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पेरियार और बुद्ध : धर्माडंबर और जाति-मुक्ति संघर्ष की 2500 वर्ष लंबी परंपरा

सामान्य
जाति-मद, अभिमान, लोभ, द्वैष तथा मूढ़ता ये सब अवगुण जहां हैं, वे इस देश में अच्छे स्थान नहीं हैं. जाति-मद, अभिमान, लोभ, द्वैष तथा मूढ़ता ये सब अवगुण जहां नहीं हैं, वे ही इस देश में अच्छे स्थान हैं.1—मातंग जातक(497).

 

पेरियार और गौतम बुद्ध के बीच करीब ढाई हजार वर्षों का अंतराल है. जिन दिनों बुद्ध का जन्म हुआ था, वैदिक कर्मकांड और धर्माडंबर अपने चरम पर थे. यज्ञ, पूजा-पाठ आदि के नाम पर राजाओं से भरपूर समिधा हासिल करना, इन्कार करने या असमर्थता जताने पर शाप द्वारा लोक-परलोक बिगाड़ने की धमकी देना. मनोवांछित समिधा प्राप्त होते ही राजा के हर कुकर्म को सुकर्म घोषित कर देना, फिर हजारों पशुओं की बलि एक साथ चढ़ा देना—ब्राह्मण पुरोहितों के लिए बिलकुल सामान्य था. आतंक ऐसा था कि किसी भी सम्राट को वे धर्म के नाम पर मनमाने आचरण के लिए विवश कर सकते थे. धर्माडंबर और वर्णाश्रम व्यवस्था के समर्थन में बड़े-बड़े शास्त्र गढ़े जा रहे थे. उन्हें पढ़ने का अधिकार सिवाय ब्राह्मणों के किसी को न था. वे उनकी मनमानी व्याख्या करते थे. बावजूद इसके उन्हें तत्कालीन राजसत्ताओं का संरक्षण प्राप्त था. उनके धुर विरोधी के रूप में आजीवक और लोकायत जैसे भौतिकवादी चिंतक थे, जिनका संबंध समाज के मेहनतकश लोगों तथा शिल्पकार समूहों से था. यज्ञ के नाम पर बलि चढ़ाना, ईश्वर, आत्मा, परमात्मा जैसे वायवी विषयों पर बहस करना उन्हें नापसंद था.

बुद्ध राजसत्ता और परिवार का मोह त्यागकर युवावस्था में परिव्राजक बने थे. राजकुल से संबंधित होने के कारण उनका तत्कालीन राजाओं के बीच अतिरिक्त सम्मान था. बुद्धत्व प्राप्ति के बाद जब उन्होंने धर्मोपदेश देना आरंभ किया तो मगध, उज्जैनी सहित उस समय के सभी बड़े राज्यों एवं व्यापारिक वर्गों का भरपूर सहयोग एवं समर्थन उन्हें प्राप्त हुआ. बुद्ध के प्रति राजाओं के आकर्षण का कारण यह भी था कि अनेक राजा ब्राह्मण-ऋषियों द्वारा यज्ञादि के नाम पर पशुधन और दूसरे संसाधन ऐंठने से तंग आ चुके थे. यज्ञों से राज्य के खजाने पर अनावश्यक बोझ पड़ता था. बुद्ध ने यज्ञों का विरोध कर व्यावहारिक नैतिकता पर जोर दिया. उन्होंने वेदों को अपौरुषेय और आप्तग्रंथ मानने से भी इन्कार कर दिया. तत्कालीन बुद्धिजीवी समाज में बहस का बड़ा मुद्दा आत्मा, परमात्मा, ईश्वरादि को लेकर था. दर्शन की इन समस्याओं पर लोग शताब्दियों से बेनतीजा बहस करते आए थे. आत्मा-परमात्मा में विश्वास रखने वाले उनकी सत्ता को पूर्व-निष्पत्ति मान लेते थे. उस अवस्था में बहस उनके अस्तित्व तथा औचित्य के बजाय, स्वरूप और विस्तार को लेकर रह जाती थी. दूसरा वर्ग बुद्धिसंगत निर्णय लेने का समर्थन करता था. वह उनके अस्तित्व एवं औचित्य सहित हर पहलू पर विचार करना चाहता था. दोनों परस्पर विपरीत-ध्रुवी विचारधाराएं थीं. इतनी कि उनके बीच संवाद का कोई उदाहरण पूरे संस्कृत वाङ्मय में नहीं मिलता. बुद्ध ने उनके बीच का रास्ता अपनाया. आत्मा-परमात्मा, लोक-परलोक, पाप-पुण्य जैसी बहसों में उलझने के बजाए उन्होंने, व्यक्तिगत एवं सामाजिक शुचिता को अपने धर्म-दर्शन का केंद्र-बिंदू बनाया, जिसका उन दिनों सामाजिक जीवन से लोप हो चला था.

ढाई हजार वर्ष पहले यानी बुद्ध के जन्म के समय वर्ण जाति में ढलने लगे थे. परिणामस्वरूप पचासियों जातियां अस्तित्व में आ चुकी थीं. जन्म के आधार पर भेदभाव करने वाली उस व्यवस्था को बुद्ध ने अनैतिक, अनुचित तथा जीवन के उच्चतम लक्ष्यों की प्राप्ति में बाधक माना तथा उसकी आलोचना की. अभिजात वर्ग की भाषा संस्कृत के बजाए उन्होंने पालि में उपदेश दिए, जो उन दिनों जनसाधारण की भाषा थी. उस समय तक जातीय अभिमान के मारे ब्राह्मण स्वयं को आश्रमों तक सीमित रखते थे. शेष समाज से उनका संबंध दानादि ग्रहण करने तक सीमित था. बुद्ध अपने विचारों को लेकर सीधे आमजन के बीच गए. भिक्षु-संघ की स्थापना की तो उसके दरवाजे समाज के सभी वर्गों के लिए खोल दिए. जाति-आधारित भेदभाव को वे बौद्धिक, सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों की राह में बाधक मानते थे—

‘अंबट्ठ! जो भी जातिवाद में बंधे हैं, गोत्रवाद में बंधे हैं, (अभि)मानवाद में बंधे हैं, आवाह-विवाह में बंधे हैं, वे अनुपम विद्या-चरण-संपदा से दूर हैं. अंबट्ठ! जातिवाद बंधन छोड़कर, गोत्रवाद बंधन छोड़कर, मानवाद बंधन छोड़कर, आवाह-विवाह बंधन छोड़कर ही अनुपम विद्या-चरण-संपदा का साक्षात्कार किया जा सकता है.’2

वेदों को अपौरुषेय न मानने, आत्मा, परमात्मा, ईश्वर आदि विषयों पर मौन साध लेने के कारण बौद्ध दर्शन की गिनती नास्तिक दर्शन के रूप में की जाती है. इसके आधार पर कुछ विद्वान उसे आजीवक और लोकायत दर्शन की तरह ही, भौतिकवादी दर्शन मानते हैं. लेकिन वह उच्छ्रंखल भौतिकवाद न था. हम उसे आदर्शोन्मुखी व्यवहारवाद कह सकते हैं जिसमें सामाजिक समानता, शुचिता एवं आचरण की पवित्रता प्रमुख थी. बुद्ध के विचारों का इतना असर हुआ कि वैदिक कर्मकांडों से आमजन का विश्वास घटने लगा. यज्ञ और दानादि के नाम पर ऋषियों की मांगों और धमकियांे तंग आ चुके राजा बौद्ध एवं जैन धर्म से जुड़ने लगे. उसके फलस्वरूप ब्राह्मण धर्म कुछ शताब्दियों के लिए नेपथ्य में चला गया. जातीय भेदभाव कमजोर पड़ने लगा. अशोक के बाद मौर्य साम्राज्य कमजोर पड़ने से ब्राह्मणधर्म को पुनर्वापसी का अवसर मिला. इसी दौर में पुराणों एवं स्मृति-ग्रंथों की रचना हुई. उसके बाद इतिहास ने अनेक करवटें लीं. राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद ब्राह्मणवाद निरंतर मजबूत और निरंकुश होता चला गया.

बुद्ध पहले विचारक थे, जिन्होंने समाज को धर्म के आधार पर संगठित करने की कोशिश की थी. वैदिक धर्म के प्रस्तोता जातीय दंभ के शिकार थे. आत्ममुग्धता की पराकाष्ठा में वे बाकी जनसमाज से अलग-थलग जीते थे. जनसाधारण के सुख-दुख की उन्हें परवाह न थी. जाति और वर्ण के नाम पर उन्होंने समाज के बड़े हिस्से को मुख्यधारा से अलग किया हुआ था. अपने आश्रमों में बंद ऋषिगण धर्म और यज्ञादि के नाम पर क्या करते हैं? बलि चढ़ाने से उन्हें क्या हासिल होता है—जनसाधारण को इसकी बहुत परवाह भी नहीं थी. ब्राह्मण बुद्धिजीवियों की उपेक्षा की परवाह न करते हुए साधारण जन आजीवकों और लोकायतों पर विश्वास करते थे, जो उस समय भौतिकवादी दर्शन की प्रमुख शाखाएं थीं. वैदिक परंपरा संसार को नकारकर, काल्पनिक, भ्रममूलक देवलोक को परम-सत्य मानती थीं. आजीवकों और लोकायतों के लिए जीती-जागती, जीवनदायिनी प्रकृति ही सबकुछ थी. वे अपने श्रमकौशल के भरोसे जीवन-यापन करने वाले बहुसंख्यक लोग थे. चूंकि धर्म-केंद्रित समाज की रचना का संकल्प सामाजिक शुचिता के बगैर असंभव था. इसलिए बुद्ध ने आदर्शोन्मुखी नैतिकता पर जोर दिया. धार्मिक आडंबरों, यज्ञ-बलियों एवं जाति-प्रथा को अनावश्यक मानते हुए उन्होंने निस्पृह और कल्याणोन्मुखी जीवन जीने का उपदेश दिया. कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में पशु-धन का विशेष महत्त्व था. यज्ञादि कर्मकांडों के विरोध का सीधा-सा अभिप्राय था, उपयोगी पशुधन की जीवनरक्षा. इसके फलस्वरूप लोग उनके धर्म की ओर आकृष्ट होने लगे.

 

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पेरियार के समय तक जाति-व्यवस्था उग्र रूप धारण कर चुकी थी. अछूतों का सार्वजनिक स्थलों पर प्रवेश निषिद्ध था. कथित ऊंची जाति के सदस्यों का स्पर्श तो दूर, अपनी छाया से भी उनको बचाना पड़ता था. शूद्रों को उनके कार्य के अनुसार थोड़ी छूट थी, परंतु वे भी एक सीमा तक ही उच्च जातियों के निकट जा सकते थे. कैथरीन मेयो ने अपनी पुस्तक ‘मदर इंडिया’ में भारतीय समाज में व्याप्त छूआछूत के बारे में वर्णन किया है. डू. बोइस के हवाले से वे उनीसवीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों में दक्षिण भारतीय समाज के बारे लिखती हैं—‘मालाबार तट पर रहने वाली ‘पुलाया’ जाति के सदस्यों को अपने लिए घर बनाने का अधिकार नहीं है. रहने के लिए वे लोग दरख्तों पर घौंसले की भांति, बांस-बल्लियों के सहारे, पत्तों की छत डाल सकते हैं.’ डू. बोइस के अनुसार, उन दिनों यदि कोई नैय्यर किसी पुलाया को सड़क पर देख लेता तो उसे वहीं मार देने का अधिकार था. बातचीत के दौरान दो व्यक्तियों के बीच दूरी से भी अस्पृश्यता के स्तर का अनुमान लगाया जा सकता था. पुलाया को नैय्यर जैसे उच्च जाति के हिंदुओं से 60 से 90 फुट की दूरी रखकर बात करनी पड़ती थी.

