेद के दशम मंडल में आई ऋचाएं, जिनके आधार पर प्राचीन भारत में सामूहिकता, साहचर्य और संगठन की उपस्थिति के तर्क दिए जाते हैं, असल में ब्राह्मणों द्वारा, ब्राह्मणों के हित के लिए ब्राह्मण होताओं के एकजुट रहने का आवाह्न मात्र हैं.

वेदों को ब्राह्मण परंपरा में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है. उनके आधार पर भारतीय दर्शन परंपरा को शताब्दियों पहले दो हिस्सों में बांट दिया था. पहले वर्ग में वे दर्शन थे जो वेदों को आप्त ग्रंथ मानते थे. दूसरे वे दर्शन जो वेदों को आप्त ग्रंथ मानने से इन्कार करते थे. जैन और बौद्ध वेदों को स्वतः प्रामाण्य मानने को तैयार न थे, इस कारण उन्हें नास्तिक दर्शन की संज्ञा दी गई. बुद्ध पूर्व भारत में भौतिकवादी दर्शन प्रचलित थे. उन विचारधाराओं के बारे में विस्तार से यहां कुछ भी कह पाना संभव नहीं है. इसके दो प्रमुख कारण है. पहला बुद्ध के समय तक उपदेशों को कलमबद्ध करने की परंपरा न थी. स्वयं बुद्ध ने अपने उपदेश मौखिक रूप में दिए थे. उनके उपदेशों को उनकी मृत्यु के पश्चात अजातशत्रु की पहल के बाद संकलित किया गया. बुद्ध क्षत्रिय थे. उस समय का शक्तिशाली सम्राट अजातशत्रु उनके प्रशंसकों में से था. इसलिए बुद्ध के विचारों को सहेज पाना संभव हो सका. आजीवक, लोकायत, वैमानिक चार्वाक संप्रदाय के प्रवर्त्तक जो मुख्यतः शूद्र अथवा शिल्पकार वर्ग से थे, निम्न वर्ग का होने के कारण मक्खलि गोशाल आदि को यह सुविधा प्राप्त न थी. परिणामस्वरूप उनके विचार विलुप्त होते गए. उनके दर्शन के कुछ सूत्र जैन और बौद्ध ग्रंथों में देखे जा सकते हैं.

विद्वान बौद्ध एवं जैन दर्शनों को मध्यमार्गी मानते हैं. इस कारण जनसाधारण भी उनकी ओर आकर्षित हुआ था. दोनों में बौद्ध दर्शन अपेक्षाकृत अधिक लोकतांत्रिक और उदार था. इसलिए जैन दर्शन की अपेक्षा उसे अधिक ख्याति मिली. इन दर्शनों को मध्यमार्गी कहने का आधार क्या है? यदि पहला मार्ग वैदिक दर्शन का था, तो दूसरा मार्ग कौन-सा था? किन दर्शनों के साथ सामंजस्य बिठाने की कोशिश जैन और बौद्ध दर्शनों ने की थी, जिसके लिए उन्हें मध्यमार्गी माना गया? इस सत्य का बोध हमें अनेक उलझनों से बचा सकता है. उसके माध्यम से हम उन समानांतर विचारधाराओं का अनुमान लगा सकते हैं, जिन्हें ब्राह्मणों द्वारा जानबूझकर उपेक्षित किया गया. कदाचित इसलिए कि वे वैदिक परंपरा के आलोचकों में से थे. किंतु वैदिक परपंरा का विरोध तो जैन और बौद्ध दर्शन ने भी किया था. फिर क्या कारण हो सकता है? दूसरा और महत्त्वपूर्ण कारण हो सकता है, आजीवक चिंतकों की जाति. मक्खलि गोशाल, अजित केशकंबलि, पूरण कस्सप, सति, कौत्स आदि के बारे में उपलब्ध जानकारी के अनुसार वे अद्विज वर्गों से आए थे. ब्राह्मणों द्वारा उनके विचारों की उपेक्षा का बड़ा कारण यह भी था. उनके बारे में समझने के लिए बौद्ध एवं जैन साहित्य की शरण में जाना पड़ता है. क्योंकि वैदिक परंपरा के विरोध के लिए अनेक तर्क उन्होंने वेद-विरोधी लोकायत और आजीवक दार्शनिकों से लिए थे.

ऋग्वेद से लेकर महाकाव्यों और पुराणों तक चलने वाला लंबा संघर्ष दर्शाता है कि तत्कालीन समाज का बड़ा हिस्सा वैदिक कर्मकांडों का बहिष्कार करता था. यह विरोध निरा प्रतिक्रियावादी नहीं था. सब जानते हैं, प्रतिक्रियावाद की उम्र छोटी होती है. ठोस विचारधारा के समर्थन के अभाव में उसे शताब्दियों लंबे संघर्ष में बदला भी नहीं जा सकता था. ‘ब्रह्मजाल सुत्त’(दीघ निकाय) के अनुसार बुद्ध के समय भारत में भौतिकवादी, प्रकृतिवादी, शाश्वतवादी, क्रियावादी, अक्रियावादी आदि 64 दार्शनिक मत प्रचलित थे. ऐसे में वैदिक चिंतनधारा जिसे आज प्राचीन भारत की मूल-चिंतनधारा और भारतीय मनीषा का इकलौता उपहार माना जाता है, बुद्धपूर्व भारत में बहुत छोटे समूह तक सीमित रही होगी. बहुसंख्यक वर्ग को या तो उससे दूर रखा जाता था, अथवा घोर आडंबरवाद के कारण स्वयं बहुसंख्यक उससे दूरी बनाए रखता था. इसके माध्यम से एक और निष्कर्ष आसानी से निकाला जा सकता है. यह कि ब्राह्मणों द्वारा शूद्रों को वेदादि ग्रंथों के पठन-पाठन से अनाधिकृत घोषित करना, केवल जातिवादी सोच तक सीमित नहीं था. बल्कि उसे तीव्र आलोचनाओं से बचाना भी था. यह तार्किक आधार पर असंभव था. इसलिए अपने उभार के साथ ही वह विरोधों का शिकार होने लगी थी. बचाव के लिए वैदिक वाङ्मय तथा उसमें आए प्रतीकों को आस्था का विषय बनाने की कोशिश लगातार होती रही. उसके लिए उन्होंने राजनीति का सहारा लिया. प्राकृतिक शक्तियों का जमकर परामानवीकरण किया. बावजूद इसके अनेकानेक टोटमों, मिथों तथा कल्पित आख्यानों के माध्यम से कालांतर में वे ब्राह्मणों की वर्गीय श्रेष्ठता का मिथ जनमानस में स्थापित करने में कामयाब भी हुए. कर्मकांड इस उद्देश्य की पूर्ति में उनके सहायक बने. संस्कृत ग्रंथों में असुरों का उल्लेख इतनी चतुराई से किया गया है कि आर्य-संस्कृति का विरोधी होने के बावजूद वे उनके महिमा-मंडन में सहायक बनते हैं. आख्यानों में देवताओं का महिमामंडन है. वे सद्गुणों की खान हैं. जबकि असुर दुरात्माएं हैं. अपवाद-स्वरूप किसी असुर में सद्गुण हैं भी तो उन्हें प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में किसी देवता का अवदान घोषित कर दिया जाता है. ध्यातव्य है कि बुद्ध से पहले तक भारत में धर्मग्रंथों को लिखने की कोई परंपरा न थी. वैदिक ऋचाएं, उपनिषद आदि भले ही रचे जा चुके हों, किंतु उनका स्वरूप मौखिक ही था. इसलिए वैदादि ग्रंथों को श्रुति कहने की परंपरा है. उस समय ऋषिगण यज्ञवेदिका के पास बैठकर शिष्यों को ऋचाओं का पाठ कराते थे. ऋचाओं को शब्द-बद्ध करने का चलन बुद्ध के बाद ही संभव हो पाया. स्वयं बुद्ध के उपदेश उनकी मृत्यु के करीब 90 वर्ष पश्चात कलमबद्ध किए गए थे. यही समय वेदादि ग्रंथों के लिखित रूप में अस्तित्व में आने का भी है. इसलिए ऋग्वेद आदि ग्रंथों के अलग-अलग पाठ हमें प्राप्त होते हैं.

