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‘दुर्गा चरित्र’ के बहाने मिथ-चर्चा

सामान्य

मिथ हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं. वे वास्तविक हों, न हों, अनगिनत मनुष्यों का अटूट विश्वास उन्हें वास्तविक से कहीं ज्यादा प्रभावशाली बना देता है. आंखों-देखी झूठ मानी जा सकती है, परंतु मिथ में अंतर्निहित या उसके माध्यम से दिया गया संदेश, यदि व्यक्ति का मिथ पर विश्वास है, उसके लिए परमसत्य होता है. यही विश्वास किसी मिथ को दीर्घजीवी और शक्तिशाली बनाता है. मिथ आमतौर पर संस्कृति का हिस्सा होते हैं. कई बार उनकी उपस्थिति को ज्ञान-विज्ञान के दूसरे क्षेत्रों पर भी थोप दिया जाता है. ऐसे मिथों की उम्र सीमित होती है. जबकि धर्म और संस्कृति के नाम पर गढ़े गए मिथ व्यावहारिक जीवन में वास्तविक पात्रों के मुकाबले अधिक शक्तिशाली तथा प्रभावी सिद्ध होते हैं. विशेषकर पारंपरिक समाजों में जो किसी कारण आधुनिक चेतना और शिक्षा से वंचित हैं. ऐसा उन समाजों में भी देखने को मिलता है जो अपनी प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति को लेकर श्रेष्ठताबोध से पीड़ित हों. ऐसे लोग अपने अधिकांश निर्णय, विशेषरूप से परिवार एवं समाज से जुड़े मामलों में, परंपरा और संस्कृति के आधार पर लेते हैं. वहां मिथ बड़ी आसानी से लोगों के सामान्य व्यवहार का हिस्सा बन जाते हैं. संस्कृति स्वयं ऐसे मूल्यों एवं परंपराओं के सहारे गढ़ी जाती है, जिनकी जड़ें सुदूर अतीत तक फैली हों. कभी-कभी इतिहास भी इनकी जकड़ में आ जाता है. हालांकि यह तभी होता है जब संस्कृति पर वर्गीय चरित्र हावी हों.

अशिक्षित समाज अपनी परंपरा एवं संस्कृति को स्मृति के सहारे सहेजता है. ऐसे में मिथों का जानकर अथवा उनकी व्याख्या का दावा करने वाला वर्ग, उन प्रतीकों को संस्कृति का हिस्सा बनाने में सफल हो जाता है, जिनसे उसके स्वार्थ जुड़े हुए हों. उन्हें लेकर कुछ कहानियां गढ़ ली जाती हैं. बार-बार सुने-सुनाए जाने तथा लोगों का विश्वास हासिल कर लेने के पश्चात वे मिथ में ढल जाती हैं. मिथों को लेकर समाज प्रायः दो वर्गों में बंटा होता है. एक वर्ग हमेशा ऐसे मिथों को जीवन की मुख्य प्रेरणा तथा जीवनीशक्ति के रूप में प्रस्तुत करने में लगा रहता है. उसके सदस्य संख्या में कम परंतु समाज में शिखर हैसियत वाले लोग होते हैं. दूसरा वर्ग मिथों की अद्वितीयता में विश्वास रखने वाला, उन्हें अपनी प्रेरणा और मार्गदर्शक मानने अधिसंख्यक लोगों का होता है. समाज की प्रमुख उत्पादक शक्ति होने के बावजूद सामाजिक संरचना में उनका स्थान गौण होता है. उनके लिए आजीविका से जुड़े प्रश्न बेहद महत्त्वपूर्ण होते हैं. उनमें वे इतने उलझे होते हैं कि मिथों की अंतर्रचना तथा उनकी सामाजिकी के बारे में शंका करने या सवाल उठाने का समय ही नहीं मिल पाता. समाज से जुड़े से रहने की इच्छा भी थोपे गए मिथों को अपनाने के लिए विवश कर सकती है. जनसाधारण की आस्था एवं विश्वास के बल पर मिथ पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपनी जगह बनाते जाते हैं. प्रचलित परिभाषा में वे लोगों की प्रमुख मार्गदर्शक शक्ति, उनका धर्म बन जाते हैं. अपनी जरूरत तथा आस्था के अनुसार समाज उनके साथ ऐसे मूल्य जोड़ता चला जाता है, जिन्हें वह अपने स्थायित्व के लिए अत्यावश्यक मानता है. सांस्कृतिक मूल्य का परिवर्तनशील होते हैं. हालांकि उसकी गति बहुत धीमी होती है. सामाजिक मूल्यों में पर्याप्त लचीलापन समाज हित में होता है. फिर भी कभी शिक्षा की कमी तो कभी अंध-श्रद्धा के कारण जनसाधारण, यहां तक कि कुछ विशिष्ट जन भी—उन मूल्यों को मिथों में अधिष्ठित तथा उन्हीं से उत्पत्तित माने रहता है.

कभी-कभी परंपरा के प्रति दुराग्रहों का आवेग स्थापित जीवनमूल्यों को भी मिथ बना देता है. महाभारत में हम भीष्म की प्रतीज्ञा को मिथ बनते हुए देखते हैं. भीष्म का पूरा जीवन वचनबद्धता का अतिरेक है. आगे चलकर वही महाभारत का कारण बनता है. कुरुक्षेत्र में अर्जुन को कमजोर पड़ते देख कृष्ण युद्ध में शस्त्र न उठाने की अपनी ही प्रतीज्ञा तोड़, भीष्म को संदेश देना चाहते हैं कि दुराग्रह किसी भी सद्गुण को अवगुण बना सकते हैं. आपत्काल में स्थापित नियमों और परंपराओं पर पुनर्विचार किया जा सकता है. लेकिन भीष्म के लिए उसकी प्रतीज्ञा ही परमसत्य है. महाभारत की कथा भीष्म की सफलताओं और असफलताओं से भरी पड़ी है. वह महाभारत का सबसे दुखी पात्र है. अत्यंत बलशाली होने के बावजूद जिस वर्ग में वह रहता है, उसी को पराजय का सामना करना पड़ता है. एक सद्गुण को मिथ की तरह जीने की सजा न केवल भीष्म, बल्कि पूरे हस्तिनापुर को झेलनी पड़ती है. धर्मयुद्ध में विजेता का पक्ष देवता तथा न्याय का पक्ष भी होता है. वर्चस्वकारी संस्कृति के समर्थक कृष्ण को ईश्वर का दर्जा देते हैं. ऐसे लोग विजेता के पक्ष को अपना पक्ष माने रहते हैं. निहित स्वार्थ के लिए ऐसे ही लोग भीष्म को त्याग और वीरता का पर्याय घोषित कर देते हैं. उसके चलते सरोकारविहीन ‘वचनबद्धता’ प्रतीज्ञा का आदर्श मान ली जाती है.

राम, कृष्ण, शिव, महादेव, गणेश, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, हनुमान आदि भारतीय संस्कृति के स्थापित मिथ हैं. इनमें तात्कालिक जीवनमूल्यों को जिन्हें सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की लालसा में गढ़ा गया था—इस तरह केंद्रीभूत किया गया है कि शताब्दियों के बाद भी वे चरित्र हमारे मनस् में रूढ़ बने हुए हैं. अंध-आस्था के योग से वे मिथ इतने प्रभावशाली हो चुके हैं कि स्वार्थवश अथवा अज्ञानता के कारण काल्पनिक प्रतीकों के आगे हमें यह जीता-जागता संसार भी भ्रम और माया लगता है. उनपर थोपे गए चरित्र से मामूली विक्षेप भी हमें उत्साही कर्म लगता है. ऐसे ही परिवेश में सांप्रदायिकता पनपती है तथा मिथों के दुरुपयोग की संभावना बराबर बनी रहती है. इन्हीं मिथों में से एक दुर्गा, ‘नारी-शक्ति’ का प्रतीक है. मिथ के रूप में उसकी जो भूमिका शास्त्रों(मार्कंडेय पुराण) में तय है, उसमें स्त्री-सुलभ गुणों का कोई योग नहीं है. शत्रु-हंता के रूप में उसे शिव की अर्धांगिनी के रूप में दर्शाया जाता है. उसका मूल चरित्र चामुंडा के करीब है, जो स्वयं असुरों की मातृदेवी से अनुप्रेत है. ज्यादा दिन नहीं हुए हैं जब दलितों की भांति चामुंडा का स्थल गांव-बाहर हुआ करता था. वे ग्रामदेवी की भांति पूजी जाती थीं. उनकी प्रतिष्ठा निचली और किसान जातियों में थी. ब्राह्मण और क्षत्रिय स्थापित पुरुष देवताओं की ही पूजा करते थे.

हिंदू संस्कृति में गृहस्थी पालन भी धर्माचरण है. हनुमान जैसे अर्धदेवता को छोड़ दें तो लगभग सभी देवता विवाहित हैं. उनकी पत्नियां ठीक उसी प्रकार पति-अनुगामिनी हैं, जैसी सामान्य भारतीय पत्नियां होती हैं. परमशक्तिशाली त्रिदेव की पत्नियों पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती की भी यही स्थिति है. हनुमान को रूद्र का अवतार माना गया है, लेकिन रामायण आदि ग्रंथों में जिस तरह से उसका चित्रण है, उससे जाहिर होता है कि हनुमान की शक्तियां उसकी अपनी नहीं हैं. वे किसी न किसी देवता का वरदान हैं. यह तर्क शौर्य की देवी दुर्गा पर भी लागू होता है. मार्कंडेय पुराण के अनुसार उसका जन्म विष्णु की नाभि से हुआ है. असुरों से लड़ने में सक्षम बनाने के लिए विभिन्न देवताओं ने उसे अपनी शक्तियां अंतरित की थीं. पुराणों में जगह-जगह पार्वती, लक्ष्मी और दुर्गा को समकक्ष माना गया है. ऐसा एकेश्वरवाद की भावना के चलते हुआ. भारत में कुछ उपनिषदें भले ही एकेश्वरवाद का समर्थन करती हों, व्यवहार में वह बहुदेववाद ही प्रचलन में रहा है. पंडित-पुरोहितों के स्वार्थ जो उससे जुड़े थे. मगर सूफी मत के रूप में दक्षिण भारत पहुंचा इस्लाम का एकेश्वरवादी दर्शन भारतीय समाज में भी जगह बनाने लगा था. हिंदू धर्म में रहकर जातीय उत्पीड़न से त्रस्त लोगों को सूफियों का एकेश्वरवाद बहुत पंसद आया था. उसकी प्रेरणा से दक्षिण में भी संत आंदोलन का सूत्रपात हुआ. आगे चलकर, हिंदुओं का इस्लाम की ओर पलायन रोकने के लिए ही शंकराचार्य को एकेश्वरवाद के समर्थन में आना पड़ा. यह भी कह सकते हैं कि इस्लाम के राजनीतिक, धार्मिक हमले से बचने के लिए वैष्णव, शैव, पाशुपत, तांत्रिक, पुराणिक, स्मार्त्त आदि मतावलंबियों को एकजुट होकर, निजी पहचान के संकट पर भी, वेदांत का समर्थन में आना पड़ा था.

दुर्गा की कथा मार्कंडेय पुराण में ‘देवी महात्म्य’ के अंतर्गत शामिल की गई है. मार्कंडेय पुराण को एफ. ईडन पार्जिटर ने लगभग नवीं शताब्दी की रचना माना है. ‘देवी महात्म्य’ की उपलब्ध प्रतियों में सबसे पुरानी प्रति नबारी लिपि में है, जिसे हरप्रसाद शास्त्री ने ‘रायल लायब्रेरी ऑफ नेपाल’ से प्राप्त किया था. उसपर 998 ईस्वी की तिथि अंकित है. तदनुसार पार्जिटर इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि मार्कंडेय पुराण का लेखनकाल नवीं या दसवीं शताब्दी होना चाहिए. पुराणों का रचनाकाल ईसापूर्व तीसरी-चौथी शताब्दी से 1000 ईस्वी तक फैला हुआ है. इसकी संभावना है कि पुराणों की रचना बौद्ध एवं जैन कथाओं की प्रेरणा से हुई थी. हालांकि रामायण एवं महाभारत में सैकड़ों उपकथाएं प्राप्त होती हैं, लेकिन जिस रूप में वे आज हमें प्राप्त हैं, वह ईसा पूर्व दूसरी-तीसरी शताब्दी से पहले का नहीं है. जाहिर है, कहानी की ताकत को पहचानकर उसकी पहुंच का उपयोग ब्राह्मणों ने अपने धर्म-दर्शन के प्रचार-प्रसार के लिए किया. चूंकि आरंभिक वैदिक धर्म केवल और केवल ब्राह्मणों द्वारा ब्राह्मणों के लिए रचा गया था, इसलिए पुराणादि ग्रंथ प्रकारांतर में ब्राह्मणवाद के प्रचार-प्रचार का माध्यम बन जाते हैं. उनकी कहानियां पाठक का मनोरंजन तो करती हैं, परंतु खास संदेश नहीं दे पातीं. इसके विपरीत जातक कथाओं तथा जैन कथाओं में, भले ही बुद्ध के माध्यम से हो, एक नैतिक संदेश छिपा हुआ रहता है.

आरंभिक संस्कृत ग्रंथों में मुख्यतः ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्गों की उपस्थिति है. बाकी वर्ग या तो उपेक्षित हैं अथवा उनका उपयोग वहीं तक सीमित है, जहां तक वे ब्राह्मणवाद का समर्थन करते हों. उससे प्रतीत होता है कि आरंभिक ऋषिगण आत्ममुग्ध समाज का हिस्सा थे. और बाकी जनसमाज से कटे-छंटे रहते थे. यज्ञ बलि के लिए पशु अथवा अन्य समिधा की आवश्यकता पड़ती तो उसके लिए राजाओं से मांग लिया करते थे. जो पुनः अपनी प्रजा से जुटाता था. बाद के ग्रंथों में जिनमें मार्कंडेय पुराण भी है, वैश्य वर्ण से जुड़ी कहानियां भी आती हैं. इस पुराण का मुख्य भाग ईसा से तीसरी-चौथी शताब्दी की रचना हैं. जब वैश्य समुदाय मजबूत आर्थिक शक्ति के रूप में खुद को स्थापित कर चुका था. यदि ऋषिगण अलग-थलग रहते थे तो प्रजा का क्या धर्म था? ब्राह्मण ग्रंथों में इसकी कोई चर्चा नहीं है. क्योंकि उस ओर उस समय के बुद्धिजीवी ब्राह्मणों का ध्यान ही नहीं था. लेकिन बौद्ध और जैनग्रंथों में छह भौतिकवादी संप्रदायों का कई जगह उल्लेख किया गया है. वे आजीवक और लोकायत मत के प्रवर्त्तक थे तथा आजीविका को प्रमुख मानते थे. ऋषियों के आश्रम उनके लिए ऐसे ही रहे होंगे जैसे कुछ यायावर कबीले आकर गांव बाहर डेरा डाल लें.

अपने धर्म-दर्शन के प्रचार के लिए बुद्ध ने क्षत्रियों के अलावा उन वर्गों पर ज्यादा ध्यान दिया था, जो ब्राह्मण धर्म से बाहर थे. या बुद्ध के विचारों से सहमत होकर उनके दर्शन की ओर आकृष्ट हुए थे. बुद्ध ने अपने उपदेशों के लिए पालि को इस्तेमाल किया था, जो उन दिनों आमजन की भाषा थी. श्रेष्ठताबोध से दबे ब्राह्मण संस्कृत के दायरे से बाहर आने की हिम्मत न जुटा सके. पुराकथाओं में उन्होंने सृष्टि निर्माण का ठेठ ब्राह्मणवादी नजरिया पेश किया. मार्कंडेय पुराण में मनु और इंद्र के उत्तराधिकारियों की चर्चा है. इनके बीच देवी महात्म्य का सम्मिलित होना अवांतर कथा जैसा है. इसलिए पार्जिटर उसे प्रक्षिप्त मानता है. देवी महात्म्य गीता की तरह सात सौ पदों में फैला हुआ है. पार्जिटर ने यह संभावना भी व्यक्त की है कि मार्कंडेय के अनुयायी उन्हें अपने समय के व्यास के सदृश सिद्ध करना चाहते थे. दूसरे यदि मार्कंडेय पुराण का मूल हिस्सा तीसरी-चौथी शताब्दी की है तब भी दो मुख्य प्रश्न विचार के लिए आवश्यक है. यदि मार्कंडेय पुराण तीसरी-चौथी शताब्दी की रचना है तो क्या उस समय ‘दुर्गा महात्म्य’, भले की स्वतंत्र कृति के रूप में—मौजूद था?  मेरा अनुमान है कि दुर्गा और काली का रूप अन्यत्र देखने को नही मिलता. दुर्गा की महत्ता कदाचित उस दौर में मिली जब पुरुष सत्तात्मक राज्य उजड़ने लगे थे. उनके राजाओं का वैभव क्षीण पड़ चुका था. वह महमूद गजनवी के आने का था. एक के बाद एक हिंदू राजा पराजित हो रहे थे. उस समय लगा कि कदाचित असुर शक्ति से लैस, कोई स्त्री-शक्ति ही उनकी रक्षा कर सकती है. दुर्गा की रचना उन्होंने इसी उद्देश्य से की, बाद में उसे मार्कंडेय पुराण का हिस्सा बना दिया गया.

छंदों की संख्या के कारण ‘दुर्गा महात्म्य’ को ‘दुर्गा सप्तशती’ भी कह दिया जाता है. उसके हिंदी अनुवाद गद्य और पद्य में पहले भी आ चुके हैं. जहां तक मुझे याद पड़ता है, डॉ. राष्ट्रबंधु ने भी ‘दुर्गा सप्तशती’ का काव्यानुवाद किया था. उस अनुवाद के बारे में इससे अधिक जानकारी मुझे नहीं है. इस काम को लेकर हाल ही में एक और नाम जुड़ा है. वह हैं—डॉ. रामपुनीत ठाकुर ‘तरुण’ तथा पुस्तक का शीर्षक है—‘दुर्गाचरित.’ पुस्तक को छापा है, समीक्षा प्रकाशन मुजफ्फरपुर. डॉ. तरुण हिंदी के सिद्ध-हस्त कवि हैं. उनके इस अनुवाद को देख कर इसपर विश्वास होने लगता है. अनुवाद सहज, सरल एवं बोधगम्य है. चौपाई, दोहा आदि रामायण के प्रचलित छंदों में लिखे जाने से पुस्तक की पठनीयता में इजाफा हुआ है. पाठक बड़ी सहजता से पाठ को आत्मसात करता चला जाता है. फिर भी कुछ प्रश्न ‘दुर्गा चरित’ को पढ़ते समय दिमाग में कौंध सकते हैं. जैसे कि कोई लेखक या रचनाकार ऐसी पुस्तकों का चयन ही क्यों करता है, जिनमें उसे मौलिक प्रयोग के न्यूनतम अवसर उपलब्ध हों? दूसरे क्या ऐसी पुस्तकों में लेखक को अपनी ओर से कहने-जोड़ने का क्या कोई अवसर उपलब्ध नहीं होता? इनमें सबसे पहला प्रश्न तो आस्था का है. कदाचित लेखक की अपनी आस्था ही उसे ऐसे ग्रंथों की ओर ले जाती है. स्वयं तुलसीदास इसी भावना के साथ रामचरितमानस की ओर आकृष्ट हुए थे.

मातृशक्ति के रूप में दुर्गा का मिथ हमें हजारों साल पुरानी उस संस्कृति की याद दिलाता है, जो मातृशक्ति प्रधान थी. सिंधू सभ्यता के उत्खनन से जो मूर्तिशिल्प प्राप्त हुए हैं, उनमें एक प्रसिद्ध मातृदेवी की मूर्ति है. ध्यातव्य है कि मातृदेवी की प्रतिमा से मिली-जुली प्रतिमाएं लगभग सभी सभ्यताओं में प्राप्त हुई हैं. उससे दो निष्कर्ष निकाले जाते हैं. पहला आरंभिक संस्कृतियां आपस में जुड़ी हुई थीं. उनके बीच व्यापारिक-सांस्कृतिक संबंध थे. दूसरे यह कि संस्कृति का सीधा संबंध उत्पादन व्यवस्था से होता है. चूंकि आदिम सभ्यताओं में उत्पादन का तौर-तरीका लगभग मिलता-जुलता था, इसलिए उनकी पूजा पद्धतियां, अध्यात्म चेतना आदि में भी अप्रत्याशित समानताएं नजर आती हैं.

जैसा कि ऊपर कहा गया है, प्रस्तुत अनुवाद सरल, सहज और बोधगम्य है. इसके लिए कवि बधाई का पात्र है. मुझे यहां विनोबा की याद आ रही है. संत ज्ञानेष्वर की ‘ज्ञानेश्वरी’ की महाराष्ट्र में बड़ी प्रतिष्ठा है. विनोबा की मां ने उसका सरल मराठी में अनुवाद करने को कहा. मां की इच्छापूर्ति के लिए विनोबा ने ‘ज्ञानेश्वरी’ को सरल ‘गीताई’ के रूप में अनुदित किया. जब वह पुस्तक प्रकाशित होकर बाजार में आई, तब तक मां दुनिया छोड़ चुकी थी. परंतु ‘गीताई’ के रूप में ‘ज्ञानेश्वरी’ महाराष्ट्र के घर-घर तक पहुंच गई. इसे अनुवाद की ताकत भी कह सकते हैं. फिर भी एक बात अखरती है. रचनाकार के लिए आवश्यक है कि उसकी रचना नए विमर्श का दरवाजा खोले. यदि धर्म उसका केंद्रीय विषय है तब भी वह केवल श्रद्धालुओं तक सिमटकर न रह जाए. उसमें साहित्य और दर्शन के विद्यार्थियों के लिए भी संभावना हो. अनूदित पुस्तकों में प्रयोग के सीमित अवसर होते हैं. इसलिए उनमें भूमिका का महत्त्व रचना जैसा ही है. भूमिका में लेखक-रचनाकार न केवल रचना की ऐतिहासिकी पर विचार करता है, अपितु उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका तथा नए अनुवाद, प्रस्तुतीकरण के औचित्य पर भी अपना पक्ष रचता है. प्राचीन पुस्तकों के अनुवाद के लिए ‘एशियाटिक सोसाइटी ऑफ कलकत्ता’ कुछ मार्गदर्शक नियम बनाए थे. उनमें से एक पुस्तक का विस्तृत विवेचनात्मक परिचय भी था. ‘दुर्गा चरित’ सहज अनुवाद की शर्त को तो पूरा करती है, परंतु उसमें सिवाय शैली के, नएपन का अभाव है. अतएव उन लोगों के लिए जो ‘दुर्गामहत्म्य’ के कवित्व का आनंद लेना चाहते हैं, मगर संस्कृत का ज्ञान नहीं रखते, उन्हें यह पुस्तक खूब पसंद आएगी. लेकिन विद्यार्थियों और आलोचकों के लिए पुस्तक में आत्मतुष्टि के बहुत कम अवसर हैं.

फिर भी सहज, सरल अनुवाद और शैलीगत प्रबंध के लिए कवि बधाई का पात्र है.

ओमप्रकाश कश्यप



ओमप्रकाश कश्यप

जी-571, अभिधा, गोविंदपुरम

गाजियाबाद-201013

कसौटी पर समय

सामान्य

 समय : सच या आभास

समय न तो गति के समरूप है, न ही उससे पूर्णतः स्वतंत्र. उसका कार्य दोनों के अंत:संबंध को दर्शाना है…..यहां एक प्रश्न जोड़ सकते हैं. जैसे जहां समय न हो, क्या वहां ‘पहले’ या ‘बाद में’ जैसा कुछ हो सकता है? या फिर जहां संपूर्ण गतिहीनता हो, क्या वहां समय की उपस्थिति की संभावना है? चूकि समय किसी गति से संबंधित संख्यामात्र है, अतएव यदि समय सार्वकालिक है तो गति को अनंत होना ही चाहिए—अरस्तु, फिजिक्स.

इस लेख का उद्देश्य न तो बालक को समयप्रबंधन के गुर सिखाना है. न उसे समयसंबंधी दार्शनिक जटिलताओं में उलझाना. हम बालक तथा उसके समयबोध को लेकर सामान्य चर्चा करेंगे. यह जानने की कोशिश करेंगे कि बालक की जो समयसंबंधी प्रतीतियां हैं; समय के बारे में उसे जितना और जैसा समझाया जाता है, क्या उसके समयप्रबोधन का वही एकमात्र और सही तरीका है? बालक के व्यक्तित्व पर समय से संबंधित ऐसी प्रतीतियों और प्रज्ञप्तियों का जो तर्क एवं ज्ञान से परे, केवल सुनीसुनाई बातों अथवा पूर्वाग्रहों पर आधारित हैं—क्या कोई दुप्रभाव पड़ता है? क्या वे बालक के स्वतंत्र विवेक की राह में बाधक हैं? आदिकाल से ही मानवमन में एक किस्सागो बैठा हुआ है, जो मनुष्य को अपने आसपास के परिवेश के बारे में झूठीसच्ची कहानियां गढ़ने; तथा उनके साथ किसी न किसी रूप में अपना संबंध स्थापित करने को प्रेरित करता रहता है. आमतौर पर वे कहानियां संबंधित समाज की सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक मानी जाती हैं. धर्म, ईश्वर, किस्मकिस्म के देवीदेवता सब उसी मानस किस्सागो की कल्पना हैं. क्या समय भी मनुष्य की ऐसी ही रोचक परिकल्पना है?

