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संत गाडगे महाराज : कीर्तन से क्रांति

सामान्य

जीवन चारि दिवस का मेला रे

बांभन(ब्राह्मण)झूठा, वेद भी झूठा, झूठा ब्रह्म अकेला रे

मंदिर भीतर मूरति बैठी, पूजति बाहर चेला रे

लड्डू भोग चढावति जनता, मूरति के ढिंग केला रे

पत्थर मूरति कछु न खाती, खाते बांभन चेला रे

जनता लूटति बांभन सारे, प्रभु जी देति न अधेला रे

पुन्य-पाप या पुनर्जन्म का , बांभन दीन्हा खेला रे

स्वर्ग-नरक, बैकुंठ पधारो, गुरु, शिष्य या चेला रे

जितना दान देवे देव गे ब्राह्मण को देवोगे, वैसा निकरै तेला रे

बांभन जाति सभी बहकावे, जन्ह तंह मचै बबेला रे

छोड़ि के बांभन आ संग मेरे, कह रैदास अकेला रे

                                       —संत रैदास

इन दिनों परिस्थितिकीय असंतुलन सर्वाधिक चिंता का विषय है. होना भी चाहिए. वातावरण में रोज तरह-तरह के जहर घुलकर जिस तरह से उसे विषाक्त कर रहे हैं, यह चिंता वाजिब है. लेकिन एक और किस्म का प्रदूषण होता है. पहले वाले प्रदूषण पर बड़ी-बड़ी पोथियां लिखने वाले, रोज जार-जार आंसू बहाने वाले लोग दूसरी किस्म के प्रदूषण की ओर से चुप्पी साधे रहते हैं. इस प्रदूषण का नाम है—सामाजिक-सांस्कृतिक प्रदूषण. इसे फैलाते हैं, जाति, धर्म, संप्रदाय, क्षेत्रीयता, रंगभेद जैसे विषाणु. पहली किस्म का प्रदूषण समाज के बीच भेद नहीं करता. उसका असर सभी पर बराबर पड़ता है, हालांकि चपेट में गरीब और निचले वर्ग ही आते हैं, क्योंकि वे उससे जूझने लायक संसाधन नहीं जुटा पाते. दूसरे प्रकार का प्रदूषण समाज को नीची जाति-ऊंची जाति, स्वामी-मालिक, निदेशक-अनुपालक आदि में बांट देता है. पहली प्रकार के प्रदूषण से निपटने के लिए समाज की सामूहिक चेतना काम करती है. दूसरे प्रदूषण से निपटने के लिए केवल प्रभावित वर्गों को आगे आना पड़ता है. संघर्ष के दौरान उन्हें शीर्षस्थ वर्ग जो उस विकृति का लाभकारी, परजीवी वर्ग है—उसका विरोध भी सहना पड़ता है. इसलिए दूसरे प्रदूषण से मुक्ति आसान नहीं होती. ऐसे में जो लोग तमाम अवरोधों और मुश्किलात के बावजूद अपने अनथक संघर्ष द्वारा, धूल अटी संस्कृति को थोड़ा-भी साफ कर पाते हैं, मनुष्यता का इतिहास उन्हें संत, महात्मा, महापुरुष, युगचेता, युगनायक आदि कहकर सहेज लेता है. ऐसे ही कर्मयोगी संत थे—गाडगे महाराज. जिन्हें हम संत गाडगे या गाडगे बाबा के नाम से भी जानते हैं.

मराठी में ‘गाडगा’ का अर्थ है—खप्पर. टूटे हुए घड़े या हांडी का नीचे का कटोरेनुमा हिस्सा. गाडगे महाराज की वही एकमात्र पूंजी थी. कहीं जाना हो तो उसे अपने सिर पर रख लेते. हाथ में झाड़ू लगी होती. जहां भी गंदगी दिखाई पड़ती, वहीं झाड़ू लगाने लगते. कोई कुछ खाने को देता तो उसे गाडगा में रखवा लेते. कालांतर में गाडगा और झाड़ू ही उनकी पहचान बन गई. झाड़ू से बाहर की सफाई. विचारों से लोगों के मन में जमा उस मैल को साफ करने की कोशिश, जो सैकड़ों वर्षों से उनके मन में जमा था. जिसे हमने दूसरी श्रेणी के प्रदूषण के लिए जिम्मेदार माना है. गांव में एक दिन से ज्यादा ठहरते नहीं थे. रोज नया गांव, नई जगह की सफाई. नए-नए लोगों को सदोपदेश.

संत गाडगे का असली नाम था, डेबुजी झिंगराजी जाणोरकर. उनका जन्म 23 फरवरी 1876 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले के शेड्गांव के धोबी परिवार में हुआ था. पिता का नाम था, झिंगराजी और मां थीं—साखूबाई. गरीब परिवार था. जब शिक्षा की उम्र थी, तब उन्हें गृहस्थी चलाने में परिवार की मदद करनी पड़ती थी. चुनौतियां बस इतनी नहीं थीं. आठ वर्ष की अवस्था में उनके पिता का साया सिर से उठ गया. मां ने उन्हें अपने भाई के यहां भेज दिया. मामा खेती-बाड़ी करते थे. डेबू जी भी उनके साथ खेतों पर जाने लगे. वे शरीर से हृष्ट-पुष्ट और परिश्रमी थे. सो कुछ ही दिनों में मामा की खेती संभाल ली. युवावस्था में कदम रखने के साथ ही उनका विवाह कर दिया गया. पत्नी का नाम था, कुंतीबाई. दोनों के चार बच्चे हुए. उनमें दो लड़के और दो बेटियां थीं. उस समय तक डेबुजी खेतों में काम करते. खूब मेहनत करते. साहस उनमें कूट-कूट कर भरा था. जरूरत पड़ने पर आततायी से अकेले ही भिड़ने का हौसला रखते थे.

उन दिनों खेती करना आसान बात न थी. जमींदार लगान और साहूकार ब्याज के बहाने किसान की सारी मेहनत हड़प लेता था. कई बार किसान के पास अपने खाने तक को अनाज न बचता था. डेबुजी को यह देखकर अजीब लगता था. एक बार जमींदार का कारिंदा उनके पास लगान लेने पहुंचा तो किसी बात पर डेबुजी का उनसे झगड़ा हो गया. हृष्ट-पुष्ट डेबुजी ने कारिंदे को पटक दिया. उस शाम घर पहुंचने पर उन्हें मामा की नाराजगी झेलनी पड़ी. कुछ दिनों के बाद उनके मामा का भी देहावसान हो गया. डेबुजी के लिए वह बड़ा आघात था. सांसारिक सुखों के प्रति आसक्ति पहले ही कम थी. मामा की मृत्यु के बाद तो उनपर वैराग्य-सा छा गया. डेबुजी को भी समझ में आ गया कि किसानों और मजूदरों की लूट की असली वजह लोगों की अशिक्षा है. लोग गरीबी के असली कारण को जानने के बजाए, उसे अपना भाग्यदोष मानकर चुप हो जाते हैं. बीमार पड़ते हैं तो वैद्य-हकीम से ज्यादा गंडे-ताबीज पर भरोसा करते हैं. 1905 में उन्होंने अपना घर छोड़ दिया. उसके बाद 12 वर्षों तक लगातार भटकते रहे. आरंभ में उनकी यात्रा ईश्वर की खोज को समर्पित थी. लेकिन मंदिरों और शिवालयों में धर्म की धंधागिरी देख पारंपरिक धर्मों से उनका विश्वास उठ गया. उसके बाद उन्होंने अपना समूचा जीवन मनुष्यता की सेवा को समर्पित कर दिया.

संत रविदास और कबीर का प्रभाव था. सो सीधी नजर समाज में व्याप्त गंदगी पर पड़ती थी. वे देखते कि लोग अशिक्षा के कारण अज्ञानता में फंसे हैं. अज्ञानता उन्हें जाति की मार सहने को मजबूर करती है. वही सामंत की चाटुकारिता को विवश करती है. वही समाज में व्याप्त तरह-तरह की रूढ़ियों और अंधविश्वास का कारण है—‘उससे उद्धार का एकमात्र रास्ता है—शिक्षा. इसलिए शिक्षित बनो और बनाओ.’ सादगी उनका जीवन थी. झाड़ू उठाए वे गांव-गांव घूमते. जहां जाते, वहां सफाई में जुट जाते. फकीरनुमा आदमी को सफाई करते देख, लोग कौतूहलवश सवाल करते—‘शाम को कीर्तन होगा, आ जाना.’ इतना कहकर वे पुनः सफाई में लग जाते. ‘कीर्तन के लिए गांव में साफ-सुथरे ठिकाने है’—लोग कहते. ‘हमें सिर्फ अपना घर नहीं, पड़ोस भी साफ रखना चाहिए.’ गाडगे महाराज बातों-बातों में सामूहिकता की महत्ता बता देते. शाम को कीर्तन होता. उसमें वे लोगों को सफाई का महत्त्व समझाते. अशिक्षा, रूढ़ि, धार्मिक-सामाजिक आडंबरों की आलोचना करते. मौज में होते तो ‘गाडगा’ को ही वाद्ययंत्र बना लेते. लकड़ी की मदद से उसे बजाते-बजाते अपनी ही धुन में खो जाते. लोगों को समझाते—‘मनुष्यता ही सच्चा धर्म है. मनुष्य होना सबसे महान लक्ष्य है. इसलिए मनुष्य बनो. भूखे को रोटी दो. बेघर को आसरा दो. पर्यावरण की रक्षा करो.’ कीर्तन करते-करते कभी उनमें कबीर की आत्मा समा जाती तो कभी संत रविदास उनकी जिव्हा पर उतर आते. एक जगह काम पूरा हो जाता तो ‘गाडगा’ को सिर पर औंधा रख, फटी जूतियां चटकाते हुए, किसी नई बस्ती की ओर बढ़ जाते. फटेहाल अवस्था, मिट्टी के कटोरे और झाड़ू के साथ देखकर कई बार लोग उन्हें पागल समझने लगते. विचित्र भेष के कारण आवारा कुत्ते उनपर भौंकते. लोग हंसी उड़ाते, मगर आत्मलीन गाडगे बाबा आगे बढ़ते जाते थे. कोई उनकी वेशभूषा को लेकर सवाल करता तो मुस्कराकर कहते—‘इंसान को हमेशा सीधा-सादा जीवन जीना चाहिए. शान-शौकत उसे बरबाद कर देती है.’

विदेशों में व्यक्ति की महानता का आकलन उसकी योग्यता और लोकहित में किए गए कार्यों द्वारा किया जाता है. भारत में योग्यता और सत्कर्म दूसरे स्थान पर आते हैं. पहले स्थान पर आती है, उसकी जाति. ब्राह्मण की संतान को जन्म से ही सबसे ऊपर की श्रेणी में रख दिया जाता है और जो शूद्र और अंतज्य हैं, उन्हें सबसे निचली श्रेणी प्राप्त होती है. इसलिए एक शूद्र को समाज में अपनी योग्यता को स्थापित करने के लिए, न केवल अतिरिक्त श्रम करना पड़ता है, अपितु चुनौतियों के बीच अपनी योग्यता भी प्रमाणित करनी पड़ती है. गाडगे बाबा का हृदय करुणा से आपूरित था. स्वार्थ के नाम पर निरीह पशु-पक्षियों की बलि देना उन्हें स्वीकार्य न था. वे उसका विरोध करते. जरूरत पड़ने पर उसके लिए परिजनों और पड़ोसियों से भी लड़ जाते थे. ईश्वर और धर्म की उनकी अपनी परिभाषा थी. लोग धर्म के बारे में सवाल करते तो कहते—‘गरीब, कमजोर, दुखी, बेबस, बेसारा और हताश लोगों की मदद करना, उन्हें हिम्मत देना ही सच्चा धर्म है. वही सच्ची ईश्वर भक्ति है.’ ईश्वर को प्रसन्न करना है तो—‘भूखे को रोटी, प्यासे को पानी, वस्त्रहीन को वस्त्र तथा बेघर को घर दो. यही ईश्वर सेवा है.’

पूरी तरह निस्पृह जीवन था. कहते थे कि, ‘अगर आप दूसरों के श्रम पर सिर्फ अपने लिए जिएंगे तो मर जाएंगे. लेकिन यदि आप अपने श्रम से, दूसरों के लिए जिएंगे तो अमर हो जाएंगे.’ कई बार गांव वाले भोजन के साथ कुछ पैसे भी थमा देते. उन पैसों को वे जोड़ते चले जाते. जब पर्याप्त रकम जमा हो जाती तो लोगों की जरूरत के हिसाब से जमाराशि को स्कूल, धर्मशाला, अस्पताल, सड़क आदि बनाने पर खर्च कर देते थे. अपने विचारों को सीधी-सरल भाषा में व्यक्त करते. यह मानते हुए कि धर्मप्राण लोग शब्द-कीर्तन पर ज्यादा विश्वास करते हैं, इसलिए अपने विचारों के बारे में कीर्तन के माध्यम से लोगों को समझाते. कहते कि मंदिर-मठ आदि साधु-संतों के अड्डे हैं. ईश्वर, आत्मा, परमात्मा, स्वर्ग-नर्क जैसी बातों पर उन्हें विश्वास ही नहीं था. आंख मूंदकर राम नाम जपने या रामनामी ओढ़ लेने को वे पंडितों का ढोंग बताते थे. पंढरपुर भक्तिमार्गी हिंदुओं का बड़ा तीर्थ है. गाडगे महाराज प्राय: वहां जाते. लेकिन विट्ठल भगवान के दर्शन करने के लिए लोगों को मानव-धर्म का उपदेश देने के लिए. उनके लिए मानव-धर्म का मतलब था—’प्राणिमात्र के प्रति करुणा की भावना.’   

उनके जीवन की एक रोचक घटना है. गाडगे महाराज को मथुरा जाना था. उसके लिए मथुरा जाने वाली गाड़ी में सवार हो गए. सामान के नाम पर उनका वही चिर-परिचित ‘गाडगा’, लाठी, फटे-पुराने चिथड़े कपड़े और झाड़ू था. रास्ते में भुसावल स्टेशन पड़ा तो वहीं उतर गए. कुछ दिन वहीं रुककर आसपास के गांवों में गए. वहां झाड़ू से सफाई की. कीर्तन कर लोगों को उपदेश दिए. मथुरा जाने की सुध आई तो वापस फिर रेलगाड़ी में सवार हो गए. इस बार टिकट निरीक्षक की नजर उनपर पड़ गई. गाडगे बाबा के पास न तो टिकट था, न ही पैसे. टिकट निरीक्षक ने उन्हें धमकाया और स्टेशन पर उतार दिया. उससे यात्रा में आकस्मिक व्यवधान आ गया. लेकिन जाना तो था. देखा, स्टेशन के पास कुछ रेलवे मजदूर काम रहे हैं. डेबुजी उनके पास पहुंचे. कुछ दिन मजदूरों के साथ मिलकर काम किया. मजदूरी के पैसों से टिकट खरीदा और तब कहीं मथुरा जा पाए.

जीवन में वे डॉ. अंबेडकर, गांधी सहित अपने समय के कई प्रगतिशील नेताओं से उनका संपर्क था.  सभी ने गाडगे जी के कार्यों की सराहना की. वे अंबेडकर से वे 15 वर्ष बड़े थे. डॉ. अंबेडकर ने दलितोद्धार के लिए आंदोलन आरंभ किया तो डेबुजी भी अपनी तरह जुट गए. मगर उसके लिए रास्ता नहीं बदला. अपने कीर्तन के माध्यम से वे मनुष्य की समानता और स्वतंत्रता का समर्थन करते. छूआछूत को अमानवीय बताकर उसकी आलोचना करते. लोगों को सामाजिक कुरीतियों से दूर रहने की सलाह देते. डॉ. अंबेडकर का साधु-संतों से दूर ही रहते थे. परंतु संत गाडगे के कार्यों की उपयोगिता को वे समझते थे. दूर-दराज के गांवों में, अत्यंत विषम परिस्थितियों में रह रहे दलितों के उद्धार का एकमात्र रास्ता है कि उनके बीच रहकर लोगों को समझाया जाए. उन्हीं की भाषा में, उनके करीब रहते रहते हुए. संत गाडगे यही काम करते थे. इसलिए दोनों समय-समय पर मिलते रहते थे.

हिंदू धर्म में साधुओं की कमी नहीं है. एक आम साधु-संत के पास पैसे जाएं तो वह सबसे पहले मंदिर बनवाता है, या फिर धर्मशालाएं, ताकि बैठे-बैठाए जीवनपर्यंत दान की व्यवस्था हो जाए. गाडगे बाबा ने अपने लिए न तो मंदिर बनवाया, न ही मठ. एक सच्चा, त्यागमय और निस्पृह जीवन जिया. कभी किसी को अपना शिष्य नहीं बनाया. रवींद्रनाथ के एकला चलो के सिद्धांत पर वे हमेशा अकेले ही आगे बढ़ते रहे. उनके कार्यों और उपदेशों से प्रभावित होकर लोग कई बार उन्हें रोकने का प्रयास करते. इसपर वे मुस्करा कर कहते—‘नदिया बहती भली, साधू चलता भला. धीरे-धीरे उनका यश बढ़ता जा रहा था. कीर्तन में सभी वर्गों के लोग आते थे. उनसे कभी-कभी मोटी दक्षिणा भी हाथ लग जाती. उसे वे ज्यों का त्यों संस्थाओं के निर्माण के नाम पर खर्च कर देते थे. शिक्षा के बारे में बात होती तो कहते—‘शिक्षा बड़ी चीज है. पैसे की तंगी आ पड़े तो खाने के बर्तन बेच दो. औरत के लिए कम दाम की साड़ियां खरीदो. टूटे-फूटे मकान में रहो. मगर बच्चों को शिक्षा जरूर दो.’ धनी लोगों को समझाते—‘शिक्षित करने से बड़ा कोई परोपकार नहीं है. गरीब बच्चों को शिक्षा दो. उनकी उन्नति में मददगार बनो.’ दान में मिले पैसों की पाई-पाई जोड़कर उन्होंने लगभग 60 संस्थाओं का निर्माण कराया. सारा पैसा उन्होंने गरीबों के लिए स्कूल खोलने, अस्पताल और ब्रद्धाश्रम बनवाने, धर्मशालाएं परिश्रमालय, वृद्धाश्रम बनवाने पर खर्च करते रहे.

संत गाडगे जी की 13 दिसंबर 1956 को अचानक तबियत खराब हुई और 17 दिसंबर 1956 को बहुत ज्यादा खराब हुई, 19 दिसंबर 1956 को रात्रि 11 बजे अमरावती के लिए जब गाड़ी चली तो रास्ते में ही उनकी तबियत बिगड़ने लगी. गाड़ी में सवार चिकित्सकों ने उन्हें अमरावती ले जाने की सलाह दी. लेकिन गाड़ी कहीं भी जाए, गाडगे बाबा तो अपने जीवन का सफर पूरा कर चुके थे. बलगांव पिढ़ी नदी के पुल पर गाड़ी पहुंचते-पहुंचते मध्यरात्रि हो चुकी थी. उसी समय, रात्रि के 12.30 बजे अर्थात 20 दिसंबर 1956 को उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली. संत गाडगे सच्चे संत थे. दिखावा उन्हें नापसंद था. अपने अनुयायियों से अकसर यही कहते, मेरी मृत्यु जहां हो जाए, वहीं मेरा संस्कार कर देना. न कोई मूर्ति बनाना, न समाधि, न ही मठ या मंदिर. लोग मेरे जीवन और कार्यों के लिए मुझे याद रखें, यही मेरी उपलब्धि होगी. गाडगे ही इच्छा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार जिस जगह किया गया, वह स्थान गाडगे नगर कहलाता है. आज वह वृहद अमरावती शहर का हिस्सा है.