पेरियार ने बचपन से जाति-आधारित भेदभाव का अनुभव किया था. बड़े हुए तो उन्हें इसका कारण भी समझ में आने लगा. उनका जन्म धनाढ्य परिवार में हुआ था. शिक्षा के नाम पर वे बस दो-तीन वर्ष ही पाठशाला जा पाए थे. बाद में पिता के व्यवसाय से जुड़ गए. उन दिनों उनके घर में संन्यासियों, शैव-मतावलंबियों, वैष्णवों, पंडितों आदि का खूब आना-जाना था. किशोर पेरियार उन्हें अधिकाधिक दान-दक्षिणा के लिए तरह-तरह के बहाने बनाते हुए देखते. कभी-कभी वे उनका मजाक भी उड़ाते. बावजूद इसके अपनी युवावस्था तक ईश्वर में उनकी आस्था बनी रही. 1925 में उन्होंने संन्यासी के रूप में बनारस की यात्रा की. यात्रा के दौरान वे बनारस में जहां-जहां गए, वहां ब्राह्मणवाद का विकृत चेहरा, धर्म के नाम पर लूट-खसोट और वृथा आडंबरों से सामना हुआ. जातीय भेदभाव का अनुभव तो उन्हें बचपन से ही था. बनारस यात्रा के बाद उनका धर्म से भी विश्वास उठ गया. उसके बाद नए पेरियार का जन्म हुआ, जो तर्कवादी था. ज्ञान-विज्ञान पर जोर देता था. व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता, समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर विश्वास करता था. आस्था के आधार पर कुछ भी मान लेना उसे अस्वीकार्य था. हर स्थापित सत्य पर संदेह करना, उसे अपने विवेक की कसौटी पर कसना और खरा उतरने के बाद ही उसे स्वीकार करना, उसकी आदत में शुमार हो चुका था.

पेरियार ने आत्मा, परमात्मा, पाप-पुण्य, भाग्य आदि को सीधे नहीं नकारा. अपितु तर्क पर जोर दिया. इस मामले में बुद्ध उनके प्रेरणा-पुरुष रहे. प्राचीन भारत के इतिहास में बुद्ध कदाचित पहले शास्ता थे जिन्होंने वैचारिक स्वतंत्रता को आगे रखते हुए अपने शिष्यों से कहा था—‘अप्पदीपो भवः.’ दूसरों की बातों में आने के बजाय, सोच-विचारकर स्वयं निर्णय लो. धर्म-दर्शन और जाति पर दिए गए अपने व्याख्यानों में पेरियार भी आत्मा, परमात्मा, ईश्वर आदि को तर्क की कसौटी पर कसते हैं. उनके अस्तित्व पर ध्यान देने के बजाए औचित्य पर विचार करते हैं. 1947 में सलेम कॉलिज में ‘हिंदू दर्शन’ पर दिए गए अपने व्याख्यान में उन्होंने इन विषयों की वैज्ञानिक पड़ताल की थी. उन्होंने सिद्ध किया कि ये सभी मिथ समाज पर सोची-समझी नीति के तहत थोपे गए हैं. सहअस्तित्व, समानता, सहयोग, सद्भाव एवं निस्पृह जीवन जीने वाले व्यक्ति को इनकी कोई आवश्यकता नहीं पड़ती. उस व्याख्यान में वे बुद्ध का नाम नहीं लेते; परंतु उनका प्रत्येक निष्कर्ष उन्हें बुद्ध के करीब ले जाता है—

‘मनुष्य अपनी इच्छाओं के साथ जीता है. वह अपने लालच का दास का है. समाज में रहकर वह दूसरों के लिए या तो अच्छा कर सकता है अथवा बुरा. कर्म की महत्ता पर जोर देने के लिए ही जीवन और आत्मा जैसी काल्पनिक चीजों की रचना की गई है. मनुष्य को अच्छे कृत्यों की ओर प्रवृत्त करने हेतु, उसे यह विश्वास करना सिखाया गया है कि यदि वह बुरे कर्म करेगा तो मृत्यु के बाद उसकी आत्मा को भयावह दंडों से गुजरना पड़ेगा. यह भी एक मिथ मात्र ही है. तर्क-सम्मत ढंग से बातचीत करने वाले निस्पृह व्यक्ति के लिए जो न अच्छा करता है, न ही बुरा, ईश्वर का भय नहीं रहता. उसे स्वर्ग या नर्क की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है.’3

बुद्ध के ‘अपना दीपक स्वयं बनो’ की तरह पेरियार ने भी लोगों से बार-बार यह आग्रह किया—‘मैंने जो कहा वे मेरे व्यक्तिगत विचार हैं. जरूरी नहीं है कि आप भी इनपर विश्वास करें. इसलिए खूब सोचें और स्वयं सार्थक निर्णय तक पहुंचे.’

एक और सूत्र जो पेरियार को बुद्ध के करीब ले जाता है, वह है—जाति व्यवस्था को लेकर दोनों का समान दृष्टिकोण. बुद्ध का जन्म नागवंशीय शाक्य कुल में हुआ था. बाकी क्षत्रियों की अपेक्षा उसे कुछ हीन माना जाता था. अश्वघोष उनका संबंध इक्ष्वाकू वंश से जोड़ते हैं. बौद्ध साहित्य के गंभीर अध्येता कोसंबी के अनुसार शाक्य एक जनजाति थी. बुद्ध ने जातिगत भेदभाव का विरोध किया था. भिक्षु संघों के दरवाजे उन्होंने सभी जातियों के लिए खोले हुए थे. लेकिन ‘अंबट्ठसुत्त’(दीघनिकाय) में वे जिस तरह क्षत्रियों को ब्राह्मणों से श्रेष्ठ बताने के लिए तर्क देते हैं, उसका एक निष्कर्ष यह भी निकलता है कि उन्हें अपने क्षत्रीय कुलोत्पन्न होने पर गर्व था; या कम से कम वर्ण-व्यवस्था से उन्हें कोई शिकायत न थी. बुद्ध द्वारा धार्मिक कर्मकांडों, आडंबरों तथा जाति-प्रथा के विरोध का इतना असर अवश्य हुआ था कि बौद्ध धर्म को जनता ने अपना धर्म मान लिया. उसके फलस्वरूप समाज में जाति-आधारित कटुताओं में भी कमी आने लगी. परंतु जाति और उसके आधार पर हो रहे भेदभाव के विरोध में बड़ा आंदोलन न चलाने के कारण, जातिवादी शक्तियां भीतर ही भीतर सक्रिय बनी रहीं. लोगों को ब्राह्मण धर्म की ओर वापस मोड़ने के लिए ब्राह्मण बुद्धिजीवी पुराणों, स्मृतियों, महाकाव्यों आदि ग्रंथों की रचना में जुट गए. अशोक द्वारा उठाए गए कदमों के फलस्वरूप बौद्ध धर्म दुनिया के विभिन्न देशों में पहुंचा. मगर उसके तुरंत बाद, मौर्य वंश के कमजोर पड़ते ही, ब्राह्मणवाद पुनः जड़ जमाने लगा. ‘मनुस्मृति’ की रचना हुई. जातीय भेदभाव और दुराग्रह जो बुद्ध के प्रभाव दब-से गए थे, वे पुनः सामने आने लगे.

 

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पेरियार के समय तक लगभग सभी धर्म अपनी प्रासंगिकता खो चुके थे. सतरहवीं-अठारहवीं शताब्दी में पश्चिम में हुई वैचारिक क्रांति के फलस्वरूप, भारत में भी मानव-मात्र की समानता और स्वतंत्रता की समर्थक नई विचार-चेतना का जन्म हुआ था. यह मानते हुए कि राजनीति सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बन सकती है, राजगोपालाचार्य के आग्रह पर पेरियार कांग्रेस में शामिल हुए थे. प्रदेश कांग्रेस के उच्च पदों पर रहते हुए उन्होंने नेताओं का मन बदलने की पूरी कोशिश की थी. मगर थोड़े ही समय में उन्हें विश्वास हो गया कि कांग्रेस के नेता अपने जातीय दुराग्रहों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं. उनकी कथनी और करनी में बड़ा अंतर है. खासतौर पर जातीय विषमता को मिटाने के लिए कांग्रेसी नेता कुछ नहीं करना चाहते. यहां तक कि गांधी भी जातीय पूर्वाग्रहों में फंसे हुए हैं. खिन्न होकर 1925 में उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया. लोगों में आत्माभिमान का भाव पैदा करने के लिए उन्होंने ‘स्वाभिमान आंदोलन’ की नींव रखी. उस समय तक धर्म को नैतिक मूल्यों का एकमात्र स्रोत माना जाता था. लोगों का विश्वास था कि केवल धर्म के सहारे समाज को एकसूत्र में बांधकर रखा जा सकता है. पेरियार किसी नए धर्म के बंधन में बंधना नहीं चाहते थे. तमिल जनता में अपनत्व एवं एकजुटता की भावना पैदा करने के लिए उन्होंने द्रविड़ संस्कृति को आधार बनाया. लोगों को समझाया कि समाजीकरण की बुनियाद पारस्परिक सहयोग और समर्पण पर टिकी होती है. पौराणिक ग्रंथों, महाकाव्यों आदि की रचना स्वार्थी ब्राह्मणों ने लोगों को भरमाने के लिए की है. जाति-व्यवस्था को दैवीय बताने वाले धर्मग्रंथों में शूद्रों और अस्पृश्यों के लिए अपमानजनक स्थितियां हैं—‘बौद्धों और जैनियों ने ब्राह्मणवाद द्वारा फैलाई गई कुरीतियों को कुछ समय के लिए समाप्त कर दिया था. उन्होंने बताया था कि सभी लोग बराबर हैं. आपसी प्रेम और भाईचारा ही असली ईश्वर हैं. ब्राह्मणों को वह स्वीकार नहीं हुआ. इसलिए उन्होंने उनके सभी कार्यों पर पानी फेर दिया.’4 लोगों को ब्राह्मणों द्वारा फैलाए गए भ्रमजाल से निकालकर मानवीय मूल्यों से जोड़ना, उनके भीतर सम्मानजनक जीवन जीने की चाहत पैदा करना पेरियार की प्रमुख चुनौती थी. फुले इसकी नींव बहुत पहले डाल चुके थे. ‘स्वाभिमान आंदोलन’ की शुरुआत का भी यही उद्देश्य था.

