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सच्ची रामायण का विरोध धार्मिक से कहीं ज्यादा राजनीतिक है

सामान्य

मैं मानव समाज का सुधारक हूँ. मैं देश, धर्म, ईश्वर, भाषा अथवा राज्य की परवाह नहीं करता. मुझे केवल मनुष्यता के विकास और उसके कल्याण की चिंता है—पेरियार

बाइबिल का परमात्मा पक्के तौर पर सर्वाधिक ईर्ष्यालु, सर्वाधिक नाकारा, सर्वाधिक क्रूर, सर्वाधिक अन्यायी, सर्वाधिक रक्त पिपासु, सबसे ज्यादा निरंकुश तथा मानवीय गरिमा एवं स्वतंत्रता का सबसे बड़ा शत्रु था. जबकि शैतान शाश्वत विद्रोही और पहला मुक्त चिंतक था—मिखाइल बकुनिन, ईश्वर और राज्य.

‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी.’ प्रथम दृष्टया लोकतांत्रिक लगने वाली ये पंक्तियां तुलसी की हैं. पढ़कर लगता है कि लिखने वाले का लोकतंत्र में अटूट विश्वास है. वह साधक को अपनी भावना के अनुसार साध्य गढ़ने की छूट देता है. मगर इनमें लोकतंत्र की व्याप्ति मान लेना वैसा ही संभ्रम है, जैसे यह कहना कि कण-कण में भगवान हैं, इसलिए चराचर जगत में सभी बराबर हैं, दुनिया में आदर्श समानता है. ऊंच-नीच, जात-पात, छोटा-बड़ा, छूत-अछूत जैसा कुछ भी नहीं है. असल में, धर्म का यह उदार चेहरा उतना ही बनावटी है, जितना किसी पुरोहित का दक्षिणा मिलते ही ‘कल्याणम् भव’ कह, निस्पृह भाव से आगे बढ़ जाना. भारतीय समाज छोटे-छोटे समुदायों, धार्मिक और सांप्रदायिक समूहों, गोत्रों-उपगोत्रों तथा जातियों-उपजातियों में हमेशा बंटा रहा. उनके बीच वर्चस्व को लेकर संघर्ष भी लगातार चलते रहे.

हालांकि एक सीमा तक तुलसी गलत भी नहीं थे. जिस दौर में वे रामचरितमानस लिख रहे थे, समाज में रामकथा के अलग-अलग रूप प्रचलित थे. प्रत्येक समूह अपनी रामकथा को असली मानता था. बावजूद इसके रामायण के भिन्न कथारूपों पर विश्वास करने वाले समूहों में परस्पर कोई द्वेष नहीं था. अकेले राम सभी के ‘भगवान’ नहीं थे, लेकिन कोई राम को सबसे बड़ा देवता और भगवान माने, इसपर उन्हें कोई आपत्ति न थी. आदिवासियों, जनजातियों, शूद्रों, अतिशूद्रों के अपने-अपने देवता थे, जो राम जैसे अवतारी, उतने ही पराक्रमी और चमत्कारी; कहीं-कहीं तो उनसे भी आगे थे. राम के देवत्व पर भरोसा कर अपना आराध्य मानने वालों ने भी, उन्हें अपनी परंपरा और संस्कृति के अनुसार ढालने के बाद ही स्वीकार किया था. यही कारण है कि उस जमाने में सीता को राम की बहन बताने वाली जैन रामायण ‘पउमचरिय’ उतनी ही लोकप्रिय और सम्मानीय मानी जाती रही, जितनी राम-सीता को पति-पत्नी बताने वाली वाल्मीकि रामायण.

विभिन्न रामायणों के मुख्य पात्र भले ही एक हों, किंतु उनके चरित्र में आधारभूत अंतर है. जैन रामायण में ब्राह्मणों पर रावण को बदनाम करने का आरोप लगाया गया है. जैन मान्यता के अनुसार रावण उनके 63 शलाकापुरुषों में से एक था. उसके अनुसार राम और रावण दोनों जैन थे. मृत्यु के बाद राम को कैवल्य; तथा लक्ष्मण को नर्क प्राप्त हुआ था. वाल्मीकि, तुलसी, विमलसूरि(पउमचरिय) द्वारा रचित रामायणों के अलावा भी रामकथा के सैंकड़ों रूप दुनिया-भर में प्रचलित हैं. फादर कामिल बुल्के ने देश-विदेश में प्रचलित रामकथाओं की गणना कर, उनकी संख्या को 300 माना था. अपने लेख ‘थ्री हंड्रेड रामायण’ में ए. के. रामानुजन रामकथा की विविधता को दर्शाने के लिए जिस लोकश्रुति का सहारा लेते हैं, उसके अनुसार रामकथा अनंत रूपों में, अनादिकालीन कथा है. फिर पेरियार ने ऐसा क्या लिखा था, जिससे उनकी लिखी ‘सच्ची रामायण’ का नाम सुनकर ब्राह्मणवादी लाल-पीले होने लगते हैं?

मुख्य कारण था, पेरियार का रामकथा के प्रति दृष्टिकोण. पेरियार स्वयं नास्तिक थे. जहां रामायण के अन्य प्रारूपों के साथ कोई न कोई धार्मिक दृष्टिकोण जुड़ा था, पेरियार उसे धार्मिक पुस्तक मानने से ही इन्कार करते थे. उनका कहना था कि रामायण एक राजनीतिक ग्रंथ है. उसकी रचना ब्राह्मणों ने द्रविड़ों पर अपना प्रभुत्व दर्शाने के लिए की गई है. वह द्रविड़ों के आत्मसम्मान की विरोधी, उनकी अस्मिता का हनन करने वाली है. ‘दि रामायण: एक ट्रू रीडिंग’ की भूमिका में वे लिखते हैं—

‘रामायण और बरधाम(महाभारत) काल्पनिक ग्रंथ हैं….इन्हें आर्यों ने द्रविड़ों को अपने जाल में फंसाने, उनके आत्मसम्मान को नष्ट करने, निर्णय सामथ्र्य को कुंद करने तथा उनकी इंसानियत को पथभ्रष्ट करने के लिए रचा है. इन दोनों कथाओं के नायक क्रमशः राम और कृष्ण हैं. जो कि आर्य हैं और बेहद साधारण व्यक्ति हैं. ये कथाएं इसलिए थोपी गईं हैं, ताकि इनके कथानायकों, उनके परिजनों एवं सहायकों को अलौकिक एवं अतिमानवीय मान लिया जाए; तथा उन्हें पूजनीय मानकर, जनसाधारण द्वारा उनकी पूजा-अभ्यर्थना की जाए.’ बावजूद इसके रामासामी पेरियार की पुस्तक ‘दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ जब तक तमिल और अंग्रेजी में थी, तब तक हिंदी पट्टी के ब्राह्मणवादियों को उससे कोई आपत्ति नहीं थी. इसलिए करीब 40 वर्षों तक उसके तमिल और अंग्रेजी में संस्करण पर संस्करण निकलते रहे.

पुस्तक को लेकर तूफान तब उठा जब कानपुर देहात के रहने वाले पेरियार ललई सिंह ने ‘सच्ची रामायण’ शीर्षक से उसका हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया. हिंदी अनुवाद दुलालपुर निवासी, राम आधार द्वारा किया गया था. उसे छापने के लिए उस समय कोई प्रकाशक तैयार नहीं था. इसलिए ललई सिंह ने उसे अपने प्रकाशन, ‘अशोक पुस्तकालय’ कानपुर से 1 अक्टूबर, 1968 को प्रकाशित किया था. मूल कृति ‘रामायण पादिरंगल’(रामायण के कथापात्र) शीर्षक से 1930 में प्रकाशित हुई थी. 1972 तक उसके दस संस्करण प्रकाशित हो चुके थे. पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद 1959 में आया था. उसके बाद दो और संस्करण क्रमशः 1972 और 1980 में प्रकाशित हुए. पुस्तक के हिंदी में आने की संभावना उसके अंग्रेजी अनुवाद के बाद ही बनी थी. ‘रामायण पादिरंगल’ की रचना से पहले पेरियार ने लगभग सभी उपलब्ध रामकथाओं यथा जैन, बौद्ध, कंब आदि का गहन अध्ययन किया था. विषय से संबंधित विद्वानों से बातचीत की थी.

रामकथा संबंधी उनके अध्ययन-चिंतन की सफल परिणति एक साथ दो पुस्तकों के रूप में हुई थी. दूसरी पुस्तक का नाम था—रामायण कुरीप्पुकल(रामायण के बारे में कुछ बातें). वह पहली की अपेक्षा अधिक गंभीर तथा कथानक की दृष्टि से मूल रामकथा के करीब थी. उनमें प्रसिद्धि मिली पहली पुस्तक को. अंग्रेजी में उसे मूल शीर्षक से थोड़ा हटकर, ‘दि रामायण: एक ट्रू रीडिंग’ शीर्षक से छापा गया. उसका हिंदी अनुवाद ‘सच्ची रामायण’ के रूप में सामने आया. हम सोच सकते हैं कि तमिल कृति ‘रामायण पादिरंगल’ यानी ‘रामायण के कथापात्र’ के हिंदी में ‘सच्ची रामायण’ के रूप में अनूदित होते-होते, शीर्षक के स्तर पर भी काफी अर्थ-परिवर्तन हो चुका था.

‘सच्ची रामायण’(रामायण पादिरंगल) की रचना विखंडनात्मक शैली में हुई है. वह रामकथा की स्थापित छवियों का खंडन करती थी. उसका उद्देश्य रामायण के कथापात्रों के चरित्र का वस्तुनिष्ट विवेचन है. जिस राम को तुलसी मर्यादापुरुषोत्तम कहकर ईश्वरतुल्य बना देते हैं, उसके बारे में पेरियार आरंभ में ही साफ कर देते हैं कि—‘राम कोई आदर्श व्यक्ति नहीं है.’ आगे वे विस्तार से राम के चरित्र को लेकर अपने विचार पेश करते हैं. शंबूक प्रसंग का उल्लेख करते हुए वे आगे लिखते हैं—

‘राम जिसने तपस्या कर रहे शंबूक की बगैर किसी गलती के, निर्दयतापूर्वक हत्या कर दी थी, उस राम को विष्णु का अवतार माना जाता है. अगर आज राम की तरह का कोई राजा होता तो उन लोगों की क्या दशा होती, जिन्हें शूद्र(जो गालीनुमा संबोधन है) कहा जाता है!’

ऐसी वैचारिक प्रखरता, प्रतिबद्धता और साफगोई के कारण वह उसकी लोकप्रियता उत्तरोत्तर बढ़ती गई.

पेरियार ललई सिंह ने न केवल ‘दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ का हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया था, अपितु ‘सच्ची रामायण’ में पेरियार के तर्कों की पुष्टि के लिए, विभिन्न रामकथाओं से कुछ संदर्भ भी दिए थे. जिसे उन्होंने ‘सच्ची रामायण की चाबी’ कहा था. पाठकों की सुविधा के लिए दोनों पुस्तकों को एक ही जिल्द में छापा गया था. उदाहरण के लिए पेरियार ने सीता का वर्णन करते हुए उसके चरित्र की दुर्बलताओं को उजागर किया था तो पेरियार ललई सिंह ने उसकी पुष्टि के लिए रामचंद्र शुक्ल की पुस्तक ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ से, ‘श्रीरामावतार भजन तरंगिनी’ से एक पद उद्धृत किया था. पद में यूं तो पति-पत्नी का सहज रति प्रसंग है. लेकिन एक ‘वनवासी मर्यादा पुरुषोत्तम’ के संदर्भ से जुड़कर वह अशालीन लगने लगता है. पद में सीता का कथन देखिए—

‘हमारे प्रिय ठाड़े सरजू तीर।।टेक।।

छोड़ लाजि मैं जाय मिली, जहां खड़े लखन के वीर

मृदु मुसुकाय पकरि कर मेरी खेच लियो तब चीर

झाऊ वृक्ष की झाड़ी भीतर करन लगे रति धीर.1

कह सकते हैं कि पेरियार द्वारा, ‘दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग’, के रूप में रामायण की विखंडनवादी अन्वीक्षा, ‘सच्ची रामायण’ में थोड़ी और मुखर, और अधिक व्यंजनात्मक हो चुकी थी. इसलिए ब्राह्मणवादियों के कान खड़े होना स्वाभाविक था. हिंदी में प्रकाशित होने के साथ पूरे हिंदी जगत में तूफान सा उठ गया. ललई सिंह पर मुकदमा ठोक दिया गया. यह कहकर कि पुस्तक हिंदुओं की भावनाओं को आहत कर, सामाजिक विद्वेष फैलाने वाली है, उसकी सभी प्रतियों को जब्त करने के आदेश सुना दिए गए. गौरतलब है कि प्रतिबंध और जब्ती के आदेश पुस्तक के केवल अंग्रेजी और हिंदी संस्करण के थे. तमिल तथा दूसरी दक्षिणी भारतीय भाषाओं में प्रकाशित पुस्तक की बिक्री पर कोई पाबंदी नहीं लगाई गई थी. गोया तमिलनाडु या दक्षिण भारत के दूसरे हिस्सों में हिंदू रहते ही नहीं थे. इससे पेरियार के कथन कि रामायण एक राजनीतिक ग्रंथ है—की पुष्टि होती है. सच तो यह है कि ‘सच्ची रामायण’ के माध्यम से ब्राह्मणवादी राजनीतिक ताकतें, अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक एवं राजनीतिक सत्ता की पुनर्वापसी को अंजाम देने में लगी थीं.

पुस्तक को प्रतिबंध मुक्त कराने के लिए ललई सिंह यादव को लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी. उसका समापन 16 सितंबर, 1976 के उच्चतम न्यायालय के फैसले से हुआ. शीर्षतम अदालत ने प्रतिबंध को गलत बताकर, पुस्तक की जब्त की गई प्रतियां लौटाने का आदेश दिया था. उच्चतम न्यायालय के आदेश के बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार औपचारिक आदेश जारी करने से बचती रही. 1995 में मायावती सरकार के दौरान पुस्तक प्रतिबंध-मुक्त हो सकी. उसके बाद से हिंदी पट्टी में ‘सच्ची रामायण’ की लोकप्रियता बढ़ती गई, मगर पोंगापंथी भी शांत न थे. वे विरोध के लिए नए सिरे से एकजुट होने लगे थे. नया दौर हिंदुओं का न होकर, हिंदुत्ववादियों का था. उनके भीतर पेरियार के प्रति नफरत कूट-कूट कर भरी थी. इसलिए नहीं कि पेरियार ने रामायण के पात्रों के चरित्र पर उंगलियां उठाई थीं. बल्कि इसलिए कि उन्होंने इन धर्मग्रंथों के पीछे छिपे ब्राह्मणवादियों के राजनीतिक मंसूबों को उजागर कर दिया था. पेरियार के प्रति उनके भीतर कितनी नफरत भरी थी, इस समझने के लिए एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा.

2002 में लखनऊ स्थित आंबेडकर पार्क जब बन रहा था तो उसमें योजनानुसार ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, शाहूजी महाराज, डॉ. आंबेडकर, बिरसा मुंडा, कांशीराम जैसी बहुजन शख्सियतों की मूर्तियां स्थापित की गईं. मायावती उसमें पेरियार की मूर्ति भी लगवाना चाहती थीं. कलाकार को मूर्ति-निर्माण का आदेश जारी हो चुका था. उस समय प्रदेश में भाजपा के सहयोग से बनी बहुजन समाज पार्टी की सरकार थी. पेरियार का नाम सुनते ही विश्वहिंदू परिषद, बजरंग दल, हिंदू महासभा जैसे उग्रपंथी संगठन भड़क उठे. विनय कटियार ने ऐलान किया कि पेरियार की मूर्ति लगाई गई तो वे उसे ढहा देंगे. भाजपा ने समर्थन वापस लेने की धमकी दे डाली. बसपा पेरियार को अपना ‘आइकन’ मानती थी. उसके हर कार्यक्रम में ज्योतिबा फुले, डॉ. आंबेडकर, शाहूजी महाराज के साथ-साथ पेरियार के चित्र भी लगे होते थे. उस समय मायावती चाहतीं तो सामाजिक न्याय समर्थित वैचारिकी को महत्व देकर, सरकार को दाव पर लगाने का खतरा उठा सकती थीं. लेकिन उन्होंने राजनीतिक सत्ता को बचाने का अवसरवादी विकल्प चुना. बयान दिया कि सरकार का पेरियार की मूर्ति लगाने का कोई इरादा नहीं है. जबकि मूर्ति तैयार होकर शिल्पकार के स्टूडियो में प्रतीक्षारत थी.

मंदिर आंदोलन की आड़ में प्रदेश में दक्षिणपंथी ताकतें दुबारा मजबूत हुई तो उच्चतम न्यायालय के फैसले के बावजूद पुस्तक पर नए सिरे से प्रतिबंध लगाने की मांग की जाने लगी. 2007 में प्रदेश में सुश्री मायावती की सरकार थी. उस समय भाजपा की प्रादेशिक इकाई ने आरोप लगाया कि ‘बहुजन समाज पार्टी’ सच्ची रामायण का प्रचार-प्रसार कर रही है. उसके संरक्षण में प्रदेश में बड़े पैमाने पर पुस्तक की बिक्री की जा रही है. भाजपा की प्रदेश इकाई ने, पुस्तक को हिंदुओं की भावनाओं को आहत करने वाली बताकर, उसपर तत्काल प्रतिबंध लगाने की मांग की थी. भाजपा विधान मंडल के तत्कालीन नेता ओमप्रकाश सिंह ने सरकार से मांग की थी कि—‘हिंदू देवी-देवताओं के विरोधी तथा द्रविड़िस्तान की मांग करने वाले, अलगाववादी पेरियार रामासामी की सरकार निंदा करे तथा उन्हें महापुरुषों की श्रेणी में स्थान न दे.’ भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी ने दावा किया था कि 9 अक्टूबर को बसपा की रैली में ‘सच्ची रामायण’ की 4000 प्रतियां बेची गई थीं. हैरानी की बात यह है कि सामाजिक न्याय की बात करने वाली समाजवादी पार्टी भी, ‘सच्ची रामायण’ के विरोध में भाजपा का साथ दे रही थी. विधानसभा में विपक्ष के नेता और समाजवादी पार्टी के सदस्य अहमद हसन ने ‘सच्ची रामायण’ के जरिये सरकार पर निशाना साधते हुए कहा था कि—

‘भगवान राम के प्रति अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना अच्छी बात नहीं है. पूरी दुनिया के मुसलमान स्वीडिश कार्टूनिस्ट द्वारा बनाए गए पैगंबर मोहम्मद के कार्टून की भर्त्सना कर रहे हैं. विवादित पुस्तक पर तत्काल प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए.2

इससे अनुमान लगाया जाता है कि मामला जब धर्म की आलोचना का हो तो समय-समय पर एक-दूसरे के प्रतिद्विंद्वी की भूमिका में उतरने वाले धर्मावलंबी भी एक-दूसरे के समर्थन पर उतर आते हैं.

देखा जाए तो भाजपा का आरोप सरकार पर न होकर, ‘बहुजन समाज पार्टी’ पर था. उस पार्टी पर जो पेरियार को अपना आदर्श मानती थी. अपनी वैचारिकी पर दृढ़ रहने के बजाए, मुख्यमंत्री मायावती ने एक बार फिर पीछे हटने का फैसला किया. उनकी ओर से वक्तव्य जारी हुआ—‘बसपा तथा सरकार का सच्ची रामायण की बिक्री से कोई लेना—देना नहीं है.’ मामले पर राजनीति करने के बजाय, पुस्तक पर प्रतिबंध की मांग कर रहे नेताओं को केंद्र सरकार से संपर्क करना चाहिए, जहां उनकी अपनी पार्टी की सरकार है.3

इस प्रसंग का सबसे रोचक पहलू यह है कि जिस ‘सच्ची रामायण’ के विरोध को लेकर भाजपा सरकार पर लगातार आरोप लगा रही थी, तथा बिना आगा-पीछा सोचे कांग्रेस और समाजवादी पार्टी उसका साथ दे रही थीं, उसकी प्रति न तो भाजपा के पास थी, न सपा, न कांग्रेस और न ही बसपा के पास. यहां तक कि बसपा के साहित्य के प्रकाशक ‘बहुजन चेतना मंडप’ के पास भी उस पुस्तक की प्रतियां उपलब्ध नहीं थी. जबकि लखनऊ के सबसे बड़े पुस्तक विक्रेता ‘यूनीवर्सल बुक सेलर’ का दावा था, ‘हमने वह पुस्तक कभी नहीं बेची, न ही वह पुस्तक फिलहाल हमारे पास है.’ उल्लेखनीय है कि भाजपा के लखनऊ मुख्यालय में ‘सच्ची रामायण’ को लेकर 27—28 अक्टूबर 2007 को एक बैठक हुई थी. उसमें पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह और नेता लालकृष्ण आडवाणी भी मौजूद थे. उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से प्रदेश भर में ‘सच्ची रामायण’ की बिक्री का विरोध करने को कहा था. जबकि जिस पुस्तक का बहिष्कार किया जाना था, उसकी एक भी प्रति उस बैठक में उपलब्ध नहीं थी.

भाजपा नेताओं द्वारा विधानसभा परिसर के आगे स्थित, अपने पार्टी मुख्यालय में ‘सच्ची रामायण’ की प्रतियों का दहन(का नाटक) किया था.4 भाजपा का ‘सच्ची रामायण’ के दहन का दावा कितना खरा था, इसे इंडियन एक्सप्रेस में अलका एस. पांडे की 7 नबंवर की रिपोर्ट से समझा जा सकता है. उसके अनुसार पार्टी ने जैसे-तैसे ‘सच्ची रामायण’ के कुछ पन्ने जुटाए थे. उन्हीं को जलाकर, पुस्तक के दहन का नाटक किया गया था. वे भूल गए कि किसी व्यक्ति को महापुरुष मानना या न मानना, सत्ता प्रतिष्ठानों द्वारा तय नहीं होता. थोपे गए महापुरुषों की कलई अल्पावधि में ही खुलने लगती है. उसके बाद जनता की निगाह में वे खलनायक सरीखे बन जाते हैं.

एक महत्वपूर्ण बात और भी है. रामायण को धार्मिक ग्रंथ न मानकर पेरियार ने उसे विशुद्ध राजनीतिक ग्रंथ माना है. पेरियार के आलोचक भी उनपर कुछ ऐसा ही आरोप लगाते हैं. उनके अनुसार पेरियार द्वारा हिंदू धर्म तथा उसके मिथकों की आलोचना पूर्णतः राजनीति से प्रेरित थी. पेरियार इससे इन्कार नहीं करते थे. अंतर सिर्फ इतना है कि ब्राह्मण कभी यह मानने को तैयार नहीं होते कि रामायण तथा रामकथा को हिंदू संस्कृति के केंद्र में रखने के पीछे उनकी राजनीति है. खुद को सबसे ऊपर, शिखर पर बनाए रखने की राजनीति. जबकि पेरियार अपनी मंशा को छिपाते नहीं हैं—

‘मैं अपने समाज के कुछ ऐसे पहलुओं पर प्रहार करता हूं, जो हमें नीचा दिखाते हैं. मेरा जोर इस बात पर है कि जब तक हिंदू धर्म, हिंदू देवताओं, हिंदू शास्त्रों, पुराणों, वेदों और इसके इतिहास पर हमारा विश्वास रहेगा, और जब तक हम इनका अनुसरण करते जाएंगे, तब तक हमारा दमन और शोषण जारी रहेगा. हम समाज की असमानताकारी स्थितियों से कभी उबर ही नहीं पाएंगे. इन सड़ी हुई स्थितियों से उबरने की कोशिश के बजाए, जो केवल इनका पालन करने में लगा रहेगा—वह चाहे जितनी बेहतर स्थिति में आ जाए, खुद को अपनी अवनति और अपमानजनक स्थितियों से कभी उबार नहीं पाएगा.’5

एक अन्य भाषण में उन्होंने कहा था—

‘मैं किसी को चाहे प्यार करूं अथवा घृणा; दोनों स्थितियों में मेरा सिद्धांत एक ही रहता है. वह सिद्धांत यह है कि मैं यह शिक्षा देता हूं कि धनी लोगों और प्रशासनिक अधिकारियों को गरीब लोगों का खून नहीं चूसना चाहिए.’6

पेरियार का मानना था कि बगैर हिंदू धर्म को मिटाए, जाति-भेद को मिटाना संभव नहीं है. वे धर्मांतरण के विरोधी थे. जाति-आधारित उत्पीड़न और अवमानना से बचने के लिए जिन लोगों ने धर्मांतरण का सहारा लिया था, उनकी सामाजिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया था. हिंदू धर्म में जो अछूत था, धर्मांतरण के बाद भी उसकी हैसियत अछूत जैसी ही रहती थी. इसलिए शूद्रों और अतिशूद्रों की राजनीतिक, सामाजिक भागीदारी को आवश्यक मानते थे. राजनीति में प्रवेश के साथ ही उन्होंने सभी वर्गों को उनकी संख्या के अनुपात में संरक्षण की मांग शुरू कर दी थी. उन दिनों अस्पृश्यों को मंदिरों में प्रवेश की स्वतंत्रता नहीं थी. पेरियार स्वयं नास्तिक थे. मगर मंदिर प्रवेश का मसला सामाजिक स्वतंत्रता से भी जुड़ा था. इसलिए तमिलनाडु कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बनने के तुरंत बाद उसके तिरुपुर सम्मेलन में उन्होंने एक प्रस्ताव पेश किया, जिसमें सभी अस्पृश्यों को मंदिरों में प्रवेश की इजाजत की मांग की गई थी. लेकिन कांग्रेस कमेटी के ब्राह्मण सदस्यों ने उस प्रस्ताव का जोरदार विरोध विरोध किया. नाराज पेरियार ने तत्काल घोषणा की कि वे मनुस्मृति, रामायण आदि पुस्तकों, जिनका उपयोग कुटिल ब्राह्मणों द्वारा धार्मिक हथियारों के रूप में किया जाता है—दहन करेंगे.

वह अवसर 1956 में आया. पेरियार ने ऐलान किया कि 1 अगस्त 1956 को वे मद्रास के समुद्री तट पर राम की तस्वीरों की होली जलाएंगे. उत्तर भारत में दशहरे के अवसर पर हर वर्ष रावण के पुतले को आग लगाई जाती है. पेरियार रावण को आदर्श द्रविड़ राजा मानते थे. इसलिए उत्तर भारतीयों द्वारा रावण के पुतले को आग लगाने के विरोध में उन्होंने राम की तस्वीरों का दहन करने का ऐलान किया था. एक तरह से वह ब्राह्मणवादी संस्कृति का प्रतीकात्मक विरोध था. पेरियार की घोषणा के बाद तमिलनाडु के सभी नेताओं ने उनसे संपर्क कर, कार्यक्रम को टाल देने का अनुरोध किया. तमिलनाडु कांग्रेस के अध्यक्ष पी. काक्कन ने कहा कि राम की तस्वीरें जलाना ईश्वर के प्रति उस विश्वास की अवमानना होगी, जिसके भरोसे गांधी ने आजादी प्राप्त की है. उन्हें पेरियार के प्रस्तावित कदम को ‘असामाजिक कृत्य’ घोषित किया था. इसपर पेरियार ने अपने निश्चय पर दृढ़ रहते हुए जवाब दिया कि उनका यह कदम सामाजिक परिवर्तन के लिए अपरिहार्य है.

अगले ही दिन सुबह, घर से निकलने के साथ ही पुलिस उपायुक्त ने पेरियार को गिरफ्तार कर लिया. पेरियार इस स्थिति के लिए पहले से ही तैयार थे. घर से निकलते समय उनके पास माचिस की डिब्बियों, राम की तस्वीरों के अलावा एक बिस्तर भी था, जिसे वे जेलयात्रा की संभावना के कारण अपने साथ लेकर निकले थे. पेरियार के गिरफ्तार होते ही उनकी पत्नी समुद्र तट पर पहुंची जहां उनके समर्थक इकट्ठा थे. उन्होंने पेरियार की गिरफ्तारी की सूचना दी. इससे उनके समर्थक उग्र हो गए और साथ लाई राम की तस्वीरों को आग के हवाले करने लगे. उस समय तक पुलिस भी वहां पहुंच चुकी थी. करीब आधा घंटे तक पुलिस से बचने और गिरफ्तार होने का नाटक चलता रहा. लोग पिटते रहे, खुद को बचाने के लिए भागते भी रहे. भागते-भागते एक व्यक्ति रेत पर फिसल गया. पुलिस उसे गिरफ्तार करने को दौड़ी. लेकिन तब तक वह राम की तस्वीर को आग लगा चुका था. बाद में पेरियार सहित सभी को रिहा कर दिया गया. पेरियार का उद्देश्य पूरा हो चुका था.

पेरियार के जीवन से जाना जा सकता है कि उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था. वे जनता के बीच में खड़े होकर खुलेआम देवी-देवताओं का मखौल उड़ाते थे. धर्म और उसके प्रतीकों में आस्था और विश्वास को जनसाधारण की गरीबी और दैन्य के लिए जिम्मेदार मानते थे. कहते थे कि धर्म का मूल उद्देश्य, ईश्वर के गौरवगान की खातिर मनुष्यता का तिरष्कार करना है. इसपर धर्म भीरू लोग कहते कि पेरियार मूर्ख है. एक न एक दिन ईश्वर का कोप उनपर कहर टूटेगा. उस समय वह संभल नहीं पाएंगे. मगर पेरियार ने 94 वर्ष लंबा संघर्षमय जीवन जिया. अपनी मृत्यु से एक दिन पहले भी वे अपने मिशन को लेकर सतर्क थे. वे अंत तक कहते रहे कि यदि ईश्वर में जरा-भी शक्ति तो वह उन्हें दंड क्यों नहीं देता! उनसे उनका जीवन छीन क्यों नहीं लेता! खुद को ‘पंडित’ और धर्माधिकारी कहने वाले लोगों के पास पेरियार के इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं था. आस्था और धर्म के नाम पर दूसरों को मूर्ख बनाते आए लोगों के पास पेरियार के तार्किक प्रश्नों का उत्तर हो भी नहीं सकता था.

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ :

  1. सच्ची रामायण और सच्ची रामायण की चाबी, अंबेडकर प्रचार समिति, मोती कटरा आगरा, पृष्ठ 76
  2. वेब दुनियाhttps://news.webindia123.com/news/ar_showdetails.asp?id=711050918&cat=&n_date=20071105
  3. वेब दुनियाhttps://news.webindia123.com/news/articles/India/20071027/805535.html.
  4. वन इंडियाhttps://www.oneindia.com/2007/10/30/bjp—workers—burnt—copies—of—sacchi—ramayan—1193744742.html
  5. रिपब्लिक 19 जनवरी, 1945
  6. दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग के प्रथम संस्करण के प्रकाशकीय से उद्धृत, 1959

वायकम सत्याग्रह : अस्पृश्यता के विरुद्ध निर्याणक जंग

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 (वायकम केरल का खूबसूरत नगर है। आजादी से पहले त्रावणकोर राज्य का हिस्सा था। और वहां राजा का शासन था। 1924 तक आधुनिक केरल, तमिलनाडु सहित दक्षिण के कई राज्यों में निचली जाति के सदस्यों को कुछ सार्वजनिक मार्गों पर चलने की आजादी नहीं थी। वायकम में शिव का प्राचीन मंदिर था। उससे जोड़ने वाली सड़कों पर चलना भी निचली जाति के शूद्रों और अस्पृश्यों  के लिए निषिद्ध था। माना जाता था कि उससे देवता और देवस्थान दोनों अपवित्र हो जाएंगे। सार्वजनिक मार्गों पर चलने के मानवतावादी अधिकार को लेकर जार्ज जोसेफ और उनके साथियों द्वारा आरंभ किया गया था। पहले चरण में सरकार आंदोलन को बलपूर्वक दबाने में सफल हो गई। हताशा की उस घड़ी में पेरियार को नेतृत्व के लिए आमंत्रित किया गया। उनके पहुंचते ही कार्यकर्ताओं में जान आ गई। आंदोलन के लिए पेरियार दो बार जेल गए। अंततः उनकी जीत हुई। पेरियार को ‘वायकम नायक’ की उपाधि मिली। 25-26 दिसंबर, 1958 को पेरियार ने अपने एक भाषण में उस घटना को याद किया था। उससे गांधी सहित तत्कालीन नेताओं और ब्राह्मणों की मानसिकता जाहिर होती है, अपितु संघर्ष की गंभीरता का भी अनुमान लगाया जा सकता है। भाषण का मूल तमिल ने अंग्रेजी अनुवाद ऐ. एस. वेणु ने किया है। हिंदी पाठ उसी का भाषांतर है)

आदरणीय अध्यक्ष महोदय,

 भाइयो और बहनो,

आपके साथियों की ओर से मुझे कन्याकुमारी जिले में आने का निमंत्रण कई बार दिया गया था। चूंकि मैं दूसरे जिलों के दौरों में व्यस्त था, इसलिए पहले नहीं आ सका था। जहां-जहां भी मैं गया, वहां मैंने देखा कि समाज में काफी जागृति आई है। हजारों की संख्या में लोग वहां जमा हुए थे। 

दस वर्ष पहले, यहां मार्तंडम में मैंने एक सभा को संबोधित किया था। उन दिनों आप स्थानीय राज्य के नागरिक थे। आपके ऊपर राजा का कानून चलता था, जबकि हम ब्रिटिश सरकार के नागरिक थे। बावजूद इसके आज भी हम सब ‘शूद्र’ हैं। हम द्रविड़ लोग अपमान-भरा जीवन जीते थे। यह हमारे साथ हुए धोखे का परिणाम  था। हमें आगे भी, हमेशा शूद्र बने रहना है। 

आज हम एक देश के नागरिक हैं। हम तमिलनाडु के तमिल हैं। आज हमें एक सूत्र में बांध दिया गया है।  हमारी एकता मजबूत हुई है। चूंकि हम सब एक ही देश के नागरिक हैं, इसलिए आज हम एक परिवार की तरह परस्पर जुड़े हुए हैं। हमें एक ही जाति माना गया है, अतएव अपने आदर्शों की प्राप्ति हेतु हम सभी को साथ-साथ, एकजुट होकर काम करना पड़ेगा।  

जहां तक मेरा संबंध है, 35 वर्ष पहले मैंने तमिलनाडु में एक आंदोलन का नेतृत्व किया था। उद्देश्य था, सामाजिक कुरीतियों, विशेषरूप से जातिभेद और घृणित छूआछूत को खत्म करना। हजारों वर्षों से हमें कुछ तयशुदा सार्वजनिक मार्गों पर चलने की अनुमति नहीं थी। जो लोग आज कम से कम पचास वर्ष के हैं, वे उन दिनों को याद कर सकते हैं। इस पीढ़ी के युवा अतीत की इन सच्चाईयों से अपरिचित हो सकते हैं।  

यदि उन दिनों आंदोलन नहीं हुआ होता, तो आज हममें से बहुत से लोग अनेक मार्गों पर चलने के अधिकार से वंचित होते। उन दिनों इस देश में बहुत बुरे हालात थे। सरकार कट्टरपंथी ब्राह्मणों के हाथों में थी। वर्णव्यवस्था अपने पूरे चरम पर थी। हमारे देश में, ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलनों के उभार द्वारा, गैर-ब्राह्मणों के अनेक अधिकारों की वापसी हुई है। ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलनों ने ब्राह्मण-आधिपत्य का सफलतापूर्वक मुकाबला किया है। गैर-ब्राह्मण आंदोलन को लोकप्रचलित रूप में ‘जस्टिस पार्टी’ के नाम से भी जाना जाता है, जिसका नामकरण उसकी पत्रिका ‘जस्टिस’ के आधार पर मिला था।  

ब्राह्मणों के भी अपने संगठन थे, जैसे कि ‘ब्राह्मण-समाज’ और ‘ब्राह्मण महासभा’। वे हमारे हितों के विरोध में काम करते थे; तथा वैध अधिकारों की प्राप्ति हेतु हमारे संघर्ष में बाधा बनकर खड़े थे। ब्राह्मण खुद को ‘सर्वोच्च  जाति’ का बताकर गर्व का अनुभव करते थे।  वे जोर देते थे कि उन्हें ‘ब्राह्मण’ संबोधित किया जाए। जबकि हम सभी को वे ‘शूद्र’ कहने पर अड़े रहते थे। ‘मनुस्मृति’ तथा दूसरे धर्मशास्त्रों में भी हमें केवल ‘शूद्र’ कहा गया है।  कितना अधिक अत्याचार और अपमान  हमें सहना पड़ता था! ऐसे विपरीत हालात ने हमारी प्रगति और जीवन दोनों को प्रभावित किया था।