ओमप्रकाश कश्यप

पेरियार और बुद्ध : धर्माडंबर और जाति-मुक्ति संघर्ष की 2500 वर्ष लंबी परंपरा

सामान्य
जाति-मद, अभिमान, लोभ, द्वैष तथा मूढ़ता ये सब अवगुण जहां हैं, वे इस देश में अच्छे स्थान नहीं हैं. जाति-मद, अभिमान, लोभ, द्वैष तथा मूढ़ता ये सब अवगुण जहां नहीं हैं, वे ही इस देश में अच्छे स्थान हैं.1—मातंग जातक(497).

 

पेरियार और गौतम बुद्ध के बीच करीब ढाई हजार वर्षों का अंतराल है. जिन दिनों बुद्ध का जन्म हुआ था, वैदिक कर्मकांड और धर्माडंबर अपने चरम पर थे. यज्ञ, पूजा-पाठ आदि के नाम पर राजाओं से भरपूर समिधा हासिल करना, इन्कार करने या असमर्थता जताने पर शाप द्वारा लोक-परलोक बिगाड़ने की धमकी देना. मनोवांछित समिधा प्राप्त होते ही राजा के हर कुकर्म को सुकर्म घोषित कर देना, फिर हजारों पशुओं की बलि एक साथ चढ़ा देना—ब्राह्मण पुरोहितों के लिए बिलकुल सामान्य था. आतंक ऐसा था कि किसी भी सम्राट को वे धर्म के नाम पर मनमाने आचरण के लिए विवश कर सकते थे. धर्माडंबर और वर्णाश्रम व्यवस्था के समर्थन में बड़े-बड़े शास्त्र गढ़े जा रहे थे. उन्हें पढ़ने का अधिकार सिवाय ब्राह्मणों के किसी को न था. वे उनकी मनमानी व्याख्या करते थे. बावजूद इसके उन्हें तत्कालीन राजसत्ताओं का संरक्षण प्राप्त था. उनके धुर विरोधी के रूप में आजीवक और लोकायत जैसे भौतिकवादी चिंतक थे, जिनका संबंध समाज के मेहनतकश लोगों तथा शिल्पकार समूहों से था. यज्ञ के नाम पर बलि चढ़ाना, ईश्वर, आत्मा, परमात्मा जैसे वायवी विषयों पर बहस करना उन्हें नापसंद था.

बुद्ध राजसत्ता और परिवार का मोह त्यागकर युवावस्था में परिव्राजक बने थे. राजकुल से संबंधित होने के कारण उनका तत्कालीन राजाओं के बीच अतिरिक्त सम्मान था. बुद्धत्व प्राप्ति के बाद जब उन्होंने धर्मोपदेश देना आरंभ किया तो मगध, उज्जैनी सहित उस समय के सभी बड़े राज्यों एवं व्यापारिक वर्गों का भरपूर सहयोग एवं समर्थन उन्हें प्राप्त हुआ. बुद्ध के प्रति राजाओं के आकर्षण का कारण यह भी था कि अनेक राजा ब्राह्मण-ऋषियों द्वारा यज्ञादि के नाम पर पशुधन और दूसरे संसाधन ऐंठने से तंग आ चुके थे. यज्ञों से राज्य के खजाने पर अनावश्यक बोझ पड़ता था. बुद्ध ने यज्ञों का विरोध कर व्यावहारिक नैतिकता पर जोर दिया. उन्होंने वेदों को अपौरुषेय और आप्तग्रंथ मानने से भी इन्कार कर दिया. तत्कालीन बुद्धिजीवी समाज में बहस का बड़ा मुद्दा आत्मा, परमात्मा, ईश्वरादि को लेकर था. दर्शन की इन समस्याओं पर लोग शताब्दियों से बेनतीजा बहस करते आए थे. आत्मा-परमात्मा में विश्वास रखने वाले उनकी सत्ता को पूर्व-निष्पत्ति मान लेते थे. उस अवस्था में बहस उनके अस्तित्व तथा औचित्य के बजाय, स्वरूप और विस्तार को लेकर रह जाती थी. दूसरा वर्ग बुद्धिसंगत निर्णय लेने का समर्थन करता था. वह उनके अस्तित्व एवं औचित्य सहित हर पहलू पर विचार करना चाहता था. दोनों परस्पर विपरीत-ध्रुवी विचारधाराएं थीं. इतनी कि उनके बीच संवाद का कोई उदाहरण पूरे संस्कृत वाङ्मय में नहीं मिलता. बुद्ध ने उनके बीच का रास्ता अपनाया. आत्मा-परमात्मा, लोक-परलोक, पाप-पुण्य जैसी बहसों में उलझने के बजाए उन्होंने, व्यक्तिगत एवं सामाजिक शुचिता को अपने धर्म-दर्शन का केंद्र-बिंदू बनाया, जिसका उन दिनों सामाजिक जीवन से लोप हो चला था.

ढाई हजार वर्ष पहले यानी बुद्ध के जन्म के समय वर्ण जाति में ढलने लगे थे. परिणामस्वरूप पचासियों जातियां अस्तित्व में आ चुकी थीं. जन्म के आधार पर भेदभाव करने वाली उस व्यवस्था को बुद्ध ने अनैतिक, अनुचित तथा जीवन के उच्चतम लक्ष्यों की प्राप्ति में बाधक माना तथा उसकी आलोचना की. अभिजात वर्ग की भाषा संस्कृत के बजाए उन्होंने पालि में उपदेश दिए, जो उन दिनों जनसाधारण की भाषा थी. उस समय तक जातीय अभिमान के मारे ब्राह्मण स्वयं को आश्रमों तक सीमित रखते थे. शेष समाज से उनका संबंध दानादि ग्रहण करने तक सीमित था. बुद्ध अपने विचारों को लेकर सीधे आमजन के बीच गए. भिक्षु-संघ की स्थापना की तो उसके दरवाजे समाज के सभी वर्गों के लिए खोल दिए. जाति-आधारित भेदभाव को वे बौद्धिक, सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों की राह में बाधक मानते थे—

‘अंबट्ठ! जो भी जातिवाद में बंधे हैं, गोत्रवाद में बंधे हैं, (अभि)मानवाद में बंधे हैं, आवाह-विवाह में बंधे हैं, वे अनुपम विद्या-चरण-संपदा से दूर हैं. अंबट्ठ! जातिवाद बंधन छोड़कर, गोत्रवाद बंधन छोड़कर, मानवाद बंधन छोड़कर, आवाह-विवाह बंधन छोड़कर ही अनुपम विद्या-चरण-संपदा का साक्षात्कार किया जा सकता है.’2

वेदों को अपौरुषेय न मानने, आत्मा, परमात्मा, ईश्वर आदि विषयों पर मौन साध लेने के कारण बौद्ध दर्शन की गिनती नास्तिक दर्शन के रूप में की जाती है. इसके आधार पर कुछ विद्वान उसे आजीवक और लोकायत दर्शन की तरह ही, भौतिकवादी दर्शन मानते हैं. लेकिन वह उच्छ्रंखल भौतिकवाद न था. हम उसे आदर्शोन्मुखी व्यवहारवाद कह सकते हैं जिसमें सामाजिक समानता, शुचिता एवं आचरण की पवित्रता प्रमुख थी. बुद्ध के विचारों का इतना असर हुआ कि वैदिक कर्मकांडों से आमजन का विश्वास घटने लगा. यज्ञ और दानादि के नाम पर ऋषियों की मांगों और धमकियांे तंग आ चुके राजा बौद्ध एवं जैन धर्म से जुड़ने लगे. उसके फलस्वरूप ब्राह्मण धर्म कुछ शताब्दियों के लिए नेपथ्य में चला गया. जातीय भेदभाव कमजोर पड़ने लगा. अशोक के बाद मौर्य साम्राज्य कमजोर पड़ने से ब्राह्मणधर्म को पुनर्वापसी का अवसर मिला. इसी दौर में पुराणों एवं स्मृति-ग्रंथों की रचना हुई. उसके बाद इतिहास ने अनेक करवटें लीं. राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद ब्राह्मणवाद निरंतर मजबूत और निरंकुश होता चला गया.

बुद्ध पहले विचारक थे, जिन्होंने समाज को धर्म के आधार पर संगठित करने की कोशिश की थी. वैदिक धर्म के प्रस्तोता जातीय दंभ के शिकार थे. आत्ममुग्धता की पराकाष्ठा में वे बाकी जनसमाज से अलग-थलग जीते थे. जनसाधारण के सुख-दुख की उन्हें परवाह न थी. जाति और वर्ण के नाम पर उन्होंने समाज के बड़े हिस्से को मुख्यधारा से अलग किया हुआ था. अपने आश्रमों में बंद ऋषिगण धर्म और यज्ञादि के नाम पर क्या करते हैं? बलि चढ़ाने से उन्हें क्या हासिल होता है—जनसाधारण को इसकी बहुत परवाह भी नहीं थी. ब्राह्मण बुद्धिजीवियों की उपेक्षा की परवाह न करते हुए साधारण जन आजीवकों और लोकायतों पर विश्वास करते थे, जो उस समय भौतिकवादी दर्शन की प्रमुख शाखाएं थीं. वैदिक परंपरा संसार को नकारकर, काल्पनिक, भ्रममूलक देवलोक को परम-सत्य मानती थीं. आजीवकों और लोकायतों के लिए जीती-जागती, जीवनदायिनी प्रकृति ही सबकुछ थी. वे अपने श्रमकौशल के भरोसे जीवन-यापन करने वाले बहुसंख्यक लोग थे. चूंकि धर्म-केंद्रित समाज की रचना का संकल्प सामाजिक शुचिता के बगैर असंभव था. इसलिए बुद्ध ने आदर्शोन्मुखी नैतिकता पर जोर दिया. धार्मिक आडंबरों, यज्ञ-बलियों एवं जाति-प्रथा को अनावश्यक मानते हुए उन्होंने निस्पृह और कल्याणोन्मुखी जीवन जीने का उपदेश दिया. कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में पशु-धन का विशेष महत्त्व था. यज्ञादि कर्मकांडों के विरोध का सीधा-सा अभिप्राय था, उपयोगी पशुधन की जीवनरक्षा. इसके फलस्वरूप लोग उनके धर्म की ओर आकृष्ट होने लगे.

 

2

पेरियार के समय तक जाति-व्यवस्था उग्र रूप धारण कर चुकी थी. अछूतों का सार्वजनिक स्थलों पर प्रवेश निषिद्ध था. कथित ऊंची जाति के सदस्यों का स्पर्श तो दूर, अपनी छाया से भी उनको बचाना पड़ता था. शूद्रों को उनके कार्य के अनुसार थोड़ी छूट थी, परंतु वे भी एक सीमा तक ही उच्च जातियों के निकट जा सकते थे. कैथरीन मेयो ने अपनी पुस्तक ‘मदर इंडिया’ में भारतीय समाज में व्याप्त छूआछूत के बारे में वर्णन किया है. डू. बोइस के हवाले से वे उनीसवीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों में दक्षिण भारतीय समाज के बारे लिखती हैं—‘मालाबार तट पर रहने वाली ‘पुलाया’ जाति के सदस्यों को अपने लिए घर बनाने का अधिकार नहीं है. रहने के लिए वे लोग दरख्तों पर घौंसले की भांति, बांस-बल्लियों के सहारे, पत्तों की छत डाल सकते हैं.’ डू. बोइस के अनुसार, उन दिनों यदि कोई नैय्यर किसी पुलाया को सड़क पर देख लेता तो उसे वहीं मार देने का अधिकार था. बातचीत के दौरान दो व्यक्तियों के बीच दूरी से भी अस्पृश्यता के स्तर का अनुमान लगाया जा सकता था. पुलाया को नैय्यर जैसे उच्च जाति के हिंदुओं से 60 से 90 फुट की दूरी रखकर बात करनी पड़ती थी.

पेरियार ने बचपन से जाति-आधारित भेदभाव का अनुभव किया था. बड़े हुए तो उन्हें इसका कारण भी समझ में आने लगा. उनका जन्म धनाढ्य परिवार में हुआ था. शिक्षा के नाम पर वे बस दो-तीन वर्ष ही पाठशाला जा पाए थे. बाद में पिता के व्यवसाय से जुड़ गए. उन दिनों उनके घर में संन्यासियों, शैव-मतावलंबियों, वैष्णवों, पंडितों आदि का खूब आना-जाना था. किशोर पेरियार उन्हें अधिकाधिक दान-दक्षिणा के लिए तरह-तरह के बहाने बनाते हुए देखते. कभी-कभी वे उनका मजाक भी उड़ाते. बावजूद इसके अपनी युवावस्था तक ईश्वर में उनकी आस्था बनी रही. 1925 में उन्होंने संन्यासी के रूप में बनारस की यात्रा की. यात्रा के दौरान वे बनारस में जहां-जहां गए, वहां ब्राह्मणवाद का विकृत चेहरा, धर्म के नाम पर लूट-खसोट और वृथा आडंबरों से सामना हुआ. जातीय भेदभाव का अनुभव तो उन्हें बचपन से ही था. बनारस यात्रा के बाद उनका धर्म से भी विश्वास उठ गया. उसके बाद नए पेरियार का जन्म हुआ, जो तर्कवादी था. ज्ञान-विज्ञान पर जोर देता था. व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता, समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर विश्वास करता था. आस्था के आधार पर कुछ भी मान लेना उसे अस्वीकार्य था. हर स्थापित सत्य पर संदेह करना, उसे अपने विवेक की कसौटी पर कसना और खरा उतरने के बाद ही उसे स्वीकार करना, उसकी आदत में शुमार हो चुका था.

पेरियार ने आत्मा, परमात्मा, पाप-पुण्य, भाग्य आदि को सीधे नहीं नकारा. अपितु तर्क पर जोर दिया. इस मामले में बुद्ध उनके प्रेरणा-पुरुष रहे. प्राचीन भारत के इतिहास में बुद्ध कदाचित पहले शास्ता थे जिन्होंने वैचारिक स्वतंत्रता को आगे रखते हुए अपने शिष्यों से कहा था—‘अप्पदीपो भवः.’ दूसरों की बातों में आने के बजाय, सोच-विचारकर स्वयं निर्णय लो. धर्म-दर्शन और जाति पर दिए गए अपने व्याख्यानों में पेरियार भी आत्मा, परमात्मा, ईश्वर आदि को तर्क की कसौटी पर कसते हैं. उनके अस्तित्व पर ध्यान देने के बजाए औचित्य पर विचार करते हैं. 1947 में सलेम कॉलिज में ‘हिंदू दर्शन’ पर दिए गए अपने व्याख्यान में उन्होंने इन विषयों की वैज्ञानिक पड़ताल की थी. उन्होंने सिद्ध किया कि ये सभी मिथ समाज पर सोची-समझी नीति के तहत थोपे गए हैं. सहअस्तित्व, समानता, सहयोग, सद्भाव एवं निस्पृह जीवन जीने वाले व्यक्ति को इनकी कोई आवश्यकता नहीं पड़ती. उस व्याख्यान में वे बुद्ध का नाम नहीं लेते; परंतु उनका प्रत्येक निष्कर्ष उन्हें बुद्ध के करीब ले जाता है—

‘मनुष्य अपनी इच्छाओं के साथ जीता है. वह अपने लालच का दास का है. समाज में रहकर वह दूसरों के लिए या तो अच्छा कर सकता है अथवा बुरा. कर्म की महत्ता पर जोर देने के लिए ही जीवन और आत्मा जैसी काल्पनिक चीजों की रचना की गई है. मनुष्य को अच्छे कृत्यों की ओर प्रवृत्त करने हेतु, उसे यह विश्वास करना सिखाया गया है कि यदि वह बुरे कर्म करेगा तो मृत्यु के बाद उसकी आत्मा को भयावह दंडों से गुजरना पड़ेगा. यह भी एक मिथ मात्र ही है. तर्क-सम्मत ढंग से बातचीत करने वाले निस्पृह व्यक्ति के लिए जो न अच्छा करता है, न ही बुरा, ईश्वर का भय नहीं रहता. उसे स्वर्ग या नर्क की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है.’3

बुद्ध के ‘अपना दीपक स्वयं बनो’ की तरह पेरियार ने भी लोगों से बार-बार यह आग्रह किया—‘मैंने जो कहा वे मेरे व्यक्तिगत विचार हैं. जरूरी नहीं है कि आप भी इनपर विश्वास करें. इसलिए खूब सोचें और स्वयं सार्थक निर्णय तक पहुंचे.’

एक और सूत्र जो पेरियार को बुद्ध के करीब ले जाता है, वह है—जाति व्यवस्था को लेकर दोनों का समान दृष्टिकोण. बुद्ध का जन्म नागवंशीय शाक्य कुल में हुआ था. बाकी क्षत्रियों की अपेक्षा उसे कुछ हीन माना जाता था. अश्वघोष उनका संबंध इक्ष्वाकू वंश से जोड़ते हैं. बौद्ध साहित्य के गंभीर अध्येता कोसंबी के अनुसार शाक्य एक जनजाति थी. बुद्ध ने जातिगत भेदभाव का विरोध किया था. भिक्षु संघों के दरवाजे उन्होंने सभी जातियों के लिए खोले हुए थे. लेकिन ‘अंबट्ठसुत्त’(दीघनिकाय) में वे जिस तरह क्षत्रियों को ब्राह्मणों से श्रेष्ठ बताने के लिए तर्क देते हैं, उसका एक निष्कर्ष यह भी निकलता है कि उन्हें अपने क्षत्रीय कुलोत्पन्न होने पर गर्व था; या कम से कम वर्ण-व्यवस्था से उन्हें कोई शिकायत न थी. बुद्ध द्वारा धार्मिक कर्मकांडों, आडंबरों तथा जाति-प्रथा के विरोध का इतना असर अवश्य हुआ था कि बौद्ध धर्म को जनता ने अपना धर्म मान लिया. उसके फलस्वरूप समाज में जाति-आधारित कटुताओं में भी कमी आने लगी. परंतु जाति और उसके आधार पर हो रहे भेदभाव के विरोध में बड़ा आंदोलन न चलाने के कारण, जातिवादी शक्तियां भीतर ही भीतर सक्रिय बनी रहीं. लोगों को ब्राह्मण धर्म की ओर वापस मोड़ने के लिए ब्राह्मण बुद्धिजीवी पुराणों, स्मृतियों, महाकाव्यों आदि ग्रंथों की रचना में जुट गए. अशोक द्वारा उठाए गए कदमों के फलस्वरूप बौद्ध धर्म दुनिया के विभिन्न देशों में पहुंचा. मगर उसके तुरंत बाद, मौर्य वंश के कमजोर पड़ते ही, ब्राह्मणवाद पुनः जड़ जमाने लगा. ‘मनुस्मृति’ की रचना हुई. जातीय भेदभाव और दुराग्रह जो बुद्ध के प्रभाव दब-से गए थे, वे पुनः सामने आने लगे.

