अरस्तु तथा उसका न्याय-दर्शन

विशेष रुप से प्रदर्शित

ज्ञान और अध्यात्म के क्षेत्र में गुरुशिष्य परंपरा का महत्त्व बताया गया है. आज भी है. भारत में सैकड़ों आश्रम और धर्मगुरु हैं. उनके लाखोंकरोड़ों भक्त हैं. प्रत्येक गुरु अपने शिष्यों के भौतिकअधिभौतिक उत्थान का दावा करता है. शिष्य भी मानते हैं कि उनके गुरु अनन्य हैं. वे अपने और गुरु के बीच मर्यादा की लकीर खींचे रहते हैं. जिसके अनुसार गुरु की आलोचना करना, सुनना यहां तक कि मन में गुरु के प्रति भूल से भी अविश्वास लाना पाप माना जाता है. इसी जड़श्रद्धा के भरोसे गुरुओं का कारोबार चलता है. उस कारोबार में कभी घाटा नहीं आता. जड़श्रद्धा के बल पर ही गुरु कमाते, भक्त गंवाते हैं. बुद्ध ने जड़श्रद्धा का निषेध किया था. अपने शिष्यों को उन्होंने अपना दीपक आप बनने(अप्पदीपो भव), उनके पंथ पर सोचसमझकर विश्वास करने(एहि पस्सिक) का आवाह्न किया था—

‘जैसे सोने को तपाकर, काटकर और कसौटी पर रगड़कर तरहतरह से उसकी परीक्षा ली जाती है, उसके शुद्ध अथवा मिलावटी होने का निर्णय लिया जाता है, उसी प्रकार हे पंडितो और भिक्षुओ! मेरे वचनों को जांचपरखकर स्वीकार करो. केवल मेरे प्रति सम्मान के कारण उन्हें स्वीकार मत करो.’

सभी धर्मदर्शनों की स्थिति ऐसी नहीं थी. मीमांसक कुमारिल भट्ट को मात्र इस कारण खुद को प्रायश्चिताग्नि के सुपुर्द करना पड़ा था, क्योंकि उन्होंने गुरु की पूर्वानुमति के बिना बौद्ध दर्शन का अध्ययन इसलिए किया था, ताकि शास्त्रार्थ में बौद्ध आचार्यों को पराजित कर वैदिक दर्शनों की श्रेष्ठता सिद्ध कर सकें. उद्देश्य सही था. ज्ञान का भी यही तकाजा था. परंतु तत्कालीन परंपरा को स्वीकार्य न था. कुमारिल अपने उद्देश्य में सफल हुए थे, किंतु गुरुद्रोह के अपराध के प्रायश्चितस्वरूप खुद को अग्निसमर्पित करना पड़ा था. सुकरात, प्लेटो और अरस्तु की गुरुशिष्य परंपरा में अंधश्रद्धा के लिए कोई स्थान न था. तीनों परंपरापोषण के बजाय उसके परिमार्जन पर जोर देते हैं. उसका आदिप्रस्तावक सुकरात खुले संवाद में विश्वास रखता था. यह सुनकर कि लोग उसे यूनान का सर्वाधिक बुद्धिमान प्राणी मानते हैं, सुकरात को अपने ही ऊपर संदेह होने लगा था. संदेह दूर करने के लिए वह एथेंस के वुद्धिमान कहे जाने वाले राजनयिकों, दार्शनिकों और तत्ववेत्ताओं से मिला. अंततः इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि वह सचमुच सबसे बुद्धिमान है. इसलिए नहीं कि उसे सर्वाधिक ज्ञान है. वह केवल एक चीज दूसरों से अधिक जानता है, वह है—अपने ही अज्ञान का ज्ञान. ‘मुझे अपने अज्ञान का ज्ञान है’—कहकर उसने खुद को उन दार्शनिकों, विचारकों और तत्ववेत्ताओं से अलग कर लिया था, जिन्हें अपने ज्ञान का गुमान था. उसके लिए ज्ञान से ज्यादा ज्ञानार्जन की चाहत और उसकी कोशिश का महत्त्व था. ज्ञान की मौलिकता के लिए वह संदेह को आवश्यक मानता था. सुकरात की इसी प्रेरणा पर अरस्तु ने मनुष्य को विवेकशील प्राणी माना है. विवेकशीलता में स्वयं अपने ज्ञानानुभवों के पुनरावलोकन की, संदेह की भावना अंतर्निहित है. ज्ञानार्जन के लिए संदेह की अनिवार्यता को रेखांकित करते हुए ग्यारहवीं शताब्दी के फ्रांसिसी विचारक पीटर अबलार्ड ने लिखा था—‘संदेह हमें जांचपड़ताल के लिए प्रेरित करता है. जांचपड़ताल हमें सत्य का दर्शन कराती है.’ ‘सुकरातप्लेटो और अरस्तु’ की त्रयी के विचारों में अंधश्रद्धा के लिए कोई जगह न थी. हालांकि इस विद्वानत्रयी को अनुपम और अद्वितीय मानने पर कुछ लेखकों को ऐतराज है.

‘पाॅलिटिक्स’ का अनुवाद करते समय भोलानाथ शर्मा ने ‘सुकरातप्लेटोअरस्तु’ की त्रयी के समकक्ष ‘पराशरव्यास और शुकदेव’ त्रयी का उदाहरण दिया है. इस निष्कर्ष के पीछे उनके पूर्वाग्रह साफ नजर आते हैं. यह ठीक है कि ‘पराशरव्यास और शुकदेव’ की पितापुत्रपौत्र त्रयी में भी तीनों लेखक थे. पराशर को भारतीय परंपरा में पुराणों के आदिरचियता होने का श्रेय दिया जाता है. बताया जाता है कि व्यास ने महाभारत के अलावा पिता के लिखे पुराणों का पुनर्लेखन कर, उन्हें वह कलेवर प्रदान किया जिसमें वे आज प्राप्त होते हैं. तीसरे शुकदेव ने ‘भागवत पुराण’ लिखकर पुराण साहित्य को समृद्धि प्रदान की थी. बावजूद इसके ये तीनों भारतीय लेखक उस कोटि के मौलिक लेखकविचारक नहीं हैं, जिस कोटि के ‘सुकरातप्लेटो और अरस्तु’ हैं. व्यास की कृति ‘महाभारत’ अवश्य अलग है. उसमें अपने समय का सामाजिकसांस्कृतिक एवं राजनीतिक विमर्श मौजूद है, परंतु जिस महाभारत से हम आज परिचित हैं, वह ईस्वी संवत्सर की शुरुआत के आसपास की कृति है, जब देश में एकराष्ट्र की भावना प्रबल थी. गणतांत्रिक पद्धति पर आधारित छोटेछोटे राज्यों को अनावश्यक मान लिया गया था. एकराष्ट्र अथवा साम्राज्यवादी सोच का उद्भव पूरी दुनिया में लगभग एक साथ हुआ था. भारत में इसका प्रवर्त्तक चाणक्य था, जबकि यूनान में अरस्तु ने सिकंदर की साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाओं का समर्थन करते हुए उसे एशिया पूर्व के छोटेछोटे देशों को अपने अधीन करने की सलाह दी थी. महाभारत मूलतः धार्मिक ग्रंथ है और उसकी रचना शताब्दियों के अंतराल में एकाधिक लेखकों द्वारा की गई है. दूसरे केवल लेखक होना ही शर्त होती तो एक ही धारा के तीन लेखकों के अनेक उदाहरण दुनियाभर में मिल जाएंगे. यहां कसौटी ज्ञान की विलक्षणता, मनुष्यता के प्रति अगाध निष्ठा तथा एकदूसरे से असहमति जताते हुए उसकी ज्ञानपरंपरा को विस्तृत तथा सतत परिमार्जित करने की है—जिसपर यह दार्शनिक त्रयी विश्वपटल पर अनुपम है. प्लेटो के लेखन के हर हिस्से पर सुकरात की छाप है. इसी तरह अरस्तु के लेखन पर भी प्लेटो का प्रभाव छाया हुआ है, लेकिन प्लेटो सुकरात से तथा अरस्तु प्लेटो से कदमकदम पर असहमति दर्शाते हैं. प्लेटो से अरस्तु की असहमतियों का दायरा तो इतना बड़ा है कि उन्हें एक ही दर्शनपरंपरा से जोड़ना अनुचित जान पड़ता है. जैसे कि पारिवारिक जीवन का महत्त्व, सुखस्वास्थ्य प्राप्ति के संसाधन, लोकमत का सम्मान, जनसाधारण की रुचि एवं इच्छाओं का समादर जैसे विषयों पर अरस्तु पर्याप्त उदार था. जबकि प्लेटो ने अपने आदर्श राज्य में सामूहिक संस्कृति और सहजीवन पर जोर देते हुए परिवार संस्था को अनावश्यक मानते हुए कठोरअनुशासित जीवन जीने की अनुशंसा की है.

फिर प्रभाव किस बात का है? कौनसा सूत्र है जो इन तीनों को परस्पर जोड़ता है? इस तारतम्यता को इन्हें पढ़ते हुए आसानी से समझा जा सकता है. एकसूत्रात्मकता ‘पराशरव्यासशुकदेव’ की त्रयी के बीच भी है. अंतर केवल इतना है कि भारतीय परंपरा के लेखकों पर अध्यात्म प्रभावी रहा है, जो अतिरेकी आस्था और विश्वास के दबाव में अंधानुकरण में ढल जाता है. जबकि ‘सुकरातप्लेटोअरस्तु’ के बीच ज्ञान की लालसा तथा शुभत्व की खोज के लिए एकदूसरे पर संदेह का सिलसिला निरंतर बना रहता है. परंपरापोषी होने के कारण भारतीय लेखक एकदूसरे को दोहराते अथवा परंपरा का पिष्ठप्रेषण करते हुए नजर आते हैं. पश्चिम का लेखन विशेषकर वह लेखन जो सुकरात से आरंभ होकर अरस्तु और आगे थामस हाॅब्स, जान लाॅक, रूसो, वाल्तेयर, बैंथम, हीगेल, माक्र्स आदि तक जाता है, उसमें संदेह का सिलसिला कभी टूटता नहीं है. वाल्तेयर और रूसो एकदूसरे के समकालीन लेखक थे. जीतेजी उनमें हमेशा विलगाव बना रहा. दोनों एकदूसरे के कट्टर आलोचक थे. परंतु वाल्तेयर और रूसो को पढ़ते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि उनमें से किसी एक के मन में ज्ञान की ललक, मनुष्यता को बेहतर बनाए जाने की उत्कंठा दूसरे से कम है. जिस तरह प्लेटो सुकरात के प्रति और अरस्तु प्लेटो के प्रति अगाध प्रेम और विश्वास रखते हुए, विनम्र असहमति क साथ विचारपरंपरा को आगे बढ़ाते हैं, वैसा भारतीय परंपरा में दुर्लभ है. प्लेटो के विपुल वाङ्मय में एक भी शब्द, एक भी पंक्ति ऐसी नहीं है, जिसपर सुकरात का असर न हो. बावजूद इसके जहां आवश्यक समझा उसने सुकरात की बात भी काटी है. अरस्तु तो प्लेटो से भी आगे निकल जाता है. उसके मन में गुरु प्लेटो के प्रति गहरा सम्मान था. बावजूद इसके उसके ग्रंथों में प्लेटो के विचारों के प्रति सहमति से अधिक असहमति नजर आती है. इस तरह प्लेटो और अरस्तु दोनों अपनेअपने गुरु के ज्ञान को आत्मसात करते हैं, परंतु उनका विश्वास उस परंपरा को आगे बढ़ाने में है, न कि अनुसरण में. उसका विश्वास केवल मनुष्यता में है. प्लेटो भावुक, कवि हृदय है, जबकि अरस्तु अपेक्षाकृत वैज्ञानिक प्रवृत्ति से युक्त. इसलिए अरस्तु के लेखन में असहमति अधिक मुखर है. इस कारण कुछ विद्वान तो अरस्तु को प्लेटो का शिष्य मानने को ही तैयार नहीं है. लेकिन अरस्तु के लेखन में प्लेटो के प्रति जैसा सम्मानभाव है उसे देखते हुए यह असंभव भी नहीं लगता. दूसरी ओर पुराणों में कथ्य के आधार पर अंतर न के बराबर है. उनमें भयंकर दोहराव भी है. अधिकांश चरित्र मिथकीय हैं. ऐसा महसूस होगा मानो सारे पौराणिक ग्रंथ एक ही लेखक द्वारा रचित अलगअलग कालखंड की कृतियां हैं; अथवा उनके लेखक मंजे हुए किस्सागो थे. उन्होंने समाज में पहले से प्रचलित कहानियों को अतिरेकपूर्ण कल्पनाओं और रोचकता के साथ पौराणिक कलेवर प्रदान किया था.

जीवन परिचय

अरस्तु(जन्म 384 ईस्वीपूर्व) और प्लेटो के जन्म के बीच लगभग चार दशक का अंतराल था. Aristole का अर्थ है—‘श्रेष्ठतम लक्ष्य’(The best purpose). कहने की आवश्यकता नहीं कि अपने नामानुरूप अरस्तु ने जीवन में महान उद्देश्य सिद्ध किए. अरस्तु का मुख्य कर्मक्षेत्र एथेंस रहा, परंतु सुकरात और प्लेटो की भांति वह मूल एथेंसवासी नहीं था. उसका जन्म एथेंस से लगभग 340 किलोमीटर दूर, थ्रेस नदी के किनारे स्थित स्तेगिरा नामक छोटे से शहर में हुआ था. उसके पिता का नाम निकोमारक्स् था. उनके पूर्वज मैसेनिया से ईसापूर्व सातवींआठवीं शताब्दी में स्तेगिरा में आकर बसे थे. उसकी मां का नाम फैस्तिस था और उसके पूर्वज यूबोइया प्रदेश के खालिक्स नामक मामूली शहर के रहने वाले थे. मेसिडन के राजा एमींतस जिसकी प्रतिष्ठा सिंकदर का दादा होने के कारण भी है—का निजी चिकित्सक होने के कारण निकोमाराक्स् की समाज में प्रतिष्ठा थी. वे वैद्यों की पंचायत के सदस्य भी थे. उन दिनों यूनान के अनेक राज्यों में नगरराज्य की व्यवस्था थी, जहां शासन प्रक्रिया में अधिकांश नागरिकों की भागीदारी रहती थी. मेडिसन में राजतंत्र था. और जैसा कि इस प्रकार की राज्य प्रणालियों में होता है, मेडिसन में भी वंशानुक्रम के आधार पर राजा की घोषणा की जाती थी. अरस्तु के बचपन के बारे में अधिक जानकारी नहीं है. यत्रतत्र बिखरी सूचनाओं से पता चलता है कि उसकी प्राथमिक शिक्षा होमर की रचनाओं से आरंभ हुई थी. उसपर अपने चिकित्सक पिता का विशेष प्रभाव पड़ा. उन दिनों चिकित्सक परिवार के बच्चों को बचपन से ही शल्यचिकित्सा का प्रशिक्षण दिया जाता था. सो अरस्तु को भी शरीर विज्ञान और वनस्पतियों की शिक्षा बचपन से ही मिलने लगी थी.शरीर विज्ञान और प्रकृतिविज्ञान के दूसरे क्षेत्रों में अरस्तु की रुचि को देखते हुए उस समय शायद ही कोई कल्पना कर सकता था कि आगे चलकर यूनानी दर्शन और तर्कशास्त्र का महापंडित कहलाएगा. बचपन के वही अनुभव कालांतर में विज्ञान, विशेषकर वनस्पति शास्त्र के क्षेत्र में उसकी रुचि का कारण बने. यह भी बताया जाता है कि बचपन के चिकित्सा क्षेत्र के अनुभवों के कारण ही अरस्तु को चिकित्सकों की स्थानीय संस्था का सदस्य बना लिया था.

अरस्तु का परिवार समृद्ध था. इसलिए बचपन में उसे सुखसुविधाओं की कमी न थी. उसका बचपन राजपरिवार के लोगों के सान्निध्य में, सुखपूर्वक बीता. संयोगवश अरस्तु के मातापिता की मृत्यु उसकी किशोरावस्था में ही हो चुकी थी. उसके बाद उसकी देखभाल का दायित्व उसके एक रिश्तेदार प्राॅक्सीनस ने संभाला. सुकरात की भांति अरस्तु की आरंभिक इच्छा भी विज्ञान के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने की थी. उसने अपने जीवन का लंबा समय वैज्ञानिक अनुभवों के लिए लगाया था. अनेक ग्रंथों की रचना की, बाद में वह प्रकृति विज्ञान से उकताने लगा. इसका कारण स्टेगिरा की राजनीति थी. सम्राट एमींतस महत्त्वाकांक्षी था. राज्य की सीमाओं के विस्तार के लिए उसने कई युद्ध लड़े थे. जिसमें उसे सफलता भी मिली थी. लेकिन राज्य की सीमाओं का विस्तार और प्रजा के सुखसंतोष में विस्तार के बीच कोई तालमेल न था. लगातार युद्ध के मैदान में रहने वाले राजा की प्रजा को जो कष्ट भोगने पड़ते हैं, वे कष्ट स्तेगिरा की प्रजा को भी भोगने पड़ते थे. इसी विसंगति सेे अरस्तु के मन में राजनीति को समझने की ललक पैदा हुई. उसने अनुभव किया था कि राज्य के उद्देश्यों तथा उसके कार्यों के बीच कोई तालमेल नहीं है. युवावस्था तक पहुंचतेपहुंचते वह ज्ञान के परंपरागत संसाधनों से उकताने लगा था. उसका झुकाव दर्शन और राजनीति की ओर गया. उस समय पूरे यूनान में प्लेटो द्वारा स्थापित ‘अकादेमी’ की प्रतिष्ठा थी. अरस्तु की प्रतिभा और उच्च शिक्षा के प्रति लगन को देखते हुए प्राॅक्सीनस ने उसका दाखिला प्लेटो की अकादेमी में करा दिया. ईस्वी पूर्व 367 में वह एथेंस पहुँचकर प्लेटो की अकादमी का सदस्य बन गया. उस समय उसकी वयस् मात्र 17 वर्ष थी. अकादमी में आने का उद्देश्य केवल राजनीति और दर्शन की शिक्षा के साथसाथ विश्व के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में रहकर अध्ययन करने की लालसा थी.

अरस्तु प्लेटो की अकादेमी में लगभग बीस वर्षों तक रहा. वहां रहते हुए उसने गणित, दर्शन, राजनीति आदि विषयों में ज्ञान प्राप्त किया. उसके बाद कुछ अर्से तक अकादेमी में अध्यापन कार्य भी किया. यहीं उसके और प्लेटो के बीच आत्मीयता का विस्तार हुआ. अरस्तु को पुस्तकें जमा करने का शौक था और अपने धन का बड़ा हिस्सा पुस्तकों और पांडुलिपियों को जुटाने पर करता था. प्लेटो ने उसके आवास को ‘श्रेष्ठ अध्येता का घर’ कहा था. कुछ लोग मजाक में कहा करते थे कि ईश्वर ने अरस्तु के मस्तिष्क में गहरा गड्ढा बना दिया है, जिसमें वह पुस्तकों को सहेज कर रखता है. अकादेमी में रहते हुए अरस्तु पर प्लेटो की विद्वता का प्रभाव उत्तरोत्तर बढ़ता गया. प्लेटो की लेखनशैली का अनुकरण करते हुए उसने अकादमी प्रवास के दौरान भौतिकी, जीवविज्ञान, वनस्पति विज्ञान, तर्कशास्त्र, तत्वदर्शन आदि पर अनेक पुस्तकों की रचना की. जहां अरस्तु के मन में अपने गुरु के प्रति बेहद सम्मान था, वहीं प्लेटो भी अपने योग्यतम शिष्य की प्रतिभा का मुरीद था. वह उसे ‘अकादेमी का मस्तिष्क’ और ‘सर्वश्रेष्ठ अध्ययनशील’ विद्यार्थी मानता था. प्लेटो का निधन हुआ, उस समय अरस्तु की उम्र लगभग 37 वर्ष थी. वह प्लेटो के उत्तराधिकारियों में से एक था. प्रतिभा को देखते हुए अरस्तु की दावेदारी भी बनती थी. वह प्लेटो का वास्तविक उत्तराधिकारी है, यह उसने आगे चलकर सिद्ध भी कर दिया था. परंतु ‘अकादमी’ का अध्यक्ष प्लेटो के रिश्तेदार तथा गणित एवं जीवविज्ञान के पंडित स्पूसिपस को बनाया गया. इसका कारण प्लेटो से अरस्तु की वैचारिक असहमतियां भी थीं. अधिकारियों में इतना साहस न था कि अकादेमी का संचालन का दायित्व ऐसे व्यक्ति के हाथों में सौंप दें, जिसकी अकादेमी के संस्थापक और गुरु से घोर असहमतियां रही हों, हालांकि अरस्तु की प्रतिभा को लेकर उन्हें कोई संदेह न था. नतीजा यह हुआ कि अरस्तु का जी अकादेमी से उचट गया. निराश होकर उसने एथेंस छोड़ दिया. वहां से वह माइसिया में एटारनियस नामक स्थान पर पहुंचा. वहां उसे अकादेमी के पूर्व छात्रों की मंडली का सदस्य चुन लिया गया. मंडली में एटारनियस का शासक हरमियाॅस भी शामिल था. इससे अरस्तु को पुनः राजपरिवार के निकट आने का अवसर मिला. कुछ ही दिनों में हरमियाॅस और अरस्तु गहरे दोस्त बन गए. इसका सुखद परिणाम अरस्तु और हरमियाॅस की भतीजी(कुछ विद्वानों के अनुसार भानजी) पिथियास के विवाह के रूप में सामने आया. उसके फलस्वरूप उसके जीवन में स्थायित्व आया. अकादमी में प्राप्त गणित और विज्ञान की शिक्षा बहुत कारगर सिद्ध हुई. पिथियास से विवाह के उपरांत अरस्तु ने खुद को प्रकृति विज्ञान की खोज में लगा दिया. समुद्र तटीय स्थानों पर जाकर वह वनस्पतियों और जीवजंतुओं का अध्ययन करने लगा. उन अनुभवों के आधार पर उसने आगे चलकर कई पुस्तकों की रचना की. एथेंस छोड़ने के बाद 12 वर्षों तक वह इसी तरह अनुभव और ज्ञान बंटोरता रहा. इस बीच राजतंत्र की निरंकुशता को करीब से देखने का अवसर मिला. कदाचित इसी बीच उसके मन में छोटेछोटे राज्यों की विकृतियां सामने आने लगी थीं. वही अनुभव कालांतर में आगे चलकर ‘पाॅलिटिक्स’ एवं ‘एथिक्स’ जैसे ग्रन्थों की प्रेरणा बनीं. अपने उत्तरवर्ती जीवन में अरस्तु ने एक अन्य युवती हरपिलिस से विवाह किया, जिससे उसे संतान हुई. पुत्र का नाम उसने अपने पिता के नाम पर निकोमाराक्स् रखा.

342 ईस्वीपूर्व के आसपास उसको मेसिडन के सम्राट की ओर से निमंत्रण प्राप्त हुआ. इस अवधि में वहां काफी कुछ बदल चुका था. एमींतस के बाद फिलिप मेसिडन का सम्राट था. उसे अपने बेटे सिकंदर के लिए योग्य शिक्षक की तलाश थी. अरस्तु की प्रतिभा के बारे में वह पहले से ही परिचित था. अकादेमी में अरस्तु द्वारा किए गए कार्य भी उसकी जानकारी में थे. ऐसे में सिकंदर की शिक्षा के लिए अरस्तु से बेहतर कोई हो ही नहीं सकता था. निमंत्रण मिलते ही अरस्तु मेसिडन लौट आया. सम्राट फिलिप की ओर से उसका जोरदार स्वागत किया गया. आते ही उसे ‘राॅयल अकादेमी आॅफ मेसिडन’ का अध्यक्ष बना दिया गया. अगले तीन वर्षों तक वह इसी पद पर बना रहा. शिक्षक के तौर पर उसने राजकुमार सिकंदर में साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाएं जगाने का काम किया. उसने सिंकदर को राज्य की सीमाओं के विस्तार के लिए एशियामाइनर तथा अन्य उत्तरपूर्वी राज्यों पर अधिकार करने की सलाह दी. इस बीच एटारनियस से दुखद समाचार आया कि एक ईरानी सेनापति ने उसके मित्र और वहां के शासक हरमियाॅस को धोखे से पकड़कर उसकी हत्या कर दी है. इस सूचना ने अरस्तु को व्यथित कर दिया. 340 ईस्वी पूर्व में फिलिप की मृत्यु के बाद सिकंदर सम्राट बना. सिंकदर के मन में शुरू से ही साम्राज्यवादी भावनाएं जोर मारती थीं. सत्ता हाथ में आते ही वह युद्ध पर निकल पड़ा. अब मेसिडन में अरस्तु को कोई काम न था. इसी बीच उसे एथेंस जाने का अवसर मिला. उसी समय अकादेमी अध्यक्ष पद के रिक्त होने की सूचना मिली. अरस्तु के मन में अकादेमी से जुड़ने की लालसा अब भी शेष थी. परंतु अरस्तु की उपेक्षा करते हुए अकादेमी के अधिकारियों द्वारा खेनोक्रातेस को अकादेमी का मुख्यअधिष्ठाता मनोनीत किया गया. अरस्तु एक बार फिर निराश हो गया. परंतु उसके जैसे मननशील व्यक्ति के आगे निराशा बहुत टिकाऊ नहीं थी. उसने स्वयं को अध्ययन के प्रति समर्पित कर दिया.

335 ईस्वी पूर्व में उसे पुनः एथेंस लौटने का अवसर मिला. इस बार आमंत्रित करने वाला था, हर्मेडयस उस समय अरस्तु की उम्र 51 वर्ष थी और एक विद्वान दार्शनिक के रूप में उसकी ख्याति आसपास के देशों में फैल चुकी थी. एथेंस की ज्ञानविज्ञान के क्षेत्र में धाक थी. अवसर गंवाए बिना अरस्तु एथेंस के लिए प्रस्थान कर गया. उन दिनों एथेंस और मेसीडन के संबंध अच्छे न थे. परंतु अरस्तु की विद्वता की धाक ऐसी थी कि एथेंस में उसका स्वागत हुआ. जाहिर है इसके पीछे एथेंसवासियों की ज्ञान के प्रति सम्मानभावना का असर था. एथेंस के उत्तरपूर्व स्थित उपनगर अपोलो में लीशियस देवी का मंदिर था. एथेंस के कानून के अनुसार वहां बाहरी व्यक्तियों को भूमि खरीदने की अनुमति नहीं थी. इसलिए अरस्तु ने मंदिर के आसपास के क्षेत्रों में कुछ मकान किराये पर लेकर अपने विश्वविद्यालय की स्थापना की. विश्वविद्यालय का नाम लीशियस देवी के नाम के आधार पर ‘लीशियम’ रखा गया. कुछ ही दिनों में एथेंस के अनेक प्रतिष्ठित लोग जिनमें अकादेमी से शिक्षित लोग भी थे, अरस्तु से जुड़ने लगे. इससे अरस्तु और उसके विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा बढ़ने लगी. उस विश्वविद्यालय की खूबी थी कि वहां टहलते हुए शिक्षार्जन पर जोर दिया जाता था. अरस्तु स्वयं टहलते हुए पढ़ाता था. इसलिए कुछ प्लेटो को ‘टहलतेटहलते पढ़ाने वाला अध्यापक’ तथा संस्था को ‘परिभ्रामी विद्यालय’(Peripatetic School) भी कहने लगे थे. लीशियम में रहते हुए अरस्तु ने अध्यापन के अलावा कई महत्त्वपूर्ण काम किए. पुस्तक संग्रह का शौक उसको अकादेमी प्रवास से ही था. लीशियम में उसे पुस्तकें जमा करने के भरपूर अवसर मिला. फलस्वरूप उसने सैकड़ों पुस्तकों एवं पांडुलियों का संग्रह किया. और उन्हें सुरक्षित रखने लिए लीशियम के भीतर एक विशाल पुस्तकालय का निर्माण किया. अरस्तु द्वारा निर्मित पुस्तकालय उसके समकालीन नाटककार यूरीपिडिस के पुस्तकालय को छोड़कर, पूरे यूनान में सबसे बड़ा था. यही नहीं उसने पुस्तकों को व्यवस्थित करने के लिए आवश्यक नियम भी बनाए थे. पुस्तकालय के अलावा उसने विश्वविद्यालय में विचित्र वस्तुओं, शैवालों तथा मानचित्रों का एक अजायबघर तैयार किया. हालांकि स्वयं अरस्तु के पास धन की कमी न थी. उसकी पत्नी धनाड्य परिवार से थी. इसके साथसाथ पुस्तकालय, अजायबघर, वैज्ञानिक उपकरण आदि के लिए सिंकदर की ओर से भी समयसमय पर मदद प्राप्त होती रहती थी. गुरु अरस्तु के प्रति सिंकदर का सम्मान इससे भी जाहिर होता है कि उसने अपने सैनिकों, मछुआरों, बहेलियों और शिकारियों को आदेश दिया था कि काम के दौरान यदि कोई विचित्र वस्तु मिले तो उसे संग्रहित कर, लीशियम के संग्रहालय में जमा करा दें. इसके अतिरिक्त सिंकदर ने जीव विज्ञान एवं भौतिक विज्ञान संबंधी खोजों के वैज्ञानिक उपकरण भेजकर भी अरस्तु की मदद की थी.

अरस्तु ‘लीशियम’ में 12 वर्षों तक रहा. इस बीच उसका विद्यालय निरंतर प्रगति करता रहा. लगभग सभी विषय की शिक्षाओं का वहां प्रबंध था और शिक्षार्थी के रूप में दूरदूर के विद्यार्थी वहां पहुंचते थे. ‘लीशियम’ के प्रशासन हेतु अरस्तु ने विशेष प्रबंध किए थे. उस व्यवस्था को प्लेटो के ‘आदर्श राज्य’ तो नहीं कह सकते, परंतु शिक्षक और विद्यार्थी के बीच अनौपचारिक बातचीत को बढ़ाने, शिक्षा में सहजता लाने की भावनाएं उसके पीछे अवश्य थीं. तदनुसार विद्यार्थी अपने बीच से एक विद्यार्थी को चुनते थे. अगले दस दिनों तक वही विश्वविद्यालय के प्रशासक का काम करता था. इसके बावजूद ‘लीशियम’ में पर्याप्त अनुशासन था. भोजनव्यवस्था वहां सामूहिक थी. महीने में एक दिन विशेष परिचर्चा के लिए सुरक्षित था, जिसके नियम अरस्तु ने निर्धारित किए थे. अरस्तु का यह विश्वविद्यालय प्लेटो द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय ‘अकादेमी’ जैसी प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं कर सका. एक तरह से यह उसकी शाखा जैसा ही था. दोनों में एक विशेष अंतर भी था. ‘अकादेमी’ में गणित पर ज्यादा जोर दिया जाता था, जबकि ‘लीशियम’ में जीवविज्ञान और वनस्पति विज्ञान की शिक्षा पर खास ध्यान दिया जाता था. प्रायोगिक शिक्षा का खास महत्त्व था. उन दिनों बाढ़ आम समस्या थी. बरसात के समय नील नदी उफनने लगती. अरस्तु ने नियमित आने वाली बाढ़ों की रोकथाम के लिए भी शोधकार्य किया था. ‘लीशियम’ को प्लेटो के ‘अकादेमी’ जैसी प्रतिष्ठा भले ही प्राप्त न कर सका, परंतु एक दार्शनिक के रूप में अरस्तु को वैसी प्रतिष्ठा प्राप्त हो चुकी थी, जैसी कभी सुकरात और प्लेटो को प्राप्त थी. अरस्तु को नकारकर जिस व्यक्ति को अकादेमी का अध्यक्ष मनोनीत किया गया था, अरस्तु के प्रभामंडल के आगे उसकी प्रतिष्ठा नगण्य थी.

लीशियम में अध्यापन करते हुए अरस्तु ने अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की. उस समय सिकंदर विश्वविजय के लिए निकला हुआ था. यात्रा के विवरणों को दर्ज करने के लिए सिंकदर के साथ कल्लिस्थेसनस् नामक युवा भी उसके साथ अभियान पर था. वह अरस्तु का शिष्य था और अपने गुरु की भांति स्पष्टवक्ता भी. अभियान के दौरान किसी कार्य के लिए कल्लिस्थेसनस् ने सिंकदर की आलोचना कर दी. परिणामस्वरूप सिंकदर उससे रुष्ट हो गया. उस समय तक सिंकदर की विश्वविजय की कामनाएं उभार पर थीं. आलोचना उससे सहन न हुई. उसके आदेश पर कल्लिस्थेसनस् को मृत्युदंड सुनाया गया. कल्लिस्थेसनस अरस्तु का करीबी शिष्य था. अरस्तु ने ही उसे सिकंदर के साथ भेजा था, इसलिए कल्लिस्थेसनस् के साथसाथ अरस्तु को भी दोषी माना गया. पता चलता है कि भारत से वापसी के बाद सिंकदर ने भी अरस्तु को दंडित करने का निर्णय कर लिया था. लेकिन भारत अभियान में वह इतनी बुरी तरह से उलझा कि वापस लौट ही नहीं पाया. ईसा पूर्व 323वें वर्ष में उसकी मृत्यु हो गई. सिकंदर की मौत का समाचार जैसे ही मेसिडन पहुंचा वहां विद्रोह हो गया. अरस्तु सिंकदर का गुरु और करीबी रह चुका था, इसलिए विद्रोहियों ने उसे भी दंडित करने का निर्णय किया. लेकिन अरस्तु को दंडित करना आसान न था. उसकी पूरे यूनान में प्रतिष्ठा थी. विद्रोहियों ने उसे ‘नास्तिक’ घोषित कर दिया. आरोप का आधार अरस्तु द्वारा ईसापूर्व 340-341 में अपने दोस्त हरमियाॅस पर लिखी कविता को बनाया गया. वह कविता अरस्तु ने हरमियाॅस की हत्या के बाद लिखी थी, जिसमें उसके गुणों का बखान करते हुए उसे देवतुल्य घोषित किया गया था. बीस वर्ष पुरानी उस कविता के समय और परिस्थिति को देखते हुए इस प्रकार के आरोप बेमानी थे. विरोधी किसी भी प्रकार अरस्तु को दंडित करना चाहते थे, इसलिए अरस्तु को नास्तिक घोषित करना, जनता के बीच उसकी छवि को धूमिल करने की चाल थी. अपने विरुद्ध बढ़ता माहौल देख अरस्तु को एथेंस छोड़ना पड़ा. उसी वर्ष 62 वर्ष की अवस्था में उसकी मृत्यु हो गई.

एथेंस छोड़ते समय उसने घोषणा की थी कि एथेंसवासियों को दर्शनशास्त्र के विरुद्ध दूसरी बार अपराध नहीं करने देगा. दर्शनशास्त्र के विरुद्ध एथेंसवासियों का पहला अपराध उसकी संसद द्वारा सुकरात को दिया गया मृत्युदंड था. एथेंस से वह युबोइया के लिए प्रस्थान कर गया. वहां खाॅल्किस नामक छोटे से नगर में जाकर रहने लगा. वहीं रहते हुए उसने अपनी वसीयत तैयार की, जिसमें उसने अपनी पत्नी हर्पीलियस के स्वभाव की प्रशंसा करते हुए उसके लिए धन की व्यवस्था की थी. पहली पत्नी पिथियास की यादें अब भी उसके दिल में बसी थीं. इसलिए उसने वसीयत में लिखा कि उसे पिथियास के अवशेषों के साथ दफनाया जाए. अपनी संपत्ति का कुछ हिस्सा दासों के नाम किया था और कुछ को उसने दासत्व से मुक्त कर, स्वतंत्र कर दिया था. ये घटनाएं उसकी संवेदनशीलता को दर्शाती हैं. कविहृदय प्लेटो ने भी पाया था, परंतु उसे कविता से अरुचि थी. मानता था कि कविता और नाटक जैसी विधाएं मनुष्य को यथार्थ से परे ले जाकर कमजोर बनाती हैं. अरस्तु मनोमस्तिष्क से वैज्ञानिक होने के साथसाथ संवेदनशील कवि भी था. एक कविता में उसने प्लेटो की विलक्षण मेधा की प्रशंसा करते हुए उसे विद्वानों के बीच अद्वितीय घोषित किया है. देहयष्टि को लेकर भी अरस्तु और प्लेटो के बीच उल्लेखनीय अंतर था. प्लेटो लंबेचैड़े डीलडोल, चैड़ी छाती और सुदर्शन चेहरे वाला व्यक्ति था. उसके नामकरण का कारण ही उसका लंबाचैड़ा डीलडौल था. दूसरी ओर अरस्तु की आंखें छोटीछोटी. पैर पतले. कदकाठी सामान्य थी. बोलते समय वह कभीकभी तुतलाने लगता था. यह भी कहा गया है कि उम्र के आखिरी पड़ाव पर उसके बाल झड़ चुके थे. रहनसहन और बोलचाल में वह असंयमी था. अरस्तु की वाक्पटुता की प्रशंसा की जाती है. दियोगेनस ने उसकी वाक्पटुता के उदाहरणों को पुस्तकाकार संग्रहित किया है. मगर उसकी प्रतिभा बेमिसाल थी. वह अपने समय के शीर्षतम दार्शनिकों और कुछ मामलों में तो अपने गुरु प्लेटो से भी आगे था. दांते ने उसे ‘सभी विद्वानों का गुरु’ घोषित किया है. अरस्तु ने विपुल साहित्य की रचना की. उसके ग्रंथों की संख्या लगभग चार सौ बताई जाती है. उनमें से अनेक ग्रंथ तो दर्शनशास्त्र और राजनीति की धरोहर हैं. लेकिन यह भी विडंबना है कि अरस्तु जैसे महामेधावी दार्शनिक की पुस्तकें भी उसके निधन के लगभग 250 वर्ष बाद ही सिसरो के प्रयासों के फलस्वरूप प्रकाशित हो सकीं. इस बीच उसकी अनेक पांडुलिपियां लुप्त हो चुकी थीं. अब सिवाय संदर्भों के उनका कहीं अतापता नहीं है. लेकिन ‘पाॅलिटिक्स’ और ‘एथिक्स’ जैसे ग्रंथ मानवता के उपहार के रूप में आज भी सुरक्षित हैं.

अरस्तु का न्याय-दर्शन

अरस्तु की विलक्षणता उसके तार्किक विश्लेषण में है. सुकरात और प्लेटो की शैली मुख्यतः निगमनात्मक थी. अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले सुकरात अपने प्रतिपक्षी के आगे तर्क करता था. उत्तर प्राप्त होने पर वह प्रति तर्क अथवा प्रत्युत्तर के माध्यम से बातचीत को आगे बढ़ाता था. सुकरात को पढ़ते हुए सुधी पाठक समझ जाता है कि संबंधित विषय को लेकर उसका खास दृष्टिकोण है. परंतु निष्कर्ष को सामने रखने से पूर्व वह उसके सभी पक्षों को गंभीरतापूर्वक परख लेना चाहता है. प्रत्येक तर्क के साथ वह अपने मंतव्य को मजबूत करता जाता है. संवादात्मक शैली इसमें सहायक बनती है. यह तर्क की निगमनात्मक पद्धति है, जिसमें एक परिकल्पना को सिद्धांत में बदलने के लिए उसके समर्थन में तर्क जुटाए जाते हैं. पर्याप्त साक्ष्य हों तो ठीक वरना उस परिकल्पना को किनारे कर नए शोध की शुरुआत की जाती है. इसका मुख्य प्रयोग विज्ञान में होता है, जिसमें एक परिकल्पना के साथ परीक्षण, अनुरीक्षण करते हुए निष्कर्ष तक पहुंचने की कोशिश की जाती है. आगमनात्मक पद्धति में निष्कर्ष भविष्य में निहित होता है. उससे जुड़ी कुछ छोटीछोटी स्थितियां, विचार अथवा अनुभवादि होते हैं. फिर उनकी पड़ताल, पुराने निष्कर्षों के साथ मिलान, व्याख्या और परिणामों में आवश्यक संशोधनपरिवर्धन के बाद अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचा जाता है. अरस्तु को तर्क के क्षेत्र में आगमनात्मक पद्धति के प्रथम उपयोग का श्रेय भी प्राप्त है.

अरस्तु को इस बात का भी श्रेय दिया जाता है कि उसने राजनीति को फुटकर विचारों से ऊपर उठाकर स्वतंत्र विषय के रूप में मान्यता दिलाने का काम किया. उससे पूर्व वह धर्मदर्शन का हिस्सा थी. भारत में तो वह आगे भी बनी रही. अरस्तु का समकालीन चाणक्य ‘अर्थशास्त्र’ में अपने राजनीतिक विचारों को सामने रखता है और मजबूत केंद्र के समर्थन में तर्क देते हुए राज्य की सुरक्षा और मजबूती हेतु अनेक सुझाव भी देता है, परंतु ‘अर्थशास्त्र’ और ‘पाॅलिटिक्स’ की विचारधारा में खास अंतर है. यह अंतर प्राचीन भारतीय और पश्चिम के राजनीतिक दर्शन का भी है. उनमें अरस्तु की विचारधारा आधुनिकताबोध से संपन्न और मानवमूल्यों के करीब है. ‘पाॅलिटिक्स’ के केंद्र में भी मनुष्य और राज्य है. दोनों का लक्ष्य नैतिक एवं सामाजिक उद्देश्यों की प्राप्ति है. अरस्तु के अनुसार राजनीतिकसामाजिक आदर्शों की प्राप्ति के लिए आवश्यक है नागरिक और राज्य दोनों अपनीअपनी मर्यादा में रहें. सामान्य नैतिकता का अनुपालन करते हुए एकदूसरे के हितों की रक्षा करें. इस तरह मनुष्य एवं राज्य दोनों एकदूसरे के लिए साध्य भी साधन भी. ‘अर्थशास्त्र’ में राज्य अपेक्षाकृत शक्तिशाली संस्था है. उसमें राज्यहित के आगे मनुष्य की उपयोगिता महज संसाधन जितनी है. लोककल्याण के नाम पर चाणक्य यदि राज्य के कुछ कर्तव्य सुनिश्चित करता है तो उसका ध्येय मात्र राज्य के लिए योग्य मनुष्यों की आपूर्ति तक सीमित है. ‘पाॅलिटिक्स’ के विचारों के केंद्र में नैतिकता है. वहां राज्य का महत्त्व उसके साथ पूरे समाज का हित जुड़े होने के कारण है. राज्य द्वारा अपने हितों के लिए नागरिक हितों की बलि चढ़ाना निषिद्ध बताया गया है. दूसरी ओर ‘अर्थशास्त्र’ के नियम नैतिकता के बजाए धर्म को केंद्र में रखकर बुने गए हैं, जहां ‘कल्याण’ व्यक्ति का अधिकार न होकर, दैवीय अनुकंपा के रूप में प्राप्त होता है. जिसका ध्येय राज्य की मजबूती और संपन्नता के लिए आवश्यक जनबल का समर्थन और सहयोग प्राप्त करना है. ठीक ऐसे ही जैसे कोई पूंजीपति श्रमिककामगार को मात्र उतना देता है, जिससे वह अपनी स्वामी के मुनाफे में उत्तरोत्तर संबृद्धि हेतु अपने उत्पादनसामर्थ्य को बनाए रख सके.