यदि हमारे पास अपने संगठन के लिए ‘द्रविड़ कझ़गम’(द्रविड़ सभा) या ‘तमिल कझ़गम’ में से कोई एक चुनने का विकल्प न हो तो उसके लिए उपयुक्त नाम के रूप में केवल ‘शूद्र कझ़गम’(शूद्र पार्टी या शूद्र सभा) को चुनना होगा। यही कारण है, जिससे हमें ‘साउथ लिबरल फेडरेशन’ जिसे बाद में ‘जस्टिस पार्टी’ कहा जाता था—का नाम बदलकर ‘द्रविड़ कझ़गम’ रखना पड़ा था, ताकि हम दुनिया को बता सकें कि हम क्या हैं! हम द्रविड़ लोग गौरवशाली राष्ट्र हैं—यह दुनिया जानती है।  

वर्ष 1919 और 1920 में चले गैर-ब्राह्मणवाद आंदोलन(जस्टिस पार्टी) तथा मेरे प्रांत तमिलनाडु में हुए आंदोलनों के फलस्वरूप, सार्वजनिक मार्गों के उपयोग का अधिकार, बिना किसी जातिभेद के सभी नागरिकों को, न केवल तमिलनाडु, अपितु आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल में भी प्राप्त हो चुका है। 

‘जस्टिस पार्टी’ के हाथों में विहित शक्तियों के इस्तेमाल के फलस्वरूप सार्वजनिक मार्गों पर चलने का अधिकार भी सभी जातियों के लिए अमल में लाया गया था। यही नहीं, उन्हीं  दिनों ‘जस्टिस पार्टी’ द्वारा लाए गए एक विधेयक में तथाकथित निचली जातियों को ऐसे कुंओं से पानी लेने के अधिकार को भी शामिल किया गया था, जिन्हें उससे पहले विशेष रूप से ब्राह्मणों के इस्तेमाल के लिए आरक्षित रखा जाता था।  

ये सभी वे घटनाएं हैं जो गांधी के(भारतीय राजनीति में) सक्रिय होने से पहले ही घट चुकी थीं। यह कहना बेतुका और कपटपूर्ण है कि यह सब उपलब्धियां केवल गांधी की देन हैं। 

केवल इतना ही नहीं। ‘जस्टिस पार्टी’ के कार्यकर्ता ही वे लोग थे जिन्होंने, पंचायतों, नगर-निकायों, क्षेत्रीय मंडलों, जिला स्तरीय मंडलों तथा विधायिकाओं में, सभी जाति के लोगों प्रवेश हेतु, सर्वप्रथम रास्ता तैयार किया था। वह भी गांधी के भारतीय राजनीति में सक्रिय होने से बहुत पहले। उन्होंने ही, यहां तक कि  गांधी से भी पहले, तथाकथित निचली जातियों के प्रतिनिधियों को लगभग सभी निकायों में मनोनीत किया था। अतः यह कहना उचित नहीं है कि गांधी ने निचली जातियों जैसे कि पारिया के लिए, तथाकथित उच्च जातीय ब्राह्मणों के समकक्ष, विधायिकाओं में प्रवेश का अधिकार दिलाया था। सच तो यह है कि गांधी से भी बहुत पहले, तथाकथित निचली जातियां जैसे कि पारिया, चक्किलीस, पल्लार विधायिकाओं की सदस्य बन चुकी थीं। मैं चाहता हूं कि आप सब इस सत्य को भली-भांति आत्मसात कर लें।  

यह प्रमाणित सत्य है कि गांधी की योजना एकदम अलग थी। उच्च जातीय ब्राह्मणों की भांति वे भी सभी शूद्रों तथा अछूतों को, कुंओं और तालाबों से पानी लेने का समान अधिकार देने के पक्ष में नहीं थे। न ही वे अस्पृश्यों को उच्च जातियों की तरह मंदिर प्रवेश की अनुमति देने का समर्थन करते थे। सच तो यह है कि गांधी उच्च जातियों के विशेषाधिकारों को, आगे भी उन्हीं के अधीन रखने के पक्ष में थे। उन्होंने मनुस्मृति का समर्थन किया था। वे उच्च जातीय ब्राह्मणों तथा निम्न जातीय शूद्रों एवं अस्पृश्यों के लिए अलग-अलग मंदिर, तालाब, आवास तथा कुंए बनवाने के पक्ष में थे। यही गांधी की असली योजना थी।  मैं इसे जानता हूं। कोई मना करके दिखाए। आज गांधी के बारे में झूठा प्रचार किया जाता है। गांधीवाद और गांधी की जीवनशैली के बारे में तो बढ़-चढ़कर कहा गया है। 

मैं तमिलनाडु कांग्रेस समिति का सचिव था। अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की ओर से 48,000 रुपये की अनुदान राशि निचली जाति के शूद्रों यथा पारिया, चिक्कलीस, पल्लारों आदि के लिए अलग मंदिर और स्कूल बनवाने के लिए तमिलनाडु भेजी गई थी। इस बात का सख्त आदेश था कि ये अछूत लोग, उच्च जातिवाले हिंदुओं द्वारा विशेषरूप से इस्तेमाल किए जाने वाले स्थानों पर जाकर किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न न करें। 

उस समय तक जस्टिस पार्टी के नेता ऐसा आदेश लागू कर चुके थे, जो सभी वर्ग के विद्यार्थियों को, बगैर किसी जातीय पक्षपात के, सभी स्कूलों में अध्ययन करने का अधिकार देता था। उन्होंने सभी के एक साथ पढ़ने की व्यवस्था की थी। शिक्षा के क्षेत्र में जाति-आधारित प्रतिबंध बहुत पहले ही समाप्त किए जा चुके थे। इस सुधार को सख्ती से लागू किया गया था। ऐसा कानून बनाया गया था जो प्राइवेट स्कूलों को अपने यहां निश्चित अनुपात में शूद्र विद्यार्थियों को प्रवेश देने के लिए बाध्य करता था। ऐसा न करने पर स्कूल की सरकारी अनुदान की पात्रता समाप्त हो जाती थी।   

आदेश था कि निरीक्षण के समय अधिकारी स्कूल प्रशासन से पूछेंगे, ‘इस संस्था में कितने अछूत विद्यार्थी अध्ययन कर रहे हैं?’ यदि उत्तर नकारात्मक हो तो अधिकारी अगला सवाल करेगा, ‘क्यों?’ यदि कोई यह कहेगा कि संस्थान में प्रवेश के लिए किसी अछूत ने संपर्क नहीं किया है, तब अधिकारी कहेगा—‘तब तुम जाओ और कुछ अछूत विद्यार्थियों को अपने विद्यालय में भर्ती कराओ।’ मैं आपको उन व्यवस्थाओं के बारे में बता रहा हूं जो हमारे राज्य में, गांधी के आने से पहले ही लागू थीं। 

जिन दिनों तमिलवासी बहुत अधिक प्रगतिशील थे, आपके कन्याकुमारी जिले में स्थितियां बहुत खराब थीं। उच्च जाति वाले हिंदू निम्न जातीय अस्पृश्य हिंदुओं के अधिकारों को सह ही नहीं पाते थे। यहां तक कि उनकी छाया भी तथाकथित उच्चतम जाति के लोगों पर नहीं पड़ सकती थी।  यह आपके प्रांत की दर्दनाक त्रासदी थी। निचली जाति के शूद्रों को अपनी उपस्थिति और स्थान के बारे में, जहां वह छिपा होता था—दूर से ही चिल्लाकर बताना पड़ता था।  वे तो थिरु. नारायण सामी के अनथक और प्रशंसनीय प्रयास थे, जिससे शूद्रों में जागृति आई थी। वायकम आंदोलन के कारण हालात में बदलाव हुआ था। अछूतों को यहां काफी कुछ मिला है। यहां मौजूद युवा इन उपलब्धियों से अनजान हो सकते हैं। 

हमने छूआछूत के विरुद्ध, वायकम में हुए संघर्ष की कीमत चुकाई थी।  हम कई बार जेल भी गए थे। अनेक बार हमारी पिटाई हुई।  छूआछूत उन्मूलन के निमित्त हमारे बलिदानों के कारण हमें बदनाम भी किया गया।  

उन दिनों जेल में श्रेणियां नहीं होती थीं। उनके साथ बहुत बुरा वर्ताब होता था। अस्पृश्यता के कलंक को मिटाने के लिए वह सबकुछ हमने सहा; और आखिरकार परिवर्तन के वाहक बने। यह बदलाव कैसे संभव हुआ था? हमारी वर्तमान स्थिति क्या है? यदि आप इसपर विचार करेंगे, और सुधार की नई संभावना की तलाश करेंगे, तो आप निश्चित ही इस तथ्य को स्वीकार करेंगे कि जातिवाद तथा उसकी बुराइयों को मिटाने के लिए हमारी रफ्तार बहुत धीमी थी। हमें और अधिक ताकत, और तीव्र गति से आगे बढ़ना चाहिए। 

आपको वायकम आंदोलन के इतिहास की जानकारी होनी चाहिए। अत्यंत मामूली घटना वायकम आंदोलन की संवाहक बनी थी। 

कामरेड माधवन एक वकील थे। एक मुकदमे में उन्हें अपने मुव्वकिल की तरफ से माननीय न्यायाधीश के समक्ष पेश होना था। अदालत महाराजा त्रावणकोर के भवन परिसर में थी। उस समय महाराज के जन्मदिवस की तैयारियां चल रही थीं।  राजभवन का पूरा परिवेश ताड़ की पत्तियों द्वारा खूबसूरती के साथ आच्छादित था। ब्राह्मणों का मंत्रोच्चारण आरंभ हो चुका था। चूंकि कामरेड माधवन इझ़वा(नाडार) समुदाय से थे, इसलिए उन्हें भवन परिसर में प्रवेश करने या गुजरने; और अदालत पहुंचने की अनुमति नहीं मिली।  

उन्हीं दिनों जस्टिस पार्टी तमिलनाडु में जाति-प्रथा और छूआछूत उन्मूलन के लिए आंदोलन चला रही थी।  अंतर्जातीय विवाह के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया जा रहा था। स्कूलों को सभी जाति-वर्गों के लिए खोल दिया गया था। ‘अंतर्जातीय भोजन’ लोकप्रिय हो चुका था।  इस तरह के सुधारवादी कार्यक्रम जस्टिस पार्टी द्वारा पूरे तमिलनाडु में चलाए जा रहे थे। जब गांधी को जस्टिस पार्टी द्वारा तमिलनाडु में चलाए जा रहे कार्यक्रमों के बारे में पता चला, तब उन्होंने हमारी अन्य योजनाओं सहित उन कार्यक्रमों को भी अपने रचनात्मक आंदोलन में शामिल किया। 

उन दिनों जस्टिस पार्टी के कार्यक्रर्ताओं ने ब्राह्मणों के षड्यंत्रों को साहसपूर्वक उजागर किया था। परिणामस्वरूप वे सड़क पर अकेले चलते हुए भी घबराते थे। गैर-ब्राह्मण नेताओं जैसे कि डॉ. टी.  एम. नायर तथा सर पी. थियागराया ने शूद्रों और अस्पृश्यों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार हेतु लगातार, बड़े-बड़े कार्यक्रम चलाए, और राज्य में शक्तिशाली पदों पर आसीन हुए। ब्राह्मण जस्टिस पार्टी की सरकार के प्रति ज्यादा ईष्यालु थे। उन दिनों उनकी जमीन खिसकी हुई थी।  

उन दिनों ब्राह्मण धूर्ततापूर्वक एक ही बात बार-बार दोहराते थे—‘हम सत्ता के दलाल नहीं हैं’, ‘हम चुनावों का बहिष्कार करते हैं!’ इस तरह के झूठे और फरेबी नारों से वे लोगों को छलते रहे, निरंतर नई-नई साजिश रचते रहे। जस्टिस पार्टी की लोकप्रियता को देखते हुए गांधीजी ने छूआछूत की समस्या पर विचार करना आरंभ किया, क्योंकि तमिलनाडु में जस्टिस पार्टी को सत्ता से बाहर करने का वही एक तरीका था।  

उन दिनों मैं जस्टिस पार्टी के नेताओं से भली-भांति परिचित था।  अनेक पदों पर आसीन होने के कारण मेरे प्रति उनके मन में बड़ा सम्मान था। राजगोपालाचार्य मुझसे मिले थे और उन्होंने मुझे गांधी का अनुयायी बनने के लिए प्रवृत्त किया था। उनका कहना था कि गांधी अकेले अपरिहार्य सामाजिक सुधारों को आगे बढ़ाने में सक्षम हैं। मैंने इरोद नगर निगम से इस्तीफा दे दिया; और कांग्रेस में शामिल हो गया। कांग्रेस में मेरे प्रवेश से पहले किसी भी तमिलवासी को कांग्रेस पार्टी का सचिव या अध्यक्ष बनने का सम्मान नहीं मिला था।  तमिल कांग्रेस के इतिहास में मैं पहला तामिल था, जिसे तमिलनाडु कांग्रेस के इतिहास में इस पदों पर आसीन होने का अवसर मिला था। 

कामरेड टी. वी.  कल्याणसुंदरम्(थिरू वी. के.) स्कूल अध्यापक थे। डॉ.  पी.  वरदराजुलू(नायडू) ‘प्रापंच मित्रन’ के संपादक थे। बावजूद इसके ब्राह्मण उनपर विश्वास नहीं करते थे। कामरेड वी. ओ.  चिदंबरम(पिल्लई), अपने सभी संसाधनों को खर्च कर देने के बावजूद, कस्तूरी रंगा आयंगर पर आश्रित थे। 

इसलिए ब्राह्मणों ने उनका सम्मान नहीं करते थे।  वे मेरी उपेक्षा नहीं कर सकते थे, क्योंकि मैं पहले से ही बड़े पदों पर था और बड़े व्यापारिक समुदाय के बीच सम्मानित था। प्रत्येक मामले में, सभी तरह से राजगोपालाचार्य मुझपर भरोसा करते थे, और उनका मुझपर काफी विश्वास था। बदले में मैं भी उनपर विश्वास करता था और उस विश्वास की रक्षा को समर्पित था।  हम दोनों ने साथ-साथ काम किया था। मैंने एक सघन प्रचार कार्यक्रम चलाया था, परिणामस्वरूप ब्राह्मण एक बार पुनः सत्ता केंद्र पर लौट आए। अपने बुद्धिवादी विचारों की अभिव्यक्ति को लेकर मैं बहुत साहसी था। ईश्वर संबंधी अपने विचारों को मैंने खुलकर व्यक्त किया था, ‘यदि लोगों के स्पर्श मात्र से मूर्ति अपवित्र हो जाती है, तो ऐसी ईश्वर की हमें आवश्यकता नहीं है। ऐसी मूर्ति के टुकड़े-टुकड़े करके उसका इस्तेमाल अच्छी सड़कें बनाने के लिए किया जाना चाहिए।  नहीं तो उन्हें नदी किनारे रख देना चाहिए, जहां वे कपड़े धोने के काम आ सकें। मुझे प्रायः ब्राह्मणों द्वारा ही बोलने के लिए खड़ा किया जाता था, चूंकि मैं किसी शक्तिशाली पद या प्रतिष्ठा की दौड़ में नहीं था, ब्राह्मण उस समय चुप्पी साध लेते थे। 

ईश्वर, धर्म और जाति के बारे में मैं आज जो भी कहता हूं, ठीक वही मैं उन दिनों भी कहा करता था। मेरे भाषणों को सुनने के बाद राजगोपालाचार्य प्रायः मुझसे कहा कहते थे कि मैं बहुत सख्त भाषा का इस्तेमाल किया है। उत्तर में मैं उनसे अकसर यही कहता था कि जब तक लोग मूर्ख बने रहेंगे, तब तक आसान शब्दों में अपनी बात रखने का कोई औचित्य नहीं है।  मेरी बात सुनकर वे बस मुस्कुरा देते थे। इस तरह, हमने ब्राह्मणों के सत्ता केंद्रों पर आसीन होने की राह आसान की थी। 

एडवोकेट माधवन को अदालत जाते समय रोकने के बाद से ही इझ़वा समुदाय के नेता उसके विरुद्ध आंदोलन करना चाहते थे। केरल कांग्रेस समिति के अध्यक्ष के.  पी.  केशवमेनन, टी.  के.  महादेवन तथा दूसरे नेताओं ने मोर्चा संभाला। उन्होंने राजभवन में होने पूजा-पाठ के दिन विरोध प्रदर्शन की शुरुआत का निर्णय लिया। सर्वाधिक उपयुक्त स्थान के रूप में उन्होंने वायकम को चुना।  केवल वायकम ही ऐसा स्थान था, जहां चार प्रवेश-द्वारों वाला मंदिर था। चारों दरवाजों से एक-एक सड़क गुजरती थी। विरोध प्रदर्शन के लिए वह सर्वोपयुक्त स्थान था। इसलिए सत्याग्रह के निमित्त उन्होंने वायकम को चुना था।  

नियम यह था कि निम्न जाति के अछूत जैसे कि ‘’अवर्णस्थानांस’ तथा ‘अयीतक कर्णस’ उन सड़कों पर प्रवेश नहीं करेंगे। यदि कोई अछूत मंदिर की दूसरी दिशा में जाना चाहे तो उसे मंदिर से 400 से 600 मीटर की दूरी बनाकर चलना पड़ता था। इस तरह उसे डेढ़ किलोमीटर से अधिक रास्ता और तय करना पड़ता था। यहाँ तक कि ‘असारियों’, ‘वनियारों’ तथा जुलाहों को भी मंदिर के चारों ओर बनी सड़कों पर चलने की पाबंदी थी। दूसरे मंदिरों विशेषकर शचींद्रम पर भी यही नियम लागू था।  इस कानून का पालन पूरी शक्ति के साथ किया जाता  था।  

प्रमुख सरकारी कार्यालय, अदालत, पुलिस स्टेशन आदि वायकम मंदिर की दूसरी दिशा में, उसके प्रवेश द्वार के निकट थे। यहां तक कि सरकारी कर्मचारियों के स्थानांतरण के समय भी ध्यान रखा जाता था कि कोई अछूत कर्मचारी वहां स्थानांरित नहीं किया जाएगा, क्योंकि उन्हें मंदिर के आसपास बने रास्तों से गुजरने की अनुमति प्राप्त न थी।  यहां तक कि मजदूरों का दुकानों तक जाने के लिए भी, उन सड़कों से होकर गुजरना निषिद्ध था। 

जैसे ही वायकम सत्याग्रह आरंभ हुआ, राजा ने 19 नेताओं जिनमें एडवोकेट माधवन, बैरिस्टर केशव मेनन, टी. के. महादेवन, जार्ज जोसेफ आदि शामिल थे—को गिरफ्तार करने का आदेश सुना दिया। उन्हें विशिष्ट कैदी के रूप में रखा गया था। उन दिनों अंग्रेज अधिकारी पिट, पुलिस महानिदेशक के पद पर राजा के अधीन कार्यरत थे। उन्होंने आंदोलनकारियों से जुड़े मामलों को भली-भांति संभाल लिया था। 19 आंदोलनकारियों के जेल जाते ही वायकम आंदोलन पटरी से उतर चुका था। उन्हीं दिनों मुझे केशव मेनन तथा बैरिस्टर जार्ज जोसेफ की ओर से एक पत्र प्राप्त हुआ। 

‘आपको यहां आकर आंदोलन को नवजीवन देना चाहिए। अन्यथा हमारे पास राजा के सामने आत्मसमर्पण कर, उनसे क्षमा-याचना करने के अलावा दूसरा कोई उपाय न होगा। उस अवस्था में हमारा तो कोई नुकसान न होगा, परंतु एक महान कार्य अधूरा रह जाएगा। असल में वही हमारी चिंता का कारण है। इसलिए आप कृपया तत्काल पहुंचें और आंदोलन की जिम्मेदारी संभालें।’

यही बातें उन्होंने अपने पत्र में लिखीं थीं। उन्होंने मुझे स्वयं चुना था और मुझे पत्र लिखा था, क्योंकि उन दिनों मैं मुखर होकर छूआछूत के कलंक पर लगातार हमले कर रहा था। इसके अलावा न केवल उग्र प्रचारक अपितु सफल आंदोलनकारी के रूप में भी मैं जाना-पहचाना और स्थापित नाम था।  जब उन्होंने पत्र भेजा, मैं यात्रा पर निकला हुआ था।  पत्र इरोद से पुन:प्रेषित होकर मुझे मदुरै जिला के पन्नईपुरम स्थान पर प्राप्त हुआ। पत्र मिलते ही मैं वायकम जाने के लिए आगे की यात्रा स्थगित कर इरोद के लिए दौड़ा। एक पत्र लिखकर मैंने राजगोपालाचार्य से अनुरोध किया कि वे मेरे स्थान पर तमिलनाडु कांग्रेस के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाल  लें। अपने पत्र में मैंने वायकम सत्याग्रह की महत्ता के बारे में बताया था। मेरे लिए वह अच्छा अवसर था। इसलिए मैं उसे छोड़ना नहीं चाहता था। मैंने अपने दो साथियों के साथ वायकम के लिए प्रस्थान कर दिया। 

किसी तरह यह बात फैल गई कि मैं वायकम आंदोलन का नेतृत्व करने  के लिए आ रहा हूं। जब में नाव के रास्ते वायकम पहुंचा, पुलिस कमिश्नर और तहसीलदार ने हमारा स्वागत किया। 

हमें बताया गया कि राजा ने उन्हें हमारा स्वागत करने तथा हमारे ठहरने का प्रबंध करने का आदेश दिया है। मैं सचमुच बेहद अचंभित था। राजा मुझपर अत्यंत मेहरबान थे, क्योंकि जब भी उन्हें दिल्ली जाना होता था, वे इरोद में हमारे ही बंगले में ठहरते, जबकि उनके कर्मचारी हमारी सराय में आश्रय पाते थे। रेलगाड़ी पर सवार होने से पहले, जब तक वे इरोद में रहते, तब तक राजा तथा उनके कर्मचारियों का भरपूर स्वागत किया जाता था। वायकम में मुझे अप्रत्याशित आदर-सत्कार मिलने के पीछे यह कारण भी हो सकता था। जब वायकम के निवासियों को मेरे और राजा के संबंधों के बारे में पता चला, वे सभी अत्यंत प्रसन्न हुए।  

बावजूद इसके कि राजा ने मेरे साथ मेहमानों जैसा व्यवहार किया था, मैंने वायकम आंदोलन के समर्थन में अनेक सभाओं में हिस्सा लिया। मैंने छूआछूत जैसी घृणित प्रवृत्ति कि आलोचना की। मैंने कहा कि ऐसे  ईश्वर को जिसे लगता है कि वह अछूतों के स्पर्श-मात्र से अपवित्र हो जाएगा—मंदिर में रहने का अधिकार नहीं है। ऐसी मूर्ति को तुरंत हटा देना चाहिए और उसका इस्तेमाल कपड़े धोने के लिए किया जाना चाहिए। मेरे प्रचार के फलस्वरूप रोज नए-नए लोग आंदोलन से जुड़ने की इच्छा जताने लगे। प्रतिदिन नए-नए लोग आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए अलग-अलग स्थानों से आने लगे। उससे राजा की परेशानी बढ़ने लगी।  बावजूद इसके वह पांच-छह दिन शांत रहा।  मेरे भाषण को लेकर कई लोगों ने उससे शिकायत की। राजा मेरी और अधिक उपेक्षा नहीं कर सकता था। इसलिए, दस दिन के बाद उसने पुलिस अधिकारी को दंड संहिता की धारा 26 को, जो आज की धारा 144 जैसी ही थी, लागू करने की अनुमति दे दी।  

मेरे पास उस प्रतिबंध के उल्लंघन के अलावा अन्य कोई रास्ता नहीं था। तदनुसार मैंने प्रतिबंध का उल्लंघन कर, एक सभा को संबोधित किया। परिणामत: मुझे गिरफ्तार कर लिया गया। मेरे साथ मि. अय्युमुथु ने भी प्रतिबंध का उल्लंघन किया था। उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। हम सभी को एक महीने के कड़े दंड के साथ कारावास भेज दिया गया।  मुझे अरुविक्कुथ जेल में रखा गया। मेरे जेल चले जाने के बाद मेरी पत्नी नागम्मई, बहन एस. आर. कन्नमल तथा दूसरों ने मिलकर राज्य-भर में आंदोलन किया। जैसे ही मैं जेल से बाहर आया, एक बार फिर आंदोलन में कूद पड़ा। 

जब मैं जेल में था, आंदोलन में यकायक तेजी आ गई। अनेक लोगों ने अदालत से उन्हें जेल भेजने की फरियाद की। प्रचार-प्रसार में तेजी ने भी लोगों को वायकम सत्याग्रह में उतरने के लिए उत्साहित किया। दुश्मन उपद्रवों और गुंडागर्दी पर उतर आए थे। उपद्रवी तत्वों ने अफवाह फैलाकर हमारे आंदोलन को ठप्प कर देने के लिए अनेक चालें चलीं। उनके गंदे मनसूबों और कोशिशों का अंत नाकामी के रूप में सामने आया। यही नहीं जो लोग विदेशों में थे, उन्हें भी देश में जाति के नाम पर हो रहे दमन और अत्याचारों की जानकारी मिल गई। वे स्वेच्छापूर्वक दान देने लगे। प्रतिदिन ढेर सारे मनीआर्डर आने लगे। आंदोलनकारी स्वयंसेवकों के लिए बड़ा पंडाल बनवाया गया था। प्रतिदिन 300 से अधिक लोगों को भोजन खिलाया जाता था। अनेक किसान और प्रतिदिन सब्जियां और नारियल भेजते थे।  उन्हें एक साथ, एक साथ ढेर लगाकर रख दिया गया था। देखने में वह छोटी पहाड़ी जैसा नजर आता था।  पूरा स्थल वैवाहिक पंडाल जैसा दिखता था। 

उसी समय राजगोपालाचार्य ने मुझे एक पत्र लिखा।  आप हमारे देश को छोड़कर दूसरे राज्य में परेशानी खड़ी क्यों कर रहे हैं? आपके लिए इस तरह करना अनुचित है।  कृपया उसे छोड़कर, मुझसे अपना पद-भार वापस लेने के लिए तुरंत यहां पहुंचें। उस पत्र में यही बातें लिखी थीं। श्रीनिवास अय्यंगर मुझसे मिलने के लिए तमिलनाडु से आए थे। उन्होंने भी मुझसे वही सलाह दी जो राजगोपालाचार्य ने अपने पत्र में लिखी थीं। उस समय तक 1000 स्वयंसेवक वायकम आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए तैयार हो चुके थे। प्रतिदिन जगह-जगह बड़े-बड़े जुलूस, भजन-कीर्तन आदि होते थे।  आंदोलन गति पकड़ चुका था। 

समाचार पंजाब तक पहुंचा। वहां स्वामी श्रद्धानंद ने एक अपील की। उन्होंने लगभग 30 पंजाबियों को वायकम भेजा। उन्होंने आंदोलन के लिए 2000 रुपये की सहायता राशि का प्रस्ताव भेजा, साथ ही आंदोलन में हिस्सा ले रहे स्वयंसेवकों के भोजन के खर्च को वहन करने की सहमति जताई। यह देखकर ब्राह्मणों ने गांधी को लिखा। उन्होंने आरोप लगाया कि सिख हिंदुत्व के विरुद्ध युद्ध भड़का रहे हैं। गांधी के विचार भी सामने आए। उन्होंने कहा था कि मुस्लिम, सिख, ईसाई और बाकी लोग जो हिंदू नहीं हैं—वे आंदोलन में हिस्सा नहीं ले सकते। उनकी अपील के बाद मुस्लिम, ईसाई और सिखों ने खुद को आंदोलन से अलग कर लिया। राजगोपालाचार्य ने जोसफ जार्ज के नाम एक और पत्र भेजा। उसमें लिखा था कि उनके लिए हिंदुत्व से जुड़े मामले में हस्तक्षेप करना गलत है। लेकिन जोसेफ जार्ज ने राजगोपालाचार्य की सलाह पर कोई ध्यान नहीं दिया। जवाब में उन्होंने लिखा कि वे कांग्रेस से निष्कासन के लिए तैयार थे। उन्होंने जोरदार शब्दों में लिखा कि वे अपना आत्मसम्मान नहीं गंवाएंगे।  मिस्टर सेन, डाॅ. एम. ई. नायडु तथा दूसरे नेता  आंदोलनकारियों के साथ मजबूती से खड़े थे। लेकिन कुछ लोगों को भय था कि गांधी आंदोलन की निंदा करते हुए उसे मिल रहे दान, सहायता आदि पर रोक के लिए लिखेंगे। लेकिन उसी समय स्वामी श्रद्धानंद वायकम पहुंचे और उन्होंने वित्तीय सहायता का आश्वासन दिया।  

वायकम आंदोलन गांधी के विरोध के बावजूद शुरू किया गया था।  मुझे दुबारा गिरफ्तार करके छह महीने की सजा के लिए जेल भेज दिया गया था। कुछ नंबूदरी ब्राह्मणों तथा कट्टरपंथी हिंदुओं ने एकजुट होकर वायकम आंदोलन के विरोध करने की योजना बनाई। जिसे उन्होंने ‘शत्रु समाहार यज्ञ’(शत्रु मर्दन यज्ञ) का नाम दिया। काफी धनराशि खर्च करके उन्होंने यज्ञ किया। उसके बारे में मैंने कारावास में सुना। एक रात को अचानक मैंने गोलियों की आवाज सुनी। मैंने पहरा दे रहे सिपाही से पूछा, क्या जेल के निकट कोई उत्सव मनाया जा रहा है? उसने बताया कि राजा का निधन हो चुका है और उससे हुई हानि को दर्शाने के लिए बंदूकों की सलामी दी जा रही है। जब मुझे पता चला कि राजा का निधन हो चुका है, मेरा हृदय विषाद से भर गया। बाद में मुझे यह सोचकर प्रसन्नता हुई कि ब्राह्मणों और कट्टरपंथीं हिंदुओं द्वारा अपने दुश्मनों को नष्ट करने के लिए की गई प्रार्थना का असर महाराज की मृत्यु के रूप में सामने आया है। उनकी प्रार्थना ने वायकम आंदोलनकारियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है।  लोग भी खुश थे। उसके बाद, महाराजा के दाह-संस्कार के दिन हम सभी को रिहा कर दिया गया। हमारे दुश्मनों की चाल-ढाल और भाषा भी बदल गई। 

बाद में, महारानी ने आपसी बातचीत से समस्या का समाधान करने की इच्छा व्यक्त की।  वे समस्या पर मेरे साथ बातचीत करना चाहती थीं। लेकिन राज्य का दीवान, जो जाति से ब्राह्मण था—हमारी बातचीत के बीच में बाधक बन गया। बोला कि महारानी मुझसे सीधे बातचीत नहीं करेंगी। इसलिए उसने राजगोपालाचार्य को पत्र लिखा। राजाजी जानते थे कि प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा मेरे पक्ष में हैं, अतएव उसका श्रेय भी मुझी को प्राप्त होगा। इसलिए उन्होंने कपटपूर्ण ढंग से तय किया कि महारानी गांधी से बातचीत करेंगी। राजाजी की प्रपंच का ही परिणाम था कि गांधी का नाम वायकम सत्याग्रह के इतिहास में घसीट लिया गया। वायकम आंदोलन का श्रेय और प्रतिष्ठा किसे प्राप्त होती है, व्यक्तिगत रूप से मुझे इसकी चिंता नहीं थी। मैं निजी प्रशस्ति के लिए आंदोलन से नहीं जुड़ा था। मेरा एकमात्र उद्देश्य समस्या का सफल समाधान था।  

गांधी आए और उन्होंने महारानी से बातचीत भी की। महारानी निचली जाति के शूद्रों और अछूतों के लिए सभी मार्ग खोल देने को तैयार थीं। लेकिन, उन्होंने अपने डर के बारे में बताया। उन्हें लगता था कि मैं अछूतों के मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर आंदोलन को उसके बाद भी जारी रख सकता हूं। गांधी यात्री-भवन में पहुंचे, जहां मैं ठहरा हुआ था। उन्होंने मेरी राय जाननी चाही। मैंने कहा, ‘क्या अछूतों को सार्वजनिक मार्गों पर चलने का अधिकार प्राप्त होना बड़ी उपलब्धि नहीं है! यूं भी, क्या मंदिर प्रवेश कांग्रेस के आदर्शों में से एक नहीं है। जहां तक मेरी बात है, यह मेरे प्रमुख सरोकारों में से एक है। लेकिन, आप महारानी को खबर कर सकते हैं कि फिलहाल मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर आंदोलन खड़ा करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। मैं आगे क्या करूंगा, इसे तय करने से पहले माहौल शांत होने दीजिए। 

गांधी ने रानी को सूचना दी और उन्होंने मंदिर के चारों ओर बनी सड़कों के चलने का अधिकार, सभी वर्गों के लिए बहाल कर दिया। इस तरह निचली जाति के शूद्रों और अस्पृश्यों को, उच्च जातीय ब्राह्मणों और कट्टरपंथी हिंदुओं की तरह, सार्वजनिक मार्गों पर चलने के अधिकार की प्राप्ति हुई।  

मैं कुछ समय के लिए इरोद में देवस्थान समिति का अध्यक्ष था। जब मैं बाहर गया हुआ था, कामरेड एस. गुरुस्वामी, पोन्नंबलन तथा ईश्वरन ने मेरे कार्यालय में, दो आदि-द्रविड़ों को अपने माथे पर पवित्र राख(विभूति) मलने के लिए उकसाया। उसके बाद वे उन्हें मंदिर के भीतर ले गए। उन्हें देखते ही ब्राह्मण जोर-जोर से चिल्लाने लगे कि उन्होंने देवस्थान को अपवित्र कर दिया है। मजदूरों को वहीं बंद कर, उनके ऊपर मुकदमा दायर कर दिया गया। जिला न्यायालय में उन्हें दंडित किया गया। लेकिन एक अपील पर सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने उन्हें निर्दोष मानकर रिहा कर दिया। यह सब ब्रिटिश शासन के दौरान हुआ था।  

सुचिंद्रम(कन्याकुमारी, केरल) पहला स्थान था, जहां मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर पहला सार्वजनिक आंदोलन चलाया गया था। स्वाभिमान सम्मेलन का आयोजन भी मेरी अध्यक्षता में किया गया था। उसमें अनेक प्रस्ताव स्वीकृत किए गए थे, जिनमें जाति उन्मूलन तथा अस्पृश्यों के मंदिर प्रवेश के अधिकार को सुनिश्चित करने की मांग की गई थी।  

स्वाभिमान आंदोलन की अगली सभा का आयोजन इर्नाकुलम में हुआ था। उस सम्मेलन में जाति प्रथा की निंदा करते हुए हिंदुओं को सुझाव दिया गया था कि वे मुसलमान बन जाएं, क्योंकि इस्लाम में कोई जातिभेद नहीं है। कुछ और लोगों ने संशोधन प्रस्ताव के माध्यम से ईसाई बनने का सुझाव दिया था। अंत में लोगों को दोनों धर्मों में से किसी एक को अपनाने का विकल्प दिया गया।  

एक दिन लगभग 50 हिंदुओं(जो जाति से पुलायार थे) ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। यह सिलसिला  आगे बढ़ता गया, उसने रूढ़िवादी हिंदुओं और ब्राह्मणों को बुरी तरह डरा दिया था। 

एक दिन, अल्लेपी में इस्लाम अपना चुका एक व्यक्ति(जो पहले जाति से पुलायार था) नायर की दुकान से कुछ सामान खरीदने गया। वहां उसकी पिटाई कर दी गई। उस घटना की परिणति हिंदुओं और मुसलमानों के बीच बड़े टकराव के रूप में सामने आई। हिंदू-मुस्लिम दंगे हर जगह फैल गए। तत्कालीन दीवान, सर सी. आर. रामासामी अय्यर जो ब्राह्मण थे, ने उस  टकराव को बलपूर्वक दबा दिया था। बाद में राजा को बताया गया कि अधिकांश निचली जाति के अस्पृश्य हिंदू जैसे इझ़वा, पुलायार आदि मुसलमान बन रहे हैं। उन्हें यह सलाह भी दी गई कि इस भगदड़ से हिंदुत्व को बचाने का एकमात्र उपाय है कि सभी मंदिरों को अस्पृश्यों के प्रवेश के लिए खोल दिया जाए। उस दिन ब्राह्मण राजा की दीर्घायु के लिए यज्ञ कर रहे थे। उन दिनों यह परंपरा थी कि राजा अपने जन्मदिवस पर प्रजा के लिए कोई अच्छी घोषणा करता था। सो राजा ने अच्छे अवसर पर एक अच्छी घोषणा करने का निश्चय किया। उसने ऐलान किया कि उसके जन्मदिवस के अवसर पर सभी मंदिर सभी के लिए खोल दिए जाएंगे, जिनमें निचली जाति के हिंदू और अछूत भी शामिल हैं। संघर्ष का ऐसा ही इतिहास रहा है। इस तरह अछूतों को मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार प्राप्त हुआ। 

इतना सब हो जाने के बाद ही राजगोपालाचार्य और गांधी सामने आए और मंदिर प्रवेश के पक्ष में बयान दिया। यह कहना एकदम बकवास है कि ये बदलाव गांधी के कारण संभव हो पाए थे। सच तो यह है कि अछूतों के भले के लिए अणुमात्र काम भी गांधी ने नहीं किया। ये सब बातें आपको डाॅ. आंबेडकर द्वारा लिखित पुस्तक ‘कांग्रेस और गांधी ने अस्पृश्यों के लिए क्या किया है’ पढ़ने से ज्ञात हो जाएंगी।  

जिन दिनों में तमिलनाडु कांग्रेस का सचिव था, पार्टी फंड द्वारा चेरंमादेवी में गुरुकुलम(नि:शुल्क छात्रावास) का संचालन किया जाता था। सचिव के रूप में मैंने 10000 रुपये देने की अनुमति दी, और बतौर पहली किश्त 5000 रुपये का भुगतान भी कर दिया गया।  गुरुकुलम को चलाने की जिम्मेदारी वी. वी. एस.  अय्यर नामक एक ब्राह्मण की थी। उस गुरुकुलम में ब्राह्मण विद्यार्थियों की विशेष देखभाल की जाती थी। उन्हें अलग भोजन दिया जाता था। जबकि गैर-ब्राह्मण बच्चों को बाहर भोजन कराया जाता था। ब्राह्मण विद्यार्थियों को ‘उप्पम’ परोसा जाता था, जबकि अब्राह्मण बच्चों को केवल दलिया से संतोष करना पड़ता था। ये बातें मुझे ओमनदुर रामासामी रेडियार(मद्रास प्रांत के भूतपूर्व मुख्यमंत्री) के बेटे ने रोते-रोते बताई थीं।  मैंने राजगोपालाचार्य से इसकी शिकायत की। जब उन्होंने वी. वी. एस. अय्यर से मामले की तहकीकात की तो उसने आरोपों से न तो इन्कार किया, न ही खेद व्यक्त किया। बल्कि दृढ़ स्वर में सभी के साथ एक समान व्यवहार करने से इन्कार कर दिया। उसने कहा कि गुरुकुलम के आसपास कट्टरपंथी लोग रहते हैं, इसलिए वह कुछ नहीं कर सकता। इसपर मैंने कहा कि मैं बाकी 5000 तभी दूंगा जब गुरुकुलम में सुधार हो जाएगा। वह जंगली की तरह व्यवहार करने लगा। उसने रूखे शब्दों में मुझसे कहा, ‘क्या यही तुम्हारी राष्ट्रसेवा है?’ इस गंभीर मामले ने ही मुझे गैर-ब्राह्मणों(तमिलों) के लिए अलग से दल बनाने के लिए प्रोत्साहित किया था। 

इन दिनों भी आप देख सकते हैं कि कांग्रेस की सभाओं में केवल ब्राह्मणों को भोजन बनाने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है। जबकि उन्हीं दिनों जस्टिस पार्टी और स्वाभिमान आंदोलन के सम्मेलनों के लिए विरुदुनगर के नाडारों को भोजन बनाने के लिए नियुक्त किया गया था। 

मैं इन पुराने प्रसंगों को क्यों याद कर रहा हूं? आपको पता होना चाहिए कि जब तक हम इस तरह से आंदोलन नहीं करेंगे, तब तक हम समाज में व्याप्त असमानता को मिटाकर, उसे प्रगतिशील नहीं बना सकते।  

इसके अलावा, आप सभी को यह पता होना चाहिए कि किसी भी सामाजिक सुधार का श्रेय न तो कांग्रेस को जाता है, न ही गांधी को उसके लिए जिम्मेदार माना जाना चाहिए, हमारे पास इसके साक्ष्य हैं।  

आज भी, ‘द्रविड़यार कझ़गम’ के केवल हम ही वे लोग हैं जो सिर उठाकर पूछते हैं कि जब मेहनतकश किसानों और मजदूरों को निम्न जाति का समझा जाता है, तो आलसी ब्राह्मणों को ऊंची जाति का क्यों समझा जाना चाहिए। हमें ऐसे ईश्वर की आवश्यकता क्यों है जो शूद्रों की अवमानना करता है?