 

3

पेरियार के समय तक लगभग सभी धर्म अपनी प्रासंगिकता खो चुके थे. सतरहवीं-अठारहवीं शताब्दी में पश्चिम में हुई वैचारिक क्रांति के फलस्वरूप, भारत में भी मानव-मात्र की समानता और स्वतंत्रता की समर्थक नई विचार-चेतना का जन्म हुआ था. यह मानते हुए कि राजनीति सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बन सकती है, राजगोपालाचार्य के आग्रह पर पेरियार कांग्रेस में शामिल हुए थे. प्रदेश कांग्रेस के उच्च पदों पर रहते हुए उन्होंने नेताओं का मन बदलने की पूरी कोशिश की थी. मगर थोड़े ही समय में उन्हें विश्वास हो गया कि कांग्रेस के नेता अपने जातीय दुराग्रहों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं. उनकी कथनी और करनी में बड़ा अंतर है. खासतौर पर जातीय विषमता को मिटाने के लिए कांग्रेसी नेता कुछ नहीं करना चाहते. यहां तक कि गांधी भी जातीय पूर्वाग्रहों में फंसे हुए हैं. खिन्न होकर 1925 में उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया. लोगों में आत्माभिमान का भाव पैदा करने के लिए उन्होंने ‘स्वाभिमान आंदोलन’ की नींव रखी. उस समय तक धर्म को नैतिक मूल्यों का एकमात्र स्रोत माना जाता था. लोगों का विश्वास था कि केवल धर्म के सहारे समाज को एकसूत्र में बांधकर रखा जा सकता है. पेरियार किसी नए धर्म के बंधन में बंधना नहीं चाहते थे. तमिल जनता में अपनत्व एवं एकजुटता की भावना पैदा करने के लिए उन्होंने द्रविड़ संस्कृति को आधार बनाया. लोगों को समझाया कि समाजीकरण की बुनियाद पारस्परिक सहयोग और समर्पण पर टिकी होती है. पौराणिक ग्रंथों, महाकाव्यों आदि की रचना स्वार्थी ब्राह्मणों ने लोगों को भरमाने के लिए की है. जाति-व्यवस्था को दैवीय बताने वाले धर्मग्रंथों में शूद्रों और अस्पृश्यों के लिए अपमानजनक स्थितियां हैं—‘बौद्धों और जैनियों ने ब्राह्मणवाद द्वारा फैलाई गई कुरीतियों को कुछ समय के लिए समाप्त कर दिया था. उन्होंने बताया था कि सभी लोग बराबर हैं. आपसी प्रेम और भाईचारा ही असली ईश्वर हैं. ब्राह्मणों को वह स्वीकार नहीं हुआ. इसलिए उन्होंने उनके सभी कार्यों पर पानी फेर दिया.’4 लोगों को ब्राह्मणों द्वारा फैलाए गए भ्रमजाल से निकालकर मानवीय मूल्यों से जोड़ना, उनके भीतर सम्मानजनक जीवन जीने की चाहत पैदा करना पेरियार की प्रमुख चुनौती थी. फुले इसकी नींव बहुत पहले डाल चुके थे. ‘स्वाभिमान आंदोलन’ की शुरुआत का भी यही उद्देश्य था.

पेरियार आस्थावान व्यक्ति नहीं थे. उनका विश्वास ज्ञान-विज्ञान में था. अरस्तु की तरह वे भी मनुष्य को विवेकशील प्राणी मानते थे. बावजूद इसके उन्होंने धर्म की शक्ति को नकारा नहीं था. लेकिन उनका धर्म मानव-मात्र के कल्याण का उद्यम था, जिसमें किसी देवता या आत्मा-परमात्मा के लिए कोई स्थान नहीं था. आजीवन वे इस पर विचार करते रहे कि मनुष्य को धर्म और धर्मशास्त्रों के मकड़जाल से बाहर कैसे निकाला जाए! यह आसान काम नहीं था. क्योंकि मानव जीवन में धर्म की व्याप्ति केवल पूजा-पाठ या संस्कारों तक सीमित नहीं रहती. ऐसे लोग भी जो मंदिर नहीं जाते, पूजा-पाठ तथा दूसरे आडंबरों से दूर रहते हैं; और ऐसे भी जो अच्छे-खासे पढ़े-लिखे हैं—दिलो-दिमाग से दकियानूसी हो सकते हैं. लोकजीवन का हिस्सा बन चुके विभिन्न संस्कार, आचार-विचार और रूढि़यां, संस्कृति का अभिन्न हिस्सा मान लिए कर्मकांड यहां तक कि उनसे जुड़े किस्से-कहानियां भी—किसी न किसी रूप में धार्मिक जड़ता के संवाहक हैं. उनकी रचना जातिभेद और सामाजिक ऊंच-नीच को दैवीय सिद्ध करने के लिए की गई है. 2400 वर्ष पहले अरस्तु ने भी तो यही कहा था, ‘मनुष्य ने ही ईश्वर को रचा है. अपने रूपाकार में, और अपनी जीवनशैली के अनुरूप भी.’ ब्राह्मण खुद को सर्वोपरि मानते हैं. वे चाहते हैं कि शेष जनसमाज उनके इशारे पर नाचे. जो ऐसा नहीं करता उसे वे शाप देने की धमकी दिया करते थे. उनका गढ़ा हुआ ईश्वर भी खुद को भक्तों से ऊपर मानता था; जो उसकी चापलूसी(भक्ति) से आनाकानी करे, उसे वह दंड देने को उतावला रहता था.

बौद्ध धर्म के रास्ते सामाजिक शुचिता की वापसी का रास्ता पेरियार से पहले दक्षिण भारत में आइयोथि थास भी दिखा चुके थे. उनका मानना था कि दक्षिण की पेरियार जाति के लोग मूलतः बौद्ध हैं और वे दक्षिण के मूल निवासी हैं. आर्य हमलावरों ने उनके धर्म और संस्कृति को उनसे छीन लिया है. थॉस के प्रभाव में केरल की जाति इझ़वा अपना संबंध गौतम बुद्ध से वंश से जोड़ने लगी थी. मद्रास प्रेसीडेंसी का नाम द्रविड़नाडु करने की मांग के समय पेरियार ने भी कहा था कि मुस्लिम, ईसाई, आदि द्रविड़ और बौद्ध सभी द्राविड़ हैं.5 थॉस की भांति पेरियार भी ब्राह्मणवाद के कटु आलोचक थे. जातीय उत्पीड़न से मुक्ति के लिए उन्होंने तमिलवासियों से हिंदू धर्म को छोड़ने का आग्रह किया था. उसके पीछे भी बौद्ध धर्म की प्रेरणा थी. 13 जनवरी 1945 के ‘कुदी अरासु’ के अंक में उन्होंने लिखा था कि यदि अंग्रेजों ने हम पर शासन करने के लिए ‘बांटो और राज करो’ की नीति का अनुसरण किया था तो ठीक यही नीति आर्यों ने भी भारत के मूल निवासियों पर राज करने के लिए अपनायी थी. उन्होंने यहां के बहुसंख्यकों को पिछड़ों और अछूतों में बांट दिया. पेरियार का कहना था—‘विश्वासघातियों का शिकार मत बनिए….राम और कृष्ण जैसे नायक तथा गीता, रामायण जैसे धर्मग्रंथ, बौद्ध धर्म के प्रति हमारे विश्वास को मिटाने के रचे गए हैं.’ उन्होंने आगे कहा था—

‘आंबेडकर जब मद्रास आए थे तब मैंने उन्हें 1923 में भारी जनसभा के सामने दिए गए अपने भाषण के बारे में बताया था कि जब तक कोई रामायण का दहन नहीं करता, तब तक छूआछूत पर सार्थक प्रहार संभव नहीं है.’6 10 जनवरी 1947 को ‘कुदीअरासु’ में उन्होंने फिर लिखा था कि जैसे ‘बुद्ध और गुरुनानक वेदों को धर्मशास्त्रों को पूरी तरह मिथ्या बताते थे, केवल हम द्रविड़जन ही वैसा कहने का साहस कर पाते हैं.’7

27 मई 1953 को बुद्ध जयंती के अवसर पर पेरियार ने अपने अनुयायियों को उसे उत्सव की तरह मनाने का आवाह्न किया था. उन्होंने कहा था कि इस अवसर पर वे मूर्ति पूजा का बहिष्कार करें. विघ्नेश्वर, गणपति, गजपति, विनायक आदि कहे जाने वाले गणेश की मूर्तियों को तोड़कर बहा दें. बौद्ध जयंती वैदिक परंपरा के धुर विरोधी की जयंती है. इस देश में हजारों देवी-देवता है. इसलिए ऐसा व्यक्ति जो विवेक से काम लेता है, तर्क को महत्त्व देता है, जीवन के प्रति व्यावहारिक दृष्टिकोण रखता है तथा जिसे मनुष्यता में भरोसा है वह स्वयं ही बुद्ध कहलाने योग्य है. यह दिखाने के लिए कि मूर्ति केवल पत्थर का टुकड़ा है, उसमें कोई दैवी शक्ति नहीं है, पेरियार ने तमिलनाडु के कई शहरों में मूर्ति तोड़ो आंदोलन का नेतृत्व किया था. मूर्ति-पूजा और धार्मिक कर्मकांडों का बहिष्कार, सामाजिक कार्यक्रमों में ब्राह्मण पुरोहित की अनिवार्यता से मुक्ति, उनके ‘स्वाभिमान आंदोलन’ का महत्त्वपूर्ण हिस्सा था. ढाई हजार वर्ष पहले बुद्ध ने भी मूर्ति पूजा की निंदा की थी. धार्मिक कर्मकांडों, आडंबरों एवं जाति-आधारित भेदभाव की आलोचना करते हुए उन्होंने पंचशील और अष्ठांग मार्ग का प्रतिपादन किया जो व्यैक्तिक एवं सामाजिक जीवन की शुचिता पर जोर देता था. बुद्ध ने दिखाया था कि किसी भी समाज में शुभत्व की मौजूदगी, इसपर निर्भर करती है कि उसके सदस्य अपने जीवन में शुचिता एवं सौहार्द्र को लेकर कितने गंभीर हैं. उसके लिए किसी धर्माडंबर की आवश्यकता नहीं है. पेरियार के भाषणों का लोगों पर अनुकूल असर पड़ा. लोग धर्म के सम्मोहन से बाहर निकलने लगे. आंदोलनकारियों ने अपने-अपने घर से देवताओं की मूर्तियां निकाल फैंकी. तिरुचिरापल्ली के टाउन हॉल के सामने खुले मैदान में सैकड़ों लोगों ने मूर्तियों को तोड़ डाला.

धर्म के प्रति विशेष आस्था न होने के बावजूद पेरियार बुद्ध को अपने विचारों के करीब पाते थे. वे चाहते थे कि लोकमानस बुद्ध के विचारों को जाने-समझे. इसके लिए उन्होंने 23 जनवरी 1954 को इरोद में एक सम्मलेन का आयोजन किया था. सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए सीलोन विश्वविद्यालय, श्रीलंका के बौद्ध संस्कृति केंद्र के प्रोफेसर जी. पी. मल्लाल शेखर ने कहा था कि बुद्ध के विचारों के अनुसरण द्वारा अंतरराष्ट्रीय शांति की स्थापना की जा सकती है. उन्होंने पेरियार द्वारा समाज सुधार विशेषरूप से धार्मिक जकड़बंदी के प्रयासों से बाहर लाने के प्रयासों की सराहना की थी. उनका मानना था कि तमाम विरोधों एवं अवरोधों के बावजूद समाज सुधार का पेरियार का रास्ता बुद्ध के विचारों से मेल खाता है. सम्मेलन में जाति प्रथा पर भी चिंता व्यक्त की गई थी. ‘अखिल भारतीय शोषित जाति संघ के सचिव और सांसद राजभोज ने सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा था कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था में दलित, शूद्र और अन्य जातियां बहुसंख्यक होने के बावजूद तरह-तरह के शोषण की शिकार रही हैं. बौद्ध धर्म जाति-प्रथा को नकारता है. उसके अनुसार समाज में सभी बराबर हैं. जाति-व्यवस्था हिंदू धर्म का कलंक है. सबसे पहले बुद्ध ने ही जाति-प्रथा और धर्माडंबरों का विरोध करते हुए, सामाजिक कुरीतियों को दूर करने में सफलता प्राप्त की थी. केवल बौद्ध धर्म से ही इस समस्या का समाधान संभव है. सम्मेलन में पेरियार की प्रशंसा करते हुए कहा गया था कि उन्होंने ब्राह्मणवाद के खात्मे के लिए कई आंदोलन चलाए हैं. उनके कारण समाज में जाति-विरोधी चेतना का जन्म हुआ है—‘बुद्ध की नीतियां ही आपकी और ‘स्वाभिमान आंदोलन’ की नीतियां हैं.’8 उस अवसर पर बुद्ध की प्रतिमा का अनावरण किया गया था. हमेशा की तरह उस सम्मेलन में भी पेरियार ने हिंदू धर्म-दर्शन पर हमला बोलते हुए बौद्ध धर्म की प्रशंसा की थी—

‘हम जो मेहनती और कामगार लोग हैं, हमें नीची जाति में डाल दिया गया है. हम भुखमरी के शिकार हैं. हमारे पास पहनने के लिए वस्त्र नहीं हैं. हमारे पास रहने को घर भी नहीं हैं. लेकिन ब्राह्मण जो कोई काम नहीं करते, उन्हें सभी प्रकार के सुख और मान-सम्मान हासिल है.’9

सम्मेलन में लोगों को संबोधित करते हुए पेरियार ने कहा था—

‘‘केवल तुम्हीं वे लोग हो जिन्होंने ये मंदिर बनाए हैं. केवल तुम्हीं हो जिन्होंने इनके लिए दान दिया है. यदि ऐसा है तो क्या हम ईश्वर को जो हमें नीची जाति का और अछूत बताता है, ऐसे ही छोड़ सकते हैं? ‘कृतघ्न ईश्वर! केवल मैंने ही तेरे लिए मंदिर और तालाब बनवाए हैं. केवल मैंने ही तुझपर अपना पैसा बहाया है.’ क्या तुम यह नहीं पूछोगे कि तुम नीची जाति के क्यों हो? तुम्हें छूने में हर्ज क्या है? तुम केवल ब्राह्मण के कहे पर विश्वास करते हो कि यदि तुम ऐसे सवाल उठाओगे तो ईश्वर तुमसे नाराज हो जाएगा.’’10

इरोद सम्मेलन में गौतम बुद्ध के विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए एक प्रस्ताव स्वीकृत किया गया था. उसमें कहा गया था—‘आर्यों द्वारा हिंदू धर्मशास्त्रों, पुराणों, महाकाव्यों की रचना सांस्कृतिक वर्चस्व कायम रखने तथा द्रविड़ों के अपमान, अवमूल्यन तथा उन्हें भरमाए रखने के लिए की गई है, उनका सबका नाश होना चाहिए.’ उसी सम्मेलन में स्वीकृत एक अन्य प्रस्ताव में कहा गया था—‘बुद्ध का जीवन तथा उनके धर्मोपदेश ईश्वर, आत्मा, स्वर्ग-नर्क, भाग्यवाद, धार्मिक परंपराओं तथा उत्सवों की मिथ्याचार को उजागर करती हैं; तथा भेदभाव रहित, आपसी सहयोग और बराबरी पर आधारित सामाजिक संरचना का समर्थन करती हैं, तमिलनाडु के सभी लोगों, जनसंगठनों, संस्थाओं और समूहों को चाहिए कि वे उनके विचारों को, समस्त मानव-समुदाय तक पहुंचाने के लिए आगे आएं.’

पेरियार की बातों को सुनकर रोज नए-नए लोग उनके आंदोलन से जुड़ने लगे. धार्मिक आयोजनों, कर्मकांडों तथा धर्मशास्त्रों में कही गई बातों पर सवाल उठाए जाने लगे. इससे सनातनी हिंदुओं को डर सताने लगा था. वे जानते थे कि धर्म की नींव अज्ञात डर पर टिकी है. मूर्तियों के प्रति श्रद्धा भी उसी डर का विस्तार है. यदि वह डर ही नहीं रहा तो लोग धर्म की गिरफ्त से बाहर होने लगेंगे. पेरियार लगातार वैज्ञानिक सोच का प्रचार-प्रसार कर रहे थे. सनातनी हिंदुओं की निगाह में धर्मशास्त्रों आलोचना नास्तिकता थी. स्वाभिमान आंदोलन की राह में अवरोध पैदा करने के लिए उन्होंने एक संगठन का गठन किया था. उस संगठन ने पेरियार तथा उनके दो सहयोगियों टी. पी. वेदाचलम और एम. आर. राधा के विरुद्ध धारा 295 के अंतर्गत मुकदमा दायर कर दिया. वेदाचलम वरिष्ठ अधिवक्ता थे, जबकि एम. आर. राधा जाने-माने अंधविश्वास विरोधी कार्यकर्ता. पेरियार और उनके सहयोगियों पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने जनभावनाओं को आहत करने का काम किया है. मामले की पहली सुनवाई सत्र न्यायालय में हुई. अगली सुनवाई के लिए मुकदमा जिला सत्र न्यायालय में पहुंचा. दोनों अदालतों का निर्णय पेरियार के पक्ष में गया. मगर पेरियार के दुश्मन इतने से शांत होने वाले न थे. उन्होंने मद्रास उच्च न्यायालय में अपील दायर कर दी. अपील की सुनवाई के बाद, 13 अक्टूबर 1954 को न्यायमूर्ति एन. सोम सुंदरम ने उसे यह कहकर खारिज कर दिया कि वादी पक्ष की यह आशंका कि पेरियार तथा उनके सहयोगियों के कृत्य से जनभावनाएं आहत होती हैं—सही मानी जा सकती है. लेकिन पेरियार और उनके साथियों ने जो मूर्तियां तोड़ीं उन्हें उन्होंने या तो स्वयं बनाया था अथवा बाजार से खरीदा गया था. वे मंदिर में पूजी जाने वाली मूर्तियां नहीं थीं. ऐसी मूर्तियों को तोड़ना कानून अपराध नहीं है.

