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बालक और समाज

सामान्य

कोई भी समाज चाहे जितना उदार हो, वह हमेशा चाहता है कि भविष्य के नागरिक के रूप में बालक स्थापित मान्यताओं को समझे, उनका पालन करे. उसकी आचारसंहिता, रीतिरिवाजों को अपनाए तथा तयशुदा मर्यादाओं में रहकर व्यवहार करे. यह न तो अनुचित है न ही अस्वाभाविक. आखिर समाज किसी एक व्यक्ति या एक दिन की रचना तो नहीं! उसको बनने में सैकड़ों वर्ष लग जाते हैं. हजारों लोग उसकी विकासमान अवस्था को बनाए रखने के लिए जिम्मेदार होते हैं. जबकि लाखोंकरोड़ों व्यक्ति उसकी आचारसंहिता जिसे प्रायः पंरपरा अथवा रीतिरिवाज कहा जाता है, से जुड़े हो सकते हैं. यह डर भी अन्यथा नहीं है कि समाज यदि अपने प्रत्येक नागरिक को तयशुदा नियमों, मर्यादाओं के पालन से छूट देने लगे तो उसका मूलभूत ढांचा ही चरमरा जाएगा. सभ्यता और संस्कृति के तब कोई मायने ही नहीं रहेंगे. बालक को यह छूट न दिए जाने के संबंध में एक तर्क यह भी हो सकता है कि उसे समाज के बारे में बहुतकुछ सीखनासमझना होता है. किसी परंपरा या रीतिरिवाज की अंतर्निहित विशेषताओं, उसकी खूबियोंखामियों को समझने के बाद ही उसकी आलोचनासमीक्षा करना न्यायसंगत माना जाता है. तदनुसार बालक से अपेक्षा होती है कि स्वयं को योग्य शिष्य दर्शाते हुए उससे जितना बन पड़े, गुरुसमाज से ग्रहण करे. समाज का दिया लौटाने को तो उम्र पड़ी है.

 

सुनने में यह बहुत तर्कसंगत और आदर्श प्रतीत होता है. समस्या यह है कि जिसे हम सीखना कहते हैं, वह स्थापित मान्यताओं, रीतिरिवाजों, विभिन्न ज्ञानशैलियों का बोध तथा उसके प्रति अनुकूलन है. औपचारिक शिक्षा का अधिकांश विद्यार्थी को समाज अथवा समाजों की सभ्यता, सांस्कृतिक विशेषताओं, उपलब्धियों से परचाने पर खर्च होता है, उसमें बालक के मौलिक विकास की बहुत कम संभावना होती है. प्रकट में हर समाज मौलिक ज्ञान को बढ़ावा देने की बात करता है. इसके निमित्त भारीभरकम तामझाम भी रचता है, मगर तब उसका आयोजन एकपक्षीय होता है. उसकी खास सुविधाएं अभिजनवर्ग से आगे बढ़ ही नहीं पातीं. निर्णायक पदों पर विराजित अभिजन समाज के बहुसंख्यक वर्ग को बहुत आसानी से छोटेछोटे गुटों में बांट देते हैं. इतने छोटे कि संख्याबल में कहीं अधिक होने के बाबजूद जनसाधारण स्वयं को शक्तिविहीन मान लेता है. यही विश्वास उसको समझौतावादी बनाए रखता है. निर्णायक पदों पर विराजमान अभिजन वर्ग समाज की कुल पूंजी एवं संसाधनों का उपयोग अपने वर्गीय हितों की पूर्ति हेतु करता है. बालक के संबंध में अभिजन मानसिकता, उसको भविष्य का अभिजन बनाने के प्रलोभन के बहाने, फिलहाल निर्णय प्रक्रिया से किनारे कर देने की होती है. पूंजी आधारित समाजों में जहां हर नई खोज पूंजीपति की तिजोरी को भरने के काम आती है, समाज, सभ्यता और संस्कृति के कमजोर पक्षों पर चर्चा या तो की नहीं जाती अथवा उसके मायने इस प्रकार बदल दिए जाते हैं कि अपनी सत्ता और पहुंच के अनुचित इस्तेमाल से अभिजन वर्ग द्वारा अर्जित वैभवसंपदा, मानसम्मान आदि उसका अधिकार मान लिए जाते हैं. अभिजन वर्ग की चालाकी से अनजान जनसमाज दुरवस्था को अपनी नियति मानने लगता है. यह आवश्यक नहीं कि जिस चालाकी को बड़े समझ न पाएं उसको बालक एकाएक समझ ले, लेकिन यदि अपनी प्रखर बुद्धिचेतना से सब कुछ देखता, महसूस करता हुआ कोई बालक उस अवस्था में यदि कोई प्रतिक्रिया दर्ज कराना चाहे तो उसे युवा होने; कम से कम उस उम्र तक इंतजार करना पड़ता है, जब उसके निर्णय को कानून के दायरे में परखा जा सके. तब तक वह परिवार तथा अन्यान्य जिम्मेदारियों में इतना गहरा फंस चुका होता है कि समझौते और समर्पण से अलावा कुछ सोच ही नहीं पाता.

 

ज्ञान की खोज एवं संवितरण के लिए स्वयं को समर्पित मानने वाले आकादमिक सदनों का ढांचा भी इससे अलग नहीं है. परीक्षा में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में छात्र यदि अपनी मर्जी से कुछ लिख आए तो उसे पास होने की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए. बालक को ज्ञानार्जन के लिए उत्सुक करने के बजाय वह उसके सोच एवं आचरण की दिशा निर्धारित करने पर जोर देता है. शिक्षा का काम हैबालक की चिंतनशक्ति को ऊर्जस्वित करना, न कि उसको विशिष्ट दायरों तक सीमित करना. इसके बावजूद बालक की रुचि के क्षेत्रों की पहचानकर अपनी उदारता का दम भरनेवाले समाज भी शिक्षा और संस्कार के माध्यम से तयशुदा व्यवस्था से अनुकूलन की सीख ही दे पाते हैं. बालक के आलोचनात्मक विवेक को उभारने की कोशिश की ही नहीं जाती. अपनी ओर से वह कुछ मौलिक करना चाहे तो डांटकर चुप करा दिया जाता है. हंसकर टाल देना समझदारी कही जाती है. यह मनोवैज्ञानिक सत्य है कि मनुष्य बाल्यावस्था से लेकर किशोरावस्था तक सर्वाधिक सचेतन, संवेदनशील, जिज्ञासु एवं मौलिक होता है. अपने आसपास के परिवेश को समझने की उसकी जिज्ञासा इस अवस्था में चरम पर होती है. उसका जितना उपयोग ज्ञानार्जन और ज्ञान की विभिन्न पद्धतियों को सिखाने, संवारने, बालमन की कमजोरियों को सामने लाने में किया जा सके, उतना ही लोकहित में है. अब इसे हम अतीत के प्रति अपना अतिरेकी सम्मोहन कहें अथवा नएपन को अपनाने का डर, जो परंपरा के माध्यम से प्राप्त सुविधाओं, उन सुविधाओं के छिन जाने के भय से जन्मते हैं, जो हमारी अपनी योग्यता, कौशल के बजाय विरासत में प्राप्त हुई हैं—हम बालक को स्थापित परंपराओं एवं संस्कृति के मानकों से जोड़े रखने में ही अपनी भलाई समझते हैं. मामूली विचलन पर हमारी धड़कनें बढ़ जाती हैं. यह भूल जाते हैं कि जीवन केवल सामाजिक, सांस्कृतिक मानकों द्वारा अनुशासित नहीं होता. वह समाज की भौतिक संपदा, उत्पादन तथा उपभोग से भी नियंत्रित होता है. बालक घर से बाहर जाता है तो परंपरा एवं संस्कृति उसके मनस् पर सवार होते हैं, जबकि भौतिक सुविधाएं तथा अन्य प्रलोभन आंखों के सामने. उनका आकर्षण इतना जबरदस्त होता है कि व्यक्ति अपने मनोभावों की उपेक्षा करके भी उनमें डूब जाना चाहता है. सामाजिकसांस्कृतिक संरक्षण और विकास के नाम पर दी गई शिक्षा वहां बहुत कारगर नहीं होती. स्वयं को सफलता की दौड़ में बनाए रखने के लिए बालक चीजों को पूरी तरह समझने के बजाय केवल उसका नाटक करने लगता है. आरंभिक सफलता बौद्धिकता के इस छदम् को उत्तरोत्तर विस्तार देती है. बाजार के प्रलोभन व्यक्ति और समूह दोनों पर लगभग एक जैसा प्रभाव डालते हैं. विभिन्न प्रकार के दबावों के बीच केवल सूचना समृद्ध होने को ज्ञानवान होना मान लिया जाता है. बालक के मौलिक सोच, समाज के संपर्क में आने पर जन्मी मौलिक उद्भावनाओं की अक्सर अनदेखी कर दी जाती है. इस तरह समाज के लगभग एकचौथाई सदस्य निर्णय प्रक्रिया से कट जाते हैं.

 

जिस प्रकार मातापिता संतान में अपना भविष्य देखते हैं, समाज भी नागरिकों में अपना भविष्य सुरक्षित रखने का सपना देखता है. लोकतांत्रिक समाजों में बालक को जन्म के साथ नागरिकता संबंधी अधिकार प्राप्त हो जाते हैं. इनमें अभिव्यक्ति का अधिकार भी सम्मिलित है. यहां एक अतिस्वाभाविक प्रश्न छोड़ा जा सकता है कि लोकतांत्रिक समाजों में जो अधिकार बड़ों को प्राप्त होते हैं, क्या उतने ही अधिकार बच्चों को भी प्राप्त होते हैं? इसका तात्कालिक उत्तर नकारात्मक होगा. खुलेपन का दावा करने वाले समाजों में भी बालक के कार्यकारी अधिकार बहुत सीमित होते हैं. उसकी वास्तविक अधिकारिता 18 वर्ष का होने तक प्रतीकात्मक ही रहती है. इसके पीछे तर्क प्रायः एक जैसे होते हैं. उस समय हम यह बिसार देते हैं कि हमने जानेअनजाने मौलिक ज्ञान की आमद के लिए सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण दरवाजे बंद कर दिए हैं. यह ठीक है कि बालक बौद्धिक विकास की आरंभिक अवस्था में होता है. वह दुनियादारी के मामलों में, विशेषकर उन मामलों में जिन्हें उसका समाज मान्यता देता है, उतनी जानकारी नहीं रखता जितनी सामान्यतः बड़े रखते हैं, परंतु यह भी सच है कि उम्र की आरंभिक अवस्था में वह सर्वाधिक मौलिक और नैतिक होता है. उचित यही है कि उसकी मौलिकता का लाभ उठाया जाए. अपने परिवेश के बारे में बालक जो सोचता, महसूस करना है, उसको अभिव्यक्त करने के लिए उत्साहित किया जाए. इसके रास्ते क्या हों, उनका निर्धारण समाज अपनी परिस्थितियों के अनुसार कर सकता है. यह संभव है कि उन अनेक मामलों में जिन्हें दुनियादारी कहा जाता है, बालक की जानकारी अत्यल्प हो, कुछ न हो तो भी यह प्रक्रिया बालक को अपने समाज और राष्ट्र के बारे में सोचने, उसको जोड़े रखने में मददगार सिद्ध होगी. उसके आत्मविश्वास और नागरिकबोध, जिसका इन दिनों बड़ों में भी अभाव है, आशानुकूल वृद्धि होगी. तदनंतर छिटपुट टिप्पणियों के रूप में भी उसकी ओर से ज्ञान की जो आमद होगी, वह अनूठी होगी. मगर बालक को तब तक उपेक्षित रखा जाता है, जब तक उसकी ज्ञानपिपासा दुनियादारी के रंग में रंगकर मंद नहीं पड़ जाती.

 

बालक का जीवन अनुशासित हो इसके लिए जिम्मेदार परिवार एवं समाज मानवव्यवहार को संस्कृति एवं परंपराओं के अनुरूप बनाए रखने पर जोर देते हैं. ताकि इन संस्थाओं का स्थापित ढांचा क्षतिहीन बना रहे. उसमें किसी प्रकार का विकार उत्पन्न न हो. लेकिन जिन मूल्यों को आधार बनाकर बालक से संस्कृति एवं परंपराओं से जुड़े रहने का आग्रह किया जाता है, उनका किताबी आकर्षण यथार्थ के आगे बगलें झांकता नजर आता है. स्कूल में जब बालक को पता चलता है कि उसकी शिक्षा के लिए मातापिता को मोटी रकम का भुगतान करना पड़ा है….जिन बच्चों के मातापिता भुगतान करने में असमर्थ थे, वे बच्चे पाठशाला नहीं आ पाए हैं, अथवा जब वह घर आए कथावाचक को कर्मकांड के बीचबीच में दान के लिए आग्रह करते, दक्षिणा के वजन से पूजा का स्वरूप तय होते देखता है. फिर जब वह देखता है कि उसका एक निबुर्द्धि पड़ोसी केवल अपनी शानदार कोठी, बड़ी गाड़ी के कारण समाज में प्रतिष्ठित है. पुनः जब वह पाता है कि कोरा ज्ञानार्जन उसकी शिक्षा का अभीष्ठ नहीं है. मातापिता उसको डाॅक्टर, इंजीनियर या बड़ा अधिकारी बनाना चाहते हैं, जिसके लिए पढ़ाई जरूरी है; यानी ज्ञान का उसका आयोजन ज्ञान के लिए न होकर दूसरों से स्पर्धा में आगे बने रहने के लिए है. और जब वह पाता है कि किताबों में पढ़ी नैतिकता भरी बातें व्यवहार में कोई मायने नहीं रखतीं, तब पुस्तकों से उसका जी उचटने लगता है. जिज्ञासावृत्ति कमजोर पड़ जाती है. परीक्षा में किसी भी तरह अधिक से अधिक अंक लाना उसका लक्ष्य बन जाता है. प्रकारांतर में स्कूल स्पर्धा का मैदान बन जाता है, पढ़ाई महज औपचारिकता. ज्ञान और ज्ञानार्जन के अतिरिक्त बालक ऐसे वैकल्पिक और आसान मार्गों की खोज में जुट जाता है, जो उसको स्पर्धा में बनाए रख सकें. चूंकि वह स्वयं को अपने ही जैसे युवाओं से घिरा हुआ पाता है, जो स्वयं स्पर्धा में आगे निकलने को आतुर हैं. स्पर्धा धीरेधीरे प्रतिद्विंद्वता में ढलने लगती है. सामाजिकसांस्कृतिक मूल्यों, परंपराओं के प्रति उसका विश्वास कमजोर पड़ने लगता है. व्यक्ति सहयोगपूर्ण परिवेश में पूरा जीवन बिता सकता है, स्पर्धा के बीच वह अधिक लंबा नहीं चल पाता. आधाअधूरा ज्ञान मन में आत्महीनता की स्थिति को जन्म देता है. धीरेधीरे वह परिवार, पड़ोसी और मित्रसंबंधियों के प्रति संदेह करने लगता है. उनसे निपटने के लिए विकल्पों की तलाश करता है. परिणामस्वरूप ज्ञान की मौलिक साधना से उसका विश्वास उठ जाता है. शिक्षा के मायने केवल डिग्री प्राप्त करने तक सीमित रह जाते हैं. उस अवस्था में धनार्जन की ललक सामाजिकसांस्कृतिक उपादानों पर भारी पड़ने लगती है. बालक उसी को अपना लक्ष्य मान लेता है.

 

किशोरावस्था के दौरान बालक में स्पर्धा की भावना जन्म ले लेती है. उसकी शुरुआत परिवार से होती है. पुत्र परिवार में स्वयं को पिता का उत्तराधिकारी मानने लगता है. वह चाहता है कि बड़े उसके निर्णय का सम्मान करें. लेकिन यदि उसको लगे कि बड़ों की निगाह में उसके निर्णय का कोई मूल्य नहीं है. तब उसे ठेस पहुंचती है. उस समय उसके सामने केवल दो रास्ते होते हैं. या तो वह बड़ों के निर्णय का सम्मान करते हुए अपने सोच और इच्छाओं को सीमित रखे तथा वयस्क होने तक बड़ों के मामलों में राय देने में संयम बरते. दूसरा यह कि किसी की भी परवाह न कर वह मनमानी करे. वही करे, जिसे उचित मानता है. अधिकांश मामलों में पहली स्थिति से समझौता कर लिया जाता है. लेकिन यदि वह अपने लिए दूसरा रास्ता अपनाता है तब समाज में विक्षोभ पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है. सर्वकुशल जैसे हालात पहली स्थिति में भी नहीं होते. इसलिए कि सर्वाधिक सक्रिय और जागरूक मानसिक अवस्था में दूसरों के निर्णय पर अवलंबित बालक धीरेधीरे अपना निर्णय सामर्थ्य खोने लगता है. सामाजिकसांस्कृतिक एकता और समरस विकास के लिए हितकर तो यही है कि बालक समाज, संस्कृति एवं परंपरा के आधार पर बने संबंधों को प्राथमिक एवं उत्पादन, उपभोग, विपणन आदि के आधार पर निर्मित संबंधों को द्वितीयक माने. मगर मौलिक सोच, आत्मविश्वास की कमी के कारण ऐसा अक्सर नहीं हो पाता. इससे प्राथमिकताओं की अदलाबदली होने लगती है तथा व्यक्ति वैयक्तिता को बढ़ावा देने वाले प्रलोलनों का शिकार हो जाता है.