अरस्तु के जीवनकाल में यूनान भारी उथलपुथल के दौर से गुजर रहा था. लोग छोटेछोटे राज्यों से उकताने लगे थे. गणतांत्रिक प्रणाली को नाकाम होते देख साम्राज्यवादियों का हौसला बढ़ा था. वे नए सिरे से साम्राज्यवादी विस्तार की तैयारियों में लगे थे. छोटे राज्यों के असफल होने के दो कारण थे. पहला उनमें आपस में बहुत झगड़े होते थे. जरासी बात पर तलवारें खिंच जाया करती थीं. दूसरा और प्रमुख कारण था—व्यापारिक बाधाएं. ईसा पूर्व पांचवीछठी शताब्दी में अंतर्प्राद्वीपीय व्यापार ने काफी तरक्की की थी. व्यापारिक बेड़े दूरदराज के राज्यों के साथ व्यापार करते थे. दूसरे राज्य में व्यापार की अनुमति पारस्परिक राजनीतिक संबंधों पर निर्भर करती थी. संबंध अनुकूल हों तब भी शिल्पकार संगठनों को दूसरे राज्य में व्यापार हेतु भारीभरकम करों का भुगतान करना पड़ता था. बड़े राज्यों के गठन केे पीछे मूल विचार था कि उनमें मुक्त व्यापार के लिए अधिक बाजार उपलब्ध हो सकेगा. कुल मिलाकर बड़े राज्यों के गठन के पीछे जहां सभ्यताकरण की प्रेरणाएं थीं, वहीं वर्तमान के प्रति असंतोष की भावना भी थी. अरस्तु जैसा प्रखर विद्वान परिवर्तनों का मूकनिष्पंद द्रष्टा बनकर नहीं रह सकता था. वह दार्शनिक था. विचारों का उसकी दुनिया में महत्त्व था. विचारों को वह किसी भी प्रकार के परिवर्तन की आधारशिला मानता था. उसका मानना था कि मनुष्य श्रेष्ठ का चयन तब कर सकता है, जब उसे श्रेष्ठत्व का बोध हो. उन खूबियों की जानकारी हो जो श्रेष्ठ को श्रेष्ठत्व प्रदान करती हैं. ऐसा नहीं है कि इसकी शुरुआत अरस्तु या प्लेटो से हुई हो. दर्शन के रूप में राजनीति के अध्ययन की शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी. प्राचीन यूनान में होमर, लायक्राग्स, सोलन, प्रोटेगोरस, एंडीफोन, पाइथागोरस, जेनोफीन जैसे अनेक नाम हैं, जिन्होंने राजनीति को सभ्यताकरण के उपकरण की भांति प्रयुक्त किया था. तथापि सुसंगत राजनीतिक चिंतन का अभाव था. राजा प्रजा की मांग तथा अपनी सुविधा के अनुसार कुछ नियम बना लिया करते थे. फिर लंबे समय तक उन्हीं को मार्गदर्शक मानकर काम चलाया जाता था. उनमें से कुछ पर अमल हो पाता था, कुछ पर नहीं. प्रजा कुछ समय तक प्रशासन की दुर्बलताओं को सहती. धीरेधीरे असंतोष उमड़ने लगता था. फलस्वरूप नए सिरे से व्यवस्थापरिवर्तन की मांग उठने लगती थी. नियमों में बड़ा परिवर्तन प्रायः बड़े सत्तापरिवर्तन के साथ ही हो पाता था.

प्लेटो ने न केवल विभिन्न राजनीतिक दर्शनों को एक साथ अध्ययनचिंतन का विषय बनाया, वहीं उनकी खूबियों और खामियों पर भी चर्चा की. उसका लक्ष्य सामाजिक आदर्श थे, जिनके लिए वे राजनीति को औजार के रूप में उपयोग करना चाहता था. अरस्तु ने उस अध्ययन को तर्कसम्मत ढंग से विस्तार दिया. उसके लिए कसौटी न्याय और नैतिकता को बनाया. अरस्तु की कामना ऐसे राज्य की थी, जो परमशुभ की प्राप्ति हेतु सतत अग्रसर हो. जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को अपनी अच्छाइयों के साथ जीने की आजादी हो. और वह अंतःस्फूर्त प्रेरणा के साथ लक्ष्यप्राप्ति हेतु संकल्परत हो. यह तभी संभव है जब व्यक्ति को कानून और समाज की मर्यादा में, वह सब कुछ करने की स्वतंत्रता हो जिसे वह अपने लिए उपयुक्त मानता है. इसके लिए आवश्यक है कि राज्य अपेक्षित रूप में उदार हो. निरंकुश, अल्पतंत्रात्मक राज्यों में जनसाधारण से उसके चयन का अधिकार छीन लिया जाता है. इस कारण प्लेटो ने निरंकुश राज्य को सबसे बुरा माना है. उसके अनुसार निरंकुश राज्य में नीचे से ऊपर तक सभी स्वार्थलिप्त होते हैं. संसाधनों पर कुछ लोगों का अधिकार होता है. बहुसंख्यक वर्ग से अपेक्षा की जाती है कि वह अल्पसंख्यक शासक वर्ग की मनमानियों को सहते हुए शासन में सहयोग करे तथा राज्य के हित को, जो वास्तव में उसपर शासक वर्ग द्वारा थोपा हुआ उसका स्वार्थ होता है—अपना हित समझकर वर्ताब करे. ऐसे राज्य में मनुष्य सज्जन की संगत को तरस जाता है. दुर्जन उसे चारों ओर से घेरे रहते हैं. परिणामस्वरूप वह अपनी ही अच्छाइयों से कट जाता है. दुष्प्रभाव केवल यहीं तक सीमिन नहीं रहता. अपने चारों और स्वार्थपरक माहौल देख भले नागरिकों का अपनी मूलभूत अच्छाई से भरोसा उठने लगता है. वे मान लेते हैं कि अस्तित्व को बचाए रखने के लिए दुर्जनों के बीच दुर्जन जैसा व्यवहार करना उसकी मजबूरी है. बुराई के लिए आपधापी में अच्छाई की बलि चढ़ा दी जाती है. परिणामस्वरूप लोगों के स्वार्थ प्रबल होने लगते हैं. केवल अपने लिए जीने की होड़ मच जाती है. कुल मिलाकर निरंकुश राज्य नागरिकों को स्वार्थ के लिए प्रेरित करता है. ऐसे समाजों में चूंकि प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए जीता है, इसलिए सामूहिक हितों के लिए संगठित प्रतिरोध की उसकी क्षमता निरंतर घटती जाती है. ऐसे समाजों में न्याय के अवसर विरल हो जाते हैं.

प्लेटो व्यक्ति एवं समाज की अंतःनिर्भरता पर जोर देता है. सामाजिकता की शर्त है कि अन्योन्याश्रितता केवल सुखसुविधाओं और संसाधनों की नहीं, आचारव्यवहार की भी बनी रहे. इस दृष्टि से मनुष्य तथा समाज के बीच बहुत अधिक अंतर नहीं होता. श्रेष्ठ मनुष्य श्रेष्ठ नागरिक भी होता है, किंतु अकेले मनुष्य की श्रेष्ठता क्षणभंगुर होती है. मनुष्य अपने आचारव्यवहार में श्रेष्ठतर बना रहे, उसके लिए समाज की श्रेष्ठता अपरिहार्य है. इस तरह जो मनुष्य के लिए आदर्श है, प्रकारांतर में वह राज्य के लिए भी आदर्श होना चाहिए. न्याय मानव जीवन का उद्देश्य तभी बन सकता है, जब वह समाज का उद्दिष्ट हो. यदि समाज में न्याय का अभाव है तो समझना चाहिए कि राज्य एवं नागरिकों के बीच विश्वास एवं तालमेल की कमी है. विचार को आगे बढ़ाता हुआ प्लेटो लिखता है कि मनुष्य के लिए क्या श्रेष्ठ है, इसे उस समय तक नहीं जाना जा सकता, जब तक हम यह न जान लें कि राज्य के लिए क्या श्रेष्ठ है. अथवा राज्य जो उसके नागरिकों के लिए श्रेष्ठ है, उसे अपने लिए भी श्रेष्ठ न मान ले. निरंकुश राज्य में ऐसा संभव नहीं होता. वहां नागरिकों से न केवल उनके चयन का अधिकार छीन लिया जाता है, बल्कि लोगों को विवश किया जाता है कि वे अपने विवेक से काम लेने के बजाय दूसरों के आदेश का अनुपालन करें. इससे मनुष्य अपने नागरिक धर्म को भूल जाता है. दूसरी ओर वे लोग जो दूसरों के श्रम और अधिकारों पर कब्जा जमाए होते हैं, विरोध की कोई संभावना न देख उनका दुस्साहस बढ़ता ही जाता है. परिणामस्वरूप स्तरीकरण स्थायी रूप ले लेता है. इससे समाज दो हिस्सों में बंट जाता है. एक ओर आज्ञाप्रदाता समूह होता है. दूसरी ओर आज्ञापालक लोग, जो संख्या में बहुसंख्यक होने के बावजूद अधिकारवंचित होने के कारण दबाव में रहने को विवश होते हैं. इससे मनुष्य की मूलभूत पहचान जो उसके मानवीकरण की शर्त के साथ जुड़ी है, धूमिल पड़ने लगती है. अरस्तु ने मनुष्य को सभी प्राणियों में श्रेष्ठ माना है. मनुष्य सबके साथ मिलकर जीने को उत्सुक होता है, इस कारण वह दूसरों से श्रेष्ठ है. परंतु सामूहिकरण की भावना जो पशुओं में भी होती है. यहां तक कि कीटपतंगे भी समूह में जीना जानते हैं. फिर मनुष्य की सामूहिकता और मानवेत्तर प्राणियों की सामूहिकता में क्या अंतर है? अरस्तु के अनुसार मनुष्य की सामूहिकता समाज के रूप में कुछ नियमों से बंधी होती है. या यह कहो कि अपनी सूझबूझ का परिचय देते हुए वह सामाजिक नियमों के रूप में कुछ मर्यादाएं चुनता है. फिर उनके अनुपालन हेतु संस्थाओं का गठन करता है. मानवेत्तर प्राणियों में ऐसा नहीं होता. वहां केवल बल का साम्राज्य होता है. इसलिए जब कोई बलशाली प्राणी अपने से कमजोर पर आक्रमण कर उसके लिए संकट उत्पन्न करता है, तो बाकी जानवरों में उसकी कोई स्थायी प्रतिक्रिया नहीं होती. मनुष्य के साथ ऐसा नहीं है. मानवसमाज में अधिकार एवं कर्तव्य साथसाथ चलते हैं. परंतु ऐसे समाजों में जहां स्तरीकरण बहुत अधिक हो, समाज शक्तिशाली और शक्तिविपन्न वर्गों में बंटा हो, वहां मिलजुलकर रहने की प्रवृत्ति भी कमजोर पड़ती जाती है. न्यायभावना किसी भी मनुष्य की श्रेष्ठता का मापदंड होती है. न्यायभावना से कटा मनुष्य नितांत जंगली हो सकता है.

कविहृदय प्लेटो आदर्श राज्य के सपने को अपनी कल्पना के जरिये विस्तार देता है. उसका वैचारिक स्तर इतना ऊंचा है कि व्यावहारिक कठिनाइयों को कभी समझ ही नहीं पाता. अरस्तु को मानवव्यक्तित्व की जटिलताओं की समझ अपेक्षाकृत अधिक थी. वह जानता था कि मनुष्य के व्यवहार के बारे में कोई भी सटीक भविष्यवाणी कर पाना संभव नहीं है. यह भी नहीं कहा जा सकता कि किसी मनुष्य में जो गुण आज हैं, वे सदैव बने रहेंगे. इसलिए किसी व्यक्ति का दार्शनिक होना उसके चरित्र का स्थायी लक्षण नहीं है. अपने विचारों की व्याख्या के लिए अरस्तु ने ‘पाॅलिटिक्स’ के तीसरे खंड के तेरहवें अध्याय में पेरियांडर का उदाहरण दिया है. पेरियांडर ने 627 ईस्वीपूर्व से 587 ईस्वीपूर्व तक कोरिंथ पर राज किया था. उसकी गिनती ग्रीक के सात प्राचीन संतपुरुषों में होती है. वह दार्शनिक, कवि, आविष्कारक, योद्धा और श्रेष्ठ प्रशासक था. यातायात साधनों की खोज तथा अनेक महत्त्वपूर्ण भवनों के निर्माण के कई आविष्कारों का श्रेय भी उसे दिया जाता है. किंतु उसका आचरण उसकी विद्वता के सर्वथा विपरीत था. अपने आचरण में वह पूरी तरह निरंकुश, क्रोधी, निर्मम, कठोर और कुटिल तानाशाह था. एक बार उसे अपनी पत्नी लिसिडा पर इतना क्रोध आया कि उसे सीढ़ियों पर ढकेल दिया था, जिसमें उसकी मृत्यु हो गई. पेरियांडर और मेनिटस के राजा थ्रेसीबुलस् के बीच गहरी मैत्री थी. पेरियांडर की भांति थ्रेसीबुलस् भी निरंकुश सम्राट था. मेलिटस और लीडिया के बीच लंबा संग्राम चला था. वर्षों तक चलने वाले युद्ध का कोई परिणाम न निकलता देख दोनों राज्य आपस में समझौते के लिए विवश हो गए. थ्रेसीबुलस ने युद्ध विराम की घोषणा तो कर दी, लेकिन वह अपने विरोधियों को मित्र का दर्जा देने को तैयार न था. इस कारण वह भीतर से बहुत आहत था. सो उसने पेरियांडर से सलाह लेने के लिए उसके पास अपना दूत भेजा. पेरियांडर ने दूत की बातें सुनीं. सलाह देने के बजाय वह दूत को बस्ती से बाहर खेत में ले गया. वहां गेहूं की फसल खड़ी थी. पेरियांडर ने साथ आए सैनिकों को सबसे ऊपर निकली बालियों को काटने का आदेश दिया. उसके इशारे पर सैनिकों ने सबसे ऊपर दिखने वाली बालियों को काटकर जमीन पर बिछा दिया. उसके बाद थ्रेसीबुलस् के दूत को वापस लौटा दिया. दूत की कुछ समझ न आया. उसने वापस लौटकर जो कुछ घटा था, सम्राट को बता दिया. सुनकर थ्रेसीबुलस् की आंखों में चमक आ गई. वह पेरियांडर का इशारा समझ गया. सबसे ऊंची बालियों को नष्ट कर देने का अर्थ जो उसने निकाला वह था, अपने सभी प्रमुख विरोधियों का निर्ममतापूर्ण सफाया. अरस्तु का निष्कर्ष था कि सत्ताएं अपना विरोध नहीं सह पातीं. गणतांत्रिक सरकारें तानाशाहों की भांति कठोर फैसले लेने से बचती हैं, लेकिन विरोधियों को वे भी अपवादस्वरूप ही पचा पाती हैं. विरोधियों के क्रूरतापूर्ण दमन से बचते हुए वे आरंभ में अपेक्षाकृत उदार दिखने वाले रास्ते अपनाती हैं. उनकी पहली कोशिश विरोधियों के संगठन को तोड़ने की होती है. फिर उनमें से एक पक्ष को बहलाफुसला या सत्ता में हिस्सेदार बनाकर अपने पक्ष में कर लिया जाता है. यदि उससे समाधान की संभावना कम हो अथवा कोई अड़ जाए राष्ट्रहित का हवाला देते हुए देशनिकाले जैसी सजा देकर उससे मुक्ति पा ली जाती है.

अरस्तु आदर्श और व्यवहार के अंतर को वह भलीभांति समझता था. प्लेटो आदर्श से तनिक पीछे हटने को तैयार न था, जबकि अरस्तु आदर्श और व्यवहार में संतुलन बनाए रखने का समर्थक था. व्यावहारिकता से जराभी पीछे हटे बिना वह समाज में नैतिकता और अनुशासन को बनाए रखने का समर्थन करता है. व्यावहारिक आदर्शोन्मुखता उसके दर्शन का मुख्य लक्षण है. उल्लेखनीय है कि ‘पाॅलिटिक्स’ की रचना से पहले उसने 158 नगरराज्यों के संविधानों का अध्ययन किया था. अंततः वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि प्रत्येक राजनीतिक दर्शन स्वयं में अपूर्ण है. केवल चरित्र की ईमानदारी और निष्ठा से अपेक्षित लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है. किसी एक व्यक्ति अथवा समूह द्वारा भी उन आदर्शों को प्राप्त नहीं किया जा सकता. इसके लिए समाज के सभी वर्गों के बीच आपसी सहयोग और तालमेल आवश्यक है. समाजवाद की भाषा में कहें तो सब एक के लिए और एक सबके लिए जीने को तैयार हो, तभी अपेक्षित लक्ष्यों की प्राप्ति संभव है. राजनीति के आधुनिक पंडित राजतंत्र की आलोचना इस आधार पर करते हैं कि वहां राजा वंशानुगत आधार पर सत्ता ग्रहण करता है. एक ही वर्ग की मनमानी चलती रहती है. महत्त्वपूर्ण निर्णय लेते समय जनता से सलाहमशविरा करने अथवा लोगों की इच्छाओं का सम्मान करने की जरूरत ही नहीं समझी जाती. प्रायः सत्ता पक्ष की पसंदों को प्रजा की पसंद या उसके लिए सर्वथा हितकारी बनाकर लाद दिया जाता है. ऐसे समाजों में संपन्न लोगों की चलती है और न्याय की संभावना अत्यंत विरल हो जाती है. जबकि अरस्तु के अनुसार न्याय प्रत्येक व्यवस्था का अंतिम उद्देश्य होना चाहिए. तदनुसार न्याय की दृष्टि में जो श्रेष्ठ है, वही राज्य के गठन का उद्देश्य भी है. इसलिए राजतंत्र हो अथवा लोकतंत्र, यदि उसका शासन समाजीकरण की प्रक्रिया को मजबूत बनाते हुए राज्य के उद्देश्यों के प्रति समर्पित है, यदि वह राजकर्म को समाज द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारी मानता है तो उसे अनैतिक नहीं माना जा सकता. हालांकि अकेले व्यक्ति के हाथों में सत्ता आने पर उसकी मनमानी के आसार अधिक होते हैं. राजतंत्र में प्रायः यह सोचकर कि राजा के सुख में ही प्रजा का सुख निहित है—नीतियां बनाई जाती हैं. इसलिए प्रजा की पसंदों के बारे में पता ही नहीं चल पाता. प्रजा भी राज्य की ओर से उम्मीद खो बैठती है. उस अवस्था में राज्य के गठन का औचित्य ही समाप्त हो जाता है. यदि प्रजा की उदासीनता बहुत अधिक बढ़ जाए तो वह राज्य की प्रवृत्ति तथा उसके बदलाव में रुचि लेना छोड़ देती है. इससे शीर्ष पर बैठे लोगों की मनमानियां बढ़ती जाती हैं.

भारत में राजा नामक संस्था को असुरों की देन बताया गया है. ऐतरेय ब्राह्मण में रोचक प्रसंग आया है—‘‘देव और असुर परस्पर युद्धरत रहते थे. दोनों के बीच पूरब दिशा में युद्ध हुआ. उसमें देवता पराजित हुए. अगली लड़ाई दक्षिण में हुई. उसमें भी असुरों की जीत हुई. उसके बाद पश्चिम में युद्ध हुआ. असुरों ने एक बार पुनः देवताओं को पराजित किया. फिर उत्तर दिशा में युद्ध हुआ. देवता उस युद्ध में भी पराजित हुए. उसके बाद वे उत्तरपूर्व में युद्धरत हुए. इस बार देवताओं की विजय हुई. देवताओं ने माना, वह दिशा ‘अपराजेय’ है….केवल वही दिशा थी, जिसमें देवताओं को जीत मिली. अंततः देवताओं को समझ आया—‘हम इसलिए पराजित हुए, क्योंकि हमारा कोई राजा नहीं है.’ उसके बाद उन्होंने सोम को अपना राजा चुना.’’ उसके बाद राजा नियुक्ति की जाने लगी. यजुर्वेद में राजा को उसके कर्तव्यों के बारे में चेताते हुए कहा गया है—‘तुम्हें यह राष्ट्र सौंपा जाना है—प्रजा के क्षेम तथा उसके सर्वविध पोषण, कृषि की उन्नति एवं बहुआयामी विकास के लिए.’ अथर्ववेद में कहा गया है—‘प्रजा के सुख में ही राजा का सुख, प्रजा कल्याण में राजा का कल्याण निहित है. लेकिन कल्याण का स्वरूप क्या हो? प्रजा के सुख को तय करने वाले मापदंड कैसे हों? क्या यह संभव है कि कोई एक सुख प्रजा के सभी सदस्यों के लिए समानरूप से सुखकारी हो? राजतंत्र चूंकि किसी एक व्यक्ति या चुने हुए व्यक्तियों के समूह की इच्छा द्वारा नियंत्रित होता है, इसलिए राजतंत्र में इन प्रश्नों को प्रायः अनसुना कर दिया जाता है.

देवासुर संग्राम एक प्रतीक है. मिथकीय आख्यान. परंतु यह ऐतिहासिक सत्य है कि प्राचीन भारत में लंबे समय तक यही हाल रहा. छोटेछोटे राज्य आपस में लड़ते रहते थे. इसलिए प्रजा ‘कोऊ नृप होय हमें क्या हानि’—कहकर राज्य और राजा दोनों की ओर से उदासीन बनी रहती थी. यहां तक कि सत्ता केंद्र पूरी तरह बदल जाने पर भी परिवर्तनों पर उसका ध्यान नहीं जाता था. सामान्यतः इसे राजनीति की असफलता कहा जाएगा. क्योंकि वह उन लोगों के राज्य का नेतृत्व करने का दावा करती थी, जिन्हें पता ही नहीं होता कि उनका राज्य के प्रति और राज्य का उनके प्रति क्या कर्तव्य है? न ही यह मालूम होता है कि राज्य समाज से ऊपर नहीं, बल्कि समाज द्वारा खुद को व्यवस्थित रखने के लिए गढ़ी गई संस्था है, जिसपर एकमात्र जनता का सर्वाधिकार है. यदि उन्हें या उनमें से किसी एक को राज्य की ओर से कुछ समस्या है तो इसका कारण केवल राज्य की दुर्बलता नहीं, बल्कि उनका अपने ही अधिकारों के प्रति उपेक्षाभाव भी है. असल में वे जान ही नहीं पाते कि वास्तविक समस्या राज्य को उत्तराधिकार का विषय और केवल शक्तिकेंद्र समझकर उसपर काबिज होने, फिर उन कर्तव्यों से पलायन से जन्म लेती है, जो राजा नामक संस्था के लिए विहित हैं. इसलिए अरस्तु ने राजतंत्र की आलोचना करने के बजाए राजा के आदर्शों पर ज्यादा जोर दिया है. उसका विचार था कि जिस व्यक्ति में नेतृत्व का गुण हो, वही राजा है. स्टोइक विचारकों के अनुसार केवल वही व्यक्ति सम्राट बनने का अधिकारी था, जो आचरण में सर्वश्रेष्ठ तथा राजपद के लिए अपेक्षित योग्यताएं रखता हो. सुकरात का विचार था कि राजा उसे बनाना चाहिए जिसमें राजा के लिए अपेक्षित सभी गुणों का समावेश हो. इस तरह सिद्धांत के स्तर पर राजशाही में भी लोकहित को साधने पर जोर दिया जाता है. परंतु यदि समाज का बहुसंख्यक समुदाय ही राज्य, उसकी गतिविधियों और अपने अधिकारों की ओर से उदासीन हो जाए तो शिखर पर बैठे लोगों को मनमानी का अवसर सहज ही मिल जाता है. अरस्तु का विचार था कि यदि नागरिक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक तथा शासक वर्ग कर्तव्यों के प्रति पूर्णतः सचेत हो तो कोई भी राजनीतिक दर्शन राज्य के उद्देश्यों को प्राप्त कर सकता है. इसलिए दोष किसी विचार अथवा विचारधारा का न होकर उसका सही अनुपालन न करने तथा राजनीतिज्ञों के स्वार्थ से घिर जाने का है. इसलिए उसने कहा था—

‘कम से कम आधी राजनीति उपलब्ध संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण तथा परिस्थितियों का श्रेष्ठतम उपयोग करने में है.’

ऐसा नहीं है कि अरस्तु राजनीतिक परिवर्तन की संभावनाओं अथवा उसमें नए चिंतन और विचारों को अनावश्यक मानता था. उसका विचार था कि राजनीतिक दर्शनों में सुधार की भरपूर संभावना है. उसके लिए राज्य एवं नागरिकों का आपसी विश्वास एवं सहयोग आवश्यक है. यह तभी संभव है जब राज्य के सभी नागरिक श्रेष्ठतम आचरण का प्रदर्शन करें, तथा राज्य के केंद्र पर आसीन शक्तियां अपने कर्तव्यों के प्रति पूरी तरह सजग एवं समर्पित हों. आदर्श राज्य को लेकर कुछ ऐसा ही स्वप्न प्लेटो का भी था. क्या दोनों का परिकल्पनाएं समान हैं? यदि कुछ अंतर है तो क्या है? ‘दि लाॅज’ प्लेटो की प्रौढ़ वयस् की रचना है. उसकी गिनती राजनीतिक दर्शन की श्रेष्ठतम कृतियों में की जाती है. प्लेटो ने उसमें आदर्श राज्य की संकल्पना को प्रस्तुत किया है. अरस्तु को वह परिकल्पना अव्यावहारिक लगती है. प्लेटो के विचारों को सर्वथा मौलिक और अनुपम बताकर वह उसकी प्रशंसा करता है, साथ में यह भी जोड़ देता है कि उसके विचार उत्कृष्ट वैचारिकता से भरपूर होने के साथसाथ, अत्यधिक क्रांतिकारी किंतु अतिकल्पनात्मक हैं. उसके शब्दों में छिपी व्यंग्यरेख को नजरंदाज नहीं किया जा सकता. अप्रत्यक्ष रूप से वह प्लेटो के विचारों को अव्यावहारिक करार देता देता है. इसका आशय यह नहीं है कि राज्य के लिए जिस उच्चतम आदर्शं की परिकल्पना प्लेटो करता है, उसके स्वरूप एवं संचालन को लेकर अरस्तु की उससे कुछ कम अपेक्षाएं हैं. देखा जाए तो दार्शनिक सम्राट के रूप में उसकी कामना ऐसे महामानव की है जो उच्च मानवादर्शों से युक्त हो. जो लोगों की समानता और स्वतंत्रता में विश्वास रखता हो. उनके सुख एवं सुरक्षा में संवृद्धि के प्रति पूरी तरह संकल्पबद्ध हो. ऐसा महामानव मिलना असंभव है. यदि चमत्कारस्वरूप मिल भी जाए तो उसके परिवत्र्ती सम्राट उसी की भांति गुणवंत होंगे इसकी संभावना अत्यंत विरल है. समय के साथ स्वयं व्यक्ति के आदर्श एवं प्राथमिकताओं में बदलाव आ सकता है. आदर्श राज्य के लिए ‘दार्शनिक सम्राट’ की अनुशंसा करते समय प्लेटो प्रकारांतर में राजतंत्र का ही पक्ष लेता है, जिसमें राजा की इच्छा सर्वोपरि होती है. जबकि व्यक्ति वह चाहे जितना उदार क्यों न हो, अपने ईमानदार सोच, संपूर्ण सदेच्छा और समर्पण के साथ काम भी करता हो, यह आवश्यक नहीं कि जिसे वह विस्तृत जनसमाज के लिए हितकारी मानता है, वह उसके लिए वास्तव में उतना ही हितकारी हो. पेरियांडर का उदाहरण पीछे दिया गया है. छब्बीस शताब्दी पहले ग्रीक में जन्मा पेरियांडर एक साथ वीर, दूरदृष्टा, आविष्कारक, कुशल प्रशासक, महत्त्वाकांक्षी सम्राट आदि सबकुछ था. उसके शासन के दौरान कोरिंथ ने खूब तरक्की की. कई नए आविष्कार उसने किए. महत्त्वपूर्ण इमारतों का निर्माण कराया, परंतु समय के साथ उसकी मान्यताओं में बदलाव आता गया. आज कुछ लोग उसे तानाशाह के रूप में पहचानते हैं, जबकि कुछ के लिए जो उसके आरंभिक जीवन के कार्यकलापों पर अटके रहते हैं, पेरियांडर संत की हैसियत रखता है. ठीक ऐसे ही जैसे राम के बारे में कहा जाता है. रामराज्य को आदर्श बताने वालों के लिए राम इतना आदर्श राजा है कि वे उसे ईश्वर का दर्जा देते है. परंतु जो लोग उसे शंबूक हत्या का दोषी मानते हैं, उनकी निगाह में वह निरंकुश सम्राट है.

अरस्तु ने वैज्ञानिक का स्वभाव पाया था. उस समय मौजूद संविधानों का अध्ययन करने के पश्चात वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि कोई भी राजनीतिक दर्शन अंतिम रूप से आदर्श नहीं हो सकता. अनेक ऐसे राज्य हैं जहां राजतंत्र था, जहां राजा ने लोककल्याण के प्रति अपने दायित्व को समझते हुए लोकहित में बड़ेबड़े काम किए, वहीं अल्पतंत्र, कुलीनतंत्र, गणतंत्रादि के अनेक ऐसे उदाहरण हैं जो जनता की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर सके. कुल मिलाकर राजनीतिक दर्शनों को लेकर अरस्तु का सीधासीधा उपयोगितावादी दृष्टिकोण था, जिसमें वह राज्य के नैतिक आचरण पर जोर देता है. ‘अंत भला सो सब भला’—यदि किसी राजनीतिक तंत्र का कामकाज कल्याणकारी और राज्य के आदर्शों के अनुरूप है, जो नागरिकों के लिए इससे कोई अंतर नहीं पड़ता किस दर्शन का अनुगामी है. परंतु क्या सचमुच ऐसा ही है. यह ठीक है कि राजा यदि उदार और आदर्शोन्मुख है तो वह निस्वार्थ भाव से लोककल्याण की नीतियां अपनाएगा. परंतु ऐसे राजा के अधीन राज्य में अनुकूल परिस्थितियों की गारंटी केवल उस राजा के जीवन या सत्तासीन रहने तक सीमित होगी. राजा बदलने के साथ ही राज्य का नागरिकों के प्रति व्यवहार बदल सकता है. अब यदि लोगों को अपना राजा चुनने की सुविधा न हो, और राजसत्ता उत्तराधिकार में अंतरित होती हो तो अथवा कुछ समय तक सत्तासीन रहने के बाद सम्राट नागरिकों के प्रति अपने कर्तव्य को भूल जाए तो सारे परिणाम उलट सकते हैं. दूसरे यह कतई आवश्यक नहीं है कि आदर्श राजा का उत्तराधिकारी भी उन्हीं आदर्शों का अनुगामी हो. आशय है राजतंत्र में आदर्श की उपस्थिति यदि हो भी तो वह अल्पकालिक होती है. पीछे पेरियांडर का उदाहरण आया है, जिसकी आरंभ में एक संत के रूप में प्रतिष्ठा थी. परंतु आगे चलकर वह निरंकुश सम्राट के रूप में कुख्यात हुआ. यह कभी भी, किसी भी राज्य में संभव है. ऐसे में राजतंत्र की सीमा अपने आप निर्धारित हो जाती है. लेकिन इससे अरस्तु का कहना गलत नहीं हो जाता. ध्यान रखना चाहिए कि वह आदर्श राजनीतिक दर्शन की बात न कहकर राज्य के आदर्श की बात कर रहा है.

इस निष्कर्ष में अरस्तु के अपने निष्कर्षों का बड़ा योगदान था. राजतंत्र को लेकर प्लेटो के जीवनानुभव बहुत ही कड़बे थे. आरंभ में सायराक्स के सम्राट डायनोसियस से उसके अच्छे संबंध थे. उसका संबंधी प्लेटो का गहरा शिष्य था. परंतु कुछ ही अवधि के बाद डायनोसियस प्लेटो का दुश्मन बन गया. नाराज होकर उसने प्लेटो को दास के रूप में बेचना चाहा. कुछ मित्रों की मदद से बड़ी मुश्किल से प्लेटो खुद को बचा पाया था. एथेंस के लोकतंत्र को वह सुकरात की हत्या का दोषी मानता था. उसके सापेक्ष अरस्तु के व्यक्तिगत अनुभव बहुत अच्छे थे. उसके पिता सिकंदर के दादा के राजदरबार में थे. जहां राजतंत्र था. एक अन्य राजतंत्र माइसिया के राजा से उसके व्यक्तिगत संबंध हमेशा ही अनुरागपूर्ण थे. एथेंस के गणतंत्र ने उसका स्वागत किया था तो सिंकदर जैसे महत्त्वाकांक्षी सम्राट उसका मित्र था और कदमकदम पर उसकी मदद करता रहता था. व्यक्ति के जैसे अनुभव हों, उसके विचारों की देहयष्टि उसी के अनुसार ढलती चली जाती है. सुकरात का संबंध साधारण शिल्पकार परिवार से था. सोफिस्टों के बौद्धिक वितंडा को उसने गहराई से देखासमझा था. सोफिस्टों का केवल सत्तावादी नजरिये से जीवन को देखना समझना उसे बहुत अखरता था. उसे लगता था कि समाज की अनेक समस्याएं दिखावे की संस्कृति की वजह से हैं. यहां तक कि गणतांत्रिक शासन प्रणाली भी जिसपर एथेंस को गर्व करता है, दिखावे की संस्कृति का शिकार है. जबकि सत्य दिखावे की नहीं, आत्मसात करने, आचरण में उतारने की वस्तु हैै. इसलिए उसने सोफिस्टों का विरोध किया था, जो तर्क को दूसरों को प्रभावित की कला मानते थे. सोफिस्टों को समाज का समर्थन था. सुकरात का मानना था कि कोरे तर्क को ज्ञान का पर्याय समझने वाले सोफिस्टों को तर्क के आधार पर ही परास्त किया जाए. उसके लिए उसने ऐसी तर्कशैली विकसित की, जिससे सामने वाला स्वयं निरुत्तर हो जाता था. वह कोरे वितंडा से परे, किसी भी निष्कर्ष से पूर्व ज्ञान को प्रत्येक कोण से परख लेने की नीति थी. जिसके लिए विषय का सर्वांगीण बोध आवश्यक था. जाहिर है सोफिस्टों को इसका अभ्यास न था. इसलिए न्याय पर विमर्श के दौरान थ्रेचाइमच्स जैसा सोफिस्ट विद्वान भी सुकरात के आगे पराजय स्वीकारने को विवश हो जाता है.

वस्तुतः राजनीतिक आदर्श के रूप में अरस्तु राज्य के जिस स्वरूप की कल्पना करता है, उसमें और प्लेटो के दर्शन में विशेष अंतर नहीं है. ‘आदर्श राज्य’ के रूप में प्लेटो जो कल्पना करता है, अरस्तु उसी सपने को ‘राज्य के आदर्श’ के रूप में साकार करना चाहता है. इस तरह हम अरस्तु के विचारों पर प्लेटो के दर्शन की छाया देख सकते हैं. बावजूद इसके अरस्तु के विचारों को प्लेटो के दर्शन की पुनरावृत्ति नहीं कहा जा सकता. ‘राज्य के आदर्श’ को परिपक्व दर्शन के रूप में विस्तार देने से पहले वह प्लेटो के ‘आदर्श राज्य’ से उतनी ही प्रेरणा लेता है, जितनी आवश्यक है. ‘लाॅज’ में प्लेटो का यह विचार कि न्याय सभ्यताकरण की कसौटी है तथा न्याय से ही मानव ने सभ्यता का पाठ पढ़ा है—अरस्तु के दर्शन के लिए प्रस्थान बिंदू का काम करता है.

न्याय की व्याख्या करते हुए अरस्तु उसके दोनों रूपों पर विचार करता है. पहला वह जिसके बारे में सामान्यजन सोचता है कि न्याय कानून के तत्वावधान में अदालतों के जरिये प्राप्त होता है. इसके साथसाथ वह मनुष्य के आचरण एवं व्यवहार की व्याख्या करता है. न्याय का यह रूप नागरिक और राष्ट्रराज्य के कानून के अंतर्संबंध को दर्शाता है. उन अनुबंधों की ओर इशारा करता है, जिनसे कोई नागरिक सभ्य समाज का नागरिक होने के नाते जन्म के साथ ही जुड़ जाता है. प्रकारांतर में वह बताता हे कि आदर्शोंन्मुखी समाज में मनुष्य का आचरण एवं कर्तव्य किस प्रकार के होने चाहिए, ताकि समाज में शांति, सुशासन और आदर्शोन्मुखता बनी रहे. प्रायः सभी समाजों में कानून को नकारात्मक ढंग से लिया जाता है. बातबात पर कानून का हवाला देने वालीं, उसके अनुपालन में लगी शक्तियां प्रायः यह मान लेती हैं कि बुराई मानवस्वभाव का स्थायी लक्षण है. जो बुरा है, उसे केवल दंड के माध्यम से बस में रखा जा सकता है. कि मानवव्यक्तित्व पर आज भी अपने उन पूर्वजों के लक्षण शेष हैं जो कभी जंगलों में जानवरों के बीच रहा करते थे. कुछ व्यक्तियों में पाशविक वृत्ति ज्यादा प्रभावी होती है. ऐसे लोगों पर बलप्रयोग उन्हें अनुशासित रखने का एकमात्र उपाय है. है. इसलिए सभ्यताकरण के आरंभ से ही दंडविधान की व्यवस्था प्रत्येक समाज और संस्कृति में रही है. इसे पुष्ट करने के लिए धर्म और संस्कृति से जुड़े ऐसे अनेक किस्से हैं, जिनसे हमारा संस्कार बनता है. स्वर्गनर्क की कल्पना भी इसी का हिस्सा है. उनमें से अधिकांश पर विजेता संस्कृति का प्रभाव है. आधुनिक संदर्भों में वह चाहे जितना लोकतंत्र और मानवस्वांतत्रय का विरोधी हो, प्राचीन इतिहास, धर्म और संस्कृति का हिस्सा होने के कारण उसे धरोहर के रूप में सहेजा जाता है.

प्राचीनकाल में जब अदालतें नहीं थीं, तब न्याय करने की जिम्मेदारी बस्ती के मुखिया या समूह के वरिष्ठ सदस्य जिसकी निष्पक्षता असंद्धिग्ध हो—की होती थी. इस्लामी शासन के दौरान यह जिम्मेदारी काजी के कंधों पर आ पड़ी. राजशाही में राजा को सर्वेसर्वा माना जाता था. दरबार में आए मामलों की सुनवाई के लिए न्यायाधिकारी और दंडाधिकारी दोनों की जिम्मेदारियां वही संभालता था. दंडविधान का आधार परंपरागत अथवा लिखितअलिखित विधिसंहिताओं को बनाया जाता था. किसी न किसी रूप में वे सभी धार्मिक उपादानों द्वारा शासितअनुशासित होती थीं. उसका लाभ धार्मिक कार्यकलापों में लिप्त ‘धंधेबाज’ उठाते थे. उदाहरण के लिए भारत में एक जैसे अपराध के लिए ब्राह्मणों तथा शूद्रों के लिए अलगअलग दंडविधान था. ब्राह्मणों को मृत्युदंड निषिद्ध था, जबकि ब्राह्मणेत्तर वर्गों के लिए इस तरह की कोई पाबंदी न थी. चूंकि दिए गए दंड के विरुद्ध अपील के बहुत कम अवसर थे, इसलिए जनसाधारण मजबूरी में दैवीय न्याय की उम्मीद करने लगता था. आज भी ऐसे लोग कम नहीं हैं. उनका मानना है कि एकमात्र ईश्वर सच्चा न्यायकर्ता है. जिन्हें अपराधी होने के बावजूद इस जन्म में दंड नहीं मिला, वे ईश्वर के दरबार में अवश्य ही दंडित किए जाएंगे—इस विश्वास के साथ साधारणजन बड़े से बड़े अनाचार को पचाते चले जाते थे. आधुनिक समाजों में न्याय की जिम्मेदारी अदालतों पर होती है. उनका आचरण संवैधानिक मर्यादाओं से आबद्ध रहता है. इसलिए यह व्यवस्था न्याय के अपेक्षाकृत अनुकूल है. इसके अनुसार राज्य अपने नागरिकों से अपेक्षा करता है कि वे कानून सम्मत व्यवहार करें, ताकि राज्य को उनके जीवन में हस्तक्षेप की आवश्यकता ही न पड़े. जो व्यक्ति अपने आचरण द्वारा दूसरे व्यक्ति के जीवन में अमर्यादित हस्तक्षेप करता है, वह राज्य को अपने जीवन में हस्तक्षेप करने का अधिकार दे देता है. दूसरों के जीवन में अवांछित और अमर्यादित हस्तक्षेप को राज्य अपराध मानता है. दूसरों के जीवन में अवांछित हस्तक्षेप करने वाला व्यक्ति अपनी निजता का अधिकार भी गंवा देता है. तदनुसार राज्य को समाज द्वारा प्राप्त शक्तियों के बल पर उस व्यक्ति के जीवन में हस्तक्षेप करने का अधिकार स्वतः हासिल हो जाता है. चूंकि राज्य पर समाज में शांति और अनुशासन बनाए रखने की जिम्मेदारी भी होती है, इसलिए वह अपराधी के विरुद्ध दंडनीति के तयशुदा प्रावधानों के अनुसार कार्रवाही करता है. न्याय का यह लोकप्रचलित रूप व्यक्ति के कर्तव्य पालन से जुड़ा है, जिसमें विचलन होते ही दंडनीति प्रभावी हो जाती है. प्रायः इसे सभ्यताकरण की अनिवार्यता के रूप में अपनाया जाता है. जनसाधारण न्याय के इसी रूप से सर्वाधिक प्रभावित होता है.

न्याय का दूसरा रूप कानून और अदालतों से प्राप्त होने वाले न्याय से अलग है. पहला जहां राज्य के अधिकारपक्ष के निकट है, दूसरा उसके कर्तव्य पक्ष की महत्ता एवं कार्यक्षेत्र को व्यापकता दर्शाता है. सिसरो के अनुसार राज्य जनता का सर्वाधिकार है. चूंकि राज्य का गठन लोगों द्वारा सामान्य हितों की पूर्ति हेतु किया जाता है, अतएव उसका वही कृत्य न्यायपूर्ण कहा जाएगा, जो उसके द्वारा संपूर्ण विवेक, निष्पक्षता, समानता और सर्वजन के विकास की चाहत के साथ उठाया जाता है. वह राज्य की नैतिकता तथा उसके गठन के औचित्य को दर्शाता है. अरस्तु इसे और भी स्पष्ट कर देता है. उसके अनुसार अन्याय केवल दूसरों के जीवन में अवांछित हस्तक्षेप, उसका प्रताड़न; अथवा मान्य कानूनों का उल्लंघन करने तक सीमित नहीं है. बल्कि दूसरों के अधिकारों का हनन करना, उन्हें उनके अधिकारों से वंचित कर देना, जो नागरिकों के प्रति राज्य का कर्तव्य भी हैं—अन्याय की सीमा में आता है. आखिर मनुष्य के अधिकारों की पहचान कैसे हो? इस बात में कैसे अंतर किया जाए कि जो अधिकार किसी एक व्यक्ति का है, वह दूसरे का भी है अथवा नहीं है? तथा उनके आकलन की कसौटी क्या है?

सवाल और भी हैं. जब हम कहते हैं कि भरपेट भोजन प्राप्त करना मनुष्य का अधिकार है? सभ्य समाज में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं प्रत्येक व्यक्ति को आसानी से प्राप्त होनी चाहिए, तो इस तर्क का आधार क्या होता है? क्यों न मान लिया जाए कि जो व्यक्ति जीवन में अतिरिक्त रूप से सफल होते हैं, उसके पीछे उनकी अपनी मेहनत और प्रतिभा का भी कमाल होता है. लोकहित में आवश्यक है कि समाज के सभी सदस्य एकदूसरे के हितों का ध्यान रखें. लेकिन यह भी जरूरी है कि योग्य व्यक्ति को उसकी योग्यता का लाभ खुद भी प्राप्त हो. परंतु इतनेभर से समस्या का समाधान नहीं हो जाता. मान लीजिए, दो मजूदर किसी कारखाने में काम करते हैं. उनमें एक की क्षमता दस नग प्रतिदिन तैयार करने की है. दूसरा उतने ही समय में बीस नग बना देता है. तो जो कारीगर बीस नग प्रतिदिन बनाता है, उसके उत्पादन क्षमता का लाभ दस नग प्रतिदिन बनाने वाले के साथ बांट देना क्या उसके प्रति अन्याय नहीं होगा? यदि किसी व्यक्ति को लगे कि उसके उत्पादन का लाभ उसे नहीं मिल रहा है, तो क्या वह अपनी पूर्ण क्षमता के साथ लगातार काम कर पाएगा? अपने लाभ को दूसरों में बंटते देख क्या वह हतोत्साहित नहीं होगा? चलताऊ ढंग से सोचें तो बात एकदम सच जान पड़ेगी. पूंजीवादी अर्थतंत्र कहता है, श्रमिक को उसके श्रम का पूरा लाभ मिले. दावा करता है कि केवल वही है जो श्रमिक को उसके श्रम का पूरा लाभ दिला सकता है. लाभ का आकलन केवल भौतिक मुद्रा के आधार पर करने वाले पूंजीवाद की निगाह में यही न्याय है. ऐसे ही तर्क देकर वह श्रमिकों को बांटे रखता है. वहां इसे स्पर्धा का नाम दिया जाता है. परिणाम यह होता है कि जो मजदूर बीस नग प्रतिदिन बनाता है, वह निरंतर आगे निकलता जाता है. जबकि दस नग बनाने वाला कारीगर स्पर्धा में पिछड़ता चला जाता है. वृहद संदर्भों में यह स्पर्धा दो कारखानों के बीच भी देखी जा सकती है. चूंकि समाज में विशिष्ट लोगों की संख्या बहुत कम होती है, अधिकांश दस नग प्रतिदिन बनाने वाले कामगार जितने ही कार्यक्षम होते हैं. इसलिए अपने उत्पाद का सारा लाभ खुद रखने वाला कामगार स्पर्धा में निरंतर आगे निकलता चला जाता है. इससे समाज में आर्थिक विभाजन बढ़ता चला जाता है. इसका समाधान क्या है? अरस्तु इतना उदार नहीं है कि वह बीस नग बनाने वाले के श्रमलाभों वाले कामगार के लाभ को दस नग प्रतिदिन बनाने वाले श्रमिकों के बीच बांटने पर सहमत हो जाए. इस असमानता को वह प्राकृतिक मानता है. अरस्तु के समय में मौद्रिक लाभ की अवधारणा इतनी पुष्ट नहीं थी, जैसी वह आज है. इसलिए उसका समाधान भी आज के संदर्भों में ही खोजना पड़ेगा.