यह हम क्यों कह रहे हैं? इसका हमारे विषय से क्या संबंध है? वेदादि ग्रंथों को भारतीय दर्शन परंपरा का प्रमुख ग्रंथ माना जाता है. संस्कृत वाङ्मय की तो शुरुआत ही ऋग्वेद से मानी गई है. वैदिक परंपरा के अनुयायी इसपर गर्व भी करते हैं. उनकी पूर्वाग्रह-ग्रस्त दृष्टि मान लेती है कि वैदिक परंपरा के विरोधियों की कोई स्वतंत्र, वैकल्पिक विचारधारा नहीं थी. असल में ऐसा नहीं है. वैदिक परंपरा के विरोधी निरे प्रतिक्रियावादी न होकर, सशक्त दर्शन-परंपरा के संवाहक थे. उनके अनेक दर्शन सिद्धांतों को ब्राह्मणवादी विचारकों ने ज्यों का त्यों अथवा थोड़े-बहुत संशोधन के साथ ग्रहण किया है. ‘दीघ निकाय’ में पूर्ण कस्सप का वर्णन बुद्ध के समकालीन छह प्रमुख तीर्थंकरों के साथ किया जाता है. उसकी प्रशस्ति में लिखा गया है—‘पूर्ण कस्सप, संघ-स्वामी, गण-अध्यक्ष, ज्ञानी, यशस्वी, गणाचार्य, तीर्थंकर, बहुत से लोगों द्वारा सम्मानित, चिरकाल का साधु, अनुभवी और वयोवृद्ध है.’(सामञ्ञफलसुत्त, दीघनिकाय). पूर्ण कस्सप को विद्वान ‘अक्रियावादी’ मानते हैं. अजातशत्रु के पूछने पर उसने अपने अकर्म-सिद्धांत का वर्णन इस प्रकार किया—

‘महाराज! छेदन करते-कराते, पकाते-पकवाते, शोक करते, परेशान होते, परेशान कराते, चलते-चलाते, प्राण हनन करते, बिना दिया लेते, सैंध मारते, गांव लूटते, चोरी करते, बटमारी करते, परस्त्रीगमन और झूठ बोलते हुए भी पाप नहीं किया जाता. छुरे से तेज चक्र द्वारा जो इस पृथ्वी के प्राणियों का मांस का ढेर बना दे, तो इसके कारण उसे पाप का आगम नहीं होता….दान-दम-संयम से, सत्य बोलने से न पुण्य है, न पाप का आगम है.’(सामञ्ञफल सुत्त, दीघनिकाय).

इसकी तुलना गीता के कर्म-सिद्धांत से की जा सकती है. आत्मा की अनश्वरता का बखान करते हुए कृष्ण अर्जुन से कहते हैं—‘आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती. जल गला नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकता.’ पूर्ण कस्सप का दृष्टिकोण प्रकृतिवादी है. उसके कहने का आशय है कि इस संसार से बाहर, परामानवीय या अतिमानवीय जैसा कुछ नहीं है. देह जिन तत्वों से बनती है, मृत्यु पश्चात पुनः उन्हीं में समाहित हो जाती है. भौतिक जगत में न कुछ घटता है, न ही बढ़ता है. कमोबेश गीता का भी यही दृष्टिकोण है. अंतर बस इतना है कि गीता मनुष्य और प्रकृति के मध्य अतिमानवीय सत्ता यानी परमात्मा को ले आती है. यह सब मनुष्य की अस्मिता मान-सम्मान और गरिमा के विरुद्ध होता है. असुरों का वैदिक परंपरा से विरोध ऋषियों द्वारा यज्ञादि के माध्यम से ज्ञान के कर्मकांडीकरण के प्रति भी था. हमारी समस्या है कि हम वैदिक परंपरा की धुर-विरोधी, उसकी समकालीन भौतिकवादी विचारधाराओं से ज्यादा परिचित नहीं हैं. ब्राह्मण ग्रंथों में तो उनकी पूरी तरह उपेक्षा की गई है. कुछ सूत्र जैन एवं बौद्ध ग्रंथों से प्राप्त होते हैं. ऐसे में सत्य जानने के लिए एकमात्र देरिदा की पद्धति कामयाबी की ओर ले जा सकती है. वह है उपलब्ध ज्ञान पर संदेह करते हुए उसकी इतनी गहन अन्वीक्षा करना कि उसका वर्तमान स्वरूप विखंडित हो जाए. यह दही मथकर मक्खन निकालने जैसा श्रम-साध्य कर्म है.

बहुजन साहित्य की रूपरेखा

अभी तक इस आलेख में जो आया, वह महज पृष्ठभूमि है. बहुजन साहित्य की अवधारणा इससे स्पष्ट नहीं होती. कुछ स्थितियां हैं जो इसकी आवश्यकता को चिन्हित करती करती हैं. वैसे ‘बहुजन’ शब्द हमारे लिए नया नहीं है. पहली बार यह बौद्ध साहित्य में नजर आता है. श्रमण-संस्कृति को बढ़ावा देते हुए बुद्ध भिक्षुओं को बहुजन के सुख और जगति-कल्याण के लिए निरंतर भ्रमणशील रहने की शिक्षा देते हैं. उनके यहां जाति, वर्ण आधारित ऊंच-नीच का विचार नहीं है. यज्ञादि के नाम पर हिंसा और आडंबर भी नहीं हैं. इसलिए सीधा-सादा जीवन जीने के इच्छुक, असमानता के शिकार लोग उनकी ओर आकर्षित होते हैं. सामाजिक निषेधों में कमी आने से आर्थिक विकास को गति मिलती है. फलस्वरूप बौद्ध दर्शन समकालीन ब्राह्मणवादी दर्शनों, जो मुख्यतः ब्राह्मणों द्वारा ब्राह्मणों के निमित्त रचे जा रहे थे—को चुनौती देने में कामयाब होता है. अपनी व्यावहारिक सोच के चलते उसे भारत के साथ-साथ विदेशों में भी प्रतिष्ठा प्राप्त होती है. फिर भी कुछ प्रश्न अनायास सामने आ जाते हैं. सर्वहित की कामना साहित्य का मूल तत्व तथा उसका परम-उद्देश्य मानी जाती है. ऐसे में ‘सर्वहित’ को ‘बहुजन हित’ अथवा ‘अधिसंख्यक के हित’ तक सीमित कर देना क्या साहित्यत्व का अवमूल्यन नहीं है? कुछ विद्वान इसी आधार पर बहुजन साहित्य को संदेह की दृष्टि से देखते हैं. उनमें अधिकांश वे हैं जो दलित साहित्य, नारीवादी साहित्य जैसी अस्मितावादी साहित्य-धाराओं को अनावश्यक ठहराते हैं. उनका तर्क है कि इससे जातिवाद बढ़ेगा(मानो अभी जातिवाद कम हो और उसे बनाने-बचाने के लिए केवल दलित और बहुजन जिम्मेदार हों). यह पहली बार भी नहीं हो रहा है. दमित अस्मिताएं जब अपना संघर्ष आरंभ करती हैं तो पहला औजार साहित्य को ही बनाती हैं. यही कारण है कि धर्म, भाषा, क्षेत्र, लिंग, समुदाय आदि के आधार पर साहित्य की नई धाराएं सदैव उभरती रही हैं. ये सब साहित्य के विराट कुनबे के सदस्य जैसी हैं. उनके माध्यम से संबंधित समाज की गतिशीलता, उसकी आकांक्षाओं तथा अंतर्द्वंद्वों को समझा जा सकता है. वे सामाजिक परिवर्तन की दिषा को सुनिश्चित करने में सहभागी बनती हैं.