तमिल समाज में जागृति लाने, उसे रूढि़मुक्त करने तथा आत्माभिमान की भावना जागृत करने के लिए पेरियार ने ‘स्वाभिमान आंदोलन’ का सूत्रपात किया था. उसी के एक कार्यक्रम में जनवरी 31, 1954 को उन्होंने मद्रास(अब चैन्नई) में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा कि बुद्ध के विचार हमारे अपने विचारों को लागू करने, आगे बढ़ाने तथा समाज में बढ़ रही विकृतियों के शमन की दिशा में बहुत ही उपयोगी हैं. उसी वर्ष पेरियार अपनी पत्नी तथा कुछ मित्रों के साथ मलेषिया और मयामार गए थे. वहां मेंडले में बुद्ध की 2500वीं जयंती के अवसर पर उनकी भेंट डॉ. आंबेडकर से हुई थी. उस समय तक डॉ. आंबेडकर बौद्ध धर्म अपनाने का निर्णय ले चुके थे. उन्होंने पेरियार से भी वैसा ही करने को कहा था. इसपर पेरियार ने डॉ. आंबेडकर से आग्रह किया था कि वे धर्मांतरण से बचें. क्योंकि ऐसा करके वे हिंदू धर्म की आलोचना का अधिकार खो देंगे. जड़वादी हिंदू दावा करने लगेंगे कि किसी गैर हिंदू को उनके धर्म की आलोचना का अधिकार नहीं है. लोग भी उनकी बात पर आसानी से विश्वास कर लेंगे. अपने धर्मांतरण के बारे में पेरियार का कहना था कि वे धर्मांतरण के बजाए हिंदू धर्म के भीतर रहकर ही उसकी आलोचना करते रहेंगे. हिंदुओं के धर्मांतरण के बारे में उनकी स्पष्ट राय थी—

‘यदि कोई हिंदुओं द्वारा इस्लाम, ईसाई, बौद्ध, जैन धर्म की ओर धर्मांतरण के आंकड़ों का विश्लेषण करे तो उनमें सर्वाधिक संख्या दलितों की होगी. वे धर्मांतरण को इसलिए अपनाते हैं क्योंकि हिंदू धर्म उन्हें बहुत ही उत्पीड़क नजर आता है. धर्मांतरण द्वारा वे जातीय निरंकुशता से बाहर निकल जाना चाहते हैं. उनमें से बहुत से लोग मानते हैं कि आस्था के अंतरण द्वारा वे अपनी जीवनशैली और आर्थिक स्थिति में सुधार ला सकते हैं. दूसरे शब्दों में धर्मांतरण उन्हें घृणित कर्मवाद के दुश्चक्र से मुक्ति दिला सकता है. धर्मांतरण उनमें बेहतरी की उम्मीद जगाता है. उनके भीतर बेहतर पहचान और संपत्ति के बारे में नई चेतना का संचार करता है.’11

उन दिनों चैन्नई में ब्राह्मण अपने स्वामित्व वाले होटलों के आगे ‘ब्राह्मण होटल’ का बोर्ड लगाते थे. इससे लगता था कि ब्राह्मण बाकी जातियों से आगे हैं. पेरियार उस प्रवृत्ति को रोकना चाहते थे. इसलिए उन्होंने उसके विरुद्ध आंदोलन छेड़ दिया. 5 मई 1957 को एक ब्राह्मण होटल के सामने से प्रतीकात्मक आंदोलन की शुरुआत हुई. 22 मार्च 1958 तक उनका आंदोलन लगातार चलता रहा. पेरियार के साथ 1010 आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया. आखिरकार उनकी जीत हुई. पूरे राज्य में होटल मालिकों को अपने बोर्ड से ‘ब्राह्मण’ शब्द हटाना पड़ा.

फरवरी 1959 में पेरियार उत्तर भारत की यात्रा पर निकले. धार्मिक कूपमंडूकता के मामले में उत्तरी और दक्षिणी भारत में आज भी बहुत अंतर नहीं है. उत्तर भारत की यात्रा के दौरान पेरियार ने कानपुर, लखनऊ और दिल्ली में बड़ी जनसभाओं को संबोधित किया था. उस समय तक डॉ. आंबेडकर बौद्ध धर्म अपना चुके थे और जातीय उत्पीड़न और अनाचार से बचने के लिए दलित और पिछड़ी जातियों के काफी लोग बौद्ध धर्म को अपनाने लगे थे. पेरियार ने इसकी चर्चा भी अपने भाषण में की थी. उसके बारे में एक संक्षिप्त रिपोर्ट ‘विदुथलाई’ के 21 फरवरी 1959 के अंक में प्रकाशित हुई थी. उनका कहना था—

‘शूद्रों और पंचमों, जिन्हें आजकल पिछड़ी जाति और दलित कहा जाता है—के अवमूल्यन को रोकने के लिए हमें आर्यों द्वारा गढ़े गए धर्म, धर्मशास्त्रों एवं ईश्वर का बहिष्कार करना होगा. जब तक इनकी सत्ता रहेगी, हम जाति को नहीं मिटा सकते. इसी के लिए डॉ. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाया था. अपने अलावा उन्होंने और बहुत से लोगों को धर्मांतरण कराया था. इसलिए सभी हिंदू धर्म, ईश्वर और जाति से मुक्ति हेतु बौद्ध धर्म अपनाने के लिए आगे आना चाहिए.’

पेरियार के अनुसार केवल बुद्ध ही थे जिन्होंने समाज में व्याप्त तरह-तरह की ऊंच-नीच के विरोध में सवाल उठाए थे—

‘‘क्या (बुद्ध के अलावा) किसी और ने पूछा था कि समाज में लंबे समय से जातीय भेदभाव क्यों मौजूद है? बुद्ध ने यह सवाल उठाया था. वे राजा के बेटे थे. उन्होंने कई चीजों पर सवाल उठाए थे. उन्होंने पूछा—‘वह आदमी बूढ़ा क्यों है?’ ‘वह व्यक्ति नौकर क्यों था? वह अंधा क्यों है? बुद्ध ने पूछा था—‘वह आदमी नीच जाति का क्यों है?’ उन्होंने बताया—‘उसे भगवान ने ही ऐसा बनाया है?’ इसपर बुद्ध ने सवाल किया—‘वह ईश्वर कहां है जिसने इसे बनाया है?’ तब वे आत्मा का सिद्धांत बघारने लगे. तब बुद्ध ने पूछा—‘आत्मा क्या है? क्या किसी ने उसे देखा है?’….बुद्ध के मुख्य सिद्धांत हैं—

‘निहित सत्य को जानने के लिए प्रत्येक वस्तु का अपने विवेकानुसार भली-भांति विश्लेषण करो.’ तथा ‘यदि तुम्हारा विवेक उसे सच मानता है, तभी उसपर विश्वास करो.’ पेरियार ने आगे कहा था—‘ईश्वर, आत्मा, देवता, स्वर्ग, नर्क, ब्राह्मण, शूद्र, पंचम यदि ये बातें तुम्हारी समझ में नहीं आती हैं तो इनपर विश्वास मत करो. ये सब काल्पनिक शब्द हैं. कुछ भी स्वीकारने से पहले अपनी सहज बुद्धि का उपयोग करो. ईश्वर ने ऐसा कहा है, वेद ऐसा कहते हैं या मनुस्मृति में यह सब लिखा है—ऐसी बातों पर विश्वास वृथा है. जिसे तुम्हारी बुद्धि स्वीकारती है, केवल उसी पर भरोसा करो.’’12

पेरियार का विश्वास किसी भी धर्म में नहीं था. बावजूद इसके ऐसे कई अवसर आए जब उन्होंने बौद्ध धर्म की प्रशंसा की. अपनी मृत्यु से कुछ महीने पहले उन्होंने ‘ईश्वर और मनुष्य’ विषय पर सारगर्भित भाषण दिया था. भाषण में ईश्वर की अवधारणा को नकारा गया था, साथ ही विभिन्न धर्मों पर चर्चा की थी. उसमें बौद्ध धर्म की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा था—‘यदि हम बौद्ध धर्म को कोई और नाम देना चाहें तो हम उसे ‘बुद्धि’ यानी ‘ज्ञान का धर्म’ कह सकते हैं. बौद्ध धर्म को ‘ज्ञान का धर्म’ या ‘ज्ञानमय धर्म’ क्यों कहा जाएगा? क्योंकि बाकी जितने भी धर्म हैं, वे सभी ईश्वर केद्रित हैं, जबकि बौद्ध धर्म किसी ईश्वर को मान्यता नहीं देता. यह इसलिए है कि कोई भी ऐसा ‘ज्ञानमय धर्म’ या ‘ज्ञान का धर्म’ नहीं हो सकता जो ईश्वर पर विश्वास करता हो. यही कारण है कि बौद्ध धर्म को ‘विवेकशील धर्म’ कहा है. उस भाषण में पेरियार ने बौद्ध धर्मावलंबियों की यह कहकर आलोचना की थी कि वे भी बौद्ध धर्म को ‘ज्ञान के धर्म’ के रूप में अंगीकार करने में विफल रहे हैं. पेरियार ने ऐसा क्यों कहा था? इस बारे में उनका कहना था कि किसी भी सामान्य—‘धर्म को अपनी पहचान बनाने के ईश्वर में विश्वास करना आवश्यक है. इसके लिए उसके अनुयायियों को कुछ बकवास कहानियों, रीति-रिवाजों और कर्मकांडों पर विश्वास करने को कहा जाता है. बौद्ध धर्म कर्मकांडों को निरर्थक विश्वासों का खंडन करता है. बावजूद इसके अधिकांश बौद्ध मतावलंबी उसी जीवन-पद्धति को अपनाए हुए हैं. उनकी पूजा पद्धति भी उसी प्रकार की है.’ धर्म और जाति-व्यवस्था पर प्रहार करते हुए अपने 25-26 दिसंबर 1958 के भाषण में पेरियार ने पुनः दोहराया था कि ऐसा ईश्वर जिसे लगता है कि वह दलितों और शूद्रों के छूने भर से अपवित्र हो जाएगा, को मंदिर में रहने का कोई अधिकार नहीं है. ऐसी मूर्ति को तुरंत हटाकर नदी किनारे डाल देना चाहिए, ताकि लोग उसका इस्तेमाल कपड़े धोने के लिए कर सकें. एक अवसर पर उन्होंने कहा था—

कहा जाता है कि ईश्वर ने जाति की रचना की है. यदि यह सच है तो सबसे पहली जरूरत इस बात ही है कि ऐसे ईश्वर को ही नष्ट कर दिया जाए. यदि ईश्वर इस क्रूर प्रथा से अनभिज्ञ है तो उसे और भी जल्दी खत्म किया जाना चाहिए. यदि वह इस अन्याय से रक्षा करने या इसपर रोक लगाने में असमर्थ है तो इस दुनिया में बने रहने का उसे कोई अधिकार नहीं है.

4

पेरियार ने गौतम बुद्ध को विश्व के सबसे पहले क्रांतिधर्मा विचारक स्वीकार किया था. कारण था कि बुद्ध ने ईश्वर, आत्मा-परमात्मा जैसी अतार्किक मान्यताओं को चुनौती दी थी. उन्होंने कहा था—‘आमतौर पर ईश्वरीय विश्वास के आधार पर मनुष्यों को मूर्ख बनाया जाता है. मैं नहीं जानता कि मानवमात्र की इस अज्ञानता का पर्दाफाश करने के लिए अभी तक कोई विचारक आगे क्यों नहीं आया है? यहां तक कि सुशिक्षित बुद्धिजीवी भी इस मामले में आलसी रहे हैं. यदि हम दुनिया के पहले दार्शनिक की खोज करना चाहें तो हम कह सकते हैं कि वह एकमात्र गौतम ही बुद्ध थे. हमारा इतिहास भी यही बताता है. उनके बाद पश्चिम में जन्मा एकमात्र विचारक सुकरात था. उनके दार्शनिक विचारों को भली-भांति नहीं समझा गया.’13

उस ज्ञानमय धर्म या ‘बुद्धि के धर्म’ को नष्ट कर दिया गया. कैसे नष्ट कर दिया गया? पेरियार के शब्दों में, ‘उन्होंने(ब्राह्मणों ने) हिंसक रास्ते अपनाए. बौद्धों का कत्लेआम किया गया. उनके मठों को मिट्टी में मिला दिया गया.’14 पेरियार किसी भी प्रकार की व्यक्ति पूजा के विरोधी थे. मगर बुद्ध के विचार उनकी वैचारिक चेतना के करीब थे. उनके प्रचार-प्रसार के लिए वे बुद्ध जयंती मनाने के पक्ष में पक्ष थे. परंतु वे नहीं चाहते थे कि बुद्ध जयंती के नाम पर होने वाले उत्सव महज कर्मकांड बनकर रह जाएं. इसलिए ‘बुद्ध जयंति क्यों मनाई जाए? लोग बुद्ध के जन्म को उत्सव के रूप में क्यों लें? पेरियार इन सवालों पर भी विचार करते हैं. उनके अनुसार बुद्ध जयंती बनाने का आशय यह नहीं है कि लोग बुद्ध-प्रतिमा के आगे खड़े होकर कपूर, नारियल, फल-फूल वगैरह लेकर उसकी पूजा-अर्चना करें. उनके अनुसार—‘हम बुद्ध के जीवन से शिक्षा ले सकते हैं और उसे अपने जीवन में उतार सकते हैं. मैं उनसे नास्तिक के रूप में प्रेरणा लेता हूं. यदि नास्तिक का अभिप्रायः है वेदों, धर्मशास्त्रों और पुराणों में अविश्वास है, तो निश्चित रूप से मैं नास्तिक ही हूं.’ पेरियार को डर था कि बुद्ध जयंती के बहाने ऐसे व्यक्ति जो वेद, शास्त्र तथा पुराणों में आस्था रखते हों, अपनी बात को घुमा-फिराकर लोगों के सामने रख सकते हैं. पेरियार के अनुसार जातिभेद के आधार पर दूसरों को कमतर समझने वाला, निरंकुश आचरण का समर्थक व्यक्ति ही ऐसा कर सकता है.

पेरियार के अनुसार बुद्ध न तो संत थे, न ही महात्मा. असल में वे ऐसे बुद्धिवादी चिंतक थे जिन्होंने प्राचीनकाल में हिंदू ऋषियों का उनके अनर्गल कर्मकांडों और आडंबरों के आधार पर विरोध किया था. इसलिए बौद्ध धर्म प्रचलित अर्थों में धर्म नहीं है. जो लोग बौद्ध धर्म को धर्म मानते हैं, वे गलत हैं. धर्म के लिए उसके केंद्र में ईश्वर का होना आवश्यक है. इसके अलावा स्वर्ग, नर्क, मोक्ष, भाग्य, पाप-पुण्य आदि अवधारणाओं पर विश्वास भी आवश्यक है. बड़े धर्मों का काम किसी एक ईश्वर नहीं चलता. उनमें अनेक ईश्वर भी हो सकते हैं. उन ईश्वरों के घर-परिवार, आवास, आने-जाने के स्वतंत्र साधन, पत्नियां और बच्चे भी हो सकते हैं. भारतीय तो ऐसे ईश्वरों को ही पहचानते हैं. 1857 के सैनिक विद्रोह, जिसे कुछ लेखक भारत का पहला स्वाधीनता संग्राम मानते है, की जाति के संदर्भ में समीक्षा करते समय पेरियार ने बौद्ध धर्म के साथ-साथ जैन धर्म की प्रशंसा की थी—

‘इतिहास गवाह है कि जिन बौद्ध और जैन श्रमणों ने हमारे लोगों को सद्व्यवहार और ज्ञान की महत्ता की शिक्षा देनी चाही, तमिल राजाओं ने उनका उत्पीड़न किया गया. उन्हें तरह-तरह के मामलों में फंसाया गया और कत्लेआम किया गया. यह दर्शाता है कि हमारे देश पर निरंकुश और असभ्य शासकों का राज रहा है.’15

बुद्ध के अनुसार मनुष्य का ईश्वर के प्रति आकर्षित होना आवश्यक नहीं है. बौद्ध धर्म अपने मानवतावादी आचरण के लिए बाकी धर्मों से बेहतर सिद्ध होता है. बुद्ध चाहते थे कि मनुष्य केवल मनुष्य का ध्यान करे. बुद्ध ने न तो स्वर्ग का महिमा-मंडन किया, न ही नर्क से लोगों को डराया. उन्होंने मनुष्य के आचरण पर जोर दिया. उसके लिए अष्ठांग मार्ग प्रस्तुत किया, जिसे आगे चलकर लगभग सभी धर्मों ने धार्मिक शुचिता के नाम पर अपनाया. पेरियार बुद्ध की प्रशंसा करते हैं. लेकिन वे उनके सम्मोहन से ग्रस्त नहीं हैं. न ही आस्था के बदले वे अपने विवेक को गिरवी रखना चाहते हैं, जैसी कि ब्राह्मण धर्म के अनुयायी अपेक्षा रखते हैं. अपितु वे लिखते हैं कि कोई बात इसलिए मान्य नहीं होनी चाहिए कि उसे किसी महात्मा ने कहा है. या उसे बहुत से लोग मानने वाले हैं. अपितु मनुष्य को अपने विवेक की कसौटी पर जो खरा प्रतीत हो, उसी को स्वीकार करना चाहिए. उसके लिए आवश्यक है कि हर सत्य या अच्छी लगने वाले तथ्यों को वह अपनी कसौटी पर परखे. उनके अनुसार बुद्धिज्म केवल गौतम बुद्ध की जयंतियों को मनाना नहीं है. हमारे लिए बुद्ध होने का अभिप्राय बुद्धि, विवेक बुद्धि का साथ होना है. अपने तर्क-सामथ्र्य का साथ होना है. पेरियार के अनुसार—

‘बौद्ध धर्म किसी भी प्रकार के श्रेष्ठतावाद(ब्राह्मणवाद) के लिए एटमबम के समान है.’16

गौतम बुद्ध का जन्म करीब 2500 वर्ष पहले हुआ था. उस समय ब्राह्मण यद्यपि धर्म और सभ्यता के दावेदार बने हुए थे, मगर यज्ञादि में जिस प्रकार हजारों बलियां एक साथ वे चढ़ा देते थे, जाति के नाम पर अपने ही धर्म-बंधुओं के साथ दमन और अवमाननापूर्ण वर्ताब करते थे, उसे देखते हुए उनका आचरण असभ्य और जंगली प्राणियों जैसा था. बुद्ध ने उन सबका विरोध किया. बुद्ध का रास्ता आसान नहीं था. देखा जाए तो उन दिनों ज्ञान और तर्क का पक्ष लेने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए अपनी बात कह पाना आसान नहीं था. परंतु बुद्ध अपने बातों पर अडिग रहे. वैदिक हिंसा के स्थान पर उन्होंने मनसा-वाचा-कर्मणा अहिंसा का पक्ष लिया. पेरियार के अनुसार उनकी ताकत उनके शब्दों में थी. पेरियार की तरह बुद्ध को भी अपने जीवन में आलोचनाओं का सामने करना पड़ा था. बुद्ध के बाद उनके आलोचकों ने मुखर स्वर में उनकी आलोचना करना आरंभ कर दिया था. पुराणों के बहाने प्राचीन धर्म को पुनर्जीवित करने की कोशिश की जाने लगी थी. जाहिर है, बुद्ध के बाद उनकी आलोचना में वही लोग लगे थे जो धर्म के नाम पर कर्मकांड और तर्क के स्थान पर तंत्र-मंत्र की वापसी चाहते थे. ऐसे ही लोग पेरियार का विरोध करते आए हैं.