फिलहाल उन्होंने संविधान में जातिवाद के बचाव हेतु सभी सुरक्षा-उपाय कर लिए हैं। एक ब्राह्मण में इतना साहस है वह कहीं से भी यहां आता है और धृष्टतापूर्वक कुछ भी बोलकर, धमकी देकर चला जाता है। क्यों? इसलिए कि उनके हाथ में ताकत है।  

वे कहते हैं कि हम दब्बू रहकर सदैव शूद्र की तरह पेश आएं।  वे हमें जेल का डर दिखाकर आतंकित करते हैं। क्या किसी में उनसे सवाल करने की हिम्मत थी?

केवल हम वे लोग हैं निडर, निष्कपट और निर्बंध थे।  

यदि हमें हिंदुत्व हमें शूद्र मानता है तो सिवाय इसके कि हम हिंदू धर्म को ही नष्ट कर दें, दूसरा उपाय क्या है? हमारा ‘द्रविड़यार कझ़गम’ राजनीतिक संगठन नहीं है।  हम चुनावों में हिस्सा नहीं लेते।  हमें आपके मतों की आवश्यकता नहीं है। हम शासक वर्ग भी नहीं है। दूसरों को कुदाल को कुदाल कहने में संकोच हो सकता है? सत्ता चाहने वाले लोग निर्दोष मतदाताओं की चापलूसी कर सकते हैं। अपने स्वार्थ के लिए वे आपकी आंखों में धूल झोंक सकते हैं। किसी ताकत या पद-प्रतिष्ठा के लिए गांधी के नाम को बीच में घसीटकर मैं आपको धोखा नहीं दे सकता। मैं उस घृणित, निश्रेयस जीवन के लिए नहीं बना हूं। 

हमने अपने जीवन निर्वाह के लिए सार्वजनिक जीवन को पेशा या व्यापार नहीं बनाया है। फिर किसलिए, सोचो? आपके भीतर स्वाभिमान की भावना जगाने के लिए हम अपना भोजन खाते हैं, समय खर्च करते हैं, अपनी ऊर्जा खपाते हैं, क्यों?

1938 तक आपने देखा कि पूरी दुनिया में ज्ञान का बोलबाला था। परंतु यहां हम आज भी बर्बर लोगों की तरह हैं। हमारा ईश्वर, धर्म और धर्मशास्त्र हमें कूपमंडूकता से बाहर नहीं आने देते। सरकार स्वयं अविवेकी और असभ्य लोगों के हाथों में है। हमारे सिवाय किसी में भी सवाल उठाने हिम्मत नहीं है।  

ब्राह्मणों ने हमें वेश्यावृति द्वारा उत्पन्न संतान कहा था।  हमारी संतान को वेश्याओं की संतान क्यों कहा जाना चाहिए? इस अपमान के बारे में कोई नहीं सोचता। जो लोग राजनीति में सक्रिय हैं, इसकी परवाह नहीं करते। आंख मूंदकर वे वही सब करते और कहते हैं, जो ब्राह्मण उनसे कहते हैं। 

जब मैं वायकम सत्याग्रह का नेतृत्व कर रहा था, नीलांबन जमींदार के पुत्र, सेतुकुट्टी अकसर मुझसे मिलने और विचार-विमर्श के लिए आया करते थे। वे मुझे ‘नायकर सामी’ संबोधित करते थे। केवल यही नहीं, वे अपनी जाति को ऊंचा बताया करते थे, क्योंकि उनका जन्म नंबूदरी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे अकसर कहा करते थे कि मैं उन्हें नायर के जन्मा हुआ न समझ बैठूं। जबकि वे बीए तक पढ़े स्नातक थे। हमारे लोगों में इस मानसिकता की निंदा करने वाला कौन है?

पल-भर के लिए सोचिए कि इन अझ़वारों ने क्या किया था। उन्होंने अपनी पत्नियों से वेश्यावृति कराकर मोक्ष की कामना की थी। यह ‘भक्त विजयम’ पुराण में बताया गया है। 

एक शूद्र जो जाति से अझ़वार था, उसे अपनी पत्नी को वेश्यावृत्ति के पेशे की ओर प्रवृत्त होने की अनुमति देने के बाद स्वर्ग मिला था। नयांमारों ने अपनी पत्नियां ब्राह्मणों को भेंट की थीं। इन दिनों भी कट्टरपंथी लोग, बगैर किसी शर्म अथवा स्वाभिमान के, इन बातों का प्रचार-प्रसार करते हैं। जब मैं इन बातों की ओर इशारा करता हूं, तो मुझपर पुराणों(धर्मशास्त्रों) को ध्वस्त करने वाली बातें करने का आरोप लगाया जाता है। इनपर दूसरा कौन साहसपूर्वक बोलता है? इन पुराणों ने हमारी नैतिकता को नष्ट किया है। इसके अलावा हम और क्या कह सकते हैं?

इसके अतिरिक्त ब्राह्मण सरकारी पदों से भी चिपके हुए हैं। ब्रिटिश शासन से मुक्त होने के पश्चात समस्त शक्तियां ब्राह्मणों के हाथों में जा चुकी हैं। मैं इसके लिए गांधी को दोषी ठहराता हूं। हमें अनंतकाल तक शूद्र बनाए रखने के लिए बड़ी साजिश रची गई थी। आज(1958) सारी शक्तियां उनके अधीन हैं।  आज देश का राष्ट्रपति ब्राह्मण है। उपराष्ट्रपति ब्राह्मण है।  प्रधानमंत्री ब्राह्मण है। उपप्रधानमंत्री भी ब्राह्मण है।1 संसद का सभापति भी ब्राह्मण है। यह देखते हुए जब हम जाति-उन्मूलन के लिए गुहार लगाते हैं, तो वे हमे दोषी ठहराकर तीन वर्ष के लिए कारावास में भेज देते हैं। इन सबके लिए कौन चिंतातुर है? सार्वजनिक जीवन के अधिकांश शिखर व्यक्तित्व सरकार, जातिवाद, धर्मशास्त्रों, पुराणों, धर्म और ईश्वर की रक्षा करना चाहते हैं। वे जानते हैं कि अस्तित्व-रक्षा के लिए, उनके पास इसके अलावा  कोई और रास्ता नहीं है। 

कोई भी व्यक्ति जो वोट और भ्रष्टाचार के सहारे जिंदा है, वह धर्म, ईश्वर, सरकार और जाति के नाम पर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध आवाज नहीं उठाएगा। 

अंग्रेज हमें कम से कम बराबर अधिकार तो देते थे। आज सरकार ब्राह्मणों के हाथों में है, जो हमें वेश्या की संतान(शूद्र) कहते हैं। यही कारण है कि वे संवैधानिक व्यवस्था में भी स्वयं को आसानी से सुरक्षित पाते हैं। कानून के अनुसार वे लोग जो जाति को मिटाने की मांग करते हैं, उन्हें तीन वर्ष की सजा काटने के लिए तैयार रहना चाहिए। 

जातिप्रथा लाइलाज बीमारी है, जो हमारे समाज को शताब्दियों से खाए जा रही है। जिन दवाइयों का इस्तेमाल हम खाज-खुजली के इलाज के लिए करते हैं, उनसे केंसर का इलाज नहीं किया जा सकता। हमें शरीर का आपरेशन कर, उससे केंसर-प्रभावित हिस्से को अलग करना होगा। भिन्न बीमारियों के लिए इलाज भी अलग-अलग तरीके से होगा। हिंदू विधान के अनुसार हम 3000 वर्षों से अधिक से शूद्र हैं। 3000 वर्षों से हम वेश्या की संतान कहलाते आए हैं। हमारा संविधान इस बुराई को भरपूर संरक्षण देता है। 

हमें इस बुराई को जड़ से खत्म कर देना चाहिए। हमें इस उपहासजन्य स्थिति से बाहर निकाल आना चाहिए। यह सचमुच कठिनतम कार्य है। जब तक आप इसकी जड़ों पर उबलता हुआ पानी नहीं डालेंगे, तब तक इसका मिटना नामुमकिन है। सख्त कदम उठाए बिना हम जाति को नहीं मिटा सकते।  

न केवल तमिलनाडु, अपितु पूरे भारतवर्ष में और कोई ताकत नहीं है, जो हमारे बराबर हिम्मत जुटाकर अपनी आवाज बुलंद कर सके। जो लोग सत्ता के लालची हैं, वे कभी उसके विरोध का सपना नहीं देखेंगे। केवल वही लोग जो निःस्वार्थ और समर्पण भावना से जनता की सेवा में लगे हैं, अपने जीवन को जाति-व्यवस्था के उन्मूलन के लिए भी, दाव पर लगा सकते हैं। जो लोग विधायिकाओं में पहुंचे हैं, उन्होंने अभी तक क्या किया है? वे कुछ भी नहीं कर सकते? हम मामूली संदेश भेजकर भी जवाब प्राप्त कर सकते हैं।  बावजूद इसके हम तैयार नहीं हैं। 

कुछ दिन पहले नेहरू ने विधानसभाओं तथा दूसरे निर्वाचित संस्थानों पर एक दुखद टिप्पणी की थी। यहां तक कि उन्होंने धमकी दी थी कि वे रिटायर होकर संन्यास ग्रहण कर लेंगे। क्या हुआ? उन्होंने चुपचाप अपनी सारी टिप्पणियां पचा लीं और सत्ता से चिपके हुए हैं। यह महज लोकप्रियता हासिल करने के लिए पुरानी गांधीवादी चाल का प्रदर्शन था। हमारे साथ रहे ‘द्रविड़ मुनेत्र कझ़गम पार्टी के नेताओं ने भी, जब तक वे ‘द्रविड़यार कझ़गम’ में थे, विधानमंडलों में प्रवेश की निंदा की थी। यहां तक कि उन्होंने निर्वाचित प्रतिनिधियों और संस्थाओं पर हमला करने वाले लेख भी लिखे थे। बल्कि नेहरू और राजेंद्र प्रसाद ने तो विधायिकाओं के विरुद्ध बोला भी था। लेकिन आज उनके लिए वहां संभावनाएं हैं, इसलिए वे उनमें प्रवेश के अत्यंत इच्छुक हैं। वे अपने अतीत को भूल चुके हैं। अब वे साम-दाम-दंड-भेद द्वारा विधायिकाओं की शोभा बनना चाहते हैं। इसके लिए वे आंतरिक तोड़फोड़ से लेकर दूसरों का कच्चा चिट्ठा खोलने तक, किसी भी काम को तैयार हैं। किसी तरह, कैसे भी हर कोई ऊपर उठना चाहता है। कोई भी हमारी द्रविड़ अस्मिता के गौरव तथा उसकी युगों लंबी अवमानना को लेकर चिंतित नहीं है।  

पूरा देश पांच बीमारियों और तीन प्रेतों के जबड़ों में दबा हुआ है। मान लीजिए कि प्रेत वास्तव में नहीं होते; हमारा आशय है—

ईश्वर, जाति और लोकतंत्र—ये तीन प्रेत हैं। 

ब्राह्मण-समाचारपत्र-राजनीतिक दल-विधायिकाएं और सिनेमा—ये पांच बीमारियां हैं। ये बीमारियां मानव शरीर पर केंसर, कुष्ठ-रोग और मलेरिया की तरह धावा बोल रही हैं। यदि समाज को प्रगतिगामी बनाना है, तो इन बीमारियों से हमें जमकर संघर्ष करना; और इन्हें पूरी तरह नष्ट कर देना होगा। 

—ई.  वी. रामासामी पेरियार 

(हिंदी अनुवाद :  ओमप्रकाश कश्यप)

विदुथलाई, 8 ओर 9 जनवरी, 1959। इस भाषण का अंग्रेजी अनुवाद द्रड़ियार कझ़गम, चेन्नई द्वारा प्रकाशित ‘कलेक्टिड वर्क्स आफ पेरियार ईवीआर, 2005(तीसरा संस्करण) से लिया गया है। अंग्रेजी अनुवादक: ए. एस. वेणु।  

1. 1958 में जब यह भाषण दिया गया, उपप्रधानमंत्री पद खाली था। 

पेरियार और बुद्ध : धर्माडंबर और जाति-मुक्ति संघर्ष की 2500 वर्ष लंबी परंपरा

सामान्य
जाति-मद, अभिमान, लोभ, द्वैष तथा मूढ़ता ये सब अवगुण जहां हैं, वे इस देश में अच्छे स्थान नहीं हैं. जाति-मद, अभिमान, लोभ, द्वैष तथा मूढ़ता ये सब अवगुण जहां नहीं हैं, वे ही इस देश में अच्छे स्थान हैं.1—मातंग जातक(497).

 

पेरियार और गौतम बुद्ध के बीच करीब ढाई हजार वर्षों का अंतराल है. जिन दिनों बुद्ध का जन्म हुआ था, वैदिक कर्मकांड और धर्माडंबर अपने चरम पर थे. यज्ञ, पूजा-पाठ आदि के नाम पर राजाओं से भरपूर समिधा हासिल करना, इन्कार करने या असमर्थता जताने पर शाप द्वारा लोक-परलोक बिगाड़ने की धमकी देना. मनोवांछित समिधा प्राप्त होते ही राजा के हर कुकर्म को सुकर्म घोषित कर देना, फिर हजारों पशुओं की बलि एक साथ चढ़ा देना—ब्राह्मण पुरोहितों के लिए बिलकुल सामान्य था. आतंक ऐसा था कि किसी भी सम्राट को वे धर्म के नाम पर मनमाने आचरण के लिए विवश कर सकते थे. धर्माडंबर और वर्णाश्रम व्यवस्था के समर्थन में बड़े-बड़े शास्त्र गढ़े जा रहे थे. उन्हें पढ़ने का अधिकार सिवाय ब्राह्मणों के किसी को न था. वे उनकी मनमानी व्याख्या करते थे. बावजूद इसके उन्हें तत्कालीन राजसत्ताओं का संरक्षण प्राप्त था. उनके धुर विरोधी के रूप में आजीवक और लोकायत जैसे भौतिकवादी चिंतक थे, जिनका संबंध समाज के मेहनतकश लोगों तथा शिल्पकार समूहों से था. यज्ञ के नाम पर बलि चढ़ाना, ईश्वर, आत्मा, परमात्मा जैसे वायवी विषयों पर बहस करना उन्हें नापसंद था.

बुद्ध राजसत्ता और परिवार का मोह त्यागकर युवावस्था में परिव्राजक बने थे. राजकुल से संबंधित होने के कारण उनका तत्कालीन राजाओं के बीच अतिरिक्त सम्मान था. बुद्धत्व प्राप्ति के बाद जब उन्होंने धर्मोपदेश देना आरंभ किया तो मगध, उज्जैनी सहित उस समय के सभी बड़े राज्यों एवं व्यापारिक वर्गों का भरपूर सहयोग एवं समर्थन उन्हें प्राप्त हुआ. बुद्ध के प्रति राजाओं के आकर्षण का कारण यह भी था कि अनेक राजा ब्राह्मण-ऋषियों द्वारा यज्ञादि के नाम पर पशुधन और दूसरे संसाधन ऐंठने से तंग आ चुके थे. यज्ञों से राज्य के खजाने पर अनावश्यक बोझ पड़ता था. बुद्ध ने यज्ञों का विरोध कर व्यावहारिक नैतिकता पर जोर दिया. उन्होंने वेदों को अपौरुषेय और आप्तग्रंथ मानने से भी इन्कार कर दिया. तत्कालीन बुद्धिजीवी समाज में बहस का बड़ा मुद्दा आत्मा, परमात्मा, ईश्वरादि को लेकर था. दर्शन की इन समस्याओं पर लोग शताब्दियों से बेनतीजा बहस करते आए थे. आत्मा-परमात्मा में विश्वास रखने वाले उनकी सत्ता को पूर्व-निष्पत्ति मान लेते थे. उस अवस्था में बहस उनके अस्तित्व तथा औचित्य के बजाय, स्वरूप और विस्तार को लेकर रह जाती थी. दूसरा वर्ग बुद्धिसंगत निर्णय लेने का समर्थन करता था. वह उनके अस्तित्व एवं औचित्य सहित हर पहलू पर विचार करना चाहता था. दोनों परस्पर विपरीत-ध्रुवी विचारधाराएं थीं. इतनी कि उनके बीच संवाद का कोई उदाहरण पूरे संस्कृत वाङ्मय में नहीं मिलता. बुद्ध ने उनके बीच का रास्ता अपनाया. आत्मा-परमात्मा, लोक-परलोक, पाप-पुण्य जैसी बहसों में उलझने के बजाए उन्होंने, व्यक्तिगत एवं सामाजिक शुचिता को अपने धर्म-दर्शन का केंद्र-बिंदू बनाया, जिसका उन दिनों सामाजिक जीवन से लोप हो चला था.

ढाई हजार वर्ष पहले यानी बुद्ध के जन्म के समय वर्ण जाति में ढलने लगे थे. परिणामस्वरूप पचासियों जातियां अस्तित्व में आ चुकी थीं. जन्म के आधार पर भेदभाव करने वाली उस व्यवस्था को बुद्ध ने अनैतिक, अनुचित तथा जीवन के उच्चतम लक्ष्यों की प्राप्ति में बाधक माना तथा उसकी आलोचना की. अभिजात वर्ग की भाषा संस्कृत के बजाए उन्होंने पालि में उपदेश दिए, जो उन दिनों जनसाधारण की भाषा थी. उस समय तक जातीय अभिमान के मारे ब्राह्मण स्वयं को आश्रमों तक सीमित रखते थे. शेष समाज से उनका संबंध दानादि ग्रहण करने तक सीमित था. बुद्ध अपने विचारों को लेकर सीधे आमजन के बीच गए. भिक्षु-संघ की स्थापना की तो उसके दरवाजे समाज के सभी वर्गों के लिए खोल दिए. जाति-आधारित भेदभाव को वे बौद्धिक, सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों की राह में बाधक मानते थे—

‘अंबट्ठ! जो भी जातिवाद में बंधे हैं, गोत्रवाद में बंधे हैं, (अभि)मानवाद में बंधे हैं, आवाह-विवाह में बंधे हैं, वे अनुपम विद्या-चरण-संपदा से दूर हैं. अंबट्ठ! जातिवाद बंधन छोड़कर, गोत्रवाद बंधन छोड़कर, मानवाद बंधन छोड़कर, आवाह-विवाह बंधन छोड़कर ही अनुपम विद्या-चरण-संपदा का साक्षात्कार किया जा सकता है.’2

वेदों को अपौरुषेय न मानने, आत्मा, परमात्मा, ईश्वर आदि विषयों पर मौन साध लेने के कारण बौद्ध दर्शन की गिनती नास्तिक दर्शन के रूप में की जाती है. इसके आधार पर कुछ विद्वान उसे आजीवक और लोकायत दर्शन की तरह ही, भौतिकवादी दर्शन मानते हैं. लेकिन वह उच्छ्रंखल भौतिकवाद न था. हम उसे आदर्शोन्मुखी व्यवहारवाद कह सकते हैं जिसमें सामाजिक समानता, शुचिता एवं आचरण की पवित्रता प्रमुख थी. बुद्ध के विचारों का इतना असर हुआ कि वैदिक कर्मकांडों से आमजन का विश्वास घटने लगा. यज्ञ और दानादि के नाम पर ऋषियों की मांगों और धमकियांे तंग आ चुके राजा बौद्ध एवं जैन धर्म से जुड़ने लगे. उसके फलस्वरूप ब्राह्मण धर्म कुछ शताब्दियों के लिए नेपथ्य में चला गया. जातीय भेदभाव कमजोर पड़ने लगा. अशोक के बाद मौर्य साम्राज्य कमजोर पड़ने से ब्राह्मणधर्म को पुनर्वापसी का अवसर मिला. इसी दौर में पुराणों एवं स्मृति-ग्रंथों की रचना हुई. उसके बाद इतिहास ने अनेक करवटें लीं. राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद ब्राह्मणवाद निरंतर मजबूत और निरंकुश होता चला गया.

बुद्ध पहले विचारक थे, जिन्होंने समाज को धर्म के आधार पर संगठित करने की कोशिश की थी. वैदिक धर्म के प्रस्तोता जातीय दंभ के शिकार थे. आत्ममुग्धता की पराकाष्ठा में वे बाकी जनसमाज से अलग-थलग जीते थे. जनसाधारण के सुख-दुख की उन्हें परवाह न थी. जाति और वर्ण के नाम पर उन्होंने समाज के बड़े हिस्से को मुख्यधारा से अलग किया हुआ था. अपने आश्रमों में बंद ऋषिगण धर्म और यज्ञादि के नाम पर क्या करते हैं? बलि चढ़ाने से उन्हें क्या हासिल होता है—जनसाधारण को इसकी बहुत परवाह भी नहीं थी. ब्राह्मण बुद्धिजीवियों की उपेक्षा की परवाह न करते हुए साधारण जन आजीवकों और लोकायतों पर विश्वास करते थे, जो उस समय भौतिकवादी दर्शन की प्रमुख शाखाएं थीं. वैदिक परंपरा संसार को नकारकर, काल्पनिक, भ्रममूलक देवलोक को परम-सत्य मानती थीं. आजीवकों और लोकायतों के लिए जीती-जागती, जीवनदायिनी प्रकृति ही सबकुछ थी. वे अपने श्रमकौशल के भरोसे जीवन-यापन करने वाले बहुसंख्यक लोग थे. चूंकि धर्म-केंद्रित समाज की रचना का संकल्प सामाजिक शुचिता के बगैर असंभव था. इसलिए बुद्ध ने आदर्शोन्मुखी नैतिकता पर जोर दिया. धार्मिक आडंबरों, यज्ञ-बलियों एवं जाति-प्रथा को अनावश्यक मानते हुए उन्होंने निस्पृह और कल्याणोन्मुखी जीवन जीने का उपदेश दिया. कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में पशु-धन का विशेष महत्त्व था. यज्ञादि कर्मकांडों के विरोध का सीधा-सा अभिप्राय था, उपयोगी पशुधन की जीवनरक्षा. इसके फलस्वरूप लोग उनके धर्म की ओर आकृष्ट होने लगे.

 

2

पेरियार के समय तक जाति-व्यवस्था उग्र रूप धारण कर चुकी थी. अछूतों का सार्वजनिक स्थलों पर प्रवेश निषिद्ध था. कथित ऊंची जाति के सदस्यों का स्पर्श तो दूर, अपनी छाया से भी उनको बचाना पड़ता था. शूद्रों को उनके कार्य के अनुसार थोड़ी छूट थी, परंतु वे भी एक सीमा तक ही उच्च जातियों के निकट जा सकते थे. कैथरीन मेयो ने अपनी पुस्तक ‘मदर इंडिया’ में भारतीय समाज में व्याप्त छूआछूत के बारे में वर्णन किया है. डू. बोइस के हवाले से वे उनीसवीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों में दक्षिण भारतीय समाज के बारे लिखती हैं—‘मालाबार तट पर रहने वाली ‘पुलाया’ जाति के सदस्यों को अपने लिए घर बनाने का अधिकार नहीं है. रहने के लिए वे लोग दरख्तों पर घौंसले की भांति, बांस-बल्लियों के सहारे, पत्तों की छत डाल सकते हैं.’ डू. बोइस के अनुसार, उन दिनों यदि कोई नैय्यर किसी पुलाया को सड़क पर देख लेता तो उसे वहीं मार देने का अधिकार था. बातचीत के दौरान दो व्यक्तियों के बीच दूरी से भी अस्पृश्यता के स्तर का अनुमान लगाया जा सकता था. पुलाया को नैय्यर जैसे उच्च जाति के हिंदुओं से 60 से 90 फुट की दूरी रखकर बात करनी पड़ती थी.

पेरियार ने बचपन से जाति-आधारित भेदभाव का अनुभव किया था. बड़े हुए तो उन्हें इसका कारण भी समझ में आने लगा. उनका जन्म धनाढ्य परिवार में हुआ था. शिक्षा के नाम पर वे बस दो-तीन वर्ष ही पाठशाला जा पाए थे. बाद में पिता के व्यवसाय से जुड़ गए. उन दिनों उनके घर में संन्यासियों, शैव-मतावलंबियों, वैष्णवों, पंडितों आदि का खूब आना-जाना था. किशोर पेरियार उन्हें अधिकाधिक दान-दक्षिणा के लिए तरह-तरह के बहाने बनाते हुए देखते. कभी-कभी वे उनका मजाक भी उड़ाते. बावजूद इसके अपनी युवावस्था तक ईश्वर में उनकी आस्था बनी रही. 1925 में उन्होंने संन्यासी के रूप में बनारस की यात्रा की. यात्रा के दौरान वे बनारस में जहां-जहां गए, वहां ब्राह्मणवाद का विकृत चेहरा, धर्म के नाम पर लूट-खसोट और वृथा आडंबरों से सामना हुआ. जातीय भेदभाव का अनुभव तो उन्हें बचपन से ही था. बनारस यात्रा के बाद उनका धर्म से भी विश्वास उठ गया. उसके बाद नए पेरियार का जन्म हुआ, जो तर्कवादी था. ज्ञान-विज्ञान पर जोर देता था. व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता, समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर विश्वास करता था. आस्था के आधार पर कुछ भी मान लेना उसे अस्वीकार्य था. हर स्थापित सत्य पर संदेह करना, उसे अपने विवेक की कसौटी पर कसना और खरा उतरने के बाद ही उसे स्वीकार करना, उसकी आदत में शुमार हो चुका था.

पेरियार ने आत्मा, परमात्मा, पाप-पुण्य, भाग्य आदि को सीधे नहीं नकारा. अपितु तर्क पर जोर दिया. इस मामले में बुद्ध उनके प्रेरणा-पुरुष रहे. प्राचीन भारत के इतिहास में बुद्ध कदाचित पहले शास्ता थे जिन्होंने वैचारिक स्वतंत्रता को आगे रखते हुए अपने शिष्यों से कहा था—‘अप्पदीपो भवः.’ दूसरों की बातों में आने के बजाय, सोच-विचारकर स्वयं निर्णय लो. धर्म-दर्शन और जाति पर दिए गए अपने व्याख्यानों में पेरियार भी आत्मा, परमात्मा, ईश्वर आदि को तर्क की कसौटी पर कसते हैं. उनके अस्तित्व पर ध्यान देने के बजाए औचित्य पर विचार करते हैं. 1947 में सलेम कॉलिज में ‘हिंदू दर्शन’ पर दिए गए अपने व्याख्यान में उन्होंने इन विषयों की वैज्ञानिक पड़ताल की थी. उन्होंने सिद्ध किया कि ये सभी मिथ समाज पर सोची-समझी नीति के तहत थोपे गए हैं. सहअस्तित्व, समानता, सहयोग, सद्भाव एवं निस्पृह जीवन जीने वाले व्यक्ति को इनकी कोई आवश्यकता नहीं पड़ती. उस व्याख्यान में वे बुद्ध का नाम नहीं लेते; परंतु उनका प्रत्येक निष्कर्ष उन्हें बुद्ध के करीब ले जाता है—

‘मनुष्य अपनी इच्छाओं के साथ जीता है. वह अपने लालच का दास का है. समाज में रहकर वह दूसरों के लिए या तो अच्छा कर सकता है अथवा बुरा. कर्म की महत्ता पर जोर देने के लिए ही जीवन और आत्मा जैसी काल्पनिक चीजों की रचना की गई है. मनुष्य को अच्छे कृत्यों की ओर प्रवृत्त करने हेतु, उसे यह विश्वास करना सिखाया गया है कि यदि वह बुरे कर्म करेगा तो मृत्यु के बाद उसकी आत्मा को भयावह दंडों से गुजरना पड़ेगा. यह भी एक मिथ मात्र ही है. तर्क-सम्मत ढंग से बातचीत करने वाले निस्पृह व्यक्ति के लिए जो न अच्छा करता है, न ही बुरा, ईश्वर का भय नहीं रहता. उसे स्वर्ग या नर्क की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है.’3

बुद्ध के ‘अपना दीपक स्वयं बनो’ की तरह पेरियार ने भी लोगों से बार-बार यह आग्रह किया—‘मैंने जो कहा वे मेरे व्यक्तिगत विचार हैं. जरूरी नहीं है कि आप भी इनपर विश्वास करें. इसलिए खूब सोचें और स्वयं सार्थक निर्णय तक पहुंचे.’

एक और सूत्र जो पेरियार को बुद्ध के करीब ले जाता है, वह है—जाति व्यवस्था को लेकर दोनों का समान दृष्टिकोण. बुद्ध का जन्म नागवंशीय शाक्य कुल में हुआ था. बाकी क्षत्रियों की अपेक्षा उसे कुछ हीन माना जाता था. अश्वघोष उनका संबंध इक्ष्वाकू वंश से जोड़ते हैं. बौद्ध साहित्य के गंभीर अध्येता कोसंबी के अनुसार शाक्य एक जनजाति थी. बुद्ध ने जातिगत भेदभाव का विरोध किया था. भिक्षु संघों के दरवाजे उन्होंने सभी जातियों के लिए खोले हुए थे. लेकिन ‘अंबट्ठसुत्त’(दीघनिकाय) में वे जिस तरह क्षत्रियों को ब्राह्मणों से श्रेष्ठ बताने के लिए तर्क देते हैं, उसका एक निष्कर्ष यह भी निकलता है कि उन्हें अपने क्षत्रीय कुलोत्पन्न होने पर गर्व था; या कम से कम वर्ण-व्यवस्था से उन्हें कोई शिकायत न थी. बुद्ध द्वारा धार्मिक कर्मकांडों, आडंबरों तथा जाति-प्रथा के विरोध का इतना असर अवश्य हुआ था कि बौद्ध धर्म को जनता ने अपना धर्म मान लिया. उसके फलस्वरूप समाज में जाति-आधारित कटुताओं में भी कमी आने लगी. परंतु जाति और उसके आधार पर हो रहे भेदभाव के विरोध में बड़ा आंदोलन न चलाने के कारण, जातिवादी शक्तियां भीतर ही भीतर सक्रिय बनी रहीं. लोगों को ब्राह्मण धर्म की ओर वापस मोड़ने के लिए ब्राह्मण बुद्धिजीवी पुराणों, स्मृतियों, महाकाव्यों आदि ग्रंथों की रचना में जुट गए. अशोक द्वारा उठाए गए कदमों के फलस्वरूप बौद्ध धर्म दुनिया के विभिन्न देशों में पहुंचा. मगर उसके तुरंत बाद, मौर्य वंश के कमजोर पड़ते ही, ब्राह्मणवाद पुनः जड़ जमाने लगा. ‘मनुस्मृति’ की रचना हुई. जातीय भेदभाव और दुराग्रह जो बुद्ध के प्रभाव दब-से गए थे, वे पुनः सामने आने लगे.