 

अकादमिक शिक्षा प्राचीन एवं आधुनिक सभ्यता के अंतर को केवल समाज की भौतिक प्रगति तक सीमित कर देती है. बालक को यह तो बताया जाता है कि मानवसभ्यता के दसबारह हजार वर्षों में मनुष्य की भौतिक उपलब्धियां क्या हैं, इस बीच विकास की कितनी लंबी यात्रा उसने तय की है. पर दो लाख वर्ष पहले से लेकर बारह हजार वर्ष पहले तक; यानी जब सभ्यता की नईनई शुरुआत हुई थी, उत्तरजीविता के लिए मनुष्य के आदि वंशजों को प्रकृति के साथ कितने संघर्ष करने पड़े होंगे? यह जानकारी उसको या तो दी नहीं जाती या उसे एकदो वाक्यों में समेट दिया जाता है. भविष्य को लेकर भी हमारे समस्त आकलन तकनीक और प्रौद्योगिकीय विकास पर केंद्रित होते हैं. तदनुसार हम पचाससौ वर्ष बाद जिन नए उपकरणों के आविष्कार की संभावना है, का अनुमान तो आसानी से लगा लेते हैं. लेकिन इतनी अवधि में समाज, संस्कृति और परंपराओं में क्या बदलाव हो सकते हैं, या होने चाहिए इसे लेकर गंभीर विमर्श न केवल बालक बल्कि बड़ों के स्तर पर भी नदारद होता है. हम यह माने रहते हैं कि संस्कृति जड़ अवधारणा है. उसका जो स्वरूप आज है वही आगे पचाससौ वर्ष बाद भी बना रहेगा. संस्कृति और परंपराओं के वे प्रतीक जो समाज की एकजुटता के लिए जिम्मेदार कहे जा सकते हैं, जिनके आधार पर समाज संगठित होता आया है, क्या वे आगे भी इसी तरह बने रहेंगे? यदि नहीं तो उनका वैकल्पिक रूप क्या हो सकता है, इसपर हम चुप्पी साधे रखते हैं.

 

जवाब में कहा जा सकता है कि ये शिक्षा के ऐसे क्षेत्र हैं, जहां मनुष्य आज भी बहुत कम जान पाया है. उसका जितना भी ज्ञान है, वह अनुमानाधारित है. उसको प्रमाणिक सिद्ध करने के लिए उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्य बहुत कम या अपर्याप्त हैं. यह सच भी है. तब शिक्षा का एक दायित्व यह भी है कि बालक को उन क्षेत्रों की जानकारी भी दी जाए जहां, मनुष्यता की ज्ञानोपलब्धियां अत्यल्प अथवा नगण्य हैं. सुकरात का अपने बारे में यह कहना, ‘मुझे अपने अज्ञान का ज्ञान है’ इस संबंध में प्रेरक हो सकता है. दूसरे शिक्षा का काम केवल यह नहीं होता कि वह अपनी खोजों, उपलब्धियों और प्रगति से बालक को परचाए, उसका यह कर्तव्य भी होना चाहिए कि वह ज्ञान के अंधकूपों की ओर इशारा करते हुए बालक को उसकी निष्पत्ति के लिए प्रवृत्त करे. उसकी प्रश्नाकुलता को विस्तार दे. बालक अपने और समाज के अज्ञान के बारे में भी जाने, यह व्यवस्था भी किसी न किसी रूप में होनी चाहिए. इसका अभाव संस्कृति और भौतिक प्रगति के बीच लंबी संवादहीनता के रूप में सामने आता है.

 

भौतिक सुखसुविधाओं के साथ असुरक्षा एवं अस्थायित्व की भावना गहरे तक जुड़ी होती है, इसलिए सुरक्षा और स्थायित्व की चाहत में व्यक्ति समाज और संस्कृति से जुड़ा रहना चाहता है. जो स्वयं परिवर्तन की परंपरा से कटे हुए होते हैं. ज्ञान की मौलिक साधना से कटे समाज आत्मविश्वास की कमी के शिकार होते हैं. वे पूंजीवादी हमलों को झेल पाने में असमर्थ होते हैं. इसलिए वे या तो उसके आकर्षण में बहने लगते हैं अथवा उसको अपने लिए हानिकारक मानकर उससे किनारा कर लेते हैं. कई बार ऊहापोह और असमंजस की स्थिति बन जाती है. ऐसे हालात में समाज में यदि बदलाव आता भी है तो मात्र नवीन प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग को लेकर. वे इसी से संतुष्ट होकर बाजार के हाथों का खिलौना बने रहते हैं.

 

इस समस्या का समाधान क्या हो? संस्कृति की गतिशीलता को बनाकर कैसे रखा जाए? बालक की कोमलता, निश्छलता, नैतिकता और सहृदयता का लोकहित में लाभ कैसे उठाया जाए? क्या कोई ऐसा रास्ता भी संभव है जिसपर चलकर संस्कृति और सभ्यता की गतिशीलता के अंतर को पाटा जा सकता है? ऐसा कैसे संभव हो कि संस्कृति सभ्यता की अनुगामी न होकर सहगामी बन जाए! परिवर्तनप्रवाह अकल्पित और आकस्मिक न होकर आकल्पित हो! इसके लिए आवश्यक है कि बालक अपने भविष्य के प्रति आश्वस्त रहे. उसके मन में डर और अकेलेपन जैसे मनोभाव पनपने न पाएं. शिक्षा व्यक्तित्व निर्माण और बौद्धिक उठान दोनों को एकसमान, एक साथ महत्त्व दे. ज्ञानार्जन आस्थावादी दुराग्रहों से पूरी तरह मुक्त हो. बालक की परवरिश विश्व नागरिक की तरह हो. ‘ज्ञान सत्य है और सत्य आत्मा की आवश्यकता’— आइंस्टाइन के ये शब्द उसके मनमस्तिष्क में उतर जाने चाहिए. लेकिन ज्ञानवान होने का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति विशिष्टताबोध का शिकार होकर रह जाए. खुद को बाकी लोगों से ऊपर समझने लगे और केवल अपनी सुखसुविधाओं को जीवन की सिद्धि मान बैठे. उसको जानना चाहिए कि अकेले व्यक्ति का न तो कोई वर्तमान है, न भविष्य. अहंकार हो या प्रेम, सौहार्द हो अथवा ईर्ष्या, मनुष्य को अपने मनोभावों के प्रदर्शन के लिए दूसरों की जरूरत पड़ती ही है.

 

मनुष्य ने अभी तक जो अर्जित किया है, वह उन महापुरुषों की देन है जो लोकहित को व्यक्तिसुख से बड़ा मानते थे. मानवजीवन की सुखमय बनाने के लिए जिन्होंने अपने सुख, सम्मान की कभी परवाह न की, बल्कि अक्सर उसकी उपेक्षा ही करते रहे. अतः जरूरी है कि ज्ञान का आयोजन, प्रदर्शन सर्वकल्याण के लिए हो. बगैर समानताबोध के यह संभव नहीं. इसलिए बालक को समझाया जाना चाहिए कि, ‘सब आंखें मनुष्य के विचारों तक पहुंचने के द्वार हैं….न तो मनुष्य जाति का अधिकांश भाग अपनी पीठ पर काठियां कसबा कर उत्पन्न हुआ है; और न कुछ थोड़े से विशेषाधिकार प्राप्त लोग ईश्वर की दया से बूट पहने और एड़ लगाए ही उत्पन्न हुए हैं कि वे उन लोगों पर तुरंत सवारी गांठ सकें.’ (थामस जैफर्सन). सत्ता का चरित्र सदैव अल्पसंख्यकवादी होता है. उसपर विराजमान लोग सदैव इस प्रयत्न में रहते हैं कि शिखर पर कम से कम लोगों की भागीदारी रहे. सत्ता के चरित्र को बालक उससे अनुकूलन करके नहीं सीख सकता. यह तभी संभव है, जब उसमें पर्याप्त आलोचनाविवेक हो.

 

बालक के संपूर्ण विकास के लिए आवश्यक है कि समाज उसके मौलिक विकास को बढ़ावा दे. उसमें समाज को समझने और बरतने की योग्यता स्वतः विकसित होने दे. ताकि वह अवसर पड़ने पर वह उनपर उठने सवालों पर तार्किक प्रतिक्रिया दे सके. उसे उसकी सीमाओं और क्षमताओं से साथसाथ परिचित कराए. उनका अधिकतम इस्तेमाल करने की प्रेरणा दे. बालक समाज एवं संस्कृति की उपयोगिता पर उठनेवाले प्रश्नों का उत्तर देने में स्वयं को असमर्थ पाता है या उस समय अपने भीतर ग्लानि, आत्मविश्वास की कमी या कुंठा का अनुभव करता है, तो वह द्वितीयक संबंधों को ही प्राथमिक समझने लगेगा. जैसा कि इन दिनों हो रहा है. इसलिए उसे समझाए कि उसकी तरह समाज भी विकासमान अवस्था में है. सभ्यता, संस्कृति या परंपराओं का कोई भी विधान ऐसा नहीं जिसकी समीक्षा न हो सके. सोच को पूर्वाग्रहमुक्त रखने के लिए उसको समझाया जाए कि धर्म एक कुटिल राजनीति है, जिसमें सत्ता का हासिल करने का सपना अगले जन्म तक टाल दिया जाता है. यह भी कि नैतिकता धर्म की चेरी नहीं है. वह मानवता का लक्ष्य है. धर्म तो उसका लक्षण मात्र है.

 

उपयुक्त अवसर पर बालक को यह भी बताएं कि धरती पर कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है जो मनुष्य के लिए निषिद्ध हो. मगर उसका यह अधिकार दूसरों के अधिकार की सुरक्षा में ही संभव है. हम यदि कोई वृक्ष लगाते हैं, तभी हमें फल खाने का अधिकार है. दूसरों के श्रम पर जीना, किसी भी तरह परावलंबी होना मानवी गरिमा के प्रतिकूल है. बालक जब खुद को समझ लेगा तो समाज को भी समझ लेगा. तब उसकी प्रतिक्रिया सकारात्मक होगी. तभी वह अपने विवेक का अधिकतम उपयोग कर सकेगा. समाज आज जिस प्रकार भय, कुंठा, नैराश्य, हताशा, नकारात्मक सोच तथा सांस्कृतिक अपसंस्करण से त्रस्त है, उसके निदान का रास्ता भी स्वतः खुलता जाएगा. लेकिन बालक की शिक्षा अकेले उसका विषय नहीं है. वह हम बड़ों से भी जुड़ा है. इसलिए जो हम बालक से चाहते हैं, जिस रूप में उसको ढालना चाहते हैं, भविष्य में जिस तरह के समाज की कल्पना करते हैं, उसके लिए क्या हम स्वयं तैयार हैं? यही वह पहेली है, जिसमें बालक और समाज दोनों का भविष्य छिपा है. जिसके रहस्य को बूझना आज के समाजविज्ञानियों और शिक्षाशास्त्रियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है.

 © ओमप्रकाश कश्यप

 

प्रागैतिहासिक भारत में व्यापार एवं शिल्पकार-संगठन

सामान्य

इस बात के पर्याप्त साक्ष्य हैं कि सभ्यता के लंबे विकास-क्रम में व्यापार निरंतर तरक्की करता जा रहा था. लोगों की आवश्यकताएं भी बढ़ रही थीं. इसलिए यह संभव नहीं रह गया था कि एक ही स्थान पर मनुष्य की जरूरत की समस्त वस्तुओं का उत्पादन संभव हो सके. कच्चे माल एवं दक्ष शिल्पकारों की उपलब्धता के अतिरिक्त बाजार भी एक बड़ा कारण था, जिससे लोगों ने संगठित व्यापार की आवश्यकता को समझा. आगे चलकर यही संगठन राज्य के विकास की धुरी बनकर उभरे. प्रकारांतर में इसी वर्ग ने बड़े व्यापारी समूहों को जन्म दिया था. लेकिन ये संगठन उन अर्थों में व्यावसायिक एवं स्पर्धी नहीं थे, जिस प्रकार हम आजकल के व्यापारिक समूहों को देखते हैं. वे दरअसल शिल्पियों और कलाकारों के अन्योन्याश्रित व्यावसायिक समूह थे, जिनके पीछे संसाधनों के सम्मिलित प्रयोग द्वारा परस्पर कल्याण की भावना निहित थी. बाजार से जुड़ने की कवायद के पीछे शिल्पियों और कारीगरों की अपने शिल्प-कौशल एवं व्यापार को देश-देशांतर तक फैलाने की महत्त्वाकांक्षा भी थी. व्यापारी वर्ग के ऐसे प्रयासों को राज्य का पूरा समर्थन प्राप्त होता था. समाज में भी उनका महत्त्व बढ़ता जा रहा था.
उत्तरोत्तर व्यापार-वृद्धि ने लोगों की जरूरतों को विस्तार किया था. साथ में बढ़ती जा रही थी व्यापारी वर्ग की संख्या भी. इस कारण व्यापारिक यात्राओं में भी निरंतर वृद्धि हो रही थी. उन दिनों कच्चे रास्तों एवं यातायात के साधनों की अत्यल्पता के चलते यात्रा कर पाना आसान नहीं था. ऊपर से चोर-डकैतों का भय भी बना रहता था. हालांकि राज्य का दायित्व था कि वह व्यापारियों समेत अपने सभी नागरिकों की सुरक्षा की पक्की व्यवस्था करे. आततायियों को दंड देकर यातायात को सुगम बनाए. राजा की ओर से इस तरह के प्रयास भी होते थे, किंतु प्रत्येक राजा की सीमाएं भी थीं. किसी भी राजा को अपने व्यापारियों की सुरक्षा के लिए उनमें से प्रत्येक को सुरक्षा दे पाना संभव ही नहीं था. निश्चित रूप से इसके पीछे कुछ भौतिक कारण भी थे. अतएव संकट के समय साथ देने के लिए लोग अपने साथियों, सहधर्मियों के साथ निकल पड़ते थे. ग्राहकों को उनकी पसंद के अनुसार विभिन्न गुणवत्ता का माल एक ही समय में उपलब्ध कराने तथा अधिक लाभ के लिए थोक में सस्ती खरीदारी करने के लिए अपेक्षाकृत अधिक पूंजी की आवश्यकता पड़ती थी. इसलिए कुछ ऐसे भी संगठन बने जो केवल पूंजी का ही व्यापार करते थे, जिनका कार्य व्यापारियों को ब्याज पर ऋण प्रदान करना था. उस समय बोध हुआ कि पूंजी का प्रबंधन भी एक विशिष्ट कला है. इसलिए व्यापार की सफलता के लिए पूंजी के व्यवहार एवं प्रबंधन की महत्ता बढ़ती चली गई.
कालांतर में पूंजी का प्रबंध करने के लिए भी स्वतंत्र संगठन बने जो उस समय की अर्थव्यवस्था का खास हिस्सा थे. चूंकि व्यवसाय में धन लगाने वाला कोई भी व्यापारी, निश्चित मुनाफे के साथ अपने धन की वापसी चाहता था. वह इस बात की गारंटी भी चाहता था कि उसके द्वारा लगाया जाने वाला धन पूरी तरह सुरक्षित है तथा धोखादड़ी की संभावना न्यूनतम है. निवेशकों में यह विश्वास जगाए रखने के लिए आवश्यक था कि व्यापार के नियम सुस्पष्ट एवं सामाजिक रूप से मान्य हों. इसके लिए लिखित आचार संहिता बनाने का कार्य भी उत्तर वैदिक काल में शुरू हो चुुका था. विष्णुगुप्त चाणक्य, याज्ञवल्क्य, शुक्राचार्य आदि ने अर्थशास्त्र की नीतिगत व्याख्या के लिए ग्रंथों की रचना की, जिनमें चाणक्य रचित ‘अर्थशास्त्र’ इस विषय की प्रतिनिधि रचना है. इन पुस्तकों में उस समय के व्यापार तथा राजनीति के संबंधों की गहन विवेचना की गई है. इनके द्वारा यह संकेत मिलता है कि भारत में सहयोगाधारित आर्थिक गतिविधियों की शुरुआत वैदिककाल में ही हो चुकी थी, महाकाव्यकाल में उनका विस्तार हुआ. उत्तरवैदिक काल तथा वौद्ध काल में वे देश की अर्थव्यवस्था का मुख्य स्तंभ बन चुकी थीं. समाज में उनकी प्रतिष्ठा थी. हालांकि उनका स्वरूप देशकाल के अनुसार परिवर्तनशील था. लेकिन उन सभी का प्रमुख लक्ष्य था अपने समूह के आर्थिक विकास के लिए संगठित कार्य करना. उत्तरोत्तर सुगम होते यातायात वस्तुओं की लगातार बढ़ती मांग ने उन्हें और अधिक मजबूत और ज्यादा महत्त्वपूर्ण एवं प्रासंगिक बनाया था. उपर्युक्त आधार पर कहा जा सकता है कि—
‘सहकारिता का उद्भव उस समय की घटना है, जब व्यापार के साथ-साथ वस्तुओं की मांग में भी निरंतर वृद्धि हो रही थी, जिस समय उद्योग-स्वामियों तथा उनके प्रबंधकों के व्यवहार एवं कार्यकलापों पंर निवेशकों, उपभोक्ताओं तथा आम जनता द्वारा नजर रखने की प्रविधि का विकास हो चुका था. लोक परिवीक्षण एवं अवलोकन की घटनाओं ने उद्यमों के सांगठनिक स्वरूप को मजबूत एवं कार्यक्षम बनाने का काम भी किया था. हालांकि इससे उत्पादन लागत में भी वृद्धि हुई थी. क्योंकि सांगठनिक स्वरूप को बनाए रखने के लिए प्रशासन संबंधी खर्चों की अतिरिक्त रूप से आवश्यकता थी. इससे लोगों में सहकार के प्रति आग्रहशीलता का विकास हुआ, तथापि सहकारिता को बढ़ावा देने वाले केवल यही कारण नहीं थे. इनके अतिरिक्त संपत्ति, संविदा कानून जैसे कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण कारक थे, जिन्होंने सहकारिता के विकास के लिए उसके प्रवर्तक एवं उन्नायक का कार्य किया था.’1
वेदों-उपनिषदों से लेकर स्मृतियों, पुराणों आदि ग्रंथों में सामूहिक उद्यमों की चर्चाएं हमारे पूर्वज जिस तरह से करते आए हैं, इससे भी साफ होता है कि वे अर्थव्यवस्था के इस कल्याणकारी स्वरूप से न केवल भली-भांति परिचित, बल्कि इसके पोषक-प्रशंसक भी थे. इसीलिए अर्थव्यवस्था की विकासगति को बनाए रखने के लिए उन्होंने ऐसे उपक्रमों का मुक्तकंठ से समर्थन किया था, जिनमें समाज के लगभग सभी सदस्यों की सहभागिता सुनिश्चित करने की व्यवस्था थी. सहकार के रूप में यह एक आदर्श-लोकोपकारी व्यवस्था थी, जिसमें समाज का कोई भी सदस्य अपने अल्पतम संसाधनों के साथ हिस्सेदारी कर, उससे निश्चित लाभ प्राप्त कर सकता था. चूंकि निवेशक किसी भी वर्ग, जाति अथवा संप्रदाय का हो सकता था, इसलिए नियम यह था कि समाज के संपूर्ण विकास के लिए उसके समस्त वर्गों का यथासंभव सहयोग प्राप्त किया जाए.