स्पर्धा के इस युग में बालक को अन्य चुनौतियों के साथसाथ समय की चुनौती से भी जूझना पड़ता है. जो लोग समय को अनादि, अनंत तथा सतत प्रवाहमान मानते हैं, वही उसकी कमी का हवाला देकर बालक को डराते रहते हैं. खुद को ‘बड़ा’ समझने वाला प्रत्येक व्यक्ति बालक को सावधान करता है—‘समय बरबाद मत करो. वह किसी की प्रतीक्षा नहीं करता. जराभी चूके तो हाथ से फिसल जाएगा….समय के साथ चलो, चलते रहो, नहीं तो पिछड़ जाओगे.’ ऐसे निर्देश बालक को अभिभावकों तथा अध्यापकों की ओर से निरंतर, इतनी बार तथा इतनी तरह से सुनने को मिलते हैं कि उसका आत्मविश्वास डगमगाने लगता है. अपनी सीमाओं में वह समय की चुनौतियों से निपटने की कोशिश भी करता है. उसके लिए समयसारणी बनाता है. अपने अध्ययनकार्य को छोटेछोटे उपखंडों में बांटता है. घड़ी की टिकटिक के साथ सामंजस्य बैठाने की कोशिश करता है. इसके बावजूद चुनौती बनी ही रहती है. क्योंकि खंडोंउपखंडों में समाहित प्रत्येक घटना बालक के अधिकार में नहीं होती. किसी न किसी रूप में दूसरे भी उससे जुड़े होते हैं. नई शिक्षा व्यवस्था में सहयोग की अपेक्षा स्पर्धा पर ज्यादा जोर दिया जाता है. पर्याप्त सहयोगसमर्थन के अभाव में बालक अपनी ही बनाई समयसारणी के हिसाब से पिछड़ने लगता है. बड़े टोकते हैं. बालक कोशिश करता है. कभी सफल होता है, कभी परिस्थितियां भारी पड़ जाती हैं. ऐसे में समय हाथ से निकल जाने की चिंता बालक का पीछा नहीं छोड़ती. धीरेधीरे वह उसके आत्मविश्वास पर भारी पड़ने लगती है. ऐसा नहीं है कि केवल बालक ही समय के बारे में प्रचलित पूर्वाग्रहों से प्रभावित होता है. बड़े भी उससे मुक्त नहीं रह पाते. समयसंबंधी पूर्वाग्रह तो प्रायः बड़ों के माध्यम से ही बच्चों तक पहुंचाए जाते हैं. बालक उन्हें लंबे समय तक, कभीकभी जीवनभर विरासत के तौर पर संभाले रखता है.

सामान्य दिनचर्या में समय को ‘सर्वशक्तिमान’ के रूप में पेश किया जाता है. ऐसा महानायक जो देवीदेवताओं से भी ऊपर, सीधे ईश्वर के अधीन है. जो एकमात्र ईश्वर का आदेश मानता है. कभी बताया जाता है कि खुद ईश्वर भी समय के बंधन में बंधा है. भारतीय समाज की जो स्थिति है, उसमें किशोरावस्था तक पहुंचतेपहुंचते बालक अंधश्रद्धा का शिकार हो चुका होता है. उसके बाद वह तर्क छोड़ आस्था की राह पकड़ लेता है; तथा दैवीय अनुकंपा को समस्त समस्याओं का एकमात्र समाधान मानने लगता है. ईश्वर का जिक्र हो तो वह सर्वशक्तिमान के रूप में सर्वप्रथम उसी की कल्पना करता है. किंतु अगले ही क्षण जब समय की चुनौती सामने होती है, तब वही उसे सर्वशक्तिमान नजर आने लगता है. समय और ईश्वर को लेकर गढ़ी गई कहानियां भी एकदूसरे में गड्डमड्ड होती हैं. उनमें कहीं ईश्वर समय पर भारी पड़ता है तो कभी समय ईश्वर के सामने चुनौती बन जाता है. इससे बालक की उलझन सुलझने के बजाय और भी उलझ जाती है. भ्रांत बालमन समझ ही नहीं पाता कि ईश्वर हो अथवा समय, दोनों में कोई एक ही सर्वशक्तिमान हो सकता है. ऊहापोह में वह किसी कार्य को तत्संबंधी घटनाओं के संबंध में देखनेसमझने के बजाय, आस्था और पूर्वाग्रहों द्वारा नियंत्रित होने लगता है.

रोजमर्रा के कार्य के सिलसिले में बालक द्वारा घड़ी देखने का सिलसिला सुबह के साथ आरंभ हो जाता है. उसके बाद नहाने, नाश्ता करने, स्कूल जाने, स्कूल में टाइमटेबिल के अनुसार विभिन्न विषयों का पाठ करने, लंच करने, खेलने, घर लौटने, आराम करने, होमवर्क निपटाने, टेलीविजन देखने, भोजन करने से लेकर रात को बिस्तर तक जाने के बीच अपने मातापिता की भांति बालक भी समय के हिसाबकिताब में उलझा रहता है. उसके समस्त कार्यकलाप छोटेछोटे टाइमपॉकेट में बंधे होते हैं. हर पीरियड के साथ स्कूल की घड़ी बदले समय और चुनौती का एहसास कराती है. बीचबीच में जब भी घटनाक्रम बदलता है, बालक की निगाहें घड़ी की सुइयों में उलझकर रह जाती हैं. उसके सामने चुनौती होती है कि वह न केवल समय के साथ अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित रखे साथ ही सहपाठी अथवा समवयस्क बच्चों, जिनके साथ उसकी प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष स्पर्धा है, से जरूरी बढ़त भी बनाए रखे. दूसरों के बराबर रहने वाले को यहां औसत तथा पीछे रहने वाले को फिसड्डी मान लिया जाता है. समय और समवयस्क बच्चों के साथ स्पर्धा बालक को अनावश्यक रूप से तनावग्रस्त रखती है. इसके अलावा एक जैविक घड़ी भी होती है. उसके बारे में आवश्यक नहीं कि बड़े ही बालक को समझाएं. उसका एहसास प्रकृति स्वयं कराने लगती है. जैसी भूख भोजन तथा थकान आराम की जरूरत की ओर संकेत करने लगती है.

सुबह से शाम तक अनगिनत बार घड़ी देखने से जो प्रथम प्रभाव बालक के मनोमस्तिष्क पर पड़ता है, वह यह कि घड़ी की सुइयां ही समय हैं. कि अपनी महीन टिकटिक के साथ घड़ी विराट समय को अपने भीतर समेटे है. घड़ी की सुइयां आगे बढ़ेंगी, तभी समय आगे खिसकेगा. बालक ही क्यों? घर में मातापिता, स्कूल में अध्यापकगण, मित्रहितैषी, सगेसंबंधी सभी सीधे घटनाओं पर नजर रखने, उन्हें नियंत्रित करने के बजाए—घड़ी की सुइयों से नियंत्रित होने लगते हैं. स्पर्धा में समय से पिछड़ जाने की आशंका बालक को अनावश्यक चिंता में डाल देती है. उसका आत्मविश्वास आहत होने लगता है. उस समय बालक को यह बताना आवश्यक है कि घड़ी की टिकटिक समय नहीं है. वह स्वयं एक घटना है, सिर्फ घटना. उसका कार्य किन्हीं दो घटनाओं के बीच का अंतराल बताना है. उन अनेक घटनाओं में से एक, जो अनंत ब्रह्मांड के भीतर और बाहर, लगातार घटती रहती हैं. जो समय को घटनाओं के प्रवाह के रूप में देखते हैं, वे उनमें रमे रहकर भी अपना नियंत्रण बनाए रखते हैं. ऐसे लोगों के लिए समय चुनौती नहीं बनता. बालक को बताया जाना चाहिए कि समय घटनाओं की अन्विति से परे कुछ नहीं है. कि घटनाओं पर विजय पाना, उनके साथ सामंजस्य बनाकर चलना—कठिन भले हो, असंभव नहीं है. कि इस धरती पर ऐसे नरपुंगव भी हुए हैं जिन्होंने समय को न तो देवता माना, न उसकी कभी परवाह ही की. बिना परिस्थितियों से घबराए, चुनौतियों को स्वीकार करके ही वे इस दुनिया को अपनी इच्छानुसार चलाने में कामयाब होते आए हैं. ऐसा बोध बालक के आत्मविश्वास को बढ़ा सकता है. प्रायः ऐसा नहीं होता. क्योंकि समय को ‘नियति’ और ‘भाग्य’ के समकक्ष रखने वाले, दोनों को परस्पर पर्याय मानने वाले, बालक के मातापिता समय को परमनियंता और महाशक्तिशाली मान स्वयं उससे भयभीत रहते हैं.

भारतीय दर्शनों में समय पर विचार किया गया है, किंतु उनमें तत्वपरक सामग्री का अभाव है. उसे या तो ईश्वरीय शक्ति के समकक्ष रखकर मनुष्य का भाग्यनियंता बताया गया है; अथवा घटनाओं तथा उनके वेग के प्रतिफल के रूप में दर्शाया जाता है. भारतीय प्रज्ञा की कमजोरी है कि वह तर्क और विवेक से अधिक, आस्था और पूर्वाग्रहों से प्रेरणा ग्रहण करती है; और उससे बहुत कम बाहर निकल पाती है. समय को लेकर वस्तुनिष्ट चिंतन के अभाव का भी यही कारण है. पूर्वाग्रहों के दबाव में हम समयसंबंधी प्रज्ञप्तियों जिन्हें समयाभास भी कहा जा सकता है, को अपने आसपास घट रही घटनाओं के सापेक्षिक वेग, परिवर्तनशीलता, पदार्थ की विशेष अवस्था आदि के संदर्भ में देखने के बजाए स्वतंत्र सत्ता माने रहते हैं. यह ‘कार्य’ को ‘कारण’ मान लेने जैसी गंभीर चूक है, जिसके साधारण और विशेष सभी लोग शिकार होते आए हैं.

आगे बढ़ने से पहले समय और समयबोध की ओर संकेत करना आवश्यक है. जैसा ऊपर संकेत किया गया है, समय को लेकर दो प्रकार की प्रज्ञप्तियां आमतौर पर प्रत्येक मनस् में होती हैं. ये एक साथ भी हो सकती हैं तथा एकदूसरे से स्वतंत्र भी. पहली मान्यता के अनुसार समय कोई भागती हुई चीज है. नदी की मानिंद सतत प्रवाहमान. भूतवर्तमान और भविष्य में निरूपित. एक के बाद एक गुजरते रातदिन इसका उदाहरण हैं. जॉन मेकटेग्गार्ट ने इसे ‘ए’ श्रेणी माना है. यानी वह समय जिसे हम श्रेणीबद्ध रूप में अपने सामने से गुजरते हुए देखते हैं. उसका एक उदाहरण इतिहास लेखन भी है. हमारे सामान्यबोध की शुरुआत ही सौर दिवस से होती है. आदमी रोजमर्रा के कार्यों को अपनी जरूरत, सुविधा अथवा दायित्वभावना के आधार पर, छोटीछोटी घटनाओं में बांट लेता है. उन घटनाओं की सापेक्षिक गति ही समयाभास का कारण बनती है. इस मान्यता के अनुसार समय दो संबद्ध घटनाओं के बीच का अंतराल है, जो उनके घटने की दर को दर्शाता है. उससे घटना की अनुभूति तथा उसकी सापेक्षिक गति का आकलन किया जा सकता है. समय पर विचार करते हुए इस तथ्य को प्रायः नजरंदाज कर दिया जाता है कि ब्रह्मांड में घट रही अनंत घटनाओं की भांति सौर दिवस भी प्राकृतिक घटना है. पृथ्वी का अपनी धुरी पर घूमना इस घटना को अंजाम देता है. दिनरात को जन्म देने वाली यह घटना भी अपने आप में पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है. पृथ्वी अपने केंद्र पर घूमने के अलावा सूर्य की कक्षा में भी चक्कर काटती रहती है. इससे दिनरात के कुल समय में भले ही ज्यादा अंतर न पड़ता हो, मगर उनकी अवधि घटतीबढ़ती रहती है. यह समय अथवा समयाभास की सापेक्षिकता का द्योतक है.

उपर्युक्त से निष्कर्ष निकलता है कि घटनाएं तथा उनका आधार यह सततपरिवर्तनशील ब्रह्मांड—शाश्वत हैं. समय वह अंतराल है, जिसमें हम ब्रह्मांड की विभिन्न गतिविधियों के अंतराल का अनुभव करते हैं; तथा जिसके माध्यम से उनकी गति का आकलन किया जा सकता है. परिवर्तन को सृष्टि का मूल लक्षण बताने वाला यूनानी विचारक हेराक्लीट्स कहता है—‘प्रत्येक वस्तु गतिमान है. तुम किसी नदी में दुबारा हाथ नहीं डाल सकते.’ समय को सतत प्रवाह मानने वाली विचारधारा भी कहती है—‘बीता हुआ समय लौटकर नहीं आता. हम किसी क्षण को दुबारा नहीं जी सकते.’ समय की इस परमभौतिकता को वैरागी भृर्तहरि अपनी तरह से अभिव्यक्त करता है—‘कालो न यातं वयमेव याताः’—‘समय नहीं गुजरता, हम गुजरते हैं.’1 अरस्तु समय को अवधि(अंतराल) के रूप में देखता था. उसके लिए समय किसी क्रिया की पूर्वकालिक एवं उत्तरकालिक अवस्था की आवधिक गणना है. वह लिखता है—

यदि आत्मा की सत्ता नहीं थी, उस अवस्था में समय की सत्ता रही होगी या नहीं—यह जिज्ञासा सीधेसीधे एक प्रश्न पर ले आती है. जहां कोई गिनने वाला ही नहीं है, वहां ऐसी चीज भी नहीं हो सकती, जिसे गिना जा सके.’2

समय का तारतम्यता वाला लक्षण बालक के लिए सदैव तनाव या चुनौतियां पेश करे, ऐसा नहीं होता. यह बालक को निश्चिंत भी करता है. बालक अथवा किशोर जब अपने मातापिता या दादादादी, नानानानी को क्रमशः वृद्धावस्था और मृत्यु की ओर अग्रसर देखता है, तब उसके अवचेतन में सहज रूप से यह भाव उत्पन्न होता है कि उसके जीवन की तो अभी बस शुरुआत है. जीने के लिए बड़ा हिस्सा अभी शेष है; तथा सामाजिक जिम्मेदारियों का दौर लंबे अंतराल के पश्चात आरंभ होने वाला है. यह विश्वास बालक को अवसाद से बाहर रखने में मदद करता है. इससे बालक और समय अथवा समयाभास के बीच अनूठा संबंध बनता है, जो उम्मीदों से लबालब और सकारात्मक होता है. यह निश्चिंतता उसे नितनवीन सपने देखने को प्रेरित करती है. छोटा बालक उमंगों से सराबोर रहता है. मनमानी शरारतें करता है. भविष्य के प्रति आशावान रहता है. उसकी कल्पना बड़ों की अपेक्षा ज्यादा रंगीन होती है. ये सब उसे अधपकी उम्र में जिम्मेदारियों से सीधे टकराने, टूटकर बिखर जाने से बचाते हैं.

सामान्य भौतिकी के लिए समय का प्रवाहशीलता वाला गुण विशेष काम का है. उसके माध्यम से पदार्थ की आंतरिक एवं बाहरी गतियों का अध्ययन किया जाता है. गति पदार्थ की विशेष अवस्था है. क्या पदार्थ की गतिहीन अवस्था में भी समय या समयाभास की कल्पना की जा सकती है? यदि हम वस्तुविशेष के संदर्भ में देखें तो इस प्रश्न का उत्तर ‘हां’ में होगा. गति के लिए किसी पिंड अथवा कण का होना आवश्यक है. पिंड स्थिर हो और परिवेश परिवर्तनशील, तब भी पिंड तथा उसके परिवेश के बीच सापेक्षिक गति बनी रहेगी; और घटनाओं की एक के बाद एक आवृति हमारे समयाभास का कारण होगी. इसे समझने के लिए एक असंभव स्थिति की कल्पना करते हैं. मान लेते हैं कि एक व्यक्ति अंतरिक्ष में किसी अकेले पिंड पर खड़ा है. चारों और केवल शून्य पसरा है. उस अवस्था में यदि प्रेक्षक की आंखों पर ऐसा चश्मा चढ़ा दिया जाए, जिससे वह अपने पिंड की गतिविधियों के साथसाथ अपनी शारीरिक गतिविधियों की ओर से भी निःसंवेद हो जाए, उस अवस्था में वह खुद को परिवर्तनशून्य विश्व में पाएगा. ऐसी स्थिति में वह समय की अनुभूति नहीं कर पाएगा. जाहिर है, तब उसका समयबोध भी शून्य होगा.

उपर्युक्त उदाहरण में यदि मान लिया जाए कि प्रेक्षक अपने आंतरिक और बाह्य कार्यकलापों के प्रभाव से भी मुक्त है तो उस अवस्था में, उसका ध्यान केवल उस अकेली घटना पर केंद्रित रहेगा. चूंकि वह घटना नितांत शून्य में घट रही होंगी, इसलिए इस बात की पर्याप्त संभावना है कि वह केवल घटना के सातत्य को परखे और वह घटना ही उसे प्रकृति की सार्वभौम हलचल के रूप में नजर आए. स्थायित्व के अनुभव; तथा समानांतर घटनाओं के अभाव में वह एकल घटना की गति के साथ समय का संबंध जोड़ ही नहीं पाएगा. समयाभास की दृष्टि से वह लगभग गतिहीनता जैसा अनुभव होगा. उसका समयबोध करीबकरीब शून्य होगा. इससे एक सामान्य निष्कर्ष यह भी निकलता है कि समयबोध के समुचित विकास हेतु घटना बहुलता आवश्यक है. वैज्ञानिक दृष्टि से न केवल ब्रह्मांडहीनता असंभव कल्पना है, बल्कि ब्रह्मांड का पूरी तरह गतिविहीन हो जाना भी असंभव परिकल्पना है. समय वस्तु नहीं है. न ही ब्रह्मांडहीनता ही अवस्था में उसकी कल्पना की जा सकती है. कदाचित इसीलिए प्लेटो से लेकर स्टीफन हाकिंग तक समय और ब्रह्मांड की उत्पत्ति साथसाथ मानते हैं. प्लेटो का मानना था कि ब्रह्मांड की भांति समय की भी रचना हुई है. वह समय को स्वर्ग के समवयस्क मानता था. यह विश्लेषण दर्शाता है कि वस्तु समयाभास का केवल आधार है, उसका कारण नहीं है. किसी वस्तु, व्यक्ति अथवा घटना से जुड़ी सापेक्षिक परिवर्तनशीलता ही समयाभास का कारण है.

दूसरे शब्दों में समय अथवा समयाभास घटना अथवा घटनाचक्र तथा उसकी अनुभूति से परे, कुछ भी नहीं है. समयाभास का लोप केवल परम स्थिरता अथवा परम वेग(प्रकाशवेग अथवा उससे अधिक कोई भी संभव वेग) की अवस्था में ही है. परम वेग की अवस्था में परिवर्तन इतनी तीव्र गति से होगा कि हम उसे परख ही नहीं पाएंगे. दूसरी अवस्था में वस्तुविशेष यदि पूर्णतः जड़ अवस्था में है तथा शेष ब्रह्मांड बदलाव की ओर अग्रसर हैं तो सापेक्षिक परिवर्तन बना रहेगा. उससे समयाभास की स्थिति भी कायम रहेगी. उदाहरण के लिए कृष्णविवर में अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण के कारण सभी पदार्थ परमसंपीडित हो परमशून्य में ढल जाते हैं. परमसंपीडन की अवस्था में वहां समस्त गतियों का लोप हो जाता है, उस अवस्था में समय अथवा समयाभास की आवश्यकता भी समाप्त हो जाती है. वैज्ञानिक उस अवस्था को समयहीनता की अवस्था मानते हैं.

समय संबंधी पहली प्रज्ञप्ति जिसके अनुसार समय को दो घटनाओं के अंतराल से मापा जाता है, का वर्णन हम ऊपर कर चुके है. दूसरी प्रज्ञप्ति जिसे जॉन मेकटेग्गार्ट ने ‘बी’ श्रेणी की संज्ञा दी है, के अनुसार समय अंतरिक्ष जैसी अंतहीन संरचना हैं, जिसमें सब कुछ निरंतर घटता रहता है. ब्रह्मांड की समस्त घटनाएं, ग्रहपिंड सभी उसमें समाहित हैं. वह भूतवर्तमानभविष्य सभी का आधार तथा ब्रह्मांड की प्रत्येक घटना का साक्षी है. इस मान्यता के अनुसार सृष्टि की प्रत्येक घटना, अंतरिक्ष के साथसाथ समय में भी घटित होती है. पहली मान्यता जहां समय को गतिशील मानती है, वहीं इस समानांतर मान्यता के अनुसार समय स्थिर होता है. स्थिर भाव से ही वह प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष घटनाओं का लेखा रखता है. जिस प्रकर अंतरिक्ष में घटनाएं घटती रहती हें. वैसे ही अनंत समय के बीच भी घटनाओं का सिलसिला बना रहता है. अंतरिक्ष वस्तुजगत के भौतिक स्वरूप को वितान देता है. वस्तुहीनता की अवस्था में विराट आभासीय शून्य होगा; जिसमें समस्त गतियों, परिवर्तनशीलता का लोप हो चुका होगा, ऐसी स्थिति में भी समय की परिकल्पना असंभव होगी. आशय है कि परिवर्तनशून्यता अथवा परमस्थिर विश्व में समय की परिकल्पना अप्रासंगिक हो जाती है.

उपर्युक्त धारणा के अनुसार समय सृष्टि के प्रत्येक परिवर्तन का साक्षी है, मगर खुद परिवर्तनकारी शक्ति नहीं है. न उसका कोई साक्षी होता है. स्टीफन हाकिंग अपनी पुस्तक ‘समय का संक्षिप्त इतिहास’ में ब्रह्मांड की उत्पत्ति परमविस्फोट से मानते हैं. हॉकिंग के अनुसार समय की उत्पत्ति का क्षण भी वही है. अपनी बहुचर्चित पुस्तक में ‘समय का इतिहास’ के बहाने वे ब्रह्मांड के इतिहास की ही चर्चा कर रहे होते हैं. उस अवस्था की चर्चा कर रहे होते हैं, जब अपनी पहली हलचल के साथ ब्रह्मांड परमशून्य से परिवर्तन ओर अग्रसर होता है. हॉकिंग के अनुसार परमविस्फोट से पहले ब्रह्मांड परमसंपीडन की अवस्था में था. वह परमस्थिरता की अवस्था थी, जिसका उल्लेख हमने ऊपर किया है. चूंकि उस समय सर्वत्र गतिशून्यता थी, इसलिए उसमें समय अथवा समयाभास की कल्पना भी असंभव है. महाविस्फोट के पश्चात ग्रहनक्षत्रों का आदि का जन्म हुआ, जिनमें हमारी पृथ्वी भी सम्मिलित हैं.

महाविस्फोट से लेकर आज तक, किसी न किसी रूप में सभी ग्रहनक्षत्र सतत परिवर्तनशीलता से गुजर रहे हैं. अपने स्वरूप और सापेक्षिक परिवर्तनशीलता के माध्यम से वे हमें अपने होने की प्रतीति कराते हैं. उनकी समस्त गतिविधियां अंतहीन समय का हिस्सा हैं, जो सृष्टि के प्रत्येक परिवर्तन का दृष्टा है, मगर खुद अपरिवर्तनशील है. यहां सामान्यसा प्रश्न उठ खड़ा होता है. यदि समय निष्क्रिय दृष्टा है, अपने आसपास घट रही घटनाओं को प्रभावित करने या प्रभावित होने का गुण यदि उसमें नहीं है, तो उसे चैतन्य अथवा कार्यकारी शक्ति कैसे माना जा सकता है? यहां से समय की समस्या विज्ञान के दायरे से बाहर निकलकर दार्शनिक हो जाती है.