 

3

पेरियार के समय तक लगभग सभी धर्म अपनी प्रासंगिकता खो चुके थे. सतरहवीं-अठारहवीं शताब्दी में पश्चिम में हुई वैचारिक क्रांति के फलस्वरूप, भारत में भी मानव-मात्र की समानता और स्वतंत्रता की समर्थक नई विचार-चेतना का जन्म हुआ था. यह मानते हुए कि राजनीति सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बन सकती है, राजगोपालाचार्य के आग्रह पर पेरियार कांग्रेस में शामिल हुए थे. प्रदेश कांग्रेस के उच्च पदों पर रहते हुए उन्होंने नेताओं का मन बदलने की पूरी कोशिश की थी. मगर थोड़े ही समय में उन्हें विश्वास हो गया कि कांग्रेस के नेता अपने जातीय दुराग्रहों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं. उनकी कथनी और करनी में बड़ा अंतर है. खासतौर पर जातीय विषमता को मिटाने के लिए कांग्रेसी नेता कुछ नहीं करना चाहते. यहां तक कि गांधी भी जातीय पूर्वाग्रहों में फंसे हुए हैं. खिन्न होकर 1925 में उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया. लोगों में आत्माभिमान का भाव पैदा करने के लिए उन्होंने ‘स्वाभिमान आंदोलन’ की नींव रखी. उस समय तक धर्म को नैतिक मूल्यों का एकमात्र स्रोत माना जाता था. लोगों का विश्वास था कि केवल धर्म के सहारे समाज को एकसूत्र में बांधकर रखा जा सकता है. पेरियार किसी नए धर्म के बंधन में बंधना नहीं चाहते थे. तमिल जनता में अपनत्व एवं एकजुटता की भावना पैदा करने के लिए उन्होंने द्रविड़ संस्कृति को आधार बनाया. लोगों को समझाया कि समाजीकरण की बुनियाद पारस्परिक सहयोग और समर्पण पर टिकी होती है. पौराणिक ग्रंथों, महाकाव्यों आदि की रचना स्वार्थी ब्राह्मणों ने लोगों को भरमाने के लिए की है. जाति-व्यवस्था को दैवीय बताने वाले धर्मग्रंथों में शूद्रों और अस्पृश्यों के लिए अपमानजनक स्थितियां हैं—‘बौद्धों और जैनियों ने ब्राह्मणवाद द्वारा फैलाई गई कुरीतियों को कुछ समय के लिए समाप्त कर दिया था. उन्होंने बताया था कि सभी लोग बराबर हैं. आपसी प्रेम और भाईचारा ही असली ईश्वर हैं. ब्राह्मणों को वह स्वीकार नहीं हुआ. इसलिए उन्होंने उनके सभी कार्यों पर पानी फेर दिया.’4 लोगों को ब्राह्मणों द्वारा फैलाए गए भ्रमजाल से निकालकर मानवीय मूल्यों से जोड़ना, उनके भीतर सम्मानजनक जीवन जीने की चाहत पैदा करना पेरियार की प्रमुख चुनौती थी. फुले इसकी नींव बहुत पहले डाल चुके थे. ‘स्वाभिमान आंदोलन’ की शुरुआत का भी यही उद्देश्य था.

पेरियार आस्थावान व्यक्ति नहीं थे. उनका विश्वास ज्ञान-विज्ञान में था. अरस्तु की तरह वे भी मनुष्य को विवेकशील प्राणी मानते थे. बावजूद इसके उन्होंने धर्म की शक्ति को नकारा नहीं था. लेकिन उनका धर्म मानव-मात्र के कल्याण का उद्यम था, जिसमें किसी देवता या आत्मा-परमात्मा के लिए कोई स्थान नहीं था. आजीवन वे इस पर विचार करते रहे कि मनुष्य को धर्म और धर्मशास्त्रों के मकड़जाल से बाहर कैसे निकाला जाए! यह आसान काम नहीं था. क्योंकि मानव जीवन में धर्म की व्याप्ति केवल पूजा-पाठ या संस्कारों तक सीमित नहीं रहती. ऐसे लोग भी जो मंदिर नहीं जाते, पूजा-पाठ तथा दूसरे आडंबरों से दूर रहते हैं; और ऐसे भी जो अच्छे-खासे पढ़े-लिखे हैं—दिलो-दिमाग से दकियानूसी हो सकते हैं. लोकजीवन का हिस्सा बन चुके विभिन्न संस्कार, आचार-विचार और रूढि़यां, संस्कृति का अभिन्न हिस्सा मान लिए कर्मकांड यहां तक कि उनसे जुड़े किस्से-कहानियां भी—किसी न किसी रूप में धार्मिक जड़ता के संवाहक हैं. उनकी रचना जातिभेद और सामाजिक ऊंच-नीच को दैवीय सिद्ध करने के लिए की गई है. 2400 वर्ष पहले अरस्तु ने भी तो यही कहा था, ‘मनुष्य ने ही ईश्वर को रचा है. अपने रूपाकार में, और अपनी जीवनशैली के अनुरूप भी.’ ब्राह्मण खुद को सर्वोपरि मानते हैं. वे चाहते हैं कि शेष जनसमाज उनके इशारे पर नाचे. जो ऐसा नहीं करता उसे वे शाप देने की धमकी दिया करते थे. उनका गढ़ा हुआ ईश्वर भी खुद को भक्तों से ऊपर मानता था; जो उसकी चापलूसी(भक्ति) से आनाकानी करे, उसे वह दंड देने को उतावला रहता था.

बौद्ध धर्म के रास्ते सामाजिक शुचिता की वापसी का रास्ता पेरियार से पहले दक्षिण भारत में आइयोथि थास भी दिखा चुके थे. उनका मानना था कि दक्षिण की पेरियार जाति के लोग मूलतः बौद्ध हैं और वे दक्षिण के मूल निवासी हैं. आर्य हमलावरों ने उनके धर्म और संस्कृति को उनसे छीन लिया है. थॉस के प्रभाव में केरल की जाति इझ़वा अपना संबंध गौतम बुद्ध से वंश से जोड़ने लगी थी. मद्रास प्रेसीडेंसी का नाम द्रविड़नाडु करने की मांग के समय पेरियार ने भी कहा था कि मुस्लिम, ईसाई, आदि द्रविड़ और बौद्ध सभी द्राविड़ हैं.5 थॉस की भांति पेरियार भी ब्राह्मणवाद के कटु आलोचक थे. जातीय उत्पीड़न से मुक्ति के लिए उन्होंने तमिलवासियों से हिंदू धर्म को छोड़ने का आग्रह किया था. उसके पीछे भी बौद्ध धर्म की प्रेरणा थी. 13 जनवरी 1945 के ‘कुदी अरासु’ के अंक में उन्होंने लिखा था कि यदि अंग्रेजों ने हम पर शासन करने के लिए ‘बांटो और राज करो’ की नीति का अनुसरण किया था तो ठीक यही नीति आर्यों ने भी भारत के मूल निवासियों पर राज करने के लिए अपनायी थी. उन्होंने यहां के बहुसंख्यकों को पिछड़ों और अछूतों में बांट दिया. पेरियार का कहना था—‘विश्वासघातियों का शिकार मत बनिए….राम और कृष्ण जैसे नायक तथा गीता, रामायण जैसे धर्मग्रंथ, बौद्ध धर्म के प्रति हमारे विश्वास को मिटाने के रचे गए हैं.’ उन्होंने आगे कहा था—

‘आंबेडकर जब मद्रास आए थे तब मैंने उन्हें 1923 में भारी जनसभा के सामने दिए गए अपने भाषण के बारे में बताया था कि जब तक कोई रामायण का दहन नहीं करता, तब तक छूआछूत पर सार्थक प्रहार संभव नहीं है.’6 10 जनवरी 1947 को ‘कुदीअरासु’ में उन्होंने फिर लिखा था कि जैसे ‘बुद्ध और गुरुनानक वेदों को धर्मशास्त्रों को पूरी तरह मिथ्या बताते थे, केवल हम द्रविड़जन ही वैसा कहने का साहस कर पाते हैं.’7

27 मई 1953 को बुद्ध जयंती के अवसर पर पेरियार ने अपने अनुयायियों को उसे उत्सव की तरह मनाने का आवाह्न किया था. उन्होंने कहा था कि इस अवसर पर वे मूर्ति पूजा का बहिष्कार करें. विघ्नेश्वर, गणपति, गजपति, विनायक आदि कहे जाने वाले गणेश की मूर्तियों को तोड़कर बहा दें. बौद्ध जयंती वैदिक परंपरा के धुर विरोधी की जयंती है. इस देश में हजारों देवी-देवता है. इसलिए ऐसा व्यक्ति जो विवेक से काम लेता है, तर्क को महत्त्व देता है, जीवन के प्रति व्यावहारिक दृष्टिकोण रखता है तथा जिसे मनुष्यता में भरोसा है वह स्वयं ही बुद्ध कहलाने योग्य है. यह दिखाने के लिए कि मूर्ति केवल पत्थर का टुकड़ा है, उसमें कोई दैवी शक्ति नहीं है, पेरियार ने तमिलनाडु के कई शहरों में मूर्ति तोड़ो आंदोलन का नेतृत्व किया था. मूर्ति-पूजा और धार्मिक कर्मकांडों का बहिष्कार, सामाजिक कार्यक्रमों में ब्राह्मण पुरोहित की अनिवार्यता से मुक्ति, उनके ‘स्वाभिमान आंदोलन’ का महत्त्वपूर्ण हिस्सा था. ढाई हजार वर्ष पहले बुद्ध ने भी मूर्ति पूजा की निंदा की थी. धार्मिक कर्मकांडों, आडंबरों एवं जाति-आधारित भेदभाव की आलोचना करते हुए उन्होंने पंचशील और अष्ठांग मार्ग का प्रतिपादन किया जो व्यैक्तिक एवं सामाजिक जीवन की शुचिता पर जोर देता था. बुद्ध ने दिखाया था कि किसी भी समाज में शुभत्व की मौजूदगी, इसपर निर्भर करती है कि उसके सदस्य अपने जीवन में शुचिता एवं सौहार्द्र को लेकर कितने गंभीर हैं. उसके लिए किसी धर्माडंबर की आवश्यकता नहीं है. पेरियार के भाषणों का लोगों पर अनुकूल असर पड़ा. लोग धर्म के सम्मोहन से बाहर निकलने लगे. आंदोलनकारियों ने अपने-अपने घर से देवताओं की मूर्तियां निकाल फैंकी. तिरुचिरापल्ली के टाउन हॉल के सामने खुले मैदान में सैकड़ों लोगों ने मूर्तियों को तोड़ डाला.

धर्म के प्रति विशेष आस्था न होने के बावजूद पेरियार बुद्ध को अपने विचारों के करीब पाते थे. वे चाहते थे कि लोकमानस बुद्ध के विचारों को जाने-समझे. इसके लिए उन्होंने 23 जनवरी 1954 को इरोद में एक सम्मलेन का आयोजन किया था. सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए सीलोन विश्वविद्यालय, श्रीलंका के बौद्ध संस्कृति केंद्र के प्रोफेसर जी. पी. मल्लाल शेखर ने कहा था कि बुद्ध के विचारों के अनुसरण द्वारा अंतरराष्ट्रीय शांति की स्थापना की जा सकती है. उन्होंने पेरियार द्वारा समाज सुधार विशेषरूप से धार्मिक जकड़बंदी के प्रयासों से बाहर लाने के प्रयासों की सराहना की थी. उनका मानना था कि तमाम विरोधों एवं अवरोधों के बावजूद समाज सुधार का पेरियार का रास्ता बुद्ध के विचारों से मेल खाता है. सम्मेलन में जाति प्रथा पर भी चिंता व्यक्त की गई थी. ‘अखिल भारतीय शोषित जाति संघ के सचिव और सांसद राजभोज ने सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा था कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था में दलित, शूद्र और अन्य जातियां बहुसंख्यक होने के बावजूद तरह-तरह के शोषण की शिकार रही हैं. बौद्ध धर्म जाति-प्रथा को नकारता है. उसके अनुसार समाज में सभी बराबर हैं. जाति-व्यवस्था हिंदू धर्म का कलंक है. सबसे पहले बुद्ध ने ही जाति-प्रथा और धर्माडंबरों का विरोध करते हुए, सामाजिक कुरीतियों को दूर करने में सफलता प्राप्त की थी. केवल बौद्ध धर्म से ही इस समस्या का समाधान संभव है. सम्मेलन में पेरियार की प्रशंसा करते हुए कहा गया था कि उन्होंने ब्राह्मणवाद के खात्मे के लिए कई आंदोलन चलाए हैं. उनके कारण समाज में जाति-विरोधी चेतना का जन्म हुआ है—‘बुद्ध की नीतियां ही आपकी और ‘स्वाभिमान आंदोलन’ की नीतियां हैं.’8 उस अवसर पर बुद्ध की प्रतिमा का अनावरण किया गया था. हमेशा की तरह उस सम्मेलन में भी पेरियार ने हिंदू धर्म-दर्शन पर हमला बोलते हुए बौद्ध धर्म की प्रशंसा की थी—

‘हम जो मेहनती और कामगार लोग हैं, हमें नीची जाति में डाल दिया गया है. हम भुखमरी के शिकार हैं. हमारे पास पहनने के लिए वस्त्र नहीं हैं. हमारे पास रहने को घर भी नहीं हैं. लेकिन ब्राह्मण जो कोई काम नहीं करते, उन्हें सभी प्रकार के सुख और मान-सम्मान हासिल है.’9

सम्मेलन में लोगों को संबोधित करते हुए पेरियार ने कहा था—

‘‘केवल तुम्हीं वे लोग हो जिन्होंने ये मंदिर बनाए हैं. केवल तुम्हीं हो जिन्होंने इनके लिए दान दिया है. यदि ऐसा है तो क्या हम ईश्वर को जो हमें नीची जाति का और अछूत बताता है, ऐसे ही छोड़ सकते हैं? ‘कृतघ्न ईश्वर! केवल मैंने ही तेरे लिए मंदिर और तालाब बनवाए हैं. केवल मैंने ही तुझपर अपना पैसा बहाया है.’ क्या तुम यह नहीं पूछोगे कि तुम नीची जाति के क्यों हो? तुम्हें छूने में हर्ज क्या है? तुम केवल ब्राह्मण के कहे पर विश्वास करते हो कि यदि तुम ऐसे सवाल उठाओगे तो ईश्वर तुमसे नाराज हो जाएगा.’’10

इरोद सम्मेलन में गौतम बुद्ध के विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए एक प्रस्ताव स्वीकृत किया गया था. उसमें कहा गया था—‘आर्यों द्वारा हिंदू धर्मशास्त्रों, पुराणों, महाकाव्यों की रचना सांस्कृतिक वर्चस्व कायम रखने तथा द्रविड़ों के अपमान, अवमूल्यन तथा उन्हें भरमाए रखने के लिए की गई है, उनका सबका नाश होना चाहिए.’ उसी सम्मेलन में स्वीकृत एक अन्य प्रस्ताव में कहा गया था—‘बुद्ध का जीवन तथा उनके धर्मोपदेश ईश्वर, आत्मा, स्वर्ग-नर्क, भाग्यवाद, धार्मिक परंपराओं तथा उत्सवों की मिथ्याचार को उजागर करती हैं; तथा भेदभाव रहित, आपसी सहयोग और बराबरी पर आधारित सामाजिक संरचना का समर्थन करती हैं, तमिलनाडु के सभी लोगों, जनसंगठनों, संस्थाओं और समूहों को चाहिए कि वे उनके विचारों को, समस्त मानव-समुदाय तक पहुंचाने के लिए आगे आएं.’

पेरियार की बातों को सुनकर रोज नए-नए लोग उनके आंदोलन से जुड़ने लगे. धार्मिक आयोजनों, कर्मकांडों तथा धर्मशास्त्रों में कही गई बातों पर सवाल उठाए जाने लगे. इससे सनातनी हिंदुओं को डर सताने लगा था. वे जानते थे कि धर्म की नींव अज्ञात डर पर टिकी है. मूर्तियों के प्रति श्रद्धा भी उसी डर का विस्तार है. यदि वह डर ही नहीं रहा तो लोग धर्म की गिरफ्त से बाहर होने लगेंगे. पेरियार लगातार वैज्ञानिक सोच का प्रचार-प्रसार कर रहे थे. सनातनी हिंदुओं की निगाह में धर्मशास्त्रों आलोचना नास्तिकता थी. स्वाभिमान आंदोलन की राह में अवरोध पैदा करने के लिए उन्होंने एक संगठन का गठन किया था. उस संगठन ने पेरियार तथा उनके दो सहयोगियों टी. पी. वेदाचलम और एम. आर. राधा के विरुद्ध धारा 295 के अंतर्गत मुकदमा दायर कर दिया. वेदाचलम वरिष्ठ अधिवक्ता थे, जबकि एम. आर. राधा जाने-माने अंधविश्वास विरोधी कार्यकर्ता. पेरियार और उनके सहयोगियों पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने जनभावनाओं को आहत करने का काम किया है. मामले की पहली सुनवाई सत्र न्यायालय में हुई. अगली सुनवाई के लिए मुकदमा जिला सत्र न्यायालय में पहुंचा. दोनों अदालतों का निर्णय पेरियार के पक्ष में गया. मगर पेरियार के दुश्मन इतने से शांत होने वाले न थे. उन्होंने मद्रास उच्च न्यायालय में अपील दायर कर दी. अपील की सुनवाई के बाद, 13 अक्टूबर 1954 को न्यायमूर्ति एन. सोम सुंदरम ने उसे यह कहकर खारिज कर दिया कि वादी पक्ष की यह आशंका कि पेरियार तथा उनके सहयोगियों के कृत्य से जनभावनाएं आहत होती हैं—सही मानी जा सकती है. लेकिन पेरियार और उनके साथियों ने जो मूर्तियां तोड़ीं उन्हें उन्होंने या तो स्वयं बनाया था अथवा बाजार से खरीदा गया था. वे मंदिर में पूजी जाने वाली मूर्तियां नहीं थीं. ऐसी मूर्तियों को तोड़ना कानून अपराध नहीं है.

तमिल समाज में जागृति लाने, उसे रूढि़मुक्त करने तथा आत्माभिमान की भावना जागृत करने के लिए पेरियार ने ‘स्वाभिमान आंदोलन’ का सूत्रपात किया था. उसी के एक कार्यक्रम में जनवरी 31, 1954 को उन्होंने मद्रास(अब चैन्नई) में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा कि बुद्ध के विचार हमारे अपने विचारों को लागू करने, आगे बढ़ाने तथा समाज में बढ़ रही विकृतियों के शमन की दिशा में बहुत ही उपयोगी हैं. उसी वर्ष पेरियार अपनी पत्नी तथा कुछ मित्रों के साथ मलेषिया और मयामार गए थे. वहां मेंडले में बुद्ध की 2500वीं जयंती के अवसर पर उनकी भेंट डॉ. आंबेडकर से हुई थी. उस समय तक डॉ. आंबेडकर बौद्ध धर्म अपनाने का निर्णय ले चुके थे. उन्होंने पेरियार से भी वैसा ही करने को कहा था. इसपर पेरियार ने डॉ. आंबेडकर से आग्रह किया था कि वे धर्मांतरण से बचें. क्योंकि ऐसा करके वे हिंदू धर्म की आलोचना का अधिकार खो देंगे. जड़वादी हिंदू दावा करने लगेंगे कि किसी गैर हिंदू को उनके धर्म की आलोचना का अधिकार नहीं है. लोग भी उनकी बात पर आसानी से विश्वास कर लेंगे. अपने धर्मांतरण के बारे में पेरियार का कहना था कि वे धर्मांतरण के बजाए हिंदू धर्म के भीतर रहकर ही उसकी आलोचना करते रहेंगे. हिंदुओं के धर्मांतरण के बारे में उनकी स्पष्ट राय थी—

‘यदि कोई हिंदुओं द्वारा इस्लाम, ईसाई, बौद्ध, जैन धर्म की ओर धर्मांतरण के आंकड़ों का विश्लेषण करे तो उनमें सर्वाधिक संख्या दलितों की होगी. वे धर्मांतरण को इसलिए अपनाते हैं क्योंकि हिंदू धर्म उन्हें बहुत ही उत्पीड़क नजर आता है. धर्मांतरण द्वारा वे जातीय निरंकुशता से बाहर निकल जाना चाहते हैं. उनमें से बहुत से लोग मानते हैं कि आस्था के अंतरण द्वारा वे अपनी जीवनशैली और आर्थिक स्थिति में सुधार ला सकते हैं. दूसरे शब्दों में धर्मांतरण उन्हें घृणित कर्मवाद के दुश्चक्र से मुक्ति दिला सकता है. धर्मांतरण उनमें बेहतरी की उम्मीद जगाता है. उनके भीतर बेहतर पहचान और संपत्ति के बारे में नई चेतना का संचार करता है.’11

उन दिनों चैन्नई में ब्राह्मण अपने स्वामित्व वाले होटलों के आगे ‘ब्राह्मण होटल’ का बोर्ड लगाते थे. इससे लगता था कि ब्राह्मण बाकी जातियों से आगे हैं. पेरियार उस प्रवृत्ति को रोकना चाहते थे. इसलिए उन्होंने उसके विरुद्ध आंदोलन छेड़ दिया. 5 मई 1957 को एक ब्राह्मण होटल के सामने से प्रतीकात्मक आंदोलन की शुरुआत हुई. 22 मार्च 1958 तक उनका आंदोलन लगातार चलता रहा. पेरियार के साथ 1010 आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया. आखिरकार उनकी जीत हुई. पूरे राज्य में होटल मालिकों को अपने बोर्ड से ‘ब्राह्मण’ शब्द हटाना पड़ा.

फरवरी 1959 में पेरियार उत्तर भारत की यात्रा पर निकले. धार्मिक कूपमंडूकता के मामले में उत्तरी और दक्षिणी भारत में आज भी बहुत अंतर नहीं है. उत्तर भारत की यात्रा के दौरान पेरियार ने कानपुर, लखनऊ और दिल्ली में बड़ी जनसभाओं को संबोधित किया था. उस समय तक डॉ. आंबेडकर बौद्ध धर्म अपना चुके थे और जातीय उत्पीड़न और अनाचार से बचने के लिए दलित और पिछड़ी जातियों के काफी लोग बौद्ध धर्म को अपनाने लगे थे. पेरियार ने इसकी चर्चा भी अपने भाषण में की थी. उसके बारे में एक संक्षिप्त रिपोर्ट ‘विदुथलाई’ के 21 फरवरी 1959 के अंक में प्रकाशित हुई थी. उनका कहना था—

‘शूद्रों और पंचमों, जिन्हें आजकल पिछड़ी जाति और दलित कहा जाता है—के अवमूल्यन को रोकने के लिए हमें आर्यों द्वारा गढ़े गए धर्म, धर्मशास्त्रों एवं ईश्वर का बहिष्कार करना होगा. जब तक इनकी सत्ता रहेगी, हम जाति को नहीं मिटा सकते. इसी के लिए डॉ. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाया था. अपने अलावा उन्होंने और बहुत से लोगों को धर्मांतरण कराया था. इसलिए सभी हिंदू धर्म, ईश्वर और जाति से मुक्ति हेतु बौद्ध धर्म अपनाने के लिए आगे आना चाहिए.’

पेरियार के अनुसार केवल बुद्ध ही थे जिन्होंने समाज में व्याप्त तरह-तरह की ऊंच-नीच के विरोध में सवाल उठाए थे—

‘‘क्या (बुद्ध के अलावा) किसी और ने पूछा था कि समाज में लंबे समय से जातीय भेदभाव क्यों मौजूद है? बुद्ध ने यह सवाल उठाया था. वे राजा के बेटे थे. उन्होंने कई चीजों पर सवाल उठाए थे. उन्होंने पूछा—‘वह आदमी बूढ़ा क्यों है?’ ‘वह व्यक्ति नौकर क्यों था? वह अंधा क्यों है? बुद्ध ने पूछा था—‘वह आदमी नीच जाति का क्यों है?’ उन्होंने बताया—‘उसे भगवान ने ही ऐसा बनाया है?’ इसपर बुद्ध ने सवाल किया—‘वह ईश्वर कहां है जिसने इसे बनाया है?’ तब वे आत्मा का सिद्धांत बघारने लगे. तब बुद्ध ने पूछा—‘आत्मा क्या है? क्या किसी ने उसे देखा है?’….बुद्ध के मुख्य सिद्धांत हैं—

‘निहित सत्य को जानने के लिए प्रत्येक वस्तु का अपने विवेकानुसार भली-भांति विश्लेषण करो.’ तथा ‘यदि तुम्हारा विवेक उसे सच मानता है, तभी उसपर विश्वास करो.’ पेरियार ने आगे कहा था—‘ईश्वर, आत्मा, देवता, स्वर्ग, नर्क, ब्राह्मण, शूद्र, पंचम यदि ये बातें तुम्हारी समझ में नहीं आती हैं तो इनपर विश्वास मत करो. ये सब काल्पनिक शब्द हैं. कुछ भी स्वीकारने से पहले अपनी सहज बुद्धि का उपयोग करो. ईश्वर ने ऐसा कहा है, वेद ऐसा कहते हैं या मनुस्मृति में यह सब लिखा है—ऐसी बातों पर विश्वास वृथा है. जिसे तुम्हारी बुद्धि स्वीकारती है, केवल उसी पर भरोसा करो.’’12

पेरियार का विश्वास किसी भी धर्म में नहीं था. बावजूद इसके ऐसे कई अवसर आए जब उन्होंने बौद्ध धर्म की प्रशंसा की. अपनी मृत्यु से कुछ महीने पहले उन्होंने ‘ईश्वर और मनुष्य’ विषय पर सारगर्भित भाषण दिया था. भाषण में ईश्वर की अवधारणा को नकारा गया था, साथ ही विभिन्न धर्मों पर चर्चा की थी. उसमें बौद्ध धर्म की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा था—‘यदि हम बौद्ध धर्म को कोई और नाम देना चाहें तो हम उसे ‘बुद्धि’ यानी ‘ज्ञान का धर्म’ कह सकते हैं. बौद्ध धर्म को ‘ज्ञान का धर्म’ या ‘ज्ञानमय धर्म’ क्यों कहा जाएगा? क्योंकि बाकी जितने भी धर्म हैं, वे सभी ईश्वर केद्रित हैं, जबकि बौद्ध धर्म किसी ईश्वर को मान्यता नहीं देता. यह इसलिए है कि कोई भी ऐसा ‘ज्ञानमय धर्म’ या ‘ज्ञान का धर्म’ नहीं हो सकता जो ईश्वर पर विश्वास करता हो. यही कारण है कि बौद्ध धर्म को ‘विवेकशील धर्म’ कहा है. उस भाषण में पेरियार ने बौद्ध धर्मावलंबियों की यह कहकर आलोचना की थी कि वे भी बौद्ध धर्म को ‘ज्ञान के धर्म’ के रूप में अंगीकार करने में विफल रहे हैं. पेरियार ने ऐसा क्यों कहा था? इस बारे में उनका कहना था कि किसी भी सामान्य—‘धर्म को अपनी पहचान बनाने के ईश्वर में विश्वास करना आवश्यक है. इसके लिए उसके अनुयायियों को कुछ बकवास कहानियों, रीति-रिवाजों और कर्मकांडों पर विश्वास करने को कहा जाता है. बौद्ध धर्म कर्मकांडों को निरर्थक विश्वासों का खंडन करता है. बावजूद इसके अधिकांश बौद्ध मतावलंबी उसी जीवन-पद्धति को अपनाए हुए हैं. उनकी पूजा पद्धति भी उसी प्रकार की है.’ धर्म और जाति-व्यवस्था पर प्रहार करते हुए अपने 25-26 दिसंबर 1958 के भाषण में पेरियार ने पुनः दोहराया था कि ऐसा ईश्वर जिसे लगता है कि वह दलितों और शूद्रों के छूने भर से अपवित्र हो जाएगा, को मंदिर में रहने का कोई अधिकार नहीं है. ऐसी मूर्ति को तुरंत हटाकर नदी किनारे डाल देना चाहिए, ताकि लोग उसका इस्तेमाल कपड़े धोने के लिए कर सकें. एक अवसर पर उन्होंने कहा था—

कहा जाता है कि ईश्वर ने जाति की रचना की है. यदि यह सच है तो सबसे पहली जरूरत इस बात ही है कि ऐसे ईश्वर को ही नष्ट कर दिया जाए. यदि ईश्वर इस क्रूर प्रथा से अनभिज्ञ है तो उसे और भी जल्दी खत्म किया जाना चाहिए. यदि वह इस अन्याय से रक्षा करने या इसपर रोक लगाने में असमर्थ है तो इस दुनिया में बने रहने का उसे कोई अधिकार नहीं है.

4

पेरियार ने गौतम बुद्ध को विश्व के सबसे पहले क्रांतिधर्मा विचारक स्वीकार किया था. कारण था कि बुद्ध ने ईश्वर, आत्मा-परमात्मा जैसी अतार्किक मान्यताओं को चुनौती दी थी. उन्होंने कहा था—‘आमतौर पर ईश्वरीय विश्वास के आधार पर मनुष्यों को मूर्ख बनाया जाता है. मैं नहीं जानता कि मानवमात्र की इस अज्ञानता का पर्दाफाश करने के लिए अभी तक कोई विचारक आगे क्यों नहीं आया है? यहां तक कि सुशिक्षित बुद्धिजीवी भी इस मामले में आलसी रहे हैं. यदि हम दुनिया के पहले दार्शनिक की खोज करना चाहें तो हम कह सकते हैं कि वह एकमात्र गौतम ही बुद्ध थे. हमारा इतिहास भी यही बताता है. उनके बाद पश्चिम में जन्मा एकमात्र विचारक सुकरात था. उनके दार्शनिक विचारों को भली-भांति नहीं समझा गया.’13

उस ज्ञानमय धर्म या ‘बुद्धि के धर्म’ को नष्ट कर दिया गया. कैसे नष्ट कर दिया गया? पेरियार के शब्दों में, ‘उन्होंने(ब्राह्मणों ने) हिंसक रास्ते अपनाए. बौद्धों का कत्लेआम किया गया. उनके मठों को मिट्टी में मिला दिया गया.’14 पेरियार किसी भी प्रकार की व्यक्ति पूजा के विरोधी थे. मगर बुद्ध के विचार उनकी वैचारिक चेतना के करीब थे. उनके प्रचार-प्रसार के लिए वे बुद्ध जयंती मनाने के पक्ष में पक्ष थे. परंतु वे नहीं चाहते थे कि बुद्ध जयंती के नाम पर होने वाले उत्सव महज कर्मकांड बनकर रह जाएं. इसलिए ‘बुद्ध जयंति क्यों मनाई जाए? लोग बुद्ध के जन्म को उत्सव के रूप में क्यों लें? पेरियार इन सवालों पर भी विचार करते हैं. उनके अनुसार बुद्ध जयंती बनाने का आशय यह नहीं है कि लोग बुद्ध-प्रतिमा के आगे खड़े होकर कपूर, नारियल, फल-फूल वगैरह लेकर उसकी पूजा-अर्चना करें. उनके अनुसार—‘हम बुद्ध के जीवन से शिक्षा ले सकते हैं और उसे अपने जीवन में उतार सकते हैं. मैं उनसे नास्तिक के रूप में प्रेरणा लेता हूं. यदि नास्तिक का अभिप्रायः है वेदों, धर्मशास्त्रों और पुराणों में अविश्वास है, तो निश्चित रूप से मैं नास्तिक ही हूं.’ पेरियार को डर था कि बुद्ध जयंती के बहाने ऐसे व्यक्ति जो वेद, शास्त्र तथा पुराणों में आस्था रखते हों, अपनी बात को घुमा-फिराकर लोगों के सामने रख सकते हैं. पेरियार के अनुसार जातिभेद के आधार पर दूसरों को कमतर समझने वाला, निरंकुश आचरण का समर्थक व्यक्ति ही ऐसा कर सकता है.

पेरियार के अनुसार बुद्ध न तो संत थे, न ही महात्मा. असल में वे ऐसे बुद्धिवादी चिंतक थे जिन्होंने प्राचीनकाल में हिंदू ऋषियों का उनके अनर्गल कर्मकांडों और आडंबरों के आधार पर विरोध किया था. इसलिए बौद्ध धर्म प्रचलित अर्थों में धर्म नहीं है. जो लोग बौद्ध धर्म को धर्म मानते हैं, वे गलत हैं. धर्म के लिए उसके केंद्र में ईश्वर का होना आवश्यक है. इसके अलावा स्वर्ग, नर्क, मोक्ष, भाग्य, पाप-पुण्य आदि अवधारणाओं पर विश्वास भी आवश्यक है. बड़े धर्मों का काम किसी एक ईश्वर नहीं चलता. उनमें अनेक ईश्वर भी हो सकते हैं. उन ईश्वरों के घर-परिवार, आवास, आने-जाने के स्वतंत्र साधन, पत्नियां और बच्चे भी हो सकते हैं. भारतीय तो ऐसे ईश्वरों को ही पहचानते हैं. 1857 के सैनिक विद्रोह, जिसे कुछ लेखक भारत का पहला स्वाधीनता संग्राम मानते है, की जाति के संदर्भ में समीक्षा करते समय पेरियार ने बौद्ध धर्म के साथ-साथ जैन धर्म की प्रशंसा की थी—

‘इतिहास गवाह है कि जिन बौद्ध और जैन श्रमणों ने हमारे लोगों को सद्व्यवहार और ज्ञान की महत्ता की शिक्षा देनी चाही, तमिल राजाओं ने उनका उत्पीड़न किया गया. उन्हें तरह-तरह के मामलों में फंसाया गया और कत्लेआम किया गया. यह दर्शाता है कि हमारे देश पर निरंकुश और असभ्य शासकों का राज रहा है.’15

बुद्ध के अनुसार मनुष्य का ईश्वर के प्रति आकर्षित होना आवश्यक नहीं है. बौद्ध धर्म अपने मानवतावादी आचरण के लिए बाकी धर्मों से बेहतर सिद्ध होता है. बुद्ध चाहते थे कि मनुष्य केवल मनुष्य का ध्यान करे. बुद्ध ने न तो स्वर्ग का महिमा-मंडन किया, न ही नर्क से लोगों को डराया. उन्होंने मनुष्य के आचरण पर जोर दिया. उसके लिए अष्ठांग मार्ग प्रस्तुत किया, जिसे आगे चलकर लगभग सभी धर्मों ने धार्मिक शुचिता के नाम पर अपनाया. पेरियार बुद्ध की प्रशंसा करते हैं. लेकिन वे उनके सम्मोहन से ग्रस्त नहीं हैं. न ही आस्था के बदले वे अपने विवेक को गिरवी रखना चाहते हैं, जैसी कि ब्राह्मण धर्म के अनुयायी अपेक्षा रखते हैं. अपितु वे लिखते हैं कि कोई बात इसलिए मान्य नहीं होनी चाहिए कि उसे किसी महात्मा ने कहा है. या उसे बहुत से लोग मानने वाले हैं. अपितु मनुष्य को अपने विवेक की कसौटी पर जो खरा प्रतीत हो, उसी को स्वीकार करना चाहिए. उसके लिए आवश्यक है कि हर सत्य या अच्छी लगने वाले तथ्यों को वह अपनी कसौटी पर परखे. उनके अनुसार बुद्धिज्म केवल गौतम बुद्ध की जयंतियों को मनाना नहीं है. हमारे लिए बुद्ध होने का अभिप्राय बुद्धि, विवेक बुद्धि का साथ होना है. अपने तर्क-सामथ्र्य का साथ होना है. पेरियार के अनुसार—

‘बौद्ध धर्म किसी भी प्रकार के श्रेष्ठतावाद(ब्राह्मणवाद) के लिए एटमबम के समान है.’16

गौतम बुद्ध का जन्म करीब 2500 वर्ष पहले हुआ था. उस समय ब्राह्मण यद्यपि धर्म और सभ्यता के दावेदार बने हुए थे, मगर यज्ञादि में जिस प्रकार हजारों बलियां एक साथ वे चढ़ा देते थे, जाति के नाम पर अपने ही धर्म-बंधुओं के साथ दमन और अवमाननापूर्ण वर्ताब करते थे, उसे देखते हुए उनका आचरण असभ्य और जंगली प्राणियों जैसा था. बुद्ध ने उन सबका विरोध किया. बुद्ध का रास्ता आसान नहीं था. देखा जाए तो उन दिनों ज्ञान और तर्क का पक्ष लेने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए अपनी बात कह पाना आसान नहीं था. परंतु बुद्ध अपने बातों पर अडिग रहे. वैदिक हिंसा के स्थान पर उन्होंने मनसा-वाचा-कर्मणा अहिंसा का पक्ष लिया. पेरियार के अनुसार उनकी ताकत उनके शब्दों में थी. पेरियार की तरह बुद्ध को भी अपने जीवन में आलोचनाओं का सामने करना पड़ा था. बुद्ध के बाद उनके आलोचकों ने मुखर स्वर में उनकी आलोचना करना आरंभ कर दिया था. पुराणों के बहाने प्राचीन धर्म को पुनर्जीवित करने की कोशिश की जाने लगी थी. जाहिर है, बुद्ध के बाद उनकी आलोचना में वही लोग लगे थे जो धर्म के नाम पर कर्मकांड और तर्क के स्थान पर तंत्र-मंत्र की वापसी चाहते थे. ऐसे ही लोग पेरियार का विरोध करते आए हैं.