पेरियार आस्थावान व्यक्ति नहीं थे. उनका विश्वास ज्ञान-विज्ञान में था. अरस्तु की तरह वे भी मनुष्य को विवेकशील प्राणी मानते थे. बावजूद इसके उन्होंने धर्म की शक्ति को नकारा नहीं था. लेकिन उनका धर्म मानव-मात्र के कल्याण का उद्यम था, जिसमें किसी देवता या आत्मा-परमात्मा के लिए कोई स्थान नहीं था. आजीवन वे इस पर विचार करते रहे कि मनुष्य को धर्म और धर्मशास्त्रों के मकड़जाल से बाहर कैसे निकाला जाए! यह आसान काम नहीं था. क्योंकि मानव जीवन में धर्म की व्याप्ति केवल पूजा-पाठ या संस्कारों तक सीमित नहीं रहती. ऐसे लोग भी जो मंदिर नहीं जाते, पूजा-पाठ तथा दूसरे आडंबरों से दूर रहते हैं; और ऐसे भी जो अच्छे-खासे पढ़े-लिखे हैं—दिलो-दिमाग से दकियानूसी हो सकते हैं. लोकजीवन का हिस्सा बन चुके विभिन्न संस्कार, आचार-विचार और रूढि़यां, संस्कृति का अभिन्न हिस्सा मान लिए कर्मकांड यहां तक कि उनसे जुड़े किस्से-कहानियां भी—किसी न किसी रूप में धार्मिक जड़ता के संवाहक हैं. उनकी रचना जातिभेद और सामाजिक ऊंच-नीच को दैवीय सिद्ध करने के लिए की गई है. 2400 वर्ष पहले अरस्तु ने भी तो यही कहा था, ‘मनुष्य ने ही ईश्वर को रचा है. अपने रूपाकार में, और अपनी जीवनशैली के अनुरूप भी.’ ब्राह्मण खुद को सर्वोपरि मानते हैं. वे चाहते हैं कि शेष जनसमाज उनके इशारे पर नाचे. जो ऐसा नहीं करता उसे वे शाप देने की धमकी दिया करते थे. उनका गढ़ा हुआ ईश्वर भी खुद को भक्तों से ऊपर मानता था; जो उसकी चापलूसी(भक्ति) से आनाकानी करे, उसे वह दंड देने को उतावला रहता था.

बौद्ध धर्म के रास्ते सामाजिक शुचिता की वापसी का रास्ता पेरियार से पहले दक्षिण भारत में आइयोथि थास भी दिखा चुके थे. उनका मानना था कि दक्षिण की पेरियार जाति के लोग मूलतः बौद्ध हैं और वे दक्षिण के मूल निवासी हैं. आर्य हमलावरों ने उनके धर्म और संस्कृति को उनसे छीन लिया है. थॉस के प्रभाव में केरल की जाति इझ़वा अपना संबंध गौतम बुद्ध से वंश से जोड़ने लगी थी. मद्रास प्रेसीडेंसी का नाम द्रविड़नाडु करने की मांग के समय पेरियार ने भी कहा था कि मुस्लिम, ईसाई, आदि द्रविड़ और बौद्ध सभी द्राविड़ हैं.5 थॉस की भांति पेरियार भी ब्राह्मणवाद के कटु आलोचक थे. जातीय उत्पीड़न से मुक्ति के लिए उन्होंने तमिलवासियों से हिंदू धर्म को छोड़ने का आग्रह किया था. उसके पीछे भी बौद्ध धर्म की प्रेरणा थी. 13 जनवरी 1945 के ‘कुदी अरासु’ के अंक में उन्होंने लिखा था कि यदि अंग्रेजों ने हम पर शासन करने के लिए ‘बांटो और राज करो’ की नीति का अनुसरण किया था तो ठीक यही नीति आर्यों ने भी भारत के मूल निवासियों पर राज करने के लिए अपनायी थी. उन्होंने यहां के बहुसंख्यकों को पिछड़ों और अछूतों में बांट दिया. पेरियार का कहना था—‘विश्वासघातियों का शिकार मत बनिए….राम और कृष्ण जैसे नायक तथा गीता, रामायण जैसे धर्मग्रंथ, बौद्ध धर्म के प्रति हमारे विश्वास को मिटाने के रचे गए हैं.’ उन्होंने आगे कहा था—

‘आंबेडकर जब मद्रास आए थे तब मैंने उन्हें 1923 में भारी जनसभा के सामने दिए गए अपने भाषण के बारे में बताया था कि जब तक कोई रामायण का दहन नहीं करता, तब तक छूआछूत पर सार्थक प्रहार संभव नहीं है.’6 10 जनवरी 1947 को ‘कुदीअरासु’ में उन्होंने फिर लिखा था कि जैसे ‘बुद्ध और गुरुनानक वेदों को धर्मशास्त्रों को पूरी तरह मिथ्या बताते थे, केवल हम द्रविड़जन ही वैसा कहने का साहस कर पाते हैं.’7

27 मई 1953 को बुद्ध जयंती के अवसर पर पेरियार ने अपने अनुयायियों को उसे उत्सव की तरह मनाने का आवाह्न किया था. उन्होंने कहा था कि इस अवसर पर वे मूर्ति पूजा का बहिष्कार करें. विघ्नेश्वर, गणपति, गजपति, विनायक आदि कहे जाने वाले गणेश की मूर्तियों को तोड़कर बहा दें. बौद्ध जयंती वैदिक परंपरा के धुर विरोधी की जयंती है. इस देश में हजारों देवी-देवता है. इसलिए ऐसा व्यक्ति जो विवेक से काम लेता है, तर्क को महत्त्व देता है, जीवन के प्रति व्यावहारिक दृष्टिकोण रखता है तथा जिसे मनुष्यता में भरोसा है वह स्वयं ही बुद्ध कहलाने योग्य है. यह दिखाने के लिए कि मूर्ति केवल पत्थर का टुकड़ा है, उसमें कोई दैवी शक्ति नहीं है, पेरियार ने तमिलनाडु के कई शहरों में मूर्ति तोड़ो आंदोलन का नेतृत्व किया था. मूर्ति-पूजा और धार्मिक कर्मकांडों का बहिष्कार, सामाजिक कार्यक्रमों में ब्राह्मण पुरोहित की अनिवार्यता से मुक्ति, उनके ‘स्वाभिमान आंदोलन’ का महत्त्वपूर्ण हिस्सा था. ढाई हजार वर्ष पहले बुद्ध ने भी मूर्ति पूजा की निंदा की थी. धार्मिक कर्मकांडों, आडंबरों एवं जाति-आधारित भेदभाव की आलोचना करते हुए उन्होंने पंचशील और अष्ठांग मार्ग का प्रतिपादन किया जो व्यैक्तिक एवं सामाजिक जीवन की शुचिता पर जोर देता था. बुद्ध ने दिखाया था कि किसी भी समाज में शुभत्व की मौजूदगी, इसपर निर्भर करती है कि उसके सदस्य अपने जीवन में शुचिता एवं सौहार्द्र को लेकर कितने गंभीर हैं. उसके लिए किसी धर्माडंबर की आवश्यकता नहीं है. पेरियार के भाषणों का लोगों पर अनुकूल असर पड़ा. लोग धर्म के सम्मोहन से बाहर निकलने लगे. आंदोलनकारियों ने अपने-अपने घर से देवताओं की मूर्तियां निकाल फैंकी. तिरुचिरापल्ली के टाउन हॉल के सामने खुले मैदान में सैकड़ों लोगों ने मूर्तियों को तोड़ डाला.

धर्म के प्रति विशेष आस्था न होने के बावजूद पेरियार बुद्ध को अपने विचारों के करीब पाते थे. वे चाहते थे कि लोकमानस बुद्ध के विचारों को जाने-समझे. इसके लिए उन्होंने 23 जनवरी 1954 को इरोद में एक सम्मलेन का आयोजन किया था. सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए सीलोन विश्वविद्यालय, श्रीलंका के बौद्ध संस्कृति केंद्र के प्रोफेसर जी. पी. मल्लाल शेखर ने कहा था कि बुद्ध के विचारों के अनुसरण द्वारा अंतरराष्ट्रीय शांति की स्थापना की जा सकती है. उन्होंने पेरियार द्वारा समाज सुधार विशेषरूप से धार्मिक जकड़बंदी के प्रयासों से बाहर लाने के प्रयासों की सराहना की थी. उनका मानना था कि तमाम विरोधों एवं अवरोधों के बावजूद समाज सुधार का पेरियार का रास्ता बुद्ध के विचारों से मेल खाता है. सम्मेलन में जाति प्रथा पर भी चिंता व्यक्त की गई थी. ‘अखिल भारतीय शोषित जाति संघ के सचिव और सांसद राजभोज ने सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा था कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था में दलित, शूद्र और अन्य जातियां बहुसंख्यक होने के बावजूद तरह-तरह के शोषण की शिकार रही हैं. बौद्ध धर्म जाति-प्रथा को नकारता है. उसके अनुसार समाज में सभी बराबर हैं. जाति-व्यवस्था हिंदू धर्म का कलंक है. सबसे पहले बुद्ध ने ही जाति-प्रथा और धर्माडंबरों का विरोध करते हुए, सामाजिक कुरीतियों को दूर करने में सफलता प्राप्त की थी. केवल बौद्ध धर्म से ही इस समस्या का समाधान संभव है. सम्मेलन में पेरियार की प्रशंसा करते हुए कहा गया था कि उन्होंने ब्राह्मणवाद के खात्मे के लिए कई आंदोलन चलाए हैं. उनके कारण समाज में जाति-विरोधी चेतना का जन्म हुआ है—‘बुद्ध की नीतियां ही आपकी और ‘स्वाभिमान आंदोलन’ की नीतियां हैं.’8 उस अवसर पर बुद्ध की प्रतिमा का अनावरण किया गया था. हमेशा की तरह उस सम्मेलन में भी पेरियार ने हिंदू धर्म-दर्शन पर हमला बोलते हुए बौद्ध धर्म की प्रशंसा की थी—

‘हम जो मेहनती और कामगार लोग हैं, हमें नीची जाति में डाल दिया गया है. हम भुखमरी के शिकार हैं. हमारे पास पहनने के लिए वस्त्र नहीं हैं. हमारे पास रहने को घर भी नहीं हैं. लेकिन ब्राह्मण जो कोई काम नहीं करते, उन्हें सभी प्रकार के सुख और मान-सम्मान हासिल है.’9

सम्मेलन में लोगों को संबोधित करते हुए पेरियार ने कहा था—

‘‘केवल तुम्हीं वे लोग हो जिन्होंने ये मंदिर बनाए हैं. केवल तुम्हीं हो जिन्होंने इनके लिए दान दिया है. यदि ऐसा है तो क्या हम ईश्वर को जो हमें नीची जाति का और अछूत बताता है, ऐसे ही छोड़ सकते हैं? ‘कृतघ्न ईश्वर! केवल मैंने ही तेरे लिए मंदिर और तालाब बनवाए हैं. केवल मैंने ही तुझपर अपना पैसा बहाया है.’ क्या तुम यह नहीं पूछोगे कि तुम नीची जाति के क्यों हो? तुम्हें छूने में हर्ज क्या है? तुम केवल ब्राह्मण के कहे पर विश्वास करते हो कि यदि तुम ऐसे सवाल उठाओगे तो ईश्वर तुमसे नाराज हो जाएगा.’’10

इरोद सम्मेलन में गौतम बुद्ध के विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए एक प्रस्ताव स्वीकृत किया गया था. उसमें कहा गया था—‘आर्यों द्वारा हिंदू धर्मशास्त्रों, पुराणों, महाकाव्यों की रचना सांस्कृतिक वर्चस्व कायम रखने तथा द्रविड़ों के अपमान, अवमूल्यन तथा उन्हें भरमाए रखने के लिए की गई है, उनका सबका नाश होना चाहिए.’ उसी सम्मेलन में स्वीकृत एक अन्य प्रस्ताव में कहा गया था—‘बुद्ध का जीवन तथा उनके धर्मोपदेश ईश्वर, आत्मा, स्वर्ग-नर्क, भाग्यवाद, धार्मिक परंपराओं तथा उत्सवों की मिथ्याचार को उजागर करती हैं; तथा भेदभाव रहित, आपसी सहयोग और बराबरी पर आधारित सामाजिक संरचना का समर्थन करती हैं, तमिलनाडु के सभी लोगों, जनसंगठनों, संस्थाओं और समूहों को चाहिए कि वे उनके विचारों को, समस्त मानव-समुदाय तक पहुंचाने के लिए आगे आएं.’