समय को लेकर कुछ मिलीजुली जिज्ञासाएं और भी हैं. जैसे कि जो घटनाएं हमारे अनुभव या दृष्टि सीमा से बाहर रह जाती हैं, उनका क्या होता है? क्या उनका समय हमारे समय से अलग होता है? क्या समय सचमुच सार्वभौम सत्ता है? क्या समय को लेकर गढ़े गए मानक किसी दूसरे ग्रह पर भी खरे उतरेंगे? ऐसे प्रश्न किसी भी विचारशील मनुष्य को परेशान कर सकते हैं. इस पर बातचीत करने से पहले हमें जान लेना चाहिए कि किसी चीज के बारे में न जानना उतना बुरा नहीं होता, जितना उसे गलत ढंग से जानना. न जानने वाले के भीतर सीखने की ललक होती है. जबकि गलत जानकारी रखने वाला हमेशा गलतफहमी का शिकार बना रहता है. अज्ञानता के कारण यदि कभी चुनौती पेश हो तो ऐसा व्यक्ति पूर्वाग्रहों से काम चलाता है. मिथों की मदद लेता है. धर्म सहित अन्यान्य पूर्वाग्रहों में फंसी भारतीय मेधा इसी कमजोरी का शिकार होती आई है. हालांकि बौद्ध, सांख्य, वैशेषिक आदि दर्शनों में समय को लेकर कहींकहीं वस्तुनिष्ट चिंतन की झलक देखने को मिलती है. लेकिन अधिकांश जगह उसे नियति अथवा ईश्वरीय शक्ति के पर्याय के रूप में प्रयुक्त किया जाता है. विज्ञान की बात की जाए तो समय को लेकर गढ़े गए मानक सामान्य परिस्थितियों तक ही प्रामाणिक हैं. यदि परिस्थितियां अत्यधिक असामान्य हों तो उसके मानक गड़बड़ाने लगते हैं.

उदाहरण के लिए आइंस्टाइन ने बताया है कि अत्यंत उच्च वेगों पर समय का वेग मद्धिम पड़ने लगता है. उसने इसे समय की सिकुड़न माना है. आइंस्टाइन के निष्कर्षों आज के अधिकांश वैज्ञानिक सहमत हैं. हालांकि उनसे असहमत विद्वानों की संख्या भी कम नहीं है. प्रसिद्ध दार्शनिक हेनरी बर्गसां समय को ‘अवधि’ के माध्यम से व्याख्यायित करते थे. इस संबंध में उनकी आइंस्टाइन के साथ हुई रोचक बहस का उल्लेख यहां अप्रासंगिक न होगा. 1922 में आइंस्टाइन के ‘सापेक्षिकता के सिद्धांत’ की आलोचना करते हुए बर्गसां ने कहा था कि सापेक्षिकता के सिद्धांत का, ‘संबंध केवल ज्ञानमीमांसा से है, न कि भौतिक विज्ञान से.’ बर्गसां की आलोचना से बौद्धिक जगत में एक बहस छिड़ गई. मगर आइंस्टाइन अपने विचार पर दृढ़ थे. अपने अपने सिद्धांत का बचाव करते हुए उन्होंने कहा था—‘दार्शनिकों की दृष्टि में समय केवल भ्रांति है.’

घटनाओं की सापेक्ष गति, यानी दो स्वतंत्र अंतरालों से हमारा समयबोध विकसित होता है. लेकिन ब्रह्मांड की भांति हमारा बोध सर्वव्यापी नहीं है. उसकी सीमा है. मनुष्य विराट ब्रह्मांड में पलप्रतिपल हो रही अनंत हलचलों में से क्षणविशेष में मात्र कुछ घटनाओं का ही अवलोकन कर पाता है. विराट ब्रह्मांड के जो ग्रहनक्षत्र हमारे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष अवलोकन से परे हैं, अरबोंखरबों प्रकाशवर्ष की दूरी पर हैं, उनसे संबंधित समय की, अपने अनुभव के आधार पर, हम केवल कल्पना ही कर सकते हैं. ठीकठीक कुछ नहीं बता सकते. चूंकि घटनाओं की गति पिंडों के गुरुत्वाकर्षण बल से भी प्रभावित होती है, इसलिए समान घटना के लिए पृथ्वी तथा दूसरे ग्रहों पर होने वाले हमारे अनुभवों में अंतर हो सकता है. पिंड का आकार, घटनाओं का वेग तथा उनकी दिशा हमारे समयाभास को प्रभावित करती है. समय संबंधी हमारा बोध हमारे अनुभवों तथा तर्कों पर आधारित होता है. उन्हीं के आधार पर हम यह निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि घटना और अंतराल का संबंध शाश्वत है. दोनों परस्पर अन्योन्याश्रित हैं. हमारा साक्षात घटनाविशेष तथा उसकी गत्यात्मकता से होता है. उनका होना ही हमारे समयाभास का कारण बनती है.

इसके बावजूद समय के भौतिक अस्तित्व को नकारने, उसे केवल मानसिक प्रबोधन का हिस्सा मानने वाले विचारकों की संख्या भी कम नहीं है. विगत दो शताब्दियों में समय संबंधी मौलिक चिंतन में तेजी आई है. अधिकांश विद्वान उसके भौतिक स्वरूप को स्वीकारते हैं, लेकिन घटनाओं से परे, उसकी स्वतंत्र सत्ता से इंकार करते हैं. लाइबिनिज ने समय के भौतिक स्वरूप को नकारा है. उसके अनुसार समय और अंतरिक्ष दोनों का कोई अस्तित्व नहीं है. उसके अनुसार समय और अंतरिक्ष की अवधारणा वस्तुजगत के बारे में हमारे दृष्टिकोण को दर्शाती है. इमानुएल कांट लाइबिनिज के विचारों का समर्थन करता है. हालांकि वह उससे पूरी तरह सहमत नहीं है. वह लाइबिनिज की इस बात से तो सहमत है कि समय और अंतरिक्ष दोनों ही कल्पनाजन्य हैं. लेकिन उस तरह नहीं जिस तरह लाइबिनिज का विचार है. कांट के अनुसार दोनों मानसिक अवधारणा हैं, इस तरह कि वे हमारे मस्तिष्क पर निर्भर हैं. उनमें से पहला वस्तुओं और स्थितियों को सहेजता है, दूसरा उनकी सापेक्षिक हलचलों को दर्शाने एवं दर्ज करने के काम आता है.

समय की अधिसत्ता को लेकर कुछ दिलचस्प बहसें विद्वानों के रही हैं. थाॅमस एक्वीनस ने समय को दो भागों में बांटा था, वास्तविक समय तथा काल्पनिक समय. मगर पेशे से गणितज्ञ इसाक बैरो को यह विभाजन स्वीकार न था. ज्यामितीय पर दिए गए अपने वक्तव्य में बैरो ने एक्वीनस की मान्यता, जो अरस्तु की समयसंबंधी विचारों पर केंद्रित थी, को सिरे से खारिज कर दिया था. एक सभा में अपने ही प्रश्न कि क्या समय सृष्टि रचना से पहले भी मौजूद था, का स्वयं उत्तर देते हुए उसने कहा था—‘विश्वोत्पत्ति से पहले और उसके बाद में, यहां तक कि ब्रह्मांड से परे भी समय था, समय है.’ अरस्तु की मान्यता है कि समय घटनाओं पर निर्भर है; तथा घटनाओं की आवृत्ति के अनुसार वह आगे बढ़ता रहता है. उसका आशय था कि समय घटनासापेक्ष है. बैरो ने उसका खंडन करते हुए कहा था—

‘‘बाकी चीजों की भांति समय की भी कुछ विशेषताएं हैं, उसका मौलिक और सार्वत्रिक गुण है कि वह अपने व्यवहार पर सदैव दृढ़ रहता है. चाहे वस्तुएं गतिमान रहें या ठहर जाएं, हम चाहे जागें या सोएं, वह अपनी निर्धारित गति से बहता रहता है. कल्पना कीजिए समस्त तारागण अपने जन्म के समय से ही स्थिर रहें, उनकी स्थिरता चाहे जितने समय तक कायम रहे, समय का उससे कुछ नहीं बिगड़ने वाला, वह अपनी गति से आगे बढ़ता जाएगा.’’

बैरो न्यूटन का गुरु रह चुका था. आकादमिक जगत में उसका सम्मान था. जबकि उससे तीन शताब्दी पहले जन्मे थाॅमस एक्वीनस की भी विद्वत जगत में नवअरस्तुवादी दार्शनिक के रूप में प्रतिष्ठित था. प्रकृति से आध्यात्मिक बैरो न्यूटन से प्रभावित था. हालांकि समय को लेकर न्यूटन से उसके मतभेद थे. उसका विचार था कि समय अपने आप में स्वतंत्र है. वह सृष्टि की रचना से पहले भी मौजूद था. न्यूटन का विचार था कि वस्तुएं समय और अंतरिक्ष में दोनों में विस्तार पाती हैं. समय में उनकी व्याप्ति क्रमवार तथा अंतरिक्ष में स्थितिअनुसार रहती है. दूसरे शब्दों में न्यूटन समय को घटनाओं का प्रभाव मानता था. प्रकारांतर में समय को लेकर उसका दृष्टिकोण भौतिकवादी था. तदनुसार उसकी उत्पत्ति भी भौतिक जगत की उत्पत्ति से जुड़ी थी. उन दिनों धर्मसंस्थाएं बहुत शक्तिशाली थीं. राज्य पर चर्च की मजबूत पकड़ थी, जिसकी एकाएक उपेक्षा संभव न थी. उनके दबाव में अपने समय के महानतम वैज्ञानिक न्यूटन को संशोधित वक्तव्य के लिए मजबूर होना पड़ा. अंततः अपनी ही पुस्तक ‘प्रंसीपिया मैथेमेटिका’ में उसे जोड़ना पड़ा—‘ईश्वर अजरअमरअनंत है, उसने समय और अंतरिक्ष को इसलिए बनाया, ताकि वह हर जगह मौजूद रह सके.’

इनका विरोध किया था—फ्रांसिसी वैज्ञानिकचिंतक लाइबिनिज ने. लाइबिनिज ने अध्यात्म और विज्ञान को एकमेव करने का काम किया था. उसका मानना था कि ईश्वर सर्वथा, संपूर्ण और किसी भी प्रकार के विक्षोभ से परे है. परंतु यह अकेले ईश्वर का गुण नहीं है. सृष्ठि छोटेछोटे परमबिंदुओं से बनी है, जो अपने गुण में ईश्वर की तरह ही है. अंतर बस इतना है कि वे बिखरे हुए हैं. जबकि ईश्वर संपूर्ण एकजुट सत्ता है. इन परमबिंदुओं को उसने ‘मोनाड’ का नाम दिया था. लाइबिनिज के अनुसार मोनाड ईश्वर की रचना है, लेकिन समय और अंतरिक्ष दोनों से स्वतंत्र हैं. आगे चलकर न्यूटन और बैरो के साथ तीसरा व्यक्ति भी उस बहस में शमिल हो गया. वह व्यक्ति था, सेमुअल क्लार्क. क्लार्क न्यूटन का शिष्य था.

लाइबिनिज द्वारा समय को स्वतंत्र सत्ता न मानने पर क्लार्क की प्रतिक्रिया थी—‘यदि तुम समय को स्वतंत्र स्वयंभू सत्ता मानने को तैयार नहीं हो, तब तुम्हें यह दावा नहीं कर सकते कि विश्व का निर्माण हुआ था. क्योंकि यदि तुम यह कहना चाहो कि ईश्वर ने इस सृष्टि की रचना की है तो तुम यह भी कह सकते हो कि ईश्वर ने दुनिया को उस क्षण से कुछ पहले रचा था, जिस क्षण उसने वास्तव में रचा था. इसका सीधा मतलब तो यही हुआ कि ईश्वर ने सृष्टि को उस क्षण से कुछ न कुछ पहले रचा था, जिस क्षण उसने वास्तव में उसे रचा था. यदि समय सृष्टि से स्वतंत्र नहीं है तो सृष्टि रचना की घटना ही पहली घटना हुई.’

सेमुअल क्लार्क और लाइबिनिज के बीच इसी प्रकार से तर्कों का आदानप्रदान होता रहा. अपने अगले पत्र में लाइबिनिज ने क्लार्क और एक्वीनस के विचारों पर टिप्पणी करते हुए लिखा—‘एक्वीनस और क्लार्क बड़ी दुविधा में हैं. ऐसी दुविधा जो किसी भी छोर पर स्पष्ट नहीं है.’ लाइबिनिज का उत्तर बहुत हल्काफुल्का था. इसपर क्लार्क ने लाइबिनिज विरोधाभासी होने का आक्षेप लगाते हुए लिखा कि लाइबिनिज के अनुसार समय की उत्पत्ति उससे तत्संबंधी घटनाएं अस्थायी तौर पर किसी तीसरे द्वारा प्रेरित हैं. इसका अभिप्राय है कि समय की उत्पत्ति से भी पहले कुछ घटा था, जो पूरी तरह असंगत और अविश्वसनीय है. समय को लेकर इस प्रकार की दुबिधा और तर्कविर्तक आगे भी चलते रहे. और आज लगभग चार सौ वर्ष बाद भी समय की उपस्थिति को लेकर विद्वानों के बीच उतने ही मतभेद हैं, जितने उस समय के दार्शनिकों के बीच विद्यमान थे.

कांट के अनुसार अंतरिक्ष के संबंध में दिए जाने वाले तर्क समय पर भी यथावत लागू होते हैं. लाइबिनिज पर टिप्पणी करते हुए वह लिखता है—‘काल और दिक् का अपनाअपना अथवा संयुक्त रूप से कोई अस्तित्व नहीं है. कुछ अर्थों में वे हमारी अभिव्यक्ति तक सीमित, उसके समुत्पाद की तरह हैं. वे अपरिवर्तनीय हैं, उन अर्थों में नहीं जिनमें लाइबिनिज उन्हें बताता है. अंतरिक्ष का अस्तित्व मानवमस्तिष्क पर निर्भर है.’ अंतरिक्ष कि काल्पनिकता को स्वीकारते हुए वह लिखता है कि कल्पना वही श्रेष्ठतम है, जिसे कोई कल्पना मानने को तैयार न हो. जो वास्तविकता का आभास कराती हो. मानवीय कल्पना का जैसा परिपूर्ण उदाहरण अंतरिक्ष है, वैसा अन्य कोई नहीं. वह हमारी संवेदनपरकता की कसौटी है. कांट इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि अंतरिक्ष बाहरी संवेदन का विषय नहीं है. बल्कि ऐसी अवधारणा है, जो बाकी वस्तुओं के रूपाकार एवं तत्संबंधी संवेदनपरकता पर निर्भर है. उसके अनुसार अनेक ऐसे तर्क जो अंतरिक्ष पर लागू होते हैं, वे समय पर भी लागू होते हैं.

कांट के अनुसार समय की सत्ता है, पर केवल इसलिए कि वह हमारी वास्तविक अंतश्चेतना का हिस्सा है. इसके बावजूद समयहीनता की कल्पना हमारे लिए उतनी ही दुष्कर है, जितनी कि ब्रह्मांड के लोप हो जाने की परिकल्पना. ब्रह्मांडहीनता की अवस्था में समयबोध का क्या होगा? उसकी पहचान किस तरह से की जाएगी? ऐसे प्रश्न हमारी कल्पना से बाहर है. सवाल है कि समय यदि ‘कुछ भी नहीं’ है, केवल आभास मात्र है, तो उसे व्यावहारिक जीवन में उसे सबकुछ क्यों दिखाया जाता है. कारण है कि ऐसे अवसरों पर हम सत्य की उपेक्षा कर, भ्रांत धारणाओं को ही सबकुछ माने रहते हैं. इसके बीजतत्व भी हमारी शिक्षासंस्कृति में अंतनिर्हित हैं. हमारी जरूरत की सभी वस्तुएं पृथ्वी उपलब्ध कराती है. बिना उसके जीवन संभव ही नहीं है. मगर हम यह माने रहते हैं कि सातवेंआठवें आसमान पर बैठा कोई देवता है, जो हमें जीवन और पृथ्वी को उर्वरा शक्ति प्रदान करता है. इस तरह से सोचने की आदत ज्यादा से ज्यादा ढाईतीन हजार वर्ष पुरानी है. लेकिन यही वह कालखंड है जब आदमी द्वारा आदमी पर शासन करने, आदमी द्वारा आदमी को गुलाम बनाने की शुरुआत हुई. धर्म, जाति, संप्रदाय के नाम पर असहिष्णुता और असमानता को व्यक्ति की पहचान जोड़ा जाने लगा. ऐसी व्यवस्था में जो भी ऊंचाई पर होता है, वह अपनी ऊंचाई को वैध बनाने के लिए अपने से भी ऊंचे का हवाला देता है. जैसे कि ब्राह्मणों ने अपने शीर्षस्व को वैध बनाने के लिए देवताओं की पूरी फौज की परिकल्पना कर डाली. इसलिए समय को और दूसरी चीजों को सही ढंग से जाना केवल विज्ञान की दृष्टि से आवश्यक है, बल्कि संस्कृति के परिष्करण तथा मनुष्य के नैतिक प्रबोधन हेतु भी अपरिहार्य है.

© ओमप्रकाश कश्यप

1. भृर्तहरि, वैराग्य शतक, 12/1045.

2. “Whether, if soul (mind) did not exist, time would exist or not, is a question that may fairly be asked; for if there cannot be someone to count there cannot be anything that can be counted…” (Physics, chapter 14).

3. time is neither identical with nor entirely independent of movement, and it remains for us to determine the relation between them….We may here interject the question: how, when there is no time, can there be any “before” and “after”; or how, when there is nothing going on, can there be time? Since time is a number belonging to a process … then,if there always is time, movement must be eternal also.—St. Thomas Aquinas, Commentary on Aristotle’s “Physics,” R. J. Blackwell, trs. (New Haven: Yale University Press, 1963).

4. The ideality of space is its mind-dependence: it is only a condition of sensibility…. Kant concluded …”absolute space is not an object of outer sensation; it is rather a fundamental concept which first of all makes possible all such outer sensation.”…Much of the argumentation pertaining to space is applicable, mutatis mutandis, to time, so I will not rehearse the arguments. As space is the form of outer intuition, so time is the form of inner intuition….Kant claimed that time is real, it is “the real form of inner intuition.”

साम्यवाद, सामाजिक न्याय और राज्य

सामान्य
  • फासिज्म रोकने का श्रेष्ठतम उपाय है, समाज में सामाजिक न्याय की यथासंभव प्रतिष्ठाआर्नोल्ड टॉयनबी.

  • भारत के संदर्भ में सामाजिक न्याय लोकप्रिय राजनीति का तकिया कलाम है. जिसे हर नेता प्रत्येक चुनाव में

    अपनीअपनी तरह से इस्तेमाल करता है.

साम्यवाद’ और ‘सामाजिक न्याय’ दोनों आयातित पद हैं. हमारे यहां मार्क्सवाद ज्यादा चलता है, जिसे खुद मार्क्स ने ही खारिज कर दिया था. लोहिया भी मार्क्सवाद कहने से बचते थे. हालांकि मार्क्सवाद के आदर्श से उन्हें कोई शिकायत न थी. साम्यवादी लक्ष्य को लेकर इस देश में जितने भी राजनीतिक संगठन बने, किसी न किसी रूप में वे सभी मार्क्सवाद का प्रतिनिधि दल होने का दावा करते हैं. इतनी शिद्दत से करते हैं कि अपना लक्ष्य, साम्यवाद का आदर्श ही उन्हें याद नहीं रहता. शायद इसलिए कि ‘मार्क्सवाद’ की प्रचलित शब्दावली यथा वर्गसंघर्ष, मजदूर, पूंजीपति, शोषण आदि को लोकप्रिय राजनीति के खांचे में आसानी से फिट किया जा सकता है. उसे लेकर राजनीति करना आसान है. साम्यवाद अपेक्षाकृत स्वप्नीला शब्द है. आदर्श और मनुष्यता के बेहद करीब. वह जिस आदर्शोन्मुखी, वर्गहीन और समतायुक्त समाज का सपना देखता है, उसकी पूर्णता पर आमजन तो क्या, आकादमिक प्रतिष्ठा वाले बड़ेबड़े विद्वान विश्वास नहीं करते.

पश्चिम में प्लेटो का आदर्श राज्य का सपना करीबकरीब साम्यवादी परिकल्पना ही थी. भारत में रैदास ने ‘बेगमपुरा’ तथा कबीर ने ‘अमरपुरी’ के रूप में समताआधारित समाज का सपना देखा था. उसके कुछ समय बाद योरोप में संत साइमन ने भी व्यंग्यात्मक शैली में वर्गहीन तथा आदर्श समाज की परिकल्पना की थी. प्लेटो की परिकल्पना को अरस्तु ने ही अव्यावहारिक मानकर नकार दिया था, वहीं संत साइमन के सपने पर उनके समकालीनों ने कोई ध्यान ही नहीं दिया. मगर डेड़दो शताब्दी बाद ही, यूरोपीय पुनर्जागरण के दौर में साइमन की यूटोपियाई कल्पना आदर्शवादी समाज का सपना देखने वाले विद्वानों, चिंतकों और आंदोलनकारियों का सपना बन गई. संत साइमन के थोड़ा आगेपीछे जॉन लाक, इमानुएल कांट, प्रस्टीले, रूसो, राबर्ट ओवेन, बैंथम, जान स्टुअर्ट मिल, मिखाइल बकुनिन आदि ने समानता और स्वाधीनता पर आधारित ऐसे राजनीतिक दर्शन को दुनिया के सामने रखा, जिसमें व्यक्तिमात्र की गरिमा, स्वतंत्रता और समान सुख की उम्मीद शामिल थी. भारत में स्थितियां अलग थीं. यहां का समाज जाति और धर्म के आधार पर बुरी तरह विभाजित था. सत्ता और संसाधन जिन लोगों के अधीन थे, वे हर हालत में यथास्थिति बनाए रखना चाहते थे. जिस धर्मसंस्कृति के भारतीय अनुगामी रहेवह खुद वर्गभेद का पोषण करता है. इसलिए समाज के उत्पीड़ित वर्गों से आए रैदास आदि संत कवियों के सपने की ओर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया. जाति और वर्णभेद में बुरी तरह फंसे, उन्हें विधि का विधान मानकर जीने वाले समाज के लिए यह कोई अनहोनी बात नहीं थी. लोग अपने दुख, दैन्य, दमन और दासत्व के साथ जीना सीख चुके थे. आजादी के बाद भी शताब्दियों के संस्कार देश के बुद्धिजीवियों के अवचेतन पर असर बनाए रहे. यही कारण है कि हमारे यहां खुद को समाजवादी कहने वाले नेता हुए, मार्क्सवादी हुए, मगर साम्यवाद कभी भी बौद्धिक और आकादमिक बहसों से बाहर न आ सका.

आजादी के बाद रोजमर्रा की शब्दावली में साम्यवाद अ़ौर मार्क्सवाद दोनों के लिए वैकल्पिक शब्द का चलन शुरू हुआ. वह शब्द हैवामपंथ. बदले परिवेश में ‘वामपंथ’ को गाली मान लिया गया है. तो भी मार्क्सवाद के पर्याय के रूप में या जिन्हें मार्क्सवाद कहनेलिखने से चिढ़ है, वे प्रायः ‘वामपंथ’ का ही प्रयोग करते हैं. वामपंथ क्या है? वह जो दक्षिणपंथ नहीं है? एक वैचारिकी के रूप में वामपंथ का साम्यवाद या मार्क्सवाद से दूरपास का कितना नाता है? क्या वह मार्क्सवाद या साम्यवाद के पर्याय से अधिक कुछ नहीं है? ऐसे प्रश्नों पर वे विचार ही नहीं करना चाहते. मार्क्सवाद और साम्यवाद की तरह ‘वामपंथ’ भी आयातित विचार है. अपने मूल अर्थों में इसका मार्क्सवाद से दूर का ही नाता है. एक रास्ता है, जिससे साम्यवाद की ओर बढ़ा जा सकता है. वामपंथ का संबंध फ्रांस की क्रांति से है, जो कभी मार्क्सवादी या साम्यवादी देश नहीं रहा. प्रथम वामपंथी होने का श्रेय टॉमस पेन तथा उसके सहयोगियों को जाता है. पेन मूलतः व्यक्तिमात्र की अधिकतम स्वाधीनता का समर्थक था. अमेरिकी क्रांति की सफलता के पश्चात, मित्र थॉमस जेफरसन से विदा लेकर वह फ्रांस पहुंचा था. वहां राजशाही के विरुद्ध उसका संघर्ष जारी था. पेन की पुस्तक ‘राइट्स ऑफ मेन’ उनीसवीं शताब्दी की सर्वाधिक प्रभावशाली पुस्तकों में से है. इस पुस्तक ने फ्रांसिसी क्रांति के लिए उत्प्रेरक का काम किया था.

