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अरस्तु तथा उसका न्याय-दर्शन

सामान्य

ज्ञान और अध्यात्म के क्षेत्र में गुरुशिष्य परंपरा का महत्त्व बताया गया है. आज भी है. भारत में सैकड़ों आश्रम और धर्मगुरु हैं. उनके लाखोंकरोड़ों भक्त हैं. प्रत्येक गुरु अपने शिष्यों के भौतिकअधिभौतिक उत्थान का दावा करता है. शिष्य भी मानते हैं कि उनके गुरु अनन्य हैं. वे अपने और गुरु के बीच मर्यादा की लकीर खींचे रहते हैं. जिसके अनुसार गुरु की आलोचना करना, सुनना यहां तक कि मन में गुरु के प्रति भूल से भी अविश्वास लाना पाप माना जाता है. इसी जड़श्रद्धा के भरोसे गुरुओं का कारोबार चलता है. उस कारोबार में कभी घाटा नहीं आता. जड़श्रद्धा के बल पर ही गुरु कमाते, भक्त गंवाते हैं. बुद्ध ने जड़श्रद्धा का निषेध किया था. अपने शिष्यों को उन्होंने अपना दीपक आप बनने(अप्पदीपो भव), उनके पंथ पर सोचसमझकर विश्वास करने(एहि पस्सिक) का आवाह्न किया था—

‘जैसे सोने को तपाकर, काटकर और कसौटी पर रगड़कर तरहतरह से उसकी परीक्षा ली जाती है, उसके शुद्ध अथवा मिलावटी होने का निर्णय लिया जाता है, उसी प्रकार हे पंडितो और भिक्षुओ! मेरे वचनों को जांचपरखकर स्वीकार करो. केवल मेरे प्रति सम्मान के कारण उन्हें स्वीकार मत करो.’

सभी धर्मदर्शनों की स्थिति ऐसी नहीं थी. मीमांसक कुमारिल भट्ट को मात्र इस कारण खुद को प्रायश्चिताग्नि के सुपुर्द करना पड़ा था, क्योंकि उन्होंने गुरु की पूर्वानुमति के बिना बौद्ध दर्शन का अध्ययन इसलिए किया था, ताकि शास्त्रार्थ में बौद्ध आचार्यों को पराजित कर वैदिक दर्शनों की श्रेष्ठता सिद्ध कर सकें. उद्देश्य सही था. ज्ञान का भी यही तकाजा था. परंतु तत्कालीन परंपरा को स्वीकार्य न था. कुमारिल अपने उद्देश्य में सफल हुए थे, किंतु गुरुद्रोह के अपराध के प्रायश्चितस्वरूप खुद को अग्निसमर्पित करना पड़ा था. सुकरात, प्लेटो और अरस्तु की गुरुशिष्य परंपरा में अंधश्रद्धा के लिए कोई स्थान न था. तीनों परंपरापोषण के बजाय उसके परिमार्जन पर जोर देते हैं. उसका आदिप्रस्तावक सुकरात खुले संवाद में विश्वास रखता था. यह सुनकर कि लोग उसे यूनान का सर्वाधिक बुद्धिमान प्राणी मानते हैं, सुकरात को अपने ही ऊपर संदेह होने लगा था. संदेह दूर करने के लिए वह एथेंस के वुद्धिमान कहे जाने वाले राजनयिकों, दार्शनिकों और तत्ववेत्ताओं से मिला. अंततः इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि वह सचमुच सबसे बुद्धिमान है. इसलिए नहीं कि उसे सर्वाधिक ज्ञान है. वह केवल एक चीज दूसरों से अधिक जानता है, वह है—अपने ही अज्ञान का ज्ञान. ‘मुझे अपने अज्ञान का ज्ञान है’—कहकर उसने खुद को उन दार्शनिकों, विचारकों और तत्ववेत्ताओं से अलग कर लिया था, जिन्हें अपने ज्ञान का गुमान था. उसके लिए ज्ञान से ज्यादा ज्ञानार्जन की चाहत और उसकी कोशिश का महत्त्व था. ज्ञान की मौलिकता के लिए वह संदेह को आवश्यक मानता था. सुकरात की इसी प्रेरणा पर अरस्तु ने मनुष्य को विवेकशील प्राणी माना है. विवेकशीलता में स्वयं अपने ज्ञानानुभवों के पुनरावलोकन की, संदेह की भावना अंतर्निहित है. ज्ञानार्जन के लिए संदेह की अनिवार्यता को रेखांकित करते हुए ग्यारहवीं शताब्दी के फ्रांसिसी विचारक पीटर अबलार्ड ने लिखा था—‘संदेह हमें जांचपड़ताल के लिए प्रेरित करता है. जांचपड़ताल हमें सत्य का दर्शन कराती है.’ ‘सुकरातप्लेटो और अरस्तु’ की त्रयी के विचारों में अंधश्रद्धा के लिए कोई जगह न थी. हालांकि इस विद्वानत्रयी को अनुपम और अद्वितीय मानने पर कुछ लेखकों को ऐतराज है.

‘पाॅलिटिक्स’ का अनुवाद करते समय भोलानाथ शर्मा ने ‘सुकरातप्लेटोअरस्तु’ की त्रयी के समकक्ष ‘पराशरव्यास और शुकदेव’ त्रयी का उदाहरण दिया है. इस निष्कर्ष के पीछे उनके पूर्वाग्रह साफ नजर आते हैं. यह ठीक है कि ‘पराशरव्यास और शुकदेव’ की पितापुत्रपौत्र त्रयी में भी तीनों लेखक थे. पराशर को भारतीय परंपरा में पुराणों के आदिरचियता होने का श्रेय दिया जाता है. बताया जाता है कि व्यास ने महाभारत के अलावा पिता के लिखे पुराणों का पुनर्लेखन कर, उन्हें वह कलेवर प्रदान किया जिसमें वे आज प्राप्त होते हैं. तीसरे शुकदेव ने ‘भागवत पुराण’ लिखकर पुराण साहित्य को समृद्धि प्रदान की थी. बावजूद इसके ये तीनों भारतीय लेखक उस कोटि के मौलिक लेखकविचारक नहीं हैं, जिस कोटि के ‘सुकरातप्लेटो और अरस्तु’ हैं. व्यास की कृति ‘महाभारत’ अवश्य अलग है. उसमें अपने समय का सामाजिकसांस्कृतिक एवं राजनीतिक विमर्श मौजूद है, परंतु जिस महाभारत से हम आज परिचित हैं, वह ईस्वी संवत्सर की शुरुआत के आसपास की कृति है, जब देश में एकराष्ट्र की भावना प्रबल थी. गणतांत्रिक पद्धति पर आधारित छोटेछोटे राज्यों को अनावश्यक मान लिया गया था. एकराष्ट्र अथवा साम्राज्यवादी सोच का उद्भव पूरी दुनिया में लगभग एक साथ हुआ था. भारत में इसका प्रवर्त्तक चाणक्य था, जबकि यूनान में अरस्तु ने सिकंदर की साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाओं का समर्थन करते हुए उसे एशिया पूर्व के छोटेछोटे देशों को अपने अधीन करने की सलाह दी थी. महाभारत मूलतः धार्मिक ग्रंथ है और उसकी रचना शताब्दियों के अंतराल में एकाधिक लेखकों द्वारा की गई है. दूसरे केवल लेखक होना ही शर्त होती तो एक ही धारा के तीन लेखकों के अनेक उदाहरण दुनियाभर में मिल जाएंगे. यहां कसौटी ज्ञान की विलक्षणता, मनुष्यता के प्रति अगाध निष्ठा तथा एकदूसरे से असहमति जताते हुए उसकी ज्ञानपरंपरा को विस्तृत तथा सतत परिमार्जित करने की है—जिसपर यह दार्शनिक त्रयी विश्वपटल पर अनुपम है. प्लेटो के लेखन के हर हिस्से पर सुकरात की छाप है. इसी तरह अरस्तु के लेखन पर भी प्लेटो का प्रभाव छाया हुआ है, लेकिन प्लेटो सुकरात से तथा अरस्तु प्लेटो से कदमकदम पर असहमति दर्शाते हैं. प्लेटो से अरस्तु की असहमतियों का दायरा तो इतना बड़ा है कि उन्हें एक ही दर्शनपरंपरा से जोड़ना अनुचित जान पड़ता है. जैसे कि पारिवारिक जीवन का महत्त्व, सुखस्वास्थ्य प्राप्ति के संसाधन, लोकमत का सम्मान, जनसाधारण की रुचि एवं इच्छाओं का समादर जैसे विषयों पर अरस्तु पर्याप्त उदार था. जबकि प्लेटो ने अपने आदर्श राज्य में सामूहिक संस्कृति और सहजीवन पर जोर देते हुए परिवार संस्था को अनावश्यक मानते हुए कठोरअनुशासित जीवन जीने की अनुशंसा की है.

फिर प्रभाव किस बात का है? कौनसा सूत्र है जो इन तीनों को परस्पर जोड़ता है? इस तारतम्यता को इन्हें पढ़ते हुए आसानी से समझा जा सकता है. एकसूत्रात्मकता ‘पराशरव्यासशुकदेव’ की त्रयी के बीच भी है. अंतर केवल इतना है कि भारतीय परंपरा के लेखकों पर अध्यात्म प्रभावी रहा है, जो अतिरेकी आस्था और विश्वास के दबाव में अंधानुकरण में ढल जाता है. जबकि ‘सुकरातप्लेटोअरस्तु’ के बीच ज्ञान की लालसा तथा शुभत्व की खोज के लिए एकदूसरे पर संदेह का सिलसिला निरंतर बना रहता है. परंपरापोषी होने के कारण भारतीय लेखक एकदूसरे को दोहराते अथवा परंपरा का पिष्ठप्रेषण करते हुए नजर आते हैं. पश्चिम का लेखन विशेषकर वह लेखन जो सुकरात से आरंभ होकर अरस्तु और आगे थामस हाॅब्स, जान लाॅक, रूसो, वाल्तेयर, बैंथम, हीगेल, माक्र्स आदि तक जाता है, उसमें संदेह का सिलसिला कभी टूटता नहीं है. वाल्तेयर और रूसो एकदूसरे के समकालीन लेखक थे. जीतेजी उनमें हमेशा विलगाव बना रहा. दोनों एकदूसरे के कट्टर आलोचक थे. परंतु वाल्तेयर और रूसो को पढ़ते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि उनमें से किसी एक के मन में ज्ञान की ललक, मनुष्यता को बेहतर बनाए जाने की उत्कंठा दूसरे से कम है. जिस तरह प्लेटो सुकरात के प्रति और अरस्तु प्लेटो के प्रति अगाध प्रेम और विश्वास रखते हुए, विनम्र असहमति क साथ विचारपरंपरा को आगे बढ़ाते हैं, वैसा भारतीय परंपरा में दुर्लभ है. प्लेटो के विपुल वाङ्मय में एक भी शब्द, एक भी पंक्ति ऐसी नहीं है, जिसपर सुकरात का असर न हो. बावजूद इसके जहां आवश्यक समझा उसने सुकरात की बात भी काटी है. अरस्तु तो प्लेटो से भी आगे निकल जाता है. उसके मन में गुरु प्लेटो के प्रति गहरा सम्मान था. बावजूद इसके उसके ग्रंथों में प्लेटो के विचारों के प्रति सहमति से अधिक असहमति नजर आती है. इस तरह प्लेटो और अरस्तु दोनों अपनेअपने गुरु के ज्ञान को आत्मसात करते हैं, परंतु उनका विश्वास उस परंपरा को आगे बढ़ाने में है, न कि अनुसरण में. उसका विश्वास केवल मनुष्यता में है. प्लेटो भावुक, कवि हृदय है, जबकि अरस्तु अपेक्षाकृत वैज्ञानिक प्रवृत्ति से युक्त. इसलिए अरस्तु के लेखन में असहमति अधिक मुखर है. इस कारण कुछ विद्वान तो अरस्तु को प्लेटो का शिष्य मानने को ही तैयार नहीं है. लेकिन अरस्तु के लेखन में प्लेटो के प्रति जैसा सम्मानभाव है उसे देखते हुए यह असंभव भी नहीं लगता. दूसरी ओर पुराणों में कथ्य के आधार पर अंतर न के बराबर है. उनमें भयंकर दोहराव भी है. अधिकांश चरित्र मिथकीय हैं. ऐसा महसूस होगा मानो सारे पौराणिक ग्रंथ एक ही लेखक द्वारा रचित अलगअलग कालखंड की कृतियां हैं; अथवा उनके लेखक मंजे हुए किस्सागो थे. उन्होंने समाज में पहले से प्रचलित कहानियों को अतिरेकपूर्ण कल्पनाओं और रोचकता के साथ पौराणिक कलेवर प्रदान किया था.

जीवन परिचय

अरस्तु(जन्म 384 ईस्वीपूर्व) और प्लेटो के जन्म के बीच लगभग चार दशक का अंतराल था. Aristole का अर्थ है—‘श्रेष्ठतम लक्ष्य’(The best purpose). कहने की आवश्यकता नहीं कि अपने नामानुरूप अरस्तु ने जीवन में महान उद्देश्य सिद्ध किए. अरस्तु का मुख्य कर्मक्षेत्र एथेंस रहा, परंतु सुकरात और प्लेटो की भांति वह मूल एथेंसवासी नहीं था. उसका जन्म एथेंस से लगभग 340 किलोमीटर दूर, थ्रेस नदी के किनारे स्थित स्तेगिरा नामक छोटे से शहर में हुआ था. उसके पिता का नाम निकोमारक्स् था. उनके पूर्वज मैसेनिया से ईसापूर्व सातवींआठवीं शताब्दी में स्तेगिरा में आकर बसे थे. उसकी मां का नाम फैस्तिस था और उसके पूर्वज यूबोइया प्रदेश के खालिक्स नामक मामूली शहर के रहने वाले थे. मेसिडन के राजा एमींतस जिसकी प्रतिष्ठा सिंकदर का दादा होने के कारण भी है—का निजी चिकित्सक होने के कारण निकोमाराक्स् की समाज में प्रतिष्ठा थी. वे वैद्यों की पंचायत के सदस्य भी थे. उन दिनों यूनान के अनेक राज्यों में नगरराज्य की व्यवस्था थी, जहां शासन प्रक्रिया में अधिकांश नागरिकों की भागीदारी रहती थी. मेडिसन में राजतंत्र था. और जैसा कि इस प्रकार की राज्य प्रणालियों में होता है, मेडिसन में भी वंशानुक्रम के आधार पर राजा की घोषणा की जाती थी. अरस्तु के बचपन के बारे में अधिक जानकारी नहीं है. यत्रतत्र बिखरी सूचनाओं से पता चलता है कि उसकी प्राथमिक शिक्षा होमर की रचनाओं से आरंभ हुई थी. उसपर अपने चिकित्सक पिता का विशेष प्रभाव पड़ा. उन दिनों चिकित्सक परिवार के बच्चों को बचपन से ही शल्यचिकित्सा का प्रशिक्षण दिया जाता था. सो अरस्तु को भी शरीर विज्ञान और वनस्पतियों की शिक्षा बचपन से ही मिलने लगी थी.शरीर विज्ञान और प्रकृतिविज्ञान के दूसरे क्षेत्रों में अरस्तु की रुचि को देखते हुए उस समय शायद ही कोई कल्पना कर सकता था कि आगे चलकर यूनानी दर्शन और तर्कशास्त्र का महापंडित कहलाएगा. बचपन के वही अनुभव कालांतर में विज्ञान, विशेषकर वनस्पति शास्त्र के क्षेत्र में उसकी रुचि का कारण बने. यह भी बताया जाता है कि बचपन के चिकित्सा क्षेत्र के अनुभवों के कारण ही अरस्तु को चिकित्सकों की स्थानीय संस्था का सदस्य बना लिया था.

अरस्तु का परिवार समृद्ध था. इसलिए बचपन में उसे सुखसुविधाओं की कमी न थी. उसका बचपन राजपरिवार के लोगों के सान्निध्य में, सुखपूर्वक बीता. संयोगवश अरस्तु के मातापिता की मृत्यु उसकी किशोरावस्था में ही हो चुकी थी. उसके बाद उसकी देखभाल का दायित्व उसके एक रिश्तेदार प्राॅक्सीनस ने संभाला. सुकरात की भांति अरस्तु की आरंभिक इच्छा भी विज्ञान के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने की थी. उसने अपने जीवन का लंबा समय वैज्ञानिक अनुभवों के लिए लगाया था. अनेक ग्रंथों की रचना की, बाद में वह प्रकृति विज्ञान से उकताने लगा. इसका कारण स्टेगिरा की राजनीति थी. सम्राट एमींतस महत्त्वाकांक्षी था. राज्य की सीमाओं के विस्तार के लिए उसने कई युद्ध लड़े थे. जिसमें उसे सफलता भी मिली थी. लेकिन राज्य की सीमाओं का विस्तार और प्रजा के सुखसंतोष में विस्तार के बीच कोई तालमेल न था. लगातार युद्ध के मैदान में रहने वाले राजा की प्रजा को जो कष्ट भोगने पड़ते हैं, वे कष्ट स्तेगिरा की प्रजा को भी भोगने पड़ते थे. इसी विसंगति सेे अरस्तु के मन में राजनीति को समझने की ललक पैदा हुई. उसने अनुभव किया था कि राज्य के उद्देश्यों तथा उसके कार्यों के बीच कोई तालमेल नहीं है. युवावस्था तक पहुंचतेपहुंचते वह ज्ञान के परंपरागत संसाधनों से उकताने लगा था. उसका झुकाव दर्शन और राजनीति की ओर गया. उस समय पूरे यूनान में प्लेटो द्वारा स्थापित ‘अकादेमी’ की प्रतिष्ठा थी. अरस्तु की प्रतिभा और उच्च शिक्षा के प्रति लगन को देखते हुए प्राॅक्सीनस ने उसका दाखिला प्लेटो की अकादेमी में करा दिया. ईस्वी पूर्व 367 में वह एथेंस पहुँचकर प्लेटो की अकादमी का सदस्य बन गया. उस समय उसकी वयस् मात्र 17 वर्ष थी. अकादमी में आने का उद्देश्य केवल राजनीति और दर्शन की शिक्षा के साथसाथ विश्व के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में रहकर अध्ययन करने की लालसा थी.

अरस्तु प्लेटो की अकादेमी में लगभग बीस वर्षों तक रहा. वहां रहते हुए उसने गणित, दर्शन, राजनीति आदि विषयों में ज्ञान प्राप्त किया. उसके बाद कुछ अर्से तक अकादेमी में अध्यापन कार्य भी किया. यहीं उसके और प्लेटो के बीच आत्मीयता का विस्तार हुआ. अरस्तु को पुस्तकें जमा करने का शौक था और अपने धन का बड़ा हिस्सा पुस्तकों और पांडुलिपियों को जुटाने पर करता था. प्लेटो ने उसके आवास को ‘श्रेष्ठ अध्येता का घर’ कहा था. कुछ लोग मजाक में कहा करते थे कि ईश्वर ने अरस्तु के मस्तिष्क में गहरा गड्ढा बना दिया है, जिसमें वह पुस्तकों को सहेज कर रखता है. अकादेमी में रहते हुए अरस्तु पर प्लेटो की विद्वता का प्रभाव उत्तरोत्तर बढ़ता गया. प्लेटो की लेखनशैली का अनुकरण करते हुए उसने अकादमी प्रवास के दौरान भौतिकी, जीवविज्ञान, वनस्पति विज्ञान, तर्कशास्त्र, तत्वदर्शन आदि पर अनेक पुस्तकों की रचना की. जहां अरस्तु के मन में अपने गुरु के प्रति बेहद सम्मान था, वहीं प्लेटो भी अपने योग्यतम शिष्य की प्रतिभा का मुरीद था. वह उसे ‘अकादेमी का मस्तिष्क’ और ‘सर्वश्रेष्ठ अध्ययनशील’ विद्यार्थी मानता था. प्लेटो का निधन हुआ, उस समय अरस्तु की उम्र लगभग 37 वर्ष थी. वह प्लेटो के उत्तराधिकारियों में से एक था. प्रतिभा को देखते हुए अरस्तु की दावेदारी भी बनती थी. वह प्लेटो का वास्तविक उत्तराधिकारी है, यह उसने आगे चलकर सिद्ध भी कर दिया था. परंतु ‘अकादमी’ का अध्यक्ष प्लेटो के रिश्तेदार तथा गणित एवं जीवविज्ञान के पंडित स्पूसिपस को बनाया गया. इसका कारण प्लेटो से अरस्तु की वैचारिक असहमतियां भी थीं. अधिकारियों में इतना साहस न था कि अकादेमी का संचालन का दायित्व ऐसे व्यक्ति के हाथों में सौंप दें, जिसकी अकादेमी के संस्थापक और गुरु से घोर असहमतियां रही हों, हालांकि अरस्तु की प्रतिभा को लेकर उन्हें कोई संदेह न था. नतीजा यह हुआ कि अरस्तु का जी अकादेमी से उचट गया. निराश होकर उसने एथेंस छोड़ दिया. वहां से वह माइसिया में एटारनियस नामक स्थान पर पहुंचा. वहां उसे अकादेमी के पूर्व छात्रों की मंडली का सदस्य चुन लिया गया. मंडली में एटारनियस का शासक हरमियाॅस भी शामिल था. इससे अरस्तु को पुनः राजपरिवार के निकट आने का अवसर मिला. कुछ ही दिनों में हरमियाॅस और अरस्तु गहरे दोस्त बन गए. इसका सुखद परिणाम अरस्तु और हरमियाॅस की भतीजी(कुछ विद्वानों के अनुसार भानजी) पिथियास के विवाह के रूप में सामने आया. उसके फलस्वरूप उसके जीवन में स्थायित्व आया. अकादमी में प्राप्त गणित और विज्ञान की शिक्षा बहुत कारगर सिद्ध हुई. पिथियास से विवाह के उपरांत अरस्तु ने खुद को प्रकृति विज्ञान की खोज में लगा दिया. समुद्र तटीय स्थानों पर जाकर वह वनस्पतियों और जीवजंतुओं का अध्ययन करने लगा. उन अनुभवों के आधार पर उसने आगे चलकर कई पुस्तकों की रचना की. एथेंस छोड़ने के बाद 12 वर्षों तक वह इसी तरह अनुभव और ज्ञान बंटोरता रहा. इस बीच राजतंत्र की निरंकुशता को करीब से देखने का अवसर मिला. कदाचित इसी बीच उसके मन में छोटेछोटे राज्यों की विकृतियां सामने आने लगी थीं. वही अनुभव कालांतर में आगे चलकर ‘पाॅलिटिक्स’ एवं ‘एथिक्स’ जैसे ग्रन्थों की प्रेरणा बनीं. अपने उत्तरवर्ती जीवन में अरस्तु ने एक अन्य युवती हरपिलिस से विवाह किया, जिससे उसे संतान हुई. पुत्र का नाम उसने अपने पिता के नाम पर निकोमाराक्स् रखा.

342 ईस्वीपूर्व के आसपास उसको मेसिडन के सम्राट की ओर से निमंत्रण प्राप्त हुआ. इस अवधि में वहां काफी कुछ बदल चुका था. एमींतस के बाद फिलिप मेसिडन का सम्राट था. उसे अपने बेटे सिकंदर के लिए योग्य शिक्षक की तलाश थी. अरस्तु की प्रतिभा के बारे में वह पहले से ही परिचित था. अकादेमी में अरस्तु द्वारा किए गए कार्य भी उसकी जानकारी में थे. ऐसे में सिकंदर की शिक्षा के लिए अरस्तु से बेहतर कोई हो ही नहीं सकता था. निमंत्रण मिलते ही अरस्तु मेसिडन लौट आया. सम्राट फिलिप की ओर से उसका जोरदार स्वागत किया गया. आते ही उसे ‘राॅयल अकादेमी आॅफ मेसिडन’ का अध्यक्ष बना दिया गया. अगले तीन वर्षों तक वह इसी पद पर बना रहा. शिक्षक के तौर पर उसने राजकुमार सिकंदर में साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाएं जगाने का काम किया. उसने सिंकदर को राज्य की सीमाओं के विस्तार के लिए एशियामाइनर तथा अन्य उत्तरपूर्वी राज्यों पर अधिकार करने की सलाह दी. इस बीच एटारनियस से दुखद समाचार आया कि एक ईरानी सेनापति ने उसके मित्र और वहां के शासक हरमियाॅस को धोखे से पकड़कर उसकी हत्या कर दी है. इस सूचना ने अरस्तु को व्यथित कर दिया. 340 ईस्वी पूर्व में फिलिप की मृत्यु के बाद सिकंदर सम्राट बना. सिंकदर के मन में शुरू से ही साम्राज्यवादी भावनाएं जोर मारती थीं. सत्ता हाथ में आते ही वह युद्ध पर निकल पड़ा. अब मेसिडन में अरस्तु को कोई काम न था. इसी बीच उसे एथेंस जाने का अवसर मिला. उसी समय अकादेमी अध्यक्ष पद के रिक्त होने की सूचना मिली. अरस्तु के मन में अकादेमी से जुड़ने की लालसा अब भी शेष थी. परंतु अरस्तु की उपेक्षा करते हुए अकादेमी के अधिकारियों द्वारा खेनोक्रातेस को अकादेमी का मुख्यअधिष्ठाता मनोनीत किया गया. अरस्तु एक बार फिर निराश हो गया. परंतु उसके जैसे मननशील व्यक्ति के आगे निराशा बहुत टिकाऊ नहीं थी. उसने स्वयं को अध्ययन के प्रति समर्पित कर दिया.

335 ईस्वी पूर्व में उसे पुनः एथेंस लौटने का अवसर मिला. इस बार आमंत्रित करने वाला था, हर्मेडयस उस समय अरस्तु की उम्र 51 वर्ष थी और एक विद्वान दार्शनिक के रूप में उसकी ख्याति आसपास के देशों में फैल चुकी थी. एथेंस की ज्ञानविज्ञान के क्षेत्र में धाक थी. अवसर गंवाए बिना अरस्तु एथेंस के लिए प्रस्थान कर गया. उन दिनों एथेंस और मेसीडन के संबंध अच्छे न थे. परंतु अरस्तु की विद्वता की धाक ऐसी थी कि एथेंस में उसका स्वागत हुआ. जाहिर है इसके पीछे एथेंसवासियों की ज्ञान के प्रति सम्मानभावना का असर था. एथेंस के उत्तरपूर्व स्थित उपनगर अपोलो में लीशियस देवी का मंदिर था. एथेंस के कानून के अनुसार वहां बाहरी व्यक्तियों को भूमि खरीदने की अनुमति नहीं थी. इसलिए अरस्तु ने मंदिर के आसपास के क्षेत्रों में कुछ मकान किराये पर लेकर अपने विश्वविद्यालय की स्थापना की. विश्वविद्यालय का नाम लीशियस देवी के नाम के आधार पर ‘लीशियम’ रखा गया. कुछ ही दिनों में एथेंस के अनेक प्रतिष्ठित लोग जिनमें अकादेमी से शिक्षित लोग भी थे, अरस्तु से जुड़ने लगे. इससे अरस्तु और उसके विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा बढ़ने लगी. उस विश्वविद्यालय की खूबी थी कि वहां टहलते हुए शिक्षार्जन पर जोर दिया जाता था. अरस्तु स्वयं टहलते हुए पढ़ाता था. इसलिए कुछ प्लेटो को ‘टहलतेटहलते पढ़ाने वाला अध्यापक’ तथा संस्था को ‘परिभ्रामी विद्यालय’(Peripatetic School) भी कहने लगे थे. लीशियम में रहते हुए अरस्तु ने अध्यापन के अलावा कई महत्त्वपूर्ण काम किए. पुस्तक संग्रह का शौक उसको अकादेमी प्रवास से ही था. लीशियम में उसे पुस्तकें जमा करने के भरपूर अवसर मिला. फलस्वरूप उसने सैकड़ों पुस्तकों एवं पांडुलियों का संग्रह किया. और उन्हें सुरक्षित रखने लिए लीशियम के भीतर एक विशाल पुस्तकालय का निर्माण किया. अरस्तु द्वारा निर्मित पुस्तकालय उसके समकालीन नाटककार यूरीपिडिस के पुस्तकालय को छोड़कर, पूरे यूनान में सबसे बड़ा था. यही नहीं उसने पुस्तकों को व्यवस्थित करने के लिए आवश्यक नियम भी बनाए थे. पुस्तकालय के अलावा उसने विश्वविद्यालय में विचित्र वस्तुओं, शैवालों तथा मानचित्रों का एक अजायबघर तैयार किया. हालांकि स्वयं अरस्तु के पास धन की कमी न थी. उसकी पत्नी धनाड्य परिवार से थी. इसके साथसाथ पुस्तकालय, अजायबघर, वैज्ञानिक उपकरण आदि के लिए सिंकदर की ओर से भी समयसमय पर मदद प्राप्त होती रहती थी. गुरु अरस्तु के प्रति सिंकदर का सम्मान इससे भी जाहिर होता है कि उसने अपने सैनिकों, मछुआरों, बहेलियों और शिकारियों को आदेश दिया था कि काम के दौरान यदि कोई विचित्र वस्तु मिले तो उसे संग्रहित कर, लीशियम के संग्रहालय में जमा करा दें. इसके अतिरिक्त सिंकदर ने जीव विज्ञान एवं भौतिक विज्ञान संबंधी खोजों के वैज्ञानिक उपकरण भेजकर भी अरस्तु की मदद की थी.

अरस्तु ‘लीशियम’ में 12 वर्षों तक रहा. इस बीच उसका विद्यालय निरंतर प्रगति करता रहा. लगभग सभी विषय की शिक्षाओं का वहां प्रबंध था और शिक्षार्थी के रूप में दूरदूर के विद्यार्थी वहां पहुंचते थे. ‘लीशियम’ के प्रशासन हेतु अरस्तु ने विशेष प्रबंध किए थे. उस व्यवस्था को प्लेटो के ‘आदर्श राज्य’ तो नहीं कह सकते, परंतु शिक्षक और विद्यार्थी के बीच अनौपचारिक बातचीत को बढ़ाने, शिक्षा में सहजता लाने की भावनाएं उसके पीछे अवश्य थीं. तदनुसार विद्यार्थी अपने बीच से एक विद्यार्थी को चुनते थे. अगले दस दिनों तक वही विश्वविद्यालय के प्रशासक का काम करता था. इसके बावजूद ‘लीशियम’ में पर्याप्त अनुशासन था. भोजनव्यवस्था वहां सामूहिक थी. महीने में एक दिन विशेष परिचर्चा के लिए सुरक्षित था, जिसके नियम अरस्तु ने निर्धारित किए थे. अरस्तु का यह विश्वविद्यालय प्लेटो द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय ‘अकादेमी’ जैसी प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं कर सका. एक तरह से यह उसकी शाखा जैसा ही था. दोनों में एक विशेष अंतर भी था. ‘अकादेमी’ में गणित पर ज्यादा जोर दिया जाता था, जबकि ‘लीशियम’ में जीवविज्ञान और वनस्पति विज्ञान की शिक्षा पर खास ध्यान दिया जाता था. प्रायोगिक शिक्षा का खास महत्त्व था. उन दिनों बाढ़ आम समस्या थी. बरसात के समय नील नदी उफनने लगती. अरस्तु ने नियमित आने वाली बाढ़ों की रोकथाम के लिए भी शोधकार्य किया था. ‘लीशियम’ को प्लेटो के ‘अकादेमी’ जैसी प्रतिष्ठा भले ही प्राप्त न कर सका, परंतु एक दार्शनिक के रूप में अरस्तु को वैसी प्रतिष्ठा प्राप्त हो चुकी थी, जैसी कभी सुकरात और प्लेटो को प्राप्त थी. अरस्तु को नकारकर जिस व्यक्ति को अकादेमी का अध्यक्ष मनोनीत किया गया था, अरस्तु के प्रभामंडल के आगे उसकी प्रतिष्ठा नगण्य थी.

लीशियम में अध्यापन करते हुए अरस्तु ने अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की. उस समय सिकंदर विश्वविजय के लिए निकला हुआ था. यात्रा के विवरणों को दर्ज करने के लिए सिंकदर के साथ कल्लिस्थेसनस् नामक युवा भी उसके साथ अभियान पर था. वह अरस्तु का शिष्य था और अपने गुरु की भांति स्पष्टवक्ता भी. अभियान के दौरान किसी कार्य के लिए कल्लिस्थेसनस् ने सिंकदर की आलोचना कर दी. परिणामस्वरूप सिंकदर उससे रुष्ट हो गया. उस समय तक सिंकदर की विश्वविजय की कामनाएं उभार पर थीं. आलोचना उससे सहन न हुई. उसके आदेश पर कल्लिस्थेसनस् को मृत्युदंड सुनाया गया. कल्लिस्थेसनस अरस्तु का करीबी शिष्य था. अरस्तु ने ही उसे सिकंदर के साथ भेजा था, इसलिए कल्लिस्थेसनस् के साथसाथ अरस्तु को भी दोषी माना गया. पता चलता है कि भारत से वापसी के बाद सिंकदर ने भी अरस्तु को दंडित करने का निर्णय कर लिया था. लेकिन भारत अभियान में वह इतनी बुरी तरह से उलझा कि वापस लौट ही नहीं पाया. ईसा पूर्व 323वें वर्ष में उसकी मृत्यु हो गई. सिकंदर की मौत का समाचार जैसे ही मेसिडन पहुंचा वहां विद्रोह हो गया. अरस्तु सिंकदर का गुरु और करीबी रह चुका था, इसलिए विद्रोहियों ने उसे भी दंडित करने का निर्णय किया. लेकिन अरस्तु को दंडित करना आसान न था. उसकी पूरे यूनान में प्रतिष्ठा थी. विद्रोहियों ने उसे ‘नास्तिक’ घोषित कर दिया. आरोप का आधार अरस्तु द्वारा ईसापूर्व 340-341 में अपने दोस्त हरमियाॅस पर लिखी कविता को बनाया गया. वह कविता अरस्तु ने हरमियाॅस की हत्या के बाद लिखी थी, जिसमें उसके गुणों का बखान करते हुए उसे देवतुल्य घोषित किया गया था. बीस वर्ष पुरानी उस कविता के समय और परिस्थिति को देखते हुए इस प्रकार के आरोप बेमानी थे. विरोधी किसी भी प्रकार अरस्तु को दंडित करना चाहते थे, इसलिए अरस्तु को नास्तिक घोषित करना, जनता के बीच उसकी छवि को धूमिल करने की चाल थी. अपने विरुद्ध बढ़ता माहौल देख अरस्तु को एथेंस छोड़ना पड़ा. उसी वर्ष 62 वर्ष की अवस्था में उसकी मृत्यु हो गई.

एथेंस छोड़ते समय उसने घोषणा की थी कि एथेंसवासियों को दर्शनशास्त्र के विरुद्ध दूसरी बार अपराध नहीं करने देगा. दर्शनशास्त्र के विरुद्ध एथेंसवासियों का पहला अपराध उसकी संसद द्वारा सुकरात को दिया गया मृत्युदंड था. एथेंस से वह युबोइया के लिए प्रस्थान कर गया. वहां खाॅल्किस नामक छोटे से नगर में जाकर रहने लगा. वहीं रहते हुए उसने अपनी वसीयत तैयार की, जिसमें उसने अपनी पत्नी हर्पीलियस के स्वभाव की प्रशंसा करते हुए उसके लिए धन की व्यवस्था की थी. पहली पत्नी पिथियास की यादें अब भी उसके दिल में बसी थीं. इसलिए उसने वसीयत में लिखा कि उसे पिथियास के अवशेषों के साथ दफनाया जाए. अपनी संपत्ति का कुछ हिस्सा दासों के नाम किया था और कुछ को उसने दासत्व से मुक्त कर, स्वतंत्र कर दिया था. ये घटनाएं उसकी संवेदनशीलता को दर्शाती हैं. कविहृदय प्लेटो ने भी पाया था, परंतु उसे कविता से अरुचि थी. मानता था कि कविता और नाटक जैसी विधाएं मनुष्य को यथार्थ से परे ले जाकर कमजोर बनाती हैं. अरस्तु मनोमस्तिष्क से वैज्ञानिक होने के साथसाथ संवेदनशील कवि भी था. एक कविता में उसने प्लेटो की विलक्षण मेधा की प्रशंसा करते हुए उसे विद्वानों के बीच अद्वितीय घोषित किया है. देहयष्टि को लेकर भी अरस्तु और प्लेटो के बीच उल्लेखनीय अंतर था. प्लेटो लंबेचैड़े डीलडोल, चैड़ी छाती और सुदर्शन चेहरे वाला व्यक्ति था. उसके नामकरण का कारण ही उसका लंबाचैड़ा डीलडौल था. दूसरी ओर अरस्तु की आंखें छोटीछोटी. पैर पतले. कदकाठी सामान्य थी. बोलते समय वह कभीकभी तुतलाने लगता था. यह भी कहा गया है कि उम्र के आखिरी पड़ाव पर उसके बाल झड़ चुके थे. रहनसहन और बोलचाल में वह असंयमी था. अरस्तु की वाक्पटुता की प्रशंसा की जाती है. दियोगेनस ने उसकी वाक्पटुता के उदाहरणों को पुस्तकाकार संग्रहित किया है. मगर उसकी प्रतिभा बेमिसाल थी. वह अपने समय के शीर्षतम दार्शनिकों और कुछ मामलों में तो अपने गुरु प्लेटो से भी आगे था. दांते ने उसे ‘सभी विद्वानों का गुरु’ घोषित किया है. अरस्तु ने विपुल साहित्य की रचना की. उसके ग्रंथों की संख्या लगभग चार सौ बताई जाती है. उनमें से अनेक ग्रंथ तो दर्शनशास्त्र और राजनीति की धरोहर हैं. लेकिन यह भी विडंबना है कि अरस्तु जैसे महामेधावी दार्शनिक की पुस्तकें भी उसके निधन के लगभग 250 वर्ष बाद ही सिसरो के प्रयासों के फलस्वरूप प्रकाशित हो सकीं. इस बीच उसकी अनेक पांडुलिपियां लुप्त हो चुकी थीं. अब सिवाय संदर्भों के उनका कहीं अतापता नहीं है. लेकिन ‘पाॅलिटिक्स’ और ‘एथिक्स’ जैसे ग्रंथ मानवता के उपहार के रूप में आज भी सुरक्षित हैं.

अरस्तु का न्याय-दर्शन

अरस्तु की विलक्षणता उसके तार्किक विश्लेषण में है. सुकरात और प्लेटो की शैली मुख्यतः निगमनात्मक थी. अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले सुकरात अपने प्रतिपक्षी के आगे तर्क करता था. उत्तर प्राप्त होने पर वह प्रति तर्क अथवा प्रत्युत्तर के माध्यम से बातचीत को आगे बढ़ाता था. सुकरात को पढ़ते हुए सुधी पाठक समझ जाता है कि संबंधित विषय को लेकर उसका खास दृष्टिकोण है. परंतु निष्कर्ष को सामने रखने से पूर्व वह उसके सभी पक्षों को गंभीरतापूर्वक परख लेना चाहता है. प्रत्येक तर्क के साथ वह अपने मंतव्य को मजबूत करता जाता है. संवादात्मक शैली इसमें सहायक बनती है. यह तर्क की निगमनात्मक पद्धति है, जिसमें एक परिकल्पना को सिद्धांत में बदलने के लिए उसके समर्थन में तर्क जुटाए जाते हैं. पर्याप्त साक्ष्य हों तो ठीक वरना उस परिकल्पना को किनारे कर नए शोध की शुरुआत की जाती है. इसका मुख्य प्रयोग विज्ञान में होता है, जिसमें एक परिकल्पना के साथ परीक्षण, अनुरीक्षण करते हुए निष्कर्ष तक पहुंचने की कोशिश की जाती है. आगमनात्मक पद्धति में निष्कर्ष भविष्य में निहित होता है. उससे जुड़ी कुछ छोटीछोटी स्थितियां, विचार अथवा अनुभवादि होते हैं. फिर उनकी पड़ताल, पुराने निष्कर्षों के साथ मिलान, व्याख्या और परिणामों में आवश्यक संशोधनपरिवर्धन के बाद अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचा जाता है. अरस्तु को तर्क के क्षेत्र में आगमनात्मक पद्धति के प्रथम उपयोग का श्रेय भी प्राप्त है.

अरस्तु को इस बात का भी श्रेय दिया जाता है कि उसने राजनीति को फुटकर विचारों से ऊपर उठाकर स्वतंत्र विषय के रूप में मान्यता दिलाने का काम किया. उससे पूर्व वह धर्मदर्शन का हिस्सा थी. भारत में तो वह आगे भी बनी रही. अरस्तु का समकालीन चाणक्य ‘अर्थशास्त्र’ में अपने राजनीतिक विचारों को सामने रखता है और मजबूत केंद्र के समर्थन में तर्क देते हुए राज्य की सुरक्षा और मजबूती हेतु अनेक सुझाव भी देता है, परंतु ‘अर्थशास्त्र’ और ‘पाॅलिटिक्स’ की विचारधारा में खास अंतर है. यह अंतर प्राचीन भारतीय और पश्चिम के राजनीतिक दर्शन का भी है. उनमें अरस्तु की विचारधारा आधुनिकताबोध से संपन्न और मानवमूल्यों के करीब है. ‘पाॅलिटिक्स’ के केंद्र में भी मनुष्य और राज्य है. दोनों का लक्ष्य नैतिक एवं सामाजिक उद्देश्यों की प्राप्ति है. अरस्तु के अनुसार राजनीतिकसामाजिक आदर्शों की प्राप्ति के लिए आवश्यक है नागरिक और राज्य दोनों अपनीअपनी मर्यादा में रहें. सामान्य नैतिकता का अनुपालन करते हुए एकदूसरे के हितों की रक्षा करें. इस तरह मनुष्य एवं राज्य दोनों एकदूसरे के लिए साध्य भी साधन भी. ‘अर्थशास्त्र’ में राज्य अपेक्षाकृत शक्तिशाली संस्था है. उसमें राज्यहित के आगे मनुष्य की उपयोगिता महज संसाधन जितनी है. लोककल्याण के नाम पर चाणक्य यदि राज्य के कुछ कर्तव्य सुनिश्चित करता है तो उसका ध्येय मात्र राज्य के लिए योग्य मनुष्यों की आपूर्ति तक सीमित है. ‘पाॅलिटिक्स’ के विचारों के केंद्र में नैतिकता है. वहां राज्य का महत्त्व उसके साथ पूरे समाज का हित जुड़े होने के कारण है. राज्य द्वारा अपने हितों के लिए नागरिक हितों की बलि चढ़ाना निषिद्ध बताया गया है. दूसरी ओर ‘अर्थशास्त्र’ के नियम नैतिकता के बजाए धर्म को केंद्र में रखकर बुने गए हैं, जहां ‘कल्याण’ व्यक्ति का अधिकार न होकर, दैवीय अनुकंपा के रूप में प्राप्त होता है. जिसका ध्येय राज्य की मजबूती और संपन्नता के लिए आवश्यक जनबल का समर्थन और सहयोग प्राप्त करना है. ठीक ऐसे ही जैसे कोई पूंजीपति श्रमिककामगार को मात्र उतना देता है, जिससे वह अपनी स्वामी के मुनाफे में उत्तरोत्तर संबृद्धि हेतु अपने उत्पादनसामर्थ्य को बनाए रख सके.