ऊपर के उदाहरण में मान लिया गया है कि बीस नग प्रतिदिन बनाने वाले कारीगर की उत्पादन क्षमता केवल उसकी अपनी उपलब्धि है. यहां व्यक्ति के कौशलनिर्माण में उसके परिवेश के प्रभाव जो एक तरह से उसका योगदान ही है, बिसरा दिया गया है. मनुष्य और उसके समाज के बीच का संबंध आपसी लेनदेन का होता है. जो समाज को अधिक लौटाते हैं, या जिनसे समाज को अधिकाधिक लौटाने की अपेक्षा की जाती है, वे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में समाज से अधिक ग्रहण भी करते हैं. यदि किसी विद्वान की बात करें तो पहले वह पीढ़ियों से अर्जित ज्ञान का अध्ययनमनन करता है, तदनंतर अपने विचारों को सामने लाता है. इस तरह से वह अपने पूर्ववर्ती विद्वानों का कर्जदार होता है. अतएव जो व्यक्ति समाज से जितना अधिक ग्रहण करता है, समाज को उसी अनुपात में वापस लौटाना उसका कर्तव्य भी है. इसमें मौद्रिक लेनदेन आवश्यक नहीं है. इसलिए इसका समाधान भी अकेले मौद्रिक लेनदेन द्वारा संभव नहीं है. उचित यही है कि मौद्रिक लाभ के स्थान पर सामाजिक लाभ की अवधारणा को स्थापित किया जाए. शांति और खुशहाली के लिए आवश्यक है कि समाज में आर्थिक विभाजन न्यूनतम हो. कुशल कामगार को यह समझाया जाए कि उसकी उपलब्धियां केवल उस अकेले की नहीं हैं. उनमें उसके परिवेश जिसमें उसके मित्र, संबंधी, पड़ोसी यहां तक कि दुश्मन भी सम्मिलित हैं, सभी का साझा है. इसी तरह धनपति को मालूम होना चाहिए कि उसके लाभ पर सिर्फ उसका अधिकार नहीं है, उन श्रमिकों और कारीगरों का भी योगदान है, जो रातदिन मेहनत करने अपने मालिक की समृद्धि को संभव बनाते हैं. अरस्तु राज्य से अपेक्षा रखता है कि दस नग बनाने वाले को निरंतर प्रोत्साहित करता रहे. और बीस नग प्रतिदिन बनाने वाले कामगार को इस बात के लिए राजी करे कि वह मौद्रिक लाभों के बजाए सामाजिक लाभों पर भी ध्यान दे, ताकि दो भिन्न उत्पादनक्षमता वाले कामगारों के बीच अधिकतम समानता संभव हो सके.

समाजीकरण मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है. यदि केवल किसी एक व्यक्ति के सुखदुख, गुणदोष का मामला हो तो समाजीकरण की आवश्यकता ही न पड़े. समाज न तो विशिष्ट व्यक्ति की चयन है, न ही व्यक्तियों की विशिष्ट पसंद. मनुष्यों की सामूहिक सृष्टि है. उसका सृजन सामूहिक रूप से सर्वकल्याण के उद्देश्य से किया जाता है. समाज की जरूरत उस व्यक्ति को भी पड़ती है, जिसकी आवश्यकता व्यक्ति के अस्तित्व से जुड़ी है. इसकी इच्छा वह व्यक्ति भी करता है, जो अतिरिक्त रूप से गुणी और संपन्न है. इसके कारणों में मामूली अंतर हो सकते हैं. जो व्यक्ति जीवन में अतिरिक्त रूप से कामयाब होते हैं, वे अपनी सफलता से दूसरों को प्रभावित करना चाहते हैं. प्रजा न हो तो राजा का होना अर्थहीन हो जाए. इसी तरह अमीर को अपनी अमीरी का प्रदर्शन करने के लिए गरीब की जरूरत पड़ती है. कह सकते हैं कि मनुष्य की किसी भी उपलब्धि का महत्त्व दूसरों के साथ, उन सबके सापेक्ष है. असफलता सफलता की पहली और निर्णायक कसौटी है. असफल व्यक्ति जितने अधिक संख्या में होंगे, सफलता का मूल्य उतना ही अधिक आंका जाएगा. यही प्रवृत्ति न्याय की जरूरत पर बल देती है.

ऊपर संकेत किया गया है कि किसी व्यक्ति की सफलता केवल उसके गुणों पर निर्भर नहीं करती. इस बात पर भी निर्भर करती है कि उस व्यक्ति को जीवन में कामयाबी दर्ज कराने के लिए कितने अवसर और संसाधन प्राप्त थे. तुलना यदि प्राकृतिक स्तर पर हो तो सफल और असफल व्यक्तियों में बहुत अंतर नहीं होता. युद्ध में किसी राजा की जीत केवल इसपर निर्भर नहीं करती कि वह स्वयं कितना बहादुर है, बल्कि उसकी ओर से लड़ रहे सैनिकों की संख्या तथा राजा के प्रति उनकी निष्ठा पर भी निर्भर करती है. इसलिए अपनी सत्ता की सुरक्षा और स्थायित्व के लिए शासक वर्ग स्वामीभक्ति को महिमामंडित करता रहता है. युद्ध में सैनिक और उनके अस्त्रशस्त्र राजा के लिए संसाधन होते हैं. वे राजा को केवल उसकी निजी योग्यता के आधार पर प्राप्त नहीं होते. उनमें से अधिकांश उत्तराधिकार में प्राप्त होते हैं. यदि राजा केवल अपने दम पर, आमनेसामने की लड़ाई करे तो उसकी सफलता की संभावना बहुत सीमित स्तर की होगी. कारखानेदार के मामले में सैनिकों का स्थान पूंजी ले लेती है. संभव है उसमें से पूंजी का बड़ा हिस्सा उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त हुआ हो. यदि यह न भी हो और किसी उद्यमी ने अपने जीवन में ही बेशुमार प्रगति की है तो इसका कारण केवल यह है कि व्यवस्था के चलते उसके कारखानों में कार्यरत श्रमिकों ने अपना श्रमोत्पाद, मामूली वृत्तिका के बदले कारखानेदार को समर्पित किया है. जैसे सैनिकों द्वारा जान की बाजी लगा देना किसी राजा के साम्राज्यवादी मनसूबों को साकार बनाता है. वैसे ही न्यूनतम मजदूरी के बदले अधिकतम श्रमोत्पाद पर कारखानेदार का अधिकार मान लेना और स्वयं मामूली वृत्तिका से संतुष्ट होकर रातदिन काम में जुटे रहना, पूंजीपति को कामयाबी दिलाता है. उद्यमी की सफलता का स्तर बताता है कि श्रमिकों ने उसके उत्पादनस्तर को शिखर तक पहुंचाने के लिए जीजान से काम किया है. यहां त्याग का अर्थ न्यूनतम वृत्तिका के बदले मालिक को अधिकतम मुनाफा कमाकर संतुष्टि प्राप्त कर लेना है. जाहिर है सफलता चाहे राजा की हो या व्यापारी की, उसमें क्रमशः प्रजा अथवा श्रमिकों का योगदान होता है. यहां पूंजी और राष्ट्रवाद दोनों ही वर्चस्वकारी शक्तियों के स्वार्थ से जुड़े होते हैं. दोनों की प्रवृत्ति मानवविवेक पर कब्जा कर लेने की होती है. अंतर केवल इतना है कि पूंजीवाद अपनी चमकदमक और भौतिक सुखों का प्रलोभन देकर लोगों को आकर्षित करता है. राष्ट्रवाद के पास उग्र राष्ट्रप्रेम के सिवाय नागरिकों को देने के लिए कुछ नहीं होता. इसलिए वह भावुक प्रतीकों के माध्यम से लोगों को लुभाने का प्रयास करता है.

अमीरगरीब, राजाप्रजा के इस कृत्रिम विभाजन से बाहर निकलकर देखें तो प्राकृतिक स्तर पर उनके बीच कोई मौलिक अंतर नजर नहीं आता. राजाप्रजा, अमीरगरीब सभी को एकसमान जीवनचक्र से गुजरना पड़ता है. धूपवर्षाशीत सभी को लुभाते हैं.सभी को भूखप्यास लगती है. यह ठीक है कि मनुष्य में प्राकृतिक स्तर पर अंतर होता है. एक मनुष्य शक्तिशाली हो सकता है और दूसरा शक्तिविपन्न. परंतु प्राकृतिक स्तर पर शक्तिशाली और शक्तिविपन्न व्यक्ति में अंतर का अनुपात उतना नहीं होता, जितना सामाजिक स्तर पर अमीरगरीब, शक्तिशाली एवं शक्तिविपन्न के बीच होता है. न प्रकृति अपने स्तर पर किसी प्रकार का भेदभाव करती है. चूंकि समाजीकरण की मूलभूत अवधारणा समानता के सिद्धांत पर गढ़ी होती है, राज्य भी इसी दावेदारी के साथ जनसमर्थन प्राप्त करता है कि वह धनीनिर्धन, शक्तिसंपन्न एवं शक्तिविपन्न के बीच बहुत अंधिक अंतर नहीं करेगा—इसलिए यदि किसी राज्य में ऐसा है तो समझ लेना चाहिए कि वह अपने गठन के मूलभूत उद्देश्यों से भटका हुआ है. दूसरे शब्दों मे समानता का आशय किसी व्यक्ति से राजा या पूंजीपति बनने के अवसर छीन लेना नहीं है. बल्कि जनसाधारण को इस आधार पर होने वाले भेदभाव से मुक्ति दिलाना है. सफलता सदैव सापेक्षिक होती है, परंतु न्याय निरपेक्ष. इस आधार पर अरस्तु न्याय पर विमर्श के आरंभ में ही उसकी दो कसौटियां बना लेता है. पहली के अनुसार तयशुदा कानून की मर्यादा में रहना न्याय है. जिन कार्यों को राज्य की विधिसंहिता स्वीकारे उनका अनुपालन न्याय है. जिनसे राज्यसमाज में शांतिसुव्यवस्था स्थापित होती हो, वह न्याय है. न्याय का दूसरा रूप अपने साथ बाकी लोगों की स्वतंत्रता और समानता का सम्मान करना है. जबकि अन्याय वह है जो कानून के विरुद्ध है. जिससे दूसरों के अधिकारों का हनन होता है. जिससे किसी व्यक्ति को उसके विधिसम्मत देय से वंचित कर दिया जाता है.

समानता का आशय यह नहीं है कि व्यक्ति की पसंदों का ध्यान न रखा जाए. न्याय इसमें है कि प्रत्येक नागरिक को विकास के समान अवसर प्राप्त हों. इसके लिए अवसरों की समानता तथा किसी कारणवश विकास में पिछड़ चुके हैं नागरिकों को विशेष प्रोत्साहन देकर मुख्यधारा में लाने की कोशिश करते रहना—न्याय और समाजीकरण दोनों की प्रथम कसौटी है. अरस्तु ने न्याय को सर्वसाधारण के सामान्य हित की संज्ञा दी है. उसके अनुसार न्याय के दो पक्ष होते हैं. पहला व्यक्ति पक्ष और दूसरा वस्तु पक्ष. व्यक्ति का संबंध भी प्रकारांतर में वस्तुओं से होता है. उसके अनुसार न्याय का तकादा है कि सभी मनुष्यों को समान वस्तुएं निर्दिष्ट की जानी चाहिए. पर कैसे? यहां एक पेंच है जिससे समानता की हमारी सार्वत्रिक अवधारणा संकट में पड़ जाती है. समानता का विचार न तो रूढ़ है न ही व्यक्तिनिरपेक्ष. सभी व्यक्तियों को सभी अवसर दिए जाने का अभिप्राय यह नहीं है कि कोई व्यक्ति अपनी रुचि या अन्यान्य कारण से किसी पद के अयोग्य है तो समानता के सिद्धांत के अनुसार उसे उस पद की जिम्मेदारी सौंप देनी चाहिए. समानता की सीधीसी अवधारणा है कि सभी व्यक्तियों को सभी अवसर प्राप्त हों. तदनुसार प्रत्येक नागरिक को यह अवसर मिलना चाहिए कि यदि वह स्वयं को राजपद के योग्य बना सके, तो वह पद उसकी पहुंच से दूर नहीं है. राज्य का हित भी इसमें है कि नागरिकों को यथायोग्य पद प्राप्त हों. राजा उसी को चुना जाए जो राजा बनने के योग्य है. अरस्तु के अनुसार व्यक्ति के अधिकार उसकी योग्यता पर निर्भर करते हैं. तदनुसार राजा बनने का अधिकार उसी को मिलना चाहिए जो राजपद के योग्य है. श्रेष्ठ राज्य अपने लिए कसौटियां स्वयं तय करता है, जिनके माध्यम से वह स्वयं को नियंत्रित एवं विकासरत रख सकता है. वीरता, व्यक्तित्व, व्यवहार कुशलता, दूरदर्शिता, बुद्धिमानी जैसे उदात्त चारित्रिक गुण यदि राजा बनने के लिए अपरिहार्य हैं—तो समानता के सिद्धांत के अनुसार जिस व्यक्ति में ये सभी गुण पर्याप्त मात्रा में मौजूद हों, उसे राजा बनने का अधिकार मिलना चाहिए. इसपर उसके परिवार अथवा उन गुणों को जिनका राजा के लिए अपेक्षित गुणों से कोई संबंध नहीं है, कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए. ‘पाॅलिटिक्स’ के तीसरे खंड के 12वें अध्याय में अरस्तु बासुंरीवादक का उदाहरण देता है—

‘यदि बहुत से व्यक्ति बासुंरी वादन की कला में निपुण हों तो उनमें से किसी व्यक्ति को सिर्फ इस कारण अच्छी या अधिक बांसुरियां नहीं दी जानी चाहिए, कि उसका संबंध किसी उच्च कुल से है.’

आगे वह स्पष्ट करता है—

‘बासुंरी-वादन एक कला है, जिसका व्यक्ति के कुल से कोई संबंध नहीं है. इसी तरह यदि कोई व्यक्ति बासुंरी वादन की कला में पीछे है, मगर कुल और सुंदरता के मामले में बाकी प्रतिस्पर्धियों से आगे तो भी अच्छी अथवा सर्वाधिक बासुंरिया किसी वाद्य-कला में निपुण व्यक्तियों को ही दी जानी चाहिए….कुल-परिवार की सदस्यता के आधार पर भी व्यक्ति अच्छी बांसुरियों की दावेदारी कर सकता है, परंतु उसमें उन गुणों की प्रधानता अपरिहार्य है, जो बांसुरी वादन की कला के लिए अत्यावश्यक हैं.’

आशय है कि श्रेष्ठ वस्तुएं यथायोग्य व्यक्तियों को प्राप्त हों. उन्हें प्राप्त हों, जिन्हें उनकी आवश्यकता है और जो उनका श्रेष्ठतम उपयोग करने में सक्षम हैं. परंतु योग्यता का मापदंड क्या हो? प्रत्येक व्यक्ति अपनी दृष्टि में योग्यतम होता है. फिर जो अधिकतम की दृष्टि में श्रेष्ठतम है, उसके भी आलोचक हो सकते हैं. इसे ‘एथिक्स’ में समझाया गया है. अरस्तु की यह पुस्तक नीतिशास्त्र की श्रेष्ठतम कृतियों में से है. सर्वथा मौलिक. इसके माध्यम से अरस्तु ने नैतिकता को उस दौर में परिभाषित किया, जब राज्य पर धर्म का नियंत्रण था. उत्तराधिकार में जो भी प्राप्त हो, उसे बचाए रखने और उसके माध्यम से अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को शिखर तक ले जाने के लिए सारे उद्यम किए जाते थे; फिर उन्हें धर्म का नाम दे दिया जाता था. अरस्तु के अनुसार न्याय ज्ञानविज्ञान की विभिन्न शाखाओं का अंतिम और वास्तविक लक्ष्य है. मनुष्य जो ज्ञानार्जन करता है, वह तब तक अनुयोगी या अल्पउपयोगी माना जाएगा, जब तक उससे किसी न किसी रूप में न्याय की पुष्टि न होती है. ताकि प्रत्येक नागरिक को यह विश्वास हो जाए कि जो उसका प्राप्य है, वह उसको यथासमय प्राप्त होता रहेगा. आखिर यह कैसे सुनिश्चित हो कि व्यक्ति को जो अधिकार है, वह उसे प्राप्त हैं. यहां राज्य की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है. राज्य का कर्तव्य है कि वह यह सुनिश्चित करे कि उसके राज्य में किसी भी नागरिक के अधिकार बाधित न हों. न ही किसी के साथ कोई पक्षपात हो. यह ध्यान रखते हुए कि समानता न्याय का उद्देश्य है, लेकिन एकमात्र समानता को भी न्याय का पर्याय मान लेना अनुचित होगा. उदाहरण के लिए दो भिन्न व्यक्तियों की कल्पना कीजिए, जिन्हें खराद मशीन पर कोई पुर्जा बनाने को दिया जाता है. मान लीजिए उनमें से पहला दस नगों का उत्पादन करता है और दूसरा उतनी ही अवधि में बीस नगों का. चूंकि व्यक्ति का अपने श्रम पर अधिकार होता है, इसलिए कानून और नैतिकता दोनों दृष्टि में यह उचित माना जाएगा कि जिस व्यक्ति ने अधिक उत्पादन किया है, उसकी अतिरिक्त लाभ में आनुपातिक साझेदारी हो. पूंजीवादी व्यवस्था इसी को न्याय मानती है. उसके अनुसार इससे समाज में स्पर्धा बढ़ती है. चीजें सस्ती होती जाती हैं. उसकी भरपाई के लिए उत्पादक उत्पादनवृद्धि का सहारा लेता है. उससे रोजाकर के अवसर बढ़ते हैं. उसके फलस्वरूप हुई उत्पादन वृद्धि का लाभ पूरे समाज को पहुंचता है. पूंजीवादी राज्यों की सरकारें भी कमोबेश वही सोचती हैं. परंतु राज्य की मजबूरी है कि उसे समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संतुलन बनाकर रखना पड़ता है. उसके लिए वे अधिक आय वाले व्यक्तियों पर कराधान की सीमा बढ़ाकर बाकी लोगों को संतुष्ट करने का प्रयास करती हैं. यह केवल दिखावा ही होता है, क्योंकि एक ओर जहां अधिक करउगाही का का नाटक किया जाता है, वहीं दूसरी ओर पूंजीपतियों को विभिन्न प्रकार की छूट देकर, ओनेपौने दाम में राज्य के संसाधन लुटाकर प्रसन्न रखा जाता है.

यदि शतप्रतिशत ऐसा हो जाए कि व्यक्ति को ठीक उतना ही प्राप्त हो, जितनी उसकी क्षमता है, तो सोचिए क्या यह जंगल के न्याय जैसी व्यवस्था न होगी? जंगल में भी प्राणी अपने सामर्थ्य के अनुसार शिकार करते हैं. चिड़िया मामूली कीड़ेमकोड़ों का शिकार करके पेट भरती है. शेर और चीता भारीभरकम सांड को भी अपना शिकार बन सकते हैं. जानवर के लिए उसका शिकार एक तरह से उसका उत्पाद ही है. अतः न्याय दृष्टि से समानता व्यक्ति और समाजनिरपेक्ष नहीं होती. उसमें परिस्थिति अनुसार बदलाव होते रहते हैं. लेकिन समानता ऐसी पहेली भी नहीं है, जिसे समझा न जा सके. आखिर समानता किसकी और कैसे? सामान्य सिद्धांत के अनुसार असमान व्यक्तियों का हिस्सा समान नहीं हो सकता. समानता की न्यूनतम शर्त नागरिकों को न्याय की अबाध प्रतीति है. यह ठीक है जन्म के आधार पर, स्थितियों के आधार पर लोगों की कार्यक्षमता में अंतर होता है. राज्य और समाज का गठन का उद्देश्य भी यही है कि व्यक्तिमात्र की इन दुर्बलताओं का असर उसकी खुशियों पर न पड़े. जहां कोई नियम या व्यवस्था न हो. दूसरों के सुखदुख की परवाह किए बिना सभी मनमानी पर उतारू रहते हों. वहां राज्य की भूमिका नगण्य मानी जाएगी. यह नियम कि व्यक्ति को ठीक उतना ही प्राप्त हो, जितना उसका सामर्थ्य है—प्रकारांतर में समाज को इस स्वार्थी सोच की प्रेरणा बन सकता है. इससे समाजीकरण का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा. अतः राज्य का कर्तव्य है कि वह उस नागरिकों को जो किसी कारण पिछड़े हुए हैं, विशेष प्रोत्साहन देकर दूसरों के बराबर लाने का प्रयास करे. साथ में यह विश्वास भी बनाए रखे की समाज की एकता, किसी भी व्यक्तिगत उपलब्धि से बड़ी है.

अरस्तु न्याय के पर्याय के रूप में सद्गुण को स्थापित करता है. राज्य के संदर्भ में ‘न्याय राज्य का सद्गुण’ है. उसकी व्याप्ति राज्य और उसके नागरिकों के आचरण से आंकी जानी चाहिए. न्याय वह है जिसे सभी नागरिक सही मानें. जिसकी श्रेष्ठतम के रूप में प्रत्येक नागरिक अपने जीवन में कामना करे. ठीक इसी तरह अन्याय वह है जो अधिकतम नागरिकों को नियमविरुद्ध और अनुचित प्रतीत होता हो. किंतु न्याय और अन्याय, उचित और अनुचित की यह बहुत सरलीकृत व्याख्या है. यह दोनों को एक दूसरे का विरोधी दर्शाती है. सामान्यतः यह सही भी दिखता है. न्यायालय का कोई फैसला यदि बहुसंख्यक वर्ग को अनुचित और अन्यायपूर्ण लगता है तो वह उचित और न्यायपूर्ण हो ही नहीं सकता. लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि न्याय और अन्याय, उचित और अनुचित को लेकर सभी नागरिकों की एकसमान राय हो. लोगों का न्यायबोध उनकी संस्कृति और मानसिक प्रशिक्षण पर भी निर्भर करता है. राजशाही में राजा और उसके परिवार की सुरक्षा शेष जनसमाज की सुरक्षा से महत्त्वपूर्ण मानी जाती थी. उसके लिए अनेकानेक सैनिक की बलि दे देना राजधर्म माना जाता था. अधिकांश युद्ध राजाओं के व्यक्तिगत अहं और राजलिप्सा का परिणाम होते थे. अपने समग्र परिणाम में वे प्रजा के लिए अहितकारी होते थे. बावजूद इसके प्रजा अपने राजा और उसकी व्यवस्था को सराहती थी. क्योंकि उसका मानसिक प्रशिक्षण इसी तरह का होता था. जनतांत्रिक समाजों में नागरिकों का सोच स्वतंत्र होता है. निर्णयविशेष को कुछ लोग उचित मान सकते हैं और कुछ अनुचित. कुछ ऐसे नागरिक भी हो सकते हैं जिन्हें वह निर्णय आंशिक अनुचित और अन्यायपूर्ण अथवा आंशिक उचित और न्यायपूर्ण लगता हो. इस तरह लोगों की दृष्टि के अनुसार न्याय और अन्याय के अनेक रूप संभव हैं. लेकिन राज्य की दृष्टि में न्याय का केवल एक रूप होता है. सभी नागरिकों के साथ समान वर्ताब और समाज में कल्याण विस्तार. ऐसे समाजों में कर्तव्यपरायण मनुष्य, न्यायसंगत बने रहने के लिए वही करता है जो समाज की निगाह में उचित है. वैसा ही सोचता है, जिसे न्यायसंगत माना जा सके.

वे कौनसी स्थितियां हैं, जब मनुष्य के कर्म को न्यायपूर्ण नहीं माना जा सकता? इसे समझना मुश्किल नहीं हैं. उपर्युक्त विवरण के आधार पर देखें तो दो मुख्य स्थितियां हैं जिनके आधार पर मनुष्य के कृत्य को अनुचित या अन्यायपूर्ण कहा जा सकता है. पहला जब वह कानून तोड़ता है. ऐसे काम करता है जो राज्य तथा समाज की निगाह में अनुचित हैं. दूसरी स्वार्थपरता. समाज में रहते हुए उससे अधिक ग्रहण करना जितना अधिकार है. अपने अलावा दूसरों की आवश्यकता पर विचार ही न करना. बल्कि जिसपर दूसरों का अधिकार है, उसे भी हड़प कर जाना. अरस्तु के अनुसार उचित होने के लिए कानून सम्मत और निस्वार्थ होना आवश्यक है. जो कानूनसम्मत नहीं है. जो अपने आचरण में निष्ठावान तथा दूसरों के प्रति ईमानदार नहीं है, इसलिए वह उचित भी नहीं है. उचित की बहुमान्य परिभाषा उपलब्ध संसाधनों, अवसरों और कर्तव्यों में न्यायपूर्ण हिस्सेदारी है. ऐसी सहभागिता जिससे दूसरों के अधिकार निर्बंध रहें. सच यह भी है कि समाज में रहते हुए अपने हिस्से से अधिक लेना हमेशा अन्यायपूर्ण नहीं होता. कई बार अपने हिस्से को छोड़ देना या दूसरों का हिस्सा भी हड़प जाना प्रशंसा का पात्र बना देता है. जब कोई भूखा व्यक्ति अपने आगे रखी थाली, ज्यों की त्यों दूसरे भूखे प्राणी को सौंप देता है तो उसकी नैतिकता हमें भावाकुल कर देती है. ठंड से ठिठुरते किसी व्यक्ति को अपने वस्त्र उतारकर दे देना मानवचरित्र की उदात्तता से परचाता है. इसी प्रकार सारे के सारे दुर्योग को, जिससे बहुतसे लोगों के अनिष्ट की संभावना हो, अपने हिस्से समेट लेना भी उचित और सराहनीय माना जाएगा. ऐसी कई कहानियां हैं, जिनमें अपनी दोषी संतान को बचाने के लिए पिता उनके सारे अपराध अपने सिर ले लेते हैं. समुद्रमंथन की मिथकथा के अनुसार शिव सबके हिस्से का विषपान करके ही नीलकंठ कहलाए थे. किसी व्यक्ति में कम बुराइयां हों, यह भी अच्छी बात है. अब सवाल है कि कानून क्या है? उससे व्यक्ति का हित सधता है या राज्य का. अथवा व्यक्ति और राज्य दोनों का?कुछ विद्वानों का मानना है कि श्रेष्ठ नागरिक आत्मानुशासित होता है. उसे अपने और दूसरों के सुखदुख की चिंता होती है. इसलिए वह किसी के जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करता. ऐसे व्यक्ति को कानून की आवश्यकता नहीं पड़ती. यह बात सही हो सकती है. परंतु हमेशा सही हो आवश्यक नहीं है. कानून अदालती प्रक्रिया मात्र नहीं है. कानून का पलड़ा हालांकि समाज के शीर्षस्थ वर्गों की ओर झुका होता है. फिर भी उसमें कई ऐसी खूबियां होती हैं, जिनकी अनुपस्थिति समाज की एकता और अखंडता के लिए खतरा बन सकती है. उनके अभाव में प्रत्येक नागरिक ‘श्रेष्ठ आचरण’ की परिभाषा अपने हिसाब से करेगा. प्रकारांतर में सब मनमानी उतर आएंगे. परिणामस्वरूप समाज के गठन का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाएगा. इसलिए कानून के रूप में सुनिश्चित आचारसंहिता का होना आवश्यक है.

अरस्तु के अनुसार कानून विधायी व्यवस्था है. राज्य यदि नागरिकों के प्रति उदार है तो कानून नागरिकअधिकारों के पक्ष में झुका पाएगा और मानवमात्र के अधिकारों का ध्यान रखेगा. यदि कानून का गठन कुछ लोगों की मर्जी से, स्वार्थभावना के साथ हुआ है तो उसका झुकाव शिखर पर मौजूद अल्पतंत्र अथवा कुलीनतंत्र के पक्ष में नजर आएगा. केवल उन्हीं लोगों के भले की सोचेगा है जो किसी न किसी रूप से सत्ता से जुड़े हों. निरंकुशता की भावना से गठित कानून केवल तानाशाह की मर्जी से संचालित होंगे. सही मायने में तो वे तानाशाह के स्वार्थ से इतर कुछ हो ही नहीं सकते. इससे हम राज्य में न्याय की मौजूदगी को परखने के लिए कुछ मापदंड बना सकते हैं. ऐसे कानून जिनसे राज्य की उदारता झलकती हो, जो समाज के अधिक से अधिक लोगों के कल्याण की भावना से बनाए गए हों, वे कानून न्यायसंगत माने जाएंगे. जबकि ऐसे कानून जिनसे अल्पसंख्यक वर्गों की स्वार्थसिद्धि होती हो, अथवा जिनका गठन तानाशाह की इच्छाओं को दूसरों पर लादने के लिए हुआ हो, उन्हें न्यायसंगत मानने में हमें संकोच होगा. जिस राज्य में पहली कसौटी का पालन होगा, वह कल्याणराज्य के मापदंडों के अनुरूप होगा. उसमें शुभ की व्याप्ति होगी. तदनुसार न्यायकारी शक्तियों का सत्ताप्रेम अथवा उनपर शासक वर्गों का नियंत्रण शासन की निरंकुशता का परिचायक होता है.

इस विवेचन से न्याय को समझा जा सकता है. न्याय हमेशा दूसरों के प्रति होता है. लेकिन मनुष्य दूसरों के प्रति तभी न्याय कर सकता है, जब उसे अपने प्रति न्याय की उम्मीद हो. इस तरह न्याय सद्गुण है. व्यक्ति का समाज और समाज का अपने नागरिकों के प्रति कल्याणभाव जिससे झलकता हो, वह सद्गुण है. समाज में सद्गुण से श्रेष्ठ कुछ नहीं होता. वह निर्मेल्य होता है. अरस्तु के अनुसार ‘न्याय कुल मिलाकर संपूर्ण सद्गुण या सद्गुणों का समुच्चय है. वह इसलिए सद्गुण है, क्योंकि वह व्यक्ति का अपने पड़ोसियों, अपने मित्र, हितैषी यहां तक कि आलोचकों के प्रति न्यायभाव को दर्शाता है. कुल मिलाकर सद्गुण किसी भी समाज की श्रेष्ठतम उपलब्धि हैं. यदि कोई व्यक्ति केवल अपने मित्रों और सगेसंबंधियों के प्रति न्यायपूर्ण आचरण करता है और बाकी समाज के प्रति वैसा करने से बचता है, तो उसका आचरण न्याय की कसौटी पर स्वार्थपूर्ण माना जाएगा. दूसरे शब्दों में न्याय सद्गुण है और सद्गुण वह है, जिसे कोई व्यक्ति दूसरों के प्रति कल्याणभाव के साथ करता है. न्यायपूर्ण व्यक्ति वह है जो दूसरों की हितसिद्धि के लिए बिना किसी स्वार्थभाव से प्रयासरत रहता है. और ऐसा व्यक्ति जो केवल स्वार्थसिद्धि में लीन रहता है, दूसरों को किसी प्रकार का कष्ट पहुंचाता है अथवा उन वस्तुओं पर कब्जा करता है, जो किसी दूसरे का अधिकार हैं, अन्यायी की श्रेणी में आएगा.

©ओमप्रकाश कश्यप

अरस्तु : विद्वानों का विद्वान

 

ज्ञान और अध्यात्म के क्षेत्र में गुरुशिष्य परंपरा का महत्त्व बताया गया है. आज भी है. भारत में सैकड़ों आश्रम और धर्मगुरु हैं. उनके लाखोंकरोड़ों भक्त हैं. प्रत्येक गुरु अपने शिष्यों के भौतिकअधिभौतिक उत्थान का दावा करता है. शिष्य भी मानते हैं कि उनके गुरु अनन्य हैं. वे अपने और गुरु के बीच मर्यादा की लकीर खींचे रहते हैं. जिसके अनुसार गुरु की आलोचना करना, सुनना यहां तक कि मन में गुरु के प्रति भूल से भी अविश्वास लाना पाप माना जाता है. इसी जड़श्रद्धा के भरोसे गुरुओं का कारोबार चलता है. उस कारोबार में कभी घाटा नहीं आता. जड़श्रद्धा के बल पर ही गुरु कमाते, भक्त गंवाते हैं. बुद्ध ने जड़श्रद्धा का निषेध किया था. दूसरी ओर मीमांसक कुमारिल भट्ट को मात्र इस कारण खुद को प्रायश्चिताग्नि के सुपुर्द करना पड़ा था, क्योंकि उन्होंने गुरु की पूर्वानुमति के बिना बौद्ध दर्शन का अध्ययन इसलिए किया था, ताकि शास्त्रार्थ में बौद्ध आचार्यों को पराजित कर वैदिक दर्शनों की श्रेष्ठता सिद्ध कर सकें. उद्देश्य सही था. ज्ञान का भी यही तकाजा था. परंतु तत्कालीन परंपरा को स्वीकार्य न था. कुमारिल अपने उद्देश्य में सफल हुए थे, किंतु गुरुद्रोह के अपराध के प्रायश्चितस्वरूप खुद को अग्निसमर्पित करना पड़ा था. सुकरात, प्लेटो और अरस्तु की गुरुशिष्य परंपरा में अंधश्रद्धा के लिए कोई स्थान न था. तीनों परंपरापोषण के बजाय उसके परिमार्जन पर जोर देते हैं. उसका आदिप्रस्तावक सुकरात खुले संवाद में विश्वास रखता था. यह सुनकर कि लोग उसे यूनान का सर्वाधिक बुद्धिमान प्राणी मानते हैं, सुकरात को अपने ही ऊपर संदेह होने लगा था. संदेह दूर करने के लिए वह एथेंस के वुद्धिमान कहे जाने वाले राजनयिकों, दार्शनिकों और तत्ववेत्ताओं से मिला. अंततः इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि वह सचमुच सबसे बुद्धिमान है. इसलिए नहीं कि उसे सर्वाधिक ज्ञान है. सुकरात ने माना कि वह केवल एक चीज दूसरों से अधिक जानता है, वह है—अपने ही अज्ञान का ज्ञान. ‘मुझे अपने अज्ञान का ज्ञान है’ कहकर उसने खुद को उन दार्शनिकों, विचारकों और तत्ववेत्ताआ से अलग कर लिया था, जिन्हें अपने ज्ञान का गुमान था. उसके लिए ज्ञान से ज्यादा ज्ञानार्जन की चाहत और उसकी कोशिश का महत्त्व था. ज्ञान की मौलिकता के लिए वह संदेह को आवश्यक मानता था. सुकरात की इसी प्रेरणा पर अरस्तु ने मनुष्य को विवेकशील प्राणी माना है. विवेकशीलता में स्वयं अपने ज्ञानानुभवों के पुनरावलोकन की, संदेह की भावना अंतर्निहित है. ज्ञानार्जन के लिए संदेह की अनिवार्यता को रेखांकित करते हुए ग्यारहवीं शताब्दी के फ्रांसिसी विचारक पीटर अबलार्ड ने लिखा था—‘संदेह हमें जांचपड़ताल के लिए प्रेरित करता है. जांचपड़ताल हमें सत्य का दर्शन कराती है.’ ‘सुकरातप्लेटो और अरस्तु’ की त्रयी के विचारों में अंधश्रद्धा के लिए कोई जगह न थी. हालांकि इस विद्वानत्रयी को अनुपम और अद्वितीय मानने पर कुछ लेखकों को ऐतराज है.

पॉलिटिक्स’ का अनुवाद करते समय भोलानाथ शर्मा ने ‘सुकरातप्लेटोअरस्तु’ की त्रयी के समकक्ष ‘पराशरव्यास और शुकदेव’ त्रयी का उदाहरण दिया है. इस निष्कर्ष के पीछे उनके पूर्वाग्रह साफ नजर आते हैं. यह ठीक है कि ‘पराशरव्यास और शुकदेव’ की पितापुत्रपौत्र त्रयी में भी तीनों लेखक थे. पराशर को भारतीय परंपरा में पुराणों के आदिरचियता होने का श्रेय दिया जाता है. बताया जाता है कि व्यास ने महाभारत के अलावा पिता के लिखे पुराणों का पुनर्लेखन कर, उन्हें वह कलेवर प्रदान किया जिसमें वे आज प्राप्त होते हैं. तीसरे शुकदेव ने ‘भागवत पुराण’ लिखकर पुराण साहित्य को समृद्धि प्रदान की थी. बावजूद इसके ये तीनों भारतीय लेखक उस कोटि के मौलिक लेखकविचारक नहीं हैं, जिस कोटि के ‘सुकरातप्लेटो और अरस्तु’ हैं. व्यास की कृति ‘महाभारत’ अवश्य अलग है. उसमें अपने समय का सामाजिकसांस्कृतिक एवं राजनीतिक विमर्श मौजूद है, परंतु जिस महाभारत से हम आज परिचित हैं, वह ईस्वी संवत्सर की शुरुआत के आसपास की कृति है, जब देश में एकराष्ट्र की भावना प्रबल थी. गणतांत्रिक पद्धति पर आधारित छोटेछोटे राज्यों को अनावश्यक मान लिया गया था. एकराष्ट्र अथवा साम्राज्यवादी सोच का उद्भव पूरी दुनिया में लगभग एक साथ हुआ था. भारत में इसका प्रवर्त्तक चाणक्य था, जबकि यूनान में अरस्तु ने सिकंदर की साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाओं का समर्थन करते हुए उसे एशिया पूर्व के छोटेछोटे देशों को अपने अधीन करने की सलाह दी थी. महाभारत मूलतः धार्मिक ग्रंथ है और उसकी रचना शताब्दियों के अंतराल में एकाधिक लेखकों द्वारा की गई है. दूसरे केवल लेखक होना ही शर्त होती तो एक ही धारा के तीन लेखकों के अनेक उदाहरण दुनियाभर में मिल जाएंगे. यहां कसौटी ज्ञान की विलक्षणता, मनुष्यता के प्रति अगाध निष्ठा तथा एकदूसरे से असहमति जताते हुए उसकी ज्ञानपरंपरा को विस्तृत तथा सतत परिमार्जित करने की है—जिसपर यह त्रयी विश्वपटल पर अनुपम है. प्लेटो के लेखन के हर हिस्से पर सुकरात की छाप है. इसी तरह अरस्तु के लेखन पर भी प्लेटो का प्रभाव छाया हुआ है. लेकिन प्लेटो सुकरात से तथा अरस्तु प्लेटो से कदमकदम पर असहमति दर्शाते हैं. प्लेटो से अरस्तु की असहमतियों का दायरा तो इतना बड़ा है कि उन्हें एक ही दर्शनपरंपरा से जोड़ना अनुचित जान पड़ता है. जैसे कि पारिवारिक जीवन का महत्त्व, सुखस्वास्थ्य प्राप्ति के संसाधन, लोकमत का सम्मान, जनसाधारण की रुचि एवं इच्छाओं का समादर जैसे विषयों पर अरस्तु पर्याप्त उदार था. जबकि प्लेटो ने अपने आदर्श राज्य में सामूहिक संस्कृति और सहजीवन पर जोर देते हुए परिवार संस्था को अनावश्यक मानते हुए कठोरअनुशासित जीवन जीने की अनुशंसा की है.

फिर प्रभाव किस बात का है? कौनसा सूत्र है जो इन तीनों को परस्पर जोड़ता है? इस तारतम्यता को इन्हें पढ़ते हुए आसानी से समझा जा सकता है. एकसूत्रात्मकता ‘पराशरव्यासशुकदेव’ की त्रयी के बीच भी है. अंतर केवल इतना है कि भारतीय परंपरा के लेखकों पर अध्यात्म प्रभावी रहा है, जो अतिरेकी आस्था और विश्वास के दबाव में अंधानुकरण में ढल जाता है. जबकि ‘सुकरातप्लेटोअरस्तु’ के बीच ज्ञान की लालसा तथा शुभत्व की खोज के लिए एकदूसरे पर संदेह का सिलसिला निरंतर बना रहता है. परंपरापोषी होने के कारण भारतीय लेखक एकदूसरे को दोहराते अथवा परंपरा का पिष्ठप्रेषण करते हुए नजर आते हैं. पश्चिम का लेखन विशेषकर वह लेखन जो सुकरात से आरंभ होकर अरस्तु और आगे थामस हॉब्स, जान लॉक, रूसो, वाल्तेयर, बैंथम आदि तक जाता है, उसमें संदेह का सिलसिला कभी टूटता नहीं है. वाल्तेयर और रूसो एकदूसरे के समकालीन लेखक थे. जीतेजी उनमें हमेशा विलगाव बना रहा. दोनों एकदूसरे के कट्टर आलोचक थे. परंतु वाल्तेयर और रूसो को पढ़ते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि उनमें से किसी एक के मन में ज्ञान की ललक, मनुष्यता को बेहतर बनाए जाने की उत्कंठा दूसरे से कम है. जिस तरह प्लेटो सुकरात के प्रति और अरस्तु प्लेटो के प्रति अगाध प्रेम और विश्वास रखते हुए, विनम्र असहमति क साथ विचारपरंपरा को आगे बढ़ाते हैं, वैसा भारतीय परंपरा में दुर्लभ है. प्लेटो के विपुल वाङ्मय में एक भी शब्द, एक भी पंक्ति ऐसी नहीं है, जिसपर सुकरात का असर न हो. बावजूद इसके जहां आवश्यक समझा उसने सुकरात की बात भी काटी है. अरस्तु तो प्लेटो से आगे निकल जाता है. उसके मन में गुरु प्लेटो के प्रति गहरा सम्मान था. बावजूद इसके उसके ग्रंथों में प्लेटो के विचारों के प्रति सहमति से अधिक असहमति नजर आती है. प्लेटो और अरस्तु अपनेअपने गुरु के ज्ञान को आत्मसात करते हैं, परंतु उनका विश्वास उस परंपरा को आगे बढ़ाने में है, न कि अनुसरण में. प्लेटो भावुक, कवि हृदय है, जबकि अरस्तु अपेक्षाकृत वैज्ञानिक प्रवृत्ति से युक्त. इसलिए अरस्तु के लेखन में असहमति अधिक मुखर है. इस कारण कुछ विद्वान तो अरस्तु को प्लेटो का शिष्य मानने को ही तैयार नहीं है. लेकिन अरस्तु के लेखन में प्लेटो के प्रति जैसा सम्मानभाव है उसे देखते हुए यह असंभव भी नहीं लगता. कथ्य के आधार पर उनमें अंतर न के बराबर मिलेगा. ऐसा महसूस होगा मानो सारे पुराण एक ही लेखक द्वारा रचित अलगअलग कालखंड की कृतियां हैं; अथवा उनके लेखक मंजे हुए किस्सागो थे. उन्होंने समाज में पहले से प्रचलित कहानियां को अतिरेकपूर्ण कल्पनाओं और रोचकता के साथ पौराणिक कलेवर प्रदान किया था.

अरस्तु(जन्म 384 ईस्वीपूर्व) और प्लेटो के जन्म के बीच लगभग चार दशक का अंतराल था. Aristole का अर्थ है—‘श्रेष्ठतम लक्ष्य’(The best purpose). कहने की आवश्यकता नहीं कि अपने नामानुरूप अरस्तु ने जीवन में महान उद्देश्य सिद्ध किए. अरस्तु का मुख्य कर्मक्षेत्र एथेंस रहा, परंतु सुकरात और प्लेटो की भांति वह मूल एथेंसवासी नहीं था. उसका जन्म एथेंस से लगभग 340 किलोमीटर दूर, थ्रेस नदी के किनारे स्थित स्तेगिरा नामक छोटे से शहर में हुआ था. उसके पिता का नाम निकोमाराक्स् था. उनके पूर्वज मैसेनिया से ईसापूर्व सातवींआठवीं शताब्दी में स्तेगिरा में आकर बसे थे. उसकी मां का नाम फैस्तिस था और उसके पूर्वज यूबोइया प्रदेश के खालिक्स नामक मामूली शहर के रहने वाले थे. मेसिडन के राजा एमींतस जिसकी प्रतिष्ठा सिंकदर का दादा होने के कारण भी है—का निजी चिकित्सक होने के कारण निकोमाराक्स् की समाज में प्रतिष्ठा थी. वे वैद्यों की पंचायत के सदस्य भी थे. उन दिनों यूनान के अनेक राज्यों में नगरराज्य की व्यवस्था थी, जहां शासन प्रक्रिया में अधिकांश नागरिकों की भागीदारी रहती थी. मेडिसन में राजतंत्र था. और जैसा कि इस प्रकार की राज्य प्रणालियों में होता है, मेडिसन में भी वंशानुक्रम के आधार पर राजा की घोषणा की जाती थी. अरस्तु के बचपन के बारे में अधिक जानकारी नहीं है. यत्रतत्र बिखरी सूचनाओं से पता चलता है कि उसकी प्राथमिक शिक्षा होमर की रचनाओं से आरंभ हुई था. उसपर अपने चिकित्सक पिता का विशेष प्रभाव पड़ा. उन दिनों चिकित्सक परिवार के बच्चों को बचपन से ही शल्यचिकित्सा का प्रशिक्षण दिया जाता था.सो अरस्तु को भी शरीर विज्ञान और वनस्पतियों की शिक्षा बचपन से ही मिलने लगी थी.शरीर विज्ञान और प्रकृतिविज्ञान के दूसरे क्षेत्रों में अरस्तु की रुचि को देखते हुए उस समय शायद ही कोई कल्पना कर सकता था कि आगे चलकर यूनानी दर्शन और तर्कशास्त्र का महापंडित कहलाएगा. बचपन के वही अनुभव कालांतर में विज्ञान, विशेषकर वनस्पति शास्त्र के क्षेत्र में उसकी रुचि का कारण बने. यह भी बताया जाता है कि बचपन के चिकित्सा क्षेत्र के अनुभवों के कारण ही अरस्तु को चिकित्सकों की स्थानीय संस्था का सदस्य बना लिया था.