सभ्यता का आदिकालीन दौर

प्राचीन भारतीय सभ्यता जिसे कुछ लोग वैदिक सभ्यता और कुछ विद्वान सिंधु घाटी की सभ्यता भी कहते हैं, अत्यंत उर्वरा धरती पर विकसित हुई थी. उसका कालखंड विस्तृत, लगभग छह हजार वर्षों का है. वह विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक और अनेक अर्थों में उनकी अपेक्षा अधिक विकसित भी थी. उस सभ्यता के अवशेष मेरहगढ़, मोआन-जो-दारो, हड़प्पा आदि अनेक स्थानों पर बिखरे पड़े हैं. उन स्थानों के उत्खनन से जो अवशेष प्राप्त हुए हैं, उनके आधार पर उस सभ्यता के बारे में सटीक कल्पना कर पाना संभव है. सिंधु नदी की उर्वरा भूमि पर पल्लवित हुई वह सभ्यता कई मायनों में अनूठी थी. वहां घर-आंगन चौड़े तथा जलनिकासी की उन्नत व्यवस्था थी. सड़कें पक्की और सीधी जाती थीं. सार्वजनिक स्नानगृह भी उस सभ्यता की प्रमुख विशेषता थे. संभवत वह पहली नागरी सभ्यता थी, जिसमें स्वच्छता और आवागमन के प्रबंधों पर इतना अधिक जोर दिया गया था. क्षेत्रफल की दृष्टि से देखा जाए तो उसका परिक्षेत्र समकालीन किसी भी सभ्यता के विस्तार के अधिक था.
सिंधु घाटी की सभ्यता के विकास के लिए जिम्मेदार आर्यगण प्राचीन वैदिक समाज से ही संबंधित थे, जो घुम्मकड़ प्रवृत्ति का था. एक स्थान से दूसरे स्थान तक भटकने रहने के कारण आर्य सैनिकों का अधिकांश समय युद्ध और उसकी तैयारियों में ही निकल जाता था. इससे वे जरूरत लायक अनाज का उत्पादन करने में सफल नहीं हो पाते थे. उसके लिए उन्हें युद्धों का सहारा लेना पड़ता था. युद्ध से बचे समय का उपयोग शिल्पकला के विकास के लिए किया जाता था. शिल्पकर्म के माध्यम से युद्ध के दौरान घायल-अशक्त सैनिकों का पुनर्वास भी संभव था. इस कारण शिल्पकला की उपयोगिता भी थी. परिणामस्वरूप दक्ष शिल्पकारों का समाज में सम्मान भी था. जिसके आधार पर शिल्पकला का विकास होता चला गया. भविष्य में अतिरिक्त रूप से उत्पादित माल के विपणन के लिए नए बाजारों की जरूरत महसूस की गई, उसी ने प्रकारांतर में संगठित व्यापार को बढ़ावा दिया. किरन कुमार थपल्याल के अनुसार—
‘वर्णाश्रम व्यवस्था के अंतर्गत श्रम-विभाजन की नीति ने भी संगठित व्यापार को आवश्यक बनाने, उसको विस्तृत करने का कार्य किया. तत्कालीन समय में वैश्यों के रोजगार के तीन प्रमुख साधन अर्थात कृषि, पशुधन एवं वाणिज्य के आधर पर आगे चलकर व्यापार की अनेक धाराओं का विकास हुआ.2
भारतीय सभ्यता के विकास के दौर को हम निम्नलिखित आधार पर वर्गीकृत कर सकते हैं: क्रमांक प्रमुख ऐतिहासिक घटनाएं कालखंड
1 सभ्यता का आदिकालीन दौर                       6500 ई.पू. से 700 ई.पू. तक

क. सभ्यता के प्रारंभिक अवशेषः मेहरगढ, मोहनजोहदड़ो आदि 6500 ई.पू. से 3300 ई.पू तक

ख. सिंधु घाटी की सभ्यता                             3300 ई.पू. से 1900 ई.पू. तक

ग. गंगा घाटी और तराई की सभ्यता             1900 ई.पू. से 700 ई.पू. तक

2 जैन एवं बौद्ध धर्म का अभ्युदय                 700 ई.पू. से 320 ई.पू तक

3 मौर्य साम्राज्य का उद्भव एवं विकास         320 ईपू. से 185 ई.पू. तक

4 मौर्य काल के बाद का भारत                     200 ई.पू. से 1300 ई पश्चात तक

क. गुप्त साम्राज्य, भारत का स्वर्णकाल       200 ई.पू. से 550 ई. पश्चात तक

ख. हर्षबर्धन एवं राजपूत महाराजाओं का काल600 ई प. से 1100 ईसा प. तक

हड़प्पा, मोय-जो-दाड़ो तथा मेहरगढ़ की जैसी भारतीय प्रायद्वीप की प्राचीनतम सभ्यताओं के पुरातात्विक अवशेषों के आधार पर यह अनुमान आसानी से लगाया जाता है कि तत्कालीन समाज कृषि-कर्म से परिचित था. उसमें शिल्पकर्म का भी पर्याप्त विकास हो चुका था. हड़प्पाकाल के लोग तो दूर-देशों के साथ अपने व्यापारिक संबंध भी बनाए हुए थे. अरब सागर के रास्ते से उनके काफिले मेसोपोटामिया, इजिप्ट, चीन आदि देशों तक निरंतर आते-जाते थे. उन काफिलों को आंतरिक स्पर्धा तथा किसी भी तनाव की स्थिति से बचाए रखने के लिए आवश्यक नियम बनाए गए थे.
भारतीय प्रायद्वीप में पनपी सभ्यताओं में मेहरगढ़ की सभ्यता के अवशेष उसके सर्वाधिक पुरातन होने के संकेत देते हैं. विद्वानों के अनुसार मेहरगढ़ सभ्यता, पाकिस्तान स्थिति आधुनिक क्योटा के निकट पनपी थी, जो करीब 6500 वर्ष पुरानी है. इस सभ्यता के अवशेष दर्शाते हैं कि मेहरगढ़ के प्राचीनतम वासियों को मिट्टी के बर्तन बनाने तथा उनको भट्टी में पकाने की कला में पारंगत हो चुके थे, तथा उनकी कलाकृतियों की मांग बाहर के बाजारों में भी बनी हुई थी. परिष्कृत सभ्यता के स्वामी सिंधु-सभ्यता के निवासी, धार्मिक दृष्टि से ईश्वर पर भरोसा करने वाले थे.
व्यापारिक दृष्टिकोण से भी वे किसी से पीछे नहीं थे. उनके व्यापारिक काफिले सूदूर रोम और ईरान तक की यात्रा करते रहते थे. भारतीय ग्रंथों में भी उसका उल्लेख मिलता है. यह इस भ्रम का भी उन्मूलन करती है कि भारतीय केवल आध्यात्मिक चिंतन में ही प्रवीण थे, दुनियादारी की बाकी बातों की तरफ उनका रुझान ही नहीं था. वस्तुतः श्रेणी के माध्यम से समूह के आर्थिक विकास तथा उसके द्वारा सामाजिक कल्याण की जो विशद् परिकल्पना की गई थी, वह भारतीय मनीषियों की मेधा की विलक्षणता और उसकी व्यापकता को दर्शाती है. आज भी अनेक अर्थशास्त्री सहयोग और सामूहिक समर्पण की प्रतीक उस व्यवस्था के प्रशंसक हैं. ऋग्वेद जिसको विश्व की किसी भी भाषा की प्राचीनतम कृति होने का गौरव प्राप्त है, में पणि का उल्लेख मिलता है. जिसके अंतर्गत व्यापारीगण परस्पर समझौता करते थे, ताकि कारवां के रूप में संगठित होकर दूर-दराज के प्रदेशों तक व्यापार किया जा सके. कठिन रास्तों तथा विपरीत भौगोलिक परिस्थितियों के कारण संगठन बनाकर चलना उस समय के व्यापारियों की विवशता थी. हालांकि कुछ विद्वान वैदिक युग में श्रेणी अथवा पणि जैसे किसी संगठन की उपस्थिति का समर्थन नहीं करते. दूसरी ओर कुछ विद्वानों का मानना है कि वैदिक काल के दौरान सहयोगाधारित संगठनों की उपस्थिति सामान्य थी. तात्कालिक अर्थव्यवस्था में उनका बहुत बड़ा योगदान था. इस संबंध में जो भी प्रमाण प्राप्त हुए हैं, उनकी विश्वसनीयता किसी भी प्रकार के संदेह से परे है. तांबे की मुहरें, ताम्रपत्र, प्रस्तर कलाकृतियां, लिखित ग्रंथ इत्यादि अनेक ऐसे प्रमाण हैं, जो प्राचीन सहयोगाधारित उद्यमों की प्रामाणिकता को दर्शाते हैं. यह भी निर्विवाद तथ्य है कि प्राचीन भारतवासी सहअस्तित्व एवं साहचर्य की महत्ता को पहचान चुके थे, अतएव परस्पर सहयोग एवं समर्थन के आधार पर नीतियां बनाना, उन दिनों की दिनचर्या में सम्मिलित हो चुका था. प्रकारांतर में उन्हीं के आधार पर सहकार के नियम बनाए गए. सहकारिता की आधुनिक अवधारणा प्राचीन सिद्धांतों से बहुत मेल खाती है. वैदेत्तर काल के साहित्यिक ग्रंथों, पुरातात्विक अवशेषों में पणि अथवा श्रेणी के रूप में सहयोगाधारित व्यापारिक संगठन होने का उल्लेख तो है, लेकिन उनके बारे और अधिक विवरण, उनकी कार्यपद्धति एवं पहुंच को लेकर अधिक साक्ष्य मौजूद नहीं हंै. इसे देखते हुए कुछ विद्वानों ने उस युग में सहयोगाधारित संगठनों की मौजूदगी पर ही संदेह प्रकट किया है. उनके अनुसार पूग अथवा पणि जैसे वैदिक वांङमय में आए शब्द गिल्ड के पर्याय नहीं हैं, न श्रेष्ठि अथवा श्रेणी-प्रमुख तथा गिल्ड के अध्यक्ष के पद को परस्पर समानार्थी मानना उचित होगा. हालांकि वैदिक समाज में शिल्पकलाओं की उन्नति पर किसी को भी संदेह नहीं है. इसलिए यह अपेक्षा की जा सकती है कि शिल्पकलाओं का उतना विकास बिना उपयुक्त बाजार के संभव ही न था. इस तर्क से भी सहयोगाधारित व्यापार संगठनों की मौजूदगी एवं उनकी उपयोगिता स्पष्ट हो जाती है.

सिंधू घाटी की सभ्यता

मेहरगढ़ की सभ्यता के अवसान के लगभग ढाई हजार वर्ष पश्चात सिंधू घाटी के तट पर एक और सभ्यता का विकास हुआ, जो अपेक्षाकृत अधिक आधुनिक एवं समृद्धिशाली थी. सिंधु थाटी के तटवर्ती क्षेत्र में विकसित होने के कारण यह सभ्यता भारतीय इतिहास में सिंधु घाटी की सभ्यता के नाम से जानी जाती है. इस सभ्यता के अवशेष मोआन-जो-दारो तथा हड़प्पा नामक स्थानों पर पाए जाते हैं. ईसा पूर्व 3300 वर्ष से लेकर 1900 ईसा पूर्व, करीब चैदह सौ वर्ष तक विकासमान रही यह सभ्यता अपनी समकालीन रोम तथा मेसापोटामिया सभ्यताओं से कहीं अधिक विस्तृत एवं समृद्ध थी. उन्नत जल निकासी, बेहतर नगर नियोजन, लेन-देन के समय माप-तौल के एक जैसे मानकों का प्रयोग, मुद्रा आधारित विनिमय इस सभ्यता की विशेषताएं थीं. इनके अतिरिक्त हड़प्पा और मोआन-जो-दारो के निवासी शिल्पकला एवं व्यापार के मामले में भी अपने समकालीनों से कहीं आगे थे. वे जल-थल दोनों ही रास्तों से व्यापार करते थे. संगठित व्यापार की कला से वे परिचित थे.
सिंधु घाटी के आसपास की जमीन अत्यंत उपजाऊ एवं प्राकृतिक रूप से समृद्ध थी, जिसका प्रभाव वहां के निवासियों की जीवनशैली पर पड़ना स्वाभाविक था. लोगों में विलासिता की वस्तुओं की खपत थी, जिसने व्यापार की संभावनाओं का सघन विस्तार दिया था. दुकानदार अपनी वस्तुओं को लेकर एक स्थान पर जमा हो जाते थे. पूरा सिंधु-प्रदेश हालांकि किसी एक राजा के स्वामित्व में नहीं था, बावजूद इसके वहां के निवासियों, व्यापारियों के बीच एक ही मुद्रा का चलन था और उसकी स्वीकार्यता सिंधु घाटी की सभ्यता की विशिष्टता थी, जिसका तब तक बाकी सभ्यताओं में प्रसार नहीं हो पाया था. प्रदेश हालांकि छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित था, तथापि विभिन्न राज्यों के नागरिकों के बीच संबंध सौहार्दपूर्ण थे. पुरातात्विक शोधों से यह भी सिद्ध हो चुका है कि सिंधू घाटी की सभ्यता उन्नत नागरिक सभ्यता थी. नगर नियोजन में समानता दर्शाती है कि वहां के निवासियों के बीच आपसी तालमेल का स्तर ऊंचा था. राज्यों के बीच झगड़े बहुत कम होते थे. नगरों में विभिन्न प्रकार के उद्योंगों एवं शिल्पकलाओं के लिए स्थान निश्चित थे. मापतौल के लिए विभिन्न स्थानों पर एक जैसे बाटों का प्रयोग होता था. नागरीकरण के कारण उत्तरोत्तर बढ़ती मांग, एक जैसी मापतौल व्यवस्था, एक ही मुद्रा का उपयोग तथा उद्यमियों एवं कारीगरों के लिए सघन बस्तियों का निर्माण, ये सभी परिस्थितियां व्यापार के पक्ष में थीं, उद्योगों के एक ही स्थान पर केंद्रीयकरण के कारण उनके बीच तालमेल एवं उनपर नियंत्रण रखना सुविधाजनक था. इन सब स्थितियों का लाभ व्यापारियों ने खूब उठाया और उनके व्यापारिक काफिले अपने माल के साथ दूर-देश की यात्राओं पर निकलने लगे—

‘ऊपर वर्णित स्थितियां ही प्रदेश के व्यापारिक विकास में सहायक बनीं. परिक्षेत्र में अपेक्षाकृत शांति ने व्यापार को सुरक्षित एवं लाभकारी बनाने में मदद की थी, परिणामतः नए बाजारों का विकास संभव हुआ. ध्यातव्य है कि विभिन्न राज्यों के बीच माप-तौल की एक समान पद्धति, विनिमय के लिए एक समान मुद्रा का प्रयोग उस समय तक केवल सिंधू घाटी की सभ्यता की विशिष्टता थीं, जिसके कारण व्यापारियों की एक-दूसरे समाजों, राज्यों में स्वीकार्यता बढ़ी, व्यापारिक लागत में कमी आई. उद्योगों एवं व्यवसायों के एक ही स्थान पर केंद्रीयकरण ने विभिन्न वर्गों के बीच आपसी तालमेल को बढ़ाने का कार्य किया था. इससे योग्य कर्मचारियों की भर्ती एवं उनका प्रशिक्षण आसान हुआ, जो उत्पादकता में वृद्धि के लिए आवश्यक था. ये सभी कारण उस परिक्षेत्र में जहां उद्योगों के विकास में सहायक बने, वहीं इन्होंने लंबे रास्तों पर सुरक्षित यात्रा करने, बड़े पैमाने पर उत्पादन करने तथा कर्मचारियों के प्रशिक्षण आदि की व्यवस्था करने के लिए, उद्यमियों एवं व्यापारियों को परस्पर सहयोग का मार्ग भी प्रशस्त किया.’3
हड़प्पा एवं मोआन-जो-दारो के टीलों की खुदाई से प्राप्त मुहरों पर उत्कीर्णित लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है. किंतु इन स्थानों की खुदाई से प्राप्त उस सभ्यता के अवशेष उस सभ्यता की अद्वितीयता एवं समृद्धिशीलता की घोषणा करते रहे हैं. प्राप्त पुरातात्विक साम्रगी में मृदा भांड, धातु की मुहरें, औजार, मूर्तियां इत्यादि सम्मिलित हैं. इनके अलावा सार्वजनिक स्नानगृह, सड़कों, पक्की नालियों, मकानों आदि से युक्त एक समृद्ध बस्ती के अवशेष के भी प्राप्त हुए हैं, जो उनके सुव्यवस्थित नगर-नियोजन के बारे में जानकारी देते हैं. प्राप्त मुहरों तथा नगर-नियोजन की उन्नत व्यवस्था को देखते हुए यह अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है कि वह एक समृद्ध सभ्यता थी. उत्खनन से प्राप्त मुहरें किसी व्यक्ति या समूह की आर्थिक समृद्धि का प्रतीक रही होंगी. बावजूद इसके यह दावा करना जल्दबाजी होगी कि उन दिनों तक समाज में सहकारिता अथवा साहचर्य का विचार अपनी पकड़ बना चुका था. न यह बात विश्वास के साथ नहीं कही जा सकती कि उस समय तक समाज में उत्पादक श्रेणियों का विकास हो चुका था, किंतु यह निविर्वाद रूप से कहा जा सकता है कि धीरे-धीरे ही सही, व्यावसायिकरण की ओर तेजी से बढ़ता हुआ वह समाज, अपने अनुभवों से सामूहिक नियंत्रण के प्रति आग्रहशील होता जा रहा था.
वस्तुतः अकेले व्यक्ति को अपनी सीमाओं का बोध भी सामूहिकीकरण का उत्पे्ररक रहा है. मनुष्य की निरंतर बढ़ती आवश्यकताओं तथा विभिन्न शिल्पकलाओं के उद्भव के बीच सिंधु घाटी के लोग अपनी कलाओं के साथ समूहबद्ध होते जा रहे थे. व्यापारियों, शिल्पियों को अब नए बाजारों की तलाश थी, जहां पर वे अपने शिल्पकर्म की अधिक से अधिक कीमत वसूल कर सकें. नए बाजारों तक आने-जाने तथा रास्ते के खतरों से निपटने के लिए व्यापारियों ने समूहबद्ध होकर यात्रा करना प्रारंभ किया, जो आगे चलकर सामूहिक उद्यमिता का रूप लेता चला गया. सभ्यता का वह पहला चरण था, जिसके आधार पर भाविष्य में साहचर्य आंदोलन की लंबी और टिकाऊ भूमिका गढ़ी जानी थी.
ध्यान देने की बात यह कि सभ्यता का वह नया रूप मनीषियों ने नहीं गढ़ा था, बल्कि उसकी रचना अपने शिल्प-कौशल के दम पर लोगों के दिलों पर छा जाने वाले शिल्पकारों, मेहनतकशों, व्यापारियों ने गढ़ी थी. संभव है कि प्रारंभ में उन्हें अपने राज्य का विरोध भी सहना पड़ा हो. लेकिन आगे चलकर जब उनका व्यवसाय अधिक मुनाफादेय होता चला गया और उसके दम पर उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति बेहद मजबूत कर ली, तो राज्य न केवल उनका समर्थन करने लगे, बल्कि मामूली कर के बाद उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उठाने को तैयार हो गए. संभवतः यही प्रतिक्रिया धार्मिक नेताओं की भी रही. परंपरा और शुचिता के नाम पर विदेश यात्रा को निषिद्ध करते आए पंडितजन, उस व्यपार में अपना हित देखकर उसके न केवल समर्थक बने, बल्कि तरह-तरह से स्वयं को उनका गुणग्राहक जताने लगे थे.