अरस्तु के जीवनकाल में यूनान भारी उथलपुथल के दौर से गुजर रहा था. लोग छोटेछोटे राज्यों से उकताने लगे थे. गणतांत्रिक प्रणाली को नाकाम होते देख साम्राज्यवादियों का हौसला बढ़ा था. वे नए सिरे से साम्राज्यवादी विस्तार की तैयारियों में लगे थे. छोटे राज्यों के असफल होने के दो कारण थे. पहला उनमें आपस में बहुत झगड़े होते थे. जरासी बात पर तलवारें खिंच जाया करती थीं. दूसरा और प्रमुख कारण था—व्यापारिक बाधाएं. ईसा पूर्व पांचवीछठी शताब्दी में अंतर्प्राद्वीपीय व्यापार ने काफी तरक्की की थी. व्यापारिक बेड़े दूरदराज के राज्यों के साथ व्यापार करते थे. दूसरे राज्य में व्यापार की अनुमति पारस्परिक राजनीतिक संबंधों पर निर्भर करती थी. संबंध अनुकूल हों तब भी शिल्पकार संगठनों को दूसरे राज्य में व्यापार हेतु भारीभरकम करों का भुगतान करना पड़ता था. बड़े राज्यों के गठन केे पीछे मूल विचार था कि उनमें मुक्त व्यापार के लिए अधिक बाजार उपलब्ध हो सकेगा. कुल मिलाकर बड़े राज्यों के गठन के पीछे जहां सभ्यताकरण की प्रेरणाएं थीं, वहीं वर्तमान के प्रति असंतोष की भावना भी थी. अरस्तु जैसा प्रखर विद्वान परिवर्तनों का मूकनिष्पंद द्रष्टा बनकर नहीं रह सकता था. वह दार्शनिक था. विचारों का उसकी दुनिया में महत्त्व था. विचारों को वह किसी भी प्रकार के परिवर्तन की आधारशिला मानता था. उसका मानना था कि मनुष्य श्रेष्ठ का चयन तब कर सकता है, जब उसे श्रेष्ठत्व का बोध हो. उन खूबियों की जानकारी हो जो श्रेष्ठ को श्रेष्ठत्व प्रदान करती हैं. ऐसा नहीं है कि इसकी शुरुआत अरस्तु या प्लेटो से हुई हो. दर्शन के रूप में राजनीति के अध्ययन की शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी. प्राचीन यूनान में होमर, लायक्राग्स, सोलन, प्रोटेगोरस, एंडीफोन, पाइथागोरस, जेनोफीन जैसे अनेक नाम हैं, जिन्होंने राजनीति को सभ्यताकरण के उपकरण की भांति प्रयुक्त किया था. तथापि सुसंगत राजनीतिक चिंतन का अभाव था. राजा प्रजा की मांग तथा अपनी सुविधा के अनुसार कुछ नियम बना लिया करते थे. फिर लंबे समय तक उन्हीं को मार्गदर्शक मानकर काम चलाया जाता था. उनमें से कुछ पर अमल हो पाता था, कुछ पर नहीं. प्रजा कुछ समय तक प्रशासन की दुर्बलताओं को सहती. धीरेधीरे असंतोष उमड़ने लगता था. फलस्वरूप नए सिरे से व्यवस्थापरिवर्तन की मांग उठने लगती थी. नियमों में बड़ा परिवर्तन प्रायः बड़े सत्तापरिवर्तन के साथ ही हो पाता था.

प्लेटो ने न केवल विभिन्न राजनीतिक दर्शनों को एक साथ अध्ययनचिंतन का विषय बनाया, वहीं उनकी खूबियों और खामियों पर भी चर्चा की. उसका लक्ष्य सामाजिक आदर्श थे, जिनके लिए वे राजनीति को औजार के रूप में उपयोग करना चाहता था. अरस्तु ने उस अध्ययन को तर्कसम्मत ढंग से विस्तार दिया. उसके लिए कसौटी न्याय और नैतिकता को बनाया. अरस्तु की कामना ऐसे राज्य की थी, जो परमशुभ की प्राप्ति हेतु सतत अग्रसर हो. जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को अपनी अच्छाइयों के साथ जीने की आजादी हो. और वह अंतःस्फूर्त प्रेरणा के साथ लक्ष्यप्राप्ति हेतु संकल्परत हो. यह तभी संभव है जब व्यक्ति को कानून और समाज की मर्यादा में, वह सब कुछ करने की स्वतंत्रता हो जिसे वह अपने लिए उपयुक्त मानता है. इसके लिए आवश्यक है कि राज्य अपेक्षित रूप में उदार हो. निरंकुश, अल्पतंत्रात्मक राज्यों में जनसाधारण से उसके चयन का अधिकार छीन लिया जाता है. इस कारण प्लेटो ने निरंकुश राज्य को सबसे बुरा माना है. उसके अनुसार निरंकुश राज्य में नीचे से ऊपर तक सभी स्वार्थलिप्त होते हैं. संसाधनों पर कुछ लोगों का अधिकार होता है. बहुसंख्यक वर्ग से अपेक्षा की जाती है कि वह अल्पसंख्यक शासक वर्ग की मनमानियों को सहते हुए शासन में सहयोग करे तथा राज्य के हित को, जो वास्तव में उसपर शासक वर्ग द्वारा थोपा हुआ उसका स्वार्थ होता है—अपना हित समझकर वर्ताब करे. ऐसे राज्य में मनुष्य सज्जन की संगत को तरस जाता है. दुर्जन उसे चारों ओर से घेरे रहते हैं. परिणामस्वरूप वह अपनी ही अच्छाइयों से कट जाता है. दुष्प्रभाव केवल यहीं तक सीमिन नहीं रहता. अपने चारों और स्वार्थपरक माहौल देख भले नागरिकों का अपनी मूलभूत अच्छाई से भरोसा उठने लगता है. वे मान लेते हैं कि अस्तित्व को बचाए रखने के लिए दुर्जनों के बीच दुर्जन जैसा व्यवहार करना उसकी मजबूरी है. बुराई के लिए आपधापी में अच्छाई की बलि चढ़ा दी जाती है. परिणामस्वरूप लोगों के स्वार्थ प्रबल होने लगते हैं. केवल अपने लिए जीने की होड़ मच जाती है. कुल मिलाकर निरंकुश राज्य नागरिकों को स्वार्थ के लिए प्रेरित करता है. ऐसे समाजों में चूंकि प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए जीता है, इसलिए सामूहिक हितों के लिए संगठित प्रतिरोध की उसकी क्षमता निरंतर घटती जाती है. ऐसे समाजों में न्याय के अवसर विरल हो जाते हैं.

प्लेटो व्यक्ति एवं समाज की अंतःनिर्भरता पर जोर देता है. सामाजिकता की शर्त है कि अन्योन्याश्रितता केवल सुखसुविधाओं और संसाधनों की नहीं, आचारव्यवहार की भी बनी रहे. इस दृष्टि से मनुष्य तथा समाज के बीच बहुत अधिक अंतर नहीं होता. श्रेष्ठ मनुष्य श्रेष्ठ नागरिक भी होता है, किंतु अकेले मनुष्य की श्रेष्ठता क्षणभंगुर होती है. मनुष्य अपने आचारव्यवहार में श्रेष्ठतर बना रहे, उसके लिए समाज की श्रेष्ठता अपरिहार्य है. इस तरह जो मनुष्य के लिए आदर्श है, प्रकारांतर में वह राज्य के लिए भी आदर्श होना चाहिए. न्याय मानव जीवन का उद्देश्य तभी बन सकता है, जब वह समाज का उद्दिष्ट हो. यदि समाज में न्याय का अभाव है तो समझना चाहिए कि राज्य एवं नागरिकों के बीच विश्वास एवं तालमेल की कमी है. विचार को आगे बढ़ाता हुआ प्लेटो लिखता है कि मनुष्य के लिए क्या श्रेष्ठ है, इसे उस समय तक नहीं जाना जा सकता, जब तक हम यह न जान लें कि राज्य के लिए क्या श्रेष्ठ है. अथवा राज्य जो उसके नागरिकों के लिए श्रेष्ठ है, उसे अपने लिए भी श्रेष्ठ न मान ले. निरंकुश राज्य में ऐसा संभव नहीं होता. वहां नागरिकों से न केवल उनके चयन का अधिकार छीन लिया जाता है, बल्कि लोगों को विवश किया जाता है कि वे अपने विवेक से काम लेने के बजाय दूसरों के आदेश का अनुपालन करें. इससे मनुष्य अपने नागरिक धर्म को भूल जाता है. दूसरी ओर वे लोग जो दूसरों के श्रम और अधिकारों पर कब्जा जमाए होते हैं, विरोध की कोई संभावना न देख उनका दुस्साहस बढ़ता ही जाता है. परिणामस्वरूप स्तरीकरण स्थायी रूप ले लेता है. इससे समाज दो हिस्सों में बंट जाता है. एक ओर आज्ञाप्रदाता समूह होता है. दूसरी ओर आज्ञापालक लोग, जो संख्या में बहुसंख्यक होने के बावजूद अधिकारवंचित होने के कारण दबाव में रहने को विवश होते हैं. इससे मनुष्य की मूलभूत पहचान जो उसके मानवीकरण की शर्त के साथ जुड़ी है, धूमिल पड़ने लगती है. अरस्तु ने मनुष्य को सभी प्राणियों में श्रेष्ठ माना है. मनुष्य सबके साथ मिलकर जीने को उत्सुक होता है, इस कारण वह दूसरों से श्रेष्ठ है. परंतु सामूहिकरण की भावना जो पशुओं में भी होती है. यहां तक कि कीटपतंगे भी समूह में जीना जानते हैं. फिर मनुष्य की सामूहिकता और मानवेत्तर प्राणियों की सामूहिकता में क्या अंतर है? अरस्तु के अनुसार मनुष्य की सामूहिकता समाज के रूप में कुछ नियमों से बंधी होती है. या यह कहो कि अपनी सूझबूझ का परिचय देते हुए वह सामाजिक नियमों के रूप में कुछ मर्यादाएं चुनता है. फिर उनके अनुपालन हेतु संस्थाओं का गठन करता है. मानवेत्तर प्राणियों में ऐसा नहीं होता. वहां केवल बल का साम्राज्य होता है. इसलिए जब कोई बलशाली प्राणी अपने से कमजोर पर आक्रमण कर उसके लिए संकट उत्पन्न करता है, तो बाकी जानवरों में उसकी कोई स्थायी प्रतिक्रिया नहीं होती. मनुष्य के साथ ऐसा नहीं है. मानवसमाज में अधिकार एवं कर्तव्य साथसाथ चलते हैं. परंतु ऐसे समाजों में जहां स्तरीकरण बहुत अधिक हो, समाज शक्तिशाली और शक्तिविपन्न वर्गों में बंटा हो, वहां मिलजुलकर रहने की प्रवृत्ति भी कमजोर पड़ती जाती है. न्यायभावना किसी भी मनुष्य की श्रेष्ठता का मापदंड होती है. न्यायभावना से कटा मनुष्य नितांत जंगली हो सकता है.

कविहृदय प्लेटो आदर्श राज्य के सपने को अपनी कल्पना के जरिये विस्तार देता है. उसका वैचारिक स्तर इतना ऊंचा है कि व्यावहारिक कठिनाइयों को कभी समझ ही नहीं पाता. अरस्तु को मानवव्यक्तित्व की जटिलताओं की समझ अपेक्षाकृत अधिक थी. वह जानता था कि मनुष्य के व्यवहार के बारे में कोई भी सटीक भविष्यवाणी कर पाना संभव नहीं है. यह भी नहीं कहा जा सकता कि किसी मनुष्य में जो गुण आज हैं, वे सदैव बने रहेंगे. इसलिए किसी व्यक्ति का दार्शनिक होना उसके चरित्र का स्थायी लक्षण नहीं है. अपने विचारों की व्याख्या के लिए अरस्तु ने ‘पाॅलिटिक्स’ के तीसरे खंड के तेरहवें अध्याय में पेरियांडर का उदाहरण दिया है. पेरियांडर ने 627 ईस्वीपूर्व से 587 ईस्वीपूर्व तक कोरिंथ पर राज किया था. उसकी गिनती ग्रीक के सात प्राचीन संतपुरुषों में होती है. वह दार्शनिक, कवि, आविष्कारक, योद्धा और श्रेष्ठ प्रशासक था. यातायात साधनों की खोज तथा अनेक महत्त्वपूर्ण भवनों के निर्माण के कई आविष्कारों का श्रेय भी उसे दिया जाता है. किंतु उसका आचरण उसकी विद्वता के सर्वथा विपरीत था. अपने आचरण में वह पूरी तरह निरंकुश, क्रोधी, निर्मम, कठोर और कुटिल तानाशाह था. एक बार उसे अपनी पत्नी लिसिडा पर इतना क्रोध आया कि उसे सीढ़ियों पर ढकेल दिया था, जिसमें उसकी मृत्यु हो गई. पेरियांडर और मेनिटस के राजा थ्रेसीबुलस् के बीच गहरी मैत्री थी. पेरियांडर की भांति थ्रेसीबुलस् भी निरंकुश सम्राट था. मेलिटस और लीडिया के बीच लंबा संग्राम चला था. वर्षों तक चलने वाले युद्ध का कोई परिणाम न निकलता देख दोनों राज्य आपस में समझौते के लिए विवश हो गए. थ्रेसीबुलस ने युद्ध विराम की घोषणा तो कर दी, लेकिन वह अपने विरोधियों को मित्र का दर्जा देने को तैयार न था. इस कारण वह भीतर से बहुत आहत था. सो उसने पेरियांडर से सलाह लेने के लिए उसके पास अपना दूत भेजा. पेरियांडर ने दूत की बातें सुनीं. सलाह देने के बजाय वह दूत को बस्ती से बाहर खेत में ले गया. वहां गेहूं की फसल खड़ी थी. पेरियांडर ने साथ आए सैनिकों को सबसे ऊपर निकली बालियों को काटने का आदेश दिया. उसके इशारे पर सैनिकों ने सबसे ऊपर दिखने वाली बालियों को काटकर जमीन पर बिछा दिया. उसके बाद थ्रेसीबुलस् के दूत को वापस लौटा दिया. दूत की कुछ समझ न आया. उसने वापस लौटकर जो कुछ घटा था, सम्राट को बता दिया. सुनकर थ्रेसीबुलस् की आंखों में चमक आ गई. वह पेरियांडर का इशारा समझ गया. सबसे ऊंची बालियों को नष्ट कर देने का अर्थ जो उसने निकाला वह था, अपने सभी प्रमुख विरोधियों का निर्ममतापूर्ण सफाया. अरस्तु का निष्कर्ष था कि सत्ताएं अपना विरोध नहीं सह पातीं. गणतांत्रिक सरकारें तानाशाहों की भांति कठोर फैसले लेने से बचती हैं, लेकिन विरोधियों को वे भी अपवादस्वरूप ही पचा पाती हैं. विरोधियों के क्रूरतापूर्ण दमन से बचते हुए वे आरंभ में अपेक्षाकृत उदार दिखने वाले रास्ते अपनाती हैं. उनकी पहली कोशिश विरोधियों के संगठन को तोड़ने की होती है. फिर उनमें से एक पक्ष को बहलाफुसला या सत्ता में हिस्सेदार बनाकर अपने पक्ष में कर लिया जाता है. यदि उससे समाधान की संभावना कम हो अथवा कोई अड़ जाए राष्ट्रहित का हवाला देते हुए देशनिकाले जैसी सजा देकर उससे मुक्ति पा ली जाती है.

अरस्तु आदर्श और व्यवहार के अंतर को वह भलीभांति समझता था. प्लेटो आदर्श से तनिक पीछे हटने को तैयार न था, जबकि अरस्तु आदर्श और व्यवहार में संतुलन बनाए रखने का समर्थक था. व्यावहारिकता से जराभी पीछे हटे बिना वह समाज में नैतिकता और अनुशासन को बनाए रखने का समर्थन करता है. व्यावहारिक आदर्शोन्मुखता उसके दर्शन का मुख्य लक्षण है. उल्लेखनीय है कि ‘पाॅलिटिक्स’ की रचना से पहले उसने 158 नगरराज्यों के संविधानों का अध्ययन किया था. अंततः वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि प्रत्येक राजनीतिक दर्शन स्वयं में अपूर्ण है. केवल चरित्र की ईमानदारी और निष्ठा से अपेक्षित लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है. किसी एक व्यक्ति अथवा समूह द्वारा भी उन आदर्शों को प्राप्त नहीं किया जा सकता. इसके लिए समाज के सभी वर्गों के बीच आपसी सहयोग और तालमेल आवश्यक है. समाजवाद की भाषा में कहें तो सब एक के लिए और एक सबके लिए जीने को तैयार हो, तभी अपेक्षित लक्ष्यों की प्राप्ति संभव है. राजनीति के आधुनिक पंडित राजतंत्र की आलोचना इस आधार पर करते हैं कि वहां राजा वंशानुगत आधार पर सत्ता ग्रहण करता है. एक ही वर्ग की मनमानी चलती रहती है. महत्त्वपूर्ण निर्णय लेते समय जनता से सलाहमशविरा करने अथवा लोगों की इच्छाओं का सम्मान करने की जरूरत ही नहीं समझी जाती. प्रायः सत्ता पक्ष की पसंदों को प्रजा की पसंद या उसके लिए सर्वथा हितकारी बनाकर लाद दिया जाता है. ऐसे समाजों में संपन्न लोगों की चलती है और न्याय की संभावना अत्यंत विरल हो जाती है. जबकि अरस्तु के अनुसार न्याय प्रत्येक व्यवस्था का अंतिम उद्देश्य होना चाहिए. तदनुसार न्याय की दृष्टि में जो श्रेष्ठ है, वही राज्य के गठन का उद्देश्य भी है. इसलिए राजतंत्र हो अथवा लोकतंत्र, यदि उसका शासन समाजीकरण की प्रक्रिया को मजबूत बनाते हुए राज्य के उद्देश्यों के प्रति समर्पित है, यदि वह राजकर्म को समाज द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारी मानता है तो उसे अनैतिक नहीं माना जा सकता. हालांकि अकेले व्यक्ति के हाथों में सत्ता आने पर उसकी मनमानी के आसार अधिक होते हैं. राजतंत्र में प्रायः यह सोचकर कि राजा के सुख में ही प्रजा का सुख निहित है—नीतियां बनाई जाती हैं. इसलिए प्रजा की पसंदों के बारे में पता ही नहीं चल पाता. प्रजा भी राज्य की ओर से उम्मीद खो बैठती है. उस अवस्था में राज्य के गठन का औचित्य ही समाप्त हो जाता है. यदि प्रजा की उदासीनता बहुत अधिक बढ़ जाए तो वह राज्य की प्रवृत्ति तथा उसके बदलाव में रुचि लेना छोड़ देती है. इससे शीर्ष पर बैठे लोगों की मनमानियां बढ़ती जाती हैं.

भारत में राजा नामक संस्था को असुरों की देन बताया गया है. ऐतरेय ब्राह्मण में रोचक प्रसंग आया है—‘‘देव और असुर परस्पर युद्धरत रहते थे. दोनों के बीच पूरब दिशा में युद्ध हुआ. उसमें देवता पराजित हुए. अगली लड़ाई दक्षिण में हुई. उसमें भी असुरों की जीत हुई. उसके बाद पश्चिम में युद्ध हुआ. असुरों ने एक बार पुनः देवताओं को पराजित किया. फिर उत्तर दिशा में युद्ध हुआ. देवता उस युद्ध में भी पराजित हुए. उसके बाद वे उत्तरपूर्व में युद्धरत हुए. इस बार देवताओं की विजय हुई. देवताओं ने माना, वह दिशा ‘अपराजेय’ है….केवल वही दिशा थी, जिसमें देवताओं को जीत मिली. अंततः देवताओं को समझ आया—‘हम इसलिए पराजित हुए, क्योंकि हमारा कोई राजा नहीं है.’ उसके बाद उन्होंने सोम को अपना राजा चुना.’’ उसके बाद राजा नियुक्ति की जाने लगी. यजुर्वेद में राजा को उसके कर्तव्यों के बारे में चेताते हुए कहा गया है—‘तुम्हें यह राष्ट्र सौंपा जाना है—प्रजा के क्षेम तथा उसके सर्वविध पोषण, कृषि की उन्नति एवं बहुआयामी विकास के लिए.’ अथर्ववेद में कहा गया है—‘प्रजा के सुख में ही राजा का सुख, प्रजा कल्याण में राजा का कल्याण निहित है. लेकिन कल्याण का स्वरूप क्या हो? प्रजा के सुख को तय करने वाले मापदंड कैसे हों? क्या यह संभव है कि कोई एक सुख प्रजा के सभी सदस्यों के लिए समानरूप से सुखकारी हो? राजतंत्र चूंकि किसी एक व्यक्ति या चुने हुए व्यक्तियों के समूह की इच्छा द्वारा नियंत्रित होता है, इसलिए राजतंत्र में इन प्रश्नों को प्रायः अनसुना कर दिया जाता है.

देवासुर संग्राम एक प्रतीक है. मिथकीय आख्यान. परंतु यह ऐतिहासिक सत्य है कि प्राचीन भारत में लंबे समय तक यही हाल रहा. छोटेछोटे राज्य आपस में लड़ते रहते थे. इसलिए प्रजा ‘कोऊ नृप होय हमें क्या हानि’—कहकर राज्य और राजा दोनों की ओर से उदासीन बनी रहती थी. यहां तक कि सत्ता केंद्र पूरी तरह बदल जाने पर भी परिवर्तनों पर उसका ध्यान नहीं जाता था. सामान्यतः इसे राजनीति की असफलता कहा जाएगा. क्योंकि वह उन लोगों के राज्य का नेतृत्व करने का दावा करती थी, जिन्हें पता ही नहीं होता कि उनका राज्य के प्रति और राज्य का उनके प्रति क्या कर्तव्य है? न ही यह मालूम होता है कि राज्य समाज से ऊपर नहीं, बल्कि समाज द्वारा खुद को व्यवस्थित रखने के लिए गढ़ी गई संस्था है, जिसपर एकमात्र जनता का सर्वाधिकार है. यदि उन्हें या उनमें से किसी एक को राज्य की ओर से कुछ समस्या है तो इसका कारण केवल राज्य की दुर्बलता नहीं, बल्कि उनका अपने ही अधिकारों के प्रति उपेक्षाभाव भी है. असल में वे जान ही नहीं पाते कि वास्तविक समस्या राज्य को उत्तराधिकार का विषय और केवल शक्तिकेंद्र समझकर उसपर काबिज होने, फिर उन कर्तव्यों से पलायन से जन्म लेती है, जो राजा नामक संस्था के लिए विहित हैं. इसलिए अरस्तु ने राजतंत्र की आलोचना करने के बजाए राजा के आदर्शों पर ज्यादा जोर दिया है. उसका विचार था कि जिस व्यक्ति में नेतृत्व का गुण हो, वही राजा है. स्टोइक विचारकों के अनुसार केवल वही व्यक्ति सम्राट बनने का अधिकारी था, जो आचरण में सर्वश्रेष्ठ तथा राजपद के लिए अपेक्षित योग्यताएं रखता हो. सुकरात का विचार था कि राजा उसे बनाना चाहिए जिसमें राजा के लिए अपेक्षित सभी गुणों का समावेश हो. इस तरह सिद्धांत के स्तर पर राजशाही में भी लोकहित को साधने पर जोर दिया जाता है. परंतु यदि समाज का बहुसंख्यक समुदाय ही राज्य, उसकी गतिविधियों और अपने अधिकारों की ओर से उदासीन हो जाए तो शिखर पर बैठे लोगों को मनमानी का अवसर सहज ही मिल जाता है. अरस्तु का विचार था कि यदि नागरिक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक तथा शासक वर्ग कर्तव्यों के प्रति पूर्णतः सचेत हो तो कोई भी राजनीतिक दर्शन राज्य के उद्देश्यों को प्राप्त कर सकता है. इसलिए दोष किसी विचार अथवा विचारधारा का न होकर उसका सही अनुपालन न करने तथा राजनीतिज्ञों के स्वार्थ से घिर जाने का है. इसलिए उसने कहा था—

‘कम से कम आधी राजनीति उपलब्ध संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण तथा परिस्थितियों का श्रेष्ठतम उपयोग करने में है.’

ऐसा नहीं है कि अरस्तु राजनीतिक परिवर्तन की संभावनाओं अथवा उसमें नए चिंतन और विचारों को अनावश्यक मानता था. उसका विचार था कि राजनीतिक दर्शनों में सुधार की भरपूर संभावना है. उसके लिए राज्य एवं नागरिकों का आपसी विश्वास एवं सहयोग आवश्यक है. यह तभी संभव है जब राज्य के सभी नागरिक श्रेष्ठतम आचरण का प्रदर्शन करें, तथा राज्य के केंद्र पर आसीन शक्तियां अपने कर्तव्यों के प्रति पूरी तरह सजग एवं समर्पित हों. आदर्श राज्य को लेकर कुछ ऐसा ही स्वप्न प्लेटो का भी था. क्या दोनों का परिकल्पनाएं समान हैं? यदि कुछ अंतर है तो क्या है? ‘दि लाॅज’ प्लेटो की प्रौढ़ वयस् की रचना है. उसकी गिनती राजनीतिक दर्शन की श्रेष्ठतम कृतियों में की जाती है. प्लेटो ने उसमें आदर्श राज्य की संकल्पना को प्रस्तुत किया है. अरस्तु को वह परिकल्पना अव्यावहारिक लगती है. प्लेटो के विचारों को सर्वथा मौलिक और अनुपम बताकर वह उसकी प्रशंसा करता है, साथ में यह भी जोड़ देता है कि उसके विचार उत्कृष्ट वैचारिकता से भरपूर होने के साथसाथ, अत्यधिक क्रांतिकारी किंतु अतिकल्पनात्मक हैं. उसके शब्दों में छिपी व्यंग्यरेख को नजरंदाज नहीं किया जा सकता. अप्रत्यक्ष रूप से वह प्लेटो के विचारों को अव्यावहारिक करार देता देता है. इसका आशय यह नहीं है कि राज्य के लिए जिस उच्चतम आदर्शं की परिकल्पना प्लेटो करता है, उसके स्वरूप एवं संचालन को लेकर अरस्तु की उससे कुछ कम अपेक्षाएं हैं. देखा जाए तो दार्शनिक सम्राट के रूप में उसकी कामना ऐसे महामानव की है जो उच्च मानवादर्शों से युक्त हो. जो लोगों की समानता और स्वतंत्रता में विश्वास रखता हो. उनके सुख एवं सुरक्षा में संवृद्धि के प्रति पूरी तरह संकल्पबद्ध हो. ऐसा महामानव मिलना असंभव है. यदि चमत्कारस्वरूप मिल भी जाए तो उसके परिवत्र्ती सम्राट उसी की भांति गुणवंत होंगे इसकी संभावना अत्यंत विरल है. समय के साथ स्वयं व्यक्ति के आदर्श एवं प्राथमिकताओं में बदलाव आ सकता है. आदर्श राज्य के लिए ‘दार्शनिक सम्राट’ की अनुशंसा करते समय प्लेटो प्रकारांतर में राजतंत्र का ही पक्ष लेता है, जिसमें राजा की इच्छा सर्वोपरि होती है. जबकि व्यक्ति वह चाहे जितना उदार क्यों न हो, अपने ईमानदार सोच, संपूर्ण सदेच्छा और समर्पण के साथ काम भी करता हो, यह आवश्यक नहीं कि जिसे वह विस्तृत जनसमाज के लिए हितकारी मानता है, वह उसके लिए वास्तव में उतना ही हितकारी हो. पेरियांडर का उदाहरण पीछे दिया गया है. छब्बीस शताब्दी पहले ग्रीक में जन्मा पेरियांडर एक साथ वीर, दूरदृष्टा, आविष्कारक, कुशल प्रशासक, महत्त्वाकांक्षी सम्राट आदि सबकुछ था. उसके शासन के दौरान कोरिंथ ने खूब तरक्की की. कई नए आविष्कार उसने किए. महत्त्वपूर्ण इमारतों का निर्माण कराया, परंतु समय के साथ उसकी मान्यताओं में बदलाव आता गया. आज कुछ लोग उसे तानाशाह के रूप में पहचानते हैं, जबकि कुछ के लिए जो उसके आरंभिक जीवन के कार्यकलापों पर अटके रहते हैं, पेरियांडर संत की हैसियत रखता है. ठीक ऐसे ही जैसे राम के बारे में कहा जाता है. रामराज्य को आदर्श बताने वालों के लिए राम इतना आदर्श राजा है कि वे उसे ईश्वर का दर्जा देते है. परंतु जो लोग उसे शंबूक हत्या का दोषी मानते हैं, उनकी निगाह में वह निरंकुश सम्राट है.

अरस्तु ने वैज्ञानिक का स्वभाव पाया था. उस समय मौजूद संविधानों का अध्ययन करने के पश्चात वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि कोई भी राजनीतिक दर्शन अंतिम रूप से आदर्श नहीं हो सकता. अनेक ऐसे राज्य हैं जहां राजतंत्र था, जहां राजा ने लोककल्याण के प्रति अपने दायित्व को समझते हुए लोकहित में बड़ेबड़े काम किए, वहीं अल्पतंत्र, कुलीनतंत्र, गणतंत्रादि के अनेक ऐसे उदाहरण हैं जो जनता की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर सके. कुल मिलाकर राजनीतिक दर्शनों को लेकर अरस्तु का सीधासीधा उपयोगितावादी दृष्टिकोण था, जिसमें वह राज्य के नैतिक आचरण पर जोर देता है. ‘अंत भला सो सब भला’—यदि किसी राजनीतिक तंत्र का कामकाज कल्याणकारी और राज्य के आदर्शों के अनुरूप है, जो नागरिकों के लिए इससे कोई अंतर नहीं पड़ता किस दर्शन का अनुगामी है. परंतु क्या सचमुच ऐसा ही है. यह ठीक है कि राजा यदि उदार और आदर्शोन्मुख है तो वह निस्वार्थ भाव से लोककल्याण की नीतियां अपनाएगा. परंतु ऐसे राजा के अधीन राज्य में अनुकूल परिस्थितियों की गारंटी केवल उस राजा के जीवन या सत्तासीन रहने तक सीमित होगी. राजा बदलने के साथ ही राज्य का नागरिकों के प्रति व्यवहार बदल सकता है. अब यदि लोगों को अपना राजा चुनने की सुविधा न हो, और राजसत्ता उत्तराधिकार में अंतरित होती हो तो अथवा कुछ समय तक सत्तासीन रहने के बाद सम्राट नागरिकों के प्रति अपने कर्तव्य को भूल जाए तो सारे परिणाम उलट सकते हैं. दूसरे यह कतई आवश्यक नहीं है कि आदर्श राजा का उत्तराधिकारी भी उन्हीं आदर्शों का अनुगामी हो. आशय है राजतंत्र में आदर्श की उपस्थिति यदि हो भी तो वह अल्पकालिक होती है. पीछे पेरियांडर का उदाहरण आया है, जिसकी आरंभ में एक संत के रूप में प्रतिष्ठा थी. परंतु आगे चलकर वह निरंकुश सम्राट के रूप में कुख्यात हुआ. यह कभी भी, किसी भी राज्य में संभव है. ऐसे में राजतंत्र की सीमा अपने आप निर्धारित हो जाती है. लेकिन इससे अरस्तु का कहना गलत नहीं हो जाता. ध्यान रखना चाहिए कि वह आदर्श राजनीतिक दर्शन की बात न कहकर राज्य के आदर्श की बात कर रहा है.

इस निष्कर्ष में अरस्तु के अपने निष्कर्षों का बड़ा योगदान था. राजतंत्र को लेकर प्लेटो के जीवनानुभव बहुत ही कड़बे थे. आरंभ में सायराक्स के सम्राट डायनोसियस से उसके अच्छे संबंध थे. उसका संबंधी प्लेटो का गहरा शिष्य था. परंतु कुछ ही अवधि के बाद डायनोसियस प्लेटो का दुश्मन बन गया. नाराज होकर उसने प्लेटो को दास के रूप में बेचना चाहा. कुछ मित्रों की मदद से बड़ी मुश्किल से प्लेटो खुद को बचा पाया था. एथेंस के लोकतंत्र को वह सुकरात की हत्या का दोषी मानता था. उसके सापेक्ष अरस्तु के व्यक्तिगत अनुभव बहुत अच्छे थे. उसके पिता सिकंदर के दादा के राजदरबार में थे. जहां राजतंत्र था. एक अन्य राजतंत्र माइसिया के राजा से उसके व्यक्तिगत संबंध हमेशा ही अनुरागपूर्ण थे. एथेंस के गणतंत्र ने उसका स्वागत किया था तो सिंकदर जैसे महत्त्वाकांक्षी सम्राट उसका मित्र था और कदमकदम पर उसकी मदद करता रहता था. व्यक्ति के जैसे अनुभव हों, उसके विचारों की देहयष्टि उसी के अनुसार ढलती चली जाती है. सुकरात का संबंध साधारण शिल्पकार परिवार से था. सोफिस्टों के बौद्धिक वितंडा को उसने गहराई से देखासमझा था. सोफिस्टों का केवल सत्तावादी नजरिये से जीवन को देखना समझना उसे बहुत अखरता था. उसे लगता था कि समाज की अनेक समस्याएं दिखावे की संस्कृति की वजह से हैं. यहां तक कि गणतांत्रिक शासन प्रणाली भी जिसपर एथेंस को गर्व करता है, दिखावे की संस्कृति का शिकार है. जबकि सत्य दिखावे की नहीं, आत्मसात करने, आचरण में उतारने की वस्तु हैै. इसलिए उसने सोफिस्टों का विरोध किया था, जो तर्क को दूसरों को प्रभावित की कला मानते थे. सोफिस्टों को समाज का समर्थन था. सुकरात का मानना था कि कोरे तर्क को ज्ञान का पर्याय समझने वाले सोफिस्टों को तर्क के आधार पर ही परास्त किया जाए. उसके लिए उसने ऐसी तर्कशैली विकसित की, जिससे सामने वाला स्वयं निरुत्तर हो जाता था. वह कोरे वितंडा से परे, किसी भी निष्कर्ष से पूर्व ज्ञान को प्रत्येक कोण से परख लेने की नीति थी. जिसके लिए विषय का सर्वांगीण बोध आवश्यक था. जाहिर है सोफिस्टों को इसका अभ्यास न था. इसलिए न्याय पर विमर्श के दौरान थ्रेचाइमच्स जैसा सोफिस्ट विद्वान भी सुकरात के आगे पराजय स्वीकारने को विवश हो जाता है.

वस्तुतः राजनीतिक आदर्श के रूप में अरस्तु राज्य के जिस स्वरूप की कल्पना करता है, उसमें और प्लेटो के दर्शन में विशेष अंतर नहीं है. ‘आदर्श राज्य’ के रूप में प्लेटो जो कल्पना करता है, अरस्तु उसी सपने को ‘राज्य के आदर्श’ के रूप में साकार करना चाहता है. इस तरह हम अरस्तु के विचारों पर प्लेटो के दर्शन की छाया देख सकते हैं. बावजूद इसके अरस्तु के विचारों को प्लेटो के दर्शन की पुनरावृत्ति नहीं कहा जा सकता. ‘राज्य के आदर्श’ को परिपक्व दर्शन के रूप में विस्तार देने से पहले वह प्लेटो के ‘आदर्श राज्य’ से उतनी ही प्रेरणा लेता है, जितनी आवश्यक है. ‘लाॅज’ में प्लेटो का यह विचार कि न्याय सभ्यताकरण की कसौटी है तथा न्याय से ही मानव ने सभ्यता का पाठ पढ़ा है—अरस्तु के दर्शन के लिए प्रस्थान बिंदू का काम करता है.

न्याय की व्याख्या करते हुए अरस्तु उसके दोनों रूपों पर विचार करता है. पहला वह जिसके बारे में सामान्यजन सोचता है कि न्याय कानून के तत्वावधान में अदालतों के जरिये प्राप्त होता है. इसके साथसाथ वह मनुष्य के आचरण एवं व्यवहार की व्याख्या करता है. न्याय का यह रूप नागरिक और राष्ट्रराज्य के कानून के अंतर्संबंध को दर्शाता है. उन अनुबंधों की ओर इशारा करता है, जिनसे कोई नागरिक सभ्य समाज का नागरिक होने के नाते जन्म के साथ ही जुड़ जाता है. प्रकारांतर में वह बताता हे कि आदर्शोंन्मुखी समाज में मनुष्य का आचरण एवं कर्तव्य किस प्रकार के होने चाहिए, ताकि समाज में शांति, सुशासन और आदर्शोन्मुखता बनी रहे. प्रायः सभी समाजों में कानून को नकारात्मक ढंग से लिया जाता है. बातबात पर कानून का हवाला देने वालीं, उसके अनुपालन में लगी शक्तियां प्रायः यह मान लेती हैं कि बुराई मानवस्वभाव का स्थायी लक्षण है. जो बुरा है, उसे केवल दंड के माध्यम से बस में रखा जा सकता है. कि मानवव्यक्तित्व पर आज भी अपने उन पूर्वजों के लक्षण शेष हैं जो कभी जंगलों में जानवरों के बीच रहा करते थे. कुछ व्यक्तियों में पाशविक वृत्ति ज्यादा प्रभावी होती है. ऐसे लोगों पर बलप्रयोग उन्हें अनुशासित रखने का एकमात्र उपाय है. है. इसलिए सभ्यताकरण के आरंभ से ही दंडविधान की व्यवस्था प्रत्येक समाज और संस्कृति में रही है. इसे पुष्ट करने के लिए धर्म और संस्कृति से जुड़े ऐसे अनेक किस्से हैं, जिनसे हमारा संस्कार बनता है. स्वर्गनर्क की कल्पना भी इसी का हिस्सा है. उनमें से अधिकांश पर विजेता संस्कृति का प्रभाव है. आधुनिक संदर्भों में वह चाहे जितना लोकतंत्र और मानवस्वांतत्रय का विरोधी हो, प्राचीन इतिहास, धर्म और संस्कृति का हिस्सा होने के कारण उसे धरोहर के रूप में सहेजा जाता है.

प्राचीनकाल में जब अदालतें नहीं थीं, तब न्याय करने की जिम्मेदारी बस्ती के मुखिया या समूह के वरिष्ठ सदस्य जिसकी निष्पक्षता असंद्धिग्ध हो—की होती थी. इस्लामी शासन के दौरान यह जिम्मेदारी काजी के कंधों पर आ पड़ी. राजशाही में राजा को सर्वेसर्वा माना जाता था. दरबार में आए मामलों की सुनवाई के लिए न्यायाधिकारी और दंडाधिकारी दोनों की जिम्मेदारियां वही संभालता था. दंडविधान का आधार परंपरागत अथवा लिखितअलिखित विधिसंहिताओं को बनाया जाता था. किसी न किसी रूप में वे सभी धार्मिक उपादानों द्वारा शासितअनुशासित होती थीं. उसका लाभ धार्मिक कार्यकलापों में लिप्त ‘धंधेबाज’ उठाते थे. उदाहरण के लिए भारत में एक जैसे अपराध के लिए ब्राह्मणों तथा शूद्रों के लिए अलगअलग दंडविधान था. ब्राह्मणों को मृत्युदंड निषिद्ध था, जबकि ब्राह्मणेत्तर वर्गों के लिए इस तरह की कोई पाबंदी न थी. चूंकि दिए गए दंड के विरुद्ध अपील के बहुत कम अवसर थे, इसलिए जनसाधारण मजबूरी में दैवीय न्याय की उम्मीद करने लगता था. आज भी ऐसे लोग कम नहीं हैं. उनका मानना है कि एकमात्र ईश्वर सच्चा न्यायकर्ता है. जिन्हें अपराधी होने के बावजूद इस जन्म में दंड नहीं मिला, वे ईश्वर के दरबार में अवश्य ही दंडित किए जाएंगे—इस विश्वास के साथ साधारणजन बड़े से बड़े अनाचार को पचाते चले जाते थे. आधुनिक समाजों में न्याय की जिम्मेदारी अदालतों पर होती है. उनका आचरण संवैधानिक मर्यादाओं से आबद्ध रहता है. इसलिए यह व्यवस्था न्याय के अपेक्षाकृत अनुकूल है. इसके अनुसार राज्य अपने नागरिकों से अपेक्षा करता है कि वे कानून सम्मत व्यवहार करें, ताकि राज्य को उनके जीवन में हस्तक्षेप की आवश्यकता ही न पड़े. जो व्यक्ति अपने आचरण द्वारा दूसरे व्यक्ति के जीवन में अमर्यादित हस्तक्षेप करता है, वह राज्य को अपने जीवन में हस्तक्षेप करने का अधिकार दे देता है. दूसरों के जीवन में अवांछित और अमर्यादित हस्तक्षेप को राज्य अपराध मानता है. दूसरों के जीवन में अवांछित हस्तक्षेप करने वाला व्यक्ति अपनी निजता का अधिकार भी गंवा देता है. तदनुसार राज्य को समाज द्वारा प्राप्त शक्तियों के बल पर उस व्यक्ति के जीवन में हस्तक्षेप करने का अधिकार स्वतः हासिल हो जाता है. चूंकि राज्य पर समाज में शांति और अनुशासन बनाए रखने की जिम्मेदारी भी होती है, इसलिए वह अपराधी के विरुद्ध दंडनीति के तयशुदा प्रावधानों के अनुसार कार्रवाही करता है. न्याय का यह लोकप्रचलित रूप व्यक्ति के कर्तव्य पालन से जुड़ा है, जिसमें विचलन होते ही दंडनीति प्रभावी हो जाती है. प्रायः इसे सभ्यताकरण की अनिवार्यता के रूप में अपनाया जाता है. जनसाधारण न्याय के इसी रूप से सर्वाधिक प्रभावित होता है.

न्याय का दूसरा रूप कानून और अदालतों से प्राप्त होने वाले न्याय से अलग है. पहला जहां राज्य के अधिकारपक्ष के निकट है, दूसरा उसके कर्तव्य पक्ष की महत्ता एवं कार्यक्षेत्र को व्यापकता दर्शाता है. सिसरो के अनुसार राज्य जनता का सर्वाधिकार है. चूंकि राज्य का गठन लोगों द्वारा सामान्य हितों की पूर्ति हेतु किया जाता है, अतएव उसका वही कृत्य न्यायपूर्ण कहा जाएगा, जो उसके द्वारा संपूर्ण विवेक, निष्पक्षता, समानता और सर्वजन के विकास की चाहत के साथ उठाया जाता है. वह राज्य की नैतिकता तथा उसके गठन के औचित्य को दर्शाता है. अरस्तु इसे और भी स्पष्ट कर देता है. उसके अनुसार अन्याय केवल दूसरों के जीवन में अवांछित हस्तक्षेप, उसका प्रताड़न; अथवा मान्य कानूनों का उल्लंघन करने तक सीमित नहीं है. बल्कि दूसरों के अधिकारों का हनन करना, उन्हें उनके अधिकारों से वंचित कर देना, जो नागरिकों के प्रति राज्य का कर्तव्य भी हैं—अन्याय की सीमा में आता है. आखिर मनुष्य के अधिकारों की पहचान कैसे हो? इस बात में कैसे अंतर किया जाए कि जो अधिकार किसी एक व्यक्ति का है, वह दूसरे का भी है अथवा नहीं है? तथा उनके आकलन की कसौटी क्या है?