अरस्तु का परिवार समृद्ध था. इसलिए बचपन में उसे सुखसुविधाओं की कमी न थी. उसका बचपन राजपरिवार के लोगों के सान्निध्य में, सुखपूर्वक बीता. संयोगवश अरस्तु के मातापिता की मृत्यु उसकी किशोरावस्था में ही हो चुकी थी. उसके बाद उसकी देखभाल का दायित्व उसके एक रिश्तेदार प्रॉक्सीनस ने संभाला. सुकरात की भांति अरस्तु की आरंभिक इच्छा भी विज्ञान के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने की थी. उसने अपने जीवन का लंबा समय वैज्ञानिक अनुभवों के लिए लगाया था. अनेक ग्रंथों की रचना की, बाद में वह प्रकृति विज्ञान से उकताने लगा. इसका कारण स्टेगिरा की राजनीति थी. सम्राट एमींतस महत्त्वाकांक्षी था. राज्य की सीमाओं के विस्तार के लिए उसने कई युद्ध लड़े थे. जिसमें उसे सफलता भी मिली थी. लेकिन राज्य की सीमाओं का विस्तार और प्रजा के सुखसंतोष में विस्तार के बीच कोई तालमेल न था. लगातार युद्ध के मैदान में रहने वाले राजा की प्रजा को जो कष्ट भोगने पड़ते हैं, वे कष्ट स्तेगिरा की प्रजा को भी भोगने पड़ते थे. इसी विसंगति से अरस्तु के मन में राजनीति को समझने की ललक पैदा हुई. उसने अनुभव किया था कि राज्य के उद्देश्यों तथा उसके कार्यों के बीच कोई तालमेल नहीं है. युवावस्था तक पहुंचतेपहुंचते वह ज्ञान के परंपरागत संसाधनों से उकताने लगा था. उसका झुकाव दर्शन और राजनीति की ओर गया. उस समय पूरे यूनान में प्लेटो द्वारा स्थापित ‘अकादेमी’ की प्रतिष्ठा थी. अरस्तु की प्रतिभा और उच्च शिक्षा के प्रति लगन को देखते हुए प्रॉक्सीनस ने उसका दाखिला प्लेटो की अकादेमी में करा दिया. ईस्वी पूर्व 367 में वह एथेंस पहुंचकर प्लेटो की अकादमी का सदस्य बन गया. उस समय उसकी वयस् मात्र 17 वर्ष थी. अकादमी में आने का उद्देश्य केवल राजनीति और दर्शन की शिक्षा के साथसाथ विश्व के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में रहकर अध्ययन करने की लालसा थी.

अरस्तु प्लेटो की अकादेमी में लगभग बीस वर्षों तक रहा. वहां रहते हुए उसने गणित, दर्शन, राजनीति आदि विषयों में ज्ञान प्राप्त किया. उसके बाद कुछ अर्से तक अकादेमी में अध्यापन कार्य भी किया. यहीं उसके और प्लेटो के बीच आत्मीयता का विस्तार हुआ. अरस्तु को पुस्तकें जमा करने का शौक था और अपने धन का बड़ा हिस्सा पुस्तकों और पांडुलिपियों को जुटाने पर करता था. प्लेटो ने उसके आवास को ‘श्रेष्ठ अध्येता का घर’ कहा था. कुछ लोग मजाक में कहा करते थे कि ईश्वर ने अरस्तु के मस्तिष्क में गहरा गड्ढा बना दिया है, जिसमें वह पुस्तकों को सहेज कर रखता है. अकादेमी में रहते हुए अरस्तु पर प्लेटो की विद्वता का प्रभाव उत्तरोत्तर बढ़ता गया. प्लेटो की लेखनशैली का अनुकरण करते हुए उसने अकादमी प्रवास के दौरान भौतिकी, जीवविज्ञान, वनस्पति विज्ञान, तर्कशास्त्र, तत्वदर्शन आदि पर अनेक पुस्तकों की रचना की. अरस्तु के मन में अपने गुरु के प्रति बेहद सम्मान था. वहीं प्लेटो भी अरस्तु की प्रतिभा का मुरीद था. वह उसे ‘अकादेमी का मस्तिष्क’ और ‘सर्वश्रेष्ठ अध्ययनशील’ विद्यार्थी मानता था. प्लेटो का निधन हुआ, उस समय अरस्तु की उम्र लगभग 37 वर्ष थी. वह प्लेटो के उत्तराधिकारियों में से एक था. प्रतिभा को देखते हुए अरस्तु की दावेदारी भी बनती थी. वह प्लेटो का वास्तविक उत्तराधिकारी है, यह उसने आगे चलकर सिद्ध भी कर दिया था. परंतु ‘अकादमी’ का अध्यक्ष प्लेटो के रिश्तेदार तथा गणित एवं जीवविज्ञान के पंडित स्पूसिपस को बनाया गया. इसका कारण प्लेटो से अरस्तु की वैचारिक असहमतियां भी थीं. अधिकारियों में इतना साहस न था कि अकादेमी का संचालन का दायित्व ऐसे व्यक्ति के हाथों में सौंप दें, जिसकी अकादेमी के संस्थापक और गुरु से घोर असहमतियां रही हों, हालांकि अरस्तु की प्रतिभा को लेकर उन्हें कोई संदेह न था. नतीजा यह हुआ कि अरस्तु का जी अकादेमी से उचट गया. निराश होकर उसने एथेंस छोड़ दिया. वहां से वह माइसिया में एटारनियस नामक स्थान पर पहुंचा. वहां अकादेमी के पूर्व छात्रों की मंडली का सदस्य बन गया. उनमें वहां का शासक हरमियॉस भी शामिल था. इससे अरस्तु को पुनः राजपरिवार के निकट आने का अवसर मिला. कुछ ही दिनों में हरमियॉस और अरस्तु गहरे दोस्त बन गए. इसका सुखद परिणाम अरस्तु और हरमियॉस की भतीजी(कुछ विद्वानों के अनुसार भानजी) पिथियास के विवाह के रूप में सामने आया. उसके फलस्वरूप उसके जीवन में स्थायित्व आया. अकादमी में प्राप्त गणित और विज्ञान की शिक्षा बहुत कारगर सिद्ध हुई. पिथियास से विवाह के उपरांत उसने खुद को प्रकृति विज्ञान की खोज में लगा दिया. समुद्र तटीय स्थानों पर जाकर वह वनस्पतियों और जीवजंतुओं का अध्ययन करने लगा. उन अनुभवों के आधार पर उसने आगे चलकर कई पुस्तकों की रचना की. एथेंस छोड़ने के बाद 12 वर्षों तक वह इसी तरह अनुभव और ज्ञान बंटोरता रहा. इस बीच राजतंत्र की निरंकुशता को करीब से देखने का अवसर मिला. कदाचित इसी बीच उसके मन में छोटेछोटे राज्यों की विकृतियां सामने आने लगी थीं. वही अनुभव कालांतर में आगे चलकर ‘पॉलिटिक्स’ एवं ‘एथिक्स’ जैसे गं्रथों की प्रेरणा बनी. अपने उत्तरवर्ती जीवन में अरस्तु ने एक अन्य युवती हरपिलिस से विवाह किया, जिससे उसे संतान हुई. पुत्र का नाम उसने अपने पिता के नाम पर निकोमाराक्स् रखा.

342 ईस्वीपूर्व के आसपास उसको मेसिडन के सम्राट की ओर से निमंत्रण प्राप्त हुआ. इस अवधि में वहां काफी कुछ बदल चुका था. एमींतस के बाद फिलिप मेसिडन का सम्राट था. उसे अपने बेटे सिकंदर के लिए योग्य शिक्षक की तलाश थी. अरस्तु की प्रतिभा के बारे में वह पहले से ही परिचित था. अकादेमी में अरस्तु द्वारा किए गए कार्य भी उसकी जानकारी में थे. ऐसे में सिकंदर की शिक्षा के लिए अरस्तु से बेहतर कोई हो ही नहीं सकता था. निमंत्रण मिलते ही अरस्तु मेसिडन लौट आया. सम्राट फिलिप की ओर से उसका जोरदार स्वागत किया गया. आते ही उसे ‘रॉयल अकादेमी ऑफ मेसिडन’ का अध्यक्ष बना दिया गया. अगले तीन वर्षों तक वह इसी पद पर बना रहा. शिक्षक के तौर पर उसने राजकुमार सिकंदर में साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाएं जगाने का काम किया. उसने सिंकदर को राज्य की सीमाओं के विस्तार के लिए एशियामाइनर तथा अन्य उत्तरपूर्वी राज्यों पर अधिकार करने की सलाह दी. इस बीच एटारनियस से दुखद समाचार आया कि एक ईरानी सेनापति ने उसके मित्र और वहां के शासक हरमियॉस को धोखे से पकड़कर उसकी हत्या कर दी है. इस सूचना ने अरस्तु को व्यथित कर दिया. 340 ईस्वी पूर्व में फिलिप की मृत्यु के बाद सिकंदर सम्राट बना. सिंकदर के मन में शुरू से ही साम्राज्यवादी भावनाएं जोर मारती थीं. सत्ता हाथ में आते ही वह युद्ध पर निकल पड़ा. अब मेसिडन में अरस्तु को कोई काम न था. इसी बीच उसे एथेंस जाने का अवसर मिला. उसी समय अकादेमी अध्यक्ष पद के रिक्त होने की सूचना मिली. अरस्तु के मन में अकादेमी से जुड़ने की लालसा अब भी शेष थी. परंतु अरस्तु की उपेक्षा करते हुए अकादेमी के अधिकारियों द्वारा खेनोक्रातेस को अकादेमी का मुख्यअधिष्ठाता मनोनीत किया गया. अरस्तु एक बार फिर निराश हो गया. परंतु उसके जैसे मननशील व्यक्ति के आगे निराशा बहुत टिकाऊ नहीं थी. उसने स्वयं को अध्ययन के प्रति समर्पित कर दिया.

335 ईस्वी पूर्व में उसे पुनः एथेंस लौटने का अवसर मिला. इस बार आमंत्रित करने वाला था, हर्मेडयस उस समय उसकी उम्र 51 वर्ष थी और एक विद्वान दार्शनिक के रूप में उसकी ख्याति आसपास के देशों में फैल चुकी थी. एथेंस की ज्ञानविज्ञान के क्षेत्र में धाक थी. अवसर गंवाए बिना अरस्तु एथेंस के लिए प्रस्थान कर गया. उन दिनों एथेंस और मेसीडन के संबंध अच्छे न थे. परंतु अरस्तु की विद्वता की धाक ऐसी थी कि एथेंस में उसका स्वागत हुआ. जाहिर है इसके पीछे एथेंसवासियों की ज्ञान के प्रति सम्मानभावना का असर था. एथेंस के उत्तरपूर्व स्थित उपनगर अपोलो में लीशियस देवी का मंदिर था. एथेंस के कानून के अनुसार वहां बाहरी व्यक्तियों को भूमि खरीदने की अनुमति नहीं थी. इसलिए अरस्तु ने मंदिर के आसपास के क्षेत्रों में कुछ मकान किराये पर लेकर अपने विश्वविद्यालय की स्थापना की. विश्वविद्यालय का नाम लीशियस देवी के नाम के आधार पर ‘लीशियम’ रखा गया. कुछ ही दिनों में एथेंस के अनेक प्रतिष्ठित लोग जिनमें अकादेमी से शिक्षित लोग भी थे, अरस्तु से जुड़ने लगे. इससे अरस्तु और उसके विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा बढ़ने लगी. उस विश्वविद्यालय की खूबी थी कि वहां टहलते हुए शिक्षार्जन पर जोर दिया जाता था. अरस्तु स्वयं टहलते हुए पढ़ाता था. इसलिए कुछ प्लेटो को ‘टहलतेटहलते पढ़ाने वाला अध्यापक’ तथा संस्था को ‘परिभ्रामी विद्यालय’;च्मतपचंजमजपब ैबीववसद्ध भी कहने लगे थे. लीशियम में रहते हुए अरस्तु ने अध्यापन के अलावा कई महत्त्वपूर्ण काम किए. पुस्तक संग्रह का शौक उसको अकादेमी प्रवास से ही था. लीशियम में उसे पुस्तकें जमा करने के भरपूर अवसर मिला. फलस्वरूप उसने सैकड़ों पुस्तकों एवं पांडुलियों का संग्रह किया. और उन्हें सुरक्षित रखने लिए लीशियम के भीतर एक विशाल पुस्तकालय का निर्माण किया. अरस्तु द्वारा निर्मित पुस्तकालय उसके समकालीन नाटककार यूरीपिडिस के पुस्तकालय को छोड़कर, पूरे यूनान में सबसे बड़ा था. यही नहीं उसने पुस्तकों को व्यवस्थित करने के लिए आवश्यक नियम भी बनाए थे. पुस्तकालय के अलावा उसने विश्वविद्यालय में विचित्र वस्तुओं, शैवालों तथा मानचित्रों का एक अजायबघर तैयार किया. हालांकि स्वयं अरस्तु के पास धन की कमी न थी. उसकी पत्नी धनाड्य परिवार से थीं. इसके साथसाथ पुस्तकालय, अजायबघर, वैज्ञानिक उपकरण आदि के लिए सिंकदर की ओर से भी समयसमय पर मदद प्राप्त होती रहती थी. गुरु अरस्तु के प्रति सिंकदर का सम्मान इससे भी जाहिर होता है कि उसने अपने सैनिकों, मछुआरों, बहेलियों और शिकारियों को आदेश दिया था कि काम के दौरान यदि कोई विचित्र वस्तु मिले तो उसे संग्रहित कर, लीशियम के संग्रहालय में जमा करा दें. इसके अतिरिक्त सिंकदर ने जीव विज्ञान एवं भौतिक विज्ञान संबंधी खोजों के वैज्ञानिक उपकरण भेजकर भी अरस्तु की मदद की थी.

अरस्तु ‘लीशियम’ में 12 वर्षों तक रहा. इस बीच उसका विद्यालय निरंतर प्रगति करता रहा. लगभग सभी विषय की शिक्षाओं का वहां प्रबंध था और शिक्षार्थी के रूप में दूरदूर के विद्यार्थी वहां पहुंचते थे. ‘लीशियम’ के प्रशासन हेतु अरस्तु ने विशेष प्रबंध किए थे. उस व्यवस्था को प्लेटो के ‘आदर्श राज्य’ तो नहीं कह सकते, परंतु शिक्षक और विद्यार्थी के बीच अनौपचारिक बातचीत को बढ़ाने, शिक्षा में सहजता लाने की भावनाएं उसके पीछे अवश्य थीं. तदनुसार विद्यार्थी अपने बीच से एक विद्यार्थी को चुनते थे. अगले दस दिनों तक वही विश्वविद्यालय के प्रशासक का काम करता था. इसके बावजूद ‘लीशियम’ में पर्याप्त अनुशासन था. भोजनव्यवस्था वहां सामूहिक थी. महीने में एक दिन विशेष परिचर्चा के लिए सुरक्षित था, जिसके नियम अरस्तु ने निर्धारित किए थे. अरस्तु का यह विश्वविद्यालय ‘अकादेमी’ जैसी प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं कर सका. एक तरह से यह उसकी शाखा जैसा ही था. दोनों में एक विशेष अंतर भी था. ‘अकादेमी’ में गणित पर ज्यादा जोर दिया जाता था, जबकि ‘लीशियम’ में जीवविज्ञान और वनस्पति विज्ञान की शिक्षा पर खास ध्यान दिया जाता था. प्रायोगिक शिक्षा का खास महत्त्व था. उन दिनों बाढ़ आम समस्या थी. बरसात के समय नील नदी उफनने लगती. अरस्तु ने नियमित आने वाली बाढ़ों की रोकथाम के लिए भी शोधकार्य किया था. ‘लीशियम’ को प्लेटो के ‘अकादेमी’ जैसी प्रतिष्ठा भले ही प्राप्त न कर सका, परंतु एक दार्शनिक के रूप में अरस्तु को वैसी प्रतिष्ठा प्राप्त हो चुकी थी, जैसी कभी सुकरात और प्लेटो को प्राप्त था. अरस्तु को नकारकर जिस व्यक्ति को अकादेमी का अध्यक्ष मनोनीत किया गया था, अरस्तु के प्रभामंडल के आगे उसकी प्रतिष्ठा नगण्य थी.

लीशियम में अध्यापन करते हुए अरस्तु ने अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की. उस समय सिकंदर विश्वविजय के लिए निकला हुआ था. यात्रा के विवरणों को दर्ज करने के लिए सिंकदर के साथ कल्लिस्थेसनस् नामक युवा भी उसके साथ अभियान पर था. वह अरस्तु का शिष्य था और अपने गुरु की भांति स्पष्टवक्ता भी. अभियान के दौरान किसी कार्य के लिए कल्लिस्थेसनस् ने सिंकदर की आलोचना कर दी. परिणामस्वरूप सिंकदर उससे रुष्ट हो गया. उस समय तक सिंकदर की विश्वविजय की कामनाएं उभार पर थीं. आलोचना उससे सहन न हुई. उसके आदेश पर कल्लिस्थेसनस् को मृत्युदंउ सुनाया गया. कल्लिस्थेसनस अरस्तु का करीबी शिष्य था. अरस्तु ने ही उसे सिकंदर के साथ भेजा था, इसलिए कल्लिस्थेसनस् के साथसाथ अरस्तु को भी दोषी माना गया. सिंकदर ने अरस्तु को दंडित करने का निर्णय कर लिया. लेकिन भारत अभियान में वह इतनी बुरी तरह से उलझा कि वापस लौट ही नहीं पाया. ईसा पूर्व 323वें वर्ष में उसकी मृत्यु हो गई.सिकंदर की मौत का समाचार जैसे ही मेसिडन पहुंचा वहां विद्रोह हो गया. अरस्तु सिंकदर का गुरु और करीबी रह चुका था, इसलिए विद्रोहियों ने उसे भी दंडित करने का निर्णय किया. लेकिन अरस्तु को दंडित करना आसान न था. उसकी पूरे यूनान में प्रतिष्ठा थी. विद्रोहियों ने उसे ‘नास्तिक’ घोषित कर दिया. आरोप का आधार अरस्तु द्वारा ईसापूर्व 340-341 में अपने दोस्त हरमियॉस पर लिखी कविता को बनाया गया. वह कविता अरस्तु ने हरमियॉस की हत्या के बाद लिखी थी, जिसमें उसके गुणों का बखान करते हुए उसे देवतुल्य घोषित किया गया था. बीस वर्ष पुरानी उस कविता के समय और परिस्थिति को देखते हुए इस प्रकार के आरोप बेमानी थे. विरोधी किसी भी प्रकार अरस्तु को दंडित करना चाहते थे, इसलिए अरस्तु को नास्तिक घोषित करना, जनता के बीच उसकी छवि को धूमिल करने की चाल थी. अपने विरुद्ध बढ़ता माहौल देख अरस्तु को एथेंस छोड़ना पड़ा. उसी वर्ष 62 वर्ष की अवस्था में उसकी मृत्यु हो गई.

एथेंस छोड़ते समय उसने घोषणा की थी कि एथेंसवासियों को दर्शनशास्त्र के विरुद्ध दूसरी बार अपराध नहीं करने देगा. दर्शनशास्त्र के विरुद्ध एथेंसवासियों का पहला अपराध उसकी संसद द्वारा सुकरात को दिया गया मृत्युदंड था. एथेंस से वह युबोइया के लिए प्रस्थान कर गया. वहां खॉल्किस नामक छोटे से नगर में जाकर रहने लगा. वहीं रहते हुए उसने अपनी वसीयत तैयार की, जिसमें उसने अपनी पत्नी हर्पीलियस के स्वभाव की प्रशंसा करते हुए उसके लिए धन की व्यवस्था की थी. पहली पत्नी पिथियास की यादें अब भी उसके दिल में बसी थीं. इसलिए उसने वसीयत में लिखा कि उसे पिथियास के अवशेषों के साथ दफनाया जाए. अपनी संपत्ति का कुछ हिस्सा दासों के नाम किया था और कुछ को उसने दासत्व से मुक्त कर, स्वतंत्र कर दिया था. ये घटनाएं उसकी संवेदनशीलता को दर्शाती हैं. कविहृदय प्लेटो ने भी पाया था, परंतु उसे कविता से अरुचि थी. मानता था कि कविता और नाटक जैसी विधाएं मनुष्य को यथार्थ से परे ले जाकर कमजोर बनाती हैं. अरस्तु मनोमस्तिष्क से वैज्ञानिक होने के साथसाथ संवेदनशील कवि भी था. एक कविता में उसने प्लेटो की विलक्षण मेधा की प्रशंसा करते हुए उसे विद्वानों के बीच अद्वितीय घोषित किया है. देहयष्टि को लेकर भी अरस्तु और प्लेटो के बीच उल्लेखनीय अंतर था. प्लेटो लंबेचौड़े डीलडोल, चौड़ी छाती और सुदर्शन चेहरे वाला व्यक्ति था. उसके नामकरण का कारण ही उसका लंबाचौड़ा डीलडौल था. दूसरी ओर अरस्तु की आंखें छोटीछोटी. पैर पतले. कदकाठी सामान्य थी. बोलते समय वह कभीकभी तुतलाने लगता था. यह भी कहा गया है कि उम्र के आखिरी पड़ाव पर उसके बाल झड़ चुके थे. रहनसहन और बोलचाल में वह असंयमी था. अरस्तु की वाक्पटुता की प्रशंसा की जाती है. दियोगेनस ने उसकी वाक्पटुता के उदाहरणों को पुस्तकाकार संग्रहित किया है. मगर उसकी प्रतिभा बेमिसाल थी. वह अपने समय के शीर्षतम दार्शनिकों और कुछ मामलों में तो अपने गुरु प्लेटो से भी आगे था. दांते ने उसे ‘सभी विद्वानों का गुरु’ घोषित किया है. अरस्तु ने विपुल साहित्य की रचना की. उसके ग्रंथों की संख्या लगभग चार सौ बताई जाती है. उनमें से अनेक ग्रंथ तो दर्शनशास्त्र और राजनीति की धरोहर हैं. लेकिन यह भी विडंबना है कि अरस्तु जैसे महामेधावी दार्शनिक की पुस्तकें भी उसके निधन के लगभग 250 वर्ष बाद ही सिसरो के प्रयासों के फलस्वरूप प्रकाशित हो सकीं. इस बीच उसकी अनेक पांडुलिपियां लुप्त हो चुकी थीं. अब सिवाय संदर्भों के उनका कहीं अतापता नहीं है. लेकिन ‘पॉलिटिक्स’ और ‘एथिक्स’ जैसे ग्रंथ मानवता के उपहार के रूप में आज भी सुरक्षित हैं.

प्लेटो और अरस्तु

अरस्तु की विलक्षणता उसके तार्किक विश्लेषण में है. सुकरात और प्लेटो की शैली मुख्यतः निगमनात्मक थी. अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले सुकरात अपने प्रतिपक्षी के आगे तर्क करता था. उत्तर प्राप्त होने पर वह प्रति तर्क अथवा प्रत्युत्तर के माध्यम से बातचीत को आगे बढ़ाता था. सुकरात को पढ़ते हुए सुधी पाठक समझ जाता है कि संबंधित विषय को लेकर उसका खास दृष्टिकोण है. परंतु निष्कर्ष को सामने रखने से पूर्व वह उसके सभी पक्षों को गंभीरतापूर्वक परख लेना चाहता है. प्रत्येक तर्क के साथ वह अपने मंतव्य को मजबूत करता जाता है. संवादात्मक शैली इसमें सहायक बनती है. यह तर्क की निगमनात्मक पद्धति है, जिसमें एक परिकल्पना को सिद्धांत में बदलने के लिए उसके समर्थन में तर्क जुटाए जाते हैं. पर्याप्त साक्ष्य हों तो ठीक वरना उस परिकल्पना को किनारे कर नए शोध की शुरुआत की जाती है. इसका मुख्य प्रयोग विज्ञान में होता है, जिसमें एक परिकल्पना के साथ परीक्षण, अनुरीक्षण करते हुए निष्कर्ष तक पहुंचने की कोशिश की जाती है. आगमनात्मक पद्धति में निष्कर्ष भविष्य में निहित होता है. उससे जुड़ी कुछ छोटीछोटी स्थितियां, विचार अथवा अनुभवादि होते हैं. फिर उनकी पड़ताल, पुराने निष्कर्षों के साथ मिलान, व्याख्या और परिणामों में आवश्यक संशोधनपरिवर्धन के बाद अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचा जाता है. अरस्तु को तर्क के क्षेत्र में आगमनात्मक पद्धति के प्रथम उपयोग का श्रेय भी प्राप्त है.

अरस्तु को इस बात का भी श्रेय दिया जाता है कि उसने राजनीति को फुटकर विचारों से ऊपर उठाकर स्वतंत्र विषय के रूप में मान्यता दिलाने का काम किया. उससे पूर्व वह धर्मदर्शन का हिस्सा थी. भारत में तो वह आगे भी बनी रही. अरस्तु का समकालीन चाणक्य ‘अर्थशास्त्र’ में अपने राजनीतिक विचारों को सामने रखता है और मजबूत केंद्र के समर्थन में तर्क देते हुए राज्य की सुरक्षा और मजबूती हेतु अनेक सुझाव भी देता है, परंतु ‘अर्थशास्त्र’ और ‘पॉलिटिक्स’ की विचारधारा में खास अंतर है. यह अंतर प्राचीन भारतीय और पश्चिम के राजनीतिक दर्शन का भी है. उनमें अरस्तु की विचारधारा आधुनिकताबोध से संपन्न और मानवमूल्यों के करीब है. ‘पॉलिटिक्स’ के केंद्र में भी मनुष्य और राज्य है. दोनों का लक्ष्य नैतिक एवं सामाजिक उद्देश्यों की प्राप्ति है. अरस्तु के अनुसार राजनीतिकसामाजिक आदर्शों की प्राप्ति के लिए आवश्यक है नागरिक और राज्य दोनों अपनीअपनी मर्यादा में रहें. सामान्य नैतिकता का अनुपालन करते हुए एकदूसरे के हितों की रक्षा करें. इस तरह मनुष्य एवं राज्य दोनों एकदूसरे के लिए साध्य भी साधन भी. ‘अर्थशास्त्र’ में राज्य अपेक्षाकृत शक्तिशाली संस्था है. उसमें राज्यहित के आगे मनुष्य की उपयोगिता महज संसाधन जितनी है. लोककल्याण के नाम पर चाणक्य यदि राज्य के कुछ कर्तव्य सुनिश्चित करता है तो उसका ध्येय मात्र राज्य के लिए योग्य मनुष्यों की आपूर्ति तक सीमित है. ‘पॉलिटिक्स’ के विचारों के केंद्र में नैतिकता है. वहां राज्य का महत्त्व उसके साथ पूरे समाज का हित जुड़े होने के कारण है. राज्य द्वारा अपने हितों के लिए नागरिक हितों की बलि चढ़ाना निषिद्ध बताया गया है. दूसरी ओर ‘अर्थशास्त्र’ के नियम नैतिकता के बजाए धर्म को केंद्र में रखकर बुने गए हैं, जहां ‘कल्याण’ व्यक्ति का अधिकार न होकर, दैवीय अनुकंपा के रूप में प्राप्त होता है. जिसका ध्येय राज्य की मजबूती और संपन्नता के लिए आवश्यक जनबल का समर्थन और सहयोग प्राप्त करना है. ठीक ऐसे ही जैसे कोई पूंजीपति श्रमिककामगार को मात्र उतना देता है, जिससे वह अपनी स्वामी के मुनाफे में उत्तरोत्तर संबृद्धि हेतु अपने उत्पादनसामर्थ्य को बनाए रख सके.

अरस्तु के जीवनकाल में यूनान भारी उथलपुथल के दौर से गुजर रहा था. लोग छोटैछोटे राज्यों से उकताने लगे थे. गणतांत्रिक प्रणाली को नाकाम होते देख साम्राज्यवादियों का हौसला बढ़ा था. वे नए सिरे से साम्राज्यवादी विस्तार की तैयारियों में लगे थे. छोटे राज्यों के असफल होने के दो कारण थे. पहला उनमें आपस में बहुत झगड़े होते थे. जरासी बात पर तलवारें खिंच जाया करती थीं. दूसरा और प्रमुख कारण था—व्यापारिक बाधाएं. ईसा पूर्व पांचवीछठी शताब्दी में अंतर्प्रायद्विपीय व्यापार ने काफी तरक्की की थी. व्यापारिक बेड़े दूरदराज के राज्यों के साथ व्यापार करते थे. दूसरे राज्य में व्यापार की अनुमति पारस्परिक राजनीतिक संबंधों पर निर्भर करती थी. संबंध अनुकूल हों तब भी शिल्पकार संगठनों को दूसरे राज्य में व्यापार हेतु भारीभरकम करों का भुगतान करना पड़ता था. बड़े राज्यों के गठन के पीछे मूल विचार था कि उनमें मुक्त व्यापार के लिए अधिक बाजार उपलब्ध हो सकेगा. कुल मिलाकर बड़े राज्यों के गठन के पीछे जहां सभ्यताकरण की प्रेरणाएं थीं, वहीं वर्तमान के प्रति असंतोष की भावना भी थी. अरस्तु जैसा प्रखर विद्वान परिवर्तनों का मूकनिष्पंद द्रष्टा बनकर नहीं रह सकता था. वह दार्शनिक था. विचारों का उसकी दुनिया में महत्त्व था. विचारों को वह किसी भी प्रकार के परिवर्तन की आधारशिला मानता था. उसका मानना था कि मनुष्य श्रेष्ठ का चयन तब कर सकता है, जब उसे श्रेष्ठत्व का बोध हो. उन खूबियों की जानकारी हो जो श्रेष्ठ को श्रेष्ठत्व प्रदान करती हैं. ऐसा नहीं है कि इसकी शुरुआत अरस्तु या प्लेटो से हुई हो. दर्शन के रूप में राजनीति के अध्ययन की शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी. प्राचीन यूनान में होमर, लायक्राग्स, सोलन, प्रोटेगोरस, एंडीफोन, पाइथागोरस, जेनोफीन जैसे अनेक नाम हैं, जिन्होंने राजनीति को सभ्यताकरण के उपकरण की भांति प्रयुक्त किया था. तथापि सुसंगत राजनीतिक चिंतन का अभाव था. राजा प्रजा की मांग तथा अपनी सुविधा के अनुसार कुछ नियम बना लिया करते थे. फिर लंबे समय तक उन्हीं को मार्गदर्शक मानकर काम चलाया जाता था. उनमें से कुछ पर अमल हो पाता था, कुछ पर नहीं. प्रजा कुछ समय तक प्रशासन की दुर्बलताओं को सहती. धीरेधीरे असंतोष उमड़ने लगता था. फलस्वरूप नए सिरे से व्यवस्थापरिवर्तन की मांग उठने लगती थी. नियमों में बड़ा परिवर्तन प्रायः बड़े सत्तापरिवर्तन के साथ ही हो पाता था.

प्लेटो ने न केवल विभिन्न राजनीतिक दर्शनों को एक साथ अध्ययनचिंतन का विषय बनाया, वहीं उनकी खूबियों और खामियों पर भी चर्चा की. उसका लक्ष्य सामाजिक आदर्श थे, जिनके लिए वे राजनीति को औजार के रूप में उपयोग करना चाहता था. अरस्तु ने उस अध्ययन को तर्कसम्मत ढंग से विस्तार दिया. उसके लिए कसौटी न्याय और नैतिकता को बनाया. अरस्तु की कामना ऐसे राज्य की थी, जो परमशुभ की प्राप्ति हेतु सतत अग्रसर हो. जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को अपनी अच्छाइयों के साथ जीने की आजादी हो. और वह अंतःस्फूर्त्त प्रेरणा के साथ लक्ष्यप्राप्ति हेतु संकल्परत हो. यह तभी संभव है जब व्यक्ति को कानून और समाज की मर्यादा में, वह सब कुछ करने की स्वतंत्रता हो जिसे वह अपने लिए उपयुक्त मानता है. इसके लिए आवश्यक है कि राज्य अपेक्षित रूप में उदार हो. निरंकुश, अल्पतंत्रात्मक राज्यों में जनसाधारण से उसके चयन का अधिकार छीन लिया जाता है. इस कारण प्लेटो ने निरंकुश राज्य को सबसे बुरा माना है. उसके अनुसार निरंकुश राज्य में नीचे से ऊपर तक सभी स्वार्थलिप्त होते हैं. संसाधनों पर कुछ लोगों का अधिकार होता है. बहुसंख्यक वर्ग से अपेक्षा की जाती है कि वह अल्पसंख्यक शासक वर्ग की मनमानियों को सहते हुए शासन में सहयोग करे तथा राज्य के हित को, जो वास्तव में उसपर शासक वर्ग द्वारा थोपा हुआ उसका स्वार्थ होता है—अपना हित समझकर वर्ताब करे. ऐसे राज्य में मनुष्य सज्जन की संगत को तरस जाता है. दुर्जन उसे चारों ओर से घेरे रहते हैं. परिणामस्वरूप वह अपनी ही अच्छाइयों से कट जाता है. दुष्प्रभाव केवल यहीं तक सीमिन नहीं रहता. अपने चारों और स्वार्थपरक माहौल देख भले नागरिकों का अपनी मूलभूत अच्छाई से भरोसा उठने लगता है. वे मान लेते हैं कि अस्तित्व को बचाए रखने के लिए दुर्जनों के बीच दुर्जन जैसा व्यवहार करना उसकी मजबूरी है. बुराई के लिए आपधापी में अच्छाई की बलि चढ़ा दी जाती है. परिणामस्वरूप लोगों के स्वार्थ प्रबल होने लगते हैं. केवल अपने लिए जीने की होड़ मच जाती है. कुल मिलाकर निरंकुश राज्य नागरिकों को स्वार्थ के लिए प्रेरित करता है. ऐसे समाजों में चूंकि प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए जीता है, इसलिए सामूहिक हितों के लिए संगठित प्रतिरोध की उसकी क्षमता निरंतर घटती जाती है. ऐसे समाजों में न्याय के अवसर विरल हो जाते हैं.

प्लेटो व्यक्ति एवं समाज की अंतःनिर्भरता पर जोर देता है. सामाजिकता की शर्त है कि अन्योन्याश्रितता केवल सुखसुविधाओं और संसाधनों की नहीं, आचारव्यवहार की भी बनी रहे. इस दृष्टि से मनुष्य तथा समाज के बीच बहुत अधिक अंतर नहीं होता. श्रेष्ठ मनुष्य श्रेष्ठ नागरिक भी होता है, किंतु अकेले मनुष्य की श्रेष्ठता क्षणभंगुर होती है. मनुष्य अपने आचारव्यवहार में श्रेष्ठतर बना रहे, उसके लिए समाज की श्रेष्ठता अपरिहार्य है. इस तरह जो मनुष्य के लिए आदर्श है, प्रकारांतर में वह राज्य के लिए भी आदर्श होना चाहिए. न्याय मानव जीवन का उद्देश्य तभी बन सकता है, जब वह समाज का उद्दिष्ट हो. यदि समाज में न्याय का अभाव है तो समझना चाहिए कि राज्य एवं नागरिकों के बीच विश्वास एवं तालमेल की कमी है. विचार को आगे बढ़ाता हुआ प्लेटो लिखता है कि मनुष्य के लिए क्या श्रेष्ठ है, इसे उस समय तक नहीं जाना जा सकता, जब तक हम यह न जान लें कि राज्य के लिए क्या श्रेष्ठ है. अथवा राज्य जो उसके नागरिकों के लिए श्रेष्ठ है, उसे अपने लिए भी श्रेष्ठ न मान ले. निरंकुश राज्य में ऐसा संभव नहीं होता. वहां नागरिकों से न केवल उनके चयन का अधिकार छीन लिया जाता है, बल्कि लोगों को विवश किया जाता है कि वे अपने विवेक से काम लेने के बजाय दूसरों के आदेश का अनुपालन करें. इससे मनुष्य अपने नागरिक धर्म को भूल जाता है. दूसरी ओर वे लोग जो दूसरों के श्रम और अधिकारों पर कब्जा जमाए होते हैं, विरोध की कोई संभावना न देख उनका दुस्साहस बढ़ता ही जाता है. परिणामस्वरूप स्तरीकरण स्थायी रूप ले लेता है. इससे समाज दो हिस्सों में बंट जाता है. एक ओर आज्ञाप्रदाता समूह होता है. दूसरी ओर आज्ञापालक लोग, जो संख्या में बहुसंख्यक होने के बावजूद अधिकारवंचित होने के कारण दबाव में रहने को विवश होते हैं. इससे मनुष्य की मूलभूत पहचान जो उसके मानवीकरण की शर्त के साथ जुड़ी है, धूमिल पड़ने लगती है. अरस्तु ने मनुष्य को सभी प्राणियों में श्रेष्ठ माना है. मनुष्य सबके साथ मिलकर जीने को उत्सुक होता है, इस कारण वह दूसरों से श्रेष्ठ है. परंतु सामूहिकरण की भावना जो पशुओं में भी होती है. यहां तक कि कीटपतंगे भी समूह में जीना जानते हैं. फिर मनुष्य की सामूहिकता और मानवेत्तर प्राणियों की सामूहिकता में क्या अंतर है? अरस्तु के अनुसार मनुष्य की सामूहिकता समाज के रूप में कुछ नियमों से बंधी होती है. या यह कहो कि अपनी सूझबूझ का परिचय देते हुए वह सामाजिक नियमों के रूप में कुछ मर्यादाएं चुनता है. फिर उनके अनुपालन हेतु संस्थाओं का गठन करता है. मानवेत्तर प्राणियों में ऐसा नहीं होता. वहां केवल बल का साम्राज्य होता है. इसलिए जब कोई बलशाली प्राणी अपने से कमजोर पर आक्रमण कर उसके लिए संकट उत्पन्न करता है, तो बाकी जानवरों में उसकी कोई स्थायी प्रतिक्रिया नहीं होती. मनुष्य के साथ ऐसा नहीं है. मानवसमाज में अधिकार एवं कर्तव्य साथसाथ चलते हैं. परंतु ऐसे समाजों में जहां स्तरीकरण बहुत अधिक हो, समाज शक्तिशाली और शक्तिविपन्न वर्गों में बंटा हो, वहां मिलजुलकर रहने की प्रवृत्ति भी कमजोर पड़ती जाती है. न्यायभावना किसी भी मनुष्य की श्रेष्ठता का मापदंड होती है. न्यायभावना से कटा मनुष्य नितांत जंगली हो सकता है.

कविहृदय प्लेटो आदर्श राज्य के सपने को अपनी कल्पना के जरिये विस्तार देता है. उसका वैचारिक स्तर इतना ऊंचा है कि व्यावहारिक कठिनाइयों को कभी समझ ही नहीं पाता. अरस्तु को मानवव्यक्तित्व की जटिलताओं की समझ अपेक्षाकृत अधिक थी. वह जानता था कि मनुष्य के व्यवहार के बारे में कोई भी सटीक भविष्यवाणी कर पाना संभव नहीं है. यह भी नहीं कहा जा सकता कि किसी मनुष्य में जो गुण आज हैं, वे सदैव बने रहेंगे. इसलिए किसी व्यक्ति का दार्शनिक होना उसके चरित्र का स्थायी लक्षण नहीं है. अपने विचारों की व्याख्या के लिए अरस्तु ने ‘पॉलिटिक्स’ के तीसरे खंड के तेरहवें अध्याय में पेरियांडर का उदाहरण दिया है. पेरियांडर ने 627 ईस्वीपूर्व से 587 ईस्वीपूर्व तक कोरिंथ पर राज किया था. उसकी गिनती ग्रीक के सात प्राचीन संतपुरुषों में होती है. वह दार्शनिक, कवि, आविष्कारक, योद्धा और श्रेष्ठ प्रशासक था. यातायात साधनों की खोज तथा अनेक महत्त्वपूर्ण भवनों के निर्माण के कई आविष्कारों का श्रेय भी उसे दिया जाता है. किंतु उसका आचरण उसकी विद्वता के सर्वथा विपरीत था. अपने आचरण में वह पूरी तरह निरंकुश, क्रोधी, निर्मम, कठोर और कुटिल तानाशाह था. एक बार उसे अपनी पत्नी लिसिडा पर इतना क्रोध आया कि उसे सीढ़ियां पर ढकेल दिया था, जिसमें उसकी मृत्यु हो गई. पेरियांडर और मेनिटस के राजा थ्रेसीबुलस् के बीच गहरी मैत्री थी. पेरियांडर की भांति थ्रेसीबुलस् भी निरंकुश सम्राट था. मेलिटस और लीडिया के बीच लंबा संग्राम चला था. वर्षों तक चलने वाले युद्ध का कोई परिणाम न निकलता देख दोनों राज्य आपस में समझौते के लिए विवश हो गए. थ्रेसीबुलस ने युद्ध विराम की घोषणा तो कर दी, लेकिन वह अपने विरोधियों को मित्र का दर्जा देने को तैयार न था. इस कारण वह भीतर से बहुत आहत था. सो उसने पेरियांडर से सलाह लेने के लिए उसके पास अपना दूत भेजा. पेरियांडर ने दूत की बातें सुनीं. सलाह देने के बजाय वह दूत को बस्ती से बाहर खेत में ले गया. वहां गेहूं की फसल खड़ी थी. पेरियांडर ने साथ आए सैनिकों को सबसे ऊपर निकली बालियों को काटने का आदेश दिया. उसके इशारे पर सैनिकों ने सबसे ऊपर दिखने वाली बालियों को काटकर जमीन पर बिछा दिया. उसके बाद थ्रेसीबुलस् के दूत को वापस लौटा दिया. दूत की कुछ समझ न आया. उसने वापस लौटकर जो कुछ घटा था, सम्राट को बता दिया. सुनकर थ्रेसीबुलस् की आंखों में चमक आ गई. वह पेरियांडर का इशारा समझ गया. सबसे ऊंची बालियों को नष्ट कर देने का अर्थ जो उसने निकाला वह था, अपने सभी प्रमुख विरोधियों का निर्ममतापूर्ण सफाया. अरस्तु का निष्कर्ष था कि सत्ताएं अपना विरोध नहीं सह पातीं. गणतांत्रिक सरकारें तानाशाहों की भांति कठोर फैसले लेने से बचती हैं, लेकिन विरोधियों को वे भी अपवादस्वरूप ही पचा पाती हैं. विरोधियों के क्रूरतापूर्ण दमन से बचते हुए वे आरंभ में अपेक्षाकृत उदार दिखने वाले रास्ते अपनाती हैं. उनकी पहली कोशिश विरोधियों के संगठन को तोड़ने की होती है. फिर उनमें से एक पक्ष को बहलाफुसला या सत्ता में हिस्सेदार बनाकर अपने पक्ष में कर लिया जाता है. यदि उससे समाधान की संभावना कम हो अथवा कोई अड़ जाए राष्ट्रहित का हवाला देते हुए देशनिकाले जैसी सजा देकर उससे मुक्ति पा ली जाती है.