गंगा-जमुनी सभ्यता

सिंधु घाटी की सभ्यता का पराभव कैसे हुआ, इस बारे में कोई ठोस जानकारी प्राप्त न होने के कारण विद्वानों के बीच मतभेद बने हुए हैं. अधिकांश विद्वान नदी में आई बाढ़ को उसका कारण मानते हैं. लेकिन उस सभ्यता के पराभव के दौर में लगभग उसी के समान एक और सभ्यता गंगा और यमुना के तटवर्ती प्रदेशों में पनप रही थी. गंगा और यमुना के दोआबे के बीच का स्थान प्राकृतिक रूप से काफी समृद्ध, हरा-भरा एवं धन-धान्य से परिपूर्ण था. मीठे पानी के लगभग अंतहीन स्रोतों से परिपूर्ण इस सभ्यता का उद्भवकाल ईसा पूर्व 1900 से लेकर ईसा पूर्व 1500 तक है.
प्राकृतिक रूप से साधन-संपन्न होने के कारण गंगा-यमुनी सभ्यता का विकास बहुत तेजी से हुआ. उद्योग-धंधों एवं शिल्पकलाओं की उन्नति ने इसे बहुत शीघ्र अपनी समकालीन सभ्यताओं में विशिष्ट बना दिया था. हालांकि इस बात के लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं है कि इस सभ्यता के निवासी आरंभिक काल से ही श्रेणी या सहव्यापार के विचार से परिचित थे. प्राचीन गोतम धर्मसूत्र का हवाला देते हुए विक्रमादित्य खन्ना लिखते हैं कि भारतीयों को 1000 ईसापूर्व से 800 ईसापूर्व के बीच सहयोगाधारित व्यावसायिक संगठनों के बारे में ज्ञान था. महाभारत तथा बृहदारण्यक उपनिषद के हवाले से डाॅ. रमेशचंद्र मजुमदार ने भी दर्शाया है कि भारत में ऋग्वेद के समय में ही पणि का अस्तित्व था. उनका लिखते हैं कि लगभग 1500 ईसा पूर्व के आसपास इस सभ्यता के निवासियों को संगठित व्यापार की कला का बोध हो चुका था. इस तथ्य के समर्थन में तो पर्याप्त लिखित प्रमाण मौजूद हैं कि ईसा पूर्व 1000 से ईसा पूर्व 800 तक भारतवासियों को पणि एवं श्रेणी का ज्ञान था. वे अपने उद्योग-धंधों पर नियंत्रण एवं योजनाओं के निर्माण के लिए संगठनशक्ति का भली-भांति उपयोग करने लगे थे.

महाकाव्य युग में सहयोगाधरित आर्थिक संगठन

भारतीय समाज एवं संस्कृति की लगभग आधी से अधिक परंपराएं किसी न किसी प्रकार से रामायण एवं महाभारत से उद्भूत हैं. रामायण में राम की कथा है, किंतु परोक्षरूप में यह ग्रंथ आर्यों की भारत के मूल निवासियों पर विजय की गाथा है. राम-रावण युद्ध मुख्यतः दो विरोधी संस्कृतियों का संघर्ष था. वर्चस्व की उस लड़ाई में अपेक्षाकृति अधिक विकसित आर्य संस्कृति भारत की प्राचीन द्राविड़ संस्कृति को अपदस्थ कर स्वयं केंद्र पर विराजमान हो जाती है. महाभारत में पांडवों एवं कौरवांे के भीषण युद्ध की कहानी, विशुद्ध राजनीतिक संघर्ष था. दोनों ग्रंथों में वर्णित घटनाक्रमों के बीच भी लगभग एक हजार तक का अंतराल संभव है. अधिकांश विद्वान इस बात से सहमत हैं कि महाकाव्यों में वर्णित घटनाक्रम का समय तीन हजार ईसापूर्व से लेकर आठ सौ ईसा पूर्व तक फैला हुआ है.
वैदिक युग से रामायण एवं महाभारतकाल तक आते-आते भारतीय जनसमाज में काफी परिवर्तन हो चुके थे. लोगों की जीवनशैली और मान्यताओं तक में बदलाव आया था. समाज पर राजनीति का असर बढ़ा था. उत्तरवैदिक काल में ही ब्राह्मणों का सामाजिक कार्यकलापों एवं राजनीति पर बढ़ा हुआ असर साफ दिखने लगा था. महाकाव्यकाल में वर्णव्यवस्था और भी जटिल होकर उभरी थी. वर्गीय स्वार्थों के कारण उन्होंने राजा को इस धरा पर ईश्वर का उत्तराधिकारी घोषित किया था. परिणामतः राज्याधिपति का जनजीवन पर हस्तक्षेप और उसकी महत्त्वाकांक्षाओं में वृद्धि हुई थी. वैदिक युग में राजा का आशय जहां कबीले के मुखिया से था, वहीं महाकाव्यों में राजा को पूरी धरती का स्वामी और पालक, भूपति तक स्वीकार किया था. जिससे सारी शक्तियां एक व्यक्ति के हाथों में सिमटती जा रही थीं. छोटे-छोटे राज्य बडॆ़ राज्यों में मिलते जा रहे थे. उनमें आपसी प्रतिद्विंद्वता एवं युद्ध होते रहते थे. किसी राज्य के क्षेत्रफल में बड़े होने में कोई बुराई नहीं थी. बुराई थी उसकी कुल शक्तियों के किसी एक व्यक्ति के हाथों में सिमट जाने में. इससे संसाधनों के केंद्रीकरण को भी इससे बढ़ावा मिला था. एक ओर जहां कर्मकांडों में लगातार वृद्धि हो रही थी. वहीं दूसरी ओर लोगों का भौतिकता के प्रति आग्रह भी बढ़ा था.
अपने आप में यह एक विसंगति थी, जिसके पीछे ठोस कारण थे. दरअसल समाज का वह वर्ग जो धर्म और अध्यात्म के नाम पर लोगों को प्रकटतः त्याग एवं संयम का उपदेश देता था, उसका अपना जीवन भोग एवं लिप्साओं से भरा हुआ था. उसकी कथनी और करनी बिलकुल अलग-अलग थीं. लोग यह जानने लगे थे कि कर्मकांडों की संरचना उन्हें भरमाए रखने, प्रमुख सामाजिक समस्याओं से उनका ध्यान हटाने के लिए की गई है. इस कारण धर्म एवं नैतिकता से भी उसका मोहभंग हुआ था. इस सबका परिणाम यह हुआ कि समाज के बड़े वर्ग को भौतिक सुख-सुविधाएं भाने लगी थीं. लोकायत दर्शन का उद्भव इसी युग की घटना है. डाॅ सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे विद्वान ने भी महाकाव्यकाल पर भौतिकवाद के प्रभाव को स्वीकार किया है—
‘रामायण और महाभारत में वर्णित घटनाएं अधिकतर उस वैदिककाल की हैं, जबकि प्राचीन आर्य बड़ी संख्या में गंगा की उपात्यका में आकर बसे थे. कुछ लोग दिल्ली के आसपास, पांचाल लोग कन्नौज के समीप, कौशल लोग अवध् के समीप और काशी लोग बनारस में-किंतु ऐसा कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, जो यह सिद्ध कर सके कि इन महाकाव्यों की रचना ईसा से छठी शताब्दी से पूर्व हुई हो. स्वयं वेदमंत्रों के क्रमबद्धता में आने का काल भी वही है, जिस समय आर्य लोग गंगा की उपात्यका में फैल रहे थे…रामायण में उन युद्धों का वर्णन है, जो आर्य लोगों एवं यहां के मूल निवासियों के मध्य हुए, जिन्होंने आर्य संस्कृति को अपना लिया. महाभारत उस समय का ग्रंथ है जब वैदिक ऋचाएं अपनी मौलिक शक्ति एवं अर्थ खो चुकी थीं और कर्मकांड प्रधान धर्म सर्वसाधारण को अधिक आकृष्ट करता था. जन्मपरक जाति को प्रधानता दी जाने लगी थी. इसलिए इन महाकाव्यों की रचना का समय ईसापूर्व छठी शताब्दी के लगभग कहीं रख सकते हैं. यद्यपि उनके अंदर ईसा के 200 वर्ष पश्चात तक परिवर्तन होते रहे और उस समय के महाकाव्य अपने अंतिम अर्थात वर्तमान रूप में आ गए.4
ध्यातव्य है कि महाकाव्यों में वर्णित घटनाओं का समय और उनका रचनाकाल दो अलग-अलग बाते हैं. रामायण एवं महाभारत की घटनाओं का समय निर्धारित है. लेकिन उनका लेखन किसी एक समय की घटना नहीं है. बल्कि वह विस्तृत कालखंड में फैला हुआ है. इन दोनों ही ग्रंथों को अपना वर्तमान स्वरूप प्राप्त करने में शताब्दियां लगी थीं. इसमें भी सचाई है कि इन दोनों पुस्तकों की रचना सामान्य कथानक के रूप में की गई थी. बाद में वर्णाश्रम धर्म की स्थापना के लिए उनमें अनेक घटनाएं-प्रसंग प्रक्षेपित किए गए. चूंकि उनका कथानक भारतीय पंरपरा एवं संस्कृति की अनेक मान्यताओं को प्रतिष्ठित करने का काम करता था, कुछ नई परंपराओं की स्थापना के साथ भारत की वर्णाश्रम धर्म की स्थापना भी करता था, इसी कारण का उसका गुणगान युगातीत महागाथा के रूप किया गया, उन्हें बार-बार सुनने-सुनाने का आग्रह किया जाने लगा. लोगों के मनोरंजन की भूख एवं उनकी अशिक्षा का लाभ वर्णाश्रम धर्म के समर्थकों-प्रचारकों को यह मिला कि इन ग्रंथों में वर्णित नायकों का देवताओं में शुमार होने लगा और प्रतिनायक भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के खलनायक मान लिए गए. देवताओं का नाम रटने से पुण्य और खलनायकों की स्मृति को भी पाप का भागी बना दिया गया. मानवी मेधा के ऐसे दुरुपयोग के उदाहरण अकेले भारत में ही नहीं हुआ, अपितु दुनिया-भर के यथास्थितिवादी धर्म और परंपरा के नाम पर ऐसा मखौल करते रहते हैं. वर्णाश्रम व्यवस्था के संकेत वेदों में भी हैं, किंतु महाकाव्यकाल में यह और भी परवान चढ़ती गई.
वैदिककाल में अर्थव्यवस्था का प्रमुख स्रोत पशुपालन था. किंतु महाकाव्यकाल तक आते-आते अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान बढ़ता चला गया, जिसके फलस्वरूप लोगों ने एक ही स्थान पर टिककर रहना सीखा. परिणामतः जीवन में स्थायित्व बढ़ा. इससे व्यापारिक गतिविधियों को भी संवरने का अवसर मिला. पशुपालक अर्थव्यवस्था में लोग सामान्यतः पशुओं का ही लेन-देन करते थे. उनकी बाकी आवश्यकताएं प्रकृति के साथ सहगमन करते समय स्वाभाविक रूप से पूरी हो जाती थीं. एक ही स्थान पर जमकर रहने से लोगों की आवश्यकताओं में इजाफा भी हुआ था. कृषि के लिए नए औजारों की जरूरत ने लुहार, बढ़ई जैसे शिल्पकारों को बढ़ावा देने का काम किया. सभ्यता के विकासक्रम में मोची, जुलाहे, रंगरेज जैसे दस्तकारों की मांग में भी वृद्धि हुई. कालांतर में व्यापारिक गतिविधियों का प्रसार और भी नए-नए क्षेत्रों तक होता चला गया. उत्पादन की प्रारंभिक अवस्था एकरैखिक थी. स्थानीय शिल्पकार अपने समाज के लोगों की आवश्यकताओं के अनुसार उत्पादन करते थे, जो उन तक सीधे पहुंचा दिया था.
कालांतर में कृषक वर्ग और शिल्पकारों के अलावा समाज में एक और वर्ग का उद्भव हुआ जो स्वयं उत्पादन से नहीं जुड़ा था. उसका कार्य उत्पादक एवं उपभोक्ता के बीच सेतु बनाने का था. उपभोक्ताओं की तलाश तथा उस तक माल पहुंचाने के लिए इस वर्ग ने शिल्पकारों के साथ मिलकर कई अनोखे प्रयास किए, चूंकि यह कार्य राज्य की समृद्धि से भी जुड़ा था अतः उसको स्थानीय शासन का समर्थन भी प्राप्त था. राज्यों के विस्तार से आवागमन सुरक्षित हुआ था, इससे आपसी व्यवहार एवं लेन-देन का परिक्षेत्र भी विकसित हुआ था. पहले जो व्यापार किसी एक क्षेत्र तक सीमित था, वह दूर-दराज के स्थानों तक फैलने लगा था. व्यापारियों के संगठन भी बनने लगे, जिनका सांगठनिक स्वरूप तथा व्यापार का क्षेत्र भिन्न-भिन्न था. इसी दौर में व्यापार के नए क्षेत्रों का पता लगाने का कार्य भी चलता रहा. राज्यों के समर्थन एवं उनके सहयोग के बिना भी सहयोगाधारित ये संगठन समाज में अपना स्थान बनाते जा रहे थे.
वैदिककाल की तरह महाकाव्यकाल में भी मनीषी वर्ग ज्ञान के अन्वेषण एवं परंपराओं की सुरक्षा में जुटा हुआ था. इस वर्ग का समाज में अभी भी सम्मान था. श्रेष्ठ विचारों को प्रत्येक शा से आने दो, आवश्यकता से अधिक धन का संचय पाप है, मनुष्य का धर्म संकटकाल में अपने पड़ोसी की मदद करना है, कामनारहित होकर कर्म करते जाना—ऐसी सद्कामनाएं वेदों और वेदोत्तर साहित्य में जगह-जगह बिखरी पड़ी हैं. ये सद्भावनाएँ केवल भारतीय धर्मग्रंथों में ही विद्यमान रही हों, ऐसा नहीं है. बल्कि हरेक परिवेश, प्रत्येक काल और हर धर्म में इन सद्विचारों की कमोवेश मौजूदगी रही है. हालाँकि शास्त्रों में जो सैद्धांतिक अवधारणा के रूप में मौजूद है, वही ज्यों का त्यों लोकप्रचलित भी हो, यह सदा नहीं होता और यह भी सत्य है कि चलन से बाहर होने पर सत्य की प्रामाणिकता संदिग्ध नहीं हो जाती. मूल्यपरकता प्रत्येक युग में सम्मानित रही है.