रामायण को हिंदु नैतिक जीवन का पाठ पढ़ाने वाले ग्रंथ के रूप में देखते हैं. पेरियार के अनुसार रामायण की रचना बौद्ध धर्म के प्रभाव को मद्धिम करने के लिए, उसकी ख्याति से उबरने की कोशिश में की गई थी. बुद्ध का धर्म ताकत का धर्म नहीं था. धर्म के प्रचार-प्रसार का जिम्मा उन्होंने भिक्षुओं और श्रमणों को सौंपा हुआ था. लेकिन जातियों में बंटे हिंदू धर्म के लिए इस तरह के समर्पित धर्म-योद्धा मिलने संभव नहीं थे. जाति व्यवस्था के नाम पर ब्राह्मणों ने खुद ही निचली जातियों को धार्मिक कार्यों में सहभागिता से अलग-थलग किया हुआ था. ऐसे में शक्ति के माध्यम से ‘धर्म-विजय’ दिखना ही एकमात्र रास्ता था. रामायण यही काम करती है. अशोक ने अपने बेटे और बेटी को बौद्ध धर्म की ध्वजा फहराने के लिए श्रीलंका भेजा था. वाल्मीकि के राम आर्य अपनी पत्नी को छुड़ाने के बहाने आर्य-धर्म की पताका फहराने के लिए लंका-विजय करते हैं. बुद्ध और अशोक ने जो धम्मविजय की थी, उसका प्रमाण आज श्रीलंका में बौद्ध धर्म की उपस्थिति है. वहां 70 प्रतिशत लोग आज भी बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं. उसके अलावा चीन, जापान, तिब्बत जैसे देषों में बौद्ध धर्म आज भी कायम है. जबकि हिंदू धर्म भारत से बाहर अपनी छाप छोड़ पाने में असफल रहा. पेरियार के अनुसार—

‘बुद्ध के पहले राम-कथा छोटी-सी कहानी थी. बौद्ध धर्म की लोकप्रियता का सामना करने के लिए उसमें बाद में भारी जोड़-तोड़ की गई. बौद्धों और जैनियों को नास्तिक, हत्यारा, डाकू, वैदिक संस्कृति का दुश्मन आदि कहा गया. पेरियार के शब्दों में शैव शिव से प्रार्थना करते हैं कि वह उन्हें शक्ति दे ताकि वे बौद्धों की पत्नियों के साथ व्याभिचार कर सकें.’17

पेरियार के अनुसार 75 प्रतिशत से अधिक पुराणों का लेखनकाल बुद्ध से बाद का है. पाश्चात्य विद्वानों का भी यही मत रहा है. बुद्ध के तर्कसंगत उपदेशों का प्रतिवाद करने के लिए पुराण लेखकों ने जिन्हें ऋषि कहा जाता था, अवतारवाद की परिभाषा गढ़ी. उन्होंने कृष्ण को मुख्य देवता के रूप में चित्रित किया. उसका एक ही उद्देश्य था, लोगों को ब्राह्मणवाद की ओर आकर्षित करना. चमत्कारपूर्ण वर्णन जनसाधारण को हमेशा ही लुभाता आया है. गीता की रचना और भी बाद में हुई. उसके बाद ही उसे महाभारत में जोड़ा गया. लोकमानस में बुद्ध की प्रतिष्ठा को देखते हुए ब्राह्मणों ने मजबूरी में उनकी प्रषंसा की. अवतारवाद को संरक्षण देने के लिए बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित किया गया. उसके बहाने सनातनी हिंदू पुराणों के लेखनकाल को बुद्ध से बहुत पीछे तक ले जाते हैं. इस काम में संस्थाएं भी पीछे नहीं हैं—‘यह कहते हुए कि ब्रिटिश विद्वानों द्वारा लिखे गए इतिहास पर विश्वास नहीं किया जाना चाहिए, उत्तर भारत में भारतीय विद्या भवन ने मूर्खतापूर्ण धार्मिक आख्यानों और अजनतांत्रिक धर्मशास्त्रों पर पर लिखना जारी रखा. के. एम. मुंशी उसके अध्यक्ष थे. डॉ. राधाकृष्णन तथा अरबपति बिरला उसके सदस्य थे. उन्होंने ‘वैदिक युग’ को लेकर पुस्तक तैयार की, जिसमें के. एम. मुंशी का बड़ा योगदान था. उन्होंने भी माना था कि प्राचीन युग असभ्य था. पुराण और महाकाव्य आदि ग्रंथ इतिहास नहीं हैं….वह सब कल्पना की उपज है. ‘व्यास’ शब्द का अर्थ किस्सागो है. पुराणों ने लोगों के दिमाग पर कब्जा कर लिया और वे उनपर शासन करने लगे. हमारी समस्याओं का मूल कारण यही है.’

 

आजीवक दर्षनों के साथ-साथ बौद्ध, जैन दर्षन और सिख धर्म ने भी वेदों को प्रामाण्य मानने से इन्कार कर दिया था. ये धर्म-दर्षन किसी ईश्वर या आत्मा-परमात्मा पर विश्वास नहीं करते. इसलिए ब्राह्मण ग्रंथों में बौद्ध और जैन दोनों दर्शनों नास्तिक कहा गया है. एक स्थान पर पेरियार नास्तिक की परिभाषा करते हैं. उनके अनुसार बुद्ध सामान्य संज्ञा है. किसी भी व्यक्ति को जो बुद्धि का प्रयोग करता है, उसे बुद्ध कहा जा सकता है. ‘निश्चित रूप से मैं भी एक बुद्ध हूं. मैं ही क्यों, हम सभी जो तर्क और बुद्धि-विवेक के आधार पर फैसले करते हैं—बुद्ध हैं.’ इसी तरह सिद्ध वह व्यक्ति है जो अपनी ज्ञानेंद्रियों पर नियंत्रण रख सकता है. वैष्णव और शैव किसी न किसी देवता को मानते हैं. यही स्थिति दूसरे संपद्रायों की है, वे भी किसी न किसी देवता में श्रद्धा रखते हैं. जहां देवता नहीं हैं, वहां गुरु है जो परोक्ष रूप में साकार या निराकार देवता से मिलवाने का दावा करता है. केवल बौद्ध धर्म ऐसा है जिसमें कोई केंद्रीय देवता नहीं है. न ही वह जीवन से इतर किसी सुख की दावेदारी करता है. वह किसी भी प्रकार के ईश्वर, आत्मा, लोक-परलोक, मोक्ष अथवा सनातनवाद को नकारता है. नास्तिक शब्द भी इसके करीब है. नास्तिक वह है जो आत्मा परमात्मा के अस्तित्व को नकारता है; संसार और जीवन के बारे में बुद्धिसंगत निर्णय लेने का समर्थन करता है. ब्राह्मणवादी मूर्ति पूजा का विरोध करने वाले को भी नास्तिक कहकर धिक्कारने लगते हैं. पेरियार के अनुसार नास्तिक होना, सही मायने में मनुष्य होना है. ऐसा मनुष्य जो न केवल अपने ऊपर अपितु पूरी मनुष्यता पर विश्वास रखता है.

भारतीय समाज धर्म के अलावा जाति के शिकंजे में भी फंसा हुआ है. ये दोनों ही तर्क और मानवीय विवेक के विरोधी है. इनकी ताकत मनुष्य की अज्ञानता में निहित है. इसलिए घूम-फिरकर वे आस्था और विश्वास पर लौट आते हैं. तयशुदा मान्यताओं पर तर्क करने और सवाल उठाने से उन्हें परेशानी होती है. इसलिए वे चाहते हैं कि अपनी विवेक-बुद्धि को बिसराकर मनुष्य केवल उनके कहे का अनुसरण करे. वेद, पुराण, गीता, रामायण आदि धर्मग्रंथों में जो लिखा है, उनपर आंख मूंदकर विश्वास कर लिया जाए. यही अतीतोन्मुखी दृष्टि ब्राह्मणवाद है; जो बार-बार पीछे की ओर ले जाती है और मानव-बुद्धि की विकासयात्रा का निषेध करती है. पेरियार इससे आजन्म जूझते रहे. इसके लिए उन्होंने किसी धर्म, व्यक्ति या राष्ट्र की परवाह तक न की. खुलकर कहा कि—

‘मैं मानव-समाज का सुधारक हूं. मैं किसी देश, ईश्वर, धर्म, भाषा अथवा राज्य की परवाह नहीं करता. मेरे सरोकार केवल मानवमात्र के कल्याण एवं विकास को समर्पित हैं.’ यही संकल्प क्रांतिधर्मी पेरियार तथा उनके विचारों को समसामयिक और प्रासंगिक बनाता है.

 

ओमप्रकाश कश्यप

 

संदर्भ:

1 जाति मदे च अतिमानिता च लोभो च, दोसो च मदो च मोहो

ऐते अवगुणा येसुब संति सब्बे तानीष खेत्तानि अयेसलानि

जाति मदो च अतिमानिता च लोभो च, दोसो च मदो च मोहो

ऐते अवगुणा येसुब न संति सब्बे तानीष खेत्तानि सुयेसलानि—मातंग जातक-497

  1.   अंबट्ठसुत्त, दीघनिकाय, 1/3
  2.   पेरियार, 1947 में सलेम कालिज में ‘हिंदू दर्शन’ पर दिया गया व्याख्यान
  3.   कुदी अरासु, 15 अगस्त 1926
  4.   कुदीअरासु, 2 दिसंबर, 1944
  5.   पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पृष्ठ-208.
  6.   पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पृष्ठ-227
  7. विदुथलाई, 14 मार्च 1954.
  8. विदुथलाई, 14 मार्च 1954, पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पृष्ठ-265
  9. विदुथलाई, 14 मार्च 1954, पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पृष्ठ-265
  10. छूआछूत पर पेरियार के विचार, मीना कंडास्वामी द्वारा तमिल से अंग्रेजी में अनूदित.
  11. विदुथलाई, 19 अप्रैल 1956,पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पेज-274-75
  12. कलेक्टिड वर्क्स आफ पेरियार, पृष्ठ-152
  13. कलेक्टिड वर्क्सआफ पेरियार, पृष्ठ-173
  14. विदुथलाई, 15 अगस्त 1957, पृष्ठ-300
  15. पेरियार आन बुद्धिज्म, रामास्वामी पेरियार, राम मनोहरन के आलेख ‘फ्रीडम फ्राम गाड: पेरियार एंड रिलीजन’ से उद्धृत
  16. कलेटिक्ट वर्क आफ पेरियार, पृष्ठ-306-307

 

 

पेरियार – दो : दक्षिण भारत का आत्मसम्मान आंदोलन

सामान्य

(आदर्श समाज को लेकर हर महापुरुष का एक सपना रहा है. पश्चिम में प्लेटो से लेकर थॉमस मूर और आल्डोस हक्सले तक. भारत में संत रविदास ने भी समानता, सहयोग और स्वतंत्रता पर आधारित सपना देखा था, जिसे हम ‘बेगमपुरा’ के नाम से जानते हैं. आने वाली दुनिया’ में रामास्वामी पेरियार भी इसी प्रकार का सपना देखते हैं. वैज्ञानि सोच के प्रसारक ईवी रामास्वामी इसमें ऐसे अनेक आष्विकारों की कल्पना करते हैं, जो आज हमारे सामने हैं. इससे उनकी दूरंदेशी का अनुमान लगाया जा सकता है. ओजस्वी विचारकों के कारण पेरियार को यूनेस्को ने ‘दक्षिण एशिया का सुकरात’ कहा तो कुछ विद्वानों ने उन्हें ‘भारत का वाल्तेयर’ माना है. कुछ विद्वान उनकी तुलना रूसो से करते हैं. उनके एक लेख के आधार पर अंग्रेजी दैनिक ‘दि हिंदू’ में उनकी तुलना बीसवीं शताब्दी का एच.जी.वेल्स से की गई थी. ओमप्रकाश कश्यप)

 

कांग्रेस से मोहभंग के पश्चात पेरियार का सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई में स्वतंत्र रूप से सक्रिय होना, न केवल उनके, अपितु पूरे तमिलनाडु के लिए क्रांतिकारी घटना थी. किंतु जैसे सूरज के ताप और प्रकाश का स्वयं सूरज के लिए उतना महत्त्च नहीं होता, जितना शेष जीवजगत के लिए, उसी प्रकार पेरियार के नेतृत्व में चले आंदोलनों का लाभ जितना उनके देश और समाज को हुआ, उसके सापेक्ष पेरियार को मिली प्रसिद्धि और मानसम्मान न के बराबर है. उस आंदोलन के फलस्वरूप देश के दक्षिणी प्रांतों के साथसाथ बाकी हिस्सों में भी सामाजिक जागृति का संचार हुआ. उत्पीड़न एवं वंचना के शिकार लोग अपने अधिकारों तथा मानसम्मान की सुरक्षा एवं संरक्षा हेतु सन्नद्ध होने लगे. उसके फलस्वरूप न केवल कांग्रेस को अपनी नीतियों में बदलाव के लिए विवश होना पड़ा, अपितु सरकार को भी सामाजिक न्याय की भावना के साथ आगे आना पड़ा. पेरियार ने हजारों वर्षों से रूढ़ पड़ी परंपराओं, आडंबरों और बौद्धिक पाखंडों पर प्रहार किया. इस कारण समाज का एक वर्ग आज भी उनसे बुरी तरह चिढ़ता है. पेरियार बहुत कम समय तक सक्रिय राजनीति मंे रहे. कांग्रेस से अलग होने के बाद कभी राजनीति से जुड़ने की कोशिश नहीं की. बावजूद इसके दक्षिण भारतीय राजनीति को जितना उन्होंने प्रभावित किया, उतना उनका समकालीन कोई नेता न कर सका. अपने समाज के बीच पेरियार की वही भूमिका है, जो अमेरिकी समाज में अब्राह्मम लिंकन, थाॅमस जेफरसन और टाॅमस पेन, इंग्लेंड में जाॅन स्टुअर्ट मिल तथा फ्रांस में वाल्तेयर और रूसो की है. उनसे पहले समाज में जितने भी नैतिक प्रतिमान प्रचलित थे, धर्म तथा उसके गर्भ से जन्मी परंपराएं उनका एकमात्र òोत हुआ करती थीं. उनका प्रभाव इतना गहरा होता था कि लोग न केवल धर्म और परंपराओं को जीते थे, बल्कि उनके लिए भी जीते थे. देखने में सबकुछ सहज और स्वाभाविक लगता था, असलियत में वह सामंतवाद को बचाए रखने, शोषण को स्थायी बनाए रखने वाली व्यवस्था थी. ‘क्या’, ‘क्यों’ और ‘क्यों नहीं’ जैसे प्रश्नों के लिए जिनपर आधुनिक सभ्यता की नींव टिकी है, उसमें कोई स्थान न था. जो भी था, सब किसी न किसी रूप में थोपा हुआ रहता था. दावा हालांकि खुलेपन का था, दिखाया यही जाता था कि लोगों ने उसे खुशीखुशी अपनाया हुआ है—लेकिन सब कुछ पूर्वनियोजित, पूर्वनिर्धारित और पुरोहित वर्ग की स्वार्थसिद्धि के वास्ते था. परंपरा को प्रमाण बनाए रखने के लिए कुछ कहानियां और मिथ गढ़ लिए जाते थे. जनसमाज के लिए वही सांसारिकता का पर्याय होते थे. उन्हीं के अंधानुकरण को वह जीवनसिद्धि माने रहता था. उनके प्रभाव में मानवीय विवेक की भूमिका घट जाती थी. मानसिक रूप से परंतत्र व्यक्ति केवल अनुसरण कर सकता है, सो परंपरा को प्रमाण मानने वाले समाज में अनुगमन की प्रवृत्ति पीढ़ीदरपीढ़ी कायम रहती थी.

पेरियार समृद्ध पिता की सफल संतान थे. परंतु आर्थिक समृद्धि से उनकी सामाजिक प्रस्थिति पर खास अंतर नहीं पड़ा था. कथित उच्च जातियों से आए कांग्रेसजनों के बीच उनकी स्थिति अब भी ‘पिछड़े’ व्यक्ति के समान थी. वे समझ चुके थे कि व्यक्तिगत उपलब्धियों के बल पर लोगों के मन में सम्मानभाव तो जगाया जा सकता है, परंतु उन धारणाओं को नहीं बदला जा सकता जो लोगों के मनोमस्तिष्क में शताब्दियों से काई की भांति जमा हैं. जो मनुष्य को जन्म से ही ऊंचा या नीचा घोषित कर देती हैं. वह न केवल दक्षिणभारत बल्कि संपूर्ण दुनिया के लिए सर्वाधिक परिवर्तनकारी दौर था. रूसी क्रांति संपन्न हो चुकी थी. साम्यवाद का प्रभाव दक्षिण भारत में भी था, किंतु शेष भारत की तरह दक्षिण में भी अधिकांश साम्यवादी नेता तथाकथित उच्च जातियों से आए थे. उनके अपने जातीय स्वार्थ प्रबल थे. भारत में जाति सामाजिक स्तरीकरण और अमानवीय आचरण का मुख्य कारण रही है. जातिआधारित वर्गभेद पर प्रहार किए बिना साम्यवाद की सफलता संभव भी नहीं थी. इससे भारत में साम्यवादी आंदोलन की असफलता और भटकाव के कारणों को समझा जा सकता है. यही कारण है कि उत्पीड़ित और वंचित जनों के पक्ष में आवाज उठाने वाले पेरियार, साम्यवादी होने का दावा करने वाले नेताओं से दूरी बनाए हुए थे. उनका मानना था कि माक्र्स का दर्शन केवल पश्चिमी देशों में कारगर हो सकता है, जहां जाति जैसी भयावह बीमारी नहीं है. धर्म का सार्वजनिक जीवन में न्यूनतम हस्तक्षेप है. भारतीय समाज में समानता और आत्मसम्मान की लड़ाई यदि किसी को लड़नी है तो उसे पहले जाति से टकराना पड़ता है; और जाति की जंग जब तक अविजित रहेगी, जब तक उसे धर्म का समर्थन प्राप्त है. यथास्थितिवादियों के अनुसार जाति और धर्म समाज में सुखशांति बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं. किंतु असलियत में वे समाज के बहुसंख्यक वर्ग के मूलभूत अधिकारों पर कुठाराघात करती हैं. जातीय अनुशासन का लाभ उठाकर कथित ऊंची जातियां निचली जातियों के लिए शासक का काम करती हैं. सामाजिक सुखशांति के लिए जो लोग धर्म और जाति को अपरिहार्य मानते हैं, वे या तो बहुत चालाक और स्वार्थी हैं, अथवा दिग्भ्रमित.

पेरियार ने धर्म को चुनौती दी. जाति के आधार पर राजनीति के स्वाभाविक दावेदार बने शीर्षस्थ जातियों के बड़े नेताओं को बहस के लिए ललकारा. ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ द्वारा द्रविड़ों की सोयी चेतना को जगाने का काम भी किया. उन्होंने तमिलवासियों को सवाल करना सिखाया. उसके फलस्वरूप पहली बार 90 प्रतिशत लोग यह सोचने को विवश हुए कि वे शिक्षा और रोजगार के अवसरों से बंचित क्यों हैं? कि तीन प्रतिशत ब्राह्मण सरकार के तीनचैथाई से अधिक पदों पर कैसे चले जाते हैं? कि दलितों और पिछड़ों को सार्वजनिक मार्गों पर आनेजाने की स्वतंत्रता क्यों नहीं है? कि जन्म से एक समान होने के बावजूद मनुष्य को जाति के आधार पर भेदभाव और असमानता का शिकार क्यों बनाया जाता है? इन प्रश्नों को उठाने वालों में पेरियार पहले नेता नहीं थे. दक्षिण भारत की लंबी पूरी संतपंरपरा उनके समर्थन में थी. 1892 में गठित ‘मद्रास समाजसुधार संघ’ ने भी सांगठनिक स्तर पर द्रविड़ अस्मिता का मामला उठाया था. फुले के विचारों से प्रभावित संघ के नेताओं ने जोरशोर से यह प्रचारित किया था कि ब्राह्मण विदेशी आर्यों के वंशज हैं, जबकि गैरब्राह्मण द्रविड़ भारत के मूल निवासी हैं. फुले ने धर्मशास्त्रों की प्रामाणिकता पर प्रश्न उठाए थे. कहा था कि वे सब ब्राह्मणों द्वारा स्वार्थसिद्धि के लिए गढ़ी गई गल्पकथाएं हैं. उसी परंपरा को विस्तार देते हुए पेरियार ने धर्मशास्त्रों को अपनी विवेचना का आधार बनाया. इसके साथसाथ उन्होंने धर्म तथा ईश्वर की सत्ता को भी कठघरे में लिया. उससे पहले न्याय और समानता की मांगों का आकलन धार्मिक आचारसंहिताओं के आधार पर किया जाता था. आवश्यकता पड़ने पर उनका समाधान भी शास्त्रों में खोजा जाता था. परंपराश्रित होने के कारण ब्राह्मणसंस्कृति विशेषता विहीन, विशेषज्ञ संस्कृति थी. उसमें कुछ जातियां विशेषाधिकार संपन्न होती हैं, तो कुछ पूर्णतः अधिकारविपन्न. अधिकारविपन्नों के लिए व्यवस्था होती कि वे विशेषाधिकार संपन्न जातियों के आदेशों का बिना किसी शर्त के पालन करें. यही शास्त्रसम्मत मर्यादा है. दुष्परिणाम यह होता है सामाजिक नेतृत्व हेतु मौलिक प्रतिभाएं आगे नहीं आ पातीं. इससे ज्ञान की धारा अवरुद्ध होती है; तथा सत्ताकेंद्रों पर खास वर्गों का अधिपत्य निरंतर बना रहता है. समयानुकूल बोध के अभाव में परंपरा और मिथक जनसाधारण का मार्गदर्शन करने लगते हैं; और सभ्यता की प्रतिगामी यात्रा शुरू हो जाती है. पेरियार ने लोगों के दिमाग को ब्राह्मणवाद से मुक्त किया. उनके सोच को वैज्ञानिकीकरण की ओर ले गए. इस योगदान के लिए तमिल जनता ने उन्हें अपना वास्तविक ‘जननेता’(थलाईवर) स्वीकार किया. कांग्रेस छोड़ते समय पेरियार ने कहा था—‘कांग्रेस और उसके नेता गैरब्राह्मणों का भला नहीं कर सकते. इसलिए मेरी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है, कांग्रेस को खत्म करना.’ वे अपने उद्देश्य में सफल भी रहे. गांधी, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी जैसे दिग्गज नेताओं के रहते कांग्रेस दक्षिण भारत में तीसरे स्तर का राजनीतिक दल बना रहा.

1925 में कांग्रेस से अलग होने के बाद उन्होंने स्वयं को पूरी तरह ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ को समर्पित कर दिया. पहले सम्मेलन में उन्होंने समानता और आत्मगौरव का मुद्दा उठाया. उन्होंने गैरब्राह्मणों का आवाह्न किया कि वे किसी भी बौद्धिकसांस्कृतिक और सामाजिक जड़ताओं से खुद को मुक्त करें. समानता उनका जन्मसिद्ध अधिकार है. लेकिन वह लक्ष्य किसी की दया या परोपकार के भरोसे प्राप्त नहीं किया जा सकता. लक्ष्यपूर्ति के लिए अपने आप को समझना और उसके लिए संगठित प्रयास आवश्यक हैं. संस्था का दूसरा सम्मेलन एम. आर. जयकर की अध्यक्षता में पेरियार के गृह नगर इरोड में 10 मई 1930 को हुआ. पेरियार ने उसमें जोरदार भाषण दिया. अपने भाषण में उन्होंने मूर्तिपूजा और आडंबरवाद को त्यागने का आवाह्न किया. उससे अगले सम्मेलन में जो अगस्त 1931 में विरुदनगर में हुआ था, पेरियार ने छूआछूत का विरोध करते हुए अंतरजातीय विवाह पर जोर दिया. सम्मेलन में उन्होंने शिक्षा और सामूहिक भोज को बढ़ावा देने की सलाह दी. लोगों पर उसका अनुकूल प्रभाव पड़ा. वे समझने लगे कि जातीयविषमताओं को मिटाने के लिए आधुनिक शिक्षा के साथसाथ सामूहिक भोजन को बढ़ावा देना अत्यावश्यक है.

महात्मा ज्योतिराव फुले और डाॅ. भीमराव आंबेडकर दोनों सामाजिक समानता और स्वतंत्रता को राजनीतिक स्वतंत्रता और समानता से अधिक महत्त्व देते थे. आजादी से पहले आवश्यक है ऐसे समाज का गठन जो आजादी का मूल्य समझता हो. जिसे अपने साथसाथ दूसरों की स्वतंत्रता की भी फिक्र हो. इस संबंध में पेरियार की राय महात्मा फुले और डाॅ. आंबेडकर जैसी ही थी. सक्रिय राजनीति का परित्याग तथा ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के माध्यम से सामाजिक न्याय के संघर्ष को आगे बढ़ाना—उनका सुविचारित निर्णय था. हिंदू धर्म में व्याप्त ऊंचनीच और छूआछूत की भावना का अनुभव उन्हें स्कूली जीवन में हो चुका था. बचपन और युवावस्था की कुछ घटनाएं उनके दिमाग पर छायी रहती थीं. एक घटना ने ईश्वर और हिंदू धर्म में उनके रहेसहे विश्वास को भी चूरचूर कर दिया. उस समय तक पेरियार के पिता का निधन हुए तीनचार वर्ष बीत चुके थे. समाज में उनकी प्रतिष्ठा थी. वे पैत्रिक व्यवसाय को कुशलतापूर्वक संभाले हुए थे. समृद्ध व्यवसायी के रूप में दूरदूर तक उनका नाम था. फिर भी उन्हें संतुष्टि न थी. उन्हीं दिनों बनारस की यात्रा पर जाना हुआ. उस समय तक पेरियार की धर्म में आस्था शेष थी. बनारस के बारे में उनका मानना था कि वह हिंदुओं की पवित्रतम नगरी है. बनारस पहुंचकर वे कई दिनों तक शंति की खोज में यहां से वहां भटकते रहे. वहां उन्होंने मंदिरों में काम करती युवा देवदासियों को देखा. पता चला कि अपनी युवावस्था में वे देवदासियां पुजारियों की वासना का शिकार बनती हैं. बूढ़ी होने के बाद उन्हें मंदिर की सफाई तथा दूसरे कामों में झांेक दिया जाता है. जब देख थक जाती है और शरीर से वे किसी काम की नहीं रहतीं, तब पुण्यार्जन के नाम पर उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया जाता है. बीमार होने पर उपचार की माकूल व्यवस्था का कोई इंतजाम न था. इन अनुभवों ने पेरियार के अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया. उस यात्रा के दौरान एक घटना ऐसी घटी जिससे उनका मन धर्म की ओर से एकदम उचट गया.

उस दिन उन्हें बहुत भूख लगी थी. भटकते हुए वे ऐसे आश्रम में पहुंचे जहां देशविदेश से आए अतिथियों के लिए भोजन की व्यवस्था थी. भोजन की आस में वे प्रवचन सुनने बैठ गए. प्रवचन पूरा होने के बाद लोग भोजन के लिए जाने लगे तो पेरियार भी उनके साथ चल पड़े. तब उन्हें पता चला कि भोजन का इंतजाम केवल ब्राह्मणों के लिए है. भूख के दबाव में पेरियार ने स्वयं को ब्राह्मण बताया. किंतु अपनी मूंछों के कारण पहचान लिए गए. उस समय तक ब्राह्मणों के लिए मूंछ रखना निषिद्ध था. वहां मौजूद ब्राह्मण चिल्लाने लगे—‘यह नकली है. इसे खदेड़ दो.’ एकाएक दर्जनों ब्राह्मण न जाने कहांकहां से निकलकर उन्हें ठेलने लगे. भूख से व्याकुल पेरियार को उचिष्ठ से काम चलाना पड़ा. उस समय वे खुद को बेहद अपमानित अनुभव कर रहे थे. धर्म के प्रति आस्था तारतार हो चुकी थी. ब्राह्मणवाद का कुटिल चेहरा उनके सामने था. वे समझ गए कि धार्मिक रहते हुए स्वाभिमान के साथ जीना संभव नहीं है. उसी दिन उन्होंने खुद को नास्तिक घोषित कर दिया. उससे पेरियार को हानि नहीं हुई. उनके लिए वह पुनर्जन्म के समान था.

बनारस की घटना से हिंदू धर्म का कुत्सित चेहरा पेरियार ने देखा था. जातिआधारिक ऊंचनीच और तत्संबंधी विकृतियों का अनुभव उन्हें स्कूली जीवन में ही हो चुका था. उनके विवाह से संबंधित घटना का उल्लेख ऊपर किया जा चुका है. दो अन्य घटनाओं का उल्लेख पेरियार के व्यक्तित्व को समझने में सहायक सिद्ध होगा. एक घटना 1902 की है. उन दिनों वे मात्र 23 वर्ष के युवा थे. धर्मशास्त्रों और पुराणों पर विश्वास तब तक उठने लगा था. एक संघर्षशील युवा की छवि विकसित होने लगी थी. उन्हीं दिनों इरोड के एक व्यापारी ने भोज का आयोजन किया. उसमें निरुंजनपेट्टई गांव के मुखिया को भी आमंत्रित किया गया था. संयोगवश मुखिया का भाई एक व्यापारी का कर्जदार था. दबंगई दिखाते हुए वह कर्ज चुकाने से आनाकानी करता आ रहा था. मामला न्यायालय में लंबित था. कोर्ट ने मुखिया के भाई को भगोड़ा घोषित कर, उसके वारंट निकाले हुए थे. पुलिस उसके पीछे लगी थी. लेकिन वह पुलिस और कर्ज वसूली में लगे अधिकारियों को लगातार चकमा देता आ रहा था. युवा पेरियार ने उसे पकड़वाने की ठान ली. जिस समय स्वामी और उसका भाई भोज में हिस्सा ले रहे थे, पेरियार एक झटके में पंडाल में घुस गएा. उस समय सरकार के स्तर पर चाहे जो हो, समाज में मनु का विधान लागू था. तदनुसार ब्राह्मणभोज के स्थल पर कुत्ता, सूअर, शूद्र और स्त्री का प्रवेश निषिद्ध माना जाता है. पेरियार शूद्र परिवार में जन्मे थे. उनके प्रवेश से भोजस्थल पर खलबली मच गई. भोजन अपवित्र हो चुका था. कोई साधारण परिवार से होता तो ब्राह्मण खुद ही निपट लेते. परंतु पेरियार धनाढ्य व्यवसायी की संतान था. उसके पिता दानादि देकर ब्राह्मणों को तृप्त रखते थे. इसलिए पेरियार की शिकायत उसके पिता से की गई. पिता ने उन्हें सामाजिक मर्यादा का पालन न करने के लिए खूब धिक्कारा. जातिसंबंधी विधान के उल्लंघन करने के लिए पेरियार की चप्पलों से पिटाई हुई. पेरियार ने पिता के क्रोध को सहा. लेकिन सामाजिक अनाचार ने निपटने की ठान ली. ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ का महत्त्वपूर्ण आयोजन प्रत्येक वर्ष चैत्र पूर्णिमा के दिन वे सामूहिक भोज था, जिसमें समाज के सभी वर्गों के लोग एक साथ सामूहिक भोज का आनंद लेते थे. यह ब्राह्मणवाद पर बड़ी मार थी. दमित एवं पिछड़े वर्गाें को संगठित करने में सामूहिक भोज के कार्यक्रम बहुत मददगार सिद्ध हुए.

आत्मसम्मान आंदोलन’ के मुख्य कार्यक्रम पेरियार के अपने जीवनानुभवों की देन थे. अंतररजातीय विवाह का मुद्दा स्त्रीमुक्ति से जुड़ा था. उसकी प्रेरणा उन्हें अपनी युवावस्था की एक घटना से मिली थी. वलेला जाति के एक युवक ने नौकरी की इच्छा के साथ पेरियार से संपर्क किया. पेरियार ने उसे अपनी दुकान पर मुनीम का सांैप दिया. कुछ अवधि के बाद उस लड़के की मां ने पेरियार से संपर्क कर, उसका विवाह कराने की प्रार्थना की. पेरियार ने उसके लिए नायडू परिवार की लड़की को चुना. लड़की अवैध नायडू संतान थी. वह शादी पेरियार के दोस्तों, स्थानीय नेताओं और सरकारी कर्मचारियों की उपस्थिति में बड़ी धूमधाम से हुई. वह पहली शादी थी, जिसे पेरियार ने ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के तहत कराया था. उसकी खूब चर्चा हुई. इससे पेरियार के विद्रोही स्वभाव की खबर दूर तक फैल गई. ‘स्त्रीमुक्ति’ के क्षेत्र में दूसरा कार्यक्रम विधवा विवाह को प्रोत्साहन देना था. बनारस सहित अन्य धर्मस्थानों पर उन्होंने ऐसी अनेक विधवाओं को देखा था, जिन्हें पति की मृत्यु के बाद घर छोड़ना पड़ा था.

स्त्रीसमानता पर उनके विचार आधुनिकता से भरपूर थे. वे वैदिक रीति से विवाह, जिसमें पंडित मंत्रोच्चार करता है, वरवधु अग्नि की सप्तपदी लेते हैं, के वे घोर विरोधी थे. स्त्रीपुरुष का विवाह स्वर्ग में बनी जोड़ियां नहीं हैं. वह दांपत्य सुख के लिए किया गया समझौता है, जिसमें लड़का और लड़की दोनों बराबर के सहभागी होते हैं. पेरियार ने मुक्त कंठ से स्त्री समानता और स्वतंत्रता का समर्थन किया. कहा कि समाज में स्त्री को वे सब अधिकार और अवसर प्राप्त होने चाहिए जो पुरुष को प्राप्त हैं. मातृत्व स्त्री का चयन होना चाहिए. कर्तव्य नहीं. यदि कोई स्त्री संतान नहीं चाहती, तो उसे संतानोत्पत्ति के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए. उन्होंने बालविवाह का विरोध तथा विधवा विवाह का जोरदार तरीके से समर्थन किया. 1930 में मद्रास में देवदासी प्रथा के विरोध में बिल लाया गया. पेरियार ने उसका जोरदार तरीके से समर्थन किया. जातिप्रथा को समाज और देश के लिए हानिकारक मानते हुए उन्होंने अंतरर्जातीय विवाह का समर्थन किया. वे स्त्री को संपत्ति संबंधी समान अधिकार देने के पक्ष में थे.

जब भी कोई व्यक्ति धर्म के विकल्प की आवाज उठाता है, बड़ेबड़ी बुद्धिजीवी मौन हो जाते हैं. अधिकांश नास्तिकों को भी धर्म का विरोध दिखता है, उसका विकल्प नहीं. ऐसे लोगों के नेतृत्व में नास्तिकता प्रतिक्रियावाद का शिकार हो जाती है. पेरियार नास्तिक थे. उनके पास आस्थावादियों के ‘धर्म नहीं तो क्या?’ जैसे प्रश्नों का भी उत्तर था. धर्म के विकल्प के रूप में वे बुद्धिवाद को स्थापित करना चाहिए थे. इस संबंध में उनके कई आलेख स्थानीय पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुए थे. उन्होंने एक अंग्रेजी की पत्रिका ‘दि मोडर्न रेशनलिस्ट’ की शुरुआत भी की थी. अपने लेखों में उन्होंने समझाया था कि समाज की स्थापना धर्म अथवा संस्कृति जैसे प्राचीन अवधारणाओं के बजाय आधुनिकता और बुद्धिवाद के आधार पर होनी चाहिए. 1971 में एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था—

हम चाहते हैं कि लोग विवेकवान प्राणी के रूप में जीवनयापन करें. हम ऐसी किसी चीज का प्रचार नहीं करते, जो अविश्वसनीय और काल्पनिक हो. हमें ईश्वर पर आश्रित कुछ भी नहीं चाहिए, न ईश्वर की संतान, न धर्म, न शास्त्र, न पूजापाठ और न किसी प्रकार का कर्मकांड. हम उन्हीं चीजों तक सीमित रहेंगे जो विवेकसम्मत होते हुए तर्क की कसौटी पर खरी उतरती हों. आप सबको भी तर्क को बढ़ावा देने में जुट जाना चाहिए. हम जो कह रहे हैं, उसपर विश्वास करने से पहले उसके प्रत्येक शब्द पर सोचिए, समझिए और भलीभांति विवकसम्मत सिद्ध होने पर उसे अपनाइए.’