रामायण को हिंदु नैतिक जीवन का पाठ पढ़ाने वाले ग्रंथ के रूप में देखते हैं. पेरियार के अनुसार रामायण की रचना बौद्ध धर्म के प्रभाव को मद्धिम करने के लिए, उसकी ख्याति से उबरने की कोशिश में की गई थी. बुद्ध का धर्म ताकत का धर्म नहीं था. धर्म के प्रचार-प्रसार का जिम्मा उन्होंने भिक्षुओं और श्रमणों को सौंपा हुआ था. लेकिन जातियों में बंटे हिंदू धर्म के लिए इस तरह के समर्पित धर्म-योद्धा मिलने संभव नहीं थे. जाति व्यवस्था के नाम पर ब्राह्मणों ने खुद ही निचली जातियों को धार्मिक कार्यों में सहभागिता से अलग-थलग किया हुआ था. ऐसे में शक्ति के माध्यम से ‘धर्म-विजय’ दिखना ही एकमात्र रास्ता था. रामायण यही काम करती है. अशोक ने अपने बेटे और बेटी को बौद्ध धर्म की ध्वजा फहराने के लिए श्रीलंका भेजा था. वाल्मीकि के राम आर्य अपनी पत्नी को छुड़ाने के बहाने आर्य-धर्म की पताका फहराने के लिए लंका-विजय करते हैं. बुद्ध और अशोक ने जो धम्मविजय की थी, उसका प्रमाण आज श्रीलंका में बौद्ध धर्म की उपस्थिति है. वहां 70 प्रतिशत लोग आज भी बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं. उसके अलावा चीन, जापान, तिब्बत जैसे देषों में बौद्ध धर्म आज भी कायम है. जबकि हिंदू धर्म भारत से बाहर अपनी छाप छोड़ पाने में असफल रहा. पेरियार के अनुसार—

‘बुद्ध के पहले राम-कथा छोटी-सी कहानी थी. बौद्ध धर्म की लोकप्रियता का सामना करने के लिए उसमें बाद में भारी जोड़-तोड़ की गई. बौद्धों और जैनियों को नास्तिक, हत्यारा, डाकू, वैदिक संस्कृति का दुश्मन आदि कहा गया. पेरियार के शब्दों में शैव शिव से प्रार्थना करते हैं कि वह उन्हें शक्ति दे ताकि वे बौद्धों की पत्नियों के साथ व्याभिचार कर सकें.’17

पेरियार के अनुसार 75 प्रतिशत से अधिक पुराणों का लेखनकाल बुद्ध से बाद का है. पाश्चात्य विद्वानों का भी यही मत रहा है. बुद्ध के तर्कसंगत उपदेशों का प्रतिवाद करने के लिए पुराण लेखकों ने जिन्हें ऋषि कहा जाता था, अवतारवाद की परिभाषा गढ़ी. उन्होंने कृष्ण को मुख्य देवता के रूप में चित्रित किया. उसका एक ही उद्देश्य था, लोगों को ब्राह्मणवाद की ओर आकर्षित करना. चमत्कारपूर्ण वर्णन जनसाधारण को हमेशा ही लुभाता आया है. गीता की रचना और भी बाद में हुई. उसके बाद ही उसे महाभारत में जोड़ा गया. लोकमानस में बुद्ध की प्रतिष्ठा को देखते हुए ब्राह्मणों ने मजबूरी में उनकी प्रषंसा की. अवतारवाद को संरक्षण देने के लिए बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित किया गया. उसके बहाने सनातनी हिंदू पुराणों के लेखनकाल को बुद्ध से बहुत पीछे तक ले जाते हैं. इस काम में संस्थाएं भी पीछे नहीं हैं—‘यह कहते हुए कि ब्रिटिश विद्वानों द्वारा लिखे गए इतिहास पर विश्वास नहीं किया जाना चाहिए, उत्तर भारत में भारतीय विद्या भवन ने मूर्खतापूर्ण धार्मिक आख्यानों और अजनतांत्रिक धर्मशास्त्रों पर पर लिखना जारी रखा. के. एम. मुंशी उसके अध्यक्ष थे. डॉ. राधाकृष्णन तथा अरबपति बिरला उसके सदस्य थे. उन्होंने ‘वैदिक युग’ को लेकर पुस्तक तैयार की, जिसमें के. एम. मुंशी का बड़ा योगदान था. उन्होंने भी माना था कि प्राचीन युग असभ्य था. पुराण और महाकाव्य आदि ग्रंथ इतिहास नहीं हैं….वह सब कल्पना की उपज है. ‘व्यास’ शब्द का अर्थ किस्सागो है. पुराणों ने लोगों के दिमाग पर कब्जा कर लिया और वे उनपर शासन करने लगे. हमारी समस्याओं का मूल कारण यही है.’

 

आजीवक दर्षनों के साथ-साथ बौद्ध, जैन दर्षन और सिख धर्म ने भी वेदों को प्रामाण्य मानने से इन्कार कर दिया था. ये धर्म-दर्षन किसी ईश्वर या आत्मा-परमात्मा पर विश्वास नहीं करते. इसलिए ब्राह्मण ग्रंथों में बौद्ध और जैन दोनों दर्शनों नास्तिक कहा गया है. एक स्थान पर पेरियार नास्तिक की परिभाषा करते हैं. उनके अनुसार बुद्ध सामान्य संज्ञा है. किसी भी व्यक्ति को जो बुद्धि का प्रयोग करता है, उसे बुद्ध कहा जा सकता है. ‘निश्चित रूप से मैं भी एक बुद्ध हूं. मैं ही क्यों, हम सभी जो तर्क और बुद्धि-विवेक के आधार पर फैसले करते हैं—बुद्ध हैं.’ इसी तरह सिद्ध वह व्यक्ति है जो अपनी ज्ञानेंद्रियों पर नियंत्रण रख सकता है. वैष्णव और शैव किसी न किसी देवता को मानते हैं. यही स्थिति दूसरे संपद्रायों की है, वे भी किसी न किसी देवता में श्रद्धा रखते हैं. जहां देवता नहीं हैं, वहां गुरु है जो परोक्ष रूप में साकार या निराकार देवता से मिलवाने का दावा करता है. केवल बौद्ध धर्म ऐसा है जिसमें कोई केंद्रीय देवता नहीं है. न ही वह जीवन से इतर किसी सुख की दावेदारी करता है. वह किसी भी प्रकार के ईश्वर, आत्मा, लोक-परलोक, मोक्ष अथवा सनातनवाद को नकारता है. नास्तिक शब्द भी इसके करीब है. नास्तिक वह है जो आत्मा परमात्मा के अस्तित्व को नकारता है; संसार और जीवन के बारे में बुद्धिसंगत निर्णय लेने का समर्थन करता है. ब्राह्मणवादी मूर्ति पूजा का विरोध करने वाले को भी नास्तिक कहकर धिक्कारने लगते हैं. पेरियार के अनुसार नास्तिक होना, सही मायने में मनुष्य होना है. ऐसा मनुष्य जो न केवल अपने ऊपर अपितु पूरी मनुष्यता पर विश्वास रखता है.

भारतीय समाज धर्म के अलावा जाति के शिकंजे में भी फंसा हुआ है. ये दोनों ही तर्क और मानवीय विवेक के विरोधी है. इनकी ताकत मनुष्य की अज्ञानता में निहित है. इसलिए घूम-फिरकर वे आस्था और विश्वास पर लौट आते हैं. तयशुदा मान्यताओं पर तर्क करने और सवाल उठाने से उन्हें परेशानी होती है. इसलिए वे चाहते हैं कि अपनी विवेक-बुद्धि को बिसराकर मनुष्य केवल उनके कहे का अनुसरण करे. वेद, पुराण, गीता, रामायण आदि धर्मग्रंथों में जो लिखा है, उनपर आंख मूंदकर विश्वास कर लिया जाए. यही अतीतोन्मुखी दृष्टि ब्राह्मणवाद है; जो बार-बार पीछे की ओर ले जाती है और मानव-बुद्धि की विकासयात्रा का निषेध करती है. पेरियार इससे आजन्म जूझते रहे. इसके लिए उन्होंने किसी धर्म, व्यक्ति या राष्ट्र की परवाह तक न की. खुलकर कहा कि—

‘मैं मानव-समाज का सुधारक हूं. मैं किसी देश, ईश्वर, धर्म, भाषा अथवा राज्य की परवाह नहीं करता. मेरे सरोकार केवल मानवमात्र के कल्याण एवं विकास को समर्पित हैं.’ यही संकल्प क्रांतिधर्मी पेरियार तथा उनके विचारों को समसामयिक और प्रासंगिक बनाता है.

 

ओमप्रकाश कश्यप

 

संदर्भ:

1 जाति मदे च अतिमानिता च लोभो च, दोसो च मदो च मोहो

ऐते अवगुणा येसुब संति सब्बे तानीष खेत्तानि अयेसलानि

जाति मदो च अतिमानिता च लोभो च, दोसो च मदो च मोहो

ऐते अवगुणा येसुब न संति सब्बे तानीष खेत्तानि सुयेसलानि—मातंग जातक-497

  1.   अंबट्ठसुत्त, दीघनिकाय, 1/3
  2.   पेरियार, 1947 में सलेम कालिज में ‘हिंदू दर्शन’ पर दिया गया व्याख्यान
  3.   कुदी अरासु, 15 अगस्त 1926
  4.   कुदीअरासु, 2 दिसंबर, 1944
  5.   पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पृष्ठ-208.
  6.   पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पृष्ठ-227
  7. विदुथलाई, 14 मार्च 1954.
  8. विदुथलाई, 14 मार्च 1954, पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पृष्ठ-265
  9. विदुथलाई, 14 मार्च 1954, पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पृष्ठ-265
  10. छूआछूत पर पेरियार के विचार, मीना कंडास्वामी द्वारा तमिल से अंग्रेजी में अनूदित.
  11. विदुथलाई, 19 अप्रैल 1956,पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पेज-274-75
  12. कलेक्टिड वर्क्स आफ पेरियार, पृष्ठ-152
  13. कलेक्टिड वर्क्सआफ पेरियार, पृष्ठ-173
  14. विदुथलाई, 15 अगस्त 1957, पृष्ठ-300
  15. पेरियार आन बुद्धिज्म, रामास्वामी पेरियार, राम मनोहरन के आलेख ‘फ्रीडम फ्राम गाड: पेरियार एंड रिलीजन’ से उद्धृत
  16. कलेटिक्ट वर्क आफ पेरियार, पृष्ठ-306-307

 

 

भारतीय नवजागरण के पुरोधा : स्वामी अछूतानंद

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जातिवाद ने भारतीय समाज को पिछड़ा बनाया है। उसने सिवाय बरबादी के हमें कुछ नहीं दिया। लोगों की निगाह में हमें हीन,वंचित एवं विपन्न बनाने वाला भी जातिवाद है….शताब्दियों पुराने जाति-आधारित भेदभाव ने हिंदू समाज को अज्ञानता के अंधकूप में ढकेल दिया है। उसी ने हिंदुओं की चारित्रिक एकता और अखंडता को विरूपित किया है। जातीय ऊंच-नीच का हिंदू मानस पर इतना गहरा प्रभाव है कि उसने उसकी सामान्य बुद्धि को भी कुंठित कर दिया हैᅳपेरियार

 

जाति भारतीय समाज का ऐसा कोढ़ है, जिसे प्रत्येक हिंदू अपनी विशिष्ट पहचान के तौर पर अपनाता है। उसे विश्वास होता है कि समाज में कुछ लोग उससे ऊपर हैं। कि जातीय अनुक्रम में कुछ लोगों का ऊपर होना उनके किसी गुण-विशेष के कारण नहीं है। वे ऊपर सिर्फ इसलिए हैं, क्योंकि उन्होंने जाति-विशेष में जन्म लिया है। विचित्र यह है कि जाति के दम पर जबरन नीचे ढकेल दिए गए व्यक्ति के मन में इससे कोई स्थायी हीनताबोध नहीं पनपता। क्योंकि उसे विश्वास होता है कि समाज में अनेक लोग ऐसे भी हैं, जिनका जन्म उससे निचली जाति में हुआ है। यह कृत्रिम गर्वानुभूति जातिगत ऊंच-नीच से जन्मे हीनताबोध से उसकी रक्षा करती है। जातीय ऊंच-नीच के एहसास से दबा-सहमा व्यक्ति जब कथित ऊंची जातियों के संपर्क में आता है, तो खुद के कमतर होने का एहसास उसके मनस् पर छाया रहता है। लेकिन जैसे ही उसका सामना निचली जाति के व्यक्ति से होता है, उसकी झुकी गर्दन एकाएक तन जाती है। चेहरा गर्व से दमकने लगता है। मुश्किल उस व्यक्ति की होती है जिसका जन्म सबसे निचली जाति में हुआ है। कोई और रास्ता न देख वह धर्म की शरण लेता है। मान लेता है कि जो वह है, वही उसकी नियति है। इस जन्म में उससे त्राण असंभव है। उसे लगातार यह समझाया जाता है कि जाति की मर्यादाओं का पालन करने में ही उसकी भलाई है। यही देवताओं की इच्छा है। इसी में उसका कल्याण है। धीरे-धीरे वह मानने लगता है कि जाति-सिद्ध व्यवस्था से अनुकूलित होकर ही वह देवताओं की निगाह में ऊपर उठ सकता है। 

जहां-जहां हिंदू समाज है, वहां-वहां जाति है। जहां-जहां जाति है, वहां सामाजिक भेदभाव, धर्म के नाम पर कट्टरता, ऊंच-नीच, आर्थिक असमानता को साफ परखा जा सकता है। उत्तर प्रदेश भी इससे अछूता नहीं है। 1931 की जनगणना के अनुसार प्रदेश में अनुसूचित जातियों की संख्या 21 प्रतिशत, पिछड़े लगभग 41.9 तथा सवर्ण मात्र 22.1 प्रतिशत थे। यह हिंदुओं के दो बड़े अवतारों राम और कृष्ण की जन्म भूमि रहा है। काशी जैसी नगरी के अलावा कुछ वर्ष पहले तक हरिद्वार भी प्रदेश का हिस्सा था। ये विशेषताएं इस प्रदेश को बाकी प्रदेशों के मुकाबले खास बनाती हैं। हिंदू संस्कृति के निर्माण में इनकी बड़ी भूमिका है। इनके प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रभाव में लोग मानने लगते हैं कि धर्म को केंद्र में रखकर बनाए गए नियम ही श्रेष्ठतम हैं। वे विश्वास कर लेते हैं कि जाति दैवीय विधान है। इसलिए जिस जाति, समाज में वे हैंᅳवहां होना ही उनकी नियति है। यही कारण है कि उनीसवीं और बीसवीं शताब्दी के सामाजिक सुधार के लिए चलाए गए आंदोलनों से यह प्रदेश करीब-करीब अछूता रहा है। दक्षिण भारतीय राज्यों की तरह यहां न तो कोई बड़ा जाति-विरोधी आंदोलन पनपा, न महामना फुले, अय्यंकालि, डॉ. आंबेडकर या पेरियार जैसा बहुजन नेतृत्व उभर पाया। धर्म सामाजिक असमानता का किस तरह पालन-पोषण करता है। शास्त्र-सम्मत बताकर जनमानस को किस तरह उसके अनुसार ढाल लेता है, श्रद्धा और भक्ति व्यक्ति के आक्रोश, स्वाभिमान और आत्मगौरव को किस प्रकार निस्तेज कर देते हैंᅳउत्तर प्रदेश का हिंदू समाज इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। प्रदेश में दलितों और पिछड़ों की  हालत आज भी लगभग वैसी ही है, जैसा ‘सत्यशोधक समाज’ के नेता मुकुंदराव पाटिल ने वर्षों पहले लिखा थाᅳ

‘भारत एक विचित्र देश है जहां तरह-तरह के लोग रहते हैं, जो अपने धर्म, विचारों, व्यवहारों और समझ के आधार पर अनेक भागों में बंटे हुए हैं। लेकिन साफ-साफ कहा जाए तो केवल दो ही श्रेणियां हैंᅳबहुसंख्यक निचली जातियां, जिनसे उनके मनुष्य होने के सामान्य अधिकार भी छीन लिए गए हैं। दूसरी विशेषाधिकार प्राप्त ऊंची जातियां जो खुद को दूसरों से श्रेष्ठतर मानती हैं, और बहुसंख्यक जातियों के श्रम के बल पर समस्त सुख-सुविधाओं का आनंद लेती हैं। एक का सुख दूसरे के लिए मुसीबत है, यही उनका संबंध है।’1   

जाति, सामाजिक-सांस्कृतिक वर्चस्ववाद, धार्मिक पोंगापंथी के विरोध में पहली और निर्णायक आवाज महात्मा फुले की थी। उन्होंने शूद्रों-अतिशूद्रों को शिक्षा का महत्त्व समझाया, उनके लिए विशेष शिक्षा-संस्थान खोले, जाति को संरक्षण देने वाले हिंदू धर्म को सीधी चुनौती दी। अपनी पुस्तक ‘गुलामगिरी’ के माध्यम से उन्होंने हिंदू अवतारवाद के साथ-साथ उन मिथों की व्याख्या की, जो हिंदू मानस की संरचना का आधार रहे है। ब्राह्मण ग्रंथों में हिंदू धर्म को सनातन कहा गया है। फुले ने इतिहास और मिथ में अंतर करते हुए मूल-निवासी सिद्धांत को प्रस्तुत किया। जिसमें उन्होंने बताया कि शूद्र और अतिशूद्र इस देश के मूल निवासी हैं। आर्यों ने उनकी प्राचीन समृद्ध संस्कृति को तहस-नहस किया था। आर्य इस देश में बाहर से आए, इसकी पुष्टि ऋग्वेद करता था। पश्चिमी विद्वानों के अलावा तिलक भी यही मानते थे। इसलिए फुले द्वारा प्रस्तुत मूल-निवासी सिद्धांत शूद्रों और अतिशूद्रों के दिलो-दिमाग पर तेजी से असर दिखाने लगा। बहुत जल्दी उसका असर देश के बाकी हिस्सों में भी नजर आने लगा। बंगाल में यह ‘नामशूद्र, पंजाब में ‘आदि-धर्म’, आंध्र प्रदेश में ‘आदि आंध्र’, दक्षिण में द्रविड़ बनाम आर्य आंदोलन के रूप में नजर आया। तमिलनाडु में ई. वी. रामासामी पेरियार ‘द्रविड़ संस्कृति’ को भारत की मूल संस्कृति बताते हुए ‘आत्म-सम्मान’ आंदोलन का सूत्रपात किया। उन्होंने कहा कि द्रविड़ आर्यों से अलग और भारत के मूल निवासी हैं। इससे सवर्णों के आगे अल्पसंख्यक होने का खतरा मंडराने लगा। उससे पहले अपने श्रेष्ठता दंभ के चलते वे स्वयं शूद्रों और अतिशूद्रों धर्म-बाह्यः मानते आए थे। चौथे  वर्ण के रूप में स्वीकार करने के बावजूद शूद्रों के सामाजिक-आर्थिक योगदान को नकारा जाता था। अधिकांश मामलों में उसके साथ दास जैसा वर्ताब किया जाता था। 