सवाल और भी हैं. जब हम कहते हैं कि भरपेट भोजन प्राप्त करना मनुष्य का अधिकार है? सभ्य समाज में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं प्रत्येक व्यक्ति को आसानी से प्राप्त होनी चाहिए, तो इस तर्क का आधार क्या होता है? क्यों न मान लिया जाए कि जो व्यक्ति जीवन में अतिरिक्त रूप से सफल होते हैं, उसके पीछे उनकी अपनी मेहनत और प्रतिभा का भी कमाल होता है. लोकहित में आवश्यक है कि समाज के सभी सदस्य एकदूसरे के हितों का ध्यान रखें. लेकिन यह भी जरूरी है कि योग्य व्यक्ति को उसकी योग्यता का लाभ खुद भी प्राप्त हो. परंतु इतनेभर से समस्या का समाधान नहीं हो जाता. मान लीजिए, दो मजूदर किसी कारखाने में काम करते हैं. उनमें एक की क्षमता दस नग प्रतिदिन तैयार करने की है. दूसरा उतने ही समय में बीस नग बना देता है. तो जो कारीगर बीस नग प्रतिदिन बनाता है, उसके उत्पादन क्षमता का लाभ दस नग प्रतिदिन बनाने वाले के साथ बांट देना क्या उसके प्रति अन्याय नहीं होगा? यदि किसी व्यक्ति को लगे कि उसके उत्पादन का लाभ उसे नहीं मिल रहा है, तो क्या वह अपनी पूर्ण क्षमता के साथ लगातार काम कर पाएगा? अपने लाभ को दूसरों में बंटते देख क्या वह हतोत्साहित नहीं होगा? चलताऊ ढंग से सोचें तो बात एकदम सच जान पड़ेगी. पूंजीवादी अर्थतंत्र कहता है, श्रमिक को उसके श्रम का पूरा लाभ मिले. दावा करता है कि केवल वही है जो श्रमिक को उसके श्रम का पूरा लाभ दिला सकता है. लाभ का आकलन केवल भौतिक मुद्रा के आधार पर करने वाले पूंजीवाद की निगाह में यही न्याय है. ऐसे ही तर्क देकर वह श्रमिकों को बांटे रखता है. वहां इसे स्पर्धा का नाम दिया जाता है. परिणाम यह होता है कि जो मजदूर बीस नग प्रतिदिन बनाता है, वह निरंतर आगे निकलता जाता है. जबकि दस नग बनाने वाला कारीगर स्पर्धा में पिछड़ता चला जाता है. वृहद संदर्भों में यह स्पर्धा दो कारखानों के बीच भी देखी जा सकती है. चूंकि समाज में विशिष्ट लोगों की संख्या बहुत कम होती है, अधिकांश दस नग प्रतिदिन बनाने वाले कामगार जितने ही कार्यक्षम होते हैं. इसलिए अपने उत्पाद का सारा लाभ खुद रखने वाला कामगार स्पर्धा में निरंतर आगे निकलता चला जाता है. इससे समाज में आर्थिक विभाजन बढ़ता चला जाता है. इसका समाधान क्या है? अरस्तु इतना उदार नहीं है कि वह बीस नग बनाने वाले के श्रमलाभों वाले कामगार के लाभ को दस नग प्रतिदिन बनाने वाले श्रमिकों के बीच बांटने पर सहमत हो जाए. इस असमानता को वह प्राकृतिक मानता है. अरस्तु के समय में मौद्रिक लाभ की अवधारणा इतनी पुष्ट नहीं थी, जैसी वह आज है. इसलिए उसका समाधान भी आज के संदर्भों में ही खोजना पड़ेगा.

ऊपर के उदाहरण में मान लिया गया है कि बीस नग प्रतिदिन बनाने वाले कारीगर की उत्पादन क्षमता केवल उसकी अपनी उपलब्धि है. यहां व्यक्ति के कौशलनिर्माण में उसके परिवेश के प्रभाव जो एक तरह से उसका योगदान ही है, बिसरा दिया गया है. मनुष्य और उसके समाज के बीच का संबंध आपसी लेनदेन का होता है. जो समाज को अधिक लौटाते हैं, या जिनसे समाज को अधिकाधिक लौटाने की अपेक्षा की जाती है, वे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में समाज से अधिक ग्रहण भी करते हैं. यदि किसी विद्वान की बात करें तो पहले वह पीढ़ियों से अर्जित ज्ञान का अध्ययनमनन करता है, तदनंतर अपने विचारों को सामने लाता है. इस तरह से वह अपने पूर्ववर्ती विद्वानों का कर्जदार होता है. अतएव जो व्यक्ति समाज से जितना अधिक ग्रहण करता है, समाज को उसी अनुपात में वापस लौटाना उसका कर्तव्य भी है. इसमें मौद्रिक लेनदेन आवश्यक नहीं है. इसलिए इसका समाधान भी अकेले मौद्रिक लेनदेन द्वारा संभव नहीं है. उचित यही है कि मौद्रिक लाभ के स्थान पर सामाजिक लाभ की अवधारणा को स्थापित किया जाए. शांति और खुशहाली के लिए आवश्यक है कि समाज में आर्थिक विभाजन न्यूनतम हो. कुशल कामगार को यह समझाया जाए कि उसकी उपलब्धियां केवल उस अकेले की नहीं हैं. उनमें उसके परिवेश जिसमें उसके मित्र, संबंधी, पड़ोसी यहां तक कि दुश्मन भी सम्मिलित हैं, सभी का साझा है. इसी तरह धनपति को मालूम होना चाहिए कि उसके लाभ पर सिर्फ उसका अधिकार नहीं है, उन श्रमिकों और कारीगरों का भी योगदान है, जो रातदिन मेहनत करने अपने मालिक की समृद्धि को संभव बनाते हैं. अरस्तु राज्य से अपेक्षा रखता है कि दस नग बनाने वाले को निरंतर प्रोत्साहित करता रहे. और बीस नग प्रतिदिन बनाने वाले कामगार को इस बात के लिए राजी करे कि वह मौद्रिक लाभों के बजाए सामाजिक लाभों पर भी ध्यान दे, ताकि दो भिन्न उत्पादनक्षमता वाले कामगारों के बीच अधिकतम समानता संभव हो सके.

समाजीकरण मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है. यदि केवल किसी एक व्यक्ति के सुखदुख, गुणदोष का मामला हो तो समाजीकरण की आवश्यकता ही न पड़े. समाज न तो विशिष्ट व्यक्ति की चयन है, न ही व्यक्तियों की विशिष्ट पसंद. मनुष्यों की सामूहिक सृष्टि है. उसका सृजन सामूहिक रूप से सर्वकल्याण के उद्देश्य से किया जाता है. समाज की जरूरत उस व्यक्ति को भी पड़ती है, जिसकी आवश्यकता व्यक्ति के अस्तित्व से जुड़ी है. इसकी इच्छा वह व्यक्ति भी करता है, जो अतिरिक्त रूप से गुणी और संपन्न है. इसके कारणों में मामूली अंतर हो सकते हैं. जो व्यक्ति जीवन में अतिरिक्त रूप से कामयाब होते हैं, वे अपनी सफलता से दूसरों को प्रभावित करना चाहते हैं. प्रजा न हो तो राजा का होना अर्थहीन हो जाए. इसी तरह अमीर को अपनी अमीरी का प्रदर्शन करने के लिए गरीब की जरूरत पड़ती है. कह सकते हैं कि मनुष्य की किसी भी उपलब्धि का महत्त्व दूसरों के साथ, उन सबके सापेक्ष है. असफलता सफलता की पहली और निर्णायक कसौटी है. असफल व्यक्ति जितने अधिक संख्या में होंगे, सफलता का मूल्य उतना ही अधिक आंका जाएगा. यही प्रवृत्ति न्याय की जरूरत पर बल देती है.

ऊपर संकेत किया गया है कि किसी व्यक्ति की सफलता केवल उसके गुणों पर निर्भर नहीं करती. इस बात पर भी निर्भर करती है कि उस व्यक्ति को जीवन में कामयाबी दर्ज कराने के लिए कितने अवसर और संसाधन प्राप्त थे. तुलना यदि प्राकृतिक स्तर पर हो तो सफल और असफल व्यक्तियों में बहुत अंतर नहीं होता. युद्ध में किसी राजा की जीत केवल इसपर निर्भर नहीं करती कि वह स्वयं कितना बहादुर है, बल्कि उसकी ओर से लड़ रहे सैनिकों की संख्या तथा राजा के प्रति उनकी निष्ठा पर भी निर्भर करती है. इसलिए अपनी सत्ता की सुरक्षा और स्थायित्व के लिए शासक वर्ग स्वामीभक्ति को महिमामंडित करता रहता है. युद्ध में सैनिक और उनके अस्त्रशस्त्र राजा के लिए संसाधन होते हैं. वे राजा को केवल उसकी निजी योग्यता के आधार पर प्राप्त नहीं होते. उनमें से अधिकांश उत्तराधिकार में प्राप्त होते हैं. यदि राजा केवल अपने दम पर, आमनेसामने की लड़ाई करे तो उसकी सफलता की संभावना बहुत सीमित स्तर की होगी. कारखानेदार के मामले में सैनिकों का स्थान पूंजी ले लेती है. संभव है उसमें से पूंजी का बड़ा हिस्सा उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त हुआ हो. यदि यह न भी हो और किसी उद्यमी ने अपने जीवन में ही बेशुमार प्रगति की है तो इसका कारण केवल यह है कि व्यवस्था के चलते उसके कारखानों में कार्यरत श्रमिकों ने अपना श्रमोत्पाद, मामूली वृत्तिका के बदले कारखानेदार को समर्पित किया है. जैसे सैनिकों द्वारा जान की बाजी लगा देना किसी राजा के साम्राज्यवादी मनसूबों को साकार बनाता है. वैसे ही न्यूनतम मजदूरी के बदले अधिकतम श्रमोत्पाद पर कारखानेदार का अधिकार मान लेना और स्वयं मामूली वृत्तिका से संतुष्ट होकर रातदिन काम में जुटे रहना, पूंजीपति को कामयाबी दिलाता है. उद्यमी की सफलता का स्तर बताता है कि श्रमिकों ने उसके उत्पादनस्तर को शिखर तक पहुंचाने के लिए जीजान से काम किया है. यहां त्याग का अर्थ न्यूनतम वृत्तिका के बदले मालिक को अधिकतम मुनाफा कमाकर संतुष्टि प्राप्त कर लेना है. जाहिर है सफलता चाहे राजा की हो या व्यापारी की, उसमें क्रमशः प्रजा अथवा श्रमिकों का योगदान होता है. यहां पूंजी और राष्ट्रवाद दोनों ही वर्चस्वकारी शक्तियों के स्वार्थ से जुड़े होते हैं. दोनों की प्रवृत्ति मानवविवेक पर कब्जा कर लेने की होती है. अंतर केवल इतना है कि पूंजीवाद अपनी चमकदमक और भौतिक सुखों का प्रलोभन देकर लोगों को आकर्षित करता है. राष्ट्रवाद के पास उग्र राष्ट्रप्रेम के सिवाय नागरिकों को देने के लिए कुछ नहीं होता. इसलिए वह भावुक प्रतीकों के माध्यम से लोगों को लुभाने का प्रयास करता है.

अमीरगरीब, राजाप्रजा के इस कृत्रिम विभाजन से बाहर निकलकर देखें तो प्राकृतिक स्तर पर उनके बीच कोई मौलिक अंतर नजर नहीं आता. राजाप्रजा, अमीरगरीब सभी को एकसमान जीवनचक्र से गुजरना पड़ता है. धूपवर्षाशीत सभी को लुभाते हैं.सभी को भूखप्यास लगती है. यह ठीक है कि मनुष्य में प्राकृतिक स्तर पर अंतर होता है. एक मनुष्य शक्तिशाली हो सकता है और दूसरा शक्तिविपन्न. परंतु प्राकृतिक स्तर पर शक्तिशाली और शक्तिविपन्न व्यक्ति में अंतर का अनुपात उतना नहीं होता, जितना सामाजिक स्तर पर अमीरगरीब, शक्तिशाली एवं शक्तिविपन्न के बीच होता है. न प्रकृति अपने स्तर पर किसी प्रकार का भेदभाव करती है. चूंकि समाजीकरण की मूलभूत अवधारणा समानता के सिद्धांत पर गढ़ी होती है, राज्य भी इसी दावेदारी के साथ जनसमर्थन प्राप्त करता है कि वह धनीनिर्धन, शक्तिसंपन्न एवं शक्तिविपन्न के बीच बहुत अंधिक अंतर नहीं करेगा—इसलिए यदि किसी राज्य में ऐसा है तो समझ लेना चाहिए कि वह अपने गठन के मूलभूत उद्देश्यों से भटका हुआ है. दूसरे शब्दों मे समानता का आशय किसी व्यक्ति से राजा या पूंजीपति बनने के अवसर छीन लेना नहीं है. बल्कि जनसाधारण को इस आधार पर होने वाले भेदभाव से मुक्ति दिलाना है. सफलता सदैव सापेक्षिक होती है, परंतु न्याय निरपेक्ष. इस आधार पर अरस्तु न्याय पर विमर्श के आरंभ में ही उसकी दो कसौटियां बना लेता है. पहली के अनुसार तयशुदा कानून की मर्यादा में रहना न्याय है. जिन कार्यों को राज्य की विधिसंहिता स्वीकारे उनका अनुपालन न्याय है. जिनसे राज्यसमाज में शांतिसुव्यवस्था स्थापित होती हो, वह न्याय है. न्याय का दूसरा रूप अपने साथ बाकी लोगों की स्वतंत्रता और समानता का सम्मान करना है. जबकि अन्याय वह है जो कानून के विरुद्ध है. जिससे दूसरों के अधिकारों का हनन होता है. जिससे किसी व्यक्ति को उसके विधिसम्मत देय से वंचित कर दिया जाता है.

समानता का आशय यह नहीं है कि व्यक्ति की पसंदों का ध्यान न रखा जाए. न्याय इसमें है कि प्रत्येक नागरिक को विकास के समान अवसर प्राप्त हों. इसके लिए अवसरों की समानता तथा किसी कारणवश विकास में पिछड़ चुके हैं नागरिकों को विशेष प्रोत्साहन देकर मुख्यधारा में लाने की कोशिश करते रहना—न्याय और समाजीकरण दोनों की प्रथम कसौटी है. अरस्तु ने न्याय को सर्वसाधारण के सामान्य हित की संज्ञा दी है. उसके अनुसार न्याय के दो पक्ष होते हैं. पहला व्यक्ति पक्ष और दूसरा वस्तु पक्ष. व्यक्ति का संबंध भी प्रकारांतर में वस्तुओं से होता है. उसके अनुसार न्याय का तकादा है कि सभी मनुष्यों को समान वस्तुएं निर्दिष्ट की जानी चाहिए. पर कैसे? यहां एक पेंच है जिससे समानता की हमारी सार्वत्रिक अवधारणा संकट में पड़ जाती है. समानता का विचार न तो रूढ़ है न ही व्यक्तिनिरपेक्ष. सभी व्यक्तियों को सभी अवसर दिए जाने का अभिप्राय यह नहीं है कि कोई व्यक्ति अपनी रुचि या अन्यान्य कारण से किसी पद के अयोग्य है तो समानता के सिद्धांत के अनुसार उसे उस पद की जिम्मेदारी सौंप देनी चाहिए. समानता की सीधीसी अवधारणा है कि सभी व्यक्तियों को सभी अवसर प्राप्त हों. तदनुसार प्रत्येक नागरिक को यह अवसर मिलना चाहिए कि यदि वह स्वयं को राजपद के योग्य बना सके, तो वह पद उसकी पहुंच से दूर नहीं है. राज्य का हित भी इसमें है कि नागरिकों को यथायोग्य पद प्राप्त हों. राजा उसी को चुना जाए जो राजा बनने के योग्य है. अरस्तु के अनुसार व्यक्ति के अधिकार उसकी योग्यता पर निर्भर करते हैं. तदनुसार राजा बनने का अधिकार उसी को मिलना चाहिए जो राजपद के योग्य है. श्रेष्ठ राज्य अपने लिए कसौटियां स्वयं तय करता है, जिनके माध्यम से वह स्वयं को नियंत्रित एवं विकासरत रख सकता है. वीरता, व्यक्तित्व, व्यवहार कुशलता, दूरदर्शिता, बुद्धिमानी जैसे उदात्त चारित्रिक गुण यदि राजा बनने के लिए अपरिहार्य हैं—तो समानता के सिद्धांत के अनुसार जिस व्यक्ति में ये सभी गुण पर्याप्त मात्रा में मौजूद हों, उसे राजा बनने का अधिकार मिलना चाहिए. इसपर उसके परिवार अथवा उन गुणों को जिनका राजा के लिए अपेक्षित गुणों से कोई संबंध नहीं है, कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए. ‘पाॅलिटिक्स’ के तीसरे खंड के 12वें अध्याय में अरस्तु बासुंरीवादक का उदाहरण देता है—

‘यदि बहुत से व्यक्ति बासुंरी वादन की कला में निपुण हों तो उनमें से किसी व्यक्ति को सिर्फ इस कारण अच्छी या अधिक बांसुरियां नहीं दी जानी चाहिए, कि उसका संबंध किसी उच्च कुल से है.’

आगे वह स्पष्ट करता है—

‘बासुंरी-वादन एक कला है, जिसका व्यक्ति के कुल से कोई संबंध नहीं है. इसी तरह यदि कोई व्यक्ति बासुंरी वादन की कला में पीछे है, मगर कुल और सुंदरता के मामले में बाकी प्रतिस्पर्धियों से आगे तो भी अच्छी अथवा सर्वाधिक बासुंरिया किसी वाद्य-कला में निपुण व्यक्तियों को ही दी जानी चाहिए….कुल-परिवार की सदस्यता के आधार पर भी व्यक्ति अच्छी बांसुरियों की दावेदारी कर सकता है, परंतु उसमें उन गुणों की प्रधानता अपरिहार्य है, जो बांसुरी वादन की कला के लिए अत्यावश्यक हैं.’

आशय है कि श्रेष्ठ वस्तुएं यथायोग्य व्यक्तियों को प्राप्त हों. उन्हें प्राप्त हों, जिन्हें उनकी आवश्यकता है और जो उनका श्रेष्ठतम उपयोग करने में सक्षम हैं. परंतु योग्यता का मापदंड क्या हो? प्रत्येक व्यक्ति अपनी दृष्टि में योग्यतम होता है. फिर जो अधिकतम की दृष्टि में श्रेष्ठतम है, उसके भी आलोचक हो सकते हैं. इसे ‘एथिक्स’ में समझाया गया है. अरस्तु की यह पुस्तक नीतिशास्त्र की श्रेष्ठतम कृतियों में से है. सर्वथा मौलिक. इसके माध्यम से अरस्तु ने नैतिकता को उस दौर में परिभाषित किया, जब राज्य पर धर्म का नियंत्रण था. उत्तराधिकार में जो भी प्राप्त हो, उसे बचाए रखने और उसके माध्यम से अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को शिखर तक ले जाने के लिए सारे उद्यम किए जाते थे; फिर उन्हें धर्म का नाम दे दिया जाता था. अरस्तु के अनुसार न्याय ज्ञानविज्ञान की विभिन्न शाखाओं का अंतिम और वास्तविक लक्ष्य है. मनुष्य जो ज्ञानार्जन करता है, वह तब तक अनुयोगी या अल्पउपयोगी माना जाएगा, जब तक उससे किसी न किसी रूप में न्याय की पुष्टि न होती है. ताकि प्रत्येक नागरिक को यह विश्वास हो जाए कि जो उसका प्राप्य है, वह उसको यथासमय प्राप्त होता रहेगा. आखिर यह कैसे सुनिश्चित हो कि व्यक्ति को जो अधिकार है, वह उसे प्राप्त हैं. यहां राज्य की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है. राज्य का कर्तव्य है कि वह यह सुनिश्चित करे कि उसके राज्य में किसी भी नागरिक के अधिकार बाधित न हों. न ही किसी के साथ कोई पक्षपात हो. यह ध्यान रखते हुए कि समानता न्याय का उद्देश्य है, लेकिन एकमात्र समानता को भी न्याय का पर्याय मान लेना अनुचित होगा. उदाहरण के लिए दो भिन्न व्यक्तियों की कल्पना कीजिए, जिन्हें खराद मशीन पर कोई पुर्जा बनाने को दिया जाता है. मान लीजिए उनमें से पहला दस नगों का उत्पादन करता है और दूसरा उतनी ही अवधि में बीस नगों का. चूंकि व्यक्ति का अपने श्रम पर अधिकार होता है, इसलिए कानून और नैतिकता दोनों दृष्टि में यह उचित माना जाएगा कि जिस व्यक्ति ने अधिक उत्पादन किया है, उसकी अतिरिक्त लाभ में आनुपातिक साझेदारी हो. पूंजीवादी व्यवस्था इसी को न्याय मानती है. उसके अनुसार इससे समाज में स्पर्धा बढ़ती है. चीजें सस्ती होती जाती हैं. उसकी भरपाई के लिए उत्पादक उत्पादनवृद्धि का सहारा लेता है. उससे रोजाकर के अवसर बढ़ते हैं. उसके फलस्वरूप हुई उत्पादन वृद्धि का लाभ पूरे समाज को पहुंचता है. पूंजीवादी राज्यों की सरकारें भी कमोबेश वही सोचती हैं. परंतु राज्य की मजबूरी है कि उसे समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संतुलन बनाकर रखना पड़ता है. उसके लिए वे अधिक आय वाले व्यक्तियों पर कराधान की सीमा बढ़ाकर बाकी लोगों को संतुष्ट करने का प्रयास करती हैं. यह केवल दिखावा ही होता है, क्योंकि एक ओर जहां अधिक करउगाही का का नाटक किया जाता है, वहीं दूसरी ओर पूंजीपतियों को विभिन्न प्रकार की छूट देकर, ओनेपौने दाम में राज्य के संसाधन लुटाकर प्रसन्न रखा जाता है.

यदि शतप्रतिशत ऐसा हो जाए कि व्यक्ति को ठीक उतना ही प्राप्त हो, जितनी उसकी क्षमता है, तो सोचिए क्या यह जंगल के न्याय जैसी व्यवस्था न होगी? जंगल में भी प्राणी अपने सामर्थ्य के अनुसार शिकार करते हैं. चिड़िया मामूली कीड़ेमकोड़ों का शिकार करके पेट भरती है. शेर और चीता भारीभरकम सांड को भी अपना शिकार बन सकते हैं. जानवर के लिए उसका शिकार एक तरह से उसका उत्पाद ही है. अतः न्याय दृष्टि से समानता व्यक्ति और समाजनिरपेक्ष नहीं होती. उसमें परिस्थिति अनुसार बदलाव होते रहते हैं. लेकिन समानता ऐसी पहेली भी नहीं है, जिसे समझा न जा सके. आखिर समानता किसकी और कैसे? सामान्य सिद्धांत के अनुसार असमान व्यक्तियों का हिस्सा समान नहीं हो सकता. समानता की न्यूनतम शर्त नागरिकों को न्याय की अबाध प्रतीति है. यह ठीक है जन्म के आधार पर, स्थितियों के आधार पर लोगों की कार्यक्षमता में अंतर होता है. राज्य और समाज का गठन का उद्देश्य भी यही है कि व्यक्तिमात्र की इन दुर्बलताओं का असर उसकी खुशियों पर न पड़े. जहां कोई नियम या व्यवस्था न हो. दूसरों के सुखदुख की परवाह किए बिना सभी मनमानी पर उतारू रहते हों. वहां राज्य की भूमिका नगण्य मानी जाएगी. यह नियम कि व्यक्ति को ठीक उतना ही प्राप्त हो, जितना उसका सामर्थ्य है—प्रकारांतर में समाज को इस स्वार्थी सोच की प्रेरणा बन सकता है. इससे समाजीकरण का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा. अतः राज्य का कर्तव्य है कि वह उस नागरिकों को जो किसी कारण पिछड़े हुए हैं, विशेष प्रोत्साहन देकर दूसरों के बराबर लाने का प्रयास करे. साथ में यह विश्वास भी बनाए रखे की समाज की एकता, किसी भी व्यक्तिगत उपलब्धि से बड़ी है.

अरस्तु न्याय के पर्याय के रूप में सद्गुण को स्थापित करता है. राज्य के संदर्भ में ‘न्याय राज्य का सद्गुण’ है. उसकी व्याप्ति राज्य और उसके नागरिकों के आचरण से आंकी जानी चाहिए. न्याय वह है जिसे सभी नागरिक सही मानें. जिसकी श्रेष्ठतम के रूप में प्रत्येक नागरिक अपने जीवन में कामना करे. ठीक इसी तरह अन्याय वह है जो अधिकतम नागरिकों को नियमविरुद्ध और अनुचित प्रतीत होता हो. किंतु न्याय और अन्याय, उचित और अनुचित की यह बहुत सरलीकृत व्याख्या है. यह दोनों को एक दूसरे का विरोधी दर्शाती है. सामान्यतः यह सही भी दिखता है. न्यायालय का कोई फैसला यदि बहुसंख्यक वर्ग को अनुचित और अन्यायपूर्ण लगता है तो वह उचित और न्यायपूर्ण हो ही नहीं सकता. लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि न्याय और अन्याय, उचित और अनुचित को लेकर सभी नागरिकों की एकसमान राय हो. लोगों का न्यायबोध उनकी संस्कृति और मानसिक प्रशिक्षण पर भी निर्भर करता है. राजशाही में राजा और उसके परिवार की सुरक्षा शेष जनसमाज की सुरक्षा से महत्त्वपूर्ण मानी जाती थी. उसके लिए अनेकानेक सैनिक की बलि दे देना राजधर्म माना जाता था. अधिकांश युद्ध राजाओं के व्यक्तिगत अहं और राजलिप्सा का परिणाम होते थे. अपने समग्र परिणाम में वे प्रजा के लिए अहितकारी होते थे. बावजूद इसके प्रजा अपने राजा और उसकी व्यवस्था को सराहती थी. क्योंकि उसका मानसिक प्रशिक्षण इसी तरह का होता था. जनतांत्रिक समाजों में नागरिकों का सोच स्वतंत्र होता है. निर्णयविशेष को कुछ लोग उचित मान सकते हैं और कुछ अनुचित. कुछ ऐसे नागरिक भी हो सकते हैं जिन्हें वह निर्णय आंशिक अनुचित और अन्यायपूर्ण अथवा आंशिक उचित और न्यायपूर्ण लगता हो. इस तरह लोगों की दृष्टि के अनुसार न्याय और अन्याय के अनेक रूप संभव हैं. लेकिन राज्य की दृष्टि में न्याय का केवल एक रूप होता है. सभी नागरिकों के साथ समान वर्ताब और समाज में कल्याण विस्तार. ऐसे समाजों में कर्तव्यपरायण मनुष्य, न्यायसंगत बने रहने के लिए वही करता है जो समाज की निगाह में उचित है. वैसा ही सोचता है, जिसे न्यायसंगत माना जा सके.

वे कौनसी स्थितियां हैं, जब मनुष्य के कर्म को न्यायपूर्ण नहीं माना जा सकता? इसे समझना मुश्किल नहीं हैं. उपर्युक्त विवरण के आधार पर देखें तो दो मुख्य स्थितियां हैं जिनके आधार पर मनुष्य के कृत्य को अनुचित या अन्यायपूर्ण कहा जा सकता है. पहला जब वह कानून तोड़ता है. ऐसे काम करता है जो राज्य तथा समाज की निगाह में अनुचित हैं. दूसरी स्वार्थपरता. समाज में रहते हुए उससे अधिक ग्रहण करना जितना अधिकार है. अपने अलावा दूसरों की आवश्यकता पर विचार ही न करना. बल्कि जिसपर दूसरों का अधिकार है, उसे भी हड़प कर जाना. अरस्तु के अनुसार उचित होने के लिए कानून सम्मत और निस्वार्थ होना आवश्यक है. जो कानूनसम्मत नहीं है. जो अपने आचरण में निष्ठावान तथा दूसरों के प्रति ईमानदार नहीं है, इसलिए वह उचित भी नहीं है. उचित की बहुमान्य परिभाषा उपलब्ध संसाधनों, अवसरों और कर्तव्यों में न्यायपूर्ण हिस्सेदारी है. ऐसी सहभागिता जिससे दूसरों के अधिकार निर्बंध रहें. सच यह भी है कि समाज में रहते हुए अपने हिस्से से अधिक लेना हमेशा अन्यायपूर्ण नहीं होता. कई बार अपने हिस्से को छोड़ देना या दूसरों का हिस्सा भी हड़प जाना प्रशंसा का पात्र बना देता है. जब कोई भूखा व्यक्ति अपने आगे रखी थाली, ज्यों की त्यों दूसरे भूखे प्राणी को सौंप देता है तो उसकी नैतिकता हमें भावाकुल कर देती है. ठंड से ठिठुरते किसी व्यक्ति को अपने वस्त्र उतारकर दे देना मानवचरित्र की उदात्तता से परचाता है. इसी प्रकार सारे के सारे दुर्योग को, जिससे बहुतसे लोगों के अनिष्ट की संभावना हो, अपने हिस्से समेट लेना भी उचित और सराहनीय माना जाएगा. ऐसी कई कहानियां हैं, जिनमें अपनी दोषी संतान को बचाने के लिए पिता उनके सारे अपराध अपने सिर ले लेते हैं. समुद्रमंथन की मिथकथा के अनुसार शिव सबके हिस्से का विषपान करके ही नीलकंठ कहलाए थे. किसी व्यक्ति में कम बुराइयां हों, यह भी अच्छी बात है. अब सवाल है कि कानून क्या है? उससे व्यक्ति का हित सधता है या राज्य का. अथवा व्यक्ति और राज्य दोनों का?कुछ विद्वानों का मानना है कि श्रेष्ठ नागरिक आत्मानुशासित होता है. उसे अपने और दूसरों के सुखदुख की चिंता होती है. इसलिए वह किसी के जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करता. ऐसे व्यक्ति को कानून की आवश्यकता नहीं पड़ती. यह बात सही हो सकती है. परंतु हमेशा सही हो आवश्यक नहीं है. कानून अदालती प्रक्रिया मात्र नहीं है. कानून का पलड़ा हालांकि समाज के शीर्षस्थ वर्गों की ओर झुका होता है. फिर भी उसमें कई ऐसी खूबियां होती हैं, जिनकी अनुपस्थिति समाज की एकता और अखंडता के लिए खतरा बन सकती है. उनके अभाव में प्रत्येक नागरिक ‘श्रेष्ठ आचरण’ की परिभाषा अपने हिसाब से करेगा. प्रकारांतर में सब मनमानी उतर आएंगे. परिणामस्वरूप समाज के गठन का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाएगा. इसलिए कानून के रूप में सुनिश्चित आचारसंहिता का होना आवश्यक है.

अरस्तु के अनुसार कानून विधायी व्यवस्था है. राज्य यदि नागरिकों के प्रति उदार है तो कानून नागरिकअधिकारों के पक्ष में झुका पाएगा और मानवमात्र के अधिकारों का ध्यान रखेगा. यदि कानून का गठन कुछ लोगों की मर्जी से, स्वार्थभावना के साथ हुआ है तो उसका झुकाव शिखर पर मौजूद अल्पतंत्र अथवा कुलीनतंत्र के पक्ष में नजर आएगा. केवल उन्हीं लोगों के भले की सोचेगा है जो किसी न किसी रूप से सत्ता से जुड़े हों. निरंकुशता की भावना से गठित कानून केवल तानाशाह की मर्जी से संचालित होंगे. सही मायने में तो वे तानाशाह के स्वार्थ से इतर कुछ हो ही नहीं सकते. इससे हम राज्य में न्याय की मौजूदगी को परखने के लिए कुछ मापदंड बना सकते हैं. ऐसे कानून जिनसे राज्य की उदारता झलकती हो, जो समाज के अधिक से अधिक लोगों के कल्याण की भावना से बनाए गए हों, वे कानून न्यायसंगत माने जाएंगे. जबकि ऐसे कानून जिनसे अल्पसंख्यक वर्गों की स्वार्थसिद्धि होती हो, अथवा जिनका गठन तानाशाह की इच्छाओं को दूसरों पर लादने के लिए हुआ हो, उन्हें न्यायसंगत मानने में हमें संकोच होगा. जिस राज्य में पहली कसौटी का पालन होगा, वह कल्याणराज्य के मापदंडों के अनुरूप होगा. उसमें शुभ की व्याप्ति होगी. तदनुसार न्यायकारी शक्तियों का सत्ताप्रेम अथवा उनपर शासक वर्गों का नियंत्रण शासन की निरंकुशता का परिचायक होता है.

इस विवेचन से न्याय को समझा जा सकता है. न्याय हमेशा दूसरों के प्रति होता है. लेकिन मनुष्य दूसरों के प्रति तभी न्याय कर सकता है, जब उसे अपने प्रति न्याय की उम्मीद हो. इस तरह न्याय सद्गुण है. व्यक्ति का समाज और समाज का अपने नागरिकों के प्रति कल्याणभाव जिससे झलकता हो, वह सद्गुण है. समाज में सद्गुण से श्रेष्ठ कुछ नहीं होता. वह निर्मेल्य होता है. अरस्तु के अनुसार ‘न्याय कुल मिलाकर संपूर्ण सद्गुण या सद्गुणों का समुच्चय है. वह इसलिए सद्गुण है, क्योंकि वह व्यक्ति का अपने पड़ोसियों, अपने मित्र, हितैषी यहां तक कि आलोचकों के प्रति न्यायभाव को दर्शाता है. कुल मिलाकर सद्गुण किसी भी समाज की श्रेष्ठतम उपलब्धि हैं. यदि कोई व्यक्ति केवल अपने मित्रों और सगेसंबंधियों के प्रति न्यायपूर्ण आचरण करता है और बाकी समाज के प्रति वैसा करने से बचता है, तो उसका आचरण न्याय की कसौटी पर स्वार्थपूर्ण माना जाएगा. दूसरे शब्दों में न्याय सद्गुण है और सद्गुण वह है, जिसे कोई व्यक्ति दूसरों के प्रति कल्याणभाव के साथ करता है. न्यायपूर्ण व्यक्ति वह है जो दूसरों की हितसिद्धि के लिए बिना किसी स्वार्थभाव से प्रयासरत रहता है. और ऐसा व्यक्ति जो केवल स्वार्थसिद्धि में लीन रहता है, दूसरों को किसी प्रकार का कष्ट पहुंचाता है अथवा उन वस्तुओं पर कब्जा करता है, जो किसी दूसरे का अधिकार हैं, अन्यायी की श्रेणी में आएगा.

©ओमप्रकाश कश्यप

न्याय की पाश्चात्य अवधारणा—तीन

सामान्य

‘रिपब्लिक’ के चौथे खंड में सूत्रधार की भूमिका ग्लाकॉन और एडीमेंटस संभालते हैं. पहले खंड में जहां न्याय क्या नहीं है, जानने का प्रयत्न किया गया है, चौथे खंड में प्लेटो ‘न्याय क्या है’ यह बताने की कोशिश करता है. शुरुआत करते हुए ग्लाकॉन ‘शुभत्व’ को तीन हिस्सों में परिभाषित करता है. आंतरिक, जैसे कि सुख, आनंद, वस्तुनिष्ठ जैसे कि सुख-सुविधा के संसाधन, धन जिससे सुख-समृद्धि बटोरी जा सकती है. तीसरा आंतरिक और वस्तुनिष्ठ जैसे कि स्वास्थ्य. तीनों में से एक का भी अभाव मनुष्य को अपूर्णता का एहसास कराता है. ग्लाकॉन द्वारा यह पूछने पर कि तीनों में से कौन-सा शुभत्व न्याय है, सुकरात तीसरे का समर्थन करता है. सुकरात मानता है कि उससे न्याय को समग्रता में परखा जाता है. लेकिन वह अपने निर्णय के समर्थन में पर्याप्त तर्क देने में असमर्थ रहता है. ग्लाकॉन न्याय संबंधी अपनी अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहता है कि न्याय दूसरों को हानि पहुंचाने तथा जरूरतमंद की मदद के बीच संतुलन हेतु व्यक्तिमात्र की अपने प्रति प्रतिबद्धता है. ऐसा करते हुए वह स्वयं को समाज के प्रति उत्तरदायी बनाने का काम करता है. स्वार्थपरकता न्याय की राह में सबसे बड़ी बाधा है. वह व्यक्ति को व्यक्ति और समाज दोनों के प्रति गैर-जिम्मेदार बनाती है. मानव की स्वाभाविक कमजोरियों लालच, स्वार्थ आदि को स्वीकारते हुए ग्लाकॉन न्याय को उनसे दूर रहने तथा अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान बनाए रखने वाली प्रेरणाशक्ति के रूप में स्वीकारता है. उसके अनुसार न्यायशील व्यक्ति का अपने और समाज के प्रति ईमानदार रहना आवश्यक है. यदि ऐसा नहीं है. यदि कोई व्यक्ति यह भ्रम रखते हुए कि केवल वही न्याय के पथ पर है, दूसरों की आलोचना करता है तथा उनपर अपना स्वार्थ थोपने का प्रयास करता है. तो ऐसे कथित न्यायशील व्यक्ति की अपेक्षा अन्याय का समर्थन करना उचित है. उसके अनुसार न्याय की एकमात्र कसौटी वृहद सामाजिक हित में है.

ग्लाकॉन के अनुसार न्याय कृत्रिम चीज, रूढ़ियों की उपज है. इसके लिए उसके तर्क अपने साथियों से थोड़ा हटकर हैं. वह कहता है कि प्राकृतिक अवस्था में लोग अन्याय करते और सहते हैं. लेकिन अन्याय की मात्रा व्यक्ति की शक्ति पर निर्भर करती है. जो अधिक शक्तिशाली है, वह तदानुरूप अधिक अन्याय करने में सक्षम होता है. इसलिए जब कमजोर यह देखते हैं कि वे उतना अन्याय करने में अक्षम हैं, जितना उन्हें सहना पड़ता है, तब वे संगठन के विवश होते हैं. इस तरह न्याय सबल की नहीं, दुर्बल की आवश्यकता और इच्छा का परिणाम बन जाता है. उसके माध्यम से वह अपने से शक्तिशाली के व्यवहार को नियंत्रित करने का सपना देख सकता है. एक संविदा के तहत, जिसका आधार धर्म भी हो सकता है और संविधान भी, वे एक-दूसरे के प्रति अत्याचार न करने, न ही सहने के लिए वचनबद्ध होते हैं. धीरे-धीरे वह संविदा कानून का रूप ग्रहण कर लेती है. लेकिन मानव-प्रवृत्ति हमेशा एक जैसी नहीं रहती. जब उसको लगता है कि किसी कानून या बल के आधार पर उसे नियंत्रित करने की तैयारी हो रही है, तो वह विरोध पर उतर आता है. परिणामस्वरूप समाज में जिसका गठन सहअस्तित्व की भावना के साथ हुआ था, कुछ लोग बल की भाषा बोलने-समझने लगते हैं. इससे समाज के वर्ग के भीतर भय उमड़ने लगता है. उसी से न्याय की उत्पत्ति होती है. ग्लाकॉन के अनुसार, ‘न्याय सबसे अच्छे और सबसे बुरे के बीच का रास्ता, एक समझौता है. सर्वोत्तम यह है कि मनुष्य अन्याय से दूर रहे, ताकि दंड से बचा रहे और सबसे बुरा यह है कि अन्याय सहे और बदला न ले सके.’ निर्बल सबल से बदला कैसे ले सकता है? वह जानता है कि वह अकेला शक्तिशाली का सामना नहीं कर सकता. अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए वह अपने ही जैसे लोगों के साथ समझौते को बाध्य होता है. चूंकि समाज में कमजोरों की संख्या अधिक होती है, इसलिए बहुसंख्यक वर्ग की सम्मिलित शक्ति अल्पसंख्यक शक्तिशाली वर्ग से अधिक हो जाती है. शक्तिशाली वर्ग इस सत्य को भली-भांति समझता है. इसलिए वह निरंतर इस प्रयास में रहता है कि शक्ति-विपन्न वर्गों में फूट डालकर उन्हें एकजुट होने से रोक सके. अल्पसंख्यक शक्तिशाली समूहों की बहुसंख्यक शक्ति-विपन्न समूहों पर शासन करने की योग्यता, प्रायः इस बात पर निर्भर करती है कि वह उन्हें बांटे रखने में कितना सफल हो पाता है. धर्म, जाति, क्षेत्रीयता, रंग-भेद आदि ऐसे ही माध्यम हैं जो असल जिंदगी में अनुपयोगी होने के बावजूद बहुसंख्यक समाज को बांटे रखने में सहायक होते हैं.

थ्रेचाइमच्स ने ‘ताकतवर हमेशा सही’ कहते हुए न्याय को ‘शक्तिशाली का स्वार्थ’ माना है. जबकि गलाकॉन न्याय की उत्पत्ति भय से मानता है. दोनों न्याय तक पहुंचने के लिए धुर-विपरीत ध्रुवों से अपनी विचार-यात्रा की शुरुआत करते हैं. यह प्लेटो की विशिष्ट शैली है. इसके माध्यम से वह किसी दार्शनिक निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले अपने मंतव्य को प्रत्येक दृष्टिकोण से परख लेना चाहता है. ग्लाकॉन का विचार वृथा नहीं गया. मध्यकाल में हॉब्स जैसे विचारकों ने भी उसका समर्थन किया है. ग्लाकॉन के विचारों में हमें परंस्पर अंतर्विरोधी तत्व दिखाई पड़ते हैं. परंतु ये अंतर्विरोध अकेले  ग्लाकॉन के नहीं है. यह मनुष्य की प्रवृत्ति है कि वह आसन्न संकट पर विजय की क्षीण संभावनाएं देख समझौते पर उतर आता है. उसके लिए लिखित-अलिखित संविदा करता है. लेकिन धीरे-धीरे वह उस वातावरण से ऊबने लगता है. हालात अनुकूल देख के शक्तिशाली वर्गों की महत्त्वाकांक्षाएं पनपने लगती हैं. और वे उन शक्तियों की अवहेलना करने लगते हैं, जिन्होंने उनके अस्तित्व को संभव बनाया है. वे भी मानते हैं कि कि न्याय मनुष्य के अंतर्मन की वस्तु नहीं है. समाज उसका सृजन करता है और फिर राज्य-सत्ता के सहयोग द्वारा लागू करता है. समाज में न्यायी और अन्यायी दोनों प्रकार के लोग हो सकते हैं. लेकिन न्यायी और अन्यायी को तभी रेखांकित किया जा सकता है, जब समाज में बल-प्रयोग की शक्ति हो. ग्लाकॉन और हॉब्स दोनों इस तथ्य से करीब-करीब सहमत नजर आते हैं कि मनुष्य स्वाभाविक रूप से स्वार्थी होता है. साधारणतः वह स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ मानता है, और यह मानते हुए कि दूसरे उसके जितने श्रेष्ठ नहीं हैं, उसे अपनी श्रेष्ठता पर खतरा दिखाई पड़ता है. यह अंतर्विरोध या कि आत्मसंघर्ष मनुष्य को दूसरों से सहयोग और समझौते के लिए प्रेरित करता है. स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठतर सिद्ध करने की प्रवृत्ति मनुष्य की यशलिप्सा के रूप में प्रकट होती है. जाहिर है समाज में रहते हुए व्यक्ति को न केवल बाहरी बल्कि आंतरिक संघर्ष से भी गुजरना पड़ता है. यही द्वंद्व समाज में न्याय को प्रासंगिक बनाता है.

केफलस, पॉलीमार्क्स, थ्रेचाइमच्स और ग्लाकॉन सब न्याय को अपनी-अपनी तरह से परिभाषित करते हैं. उसके लिए वे अलग-अलग तर्क देते हैं. सुकरात को बीच में लाकर प्लेटो उनकी मान्यता के कमजोर पक्षों की ओर इशारा करता है. अलग-अलग दिखने वाले उन विचारों में प्लेटो को जो सामान्य बात नजर आती है, वह यह है कि चारों न्याय को बाहरी चीज मानते हैं. उनके अनुसार न्याय चूंकि बाहर की चीज है इसलिए किसी न किसी रूप में वे सभी मनुष्य की क्षमताओं, उसकी प्रवृत्तियों और संभावनाओं पर संदेह कर रहे होते हैं. चारों के दर्शन में प्लेटो को यही बात सर्वाधिक अखरती है. मन से कवि और विचारों से दार्शनिक प्लेटो मनुष्य और मनुष्यता में अपने विश्वास को कम नहीं होने देता. इसलिए वह यह सिद्ध करने में जुट जाता है कि न्याय बाहरी वस्तु न होकर मनुष्य के आंतरिक बल का परिचायक है. वह सिद्ध करने की कोशिश करता है कि न्याय न तो बाहरी सौगात है, न ही रूढ़ि न ही किसी अदृश्य सत्ता की ओर से उपहार. असल में वह मनुष्य की अपनी महिमा, उसका आंतरिक बल, ओज और तेज है. वह बताता है कि उसके साथी न्याय पर समग्रता से विचार करने के बजाय, उसके परिस्थितिगत लक्षणों पर विचार कर रहे हें. इसलिए न्याय को लेकर उनके विचार अधूरे और अपर्याप्त हैं. उसके अनुसार न्याय मानव प्रकृति की उच्चतम अवस्था है. समाज का अपना व्यक्तित्व होता है. सीमित संदर्भों में जहां न्याय मानव-मात्र की आंतरिक शुभता का परिणाम हैं, वहीं व्यापक संदर्भों में वह समाज की आंतरिक शुभता को भी दर्शाता है. इसकी विवेचना हेतु प्लेटो पुस्तक का उदाहरण देता है. मान लीजिए एक व्यक्ति के पास किसी पुस्तक की दो प्रतियां हैं. उनमें से एक बड़े अक्षरों में टाइप होने के कारण काफी मोटी है, दूसरी छोटे अक्षरों में, आकार में अपेक्षाकृत छोटी है. हालांकि दोनों प्रतियों की विषय-वस्तु में कोई अंतर नहीं है. फिर यदि किसी व्यक्ति को उन्हें पढ़ने को दिया जाए तो वह बड़े फांट की पुस्तक को पढ़ना पसंद करेगा. यही उसके लिए आसान भी होगा. भले ही बड़े अक्षरों वाली पुस्तक को लाना-ले-जाना उसके लिए कठिन हो. प्लेटो के अनुसार व्यक्तिगत न्याय और सामाजिक न्याय में यही अंतर है. दोनों मनुष्य की आंतरिक शुभता, उसके सदाचार और सद्गुणों की उत्पत्ति होता है. समाज में जाकर उसका रूप बड़ा हो जाता है. वह व्यक्ति से अधिक समाज को समझने पर जोर देता है. अपने दायरे के कुछ लोगों को वह दूसरों से अधिक जान पाता है तो इसलिए कि वे उसकी सामाजिकता के दायरे में हैं. आदर्श समाज में किसी नागरिक को जानने और समाज को जानने में अंतर नहीं होता. न्याय की इस विशेषता को समाज के प्रति सकारात्मक सोच और वृहद संदर्भों में ही परखा जा सकता है. इसके लिए प्लेटो स्पष्ट करता है कि कोई राज्य अपनी धन-संपदा या शक्ति के बल पर आदर्श नहीं बनता. आदर्श राज्य अपने नागरिकों के श्रेष्ठतम चरित्र से आकार लेता है.

