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विमुद्रीकरण के बहाने

सामान्य

जनता जब तक निजी क्षेत्र की बढ़ती अर्थशक्ति की ओर से आंखे मूंदे रहेगी, उस समय तक मूंदे रहेगी जब तक कि वे गणतांत्रिक राज्य से अधिक शक्तिशाली नहीं हो जाते, तब तक गणतंत्र असुरक्षित बना रहेगा. कुल मिलाकर फासिस्ज्म का अर्थ सरकार पर किसी व्यक्ति, दल अथवा निजी संस्थान का सर्वाधिकार है.रूजवेल्ट, अमेरिकी राष्ट्रपति.

बाजार केंद्रित अर्थव्यवस्था में मुद्रा के महत्त्व से इन्कार नहीं किया जा सकता. 8 नवंबर के बाद ‘नोटबंदी’ या ‘विमुद्रीकरण’ की घोषणा के पश्चात देशभर में मचे हाहाकार से उसे समझा जा सकता है. सरकार ने आतंकवाद और कालेधन पर रोकथाम के लिए विमुद्रीकरण की घोषणा की थी. उसका मानना है कि प्रचलित मुद्रा का बड़ा हिस्सा गैरकानूनी रूप से जमाखोरों तथा कालाबाजारियों के पास जमा है, पड़ोसी देश नकली करेंसी भारत में झोंककर आतंकवाद को बढ़ावा देता है. इसलिए एक साहसिक निर्णय के अंतर्गत प्रधानमंत्री ने प्रचलित मुद्रा को निश्चित अवधि के भीतर वापस लेने का ऐलान किया है. वर्तमान सरकार के लगभग ढाई वर्ष के कार्यकाल में यह पहला निर्णय है, जिसपर पिछली यूपीए सरकार की छाप नहीं है. इसके अलावा वर्तमान सरकार की ‘जनधन’ तथा ‘मनरेगा’ जैसी जितनी भी योजनाएं हैं, सब विरासत में मिली हैं. वर्तमान सरकार ने उन्हें ज्यों की त्यों अथवा नाम बदलकर अपनाया है. योजना आयोग के स्थान पर सरकार ने नीति आयोग का गठन जरूर किया है, परंतु नए संस्थान की ओर से अभी तक ऐसा ठोस कार्यक्रम सामने नहीं आया है, जिससे इस बदलाव का औचित्य सिद्ध हो. जिन मामलों में सरकार ने तत्परता से काम किया है, उनमें उच्च पदों पर प्रतिबद्ध संघियों को नियुक्त करना, उनके संगठनों को प्रोत्साहित करना तथा यथासंभव मदद पहुंचाना शामिल हैं. इसके अलावा जिन कार्यों को इस सरकार ने प्राथमिकता दी है, उनके नाम हैंदूरदर्शन पर तंत्रमंत्र, पूजापाखंड वाले धारावाहिकों को बढ़ावा देना, पाठ्यक्रम में अपनी विचारधारा के अनुरूप फेरबदल करना और हिंदू मतों के ध्रुवीकरण हेतु हिंदूमुस्लिम सांप्रदायिकता को हवा देना. इन सबका विकास से कोई संबंध नहीं है. बल्कि ये समाज को पीछे ढकेलकर लोगों के बीच अविश्वास और अव्यवस्था फैलाने वाले हैं. वर्तमान सरकार ने यदि इनका चयन किया है तो इसलिए कि उसके सबसे बड़े घटक की राजनीति सांप्रदायिक अविश्वास और धार्मिक पाखंड के सहारे चलती है.

प्रचलित करेंसी नोटों को तयशुदा अवधि में वापस लेने की योजना को प्रधानमंत्री ने ‘डीमोनीटाइजेशन’ का नाम दिया है. जिसे मीडिया ने ‘नोटबंदी’ या ‘विमुद्रीकरण’ कहकर प्रचारित करना शुरू कर दिया. इसका आशय प्रचलित मुद्रा जिसका एक हिस्सा, सरकार के अनुसार टैक्स चोरों की गिरफ्त में हैको सरकारी खजाने में खींच लेने या छिपाए रखने की स्थिति में उसे कागज के टुकड़ों में बदल देने की नीति से है. यह अर्थशास्त्र सम्मत प्रक्रिया है, जिसकी अनुशंसा डॉ. आंबेडकर जैसे विद्वान अर्थशास्त्री ने भी की है. ‘नोटबंदी’ या ‘विमुद्रीकरण’ इस योजना के लिए उपयुक्त शब्द नहीं हैं. लेकिन व्यक्ति की भांति भाषा की भी सीमा होती है. कभीकभी ऐसा होता है जब सटीक शब्द की खोज के लिए शब्दकोश अपर्याप्त दिखने लगते हैं. हड़बड़ी में हम उन शब्दों का उपयोग करने लगते हैं, जो हमारे मंतव्य से मेल न खाते हों. यह मुख्यतः मुद्रा के स्वरूप में परिवर्तन से जुड़ा मसला है. उपयुक्त शब्द के अभाव में हम फिलहाल ‘विमुद्रीकरण’ का उपयोग करेंगे. ‘विमुद्रीकरण’ को लेकर असमंजस सरकार के स्तर पर भी था. इसलिए आरंभ में केवल करेंसी नोटों में बदलाव का संकेत देते हुए, बड़े नोटों को बैंकों में जमा करने का आदेश दिया गया. बाद में नकदी की कमी से समाज में अफरातफरी मची तो कागजी मुद्रा के स्थान पर डिजिटल लेनदेन पर जोर दिया जाने लगा.

इस लेख का उद्देश्य विमुद्रीकरण या उसके प्रभावों की समीक्षा करना नहीं है, केवल यह देखना है कि योजना लागू होने के पश्चात समाज में जो उथलपुथल मची है, क्या उसे स्वाभाविक माना जाएगा! क्या यह स्वस्थ समाज का लक्षण है! लाभकेंद्रित अर्थव्यवस्था में ‘विमुद्रीकरण’ पूंजीवादी कामना है. इससे लोगों के मुद्राअधिकार बाजारहित में बदला जा सकता है. भारत जैसे भीषण समाजार्थिक असमानताओं वाले देश में यह विषमताओं और अधिक बढ़ाएगा. शायद इसीलिए पिछली सरकारें उसे लागू करने से बचती आई थीं. यदि लागू किया भी तो पर्याप्त लचीलापन अपनाते हुए, ताकि जनसाधारण को किसी प्रकार की परेशानी न झेलनी पड़े. कदाचित वर्तमान सरकार को इस कार्य की जटिलता का आभास नहीं था. इतनी बड़ी योजना को तरीके से निपटाने के लिए जैसी तैयारी चाहिए, सरकार उससे बहुत पीछे थी. केवल राजनीतिक हित साधने हेतु किए गए निर्णय के दुष्परिणाम बैंकों तथा एटीएम के आगे लंबीलंबी लाइनों के रूप में सामने आए. लगभग 135 व्यक्तियों की बैंक और एटीएम की लाइनों में लगेलगे जानें चली गईं. यह इस साल भारतपाकिस्तान बार्डर पर मारे गए सैनिकों की संख्या से सवा गुनी है. बाजार से मुद्रा गायब होने से उपभोक्ता और व्यापारी सबका हालबेहाल हैं. उद्योगधंधे ठप्प पड़ चुके हैं. दिहाड़ी मजदूर, रिक्शाचालक, ऑटोवाले, रेहड़ीखोमचे वाले जिनका चूल्हा रोज की कमाई से चलता हैसब परेशान हैं. रोजगार की तलाश में गांव छोड़ चुके लोग आहत हैं. गांव की राजनीति और बेरोजगारी से बचने के लिए शहर चुना था. अब यहां से कहां जाएं! किसी के पास ग्राहक नहीं है तो किसी के नियोक्ता के पास उसे देने के लिए नकदी का अभाव है. शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन, आयातनिर्यात उत्पादन, सर्विस सेक्टर, खेतीबाड़ी आदि अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्र आर्थिक मंदी के शिकार हैं. विडंबना यह कि सरकार के कदम से जितना कालाधन उजागर होने की उम्मीद है, उससे कहीं अधिक धनराशि का नुकसान व्यापार तथा उद्योगधंधों की मंदी के चलते पूरा देश उठा चुका है. घोषणा में तीस दिसंबर के बाद हालात सामान्य होने की बात कही गई थी, मगर इसके छह महीने बाद भी सब कुछ पटरी पर आ पाएगा, इसकी बहुत क्षीण संभावना है.

क्या यह मुद्रा की ताकत है? समाजार्थिक विषमताओं से घिरे देश में जो कल्याणराज्य होने का दावा करता हो, क्या मुद्रा को इतना ही शक्तिशाली होना चाहिए? क्या मुद्रा का शक्तिशाली होना देश और समाज के शक्तिशाली होने जैसा ही है? लोकतंत्र में समस्त निर्णायक शक्तियां जनता के पास होती हैं. परंतु लोकहित के नाम पर लिए गए इस निर्णय में लोक ही सर्वाधिक आहत हुआ है. अधिकांश जन निर्णय से नाखुशी जता चुके हैं. बैंक और एटीएम की लाइनों में लोग दम तोड़ रहे हैं. कामधंधे तबाह हो चुके हैं. फिर भी सरकारी निर्णय के विरोध में कोई विशेष आक्रोश नजर नहीं आता. क्यों? बिना सार्थक आक्रोश और विरोध की अभिव्यक्ति के क्या लोकतंत्र सुरक्षित रह सकता है? आप कह सकते हैंजीवन में अर्थ की उपयोगिता है. ‘रुपया’ को ‘बाप और भइया से बड़ा’ भी हमारे यहां कहा गया है. कितने ही मुहावरे जीवन में अर्थ की उपयोगिता को लेकर लोकप्रचलित हैं. हिंदू धर्म में उसे जीवन के चार पुरुषार्थों में से एक माना गया है. ठीक है, लेकिन हम एक बात प्रायः भूल जाते हैं. जिन दिनों यह ‘अर्थ’ को पुरुषार्थ माना गया था, उन दिनों मुद्रा का मूल्य वास्तविक होता था. सौ मुद्राएं चुकाने का मतलब था, सौ स्वर्णभार का भुगतान. आज मुद्रा का मूल्य प्रतीकात्मक है. बिना सरकार की गारंटी के नोट महज कागज का टुकड़ा है. वह बाजार में मनुष्य के क्रय सामर्थ्य को दर्शाता है, परंतु स्वयं ‘समृद्धि’ का मानक नहीं है. यद्यपि उसके उपयोग द्वारा वास्तविक ‘समृद्धि’ खरीदी जा सकती है.

यदि बिना सरकारी गारंटी के मुद्रा का वास्तविक मूल्य शून्य है तो नागरिक जीवन में मुद्रा के वास्तविक महत्त्व की समीक्षा आवश्यक हो जाती है. खासकर समृद्धि में उसके योगदान को लेकर. क्योंकि कोई भी सरकार समाज से बड़ी नहीं होती. खुद को व्यवस्थित रखने के लिए समाज ही सरकार का गठन करता है. समाज राज्य की आत्मा है तो सरकार महज उसका एक संस्कार. यदि सरकार अथवा उसकी कोई संविदा सामाजिक संबंधों के लिए ही संकट का विषय बन जाए तो मान लेना चाहिए कि उस संविदा और समाज के अंतःसंबंधों की समीक्षा का समय आ चुका है. उस ओर से समाज की उदासीनता उसके पतन की संकेतक हैं. यह स्वस्थ समाज का लक्षण नहीं कि बैंक की कतार में खड़ेखड़े नागरिक की मृत्यु हो जाए और लाश को किनारे कर, दोचार हजार रुपये की उम्मीद में लोग कतार में बने रहने के लिए धक्कामुक्की करते रहें. इस घटना ने मानवीय संबंधों को तारतार कर दिया है. उधर सरकार है कि उसके कर्ताधर्ताओं को हर वह व्यक्ति जो बैंक या एटीएम की कतार में है, कहीं न कहीं चालू, बेईमान और भ्रष्टाचारी नजर आता है.

करेंसी राज्य की ओर से आपसी लेनदेन को सुगम बनाने के लिए की जाने वाली व्यवस्था है. उसका अपना कोई मूल्य नहीं होता. राज्य की गारंटी उसे मूल्यवान बनाती है. चूंकि करेंसी का अपने आप में कोई मूल्य नहीं होता, इसलिए वह अर्थव्यवस्था की मजबूती का पर्याय भी नहीं होती. वह केवल उसके प्रवाह को दर्शाती है. जैसे थर्मामीटर का तापांक स्वयं उष्मा न होकर मात्र उसके स्तर को दर्शाता है, वैसे ही मुद्रा की मात्रा केवल मनुष्य के क्रयसामर्थ्य की संकेतक होती है, समृद्धि की नहीं. बाजारकेंद्रित मुद्राप्रवाह में समृद्धि का आवागमन बराबर नहीं होता, बल्कि वह मुनाफे के रूप में निरंतर ऊपर की ओर अग्रसर रहता है. मुद्रा की उपयोगिता आपसी लेनदेन को सहज बनाने में है. उससे बाजार को गति मिलती है. लोग अपने अधीन मुद्रा का अधिकाधिक उपयोग खरीदफरोख्त में करें, इसके लिए बाजार मुद्रा की मौजूदगी को सराहता है. उसे आर्थिक शक्ति के रूप में पेश करता है. किंतु उसकी मूल्यवत्ता तभी तक है, जब तक उसके पीछे सरकार की गारंटी हो. मुद्रा का उपयोग सभी वर्गों में समान नहीं होता. उसकी मुख्य उपयोगिता मध्य तथा निम्न वर्गों तक सीमित होती है, जिन्हें अपनी तात्कालिक जरूरतों के लिए खरीदफरोख्त करनी होती है. बड़े व्यापारियों, उद्योगपतियों तथा पेशेवरों के लेनदेन में, जहां भुगतान राशि अत्यधिक हो, मुद्रा का उपयोग अव्यावहारिक मान लिया जाता है. उनके यहां समृद्धि का आकलन संसाधनों पर अधिकार से किया जाता है, न कि लेनदेन से. उदाहरण के लिए जमींदार की समृद्धि का आकलन भूसंपदा के आधार किया जाता है. व्यापारी और उद्योगपति की समृद्धि, उसके अधीन बाजार, कलकारखानों आदि पर एकाधिकार से आंकी जाती है. मुद्रा का महत्त्व केवल व्यापारिक हिसाबकिताब तक सीमित होता है.

व्यक्ति करेंसी के उपयोग द्वारा भूमि तथा समृद्धि के दूसरे स्थायी उपादानों का अर्जन कर सकता है. उस समय वह वास्तव में ‘अर्थ’ बन जाती है. लेकिन जनसाधारण द्वारा अर्जित करेंसी का अधिकांश जीवन की भोजन, वस्त्र, स्वास्थ्य जैसी बेहद सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति में ही खप जाता है. वास्तविक समृद्धि में अंतरित करने का अवसर उसे कम ही प्राप्त होता है. उसे भुलावे में रखने के लिए बाजारवादी ताकतें तथा उसके पोषित अर्थविज्ञानी समृद्धि को दैनिक जरूरतों के संदर्भ में, क्रयसामर्थ्य द्वारा परिभाषित करते हैं. सामान्यतः यह मान भी लिया जाता है. मुद्रा को वास्तविक संपदा अथवा समृद्धि का प्रतीक मानना मूर्ति को देवता मानने की स्थिति है. चालाक पुरोहित जैसे पत्थर की मूर्ति में देवता की प्रतिष्ठा करते रहते हैं, वैसे ही पूंजीवादी शक्तियां अर्थव्यवस्था की सारी ताकत मुद्रा में केंद्रित होने का भ्रम फैलाए रखती हैं. बाजारकेंद्रित अर्थव्यवस्था में ऊपर के स्तर पर मुनाफे की स्पर्धा होती है, जबकि निचले वर्ग रोजीरोटी के संघर्ष में उलझे रहते हैं. स्पर्धा उनके आत्मविश्वास, आपसी विश्वास और सहअस्तित्व की भावना का हनन करती है. आपसी विश्वासहीनता तथा निचले स्तर की स्पर्धा उनके जीवन में मुद्राआधारित लेनदेन को अपरिहार्य बना देती है. इस तरह मुद्रा की आभासी शक्ति सामान्यतः जनसाधारण तथा मध्यवर्ग को प्रभावित करती है, उच्च वर्गों को नहीं. मुद्रा उनके लिए महज संख्या जितना महत्त्व रखती है, जिसका उपयोग व्यापारिक हिसाबकिताब तक सीमित होता है.

बाजार में करेंसी की किल्लत तथा शीघ्र ही उसके समाधान की क्षीण संभावनाओं को देखते हुए सरकार रोजमर्रा के लेनदेन में डिजिटल करेंसी को अपनाने पर जोर दे रही है. उपभोक्ताओं को डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, पेटीएम, आधारकार्ड आदि के माध्यम से खरीदफरोख्त करने की सलाह दी जा रही है. डिजिटल पेमेंट गेटवे को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने कई उपहार योजनाएं लागू की हैं. सेवाकर की छूट, लॉटरी द्वारा पुरस्कार आदि योजनाओं से सरकार की नीयत और नीति दोनों को समझा जा सकता है. इससे सरकार का क्या लाभ है? यह समझने के लिए ज्यादा माथापच्ची की आवश्यकता नहीं है. ऐसे दुकानदारों की संख्या लाखों में है जो कर चोरी को अपना अधिकार मान बैठे हैं. बिना रसीद के लेनदेन बाजार में बहुत आम है. करयोग्य आमदनी वाले दुकानदारों में से बामुश्किल दो या तीन प्रतिशत आयकर देते हैं. सरकार का मानना है कि लेनदेन डिजिटल गेटवे से होगा तो भ्रष्ट दुकानदारों, व्यापारियों तथा कालेधन के बूते खरीदारी करने वालों पर नजर रखना आसान हो जाएगा. उसकी आमदनी बढ़ेगी. भ्रष्टाचार पर काबू कर पाना संभव होगा. सवाल है कि इससे उपभोक्ता को क्या लाभ होगा? दुकानदार उसे ‘अधिकतम खुदरा मूल्य’ पर बेचता है, जिसमें सामान्यतः स्थानीय कर भी सम्मिलित होता है. इस तरह व्यक्ति जो भी वस्तु खरीदता है, उसपर दुकानदार के लाभ तथा कर आदि का भुगतान वह कमोबेश करता ही है. क्या नई व्यवस्था उसके लिए हितकर सिद्ध होगी? पेमेंट सीधे बैंक में जाने से धनराशि की सुरक्षा, लानेले जाने में बचत, रकम पर मिलने वाला तात्कालिक ब्याज अपरोक्ष रूप में बड़े दुकानदारों को लाभ पहुंचाएगा. ग्राहक को भी इसका लाभ पहुंचे, सरकार इसपर विचार करने के लिए फिलहाल तैयार नहीं है. इतना तय है कि इस व्यवस्था से डिजिटल पेमेंट के लिए जिस माध्यम को ग्राहक अपनाएगा, उसके सेवामूल्य के साथ सेवाकर के रूप में अतिरिक्त धनराशि भी उसे वहन करनी पड़ेगी.

बाजार की नीयत और नीति को समझने वालों के लिए यह कोई अबूझ पहेली नहीं है. परंपरागत पद्धतियों में उत्पादक एवं उपभोक्ता का सीधा संबंध होता था. उत्पादक अपने उपभोक्ता की आवश्यकता के अनुसार उत्पादन करता था. मुनाफे के लालच में उत्पाद का निर्माण करना तब की अर्थव्यवस्था में प्रचलित नहीं था. कुछ कारीगर और कलाकार ऐसे अवश्य होते थे जो अपने हुनर का प्रदर्शन राजाओं और सामंतों को प्रसन्न करने के लिए करते थे. उनके उत्पाद को कई बार कला तो कई बार विलासिता की वस्तु तक मान लिया जाता था. परंतु वह संख्या की दृष्टि से समाज का मामूली हिस्सा था. वे अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने की हैसियत नहीं रखते थे. दूसरे उनका ध्येय महज अपने आश्रयदाता को खुश करना होता था. बाजार केंद्रित अर्थव्यवस्था में उत्पाद और उपभोक्ता के बीच दुकानदार के रूप में तीसरा पक्ष उपस्थित हो जाता है. उसके तहत उत्पादक लाभ की कामना के साथ माल बनाता है. उपभोक्ता तक पहुंचतेपहुंचते वस्तु के मूल्य में उत्पादक के मुनाफे तथा उत्पादनकर के साथसाथ, दुकानदार का मुनाफा भी जुड़ जाता है. यदि उत्पादक के अलावा उपउत्पादक भी हैं, तथा अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचने के वस्तु कई दुकानदारों के हाथों से होकर गुजरती है तो उसमें उपउत्पादकों तथा बिचौलिए दुकानदारों का मुनाफा भी जुड़ता चला जाता है. उपभोक्ता न केवल उन सबके मुनाफे का हिस्सा वहन करता है, अपितु अपरोक्ष रूप में विभिन्न स्तरों पर देय कराधान, यातायात, सर्विस चार्ज, विज्ञापन आदि का बोझ भी वही उठाता है. परिणामस्वरूप वास्तविक उपभोक्ता तक पहुंचतेपहुंचते वस्तु की कीमत कई गुना बढ़ जाती है. कई बार तो वास्तविक मूल्य तथा सभी बिचौलिये दुकानदारों के सकल मुनाफे का अनुपात एक और चार का हो जाता है. उत्पादक एवं उपभोक्ता के बीच सीधा संबंध न होने के कारण चालू अर्थव्यवस्था को मुनाफे की अर्थव्यवस्था माना जाता है. जिसमें उपभोक्ता एवं उत्पादक के बीच किसी भी प्रकार की आत्मीयता नहीं पनप पाती. वस्तुविनिमय जरूरत और मुनाफे का लेनदेन बन जाता है. इसमें उपभोक्ता जो अपनी जरूरत के चलते खरीदारी को विवश है, हमेशा घाटे में रहता है.

सरकार को लगता है कि व्यापारी और दुकानदार अपने मुनाफे पर देय आयकर तथा अन्य करों का भुगतान करने में बेईमानी करते हैं. हालांकि इसकी रोकथाम के लिए सरकार के अधीन भारीभरकम निगरानी तंत्र रहता है. उसका कार्य दुकानदारों के आयव्यय पर नजर रखना तथा उनसे निर्धारित कर वसूली करना है. डिजिटल पेमेंट गेटवे को बढ़ावा देने का अर्थ यह भी है कि सरकार अपने निगरानी तंत्र की विफलता को स्वीकार चुकी है. उसे लगता है कि लेनदेन के डिजिटलाइजेशन द्वारा कराधान का हिसाबकिताब और संग्रह सुगम हो जाएगा. चूंकि धनराशि का लेनदेन बैंकों या उपबैंकीय संस्थानों तथा संविदाओं यथा पेटीएम, आधारकार्ड, डेबिटक्रेडिट कार्ड आदि के माध्यम से होगा, तब उसकी वसूली भी आसान होगी. फलस्वरूप सरकार की अपने ही तंत्र पर निर्भरता घटेगी. इस निर्णय द्वारा सरकार को दुहरा लाभ होने की उम्मीद है. सरकार को लगता है कि इससे वह अधिकतम कराधान में सफल होगी. दूसरे बैंकिंग सेवाओं के जरिये उसे मोटी रकम सेवाकर के रूप में भी प्राप्त होगी. कुल मिलाकर सरकार अपने निगरानी तंत्र और उपभोक्ताओं से अधिक भरोसा उपबैंकीय एजेंसियों पर कर रही है. यह तब है जबकि उपभोक्ता वस्तुओं तथा अधिकांश औद्योगिक उत्पादों के मूल्य पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है. कराधान से बढ़े खर्च की भरपाई पूंजीपति और उद्यमी बड़ी आसानी से मूल्य बढ़ाकर कर सकते हैं. उसका असर सीधे उपभोक्ता की जेब पर पड़ेगा. उसके लिए चीजें और भी महंगी होंगी. सेवा प्रदाता बैंकिंग और उपबैंकिंग एजेंसियों का खर्च तथा उसपर लगने वाला सेवा कर भी अंततः उपभोक्ता की जेब से ही जाएगा. उसे न केवल बैंकिंग सेवा के बदले भुगतान करना पड़ेगा, बल्कि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में दुकानदार पर लगने वाले करों का हिस्सा भी उसे ही वहन करना पड़ेगा. चूंकि नकदी जेब में नहीं रहेगी, इसलिए उसका लाभ बैंक उठाएगा. ये बातें आम उपभोक्ता से छिपी नहीं हैं. बावजूद इसके सामाजिक स्तर पर कोई बड़ी हलचल या आक्रोश नजर नहीं आता. आमजन की इस चुप्पी या अपार सहनशीलता को सरकार अपने निर्णय के प्रति समर्थन के रूप में पेश कर रही है. क्या हालात पूर्णतः विकल्पहीन हैं?

लोकतंत्र में मतसंख्या महत्त्वपूर्ण होती है. लेकिन मतदान में समाज के सभी वर्ग समान रूप से हिस्सा नहीं लेते. मतदाताओं की आय के आधार पर हम उन्हें तीन वर्गों में बांट सकते हैं. पहला अतिसंपन्न वर्ग. प्रत्यक्ष या परोक्ष उसका संबंध पक्षविपक्ष के सभी नेताओं से होता है. असल में यह वर्ग राजनीति का उपयोग अपने हक में करता है. चाहे जिस दल की जीत हो यह वर्ग सत्ता के हमेशा करीब रहता है. उसे निर्वाचन प्रक्रिया की परवाह नहीं होती. चुनावों में इसकी आनुपतिक भागीदारी सबसे कम होती है. दूसरा मध्य वर्ग. इस वर्ग में पढ़ालिखा रोजगारपरस्त वर्ग, छोटेव्यापारी, पेशेवर, बुद्धिजीवी आदि आते हैं. यह किसी भी समाज की प्राणशक्ति होता है. इसका एक हिस्सा समाज के शीर्षस्थ वर्ग से समझौता कर अपनी स्वार्थसिद्धि में लगा रहता है, जबकि दूसरा हिस्सा व्यवस्था से असंतुष्टों का होता है. जनता का साथ मिले तो यह सामाजिक क्रांति का वाहक बन जाता है. इसकी दुर्बलता है कि यह राजनीतिक रूप से बेहद बंटा हुआ होता है. संख्या में यह अतिसंपन्न वर्ग से अधिक तथा राजनीतिक दृष्टि से सबसे चलायमान वर्ग माना जाता है. चुनावों में आगापीछा सोचकर मतदान करता है. बंटा होने के कारण यह वर्ग खुद तो राजनीतिक ताकत नहीं बन पाता, लेकिन लोकमानस को बनानेबिगाड़ने, दलविशेष के संबंध में हवा बनाने में इस वर्ग का बहुत योगदान होता है. इसके मामूली प्रतिशत का किसी दल या विचार की ओर झुकाव, मतदाताओं के बड़े वर्ग को प्रभावित करता है. तीसरा वर्ग जनसाधारण का होता है, जिसमें किसान, मजदूर, छोटे पेशेवर आदि आते हैं. इस वर्ग के लिए रोजीरोटी के मसले जीवन के बाकी मामलों से बड़े होते हैं. वर्तमान चुनौतीपूर्ण होता है, जिससे भविष्य के सपनों की ओर उनका ध्यान ही नहीं जा पाता. इस वर्ग के पास देशदुनिया के बारे में ज्यादा सोचने का अवसर नहीं होता. इसलिए मतदान के समय धर्म, जाति, क्षेत्रीयता जैसे मुद्दों के आधार पर अपनी राय बनाता है, जिनका इसके विकास से कोई संबंध नहीं होता. लोकतांत्रिक विवेक की कमी भी इसका कारण बनती है. इस वर्ग का मानस धर्म, संस्कृति परंपरा के मौखिक पाठों द्वारा तैयार होता है. समस्याओं के निदान के लिए इसे सदैव किसी तारणहार की प्रतीक्षा रहती है. इस कारण इसे फुसलाना आसान होता है. अतएव नेतागण चुनावी नारे इसी वर्ग को ध्यान में रखकर बनाते हैं. रातदिन इसी के कल्याण का राग अलापते हैं. परंतु चुनाव जीतते ही वे इससे पूरी तरह कटकर उस वर्ग के रहनुमा बन जाते हैं जिसे हमने पहले स्थान पर रखा है.

जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि यदि जनता के नहीं रहते, जनकल्याण के नाम पर बनी सरकारें यदि पूंजीपतियों और सरमायेदारों की हितैषी बन जाती हैं, तो जनता क्या करे? समस्या का कारण जनता की दुर्बलता नहीं, आत्मविश्वास और अपनी शक्ति के प्रति अनभिज्ञता है. लोग जानते हैं कि संसद में पहुंचे नेताओं को सर्वाधिक वोट उन्हीं के प्राप्त होते हैं. जो अमीर हैं, जिनकी सत्ता और संस्थानों तक पहुंच है, वे मतदान के दिन घर से नहीं निकलते. इसके बावजूद नेता हैं कि संसद तथा विधायिकाओं में जाते ही उस वर्ग को भुला देते हैं, जिसका उनकी जीत में सर्वाधिक योगदान है. वे उस वर्ग के पिछलग्गू बन जाते हैं, जो सामान्यतः उनकी परवाह नहीं करता. जनसाधारण जो मतदान में उत्साहपूर्वक हिस्सा लेता है, जनप्रतिनिधियों के माध्यम से सरकार के गठन को संभव बनाता है, अपनी समस्याओं के समाधान के लिए पुनः किसी तारणहार की प्रतीक्षा में लगा रह जाता है.

दरअसल हमने लोकतंत्र को तो अपनाया, मगर आधेअधूरे मन से. संविधान की भावना के अनुरूप लोगों की चेतना का लोकतांत्रिकरण कर ओर हमने ध्यान ही नहीं दिया. बताया गया कि लोकतंत्र की परिभाषा जनता द्वारा सरकार चुनना है. जनता इसके लिए निर्वाचन प्रक्रिया में हिस्सा लेती रही. बिना यह जाने कि उसके द्वारा चुने गए प्रतिनिधि संसद और विधायिकाओं में जाते ही शासक बन जाते हैं. निहित स्वार्थ के लिए वे जनसाधारण से उसकी स्वतंत्रता, समानता तथा विकास के अवसर छीन लेते हैं, जिनपर नागरिक होने के नाते उनका अधिकार है. लोकतांत्रिक सरकार को चाहिए कि वह न्यूनतम शासन करे. उसके लिए लोगों का जागरूक रहना जरूरी है. लोग स्वयं जागरूक होंगे तो अनुशासित भी होंगे. अनुशासित होंगे तो सरकार का लावलश्कर कम होगा. लाव लश्कर कम होगा तो नागरिकों की जेब पर पड़ने वाला खर्च स्वतः घट जाएगा. वर्तमान व्यवस्था में सरकार मानती है कि लोगों में जागरूकता की कमी है. अनुशासन बनाए रखने के लिए वह नागरिकों के खर्च पर पुलिस को ले आती है. पुलिस से झगड़ा नहीं सुलझता तो अदालतें आ जाती हैं. हर संस्था नागरिक आजादी को थोड़ी कम करती है और उसकी जेब पर बोझ बढ़ा देती है. यानी लोकतंत्र में जनता की जिम्मेदारी केवल प्रतिनिधि चुनने से पूरी नहीं हो जाती. वे प्रतिनिधि ही बने रहें, शासक और सर्वेसर्वा न बनें इसका ध्यान रखना भी जनता की जिम्मेदारी है. इस तरह जनता का जनताकरण राजनीति के लोकतांत्रिकरण की बुनियादी शर्त है.

इस अवांतर से वार्तालाप का लेख की विषयवस्तु से क्या संबंध है? विमुद्रीकरण अर्थशास्त्र की समस्या है, राजनीति की नहीं. फिर भी यह हमें आवश्यक लगा, क्योंकि विमुद्रीकरण का वर्तमान निर्णय विशुद्ध अर्थशास्त्रीय नहीं है. उसके पीछे राजनीति छिपी है. यदि सरकार इसे अर्थशास्त्रीय मुद्दा समझती तो रिजर्ब बैंक या ज्यादा से ज्यादा वित्तमंत्री के स्तर पर इसकी घोषणा होनी चाहिए थी. आधीअधूरी तैयारी के साथ स्वयं प्रधानमंत्री को पहल करने की आवश्यकता नहीं थी. विमुद्रीकरण की घोषणा चार राज्यों में विधानसभा चुनावों से पहले की गई है. सो इसके राजनीतिक निहितार्थ होंगे ही. नेताओं की हर निर्णय को राजनीतिक नफानुकसान सोचकर करने की प्रवृत्ति की ओर ध्यान आकृष्ट कराना हमें इसलिए भी आवश्यक लगा क्योंकि यह न केवल समस्या की जड़ है, बल्कि समाधान भी इसी में अंतर्निहित है. लोकतांत्रिक व्यवस्था में यदि जनप्रतिनिधि कर्तव्यपथ से विचलित होते हैं, तो उसके लिए केवल वही दोषी नहीं होते. प्रकारांतर में जनता भी उसके लिए जिम्मेदार होती है. यदि निर्वाचित प्रतिनिधि या चुनी हुई सरकार जनता के कष्टों की ओर से लापरवाह हैं तो जनता के लिए सबसे अच्छा रास्ता यही है कि वह अपनी संगठित शक्ति का उपयोग हालात को सुधारने के लिए करे. इस कार्य को जनप्रतिनिधियों पर दबाव डालकर किया सकता है, यदि फिर भी सरकार के स्तर पर निरंकुशता बनी रहती है तो जनता के पास एकमात्र रास्ता बचता है कि वह सरकार पर अपनी निर्भरता को कम करते हुए न्यूनतम स्तर पर ले आए. हमारी यह सलाह अव्यावहारिक लग सकती है. लेकिन लोकतंत्र को उत्सव की तरह जीने का रास्ता इसी ओर से जाता है. प्रूधों के शब्दों मेंᅳ‘मुक्त समाज में कानून बनाने, नई संस्थाएं गठित करने, उनका संविधान रचने, स्थापना एवं प्रशासनिक ढांचा खड़ा करने से लेकर कार्यारंभ तक सरकार की भूमिका न्यूनतम, इतनी कम जितनी कि संभव होहोनी चाहिए. राज्य (सरकार का लाभकारी) उद्यम नहीं है. इसलिए उद्यमों एवं संस्थाओं की स्थापना/संचालन के उपरांत सरकार को उनसे स्वयं अलग होकर, उन्हें स्थानीय प्राधिकरणों और जनसंस्थाओं के सुपुर्द कर देना चाहिए.’

राज्य पर निर्भरता को कम करने के अनेक रास्ते हैं. करेंसी के मुद्दे को ही लें. किसी भी राज्य की राज्य की वास्तविक शक्ति उसकी जनता में अंतर्निहित होती है. जबकि राज्य करेंसी को प्रत्याभूत करता है. इस तरह करेंसी के प्रत्याभूतिकरण के पीछे अंतिम शक्ति जनता की ही होती है. जनता यदि करेंसी को प्रत्याभूत कर सकती है तो उसके विकल्प भी तलाश सकती है. ऐसे विकल्प जो उसे अधिक स्वतंत्रता तथा आत्मनिर्भरता का एहसास दिलाते हुए उसके आत्मविश्वास बनाए रखने में मददगार हों. इस दिशा में प्रचलित विकल्पों को समाजवाद के आधुनिक अपररूप की संज्ञा दी जा सकती है. हालांकि इनकी कार्यशैली उससे भिन्न है. ये पूंजीवाद के जूझने के बजाए संगठन और सामूहिक विवेक के बल पर उससे मुक्ति का भरोसा दिलाते हैं. कुछ दशक पहले तक भारत के गांवों में जो प्राचीन सहयोगाधारित व्यवस्था रही है, जिसे हमारी ही पीढ़ी ने दम तोड़ते देखा है, इन्हें उसका संशोधित संस्करण भी कहा जा सकता है. आजकल शहरों में मिश्रित बस्तियों का चलन है. एक ही मुहल्ले में विभिन्न पेशों और कलाओं में दक्ष लोग रहते हैं. उनमें प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, बढ़ई, लुहार, एकाउंटेंट, राजमिस्त्री, पेंटर, ऑटो चालक वगैरह अनेक प्रकार के पेशेवर और तकनीकी कौशल वाले लोग रहते हैं. यदि ये ठान लें कि आपसी व्यवहार के दौरान मुद्रा का प्रयोग न्यूनतम करेंगे, तो थोड़ीसी आरंभिक हिचक के बावजूद, वे आसानी से ऐसा कर सकते हैं. इस व्यवस्था के अंतर्गत श्रम का आकलन एवं भुगतान बजाय मुद्रा के श्रमघंटों में किया जाएगा. मान लीजिए ‘क’ कंप्यूटर पेशेवर है. उसे अपने घर के लिए प्लंबर की आवश्यकता है. वह बस्ती के प्लंबर ‘ख’ को आमंत्रित करेगा. ‘ख’ को काम पूरा करने में यदि दो घंटे लगते हैं, तो उसके दो श्रमघंटे ‘क’ पर उधार माने जाएंगे. मुद्रा रहित भुगतान प्रणाली में ‘क’ को कुछ ऐसा करना होगा, जिससे वह ‘ख’ के श्रमघंटों का भुगतान श्रमघंटों में ही कर सके. इसके लिए वह ‘ख’ की आवश्यकतानुसार कुछ डिजायन कर सकता है. यदि ऐसा होता है तो वह श्रमघंटों का सीधा आदानप्रदान मान लिया जाएगा. यह भी हो सकता है कि ‘ख’ को ‘क’ की सेवाओं की तत्काल कोई जरूरत न हो. उस अवस्था में उनके बीच का लेनदेन सुरक्षित माना जाएगा. मान लीजिए कुछ दिनों के बाद ‘ख’ को बिजली मिस्त्री ‘ग’ की आवश्यकता पड़ती है. जिसपर ‘क’ के किसी काम के दो श्रमघंटे बकाया हैं. तो ‘ग’ उस उधार के बदले ‘ख’ को अपनी सेवाएं देकर ‘क’ से उऋण हो सकता है. यह उदाहरण है. इस प्रणाली को थोड़े प्रबंधन के साथ आसानी से अपनाया जा सकता है. मुहल्ला सभाएं इस काम को बड़े आराम से कर सकती हैं. हो सकता है कंप्यूटर पेशेवर दावा करे कि उसके काम के लिए आनुपातिक रूप से अधिक योग्यता की आवश्यकता पड़ती है. और वह अपने श्रमघंटों के मूल्य की तुलना बिजली मैकेनिक या पलंबर से करने को तैयार न हो. इस समस्या के समाधान के दो रास्ते हैं. पहला और श्रेष्ठतर उपाय है कि कंप्यूटर पेशेवर से अनुरोध किया जाए कि वृहद सामूहिक हितों के लिए उदारता दिखाते हुए इस प्रकार की तुलना को रहने दे. दूसरा यह कि आपसी सहमति से ऐसे नियम बनाए जाएं जिससे इस प्रकार के विवाद उत्पन्न ही न हों. इससे मौद्रिक लाभ सामाजिक लाभ के अपेक्षा श्रेष्ठतर रूप में प्राप्त होंगे. यह रास्ता अव्यावहारिक लग सकता है, मुश्किल बिलकुल नहीं है. अधिकांश कारखाने अपने कामगारों को वेतन देने के लिए उनके कार्य का मूल्यांकन श्रमघंटों के आधार पर करते ही हैं. एक बार चलन में आ जाने के बाद व्यवस्था सहज लगने लगेगी. इससे सरकार और उसके तंत्र पर निर्भरता घटेगी और मुद्राकेंद्रित क्रयविक्रय में जनता को जो भारीभरकम कर सरकार को चलाने के लिए देना पड़ता है, उसकी बचत हो जाएगी. सरकार का काम सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय संबंधों तक सिमट जाएगा. क्लेरेंस ली स्वार्ज ने अपनी पुस्तक ‘व्हॉट इज म्युच्युलिज्म’(1927) में इसकी प्रशंसा करते हुए लिखा है

यह एक ऐसा सामाजिक दर्शन है जो सभी नागरिकों के लिए समान स्वाधीनता, पारस्परिक समानताधारित लेनदेन तथा व्यक्तिविशेष की अपने जीवन, श्रम एवं श्रमोत्पाद पर पूर्ण संप्रभुता को दर्शाता है.’