आत्मसम्मान आंदोलन’ दिनोंदिन फैल रहा था. पेरियार सक्रिय राजनीति छोड़ सामाजिक क्रांति लाने के लिए संकल्परत थे. फिर एक ऐसी घटना घटी जिसने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित कर दिया. त्रावणकोर रियासत के वायकम में महादेव का पुराना मंदिर था. उसमें अछूतों का प्रवेश निषिद्ध था. मंदिर के आसपास की कुछ सड़कें ब्राह्मणों और राजपरिवार के सदस्यों के लिए आरक्षित थीं. अछूत उनपर चल नहीं सकते थे. इस अमानवीय व्यवस्था का विरोध लंबे समय से चला आ रहा था. जनता की मांग को देखते हुए ट्रावणकोर सरकार ने 1865 में अध्यादेश के जरिये कानून बनाया था. उसके अनुसार राज्य के सभी नागरिकों को सार्वजनिक स्थानों पर आनेजाने की छूट दी गई थी. व्यवस्था की गई थी कि राज्य की सभी सड़कें सभी नागरिकों के लिए खुली रहेंगी. कोई भी नागरिक उनपर आजा सकेगा. किंतु ब्राह्मण तथा राजपरिवार के सदस्य इस आदेश का विरोध करते आ रहे थे. उनकी परवाह न करते हुए 1884 में सरकार की ओर से एक और आदेश जारी किया गया था, जिसमें पिछली व्यवस्था का समर्थन किया गया था. उसके विरोध में ब्राह्मणों ने ट्रावणकोर उच्च न्यायालय में अपील कर दी. जिसमें मंदिर के आसपास की कुछ सड़कों पर अछूतों के लिए चलना निषिद्ध कर दिया गया. उस आदेश की अछूतों में तीखी प्रतिक्रिया हुई. नारायण गुरु के नेतृत्व मंे उन्होंने अपना आंदोलन तेज कर दिया. दूसरी ओर दलितों और पिछड़ों को सबक सिखाने के लिए सवर्ण भी ब्राह्मणों के नेतृत्व में संगठित होने लगे थे.

एक बार नारायण गुरु अपने शिष्यों के साथ गाड़ी में सवार होकर मंदिर के बराबर से गुजर रहे थे. महाकवि कुमारन और दलितपिछड़ों के अनेक नेता उनके साथ थे. अचानक उच्च जाति के कुछ गुंडे आकर उनकी गाड़ी के आगे खड़े हो गए. उनका नेतृत्व एक ब्राह्मण कर रहा था. उसने नारायण गुरु की गाड़ी को वहां से हटने के लिए विवश कर दिया. उस घटना का वर्णन सुप्रसिद्ध मलयाली कवि मुलूर एस. पद्मनाभा पणिक्कर ने अपनी कविता में इस प्रकार किया है—

बहुत पहले की बात है. महान नारायण गुरु रथ पर सवार होकर वायकम की सड़क से गुजर रहे थे. अचानक एक मूर्ख ब्राह्मण जो खुद को पृथ्वी का देवता कहता था, वहां आया. उसने नारायण गुरु के रथ को वहां से हटने का आदेश देने लगा.’

पेरियार उस समय तक नास्तिक होने का संकल्प ले चुके थे. लेकिन ऐसे समाज में जहां धर्म जीवन की समस्त पे्ररणाओं का स्रोत हो, बगैर धार्मिक स्वतंत्रता के सामाजिकराजनीतिक स्वतंत्रता की अनुभूति असंभव है. फिर वायकम में केवल मंदिर प्रवेश मुद्दा न था. बल्कि दलितों के सार्वजनिक स्थानों पर उपयोग का अधिकार भी शामिल था. इसलिए उन्होंने वायकम आंदोलनकारियों का साथ देने का निर्णय लिया. 1924 में मंदिर प्रवेश तथा सड़कों पर चलने की आजादी को लेकर संघर्ष तेज हो चुका था. आंदोलनकारियों को दुनियाभर से समर्थन मिल रहा था. लोग खुले मन से सत्याग्रह का हिस्सा बन रहे थे. आंदोलनरत दलितों को सिख, ईसाई सहित अन्य धर्माब्लंवियों का सहयोग भी मिल रहा था. सत्याग्रहियों के भोजन की व्यवस्था का काम 200 से अधिक सिख स्वयंसेवक कर रहे थे. गांधी जी स्वयं उस मामले में रुचि ले रहे थे. किंतु वे इसे हिंदुओं का आंतरिक मामला मानते हुए, अन्य धर्माबलंबियों के हस्तक्षेप के विरुद्ध थे. ‘यंग इंडिया’ में लेख लिखकर उन्होंने गैरहिंदुओं को वहां से हट जाने का आग्रह किया था, जिसे उन्होंने नकार दिया था. गांधी, कांग्रेस और पेरियार को भी वायकम सत्याग्रह से दूर रखना चाहते थे. कांग्रेस गांधी के प्रभाव में थी. किंतु पेरियार का निर्णय अटल था. वे स्वयं को गांधी और कांग्रेस की छाया से बाहर लाने के लिए तैयार कर चुके थे. 14 अप्रैल 1924 को वे अपने साथियों के साथ वायकम आंदोलनकारियों के साथ मिल गए. पेरियार की लोकमानस में पैठ थी. उनके उतरते ही आंदोलन में तेजी आ गई. जयार ने वायकम आंदोलन को द्रविड़ अस्मिता का मुद्दा बनाया. लोग उनके समर्थन में जुटने लगे. आंदोलन तेजी से आगे बढ़ने लगा. अंततः गांधी को भी वायकम सत्याग्रहियों के समर्थन में आना पड़ा. ‘यंग इंडिया’ में उन्होंने लिखा—‘यदि ब्राह्मणों ने अछूतों को सड़कों पर चलने की आजादी नहीं दी तो यह आंदोलन दिनोंदिन उग्र होता जाएगा. अभी तक सड़कों पर चलने की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे आंदोलनकारी आगे मंदिर प्रवेश की स्वतंत्रता की मांग भी करने लगेंगे.’

वही हुआ. पेरियार वायकम मुद्दे को दक्षिण भारतीय दलितों को पिछड़े वर्गों की अस्मिता का मुद्दा बना चुके थे. सरकार ने पेरियार को दबाने की कोशिश की. उन्हें दो बाहर कैद किया गया. तरहतरह के दबाव डाले गए. लेकिन पेरियार डटे रहे. जेल से लौटने के साथ ही वे पुनः आंदोलकारियों से जुड़ जाते थे. अंततः ब्राह्मणों को झुकना पड़ा. एक निर्णय के तहत सरकार ने दलितों को सड़कों पर चलने की स्वतंत्रता बहाल कर दी. वह पेरियार की बड़ी सफलता थी. उनके योगदान को केरल उच्च न्यायालय और सरकार दोनों की ओर से सराहा गया था. उस जीत ने पेरियार को संपूर्ण दक्षिण भारत में प्रतिष्ठित कर दिया. उसके फलस्वरूप वहां गांधी का प्रभावक्षेत्र सिकुड़ने लगा. यह पेरियार की बड़ी जीत थी. यहां तक कि कांग्रेस को भी जो आरंभ में पेरियार के कार्यक्रमों का विरोध कर रही थी, अंततः उनके समर्थन में आना पड़ा. कांचीपुरम् अधिवेशन में कांगे्रस ने उन्हें ‘वायकम वीरर’, ‘वायकम का हीरो’ कहकर सम्मानित किया.

गांधी तथा वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं के साथ पेरियार के मतभेद राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं से सर्वथा मुक्त थे. कांग्रेस राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग कर रही थी. कांग्रेस के अभिजन नेता, अंगेजी के साथ आ रहे आधुनिक विचारों से त्रस्त थे. वे उसे ‘भारतीयता’ पर संकट के रूप में देखते थे. औपनिवेशिक शासन से मुक्ति केवल उसका राजनीतिक एजेंडा नहीं था. बल्कि उसके पीछे कांग्रेस के अभिजन नेताओं के वर्गीय स्वार्थ भी छिपे थे. ऐसे नेताओं का प्रमुख उद्देश्य था, सामाजिक परिवर्तन की धारा को अवरुद्ध कर, उसे मनमानी दिशा दी जा सके. राजनीतिक स्वतंत्रता से उनका आशय था, राष्ट्रवाद के नाम पर स्वतंत्रता को भावनात्मक मुद्दा बताकर उसके लिए व्यापक जनसहमति हासिल लेना चाहते थे. जबकि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी कारगर हो सकती है, जब लोग अपनी स्वाधीनता को जीना जानते हों. उनमें अपने अधिकारों के प्रति पर्याप्त चेतना हो. इसलिए पेरियार की राजनीति संबंधी मांग केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं थी. गांधी की भांति पेरियार का भी विचार था कि अशिक्षा, धर्म और तज्जनित तरहतरह के अंधविश्वासों से ग्रसित समाज राजनीतिक आजादी को पूरी तरह आत्मसात् करने में सक्षम नहीं है. ऐसे समाज को यदि राजनीतिक स्वतंत्रता मिल भी जाए तो वह उसका लाभ उठाने में अक्षम होगा. इसलिए तिलक आदि नेता जो कहते आए थे कि ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’ के बजाए पेरियार का नारा था—‘आत्मसम्मान मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है.’ छूआछूत से ग्रसित दलितों और उत्पीड़न के शिकार अन्त्यजों के लिए इस नारे का विशेष महत्त्व था. नारे के पीछे उनकी समानता और न्याय की भावना अंतनिर्हित थी. प्रकारांतर में वे कांग्रेस के समानांतर एक ऐसे आंदोलन का संचालन कर रहे थे जो विशुद्ध तर्कसम्मत समाज की स्थापना को समर्पित था. ऐसे समाज के लिए जिसमें मनुष्य अपने विवेक को किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रहों से मुक्त रख सकता है. आर्थिक आत्मनिर्भरता उसकी अनिवार्य शर्त है. ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के उद्देश्यों और कार्यक्रमों को तमिल जनता तक पहुंचाने के लिए पेरियार ने दो पर्चे प्रकाशित किए थे. उनके द्वारा पेरियार की आदर्श समाज संबंधी संकल्पना और संपनों को समझा जा सकता है—

1. ऐसे समाज को उखाड़ फेंकना जिसमें एक वर्ग दूसरे से खुद को ऊंचा समझता है. मात्र जन्म के आधार पर जो आदमीआदमी के बीच अविश्वास को जन्म देता और उसे निरंतर पालतापोसता है.

2. ऐसे समाज की स्थापना करना जिसमें सभी बराबर हों. जिसमें सभी को अपनी बात कहने की आजादी हो. विकास के लिए समान अवसर प्राप्त होते हैं. जिसमें गैरबराबरी के लिए कोई जगह न हो. कानून और समाज के स्तर पर स्त्रियों को पुरुषों के बराबर अधिकार और मानसम्मान प्राप्त होता हो. उन्हें समाजार्थिक स्तर पर किसी पर किसी प्रकार के भेदभाव का सामना न करना पड़े.

3. जिसमें समाज के सभी वर्गों को अपनेअपने विकास के लिए समान अवसर प्राप्त हों. जिससे वे अपनी नैसर्गिक स्वाधीनता का आनंद ले सकें.

4. छूआछूत का समूल नाश करते हुए आपसी सहयोग और भाईचारे की भावना के अनुरूप समाज की स्थापना करना.

5. अनाथों और विधवाओं के लिए आवासइकाइयों का निर्माण तथा उनकी शिक्षा का व्यापक प्रबंध करना.

6. जनसाधारण को नए मंदिर, मठ तथा गुरुकुल पद्धति पर स्कूल बनाने की प्रवृत्ति की ओर से हतोत्साहित करना.

7. नाम के साथ जाति अथवा गौत्र सूचक शब्दों के प्रयोग बंद करने पर जोर देना. उपलब्ध संसाधनों एवं संपदाओं के सामूहिक इस्तेमाल को बढ़ावा देना. उससे सभी के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य आवास आदि के विकास पर जोर देना. इसके लिए सामूहिक स्तर पर प्रयास करते रहना.

आत्मसम्मान आंदोलन’ लंबे समय तक अनौपचारिक संगठन के रूप में काम करता रहा. उसे विधिसम्मत संस्था के रूप में 1952 में त्रिरुचिलापल्ली में पंजीकृत कराया गया. नाम रखा गया—‘पेरियार आत्मसम्मान प्रचार संस्था.’ संस्था का प्रमुख लक्ष्य था—अंधविश्वास और रूढ़ियों से मुक्त ऐसे समाज की संरचना पर बल देना जो समानता और समरसता के सिद्धांतों पर टिका हो. धर्म केंद्रित आचारसंहिता में स्त्री को पुरुष से हेय माना गया है. पेरियार ने स्त्रीसमानता पर जोर दिया और उसे ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के मुख्य उद्देश्य के रूप में शामिल किया. बनारस यात्रा के दौरान उन्होंने मंदिरों में देवदासियों की दुर्दशा के बारे में देखा था. धर्म के नाम पर स्त्रीअस्मिता के अपमान ने उनके अंतर्मन को आहत किया था. हिंदू धर्म के प्रति उनकी नफरत का एक कारण मंदिरों में चल रही देवदासी प्रथा भी थी, जिनमें ईश्वर की सेवा के नाम पर युवा लड़कियों को अघोषित वेश्यावृत्ति की ओर ढकेल दिया था. स्त्रीसमानता और स्वतंत्रता के लिए विवाह को स्त्रीपुरुष के बीच एक करार की संज्ञा दी थी, जबकि ब्राह्मणी सभ्यता मानती थी कि दांपत्य संबंध स्वर्ग में तय किए जाते हैं. देवदासी प्रथा को समाप्त करने के लिए 1930 में पेरियार ने मद्रास विधानसभा में एक बिल भी पेश किया था. उन्होंने विधवा विवाह का समर्थन किया, जिसकी उस समय स्त्रीवादी संगठनों ने भूरिभूरि प्रशंसा की थी. उनके विचारों से प्रेरणा लेते हुए 1938 में मद्रास में प्रांतीय महिला संगठनों का बड़ा सम्मेलन हुआ था. उसमें पेरियार के स्त्रीउत्थान को लेकर चलाए जा रहे कार्यक्रमों की प्रशंसा करते हुए उन्हें ‘पेरियार’ की उपाधि से अलंकृत किया था.

पेरियार के आदर्श समाज किसी भी प्रकार के भेदभाव, छूआछूत और रूढ़ियों के लिए कोई स्थान न था.‘आमसम्मान आंदोलन’ के पीछे निहित पेरियार की भावना को समझना कठिन नहीं है. पेरियार ने जाति और धर्म के आधार पर ब्राह्मणों द्वारा गैरब्राह्मणों के शोषण को अपनी आंखों से देखा था. कांग्रेस में रहकर वे समझ चुके थे कि उसके अभिजन नेता येनकेनप्रकारेण स्वार्थसिद्धि में लगे रहते हैं. वे वही राह अपनाते हैं, जिससे उनके वर्गीय हितों को लाभ पहुंचता हो. इसके लिए वे धर्म को, राजनीति को हथियार बनाते हैं. शूद्रों को संपत्तिअधिकार से बेदखल कर समाज बड़े वर्ग को अपंग बनाने की व्यवस्था उन्होंने पहले से ही धर्मशास्त्रों में की हुई है. ऐसे में गैरब्राह्मणों का भला तभी संभव है, जब वे अपने सामूहिक हितों के प्रति संगठित हों. इसके लिए उनमें स्वाभिमान की भावना का संचार करना आवश्यक है. इसके लिए उन्हें पहले ब्राह्मणवाद के चंगुल से बाहर निकालना होगा.

आत्मसम्मान आंदोलन’ के पीछे पेरियार की कांग्रेस और गांधी की ओर से जन्मी निराशा थी. वे चाहते थे कि कांग्रेस और गांधी सामाजिक न्याय को भी अपने आंदोलन का मुद्दा बनाएं. राजनीति और समाज में ब्राह्मणवर्चस्व को कम करने के लिए उनका साथ दें. जबकि कांग्रेस के सर्वेसर्वा बने गांधी धर्म और जाति के क्षेत्र में यथास्थिति बनाए रखने को प्रयत्नरत थे. हिंदू धर्म में सुधार की उनकी योजना किसी भी तरह वर्णव्यवस्था को बचाए रखने तक सीमित थी. कांग्रेस को जनसाधारण के सरोकारों से जोड़ने के लिए उन्होंने एक प्रस्ताव तैयार किया था, जिसमें समाज के उपेक्षित एवं विपन्न वर्गों के लिए शिक्षा एवं अन्यान्य अवसरों में समानता की मांग की गई थी. वे उसे कांग्रेस के कांचीपुरम् अधिवेशन में पेश करना चाहते थे. किंतु उस समय के बड़े कांग्रेसी नेताओं ने यह कहते हुए कि इससे समाज में दरार आएगी, पेरियार के प्रस्ताव पर विचार करने से ही इन्कार कर दिया था. कांग्रेस उससे पहले भी पेरियार के प्रस्ताव को ठुकरा चुकी थी. तनमनधन से कांग्रेस को पूरी तरह समर्पित पेरियार के लिए यह बड़ा झटका था. नाराज होकर उन्होंने अधिवेशन का बहिष्कार कर दिया. ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ इसी विद्रोह की देन था. उनका ध्येय था, दलित और पिछड़ों के सम्मान की रक्षा. मानवमात्र की स्वतंत्रता, समानता सामाजिक समरसता की सुरक्षा करते हुए आधुनिक जीवनमूल्यों पर आधारित समाज की संरचना के लिए काम करना. यह जानते हुए कि गांधी और कांग्रेसी नेता उनका साथ देने वाले नहीं हैं, आंदोलन का शुरुआती संकल्प था—‘न ईश्वर, न धर्म, न ब्राह्मण, न गांधी और न ही कांगे्रस.’ ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ मनुष्य के मूलभूत अधिकारों और अस्मिता की रक्षा को समर्पित होगा. आत्मसम्मान आंदोलन का मुख्य उद्देश्य था—

द्रविड़ जनता के मनस् की ब्राह्मणवाद से मुक्ति. द्रविड़ों को उनके प्राचीन गौरव का विश्वास दिलाना. उसके लिए उन सभी धर्मग्रंथों, रीतिरिवाजों और परंपराओं से मुक्त करना जो ब्राह्मणवर्चस्व को अपरिहार्य ठहराते थे.’

आत्मसम्मान आंदोलन’ के नामकरण के पीछे की वैचारिकी को समझना कठिन नहीं है. प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में आर्यों और द्रविड़ों के संघर्ष का उल्लेख हुआ है. उनके अनुसार आर्य कबीलों ने भारत के मूल निवासी कबीलों को युद्ध में पराजित कर, दक्षिण दिशा में पलायन के लिए बाध्य कर दिया था. द्रविड़ उन्हीं के वंशज माने जाते हैं. इस तरह द्रविड़ होना एक ऐतिहासिकसांस्कृतिक पराजय का कलंक अपने सिरमाथे ढोना है. हालांकि जो महाकाव्य या मिथ उन युद्धों को लेकर गढ़े गए हैं, उनकी प्रामाणिकता को लेकर अनेकानेक संशय हैं. किंतु अन्य प्रमाणों के अभाव में लेखकों एवं इतिहासकारों को महाकाव्यों तथा प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में मौजूद मिथकीय आख्यानों से ही इतिहास के सूत्र खोजने पड़ते हैं. भारतीय संस्कृति की विडंबना है कि उसके नेतृत्व और संरक्षण का दायित्व लंबे समय से उन वर्गों के अधीन रहा, जिनके अपने स्वार्थ लोकहित की अपेक्षा प्रबल थे. जिनमें निष्पक्षता का अभाव था. यही कारण है कि समानता और स्वतंत्रता जैसे मूलभूत गुणों का, जो किसी संस्कृति को महान बनाते हैं—भारतीय संस्कृति में अभाव बना रहा. बावजूद इसके वे वर्ग श्रेष्ठतम होने का दावा भी करते रहे.

प्रक्षेपण का शिकार होने के कारण प्राचीन संस्कृत वाङ्मय में अनेक विरोधाभास दिखाई पड़ते हैं. पुराणों में दर्ज है कि अनार्य भारतीयों की युद्धशैली आक्रामक आर्यों की अपेक्षा परिष्कृत थी. देवासुर संग्राम में देवताओं को अनेक बार पराजय का सामना करना पड़ा था. सफलता तब मिली जब उन्होंने अनार्यों कबीलों में फूट डालकर उनमें से कुछ का बारीबारी से सहयोग लेना आरंभ किया. समाजीकरण की उस प्रक्रिया में एक ऐसा वर्ग भी पनपा जिसकी निपुणता कर्मकांडों में थी. जिसका दावा था कि वह दैवीय शक्तियों का ज्ञाता है तथा यज्ञादि कर्मकांडों के माध्यम से उनसे संवाद भी कर सकता है. कहने की आवश्यकता नहीं कि वे शक्तियां उस वर्ग की कल्पना की उपज थीं. फिर भी उनकी बातों का जादू ऐसा था कि उस समय का बड़ा वर्ग उससे प्रभावित था. विशेष अवसरों पर उस वर्ग की राय महत्त्वपूर्ण मानी जाती थी. अपनी काल्पनिक योग्यता के बल पर वह वर्ग जनसाधारण को सम्मोहित करने का सामथ्र्य रखता था. सर्वश्रेष्ठ होने का दावा करते हुए वह वर्ग प्रायः विजेता के पक्ष में रहता था. हालांकि कालांतर में, सांस्कृतिक विजय प्राप्त होने के बाद उस वर्ग ने जो नए मिथ गढ़े, उनमें पराजित वर्गों; यानी उन वर्गों को भी अपना समर्थक और अनुयायी दर्शाने की कोशिश की, जिनसे विरुद्ध संघर्ष में उसने आर्यों का नेतृत्व किया था. सामाजिकसांस्कृतिक वर्चस्व लिए यह अनिवार्य था. आरंभ में सब कुछ स्वाभाविक लगता था. यज्ञादि कर्मकांडों के लिए संसाधनों की आवश्यकता थी. उसके लिए गणप्रमुख अथवा मुखिया की मदद आवश्यक थी. आगे चलकर गणप्रमुख का पद राजा ने ले लिया और यज्ञ को प्रतिष्ठा का विषय माना जाना लगा. जो यज्ञ में अधिक बलि दे, दानादि में ज्यादा संसाधन खपाए और अधिकाधिक लोगों को भोज कराए, वह उतना ही बड़ा राजा माना जाता था. धीरेधीरे यज्ञों की संख्या और उनकी मान्यता बढ़ती गई. अपना वैशिष्ठ्य बनाए रखने के लिए ब्राह्मणों ने अवसरविशेष के अनुसार यज्ञों और कर्मकांडों का नियमन किया; और अवसरानुकूल रणनीति अपनाकर उसे शेष समाज पर थोपते चले गए. वास्तविकता से हटाकर वायवी दुनिया की ओर ले जाने की उस प्रवृत्ति जैसा विरोध अपेक्षित था, वैसा नहीं हुआ. यदि छिटपुट विरोध हुए भी तो उन्हें दबा दिया गया. पुराणों के अनुसार वेन पृथ्वी का पहला राजा था. उसे जनता ने चुना था. कदाचित इसीलिए वह ब्राह्मणों को अतिरिक्त महत्त्व देने के लिए तैयार न था. इससे क्षुब्ध ब्राह्मणों ने जनता को उसके विरुद्ध भड़का दिया और वेन उत्तेजित भीड़ के कोप का शिकार बन गया. प्रजा की सहानुभूति प्राप्त करने के लिए ब्राह्मणों ने वेन के बेटे पृथु को राजा नियुक्त किया. पृथु ब्राह्मणों की शक्ति को समझ चुका था. पिता की हत्या से भयभीत पृथु ने ब्राह्मणों की प्रत्येक आज्ञा को शिरोधार्य किया. इसलिए उनकी दृष्टि में वह आदर्श राजा कहलाया. पुराणों में उसकी भूरिभूरि प्रशंसा की गई है. बताया जाता है कि उसी के नाम पर पृथ्वी का नामकरण हुआ है. वेन और पृथु की कहानियां दर्शाती हैं कि ब्राह्मणत्व या ब्राह्मण की खुशी राजसत्ता के श्रेष्ठत्व का प्रमाण मान ली गई थी. महाभारत में पांडव सारे धत्त्कर्म करने के बाद भी धर्मानुयायी घोषित कर दिए जाते हैं.

सांस्कृतिक वर्चस्व को स्थायी बनाए रखने के लिए ब्राह्मणों ने देवताओं को अपराजेय एवं अलौकिक शक्तियों का स्वामी घोषित कर दिया था. सांस्कृतिक संघर्ष शताब्दियों तक चलता रहा. इतिहास के एक चरण में जैसे ही आर्य कबीलों को अवसर मिला, उन्होंने सांस्कृतिक प्रतीकों और धरोहरों का अपने स्वार्थ के अनुसार अनुकूलन करना आरंभ कर दिया. उनमें बड़ी चालाकी से आर्यश्रेष्ठता के मिथ को स्थापित किया गया. इतिहास और संस्कृति की ताकत से अनजान अनार्य कबीले धीरेधीरे उस षड्यंत्र का शिकार होते गए. सभ्यता के इतिहास में किसी प्रजाति अथवा समूह की राजनीतिक पराजय अनहोनी घटना नहीं है. देशविदेश के इतिहास में इस तरह की लाखों घटनाएं दर्ज हैं. परंतु जब इतिहास को मिथ में ढालकर आस्था का विषय बना दिया जाए तो उसपर विमर्श की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है. साक्ष्यों के अभाव में विद्वानों को केवल अपनी कल्पनाशक्ति और विवेक से काम लेना पड़ता है. परिणामस्वरूप उनके निष्कर्षों में एकरूपता का अभाव होता है. ठोस वैचारिक चेतना की कमी के चलते सुधार के लिए कोई बड़ा आंदोलन नहीं बन पाता.

इस देश में विदेशी आक्रामक सामरिक शक्ति अथवा बुद्धिबल के कारण कभी सफल नहीं हुए. वे भारत पर लंबे समय तक शासन करने में इसलिए कामयाब रहे क्योंकि उन्होंने यहां के बुद्धिजीवी वर्ग, यानी ब्राह्मणों के सांस्कृतिक साम्राज्य में सैंध लगाने की कभी कोशिश नहीं की. सैकड़ों वर्षों के दौरान देश राजनीतिक स्तर पर अनेक उतारचढ़ाव से गुजरा. बड़ेबड़े साम्राज्य बने और ढहे भी, परंतु ब्राह्मणों के सामाजिकसांस्कृतिक वर्चस्व को कभी चुनौती नहीं मिली. 400 वर्ष से अधिक समय तक दिल्ली के तख्त पर आसीन, मुगल सम्राटों ने जान लिया था कि ब्राह्मण जो समाज का बहुत छोटासा हिस्सा है, को साधकर पूरे भारत को साधा जा सकता है. यही आगे चलकर अंग्रेजों ने किया. यही कारण है कि इस देश में विदेशी शासकों के प्रति आक्रोश कहीं नजर नहीं आता. उनीसवीं शताब्दी में यदि विदेशी सत्ता के प्रति जनज्वार उमड़ता दिखाई पड़ता है तो इसलिए कि नई शिक्षा की रोशनी में समाज का बड़ा हिस्सा ब्राह्मणों के बौद्धिक वर्चस्व को नकारकर स्वतंत्र निर्णय लेने लगा था. दूसरे अमेरिका और फ्रांस में हुई क्रांतियों के दबाव में वे समानता और स्वतंत्रतामूलक आधुनिक जीवनमूल्यों को अपना चुके थे. इसलिए भारत में आगमन के साथ ही उन्होंने समाननागरिक संहिता का पर अमल करना आरंभ कर दिया. जिसके फलस्वरूप वर्ण, जाति, धर्म आदि के नाम पर उपेक्षा और दमन का शिकार रहे वर्गों को शिक्षा और जीवन के बाकी क्षेत्रों में आगे बढ़ने का अवसर मिला. अकादमिक स्तर पर बहुत अधिक पढ़ेलिखे न होने के बावजूद पेरियार इसे समझते थे. वे जान चुके थे कि आत्मसम्मान आंदोलन की सफलता के लिए ब्राह्मणों के बौद्धिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक श्रेष्ठतावाद को चुनौती देना अत्यावश्यक है. श्रेष्ठतादंभ के शिकार तमिल ब्राह्मण स्वयं को आर्य मूल का मानते थे. पिछड़े समूहों को उनके वर्चस्व से बाहर निकालने के लिए प्राचीन सांस्कृतिक स्थापनाओं को चुनौती देना आवश्यक था. पेरियार ने धर्म को सीधी चुनौती दी. कहा कि धर्म के अंधेरे में भटकने बजाय लोगों को चाहिए कि वे अपने विवेक का इस्तेमाल करें. उन्होंने महाकाव्यों और पुराणों को कपोलकल्पित माना. समाज को मूर्तिपूजा और तत्संबंधी अन्यान्य आंडबरों से दूर रखने के लिए आंदोलन चलाया. जिसमें गणेश की प्रतिमाएं तोड़ डाली गईं. वर्णव्यवस्था का समर्थन करने वाले ग्रंथों ‘रामायण’ और ‘मनुस्मृति’ की प्रतियां जलाई गईं. 1953 में उन्होंने अपने समर्थकों के साथ मिलकर राम के पुतलों का दहन किया. 1955 में सार्वजनिक स्ािान पर राम के चित्र का दहन करते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. इसके लिए उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा, किंतु वे डटे रहे.

पेरियार के विचार था कि धर्म बहुसंख्यक वर्ग को सामाजिकबौद्धिक रूप से दास बनाए रखने का शक्तिशाली माध्यम है. उसका पहला हमला मनुष्य के आत्मविश्वास पर होता है. जिससे वह अपने विवेक से काम लेने के बजाए पंडेपुरोहितों के प्रपंच में फंसकर रह जाता है. फुले और आंबेडकर की भांति पेरियार भी सामाजिक स्वतंत्रता को राजनीतिक स्वतंत्रता से ऊपर मानते थे. उनका मानना था कि उत्पीड़ित वर्गों यथा दलितोंपिछड़ों के लिए सामाजिकसांस्कृतिक स्वतंत्रता, राजनीतिक स्वतंत्रता से कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण है. इसलिए जाति प्रथा का उन्मूलन ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ का प्रमुख एजेंडा था. पेरियार का मानना था कि ईश्वर, धर्म और ब्राह्मण, तीनों किसी न किसी रूप में जातिप्रथा के जन्मदाता रहे हैं. जबकि गांधी और कांग्रेस दोनों जातिप्रथा के छदम् विरोधी थे. पेरियार का मानना था कि जाति के समूल उच्छेद के बिना मनुष्य की वास्तविक स्वतंत्रता असंभव है. उस समय तक समानता का सपना भी अधूरा रहेगा. अपने नाम के आगे जातिसूचक शब्द न लगाने का निर्णय वे 1923 में ही ले चुके थे. ‘पेरियार’ संबोधन उन्हीं दिनों उन्होंने अपनाया था.

दक्षिण में अस्मितावादी राजनीति की बागडोर धनी पिछड़ी जातियों के हाथों में थी. उनमें रेड्डी, कम्मा, वेल्लाल, नायर, वेलमाज आदि शुरू से सक्रिय थीं. यह भी कह सकते हैं कि ब्राह्मणों के विरुद्ध दलित एवं पिछड़ी जातियों में विकसी चेतना का लाभ उठाने के लिए वे जातियां अकस्मात मैदान में उतर आई थीं, जो उससे पहले तक ब्राह्मणों के साथ थीं और किसी न किसी प्रकार सत्तासुख भोगती आई थीं. चूंकि वह आंदोलन ब्राह्मण बनाम गैर ब्राह्मण, द्रविड़ बनाम आर्य था, इसलिए उनके आंदोलन को पिछड़ी एवं दलित जातियों का सहयोग भी प्राप्त था. ‘दव्रिड़त्व’ उन्हें अतीत से जोड़ता था. पेरियार के लिए वह कोई चिंताजनक बात न थी. वे ब्राह्मणवाद को किसी भी प्रकार के क्षेत्रीयतावाद से खतरनाक मानते थे. ब्राह्मणवाद पर निर्णायक चोट करने के लिए उन्होंने जातिवाद के समूल उन्मूलन, स्त्रीमुक्ति की मांग की. अस्मितावादी राजनीति प्रकारांतर में यह संदेश भी देती थी कि विभिन्न जातियोंउपजातियों में बंटे द्रविड़ कभी साझा इतिहास और संस्कृति के सहचर थे. उनके बीच भेदभाव की भावना आर्यों, जिनसे उनका आशय प्रायः ब्राह्मणों तक सीमित था, द्वारा अपने स्वार्थ के लिए आरंभ किया गया था. पिछड़े वर्ग की धनी जातियों का संगठन उत्तर भारत में भी बना था. गत शताब्दी के चैथे दशक में कुर्मी, कुशवाहा और यादव, पिछड़ों में अपेक्षाकृत समृद्ध जातियों ने ‘त्रिवेणी संघ’ के रूप में वर्चस्वकारी जातियों का विरोध रचने की कोशिश की थी. उनकी कमजोरी थी कि सिवाय जाति के उनके बीच दूसरा कोई संगठनकारी तत्व न था. दक्षिण में अस्मितावादी आंदोलन की सफलता का कारण द्रविड़ के रूप में उनकी स्वतंत्र पहचान थी. ‘त्रिवेणी संघ’ का प्रयोग महत्त्वपूर्ण और अत्यावश्यक होने के बावजूद लंबे समय तक कारगर न हो सका. इसलिए कि संगठन में शामिल जातियां स्वयं को क्षत्रिय वंशज मानती थीं. इस तरह प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में वे उसी ब्राह्मणवाद का समर्थन करती थीं, जिसने उन्हें शताब्दियों तक उत्पीड़ित रखा था और जिससे मुक्ति की कामना के लिए उन्होंने ब्राह्मणवाद को चुनौती दी. इसलिए बहुसंख्यक होने के बावजूद वे मणवाद के विरोध में सार्थक प्रतिपक्ष न बना सकीं. चुनावों में मिली पराजय के बाद वे पूरी तरह बिखर गईं. दूसरे पिछड़ों में उभरती चेतना के बाद स्वयं कांग्रेस ने ‘पिछड़ा वर्ग कल्याण संघ’ की स्थापना की थी. चूंकि कांग्रेस को गांधी का आशीर्वाद प्राप्त था. जनमानस में उनकी पैठ को देखते हुए

दक्षिण भारत के इतिहास में 1927 से 1934 तक का समय सर्वाधिक परिवर्तनकामी था. उस समय तक पेरियार द्वारा चलाया गया ‘अस्मितावादी आंदोलन’ जनमानस में गहरी पैठ बना चुका था. उससे पूर्ववर्ती आंदोलनों पर किसी न किसी रूप में धर्म की छाया थी. जबकि आत्मसम्मान आंदोलन की नींव धर्मनिरपेक्षता और किसी भी प्रकार के आडंबरवाद से मुक्त थी. आत्मसम्मान आंदोलन की पैठ का अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि न केवल सामाजिक शक्तियां बल्कि दक्षिण भारत के सैन्य बल भी उसके समर्थन में थे. ब्राह्मणीकरण की काट के लिए पेरियार ने द्रविड़ अस्मिता के मुद्दे को उछाला था, जिसे वहां के जनसाधारण की स्वीकृति प्राप्त थी. ब्राह्मणवाद की नींव आस्था और विश्वास पर केंद्रित रही है. पेरियार की कोशिश ऐसे समाज की रचना की थी, जो आधुनिक ज्ञान और तर्क को समर्पित हो. ‘जस्टिस पार्टी’ के वरिष्ठ नेता और दक्षिण भारत में ‘निब्र्राह्मणीकरण आंदोलन’ के सक्रिय कार्यकर्ता आॅर्कट रामास्वामी मुदलियार ने पेरियार के ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के लिए उनकी तुलना महान दार्शनिक रूसो के साथ की है—

उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में फ्रांसिसी विचारक रूसो ने अपने देशवासियों के तर्कसामर्थ्य को संदीप्त किया. जिससे वहां फ्रांसिसी समाज बड़ी क्रांति के लिए तैयार हुआ. मैं यह कहूंगा कि पेरियार के कारण ही हम तमिलवासियों ने तर्क करना सीखा. जिसने आगे चलकर हमारे भी आत्मसम्मान की चेतना जाग्रत की. इस आधार पर पेरियार तमिलनाडू के रूसो हैं.’