प्रकारांतर में बहुजन साहित्यकार का काम उस अनलिखे की खोज करना है, जिसे उस समय के कलमकारों ने या तो छोड़ दिया है, अथवा उसे तोड़-मरोड़कर पेश करते आए हैं. यह काम आसान नहीं है. अभी तक यह छबि बनाई गई कि ब्राह्मणों द्वारा समय-समय रचा गया साहित्य ही मुख्यधारा का साहित्य है. इसमें बौद्ध और जैन दर्शन की उपस्थिति अपवाद कही जा सकती है. यह धारणा साहित्य की आरंभिक कसौटी पर ही खरी नहीं उतरती. साहित्य-सृजन मात्र लेखकीय सृजन नहीं है. उसका दूसरा चरण पाठक-श्रोता के मानस में संपन्न होता है. बिना पाठकीय अनुक्रिया के किसी भी विचार के साहित्यकरण की प्रक्रिया पूरी नहीं होती. अतः ऐसा लेखन जिसका पाठन-श्रवण समाज के बड़े हिस्से के लिए प्रतिबंधित हो, प्रतिबंध के लंघन पर कठोरतम दंड का शास्त्रीय प्रावधान हो—उसकी कृति चाहे जितनी महत्त्वपूर्ण क्यों न हो, अपने लेखक अथवा समुदाय की उत्कृष्ट रचना तो हो सकती है—साहित्य नहीं बन सकती. बहुजन साहित्य वही रच सकता है, जिसकी न्याय और लोकतंत्र में अटूट आस्था हो. जो दृश्यमान से संतोष न करके, उसके पीछे निहित सत्य को परखने का हौसला रखता हो. दूसरे शब्दों में बहुजन साहित्य के लिए बहुजन दृष्टि का साथ अनिवार्य है. यह बहुजन दृष्टि क्या है? बहुजन दृष्टि वह है जो जीवन-जगत में विश्वास रखे. जिसे मिथों से अधिक भरोसा इंसानियत में हो. जो समतावादी हो और श्रम का सम्मान करती हो. जिसे मानव-मात्र की स्वतंत्रता की कद्र हो. आवश्यकता पड़ने पर जो संघर्ष का हौसला रखती हो. जो विश्वास-मूलक न होकर संदेह-मूलक हो. यथास्थितिवादी न होकर अन्वेषणात्मक हो. ऐसी खोजक दृष्टि ही उपलब्ध वाङ्मय से काम की चीजें निकाल सकती है. वह निषेधों की नहीं जीवन के सम्मिलित उत्सव की दृष्टि है.

यह बात बार-बार दोहराई जा चुकी है कि बहुजन साहित्य बहुसंख्यक का साहित्य नहीं है. वह जाति-वर्ग केंद्रित साहित्य भी नहीं है. न उसका संबंध बहुसंख्यक अथवा अल्पसंख्यक धर्म से है. बहुजन साहित्य विराट लोकतांत्रिक चेतना का साहित्य है. इसलिए समाज को बांटने वाले धर्म और जाति केंद्रित प्रतीकों, मिथों से उसकी स्वाभाविक दूरी बनी रहती है. उदाहरण के लिए कृष्ण जिस यदुकुल से संबंधित बताए जाते हैं, वह जातीयता की दृष्टि से बहुजन समाज का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है. बावजूद इसके यदुवंशी कृष्ण की भगवत्ता बहुजन साहित्यकार के लिए मिथ से ज्यादा महत्त्व नहीं रखती. न ही कृष्ण द्वारा तथाकथित धर्मयुद्ध का नेतृत्व जिसमें अठारह अक्षौहिणी सेनाएं(500000 सैनिक, 130000 अश्व सहित रथ, इतने ही हाथी तथा 390000 घोड़े) और बड़े-बड़े महारथी खेत रहते हैं—उसकी प्रेरणा बन सकता है. फिर भी महाभारत जैसे ग्रंथ से बहुजन दृष्टि अपने लिए बहुत कुछ खोज सकती है. जैसे कि धर्मयुद्ध के नायक और कृष्ण के परमप्रिय होते हुए भी पांचों पांडवों को कष्टकारी नर्क-भोग करना पड़ा; जबकि कौरव कथित रूप से अधर्मी, पापी, दुराचारी होने के बावजूद तुरंत स्वर्ग के अधिकारी मान लिए गए. आखिर क्यों? बहुजन दृष्टि से कृष्ण की वह अनुभूति भी महत्त्वपूर्ण है जिसे महाभारत के युद्ध का नेतृत्व करते हुए वे स्वयं नहीं समझ पाते. उस समय समझते हैं जब युद्धाग्नि में उनका अपना यादव-कुल दहकने लगता है. उसके योद्धा-महारथी एक-दूसरे की जान लेने को आमने-सामने डटे होते हैं. कृष्ण उन्हें समझाने की कोशिश करते हैं, परंतु कोई उनके कहे पर ध्यान नहीं देता. उस समय महाभारतकार द्वारा यह उल्लेख प्रकारांतर में कृष्ण की हताशा, नायक के रूप में उनकी विफलता, युद्ध की निस्सारता तथा मनुष्य की सर्वाेच्चता को दर्शाता है—‘सुनो! मैं अपने हाथ उठाकर एक रहस्य की बात तुम्हें बताता हूं. यह कि इस संसार में मनुष्य से श्रेष्ठतर कुछ भी नहीं है.’7 ‘मनुष्य श्रेष्ठतम है’—देर से ही सही कृष्ण का यह आत्मबोध उनकी भगवत्ता को संदेह के दायरे में ले आता है.