चर्चा के अगले चरण में एडीमेंटस विमर्श में शामिल हो जाता है. न्याय की उसकी व्याख्या सामाजिक अनुभवों पर केंद्रित तथा आत्मपरक है. उसके अनुसार लोग अपने बच्चों को न्याय का समर्थन करना इसलिए नहीं सिखाते क्योंकि वह शुभता का प्रतीक है. बल्कि इसलिए सिखाते हैं कि बच्चे बड़े होकर उनका साथ दे सकें. प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि एडीमेंटस न्याय को पारिवारिक सुख तक सीमित रखकर, राज्य की उपेक्षा कर रहा है. लेकिन ऐडीमेंटस निरा परिवारवादी नहीं है. उसका समाज में भरोसा है. वह मानता है कि समाज कोई अमूर्त्त अवधारणा नहीं है. किसी भी व्यक्ति का समाज उसके आसपास के परिवेश से बनता है, जिसमें उसमें परिवार भी सम्मिलित होता है. इसलिए परिवार और परिवेश के प्रति निष्ठा प्रकारांतर में समाज के प्रति निष्ठा की परिचायक है. अतएव व्यक्ति को न्याय के प्रति अनुरक्त करने का सर्वात्तम रास्ता है कि उसके परिवेश में सुधार लाया जाए. ऐसे परिवेश का निर्माण किया जाए जिसमें उसे न्यूनतम अंतर्द्वंद्वों का सामना करना पड़े. समाज और सामाजिकता में विश्वास बनाए रखने का दायित्व व्यक्ति और समाज दोनों का है. ऐडीमेंटस आगे कहता है कि न्याय से लोगों को परचाने, उसके अनुपालन करने हेतु धार्मिक शिक्षा अपर्याप्त है. वह न्याय को राज्य एवं नागरिकों के बीच शुभता के आदान-प्रदान के रूप में प्रभावी करने के बजाए, उसे दैवीय बना देती है. धार्मिक व्यक्ति कहता है—यदि तुम दूसरों के साथ न्याय करोगे तो ईश्वर तुम्हारी मदद करेगा, तुम्हें उसका पारितोषिक देगा. और यदि तुम अन्याय करोगे तो ईश्वर की निगाह में दंड के भागी बनोगे. स्वर्ग-नर्क की अवधारणा, मोक्ष आदि न्याय के ऐसे ही भ्रांत स्वरूप हैं. ऐसे में व्यक्ति जो करता है, वह या तो डर के कारण, अथवा दूसरों के विवेक से अनुशासित होकर. कर्तव्य एवं न्याय-भावना को भुलाकर पूजापाठ, दान-पुण्य आदि के बहाने वह ईश्वर को खुश करने की कवायद में जुट जाता है. चूंकि ईश्वर का कोई अस्तित्व ही नहीं है, इसलिए धार्मिक व्यक्ति का न्यायबोध सिवाय भ्रांति के कुछ नहीं होता. यह भ्रांति न केवल उसके अपने लिए, बल्कि समाज के लिए भी हानिकारक है. इसके चलते ईश्वरीय न्याय को ही वास्तविक न्याय मानने का दावा करने वाले उसके नाम पर मनमानी करने में सफल हो जाते हैं. न्याय सामाजिक शुभता का दूसरा नाम है. अवास्तविक अथवा काल्पनिक पात्रों के सहारे समाज द्वारा उसकी सिद्धि असंभव है. न ही उसे भय फैलाकर प्राप्त किया जा सकता है. ईश्वर के नाम पर होने वाला न्याय पुरोहित तथा उसके चेले-चपाटों के बीच चढ़ावे की हिस्सेदारी में सिमटकर रह जाता है. धर्म को लेकर एंडीमेटस का दृष्टिकोण कई मायने में महत्त्वपूर्ण है. वह न्याय के बारे में आधुनिक विचारधाराओं से मेल खाता है. जान लॉक, रूसो, बैंथम, फायरबाख, कार्ल मार्क्स, से लेकर पीटर क्रोप्टोकिन तक सभी विचारक जीवन में धर्म के अतिरेकी विस्तार तथा उसे न्याय का पर्याय मानने वाली मानसिकता का विरोध करते आए हैं. इसी का प्रभाव है कि धर्म को आधुनिक राज्यों में नीति-निर्माण की प्रक्रिया से अलग-थलग कर दिया गया है.

वैसे भी धर्म और न्याय का कोई अंतःसंबंध नहीं है. आरंभ से ही धर्म अभिजन-हितों का समर्थक-साधक रहा है. इसके अनगिनत उदाहरण रोजमर्रा के जीवन में खोजे जा सकते हैं. महाभारत-युद्ध को प्रायः धर्म-युद्ध कहकर प्रचारित किया जाता है. युद्ध के प्रमुख सूत्रधार की भूमिका निभाता हुआ कृष्ण अठारह अक्षौहिणी सेना, जो उस समय विश्व की कुल जनसंख्या की एक-तिहाई थी, को एक-दूसरे से भिड़ाकर भगवान बन जाता है. उस युद्ध का प्राप्य क्या था? युधिष्ठिर को राज्य मिला. पर अठारह अक्षौहिणी सेना का हिस्सा बनकर लड़े सैनिकों या उनके परिजनों को क्या मिला? इसपर महाभारत या इतिहास की किसी पुस्तक में कोई उल्लेख नहीं है. आज भी इस पर कोई चर्चा नहीं करता. बस धर्म-युद्ध मानकर उसपर उठने वाले प्रत्येक सवाल पर पर्दा डाल दिया जाता है. युधिष्ठिर के धर्म-राज्य में प्रजा का क्या हाल था, पता नहीं. परंतु स्वयं महाभारत का संकेत है कि उस युद्ध ने एक परजीवी वर्ग को जन्म दिया था, जो इतना शक्तिशाली था कि नवनियुक्त सम्राट की आंखों के सामने किसी की भी हत्या कर सकता था. धर्मराज होने का दावा करने वाला युधिष्ठिर उसको देखकर भी चुप रहने को विवश था. यह उदाहरण महाभारत के शांतिपर्व से है—

‘कुरुक्षेत्र के महाभारत के बाद जब पांडव विजयी होकर लौटे तो प्रजा उनके स्वागत को उमड़ पड़ी थी. हजारों ब्राह्मण भी दान की अभिलाषा युधिष्ठिर को आशीर्वाद देने के नाम पर नगर-द्वार पर आ जुटे. जैसे ही युधिष्ठिर का रथ आता दिखाई पड़ा, प्रजा उसकी जय-जयकार करने लगी. नगर-द्वार पर जमा ब्राह्मण स्तुतिगान में लग गए. उस खुशनुमा माहौल में एक श्रमण साधुओं के बीच से अचानक निकला और युधिष्ठिर को देखकर कहने लगा—

‘हे युधिष्ठिर! तुमने अपने बंधुओं की हत्या की है. स्वजनों की हत्या और गुरुजनों का नरसंहार करके तुम्हें क्या मिला? तुम पापी हो. तुम्हें क्षोभ से मर जाना चाहिए.’

युधिष्ठिर स्तब्ध. लोगों को काटो तो खून नहीं. कुछ पलों के लिए ब्राह्मणों को भी मानो सांप सूंघ गया. अपराधबोध का मारा युधिष्ठिर सचमुच मर जाना चाहता था. अचानक ब्राह्मण दल को चेत हुआ. सारे के सारे ब्राह्मण एक-साथ चिल्लाने लगे—‘यह हमारा प्रतिनिधि नहीं है. हम ऐसा नहीं सोचते. यह पापी चार्वाक है. इस अधर्मी को जीने का कोई अधिकार नहीं है.’

यह कहकर सारे साधु उस श्रमण पर टूट पड़े. धर्मावतार युधिष्ठिर की आंखों के सामने उसे जीते-जी भस्म कर दिया गया.’

धर्म के नाम पर ऐसे ही अमानवीय न्याय का उदाहरण वेन की कहानी के रूप में आया है. पुराणों में वेन को विश्व का पहला निर्वाचित सम्राट बताया गया है. कहानी के अनुसार आर्यों ने जब कृषि की शुरुआत की और उसके लिए एक जगह टिककर रहना आरंभ किया तो सुरक्षा के लिए राजा चुनने का विचार सामने आया. ऐसा व्यक्ति जो जरूरत के समय उनका नेतृत्व कर सके. उस समय लोगों ने सर्वसम्मिति से वेन को अपना राजा निर्वाचित किया. वेन ने न्याय करते हुए जमीन का समुचित विभाजन किया. ब्राह्मण चूंकि शिक्षा का दायित्व संभाले हुए थे, उन्हें अनेक कर्मकांडों में लिप्त रहना पड़ता था, इसलिए उन्हें नदी किनारे की उपजाऊ जमीन दी गई. लोग खेती करने लगे. वेन के नेतृत्व में विश् तरक्की करने लगा. लेकिन खेती तो मौसम पर निर्भर थी. एक बार भयंकर अकाल पड़ा. पूरा विश् भूख की चपेट में आ गया. लोग तड़फ-तड़फकर मरने लगे. जब तक सुख देती थी, तब तक नई व्यवस्था लोगों को हितकारी लगती थी. मौसम की मार के साथ ही उसकी कमजोरी सामने आ गई. लोग वेन को दोष देने लगे. एक राजा का दायित्व निभाते हुए वेन ने विश् के लोगों की बैठक बुलाई. ब्राह्मणों को दी गई भूमि पर अब भी खेती हो रही थी. नदी किनारे होने का उसे लाभ मिला था. वेन उनसे आपद्धर्म के रूप में कृषि उपज को जरूरतमंदों के बीच बांटने का आग्रह किया. इसपर वे चिढ़ गए. लोगों को राजा के विरुद्ध भड़काने लगे. भूखे लोगों का दिलो-दिमाग सुन्न हो चुका था. आक्रोश जब सीमा पार कर गया तो भूखे से अकुलाए उग्र विश-वासियों ने राजा पर हमला कर दिया. इस तरह प्रथम निर्वाचत राजा अपने ही लोगों के हाथों मारा गया.

विमर्श के अगले चरण में प्लेटो इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि न्याय को उसकी लोकोन्मुखता तथा वृहद सामाजिक हितों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए. न कि उन व्यक्तियों के व्यवहार से जो न्याय प्रक्रिया में सम्मिलित होने की दावेदारी करते हैं. न्याय-संबंधी विमर्श में अनेक लोगों को सम्मिलित कर वह तत्कालीन समाज में प्रचलित न्याय के परंपरावादी, उग्रवादी एवं व्यवहारवादी स्वरूपों की समीक्षा करता है. अंततः उसका संवेदनशील कवि हृदय उसको आदर्शवाद के समर्थन में ले जाता है. सुकरात के माध्यम से वह स्पष्ट करता है कि न्याय मनुष्य की आंतरिक शुभता, उसका सदाचरण है—‘यदि कोई व्यक्ति अपने दायित्वों का समुचित वहन करता है, तो उसका आचरण ही उसकी न्याय-प्रियता का प्रमाण बन जाता है.’ वह मानता है कि न्याय प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में रहता है. मनुष्य द्वारा अपने कर्तव्य का समयानुसार पालन करना ही न्याय है. जाहिर है प्लेटो के लिए न्याय कोई सिद्धांत या विचारधारा न होकर आचरण की वस्तु है. क्या न्याय की शिक्षा दी जा सकती है? इसी से जुड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या शिक्षा व्यक्ति को अधिक न्यायशील बनाती है. प्लेटो शिक्षा की उपयोगिता से इन्कार नहीं करता. व्यक्तित्व विकास हेतु शिक्षा अनिवार्य है. तथापि उसके अनुसार शिक्षा साध्य नहीं है. वह केवल साधनमात्र है. उसका महत्त्व व्यक्ति को राज्य का योग्यतम सदस्य बनाने में मदद करना है. शिक्षा के अलावा अधिकार चेतना, जिसमें अपने साथ-साथ दूसरों के अधिकारों का बोध भी जरूरी है तथा कर्तव्य के प्रति जागरूकता और समर्पण का भाव व्यक्ति को श्रेष्ठ नागरिक बनाने में मदद करता है. ‘रिपब्लिक’ की शुरुआत वह व्यैक्तिक नैतिकता एवं न्याय-प्रिय व्यक्ति के न्याय-संगत जीवन की विशेषताओं से करता है, लेकिन आगे बढ़ते-बढ़ते स्थिति साफ होती जाती है. पता चलता है कि लेखक का उद्देश्य संपूर्ण समाज को न्याय एवं नैतिकता से बंधे हुए देखना है. वह मानता है कि न्याय समाज का विशिष्ट गुण है. यह गुण समाज में बाहर से नहीं आता. बल्कि उसके नागरिकगण अपने न्याय-संगत आचरण द्वारा उसे संभव बनाते हैं. न्याय तथा औचित्य अथवा अन्याय एवं अनौचित्य जिस प्रकार व्यक्ति के गुण-दोष हो सकते हैं, उसी प्रकार ये समाज के भी गुण-दोष हो सकते हैं. न्याय व्यक्ति एवं समाज को परस्पर अन्योन्याश्रित, पूरक एवं प्रेरक बनाता है.

आधुनिक विचारक जॉन रॉउल न्याय को सामाजिक संस्थाओं का विशेष लक्षण मानता है. उसके अनुसार—‘न्याय सामाजिक संस्थाओं का शुभत्व है. उसका वही महत्त्व है जो वैचारिक उद्यमों में सत्य का होता है.’8 प्लेटो के लिए न्याय एवं नैतिकता में कोई अंतर नहीं है. दोनों परस्पर पूरक और पर्याय हैं. आदर्श स्थिति वह है जब व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर न्याय में अंतर मिट जाता है. इसके लिए प्लेटो समाज को शासक, रक्षक और कृषक तीन हिस्सों में बांटता है. जैसे भारत में शूद्रों को वर्ण विभाजन में सबसे निचले स्तर पर रखा गया है और दासों को वर्ण विभाजन में स्थान ही नहीं दिया गया है, इसी प्रकार प्लेटो के आदर्श राज्य में भी दासों को कार्यविभाजन से बाहर रखा गया है. दोनों ही जगह उनकी स्थिति खरीदी गई वस्तु या संसाधन के समान है. बावजूद इसके दोनों में बड़ा अंतर है. प्लेटो का सिद्धांत पूरी तरह से सामाजिक जरूरतों और विकास के नजरिये पर आधारित है. वह किसी व्यक्ति को जन्म, लिंग अथवा उसकी पैत्रिक पहचान के आधार पर छोटा या बड़ा घोषित नहीं करता. व्यक्ति का चयन उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि से इतर, विशुद्ध योग्यता के आधार पर हो—इसके लिए वह बच्चों का पालन-पोषण सात वर्ष का होते ही—माता-पिता से दूर, उसकी पैत्रिक पहचान को छिपाकर करने की अनुशंसा करता है. ताकि बड़े होने पर उनमें जन्म के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव न किया जा सके. भारत में कार्यविभाजन इससे भिन्न था. वेदों, स्मृतियों तथा धर्म-सूत्रों में कार्यविभाजन के नाम पर समाज को चार वर्गां में बांटने का विधान रचा गया है. हालांकि दावा यह किया गया है कि वह विशुद्ध गुणों पर आधारित विभाजन हे और कोई मनुष्य अपने गुण एवं प्रतिभा के आधार पर वर्ग-अंतरण कर सकता है. परंतु वास्तविकता इससे अलग है. कर्म-गुण के आधार पर भारतीय समाज में वर्ग-अंतरण के उदाहरण इतने विरल हैं कि उन्हें अपवाद मानकर छोड़ा जा सकता है. भारतीय विशेषकर हिंदू समाज में जाति-व्यवस्था दास प्रथा की अपेक्षा कहीं अधिक निकृष्ट और भयावह थी. अपने स्वामी की अनुकंपा अथवा तय मूल्य-राशि का भुगतान करने के पश्चात दास अपनी स्वतंत्रता खरीद सकता था. जातिप्रथा में दबे शूद्रों को इस प्रकार के अवसर उपलब्ध न थे. जाति जन्म के साथ जीवन में प्रवेश करती और मरण तक देह और मन से चिपकी रहती थी. ‘रिपब्लिक’ में कार्य-विभाजन नीति-सम्मत है. प्लेटो व्यक्ति के गुण-दोष के अनुसार उसे उपयुक्त जिम्मेदारी सौंपने की सिफारिश करता है, ताकि उसकी योग्यता का समाज-हित में भरपूर इस्तेमाल किया जा सके. भारतीय, विशेषकर हिंदु समाज में जातीय विभाजन धर्म-सम्मत व्यवस्था है. जाति-व्यवस्था के लिए व्यक्ति की रुचि एवं योग्यता कोई मूल्य नहीं है. वह सबकुछ जन्म के आधार पर, बिना व्यक्ति की रुचि अथवा योग्यता देखे, काम सौंपने में विश्वास रखती है. इसलिए उसमें बदलाव सरल नहीं है. दूसरी ओर प्लेटो का कार्य-विभाजन अधिक वैज्ञानिक, निष्पक्ष और राज्य-कल्याण की भावना से भरा है.

‘रिपब्लिक’ मानवीय मेधा की अमूल्य धरोहर है. उसकी प्रशंसा करते हुए बार्कर ने लिखा है—न्याय रिपब्लिक की आधारशिला है. और रिपब्लिक न्याय की मूल अवधारणा का संस्थागत रूप है.’ ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो ने कहा है कि समाज के तीनों वर्गों को बिना एक-दूसरे के कार्य में व्यवधान उत्पन्न किए, काम करते रहना चाहिए. सब अपना-अपना कार्य मनोयोग से करेंगे तो सामाजिक शांति और सद्भाव बना रहेगा. राज्य आत्मनिर्भर बनेगा. अंतर्द्वंद्व घटेंगे और उनके समाधान में खप रही ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग लोककल्याण के निमित्त संभव हो सकेगा. सेबाइन ने प्लेटो के न्याय-सिद्धांत को सामाजिक न्याय के लिए आवश्यक माना है. उसके अनुसार—‘न्याय वह बंधन है जो मानव-समाज को एकता के सूत्र में पिरोता है. यह उन व्यक्तियों के सहयोग और समन्वय का नाम है जो अपनी शिक्षा-दीक्षा, योग्यता एवं रुचि के अनुसार अपने कर्तव्य का चयन करते हैं और फिर अपनी संपूर्ण निष्ठा से उसके अनुपालन में लगे रहते हैं. अपनी निष्ठा एवं समर्पण भावना से वे समाज को संपूर्ण एवं आत्मनिर्भर बनाते हैं. ऐसा समाज जो संपूर्ण मानव-मनस् की रचना हो, जिसमें हर कोई अपना प्रतिबिंब देख सके. सामाजिक जीवन के ऐसे ही मूलभूत, उदात्त रूप को प्लेटो ने न्याय की संज्ञा दी है. आचरण की शुभता पर जोर देते हुए वह ऐसे आदर्श समाज की परिकल्पना करता है, जिसमें मानव-व्यक्तित्व की उठान सामाजिक शुभता के परम-बिदु को छूने लगती हे. लक्ष्य आसान नहीं है. परंतु निजता को सर्वकल्याण को समर्पित करने के बाद मनुष्य उस अवस्था को प्राप्त कर सकता है.

प्लेटो न्याय और ज्ञान को परस्पर पूरक मानता है. उसके अनुसार ज्ञान मनुष्य को न्याय की पहचान कराता है. ज्ञान ही एकमात्र ऐसा उपकरण है जिससे मनुष्य शुभ-अशुभ, अच्छे-बुरे का बोध कराता है. ज्ञान न्याय की पूर्वापेक्षा और अनिवार्यता है. इसलिए ज्ञान एकमात्र शुभ है. सुकरात के माध्यम से प्लेटो द्वारा न्याय की खोज का सिलसिला आदर्श समाज की अवधारणा तक बढ़ जाता है. प्लेटो ने साहित्य की महत्त्वपूर्ण विधाओं, नाटक, कविता आदि की आलोचना की थी. वह उन्हें लोकरंजन के माध्यम से अधिक मानने को तैयार न था. नाटक एवं कविता को तो वह मानव-चरित्र को दुर्बल बनाने वाली विधाएं मानता था. लेकिन उसके दर्शन में कवि मन की संवेदनशीलता साफ-साफ झलकती है. ‘रिपब्लिक’ में न्याय की खोज का सिलसिला, संवेदनशील मन की कविता जैसा है, जिसे उसकी विद्वता महत्त्वपूर्ण बना देती है. प्लेटो की न्याय-संबंधी अवधारणा के कई बिंदू विचारणीय है. उनमें कुछ ऐसे भी हैं जिनसे उसकी कुंठा जाहिर होती है. ध्यातव्य है कि प्लेटो का संबंध एथेंस के शासक परिवार से था. वह स्वयं को एथेंस की सत्ता की सत्ता के प्रमुख दावेदारों में से एक मानता था. लेकिन सुकरात को मृत्युदंड दिए जाने के बाद से तत्कालीन राजनीति से उसका जी उचट गया था. प्लेटो से पहले यूनानी समाज में कोई खास कार्यविभाजन न था. न ही कार्य-विशेष के प्रति व्यक्ति की रुचि का कोई महत्त्व था. इसलिए माना जाता था कि कोई भी व्यक्ति कुछ भी कार्य कर सकता है. इसी धारणा के चलते एथेंस में गणतांत्रिक पदों पर नियुक्तियां लॉटरी के माध्यम से की जाती थीं. इसके चलते कई बार कार्य-विशेष के लिए अयोग्य व्यक्ति चुन लिए जाते थे. इस अविवेकी व्यवस्था ने एथेंस का गणतंत्र अयोग्य हाथों की कठपुतली बना हुआ था. सुकरात ने उस पर चोट की थी. खुद को गणतंत्र का समर्थक मानने वाले एथेंस की यह सबसे बड़ी त्रासदी थी. प्लेटो की आदर्श राज्य की परिकल्पना उसकी इसी छटपटाहट का सुफल कही जा सकती है. न्याय की विवेचना के रूप में यही छटपटाहट आदर्श राज्य की कल्पना में भी दिखाई पड़ती है. वह ऐसे राज्य की कल्पना पेश करता है, जहां लोग बजाए स्वार्थ-भाव के सर्वोदय भाव से जुड़े हों. जिनमें पारस्परिक कल्याण के प्रति एका और विश्वास हो. वह स्पष्ट करता है कि न्याय आदर्शोन्मुखी समाज की सहज-स्वाभाविक उपलब्धि है. वह कृत्रिम अथवा बाहरी शक्ति द्वारा थोपी गई व्यवस्था नहीं है. किसी भी समाज में न्याय का संरक्षण किसी भय या दबाव में न होकर उसके स्वयं स्फूर्त्त प्रयासों के माध्यम से होता हे. वह इसलिए भी आवश्यक है कि न्याय का कोई दूसरा या तीसरा पक्ष नहीं होता. न्याय या तो न्याय होता है, अथवा न्याय नहीं होता. उसे केवल वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में ही समझा जा सकता है. उसके लिए आवश्यक है कि समाज की इकाइयों में परस्पर सामंजस्य और एक-दूसरे के प्रति विश्वास का भाव हो.

‘रिपब्लिक’ के लिए प्लेटो को अपूर्व ख्याति प्राप्त हुई है. उसे ‘दार्शनिकों का दार्शनिक’ माना गया है. यह माना गया है कि जो प्लेटो के यहां नहीं है, दर्शन में वह कहीं भी नहीं है. बावजूद इसके प्लेटो को आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा है. कुछ विद्वानों ने उसके न्याय-संबंधी दर्शन को निष्क्रियता का दर्शन माना है. उनका कहना है कि प्लेटो का न्याय कल्पना की उड़ान, खूबसूरत सपने से अधिक कुछ नहीं है. न्याय को लेकर वह जो सपना देखता है, उसका सच हो पाना असंभव है. प्लेटो की भांति उसका न्याय भी इतना आत्मसंयमी और मर्यादित है कि उसे व्यवहार में उतार पाना बेहद कठिन है. बार्कर तो प्लेटो के न्याय को न्याय मानने के लिए ही तैयार नहीं है. उसके अनुसार प्लेटो का न्याय महज भावना या कवि मन की खूबसूरत परिकल्पना है. उसके अनुसार प्लेटो का न्याय-सिद्धांत एकतरफा है. वह केवल मनुष्य के कर्तव्यों को निर्धारित करता है और अधिकारों को तय करने का काम पूरी तरह समाज की मर्जी पर थोप देता है. यदि समाज सचमुच इतना ही उदार हो, जैसा कि प्लेटो सोचता है तो ऐसे समाज में न्याय का औचित्य ही समाप्त हो जाता है. वस्तुतः ईसापूर्व चौथी-पांचवीं शताब्दी के जिस समाज का जिक्र प्लेटो के ग्रंथों में मिलता है, उन दिनों यूनानी समाज युद्ध प्रिय समाज था. वहां छोटे-छोटे नगर राज्य थे, जिनके बीच युद्ध अकसर होते रहते थे. एथेंस स्पार्टा के हाथों पराजित हो चुका था. वह पराजय भी एथेंसवासियों के लिए कुंठा का कारण बनी थी. एथेंस जहां अपने दार्शनिक विचारों, कवियों और सुंदरियों के लिए प्रसिद्ध था, उसके पड़ोसी नगर-राज्य स्पार्टा की प्रतिष्ठा वहां के बहादुर सैनिकों के कारण थी. एक युद्ध में स्पार्टा के हाथों भीषण पराजय के बाद एथेंसवासियों के मन में ‘उस जैसा’ बनने की बड़ी कामना थी. आदर्श गणराज्य के रूप में प्लेटो ऐसे ही गणतंत्र की कामना करता है. सेबाइन ने भी माना है कि प्लेटो की ‘न्याय-संबंधी कल्पना जड़, आत्मपरक, निष्क्रिय, ठहराव-युक्त, अव्यावहारिक एवं अविश्वसनीय है.’ ‘न्याय’ की बात करता हुआ प्लेटो कहीं-कहीं ‘अन्याय’ का पक्ष लेता हुआ नजर आता है; यदि यह मान लिया जाए कि व्यक्ति या समूह अपनी किसी खास प्रवृति का दास होता है तो भी उसे यह बताने की क्या आवश्यकता है कि प्रत्येक मनुष्य केवल एक ही कार्य करे. या केवल समाज द्वारा निर्दिष्ट कार्यों को ही करे.

दरअसल न्याय की विवेचना करते हुए प्लेटो विषय को इतना व्यापक कर देता है कि अन्याय और न्याय के बीच भेद कर पाना असंभव-सा हो जाता है. इससे उसके विचारों में कहीं-कहीं असंगतियां और अंतर्विरोध भी दिखने लगता है. वह एक ओर तो दावा करता है कि आदर्श समाज में कोई व्यक्ति दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, दूसरी ओर राज्य को व्यक्ति के कर्तव्यों के निर्धारण का अधिकार देकर उसकी स्वतंत्रता छीन लेता है. प्लेटो के अनुसार समाज में संरक्षक वर्ग का कर्तव्य अपने बुद्धि-विवेक से समाज को अनुशासित और कर्तव्योन्मुखी बनाए रखना है, इसके लिए उन्हें व्यापक अधिकार प्राप्त होते हैं. लेकिन यदि ऐसे वर्ग का कोई व्यक्ति जो ‘संरक्षक’ या संरक्षक वर्ग से नहीं है, न ही उसकी योग्यता रखता है, जेसे दास, यदि ऐसा व्यक्ति बुद्धि-विवेक में ‘संरक्षक’ से आगे निकल जाता है, तो उसका क्या किया जाए? कैसे उसकी योग्यता का समाज के हित में उपयोग किया जाए? न्याय-भावना तो इसमें है कि ऐसे व्यक्ति को तत्काल संरक्षक वर्ग में सम्मिलित कर उसकी काबलियत का उपयोग लोक-हित में किया जाए. साथ ही संरक्षक वर्ग में सम्मिलित व्यक्ति जो बौद्धिक नेतृत्व करने में असमर्थ हैं, जो समाज-हित के बजाय जो केवल स्वार्थ को वरीयता देते हैं तथा नैतिक दृष्टि से भी पतनशील हैं—उचित होगा कि ऐसे दुराचारियों को पदावनत कर निचले वर्गों में ढकेल दिया जाए. समाज हित के लिए यह जरूरी भी है. प्लेटो उसकी कोई व्यवस्था नहीं करता. बजाए इसके वह दासप्रथा का समर्थन करता है और उसको बनाए रखने के लिए तर्क देता है. यहीं उसकी न्याय की अवधारणा ‘अन्याय’ में बदलती नजर आती है. चह दार्शनिक सम्राट को इतना अधिकार-संपन्न बना देता है कि वह निरंकुश नजर आने लगता है. कदाचित वह सोचता था कि जो ‘दार्शनिक सम्राट’ के लिए अपेक्षित स्तर को प्राप्त कर चुके व्यक्ति मनुष्य की सामान्य कमजोरियों से मुक्त होंगे. जबकि मानवीय प्रवृत्ति परिवर्तनशील है. ध्यातव्य है कि दासप्रथा का समर्थन करने वाला प्लेटो अकेला विचारक नहीं है, सुकरात, अरस्तु, जेनोफीन जैसे उसके समकालीन विचारक भी उससे सहमत हैं. दूसरे प्लेटो के आदर्श राज्य में जनसाधारण के लिए कोई स्थान नहीं है. उसका कवि-हृदय सपने की तरह केवल आदर्श बुनता है. नैतिकता चूंकि स्वयं एक आदर्श है, इसलिए उसके सपने की महत्ता से इंकार नहीं किया जा सकता.

प्लेटो ने स्वीकार किया था कि जन्म एवं शिक्षा में दूसरों से बेहतर होने के कारण संरक्षकों के बेटे-बेटियां समाज के शेष वर्गां की संतान की अपेक्षा लाभ की स्थिति में होंगे, जिससे समाज का शक्ति संतुलन एक वर्ग विशेष के पक्ष में खिसकता चला जाएगा. न्याय की व्याख्या के अगले चरण में वह ऐसे राज्य की परिकल्पना करता है जिसका संघटन पंरपरा अथवा किंचित आदर्शयुक्त पसंदों के आधार पर किया गया हो. आदर्श राज्य के रूप में प्लेटो की परिकल्पना में ऐसा राज्य था, जहां ‘न्याय’ कि सर्वत्र व्याप्ति हो. प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यपालन में तल्लीन रहता हो. वह प्रश्न उठाता है कि व्यक्ति के कर्तव्य को परिभाषित कैसे किया जाए? वह कौन-सा कार्य हो सकता है, जिसको करके कोई नागरिक आदर्श राज्य के निर्माण में अपना योगदान दे सकता है? प्राचीन यूनान, आमेर आदि राज्यों में पुत्र को वही कार्य करना पड़ता था, जो उसके पिता के लिए निर्धारित था. पीढ़ी-दर-पीढ़ी यही चलता रहता था. इस प्रणाली पर कभी कोई प्रश्न नहीं उठता था. मगर प्लेटो के राज्य में स्थिति दूसरी थी. ‘रिपब्लिक’ में उसने बच्चों का पालन-पोषण माता-पिता से दूर, इस प्रकार करने की अनुशंसा की है, जिसमें माता-पिता अथवा उनकी संतान एक-दूसरे को कभी पहचान ही सकें. उसके राज्य में व्यक्ति का कोई निजी अभिभावक नहीं था. वहां संबंधों के वर्ग थे, जिनके अनुसार पिता की उम्र के सभी व्यक्तियों को पिता का दर्जा प्राप्त था और पुत्र की उम्र के युवाओं को पुत्र का. यही स्थिति स्त्री के साथ थी. काम-संबंधों में पर्याप्त खुलापन था. प्लेटो ने विवाह संस्था का निषेध किया है. इसके दो कारण थे. पहला उसे लगता था कि पारिवारिक संबंध व्यक्ति के उद्देश्यों को सीमित बनाते हैं. दूसरा स्त्री को पुरुष के बराबर दर्जा देना. प्लेटो ने दांपत्य संबंधों में साम्यवाद का समर्थन किया है. एक-दूसरे की इच्छा पर कोई भी युगल परस्पर सहवास कर सकता था. संतानोपत्ति का मुख्य ध्येय युद्धप्रिय राज्य को श्रेष्ठ योद्धा उपलब्ध कराना था. संरक्षक स्त्री-पुरुषों के लिए नियम और भी कठोर थे. ‘रिपब्लिक’ में उसने लिखा है—

‘संरक्षक वर्ग के स्त्री-पुरुषों में से कोई भी अपना घर-परिवार नहीं बसाएगा. कोई भी किसी के साथ व्यक्तिगत रूप से सहवास नहीं करेगा. शासक स्त्रियां शासक वर्ग के सभी पुरुषों की समान रूप से पत्नियां होंगी. उनकी संतानें भी समान रूप से सभी की होंगी. न तो माता-पिता अपनी वास्तविक संतान के बारे में जान पाएंगे न ही संतान अपने वास्तविक जन्मदाता को जान सकेगी.’

ऐसी अवस्था में कार्यांतरण की प्राचीन यूनानी पद्धति वहां कारगर ही न थी. इसलिए व्यक्ति के कार्य का निर्धारण या तो राज्य की मर्जी से हो सकता था अथवा उसकी अपनी रुचि के आधार पर. परंतु वह भी आसान न था. यदि सबकुछ व्यक्ति की इच्छा पर छोड़ दिया जाए तो जो कार्य बहुत श्रम की अपेक्षा रखते हैं, जो बेहद हानिकर हैं, या जिनमें अप्रीतिकर हालात का सामना करना पड़ता है, उनका क्या होगा? बिना किसी प्रलोभन अथवा दबाव के समाज के लिए अनिवार्य होने के बावजूद, ऐसे कार्यों को भला कौन करना चाहेगा! चूंकि लोकहित के कार्यों को टाला नहीं जा सकता, बल्कि कुछ कार्य तो अत्यावश्यक, नैमत्तिक महत्त्व के होते हैं, स्पष्ट है कि ऐसे कार्यों के लिए सरकार को अलग से व्यवस्था करनी होगी.

प्लेटो स्वीकार करता है कि आदर्श राष्ट्र-राज्य में यह दायित्व सरकार को खुद संभालना चाहिए. परंतु कैसे? लोग अप्रीतिकर कार्यों को भी समाज के प्रति अपना दायित्व मानकर करें, यह प्लेटो के समक्ष बड़ी चुनौती थी. ऐसे कार्यों को करने के लिए कोई तो नियुक्त किया जाएगा. जिसे वे कार्य सौंपे जाएंगे, क्या वह उन्हें खुशी-खुशी करने को तैयार होगा? यदि नहीं जो जिसे वे कार्य बलपूर्वक सौंपे जाएंगे क्या वह उसके प्रति अन्याय नहीं होगा? क्या उसे राज्य की मनमानी नहीं माना जाएगा? विकसित देशों में मशीनीकरण के बाद से अप्रीतिकर अथवा खतरे की अधिक संभावना वाले कार्यों को मशीनों से लिया जाने लगा है. लेकिन प्लेटो के समय में ऐसे कार्यों को करने के लिए केवल दास थे. उनकी उपस्थिति राज्य की सुख-समृद्धि के लिए आवश्यक थी. परंतु जिनके अधिकारों की ओर किसी का ध्यान न था. उन्हें संपत्ति के अधिकार से वंचित रखा जाता था. राजनीति में उनकी कोई हिस्सेदारी न थी. दूसरी ओर एथेंस का हर वयस्क आम सभा का सदस्य होता था. बुद्धकालीन गणतंत्रों में भी एक समय ऐसा था, जब वहां का प्रत्येक नागरिक ‘मैं राजा हूं’, ‘मैं राजा हूं’ कहकर शासक होने का दावा करता था. सोफिस्टों के कार्यकाल में एथेंस का भी यही हाल था. ऐसे समाज में जहां प्रत्येक आदमी खुद को ‘मुखिया’ समझता हो, वहां नागरिकों को व्यक्तिगत एवं सामाजिक नैतिकता के प्रचार द्वारा प्रेरित किया जा सकता था. उसके लिए प्लेटो की सारी उम्मीद दार्शनिक सम्राट पर टिकी थी. उसका मानना था कि दार्शनिक सम्राट किसी भी प्रकार के लालच से परे, परमबुद्धिमान, व्यवहारकुशल, परम-प्रज्ञावान, वीर, तेजस्वी और परिश्रमी होंगे. लोग स्वयं उससे प्रेरणा ले सकेंगे. लेकिन महामानव की खोज आसान नहीं थी. इस बात को प्लेटो भी समझता था. ऐसी अवस्था में उसने दार्शनिकों के समूह को राज्य की बागडोर सौंपने की अनुशंसा की है. मुश्किल यह है कि केवल विचार के बल पर समाज नहीं चलता. विकास की गति को बनाए रखने के लिए नए आविष्कारों की भी जरूरत पड़ती है. राज्य में उत्पादन वृद्धि और तकनीकी शोध के लिए दार्शनिक सम्राट का क्या योगदान होगा? प्लेटो इस बारे में कोई सुझाव नहीं देता. न ही उसकी कल्पनाशीलता काम करती है. इसका कारण दास के रूप में उपलब्ध अतिरिक्त और सस्ता श्रम भी हो सकता है.

प्लेटो का न्याय-दर्शन एथेंस की राजनीति से प्रभावित था. एथेंसवासियों को गर्व था कि वे एक विकसित गणतंत्र के संचालक हैं. जबकि असल में वह भीड़तंत्र द्वारा शासित राज्य था. उसमें तीन प्रमुख दोष थे. पहला यह कि राजनीतिक अनुभवहीनता और अपर्याप्त ज्ञान के बावजूद एथेंस का प्रत्येक नागरिक राजनीति में हिस्सा लेता था. उससे गलत फैसले होते थे. सुकरात को मृत्युदंड का निर्णय ऐसा ही अनुचित निर्णय था. उस घटना के बाद प्लेटो का लोकतंत्र से विश्वास उठ-सा गया था. दूसरा दोष यह था कि प्रत्येक नागरिक खुद की निगाह में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण था. किसी का किसी में विश्वास न था. हर कोई अपने लिए अधिकतम सुख-सुविधाओं की अपेक्षा रखता था. भ्रष्टाचार और स्वार्थभाव चरम पर था. बिना इसकी चिंता किए कि उनके दुराचरण से राज्य का कितना अहित हो रहा है, एथेंस के नागरिक स्वार्थ-सिद्धि में लगे रहते थे. प्लेटो के आगे स्पार्टा का उदाहरण था, जहां के नागरिक राज्य को समर्पित थे. इसलिए उसने ‘रिपब्लिक’ में राज्य को व्यक्ति से बढ़कर माना है. वह व्यक्ति का राज्य में विलय कर देने जैसा था. तीसरा और महत्त्वपूर्ण यह कि उस समय एथेंस की राजनीति में दो गुट बने हुए थे. उनके अपने-अपने समर्थक थे. दोनों हमेशा एक-दूसरे को नीचा दिखाने पर लगे रहते थे. ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो विभिन्न प्रतिद्विंद्वी समूहों को राज्य के प्रति समर्पित होने को कहता है. उसके अनुसार राज्य किसी एक व्यक्ति, समूह या वर्ग का नहीं होता—‘उसपर सभी वर्गों का समानाधिकार है. इसलिए प्रत्येक वर्ग का यह स्वयंसिद्ध कर्तव्य है कि वह राज्य की अखंडता तथा बल-वैभव को बनाए रखने के लिए समर्पित भाव के साथ काम करे.’ दार्शनिक सम्राट की अवधारणा भी प्लेटो का पूर्वाग्रह था. राजनीति को अनुभवहीन लोगों के हाथों से निकालकर परिपक्व हाथों को समर्पित करने की कोशिश. परंतु उसमें वह इतना आगे बढ़ जाता है कि ‘रिपब्लिक’ का संदेश ही बिगड़ जाता है. तो फिर प्लेटो के ‘रिपब्लिक’ की देन क्या है? आधुनिक समाज उससे क्या ग्रहण कर सकता है? इस बारे में एक बीसवीं शताब्दी के महानतम दार्शनिकों में से एक बर्ट्रेंड रसेल की टिप्पणी है—

‘उत्तर है—गतिहीनता, ठहराव, एकरसता! इससे केवल युद्धकाल में सफल हुआ जा सकता है, वह भी तब, जब सामना करीब-करीब बराबरी का हो. यह केवल छोटे समूह की आजीविका को सुरक्षित रख सकता है. जड़ सोच और कठोर नियमों के कारण इस व्यवस्था में निश्चित रूप से, न तो विज्ञान का भला होगा, न ही कलाओं का.’9

स्पार्टा और वहां की राजनीति ने अपने समकालीन जिन विचारकों को प्रभावित किया था, प्लेटो भी उनमें से एक था. अपने जीवन में उसने कई उतार-चढ़ाव देखे थे, जिनमें उसके देश एथेंस की शर्मनाक पराजय तथा अकाल आदि सम्मिलित थे. इन सभी घटनाओं ने उसके संवेदनशील मन को गहराई से प्रभावित किया था. इसका स्पष्ट प्रभाव उसके राजनीतिक सोच पर देखने को मिलता है. वह मानता था राजनीतिज्ञों में सुधार के साथ इन आपदाओं से मुक्ति संभव है. कवि-हृदय प्लेटो का मनुष्यता में अटूट विश्वास था. उसके लेखन से सर्वत्र इसकी पुष्टि भी होती है. हालांकि वह या तो समझ नहीं पाया था अथवा स्वयं को जानबूझकर भुलावे में रखे था कि आदर्श सदैव व्यक्ति-सापेक्ष होता है. उसके बारे में चर्चा भी वही करते हैं, जो उसमें विश्वास रखते हैं. अधिकांश व्यक्ति निजी सुखों को ही अहमियत देते हैं. उन्हें अपने लिए बेहतर भोजन, अच्छा आवास तथा अन्य सुख-सुविधाएं चाहिए. तब आदर्श और सामान्य पसंदों के बीच अंतर कैसे किया जाए? वह कौन-सा गुण है जो व्यक्ति की सामान्य पसंदों को आदर्श पसंदों का रूप दे दे सकता है? प्लेटो के अनुसार व्यक्ति की इच्छाएं कहीं न कहीं उसके अहं से प्रेरित-प्रभावित होती हैं. अहं व्यक्ति को आत्मकेंद्रित एवं स्वार्थी बनाता है. इसलिए ‘आदर्श पसंदें’ वे पसंदें कही जा सकती हैं, जिनमें व्यक्ति के अहं का न्यूनतम प्रभाव हो—जो समाज की सामान्य इच्छाएं हों तथा व्यक्ति के निजत्व को सामान्यबोध की पहचान देकर उसे लोकोन्मुखी बनाती हों. समाज का हित है कि ऐसी पसंदों को प्राथमिकता दी जाए. जैसे किसी व्यक्ति की यह इच्छा कि प्रत्येक व्यक्ति के पास पर्याप्त भोजन हो अथवा यह सोच कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति के पास उत्तम आवास, वस्त्र तथा भोजन आदि की सुविधाएं पर्याप्त मात्रा में हों. इस प्रकार की इच्छा के साथ व्यक्ति का अहं तिरोहित हो जाता है. किंतु सभी मनुष्य तो एकसमान नहीं होते. उनकी रुचियों, स्वभाव और पसंदों में स्वाभाविक अंतर होता है. ऐसे में इच्छाओं का समाजीकरण कैसे हो? कैसे उनके आदर्श स्वरूप को कायम रखा जाए? ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो इसकी भी व्याख्या करता है. उसके अनुसार अहं के तिरोहण के पश्चात इच्छाओं का सहज समाजीकरण संभव है. उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति की दर्शन में रुचि है तो वह इच्छा कर सकता है कि समाज के सभी व्यक्तियों को दर्शन का भरपूर ज्ञान हो. ऐसे ही विज्ञान में रुचि रखने वाला व्यक्ति विज्ञान तथा कलाओं में रुचि रखने वाला व्यक्ति कलाओं के बारे में इच्छा व्यक्त कर सकता है. इस तरह इच्छाओं का समाजीकरण क्या मानव-स्वभाव से निरपेक्ष नहीं होता. प्लेटो का विश्वास था कि उदारतापूर्ण इच्छाएं अपने समन्वयीकरण की प्रक्रिया में समाज में अपनी ही जैसी इच्छाओं को बढ़ावा देंगी. इससे व्यक्ति के निजी स्वार्थ में कमी आएगी. समाज में निजी संपत्ति की अवधारणा कमजोर पड़ेगी. फलस्वरूप आर्थिक समानता के स्तर को बनाए रखना आसान होगा.