शिक्षा क्रांति के साथ-साथ स्थानीय निकायों में भारतीयों को स्थान देने की शुरुआत उनीसवीं शताब्दी में ही हो चुकी थी। उसमें संख्याबल का महत्त्व था। इससे सवर्ण हिंदुओं के आगे अल्पसंख्यक हो जाने का खतरा मंडराने लगा। उन्हें लगने लगा था कि अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए शूद्रों और अतिशूद्रों को साथ रखना आवश्यक है। परिणामस्वरूप अनेक सामाजिक आंदोलनों का जन्म हुआ। इनमें दयानंद सरस्वती का ‘आर्य-समाज’ आंदोलन प्रमुख था। स्वामी दयानंद जाति का बहिष्कार करते थे, लेकिन वर्ण-व्यवस्था के समर्थक थे। उन्हें ब्राह्मण वर्चस्व से भी इन्कार न था। ‘आर्य-समाज’ असलियत में उदार ब्राह्मणवाद का सुरक्षा-कवच था। उसके बैनर तले कट्टरपंथी हिंदू उदार और प्रगतिशील होने का नाटक करने लगे थे। भारतीय समाज पर ‘आर्यसमाज’ का, विशेषकर उत्तर-पश्चिम भारत में, व्यापक असर पड़ा। पंजाब, गुजरात, हरियाणा, उत्तर-प्रदेश आदि प्रदेशों में निचली और मंझोली जातियां उसकी ओर आकर्षित होने लगीं। मगर आर्य-समाज में शामिल हुए पिछड़ों और अतिपिछड़ों को बहुत जल्दी समझ में आने लगा कि जातिवाद की आलोचना करने वाला आर्यसमाज संगठन के स्तर पर उससे मुक्त नहीं है। इसी बीच ‘हिंदू महासभा’ जैसे संगठन भी उभरे, जो नई शिक्षा प्रणाली का विरोध करते थे। संस्कृति और परंपराओं की दुहाई देकर वे हर परिवर्तन को रोके रखना चाहते थे। इस घेराबंदी का विरोध करने के लिए अनेक दलित नेता और सामाजिक कार्यकर्ता आगे आए। उन्हीं में से एक स्वामी अछूतानंद भी थे, जिन्होंने उत्तर प्रदेश में दलित-अस्मिता के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद की थी।  

 

स्वामी अछूतानंद : जीवन परिचय

अछूतानंद हरिहर का जन्म फर्रुखाबाद जिले के सौरिख गांव में 6 मई 1879; को चमार जाति में हुआ था। उनके पिता का नाम था, मोतीराम तथा मां थीं रामप्यारी। माता-पिता ने उनका नाम हीरालाल रखा था। सौरिख गांव में ब्राह्मणों तथा दूसरी सवर्ण जातियों का बोलबाला था। एक बार उनके पिता और चाचा का ब्राह्मणों से झगड़ा हुआ था। गांव वाले दलितों को किसी भी प्रकार की छूट देने को तैयार न थे। तंग आकर मोतीराम और उनके भाइयों ने सौरिख छोड़ दिया। पलायित होकर वे मैनपुरी जिले की तहसील सिरसागंज के उमरी गांव में आ बसे, जहां उनके सजातीय लोगों का संख्यानुपात अपेक्षाकृत अधिक था।2  ध्यातव्य है कि बीसवीं शताब्दी के आरंभ में मैनपुरी में चमार अहीरों के बाद सबसे बड़ी जाति थी। उनमें से कुछ अच्छे काश्तकार थे तो कुछ पारंपरिक धंधे को अपनाए हुए थे। जबकि कुछ मजदूरी करके अपना जीवनयापन करते थे। इस बीच कुछ शिक्षा प्राप्त कर, सरकारी पदों पर विराजमान थे। फलस्वरूप उनके समाज में नई महत्त्वाकांक्षाएं पनपने लगी थीं, जिससे सवर्णों के बीच ईर्ष्याभाव बढ़ता ही जा रहा था। हीरालाल के पिता ने उनका दाखिला उमरी की प्राथमिक पाठशाला में कराने का निर्णय लिया। जब वे हीरालाल को लेकर पाठशाला पहुंचे तो वहां मौजूद ब्राह्मण अध्यापक एक अछूत बालक को देखकर आनाकानी करने लगाᅳ

‘तुम्हारी जात वालों का काम-धंधा पहले से तय है। उसके लिए तुम्हें अपने बच्चे को पढ़ाना आवश्यक नहीं है। दूसरे एक अछूत बालक को दाखिला देकर मैं अपने विद्यालय की बदनामी नहीं करना चाहता।’

स्कूल मास्टर का व्यवहार अनोखा नहीं था। वह समाज में दलितों साथ होने वाले भेदभाव को ही दर्शाता था। बालक हीरालाल के मन पर वर्षों तक पड़ा रहा। पिता के निधन के बाद वे अपने अविवाहित चाचा मथुरा प्रसाद के साथ नसीराबाद, अजमेर में आकर रहने लगे, जो उन दिनों फौज में सूबेदार थे। उन दिनों ब्रिटिश सेना में कार्यरत दलितों के आश्रितों के लिए अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान था। और इस तरह मान सकते हैं कि ब्रिटिश सेना का दलितों के उद्धार में बड़ा योगदान रहा था। 

बालक हीरालाल के लिए गांव में रहते हुए शिक्षा के जो दरवाजे बंद थे, अजमेर आने के साथ एकाएक खुल गए। सेना के स्कूल में रहते हुए उन्होंने प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की। बुद्धि प्रखर थी, सो अल्पावधि में ही हिंदी के अलावा अंग्रेजी और उर्दू भाषा का ज्ञान भी हासिल कर लिया। हीरालाल के चाचा की आस्था कबीरपंथ में थी। उनके यहां रविदासियों और कबीरपंथियों का निरंतर आना-जाना लगा रहता था। हीरालाल के मन पर उसका गहरा प्रभाव पड़ा। किशोरावस्था में उनके भीतर निर्गुण भक्ति के प्रति अनुराग बढ़ने लगा। वे कबीर और रविदास के पद अपने चाचा को गाकर सुनाया करते थे। उस समय तक पिता की मृत्यु हो चुकी थी, जिसका उन्हें बहुत दुख था। कबीर और रविदास की निर्गुण भक्ति का असर और पिता के मृत्यु से जन्मे वैराग्य भाव ने एक दिन उन्हें घर छोड़ने पर विवश कर दिया। स्वामी हरिहरानंद बनकर वे सत्य की खोज में भटकने लगे। उनके लिए वह केवल आध्यात्मिक खोज की यात्रा न थी। कबीरपंथी साधुओं की मंडली के साथ देश की विभिन्न अछूत बस्तियों में यात्रा करते, वहां निर्गुण भक्ति का प्रचार करते। दलितों की दुरावस्था देखकर उनका मन आहत होता। 24 वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने हिंदी, उर्दू के अलावा संस्कृत, गुरमुखी, मराठी, गुजराती और बांग्ला भाषा का ज्ञान अर्जित कर लिया। युवावस्था में उनका विवाह इटावा जिले के पीधासर गांव की कन्या दुर्गाबाई से हो गया। उसके बाद पीधासर उनका अस्थायी ठिकाना बन गया। दुर्गाबाई से उन्होंने तीन बेटियों, विद्याबाई, शांतीबाई और सुशीलाबाई को जन्म दिया। दुर्गाबाई उनकी सच्ची जीवनसंगिनी सिद्ध हुईं। वे हरिहरानंद के साथ दलित बस्तियों की यात्रा करतीं। वहां दलित स्त्रियों को समझातीं। उन्हें अपने बच्चों को पढ़ाने की प्रेरणा देतीं। उनमें आत्मसम्मान की भावना जगातीं। धीरे-धीरे दलित बस्तियों में उनका प्रभाव बढ़ने लगा। लोग तन-मन-धन के साथ उनकी मदद को आगे आने लगे।  

 

आर्यसमाज की ओर

उन्हीं दिनों हरिहरानंद का संपर्क आर्यसमाजी स्वामी सच्चिदानंद से हुआ। आर्यसमाज जाति-प्रथा का विरोध और समाज के सभी वर्गों के लिए शिक्षा का समर्थन करता था। अछूतों के लिए हाॅस्टल बनवाने का आश्वासन भी देता था। इससे प्रभावित होकर हरिहरानंद ने 1905 में आर्यसमाज के अजमेर कार्यालय में विधिवत रूप से आर्यसमाजी के रूप में दीक्षा ग्रहण कर ली। उसके बाद उन्होंने वेदादि  ग्रन्थों का गंभीर अध्ययन किया। आर्यसमाजी के रूप में उनका जीवन बहुत सक्रिय रहा। आर्यसमाज के महत्त्वपूर्ण कार्यक्रमों में से एक शिक्षा का प्रसार भी था। वे अछूत बस्तियों में जाकर शिक्षा का प्रचार करने लगे। इसी बीच उन्होंने आगरा में ‘आल इंडिया जाटव महासभा’ की स्थापना की। आर्यसमाज के प्रचारक के रूप में उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों की यात्रा की। उससे समाज में व्याप्त जाति-व्यवस्था को एक नए दृष्टिकोण से जानने का अवसर मिला। 

धीरे-धीरे आर्यसमाजियों की कथनी और करनी का अंतर साफ नजर आने लगा। आर्यसमाज की स्थापना हिंदू धर्म में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने के लिए की गई थी। लेकिन उसका असली उद्देश्य हिंदुओं के धर्मांतरण पर रोक लगाना था। जातीय उत्पीड़न और भेदभाव से आहत शूद्र इस्लाम और ईसाई धर्म की ओर आकर्षित रहे थे। इससे सवर्ण हिंदुओं के आगे अल्पसंख्यक होने का खतरा मंडराने लगा था। आर्यसमाज धर्मांतरित हिंदुओं की वापसी के लिए शुद्धि कार्यक्रम चलाता था। लेकिन शुद्धि के बाद हिंदू धर्म में लौटे हिंदुओं के लिए उसकी कोई विशिष्ट नीति नहीं थी। धर्म में वापस आए हिंदुओं को पुनः उसी गलीच जाति-व्यवस्था के बीच लौटना पड़ता था, जिससे क्षुब्ध होकर उन्होंने या उनके पूर्वजों ने धर्मांतरण का सहारा लिया था। हिंदू धर्म में वापस लौटे व्यक्तियों को ससम्मान जीवन जीने के अवसर प्राप्त हों, इसकी ओर से वह पूर्णतः उदासीन था। 1920 के दशक में उसने हिदुंत्व की राह पकड़ ली। वह वेदादि के अलावा उन्हीं प्रतीकों का समर्थन करने लगा, जो जाति-व्यवस्था का समर्थन करते थे। धीरे-धीरे स्वामी अछूतानंद को आर्यसमाज की कमजोरियों का एहसास होने लगा। उन्हें लगने लगा कि आर्यसमाज असल में ब्राह्मणवाद की सुधरे हुए रूप में वापसी का उपक्रम हैं। सवर्ण हिंदू दलितों और पिछड़ों का उपयोग सांप्रदायिक संघर्ष की स्थिति में मुस्लिमों से सामना करने के लिए करना चाहते हैं। 

‘शुद्धि’ कार्यक्रम विशुद्ध राजनीतिक अभियान था। ब्रिटिश सरकार ने 1909 में जातीय प्रतिनिधित्व के कानून के आधार पर मुस्लिमों के प्रतिनिधि चुनने का अधिकार दे दिया था। उससे अगले ही वर्ष मुस्लिम लीग के प्रतिनिधि मंडल ने वायसराय से मिलकर यह अपील की थी कि जाति-बाह्यः दलितों और शूद्रों को जिन्हें यज्ञादि हिंदू कर्मकांडों का अधिकार प्राप्त नहीं है, हिंदू न माना जाए। इससे सवर्ण हिंदुओं के सामने अल्पसंख्यक हो जाने का खतरा और भी साफ हो गया था। अछूतों को यज्ञोपवीत संस्कार का समर्थन करने वाला शुद्धिकरण अभियान, उसी की प्रतिक्रिया में उपजा था। आरंभ में उसे बहुत प्रसिद्धि मिली थी। ‘शुद्धि’ की रस्म का उपयोग अछूतों के ‘शुद्धिकरण’ के लिए भी किया जाता था। प्रकारांतर में वह अछूतों को ‘प्रायश्चित’ के लिए प्रेरित करता था। उसका अर्थ था कि शुद्धिकरण से पहले अछूतों की स्थिति पापमय थी। शुद्धिकरण के लिए मुंडन, यज्ञ, जनेऊ धारण कराने जैसी रस्में थीं। गायत्री मंत्र का उच्चारण किया जाता था। परंतु यज्ञोपवीत के बावजूद अछूतों को बराबरी का अधिकार न मिलने से यह साफ हो गया था कि हिंदुओं के लिए जाति का मसला धर्म से बड़ा है।3 वे समझने लगे कि शुद्धिकरण के माध्यम से अछूतों को आर्यसमाजी बनाकर हिंदुओं के दायरे में लाना सिवाय नंबरों के खेल के और कुछ नहीं है। उससे अछूतों का वास्तविक उत्थान संभव नहीं है। 

इसी बीच एक घटना ऐसी घटी जिससे उनका आर्यसमाज से मन उचट गया। अछूतों के बीच शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने अपने गृहनगर मैनपुरी में स्कूल खोलने का फैसला किया। उसके लिए समाज के सभी वर्गों की ओर से दान राशि प्राप्त हुई। उनकी पत्नी दुर्गाबाई के पास आभूषण के नाम पर एकमात्र अंगूठी थी। उन्होंने उसे भी स्कूल के लिए दान कर दिया था। स्कूल के उद्घाटन के अवसर पर वे मैनपुरी पहुंचे। 1912 का वर्ष था। कार्यक्रम का आयोजन स्थानीय आर्यसमाजी कार्यकर्ताओं की ओर से किया गया। समारोह स्थल पर उन्होंने जो देखा कि उससे वे हैरान रह गए। आर्यसमाज के प्रति मोह एकाएक भंग हो गया। उन्होंने देखा कि समारोह में ऊंची जाति के बच्चों के बैठने के लिए कालीन का इंतजाम था। जबकि अछूत बच्चों को सीधे जमीन पर बिठाया गया था। उसे देखकर अछूतानंद को आर्यसमाज के सिद्धांतों और व्यवहार में साफ अंतर नजर आने लगा। इससे स्वामी अछूतानंद का आर्यसमाज से मोह-भंग होना स्वाभाविक था। 1912 में ही उपर्युक्त घटना के बाद मेरठ में आयोजित एक सभा में उन्होंने लोगों को संबोधित करते हुए कहा थाᅳ

‘आर्यसमाज का शुद्धिकरण अभियान, वैदिक धर्म के नाम पर मुस्लिमों और ईसाइयों से ब्राह्मणवाद को बचाए रखने का प्रपंच मात्र है। उसका दर्शन और ‘शुद्धि’ अभियान अज्ञानी जनता को गुमराह करने वाले, कह सकते हैं ᅳशब्दों की बाजीगरी मात्र हैं। इस तरह आर्यसमाज न केवल इतिहास का दुश्मन है, अपितु सत्य का हत्यारा भी है। उसका एकमात्र उद्देश्य हिंदुओं, मुसलमानों और ईसाइयों के बीच वैर-भाव को बढ़ावा देना, प्रकारांतर में उन्हें(बहुसंख्यक गैरसवर्णों को) वेदों और ब्राह्मणों का गुलाम बनाए रखना है।’4 

अंततः यह कहते हुए कि ‘अभी तक हम सोचते थे कि आर्यसमाज जाति-आधारित भेदभाव से मुक्त है; यही कारण है कि हम अपनी पूरी शक्ति से उसके लिए काम कर रहे थे, लेकिन हम अंधेरे में थे। मैनपुरी की घटना हमें अपने पैरों पर खड़े होने तथा अपने समाज के भले के लिए काम करने की शक्ति दी है5ᅳ उन्होंने आर्यसमाज को अलविदा कह दिया। उसके बाद उन्होंने स्वयं को पूरी तरह से अछूतों और वंचितों के लिए समर्पित कर दिया। 

 

हरिहरानंद से अछूतानंद

उस समय तक आर्यसमाज से जुड़े दूसरे अछूत नेता भी समझने लगे थे कि उसका शुद्धि अभियान महज ब्राह्मणधर्म को बनाए रखने का षड्यंत्र है। वह हिंदुओं के शक्तिशाली वर्गों के प्रतिनिधि के रूप में काम कर रहा है, जिसका उद्देश्य जाति-व्यवस्था का उन्मूलन न होकर येन-केन-प्रकारेण ब्राह्मणों के वर्चस्व की रक्षा करना है। आर्यसमाज छोड़ने की घोषणा के साथ ही स्वामी अछूतानंद ने दलितों का आवाह्न किया कि वे आर्यसमाज द्वारा फैलाए जा रही भ्रांतियों से बाहर निकलें। उसके फलस्वरूप अस्पृश्यों के कई नेता, आर्यसमाज छोड़कर उनके समर्थन में आ गए। 1917 में उन्होंने दिल्ली में देवीदास, जानकीदास, जगतराम आदि नेताओं के साथ मिलकर ‘अखिल भारतीय अछूत महासभा’ की नींव रखी। उसी दौरान उन्होंने उन्होंने ‘अछूत’ शब्द की नई व्याख्या प्रस्तुत की। ब्राह्मणवादी ग्रंथों में अछूत को गंदा और अपवित्र बताते हुए अस्पृश्य कहा जाता था। स्वामी अछूतानंद ने कहा कि अछूत वे हैं जो किसी भी प्रकार की ‘छूत’ यानी अपवित्रता और गंदगी से मुक्त हैं। जो पूरी तरह पवित्र हैं। इसलिए उन्हें अपने भीतर किसी प्रकार की कुंठा या अपवित्रता की भावना रखने की आवश्यकता नहीं है। नैराश्य और हताशा से ऊपर उठकर उन्हें अपने ऊपर गर्व करना चाहिए। यह अछूतपन की एकदम नई व्याख्या थी, जिसके मूल में जातीय स्वाभिमान का भाव था। फलस्वरूप अस्पृश्य स्वामी अछूतानंद के पीछे संगठित होने लगे। 

स्वामी अछूतानंद का अगला लक्ष्य था, जाति का विनाश। वे समझ चुके थे हिंदू धर्म की परिधि में रहते हुए यह कार्य संभव नहीं है। इसलिए 1920 के दशक आरंभिक वर्षों में ही उन्होंने उत्तरप्रदेश में आदि-हिंदू आंदोलन की शुरुआत की थी। उल्लेखनीय है कि ‘आदि-हिंदू’ के ‘हिंदू’ का हिंदू धर्म से कोई संबंध नहीं है। यह भौगोलिक पद है, जिसे अरबी कबीलों ने सिंधु के इस पार रह रहे भारतीयों के लिए प्रयोग किया था। ‘आदि-हिंदू’ के मूल में भारत के ‘मूल निवासी’ का विचार था, जिसे सबसे पहले ज्योतिराव फुले ने प्रयोग किया था। उन्हीं से प्रेरणा लेकर भाग्यरेड्डी वर्मा ने 1913 में अस्पृश्यों के लिए ‘पंचम’ वर्ण की संज्ञा को नकारकर आदि-हिंदू की पहचान दी थी। उनके अनुसार ‘आदि-हिंदू’ आर्यों के आगमन से पहले से ही भारत में रह रहे, यहां के मूलनिवासी तथा समृद्ध सभ्यता के स्वामी थे। 