पेरियार की बातों को सुनकर रोज नए-नए लोग उनके आंदोलन से जुड़ने लगे. धार्मिक आयोजनों, कर्मकांडों तथा धर्मशास्त्रों में कही गई बातों पर सवाल उठाए जाने लगे. इससे सनातनी हिंदुओं को डर सताने लगा था. वे जानते थे कि धर्म की नींव अज्ञात डर पर टिकी है. मूर्तियों के प्रति श्रद्धा भी उसी डर का विस्तार है. यदि वह डर ही नहीं रहा तो लोग धर्म की गिरफ्त से बाहर होने लगेंगे. पेरियार लगातार वैज्ञानिक सोच का प्रचार-प्रसार कर रहे थे. सनातनी हिंदुओं की निगाह में धर्मशास्त्रों आलोचना नास्तिकता थी. स्वाभिमान आंदोलन की राह में अवरोध पैदा करने के लिए उन्होंने एक संगठन का गठन किया था. उस संगठन ने पेरियार तथा उनके दो सहयोगियों टी. पी. वेदाचलम और एम. आर. राधा के विरुद्ध धारा 295 के अंतर्गत मुकदमा दायर कर दिया. वेदाचलम वरिष्ठ अधिवक्ता थे, जबकि एम. आर. राधा जाने-माने अंधविश्वास विरोधी कार्यकर्ता. पेरियार और उनके सहयोगियों पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने जनभावनाओं को आहत करने का काम किया है. मामले की पहली सुनवाई सत्र न्यायालय में हुई. अगली सुनवाई के लिए मुकदमा जिला सत्र न्यायालय में पहुंचा. दोनों अदालतों का निर्णय पेरियार के पक्ष में गया. मगर पेरियार के दुश्मन इतने से शांत होने वाले न थे. उन्होंने मद्रास उच्च न्यायालय में अपील दायर कर दी. अपील की सुनवाई के बाद, 13 अक्टूबर 1954 को न्यायमूर्ति एन. सोम सुंदरम ने उसे यह कहकर खारिज कर दिया कि वादी पक्ष की यह आशंका कि पेरियार तथा उनके सहयोगियों के कृत्य से जनभावनाएं आहत होती हैं—सही मानी जा सकती है. लेकिन पेरियार और उनके साथियों ने जो मूर्तियां तोड़ीं उन्हें उन्होंने या तो स्वयं बनाया था अथवा बाजार से खरीदा गया था. वे मंदिर में पूजी जाने वाली मूर्तियां नहीं थीं. ऐसी मूर्तियों को तोड़ना कानून अपराध नहीं है.

तमिल समाज में जागृति लाने, उसे रूढि़मुक्त करने तथा आत्माभिमान की भावना जागृत करने के लिए पेरियार ने ‘स्वाभिमान आंदोलन’ का सूत्रपात किया था. उसी के एक कार्यक्रम में जनवरी 31, 1954 को उन्होंने मद्रास(अब चैन्नई) में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा कि बुद्ध के विचार हमारे अपने विचारों को लागू करने, आगे बढ़ाने तथा समाज में बढ़ रही विकृतियों के शमन की दिशा में बहुत ही उपयोगी हैं. उसी वर्ष पेरियार अपनी पत्नी तथा कुछ मित्रों के साथ मलेषिया और मयामार गए थे. वहां मेंडले में बुद्ध की 2500वीं जयंती के अवसर पर उनकी भेंट डॉ. आंबेडकर से हुई थी. उस समय तक डॉ. आंबेडकर बौद्ध धर्म अपनाने का निर्णय ले चुके थे. उन्होंने पेरियार से भी वैसा ही करने को कहा था. इसपर पेरियार ने डॉ. आंबेडकर से आग्रह किया था कि वे धर्मांतरण से बचें. क्योंकि ऐसा करके वे हिंदू धर्म की आलोचना का अधिकार खो देंगे. जड़वादी हिंदू दावा करने लगेंगे कि किसी गैर हिंदू को उनके धर्म की आलोचना का अधिकार नहीं है. लोग भी उनकी बात पर आसानी से विश्वास कर लेंगे. अपने धर्मांतरण के बारे में पेरियार का कहना था कि वे धर्मांतरण के बजाए हिंदू धर्म के भीतर रहकर ही उसकी आलोचना करते रहेंगे. हिंदुओं के धर्मांतरण के बारे में उनकी स्पष्ट राय थी—

‘यदि कोई हिंदुओं द्वारा इस्लाम, ईसाई, बौद्ध, जैन धर्म की ओर धर्मांतरण के आंकड़ों का विश्लेषण करे तो उनमें सर्वाधिक संख्या दलितों की होगी. वे धर्मांतरण को इसलिए अपनाते हैं क्योंकि हिंदू धर्म उन्हें बहुत ही उत्पीड़क नजर आता है. धर्मांतरण द्वारा वे जातीय निरंकुशता से बाहर निकल जाना चाहते हैं. उनमें से बहुत से लोग मानते हैं कि आस्था के अंतरण द्वारा वे अपनी जीवनशैली और आर्थिक स्थिति में सुधार ला सकते हैं. दूसरे शब्दों में धर्मांतरण उन्हें घृणित कर्मवाद के दुश्चक्र से मुक्ति दिला सकता है. धर्मांतरण उनमें बेहतरी की उम्मीद जगाता है. उनके भीतर बेहतर पहचान और संपत्ति के बारे में नई चेतना का संचार करता है.’11

उन दिनों चैन्नई में ब्राह्मण अपने स्वामित्व वाले होटलों के आगे ‘ब्राह्मण होटल’ का बोर्ड लगाते थे. इससे लगता था कि ब्राह्मण बाकी जातियों से आगे हैं. पेरियार उस प्रवृत्ति को रोकना चाहते थे. इसलिए उन्होंने उसके विरुद्ध आंदोलन छेड़ दिया. 5 मई 1957 को एक ब्राह्मण होटल के सामने से प्रतीकात्मक आंदोलन की शुरुआत हुई. 22 मार्च 1958 तक उनका आंदोलन लगातार चलता रहा. पेरियार के साथ 1010 आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया. आखिरकार उनकी जीत हुई. पूरे राज्य में होटल मालिकों को अपने बोर्ड से ‘ब्राह्मण’ शब्द हटाना पड़ा.

फरवरी 1959 में पेरियार उत्तर भारत की यात्रा पर निकले. धार्मिक कूपमंडूकता के मामले में उत्तरी और दक्षिणी भारत में आज भी बहुत अंतर नहीं है. उत्तर भारत की यात्रा के दौरान पेरियार ने कानपुर, लखनऊ और दिल्ली में बड़ी जनसभाओं को संबोधित किया था. उस समय तक डॉ. आंबेडकर बौद्ध धर्म अपना चुके थे और जातीय उत्पीड़न और अनाचार से बचने के लिए दलित और पिछड़ी जातियों के काफी लोग बौद्ध धर्म को अपनाने लगे थे. पेरियार ने इसकी चर्चा भी अपने भाषण में की थी. उसके बारे में एक संक्षिप्त रिपोर्ट ‘विदुथलाई’ के 21 फरवरी 1959 के अंक में प्रकाशित हुई थी. उनका कहना था—

‘शूद्रों और पंचमों, जिन्हें आजकल पिछड़ी जाति और दलित कहा जाता है—के अवमूल्यन को रोकने के लिए हमें आर्यों द्वारा गढ़े गए धर्म, धर्मशास्त्रों एवं ईश्वर का बहिष्कार करना होगा. जब तक इनकी सत्ता रहेगी, हम जाति को नहीं मिटा सकते. इसी के लिए डॉ. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाया था. अपने अलावा उन्होंने और बहुत से लोगों को धर्मांतरण कराया था. इसलिए सभी हिंदू धर्म, ईश्वर और जाति से मुक्ति हेतु बौद्ध धर्म अपनाने के लिए आगे आना चाहिए.’

पेरियार के अनुसार केवल बुद्ध ही थे जिन्होंने समाज में व्याप्त तरह-तरह की ऊंच-नीच के विरोध में सवाल उठाए थे—

‘‘क्या (बुद्ध के अलावा) किसी और ने पूछा था कि समाज में लंबे समय से जातीय भेदभाव क्यों मौजूद है? बुद्ध ने यह सवाल उठाया था. वे राजा के बेटे थे. उन्होंने कई चीजों पर सवाल उठाए थे. उन्होंने पूछा—‘वह आदमी बूढ़ा क्यों है?’ ‘वह व्यक्ति नौकर क्यों था? वह अंधा क्यों है? बुद्ध ने पूछा था—‘वह आदमी नीच जाति का क्यों है?’ उन्होंने बताया—‘उसे भगवान ने ही ऐसा बनाया है?’ इसपर बुद्ध ने सवाल किया—‘वह ईश्वर कहां है जिसने इसे बनाया है?’ तब वे आत्मा का सिद्धांत बघारने लगे. तब बुद्ध ने पूछा—‘आत्मा क्या है? क्या किसी ने उसे देखा है?’….बुद्ध के मुख्य सिद्धांत हैं—

‘निहित सत्य को जानने के लिए प्रत्येक वस्तु का अपने विवेकानुसार भली-भांति विश्लेषण करो.’ तथा ‘यदि तुम्हारा विवेक उसे सच मानता है, तभी उसपर विश्वास करो.’ पेरियार ने आगे कहा था—‘ईश्वर, आत्मा, देवता, स्वर्ग, नर्क, ब्राह्मण, शूद्र, पंचम यदि ये बातें तुम्हारी समझ में नहीं आती हैं तो इनपर विश्वास मत करो. ये सब काल्पनिक शब्द हैं. कुछ भी स्वीकारने से पहले अपनी सहज बुद्धि का उपयोग करो. ईश्वर ने ऐसा कहा है, वेद ऐसा कहते हैं या मनुस्मृति में यह सब लिखा है—ऐसी बातों पर विश्वास वृथा है. जिसे तुम्हारी बुद्धि स्वीकारती है, केवल उसी पर भरोसा करो.’’12

पेरियार का विश्वास किसी भी धर्म में नहीं था. बावजूद इसके ऐसे कई अवसर आए जब उन्होंने बौद्ध धर्म की प्रशंसा की. अपनी मृत्यु से कुछ महीने पहले उन्होंने ‘ईश्वर और मनुष्य’ विषय पर सारगर्भित भाषण दिया था. भाषण में ईश्वर की अवधारणा को नकारा गया था, साथ ही विभिन्न धर्मों पर चर्चा की थी. उसमें बौद्ध धर्म की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा था—‘यदि हम बौद्ध धर्म को कोई और नाम देना चाहें तो हम उसे ‘बुद्धि’ यानी ‘ज्ञान का धर्म’ कह सकते हैं. बौद्ध धर्म को ‘ज्ञान का धर्म’ या ‘ज्ञानमय धर्म’ क्यों कहा जाएगा? क्योंकि बाकी जितने भी धर्म हैं, वे सभी ईश्वर केद्रित हैं, जबकि बौद्ध धर्म किसी ईश्वर को मान्यता नहीं देता. यह इसलिए है कि कोई भी ऐसा ‘ज्ञानमय धर्म’ या ‘ज्ञान का धर्म’ नहीं हो सकता जो ईश्वर पर विश्वास करता हो. यही कारण है कि बौद्ध धर्म को ‘विवेकशील धर्म’ कहा है. उस भाषण में पेरियार ने बौद्ध धर्मावलंबियों की यह कहकर आलोचना की थी कि वे भी बौद्ध धर्म को ‘ज्ञान के धर्म’ के रूप में अंगीकार करने में विफल रहे हैं. पेरियार ने ऐसा क्यों कहा था? इस बारे में उनका कहना था कि किसी भी सामान्य—‘धर्म को अपनी पहचान बनाने के ईश्वर में विश्वास करना आवश्यक है. इसके लिए उसके अनुयायियों को कुछ बकवास कहानियों, रीति-रिवाजों और कर्मकांडों पर विश्वास करने को कहा जाता है. बौद्ध धर्म कर्मकांडों को निरर्थक विश्वासों का खंडन करता है. बावजूद इसके अधिकांश बौद्ध मतावलंबी उसी जीवन-पद्धति को अपनाए हुए हैं. उनकी पूजा पद्धति भी उसी प्रकार की है.’ धर्म और जाति-व्यवस्था पर प्रहार करते हुए अपने 25-26 दिसंबर 1958 के भाषण में पेरियार ने पुनः दोहराया था कि ऐसा ईश्वर जिसे लगता है कि वह दलितों और शूद्रों के छूने भर से अपवित्र हो जाएगा, को मंदिर में रहने का कोई अधिकार नहीं है. ऐसी मूर्ति को तुरंत हटाकर नदी किनारे डाल देना चाहिए, ताकि लोग उसका इस्तेमाल कपड़े धोने के लिए कर सकें. एक अवसर पर उन्होंने कहा था—