गांधी ने ‘रामराज्य’ की परिकल्पना को आदर्श माना है. गीता के दर्शन में उन्हें विश्वास था. ये दोनों ही वर्ण-व्यवस्था का समर्थन करते हैं. बहुजन साहित्यकार ने लिए न तो गीता में कुछ प्रेरणास्पद है, न रामराज्य की परिकल्पना उसके लिए आदर्श हो सकती है. इससे ब्राह्मण-संस्कृति तथा उसके पोषकों के चरित्र को आसानी से समझा जा सकता है. स्वतंत्र बहुजन दृष्टि रामायण जैसे ठेठ ब्राह्मणवादी ग्रंथ से भी प्रेरणा ले सकती है. राम की पत्नी के रूप में सीता अभिजन समाज का हिस्सा है. वह राम के हर उस कार्य में सहधर्मिणी है जिसे वह साम्राज्यवादी लिप्सा अथवा धर्म-संस्थापना के नाम पर करता है. लेकिन सीता के अपने जीवन की त्रासदी जिसे एक औरत के नाते उसे सहना पड़ता है, बहुजन साहित्यकार को संवेदाकुल कर सकती है. रामायण के ही एक उपेक्षित-से पात्र शंबूक के जीवन की त्रासदी बहुजन साहित्यकार के अपने जीवन की त्रासदी भी है. शंबूक परम जिज्ञासु है. वह वेदों का अध्ययन करना चाहता है. तत्कालीन पंडितों से यह सहन नहीं होता. वे राम को जाकर भड़काते हैं. वर्णाश्रम धर्म का अंधानुयायी राम शंबूक की हत्या कर देता है. यही रामायण का शंबूक प्रसंग है. शूद्र द्वारा वेदाध्ययन को लेकर ब्राह्मण ग्रंथों में अलग-अलग विचार हैं. अधिकांश में उनके लिए वेद पढ़ना-सुनना निषिद्ध माना गया है. लेकिन यह नियम शाश्वत नहीं था. यदि कोई शूद्र वेदादि ग्रंथों का अध्ययन-अध्यापन, ब्राह्मणों के शीर्षत्व का सम्मान तथा उस संस्कृति के प्रति निष्ठावान रहते हुए करना चाहे, तो उन्हें उससे कोई आपत्ति न थी. ऐसा व्यक्ति विद्वान होने के साथ-साथ असाधारण प्रतिभाशाली भी हो तो बतौर पारितोषिक उसका येन-केन-प्रकारेण ब्राह्मणीकरण कर दिया जाता था.

खोजने पर अनेक उदाहरण मिल जाएंगे. दासी पुत्र ऐतरेय महीदास तथा वेश्या जाबाला का बेटा सत्यकाम जाबाल दोनों शंबूक की भांति शूद्र थे. लेकिन महीदास और सत्यकाम जाबाल दोनों का शुमार वैदिक मनीषियों में किया गया. आखिर शंबूक के साथ अन्याय क्यों हुआ? वेदाध्ययन की मामूली-सी चाहत के लिए उसे क्यों मृत्युदंड मिला? अधिकांश विद्वानों का विचार है कि वैदिक काल में वर्ण-व्यवस्था उतनी कठोर नहीं थी. महाकाव्य युग में वह जाति के अंतर्गत रूढ़ होने लगी थी. लेकिन महीदास और शंबूक के समय में बहुत अधिक अंतर नहीं है. फिर रामायण में ही मतंग और कर्दम जैसे अब्राह्मण ऋषि हैं, जिनके ऋषित्व से तत्कालीन पंडितों को कोई आपत्ति न थी. अपनी-अपनी जन्मकथा के अनुसार तो वशिष्ट और अगस्त्य भी शूद्र हैं. फिर ऐसा क्या था कि सत्यकाम जाबाल, महीदास, वशिष्ट, अगस्त्य आदि को ब्राह्मण सिद्ध करने के लिए तो आख्यान गढ़े गए, जबकि शंबूक को मृत्यु दंड देकर रास्ते से तत्काल हटा दिया गया. इसका एकमात्र यही कारण हो सकता है कि महीदास और सत्यकाम जाबाल वैदिक संस्कृति के प्रति नतमस्तक थे. उसकी सर्वोच्चता को स्वीकारते थे. ब्राह्मणों के शिखरत्व से उन्हें कोई शिकायत न थी. इस कारण दोनों को न केवल वेदाध्ययन के योग्य माना गया, अपितु वैदिक ऋषियों में, ब्राह्मणों में शामिल भी कर लिया गया. शंबूक-प्रसंग और मनुस्मृति की व्यवस्था बताती है कि ज्ञान के क्षेत्र में गैर-ब्राह्मण की ओर से चुनौती ब्राह्मणों के लिए असह् थी. शंबूक की दृष्टि अवश्य ही आलोचकीय रही होगी. ब्राह्मण तथा उनकी संस्कृति की सर्वाेच्चता को स्वीकारे बिना वह वेदादि ग्रंथों को तर्क के आधार पर परखना चाहता था. उसे वही दंड मिला जो उस सभ्यता में असुरों के लिए निर्धारित था. छल से, बल से समानांतर संस्कृति के अनुयायियों तथा उनकी ज्ञान-परंपरा को नष्ट कर देना, ताकि आर्य-संस्कृति को कोई चुनौती न रहे. प्रकारांतर में उसकी सर्वश्रेष्ठता का मिथ स्थापित हो सके.

इस बात के अनेक उदाहरण हैं कि वैदिक ऋषियों को राष्ट्रद्रोह या राज्यद्रोह से आपत्ति न थी. परंतु संस्कृति-द्रोह उन्हें स्वीकार न था. कदाचित इसलिए कि राजनीतिक जय-पराजय के लिए वे सीधे जिम्मेदार न थे. उसके लिए क्षत्रियों, जिन्हें वर्ण-व्यवस्था में दूसरे स्तर पर रखा गया था—को जिम्मेदार ठहराया जा सकता था. खुद को परम-पिता के मुख से उत्पन्न बताने वाले ब्राह्मणों के लिए, बौद्धिक पराजय विषेषरूप से अब्राह्मण द्वारा—बड़ा ही हेठी वाला काम था. हालांकि बाद में मूर्ख ब्राह्मण को लेकर किस्से भी गढ़े गए. फिर भी जहां बौद्धिकता की कसौटी हो, वहां ब्राह्मणों के लिए यह प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता था. शंबूक को जो दंड मिला उसे बाद में मनु के विधान में संरक्षित कर लिया गया. यह भी कह सकते हैं कि शंबूक को वही दंड मिला, जो मनु के विधान में सुरक्षित किया गया था. बौद्धिकता के क्षेत्र में किसी प्रकार की प्रतिद्विंद्वता न रहे. इसलिए लोकायत और चार्वाक परंपरा के ग्रंथों को सांस्कृतिक विजय के बाद नष्ट कर दिया. चूंकि आजीवक परंपरा के अनुयायी शिल्पकार और मेहनतकश वर्ग के लोग थे, समाज को उनकी आवश्यकता थी—इसलिए ब्राह्मण संस्कृति के अधिपत्य में भी वे अपनी संस्कृति को किसी न किसी रूप में बचाए रहे. उसके अवशेष देश-भर में मौजूद मैकासुर(महिषासुर) की पूजा के ठिकानों के अवशेष के रूप में, गांव-बाहर बने मातृ-देवियों के मठों तथा संत-परंपरा आज भी जीवित हैं. उस परंपरा का कोई ग्रंथ आज मौजूद नहीं है. किंतु जैन साहित्य में आजीवकों के एकाधिक ग्रंथों की मौजूदगी के संकेत मिलते हैं. तीसरी-चैथी शताब्दी की तमिल कृति ‘नीलकेसी’ में आजीवक संप्रदाय के एक ग्रंथ ‘नवायन’(नौ प्रकाश पुंज) का उल्लेख है, जिसे मक्खलि गोशाल और पूरण कस्सप के आजीवक संप्रदाय का प्रतिनिधि ग्रंथ बताया गया है. दसवीं शताब्दी तक वह ग्रंथ अथवा उसकी स्मृतियां मौजूद थीं. इसकी पुष्टि लगभग इसी दौरान लिखे गए बौद्ध ग्रंथ ‘मणिमेखलाई’ से भी होती है. सातवीं शताब्दी में रचित ‘हर्षचरित’ में भी आजीवकों की ससम्मान उपस्थिति दर्ज की गई है. दसवीं शताब्दी के बाद देश पर मुस्लिमों के आक्रमण होने लगे थे. परिणाम यह हुआ कि जातीय उत्पीड़न से त्रस्त लोग धर्मांतरण द्वारा इस्लाम की राह पकड़ने लगे. कदाचित उसी के प्रभाव में आजीवक ग्रंथ तथा उसकी स्मृति कहीं बिला गई.