इच्छाओं और पसंदों का सामान्यीकरण जितना आसान दिखता है, उतना होता नहीं. यदि व्यक्ति का पालन-पोषण भिन्न परिस्थितियों में हुआ हो तो यह और भी कठिन हो जाता है. विकास की भिन्न स्थितियां तथा तज्जनित विषमताएं मतभेदों को जन्म देती हैं. मतभेद हों तो व्यक्तिगत इच्छाएं भी अहं से संचालित होने लगती हैं. जैसे राष्ट्रीय भावना से प्रेरित कोई व्यक्ति यह इच्छा रख सकता है कि सभी जर्मनवासी प्रसन्न हों. जबकि दूसरा व्यक्ति इसपर आपत्ति सकता है कि सिर्फ जर्मनवासी क्यों, दुनिया में जितने भी लोग हैं, सभी प्रसन्न रहने चाहिए. इसी तरह भारतीय राष्ट्रवादी का सामान्य सोच होगा कि भारत दुनिया में अन्य सभी देशों में अग्रणी हो. अतिश्रद्धालु व्यक्ति अपने धर्म को पूरी दुनिया पर छाये हुए देखना चाहेगा. जबकि मानवतावादी सपना होगा कि विश्व के सभी देश बराबर हों. किसी का किसी पर अधिकार न हो. लोग अपने-अपने विश्वास, मान्यताओं और परंपरा के साथ सुरक्षित रहें. सुख में सभी की समान साझेदारी हो. ऐसे परस्पर विरोधी विचारधाराओं वाले मनुष्य समाज में एक साथ होंगे तो उनके मतभेद उभरकर सामने आएंगे ही. फिर उनके बीच तालमेल कैसे संभव है? कैसे उन सभी की रचनात्मक क्षमताओं का इस्तेमाल समाज-हित में किया जाए? यह चुनौती प्लेटो के समय में थी. आज भी है. निजी स्वार्थ एवं मतभेदों के कारण वह एथेंस के गणतंत्र की दुर्दशा को देख चुका था. उसका मानना था कि व्यक्तिगत मतभेदों का समाहाहर केवल आदर्श समाज में संभव है. आदर्श समाज से उसका आशय था, ऐसा समाज जहां सभी को अपने-अपने कर्तव्य का एहसास हो और सभी उसके प्रति समर्पित होकर काम करें. बदले में राज्य बिना किसी पक्षपात के सभी को जीवनयापन के आवश्यक संसाधन उपलब्घ कराने की जिम्मेदारी ले.

अहं संवेदनाओं को कुचलता आया है. अहं के टकराव की समस्या प्लेटो के समय में भी रही होगी. इसलिए वह समाधान भी देता है. समाधान उसके इस विश्वास से जन्म लेता है कि मनुष्य मूलतः अच्छा प्राणी होता है. प्लेटो के अनुसार व्यक्ति का सामान्य मनोविज्ञान यह है कि वह व्यक्ति-विशेष अथवा कुछ व्यक्तियों के अप्रसन्न रहने की इच्छा तो कर सकता है, किंतु दुनिया के अधिकांश लोगों के अप्रसन्न होने की चाहत व्यक्ति के सामान्य मनोविज्ञान के विरुद्ध है. इसलिए ऊपर के उदाहरण में दूसरे व्यक्ति की इच्छा जो दुनिया-भर के लोगों के प्रसन्न होने की कामना करता है, पहले व्यक्ति, जो केवल किसी खास देश, धर्म अथवा संस्कृति को सबसे आगे निकलते देखने की इच्छा रखता है, पर मनोवैज्ञानिक दबाव बना सकती है. इच्छाओं के सार्वजनिक प्रकटीकरण के अवसर पर वह अपने अहं को आहत महसूस कर सकता है. यह उसको अपनी राष्ट्रभावना के विरुद्ध भी लग सकता है. इसके बावजूद सार्वजनिक रूप में उसको दूसरे व्यक्ति की भावनाओं का सम्मान करना पड़ेगा. सच यह भी है कि व्यवहार में निरपेक्ष आदर्श जैसा कुछ हो ही नहीं सकता. व्यक्ति की अभिप्रेरणाएं उसकी रुचियों, स्वभाव, सोच और परिस्थितियों द्वारा संचालित होती हैं. नीत्शे के महामानव की संकल्पना ईसाई परंपरा में संत की अवधारणा से एकदम भिन्न है. उसके बावजूद नीत्शे पर यह आरोप नहीं लगाया जा सकता कि इस संकल्पना के पीछे उसका कोई स्वार्थ था. सच तो यह है कि समाज की बेहतरी के लिए ईसाई परंपरा में संत जो काम करते हैं, विचारक के नाते नीत्शे ने महामानव की संकल्पना उसी कोटि की है. इसलिए नीत्शे के विचारों की आलोचना की जा सकती है, किंतु उसकी नीयत पर संदेह करना अथवा उसे निरंकुश राज्य का समर्थक मानना—सर्वथा अनुचित होगा. अज्ञानता के कारण ही सही प्राचीन भारत और विश्व में पशुबलि को मानवकल्याण के लिए जरूरी माना जाता रहा है. भारत में जब बौद्ध धर्म का उदय हुआ तो बुद्ध ने न केवल पशुबलि का जोरदार विरोध किया था, बल्कि आत्मा और परमात्मा जैसे विषयों पर चर्चा को भी अनावश्यक माना था. जबकि श्रमण परंपरा को छोड़कर बुद्ध से पहले का लगभग पूरा का पूरा भारतीय दर्शन उन्हीं विषयों पर केंद्रित था. चूंकि बौद्ध दर्शन वृहद जनसमाज के हितों का पक्ष लेता था तथा पशुबलि का निषेध लोगों के आर्थिक-सामाजिक विकास से भी जुड़ा था, इसलिए ऐसे लोगों ने बौद्ध धर्म को हाथों-हाथ अपनाया जो पिछली व्यवस्था में अभाव और उत्पीड़न झेलते आए थे. बौद्ध धर्म अपेक्षाकृत समानता पर जोर देता था. उनके प्रभाव के चलते समाज में जातीय वैमनस्य में कमी आई थी. उसके फलस्वरूप सामाजिक असंतोष भी घटा था.

प्लेटो के अनुसार इच्छाओं का पूर्ण सामान्यीकरण असंभव है. दो इच्छाओं के बीच चयन उस समय संभव नहीं है, जब तक व्यक्ति का किसी एक इच्छा की ओर विशेष झुकाव न हो. यदि उनमें से एक भी इच्छा से उसकी सहमति नहीं है तो वह उनका विरोध करेगा. इसके लिए व्यक्ति में नैतिक साहस का होना जरूरी है. जहां नैतिक सहमति-असहमति आसान न हो, वहां बल-प्रयोग की संभावना बनी ही रहती है. ‘रिपब्लिक’ में थ्रेचाइमच्स जब यह कहता है कि ‘न्याय ताकतवर के हितलाभ के सिवाय कुछ नहीं है,’ उस समय वह सुकरात सहित उन सभी साथियों से असहमति दर्शा रहा होता है, जो उसके मत के विरोध में हैं. न्याय को सबल का एकाधिकार कहने वाला थ्रेचाइमच्स अकेला व्यक्ति नहीं था. उसका मत न केवल सोफिस्ट विचारकों से प्रेरित था, बल्कि जनसाधारण के सामान्य सोच का भी प्रतिनिधित्व करता है. दुनिया में लगभग नब्बे प्रतिशत लोग आस्थावादी हैं. हर श्रद्धालु मानता है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है और वही सच्चा न्यायकर्ता भी है. भारत में धर्म को, जिसका पूरा कारोबार ईश्वर और डर पर टिका है, न्याय के रूप में थोपा जाता रहा है. इसका अर्थ यह नहीं है कि हर व्यक्ति दूसरों पर शासन करने का सपना देखता है; या अधिकांश लोग शासित होने को अपनी नियति माने रहते हैं. सच तो यह है कि सुख की कामना प्रत्येक व्यक्ति को होती है. सुख और सुरक्षा पर खतरा उसे प्रतिरोध के लिए उकसाता है. समाज को अंतर्द्वंद्वों और अनावश्यक विक्षोभों से बचाने के लिए आवश्यक है कि नागरिकों के बीच असमानता का स्तर न्यूनतम हो. उनमें यह भरोसा बना रहे कि राज्य न्याय के समर्थन और सुरक्षा में खड़ा है. इसलिए बात जब आदर्श समाज की होगी, तो लोकहित से जुड़े मुद्दों की समीक्षा की मांग भी उठेगी. सच यह भी है कि अधिकांश समाज न्याय की वस्तुनिष्ठ समीक्षा और उसकी व्याप्ति की ओर से उदासीन रहते हैं. सरकारें सत्ताधारी वर्ग के जो संख्या में अल्प हैं, हित साधने में लगी रहती हैं. इस कारण ‘न्याय’ की वस्तुनिष्ठ समीक्षा, उसकी संकल्पना पर गंभीर विमर्श संभव नहीं हो पाता. कारण यह भी है कि अधिकांश लोग न्याय के वृहत्तर संदर्भों से अपरिचित होते हैं. वे उसे किसी अदालती ‘फैसले’ के रूप में लेते हैं, जिसमें दो पक्षों के बीच तीसरा पक्ष जो घटना से पूरी तरह अनजान है, निर्णायक पक्ष की भूमिका निभाता है. तीसरा पक्ष हालांकि राज्य का प्रतिनिधित्व करता है. इसने भी न्यायविद्ों और राजनीति विज्ञानियों के लिए सदैव समस्याएं उत्पन्न की हैं. उनमें से एक बड़ी समस्या है कि ‘अच्छे’ और ‘बुरे’, ‘पाप’ और ‘पुण्य’ की तार्किक व्याख्या कैसे संभव हो? वे कौन से मानक हैं, जिनके आधार पर इनके बीच एक स्पष्ट विभाजनरेखा खींच पाना संभव है? यह समस्या प्लेटो के सामने भी थी. वह विविध स्थितियों की व्याख्या करता है, जिन्हें न्यायसंगत माना जा सकता है. बहस को प्रभावित करने के बजाय वह केवल दर्शक के रूप में मौजूद है. वह देखता है कि सुकरात जैसे विद्वान की उपस्थिति के बावजूद बहस के दौरान कोई न कोई पक्ष सदैव असंतुष्ट बना रहता है.

फिर विमर्श का समापन कहां पर हो? ‘आदर्श पसंदों’ का विचार इसी की परिणति था. ‘आदर्श पसंदों’ से उसका अभिप्राय ऐसी पसंदों से था, जिनकी अधिकांश लोग कामना करते हों. परोक्ष रूप में यह भी बहुमत की दादागिरी हुई, जिसे न्याय की दृष्टि से निरापद नहीं कहा जा सकता. लोकतंत्र को ‘बहुमत की दादागिरी’ बताकर प्रायः उसकी आलोचना की जाती है. दादागिरी या निरंकुश आचरण किसी का भी हो सकता है. राजशाही में अकसर उस व्यक्ति की दावेदारी चलती थी, जिसके हाथों में राजमुद्रा हो. धर्म को लोककल्याणकारी बताया जाता है. परंतु वह भक्त और भगवान दोनों की अतियों पर निर्भर करता है. भक्त समर्पण की उच्चतम सीमा तक समर्पित होता है. ईश्वर उच्चतम सीमा तक निरंकुश और तानाशाह, परिणामस्वरूप धर्म के नाम पर हुए धत्त्कर्म को जीवन के आदर्श की तरह थोपा जाता है. एक प्रकार से यह भी अति ही है. व्यावहारिक सोच यही है कि चयन जब ‘बहुमत की दादागिरी’ और ‘अल्पमत की दादागिरी’ के बीच हो तो न्याय को पहले के पक्ष में झुके हुए नजर आना चाहिए. आदर्शवादी प्लेटो को इस तरह का व्यावहारिक चलन नापसंद था. उसके अनुसार न्याय के लिए कोई बीच का रास्ता नहीं होता. न्याय या तो न्याय होता है, अथवा न्याय नहीं होता. उसके सामने अपने आदर्श नगर-राज्य की समृद्धि और सुरक्षा का मसला बहुत बड़ा था. लोकतंत्र की विकृतियों को वह देख-समझ सका था. इसलिए न्याय पर चर्चा करते हुए उसकी अन्यान्य स्थितियों पर चर्चा करता है तथा निर्णय पाठक के विमर्श के लिए छोड़ देता है. उसके लिए यह समीचीन भी था.

क्या न्याय को धर्म के आधार पर परिभाषित किया जा सकता है? जो समाज ईश्वर को हाजिर-नाजिर मानकर न्याय करने का दावा करते हैं, क्या उनकी वैचारिकी को आदर्श समाज की वैचारिकी के बराबर माना जा सकता है? प्लेटो इसपर विचार नहीं करता. एक सपाट-सी व्याख्या में वह कह देता है कि क्या अच्छा है और क्या बुरा—इसका निर्धारण ईश्वर करता है. इससे समस्या सुलझने के बजाय और भी उलझ जाती है. सब जानते हैं कि ईश्वर अपनी इच्छा के बारे में किसी से भी संवाद नहीं करता. उसका अपना अस्तित्व ही संद्धिग्ध है. वह अपने भक्तों के विश्वास से परे, जिसे वे अपना धर्म मानते हैं, कुछ भी नहीं है. बावजूद इसके धर्माचार्य दावा करते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति जो कथित ईश्वरेच्छा को अपनी इच्छा मान लेता है—वही सत्पुरुष है. उनके अनुसार ईश्वर परमकल्याणकर्ता है, अतएव उसकी इच्छा और कर्तव्यों को शुभ का आधार माना जा सकता है. पर ईश्वर की इच्छा जाहिर कैसे हो? यह कैसे तय हो कि ईश्वर यही चाहता है? क्या ऐसा भी रास्ता है, जिससे कथित ईश्वरेच्छा का सटीक अनुमान लगाया जा सके? दूसरे जिसे ईश्वरेच्छा होने का दावा किया जाता है, उसके प्रमाणन का सही रास्ता क्या हो? कैसे तय किया जाए कि जिसे ईश्वरेच्छा बताया जा रहा है, वही श्रेष्ठतम विकल्प है. चूंकि ऐसा कोई रास्ता व्यवहार में संभव नहीं है. ईश्वरेच्छा अपने आप में अप्रामाणिक है. इसलिए उसके अनुयायी उसे आस्था का विषय बनाकर पेश करते हैं. सच तो यह है कि जिसे ईश्वरेच्छा बताकर उसके अनुयायियों द्वारा आरोपित किया जाता है, वह वास्तव में उसके अनुयायियों की ही इच्छा होती है. धर्म और ईश्वरेच्छा के नाम पर ऐसे पाखंड पुरोहित वर्ग सहòाब्दियों से रचता आ रहा है. हो सकता है धर्मानुशासन से समाज का थोड़ा-बहुत भला होता हो. परंतु उसके माध्यम से होने वाला नुकसान उससे कहीं अधिक होता है. दरअसल ‘शुभ’, ‘अशुभ’, ‘पाप’, ‘पुण्य’ आदि अवधारणाएं व्यक्ति-सापेक्ष होती हैं. ‘वस्तुनिष्ठ सत्य’ जैसा कुछ नहीं है. हां, सीमित संदर्भों में व्यक्ति ‘सत्य’ अथवा ‘असत्य’ के बारे में अनुमान अवश्य लगा सकता है. ठीक ऐसे ही जैसे यह जान लेना कि ‘वर्फ’ सफेद है. यहां सफेद रंग वर्फ का प्रमुख लक्षण है, परंतु ‘सफेद’ कह देने-भर से वर्फ का बोध नहीं होता. बगुले का रंग भी सफेद होता है. यह संज्ञा मनुष्य की ओर से ही एक रंग विशेष के नाम की गई है. कोई व्यक्ति वर्फ के रंग का बयान कर सकता है. पर यदि कोई ऐसा व्यक्ति जिसने सफेद वर्फ कभी देखी ही न हो, वह वर्फ के रंग के बारे में दावे के साथ कोई बात नहीं कह सकता. तो भी सामान्य जानकारी में यह कहना कि वर्फ सफेद होती है, कि महात्मा गांधी की हत्या हुई थी, कि जवाहर लाल नेहरू इस देश के प्रथम प्रधानमंत्री थे, कि 1947 में भारत का विभाजन एक सच्ची ऐतिहासिक घटना है जैसी कुछ बातें हैं जो लोकसम्मति के आधार पर सच मान ली जाती हैं.

प्लेटो मानता था कि ‘शुभ’ की सत्ता है तथा उसको पहचाना जा सकता है. अपने आदर्शलोक में वह उन स्थितियों पर जोर डालता है, जिनके द्वारा मनुष्य के आचरण को नैतिक बनाए रखकर शुभ की संभावना को बढ़ाया जा सकता है. उसका मानना था कि आदर्श गणतंत्रात्मक राज्य भी अपने आप में ‘शुभ’ है. हालांकि गणतंत्र की कोई स्पष्ट परिभाषा वह नहीं देता. जिस आदर्शलोक की परिकल्पना वह ‘रिपब्लिक’ में करता है, उसमें जबरदस्त आर्थिक-सामाजिक स्तरीकरण है. निकृष्ट दासप्रथा है. सुकरातकालीन एथेंस की तीन लाख की आबादी में लगभग आधी दास और अर्धदास लोगों की थी, जिन्हें सामान्य जीवन जीने के लिए आवश्यक न्यूनतम अधिकारों से भी वंचित रखा गया था. प्लेटो की आलोचना का यह बड़ा आधार है. स्वयं प्लेटो के समय में भी उसके कई आलोचक और विरोधी थे. लेकिन प्लेटो के चिंतन का दायरा विशद है. उसकी आलोचना की जा सकती है. असहमत भी हुआ जा सकता है. स्वयं प्लेटो ने अपने साथियों के असमति के अधिकार की रक्षा की है. लेकिन उसके चिंतन को नकारा नहीं जा सकता. प्लेटो के दर्शन को लेकर थ्रेचाइमच्स की टिप्पणी सहस्राब्दियों बाद भी प्रासंगिक है. उसका कहना था—‘प्लेटो से सहमति अथवा असहमति का प्रश्न ही नहीं है. प्रश्न सिर्फ इतना है कि आप प्लेटो के आदर्शलोक की कल्पना से कितने और कहां तक सहमत हैं? यदि आप उससे सहमत हैं तो यह आपके लिए शुभ है; और यदि आप उससे असहमत हैं तो निश्चय ही यह आपके लिए बुरा है.’

कुल मिलाकर प्लेटो के दर्शन में ऐसा बहुत कुछ है, जो उससे असहमति से बावजूद बुद्धिजीवियों को प्रेरित और आकर्षित करता आया है. उसके आदर्शलोक की विशेषता यह भी है कि वह केवल बौद्धिक विमर्श और कागजों तक सीमित नहीं था, बल्कि उसकी स्थापना वास्तविक धरातल पर संभव हुई थी. उसके अनेक प्रावधान जिन्हें अव्यावहारिक माना जाता है, जैसे बच्चों को उनके माता-पिता से दूर रखकर उनकी पहचान को छिपाकर पालना-पोसना स्पार्टा से लिए गए थे. दार्शनिक सम्राट का प्रयोग भी अनेक राज्यों में आजमाया जा चुका था. अनेक सम्राट ऐसे थे जो अपने राज्यों में दार्शनिकों को उच्च स्थान पर रखते थे, यद्यपि ऐसे राज्यों की सफलता के बारे में सटीक टिप्पणी कर पाना संभव नहीं है. सही मायने में प्लेटो सबसे पहला दार्शनिक था, जिसने ऐसे समानता पर आधारित समाज का सपना देखा था. जहां संसाधनों का उपयोग संपूर्ण समाज के भले के लिए किया जाता हो. इसलिए उन सबके लिए वह आज भी सम्मानेय है, जो आमूल परिवर्तन का सपना अपनी आंखों में पाले हुए हैं.

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

9. The answer is rather humdrum. It will achieve success in wars against roughly equal populations, and it will secure a livelihood for a certain small number of people. It will almost certainly produce no art or science, because of its rigidity.-BERTRAND RUSSELL, A HISTORY OF WESTERN PHILOSOPHY, page 109.

 

स्वतंत्र देश में स्वाधीन मनस्

सामान्य
  • सच्ची स्वाधीनता का अभिप्राय है, दूसरों की समान स्वाधीनता का सम्मान करते हुए कार्य करने की संपूर्ण आजादी. मेरा मतलब कानून सम्मत अधिकारों से नहीं है. क्योंकि कभीकभी कानून भी तानाशाह की मनमर्जी का शिकार हो जाता है. उस समय वह दूसरों की स्वाधीनता का हनन करने लगता है.—थॉमस जेफरसन.

  • क्या स्वतंत्रता सिवाय इसके कि जैसा जीवन हम अपने लिए चाहते हैं, वैसा ही जीवन जीने की क्षमता के अलावा कुछ और है? कुछ भी नहीं.1एपिक्टीटस, दि डिस्कोर्स.

शुरुआत एक पहेली से करते हैं. देश स्वतंत्र है. लोग स्वतंत्र हैं. पर क्या वे स्वाधीन भी हैं? सामान्यतः हम ‘स्वतंत्रता’ और ‘स्वाधीनता’ दोनों को एक माने रहते हैं. मान लेते हैं कि इनके बीच महज शब्दों का ऐरफेर है. दोनों में से किसी भी शब्द का प्रयोग करो, मंतव्य वही रहता है. अर्थात यदि हम स्वतंत्र हैं, तो स्वाधीन भी हैं. या स्वाधीन हैं, इसलिए स्वतंत्र भी है. ‘स्वतंत्रता’ एवं ‘स्वाधीनता’ के अर्थों में घालमेल का एक कारण यह भी है कि स्वतंत्र भारत में हमने लोकतंत्र को तो अपनाया, मगर शताब्दियों तक सामंती संस्कारों में पलेढले समाज के लोकतांत्रिकरण हेतु अपेक्षित प्रयासों की ओर से मुंह मोड़े रहे. स्वतंत्रता आंदोलन के हमारे कई महानायक तो, जो कदाचित सबसे भरोसेमंद दिखाई पड़ते थे—समानता और स्वाधीनता के अधिकार तथा लोकतंत्र की आलोचना ही करते रहे. गांधी के सर्वाधिक प्रिय शिष्य विनोबा को समान मताधिकार का विचार ही विचित्र लगता था. उन्हें यह स्वीकार नहीं था कि नेहरू और उनके खानसामा दोनों का वोट एक हो. ‘गणतंत्र’ को एक स्थान पर उन्होंने ‘अवगुणतंत्र’ कहा है(गणतंत्र नहीं गुणतंत्र, लोकनीति). कथित इसलिए कि उनमें से कई गांधी के कहने पर ‘हरिजनोद्धार’ के कार्यक्रमों में हिस्सा ले चुके थे, परंतु जिस मनुस्मृति को दलित अपने गले की फांस मानते आए थे—ऋषि के राज के बहाने वे उसी का महिमामंडन करते थे(ऋषि अनुशासन, विनोबा, लोकनीति). लोकतंत्र के प्रति चलताऊ निष्ठा का नुकसान यह हुआ कि हम राज्य और नागरिक के अंतःसंबंधों को पहचानने तथा उनकी मजबूती के लिए उपयुक्त तंत्र खड़ा करने में असफल रहे. हमने लोकतंत्र को आधेअधूरे बोध के साथ, केवल इतने बोध के साथ अपनाया कि उसके माध्यम से हमारा संविधान हमें सरकार चुनने का अधिकार देता है. संविधान हमें अपनी स्वाधीनता को परिपक्व बनाने, उसके दायरे को विस्तृत करते जॉने तथा स्वतंत्रता का सहीसार्थक उपयोग करने के जो अवसर हमें देता है, उस ओर से हम प्रायः अनभिज्ञ बने रहे. भूल गए कि अच्छी नागरिक सरकार अपनी स्वतंत्रता की व्याप्ति नागरिकों में देखती है. चूंकि हम स्वयं अपनी स्वाधीनता की ओर से उदासीन रहे, इसलिए सरकार और अन्य संस्थाएं कब अपनी स्वतंत्रता का दायरा लांघकर हमारी स्वाधीनता और अधिकारों को अवरुद्ध करने लगीं, हम समझ ही नहीं पाए. इस बीच शासनप्रशासन की निरंकुशता ने जबजब हमें आहत किया, उसे लोकतंत्र की स्वाभाविक दुर्बलता मानकर हम प्रायः मौन साधे रहे.

स्वतंत्रता’ के अंग्रेजी पर्याय Freedom से किसी भी प्रकार के दासत्व से संपूर्ण मुक्ति का भाव जुड़ा है. तदनुसार स्वतंत्र वह है जो बाहरी बंधनों से सर्वथा मुक्त हो. जिसके सोच पर, कर्म पर किसी भी प्रकार का बाहरी प्रतिबंध न हो. स्वतंत्रता मनुष्य को उसके मनुष्यत्व का एहसास कराती है, इसलिए लोग उससे प्यार करते हैं. आरनेल्डो पेटरसन के अनुसार—स्वतंत्रता ऐसा मूल्य है, जिसके लिए लोग खुशीखुशी जान देने को तैयार रहते हैं….यह नेताओं का चहेता नारा, मुक्त अर्थतंत्र का धर्मनिरपेक्ष अवतार तथा हमारी समस्त सांस्कृतिक गतिविधियों का आधार है.” किसी देश के संदर्भ में स्वतंत्रता बाहरी प्रतिबंधों से पूरी तरह मुक्ति तथा संपूर्ण निर्णयाधिकार की क्षमता एवं उसकी स्वयंप्रभुता को दर्शाती है. स्वतंत्रता का इतिहास राज्य की उत्पत्ति से जुड़ा है. उसकी मांग लगभग 2600 वर्ष पहले तब शुरू हुई जब यह महसूस किया गया कि विवेकशील प्राणी होने के नाते मनुष्य अपने बारे में निर्णय करने में स्वयं सक्षम है. इस योग्यता का सम्मान करना राज्य के हित में है. इस सोच में कल्याण राज्य की अवधारणा के बीज छिपे थे, हालांकि उसे भलीभांति विकसित होने में अनेक शताब्दियां गुजर गईं. इस बीच सर्वसत्तावादी निरंतर दावा करते रहे कि सभ्यता के लंबे दौर से गुजरने के बावजूद मानव स्वभाव में जंगली जीवन की प्रवृत्तियां शेष हैं. उसके समुचित मार्गदर्शन तथा समाज में शांति एवं अनुशासन बनाए रखने के लिए शक्तिशाली राज्य की उपस्थिति अपरिहार्य है. दूसरी ओर उदारचेता विद्वान लगातार मानवमात्र की स्वाधीनता पर जोर देते रहे. इससे कल्याणकारी राज्य के विचार ने जोर पकड़ा. यह विचार भी आगे बढ़ा कि स्वाधीन व्यक्ति न केवल अपना विकास बेहतर कर सकता है, बल्कि समाज को भी अपना श्रेष्ठतम प्रदान करने में सक्षम होता है. कुछ विद्वानों के अनुसार Freedom शब्द की उत्पत्ति दासों के मुक्ति संघर्ष से जुड़ी है. लगभग ढाई हजार वर्ष पहले एथेंस में सम्राट सोलोन ने नागरिकों को अधिकार दिए जाने के लिए अपेक्षाकृत उदार नियम बनाए थे. बाद की शताब्दियों में एथेंस की प्रगति में सोलोन द्वारा लागू संविधान की बड़ी भूमिका थी. तदनंतर स्वतंत्रता की अवधारणा में अनेक बदलाव हुए हैं. नई मान्यताओं के अनुसार बिना नागरिकों की स्वाधीनता के राज्य की स्वतंत्रता अपर्याप्त मानी जाती है. इसलिए मानवाधिकार, समानता, सामाजिक न्याय आदि के माध्यम से स्वतंत्रता का लाभ जनजन तक पहुंचाने के लिए जनसमर्थन और सहभागिता पर जोर दिया जाने लगा है.

स्वतंत्रता और स्वाधीनता परस्पर पूरक हैं. स्वतंत्रता तभी पूर्ण मानी जाती है, जब शिखर पर बैठे लोग उसके अच्छेखासे हिस्से को, बगैर किसी पक्षपात के नागरिकों तक अंतरित करने लगते हैं. लोकतंत्र में निर्णयाधिकार जनता के पास होते हैं. तथापि नागरिक उसका वास्तविक लाभ तभी उठा सकते हैं, जब वे अपनी स्वाधीनता का सदुपयोग करने में सक्षम हों. दूसरों के हितों पर आंच आए बिना अपने हितों के अनुरूप उपयुक्त निर्णय लेने का नागरिक अधिकार स्वाधीनता की कोटि में आता है. इसके अंग्रेजी पर्याय के रूप में Liberty का प्रयोग किया जाता है. स्वतंत्रता राज्य से संबंधित, उसपर किसी भी प्रकार के बाहरी नियंत्रण से मुक्ति का नाम है. जबकि स्वाधीनता समाज और शासन की ओर से प्रदान की जाती है, जिसमें सत्ता की आलोचना का अधिकार भी सम्मिलित है. इतिहासकार, राजनीति विज्ञानी जॉन अक्टन के लिए वह सत्ता के वाजिब विरोध का माध्यम है. स्वाधीनता की कदाचित सबसे अच्छी परिभाषा जे. आर. ल्यूकस ने अपने ग्रंथ ‘दि प्रिंसिपल आफ दि पॉलिटिक्स’ में दी है, उसके अनुसार—‘‘स्वाधीनता का तात्विक अर्थ यह है कि विवेकशील कर्ता को जो भी सर्वोत्तम प्रतीत हो, वह वही कुछ करने में समर्थ हो तथा उसके कार्यकलाप बाहर से प्रतिबंधित न हों.’’ राष्ट्र विशेष के संबंध में स्वतंत्रता से भी यही उद्दिष्ट है. कुल मिलाकर ‘स्वतंत्रता’ विशेषत: राष्ट्र का मसला है. वही स्वतंत्रता जब आंतरिक स्तर पर विस्तरित होकर नागरिकों के सोच और व्यवहार का हिस्सा बन जाती है, तो स्वाधीनता कहलाने लगती है. इस तरह स्वाधीनता नागरिकों का अधिकार, विवेक सम्मत आचरण की संपूर्ण आजादी है. वह राज्य की उदारता एवं न्याय भावना की संकेतक है. स्वतंत्रता एवं स्वाधीनता परस्पर पूरक, सहायक और अन्योन्याश्रित पद हैं. दोनों में इतना सूक्ष्म अंतर है कि समझने में प्रायः गड़बड़ हो ही जाती है.

यह मान लेना कि स्वतंत्रता केवल राष्ट्र का विषय है, सामान्य नागरिक का उससे कोई सरोकार नहीं है, अनुचित होगा. कोई भी राष्ट्र अपने नागरिकों के सपनों तथा उनकी कर्तव्यनिष्ठा से बनता है. अरस्तु के शब्दों में कहें तो अच्छी जनता ही अच्छे शासन की जनक होती है. ऐसी जनता को बाहरी नियंत्रण में लंबे समय तक नहीं रखा जा सकता. अपने अधिकारों के प्रति चैतन्य, सतत जागरूक जनता अपने लिए स्वतंत्रता का रास्ता खोज ही लेती है. स्वाधीनता, स्वतंत्रता की अगली सीढ़ी है. उसे तभी प्राप्त किया जा सकता है, जब राज्य स्वतंत्र तथा अपने नागरिकों के प्रति उदार हो. शिखर पर आसीन लोग मानते हों कि शासन चलाने का अधिकार उन्हें जनता की ओर से प्राप्त है. वास्तविक स्वाधीनता मनुष्य को, दूसरे के स्वाधीनता क्षेत्र में अतिक्रमण को छोड़ वह सब करने की आजादी देती है, जिसे वह अपने लिए आवश्यक मानता है. भले ही उससे समाज, सत्ता, विचारधारा या स्थापित रीतिरिवाजों को चुनौती मिलती हो. स्वाधीनता की सीमा शासन की प्रवृत्ति से भी तय होती है. यह कतई आवश्यक नहीं है कि दो स्वतंत्र राज्यों की जनता को समान स्वाधीनता भी उपलब्ध हो. यह भी हो सकता है कि राज्य स्वतंत्र हो, परंतु लोग पूरी तरह स्वाधीन न हों. उदाहरण के लिए हिटलर के समय जर्मनी एक स्वतंत्र और शक्तिशाली देश था. मगर वहां की जनता नागरिक अधिकारों से वंचित थी. यहां तक कि मनुष्य के मौलिक अधिकारों पर भी डाका पड़ चुका था. चीन का उदाहरण भी हम ले सकते हैं. वह स्वतंत्र देश है. लेकिन वहां के नागरिकों को उतने निर्णयाधिकार उपलब्ध नहीं हैं, जितने भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों में प्राप्त होते हैं. इस उदहारण को आगे और भी बढ़ाया जा सकता है.

निरंकुश शासक ताकत के बल पर शासन करता है. अपनी सर्वोच्चता के प्रदर्शन के लिए वह नागरिकों के सामान्य अधिकारों का भी हरण कर लेता है. ऐसे में स्वाधीनता का आकार सिकुड़ जाता है. नागरिक अधिकार की दृष्टि से ऐसी स्वतंत्रता जिसमें नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन हो, नकारात्मक स्वतंत्रता कही जाएगी. उसमें अधिकांश अधिकार केंद्रीय शक्तियों में सिमट जाते हैं. परिणामस्वरूप नागरिकों के मूलभूत अधिकारों पर भी कटौती के बादल मंडराने लगते है. सकारात्मक या वास्तविक स्वतंत्रता वहां संभव है, जहां जनता के विवेकाधिकार बाधित न हों. लोग अपने हितों के अनुसार निर्णय लेने को स्वतंत्र हों. वहां शासन की बागडोर जनता के हाथों में होती है. अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से वह ऐसी सरकार का गठन करती है, जो न्यूनतम शासन करे. इस तरह स्वस्थ नागरिक समाजों में सरकार और नागरिक अपनीअपनी मर्यादा से आबद्ध रहकर स्वाधीनता का आनंद लेते हैं. सरकार की स्वतंत्रता वहां तक मर्यादित होती है जहां तक वह नागरिकजीवन में अनावश्यक दखलंदाजी प्रतीत न हो. वहीं नागरिक के लिए स्वाधीनता की मर्यादा, दूसरों की स्वाधीनता को अक्षुण्ण रखने तक सीमित रहती है. नागरिकगण केवल दूसरे नागरिकों की स्वाधीनता का सम्मान करके अपनी स्वाधीनता की रक्षा कर सकते हैं. दूसरे की स्वाधीनता में हस्तक्षेप करने वाला व्यक्ति अपनी स्वाधीनता के अधिकार को खो बैठता है. उस अवस्था में शांतिव्यवस्था बनाए रखने के लिए शासन को उसकी स्वाधीनता की परिसीमा में हस्तक्षेप का अधिकार मिल जाता है. कह सकते हैं कि स्वतंत्रता और स्वाधीनता परस्पर पूरक और सहायक हैं. नागरिकों की स्वाधीनता का स्तर बढ़ाने के लिए चुनी हुई सरकारें जहां न्यूनतम शासन करती हैं. वहीं एकदूसरे की स्वाधीनता का सम्मान करते हुए नागरिक सरकार और शासन को यह भरोसा दिलाते रहते हैं कि वे अपने कर्तव्य के प्रति सचेत हैं. फलस्वरूप राज्य की स्वतंत्रता नागरिकों की स्वाधीनता से अनुप्रेत होने लगती है; या यूं कहें कि स्वतंत्रता और स्वाधीनता का अंतर लुप्त होने लगता है.

स्वाधीनता और मानवाधिकार परस्पर पूरक हैं. उन्हें बिना किसी भेदभाव के नागरिकों को उपलब्ध कराने का संकल्प राज्य की उदारता को दर्शाता है. कल्याण राज्य में हर अवधारणा के केंद्र में नागरिक होता है. इसलिए वहां स्वाधीनता भी नागरिक दृष्टि से परखी जानी चाहिए, जैसे—लोग यदि स्वाधीन हैं तो कितने? परिपक्व लोकतंत्र के लिए जितनी स्वाधीनता चाहिए, क्या उतनी स्वाधीनता नागरिकों को प्राप्त है? स्वाधीनता को समझना, उसे पाने जितना ही महत्त्वपूर्ण होता है. स्वाधीनता को समझा कैसे जाए? इसपर बड़ी अच्छी बात एपिक्टीटस(55 ईस्वी—135ईस्वी) ने कही है. वह एक दास था. उसका धनवान मालिक एप्फ्रिोडिटो भी किसी जमाने में दास हुआ करता था. बाद में उसने अपने दासत्व से मुक्ति प्राप्त की और बादशाह नीरो का मंत्री बन गया. एपिक्टीटस की पढ़ने की बड़ी ललक थी. वह सुकरात और प्लेटो का प्रशंसक था; और खुद भी दार्शनिक बनना चाहता था. एपिक्टीटस की ललक देखकर उसके स्वामी ने उसे मुक्त कर दिया. बाद में उसने दास बच्चों को पढ़ाने के लिए स्कूल की स्थापना की. एपिक्टीटस का मानना था कि दासत्व का कारण संसाधन छीन लेना नहीं है, बल्कि लोगों को ज्ञान के अवसरों से वंचित कर देना है. उसका विश्वास था कि केवल शिक्षा ही व्यक्ति को भय, भ्रांति और उद्धिग्नता से मुक्ति दिला सकती है. अपने शिष्यों को संबोधित करते हुए उसने कहा था—

हमें उन अनेक लोगों की बात पर भरोसा नहीं करना चाहिए जो कहते हैं कि केवल मुक्त लोगों को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है. बजाय इसके हमें यह मानना चाहिए कि केवल शिक्षा ही हमें मुक्ति दिला सकती है.’2

स्वतंत्रता की भांति स्वाधीनता भी निःशर्त नहीं होती. प्रकटतः वह बंधनमुक्ति का पक्ष लेती है, परंतु व्यक्ति को कुछ भी करने की आजादी नहीं देती. स्वाधीनता का संपूर्ण आनंद बिना नैतिक बने असंभव है. जो नैतिक है, आत्मानुशासित है, समाज और राज्य के विधान के प्रति जिसकी निष्ठा विवेकसम्मत है, जो दूसरे के मूलभूत अधिकारों का सम्मान करता है, वही व्यक्ति स्वाधीनता का सच्चा लाभ उठा सकता है. सरकार नागरिकों की संरक्षक होती है. अतः जब तक वह अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदार है, उसकी स्वतंत्रता और अधिकारिता का सम्मान करना नागरिकों का कर्तव्य है. कहा यूं भी जा सकता है कि अच्छी सरकार और नागरिक स्वाधीनता को एकदूसरे से अलग नहीं किया जा सकता. क्योंकि जो लक्ष्य अच्छी सरकार का होता है, वही लक्ष्य स्वाधीनता का भी होता है. जैसे अच्छी सरकार स्वयं एक उपलब्धि है, वैसे ही स्वाधीनता अपने आप में परम लक्ष्य है. वह समाजीकरण की उच्चतम अवस्था है, जिसमें व्यक्ति के निजत्व को भी उतना ही सम्मान प्राप्त होता है, जितना समाज को. वह नागरिकों को उनकी पसंदों के साथ बने रहने का अधिकार ही नहीं देती. बल्कि वे सभी अवसर प्रदान करती है, जिनसे वे उस सभी कार्यों को कर सकें जिन्हें अपने लिए आवश्यक मानते हैं. वह मनुष्य को अपने, समाज और देश; फिर दुनिया के हित में अपना अधिकतम योगदान देने के लिए आवश्यक अवसर उपलब्ध कराती है. स्वाधीनता को दैविक कहकर किसी भी हालत में टाला नहीं जा सकता. ना ही उसमें कटौती की जा सकती है. वह मनुष्य का जीवनसिद्ध अधिकार है. इसलिए वह नैतिक लक्ष्य न होकर समाजीकरण की उच्चतम अवस्था है.