कहा जाता है कि ईश्वर ने जाति की रचना की है. यदि यह सच है तो सबसे पहली जरूरत इस बात ही है कि ऐसे ईश्वर को ही नष्ट कर दिया जाए. यदि ईश्वर इस क्रूर प्रथा से अनभिज्ञ है तो उसे और भी जल्दी खत्म किया जाना चाहिए. यदि वह इस अन्याय से रक्षा करने या इसपर रोक लगाने में असमर्थ है तो इस दुनिया में बने रहने का उसे कोई अधिकार नहीं है.

4

पेरियार ने गौतम बुद्ध को विश्व के सबसे पहले क्रांतिधर्मा विचारक स्वीकार किया था. कारण था कि बुद्ध ने ईश्वर, आत्मा-परमात्मा जैसी अतार्किक मान्यताओं को चुनौती दी थी. उन्होंने कहा था—‘आमतौर पर ईश्वरीय विश्वास के आधार पर मनुष्यों को मूर्ख बनाया जाता है. मैं नहीं जानता कि मानवमात्र की इस अज्ञानता का पर्दाफाश करने के लिए अभी तक कोई विचारक आगे क्यों नहीं आया है? यहां तक कि सुशिक्षित बुद्धिजीवी भी इस मामले में आलसी रहे हैं. यदि हम दुनिया के पहले दार्शनिक की खोज करना चाहें तो हम कह सकते हैं कि वह एकमात्र गौतम ही बुद्ध थे. हमारा इतिहास भी यही बताता है. उनके बाद पश्चिम में जन्मा एकमात्र विचारक सुकरात था. उनके दार्शनिक विचारों को भली-भांति नहीं समझा गया.’13

उस ज्ञानमय धर्म या ‘बुद्धि के धर्म’ को नष्ट कर दिया गया. कैसे नष्ट कर दिया गया? पेरियार के शब्दों में, ‘उन्होंने(ब्राह्मणों ने) हिंसक रास्ते अपनाए. बौद्धों का कत्लेआम किया गया. उनके मठों को मिट्टी में मिला दिया गया.’14 पेरियार किसी भी प्रकार की व्यक्ति पूजा के विरोधी थे. मगर बुद्ध के विचार उनकी वैचारिक चेतना के करीब थे. उनके प्रचार-प्रसार के लिए वे बुद्ध जयंती मनाने के पक्ष में पक्ष थे. परंतु वे नहीं चाहते थे कि बुद्ध जयंती के नाम पर होने वाले उत्सव महज कर्मकांड बनकर रह जाएं. इसलिए ‘बुद्ध जयंति क्यों मनाई जाए? लोग बुद्ध के जन्म को उत्सव के रूप में क्यों लें? पेरियार इन सवालों पर भी विचार करते हैं. उनके अनुसार बुद्ध जयंती बनाने का आशय यह नहीं है कि लोग बुद्ध-प्रतिमा के आगे खड़े होकर कपूर, नारियल, फल-फूल वगैरह लेकर उसकी पूजा-अर्चना करें. उनके अनुसार—‘हम बुद्ध के जीवन से शिक्षा ले सकते हैं और उसे अपने जीवन में उतार सकते हैं. मैं उनसे नास्तिक के रूप में प्रेरणा लेता हूं. यदि नास्तिक का अभिप्रायः है वेदों, धर्मशास्त्रों और पुराणों में अविश्वास है, तो निश्चित रूप से मैं नास्तिक ही हूं.’ पेरियार को डर था कि बुद्ध जयंती के बहाने ऐसे व्यक्ति जो वेद, शास्त्र तथा पुराणों में आस्था रखते हों, अपनी बात को घुमा-फिराकर लोगों के सामने रख सकते हैं. पेरियार के अनुसार जातिभेद के आधार पर दूसरों को कमतर समझने वाला, निरंकुश आचरण का समर्थक व्यक्ति ही ऐसा कर सकता है.

पेरियार के अनुसार बुद्ध न तो संत थे, न ही महात्मा. असल में वे ऐसे बुद्धिवादी चिंतक थे जिन्होंने प्राचीनकाल में हिंदू ऋषियों का उनके अनर्गल कर्मकांडों और आडंबरों के आधार पर विरोध किया था. इसलिए बौद्ध धर्म प्रचलित अर्थों में धर्म नहीं है. जो लोग बौद्ध धर्म को धर्म मानते हैं, वे गलत हैं. धर्म के लिए उसके केंद्र में ईश्वर का होना आवश्यक है. इसके अलावा स्वर्ग, नर्क, मोक्ष, भाग्य, पाप-पुण्य आदि अवधारणाओं पर विश्वास भी आवश्यक है. बड़े धर्मों का काम किसी एक ईश्वर नहीं चलता. उनमें अनेक ईश्वर भी हो सकते हैं. उन ईश्वरों के घर-परिवार, आवास, आने-जाने के स्वतंत्र साधन, पत्नियां और बच्चे भी हो सकते हैं. भारतीय तो ऐसे ईश्वरों को ही पहचानते हैं. 1857 के सैनिक विद्रोह, जिसे कुछ लेखक भारत का पहला स्वाधीनता संग्राम मानते है, की जाति के संदर्भ में समीक्षा करते समय पेरियार ने बौद्ध धर्म के साथ-साथ जैन धर्म की प्रशंसा की थी—

‘इतिहास गवाह है कि जिन बौद्ध और जैन श्रमणों ने हमारे लोगों को सद्व्यवहार और ज्ञान की महत्ता की शिक्षा देनी चाही, तमिल राजाओं ने उनका उत्पीड़न किया गया. उन्हें तरह-तरह के मामलों में फंसाया गया और कत्लेआम किया गया. यह दर्शाता है कि हमारे देश पर निरंकुश और असभ्य शासकों का राज रहा है.’15

बुद्ध के अनुसार मनुष्य का ईश्वर के प्रति आकर्षित होना आवश्यक नहीं है. बौद्ध धर्म अपने मानवतावादी आचरण के लिए बाकी धर्मों से बेहतर सिद्ध होता है. बुद्ध चाहते थे कि मनुष्य केवल मनुष्य का ध्यान करे. बुद्ध ने न तो स्वर्ग का महिमा-मंडन किया, न ही नर्क से लोगों को डराया. उन्होंने मनुष्य के आचरण पर जोर दिया. उसके लिए अष्ठांग मार्ग प्रस्तुत किया, जिसे आगे चलकर लगभग सभी धर्मों ने धार्मिक शुचिता के नाम पर अपनाया. पेरियार बुद्ध की प्रशंसा करते हैं. लेकिन वे उनके सम्मोहन से ग्रस्त नहीं हैं. न ही आस्था के बदले वे अपने विवेक को गिरवी रखना चाहते हैं, जैसी कि ब्राह्मण धर्म के अनुयायी अपेक्षा रखते हैं. अपितु वे लिखते हैं कि कोई बात इसलिए मान्य नहीं होनी चाहिए कि उसे किसी महात्मा ने कहा है. या उसे बहुत से लोग मानने वाले हैं. अपितु मनुष्य को अपने विवेक की कसौटी पर जो खरा प्रतीत हो, उसी को स्वीकार करना चाहिए. उसके लिए आवश्यक है कि हर सत्य या अच्छी लगने वाले तथ्यों को वह अपनी कसौटी पर परखे. उनके अनुसार बुद्धिज्म केवल गौतम बुद्ध की जयंतियों को मनाना नहीं है. हमारे लिए बुद्ध होने का अभिप्राय बुद्धि, विवेक बुद्धि का साथ होना है. अपने तर्क-सामथ्र्य का साथ होना है. पेरियार के अनुसार—

‘बौद्ध धर्म किसी भी प्रकार के श्रेष्ठतावाद(ब्राह्मणवाद) के लिए एटमबम के समान है.’16

गौतम बुद्ध का जन्म करीब 2500 वर्ष पहले हुआ था. उस समय ब्राह्मण यद्यपि धर्म और सभ्यता के दावेदार बने हुए थे, मगर यज्ञादि में जिस प्रकार हजारों बलियां एक साथ वे चढ़ा देते थे, जाति के नाम पर अपने ही धर्म-बंधुओं के साथ दमन और अवमाननापूर्ण वर्ताब करते थे, उसे देखते हुए उनका आचरण असभ्य और जंगली प्राणियों जैसा था. बुद्ध ने उन सबका विरोध किया. बुद्ध का रास्ता आसान नहीं था. देखा जाए तो उन दिनों ज्ञान और तर्क का पक्ष लेने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए अपनी बात कह पाना आसान नहीं था. परंतु बुद्ध अपने बातों पर अडिग रहे. वैदिक हिंसा के स्थान पर उन्होंने मनसा-वाचा-कर्मणा अहिंसा का पक्ष लिया. पेरियार के अनुसार उनकी ताकत उनके शब्दों में थी. पेरियार की तरह बुद्ध को भी अपने जीवन में आलोचनाओं का सामने करना पड़ा था. बुद्ध के बाद उनके आलोचकों ने मुखर स्वर में उनकी आलोचना करना आरंभ कर दिया था. पुराणों के बहाने प्राचीन धर्म को पुनर्जीवित करने की कोशिश की जाने लगी थी. जाहिर है, बुद्ध के बाद उनकी आलोचना में वही लोग लगे थे जो धर्म के नाम पर कर्मकांड और तर्क के स्थान पर तंत्र-मंत्र की वापसी चाहते थे. ऐसे ही लोग पेरियार का विरोध करते आए हैं.