आंबेडकर की भांति पेरियार भी सामाजिक स्वतंत्रता को राजनीतिक स्वतंत्रता से बढ़कर मानते थे. उनका मानना था कि दलित और पिछड़े लोग जो समाजार्थिक कारणों से दूसरों पर निर्भर हैं, या निर्भर बना दिए गए हैं, कोरी राजनीतिक स्वतंत्रता उनका भला नहीं कर सकती. राजनीतिक स्वतंत्रता राज्य को केवल कानून बनाने तथा उनपर अमल करने हेतु आवश्यक स्वायत्तता प्रदान करती है. वह व्यक्तिमात्र को उसकी स्वाधीनता का एहसास कराने की जिम्मेदारी नहीं लेती. असमानताग्रस्त समाजों में कुछ नागरिक अधिकांश नागरिकों पर अधिकार जमाए रहते हैं. दूसरी ओर शिक्षा, अज्ञानता अथवा संसाधनों के मामले में अभिजन समाज पर निर्भरता के कारण बहुजन समाज अपनी स्वाधीनता का उपयोग करने में असमर्थ रहता है. उसके लिए राजनीतिक स्वतंत्रता समाज के शीर्षस्थ वर्ग के निर्णयों का दास बन जाने तक सीमित हो जाती है. स्वतंत्रता को अपने हक में इस्तेमाल करना, जीवन में उसका आनंद लेना स्वाधीनता है. यह स्वतंत्रता को जीने, उसे जीवन में उतारने का नागरिक अधिकार है. नागरिक हित में आवश्यक है कि लोग स्वतंत्रता के साथसाथ स्वाधीनता का मोल भी समझें. पेरियार का कहना था कि बगैर सामाजिक स्वाधीनता के राजनीतिक स्वतंत्रता अर्थहीन होगी. गांधी, नेहरू जैसे कांग्रेस के बड़े नेताओं की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा था कि उनके लिए मानवमात्र की सम्मानता का विचार कोई मूल्य नहीं है. भारतीय गौरव की प्रशंसा करते हुए वे प्रायः उस दौर का महिमामंडन करने लगते हैं, जब चातुर्वर्ण्य का बोलबाला था. शूद्रों और दलितों को मूलभूत अधिकारों से भी वंचित रखा जाता है. गांधी और कांग्रेस एक और तो दलितों और पिछड़ों को समानता और स्वतंत्रता का सपना दिखाते हैं. दूसरी ओर व्यवहार के स्तर उन संस्थाओं को भी बचाए रखना चाहते हैं, जो शताब्दियों से समाज के बड़े वर्ग के शोषण का कारण रही हैं. मानवमात्र के सम्मान की सुरक्षा के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता की परिकल्पना करना अनैतिक विचार है.

जैसेजैसे सामाजिक परिवर्तन को लेकर पेरियार की स्वतंत्र वैचारिकी का निर्माण हो रहा था, वैसेवैसे कांग्रेस तथा उसकी नीतियों के प्रति उनका विरोध भी बढ़ता जा रहा था. उसकी रचनात्मक परिणति ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के रूप में सामने आई. इतिहासकारों के अनुसार द्रविड़ पराजित जाति रही है. आर्यों ने उन्हें दक्षिण की ओर ढकेल दिया था. जाति के आधार पर समाज के विभाजन तथा ऊंचनीच की भावना करीबकरीब पूरे देश में एकसमान है. मगर द्रविड़ों के माथे आर्यों के माथे पर आर्यों से पराजय का दोष मढ़ा था. इससे उबरने के लिए पेरियार ने द्रविड़ों को भारत का मूल निवासी बताया और आर्यों को आक्रामक. ब्राह्मणवाद पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि ब्राह्मण विदेशी के हैं. इसलिए इस देश और यहां के संसाधनों पर मूलनिवासियों का अधिकार उनसे ज्यादा है. मूल निवासी की अवधारणा नई नहीं थीं. ज्योतिबा फुले उसे वर्षों पहले ‘गुलामगिरी’ में स्थापित कर चुके थे. 1892 में ‘मद्रास समाज सुधार संघ’ का गठन भी इसी सिद्धांत के आधार पर किया गया था.

1925 में पेरियार द्वारा शुरू किए गए ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ को आरंभ में केवल पढ़ेलिखे और मध्यवर्गी युवाओं का आकर्षण था. आरंभ में उन्हीं के भरोसे आंदोलन आगे बढ़ा. धीरेधीरे बात लोगों की समझ में आने लगी. शहर से लेकर गांव तक लोक पेरियार से जुड़ने लगे. 1930 में वह पूरे दक्षिण भारत में अपनी पकड़ बना चुका था. आंदोलन के साथसाथ पेरियार का आत्मविश्वास भी बढ़ता गया. उन्हें लग रहा था कि सामाजिक विकास के लक्ष्य को केवल सामाजिक परिवर्तन के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है. राजनीति ऐच्छिक सामाजिक परिवर्तनों की दिशा में राजनीति केवल उत्प्रेरक का काम कर सकती है. धीरेधीरे पेरियार के मन में सक्रिय राजनीति को लेकर निराशा उमड़ने लगी. उन्हें यह विश्वास हो चला था कि सामाजिक सुधार के वास्तविक लक्ष्य की प्राप्ति लोकप्रिय राजनीति के माध्यम से संभव नहीं है.

अपने विचारों को जनजन तक पहुंचाने के लिए उन्होंने ‘कुदी अरासु’(गणतंत्र) शीर्षक से साप्ताहिक की शुरुआत की. उसमें उन्होंने महिला उत्थान, सामाजिक न्याय, धर्म और पाखंड के विरोध में लिखना आरंभ किया. ‘कुदी अरासु’ नए मूल्यों को समर्पित साप्ताहिक था. इसी पत्र में उन्होंने 1935 में भगत सिंह के चर्चित लेख ‘मैं नास्तिक क्यों बना’ का तमिल अनुवाद प्रकाशित किया. ‘कुदी अरासु’ के उस अंक को सरकार द्वारा जब्त कर लिया गया. पेरियार के लिए यह कोई नई बात न थी. उग्र विचारों के कारण मद्रास सरकार ‘कुदी अरासु’ को कई बार प्रतिबंधित कर चुकी थी. प्रोफेसर चमनलाल के अनुसार आजादी के बाद एक समय ऐसा भी आया जब भगत सिंह के उपर्युक्त लेख का अंग्रेजी प्रारूप उपलब्ध नहीं था. तब पेरियार द्वारा छापे गए लेख का अंग्रेजी में दुबारा अनुवाद करके काम चलाया गया. ‘कुदी अरासु’ में भगत सिंह को फांसी पर गांधी की चुप्पी की आलोचना करते हुए पेरियार ने इस पत्रिका के 29 मार्च 1931 के अंक में लिखा था—

देशभर में ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं है, जिसने भगत सिंह की फांसी की निंदा न की हो. कहीं कोई भी नहीं है जिसने इस घटना के लिए सरकार को कोसा न हो. दूसरी ओर हम देख रहे हैं कि देशभर में ऐसे अनेक देशभक्त, और राष्ट्रनेता हैं जो गांधी को इस घटना के लिए दोषी मानते हैं.’

पेरियार की भाषा में कबीर जैसा तंज और साफगोई थी. अल्पशिक्षिात होने के बावजूद उनमें गजब आत्मविश्वास था. वे मुखर वक्ता, निर्भीक और मानवमूल्यों से प्रतिबद्ध नेता थे. उनके लिए सामाजिक परिवर्तन राजनीतिक भागीदारी से ज्यादा महत्त्वपूर्ण था. फुले का अनुसरण करते हुए पेरियार ने शोषण का आधार रहे ब्राह्मणवादी मिथकों पर न केवल जोरदार प्रहार किया, बल्कि ईश्वर के अस्तित्व को भी चुनौती दी. यह जानते हुए भी भारत की धर्मप्राण जनता नास्तिक व्यक्ति को अपने नेता के रूप में शायद ही स्वीकार करेगी, पेरियार ने खुद को नास्तिक कहा और आजीवन नास्तिकता के प्रचार में लगे रहे. पेरियार के योगदान को सम्मानित करते हुए यूनेस्को ने उन्हें ‘दक्षिणपूर्वी एशिया का सुकरात’ का दर्जा दिया था.

ओमप्रकाश कश्यप

ई वी रामास्वामी पेरियार : दि वाल्तेयर ऑफ ईस्ट

सामान्य

ईश्वर नहीं है..

ईश्वर नहीं है

ईश्वर हरगिज नहीं है….

जिसने ईश्वर को गढ़ा वह मूर्ख था

जो ईश्वर की वकालत करता है, वह महाधूर्त्त है

जो ईश्वर की पूजा करता है, वह असभ्य है.

ईश्वर नहीं है..

ईश्वर नहीं है

ईश्वर हरगिज नहीं है….

ईवी रामास्वामी पेरियार

भारत में जातीय शोषण में लगी शक्तियों की पैठ का आकलन इससे भी किया जा सकता है कि यहां सुधारवादी आंदोलनों की धारा बहुत प्रच्छन्न और अवमंदित रही है. ज्ञात इतिहास में ब्राह्मणवाद को पहली चुनौती बुद्ध की ओर से मिली. बुद्ध से भी पहले आजीवक और लोकायत जैसे प्रकृतिवादी दर्शन ब्राह्मणवाद के समानांतर अपनी उपस्थिति बनाए हुए थे. उस समय तक ब्राह्मणधर्म केवल आश्रमों तक सीमित था. वहीं से वह धीरेधीरे राजकुलों पर अपना प्रभाव जमाने की कोशिश कर रहा था. किसानों, शिल्पकारों, श्रमिकों तथा दासवर्ग के लिए न तो ब्राह्मणधर्म में कोई जगह थी, न ही उन्हें उसकी विशेष चिंता थी. फिर जैसेजैसे राज्य संगठित होते गए, लोगों पर अपना अनुशासन बनाए रखने के लिए धर्म और राजनीति परस्पर जुड़ते चले गए. बुद्ध के समय तक ब्राह्मणपुरोहित राज्यों पर अपनी पकड़ बना चुके थे. इसके साथसाथ जनता पर भी उनका प्रभाव बढ़ा था, जिसने उन्हें अतिरिक्त रूप से शक्तिशाली बना दिया था. अब वे राजाओं के आगे मनमानी करने, मनचाही मांगे रखने तथा उन्हें अपने स्वार्थ के अनुरूप निर्णय लेने को विवश कर सकते थे. राजा उनकी मनमानी से खिन्न भी होते थे. यज्ञ और दानादि पर होने वाले विपुल खर्च से उनपर आर्थिक बोझ भी पड़ता था. इसलिए बुद्ध ने कर्मकांड और बलिप्रथा का विरोध करते हुए, कर्मकांड विरोधी, उदार और मध्यममार्गी धर्मदर्शन का विचार लोगों के सामने रखा तो तत्कालीन राजाओं द्वारा उसका खुले मन से स्वागत किया गया. उसके फलस्वरूप ब्राह्मणधर्म को आने वाली कई शताब्दियां निर्वासन में गुजारनी पड़ीं. बुद्ध को वर्णव्यवस्था से शिकायत न थी. उनका विरोध जातिआधारित भेदभाव, शोषण और थोपी गई असमानता से था. उनका असली हमला यज्ञ के बहाने दी जाने वाली निरर्थक बलियों, तंत्रमंत्र, पूजापाखंड तथा कर्मकांड पर हुआ, जो आदमीआदमी के बीच द्वेष और भेदभाव परोसते थे. शोषणकारी जातिव्यवस्था को दैवी ठहराते थे. जनसाधारण की आय का बड़ा हिस्सा उसके विकास में काम आने बजाए आडंबरों पर व्यर्थ चला जाता था. बुद्ध के नैतिक आभामंडल के आगे ब्राह्मणवादी शक्तियां लंबे समय तक निस्तेज रहीं.

ब्राह्मणधर्म को दूसरी चुनौती संत कवियों की ओर से मिली. आरंभिक संत कवि समाज के निचले वर्गों से आए थे. अन्य धर्मों में धर्मग्रंथों को पढ़नेपढ़ाने का काम पवित्र माना जाता है, भारत में वेदादि ग्रंथों का पाठ बहुसंख्यक वर्ग के लिए निषिद्ध था. शूद्र वेदाध्ययन की कोशिश करे तो उसके कानों में पिघला सीसा डालने का शास्त्रोक्त दंडविधान था. देवालयों में पूजनअर्चन तो दूर, उनकी सीढ़ियां चढ़ना भी उनके लिए निषिद्ध था. जातीय शोषण झेलते आए उन कवियों ने आडंबरों को धता बताते हुए, निराकार ईश्वर की अराधना पर जोर दिया. मंदिरप्रवेश पर पाबंदी को उन्होंने यह कहकर चुनौती दी कि ईश्वर मंदिरमस्जिद में नहीं, मनुष्य के हृदय में वास करता है. धर्म के नाम पर दिखावा करने वालों को ललकारा. मूर्ति पूजा के विरुद्ध विद्रोही तेवर अपनाते हुए कबीर ने कहा कि यदि पत्थर पूजने से ईश्वर प्राप्त होता है तो वे पहाड़ पूजने को तैयार हैं. रैदास ने समानता पर आधारित समाज का सपना देखा था. ऐसे ‘बेगमपुरा’ की कल्पना की थी, जहां ऊंचनीच, दुखक्लेश, कष्टशोकों का सर्वथा अभाव है. सभी स्वतंत्र हैं. आमजन ने संतकवियों के जीवनदर्शन को हृदयंगम किया. जातीय शोषण के शिकार लोग उनके अनुयायी बनने लगे. रैदास, कबीर, दादू आदि संतकवियों से प्रेरणा लेकर गुरु नानक ने सिख धर्म की स्थापना की. पूरी दुनिया को समानता का संदेश दिया. परंतु जाति की जकड़बंदी ऐसी कि बड़ेबड़े महात्माओं के प्रयत्न उसके आगे नाकाफी सिद्ध हुए.

जातीय उत्पीड़न के शिकार लोग विवश होकर धर्मांतरण की राह अपनाने लगे थे. कबीर के अनुयायियों में हिंदुमुसलमान दोनों थे. उनकी एकता से सवर्ण हिंदुओं के आगे अल्पसंख्यक हो जाने का खतरा मंडराने लगा. तात्कालिक समाधान यह था कि शूद्रों के हिंदू धर्म से पलायन को रोका जाए. जो दूर जा चुके हैं, उन्हें वापस लाया जाए. उधर संतत्व की लोकप्रियता देख उच्च जाति के कवियों ने भी ‘भक्ति’ का महिमामंडन शुरू कर दिया था. वे अपने संस्कार तथा देवता भी साथ लेकर आए थे. संत कवियों के नेतृत्व में चल रहे सुधारवादी आंदोलनों की धारा को कुंद करने के लिए उन्होंने वही किया जो दो हजार वर्ष पहले उनके पूर्वजों ने बौद्ध धर्म के साथ किया था—बुद्धत्व की प्रखरता कम करने के लिए तंत्रमंत्र तथा कर्मकांडों का बौद्ध धर्म में प्रक्षेपण. साथ में बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित करना. उसके परिणामस्वरूप ब्राह्मणधर्म के पूजापाखंड, तंत्रमंत्र और अन्यान्य आडंबरों को बौद्ध धर्म में प्रवेश मिला. गौतम बुद्ध ने मूर्ति पूजा का विरोध किया था, परंतु ब्राह्मण धर्म के प्रभाव में उनकी मूर्तियां जगहजगह लगने लगीं.

भक्त कवियों ने निराकार को छोड़ साकार का गुणगान किया. उस समय तक वैदिक देवता अप्रासंगिक हो चुके थे. देवराज इंद्र के चारित्रिक विचलन को लेकर अनेक कहानियां प्रचलित थीं. उनके आधार पर ब्राह्मण धर्म को पुनः स्थापित करना असंभव था. अतएव तात्कालिक जरूरत को समझते हुए राम और कृष्ण जैसे नए देवीदेवता गढ़े गए. उनकी प्राचीनता स्थापित करने के लिए उन्हें मिथकों के सहारे, अनार्य देवता शिव और गणपति से जोड़ा गया. ध्यातव्य है कि गणपति कोई देवता न होकर प्राचीन जनसमाजों में प्रचलित गणतंत्र का प्रतीक हैं. लगभग 2300 वर्ष पहले बड़े राज्यों की स्थापना पर जोर दिया जाने लगा था. वह राजशाही और सर्वसत्तावाद का दौर था. समाज ब्राह्मण और गैरब्राह्मण में बंट चुका था. ब्राह्मण शक्ति और सम्मान का प्रतीक था. गैरब्राह्मण जिसमें बड़ी संख्या मेहनतकशों तथा शिल्पकार वर्ग की थी. उन लोगों की थी जो कभी सफल गणतंत्र के संचालक और अनुयायी रहे थे. उन्हें सत्ता, संसाधन तथा उनके लाभों से काटकर पूर्णतः पराश्रित बना दिया गया. सर्वसत्तावाद को वैध ठहराने के लिए गणतंत्र और उससे जुड़े प्रतीकों का जमकर विरूपण किया गया. सूर, तुलसी, मीरा, नरसी मेहता आदि ने ईश्वर के अवतारवाद को स्थापित करने में मदद की. राम वाल्मीकि रामायण के कथानायक थे. उसका मूल कथानक ऋग्वेद में वर्णित राजा सुदास और दस अनार्य कबीलों के युद्ध का पुनर्कथन था, जिसे किसी अज्ञात लेखक ने सबसे पहले ‘पुलत्स्यवध’ शीर्षक से रचा था. उसी कथानक को तुलसी ने नए कलेवर में ‘रामचरितमानस’ के रूप में लिखा, जिसमें उन्होंने राम को भगवान के रूप में प्रचारित किया. धर्म के नाम पर वर्गीय स्वार्थों का समर्थन करने वाली मिथ कथाओं की रचना के साथसाथ इतिहास और संस्कृति के विरुपण का दौर भी चलता रहा. वर्चस्ववादियों ने उनकी मनमाने ढंग से व्याख्या की. तथ्यों को जमकर तोड़ामरोड़ा. स्वार्थ के लिए नएनए झूठ गढ़े गए. झूठ को सच बनाया गया. ऐसी संस्कृति की रचना की गई, जिसमें जो जितना अधिक श्रम करता था, सही मायने में उत्पादक वर्ग था, सामाजिक पायदान पर उसे उतना ही कम मानसम्मान हासिल था. जो चालाक और अनुत्पादक होकर दूसरों के श्रम पर जीता था, उसे समस्त संसाधनों का स्वामी और कर्ताधर्ता घोषित कर दिया गया.

भारतीय संस्कृति के इतिहास में हम पढ़ते आए हैं कि हजारों वर्ष पहले आर्यों ने भारत भूमि में प्रवेश किया था. बालगंगाधर तिलक जैसे लेखकों का यही मानना था. भारत पहुंचने के बाद उनका यहां के शांतिप्रिय कबीलों के साथ संघर्ष हुआ. कुछ लड़ाइयों में आर्य विजयी रहे. जहां सीधे विजय असंभव थी, वहां संधियों से काम चलाया गया. उसके लिए जो भी समझौते आवश्यक थे, किए गए. ऋग्वेद के अनुसार शिव अनार्य देवता हैं. मूलनिवासियों की सुविचारित युद्धशैली और नायकप्रधान सेना थी. इसलिए आरंभिक युद्धों में आर्यों को पराजय का सामना करना पड़ा था. सीधी लड़ाई से बचने के लिए उन्होंने कदमकदम पर कूटनीति को अपनाया. असुरों के नायक शिव को अपने पक्ष में करने के लिए आर्य सम्राट हिमवंत की पुत्री गौरी का विवाह उनके साथ कराया गया. फलस्वरूप शिव को ‘महादेव’ का दर्जा प्राप्त हुआ. शिव के देवताओं के पक्ष में जाते ही असुर बिखरने लगे. प्रकारांतर में देवताओं की कूटनीति को समझे बिना ‘भोले’ शिव भारत की मूल संस्कृति की कीमत पर, आर्य संस्कृति के सबसे सशक्त संवाहक सिद्ध हुए.

दूसरा उदाहरण कृष्ण का है. उनका आदिउल्लेख ऋग्वेद में मिलता है. तदनुसार उन्होंने अनार्य योद्धा और यदुओं के नायक के रूप में, दस सहò यदुसैनिकों के साथ इंद्र से टक्कर ली थी. इंद्र द्वारा छलपूर्वक पराजित यदु कबीला उत्तरपश्चिम की ओर विस्थापित हो गया. अगले 1500 वर्ष के अंतराल में उसके वंशज यमुना किनारे की उपजाऊ जमीन को खेती योग्य बनाकर खासी शक्ति और समृद्धि प्राप्त कर चुके थे. उनकी उपेक्षा करना संभव न था. इसलिए इंद्र के हाथों छलपूर्वक मारे गए कृष्ण को देवता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया. ‘देवराज’ के माथे से कृष्णहत्या का कलंक मिटाने के लिए महाभारत सहित पौराणिक ग्रंथों में भील को कृष्ण का हत्यारा घोषित किया गया. उसके लिए कुछ कथाएं और उपकथाएं गढ़ी गईं. इससे दो उद्देश्य साधे गए. सुदास के विरुद्ध संग्राम में भीलों ने यदु कबीले का साथ दिया था. दोनों अनार्य जातियां थीं. भील कबीले के नायक द्वारा हत्या दिखाकर एक तो इंद्र को उस कलंक से मुक्ति दिलाई गई. दूसरे यदु कबीले और भीलों की एकता को हमेशाहमेशा के लिए समाप्त कर दिया गया. राम और कृष्ण का देवत्व सिद्ध करने के लिए भक्त कवियों ने नएनए मिथ गढ़े. परिणामस्वरूप मंदिरों और धर्मालयों की खोई प्रतिष्ठा पुनः वापस लौटने लगी.

संतकाल के बाद सुधारवाद की अगली आहट उनीसवीं शताब्दी के साथ सुनाई पड़ती है. उसके पीछे पश्चिम से आए विचारों और नई शिक्षा की प्रेरणाएं थीं. उन्नीसवीं शताब्दी के सुधारवादियों को हम दो वर्गों में बांट सकते हैं. पहला धार्मिक सुधारवादी. दूसरा सामाजिक सुधारवादी. पहले वर्ग के सुधारक समाज के उच्च वर्गों से आए थे. उनकी प्राथमिकता हिंदू धर्म को उन कुरीतियों से मुक्ति दिलाना था, जो दलितों और पिछड़ों को धर्मांतरण के लिए प्रेरित कर रही थीं. धार्मिक सुधारवादियों में महर्षि दयानंद, रामकृृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद आदि के नाम लिए जा सकते हैं. उन्होंने सामाजिक भेदभाव पर सवाल उठाए. ऊंचनीच की भावना से मुक्ति का आवाह्न किया. लेकिन येनकेनप्रकारेण वे वर्णव्यवस्था के समर्थक बने रहे. जातियों को वैध ठहराने तथा शूद्रों को वैदिक संस्कृति से जोड़ने के लिए प्राचीन मिथकों का सहारा लिया गया. कुल मिलाकर जातिभेद को कम करने, ऊंचनीच की खाई को पाटने में वे सभी नाकाम रहे. जाति और धर्म के बीच शक्तिशाली गठजोड़ सामाजिक वैषम्य को प्राकृतिक बताया. जो भी हो, सुधारवादियों की असफलता ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि भारतीय समाज में जाति जीवन के प्रत्येक पक्ष को प्रभावित करती है. यहां तक कि आंदोलनों की सफलताअसफलता, उसकी दशादिशा पर भी उसके प्रवत्र्तकों की जाति का प्रभाव पड़ता है.

जाति के आधार पर सामाजिक सुधारवादियों को पुनः दो हिस्सों में बांटा जा सकता है. पहले वे जो ऊंची जातियों से आए थे. उनका असली उददेश्य हिंदू धर्म के बिखराव को रोकना था. सुधार की उनकी संकल्पना धर्म और जाति की सीमा में, उनके मूलभूत ढांचे को चुनौती दिए बिना, केवल रूढ़ियों पर प्रहार तक सीमित थी. व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव की न तो उनकी इच्छा थी, न कार्ययोजना, न ही उनकी वैचारिक चेतना में उसके लिए खास जगह थी. केशवचंद सेन(प्रार्थना समाज), डाॅ. आत्माराम पांडुरंग(ब्रह्म समाज), गोपाल भंडारकर, जस्टिस रानाडे(सर्वेंट्स आॅफ इंडिया सोसाइटी) आदि ने जातिप्रथा पर सवाल उठाते हुए उसके उन्मूलन की मांग की. परंतु उनके आंदोलन का मुख्य ध्येय छूआछूत और जातिआधारित भेदभाव को कम करने; तथा शूद्रों के प्रति थोड़ा नर्म रुख अपनाने तक सीमित था. शूद्रों के अधिकारहनन तथा उनपर होने वाले अत्याचारों की ओर से लगभग सभी मुंह मोड़े रहे. सच तो यह है कि शताब्दियों से प्राप्त सुखसुविधाओं तथा विशेषाधिकारों को पूरी तरह से छोड़ने को उनमें से कोई भी तैयार न था. इसलिए उनके आंदोलन बहुत कम प्रभावकारी सिद्ध हुए.

दूसरे वर्ग के समाज सुधारक समाज के निम्नस्थ वर्गों से आए थे. जाति आधारित भेदभाव और दमन के कड़वेकसैले अनुभव उन्हें पीढ़ियों से प्राप्त थे. नई शिक्षा और विचारचेतना ने उन्हें यह समझ दी थी कि वे शोषण के असली कारणों को समझ, उनका समाधान खोजते हुए समाज को उसके अनुरूप चेता सकें. उन्होंने जाति के साथसाथ उसको प्रश्रय देने वाले धर्म को भी अपना निशाना बनाया. यह मानते हुए कि अकेले धर्म, धार्मिक नैतिकता या नैतिकता के भरोसे सामाजिक न्याय को समर्पित आदर्श समाज की रचना असंभव है, डाॅ. आंबेडकर आदि विद्वानों विधिआधारित राज्य की आवश्यकता पर जोर दिया. ज्योतिराव फुले ने समाज को धार्मिक अंधविश्वासों से बाहर लाने के लिए शिक्षा और स्त्रीसमानता पर जोर दिया. उसके फलस्वरूप आधुनिक भारत की नींव रखी गई. यह आंदोलन जैसेजैसे आगे बढ़ा, ब्राह्मणवादी अभिजन संस्कृति के समानांतर जनसंस्कृति को बढ़ावा देने की मांग समाज में जोर पकड़ने लगी. ऐसी संस्कृति जिसमें सभी के लिए सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक स्वतंत्रता हो. लोग समानता और सहभागिता के आधार पर जीवनयापन करते हों. जो किसी भी प्रकार के स्तरीकरण से सर्वथा मुक्त हो. वे कबीर और रैदास की परंपरा के लोग थे. इस श्रेणी के विचारकों में सबसे पहला नाम महात्मा ज्योतिराव फुले का आता है. फुले ने धार्मिक प्रतीकों और मिथकों की नई व्याख्या की. धर्म और संस्कृति के नाम पर प्रचलित आडंबरों का पर्दाफाश किया. अंग्रेजी शिक्षा पर जोर दिया. पत्नी सावित्रीबाई फुले और फातिमा बी के साथ मिलकर उन्होंने कई स्कूलों की शुरुआत की. फुले के सहयोगियों में गोपाल बाबा वालंग्कर(मृत्यु सन 1900), शिवराम जनबा कांबले(1875—1942) शामिल थे. फुले के प्रेरणास्रोतों में कबीर, रैदास आदि संत कवि तथा शिवाजी सम्मिलित थे. शिवाजी की जाति कुन्बी, पिछड़ी जातियों में गिनी जाती है. अपनी प्रतिभा, रणकौशल और जुझारूपन के बल पर शिवाजी ने स्वतंत्र साम्राज्य खड़ा किया था. परंतु स्थानीय ब्राह्मण एक शूद्र को राजपद सौंपने को तैयार न थे. इस काम को काशी के ब्राह्मणों की मदद से संपन्न कराया गया. फुले के बाद आंदोलन को गोपाल गणेश अगरकर, डाॅ. भीमराव आंबेडकर, ईवीएस रामास्वामी पेरियार ने विस्तार दिया. उसे शिवाजी के वंशज शाहू जी महाराज का संरक्षण तथा निचली जातियों का भरपूर समर्थन मिला. डाॅ. आंबेडकर अपने समय के सर्वाधिक प्रतिभाशाली व्यक्तियों में से थे. उन्होंने वंचितों और उत्पीड़न के शिकार लोगों को संगठित करने, उनके अधिकारों की संरक्षा हेतु स्वतंत्र भारत के संविधान में युगांतरकारी व्यवस्था करने जैसे क्रांतिकारी कार्य किए.

वर्णव्यवस्था जिसे आर्यों की देन कहा जाता है, को वे अपने मूल प्रदेश से लेकर आए थे. इस तर्क के आधार पर ब्राह्मण जो वर्णव्यवस्था के शिखर पर हैं, मूलतः विदेशी सिद्ध हुए. इस विचार का प्रयोग अभी तक केवल अकादमिक क्षेत्रों तक सीमित था. पहली बार फुले ने उसका उपयोग दलितों और पिछड़ों में जातीयचेतना जगाने के लिए किया. वेदों तथा अन्य धर्मशास्त्रों के उल्लेख से उन्होंने ब्राह्मणों को बाहरी घोषित किया तथा शूद्रों एवं दलितों को यहां का मूलनिवासी. फुले की यह सैद्धांतिकी उनकी पुस्तक ‘गुलामगिरी’(1873) में सामने आई. उसके आधार पर 1892 में ‘मद्रास समाजसुधार संघ’ की स्थापना हुई. उसने जाति और वर्ण के आधार पर गैरब्राह्मणों के शोषण की ओर लोगों का ध्यान आकर्पित कराया. अस्पृश्यता को हिंदू समाज का कलंक मानते हुए उसे मिटाने का संकल्प लिया. संघ के नेताओं को उम्मीद थी कि गांधी के नेतृत्व में दक्षिण में तेजी से पांव पसार रही कांग्रेस सामाजिक न्याय के मुद्दे पर उनका साथ देगी. लेकिन उन्हें निराशा ही हाथ लगी. अंततः संघ ने अपने बल पर जातिवाद, ब्राह्मण वर्चस्व और दलितों के साथ हो रहे अत्याचारअनाचार के विरुद्ध संघर्ष तेज किया. उसने वर्षों से उत्पीड़न का शिकार रही जातियों में असंतोष का संचार किया. कांग्रेस की भाांति ‘मद्रास समाजसुधार संघ’ के भी ‘नरम दल’ और ‘गरम दल’ नामक दो वर्ग थे. ‘नरमदल’ वाले जनतंत्र में भरोसा रखते थे. उन्होंने आंदोलन का रास्ता अपनाया. गर्मदल वाले प्रांत में ब्राह्मण वर्चस्व के विरुद्ध संघर्ष छेड़े रहे. आगे चलकर उसके नेताओं ने ‘जस्टिस पार्टी’ का गठन किया और जनता में व्याप्त असंतोष का लाभ उठाते हुए सत्ता हासिल की. वह राजनीतिक स्वतंत्रता से सामाजिक स्वाधीनता पर जोर देती थी. इस कारण अंग्रेजों के प्रति उसके नेताओं के मन में सहानुभूति थी. उसके समर्थकों में बड़ी संख्या तमिलनाडु की मध्यम और पिछड़ी जातियों की थी. उन्हें समाज के बड़े वर्गों का समर्थन भी उन्हें प्राप्त था. सरकारी पदों पर ब्राह्मणों के वर्चस्व को रोकने के लिए ‘जस्टिस पार्टी’ ने ब्राह्मणों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण देने की व्यवस्था की.

दर्जनों आंदोलनों तथा सैकड़ों महापुरुषों के अनथक योगदान के बावजूद स्वातं×यपूर्व भारत में अपेक्षित जातीय सुधार संभव न हो सके. दरअसल आमूल परिवर्तन की पहली और महत्त्वपूर्ण शर्त संबंधित वर्गों में उसके प्रति जागरूकता तथा उसकी स्वयंस्फूत्र्त कामना है. जिस समाज में परिवर्तन के प्रति सामान्य चेतना का अभाव हो वहां परिवर्तन, केवल दिखावे के लिए ऊपर से थोप दिए जाते हैं. उनकी रूपरेखा, लोकहित के बजाए शीर्ष पर मौजूद मुट्ठीभर लोगों की स्वार्थसिद्धि हेतु बनाई जाती है. इस कारण जनता भी उन आंदोलनों की ओर से उदासीन बनी रहती है. नतीजन वास्तविक परिवर्तन हमेशा अलभ्य बना रहता है. देखा यही गया है कि जो समाज में मसीहा बनकर आता है, वह अंततः मठाधीश बनकर रह जाता है. अनुयायी पत्थर को देवता में तब्दील कर देते हैं. इसलिए जागरूक जनता अपने विकास की जिम्मेदारी खुद संभालती है, किसी मसीहा का इंतजार नहीं करती. भारत स्वयं इसका उदाहरण है. फुले, आंबेडकर, पेरियार जैसे नेताओं ने लोगों को उनके इतिहास और सामथ्र्य का बोध कराया तो वे स्वतः संगठित होने लगे.

ई वी रामास्वामी पेरियार : दि वाल्तेयर आॅफ ईस्ट

यूनेस्को ने पेरियार को ‘पूरब का सुकरात’ कहकर सम्मानित किया था. समर्थक उन्हें आधुनिक संत मानते हैं. भारतीय राजनीति में अपने विद्रोही तेवरों के साथ उन्होंने जिस तर्कशक्ति का आगाज किया, उसके लिए यह उपमा सही बैठती है. किंतु जिस निर्भीकता, साहस और बुद्धिमत्ता के साथ उन्होंने निरर्थक कर्मकांडों तथा जड़परंपराओं को चुनौती दी, धर्म के नाम पर गुरुडम फैलाने वालों को ललकारा, उनका योगदान उन्हें महान फ्रांसिसी चिंतक वाल्तेयर के समकक्ष ठहराता है. उन्होंने समाज में धर्म के आधार पर हो रहे शोषण को समझा. जाना कि धर्म किस प्रकार लोगों के दिलोदिमाग का बेमेलकारी सभ्यता एवं संस्कृति से अनुकूलन करता है. असमानता को नियति बताकर उन्हें बौद्धिक स्तर पर पंगु बनाता है. लोकप्रिय राजनीति में जबकि अधिकांश नेता ईश्वर या उसके नाम पर होने वाले कर्मकांडों में निजी अविश्वास के बावजूद खुद को नास्तिक कहने का साहस नहीं जुटा पाते—पेरियार ने स्वयं को न केवल ईश्वरविरोधी कहा, बल्कि धार्मिक रूढ़ियों, पाखंड और बौद्धिक जड़ताओं के विरुद्ध आवाज भी उठाई. लोकप्रियता के तमाम खतरे उठाते हुए उन्होंने जोरदार शब्दों में ईश्वरीय सत्ता को नकारा. साथ ही समानता, सहयोग और सामंजस्य पर आधारित समाज की संरचना पर बल दिया. छूआछूत जैसी घृणित पृथा के लिए उन्होंने ईश्वर में आस्था को दोषी माना. विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग पर हमला करते हुए उन्होंने कहा कि समाज का बहुत छोटासा हिस्सा धर्म और जाति के नाम पर राज्य के अधिकांश संसाधनों और महत्त्वपूर्ण पदों पर अधिकार जमाए रहता है. उसके लिए वर्गीय स्वार्थ ही सबकुछ हैं. अपने सामाजिकसांस्कृतिक और राजनीतिक अधिकारों का उपयोग वह अपने वर्गीय स्वार्थों की सिद्धि के लिए करता है. उनका इशारा ब्राह्मणों की ओेर था, जो मद्रास प्रेसीडेंसी की कुल जनसंख्या का मात्र 3.2 प्रतिशत होने के बावजूद प्रांत के 70 प्रतिशत संसाधनों और सरकारी पदों पर विराजमान थे. उसके परिणामस्वरूप बहुसंख्यक वर्ग घोर विपन्नता और दमनकारी हालात में जीने के लिए बाध्य था. छूआछूत जैसी निकृष्ट प्रथा के लिए उन्होंने भारतीयों की अंधश्रद्धा को दोषी माना. शूद्रों के मंदिर प्रवेश पर रोकथाम को लेकर उनका कहना था—

‘‘इस देश में जब तक ईश्वर का अस्तित्व रहेगा, तब तक छुआछूत भी कायम रहेगी. यह ऐसा घिनौना आविष्कार है, जिसकी मदद से अछूतों को जानवरों से भी बदतर माना जाता है. मंदिर बनाने की प्रक्रिया से लेकर मूर्ति स्थापना तक अस्पृश्यों के आगमन से न तो वह जगह अपवित्र होती है, न मूर्तियां. लेकिन मंदिर बनने के बाद, मूर्तियों में प्राणप्रतिष्ठा होते ही अछूतों के लिए वह स्थान निषिद्ध मान लिया जाता है.’’