अरस्तु आदर्श और व्यवहार के अंतर को वह भलीभांति समझता था. प्लेटो आदर्श से तनिक पीछे हटने को तैयार न था, जबकि अरस्तु आदर्श और व्यवहार में संतुलन बनाए रखने का समर्थक था. व्यावहारिकता से जराभी पीछे हटे बिना वह समाज में नैतिकता और अनुशासन को बनाए रखने का समर्थन करता है. व्यावहारिक आदर्शोन्मुखता उसके दर्शन का मुख्य लक्षण है. उल्लेखनीय है कि ‘पॉलिटिक्स’ की रचना से पहले उसने 158 नगरराज्यों के संविधानों का अध्ययन किया था. अंततः वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि प्रत्येक राजनीतिक दर्शन स्वयं में अपूर्ण है. केवल चरित्र की ईमानदारी और निष्ठा से अपेक्षित लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है. किसी एक व्यक्ति अथवा समूह द्वारा भी उन आदर्शों को प्राप्त नहीं किया जा सकता. इसके लिए समाज के सभी वर्गों के बीच आपसी सहयोग और तालमेल आवश्यक है. समाजवाद की भाषा में कहें तो सब एक के लिए और एक सबके लिए जीने को तैयार हो, तभी अपेक्षित लक्ष्यों की प्राप्ति संभव है. राजनीति के आधुनिक पंडित राजतंत्र की आलोचना इस आधार पर करते हैं कि वहां राजा वंशानुगत आधार पर सत्ता ग्रहण करता है. एक ही वर्ग की मनमानी चलती रहती है. महत्त्वपूर्ण निर्णय लेते समय जनता से सलाहमशविरा करने अथवा लोगों की इच्छाओं का सम्मान करने की जरूरत ही नहीं समझी जाती. प्रायः सत्ता पक्ष की पसंदों को प्रजा की पसंद या उसके लिए सर्वथा हितकारी बनाकर लाद दिया जाता है. ऐसे समाजों में संपन्न लोगों की चलती है और न्याय की संभावना अत्यंत विरल हो जाती है. जबकि अरस्तु के अनुसार न्याय प्रत्येक व्यवस्था का अंतिम उद्देश्य होना चाहिए. तदनुसार न्याय की दृष्टि में जो श्रेष्ठ है, वही राज्य के गठन का उद्देश्य भी है. इसलिए राजतंत्र हो अथवा लोकतंत्र, यदि उसका शासन समाजीकरण की प्रक्रिया को मजबूत बनाते हुए राज्य के उद्देश्यों के प्रति समर्पित है, यदि वह राजकर्म को समाज द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारी मानता है तो उसे अनैतिक नहीं माना जा सकता. हालांकि अकेले व्यक्ति के हाथों में सत्ता आने पर उसकी मनमानी के आसार अधिक होते हैं. राजतंत्र में प्रायः यह सोचकर कि राजा के सुख में ही प्रजा का सुख निहित है—नीतियां बनाई जाती हैं. इसलिए प्रजा की पसंदों के बारे में पता ही नहीं चल पाता. प्रजा भी राज्य की ओर से उम्मीद खो बैठती है. उस अवस्था में राज्य के गठन का औचित्य ही समाप्त हो जाता है. यदि प्रजा की उदासीनता बहुत अधिक बढ़ जाए तो वह राज्य की प्रवृत्ति तथा उसके बदलाव में रुचि लेना छोड़ देती है. इससे शीर्ष पर बैठे लोगों की मनमानियां बढ़ती जाती हैं.

भारत में राजा नामक संस्था को असुरों की देन बताया गया है. ऐतरेय ब्राह्मण में रोचक प्रसंग आया है—‘‘देव और असुर परस्पर युद्धरत रहते थे. दोनों के बीच पूरब दिशा में युद्ध हुआ. उसमें देवता पराजित हुए. अगली लड़ाई दक्षिण में हुई. उसमें भी असुरों की जीत हुई. उसके बाद पश्चिम में युद्ध हुआ. असुरों ने एक बार पुनः देवताओं को पराजित किया. फिर उत्तर दिशा में युद्ध हुआ. देवता उस युद्ध में भी पराजित हुए. उसके बाद वे उत्तरपूर्व में युद्धरत हुए. इस बार देवताओं की विजय हुई. देवताओं ने माना, वह दिशा ‘अपराजेय’ है….केवल वही दिशा थी, जिसमें देवताओं को जीत मिली. अंततः देवताओं को समझ आया—‘हम इसलिए पराजित हुए, क्योंकि हमारा कोई राजा नहीं है.’ उसके बाद उन्होंने सोम को अपना राजा चुना.’’16 उसके बाद राजा नियुक्ति की जाने लगी. यजुर्वेद में राजा को उसके कर्तव्यों के बारे में चेताते हुए कहा गया है—‘तुम्हें यह राष्ट्र सौंपा जाना है—प्रजा के क्षेम तथा उसके सर्वविध पोषण, कृषि की उन्नति एवं बहुआयामी विकास के लिए.’17 अथर्ववेद में कहा गया है—‘प्रजा के सुख में ही राजा का सुख, प्रजा कल्याण में राजा का कल्याण निहित है.18 लेकिन कल्याण का स्वरूप क्या हो? प्रजा के सुख को तय करने वाले मापदंड कैसे हों? क्या यह संभव है कि कोई एक सुख प्रजा के सभी सदस्यों के लिए समानरूप से सुखकारी हो? राजतंत्र चूंकि किसी एक व्यक्ति या चुने हुए व्यक्तियों के समूह की इच्छा द्वारा नियंत्रित होता है, इसलिए राजतंत्र में इन प्रश्नों को प्रायः अनसुना कर दिया जाता है.

देवासुर संग्राम एक प्रतीक है. मिथकीय आख्यान. परंतु यह ऐतिहासिक सत्य है कि प्राचीन भारत में लंबे समय तक यही हाल रहा. छोटेछोटे राज्य आपस में लड़ते रहते थे. इसलिए प्रजा ‘कोऊ नृप होय हमें क्या हानि’—कहकर राज्य और राजा दोनों की ओर से उदासीन बनी रहती थी. यहां तक कि सत्ता केंद्र पूरी तरह बदल जाने पर भी परिवर्तनों पर उसका ध्यान नहीं जाता था. सामान्यतः इसे राजनीति की असफलता कहा जाएगा. क्योंकि वह उन लोगों के राज्य का नेतृत्व करने का दावा करती थी, जिन्हें पता ही नहीं होता कि उनका राज्य के प्रति और राज्य का उनके प्रति क्या कर्तव्य है? न ही यह मालूम होता है कि राज्य समाज से ऊपर नहीं, बल्कि समाज द्वारा खुद को व्यवस्थित रखने के लिए गढ़ी गई संस्था है, जिसपर एकमात्र जनता का सर्वाधिकार है. यदि उन्हें या उनमें से किसी एक को राज्य की ओर से कुछ समस्या है तो इसका कारण केवल राज्य की दुर्बलता नहीं, बल्कि उनका अपने ही अधिकारों के प्रति उपेक्षाभाव भी है. असल में वे जान ही नहीं पाते कि वास्तविक समस्या राज्य को उत्तराधिकार का विषय और केवल शक्तिकेंद्र समझकर उसपर काबिज होने, फिर उन कर्तव्यों से पलायन से जन्म लेती है, जो राजा नामक संस्था के लिए विहित हैं. इसलिए अरस्तु ने राजतंत्र की आलोचना करने के बजाए राजा के आदर्शों पर ज्यादा जोर दिया है. उसका विचार था कि जिस व्यक्ति में नेतृत्व का गुण हो, वही राजा है. स्टोइक विचारकों के अनुसार केवल वही व्यक्ति सम्राट बनने का अधिकारी था, जो आचरण में सर्वश्रेष्ठ तथा राजपद के लिए अपेक्षित योग्यताएं रखता हो. सुकरात का विचार था कि राजा उसे बनाना चाहिए जिसमें राजा के लिए अपेक्षित सभी गुणों का समावेश हो. इस तरह सिद्धांत के स्तर पर राजशाही में भी लोकहित को साधने पर जोर दिया जाता है. परंतु यदि समाज का बहुसंख्यक समुदाय ही राज्य, उसकी गतिविधियों और अपने अधिकारों की ओर से उदासीन हो जाए तो शिखर पर बैठे लोगों को मनमानी का अवसर सहज ही मिल जाता है. अरस्तु का विचार था कि यदि नागरिक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक तथा शासक वर्ग कर्तव्यों के प्रति पूर्णतः सचेत हो तो कोई भी राजनीतिक दर्शन राज्य के उद्देश्यों को प्राप्त कर सकता है. इसलिए दोष किसी विचार अथवा विचारधारा का न होकर उसका सही अनुपालन न करने तथा राजनीतिज्ञों के स्वार्थ से घिर जाने का है. इसलिए उसने कहा था—

कम से कम आधी राजनीति उपलब्ध संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण तथा परिस्थितियों का श्रेष्ठतम उपयोग करने में है.’

ऐसा नहीं है कि अरस्तु राजनीतिक परिवर्तन की संभावनाओं अथवा उसमें नए चिंतन और विचारों को अनावश्यक मानता था. उसका विचार था कि राजनीतिक दर्शनों में सुधार की भरपूर संभावना है. उसके लिए राज्य एवं नागरिकों का आपसी विश्वास एवं सहयोग आवश्यक है. यह तभी संभव है जब राज्य के सभी नागरिक श्रेष्ठतम आचरण का प्रदर्शन करें, तथा राज्य के केंद्र पर आसीन शक्तियां अपने कर्तव्यों के प्रति पूरी तरह सजग एवं समर्पित हों. आदर्श राज्य को लेकर कुछ ऐसा ही स्वप्न प्लेटो का भी था. क्या दोनों का परिकल्पनाएं समान हैं? यदि कुछ अंतर है तो क्या है? ‘दि लॉज’ प्लेटो की प्रौढ़ वयस् की रचना है. उसकी गिनती राजनीतिक दर्शन की श्रेष्ठतम कृतियों में की जाती है. प्लेटो ने उसमें आदर्श राज्य की संकल्पना को प्रस्तुत किया है. अरस्तु को वह परिकल्पना अव्यावहारिक लगती है. प्लेटो के विचारों को सर्वथा मौलिक और अनुपम बताकर वह उसकी प्रशंसा करता है, साथ में यह भी जोड़ देता है कि उसके विचार उत्कृष्ट वैचारिकता से भरपूर होने के साथसाथ, अत्यधिक क्रांतिकारी किंतु अतिकल्पनात्मक हैं. उसके शब्दों में छिपी व्यंग्यरेख को नजरंदाज नहीं किया जा सकता. अप्रत्यक्ष रूप से वह प्लेटो के विचारों को अव्यावहारिक करार देता देता है. इसका आशय यह नहीं है कि राज्य के लिए जिस उच्चतम आदर्शं की परिकल्पना प्लेटो करता है, उसके स्वरूप एवं संचालन को लेकर अरस्तु की उससे कुछ कम अपेक्षाएं हैं. देखा जाए तो दार्शनिक सम्राट के रूप में उसकी कामना ऐसे महामानव की है जो उच्च मानवादर्शों से युक्त हो. जो लोगों की समानता और स्वतंत्रता में विश्वास रखता हो. उनके सुख एवं सुरक्षा में संवृद्धि के प्रति पूरी तरह संकल्पबद्ध हो. ऐसा महामानव मिलना असंभव है. यदि चमत्कारस्वरूप मिल भी जाए तो उसके परिवर्त्ती सम्राट उसी की भांति गुणवंत होंगे इसकी संभावना अत्यंत विरल है. समय के साथ स्वयं व्यक्ति के आदर्श एवं प्राथमिकताओं में बदलाव आ सकता है. आदर्श राज्य के लिए ‘दार्शनिक सम्राट’ की अनुशंसा करते समय प्लेटो प्रकारांतर में राजतंत्र का ही पक्ष लेता है, जिसमें राजा की इच्छा सर्वोपरि होती है. जबकि व्यक्ति वह चाहे जितना उदार क्यों न हो, अपने ईमानदार सोच, संपूर्ण सदेच्छा और समर्पण के साथ काम भी करता हो, यह आवश्यक नहीं कि जिसे वह विस्तृत जनसमाज के लिए हितकारी मानता है, वह उसके लिए वास्तव में उतना ही हितकारी हो. पेरियांडर का उदाहरण पीछे दिया गया है. छब्बीस शताब्दी पहले ग्रीक में जन्मा पेरियांडर एक साथ वीर, दूरदृष्टा, आविष्कारक, कुशल प्रशासक, महत्त्वाकांक्षी सम्राट आदि सबकुछ था. उसके शासन के दौरान कोरिंथ ने खूब तरक्की की. कई नए आविष्कार उसने किए. महत्त्वपूर्ण इमारतों का निर्माण कराया, परंतु समय के साथ उसकी मान्यताओं में बदलाव आता गया. आज कुछ लोग उसे तानाशाह के रूप में पहचानते हैं, जबकि कुछ के लिए जो उसके आरंभिक जीवन के कार्यकलापों पर अटके रहते हैं, पेरियांडर संत की हैसियत रखता है. ठीक ऐसे ही जैसे राम के बारे में कहा जाता है. रामराज्य को आदर्श बताने वालों के लिए राम इतना आदर्श राजा है कि वे उसे ईश्वर का दर्जा देते है. परंतु जो लोग उसे शंबूक हत्या का दोषी मानते हैं, उनकी निगाह में वह निरंकुश सम्राट है.

वस्तुतः राजनीतिक आदर्श के रूप में अरस्तु राज्य के जिस स्वरूप की कल्पना करता है, उसमें और प्लेटो के दर्शन में विशेष अंतर नहीं है. ‘आदर्श राज्य’ के रूप में प्लेटो जो कल्पना करता है, अरस्तु उसी सपने को ‘राज्य के आदर्श’ के रूप में साकार करना चाहता है. इस तरह हम अरस्तु के विचारों पर प्लेटो की छाया को देख सकते हैं. बावजूद इसके अरस्तु के विचारों को प्लेटो के दर्शन की पुनरावृत्ति नहीं कहा जा सकता. ‘राज्य के आदर्श’ को परिपक्व दर्शन के रूप में विस्तार देने से पहले वह प्लेटो के ‘आदर्श राज्य’ से उतनी ही प्रेरणा लेता है, जितनी आवश्यक है. ‘लॉज’ में प्लेटो का यह विचार कि न्याय सभ्यताकरण की कसौटी है तथा न्याय से ही मानव ने सभ्यता का पाठ पढ़ा है—अरस्तु के दर्शन के लिए प्रस्थान बिंदू का काम करता है.

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

16. ऐतरेय ब्राह्मण, 1/1/14

17. इय ते राष्ट्र. कृप्ये त्वा क्षैमाय. त्वा रय्यै त्वा पोषाय, त्वा। यजुर्वेद-9/22।।

18. प्रजा सुखे सुख राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्!—अथर्ववेद.

न्याय की पाश्चात्य अवधारणा—दो

‘न्याय क्या है’ पर सबसे पहली प्रतिक्रिया केफलस की ओर से ही आती है. केफलस मैटिक(विदेशी) है. उसके विचार कुछ-कुछ परंपरागत किस्म के हैं. उसके अनुसार न्याय का अर्थ है—‘अपने कथन और कर्म में सच्चा रहना तथा मनुष्यों एवं देवताओं के प्रति ऋण चुकाना.’ सुकरात इस परिभाषा से संतुष्ट नहीं होता. उसके अनुसार सत्य सापेक्षिक होता है. यानी एक व्यक्ति के लिए जो सत्य है, आवश्यक नहीं कि दूसरे व्यक्ति की परिस्थितियों में भी ठीक वैसा ही सत्य स्वीकार्य हो. इसलिए केफलस के विचारों की आलोचना वह यह कहकर करता है कि विशेष परिस्थितियों में सत्य और समुचित व्यवहार को न्याय माना जा सकता है. परंतु उसे सार्वभौमिक सत्य के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. उधार को समय पर चुकाना अच्छी बात है. उसे मानव-चरित्र के विशिष्ट गुण के रूप में लिया जा सकता है. परंतु इस नियम की भी सीमा है. यह प्रत्येक परिस्थिति में निरापद नहीं है. केफलस के मत के विरोध में अपना तर्क प्रस्तुत करते समय सुकरात उदाहरण देता है—‘मान लीजिए आपके दोस्त ने अपना घातक हथियार आपके पास सुरक्षित रख छोड़ा है. उसे वह उस समय वापस मांगता है, जब वह अत्यंत क्रोधावस्था में है; तथा हथियार द्वारा किसी तीसरे व्यक्ति की हत्या करना चाहता है. उस क्षण हथियार लौटाकर ऋण-मुक्त होना क्या न्याय की परिसीमा में आएगा?’ इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर केफलस के पास नहीं है. परिस्थिति चाहे जो हो, शुभ यदि अशुभ का जन्मदाता अथवा उसे प्रोत्साहित करता है—तो वह न्याय नहीं माना जा सकता. न्याय की कसौटी उसकी सार्वभौमिकता में है. वही न्याय है जो अधिकतम व्यक्तियों को न्याय जंचे और अधिकतम परिस्थितियों में न्याय-संगत सिद्ध हो. समय पर उधार लौटाने का गुण व्यक्ति को जिम्मेदार तो दर्शाता है, परंतु वह न्याय की कसौटी नहीं बन सकता.

केफलस वयोवृद्ध है. उस पीढ़ी का प्रतीक जो सुकरात के समय बूढ़ी हो चली थी. उसका ज्ञान सुदीर्घ अनुभव पर आधारित है. उसकी पीढ़ी के लिए न्याय और नैतिकता के अर्थ बहुत सीमित थे. सत्य-भाषण एवं समय पर उधार चुकाने का मामला भी व्यावहारिक नैतिकता से जुड़ा था. लोगों में उधार लेन-देन चलता रहता था. उसके कारण झगड़े भी होते थे. प्रकारांतर में केफलस उस न्याय की ओर इशारा करता है, जिसके लिए न्यायालय या किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की आवश्यकता पड़ती है. जबकि सुकरात न्याय को उसके वृहद संदर्भों में देख रहा था. सबकुछ जानते-समझते हुए भी सुकरात केफलस के विचारों को पुराना मानकर उसका उपहास नहीं करता. अच्छे विमर्शकार की भांति वह धैर्यपूर्वक सुनता और बाद में विनयपूर्वक उसका प्रतिवाद करता है. इसके लिए सिसरो ने सुकरात की प्रशंसा की है—‘सुकरात का आचरण एक उदाहरण है, जिसे अरस्तु ने दर्शन के अध्येता के लिए अनुकरणीय बताया है.’ न्याय की दृष्टि से सुकरात ने केफलस को भले ही निरुत्तर कर दिया हो, परंतु उसके अनुभवों से हमें व्यावहारिक नैतिकता की झलक मिलती है. जिनका दर्शन की दृष्टि से भले ही बहुत ज्यादा महत्त्व न हो, परंतु समाज का समूचा कार्य-भार सामान्यतः उसी पर केंद्रित होता है. प्रकारांतर में वह सुकरात को चरित्र की महत्ता से परचाना चाहता है. वह बताना चाहता है कि गरीबी निश्चित रूप से मनुष्य के सुख में बाधक बनती है. जीवन में अनेक परेशानियां और दुश्वारियां धनाभाव के कारण पैदा होती हैं. बावजूद इसके यह मान लेना कि जो अमीर हैं, जिन्हें कोई अभाव नहीं है, वे पूरी तरह प्रसन्न हैं अनुचित होगा. मनुष्य के लिए उसका चरित्र ही सच्ची दौलत है—इस तरह का सोच लंबे अनुभव और समाज के साथ सतत संवाद के बाद ही पनप सकता है. इसलिए व्यावहारिक न्याय और नैतिकता को देखते हुए केफलस के विचार मायने रखते हैं, हालांकि न्याय की परिभाषा की दृष्टि से उनका खास महत्त्व नहीं है.

केफलस को निरुत्तर देख उसका बेटा पोलीमार्क बहस में कूद पड़ता है. पोलीमार्क की न्याय संबंधी अवधारणा सीधी-सरल है. वह सोफिस्ट विचारकों से प्रभावित है. एक तरह से वह अपने पिता के न्याय संबंधी सहज बोध को ही आगे बढाता है. उसके अनुसार, ‘न्याय का अभिप्राय है—मित्रों को लाभ पहुंचाना और दुश्मनों को हानि.’ इस प्रकार का भेदभाव न्याय की आधारभूत मान्यता के विपरीत है. उसके आधार पर न्याय की कसौटी का निर्माण असंभव है. गौरतलब है कि उन दिनों यूनान के छोटे-छोटे राज्य परस्पर युद्ध करते रहते थे. युद्धक संस्कृति पूरे यूनान पर बढ़त बनाए थी. मित्र राज्यों की मदद तथा दुश्मन राज्यों का विरोध करना उस संस्कृति का सामान्य लोकाचार था. मित्रों के प्रति अनुराग और शत्रु से राग-विराग प्राचीन यूनानी समाज की सामान्य नैतिकता का हिस्सा था. सोलन की कविताओं में मिलता है—‘मुझे अपने मित्रों के प्रति सुखद तथा शत्रुओं के प्रति उदार बना दो.’ इसी तरह ईसा पूर्व आठवीं शताब्दी के कवि हेसियाद ने एक जगह लिखा था—‘वे हमें देंगे तो हम भी देंगे. वे यदि नहीं देंगे तो हम भी नहीं देंगे.’ प्राचीन भारत में न्याय की यही स्थिति थी. देवताओं से कुछ प्राप्त करने के लिए उन्हें अर्घ्य, भेंट-पूजा चढ़ाना. एक चढ़ाकर दस लाख की उम्मीद न करना. नहीं तो देवता के कोप-भाजन बनने से भयभीत रहना. यही व्यवस्था तत्कालीन राजनीति के न्याय-सिद्धांत की मुख्य प्रेरणा थी. राजा प्रसन्न हो तो भेंट-सौगात से मालामाल कर देता था. राजा के अप्रसन्न होने पर दंड सुनिश्चित था. दंड की मात्रा भी राजा के कोप और उसकी मर्जी पर निर्भर करती थी. कोई लिखित विधान न था. बाद में धर्मसूत्रों में हालांकि दंड संबंधी व्यवस्था देखने को मिलती है. परंतु उसका अनुसरण आवश्यक न था. राजा की मर्जी ही दंड विधान था. उसके विरोध में कहीं, कोई सुनवाई न थी.

पोलीमार्क का तर्क भी उससे प्रभावित है. परम जिज्ञासु सुकरात उसके तर्कां से आश्वस्त नहीं है. वह बताता है कि निष्पक्षता न्याय की कसौटी है. यदि नैतिकता की दृष्टि से सभी मनुष्य बराबर हैं, तो समान परिस्थितियों में उनके साथ एक जैसा व्यवहार करना ही न्यायिक उत्कृष्टता की कसौटी है. यदि दो व्यक्ति समान अपराध में लिप्त हों तथा उनमें से एक शासक का मित्र तथा दूसरा उसका शत्रु हो तो दोनों के अपराध का दंड क्या अलग-अलग होना चाहिए? व्यक्ति मित्रों के प्रति सामान्यतः उदार होता है, जबकि अमित्रों तथा दुश्मनों के प्रति अनुदार. ऐसे में उसका निर्णय निजी धारणाओं से प्रभावित होगा, जो न्याय-भावना के विपरीत है. पूर्वाग्रहवश वह मित्रों का पक्ष लेगा. जो मित्र नहीं हैं, उनके प्रति उसके निर्णय उपेक्षा से भरे, पक्षपातपूर्ण होंगे. पक्षपात जहां किसी अपात्र को लाभ पहुंचाता है, वहीं किसी अन्य व्यक्ति से जो उसका न्यायपूर्ण अधिकारी है, उचित अवसर छीन लेता है. सुकरात के अनुसार किसी को नुकसान पहुंचाना अथवा उसका बुरा करना न्याय की मूल अवधारणा के विपरीत है. फिर मित्रता कोई स्थायी संबंध नहीं है. दो व्यक्तियों के बीच संबंधों में उतार-चढ़ाव आते ही रहते हैं. आज जो मित्र हैं, कल वही दुश्मन भी बन सकते हैं. तदनुसार एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्तियों के प्रति व्यवहार भिन्न परिस्थितियों में अलग-अलग हो सकता है. अपने मत के समर्थन में प्लेटो सुकरात के माध्यम से कई तर्क प्रस्तुत करता है.

न्याय को यदि अच्छाई और बुराई से अभिव्यक्त होने वाला गुण मान लिया जाए तो कोई भी व्यक्ति उसका मनमाना उपयोग करने को स्वतंत्र हो जाएगा. एक डॉक्टर जो अपने उपचार द्वारा किसी रोगी को सही कर सकता है, उपचार न करके या जानबूझकर गलत उपचार द्वारा उसे नुकसान भी पहुंचा सकता है. प्रत्येक अवस्था में वह अपेने ज्ञान का उपयोग कर रहा होगा, हालांकि उसके परिणाम भिन्न-भिन्न होंगे. मगर जानबूझकर नुकसान पहुंचाने अथवा उपचार में लापरवाही बरतने की अवस्था में रोगी के प्रति उसके व्यवहार को न्यायपूर्ण नहीं माना जाएगा. न्याय कला भी नहीं है. कोई भी कलाकार अपनी कृति को रूपाकार देने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होता है. जबकि न्याय का न तो मनचाहा उपयोग संभव है, न ही मनमाने ढंग से उसे तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है. कलाएं अनुभव के साथ-साथ निरंतर परिष्कृत होती जाती हैं. जबकि न्याय के साथ ऐसा नहीं है. किसी भी समाज में न्याय उसकी आदर्शोन्मुखता का प्रतिरूप होता है. उसे अनुभव के आधार पर परिष्कृत नहीं किया जा सकता. सुकरात के अनुसार न्याय का सीमित अर्थों एवं संदर्भों में प्रयोग निषिद्ध है. वह बृहत्तर ज्ञान का विषय है. पोलीमार्क्स के तर्क के विरोध में सुकरात की अनेक शंकाएं हैं. उसके अनुसार मित्र को लाभ पहुंचाने और शत्रु का अहित करने की बात करना जितना आसान है, वास्तविक मित्र और शत्रु की पहचान करना उतना ही कठिन है. मनुष्य का व्यवहार बदलता रहता है. कुछ मनुष्य इतने तेज-तर्रार होते हैं कि उनके व्यवहार से पता ही नहीं चलता कि वे मित्र हैं या शत्रु? ऐसे लोग सामने हितैषी होने का दावा करते हैं, परंतु पीठ पीछे वे नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं. ऐसे मनुष्य के प्रति कैसा व्यवहार न्यायोचित होगा—यह समझ पाना आसान नहीं होता. ऐसे व्यक्तियों के लिए जिनकी मैत्री केवल दिखावा है, हमेशा लाभ की बात करना उन लोगों के प्रति प्रति सरासर अन्याय होगा जिनका व्यवहार आपको पसंद नहीं है, परंतु उन्होंने आपको या किसी अन्य को कभी भी नुकसान पहुंचाने की कोशिश नहीं की है. ऐसे व्यक्ति के साथ जो मन से बुरा नहीं है, या परिस्थितिवश बुराई अपनाने को विवश हुआ है—यदि दुर्व्यवहार किया जाए तो समाज के प्रति उसके विश्वास में कमी आएगी. दूसरी ओर जो व्यक्ति सचमुच बुरा है, यदि उसके अहित को न्याय मान लिया जाए तो वह अपने पक्ष को ही न्यायपूर्ण मान लेगा. इस प्रकार उसके सुधार की समस्त संभावनाओं का अंत हो जाएगा. न्याय की पहली शर्त करने वाले और जिसके साथ न्याय किया जा रहा है, स्पष्टता है. उसमें समिष्ठि की भावना अंतनिर्हित होती है. न्याय परिस्थिति-निरपेक्ष, व्यक्ति निरपेक्ष और देश-काल निरपेक्ष होता है. सार्वदैशिकता उसका गुण होता है. देश-काल के अनुसार अपराध की प्रवृत्ति, परिभाषाएं और उनके अनुरूप दंड विधान बदल सकता है, न्याय नहीं. उसे तो पक्षपात रहित और इन सभी से ऊपर, सर्वकल्याणकारी होना चाहिए. इसलिए न्यायशील व्यक्ति मित्र या शत्रु का भेद किए बगैर सर्वकल्याण की भावना के साथ न्याय को अपनाएगा. अतएव मित्र को लाभान्वित करने तथा अमित्र को नुकसान पहुंचाने की भावना न्यायसंगत नहीं कही जा सकती. किसी भी प्रकार का भेदभाव न्याय की मूल-भावना के पूरी तरह विपरीत है. सुकरात के तर्कों के बाद पॉलीमार्क्स तर्क छोड़कर बहस से बाहर आ जाता है. उस तर्क-शृंखला का समापन प्लेटो यह कहकर करता है कि ‘मित्रों के भलाई और दुश्मन के साथ बुराई जैसी धारणा पेरियांडर जैसे निरंकुश सम्राट ने बनाई होगी. प्रसंगवश बता दें कि पेरियांडर की गिनती यूनान के सात प्रसिद्ध संतों में की जाती है. यह उन दिनों की बात है जब वहां दार्शनिक का राजा होना श्रेष्ठतर माना जाता था. पेरियांडर ने कोरिंथ पर ईसापूर्व 625 से 585 ईस्वीपूर्व तक शासन किया था. आरंभ में उसका शासन बहुत दयालुतापूर्ण था. लेकिन बाद में वह दमन का रास्ता अपनाने लगा था.

‘रिपब्लिक’ को पढ़ते हुए कभी-कभी यह लगता है कि उसके पात्र प्लेटो की कल्पना की उपज हैं. उनकी भूमिका किसी न किसी विचार के पक्ष-विपक्ष को आगे बढ़ाने तक सीमित है. सुकरात का योगदान कहीं सूत्रधार का है, कहीं महत्त्वपूर्ण वक्ता के रूप में तो कहीं विभिन्न विचारधाराओं में समन्वयक का. संवाद के बीच अनेक व्यक्तियों की सहभागिता का उद्देश्य है कि उनके माध्यम से प्लेटो, अंतिम निष्कर्ष से पहले किसी एक विचार या अवधारणा के यथासंभव सभी पक्षों पर खुलकर विचार कर लेना चाहता है. वह लगातार यह सिद्ध करने की कोशिश करता है कि न्याय को लेकर परंपरागत किस्म की धारणाएं व्यावहारिक दृष्टि के लिए उपयोगी कही जा सकती हैं. परंतु विशिष्ट परिस्थितियों में उनकी उपयोगिता सीमित तथा अलाभकारी हो जाती है. व्यापक परिदृश्य में उनके अंतर्विरोध और सीमाएं सामने आने लगती हैं. न्याय पर चर्चा करते हुए सुकरात केवल अपने साथियों की न्याय-संबंधी अवधारणा में खोट नहीं निकालता. परिचर्चा के दौरान वह खुद का भी अविकल परिमार्जन करता जाता है. ‘रिपब्लिक’ में हम प्लेटो न्याय-संबंधी प्रारंभिक संकल्पना में एक के बाद एक सुधार हुआ पाते हैं. न्याय की अवधारणा पर शुरू हुई बहस में तीसरे पात्र के रूप में थ्रेचाइमच्स का आगमन होता है. प्लेटो ने उसे वाग्मिता में निपुण ऐसा व्यक्ति बताया है तो श्रोताओं की वासनाओं को उत्तेजित करने में दक्ष था. शिक्षा का प्राथमिक ध्येय ज्ञानार्जन है. जबकि सोफिस्टों के लिए वह केवल वाक्-कौशल अथवा वाक्-चातुर्य तक सीमित था. तो भी सोफिस्टों की ग्रीक संस्कृति में महत्ता से इन्कार नहीं किया जा सकता. सुकरात और प्लेटो के आगमन से पहले सोफिस्ट ही थे, जिनसे ग्रीक संस्कृति का बोध होता था. वे अपनी विचारधारा और तर्क-सामर्थ्य के आधार पर जाने जाते थे. तर्क-नैपुण्य उनके लिए इतना महत्त्वपूर्ण था कि आगे चलकर उन्होंने उसी को अपना व्यवसाय बना लिया था. यूनानी समाज में उनकी हैसियत ठीक ऐसी ही थी जैसी भारत में पुरोहित वर्ग की. थ्रेचाइमच्स के विचार ‘सत्ता-सर्वेसर्वा’ का प्रतिनिधित्व करते हैं. बहस में उतरने के पश्चात वह दावा करता है कि शक्तिशाली की हित-सिद्धि ही न्याय है. उसके अनुसार—‘सबल सर्वदा सही होता है.’ ‘राजा जो करे वही न्याय’—ऐसी मान्यता भारत में भी रही है. तुलसी ने लिखा है, ‘समरथ को नहिं दोष गुसाईं.’ इसी से शायद यह कहावत भी बनी है—‘जिसकी लाठी उसकी भैंस.’ अपने मंतव्य को स्पष्ट करता हुआ थ्रेचाइमच्स कहता है—

‘विभिन्न प्रकार के राजदर्शनों यथा जनतंत्रात्मक, निरंकुश, कुलीनतंत्री आदि के आधार पर गठित सरकारें इस प्रकार के कानून बनाती हैं, जिनके द्वारा उनकी अपनी स्वार्थ-सिद्धि होती है. निहित स्वार्थ के लिए बनाए गए कानूनों को ही वे न्याय की संज्ञा देती हैं और चाहती हैं कि लोग बिना कोई प्रश्न उठाए उनका पालन करें. जो व्यक्ति उनके आदेश की अवहेलना करता है उसे वे कानून के उल्लंघन का तर्क देते हुए दंडित करती हैं. सभी राज्यों में न्याय का एकमात्र उद्देश्य है शासकीय वर्गों का हित. चूंकि राज्य अपने आप में शक्तिशाली तंत्र होता है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि न्याय सर्वत्र एक ही है, वह है—शासक वर्ग का हित और शक्तिशाली का स्वार्थ.’

थ्रेचाइमच्स के अनुसार न्याय शक्तिशाली का अधिकार है. जो शक्तिसंपन्न है, वह न्याय को अपने पक्ष में कर लेता है. शक्तिशाली हमेशा अपने पक्ष में कानून बनाता है. सवाल है शक्ति कैसी? देह की, मन की या किसी और प्रकार की? सुकरात प्रश्न करता है. थ्रेचाइमच्स इस बारे में स्पष्ट है. वह शारीरिक शक्ति से इन्कार करता है. भूल जाता है कि शारीरिक शक्तियों, जिनमें बौद्धिक सामर्थ्य भी सम्मिलित है, से इतर जितनी भी शक्तियां हैं, वे सभी व्यक्ति को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में समाज की ओर से प्राप्त होती हैं, भले ही समाज अपनी इस देन को गंभीरता से न लेता हो. उसमें व्यक्ति की अपनी प्रतिभा एवं परिश्रम का भी योगदान होता है, परंतु इतना नहीं कि समाज के योगदान की बराबरी कर सके. अध्ययन-अध्यापन, अनुभव आदि के माध्यम से मनुष्य जो ज्ञान अर्जित करता है, वह उसकी पूर्ववर्त्ती पीढ़ियों के अनुभवों का निचोड़ होता है. परंतु अहंभाव के चलते व्यक्ति समाज की देन को अपनी मान बैठता है. यह उसका अहंभाव है. अपने ज्ञान पर गर्व करने का अधिकार उसे है. लेकिन पूर्ववर्त्ती पीढ़ियों के योगदान को बिसरा देना भी अनैतिक कर्म है. थ्रेचाइमच्स नेतृत्व के अधिकार को शक्ति मानता है. उसके अनुसार जिसके पास कानून बनाने की शक्ति है, उसे दूसरों पर नियंत्रण का अधिकार और अवसर स्वतः प्राप्त हो जाते हैं. थ्रेचाइमच्स की कसौटी है कि जो शक्ति-संपन्न है, वह न्याय-संपन्न भी है. कानून-निर्माता होने के कारण शक्तिशाली सदैव लाभ की अवस्था में रहता है. उस गड़हरिया की भांति जो अपनी भेड़ों को इसलिए पालता है ताकि समय आने पर वह उनसे काम ले सके. जिसमें जरूरत पड़ने पर उसकी बलि भी शामिल है. थ्रेचाइमच्स का विचार प्राचीन राजनीति के बेहद करीब है. प्राचीन सम्राट अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के लिए प्रजा को कभी भी युद्ध में उतार सकते थे, लोगों से मनचाहा काम या बेगार ले सकते थे. थ्रेचाइमच्स के अनुसार जो लोग शासन से दूर हैं, जिन्हें कानून बनाने या बदलने का कोई अधिकार नहीं है, वे सामान्यतः नुकसान में रहते हैं. शिखर पर मौजूद व्यक्ति यदि जनता की भलाई के लिए काम भी करता है तो इसलिए कि उसके पीछे उसका कहीं बड़ा स्वार्थ निहित है. सुकरात को यह तर्क मंजूर नहीं है. उसके अनुसार ऐसा करना राज्य की नीयत को कठघरे में लाना तथा उसके औचित्य के आगे प्रश्न-चिह्न लगाना है, शिखर पर मौजूद लोग अपना स्वार्थ देखते हैं. परंतु वे ऐसा हमेशा करें, यह आवश्यक नहीं है. डॉक्टर अपनी प्रक्टिश केवल धन जुटाने के लिए नहीं करता. लोग सेवाभाव से भी चिकित्सक के पेशे को अपनाते आए हैं. यही बात शिक्षक पर भी लागू होती है. कलाकार भी लोक-कल्याण का भाव लेकर कला-साधना करता है.

सुकरात को विपरीत-कथन या व्याजोक्ति के लिए भी जाना जाता है. बहस के दौरान ऐसा ही विपरीत-कथन जैसा थ्रेचाइमच्स भी करता है. हालांकि वह अपने विचारों पर दृढ़ है और उसका यह कथन ‘शक्तिशाली सदा सही’ का ही विस्तार है. वह कहता है—‘अन्याय करना न्याय करने से बेहतर है.’ अपने तर्क को नई दिशा में बढ़ाता हुआ थ्रेचाइमच्स कहता है कि न्याय को शक्तिशाली की इच्छा या उसके लाभ तक सीमित कर देने से प्रत्येक व्यक्ति को उसका लाभ नहीं मिल पाएगा. बल्कि जो अन्यायी है वह अधिक प्रसन्न और संतुष्ट दिखाई पड़ेगा. इन परिस्थितियों में अन्याय अधिक सुखदायी और आश्वस्तिकारक हो सकता है. इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति केवल अपने स्वार्थानुरूप कार्य करेगा, जिसके लिए उसे अन्यायी मान लिया जाएगा. जबकि वह वही कर रहा है, जिसे करने में वह सक्षम है और जिसके द्वारा उसकी स्वार्थ-सिद्धि संभव है. कुल मिलाकर व्यक्ति का हित अन्यायी बनने में है. अपने तर्क की पुष्टि के लिए थ्रेचाइमच्स के पास अपने तर्क हैं. आप उन्हें कुतर्क सकते हैं; और चाहें तो वाग्जाल भी. लेकिन अन्य सोफिस्टों की भांति थ्रेचाइमच्स को भी अपनी इस कला पर गर्व था. अपने तर्क को आगे बढ़ाता हुआ वह कहता है—‘यदि न्यायी और अन्यायी दो व्यक्ति साथ-साथ व्यापार करें तो लाभ की गणना के समय यह कहना बहुत कठिन होगा कि न्यायी को अधिक लाभ हुआ हो. संभावना इसी की है जो अन्यायी है, उसने अधिक लाभ कमाया हो. व्यवहार में प्रायः देखा जाता है कि न्यायी व्यक्ति हमेशा घाटे में रहता है, जबकि अन्यायी ज्यादा ऐंठ ले जाता है. कराधान के समय भी अन्यायी कर-चोरी कर लाभ की अवस्था में रहता है. दूसरी ओर न्यायी व्यक्ति ईमानदारी बरतते हुए अधिक कराधान कर अपेक्षाकृत घाटे में रहता है. राज्य की ओर कोई सुविधा प्राप्त करनी हो तो अन्यायी आगे बढ़कर ज्यादा हाथ मार ले जाता है, जबकि न्यायी वहां भी पिछड़ जाता है. इन तर्कों से वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि न्यायी व्यक्ति से अन्यायी होना अच्छा है. थ्रेचाइमच्स के अनुसार, ‘न्याय बलवान का स्वार्थ’ अथवा ‘सबल की स्वार्थ दृष्टि है.’ जनसाधारण को न्याय सिवाय आत्मतुष्टि के, कुछ नहीं दे पाता. थ्रेचाइमच्स का तर्क यहीं समाप्त नहीं होता. वह आगे बढ़कर शासकीय पदों पर विराजमान व्यक्तियों की तुलना करते हुए कहता है कि अन्यायी व्यक्ति, न्यायी की अपेक्षा सदैव अधिक लाभ कमाते हैं. अन्यायी व्यक्ति न केवल अपने परिजनों को अधिक सुख दे पाता है, बल्कि न्यायी की अपेक्षा अधिक यश-लाभ का भी भागी बनता है. अन्याय जितना बड़ा हो, लाभ में रहने की संभावना भी उतनी ही बढ़ जाती है. छोटी-मोटी चोरी या लूट करने वाले चोर-डकैत कहे जाते हैं और समाज में अपमान और दंड के भागी बनते हैं. जबकि अपनी सेना और शक्ति के भरोसे यदि कोई नरेश दूसरे राज्य को लूटकर ले जाता है तो वह यश का भागी बनता है. चारणवृंद उसकी गौरव-गाथाएं लिखते हैं. इसलिए थ्रेचाइमच्स कहता है कि—‘हे सुकरात! पर्याप्त रूप से बड़े स्तर पर किया गया अन्याय, न्याय की अपेक्षा अधिक गौरवशाली, स्वच्छंद एवं यश-लाभ देने वाला कार्य है.’ उस समय थ्रेचाइमच्स न्याय के साथ-साथ लाभ को भी बहुत सीमित संदर्भों में ले रहा होता है. या यह कहें कि न्याय और लाभ को लेकर शक्तिशाली की जो दृष्टि है, वह उसी को आगे बढ़ाता है. आदर्श राज्य में लाभ का अभिप्रायः केवल मौद्रिक लाभ तक सीमित नहीं रहता. बल्कि उसके सारे कारोबार और संकल्प सामाजिक लाभ की दृष्टि के साथ रचे जाते हैं. राज्य व्यक्तियों से इतर संस्था नहीं है. वह अपने नागरिकों की सामूहिक इच्छा और संकल्पशक्ति का ही रूप है. राज्य की समस्त शक्तियां, संसाधन तथा लक्ष्य उसके नागरिकों के सामूहिक श्रम तथा इच्छा का सुफल होते हैं. इसलिए जो व्यक्ति ईमानदारी से अपना अपना काम करते हुए यथानिर्दिष्ट कराधान देता है, वह परोक्ष रूप में उन कार्यों को पूरा करने में भी सहभागी बनता है, जिनके लिए राज्य का गठन किया गया है. ऐसा व्यक्ति मौद्रिक अवदान के बदला सामाजिक लाभ के अपेक्षाकृत वृहत्तर संदर्भों में प्राप्त करता है.

थ्रेचाइमच्स का कथन सर्वथा गलत भी नहीं है. सामान्य धारणा यही है कि न्याय सदैव सबल का पक्ष लेता है. शक्तिशाली के आगे अदालतें भी झुक जाया करती हैं. रोजमर्रा के सामान्य अनुभवों से न्याय को लेकर एक दृष्टिकोण यह भी बनता है कि न्याय का जन्म दुर्बलों को शक्तिशाली वर्ग की लोभ, लालच और स्वार्थपरता से बचाने के लिए हुआ है. समाज में यदि सभी सबल हों अथवा सभी दुर्बल हो तो न्याय की कदाचित आवश्यकता ही न पड़े. इसलिए न्याय एक कृत्रिम व्यवस्था है, जो असमानताओं के अन्याय को पाटने के लिए जरूरी मानी गई है. उसे ‘भय की संतान’ या कमजोर का ‘रक्षाकवच’ भी कहा जा सकता है. प्रकृति में भी हम देखते हैं कि वहां जो शक्तिशाली है, वह सदैव लाभ की अवस्था में रहता है. इसलिए न्याय और कानून जैसी कृत्रिम व्यवस्थाएं कमजोर वर्ग की सुरक्षा और बेहतरी के लिए की गई हैं. वे शक्तिशाली वर्ग की मनमानी पर रोक लगाने तथा दुर्बल वर्ग को संरक्षण देने का काम करती हैं. ‘रिपब्लिक’ के अगले ‘संवाद’ में प्लेटो गलाकॉन के मुंह से कहलवाता है—‘जनसाधारण की मान्यता है कि न्याय को वास्तविक अच्छाई और शुभता का पर्याय कभी नहीं माना जा सकता. असल में वह ऐसी चीज है जिसको अन्याय न कर पाने की क्षमता के कारण स्वीकार्य माना जाता है.’ ग्लाकॉन के अनुसार न्याय की जरूरत कमजोर व्यक्ति की अन्याय न कर पाने की क्षमता तथा अन्यायी का सामना न करने की अक्षमता के कारण पड़ती है. दूसरे शब्दों में न्याय कमजोर की बैशाखी है, और शक्तिशाली की राह की बाधा. थ्रेचाइमच्स जहां न्याय को शक्तिशाली व्यक्तियों का हित स्वीकारता है, ग्लाकॉन उसे भय की भावना के कारण दुर्बल वर्ग के हित में बनाई कई अनिवार्यता की संज्ञा देता है. दोनों ही न्याय को बनावटी और दुर्बल वर्ग की रक्षा के लिए बनाई गई व्यवस्था स्वीकारते हैं. दोनों का मानना है कि न्याय को अपने आप में नैतिक या शाश्वत सिद्धांत नहीं माना जा सकता. अपने पक्ष को प्रस्तुत करते हुए थ्रेचाइमच्स कुतर्क की सीमा तक चला जाता है. उसके कहने का आशय है कि मनुष्य अपनी शक्ति के बल पर जितना समेट सकता है, उतना समेट लेने का उसे अधिकार है और यह काम उसे करते रहना चाहिए. इसी में उसका सुख है. वह संतोष को दुर्बल व्यक्ति द्वारा किया गया समझौता मानता है. लोकतंत्र में भी जनता यदि शासन की ओर से मुंह मोड़ ले, पूरी तरह निर्वाचित प्रतिनिधियों पर छोड़कर शासन की ओर से उदासीन हो जाए तो लोकतंत्र के अल्पतंत्र में बदलने में देर नहीं लगती. ऐसे राज्यों के कानून केवल अल्पतंत्र के हितों का ही रक्षण करते हैं. लोकतांत्रिक सरकारें निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा संचालित होती हैं. उनमें निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथों में जो संख्या में अत्यल्प होते हैं—कानून बनाने के अधिकार होते हैं. संयोग से अल्पतंत्र में भी कानून बनाने का अधिकार सीमित वर्ग के अधीन होता है. इसलिए जनता की उदासीनता अथवा जनमत के बंटा होने पर शासन-शिखर पर मौजूद लोगों को मनमानी का अधिकार मिल जाता है. परिणामतः जनतंत्र के अल्पतंत्र में बदलते देर नहीं लगती.