सच यह है कि सरकार का विवेक, जनता के विवेक पर टिका होता है.

© ओमप्रकाश कश्यप

बेलगाम पूंजीवाद को लगाम

सामान्य

आलेख 

एक

 

बीसवीं शताब्दी का पूर्वार्ध पूंजीवाद के विकास का था. उस कालखंड में पूंजी का वर्चस्व पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ा; और मुनाफा जिसे कभी व्यावसायिक नैतिकता के अनुपालन में मर्यादित रखने की सलाह दी जाती थी, उसे आर्थिक विकास के नजरिये से देखा जाने लगा था. पूंजीवाद का अभीष्ट थाबाजार पर एकाधिकार और अधिकतम मुनाफा. यह कहीं न कहीं श्रम शोषण से जुड़ा मसला भी था. इतिहास की तह में जाकर देखें तो पता चलेगा कि श्रमशोषण की समस्या पूंजीवाद की पूर्ववर्ती अर्थव्यवस्थाओं में भी थी. सहयोगाधारित संगठनों को छोड़कर, जिनके बारे में 3000 वर्ष पहले तक की जानकारी उपलब्ध है—श्रमशोषण प्रायः हर युग की समस्या रही है. बल्कि लंबे युग तक इसे नियतिबद्ध मानते हुए गंभीरता से लिया ही नहीं गया. सहयोगाधिारित संगठनों ने इस समस्या का सार्थक समाधान खोजने की कोशिश की थी. उस समय तेली, रंगरेज, बुनकर, राजमिस्त्री, काष्ठकार जैसे दस्तकारों के प्रभावशाली संगठन थे. समाज में उनका खासा मानसम्मान था. हालांकि उसी युग में जिसे सहयोगाधारित संगठनों का स्वर्णकाल माना जाता है, समानांतर रूप में दासप्रथा भी कायम थी.े दास की निजी इच्छाओं का कोई महत्त्व न था. वह एकमात्र अपने स्वामी की इच्छा से नियंत्रित होता था. प्रकारांतर में उससे अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने के अधिकार छीन लिए जाते थे. कालांतर में जैसेजैसे छोटे राज्यों का विकास हुआ, श्रमिक संगठनों के लिए स्वतंत्र रूप में काम करना कठिन होता गया. अद्वितीय शिल्पी जो अपने कौशल के लिए दूरदूर तक जाने जाते थे, वे पूरी तरह राज्याश्रित होने लगे. स्वामी प्रसन्न तो इनामइकराम की भरमार, स्वामी अप्रसन्न तो मृत्युदंड तक की नौबत आ जाती थी. उसके विरुद्ध सुनवाई किसी अदालत में संभव न थी. संभव है सहयोगाधारित संगठन भी दासों की सेवाएं लेते हों. लेकिन शिल्पकार और पेशेवरों द्वारा गठित वे संगठन निजी लाभ के साथसाथ सामाजिक लाभ की वांछा से चलाए जाते थे. उनमें स्वामीश्रमिक संबंधों नहीं होते थे. समूह के अंदर कार्यों का सामान्य सहमति के आधार पर विभाजन और अन्योन्याश्रितता होती थी. श्रेणियों का यह गुण उन्हें समकालीन उत्पादक समूहों से श्रेष्ठतर और मानवीय सिद्ध करता है.

मशीनी क्रांति के आरंभ में श्रमिकों को उम्मीद थी कि पूंजीवाद का आगमन सामंती शक्तियों के पतन में सहायक होगा, फलस्वरूप श्रमिक को श्रम और शिल्पकार को उसके शिल्पकौशल का भरपूर प्रतिदेय प्राप्त होगा. वे अपने श्रमकौशल का मूल्यांकन करने को पूर्ण स्वतंत्र होंगे. इसमें कोई संदेह नहीं कि पूंजीवाद ने सामंतवाद की अनेक ज्यादतियों पर प्रहार किया. कठिन श्रम से मुक्ति दिलाने में भी नई प्रौद्योगिकी मनुष्य की मददगार बनी. औद्योगिक अर्थव्यवस्था ने बेगार जैसी कुप्रथाओं पर नियंत्रण लगाया था. श्रमिक को उसके श्रम के बदले नकद भुगतान किया जाने लगा. किंतु श्रम पर पूर्ण स्वत्वाधिकार; यानी श्रममूल्य के निर्धारण का अधिकार जो श्रमिक की पुरानी नीतिसम्मत मांग थी—पर पूंजीपतियों और सरमायेदारों का अधिकार यथावत था. वैज्ञानिक क्रांति ने उत्पादन वृद्धि के जो नए रास्ते ईजाद किए थे, उनका अधिकांश लाभ पूंजीपति के हिस्से आया था. कामगारों को तुलनात्मक रूप से बहुत कम, बल्कि नगण्य लाभ पहुंचा था. नई प्रौद्योगिकी समाज में आर्थिक असमानता की खाई को और गहरा करने में सहायक बनी, जिसके परिणामस्वरूप पूंजीवादी शोषण का दायरा लगातार बढ़ता गया.

नई अर्थव्यवस्था में व्यावसायिक और उत्पादक इकाइयों को प्रतिस्पर्धी बनने/बनाने की अपेक्षाओं के चलते मुनाफे को तय करने का अधिकार समाज एवं सरकार के हाथों से खिसककर, पूर्णतः पूंजीपति के हाथों में चला गया. कुछ अपवादों को छोड़कर पूंजीपतियों को मिला अधिकार असीमित था. विशेषकर श्रमिकसंबंधी विषयों को लेकर. श्रमअधिकारों के संरक्षण हेतु कुछ कानून अवश्य बनाए गए. लेकिन उनका रास्ता इतना लंबा, दुरूह और जटिलताओंभरा था कि साधारण श्रमिक द्वारा उनका लाभ उठाना तो दूर, समझना तक कठिन था. इस तरह प्रतिस्पर्धा का पहला शिकार बना था—श्रमिक. दूसरा वह शिल्पकर्मी जिसके पास सिवाय अपने शिल्पकर्म के उपार्जन का कोई और माध्यम नहीं था. नतीजा यह हुआ कि जो शिल्पकर्मी प्राचीन समाजों में अपने हुनर के लिए सराहे जाते थे, जिनका विशेष मानसम्मान था, वे बेरोजगारी का शिकार होने लगे. इससे उनका कलाकौशल भी दम तोड़ने लगा, जो उन्होंने पीढि़यों के संघर्ष के बूते प्राप्त किया था. उचित यही था कि जिस प्रकार उद्यमी अपने उत्पाद के मूल्यनिर्धारण को स्वतंत्र होता है, श्रमकौशल के मूल्यांकन की वैसी ही स्वतंत्रता श्रमिक और शिल्पकार को भी प्राप्त होती. व्यावसायिक और सामाजिक नैतिकता की दृष्टि से भी यही अपेक्षित था. परंतु प्रौद्योगिकीकरण ने श्रम और शिल्प दोनों के सक्षम और सस्ते विकल्प पेश किए थे. परिणामस्वरूप श्रमिक और कामगार वर्गाें के ऊपर बेरोजगारी की तलवार लटकने लगी थी. मशीनों ने मानवश्रम का विकल्प बनना शुरू किया तो बेरोजगारी संकट से घिरे, हतोत्साहित शिल्पकार और मजदूर पूंजीपतियों पर निर्भर होते चले गए. उनके शिल्प और श्रम के मूल्यांकन का अधिकार उन लोगों के हाथों में चला गया जो केवल और केवल अपने मुनाफे के लिए काम करते थे.यह पूंजी की सुदृढ़ता का पहला चरण था. दूसरे चरण की शुरुआत उपभोक्तावाद से होनी थी. जिसमें उत्पादन व्यक्ति की जरूरत के बजाय पूंजीवादी अर्थतंत्र की लाभकामना के निमित्त होता था. उसकी शुरुआत तो मशीनीकरण के साथ ही हो चुकी थी, मगर वास्तविक सफलता मध्य वर्ग के मजबूत आर्थिक शक्ति बनने के बाद संभव हो सकी.

स्वाधीन भारत में कल्याण राज्य की नींव रखी गई और आजादी का लाभ सभी वर्गों तक पहुंचाने के लिए मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया गया. सोचा गया कि राष्ट्रीय महत्त्व के जितने भी भारी उद्यम हैं, उनपर सरकार का अधिपत्य हो. इसके फलस्वरूप सार्वजनिक उद्यमों की स्थापना की गई थी. मगर कमजोर नेतृत्व, इच्छाशक्ति का अभाव, पूंजीपति और भ्रष्ट नौकरशाही के अनुचित गठजोड़ में फंसकर, वे लगातार घाटे का शिकार होने लगे. भारीभरकम पूंजी के आधार पर लगे सार्वजनिक उद्यमों पर पूंजीपतियों की कुदृष्टि थी. येनकेनप्रकारेण वे उनपर एकाधिकार चाहते थे. आजादी के तीसरे दशक बाद से राजनीति पर पूंजीपतियों का प्रभाव बढ़ने लगा था. इसलिए हुआ वही जो पूंजीपति तथा उनके चहेते भ्रष्ट नेता चाहते थे. बीसवीं शताब्दी के समाप्त होतेहोते यह मान लिया गया कि मिश्रित अर्थव्यवस्था के बूते दुनिया के साथ स्पर्धा कर पाना असंभव है. इसलिए उदारीकरण के बहाने भारतीय बाजारों को दुनियाभर के उद्यमों के लिए खोल दिया गया. इसी के साथ देशभर में प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित दोहन और शोषण की शुरुआत हो गई. पूंजीपतियों और वैश्विक कारपोरेट घरानों की गिद्धदृष्टि अर्से से इस देश के प्राकृतिक संसाधनों पर टिकी थी. उदारीकरण के साथ वे उन संसाधनों को औनेपौने दामों में खरीदने या जोड़तोड़ द्वारा हड़पने का स्वप्न देखने लगे. मिश्रित अर्थव्यवस्था के दौरान पिछले पचास वर्षों में जो बड़ेबड़े सार्वजनिक उद्यम खड़े किए गए थे, उनसे पीछा छुड़ाने के लिए विनिवेश पर खास जोर दिया गया. सरकार किसी भी दल की रही हो, अपनीअपनी तरह से सभी ने, कभी प्रकट रूप में तो कभी पिछले दरवाजे से, उदारवाद और विनिवेशीकरण को बढ़ावा दिया. यह अवधारणा बनी कि कारखाने चलाना सरकार का काम नहीं है. उसका काम केवल शासन और व्यवस्था संभालना है. नतीजा यह हुआ कि कुछ वोटबटोरू, लोकप्रिय योजनाओं को छोड़कर बाकी योजनाएं निजी हाथों की ओर खिसकने लगीं. यह काम पश्चिम की तर्ज पर किया गया, जिनकी पहचान विकसित देश के रूप में थी. जहां शिक्षा, भोजन, आवास और बेरोजगारी जैसी समस्याएं उतनी भयावह नहीं थीं, जितनी वे भारत सहित दूसरे विकासशील एवं अल्पविकसित देशों में. पिछली ढाई दशाब्दियों से तो पूरी अर्थव्यवस्था ही पूंजीवाद के नाम लिख जा चुकी है.

घोषित रूप से समाजवादी भारत में पूंजीवाद ने बड़े नाजुक अंदाज में, उदारवाद के नाम से प्रवेश किया था. चूंकि अर्थव्यवस्था के पूंजीकरण को लेकर समाज में अनेकानेक अंतर्विरोध थे पहला अंतर्विरोध यहां की जाति व्यवस्था के रूप में था, जिसमें व्यक्ति को अरुचि और अनिच्छा के बावजूद पैत्रिक पेशे की ओर ढकेल दिया जाता था. अंततः वह उसको अपनी नियति मानकर, परंपरा की लकीर पीटते हुए काम करता था. चूंकि उसके पास भविष्य को लेकर कोई बड़ा सपना नहीं होता था, इसलिए साधारणतः उसके काम में रचनात्मक कौशल और मौलिकता का अभाव रहता था. यह कमी कथित ऊंची जातियों में भी थी. ‘पंडिज्जी’ संबोधन सुन, फूलकर कुप्पा हो जानेवाले ब्राह्मणपुरोहित कथावाचन को ज्ञान, रटंत को शिक्षा और कर्मकांडों को सभ्यता एवं संस्कृति मानकर, एक पोथीपत्रा पढ़ते हुए ‘अंधों में काना सरदार’ वाली कहावत को चरितार्थ करते रहते थे. वास्तव में ज्ञान से उनका नाता केवल रटे हुए को रटाने तक सीमित था. उन अंतर्विरोधों को दूर करने, देश को बड़े परिवर्तन के लिए तैयार करने के बजाए आननफानन में उदारीकृत अर्थनीतियों को लागू किया था. उसका दुष्परिणाम यह हुआ कि भारत विश्वउत्पादकों के लिए मंडी बन गया. छोटेमोटे लाखों उद्यम, जिनसे देश के करोड़ों लोगों को रोजगार मिलता था, धीरेधीरे बंद होने लगे. सरकार किसी भी दल की रही हो, उसकी व्यापार नीति करीबकरीब एक समान और पूंजीपतियों की हितरक्षक रही है. आज ‘मेक इन इंडिया’ की हवा में भी लघु, कुटीर उद्यमों तथा छोटे व्यवसायों की सुध लेने वाला कोई नहीं है. अब तो इसे देखकर ऐसा लगता है कि वह खुद पर सवारी गांठ रहे सहसवार के नियंत्रण से भी बाहर जा चुका है.

पूंजीवाद को मिली इस अप्रत्याशित सफलता का राज? कौनसा विचार है जिसने नईपुरानी सभी पीढि़यों को अपने मोहपाश में जकड़ लिया है? जवाब है, कोई नहीं. पूंजीवाद की सफलता का एकमात्र रहस्य है कि वह अपने उपभोक्ताओं को विचारधाराओं के दबाव से मुक्त करता है. परंपरागत सामाजिक मूल्यों के के स्थान पर वह उत्पादकउपभोक्ता के संबंधों को ले आता हौ. ‘जिन चीजों से मनुष्य को सुख प्राप्त हो, उन्हें प्राप्त करने का उसे अधिकार है.’—यह धारणा पूंजीवाद का आदर्श है. यह धारणा मनुष्य और पशु के अंतर को मिटाती है. समाज को उत्पादक और उपभोक्ता में बांट देती है. उत्पादक का सुख अधिकतम मुनाफे में निहित होता है. इसलिए अपने सुख की तलाश में बाजार में पहुंचे उपभोक्ता, बहुसंख्यक होने के बावजूद, उत्पादक की अधिकतम लाभ में अपना सुख खोजने की मानसिकता के विरुद्ध कोई नैतिक दबाव नहीं बना पाते. 1751 में फ्रांस के अर्थशास्त्री फ्रांसिस केने ने पहली बार ‘लेजेज फेयर’ पद का उपयोग कर, उद्योगों को नियंत्रण मुक्त करने की सलाह दी थी. आगे चलकर एडम स्मिथ ने केने की इस मान्यता को तर्कसम्मत ढंग से आगे बढ़ाया. वे उद्योगों को नियंत्रण मुक्त करने की मांग कर रहे थे, क्योंकि उन्हें उद्यमों की स्वतंत्रता में ही राष्ट्र हित नजर आता था. वे भूल गए थे कि उत्पादकों को नियंत्रण मुक्त करने के पीछे एडम स्मिथ का ध्येय राष्ट्रीय उत्पादन में वृद्धि करना था, न कि अर्थव्यवस्था को कुछ पूंजीपतियों के हाथों में सौंप देना. इसलिए उसने ‘वैल्थ आ॓फ नेशन’ लिखा था, न कि ‘वैल्थ आ॓फ कैपीटलिस्ट’. नीतिनिर्माण की दृष्टि से तत्कालीन राजनीतिज्ञों की भूमिका किसी भी पूंजीपति की अपेक्षा अधिक सामथ्र्यशाली थी. वे राष्ट्रहित के अनुसार आवश्यक निर्णय लेने के लिए पूर्ण स्वतंत्र थे. मगर कुछ ही दिनों में औद्योगिक संस्थानों को दी गई स्वतंत्रता सरकार की सीमा बनने लगी. देशहित के निर्णय पूंजीवादी संस्थानों के निर्देश पर, उनके हितों को देखकर लिए जाने गले. भारत में यह आपाधापी के साथ, कतिपय भौंडे तरीके से हुआ.

हमारे नेतागण ‘मेक इन इंडिया’ का नारा लगाते हैं. 56 इंची सीने का दावा करते हैं, मगर इस तथ्य को नजरंदाज कर देते हैं कि भारतीय बाजार चीनी और दूसरे विदेशी उत्पादों से भरे पड़े हैं. इनमें चीन का तो इतना दबदबा है कि सस्ते खिलौने, इलेक्ट्रोनिक्स, मोबाइल, कंप्यूटर, टेलीविजन से लेकर छोटीछोटी चीजें जैसे दर्पण और बच्चों की काॅपी, कलम, पेंसिल, वर्कबुक तक चीन से आयात की जा रही हैं. मंडी में जाओ तो फल और सब्जियां तक आयातित मिल जाएंगी. उन्हें कौन बताए कि देशभक्ति हवा में नहीं तैरती, लोगों के व्यवहार में बसती है. वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं के इस दौर में जो देश बाजार में नहीं होता, उसकी हैसियत समाज में भी घट जाती है. ऐसा देश नागरिकों के आत्मसम्मान का सबब नहीं बन पाता. वैसे भी पुरानी कहावत है कि लोग जिसका खाते हैं, गुण भी उसी के गाते हैं. एक समय था जब देश में बाजार में जापान के उत्पाद छाये होते थे. उच्चगुणवत्ता युक्त वे उत्पाद भारतीयों के मन में जापानी प्रौद्योगिकी के बारे में एक सकारात्मक छवि का निर्माण करते थे. इसलिए जापानियों की कमर्ठता और अनुशासनप्रियता के किस्से उन दिनों आम हुआ करते थे. आजकल बाजार पर चीन का कब्जा है. इसलिए हम व्यवहार में देख सकते हैं कि जापान हमारे लिए एक भूला हुआ देश बनता जा रहा है. जनसाधारण तक चीन के जो उत्पाद पहुंचते हैं, वे घटिया गुणवत्ता के होते हैं. चीन के बारे में नागरिकों की राय भी एक गैर भरोसेमंद देश की है. दरअसल हम ऐसे राष्ट्रवादियों की सरकार के इकबाल में रह रहे हैं जहां बाजार में राष्ट्रीय उत्पादों का टोटा है. इसका नकारात्मक प्रभाव हमारे राष्ट्रीयताबोध पर पड़ा है. पिछले 14 वर्षों में देश से 61000 करोड़पतियों के पलायन की घटना भी इसी प्रवृत्ति की संकेतक है. ऐसी घटनाएं यदि सरकार की नींद खराब नहीं करतीं तो समझ लेना चाहिए कि वे सरकारें देश की होकर भी देश के लिए काम नहीं कर रही हैं. वे या तो अपने नेताओं के स्वार्थ के लिए काम कर रही हैं, अथवा उन पूंजीपतियों के लिए जो उन्हे सत्ताकेंद्र तक पहुंचाने में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं. इसके लिए वे अकेले जिम्मेदार भले न हों, लेकिन सुधार की कोशिश करने के बजाए इसे और आयातनिर्भर बना देना चाहते हैं. हमारी प्रथम दर्जे की प्रतिभाएं परराष्ट्रों के अर्थतंत्र को मजबूत करने के लिए नईनई योजनाएं बनाती हैं. और औसत दर्जे की प्रतिभाएं हैं, वे उनके लिए बाजार का काम देखती हैं. पिछले कुछ दशकों में भारतीय शिक्षा ने जितने सेल्समेन इस देश को दिए हैं, वह अपने आपमें विश्वरिकार्ड है.

वे दिन गए जब युद्ध सीमाओं पर लड़े जाते थे. दुनिया बदल चुकी है. इन दिनों राष्ट्र की भूमिकाएं अब राष्ट्राध्यक्ष तय नहीं करते. उन्हें मनमाफिक भूमिका निभाने के लिए पूंजीवादी कंपनियों की ओर से बाध्य किया जाता है. आदमी का मोल समाप्त हो चुका है. मोल संसाधनों का है. इसलिए नई युद्धनीतियां कूटनीतिपरक होती हैं. वे संसाधनों पर अधिकार को हड़पने के लिए बनाई जाती हैं. इस लड़ाई में चीन भारत से बहुत आगे है. हम भले ही सीमा पर चीन को उसकी गीदड़भभकियों से बाज आने की सलाह दे रहे हों, अर्थव्यवस्था के मैदान में वह हमारे घर में घुसकर हमें मात दे रहा है और हमारे नेता रेत में गर्दन दबाए शुतुरमुर्ग की भांति खुद को धोखा दिए जा रहे हैं. सतरहवीं शताब्दी में मानवमुक्ति के जितने भी शब्द, मुहावरे, उपकरण और औजार चुने गए थे, इस दैत्य के आगे, एकएक कर वे सभी बेअसर सिद्ध हो रहे हैं. कमी उन विचारों की नहीं, विचारहीनता को अपनी जीवनशैली बना चुके समाजों की थी. वे तार्किकता और उन निष्ठाओं से निरंतर परे हटते गए, जो उनके विकास की आधारशिला बनी थीं. इस संबंध में भारतीय विरोधाभास छिपे नहीं हैं. हमारे यहां पश्चिम से मशीनीकरण तो उधार लिया गया. लेकिन उन विचारों से पूरी तरह कन्नी काट ली, जो वहां मशीनीकरण की समस्याओं से जूझते हुए, उनके समाधान की चाहत में विकसित हुए थे. परिणामस्वरूप समाज तथा हमारे व्यवहार में विचारशून्यता पसरती गई, जो आगे चलकर उपभोक्तावाद के समाज में पैठ बनाने में मददगार बनी. मसलन जेरेमी बैंथम का उपयोगितावादी सिद्धांत निरे भोग का, कोरा उपभोक्तावादी दर्शन नहीं था. वह खुशियों पर खास वर्गों के एकाधिकार का विरोधी था. वह शताब्दियों से वंचित रहे समाज के अधिकारों का समर्थन करते हुए उसे मुख्य धारा में शामिल करने का पक्षधर था. उससे पहले राज्य धार्मिक आचारसंहिताओं से अनुशासित होते थे. बैंथम ने पहली बार विधि के न्याय का पक्ष लिया था. इसके लिए आधुनिक न्याय प्रणाली बैंथम की ऋणी है. सामाजिक न्याय की आधुनिक संकल्पना को हम बैंथम के उपयोगितावाद और विधि के दर्शन की अवधारणा के विकास के रूप में देख सकते हैं. उसका आदर्श कथन था—‘अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख.’ उपयोगितावादी विचारकों के अनुसार दुनिया में कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जिसका मानव कल्याण के हित में उपयोग वर्जित हो. जो है, जिसकी उपयोगिता है, उसपर समूची मनुष्यता का अधिकार है. न तो कोई व्यक्ति विशेष है, न ही तिरष्कृत. बाजार ने उपयोगितावाद को उपभोक्तावाद में बदल दिया, जिसमें ऐसा जताया जाता है कि जीवन का अभीष्ट केवल सर्वोत्तम का भोग करना है, उसके कोई और सरोकार नहीं हैं. विचार शून्यता के परिवेश में यह पूर्ण स्वाभाविक था.

बैंथम ने जनसाधारण तक सुख की समान उपलब्धता सुनिश्चित करने को राज्य का कर्तव्य बताया था. इसके लिए उसने कानून के राज्य का समर्थन किया. जिन दिनों पूरा यूरोप चर्च से अनुशासित होता था, कानून के राज्य की बात करना बहुत बड़ी बात थी. इसकी शुरुआत पूर्ववत्र्ती विचारकों द्वारा हो चुकी थी. बैंथम ने उसको विधिक आधार दिया, साथ ही लागू भी कराया. पूंजीवाद की मान्यता रही कि सुखसुविधाएं उसकी जिसकी जेब में पैसा है. जो उनके मूल्य का भुगतान कर सकता है. बैंथम के आदर्श था, ‘अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख.’ सिक्का शक्तिशाली पूंजीवाद का चला. बैंथम का सिद्धांत केवल अकादमिक क्षेत्रों तक सिमटकर रह गया. देखते ही देखते, ‘अधिकतम लोगों को अधिकतम सुख’ का विचार ‘संपन्नतम व्यक्तियों को अधिकतम वैभवविलास’ में बदल गया. पूंजी या धन को सुविधाओं के साथसाथ सुख को अर्जित करने का पैमाना मान लिया गया. सामाजिक लाभ की संकल्पना मौद्रिक लाभ तक सीमित होकर रह गई. इससे मानवसंबंधों पर पूंजी को वरीयता मिलने लगी. खुद की स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए पूंजीवाद ने समाज में जो भी, जब भी मिला, सभी का अपने स्वार्थानुकूल इस्तेमाल किया. कानून, न्याय, अदालत, व्यक्ति स्वातंत्रय, मानवाधिकार, उपभोक्ता अधिकार, लोकतंत्र सब पूंजीवाद के हितों के अनुकूल ढलते गए. उपयोगितावाद, सुखवाद और मानवतावाद जैसी विचारधाराएं उच्चमानवीय आदर्शों को केंद्र में रखकर गढ़ी गई थी. उनमें किसी भी प्रकार के वर्चस्ववाद को नकारने की सर्वसाधारणीय वांछा शुरू से ही स्पष्ट थी. पूंजीवाद एक और तो उपभोक्ता वस्तुओं की आधुनिकतम रेंज बाजार में उतारता रहा, संस्कृति के क्षेत्र में वह ‘प्राचीनतम को महानतम’ सिद्ध करने में सहायक बना. पोंगापंथी पुरोहित इस काम को लगातार अंजाम देते रहे. यंत्रों पर निर्भर समाज में भावुक और संवेदनशील होना अविवेकपूर्ण तथा दुर्बलता की निशानी कहा जाने लगा. मानवाधिकार, स्वतंत्रता, व्यक्तिस्वातंत्रय जैसी जितनी भी चेतनाप्रधान अभिव्यक्तियां थीं, उन सभी को पूंजीवाद ने अपनाया अवश्य, मगर पूरी तरह से निस्तेज कर, स्वार्थानुसार अनुकूलन करते हुए. ताकि वे अंधानुकरण और स्तुतिगान के अलावा कहीं और सहायक न हो सकें. मानवीकरण के इन माध्यमों का अपने पक्ष में अनुकूलन करते हुए पूंजीवादी अर्थतंत्र के लक्ष्य को मौद्रिक लाभ तक सीमित कर, केवल और केवल एक शब्द को स्थापित करता गया. उदारवादी अर्थतंत्र की दृष्टि में वह पवित्रतम, मार्गदर्शक, परमकल्याणकारी शब्द है—मुनाफा. आखिर ऐसा क्यों हुआ कि धर्मदर्शन, संस्कृति, परंपरा आदि मानवसभ्यता और जीवन को मर्यादित करने वाली जितनी भी संस्थाएं और संगठन थे, सब के सब पूंजी के आराधन में लग गए? यहां तक कि इसके लिए राष्ट्रीय हितों की बलि भी दी जाने लगी. इसके कारणों तक पहुंचने के लिए हमें भारतीय संस्कृति और सभ्यता की पड़ताल करनी पड़ेगी. विशेषकर डेढ़दो शताब्दी पहले के इतिहास में जाना होगा.

1857 के भारतीय स्वाधीनता संग्राम की बात करें. उस समय तक भारत लगभग 400 वर्ष पराधीनता में गुजार चुका था. प्रथम स्वाधीनता संग्राम के बाद भारत पर जब ब्रिटिश राज्य हुआ तथा मुस्लिमों के हाथ से सत्ता जाने पर भारतीय अभिजात वर्ग ने प्रशंसा व्यक्त की थी, जबकि शासक बदल जाने से भारतीयों की राजनीतिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था. वे पहले की तरह ही परतंत्र थे. वह परतंत्रता पहले से कहीं अधिक परेशान करने वाली इसलिए भी थी कि 1857 में लगभग 25 करोड़ भारतीयों पर मात्र कुछ हजार अंग्रेज शासन चला रहे थे. मुस्लिम शासकों के जमाने में यह बात नहीं थी. इसलिए कि इस्लामिक जिहादियों के भारत आक्रमण से पहले यहां सूफी संतों, औलियाओं के रूप में इस्लाम दस्तक दे चुका था. उसने जाति के आधार पर बुरी तरह से बंटे समाज के निचले वर्गों में काफी पैठ पैदा कर ली थी. उसके फलस्वरूप लोग इस्लाम के प्रति आकर्षित हो रहे थे. बाद में भी इस्लाम के शासकों ने भारतीय जनजीवन को प्रभावित करने की कोशिश नहीं की. चारपांच शताब्दी के इस्लामिक शासन में भारत का इलीट वर्ग राजनीतिक और आर्थिक लाभों के लिए मुस्लिम शासकों से जुड़ा था, जबकि जनसाधारण, विशेषकर समाज के निचले जातिवर्गों के लिए के लिए वह उनकी लुप्त अस्मिता की पहचान का मसला था, जिसे वे इस देश में जातीय विभाजन के कारण शताब्दियों से सहते आए थे. ब्राह्मण एवं पुरोहित वर्ग को केवल अपने धर्म एवं संस्कृति की चिंता थी. शासक का धर्म और चरित्र क्या है, इससे उन्हें कोई संबंध न था. मुगल शासकों के पराभव तथा उनके स्थान पर अंग्रेज शासकों के आने से इलीट वर्ग प्रसन्न था. इसलिए कि मुगल सभ्यता भारतीय सभ्यता के सापेक्ष पिछड़ी हुई थी, जबकि औद्योगिकीकरण के कारण यूरोपियन सभ्यता तीव्र गति से विकासमान थी. अंग्रेज इस देश में व्यापार के लिए आए थे. मगर उनके भारत आगमन से पहले ही यूरोपियन औद्योगिक क्रांति की खबरें शेष दुनिया को चमत्कृत कर रही थीं. भारत का अभिजात वर्ग उसके प्रति आकर्षित था और एक तरह से उस सभ्यता को अपनाने के लिए उतावला भी.

गौरतलब है कि भारत का प्राचीन गौरव कम न था. प्राचीन भारतीय सभ्यता अपनी समकालीन सभी सभ्यताओं के मुकाबले बहुत अधिक विकसित भले न हो, मगर उसे पिछड़ा हरगिज नहीं माना जा सकता. ढाईतीन हजार वर्ष पहले भारतीय मेधा ने विश्वमेधा को चमत्कृत करते हुए उसपर अपना प्रभाव छोड़ा था. लेकिन परतंत्रता के लंबे दौर में वह निरंतर क्षरणशील होकर अपना तेज खो चुकी थी. दूसरों को तो दूर उसे खुद अपनी वास्तविकता की पहचान तक न थी. अतः 1874 के आसपास जब यूरोपियनों ने अपनी सत्ता के स्थायित्व के लिए भारतीय सभ्यता और इतिहास को समझना आरंभ किया, तो सबसे ज्यादा चमत्कृत होने वालों में वे लोग थे, जिनपर इस सभ्यता के बौद्धिक नेतृत्व की जिम्मेदारी थी. इसलिए कि वे अपना कर्तव्य भुलाकर केवल चाटुकारिता को अपने आचरण में ढाल चुके थे; और सत्ता के इर्दगिर्द रहकर उसका लाभ उठाने में प्रवीण थे. उस समय तक दर्शन की जगह कर्मकांड छा चुका था. जातिवाद का बोलवाला था और रूढि़यों में जकड़ी सभ्यता अपने अतीत को पूरी तरह बिसराए हुए थी. पढ़ालिखा वर्ग अंग्रेजों की कृपा प्राप्त करने के लिए अपने ही देशवासियों पर जुल्म ढा रहा था. वह एक प्राचीन जाति और वर्ग में बंटी संस्कृति का अपेक्षाकृत विकसित संस्कृति के आगे समर्पण था. भारतीय समाज चूंकि छोटेछोटे जाति, वर्गों में बुरी तरह बंटा हुआ था. जाति व्यवस्था की जकड़ बहुत गहरी थी. इसलिए अंग्रेजों के आगमन पर खुश होने के विभिन्न वर्गों के अलगअलग कारण थे. अभिजात वर्ग अंग्रेजों की कृपा शासन के निकट रहने, उनके जैसी जीवनशैली प्राप्त करने के लिए चाहता था. औद्योगिकीकरण के बाद यूरोप की अर्थव्यवस्था का जादुई तेजी से विकास हुआ था. उच्च वर्गों की संपन्नता बहुत तेजी से बढ़ी थी. भारतीय सामंतवर्ग में उसके प्रति विशेष आकर्षण था. यूरोपीय उद्यमियों की भांति वे भी आननफानन में संपन्नता बटोर लेना चाहते थे; और इसके लिए कुछ भी करने को तैयार थे. समाज के पढ़ेलिखे वर्गों के एक तबके की श्रद्धा यूरोप में चले बौद्धिक आंदोलनों के कारण थी, जिसमें वे अपने मानसम्मान और अस्मिता की सुरक्षा का सपना देखते थे. नए विचारों की रोशनी में उत्पीडि़त वर्ग भी अपनी अस्मिता के संघर्ष को खड़ा करना चाहते थे. उसकी शुरुआत ज्योतिबा फुले महाराष्ट्र से कर ही चुके थे. उसके लिए अंग्रेजी शिक्षा नए विचारों के साथ मुक्तिसंदेश की वाहक बनी हुई थी.

लगभग दो शताब्दियों के ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय समाज को अपने भीतर झांकने का अवसर मिला था. हालांकि उस समय भी समाज का एक वर्ग परिवर्तनों के विरोध में अड़ा था. जबकि पढ़ालिखा वर्ग अंग्रेजों से प्रभावित था. ज्ञानविज्ञान की यूरोपियन शैली उसको आकर्षित करती थी. यह प्रभाव इतना गहरा था कि औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के लिए भारत में वही रास्ते अपनाए गए जो अंग्रेजों के थे. यह स्वाभाविक भी था. ब्रिटिश साम्राज्यवाद के मूल में आर्थिक साम्राज्यवाद की लालसा थी. वह एक ऐसा राजनीतिक तंत्र था जो जनता की विकास की आकांक्षा तथा पंूजीपतियों की अतिमहत्त्वाकांक्षाओं के योग से बना था. अलगअलग दिखने के बावजूद उसमें अन्योन्याश्रितता का भाव था. उसकी कमी थी कि उसमें उत्पादन में भागीदारी सभी वर्गों की थी, मगर लाभानुपात शीर्ष की ओर तेजी से बढ़ता जाता था. इससे मध्यक्रम और निचले वर्गों में भारी असंतोष था. उस असंतोष के फलस्वरूप उपजे विद्रोह ने ही पश्चिम में प्रतिरोध के नए हथियारों को जन्म दिया था. देशी सभ्यता और संस्कृतिसमर्थक गांधी ने भी अंग्रेजों से काफी ग्रहण किया. उन्होंने समय रहते ही समझ लिया था कि इस नए किस्म के साम्राज्यवाद को गैरपरंपरागत हथियारों से ही चुनौती दी जा सकती है. ‘सत्याग्रह’ नामक उनका औजार थोरो के ‘सिविल डिसओविडियंस’ का भारतीयकरण था. उसने लोगों को अपनी शक्ति का आकलन करने तथा आजादी के लिए एकजुट होने के लिए प्रेरित किया. फलस्वरूप देशभर की जनता स्वाधीनता की मांग लेकर घरों से निकल पड़ी.