फ्रांसिसी क्रांति ने सामाजिकराजनीतिक संरचनाओं में अनेक बदलाव किए थे. उससे पहले धर्म राजनीति के मुख्य मार्गदर्शक की भूमिका निभाता था. क्रांति के बाद धर्म के प्रभावक्षेत्र मनुष्य के निजी विश्वास और आचरण तक सीमित हो गया. नई विचारधाराओं के आलोक में राजनीति में धर्म की कार्यकारी भूमिका को लगभग समाप्त कर दिया गया था. उसके स्थान पर न्याय, लोककल्याण, नागरिक और राज्य की आंतरिक शुभता, मानवाधिकार आदि को राजनीति का प्रमुख मार्गदर्शक घोषित कर दिया गया. फलस्वरूप विधि के शासन को बल मिला. राज्य जिसे पहले दैवीय अथवा देवताओं की विशेष अनुकंपा माना जाता था, उसको मनुष्य द्वारा अपने तथा मानवमात्र के कल्याण हेतु निर्मित संस्था कहा जाने लगा. राज्य के संचालन में नागरिकों की भूमिका जो धर्मप्रधान राजनीति में अत्यंत गौण थी, वह प्रमुख हो गई. तीसरी और प्रमुख सफलता थी, राजनीति में कुल, परंपरा, जाति, वंशाधिकार, वर्णश्रेष्ठता आदि के दावे के आधार पर विशेषाधिकारों का लोप. उससे, कालांतर में लोकतंत्र के रास्ते प्रशस्त हुए, आधुनिक समाज की नींव रखी गई.

आरंभिक अवधारणा के अनुसार वामपंथ मार्क्सवाद या साम्यवाद का पर्याय भले न हो, किंतु अपनी इन समानधर्मा विचारधाराओं की भांति वह किसी भी प्रकार की सर्वसत्तावादी अवधारणा का विरोध करता है, इस दृष्टि से इसे साम्यवाद और मार्क्सवाद दोनों के करीब माना जा सकता है. मार्क्सवाद का मूलभूत विचार वर्गसंघर्ष है. वर्गहीन समाज की स्थापना उसका लक्ष्य है. वर्गसंघर्ष को हम हीगेल की दार्शनिक संकल्पना ‘द्वंद्ववाद’ का राजनीतिक अवतार भी कह सकते हैं. 1848 में श्रमिकों का आवाह्न करते हुए मार्क्स ने कहा थाᅳ‘तुम्हारे पास खोने के लिए सिवाय अपनी बेड़ियों के कुछ नहीं है, लेकिन जीतने के लिए पूरी दुनिया पड़ी है.’ इस कथन के संकेत साफ थे. मार्क्स चाहता था कि श्रमिक वर्ग संगठित क्रांति द्वारा उत्पादन एवं सत्ता प्रतिष्ठानों पर अधिकार कर ले. इस आवाह्न का श्रमिक संगठनों ने खुले दिल से स्वागत किया था. उसके आधार पर 1871 में पेरिस क्रांति हुई. उसका सुफल ‘पेरिस कम्यून’ के रूप में दुनिया सामने आया. पेरिस और आसपास के कुछ ठिकानों पर श्रमिकसंगठनों का अधिकार हो गया. वह सफलता अस्थायी सिद्ध हुई. तीन महीने से भी कम समय में सत्ता श्रमिकसंगठनों से वापस छीन ली गई. पेरिस कम्यून की असफलता मार्क्स के लिए भी सबक थी. वर्गक्रांति की सफलता के लिए वर्गभेद के कारणों को समझना और समझाना अत्यावश्यक था. उसके बाद मार्क्स ने खुद को पूंजीवाद के गंभीर अध्ययन के लिए समर्पित कर दिया था. वर्गहीन समाज की संकल्पना उसके लंबे अध्ययनमनन का सुफल थी. ‘पेरिसक्रांति’ के बाद मार्क्स का नाम दुनियाभर में फैल चुका था. लोग संगठित विद्रोह की शक्ति से परिचित हो चुके थे. समझने लगे थे कि संगठित ताकत से आजादी को संभव बनाया जा सकता है. भारत भी उससे अछूता न था. ‘वर्गसंघर्ष का उपयोग औपनिवेशिक दासता से मुक्ति के लिए किस प्रकार किया जाए?’ यह प्रश्न अनेक विचारवान लोगों को उद्वेलित करने लगा था. मार्क्स से मिलने की साध लेकर राजा राममोहनराय ने इंग्लेंड की यात्रा भी की थी. हालांकि उन दोनों की भेंट के बारे में दावे के साथ कुछ भी कह पाना कठिन है.

सर्वहारा शोषण की जिन स्थितियों का विश्लेषण मार्क्स ने अपने लेखन में किया था, वे उससे पहले भी अजानी नहीं थीं. प्लेटो और अरस्तु दोनों यद्यपि दास पृथा के समर्थक थे, लेकिन वे राज्य से अपेक्षा करते थे कि वह नागरिकों के प्रति अपने दायित्वों को समझे तथा उनका निष्ठापूर्वक पालन करे. मध्यकाल के विचारक भी लोककल्याण के लिए राज्य की ओर से उत्तरदायी आचरण की अपेक्षा करते हैं. फ्रांसिसी विचारक पियरे जोसेफ प्रूंधों ने समाजार्थिक समानता पर आधारित राज्य की परिकल्पना की थी. बेहद मामूली, गरीब परिवार में जन्मा प्रूंधों बचपन में अपने पिता के साथ कहवाघर में काम करता था. उसने अपना सारा ज्ञान जीवनानुभवों और स्वाध्याय के बल पर अर्जित किया था. वह अराजकतावादी था. उसका मानना था कि राज्य की कुल संपत्ति पर सरकार का अधिकार होना चाहिए. सरकार कैसी हो? इस बारे में उसकी स्पष्ट मान्यता थीᅳ‘प्रत्येक के द्वारा खुद की सरकार’. कुल मिलाकर शासक वर्ग का पूर्णतया लोप. प्रत्येक नागरिक के लिए अधिकतम स्वतंत्रता. यह थोरो द्वारा दी गई अच्छी सरकार की विशेषता, ‘अच्छी सरकार वह है जो बिलकुल भी शासन नहीं करती’का समर्थन करती है. प्रूंधों ने व्यक्तिगत संपत्ति को चोरी और संपत्तिधारक को चोर कहा था. अपने समय में वह मार्क्स कहीं अधिक लोकप्रिय था. लेकिन पूंजीवाद के दुष्प्रभावों को लेकर मार्क्स का अध्ययन कहीं अधिक व्यापक और तथ्यपरक था. सभ्यताओं के लंबे, ऐतिहासिक अध्ययन द्वारा वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि उत्पादन प्रविधियों में बदलाव संस्कृति एवं सभ्यता को प्रभावित करता है. उत्पादकता के साधनों पर पूंजीवादी वर्चस्व के रहते शोषण से मुक्ति असंभव है. एकमात्र समाधान वर्गसंघर्ष है. वह सामाजिक परिवर्तन की दिशा में प्रमुख औजार है. ऐसा रास्ता, जिसका लक्ष्य साम्यवाद है. ‘थीसिस ऑन फायरबाख’ में मार्क्स का निष्कर्षवाक्य हैᅳ‘दार्शनिकों ने इस संसार की अनेक तरह से व्याख्या की है. सवाल है कि उसे बदला किस तरह जाए?’ मार्क्स का पूरा जीवन बदलाव को समर्पित रहा. इसके लिए उसने वर्गक्रांति का आवाह्न किया, जो इतनी ओजपूर्ण है कि प्रायः वर्गसंघर्ष को ही साम्यवाद की आधारसैद्धांतिकी मान लिया जाता है. मार्क्स और मार्क्सवाद के नाम पर राजनीति करने वाले लोग कभी अनजाने में तो कभी जानबूझकर ऐसी गलती करते रहते हैं. कदाचित इसलिए भी कि वर्गसंघर्ष यानी टकराव की राजनीति करना आसान है. विशेषकर भीषण असमानता के शिकार उन समाजों में जहां लोकतंत्र लोकप्रिय राजनीति तक सिमटकर अपनी गरिमा तथा उद्देश्य दोनों से दूर जा चुका है.

सामाजिक न्याय : ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

सामाजिक न्याय’ पर चर्चा करने से पहले उचित होगा कि उसके इतिहास पर भी कुछ बातचीत कर ली जाए. उन परिस्थितियों पर विचार किया जाए जिनके कारण चर्च जैसी शक्तिशाली संस्था को कल्याणराज्य के समर्थन में उतरना पड़ा था? 16वीं शताब्दी की वैज्ञानिक क्रांति यूरोप में कई वैचारिक आंदोलनों की प्रेरक बनी थी. उनके केंद्र में मनुष्य था. फलस्वरूप सामंतवादी दौर की वे विचारधाराएं सवालों के घेरे में आने लगीं, जो किसी अजाने, अदृश्य लोक तथा पैगंबर की बातें किया करती थीं. जिनकी निगाह में सब कुद्ध नियतिबद्ध था. उन्हें कठघरे में लाने की शुरुआत थॉमस हॉब्स की ओर से हो चुकी थी. आगे चलकर उसे ह्यूम, जान लॉक, देकार्त्त, वाल्तेयर, रूसो, इमानुएल कांट, बैंथम, प्रूधां और टॉमस पेन जैसे विचारकों का समर्थन मिला. इनमें कई आस्थावादी भी थे, मगर धर्म उनके लिए व्यक्तिगत आस्था और विश्वास तक सीमित था. राजनीति के साथ उसके घालमेल के सभी विरोधी थे. नई विचारधाराओं के आलोक में लोकतंत्र और व्यक्तिस्वातंत्र्य पर जोर दिया जाने लगा था. फ्रांसिसी क्रांति तथा उसके पहले संपन्न हुई अमेरिकी क्रांति, धर्म केंद्रित प्राचीन राजनीतिक संस्थाओं को वर्षों पहले नकार चुकी थीं. नए राजनीतिक दर्शनों पर बहस जारी थी. इससे पुरातनपंथी धर्माचार्यों में बेचैनी थी. अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए वे छटपटा रहे थे.

विज्ञान के पंखों पर सवार होकर आने वाली औद्योगिक क्रांति सर्वथा निरापद न थी. अनियोजित मशीनीकरण ने अनेक समस्याओं को जन्म दिया था. वैज्ञानिक क्रांति का स्वागत करते हुए ‘आधुनिक विज्ञान का पितामह’ कहे जाने वाले फ्रांसिस बेकन ने कहा था कि औद्योगिक क्रांति श्रमिकों को उनके जानलेवा कष्टों से मुक्ति दिलाकर नए समाज की नींव रखेगी. किंतु उद्योगपतियों की स्वार्थपरता, लाभ को केंद्र में रखकर उत्पादन करने की उनकी नीति तथा श्रमिकों को उनके श्रम का पूरा लाभ न देकर सबकुछ हड़प जाने की लालची वृत्ति ने मशीनीकरण के लाभों को विशिष्ट वर्ग तक सीमित कर, श्रमिक वर्ग के उन सभी सपनों पर पानी फेरने का काम किया था, जो उसने औद्योगिक क्रांति के साथ देखे थे. उससे श्रमिकों का आक्रोश बढ़ रहा था. वे एक साथ लामबंद होने लगे थे. चार्ल्स फ्यूरियर, प्रूंधों, मार्क्स, मिखाइन बकुनिन जैसे विचारक, आंदोलनकारी उनके समर्थन में थे. फ्रांसिसी क्रांति की सफलता से श्रमिक संगठनों के हौसले बढ़े हुए थे. उसका दूरगामी असर भविष्य की राजनीति पर पड़ा. फलस्वरूप राजनीति में धर्म की भूमिका सिमटने लगी. न्याय का ईश्वरीय आधार समाप्त हो गया. प्रशासनिक फैसलों में तर्क और ज्ञानविज्ञान की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो गई. क्रांति की तीसरी बड़ी उपलब्धि थी, वंशानुगत शासन का अंत. फलस्वरूप वैधानिक और नागरिक अधिकार राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनने लगे. शासनप्रशासन में लोकतांत्रिक संस्थाओं की संख्या बढ़ने लगी, जिनके लिए नागरिक तथा नागरिकअधिकार प्रमुख थे.

बीसवीं शताब्दी के आरंभ में सोवियत क्रांति की कामयाबी श्रमिक आंदोलन के इतिहास में निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई. सोवियतसंघ विश्व का पहला समाजवादी राज्य था, जिसका गठन साम्यवादी सपने के मद्देनजर किया गया था. उस सफलता से उत्साहित सर्वहारा वर्ग पूरे विश्व को कम्युनिज्म की परिसीमा में लाने का सपना देख रहा था. मंगोलिया, जर्मनी, इटली, रोमानिया जैसे दर्जनों देशों उसके प्रभाव में आ चुके थे. अमेरिका, इंग्लेंड जैसे ठेठ पूंजीवादी देशों में साम्यवादी दलों का गठन हो चुका था. उन्हें अपने समय के प्रखर विद्वानों और बुद्धिजीवियों का नेतृत्व प्राप्त था. चीन भी तेजी से श्रमिकक्रांति की ओर अग्रसर था. वहां माओ के नेतृत्व में परिवर्तन की लड़ाई सफलतापूर्वक लड़ी जा रही थी. उधर अमेरिका के उपनिवेश रहे अफ्रीकी देशों में वर्गचेतना अंगड़ाई ले रही थी. लोग औपनिवेशिक दासता से बाहर निकलने के लिए आतुर थे. हथियार खरीद की अवांछित स्पर्धा का सीधा असर उन देशों की विकासदर पर पड़ा. दूसरे विश्वयुद्ध का डर दिखाकर प्रतिक्रियावादी शक्तियां सत्ताकेंद्रों पर सवार होने लगी थीं.

औपनिवेशिक देशों में आजादी की बढ़ती मांग का एक असर विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के रूप में सामने आ रहा था. उनीसवीं शताब्दी में तेजी से हो रही बाजारवृद्धि लगभग रुकसी गई थी. ऊपर से विश्वयुद्ध की मार. विश्वघटनाक्रम तेजी से बदल रहा था. जिन देशों में सर्वहारा क्रांति संपन्न हुई थी, वहां वर्गहीन समाज की स्थापना का लक्ष्य अभी बाकी था. युद्ध से जनअसंतोष में वृद्धि हुई थी. पूंजीवादी ताकतों के सामने केवल दो रास्ते शेष थे. पहला बिना किसी ढांचागत परिवर्तन के, श्रमिक आंदोलन की ओर से आंखें मूंदकर उत्पादन में तेजी लाई जाए. तत्कालीन परिस्थतियां में वह असंभव जैसा था. दूसरा और अंतिम रास्ता यही था कि श्रमिकों की वैध मांगों से समझौता कर श्रमिकअसंतोष को दूर करने के उपाय किए जाएं. इस भावना ने ‘सामाजिक न्याय’ की अवधारणा को जन्म दिया. इस तरह अपने मूल में ‘सामाजिक न्याय’ जरूरतमंदों को बहलाफुसलाकर उनके असंतोष को दबा देने की कोशिश का परिणाम था. धार्मिक संगठन उसे राज्य की उदारता के रूप में, जनता का विश्वास जीतने के लिए आवश्यक मानते थे, ताकि उसकी आड़ में धर्मसत्ता अपने वर्गीय स्वार्थों का संरक्षण कर सकें. इसके समर्थन में वे विचारक, बुद्धिजीवी, लेखक और धर्माचार्य भी थे जो सामाजिकऔद्योगिक संरचना में बड़ा बदलाव किए बिना, औद्योगिक लाभों का एक हिस्सा राज्य के माध्यम से श्रमिकों तक पहुंचाकरश्रमिकआंदोलनों से उपजे असंतोष का समाधान खोजना चाहते थे. इसे श्रमिक आंदोलन से गुजर रहे देशों की सरकारों का समर्थन हासिल था. प्रथम विश्वयुद्ध के बाद विभिन्न राष्ट्रों में मारक हथियार खरीदने की होड़ शुरू हो चुकी थी. वर्गक्रांति से गुजर चुके देशों ने भी अपने संसाधन युद्ध की तैयारी अथवा संभावित युद्ध की अवस्था में बचाव के लिए झोंक दिए थे. वे देश एकदूसरे के साथ स्पर्धा में थे. साम्यवाद की सफलता स्पर्धा के बजाय सहयोग पर टिकी होती है. स्पर्धा, भले ही वह हथियारों के लिए दूसरे देशों के साथ हो, साम्यवाद के मूल सिद्धांतों के विपरीत है. हथियारों की स्पर्धा उन देशों में साम्यवादी मूल्यों के प्रचारप्रसार पर भारी पड़ने लगी थी.

सामाजिक न्याय की उद्भावना के दौर में एक वर्ग आमूल परिवर्तनवादियों का भी था. उसके समर्थक मानते थे कि धर्म और धर्म जैसी सामंती चरित्र वाली संस्थाओं के सहारे सामाजिक संरचना में आमूल परिवर्तन असंभव है. इन विचारधाराओं के मूल में यूरोप की वैज्ञानिक क्रांति का बड़ा योगदान था. मशीनीकरण द्वारा पूंजीपति वर्ग की संपत्ति में तेज बढ़ोत्तरी हुई थी. पुराने उद्योगधंधे उजड़ने से शिल्पकार और कामगार वर्ग में असंतोष पनप रहा था. अनियोजित शहरीकरण ने भी अनेक समस्याओं को जन्म दिया था. फलस्वरूप उन देशों में पूंजीवाद के विरुद्ध माहौल बनने लगा था. वैज्ञानिक क्रांति ने लोगों के सोच और मानस को बदला था. नईनई विचारधाराएं सामने आ रही थीं. धार्मिक संस्थाएं, पहले जिनकी हर शिक्षा जनसाधारण के लिए आदेश होती थी, अब उतनी विश्वसनीय नहीं रह गई थीं. बल्कि यह मानते हुए कि धर्म शोषण में मददगार है, उसके विरुद्ध आवाज उठने लगी थीं. हॉब्स, ह्यूम, जान लॉक, देकार्त्त, वाल्तेयर, रूसो, बैंथम, प्रूधों आदि ने धर्म की विश्वसनीयता तथा उसके सर्वसत्तावादी स्वरूप पर सवाल उठाए थे. नए विचारों का मूल्यबोध मानवमात्र के सुख, स्वतंत्रता और सम्मान से अभिप्रेत था. उन्हें जनसमाज का समर्थन भी प्राप्त था. औद्योगिकीकरण रोजगार के परंपरागत संसाधनों पर उनकी निर्भरता घटी थी. उनका आत्मविश्वास लौटा था और अब वे स्वतंत्र निर्णय लेने में सक्षम थे. इसका एहसास पूंजीपति और राजनेताओं को भी था. इसलिए श्रमिककामगार वर्ग को संतुष्ट रखने की कोशिशें श्रमिक चेतना के उभार के साथ ही आरंभ हो चुकी थी. चूंकि जनसाधारण पर धर्म का गहरा प्रभाव था, इसलिए श्रमिक असंतोष को नियंत्रित करने के लिए आरंभ में धर्म को ही माध्यम बनाया गया.

यह कम आश्चर्यजनक नहीं है कि ‘सोशल जस्टिस’ जैसे शब्दयुग्म जिसका प्रयोग राज्य की उदारता और न्यायप्रियता दर्शाने के लिए किया जाता है, का प्रथम प्रयोग एक कट्टर पुरातनपंथी द्वारा किया गया था. इटली निवासी ल्यूगी अजीलिओ टपरेली पेशे से धर्मप्रचारक पादरी था. 1845 में लिखे गए एक लेख Theoretic Essay of Natural Straight में उसने इस शब्दयुग्म का पहली बार प्रयोग किया था. ‘सामाजिक न्याय’ से टपरेली का आशय भी वह नहीं था, जैसा आज है. उसका आशय राज्य के सामान्य न्यायबोध से था. उन दिनों लेखकों और चिंतकों का एक ऐसा वर्ग था जो ईसाई धर्म की मूलभूत मान्यताओं को आगे रखकर राज्य से नागरिकों के प्रति करुणा और सहानुभूतिपूर्ण आचरण की मांग कर रहा था. थॉमस एक्वीनस से प्रभावित, उसे अपना गुरु मानने वाले टपरेली का संबंध इसी वर्ग से था. वह मानता था कि आधुनिकता से लोगों की जो अपेक्षाएं हैं, धर्म की परिसीमा में उनका समाधान संभव है. समानता और व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता को लेकर टपरेली के विचार दकियानूसी किस्म के थे. वह मध्यकालीन दर्शनों से प्रभावित था. जिनमें राजसत्ता से, धर्मसत्ता की अनुप्रेरणा अथवा उसके मार्गदर्शन में काम करने की अपेक्षा की जाती है. उसका विचार था कि प्राकृतिक आधार पर मनुष्य भी बाकी जीवों के समान है. परंतु अपनी मेधा, स्वाध्याय, धन, चरित्र, कुलपरंपरा आदि के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति दूसरों से अलग होता है. चरित्र एवं गुणों में दूसरों से श्रेष्ठतर व्यक्ति, श्रेष्ठता की कसौटी पर कमजोर वर्गां पर शासन करने का अधिकार स्वाभाविक रूप से प्राप्त कर लेता है. समाज को शासक एवं शासित के रूप में देखने वाले टपरेली के लिए न्याय राज्य की उदारता का लक्षण है. उसके दर्शन में शासक एवं शासित के बीच द्वंद्वात्मकता के लिए जगह नहीं है. वह किसी व्यक्ति के शिखर पर होने को उसका विशेषाधिकार मान लेता है. उसके अनुसार कोई व्यक्ति शासन इसलिए करता है, क्योंकि उसमें राज करने का स्वयंअर्जित गुण है.

वर्तमान में ‘सामाजिकन्याय’ जिन अर्थों में प्रयुक्त किया जाता है, उन तक पहुंचने के लिए उसे आधी शताब्दी से भी अधिक का समय लगा है. इस बीच उसका प्रयोग विभिन्न लेखकों, विचारकों द्वारा अलगअलग संदर्भों में किया जाता रहा. 1851 में इतालवी भाषा के एक आलेख ‘दि कैथोलिक सिविलाइजेशन’ में ‘सामाजिक न्याय’ को सामान्य प्रकृतिबोध, ज्ञानविज्ञान और अनुभव पर आधारित ऐसा दर्शन माना गया जो विकेंद्रीकृत सत्ता का विरोध करता है. उसके लगभग तीन दशक बाद 1883 में फ्रांसिसी कैथोलिक समाजविज्ञानी दि मुन ने ‘सामाजिक न्याय’ को श्रमिकों और कामगारों के ऐसे संगठन के साथ जोड़ा, जिसके सदस्य पारस्परिक उत्तरदायित्व एवं सामाजिक आदर्श की भावना के साथ समान उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु परस्पर एकजुट होकर काम करते हैं. उसके दो वर्ष बाद फ्रांसिसी समाजवादी नेता, लेखक और विचारक जार्ज गोयो ने ‘सामाजिक न्याय’ की कामना के साथ ऐसे राष्ट्र के गठन पर जोर दिया, जिसमें नागरिक और सरकार दोनों अपनेअपने कर्तव्य को समर्पित हों; तथा जिसमें नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा का पूरा भरोसा हो. बीसवीं शताब्दी के आरंभ में यह शब्दयुग्म विमर्श का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन चुका था. दर्जनों लेखकों ने ‘सामाजिक न्याय’ को अपनीअपनी तरह से परिभाषित करते हुए उसकी जरूरत पर बल दिया. अमेरिकी लेखक डब्ल्यू विलियोग्वि ने ‘सामाजिक न्याय’ को लेकर कई लेख लिखे. एक लेख में उसने लिखाᅳ‘न्याय का आशय नागरिकों को यथासंभव ऐसे और इतने अवसर उपलब्ध कराना है, जिनसे वह अपने भीतर के शुभत्व को उच्चतम बिंदू तक उठान दे सके. राज्य का स्वरूप ऐसा हो जिसमें सभी को अपने विकास के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हों.’ विलियोग्वि की यह परिभाषा ‘सामाजिक न्याय’ की आधुनिक अवधारणा के काफी करीब है. 1930 तक ‘सामाजिक न्याय’ की अवधारणा पूरी तरह चलन में आ चुकी थी. उसके माध्यम से ऐसे राज्य की परिकल्पना को बल मिला, जहां नागरिक व्यक्तिगत एवं सामूहिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए अपने कर्तव्यों के प्रति सजग हों और राज्य अपने नागरिकों के हितों के प्रति जागरूक.