नैतिकता को प्रत्येक युग में मानवजीवन का अभीष्ट माना गया है. वेद से लेकर महाभारत काल तक आते-आते हालांकि समाज में काफी परिवर्तन आया था. साथ ही मनुष्य का अपने सिद्धांतों से विचलन भी हुआ था. धर्म और राजनीति, जो पहले नैतिकता को प्रश्रय देने, उसे और ऊंचा उठाने के लिए जाने जाते थे, वे अनुसरण और लिप्सा के जनक बन चुके थे. लेकिन समाज के एक हिस्से पर यदि जड़ता व्याप्त थी, यदि वहां पर लोग यथास्थितिवाद के पोषक-प्रवर्त्तक बनकर हरेक परिवर्तन को रोके रखना चाहते थे, तो व्यवहार एवं संगठन के स्तर पर समाज में ऐसा भी बहुत कुछ घट रहा था, जो रचनात्मक था और उम्मीद जगाता था. इसके संकेत कारीगरों, शिल्पकारों तथा छोट-छोटे व्यापारियों के उन संगठनों के द्वारा मिल रहे थे, जो अपने व्यापार के माध्यम से समाज को न केवल समृद्धि की ओर ले जा रहे थे, बल्कि भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं को देश की सीमाओं से बाहर तक फैला रहे थे. वे संगठन सामूहिक लाभ के लिए गठित किए जाते थे. किंतु उनकी सफलता इसमें थी कि जनसामान्य भी उन्हें अपने लिए लाभकारी समझें. इसलिए आम जनजीवन पर उनका प्रभाव भी होता था. उत्पादक और व्यापारिक संगठनों की उपस्थिति को शास्त्रीय मान्यता देने के लिए विशः की संकल्पना की गई थी. यह माना गया था कि अकेले ‘ब्रह्म’ और ‘क्षत्र’ से कार्य नहीं चल सकता. ब्रह्म अर्थात ब्राह्मण, धार्मिक नेतृत्वकर्ता, जो समाज में शिक्षण एवं कर्मकांड की जिम्मेदारी संभालता था. क्षत्र यानी क्षत्री, जिसके ऊपर समाज की आततायियों से सुरक्षा का दायित्व था. और ये विशः क्या थे? विशः के संबंध में बृहदारण्यक उपनिषद में उल्लिखित है कि—
‘न तो ब्रह्म द्वारा समस्त कार्यों की सिद्धि संभव है, न अकेला क्षत्र इस दायित्व को उठा सकता है. इसलिए विशः की उत्पत्ति की गई, जो गणों के रूप में संगठित होकर अपने-अपने दायित्व का निर्वाह करते हैं.’5
स्पष्ट है कि उत्तरवैदिक काल में समाज में आर्थिक गतिविधियां महत्त्वपूर्ण हो चुकी थीं. अब केवल कृषि और पशुपालन द्वारा काम चलना संभव नहीं रहा था. उपनिषदों में विशः को मिले महत्त्व का उल्लेख शंकराचार्य ने भी किया है. विशः की उत्पत्ति के संबंध में उन्होंने लिखा है कि—
‘धनार्जन न तो क्षत्रिय द्वारा संभव है, न ब्राह्मण का ही यह कर्तव्य कि वह वित्त उपार्जन पर ध्यान दे. तब? तब देवों ने वित्त के उपार्जन तथा तत्संबंधी अन्य कार्यों को साधने हेतु ‘विश’ को उत्पन्न किया. विशः गण का ही पर्याय हैं, क्योंकि ये संहत (संगठन बनाकर) वित्त-उपार्जन में समर्थ होते हैं, अकेले-अकेले नहीं. इसलिए इनमें गणों की सत्ता निहित होती है.6
प्रारंभ में प्रायः सभी व्यापारिक समूह लगभग एक ही जैसे थे. एक व्यापारिक समूह कई प्रकार के व्यवसाय एक साथ कर सकता था. विकास की प्रारंभिक स्थिति में यह कार्य सरल था और संभव भी. लेकिन जैसे-जैसे व्यापार बढ़ता गया, किसी अकेले समूह द्वारा सभी क्षेत्रों में दक्षता बनाए रखना, अपने ग्राहकों को संतुष्ट रख पाना, असंभव होने लगा था. व्यापारिक सफलता के लिए किसी एक क्षेत्र में पूर्णतः दक्षता प्राप्त कर लेना आवश्यक मान लिया गया. आचार्य चाणक्य, बृहश्पति, शुक्राचार्य आदि मनीषियों ने अर्थशास्त्रीय नियमों की संरचना कर व्यापारिक समूहों को संहिताबद्ध करने का कार्य किया, जिससे उन्हें सामाजिक मान्यता भी मिलने लगी. समूहों द्वारा किए जा रहे कार्य के आधार पर उनका वर्गीकरण भी किया जाने लगा. संगठनों के कार्य तथा उनकी पहुंच के आधार पर उनका नामकरण होने लगा.
भारत के प्राचीन आर्थिक संगठनों की विशेषताओं और उनकी महत्ता को व्यक्त करने के लिए उन्हें कई नामों से पुकारा जाता है. उन सब में श्रेणी बहुप्रचलित एवं बहुस्वीकार्य नाम है. प्राचीन भारत में दायित्वों का विभाजन वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार होता रहा है. लेकिन ‘श्रेणी’ इस मायने में किंचित भिन्न थी. दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि ‘श्रेणी’ की संज्ञा प्राप्त आर्थिक समूह सामान्य हितों के लिए बहुमान्य वर्णाश्रम व्यवस्था की उपेक्षा तक कर सकते थे— आर्थिक संगठन के रूप में ‘श्रेणी’ की तुलना मध्यकालीन यूरोपीय देशों में कार्यरत उसके समानधर्मा आर्थिक संगठन ‘गिल्ड’ से की जा सकती है. दोनों में किंचित समानताएं भी हैं. जैसे दोनों ही का गठन सामूहिक कल्याण की भावना के साथ किया जाता था. दोनों ही के लिए अपने समूह के आर्थिक हित महत्त्वपूर्ण होते थे. सामूहिक नियंत्रण की व्यवस्था भी दोनों में लगभग एक जैसी ही थी. दोनों प्रकार के संगठनों में अनुशासन एवं व्यवस्था को बनाए रखने के लिए सर्वसम्मति से नियम बनाए गए थे, जिनका पालन पूरी निष्ठा एवं ईमानदारी के साथ किया जाता था. बावजूद इसके गिल्ड की अपेक्षा श्रेणी का स्तर कहीं अधिक व्यापक एवं वैविध्यपूर्ण था. एक और मुख्य अंतर इन दोनों में यह है कि यूरोपीय देशों में गिल्ड की प्राचीनतम मौजूदगी के संकेत पूर्वमध्यकाल में 1100 वीं शताब्दी में मिलते हैं, जबकि भारत में सहयोगाधारित आर्थिक संगठनों के संकेत वैदिक वांङमय में भी मिलते हैं. सहकारी समिति/संस्थाओं के समानधर्मा संगठन श्रेणी का इतिहास भी कम से कम ईसा से भी छह सौ वर्ष पुराना है. श्रेणी का कार्यव्यापार भी विस्तृत था. हालांकि श्रेणी से यह अपेक्षित था कि वह किसी एक व्यवसाय में रहकर अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन करे. तथापि यह उसकी अनिवार्यता नहीं बन पाई थी. प्रख्यात विद्वान रमेशचंद्र मजुमदार अपनी पुस्तक Corporate Life In Ancient India में बुनकरों की एक ऐसी श्रेणी का उल्लेख करते हैं, जो व्यापार के सिलसिले में एक नगर से दूसरे नगर की सतत यात्रा करती रहती थी और जिसके कुछ सदस्य धनुर्विद्या, ज्योतिष, मल्लयुद्ध तथा धार्मिक प्रचार-प्रसार का दायित्व भी संभालते थे. उन्हीं के हवाले से विक्रमादित्य खन्ना लिखते हैं—
‘श्रेणी के लिए किसी एक व्यवसाय से जुड़े रहना आवश्यक नहीं था. उसके सदस्य अपनी क्षमता एवं रुचि के अनुसार विभिन्न कार्यों (धनुर्विद्या, ज्योतिष, मल्लयुद्ध आदि) को अपना सकते थे…यही नहीं राजनीतिक गतिविधियों तथा नागरिक सुविधाएं प्रदान करने के लिए भी श्रेणी की मदद ली जाती थी.’7
उल्लेखनीय है कि उस युग में सामाजिकता की भावना बहुत प्रगाढ़ थी. इसके कारण भी थे. उस समय समूचा समाज अन्योन्याश्रित था. शनैः-शनैः पतनशील वर्ण-व्यवस्था जातिवादी स्वरूप ग्रहण करती जा रही थी. इस कारण समाज के बीच ऊंच-नीच का भेद और आर्थिक आधार पर स्तरीकरण भी था. ऊंच-नीच की भावना ने समाज में आंतरिक संघर्षों को जन्म दिया था. बावजूद इसके अधिकांश लोग यह समझ चुके थे कि एक सीमा के बाद शासित वर्ग की नजरों में वे सभी बराबर हैं…कि वह उन लोगों को जाति-वर्ग के मसलों में भटकाए रखकर सत्ता का असली आनंद उठाता है…कि ग्राम्यः जीवन की अभावमयी स्थितियों का सामना उन सभी को कमोवेश बराबर, साथ-साथ सहन करना पड़ता है. उच्च वर्ग को महज यह तसल्ली रहती थी कि वह वह सत्ता वर्ग के अपेक्षाकृत अधिक निकट है, कि उसको शासकवर्ग का करीबी होने का सम्मान प्राप्त है. जबकि स्तरीकरण के निचले स्तर पर शारीरिक एवं मानसिक शोषण के शिकार लोगों की मनःस्थिति विद्रोहात्मक होती है. इस विद्रोह को दबाए रखने, आक्रोश के शमन के लिए समाज में संगठन और सहयोग पर जोर दिया जाता था. इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए डाॅ. सत्यकेतु विद्यालंकार लिखते हैं—
‘उत्तर वैदिक युग में ही विभिन्न शिल्पियों का अनुसरण करने वाले, सर्वसाधारण जनता के व्यक्ति, अपने संगठन बनाकर आर्थिक उत्पादन में तत्पर हो गए थे. यह स्वाभाविक भी था, क्योंकि शिल्पियों के लिए पूर्णतः स्वच्छंद होकर कार्य कर सकना संभव नही था. परस्पर संगठित होकर ही वे अपने कार्य को सुचारू रूप में संपादित कर सकते थे.’7
समाज की सत्ता उसकी प्रत्येक इकाई से विनिर्मित थी. यद्यपि समाज का चातुवण्र्य विभाजन जिसकी शुरुआत वैदिक काल में ही हो चुकी थी, निरंतर मजबूत हुआ था, अथर्ववेद में इस बात के पर्याप्त संकेत मिलते हैं कि उस काल तक ब्राह्मणों का लालच बढ़ चुका था. निहित स्वार्थों के लिए वे कर्मकांड को केंद्र में रखकर सत्ता पर नियंत्रण बनाए हुए थे. वर्णाश्रम व्यवस्था का लाभ समाज के शीर्षस्थ वर्गों के हाथों तक सिमटता जा रहा था. दार्शनिक चिंतन, क्षुद्र बहसों और तंत्र-मंत्र संबंधी पोंगा-पंथी अवधारणाओं तक सीमित हो चुका था. परंपराओं और सामाजिक नियमों की स्वार्थानुकूल व्याख्या की जा रही थी. अपने लक्ष्य में उन्हें सफलता भी मिल रही थी. उन्हीं की प्रेरणास्वरूप समाज में शासक वर्ग का उदय हो रहा था, जिससे अधिकार एवं संसाधन सीमित हाथों में कैद होते जा रहे थे. प्रकट में तो सब यही स्वीकार करते थे कि समाज को गतिमान बनाए रखने के लिए उसके सभी वर्गों का पूरा सहयोग, प्रयासों में उन सभी की समान और सक्रिय साझेदारी आवश्यक है—किसी बड़ी मशीन के छोटे-छोटे पुर्जों की भांति, जिनके बिना वह कार्य करने में अक्षम सिद्ध होती है. परंतु उनके सभी आचरण स्वार्थ-भावना से प्रेरित तथा कहीं-कहीं तो नैतिकता को लांक्षित करने वाले थे.
परिणामस्वरूप समाज का एक वर्ग इन कर्मकांडों और छिछली धार्मिक व्याख्याओं के चंगुल में फंसकर और अधिक रूढ़िवादी और वौद्धिकरूप से जड़ बनता जा रहा था, वहीं दूसरा वर्ग उनकी असलियत को पहचानकर उनसे या तो दूर भाग रहा था, अथवा धार्मिक विवादों से परे रहकर व्यापार और उद्यमशीलता के माध्यम से अपने विकास के प्रति समर्पित था. स्पष्ट है कि उनमें एक बड़ा वर्ग शिल्पियों और कारीगरों का था. अपने अनूठे श्रम-कौशल एवं श्रम-भावना के कारण यह वर्ग समाज में निरंतर प्रतिष्ठा भी पा रहा था. ऐसे में जब इस वर्ग द्वारा संगठन बनाकर बड़े स्तर पर व्यापार प्रारंभ किया गया तो समाज में उसको स्वतंत्र पहचान मिलना अवश्यंभावी था ही.
महाकाव्यों यानी महाभारत और रामायण दोनों में भी व्यावसायिक संगठनों/निगमों की सार्थक उपस्थिति का उल्लेख मिलता है. राम अपने वनवास की अवधि पूरी होने के पश्चात जब अयोध्या लौटते हैं तो उनके स्वागत के लिए अन्य प्रजाजनों के साथ श्रेणि-प्रमुख भी मौजूद रहते हैं. महाभारत के शांतिपर्व मंे श्रेणि-प्रमुखों का उल्लेख करते हुए राजा को सावधान रहने के लिए कहा गया है कि वह उन्हें शत्रुओं द्वारा भेदनीति से बचाए रखे. महाभारत में वनपर्व की एक और लोकप्रचलित कथा बताती है कि गंधर्वों से पराजित दुर्योधन यह सोचकर खिन्न है कि हस्तिनापुर लौटने पर श्रेणि-प्रमुख उसको अवश्य ही उलाहना देंगे. उस समय क्या वह उनका प्रतिकार कर पाने में सफल होगा. यदि नहीं कर सका तो प्रजा पर उनका कैसा प्रभाव पड़ेगा. यह हमें तत्कालीन राजसत्ता पर व्यापार संघों के प्रभाव एवं उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा से परिचित कराता है.