अच्छा नेता जनता का मार्गदर्शन करता है. लेकिन सबसे अच्छा नेता वह होता है जो लोगों को उनके भीतर छिपी शक्तियों से परचाता है. उन शक्तियों को बाहर लाकर उपयुक्त प्रेरणा जगाता हे. गांधी ने यही जादू इस देश की जनता के साथ किया था. ज्ञात हो कि धर्म, जातपात में बंटा भारतीय समाज कोई जड़ समाज नहीं था. कभी रहा भी नहीं है. परिवर्तन की कामना विशेषकर उत्पीडि़त वर्ग में हमेशा से विद्यमान रही है. उसके लिए शीर्ष नेतृत्व आवश्यक नहीं था. बल्कि जनता के भीतर से ही नेतृत्वकारी शक्तियां स्वयंस्फूर्त्त भाव से निकल आती थीं. वैदिक कर्मकांड के विरोध में जैन और बौद्ध दर्शन के उदय से बहुत पहले ही पूर्ण कस्सप, निगंठ नागपुत्त, अजित केशकंबली, संजय वेल्ट्ठिपुत्त, कौत्स, मक्खलि घोषाल आदि के बौद्धिक अवदान स्वरूप भौतिकवादी परंपरा इस देश में पनप चुकी थी. उनसे प्रेरणाओं के आधार पर ही जैन और बौद्ध दर्शन का विकास हुआ. जैन दर्शन का प्रसिद्ध ‘स्याद्वाद’ का सिद्धांत जिसे आज कुछ विद्वान क्वांटम थ्योरी के निष्कर्ष ‘अनिश्चितता का सिद्धांत’(थ्योरी आ॓फ अनसर्टेनिटी) से जोड़ते हैं, की मूल अवधारणा संजय वेल्ट्ठिपुत्त से प्राप्त हुई थी. साधना के आरंभिक दौर में महावीर स्वामी और मक्खलि घोषाल साथसाथ थे. कालांतर में दोनों अलगअलग हुए तो मक्खलि ने आजीवक संप्रदाय और महावीर स्वामी ने जैन धर्म की नींव डाली थी. मक्खलि घोषाल और बाकी विचारकों के बारे में भारतीय साहित्य में अधिक प्रसंग प्राप्त नहीं होते. लेकिन इतना महत्त्वपूर्ण उल्लेख हमें प्राप्त होता है कि बौद्ध धर्म के आरंभिक दिनों में आजीवक संप्रदाय को चाहनेवालों की संख्या बौद्ध धर्म से कहीं अधिक थी. मक्खलि के बारे में प्रसेनजित ने बुद्ध से एक बार कहा था कि वह उसे(मक्खलि को) उनसे अधिक बुद्धिमान मानता है. क्या इसके पीछे कोई सामाजिक कारण थे? इसे प्रमाणसहित कह पाना तो कठिन है. भारतीय समाज में व्याप्त जातीय भेदभाव को देखते हुए कुछ आकलन अवश्य लगाए जा सकते हैं. महावीर स्वामी और बुद्ध दोनों ही क्षत्रिय कुलों से आए थे. उन दिनों बलि, धार्मिक भेदभाव, अनावश्यक निषेधों की वजह से क्षत्रिय और ब्राह्मणों के बीच मनमुटाव बढ़ने लगे थे. इसलिए जब महावीर स्वामी और बुद्ध ने धर्मदर्शन में रुचि खोजने की कोशिश की तो तत्कालीन क्षत्रिय सम्राट उनकी ओर आकर्षित होते गए. आशय है कि न केवल आज बल्कि सहस्राब्दियों से भारतीय जनसमाज में परिवर्तन की वांछा रही है. उसके लिए उसे जब भी, जो भी अवसर मिला, उसका उपयोग किया है. चाहे वह निराकार की भक्ति हो अथवा सूफी परंपरा, कबीर हों या गांधी, जयप्रकाश नारायण हों या कांशीराम अथवा विश्वनाथ प्रताप सिंह समाज की परिवर्तन की चाहत, अलगअलग स्वरों से गूंजती रही है. इतिहास जनविद्रोहों से भरा पड़ा है. लेकिन यह भी सच है कि भारतीय दमित वर्गों का वास्तविक संघर्ष बाहरी लोगों से कम, अपने लोगों से अधिक रहा है. भारतीय समाज की परिवर्तन की उत्कट अभिलाषा का सबसे सार्थक उपयोग गांधी ने सत्याग्रह के दौरान किया था. जबकि डा॓. अंबेडकर जनमानस के मुक्तिस्वरों को आवाज दे रहे थे.

परंपरा और संस्कृति का गुणगान करनेवाला भारतीय समाज का अभिजात तबका अंग्रेजी शिक्षा और नई प्रौद्योगिकी से के प्रति भी आकर्षित था. इसलिए 1947 तक आतेआते भारत में अंग्रेजी राज और अंग्रेजी शिक्षा के समर्थकों की बड़ी फौज खड़ी हो चुकी थी. जिसे अपने अंग्रेजी ज्ञान पर गर्व था, वह अंग्रेजी ज्ञान एवं आधुनिक सभ्यता से वंचित अपने ही भाईबहनों को वह हेय दृष्टि से देखता था. उनीसवीं शताब्दी के अंतिम अंतिम दशकों में मध्यम मार्गी कांगेस की स्थापना मुख्यतः पढ़ेलिखे वर्ग को अंग्रेजी शासन से जोड़ने और जनाक्रोश पर नियंत्रण रखने के लिए की गई थी. एक प्रकार से वह अंग्रेजी शैली का ही संगठन था. धीरेधीरे वक्त बदला और जनता के दबावों में कांग्रेस को स्वराज की मांग पर उतरना पड़ा. उल्लेखनीय है कि ‘स्वराज्य’ और ‘स्वराज’ के आधार पर कांग्रेस में भी दो दल बन चुके थे. स्वराज्य की मांग करनेवाले कम संख्या में थे. उनमें से बड़ी संख्या उन नेताओं की थी, जो किसी न किसी प्रकार से ग्रामीण क्षेत्रों से आए थे और जिनकी प्रतिबद्धता अपने लोगों के साथ थी. कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में से एक दादा भाई नौरोजी हालांकि कांग्रेस की नर्म राजनीति की धारा का प्रतिनिधित्व करते थे. किंतु उनकी लिखी पुस्तक ‘पावर्टी एंड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया’ ब्रिटिश भारत की त्रासदी को बयान करती थी. पुस्तक में उन्होंने ‘ड्रैन थ्योरी’ को स्थापित किया था, जिसके अनुसार अंग्रेजों द्वारा विभिन्न रास्तों से भारतीय संपदा के दोहन तथा उसको इंग्लेंड ले जाने की बात कही थी. इस पुस्तक ने ब्रिटिश शासन के विरोध को तार्किक आधार प्रदान किया था. वे देश की अंग्रेजों से पूर्ण आजादी चाहते थे. ‘स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है.’ कहनेवाले तिलक इस वर्ग के अग्रणी नेताओं में से थे. उनके सापेक्ष गांधी चतुर बनिये की तरह अपनी और भारतीय समाज की स्वाधीनता की वांछा को तौल रहे थे. 1942 से पहले तक उनकी मांग ‘स्वराज’ तक सीमित थी. संभवतः पूरी तैयारी के बिना अंग्रेजों से कोई टकराव मोल लेना नहीं चाहते थे. वे मानते थे कि अंग्रेज इस देश का समाजार्थिक शोषण कर रहे हैं. ‘हिंद स्वराज’ का पहला संस्करण गुजराती में ‘हिंद स्वराज्य’ के नाम पर लिखा गया था. परंतु जब अंग्रेजों ने उस उस संस्करण को प्रतिबंधित कर दिया तो गांधी ने तुरंत पुस्तक का शीर्षक बदलकर उसका अंग्रेजी अनुवाद ‘इंडियन होमरूल’ नाम से प्रकाशित कराया, ‘हिंद स्वराज’ के नाम से प्रकाशित किया, जो कांग्रेस की मांग से मिलतीजुलती थी.

बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशक विश्वराजनीति में हलचल भरे थे. सोवियत संघ, जर्मनी, इटली, फ्रांस, चीन आदि देशों में राजनीतिक परिवर्तन जारी थे. इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण था, सोवियत संघ का कम्युनिज्म के घेरे में चले जाना. चीन में भी साम्यवादी शक्तियां प्रभावी थीं. वहां माओ के नेतृत्व में साम्राज्यवादी शक्तियों से संघर्ष जारी था. उसकी लाल सेना चीन के बड़े हिस्से को अपने अधिकार में चुकी थी. भारतीय बुद्धिजीवियों खासकर पढ़ेलिखे वर्ग पर साम्यवादी आंदोलन का गहरा प्रभाव था. उन्हें उसमें ब्रिटिश साम्राज्यवाद का तोड़ नजर आता था. बंगाल, केरल, पंजाब आदि प्रांतों के युवक सोवियत संघ जाकर वहां की राजनीतिक जमीन को समझने में लगे थे. रूस के साम्यवादियों का भी भारतीयों को भरपूर समर्थन था. वे इसे साम्यवादी आंदोलन की पूर्णता के रूप में देखते थे. इससे पूंजीवादी ताकतों में इस बात की चिंता स्वाभाविक थी कि यदि भारत भी साम्यवादी झंडे के नीचे आ जाता है तो एशिया के छोटेछोटे देशों को भी उसके प्रभाव में आते देर न लगेगी. वह यूरोप के बाकी देशों के लिए बड़ा खतरा हो सकता है, जिसके उस समय पूरे आसार थे. भारतीय स्वाधीनता आंदोलनकारियों की पहली खेप साम्यवादी रूस से काफी प्रेरित थी. उस समय के सभी प्रमुख नेता और बुद्धिजीवी उससे प्रभावित थे. महान समाज सुधारक राजा राममोहन राय स्वयं कार्ल मार्क्स से प्रेरित थे. वे मार्क्स से मिलने इंग्लेंड भी गए थे. लेकिन उनकी मार्क्स से मुलाकात न हो सकी थी. उस समय के प्रमुख नेता डा॓. हरदयाल, करतार सिंह सराबा आदि क्रांतिकारी नेताविचारकों पर रूस के साम्यवादी आंदोलन का असर था. भारत के सैकड़ों युवा रूसी जमीन पर रहकर क्रांति की शिक्षा ले रहे थे. यहां तक कि पूरी तरह भारतीयता के रंग में रंगे विवेकानंद पर भी साम्यवादी विचारधारा का प्रभाव था.

दूसरी ओर भारत में लाल झंडा न फहरने पाए, इसके लिए देश और विदेश में बड़ेबड़े कूटनीतिज्ञ सक्रिय थे. लाला लाजपत राय, भगत सिंह, राजगुरु जैसे क्रांतिकारियों के देश के युवावर्ग पर प्रभावी होने से रोकने के लिए बड़ा खेल खेलने की तैयारी हो रही थी. 1857 का संग्राम हिंदुओं और मुस्लिमों ने मिलकर लड़ा था. उस समय तक देश में सांप्रदायिक विभाजन जैसी बात न थी. अंगेज चाहते थे कि भारतीय अंग्रेजी सीखें. कम से कम इतनी कि सरकारी कामकाज में उनकी मदद ली जा सके, लेकिन साम्यवाद जैसी विचारधाराओं से उन्हें चिढ़ थी. सामरिक दृष्टि से भी अंग्रेज भारत को रूसी साम्यवाद के प्रभाव से बचाए रखना चाहते थे. इसलिए अंग्रेजी के प्रति सम्मोहित, मगर प्राचीन भारतीय संस्कृति में गहरी आस्था रखने वाले गांधी और रवींद्रनाथ ठाकुर जैसे व्यक्तित्वों को अतिरिक्त रूप से बढ़ावा दिया गया. यही कारण है कि महात्मा गांधी ने जब सत्याग्रह की शुरुआत की तो उन्हें अपने समय के सभी प्रमुख उद्यमियों का साथ मिला था. जमनालाल बजाज, घनश्यामदास बिड़ला, खेतान जैसे उद्यमियों और व्यापारियों से गांधी जी के आत्मीय संबंध थे. उनकी समृद्धि का अधिकांश विश्वयुद्धों की देन था. दोनों विश्वयुद्धों के दौरान गांधी भी, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में साम्राज्यवादियों के साथ थे. उल्लेखनीय है कि रूस ने अपनी स्वतंत्रता हिंसक क्रांति के माध्यम से ग्रहण की थी. चीन भी उसी दिशा में बढ़ रहा था. ऐसे में गांधीजी का अहिंसा का विचार केवल जमीनी सचाइयों की देन न होकर भारत को रूसी एवं चीनी प्रभाव से बचाने की कोशिश भी था. दूसरे शब्दों में गांधी की अहिंसा केवल साम्राज्यवादी अंग्रेजों का रक्षाकवच नहीं थी. वह भारतीय नवपूंजीपतियों एवं जमींदारों को उस भय से बचाने में सहायक थी, जो रूस तथा दूसरे देशों के रास्ते आ रहा था. दूसरे शब्दों में गांधी जितना काम भारतीयों के लिए कर रहे थे, उतना ही काम अंग्रेजों के लिए भी कर रहे थे. और चाहेअनचाहे वैसा ही काम भारतीय नवपूंजीपति वर्ग की रक्षा के लिए भी कर रहे थे, जिनके लिए स्वतंत्रता के मायने पश्चिमी प्रौद्योगिकी से गठजोड़ तथा उसके माध्यम से भारत की अर्थसत्ता पर कब्जा करने तक सीमित था.

यहां एक प्रश्न स्वाभाविक है कि महात्मा गांधी जो बडे़ उद्यमों में कटौती के पक्ष में थे, हाथ के उद्यमों तथा दस्तकारों को आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे, आखिर क्यों बिड़ला और बजाज जैसे उद्यमी उनके पीछे लगे हुए थे. बड़ी पूंजी का निषेध करनेवाले गांधी को अपने कार्यक्रमों के लिए पूंजीपतियों की ओर से चंदा आता था. साध्य एवं साधन दोनों की पवित्रता के समर्थक गांधी को उससे कोई विरोध क्यों नहीं था? क्या वह पूंजीपतियों का राष्ट्रप्रेम था? गांधीजी द्वारा चलाए गए स्वदेशी अभियान का लाभ सीधे पूंजीपतियों को पहुंचा था. खादी का लाभ उठाने वालों में बिरला घराना सबसे आगे था. बदले में वह उनका लाभ भी उठा रहा था. उल्लेखनीय है कि गांधीजी ने खादी को बढ़ावा देने के लिए मिल से बुने कपड़े का बहिष्कार किया था. बाद में अपनी राय में संशोधित करते हुए भारतीय मिलों से बुने कपड़े को उपयोग में लाने की छूट दे दी थी. यह गांधी की नीति में बड़ा परिवर्तन था. वे यदि इसकी अनुमति न देते तो भी मशीनीकरण की ओर बढ़ते भारत के कदम रुकनेवाले नहीं थे. इसलिए पूंजीपति गांधी जी का उतना ही समर्थन चाहते थे, जो उनको व्यावसायिक दृष्टि से लाभकारी हो. दरअसल गत शताब्दी के दूसरे दशक में जब दक्षिण अफ्रीका में सफलता के झंडे गाढ़कर गांधीजी हिंदुस्तान पहुंचे उस समय दुनिया में माक्र्स के विचारों की धूम मची हुई थी. रूसी क्रांति सफल हो चुकी थी. चीन का बड़ा भूभाग माओत्से तुंग की लाल सेना के अधिकार में था. लेनिन के सिपहसालार ट्राटस्की भारत में भी साम्यवादी क्रांति को सफल देखना चाहते थे. भारत के सैकड़ों युवा उससे उत्साहित थे. अंग्रेज अब सर्वविजेता कौम नहीं नहीं रह गई थी. भगत सिंह, सुभाष, नेहरू आदि पर साम्यवादी विचारों की छाया थी. अमेरिका में बसे भारतीय समानता और व्यक्ति स्वातंत्रय का संदेश भारत तक पहुंचा रहे थे. अब्राह्म लिंकन के नेतृत्व में वहां जो स्वाधीनता संग्राम लड़ा गया था, उसका अगला सफलतापूर्ण चरण फ्रांस में पूरा हुआ था. टामस पेन, थामस जेफरसन आदि ने, ने व्यक्ति मात्र की समानता, समानता और अधिकारों को लेकर आवाज उठाई थी. भारत में वही काम ज्योतिबा फुले और बाद में चलकर उनके सशक्त उत्तराधिकारी डा॓. अंबेडकर द्वारा किया गया. यही कारण है कि घबराए हुए भारतीय पूंजीपतियों ने धर्म भीरू और परंपरावादी गांधी की लुकाटी को चमकाते रहने में ही अपनी भलाई समझी थी. चूंकि आर्थिक और सामाजिक समानता के सवालों को राजनीतिक स्वतंत्रता के उत्साह में दबाया जा सकता था, इसलिए कांग्रेस ने सामाजिकआर्थिक स्वतंत्रता के प्रश्न को कोई महत्त्व नहीं दिया गया था. गांधी की राजनेता और धार्मिक संत की तस्वीर साथसाथ गढ़ी गई. भारतीय हिंदूमन जो सात सौ वर्ष की दासता से गुजर चुका था, अपनी पहचान को सम्मान देना चाहता था. इसलिए राष्ट्रीय भावनाओं की धार्मिक आर्थिकसामाजिक समानता जैसे शाश्वत मूल्यों पर संप्रदायवाद की जीत हुई. इस बीच भारतीय जनमानस पर गांधी का प्रभाव उत्तरोत्तर बढ़ता गया. गांधी तथा अन्य परंपरापोषी नेताओं की छत्रछाया में भारतीय उद्योगपति अपना काम करते रहे. कुल मिलाकर भारतीयता की बात करनेवाले हमारे तत्कालीन बड़े नेता, पूंजीवाद के प्रवेश को रोकने के बजाय उसकी पैठ बनाने में सहायक सिद्ध हुए.

स्वातंत्रयोत्तर भारत में पूंजी का हस्तक्षेप आजादी के समय से ही रहा. महात्मा गांधी की सफलता में उन पूंजीवादी ताकतों का बड़ा योगदान था. गांधीजी के आयोजनों में खर्च सामंतों और पूंजीवादी ताकतों का ही लगता था. स्वाधीनता आंदोलन में उन्होंने खादी का समर्थन किया था. स्वदेशी का जोरदार समर्थन करते हुए वे आगे बढ़े. दरअसल खादी और स्वदेशी में अंतर है. खादी की अवधारणा गांधीजी की गांव के आर्थिक स्वावलंबन से जुड़ी थी, जबकि स्वदेशी की सीमा में भारतीय उद्योग भी आ जाते थे. ‘हिंद स्वराज’ में गांधी ने मशीनों की आलोचना की थी. खादी मानवीय श्रम का सम्मान करती है. वह मानवीय कौशल को हस्तशिल्प और यंत्रशिल्प की स्पर्धा में भी मरने नहीं देती. व्यक्ति को उसके श्रम का पूरापूरा मूल्य मिले, यह व्यवस्था गांधी दर्शन में कहीं नहीं है. गांधीजी ने जब खादी का दर्शन दुनिया को दिया, वे चरखे के बारे में जानते नहीं थे. हिंद स्वराज पर अपने साक्षात्कार के दौरान उन्होंने यह स्वयं स्वीकारा था. उस समय तक खादी को ग्रामीण अर्थव्यवस्था के आधार के रूप में प्रस्तुत करने में कोई बड़ी आर्थिक समझ नहीं हो सकती. स्वयं गांधी जी ने इसका कोई दावा नहीं किया था. लेकिन गांधी की व्यापक लोकप्रियता के चलते इसका बड़े उद्योगों पर इसका असर पड़ना स्वाभाविक था. कालांतर में पूंजीपतियों के आग्रह या दबाव में ‘हिंद स्वराज’ के मूल कथ्य में कोई परिवर्तन न करनेवाले, पुस्तक के प्रथम संस्करण में आदमी को अपने हाथ का कताबुना कपड़ा पहनने का आग्रह करने वाले गांधी, 1931 में ‘भारतीय मिलों का कताबुना’ पहनने की अनुशंसा कर चुके थे. यानी खादी का स्थान स्वदेशी ले चुकी थी. स्वदेशी का मतलब है देश में बना हुआ. यह अपने आप में भावुक अवधारणा है. उसे बनाने के, बनाने का कारखाना लगाने के लिए किसका पैसा लगा है, तकनीक कैसी है, उसपर जोर नहीं देती. यानी स्वदेशी का समर्थन करते समय गांधीजी मशीनों की आलोचना के बारे में अपने तर्क को बहुत पीछे छोड़ चुके थे. यदि लंकाशायर का कोई पूंजीपति सस्ते श्रम की चाहत में भारत में कोई कारखाना, अत्याधुनिक श्रमविरोधी मशीनों के साथ लगाए तो उसका बुना कपड़ा स्वदेशी है. तथा गांधीजी का उससे विरोध नहीं था. इसलिए वे खादी की अपनी अवधारणा में संशोधन कर, स्वदेश निर्मित वस्तुओं के पक्ष में तर्क देने लग जाते हैं. भले ही लंकाशायर का वह पूंजीपति अपने देश के मुकाबले यहां के श्रमिकों को बहुत कम वेतन पर रख रहा हो. गांधी जी जीवन को धार्मिक नजरिये से देखते हैं. आर्थिक दृष्टिकोण उनके लिए अधिक महत्त्व नहीं रखता. जो पूंजीपति गांधीजी के आगेपीछे लगे थे, उन्हें इससे मतलब भी नहीं था. बल्कि प्रकारांतर में धार्मिक जड़ता उनके लिए मददगार ही थी.

गांधी बारबार धार्मिक आजादी की बात करते रहे. आर्थिक स्वावलंबन के लिए उन्होंने ग्राम स्वराज, खादी एवं ग्रामोद्योग का नारा दिया. वैसे भी उन दिनों शिक्षा और शहरों से कटे भारतीय गांवों के मशीनीकरण की संभावना भी नहीं थी. भीषण गरीबी के कारण लोगों का क्रयसामथ्र्य अत्यधिक कम था. उनमें निवेश करने से पूंजीपतियों को कोई तात्कालिक लाभ होनेवाला नहीं था. इसलिए इस बात को खूब उछाला गया. गांधी ब्रिटेन के सम्राट के बुलाने पर गए तो एक लंगोटी में थे. इसके लिए उनकी प्रशंसा भी की जाती है. बात है भी प्रशंसा की. उन्होंने कहा था कि वे भारत की जनता के प्रतिनिधि हैं. एक नेता को ऐसा ही होना चाहिए. ऐसे सुनने में भी अच्छा लगता है. लेकिन क्या इससे यह जाहिर नहीं होता कि इससे गरीबी का महिमा मंडन होता है. क्या इससे यह नहीं लगता कि कि गांधीजी ने गरीब भारत की अभावग्रस्तता को चुनौती मानने के बजाय उसको उसी रूप में स्वीकार कर लिया था. वैसे भी उनके ऐजेंडा में राजनीतिक आजादी प्रमुख थी. समाजार्थिक आजादी के सवालों को वे स्वातंत्र्योत्तर भारत में सुलझाना चाहते थे. इसलिए गांधीजी की वह घटना एक गरीब देश के स्वाभिमान का प्रतीक तो बन सकती है, लेकिन उसके माध्यम से गरीबी के महिमा मंडन का जो संदेश जाता है, उससे आगे चलकर नुकसान ही हुआ. प्रकारांतर में यह नामक एक और हथियार मिल गया. आशय है कि गांधी और गांधीवाद, मशीनीकरण को रोकने और त्याज्य बताने के बावजूद पूंजीवाद पर नकेल कसने में नाकाम रहे हैं. पूंजीवाद को नाथने के लिए गांधी ने ट्रस्टीशिप का विचार रखा था. ऊपर से देखने पर यह आदर्श विचार प्रतीत होता है. मगर व्यवहार में यह आर्थिक विभाजन को न्यायसम्मत मान देती है. वह दान की व्याख्या को जन्म देता है. जिसके आधार पर समाज में परजीवी वर्ग को फलनेफूलने का अवसर मिलता है. जिस ग्रामस्वराज को वे ग्रामीण परिवेश में फलतेफूलते देखना चाहते हैं, उसकी परिणति सामंतवाद में होती रही है. पूंजीवाद चूंकि लोकतंत्र का पक्ष लेता है, जिसमें उसका अपना हित भी है. जबकि सामंतवाद में पूंजीपतियों पर नियंत्रण केवल मनमानी और बलप्रयोग द्वारा होता था. इसलिए पूंजीवाद की सफलता के लिए सामंतवाद को पुराना, दकियानूसी शासन पद्धति वाला और लोकतंत्र विरोधी कहकर बदनाम करने का काम किया गया. बहरहाल सामंतवाद जिन कमजोरियों का शिकार था, उसका पतन स्वाभाविक था.

पूंजीवाद को नाथने की कोशिश गत दो सौ वर्षों में होती रही है. निश्चय ही इसका केंद्र यूरोप था. मगर उसकी धमक दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों तक सुनाई पड़ी थी. पूंजीवाद को नाथने के लिए साहचर्य, अराजकतावाद, श्रमिक संघवाद, संगठनवाद, सहजीवितावाद जैसे विचार आए. उन सभी की विशेषता थी कि वे श्रम को महत्त्व दिए जाने पर जोर देते थे. सभी का आग्रह था कि पूंजीस्वामी को पूंजी के आधार पर अतिरिक्त लाभ का अधिकारी बनाने से रोका जाए और आपसी व्यवहार में मौद्रिक विनिमय को न्यूनतम किया जाए. संक्षेप में ये सभी धनबल के स्थान पर श्रमबल को खड़ा कर देना चाहते थे. संगठन में ताकत है. पूंजीवाद के सुरसई आतंक पर केवल संगठित जनशक्ति रोक लगा सकती है, ऐसा इस वर्ग का विश्वास था. इनके बीच एक समानता यह भी है कि वे लोकतंत्र और व्यक्तिमात्र की इच्छाओं का समर्थन करते हैं. व्यक्ति और समाज से उनकी अपेक्षा होती है कि वे एकदूसरे की इच्छाओं का सम्मान करते हुए उपलब्ध संसाधनों के न्यायपूर्ण बंटवारे से सभी वर्गों के लिए काम करें. वे मानते हैं कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति की राय महत्त्वपूर्ण है. इसलिए निर्णय में सभी की साझेदारी होनी चाहिए. व्यक्ति की अपनी आवश्यकता भी होती है. इसके लिए उसको अपने अलावा दूसरों के उत्पाद पर भी निर्भर रहना पड़ता है. विडंबना यह है कि सुख, व्यक्तिगत आकांक्षाओं और मानवाधिकार को लेकर, समाजवाद के आधुनिक प्रकल्पों तथा पूंजीवाद में बहुत अंतर नहीं है. व्यक्ति कल्याण के जिस लक्ष्य को लेकर समाजवाद आगे बढ़ता है, पूंजीवाद भी उन्हीं के आधार पर अपना औचित्य सिद्ध करने में लगा रहता है. समाजवाद की भांति पूंजीवाद भी व्यक्तिस्वातंत्र्य एवं मानवाधिकार का बढ़चढ़कर गुणगान करता है, किंतु उसकी कमजोरी है कि वह इसको सस्थाओं के माध्यम से लागू करना चाहता है. संस्थाओं की जटिलता और नियमादि उनकी कार्यप्रणाली को जटिल बनाते हैं जिससे जनसाधारण के लिए संस्थाओं का लाभ उठा पाना बहुत कठिन होता है. इससे विशेषज्ञ संस्कृति को बढ़ावा मिलता है. उसके फलस्वरूप समाज में बौद्धिक आधार पर विभाजन को स्वीकृति मिलने लगती है. यही समाज के आर्थिक आधार पर विभाजन का बुनियादी आधार है, जिसे पूंजीवाद निहित स्वार्थ के लिए पोषितपल्लवित करता है.

पूंजीवाद में मनुष्य की नैतिक प्रेरणाओं को जगाने के लिए कोई कोई तंत्र नहीं होता. न ही वह इस तरह का कोई प्रयास करता है. इसके उलट पूंजीवाद सुखसुविधाओं के नाम पर ऐसे उपकरण और संसाधन बाजार में उतार देता है जो मनुष्य के भीतर अकेलेपन को संपूर्णता के साथ जी लेने का भ्रम पैदा करते हैं. इससे समाज में संवाद के अवसर घटते जाते हैं. परिणामस्वरूप विभिन्न इकाइयों के बीच संदेह और अविश्वास को बढ़ावा मिलता है. व्यक्ति के अकेलेपन को बांटने, उसकी भरपाई के नाम पर पूंजीवाद बहुत चतुराई से बाह्यः संस्थाओं को ले आता है. जिससे समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संदेह और अविश्वास स्थायी रूप लेने लगता है. इससे सामाजिक विक्षोभ पैदा होते हैं. उस समय वह मध्यस्थता का नाटक करते हुए ऐसे रेफरी की भूमिका में होता जिसका टीमों की हारजीत से कोई नाता नहीं होता. उसकी नजर अपने मुनाफे और प्रोत्साहनलाभ पर टिकी होती है. इसके बावजूद पूंजीवाद के समर्थक शांत नहीं बैठते. वे मनुष्य के अकेलेपन को बढ़ाने, समाज में अविश्वास और संदेह पैदा करने के लिए चोरीचोरी हर समय, हर कालखंड में काम करते रहते हैं. इसलिए कि अकेलेपन की अनुभूति और समाज से डरे हुए व्यक्ति को पूंजीवाद के चंगुल में फंसाना बहुत आसान होता है. उसे पूंजीवाद द्वारा खड़ी की गई संस्थाओं के मोहपाश में आसानी से फंसाया जा सकता है. पूंजीवाद के लिए मुनाफा ही मोक्ष है. उसकी हर बहस लाभ पर आकर दम तोड़ लेती है. स्वयं को वैज्ञानिक सोच और नवीतम ज्ञान का समर्थक बताने वाला, नवीनतम शोध एवं प्रौद्योगिकी के आधार पर अहर्निंश काम करने वाला पूंजीवाद, मुनाफे के लिए बुरी नजर से बचाने वाले ‘नजर सुरक्षा कवच’ तथा ‘शनियंत्र’ आदि बेचता है. पाखंड के कारोबार को तरहतरह से बढ़ावा देता है. मुनाफे के लिए उसे मौत को प्रायोजित करने का अवसर मिले वह उसके लिए भी सहर्ष तैयार रहता है.

इसी स्वार्थपरता के कारण पूंजीवाद की आलोचना उसके उभार के दिनों में ही होने लगी थी. इसके बावजूद वह विकासमान रहा. इसका कारण है कि पूंजीवाद ने समाज में मध्यवर्ग पैदा किया था. उससे पहले समाज में अमीर और गरीब का विभाजन था. उसकी विडंबना थी कि जो अमीर था, उसके पास जरूरत से इतना अधिक था, उसको बनाए रखना ही उसके लिए बड़ी चुनौती थी. दूसरी ओर गरीब था जिसके पास इतने अभाव थे कि जीवन को बचाए रखना बड़ी चुनौती होती थी. एक को सपनों की जरूरत इसलिए नहीं थी क्योंकि उसकी हर ख्वाइश तत्काल पूरी हो जाती थी. दूसरे के पास कोई सपना नहीं था. इसलिए कि घोर अभावों के बीच सपना देखने की उसकी हिम्मत ही नहीं होती थी. मामला सीधेसीधे ‘होने’ या ‘न होने’ का था, इसलिए उसे आसानी से नियतिबद्ध किया जाता था. लोगों के दिलों में यह बात बिठाई जा चुकी थी कि जो विशिष्ट तथा सुखसुविधा संपन्न वर्ग है, उसपर ईश्वर की विशेष अनुकंपा है. मध्यवर्ग ने व्यक्ति की खुशहाली को नियतिबद्ध मानने वाली धारणा पर प्रहार किया था. उसके पास सपने थे और संकल्प भी. ऊपर से खूबी यह कि वह अपनी सीमाओं के अतिक्रमण के लिए निरंतर प्रयत्नरत रहता था. मशीनीकरण और पूंजीवाद की सफलता में इस वर्ग का योगदान किसी से छिपा नहीं था. इसका उसे लाभ भी मिला था. इस वर्ग का बड़ा हिस्सा पूंजीवाद को कामयाब बनाने के लिए सतत प्रयत्नशील रहता था. मगर एक हिस्सा असंतोष का शिकार भी था. उसे हमेशा यह लगता था कि मात्र पूंजी और अपने निष्क्रिय योगदान के बल पर पूंजीपति जितना लाभ कमाता है, उसका उसे कोई अधिकार नहीं है. यह वर्ग लाभ में अपनी सम्मानजनक हिस्सेदारी चाहता था. इस वर्ग के असंतोष के कारण पश्चिम में अनेक पूंजीवादी आंदोलनों और विचारधाराओं का जन्म हुआ था. उन आंदोलनों और विचारधाराओं को पूंजीवाद उत्पादन व्यवस्था से जुड़े अन्य वर्गों का समर्थन भी प्राप्त हुआ.

क्रमश:

ओमप्रकाश कश्यप

पूंजी दि (कैपीटल) : संक्षिप्त विमर्श : अंतिम

सामान्य

28. उपनिवेशीकरण का आधुनिक सिद्धांत

पूंजी’ की रचना के समय पूंजीवादी शोषण की स्पष्ट छवि थी. उत्पादन व्यवसाय में और व्यवसाय शोषण में ढल चुका था. उत्पादन व्यवस्था पर पर पूंजीवादी एकाधिकार की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही थी. पूंजीपतियों की आपसी स्पर्धा के कारण श्रमिक शोषण के नएनए अध्याय खुल रहे थे. समाज में अमीरी और गरीबी के बीच की खाई निरंतर गहराती जा रही थी. मशीनों के आगमन के समय उनसे जो उम्मीदें बांधी गई थीं, वे टूटने लगी थीं. यद्यपि राजनीतिक वर्चस्व और साम्राज्यवादी विस्तार के लिए होने वाले युद्धों में कमी आई थी. मगर साम्राज्यवाद के नए प्रतीक के रूप में बड़ीबड़ी व्यावसायिक कंपनियां उभरती जा रही थीं. उनका एकमात्र कार्य आर्थिक रूप से पिछड़े देशों की परिस्थितियों का लाभ उठाकर, वहां के श्रमिकों एवं संसाधनों का दोहन कर अपने लिए भारी मुनाफा बटोरना था. कानून उसके समर्थन में था. वह इतना ताकतवर और पहुंचवाला था कि कानून को मनचाहा मोड़ दे सकता था. अपनी पूंजी के दम वह अपने स्वार्थानुकूल संवैधानिक व्यवस्थाएं भी करा सकता था. वह लोकतंत्र का नारा देकर व्यक्तिवाद को उकसाता था. मानवाधिकारों पर जोर देने का उसका उद्देश्य मात्र इतना था कि समाज में अमर्यादित और अविवेकी उपभोक्तावर्ग जन्म ले. कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि एक नए प्रकार का उपनिवेशवाद हवा में था.

पुस्तक के तेतीसवें अध्याय में मार्क्स नव्यउपनिवेशवाद की विशद् व्याख्या करता है. अध्याय का आरंभ वह निजी संपत्ति के दो भिन्न, किंतु परस्पर विरोधी स्वरूपों की चर्चा के साथ करता है. ये दोनों रूप में हैं

. उत्पादक के अपने श्रमकौशल द्वारा अर्जित.

. दूसरों के श्रम के शोषण के आधार पर अर्जित.

मार्क्स के अनुसार दूसरी स्थिति पहली का परिणाम है. संपत्ति की उपस्थिति व्यक्ति को और भी महत्त्वाकांक्षी बनाती है. उसके मन में दूसरों से आगे निकलने की होड़ पैदा करती है. हर पूंजीपति कम समय में अधिक से अधिक संपत्ति अर्जित कर लेना चाहता है. इसके लिए वह श्रमलागत को न्यूनतम कर, लाभानुपात को बढ़ाने का प्रयास करता है. श्रमशोषण के नए तरीकों और बाजारों की खोज करता है. स्थानीय संसाधनों का असीमित दोहन कर प्रकृति और पर्यावरण के लिए विकट समस्याएं खड़ी करता है. उन वस्तुओं के उत्पादन पर जोर देता है, जिनका वास्तविक जरूरतों से कोई संबंध न हो, फिर भी व्यक्ति को उनके अभाव की सतत अनुभूति होती रहे.

मार्क्स के अनुसार उपनिवेशों की स्थापना के बाद पूंजीपति का चरित्र उससे एकदम अलग रूप ले चुका था, जैसा कि वह घरेलू पूंजीवाद, जिसको वह ‘होमलेंड कैपीटलिज्म’ का नाम देता है, के समय था. इस बारे में एडवर्ड गिबन वेकफील्ड लिखता है

औपनिवेशिक पूंजी का अभिप्राय किसी वस्तु/उत्पाद से नहीं है, बल्कि व्यक्तियों के बीच वे सामाजिक संबंध है, जो वस्तुओं के माध्यम से आकार लेते हैं.’