थ्रेचाइमच्स के अनुसार द्वारा ‘शक्तिशाली सदा सही’ कहना अनुभव-सिद्ध निर्णय था. जिस दौर में सोफिस्ट विचारधारा पनपी थी, उस दौर के शासकों के लिए शक्ति की सबकुछ थी. यूनान ही क्यों, प्राचीन सभी सभ्यताओं में लगभग वही स्थिति थी. भारत में इसे धर्म कहा गया है; और धर्म के नाम पर सत्ता के प्रत्येक धत्तकर्म को श्रेय की कोटि में रख दिया जाता था. राम जब शंबूक को मृत्युदंड देता है, निर्दोष पत्नी को वनवास की सजा सुनाता है अथवा बालि की छिपकर हत्या करता है, तो तत्कालीन विधान उसे दोष नहीं देता. उल्टे उसका महिमा-मंडन करता है. चूंकि राम वर्चस्वकारी संस्कृति का महानायक है, इसलिए उसके दोष पर पर्दा डालने के लिए समर्थन में तर्क गढ़ लिए जाते हैं. धर्म-विजय कहकर शक्तिशाली के वर्चस्व को अधिमान्य ठहराया जाता है. महाभारत युद्ध को जीतने के लिए कृष्ण कदम-कदम पर छल करता है. उसकी हर चतुराई और छल का भी धर्म बताकर महिमामंडन कर दिया जाता है. अपने स्तर पर यही काम संस्कृति भी करती है. इसे विजेता संस्कृति का दर्प भी कह सकते हैं, जो इतिहास और सांस्कृतिक प्रतीकों की व्याख्या अपने स्वार्थ के अनुरूप करती रहती है. प्लेटो का ध्येय न्याय संबंधी प्रचलित अवधारणाओं पर विचार करते हुए उसके वास्तविक रूप की पहचान करना है. थ्रेचाइमच्स का तर्क तत्कालीन यूनानी प्रभुवर्ग की सामान्य मानसिकता को दर्शाता है. चर्चा के दौरान सवाल करने पर वह कहता है—‘न्याय असल में दूसरों के कल्याण से ही संबंधित है. शासकवर्ग नियम बनाता है, इसलिए वह सदैव लाभ की अवस्था में रहता है.’ किसी न किसी रूप में वह उन्हीं नियमों को मान्यता देता है जो उसके लिए हितकारी हैं. जो व्यक्ति उन नियमों को एकतरफा मानकर उसका विरोध करता है, उन्हें वह दंडित करता है; अथवा उपेक्षित कर हाशिये पर ढकेल देता है.’ उस समय वह बड़ी चतुराई से संस्कृति, समाज तथा कानूनी प्रावधानों की अपने पक्ष में व्याख्या करता है. न्याय की यह अवधारणा सुकरात की निगाह में उचित नहीं है. यदि शक्तिशाली द्वारा मनमाने ढंग से, केवल अपने हितों में काम करने को न्याय मान लिया जाए तो उसकी मूल अवधारणा ही खतरे में पड़ जाएगी. न्याय को परखने के लिए वह तीन कसौटियां बनाता है—‘कौन-सा कार्य बुद्धिमत्तापूर्ण है?’ ‘सबसे सुरक्षित रास्ता क्या है?’ तथा ‘जीवन में शुभत्व की स्थापना किस प्रकार संभव है?’ सुकरात के लिए इनमें तीसरा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है.

‘रिपब्लिक’ की शैली में दार्शनिक गांभीर्य है. प्लेटो न तो व्यंजना का सहारा लेता है, न ही अनपेक्षित संवेदना को बीच में हालात है. ध्रेचाइमच्स के माध्यम से वह सोफिस्टों की न्याय-संबंधी अवधारणा को हमारे सामने लाता है. सोफिस्ट शक्ति का आराधन करने वाले थे. लेकिन उनके राज्य बड़े नहीं थे. जब चारों और शक्ति का बोलबाला हो और लोग समाज की समन्वित शक्ति के बजाय अपनी-अपनी शक्ति पर नाज करते हों तो संघर्ष की स्थितियां बनेंगी ही. सो उस समय तक राज्य नगरीय सीमाओं में सिमटे हुए थे. थ्रेचाइमच्स शक्ति के सर्वसत्तावादी दृष्टिकोण को हमारे सामने रखता है. सुकरात को माध्यम बनाकर प्लेटो उसका प्रतिवाद करता है. बताता है कि केवल शक्ति-आराधन से राज्य नहीं बनते. प्रत्येक समाज में ऐसे लोग होते हैं जो दूसरों के लिए समर्पण-भाव से जीना जानते हैं. डॉक्टर अपना पेशा दूसरों के भले के लिए चलाता है. अध्यापक ज्ञान बांटता है. दर्जी दूसरों के लिए वस्त्र सिलता है, कलाकर लोककल्याण की भावना के साथ चित्र बनाता है. ठीक है ये सब अपने-अपने कार्य के बदले में समाज से कुछ वसूलते हैं. डॉक्टर रोगी से फीस लेता है. अध्यापक को पढ़ाई के बदले वेतन मिलता है. इसी तरह दर्जी, कलाकार आदि भी अपने-अपने श्रम-कौशल के बदले समाज से कुछ न कुछ प्राप्त करते हैं. परंतु यह सब तो इसलिए आवश्यक है ताकि वे समाज को अपनी अनवरत सेवाएं प्रदान कर सकें. इससे उनके योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता. ‘रिपब्लिक’ में थ्रेचाइमच्स सुकरात के तर्कों के आगे शांत हो जाता है. परंतु जिस प्रकार वह शक्ति का पक्ष लेता है, उसके सर्वसत्तावादी दृष्टिकोण का समर्थन करता है, उसका प्रभाव पीढ़ियों तक बना रहता है. थ्रेचाइमच्स के दृष्टिकोण का विस्तार उनीसवीं शताब्दी में, नीत्शे के दर्शन में नजर आता है. प्लेटो ने जहां दार्शनिक सम्राट की परिकल्पन की थी, नीत्शे ने महामानव की परिकल्पना की, जो प्लेटो के दार्शनिक सम्राट जैसा ही सर्वगुणसंपन्न, विराट व्यक्त्वि का स्वामी है. अपनी पुस्तक The genealogy of morals में वह  ‘दास नैतिकता’ और ‘स्वामी नैतिकता’ की बात करता है. उसके अनुसार स्वामी के नैतिक मूल्य शक्ति, सदाचरण, सज्जनता, अच्छे और बुरे को परखने की दृष्टि से देखे जा सकते हैं, जो दास की नैतिकता ‘समर्पण’, दयालुता, मानवता, करुणा और संवेदना से परखी जा सकती है.

प्लेटो मानता है कि सृष्टि में पूर्ण समानता असंभव है. जितने भी प्राणी हैं उनमें परस्पर अनेक भिन्नताएं हैं. प्रकृति में देखा जाता है कि शक्तिशाली कमजोर पर राज्य करता है. उसपर अधिकार जमाकर किसी न किसी रूप में उसके अधिकारों का हनन करता है. ऐसे में राज्य की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है. राज्य प्राकृतिक असमानताओं की खाई को पाटते हुए लोगों को समान धरातल पर लाने का प्रयास करता है. यही उसके गठन का उद्देश्य भी है. साधारण सोच यही है कि शक्तिशाली को दुर्बल पर राज्य करना चाहिए. वृहद सामाजिक हितों के लिए यह अत्यावश्यक है. सोफिस्ट चिंतक यही मानते थे. ‘जार्जियस’ नामक संवाद में प्लेटो स्वयं यूनानी विचारक केलीक्लिस के विचारों से सहमत नजर आता है. वह स्वीकारता है कि प्राकृतिक आधार पर असमानताओं की भरपाई के लिए शक्तिशाली को समाज के कमजोर पक्षों का समर्थन, प्रोत्साहन करते हुए शासन करना चाहिए. इसी से प्राकृतिक स्तर पर गैरबराबरी को कम किया जा सकता है. सुकरात वहां भी प्रतिवादी के रूप में उपस्थित हो जाता है. वह उसी प्रश्न को दोहराता है, जो उसने थ्रेचाइमच्स से किया था कि श्रेष्ठतम के चयन की कसौटी क्या हो? शक्ति या फिर बुद्धिमत्ता? केवल ताकत के भरोसे शासन करना संभव नहीं है. जनता की सामूहिक शक्ति किसी भी शक्तिशाली शासक के कुल सैन्य-सामर्थ्य से अधिक होती है. प्रजा ही कभी समर्थन तो कभी निष्क्रिय रहकर राज्य के सर्वसत्तासंपन्न होने का भ्रम पैदा करती है. युद्ध तक में शारीरिक बल से अधिक बुद्धिबल की आवश्यकता पड़ती है. दूसरे शारीरिक बल को श्रेष्ठता का पर्याय मान लेना प्रकारांतर में प्राकृतिक न्याय को सामाजिक न्याय मान लेने जैसा ही है. यदि मान लिया जाए कि शक्ति ही सबकुछ है तो उसके आधार पर प्रतिफल की अपेक्षा से कौन रोक सकता है. सुकरात के अनुसार केलीकिल्स न्याय की मूल-भावना को पकड़ने में असमर्थ है. केवल शक्ति को न्याय का पर्याय बताकर वह अन्याय का पक्ष लेने की गलती कर जाता है. पहले चरण की बहस बेनतीजा समाप्त होती है. उससे हम यह तो जान लेते हैं कि ‘न्याय क्या नहीं है’, परंतु यह नहीं जान पाते कि ‘न्याय वास्तव में क्या है?’

© ओमप्रकाश कश्यप

न्याय की पाश्चात्य अवधारणा

न्यायमूलक भावना ही मनुष्यता के साथ प्रेम संबंधों का नैरन्तर्य है.1जॉन रॉल्स

न्याय बड़ा खूबसूरत शब्द है. साथ में सम्मानित भी. परंपरा में वह शब्दों का ‘अभिजन’ है. इसीलिए जो व्यक्ति ईमानदार और न्यायकर्ता है, जिसके पास न्याय करने का अधिकार है. किसी भी दबाव, विशेषकर सत्ता के दबावों से जो मुक्त है, ‘दूध को दूध और पानी को पानी’ सिद्ध करने की कला जिसे आती है—जनसाधारण उसकी ओर उम्मीद-भरी निगाह से देखता है. आवश्यकता पड़ने पर वह अपने जीवन में ऐसे ही न्याय की कामना करता है. किसी भी समाज में न्याय का स्तर उस समाज में मानवीय अधिकारों की पहुंच का भी संकेतक होता है. समृद्ध न्याय-बोध हेतु परिपक्व अधिकारबोध आवश्यक है. परंपरागत समाजों में मनुष्य का अधिकारबोध, सामूहिकताबोध के दबावों से मुक्त नहीं हो पाता था. सामूहिकता का दायरा परिवार, बस्ती, जाति-समूह, पंचायत वगैरह कुछ भी हो सकता था. साधारणजन उन्हीं के बीच रहते हुए प्रचलित सांस्कृतिक प्रतीकों, लोकगाथाओं, रूपकों और मिथों से अपने न्यायबोध का संस्कार करता था. हालात आज भी वही हैं. आज भी किस्से-कहानियां जनसाधारण के न्यायबोध को बनाते हैं. बचपन से ऐसे अनेकानेक किस्सों, मिथों, धार्मिक प्रतीकों और गाथाओं से उसका वास्ता पड़ता है, जो उसे न्याय की प्रतीति कराते हैं. या जिन्हें उसके समक्ष न्याय के मानक के रूप में पेश किया जाता है. ‘जहांगीर का न्याय’, ‘अकबर-बीरबल’, ‘खोजा-बादशाह’, ‘मुल्ला नसरुद्दीन’, उपनिषदों और महाकाव्यों की कहानियों के अलावा समाज में लोक-किस्सों की भरमार हैं. उलझनों के बीच वही हमारी प्रेरणा बनते हैं. वही हमारे लोकमानस को बनाते हैं. उन्हीं से हमारे भीतर न्याय का संस्कार बनता है. भारतीय धर्मग्रंथों में यमराज को भी न्याय-प्रिय बताया गया है. उसे लेकर अनेक कहानियां और मिथ समाज में विद्यमान हैं. चूंकि उनके मूल में मिथकीय अंश ज्यादा हैं, इसलिए वे न्यायबोध को निखारने के बजाय तयशुदा निष्पत्तियों को थोपने का ही काम करते हैं. अपने समग्र प्रभाव में वे व्यक्ति को न्याय की मूल अवधारणा से दूर ले जाते हैं. जिस न्याय पर हम फिलहाल विचार करने जा रहे हैं, उसका दायरा विस्तृत है. वह बादशाह, काजी, अदालत, यमराज या किसी दयालु सम्राट के परंपरागत न्याय-बोध से परे है. न्याय के विविध रूपों पर विचार करने से पहले दो किस्से, बतौर उद्धरण यहां प्रस्तुत हैं—

‘महमूद गजनबी का पिता सुबुक्तगीन गजनी के बादशाह का गुलाम था. कहते हैं कि प्रतिभा किसी की चेरी नहीं होती. गरीब के घर विद्वान जन्म ले सकता है, और तमाम इंतजामात के बावजूद बादशाह का बेटा निकम्मा, आलसी, दुर्व्यसनी और मंदबुद्धि हो सकता है. तुर्की मूल के गुलाम सुबुक्तगीन की प्रतिभा को देखते हुए गजनी के बादशाह ने उसे अपना दामाद बना लिया था. अवसर मिला तो सुबुक्तगीन की साम्राज्यवादी लालसाएं जोर मारने लगीं. उसने भारत पर आक्रमण कर कांधार पर कब्जा कर लिया और वहां अपनी छावनी बना दीं. सुबुक्तगीन भारतीय इतिहास में खुद तो ज्यादा हस्तक्षेप न कर सका. लेकिन उसके बेटे महमूद गजनवी ने भारत के बड़े हिस्से पर कब्जा कर अपनी सलनत कायम कर ली. महमूद गजनवी भले ही सुलतान हो, हजारों सैनिकों की फौज का बेड़ा रखता हो. परंतु यह बात वह भी भली-भांति जानता था कि राजा-महाराजाओं को तलवार के दम पर दबाया जा सकता है. परंतु प्रजा को तलवार के बल पर लंबे समय तक दबा पाना असंभव होता है. निहत्थी जनता यदि अपनी पर आ जाए तो बड़े-बड़े साम्राज्य भू-लुंठित होने लगते हैं. हां, उसे भुलावे में जरूर रखा जा सकता है. धर्म, परंपरा, संस्कृति, राष्ट्रवाद जनता को भुलावे में रखने के ही उद्यम हैं. निजी मंसूबों को साधने के लिए चालबाज लोग इन्हीं का सहारा लेते आए हैं. भारतीय राजाओं का इतिहास रहा है कि वे आपसी फूट द्वारा प्रतिपक्षी की विजय को खुद आसान बना देते थे. सुबुक्तगीन को इसी का लाभ मिला था. अपनी छोटी-सी सेना की मदद से उसने युद्ध में स्थानीय राजा जयपाल को बुरी तरह पराजित किया था. उस युद्ध में जयपाल ने एक लाख सैनिक उतारे थे. परंतु युद्ध कौशल का अभाव और आपस की फूट ने उसे हथियार डालने को विवश कर दिया था.

बड़ी सलतनत खड़ी करने और लंबे समय तक बनाए रखने के लिए प्रजा का भरोसा जीतना भी आवश्यक है. सो मोहम्मद गजनवी ने प्रजा को न्याय का भरोसा दिलाया. विश्वास दिलाया कि न्याय के आगे बादशाह हो या फकीर सब बराबर हैं. ‘मनुस्मृति’ के विधान के जरिये ऊंच-नीय और गैरबराबरी में जीने वाले भारतीय जनसमाज के लिए ‘इस्लाम का बराबरी का सिद्धांत’ बड़ा ही आकर्षक सिद्ध हुआ. वर्ण-व्यवस्था के सताए लोग इस्लाम में दीक्षित होने लगे. नए धर्म में शामिल होने के बाद उनके हालात में क्या सुधार हुआ, यह कहना कठिन है. परंतु यह बात सही है कि इस्लाम अपने साथ कई आकर्षक परंपराएं भी लेकर आया था. प्राचीन फारस में न्याय के लिए काजी नियुक्त करने की व्यवस्था थी. काजी उसे बनाया जाता था जो अनुभवी हो. निडर हो. राजा-प्रजा के भेद से जिसका न्याय प्रभावित न होता हो. महमूद का काजी था—मोहतसिब. वह सुलतान के किसी भी आदेश से बरी था. न्याय के लिए उसे किसी खास समय की दरकार न थी. इसलिए लोग उसे चलता-फिरता न्यायालय मानते थे. उसका देखा-सुना ही प्रमाण था. घटना का यदि वह स्वयं साक्षी हो तो बिना किसी औपचारिकता के घटना-स्थल पर अदालत लगा, मामले को वहीं निपटा देता था. राज्य में सामाजिक स्थलों पर शराब पीने या शराब पीकर बाहर निकलने पर पूरी पाबंदी थी. एक दिन सुलतान और उसके सरदार ने शराब पी. नशे से दोनों झूमने लगे. शराब पीने के बाद सरदार ने घर जाने की इच्छा जाहिर की. इस पर सुलतान ने उसे रोका. समझाया कि नशा उतरने के बाद बाहर निकलना. लेकिन सरदार न केवल शराब का बल्कि रुतबे का नशा भी सवार था. सो सुलतान की सलाह की परवाह किए बिना वहां से चल दिया. संयोग ऐसा कि उसी समय काजी मोहतसिब खाना खाने के बाद घूमने के लिए निकला था. उसने सरदार को डगमगाते कदमों से गुजरते देखा तो गुस्सा आ गया. तत्क्षण सरदार को गिरफ्तार कर कोड़े लगाने का दंड सुनाया गया. न्याय हुआ, स्वयं बादशाह अपने चहेते सरदार को बचा न सका.’

ऐसे किस्सों में कितना सच होता है कितना झूठ, यह ठीक-ठीक बता पाना आसान नहीं है. सभी राजा-महाराजा, बादशाह-सुलतान दरबार में भाटों को नियुक्त रखते थे. उनका काम ही था, राजा की महिमा का बखान करते रहना. ताकि जनता को अपने राजा पर भरोसा बना रहे. उस समय तक ‘राजा’ और ‘राज्य’ में बड़ा अंतर नहीं था. राजा एक व्यक्ति के साथ-साथ संस्था भी होता था. उसकी इच्छा ही न्याय होती थी. जाहिराना तौर पर उसका झुकाव राजा के करीबियों की ओर अधिक होता था. न्याय के दूसरे स्वरूप को जानने के लिए दूसरा किस्सा प्रस्तुत है. यह न्याय से जुड़े नैतिक पक्ष की ओर संकेत करता है. महाभारत के वनपर्व में राजा उशीनर के न्याय की कहानी आई हैं. कुछ पुराणों इस कहानी को महान असुरराज बलि की दानवीरता से भी जोड़ा गया है—

‘एक दिन उशीनर दरबार में बैठे हुए थे कि एक घबराया हुआ कबूतर उनकी गोद में आकर गिरा. पीछे-पीछे एक बाज भी वहां आ पहुंचा. शरणागत की रक्षा के लिए उशीनर ने तलवार उठा ली. इस पर बाज बोला—‘महाराज! यह मेरा भोजन है. इसपर मेरा अधिकार है.’ उशीनर ने कबूतर की आंखों में झांककर देखा, वहां भय ही भय था. उसे देख राजा ने कहा—‘यह मेरी शरण में आया है और शरणागत की रक्षा करना मेरा धर्म है.’ बाज इस प्रश्न के उत्तर के लिए तैयार था. बोला—‘आपकी दया और दानवीरता के अनेक किस्से मैं सुन चुका हूं. इस समय मैं भूख से व्याकुल हूं. अगर जल्द कुछ इंतजाम न हुआ तो मैं यहीं दरबार में सबके सामने अपने प्राण त्याग दूंगा. राज्य में भूख के कारण मेरी अकाल मृत्यु के जिम्मेदार एकमात्र आप होंगे.’

उशीनर पेशोपेश में पड़ गया. कबूतर भयभीत था. राज्य-धर्म कहता था, शरण में आए की रक्षा करना. दूसरी ओर बाज भी अपनी जगह सही है. सृष्टि में ऐसे अनेक प्राणी है जिनका आहार दूसरे जीव हैं. प्रकृति की इस व्यवस्था को भी नहीं बदला जा सकता. सहसा राजा ने निर्णय लिया. उसका दायां हाथ उठा. कटार चली. राजा ने जांघ पर प्रहार कर मांस का एक हिस्सा शरीर से अलग कर दिया—‘कबूतर के मांस के बराबर मेरा मांस लेकर तुम अपनी क्षुधा शांत कर सकते हो.’

पहले किस्से में न्याय का लोक-प्रचलित रूप है. न्याय को लेकर सामान्य धारणा इसी प्रकार की होती है. राज्य का कर्तव्य है कि वह प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की रक्षा करे. प्राणरक्षा करना कबूतर का भी अधिकार है. बाज के सामने जब वह खुद को बचा नहीं पाता तो राजा की शरण लेता है. तभी बाज अपने दावे के साथ उपस्थित हो जाता है. एक तरह से दोनों का जीवन दाव पर लगा है. बाज सोचता है कि भोजन नहीं मिला तो उसके प्राण चले जाएंगे. दूसरी ओर कबूतर भी जानता है कि यदि वह बाज के प्राकृतिक अधिकार के आगे झुका तो वह स्वयं अपने जीवन से हाथ धो बैठेगा. उशीनर कबूतर और बाज दोनों के जीवन के अधिकार का सम्मान करता हुआ, तीसरा जो अपेक्षाकृत निरापद रास्ता है, अपनाता है. कबूतर के भार के बराबर अपना मांस देकर वह बाज के जीवन की रक्षा करता है. यह न्याय की पराकाष्ठा है, जिसमें राज्य(उशीनर) किसी भी पक्ष को हानि पहुंचाए बिना उन्हें संतुष्ट कर देता है. यह अपेक्षाकृत दुर्बल प्राणियों के प्रति राज्य के कर्तव्य को दर्शाता है. ऐसी अवस्था में वकील, अदालत आदि की भूमिका अप्रासंगिक हो जाती है. पहले किस्म के न्याय का परिष्कृत रूप हम अदालतों में देखते हैं. न्याय के प्रति जनसाधारण का दृष्टिकोण न्यायालयों में होने वाले न्याय तक सीमित होता है. कई बार क्षोभ और हताशा में डूबा व्यक्ति पुकार उठता है—‘दुनिया से न्याय मानो उठ-सा गया है.’ उस समय उसकी शिकायत पूरे समाज, देश और व्यवस्था से होती है. दूसरी कहानी में न्याय का स्वरूप परिष्कृत है. वहां भौतिक संसाधनों की अपेक्षा अधिकार और कर्तव्य पर चर्चा होती है. न्याय करते हुए उशीनर सामान्य दंडाधिकारी से बहुत ऊपर उठ जाता है. वादी और प्रतिवादी में से किसी को कष्ट न हो, इसलिए वह स्वयं कष्ट-पीड़ा सहकर न्याय का संकल्प उठाता है. हालांकि न्याय की आधुनिक सैद्धांतिकी पर ऐसे उद्धरण पूरी तरह खरे नहीं उतरते.

धर्म-केंद्रित समाजों की सामान्य धारणा होती है कि केवल परमात्मा की कृपा और उसका डर मनुष्य को धर्म की ओर प्रवृत्त कर सकता है. इसलिए हर धर्म के साथ कुछ न कुछ सिद्ध-निषिद्ध जुड़े होते हैं. मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि जो सामाजिक रूप से अनुमन्य है, उसका पालन करे तथा जिन कार्यों को निषिद्ध घोषित किया गया है—उनसे अपेक्षित दूरी बनाए रखे. ये शिक्षाएं विभिन्न सांस्कृतिक कार्यकलापों, किस्से-कहानियों, गाथाओं और मिथकों के माध्यम से जनता तक पहुंचती हैं. उपर्युक्त दोनों कहानियां धर्म के न्यायशील पक्ष को दर्शाती हैं. दोनों राजशाही के दौर की हैं. जिस दौर की ये कहानियां हैं वहां असहमतियों के लिए बहुत कम गुंजाइश थी. इसलिए वर्षों-वर्ष राज्य की मर्जी को ही धर्म और न्याय कहकर महिमा-मंडित किया जाता रहा. प्रकारांतर में ये कहानियां न्याय के दो भिन्न रूपों की ओर हमारा ध्यानाकर्षित करती हैं. जैसा कि अध्याय के आरंभ में ही कहा गया है, इस तरह की कहानियां ही जनसाधारण की चेतना का निर्माण करती हैं. यदि यह सच है तो न्याय को धर्म का विस्तार अथवा उसका प्रतिफल मानने में संकोच कैसा? वैसे भी धर्म जनसाधारण के बीच न्याय की अपेक्षा कहीं लोकप्रिय शब्द है. धर्म का इतिहास भले ही खून-खराबे का रहा हो, पुरोहितों ने उसके सहारे अपना धंधा खूब चमकाया हो, परंतु उसे सामाजिकता का आधार बनाने वाले आरंभिक मनीषियों की नीयत पर संदेह नहीं किया जा सकता. यदि उन्होंने समाज की सुख-शांति के लिए डर को आवश्यक माना तथा समाज उसके कारण शताब्दियों तक अनुशासित रहा तो आगे भी उसका अनुसरण करने में बुराई क्या है! प्रश्न जितना आसान दीखता है, उत्तर उतना सरलीकृत नहीं है. धर्म-प्रधान राज्यों की न्याय व्यवस्था को देखकर इस वास्तविकता को समझा जा सकता है. अपना औचित्य सिद्ध करने के लिए प्रत्येक धर्म नैतिकता का समर्थन करता है. यह बात अलग है कि धर्म-प्रेरित नैतिकता स्वयं स्फूर्त्त नहीं होती. वहां ईश्वर या परमात्मा के रूप में तीसरी सत्ता अवश्य होती है. ऐसी सत्ता जो सर्वोपरि है. सर्वशक्तिमान भी है. जिसका स्वरूप अनिश्चित और अदृश्य है. सर्वोपरि और सर्वशक्तिमान बताकर उसका हर निर्णय अंतिम मान लिया जाता है. वहीं स्वरूप निश्चित न होने के कारण व्यक्ति को यह अवसर मिलता है, कि वह ईश्वर के नाम पर अपनी इच्छाएं थोप सके. धर्मप्राण मनुष्य के सद्कर्म और इच्छाएं बिना ईश्वर को बीच में लाए पूरी नहीं होतीं. परिणामस्वरूप उसके लिए जीवन और व्यक्ति दोनों का महत्त्व घट जाता है. वह अपने फैसले व्यक्ति और समाज की जरूरत के बजाय तीसरी शक्ति को प्रसन्न करने की चाहत के साथ लेने लगता है. ‘रिपब्लिक’ में सुकरात के साथ चर्चा करते हुए ग्लाकॉन नामक पात्र धर्माधारित न्याय की इसी कमजोरी की ओर इशारा करता है. इससे विकास के मायने और लक्ष्य दोनों बदल जाते हैं. प्राचीन सम्राट धर्मालयों के निर्माण पर जितना खर्च करते थे, लोकमहत्त्व के निर्माण यथा सड़क, चिकित्सालय, नहर, स्कूल आदि पर बहुत कम खर्च होता था. भारतीय राजाओं ने देश में जितनी बड़ी संख्या में मंदिर बनवाए, उसका दसवां हिस्सा भी यदि विद्यालय बनवाए होते तो समाज की हालत दूसरी होती. उन्होंने शिक्षा की जिम्मेदारी उस वर्ग को सौंपी हुई थी, जिसके वर्गीय स्वार्थ प्रबल थे. यही कारण है कि शिक्षा भारत में सदा ही धर्म का पूरक संस्कार बनी रही, उसके प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण कभी नहीं पनप सका. बावजूद इसके प्राचीन समाजों में जनविद्रोह की घटनाएं विरल हैं. यह भी संभव है कि जानबूझकर उनका उल्लेख करने से बचा गया हो. इतिहासकारों, लेखकों और कवियों ने उनके दस्तावेजीकरण में उपेक्षा बरती हो. क्योंकि उस दौर में सामाजिक-राजनीतिक घटनाओं को धर्म और सत्ता की दृष्टि से देखने का चलन था. धर्म का जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हस्तक्षेप था. यह जानते हुए भी कि जिसे धर्मानुशासन कहा जाता है, वह स्वयं-स्फूर्त्त नहीं होता. मनुष्य को उसकी कीमत अपने विवेक के रूप में चुकानी पड़ती है, जिससे अपने बुद्धि-विवेक से निर्णय लेने का अभ्यास निरंतर कम होता जाता है.

उपर्युक्त के बावजूद लंबे समय तक न्याय का धर्म-केंद्रित होना ही ‘श्रेष्ठतम न्याय’ माना जाता रहा. वैदिक युग से लेकर दो-ढाई सौ वर्ष पहले तक भारत में यही व्यवस्था काम करती रही. हालांकि ईश्वर को किसी ने देखा नहीं था, धर्म की परिभाषाएं आपस में गड्ड-मड्ड थी, फिर भी लोग एक-दूसरे को समझाते—‘दुनिया धर्म पर टिकी है. ईश्वर सच्चा न्यायकर्ता है.’ यह सोचते हुए वे अपने जीवन के महत्त्वपूर्ण निर्णय भी दूसरों के हवाले कर देते. बिना यह सोचे-विचारे कि ईश्वर के नाम पर स्वार्थ का सारा कारोबार उसके चेले-चपाटों ने कब्जाया हुआ है. चूंकि तीसरी शक्ति का कल्पना से बाहर कोई अस्तित्व नहीं है, इसलिए जनसाधारण ईश्वरेच्छा के नाम पर चंद लोगों की मनमानी का दास होकर रह जाता है, जिन्हें वह अपना गुरु अथवा अधीश्वर मानता है. उनके प्रभाव में न्याय व्यक्ति का अधिकार न रहकर शीर्ष पर बैठे लोगों की अनुकंपा मान लिया जाता है. इसी के साथ व्यक्ति से निर्णय की आलोचना का अधिकार छिन जाता है. कई बार तो न्याय की आलोचना या विरोध को दैवीय इच्छा का अपमान मान लिया जाता है. इस कोशिश में मानवीय अस्मिता को पीछे ढकेल दिया जाता है. मनुष्य के मान-सम्मान, आत्मगौरव, सहज विश्वास यहां तक कि स्वतंत्र पहचान को भी धर्म की राह में बाधक मान लिया जाता है. यह नजरंदाज कर दिया जाता है कि न्याय व्यक्ति का अधिकार, राज्य का अपने नागरिकों के प्रति पवित्रतम दायित्व है. उसे राज्य की अनुकंपा मानना समाजीकरण के उद्देश्यों पर पानी फेरने जैसा है. न्यायशीलता राज्य और राजा दोनों का अभीष्ट गुण है. यदि किसी धर्म में यह गुण मौजूद है तो निश्चित रूप से वह प्रशंसनीय है. फिर भी न्याय को धर्म का प्रतिफल मानना सर्वथा अनुचित होगा. उसे लोकचेतना का विस्तार अवश्य कहा जा सकता है. अरस्तु के शब्दों में न्याय, ‘समाज का शुभत्व है, वही राज्य को शुभत्व प्रदान करता है.’

अभी तक के विश्लेषण से न्याय की दो प्रवृत्तियां उभरती हैं. अदालतों में वकील, जज आदि के माध्यम से होने वाला न्याय. दूसरे अपने नागरिकों के प्रति राज्य के कर्तव्य के रूप में निरूपायित न्याय. भारतीय धर्मग्रंथों में न्याय के प्रथम रूप पर पर्याप्त चर्चा है. ब्राह्मण ग्रंथों, स्मृतियां और धर्मसूत्रों में इसपर खुलकर विचार किया गया है. उसे राज्य का कर्तव्य बताया गया है. परंतु न्याय के दूसरे पक्ष जो नागरिक-समाज के प्रति राज्य के दायित्व को दर्शाता है, को लेकर भारतीय वाङ्मय में गहरी चुप्पी पसरी है. अर्थशास्त्र में राजा के सामने हालांकि लोकहित का बड़ा आदर्श रखा गया है. जोर देकर कहा गया है—‘प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है. प्रजाहित में राजा का हित सन्निहित है.’2 ‘विष्णु धर्मसूत्र’ में भी इस भावना को विस्तार दिया गया है. तदनुसार—‘जो राजा प्रजा के सुख में सुखी, उसके दुख में दुखी हो जाता है. उसे संसार में अपनी कीर्ति बनाए रखने के लिए यज्ञ और तपादि की आवश्यकता नहीं है.’3 लेकिन यही ग्रंथ जब राजा को पृथ्वी का ईश्वर या देवता घोषित करते हैं, और उसके हाथ में सारे अधिकार सौंप देते हैं, और उत्तराधिकार में अंतरित राजन्य जब अयोग्य हाथों में पहुंचकर मनमानी का अवसर देता है, तब वह एक ऐसी निरंकुश शक्ति का प्रतीक बन जाता है, जिसका निर्णय समीक्षा और आलोचना से परे है. इन ग्रंथों के अनुसार राजा अकेला ही रक्षक, प्रजापालक, अन्नदाता, दंडाधिकारी वगैरह सबकुछ होता था. फैसले पर कोई सवाल न उठे, इसलिए उसके निर्णय को देववाणी घोषित कर दिया जाता था.

न्याय की दृष्टि से पश्चिमी दर्शन अपेक्षाकृत उदार रहे हैं. विशेषकर सुकरात और उसके बाद के यूनानी विचारक. मानव-केद्रित होने के कारण वे नियतिवाद से उतने प्रभावित नजर नहीं आते, जितने भारतीय धर्म-दर्शन. ऐसा नहीं है कि यूनानी साहित्य मिथकीय प्रभावों से सर्वथा मुक्त रहा है. इस आधार पर यूनानी दर्शनों को सुकरात पूर्व और सुकरात के बाद के दर्शनों में बांटा जा सकता है. सुकरात पूर्व के यूनानी दर्शनों पर मिथकीय चरित्रों का वैसा ही प्रभाव है, जैसा भारतीय धर्म-दर्शनों पर. कुछ अंशों में यह प्लेटो के विचारों पर भी बना रहता है. लेकिन प्लेटो उससे सिर्फ प्रेरणा लेता है. अपने विचारों को परंपरा से बांधता नहीं है. अरस्तु सहित उत्तरवर्ती विचारक उसे और भी विस्तार देते हैं. वस्तुतः ईसा पूर्व छठी शताब्दी का समय पूरी दुनिया में बौद्धिक क्रांति का था, जिसमें विश्वास को तर्क की कसौटी कसा जाने लगा था. भारत में उसके सूत्रधार थे— गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी तथा यूनान में सुकरात, प्लेटो, जेनोफीन, डेमीक्रिटिस आदि. भारत में जैन एवं बौद्ध दर्शन के अलावा अनीश्वरवादी विचारक यथा आजीवक, लोकायत, वैनायिक भी वैदिक परंपरा के धर्म-दर्शनों का तार्किक विरोध कर रहे थे. फिलहाल उनके पक्ष में शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध न होने के कारण कुछ भी कहना अनुचित होगा. बुद्ध और सुकरात दोनों ने अपने-अपने देश में ठेठ परंपरावाद, आडंबर और दिखावे का जोरदार विरोध किया था. दोनों ने दर्शन के क्षेत्र में व्यावहारिकता को समर्थन दिया. यूनान में सुकरात आदि के नेतृत्व में उभरे बौद्धिक आंदोलनों ने मिथकीय विश्वासों को दर्शन के क्षेत्र से करीब-करीब अलग-थलग कर दिया था. इससे न्याय के क्षेत्र में स्वतंत्र चिंतन को बल मिला.

एक प्रसिद्ध ग्रीक कहावत है—‘मनुष्य अपने लिए न्याय का दरवाजा स्वयं खोलता है.’ इसका मंतव्य एकदम स्पष्ट है. जब भी कोई मनुष्य अपने मित्रों, सगे-संबंधियों, पड़ोसियों तथा परिजनों के प्रति न्याय-भाव से परिपूर्ण आचरण करता है, तो उसके अपने लिए न्याय के रास्ते प्रशस्त हो जाते हैं. उसे न्याय के लिए भटकना नहीं पड़ता. आवश्यकता पड़ने पर न्याय स्वयं उस तक चला आता है. दूसरे शब्दों में ‘न्याय ही न्याय को कमाता है.’ कदाचित इसीलिए सुकरात ने कहा था—‘न्याय समाज का सद्गुण है. वह समाज में शुभत्व की उपस्थिति को दर्शाता है.’ सुकरात की यह अवधारणा न्याय की आधुनिक परिभाषा के काफी निकट है. हालांकि यूनान में सुकरात के पहले से ही न्याय को समझने की कोशिश होती रही है. सोलोन की कविता में कहा गया है कि ‘बिना कानून के राज्य को कानून एवं व्यवस्था के राज्य में बदल देना चाहिए.’4 यूनानी धर्मशास्त्रों में ‘दाइक’ को न्याय की देवी बताया गया है. हेसियद की कविता में ‘दाइक’ को ‘क्रूरता को समाप्त करने के लिए जीयस की ओर से उपहार’ बताया गया है. प्लेटो ने ‘दाइक’ को दंड के निषेध के रूप में, उदारता एवं विवेक से न्याय करने वाली पराशक्ति के रूप में परिभाषित किया है. ‘दाइक’ की प्रतिपक्षी के रूप में ‘अदाइका’ का उल्लेख है, जिसे यूनानी धर्मशास्त्रों में ‘अन्याय’ की देवी माना गया है. मिथकीय गाथा के अनुसार ‘दाइका’ अन्याय की देवी ‘अदाइका’ को छड़ी से पीटकर भगा देती है. रोमन धर्मशास्त्रों में ‘दाइक’ की समकक्ष देवी ‘जस्टीटिया’ है. दोनों अपने हाथ में न्याय के प्रतीक के रूप में ‘तराजू’ को उठाए रहती हैं. स्पष्ट है कि भारतीय धर्मशास्त्रों की भांति प्राचीन यूनानी एवं रोमन धर्मशास्त्रों में भी न्याय की आरंभिक अवधारणा रूढ़ ही रही है. उसमें बदलाव ईसा पूर्व छठी शताब्दी के बाद से दिखाई पड़ता है. सुकरात उसका प्रमुख सूत्रधार है.

उन दिनों का यूनानी समाज युद्ध-प्रिय समाज था. यूनानी द्वीप समूह पर छोटे-छोटे राज्य थे. उनके बीच आपस में युद्ध होता रहता था. स्पार्टा और एथेंस के बीच तो शताब्दियां पुराना वैर-भाव था. वहां का पूरा समाज युद्धक मानसिकता में जीता था. वास्तविक नायकों की पूजा के दौर में मिथकों का अप्रासंगिक हो जाना स्वाभाविक भी था. उस समय के सभी प्रमुख विचारकों हिरोटोडस, एनेक्सिमेंडर, पेरामेनीडिस, प्लेटो, जेनोफीन, हेराक्लाट्स आदि के विचार युद्धक भावनाओं से भरे हैं. एनेक्सिमेंडर(610—546 ईस्वीपूर्व), हेराक्लाइट्स जैसे विद्वान युद्ध को सकारात्मक अर्थ में देखते थे. वह न्याय को ऐसे ही अंत:संघर्षों का परिणाम मानता था. उसका मानना था, ‘युद्ध सामान्य बात है. न्याय दो पक्षों में विक्षोभ की परिणति है. उसके परिणाम विवाद की प्रवृत्ति और आवश्यकता के अनुसार बदलते रहते हैं.’ एनेक्सिमेंडर भी न्याय को व्यवहार की श्रेष्ठता के रूप में देखता था. उसके अनुसार मनुष्य का कर्तव्य है—‘परस्पर न्याय-भावना के साथ पेश आना और एक-दूसरे के अन्याय को भूलते चले जाना.’ उसके अनुसार न्याय को उस रूप में देखना चाहिए जिसके अनुसार वस्तुएं अपने स्वाभाविक रूप में आकार ग्रहण करती हैं तथा किसी समय विशेष में दूसरी वस्तुओं पर प्रभाव डालती हैं. उल्लेखनीय है कि एनेक्सिमेंडर की न्याय-संबंधी अवधारणा में समानता और स्वतंत्रता के लिए कोई जगह नहीं थी. उसका महत्त्व न्याय को दार्शनिक विवेचना की विषय-वस्तु बनाने के कारण है.

उस समय पूरे यूनान में दास प्रथा थी. अर्थव्यवस्था में दासों की संख्या का बड़ा योगदान था. सुकरात के समय एथेंस की कुल जनसंख्या लगभग तीन लाख थी. उसमें से 125000 दास तथा लगभग 25000 कृषिदास अथवा अर्धदास थे. कृषिदास मुख्यतः कृष्ट भूमि से जुड़े किसान थे. भू-अधिकार में परिवर्तन के साथ ही उनका स्वामित्व भी नए भू-स्वामी के हाथों में अंतरित हो जाता था. अर्धदासों में छोटे शिल्पकार और कारीगर भी आते थे. एथेंस और रोम की संपन्नता का सारा दारोमदार उन्हीं के कंधों पर था. इसलिए दर्शन के क्षेत्र में शुभत्व और सदगुण की मांग करने वाले सुकरात, प्लेटो और अरस्तु जैसे विचारक भी दास प्रथा के समर्थक थे. वे उसे समाज की आवश्यकता के रूप में देखते थे. अभिजात वर्ग में जन्मे विचारकों के लिए उस व्यवस्था का विरोध एकाएक संभव भी न था. न्याय संबंधी उनकी अवधारणा जीवन में सामान्य नैतिकता के अनुपालन तक सीमित थी. एनेक्सिमेंडर के लिए न्याय का सामान्य अर्थ था—व्यक्ति के संपत्ति-अधिकारों की सुरक्षा. उन दिनों यूनानी देशों की परंपरा थी कि यदि किसी कुलीन परिवार की स्त्री का पति मर जाता था, तो उसकी संपत्ति राज्य के अधीन मान ली जाती थी. इस कानून के विरोध में स्त्रियां मोर्चा निकाल चुकी थीं. एनेक्सिमेंडर जैसे कुछ विचारक कुलीन परिवार की विधवाओं को संपत्ति अधिकार देने के पक्ष में थे. दूसरे की संपत्ति पर अधिकार को अनैतिक माना जाने लगा था. सुकरात के समकालीन थियोगनिस की काव्य-पंक्तियों में तत्कालीन समाज में न्याय एवं कानून-व्यवस्था के प्रति क्षोभ समाया हुआ है—

‘उन्होंने हिंसा द्वारा संपत्ति कब्जा ली है. यह पूरे विश्व के लिए संकट की स्थिति है. वास्तविक न्याय अब संभव नहीं दिखता.’5

हेराक्लाइट्स(535—475 ईस्वीपूर्व) न्याय को उसके सामान्य अर्थों से बढ़कर मानता था. उसका मानना था कि न्याय ब्रह्मांड का सर्वाधिक क्रियाशील तत्व है. हेराक्लाइट्स की न्याय संबंधी अवधारणा को एनेक्सिमेंडर के विचारों के तत्वावधान में समझा जा सकता है. एनेक्सिमेंडर विश्व को दो ध्रुवी मानता था. उसका मानना था कि समय विशेष में दोनों ध्रुवों से कोई एक सक्रिय रहता है. उस दौरान दूसरा शांत बना रहता है. कभी-कभी दोनों में एक जीत की ओर अग्रसर रहता है तो दूसरा पराजित होता दिखाई पड़ता है. द्वंद्व के बीच ऐसा अवसर भी आता है जब दूसरे पक्ष की सहनशक्ति समाप्त हो जाती है. वह पलटकर प्रहार करता है. इससे परिवर्तन की स्थिति उत्पन्न होती है. इस धारा का विस्तार हीगेल के ‘द्वंद्ववाद’ तथा मार्क्स के सुप्रसिद्ध दर्शन ‘ऐतिहासिक भौतिकवाद’ में देखा जा सकता है. एनेक्सिमेंडर द्वंद्व को न्याय की स्वाभाविक अवस्था मानता था. उसके अनुसार विपरीत विचारधाराओं का द्वंद्व समाज को न्याय की ओर ले जाता है. उन्हें सार्थक परिणाम तक पहुंचाने में समय की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है. अपने मंतव्य को स्पष्ट करने के लिए वह धनुष का उदाहरण देता है. उसके अनुसार धनुष में खिंचाव उत्पन्न होने पर उसके दोनों सिरे डोर को अपनी-अपनी ओर खींचते हैं. उनके खिंचाव की दिशा परस्पर विरोधी होती है. खिंचाव से धनुष असामान्य अवस्था में आ जाता है. फिर भी धनुष ठीक से काम करे उसके लिए खिंचाव आवश्यक है. बगैर तन्यता के धनुष काम नहीं कर पाएगा. लक्ष्य भेदने के लिए खिंचाव की मात्रा तथा उसकी दिशा महत्त्वपूर्ण होती है.