अभिजन बनाम जनसंस्कृति

शंबूक को उसकी जाति या वर्ण के कारण दंडित किया गया. बहुजन साहित्यकार के खुद के भी ऐसे अनुभव हो सकते हैं. बावजूद इसके जाति-आधारित लेखन भले ही वह समाज के बहुसंख्यक वर्ग, जिसकी संख्या तीन-चौथाई से भी अधिक है, के लिए हो—बहुजन साहित्यकार के लिए आदर्श नहीं हो सकता. इससे उसके सामने प्रतिक्रियावादी कहकर नकारे जाने का खतरा सदैव बना रहेगा. फिर बहुजन साहित्य का आदर्श क्या हो? बहुजन साहित्यकार की वैचारिकी आधुनिकताबोध से संपन्न होगी. आधुनिकता केवल दिखावे की नहीं, मूल्यों की भी. उसकी नींव न्याय, समानता, स्वतंत्रता, सामंजस्य, सहकार और लोकतंत्र पर निर्भर होगी. वह संत-कवियों से भी आवश्यकतानुसार प्रेरणा ले सकता है. संत रविदास, कबीर, तुकाराम आदि ने ऐसे समाज का सपना देखा था, जिसमें सभी बराबर है. ऊंच-नीच, भेद-भाव का नामो-निशां नहीं है. जहां न राजा है न राज्य. न अपराधी है न किसी प्रकार का दंड-विधान. सब अपने-अपने काम को समर्पित, मिल-जुलकर रहते हैं. आदर्श राज्य की यह परिकल्पना संत रविदास के ‘बे-गमपुरा’, कबीर की ‘अमरपुरी’ और ‘प्रेमनगरी’ तथा संत तुकाराम के ‘पंडरपुर’ में सुरक्षित है. इसी तरह की परिकल्पना करते हुए थामस मूर ने करीब चार शताब्दी पहले ‘यूटोपिया’ की रचना की थी. व्यग्यांत्मक शैली में लिखी गई वह कृति आगे चलकर समाजवादी आंदोलन की मुख्य प्रेरणा बनी. ऐसा ही आदर्शलोक बहुजन साहित्य का अभीष्ट है. वही उसके सृजन की प्रेरणा बन सकता है.

ब्राह्मण अभिजन संस्कृति के पालक-पोषक रहे हैं. जबकि बहुजन संस्कृति में अभिजात्य मानसिकता के लिए कोई स्थान नहीं है. अभिजन संस्कृति जिसका दूसरा नाम ब्राह्मण संस्कृति है, न्यूनतम लोगों के हाथों में अधिकतम अधिकार सौंपने को न्यायपूर्ण मानती है. वह जनसाधारण को निरंतर यह विश्वास दिलाती रहती है कि शासक अथवा शासित होना मनुष्य का जन्मजात गुण है. तदनुसार जो शासक वर्ग से नहीं है, शासित होना उसकी नियति है. अतएव उसे चाहिए कि बिना कोई प्रश्न उठाए शासकवर्ग के साथ अधिकतम सहयोग करे. यह विभाजन प्रायः सभी समाजों में देखा जा सकता है. शासकीय मनोवृत्ति आरंभ से ही भाषा को अपने स्वार्थानुकूल ढालने लगती है. ‘शूद्र’ को ‘क्षुद्र’ का अपभ्रंश बताना जिसके बारे में हम ऊपर चुके हैं—उनकी इसी मानसिकता को दर्शाता है. यह पूर्वाग्रहों को दूसरों पर लाद देने जैसा था. वरना जो वर्ग मेहनती और हुनरमंद है, अपने श्रम-कौशल से जीविकोपार्जन करता है तथा किसी भी राष्ट्र-समाज की अर्थव्यवस्था की धुरी कहा जाता है—वह क्षुद्र भला कैसे हो सकता है! शिल्पकार के रूप में जिसने तरह-तरह की वस्तुओं का निर्माण किया, बड़े-बड़े राजप्रासाद, किले, महल, सुंदर अटारियां बनाईं. युद्ध में शत्रु सेना के छक्के छुड़ाने वाले हथियारों को ढाला. सुंदर कलाकृतियों, रेशमी वस्त्रों की रचना की, उसे भला कौन क्षुद्र कह सकता है! मगर ऐसा होता आया है. न केवल संस्कृत तथा हिंदी में, बल्कि दुनिया के प्रायः सभी सभ्य समाजों में. उन समाजों में और भी विकृत रूप से जो खुद को सभ्यता के षिखर पर आसीन मानते हैं.

अंग्रेजी में ‘अभिजन’ के लिए ‘इलीट’ और ‘अस्टिोक्रेट’ जैसे गरिमामय शब्द हैं, तो उसके विलोम के रूप में ‘बेड’(बुरा), ‘आर्डिनरी’(साधारण) जैसे शब्द प्राप्त होते हैं. बहुजन के समानांतर दिखते अंग्रेजी शब्द ‘सबाल्टन’ को ‘जनसाधारण’ अथवा ‘सर्वहारा’ के पर्याय के रूप में देखा जाता है. उसका अर्थ ‘निम्न’ अथवा ‘मातहत’ है, जिसे सम्मानित नहीं कहा जा सकता. न ‘बहुजन’ शब्द से उसका कोई अर्थ-साम्य दिखता है. यह भाषा की कमी नहीं है. प्रत्येक भाषा अपने आप में समर्थ होती है. भाषा तब विपन्न होती है जब उसे गढ़ने वाले शब्दों को मनमाने अर्थ देने लगते हैं. पुराणादि प्राचीन ग्रंथों में यही हुआ है. दरअसल भाषाओं, खासकर साहित्य की भाषा को गढ़ने में मुख्य योगदान अभिजन समूहों का होता है. वे वही करते हैं जिससे उनका शिखरत्व बना रहे. उनकी सत्ता को कम से कम चुनौतियां पेश हों. राजनीतिक परिवर्तन की अपेक्षा सांस्कृतिक परिवर्तन की गति बहुत धीमी होती है. इसलिए चतुर शासक वर्ग सत्ता संभालने के साथ ही अधीनस्थ समूहों को अपनी संस्कृति के अनुरूप ढालने में जुट जाता है. शुरुआत भाषा-साहित्य से की जाती है. क्रीत बुद्धिजीवी उसकी मदद करते हैं. विद्रोह की संभावनाओं को न्यूनतम रखने के लिए वह जनसमूह को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट देता है. ऐसी व्यवस्था करता है जिसमें उनके हित परस्पर टकराते रहें. धर्म, संस्कृति और बाजार उसके मददगार बनते हैं. उन सबकी मदद से वह इतना शक्तिशाली हो जाता है कि संख्या में अत्यल्प होने के बावजूद वह बहुसंख्यक पर शासन गांठता रहता है. भारत में यही हुआ है. इसी कारण साहित्य और राजनीति में बहुजन समूहों की अनुपातिक हिस्सेदारी बहुत कम है. इसलिए बहुजन साहित्य समाज के बड़े हिस्से की अस्मिता का सवाल भी है. उसके अभाव में ‘बहुजन-कल्याण’ के नाम पर गठित राजनीतिक दल और संस्थाएं, बहुजन की राजनीति का दावा करते-करते सर्वजन की पैरोकार बन जाती हैं. पुनश्च: भटकते-भटकते अल्पजन की होकर रह जाती हैं.