आगे चलकर वह भूमि एवं मजदूरों संबंधों की विवेचना करता है. मार्क्स के अनुसार कोई भी समाज पूंजीवादी संबंधों को अनायास स्वीकार नहीं कर लेता. बल्कि अपनी परंपरा और परिस्थितियों के आधार पर, प्रारंभ में वह उनका जमकर विरोध करता है. किंतु एक नियति के रूप में पराजय ही उसके हाथ लगती है. इस तरह उसे अपने संसाधन पूंजीपतियों को सौंपने ही पड़ते हैं. औपनिवेशिक देशों में भूमि सामान्यतः सस्ती और फैली हुई होती है. इसलिए पूंजीपति वहां अपने लिए बेहतर अवसर देखते हैं. संसाधनों की विपुलता और सस्ता श्रम उन्हें वहां अपने उद्योग लगाने के लिए प्रेरित करता है, तो भी वहां के मजदूर अपने श्रम को बेचने के लिए उस तरह उत्साहित नहीं होते, जैसे कि वे उससे पहले तक करते आए थे. पूंजीवाद की यह विशेषता है कि वह उत्पादनव्यवस्था का सांस्थानिकीकरण करता है. श्रमिकों और शिल्पकारों द्वारा संचालित उत्पादन को कारखानों तक लाकर वह उनका पूंजीकरण कर देता है. इससे पहले से ही उत्पादन में लगे श्रमिक और कामगार बेदखल होते जाते हैं. उनमें से कुछ रोजगार के लिए कारखानों की शरण लेते हैं, तो बाकी बेरोजगार होकर जीविका के लिए अन्य क्षेत्रों में पलायन कर जाते हैं.

आगे मार्क्स एक स्वाभाविकसा प्रश्न उठाता हैµपूंजी और सर्वहारा का उद्गम कैसे हुआ. मार्क्स यहां, पूंजीवाद के उद्गम स्रोत को जानना चाहता है. प्रश्न के बाद वह स्वयं उसकी विवेचना भी करता जाता है. उसके अनुसार उत्पादन की प्राचीन सामाजिक व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति अपने श्रम के आधार पर वस्तुओं का अर्जन करता था. कालांतर में सामंतवाद ने दस्तक दी और दूसरे के श्रम पर आधारित जिंदगी जीने वाला एक परजीवी वर्ग समाज में पनपने लगा. इस वर्ग के पास मजदूरों के कठिन परिश्रम से कमाई कई बेशुमार धनसंपदा थी, लेकिन वह उसको उत्पादन में बदलने की कला से अनभिज्ञ था. शायद इसलिए वह विलासितामय रूप को, धनसंपदा के सर्वोत्तम प्रयोग और अपने वैभव प्रदर्शन के रूप में देखता था. धर्म, जाति, क्षेत्रीयता जैसे अनुत्पादक तत्व उसके सुरक्षा कवच होते थे. प्रौद्योगिकी के विकास के साथ सामंतों का एक वर्ग पूंजीपति के रूप में आकार लेता गया. तो मार्क्स के अनुसार इनकी(पूंजी और मजदूर) उत्पत्ति श्रमिकों के बंटवारे की उस घटना के साथ हुई जब उनका एक वर्ग पूंजी का मालिक बना और दूसरा वर्ग मात्र अपने श्रम का स्वामी बना रहा

यह श्रमिकों के पूंजी के स्वामी और श्रम के स्वामी में विभाजन की घटना से जुड़ा है, जिसके अंतर्गत श्रमिकों ने पूंजी के संचयन के प्रति निष्ठा दर्शाते हुए खुद को श्रम से अनिवार्यरूप से बेदखल कर दिया था.’

मार्क्स के अनुसार उपनिवेशों में भूमि के लिए होने वाला संघर्ष केवल पूंजीवाद की स्थापना तक सीमित नहीं रह जाता. उसकी शुरुआत छोटे किसानों और उद्यमों की बेदखली के साथ होती है. भूनिर्वासन की यह प्रक्रिया क्रमिक और क्षेत्रवार होती है. जहां यह प्रक्रिया अधूरी हो, वहां छोटे किसानों और कृषिव्यवसाय से जुड़े पूंजीपतियों के बीच संघर्ष चलता रहता है. देर तक चलने वाले इस संघर्ष में जीत अंततः पूंजीपतियों की ही होती है, लेकिन उन्हें शतप्रतिशत सफलता कभी नहीं मिल पाती. संघर्ष के विभिन्न चरणों में भूमि छोटे किसानों से हाथों से खिसककर धीरेधीरे पूंजीपतियों के हाथों में जाती ही रहती है. अपवादस्वरूप कई बार किसानमजदूरों का एक वर्ग, पूंजीवादी प्रलोभनों का शिकार होकर, पूंजीकरण की प्रक्रिया को आत्मसात कर लेता है, इससे उसका रवैया पूंजीवाद के प्रति सहयोगात्मक हो जाता है. लेकिन ऐसा हर जगह और हर समाज में संभव नहीं होता. उस अवस्था में पूंजीवादी वर्चस्व के विरुद्ध अपनी परंपरागत उत्पादन प्रविधियों को बचाए रखने का संघर्ष सतत चलता ही रहता है.

मार्क्स के अनुसार श्रम से स्वतःनिर्वासन की यह क्रिया पारंपरिक नियमों के अनुसार संपत्ति संचय की प्राचीन कामना के रूप में व्यक्त हुई थी. यही कारण है कि इसने उपनिवेशों में पूंजीवाद के विस्तार के लिए उत्प्रेरक का काम किया. श्रमिक आत्मनिर्वासन की भावना के साथ, कतिपय कृत्रिम उपायों से मुद्रा (मजदूरी अर्जन हेतु आर्थिकसामाजिक रूप से पूंजीपतियों पर निर्भर होते चले गए. श्रम को बेचने की उनकी आतुरता पूंजीवाद के लिए मददगार बनी. उनकी निर्भरता को स्थायी रूप देने के लिए पूंजीपतियों द्वारा जनसुविधाओं का व्यावसायिकीकरण किया गया. विकास और आधुनिक समाज के प्रतीक के रूप में ऐसी संस्थाओं का गठन किया जाने लगा जो परिवार के गठन की अनिवार्यता पर प्रहार करती थीं. समाज में पहले एकल और छोटे परिवारों के गठन पर बल दिया गया.नतीजा यह हुआ कि पूंजीपतियों को सस्ता श्रम उपलब्ध होने लगा, जो उनके लाभानुपात में भारी वृद्धि का कारण बना. फिर जैसेजैसे उत्पादन पूंजीवादी व्यवस्था के अधीन होता गया, समाज में श्रमिकों की संख्या भी बढ़ती गई. रातदिन चलती फैक्ट्रियां उनके लिए मुनाफा उगलती गईं. पूंजीवाद के विस्तार के साथ ऐसे आर्थिक उपनिवेशों की संख्या में भी विस्तार होता गया.

क्या कोई श्रमिक जितना अपनी मात्रभूमि के प्रति समर्पित है, उतना ही किसी उपनिवेश के प्रति भी हो सकता है. पूंजीवाद के औपनिवेशिक विस्तार की सरणियों को समझने के लिए इस अंतर को समझना बेहद जरूरी है. पिछले विश्लेषण से हमने जाना कि औपनिवेशिक विस्तार के लिए पूंजीपति संपदासंचयन की प्राचीन पद्धतियोंस्वभावों से लाभ उठाते आए हैं, हालांकि आगे चलकर इसी के आधार पर श्रमिकों को अविरत निर्वासन भी सहना पड़ा है. ये स्थितियां पूंजीवादी समाज की अनिवार्य परिणति हैं. अंत में वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि पूंजीपति की निजी समृद्धि व्यक्तिगत संपत्ति के हड़पने, पचा लेने के बाद ही संभव है.

पूंजी’ के पहले खंड में मार्क्स आरंभ से अंत तक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में श्रमशोषण की अनिवार्य स्थितियों का विश्लेषण करता है. तो भी यह नकारात्मक आख्यान नहीं है. पुस्तक में मार्क्स जहां शोषण की अनिवार्यता और पूंजीवादी दमनचक्र की सर्वव्यापकता का विवरण प्रस्तुत करता है, वहीं वह हमें इस बात का भी भरोसा दिलाता है कि पूंजीवादी उत्पीड़न से मुक्ति संभव है. श्रममुक्ति का गुलाब पूंजीवाद की राख से खिलेगा, ‘पूंजी’ का यह संदेश उसको आधुनिक समय का अर्थशास्त्रीय महाकाव्य सिद्ध करने को पर्याप्त है.

 

दि कैपीटल : खंड दो एवं तीन

उनीसवीं शताब्दी के छठे दशक में लंदन में मात्र तीन कमरों के छोटेसे मकान में अपने बड़े परिवार के साथ रहते हुए मार्क्स अपनी आजीविका के लिए ‘न्यू यार्क डेली ट्रिब्यून’ जैसे समाचारपत्रों के लिए लिखे गए साप्ताहिक लेखों से मिले पारिश्रमिक पर निर्भर था. कुछ आमदनी पुस्तकों की बिक्री तथा स्थानीय समाचारपत्रों द्वारा बड़े परिवार का बोझ उठाने और अपनी लगभग स्थायी बीमारी का इलाज कराने के लिए उतनी आमदनी पर्याप्त न थी. आड़े वक्त में मित्र ऐंगल्स ही काम आता था. विषम परिस्थितियों में भी वह राजनीतिक अर्थशास्त्र पर, धीरेधीरे मगर निरंतर काम करता आ रहा था. 1857 में उसने एक बड़ी पांडुलिपि तैयार की, जिसमें पूंजी, संपत्ति, श्रम, मजदूरी, राज्य, विदेश व्यापार तथा विश्वबाजार जैसी विषयों पर गंभीर काम किया गया था. 1860 में आखिर मार्क्स ने उस पुस्तक को प्रकाशन को भेजने से पहले दुबारा जांचापरखा. पुस्तक प्रकाशित होकर बाजार तक पहुंचने में सात वर्ष का लंबा समय और लगा. 1867 में ‘पूंजी’ का पहला खंड बाजार में आया. इस खंड में उसने श्रमसिद्धांत, अधिलाभ, मजदूरी, श्रमशोषण आदि अनेक विषयों पर अपने विचारों को प्रस्तुत किया था. पुस्तक का दूसरा और तीसरा खंड भी 1860 में ही तैयार हो चुका था. लेकिन उन्हें अंतिम रूप देने के लिए मार्क्स उन खंडों पर लगातार काम करता रहा. इस तरह दूसरे और तीसरे खंड का प्रकाशन क्रमशः 1885 और 1894 में संभव हो सका. उस समय तक कार्ल मार्क्स की मृत्यु हो चुकी थी. दोनों खंडों का संपादन उसके अभिन्न मित्र और सहयोगी फ्रैड्रिक ऐंगल्स ने किया था.

पूंजी’ का दूसरा खंड भी पहले खंड की तरह श्रममूल्य और पूंजीवादी शोषण की व्याख्या पर टिका है और एक तरह से पहले खंड का पूरक है. तीसरे खंड में मार्क्स ने पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था की प्रवृत्तियों को दर्शाया है. यह सात हिस्सों में बंटा है

1. अधिलाभ का लाभ में तथा अधिलाभ की दर का लाभ की दर में रूपांतरण.

2. लाभ का औसत लाभ में रूपांतरण.

3. लाभदर में गिरावट की प्रवृत्ति का नियम.

4. उपभोक्ता पूंजी तथा पूंजीधनराशि का वाणिज्यिक पूंजी एवं मुद्राव्यवहार पूंजी(सौदागर की पूंजी) में रूपांतरण.

5. लाभ का ब्याज एवं उद्यमलाभ तथा ब्याजयुक्त पूंजी में विभाजन.

6. अधिलाभ का भूमिकर में परिवर्तन.

7. राजस्व एवं उसके स्रोत.

तीसरे खंड में पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था के गहन अध्ययन के उपरांत मार्क्स इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि उत्पादनवृद्धि के दौर में जैसेजैसे मानवीय श्रम की आवश्यकता बढ़ती जाती है, वैसेवैसे लाभ की दर में गिरावट आने लगती है. प्रथम द्रष्टया यह तर्क मार्क्स के अन्य स्थापनाओं का विरोधी जान पड़ता है, जिसके आधार पर वह मशीनीकरण की आलोचना करता है. मगर यह तथ्य मशीनीकरण और बढ़ती स्पर्धा के दौर में यह तथ्य अनिवार्य परिणति के रूप में सामने आता है. मशीनीकरण के युग में मानवीय श्रम की अनिवार्यता का औचित्य क्या है? वे कौनसी स्थितियां हैं जहां प्रौद्योगिकीय उन्नति साथ नहीं दे पाती?

वस्तुतः मशीनों की अभिकल्पना इस उद्देश्य के निमित्त की जाती है कि वे उत्पादन में कमी लाएं. इससे उत्पादन में तेजी आती है. अतिरिक्त उत्पादन को खपाने के लिए पूंजीपति को नए बाजारों की जरूरत पड़ती है. संचार माध्यमों और प्रचार कीे नवीनतम तकनीक के माध्यम से कोई पूंजीपति अपने उत्पाद के पक्ष में माहौल बना सकता है. मगर कठिन स्पर्धा के दौर में इतनेभर से काम नहीं चलता. उत्पादक को अपने उत्पाद की विशेषताओं के साथ उपभोक्ता के करीब जाना पड़ता है. इस कार्य में मशीनों की भूमिका मात्र सहायक तक सिमट जाती है. इसलिए कि उपभोक्ता से अंतरंग संबंध बनाने, उसको अपने उत्पाद से जोड़े रखने के लिए विशेषरूप से प्रशिक्षित मानवीय श्रम की आवश्यकता पड़ती है. स्पर्धा के चलते उत्पादक का इस मद में खर्च लगातार बढ़ता ही जाता है. इस निष्कर्ष से मार्क्स और उसके अनुयायी मानते आए हैं कि पूंजीवाद एक दिन अपने ही बोझ से दबकर समाप्त हो जाएगा. हालांकि उसकी यह भविष्यवाणी अभी तक सच सिद्ध नहीं हुई है, लेकिन मार्क्स के समानताधारित समाज के सपने की स्थापना का औचित्य कम नहीं हो जाता.

 

ओमप्रकाश कश्यप

 

पूंजी (दि कैपीटल): संक्षिप्त विमर्श : चार

सामान्य

1. इतिहास का संकट, पूंजीवाद एवं पूंजीवादी समाज की व्युत्पत्ति

मार्क्स ने पूंजीवाद की समीक्षा ऐतिहासिक संदर्भों के साथ की है. हालांकि कुछ विद्वान इसे इतिहास की अर्थशास्त्रीय व्याख्या भी कहते हैं. मगर इनमें से कुछ भी कहा जाए, बात लगभग एक ही है. इतिहास के अर्थशास्त्रीय अध्ययन द्वारा मार्क्स अपने इस बहुख्यात सिद्धात पर पहुंचा था कि सामाजिक परिवर्तनों का मुख्य आधार उत्पादन के साधनों में परिवर्तन है. उत्पादनपद्धति में आए परिवर्तन से ही उससे जुड़े संबंधों में बदलाव आता है. अर्थ सामाजिक संबंधों का निर्माता और निर्धारक बन जाता है. वही अन्य परिवर्तनों को दिशा देता है. पुस्तक के छबीसवें अध्याय में वह प्राचीन समाजों में पूंजी संचयन के सिद्धांतों के गूढ़ रहस्यों की पड़ताल करता है. मार्क्स के अनुसार प्राचीन समाज यानी पूंजीवादी समाज के उद्भव से पहले पूंजीसंचयन केवल धनसंचयन तक सीमित था. दूसरे शब्दों में उस समय तक धन पूंजी का रूप नहीं ले पाया था. पूरा समाज एक असंगठितसहयोगाधारित समाज था. उत्पादन की बजाय उसका जीवन प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर करता था. शिकार आधारित भोजनव्यवस्था में देखा यह गया था कि कुछ व्यक्ति शिकार करने में निपुण हैं. उनका निशाना अचूक है. एक ही पत्थर में वे खूंखार जानवर को धराशायी कर सकते हैं. जरूरत पड़ने पर उससे स्वयं भिड़ सकते हैं. भारीभरकम शिकार को पीठ पर लादकर ठिकाने तक लेकर आ सकते हैं. कुछ ऐसे भी रहे होंगे, जिन्हें शिकार के नाम से ही डर लगता होगा. जिनका निशाना अचूक नहीं था. स्वाभाविक रूप से कबीले के लोग पहले व्यक्ति को ही नायक के रूप में स्वीकार कर सकते थे. दूसरों से उसको अपने लिए अधिक उपयोगी मान, उसकी बात भी मानते होंगे. कालांतर में ऐसे लोगों को समूह का नेतृत्व सौंपा जाने लगा. परिणाम यह हुआ कि मानवसमाज धीरेधीरे ताकतवर और कमजोर के रूप में बंटता चला गया. अपनी स्थिति का लाभ उठाते हुए ताकतवर लोगों ने संसाधनों को कब्जाना आरंभ कर दिया, परिणामस्वरूप दूसरे वर्ग के हाथों से संसाधन छिनते चले गए और वह पराश्रित होता गया.

मार्क्स के अनुसार आर्थिकसामाजिक परिवर्तन की आरंभिक प्रक्रिया महज धन की जमाखोरी तक सीमित नहीं थी, जिसने आगे चलकर पूंजीवादी संचयन और फिर पूंजीवादी समाज की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया. प्रकारांतर में पूरा समाज सर्वहारा और पूंजीपतिवर्ग में बंटता चला गया. वास्तव में वह समाज के कुल संसाधनों के चंद लोगों के हाथों में सिमटने जाने का परिणाम था, जिसके कारण समाज का बड़ा हिस्सा, जो मेहनती एवं कुशल था और अपने श्रमकौशल के बल पर सम्मानजनक जीवन जीने की योग्यता रखता था, वह संसाधनविहीन और दूसरों पर निर्भर होता चला गया. कालांतर में उस वर्ग की संख्या बढ़ती ही चली गई. एक दिन पूरा समाज दो हिस्सों में बंट गया. पहला वह जिसका समाज के संसाधनों पर कब्जा था, लेकिन उन संसाधनों का वह स्वयं कोई उपयोग नहीं करता था. दूसरा वह जो उन संसाधनों के दम पर जीविकोपार्जन करता था और बदले में पहले वर्ग को संसाधनों का कब्जाधारकस्वामी मानते हुए एक निश्चित राशि, अधिलाभ, लगान, कर आदि के रूप में प्रदान करता था. धनसंग्रह की प्राचीन पद्धति का रहस्य इस तथ्य में निहित था कि वह एक थोड़ेसे पूंजीवादियों से भरे सर्वहारा समाज के बजाय एक हिंसक एवं निर्दयी समाज से जन्मा था. गुलामों और दासों को उनके सामंत जमींदारों से मुक्त कराना, वास्तव में उनके घरों, जमीनों, उनके उत्पादन के संसाधनों और आजीविका के साधनों से भी दूर करना था. इतिहास का अर्थशास्त्रीय दृष्टि से अध्ययन करता हुआ मार्क्स इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि—

तथाकथित प्राचीन पूंजीसंचय और कुछ नहीं, बल्कि समाज के उत्पादक वर्ग को उत्पादन के संसाधनों से अलग कर देने की प्रक्रिया है.’

मार्क्स के निष्कर्ष पश्चिमी समाज की सामाजिकआर्थिक गतिविधियों के अध्ययन का निकष थे. उसने सोलहवीं शताब्दी से पहले के समाज को पूंजीवादी अवशेषों से रहित समाज स्वीकार किया था. उल्लेखनीय है कि यूरोप के इतिहास में वैज्ञानिक प्रबोधन की शुरुआत ही पंद्रहवीसोलहवीं शताब्दी से होती है. वैज्ञानिक चेतना के विकास का पहला उपयोग उत्पादन में मशीनीकरण की शुरुआत के साथ हुआ था. जिससे संचित धन को पूंजी में बदलने, उसका उपयोग और अधिक धन कमाने का प्रचलन हुआ. भारत और अन्य एशियाई देशों में यह प्रक्रिया काफी देर से करीब सतरहवीं शताब्दी से ही आरंभ हो पाई थी. सतरहवींअठारहवीं शताब्दी के बौद्धिक आंदोलनों के फलस्वरूप समाज में लोकतंत्र का आगमन हुआ. व्यक्तिस्वातंत्रय का नारा पूंजीवाद के विकास में सहायक सिद्ध हुआ, क्योंकि उसके बहाने वह समाज पर उपभोक्तावादी संस्कार थोपने में सफल सिद्ध हुआ.

22. कृषिआश्रित समूहों को भूसंपदा से बेदखल करना

पूंजी’ के सताइसवें अध्याय में मार्क्स पश्चिमी समाज में औद्योगिकीकरण के बाद आए बदलावों तथा उन स्थितियों पर विचार भी विचार करता है, जिनके कारण एक सामंती समाज पूंजीवादी समाज में परिवर्तित होता चला जाता है. मार्क्स के अनुसार पंद्रहवीं शताब्दी के अंतिम दो दशक यूरोप में पूंजीवाद के उद्भव का समय था. उससे पहले इंग्लेंड में जमींदारी प्रथा थी. सामंतों और जागीरदारों के माध्यम से राजशाही राजनीतिक कार्यव्यवहार देखती थी. उस समय लागू विधान के अनुसार राज्य की समस्त भूसंपदा उसके राजा के अधीन होती थी. उसके प्रबंधन तथा लगान वसूली के लिए वह जागीरदारों और सामंतों की नियुक्ति करता था, जो जनता के साथ निरंकुश व्यवहार करते थे. विज्ञान ने परंपरागत ज्ञान के साथसाथ प्राचीनकाल से चली आ रही अर्थव्यवस्था को भी चुनौती दी थी. परिणामस्वरूप नई प्रौद्योगिकी का जन्म हुआ और उत्पादन के स्रोत अपढ़कुपढ़ सामंतों के हाथों से फिसलकर पढ़ेलिखे पेशेवरों और तकनीशियनों के हाथों में आ गए.

उल्लेखनीय है कि सामंती समाज के पतन के चिह्न चैदहवीं शताब्दी के अंतिम दशक में ही दिखाई पड़ने लगे थे, जब किसानों से भूसंबंधी अधिकार छीने जा रहे थे. उस समाज में अधिकांश वे कृषक थे, जो जमींदारों और सामंतों के कब्जेवाली भूमि पर खेती करते थे. कठोर परिश्रम के बावजूद उन्हें नाममात्र की ही आमदनी थी. अपनी आजीविका के लिए उन्हें सामंतोंजागीरदारों की दया पर निर्भर रहना पड़ता था. उनमें कृषकों के अलावा बड़ी संख्या में वे मजदूर भी शामिल थे, जो खेती तथा दूसरे क्षेत्रों में मेहनतमजदूरी करके अपना जीवनयापन करते थे. जिन सामंतोंजमींदारों के लिए वे परिश्रम करते थे, वही उन्हें रहने के लिए छोटे झोपड़ीनुमा घर और जमीन का एक टुकड़ा दे देते थे. उस जमीन से अपने परिवार के भरणपोषण के लिए अन्न उपजा सकते थे. इसके अलावा कुछ सार्वजनिक जमीन भी होती थी, जिसपर वे अपने पशु चराते तथा लकड़ी, चारे और्र इंधनसंबंधी जरूरतें पूरी करते थे. कुल मिलाकर उन मजदूरों की हालत बंधुआ मजदूरों जैसी थी.

पंद्रहवीं शताब्दी के पश्चात हालात बदले. जमींदारों और सामंतों ने किसानों को भूमि से बेदखल करना प्रारंभ कर दिया. मजदूरोंकिसानों ने जो भूमि वर्षों की मेहनत के बाद, पसीना बहाकर कृषि के योग्य बनाई थी, वह भूसामंतों के कब्जे में जाने लगी. जमीन को संपदा मान लिया गया. भाड़े के लठैतों का डर दिखाकर किसानों को ऊबड़खाबड़ और बंजर जमीन की ओर खदेड़ा जाने लगा. वह भूमि जिसपर वे पीढ़ियों से खेती करते आए थे, जिसको उन्होंने वर्षों के कठिन परिश्रम के बाद तैयार किया था, समाज के ताकतवर वर्ग की निजी संपत्ति में ढलने लगी. उल्लेखनीय है कि कपड़ा उद्योग के विकास के बाद इस वर्ग के पास ऊन और कपास की बिक्री से बेशुमार दौलत जमा हुई थी, जिससे उस वर्ग की महत्त्वाकांक्षाएं सातवें आसमान पर थीं. मार्क्स के अनुसार किसानों को बेदखल करने का दूसरा मुख्य कारण वे मशीनें थीं, जिन्होंने सबसे पहले कपड़ा उद्योग में दस्तक दी थी. पूंजीपतियों के पक्ष में अपनी उपयोगिता सिद्ध करने के उपरांत वे अन्य उद्योगों के साथसाथ, कृषिक्षेत्र में भी अपनी उपस्थिति दर्शाने लगी थीं. मशीनों का आविष्कार हालांकि मनुष्य को कठोर परिश्रम से मुक्ति दिलाने के नाम पर किया गया था, मगर अनुभव में वे मनुष्य को ही काम से बेदखल करने में लगी थीं. कपड़ा उद्योग में वे यह काम कर चुकी थीं. लाखों बुनकर, रंगरेज, कपास ओटने वाली औरतें, मशीनों के आगमन के बाद बेरोजगार हो चुकी थीं.

अन्य क्षेत्रों की भांति कृषिकर्म भी उनके हमले से अछूता न था. जुताईबुबाईगहाई की भारीभरकम मशीनों ने कम मजदूरों द्वारा बड़े कृषि फार्मों पर खेती करना आसान कर दिया था. चूंकि यूरोप का कपड़ा उन दिनों शीर्ष पर था, इसलिए कपास आदि कृषि उपजों की मांग बढ़ी हुई थी. इसलिए भूसामंतों ने अपने खेतों को बड़े कृषिफार्मों में बदलना आरंभ कर दिया था. परिणामस्वरूप छोटे किसान अपने खेतों से बेदखल किए जाने लगे. सोलहवीं शताब्दी के अंत तक कपड़ा उद्योग के विकास के साथ ऊन की मांग में भी लगातार वृद्धि हो रही थी. ऊन की खेती के लिए भेड़ों के बड़ेबड़े बाड़े बनाए जा रहे थे. उनके चरागाह के लिए किसानों से जमीन छीनी जा रही थी. उनके झोपड़ों को उजाड़कर मिट्टी में मिला दिया गया. जमीन की आवश्यकता तेजी से बन रहे कारखानों के लिए भी थी. इसलिए कस्बों और गांवों में कृषियोग्य भूमि को कारखानों के नाम पर हड़पा जा रहा था. कारखानों, ऊनउत्पादक केंद्रों यहां तक कि भेड़ चराने के लिए भी मानवश्रम की आवश्यकता थी. मगर पहले वे संसाधनों के स्वामी की तरह काम करते थे, उनके शिल्प का सम्मान किया जाता था, मगर अब उन्हें समाज में तेजी से उभरते नवसामंतवर्ग के कारखानों में, उसके अधीन कार्य करना पड़ता था.

सतरहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक भूसामंत अपनी स्थिति को काफी सुदृढ़ कर चुके थे. उन्हें धार्मिक और राजनीतिक शक्तियों का भी पूरा समर्थन प्राप्त था. हाथों से जमीन और रोजगार छिन जाने के कारण समाज में बेरोजगारों की संख्या बढ़ी थी. इसलिए भूसामंत जो आगे चलकर पूंजीपतिवर्ग में ढलने वाले थे, के पास पूरा अवसर था कि अपनी ताकत और स्थिति का लाभ उठाकर श्रमिकों से मनमानी दरों पर काम ले सकें. यही नहीं, श्रमिकोंकामगारों के शोषण का दौर भी आरंभ हो चुका था. मानवश्रम की जरूरत को पूरा करने के लिए बड़ेबड़े जमींदार और भूसामंत कृषिफार्मों और ऊन के कारखानों के नाम पर बड़ेबड़े बाड़े बनाने लगे थे. उन बाड़ों में सिर्फ पशुओं को ही नहीं, मजदूरों और कामगारों को भी कैद करके रखा जाता था. बाड़े में कैद लोगों में से अधिकांश भूसामंतों और जमींदारों के दास होते थे. जिनकी पशुओं की भांति ही खरीदफरोख्त की जाती थी.

मजदूरों का पूरा का पूरा परिवार उन बाड़ों में काम करता था. यहां तक कि छोटे बच्चों को भी बचपन से ही काम पर जोत दिया जाता था. मजदूरी के रूप में उन्हें सिर्फ पेट भरने लायक रोटी और तन ढकने को कपड़ा दिया जाता था. रहने के लिए ठिकाना, वह भी इसलिए ताकि पतिपत्नी मिलकर मजदूरों और गुलामों की नई पीढ़ी पैदा कर सकें. भूसामंतों, जमींदारों की आमदनी बढ़ने के साथ ही उनमें विलासिता के लक्षण भी पैदा होने लगे थे. किसानों से छीनी गई जमीनों, मगर खाली पड़े कुछ मैदानों को अरण्य क्षेत्र घोषित करने की प्रथा जोर पकड़ चुकी थी. उन अरण्यों का उपयोग हिरन के आखेट के लिए किया जाता. उल्लेखनीय है कि कृषियोग्य जमीन को आखेटस्थलों में बदल जाने का दुष्परिणाम जर्मनी में भीषण अकाल के रूप में देखने को मिला था. बावजूद इसके सरकार भूसामंतों के पक्ष में थी.

अठारहवीं शताब्दी में ब्रिटिश संदद में एक बिल पेश किया गया, जिसके द्वारा भूकब्जाधारकों को उसके कानूनी मालिक का रूप दे दिया गया. अब वे अपने कब्जे वाली जमीन का उपयोग निजी संपत्ति के रूप में करने को स्वतंत्र थे. इससे भूस्वामियों को बेरोजगार श्रमिकों के साथ मनमानी करने, उनसे अपनी शर्तों पर काम लेने का अधिकार मिल गया. कृषियोग्य भूमि के छिन जाने से लोग मजदूरी की तलाश में भटकने लगे. दूसरी ओर भूसामंतों, जमींदारों ने अपने कब्जेवाले विशाल कृषि मैदानों में मशीनों के सहारे खेती करना प्रारंभ कर दिया. खेती एक उद्योग में बदलने लगी. भूवंचित किसानों के पास अपनी आजीविका के लिए, सिवाय मजदूरी पर काम करने के और कोई चारा न था. यह एक सर्वहारा वर्ग था, जो रोजीरोटी की तलाश में कहीं तक जाने को विवश था. इन्हीं भूसामंतों ने अतिरिक्त पूंजी के दम पर कारखानों और उद्योगों की स्थापना की. आम जरूरत का वस्तुएं जिन्हें पहले हस्तकौशल से बनाया जाता था और जिनके द्वारा हजारोंलाखों लोगों को रोजगार मिलता था, वे मशीनों द्वारा बनने लगीं. जिससे उन उद्योगधंधों में लगे कारीगर बेरोजगारी का शिकार बनने लगे. विवश होकर वे भी नौकरी के लिए कारखानों और फैक्ट्रियों में भटकने लगे. उनपर नियंत्रण रखने के लिए कानून बनाए गए. पूंजीपतियों के समर्थन पर बनी सरकारें, अनुशासन और व्यवस्था के नाम पर मजदूरों और कामगारों के मौलिक अधिकार, जीविका के अधिकार के हनन में—पूंजीपतियों का साथ दे रही थीं.

23. भू-अधिग्रहण के विरुद्ध खूनी विद्रोह: बुर्जुआ वर्ग का उदय

भूमि छिन जाने के कारण समाज का बड़ा वर्ग बेरोजगारी का शिकार बना था. हजारों एकड़ जमीन जिसपर छोटे किसानमजदूर अपने पसीने से अन्न उपजाते थे, भूसामंतों और जमींदारों की संपत्ति बन चुकी थी. उन दिनों के सभी कानून भूसामंतों और जमींदारों के पक्ष में थे. यूरोप के जिन देशों में सरकार का चयन निर्वाचन द्वारा होता था. वहां एक प्रकार का कुलीनतंत्र था. सरकार के चुनाव में वही लोग चुनाव ले सकते थे, जिनके पास न्यूनतम वांछित क्षेत्रफल की कृषियोग्य जमीन हो. उससे पहले लोग या तो खेती पर निर्भर थे, अथवा आम उपयोग की उन वस्तुओं का निर्माण करते थे, जिनकी स्थानीय लोगों मेें खपत हो. उत्पादन लाभकेंद्रित न होकर, आवश्यकताकेंद्रित था. समाज में कारीगरोंशिल्पकारों को पूरा सम्मान मिलता था. बावजूद इसके, पारस्परिक आवश्यकताओं पर आधारित वह प्रणाली मशीनीकरण की मार झेलने में असमर्थ सिद्ध हो रही थी. मशीनों ने किसान और कामगार दोनों को बेरोजगार किया था. प्रौद्योगिकीय विकास के साथ ही समाज में विशिष्ट तकनीक क्षमता संपन्न दक्ष कामगारों की मांग भी बढ़ती जा रही थी. इसके लिए नए शिक्षासदन और प्रशिक्षण केंद्र खोले जा रहे थे. प्रशिक्षणप्राप्त कामगारों को अपेक्षाकृत अच्छे वेतन पर रखा जाता था. वे पूंजीपतिप्रबंधन के अपेक्षाकृत निकटवर्ती माने जाते थे. इससे श्रमिकों के बीच विषमता की खाई लगातार फैलती जा रही थी.

इसी समय को मार्क्स ने बुर्जुआ वर्ग के उद्भव का काल माना है. वह सामंतवाद और पूंजीवाद का संक्रमणकाल था. आरंभ में पूंजीवाद इतना विकृत भी नहीं हुआ था कि दूसरे के परिश्रम को अपनी प्रगति का आधार बनाया जा सके. न उद्योगों का उतना विकास हो पाया था कि उसमें सर्वहारा वर्ग के सभी बेरोजगारों को खपाया जा सके. न ही किसी एक की जमीन पर कब्जा जमाकर उसको भिखारी बना देने की रीतिनीति चलती थी. सोलहवीं शताब्दी तक यूरोपीय समाज तेजी से पूंजीवादी समाज में ढलने लगा था. बावजूद इसके उसपर परंपरा का पूरा दबाव था. यही वह कारण है जिससे सतरहवीं शताब्दी के आरंभ में ऐसे बहुत से नियम बनाए गए, जिनसे नागरिकों के अधिकारों को कानूनी संरक्षण दिया जा सके. लेकिन वे सभी कानून समाज के संपन्न और शक्तिशाली वर्ग के हित में थे. वही श्रमशोषण का मुख्य आधार थे. तो भी दासप्रथा के विरुद्ध सोलहवीं शताब्दी से ही आवाजें उठने लगी थीं. स्वयं दासों में भी अपने हालात को लेकर बेचैनी थी. वे आजाद होना चाहते थे. उस समय तक लोकप्रिय हो चुका मानवतावादी चिंतन और उससे जुड़े दार्शनिकविचारक और लेखक उनकी मांगों का समर्थन कर रहे थे. यूरोप के कई देशों में दासप्रथा पर कानूनी प्रतिबंध लगा दिया गया था. किसी भी व्यक्ति को बेगार और गुलामी के लिए बाध्य करना कानूनी अपराध था. कुछ देशों में तो दासता के लिए बाध्य करने पर मृत्युदंड का भी प्रावधान था.

समाज में अनुशासनसंबंधी नियम कड़े थे. कहींकहीं तो उनसे निरंकुशता की झलक भी मिलती थी. थाॅमस मूर के हवाले से मार्क्स ने बताया है कि सोलहवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में ही केवल चोरी के आरोप में लगभग 72, 000 नागरिकों को मृत्युदंड दिया गया था. नागरिक अधिकारांे के संरक्षण की पर्याप्त व्यवस्था न होने के कारण उनमें कुछ निर्दोष भी दंडित हुए होंगे. इसलिए कानूनों का विरोध होना स्वाभाविक था. परिणाम यह हुआ कि लोग रोजगार के वैकल्पिक रास्तों की तलाश करने लगे. निश्चित ही उन दिनों तेजी से बढ़ते उद्योग लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने का सर्वश्रेष्ठ क्षेत्र थे. लोग उनके माध्यम से सामंतवादी अत्याचारों से मुक्ति का सपना देख रहे थे. कारखानों का प्रबंधन पूंजीवादी नियमों के अनुसार किया जाता था. उनके लिए मजदूर का श्रम महज एक कामोडिटी, उपभोक्ता वस्तु जितना था, जिसको बाजार में बोली लगाकर कम से कम कीमत पर खरीदा जा सकता था—बिना यह सोचे कि मजदूर भी एक जैविक इकाई है. उसकी भी अपनी जरूरतें और सपने हो सकते हैं. कालांतर में जैसेजैसे मशीनीकरण का विस्तार हुआ, पूंजीवाद अपने पंजे फैलाता गया, फिर तो जहांजहां वह पहुंचा, मानवीय श्रम को उपभोक्ता वस्तु समझने की प्रथा भी वहांवहां फैलती गई. पूंजीवादी विस्तार के साथ सर्वहारा वर्ग और उसकी समस्याएं भी विस्तार लेती र्गइं. इसके साथ ही पूंजीवाद के प्रति आक्रोश भी परवान चढ़ता गया. इस जनाक्रोश को हवा देने में दार्शनिकों और बुद्धिजीवियों का भी पूरापूरा हाथ था.