जैन एवं बौद्ध धर्म का उद्भव

भारतीय इतिहास के संदर्भ में सातवीं शताब्दी का कालखंड अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. बिना इस शताब्दी के उल्लेख न तो भारत की धार्मिक, आध्यामिक तथा तात्विक चेतना के उद्भव की व्याख्या संभव है, न ही भौतिक एवं राजनीतिक समृद्धि का इतिहास लिखा जा सकता है. इसी शताब्दी में भारत के दो प्रमुख धर्मों, जैन एवं बौद्ध का उदय हुआ था. हालांकि इन दोनों ही धर्मों का उद्भव प्राचीन परंपरागत वैदिक धर्म में कर्मकांड के बढ़ते अतिरेक एवं समाज पर एक ही वर्ग के बढ़ते वर्चस्व के प्रतिक्रियास्वरूप हुआ था, किंतु बहुत शीघ्र दोनों धर्म समाज पर अपनी पकड़ बनाने में कामयाब हो गए. दोनों की स्थापना जीवन के प्रति व्यावहारिक दृष्टिकोण के साथ हुई थी. इसलिए इनमें जीवन और समाज को लेकर एक सकारात्मक दृष्टि थी. विशेषकर बौद्धधर्म तो व्यावहारिकता के स्तर पर इतना लचीला था कि इसके आलोचकों ने इसे भौतिकतावादी धर्म ही कह डाला. स्थिति चाहे जो भी हो, दोनों धर्म समाज और जीवन को लेकर आमजन की मान्यताओं के एकदम करीब थे. उपभोग को लेकर भी बौद्धधर्म में वैसे निषेध नहीं थे, जैसे कि उसके पूर्ववर्ती वैदिक धर्म में. इसलिए शिल्पकारों तथा व्यापारकर्म के सहारे जीविका चलाने वाली जातियां बौद्धधर्म की ओर आकर्षित होती चली गईं.
बौद्ध एवं जैन दोनों ही धर्मों में जातिप्रथा या वर्णव्यवस्था को कोई स्थान प्राप्त नहीं था. इसलिए इन धर्मों की ओर वे लोग भी आकर्षित हुए जो परंपरागत हिंदू धर्म में जातीय स्तरीकरण या वर्णविभाजन के कारण स्वयं को उत्पीड़ित-उपेक्षित अनुभव करते आ रहे थे. इससे विभिन्न क्षेत्र नई प्रतिभाओं के आगमन के लिए खुल गए. मनुष्य ने लोहे का उपयोग करना सीखा, निर्माण एवं उद्योगों के विकास के लिए नवीनतम मशीनों एवं उपकरणों की खोज हुई. आवागमन सुगम हुआ, फलस्वरूप नागरीकरण को गति मिली. व्यापारिक विनिमय को सरल बनाने के लिए धातु के सिक्कों का चलन हुआ, जिससे व्यापार के नए क्षेत्रों का उदय हुआ. उद्योगों के साथ कृषिक्षेत्र पर भी लोहे के आविष्कार का प्रभाव पड़ा. हल में लोहे की फाल के उपयोग ने कृषिकर्म को आसान बना दिया. इससे कृषिजोतों का विस्तार हुआ, उपज बढ़ी और समृद्धि को नए आयाम मिले.
व्यावसायिक प्रगति के चलते किसी एक व्यक्ति के लिए पूरे व्यवसाय पर नियंत्रण रखना कठिन होने लगा था. मुख्य उद्योग एवं व्यवसाय हालांकि अभी भी नगरों एवं कस्बों तक सिमटे हुए थे, किंतु उनपर उनपर सामूहिक नियंत्रण की प्रवृत्ति बढ़ने लगी थी. एक और विशिष्ट प्रगति इस दौर में देखने को मिली वह थी, उद्योगों, व्यवसायों में लाभ-हानि के परिकलन के लिए दक्ष लेखाकारों की भर्ती एवं लेखा-बही का उपयोग. दक्ष लेखाकारों के उपयोग से लाभ-हानि की परिगणना आसान थी, इससे उद्योगों में पूंजी का वर्चस्व बढ़ने लगा. इससे पहले तक उत्पादक स्वयं ही विपणन की जिम्मेदारी संभालता था, वही उद्यम का स्वामी भी होता था. लेकिन लेखा-बही के प्रयोग ने केवल पूंजी के दम पर उद्यम-स्वामी बनने का रास्ता आसान कर दिया था. इससे जहां व्यापार को व्यवस्थित करना आसान हुआ, वहीं शोषण को भी बढ़ावा मिला क्योंकि समाज का एक वर्ग वर्णव्यवस्था के बंधनों के कारण शिक्षा से दूर रखा गया था. बाद में लिखित परंपरा का हवाला देते हुए इस वर्ग को दबाए रखने के लिए नए कानून बनाए जाने लगे. जिसके आधार पर पुराणों की रचना हुई. और पुराणों को प्रामाण्य बनाए रखने के लिए वेद, महाकाव्य सहित सभी प्राचीन ग्रंथों में संशोधन किए जाने लगे.
प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था तथा राजनीति को जानने के लिए कौटिल्य कृत ‘अर्थशास्त्र’ को एक मानक ग्रंथ की मान्यता मिली हुई है. ईसा से चार सौ वर्ष पुरानी इस रचना में उस समय के समाज तथा आर्थिक-राजनीतिक सरंचनाओं के बारे में प्रामाणिक जानकारी हमें प्राप्त होती है. अर्थशास्त्र में नगरों को बसाने की आदर्श योजना का जो विवरण प्राप्त होता है उसमें गणों तथा श्रेणी के सदस्य शिल्पकारों को बसाने के लिए एक स्थान आरक्षित किए जाने की व्यवस्था का उल्लेख मिलता है. श्रेणियां राज्य को करों का भुगतान करती थीं, जो राज्य की आय का प्रमुख स्रोत था. श्रेणियों के राज्य पर प्रभाव का अनुमान इस तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि बौद्धकाल में राजदरबार में एक नए पद ‘भंडागारिका’ का सृजन किया गया था, जिस पद पर श्रेणी के मामलों के विशेषज्ञ को नियुक्त किया जाता था. भंडागारिका का दायित्व श्रेणियों के बीच होने वाले विवादों का निपटान करना था. उन दिनों कुल अठारह प्रकार की श्रेणियां होने का उल्लेख भी आचार्य चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र में किया है, जो उस समय के जनजीवन में श्रेणियों के महत्त्व तथा उनकी व्यापक पहुंच की ओर इशारा करता है. कुछ श्रेणियों की आंतरिक व्यवस्था आधुनिक सहकारी समितियों के समान थी. उन्हें ‘समुत्तचरः’ कहा जाता था. ये श्रेणियां न केवल उद्योगों और व्यवसाय की देखरेख तथा नियंत्रण करने का काम करती थीं, बल्कि जनकल्याण के मामलों में उनका दखल था. जनता एवं स्थानीय प्रशासन पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए वे जनसरोकारों से युक्त कार्यक्रमों को वरीयता देती थीं. आवश्यकता पड़ने पर ये श्रेणियां राज्य को आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराती थीं. कई बार राज्य भी अपने उत्तरदायित्वों के निर्वहन के लिए श्रेणियों की मदद लेता था. तत्कालीन ग्रंथों में इस प्रकार के उल्लेख कई स्थानों पर आए हैं.
ईसा से पांचवी शताब्दी पहले के गं्रथ गौतम धर्मसूत्र के अनुसार—
‘किसानों, व्यापारियों, साहूकारों, शिल्पकारों, तकनीकी विशेषज्ञों यहां तक कि पशु चराने वाले गड़हरियों की भी अपनी अलग श्रेणी थी, जिनके माध्यम से वह अपने वर्ग के हितों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कानून बना सकते थे. उनके वर्ग के कल्याण से संबंधित किसी प्रकार की समस्या अथवा प्रस्तावित योजना को लेकर सम्राट अथवा राज्य के प्रतिनिधि उन्हीं श्रेणियों से विचार-विमर्श करते थे.’8
एक जातक कथा के अनुसार बौद्धकाल में कम से कम अठारह प्रकार की श्रेणियां कार्यरत थीं. यह भी उल्लेखनीय है कि बौद्धधर्म को राजधर्म के रूप में अपनाए जाने के बावजूद जातिप्रथा का पूरी तरह से लोप नहीं हो पाया था. एक अन्य जातक कथा में उल्लेख किया गया है कि परिवार का बड़ा पुत्र प्रायः अपने पिता के शिल्प को अपना लेता था, जिससे तकनीकी रूप से दक्ष शिल्पकारों की समस्या का समाधान हो जाता था. श्रेणियों को सम्मान और प्रतिष्ठा की दृष्टि से देखा जाता था. इसलिए लोगों में अपनी पहचान कायम करने के लिए अपने नाम के साथ अपनी श्रेणी या व्यवसाय का नाम जोड़ लेने का चलन था.
श्रेणी के व्यवसाय को पैत्रिकता अथवा परंपरा के नाम पर अपनाए जाने की प्रथा भारत की श्रेणियों को शेष विश्व की श्रेणियों से अलग सिद्ध करती थी. यह विशेषता दुनिया के किसी ओर गिल्ड सिस्टम में देखने को नहीं मिलती. भारत के प्राचीन ग्रंथों में श्रेणियों की पहुंच, उनकी प्रकृति तथा विशेषताओं के बारे में जगह-जगह उल्लेख किया गया है. कहीं पर उनसे राजा को सावधान रहने का उल्लेख है तो कई स्थानों पर राजा को यह निर्देश भी दिया गया है कि वह श्रेणियों की पहुंच का लाभ उठाकर, राज्य के हित में उनके विकास के लिए सभी जरूरी उपाय करे. महाभारत में एक स्थान पर उल्लेख किया गया है कि राजा श्रेणी-प्रमुखों पर नजर रखे और उनमें शत्रुओं द्वारा भेदनीति का उपयोग न करने दे.9 इसी प्रकार एक अन्यंत्र स्थल पर श्रेणी-प्रमुखों के उपजाप अर्थात भेदनीतिपूर्ण षड्यंत्रों से अपने अमात्यों की रक्षा के सभी जरूरी उपाय करने का उपदेश दिया है.10 स्पष्ट है कि समाज में श्रेणियों की भूमिका इतनी बढ़ चुकी थी कि किसी भी स्तर पर उनकी उपेक्षा कर पाना संभव नहीं था.
‘व्यापारिक संगठनों/श्रेणियों के गठन की शुरुआत बौद्धकाल के प्रारंभिक वर्षों में ही हो चुकी थी. उस समय की स्थापत्य कला तथा अन्य ऐतिहासिक दस्तावेज में इस बात के पर्याप्त संकेत मौजूद हैं कि उन दिनों के नगरों में विभिन्न प्रकार के व्यापारियों को उनके व्यवसाय के आधर पर अलग-अलग बसाने की प्रथा थी. कच्चेमाल की उपलब्धता के आधार पर विभिन्न शिल्पकारों के पृथक गांव बसाए जाते थे. किसी भी क्षेत्र में श्रेणी अथवा गिल्ड की स्थापना के लिए तीन प्रमुख विशेषताओं पर ध्यान देना आवश्यक था. पहला कच्चेमाल की उपलब्धता के अनुसार उद्योगों का विकेंद्रीकरण, दूसरा ज्ञान तथा तकनीकी कौशल का परंपरा के आधार पर पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरण तथा तीसरा श्रेणी के स्वामी अथवा मुख्य संगठक ‘जेट्टका’ की विचारदृष्टि, जिसके आधार पर श्रेणी की कार्यशैली तय होती थी. मौर्यकाल में श्रेणियों को व्यापक समर्थन मिलने से उनकी लोकप्रियता निरंतर बढ़ती जा रही थी. श्रेणियों की लोकप्रियता का दूसरा बड़ा कारण स्पर्धा की भावना थी. प्रयोगों द्वारा यह देखा गया था कि आर्थिक दृष्टि से भी अकेले व्यक्ति की कार्यक्षमता की अपेक्षा समूह के साथ उसकी कार्यक्षमता अधिक प्रभावी और लाभदायक होती है. इस प्रकार सहकार को बढ़ावा मिला. जिसके अनुसार किसी सदस्य को जब भी आवश्यकता हो, वह दूसरों की मदद ले सकता था.11
किसी भी श्रेणी में ज्येष्ठक अथवा श्रेष्ठिन् का पद बड़ा ही महत्त्वपूर्ण होता था. जातक कथाओं में कम्मारजेट्ठक, मालाकारजेट्ठक आदि शब्द बहुतायत प्रयुक्त हुए हैं. जिनसे इनकी सत्ता स्पष्ट हो जाती है. किसी एक जेट्ठक के अधीन शिल्पियों की संख्या निर्धारित नहीं थी. समुद्द वणिज जातक में नर्तकियों के एक गांव का उल्लेख है जिसमें उनके एक हजार परिवार निवास करते थे. जातक के अनुसार गांव में दो जेट्ठक थे, उनमें से प्रत्येक के अधीन पांच सौ नर्तक परिवार थे. श्रेणी की परिकल्पना से लेकर उसकी कार्यपद्धति तय करने तक का काम श्रेष्ठिन् अथवा जेट्ठक का ही होता था. कई स्थान पर उसे स्वामी के संबोधन का भी रिवाज रहा है. उसका कार्य भंडार के हिसाब-किताब से लेकर लेखा-बही की देखभाल करने तक विस्तृत था. भंडार की देखभाल करने वाले के कारण उसे ‘भंडारी’ अथवा ‘भंडारक’ भी कहा जाता था. प्रत्येक श्रेणी के व्यवसाय, कार्यक्षमता, सदस्यों की संख्या तथा पूंजी के आदान-प्रदान से संबंधित सभी आवश्यक सूचनाएं, परंपराएं और रीति-रिवाज यहां तक कि उसका इतिहास भी साफतौर पर उल्लिखित किया जाता था. साफ है कि समाज में जेट्ठकों अथवा श्रेष्ठ्नि की व्यापक प्रतिष्ठा थी. राजदरबार में उनका सम्मान था. सूचिजातक में लिखा है कि—
‘एक सौ कम्मारों का जेट्ठक राजदरबार में बहुत सम्मानित था. वह बहुत समृद्ध एवं ऐश्वर्यशाली भी था. अन्यत्र एक जातक में यह लिखा है कि एक राजा ने कम्मारजेट्ठक को अपने पास बुलाया, और उसको सुवर्ण की एक प्रतिमा बनाने का कार्य दिया.12
उपर्युक्त उद्धणों से साफ है कि  प्रागैतिहासिक भारत में व्यवसायी समूह उसी प्रकार संगठित थे, जैसे कि यूरोपीय व्यापारी गिल्ड के रूप में. लेकिन भारतीय समूह का आचरण अपने समकालीन गिल्डों की अपेक्षा कहीं अधिक लोकतांत्रिक था.
© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भानुक्रमणिका :

1.  Thus, one would expect the corporate form’s development to be more likely when the demand for production and trade is increasing and when methodologies for monitoring the behavior of owners and managers by creditors and by other owners are present. Such situations enhance the value of organizational forms and also help to contain their costs, such as their agency and creditor information costs. Of course, there are other factors that are also important to the development of the corporate form (e.g., property and contract law). Dr. Vikramaditya Khanna in The Economic History of the Corporate Form in Ancient India.

2. ‘…that division of labour under the varna system may have been conducive to the emergence of guild organization. Agriculture, animal husbandry and trade, the three occupations of the Vaisyas, in course of time developed as separate groups.- Thaplyal, Kiran Kumar in Guilds in Ancient India.
3.  The relative peace in the region makes travel safer for traders and opens up new markets for trade. The uniformity of weights and measures, uncommon at that time in world history, benefits trade by reducing the transactions costs of engaging in trade. The localization of craft and industry to certain parts of the city might enhance group cohesion, make training of new recruits/employees somewhat easier, and increase productivity. In light of all these factors, trade was active, substantial and growing which suggests the demand for collective efforts – to protect traders traveling long distances, to engage in larger scale production and so forth – was large and probably rising. This often enhances the demand for organizational forms.- Dr. Vikramaditya Khanna.
4. भारतीय दर्शन- डा॓. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, राजकमल प्रकाशन, हिंदी अनुवाद: नंदकिशोर गोभिल, प्रष्ठ-219.
5. स नैव व्यंभवत्, स विशमसृजत, यान्येतानि देवजातानि गणशः आख्यान्ते. – बृहदारण्यक-1/4/12
6.  क्षात्रसृष्टोऽपि स नैव व्यभवत् कर्मणे ब्रह्म तथा न व्यभवत् वित्तोपार्जयितुरभावात्। स विशमसृजत् कर्मसाधनवित्तोपार्जनाय। कः पुनरसौ विट? यान्येतानि देवजातानि ….गणशः गणं गणं आख्यान्यन्ते कथ्यन्ते गणप्राया हि विशः। प्रायेन संहता हि वित्तोपार्जनसमर्थाः नैकैकशः. – शंकराचार्य.
7. …a sreni need not be dedicated to a single profession and members could practice different trades – indeed, there is an example of a silk weaving sreni where some members practiced. other professions as well (e.g., archery, astrology)…Moreover, the sreni was used in municipal and political activity as well as economic activity. – Vikramaditya Khanna.
8.  The Gautama Dharmasutra (c. 5th century BC) states that “cultivators, traders, herdsmen, moneylenders, and artisans have authority to lay down rules for their respective classes and the king was to consult their representatives while dealing with matters relating to them.- By Manikant Shah & D.P. Agrawal in Sreni (Guilds): a Unique Social Innovation of Ancient India.
9.   अग्निदैर्ग़दैश्चैव प्रतिरूपककारकैः।
श्रेणिमुख्योपाजापेन वीरुधश्छेदनेन चः।। महा. शांतिपर्व-158/52.
10.  श्रेणिमुख्योपजापेषु वल्लभानुनयेषु च।
अमात्यान् परिरक्षेत भेदसंघातयोरपि।। महा. शांतिपर्व-104/64.
11.  The ancient sources frequently refer to the system of guilds which began in the early Buddhist period and continued through the Mauryan period. ….Topography aided their development, in as much as particular areas of a city were generally inhabited by all tradesmen of a certain craft. Tradesmen’s villages were also known, where one particular craft was centred, largely due to the easy availability of raw material. The three chief requisites necessary for the rise of a guild system were in existence. Firstly, the localization of occupation was possible, secondly the hereditary character of professions was recognized, and lastly the idea of a guild leader or jetthaka was a widely accepted one. The extension of trade in the Mauryan period must have helped considerably in developing and stabilizing the guilds, which at first were an intermediate step between a tribe and a caste. In later years they were dominated by strict rules, which resulted in some of them gradually becoming castes. Another early incentive to forming guilds must have been competition. Economically it was better to work in a body than to work individually, as a corporation would provide added social status, and when necessary, assistance could be sought from other members.- Thapar, Romila. Asoka and the Decline of the Mauryas, Delhi: Oxford. P. 73.
12.  डा॓. सत्यकेतु विद्यालंकार, प्राचीन भारत की शासन-संस्थाएं तथा राजनीतिक विचार, पृष्ठ-264.

प्राचीन भारत में गणतंत्र

सामान्य

लोकतंत्र राजनीति का आधुनिक सिद्धांत है. यह, हालांकि राजनीतिक व्यवस्था को तय करनेवाली एक प्रणाली है, जो नागरिकों को अपनी अधिकार चेतना से समृद्ध करने, उनमें आवश्यक नागरिकताबोध पैदा करने का काम करती है. इसके द्वारा सत्ता पर जनता का अंकुश बना रहता है. व्यवस्था से असंतुष्ट जनता समय आने पर उसे बदलने में सक्षम सिद्ध होती है. लोकतंत्र में सत्ता धर्म, जाति, संप्रदाय, पूंजी आदि के बल पर प्राप्त करना संभव नहीं है. इसलिए इसे सर्वाधिक कल्याणकारी राजनीतिक प्रणाली भी माना जाता है. हालांकि लोकतांत्रिक समाजों में पूंजीपति वर्ग प्रकटतः नागरिकों के अधिकारों का पक्ष लेते दिखाई पड़ते हैं. बावजूद इसके जरूरी नहीं है कि यह सदैव उनकी सदिच्छा से ही प्रेरित हो. कई बार नागरिक अधिकारों की पक्षधरता के पीछे उनकी मंशा एक स्वतंत्र, अनियंत्रित, उपभोक्तावादी समाज को बढ़ावा देने की भी होती है. लोकतंत्र यदि नैतिकता से आवृत न हो तो पूंजीवाद की भांति वह भी व्यक्तिवाद को बढ़ावा देने वाला सिद्ध होता है. व्यवहार में अपनी जनोन्मुखता सिद्ध करने के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं कराधान के रूप में धनी व्यक्ति से अधिक राशि वसूल करती हैं. इस दावे के साथ कि उसके द्वारा जनसामान्य को लाभ पहुंचाने वाली योजनाओं का क्रियान्वन किया जाएगा.

वेदों में इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं, जो यह दर्शाते हैं कि तत्कालीन समाज बहुमत का सम्मान करता था. आश्रम-व्यवस्था ज्ञानाधारित समाज के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध थी, उसके लिए निर्णयों में पारदर्शिता होना आवश्यक था. उपनिषदों में छात्र गुरु के समक्ष मुक्त विमर्श करते हैं. ईसा पूर्व सातवीं शताब्दी में भारतीय गणतंत्र और भी मजबूत हुए थे और गणतांत्रिक राज्यों की स्थापना आम हो चुकी थी. यह मान लिया गया था कि समाज का बहुआयामी और सर्वतोन्मुखी विकास तभी संभव है जब योजनाओं के निर्माण एवं उनके कार्यान्वन में अधिकाधिक लोगों की सहमति एवं भागीदारी संभव हो. वौद्ध एवं जैनधर्म चूंकि समाज के जाति आधारित विभाजन का निषेध करते थे, अतएव उनके प्रभाव के चलते समाज में समानता आधारित तंत्र की स्थापना का काम सरल एवं व्यावहारिक था. किंतु यह मान लेना अनुचित होगा कि ब्राह्मण धर्म एकदम दम तोड़ चुका था. वस्तुतः वौद्ध धर्म की सफलता का एक कारण यह भी था कि उसने राजसत्ता के सहारे धार्मिक विजय का सपना देखा था. मौर्य कालीन चंद्रगुप्त से लेकर सम्राट अशोक आदि अनेक भारतीयता के प्रतीक हिंदु सम्राट वौद्धधर्म को मानने वाले थे. बल्कि अशोक ने तो वौद्धधर्म को राजधर्म घोषित करते हुए उसके प्रचार-प्रसार में अपने पुत्र एवं पुत्री को भी लगा दिया था. राजधर्म घोषित होने जाने के बाद बौद्धधर्म के विरोधी शिथिल जरूर पड़े, पूरी तरह शांत नहीं थे. परंपरागत ब्राह्मणधर्म की समर्थक प्रवृत्तियां अनुकूल अवसर की प्रतीक्षा में थीं. पुराणों और स्मृतियों की रचना द्वारा जनमानस को फुसलाने तथा बरगलाने की कोशिशें भी की जा रही थीं.