मुख्यधारा के साहित्य का मूल स्वर कलावादी रहा है. प्रेमचंद आदि कुछ साहित्यकारों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश ‘कला कला के लिए’ की सैद्धांतिकी तक सीमित रहे हैं. बहुजन साहित्य का सौंदर्य शास्त्र तथाकथित मुख्यधारा के सौंदर्यशास्त्र से अलग होगा. वह ‘कला समाज के लिए’ की सैद्धांतिकी पर अडिग रहेगा. उसकी कसौटी सामाजिक न्याय की होगी. इस संबंध में दलित साहित्य से उसकी एकता रहेगी. यह स्वाभाविक भी है. क्योंकि दोनों के सपने और संघर्ष समान रहे हैं. दोनों ने जाति-आधारित उत्पीड़न को झेला है. कुछ विद्वानों को इसपर आपत्ति हो सकती है. वे कह सकते हैं कि दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र पहले से ही विकसित है. उनके मन में यह कसक भी सकती है कि दलितों पर अत्याचार के समय कुछ पिछड़ी जातियां सवर्णों का साथ देती आई हैं. अपनी चाल चलने के लिए ब्राह्मणवाद सदैव दूसरों के कंधे इस्तेमाल करता आया है. जाति और धर्म के नाम पर बहुसंख्यक वर्ग में फूट डालकर अपना उल्लू सीधा करते रहना उसकी पुरानी नीति है. इसलिए ऐसे आरोपों में किंचित सचाई हो सकती है. लेकिन यह जानते हुए कि बहुजन अपेक्षाकृत बड़ा समूह है और लोकतंत्र में संख्या-बल महत्त्वपूर्ण होता है—यह दलितों के लिए भी हितकर होगा कि जातीय उत्पीड़न का समान रूप से शिकार रहे वर्गों के साथ साझा कर बड़ी राजनीतिक शक्ति का निर्माण करें, ताकि ब्राह्मणवाद के विरुद्ध निर्णायक युद्ध लड़ा जा सके. कुल मिलाकर बहुजन साहित्य का सौंदर्यशास्त्र दलित साहित्य के सौंदर्यशास्त्र की नींव पर विकसित होगा और कदाचित उससे ऊपर की चीज होगा. उसमें धर्म व्यक्ति की निजी आस्था तक सीमित होगा. बहुजन साहित्य जाति अथवा धर्म के आधार पर किसी भी प्रकार के संगठन या संस्कृतिकरण का विरोध करेगा.

पिछले तीन हजार वर्षों में भारतीय समाज जितना नुकसान जाति-व्यवस्था ने किया है, उतना किसी अन्य संस्था ने नहीं किया. इसलिए जाति-मुक्त समाज की स्थापना बहुजन साहित्य और साहित्यकार का पहला उद्देश्य होना चाहिए. धर्म उसमें निजी आस्था के रूप में बचा रह सकता है. दूसरे शब्दों में बहुजन साहित्य निरा साहित्यिक आयोजन नहीं है. न ही वह केवल समाजार्थिक असमानता के प्रतिकार का स्वर है. अपने समग्र रूप में वह वर्चस्वकारी संस्कृति के विरुद्ध जनसाधारण का, उन लोगों की ओर से जो धर्म, संस्कृति, जातीयता आदि के आधार पर किसी भी प्रकार के शोषण का शिकार हैं—आजादी और समानता के लिए किया गया शंखनाद है.

© ओमप्रकाश कश्यप

 

  1. उरुं यज्ञाय चक्रथुर उलोकं जनयन्ता सूर्यम उषासम अग्निम |
    दासस्य चिद वर्षशिप्रस्य माया जघ्नथुर नरा पर्तनाज्येषु ||
    इन्द्राविष्णू दरंहिताः शम्बरस्य नव पुरो नवतिं च शनथिष्टम |
    शतं वर्चिनः सहस्रं च साकं हथो अप्रत्य असुरस्य वीरान || ऋग्वेद 7/99/4-5
  2. शतं वा यस्य दश साकमाद्य एकस्य शरुष्टौ यद धचोदमाविथ |
    अरज्जौ दस्यून समुनब दभीतये सुप्राव्योभवः स. उ. || ऋग्वेद 2/13/9
  3. अस्वापयद दभीतये सहस्रा तरिंशतं हथैः |
    दासानाम इन्द्रो मायया || ऋग्वेद 4/30/21
  4. आर्थर मैक्डोनल, वैदिक माइथोलाजी’, पृष्ठ 157

5 ‘शूद्रों का इतिहास’, अनुवाद विजयनाथ ठाकुर, भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, पृष्ठ-4.

  1. नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।। गीता 2/23
  2. ‘गुह्यं ब्रह्म तदिदं तो ब्रवीमि. ना मानुषाच्छ्रेष्ठतरं हि किंचितः’—महाभारत, शांतिपर्व, 288/20