24. पूंजीपति किसान की व्युत्पत्ति

पूंजीवादी व्यवस्था के सच को बेनकाब करने के लिए ‘पूंजी’ में मार्क्स एक ही प्रश्न को अनेक रूपों में जगहजगह उठाता है. उनतीसवें अध्याय में यह प्रश्न एक बार पुनः दोहराया गया है. वह पूछता है कि आखिर पूंजीवाद आया कहां से? इसका मूल उद्गम कहां है? किस प्रकार यह पूरी दुनिया में फैलने में कामयाब हुआ? वे कौनसी शक्तियां थीं, जो पूंजीवाद को अपने हितानुकूल मानकर उसको बचाए रखने का षड्यंत्र रचती थीं? अपने ही प्रश्नों पर विचार करते हुए मार्क्स इस परिणाम पर पहुंचा था कि ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो पूंजीपति का विकास वही घटना है, जब समाज में सर्वहारा वर्ग का जन्म हुआ था. दूसरे शब्दों में पूंजीपति और सर्वहारा दोनों का उद्गमकाल एक ही है. उसके अनुसार मनुष्यता के इतिहास में पूंजीवाद और सर्वहारा वर्ग का उद्गम वास्तव में इतिहास का वह हिस्सा है, जब मनुष्य में पहलेपहले धनसंग्रह की प्रवृत्ति का विकास हुआ. कालांतर में इसी से धन को पूंजी की भांति उपयोग करने और उसका पूर्ण आर्थिक लाभ उठाने की परंपरा को जन्म दिया.

न्यूटन का तीसरा नियम है कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया साथसाथ और समान बलयुक्त होती है. पूंजीपति वर्ग के उदय के साथ सर्वहारा वर्ग का उद्भव भी ऐसी ही ऐतिहासिक और स्वाभाविक घटना थी. सर्वहारा वर्ग का विकास स्पष्टतः पूंजीवाद के विकास की परिणति था. उन दोनों के बीच स्वाभाविक द्वंद्वात्मकता थी, तो भी वे एकदूसरे के विकास को गति देने का उत्तरदायित्व निभा रहे थे. उनमें से पूंजीपतिवर्ग अपनी ताकत और पहुंच के बल पर पूरी दुनिया पर छा जाने का सपना देख रहा था. दूसरा करीबकरीब विपन्न और साधनविहीन सर्वहारा था. उसकी ताकत उसके संख्याबल में निहित थी, किंतु अन्यान्य कारणों से कई खेमों में बंटे होने के कारण वह किसी निर्णायक स्थिति में नहीं था. हालांकि उसकी भी वैश्विक व्याप्ति थी. मजदूर संगठन थे, मगर आपस में बंटे हुए. मार्क्स के अनुसार पूंजीवाद का उदय किसानों और मजदूरों को उनकी जमीनों से बेदखल करने की घटना से जुड़ा था. पंूजीपतियों का एक वर्ग ऐसा भी था जो मजदूरों और किसानों के बल पर खेती करने का सपना देख रहा था. अवसर का लाभ उठाते हुए उन्होंने उत्पादन प्रणाली का आमूल मशीनीकरण किया. पूंजी जमा की और उसके दम पर छोटे किसानों को उजाड़ना आरंभ कर दिया. उजड़े हुए जमीन से बेदखल लोग भूसामंतों, पूंजीपति किसानों के अधीन कार्य करने और उत्पीड़न सहने को विवश थे.

पूंजीपति किसानों और सर्वहारा वर्ग के साथ एक और वर्ग भी बड़ी तेजी से पनप रहा था, जो था तो सर्वहारा वर्ग का हिस्सा, मगर अपने बुद्धिबल के हिसाब से वह पूंजीपति वर्ग के हितों को प्रभावित करने में सक्षम था. यह स्थिति उसने आधुनिक शिक्षा और तकनीकी कौशल के बल पर अर्जित की थी. मशीनीकरण के दौरान विशिष्ट प्रशीक्षणयुक्त कार्मिकों की मांग बढ़ने पर इस वर्ग को आर्थिक लाभ भी पहुंचा था. पूंजीवाद के आगमन के पश्चात नवधनाढ्यों की श्रेणी में आए इस वर्ग को मार्क्स ने ‘बुर्जुआ’ वर्ग कहा है. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के बीच, देखा जाए तो उसकी भूमिका कैटलिस्ट के समान थी. ‘पूंजीपतियों’ के साथ इस वर्ग के रिश्ते सहयोग और विरोध के थे. निहित स्वार्थों के लिए यह वर्ग कभी श्रमिकों के खेमे में जाकर उनसे अंतरंगता दर्शाता, उन्हें अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने को उकसाता, तो कभी पूंजीपतियों का हितैषी बनकर श्रमिकों के हितों की बलि लेने से भी नहीं हिचकिचाता था.

चूंकि पूंजीपति और सर्वहारा एक ही सामाजिक प्रक्रिया से उद्भूत थे, अतएव जिस सामाजिक प्रक्रिया द्वारा सर्वहारावर्ग का जन्म हुआ था, उसी ने नए किसानों के लिए भी नियम बनाए थे. उनमें से एक नियम यह भी था कि भूसामंत अथवा पूंजीपति किसान अपने कृषिक्षेत्र के प्रबंधन का काम देख सकता था. वहां न्यूनतम मजदूरी के आधार पर नौकर रख सकता था. कालांतर में मजदूरी की दरों में गिरावट लगातार बनी रही, जिसका एक परिणाम मुद्रास्फीति के रूप में सामने आया, जो मजदूरी की दरों में अतिरिक्त गिरावट का कारण बना. उल्लेखनीय है कि अपनी स्थिति का अनुचित लाभ उठाते हुए पूंजीपति किसान मजदूरी की गणना मुद्रा की पुरानी दरों के आधार पर करता था. जिससे मजदूरों की वास्तविक आय काफी कम हो जाती थी. मजदूरी की दरों में आई भारी गिरावट और जमींदारों, भूसामंतों को दिए जाने वाले लगान में उत्तरोत्तर कमी का सीधा लाभ पूंजीपतिकिसानों को पहुंचा था. मार्क्स ने उदाहरण देकर इस स्थिति को स्पष्ट करने का पूरापूरा प्रयास किया है, जिसके परिणामस्वरूप परंपरागत जमींदारों और भूसामंतों के स्थान पर उन किसानों का वर्चस्व लगातार बढ़ता जा रहा था, जो पूंजीवादी सिद्धांतों के अनुसार कृषिकर्म को वरीयता देते थे. यह वर्ग एक ओर जहां मजदूरों का शोषण करता था, वहीं सघन खेती को प्रोत्साहन के सरकार से मिलने वाली सुविधाओं का भी लाभ उठाता था.

25. कृषि-क्रांति का उद्योग-जगत पर प्रभाव

पूंजी’ के तीसवें अध्याय में मार्क्स कृषिउत्पादन में मशीनों के आगमन के बाद आई क्रांति और उसके प्रभावों की विवेचना करता है. वह दर्शाता है कि मशीनीकरण के बाद पूंजीपति वर्ग न केवल उत्पादन क्षेत्र पर, बल्कि अर्थव्यवस्था के प्रत्येक प्रत्येक क्षेत्र पर काबिज हो चुका था. यहां तक कि परंपरागत कृषिकर्म भी उसके आक्रमण से अछूता नहीं था. वह लिखता है कि—सतत एवं सुव्यवस्थित क्रम में कृषकसमूहों को उनकी कृषिभूमि से बेदखल किए जाने से पूरे यूरोप में बेरोजगारी बढ़ी थी. रिक्त कराई गई भूमि का उपयोग पूंजीवादी ढंग से खेती किए जाने अथवा कारखाने स्थापित करने के लिए होता था. यद्यपि नए कारखानों के लिए मजदूरोंकामगारों की आवश्यकता पड़ती थी. तो भी मजदूरों के हिस्से का अधिकांश कार्य मशीनों द्वारा निपटा दिए जाने के बाद कुल रोजगार अवसरों में कमी आई थी. बेरोजगारों की संख्या उन कारखानों में रोजगार प्राप्त श्रमिकों की संख्या से कहीं अधिक थी. सर्वहारावर्ग की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही थी. मार्क्स आगे लिखता है कि खेती करने वाले किसानों और मजदूरों को जमीन से बेदखल किए जाने के कारण बाजार में उपलब्ध श्रमशक्ति में कई गुना वृद्धि की थी. बेरोजगार हुए वे सभी श्रमिक आजीविका के लिए काम की तलाश में थे.

चूंकि बड़े फार्महाउसों में कृषिकार्य का मशीनीकरण हो चुका था, इसलिए बेदखल किए गए किसानों को वहां रोजगार मिलने की संभावना अत्यंत क्षीण थी. उनके पास सिवाय कारखानों और फैक्ट्रियों में मेहनतमजदूरी करने के लिए खुद को जीवित रखने का और कोई रास्ता न था. जो किसान अपना पसीना बहाकर खेतों में अपनी जरूरत का अन्न उपजा लेते थे, जो उससे पहले तक पूरे समाज का पेट भरते आए थे, अब उन्हें अपना पेट भरने के लिए दूसरों के आगे गिड़गिड़ाना पड़ रहा था. उनका नया अन्नदाता वह पूंजीपतिवर्ग था, जिसने उनसे उनके खेतों को हड़पकर उनमें बड़ीबड़ी मशीनें खड़ी कर दी थीं. उन्हीं के संसाधनों का दोहन करता हुआ वह तेजी से पूंजी बना रहा था. यही नहीं, अपनी आर्थिक हैसियत और श्रमिकों की मजबूरी का लाभ उठाते हुए वह उनका जमकर शोषण भी करता था.

मार्क्स के अनुसार कृषिक्षेत्र से भारी मात्रा में मजदूरों के बेदखल किए जाने से घरेलू बाजार में वृद्धि हुई थी. इसलिए कि जो किसानमजदूर अपनी जरूरत की वस्तुएं अपने खेतों में उगा लिया करते थे, अब उन्हें वे बाजार से खरीदनी पड़ती थीं. इस तरह जो किसान और खेतिहर मजदूर पहले दूसरों का पेट भरते थे, वे अब अपना पेट भरने के लिए कारखानों में बनाए जा रहे, उत्पादों पर निर्भर हो चले थे. इससे बाजार का विस्तार हुआ था. इसका आशय ही था, पूंजीपतियों के लिए अतिरिक्त मुनाफा, बाजार का उत्तरोत्तर फैलाव और पूंजीवाद का निरंतर विस्तार.

26. औद्योगिक पूंजीवाद की उत्पत्ति

मार्क्स के अनुसार पूंजीवाद का विस्तार एक ऐतिहासिक परिघटना थी. ‘पूंजी’ के अध्यायों में वह एक के बाद एक उन स्थितियों और परिवर्तनों का क्रमानुसार विश्लेषण करता है, जिनसे गुजरते हुए एक सरल समाज प्रकारांतर में औद्योगिक पूंजीवाद का शिकार हुआ और जिसके कारण समानताआधारित अर्थव्यवस्था चंद लोगों के वर्चस्व वाली अर्थव्यवस्था में बदलती जा रही थी. मार्क्स स्पष्ट करता है कि औद्योगिक पूंजीवाद का गुलाब, जमींदारी प्रथा की राख पर खिला था. बेलगाम मुनाफाखोरी के लिए जमीन उन मेहनतकश किसानों से हड़पी गई थी, जो पीढ़ियों से उसपर खेती करते आए थे. जमीन के साथ उनके भावनात्मक और बेहद करीबी संबंध थे. सामंतवादी शोषण और उत्पीड़न की विषम परिस्थितियों के बीच जो अपने जीवन को जैसेतैसे बचाए हुए थे. अपने परंपरागत उद्यमों से बेदखल हुए वे किसानमजदूरशिल्पकार जीवित रहने के लिए भारी संघर्ष से गुजर रहे थे. उनके पास बहुत कम विकल्प थे. अधिकांश लोगों ने पूंजीवादी उद्यमों की शरण ली थी. उनमें मजदूरी कर वे अपना जीवनयापन करने लगे. उनमें से कुछ ने जो व्यवहारकुशल और व्यावसायिक दृष्टि रखते थे, मशीनीकरण की शरण ली. उनमें से कुछ को सफलता भी मिली. लगातार मुनाफा कमाते हुए वे स्वयं को छोटे उद्यमियों की श्रेणी में स्थापित करने में सफल सिद्ध हुए. लेकिन ये सब संसाधनों की कमी का शिकार थे और अपनीअपनी सरकार से संरक्षण की आस लगाए हुए थे.

जमेजमाए उद्योगपति बाजार पर एकाधिकार चाहते थे. उनके पास संसाधनों की कमी न थी. अपने उद्योगों में वे बेहतर तकनीक का उपयोग कर सकते थे. उत्पादों के लिए नए बाजारों की खोज का उन्हें लंबा अनुभव था. किंतु अपने ही जैसे पूंजीपतियों से कड़ी स्पर्धा तथा बाजार पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए उन्हें भारी मात्रा में श्रमशक्ति की आवश्यकता थी. समस्या के समाधान के लिए पूंजीपतियों ने श्रमिकों को काबू में रखने के लिए दीघसूत्री योजना पर काम करना आरंभ कर दिया. यह योजना राजनीतिक सत्ता के साथ गठजोड़ पर टिकी थी. सरकार पर अपने दबदबे के कारण वे मनमाने कानून बनवाने में भी सक्षम थे. अठारहवीं शताब्दी में ब्रिटिश सरकार द्वारा आरंभ की गई राष्ट्रीय ऋणकोश, कराधान जैसी अनेक नई व्यवस्थाएं, पूंजीपतियों की योजना के अनुसार थीं, इन सबने येनकेनप्रकारेण पूंजीवाद को मजबूत करने का ही काम किया था. इससे छोटे उद्यमी, किसान स्पर्धा में पिछड़ने लगे थे.

इन सभी व्यवस्थाओं को यद्यपि सर्वतोन्मुखी विकास के नारे के साथ लागू किया गया था. तथापि इनका प्रभाव सीमित एवं श्रमविरोधी था. यह औपनिवेशिक सरंचना आर्थिक मोर्चे पर फतह और नए संसाधन जुटाने के लिए भले अत्यावश्यक हो, मगर मूल रूप में यह श्रमशोषण एवं बेगार के सिद्धांत पर टिकी थी. इसका पलड़ा हमेशा पूंजीपतियों के पक्ष में झुका होता था. परिणाम यह हुआ कि औद्योगिकीकरण के विस्तार और उद्योगों के बीच कड़ी स्पर्धा के बीच अधिकतम लाभ की संभावना के साथ कारखानों में बालमजदूरों की भर्ती और उनका खुलेआम शोषण किया जाने लगा. पूरा का पूरा बाजार पूंजीपति के लाभ के लिए काम में जुट गया. विडंबना देखिए कि यूरोपीय देशों में 1769 से 1770 के बीच पड़ा भीषण अकाल भी पूंजीपतियों के लिए मुनाफे का संदेश लेकर आया था. उसमें एक ओर जहां लाखों गरीबों, बेबसों, स्त्रियों और मासूम बच्चों को जान से हाथ धोना पड़ा, वहीं पूंजीपति जमाखोरों ने सरकारी उदासीनता और अकाल की स्थितियों का लाभ उठाते हुए खूब चांदी काटी थी. लाभ के सिद्धांत पर टिकी उस पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में अधिकतम मुनाफा ही नैतिकता थी, इसलिए पुराने जीवनमूल्य धराशायी होने लगे थे.

मार्क्स के अनुसार पूंजीवादी समाज में श्रमिक उसका सबसे शक्तिशाली केंद्रबिंदू हैं. अतएव श्रमिकवर्ग को काबू में रखने के लिए उन्हें संगठित होने, उधार लेने तथा ज्वाइंट स्टाॅक कंपनी की स्थापना के लिए प्रेरित किया गया. यह कार्य आधुनिक समाज में विकास और कल्याणकारी व्यवस्थाओं की स्थापना के नाम पर संपन्न हुए. मानवाधिकार और लोकतंत्र जैसी संस्थाओं ने भी अंततः पूंजीवाद को मजबूत करने का कार्य किया. इससे उत्साहित होकर अधिकांश कामगार ज्वाइंट स्टाॅक कंपनी, स्टाॅक एक्सचेंज तथा आधुनिक बैंक कर्जदारी के लिए प्रवृत्त हुए. उद्योगों को कर्ज प्रदान करने की अंतरराष्ट्रीय स्तर की संस्थाओं ने, जो इस तथ्य को गोपनीय रखती थीं कि कर्ज के लिए वित्त की व्यवस्था किन òोतों से की जा रही है, कारखानों में श्रमिकों के शोषण को बढ़ाने का ही काम किया. आयकरदाताओं को टैक्स चुकाने और कर्ज लेने के लिए उकसाया जाता रहा. पूंजीपतियों ने जरूरी सेवाओं को भी बाजार में उतार दिया, ताकि उनके माध्यम से अपने लिए आय के नए स्रोत पैदा कर सकें. इसका उन्हें लाभ भी हुआ. बाजार के बहुमुखी विकास ने नई प्रौद्योगिकी की मांग पैदा की. नए क्षेत्रों में प्रौद्योगिकी के आगमन से उनमें कार्यरत श्रमिककामगार, नाई, धोबी, दर्जी, बढ़ई, लुहार, स्वर्णकार आदि बेरोजगार होकर सड़क पर आ गए. कुल मिलाकर हालात ऐसे बनाए गए कि श्रमिक, कारीगर, हस्तशिल्पी सब के सब उसमें निरंतर उलझते ही गए. वास्तव में इस व्यवस्था से जुड़ा कोई भी व्यक्ति पूंजी के खूनी पंजों से बाहर जाने में असमर्थ था. वह सिर्फ छटपटा सकता था. अपसंस्कृतीकरण और महंगाई की बढ़ती दर से आहत हो सकता था. अपने हालात पर रो और छटपटा सकता था, लेकिन व्यवस्था में रहने, शोषण का शिकार होने और खुली आंखों से सबकुछ देखते जाने से अधिक कुछ और उसके बस में भी नहीं था. इन सभी परिवर्तनों के फलस्वरूप पूंजीवाद बेलगाम दौड़ता चला गया.

27. पूंजीवादी संचय की ऐतिहासिक प्रवृत्ति

प्रूधों का कहना था—व्यक्तिगत संपत्ति चोरी है….संपत्तिधारी व्यक्ति चोर है. मार्क्स हालांकि प्रूधों से कई मामलों में असहमत था. मगर व्यक्तिगत संपत्ति को लेकर उसकी कुछ मान्यताएं पू्रधों से मेल खाती हैं. इतिहास का भौतिकवादी अध्ययन करते हुए वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि उत्पादन के संसाधन सामाजिक परिवर्तन की मुख्य प्रेरणा रहे हैं, और इसके पीछे मनुष्य की संपत्ति संचय की प्रवृत्ति का भारी योगदान है. ‘पूंजी’ के बतीसवें अध्याय में मार्क्स पूंजीवादी संचय की प्रमुख वृत्तियों और उन अवस्थाओं का वर्णन करता है, जिनकी ओर वह उन्मुख है. लंबे चिंतनविश्लेषण के उपरांत वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि एक दिन श्रमिकवर्ग पूंजीवाद की, जो उसकी दुर्दशा का मूल कारण है, की वास्तविकता को पहचानेगा तथा संगठित होकर क्रांति का शंखनाद करेगा. वह पूंजीवाद का अंतिम दिन होगा. अध्याय के आरंभ में ही वह एक प्रश्न उठाता है—

‘‘प्राचीन पूंजीसंचयन ने अपने भीतर कौनसा परिवर्तन किया है?’ इस प्रश्न का उत्तर वह आगे स्वयं ही दे देता है—‘निजी संपत्ति का विलयन, जो उनके मालिकों ने कठोर परिश्रम द्वारा अर्जित की थी, अर्थात तात्कालिक उत्पादकों को बेदखल कर देना.’

पू्रधों से भिन्न मार्क्स ने निजी संपत्ति की अवधारणा का पक्ष लिया था. उसका मानना था कि श्रमिकों को निजी संपत्ति का अधिकार होना चाहिए, ताकि उसके द्वारा वे छोटेछोटे उद्यम स्थापित कर सकें. वह लघु उद्यमों की सामाजिक उत्पादकता को बनाए रखने एवं श्रमिक की अस्मिता और सम्मान की रक्षा के लिए आवश्यक मानता था. श्रमिक अपना बाॅस स्वयं है. चाहे वह हल जोतने वाला किसान हो अथवा हाथ में औजार लेकर काम करने वाला शिल्पकार. चाहे वह कारखानों में पसीना बहाकर रोजीरोटी कमाने वाला मेहनतकश श्रमिक हो अथवा दस्तकार. निजी संपत्ति ही उन सबके कल्याण की वाहक हो सकती है. वह लिखता है कि यद्यपि पूंजीवाद की नींव मजदूरों की भारी मात्रा में हुई बेदखली ने रखी है. निजी संपत्ति पूंजीपति के हाथों में पहुंचकर बहुआयामी शोषण का सबसे बड़ा हथियार बन चुकी है. उसके कारण जो श्रमिककामगार कभी मुक्त जीवन जीने के अभ्यस्त थे, अब विस्थापित मजदूर बनकर कष्टमय जीवन जी रहे हैं. पूंजीवाद के चंगुल में फंसकर वे अपना सबकुछ गंवा चुके, सर्वहारा हैं. पूंजीपतियों ने उनके श्रम को पूंजी में बदल दिया है. उसके माध्यम से वह लाचार श्रमिकों का मनमाना शोषण कर रहा है. मार्क्स स्पष्ट करता है कि पूंजीपति की निजी संपत्ति पूंजीवादी विनियोजन के रूप में अविरत विस्तार लेती जाती है. इस कोशिश में वह अपने संपर्क में आने वाली हर छोटी संपत्ति जिसमें श्रमिक की अपनी पूंजी यानी श्रम भी सम्मिलित है, को आभाहीन कर देती, उसको ग्रस लेती है. ऐसी स्थितियां पैदा कर दी जाती हैं, जिनमें श्रमिकवर्ग का शोषण अपरिहार्य हो जाता है.

पूंजी के अध्ययन से स्पष्ट है कि मार्क्स अपने चारों ओर पूंजीवाद का नंगा नाच देख रहा था. उसके चंगुल में फंसे मजदूरों को उसने छटपटाते हुए देखा था. बावजूद इसके वह पूरी तरह आशावान था. पूंजीवाद की विशद् समीक्षा करने के पश्चात वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि अपनी मौत को स्वयं न्योता देना पूंजीवाद की मूल प्रवृत्ति है. यह एक ऐसा भस्मासुर है, जो दूसरे के श्रमकौशल के आधार पर ताकत ग्रहण करता है. किंतु अपनी मौत का उद्यम भी साथ लिए चलता है. श्रमिकअसंतोष की अनियंत्रित स्थितियां कभी भी उसको धराशायी कर सकतीं हैं. इसलिए पूंजीवादी व्यवस्था जहां अपने लाभ के लिए सार्थक उद्यम करती है, वहीं वह श्रमिकों को भुलावे में रखने के लिए निरंतर प्रयासरत रहती है. ये भुलावे सांस्कृतिक पहचान, धर्म और विशिष्ट क्षेत्रीयताओं को अस्मितावादी पहचान देने के नाम पर लगातार जारी रहते हैं.

पूंजीवाद की आलोचना करते हुए उसने उसको ऐसा उपक्रम बताया है, जिसमें सामाजिक नियंत्रण, सहयोग और सहकारिता, प्रकृति की नियामक शक्तियों तथा समाज के उत्पादक बलों के मुक्त विकास के लिए कोई स्थान नहीं है. अपने विकास के दौर वह इन्हें हड़पता चला जाता है. पूंजीवादी व्यवस्था में पूंजीपतियों के बीच आंखमिचैनी जैसा स्पर्धा का खेल चलता ही रहता है. तमाम व्यावसायिक मनमुटाव और लागडांट के एक भी पूंजीपति नहीं चाहता कि उनके उत्पादनतंत्र में कोई बाहरी शक्ति हस्तक्षेप करे. मगर श्रमिकों के पास संगठन की ताकत, श्रम की ताकत और उत्पादन की योग्यता होती है. उसका विश्वास था कि पूंजीपतियों के व्यापक और शोषणकारी तंत्र को संगठित उत्पादक न केवल उखाड़ फेंक सकते हैं, बल्कि अपने श्रमकौशल के दम पर सर्वकल्याणकारी और विकेंद्रीकृत उत्पादनतंत्र की नींव भी रख सकते हैं. खदेड़ने वालों को भी खदेड़ा जा सकता है, मुट्ठीभर हाथों में सिमटे गैरसामाजिक उत्पादनतंत्र का सामाजीकरण कर उसके लौकिक और मानवीय चरित्र को वापस लौटाना असंभव नहीं है—मजदूरों की कार्यक्षमता में अटूट विश्वास रखने वाले मार्क्स का यही मानना था.

मार्क्स निजी संपत्ति को उतना बुरा नहीं मानता, जितना कि प्रूधों मानता था. बल्कि वह बड़े उद्योगों के स्थान पर छोटे उद्यम लगाने के पक्ष में था, जिनपर श्रमिकों का नियंत्रण हो. जहां वे अपनी जरूरत का सामान बना सकें. जहां हुए उत्पादन का पूरा लाभ वहां कार्यरत श्रमिकों को मिलें. उत्पादनतंत्र के समाजीकरण की प्रक्रिया में उसने निजी संपत्ति को व्यक्तिमात्र की संपत्ति कहा था. वह मानता था कि पूंजीवाद के पतन के बाद, उत्पादन व्यवस्था श्रमिकों के हाथों में चले आने का अभिप्राय निजी संपत्ति की अवधारणा की पुनः स्थापना नहीं है. वह लिखता है कि उत्पादन के समाजीकरण की क्रिया है, जो—

यह निजी संपत्ति की पुनः स्थापना नहीं करती. बजाय उसके यह पूंजीवादी युग की उपलब्धियों एवं शिक्षाओं के आधार पर, व्यक्तिमात्र की संपत्ति की अवधारणा जैसे कि सहयोगसहकारिता, कृषिभूमि पर समाज के संयुक्त अधिकार तथा श्रमिकों द्वारा संचालित विकेंद्रीकृत उत्पादनतंत्र की स्थापना करती करती है.’

मार्क्स की समस्या थी कि पूंजीपति के हाथों में जाकर सर्वभक्षणकारी बन चुकी पूंजी को किस प्रकार लोकोपकारी सामाजिक संपदा में बदला जाए. वह कौनसी प्रक्रिया है जिसमें समाज की संपत्ति उसके सर्वांगीण विकास से प्रेरित हो, न कि मुट्ठीभर लोगों के वर्चस्व वाली पूंजीवादी व्यवस्था से. अपनी पुस्तक में वह लगातार इसपर विचार करता है. वह जानता था कि पूंजी, धर्म और राजनीति के दम पर बेहद शक्तिशाली बन चुके पूंजीपतियों का न तो हृदय परिवर्तन संभव है, न ही उस व्यवस्था से जो मनुष्यमात्र को उपभोक्ता और उसके आसपास की प्रत्येक वस्तु को उपभोक्तावस्तु में बदल देने को प्रयासरत हो, किसी भी प्रकार के परिवर्तन की उम्मीद करना उचित है. वह मानता था सरकार अथवा समाज की अन्य नैतिक शक्तियों द्वारा बेलगाम बन चुके पूंजीवाद को काबू में करना असंभव है. उत्पीड़न से मुक्ति के लिए सिर्फ उत्पीड़क वर्ग को ही आगे आना होगा. श्रमिक अभी तक जो उत्पादन पूंजीपति के लिए करता है, वह अपने लिए करे, पूरे समाज के लिए करे, तभी पूंजीवाद के विषैले दांत उखाड़े जा सकते /हैं.

निरीह मजदूर जो अपनी आजीविका के लिए भी दूसरों पर आश्रित हों, वे शक्तिशाली पूंजीपतियों को भला कैसे उखाड़ सकते हैं? विशेषकर तब जब समस्त कानून, सरकारी विधान उनके पक्ष में होकर, उनकी सुरक्षा के लिए सन्नद्ध हों. इस बारे में मार्क्स का मानना था कि श्रमिकवर्ग को यह अवसर पूंजीवाद की ओर से स्वयं ही प्राप्त होगा. इसलिए कि पूंजीवाद की सबकुछ हड़प लेने का स्वभाव ही उसपर भारी पड़ने वाला है. एक दिन वह स्वयं अपने आप को समाप्त कर लेगा. उस दिन श्रमिकोंकामगारों के पास अवसर होगा कि अपने श्रमकौशल और संगठित शक्ति के दम पर समाज को निर्दिष्ट परिवर्तन की ओर ले जा सकें. जहां समाज मुख्य हो. उत्पादन के साधनों पर व्यक्ति का कब्जा न होकर समस्त समाज का अधिकार हो. जहां उत्पादन उपभोगआधारित न होकर आवश्यकताआधारित हो. और जहां आवश्यकताएं व्यक्ति की निजी महत्त्वाकांक्षाओं का प्रतीक न होकर, सामाजिक चेतना द्वारा मर्यादित होती हों.

क्रमश:

ओमप्रकाश कश्यप

पूंजी (दि कैपीटल): संक्षिप्त विमर्श—तीन

सामान्य

15. समयाधारित वृत्तिका

इस अध्याय में मार्क्स ने मजदूरी के विभिन्न रूपों का विश्लेषण किया है. पूंजीवादी व्यवस्था में मजदूरी का भुगतान प्रायः दो तरीके से किया जाता है. पहला कार्यघंटे के आधार पर. तथा दूसरा किए गए कार्य के आधार पर. कार्यघंटे के आधार पर दी जाने वाली मजदूरी की एक मौलिक विशेषता है कि वह समयसापेक्ष होती है. प्रत्येक श्रमिक अपने श्रम का स्वामीपूंजीपति की इच्छानुसार कुछ सुनिश्चित कालावधि के लिए निवेश करता है. यह अवधि घंटे, दिन, सप्ताह, महीना आदि कुछ भी हो सकती है. अवधि के पूरा होने पर जो धनराशि श्रमिक को उसके श्रममूल्य के रूप में प्राप्त होती है, वह उसकी वृत्तिका अथवा मजदूरी कहलाती है. हालांकि पूंजीवादी व्यवस्था में मजदूरी की मात्रा श्रमिक की श्रमलागत का कुछ ही हिस्सा होती है. अधिकांश तो पूंजीपतिस्वामी द्वारा लाभांश के रूप में हड़प ली जाती है. कार्यदिवस की लंबाई के अनुसार, उसकी दैनिक अथवा साप्ताहिक मजदूरी में खतरनाक रूप से बड़े अंतर दिखाई पड़ सकते हैं. ऐसे में यदि किसी श्रमिक के औसत श्रममूल्य की गणना करनी हो तो वह उसकी दैनिक माध्यवृत्तिका अथवा औसत मजदूरी को कुल कार्यघंटों द्वारा विभाजित करने पर प्राप्त की जा सकती है. स्पष्ट है कि जैसेजैसे औसत कार्यघंटों की संख्या बढ़ती है, श्रमिक की औसत मजदूरी में भी गिरावट आने लगती है. इसके आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि किसी भी श्रमिक का औसत श्रममूल्य उसके दैनिक कार्यघंटों की संख्या के व्युत्क्रमानुपाती होता है. औसत श्रममूल्य की गिरावट श्रमिक की साप्ताहिक या मासिक मजदूरी से स्वतंत्रा होती है, यानी दैनिक या साप्ताहिक मजदूरी समान रहने पर भी उसके औसत श्रममूल्य में पतन संभव है. यहां तक कि कार्यघंटों की बढ़ती दर के आधार पर, श्रमिक की मजदूरी बढ़ने पर भी उसके औसत श्रममूल्य में स्थिरता अथवा गिरावट के लक्षण बने रह सकते हैं. यही स्थिति उनके शोषण के स्तर को दर्शाती है. मार्क्स ने स्पष्ट किया था कि मजदूरी का बढ़ना और औसत श्रममूल्य का बढ़ना दोनों एकदूसरे से भिन्न स्थितियां हैं.


मार्क्स ने लिखा है कि श्रमशक्ति के मूल्य एवं उसके श्रममूल्य की अंतर्संबद्धता को छिपाने के लिए पूंजीपति हालांकि प्रतिघंटा के आधार पर मजदूरी के भुगतान के नियम को अपना सकता है. मगर यह उसी अवस्था में लागू किया जाता है जहां कार्यदिवस के घंटों को निर्धारित करना संभव हो. पूंजीपति श्रमिक को एक कार्यदिवस के लिए नियुक्त कर सकता है. लेकिन यह तभी संभव है कि जब कार्यदिवस दिवस के दौरान किए कार्य का कुल मूल्य श्रमिक की दैनिक मजदूरी से अधिक हो और मालिक के लिए अधिलाभ की सुनिश्चितता हो. ऐसी अवस्था में पूंजीपति के लिए श्रमिक को लंबे समय के लिए नियुक्त करने के बजाय अल्पावधि के लिए काम पर रखना लाभप्रद होता है. अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं के लिए श्रमिक उस अल्पावधि में भी अधिकतम कार्य कर मालिक को संतुष्ट करना चाहता है, ताकि उसको आगे भी काम की उम्मीद बनी रहे. कम वृत्तिका लेकर भी स्वयं को स्पर्धा में बनाए रखने की श्रमिक की व्यवस्था ही पूंजीवाद को ताकतवर बनाने का काम करती है. अक्सर आठ घंटे अथवा एक औसत कार्यदिवस के दौरान मजदूरी की दर इतनी कम रखी जाती है कि श्रमिक को अपनी जरूरतों की भरपाई के लिए अतिरिक्त समय तक कार्य करना पड़ता है. यह स्थिति स्वामीपूंजीपति के लिए और भी लाभकारी होती है. इससे उसको दुहरा लाभ होता है. मार्क्स इसकी व्याख्या कुछ इन शब्दों में करता है—

जब कोई अकेला कामगार डेढ़ अथवा दो कामगारों जितना कार्य निपटाता है, तब श्रम की उपलब्धता बढ़ती है, यद्यपि इससे बाजार में श्रमशक्ति की आपूर्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. वह स्थिर बनी रहती है. इससे श्रमिकों में स्पर्धा का माहौल बनता है. यह स्थिति पूंजीपति को बलपूर्वक श्रममूल्य घटाने का अवसर प्रदान करती है. इस तरह जब श्रममूल्य में गिरावट को अघोषित अनुमति मिल जाती है, तब पूंजीपतिस्वामी श्रमिकों पर और भी अधिक समय तक काम करने के लिए दबाव डालने की स्थिति में होता है.

समय के आधार पर मजदूरी का भुगतान पूंजीपति और श्रमिक दोनों के बीच यह विश्वास पैदा करता है कि श्रम को सीधेसीधे खरीदा जा रहा है. मजदूर यह मानकर संतुष्ट हो जाता है कि जिस अवधि के लिए उसने श्रम का निवेश पूंजीपति के लिए किया, उस अवधि का श्रममूल्य वह प्राप्त कर चुका है. दूसरी ओर पूंजीपति भी कार्यघंटों के हिसाब में मजदूरी का भुगतान कर निश्चिंत हो जाता है. मगर इस व्यवस्था में मजदूर को एक जीवित इकाई के बजाय मात्रा एक मशीन अथवा अपना श्रमकौशल बेचने वाली निर्जीव इकाई मान लिया जाता है. जबकि यथार्थ में ऐसा हरगिज नहीं होता. यह स्थिति श्रम के लिए शोषणकारी सिद्ध होती है. बाजार में श्रम की स्पर्धा श्रममूल्य में निरंतर गिरावट की स्थितियां पैदा करती है. जबकि पूंजीपतिस्वामी खुद को निर्दोष मानकर न केवल निस्पृह बना रहता है, बल्कि कानूनी जटिलताओं का लाभ उठाते हुए स्थितियों को निरंतर अपने पक्ष में बनाए रखता है.

16. उत्पादनआधारित वृत्तिका

कामगार को काम के बदले मजदूरी दिए जाने की दूसरी प्रणाली में श्रमिक को उसके द्वारा उत्पादित माल के प्रति नग के अनुसार, पूर्वनिर्धारित दर पर, मजदूरी प्रदान की जाती है. पूंजीवादी व्यवस्था में यह प्रणाली भी शोषण का आधार बनती है. इस प्रणाली में श्रमिक द्वारा बनाए गए माल के प्रति नग के अनुसार तय धनराशि का भुगतान किया जाता है. इसे वृत्तिकाभुगतान की परिष्कृत प्रणाली माना जाता है. इस प्रणाली में पूंजीपतिस्वामी को उत्पाद की एक इकाई के निर्माण में लगने वाले समय की जानकारी होती है. इसलिए वह उन्हीं कामगारों को नियुक्त करता है, जो उस समयमानक पर खरे उतरते हों. इस प्रणाली में उत्पादनचक्र को विभिन्न इकाइयों में बांट दिया जाता है, ताकि उनमें लगे श्रममूल्य की गणना की जा सके. यह व्यवस्था दलालों को बढ़ावा देने में सहायक सिद्ध होती है. ये दलाल पूंजीपति स्वामी से जो निश्चित राशि लेते हैं, उसका एक आकर्षक हिस्सा अपने लिए बचाकर बाकी का भुगतान श्रमिक को करते हैं. इससे श्रमिक को उसका पूरा श्रममूल्य नहीं मिल पाता. ये स्थितियां मजदूर के शोषण को बढ़ावा देती हैं.