रामायण को हिंदु नैतिक जीवन का पाठ पढ़ाने वाले ग्रंथ के रूप में देखते हैं. पेरियार के अनुसार रामायण की रचना बौद्ध धर्म के प्रभाव को मद्धिम करने के लिए, उसकी ख्याति से उबरने की कोशिश में की गई थी. बुद्ध का धर्म ताकत का धर्म नहीं था. धर्म के प्रचार-प्रसार का जिम्मा उन्होंने भिक्षुओं और श्रमणों को सौंपा हुआ था. लेकिन जातियों में बंटे हिंदू धर्म के लिए इस तरह के समर्पित धर्म-योद्धा मिलने संभव नहीं थे. जाति व्यवस्था के नाम पर ब्राह्मणों ने खुद ही निचली जातियों को धार्मिक कार्यों में सहभागिता से अलग-थलग किया हुआ था. ऐसे में शक्ति के माध्यम से ‘धर्म-विजय’ दिखना ही एकमात्र रास्ता था. रामायण यही काम करती है. अशोक ने अपने बेटे और बेटी को बौद्ध धर्म की ध्वजा फहराने के लिए श्रीलंका भेजा था. वाल्मीकि के राम आर्य अपनी पत्नी को छुड़ाने के बहाने आर्य-धर्म की पताका फहराने के लिए लंका-विजय करते हैं. बुद्ध और अशोक ने जो धम्मविजय की थी, उसका प्रमाण आज श्रीलंका में बौद्ध धर्म की उपस्थिति है. वहां 70 प्रतिशत लोग आज भी बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं. उसके अलावा चीन, जापान, तिब्बत जैसे देषों में बौद्ध धर्म आज भी कायम है. जबकि हिंदू धर्म भारत से बाहर अपनी छाप छोड़ पाने में असफल रहा. पेरियार के अनुसार—

‘बुद्ध के पहले राम-कथा छोटी-सी कहानी थी. बौद्ध धर्म की लोकप्रियता का सामना करने के लिए उसमें बाद में भारी जोड़-तोड़ की गई. बौद्धों और जैनियों को नास्तिक, हत्यारा, डाकू, वैदिक संस्कृति का दुश्मन आदि कहा गया. पेरियार के शब्दों में शैव शिव से प्रार्थना करते हैं कि वह उन्हें शक्ति दे ताकि वे बौद्धों की पत्नियों के साथ व्याभिचार कर सकें.’17

पेरियार के अनुसार 75 प्रतिशत से अधिक पुराणों का लेखनकाल बुद्ध से बाद का है. पाश्चात्य विद्वानों का भी यही मत रहा है. बुद्ध के तर्कसंगत उपदेशों का प्रतिवाद करने के लिए पुराण लेखकों ने जिन्हें ऋषि कहा जाता था, अवतारवाद की परिभाषा गढ़ी. उन्होंने कृष्ण को मुख्य देवता के रूप में चित्रित किया. उसका एक ही उद्देश्य था, लोगों को ब्राह्मणवाद की ओर आकर्षित करना. चमत्कारपूर्ण वर्णन जनसाधारण को हमेशा ही लुभाता आया है. गीता की रचना और भी बाद में हुई. उसके बाद ही उसे महाभारत में जोड़ा गया. लोकमानस में बुद्ध की प्रतिष्ठा को देखते हुए ब्राह्मणों ने मजबूरी में उनकी प्रषंसा की. अवतारवाद को संरक्षण देने के लिए बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित किया गया. उसके बहाने सनातनी हिंदू पुराणों के लेखनकाल को बुद्ध से बहुत पीछे तक ले जाते हैं. इस काम में संस्थाएं भी पीछे नहीं हैं—‘यह कहते हुए कि ब्रिटिश विद्वानों द्वारा लिखे गए इतिहास पर विश्वास नहीं किया जाना चाहिए, उत्तर भारत में भारतीय विद्या भवन ने मूर्खतापूर्ण धार्मिक आख्यानों और अजनतांत्रिक धर्मशास्त्रों पर पर लिखना जारी रखा. के. एम. मुंशी उसके अध्यक्ष थे. डॉ. राधाकृष्णन तथा अरबपति बिरला उसके सदस्य थे. उन्होंने ‘वैदिक युग’ को लेकर पुस्तक तैयार की, जिसमें के. एम. मुंशी का बड़ा योगदान था. उन्होंने भी माना था कि प्राचीन युग असभ्य था. पुराण और महाकाव्य आदि ग्रंथ इतिहास नहीं हैं….वह सब कल्पना की उपज है. ‘व्यास’ शब्द का अर्थ किस्सागो है. पुराणों ने लोगों के दिमाग पर कब्जा कर लिया और वे उनपर शासन करने लगे. हमारी समस्याओं का मूल कारण यही है.’

 

आजीवक दर्षनों के साथ-साथ बौद्ध, जैन दर्षन और सिख धर्म ने भी वेदों को प्रामाण्य मानने से इन्कार कर दिया था. ये धर्म-दर्षन किसी ईश्वर या आत्मा-परमात्मा पर विश्वास नहीं करते. इसलिए ब्राह्मण ग्रंथों में बौद्ध और जैन दोनों दर्शनों नास्तिक कहा गया है. एक स्थान पर पेरियार नास्तिक की परिभाषा करते हैं. उनके अनुसार बुद्ध सामान्य संज्ञा है. किसी भी व्यक्ति को जो बुद्धि का प्रयोग करता है, उसे बुद्ध कहा जा सकता है. ‘निश्चित रूप से मैं भी एक बुद्ध हूं. मैं ही क्यों, हम सभी जो तर्क और बुद्धि-विवेक के आधार पर फैसले करते हैं—बुद्ध हैं.’ इसी तरह सिद्ध वह व्यक्ति है जो अपनी ज्ञानेंद्रियों पर नियंत्रण रख सकता है. वैष्णव और शैव किसी न किसी देवता को मानते हैं. यही स्थिति दूसरे संपद्रायों की है, वे भी किसी न किसी देवता में श्रद्धा रखते हैं. जहां देवता नहीं हैं, वहां गुरु है जो परोक्ष रूप में साकार या निराकार देवता से मिलवाने का दावा करता है. केवल बौद्ध धर्म ऐसा है जिसमें कोई केंद्रीय देवता नहीं है. न ही वह जीवन से इतर किसी सुख की दावेदारी करता है. वह किसी भी प्रकार के ईश्वर, आत्मा, लोक-परलोक, मोक्ष अथवा सनातनवाद को नकारता है. नास्तिक शब्द भी इसके करीब है. नास्तिक वह है जो आत्मा परमात्मा के अस्तित्व को नकारता है; संसार और जीवन के बारे में बुद्धिसंगत निर्णय लेने का समर्थन करता है. ब्राह्मणवादी मूर्ति पूजा का विरोध करने वाले को भी नास्तिक कहकर धिक्कारने लगते हैं. पेरियार के अनुसार नास्तिक होना, सही मायने में मनुष्य होना है. ऐसा मनुष्य जो न केवल अपने ऊपर अपितु पूरी मनुष्यता पर विश्वास रखता है.

भारतीय समाज धर्म के अलावा जाति के शिकंजे में भी फंसा हुआ है. ये दोनों ही तर्क और मानवीय विवेक के विरोधी है. इनकी ताकत मनुष्य की अज्ञानता में निहित है. इसलिए घूम-फिरकर वे आस्था और विश्वास पर लौट आते हैं. तयशुदा मान्यताओं पर तर्क करने और सवाल उठाने से उन्हें परेशानी होती है. इसलिए वे चाहते हैं कि अपनी विवेक-बुद्धि को बिसराकर मनुष्य केवल उनके कहे का अनुसरण करे. वेद, पुराण, गीता, रामायण आदि धर्मग्रंथों में जो लिखा है, उनपर आंख मूंदकर विश्वास कर लिया जाए. यही अतीतोन्मुखी दृष्टि ब्राह्मणवाद है; जो बार-बार पीछे की ओर ले जाती है और मानव-बुद्धि की विकासयात्रा का निषेध करती है. पेरियार इससे आजन्म जूझते रहे. इसके लिए उन्होंने किसी धर्म, व्यक्ति या राष्ट्र की परवाह तक न की. खुलकर कहा कि—

‘मैं मानव-समाज का सुधारक हूं. मैं किसी देश, ईश्वर, धर्म, भाषा अथवा राज्य की परवाह नहीं करता. मेरे सरोकार केवल मानवमात्र के कल्याण एवं विकास को समर्पित हैं.’ यही संकल्प क्रांतिधर्मी पेरियार तथा उनके विचारों को समसामयिक और प्रासंगिक बनाता है.

 

ओमप्रकाश कश्यप

 

संदर्भ:

1 जाति मदे च अतिमानिता च लोभो च, दोसो च मदो च मोहो

ऐते अवगुणा येसुब संति सब्बे तानीष खेत्तानि अयेसलानि

जाति मदो च अतिमानिता च लोभो च, दोसो च मदो च मोहो

ऐते अवगुणा येसुब न संति सब्बे तानीष खेत्तानि सुयेसलानि—मातंग जातक-497

  1.   अंबट्ठसुत्त, दीघनिकाय, 1/3
  2.   पेरियार, 1947 में सलेम कालिज में ‘हिंदू दर्शन’ पर दिया गया व्याख्यान
  3.   कुदी अरासु, 15 अगस्त 1926
  4.   कुदीअरासु, 2 दिसंबर, 1944
  5.   पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पृष्ठ-208.
  6.   पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पृष्ठ-227
  7. विदुथलाई, 14 मार्च 1954.
  8. विदुथलाई, 14 मार्च 1954, पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पृष्ठ-265
  9. विदुथलाई, 14 मार्च 1954, पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पृष्ठ-265
  10. छूआछूत पर पेरियार के विचार, मीना कंडास्वामी द्वारा तमिल से अंग्रेजी में अनूदित.
  11. विदुथलाई, 19 अप्रैल 1956,पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पेज-274-75
  12. कलेक्टिड वर्क्स आफ पेरियार, पृष्ठ-152
  13. कलेक्टिड वर्क्सआफ पेरियार, पृष्ठ-173
  14. विदुथलाई, 15 अगस्त 1957, पृष्ठ-300
  15. पेरियार आन बुद्धिज्म, रामास्वामी पेरियार, राम मनोहरन के आलेख ‘फ्रीडम फ्राम गाड: पेरियार एंड रिलीजन’ से उद्धृत
  16. कलेटिक्ट वर्क आफ पेरियार, पृष्ठ-306-307

 

 

संस्कृति और सामाजिक न्याय

सामान्य

प्रत्येक समाज अपनी संस्कृति से पहचाना जाता है. उसका प्रमुख कार्य समाज में एकता की अनुभूति जगाना पैदा करना है. इसके लिए जरूरी है कि वह सामाजिक संबंधों, नागरिकों के सामान्य व्यवहारों, सार्वकालिक जीवनमूल्यों और भविष्य के सपनों से अनुप्रेत हो. प्रायः धर्म एवं संस्कृति को एक मान लिया जाता है. जबकि आस्था और विश्वास को अपनी पीठ पर ढोने वाला धर्म विराट संस्कृति का अंग तो हो सकता है, उसका पर्याय नहीं. किसी समाज द्वारा धर्म की केंचुल से बाहर आने की छटपटाहट विवेकीकरण के प्रति उसकी उत्सुकता को दर्शाती है. जहां तक भारतीय संस्कृति का प्रश्न है, अधिकांश विद्वान इसे ‘विविधता की संस्कृति’ मानते तथा ‘सनातन संस्कृति’ कहकर इसका महिमामंडन करते हैं. इनमें से एक भी धारणा मूल्यबोधक नहीं हैं. सांस्कृतिक वैविध्य तभी सार्थक है जब वह मानवीय चेतना का स्वयंस्फूर्त विस्तार हो. साथ ही लोकतांत्रिक सोच को बढ़ावा देता हो. प्राचीनता कालसापेक्ष स्थिति है. वह केवल घटनाविशेष की ऐतिहासिकता को दर्शाती है. संस्कृति का असल बड़प्पन इसमें है कि अपने अनुयायियों के बीच न्याय, समानता और समरसता के वितरण को लेकर वह कितनी उदार है! कितने प्रयास उसने अपने अंतर्विरोधों के समाहार हेतु किए हैं. और इन सब के लिए वह लोकतंत्र के कितने करीब है. इस कसौटी पर भारतीय संस्कृति उतनी सफल सिद्ध नहीं होती, जितनी बताई जाती है.