1924 में सोवियत क्रांति के महानायक रहे विलादिमिर लेनिन की मृत्यु के बाद सत्ता जोसेफ स्टालिन के हाथों में आ चुकी थी. स्टालिन का अर्थ हैलौहपुरुष. अपने नाम के अनुरूप स्वभाव पाया था उसने. इरादों से मजबूत. कड़े फैसले लेने में सक्षम. स्टालिन की पूरी कोशिश सोवियत संघ को वर्गहीन समाज में बदल देने की थी. उसके लिए बड़े पैमाने पर भूप्रबंधन किया जा रहा था. धर्म को किनारे कर पारंपरिक संस्थाओं को शक्तिहीन किया जा चुका था. अपने कठोर निर्णयों से वह अपने मित्रों की नाराजगी भी मोल ले चुका था. मगर स्टालिन के लिए यह विशेष चिंता का विषय नहीं था. ट्राटस्की, लेव केमानोव जैसे नेता जो सोवियत क्रांति के दौरान लेनिन के सहयोगी रह चुके थे, को मृत्युदंड देकर उसने अपने मजबूत इरादों को दर्शा दिया था. चूंकि स्टालिन के नेतृत्व में रूस तरक्की कर रहा था, इसलिए जनता उसके साथ थी. साम्यवादी राष्ट्रकुल के गठन की दिशा में उसकी उसकी प्रगति दर चौंकाने वाली थी. औपनिवेशिक दासता का शिकार देशों में साम्यवाद का तेजी से विस्तार हो रहा था. यह डर पूंजीपतियों तथा उनके समर्थनसहयोग के आधार पर टिकी सरकारों के लिए काफी था. यथास्थिति बनाए रखने का एकमात्र रास्ता था, श्रमिकों और कामगारों को अपने पक्ष में लिया जाए. इसके लिए उन्हें थोड़ीबहुत छूट देकर न्याय का माहौल बनाया गया. विश्वस्तर पर ऐसे बुद्धिजीवियों की पहचान की जाने लगी, जिन्हें पूंजीवाद से कोई शिकायत न थी; अथवा जो बदलाव के लिए हिंसक क्रांति का विरोध करते थे ऐसे बुद्धिजीवियों के समर्थन में आने से ‘सामाजिक न्याय’ का खूब प्रचारप्रसार हुआ.

साम्यवाद, सामाजिक न्याय और राज्य

सामाजिक न्याय’ की ऐतिहासिक अवधारणा हमें प्लेटो और अरस्तु तक ले जाती है. न्याय से प्लेटो का अभिप्राय थामानवीय सद्गुण. ऐसे गुण जो आत्मा का लक्षण और मनुष्यता की कसौटी हैं. जो मनुष्य को एकदूसरे के प्रति सदाशयी तथा समाज का जिम्मेदार सदस्य बनाते हैं.’ न्याय समाज से प्लेटो का अभिप्राय ऐसे समाज से था, जिसमें मनुष्य उन सभी कर्तव्यों को स्वेच्छापूर्वक पूरा करे, जिनका पालन समाज के प्रयोजनों की दृष्टि से अपरिहार्य है. आदर्श समाज में समाज और राज्य मिलकर नागरिकों की योग्यतानुसार जिन कर्तव्यों का निर्धारण करते हैं, उन्हें पालन किया जाना ही श्रेयस्कर है. न्यायअनुगामी व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन इस भावना के साथ करता है कि उसी में उसकी तथा बाकी समाज की खुशी है. बदले में समाज भी पीछे नहीं रहता. अपनी प्रत्येक इकाई के साथ वह ऐसा व्यवहार करता है मानो उसकी खुशी के अभाव में शेष समाज की खुशी भी अधूरी है. इस तरह एक व्यक्ति का सुख समाज के सुख में तथा समाज का सुख उसकी प्रत्येक इकाई के सुख के संरक्षण में नजर आने लगता है. उस अवस्था में सुख का बंटवारा नहीं, उसमें हिस्सेदारी होती है. न्यायसमर्पित समाज सुख को सामूहिक उपलब्धि मानता है. उसमें व्यक्तिगत इच्छाओं का सम्मान किया जाता है, पर जोर सामूहिक लक्ष्यों की प्राप्ति पर दिया जाता है. यह काम सामान्य इच्छा के भरोसे किया जाता है. फलस्वरूप ऐसे समाज में व्यक्तिगत और सामूहिक सुख का अंतर मिटने लगता है. न्यायसमर्पित समाज अपनी प्रत्येक इकाई की इच्छाओं सम्मान यह सोचकर करता है, मानो वे उसका अधिकार हां. वहां प्रत्येक नागरिक दूसरों की इच्छाओं का सम्मान करते हुए अपनी इच्छाओं को मर्यादित रखता है. जिम्मेदार समाज इसमें भी सदस्य इकाइयों की मदद करता है. इस तरह कि सदस्य इकाइयों की अधिकतम इकाइयों की इच्छाओं की अधिकतम पूर्ति संभव हो सके.

सामाजिक न्याय’ राज्य के समर्थन तथा उसके जिम्मेदराना आचरण पर टिका होता है. वह राज्य को न केवल आवश्यक कार्यकारी शक्तियां सौंपने का समर्थन करता है, बल्कि उनके सकारात्मक उपयोग की राह भी बताता है. वह राज्य से अपेक्षा करता है कि ऐसे नागरिकों के साथ सहानुभूति और जिम्मेदराना ढंग से पेश आए, जो प्राकृतिक अथवा अन्य किसी कारण से सामान्य सुखसुविधा के मामले में पिछड़ चुके हैं. इसके लिए कोई एक और सार्वभौमिक रास्ता संभव नहीं है. संसाधनों के उपयोग के लिए न्यायानुगामी राज्य सामान्य सहमति को आधार बनाता है. फिर उसपर इस तरह अमल करता है, जिससे समाजार्थिक असमानताओं को न्यूनतम किया जा सके. फलस्वरूप अन्याय और असमानता के शिकार रहे लोगों के मन में एकदूसरे के प्रति सामंजस्य भाव का संचार होता है. उनका आत्मविश्वास बढ़ता है. इस प्रकार न्यायप्रधान राज्य वह है जिसमें दुखदैन्य के शिकार प्रत्येक नागरिक को राज्य और समाज दोनों की मदद का भरोसा होता है. ऐसा राज्य जो न्याय को अपना नैतिक और वैधानिक कर्तव्य मानता है. उसके अभाव में राज्य अपने होने का औचित्य खो देता है. न्यायशास्त्र के सुविख्यात अध्येता, विचारक जान रॉल्स ने ‘सामाजिक न्याय’ की महत्ता को रेखांकित करते हुए लिखा है

जैसे किसी भी विचारधारा की पहला गुण उसका सत्य होना है, वैसे ही न्याय, सामाजिक संस्थाओं का प्रथम सद्गुण है. कोई दर्शन वह चाहे जितना सरल और सुंदर क्यों न हो, यदि वह असत्य को बढ़ावा देता है तो उसे या तो बदलना चाहिए, अन्यथा मिट जाना चाहिए. ऐसे ही कोई कानून या संस्था वह चाहे जितनी व्यवस्थित और क्षमतावान क्यों न हो, यदि वह अन्याय का समर्थन करती है, तो उसे सुधरना चाहिए, वरना खत्म हो जाना चाहिए.’2

अपने विशद लेखन में रॉल्स क्लासिक समाजवादियों यथा हॉब्स, जॉन लाक, रूसो की ‘सोशल कांट्रेक्ट’ की सैद्धांतिकी को ही विस्तार देता है. उसके अनुसार न्याय श्रेष्ठ समाज का सर्वश्रेष्ठ गुण है. न्याय की पहचान कैसे की जाए? कोई नियम या विचार कब न्यायसंगत बनता है? इसके लिए रॉल्स बहुत साधारण सूत्र देता हैयदि व्यक्तियों के एक समूह को उनकी वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थितियों से एकदम स्वतंत्र कर, उन्हें अपने लिए नया देश, नया परिवेश चुनने तथा नवीन संस्थाएं गढ़ने की आजादी हो, तो उस समूह के लिए यह प्राकृतिक अवस्था में लौटने जैसा होगा. रॉल्स इसे मूल अवस्था की संज्ञा देता है. पुनश्चः मूल अवस्था में लौटी इकाइयों को यदि यह आजादी दी जाए कि भावी समाज के गठन हेतु सोचसमझकर जरूरी नियमों का गठन करें. उस समय परस्पर सहमति, सहभागिता तथा सहकल्याण हेतु वे जिन नियमों का वरण करेंगी, वही न्यायोचित राह होगी. उन नियमों पर ईमानदारी से चलते हुए वे जिन कर्तव्यों का निष्पादन करेंगे, वे सामाजिक न्याय को बढ़ावा देंगे. उसके अनुसार ‘सामाजिक न्याय’ समाज की प्रत्येक इकाई की आंतरिक शक्तियों, शुभताओं, सद्गुणों एवं कर्तव्यों को पहचानने, तथा उन्हें अपने भले के लिए इस प्रकार प्रयुक्त करना है, जिससे शेष सामाजिक इकाइयों के हित बाधित न हों. ‘सामाजिक न्याय’ उत्तरदायी सरकार का सबसे महत्त्वपूर्ण और प्राथमिक कर्तव्य है. उसके माध्यम से वह अपने होने के औचित्य को सिद्ध कर सकती है.

यदि नागरिककल्याण को कसौटी मान लिया जाए तो ‘साम्यवाद’ और ‘सामाजिक न्याय’ के बीच की दूरी मिटने लगती है. वे समानधर्मा न होकर पूरक विचारधाराएं सिद्ध होती हैं. लक्ष्य की दृष्टि से दोनों के बीच कोई खास मतभेद नहीं है. अंतर वहां तक पहुंचने के रास्ते में है. उसके लिए साम्यवाद वर्गसंघर्ष का रास्ता अपनाता है. उसकी मूल धारणा है कि शिखर पर आसीन सर्वसत्तावादी शक्तियां अपने विशेषाधिकारों को छोड़ने के लिए कभी तैयार न होंगी. वर्गहीन समाज की रचना के लिए आवश्यक है कि उनसे उन सभी संसाधनों को छीनकर राज्य के नियंत्रण में ले लिया जाए जो उन्होंने श्रमिकों और कामगारों के अंतहीन शोषण द्वारा अर्जित किए हैं. ‘सामाजिक न्याय’ समाजवादी राज्य का आदर्श सामने रखता है. वह अपेक्षा करता है कि सरकार उन लोगों के प्रति सहानुभूति से पेश आए जो किसी कारण विकास की स्पर्धा में पिछड़ चुके हैं. वर्गहीन समाज की परिकल्पना के साथ साम्यवाद, समाजवाद से आगे की, अपेक्षाकृत प्रगतिशील विचारधारा है, जिसमें नागरिकों को सहभागिता के सिद्धांत पर अपनी अधिकतम स्वतंत्रता का भोग करने के अवसर प्राप्त होते हैं.

साम्यवाद’ और ‘समाजवाद’ दोनों में संपत्ति पर राज्य का अधिकार होता है. समाजवाद की मूल सैद्धांतिकी है, ‘प्रत्येक से उसकी क्षमतानुसार, तथा प्रत्येक को उसके योगदान के अनुसार.’ साम्यवाद राज्य से और अधिक जिम्मेदार आचरण की अपेक्षा रखता है. उसका आदर्श हैᅳ‘प्रत्येक से उसकी क्षमता के अनुसार, प्रत्येक को उसकी जरूरत के अनुसार.’ ‘साम्यवाद’ और ‘समाजवाद’ दोनों ही अपने नागरिकों से उम्मीद करते हैं कि वे राज्य के विकास में अपना भरपूर योगदान दें. यह पूंजीवादी तंत्र से बिलकुल अलग है. उसमें लाभ पर पूंजीपति का एकाधिकार होता है. वही उत्पादन किया जाता है, जिससे पूंजीपति को अधिकतम लाभ की संभावना हो. समाजवादी राज्य लोगों की सामान्य आवश्यकताओं के आधार पर अपनी उत्पादननीति बनाता है; तथा उनका लोककल्याण के निमित्त प्रयोग करता है. दूसरी ओर पूंजीवादी उत्पादन की मुख्य प्रेरणा लाभार्जन होता है. अधिक लाभ की उम्मीद हो तो पूंजीपति, केवल अपने स्वार्थ को ध्यान में रखकर नई मांग बनाने का प्रयत्न करता है. उसका लोगों की सामान्य जरूरत से कोई संबंध नहीं होता. अशक्तता अथवा किसी अन्य कारण से यदि कोई नागरिक राज्य के विकास में अपना पर्याप्त योगदान देने में असमर्थ है तो, समाजवादी तंत्र में उसकी आय या परिलब्धियां उसके द्वारा दिए गए योगदान के अनुसार तय होंगी. साम्यवादी राज्य व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने की जिम्मेदारी स्वयं उठाता है. उसका संकल्प यहीं पूरा नहीं हो जाता. अपति साम्यवादी राज्य निरंतर ऐसी कोशिश में रहता है, जिससे नागरिक असमानता और अन्याय को बढ़ावा देने वाली परिस्थितियां दुबारा पैदा न हों. इस तरह साम्यवाद, मानवमात्र के कल्याण की दृष्टि से अधिक उपयोगी दर्शन है.

अधिकांश लोग ‘समाजवाद’ और ‘साम्यवाद’ का अंतर ही नहीं समझ पाते. जैसा कि कहा गया है साम्यवाद, समाजवाद से आगे की चीज है. समाजवाद में उत्पादन एवं वितरण का अधिकार चुनी गई सरकार के अधीन होता है. समस्त संसाधन जनता की संपत्ति माने जाते हैं. सरकार न्याय भावना के साथ, सभी के विकास को ध्यान में रखकर उनका प्रबंधन करती है. साम्यवाद राजनीतिक परिवर्तन का सपना संजोता है और श्रमिक संगठनों द्वारा अधिकृत व्यवस्था में समतामूलक समाज की स्थापना पर जोर देता है. इस रूप में वह एक राजनीतिक संकल्प है. अपनी मूल संकल्पना में ‘सामाजिक न्याय’ बीच का रास्ता है, जो व्यवस्था में बिना किसी बड़े परिवर्तन के राज्य से समाजार्थिक विपन्नता के शिकार नागरिकों के कल्याण हेतु विशेष प्रयास करने की अपेक्षा रहता है. वह कामना करता है कि अपने उत्तरदायी आचरण द्वारा राज्य ऐसे नागरिकों के कल्याण के लिए विशेष प्रयत्न करें, जो किसी कारणवश विकास की स्पर्धा में पिछड़ चुके हैं. साम्यवाद का मुख्यआधार बहुआयामी समानता है. समाजवाद भी सामाजिक स्तर पर नागरिकों के लिए समान अवसरों का पक्ष लेता है. ‘सामाजिक न्याय’ समान अवसर उपलब्ध कराने के अलावा राज्य द्वारा ऐसे आचरण की अपेक्षा रखता है, ताकि सभी नागरिक उसका लाभ उठा सकें और ऐसे नागरिक जिन्हें किसी भी रूप में विशेष मदद या प्रोत्साहन की आवश्यकता है, उन्हें वह समयानुसार प्राप्त होता रहे. ‘सामाजिकन्याय’ चूंकि राज्य की सदेच्छा का सुफल है, इसलिए यदि पूर्ण समानता संभव न हो तो समरसता से ही संतोष कर लिया जाता है. ताकि सामाजिक विक्षोभों में कमी आए और राज्य की ऊर्जा प्रतिक्रियात्मक कार्यों के बजाय राज्य के निर्माण में काम आने लगे. साम्यवाद का लक्ष्य पूर्ण समानता है. जिसमें किसी भी प्रकार की ऊंचनीच, वर्गीकरण आदि के लिए कोई जगह न हो. भारतीय समाज में जाति सामाजिक विषमता, अन्याय, वर्गभेद और उत्पीड़न का मुख्य कारण रही है. इसलिए यहां धर्म, जाति, वर्ण जैसी विभेदकारी संस्थाओं का उन्मूलन सामाजिक न्याय के कार्यकर्ताओं और विचारकों की प्रमुख मांग रही है.

किसी राज्य को साम्यवाद की ओर ले जाना आसान नहीं है. यह कई चरणों में संपन्न होने वाली प्रक्रिया है. मार्क्स इसके दो प्रमुख चरणों का उल्लेख करता है. उसके अनुसार केवल सत्ताकेंद्रों पर सर्वहारा के अधिकार से क्रांति का लक्ष्य पूरा नहीं हो जाता. उसकी अगली चुनौती यानी दूसरा चरण वर्गहीन समाज की स्थापना करना है. उसमें समस्त अंतर्भेदों का शमन हो जाता है. उन स्थितियां का लोप हो जाता है, जो असमानता और असुरक्षा को बढ़ावा देती हैं. यह बड़ा लक्ष्य है. आदर्श को एकदम छूता हुआ. मार्क्स मानता है कि वर्गहीन समाज की स्थापना शीर्षस्थ वर्ग का सपना नहीं हो सकता. जो सुख, सुविधाएं और विशेषाधिकार उसे वर्तमान व्यवस्था में आसानी से प्राप्त हैंउन्हें वह आसानी से छोड़ने के लिए भला क्यों तैयार होगा? यथास्थिति बनाए रखने के लिए उसे जो भी कदम उन्हें उठाना पड़े, उससे वह पीछे नहीं रहता. आमूल परिवर्तन का सपना केवल सर्वहारा देख सकता है. इसलिए क्रांति की सफलता और संचालन उसी पर निर्भर करता है.

साम्यवाद जिस वर्ग का सपना या संकल्प हो सकता है, उसका बड़ा हिस्सा, भीषण गरीबी, अशिक्षा और अनेकानेक रूढ़ियों से ग्रस्त रहा है. भारत के संदर्भ में जाति भी बाधा है. हजारों वर्षों की पराधीनता, शोषण और उत्पीड़न का शिकार रहने के कारण, अपने लिए स्वयं निर्णय लेने की आदत करीबकरीब छूट चुकी है. दूसरी ओर विपुल संसाधनों, ज्ञानविज्ञान तथा सभी प्रकार की शक्तियों से लैस अल्पसंख्यक अभिजन समुदाय हमेशा आत्मविश्वास से भरा रहता है. वह बदलाव के लिए उतनी ही छूट देने को तैयार होता है, जिससे उसके स्वार्थ को किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचे. व्यवस्था में आमूल परिवर्तन न तो उनका सपना होता है, न ही संकल्प. आमूल परिवर्तन तभी संभव है, जब लोगों में वर्गीय चेतना जागृत हो. वे शोषण के कारणों को समझें तथा समान हितों के लिए संगठित हों. ‘थीसिस ऑन फायरबाख’ का समापन वाक्य, जिसमें मार्क्स बदलाव की जरूरत पर अतिरिक्त बल देता है, क्रांति की आवश्यकता तथा आकादमिक ज्ञान की सीमाओं को ही रेखांकित करता है. इससे मार्क्स तथा उसके पूर्ववर्ती चिंतकों, जिनमें उदार कैथोलिक विचारक भी शामिल हैं, का अंतर साफ दिखने लगता है. मार्क्स का केवल कथनी और करनी के अंतर को पाटने तक सीमित नहीं रहता, लक्ष्य तक पहुंचने का रास्ता भी बताता है. कथनी और करनी की समानता को लेकर गांधी का उल्लेख प्रासंगिक है. बताया जाता कि उनकी कथनी और करनी में समानता थी. लेकिन उनकी कथनी, करनी सामान्य राजनीतिक कार्यक्रमों तक सीमित थी. ग्राम को स्वतंत्र आर्थिक इकाई के रूप में प्रचारित करते हुए वे भूल जाते हैं कि अपनी समाजार्थिक संरचना में भारतीय गांव सामंतवाद और जातिवाद के गढ़ रहे हैं. सामाजिक न्याय की गांधीवादी परिकल्पना उच्चस्थ जातियों द्वारा निचली जातियों के प्रति सामान्य सदाचार से अधिक कुछ न थी. यानी कुल मिलाकर उसमें ‘सामाजिक न्याय’ जैसा कुछ था ही नहीं. जाति और धर्म को लेकर सामान्य उदारता गांधी से पहले के विचारक भी प्रकट कर चुके थे. गांधी लगभग उसी को दोहराते हैं. ‘हिंदस्वराज’ में उनका आधुनिकताविरोधी रवैया मशीनीकरण से विलगाव के रूप में सामने आता है. गांधी लोकतंत्र और व्यक्तिस्वातन्त्र्य के क्षेत्र में हो रहे बदलावों से निस्पृह थे, जबकि मार्क्स का एकएक शब्द आवाह्नकारी है.

यहां से साम्यवाद जिसे मार्क्स के प्रति सम्मानभाव दिखाने के लिए सामान्यतः ‘मार्क्सवाद’ भी कहा जाता है, का अन्य विचारधाराओं से अंतर साफ दिखने लगता है. मार्क्स के पूर्ववर्ती विचारक सभ्यता के आधुनिक मूल्यों की प्राप्ति के लिए राज्य से उदार आचरण की उम्मीद करते थे. किसी न किसी रूप में वे राज्य की अधिसत्ता को स्वीकारते थे. उनका विश्वास था कि राज्य के अभाव में समाज का ऐच्छिक विकास संभव ही नहीं है. बदलाव संबंधी उनकी उम्मीदें राज्य के उदार एवं जिम्मेदाराना आचरण पर टिकी थीं. मार्क्स सत्ता एवं शक्ति के केंद्रीकरण के दुष्परिणामों को समझता था. उसके अनुसार सत्ता हाथ में आने के बाद सर्वहारा संगठनों को चाहिए कि वे ऐसे प्रयास करें, जिससे वर्गसंघर्ष की स्थितियां दुबारा उत्पन्न न हों. पर यह काम आसान नहीं है. इसलिए कि लगातार वर्गभेद के बीच रहने के कारण उत्पीड़क वर्ग उसी के अनुसार जीने का अभ्यस्त हो जाता है. चूंकि शीर्षस्थ वर्ग उससे दूर होता है. इतना दूर कि उसके करीब पहुंचना तो दूर, ऐसा सोचना भी उसके लिए सपने जैसा होता है. उसका संपर्क उन्हीं हालात में जी रहे, अपने जैसे आसपास के लोगों से रहता है. इसलिए वह अपने हालात की तुलना बजाय शिखरस्थ अभिजन के, अपने ही जैसे लोगों के साथ करने लगता है. शीर्षस्थ अभिजन के सुखसाधन तथा वैभवविलास उसे मिथकीय आभास देने लगते हैं. समयसमय पर उनका प्रयोग वह अपनी कुंठाओं के शमन हेतु करता है. जीवन की लगातार बढ़ती चुनौतियां उसे बहुत बड़े सपने देखने की अनुमति नहीं देतीं. सपनों के अभाव में वह अपने कष्टों की तुलना आसपास के लोगों से करता है, जब सैकड़ोंहजारों लोगों को अपने जैसे हालात में जीते हुए देखता है, तब वह उन्हें जीवन की स्वाभाविक अवस्था मानने लगता है. यह अनुभूति उसे समझौतावादी बनाती है. यदि वह स्पर्धा के लिए आगे आता तो अपने ही जैसे लोगों के साथ. उस समय अपने ही जैसे लोगों साथ वह वही आचरण करता है; जैसा वह भोगता हुआ आया है. इस तरह परिवर्तन का उसका सपना स्वयं को उत्पीड़क की स्थिति में लाने तक सिमट जाता है. ऐसे में यदि वर्गक्रांति सफल हो जाए तब भी वास्तविक परिवर्तन अलभ्य बना रहता है.

  अगले खंड में समाप्य…..

ओमप्रकाश कश्यप

इतिहास में घालमेल के बहाने

सामान्य
इतिहास केवल विजेता का होता है. दो संस्कृतियों के द्वंद्व में पराजित संस्कृति को मिटने के लिए बाध्य किया जाता है. विजेता इतिहास की पुस्तकों को इस प्रकार लिखता है जिसमें उसका गुणगान हो, और विजित को अपमानित किया गया हो. जैसा कि नेपोलियन ने एक बार कहा था, ‘इतिहास क्या है, महज एक दंतकथा, जिससे सब सहमत हों —डॉन ब्राउन.

 

इतिहास दीर्घकालीन राजनीति है. ऐतिहासिक घटनाएं प्रायः द्वंद्वात्मकता में घटती हैं. सत्ता उनकी दशा-दिशा तय करती है. हर नया विजेता सत्तासीन होते ही अपनी कीर्ति-कथा गढ़ने में जुट जाता है. इसके लिए वह क्रीत बुद्धिजीवियों की मदद लेता है. कला और संस्कृति के माध्यमों का इस्तेमाल करता है. खरीदे हुए बुद्धिजीवी स्थितियों की व्याख्या अपने तथा अपने आश्रयदाता के स्वार्थानुसार करने लगते हैं. जरूरत पड़ने पर इतिहास से छेड़छाड़ भी करते हैं. उसका एकमात्र उद्देश्य होता है, विजित के दिलोदिमाग पर कब्जा कर लेना. भरोसा दिलाना कि उनकी भलाई आश्रित बने रहने में है. दरअसल बड़े से बड़ा शिखर-पुरुष अपने प्रतिद्विंद्वी से इतना नहीं डरता जितना वह जन-विद्रोह की संभावना से घबराता है. विद्रोह की न्यूनतम संभावना हेतु वह जनता का हर समय बेहद करीबी, भरोसेमंद तथा परम-हितैषी दिखना चाहता है. वाल्तेयर ने इतिहास को ‘सर्वमान्य झूठ का सिलसिला’ कहा है. इससे इतर जार्ज आरवेल की टिप्पणी इतिहास की महत्ता को रेखांकित करती है—

‘किसी समाज को नष्ट करने का सबसे कारगार तरीका है, उसके इतिहासबोध को दूषित और खारिज कर दिया जाए.’