निहित स्वार्थ के लिए पूंजीपति की ओर से श्रमिक को बराबर यह समझाया जाता है कि उसके अतिरिक्त श्रम का लाभ उसको सीधे मिल रहा है. यदि वह अधिक काम करेगा, तो उसका पूरा लाभ उसी को प्राप्त होगा. अतएव अपने आर्थिक हित को देखते हुए उसको अधिक से अधिक कार्य करना चाहिए. श्रमिक जो अक्सर इस पद्धति की बारीकियों से अनजान होता है, लालच में आकर प्रति समयइकाई में अधिक से अधिक नगों का उत्पादन करने की कोशिश करता है, जिसके लिए उसको निर्धारित कार्यघंटों से भी अधिक देर तक काम करना पड़ सकता है. लेकिन जैसेजैसे उसके प्रतिदिवस कार्यघंटों की बढ़ोत्तरी होती है, उसके श्रममूल्य में उतनी ही गिरावट आने लगती है. दूसरी ओर पूंजीपति स्वामी को उत्पाद की प्रति नग के अनुसार होने वाला लाभ बढ़ता चला जाता है. यह स्थिति भी श्रम को स्पर्धात्मक बनाती है. मार्क्स के अनुसार—

प्रति नग मजदूरी की एक खास प्रवृत्ति होती है. यह कि जब किसी श्रमिक की मजदूरी औसत से बढ़ने लगती है, तो उसका माध्यमान अपने आप नीचे गिर जाता है. स्पष्ट है कि प्रतिनग मजदूरी भुगतान की प्रणाली पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था के बेहद अनुकूल है.’

अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए मार्क्स ने फ्रांस के कपड़ा उद्योग का उदाहरण दिया है. वह लिखता है कि युद्धक स्थितियों के दौरान फ्रांस में कई घंटे लंबे कार्यदिवस के बावजूद प्रतिउत्पाद मजदूरी की दर में भारी गिरावट दर्ज की गई थी. मजदूर प्रतिदिन बीस घंटे काम करके भी अपनी जरूरत की चीजें नहीं जुटा पाते थे. दैनिक मजदूरी की दर अपने न्यूनतम स्तर तक गिर चुकी थी. दूसरी ओर श्रमिकों ने इस स्थिति का खूब लाभ उठाया था. चूंकि युद्ध के कारण उद्योगधंधों में मंदी का आलम था, और बेरोजगारी अत्यंत बढ़ चुकी थी, इसलिए श्रमिकों के लिए बाहर रोजगार के अवसर काफी घट चुके थे. ऊपर से रोजमर्रा की वस्तुएं अत्यधिक महंगी हो जाने के कारण उन्हें जुटाने के लिए श्रमिक को अतिरिक्त श्रम करना ही पड़ता था. इसलिए पूंजीपति की शर्तों पर, अपेक्षाकृत कम वृत्तिका पर भी काम करने को विवश थे.

गहन अध्ययन के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि प्रतिउत्पाद मजदूरी के भुगतान की व्यवस्था सिवाय श्रमिकों के शोषण के और कुछ नहीं है. प्रति नग उत्पादन प्रणाली पूंजीपतिस्वामी के लिए विशेष हितकारी होती है. वह उसकी दर अपनी शर्तों पर तय करता है, जो सामान्यतः इतनी कम होती है कि अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए अतिरिक्त समय तक काम करना हर श्रमिक की विवशता बन जाता है. परिणाम यह होता है कि पूंजीपतिस्वामी को उतने ही संसाधनों से अतिरिक्त उत्पादन प्राप्त हो जाता है, जो उसके अधिलाभ को बढ़ाने में सहायक होता है. युद्ध जैसी आपात्कालिक स्थितियां जहां जनसाधारण के लिए जानलेवा संकट बन जाती हैं, वहीं पूंजीपति के लिए वे विशेष लाभदायक सिद्ध होती हैं. समाज अथवा सरकार की ओर से कोई कानूनीनैतिक बंधन न होने के कारण वे पूरी तरह स्वार्थी और निष्ठुर बन जाती हैं.

17. पूंजी-संचयन की प्रक्रिया

उन्नत प्रौद्योगिकी पर आधारित उत्पादन व्यवस्था पूंजीपति के लिए विशेषरूप से लाभकारी सिद्ध होती है. अपनी पूंजी के दम पर वह आधुनिकतम प्रौद्योगिकी में निवेश करता है, जिनके आगे श्रमिक की हैसियत मशीनसहायक जितनी होती है. इसका लाभ उठाते हुए पूंजीपति श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी देता है. अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए श्रमिक को अधिक देर तक काम करना पड़ता है. यह स्थिति भी पूंजीपतिस्वामी के हित में होती है. वह न्यूनतम मजदूरी देकर अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने की स्थिति में रहता है. परिणामस्वरूप उसका अधिलाभ निरंतर बढ़ता ही जाता है. उत्पादन व्यवस्था में अधिलाभ की लगातार बढ़ती दर के कारण अतिरिक्त पूंजी, कारखाना मालिक के खजाने में जमा होती जाती है. जो उसको और अधिक ताकतवर, महत्त्वाकांक्षी, साधनसंपन्न, लालची और उत्पीड़क बनाती है.

पुस्तक के अगले अध्यायों में मार्क्स ने अधिलाभ के पूंजी में ढलने और उसके वर्गीय चरित्र को पुनः उभारने वाली प्रवृत्तियों का विवेचन किया है, जो श्रमिकों के शोषण को बढ़ावा देती हैं. अधिलाभ की बढ़ती मात्रा पूंजीपति की एकाधिकार की प्रवृत्ति को बढ़ावा देती है. अपनी संचित पूंजी के दम पर वह और महंगी, मजदूरविरोधी तकनीक खरीदता है. नई तकनीक उसके पूंजीलाभ और भी वृद्धि करती है, जिससे उसका लाभानुपात निरंतर बढ़ता जाता है. उच्च तकनीक के आगमन के पश्चात श्रमिकों को उनकी वृत्तिका के रूप में दी जाने वाली चल पूंजी, मशीनादि के रूप में अचल पूंजी का रूप धारण कर लेती है. पूंजीपतिस्वामी उसका लाभ उठाता है. वह अधिलाभ का बड़ा हिस्सा मशीनों के संरक्षण, रखरखाव, क्षरण, संचालनशुल्क आदि पहले ही अपने पास रख लेता है. नई मशीनों के आगमन के परिणामस्वरूप कुछ श्रमिक बेरोजगार हो जाते हैं. हालांकि उन्हें यह अवसर प्राप्त होता है कि नई तकनीक से सामन्जस्य बनाए रखने के लिए स्वयं को प्रशीक्षित करें, लेकिन उससे पहले तक पूंजीपतिस्वामी की ओर से मिल रही धनराशि इतनी कम होती है कि वह प्रशिक्षण का व्यय उठाने में अक्सर असमर्थ होता है. वह पूंजीपति से अपेक्षा करता है कि प्रशिक्षण का खर्च स्वयं उठाकर उसके साथ सहयोग करे. उस समय पूंजीपति चुनिंदा कर्मचारियों को, जितनी नई प्रौद्योगिकी युक्त मशीनों के संचालन के लिए उसे आवश्यकता है, प्रशिक्षण देकर बाकी को अपनी मनमानी शर्तों पर काम करने के लिए बाध्य कर देता है. पूंजीपति स्वामी प्रशिक्षण का स्वयं खर्च उठाने के बजाय बाहर से प्रशिक्षित कर्मचारियों को काम पर लेने को प्राथमिकता देते हैं. नए कर्मचारी अनुभवी कर्मचारियों की अपेक्षा कम वृत्तिका पर ही काम करने को तैयार हो जाते हैं. उनके ऊपर अपनी शर्तें थोपना भी आसान होता है. इसका दुष्परिणाम यह होता है कि अनुभवी कर्मचारियों के सिर पर छंटनी की तलवार लटक जाती है. अंततः उन्हें भी पूंजीपति स्वामी की शर्तों के अधीन काम करने को सहमत हो जाते हैं.

पूंजीवाद का बढ़ता वर्चस्व समयसमय पर अनेक वित्तीय संकटों का कारण बनता है. पूंजीपतियों के बीच बढ़ती स्पर्धा एक और जहां श्रमिकों के शोषण को बढ़ावा देती है, वहीं यह पूंजीपतियों के बीच भी एक निर्लज्ज होड़ पैदा करने लगती है. मार्क्स के अनुसार पूंजी के संचयन की प्रवृत्ति अर्थव्यवस्था में स्थायित्व के लिए चुनौतीपूर्ण होती है. बाजार पर एकाधिकार प्राप्त करने की प्रवृत्ति उत्पादनव्यवस्था में निरंतर क्रांतिकारी परिवर्तनों को बढ़ावा देती है. श्रमिक जब तक एक तकनीक का अभ्यस्त होने का प्रयास करता है, उससे पहले ही बाजार में नई तकनीक दस्तक देने लगती है. स्वाभाविक रूप से नई तकनीक पहले से कहीं अधिक उत्पादनक्षम किंतु श्रमविरोधी होती है. बावजूद इसके बाजार पर एकाधिकार कायम रखने के लिए पूंजीपति उस तकनीक को अपना भी लेता है. नई तकनीक के प्रति अकुशल श्रमिक एक बार पुनः पूंजीपति की मनमानी के आगे झुकने को विवश हो जाता है.

18. पुनरुत्पादनमात्र

मार्क्स के लेखन की विशेषता यह है कि पूंजीवाद के चरित्र का कोई भी पहलू, कोई भी कोना उसके चिंतन से बच नहीं सका है. पूंजी की तानाशाही से जुड़े प्रत्येक मुद्दे पर वह अपने मौलिक विचार प्रस्तुत करता है. पूंजीवादी व्यवस्था के लगभग हर निहितार्थ की विवेचना करता हुआ वह बारबार उसकी शोषणकारी प्रवृत्तियों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित कराता है, और हर बार वह पूंजीवाद की वैकल्पिक प्रविधियों पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है. पुस्तक के तेइसवें अध्याय में वह पुनरुत्पादन पर चर्चा करता है और उत्पादन को उससे जोड़ देता है. पुनरुत्पादनमात्र का अभिप्राय पूंजीपतिस्वामी की उस प्रवृत्ति से है जो समस्त अर्जित अधिलाभ को पचाकर, दूसरे शब्दों में श्रमिकों के हिस्से के अधिलाभ को हड़पकर, हर बार उतनी ही पूंजी का निवेश उत्पादन में जोड़ देता है. इसके परिणामस्वरूप उत्पादनस्तर में स्थायित्व आता है. मार्क्स के अनुसार उपभोग समाज की जरूरत है, और संभवतः उसका चरित्र भी. समाज के लिए उपभोग को रोक पाना असंभव है. न ही उसके लिए उत्पादन पर अंकुश लगाया जा सकता है. उपभोग उत्पादन की प्रेरणा बनता है. मगर उत्पादन मात्रा से पूंजीपति की महत्त्वाकांक्षाओं की तृप्ति नहीं हो पाती. लाभवृद्धि की कामना से वह अधिक उत्पादन करना चाहता है. इसके लिए वह अर्जित लाभ को निवेश का हिस्सा बना लेता है. बढ़ी हुई पूंजी को सक्रिय बनाए रखने के लिए नए क्षेत्रों में उत्पादन की जरूरत पड़ती है, पुनरुत्पादन की मांग बढ़ने लगती है. लाभ के निवेश और मशीनीकरण के चलते एक दिन पुनरुत्पादन व्यवस्था की अनिवार्यता बन जाता है—

समाज की उत्पादन की प्रत्येक प्रक्रिया, उसी क्षण पुनरुत्पादन की प्रक्रिया भी है.’

मार्क्स का यह निर्णय बहुत ही महत्त्वपूर्ण तथा उसकी सुतीक्ष्ण विश्लेषणात्मक वुद्धि का आविष्कार था. मार्क्स के अनुसार पूंजी का वर्गीय चरित्र ही ऐसा है कि वह सदैव विकासमान अवस्था में रहे. उत्पादन की अवस्था में चूंकि श्रमशक्ति और उत्पादन के अन्य संसाधनों की लगातार खपत हो रही होती है, अतएव उत्पादन की निरंतरता को बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि श्रम और संसाधनों का समानुपातिक पुनरुत्पादन भी होता रहे. ऐसा न होने पर उत्पादन शृंखला बाधित हो जाएगी. पुनरुत्पादन की बढ़ती मांग श्रमशोषण के नए आयाम विकसित करती है. मार्क्स यहां दो बिंदुओं का विशेष उल्लेख करता है. वह लिखता है कि—

‘सामान्यतः यही लगता है कि पूंजीपति अपने श्रमिक को काम के बदले मुद्रा के रूप में भुगतान करता है, जबकि हकीकत यह है कि मजदूर को मात्रा उतनी मजदूरी ही प्राप्त हो सकती है, जिससे वह किसी भी प्रकार अपना एक दिन बिता सके. अपनी सामान्य जरूरतों को पूरा करने के लिए श्रमिक को सारे दिन काम करना पड़ता है. उसके बदले पूंजीपति उसको मजदूरी के रूप में कुछ धन का भुगतान करता है. किंतु अपने श्रम के माध्यम से श्रमिक पूंजीपति द्वारा दी गई मजदूरी से कहीं अधिक उसे कार्य के रूप में लौटा भी चुका होता है. वह पूंजी पूंजीपति का अधिकार मानी जाती है और दिनप्रतिदिन बढ़ते हुए भारी धनराशि का रूप ले लेती है. यह पूंजी प्रकारांतर में पूंजीपति को और अधिक समृद्ध करने के काम आती है. चूंकि कामगार की जरूरत की अधिकांश वस्तुएं, जीवनोपयोगी दैनिक सामग्री भी पूंजीपति के कारखानों में बनती है, जिन्हें वह भारी लाभानुपात के साथ बेचता है. बिना यह सोचेविचारे कि उनके उत्पादन में श्रमिक वर्ग ने अपना पसीना बहाया है, और इस नाते उसका भी उतना ही अधिकार है, जितना कारखानेदार का. उन्हें अर्जित करने के लिए श्रमिक अपनी मजदूरी को दुबारा पूंजीपति को लौटा देता है. मजदूर और मालिक के बीच इस अदलाबदली द्वारा मालिक को पुनः निवेश योग्य धन एवं श्रमिक को उपभोक्ता सामग्री की प्राप्ति होती है. परिणाम यह होता है कि श्रमिक जहां जीनेभर का सामान जुटा पाता है, वहीं पूंजीपति के पास मुनाफे के रूप में पूंजी की लगातार आमद रहती है, जो उसको और अधिक समृद्ध करने का काम करती है.’

मार्क्स आगे लिखता है कि उत्पादनप्रणाली को गतिमान बनाए रखने हेतु उससे लाभ का सृजन अनिवार्य है. यदि लाभ के बिना भी पूंजीपति उद्योग को चलाए रहता है, उसके लिए वह अपनी जेब से लगातार पूंजी लगाता है, तो एक दिन निश्चय ही ऐसा आएगा, जब वह टूट चुका होगा. अतएव पुनरुत्पादनमात्रा का आशय है, समस्त पूंजी को इस तरह उद्यम का हिस्सा बना देना कि उससे सतत लाभार्जन होता रहे और अर्जित लाभ के एक हिस्से का उद्यम में निवेश कर, उसको आगे बढ़ाते रहने की संभावना भी निरंतर बनी रहे. पुनरुत्पादन अथवा उत्पादन की चक्रीय व्यवस्था दरअसल समाज के वर्गचरित्रों की अनुकृति है. पूंजीवादी अवस्था में श्रमिक को सिर्फ इतना ही मिल पाता है जिससे वह अपनी सामान्य जरूरत के लिए आवश्यक वस्तुएं जुटा सके. कई बार तो वह इतना कम होता है कि श्रमिक को अपनी न्यूनतम आवश्यकताएं पूरी करने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है और अपनी कुछ अपेक्षा कम जरूरी वस्तुओं के साथ कतरब्योंत करनी पड़ती है. श्रमिक जिन उद्यमों में अपने श्रम का निवेश करता है, वे पूंजीपति की संपत्ति होते हैं. अपने श्रमकौशल के माध्यम से श्रमिक वहां पूंजीपतिस्वामी के लिए लाभ का सृजन करता है. काम पूरा होने के साथ ही वह कारखाने को ज्यों का त्यों छोड़कर चला जाता है. इस बीच वह सिर्फ उतना जुटा पाता है, जो उस अवधि में काम करने के लिए अनिवार्य था. पूंजीपति की भांति वह धन को कभी अपने जीवन की वास्तविकता में नहीं बदल पाता. इससे पूंजीपति पर उसकी आश्रितता सदैव बनी रहती है. यह व्यवस्था समाज के बहुसंख्यक श्रमजीवी वर्ग को पूंजीपतियों का आश्रित बना देती है, जिससे शोषण और अनाचार को बढ़ावा मिलता है. मार्क्स के शब्दों में—

श्रमिक उत्पादनप्रक्रम को सदैव उस अवस्था में छोड़ता है, जैसा वह उसके आगमन के समय था—धन का वैयक्तिक स्रोत, वह उसे अपने लिए धनार्जन का नियमित स्रोत बनाने से वंचित रह जाता है.’

श्रमिक को मजदूरी के रूप में उतनी ही धनराशि मिलती है, जिससे वह अपने जीवनयापन के लिए केवल अनिवार्य वस्तुओं की खरीद कर सके. उसके बाद उसके पास कुछ शेष नहीं बचता. इसलिए उसको श्रम के लिए दुबारा समर्पित होना पड़ता है. मार्क्स यहां गहराई में जाकर अन्वीक्षा करता है. वह लिखता है कि मजदूर को प्राप्त मजदूरी उस अवधि के लिए होती है, जिसको वह पूरा कर चुका होता है. इसका आशय है कि श्रमिक अग्रिम श्रमनिवेश करता है. मजदूरी उसको बाद में प्राप्त होती है. इस अवधि का पूंजीपति की ओर से उसको कोई ब्याज भी नहीं मिलता. उल्टे पूंजीपति के अधिकारभाव के आगे उसको सदैव झुकना पड़ता है. यही कारण है कि इस व्यवस्था में श्रमिक निरंतर पिसता जाता है, जबकि पूंजीपति सदैव लाभ की स्थिति में रहता है. वह पूंजी का निवेश करता है, लाभ कमाता है, दुबारा उसका निवेश करता है. वह श्रमिक को कम मजदूरी देता है. जितना देता है, उसका एक हिस्सा उसे उपभोक्ता वस्तुएं बेचकर अधिलाभ के रूप में पुनः वापस ले लेता है. अतएव मजदूर के पास सिवाय उसके एक दिन के, जिसे वह कारखाने में श्रम करते हुए बिताता है, और कुछ नहीं बच पाता. इस प्रकार उसका लाभ और उत्पादनव्यवस्था पर वर्चस्व बढ़ता ही जाता है.

उल्लेखनीय है कि पूंजीपति समस्त लाभ का एक साथ निवेश नहीं करता. न ही उसको वह अपने पास बचाकर रखता है. बल्कि लाभार्जन के रूप में संचित पूंजी का निवेश वह उत्पादन के नए क्षेत्रों में करता है, जो उसके साथसाथ दूसरे पूंजीपतियों को भी लाभ पहुंचाने का काम करते हैं. परिणाम यह होता है कि पूंजीपति की आरंभिक पूंजी चक्रीय पूंजी का रूप ले लेती है, जो पूंजीपति के लिए मजदूरों के श्रम को अधिलाभ में बदलने का काम करती है. इस व्यवस्था में श्रमिक को यह लगता है कि वह पूंजीपति से अपनी मजदूरी के रूप में कुछ अर्जित कर रहा है, जबकि अर्जित की गई मुद्राएं जीवन के लिए जरूरी वस्तुओं की खरीद में खप जाती हैं. अगले दिन से श्रमिक को पुनः संघर्ष में जुटना पड़ता है. कामगार जीवित रहने की कोशिश में अपने श्रम को बेचता है, और इस दौरान वह पूंजीपतिस्वामी के लिए अधिलाभ का लगातार सृजन करता है, जिसका एक हिस्सा पुनः निवेश होकर पूंजीपति के अधिलाभ में वृद्धि करने और अपने लिए वर्गीय शोषण की स्थितियां पैदा करने का काम करता है. श्रम और संसाधन की खरीदफरोख्त के इस क्रम में श्रमिक अपने श्रम से पूंजीपति को बढ़ावा देता है, जबकि पूंजीपति अपनी पूंजी के दम पर श्रमिकों की कतार पर कतार पैदा करता चला जाता है. मार्क्स के अनुसार यह स्थिति आगे चलकर वर्गसंघर्ष को प्रासंगिक और अनिवार्य बनाने का काम करती है.

19. अधिलाभ का पूंजी में अंतरण

मार्क्स के अनुसार हर धन पूंजी नहीं है. न ही हर वस्तु उपभोक्ता सामग्री कही जा सकती है. पूंजी का आशय उस संपदा से है जो उत्पादनप्रक्रिया में प्रवृत्त होकर पूंजीपति के निमित्त अधिलाभ का सृजन करती है. इसी प्रकार उपभोक्ता वस्तु का आशय उस वस्तु से है, जिसका निर्माण दूसरों के उपयोग हेतु, आर्थिक लाभ कमाने की वांछा के साथ किया जाता है. ‘पूंजी’ के चैबीसवें अध्याय में मार्क्स उन स्थितियों की विस्तृत विवेचना करता है जिनके माध्यम से कोई पूंजीपति अपने लाभ का उपयोग पूंजीविस्तार के लिए करता है. पिछले अध्यायों में किए गए विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए वह एक बार फिर पूंजी के संचयन, उसके पुनः निवेशन और लाभ में बदलने की प्रक्रिया को अपने विश्लेषण से जोड़ता है. मार्क्स के शब्दों में अधिलाभ के संचयन का अभिप्राय—

अधिलाभमूल्य का पूंजी के रूप में निवेश करना; अथवा उसका पूंजी के रूप में पुनः रूपांतर है.’

अपने मंतव्य को स्पष्ट करने के लिए वह सूती धागा बनाने वाले एक मजदूर का चित्र खींचता है. शब्दचित्र के माध्यम से वह दर्शाता है कि एक पूंजीपति किस प्रकार अपनी पूंजी का उपयोग अपने उत्पादन को बढ़ाने और श्रमशक्ति जुटाने के लिए करता है. वह बारबार एक ही बात पर लौटकर आता है कि किस प्रकार अधिलाभ को पूंजी का रूप देने के लिए पूंजी का संचयन और उसका पुनः निवेशन अनिवार्य है. आखिर वे कौन से कारण हैं, जिनके कारण कोई पूंजीपति अपने लाभ का निवेश करने को तैयार होता है? वे कौनसी लालसाएं हैं जो पूंजीपति को श्रमिकों के शोषण के लिए उकसाती हैं और उसको उस व्यवस्था का खलनायक बनने के लिए बाध्य करती हैं?

मार्क्स के अनुसार लाभ की मात्रा जैसेजैसे बढ़ती है, पूंजीपति के मन में बाजार पर एकाधिकार कायम करने की इच्छा बलवती होती जाती है. आर्थिक साम्राज्य का मुखिया बनने की साध उसे उत्पादनवृद्धि और नई उपभोक्ता वस्तुओं के विकास के साथ नए बाजारों की खोज के लिए भी प्रेरित करती है. स्मरणीय है साधारण अवस्था में उत्पादनवृद्धि का सपना देखना और उसके लिए नई प्रौद्योगिकी का उपयोग करना अपने आप में बुरा नहीं है, बशर्ते इसके साथ सामाजिक हितों का भी पूरापूरा ध्यान रखा जाए. उन श्रमिकों, कारीगरों को भी लाभ का समुचित हिस्सा प्रदान किया जाए, जो उन वस्तुओं के उत्पादन के लिए अपना पसीना बहाते हैं. लेकिन पूंजीपति यह कार्य विशुद्ध लाभ कामना के साथ, केवल निहित स्वार्थों के लिए करता है. इस कारण उसकी अपने साथी पूंजीपतियों के साथ एक स्पर्धा कायम हो जाती है, जो उसकी व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं का निकष होती है. इसके लिए वह उत्पादन के नए क्षेत्रों की तलाश कर अपनी पूंजी को बहुमुखी विस्तार देने के सपने पालने लगता है. पूंजी के विस्तार के साथ यह प्रवृत्ति कम होने के बजाय लगातार बढ़ती ही जाती है. मार्क्स के अनुसार पूंजीवादी विस्तार अतिरिक्त श्रमशक्ति की अपेक्षा करता है. यह श्रमशक्ति अनायास नहीं उत्पन्न नहीं होती. वह समझाता है—

पूंजीवादी उत्पादन का पूरा का पूरा तंत्र, वास्तव में उस श्रमिक वर्ग के उत्पादन और पुनरुत्पादन की स्थायी व्यवस्था है, जो अपने जीवन के लिए मजदूरी पर निर्भर रहता है, इस प्रकार पूंजीपति की श्रमशक्ति संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए वह उस(पूंजीपति)के विस्तार में सहायक बनता है.’

मार्क्स के अनुसार पूंजीवादी व्यवस्था में श्रमपुनरुत्पादन में खर्च होने वाला श्रम पूंजीपति के और अधिक लाभ की संभावना के बिना असंभव है. यहां तक कि श्रमिक वर्ग की भोजन और कामसंबंधी मूल जैविक आवश्यकताएं भी लगातार पूंजीवाद को ही पुष्ठ करने में सहायक होती है, उनके माध्यम से पूंजीपति के लिए श्रमशक्ति की निरंतर उपलब्धता बनी रहती है. उसके उपभोक्तावर्ग का दिनोंदिन विस्तार होता जाता है. इससे पूंजीपति का लाभ लगातार बढ़ता जाता है, जिसका एक हिस्सा उत्पादन में ढलकर उसके लाभानुपात को निरंतर विस्तार देता जाता है. यह प्रक्रिया चक्रीय रूप धारण कर लेती है. इस विश्लेषण के माध्यम से मार्क्स तीन परिणामों तक पहुंचता है, जो धन को पूंजी में अंतरित करने में सहायक होते हैं—

. यह कि उत्पाद पर पूंजीपति का अधिकार होता है, न कि श्रमिक का.

. यह कि उत्पाद के मूल्य में लगाई गई पूंजी के अतिरिक्त, पूंजीपतिस्वामी का अधिलाभ भी सम्मिलित होता है, जिसे केवल श्रमिक का पसीना संभव बनाता है, पूंजीपति का नहीं. बावजूद इसके उसे पूंजीपति की वैध संपत्ति मान लिया जाता है. सरकार और सामाजिक संस्थानों की सहमति पूंजीपतिस्वामी को राजनीतिकआर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाती है.

. यह कि श्रमिक अपनी श्रमशक्ति को सुरक्षित रखता है. यदि कोई नया खरीदार मिले तो वह उसको नए रूप में बेचने को तत्पर होता है.

उपर्युक्त विवेचना के उपरांत मार्क्स इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि उत्पादन और पुनरुत्पादन की साधारण स्थितियों में भी पूंजी का चक्रीय क्रम(निवेश—उत्पादन—लाभांश—पुनः निवेश—पुनरुत्पादन—अतिरिक्त लाभांश) बना ही रहता है. इस बीच पूंजीपति के लाभ में भी उत्तरोत्तर वृद्धि जारी रहती है, हालांकि इस बीच पूंजीपति द्वारा किए गए प्रारंभिक निवेश—मशीनरी, भवन आदि के मूल्य में स्वाभाविक मूल्यहृास के कारण लगातार कमी आती रहती है. दूसरे शब्दों में पूंजीपति एक बार निवेश के बाद कारखाने से सतत लाभांश का अधिकारी मान लिया जाता है, जबकि श्रमिक को उसके निरंतर श्रम के बावजूद केवल उत्तरजीविता ही हासिल होती है. विड़बना यह है कि मजदूरी की संतति आगे चलकर उन्हीं कारखानों को समृद्धि के लिए अपना खूनपसीना बहाती है, जहां उनके पूर्वज का शोषण हुआ था.


20. पूंजी संचयन का सामान्य सिद्धांत

पूंजी का निर्माण दो घटकों से होता है, वे हैं—श्रममूल्य एवं उत्पादन के अन्य संसाधन.अन्य संसाधनों में कच्चामाल, मशीनरी, भवन, औजार आदि सम्मिलित हैं. इनमें भी श्रमऊर्जा अधिक महत्त्व रखती है. किसी भी उत्पादन कार्य के लिए जब नई मशीनरी का उपयोग किया जाता है, तब पूंजी के घटकों में गुणात्मक परिवर्तन देखने को मिलता है. नई तकनीकयुक्त मशीनों के परिचालन के लिए प्रशिक्षित श्रमशक्ति की आवश्यकता पड़ती है. विशिष्ट क्षेत्र में प्रशिक्षित श्रमशक्ति को पूंजीपति अधिक मजदूरी देकर भी खरीद सकता है. मगर उसका श्रमशक्ति के वास्तविक कल्याण पर कम ही असर पड़ता है, क्योंकि उच्च तकनीकयुक्त मशीनें मानवश्रम विरोधी भी होती हैं, जो येनकेनप्रकारेण पूंजीपति को ही लाभ पहुंचाती हें.

पूंजी के विविध घटकों के बीच गुणात्मक परिवर्तन, समाज की कुल पूंजी में वृद्धि अथवा उसके संचयन के समय भी दिखाई पड़ता है, तथापि उसके दुष्परिणाम भी कम नहीं होते. मार्क्स के अनुसार पूंजी का संचयन और उच्च प्रौद्योगिकी के रूप में उसका पुनः निवेशन, संबंधित उद्योग में उत्पादनवृद्धि की संभावना पैदा करता है. मगर उन्नत तकनीक का श्रम विरोधी चरित्र, उत्पादन प्रक्रिया में श्रमशक्ति के महत्त्व को कम करने का काम करता है. उच्च उत्पादकतायुक्त मशीनें अनेक श्रमिकों का कार्य कम समय और लागत में निपटा देती हैं. जिससे अनेक श्रमिकों का कार्य अनायास छिन जाता है. परिणामस्वरूप श्रमिक नए क्षेत्रों में कार्य खोजने को विवश हो जाता है, जिनमें उसकी कार्यक्षमता सीमित होती है. ऐसी अवस्था में पूंजीपति उसकी वृत्तिका का निर्धारण मनमानी दरों पर करता है. मानवश्रम के स्थान पर मशीनों के आगमन से उत्पादकता में वृद्धि तो होती है, मगर साथ ही रोजगार के अवसरों में भी गिरावट आती है. हालांकि नए क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ने से वहां रोजगार के नवीन अवसर पैदा हो सकते हैं, मगर कुल मिलाकर मशीनें उत्पादन कार्य में मानवश्रम के आनुपातिक योगदान को कम करने का काम करती हैं. हालाकि समाज में उत्पादकता का बढ़ता स्तर उसकी ऊपरी पर्तों में समृद्धि ला सकता है. उनके जीवन को सुखमय और सुविधासंपन्न बना सकता है, तथापि कुल मिलाकर इससे रोजगार के अवसरों में गिरावट आती है, जिससे समाज के बड़े वर्ग के समक्ष, उस वर्ग के समक्ष जो केवल अपना श्रम बेचकर जीविकोपार्जन करना जानता है, जीविकासंकट पैदा होने लगता है. उन्नत प्रौद्योगिकी समाज में बेरोजगारों की फौज खड़ी कर दूसरे सामाजिक संकटों को बढ़ावा देती है.

इसके विपरीत यदि उत्पादन और पूंजी संचयन स्थिर रहता है, अथवा मशीनों की लागत और लाभ का अनुपात पूंजीपति के हितों के प्रतिकूल है, तो वह उसकी भरपाई श्रमशक्ति से करना चाहता है. उस अवस्था में पूंजीपति के लिए लार्भाजन की दर को बढ़ाने या कम से कम स्थिर बनाए रखने की और बड़ी जिम्मेदारी, श्रमशक्ति के कंधों पर आ जाती है. पूंजीपति इसी से संतोष नहीं कर लेता. उसका पूरा ध्यान उत्पादनवृद्धि द्वारा अपने अधिलाभ में अधिकतम वृद्धि करने पर केंद्रित होता है. चूंकि वह पूंजी का बड़ा हिस्सा मशीनों में निवेश कर चुका होता है, इसलिए उसका प्रयास होता है कि कम से कम श्रमिकों द्वारा अधिकतम उत्पादकता प्राप्त कर सके. इसके लिए वह श्रमिकों से अधिक समय तक काम लेता है. ऐसी तकनीक को बढ़ावा देता है, जो श्रमविरोधी हो. अपने लाभ का एक हिस्सा वह तकनीक के परिष्करण पर अनिवार्यरूप से निवेश करता है, ताकि श्रम पर अपनी अनिवार्यता को कम से कम कर सके, जिससे कारखानों में कार्यरत श्रमिकों पर भी संकट मंडराने लगता है. चूंकि उन्नत तकनीकी युक्त मशीनों के संचालन के लिए दक्ष श्रमिकों की आवश्यकता पड़ती है, इसलिए वह कम मजदूरी वाले अनेक श्रमिकों के स्थान पर अधिक वेतनमान वाले कम कामगारों की नियुक्ति पर जोर देता है.

मार्क्स के अनुसार यह स्थिति श्रमिकों के बीच वर्गविभाजन का काम करती है. उसके एक सिरे पर वे श्रमिक होते हैं, जिन्हें मशीनीकरण के कारण नौकरी से बेदखल होना पड़ा है या वे लोग जो बढ़ते प्रौद्योगिकीकरण के साथ अपनी संगति बिठा पाने में असमर्थ रहे हैं और इस कारण बेरोजगारी का शिकार बने हैं. या जो नई तकनीक के आगमन के पश्चात सहायक की भूमिका आ चुके हैं, इस डर के शिकार हैं कि उत्तरोत्तर विकासमान तकनीक कभी भी उन्हें उत्पादनप्रक्रिया के लिए ‘बेकार’ घोषित कर सकती है. दूसरे सिरे पर वे कामगार होते हैं जो रोजगार में हैं, मगर जिनको कम मजदूरी के बावजूद अधिक श्रम करना पड़ता है. दोनों ही पक्ष तनाव की स्थिति में होते हैं. एक रोजगार छिन जाने के गम, जीविका के संकट से तनावग्रस्त होता है. दूसरा वर्ग इसलिए तनाव में होता है, क्योंकि उसको लगता है कि उससे कम पगार देकर अधिक काम लिया जा रहा है. यह स्थिति मजदूरी को दो तरीके से प्रभावित करती है. यदि बेरोजगार श्रमिकों की संख्या, रोजगार प्राप्त अथवा कार्यरत श्रमिकों की संख्या से अधिक है, तब उसका सीधासा निष्कर्ष है कि बाजार में श्रमिकों की मांग कम है. उस अवस्था में स्वाभाविक रूप से मजदूरी में गिरावट देखने को मिलेगी. इसके विपरीत यदि आरक्षित यानी बेरोजगार श्रमिकों की संख्या, रोजगार प्राप्त श्रमिकों की संख्या से कम है, तब यह समझा जाएगा कि श्रमिकों की मांग अधिक है, साथ में उनकी मजदूरी भी अधिक है, यानी पूंजीपति के मुद्राभंडार में नियमित वृद्धि हो रही है. प्रथम दृष्टया यह स्थिति श्रमिकवर्ग के लिए हितकर हो सकती है.

पूंजीवाद का धुर विरोधी मार्क्स यहां एक और पहलु पर चिंता व्यक्त करता है. यदि पूंजीवादी व्यवस्था में रोजगार प्राप्त श्रमिकों की संख्या बेरोजगार श्रमिकों से अधिक है तो समझना होगा कि कारखाने अपनी पूरी क्षमता के साथ उत्पादन कर रहे हैं. उस अवस्था में उत्पादनदर इतनी बढ़ सकती है कि उनकी खपत संभव न हो. इसके परिणामस्वरूप उत्पाद और उसके माध्यम से पूंजीपति को मिलने वाला लाभ दोनों ही बेकार जा सकते हैं. घटते मुनाफे की सबसे पहली मार श्रमिकों पर पड़ेगी. अपने लाभ के स्तर को बनाए रखने के लिए पूंजीपति मजदूरों की छंटनी करेगा और जो श्रमिक काम पर रहेंगे, उनकी मजदूरी में कटौती करेगा. छंटनी के शिकार हुए बेरोजगार मजदूर नए क्षेत्रों में काम की तलाश में होंगे. परिणामस्वरूप बाजार में बेरोजगारों की संख्या बढ़ने लगेगी. एक बार फिर वही चक्र आरंभ हो जाएगा. एक बिंदु ऐसा भी आ सकता है, जब श्रमशक्ति अपने उच्चतम मूल्य पर हो. उस अवस्था में पूंजीपति, खासकर छोटा उद्यमी उत्पादन से अपने हाथ खींच लेगा. इसका परिणाम यह होगा कि उत्पादनव्यवस्था बिखर जाएगी, जिससे और भी लोग बेरोजगार होकर सड़क पर आ सकते हैं. इसकी मार मजदूरी पर पड़ेगी और उसमें गिरावट का नया दौर फिर शुरू हो जाएगा. अंत में एक ओर तो अत्यधिक धनी पूंजीपति बचेगा, दूसरी ओर अत्यधिक गरीब मजदूर.

पूंजीवादी व्यवस्था में एक श्रमिक का जीवन ही अपने आप में विडंबना है. विसंगति है कि खूब मेहनत करो, भूखे पेट, नंगे तन रहो, पसीना बहाओ, खूब पैदा करके दोलेकिन अंत में गालियां और धक्के खाने के लिए तैयार रहो. इसलिए कि पूंजीपति समाज की जरूरत के लिए नहीं, अपने लाभ के लिए उत्पादन में हाथ डालता है. वह जरूरतें पैदा करता है. जितनी जल्दी आविष्कार होते हैं, जितनी जल्दी नए उत्पाद बाजार में आते हैं, उतनी जल्दी आवश्यकताएं सृजित नहीं हो पातीं. अर्से से जड़ जमाए संस्कार आसानी से नहीं बदलते. समाज बदलने में समय लेता है. सिर्फ लाभ की कामना के साथ काम करने वाले पूंजीपति को बदलने में देर नहीं लगती. बल्कि समाज जल्दी बदले, नए आविष्कारों, का उपभोक्तावर्ग पैदा हो, इसके लिए वह पूरे संसाधन झोंक देता है. उसकी पूंजी इशारे पर नाचने वाला मीडिया उसका साथ देता है. इस कारण पूंजीवादी व्यवस्था में उतारचढ़ाव का स्वाभाविक दौर सदैव बना रहता है. जैसेजैसे सामाजिक धन में अभिवृद्धि होती है, उसका वैसा ही प्रभाव जनसंख्या पर भी पड़ता है. ऊपर दिए गए चक्र के दौरान जितनी जनसाधारण की परेशानी बढ़ती है, अत्यधिक उत्पादकता के शिकार बेरोजगार उसी अनुपात में बढ़ते जाते हैं. पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत यह अपरिहार्य स्थिति है. इससे बच पाना असंभव है.