हेराक्लाट्स के अनुसार विपरीतधर्मियों का द्वंद्व सदैव बाहर की ओर नहीं होता. मनुष्य के भीतर भी अंतर्द्वंद्व प्रभावी रहते हैं. अच्छे और बुरे का बोध मानवीकरण की प्रक्रिया का प्रथम चरण होता है. वही उस प्रक्रिया को आसान बनाता है. हेराक्लाइट्स के लिए द्वंद्व ही सृष्टि की समस्त गतियों का उत्प्रेरक है. द्वंद्वात्मकता का सबसे बड़ा प्रमाण है, सृष्टि में नर और मादा जैसे विपरीतलिंगी जीवधारियों की मौजूदगी. यदि यह नहीं तो दुनिया में सब कुछ थम-सा जाए. हेराक्लाइट्स यह मानने को तैयार नहीं था कि दुनिया में अन्याय है. बल्कि उसका मानना था कि यह न्याय ही है जो दुनिया की हर चीज को संवारे हुए है. उसके अनुसार संसार में द्वंद्व से मुक्ति असंभव है. द्वंद्व सृष्टि को संवारता तथा उसके विकास को गति देता है. उसका समकालीन पेरामेनीडिस न्याय को समाज के लिए उत्प्रेरक शक्ति के रूप में देखता था. न्याय-केंद्रित समाजों में मनुष्य को यह विश्वास होता है कि समाज में रहते हुए उसके हित सुरक्षित है. आवश्यकता पड़ने पर पूरा समाज मदद के लिए उसके साथ होगा. उसने न्याय को समाज की प्रमुख मार्गदर्शक शक्ति माना है. तदनुसार न्याय मनुष्य का समाज में विश्वास बढ़ाता है. उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है. एक कविता में उसने देवी के मुंह से कहलवाया है—

‘सुनो! बुराई तुम्हें आगे नहीं ले जाएगी. इस रास्ते पर मनुष्य को आगे बढ़ने से रोकने के लिए बाधाएं अनेक हैं. केवल न्याय और कानून ही तुम्हें राह दिखा सकते हैं.’6

एनेक्सिमेंडर, हेराक्लाट्स, पेरामेनिडस आदि जितने भी सुकरात पूर्व तथा उसके समकालीन यूनानी चिंतक हैं, सभी ने न्याय को अपनी-अपनी तरह से परिभाषित करने की कोशिश की थी. परंतु लगभग सुकरात पूर्व के सभी विचारक न्याय को ईश्वर के संदर्भ में देख रहे थे. उनके लिए न्याय या तो ईश्वर का उपहार था अथवा दैवीय विधान, जिसमें किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप अवांछनीय है. कह सकते हैं कि जिस तरह भारतीय चिंतक न्याय को धर्म के उपांग या उपहार के रूप में देखते थे, वैसे ही पश्चिम में भी न्याय ईश्वरीय प्रेरणा या उपहार तक सीमित था. इसके लिए वहां ‘न्याय की देवी’ जैसी मिथकीय कल्पना भी मौजूद है. हालात में परिवर्तन सुकरात के आगमन से होता है. सुकरात ने सत्य को सद्गुण और सद्गुणों को शुभत्व की यात्रा का पाथेय मानकर उसे सामाजिक नैतिकता का विषय बना दिया. भारत में व्यावहारिक नैतिकता पर जोर देने का काम सुकरात से थोड़ा पहले बुद्ध ने किया था. बुद्ध की न्याय-संबंधी अवधारणा व्यैक्तिक एवं सामूहिक हितों से मिलकर बनी थी. उनके अनुसार व्यक्तिमात्र की खुशी आत्मलाभ में होती है. यानी हर कोई अपनी खुशी चाहता है. यह मनुष्य की सामान्य प्रवृत्ति है. दूसरी ओर समाज का हित सामूहिक लाभ में होता है. चूंकि समाज व्यक्ति-सापेक्ष रचना है. उसमें व्यक्ति स्वयं समाहित हैं, इसलिए समाज-हित तभी संभव है जब उसमें व्यक्तिमात्र के हितों की सुरक्षा होती हो. इसलिए न्याय का अभिप्रायः ‘सामूहिक आत्मलाभ’ है. ऐसी व्यवस्था जिसमें समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने तथा बाकी सदस्यों के सुख एवं सुरक्षा के प्रति आश्वस्त हो.

प्लेटो का न्याय-दर्शन

प्लेटो के विपुल लेखन को देखते हुए विद्वानों की यह धारणा रही है कि जो प्लेटो के दर्शन में नहीं है, वह कहीं भी नहीं है. न्याय के बारे में भी सबसे पहले और विशद् विवरण प्लेटो के दर्शन में प्राप्त होता है. न्याय के पर्यायवाची के रूप में उसने ग्रीक भाषा के शब्द ‘दिकायसने’(Dikaisyne) का प्रयोग किया है, जिसका अभिप्राय है—‘नैतिकता’ अथवा ‘न्याय-परायणता’ से है. ग्रीक साहित्य में ‘दाइक’ मिथकीय कल्पना है, जिसे ‘न्याय’ की देवी’ कहा जाता रहा है. परंतु प्लेटो का ‘दिकायसने’ मिथकीय न होकर न्याय को समर्पित राज्य की आदर्श व्यवस्था है. वह न्याय को मनुष्य की संपूर्ण कर्तव्यपरायणता के रूप में देखता है. कर्तव्यपरायणता से उसका आशय उन सभी कार्यों से है, जिनसे कोई व्यक्ति अपने साथ-साथ दूसरों को भी प्रभावित करता है; अथवा जिनके परिणाम किसी न किसी रूप में समाज पर असर डालते हैं. उसके अनुसार व्यक्ति का चयन ऐसा होना चाहिए जिससे समाज में शुभत्व का विस्तार हो. वह न्याय को ‘आत्मा का विशिष्ट गुण’ मानता था.’ उसका मानना था कि सभी मनुष्य अपने-अपने कर्तव्य को समर्पित होंगे तो समाज स्वतः ही अपने दायित्वों के प्रति सजग रहेगा. अतएव न्याय व्यक्ति-मात्र की ऐसी नैतिक साधना है जिसमें वह उन सभी वस्तुओं से दूरी बनाने लगता है, जो उसके निर्णय सामर्थ्य को नितांत व्यक्तिगत बनाती हैं. यहां तक कि वह अपनी उन सभी इच्छाओं भी से दूरी बना लेता है, जो वृहद सामाजिक हितों का अवरोधक है तथा जिनमें स्वार्थपरता की गंध बसी हो. समाज को शुभत्व की ओर अग्रसर करने के लिए उसकी प्रत्येक इकाई का सहयोग अत्यावश्यक है. इस अवधारणा में ‘सोशल कांट्रेक्ट’ के बीजतत्व देखे जा सकते हैं, जिन्हें आगे चलकर हॉब्स और रूसो के लेखन में विस्तार मिला.

प्लेटो का न्याय इकतरफा नहीं है. न ही, उसके अनुसार न्याय के स्वत्व को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी केवल मनुष्य की है. समाज की भी जिम्मेदारी है कि अपनी नागरिक इकादयों को वह सब प्राप्त करने में मदद करे जो उनका अधिकार है. समाज और व्यक्ति दोनों का भला इसी में है कि व्यक्तिमात्र को वही कार्य सौंपा जाना चाहिए जिसके वह सर्वाधिक योग्य है.7 न्याय को परिभाषित करते हुए वह लिखता है—‘व्यक्ति को समाज में वह सब कुछ प्राप्त होना चाहिए, जो उसका प्राप्य है.’ अब व्यक्ति का ‘प्राप्य’ क्या है. यदि सभी मनुष्य केवल अपने प्राप्य का ध्यान केंद्रित कर लें तो समाज का क्या होगा? जार्ज हॉलेंड सेबाइन के अनुसार, ‘प्राप्य’ में कर्तव्य और दायित्व दोनों सन्निहित हैं. ‘हिस्ट्री ऑफ पॉलिटिकल थ्योरी’ में ‘प्राप्य’ की विवेचना करता है—‘व्यक्ति के लिए उसका प्राप्य क्या है?’ इससे प्लेटो का अभिप्राय है कि व्यक्ति के साथ उसकी योग्यता, रुचि, शिक्षा-दीक्षा और कार्यकुशलता के अनुसार व्यवहार किया जाना चाहिए. सेबाइन के अनुसार इसमें यह भी अंतर्निहित है कि व्यक्ति को उसकी योग्यता के अनुसार समाज की ओर से जो भी कर्तव्य सौंपे जाएंगे, उनका पालन वह अपनी संपूर्ण कार्यनिष्ठा, संकल्प और क्षमता के साथ करेगा.’ प्लेटो स्पष्ट करता है कि राज्य का दायित्व नागरिकों की सुरक्षा, शांति-व्यवस्था एवं स्वतंत्रता की रक्षा करने तक सीमित नहीं है. राज्य का यह भी कर्तव्य है कि अपने नागरिकों के सामाजिक-आर्थिक जीवन में सुधार के लिए वह वे सभी प्रयत्न करे, जो आवश्यक हैं और जिन्हें वह अपने सामर्थ्य के अनुसार करने में सक्षम है. लेकिन राज्य तो अमूर्त्त है. नागरिकों से इतर उसका कोई वजूद नहीं है. इसलिए प्लेटो के अनुसार राज्य के जो अधिकार एवं दायित्व हैं, वे अप्रत्यक्ष रूप से उसके नागरिकों के अधिकार एवं दायित्वों के आधार पर ही जाने जाते हैं. राज्य अपने नागरिकों की योग्यता एवं कार्यकुशलता को देखते हुए उनके लिए कर्तव्य विहित करता है, जिनका अनुपालन नागरिकों की जिम्मेदारी है. बदले में राज्य अपने नागरिकों के सुख, सुविधा, स्वतंत्रता एवं सुरक्षा के लिए वह सभी करने के लिए वचनबद्ध होता है, जिसे करने में वह सक्षम है.

प्लेटो का न्याय-दर्शन सुकरात की शुभता की अवधारणा से प्रभावित था, जिसने ज्ञान को सद्गुण की संज्ञा दी थी. सुकरात ने स्वयं कोई ग्रंथ नहीं लिखा. परंतु प्लेटो के दर्शन में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में हर जगह उसकी उपस्थिति है. इसलिए यह तय करना बड़ा ही कठिन है कि ‘रिपब्लिक’ आदि ग्रंथों में जो विचार सुकरात के हवाले से आए हैं, क्या वे सचमुच सुकरात के विचार हैं; अथवा प्लेटो ने अपने विचार, गुरु सुकरात को अतिरिक्त सम्मान देने के लिए, उसके माध्यम से व्यक्त किए हैं? समानांतर प्रश्न यह भी हो सकता है कि यदि वे विचार सुकरात के ही हैं, तो क्या प्लेटो ने उन्हें उसी रूप में, वस्तुनिष्ठ भाव से अभिव्यक्त किया है, अथवा अपनी ओर से उनमें कुछ फेर-बदल किया है. इस बारे में विश्वास के साथ कुछ भी कहना कठिन है. इतना अवश्य है कि प्लेटो अपने गुरु से बेहद प्रभावित था. उन दिनों एथेंस में गणतंत्र को आदर्श राजदर्शन के रूप में मान्यता प्राप्त थी. प्लेटो ने गणतंत्र को भीड़तंत्र में बदलते हुए भी देखा था. सुकरात को गणतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा ही मृत्युदंड दिया गया था. यह प्लेटो के लिए व्यक्तिगत रूप से बहुत भारी क्षति थी. इन घटनाओं का उसके व्यक्तित्व पर इतना अधिक प्रभाव पड़ा था कि सक्रिय राजनीति से ही अरुचि हो चली थी. उसके लेखन का बड़ा हिस्सा आदर्श राजदर्शन की खोज को समर्पित है. इसी क्रम में वह न्याय को अलग-अलग दृष्टि से परिभाषित करता है. न्याय को लेकर ‘रिपब्लिक’ का पहला और चौथा खंड तथा ‘दि लॉज’ जैसा विशद् ग्रंथ विशेषरूप से दृष्टव्य है. ‘दि लॉज’ प्लेटो द्वारा वृद्धावस्था में रचा गया ग्रंथ है, जब उसपर किंचित निराशा हावी होने लगी थी. ‘रिपब्लिक’ की गिनती राजनीतिक दर्शन के प्रमुखतम ग्रंथों में ही जाती है. ग्रंथ में प्लेटो जिस गंभीरता के साथ ‘न्याय’ पर विचार करता है, उससे स्पष्ट हो जाता है कि उसका मुख्य विषय ‘राजनीतिक दर्शन’ अथवा ‘गणतंत्र’ न होकर ‘न्याय’ है.

न्याय की पर्त-दर-पर्त व्याख्या करता हुआ प्लेटो स्पष्ट करता है कि राज्य की सफलता तभी सुनिश्चित है, जब उसके नागरिक निर्दिष्ट कर्तव्यों का संपूर्ण निष्ठा के साथ पालन करें. व्यापारी निष्ठापूर्ण ढंग से व्यापार करें, सेनाएं युद्ध में वीरता का प्रदर्शन कर राज्य की गरिमा को सुरक्षित रखें तथा संरक्षक वर्ग अपने दायित्वों का कुशलतापूर्वक निर्वाह करे. समाज के ये सभी वर्ग बिना दूसरे के काम में बाधा उत्पन्न किए अपने कर्तव्य का पालन करें, तभी राज्य की समृद्धि और सुरक्षा संभव है. इसके साथ-साथ वह यह भी कहता है कि यदि सभी नागरिक अपने-अपने कर्तव्य-पालन के प्रति सचेत हों तो ‘कानून’ और ‘न्याय’ जैसे मुद्दों का कोई अर्थ ही न रहे. जीवन में राज्य की भूमिका सिमट जाए. राज्य और नागरिकों के संबंधों की व्याख्या प्लेटो के लगभग 2100 वर्ष बाद जॉन लॉक, थॉमस हॉब्स और रूसो के दर्शन में देखने को मिलती है. रूसो का ग्रंथ ‘सोशल कांट्रेक्ट’ प्लेटो के दर्शन-चिंतन का विस्तार है. प्लेटो मानता था कि अज्ञानता और स्वार्थपरता के चलते लोग कर्तव्य-पालन में चूक करते रहते हैं. मानवीय कमजोरियां उसके कर्तव्यपालन में विचलन का कारण बनती हैं. वही समाज में शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बाहरी शक्तियों की आवश्यकता को जन्म देती हैं. इससे राज्य को शक्तिशाली होने का अवसर मिलता है. शक्तिशाली राज्य खुद को और शक्तिमान बनाने के लिए नागरिक अधिकारों का हनन करता है. इस समस्या के समाधान हेतु प्लेटो प्रचलित राज्य प्रणालियों पर विचार करता है और अंततः दार्शनिक सम्राट के विचार पर जाकर ठहरता है. उसके अनुसार केवल दार्शनिक ही सत्ता-मोह ने निर्लिप्त, निष्पक्ष, दूरदृष्टा और ईमानदार हो सकता है.

‘न्याय’ को राज्य की नैतिकता से जोड़ने वाला प्लेटो अकेला यूनानी चिंतक नहीं है. बल्कि उसे जमीन देने और आगे बढ़ाने वाले विचारकों की लंबी परंपरा है. आरंभिक यूनानी दर्शन के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति तथा वस्तु का पूर्व निर्धारित स्थान और कर्तव्य होता है. व्यक्ति अपने कर्तव्य को पूरे मनोयोग तथा विवेक सम्मत ढंग से करे, इसके लिए उसकी किसी भी पराभौतिक शक्ति के बंधन और तत्संबंधी पूर्वाग्रहों से मुक्ति अनिवार्य है. प्लेटो परमसत्ता को कर्मशील मानता था, जो अपने कर्तव्य से उसी प्रकार आबद्ध है, जैसे सृष्टि की बाकी वस्तुएं तथा प्राणी. इसलिए अपने दायित्व का निर्वहन करना समाज के प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह किसी भी पद अथवा प्रतिष्ठा से जुड़ा क्यों न हो, की जिम्मेदारी है. यह पराभौतिक शक्तियों पर भी, यदि वे हैं तो, उतनी ही गंभीरता से लागू होता है. समस्या तब उत्पन्न होती है, जब व्यक्ति शक्ति के उन्माद में अपने कर्तव्य की उपेक्षा करने लगता है. शक्ति की अनुभूति अथवा शक्तिकेंद्रों पर अल्पतम लोगों का अधिकतम नियंत्रण सत्तासीन वर्ग में श्रेष्ठता का दर्प पैदा करता है. यही दर्प उसको नियमों की अवहेलना के लिए उकसाता है. यह भ्रम पैदा करता है कि वह दूसरों पर शासन करने, नियम बनाने के लिए जन्मा है, न कि बंधे-बंधाए नियमों के अनुपालन हेतु. इसलिए जो व्यक्ति उस जैसे या उतने शक्ति-संपन्न नहीं हैं, उनका कर्तव्य है कि उसका आदेश मानें. श्रेष्ठता-दंभ का प्रभाव आंतरिक भी होता है. सामान्यतः मनुष्य विवेक से अधिक अहं से निर्देशित होते हैं. कभी-कभी ऐसा अवसर भी आता है जब शक्ति के उन्माद तथा घमंड में डूबा व्यक्ति अपने कर्तव्य से विमुख हो, मनमानी पर उतारू हो जाता है. परिणामस्वरूप समाज में अंतर्द्वंद्व पैदा होते हैं. किसी भी सत्ता की संपूर्ण शक्तियां समाज की समेकित शक्ति के सापेक्ष नगण्य होती हैं. इस कारण प्रत्येक सत्ता वह चाहे जितनी शक्तिशाली हो, दूसरों पर शासन चलाने के लिए उसकी शक्तियां लंबे समय तक कारगर नहीं होतीं. शिखर पर बने रहने के लिए उसे जनता के सामान्य समर्थन की जरूरत पड़ती है. शासन के किसी भी निर्णय, वह चाहे जितना महत्त्वपूर्ण क्यों न हो, की सफलता तब तक संद्धिग्ध रहती है, जब तक समाज के सभी वर्गों का उसे खुला समर्थन प्राप्त न हो. अतः यह कहना कि कानून राज्य बनाता है, और केवल राज्य के भरोसे वे कारगर सिद्ध होते हैं, सर्वथा अनुचित है. राज्य कानून बनाता है. लेकिन कानून बनाने की शक्ति उसे जनसमाज की ओर से प्राप्त होती है. इसलिए कानून की सफलता व्यापक जनसहयोग पर निर्भर करती है. धर्म और सांस्कृतिक प्रतीक तथा उनसे जन्मे संस्कार अधिकतम जनता द्वारा समर्थित होने के कारण ही लोकप्रिय बने रहते हैं. अतएव शिखर पर मौजूद लोगों का दायित्व है कि वे जनता, जो उनकी शक्तियों का एकमात्र स्रोत एवं वास्तविक अधिमान्य सत्ता है, के प्रति ईमानदार तथा कर्तव्यनिष्ठ रहें. परंतु व्यक्ति या समूह का दर्प उसे कानून या अनुशासन में बंधने से रोकता है. इसलिए प्राचीन यूनानी विधिशास्त्र में दर्प को कुचल डालने की अनुशंसा की गई है. यह माना गया है कि दूसरों से श्रेष्ठता का दर्प मनुष्य को कर्तव्य से विमुख होने तथा उनके कार्य में बाधा खड़ी करने के लिए उकसाता है. प्लेटो की ‘न्याय’ संबंधी अवधारणा इसी यूनानी चेतना से बनी थी. उसके लिए ‘न्याय’ का मतलब था—‘सामाजिक आदर्श का बोध तथा कर्तव्यपरायणता. वह मानता था कि आदर्श राज्य की परिकल्पना को साकार करने के लिए आंतरिक शुभता अपरिहार्य है. व्यापक स्तर पर यह कैसे संभव हो इसके लिए वह प्रचलित राजदर्शनों की विवेचना करता है.

‘रिपब्लिक’ के माध्यम से हमारा सामना प्लेटो की बड़ी समस्या से होता है. सुकरात को एथेंस की न्याय प्रणाली के आधार पर दंडित किया गया था. जूरी के सदस्यों के चयन हेतु कोई विधि-सम्मत प्रक्रिया न थी. उसमें व्यक्ति की आर्थिक समृद्धि का बड़ा योगदान था. वाक्-चातुर्य और दूसरों को प्रभावित करने की कला उसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थी. जिस जूरी ने सुकरात को मृत्युदंड सुनाया था, उसके सदस्यों अपने दुराग्रह प्रबल थे. उनमें से अधिकांश सुकरात की साफगोई के कारण उससे ईर्ष्या करते थे. सुकरात के विचार उनके लिए चुनौती बने थे. इसलिए सुकरात पर चलाए जा रहे मुकदमे का वास्तविक उद्देश्य उसकी अवमानना या उसे दंडित करने से अधिक उस वैचारिकी को परास्त होते देखना था, जो उनके वर्चस्व के लिए चुनौती बन चुकी थी. सारा तमाशा आधी-अधूरी गणतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से, न्याय के नाम पर हुआ था. यहीं से प्लेटो के मन में सवाल उठा था कि ‘न्याय क्या है?’ क्या जिसे बहुत से लोग मान लें वह न्याय है. अथवा जिसे राज्य अपनी शक्ति के बल पर लागू करे, वह न्याय है? इस समस्या को वह सुकरात के माध्यम से ‘रिपब्लिक’ में उठाता है. अपने स्वभाव के अनुरूप सुकरात अपनी शिष्य-मंडली के बीच प्रश्न उठाता है. चर्चा के पहले चरण में सुकरात के अलावा केफलस, पोलीमार्क, थ्रेचाइमच्स, लीसियस और केल्सीडॉन प्रमुख सहभागी बनते हैं. चर्चा-स्थल केफलस का आवास है. उन सबको केफलस की ओर से एक उत्सव में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित किया गया है. मित्रों के आगमन पर बूढ़ा केफलस स्वयं उनका स्वागत करता है. प्रकारांतर में चर्चा का मुख्य सूत्रधार भी वही बनता है. अपने लंबे जीवनानुभवों को याद करते हुए वह ग्रीक कवि पिंडोरयस को उद्धृत करता है, जिसका आशय है—‘जब कोई मनुष्य अपना जीवन न्याय एवं श्रद्धा के साथ व्यतीत करता है तो उसके जीवन को आह्लादित करने तथा वृद्धावस्था में उसको सहारा देने के लिए ‘आशा’ जीवन-संगिनी की भांति सदैव उसके साथ रहना चाहती है.’ इसपर परम जिज्ञासु सुकरात प्रश्न करता है—‘क्या यही न्याय है?’ सुकरात का यही कौतूहल ‘रिपब्लिक’ की चर्चा का केंद्रीय विषय बन जाता है. उससे पहले तक न्याय को व्यक्ति और राज्य के व्यवहार और अंतर्संबंधों के अनुसार देखने की प्रथा थी, जिसमें राज्य की इच्छा और उसका अधिकार पक्ष प्रबल रहता था. चर्चा बढ़ती है तो न्याय पर नए-नए विचार आते चले जाते हैं.

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

  1. The sense of justice is continuous with the love of mankind.-Rowls.
  2. प्रजासुखे सुख राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्। नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्।। — अर्थशास्त्र-1/19
  3. प्रजासुखे सुखी राजा. तद्दुःखे यश्च दुःखित। सः कीर्तियुक्तो लोकेस्मिन् प्रेत्य यस्य महीस्यते।।— विष्णुधर्मसूत्र 3,
  4. A-nomia, lawlessness, must be replaced by eunomia, law and order-The Greek Concept of Justice, Eric A. Havelock, page 298.
  5. they seize property by violence; kosmos has perished

Equitable distribution no longer obtains.-Theognis, as quoted by Andrew    Gregory    in  Anaximander: A Re-assessment, Page 77

  1. Welcome! for it is no evil fate [trzoira] that escorted you forth to travel along this way: for indeed it lies [estin] far outside of the treading of men.

No, it was the law [themis] and justice [dike].-Parmenides, from The Greek Concept      of Justice, page 269.

  1. every member of the community must be assigned to the class for which he finds himself best fitted. Plato, The Republic.

 

 

प्लेटो के आदर्शराज्य की शिक्षानीति—दो

प्लेटो का मानना था कि सभी मनुष्य अपूर्ण हैं, इसलिए उन्हें राज्य के रूप में संगठितसुनियोजित होने की आवश्यकता पड़ती है. चूंकि हर व्यक्ति प्रत्येक कार्य में निपुण नहीं हो सकता, इसलिए राज्य का कर्तव्य है कि व्यक्ति की रुचि, योग्यता और सामर्थ्य के आधार पर उसके अनुकूल कर्तव्य का निर्धारण करे. प्लेटो का यह भी मानना था कि शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति स्वयं को समाज के लिए उपयोगी बना सकता है. शिक्षा की महत्ता को समझते हुए उसने ‘अकादमी’ की स्थापना की थी. प्लेटो का शिक्षादर्शन उसकी संवादपुस्तकों ‘रिपब्लिक’ तथा लॉजमें विस्तारपूर्वक सामने आया है. उसने न्यायाधारित समाज की परिकल्पना की थी, जिसमें सभी व्यक्ति अनुशासनबद्ध रहकर अपना सर्वोत्तम सहयोग दे सकें. कबीलाई योद्धाओं और तानाशाह सम्राटों से भरे यूनान में यह एक आदर्श कल्पना थी. प्लेटो का राज्य एक कल्पनालोक जैसा है. लेकिन वह आदर्श मनुष्य द्वारा अभिकल्पित वृहद नागरिक समाज के लिए है, जिसमें पराभौतिक शक्तियों का कोई हस्तक्षेप नहीं है. उल्लेखनीय है कि आदर्शलोक की अभिकल्पना भारतीय वेदादि ग्रंथों में भी गई है, लेकिन वहां आदर्शलोक की स्थापना बिना आध्यात्मिक शक्तियों की कृपा के असंभव है. प्लेटो यथार्थ और कल्पना के अंतर को भलीभांति समझता था. वह जानता था कि विचारों को सर्वत्र साकार कर पाना संभव नहीं होता. वे सिर्फ प्रेंरणादायी हो सकते हैं. इसलिए उसका यह भी मानना था कि विचारजगत, परिवर्तनशील वस्तुजगत की अपेक्षा अधिक स्थायी एवं वास्तविक होता है. रूसो ने अपनी पुस्तक ‘एमाइल’ में प्लेटो के संवाद ‘रिपब्लिक’ को शिक्षादर्शन की सबसे पहली पुस्तक माना है. ‘लॉजमें प्लेटो औपनिवेशिक नगरराज्य के लिए न्यायिक व्यवस्था का विस्तृत खाका तैयार करता है. इन दोनों संवादपुस्तकों की विषयवस्तु प्लेटो के आदर्शराज्य की स्थापना के लिए समर्पित है. यद्यपि उनमें किंचित अंतर है, तथापि समाज में शिक्षा की अनिवार्यता को लेकर दोनों ही पुस्तकों में असंद्धिग्ध एकरूपता है. उल्लेखनीय है कि जहां ‘रिपब्लिक’ में उसने आदर्श राज्य की व्याख्या की है, वहीं लॉजमें उन व्यावहारिक पक्षों की गंभीर विवेचना की गई है, जिनके आधार पर किसी वांछित शासनव्यवस्था को अनुकूल आकार दिया जा सकता है.

प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ में लोगों को कुल तीन भागों में विभाजित किया है. पहला है—दास, जिनके लिए उसने इस ‘संवाद’ में विशिष्ट प्रावधान किए हैं. दूसरे हैं दस्तकार, हस्तशिल्पी यथा काष्ठकार, बुनकर, चर्मकार, दुकानदार, राजमिस्त्री छोटे व्यवसायी, जो उत्पादन विपणन के लिए जिम्मेदार हैं और सही मायने में किसी भी समाज अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं. दास और शिल्पकार वर्गों को उसने नागरिकता के अधिकार से वंचित रखा है. तीसरी श्रेणी संरक्षक वर्ग की है, जिसको उसने पुनः दो भागों ‘पूरक’ अथवा ‘सहायक’ और ‘सक्षम’ में विभाजित किया है. राज्य के शासन को कुशलतापूर्वक चलाने की जिम्मेदारी इसी संरक्षक वर्ग की है. ‘पूरक’ अथवा ‘सहायक’ संरक्षक अपेक्षाकृत युवा होते हैं, जिनके ऊपर राज्य की आंतरिक एवं बाह्यः सुरक्षा का दायित्व होता था. पुलिस और सेना इनके अधीन होती हैं. संरक्षकों का दूसरा वर्ग शासन का वास्तविक कर्ताधर्ता और नियामक होता है. राज्य की समस्त निर्णायक शक्तियां इसी वर्ग के अधीन होती हैं. प्लेटो ने अपने आदर्श राज्य के सर्वोच्च शासनाधिकारी के रूप में ‘दार्शनिक सम्राट’ को रखा है. दार्शनिक सम्राट वह बन सकता है जो बुद्धि, विवेक, साहस, ज्ञान, समानता, दयालुता, निष्पक्षता आदि मानवीय गुणों से संपन्न हो. ऐसे व्यक्ति के कंधों पर राज्य की सुरक्षा और शांतिव्यवस्था के साथ विकासदर को भी उत्तरोत्तर गतिमान बनाए रखने की जिम्मेदारी होती है. उल्लेखनीय है कि प्लेटो के दो प्रमुख ‘संवाद’ ‘रिपब्लिक’ एवं ‘दि स्टेट्समेन’ में जहां दार्शनिक सम्राट का उल्लेख होता है, वहीं लॉजमें वह संरक्षक वर्ग में से चुने गए प्रतिनिधिमंडल को राज्य की बागडोर सौंपने का समर्थन करता है. ‘लॉजप्लेटो के अंतिम दिनों की रचना है. ‘रिपब्लिक’ का लेखन लॉजसे लगभग बीस पहले संपन्न हुआ था. जिसमें उसने दार्शनिक सम्राट की परिकल्पना की थी और लोकतांत्रिक शासनपद्धति की आलोचना. इससे लगता है कि लॉजतक आतेआते प्लेटो को लगने लगा था कि कुछेक व्यक्तियों, चाहे वे दार्शनिक ही क्यों न हों, के हाथ में सत्ता का सिमटना घातक हो सकता है, इसके निदान के लिए वह दार्शनिक मंडल के हाथों में सत्ता सौंपने का विचार प्रस्तुत करता है, जो गणतंत्र की भावना के अपेक्षाकृत निकट है.

प्लटो का मानना था कि आदर्शराज्य में बहुत अधिक फेरबदल की संभावना नहीं होती. अगर नागरिक ऐसा महसूस करते हैं, तो समझना चाहिए कि उनमें असंतोष बना हुआ है, यानी वहां राज्य के स्तर पर कोई कमी बनी है. आदर्श राज्य की तुलना उसने प्राचीन यूनानी मंदिर से की थी, जिसमें कोई बड़ा फेरबदल संभव नहीं होता. आदर्श राज्य के बदलाव व्यवस्था को और आदर्श एवं नीतिसंपन्न बनाने के लिए होने चाहिए. संरक्षक वर्ग का दायित्व है कि वह स्वयं को राज्यकल्याण के प्रति समर्पित रखे. उनमें भौतिक वस्तुओं, विशेषकर विलासितापूर्ण सामग्री के प्रति कोई आकर्षण नहीं होना चाहिए, इसलिए कि ऐसी वस्तुएं निरर्थक स्पर्धा और आपसी ईष्र्या को बढ़ाती हैं. इसलिए उन्हें इस प्रकार प्रशिक्षित किया जाना चाहिए कि उनमें विलासिता की सामग्री के प्रति स्वतः अनाकर्षण हो. अभिभावकों को सैनिक की भांति करना चाहिए, जिसका दायित्व उसकी रक्षा करना है, जिसके लिए उसे नियुक्त किया गया है. उन्हें गंभीर और मननशील होना चाहिए, ताकि वे निजी आकांक्षाओं से बच सकें. संरक्षक वर्ग में निजी महत्त्वाकांक्षा के शमन के लिए प्लेटो उनके लिए सामूहिक आवासबस्तियां बनवाने का सुझाव देता है. यही नहीं सामाजिक एकता के पक्ष में वह निजी संपत्ति के सभी प्रतीकों का सामूहिकीकरण करते हुए संरक्षक वर्ग के लिए सामूहिक आवासकक्ष, मनोरंजनालय, यहां तक कि पत्नियों और बच्चों में भी साझेदारी का सुझाव देता है. प्लेटो ने शिक्षा के महत्त्व को स्वीकारा है, मगर इस बारे में प्लेटो के विचार उस समय आधुनिकता विरोधी जान पड़ते हैं, जब वह लिखता है कि शिक्षा का एक कृत्य यथास्थिति बनाए रखना भी है. वह ऐसे आविष्कारों का निषेध करता है, जो आदर्श समाज के लिए हानिकारक सिद्ध हों. और अपेक्षा करता है कि शिक्षा ऐसे परिवर्तनों से आगाह करने के लिए सचेतक की भूमिका भी निभाएगी. उसके अनुसार शिक्षा इन बदलावों का न केवल विरोध करती है, बल्कि अपसंस्करण की कोशिशों को नाकाम करने के लिए नागरिकों को सदैव तत्पर भी रखती है.

किंचित विरोधाभास के बावजूद प्लेटो का शिक्षा दर्शन पर्याप्त आधुनिक और अभिनव संभावनाओं से युक्त है. वह पहला विचारक था जिसने स्त्रियों की शिक्षा पर बराबर जोर दिया, खासकर ऐसे समय में जब उसके समकालीन विचारकों में से अधिकांश स्त्रिायों को घर की चारदीवारी से बाहर कोई जिम्मेदारी देने को तैयार न थे. प्लेटो के आदर्श राज्य में लड़के और लड़की की शिक्षा में कोई भेद नहीं था. लड़कियां लड़कों की भांति उनके साथ न केवल नंगी व्यायाम कर सकती थीं, बल्कि वे शिक्षा भी ग्रहण कर लेती थीं. उन्हें सेना के साथ सशस्त्र सैनिक के रूप में युद्ध में भाग लेने के अधिकार भी प्राप्त थे. शिक्षालयों में उनके साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं बरता जाता था. प्लेटो ने संरक्षक वर्ग के सदस्यों और उनकी संतान के लिए अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान किया है. दस्तकारों, शिल्पकर्मियों तथा दुकानदारों की शिक्षा के बारे में उसका मानना था कि उन्हें केवल उनके व्यवसाय से संबंधित प्रशिक्षण देना ही पर्याप्त होगा. दासों के लिए उसने शिक्षा को पूर्णतः अनावश्यक माना है. उल्लेखनीय है कि प्लेटो अभिजात नागरिकों की शिक्षा के बारे में तो क्रांतिकारी सुझाव देता है, किंतु बाकी जनसमाज की शिक्षा के प्रति उसके विचार परंपरागत और रूढ़िवादी हैं. इसके लिए प्लेटो को दोष देने के बजाय हमें यह भी मानना होगा कि वह स्वयं अभिजात्य वर्ग से था. शिक्षा को लेकर उसके विचार तत्कालीन परिस्थितियों के अनुकूल थे. उनमें बहुत परिवर्तनकारी चिंतन भी नहीं था, जैसा कि सतरहवींअठारवीं शताब्दी के फ्रांस में संभव हो सका, जहां रूसो ने शिक्षा को सभी वर्गीय भेदभावों से परे, सभी के लिए सुलभ करने की आवश्यकता पर जोर दिया. तथापि हमें प्लेटो की इसके लिए सराहना करनी होगी कि 2400 वर्ष पहले के समाज में उसने एक संपूर्ण शिक्षातंत्र की परिकल्पना की थी, जिसमें प्रशासन से लेकर शैक्षिक विषयवस्तु पर गंभीरतापूर्वक विचार किया गया था.

आदर्शराज्य की परिकल्पना की स्थितियों की संभावना को आगे बढ़ाने वाली अपनी एक अन्य संवाद पुस्तक लॉजमें प्लेटो उसके अनिवार्य शिक्षातंत्र की विशेषताओं का सविस्तार उल्लेख करता है. उसके अनुसार पूरा तंत्र किसी कुशल पर्यवेक्षक की देखरेख में होना चाहिए, जो शिक्षा से जुड़े समस्त मामलों की विशद जानकारी रखता हो तथा जो समाज के सभी वर्गों, स्त्री, पुरुष आदि के बीच बिना किसी भेदभाव के शिक्षा का प्रसार कर सके. यह पूछे जाने पर शिक्षा का लाभ क्या है, प्लेटो इसी संवाद में एक एथेंसवासी के माध्यम से स्पष्ट करता है—

यदि तुम यह जानना चाहते हो कि शिक्षा का सामान्य लाभ क्या है, तो इसका उत्तर बहुत आसान है—शिक्षा मनुष्य को सदगुणसंपन्न करती है; और सद्गुणसंपन्न व्यक्ति विनम्रतापूर्ण व्यवहार करता है. अपनी विनम्रता के बल पर वह युद्ध में अपने शत्रुओं का दिल भी जीत लेता है.’1

प्लेटो यहां निर्दिष्ट करता है शिक्षा का दायित्व मंत्री स्तर के उस व्यक्ति को सौंपा जाना चाहिए तो उदार, गुणी और भेदभाव रहित हो. वह किसी प्रतिष्ठित परिवार में जन्मा हो तथा उसकी उम्र ‘कम से कम पचास वर्ष’ होनी चाहिए. उसको यह पता होना चाहिए कि उसका कार्य बाकी सभी मंत्रियों की अपेक्षा कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है. शिक्षा के लिए विद्यार्थी की उम्र कितनी हो? इस बारे में वह लिखा है कि बालक की शिक्षा का शुभारंभ यथासंभव न्यूनतम उम्र से कर देना चाहिए. यदि संभव हो तो उसके जन्म से अथवा उसके पहले से भी. उसके अनुसार शिक्षा का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हिस्सा ही वह है, जो बचपन में सिखाया जाता है—इसलिए अभिभावक वर्ग का दायित्व है कि वह शिशु की शिक्षा का अनुकूल प्रबंध करे. ताकि बड़ा होने पर वह अपने कार्य में पूरी दक्षता प्राप्त कर सके. प्लेटो के अनुसार शिक्षा कभी समाप्त न होने वाला कृत्य है. उसके लिए उम्र की कोई सीमा नहीं है. इसलिए बालक को जहां तक संभव हो, जन्म से ही शिक्षा के लिए तैयार किया जाना चाहिए. प्लेटो प्रौढ़ शिक्षा का समर्थक था. उसके अनुसार ऐसे व्यक्तियों को जो किसी कारणवश बचपन में शिक्षा से वंचित रह गए हों, बड़ा होने पर शिक्षा दी जा सकती है. संरक्षक वर्ग को तो आजीवन, जन्म से लेकर सेवानिवृत्ति की अवस्था तक, कुछ न कुछ लगातार सीखते रहना चाहिए. ‘लॉजमें प्लेटो आदर्श राज्य में अधिकारियों की भर्ती की प्रविधियों के बारे में भी विस्तार सहित चर्चा करता है, जिसके अंतर्गत वह कानूनविशेषज्ञ संरक्षकों, पुजारियों, पहरेदारों, शिक्षा विभाग के मंत्री, न्यायाधीश आदि की भर्ती के तरीकों के बारे में सुझाव देता है. उसके अनुसार कानून सभी के लिए सुलभ होना चाहिए. न्याय से असहमति की स्थिति में व्यक्ति को अपील का अधिकार होना चाहिए—इसे ध्यान में रखते हुए वह अपील प्राधिकारी की नियुक्ति तथा अपील की प्रविधि का विस्तार सहित उल्लेख करता है.

रिपब्लिक’ में प्लेटो ने शिक्षा को दो प्रमुख वर्गों ‘संगीत’ एवं ‘व्यायाम’ में विभाजित किया है. यह विभाजन केवल नाम तक सीमित नहीं है. प्लेटो के लिए ‘संगीत’ का अर्थ हर उस बोध से है जिसको मनुष्य अपने जीवन में ग्रहण कर सकता है. उसी प्रकार ‘व्यायाम’ से उसका आशय लगभग वैसा ही है, जैसा आजकल ‘एथिलीट’ शब्द से है, जो शारीरिक और मानसिक स्वाथ्य दोनों पर जोर देता है. प्लेटो नागरिकों को शारीरिक और मानसिक रूप से हृष्टपुष्ट देखना चाहता था. धैर्य, अनुशासन और साहस को उसने शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य के रूप में लिया था. साहित्य के अंतर्गत बच्चों को क्या पढ़ाना चाहिए, इसपर भी वह नियंत्राण के पक्ष में था. खासकर प्राचीन यूनानी प्रेमकथाओं को लेकर, जिन्हें वह बालमनोविज्ञान के प्रतिकूल मानता था. लेकिन वह संगीत शिक्षा की अनुमति देता है. उसके अनुसार मां और नर्स का कर्तव्य है कि वे बच्चों को केवल साहस, धैर्य और कर्तव्यपरायणता से भरपूर कहानियां सुनाएं. होमर और हेसोद की रचनाओं को वह बालमनोविज्ञान के प्रतिकूल मानता था, इसलिए उसने ‘रिपब्लिक’ में इन कहानियों को सुनाए जाने का निषेध किया है. प्लेटो के अनुसार ये कहानियां ईश्वर के बारे में गलत पाठ पढ़ाती हैं. ये शिक्षा देती हैं कि ईश्वर भी कभीकभी बुरे कार्यों में लिप्त हो जाता है, जो सर्वथा असत्य एवं भ्रामक है, जिसे तर्क द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता. प्लेटो के अनुसार किशोरों को पढ़ाया जाना चाहिए कि बुराइयां कभी भी ईश्वर की ओर से नहीं आतीं. सृष्टि में व्याप्त ‘शुभअशुभ’ में से केवल ‘शुभ’ ही ईश्वर की निर्मिति है. ‘अशुभ’ या तो भ्रांति है अथवा मानवीय लालच और अज्ञानता की उपज. इसलिए सुधार की आवश्यकता मनुष्य और उसकी समाज रचना में. प्लेटो के परमशुभ की धारणा का विस्तार सर्वेश्वरवादी दार्शनिक बरुच स्पिनोजा(1632—1677) तथा द्वंद्ववादी विचारक फ्रैड्रिक हीगेल (1770—1831) के दर्शन में देखने को मिलता है. इन दोनों ही दार्शनिकों ने शुभत्व की अवधारणा को स्वीकार किया है.