रूसो ने कहा था कि सभी मनुष्य आजाद जन्मते हैं. बेड़ियां समाज उन्हें पहनाता है. स्वाधीनता इस विकृति का निस्तार है. वह मनुष्य को निर्बंधता का एहसास कराती है. पराधीनता मानव समाज के लिए कलंक है. वह महज राजनीतिकसामाजिक अवस्था है, जो व्यक्ति और समाज के बीच किसी न किसी प्रकार की सत्ता को ले आती है. स्वाधीनता प्राकृतिक जीवन के निकट होती है. इसलिए वह मनुष्य को अधिकतम आज़ादी का एहसास करने में सक्षम होती है. वह मनुष्यों को परस्पर निकट लाकर, मनुष्यता में विश्वास करना सिखाती है. बताती है कि सभी मनुष्य श्रेष्ठ हैं. अपने सर्वोत्तम की अभिव्यक्ति, उसको अपने तथा शेष समाज के लाभ के लिए प्रयुक्त करने का अधिकार प्रत्येक को है. अधिकांश लोग अपनी ऊर्जा दूसरों को अनुशासित करने में खपाते रहते हैं. जबकि वह दुष्कर कार्य है. स्वाधीन समाज में सच्चा नागरिक धर्म स्वयं को अनुशासित रखना है. खुद पर अनुशासन दूसरों को अनुशासित करने से आसान होता है. शासन का कार्य नागरिकों को अनुशासित करना नहीं, ऐसे वातावरण का निर्माण करना है, जिसमें नागरिकगण आत्मानुशासन हेतु स्वत: अनुप्रेत हों. उसके लिए सार्वजनिक जीवन में राज्य की न्यूनतम भूमिका अपरिहार्य है. किसी ने कहा है कि कोई भी प्रजाति, समूह या मनुष्य अनुशासन की दृष्टि से अयोग्य नहीं होता. जबकि शासन करने के लिए सभी अनफिट होते हैं. अक्टन के शब्दों में—

‘‘बीजगणित की कोई भी प्रमेय इससे ज्यादा स्वयंसिद्ध नहीं है कि जिन लोगों के हाथों में जितनी ताकत होती है, वे उतने ही अधिक अपराध करते हैं.’’ उसके अनुसार—‘‘शक्ति का अतिरेक आदमी को पत्थर दिल बनाता है, विवेक का हरण करता है और विचारधारा को कलुषित करता है.’’3

स्वाधीनता का इतिहास स्वंतंत्रता के इतिहास से बहुत पुराना है. स्वतंत्रता का इतिहास सामान्यतः राज्यों की स्थापना के बाद आरंभ होता है. जब राज्य नहीं था, तब भी मनुष्य स्वाधीन था. लेकिन तब उसके चर्या में स्थायित्व नहीं था. यायावर जीवन में हर दिन नई चुनौती से जूझना पड़ता था. जिसके लिए वह हर रोज नई योजना बनाता था. दूसरी ओर स्वाधीनता का इतिहास मनुष्य की विकास की चाहत से जुड़ा है. अपनी पुस्तक ‘ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ लिबर्टी’ में डेविड शेमिड्ज और जेसन ब्रेनन स्वाधीनता के इतिहास को 40000 वर्ष पहले तक ले जाते हैं. उस समय मनुष्य को हिम युग से बाहर आए कुछ ही समय हुआ था. जीवन संघर्षभरा था. उसे न केवल विषम प्राकृतिक हालातों से चुनौती थी, बल्कि अपने भीतर पैठे भय और दूसरे मानवसमूहों से भी जूझना पड़ता था. उसके पीछे कहीं न कहीं स्वयं को स्वाधीन बनाने की चाहत थी. लेखकद्वय के अनुसार स्वाधीनता प्रत्येक युग में द्वंद्वात्मकता का शिकार रही है. जनतांत्रिक समझ के अभाव में लोगों के लिए उसके मायने भी अलगअलग रहे हैं. ताकतवर ज्यादा आजादी इसलिए चाहता है, ताकि वह और ताकत जुटा सके. इसके लिए वह अपनी शक्ति और संसाधनों का दुरुपयोग करता है. गरीब सोचता है कि आजाद होने पर वह अपने श्रम का उपयोग अपने लिए कर, दरिद्रता से मुक्ति पा सकेगा. मगर उसकी सीमाएं हैं. न्यूनतम स्वाधीनता प्राप्त करने के लिए उसके पास सिवाय देह के कुछ नहीं होता. उसका उपयोग वह जीविकोपार्जन से इतर कर ही नहीं पाता. अपनी स्वाधीनता के लिए उसे शक्तिशाली वर्गों तथा सरकार पर आश्रित रहना पड़ता है. सरकार का दायित्व है कि न्याय भावना का पालन करे हुए नागरिक स्वाधीनता के उच्चतम स्तर को बनाए रखे. सामाजिक शांति और समरसता के लिए यह आवश्यक है. मनुष्य सामाजिक प्राणी है. मगर समाज के साथ वह आत्मनिर्भर होकर रहना चाहता है. दूसरों पर बोझ बनकर नहीं. प्रत्येक युग में कभी समूह की मदद से तो कभी अकेले ही, आत्मनिर्भर बनने की चाहत मनुष्य के लिए देरसवेर मुक्तिप्रदाता बनी है. आत्मनिर्भरता का आशय यह नहीं है कि मनुष्य अपनी जरूरत की हर वस्तु का उत्पादन स्वयं करे. जरूरतों का आदानप्रदान भी आत्मनिर्भरता के स्तर को दर्शाता है. प्रस्तरकालीन मानव प्रजातियां अपनी पूर्वज प्रजातियों के मुकाबले इसलिए जीवित रह सकीं, क्योंकि उन्होंने दूसरे मानवसमूहों से तालमेल तथा वस्तुओं के आदानप्रदान की योग्यता प्राप्त कर ली थी. एकदूसरे की जरूरतों का सम्मान करते हुए उन्होंने प्रकृति के अनेक झंझावात पार किए थे. इससे जीवन में स्वाधीनता की उपयोगिता को समझा जा सकता है.

स्वतंत्रता आमतौर पर राजनीतिक और विधिमान्य होती है. वह जब नागरिकों के व्यवहार में रचबस जाती है और राष्ट्र मान लेता है कि उसके नागरिक स्वतंत्रता को आत्मसात् कर चुके हैं, तो वह अपने विशेषाधिकारों में धीरेधीरे कटौती करने लगता है. नागरिक उसका उपयोग दूसरों की स्वाधीनता का सम्मान करते हुए करते हैं. इस तरह स्वाधीनता केवल स्वतंत्र राष्ट्र में संभव होती है. उस समय संभव होती है जब राज्य नागरिकों के जीवन में अपनी भूमिका को सीमित कर लेता है. जब यही भाव नागरिकों के मन में समा जाता है तो वे दूसरों के निणर्याधिकार का सम्मान करते हुए खुद को सामाजिक की मर्यादा में बांध लेते हैं. इससे समाज को अनुशासित करने में लगने वाली ऊर्जा बचने लगती है. यानी स्वाधीनता का अभिप्राय दूसरों की इच्छा और अधिकारों का मान रखते हुए अपने विकास का मार्ग सुनिश्चित करने में है. जबकि स्वतंत्रता का अभिप्राय राज्य द्वारा बिना किसी प्रतिबंध के निर्णय लेने के अधिकार से है.

स्वाधीनता और स्वतंत्रता के अलावा एक प्यारासा शब्द और भी है—स्वच्छंदता! मुक्त नीलांचल में पक्षियों को उड़ान भरते या जंगल में हिरनों को कुलांचे मारते देख कई बार हम उनसे इर्ष्या करने लगते हैं. काश! हम भी वैसी ही स्वछंद उड़ान भर पाते. न आज की चिंता न आने वाले कल का भय—जंगल के मुक्त प्राणियों जैसा निर्बंध जीवन, काश! हमारा भी होता. यथार्थ में यह संभव नहीं है. पूर्ण स्वच्छंदता केवल कल्पना की वस्तु है. समाज का गठन ही कुछ मर्यादाओं के साथ होता है. जबकि स्वच्छंदता मर्यादाविहीन होती है. इसलिए जहां सभ्यता है, वहां स्वच्छंदता ज्यादा देर नहीं टिक सकती. दूसरे स्वच्छंदता प्रायः अल्पजीवी होती है. उसका जीवन लंबा नहीं होता. क्योंकि प्रत्येक की स्वच्छंदता, प्रकारांतर में प्रत्येक की निरंकुशता को न्योंता देती है. हरिण को लगता है कि उसे जंगल में मुक्त कुलांच भरने की स्वच्छंदता है, तो भेड़िया कहेगा कि मेरी स्वच्छंदता किसी का भी भक्षण कर, अपनी भूख मिटाने की है. यदि चिड़िया आसमान में मुक्त उड़ान को अपनी स्वच्छंदता मानती है, तो बाज अपनी स्वच्छंदता के नाम पर कहीं भी, किसी भी निरीह पक्षी पर झपट्टा मारने को अपनी स्वच्छंदता मानेगा. दोनों अपनेअपने सामर्थ्य और इच्छाशक्ति से अनुशासित हैं. इसके अलावा कोई नियम उनके बीच काम नहीं करता. जैसे ही सामर्थ्य की टकराहट होती है, भेड़िया के सामने मेमना और बाज के आगे चिड़िया को पस्त होना ही पड़ता है. इस अत्याचार के लिए न तो भेड़िया को दोषी माना जा सकता है, न ही बाज को. स्वच्छंद वातावरण में नियम जरूरतों और महत्त्वाकांक्षाओं से बनते हैं. सामर्थ्य के दुरुपयोग को रोकने का वहां कोई नियम नहीं होता. ऐसी स्वच्छंदता सभ्य समाज के लिए वरेण्य नहीं है. स्वाधीनता जहां बहुमान्य नियमों से अनुशासित होती है, वहीं स्वच्छंदता में सभी अपनेअपने नियम के अनुसार जीते हैं. स्वच्छंद समाज में यदि कोई नियम होता है तो यही कि वहां कोई नियम नहीं होता. सभ्य समाज नागरिकों की सहमति से स्वच्छंदता के अतिरिक्त हिस्से पर कैंची चलाकर उसे स्वाधीनता तक सीमित कर देता है. तय कर देता है कि उनमें से हरेक की स्वाधीनता, दूसरे की स्वाधीनता की हद पर समाप्त होगी.

स्वाधीनता चूंकि नागरिक का विषय है, अतएव उसका आनंद उठाने के लिए नागरिकों को स्वयं पहल करनी पड़ती है. राज्य खुद को अधिकतम उदार उनकी मदद कर सकता है. ऐसे वातावरण का निर्माण कर सकता है, जिसमें लोग अपनी स्वाधीनता का अधिकतम लाभ उठा सकें. स्वाधीनता की एक कसौटी विकास में सभी की समान सहभागिता है. लेकिन विकास को पूरी तरह समझना आसान नहीं. वह जटिल प्रक्रिया है, जिसकी व्याप्ति अनेकायामी होती है. नागरिक विशेष के संबंध में वह भ्रामक अवधारणा है. शरीर में कूबड़ भी निकल आए और वह लगातार बढ़ता जाए तब उसका भी विकास होता है, ऐसा हमारे डाक्टर और समाजविज्ञानी दोनों मानते हैं. लेकिन जब हम किसी देश के संदर्भ में इस शब्द को लेते हैं तो उसका अर्थ सामान्यतः प्रगति के पर्याय के रूप में होता है. प्रगति सामान्यत: एकदैशिक होती है. विकास की चर्चा करते समय उसके साथ जुड़े नकारात्मक एवं अनैच्छिक पहलुओं को कुछ देर के लिए नजरंदाज कर दिया जाता है. किसी स्वतंत्र देश के लिए विकास उसकी स्वतंत्रता का विस्तार होता है. इसलिए उसे आंकने का पैमाना यह होना चाहिए कि विकास ने लोगों की स्वाधीनता की अनुभूति का गाढ़ा करने में कितनी तरक्की है. या उस देश के नागरिकों के बीच न्याय के समविभाजन में वह कितना सफल सिद्ध हुआ है. समाज में नागरिकों की रुचियों, जरूरतों और कार्यक्षमताओं में अंतर होता है. इसलिए सभी नागरिक विकास योजनाओं का समान लाभ नहीं उठा सकते. हालांकि उचित यही है कि वह सभी के लिए सामान रूप से लाभदायक हो. व्यवहार में यह संभव नहीं है. अच्छी से अच्छी योजना कुछ लोंगों के लिए हानिप्रद हो सकती है. उन हालात में सरकार से अपेक्षा की जाती है कि वह ऐसे लोगों के नुकसान की भरपाई के लिए वैकल्पिक कार्यक्रम बनाए, ताकि कल्याण के विभाजन में समानता बनी रहे. नागरिकों द्वारा अपनी और दूसरों की स्वाधीनता का सम्मान करने के लिए ऐसे विश्वास का होना आवश्यक है.

स्वाधीनता का रास्ता हमेशा सरल नहीं होता. बावजूद इसके कि कल्याण राज्य की अवधारणा मानवमात्र के लिए अधिकतम स्वाधीनता के विचार पर टिकी है, सभ्यताकरण की कोशिश में मानवीय स्वाधीनता पर निरंतर हमले होते रहे हैं. मनुष्य ने खेती करना सीखा. एक जगह टिककर खेती करतेकरते एक समय ऐसा आया जब समाज के संसाधन मुट्ठीभर आदमियों के हाथों में सिमट गए और बाकी लोक उनकी इच्छा के अनुसार कार्य करने को विवश हो गए. धीरेधीरे भूमि और अन्य संसाधनों पर कब्जा जमाकर एक वर्ग दूसरे वर्ग का मालिक बन बैठा. खुद को सर्वेसर्वा बताकर वह लोगों से मन चाहा काम लेने लगा. जनसाधारण का जीवन संघर्ष और त्रासदियों से भरा था. सो सबसे पहले धर्माचार्य मदद के लिए आगे आया. संघर्ष से थकेहारे लोगों का आवाह्न करते हुए उसने कहा—‘तुम मुझे दान दो. मैं तुम्हें संघर्ष से सदा के लिए मुक्ति दिलाऊंगा.’ लोग दान देने लगे. हालात ज्यों की त्यों रहे. परेशान लोग धर्माचार्य से मुक्ति के बारे में पूछते तो उसका एक ही जवाब होता—‘मसीहा का इंतजार करो. अपनी संतान को संकट में देखकर वह मदद के जरूर आगे आएगा.’ लोगों ने इंतजार किया. कुछ दिनों बाद लोगों की निराशा बढ़ने लगी. तब तलवार लिए एक व्यक्ति आगे आया, बोला—‘मैं तुम्हारा राजा हूं. तुम मुझे कर दो. मैं तुम्हें दुश्मनों से बचाऊंगा.’ लोगों ने उसे कर देना शुरू कर दिया. थोड़े दिन बाद सैनिक ने पुरोहित से दोस्ती कर ली. प्रजा वैसी की वैसी ही रही. फिर एक दिन एक और व्यक्ति आया, ‘मैं व्यापारी हूं. तुम मेरे लिए काम करो. मैं तुम्हें सारे कष्टों से मुक्ति दिलाऊंगा.’ हताश लोगों ने दिल और दिमाग दोनों व्यापारी के यहां गिरवी रख दिए. बाद में पुरोहित, राजा और व्यापारी एक साथ मिल गए. पुरोहित राजा और व्यापारी के भले के लिए पूजा करने लगा. राजा व्यापारी के धन की देखभाली में जुट गया. और व्यापारी उसका व्यापार दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा था. राजा उसके धन की रखवाली करता, पुरोहित उसके लिए हवा बनाने का काम करता. जनता उन तीनों की गुलाम बनकर रह गई.

कहानी से पता चलता है कि दिमाग की गुलामी देह की गुलामी से चार कदम आगे चलकर आती है. मनुष्य पहले मानसिक रूप में दास बनता है, बाद में दैहिक रूप में. ऊपर के उदाहरण में मनुष्य के समक्ष एक के बाद एक स्थितियां जन्म लेती हैं. हर बार उसके विवेक पर कोई और कब्ज़ा करता चला जाता है. सभ्यता का इतिहास साक्षी है कि लोगों ने पहले अपनी निर्णयप्रक्रिया दूसरों को समर्पित की. दूसरों के फैसलों पर पूरी तरह आश्रित होने के बाद शरीर को उससे आजाद रख पाना असंभव था. परिणाम यह हुआ कि समाज स्वामी और दास में बदल गया. एक व्यक्ति अनेक व्यक्तियों के दिलोदिमाग पर कब्जा, लोगों को अपना दास बना, उनसे काम लेने लगा. फिर उसी को व्यवस्था मान लिया गया. मुट्ठी भर लोगों द्वारा बहुसंख्यक की चेतना पर सवार हो जाने की नीति थी. आगे चलकर दास वर्ग में चेतना का प्रवाह हुआ. वह समझने लगा कि कोई मसीहा उसकी मदद को नहीं आने वाला. न कोई व्यापारी उसका कल्याण करेगा. उसे अपनी सुरक्षा, अपना कल्याण, अपनी मदद स्वयं करनी होगी. तदनंतर वह वर्ग अपनी मुक्ति के लिए एकजुट होने लगा. सतत संघर्ष से उसे सफलता भी मिली. स्वतंत्रता की मूल अवधारणा यही है. स्वतंत्रता का मूलभूत अर्थ इसी चेतना के सुफल है. उसका आशय राज्य की स्वायत्तता से है. ऐसा राज्य जो अपनी इच्छाओं के आधार पर संचालित हो. लेकिन ऐसी स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है जो केवल राज्य के स्तर पर सीमित हो. जब तक नागरिक जीवन में स्वतंत्रता की संपूर्ण व्याप्ति नहीं है, तब तक उसकी कोई उपयोगिता नहीं है.

स्वतंत्रता लोकचेतना का विस्तार है. कह सकते हैं कि स्वतंत्रता एवं स्वाधीनता दोनों सापेक्षिक अवस्थाएं हैं. संदर्भ बदलते ही उनके अर्थ भी बदल जाते हैं. हिटलर का जर्मनी तथा मुसोलिनी का इटली दोनों स्वतंत्र देश थे. उनकी किसी बाहरी शक्ति का दबाव नहीं था. परंतु उन देशों की प्रजा स्वाधीन नहीं थी. आशय है कि नागरिकों की स्वाधीनता राज्य की मर्जी पर टिकी होती है. राज्य यदि अपने नागरिकों के प्रति संवेदनशील है. उनकी भावनाओं का सम्मान करता है, तो वह उनके सतत प्रबोधीकरण पर भी जोर देता है. लेकिन राज्य यदि कट्टर हो तो नागरिकों के सामान्य अधिकार भी संकट में पड़ जाते हैं. केवल राज्य व्यक्ति की स्वाधीनता को बाधित नहीं करता. अपनीअपनी तरह से बाज़ार और धर्म भी इस काम को करते हैं. चूँकि वैधानिक अधिकार राज्य के पास होते हैं. धर्म और बाज़ार को नागरिकों की स्वाधीनता में सीधे हस्तक्षेप का अधिकार नहीं होता, इसलिए वे चतुराई से काम लेते हैं. वे तरहतरह के प्रलोभनों द्वारा लोगों का ध्यान इस तरह से भटकाने में लगे रहते हैं. जिससे वे स्वाधीनता के भ्रम और वास्तविकता स्वाधीनता में अंतर नहीं कर पाते. जैसे कुछ लोग फैशन को ही आधुनिकता माने रहते हैं, वैसे ही वे नकली स्वाधीनता को वास्तविक मान कर भ्रम में जीते चले जाते हैं. जिन लोगों का विवेक दूसरों के पास गिरबी हो उनके लिए स्वाधीन होना, न होना बेमानी हो जाता है.

स्वधीनता नागरिक का विवेकाधिकार है. कानून जनता के भले के लिए बनाए जाते हैं. उसके लिए जरूरी है कि सबका भला हो. उनसे यदि एक भी व्यक्ति को नुकसान पहुंचता है, तो वह अधूरा माना जाएगा. अत: अधिकतम लोगों को अधिकतम सुख को ध्यान में रखकर कानून बनाने के साथसाथ आवश्यक है कि जो नागरिक अधिकतम की सीमा में नहीं आ पाए हैं, उनकी भी उपेक्षा न हो. इसके अभाव में स्वतंत्रता और स्वाधीनता दोनों ही का दुरुपयोग माना जाएगा. स्वाधीनता के विस्तार के लिए ऐसे अनेक काम हैं जिन्हें सरकार कर सकती है. करना चाहिए. इसी के लिए जनता उसे जिम्मेदारी सौंपती है. मगर यह कार्य जनता और नागरिकों के मध्य संवाद द्वारा होना चाहिए. यदि सरकार यह दावा करती है कि वह जनता की शिक्षक है, इस कारण लोगों की राय को बदलने का उसे अधिकार है तो समझ लीजिए कि उसकी निष्ठा लोकतंत्र में न होकर, निरंकुश शासन में है. इसलिए लोकतंत्र का पहरुआ बनने के लिए सरकार को जनता का शिक्षक बनने का भ्रम छोड़ देना चाहिए.

लोकतंत्र पर यह आरोप लगाया जाता है कि वह अनेक लोगों की निरंकुशता है. यह आरोप प्राय: वही लोग लगाते हैं जो लोकतंत्र पर भरोसा नहीं करते या उसको ढंग से समझ ही नहीं पाते. ऐसे लोगों से आप कोई उदाहरण पेश करने को कहिए. फिर ध्यानपूर्वक उस उदाहरण का विश्लेषण करने की कोशिश कीजिए. कुछ ही देर में सच सामने आ जाएगा. जिसे वे लोग बहुसंख्यक की तानाशाही कहते हैं, असल में वहां बहुसंख्यक के नाम पर कुछ लोगों की मनमानी वाली सरकार होगी. निर्वाचन प्रक्रिया में उलटफेर कर धोखा देकर आए लोग. जो लोग लोकतंत्र को समझते हैं; और वह जनता जो लोकतंत्र का महत्त्व जानती है, वह न तो तानाशाह हो सकती है, न ही तानाशाही को पाल सकती है. इसलिए कि अल्पसंख्यक समूह द्वारा बहुसंख्यक समूह का दमन लज्जाजनक है. लेकिन बहुसंख्यक द्वारा अल्पसंख्यक का दमन घृणित कार्य है.

स्वतंत्रता और स्वाधीनता के सूक्ष्म अंतर को यदि स्वीकार लिया जाए तो 1857 के जनविद्रोह को क्या कहना उचित रहेगा—‘स्वाधीनता संग्राम’ या ‘स्वतंत्रता संग्राम’? फैसला एकदम साफ है. जिन आंदोलनों में जनता की प्रत्यक्ष या परोक्ष भागीदारी हो, वहां स्वतंत्रता और स्वाधीनता को एकदूसरे से अलग नहीं किया जा सकता. अधिकतम स्वाधीनता के लिए अपना शासनतंत्र जिसपर जनता का नियंत्रण हो, होना आवश्यक है. 1857 की क्रांति के मूल में मुख्यतः सैनिक विद्रोह की भूमिका को रेखांकित किया जाता है, जिसे क्रांति में ढालने की जमीन किसानों, मजदूरों और शिल्पकार वर्ग के असंतोष ने तैयार की थी. उसकी तात्कालिक परिणति के पीछे सैनिकों की धार्मिक भावनाओं का प्रस्फुटन था. कारतूसों में गाय और चर्बी प्रयुक्त किए जाने की अपवाह से भारतीय सैनिक नाराज थे. मेरठ की बैरक से निकलकर जैसे ही विद्रोह की सूचना देश के बाकी हिस्सों तक पहुंची, उसमें आम नागरिकों की सहभागिता भी बढ़ती गई. लोग अंग्रेजों को खदेड़ कर अपनों का शासन चाहते थे. बाद में अंग्रेजों के हाथों सत्ता गंवा चुके चंद राजा और नबाव भी उनके साथ मिल गए. उनका असली मकसद अपनी खोई सत्ता हासिल करना था. दूसरी ओर आम जनता अपना मानसम्मान वापस पाने तथा स्वाधीनता की चाहत के साथ, स्वतंत्रता सेनानियों की मदद के लिए उतरी थी.

लंबे संघर्ष के उपरांत देश को 15 अगस्त 1947 को बाहरी शासन से मुक्ति मिली. तय किया गया कि देश में जनता का अपना शासन होगा. एक तरह से जनता के संघर्ष का समापन सुखद एवं फलदायी था. तब से आज तक, लगभग सात दशक लंबी विकास यात्रा पर गर्व करने के लिए पर्याप्त कारण हमारे पास हैं. स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार से भारतीय मनुष्य की औसत आयु आजादी के समय के औसत 32 वर्ष से बढ़कर 66 वर्ष हो चुकी है. अनाज, दुग्ध, सीमेंट, लोहा आदि के उत्पादन में यह देश आत्मनिर्भर है. देश की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा युवा है. इन सब उपलब्धियों पर हम अपनी पीठ थपथपा सकते हैं. मगर केवल भौतिक उपलब्धियां स्वतंत्रता की जरूरत का मापदंड नहीं होतीं. मानवमन का स्वाभाविक उल्लास भी उसकी पहचान होता है. समानताधारित समाजों में वह नागरिकों के व्यक्तित्व का हिस्सा होता है. स्वतंत्रता की वीं वर्षगांठ पर विचारणीय यह है कि स्वाधीनता के जो लक्षण हमने ऊपर गिनाए हैं, क्या उनका लाभ सभी नागरिकों को समान रूप से पहुंचा है? क्या लोग स्वाधीनता और स्वतंत्रता के अंतर तथा उसके मूल्य को समझते हैं? समानता, समरसता, न्याय और समानाधिकार का जो सपना संविधान निर्माताओं ने देखा था, क्या वह पूरा हुआ है? यदि नहीं तो उसके कारण क्या है?

15 अगस्त का दिन यह याद रखने का भी है कि सत्ता का चरित्र मूलतः एक जैसा होता है. स्वयंभू बनने की चाहत प्रत्येक सत्तासीन के भीतर छिपी होती है. उसपर केवल जागरूक जनता नियंत्रण रख सकती है. जाति, धर्म, सांप्रदायिकता आदि के अनेकानेक खानों में बंटी जनता क्या इस स्थिति में है कि स्वाधीनता पर आसन्न खतरों को समझ सके? इन दिनों आतंकवाद को देश की शांति, एकता और अखंडता के बड़े खतरे के रूप में पेश किया जाता है. कदाचित वह है भी. लेकिन इस खतरे का शोर मचाकर आर्थिक वैषम्य और जातीय भेदभाव की उत्तरोत्तर चौड़ी होती खाई की ओर से हमारा ध्यान हटा दिया जाता है. चूंकि सरकार ने शासन के स्तर पर जातिआधारित भेदभाव को हटाने के लिए कुछ नहीं किया, इसलिए जातीय दंश का शिकार रही जातियां मजबूरी में जाति को अपना तारणहार समझने लगती हैं. गत दो दशकों से मतदाताओं का जितना जातिआधारित ध्रुवीकरण हुआ, उतना पहले कभी नहीं हुआ. क्या जनता इस प्रपंच को समझती है? कोई भी देश अपने नागरिकों से बनता है. यदि नागरिक अपनी स्वाधीनता पर मंडराते संकट की ओर से बेखबर हों तो समझ लेना चाहिए कि उतना ही बड़ा खतरा देश की स्वतंत्रता और अखंडता पर भी मंडरा रहा है. 2021 में भारत आजादी की 75वीं वर्षगांठ मनाएगा. तब तक इन समस्याओं का समाधान न सही, असली कारण भी हम पहचान पाए तो बड़ी उपलब्धि होगी.

© ओमप्रकाश कश्यप

शब्दानुक्रमणिका

1. in these matters we must not believe the many, who say that free persons only ought to be educated, but we should rather believe the philosophers, who say that the educated only are free. – Epictetus, The Discourses.

2. (Freedom) is the one value that many people seem prepared to die for….It is the catchword of every politician, the secular gospel of our economic, ‘free enterprise’ system, and the foundation of all our cultural activities.”-Orlando Patterson, Freedom : Freedom in the Making of Western Culture.

3. Those who have more power are liable to sin more; no theorem in geometry is more certain than this….the possession of unlimited power…corrodes the conscience, hardens the heart, and confounds the understanding…

 

विचारहीन राजनीति और परिवर्तन का स्वप्न

सामान्य

हम ऐसे दौर में हैं जब राजनीति को परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम मान लिया गया है. सदियों से दमितशोषित रहे वर्ग अपनी पहचान पाने को आकुल हैं, लोकतांत्रिक निजाम में सब अपने लिए सुरक्षित स्थान चाहते हैं. इसके लिए वे राजनीति को परिवर्तनकारी ‘टूल’ की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन उसका उपयोग कैसे किया जाए? जिन सपनों को राजनीति के माध्यम से साकार करना है, उन्हें लोकस्वीकृति कैसे दिलाई जाए? इस बारे में किसी के पास कोई स्पष्ट दिशा नहीं है. जहां दृष्टि है, वहां प्रतिबद्धता का अभाव है. नतीजा, नए वर्गों के प्रवेश तथा आशाओं, अपेक्षाओं के बावजूद राजनीति का चेहरा ज्यों का त्यों है. आरक्षण, भ्रष्टाचार, जातिवाद, क्षेत्रीयता जैसे वही पुराने घिसेपिटे मुद्दे हैं. पिछले कुछ दशकों से देश की राजनीति इन्हीं के इर्दगिर्द चकराती रहती है. ये इतने लोकलुभावन और सदाबहार हैं कि कोई दल इन्हें छोड़ना नहीं चाहता. यह मान लिया गया है कि वैचारिक राजनीति के दिन लद चुके हैं. ‘समाजवाद’, ‘साम्यवाद’, ‘गांधीवाद’ आदि को लेकर जो बहसें बीसवीं शताब्दी में सुर्खियां बना करती थींउनसे किनारा कर लिया गया है. तात्कालिकता में विश्वास ऐसा बढ़ा है कि दीर्घकालिक हित के अलोकप्रिय मुद्दों को कोई छूना तक नहीं चाहता. लोकप्रियता की राजनीति, अपनी पूरी चमकदमक, टोनोंटोटकों के साथ लगातार हमें भरमाए रखती है. संविधान पर दिए गए अपने भाषण में डॉ. अंबेडकर ने जिस सामाजिक लोकतंत्र की कामना की थी, उसे पूरी तरह भुला दिया गया है. प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में, देश की राजनीति पर आरएसएस जैसे उन जड़संस्कृतिवादी संगठनों का दबदबा है, जो तर्क के बजाय आस्था से काम लेने का प्रचार करते हैं, संस्कृति की आड़ में संप्रदाय और वर्गविरोध की राजनीति करना जिनकी फितरत है. हालांकि बहुसंख्यक वर्ग ऐसे संगठनों को पसंद नहीं करता, लेकिन वे मीडिया और दूसरे माध्यम से विभेदकारी राजनीति को गरमाए रहते हैं. धर्मसत्ता, अर्थसत्ता और राजसत्ता की तिकड़ी के समर्थन से वे प्रायः कामयाब भी होते हैं.

धर्म केंद्रित संस्कृति के अलावा जातिवाद भारतीय समाज एवं राजनीति की बड़ी विकृति है. हिंदू धर्म जातिवाद को पोषता है. जाति समाज के छोटे से हिस्से के लिए विशेषाधिकारों का गुलदस्ता है, वहीं बहुसंख्यक वर्ग के लिए अपने विवेक, पसंदों, इच्छाओं, सपनों और तर्कशक्ति को दूसरों के हाथों में सौंपकर खुद धर्म और संस्कृति की कारा को घर समझ लेने वाली स्थिति है. उसमें हालात से अनुकूलित लोग चमत्कारों की आस में जीते हैं, जबकि उन्हीं की खूनपसीने की कमाई के सहारे शिखर पर विद्यमान अभिजन शेष जनसमाज को अपने चंगुल में फंसाए रखने के लिए निरंतर बरगलाते रहते हैं. परिवर्तन की वांछाओं के दमन के लिए वे धर्म और संस्कृति को आगे कर देते हैं. जो जाति सहित अन्यान्य विभेदकारी व्यवस्थाओं का सुरक्षाकवच है. राजनीति की अपेक्षा धर्म और संस्कृति की परिवर्तनदर बहुत धीमी, आनुपातिक रूप से नगण्य होती है. अतएव राजनीति के सहारे परिवर्तन का सपना देखने वाले लोग, धर्म को अपना हथियार बनाते हैं. धर्म और सामंतवाद में कोई खास अंतर नहीं है. दोनों के अधिकांश लक्षण एकदूसरे से मिलतेजुलते हैं. दोनों ही वर्चस्ववाद को प्रश्रय देते तथा मौलिकता से घबराते हैं. अंतर केवल इतना है कि धर्म पहले दिमाग पर कब्जा करता है, फिर शरीर पर कब्जे को आसान बनाता है, जबकि सामंतवाद का प्रथम प्रहार मनुष्य के शरीर पर होता है और वहां से दिलोदिमाग को जकड़ता चला जाता है. इसलिए जो लोग धर्म को बीच में लाकर अथवा उसके सहारे से राजनीति करना चाहते हैं, वे प्रकारांतर में दैवी सत्ता के नाम पर सामंती प्रतीकों को ही थोप रहे होते हैं. ऐसे लोग या तो मूर्खता की हद तक भोले और नेतृत्व के गुणों से शून्य हो सकते हैं; अथवा अत्यंत स्वार्थी. इसलिए उनकी राजनीति भी स्वार्थपरक होती है. इसी कारण परिवर्तनकामी लोग धर्म और धार्मिक विश्वासों को राजनीति से दूर रखते हैं. उन्हें निजी विश्वासों की सीमारेखा से भीतर नहीं आने देते.

भारत जैसे देशों में जहां धर्म जीवनसंस्कृति में गहरे तक रचाबसा हो तथा मानवीय विवेक जातिपाश से बाहर आने के बजाय उसी को अपनी नियति मान बैठा हो, वहां वास्तविक परिवर्तन लंबे समय तक महज सपना बना रहता है. भारत में जाति ऐसी सचाई है जो समाज के हर पढ़ेलिखे और अनपढ़ की समझ में तुरंत और एकसमान आती है. जाति का इतिहास जितना पुराना है, लगभग उतना ही लंबा इतिहास इससे मुक्ति की छटपटाहट का भी है. बावजूद इसके यह हर समय, हर समाज में किसी न किसी न किसी रूप में विद्यमान रही है. हाल में तो यह मान लिया गया है कि जाति से एकाएक मुक्ति असंभव है. बुद्धिजीवियों का एक वर्ग तो जाति को भारतीय समाज की कड़वी हकीकत के रूप में स्वीकार कर चुका है. इसलिए वह जाति से मुक्ति के बजाय उसकी मदद से मुक्ति का सपना देखता है. जिसे समाज की विकृति माना जाता है, उसी के सहारे शताब्दियों से वंचना और उत्पीड़न का शिकार रहे वर्गों को एकजुट करने की कवायद की जा रही है. जाति के नाम पर सामाजिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने वाला दूसरा वर्ग राजनीतिज्ञों का है. उनके लिए जनसाधारण की कीमत एक अदद वोट तक सीमित होती है. उस ‘वोट’ को अपने पक्ष में करने के लिए वे तरहतरह के उपक्रम करते रहते हैं, जिनमें जाति भी एक है. धर्म और जाति के नाम पर मतदाताओं ध्रुवीकरण करना भारतीय राजनीतिज्ञों का सबसे पसंदीदा चलन है. आजादी से पहले और कुछ दशक बाद तक जातिविहीन समाज की स्थापना के लिए जो आंदोलन चले थे, समरस और वर्गहीन समाज की स्थापना का जो लक्ष्य रखा गया थाउनका अब कोई जिक्र तक नहीं करता. इसका परिणाम यह हुआ है कि आजादी के संघर्ष के दौरान प्रभाव खोने वाली जातिव्यवस्था इन दिनों पुनः अपनी केंद्रीय भूमिका है. सवाल है कि जाति को औजार बनाने का समाज को क्या लाभ पहुंचा है? क्या इससे समाज में दलित और शोषित वर्ग के मानसम्मान और सुखसमृद्धि में बढ़ोत्तरी हुई है. और यदि सुखसमृद्धि में सचमुच कुछ वृद्धि हुई तो क्या वह जाति को अस्मिता संघर्ष का औजार बनाए बिना असंभव थी?

यह ठीक है कि पिछली कुछ शताब्दियों में समाज के दलितशोषित वर्गों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में सुधार आया है. यह सुधार इतना बड़ा है जिसकी आज से सौ वर्ष पहले इसकी कल्पना तक असंभव थी. इसके साथसाथ जाति को टूल बनाकर पोषने के दुष्परिणाम भी कम सामने नहीं आए हैं. इससे जातियों के बीच ही असमानताओं के छोटेबड़े ऐसे अनेकानेक टापू बनने लगे हैं, जो समाज में दूसरे कारण से व्याप्त असमानताओं से किसी भी भांति कम नहीं हैं. हालांकि उपजातियों की संख्या घटी है. लेकिन ऐसा किसी सामाजिक सुधारभावना के चलते संभव नहीं हुआ है. बल्कि लोकतंत्र की मजबूरियों के चलते छोटेछोटे जातिसमूह परस्पर एकजुट होने लगे हैं. जो जातियां ऐसा करने में सफल हुईं, उन्हें विकास के अपेक्षाकृत अधिक अवसर भी मिले हैं. मगर जिस समाजार्थिक समानता के ध्येय से परिवर्तनकामी बुद्धिजीवियों ने जाति को एक औजार की भांति स्वीकार करना आरंभ किया था, वह भीतर ही भीतर दूसरे घाव करने लगा है. उससे अविश्वास और वर्गभेद की अलंघ्य दीवारें खड़ी होने लगी हैं.

जाति स्वयं में नकारात्मक व्यवस्था है. मनुष्य की योग्यता और रुचियों का ध्यान रखे बिना यह उसके चयन के अधिकार को बाधित करती है. यह श्रम के विभिन्न रूपों में न केवल भेद करती है, बल्कि उन्हीं के आधार पर समाज में अलंघ्य दूरियां पैदा कर देती है. इसके चलते शिखरस्थ वर्ग के प्रतिनिधियों के उत्तराधिकारी बिना किसी योग्यता के शिखर पर बने रहते हैं. जबकि निम्नस्थ वर्ग के प्रतिभाशाली प्रतिनिधियों को भी को अपनी योग्यता के सदुपयोग से वंचित कर दिया जाता है. इससे न केवल उस व्यक्ति बल्कि समाज की भी हानि होती है. वह मुट्ठीभर लोगों को जन्म के साथ ही शासकीय गुणों से संपन्न मानकर शेष जनता को शासित घोषित कर देती है. कुल मिलाकर देखा यही गया है कि लोकतंत्र में जाति लोगों को संगठित करने का औजार तो बन सकती है. बनती भी है, किंतु न्याय, समानता और समरस विकास जैसे जीवनमूल्य उसके सहारे संभव नहीं हैं. जाति सामाजिक अंतर्द्वंद्वों का बड़ा कारण है. जातीय अस्मिताओं का कड़ा संघर्ष विभिन्न जातिसमूहों को अनावश्यक स्पर्धा की ओर ले जाता है. इससे कथित जातीय पायदान के निचले स्तर पर मौजूद जातियों को, संख्या में अधिक होने के बावजूद परिवर्तनकारी शक्ति में ढालना कठिन हो जाता है.

लोकतंत्र में संख्याबल बहुत मायने रखता है. अतः उसके आधार पर खुद को निर्णायक शक्ति के रूप में ढालने में असमर्थ जातियां, ऐसे जातिसमूहों से गठजोड़ कर लेती हैं, जिनकी आर्थिकराजनीतिक ताकत अपेक्षाकृत अधिक है. हड़बड़ाहट में वे ऐसे दलों के समर्थन में उतर आती हैं, जिनपर सवर्णों का वर्चस्व है तथा जिनका न्याय, समानता, वर्गहीन समाज, विकास में साझेदारी जैसे मूल्यों पर कोई विश्वास नहीं है. जो जाति जैसी क्रूरतम और विभेदकारी संस्था को बनाने तथा उसे निरंतर पालनेपोसने के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार हैं. इससे उनकी समस्त जातीय चेतना निर्णायक शक्ति बनने के बजाय वर्चस्ववादी शक्तियों की पिछलग्गू बनकर रह जाती है. संवैधानिक व्यवस्था, सामाजिक आंदोलन के प्रभाव अथवा अन्यान्य परिस्थितियों के चलते भी, गैर सवर्ण नेता प्रायः संसद और विधायिकाओं में प्रवेश करते रहते हैं. किंतु अपने संस्कार, आत्मविश्वास की कमी, विशिष्ट मतदाता वर्ग की संसाधनों के लिए वर्चस्वकारी वर्गों पर निर्भरता तथा दलीय राजनीति के चलते वे विधायिकाओं में सार्थक भूमिका निभाने में असमर्थ रहते हैं. लोकतंत्र में संख्याबल का महत्त्व होता है, किंतु सदैव वही निर्णायक हो, यह आवश्यक नहीं है. बहुमत की आवश्यकता संसद में भी पड़ती है, जहां लोग दलीय आधार पर बंटे हो सकते हैं. कुल मिलाकर राजनीति में गैर सवर्णों के लिए सम्मानजनक अवसरों की कमी पहले भी थी. इन दिनों भी वे हाशिये पर हैं. वे राष्ट्रवाद को स्वतंत्रता, समानता और सामंजस्य जैसे आधुनिक जीवनमूल्यों पर खतरे के रूप में देखते हैं. जबकि यथास्थितिवादी परिवर्तन की वांछाओं को कुचलने के लिए सामदामदंडभेद यानी हर तरह के उपाय आजमा रहे हैं. सांस्कृतिकरण के बहाने वे भारत की पुरानी वर्णाश्रमी व्यवस्था को नए रूप में लौटाना चाहते हैं. इसके लिए हिंसा भी उनके लिए वज्र्य नहीं है. पिछले कुछ वर्षों में जातीय झगड़ों में जिस तेजी से इजाफा हुआ है और गैर सवर्णों पर हमले बढ़े हैं, उससे मामले की गंभीरता को समझा जा सकता है.

जाति विचारहीन राजनीति को बढ़ावा देने वाले कारकों में प्रमुख है. वह विकास पर प्रतिकूल असर डालती है. थोपी गई जाति के प्रति मनुष्य का समर्पण दूसरी थोपी गई चीजों के प्रति अनुकूलन पैदा करता है. जैसे पिछले कुछ दशकों में तमाम कड़वे अनुभवों के बावजूद यह धारणा बन चुकी है कि विदेशी पूंजी होगी, तब विकास होगा. इसके चलते अंदरूनी संसाधनों के सदुपयोग से किनारा कर लिया गया है. जबकि सभी जानते हैं कि विदेशी पूंजी अतिरिक्त लाभ की सुनिश्चितता के बगैर न तो आती है, न ही उसके अभाव में ठहरती है. इस संबंध में पूंजीपति और चूहों में अधिक अंतर नहीं होता. बाढ़ के समय जैसे चूहे घर छोड़ने वालों में अग्रणी होते हैं, वैसे ही लाभ के अवसर कम होते देख विदेशी पूंजी भी पलायन करने लगती है. इसके बावजूद 2014 का चुनाव ऐसे व्यक्ति के नेतृत्व में लड़ा गया, जो विकास को विदेशी पूंजी की अनिवार्यता से जोड़ता है. सरकार बनने के पहले बीस महीनों में करीब तीस देशों की यात्राएं, उनके इसी विश्वास की पुष्टि करती हैं. चुनावों में मतदाताओं के बीच भाजपा समर्थक मीडिया और पूंजीपतियों ने विकास का ऐसा रुपहला सपना पेश किया था कि लोग गच्चा खा गए. विकास के अलावा उन चुनावों में जो दूसरा महत्त्वपूर्ण कारक थी, वह थी जाति. भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने खुद को बारबार पिछड़े वर्ग का बताकर अतिपिछड़ी जातियों के बीच ऐसी जगह बनाई कि वे वर्ग जो कांग्रेस से उम्मीदें खोकर बसपा और सपा के बीच गैंद की तरह ठोकर खाते रहते थे, एकमुश्त भाजपा के खाते में चले गए. भूल गए कि भाजपा की नीतियां संघ के कार्यालय में बनती हैं, जिसका ‘सामाजिक न्याय’ की वैचारिकी में कतई विश्वास नहीं है. वर्णाश्रम व्यवस्था आज भी उसके लिए आदर्श है.

भारतीय जनसमाज में परिवर्तन की चाहत को शिखरस्थ वर्ग अपने अस्तित्व पर संकट के रूप में देखते हैं. 2014 में सत्ता परिवर्तन के बाद उनके हौसले बुलंद हुए हैं. केंद्र में अपनी सरकार है, ऐसा मानकर वे आक्रामक मुद्रा अपनाए हुए हैं. सामाजिक यथास्थिति बनाए रखने तथा परिवर्तन की इच्छाओं के दमन के लिए संस्कृति और राजनीति दोनों स्तर पर प्रयत्न किए जा रहे हैं. उनकी आक्रामकता देख परिवर्तन की चाहत रखने वाले वर्गों में यह विश्वास आम हो चला है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नारा समानता, स्वतंत्रता तथा समरसता जैसे आधुनिक जीवनमूल्यों के परिवर्तनकारी उष्मा के क्षरण हेतु उछाला गया है. उसके पीछे वे लोग हैं जो वर्णव्यवस्था का लाभ उठाकर शताब्दियों से सत्तासुख भोगते आए हैं; और निहित स्वार्थ के लिए उसे बनाए रखना चाहते हैं. इसलिए भाजपा और उसके सहयोगी दल जब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का राग अलापना आरंभ करते हैं, तो उन वर्गों के जो राजनीति को परिवर्तनकारी औजार के रूप में इस्तेमाल करने के पक्ष में हैंकान खड़े हो जाते हैं.