क्रमश:

ओमप्रकाश कश्यप

कार्ल मार्क्स की पूंजी : संक्षिप्त विमर्श—दो

सामान्य

10. श्रमविभाजन के सिद्धांत और उत्पादन

अर्थशास्त्र के दृष्टि से यह ‘पूंजी’ के अतिमहत्त्वपूर्ण अध्यायों में से एक है. इसमें मार्क्स उन उत्पादन प्रविधियों का विश्लेषण करता है, जिन्हें पूंजीवादी अर्थव्यवस्था अपने लाभ को ध्यान में रखकर गढ़ती है. विश्लेषण के दौरान वह उत्पादन के दो प्रविधियों का उल्लेख करता है. पहली विधि के अंतर्गत उत्पादन प्रक्रिया में निपुण कामगारों को श्रेणीक्रम में इस प्रकार संयोजित किया जाता है कि उत्पादन कार्य उनमें से एक के बाद एक हाथों में जाकर पूर्णता को प्राप्त होता है. इस विधि में कार्य को छोटे-छोटे चरणों में बांटकर उन्हें क्रमानुरूप संयोजित कर दिया जाता है. उद्यमी प्रायः एक ही प्रकार के उत्पाद की रचना करता है. उदाहरण के लिए ट्रकों के लिए पिस्टन बनाने वाला कारीगर, कारखाने में एक समय में केवल पिस्टन बनाने का ही कार्य करेगा. और वह भी एक बार में एक ही किस्म के. भले ही वह अलग-अलग प्रकार के पिस्टन बनाने में निपुण हो. इस पद्धति में कर्मचारी का मस्तिष्क एकाग्र रहता है. एक कार्य को करते समय उसके हाथ उस काम में पारंगत हो जाते हैं, जिससे उसकी उत्पादकता बढ़ जाती है तथा उसको अपने काम में निपुणता का एहसास होने लगता है. उनके आत्मविश्वास में वृद्धि होने लगती है. उनकी कार्यक्षमता वैविध्ययुक्त होती है. साथ ही उन्हें यह आश्वति होती है कि कारखाना बंद होने अथवा छंटनी के अवसर पर उनके पास रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध होंगे.

कार्यविभाजन की दूरी पद्धति के अंतर्गत पूंजीपति कामगारों की भारी-भरकम संख्या को नौकरी पर रखता है तथा कार्य का इस प्रकार समायोजन करता है कि प्रत्येक कारीगर पूरा का पूरा माल स्वयं बनाता है. इस पद्धति में प्रत्येक कारीगर माल बनाने में निपुण होता है. मगर जटिल उत्पादन प्रक्रिया के दौरान, जिसके निर्माण में तरह-तरह की मशीनों, औजारों और सामग्रियों का उपयोग होता हो, अथवा अनेक पुर्जों को जोड़कर किसी बड़े उत्पाद का निर्माण करना हो, तो यह पद्धति कारगर नहीं हो पाती. उस अवस्था में यह अव्यावहारिक सिद्ध होती है. यह पद्धति कामगारों के निजी कौशल पर निर्भर करती है और बहुआयामी तकनीकी निपुणता वाले श्रमिक मिलना आसान नहीं होता. उत्पादन में अचानक वृद्धि करनी पड़े तो उसके लिए अतिरिक्त कुशल कारीगरों का इंतजाम करना कठिन हो जाता है. इस प्रविधि में उत्पादन श्रमिकों के कौशल पर निर्भर करता है. परिणामस्वरूप उत्पादक श्रमिकों पर आश्रित हो जाता है. यह स्थिति उसके पूंजीवादी हितों के प्रतिकूल होती है. अतः मानवीय कौशल पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए पूंजीपति उत्पादन प्रक्रिया के अधिकतम मशीनीकरण पर जोर देता है. उच्चतम उत्पादन क्षमता बनाए रखने के लिए वह उत्पादन क्रियाओं का छोटे-छोटे प्रखंडों में वर्गीकरण करता है, ताकि प्रत्येक श्रमिक से उसका सर्वश्रेष्ठ कार्य लिया जा सके. इस पद्धति में श्रमिक को भी कम परिश्रम करना पड़ता है, अतः बगैर यह जाने कि यह पूंजीपति के लिए अपेक्षाकृत अधिक लाभकारी है, वह इसका समर्थन करता है.

बड़े उद्यमों में पूंजीपति की कोशिश होती है कि कार्य को छोटे-छोटे प्रखंडों में विभाजित कर दिया जाए तथा एक कारीगर को उसकी क्षमता के अनुसार छोटे-से-छोटे प्रखंड की जिम्मेदारी सौंपी जाए, ताकि वह किसी एक क्रिया पर अपने आप को एकाग्र रखे. उस अवस्था में उसकी कार्यक्षमता अलग-अलग प्रवृत्ति का काम करने की अपेक्षा अधिक उत्पादक होगी. मार्क्स का कहना था कि जो कारीगर पूरे जीवनकाल में एक ही प्रकार का कार्य करता रहता है, उसके काम में दूसरों की अपेक्षा अधिक कौशल होता है.उसकी उत्पादक दूसरे कामगारों से अधिक पाई जाती है. इसलिए पूंजीपति की कोशिश होती है कि वह बहुमुखी कारीगरों के स्थान पर प्रत्येक उत्पादन-स्तर के लिए अलग-अलग कामगारों की नियुक्ति करे. संभव है इसके लिए आनुपातिक रूप में अधिक संख्या में श्रमिकों को नियुक्त करना पड़े. लेकिन अपेक्षाकृत कम कुशल श्रमिकों से भी काम चल जाने के कारण इसमें मजदूरी की बचत होती है और मालिक को श्रमिकों पर निर्भर भी नहीं होना पड़ता. कुल मिलाकर यह पद्धति पूंजीपति स्वामी के हितों के अनुकूल होती है. मार्क्स का यह भी कहना था कि एक ही प्रकार के उत्पादन से लंबे समय तक जुड़े रहने वाले विशेषज्ञता प्राप्त कारीगर प्रायः परिष्कृत औजारों से काम लेने में सक्षम होते हैं. हालांकि वे अलग-अलग काम करने में उतने कार्यक्षम नहीं होते, जितना कि कोई दक्ष कारीगर हो सकता है. इस व्यवस्था में श्रमिक मशीन का पुर्जा बनकर रह जाता है.

उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन श्रमिकों को कुशल और अकुशल श्रेणी में बांट देता है. कुशल श्रमिक के लिए लंबे प्रशिक्षण की आवश्यकता पड़ती है, इसलिए उत्पादन-प्रक्रिया के अंतर्गत उसके द्वारा किया गया योगदान अधिक श्रम-मूल्य की अपेक्षा रखता है. इसके विपरीत अकुशल कर्मचारी के काम में किसी भी प्रकार की विशेषज्ञता नहीं होती. उसको आमतौर पर वह कार्य सौंपा जाता है, जिसे कोई भी व्यक्ति बड़ी आसानी से पूरा कर सकता है. इसलिए उसके योगदान को अपेक्षाकृत कम श्रम-मूल्य द्वारा आंका जाता है. अपनी विशेषज्ञता और कुशलता का लाभ उठाने के लिए प्रशिक्षित कारीगर ऐसे कार्यों की तलाश में रहता है, जहां उसके कौशल की अपेक्षाकृत ऊंची कीमत प्राप्त हो सके. वह यह भी उम्मीद करता है कि उसको बाकी श्रमिकों, विशेषकर अकुशल कामगारों की श्रेणी से अलग और ऊपर माना जाए. मार्क्स के अनुसार बाजार में अपने ऊंचे श्रम-मूल्य के लिए प्रयासरत कुशल कामगार अंततः स्वयं महंगी उपभोक्ता सामग्री का रूप धारण कर लेता है. अन्य उपभोक्ता-सामग्री की भांति बाजार में आकर वह भी स्पर्धा की वस्तु बन जाता है. श्रमिकों के बीच स्पर्धा की अघोषित स्थिति पूंजीवादी व्यवस्था को मजबूत करने का काम करती है. कार्य का छोटे-छोटे समूहों में विभाजन श्रमिकों के बीच श्रम-मूल्य तथा श्रम-शक्ति के आधार पर स्तरीकरण को बढ़ावा देता है. यह स्थिति भी उत्पादक वर्ग के पक्ष में जाती है. क्योंकि श्रम-मूल्य और श्रम-शक्ति के कृत्रिम विभाजन को आधार बनाकर वह श्रमिकों के बीच स्पर्धा बनाए रखने में कामयाब हो जाता है.

श्रम-विभाजन को सिर्फ पूंजीवाद की उत्पत्ति मानना अनुचित होगा. वह उससे पहले भी समाज में अपनी उपस्थिति बनाए हुए था. मनुष्य की प्रकृति पर निर्भर होने के कारण यह संभव भी नहीं है कि हर व्यक्ति सभी कार्यों में समानरूप से दक्ष हो. उसका परिवेश और मानसिक-शारीरिक सामथ्र्य उसको कार्यविशेष की और उन्मुख करता है. उस कार्य में लगातार कार्य करते हुए वह पर्याप्त कौशल प्राप्त कर लेता है. मार्क्स का मानना था कि पूंजीवाद-नियंत्रित कार्यशालाओं तथा फैक्ट्रियों में श्रमिकों के बीच कार्य-विभाजन एकरूपता लिए होता है, दूसरी ओर सामाजिक-मनोवैज्ञानिक कारक उसको समाज के बीच अलग-अलग वर्गों में बांट देते हैं. इससे उसके विभिन्न समूहों के बीच द्वंद्व की संभावना बढ़ जाती है. सामाजिक स्तर पर श्रमिकों का विभाजन भी पूंजीपतियों के लिए हितकारी होता है. मार्क्स का मानना था कि श्रमिकों की संख्या के अनुपात में उत्पादन-वृद्धि के साथ-साथ अधिशेष मूल्य में बढ़ोत्तरी का प्रयास, कालांतर में अकुशल श्रमिकों की संख्या में कमी लाता है. लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था में उत्पादक का ध्यान श्रमिकों की संख्या में वृद्धि से अधिक मशीनों की संख्या में वृद्धि पर होता है. उत्पादन क्षेत्रा में आत्मनिर्भरता बढ़ाने बाजार में एकाधिकार कायम रखने के लिए वह नवीनतम तकनीक के उपयोग पर जोर देता है. अपने दूरगामी हितों को साधने के लिए लाभ का एक हिस्सा नवीनतम तकनीक की खोज पर लगाता है. इससे लाभांश सीमित हाथों में सिमटकर रह जाता है.

11. मशीनों का विकास

मशीनें आधुनिक उत्पादन-तंत्रा की जान हैं. उत्पादन प्रक्रिया के दौरान मशीनरी के उपयोग का वास्तविक उद्देश्य उत्पादकता में अपेक्षित बढ़ोत्तरी करना है. आदर्श स्थिति तो यह होगी कि मशीनें श्रमिक से रोजगार के अवसर छीने बगैर उत्पादन में हिस्सा लें, साथ ही कठिन श्रम और अप्रिय स्थितियों से भी उसकी रक्षा करें. सामान्यतः ऐसा नहीं होता. चूंकि मशीनों का आविष्कार पूंजीपति की महत्त्वाकांक्षा एवं पूंजी के सहयोग से होता है, इसलिए शोध संस्थानों में कार्यरत वैज्ञानिक-इंजीनियर अपने आका पूंजीपति को खुश करने के लिए तकनीक का अधिकाधिक स्वचालीकरण करने पर जोर देते हैं. मशीनों की अभिकल्पना केवल उत्पादकता में वृद्धि को आधार बनाकर की जाती है. श्रमिक की कठिनाई को सामान्यतः नजरंदाज कर दिया है. मार्क्स के अनुसार उत्पादकता में वृद्धि होते ही उपभोक्ता वस्तुएं सस्ते दाम पर उपलब्ध होने लगती हैं. इसी के साथ उत्पादक के लाभांश में वृद्धि होती जाती है. मशीनें उत्पादन-प्रक्रिया के अंतर्गत लगने वाले श्रम को कम कर देती हैं, वे इतना कार्य एक साथ निपटा देती हैं जिसके लिए श्रमिकों की भारी संख्या की जरूरत पड़ती. इस तरह वे एक साथ कई श्रमिकों के कई कार्यदिवसों को छीन लेती हैं, जो उनके जीवन की अनिवार्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आवश्यक हैं. परिणामस्वरूप श्रमिकों के हाथों से काम खिसकने लगता है. मशीनों के आ जाने से पूंजीपति की उत्पादकता पर कोई असर नहीं पड़ता, बल्कि वह लगातार वृद्धि की ओर अग्रसर होती है.पूंजीपति सुनियोजित तरीके से तकनीकी शोध एवं विकास पर जोर देता है, ताकि उसकी श्रमिकों पर कम से कम निर्भरता हो. इस प्रकार वह पूंजी के दम पर विद्रोह की तमाम स्थितियों से निपटने में सक्षम होता जाता है. मशीनों की कार्यक्षमता में होने वाला निरंतर सुधार पूंजीपति के हितों की रक्षा करता है, लेकिन श्रम-शोषण और बेरोजगारी को बढ़ावा देने का माध्यम भी बनता है. उत्पादन-प्रक्रिया में श्रम-मूल्य घटने से श्रमिक को होने वाली आय में भी गिरावट आती है. परिणाम यह होता है कि जीवन के न्यूनतम स्तर से समझौता कर लेने के बावजूद अपने जीवन की न्यूनतम जरूरतों को पूरा करने के लिए भी उसको अधिक देर तक कार्य करना पड़ता है.

मार्क्स मशीन, औजार तथा उनकी कार्यविधियों में अंतर करके देखता था. उसने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया था कि बहुत से विशेषज्ञ, जिनमें वैज्ञानिक, इंजीनियर, अर्थशास्त्री आदि सभी सम्मिलित हैं, औजार और मशीन के मूलभूत अंतर को समझने में अक्षम होते हैं. वे औजार को प्रायः मशीन का पूरक या उसका लघु संस्करण मानते हैं—

‘वे औजार को साधारण मशीन एवं मशीनों को संश्लिष्ट औजार कहकर पुकारते हैं.’

औजारों के संचालन के पीछे मनुष्य का प्रयोजन और उसका श्रम कार्यकारी शक्ति के रूप में उपस्थित होता है. जबकि मशीन का संचालन ऊर्जा के मानवेत्तर स्रोतों यथा पशु,विद्युत, जल, वायु आदि द्वारा किया जाता है. इस आधार पर पशुओं द्वारा खींचा जाने वाला हल या बैलगाड़ी को मशीन कहना चाहिए तथा करघा जो मनुष्य द्वारा संचालित होता है,औजार है. पुस्तक में मार्क्स ने क्लाजेन द्वारा निर्मित वृताकार करघे का उदाहरण दिया था,जिसको एक मजदूर चला सकता था. वह अत्यंत तीव्र गति से बुनाई करता था तथा एक बार में कई बुनकरों जितना काम करने में सक्षम था. उसका मानना था कि मशीन और औजार के अंतर का साधारणीकरण अनेकानेक समस्याओं को जन्म देता है. वह चाहता था कि इस बारे में सरकार, उद्योगपति समेत सभी संबंधित पक्षों की स्पष्ट नीति होनी चाहिए.मशीन को परिभाषित करते हुए मार्क्स ने लिखा है—

‘मशीन वस्तुतः एक ऐसी यांत्रिक युक्ति है, जब उसको गतिशील किया जाता है तो वह अपने यंत्रों/पुर्जों के माध्यम से सामान्यतः उन्हीं क्रियाओं का निष्पादन करती है, जिन्हें मनुष्य उससे पहले औजारों के माध्यम से करता आया था. यह बात महत्त्वहीन है कि उस मशीन को संचालन-ऊर्जा चाहे किसी मनुष्य द्वारा प्राप्त हो अथवा किसी अन्य स्रोत से आयातित.’

मार्क्स का मानना था कि पूंजीवादी व्यवस्था की जान आधुनिक विशाल संयंत्रा अठारहवीं शताब्दी में आविष्कृत सरल मशीनों द्वारा विकसित हैं. मशीनों का विकास मूलरूप से उन शिल्पकारों द्वारा किया गया है, जो अपने श्रम-कौशल से उत्पादकता की जिम्मेदारी संभालते थे. उन्होंने शिल्पकला को उद्योगों में बदलकर औद्योगिक क्रांति की शुरुआत की थी. हालांकि उनका प्रारंभिक ध्येय उत्पादन प्रक्रिया को सरल एवं कम परिश्रम-युक्त बनाना था. इस कारण ये मशीनें शिल्पकारों को स्थानापन्न करने में सक्षम थीं. वे उन सभी कार्यों को सफलतापूर्वक, बहुत कम समय में, परिष्कृत ढंग से अंजाम दे सकती थीं, जिन्हें उनसे पहले सिर्फ कुशल शिल्पकार ही कर पाता था. साथ ही एक मशीन एक साथ कई शिल्पकारों की भरपाई, लंबे समय तक और बिना किसी मानवीय थकान के कर सकती थी. मशीनों का डिजाइन और निर्माण इस प्रकार किया जाता है कि कारखाने में एक के बाद एक लगी हुई मशीनें, एक-दूसरे की सहयोगी और पूरक की भांति कार्य करती हैं तथा दूसरी मशीनों के साथ मिलकर एक उत्पादन-चक्र को पूरा करती हैं. मशीनों का निरंतर परिष्करण शिल्पकारों पर उनकी निर्भरता को कम से कम करता जाता है. औजार के सामने शिल्पकार के मूल्य होता है. इसलिए पूर्व-मशीनीकृत उत्पादन व्यवस्था में उसका सम्मान होता था. मशीन के आगमन के बाद उसकी हैसियत एक पुर्जे तक सिमटती गई.और अब स्वचालीकरण के बाद तो वह मशीनों पर निर्भर होकर रह गया है. स्वचालित मशीनें उसको स्वयं निर्देश देती हैं. एक स्थिति ऐसी भी आती है, जब मशीनें सारी उत्पादन-प्रक्रिया को स्वयं संभाल लेती हैं. स्वचालन की इस अवस्था में कारखाना मालिक की श्रमिकों-कामगारों पर निर्भरता न्यून हो जाती है. मशीनें कारीगरों से उनका हुनर और रोजगार छीन लेती हैं. मुनाफे का बड़ा हिस्सा स्वयं हड़पने के लिए पूंजीवादी व्यवस्था उत्पादन-तंत्रा के अधिक से अधिक स्वचालन पर जोर देती है. स्वचालीकरण के क्रम में मनुष्य के शिल्प-कौशल की महत्ता निरंतर घटती जाती है. परिणामस्वरूप उसकी उपेक्षा होने लगती है. यह स्थिति पूंजीपति को उत्पादन की असीमित शक्तियां सौंप देती है.

मशीनीकरण के आरंभिक दौर का विश्लेषण करता हुआ मार्क्स उनके रोचक विकासक्रम की ओर संकेत करता है. उसके अनुसार आविष्कारकों द्वारा मशीनों का विकास उत्पादन प्रक्रिया के कुछ खास चरणों को सफलतापूर्वक पूरा कर लेने की दृष्टि से किया था. उस समय यह सोचा गया था कि मशीनें आदमी को जानलेवा श्रम से मुक्ति दिलाकर उसके जीवन को आनंदमय बनाने का काम करेंगी. वे मनुष्यता के लिए, खासकर उस वर्ग के लिए जो अपने श्रम और कौशल पर जीवित हैं, अपेक्षाकृत आरामदेय और सुखमय जीवन प्रदान करेंगी. इसीलिए बेकन जैसे दार्शनिक ने मशीनों का स्वागत खुले दिल से किया था.लेकिन हुआ यह कि मशीनें लगातार बड़ी होती गईं और जो श्रम आवश्यक वस्तुओं के निर्माण में लगना चाहिए, वह मशीनों के निर्माण पर खर्च होने लगा. आदमी मशीनों के उत्पादन में जुट गया. अब तक न जाने कितनी मशीनों का आविष्कार हो चुका है और न जाने कितनी मशीनों के आविष्कार पर काम चल रहा है. मगर देखने में आया है कि जैसे-जैसे मशीनों का विकास होता है, नई और अधिक उत्पादन क्षमतायुक्त मशीन की जरूरत महसूस की जाने लगती है, जो उपलब्ध मशीन को कुछ ही अर्से में पुराना माॅडल घोषित कर देती है. एक मशीन तत्काल दूसरी मशीन की जरूरत को विस्तार देती है.पूंजीवादी उत्पादन प्रक्रिया में उत्पादन कई चरणों में बंटा होता है. उत्पादनतंत्रा में निरंतरता बनाए रखने के लिए उसके विभिन्न चरणों के बीच तारतम्यता बनाए रखना आवश्यक होता है. इसलिए एक मशीन तत्काल दूसरी मशीन की आवश्यकता को बढ़ावा देने लगती है. उदाहरण के लिए बुनाई मशीन की खोज ने छपाई और रंगाई मशीन के आविष्कार को भी बढ़ावा देने का काम किया है. एक मशीन का निर्माण दूसरी उसी प्रकार की मशीनों को संतुष्टि प्रदान करता है. मार्क्स कहता है कि मशीनें अपने उत्पादन के आधार पर एक-दूसरे से संबद्ध होती हैं, जैसे कि—

‘भाप के इंजन के अभाव में हाइड्रोलिक प्रेस का आविष्कार असंभव था. हाइड्रोलिक प्रेस ने आगे चलकर खराद मशीन और कटिंग मशीन के आविष्कार पर जोर दिया. श्रम का भौतिकवादी आचरण प्राकृतिक श्रम के हाथों मानवीय श्रम की अदला-बदली को आवश्यक बना देता है.’

यह स्थिति पूंजीपति व्यवस्था के लिए लाभकारी होती है, क्योंकि उस अवस्था में वह श्रम को एक उपभोक्ता सामग्री की भांति प्रयोग करता है. बाजार में आने से श्रम के बीच स्पर्धा की स्थिति पैदा हो जाती है, जो प्रकारांतर में पूंजीपति के लिए मददगार सिद्ध होती है.यही कारण है कि भारी-भरकम निवेश की जरूरत के बावजूद पूंजीपति अनुधनातन प्रौद्योगिकी का ही विकल्प चुनता है.

12. मशीन द्वारा उत्पाद को अंतरित मूल्य

गहन विश्लेषण के उपरांत मार्क्स इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि मशीनें मानव-ऊर्जा द्वारा चलने वाले औजारों का स्थानापन्न नहीं हो सकतीं. वे मानवीय श्रम एवं कौशल का हनन कर सकती हैं. उसकी अस्मिता के लिए चुनौती बन सकती हैं. मगर औजार हमेशा ही मानवीय श्रम-कौशल के हितैषी हों, ऐसा भी नहीं है. जब कई औजार एक साथ मिल जाते हैं, जो उन्हें मानवीय श्रम से चला पाना संभव नहीं रह जाता. तब वे एक मशीन का रूप ले लेते हैं. उस अवस्था में कारीगर औजारों से काम नहीं लेता, बल्कि उसको मशीन जो औजारों का ही जटिल समुच्चय है, से जूझना पड़ता है. कई बार वे उन सारी क्रियाओं को अपने अधीन कर लेते हैं, जिनसे कभी श्रमिक का कौशल झलकता था. औजार समुच्चय अथवा मशीन के समकक्ष श्रमिक की योग्यता मात्रा सहायक की रह जाती है. बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठान अधिकतम उत्पादन के लिए उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ तकनीक का चयन करते हैं. इसके लिए वे ध्यान रखते हैं कि उनकी श्रमिक पर कम से कम निर्भरता हो.

तदनुसार पूंजीवादी व्यवस्था में उत्पादन वृद्धि का अभिप्राय यह नहीं है कि श्रममूल्य तथा रोजगार के अवसरों में भी उसी अनुपात में वृद्धि होगी. इसलिए कि मशीन अपने आप में किसी भी मूल्य का सृजन नहीं करती. बल्कि अंततः वह श्रमिक की मूल्यवत्ता का ही हनन करती है, जिसको उत्पादकता में बदला जा सकता था और जिसका उपयोग मशीनों के आने से पहले, उत्पादन के स्तर को बनाए रखने के लिए अतीत में भी होता रहा है.मार्क्स का मानना था कि केवल पूंजीपतियों द्वारा क्रय की गई श्रम-शक्ति ही मूल्य का सृजन कर सकती है. मशीन केवल मूल्य का अंतरण कर सकती है, जो उसके अपने मूल्य के समानुपाती होता है. यह अंतरण उत्पाद के मूल्य में वृद्धि के लिए जिम्मेदार होता है.मार्क्स के अनुसार—

‘मशीन की जितनी अधिक उत्पादकता होगी, उत्पाद को अंतरित मशीन-मूल्य उतना ही कम होगा.’

मार्क्स का यह निष्कर्ष बड़े काम का है. उसके अनुसार उत्पाद के मूल्य और मशीन के मूल्य में कोई सीधा संबंध नहीं होता. संबंध होता है मशीन की उत्पादकता का. मान लीजिए कोई पूंजीपति पुरानी मशीन के स्थान पर नई प्रौद्योगिकी ये युक्त मशीन बदलना चाहता है, जिसका मूल्य पुरानी मशीन की अपेक्षा दो गुना है. नई मशीन पुरानी की अपेक्षा चार गुना उत्पादन करने में सक्षम है. ऐसे में उत्पादक दो गुनी कीमत देकर भी नई तकनीक युक्त मशीन खरीदने को उत्सुक होगा. इसलिए कि उसके उत्पाद की मशीनी लागत घटकर आधी रह जाएगी. इसके विपरीत श्रमिक की सीमा होती है. यदि किसी मालिक को अपने उत्पादन को दो गुना करना है तो उसको दुगुनी श्रमशक्ति की आवश्यकता होगी. इससे उत्पाद की निर्माण लागत अपरिवर्तित बनी रहेगी. यही कारण है कि पूंजीपति भारी-भरकम निवेश के बावजूद नई प्रौद्योगिकी खरीदने को उत्सुक रहता है.उसके लिए शोध पर भारी-भरकम निवेश करता है.

मशीनरी के उपयोग का सामान्य सिद्धांत यह है कि किसी मशीन अथवा मशीन-समुच्चय द्वारा उत्पाद विशेष के निर्माण में लगा श्रम उस उत्पाद के निर्माण में लगे मानवीय श्रम से कम होना चाहिए. यदि ऐसा नहीं है तो मशीन का उपयोग अर्थहीन हो जाएगा. उस अवस्था में पूंजीपति मशीन में निवेश के बजाय सीधे मजदूर से काम लेना पसंद करेगा.मशीन का उपयोग लाभ के बजाय घाटे का सौदा बन जाएगा.

13. फैक्ट्री और कामगार

मार्क्स के आर्थिक चिंतन की विशेषता यह है कि वह उत्पादन और उससे संबद्ध प्रत्येक पहलु की गंभीर विवेचना करता है. चाहे वह मशीन हो अथवा पूंजी. अपने चिंतन को आगे बढ़ाते हुए वह लिखता है कि पूंजी को उत्पादन प्रक्रिया में संवृत्त होने के लिए, पूंजीधारक को एक ऐसे स्थल की आवश्यकता होती है, जहां पर श्रम और मशीन के कार्यकलापों को उत्पाद में बदला जा सके. यह स्थल फैक्ट्री कहलाता है. लेकिन फैक्ट्री अथवा कारखाना केवल भौगोलिक स्थल अथवा मशीनरी का ठिकाना मात्रा नहीं होता, बल्कि वह एक मशीन,उत्पाद, श्रम एवं श्रमिक के अंतःसंबंधों, सहयोगात्मक प्रकार्यों, निर्देशक शक्तियों,नियमों-विनियमों की संपूर्ण व्यवस्था होती है. फैक्ट्री को परिभाषित करते हुए मार्क्स ने लिखा है. इस विवरण से मशीन एवं श्रम-शक्ति के अंतःसंबंधों को समझा जा सकता है—

‘‘सामान्यतः एक ही प्रकार के कार्य में प्रवृत्त विभिन्न स्तर के,वयस्क एवं युवा कामगारों, उत्पादक मशीनों की संयुक्त कार्यवाही,जो लगातार किसी केंद्रीय शक्ति अथवा सर्वप्रमुख संचालक द्वारा प्रेरित और निर्देशित होते हैं…’ दूसरे शब्दों में, ‘अनेकानेक मशीनों और सुविज्ञ कर्मिकों से बना एक व्यापक स्वचालन तंत्र जो किसी सामान्य उत्पाद के निर्माण हेतु निरंतर-निर्बाध कार्यरत हों; तथा वे सभी किसी स्वतः अनुशासित, प्रेरक शक्ति के प्रति उत्तरदायी हों.’’

उपर्युक्त विवेचन के दोनों खंड प्रथम दृष्टया एक ही जैसे जान पड़ते हैं, किंतु यदि गहराई से पड़ताल की जाए तो दोनों में पर्याप्त अंतर है. विवरण के पूर्वार्ध में श्रमिक अथवा संगठित श्रम-शक्ति मशीनों से स्वतंत्रा दिखाई पड़ती है. इस तरह उसकी मशीन के समानांतर सत्ता है. इसलिए उत्पादन व्यवस्था में उसका महत्त्व भी है. विश्लेषण के दूसरे हिस्से में मशीनें स्वचालित होकर प्रधान भूमिका में हैं, वहां श्रमिक अथवा कारीगर की भूमिका एक मशीन के सहायक या उपांग की है, जिसका अपना कौशल मशीन की योग्यता के आगे महत्त्वहीन हो जाता है. इस अवस्था का लाभ उठाकर पूंजीपति श्रमिक की मजदूरी में कटौती करता जाता है.

मशीनीकरण के आरंभ में कामगार के श्रम-कौशल का महत्त्व होता था. मशीनें तब औजारों का समुच्चय मात्रा थीं. अतएव कारखाना मालिक मशीनों के साथ दक्ष कामगारों पर भी समानरूप से निर्भर होता था. इसलिए औद्योगिकीकरण के आरंभिक दौर में उन्हीं को रोजगार मिला था, जो उस पेशे में दक्ष थे. पूंजी के विस्तार के साथ-साथ जैसे-जैसे मशीनांे का स्वचालन होता गया, कुशल कामगारों पर उनकी निर्भरता उत्तरोत्तर घटती गई.आधुनिक पूंजी-आधारित उद्यमों की विशेषता है कि उनमें मशीनों के आगे श्रमिक की भूमिका लगातार गौण होती जाती है. पूंजी-आधारित कारखानों में श्रमिकों के औजार,जिनके माध्यम से उसका हस्तकौशल उत्पादकता में बदलता है, लुप्तप्रायः हो जाते हैं.उसकी हुनरमंदी का स्थान मशीनें ले लेती हैं. यह सच है कि फैक्ट्रियां श्रम-विभाजन एवं शिल्प-विशेषज्ञता का भरपूर उपयोग करती हैं, बल्कि पूंजीवादी दबावों के अंतर्गत यह विभाजन और स्तरीकरण कई बार विस्फोटक रूप धारण कर लेता है. उल्लेखनीय है कि कारखानों में प्रायः दो प्रकार से काम लिया जाता है. पहली श्रेणी में वह कार्य आता है,जिसमें श्रमिक मशीन पर कार्यरत होते हैं. जबकि दूसरी श्रेणी में श्रमिक मशीनों का प्रेक्षक-मात्रा होता है. इनके अतिरिक्त फैक्ट्रियों में, वहां कार्यरत अथवा बाहर से बुलाए गए श्रमिकों का तीसरा वर्ग भी हो सकता है, जो मरम्मत और रखरखाव के काम में दक्ष हांे.कारखानों में ये सभी एक-दूसरे के सहयोगी और पूरक के रूप में कार्य करते हैं. उन सभी का एक ही ध्येय होता है. अपनी सम्मिलित कार्यक्षमता और परिश्रम से कारखाने को लाभ की स्थिति में बनाए रखना. मजदूर अपने स्वेद से मालिक के उद्यम को सोना उगलने वाले कारखानों में तब्दील करता है. मगर उनसे होने वाले लाभ पर मालिक का एकाधिकार होता है, जिससे उसका मौलिक सोच, शिल्पकर्म दम तोड़ने लगता है.

लोकतांत्रिक सरकारों में यह संभव है कि सरकार अथवा पूंजीपति हस्तकला एवं शिल्पकर्म के संरक्षण के नाम पर योजनाएं बनाएं. आधुनिक समाज में सरकारें अक्सर ऐसा ही करती हैं. लेकिन उनके संरक्षण के बावजूद मूल उत्पादन व्यवस्था में किसी भी प्रकार का योगदान न होने के कारण उनकी स्थिति दोयम दर्जे की हो जाती है. वे कलाएं जिनके आधार पर मशीनीकरण से पहले पूरी उत्पादन व्यवस्था निर्भर थी, केवल दिखावे और कभी-कभी तो दया की पात्रा मान ली जाती हैं. विडंबना यह है कि इस नियति को बदलने के लिए न तो सरकार कुछ कर पाती है, न शिल्पकारों के संगठन. बल्कि वहां भी पूंजीपति बिचैलिए के रूप में उपस्थित होकर बाजार पर कब्जा जमा लेता है. इससे शिल्पकारों को भी उनकी कृति का वास्तविक मूल्य नहीं मिल पाता.

पूंजीवादी व्यवस्था में, जब तक बाहरी बाध्यता न हो, आमतौर पर कम वयस् के बच्चों को भी नौकरी पर रखा जाता है. ताकि वे वहां की परिस्थितियों, कानूनों और अनुशासन के अनुरूप स्वयं को ढाल सकें. साथ ही स्वचालित मशीनों के संग काम करते हुए उनके साथ अपनी कार्यशैली का अनुकूलन कर सकें. मार्क्स के अनुसार ये सभी स्थितियां मनुष्य के मानसिक विकास की अवरोधक होती हैं. फैक्ट्रियों का माहौल श्रमिकों से उनकी मूलभूत जरूरतों यथा स्वच्छ हवा, मुक्ताकाश, सुरक्षा, संवेदनशीलता, प्रकाश, स्वतंत्रा निर्णय लेने की आजादी को छीन लेता है. उल्लेखनीय है कि जिस समय मार्क्स ने पूंजी का लेखन किया,उन दिनों तक फैक्ट्रियों में काम करने वाले बालश्रमिकों पर रोक के लिए ठोस कानूनी प्रावधानों का अभाव था. जो कानून थे, वे सभी ढुलमुल, अस्पष्ट और मालिकों का पक्ष लेने वाले थे. मार्क्स की भांति फ्यूरियर ने भी बड़े कारखानों को श्रमिक हितों के विरुद्ध माना था. उसने फैक्ट्रियों को ‘उत्पीड़क कार्यशालाएं’ कहते हुए उनसे बचाव की सलाह दी थी. मार्क्स ने भी फैक्ट्रियों को पूंजीपतियों के लिए एकतरफा लाभ पहुंचाने वाला उद्यम माना, लेकिन वह वह फ्यूरियर की स्थापना से असहमत था.

पुस्तक के अगले चरण में मार्क्स उन स्थितियों और विचारों की विशद् समीक्षा करता है,जिनके आधार पर वह अभी तक मशीनों और कारखानों का विरोध करता आ रहा था.किसी समय मशीनों पर नियंत्राक की भूमिका निभाने वाला श्रमिक जब मशीन का पूरक या सहायक मात्रा बनकर रह जाता है, तब उसके मन में असंतोष पनपने लगता है.हालांकि एकाकी असंतोष की परिणति सामान्यतः व्यक्तिगत कुंठाओं और क्षोभ के रूप में ही सामने आती है. इनकी सतत और लंबे समय तक मौजूदगी प्रकारांतर में श्रमिकों के मन में आक्रोश को जन्म देती है, जिससे उनके मध्य से विरोधी स्वर उभरने लगते हैं.स्मरणीय है कि यहां मार्क्स नवीनतम प्रौद्योगिकी तथा उसके आधार पर विकसित मशीनों का विरोध नहीं करता. बजाय इसके वह सीधे-सीधे पूंजीवादी व्यवस्था की आलोचना करता है, जो श्रमिक से उसका मनुष्यत्व छीनकर उसको मशीन के मामूली पुर्जे की हैसियत तक अवमूल्यित कर देती है. वह लिखता है—

‘परंपरागत औजारों और पूंजी-आधारित उद्यमों में नवीनतम प्रौद्योगिकी पर आधारित रोजगार में अंतर करने में श्रमिकों का ढेर सारा समय और अनुभव लगा; और इस प्रकार वे अपना सारा ध्यान उत्पादन का मूलभूत औजार बनने के बजाय एक ऐसा समाज बनाने में लगा सके, जो उन औजारों का उपयोग कर सके.’