महान यूनानी कवि होमर की रचनाओं को बच्चों के लिए निषिद्ध मानने का अन्य कारण यह था कि उसकी रचनाएं प्रेम और संवेदना का पक्ष लेती हुई, उन्हें बढ़ावा देने का काम करती हैं. प्लेटो के अनुसार वे बच्चों को मृत्यु से डरना सिखाती हैं, जबकि शिक्षा का उद्देश्य बालकों में जोश भरना, वीरता और युद्धक्षेत्र में शहीद हो जाने की भावना पैदा करना भी है. अतः किशोरों को सिखाया जाना चाहिए कि दासता मृत्यु से कहीं बदतर है. इसलिए उन्हें रोनेधोने वाले मनुष्य की कहानी सुनाने से बचना चाहिए, भले ही वह व्यक्ति अपने किसी निकट मित्र अथवा संबंधी की मृत्यु के कारण शोकनिमग्न क्यों न हो. अनुशासन के रूप में प्लेटो चाहता था कि बच्चों को गंभीर रहने की शिक्षा दी जाए. उन्हें सिखाया जाना चाहिए कि जोर से हंसना अशिष्ठता का प्रतीक है. उसने होमर, हेसोद की रचनाओं को बालकों के लिए इसलिए भी अनुपयुक्त माना था, क्योंकि उनमें शानदार दावतों का गुणगान किया गया है. वे ईश्वर को लालची सिद्ध करती हैं. प्रकारांतर में वे बच्चों में धनसंग्रहण एवं विलासितामय जीवनशैली के प्रति ललक बढ़ाती हैं. इस प्रकार की कहानियां बालकों के धैर्य के लिए घातक हैं. वह बच्चों को ऐसी कहानियां सुनाने के पक्ष में भी नहीं था, जिसमें बुरे आदमी को सुखी और भले व्यक्ति को दुखी बताया गया हो. उसके अनुसार इससे बालक की अनैतिक जीवन के प्रति आसक्ति बढ़ सकती है. चूंकि कविताओं में करुणा, दया आदि मानवीय संवेगों का बढ़ाचढ़ाकर बखान किया जाता है, इसलिए उसने युवा विद्यार्थियों को कवि और कविताओं से दूर रखने की सलाह दी है. नाटक को लेकर भी प्लेटो ने रोचक बात कही है. उसके अनुसार कोई भी भला व्यक्ति किसी बुरे व्यक्ति की नकल करने से बचेगा, जबकि प्रायः सभी नाटकों में खलनायक की मौजूदगी होती है. नाटककार एवं अभिनेता उस पात्र को जीवंत बनाने के लिए उसकी खलनायकी के तरहतरह के रूप, कई बार बढ़ाचढ़ाकर भी, दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं. परिणामस्वरूप लोगों को अपराध के नए तरीकों की जानकारी मिल सकती है. प्लेटो लिखता है कि न केवल खलनायक, बल्कि स्त्री, दास तथा अन्य निम्नवर्गीय व्यक्तियों का अभिनय भले व्यक्तियों को करना पड़ता है. इसलिए ऐसे नाटकों के प्रदर्शन पर रोक लगाई जानी चाहिए, विशेषकर बच्चों को तो उनसे दूर रखना ही श्रेयस्कर है. उनके लिए ऐसे नाटक लिखे जाने चाहिए जिसमें किसी भी दोषी, अपराधी अथवा चरित्राहीन व्यक्ति का उल्लेख न हो. चूंकि अधिकांश नाटक मंडलियों की राय में ऐसे नाटक लिखे जाने संभव नहीं हैं, इसलिए प्लेटो ने उन सभी को नगर से निर्वासित करने की सलाह दी है.

प्लेटो संगीत पर भी नजर रखने के पक्ष में था. खासकर बच्चों के संगीत को लेकर. उसका मानना था कि अभिभावक वर्ग का यह कर्तव्य है कि बच्चों को उसी संगीत का आनंद लेने दें, जो उनके लिए पूरी तरह उपयुक्त हो. जो उनके चारित्रिक विकास में सहायक हो. इस आधार पर उसने प्राचीन लीडियन और आयोनियन संगीत को बच्चों के मनोविज्ञान के प्रतिकूल मानते हुए उससे उन्हें दूर रखने का सुझाव दिया है. प्लेटो के अनुसार इस प्रकार का संगीत बच्चों में दुख तथा नैराश्य की भावना पैदा कर उन्हें भाग्योन्मुखी और शिथिल बनाता है. इसके स्थान पर उसने डोरियन तथा फ्राइजियन संगीत को बच्चों के लिए उपयुक्त माना है, इसलिए कि वह बच्चों में साहस, धैर्य एवं दृढ़ता की भावना का विकास करता है. उसका मानना था कि बच्चों के लिए तैयार की जाने वाली धुनें आसान होनी चाहिए. आवश्यक है कि उनसे साहस और आपसी तालमेल युक्त, सामूहिक जीवन का संदेश मिलता हो. बच्चों को सादा और संयमित जीवन की शिक्षा दी जानी चाहिए. उनका भोजन साधारण हो, जिसमें भुने हुए मांसमछली तथा ऐसे ही साधारण व्यंजनों को सम्मिलित किया जा सकता है. विलासिता के प्रतीक चटनी, मिठाई जैसे चटकारेदार और स्वादिस्ट व्यंजनों को बच्चों के भोजन से दूर रखना चाहिए. यदि लोगों का रहनसहन मर्यादित और संयमित होगा तो उनका स्वास्थ्य भी उत्तम रहेगा. उन्हें चिकित्सक की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी.

प्लेटो के अनुसार युवाओं को मर्यादित भाषण की शिक्षा दी जानी चाहिए. उन्हें न तो जोर से गाना चाहिए, न ही मुंह से कोई भद्दा मजाक करना चाहिए. लेकिन किशोरावस्था पार करते समय, उन्हें गाने और चीखनेचिल्लाने की शिक्षा दी जा सकती है. उन्हें अपने मुंह से ऐसी आवाज निकालने का अभ्यास कराना चाहिए, जो आतंक पैदा करती हो. यह भी अत्यावश्यक है कि उस समय वे स्वयं आतंकित न हों. उन्हें पीड़ा का अहसास भी कराया जाना चाहिए, परंतु इस प्रकार कि वह उनकी इच्छाशक्ति एवं संघर्षभावना को कमजोर न पड़ने दे. युद्ध की शिक्षा देने के लिए युवाओं को युद्धस्थल पर ले जा सकता चाहिए, किंतु उन्हें युद्ध में सीधे भाग लेने से यथासंभव बचाना चाहिए. इस तरह कठोर प्रशिक्षण से गुजरने के पश्चात ही बच्चे भविष्य में संरक्षक की भूमिका का सफल निर्वाह कर सकते हैं.

प्लेटो लैंगिक समानता का समर्थक था. ‘रिपब्लिक’ में उसने लड़कों और लड़कियों को संगीत तथा व्यायाम की एकसमान शिक्षा दिए जाने का समर्थन किया है. अपने समकालीन विचारकों से इतर वह लड़कियों को युद्ध की भी वैसी ही शिक्षा दिए जाने के पक्ष में था, जैसी लड़कों को—

समान शिक्षा आदमी को श्रेष्ठ संरक्षक तथा स्त्री को अच्छी संरक्षिका बनने में मदद करेगी, इसलिए कि दोनों का मूलभूत स्वभाव एक जैसा होता है.’2

बावजूद शैक्षिक समानता के प्लेटो स्त्रिायों को सक्रिय राजनीति से दूर रखने का समर्थक था. उसके अनुसार राजनीति का क्षेत्र स्त्रियों के लिए अनुपयुक्त है. न स्त्रियों के पास कुछ ऐसा है जिसके द्वारा वे राजनीति में कामयाब हो सकें. हालांकि कुछ स्त्रियां दार्शनिक प्रवृत्ति की हो सकती हैं. मगर यह गुण उन्हें अच्छी संरक्षिका तो बना सकता है, राजनीति में पारंगत नहीं. प्लेटो के अनुसार स्त्रिायों की अतिशय भावुकता ही उन्हें राजनीति के लिए अपात्र सिद्ध करती है. यह संभव है कि कुछ लड़कियों की रुचि युद्ध में हो, उनमें अच्छी सैनिक बनने के लक्षण भी हो सकते हैं. इसके बावजूद उन्हें सेना में भर्ती के योग्य नहीं माना जा सकता. प्लेटो के अनुसार राज्य के संविधान व्यवस्था होनी चाहिए कि वह स्त्राी और पुरुष में सादा रहनसहन और सहजीवन के प्रति उत्सुकता एवं ललक को बढ़ावा दे. इसके लिए उन्हें बचपन से ही प्रशिक्षित किया जाना चाहिए. उन्हें एक ही रसोई का बना भोजन करने की प्रेरणा मिलनी चाहिए. वह विवाहसंस्था के परंपरागत स्वरूप में क्रांतिकारी परिवर्तन का समर्थक था. चूंकि उस समय राज्य छोटे थे और उनमें अक्सर युद्ध होते रहते थे, ऐसे में जनसंख्या के न्यूनतम स्तर को बनाया रखना भी एक बड़ी चुनौती थी. इसलिए प्लेटो ने संतानोत्पत्ति को नागरिकधर्म माना है. ‘रिपब्लिक’ में उसने अनुशंसा की है कि खास अवसरों पर उतने पतिपत्नियों को, जितने जनसंख्या को स्थायी बनाए रखने के लिए आवश्यक हों, साथसाथ रहने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए. यहां उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि प्लेटो ‘टाइमस’ में विवाह संस्था का निषेध करता है. ऐसे में संतति नियमन और प्रजनन का स्वरूप क्या होगा? विशेषकर उस राज्य में जो अपने प्रत्येक नागरिक की देखभाल करना, उसके हितों का संरक्षण करना अपना कर्तव्य मानता हो. इसपर टिप्पणी करते हुए सुकरात टाइमस को अपने पिछले संवाद की याद दिलाता है, जिसमें उसने अपने आदर्श राज्य के लिए व्यवस्था की थी कि उसमें—

सभी पत्नियां और बच्चे साझे होगे, संबंधों का निर्वाह इस प्रकार किया जाएगा कि कोई भी व्यक्ति अपने बेटे अथवा बेटी की पहचान न कर सके, बल्कि लोगों में यह धारणा बलवती रहे कि वे सब एक ही परिवार के अंग हैं. उम्रविशेष तक सभी लड़केलड़कियां स्वयं को भाईबहन मानेंगे, जो उनसे बड़े हैं वे स्वयं को अपनी उम्र के अनुसार मातापिता और दादादादी समझेंगे, इसी प्रकार युवा स्वयं को उनके बेटाबेटी अथवा पोतेपोतियां मानेंगे.’3

प्लेटो बच्चों को जन्म से ही राज्य के संरक्षण में रखने और और पूर्व निर्धारित मापदंडों के अनुसार उनका पालनपोषण करने का सुझाव देता है. किंतु वह मानता है कि शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर तथा हृष्टपुष्ट बच्चों का लालनपालन अलगअलग समूहों में होना चाहिए. कठोर निर्णय लेते हुए वह अःशक्त एवं अपंग बच्चों को अज्ञात स्थान पर रखने का सुझाव देता है. प्लेटो का लेखनकाल लंबा रहा है. अपने सुदीर्घ जीवन में वह पचास से अधिक वर्षों तक सक्रिय लेखन करता रहा. इसलिए उसके लेखन में कहींकहीं विरोधाभास भी नजर आते हैं. जैसे एक स्थान पर तो वह लिखता है कि बच्चों की प्राथमिक शिक्षा का दायित्व उनके मातापिता का होगा. ‘रिपब्लिक’ में वह जोर देकर कहता है कि समाज में पतिपत्नी साझे होंगे और अभिभावक अपनी वास्तविक संतान के बारे कभी नहीं जान पाएंगे. वहीं दूसरी ओर लॉजमें वह मातापिता को अपने बच्चों के साथ संतुलित व्यवहार करने का परामर्श देता है. वह अपेक्षा करता है कि आदर्श राज्य के मातापिता अपने बच्चों को कानून की मर्यादाओं का पालन करने तथा अनुशासन में रहने की शिक्षा देंगे. वह लिखता है कि—

बच्चों की उपेक्षा उन्हें मानसिक रूप से चिड़चिड़ा, कमजोर तथा अधैर्यवान बना सकती है, उनके साथ दोषपूर्ण व्यवहार तथा अज्ञानतापूर्ण जोरजबरदस्ती, मारपीट उन्हें कठोर, चापलूस, संकोची एवं एकांतजीवी बनाएगी. प्रकारांतर में वे सामान्य पारिवारिक और नागरिक जीवन जीने के अयोग्य हो सकते हैं.’4

प्लेटो का मानना था कि शारीरिक प्रशिक्षण, कसरत के बारे में बच्चों को उनके बचपन से ही सिखाया जाना चाहिए. शिशु के अच्छे स्वास्थ्य के लिए उसने गर्भवती महिलाओं को भी घूमनेफिरने तथा भोजन पर ध्यान देने की सलाह दी है. शारीरिक शिक्षा की भांति बच्चों का सांस्कृतिक प्रशिक्षण भी छोटी अवस्था से ही आरंभ कर देना चाहिए. अभिभावक कहानी के माध्यम से बच्चों को अपनी सभ्यता एवं संस्कृति के बारे में बता सकते हैं. लेकिन उन्हें वही कहानियां सुनाई जानी चाहिए जो उनकी उम्र के लिए उपयुक्त हों तथा उनके मानसिक विकास में सहायक सिद्ध हों. वह बच्चों को सुनाई जानी वाली कहानियों पर नियंत्राण रखने के पक्ष में था. उसका सुझाव है कि बच्चों को सुनाई जाने वाली कहानियां सरल, किंतु प्रभावयुक्त होनी चाहिए, जो उनके मानसिक स्तर के अनुकूल हों—तभी वे उन्हें रुचि लेकर पढ़ सकेंगे. बच्चों को सुनाई जाने वाली कहानियों को लेकर प्लेटो इतना सतर्क है कि वह होमर आदि प्राचीन यूनानी कवियों की रचनाओं को भी बच्चों के लिए निषिद्ध ठहराता है. कहानियों के अलावा खेल भी बच्चों के चरित्र विकास में सहायक होते हैं. इसलिए उसका मानना था कि बड़ा होने पर व्यक्तिमात्र के लिए जो भी आवश्यक है, उसकी शिक्षा उसको बचपन से ही, खेलों के माध्यम से दी जानी चाहिए. यदि किसी बालक में अच्छा भवन निर्माता बनने का गुण है, तो उसके खेलों की रूपरेखा इस प्रकार निर्धारित की जानी चाहिए, जिससे उसको भवननिर्माण की बारीकियों की जानकारी खेलखेल में मिलती हो. इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति काष्ठकला में रुचि रखता है तो उसको उस उद्यम के बारे में बताया जाना चाहिए. इससे बच्चों की रुचि में स्वाभाविक निखार आएगा. फलस्वरूप आगे चलकर अपने कार्य में पूरी तरह दक्ष सिद्ध होंगे.

प्लेटो प्रावधान करता है कि तीन से छह वर्ष तक के बच्चों को मातापिता अपनी देखरेख में खेलने का अवसर दें. यह कार्य गृहणियां अधिक कुशलतापूर्वक कर सकती हैं, इसलिए उन्हें इसकी जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए. छह वर्ष का होते ही उसको स्कूल में भर्ती कर देना चाहिए. वहां प्रारंभ में उसको पढ़ना, लिखना और गिनती करना सिखाया जाए. छह वर्ष के बाद लड़के और लड़की को अलगअलग, उनके कार्य और रुचि के अनुसार शिक्षा देने की अनुशंसा प्लेटो ने की है. लेकिन किसी भी प्रकार के लैंगिक भेदभाव से परे. लड़कियां चाहें तो वे सभी कार्य सीख सकती हैं, जो लड़कों के लिए निर्धारित हैं—

छह वर्ष की अवस्था लड़केलड़की को अलगअलग कर देने का समय होता है. तदनंतर लड़के को लड़कों के समूह में तथा लड़की को लड़कियों के साथ रहना चाहिए. उसके बाद उनकी पढ़ाई आरंभ कर देनी चाहिए. लड़कों को घुड़सवारी, तीरंदाजी, बर्छी तथा अन्य हथियार चलाने की कला. यदि स्वेच्छापूर्वक सीखना चाहें तो लड़कियों को भी इन सभी कलाओं में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए, जब तक कि वे भारी हथियार चलाना सीख न जाएं. इसके लिए चाहे जितनी मेहनत करनी पड़े.’5

प्लेटो के अनुसार दस वर्ष का होते ही बालक की विधिवत शिक्षा आरंभ कर देनी चाहिए. उसके आगे 3 वर्ष तक उन्हें अक्षरज्ञान दिया जाना चाहिए. तेरह वर्ष का होतेहोते बालक संगीत की धुनों को समझनेयोग्य हो जाता है. उसके बाद पूरे तीन वर्ष तक, न इससे कम न अधिक उसको संगीत आदि कलाओं के विधिवत अध्ययन में जुटे रहना चाहिए. भले ही उसके मातापिता की उसके अध्ययन में कोई रुचि न हो. इसके बाद यदि वह चाहे तो भी संगीत में उसको संगीत के और अध्ययन की अनुमति नहीं देनी चाहिए. प्लेटो एथेंस की समकालीन शिक्षा प्रणाली से असंतुष्ट था. उसको लगता था कि वर्तमान शिक्षापद्धति अंकगणित तथा ज्योतिष के अध्यापन के प्रति उदासीन है. जबकि प्राचीन यूनान में ये दोनों ही विषय खासे लोकप्रिय थे. इसलिए वह बच्चों को गणित और ज्योतिष पढ़ाए जाने के पक्ष में था. उसके अनुसार नृत्य, संगीत, व्यायाम तथा गणित जैसे विषय शिक्षा का अनिवार्य अंग होने चाहिए. और बिना यह जाने कि लड़का है या लड़की, सभी को यह शिक्षा अनिवार्यरूप से दी जानी चाहिए. संगीत, गणित तथा व्यायाम की पढ़ाई के अलावा बच्चों को सभी प्रकार के खेल भी सिखाना जरूरी है, ताकि वे शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहें.

अठारह वर्ष तक विभिन्न विषयों की शिक्षा प्रदान करने के पश्चात बच्चों की परीक्षा भी ली जानी चाहिए. परीक्षा में सभी विषय जैसे हथियार चलाना, घुड़सवारी, संगीत, नृत्य, अंकगणित आदि, जिनका वह अध्ययन करता रहा है—सम्मिलित होने चाहिए. प्लेटो द्वारा उच्च शिक्षा के लिए विद्यार्थी की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष निर्धारित की गई है, जिसमें विद्यार्थी की पिछली प्रगति को देखते हुए प्रवेश दिया जाता था. उच्च शिक्षा के लिए प्लेटो द्वारा जो पाठ्यक्रम निर्धारित किया गया था, वह सोफिस्टों द्वारा तय पाठ्यक्रम से भिन्न था. दर्शन प्लेटो का पसंदीदा विषय था. इसलिए उसने उच्च शिक्षा के लिए दर्शनशास्त्र को अनिवार्य माना था. दर्शनशास्त्र की महत्त्वपूर्ण और प्रभावशाली धारा के रूप में उसने राजनीतिक दर्शन के अध्ययन पर भी जोर दिया है. उसने अकादमी में बीस वर्ष की अवस्था तक शिक्षा को अनिवार्य घोषित किया था. किंतु वह शिक्षा के मामले में व्यक्ति की रुचि और उसकी इच्छा का सम्मान करने का समर्थक था. इस कार्य में किसी भी प्रकार का दबाव उसे अस्वीकार था. अतएव—

प्लेटो ने अनुशंसा की थी कि व्यक्ति की संपूर्ण शिक्षा अनिवार्य निर्देशों के दबाव से मुक्त रहनी चाहिए. इसलिए कि किसी भी मुक्त आत्मा को पराधीनतापूर्ण स्थितियों में अध्ययन नहीं करना चाहिए. यही नहीं, जोरजबरदस्ती से सिखाया हुआ ज्ञान मस्तिष्क में कभी ठहर ही नहीं सकता.’6

उच्च शिक्षा की अवधि अगले दस वर्ष तक संभव है. उसमें विद्यार्थी को दर्शन और राजनीति के अलावा हर उस विषय की शिक्षा दी जानी चाहिए, जो भविष्य में उसके लिए हितकारक सिद्ध हो सके. उच्च शिक्षा के दौरान निचले स्तर पर दी गई शिक्षा की पुनरावृत्ति भी साथसाथ होती रहनी चाहिए, ताकि विद्यार्थी उसे याद रख सकें. राजनीति एवं दर्शन के अतिरिक्त उन्हें गणित, संगीत, विज्ञान, समाज विज्ञान, कानून आदि विषयों के बारे में भी सिखाया जाना चाहिए, ताकि वे बड़े होकर अभिभावक के रूप में अपने दायित्वों का निर्वाह भलीभांति कर सकें. तथापि यह अत्यावश्यक है कि विषयों का चयन विद्यार्थी की रुचि एवं मानसिक क्षमता के अनुसार हो. सुकरात को संवादशैली का जन्मदाता माना जाता है. प्लेटो के अधिकांश लेखन इसी शैली में है. अपने गुरु की शैली से प्रभावित प्लेटो का मानना था कि उच्च शिक्षा के आग्रही विद्यार्थी को संवादकला में निपुण होना चाहिए. इससे वह न केवल दूसरों के मंतव्य को भलीभांति समझ सकता है, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर अपने विचारों को भी तर्कसहित, पूरी दृढ़ता एवं आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत कर सके. व्यक्ति को तर्ककला में निपुण होना चाहिए.

ध्यातव्य है कि सुकरात और प्लेटो के समकालीन सोफिस्ट विद्वान भी वाक्कला को शिक्षा के प्रमुख विषय के रूप में स्वीकार करते थे. उनके लिए शिक्षा का एकमात्र लक्ष्य था, व्यक्ति खासकर अभिजात्य युवाओं को तर्ककला में निपुण बनाना, ताकि बातचीत के दौरान वे दूसरों को प्रभावित कर सकें. अपने भाषण और वाक्निपुणता से बड़े से बड़े समूह, यहां तक कि भीड़ को भी अपने प्रभाव में ले सकें. सुकरात और प्लेटो दोनों सोफिस्ट विचारकों का सिद्धांततः विरोध करते हैं. तथापि सोफिस्टों से अपने गहरे मतभेदों के बावजूद सुकरात ने वाक्कला की महत्ता को स्वीकारा है. विचारों के आदानप्रदान के लिए सुकरात अपने शिष्यों के साथ अविरत संवाद करता है. उसका पूरा दर्शन प्लेटो की पुस्तकों में प्रभावशाली संवादों के रूप में सुरक्षित है. प्लेटो का अधिकांश लेखक संवाद शैली में है, इसी कारण उसकी पुस्तकों को ‘संवाद’ का विशेषण भी दिया जाता है. इससे तय है कि सुकरात और प्लेटो के वैचारिक स्तर पर चाहे जो मतभेद हों, मगर वह वाक्कला की शक्ति को परिचित और प्रभावित थे. इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि संवादशैली प्राचीन यूनान की सबसे लौकप्रिय शैली थी. ऐसे में किसी भी विचारक के लिए उससे बच पाना असंभव था. किंतु सोफिस्टों के विपरीत सुकरात और प्लेटो वाक्कला को अपने विचारों को प्रकट करने का माध्यम मानते हैं. उनके लिए संवाद अपना मत प्रकट करने तथा दूसरों की सुनने का माध्यम है. तर्ककला में निपुण व्यक्ति का आशय ऐसे व्यक्ति से नहीं है, जो येनकेनप्रकारेण अपनी बात दूसरों पर थोपना चाहता हो. उन्होंने ऐसे व्यक्ति को तर्कशास्त्री माना है, जो दूसरे मंतव्य और बातों की गहराई को भलीभांति समझ सके.इसकी व्याख्या करते हुए ‘रिपब्लिक’ में सुकरात के मुंह से कहलवाया गया है कि श्रेष्ठ—

तर्कशास्त्री वह है जो प्रत्येक वस्तु के मंतव्य, उसकी मूलभूत विशेषताओं को गहराई से समझ सके. जो लेशमात्र भी दुराग्रही न हो और स्वयं को वह इस धारणा से एकदम मुक्त रखता हो कि तर्क करते समय यदि किसी मुद्दे पर वह मात खाता है तो इसका आशय उसकी अज्ञानता अथवा बुद्धिमानी का अभाव है.’7

यह मानते हुए कि सभी व्यक्ति एकसमान बुद्धिस्तर के नहीं हो सकते, प्लेटो ने सामान्य नागरिकों को प्रतिष्ठित दार्शनिकों, तर्कशास्त्रियों का अनुकरण करने की छूट दी है. इसके लिए आवश्यक है कि उस दार्शनिक या तर्कशास्त्री की बौद्धिक चेतना सत्य के अनुसंधान के प्रति समर्पित हो. जो विचारों से रूढ़िवादी तथा दुराग्रही न हो. जिसके तर्क के पीछे प्रतिपक्षी को पराजित कर यश प्राप्त करने के बजाय, उससे कुछ ग्रहण करने की स्वाभाविक जिज्ञासा और लग्न हो. प्लेटो का मानना था कि दर्शनशास्त्री को अंकगणित, ज्यामिति, खगोलविज्ञान तथा समन्वयविद्या में निपुण होना चाहिए. इन विषयों का ज्ञान व्यक्ति को वैचारिक दृढ़ता तथा ऊंचे आत्मविश्वास के लिए परमावश्यक है—

ये विषय विद्यार्थी की आत्मा को वैचारिक दृढ़ता एवं आत्मविश्वास के उच्चतम स्तर तक ले जाएंगे. गणित यानी ‘अंकगणित’ तथा ‘ज्यामिति’, मस्तिष्क को व्यर्थ की उत्तेजना और सनसनी से मुक्त रख, उसका विशुद्ध विचारों से परिचय कराएंगे तथा आत्मा को विचारजगत की वास्तविक ऊंचाइयों की ओर ले जाने में सहायक होंगे. ‘ज्यामिति’ वस्तुतः अनंत सत्ता की उपस्थिति की प्रतीति है. यही वह विषय हैं जिनके द्वारा कोई व्यक्ति समझ सकता है कि वह अपनी अवधारणाओं को तार्किक परिणति तक किस प्रकार पहुंचा सकता है. ‘खगोल विज्ञान’ की समझ आत्मा को बृह्मांड के अनूठे ऐक्यभाव और सांमजस्यभावना से जोड़ती है. एकता अथवा सामंजस्यता की भावना असल में ‘खगोल विज्ञान’ की बहन है, यह व्यक्ति के मनस् को ज्ञान के शोध पर केंद्रित रखते हुए उसे संगीतकला की बारीकियां समझाने में भी सहायक सिद्ध होती है.’8

प्लेटो का गणित के प्रति अनुराग उसपर पाइथागोरस के अनुयायियों के प्रभाव की देन था. उसके अनुसार जिज्ञासु व्यक्ति को अपने विचारों में सुस्पष्ट होना चाहिए. उसके भीतर सीखने की प्रबल इच्छा होनी चाहिए. स्वयं को समस्त पूर्वग्रहों से मुक्त रहते हुए उसे केवल ज्ञान के अनुसंधान के प्रति समर्पित रहना चाहिए. दर्शनशास्त्र अथवा तर्कशास्त्र के अध्ययन के लिए उसने न्यूनतम 30 वर्ष की वयस् निर्धारित की है. लेकिन दर्शनशास्त्र का विषयक्षेत्र अत्यंत व्यापक है, इसलिए इस विषय का अध्ययनमनन करते हुए उसे इसमें एकदम डूब नहीं जाना चाहिए. उस अवस्था में व्यक्ति अपने सामाजिकराजनीतिक दायित्वों को पूरा करने में असमर्थ सिद्ध होगा. अतः दर्शनशास्त्र आदि विषयों के 5 वर्ष के नियमित अध्ययनमनन के पश्चात उसको वापस समाज की ओर मुड़ जाना चाहिए. अगले 15 वर्ष तक उसे सेना तथा अन्य राजकीय सेवाओं में, जहां वह स्वयं को सर्वाधिक सहज एवं उपयुक्त मानता हो, अथवा जहां राज्य को उसकी सेवाओं की सर्वाधिक आवश्यकता हो, अपना योगदान देना चाहिए. 50 वर्ष की अवस्था तक व्यक्ति वैचारिक और आनुभविक रूप से परिपक्व हो चुका होता है. इस अवस्था तक पहुंचने के बाद जो व्यक्ति ज्ञान की सभी शाखाओं में प्रवीण हो चुका हो, वह दूसरों के लिए आदर्श और अनुकरणीय है. ऐसे व्यक्ति की सेवाएं राज्य के लिए कानून बनाने, व्यवस्थित रखने के लिए ली जा सकती हैं. ऐसे सर्वगुण संपन्न व्यक्ति यदि चाहें तो अपना बाकी जीवन दर्शनशास्त्र का अध्ययन करने अथवा समाजसेवा करते हुए भी बिता सकते हैं. राजकीय अथवा सामाजिक सेवा से मुक्त होने के उपरांत उन्हें अपना शेष जीवन दर्शनशास्त्र और जीवन के वास्तविक सत्य के अनुसंधान, चिंतनमनन को समर्पित कर देना चाहिए. यही उनके जीवन की वास्तविक उपलब्धि होगी.

प्लेटो की नगरयोजना में रहने वाले नागरिक वस्तुतः एक शिक्षित और विवेकवान समुदाय के सदस्य थे. उन्हें राजनीति, अर्थनीति तथा सामाजिक व्यवस्था में हस्तक्षेप करने, उसको बेहतर बनाने के लिए सुझाव देने के पर्याप्त अधिकार थे. वह शिक्षा को परंपरा के दबावों से मुक्त कर, उसमें दर्शनशास्त्र, गणित, विज्ञान, खगोल विद्या, राजनीति, कानून आदि को सम्मिलित करने पर जोर देता है. उसका मानना था कि सभी नागरिकों को शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए, ताकि वे विकासोन्मुखी राजनीतिक निर्णय ले सकें तथा अपने राज्य और समाज को उन सभी दुष्प्रभावों से दूर रह सकें जो मानवीय अज्ञानता के कारण जन्म लेते हैं. यहां उल्लेखनीय है कि प्लेटो और उसका गुरु सुकरात दोनों दर्शनशास्त्र को सभी विषयों में श्रेष्ठतम मानते हुए उसके नियमित अध्ययनमनन को विशिष्टतम मानवीय उपलब्धि में शुमार करते हैं. धर्म तथा तत्संबधी रूढ़ धारणाओं के लिए वहां कोई स्थान नहीं है, उसके स्थान पर दोनों मानवीय विवेक को महत्ता देते हैं. प्लेटो के लिए शिक्षा का लक्ष्य किसी व्यक्ति का निजी उत्थान नहीं है. वृहद सामाजिक हितों के आगे वह स्त्रीपुरुष की निजता को महत्त्व ही नहीं देता. वह व्यक्ति के अंतरंग कामसंबंधों को भी उनके राज्य के प्रति दायित्व का हिस्सा मानता है. वह लिखता है कि कोई भी दार्शनिक दर्शनशास्त्र का अध्ययनमनन इसलिए नहीं करता कि उसके माध्यम से वह अपनी मुक्ति की कामना करना रखता है, न ही वह इस विषय को अपना जीवन इसलिए समर्पित करता है कि दुनिया को अपनी बौद्धिक क्षमताओं से चमत्कृत कर, ख्याति बटोर सके. उसके लिए शिक्षा का उद्देश्य राज्य की सेवा करना, समाज के निमित्त स्वयं को अधिकतम उपयोगी बनाना है.

यदि हम तुलनात्मक रूप से उस समय के भारतीय विचारकों, विशेषकर वैदिक साहित्य की बात करें तो पाते हैं कि वहां सारा जोर मोक्ष पर केंद्रित है. संसार को वहां माया और भ्रम माना गया है. इसलिए कुछेक को छोड़कर प्रायः सभी भारतीय विचारक इस ‘मायावी’ विश्व के मोहजाल से निकल भागने का उपाय सुझाते रहे हैं. मोक्ष की यह छटपटाहट व्यक्ति को कहीं न कहीं आत्मकेंद्रित और स्वार्थी भी बनाती है. भारतीय वांङमय में राज्य की सुरक्षा और उसकी देखभाल का दायित्व सम्राट का होता था, जिसको प्रायः युद्धकला और राजनीति की शिक्षा ही दी जाती थी. उसके असल मार्गदर्शक वे पुरोहित होते थे, जिनका काम यज्ञादि कर्मकांडों को संपन्न कराना तथा ऐसी व्यवस्था बनाए रखना था जो वर्णविभाजन की पोषकसमर्थक हो. रट्टा लगाकर ग्रंथों को कंठस्थ कर लेना उनके लिए विद्वता का पर्याय था. इससे तुलना की जाए तो प्लेटो ने शिक्षा को लेकर जो सुझाव दिए हैं, वे अधिक वैज्ञानिक एवं उपयोगी हैं. हालांकि सच यह भी है कि उसके काल्पनिक आदर्शराज्य में शिक्षा के समस्त अधिकार केवल समाज के अभिजात वर्ग तक सीमित थे. मजदूरों, लघु उद्यमियों और शिल्पकर्मियों को उसने केवल उतनी शिक्षा प्रदान करने का सुझाव दिया है, जितनी उनके व्यवसाय के लिए आवश्यक हो. जबकि दासों को उसके आदर्श नगरराज्य में समस्त अधिकारों से वंचित रखा गया था. इन कमजोरियों के बावजूद प्लेटो के योगदान की अवहेलना कर पाना असंभव है. उसका मौलिक अवदान था—स्त्रियों को पुरुषों के समान शिक्षा का अधिकार देना. यद्यपि स्त्रीशिक्षा का वास्तविक उपयोग उसकी काल्पनिक नगररचना में संभव नहीं था, तथापि हमें ध्यान रखना चाहिए कि ये सुझाव प्लेटो ने उस समय दिए थे, जब पूरी दुनिया कबीलाई समुदायों में बंटी थी. उनके बीच मामूलीसी बात पर युद्ध छिड़ जाना एकदम सामान्य बात थी. ऐसे में एक आदर्श को लेकर समाज की व्यवस्थित परिकल्पना उसकी बौद्धिक विलक्षणता का ही पर्याय है. यही कारण है कि चौबीस शताब्दियां गुजर जाने के बाद भी प्लेटो आधुनिक विचारकों को प्रभावित करता है. व्यक्तिगत मान्यता चाहे जो हो, उसके विपुल साहित्यक भंडार में प्रत्येक विद्वान को प्रायः कुछ न कुछ मिल ही जाता है.

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भानुक्रमणिका

  1. ….if you ask what is the good of education in general, the answer is easy””that education makes good men, and that good men act nobly, and conquer their enemies in battle…-The Laws by Plato.

  2. The same education which makes a man a good guardian will make a woman a good guardian; for their original nature is the same.-REPUBLIC.

  3. ...for all wives and children were to be in common, to the intent that no one should ever know his own child, but they were to imagine that they were all one family; those who were within a suitable limit of age were to be brothers and sisters, those who were of an elder generation parents and grandparents, and those of a younger, children and grandchildren.– Plato in TIMAEUS, translated by Benjamin Jowett.

  4. …while spoiling of children makes their tempers fretful, peevish and easily upset by mere trifles, the contrary treatment, the severe and unqualified tyranny which makes its victims spiritless, servile, and sullen, renders them unfit for the intercourse of domestic and civic life.- LAWS.

  5. After the age of six years the time has arrived for the separation of the sexes, “”let boys live with boys, and girls in like manner with girls. Now they must begin to learn””the boys going to teachers of horsemanship and the use of the bow, the javelin, and sling, and the girls too, if they do not object, at any rate until they know how to manage these weapons, and especially how to handle heavy arms…LAWS.

  6. Plato recommended that all this study must be presented not in the form of compulsory instruction, because a free soul ought not to pursue any study slavishly’. Moreover, nothing that is learned under compulsion stays with the mind.’-Charles Hummel in his article PLATO, published in Prospects, vol. 22, no. 4, 1992.

  7. ....the dialectician as one who attains a conception of the essence of each thing? And he who does not possess and is therefore unable to impart this conception, in whatever degree he fails, may in that degree also be said to fail in intelligence?REPUBLIC.

  8. These disciplines lift the soul to the level of the immutable. Mathematics—arithmetic and geometry—liberate the mind from sensation, familiarize it with the world of pure thought and turn the soul towards the heights of the world of ideas. ‘Geometry is the knowledge of the eternally existent’ (Republic, 527b). It is through geometry that one learns how to manipulate concepts (Republic, 510–511). Astronomy initiates the soul to the order and immutable harmony of the cosmos. Harmony, a sister science of astronomy’s, focuses on the search for and knowledge of the laws of, and the order in, the world of sound.Charles Hummel.

प्लेटो के आदर्शलोक में शिक्षा नीति : लैंगिक समानता का प्रथम स्वप्न

राज्य की एकता और अखंडता सर्वोपरि है. इसके लिए प्लेटो ने सुझाव दिया था कि राज्य का आकार कभी भी तय सीमा से अधिक नहीं होना चाहिए. लोगों को अपने विकास के, तरक्की के अवसर भी मिलने चाहिए. इसके लिए उचित होगा कि प्रशासन को समानता के दायरे में रखा जाए. उसमें किसी भी प्रकार का वर्गीय विभाजन, ऊंचनीच की भावना नहीं होनी चाहिए. लोगों में कर्तव्यभावना जाग्रत हो, उनमें इतना विवेक हो कि वे राज्य के कल्याण के लिए आवश्यक नियमकानून बना सकें. वे शारीरिक रूप से स्वस्थ और मजबूत हों, ताकि युद्धकाल में शत्रु के समक्ष मोर्चे पर डटे रह सकेंइसके लिए प्लेटो शारीरिक और बौद्धिक दोनों ही प्रकार की शिक्षा पर जोर देता है.

शिक्षा के बारे में उसके विचार आधुनिक के करीब तथा किसी भी प्रकार के पूर्वग्रह से मुक्त थे. वह समाज में स्त्रीपुरुष के बीच किसी भी प्रकार के भेदभाव को अस्वीकार करता था. उसका मानना था कि स्त्री और पुरुष बराबर हैं. इसलिए स्त्रियों को भी पुरुषों के समान पढ़नेलिखने के अवसर मिलने चाहिए. उन्हें समाज के सर्वश्रेष्ठ संरक्षकों के अधीन रखा जाना चाहिए, जो उनके साथ समानतापूर्ण व्यवहार कर सकें. उल्लेखनीय है कि प्लेटो से जीवनकाल में एथेंस में स्त्रीपुरुष अधिकारों में काफी अंतर था. स्त्रियों को पुरुषों से अलग, एकांत स्थल पर रहना पड़ता था. सक्रिय राजनीति में हिस्सा लेने की उन्हें मनाही थी. समाज में भी उन्हें केवल कामेच्छापूर्ति तथा संतानोत्पत्ति का साधन माना जाता था. ऐसे में प्लेटो ने खुलकर लिखा था कि उन्हें पुरुषों के समान ही शिक्षा तथा अन्य अवसर प्राप्त होने चाहिए, ताकि वे भी अपना विकास कर सकें. प्लेटो का यह विचार इस भावना से प्रेरित था कि मनुष्य की आत्मा ही महत्त्वपूर्ण है, वही ‘शुभ’ की संरक्षक है. लेकिन वह एक उभयलिंगी सत्ता है. हालांकि उसने माना कि स्त्री और पुरुष की स्वभावगत भिन्नताएं और शारीक्षिक क्षमताएं अलगअलग हो सकती हैं. सामान्यतः ये समाज और स्थानीय लोकाचारों में अंतर का परिणाम होती हैं. तथापि यह भेद कहीं से भी प्राकृतिक नहीं है. अतः समाज को स्त्री के साथ बजाय किसी प्रकार का भेदभाव करने के, उन्हें वे सभी अवसर देने चाहिए जो उनके मानसिक और शारीरिक विकास के लिए अत्यावश्यक हैं.

प्लेटो ने यह भी स्वीकार किया था कि स्त्री और पुरुष को साथसाथ शिक्षा देने, साथसाथ व्यायाम कक्षाओं में हिस्सा लेने की अनुमति देने से कुछ व्यावहारिक कठिनाइयां उत्पन्न हो सकती हैं. सामान्य लोकाचार के विपरीत होने के कारण लोग आरंभ में उनका उपहास भी उड़ा सकते हैं. एक प्रश्न के उत्तर में वह उन स्थितियों पर भी विचार करता है जब लड़के और लड़की को साथसाथ व्यायाम करते देख, विशेषकर जब लड़कियां अर्धनग्न अवस्था में व्यायामरत हों, उत्पन्न हो सकती हैं. उस अवस्था में लड़के उनका उपहास भी कर सकते हैं. यदि स्त्री वुजुर्ग अथवा देखने में असुंदर है तो इसकी संभावना अधिक भी हो सकती है. इसके बावजूद व्यापक हित में उन्हें मात्र इसी कारण से शारीरिक और अकादमिक शिक्षा से वंचित नहीं किया जाना चाहिए.

रिपब्लिक’ के पांचवे खंड में वह स्त्रीपुरुष की शारीरिक एवं मानसिक भिन्नताओं पर चर्चा करता है और इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि ये आभासी हैं. पांचवे खंड में एडीमेंटस, पोलीमार्क्स और ग्लुकोन के साथ चर्चा में हिस्सा ले रहा सुकरात कहता है कि जिस प्रकार घर की देखभाल के लिए कुत्ते का चयन करते समय यह नहीं देखा जाता कि वह नर है अथवा मादा, केवल उसके गुणों पर ध्यान पर रखा जाता है, इसी प्रकार सामाजिक दायित्वों के अनुपालन के लिए भी स्त्री और पुरुष के भेद को नजरंदाज किया जाना चाहिए. यदि फिर भी कोई मानता है कि स्त्री और पुरुष की कार्यक्षमताओं में अंतर होता है तो भी कार्यविभाजन के समय इस अंतर की उपेक्षा की जानी चाहिए. प्लेटो ने सुकरात से कहलवाया है—

और यदिस्त्री और पुरुष की देहयष्टि, उसके कार्य अथवा प्रदर्शन में यदि कोई अंतर लक्षित भी होता है, तो हम यह कहते हैं कि उस कार्य अथवा प्रदर्शन का दायित्वभार उनमें से ही किसी अन्य को सौंप दिया जाना चाहिए(जो उस कार्य को करने में अधिक निपुण हों). लेकिन वह अंतर यदि सिर्फ बाहरी पहनावे और देहरचना तक सीमित है तो इसका यह अभिप्राय कदापि नहीं है कि स्त्री पुरुष से भिन्न अथवा कमतर है तथा उसको किसी क्षेत्रविशेष में शिक्षित किया ही नहीं जा सकता, इसलिए हमें अपने अभिभावकों तथा उनकी पत्नियों को एक ही स्तर की शिक्षा देनी चाहिए. इस मामले में किसी भी प्रकार का भेद करना अनुचित एवं न्याय भावना के विरुद्ध होगा.’

ऐसा नहीं है कि अपने विचारों में प्लेटो ने सर्वत्र उदारता ही बरती हो. यदि ऐसा होता तो आज से करीब चौबीस सौ वर्ष पहले ही यूनान में वास्तविक लोकतंत्र को बढ़ावा मिलता है. कम से कम उस दिशा में मौलिक चिंतन कुछ तो आगे बढ़ता. दरअसल प्लेटो और सुकरात दोनों ही स्पार्टा की सादगी से बेहद प्रभावित थे. एक युद्धसमर्पित समाज बनाने के लिए स्पार्टा ने अपने नागरिकों से उनका निजी जीवन छीन रखा था. परंतु प्लेटो के लिए व्यापक राज्य हितों के लिए यह बलिदान बहुत मामूली था. यद्यपि सादगी की कीमत वहां के नागरिकों को अपने अस्मिताबोध से चुकानी पड़ती थी. राज्यहित के आगे वहां व्यक्तिहितों को गौण माना जाता था. यही नहीं, व्यक्ति को अपनी महत्त्वाकांक्षाएं, जीवन की खुशियां, यहां तक कि अपनी पारिवारिक पहचान भी राज्य के पक्ष में भुलानी पड़ती थी. प्लेटो सुदृद्ध राजनीतिक तंत्र के पक्ष में था. इसके लिए राज्य का अधिनायकवादी रवैया भी उसको स्वीकार्य था. शिक्षा, कला, स्वास्थ्यरक्षण आदि के प्रति वह इसलिए आग्रहशील है. क्योंकि वह केंद्र की मजबूती और खुशहाली के लिए भी अत्यावश्यक है. प्लेटो की निगाह में राज्य के आगे व्यक्ति की अपनी इच्छाआकांक्षाएं अर्थविहीन है. यहां तक वह बच्चों को भी उनके मातापिता से अलग राज्य के संरक्षण में इस प्रकार पाले जाने का अनुमोदन करता है, ताकि मातापिता और संतान में से कोई भी परस्पर पहचान न सके. प्लेटो की अंतिम संवादिका है—‘लॉज’. जिसमें वह ऐसी सलाह देता है, जो आधुनिक समाज में शायद ही मान्य हो. हालांकि उन दिनों स्पार्टा में ऐसी वही व्यवस्था थी, परंतु प्लेटो का इसे समर्थन इसलिए हैरान करने वाला है, क्योंकि वह संभवतः पहला विचारक है जो स्त्रीपुरुष समानता के पक्ष में आवाज उठाता है. स्त्री की शिक्षा एवं स्वास्थ्यरक्षण की अनिवार्यता पर जोर देते हुए वह लिखता है कि—

अभिभावक वर्ग की पत्नियां तथा उनकी संतान संयुक्त होनी चाहिए. इस तरह कि किसी भी मातापिता को उसकी संतान के बारे में कोई जानकारी न हो, न ही कोई बालक अपने मातापिता के बारे में जान पाए.’

यह संदेह व्यक्त करने पर कि पत्नियों और बच्चों के संयुक्त रहने पर क्या विवाद नहीं होंगे? प्रत्युत्तर में प्लेटो आश्वस्त करता है कि स्थिति ठीक इसके विपरीत होगी. पत्नी और संतान के एक होने से लोगों के बीच परस्पर अधिक भाईचारा, विश्वसनीयता और पारिवारिकता भी पनप सकती है, जो उन्हें एकदूसरे से सहयोग के लिए प्रेरित करेगी.