जिस इतिहास की बात आरवेल करते हैं, उसे घटनाओं तथा उन्हें जन्म देने वाली स्थितियों का प्रामाणिक दस्तावेज होना चाहिए. इस कसौटी पर भारत के इतिहास को कैसे देखा जाए? इतिहास के नाम पर हमें जो पढ़ाया जा रहा है, क्या वह प्रामाणिक है? जो लोग निहित स्वार्थ हेतु ऐतिहासिक तथ्यों के साथ खिलबाड़ कर रहे हैं, उनसे कैसे निपटा जाए? ऐसे कई प्रश्न हैं, जिनपर विचार करना आज की परिस्थितियों में आवश्यक हो जाता है. वैसे इतिहास से खिलबाड़ की समस्या आज की नहीं है. सहस्राब्दियों से यही होता आया है. आर्य यहां 1500 ईस्वी पूर्व में आए. उस समय सिंधु सभ्यता(3300 ईस्वी पूर्व—1750 ईस्वी पूर्व) पराभव की ओर अग्रसर थी. वे चाहते तो मरणासन्न सभ्यता को सहेजने की कोशिश कर सकते थे. पर इस बारे में उन्होंने सोचा तक नहीं. उल्टे प्राकृतिक आपदा के शिकार दुर्ग और दुर्गवासियों पर आक्रमण कर अपनी वीरता दिखाते रहे. सहेजने से ज्यादा जोर उन्होंने मिटाने पर दिया. विलासी और विध्वंसक प्रवृत्ति के इंद्र को राजा माना. अनार्य जो समृद्ध सभ्यता के उत्तराधिकारी रह चुके थे, उन्हें असुर, असभ्य, क्षुद्र आदि कहकर अपमानित करते रहे. खुद घुमक्क्ड़ थे. उपलब्धि के नाम पर उनके पास कुछ था नहीं. जिनके पास था, उनका उल्लेख करके अपनी हेटी नहीं करना चाहते थे. झूठे आर्य(श्रेष्ठ)त्व की रक्षा हेतु उन्होंने मिथकों और कपोल-कल्पनाओं से भरे वेद-पुरान रचे. ऐसे ग्रंथ जिनमें सच खोजने चलो तो सबसे शक्तिशाली सूक्ष्मदर्शी भी नाकाम हो जाए. उनका ध्येय था, जैसे भी हो ब्राह्मणवाद का महिमामंडन करना. ब्राह्मण को सबसे ऊपर, अनुपम और परम-प्रज्ञाशील दिखाना.

मध्यकाल में इतिहास-लेखन की दृष्टि से कुछ जागरूकता आती है. उस दौर की रचनाओं में तत्कालीन राजा-महाराजाओं का बखान है. कुछ तारीखें, घटनाएं तथा तथ्यों का उल्टा-सीधा विवरण है. मगर विरासत में मिले संस्कारों की वजह से इतिहासबोध गायब रहता है. उस समय के कवि-लेखक अपने आश्रयदाता की कीर्ति-कथा गढ़ने, उसे दूसरों से श्रेष्ठतर दिखाने को लालायित दिखते हैं. उसके लिए सत्य को मनचाहे ढंग से तोड़ते-मरोड़ते हैं. चारण, भाट, विदूषक कहलाकर भी गर्व का अनुभव करते हैं. उनीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक हालात ज्यों की त्यों बने रहते हैं. इसी दौर में पश्चिम में बौद्धिक क्रांति हुई. भारतीय संस्कृति की ओर योरोपीय विद्वानों का आकर्षण बढ़ने लगा. उनकी देखा-देखी भारतीयों में भी इतिहास चेतना उभरने लगी. स्वाधीनता संग्राम की स्थितियों का असर भी उसपर पड़ा. उस संघर्ष में समाज के सभी वर्ग सहभागी थे. धर्मनिरपेक्षता अधिकांश के लिए सामाजिक मूल्य बन चुकी थी. ऐसे में जो इतिहास-दृष्टि विकसित हुई, उसका स्वरूप समन्वयवादी था.

भारतीय इतिहासकारों को मोटे तौर पर दो वर्गों में बांटा जा सकता है—पहले वर्ग में वे इतिहासकार हैं जिनके लिए भारतीयता का मतलब हिंदू या ‘हिंदुत्व’ है. अतीतमोह उनकी कमजोरी होता है. मानते हैं कि साहित्य तथा अन्य कला-माध्यमों की सार्थकता विलुप्त भारतीयता की खोज में है. उनके लिए संस्कृति और इतिहास में अधिक अंतर नहीं होता. दोनों में से चयन करना हो तो वे संस्कृति का पक्ष लेते हैं. इस नासमझी के कारण लाखों सैनिकों की बलि लेने वाला, छल-प्रपंच से भरा ‘महाभारत’ ‘धर्मयुद्ध’ घोषित कर दिया जाता है. दूसरा वर्ग आधुनिकता समर्थक लेखकों-इतिहासकारों का है. ऐसे इतिहासकार अतीत के नाम पर भविष्य कुर्बान नहीं करते. वे अतीत को सहेजते हैं ताकि भविष्य संवारा जा सकें. गंगा-जमुनी संस्कृति के समर्थक के तौर पर वे मानते हैं कि भारत को आधुनिक राष्ट्र बनाने के लिए सभी वर्गों को साथ लेकर चलना आवश्यक है. आजादी के बाद से कमोबेश यही दृष्टि प्रभावी रही है. हालांकि संघीय विचारधारा के इतिहासविद् अपने लंगड़े इतिहासबोध द्वारा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर बीच-बीच में सांप्रदायिक प्रदूषण फैलाने की साजिश रचते आए हैं. कुछ ऐसा ही केंद्र में भाजपा सरकार बनने के बाद शुरू हुआ है. 2014 में वह विकास के वायदे के साथ सत्ता में आई थी. मगर आने के साथ ही उसने दिखा दिया था कि उसकी असल मंशा कुछ और ही है. सरकार बनने के साथ ही ज्ञान-विज्ञान की आधुनिक संस्थाएं उसके सीधे निशाने पर आ गईं. कला-संस्कृति के प्रमुख केंद्रों पर संघीय मानसिकता के लोगों को बिठाया जाने लगा. सरकार का सबसे पहला और विवादित कदम ‘भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद’ के अध्यक्ष की नियुक्ति थी. उसके लिए वाई. सुदर्शन राव को चुना गया था. पद-संबंधी सुदर्शन राव की योग्यता पर प्रख्यात इतिहासविद् रोमिला थापर की टिप्पणी थी—‘इतिहास के क्षेत्र में सुदर्शन राव का, मानक-रहित पत्रिकाओं में हिंदू धर्म के मिथकीय पात्रों पर लेख लिखने से बड़ा और कौन-सा योगदान है.’ दूसरे सचेत बुद्धिजीवियों, इतिहासकारों ने भी सरकार के उस कदम की आलोचना की थी, किंतु सरकार अड़ी रही.

सुदर्शन राव रामायण और महाभारत के कथ्यों की ऐतिहासिकता को स्वीकारते हैं. उनका यह सोच भाजपा के पितृ संगठन ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ से मेल खाता है. आधुनिकता की कसौटी पर जाति प्रथा कलंक साबित हुई है. फिर भी संघ उसे किसी न किसी रूप में सहेजे रखना चाहता है. जाति-पृथा का महिमामंडन करते हुए अपने आलेख ‘भारतीय जातिपृथा: एक पुनर्मूल्यांकन’ में सुदर्शन राव लिखते हैं—‘अतीत में जातिप्रथा भली-भांति काम करती आई है. बीते जमाने में उसे लेकर कोई शिकायत प्राप्त नहीं होती. प्रायः उसे गलत ढंग से पेश किया जाता है. आरोप लगाया जाता है कि वह शासक वर्ग के समाजार्थिक स्वार्थों को कायम रखने के लिए गढ़ी गई थी. असल में वह धर्मशास्त्रों द्वारा समर्थित, सभ्यताकरण की अनिवार्यता है. सुदर्शन राव की ‘योग्यता’ के वास्तविक आकलन हेतु उचित होगा कि जाति-संबंधी उनके विचारों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा गुरु गोलवरकर के जाति-संबंधित विचारों के समानांतर रखकर पढ़ लिया जाए.

2007 में ‘कर्मयोग’ शीर्षक से लिखी गई पुस्तक में मोदी जी ने मैला उठाने के काम को ‘वाल्मीकियों के लिए आध्यात्मिक अनुभव’ बताया था. वह जाति-व्यवस्था के महिमामंडन जैसा था, जिसका गुणगान संघ और उसके समर्थक करते ही रहते हैं. शब्दों के किंचित ऐर-फेर के साथ यही विचार गोलवरकर की पुस्तक ‘बंच आफ थाट्स’(भाग-दो, अध्याय दस) में भी देखे जा सकते हैं—‘जातिप्रथा प्राचीनकाल में भी मौजूद थी. यह हमारे राष्ट्रीय जीवन में हजारों वर्षों से निरंतर उपस्थित है….यह लोगों में संगठन तथा बंधुत्व की भावना पैदा करती है.’ भारत को लंबे समय तक गुलाम बनाए रखने में जाति-प्रथा का योगदान किसी से छिपा नहीं है. मगर गोलवरकर के विचार अलग हैं. उनका मानना है कि जाति-प्रथा थी, इसीलिए यह देश विदेशियों का कम गुलाम रहा. वरना दासता और लंबी खिंच सकती थी. गोलवरकर संभवतः अकेले विचारक हैं जो 800 वर्षों के दासताकाल को भी कम मानते हैं. बहरहाल, ऐसे समय में जब अधिकांश बुद्धिजीवी जाति प्रथा की आलोचना करते हों, सुदर्शन राव जैसे बुद्धिजीवी उसे अकादमिक संदर्भ देते रहते हैं. उन्हें पारितोषिक मिलना ही था.

राव अकेले उदाहरण नहीं हैं. ज्ञान-विज्ञान और कला संस्थाओं के शिखर पदों पर खास विचारधारा के लोगों को नियुक्त कर सरकार ने दिखा दिया था कि तर्क और आलोचनाएं उसे तयशुदा दिशा में काम करने से रोक नहीं सकतीं. केंद्र सरकार तथा भाजपा शासित राज्यों की सरकारों अगली वरीयता है, पाठ्य-पुस्तकों में बदलाव करना. महाराष्ट्र सरकार ने फैसला किया है कि विद्यार्थियों को शिवाजी के बारे में और अधिक पढ़ाया जाना चाहिए. बदले में कुछ मुगल शासकों को पाठ्यपुस्तकों से गायब कर दिया गया. राजधानी दिल्ली सहित देश के अनेक भागों में मुगल स्थापत्यकला को दर्शाती, ऐतिहासिक महत्त्व की अनेक इमारतें हैं. उनमें कुतुबमीनार जैसी विश्वविख्यात निमिर्ति भी शामिल है. बदली नीति के तहत पाठ्यपुस्तकों से रजिया सुल्तान तथा मुहम्मद बिन तुगलक जैसे शासकों से संबंधित पाठ को हटा दिया गया है. जब महाराष्ट्र कर रहा है तो मध्यप्रदेश और राजस्थान क्यों पीछे रहते. करीब तीन वर्ष पहले राजस्थान के तीसरे स्तर के इतिहासकार ने फतवा जारी किया था कि अकबर की सेना के साथ हुए युद्ध में राणा प्रताप विजयी हुए थे. उन्हें पराजित दिखाना वामपंथी इतिहासकारों की चाल है. राज्य के शिक्षामंत्री वासुदेव देवनानी को मानो बैठे-बैठाए एक मुद्दा मिल गया. उन्होंने यह कहकर, ‘अकबर या प्रताप में से एक ही महान हो सकता है. हमारे लिए महान महाराणा प्रताप हैं’—इतिहास को अपने हिसाब से मोड़ने का निर्णय ले लिया है. पाठ्यक्रम में बदलाव से पहले सरकार मामले को ‘हिस्ट्री बोर्ड आफ स्टीज’ के पास भेजकर खानापूर्ति कर लेना चाहती है. मामला केवल निचली कक्षाओं तक सीमित नहीं रहा. ‘फर्स्ट पोस्ट’ की एक रिपोर्ट बताती है कि राजस्थान विश्वविद्यालय ने इतिहास की पुस्तकों में चंद्रशेखर शर्मा का एक लेख ‘राष्ट्ररत्न महाराणा प्रताप’ शामिल किया गया है. संघ के विचारक दीनानाथ बत्रा की पुस्तकों को उच्च अध्ययन के लिए संदर्भ सामग्री के रूप में मान्यता देना भी इसी रणनीति का हिस्सा है.

इतिहास के फेरबदल का मामला केवल पाठ्यपुस्तकों सीमित नहीं है. दूरदर्शन और फिल्में भी उसका निशाना बनती आई हैं. हालिया उदाहरण सुभाष घई की फिल्म है, जिसे वे फिल्म की नायिका ‘पदमावती’ के नाम से रिलीज करना चाहते थे. मगर फिल्म को देखे बिना ही करणी सेना बिदक गई. फिल्म में पदमावती को अलाउद्दीन खिलजी के आगे नाचते हुए दिखाना उसके नेताओं को राजपूती आन-बान-शान के विरुद्ध लगा. वे दल-बल सहित आंदोलन पर उतर आए. देखते ही देखते सिनेमाघर, बसें, गाड़ियां फूंक दी गईं. रेल को नुकसान पहुंचाने की कोशिश भी की गई. ‘पदमावत’ में जायसी ने नायिका को काल्पनिक माना है. निर्माताओं ने पदमावती को काल्पनिक चरित्र दर्शाना चाहा, पर उन्हें संतोष न हुआ. आंदोलन राजस्थान की सीमाएं पार कर दूसरे राज्यों तक फैलता गया. पुलिस, प्रशासन, सरकार और विपक्ष मौन तमाशबीन बने रहे. फिल्म का नाम ‘पदमावत’ करने और कुछ दृश्यों के संपादन के बाद समझौता हुआ. अचानक माहौल शांत हो गया. करणी सेना उसे लेकर देश-भर में उत्पात मचाए थी, एकाएक फिल्म के समर्थन में आ गई. सिर्फ इसलिए नहीं कि उसमें अंबानी का पैसा लगा है, बल्कि इसलिए भी कि सती-प्रथा पर सवाल उठाने तथा स्त्री-विरोधी सिद्ध करने के बजाय, फिल्म परोक्षतः उसका महिमा-मंडन करती है. जिसे कुछ लोग आज भी राजपूती शान से जोड़कर देखते हैं.

दूरदर्शन धारावाहिक भी इतिहास के साथ छेड़छाड़ का माध्यम बनते आए हैं. पहले यह काम मुख्यतः मनोरंजन के वास्ते, कभी-कभी कथानक में नाटकीयता पैदा करने के लिए किया जाता था. इन दिनों उनका इस्तेमाल हिंदुत्व के औजार के रूप में किया जा रहा है, इसलिए ऐतिहासिक तथ्यों को मन मुताबिक बदला जा रहा है. उदाहरण के लिए धारावाहिक ‘सोमनाथ’ पर चर्चा कर सकते हैं. राष्ट्रीयता की प्रचलित अवधारणा पश्चिम से आयातित है. स्वाधीनता आंदोलन के दौरान राष्ट्रीयता की भावना ने लोगों को परस्पर जोड़ा था. संस्कृत ग्रंथों में भी ‘राष्ट्र’ का उल्लेख है, परंतु उसका संदर्भ एकदम अलग है. ‘सोमनाथ’ में राष्ट्रीयता की प्राचीन अवधारणा को, आधुनिक संदर्भ में, सांप्रदायिक उन्माद के साथ प्रस्तुत किया गया है.

लगता है, स्वाधीनता संग्राम में किसी प्रकार का योगदान न होने की कमी को भाजपा और संघ इतिहास की मनमानी व्याख्या द्वारा पाट देना चाहते हैं. उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद उनके हौसले और भी बुलंद हैं. इतिहास में दखलंदाजी का खेल मूर्ति-स्थापना के बहाने भी खेला जा रहा है. महाराष्ट्र में शिवाजी और गुजरात में पटेल की मूर्ति विराट मूर्तियां लगवाने का फैसला लिया जा चुका है. एक कम चर्चित मगर महत्त्वपूर्ण मामला लखनऊ से है. वहां मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने आंबेडकर पार्क में राजा सुहेलदेव(995-1060 ईस्वी) की प्रतिमा लगाने की मांग की थी. जिसे राजनीतिक कारणों से तत्काल मान लिया गया था. इतिहास में सुहेलदेव का वर्णन नहीं है. पर्शियन लेखक अब्दुर्र रहमान चिश्ती सतरहवीं शताब्दी में किस्सागोई से भरपूर कृति ‘मिरात-ए-मसूदी’ में उसकी चर्चा करते हैं. सालार मसूद गजनी के सुलतान का भतीजा था. उसको प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर के विध्वंस का दोषी माना जाता है. गुजरात से दिल्ली, मेरठ होता हुआ वह बहराइच की ओर रहा था कि सुहेलदेव ने उसे चुनौती थी. राजा सुहेलदेव ने पड़ोसी राजाओं के साथ मिलकर संगठित सेना तैयार की. एक महीने तक चली लड़ाई में दोनों पक्षों का भारी नुकसान हुआ. अंततः सालार मसूद युद्ध में घायल हुआ और वहीं चल बसा. उसका मजार बहराइच में है. जहां उसे ‘गाजी मसूद’ नाम से जाना जाता है. ‘मीराते मसूदी’ में सुहेलदेव को भर-थरू जाति से माना जाता है, जो राजपूतों की उपजाति है. लेकिन 1980 के आसपास सुहेलदेव को पासी राजा कहा जाने लगा. वहीं राजभर समुदाय भी सुहेलदेव के नाम पर एकजुट होने लगा. कहानी में सांप्रदायिक रंग घोलते हुए सुहेलदेव को ‘गौ-रक्षक’ बताया गया. हिंदुत्ववादी सालार मसूद को सोमनाथ के सूर्यमंदिर की मूर्ति को ध्वस्त करने का दोषी मानते हैं. जबकि मुस्लिम संप्रदायवादी उसे गाजी और शहीद का दर्जा देते है. इनमें कौन-सा पक्ष सही है, उपलब्ध साक्ष्यों के आधार यह बता पाना संभव नहीं है. बीच संघ सालार मसूद की मजार पर भी अपना दावा ठोक चुका है. उसके अनुसार जहां मजार है, वह कभी ऋषि बालकराम का आश्रम था. फिरोज तुगलक ने आश्रम के स्थान पर मंदिर बनवा लिया है. इतने सारे विवादों में सुहेलदेव के प्रामाणिक इतिहास को गुम होना था, सो हो चुका है.

चलते-चलते सामान्य-सी जिज्ञासा. आखिर वे इतिहास में अतिक्रमण करना क्यों चाहते हैं? इतिहास की पुस्तकों में उल्टा-सीधा कुछ भी जोड़ देने से वर्तमान तो बदल नहीं जाएगा? इसके लिए हमें संस्कृति-निर्माण में इतिहास की भूमिका को समझना पड़ेगा. राजनीतिक दासता ज्यादा से ज्यादा कुछ दशक या पचास-सौ वर्षों की हो सकती है. परंतु सांस्कृतिक दासता सैकड़ों, हजारों वर्षों तक खिंचती जाती है. उससे उबरना आसान नहीं होता. जैसे भारत में ब्राह्मणवाद. वे इतिहास पर कब्जा करना चाहते हैं. ताकि संस्कृति को काबू में रख सकें. इसलिए वाल्तेयर भले ही इतिहास को झूठ कहे, पर उसकी महत्ता है. इतिहास हर हाल में लिखा जाना चाहिए. जार्ज आरवेल के शब्दों में—‘जो इतिहास को नियंत्रण में रखता है, वह भविष्य को नियंत्रण में रखता है. जो वर्तमान को नियंत्रण में रखता है, वही इतिहास को नियंत्रण में रख सकता है.’ आज जो लोग सत्ता मैं हैं, वे इतिहास की उलटगामी को भली-भांति समझते हैं. इसलिए जब वे सत्ता-बाहर हों, तब भी झूठ-पुराण गढ़ते रहते हैं.

स्थितियां एक बार फिर उनके नियंत्रण में है. सांस्कृतिक वर्चस्व के लिए वे इतिहास बदलने पर उतारू हैं. वे हमारे इस भ्रम को बनाए रखना चाहते हैं कि शासक होना उनका जन्मजात गुण है. एलफिंस्टिन का कथन कि ‘भारत का इतिहास सिकंदर के आक्रमण के बाद से आरंभ होता है और यही वह समय है जब भारत विदेशियों के संपर्क में आता है.’ उनके लिए अर्थहीन है. उन्हें झूठ का पहाड़ खडा करने में महारत हासिल है. मिथकों और गल्प-आख्यानों के माध्यम से वे काल्पनिक इतिहास को सिकंदर के आक्रमण से भी हजारों वर्ष पीछे तक ले जाते हैं. चूंकि उस समय उनकी उपलब्धियां नगण्य थीं, इसलिए हमारे मन-मस्तिष्क पर छाये रहने के लिए पुराणों और महाकाव्यों के माध्यम से पूरा मिथकीय भंडार हमारे आगे परोस देते हैं. फिर पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसे दोहराते चले जाते हैं. उस समय तक जब तक कि उनका गढ़ा गल्पशास्त्र हमें इतिहास जैसा दिखने न लगे. हम जानते हैं कि सिंधुवासियों को लिपि का बोध था. लेकिन उस दौर का ब्राह्मणों के लिखे के अलावा हमारे पास दूसरा कोई वाङ्मय नहीं है. कल्पना कीजिए आज से 3000-3500 वर्ष पहले, उस समय के आर्यों के चाल-चलन को देखते हुए, ऋग्वेद के उन गीतों को सुनकर जिनमें इंद्र से पुरों को ध्वस्त करने की प्रार्थना बार-बार की गई है, सिंधु-सभ्यता के तत्कालीन उत्तराधिकारियों की प्रतिक्रिया कैसी रही होगी. हम केवल कल्पना ही कर सकते हैं. आक्रामक आर्यों को लेकर वे शब्द कदाचित यही रहे होंगे—‘घोर आत्ममुग्ध, उज्जड़, और अहंकारी.’

लेकिन जो इतिहास हमें पढ़ाया गया है, अथवा जैसा इतिहास पढ़ाने के लिए वे जी-जान से जुटे हैं, वर्तमान परिस्थितियों में अपनी ओर से क्या हम इस तरह की प्रतिक्रिया की कल्पना कर सकते हैं?

ओमप्रकाश कश्यप

बालक, समाज और शिक्षा

सामान्य

अभिजन समूह अपवाद से बचते हैं. उनकी कोशिश होती है कि उसे कम से कम चुनौतियों का सामना करना पड़े. यथास्थिति बनाए रखने के लिए वे नएनए तरीके आजमाते हैं. यह कोशिश जैसा कि ऊपर बताया गया है, समाजीकरण के नाम से, बचपन से आरंभ कर दी जाती है. धर्म का उत्तराधिकार के रूप में अंतरण, दुनिया के लगभग सभी देशोंसमाजों के बीच बनी मूक सहमति का नतीजा है. धार्मिक विश्वासों को लेकर दुनिया में टकराव होते हैं. आस्था के नाम पर रक्त बहाये जाते हैं. संवेदनशील लोग उससे आहत होते हैं. मनुष्य की आस्था उसके विवेक से संतुलित हो, इसकी कोशिश धर्म केंद्रित समाजों में नहीं की जाती. न व्यक्ति को छूट दी जाती है कि वह अपने धर्म का चयन वयस्क होने के बाद अपने विवेकानुसार कर सके. दरअसल आस्था के कारोबार में लगे लोग भलीभांति जानते हैं कि धर्म का उत्तराधिकार में अंतरण बंद हो जाए तो उसका महत्त्व उस जर्जर खटोले जितना रह जाएगा जिसे कोई परिवार वुजुर्गों की पुरानी यादें सहेजने के लिए संभाले रखता है.