मार्क्स के अनुसार मशीन शिल्पकारों, कारीगरों के साथ स्पर्धा में रहती है, और इस प्रकार वह श्रम-शक्ति के उपयोग-मूल्य में गिरावट का कारण बनती हैं. गहन विश्लेषण के उपरांत मार्क्स ने स्पष्ट किया था कि मशीनें दक्ष कामगार को हटाकर उसके स्थान पर अकुशल अथवा अर्धकुशल कर्मचारी को ले आती हैं, जिसकी परिणति मजदूरी में नकारात्मक प्रभाव के रूप में देखने को मिलती है. इससे समाज में मानवीय कौशल की महत्ता तथा लोगों में खुद को परिष्कृत करने की ललक घटने लगती है. स्वचालित मशीनें अकुशल कामगारों द्वारा भी संचालित हो सकती हैं. परिणामस्वरूप समाज में दक्ष कामगारों की संख्या लगातार घटने लगती है. दूसरी ओर बालश्रमिकों की संख्या और पूंजीपतियों के लाभ में लगातार वृद्धि होती जाती है. इस लाभ के एक हिस्से का उपयोग पूंजीपति मशीनों के कार्यकुशलता को और अधिक बढ़ाने के लिए शोध आदि पर करता है, जिससे श्रम-शोषण की नई स्थितियों का जन्म होने लगता है.

पुस्तक में मार्क्स ने राजनीतिक अर्थशास्त्रियों के क्षतिपूरक सिद्धांत की आलोचना की है.पूंजीवाद के समर्थक इन अर्थशास्त्रियों का कहना था कि मशीनीकरण की प्रक्रिया जितने श्रमिकों को बेदखल करती है, वह अनिवार्यतः उतनी ही सचल पूंजी की बचत भी करती है,जो उससे पहले तक श्रमिकों को वेतन-मजदूरी आदि के रूप में अदा की जाती थी. यह राशि आगे भी इसी मद में उपयोग की जाती है, जिससे अन्य श्रमिक लाभांन्वित होते हैं और इस प्रकार उन्हें अब तक हुए नुकसान की भरपाई सामान्यतः हो ही जाती है. इस तर्क के विरोध में मार्क्स का कहना था कि मशीनीकरण की प्रक्रिया में अस्थायी अथवा चल पूंजी स्थायी पूंजी का रूप ले लेती है. मालिक अवशेष पूंजी का उपयोग नवीनतम प्रौद्योगिकी, जो प्रायः श्रम-विरोधी होती है, की खरीद के लिए करता है, जिसका सीधा प्रभाव कारखाने में श्रमिकों की संख्या पर पड़ता है. अतएव बची हुई चल पूंजी का उपयोग श्रमिकों की मजदूरी आदि के रूप में करना इसलिए भी संभव नहीं है, क्योंकि वह पहले ही उन्नत तकनीकी युक्त मशीनों में निवेश कर दी जाती है, जो उद्योग-स्वामी की परिसंपत्ति कहलाती है. यदि कुछ राशि बचती भी है तो भी क्षतिपूर्ति के लिए उपलब्ध कुल धनराशि उस राशि से बहुत कम होती है, जिसका उससे पहले श्रम-शक्ति की खरीद के लिए उपयोग किया जाता था. इसके अलावा अवशेष अस्थायी पूंजी का उपयोग नवीनतम मशीनरी के संचालन हेतु विशेषज्ञ-शिल्प पर व्यय होता है, जिसके फलस्वरूप अधिक से अधिक धन स्थायी पूंजीनिवेश के काम आता है. प्रौद्योगिकी में होने वाले निरंतर सुधार के फलस्वरूप जिन कामगारों से काम छूटता है, उनको तत्काल प्रभाव से क्षतिपूर्ति संभव नहीं होती. इस तरह कारखानों से बेदखल हुए श्रमिक बेरोजगार श्रमिकों की संख्या में चिंताजनक वृद्धि का कारण बनते हैं, जो अंततः श्रमिकों के शोषण और प्रकारांतर में उनकी दुर्दशा का कारण बनते हैं. मार्क्स यह तो स्वीकार करता था कि मशीनों के क्षेत्रा में हुए नए आविष्कार नए क्षेत्रों में रोजगार सृजन को बढ़ावा दे सकते हैं, लेकिन इससे पूंजी के बढ़ते वर्चस्व और श्रमिक की शोषणकारी प्रवृत्तियां कम होने के बजाय उत्तरोत्तर बढ़ती जाती हैं. स्पष्ट है कि प्रौद्योगिकी के क्षेत्रा में होने वाला लाभ एकतरफा होता है. मशीनें मजदूर के अतिरिक्त श्रम की बचत तो करती हैं, मगर वे उससे उसका शिल्प भी छीन लेती हैं, जिसके कारण उसको पूंजीपतियों पर आश्रित होकर रह जाना पड़ता है.

उत्पादकता में वृद्धि का सकारात्मक प्रभाव निश्चित रूप से उन क्षेत्रों पर भी पड़ता है, जो उसके लिए कच्चेमाल की आपूर्ति करते हैं. इसको ऐसे भी कहा जा सकता है कि कच्चेमाल की आपूर्ति के क्षेत्रा में नई मशीनरी का आगमन, उसके उपभोग से संबंधित उद्योगों के विकास को भी समानुपातिक गति देता है. कुल मिलाकर इससे पूंजीपति वर्ग के लाभ में भी वृद्धि होती है. यह अधिशेष वृद्धि प्रकारांतर में शासक वर्ग की कुल संपदा में बढ़ोत्तरी का कारण बनती है, जिसका उतना ही असर श्रमिक-बाजार पर भी पड़ता है, जो अंततः नए उद्योगों के विकास का रास्ता खोल देता है. नए उद्योग श्रमिकों के रोजगार के नए ठिकाने बनते हैं. क्योंकि तब तक श्रम-विरोधी प्रौद्योगिकी उनके शोषण एवं बेदखली के नए क्षेत्रा विकसित कर चुकी होती है. इस विश्लेषण के उपरांत मार्क्स इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि स्थानीय सेवा-आधारित उद्योगों में हुई वृद्धि उसी अनुपात में उत्पीड़ित वर्ग की संख्या और उत्पीड़क-स्थितियों में वृद्धि करती जाती है.

आगे इसी अध्याय में मार्क्स मशीनों के विकास के प्रति श्रमिकों के आकर्षण और विकर्षण पर चर्चा करता है. इसके लिए वह उनीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में कपास उद्योग पर आए संकट को माध्यम बनाता है. वह लिखता है कि राजनीतिक अर्थशास्त्री तर्क देते हैं कि मशीनीकरण से बेदखल हुए मजदूरों को अन्य क्षेत्रों में आसानी से रोजगार मिलता रहता है, जो मशीनीकरण के कारण उत्पन्न लेते हैं. अपने तर्क को स्पष्ट करने के लिए वह सिल्क उद्योग का उदाहरण देता है, जिसमें मशीनीकरण के कारण आई रोजगार अवसरों में गिरावट की भरपाई उसी क्षेत्रा में मशीनों की संख्या के फलस्वरूप होती जाती है. दूसरे शब्दों में—

‘कार्यरत फैक्ट्री-श्रमिकों की संख्या में हुई आनुपातिक वृद्धि उससे मिले-जुले क्षेत्रों में हुई औद्योगिक वृद्धि का परिणाम होती है, साथ ही यह नए कारखानों का निर्माण अथवा पुरानी फैक्ट्रियों का विस्तार है.’

मार्क्स का तर्क था कि फैक्ट्री कामगारों की संख्या में आनुपातिक वृद्धि इसलिए जरूरी है क्योंकि मशीनीकरण के कारण बेरोजगार हुए श्रमिकों की संख्या और नई मशीनों के परिचालन के लिए आवश्यक यानी उनके माध्यम से रोजगार-प्राप्त श्रमिकों की संख्या में भारी अंतर होता है. पूंजीवाद में निरंतर वृद्धि तथा उसके प्रयासस्वरूप हुए तकनीकी सुधार,उपभोक्ता वस्तुओं के बाजारों की संख्या में उस समय तक वृद्धि करते हैं, जब तक कि वे दुनिया के प्रत्येक कोने तक फैल नहीं जातीं, जो अंततः पूंजीपतिवर्ग के लिए वैभव और संपन्नता तथा श्रमिकवर्ग के लिए विपत्तिचक्र का कारण बनती हैं. लंबे विश्लेषण के बाद मार्क्स इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि तकनीकी सुधारों के लिए श्रमिकवर्ग का विकर्षण और आकर्षण वस्तुतः वह क्रमिक आवृत्ति है, जिसमें मशीनीकरण के कारण रोजगारविहीन हुए श्रमिकों की संख्या उत्पादकता-वृद्धि को जन्म देती है. इसकी प्रतिक्रिया नए क्षेत्रों में औद्योगिक विस्तार और तदनुसार श्रमिकों को मिले अतिरिक्त रोजगार के रूप में सामने आती है. यह शृंखला नए क्षेत्रों में औद्योगिक विस्तार तथा परिवर्तनशील श्रम-शक्ति को जन्म देती है, जो स्वचालीकरण की प्रक्रिया में लगातार सहायक की भूमिका में आती रहती है, परिणामस्वरूप मशीनरी आदि के रूप में पूंजी का एक ही स्थान पर संकेंद्रण होता जाता है, जो पूंजीपति को और ताकतवर एवं श्रमिकों से उनकी निर्णय लेने की स्वतंत्राता को छीनकर कमजोर और पर-आश्रित बनाता है.

14. परम अधिशेष और आनुपातिक अधिशेष का सृजन

‘दि कैपीटल’ के सोलहवें अध्याय में मार्क्स कारखाना मजदूरों की व्यक्तिगत उत्पादक गतिविधियों के अनेक श्रमिकों के सामूहिक प्रयास में बदल जाने के प्रभावों का वर्णन करता है. विरोधाभास देखिए कि व्यक्तिवाद को अपने लिए हितकारी मानने तथा अपने व्यावसायिक हितों के लिए उसका लाभ उठाने वाला पूंजीपति वर्ग श्रमिकों के मामले में एकदम विपरीत आचरण करता है. बाजार के विस्तार के लिए वह चाहता है कि परिवार का प्रत्येक सदस्य, अन्य सदस्यों के साथ उपलब्ध सुविधाओं में साझा करने के बजाय अपने लिए निजी सुविधाएं खरीदे. हर सदस्य के पास अपनी निजी टेलीफोन, मोबाइल,कंप्यूटर, कार, मोटर साइकिल वगैरह हों. इनमें से एक भी सुविधा उसको परिवार के सदस्यों के साथ बांटनी न पड़े. इसके लिए वह जाॅन स्टुअर्ट मिल जैसे व्यक्ति-स्वातंत्रय के समर्थक दार्शनिकों का तर्क देता है. चूंकि लोकतंत्रा व्यक्तिवाद का ही सुसंस्कृत रूप है,इसलिए चाहे-अनचाहे वह लोकतंत्रा का भी समर्थन करता है. किंतु श्रमिक से काम लेते समय वह उसके निजी कौशल की सतत उपेक्षा करता है. वह चाहता है कि मशीनें इतनी सक्षम हों कि उसको कुशल श्रमिकों पर निर्भर रहना ही न पड़े. वह जानता है कि काम को करने वाले जितने अधिक होंगे, उतनी ही उनके बीच स्पर्धा होगी, जो अंततः उसके लिए लाभकारी होगी.

मार्क्स का मानना था कि यह प्रक्रिया श्रमिकों को उपभोक्ता वस्तुओं के वास्तविक उत्पादन से परे ले जाकर पूंजीपति को इस बात का पूरा अवसर देती है कि वह उसका उपयोग केवल अपने अधिलाभ की वृद्धि हेतु कर सके. जबकि अधिशेष में वृद्धि संपूर्ण प्रविधियों यथा कार्य-दिवस का विस्तार, कार्यघंटों में वृद्धि और उसके अनुसार उत्पादकता में वृद्धि के आधार पर ही संभव है. श्रमिकों का उपभोक्ता सामग्री के उत्पादक के बजाय उत्पादकों के भले के लिए काम करना, पूंजीवाद के विकास के लिए आवश्यक है. पूंजीवाद से पहले कामगार और शिल्पकर्मी प्रायः निजी उपयोग के लिए अनिवार्य समझी गई वस्तुओं का उत्पादन करते थे. कालांतर में औजारों के सहयोग से, उन्होंने अपनी आवश्यकता से इतर वस्तुओं का उत्पादन आरंभ किया तो श्रम और मजदूरी के बीच आदान-प्रदान की प्रक्रिया आरंभ हुई. श्रमिकगण प्राप्त मजदूरी से जीवन के लिए अनिवार्य वस्तुओं की खरीद-फरोख्त करने लगे. श्रम का मजदूरी के बदले अंतरण पूंजीपतियों को अपने हितों के अनुकूल लगा.उन्होंने मजदूरों को इसके लिए उत्साहित किया. प्रारंभ में पूंजीपतियों द्वारा उत्पादन-विशेष के लिए प्रदान की गई मजदूरी, इतनी होती थी कि उसके सहारे श्रमिक अपनी सामान्य आवश्यकताओं को पूरा कर सके, मगर वह उस राशि से बहुत कम थी, जिसे वे उत्पादक के रूप में स्वयं अर्जित करने में सक्षम थे. आगे चलकर जैसे-जैसे मशीनें उत्पादन की जिम्मेदारी निभाने में सक्षम होती गईं, पूंजीपति श्रमिकों की उपेक्षा करने लगा. यही नहीं वे सारे कार्य जो कुशल शिल्पकर्म की अपेक्षा रखते थे और जिन्हें श्रमिकों द्वारा आसानी से कराया जा सकता था, उन्नत तकनीकयुक्त मशीनों के माध्यम किए जाने लगे. दूसरे शब्दों में उन्हें अब दक्ष कामगारों की आवश्यकता ही नहीं थी. हालांकि कुछ मशीनें ऐसी भी विनिर्मित हुईं, जिनके परिचालन के लिए विशिष्ट प्रशिक्षण की आवश्यकता थी. इसके लिए पूंजीपतियों ने कुछ नए पद सृजित किए और अपेक्षाकृत अधिक वृत्तिका देकर काम चलाया. साथ ही उन्हें बाकी श्रमिकों से अलग बताते हुए दोनों के बीच कृत्रिम अंतर का दिखावा किया, जिससे कि उनके बीच की दूरी सदैव बनी रहे. ऐसे पदों की संख्या बहुत कम थी.

उच्चतकनीक पर निर्भर मशीनों को सामान्य कुशलता प्राप्त अथवा अर्धकुशल कामगार भी चला सकता था, जिनपर पूंजीपति को अपेक्षाकृत कम खर्च करना पड़ता था. ये सभी स्थितियां पूंजीपतियों के पक्ष में थीं. उच्च कार्यक्षमता संपन्न सघन उत्पादन तकनीक ने मशीनों का अधिक से अधिक स्वचालीकरण कर श्रमिकों को उत्पादनचक्र से बाहर ढकेल दिया था. उनकी भूमिका जटिल उत्पादन-प्रक्रिया के केवल एक हिस्से तक सिमटकर रह गई. इससे उत्पादक श्रम के मायने ही बदल गए. अब श्रमिक और शिल्पकर्मी वृहद उत्पादन तंत्रा के मामली पुर्जे के समान थे, जिसकी भूमिका पूंजीपति के लाभ में वृद्धि करने तक सीमित थी. मशीन-आधारित उत्पादन प्रणाली के दबाव के चलते उत्पादन मजदूरों और शिल्पकर्मियों के हाथों से फिसलकर पूंजीपतियों के अधीन चला गया.परिणामस्वरूप हस्तकौशल एवं व्यक्तिगत श्रम की महत्ता अतीत के अरण्यरोदन तक सिमटकर रह गई. इस व्यवस्था में पूंजीपति न केवल उत्पादन का अधिकतम हिस्सा हड़प लेता था, बल्कि उसका प्रयास होता था कि वह लाभ के अधिकतम हिस्से पर कब्जा कर सकें.

अपने लाभानुपात में वृद्धि के लिए पूंजीपति कार्यदिवस में बढ़ोत्तरी करने के प्रयास में रहता है, ताकि उसी मजदूरी के बदले में वह श्रमिकों से अधिक कार्य ले सके. लाभानुपात में वृद्धि का यह सबसे आसान तरीका है. जहां पूंजीपतियों पर प्रशासनिक अनुशासन कम हो अथवा शासन-प्रशासन को उसने अपने प्रभाव में ले रखा हो, वहां की सरकारें कार्यघंटे तय करने का अधिकार पूंजीपतियों को सौंप देती हैं, अथवा इस ओर से लगभग उदासीन हो जाती हैं. इस अवस्था में पूंजीपतियों को मनमानी करने, श्रमिकों पर अपनी शर्तें थोपने का अवसर मिल जाता है. लाभानुपात में वृद्धि का दूसरा उदाहरण उत्पादन प्रविधि में व्यापक बदलाव है, जिसको पूंजीपति प्रौद्योगिकी के अधिकाधिक आधुनिकीकरण द्वारा प्राप्त करने के लिए प्रयासरत रहता है. आधुनिक तकनीक पर आधारित मशीनें कम समय में अधिक उत्पादन करने में सक्षम होती हैं. प्रायः वे उत्पादन-प्रक्रिया की जटिल स्थितियों,अभिक्रियाओं को अपने हाथ में ले लेती हैं. ऐसी अवस्था में उनपर कार्यरत श्रमशक्ति का अवमूल्यन होता है, जो श्रम-स्पर्धा में वृद्धि का कारण बनता है. परिणामस्वरूप श्रम-मूल्य में गिरावट आने लगती है, जो पूंजीपति के लिए लाभदायक होती है.

यदि कोई श्रमिक निर्धारित समय-सीमा के अंतर्गत केवल उतना कार्य करता है, जितने के लिए उसे मजदूरी प्राप्त होती है, उस स्थिति में पूंजीपति-स्वामी को उससे कोई अतिरिक्त अधिलाभ नहीं होगा. अतएव पूंजीपति-स्वामी निरंतर यह प्रयास करता है कि उसका श्रमिक न्यूनतम समय लेकर अधितम कार्य पूरा करे, अथवा बिना किसी अतिरिक्त मजदूरी की अपेक्षा के निर्धारित कार्य-घंटों से अधिक समय तक कार्य करे. पूंजीपति-स्वामी का लालच श्रम-शोषण को जन्म देता है. श्रमिक की भलाई इसी में है कि वह शोषणकारी स्थितियों से स्वयं को बचाने का यथासंभव प्रयास करे. किंतु जिन समाजों में अतिरिक्त श्रम की उपलब्धता हो तथा अधिकांश श्रम-शक्ति प्राकृतिक उपादानों पर निर्भर हो, वहां एक व्यक्ति द्वारा अपने श्रम के बोझ को दूसरे के कंधे पर डाल देना बहुत आसान होता है.हालांकि श्रमिक भी एक व्यक्ति के रूप में पूंजीवादी उत्पीड़न से बाहर आने के लिए प्रयासरत रहता है.

पूंजीवादी शोषण से मुक्ति का एक सुनिश्चित तरीका तो यह है कि श्रमिक स्वयं पूंजीपति बनकर उत्पादन पर अधिकार जमा ले. एक अन्य रास्ता यह भी हो सकता है कि वह अपने श्रम-कौशल का इस प्रकार विशिष्टीकरण कर ले कि उत्पादन प्रक्रिया में न केवल उसका योगदान अनिवार्य हो, बल्कि उसकी उपस्थिति दूसरे श्रमिकों के लिए अपरिहार्य बन जाए. यह श्रम के समाजीकरण की अवस्था है, जिसमें अतिरिक्त श्रम आपसी तालमेल के आधार पर अपने अस्तित्व की रक्षा कर सकता है. मार्क्स ने संपदा की दो मूलभूत अवस्थाओं को विशिष्टीकृत श्रम की प्रगति में सहायक माना है. इनमें पहली अवस्था है जब प्राकृतिक संपदा जीवनयापन का प्रमुख माध्यम बन जाती है. दूसरी अवस्था वह होती है, जब वह श्रम की सहायक अथवा औजार बनकर उत्पादन में सहायक बनती है. मार्क्स के अनुसार सामाजिक विकास की मुख्य विशेषता यही होती है कि वह सदैव आगे की ओर जाता है. उसमें उतार-चढ़ाव के स्वाभाविक दौर तो आते रहते हैं, मगर एक सातत्य उनके बीच सदैव विद्यमान रहता है. थोड़े ही वर्ष पहले की बात है जब प्रत्येक समाज अपनी आवश्यकतानुरूप उत्पादन करने में सक्षम होता था और अतिरिक्त श्रम जैसी कोई समस्या भी नहीं थी. उत्पादन-प्रक्रिया के असंगठित रूप में यह भी असंभव था कि मनुष्य इसी आधार शोषण करता रहे. मार्क्स के अनुसार उत्पादन की वह प्रणाली परस्पर सहयोग और सहअस्तित्व की भावना के साथ कायम थी, जिसमें किसी एक पक्ष द्वारा उसके दुरुपयोग की संभावना न के बराबर थी.

मार्क्स ने मिश्रवासियों के उदाहरण द्वारा समाज की अंतर्निहित शक्ति का उल्लेख किया है,जब मनुष्य के पास समय तो था, लेकिन उसका उपयोग अतिरिक्त-श्रममूल्य की स्थापना के लिए नहीं होता था. उसने लिखा है कि मिश्र के निवासी बहुत ही उर्वरा भूमि कर वास करते थे, उनका जीवन प्रकृति और वन्य जंतुओं पर निर्भर था. चूंकि भोजन की व्यवस्था प्रकृति पर निर्भर थी और वह उन्हें कभी निराश भी नहीं करती थी, अतएव एक और बच्चे के आगमन से उनपर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता था. परिणाम यह हुआ कि उनकी जनसंख्या बढ़ती चली गई. मिश्र की वास्तुकला और वहां के महान ऐतिहासिक पिरामिडों के बारे में मार्क्स का विचार था कि उनकी रचना इसलिए संभव नहीं हुई थी कि वहां की जनसंख्या बहुत विशाल थी. बल्कि इसलिए संभव हो पाई थी कि उनके पास अतिरिक्त समय था. पूंजीवाद के बारे में आप सोच सकते हैं कि अधिक प्राकृतिक संपदा होने का अभिप्राय तीव्र प्रगति और सघन उत्पादन है, जैसाकि मिश्र में हुआ था. मगर ऐसा हर स्थिति में संभव नहीं है. रोजी-रोटी की चिंता किए बगैर वे अपने समय को मनोेनुकूल कार्यों में लगा सकते थे. यही कारण है कि पूंजीवाद उन देशों में अधिक मजबूत होकर उभरा, जो देश प्राकृतिक रूप से कम संपन्न हैं, जहां प्राकृतिक संसाधनों का अपेक्षाकृत अभाव है. इसलिए समाज के बहुसंख्यक वर्ग की भलाई के लिए प्राकृतिक संसाधनों को पूंजीवादी एकाधिकार से बाहर रखना अत्यावश्यक है.

मार्क्स ने अगले चरण में अफ्रीका के पुराने निवासियों के उदाहरण देकर बताया है कि वहां के मूल निवासी सप्ताह मे केवल बारह घंटे कार्य करके अपने जरूरत की वस्तुओं का उत्पादन बहुत आसानी से कर लेते थे. पूंजीवाद के आगमन से पहले यह उनकी संपन्न जीवनचर्या का हिस्सा था. पूंजीवाद ने उत्पादन को मशीनीकृत किया. मशीनों का आगमन श्रम को सुविधामय बनाने के नारे के साथ हुआ. इसलिए प्रारंभ में श्रमिकों की ओर से उनका स्वागत भी हुआ. लेकिन मशीनें सिर्फ उन्हीं के हितसाधन हो उन्मुख होती हैं, जो उनका स्वामी, यानी पूंजीपति है. परिणाम यह हुआ कि नई व्यवस्था में अफ्रीकावासियों सप्ताह में पूरे छह दिन तक काम करना पड़ता है. इस तथ्य पर कोई विचार करने के लिए तैयार नहीं है कि जो श्रमिक पहले मात्रा बारह घंटे प्रतिसप्ताह काम करने अपना भरणपोषण बहुत आसानी से कर लेते थे, अब उन्हें उससे पांच या छह गुना कार्य क्यों करना पड़ता है. इस बीच में उनकी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हो पाया है. इसलिए कि पहले जो उत्पादन पूरे समाज की जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाता था, अब वह पूंजीपति की स्वार्थपूर्ति के निमित्त होता है. इससे पूंजीपति-मालिकों की संख्या और उनकी संपन्नता में कई गुना वृद्धि हुई है. जाहिर है कि प्रत्येक श्रमिक को अपनी जरूरतों के निष्पादन के लिए जो पांच या छह गुना अधिक कार्य करना पड़ता है, उसका लाभ पूंजीपति को मिलता है और श्रमिक के हिस्से सिर्फ उत्पीड़न रह जाता है.

मार्क्स ने डेविड रिकार्डो से बहुत सीखा था. लेकिन कई स्थानों पर उसकी आलोचना भी की है. उसका आरोप था कि रिकार्डो अतिरिक्त श्रम के मुद्दे पर कोई विचार नहीं करता,बल्कि उसकी उपेक्षा करता हुआ आगे बढ़ जाता है. आगे चलकर जान स्टुअर्ट मिल आदि ने भी स्वीकार किया था कि अतिरिक्त श्रम ही लाभ का प्रमुख स्रोत है, लेकिन उसका मानना था कि जीवन की वास्तविक जरूरतों लायक उत्पादन, समाज द्वारा अपेक्षित उत्पादन से बहुत कम समय में संभव है. अतिरिक्त श्रम का यही हिस्सा पूंजीपति के लाभ में ढलकर पूंजी के रूप में संग्रहित होता जाता है, जिसका उपयोग पुनः श्रमिक-शोषण तथा उसको उत्पादन-बाह्यः करने के लिए किया जाता है. यहां तक मार्क्स और मिल दोनों एकमत थे, किंतु मिल से भिन्न मार्क्स का मानना था कि अतिरिक्त श्रम का प्रतिशत पूंजीपति को होने वाले लाभ की अपेक्षा अधिक होता है. यही स्थिति श्रम-शोषण का कारण है. मिल श्रमिकों को पूंजीवादी व्यवस्था की देन, उसका स्वाभाविक हिस्सा मानता था.उसका मानना था कि श्रमिक पहले अपने श्रम का निवेश करता है, तत्पश्चात उत्पादन में से अपना हिस्सा प्राप्त करता है. मार्क्स ने मिल के विचारों को दृष्टिभ्रम की संज्ञा दी थी.उसने पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था में अधिलाभ की संकल्पना का बहुआयामी अध्ययन किया था. लंबे विमर्श के उपरांत वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था स्वामी के लिए अधिकतम लाभ की संभावना पर टिकी है. इसके लिए वह श्रमिक के शोषण के सभी यथासंभव प्रयासों पर अमल करती है. चूंकि वहां श्रमिक के विकल्प के रूप में मशीनों का आगमन लगातार बढ़ता जाता है, इसलिए उसके स्थानापन्न होते, उत्पादन-प्रक्रिया से बेदखली के भी बढ़ते जाते हैं.

15. श्रम-शक्ति एवं अधिलाभ के ध्रुवांतों की परिवर्तनशीलता

एक विशेषज्ञ अर्थविज्ञानी के रूप में मार्क्स ‘दि कैपीटल’ में उन सभी स्थितियों पर गंभीरतापूर्वक चिंतन करता है, जो श्रम-शोषण को बढ़ावा देती हैं. साथ ही वह उन तकनीकों की भी गहन समीक्षा करता है, जो पूंजीवादी शोषण का आधार बनती हैं. पुस्तक के सतरहवें अध्याय में वह श्रम-शक्ति और लाभ के विभिन्न पहलुओं तथा उनकी पारस्परिक परिवर्तनशीलता पर विचार करता है. श्रम-शक्ति के मूल्य को प्रायः मजदूरी के नाम से जाना जाता है. सतरहवें अध्याय के आरंभ में मार्क्स मजदूरी की एक बार पुनः विवेचना करता है. उसके अनुसार मजदूरी पूंजी की वह मात्रा है जो औसत मजदूर को सामान्य जीवनस्तर बनाए रखने के लिए अत्यावश्यक होती है. जिसको सामान्य अवस्था में उससे कम कर पाना असंभव है. मजदूरी की सैद्धांतिक विवेचना के बाद मार्क्स अध्याय के प्रतिपाद्य विषय की ओर लौटता है. श्रम-शक्ति के सैद्धांतिक पक्ष को स्पष्ट करते हुए वह परिवर्तन के कारक दो प्रमुख पहलुओं की ओर संकेत करता है, ये हैं:

क. श्रमशक्ति की लागत, जो उत्पादन के विभिन्न चरणों, उत्पादन की प्रवृत्तियों और प्रारूपों के अनुसार परिवर्तनशील होती है.

ख. लैंगिक आधार पर श्रम-शक्ति का विभेदीकरण यथा स्त्राी और पुरुष, बच्चे और वयस्क की वृत्तिकाओं में अंतर आदि.

अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुए वह दो मुख्य परिकल्पनाएं करता है. पहली यह कि उपभोक्ता सामग्री की बिक्री सामान्यतः उसके मूल्य के आधार पर की जाती है. दूसरी परिकल्पना के अनुसार श्रम-शक्ति कभी-कभी अपने मूल्य से भी ऊपर चली जाती है, मगर यह उससे नीचे कभी नहीं आती. इन परिकल्पनाओं पर विचार करता हुआ वह तीन सामान्य मूल-निष्कर्षों तक पहुंचता है, जो श्रम-शक्ति की मूल्यवत्ता का निर्धारण करते हैं.वे निम्नलिखित हैं—

क. पूर्वनिर्धारित घंटों का कार्यदिवस सदैव एकसमान मूल्य का उत्पादन करेगा. यह मूल्य श्रमिक की उत्पादकता अथवा उत्पादित वस्तु के मूल्य से निरपेक्ष तथा प्रत्येक परिस्थिति में स्थिर और अपरिवर्तनीय रहेगा.

ख. अधिलाभ की मात्रा एवं श्रम-शक्ति परस्पर व्युत्क्रमानुपाती होते हैं. उपभोक्ता वस्तु का मूल्य स्थिर रहने की शर्त पर जब अधिलाभ-मात्रा में एक इकाई की वृद्धि होती है तो उसके परिणामस्वरूप श्रम-शक्ति की मात्रा में भी एक इकाई की कमी आ जाती है. इस विवेचन से यह निष्कर्ष भी संभव है कि लाभानुपात और श्रम-शोषण एक-दूसरे के पूरक और सहगामी होते हैं.

ग. अधिलाभ की मात्रा में हुआ परिवर्तन श्रम-शक्ति में होने वाले बदलाव का पूर्वाभास होता है.

पुस्तक के सतरहवें अध्याय में मार्क्स श्रम-उत्पादकता, श्रम-मूल्य की महत्ता तथा उनकी परिवर्तनीयता का गहन विश्लेषण करता है. वह लिखता है कि—

‘अधिलाभ-मूल्य के उच्चतम स्तर में हुआ परिवर्तन, श्रम-शक्ति के मूल्य का पूर्भाभास होता है, यह स्थिति श्रम की उत्पादकता में हुए परिवर्तन का निकष होती है.’

श्रम की उत्पादकता में आया उतार-चढ़ाव वही है तो प्रकारांतर में श्रम-मूल्य की विकास-दर में आए परिवर्तन को दर्शाता है. श्रम का मूल्य यानी मजदूरी को प्रभावित करने वाले कारक अनेक होते हैं, जिन्हें दूर किया जा सकता है. उनमें तीन प्रमुख हैं, श्रम की उत्कृष्टता, उत्पादकता और कार्यदिवस की लंबाई यानी कार्यघंटों की संख्या. मार्क्स ने इन तीनों की अंतःसंबद्धता का गंभीर विश्लेषण किया है.

16. मजदूरी

मार्क्स पूंजीवादी व्यवस्था का आलोचक था. वह इसको श्रम-शोषण का उद्यम कहता था.चूंकि पूंजीपति श्रमिक के शोषण के लिए उसकी वृत्तिका को आधार बनाता है. इसलिए उसने पूंजीवादी व्यवस्था में मजदूरी के स्तर एवं उसके विभिन्न रूपों की विस्तृत समीक्षा की है. मार्क्स के लिए इस विषय की गंभीरता और इस बारे में उसके चिंतन की गहराई का अनुमान मात्रा इसी से लगाया जा सकता है कि पुस्तक का पूरा एक खंड, जिसमें तीन अध्याय संकलित हैं, उसने मजदूरी को समर्पित किया है. उसके अनुसार श्रमिक के लिए श्रम ही उसकी एकमात्रा पूंजी होता है. उत्पादन-प्रक्रिया की संपूर्णता के निमित्त वह अपनी इस एकमात्रा पूंजी का निवेश करता है. इस अपेक्षा के साथ कि पूंजीपति की ओर से लाभांश का समुचित हिस्सा उसको प्राप्त होगा. लेकिन पूंजीपति श्रम के साथ निवेश-निधि के बजाय किराये पर अर्जित वस्तु की तरह व्यवहार करता है; और इस तरह उसका मूल्यांकन करता है कि प्राप्त वृत्तिका से श्रमिक अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति ही कर पाता है. मुश्किल यह भी है कि प्रौद्योगिकीय सुधार और मशीनों के स्वचालीकरण के कारण श्रमिक की भूमिका मशीन-सहायक के रूप में सिमट जाती है. मशीनें उसके श्रम-कौशल का हनन कर, उसकी आजादी को सीमित कर देती हैं.

इन अध्यायों में मार्क्स ने पूंजीवादी व्यवस्था की उन धूत्र्तताओं का पर्दाफाश करने का प्रयास किया है, जो एक ओर तो श्रम-शोषण का कारण बनती हैं, साथ ही उन चालबाजियों पर पर्दा डालने का काम भी करती हैं, जिनके फलस्वरूप बिना किसी भुगतान के आधार पर किए गए श्रम का अनुपात लगातार बढ़ता जाता है. जाहिर है कि श्रम वह मूल्य जो बचाया गया है, उत्पादक-पूंजीपति के पास उसके अधिलाभ के रूप में संग्रहित होता जाता है. अधिलाभ की लगातार बढ़ती मात्रा तथा जमाराशि उत्पादक-पूंजीपति को और अधिक सशक्त एवं सामथ्र्यवान बनाती है. अधिलाभ का बड़ा हिस्सा वह ऐसे प्रौद्योगिकीय शोधों पर करता है, जो श्रम एवं मानवीय कौशल के विरोधी होते हैं. इससे उत्पादन-व्यवस्था में श्रमिक लगातार उपेक्षित और कमजोर पड़ता जाता है. चूंकि नई तकनीक त्वरित उत्पादन में भी सक्षम होती है, इसलिए वह अतिरिक्त श्रम-शक्ति को अपने उत्पाद के लिए नए बाजारों की खोज पर लगा देता है, जिनकी वृत्तिका का निर्धारण वह अपनी शर्तों पर, अपने स्वार्थ को देखते हुए करता है.

मार्क्स उन स्थितियों को परिप्रेक्ष्य में लाकर उनकी गहन विवेचना करता है, जिनके आधार पर मजदूरी अपने लघुत्तम आकार के बावजूद पूंजीवाद के कैनवास पर एकदम ठीक फिट हो जाती है, और श्रमिक की ओर से जो उससे सर्वाधिक प्रभावित होता है, किसी प्रकार को विरोध भी नहीं किया जाता. अपने श्रम के बदले उत्पादन-मूल्य में से अपनी न्यायिक हिस्सेदारी के बजाय उसका सर्वाधिक आग्रह पहले अपनी प्रारंभिक जरूरतें पूरा करने पर होता है. न्यूनतम वृत्तिका के लिए भी वह पूंजीपति के आगे गिड़गिड़ाता है. घुटने टेकता है. एक दास की भांति विश्वसनीयता का दावा करता है. इस बीच एक-एक कर उसके सारे सपने दम तोड़ लेते हैं. न्यूनतम जरूरतों के लिए ही वह अपनी नियति से समझौता कर लेता है. प्रारंभिक आवश्यकताओं की पूर्ति होते ही वह शिथिल पड़ने लगता है, विशेषकर उस समय तक जब तक कि उसको कोई उत्पे्ररित करने वाला न हो. पूंजीपति श्रमिक की इसी दुर्बलता का लाभ उठाता है. वह उसके श्रम के बराबर मजदूरी का भुगतान करने के बजाय उसको किसी न किसी बहाने न्यूनतम मजदूरी देकर टाल देना चाहता है. चूंकि श्रमिक को उम्मीद होती है कि वह अपनी श्रम-शक्ति द्वारा केवल अपनी सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकता है. उसके परिवेश में यही सबसे अधिक जरूरी होता है.इसलिए कदाचित उसकी विवशता होती हैं कि अपनी श्रम-शक्ति को बेचकर सबसे पहले अपनी सामान्य जरूरतों की पूर्ति का प्रबंध करे.

मार्क्स ने दर्शाया है कि पूंजीपति किस प्रकार मजदूरी को ही शोषण का माध्यम बना लेता है. वह वास्तविक मजदूरी में कटौती के नित नए रास्ते सोचता रहता है. विवेचन के दौरान वह तीन भिन्न स्थितियों का विश्लेषण करता है, जो मजदूरी पर आधारित शोषण को दर्शाती हैं. उसके अनुसार जागीरदारी या सामंती प्रणाली में श्रमिक इस तथ्य से सुपरिचित होता था कि जो श्रम वह अपनी भूमि कर करता है, वह उसके अपने लिए है. लेकिन जो श्रम वह जमींदार की भूमि पर करता है, वह जमींदार के लिए है. अपनी भूमि पर किए गए श्रम का सारा लाभ उसके हिस्से आएगा. जबकि पूंजीपति के लिए किए गए श्रम के लिए उसको उनकी दया पर निर्भर होना पड़ेगा. यही बात दास के लिए भी सही थी. दास जो सुबह से शाम तक अपने मालिक के लिए कार्य करता था, भली-भांति जानता था कि उसका कोई भी लाभ उसको नहीं मिलने वाला. सिवाय भरपेट रोटी के लिए. भूख की भरपाई को ही वह अपने श्रम क