सच तो यह है कि स्मृतिग्रंथों, पुराणों, महाकाव्यों आदि के माध्यम से जो संस्कृति हमारे जीवन में दाखिल होती हैय या एक अल्पसंख्यक अभिजन वर्ग द्वारा बहुसख्यक जनसमुदाय पर बरबस थोप दी जाती है, वह सामाजिक न्याय की अवरोधक तथा सामूहिक विवेक का क्षरण करने वाली है. सामान्य नैतिकता एवं लोकादर्शों को अमल में लाने के बजाय वह धर्म के हाथों में खेलती है; और खुद को बड़ी आसानी से उसकी सामंती वृत्तियों के अनुसार ढाल लेती है. वह लोगों से अपेक्षा रखती है कि वे क्या करें, क्या खाएं, क्या पियें, क्या पढ़ेलिखें, और किन लोगों से कैसे संबध बनाएं? न तो उसे मानवीय विवेक की परवाह रहती है, न उसकी रुचियों का परिष्कार. बावजूद इसके जीवन में अनावश्यक दखल देकर, वह समानता और स्वतंत्रता की भावना का हनन करती है. कभी धर्म, कभी समाज और कभी परंपरावैविध्य के बहाने, असमानता को मानवीय नियति घोषित करना उसकी मूल प्रवृत्ति रही है. वह असल में शासक संस्कृति है, जो व्यक्ति को जन्म के साथ ही बता देती कि उसका जन्म शासन करने के वास्ते हुआ है या शासित होने के लिए. जो लोग शासक वर्ग में जन्म लेते हैं, अभिजनोन्मुखी संस्कृति का रेशारेशा उनकी मदद में जुटा होता है. शासितों की कोटि में जन्मे व्यक्ति, यदि दुर्दशा से उबरना चाहें या इस तरह का सपना भी देखें तो वह लगातार अवरोध उत्पन्न कर, परिवर्तन की चाहत को ही मिटाने पर तुल जाती है. लोगों के सवाल करने की आदत को छुड़ाकर वह उनके निर्मानवीकरण को गति देती है. इससे सामूहिकताबोध, जो संस्कृति का प्रमुख उद्देश्य है, का हृास होता है. सांप्रदायिकता पनपती है; और जनशक्ति छोटेछोटे टुकड़ों में बंटकर निष्प्रभावी हो जाती है. इससे परिवर्तन का लक्ष्य निरंतर दूर खिसकता रहता है.

हम भारतीयों, विशेषकर जो लोग स्वयं को हिंदू मानते हैं, का जीवन जन्म से लेकर मृत्यु तक तरहतरह के कर्मकांडों से बंधा होता है. वे अनेक प्रकार के हो सकते हैं. एक समाज से दूसरे समाज, यहां तक कि एक जाति समूह से दूसरे जातिसमूह के बीच उनका रूप बदलता रहता है. कर्मकांडों का उद्देश्य होता है, किसी महाशक्ति को प्रसन्न करना. उनमें एक पक्ष दाता(जाहिर है काल्पनिक), दूसरा याचक की भूमिका में होता है. याचक अपने श्रेष्ठतम को समर्पित करने की भावना के साथ दाता के आगे नतशिर होता है. तत्क्षण खुद को दाता का प्रतिनिधि घोषित करते हुए पुरोहित बीच में आ टपकता है. याचक द्वारा दाता के नाम पर समर्पित सामग्री के अलावा वह दक्षिणा की भी दावेदारी करता है. कर्मकांडों को लोक की सामान्य स्वीकृति प्राप्त होने के कारण उनसे पैदा स्तरीकरण समाज में गहरी पैठ बना लेता है. तदनुसार जो दाता या उसके स्वयंघोषित प्रतिनिधि की इच्छा है, उसे उसी रूप में, बगैर किसी नानुकर के, स्वीकार कर लेना याचक की विवशता होती है. इसका लाभ शिखर पर बैठे लोग उठाते हैं. राज्य की कुल उत्पादकता में नगण्य योगदान के बावजूद वे किसी न किसी बहाने लाभ के नब्बे प्रतिशत को हड़पे रहते हैं. उसी के दम पर वे दाता की भूमिका निभाए जाते हैं. उनके नेतृत्व में पूरी संस्कृति कर्मकांडों में सिमटकर रह जाती है.

कर्मकांडों की व्याख्या जिन ग्रंथों में है, सब ब्राह्मणों द्वारा रचे गए हैं. उनकी समीक्षा अथवा संशोधनविस्तार का अधिकार ब्राह्मणेत्तर वर्गों को नहीं है. उनसे बस इतनी अपेक्षा होती है कि ब्राह्मणों द्वारा गढ़े गए लिखितअलिखित विधान का बगैर नानुकुर अनुसरण करें. उनपर किसी भी प्रकार का संदेह, आलोचना, समीक्षा पाप की कोटि में आती है. सांस्कृतिकसामाजिक असमानता का पोषण करने वाली इस संस्कृति के प्रति विरोध के स्वर आरंभ से ही उठते रहे हैं. उनके दस्तावेजीकरण का काम हमें अपेक्षाकृत उदार एवं समावेशी संस्कृति के करीब ला सकता है. उसे हम जनसंस्कृति अथवा मूल भारतवंशियों की संस्कृति भी कह सकते हंै.

सत्य यह भी है कि कोई भी संस्कृति स्वयं लक्ष्य नहीं होती. वह केवल मार्ग चुनने में मदद करती है. उसका काम मानवीय वृत्तियों को सुसंस्कृत करना है, किसी व्यक्ति या व्यक्तियों की रोजमर्रा की आदतों पर नियंत्रण करना नहीं. विडंबना है कि भारतीय संस्कृति की अधिकांश ऊर्जा नकारात्मक कार्यों में खपती आई है. वह बड़ी आसानी से उन लोगों के हाथों में खेलने लगती है, जिनका काम दूसरों के मूलभूत अधिकारों का हनन करना है. शिखरस्थ ब्राह्मण उसके विधान का निर्माता, व्याख्याता, पालकअनुपालक सब होता है. विशेष मामलों में, या यूं कहिए कि अपवादस्वरूप संस्कृति के विशिष्ट प्रवत्र्तकों को, जन्मना ब्राह्मण न हों तो भी उन्हें कर्मणा ब्राह्मण मान लिया जाता है. व्यास, वाल्मीकि, महीदास आदि शास्त्रीय परंपरा के ब्राह्मण नहीं हैं. फिर भी उन्हें ब्राह्मण माना गया है. क्योंकि वे उस संस्कृति के सिद्ध संहिताकार हैं, जो वर्णव्यवस्था को आदर्श तथा ब्राह्मणों को समाज का सर्वेसर्वा मानकर उन्हें अंतहीन अधिकार सौंप देती है. कुछ लोग इसे भारतीय संस्कृति की उदारता या उसका लचीलापन मानते हैं. असल में यह दूसरे वर्गों के बुद्धिजीवी, उनकी उपलब्धियों का श्रेय हड़प लेने की स्वार्थपूर्ण व्यवस्था है. इससे निम्न वर्गों की उच्च स्तरीय मेधा, उच्चस्थ वर्गों की स्वार्थसिद्धि में लगी रहती है.

इस प्रवृत्ति के दर्शन ऋग्वेद से लेकर आधुनिक साहित्य तक मौजूद हैं. गुरु उद्दालक के पास सत्यकाम जाबाल जब यह कहता है कि वह घरों में काम करने वाली दासी के गर्भ से जन्मा है और पिता का नाम पता नहीं है, तो महर्षि उसे यह कहकर कि ‘तूने सत्य कहा, ऐसा सत्यभाषी ब्राह्मण पुत्र ही हो सकता है.’-दीक्षा देने को तैयार हो जाते हैं. भारतीय संस्कृति के अध्येता इस उद्धरण को उसके उदात्त लक्षण के रूप में प्रस्तुत करते आए हैं. वस्तुतः यह बौद्धिक धूर्तता है, जिससे ब्राह्मणेत्तर वर्गों को एक ही झटके में ‘मिथ्याभाषी’ घोषित दिया जाता है. सत्यकाम जाबालि की भांति महीदास भी दासी पुत्र था. जन्म से शूद्र किंतु मनबुद्धि से ब्राह्मण संस्कृति का प्रतिभाशाली संहिताकार. ऋग्वेद शाखा के ‘ऐतरेय ब्राह्मण’, ‘ऐतरेय उपनिषद’ और ‘ऐतरेय आरण्यक’ का रचियता. इस संस्कृति ने महीदास को भी शूद्रों से झटक लिया. अपवादस्वरूप ही सही, ब्राह्मणेत्तर वर्ग के कुछ अतिप्रतिभाशाली बुद्धिजीवियों को अनुलोम परंपरा के अनुसार ब्राह्मण मान लिए जाने की नीति, प्रतिभाहीन ब्राह्मण पुत्रों के लिए शिखर का स्थान सुरक्षित रखती है. स्तर से ऊपर उठने के लिए ब्राह्मणेत्तर वर्ग के बुद्धिजीवियों को जहां विरलतम प्रतिभा, सर्जनात्मक मेधा एवं विभेदकारी ब्राह्मणसंस्कृति के प्रति अटूट निष्ठा का प्रदर्शन करना पड़ता है, वहीं ब्राह्मणसंतति को उसका स्वाभाविक उत्तराधिकारी मान लिया जाता है. प्रमुख प्रतिभाओं के पलायन के बाद निचले वर्ग आवश्यक बौद्धिक नेतृत्व से वंचित रह जाते हैं. दूसरे षब्दों में भारतीय संस्कृति, उसके नामित देवता, कर्मकांड, धर्मदर्शन आदि केवल ब्राह्मणों का सृजन नहीं हंै. उसमें ब्राह्मणेत्तर वर्गों का भी भरपूर योगदान रहा है. हालांकि लाभ सर्वाधिक ब्राह्मणों ने उठाया है.

ब्राह्मण संस्कृति के व्याख्याकारों की प्रशंसा करनी होगी कि वर्गीय श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए उन्होंने अपनी रचना का श्रेय स्वयं लेने के बजाय वर्गीय श्रेय को प्राथमिकता दी. ब्राह्मण होने के नाते व्यक्तिगत श्रेयसम्मान तो उन्हें आसानी से मिल ही जाता है. व्यास, याज्ञवल्क्य, वशिष्ट आदि किसी मनीषी के नहीं, गौत्र या परंपरा के नाम हैं. उनका उल्लेख स्मृतिग्रंथों से लेकर रामायण, महाभारत, पुराण यहां तक कि उत्तरवर्ती ग्रंथों में भी, मुख्य सिद्धांतकार के रूप में होता आया है. व्यक्तिगत श्रेय के आगे वर्गीय श्रेय को वरीयता दिए जाने का अच्छा उदाहरण ‘योग वशिष्ट’ है. लगभग एक हजार वर्ष पुराने, 29000 से अधिक पदों वाले तथा शताब्दियों के अंतराल में अनाम लेखकों द्वारा रचित, परिवर्धित इस विशद् ग्रंथ का रचनाकार होने का श्रेय आदि कवि वाल्मीकि को प्राप्त है, जबकि वाल्मीकि का नाम लगभग दो हजार वर्ष पुरानी कृति ‘पुलत्स्य वध’ जो निरंतर प्रक्षेपण के उपरांत ‘रामायण’ महाकाव्य के रूप में ख्यात हुआसे भी जुड़ा है. ज्ञान को परंपरा में ढाल देने का लाभ तो केवल ब्राह्मणों को जबकि नुकसान पूरे बहुजन समाज को उठाना पड़ा है. वर्णव्यवस्था के चलते पोंगा पंडितों को भी बौद्धिक नेतृत्व का अवसर मिलता रहा. पीढ़ीदरपीढ़ी एक ही धारा के लेखन से मौलिकता का हृास हुआ. चूंकि धर्मग्रंथों में प्रक्षेपण अलगअलग समय में हुआ था, इसलिए उनमें परस्पर विरोधी बातें भी शामिल होती गईं. जिस महाभारत(शांतिपर्व) कहा गया था, ‘वर्णविभाजन जैसी कोई चीज असलियत में नहीं है. यह पूरी सृष्टि ब्रह्म है, क्योंकि इसे ब्रह्मा ने बनाया है.’ उसी में द्रोणाचार्य द्वारा एकलव्य का अंगूठा मांग लेने के धत्तकर्म को भी ‘धर्म’ मान लिया गया.