बहुजन राजनीति और अस्मिता

सामान्य

करीब ढाई साल पहले उत्तरप्रदेश में बसपा की जीत ने दलितों समेत कई लोगों को यह भ्रम बनाए रखने का अवसर दिया था कि ब्राह्मणों तथा अन्य सवर्णों को मायावती का नेतृत्व स्वीकार है. वे मान चुके थे कि करीब सवा सौ साल पहले उत्पीड़ित समुदाय के सम्मान एवं समानता के लिए जो आंदोलन ज्योतिबा फुले ने प्रारंभ किया था, जिसे बाद में डा॓. आंबेडकर, पेरियार जैसे महामानवों ने आगे बढ़ाने तथा कामयाबी तक पहुंचाने कार्य किया; और कांशीराम ने जिसे राजनीतिक शक्ति रूप में बदलने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी, वह मुलायम की हार तथा मायावती की एकक्षत्र विजय के साथ अपनी कामयाबी के शिखर तक जा पहुंचा है. दलित-ब्राह्मण गठजोड़ द्वारा सत्ता में मिली हिस्सेदारी से ब्राह्मण भी इस बात से प्रसन्न हो रहे थे कि येन-केन-प्रकारेण सत्ता की चाबी उन्हीं के हाथों में है. उनके लिए निर्णायक स्थिति में बने रहना, अपने सम्मान को बचाए रखना ही आपदधर्म है, जिसकी रक्षा उनके पूर्वज विश्वामित्र ने व्याध के घर मांस खाकर भी की थी. कुछ लोग मुलायम सिंह और उनके यादववाद की हार को मायावती के निजी पराक्रम की जीत मानकर प्रसन्न थे. जबकि कुछ इसे नए युग की शुरुआत के रूप में देख रहे थे. कुछ अनमन्यस्क भाव से परिवर्तनों के साक्षी बने थे.
कम ही सही परंतु कुछ लोग ऐसे भी थे, जो जानते थे कि दलित-ब्राह्मण राजनीति वास्तव में एक अतिअवसरवादी गठजोड़ है. एक ऐसी बेमेल खिचड़ी है, जिसके घटकों को कुछ दिन बाद ही अलग-अलग दिखने लगना है. उनके निहित स्वार्थ उन्हें लंबे समय तक एक रहने ही नहीं देंगे. वे लोग इसे दलित राजनीति के भटकाव और परिवर्तनकारी शक्तियों के एक वर्ग के पराभव के रूप में देख रहे थे. वे समझते थे कि इस जीत में दलितों के हाथ लगना कम, खिसकना कहीं ज्यादा है. वह इसलिए कि बसपा की राजनीति सामाजिक न्याय की राह में एक लंबे और प्रतिबद्ध आंदोलन का सुफल रही थी. ऐसे लोगों का विश्वास था कि दलित-ब्राह्मण गठजोड़ अस्वाभाविक है, जो प्रकारांतर में उत्पीड़ितों, वंचितों के स्वाभिमान के लिए चलाए जा रहे अभियान के लिए वाटरलू सिद्ध होगा. ब्राह्मणों के कंधे पर सवार होकर मायावती की ताजपोशी अंततः दलितों को ही भारी पड़ने वाली है. यह मानकर वे दुःखी और भीतर ही भीतर आहत हो रहे थे.
यह बात अलग है कि उनकी पीड़ा के बारे में जानने-सुनने की किसी को न तो फुर्सत थी, न अवसर. मीडिया तो षड्यंत्रकारी ढंग से उस जीत को युगपरिवर्तनकारी घटना के रूप में बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा था. दलित मतों के सहारे केवल कुर्सी की राजनीति करने वाली मायावती अपनी जीत पर गद्गद थीं. लगभग दलितों जितने ही जातीय उत्पीड़न का शिकार रहे अतिपिछड़े वर्ग की अपेक्षा ब्राह्मणों को दलितों का स्वभाविक सहयोगी मानने वाले चंद्रभान प्रसाद जैसे बसपा के सलाहकार और तथाकथित दलित चिंतक भी अपने विचारों को साकार होते देख प्रसन्न थे. गठजोड़ के स्थायित्व को मन में भले ही हजार शंकाएं सही, मगर उस समय वे अपनी खुशी में जरा-भी कमी आने देने या संभलने के लिए तैयार नहीं थे. अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि लंबे संघर्ष में तपकर राजनीति में अपना स्थान सुरक्षित करने वाली मायावती को इन बातों का अंदेशा ही न हो. हां चुप्पी साधे रहना उनकी तात्कालिक विवशता, या फिर सत्ता के लिए किए गए समझौते का परिणाम अवश्य हो सकती है. वे जरूर समझती होंगी कि किसी ब्राह्मण के लिए दलितों के साथ राजनीतिक गठबंधन में आना जितना आसान है, उसका अपने ब्राह्मणत्व से मुक्त होना उतना ही कठिन है. शपथग्रहण के दिन मुख्यमंत्री और पार्टी अध्यक्ष मायावती के बजाए पीछे बैठे सतीशचंद्र मिश्र के पांव छूने वाले ब्राह्मण विधायकों ने साफ कर दिया था कि वे अब भी ब्राह्मणत्व की मर्यादा में हैं. दलित मायावती के नेतृत्व को स्वीकारना न तो उनका कायाकल्प था, न इस बात का प्रतीक कि उनका ब्राह्मणत्व नख-दंत विहीन हो चुका है. मायावती यदि राजनीतिक सत्ता पर काबिज होकर दलित सम्मान की रक्षा करना चाहती हैं, तो उनका लक्ष्य भी राजनीति के जरिए अपने वर्गीय हितों को पूरा करना है. उसी को अब तक साधते आए हैं, वही आगे साधते रहेंगे. यह उन्हांेने पिछले लोकसभा चुनावों में दिखा भी दिया, जब ब्राह्मण मतों का बड़ा हिस्सा कांग्रेस की ओर खिसकता हुआ नजर आया.
ध्यातव्य है कि बसपा के बैनर तले जीतकर आए अधिकांश विधायक राजनीति के लिए अपेक्षाकृत नए और अनजाने चेहरे हैं. जिनके लिए दूसरी किसी पार्टी से टिकट पर जीतकर आना कठिन था. बसपा के प्रतिबद्ध दलित वोटों के सहारे उन्होंने चुनाव की वैतरिणी पार की है. इसके अलावा उन्हें मुलायम सिंह यादव से खिन्न अतिपिछड़े वर्ग का भी वोट भी मिला, जिससे जीत उनकी झोली में आ गिरी. विधान सभा चुनावों से पहले समाज की अतिपिछड़ी जातियां मुलायम सिंह यादव के साथ थीं. समाजवादी पार्टी से उनके मोहभंग के भी पर्याप्त कारण रहे. स्मरणीय है कि 2005 में अतिपिछड़े वर्ग को लुभाने के लिए मुलायम सिंह यादव ने कुछ अतिपिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों की सूची में सम्मिलित करने का नाटक किया था. जिसके अंतर्गत प्रदेश में इन जातियों के लिए अनुसूचित जाति के प्रमाणपत्र भी बनने लगे थे. हालांकि इसके पीछे भी उनकी चाल थी, जिसके द्वारा वे इन जातियों को अन्य पिछड़ा वर्ग से निकालकर ओबीसी के सताइस प्रतिशत आरक्षण को यादव जैसी पिछड़े वर्ग की मजबूत जातियों के लिए छोड़ देना चाहते थे. दूसरी तरफ अनुसूचित जातियों की संख्या बढ़ाकर वे अपनी राजनीतिक प्रतिद्विंद्वी मायावती को अपनी ताकत का एहसास कराना चाहते थे. वे यह भी जानते थे कि किसी जाति को अनुसूचित जाति वर्ग में सम्मिलित करना राज्य सरकार के अधिकार-क्षेत्र से बाहर है. मुलायम सिंह यादव के निर्णय को अदालत में चुनौती मिलनी ही थी. उस समय अपने निर्णय के पक्ष में केंद्र सरकार और अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखने के बजाय राज्य सरकार ने जिस तरह से लापरवाही दिखाई यह प्रभावित अतिपिछड़ी जातियों से छिपा नहीं था. जैसा कि अंदेशा था अदालत ने राज्य सरकार के निर्णय पर रोक लगा दी थी. अब मुलायम अतिपिछड़ी जातियों को दुबारा अपनी ओर खींचने के लिए मायावती सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने इन जातियों के उत्थान के लिए किए गए कार्य के ऊपर पानी फेर दिया है. उनकी बातों पर अतिपिछड़ावर्ग कितना विश्वास करता है, यह तो आनेवाला समय ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि आने वाले चुनावों में मायावती को यदि सत्ता बनाए रखने के लिऐ उन्हें अपने ‘स्वाभाविक साथियों’के मन में झांककर यह पता लगाना होगा कि क्या उनका सचमुच कायाकल्प हो चुका है! गत लोकसभा चुनावों के परिणाम उनका आवश्यक दिशा-निर्देश कर सकते हैं.