जातिव्यवस्था के प्रति यथास्थितिवादी दृष्टिकोण तथा विकास को लेकर दिशाहीनता केवल भाजपाई राजनीति का लक्षण नहीं है. परिवर्तन का संकल्प लेकर उतरने वाले सभी दलों की कमोबेश यही हालत है. 130 वर्ष पुरानी कांग्रेस स्वयं को देश के स्वाधीनता संग्राम से जोड़ती है. उस समय वह भूल जाती है कि स्वतंत्रता मिलने के साथ ही गांधी ने कांग्रेस को भंग करने की सिफारिश की थी. तब जवाहरलाल नेहरू सहित बाकी कांग्रेसी नेता, जो स्वतंत्रता संग्राम में दिए गए योगदान का मानदेय सत्ता की सीढि़यां चढ़कर प्राप्त करना चाहते थे, उसके लिए तैयार नहीं थे. आरंभ में कांग्रेस स्वयं देश के अभिजनों की पार्टी थी. उसमें बदलाव गांधीजी के नेतृत्व के दौरान आया. स्वयं गांधीजी वर्णाश्रम धर्म को श्रेष्ठ मानते थे. उनकी ओर से ‘प्रथम सत्याग्रही’ के गौरव से नवाजे गए विनोबा आम मताधिकार के सख्त विरोधी थे. नेहरू और उनके खानसामा दोनों का एक ही वोट हो, यह सुनकर उन्हें बड़ा अजीब लगता था. कांग्रेस के अधिकांश नेता भी तथाकथित ऊंची जातियों से आए थे, जो गैर सवर्णों के शोषणउत्पीड़न का शिकार थे. आगे भी कांग्रेस का चरित्र छदम् सेकुलरवादी और छद्म समानतावादी बना रहा.

राजनीति की सफलता लोकहित में किए गए प्रयासों से आंकी जाती है. इस बात से आंकी जाती है कि न्याय को सामाजिक लक्ष्य बनाने के लिए उसने कितने कारगर प्रयास किए हैं. इस आधार पर शासन के लक्ष्यों दो वर्गों में बांटा जा सकता है. लघु आयामी, तथा दीर्घ आयामी. लघु आयामी लक्ष्य आमजन की दैनंदिन की समस्याओं, शांतिव्यस्वस्था और अनुशासन से जुड़ा होता है. यह सुनिश्चित करने से होता है कि लोककल्याण के लिए बनाई गई योजनाओं का कार्यावन नियमानुसार हो रहा है अथवा नहीं. इसके लिए सरकार कुछ नागरिक संस्थाओं का गठन करती है; और स्वयं मुख्य कार्यकारी संस्था की भूमिका निभाती है. उसका दायित्व लोगों की रोजमर्रा की सुविधाओं का ध्यान रखा जाता है. दीर्घायामी योजनाओं का निर्माण और कार्यान्वन इस बात पर निर्भर करता है, कि हम कैसा समाज चाहते हैं? उसके लिए संसाधनों की उपलब्धता, नागरिकों की अपेक्षा, बाहरी दबावों आदि को ध्यान में रखकर योजनाएं बनाई जाती हैं. देश और समाज के दूरगामी हितों को देखते हुए विकास के लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं. लोकप्रिय राजनीति आज, अभी और स्थानीयता के बूते पनपती है. उनमें दीर्घायामी योजनाएं बनाने तथा उनका सफल संचालन हेतु आवश्यक धैर्य का अभाव होता है. जबकि लोकतंत्र में नागरिकों की अपेक्षाओं पर खरा उतरना सरकार की जिम्मेदारी होती है. इसे हम उनका कर्तव्य भी मान सकते हैं.

भारतीय राजनीति की विडंबना है कि यहां नेतागण लोकप्रिय राजनीति की सीढि़यां चढ़कर शिखर तक पहुंचते हैं. लोग उनसे उम्मीद करते हैं. शायद सबसे ज्यादा उम्मीद करते हैं. बावजूद इसके राजनेताओं के बारे में आम राय अच्छी नहीं है. साफ है कि लोग नेताओं को इसलिए चुनते हैं क्योंकि उनके पास दूसरा कोई विकल्प नहीं होता. जनता की इस मजबूरी का लाभ नेतागण अपनी तरह से उठाते हैं. वे सपना देखते हैं कि जनता उनकी अंधसमर्थक बनी रहे. लोग उन्हें हमेशा अपने कंधों पर उठाए रखें. हालात उन दिनों की याद दिलाते हैं, जब राजशाही के दौर में कोई महत्त्वाकांक्षी सरदार या सामंत अपने नेतृत्व में सेना जुटाकर एकाध किला फतह कर लेता था. चूंकि उसके पास नया करने को कुछ नहीं होता था, इसलिए अपने आका की नएपन की चाहत को पूरा करने के लिए उसके चारणवृंद प्रशस्तिगायन के ऐसे आयोजन रचते रहते थे, जिनका जनता के विकास से कोई संबंध नहीं होता था. गणतंत्र में नीतियां लोगों के सपनों और जरूरतों के आधार पर बदलती हैं. लेकिन यहां बदलाव की कोई गुंजाइश नजर नहीं आती. चारों ओर विचारहीनता का आलम है. बस किसी तरह सत्ता प्राप्त कर लेना चाहते हैं. चूंकि परिवर्तनकारी सत्ता का स्वरूप कैसा हो, इसका खाका किसी के भी पास नहीं है, इसलिए वंचित समूह के प्रतिनिधि सत्ता में आते ही इसकी चकाचौंध में खो जाते हैं. उस समय उन्हें वह लक्ष्य बिलकुल याद नहीं रहता, जिसका वायदा कर वे सत्ता में आए हैं.

राजनीति के शिखर पर भले ही कुछ लोगों का अधिकार हो. पीढ़ीदरपीढ़ी सत्ता भोगने के बाद अब वे इसके अभ्यस्त हो चुके हों, फिर भी यह मान लिया गया है कि राजनीति अब इलीट कर्म नहीं रही. कम से कम वैसी तो नहीं जैसी पहले थी. यदि पिछले बीसतीस वर्षों के इतिहास की पड़ताल ही कर ली जाए तो इस दौरान उन क्षेत्रों के लोगों ने राजनीति में अपनी जगह पुख्ता की है, जो पहले इससे बहिष्कृत थे. हां, सक्रिय राजनीति में आने के बाद उनका तेज अवश्य घटा है. राजनीति का अतिरेक भी दिखाई पड़ता है. पहले जो काम सामाजिक संगठनों की मदद से हो जाते थे, अब उनके लिए भी राजनीति करनी पड़ती है. इसलिए गलीमुहल्लों में छुटभइये नेताओं की पूछ बनी रहती है. अवसर का लाभ उठाते हुए सामाजिक संगठन भी राजनीति से संपर्क बढ़ा रहे हैं. राजनीतिकरण का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा है, उन दमितशोषितों पर जो सदियों से उत्पीड़न और उपेक्षा का शिकार थे. लोकतांत्रिक अवसरों का लाभ उठाकर अब वे सत्ता के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं. वे सत्ता में हिस्सेदारी चाहते हैं.

आधुनिक राजनीति मोटे तौर पर दो लोकप्रिय मुहावरों के आसपास घूमती है. विकास और भ्रष्टाचार. बाजार का जादू लोगों के सिर पर इतना चढ़कर बोल रहा है कि लोग दन से विकास की मंजिलें पार कर लेना चाहते हैं. विकास का स्वरूप कैसा हो, उसके लिए संसाधन कैसे जुटाए जाएंगे, यह कोई विचार नहीं करता. विकास हो, चाहे उधार से, या बाहर की पूंजी से. ‘जब तक जियो, सुख से जियो. कर्ज लेकर भी घी पियो.’जैसी भौतिकवादी विचारधारा के लिए चार्वाक पंथियों की खिल्ली उड़ाई जाती है. हालांकि संभावना इसी बात की है कि यह उक्ति चार्वाकपंथियों की आलोचना में, उनपर कटाक्ष करने की नीयत से गढ़ी गई हो. जो हो संस्कृति और सभ्यता के बीच चौड़ी खाई के चलते यह भुला दिया गया है कि विकास के मायने क्या हैं? इस बारे में कोई स्पष्ट सोच लोगों के पास नहीं है. यदि पिछले दोतीन दशकों के बारे में सोचा जाए तो लोगों के पास संसाधनों की रेलपेल हुई है. टेलीविजन, मोबाइल, इंटरनेट ने दुनिया को एक कर दिया है. इनकी पहुंच से देश का कोई कोना, कोई घर नहीं बचा है. ध्यान करें, इन्हें विकास के प्रतीक के तौर पर ही परोसा गया था. जिन दिनों संचार क्रांति का गुब्बारा फूलने लगा था, उन दिनों उसका गुणगान किया जा रहा था. लेकिन आज उसकी पैठ केवल फेसबुक, वाटअप, ईमेल और चैटिंग तक सिमट गई है. इन संसाधनों ने लोगों का प्रबोधीकरण किया हो, उनका मानसिक स्तर ऊपर उठा हो यह बात इनका बड़े से बड़ा समर्थक भी कह सकता. फिर भी विकास और भ्रष्टाचार इतने बड़े मुद्दे हैं कि इनके सहारे सत्ता की अदलाबदली आसानी से की जा सकती है.

भ्रष्टाचार की परिभाषा अपने आप में सुस्पष्ट नहीं है. कमाई के अवैधानिक तरीकों को भ्रष्टाचार कहा जाता है. लेकिन यह परिभाषा केवल सरकारी निकायों तक सीमित है. निजी संस्थानों में अवैधानिक कमाई पर या तो ध्यान नहीं दिया जाता अथवा वित्तीय अनियमितता कहकर उनका प्रभाव हल्का कर दिया जाता है. लेकिन लोकप्रिय राजनीति में भ्रष्टाचार भी बड़ा मुद्दा है. इतना बड़ा कि इसी को आधार बनाकर पिछले चुनावों में दिल्ली में आम ने 15 वर्षों से जमीजमाई कांग्रेस पार्टी को किनारे होने को मजबूर कर दिया. करीब सवा सौ वर्ष पुरानी पार्टी आज सत्ता में वापसी के लिए हांफ रही है. केंद्र में यह काम भाजपा के द्वारा हुआ. भ्रष्टाचार के साथसाथ विकास को मुद्दा बनाकर उसने दस वर्षों की जमी कांग्रेस सरकार को पटखनी दी. कांग्रेस को लगी चोट इतनी गहरी थी कि वह संसद में विपक्षी नेता का पद पाने में नाकाम रही. हाल में संपन्न हुआ बिहार का चुनाव भी विकास और जातिवाद के बीच फंसा था.

हमारी सरकारें भ्रष्टाचारभ्रष्टाचार इसलिए चिल्लाती हैं क्योंकि इससे वे प्रकारांतर में वे उन्हीं लोगों को कठघरे में खड़ा करने में कामयाब हो जाती हैं, जिनके सहयोग से वे सत्ता में पहुंचती हैं. क्या विकास और भ्रष्टाचार अलगअलग मुद्दे हैं? दिखने में दोनों परस्पर विपरीत नजर आते हैं. मगर असल में दोनों एक ही सिक्के के पहलू हैं. सरकारों की कमी है कि वे भ्रष्टाचार को आर्थिक अपराध मानकर विचार करती हैं. जबकि वह नैतिक मसला भी है. जब कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार करता है तो वह आर्थिक अपराध से पहले नैतिक पराभव का शिकार होता है. वह मान लेता है कि सुख और सुविधाएं बटोरने का एकमात्र माध्यम धन है. सेवाओं के आदानप्रदान में यदि धन का हस्तक्षेप कम कर दिया जाए तो भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई जा सकती है. वह सिक्का विचारहीनता का है. राजनीति में विचार न होने के कारण दोनों मुद्दे अकस्मात प्रभावी हो जाते हैं. हैरानी यह है कि दोनों ही मुद्दे आधुनिक विकासवादी अवधारणा की देन हैं. समस्या विचार के हाशिये पर पहुंच जाने की है.

विकास अपने आप में भ्रामक अवधारणा है. आवश्यक नहीं कि उसका असर मनुष्य और समाज के लिए सदैव सकारात्मक ही हो. परिवर्तन की दिशा जो भी हो, विकास की दिशा उसी ओर होती है. ‘कुविकास’ या ‘अविकास’ जैसी कोई अवधारणा नहीं है. शरीर में यदि कूबड़ निकल आए तो वह भी विकास माना जाएगा. इसलिए अर्थक्षेत्र के पुरोधा इस भ्रामक अवधारणा को अपने और व्यापार के बीच में नहीं आने देते. इसके बजाए वे ‘प्रगति’ पर ध्यान देते हैं, जो वांछित दिशा में सप्रयास प्रयत्नों की उन्नति को दर्शाती है. कहा जा सकता है कि समाज ‘जटिल’ संरचना है. सरकार जो विकास योजनाएं बनाती है, उनका एक छोर जनता में उनकी स्वीकार्यता और संसाधनों की उपलब्धता आदि पर भी पड़ता है. पूंजीपति जिस तरह अपने श्रमिकों और अन्य कर्मचारियों से काम लेता है, सरकार वैसा नहीं कर सकती. इसलिए सामाजिक प्रगति को मापने के लिए कोई मीटर नहीं बनाया जा सकता. क्योंकि नागरिकगण न तो जड़ पदार्थ हैं, न ही मशीन कि उनसे जब, जैसा चाहे काम लिया जा सके. वे परंपरा और संस्कृति से भी प्रभावित होते हैं. अपने अधिकांश निर्णय परंपरा और संस्कृति को केंद्र में रखकर ही लेते हैं. ऊपर से प्रकृति भी अपना खेल खेलती है. इसके अलावा जनसंख्या वृद्धि जैसे कारण, जिनसे विकास योजनाओं पर प्रतिकूल दबाव बना रहता है. इस कारण सरकार द्वारा आरंभ की गई योजनाओं के ठीक वही परिणाम नहीं निकलते जिन्हें ध्यान में रखकर उन्हें बनाया और लागू किया जाता है.

सरकारी तर्क अपनी जगह सही हो सकते हैं. लेकिन एक तरह से तो यह सरकार द्वारा अपनी ही जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की कोशिश कही जाएगी. दरअसल सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है. प्रायः सभी योजनाओं के मूल में सामाजिक विकास की भावना निहित होती है. एक उदाहरण लेते हैंमान लेते हैं एक पूंजीवादी उद्यम को शीतल पेय बनाने के लिए सरकार लाइसेंस देती है. उस समय उस उद्यम के पास अगले पांच से दस वर्ष तक अनुमानित प्रगति की रिपोर्ट होती है. लागू करने के बाद प्रायः हर वर्ष या त्रैमासिक आधार पर उसकी समीक्षा की जाती है. अपने आंकड़ों को लेकर कंपनी आश्वस्त होती है. कोई गड़बड़ न हो इसके लिए उनका निरंतर अवलोकनपुनरावलोकन किया जाता है. अनुमानित आंकड़े परियोजना प्रस्ताव का हिस्सा होते हैं, जिनकी एक प्रति, समयसमय पर प्रकाशित होने वाली प्रगति रिपोर्ट के अलावा सरकार को भी सौंपी जाती है.

कोई भी कारखाना केवल मशीनों के बल पर नहीं चलता. उसके लिए तकनीशियनों और कामगारों की जरूरत भी पड़ती है. जो जनता के बीच से ही आते हैं. सामान्य नागरिकों की भांति वे भी परंपरा, संस्कृति और प्राकृतिक कारणों से प्रभावित होते हैं. उद्योग की परियोजना के समय इन सबका ध्यान भी रखा जाता है. कारखाना मालिक इस सबको ध्यान में रखकर ही अपनी अपनी प्रगति रिपोर्ट परिकल्पित करता है. सरकार ऐसा क्यों नहीं कर सकती? कहा जा सकता है कि सरकार, कल्याणकारी उपक्रम है. उसका ध्येय मुनाफा कमाना नहीं है. सरकार का यह सोच प्रकारांतर में पूंजीपति को निष्प्राण यंत्र की भांति उपयोग करने की अनुमति दे देता है. सरकार विकास को प्रगति के पर्याय के रूप में पेश करती है. लेकिन वह उस अनिश्चितता और दुष्परिणामों के बारे में नहीं बताती, जो विकास के साथ स्वाभाविक रूप से जुड़े होते हैं. उदाहरण के लिए शीतल पेय का कारखाना लगाने से पारिस्थिकीय संबंधी संकट पैदा हो सकते हैं. उसके लिए भूजल का भारी मात्रा में दोहन करना पड़ता है. इससे जलस्तर में तीव्र गिरावट आती है. कारखाना मालिक अपनी प्रगति रिपोर्ट तो सार्वजनिक करता है, सरकार भी उसके आंकड़ों को उपयुक्त स्थान पर दर्शाती है, लेकिन कारखाने के कारण जो परिस्थितिकीय एवं पर्यावरण संबंधी संकट उस क्षेत्र में पैदा हो रहे हैं, उसपर न कारखाना मालिक ध्यान देता है, न ही सरकार. जबकि इसके लिए सरकार के पास पूरा अमला होता है. समयसमय पर वे अपनी रिपोर्ट भी देते हैं. लेकिन वह सार्वजनिक नहीं की जाती. सरकार विकास के साथ जुड़े उन नकारात्मक प्रभावों के अध्ययन से भी बच जाती है, जो बिना सोचेसमझे आरंभ की गई अनेकानेक योजनाओं से स्वाभाविक रूप से जुड़े होते हैं.

एक अन्य उदाहरण सिगरेट के कारखाने का लिया जा सकता है. सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, सरकार इसे लेकर निरंतर प्रचार करती है. हर वर्ष करोड़ों रुपये के विज्ञापन इसके प्रचारप्रसार पर खर्च किए जाते हैं. लेकिन सिगरेट के कारखाने को अनुमति देते समय सरकार की दृष्टि मुट्ठीभर रोजगार और रिवेन्यु पर केंद्रित रहती है. सिगरेट का कारखाना लोगों के स्वास्थ्य, सामाजिक जीवन और परिस्थितिकी पर क्या प्रभाव डालता है, सरकार उसकी ओर से मुंह मोड़े रहती है. हम इस बात पर गर्व करते हैं कि प्रवासी भारतीय विदेशी मुद्रा का बड़ा स्रोत हैं. प्रवासी भारतीयों ने अपने आपको सिद्ध भी किया है. पिछले वर्ष उन्होंने 72 अरब डालर की पूंजी मनीआर्डर के माध्यम से भारत में भेजी, जो दुनिया में सबसे अधिक है. मगर इसका दूसरा पहलू भी है. वह यह कि हम अपने आला दर्जे के दिमाग निर्यात कर देते हैं और दोयम दर्जे की प्रतिभाओं से काम चलाते हैं. देश की सत्ता अव्वल दर्जे के धूर्त राजनीतिज्ञों के हाथों में तथा कामकाज दोयम दर्जे की प्रतिभा के हाथों में रह जाता है.

विकास को लेकर वर्तमान सरकार और उसके मुखिया अनेकानेक अंतर्विरोधों के शिकार हैं. उनके अंतर्विरोध उनकी विचारधारा की देन हैं जो सांस्कृतिक वर्चस्ववाद को अपना अभीष्ट मानती है. युवावस्था में संघ की विचारधारा को समर्पित कर देने, फिर कई दशकों तक उसके साथ जीने के क्रम में वे उसे पूरी तरह आत्मसात् कर चुके हैं. इसलिए जो राजनीति वे इन दिनों कर रहे हैं, वह खुद भी अंतर्विरोधों से भरी है. वे भारत का नवोन्मेष चाहते हैं. इसके लिए ‘डिजिटल इंडिया’, ‘मेक इन इंडिया’, ‘अतुल्य भारत’ जैसे नारे उनके नेतृत्व में गढ़े गए हैं. वे चाहते हैं कि देश ज्ञानविज्ञान के क्षेत्र में आगे जाए. इसके लिए वे अमेरिका, रूस, फ्रांस, आस्ट्रेलिया, यानी जहां से भी नवीनतम प्रौद्योगिकी खरीदने के प्रयास में हैं. दूसरी ओर ज्ञान और विज्ञान के क्षेत्र में ऐसे व्यक्तियों को महत्त्वपूर्ण पदों पर बिठाया गया है, जो भारत को लेकर किसी न किसी किस्म के ‘नास्टेल्जिया’ के शिकार हैं और अपनी शक्ति या संसाधनों का उपयोग उस नास्टेल्जिया को साकार करने में लगाना चाहते हैं. इस कारण वे आरएसएस जो विशुद्ध जातिवादी संगठन है, के भी करीब हैं. बारहवीं पास स्मृति ईरानी को भारत सरकार के मानव संसाधन जैसा महत्त्वपूर्ण मंत्रालय सौंप देना, दीनानाथ बत्रा को एनसीईआटी, पी. सुदर्शन राव को भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद का प्रमुख(राव साहब पद पर वेतन की व्यवस्था न होने के कारण इस्तीफा दे चुके हैं) बना देते हैं, जिसका संबंध भारतीय समाज के विवेकीकरण से कम है. ये अंतर्विरोध तभी तक अंतर्विरोध कहे जा सकते हैं जब तक हम उनके बारे में लोकतांत्रिकसमानतावादी समाज की, जैसा भारतीय संविधान में संकल्पित है, विचार करते हैं. इसलिए संघ के नेताओं को संविधान से ही शिकायत है. अवसर मिलते की वे संविधान को ही बदल देना चाहते हैं. हालांकि इसकी संभावना न्यूनतम है.

यह अच्छी बात है कि हमारे प्रधानमंत्री समयसमय पर लोगों से संवाद करते हैं. अपने ‘मन की बात’ उन तक पहुंचाते हैं. लेकिन विकास के संदर्भ में देखा जाए तो वे सर्वाधिक संशयमना प्रधानमंत्री लगते हैं. संशय लंबा है. इसके बने रहने का मुख्य कारण यह भी है कि वे स्वयं उसके बारे में अनजान हैं. यह शायद उनकी प्रवृत्ति है. उनका मिजाज प्रचारक का रहा है. प्रचारक की विशेषता होती है कि वह अपने विचारों को दूसरों तक पहुंचाने को उत्सुक रहता है. कुशल सेल्समेन की भांति वह अपने उत्पाद की खूबियों को ग्राहक के सामने रखता है. उत्पाद की कमजोरियां क्या हैं, इसपर वह अधिक ध्यान नहीं देता. कई बार तो जानकर भी वह अनजान बना रहता है. यह उसके पेशे की मांग भी है. इसलिए उसकी सबसे अच्छी भूमिका तब होती है, जब वह अपने ‘प्राडक्ट’ के बारे में ग्राहकों से संवाद कर रहा होता है. सवाल है कि जिस विचारधारा के वे प्रचारक है, वैसे प्रचारक तो उनकी पार्टी के पास और भी बहुत हैं. फिर मोदी जी में ऐसा क्या है? इस सचाई के बारे में संभवतः मोदी जी भी अनजान हैं.

दरअसल भारत की जाति केंद्रित राजनीति में आरएसएस और भाजपा की विचारधारा का प्रचार करते, करते वे स्वयं कब ब्रांड मान लिए गए, इस बात से संभवतः वे स्वयं भी अनजान हैं. गुजरात के दंगों के दौरान उनकी छवि कटटर हिंदुत्ववादी नेता की बनी. लेकिन आम चुनावों में सफलता के लिए कट्टर हिंदुत्ववादी होना कारगर नहीं था. भारतीय राजनीति की यह विशेषता है कि यहां कट्टरता सीधेसीधे कामयाब नहीं हो सकती. भारतीय मतदाता को कट्टरता स्वीकार ही नहीं है. यहां अटलविहारी बाजपेयी को कामयाबी तब मिलती है जब वे उग्र हिंदूवाद चोला उतारकर समन्वयवादी का मुखौटा पहन लेते हैं. प्रधानमंत्री बनने के इच्छुक लालकृष्ण अडवाणी नाकाम होते हैं, क्योंकि रथयात्रा के दौरान उन्होंने अपनी छवि उग्र हिंदुवादी की गढ़ ली थी. अयोध्या में मस्जिद के अवशेषों को गिराने का दाग उनपर लगा था. आगे चलकर इस दाग को मिटाने के लिए उन्होंने पाकिस्तान जाकर जिन्ना की मजार पर चादर चढ़ाकर इस दाग को मिटाने की कोशिश की. बस यहीं आरएसएस की निगाह में वे खलनायक मान लिए गए. इसलिए ऐसे चेहरे की तलाश की जाने लगी, जो संघ की विचारधारा का आंख मूंदकर समर्थन करता हो. दाग मोदी पर भी था. गुजरात दंगों का. लेकिन उनके मातृसंगठन के लिए यह उनकी विशेषता थी.

आरएसएस की निगाह में ‘ब्रांड’ मोदी का पिछड़ा होना उनकी बड़ी खूबी थी. इसलिए चुनावों के दौरान कई मिथक उस ब्रांड के साथ जोड़े गए. पहला मिथक विकास का था. मंदी की शिकार अर्थव्यवस्था में भारत का युवा चमत्कार की उम्मीद पाले हुए था. विकास का नारा उसे एक उम्मीद में बदल देता था. लेकिन केवल विकास के नाम पर बहुमत का जुगाड़ असंभव था. इसलिए कि कांग्रेस विकास के नाम पर ही राजनीति कर रही थी. उसके पास मनमोहन सिंह जैसा नेता था, जिसे आर्थिक सुधारों का सबसे बड़ा नक्काश माना जाता है. इसलिए विकास के साथसाथ मोदी जी के पिछड़े वर्ग से संबंधित होने ने उन्हें भारतीय राजनीति में स्वीकार्य चेहरा बना दिया. अपनी कुशल सेल्समेनी के बल पर मोदीजी अपनी छबि बनाने में कामयाब भी रहे.

कारपोरेट घरानों से निकटता, मीडिया के समर्पण, धार्मिक कट्टरपंथ, जातिवाद सांप्रदायिकता और पूंजीवाद के साथ मिलकर उन्होंने ऐसा कोलाज रचा कि धर्म और कट्टर राष्ट्रवाद को आसानी से खपा लिया गया. पूंजीवाद के नेतृत्व में धर्म, संस्कृति और राजनीति का ऐसा कोलाज शायद ही किसी और देश में रचा गया हो. धार्मिक धु्रवीकरण और पूंजीवादी संस्थाओं से अपनी निजता के आधार पर मोदी जी ने इतनी लोकप्रियता बटोरी कि केंद्रीय चुनावों में सफलता के लिए अपने चुनावी राजनीति के तहत हर प्रयोग को दोहरा चुकी भाजपा के लिए वाजपेयी के बाद नरेंद्र मोदी सबसे उपयुक्त उम्मीदवार सिद्ध हुए. उन्हें सबसे उपयुक्त और प्रभावी नेता मान लिए गए. राजनीति में ‘मोदीत्व’ को अपरिहार्य मानते हुए संघ की ओर से पार्टी के जमेजमाए नेताओं, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गज भी किनारे करते देर नहीं लगी. चालीस वर्षों तक संघ के प्रचारक रहे मोदी को अपना उम्मीदवार बनाते देर नहीं की. और मोदी जी ने भी अपनी इस तरह मार्किटिंग की कि पूरा का पूरा विपक्ष भौंचक्का रह गया. जाति और वर्ग के धु्रवीकरण के बीच में उलझी भारतीय राजनीति इस तरह के मुखौटे का होना, संघ की नजरों में समय की मांग थी.

मुखौटे की विशेषता होती है कि वह अवसर विशेष के लिए बनाया जाता है. काम निकलते ही वह बोझ लगने लगता है. तो जिन लोगों ने मोदी जी को अपना नेता माना है, और उन्हें लोकतंत्रात्मक शक्तियां प्रदान की हैं, उनकी संस्कृति ऐसी नहीं है कि एक शूद्र को सत्ता सौंपकर उसके अधीन काम कर सकें. वे मनु महाराज को अपना आराध्य मानने वाले और शंबूक की हत्या करनेवाले लोग हैं. मोदी जी को प्रधानमंत्री बनाने का एक ही उनका मकसद है, येनकेनप्रकारेण वर्चस्वकारी संस्कृति को आगे बढ़ाना. जिन लोगों की दूरदर्शन धारावाहिकों में रुचि है, वे आसानी परख सकते हैं. हर सीरियल में हनुमान चालीसा का पाठ हो तो सेंसर बोर्ड अपने आंख, नाक और कान सब बंद कर लेता है. पिछले दिनों एक अच्छी बात अवश्य हुई है. विदेशी पूंजी की तरफ से निराश होकर सरकार ने नव उद्यमियों के प्रोत्साहन हेतु ‘स्टार्टअप’ योजना लागू करना. यदि ढंग से, इस देश की जनशक्ति में विश्वास करते हुए इस योजना का कार्यान्वन किया जाए तो गिरती अर्थव्यवस्था के दौर में चमत्कारी सिद्ध हो सकती है. प्रधानमंत्री यदि कुछ दिनों के लिए विदेशयात्राओं का मोह छोड़कर इसी योजना को आगे बढ़ाने के लिए काम करें तो विकास को सही मायने में ‘प्रगति’ से जोड़ा जा सकता है. लेकिन इसके लिए उन्हें अपने उन नेताओं पर नकेल कसनी होगी जो सांप्रदायिकता की राजनीति करते हैं, जाति के नाम पर लोगों को भड़काते हैं और किसी न किसी बहाने देश को एक हजारबारह सौ वर्ष पीछे ढकेल देना चाहते हैं. वे ऐसा करेंगे या कर पाएंगे, इसकी संभावना बहुत कम है.

© ओमप्रकाश कश्यप

न्याय, न्याय की परंपरा और समाज : दो

सामान्य

सोशल कांट्रेक्ट (सामाजिक संविदा) की अवधारणा

न्याय के संदर्भ में हॉब्स के विचारों को हम प्राचीन धर्माधारित विधानों तथा आधुनिक गणतांत्रिक राजनीतिक दर्शन के संधिस्थल के रूप में भी देख सकते हैं. हॉब्स ने परिवर्ती विचारकों की पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया. ‘सामाजिक संविदा’(सोशल कांट्रेक्ट) का उसका विचार जान लॉक, रूसो, डेविड ह्यूम, इमानुएल कांट, जैरमी बैंथम आदि के राजनीतिक दर्शन की पृष्ठभूमि बना. अपने युगांतरकारी लेखन द्वारा उसने परंपरा एवं आधुनिकता के बीच तालमेल स्थापित करने की कोशिश की. फलस्वरूप न्यायव्यवस्था जो पहले नियतिवादी थी, उसे मानवीय स्वतंत्रता, समानता एवं अधिकारिता के संदर्भ में देखापरखा जाने लगा. वह बड़ा परिवर्तन था, जिससे आधुनिक गणतांत्रिक राज्यों की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ. ध्यातव्य है कि ‘सामाजिक संविदा’ यानी सामाजिक करारनामे का विचार हॉब्स की मौलिक स्थापना नहीं थी. इसके बीजतत्व भारतीय चिंतन परंपरा सहित प्लेटो और अरस्तु के दर्शन में पहले से ही मौजूद थे. सभी ने नागरिक, समाज और राज्य के मध्य सामंजस्य बनाए रखने पर जोर दिया था. यहां तक कि राजा की नियुक्ति भी निःशर्त न थी. उसके पीछे सामाजिक सोद्देश्यता और करार की भावना आरंभ से ही जुड़ी थी. आरंभिक समाजों में राजा मनोनीत किया जाता था. उसका प्रथम कर्तव्य होता था, प्रजा हित को अपना हित समझकर कार्य करना. अथर्ववेद में कहा गया है—

प्रजा के सुख में ही राजा का सुख निहित है। प्रजा के कल्याण में ही राजा का कल्याण संभव है।’1

बीच में शताब्दियों लंबा दौर ऐसा भी आया जब ‘राजा’ नामक सत्ता को पूर्णतः दैवीय मान लिया गया. व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा विकसित हुई तो भौतिक संपदा की भांति राज्य को भी उत्तराधिकार में सौंपा जाने लगा. अयोग्य प्रतिनिधियों के कंधों पर शासनभार आने से राजनीति का स्तर गिरा. अनुबंध के आधार पर राजन्य की स्थापना के संबंध में प्राप्त प्राचीन उल्लेखों के अध्ययन से पता चलता है कि सभ्यता के आरंभिक दिनों में ‘राजा’ कोई विशेषाधिकार संपन्न संस्था नहीं थी. उसकी स्वीकार्यता लोगों की सहमति पर निर्भर थी. उसे वही अधिकार प्राप्त थे, जो कार्यों के निष्पादन के लिए आवश्यक माने जाते थे. उस विधान में समूह या समाज अपने निर्वाचित प्रतिनिधि से अधिक शक्तिशाली होता था. यह व्यवस्था हजारों साल तक कायम रही. इसमें बदलाव धर्म के आने के बाद उस समय सामने आया, जब राज्याश्रय में पलने वाले पुरोहितों और पंडितों ने निहित स्वार्थ के लिए राजा को पृथ्वी का स्वामी और सर्वेसर्वा घोषित करना आरंभ किया. धीरेधीरे धर्म, राजनीति और अर्थसत्ता का ऐसा गठजोड़ बनता गया, जो न केवल बुद्धि बल्कि संसाधनों के मामले में भी आगे था. उसने जनसाधारण को एकदम किनारे कर दिया. इसमें सबसे बड़ी भूमिका धर्म की रही.

राजा की नियुक्ति के संबंध में प्राचीनतम उल्लेख ऐतरेय ब्राह्मण(1/14) में मिलता है. उसके अनुसार देवताओं और राक्षसों का युद्ध चल रहा था. देवता पराजय की कगार पर थे. उस समय देवताओं ने विचार किया कि एक राजा होना चाहिए, जो उनकी सेना का नेतृत्व कर सके. तब ‘इंद्र’ को देवसम्राट मनोनीत किया गया. इस कहानी के अनुसार राजा नामक संस्था की उत्पत्ति सैन्य उद्देश्य से हुई. इससे मिलतीजुलती कहानी आगे चलकर ‘तैत्तीरीय उपनिषद’ में मिलती है. तदनुसार देवासुर संग्राम में पराजय सम्मुख देख देवताओं ने मदद के लिए प्रजापति से प्रार्थना की. तब उन्होंने प्रसन्न होकर अपने पुत्र इंद्र को देवताओं की मदद के लिए भेजा. प्रजापति के अनुसार, ‘इंद्र अपेक्षित कार्य के निष्पादन हेतु सर्वाधिक सक्षम, शक्तिशाली, स्वस्थ, सर्वोत्तम तथा सभी तरह से पूर्ण था.’ ‘शुक्रनीतिसारदोनों की अपेक्षा काफी बाद की रचना है. उसमें लिखा है कि ‘जब सभी भयाकुल होकर इधरउधर दौड़ने लगे, जब विश्व में कोई किसी का स्वामी नहीं था, तब विधाता की ओर से नृप की नियुक्ति की गई.’(शुक्रनीतिसार,1/71). इस तरह राजा धरती पर विधाता का प्रतिनिधि बना. कालांतर में उसके फैसलों को देवाज्ञा माना जाने लगा. तीसरी कहानी का कथानक कुछ अलग अवश्य लगता हो, मगर संकेत उसका भी यही है कि राजा समाज की राजनीतिक और सामरिक आवश्यकता है. इसलिए शारीरिक और मानसिक सर्वश्रेष्ठता को उसके चयन का आधार बनाया गया. बिहार के गया, सोनपुर आदि क्षेत्रों के उत्खनन से ज्ञात होता है कि भारत में कृषिकर्म की शुरुआत लगभग दस हजार वर्ष पहले हो चुकी थी. हड़प्पा सभ्यता के अवशेष बताते हैं कि उस क्षेत्र में ईसा से 1500-3000 वर्ष पहले तक समृद्ध नागरी संस्कृति विकसित हो चुकी थी, जिनके व्यापारिक रिश्ते दूरदराज की सभ्यताओं से थे. समूह की एकता और नेतृत्व हेतु सम्राट की नियुक्ति की शुरुआत का वही दौर रहा होगा. उसके सापेक्ष ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ आदि ऊपरोल्लिखित कृतियां बहुत बाद की रचना हैं. जाहिर है इनकी रचना उस समय हुई जब देश में राज्य बड़ी और केंद्रीय सत्ता के रूप में ढल चुका था. वर्णव्यवस्था रूढ़ होकर जाति में ढलने लगी थी. आश्रयदाताओं को प्रसन्न करने के लिए तत्कालीन बुद्धिजीवी वर्ग उनके सत्ताधिकार को वैध ठहराने में लगा था. राजा की नियुक्ति को देवताओं का निर्णय घोषित करना, इसी दिशा का संकेतक है. वे अपने समय की साहित्यिक रचनाएं रही होंगी, जिनके रचनाकर अपने अतीत से प्रेरणा लेकर उन्हें गढ़ रहे थे. आगे चलकर जब मनुष्य की आध्यात्मिक जिज्ञासाएं धर्म और तज्जनित कर्मकांडों के रूप में रूढ़ होने लगीं, तब उन्हें धर्मशास्त्र का दर्जा दे दिया गया.

विशुद्ध लौकिक उद्देश्य के लिए जनता द्वारा राजा के चयन का उल्लेख ऋग्वेद के अलावा पुराणों में भी मौजूद है. जनसहमति के आधार पर निर्वाचित पहले सम्राट की कहानी हमें उस कालखंड तक ले जाती है जब पशुआधारित अर्थव्यवस्था, कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में ढलने को उत्सुक थी. खेती के प्रति रुझान में तेजी आ रही थी. हालांकि व्यक्तिगत भूसंपत्ति की अवधारणा तब तक नहीं पनपी थी. सम्मिलित खेती में कृषि उत्पाद पर सामूहिक अधिकार माना जाता था. धीरेधीरे यह समस्या सामने आने लगी कि अनाज का समूह के बीच बंटवारा कैसे किया जाए? उसका आधार क्या हो? क्योंकि कुछ लोग जहां आवश्यकता से अधिक अनाज एकत्र कर लेते थे, वहीं कुछ ऐसे भी होते थे जिन्हें अपनी आवश्यकता के अनुसार अन्न मिल ही नहीं पाता था. उनके बीच अनाज को लेकर परस्पर छीनाझपटी होती थी. बंटवारे के दौरान विवाद उत्पन्न होना बहुत सामान्य बात थी. समस्या के समाधान हेतु ऐसे व्यक्ति के चयन का निश्चय किया गया, जो बुद्धिमान होने के साथसाथ निष्पक्ष और निर्विवाद भी हो. जो कुशलतापूर्वक सदस्यों के बीच अनाज का बंटवारा कर सके. बदले में उस व्यक्ति को कृषि उत्पाद का एक हिस्सा देने का प्रावधान किया गया, जो बहुत कारगर सिद्ध हुआ. लेकिन गणप्रमुख या विश के मुखिया की सफलता तभी तक संभव थी, जब लोगों के पास उनकी जरूरत लायक अनाज मौजूद हों. किसी कारण यदि भरपूर अनाज उत्पन्न न हो, तब लोगों के मन में क्षोभ उभरना स्वाभाविक था. कुछ ऐसा ही सम्राट वेन के प्रकरण में हुआ था. वेन की कथा2 विष्णु पुराण, भागवत पुराण तथा पदम पुराण में आती है, हालांकि उनमें प्रक्षेपण एवं रूपांतरण की बहुत अधिक संभावना है. वेन के बारे में अलगअलग जगह मौजूद कहानियों में अंतर है. तथापि सभी जगह उसे जनता द्वारा पहला निर्वाचित राजा माना गया है. सम्राट मनोनीत होने के पश्चात वेन ने कृषि को बढ़ावा देने के लिए यथोचित उपाय किए. लेकिन परिस्थितियों ने ऐसी करवट ली कि जिन लोगों ने उसको अपना राजा घोषित किया था, उन्हीं के हाथों उसका अंत भी हुआ.

पुराणों में पृथु का मुक्त गुणगान है. पृथु वें का पुत्र था. पिता की हत्या के बाद वह समझ चुका था कि ऋषिगणों को नाराज करके राजकर्म करना आसान नहीं है. अतः राज्याभिषेक के समय ही उसने ऋषिगणों को आश्वस्त करते हुए कहा—‘मैं स्वधर्म, आश्रमधर्म एवं वर्णाश्रम धर्म की स्थापना करूंगा तथा राजदंड द्वारा उन्हें कार्यान्वित करूंगा.’3 वह जनतंत्र की पहली पराजय और पुरोहितवाद की पहली बड़ी जीत थी. पृथु ने ब्राह्मणों को सभी राज्यादेशों से ऊपर रखने की घोषणा की थी. कुल मिलाकर उसने वही किया था, जो ऋषिगण चाहते थे. माना जाता है कि पृथ्वी का नामकरण उसी के नाम पर पड़ा. इन प्रसंगों से यह संकेत भी मिलता है कि प्राचीनकाल में राजा का चयन केवल दैवी प्रेरणा या नियुक्ति तक सीमित नहीं था.

राज्य की उत्पत्ति को लेकर अनुबंध का सिद्धांत बौद्ध ग्रंथों में भी मौजूद है. ‘दीर्घनिकाय’, ‘महावस्तु’ आदि बौद्ध ग्रंथ राजा की नियुक्ति से संबंधित अनुबंध के सिद्धांत की पुष्टि करते हैं. ‘दीर्घनिकाय’ में राजा की नियुक्ति को लेकर एक निर्देश प्राप्त होता है. उसमें मनोनीत राजा अपनी प्रजा के साथ करार करता है कि वह केवल ‘वहीं पर क्रोध करेगा, जहां उसे करना चाहिए. उसी की भर्त्सना करेगा, जो भर्त्सनायोग्य है. उसी को देश निकाला देगा, जिसे देश निकाला मिलना चाहिए.’4 बौद्ध समर्थित राजदर्शन लोककल्याण के आदर्श के इर्दगिर्द घूमता है. ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ में राजा के चरित्र में ओज और साहस जैसे गुणों को महत्त्वपूर्ण बताया गया है. वहीं ‘दीर्घनिकाय’ में राजा की लोकप्रियता, सौंदर्यबोध, बुद्धिमत्ता आदि को उसका प्रमुख गुण माना गया है. राजा पर प्रजा के खेतों, धनधान्य और पशुओं की सुरक्षा का दायित्व होता था. बदले में प्रजा उसे अपनी आय का एक हिस्सा देने का वचन देती थी. ‘महावस्तु’, दीर्घनिकाय से लगभग तीन शताब्दी बाद की रचना है. लौकिक संस्कृत में लिखा गया यह ग्रंथ अपने भीतर बौद्ध दर्शन की अनेक आदर्श स्थापनाओं को समेटे है. ‘दीर्घनिकाय’ की भांति ‘महावस्तु’ भी राजा की नियुक्ति को लेकर ‘आपसी सहमति’ के लौकिक सिद्धांत की पुष्टि करता है—

सृष्टि के आरंभ में सभी प्राणी एक दिव्य स्थल पर निवास करते थे. वे सुगंधित का आनंद लेते. सुरम्य धरा पर मग्नमन नृत्य करते. उस समय उन्हें न तो भोजन की आवश्यकता थी, न वस्त्रों की, न निजी संपत्ति थी, न सरकार, न ही किसी प्रकार का कानून. और तब सृष्टि का पतन आरंभ हुआ. मनुष्य उस पुनीत लोक से पतित होकर पृथ्वी पर आ गिरा. मनुष्य का पतन आरंभ हो चुका था. अब उसे भोजन और आवास की आवश्यकता महसूस हुई. मनुष्य अपनी आरंभिक पवित्रता को खो चुका था. वर्णव्यवस्था का आरंभ हुआ और लोगों ने एक दूसरे के साथ अनुबंध के आधार पर रहना आरंभ किया. परिवार और निजी संपत्ति उस अनुबंध का हिस्सा बने. इसी के साथ चोरी, हत्या, लूटमार, परस्त्रीगमन जैसे अपराध होने लगे. समस्या से मुक्ति पाने के लिए सब मनुष्य एक बार एकत्र हुए, उन्होंने मिलजुलकर एक राजा चुना, जो उनकी फसल का वाजिब हिस्सा उन्हें बांट सके. उस चयन को उन्होंने ‘अनेक द्वारा एक का चयन’ यानी ‘महासम्मत’ की संज्ञा दी. उस व्यक्ति से अनेक लोगों को खुशी प्राप्त हुई थी, इसलिए उन्होंने उसे ‘राजा’ कहना आरंभ कर दिया. उसी से ‘राजनीति’ का विकास हुआ.’5

उपर्युक्त उद्धरणों से वैदिक परंपरा और बौद्ध परंपरा के बीच राजा की नियुक्ति संबंधी अंतर को समझा जा सकता है. वैदिक परंपरा में राजा निर्वाचित न होकर, कभी धर्म तो कभी देवताओं के नाम पर ऊपर से थोपा जाता है. राजपद की आवश्यकता विशुद्ध राजनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए पड़ती है. वह आर्यों की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं का संकेतक है. बौद्ध परंपरा में राजा की नियुक्ति का उद्देश्य उन लौकिक कर्तव्यों की पूर्ति करना है, जो समाज में सुख, समृद्धि और शांति की स्थापना के लिए आवश्यक माने जाते हैं. दोनों ही मान्यताओं में इतना स्पष्ट है कि राजा के रूप में मनोनीत व्यक्ति सत्यनिष्ठा, विश्वसनीयता और नेतृत्व के विशिष्ट गुणों से संपन्न होता था. उसका मुख्य कर्तव्य लोककल्याण के निमित्त उन कर्तव्यों का निष्पादन करना था, जो उसकी प्रजा के हितों के लिए आवश्यक हों. यह बात अलग है कि खुद को ईश्वरीय प्रतिनिधि घोषित करने वाला व्यक्ति अवसर आने पर स्वयं को प्रजा से बहुत ऊपर, यहां तक कि ईश्वरतुल्य समझने लगता था. इससे राजनीति में विकार आना स्वाभाविक था.