उधर व्यवस्था से अनुकूलित गरीबविपन्न लोग निरंतर यह आस बांधे रहे कि जो पंडित लोग चैंसठ लाख योनियों का हिसाब रखते हैं, आदमी के ‘भाग्य’ का अगलापिछला सब बांच लेने का दावा करते हैं, वे उनका भी ‘हिसाब’ रखेंगे! यदि परमात्मा छोटेबड़े, गरीबअमीर, ब्राह्मण और शूद्र में भेद नहीं रखता तो वे भी नहीं रखेंगे. इस भरोसे के साथ वे अपने अधिकारों की ओर से, इतिहास की ओर से मुंह फेरे रहे. समय के दस्तावेजीकरण के प्रति निचले वर्गों की उदासीनता का लाभ ऊपर वालों ने खूब उठाया. उन्होंने कर्मफल का सिद्धांत पेश किया. उसके जरिये शोषित वर्गों को समझाया जाने लगा कि उनकी दुर्दशा के लिए कोई दूसरा नहीं, वे स्वयं जिम्मेदार हैं. संस्कृति के आवरण में उन्होंने पहले अवसर छीने, फिर मानसम्मान. अपने से नीचे के लोगों को बर्बर, असभ्य, गंवार, गलीच घोषित करके खुद इतिहास में तोड़मरोड़ करते रहे. उनके द्वारा रचे गए इतिहास में ‘भेड़ों’ और ‘मेमनों’ को जंगल में अव्यवस्था का दोषी बताया जाता रहा तथा ‘भेड़ियों’ और ‘लक्कड़बघ्घों’ को प्रत्येक अपराध से बरी रहने की व्यवस्था की गई. पंडित, देवता, करुणानिधान, अन्नदाता, रक्षक, सेठ, साहूकार जैसे सुशोभन विशेषण उन्होंने अपने लिए सुरक्षित कर लिए. पिछले दो हजार साल का सांस्कृतिक खेल उनकी चालों और समझौतापरस्ती से बना है. ऐसी संस्कृति में जनसाधारण के लिए न्याय की उम्मीद करना खुद को धोखा देना है.

सांस्कृतिक वर्चस्व’ बनाए रखने की कोशिश के समानांतर उससे उबरने की छटपटाहट भी मानवइतिहास का हिस्सा रही है. भारत में उसका पहला उदाहरण मक्खलि गोशाल के चिंतनकर्म में दिखाई पड़ता है. वह पहला विद्वान था जिसने श्रमशोषक, परजीवी ब्राह्मण संस्कृति के बरक्स समाज में मेहनतकशों, शिल्पकारों तथा उसके श्रमकौशल के सहारे आजीविका जुटाने वाले लोगों को संगठित कर आजीवक संप्रदाय की स्थापना की थी. मक्खलि की लोकप्रियता का अनुमान इससे भी लगाया जाता है कि उसके जीवनकाल में आजीवक संप्रदाय के अनुयायियों की संख्या बौद्ध अनुयायियों से अधिक थी. विद्वता के मामले में भी वह अद्वितीय था. सम्राट प्रसेनजित ने बुद्ध से कहा था कि वह गोशाल को उन(बुद्ध)से अधिक प्रतिभाशाली मानते हैं. बुद्ध की हिंसा तथा कर्मकांड विरोधी भौतिकवादी विचारधारा पर आजीवक संप्रदाय का ही प्रभाव था. मक्खलि तथा बुद्ध के अलावा निगंठ नागपुत्त, संजय वेठलिपुत्त, पूर्ण कस्सप, अजित केशकंबलि, कौत्स आदि विद्वान भी यज्ञों में दी जाने वाली बलि तथा कर्मकांड का विरोध कर रहे थे. निगंठ नागपुत्त आगे चलकर महावीर स्वामी के नाम से जैन दर्शन के प्रवर्त्तक माने गए. इनमें सर्वाधिक ख्याति मध्यमार्गी गौतम बुद्ध को मिली, जो उस समय की चर्चित दार्शनिक समस्याओं ‘आत्मा’, ‘परमात्मा’ आदि पर विमर्श करने के बजाय उन्हें टालने के पक्ष में थे. क्षत्रिय कुल में जन्म लेने के कारण बुद्ध और उनके विचारों को उन राजदरबारों में आसानी से प्रवेश मिलता गया, जो ब्राह्मण पुरोहितों के बढ़ते दबाव से तंग आ चुके थे. ‘आजीवक’ और ‘लोकायत’ धारा का प्रतिनिधि साहित्य आज अप्राप्य है. उनका छिटपुट उल्लेख ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन ग्रंथों में ही प्राप्त होता है. सभी में उनकी पड़ताल नकारात्मक दृष्टिकोण के साथ की गई है. संकेत साफ हैं कि विजेता संस्कृतियों ने, पराजित संस्कृति के ग्रंथों को मिटाने का काम पूर्णतः योजनाबद्ध ढंग से किया.

धर्म और संस्कृति का आधार कहे जाने वाले ग्रंथों में, लंबे प्रक्षेपण के बावजूद ऐसे अनेक तत्व हैं, जो वैकल्पिक जनसंस्कृति के प्रवत्र्तक और संवाहक रहे हैं. महिषासुर, बालि, पौराणिक सम्राट वेन के अलावा गणेश, शिव जैसे अनेक नाम मिथक भी हो सकते हैं और यथार्थ भी. लेकिन यदि इन्हें मिथक मान लिया जाए तो ब्राह्मण संस्कृति के प्रमुख संवाहक ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र, हनुमान तथा अन्य देवीदेवताओं को भी मिथक मानना पड़ेगा. क्योंकि उसका पूरा का पूरा भवन इन्हीं के कंधों पर टिका है. शिव भारत की आदिम जातियों के मुखिया रहे होंगे. उनके सहयोगी के रूप में भूत, पिशाच, प्रेत आदि हमें भारत के आदिम कबीलों की याद दिलाते हैं. आर्यों ने शिव को तो अपनाया. मगर उनके सहयोगी कबीलों की पूरी तरह उपेक्षा की. अप्रत्यक्ष रूप से बख्शा शिव को भी नहीं गया. उन्हें आक, धतूरा खाने और भभूत लगाकर रमने वाले अवधूत की तरह दर्शाते हुए सृष्टि चलाने(शासन करने) का अधिकार ‘ब्राह्मण ब्रह्मा’ तथा ‘क्षत्रिय विष्णु’ की बपौती मान लिया गया. गणेश का मिथक भी प्राचीन भारतीय गणतंत्रों के मुखिया की याद दिलाता है. गणतांत्रिक व्यवस्थाओं में मुखिया को प्रथम सम्मानेय माना जाता था. कालांतर में बड़े राज्यों का गठन होने लगा तो सभा का नेतृत्व करने वाले गणप्रमुख के चरित्र का भी विरूपण किया जाने लगा. बैठेबैठे सूंड लटक आना और लंबोदर जैसे प्रतीक गणप्रमुख पर कटाक्ष तथा उसे अपमानित करने के लिए रचे गए.

सामाजिक न्याय’ का सपना देखने वाले बुद्धिजीवियों की असली लड़ाई धार्मिक वर्चस्ववाद, विपन्नता और जड़ हो चुकी वर्णव्यवस्था से है. इस लक्ष्य की सिद्धि वर्चस्वकारी संस्कृति से मुक्ति के बिना असंभव है. ब्राह्मण संस्कृति ईश्वरीय न्याय में विश्वास करती है. न्याय का स्वरूप क्या हो? वंचित तबकों की उन्नति में वह किस भांति सहायक हो सकता हैयह नहीं बताती. ‘सामाजिक न्याय’ के पैरोकारों का प्रथम लक्ष्य ऐसी संस्कृति का पुनरुद्धार करना है, जिसमें संगठित धर्म का हस्तक्षेप न्यूनतम हो. जो पूरी तरह उदार एवं लोकतांत्रिक हो. इसके लिए आवश्यक है कि प्राचीन संस्कृति के उन प्रतीकों को रेखांकित किया जाए जो कभी ब्राह्मण संस्कृति के विरोध में या उसके समानांतर खड़े थे. क्या यह धर्म के भीतर एक और धर्म की खोज सिद्ध नहीं होगी? यह आशंका पूर्णतः निर्मूल नहीं है. ध्यान यह रखना होगा कि समानांतर संस्कृति के इन प्रतीकों, नायकों, मिथकों का योगदान दमितशोषित वर्गों के आत्मविश्वास को लौटाने तक सीमित हो. यह एहसास दिलाने के लिए हो कि वे हमेशा से ही ‘ऐसे’ नहीं थे. वे न केवल ‘वैसे’ बल्कि कई मायनों में उनसे भी बढ़कर थेरावण की लंका में विभीषण को अपनी आस्था और विश्वास के साथ ससम्मान जीने की स्वतंत्रता प्राप्त थी. रामराज्य में शंबूक से यह स्वतंत्रता छीन ली जाती है. इसी तरह राक्षससम्राट जलंधर अपनी विष्णुभक्त पत्नी वृंदा के साथ सुखी जीवन जीता है और उनके दांपत्य के बीच अविश्वास की किरच तक मौजूद नहीं है, जबकि सीता को रावण की अशोकवाटिका में रहने के लिए भी अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ता है. यह गरीबी तथा जातिभेद द्वारा पैदा की गई अन्यान्य विषमताओं के विरुद्ध जंग भी है. सदियों से जाति के आधार पर सुखसुविधा और सम्मान भोगते आए समूह, परिवर्तनकामी समूहों पर जातिभेद को बढ़ावा देने का आरोप लगा रहे हैं. दूसरी ओर जातीय उत्पीड़न का शिकार रहे वर्गों को लगता है कि लोकतांत्रिक माहौल का लाभ उठाकर वे अपने संघर्ष को आगे बढ़ा सकते हैं. इसलिए वे जाति को संगठनकारी ‘टूल’ की तरह इस्तेमाल कर रहे है. लेकिन जातिआधारित संगठनों की अपनी परेशानियां हैं. इस देश में हजारों जातियां हैं. अपनें दम पर कोई भी जाति परिवर्तनकारी ताकत बनने में अक्षम है. अतः लोग समझने लगे हैं कि सामाजिक न्याय के संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए समानांतर लड़ाई संस्कृति के मोर्चे पर भी लड़नी होगी. जीत उन्हीं की होगी जो संगठित रहने के साथसाथ सामूहिक विवेक से काम लेंगे.

ओमप्रकाश कश्यप