जहां तक अपना मानना है उससे पहले मुलायम सिंह यादव को सत्ता में लाने में मुसलमान, यादव, ठाकुर और अतिपिछड़ेवर्ग का हाथ रहा था. लेकिन सत्ता में आने के बाद उन्होंने अतिपिछड़ेवर्गों की उपेक्षा की. चुनावों को करीब जानकर आरक्षण के नाटक के बहाने उन्हें एक बार फिर बरगलाने का प्रयास किया, लेकिन तब तक यह वर्ग उनकी चुनावी चाल को समझ चुका था. मुलायम सिंह यादव से मोहभंग के पश्चात यही अतिपिछड़ा वर्ग चुनावों में मायावती के समर्थन में उतरा था. मायावती की सख्त प्रशासक की छवि और समाजवादी पार्टी के जंगलराज ने भी बसपा की ओर मतदाताओं को मोड़ा था. यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतों का स्वाभाविक अंतरण था. इसका लाभ ब्राह्मणों ने उठाया, जो पिछले कई वर्षों से राजनीतिक उपेक्षा का दंश झेलते आ रहे थे. अभिप्राय है कि सर्वजन राजनीति के नाम पर मायावती ने जो चमत्कार किया दलित और ब्राह्मण मतों के गठजोड़ का यह करिश्मा कांग्रेस आजादी के बाद से ही करती आ रही थी. अंतर सिर्फ यह रहा कि कांग्रेस का अध्यक्ष प्रायः नेहरू-गांधी परिवार का सदस्य रहा है, जबकि मायावती दलित हैं. किंतु राजनीति के लिए इस प्रकार की अवसरवादी घटनाएं असामान्य नहीं हैं.
ध्यातव्य है कि कांग्रेस के प्रदेश में पतन के बाद से ही लगभग दो दशकों से ब्राह्मणों को अपनी उपेक्षा खल रही थी. दूसरे उत्तरप्रदेश के पिछड़े वर्गों में उभरती राजनीतिक चेतना ने भाजपा समेत सभी दलों को अपनी राजनीति को पिछड़ा वर्ग पर केंद्रित कर दिया था. भाजपा स्वयं पिछड़े मुख्यमंत्री को आगे करके चुनाव लड़ रही थी. इन चुनावों में ब्राह्मणों की समझदारी यह रही कि उन्होंने उसी पार्टी को चुना, जिसमें समाजवादी पार्टी का विकल्प बनने की संभावना सर्वाधिक थी. यह अवसर देखकर राजनीति के समीकरण बिठाने की कला है, जिसमें मायावती ने अपनी परिपक्वता का परिचय दिया था. उत्साह में आकर इसको सोशल इंजीनियरिंग भी कहा सकता है. लेकिन यह मान लेना कि इस घटना से भारतीय समाज की जातिवादी संरचना कमजोर हुई या होगी अथवा यह कहना कि जातिवादी राजनीति का दौर समाप्त हो चुका है, जल्दबाजी होगी. अंत में इतना कहना ही काफी है कि मायावती की पिछली जीत केवल बहुजन राजनीति की जीत थी. इसको सर्वजन राजनीति कहना, एक छल-जैसा है. लोकसभा चुनावों में यह सच सामने आ चुका है. मायावती अगर अब भी न संभली जो आने वाले विधानसभा चुनावों में उन्हें और भी मात खानी पड़ सकती है. हालांकि वे इस बात पर प्रसन्न हो सकती हैं कि गत लोकसभा चुनावों में बसपा के मत-प्रतिशत में अपेक्षाकृत वृद्धि हुई थी. मगर वह वृद्धि मतदाताओं का भाजपा से मोहभंग होने का भी परिणाम थी. दूसरे वोट प्रतिशत बढ़ना सीट-संख्या बढ़ना नहीं होता.
मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है बसपा की तथाकथित सोशल इंजीनियरिंग मायावती द्वारा अपनी ही प्रतिबद्धताओं के साथ खिलवाड़ है. इसके लिए उन्हें उन नारों को भी बदलना पड़ा था, जिनके सहारे वह अब तक की सीढ़ियां चढ़कर आई थीं. हालांकि वे नारे विभेदकारी राजनीति के परिचायक थे. और समाज की जातीय विभाजन की घिनौनी राजनीति को बढ़ावा देने वाले थे. मगर इस बात से भी कोई इंकार नहीं किया जा सकता कि उन नारों के पीछे समाज के बड़े वर्ग का आक्रोश भी झलकता था जो सहस्राब्दियों से जातीय उत्पीड़न का दंश सहते आए थे.
चूंकि वापस लौटना एकाएक संभव नहीं है, इसलिए मायावती अब दलित नेताओं की मूर्तियां लगवाकर दलित राजनीति और उसके बहाने सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखना चाहती हैं. इसके लिए राज्य में भारी भरकम धनराशि खर्च करके पार्क बनवाए जा रहे हैं. जिनमें डाॅ. आंबेडकर, पेरियार, महात्मा बुद्ध, कांशीराम आदि की मूर्तियां लगवाई जा रही हैं. लेकिन क्या कोई मूर्ति बिना बौद्धिक आंदोलन अथवा उसके समर्थन के समाज को परिवर्तन की हद तक प्रभावित कर सकती है? उस आंदोलन को पुनर्जीवन प्रदान कर सकती हैं, जिसको उन्होंने अपनी सर्वजन राजनीति अथवा तथाकथित सोशल इंजीनियरिंग द्वारा शक्तिहीन कर दिया है. प्रदेश की जनता महंगाई, बिजली और सूखे की समस्या से त्रस्त है. इनसे जूझने के लिए केंद्र सरकार से संसाधनों की मांग करना और प्रदेश के अपने संसाधनों को मूर्तियों और पार्कों के नवीकरण पर खर्च कर देना, किस परिवर्तनकारी आंदोलन का प्रतीक है. खबर यह भी है कि मायावती महान नेताओं की बगल में अपनी मूर्तियां भी टिकवा रही हैं. क्या इससे लोग उन्हें ज्योतिबा फुले या डा॓. आंबेडर के समकक्ष मानने लग जाएंगे? कहीं उनके मन में डर तो नहीं कि अपनी सर्व सत्तावादी राजनीति के चलते उन्होंने दलित आंदोलन, विशेषकर दलित चेतना को इतना धूमिल कर दिया है कि उसको वापस अपनी स्थिति में आने में वर्षों लग सकते हैं. इतना कि मायावती का अपना जीवनकाल भी कम पड़ सकता है. उस अवस्था में आने वाली पीढ़ियां उन्हें मूर्तियों के बहाने याद रखेगी. क्या उन्हें पता नहीं कि गांधी जी के विचारों की हत्या करने वाले ही राजघाट जाकर उनकी समाधि पर फूल चढ़ाते हैं. कि मूर्तियों के प्रति अंधश्रद्धा समय आने टोटम में बदल जाती है. जिसका मनमाना अर्थ निकाला जा सकता है. और शताब्दियों पहले विलक्षण भारतीय मनीषा का तंत्र-मंत्र, जादू-टोने और कर्मकांडों में सिमट जाना भी समाज का विचारों से कट जाने का दुष्परिणाम था. इसलिए आने वाले वर्षों में एक चुनौती मायावती के सामने यह भी होगी कि प्रदेश की जनता को समस्याओं से मुक्ति दिलाने के साथ-साथ, अपने स्वाभाविक सहयोगियों की तलाश द्वारा वे किस प्रकार अपनी प्रतिबद्धताओं की रक्षा कर पाती हैं. वे संभवतः यह तो समझ चुकी हैं कि उनकी सोशल इंजीनियरिंग आने वाले वर्षों में कारगर नहीं होने वाली है. लेकिन जिस रास्ते पर चलकर वह दलित चेतना में जान डालने का प्रयास कर रही हैं, वह भी अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने जैसा उद्यम है. यह याद रखना भी जरूरी है कि मूर्तियां सिर्फ श्रद्धालु समाज गढ़ सकती हैं, विवेकवान समाज की स्थापना तो विचारों और उनके निरंतर परिवर्धन-परिष्करण द्वारा ही संभव है. लेकिन मायावती जिस रास्ते पर बढ़ रही हैं, उस ओर तो यह संभावना नजर नहीं आती.
ओमप्रकाश कश्यप