सुकरात, प्लेटो, अरस्तु आदि विचारकों ने राजसत्ता एवं समाज के कर्तव्यों एवं दायित्वों में तालमेल बनाए रखने के लिए न्यूनतम अनुबंध का समर्थन किया था. प्लेटो ने तो दार्शनिक सम्राट की परिकल्पना पेश की थी. उसका विचार था कि केवल दार्शनिक ही सत्ता के अहंकार, विलासिता तथा अन्य विकारों से स्वयं को बचा सकता है. अपने ग्रंथ ‘रिपब्लिक’ और लॉज में राज्य एवं समाज के कर्तव्यों की विस्तृत व्याख्या करते हुए उसने आदर्श राज्य की रूपरेखा प्रस्तुत की थी. अरस्तु राज्य के उच्च नैतिक स्तर को बनाए रखने का समर्थक था. उनके कुछ शताब्दी पश्चात पश्चिम की वैचारिक चेतना अपना तेज खोने लगी थी. मध्यकाल तक वहां भी धर्मसत्ता और राजसत्ता का ऐसा गठजोड़ बन चुका था, जिसमें जनसाधारण की नियति केवल आदेशानुपालन करना तथा परंपराओं का बोझ ढोनाभर रह गया. इंग्लेंड में जेम्स प्रथम ने राजा को पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि और सर्वेसर्वा माना. उसका मानना था कि राज्य और समाज दोनों के लिए राजा का होना अपरिहार्य है. बगैर राजा के न तो राज्य चल सकता है न ही समाज—‘राजा के बिना नागरिक समाज की कोई गति नहीं है. बिना नेतृत्व के समाज बुद्धिहीन भीड़ बनकर रह जाता है.’ राजा को अतिमानवीय सत्ता मानते हुए जेम्स प्रथम ने उसके अधिकारों और कर्तव्यों को राज्य की समीक्षा से ऊपर माना था. 1616 ईस्वी में न्यायाधीशों की बैठक को संबोधित करते समय उसने कहा था—‘राजा की शक्ति से संबंधित बातों पर चर्चा करना विधिसंगत नहीं है. ऐसा करना राजा की दुर्बलता को दर्शाना तथा उसके प्रति अपने सम्मान भाव को नष्ट करने जैसा होगा. राजा ईश्वर के सिंहासन पर बैठता है.’

जाहिर है समाज में राजा का स्थान ऊंचा रखा गया है. उसकी इच्छा की अवहेलना या अपमान अपराध की श्रेणी में आता था और उसके लिए दंड का प्रावधान था. राजा को ईश्वरीय प्रतिनिधि घोषित करने का ध्येय समाज में उसके निर्णयों के प्रति सम्मानभाव पैदा करने तक सीमित न था. किसी एक या कुछ लोगों को सामान्य से बहुत ऊंचा उठा देने की परिणति दूसरों को, खासकर उन्हें जो सत्ताकेंद्र से दूर हैं, स्वतः ही नीचे ले आती है. यह अंतर सत्ताकेंद्र में दूरी के अनुपात में बढ़ता ही जाता है. उत्तराधिकार प्रणाली का लाभ उठाते हुए शिखर पर यदि ऐसा व्यक्ति आ बैठे जो औसत से बहुत कम प्रतिभाशाली और स्वार्थी हो तो इस प्रणाली के बहुत भयावह परिणाम निकलते हैं. इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब केंद्रीय नेतृत्व की अकुशलता और अदूरदर्शिता का नुकसान जनसाधारण को उठाना पड़ा है. कुल मिलाकर वह निषेधात्मक व्यवस्था थी. उसका मानना था कि बगैर दंड के शांति और सुव्यवस्था असंभव है. दूसरे शब्दों में प्राचीन विधिसंहिता का गठन, समाज के बड़े वर्ग के प्रति अविश्वास की भावना के साथ हुआ था. उसकी कमजोरी थी कि वह समाज को शासक एवं शासित में बांट देती थी, जबकि न्याय की आधुनिक अवधारणा में मानवीय स्वतंत्रता, समानता और सुरक्षा अनिवार्य शर्तें हैं.

राजतंत्र, भले ही उसके शिखर पर मौजूद व्यक्ति चाहे जितना उदार एवं मानवमूल्यों को समर्पित क्यों न हो, कुल मिलाकर व्यक्तिवादी संस्था है. वह एक व्यक्ति को सर्वेसर्वा मानकर काम करती है. वहां शक्तियां किसी एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों के हाथों में सीमित रहती हैं, जिसमें बाकी लोग निर्णय प्रक्रिया से कट जाते हैं. ऐसे में यदि राजपद पर कोई कुटिल और स्वार्थी व्यक्ति मौजूद हो तो जनसाधारण एकदम अलगथलग पड़ जाता है. राजतंत्र में समानता और सभी की स्वतंत्रता जैसी बातों को हवाई माना जाता है. उसके अनुसार मनुष्य जन्म से असमान होते हैं. उनमें से कुछ श्रेष्ठ और सर्वगुण संपन्न होते हैं, जबकि कुछ निष्कृष्ट और अल्प बुद्धि संपन्न. जो निष्कृष्ट अथवा अल्प बुद्धिमान हैं, उन्हें मार्गदर्शन की आवश्यकता पड़ती है. इसके लिए ईश्वर कुछ व्यक्तियों को शासन का अधिकार देकर पृथ्वी पर भेजता है. समाज की एकता एवं अखंडता के लिए बाकी लोगों द्वारा उसके आदेश का पालन करना, ईश्वरीय आज्ञा होती है. राजा ईश्वर के नाम पर राज्य करता है. इस कार्य में धर्म उसके मार्गदर्शन की जिम्मेदारी निभाता है. धार्मिक शक्तियां एक ओर तो राजा के अतिरिक्त अधिकारसंपन्न होने का समर्थन करती हैं. दूसरी ओर यह दावा भी किया जाता है कि ईश्वर की निगाह में सभी बराबर हैं. उस समय वे प्रकृति और ईश्वर में भेद नहीं कर पातीं. जबकि प्रकृति की विशेषता है कि वह भेद नहीं करती. सभी के साथ समानतापूर्ण एवं पारदर्शी व्यवहार करती है. इसके बावजूद वे अवसर मिलते ही न्याय प्रदाता शक्ति के रूप में ईश्वर को बीच में ले आते हैं. उस समय प्रकृति को ईश्वर में समाहित मान लिया जाता है, जो न तो दृश्यमान है, न ही प्रामाणिक. परिणामस्वरूप मूर्त्त सत्य अमूर्त्तन में ढल जाता है. जनसाधारण को भरमाने के लिए सहज प्राकृतिक घटनाओं की मनमानी और स्वार्थपूर्ण व्याख्याएं चलती रहती हैं. जनसाधारण उनके वितंडा में उलझकर रह जाता है. इससे धर्माधारित विधानों की कमजोरी को समझा जा सकता है. विभिन्न किस्म की आस्थाओं और वितंडाओं में उलझा व्यक्ति यह समझ ही नहीं पाता कि ईश्वर की निगाह में यदि सब बराबर हैं तो समाज में भीषण असमानता क्यों है? किसी व्यक्ति के पास दूसरे को दंडित करने का अधिकार कहां से आता है? और शिखर पर विराजमान, खुद को स्वयंभू, सर्वशक्तिमान, सर्वोपरि और निरंकुश समझने वाला ईश्वर समानता का समर्थन भला कैसे कर सकता है. लोगों को उलझाने के लिए प्रायः वे कहते हैं कि सबकुछ नियतिबद्ध होता है. आदमी के बस के बाहर. कठपुतली की भांति मनुष्य की नियति उसको बस सहते जाना है.

यदि यह मान लिया जाए कि समाज को व्यवस्थित रखने के लिए राजा का होना आवश्यक है, ईश्वर स्वयं उसका विधान रचता है, तो राजा के औचित्य पर सवाल नहीं उठाए जा सकते. बावजूद इसके यहां एक प्रश्न अनायास सामने आता है कि यदि सभी कुछ पूर्वनिर्धारित और नियतिबद्ध है तो दोषी को, उसका अपराध चाहे जो भी हो, दंडित करने का औचित्य नहीं रह जाता. इस विचार के साथ ही न्यायआधारित समाज की संकल्पना भी सवालों के घेरे में आ जाती है. चूंकि धार्मिक स्थापनाएं आस्था और विश्वास पर चलती हैं, इसलिए वहां तर्क की कोई गुंजाइश नहीं रहती. बल्कि कई बार तो संदेह करना भी कुफ्र मान लिया जाता है. उसकी खूबी भी यही है कि अपनी सहजता और किस्सेकहानियों की मदद द्वारा वह बहुत आसानी से लोकसंस्कृति का हिस्सा बन जाती है. मनुष्य उन्हें इतनी गहराई से आत्मसात् करता है कि उनपर किसी भी प्रकार के संदेह, शंका आदि का विचार उसके दिमाग में नहीं आता. लोक की जुबान पर चढ़ी ये कहानियां शिखर पर मौजूद लोगों तथा बेमेलकारी विचारों का गुणगान करती हैं. जनसाधारण अपने रोजमर्रा के कार्यों के संपादन हेतु इन्हीं से प्रेरणाएं लेता हैं. सामान्य परिस्थितियों में इससे कोई अंतर नहीं पड़ता. लेकिन यदि किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की चुनौती का मसला हो या ऐसा ही कोई दूसरा मसला, जिसमें नागरिकअस्मिता दाव पर लगी हो, तथा उसके समाधान के लिए तर्क और विश्वसनीयता जरूरी आन पड़े—वहां यह व्यवस्था असफल होती जाती है.

यह कहना तो ज्यादती होगी कि समाज में धर्म की भूमिका हमेशा नकारात्मक रही है. संगठित धर्म भले ही दोढाई हजार वर्ष पुराने हों, मनुष्य की आध्यात्मिक जिज्ञासाएं उसी समय से उसके साथ जुड़ी हैं, जब उसने सोचनासमझना आरंभ किया था. आध्यात्मिक जिज्ञासाओं को स्थायी रूप देने की कोशिश के फलस्वरूप ही धर्म का विकास हुआ था. बाद में आध्यामिक शक्तियों के प्रति मनुष्य के सम्मानभाव एवं डर को देखते हुए उनका उपयोग समाज को अनुशासित करने के लिए किया जाने लगा. उससे एक वर्ग ऐसा पनपा, जिसने ईश्वर को जाननेसमझने से अधिक उसके महिमामंडन पर जोर दिया. उससे समाजीकरण के साथसाथ विकसित होते नैतिक मूल्यों की व्याख्या भी धर्म और राजसत्ता के स्वार्थानुरूप की जाने लगी. सामंती संस्कार और जीवन की बढ़ती चुनौतियों के बीच लोगों को यह सहज भी लगा. कालांतर में नैतिक मूल्य और आध्यात्मिक विश्वास एकदूसरे में इतने गड्डमड्ड हो गए कि धर्म और नैतिकता को परस्पर पर्याय मान लिया गया. वह संस्कृति और विकास दोनों की दृष्टि से प्रतिगामी चलन था. अध्यात्म एवं संस्कृति दोनों सतत नवोन्मेषी और पुरोगामी रहें, तभी उनकी सार्थकता है. आस्था और विश्वास में ढल जाने से उनकी स्वाभाविक वृद्धि रुक जाती है. यही हाल नैतिकता का भी है. मनुष्य नैतिक मूल्यों से प्रेरित होता है. उनसे अपनी सभ्यता और संस्कृति का अलंकरण करता है. लेकिन नैतिक मूल्य, कुछ प्राकृतिक मूल्यों को छोड़कर सतत परिवर्तनशील रहते हैं. इसी में उनकी गरिमा है. धर्म का हिस्सा बन जाने के बाद मनुष्य के विवेकीकरण की प्रक्रिया अवरुद्ध होने लगती है. परिणामस्वरूप समाजीकरण की प्रक्रिया में भी अवमंदन का दौर शुरू हो जाता है. धर्म की इस दुर्बलता को सहस्राब्दियों पहले समझ लिया गया था. भारत में मक्खलि घोषाल, अजित केशकंबलि, कौत्स ने धर्म को गुरुडम और पाखंड में ढालने के और पुरोहितवर्ग की जमकर आलोचना की थी. वहीं बुद्ध ने धर्म के नाम पर चलने वाले कर्मकांडों एवं आडंबरों का तर्कसम्मत प्रतिकार किया. लेकिन वास्तविक सफलता 15वीं शताब्दी के बाद, उस समय मिलनी शुरू हुई जब प्रौद्योगिकीकरण ने वैकल्पिक अर्थव्यवस्था की राह प्रशस्त की. उससे जनसाधारण के लिए सामंतवाद के चंगुल से बाहर निकलने का मार्ग प्रशस्त हुआ. मशीनीकरण से नए मध्यवर्ग का विकास हुआ. कालांतर में उसने अपने बुद्धिजीवी पैदा किए, जिन्होंने असमानताकारी व्यवस्थाओं के विरोध में बौद्धिक एवं राजनीतिक आंदोलनों का सूत्रपात किया.

हॉब्स, लॉक, रूसो आदि प्राचीन विचारकों का योगदान यह भी है कि उन्होंने न्याय और सुशासन जैसी व्यवस्थाओं को धर्म और सामंतवाद के चंगुल से निकालकर तर्कसम्मत बनाने का काम किया. उसके फलस्वरूप लोगों ने प्रश्न करना सीखा. हॉब्स यद्यपि राजतंत्र का समर्थक था. लेकिन वह उसमें सुधार चाहता था. उसने राजा के दैवी अधिकारों का निषेध किया है. इस तरह वह जेम्स प्रथम, राबर्ट फिल्मर आदि की उस विचारधारा को खारिज करता है, जो उस समय प्रचलित थी. जेम्स प्रथम की भांति फिल्मर का भी विश्वास था कि राजा की सत्ता तथा उसकी शक्तियां ईश्वरप्रदत्त होती हैं. कि राजा का आदेश और उसकी इच्छा अपने आप में स्वतः प्रमाण है. फिल्मर राजनीति को धर्म में समाहित कर देता है. समकालीन उदारवादियों की भांति हॉब्स यह मानने को तैयार नहीं था कि राज्य की शक्तियां सम्राट और सांसदों के बीच विकेंद्रीकृत होनी चाहिए. इसके समानांतर हॉब्स जो वैचारिकी प्रस्तुत करता है, वह अपने समय का कदाचित सबसे क्रांतिकारी सोच था. वह जोर देकर कहता है कि राज्य की शक्तियां तथा उसके संकल्प उसकी सदस्य इकाइयों की निजी इच्छाओं और आकांक्षाओं पर निर्भर करते हैं. समाज में किसी को भी यह अधिकार नहीं है कि वह दूसरों पर शासन करे. उसकी इच्छाओं का दमन कर अपनी इच्छाएं थोपे. हॉब्स नागरिकों को अधिकार देता है कि अपने सुख, स्वतंत्रता और समानता की रक्षा के लिए वे किसी भी सीमा तक जा सकते हैं. इस तरह नागरिकों की स्वतंत्रता एवं सुरक्षा उसकी प्राथमिकता है, लेकिन स्वतंत्रता का आशय कुछ भी करने की स्वच्छंदता नहीं है. आधुनिक विचारकों की भांति हॉब्स का भी मानना था व्यक्ति की आजादी अन्य नागरिकों के सुख और सुविधा पर निर्भर करती है. समाज में किसी को भी यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि अपने सुख के लिए वह दूसरों के हितों की बलि चढ़ाए अथवा उन्हें किसी भी प्रकार से कष्ट दे. इस परिस्थिति में हॉब्स राज्य के समर्थन में खड़ा नजर आता है. समाज में अनुशासन बनाए रखने के लिए वह राज्य को असीमित अधिकार दे देता है. इस तरह हम उसके विचारों में परंपरा और आधुनिकता के बीच झूलता हुआ पाते हैं. असल में वह विचारों के इतिहास का वह क्रांतिकारी दौर है, जब पुराने विचार अप्रासंगिक लगने लगते हैं, जबकि नए विचार केंद्र में आने के संघर्षरत होते हैं. वैचारिक संवेदनशीलता का परिचय देता हुआ हॉब्स दोनों के बीच संतुलन बिठाने की सफल कोशिश करता है, और अपने उत्तरवर्त्ती विचारकों के लिए मार्गदर्शक का कार्य करता है.

हॉब्स के पश्चात न्याय और सामाजिक समानता के ध्येय को लेकर जिन विचारकों का उल्लेखनीय योगदान है, उनमें जान लॉक, रूसो, डेविड ह्यूम, इमानुएल कांट, बैंथम, जान रॉल्स आदि का नाम लिया जा सकता है. इनमें से लॉक एवं रूसो ने न्याय को लेकर स्वतंत्र रूप से विचार नहीं किया, उनका मुख्य योगदान राजनीतिक दर्शन के क्षेत्र में है. लेकिन जिस आग्रह और तर्कसम्मत ढंग से वे स्वतंत्रता और समानतासंबंधी मुद्दों को उठाते हैं, और विशेषकर मानवस्वातंत्र्य के लिए जमीन तैयार करते हैं, आगे चलकर उन्हीं से सामाजिक न्याय की नई संकल्पनाएं जन्म लेती हैं. मसलन आदर्श राज्य को कैसा होना चाहिए? आदर्श राज्य में नागरिकों के क्या कर्तव्य हैं? समानता, सुरक्षा और स्वतंत्रता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए राजनीति का स्वरूप कैसा हो? इन सब विषयों पर उन्होंने विस्तार से लिखा है. कहने की आवश्यकता नहीं कि आधुनिक राजनीति पर उनका गहरा प्रभाव पड़ा है. कालांतर में उन्हीं की प्रेरणा से आधुनिक विधिसंहिता के विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ. इस आधार पर लॉक एवं रूसो को युग प्रवर्त्तक दार्शनिकों की श्रेणी में कहा जा सकता है. जान लॉक(1632—1704) अनुभववादी दार्शनिक था. मानता था कि मनुष्य अपने अनुभवों से सीखता है तथा अपने विवेक द्वारा ज्ञान को आगे बढ़ाता है. प्राकृतिक रूप से सभी मनुष्य समान हैं. जन्म के आधार पर न तो किसी को शासक घोषित किया जा सकता है, न ही यह मान लेना चाहिए कि कोई व्यक्ति केवल शासित होने के लिए जन्मा है. प्रकृति सभी प्राणियों के साथ समभाव का प्रदर्शन करती है. स्वतंत्रता स्वयं प्राकृतिक देन है. आदर्श राज्य वही है जो मनुष्य की अधिकतम स्वतंत्रता का संरक्षण करने में सक्षम हो. जिसमें नागरिक अपनी अधिकतम सुख और सुरक्षा का अनुभव कर सकें. इसके लिए व्यक्ति को अपनी इच्छानुसार कार्य करने की पूरीपूरी स्वतंत्रता आवश्यक है. इसका आशय यह नहीं है कि प्राकृतिक विधान सभी को सभी कुछ करने की आजादी देता है. न ही किसी नागरिक को यह अधिकार होता है कि अपने सुख के लिए ऐसे कार्य करे, जिससे दूसरों की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप होता हो. आदर्श राज्य का अभिप्राय ऐसे भूराजनीतिक क्षेत्र से है जहां व्यक्ति को वह सब कुछ करने की स्वतंत्रता हो, जिसमें वह दूसरे के सुख एवं स्वतंत्रता को बाधित किए बिना अपने सुख और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अधिकतम स्तर तक कर सके. लॉक मानता था कि मनुष्य मूलतः स्वार्थी होता है. इसलिए उसने किसी कदम की सीधी व्याख्या संभव नहीं है. प्रकृति हालांकि सभी प्राणियों के साथ समानता का भाव रखती है, लेकिन उन लोगों के सुधार हेतु जो स्वार्थवश प्राकृतिक नियमों की अवहेलना करते हैं, कोई तर्कसम्मत व्यवस्था उसके पास नहीं होती. प्राकृतिक न्याय अकेले व्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन करता है. किंतु समाज में रहते हुए अधिकतम स्वतंत्रता के भोग की उसमें कोई व्यवस्था नहीं होती. यही कारण है कि प्राचीन न्यायसंहिताओं में जो प्राकृतिक न्याय के अपेक्षाकृत करीब थीं, मृत्युदंड और अंगभंग जैसी सजाओं को सामान्य समझा जाता था.

लॉक के अनुसार प्राकृतिक न्याय ईश्वरीय भाव से प्रेरित होता है. इसलिए उसमें प्राणिमात्र के प्रति समानता और स्वतंत्रता का भाव होता है. यदि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता अथवा अस्मिता पर संकट आ पड़े तो ईश्वरीय न्यायव्यवस्था चरमराने लगती है. उस अवस्था में पुरोहितवर्ग या तो नियतिवादी समाधान सुझाने लगता है अथवा किसी चमत्कार की उम्मीद में वास्तविकता से कट जाता है. दोनों अवस्थाओं में पीडि़त व्यक्ति को न्याय नहीं मिल पाता. समाधान की धर्मसम्मत व्यवस्था, चुनौतियों का सामना करने के बजाय उनसे पलायन की प्रेरणा देती है. समस्या के विधिसम्मत समाधान हेतु लॉक हॉब्स की ‘सोशल कांट्रेक्ट’ की अवधारणा को आगे कर देता है. अपनी महत्त्वपूर्ण कृति ‘सेकिंड ट्रटीज आफ दि गवर्नमेंट’ में वह लिखता है कि जीवन, संपत्ति एवं स्वतंत्रता की सुरक्षा हेतु नागरिकों को परस्पर एकजुट होकर सामान्य हितों के लिए ‘सामाजिक संविदा’ के अनुरूप कार्य करना चाहिए. वह कामना करता है कि नागरिकगण बजाय व्यक्तिगत लाभ के संपूर्ण समाज के लाभों के लिए एकजुट होंगे. उस समय उनके समक्ष दो उद्देश्य हो सकते हैं. पहला उस समाज की रूपरेखा बनाना या सपना देखना, जैसे समाज की कामना वे अपने लिए करते हैं. दूसरी उस लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु अनिवार्य संकल्पबद्धता. प्राकृतिक एवं धर्मकेंद्रित समाजों में यह काम दैवी शक्ति के भरोसे होता है. इसलिए वहां नागरिकों में आत्मविश्वास की कमी सहज ही देखने को मिलती है. आकस्मिक चुनौती के समय वे प्रायः बिखर जाते हैं और उद्धार के लिए चमत्कारों की उम्मीद में जीने लगते हैं, जो विकास को नकारात्मक दर से प्रभावित करती है. चूंकि इतिहास चक्र में वापस लौटना संभव नहीं होता, इसलिए समाज में दो प्रकार की शक्तियां प्रभावी होती हैं. लोगों की परिवर्तन की वांछा जो चमत्कारों और जनसंकल्प के बीच कहीं झूलती रहती है. दूसरा अतीत के प्रति अतिरेकी लगाव जो धर्म और परंपरा के जरिये मानवस्वभाव का जटिल हिस्सा बन जाता है. अंतर्द्वंद्वों में फंसा समाज इन्हीं के बीच कहीं झूलता रहता है.

प्राकृतिक अथवा धर्मकेंद्रित समाजों के राजनीतिकरण का आरंभ सामान्य हितों की पहचान तथा उनके लिए एकजुटता बरतने से होता है. उसके अगले चरण में नागरिकों को अपने मूलभूत अधिकारों की सुरक्षा एवं संरक्षा के लिए कुछ हितों का बलिदान देना पड़ सकता है. जिसमें उनकी स्वतंत्रता के एक हिस्से में कटौती भी संभव है. किंतु समाजीकरण के वृहद उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए यह अनिवार्य अवस्था है. समाजीकरण की यह प्रक्रिया सामान्य सहमति के आधार पर गठित सरकार के तत्वावधान में होनी चाहिए. उसमें नागरिकों की सविवेक भागीदारी भी अपेक्षित है. थामस हॉब्स ‘सामाजिक संविदा’ का प्रमुख सिद्धांतकार है. उसका समर्थन करने के साथसाथ लॉक उसके परिष्करण की संभावनाओं का भी विवेचन करता है. उसे आगे बढ़ाते हुए रूसो व्यक्ति, समाज एवं राज्य के संबंधों को लेकर आदर्शोन्मुखी व्यवस्था की कामना के साथ सही मायने में ‘सोशल कांट्रेक्ट’ की रचना करता है. उसे विश्वास था कि नागरिकगण अपनी स्वतंत्रता, समानता और जीवन के लिए एकजुट होकर संघर्ष करेंगे. रूसो का जीवनकाल यूरोपीय इतिहास का ऐसा दौर है, जब वह अपनी बौद्धिक चेतना के एकदम शिखर पर था. लॉक की भांति वह भी व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता, समानता और संपत्ति अधिकारों का तीव्र समर्थक था. आस्था, विश्वास और परंपरा के स्थान पर वह मानवीय विवेक को महत्त्व देता है. ऐसे समाज की रूपरेखा पेश करता है, जो आपसी सहयोग और सामान्य विवेक द्वारा अनुशासित होता है. व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता और समानता का समर्थक होने के कारण लॉक और रूसो का न्याय की आधुनिक अवधारणा को विकसित करने में बड़ा योगदान है. जबकि रूसो की कृति ‘सोशल कांट्रेक्ट’ की गिनती कार्ल मार्क्स की ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ के साथ विश्व की उन तीनचार अतिमहत्त्वपूर्ण पुस्तकों में की जाती है, जिनकी आधुनिक विश्व को गढ़ने में विलक्षण भूमिका रही है.

मानवीय स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक रूसो की प्रसिद्ध उक्ति है—‘मनुष्य आजाद जन्मता है, किंतु वह हर जगह बेडि़यों में है.’ ये बेडि़यां कहां से आती हैं? कैसे प्रभावी हो जाती है और कैसे अल्पसंख्यक अभिजन, बहुसंख्यक जनसामान्य को छोटेछोटे हिस्सों में बांटकर उन्हें अपना दास और आश्रित बना लेता है? यदि रूसो की माने तो बंधन मनुष्य के चारों ओर से प्रभावी रहते हैं. हर कोई मनुष्य की नैसर्गिक स्वतंत्रता पर डाका डालने को तत्पर रहता है. जबकि प्राकृतिक राज्य में मनुष्य अपनी स्वाधीनता के अधिकतम हिस्से भोग कर रहा होता है. कानून और समाज की मर्यादाएं वहां आड़े नहीं आतीं. प्रौद्योगिकी द्वारा नियंत्रित समाज में प्राकृतिक राज्य की वापसी सुदूर इतिहास का हिस्सा बन चुकी है. मनुष्य तकनीक पर इतना आश्रित है कि उनसे मुक्त जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता. चूंकि आधुनिक प्रौद्योगिकी महंगी है. उसपर निरंतर ऐसे लोगों का अधिकार बना रहता है, जिनके वर्गीय स्वार्थ मानवकल्याण की भावनाओं पर सदैव भारी पड़ते हैं. प्रौद्योगिकी के बल पर वे अकूत मुनाफा बटोरते हैं. फिर उसका एक हिस्सा शोध और प्रौद्योगिकीय प्रौन्नति हेतु करते हैं. उससे आर्थिक और सामाजिक अंतर बढ़ता ही जाता है. संक्षेप में आधुनिक समाज की समस्याएं आधुनिक जीवनशैली की देन हैं, जिसके प्रति मनुष्य का बेहद लगाव है. हमारी कमजोरी है कि विचारधाराओं के मामले में प्रायः रूढ़ दृष्टिकोण अपनाते हैं. यह जान ते हुए भी कि आधुनिक समाज की समस्याओं के समाधान हेतु आधुनिक विचार आवश्यक है, हम समाधान के लिए प्राचीन धर्मग्रंथों और परंपराओं में झांकते रहते हैं. प्राकृतिक राज्य की महत्ता अपनी जगह स्वयंसिद्ध है, लेकिन यदि कोई आधुनिकता द्वारा उत्पन्न समस्याओं का समाधान प्राकृतिक राज्य में चाहे तो सिवाय पलायन के उसके कुछ और हाथ नहीं लगने वाला. दूसरी ओर यह भी सच है कि शिक्षा और संसाधनों ने मनुष्य को पहले की अपेक्षा अधिक जागरूक बनाया है. इसलिए परंपरागत राज्य की नीतियां, जिसमें निर्णय ऊपर से थोप दिए जाते थे, उसे रास नहीं आतीं.

थोरो, एडबर्ड कारपेंटर, गांधी, रसेल आदि का विचार था कि आधुनिक समाज की अनेक समस्याएं अतिरेकी मशीनीकरण की देन है. सुविधाओं की चाहत तथा उसके लिए अंधाधुंध मशीनीकरण ने अनियोजित विकास को जन्म दिया है. रूसो ने इसकी कल्पना करीब ढाई सौ वर्ष पहले ही कर ली थी. उसका विचार था कि प्राकृतिक राज्य में मनुष्य इच्छाओं के संबंध में मुक्त होता था. जरूरत की वस्तुओं पर किसी का एकाधिकार नहीं था. आवश्यक श्रम के उपरांत मनुष्य उन्हें जुटा ही लेता था. इस कारण उन दिनों गलाकाट स्पर्धा भी नहीं थी. आधुनिक मनुष्य की इच्छाएं उसकी आवश्यकता के आधार पर जन्मने के बजाए बाजारवादी प्रलोभनों, दूसरों से पिछड़ जाने के भय तथा भौतिक लालसाओं द्वारा पैदा होती हैं. वे समाज में अनावश्यक स्पर्धा को जन्म देती हैं. रूसो के अनुसार आधुनिक समाज की समस्याएं मुक्ति की न होकर स्वतंत्रता के हृास के कारण जन्मी है. ऐसे में मनुष्य परस्पर सहयोग तथा एकदूसरे की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए अधिकतम स्वतंत्रता का भोग कर सकता है. प्राकृतिक राज्य की प्रशंसा करने के बावजूद वह उसकी ओर लौटने पक्ष में न था. उसका मानना था कि उसमें सबकुछ अव्यवस्थित रहता है. उसे हम ऐसा भूक्षेत्र मान सकते हैं जिसमें प्रत्येक नागरिक अपनी शक्ति के सर्वोच्च शिखर पर हो सकता है. लेकिन संगठन के अभाव में व्यक्ति की शक्तियां, एकदूसरे के साथ क्षुद्र स्पर्धा में अकसर व्यर्थ चली जाती हैं. कई बार तो व्यक्ति अपनी शक्तियों और कार्यक्षमता का अनुमान तक नहीं लगा पाता. आकस्मिक संकट के समय ऐसे समाज में व्यक्ति एकदम अकेला पड़ जाता है. मानवीय स्वतंत्रता और विकास की दृष्टि से भी प्राकृतिक राज्य सर्वथा निरापद नहीं है. उसकी अपनी कमजोरियां हैं. रूसो के अनुसार प्राकृतिक राज्य में मनुष्य का नैतिक स्तर अपने चरम पर हो सकता है. लेकिन समाज का कोई स्पष्ट चरित्र नहीं बन पाता. इससे व्यक्ति और समूह के स्तर पर असंतोष पलता रहता है. परिणामस्वरूप व्यक्ति की उच्च नैतिकता भी निष्प्रभावी होकर रह जाती है. परंपरा और आधुनिकता के बेमेल गठबंधन से पैदा द्वंद्व उसे ‘सोशल कांट्रेक्ट’ की प्रेरणा बनता है.

रूसो के जीवनकाल तक मशीनी क्रांति आरंभ हो चुकी थी. मध्यवर्ग का उभार तेजी पर था. उसके फलस्वरूप सामाजिक उथलपुथल जारी थी. इसी के साथ जारी था, नए सामाजिक संबंधों के गठन का सिलसिला. प्रमुख चुनौती मशीनों के आगमन से उत्पन्न मानवीय अवमूल्यन की चुनौतियों से निपटने की थी. रूसो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को बडे़ पूंजीपतियों के हाथों में देखकर भविष्य का अंदाजा लगा चुका था. उसका विचार था कि मनुष्य की सामाजिक एवं राजनीतिक समस्याएं आधुनिक विकासमान समाजों की देन हैं. वह ‘सोशल कांट्रेक्ट’ का आरंभ ही इन शब्दों से करता है—‘मनुष्य मुक्त जन्म लेता है, लेकिन हर जगह वह बेड़ियों में हैं.’ ये बेड़ियां कभी सामाजिक शुचिता के नाम पर थोपी जाती हैं, कभी कानून, तो कभी मनुष्यता की भलाई के नाम पर. लेकिन हर बार ये मनुष्य की स्वतंत्रता का एक हिस्सा हड़प लेती हैं. मानवीय स्वतंत्रता की सलामती के लिए आवश्यक है कि उन श्रंखलाओं को तोड़ा जाए. पुस्तक में वह उन सभी विसंगतियों की विवेचना करता है जो मानवीय स्वतंत्रता को बाधित कर सकती हैं. उसके अनुसार राजनीति का मुख्य उद्देश्य मनुष्य की स्वतंत्रता, जो समाजार्थिक असमानता, विद्वैष भाव आदि से संकटग्रस्त है, को वापस दिलाना है. यह कार्य किसी सरकार या सत्ता के भरोसे संभव नहीं है. क्योंकि वे वर्चस्व की भावना को कभी त्यागने वाली नहीं है. उसके लिए पीड़ित पक्षों को स्वयं आगे आना होगा. अधिकतम स्वतंत्रता का लक्ष्य एकदूसरे की स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा के साथ ही प्राप्त किया जा सकता है. हॉब्स और लॉक की भांति रूसो भी इच्छाओं के सामान्यीकरण पर बल देता है. उसके अनुसार सामान्यीकृत इच्छा का आशय समाज की ऐसी सम्मिलित इच्छा से है जिसे वह विकास के अन्यान्य अवसरों, तकनीकों के बीच से अधिकतम लाभकामना के साथ चुनता है. रूसो उस समय पूर्ववर्ती प्रकृतिवादी विचारकों के समर्थन में उतर आता है, जिनका विचार था कि प्राकृतिक रूप से सभी बराबर हैं. प्रकृति की ओर से सभी मुक्त भी हैं. जिस तरह प्रकृति में सामंजस्य की अनूठी भावना और तालमेल है, वह चाहती हैं प्राणिमात्र में भी इसी प्रकार के सहयोग और सामंजस्य की भावना हो. सृष्टि का एकमात्र विवेकवान प्राणी होने के नाते मनुष्य का दायित्व अन्य प्राणियों से कहीं अधिक है. इसलिए उसे चाहिए कि वह ऐसे कार्य करे, जिससे प्राणिमात्र की स्वतंत्रता और समानअधिकारिता की रक्षा हो सके. ध्यान रखे कि प्रकृति सभी को एकदूसरे के साथ सहयोग करने की अनुमति तो देती है, मगर एकल अधिकार किसी का भी पसंद नहीं करती. तदनुसार पृथ्वी के जितने भी उपहार हैं, वे सबके लिए हैं. मगर वह स्वयं भी किसी एक की न होकर सबकी है. चाहती है कि लोग उसके उपहारों का मिलजुलकर भोग करें. किसी भी प्रकार का दुराव या स्पर्धा उनमें न हो.

रूसो का विश्वास था कि व्यवस्थित समाज की रचना केवल आपसी सहमति के आधार पर संभव है. समाज की वास्तविक स्थापना ही तब होती है जब अलगअलग नागरिक मिलकर प्रबुद्ध जनता में ढल जाते हैं. यहां ‘प्रजा’ और ‘जनता’ के सूक्ष्म भेद पर कुछ चर्चा प्रासंगिक होगी. दोनों में वही अंतर है जो बाड़े में बंद भेड़ों तथा जंगल में मुक्त विचरने वाले प्राणियों के बीच होता है. प्रजा अपने अधिकतम अधिकार राजा को सौंपकर उसकी इच्छा की अनुगामी हो जाती हैं. यहां तक कि उसके जीवन पर भी उसका अधिकार नहीं रहता. उसमें राजा और राजकुल के सदस्यों का जीवन साधारण प्रजाजन के जीवन से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है. इसलिए राजा अथवा राजकुल के किसी सदस्य को बचाने के लिए एक या अनेक प्रजाजनों की बलि पर भी वहां कोई सवाल खड़े नहीं करता. प्रायः ‘स्वामीभक्ति’ या ‘राजभक्ति’ कहकर उसका महिमामंडन किया जाता है. प्रजा के उलट जनता अधिकतम अधिकार अपने पास रखती है. जागरूक जनता को दास नहीं बनाया जा सकता. यदि कहीं ऐसा प्रतीत होता तो समझ लेना चाहिए कि वहां की जनता बनावटी किस्सों को सुनतेसुनते अपने आत्मबल को बिसरा चुकी है. प्रबुद्ध जनता अपने सामान्य हितों लिए संगठित होती है. उसके लिए वह अपने शासक स्वयं चुनती है. बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन करते हुए चुने हुए अपने प्रतिनिधि को उतने ही अधिकार सौंपती है, जितने शासकीय कर्तव्यों के निष्पादन हेतु आवश्यक हों. वह अपने शासकों पर नजर भी रखती है. यदि उसे लगे कि निर्वाचित प्रतिनिधि कर्तव्यच्युत हैं तो वह उन्हें वापस बुलाने में भी देर नहीं करती. शीर्षस्थ स्वार्थी शक्तियों की कोशिश होती है कि जनता अपना आत्मगौरव बिसराकर प्रजा में ढल जाए. जनताकरण विवेकीकृत जनसमूह की खुद के उत्थान हेतु स्वयंस्फूर्त्त प्रक्रिया है. आर्थिक आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के बाद, प्रजा जनताकरण का सपना देखना आरंभ करती है और फिर धीरेधीरे उस दिशा की ओर अग्रसर होती है. लक्ष्य तक पहुंचने के लिए उसे अनेक जनांदोलनों से गुजरना पड़ता है. उसकी यह गति उसकी आर्थिकसामाजिक स्वतंत्रता के स्तर से तय होती है. कह सकते हैं कि जनता नागरिकों का समूह होने के साथसाथ उसकी उपलब्धि भी है. वह सामूहिकता में विश्वास रखती है. अपने निर्णय स्वयं लेती है. उसके सदस्य नागरिक बहुमत के निर्णयों का सामान्यीकरण करने में माहिर होते हैं. चालाक राजनीतिज्ञ जनता की जागरूकता, विशेषकर ‘बहुमत के निर्णयों का सामान्यीकरण करते रहने की कला’ से घबराते हैं. इसलिए समाज में असमानता के प्रतीकों को इस चतुराई से रोपते हैं कि जनता की एकता प्रभावित हो. वह अलगअलग समूहों में बंट जाए. जिससे उसकी शक्ति एवं ऊर्जा निर्दिष्ट लक्ष्यों को प्राप्त करने की कोशिश के बजाए एकदूसरे पर संदेह करने लगे. धीरेधीरे लोग उस षड्यंत्र का शिकार होने लगते हैं.

आशय है कि जनता विवेकवान न हो, या उसका नेतृत्व अकुशल और बेईमान हो तो वह दिग्भ्रमित होकर बड़ी आसानी से भीड़ में ढल जाती है. लोकतंत्र में शासन जनप्रतिनिधियों के माध्यम से चलता है. भीड़ की मानसिकता से प्रभावित जनता अपने प्रतिनिधियों के निर्वाचन तथा उन्हें अनुशासित रखने में चूक जाती है. उस समय जनता की समस्त सर्जनात्मक शक्तियां छोटेछोटे समूहों की विशेषताओं में ढलकर, एकदूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश में दम तोड़ने लगती हैं. इससे सामाजिक असंतोष पनपता है और शासन को शांति और सुरक्षा के नाम पर बल प्रयोग करने का बहाना मिल जाता है. स्थिति का लाभ उठाकर स्वार्थी शीर्षस्थ वर्ग जनता द्वारा दी गई शक्तियों का उपयोग स्वयं जनता के ऊपर करने लगते हैं. छोटेछोटे समूहों में विभाजित, भीड़ की मानसिकता से ग्रस्त मनोबलविहीन जनता अपने प्रतिनिधियों पर आश्रित होकर रह जाती है. परिणामस्वरूप लोकतंत्र कुछ लोगों की मर्जी से संचालित होने लगता है. सामाजिक विकास प्रतिगामी रूप ले लेता है और मनुष्य स्वतंत्रता और समानता के अपने वास्तविक लक्ष्य से भटक जाता है. सवाल है कि जनता यदि जागरूक है तो विभाजनकारी शक्तियों का शिकार कैसे हो जाती है? यदि उसे इतनी जल्दी बरगलाया जा सकता है तो प्रजाऔर जनतामें कुछ अंतर ही नहीं रह जाता. यह कठिन पहेली है. दरअसल उन समाजों में जहां भारी असमानता हो, जनसाधारण को संसाधनों की भारी कमी से गुजरना पड़ता हो, वहां रोजमर्रा की वस्तुओं का अभाव अनावश्यक स्पर्धा को जन्म देता है. जिससे उनका ध्यान दूरगामी हितों के बजाए रोजमर्रा की समस्याओं पर केंद्रित होकर रह जाता है. इससे उसके विवेकीकरण की प्रक्रिया अवरुद्ध हो सकती है. ऐसी समस्याओं से उबरने के लिए जनता को कुशल नेतृत्व और मजबूत संगठन की आवश्यकता पड़ती है.

रूसो न्याय को लेकर सीधे विचार नहीं करता, किंतु सामाजिक असमानता और अन्याय को जन्म देने वाली स्थितियों की गहन विवेचना करता है. वह लिखता है कि स्वतंत्र समाज में व्यक्तिमात्र की इच्छाओं का सम्मान होता है. अन्योन्याश्रितता की भावना से संगठित समाज में, व्यक्तिगत इच्छाएं सदस्य इकाइयों को व्यक्तिमात्र के हितों की रक्षा हेतु प्रेरित करती हैं. ध्यातव्य है कि रूसो जब व्यक्तिगत हित की बात करता है तो उसकी निगाह में कोई व्यक्ति अथवा समूहविशेष नहीं होता. मानवमात्र के सम्मान, समानता और न्याय की रक्षा हेतु वह पूरे समाज को विराट मानव के रूप में कल्पित करता है. जो भलीभांति जानता है कि उसकी सफलता उसके सभी अंगों के परस्पर तालमेल और मिलजुलकर कार्य करने की योग्यता पर निर्भर है. इसलिए वह अपने प्रत्येक अंग का बराबर ध्यान रखता है. सभी को सम्मान की दृष्टि से देखता है. महसूस करता है कि यदि एक की स्वतंत्रता भी बाधित होती है तो पूरी देह की स्वतंत्रता खतरे में पड़ सकती है.

रूसो की दृष्टि में व्यक्तिस्वातंत्र्य का मसला सर्वोपरि था. वह किसी भी स्थिति में मानवमात्र की स्वतंत्रता को खतरे में नहीं डालना चाहता. न ही उसमें किसी भी कारण किसी तरह की कटौती की कामना करता है. उसके अनुसार समाज के नियंताओं, जिन्हें जनता की ओर से निर्णय लेने का दायित्व सौंपा गया है, को चाहिए कि वे व्यक्तिमात्र की इच्छा की अवमानना करने के बजाय, इच्छाओं के सामान्यीकरण पर जोर दें. इस कार्य में कुछ समय लग सकता है. किं