शैश्वावस्था में बुद्धि संश्लेषणात्मक होती है. शिशु अपने परिवेश से सूचना जुटाने में लगा रहता है. उसे सूचनाओं की प्रकृति तथा उनके अंतर्संबंधों की समझ नहीं होती. न ही वह तथ्यों की विवेचना में समर्थ होता है. फिर भी वस्तुजगत के प्रति उसके अवचेतन में तीव्र आकर्षण होता है. दिमाग की कोरी सलेट पर वह तेजी से सूचनाएं दर्ज करता चला जाता है. परिवेश को जानने की उसकी अव्यक्त इच्छा बड़ों से कई गुना प्रबल होती है. तीन वर्ष तक पहुंचतेपहुंचते बालक का कौतूहल अत्यंत तीव्र हो जाता है. तब तक वह मातापिता की भाषा सीख चुका होता है. कुछ शब्द उसके ज्ञानभंडार की शोभा भी बढ़ाने लगते हैं. भाषाबोध उसे परिवेश का मूकदृष्टा नहीं रहने देता. उसकी मदद से बालक की जिज्ञासा फलीभूत होकर ज्ञान में ढलने लगती है. भाषा न केवल बालक के चिंतनसामथ्र्य को निखारती है, अपितु प्रतीकों के माध्यम से उसका मार्गदर्शन भी करती है. उसकी मदद से बालक अपने आसपास के लोगों तथा स्वयं से संवाद करने में सक्षम हो जाता है. फलस्वरूप उसमें परिवेश में हस्तक्षेप करने की कला विकसित होने लगती है.

वस्तुओं के बीच संबंध खोजने की शुरुआत उम्र के पहले वर्ष से हो जाती है. बालक चलअचल में अंतर करने लगता है. उसका प्रभाव संबंधों की प्रकृति पर भी पड़ता है. गायभैंस दूध देती हैं तो उनके बच्चों से प्यार करना, बंदर घुड़की देता है तो उसे देखते ही मुक्का तानना या डंडा उठा लेना—ये क्रियाएं बालक देखतेदेखते सीख जाता है. ढाईतीन वर्ष का बालक परिवेश का सजग दृष्टा होता है. एक वैज्ञानिक की भांति जिज्ञासु और तटस्थ. जिज्ञासापूर्ति के लिए वह मातापिता के आगे नितनए प्रश्न उठाता है. वस्तु सीधी पहुंच में हो तो वह उसके बारे में प्रश्न करने की जहमत नहीं उठाता, बल्कि खुद पड़ताल करने बैठ जाता है. बालक का तीव्र कौतूहल कभीकभी अभिभावकों की चिंता का रूप ले लेता है. जबकि खिलौने के अंगप्रत्यंग को हिलाडुलाकर देखना, उसके साथ तोड़फोड़ करना, गली में चुपचाप बैठे कुत्ते पर कंकड़ उठाकर फेंकना या डंडा उठाकर मारने के प्रयास, हमेषा ध्वंसात्मक वृत्ति का परिचायक नहीं होते. बालक का सहज कौतूहल उसके मूल में होता है. कुत्ते के निकट आने पर मातापिता समझाते हैं, ‘दूर रहो, काट लेगा.’ मातापिता बालक के प्रथम गुरु, मित्र और हितैषी हैं, इसलिए वह मान जाता है. मगर पूरी तरह नहीं. जो बताया गया है, उसे वह स्वयं अनुभव करना चाहता है. इसी सहजभाव से बालक के ज्ञानार्जन की प्रक्रिया आगे बढ़ती है.

बालक की शरारतें जिन्हें बड़े प्रायः उसका बचपना कहकर नजरंदाज कर देते हैं, उसकी प्रबोधन प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा होती हैं. ऐसी गतिविधियां बालक के भीतर उभरते आत्मविश्वास, परिवेशचेतना, कौतूहल तथा ज्ञानार्जन की उत्कट इच्छा को दर्शाती हैं. होना तो यह चाहिए कि मातापिता और परिजन बालक की शोधवृत्ति का सम्मान करें. मौलिकता की खोज में उसके सहायक बनें. परंतु यहां समाज के अपने विश्वास 8और परंपराएं आड़े आने लगती हैं. समाज अपनी संस्कृति और रीतिरिवाजों में जीता है. उसे सदैव यह भय सताए रहता है कि लीक से हटते ही उसके अस्तित्व पर बन आएगी. अपनी भौतिक आवश्यकताओं के लिए बालक मातापिता पर निर्भर होता है. इसलिए उनके आग्रहों की उपेक्षा उसके लिए संभव नहीं होती. इसके बावजूद वह अपनी स्वतंत्रता को लेकर बेहद सतर्क रहता है. परिणामस्वरूप समाजीकरण की प्रक्रिया और बालक की चेतना का अघोषित टकराव उसके प्रबोधनकाल से ही आरंभ हो जाता है.

अपने व्यक्तित्व के प्रति पूर्णतः सजग बालक नहीं चाहता कि उसके मातापिता ज्ञानार्जन तथा अनुभव संचयन की कोशिशों में बिना उसकी इच्छा के हस्तक्षेप करें. इससे उसका व्यक्तित्व आहत होता है. वह चाहता है कि मातापिता और परिजन उसकी स्वातंत्र्यचेतना का सम्मान करें. दूसरी ओर मातापिता और परिजन कामना करते हैं कि बालक जल्दी से जल्दी बिना किसी संदेह और प्रश्नाकुलता के, अपनी सामाजिक परंपराओं, रीतिरिवाजों और मर्यादाओं को समझने लगे. इसके लिए उसे समयसमय पर अनेक संस्कारों, जिन्हें समाज पवित्र मानकर अपनी धार्मिकसांस्कृतिक पहचान के रूप में सहेजे रखता हैसे गुजारा जाता है. इसके कुछ अच्छे परिणाम आते हैं. बालक का आत्मविश्वास बढ़ता है. सामाजिक संबंधों, रीतिरिवाजों के प्रति उसकी समझ में इजाफा होता है. नुकसान यह होता है कि उसकी प्रश्नाकुलता मिटने लगती है. कौतूहल पर थोपे गए पूर्वाग्रह हावी हो जाते हैं. बालक बिना किसी शंकासंदेह के सामाजिक मर्यादाओं को अपनाए, उनका अनुपालन करे, यह मातापिता के लिए उसके अच्छेपन की कसौटी होती है. इसलिए वे बारबार परंपरा और संस्कृति की दुहाई देते हैं.

चारपांच वर्ष का बालक औसतन 450 प्रश्न प्रतिदिन अपने अभिभावकों से करता है. समाज में इतना ताव नहीं होता कि वह बालक की जिज्ञासाओं के आवेग को सह सके. इसलिए उसे अवमंदित करने के प्रयास उसके बचपन से ही शुरू कर दिए जाते हैं. नन्हे शिशु के रूप में अपने भाई या बहन को देखकर बालक मां से पूछता है कि वह कहां से आया है? मातापिता का रटारटाया उत्तर होता है‘भगवान के घर से.’ यदि बालक पूछे कि भगवान कौन है? तब दीवार पर टंगी तस्वीर या आले में रखी मूर्ति दिखाकर उसकी जिज्ञासा का शमन करने की कोशिश की जाती है. बालक प्रायः मान लेता है. इसलिए कि वह अपने मातापिता पर भरोसा करता है. दूसरे उस उम्र तक शब्दों की, वाक्यों की एकदो कड़ी से लंबा सोचने का अभ्यास उसे नहीं होता. जब तक उसमें प्रवीण होता है, तब तक संस्कारीकरण की कोशिश सफल हो चुकी होती है. बालक की मेधा अपनी स्वतंत्र राह छोड़, बंधीबंधाई लीक का अनुसरण करने लगती है.

दोष मातापिता का भी नहीं होता. निस्संदेह वे वही कर रहे होते हैं, जो उन्हें उनके बचपन में सिखाया गया था. अज्ञानतावश वे बालक पर उन मान्यताओं और रूढ़ियों को थोपते चले जाते हैं, जिनके आधार पर वे और उनके पूर्वज असमानता और शोषण के शिकार होते आए हैं. परंपरा के प्रति अतिशय लगाव सामाजिक गतिशीलता में ठहराव को जन्म देता है. अप्रासंगिक हो चुकी रूढ़ियों के प्रति मातापिता के दुराग्रह, जिसे उनकी अज्ञानता भी कहा जा सकता है, बालक के विवेकीकरण की प्रक्रिया पर असमय विराम लगा देते हैं.

मातापिता सोचते हैं, सुखशांति, मानसम्मान और भविष्य के लिए निर्धारित मर्यादाओं का पालन अपरिहार्य है. उसके बिना उनकी पहचान अधूरी होगी. इस कारण वे सन्तान को ऐसे किसी भी आचरण से दूर रखना चाहते हैं, जो सामाजिक अपवाद का कारण बने तथा जिससे परिवारसंस्था के भविष्य पर खतरा उत्पन्न हो. यह प्रवृत्ति बालक के मन में अंतद्र्वंद्वों को जन्म देती है. समाज द्वारा दी गई शिक्षा तथा बालक के अपने अनुभवों का विरोधाभास उसे कदमकदम पर चौंकाता है. समाज इसे नजरंदाज करता जाता है. बालक जैसेजैसे बड़ा होता है, स्वाभाविक रूप से भिन्न मान्यताओं वाले समाजों और व्यक्तियों के संपर्क में आता है. उस समय उसके मन में किसी प्रकार का हीनताबोध, संदेह, अविश्वास पैदा न हों, इसके लिए तरहतरह के इंतजाम किए जाते हैं. अपने धर्म, अपनी जाति तथा अपनी संस्कृति को सर्वश्रेष्ठ बताना, आस्था और विश्वास के आगे ज्ञानविज्ञान और तर्क की अवहलेना तथा धार्मिकसांस्कृतिक रूढ़ियों के प्रति दुराग्रही बने रहने की शिक्षाजैसे उपाय लगभग सभी समाजों में करीबकरीब एक तरह से किए जाते हैं. हिंदू समाज में तो धर्म के अलावा जाति की फांस भी है, जिसके माध्यम से बालक के दिलोदिमाग को छुटपन से ही जकड़ लिया जाता है.

सभ्यता के मामले में अगड़ापिछड़ा हर समाज अपनी संस्कृति को श्रेष्ठतम मानता है. दावा करता है कि उसकी संस्कृति में उसके सभी सदस्यों की समान सहभागिता है. अधिकारों का न्यायपूर्ण वितरण है. यह अतिरेकी विश्वास संस्कृति को ईश्वरीय वरदान मानने की प्रेरणा जगाता है. इससे धर्म स्वतः संस्कृति के केंद्र में आ जाता है. एक बार केंद्र में आने के बाद वह शिक्षा, उत्पादन पद्धति, सामाजिक संबंध आदि सभी को अपने अनुरूप ढालने लगता है. धर्म खुद को नैतिकता के स्रोत के रूप में पेश करता है. जबकि उसकी उसकी मूल संरचना सामंतवादी लक्षणों से युक्त होती है. समाज में व्याप्त असमानता को वह व्यक्ति की नियति का नाम देता है. तथा उसके समाधान हेतु ईश्वरीय अनुकंपा को जरूरी मान लेता है. उसके प्रभाव में व्यक्ति मिथकों की दुनिया में जीने लगता है. उसके संघर्ष भावना कमजोर पड़ती है. नियति पर अत्यधिक भरोसा बालक को समझौतावादी बना देता है.

शिक्षा का उद्देश्य बालक को उपलब्ध ज्ञानसंपदा से परचाने के साथ उसके प्रबोधन सामर्थ्य को बढ़ाना है. यह काम बालक की प्रश्नाकुलता को बढ़ाए बिना संभव नहीं है. उचित यही है मातापिता बालक पर अपना धर्म, आस्था और विश्वास थोपने से बाज आए. धर्म के चयन का मामला बड़ा होने तक बालक के विवेक पर छोड़ दिया जाए. लेकिन असमानताग्रस्त समाजों में शिक्षा शीर्षस्थ वर्गों के स्वार्थ को ध्यान में रखकर गढ़ी जाती है. भारतीय समाज इसका उदाहरण है. प्राचीन भारत में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य विद्यार्थियों को दी जाने वाली शिक्षा में अंतर होता था. ब्राह्मण बालक अपनी रुचि और गुरु की आज्ञा के अनुसार कुछ भी सीखने को स्वतंत्र होता था. जबकि वैश्य और क्षत्रिय को उनके कार्य के अनुसार शिक्षा दिए जाने का विधान था. शूद्र का काम चूंकि आज्ञापालन तक सीमित था, इसलिए उसके लिए किसी भी प्रकार की शिक्षा निषिद्ध थी. यदि वह अपने अध्यवसाय से कुछ सीखना चाहे तो उसपर भी नियंत्रण था. नतीजा यह हुआ कि समाज का बड़ा हिस्सा अधिकार एवं आत्मसम्मान की लड़ाई में पिछड़ता गया. दूसरी ओर शीर्षस्थ वर्ग खुद को निरंतर मजबूत करने में लगा रहा.

आजादी के समय देश के पुननिर्माण की जिम्मेदारी थी. इसलिए शिक्षा का स्वरूप बहुआयामी था. उसमें प्रौद्योगिकी, चिकित्सा के अलावा ज्ञानसंपदा से जुड़े सभी विषयों के अध्यापन का ध्यान रखा गया था. अस्सी के दशक तक महसूस किया जाने लगा था कि केवल कृषि के भरोसे समाजार्थिक चुनौतियों से निपटना आसान नहीं है. बढ़ती जनसंख्या के कारण बेरोजगारी बढ़ी थी. उसके समाधान हेतु औद्योगिक विकास पर जोर दिया जाने लगा. धीरेधीरे ज्ञानकेंद्रित शिक्षा के स्थान पर रोजगारमूलक शिक्षा का प्रत्यय लोगों के दिलोदिमाग पर छाता चला गया. जगहजगह आईटीआई, पाॅलिटेक्नीक खुलने लगे. उनका लाभ हुआ. उद्योग जगत में रोजगार के अवसर बढ़ने लगे. इकीसवीं शताब्दी तक पूरी दुनिया में डिजीटल क्रांति हो चुकी थी. स्वचालित मशीनों के आविष्कार से उद्योगों की मानवश्रम पर निर्भरता तेजी से घटी थी. बढ़े उत्पादन को खपाने के लिए बाजार को नए किस्म के प्रबंधकों तथा बिक्री एजेंटों की आवश्यकता थी. उसकी आपूर्ति के लिए निजी संस्थानों के माध्यम से प्रबंधन स्तर की शिक्षा दी जाने लगी. परिणामस्वरूप शिक्षा, जिसका प्रथम ध्येय मनुष्य का विवेकीकरण करना है, प्रबंधन का विषय मान ली गई. देखते ही देखते खरपतवार की तरह ऐसे शिक्षण संस्थान खुल गए जिनके लिए शिक्षा मात्र उत्पाद थी, विद्यार्थी महज उपभोक्ता. यह सब सोचीसमझी नीति के तहत किया जाता है. ऐसी ही कोशिश आज भी जारी है.

अभिजन समूह अपवाद से बचते हैं. उनकी कोशिश होती है कि उसे कम से कम चुनौतियों का सामना करना पड़े. यथास्थिति बनाए रखने के लिए वे नएनए तरीके आजमाते हैं. यह कोशिश जैसा कि ऊपर बताया गया है, समाजीकरण के नाम से, बचपन से आरंभ कर दी जाती है. धर्म का उत्तराधिकार के रूप में अंतरण, दुनिया के लगभग सभी देशोंसमाजों के बीच बनी मूक सहमति का नतीजा है. धार्मिक विश्वासों को लेकर दुनिया में टकराव होते हैं. आस्था के नाम पर रक्त बहाये जाते हैं. संवेदनशील लोग उससे आहत होते हैं. मनुष्य की आस्था उसके विवेक से संतुलित हो, इसकी कोशिश धर्म केंद्रित समाजों में नहीं की जाती. न व्यक्ति को छूट दी जाती है कि वह अपने धर्म का चयन वयस्क होने के बाद अपने विवेकानुसार कर सके. दरअसल आस्था के कारोबार में लगे लोग भलीभांति जानते हैं कि धर्म का उत्तराधिकार में अंतरण बंद हो जाए तो उसका महत्त्व उस जर्जर खटोले जितना रह जाएगा जिसे कोई परिवार वुजुर्गों की पुरानी यादें सहेजने के लिए संभाले रखता है.

ऐसे में जो लोग सामाजिक परिवर्तन की कामना करते हैं, उन्हें बड़ों के साथसाथ बालक को भी अपनी उम्मीद के केंद्र में लाना होगा. बालक की जिज्ञासा, उसके कौतूहल और शिक्षा की मौलिकता की रक्षा करके सामाजिक परिवर्तन की नई राह तैयार की जा सकती है. उसमें परंपरा, संस्कृति और धर्म के लिए सिर्फ इतनी जगह होगी, जिससे बालक को यह एहसास दिलाया जा सके कि वह जिस समाज का सदस्य है उसका बड़ा हिस्सा उनपर विश्वास करता है. यह काम निरे बुद्धिवाद के भरोसे संभव नहीं है. परंतु बुद्धिवाद को नकारने के भी अपने खतरे हैं. विशेषकर बालक से संदर्भ में. इसलिए वौद्धिकता के साथ हम बचपन को भी सहेज सकें, इसी में हम सबकी जय है.

ओमप्रकाश कश्यप

बहुजन संस्कृति और सामाजिक न्याय

सामान्य
भारत के पास अनगिनत आख्यान हैं, इतिहास नहीं है.—हेनरी बर

 

‘संस्कृति’ समाजशास्त्र के सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाले शब्दों में से है. प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसके अलग-अलग संदर्भ होते हैं. कई बार परंपरा को संस्कृति समझ लिया जाता है. जबकि अनेक बार लोग संस्कृति और सामान्य व्यवहार के बीच अंतर नहीं कर पाते. जनसामान्य ‘संस्कृति’ को सलीके से परिभाषित भले ही न कर पाए, लेकिन यदि किसी व्यक्ति से उसके सामान्य व्यवहार, कार्यकलापों, सामाजिक-पारिवारिक जीवन की प्रेरणाओं के बारे में प्रश्न किया जाए तो बिना झिझके उसका एक ही उत्तर होगा—‘यही मेरी संस्कृति है.’ संस्कृति मनुष्य और समाज के संबंधों को न केवल व्याख्यायित करती है, अपितु उन्हें सफल एवं सार्थक भी बनाती है. संस्कृति के स्वरूप, उसकी अवधारणा, परिभाषा आदि को लेकर समाजविज्ञानियों के बीच मतभेद रहे हैं. कई बार लोग संस्कृति को मनुष्य के सामान्य व्यवहार से जोड़ने लगते हैं तो कई बार उसे सभ्यता के साथ गड्मड कर दिया जाता है. किसी व्यक्ति अथवा समाज के संदर्भ में संस्कृति उसके समग्र ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, कला, रोजमर्रा के व्यवहारों, संबंधों, रीति-रिवाजों, परंपराओं आदि का समुच्चय होती है.

संस्कृति का कोई एक स्रोत नहीं होता. मनुष्य संस्कृति के तत्व माता-पिता, गांव-पड़ोस, रीति-रिवाज, किस्से-कहानियों, साहित्य-कला, ज्ञान-विज्ञान आदि विविध स्रोतों से ग्रहण करता है तथा उन्हें अपनी अस्मिता और पहचान के रूप में सहेजकर रखता है. इस तरह कि वे उसके रोजमर्रा के व्यवहार, ज्ञान, सामाजिक संबंधों और मर्यादाओं का आधार बन जाते हैं. दूसरे शब्दों में संस्कृति उत्तराधिकार का विषय है. व्यक्ति अथवा समाज जिन आदतों को यत्नपूर्वक अपनी विरासत के तौर पर संभाले रहता है, जिनसे उसकी विशिष्ट पहचान बनती है, उनका समन्वित, समावेशी और लोकोपकारी रूप संस्कृति कहा जा सकता है. उनमें कला, साहित्य, अर्जित ज्ञान, रीति-रिवाज, परंपराएं, सामूहिक प्रवृत्तियां, खान-पान, आचार-व्यवहार आदि सब सम्मिलित होते हैं. इसके अलावा उसमें वे आदर्श और नियम भी समाहित होते हैं, जिन्हें कोई समाज खुद को दूसरों से अलग और बेहतर दिखाने तथा स्थायित्व की भावना के साथ अपनाता है. मनुष्य की भौगोलिक और परिस्थितिकीय विशेषताएं भी उसकी संस्कृति को प्रभावित करती हैं.

‘संस्कृति’ शब्द ‘सम्’ और ‘कृति’ की संधि से बना है. उसका आशय ऐसी अमूर्त्त सामाजिक संरचना से है, जिसमें सभी का साझा हो. संस्कृति और सभ्यता को प्रायः एक-दूसरे के पर्यायवाची के रूप में देखा जाता है. लेकिन दोनों में अंतर है. सभ्यता की कसौटी भौतिक जगत की उपलब्धियां तथा उनके फलस्वरूप जीवन में आए परिवर्तन को माना जाता है. सभ्यता संस्कृति से प्रभावित होती है, एक तरह से उसका हिस्सा भी है, लेकिन वह स्वयं संस्कृति नहीं होती. ऐसे ही जैसे भाषा ज्ञान की वाहक होती है, स्वयं ज्ञान नहीं होती. हां, भाषा का ज्ञान हो सकता है, जो मनुष्य की संपूर्ण ज्ञान-संपदा का मामूली हिस्सा है. इसी तरह मनुष्य अथवा समाज की भौतिक उपलब्धियां संस्कृति नहीं होतीं. सभ्यता को आमतौर पर संस्कृति का उत्पाद माना जाता है. लेकिन यह बात पूरी तरह सत्य नहीं है. सभ्यता और संस्कृति का संबंध अन्योन्याश्रित होता है, जिनमें संस्कृति का स्थान अपेक्षाकृत ऊपर माना जाता है. अपनी हर उपलब्धि के लिए सभ्यता संस्कृति की ऋणी रहती है. उसे हम संस्कृति का आवरण भी कह सकते हैं. परोक्षतः दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं. किसी समूह अथवा समाज की सभ्यता को उसकी संस्कृति अथवा संस्कृतियों का समुत्पाद भी कहा जा सकता है.

संस्कृति और व्यवहार में भी अंतर है. लोग संस्कृति को रोजमर्रा के आचरण के रूप में देखने की भूल कर बैठते हैं. यह गलत है. मनुष्य का नैमत्तिक व्यवहार कानून, समाज, बाजार आदि से प्रभावित हो सकता है. उसका अध्ययन मानव-व्यवहार के अंतर्गत आता है. इस तरह वह मनोविज्ञान की विषय-वस्तु है. संस्कृति व्यवहार भी नहीं होती. उसे व्यवहार की नियंत्रक शक्ति अवश्य कहा जा सकता है. कोई भी सामाजिक अथवा व्यक्तिगत व्यवहार संस्कृति का हिस्सा हो सकता है, उसे संस्कृति नहीं माना जा सकता. कारण यह कि व्यवहार मूर्त्त होता है, संस्कृति अमूर्त्त. होली के पर्व पर एक-दूसरे पर रंग डालना अथवा रक्षाबंधन के अवसर पर बहन द्वारा भाई को राखी बांधना, सहज सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवहार का हिस्सा हैं, स्वयं संस्कृति नहीं है. संस्कृति उनमें अंतर्निहित प्रेरणा है. ऐसी अंतश्चेतना जो मनुष्य को अधिकाधिक सभ्य तथा प्राणिमात्र के प्रति अधिकतम उपयोगी होने का उत्साह जगाती है. मनुष्य ऐसी प्रेरणाओं को अपनी-अपनी तरह से परिभाषित कर सकता है. उनके स्वरूप में थोड़ा-बहुत परिवर्तन ला सकता है, किंतु सामाजिक पहचान से जुड़े होने के कारण उन्हें पूर्णतः नकार नहीं सकता. कुल मिलाकर समाज अथवा व्यक्ति-विशेष के संदर्भ में संस्कृति को हम उसकी सामूहिक आदतों, स्वभाव, ज्ञान-विज्ञान, कला, साहित्य आदि के समुच्चय के रूप में देख सकते हैं.

अपने मूल विषय ‘बहुजन संस्कृति’ लौटने से पहले आवश्यक है कि ‘बहुजन’ की अवधारणा तय कर ली जाए. ‘बहुजन’ का अभिधार्थ ‘बहुसंख्यक जन’ अवश्य है, लेकिन इसका आधार मात्र संख्याबल नहीं है. संख्या के माध्यम से बहुजन को परिभाषित करने के अनेक खतरे हैं. इससे ‘बहुजन’ को संख्याबल समझ लिए जाने की संभावना बराबर बनी रहेगी. वह भीड़ को समाज का दर्जा देने के बराबर होगा. प्रकारांतर में वह अनेक भ्रांतियों को जन्म देगा. पुनश्चः ‘बहुजन’ और ‘बहुसंख्यक जन’ दोनों को एक मान लिया गया तो अल्पसंख्यक मुस्लिमों के मुकाबले हिंदू बहुजन होंगे तथा दलितों के सापेक्ष पिछड़ी जातियों के लोग. इस कसौटी पर आदिवासियों के मुकाबले गैर आदिवासी ‘बहुजन’ माने जाएंगे. यह विभाजन आगे भी बढ़ता जाएगा. एक समय ऐसा भी आ सकता है जब बहुजन की संकल्पना का आधार और उद्देश्य दोनों समाप्त हो जाएं. जैसे ‘बहुजन’ को ‘बहुसंख्यकजन’ नहीं कहा सकता, ऐसे ही ‘बहुजन’ के आधार पर ‘बहुजनवाद’ जैसी भी संकल्पना भी अनुचित कही जाएगी. उससे उसके ‘बहुसंख्यकवाद’ में बदलने की संभावना बनी रहेगी. अतएव ‘बहुजन’ की अवधारणा तय करने के लिए संख्या-तत्व को नजरंदाज करना ही उचित होगा.