भारतीय दर्शन परंपरा की दृष्टि से वह युग कई मायने में अविस्मरणीय है. इस युग को भारतीय चेतना के नवोन्मेष का स्वर्णकाल भी कहा जाता रहा है. क्योंकि इस युग में तर्क एवं विज्ञानाधारित दर्शन को स्वीकार्यता मिलने लगी थी. बौद्धधर्म की ओर से चुनौती पेश होने पर प्राचीन वैदिक धर्म को भी आत्मावलोकन के लिए विवश होना पड़ा था, जिसके फलस्वरूप न्याय, वैशेषिक, चार्वाक जैसे भौतिकतावादी एवं तर्काधारित दर्शनों का उदय हुआ. विभिन्न मतावलंबियों के बीच शास्त्रार्थ, गोष्ठियों, परिचर्चा कार्यक्रमों ने भारतीय समाज को बौद्धिकता के ढांचे में ढालने का कार्य किया. जैन और बौद्ध धर्म ने अपने तात्विक एवं गूढ़ दार्शनिक विमर्श के माध्यम से पूरे समाज में संवाद और विमर्श की उस धारा को पुनर्जागरित करने का काम किया था, जो वैदिककाल के पश्चात रास्ता भटक चुकी थी. नए दार्शनिक विमर्श का पूरा आग्रह धर्म को अज्ञानता से मुक्त कर, उसे अधिकाधिक मानवीय स्वरूप प्रदान करने के प्रति था. इससे उसकी जनसामान्य के बीच स्वीकार्यता में बृद्धि हुई थी.

वौद्धिक आंदोलनों का प्रभाव तत्कालीन राजनीति पर पड़ना स्वाभाविक ही था. परिणामस्वरूप राजनीति को और अधिक लौकिक तथा मानवीय बनाने के प्रयास किए जाने लगे थे. परंतु इस कार्य में सफलता तभी संभव थी, जब निर्णय के स्तर पर ज्यादा से ज्यादा लोगों की सहभागिता हो. इसलिए शासन-प्रशासन के स्तर पर अधिकतम लोगों की हिस्सेदारी की जरूरत महसूस की जाने लगी. लिच्छवी और वैशाली जैसे गणतांत्रिक राज्यों का उदय इसी समय में हुआ. पालि, संस्कृत, ब्राह्मी लिपि में उपलब्ध साहित्य में ऐसे बहुसमर्थित राज्य के बारे अनेक संदर्भ मौजूद हैं. जनतांत्रिक पहचान वाले गण तथा संघ जैसे स्वतंत्र शब्द भारत में आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पहले ही प्रयोग होने लगे थे. महाभारत के शांतिपर्व में राज्यकार्य के निष्पादन के लिए बहुत से प्रजाजनों की भागीदारी का उल्लेख मिलता है, जो उस समय समाज में गणतंत्र के प्रति बढ़ते आकर्षण का संकेत देता है—

‘गणप्रमुख का सम्मान किया जाना चाहिए, इसलिए कि दुनियादारी के बहुत से कार्यों के लिए शेष समूह उसी के ऊपर निर्भर करता है. गुप्तचर विभाग और लोकपरिषद की कार्रवाहियों को आवश्यक गोपनीयता बनाए रखने का कार्य भी उसके ऊपर छोड़ देना चाहिए, क्योंकि यह बहुत अनुचित होगा कि पूरा संघ या कि समूह के सभी सदस्य उन रहस्यों के बारे में जान पाएं. संघ-प्रमुखों को चाहिए कि आवश्यक गोपनीयता की रक्षा करते हुए सदस्यों के सुख-समृद्धि के लिए सभी के साथ मिलकर, दायित्व भावना के साथ कार्य करें, अन्यथा समूह का धन-वैभव नष्ट होते देर नहीं लगेगी.1

सिकंदर के भारत अभियान को इतिहास में रूप में प्रस्तुत करने वाले डायडोरस सिक्युलस तथा का॓रसीयस रुफस ने भारत के सोमबस्ती नामक स्थान का उल्लेख करते हुए लिखा है कि वहां पर शासन की ‘गणतांत्रिक प्रणाली थी, न कि राजशाही.’2 ईसा पूर्व चौथी शताब्दी के दौरान गणतंत्र भारत में लोक प्रचलित शासन प्रणाली थी. डायडोरस सिक्युलस ने अपने ग्रंथ में भारत के उत्तर-पश्चिमी प्रांतों में अनेक गणतंत्रों की मौजूदगी का उल्लेख किया है. एक अन्य स्थान पर वह लिखता है कि—

‘अधिकांश नगरों (राज्यों) ने गणतांत्रिक शासन-व्यवस्था को अपना लिया था; और उसको बहुत वर्ष बीच चुके थे, यद्यपि कुछ राज्यों में भारत पर सिकंदर के आक्रमण के समय भी राजशाही कायम थी.3

ईसा पूर्व छठी शताब्दी तक भारत में गणतांत्रिक राज्यों का चलन आम हो चुका था. हालांकि ये राज्य राजशाही द्वारा नियंत्रित राज्यों की अपेक्षा आकार में छोटे थे. किंतु उनके वैभव एवं समृद्धि के कारण बड़े राज्य भी उनकी ओर सम्मान की दृष्टि से देखते थे. उन राज्यों में कृषि व्यवस्था उन्नत थी. प्रायः सभी राज्य उपजाऊ, शस्यश्यामला भूमि पर विकसित हुए थे. व्यापार एवं उद्योग-धंधों के मामले में वे आत्मनिर्भर थे. बौद्धधर्म ने समाज को उन बंधनों से मुक्त करने का काम किया था, जो वर्णव्यवस्था के कारण सामाजिक ऊंच-नीच का पर्याय बने हुए थे. प्रश्न किया जा सकता है साम्राज्यवादी व्यवस्था के दौर में जब बड़े राज्य छोटे राज्यों पर अपनी गिद्धदृष्टि जमाए रखते थे, अपेक्षाकृत छोटे गणतांत्रिक राज्य अपनी स्वतंत्रता एवं समृद्धि को कैसे सुरक्षित रख पाते थे?

उल्लेखनीय है कि कथित छोटे गणतांत्रिक राज्य सुख-समृद्धि के मामले में देश के बाकी राज्यों से कहीं आगे थे. वहां के नागरिकों को अपनी रुचि एवं कार्यक्षमता के अनुसार अपना व्यवसाय चुनने की आजादी थी. जिससे वहां का समाज अपेक्षाकृत अधिक खुला था. उसमें तनाव भी न्यूनतम थे. परिणामतः समाज की ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग संभव था. यही नहीं गणतांत्रिक राज्यों के पास बड़ी युद्धक सेना भी होती थी. किसी एक राज्य पर आए संकट के समय बाकी राज्य भी उसकी मदद के लिए तत्पर रहते थे. धन की कमी न होने के कारण जरूरत पड़ने पर भाड़े के सैनिकों की सेना खड़ा कर लेना भी असंभव न था. डायडोरस सिक्युलस ने साबरकी या सामबस्ती नामक एक गणतांत्रिक राज्य का उल्लेख किया है, जहां के नागरिक मुक्त और आत्मनिर्भर थे तथा जिसकी सेना में साठ हजार पैदल सैनिक, छह हजार घुड़सवार तथा छह सौ रथवान होते थे. वी. एस. अग्रवाल और ए. के. मजुमदार के हवाले से डाॅ. स्टीव मुलबर्गर लिखते हैं कि—

‘प्राचीन भारत में जनतांत्रिक ‘कार्यकलापों का स्वतंत्र रूप से संचालन करने वाले समूहों और उनकी विशेषताओं को अभिव्यक्त करने के लिए एक सुदीर्घ शब्दावली थी. निश्चित रूप से उसमें बहुत से शब्द ऐसे थे जो वीरता का गुणगान करते समय प्रयुक्त किए जाते थे, किंतु उनमें से अधिकांश का प्रयोग शांतिकाल में तथा आर्थिक समूहों और उनकी गतिविधियों की व्याख्या के लिए प्रयुक्त किया जाता था. जैसे कि किसी संगठन को उसके कार्य के आधर पर गण अथवा संघ का नाम दिया जा सकता था. उससे कम महत्त्वपूर्ण, केवल आर्थिक मामलों से जुड़े संगठनों को श्रेणि, पूग, व्रात, गण आदि नामों से पुकारा जाता था. इन संगठनों की प्रमुख विशेषता थी, इनके लक्ष्यों की एकता. छठी शताब्दी तक इन स्वशासित संगठनों-समितियों का चलन आम हो चला था. इनके सभी निर्णय आमसहमति के आधर पर लिए जाते थे. दूसरा वर्ग सर्वसम्मति अथवा आमसहमति के आधर पर शासन की जिम्मेदारी संभालता था. आधुनिक शब्दावली में इन संगठनों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त शब्द ‘गणतंत्र’ ही हो सकता है.’4

गणतांत्रिक भारत में संपन्नता और समृद्धि समाज के बहुसंख्यक वर्ग तक फैली हुई थी. हालांकि आर्थिक स्तर में विभिन्न समुदायों, व्यवसायकर्मियों के बीच भारी अंतर तब भी था. बावजूद इसके समाज में जागरूकता एवं अवसरों की समानता अधिक थी. इसी कारण छोटे-छोटे उद्यमियों/व्यापारियों ने अपने संगठन खडे़ कर लिए थे, जिनके माध्यम से वे संगठित व्यापार के लाभों में हिस्सेदारी की संभावना बढ़ाते थे. इस बात का प्रमाण उस समय के साहित्य तथा अन्य पुरातात्विक साक्ष्यों में उपलब्ध है. वैशाली और कौशांबी जैसे संपन्न राज्य और कुशावती जैसी संपन्न नगरी का वर्णन जातक कथाओं तथा पालि साहित्य में अनेक स्थान पर हुआ है. ये सभी राज्य गणतांत्रिक प्रणाली द्वारा शासित थे. जे. पी. शर्मा की पुस्तक ‘प्राचीन भारत में गणतंत्र’ के माध्यम से मुलबर्गर महोदय लिखते हैं कि—

‘छह सौ ईस्वी पूर्व से दो सौ ईस्वी बाद तक, भारत पर जिन दिनों बौद्ध धर्म की पकड़ थी, जनतंत्र आधारित राजनीति यहां बहुत लोकप्रचलित एवं बलवती थी. उस समय भारत में नागरीकरण की प्रक्रिया बहुत तीव्रता से चल रही थी. पालि साहित्य में उस समय की समृद्ध नगरी वैशाली का विवरण मिलता है. उसमें उपलब्ध विवरण के अनुसार वहां 7707 बहुमंजिला इमारतें, 7707 अट्टालिकाएं, 7707 ही उपवन तथा कमलसरोवर शोभायमान थे. इनके अतिरिक्त वहां पर लोगों का एक कार्यकारी संघ भी था, जिसपर वहां की शासन-व्यवस्था का अनुशासन चलता था. आम्रपाली जैसी अनिंद्ध सुंदरी, अद्वितीय नर्तकी थी, जिसकी सुंदरता और कला के चर्चे दूर-दूर तक फैले हुए थे. आम्रपाली न केवल वैशाली की समृद्धि का प्रतीक थी, बल्कि वहां का गौरव भी थी. वैशाली के अतिरिक्त कपिलवस्तु तथा कुशावती जैसे नगरों का विवरण भी बौद्ध साहित्य में ससम्मान उपलब्ध है, जो व्यापार, कला एवं संस्कृति के महान केंद्र थे. पांच सौ से हजार गाड़ियों तक के काफिले उन नगरों से व्यापार के सिलसिले में गुजरते रहते थे, जिसके कारण वहां पर किसी आधुनिक शहर जैसी भीड़-भाड़ तथा शोरगुल मचा रहता था. आवश्यकता पड़ने पर ये काफिले जहां भी पड़ाव डालते तो महीनों तक एक ही स्थान पर जमे रहते. चैमासे में तो यह अक्सर होता था. इन काफिलों के साथ-साथ धार्मिक संवाद, सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रचार-प्रसार का काम भी चलता रहता था.’5

ऐसा प्रतीत होता है कि 7707 की संख्या उन दिनों मानक अथवा शुभ मानी जाती थी. क्योंकि एक अन्य प्रसिद्ध जातककथा के अनुसार लिच्छवी गणराज्य की राजधानी वैशाली में 7707 राजा, 7707 राजदूत, 7707 सेनापति तथा 7707 खजांची मौजूद थे, जो किसी भी मसले पर निष्पक्ष और निर्भीक होकर अपना मत प्रस्तुत करते थे.6 यह विवरण प्रतीकात्मक भी हो सकता है. यह जनमानस के गणतांत्रिक सोच एवं समानताबोध का परिणाम था. सामूहिक आर्थिक कार्यक्रम, नागरिक प्रशासन में अधिकतम की सहभागिता तथा समान आधिकारिता के कारण यह संभव भी था. अपने प्रबल नागरिकताबोध के कारण लिच्छवियों को आलोचकों के व्यंग्य का सामना भी करना पड़ा था. ललितविस्तार जो कि एक व्यंग्य-प्रधान कृति है, में यह कहकर कटाक्ष किया गया है कि वैशाली में राजाओं की भरमार है, वहां हर कोई सोचता है—

‘मैं राजा हूं…मैं राजा हूं.’ और इस प्रकार वहां व्यक्ति के पद, आयु, अनुभव, मान-सम्मान को भुला दिया जाता है.’7

पाणिनी की अष्ठाध्यायी में जनपद शब्द का उल्लेख अनेक स्थानों पर किया गया है, जिनकी शासनव्यवस्था जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों के हाथों में रहती थी. एक और जातक कथा में पांच सौ लिच्छिवी राजाओं का उल्लेख किया गया है. यह विवरण भी प्रतीकात्मक अथवा अतिश्योक्तिपूर्ण हो सकता है. दरअसल इस तरह के आख्यान तत्कालीन राजनीति में तेजी से बढ़ते आर्थिक समूहों का परिणाम थे. आर्थिक रूप से समृद्ध समूह अपना स्वतंत्र राजनीतिक गठबंधन बना लेता था. आंतरिक प्रशासन के लिए वे सब स्वतंत्र समूह के रूप में काम करते थे, किंतु बाह्यः हमले के समय उनकी संगठित शक्ति दुश्मन का मुकाबला करने के काम आती थी. नए गणतंत्रों की स्थापना का कार्य भारत के किसी एक क्षेत्र तक ही सीमित नहीं था. बल्कि उसका असर पूरे देश में स्थान-स्थान पर नजर आ रहा था. पाणिनी साहित्य के अध्येता वी. एस. अग्रवाल के अनुसार— ‘उस समय देश-भर में नए-नए गणतंत्र स्थापित करने की जैसे होड़ मची हुई थी. विशेषकर उत्तर-पश्चिमी सीमा पर स्थित वाहीक देशों में नए गणतंत्रों की स्थापना का कार्य तो अपनी चरमस्थिति को प्राप्त कर चुका था, जहां केवल सौ परिवारों वाले गोष्ठ, स्वयं को एक स्वतंत्र गणतंत्र के रूप में स्थापित कर रहे थे.’8

वस्तुतः उस समय भारत में छोटे-छोटे गणतंत्रों के रूप में स्वतंत्र आर्थिक समूहों के उदय हो रहा था. वे आर्थिक समूह इतने शक्तिशाली थे कि जिस क्षेत्र में होते, वहां कि राजनीतिक सत्ता पर अपना अधिकार स्थापित कर लेते थे. हालांकि राजशाही की अपेक्षा वह एक मुक्त समाज था, जहां राजनीतिक निर्णय परस्पर सहमति और सम्मान के आधार पर लिए जाते थे. एक श्रेष्ठी वर्ग उस समाज में पनप रहा था, जिसके आर्थिक संबंध दूर-दराज के क्षेत्रों से बने थे. उन राज्यों के पास अपनी सेना थी और संकट का सामना वे सभी मिलकर पूरी ताकत और एकजुटता के साथ करते थे. वहां के श्रेष्ठीगण आवश्यकता के समय बड़े सम्राटों को ऋण देकर, समाजकल्याण के कार्यों के लिए मुक्त हस्त से दान लुटाकर समाज पर अपना प्रभुत्व जमाए रखते थे. उनकी एकता और समाज पर उनके प्रभाव के कारण बड़े-बड़े सम्राट उनपर हमला करने से बचते थे. धन-संपत्ति का बाहुल्य कई बार सामाजिक बुराइयों का कारण भी बन जाता है, इस दोष से वे भी अछूते नहीं थे. उन्हें न केवल अपनी आर्थिक समृद्धि का गुमान था, बल्कि उनमें दिखावे की प्रवृत्ति भी जोर पकड़ती जा रही थी. अपनी अकूत धन-संपदा को खर्च करने के लिए वहां के नवधनाढ्य वर्ग के बीच निरर्थक स्पर्धाएं अक्सर चलती रहती थीं. आम्रपाली जैसी नगरवधुओं का चलन तात्कालिक समाज में निरंतर बढ़ते उपभोक्तावादी कुसंस्कारों की ओर संकेत करता है. उन नगरवधुओं को राज्य का समर्थन और सरंक्षण प्राप्त था. नगरवधुओं के ठिकाने राज्य की कमाई के बहुत बड़े स्रोत थे, इससे समाज के बुद्धिजीवी वर्ग में उन गणतंत्रों के भविष्य को लेकर चिंता व्यापने लगी थी. वे अपने नागरिकों को समय-समय पर सावधान भी करते रहते थे. हालांकि मद और मदिरा में तेजी से डूबता जा रहा नवधनाढ्य वर्ग उसकी शायद की परवाह करता था. महात्मा गौतम बुद्ध स्वयं गणतांत्रिक राज्यों के उद्भव के पक्ष में थे.