उनका पूरा नाम इरोड वेंकट रामास्वामी नायकर था. प्रशंसक उन्हें ईवी रामास्वामी पेरियार भी कहते हैं. ‘पेरियार’ उनकी उपाधि थी. उसका अर्थ है—श्रेष्ठतम; यानी महानअग्रज….दि ग्रेट मेन. 1923 में धर्म और जाति को तिलांजलि देते हुए यह संबोधन उन्होंने अपने नाम के साथ जोड़ा था. एक सभा में उन्होंने उपस्थित जनसमुदाय से आग्रह किया वे जातिसूचक शब्दों को त्याग दें. वे उम्र में फुले से 52 वर्ष कम तथा आंबेडकर से 12 वर्ष अधिक थे. उन्होंने लंबा तथा संघर्षपूर्ण जीवन जिया. पेरियार आंबेडकर की तरह उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं थे, किंतु अपने अनुभव एवं स्वाध्याय के बल पर उन्होंने जो ज्ञान अर्जित किया; उसके आधार पर जैसा आत्मविश्वास उनमें था, उसे देखते हुए वे समकालीन बुद्धिजीवियों में अग्रणी सिद्ध होते हैं. तर्कशक्ति और विवेचनसामर्थ्य में वे बेमिसाल थे. चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य उनके मित्र थे. लेकिन दोनों के बीच विचारवैभिन्न्य बहुत बड़ा था. उन्होंने अपने लाखों प्रशंसक और आलोचक तैयार किए. तर्क के समय वे अपने प्रतिद्वंद्वियों पर हमेषा भारी पड़ते थे. वैचारिक स्तर पर हम उन्हें आंबेडकर की अपेक्षा फुले के अधिक करीब पाते हैं. दोनों के बीच एक अंतर यह भी है कि आंबेडकर समाज सेवा में सफल होकर राजनीति में आए थे, उनके लिए राजनीति समाजसेवा ही थी. पेरियार पहले राजनीति में थे. सीमित समय में जितनी सफलता संभव थी, प्राप्त की. किंतु सक्रिय राजनीति उन्हें लंबे समय तक बांध कर न रख सकी. जल्दी ही वे उससे ऊब गए और समाजसेवा में लौट आए. लक्ष्य दोनों का एक ही था—समाज के विपन्न, उत्पीड़ित और असमानता के शिकार वर्गाें के अधिकारों के लिए संघर्ष करना. दोनों ने अपनेअपने क्षेत्र में युगांतरकारी कार्य किए और सामाजिक परिवर्तन के संवाहक बने.

पेरियार चाहते तो बाकी राजनीतिज्ञों की भांति मानसम्मान और पदप्रतिष्ठा से भरा जीवनयापन कर सकते थे. राजनीति उनके लिए सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मात्र थी. वहां भी उन्होंने संघर्ष का रास्ता चुना. जब लगा कि परंपरागत राजनीति से सामाजिक न्याय के लक्ष्य को प्राप्त करना कठिन है, सक्रिय राजनीति से अविलंब नाता तोड़, वे सामाजिक आंदोलनों की डगर पर चल पड़े. आजीवन उन लोगों के लिए संघर्षरत रहे जो धर्म के नाम पर, जाति, वर्ण तथा लिंग के नाम पर असमानता, दैन्य और अपमान से भरपूर जीवन जीने को विवश थे. कबीर, रैदास, नारायण गुरु, फुले आदि से प्रेरणा लेते हुए उन्होंने द्रविड़ अस्मिता के मुद्दे को ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ का केंद्रीय मुद्दा बनाया. वैज्ञानिक चेतना से भरपूर, अकाट्य तर्कों के बल पर वे दलितपिछड़ी जातियों के अंतर्मन में छिपे आक्रोश को हवा देने में कामयाब हुए. उनके अस्मितावादी आंदोलनों को व्यापक जनसमर्थन हासिल हुआ. फलस्वरूप वहां सामाजिक परिवर्तन की बड़ी इबारत लिखी गई. अकेले पेरियार ने दक्षिण में वह कर दिखाया, जिससे आगे चलकर संपूर्ण भारत में सामाजिक न्याय का रास्ता प्रशस्त हुआ.

रामास्वामी का जन्म 17 सितंबर, 1879 को मद्रास प्रेसीडेंसी के कोयंबटूर जिले के इरोड नामक कस्बे में हुआ था. पिता का नाम था, वेंकटप्पा नायडु तथा माता थीं—चिन्ना थ्याम्मल. कुल चार भाईबहनों में बड़े भाई ई वी कृष्णास्वामी थे. बहनें पोन्नुथेई और कन्नामल रामास्वामी से छोटी थीं. रामास्वामी का परिवार कन्नड़ मूल का था. जाति बलीजा, जिसे वहां पिछड़े वर्ग में गिना जाता था. ‘नायकर’ उनका गौत्र नाम था. रामास्वामी के मातापिता पारंपरिक रीतिरिवाजों में विश्वास रखते थे. आगे चलकर स्वयं को ठेठ नास्तिक घोषित करने वाले रामास्वामी पेरियार आरंभ में अपने परिजनों की भांति आस्थावादी थे. उनका बचपन अनुभवसमृद्ध था. जन्म के समय उनके परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य थी. पिता साधारण व्यापारी थे. नौ वर्ष की अवस्था तक उनका जीवन संघर्षपूर्ण परिस्थितियों में बीता. धीरेधीरे हालात सुधरे. व्यापार जमने लगा. 1888 तक उनके पिता की गिनती इरोड के सबसे धनाढ्य व्यापारी के रूप में होने लगी थी. पिता चाहते थे कि रामास्वामी उनके व्यापार को आगे बढ़ाएं. लेकिन रामास्वामी के जीवन का लक्ष्य कुछ और ही था. इसके संकेत बचपन में ही मिलने लगे थे. उनकी स्कूली शिक्षा मात्र पांच वर्ष चल सकी. पहले तीन वर्ष उन्होंने एक नर्सरी स्कूल में बिताए. विद्रोही स्वभाव के कारण जातीय दंभ के शिकार लड़कों से उनका झगड़ा होता रहता था. इसलिए प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद उनके पिता ने उन्हें ननिहाल पढ़ने के लिए भेज दिया था.

उन दिनों समाज जाति के आधार पर बुरी तरह से विभाजित था. स्कूलों में उच्च जाति के बच्चे निचली जाति के विद्यार्थियों से दूरी बनाए रखते थे. घर और स्कूल दोनों में उन्हें यही सिखाया जाता था. बालक रामास्वामी विद्रोही स्वभाव का था. उनके मित्रों में अगड़ीपिछड़ी सभी जातियों के बच्चे शामिल थे. पुराने मिजाज के मातापिता चाहते थे कि उनका बेटा सामाजिक मर्यादाओं का पालन करे. स्कूल और स्कूल से बाहर छोटी जाति के विद्यार्थियों से दूरी बनाकर रखे. मगर बालक रामास्वामी पर उनकी बातों का कोई असर न पड़ा. स्कूल के आसपास गरीब लोगों की बस्तियां थीं. मातापिता और अध्यापक के निर्देशों की परवाह किए बिना किशोर रामास्वामी उन बस्तियों में चला जाता, और वहां बच्चों के साथ खेलने लगता. बच्चों के बीच झगड़े भी होते. उस समय उसे डांट पड़ती. कभीकभी मार भी खानी पड़ती. एक बार बालक रामास्वामी अछूत बच्चों के साथ खेलते हुए पकड़ा गया. दंडस्वरूप उसके दोनों पैरों में लोहे की दो राॅडें बांध दी गईं. इसके बावजूद उसके आचरण में कोई सुधार नजर न आया तो पिता ने बेटे के और पढ़नेलिखने की उम्मीद छोड़ दी. विद्रोही मानसिकता के चलते वे औपचारिक पढ़ाई के क्षेत्र में कुछ खास हासिल न कर सके.

उस समय पेरियार की अवस्था मात्र ग्यारह वर्ष थी. वे पिता के साथ व्यवसाय में हाथ बंटाने लगे. 1911 में पिता के निधन के बाद उन्होंने अपने पैत्रिक व्यवसाय को भलीभांति संभाल लिया. अगले बीस बर्ष उन्होंने व्यापार करते हुए बिताए. व्यापार करते हुए उन्होंने दुनियादारी सीखी. समाज में व्याप्त ऊंचनीच और उसके कारणों को समझा. अपने परिश्रम और बुद्धिबल के आधार पर पेरियार खुद को कुशल व्यापारी सिद्ध करने में कामयाब रहे. फलस्वरूप समाज और स्थानीय व्यापारियों में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ने लगी. उन्हीं दिनों उनका स्थानीय नेताओं से संपर्क बढ़ा. उन संपर्कों के बल पर राजनीति की राह आसान होती गई. उन दिनों मद्रास की राजनीति में परिवर्तन का दौर चल रहा था. पूरे भारत में स्वतंत्रता की मांग बढ़ती जा रही थी. उसने वंचित एवं उत्पीड़ित समुदायों के मन में अस्मितावादी चेतना का संचार किया था. अपने प्रवचनों में गांधी छूआछूत और जातीय भेदभाव का खंडन करते थे. प्रकट रूप में सभी बड़े कांग्रेसी नेता उनका समर्थन करते थे. इसलिए उस समय के सामान्य युवा की भांति पेरियार भी गांधी और कांग्रेस के आकर्षण में बंधते चले गए.

पेरियार का विवाह 19 वर्ष की अवस्था में विधिविधान के साथ, नागम्मई के साथ संपन्न हुआ. नागम्मई उनसे उम्र में पांच वर्ष छोटी थीं. उनका विवाह भी असाधारणसी घटना थी. उस समय की परंपरा थी कि किशोरावस्था पार करतेकरते लड़केलड़कियों के विवाह हो जाया करते थे. पेरियार के पिता ने अपने ही जैसे धनाढ्य व्यापारी की कन्या को उनके लिए चुना था. पेरियार तक बात पहुंची तो उन्होंने उस रिष्ते से इन्कार कर दिया. बजाय व्यापारी की बेटी के उन्होंने ननिहाल के पक्ष की दूर के रिश्तेदार की बेटी से विवाह करने की इच्छा जाहिर की, जिससे वे मिल चुके थे. लड़की के मातापिता की आर्थिक स्थिति उनके परिवार की अपेक्षा बहुत कमजोर थी. मगर पेरियार के पिता उस समय तक उनके दृढ़निश्चयी स्वभाव को समझ चुके थे. न चाहते हुए भी उन्होंने नागम्मई से विवाह की सहमति दे दी. विवाह के समय भी पेरियार ने उन परंपराओं का विरोध किया, जिनपर ब्राह्मणत्व की छाप थी. वे नहीं चाहते थे कि उनकी पत्नी सामान्य स्त्री की तरह फिजूल के पूजापाठ में समय बरबाद करे. लेकिन नागम्मई नियमित मंदिर जाने वाली आस्थावान स्त्री थीं. पेरियार ने उन्हें समझाने की कोशिश की. आरंभ में नागम्मई पर उनकी सलाह बेअसर रही. उसके बाद पेरियार ने वह किया, जो किसी को भी चैंका सकता है. जिस रास्ते से नागम्मई मंदिर के लिए निकलतीं, अपने कुछ साथियों के साथ पेरियार भी वहां खड़े हो जाते और अपनी ही पत्नी पर छींटाकशी करने लगते. तंग आकर उन्होंने मंदिर जाने की जिद छोड़ दी. पति के साथ रहते हुए नागम्मई का मन बिलकुल बदल गया. पति की सलाह पर उन्होंने अपने बहुमूल्य गहने तक त्याग दिए. आगे चलकर वे पेरियार के प्रत्येक आंदोलन में उनकी सच्ची सहधर्मिणी सिद्ध हुईं. वायकम आंदोलन में पेरियार को गिरफ्तार कर लिया तो नागम्मई संघर्ष में उतर आईं. विवाह के कुछ वर्ष पश्चात नागम्मई ने एक पुत्री का जन्म दिया. तब तक पेरियार खुद को समाजकल्याण के लिए समर्पित कर चुके थे. मात्र पांच महीने की थी, जब वह बच्ची बीमार पड़ी और देखभाल के अभाव में चल बसी. वह उनकी पहली और अंतिम संतान थी. 1933 में नागम्मई का भी निधन हो गया. आगे चलकर रामास्वामी पेरियार ने दूसरी शादी भी की परंतु उससे कोई संतान न हुई.

अभी तक रामास्वामी नायकर के बारे में जो चर्चा हुई है, वे साधारणसी बातें हैं. पेरियार सफल व्यापारी पिता की महत्त्वाकांक्षी संतान थे. लेकिन यदि वे केवल व्यापार तक सिमटे रहते तो उन हजारोंलाखों धनपशुओं में से एक होते जो ताजिंदगी धनार्जन में लिप्त रहकर अंततः उसी की कामना में दम तोड़ देते हैं. अथवा ज्यादा से ज्यादा उन लोगों में से होते, जिनका काम बातों के बल पर चाय के प्याले में तूफान उठाते रहना है. तब वे ‘पेरियार’ न बन पाते. ऐसे रामास्वामी के लिए भला हम भी क्यों कागज काले कर रहे होते! समय की जरूरतों ने आंबेडकर को अर्थशास्त्री से समाजविज्ञानी और विधिशास्त्री बना दिया था. सामाजिक दबावों ने ही पेरियार को उन रास्तों की ओर मोड़ दिया, जिस दिशा में बढ़ने की उससे पहले उन्होंने कभी कल्पना तक न की होगी.

पेरियार के नेतृत्व में उनका पैत्रिक व्यवसाय तेजी से बढ़ रहा था. 1920 में ‘मद्रास पे्रसीडेंसी ऐसोशिएसन’ का गठन हुआ. पेरियार तब तक स्थानीय नेताओं से संपर्क बना चुके थे. जिस समाज से वे आए थे, उसमें सक्रिय राजनीति से जुड़ने की कोई परंपरा न थी. सवर्ण वर्चस्व वाली राजनीति में पिछड़े वर्गों को ऐसा अवसर मिल भी नहीं पाता था. परंतु पेरियार उन युवाओं में से न थे जो परिवेश और परिस्थितियों के दास बन जाते हैं. वे उन विरले लोगों में से थे जो तमाम चुनौतियों से टकराकर स्थितियों को अपने अनुसार मोड़ने का सामथ्र्य रखते हैं. युवावस्था में ही उनकी राजनीति में रुचि बढ़ने लगी थी. उन दिनों कांग्रेस राजनीति का प्रवेश द्वार थी. बड़ेबड़े नेता, जिन्होंने आगे चलकर कांग्रेस के साथ और उसके विरोध में अपनी राजनीति को चमकाया, कांग्रेस से ही निकले थे. युवा रामास्वामी को भी कांग्रेस से उम्मीदें थीं. इसलिए 1920 में उन्होंने कांगे्रस की सदस्यता ग्रहण कर ली. उसी वर्ष गांधी जी ने ‘असहयोग आंदोलन’ की शुरुआत की थी. पेरियार को कांग्रेस का उदारवादी रवैया, विशेषकर छूआछूत उन्मूलन के लिए चलाए जा रहे कार्यक्रम पसंद थे. इस कारण वे कांगे्रस और गांधीजी से प्रभावित भी थे. असहयोग आंदोलन के दौरान गांधीजी ने औपनिवेशिक सरकार के साथ किसी भी प्रकार का सहयोग का आवाह्न किया. कांग्रेसजनों और आम जनता से अपील की कि वे उन सभी पदों और सुविधाओं का त्याग कर दें, जो किसी भी रूप में सरकार की ओर से प्राप्त हुए हैं. पेरियार के व्यवसाय का सरकार से कोई सीधा संबंध न था. तो भी गांधीजी के आवाह्न पर उन्होंने अपने जमेजमाए व्यापार को छोड़ दिया और पूरी तरह से असहयोग आंदोलन से जुड़ गए. अपने खजाने के दरवाजे भी आंदोलन के लिए खोल दिए. उनके नेतृत्व में मद्रास में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का सफल आंदोलन हुआ. विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई. खादी को प्रोत्साहन देने के लिए वे न केवल खुद मोटे खद्दर के कपड़े पहनने लगे, बल्कि अपने परिवार और परिजनों को भी उसके लिए प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया. खादी के समर्थन में उनका कहना था—

यदि प्रत्येक व्यक्ति खादी को अपना ले तो देश में बेरोजगारी और भुखमरी की कोई समस्या न रहे’

कुशल प्रबंधन क्षमता, नेतृत्वकला और वक्तृत्वकौशल के बल पर वे तमिलनाडु की राजनीति में जगह बनाने में सफल हुए. उनकी निष्ठा और लगन को देखते हुए उन्हें कांग्रेस का प्रांतीय अध्यक्ष बना दिया गया. उस पद पर वे लगातार दो वर्षों तक बने रहे. उस समय तक वे वैचारिक स्तर पर परिपक्व हो चुके थे. उनकी प्रतिबद्धताएं भी सामने आने लगी थीं. कांग्रेस बुर्जुआ पार्टी थी. पेरियार के लिए वहां सबकुछ आसान न था. हालांकि एक नेता के रूप में कांग्रेस के भीतर उनकी प्रतिष्ठा, मानसम्मान और पैठ में निरंतर बढोत्तरी हो रही थी. पेरियार सामाजिक भेदभाव और जातिआधारित ऊंचनीच से आहत थे. राजनीति के माध्यम से वे उन जड़ताओं पर प्रहार करना चाहते थे. मगर कांग्रेसजनों का असहयोगी रवैया देख उन्हें लगता था कि जिस कार्य के लिए वे राजनीति से जुड़े हैं, उसे पूरा नहीं कर पा रहे हैं. कांग्रेस के नेता किसी भी बड़े सामाजिक परिवर्तन के लिए तैयार ही नहीं हैं.

यह स्वाभाविक था. अपने गठन के समय से ही कांग्रेस अभिजनों की पार्टी थी. उसकी स्थापना कुछ अभिजात्यों द्वारा अपने वर्गीय हितों की सुरक्षा हेतु की गई थी. कांग्रेस के संस्थापक ह्यूम का विचार था कि इससे समाज के पढ़ेलिखे वर्गों में अंग्रेज सरकार के प्रति आक्रोश कम होगा. इससे 1857 जैसी क्रांति की संभावनाएं क्षीण होंगी. ह्यूम को तत्कालीन अंग्रेज शासकों का समर्थन प्राप्त था. लगभग पचास वर्षों तक कांग्रेसी नेता, अंगे्रज सरकार को बड़ी चुनौती दिए बिना, अपना उद्देश्य साधने में लगे रहे. गांधी ने उसका कायाकल्प करने की कोशिश की. उनके कार्यकाल में कांग्रेस और जनता के बीच की दूरी में कुछ कमी आई. फिर भी उसके अधिसंख्यक नेता अभिजन मानसिकता से बाहर न आ सके. परिणामस्वरूप दलितों और पिछड़ों को लेकर कांग्रेस का रवैया ज्यों का त्यों बना रहा. पेरियार चाहते थे कि सरकार पढ़ीलिखी अभिजात्य संतानों के लिए ब्रिटिश इंडिया की नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करे. कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण करते समय उन्हें विश्वास था कि जैसेजैसे कांग्रेस में वंचित और पिछड़े वर्ग के नेताओं की संख्या बढ़ेगी, उसके बड़े नेता देशहित में भेदभाव से ऊपर उठकर काम करने लगेंगे. अपने भाषणों में गांधीजी समेत कांग्रेस के सभी बड़े नेता यह आश्वासन भी देते थे. हकीकत इससे जुदा थी. कुछ ही अवधि में पेरियार को कांग्रेसी नेताओं की कथनी और करनी का अंतर समझ आने लगा. उन्हें यह देखकर हैरानी होती कि सार्वजनिक मंचों पर समानता और समरसता की बात करने वाले कांग्रेस के बड़े नेता भी भीतर से घोर जातिवादी हैं. समाज में व्याप्त ऊंचनीच को कम करने की उनकी न तो कोई योजना है, न ही संकल्प. कांगे्रसी नेता भी पेरियार के विचारों और उनकी प्रतिबद्धता को लेकर सशंकित रहते थे. पेरियार के वकृत्व कौशल और जनता में उनकी पैठ के कारण वे भीतर ही भीतर उनसे डरते थे. तो भी उन्हें लगता था कि पद और प्र्रतिष्ठा का प्रलोभन उन्हें कांग्रेस से, जो उन दिनों देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी थी, जोड़े रखेगा.

1924 तक पेरियार राजनीति में पैर जमा चुके थे. इस अवधि में उन्होंने खुद को बौद्धिक स्तर पर परिपक्व किया था. समकालीन राजनीति को उन्होंने समाज और संस्कृति के संदर्भ में समझने की कोशिश की. वे चाहते थे कि कांग्रेस सामाजिक सुधार के लिए ऐसे रचनात्मक कार्योें को अपनाए जिनसे समाज के दमितउत्पीड़ित जन को जातीय शोषण से मुक्ति मिले. वे मानसम्मान से भरपूर जीवन जी सकें. उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता विकसित हो. परंतु उन्हें लग रहा था कि जिन सामाजिक लक्ष्यों की पूर्ति वे राजनीति के माध्यम से चाहते हैं, और स्वतंत्र भारत को लेकर जनसाधारण की जो उम्मीदें हैं, प्रचलित राजनीति के माध्यम से उनकी पूर्ति असंभव है. ब्राह्मणवाद जिसने समाज को शताब्दियों से जकड़ा हुआ है, और जिससे समाज के बड़े समूह की स्वतंत्रता आहत है, वही कांग्रेस की नीतियों का नियामक, वास्तविक कर्ताधर्ता है. बावजूद इसके पेरियार कांग्रेस के कार्यक्रमों में सक्रिय हिस्सा लेते रहे. उनकी इच्छा थी कि कांग्रेस समाजार्थिक आधार पर पिछड़े और धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यकों की शिक्षा एवं रोजगार की मांग को सरकार के सामने रखे. उन्होंने इस आशय का एक मसौदा तैयार किया था, जिसे वे कांग्रेस के 1920 में थिरुमलई में होने वाले प्रांतीय अधिवेशन में प्रस्तुत करना चाहते थे. उस सम्मेलन की अध्यक्षता एस. श्रीनिवास अयंगर कर रहे थे. उन्होंने पेरियार के प्रस्ताव पर यह कहते हुए विचार करने से इंकार कर दिया था कि उससे समाज में जातीय दुराग्रह तीव्र होंगे और सामाजिक विद्वेष बढ़ेगा. पेरियार के लिए यह निराशाजनक था. फिर भी उन्होंने उम्मीद बनाए रखी. उन्हें लगता था कि आज नहीं तो कल, कांग्रेस के नेता वृहद लोकहित में उनके प्रस्ताव पर विचार करने को तैयार हो जाएंगे.

1922 में कांग्रेस के त्रिरुपुर अधिवेशन में उन्होेंने अपने प्रस्ताव को दुबारा पेश करने की कोशिश की. उस बार भी कांग्रेस के बड़े नेताओं के वर्गीय स्वार्थ आड़े आ गए. प्रस्ताव की उपेक्षा होते देख पेरियार उग्र हो गए. मुद्दे को लेकर उनकी वरिष्ठ नेताओं से जमकर बहस हुई. उच्च जातिवर्ण से आए नेता पुराणों और धर्मशास्त्रों की दुहाई देने लगे. हिंदू धर्म का कुटिल चेहरा एक बार फिर पेरियार के सामने था. क्षुब्ध होकर उन्होंने शोषणउत्पीड़न और उपेक्षा का शिकार रहे लोगों के लिए, न्याय का समर्थन करने वाले नेताओं को एक मंच पर आने का आवाह्न किया. वर्णव्यवस्था के समर्थक ग्रंथों रामायण, मनुस्मृति आदि की होली जलाने का निश्चय कर लिया. अगले वर्ष 1923 में एक बार फिर उन्होंने प्रस्ताव पर विचार करने का अनुरोध किया. उससे उच्च जाति के नेता बिफर गए. एक बार फिर जोरदार बहस हुई. मगर चली उच्च जाति के नेताओं की ही. प्रस्ताव एक बार फिर ठुकरा दिया गया. यही दौर था जब गांधी से उनके मतभेद सामने आ चुके थे. पेरियार का कहना था कि कांग्रेस के शिखर पुरुष गांधी स्वयं वर्णभेद की मानसिकता से ग्रस्त हैं. राजनीतिक मजबूरियों के तहत उनके नेतृत्व में कांग्रेस कुछ रचनात्मक कार्यों को अपनाने के विवश हुई थी, लेकिन पहले से चली आ रही व्यवस्था में आमूल परिवर्तन के लिए वह कदापि तैयार नहीं हैं. गांधी का सुधारवाद तात्कालिक उदारता के अलावा कुछ नहीं है.

पेरियार का सोच निराधार न था. तमिलनाडु की कुल जनसंख्या में ब्राह्मण मात्र 3.2 प्रतिशत थे. इतनी कम संख्या के बावजूद प्रांत के तीनचैथाई संसाधनों पर उन्हीं का अधिकार था. धर्मशास्त्रों में कृषिकर्म को वैश्य के लिए निर्दिष्ट किया गया था. ब्राह्मणों के लिए खेती निषिद्ध कर्म है. बावजूद इसके प्रांत के बड़े जमींदारों में अधिसंख्यक ब्राह्मण थे. लोग इसे लेकर सवाल न करें, इसके लिए बड़े जमींदारों ने शहरों में ठिकाना बनाया हुआ था. सरकारी पदों पर अधिसंख्यक ब्राह्मण काबिज थे. 1912 में 55 प्रतिशत डिप्टी कलेक्टर तथा 72.6 प्रतिशत जिला मुंसिफ ब्राह्मण ही थे. अनंतपुर में एक ऐसा ब्राह्मण परिवार था, जिसने सत्ता से अपनी निकटता का लाभ उठाते हुए समस्त सरकारी पदों को हथिया लिया था. यह देख स्थानीय लोगों में भारी असंतोष व्याप्त था. ब्राह्मणों के वर्चस्ववादी रवैये के विरोध की बात नई न थी. इस बेईमानी के विरोध में 1896 में एक दर्जन से अधिक लोगों ने अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया था. दूसरा उदाहरण नैल्लोर के एक ब्राह्मण परिवार का था. उसके पचास सदस्यों ने सरकारी नौकरियों पर कब्जा किया हुआ था. उसके विरोध में भी एक दर्जन से अधिक स्थानीय नागरिकों ने यूरोपीय अधिकारियों के समक्ष अपनी शिकायत पेश की थी. यह तब था, जब स्थानीय कलेक्टर सरकारी नौकरियों में सभी वर्गों को समान प्रतिनिधित्व देने की मांग उठा चुका था. इसे लेकर वहां जनमानस में गुस्सा था. दक्षिण में ब्राह्मणों के अलावा बाकी जातियों को भी प्रशासनिक नौकरियों में हिस्सेदारी की मांग वर्षों पुरानी थी. 1840 में यानी प्रथम स्वाधीनता संग्राम से भी बहुत पहले वहां ब्राह्मणेत्तर वर्गों को सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व देने की मांग उठ चुकी थी. उस वर्ष तमिलनाडु के 32 पंचलारों ने मांग की थी कि सरकारी नौकरियों में समाज के बाकी वर्गांे को भी उचित प्रतिनिधित्व दिया जाए. ब्राह्मण एक ओर दावा करते थे कि सरकार उन्हें उनकी योग्यता के आधार पर नियुक्तियां देती है. दूसरी ओर शिक्षा और दूसरे मामलों में दलितों और पिछड़ों के साथ कदमकदम पर पक्षपात किया जाता था. उनके लिए शिक्षा की कोई व्यवस्था न थी. मिशनरियों के आने से दलितों को शिक्षा का अवसर मिला था. ब्राह्मण और अन्य सवर्ण उनका भी विरोध करते थे. पेरियार का विचार था कि सामाजिक समानता हेतु दलितों और पिछड़ों में आर्थिक आत्मनिर्भरता अत्यावश्यक है. उसके लिए जरूरी है कि सरकारी नौकरियों में सभी वर्गों की समान हिस्सेदारी हो. इसलिए पेरियार की मांग थी कि कांगे्रस सरकार पर दबाव बनाए, ताकि बहुजन समाज के लोग सरकारी पदों तक पहुंच सकें. ब्राह्मण वर्चस्व को तोड़ने के लिए वे चाहते थे कि दलितों और पिछड़ों को उनकी संख्या के अनुपात में आरक्षण दिया जाए. इसके लिए उन्होंने एक मसौदा तैयार किया था; जिसे वे औपनिवेशिक सरकार तक पहुंचाना चाहते थे. यह क्रांतिकारी विचार था. उसकी भनक लगते ही कांग्रेसी नेताओं में खलबली मच गई. पेरियार चाहते थे कि गांधी सहित प्रांत के बड़े कांग्रेसी नेता उनका साथ दें. लेकिन न तो गांधी ने उनकी मांग की ओर ध्यान दिया, न ही कांग्रेस का दूसरा कोई नेता उनके समर्थन में आया. उससे पेरियार का कांग्रेस के प्रति रहासहा मोह भी जाता रहा. यह मानते हुए कि कांग्रेस के साथ रहते हुए उद्देश्यपूर्ति असंभव है, उन्होंने तत्क्षण कांग्रेस से अलग होने का फैसला कर लिया.

पिछड़ों और दलितों की राजनीतिक सहभागिता को रोकने की चालें केवल दक्षिण भारत तक सीमित नहीं थी. उत्तर भारत के नेता भी इसके शिकार थे. ‘त्रिवेणी संघ’ का गठन पटना में तीन प्रमुख खेतिहर जातियों कुर्मी, कुशवाहा और यादव के नेताओं द्वारा 1934 में किया गया था. उन्हें भी उसी समस्या से जूझना पड़ा था जिनसे दक्षिण भारत पेरियार गुजर चुके थे. उसके संस्थापक नेता यदुनंदन प्रसाद मेहता ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए ‘त्रिवेणी संघ का बिगुल’ में कांग्रेस के बारे में अपने अनुभवों को साझा किया है—‘पहले ऐलान किया गया कि योग्य व्यक्तियों को लिया जाएगा. जब इन बेचारों ने योग्य व्यक्तियों को ढूंढना शुरू किया तो कहा गया कि खद्दरधारी होना चाहिए. जब खद्दरधारी सामने लाए गए तो कहा गया कि जेल यात्रा कर चुका हो. जब ऐसे भी आने लगे तो कहा गया कि वहां क्या सागभंटा बोना है. किसी को कहा जाता कि वहां क्या भैंस दुहनी हैं? तो किसी को व्यंग्य मारा जाता कि वहां क्या भेड़ें चरानी हैं? किसी को यह कहकर फटकार दिया जाता कि वहां क्या नमकतेल तौलना है.’ कांग्रेस के बड़े नेताओं में से एक तिलक के भी ठीक ऐसे ही विचार थे. यह तब है जब कांग्रेस पूरे देश और समाज का प्रतिनिधित्व करने का दावा करती थी. देश का प्रमुख दल होने के बावजूद कांग्रेस पर वर्गचरित्र हावी था. थोड़े ही समय में पेरियार ने समझ लिया कि कांग्रेस मुख्यतः सवर्ण हितों का सरंक्षण करती है. कोई उम्मीद न देख उन्होंने नवंबर 1925 में कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया. इसी के साथ उन्होंने स्वयं को सक्रिय राजनीति से भी अलग कर लिया. पेरियार की ओर से वह सोचासमझा निर्णय था. उनका मानना था कि वर्तमान राजनीति का चरित्र सामाजिक न्याय भावना से कोसों परे है. यदि कांग्रेस नहीं तो क्या? इसपर पेरियार ने ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ का शुभारंभ किया. कुछ ही वर्षों में उस आंदोलन का असर पूरे प्रांत में दिखने लगा था. लोग तेजी से उसके साथ जुड़ रहे थे. पेरियार के लिए वह समय अपनी वैचारिकी के साथ आगे बढ़ने का था.

पेरियार की वैचारिकी के आधार पर हम उन्हें आंबेडकर और फुले का समिश्रण कह सकते हैं. फुले की भांति पेरियार ने भी धार्मिक जड़ताओं पर तीखे प्रहार किए. स्त्रीपुरुष समानता और शिक्षा पर जोर दिया. आंबेडकर से प्रेरणा लेते हुए उन्होंने पिछड़ों और दलितों का अपने मानसम्मान एवं अधिकारों के लिए एकजुट होने का आवाह्न किया. यह मानते हुए कि भारतीय समाज में जाति विकास और सामाजिक समरसता की सबसे बड़ा अवरोधक है, उन्होंने न केवल जाति पर, बल्कि उसे आश्रय देने वाले धर्म पर भी तीखे प्रहार किए. यह उनका दुस्साहसी कदम था. धर्म का विरोध आंबेडकर ने भी किया था, लेकिन उनका विरोध मुख्यतः हिंदू धर्म के जातिवादी ढांचे पर था. ब्राह्मणवाद पर था, जिससे वह अनुशासित होता था. आलोचना से पहले उन्होंने हिंदू धर्म के साथसाथ दूसरे धर्मों का भी विशद् अध्ययन किया था. लंबे चिंतनमनन के उपरांत उन्होंने तुलनात्मक रूप से उदार, बौद्ध धर्म की राह ली थी. हालांकि उन जैसे मेधा के धनी और प्रकांड विद्वान के लिए धर्म किसी भी रूप में अनावश्यक था. दरअसल जिस समाज का वे नेतृत्व कर रहे थे, वह शताब्दियों से धर्म के प्रभावक्षेत्र में जीते हुए उसके साथ अनुकूलन कर चुका था. धर्मविहीन जीवन की कल्पना भी उसके लिए असंभव थी. इसलिए कदाचित एक तात्कालिक व्यवस्था के रूप में धर्मांतरण को अपनाया था. पेरियार जीवन में धर्म की जकड़बंदी को कहीं वृहद् संदर्भ में देख रहे थे. वे मानते थे कि धर्म व्यक्ति को न केवल बौद्धिक रूप से विपन्न करने के साथसाथ सांस्कृतिक वर्चस्ववाद को वैधता प्रदान करता है. वह बेमेलकारी सभ्यता को ईश्वरीय वरदान की तरह अपनाने के लिए प्रेरित करता है. वाल्तेयर ने धर्म को रस्सी और ईश्वर को खूंटे की संज्ञा दी थी. यह उक्ति भारत के संदर्भ में एकदम वह दार्शनिक था. पेरियार के लिए, खासकर भारत जैसे देश में जहां लोकतंत्र लोकप्रिय राजनीति के भरोसे टिका हो—ऐसा करना आसान नहीं था. बड़ेबड़े नेता, जिनका ईश्वरीय सत्ता में खास विश्वास नहीं रहा, लोकदिखावे के लिए, इस डर से कि भारतीय जनता नास्तिक को स्वीकार नहीं करेगी, आस्तिक होने का दिखावा करते आए हैं. बावजूद इसके पेरियार ने खुद को खुलेआम नास्तिक कहा और नीत्शे की भांति ईश्वर की अवधारणा पर तीखे सवाल उठाए. अपने राजनीतिक भविष्य को ताक पर रख, अपने भाषणों तथा कार्यक्रमों के जरिये आजीवन नास्तिकता का प्रचार करते रहे.

ओमप्रकाश कश्यप