स्वामी अछूतानंद द्वारा आर्यसमाज पर किए जा रहे हमलों से उसके नेता परेशान थे। 1921 में स्वामी अछूतानंद को आर्यसमाज के प्रचारक पंडित अखिलानंद की ओर से शास्त्रार्थ की चुनौती मिली, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। उससे पहले वे ऋग्वेद सहित दूसरे ग्रंथों का अध्ययन कर चुके थे। 22 अक्टूबर 1921 को अखिलानंद और अछूतानंद के बीच शाहदरा दिल्ली की अनाजमंडी में शास्त्रार्थ हुआ। शास्त्रार्थ का मुख्य विषय आर्यों के मूल निवास स्थान को लेकर था। ऋग्वेद में इंद्र द्वारा दस्युओं के किलों के ध्वंस का उल्लेख अनेक स्थान पर हुआ है। अछूतानंद ने उन्हीं उद्धरणों के माध्यम से आसानी से अखिलानंद को परास्त कर दिया। शास्त्रार्थ के दौरान आर्यसमाजी प्रचारक पंडित रामचंद्र, नौबत सिंह, स्वामी दातानंद सहित आर्यसमाज की स्थानीय शाखा के कई प्रचारक और दलित नेता उपस्थित थे। शास्त्रार्थ में विजयी होने पर उन्हें ‘श्री-108’ की उपाधि प्रदान की गई, जिसका प्रस्ताव पंडित रामचंद्र की ओर से आया था। ‘श्री-108’ की उपाधि संत समाज में बड़ी सम्मानित मानी जाती थी। इस उपाधि के धारक व्यक्ति को पुण्यात्मा, दार्शनिक विषयों का पंडित और शास्त्रार्थ का धनी माना जाता था। किसी अछूत को यह उपाधि मिलना अपने आप में ऐतिहासिक उपलब्धि थी। उससे भी बड़ी बात थी कि अछूत व्यक्ति द्वारा उच्च जाति के ब्राह्मण को खुले शास्त्रार्थ में पराजित करना। उस घटना को व्यापक प्रसिद्धि मिलना स्वाभाविक था। अछूतानंद की विजय का समाचार श्री देवीदास द्वारा संपादित ‘प्राचीन भारत’ समाचार के मुख्य पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, आदि में उस विजय को लेकर पोस्टर बंटवाए गए। वह दलित मेधा को पहली सार्वजनिक स्वीकृति थी, वह भी वैदिक ज्ञान के क्षेत्र मेें जिसपर ब्राह्मण शताब्दियों से अपना दावा ठोकते आए थे। इस घटना के बाद ही स्वामी हरिहरानंद ने अपना नाम बदलकर स्वामी अछूतानंद रख लिया। इस नाम का प्रस्ताव शास्त्रार्थ की समाप्ति के बाद, जाटव समाज के नेताओं चौधरी जानकी दास, देवीदास और जगतराम की ओर से आया था। 

 

सामाजिक आंदोलन का राजनीतिक विस्तार  

1919 में ब्रिटिश सरकार ने भारत में ‘कम्यूनल अवार्ड’ लागू किया था। उसके अनुसार धार्मिक संप्रदायों की संख्या के आधार पर उन्हें राजनीतिक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व दिया जाना था। इसलिए हर संप्रदाय अपनी अधिक से अधिक संख्या बताने में लगा था। आर्यसमाज द्वारा चलाया जा रहा शुद्धि आंदोलन भी उसी से प्रेरित था। वह धार्मिक से ज्यादा राजनीतिक अभियान था। इस पर टिप्पणी करते हुए स्वामी अछूतानंद के सहयोगी रामचरन ने कहा थाᅳ‘1919 के सुधार लागू हो चुके थे….उसके अनुसार प्रत्येक धार्मिक समूह को उसकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जाना था। जिसकी जितनी बड़ी संख्या, उसे उतना ही बड़ा प्रतिनिधित्व। उसके बाद से ही जगह-जगह ‘अछूतोद्धार’ के नाम पर सम्मेलन आयोजित किए जा रहे थे।’6   इस तरह 1920 के दशक से ही आर्यसमाज का इस्तेमाल राजनीति के लिए होने लगा था। स्वामी अछूतानंद सहित पढ़े-लिखे अछूत नेताओं पर उसका सकारात्मक असर पड़ा था। वे संगठन की ताकत को समझने लगे थे। 

1923 तक आदि-हिंदू आंदोलन को औपनिवेशिक सरकार की मान्यता मिल चुकी थी। उसे देश में चल रहे दूसरे सुधारवादी कार्यक्रमों के समकक्ष मान लिया गया था। आंदोलन का मुख्य केंद्र कानपुर था। उसका निरंतर विस्तार हो रहा था। इसके साथ-साथ कांग्रेस और उसके नेताओं की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। वे अछूतों को हिंदू धर्म के दायरे में रखना चाहते थे। दूसरी ओर आदि-हिंदू के नेता अपने आप को इस देश की प्राचीनतम सभ्यता का उत्तराधिकारी बता रहे थे। उनके अनुसार ब्राह्मण बाहर से आए आर्यों के उत्तराधिकारी थे। उन्हीं दिनों गांधी के छोटे बेटे देवदास ने स्वामी अछूतानंद से हिंदू समाज तथा कांग्रेस की भलाई के नाम पर आंदोलन को रोक देने की अपील की। यही नहीं, उन्होंने स्वामी अछूतानंद को कुछ धन का प्रलोभन भी दिया। इस पर अछूतानंद ने ब्रेड के एक टुकड़े को दिखाते हुए कहा थाᅳ‘मेरे लिए यही पर्याप्त है।’ देवदास गांधी को यह अपमानजनक लगा। क्षुब्ध होकर उन्होंने स्वामी अछूतानंद को ‘जूतानंद स्वामी’ कहना आरंभ कर दिया।’7 गांधी जो लगभग अपने हर भाषण में मनसा-वाचा-कर्मणा अहिंसा का समर्थन करते थे, के बेटे का ऐसा व्यवहार पूर्णतः अशोभनीय था। लेकिन उसमें अलग कुछ न था। देवदास दलितों के प्रति सवर्ण हिंदुओं के सामान्य व्यवहार का अनुसरण कर रहे थे।

अक्टूबर 1921 में ‘वाल्स के राजकुमार’ एडवर्ड अष्टम, अपने पांच महीने लंबे दौर पर भारत पहुंचे थे। कांग्रेस उनका बहिष्कार कर रही थी। जबकि डॉ. आंबेडकर सहित लगभग सभी बड़े दलित नेता अपनी मांगों को ब्रिटिश सरकार तक पहुंचाने के लिए उसे अच्छा अवसर मान रहे थे। उनका मानना था कि कांग्रेस तथा दूसरे सवर्ण नेता ‘वाल्स के राजकुमार’ का विरोध निहित स्वार्थों के लिए कर रहे हैं। राजकुमार के स्वागत के लिए स्वामी अछूतानंद ने 1922 में दिल्ली में ‘विराट अछूत सम्मेलन’ का आयोजन किया, जिसमें उन्हें मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। सम्मेलन में देश के कोने-कोने से आए 25000 से अधिक दलित उपस्थित थे। राजकुमार के सम्मान में भाषण देते हुए स्वामी अछूतानंद ने ‘मुल्की हक’(राष्ट्रीय अधिकार) की आवाज उठाते हुए दलितों की दुर्दशा का मामला उठाया। अपने भाषण में दूर-दूर से आए दलितों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा थाᅳ

‘बाहर से आए आर्य हमलावरों ने हमें दबाया हुआ था। उन्होंने हमें गुलामी और छूआछूत की दहलीज पर पटक दिया था। अब हमें अपने दमन के विरुद्ध आवाज उठानी होगी। इस देश का मूल निवासी होने के कारण हमें अपने ‘मुल्की हक’ की मांग करनी होगी। हमें ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विद्रोह करने के बजाए, राजकुमार का स्वागत करना होगा।’8

‘मुल्की हक’ से स्वामी अछूतानंद का आशय था, वे सभी अधिकार जो किसी स्वयंभू देश के नागरिक को प्राप्त होते हैं। जो दलितों को आर्यों के आगमन से पहले स्वाभाविक तौर पर प्राप्त थे। उन्होंने ‘वाल्स के राजकुमार’ एडवर्ड के आगे लिखित प्रतिवेदन भी प्रस्तुत किया था, जिसमें दलितों की 17 मांगें शामिल थीं। उन मांगों का असर यह हुआ कि उसी वर्ष यानी 1922 में औपनिवेशिक सरकार ने दलितों को संयुक्त प्रांत में कहीं भी सभाएं करने का अधिकार दे दिया। सरकारी अधिकारियों को आदेश दिया गया था कि वे दलितों को समुचित सुरक्षा प्रदान करें। स्वामी अछूतानंद की वह एक और बड़ी जीत थी। ब्राह्मणों शताब्दियों से शूद्रों को ‘क्षुद्र’ कहकर तथा वर्णव्यवस्था से बाहर के लोगों को दास, दस्यु, राक्षस आदि कहकर अपने धर्म से बाहर मानते आए थे। पूरा संस्कृत वाङ्मय इस तरह के किस्सों से भरा पड़ा है। उन्होंने न केवल गैर सवर्णों के पढ़ने-लिखने पर पाबंदी लगाई थी, बल्कि उन्हें उनके सामान्य अधिकारों से भी वंचित किया हुआ था। बदले समय में पहली बार था, जब सवर्ण अल्पसंख्यक होने के भय से गैर सवर्णों को अपने साथ रखना चाहते थे। आर्यसमाज और दूसरे संगठन इसी कोशिश में लगे थे, जबकि दलित उनके साथ जाने को तैयार न थे। अपितु स्वयं को इस देश का मूल निवासी बताकर अपनी स्वतंत्र संस्कृति और सभ्यता के दावे कर रहे थे। बड़ी बात यह कि जिन धर्मग्रंथों को पढ़ने से दलितों को रोका जाता था, जिनके आधार पर ब्राह्मण पांडित्य का दावा करते आए थे, उन्हीं के आधार पर अछूत ब्राह्मणों को विदेशी मूल का ठहरा रहे थे। 

स्वामी अछूतानंद पर कबीर, रविदास सहित भारतीय संतों का गहरा प्रभाव था। किशोरावस्था में अपने कबीरपंथी चाचा मथुरादास को कबीर और रविदास के पद सुनाया करते थे। उन्हीं से उनकी मानस-रचना हुई थी, वह सभी मनुष्यों को एक समान मानती थी। जाति को कबीरादि संत कवियों ने निशाने पर लिया था और अब वह अछूतानंद के भी निशाने पर थी। बस एक अंतर था। प्राचीन संत दुनियादारी के प्रति आसक्त नहीं थे। इसलिए संतोष पर जोर देते थे। कबीर तो रूखी-सूखी खाकर संतोष करने और दूसरे की चुपड़ी रोटी देख जी न ललचाने की बात खुलेआम करते हैं। कुल मिलाकर संत कवियों के लिए आर्थिक असमानता कोई बड़ा मुद्दा न थी। कबीर ने ‘अमरपुरी’ और रविदास ने ‘बे-गमपुरा’ के बहाने सामाजार्थिक ऊंच-नीच और भेदभाव से मुक्त समाज का सपना जरूर देखा था, मगर तत्कालीन परिस्थितियों में वह महज सपना ही था। उनीसवीं-बीसवीं शताब्दी के दलित आंदोलनों की नींव व्यक्ति स्वातंत्र्य और सहभागिता पर रखी गई थी। इसलिए फुले से लेकर स्वामी अछूतानंद तक, दलित नेताओं की प्रमुख मांगें थींᅳछूआछूत का विरोध, दलितों के साथ सम्मान-भरा व्यवहार, समानता और सहभागिता।   

1927 तक आते-आते देश-भर के दलित अपने अधिकारों के लिए उठ खड़े हुए थे। महाराष्ट्र में डॉ.  आंबेडकर, तमिलनाडु में ई. वी. रामासामी पेरियार, केरल में पोयकाइल योहन्नान अपनी-अपनी तरह से दलितों की मांगों को आगे बढ़ाने में लगे थे। छूआछूत और दलित उत्पीड़न उन सभी के निशाने पर था। उत्तर प्रदेश में यह जिम्मेदारी स्वामी अछूतानंद संभाले हुए थे। कुल मिलाकर पूरे देश के दलित अपने अधिकारों के लिए उठ खड़े हुए थे। कांग्रेसी नेताओं का कहना था कि इस समय देश के लिए सबसे बड़ी जरूरत आजादी प्राप्त करना है। अछूतों और अंत्यजों के नेता भी आजादी चाहते थे। लेकिन आजादी की उनकी संकल्पना कांग्रेस और दूसरे सवर्ण नेताओं से भिन्न थी। उसी वर्ष कानपुर में हुए ‘आदि हिंदू सम्मेलन’ में स्वामी अछूतानंद ने आजादी की अपनी संकल्पना को प्रस्तुत करते हुए कहा था कि इस समय देश में, ‘आजादी के वास्तविक हकदार यदि कोई है तो वे अछूत हैं। क्योंकि उन्हें हजारों वर्षों से गुलामी में रखा गया है।’ कांग्रेस द्वारा आजादी की मांग की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा था कि कांग्रेस द्वारा आजादी की मांग केवल समाज के अभिजन तबके, जो पहले से ही विशेषाधिकार प्राप्त है, की स्वार्थपूर्ति तक सीमित है। अछूतों का उस आजादी से कोई संबंध नहीं है। दिसंबर 1927 में दलित जातियों के प्रतिनिधियों की विशेष बैठक हुई थी। उस समय तक साइमन कमीशन के आने की घोषणा हो चुकी थी। बैठक का साइमन कमीशन के सामने दलितों की मांगों तथा अगले सुधारवादी कार्यक्रमों पर चर्चा होनी थी। बैठक की अध्यक्षता एम. सी. राजा(मिलै चिन्ना थंबी पिल्लई राजा) ने की थी। स्वामी अछूतानंद स्वागत समिति के अध्यक्ष थे। उस सभा में दलित जातियों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र तथा विधायिकाओं में अधिक सीट सुरक्षित करने की मांग की गई थी।

स्वामी अछूतानंद और डॉ. आंबेडकर का लक्ष्य एक समान था। दोनों पिछड़ी और दमित जातियों के उत्थान के लिए सक्रिय थे। लेकिन दोनों की सीधी भेंट अभी तक नहीं हो पाई थी। यह अवसर 1928 में आया। अवसर था, मुंबई में होने वाला ‘आदि हिंदू सम्मेलन’। भेंट के दौरान दोनों ने एक-दूसरे के कार्यक्रमों की सराहना की। डॉ. आंबेडकर ने स्वामी अछूतानंद से साइमन कमीशन के आगे दलितों की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करने का आग्रह किया। दोनों का संबंध आगे भी बना रहा। 30 नवंबर 1930 को साइमन कमीशन कमीशन भारत आया तो स्वामी अछूतानंद ने अपने सहयोगी नेताओं तिलकचंद कुरील, गिरधारीलाल भगत, लक्षमण प्रसाद, किरोड़ीमल खटीक आदि के साथ कमीशन से लखनऊ में मुलाकात की। कांग्रेस साइमन कमीशन का बहिष्कार करने पर तुली हुई थी। स्वामी अछूतानंद ने आरोप लगाया कि कांग्रेस कमीशन के आगे दलितों और पिछड़ों की गलत तस्वीर पेश कर रही है। उन्होंने कांग्रेस पर दलित बस्तियों में नए कपड़े बांटने का आरोप भी लगाया। स्वामी अछूतानंद ने साइमन कमीशन के आगे दलितों के लिए स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्र की मांग की। उन्होंने कहा थाᅳ‘हमें ब्रिटिश सरकार की सहानुभूति की आवश्यकता नहीं है। हम केवल अपने लिए सम्मान और आदर-भाव की इच्छा रखते हैं।’ डॉ. आंबेडकर ने बहिष्कृत हितकारिणी सभा के अध्यक्ष के नाते साइमन कमीशन से मुलाकात की थी। उन्होंने सभा की ओर से एक मांगपत्र प्रस्तुत किया था, जिसमें दमित जातियों की दुर्दशा का विवरण तथा सभा की ओर से मांगें थीं। दलितों और पिछड़ों के उत्थान के लिए स्वामी अछूतानंद द्वारा किए जा रहे अनथक प्रयासों के कारण देश-विदेश में उनकी ख्याति बढ़ती ही जा रही थी। 

दलितों और पिछड़ों का आत्मविश्वास लौटाने के लिए आदि हिंदू अभियान लगातार अपना काम कर रहा था। स्वामी जी का कहना था कि दलित हमेशा ही दलित न थे। बल्कि वे समृद्ध संस्कृति के जन्मदाता रह चुके हैं। आर्यों के आगमन से पहले उनके भी किले थे। एक समृद्ध सभ्यता थी, जिसमें ऊंच-नीच का भेद न था। आर्यों ने न केवल उस सभ्यता को तहस-नहस किया है, अपितु उसके तथ्यों से भी छेड़छाड़ की है। इलाहाबाद में 17 सिंतबर 1930 को आयोजित आठवें ‘अखिल भारतीय आदि हिंदू सम्मेलन’ की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता पर जोर दिया था। 1930 में लंदन में होने वाली ‘राउंड टेबल कान्फ्रेंस’ में डॉ. आंबेडकर और रतनमालाई श्रीनिवासन को मिले आमंत्रण का समर्थन करते हुए सरकार को तार भेजे थे, जिसमें उन्होंने दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग का समर्थन किया था। उस टेलीग्राम में उन्होंने ‘राजा-मुंजे समझौता’ का विरोध भी किया था। यह समझौता अछूतों द्वारा अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग को देश की एकता के लिए खतरा मानता था। गांधी द्वारा दलितों को दिया गया ‘हरिजन’ नाम भी उन्हें स्वीकार्य न था।  

स्वामी अछूतानंद चाहते थे कि ब्रिटिश सरकार गोलमेज सम्मेलन में डॉ. आंबेडकर की बात को गंभीरता से ले। इसके लिए उन्होंने अपने समर्थकों से सरकार को पत्र लिखने का आग्रह किया। उनके संकेत मात्र पर हजारों पत्र डॉ. आंबेडकर के समर्थन में संबंधित अधिकारियों तक पहुंचे थे। उसके फलस्वरूप असर ब्रिटिश सरकार ने डॉ. आंबेडकर को शोषित जातियों का प्रतिनिधि मानकर 1932 में ‘कम्यूनल एवार्ड’ को स्वीकृति दी। उसके फलस्वरूप दलितों की अलग मतदान की मांग को स्वीकार लिया गया। यह दलित आंदोलन की ऐतिहासिक विजय और कांग्रेस की सबसे बड़ी पराजय थी। उसके लिए गांधी को आगे आना पड़ा। कांग्रेस का तर्क था कि दलितों के लिए स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्र घोषित होने से हिंदू समाज बंट जाएगा। इससे उसका हिंदू राष्ट्र बनने का स्वप्न भी जाता रहेगा। यह अनोखा तर्क था। कुछ दशक पहले तक ही सवर्ण निचली जातियों को अपने से अलग मानते आए थे। उनके बड़े हिस्से को वे हिंदू मानने से भी इन्कार कर देते थे। मगर बदली परिस्थिति में ऐसा कतई संभव न था।  