बौद्ध साहित्य के अत्यंत महत्त्वपूर्ण ग्रंथ महापरिनिर्वाण सुत्तंत की एक कथा बहुत चर्चित है, जिसके अनुसार मगध-सम्राट अजातशत्रु वैशाली के सुख-समृद्धि से ईष्र्या करते हैं तथा उसे किसी भी तरह से अपने राज्य में मिलाना चाहते हैं. सम्राट की ओर से महामात्य वर्षकार लिच्छिवी गणराज्यों पर हमला करने से पहले परामर्श के लिए महात्मा बुद्ध के पास जाते हैं. यह जानने के लिए कि विजय के लिए यह युद्ध क्या उपयुक्त रहेगा? युद्ध हुआ तो विजयश्री किसका वरण करेगी. महामात्य वर्षकार विद्वान एवं कूटनीति थे. महात्मा बुद्ध आश्रम पहुंचे अतिथि का स्वागत करते हैं. किंतु आचार्य वर्षकार को खुलकर जवाब देने के बजाय वे अपने शिष्य आनंद के साथ एक रूपक की रचना करते हैं—

मगध-सम्राट अजातशत्रु की वैशाली तथा अन्य वज्जिऩ गणतंत्रों के धन-वैभव पर निगाह गढ़ी थी. वह उनपर बलात् अधिकार जमाना चाहता था. आक्रमण से पहले इस बारे में परामर्श करने के लिए उसने अपने महामात्य आचार्य वर्षकार को महात्मा बुद्ध के पास उनका आशीर्वाद लेने के लिए भेजा. आचार्य वर्षकार संशय में थे. वे गौतम बुद्ध के समक्ष उपस्थित हुए. उस समय महात्मा बुद्ध अपने शिष्यों के साथ थे. आचार्य वर्षकार ने वैशाली पर आक्रमण को लेकर सम्राट अजातशत्रु की इच्छा से महात्मा को अवगत कराया—

‘क्या उन्हें इस युद्ध में विजयश्री प्राप्त होगी?’ आचार्य वर्षकार ने प्रश्न किया.

आचार्य के प्रश्न का उत्तर देने के बजाय महात्मा बुद्ध ने शिष्य आनंद से सवाल किया—

‘तुमने सुना आनंद? आज भी वज्ज़िन गणसमूहों की बैठक पूरे उत्साह के साथ और निरंतर होती हैं? उनमें सभी गण स्वेच्छा और खुशी से हिस्सा लेते हैं?’

‘जी हां, मैंने भी यही सुना है!’ आनंद ने उत्तर दिया. तब महात्मा बुद्ध बोले, मानो आशीर्वाद दे रहे हों—

‘तो सुनो आनंद! जब तक वज्ज़िन गणतंत्र इसी प्रकार संगठित बने रहेंगे…जब तक वे अपने महत्त्वपूर्ण निर्णय लगातार मिलजुलकर, आपसी सहमति से लेते रहेंगे, तब तक आनंद उनके वैभव में कमी नहीं आएगी. वे निरंतर प्रगति की ओर अग्रसर रहेंगे…सुख और समृद्धि प्राप्त करेंगे.’ गणतंत्र के समर्थन में महात्मा बुद्ध यहीं नहीं रुक जाते. आनंद द्वारा किए गए प्रश्नों के उत्तर में वे उसे और उसके माध्यम से आचार्य वर्षकार को भिन्न-भिन्न तर्कों से संतुष्ट करने का प्रयास करते हैं—

‘इसलिए सुनो आनंद! वज्ज़िनगण जब तक सुसंगत ढंग से साथ-साथ उठते-बैठते, बातचीत करते रहेंगे, जब तक वे अपने महत्त्वपूर्ण निर्णय प्रेमपूर्वक मिल-जुलकर, बिना किसी ईर्ष्या-द्वेष के लेते रहेंगे…जब तक वे पूर्वस्थापित विधान का विरोध करने से बाज आएंगे…और पूर्वस्थापित सामंजस्यपूर्ण मान्यताओं-नियमों का निषेध करने के स्थान पर उनका विनयपूर्ण अनुसरण करते रहेंगे…जब तक वे वज्ज़िन गणतंत्रों द्वारा पूर्व स्थापित आदर्शों का पालन करते रहेंगे और दिए गए वचन का सम्मान करेंगे, उसपर डटे रहेंगे…तथा अपने वुजुर्गों और सनातन मर्यादाओं का अनुसरण करेंगे…जब तक वे अपने विचारों पर दृढ़ बने रहेंगे तथा अपने कर्तव्य के प्रति सचेत रहेंगे…और जब तक वे अपनी स्त्रियों का सम्मान करेंगे…उनके समूह की किसी महिला या बच्ची के साथ बलात् छेड़छाड़ नहीं होगी…जब तक वे अपने तीर्थस्थलों तथा पवित्र ग्रंथों में आस्था बनाए रखेंगे तथा उनका, चाहे वे नगर अथवा देश के किसी भी हिस्से में क्यों न हों, सम्मान करेंगे, सभी संस्कारों का विधि अनुसार निर्वाह करेंगे, साथ ही उसमें किसी प्रकार की जड़ता आने से बचाए रखेंगे…जब तक वे समाज में मौजूद गरीबों, वंचितों और उत्पीड़ितों के अधिकारों की सुरक्षा का खयाल रखेंगे…उनके लिए यथासंभव सहयोग करते रहेंगे, जिससे वे सुखी रह सकें, उनका इतना ध्यान रखेंगे कि उनके जैसे निर्धन-निर्बल, समाज के उत्पीड़ित लोग दूर-दूर से आकर उनके राज्य में सुखपूर्वक शरण पाते रहें, तब तक, हां तब तक आनंद! वज्ज़िनगणों के सुख और वैभव पर कोई आंच नहीं आ सकती…वे अजेय रहेंगे, उन्हें कोई नहीं हरा सकता, वे सुख और समृद्धि की ओर निरंतर अग्रसर रहेंगे.’

इसके बाद महात्मा बुद्ध ने आचार्य वर्षकार को संबोधित कर कहना शुरू किया—

‘महात्मन्! जिन दिनों मैं वैशाली के एक मंदिर में ठहरा हुआ था, उन्हीं दिनों मैंने वज्ज़िनगणों के जनकल्याणकारी नियमों का अध्ययन किया था. मुझे पूरा विश्वास है कि जब तक वे अपने बनाए विधान को अच्छी तरह समझते रहेंगे…जब तक वे इन अपने नियमों का मन-वचन कर्म से अनुसरण करते रहेंगे…अपनी परंपरा एवं कानूनों का अर्थ समझकर उनका पालन करते रहेंगे…तब तक मुझे पूरा विश्वास है कि वे उनको कोई परास्त नहीं कर सकता. तब तक उनका सुख और समृद्धि इसी तरह बने रहेंगे.’ महात्मा बुद्ध के वचनों से प्रभावित होकर आचार्य वर्षकार कुछ देर तक विचार मग्न रहे. फिर बोले,

‘मैं समझ गया देव! ऐसे वज्झिनगणों को सीधे युद्ध में, बिना कूटनीति या उनके संगठन को भंग मगध कभी नहीं हरा पाएगा.’

आत्मनिर्भर एवं आत्मनिर्णय का संस्कार. वज्जिन गणतंत्र के इन्हीं सदगुणों ने महात्मा बुद्ध को प्रभावित किया था. यही गणतांत्रिकता गिल्ड की सफलता का कारण थी. हम पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं गिल्ड अथवा श्रेणि प्राचीन भारत में समान उद्योग और/या व्यवसाय में लगे कारीगरों, शिल्पकारों, छोटे उद्यमियों तथा व्यापारियों के स्वैच्छिक संगठन थे, जिनका गठन आपसी हितों की सुरक्षा और सामूहिक कल्याण की भावना के साथ किया जाता था. प्रायः छोटे उद्यमी, कारीगर अथवा शिल्पकार स्वयं को स्पर्धा में बनाए रखने के लिए श्रेणि के रूप में संगठित होते थे. इससे उन्हें एक प्रकार की व्यावसायिक सुरक्षा की अनुभूति भी होती थी. परंपरागत भारतीय समाज जाति और वर्ग के आधार पर विभाजित था. लेकिन श्रेणियों में कार्यविभाजन का आधार आमतौर पर व्यक्तिगत दक्षता ही थी.

हम यह भी कह सकते हैं कि श्रेणियां एक प्रकार से प्राचीनकाल से चली आ रही वर्णव्यवस्था के प्रति जनसमाज का सकारात्मक विद्रोह का परिणाम थीं. चूंकि बौद्धधर्म जाति एवं वर्ण के आधार पर समाज के विभाजन का विरोध करता था, अतएव उसके प्रभाव के चलते श्रेणियों को अपने विकास का भरपूर अवसर प्राप्त हुआ. ये श्रेणियां अपने समय के तकनीकी कौशल, ज्ञान, अनुभव तथा औद्योगिक संसाधनों को सहेजने तथा स्थानीय रूप से उपलब्ध कच्चेमाल के दोहन का कार्य भी करती थीं. आवश्यकता पड़ने पर श्रेणि मजदूर संगठन का काम भी कर सकती थी. उनके सदस्य अपने उद्यम के अकेले स्वामी तथा मुख्यकर्ता होते थे, व्यावसायिक नैतिकता के आधार पर वे एक-दूसरे के साथ व्यवहार करते थे तथा उनमें आंतरिक लोकतंत्र था. बावजूद इसके अधिकांश गिल्ड तत्कालीन मुख्य शासन-व्यवस्था अर्थात राजशाही के ही समर्थक थे. इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि सामाजिक मुद्दे पर किसी भी प्रकार के टकराव से बचते हुए वे स्वयं को केवल आर्थिक कार्यक्रमों तक समेटे रखना चाहते हों. क्योंकि वर्ण-विभाजन के अनुसार राज्य करना क्षत्रिय वर्ग का कार्य था. जबकि श्रेणियों के रूप में संगठित होने वाले व्यक्ति अधिकांशतः वैश्य एवं कामगार जातियों से आए हुए लोग थे. भारत में श्रेणि का प्रारंभ कब हुआ, इस बारे में कदाचित मतभेद हैं. कुछ विद्वानों का मानना है कि वैदिक समाज मुख्यतः पशुपालक समाज था, जो शनै-शनै कृषि आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा था. उद्योग-धंधे विकास की प्रारंभिक अवस्था में थे और उनका इतना विकास नहीं हुआ था कि उनमें लगे लोग अपने स्वतंत्र संगठन बना सकें. इस विचारधारा के समर्थक विद्वानों का विश्वास है कि श्रेणि आधारित अर्थव्यवस्था कालांतर में विकसित हुई. इसके विपरीत कुछ विद्वानों को भरोसा है कि वैदिक सभ्यता इतनी विकसित हो चुकी थी कि वहां पर श्रेणियों का गठन होने लगा था. इस मत के समर्थकों में से एक किरन कुमार थपलियाल का मानना है कि वैदिक सभ्यता में भारत में शिल्पकारों तथा व्यापारियों के संगठन बनने लगे थे तथा उनका वैदिक भारत की अर्थव्यवस्था की समृद्धि में बहुत बड़ा योगदान था. ये संगठन आंतरिक लोकतंत्र की भावना से समृद्ध थे.

थपलियाल के अनुसार वैदिक सभ्यता के जो भी साहित्यिक और ऐतिहासिक स्रोत आज उपलब्ध हैं, उनमें इस तथ्य का समर्थन करते पर्याप्त प्रमाण मौजूद हैं, जिनके अनुसार उस समय भी भारत के व्यावसायिक और औद्योगिक संगठन सुदूर देशों के साथ व्यापारिक संबंध बनाए हुए थे. कुछ विद्वान मोहान-जो-दारो तथा हड़प्पा की सभ्यता को वैदिक सभ्यता ही मानते हैं. हालांकि वे कोई स्पष्ट साक्ष्य देने में नाकाम रहे हैं. लेकिन यदि वैदिक सभ्यता तथा मोहान-जो-दारो सभ्यता का कार्यकाल एक ही है तो यह भी सत्य है कि मोहन-जो-दारो के लोगों के व्यापारिक रिश्ते चीन, मेसोपोटामियां, रोम आदि सुदूर देशों के साथ थे.

गणपति शब्द का प्रयोग वैदिक साहित्य में अनेक स्थानों पर हुआ है, जिसका एक अर्थ गण अर्थात नागरिक भी है. इस तरह गणपति यानी नागरिकों द्वारा परस्पर सहमति के आधार पर चुने गए प्रशासक से है. भारतीय परंपरा में गणपति को सभी देवताओं में अग्रणी, सर्वप्रथम पूज्य माना गया है. इस बात की प्रबल संभावना है कि इस शब्द की व्युत्पत्ति गणतांत्रिक राज्य में हुई हो. बाद में जब समाज में पांडित्य के नाम पर पोंगापन अपना असर जमाने लगा तब गणपति का अर्थ भी रूढ़ होकर हाथी की सूंड वाला प्राणी हो गया. लेकिन गणेश को देवता के रूप में मिलने वाला सम्मान, तथा उसे समृद्धि का प्रतीक मानना आज भी इस बात का द्योतक है कि गणपति का अभिप्राय आर्थिक समूह का नेतृत्व करने वाले व्यक्ति से ही था. व्यापार के सिलसिले में चलने वाले काफिलों में गणपति की स्थिति उनके संरक्षक के रूप में मान्य थी. जिसे पूरी श्रद्धा एवं सम्मान के साथ देखा जाता था.

भारतीय समाज के पिछड़ेपन के मुख्य कारणों में से एक इसकी जाति-व्यवस्था है, जिसने शताब्दियों से समाज के एक बड़े वर्ग को मौलिक अधिकारों से वंचित करने का कार्य किया है. इसी ने देश को पराधीनता की और ढकेला, परिणामतः शताब्दियों तक पराये लोग हमारे भाग्यविधाता बने रहे. इस समाज को पहली बार एकसूत्र में पिरोने में कामयाबी महात्मा गांधी ने हासिल की थी. स्वाधीनता संग्राम के दौरान भारत की जनता ने अपनी संगठित ताकत को पहचान. परिणाम यह हुआ कि हर वर्ग हर जाति का आदमी अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध के लिए खड़ा हो गया. देश ने संभवतः पहली बार एक राष्ट्र के रूप में स्वयं को अनुभव किया. आजादी मिली तो यह भी अनुभव किया जाने लगा कि समरस समाज सुदृढ़ राज्य की जरूरत है. इसलिए राष्ट्र की मजबूती के लिए धर्म, जाति एवं आर्थिक आधार जितने भी भेदभाव हैं, उन सभी को मिटाकर एक समानता पर आधारित समाज की स्थापना की जाएगी. लोकतांत्रिक व्यवस्था सोचे गए लक्ष्य के लिए वरदान सिद्ध हो सकती थी. इसलिए स्वाधीनता प्राप्ति के उपरांत देश में जाति एवं धर्म आधारित विभाजन को गैरजरूरी मानते हुए समरस समाज की स्थापना पर जोर दिया गया. गणतंत्र प्राचीन भारत में भी जाति-वर्ग के आधारित समाजों की कमी को पाटने की कोशिश करता रहा था, आजादी के बाद भी वह समाज को एकसूत्र में पिरोने के लिए भरसक प्रयासरत है, आवश्यकता गणतांत्रिक संस्थाओं को और अधिक सशक्त करने, तथा लोगों को इस बारे में जागरूक बनाने की है.

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भानुक्रमणिका

1. The gana leaders should be respected as the worldly affairs (of the ganas) depend to a great extent upon them…the spy (department) and the secrecy of counsel (should be left) to the chiefs, for it is not fit that the entire body of the gana should hear those secret matters. The chiefs of gana should carry out together, in secret, works leading to the prosperity of the gana , otherwise the wealth of the gana decays and it meets with danger. Mahabharata 12.107, trans. – by R.C. Majumdar, Corporate Life, 251 as quoted by by Steve Muhlberger in Democracy in Ancient India.

2. …the form of government was democratic and not regal. – Q. Curtius Rufus, History of Alexander the Great 9.8, Classical Accounts, p. 151; Diodorus Siculus, Bibliotheca Historica 17.104, Classical Accounts, p. 180.

3. At last, however, after many years had gone, most of the cities adopted the democratic form of government, though some retained the kingly until the invasion of the country by Alexander. – Diodorus Siculus 2.39, Classical Accounts, p. 236.

4. There was a complex vocabulary to describe the different types of groups that ran their own affairs. Some of these were obviously warrior bands; others more peaceful groups with economic goals; some religious brotherhoods. Such an organization, of whatever type, could be designated, almost indifferently, as a gana or a sangha; and similar though less important bodies were labeled with the terms sreni, puga, or vrata. Gana and sangha, the most important of these terms, originally meant “multitude.” By the sixth century B.C., these words meant both a self-governing multitude, in which decisions were made by the members working in common, and the style of government characteristic of such groups. In the case of the strongest of such groups, which acted as sovereign governments, the words are best translated as “republic.” by Steve Muhlberger, Democracy in Ancient India.

5. ‘Republican polities were most common and vigorous in the Buddhist period, 600 B.C.-A.D. 200. At this time, India was in the throes of urbanization. The Pali Canon gives a picturesque description of the city of Vesali in the fifth century B.C. as possessing 7707 storied buildings, 7707 pinnacled buildings, 7707 parks and lotus ponds, and a multitude of people, including the famous courtesan Ambapali, whose beauty and artistic achievements contributed mightily to the city’s prosperity and reputation. The cities of Kapilavatthu and Kusavati were likewise full of traffic and noise. Moving between these cities were great trading caravans of 500 or 1000 carts — figures that convey no precise measurement, but give a true feeling of scale: caravans that stopped for more than four months in a single place, as they often did because of the rainy season, were described as villages. Religion, too, was taking to the road.’ – by Steve Muhlberger, Democracy in Ancient India.

6. Furthermore, power in some republics was vested in a large number of individuals. In a well-known Jataka tale we are told that in the Licchavi capital of Vesali, there were 7707 kings (rajas), 7707 viceroys, 7707 generals, and 7707 treasurers.- Jataka 149, trans. in The Jataka, or Stories of the Buddha’s Former Births, ed. E.B. Cowell, tr. by Various Hands, 6 vols. (1895; reprint, London, 1957).

7. The Lalitavistara, in an obvious satirical jab, depicts Vesali as being full of Licchavi rajans, each one thinking, ‘I am king, I am king,” and thus a place where piety, age and rank were ignored.’ – Khanna.

8. .…there was “a craze for constituting new republics” which “had reached its climax in the Vahika country and north-west India where clans constituting of as many as one hundred families only organized themselves as Ganas.” By V.S. Agrawala, India as Known to Panini: A study of the cultural material in the Ashatadhyayi as quoted by Steve Muhlberger.