‘आदि हिंदू आंदोलन’ लगातार विस्तार ले रहा था। इसके साथ ही स्वामी अछूतानंद की ख्याति भी बढ़ती जा रही थी। उत्तर भारत में वे दलितों के डॉ. आंबेडकर के बाद सबसे बड़े नेता थे। चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु ‘आदि हिंदू आंदोलन’ को असली समाजवादी आंदोलन मानते थे। स्वामी अछूतानंद और आंबेडकर को वे क्रमशः कार्ल मार्क्स और लेनिन की संज्ञा देते थे। द्विज उनके लिए बुर्जुआ समुदाय था, जबकि आदि हिंदू सर्वहारा वर्ग के प्रतिनिधि। ‘आदि हिंदू आंदोलन’ और अछूतानंद की निरंतर बढ़ती ख्याति सवर्ण हिंदुओं, विशेषकर आर्य समाजियों के लिए सिरदर्द बन चुकी थी। इसलिए उन्होंने स्वामी अछूतानंद तथा उनके आंदोलन को बदनाम करने के लिए तरह-तरह की अफवाहें फैलाना आरंभ कर दिया था। कुछ कहते कि स्वामी अछूतानंद ईसाई बन चुके हैं। वे ईसाई संस्थाओं से पैसा लेते हैं। एक दिन वे अपने समर्थकों को भी ईसाई बना देंगे। कुछ आरोप लगाते कि स्वामी अछूतानंद मुस्लिमों के लिए काम कर रहे हैं। एक अफवाह यह भी फैलाई जा रही थी कि स्वामी अछूतानंद को आर्यसमाज विरोधी गतिविधियों के कारण उससे निकाल दिया था। उसी अपमान से आहत होकर वे आर्यसमाज और हिंदुओं को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन स्वामी अछूतानंद को उसकी कोेई परवाह न थी। वे केवल अपने काम में लगे थे। उनके लिए उनके आंदोलन का लक्ष्य व्यक्तिगत प्रतिष्ठा या बदनामी से कहीं बड़ा था। इसके लिए भूखे-प्यासे रहकर भी काम करना पड़े तो पीछे नहीं रहते थे। चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु ने उनके बारे में लिखा है कि आंदोलन की गतिविधियों को आगे बढ़ाने में इतने लिप्त रहते थे कि खाने-पीने की सुध न रहती थी। कभी चना-चबैना के भरोसे वक्त बिताना पड़ता तो कभी भूखे भी सोना पड़ता था। मिशन के काम के लिए मीलों पैदल चलने का तो उन्हें अभ्यास था। बावजूद इसके कभी कोई प्रलोभन, कोई सत्ता उन्हें डिगा नहीं पाती थी। अपने लक्ष्य के प्रति वे कितने सतर्क थे, इसे इस उदाहरण से भी समझा जा सकता हैᅳ

आदि हिंदू आंदोलन के प्रचार के सिलसिले में एक बार उन्हें कन्नौज जाना पड़ा। कन्नौज पुराना शहर है। तय किया गया था कि आदि हिंदू आंदोलन के तहत वहां बड़ा कार्यक्रम होगा। हजारों अस्पृश्य उसमें हिस्सा लेंगे। प्रजा की सहानुभूति बटोरने के लिए उन दिनों राजा-महाराजा भी ऐसे आंदोलनों को मदद पहुंचाया करते थे। हालांकि व्यवहार में वे पूरी तरह परंपरावादी होते थे। केवल पैसे के बल पर हर वर्ग पर अपनी धाक जमाना, प्रकारांतर में उसकी सहानुभूति बटोरना उनका मकसद होता था। कन्नौज के कार्यक्रम के लिए तिरवा के राजा की ओर से मदद का प्रस्ताव आया। वह टेंट और स्टेज पर होने वाले खर्च के लिए मोटी रकम देने को तैयार था। अगर राजा पैसे के दम पर दलित समुदायों की सहानुभूति और प्रशंसा अर्जित कर मसीहा बनना चाहता था तो दलितों में भी एक ऐसा वर्ग था जो सम्मेलन के बहाने राजा को खुश करना चाहता था। उस वर्ग ने प्रस्ताव रखा था कि सम्मेलन की अध्यक्षता राजा तिरवा द्वारा कराई जाए। समाचार अछूतानंद स्वामी तक पहुंचा तो मामला अड़ गया। अछूतों के सम्मेलन की अध्यक्षता कोई गैर-अछूत करे, यह उन्हें बिलकुल स्वीकार्य न था। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि सम्मेलन की अध्यक्षता किसी उपयुक्त अछूत से ही कराई जानी चाहिए। स्वामी जी के विरोध का सुफल यह हुआ कि राजा से सम्मेलन की अध्यक्षता कराने का प्रस्ताव टाल दिया गया। उसके बजाए अध्यक्षता के लिए वयोवृद्ध दलित नेता रामचरन कुरील को चुना गया।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                

28 अप्रैल 1930 को स्वामीजी ने ‘आदि हिंदू सामाजिक परिषद’ की अमरावती बरार में बैठक हुई। उस बैठक में उन्होंने खुलासा किया कि कुछ लोग उन्हें मारने की योजना बना रहे हैं। इससे पहले भी अखबारों में ऐसी सूचना प्रकाशित हो चुकी थी। आगरा की एक सभा में उनपर हमला हो चुका था, जिससे वे किसी तरह सुरक्षित बच निकलने में कामयाब रहे थे। लगातार बढ़ रहे हमले स्वामी अछूतानंद की बढ़ती लोकप्रियता और उनके आंदोलन की सफलता का प्रमाण थे। बड़ी बात यह थी कि स्वामी अछूतानंद ने दलित आंदोलन को बड़ा मोड़ दिया था। उससे पहले के दलित उद्धार से जुड़े कार्यक्रम मुख्यतः सामाजिक होते थे। डॉ. आंबेडकर और अछूतानंद के आने से उसमें राजनीतिक लक्ष्य भी जुड़ चुका था। उसका अर्थ था, राजनीति के क्षेत्र में सहभागिता। ‘आदि हिंदू आंदोलन’ के मूल में ही राजनीति थी। उसके अनुसार आदि हिंदू इस देश के पुराने शासक-संचालक थे। वह कांग्रेस को उसके स्वराज का जवाब था। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस स्वराज के माध्यम से राजनीतिक सहभागिता की मांग तो करती थी, लेकिन उसमें समाज के पिछड़े वर्गों की हिस्सेदारी भी सुनिश्चित हो, इसका कोई विचार न था। उन दिनों तक सत्ता के दो प्रमुख दावेदार थेᅳहिंदू और मुसलमान। मुस्लिमों का दावा था कि इस देश पर सात-आठ सौ वर्षों तक उनके पूर्वजों का राज्य रहा है। इसलिए अंग्रेजों को चाहिए कि देश को छोड़ते समय उन्हीं के हाथों में सत्ता सौंपकर जाएं, जिनसे उन्होंने सत्ता छीनी थी। हिंदुओं का दावा था कि वे बहुसंख्यक हैं। देश-दुनिया की प्राचीनतम संस्कृति के वारिस हैं। इस्लाम के आगमन से पहले हजारों वर्षों से देश उन्हीं के अधीन रहा है। इसलिए देश की सत्ता के वही वास्तविक उत्तराधिकारी हैं। 

उनके लिए हिंदुओं का आशय चंद ऊंची जातियों से था। अछूत और शूद्रों को सत्ता में भागीदारी के अयोग्य माना जाता था। मुस्लिमों के प्रतिनिधि मोहम्मद अली जिन्ना थे। गांधी ने दावा किया था कि वे हिंदुओं के एकमात्र प्रतिनिधि हैं। इसपर डॉ. आंबेडकर ने कहा कि अस्पृश्य हिंदू नहीं हैं। उन्होंने अछूतों के प्रतिनिधि के रूप में ही उन्होंने गोलमेज सम्मेलन में हिस्सा लेकर उनके लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों की मांग की थी। आर्यसमाज और कांग्रेस नहीं चाहते थे कि आंबेडकर की योजना सफल हो। ऐसे में स्वामी अछूतानंद ने न केवल खुले मन से डॉ. आंबेडकर का समर्थन किया था, अपितु अपने समर्थकों से कहकर हजारों पर ब्रिटिश सरकार को भिजवाए थे, जिनसे डॉ. आंबेडकर को दलितों का प्रतिनिधि बताया गया था। उसी के फलस्वरूप आंबेडकर की दावेदारी मजबूत हुई थी और गोलमेज सम्मेलन में ब्रिटिश सरकार उनकी मांग मानने को बाध्य हुई थी। गांधी जी जानते थे कि डॉ. आंबेडकर की पृथक निर्वाचन क्षेत्र की मांग के केवल राजनीतिक निहितार्थ नहीं है। यदि वह मान ली जाती है तो सवर्णों और गैरसवर्णों के बीच हमेशा के लिए गहरी खाई बन जाएगी। उससे डॉ. आंबेडकर की मान्यता जिससे वे अस्पृश्यों को हिंदू मानने से इन्कार करते थेᅳको बल मिलेगा। यह कहने पर कि इससे हिंदू राष्ट्र की संकल्पना ही समाप्त हो जाएगी, डॉ. आंबेडकर का गांधी को उत्तर थाᅳ‘सही मायने में तो भारतीयों का कोई राष्ट्र नहीं है। अभी उसका सृजन किया जाना है।’ उन्होंने आगे कहा था कि ‘राष्ट्र के सृजन का तरीका यह नहीं है कि किसी अलग और विशिष्ट समुदाय का दमन किया जाए। दूसरे अस्पृश्य यदि अस्पृश्य प्रतिनिधि का चयन करता है तो इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि निर्वाचित प्रतिनिधि उनका वास्तविक प्रतिनिधि होगा। यदि यही सही स्थिति है तो अलग निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था ही अस्पृश्यों के वास्तविक प्रतिनिधित्व की गारंटी हो सकती है।’ 18 मई 1932 को ‘अखिल भारतीय दलित वर्ग सम्मेलन’ उत्तरप्रदेश के कामठी में हुआ। सम्मेलन में देश के विभिन्न भागों से आए सौ से अधिक प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। जिसमें एक बार फिर दलितों के लिए स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्र की मांग पर जोर दिया गया।  

यह बात अलग है कि आगे चलकर गांधी की जिद और डॉ. आंबेडकर पर चौतरफा दबावों के बाद उन्हें पूना समझौते के लिए बाध्य होना पड़ा और उन्हें स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्र की अपनी मांग छोड़नी पड़ी थी। पूना समझौते के विरोध में स्वामी अछूतानंद ने सितंबर 1932 में कई प्रदर्शन किए थे। समझौते का विरोध करते हुए उन्होंने देश के विभिन्न भागों की यात्राएं की थीं। उन्हीं दिनों गांधी ने अछूतों को ‘हरिजन’ नाम दिया था। डॉ. आंबेडकर सहित विभिन्न दलित नेताओं और स्वामी अछूतानंद ने उसका तीखा विरोध किया। स्वामी अछूतानंद कवि थे। अपना विरोध दर्शाते हुए उन्हीं दिनों उन्होंने कविता लिखी थी। उस कविता में जहां अछूतों के अतीत के गौरव को याद दिलाया गया था, वहीं उसमें उनकी पीड़ा भी समाई हुई थीᅳ

कियौ हरिजन-पद हमैं प्रदान

अन्त्यज, पतित, बहिष्कृत, पादज, पंचम, शूद्र महान

संकर बरन और वर्णाधम पद अछूत-उपमान

                            ….

हम तो कहत हम आदि-निवासी, आदि-वंस संतान

भारत भुइयाँ-माता हमरी, जिनकौ लाल निशान

आर्य-वंश वारे-सारे तुम, लिये वेद कौ ज्ञान

पता नहीं कित तें इत आये, बांधत ऊँच मचान

….

हम हरिजन तौ तुम हूँ हरिजन कस न, कहौ श्रीमान?

कि तुम हौ उनके जन, जिनको जगत कहत शैतान

स्वामी अछूतानंद भारत के नवजागरण के प्रतीक और सच्चे समाज सुधारक थे। मृत्यु से कुछ महीने पहले उन्होंने ग्वालियर में ‘विराट आदि-हिंदू सम्मेलन’ में भी हिस्सा लिया था, जहां उन्होंने स्त्रियों के शोषण के विरुद्ध आवाज बुलंद की थी। उन्होंने कहा था कि आदि-हिंदू संस्कृति में स्त्री का सम्मान होता आया है। विधवा विवाह पर रोकथाम, बाल-विवाह हिंदुत्व की कुरीतियां हैं। आदि हिंदूओं में इन बुराइयों के लिए कोई स्थान नहीं था। उन्होंने जोर देकर कहा था कि आर्यों के आगमन से पहले महिलाओं का समाज में सम्मान होता था। उन्हें शिक्षा दी जाती थी। सम्मेलन में उन्होंने महिलाओं, बच्चों और अछूतों पर अत्याचार करने वाले जमींदारों का सम्मान करने के लिए सरकार की आलोचना भी की थी। पूना समझौते का असर उनके मन-मस्तिष्क पर था। ग्वालियर सम्मेलन के बाद वे बीमार पड़ गए। शरीर लगातार क्षीण पड़ने लगा। अंततः 22 जुलाई 1933 को कानपुर में उन्होंने देह-त्याग निर्वाण का रास्ता पकड़ लिया। उस समय उनकी उम्र मात्र 54 वर्ष की थी। मृत्यु से कुछ दिन पहले जब ‘पूना समझौता’ पर उनकी राय जाननी चाही तो उनका कहना थाᅳ

‘जो हुआ, वह भी काफी अच्छा है। इसे स्वीकार कर लेने में ही बुद्धिमानी है। इससे एक ओर तो महात्मा गांधी के प्राणों की रक्षा हुई, और हम कलंक से बच गए, दूसरे हम अपने बड़े भइयों(हिंदुओं) से मेल-जोल बना रहा। देखना है, अब हिंदू किस तरह अपना प्रायश्चित और आत्मशुद्धि करते हैं। किंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि इस समझौते से हमारा सामाजिक और धार्मिक आंदोलन बंद हो जाएगा। उसे तो और जोरों से चलना चलना चाहिए। हमें हिंदुओं के मंदिर में जाने की जरूरत नहीं है। हमारे आत्मदेव का मंदिर समस्त विश्व है और प्रत्येक घट मंदिर है। यह जो कुछ हुआ है, सब हमारे ‘आदि-हिंदू आंदोलन’ का ही फल है।’9  

फुले और आंबेडकर की भांति स्वामी अछूतानंद भी अछूतों और पिछड़ी जातियों के संगठन की कामना करते थे। उनका कहना था कि यदि ये वर्ग एकजुट हो जाएं तो अपने आप में बड़ा समूह होंगे। उन्हें राजनीतिक रूप से परास्त करना असंभव होगा। वे अपनी सरकार स्वयं बना सकेंगे। पिछड़ों और अतिपिछड़ों को फुले की तरह वे भी ‘बहुजन समाज’ कहकर पुकारते थे। जो आज भी प्रासंगिक है। जिसमें भविष्य की सामाजिक न्याय की राजनीति के बीजतत्व छिपे हुए हैं। नेता और मार्गदर्शक के अलावा स्वामी अछूतानंद अच्छे कवि, लेखक और नाटककार भी थे। उनकी छह पुस्तकों में राजा राम न्याय(नाटक), मायानंद बलिदान(जीवनी), पाखंड खंडिनी, अछूत पुकार(दोनों कविता संग्रह) आदि शामिल हैं। शोषित जातियों में जागरूकता लाने के लिए उन्होंने दिल्ली से ‘अछूत’ मासिक पत्र की शुरुआत की थी। पत्रिका ज्यादा दिन न चल सकी। उसके तुरंत बाद उन्होंने ‘प्राचीन हिंदू’ शीर्षक से पत्रिका का आरंभ किया। संयोगवश वह अखबार भी एक वर्ष ही निकल पाया। उसके बाद उन्होंने कानपुर से ‘आदि हिंदू जर्नल’ की शुरुआत की। अपने भाषण के बीच-बीच वे कविता का उपयोग करते थे। लेख के समापन पर उनकी कविता के कुछ पद प्रस्तुत हैं, जिसे उन्होंने 1927 में ‘उत्तर प्रदेश आदि सभा सम्मेलन’ के समापन पर पढ़ा थाᅳ

निसिदिन मनुस्मृति ये हमको जला रही है,

उपर न उठने देती नीचे गिरा रही है

हमको बिना मजूरी, बैलों के संग जोते,

गाली व मार उस पर हमको दिला रही है

लेते बेगार, खाना तक पेट भर न देते,

बच्चे तड़पते भूखे, क्या जुल्म ढा रही है

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ब्राह्मण व क्षत्रियों को सबका बनाया अफसर

हमको ‘पुराने उतरन पहनो’ बता रही है

दौलत कभी न जोड़े, गर हो तो छीन लें वह

फिर ‘नीच’ कह हमारा, दिल भी दुखा रही है

कुत्ते व बिल्ली, मक्खी, से भी बना के नीचा

हा शोक! ग्राम बाहर, हमको बसा रही है

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

1. एम. पाटिल, जून-1913, दीनमित्र, गेल ओमवेड ‘कल्चर रिवोल्ट इन कोलोनियल सोसाइटी : नाॅन ब्राह्मन मूवमेंट इन  वेस्टर्न इंडिया, 1873ᅳ1930, पुणे साइंटिफिक सोशलिष्ट एजुकेशन ट्रस्ट’ में उद्धृत पृष्ठ -157.
2. ई. आर. नीव द्वारा संपादित और संकलित, मैनपुरी गजैटियर, संयुक्त प्रांत जिला आगरा और अवध, खंड-10, इलाहाबाद : सुपरिटेंडेंट, गवर्नमेंट प्रेस, उ.प्र. 1910, पृष्ठ 89.
3. केनिथ डब्ल्यू जोन्स, आर्यधर्म : हिंदू काॅसियशनेस इन नाइनटीथ सेन्चुरी पंजाब, नई दिल्ली, मनोहर पब्लिकेशन, 1976, पृष्ठ 310
4. डॉ. अमरजीत द्वारा ‘स्वामी अछूतानंद एंड राइज आफ दलित कानशियसनेस’ लेख से उद्धृत।  
5. उपर्युक्त, मूलतः गुरुप्रसाद मदान: स्वामी अछूतानंद हरिहर : जीवन और कृतित्व, अप्रकाशित पांडुलिपि 1969,
6. अछूतानंद स्वामी जी, इंजीनियर हेमराज फोंसा का आलेख, दलित विजन: http://dalitvision.blogspot.com/2017/06/achhutanand-swami-ji-1879-to-1933-his.html 
7. नंदिनी गोप्तू, दि पाॅलिटिक्स आफ अर्बन पूअर इन अर्ली ट्वंटीथ सेन्चुरी इंडिया, पृष्ठ-157
8. चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु, भारतीय मौलिक समाजवाद : सृष्टि और मानव समाज का विकास, आदिहिंदू ज्ञान प्रसारक ब्यूरो, 1941, पृष्ठ 271-272, से डॉ.अमरदीप द्वारा उद्धृत 
9. कंवल भारती, ‘स्वामी अछूतानंद ‘हरिहर’ का जीवनवृत’ से उद्धृत :
https://www.forwardpress.in/2019/01/swami-acchutanad-harihari-profile-story-hindi/#_ftn23