फिर ‘बहुजन’ किसे माना जाए? इस शब्द का प्रथम उपयोग बौद्ध दर्शन में प्राप्त होता है. बुद्ध इसे परिभाषित नहीं करते, किंतु जिस संदर्भ में वे इसका प्रयोग करते हैं, उससे ‘बहुजन’ की अवधारणा साफ होने लगती है. भिक्षु संघ को संबोधित करते हुए वे कहते हैं—‘चरथ भिक्खवे चारिकम्-बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय.’ ‘हे भिक्षु! बहुजन कल्याण और बहुजन-हित के लिए निरंतर प्रयाण करते रहो.’ बुद्ध राज-परिवार में जन्मे थे. समकालीन राजाओं, विशेषकर श्रेष्ठिवर्ग पर उनका प्रभाव था. फिर भी वे भिक्षुसंघ से ‘बहुजन’ के कल्याण हेतु निरंतर प्रयत्नशील रहने की कामना करते हैं. आखिर क्यों? तत्कालीन सामाजिक स्थितियों को देखते हुए इसे समझ पाना कठिन नहीं है. उस समय तक वर्ण-व्यवस्था कट्टर रूप ले चुकी थी. कर्मकांड शिखर पर था. लोग जाति देखकर व्यवहार करते थे. इस मामले में सर्वाधिक मुखर ब्राह्मण थे. उनका दावा था कि उन पर सृष्टि-रचियता ब्रह्मा की विशेष कृपा है. जिसने उन्हें अपने मुख से पैदा किया है. निहित स्वार्थ के लिए उन्होंने प्राकृतिक शक्तियों अग्नि, वायु, आकाश, जल, पृथ्वी आदि का देवताकरण किया था और लगातार यह प्रचारित करते रहते कि वे यज्ञों के माध्यम से देवताओं के संपर्क में रहते हैं. दूसरा वर्ग क्षत्रियों का था, जिसे समाज की रक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. देवताओं की दुहाई देते-देते ब्राह्मण खुद देवता होने का गुमान करने लगे थे, जबकि क्षत्रिय राज्य के रखवाले से उसका स्वामी बन बैठे थे. स्वार्थ के लिए ब्राह्मण क्षत्रिय का महिमामंडन करता था, क्षत्रिय ब्राह्मण के पांव पखारता था.

तीसरा व्यापारी वर्ग था. पहले दो वर्गों की तरह अनुत्पादक वर्ग. उसका कार्य दूसरों के उत्पाद बेचकर मुनाफा कमाना था. मुनाफे का एक हिस्सा ब्राह्मण और क्षत्रिय को भेंट कर वह मस्त रहता था. शेष जनसमाज यानी चौथे वर्ग में किसान, मजदूर, शिल्पकार आदि सभी आते थे. उनपर समाज के विकास की जिम्मेदारी थी, परंतु थे सब दूसरों की मर्जी के दास. किसी को अपनी रुचि और हितों के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता न थी. किसान खेत में पसीना बहाता था, मगर फसल पर उसका अधिकार न था. वह राजा और सामंत की मान ली जाती थी. शिल्पकार अपनी कला से संस्कृति और सभ्यता को संवारने का काम करते थे, किंतु अपने ही श्रम-कौशल पर उनका अधिकार न था. उनके श्रमोत्पाद के मूल्यांकन का अधिकार व्यापारी वर्ग के पास था. शूद्र का कर्तव्य था राज्य के लिए कर और ब्राह्मण के लिए दान देना. वफादार रहना तथा उनके प्रत्येक आदेश  को कृपा-भाव के साथ ग्रहण करते हुए दासत्व का धर्म निभाना. इसी में उसकी मुक्ति है—ऐसा कहा जाता था.

संख्याबल में ऊपर के तीनों वर्ग शेष जनसमाज के सापेक्ष बहुत कम थे. कुल जनसंख्या का बमुश्किल पांचवा हिस्सा. लेकिन समाज के कुल संसाधनों पर उनका अधिकार था. इसलिए संख्या-बहुल होने के बावजूद निचले वर्ण के लोग ऊपर के तीन वर्गों की मनमानी सहने के लिए विवश थे. कार्य-विभाजन के नाम पर ब्राह्मणों ने समाज के बहुसंख्यक हिस्से को छोटी-छोटी जातियों और वर्गों में बांट दिया था. बहुजन के पास बुद्धि थी, हस्तकौशल था, अनथक परिश्रम करने का हौसला तथा ईमानदारी भी थी. नहीं था तो आत्मविश्वास और सपने जो जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं. ये सब सेवा-भाव की भेंट चढ़ चुके थे. निरंतर बढ़ते सामाजिक दबावों तथा यह भ्रम कि ईश्वर एकमात्र और सच्चा न्यायकर्ता है, कि इस जीवन में उन्हें जो खोना पड़ रहा है वह मृत्योपंरात जीवन में सहज प्राप्त होगा—के चलते वे पूर्णतः नियतिवादी हो चुके थे. अपने सामान्य हितों के बारे में निर्णय लेने के लिए भी वे समाज के शीर्षस्थ वर्गों पर निर्भर थे; तथा उन्हें अपना स्वामी, सर्वेसर्वा एवं मुक्तिदाता मानते थे. हालात ऐसे थे कि अपने प्रत्येक कार्य में स्वार्थ को आगे रखने वाले तीनों शीर्षस्थ वर्गों के बीच अभूतपूर्व एकता थी, जबकि चौथा और बहु-संख्यक वर्ग सामान्य हितों के लिए एक-दूसरे के साथ स्पर्धा करता हुआ, अपनी प्रभावी ताकत खो चुका था. ‘दिमाग’ और ‘हाथों’ की उस अघोषित-अवांछित स्पर्धा में लाखों हाथ, कुछ सौ या हजार दिमागों की मनमानी के समक्ष बेबस थे. ‘बहुजन’ से बुद्ध का आषय ऐसे ही लोगों से था, जो समाज के प्रमुख कर्ता और उत्पादक वर्ग का हिस्सा होने के बावजूद उपेक्षित, तिरष्कृत, उत्पीड़ित और इस कारण विपन्नता का जीवन जीने को विवश थे. अपने जीवन संबंधी महत्त्वपूर्ण निर्णयों के लिए वे ऐसे लोगों पर निर्भर थे जो उन्हीं के प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष समर्थन से शक्तिशाली होकर बहुजन-हितों के विपरीत कार्य करते थे.

कदाचित अब हम ‘बहुजन’ की अवधारणा तय करने की स्थिति में आ चुके हैं. अभी तक के विवरण जो छवि बनती है, उसके अनुसार ‘बहुजन’ समाज का प्रमुख उत्पादक वर्ग है, जो कभी जाति तो कभी धर्म के नाम पर आरंभ से ही अन्याय, असमानता और शोषण का शिकार रहा है. मानव सभ्यता उसके स्वेद-बिंदुओं की ऋणी है, फिर भी उसे किसी न किसी रूप में, उसके श्रम-लाभों से वंचित रखा गया है. वह खेतों में काम करने वाला मजदूर हो सकता है; और गली-नुक्कड़ पर जूते गांठने वाला मोची भी. स्त्री भी हो सकता है, पुरुष भी. आजीविका उसका धर्म है. वही उसका भरोसा भी. इसी कारण बुद्ध पूर्व भारत में वह आजीवक कहलाता था. उन दिनों प्रकृति पर उसे भरोसा था. वही उसकी श्रद्धा का पात्र भी थी. प्रकृति के प्रति सम्मान-भाव के साथ जिस दर्शन की रचना उसने की थी, विद्वत जगत में वह लोकायत के रूप में ख्यात हुआ. उसकी सहायता से शताब्दियों तक वे लोग आंडबर और याज्ञिक कर्मकांडों पर टिके वैदिक धर्म-दर्शन को चुनौती देता रहा. इस तरह बहुजन की अवधारणा हमें सामाजिक न्याय की भावना से जोड़ती है. अपने साथ-साथ दूसरों के कल्याण के लिए जिम्मेदार बनाती है. यही उसका उद्देश्य है और यही अभीष्ट भी है. हालांकि सामाजिक न्याय की अवधारणा को लेकर मत-वैभिन्न्य हो सकते हैं.

मार्क्स ने पूंजीवादी तंत्र में उत्पीड़ित वर्ग को ‘सर्वहारा’ का नाम दिया था. ‘सर्वहारा’ और ‘बहुजन’ की आर्थिक अवस्था में अधिक अंतर नहीं होता. दोनों ही शोषण का शिकार होते हैं. उनमें से किसी को भी अपने श्रम के मूल्यांकन का अधिकार नहीं होता. फिर भी दोनों की सामाजिक स्थिति में अंतर है. मार्क्स का जन्म ऐसे समाज में हुआ था जहां जाति, वर्ण और धर्म के आधार पर विभाजन न था. अतएव सर्वहारा की उसकी परिकल्पना ठेठ पूंजीवादी समाज में आर्थिक विपन्नता के शिकार श्रमिक-वर्ग के शोषण तथा उसके सामाजिक-सांस्कृतिक दुष्परिणामों तक सीमित थी. बहुजन की समस्याओं का मूल सामाजिक-सांस्कृतिक भेदभाव होते हैं. प्रकारांतर में वही उसकी समाजार्थिक दुरावस्था का कारण बनते हैं. मुख्यधारा से जुड़ने के लिए सर्वहारा को आर्थिक बाधाएं पार करनी पड़ती हैं. जबकि बहुजन को आर्थिक के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक समस्याओं से भी जूझना पड़ता है. चूंकि सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव की गति अत्यंत मंथर होती है, इसलिए बहुजन-कल्याण की राह हमेशा अनेकानेक चुनौतियों से भरी होती है. लोकतांत्रिक परिवेश का लाभ उठाकर सर्वहारा अपनी स्थिति में सुधार ला सकता है. पश्चिमी देशों में ऐसा हुआ भी है. जाति के संबंध में लोकतांत्रिक सरकारें भी अपेक्षानुरूप सफल नहीं हो पातीं. प्रतिगामी शक्तियां जाति को व्यक्ति का निजी मामला बताकर सामाजिक परिवर्तन को टालती रहती हैं. सामाजिक-सांस्कृतिक भेदभाव तथा अवसरों की कमी के कारण बहुजन के लिए आर्थिक विषमताओं के चक्रव्यूह को भेद पाना आसान नहीं होता. जटिल जाति-व्यवस्था तथा उसके साथ धर्म का चिरस्थायी गठजोड़, बहुजन के संघर्ष को कई गुना बढ़ा देते हैं.

‘बहुजन’ का प्रथम उल्लेख भले ही बौद्ध दर्शन में हुआ हो, इसकी भूमिका वैदिक संस्कृति की स्थापना के साथ ही बन चुकी थी. लगभग 1500 ईस्वी पूर्व मध्य एशिया से भारत पहुंचे पशुचारी कबीलों ने खुद को ‘आर्य’ कहा था. इसका अर्थ बताया जाता है—‘श्रेष्ठ’ अथवा ‘श्रेष्ठजन.’ इस संबोधन का आशय था—मूल भारतवासी अथवा उनसे हजारों वर्ष पहले से इस देश में बस चुके जनसमूहों की संस्कृति को हेय मान लेना. भारत के मूल निवासी कौन थे? विद्वान दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं में अग्रणी सिंधू सभ्यता को अनार्य सभ्यता मानते हैं. डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी अपने ग्रंथ ‘हिंदू सभ्यता’(राजकमल प्रकाशन, पांचवा संस्करण, 1975, पृष्ठ 46) में मोहनजोदड़ो से प्राप्त नरकंकालों के आधार पर सिंधू सभ्यता के निर्माताओं को चार नस्लों में बांटते हैं—आद्य-निषाद, भूमध्य सागर से संबंधित जन, अल्पाइन तथा मंगोल, किरात. आगे वे लिखते हैं कि आद्य-निषाद भारत महाद्वीप के निवासी थे. भूमध्यसागरीय लोग दक्षिण एशिया से आए थे. अल्पाइन पश्चिमी एशिया तथा मंगोल, किरात वर्ण के लोग पूर्वी एशिया से पलायन कर लंबी यात्रा के उपरांत भारत पहुंचे थे. इनके अलावा  अलग-अलग नस्ल के संसर्ग से जन्मीं संकर नस्लें भी थीं. ऋग्वेदादि ग्रंथों में आर्यजनों ने इन्हीं नस्लों के सापेक्ष जो उनसे सहस्राब्दियों पहले इस प्रायद्वीप पर आकर बस चुकी थीं; तथा अपने श्रम-कौशल के बल पर समृद्ध सभ्यता की स्वामिनी थीं—अपनी वर्ण-श्रेष्ठता का दावा किया है. यदि उनके दावे को स्वीकार कर लिया जाए तो समकालीन बाकी नस्लें जिनका उल्लेख ऊपर किया गया है, तुलनात्मक रूप से अश्रेष्ठ अथवा निकृष्ट सिद्ध होती हैं, लेकिन पुरातात्विक साक्ष्य इसे वैदिक ब्राह्मणों की आत्ममुग्धता से अधिक मानने को तैयार नहीं है. आज यह प्रमाणित है कि सिंधू घाटी की सभ्यता ऋग्वैदिक सभ्यता की अपेक्षा 1500-2000 पुरानी तथा उससे कहीं अधिक समृद्ध और सुव्यवस्थित थी. पुरातत्ववेत्ता सिंधू सभ्यता की शुरुआत 3200 ईस्वी पूर्व से मानते हैं. 2300 ईस्वी पूर्व से 1750 ईस्वी पूर्व तक वह सभ्यता अपने वैभव के शिखर पर थी. उसके बाद उसके पराभव का दौर शुरू हुआ. 1500 ईस्वी पूर्व में जब आर्यों ने जब भारत में प्रवेश किया, उस समय वह सभ्यता करीब-करीब मिट चुकी थी. उसके अवशेष हड़प्पा, मोहनजोदड़ो’, कालीबंगा, लोथल, मेहरगढ़ जैसे दर्जनों स्थानों पर आज भी सुरक्षित हैं. सिंधुवासियों को दुनिया की सबसे पुरानी और समृद्ध नागरिक सभ्यता की नींव रखने वाला बताया जाता है. पुरातत्ववेत्ता इस बात पर सहमत हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता का कुल क्षेत्रफल आधुनिक पाकिस्तान के क्षेत्रफल से भी अधिक था.

भारतीय इतिहास के संदर्भ में 1500 ईस्वी पूर्व से 700 ईस्वी पूर्व तक के समय को विद्वान ‘अंधकार युग’ मानते हैं. इसलिए कि उस कालखंड के बारे में हमें प्रामाणिक तौर पर कुछ भी ज्ञात नहीं है. विद्वानों के अनुसार ऋग्वेदादि श्रुति ग्रंथों का रचनाकाल भी यही कालखंड है. लेकिन ये ग्रंथ 700 ईस्वी पूर्व में भी लिखित रूप में मौजूद थे, यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता. दूसरी ओर यह प्रमाणित तथ्य है कि सिंधू सभ्यता के निर्माताओं को न केवल लिपि बल्कि संख्याओं, वास्तविक और प्रतीक मुद्रा तथा उनके अनुप्रयोगों की भी पर्याप्त जानकारी थी. उनके खेती के तरीके विकसित थे. इतने विकसित कि भारत में बीसवीं शताब्दी के आरंभ तक भी उनमें खास परिवर्तन नहीं हो पाया था. उनके पास सुनियोजित व्यापार-तंत्र और ऐसी भाषा थी, जिसके माध्यम से वे समकालीन सभ्यताओं से संवाद करने में सक्षम थे. जबकि आर्यजन महज घुमंतु पशुचारी कबीले थे. सभ्यता की दृष्टि से सिंधुवासियों से लगभग हजार साल पिछड़े हुए. इसके बावजूद यदि उन्होंने स्वयं को ‘आर्य’ यानी ‘श्रेष्ठजन’ कहा, तो इसके दो प्रमुख कारण हो सकते हैं. पहला या तो वे सिंधू घाटी की सभ्यता के प्राचीन वैभव तथा उसके महत्त्व से अपरिचित थे. अथवा यह संबोधन उन्होंने बहुत बाद में अनार्यजनों पर अपनी सांस्कृतिक विजय, वैदिक संस्कृति की स्थापना के समय चुना था. वे जानते थे कि अपनी संस्कृति को श्रेष्ठ बताए बिना जीत को स्थायी बनाना और मूल-भारतवासियों पर ‘आर्यत्व’ को थोप पाना असंभव है. ईसा पूर्व चौथी-पांचवी शताब्दी तक वह लक्ष्य ही बना रहा. यह भी संभव है कि ‘आर्य’ संबोधन मध्य एशिया से प्रयाण से पहले ही उनके साथ जुड़ा हो और उसका अभिप्राय ‘श्रेष्ठजन’ न होकर कुछ और हो. ऋग्वेद को प्राचीनतम वेद, हिंदुओं का पवित्रतम ग्रंथ, जिसकी रचना ब्राह्मणों द्वारा ब्राह्मणों के लिए की गई है—माना जाता है. उसके आरंभिक उद्गाता ऋषियों में सभी वर्णों के रचनाकार सम्मिलित हैं.

वेदादि ग्रंथों को ‘ब्राह्मण-ग्रंथ’ कहने की प्रवृत्ति बहुत बाद में, कदाचित यजुर्वेद की रचना के समय हुई. उस समय तक उस समय तक ‘पुरोहित’, ‘राजा’, सम्राट जैसे पदों का सांस्थानीकरण हो चुका था. धर्म और राजनीति दोनों ही व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति का माध्यम बन चुके थे. वैदिक कर्मकांड जो उससे पहले तक मुख्यतः आश्रमों तक सीमित थे, वे राजा-महाराजाओं तथा धनी व्यापारियों के घर-आंगन तक पहुंचकर वैभव-प्रदर्शन के काम आने लगे थे. ब्राह्मणों की पूरी मेधा यज्ञादि कर्मकांडों को विस्तार देने में जुटी थी. चतुर्भुजी ब्रह्मा के हाथ में ‘ऋग्वेद’ के बजाय ‘यजुर्वेद’ की प्रति का होना, वैदिक धर्म-दर्शन की परपंरा में कर्मकांडों के बढ़ते महत्त्व को दर्शाता है. ऐसे में ज्ञान की परंपरा का अवरुद्ध होना स्वाभाविक था. वही हुआ भी. उसके तुरंत बाद पौराणिक लेखन की बाढ़-सी आ गई, जिसने उस समय तक उपलब्ध ज्ञान-विज्ञान और ऐतिहासिक तत्वों का मिथकीकरण करने का काम किया.

ऋग्वेद में अनार्य पुरों के ध्वंस का जगह-जगह वर्णन है. लेकिन ऋग्वेद की रचना का जो काल है, उस समय तक सिंधु सभ्यता का पराभव हो चुका था. इसलिए संभावना यही बनती है कि ऋग्वैदिक आर्यों ने सिंधु-घाटी के उन नगरों और पुरों पर हमला किया था, जो प्रकृति की मार के चलते पहले से ही निष्प्रभ हो चुके थे. पराजित अनार्यों में से कुछ यहां-वहां छिटक गए. जो बचे उन्हें लेकर ब्राह्मणों ने चातुर्वर्ण्य समाज की नींव रखी. चातुर्वर्ण्य समाज की अवधारणा कदाचित आर्यों की प्राचीन स्मृति का हिस्सा थी. गौरतलब है कि प्राचीन मिस्र तथा पर्शिया में भी चातुर्वर्ण्य वर्ण-व्यवस्था प्रचलित थी. अवेस्ता(यसना, 19/17, फ्रे) में जिन चार वर्णों का उल्लेख मिलता है, वे हैं—असर्वण(पुरोहित वर्ग), अर्तेशत्रण(क्षत्रिय), डबेरियन(वैश्य) तथा वास्त्रोषण(शूद्र). ध्वनि के आधार पर आर्य शब्द ‘असर्वण’ के अपेक्षाकृत निकट है. अवेस्ता में ‘असर्वण’ को वर्ण-क्रम में पहला स्थान पर रखा गया है. संभव है ‘आर्य’ शब्द की उत्पत्ति पार्शियन ‘असर्वण’ से हुई हो; या फिर ‘आर्य’ की अवधारणा के मूल में इस शब्द का प्रभाव रहा हो. ‘अवेस्ता’ के अनुसार ‘अहुरमज्द’ एक प्रमुख देवता है. उसे सृष्टि निर्माता और उसका पालक माना गया है. मान्यतानुसार उसने कई द्वीपों की रचना की थी. भारत में प्रवेश के बाद ‘अहुरमज्द’ का ‘अहुर’ ही प्रकारांतर में ‘असुर का रूप ले लेता है. इससे एक संभावना यह भी बनती है कि भारत पहुंचे आर्य कबीले अपने मूल प्रदेश की संस्कृति का प्रतिपक्ष थे. ‘अहुरमज्द’ को सर्वोच्च पद का दिया जाना, उन्हें स्वीकार न था. इसलिए भारत पहुंचकर उन्हें जैसे ही अवसर मिला, ‘अहुरमज्द’ को नकारात्मक शक्तियों के प्रतीक असुर में ढाल दिया गया. भारत में आर्यों का आगमन अलग-अलग समय में टुकड़ियों के रूप में हुआ था. उधर ऋग्वेद में ‘असुर’ का प्रयोग अच्छे और बुरे दोनों अर्थों में हुआ है. इससे एक संभावना यह भी है कि अलग-अलग समय में आने वाली आर्य-टोलियां भिन्न समाज और संस्कृतियों से संबंधित थीं. यह भी संभव है कि ‘असुर’ शब्द का प्रयोग पहले ‘अच्छे’ के संदर्भ में होता हो, उसे ‘बुरे’ का प्रतीक और आर्यों का दुश्मन बाद में माना गया हो. मानव-संस्कृति के इतिहास में ऐसे बदलाव स्वाभाविक कहे जा सकते हैं. उन्हें हम समाज में निरंतर बदलते शक्ति-केंद्रों का परिणाम भी कह सकते हैं. आरंभ में गणेश को ‘विघ्नकर्ता’ देवता माना जाता था. प्राचीनतम उल्लेखों में उन्हें कर्मकांड और आडंबरों का विरोधी दर्शाया गया है. आगे चलकर वे हिंदुओं के प्रमुख देवता के रूप में प्रतिष्ठित होकर, ‘विघ्नहर्ता’ मान लिए जाते हैं. ऐसे ही शिव जो पहले अनार्यों के लोकनायक के रूप में प्रतिष्ठित थे, उन्हें देवताओं की तिकड़ी में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया.

शिव को संहार का देवता माना जाता है. यह मिथ शिव की अनार्य समूहों के बीच महत्ता को दर्शाता है. भारत में आर्यों का आगमन भले ही उस युग में हुआ हो जब प्राचीन सिंधु सभ्यता का वैभव लुट चुका था. तो भी भारत पहुंचने के बाद उनके लिए यहां के निवासियों पर जीत हासिल करना आसान नहीं रहा होगा. शिव पूरे सिंधु प्रदेश के प्रतिष्ठित लोकनायक थे. उस समय के सभी अनार्य समूहों पर उनका प्रभाव था. इसलिए भारत आने के साथ ही आर्यों को शिव के समर्थकों से जूझना पड़ा होगा. संस्कृत ग्रंथों में इस बात के प्रमाण हैं कि अनार्यों के साथ आरंभिक युद्धों में आर्यों को पराजय का सामना करना पड़ा था. बल्कि लंबे समय तक जीत उनके लिए सपना ही बनी थी. मजबूरी में आर्यों से सहमति और समझौते से काम लिया. वह समझौता था, अनार्य महानायक शिव को आर्य देवताओं के बराबर का दर्जा देना. उनके साथ वैवाहिक संबंध स्थापित करना. चूंकि वे शिव के पीछे निहित अनार्य कबीलों की जनशक्ति से परिचित हो चुके थे, और परोक्ष रूप में उसका डर भी उनके मनो-मस्तिष्क पर सवार रहता था, कदाचित उसी भय ने उन्हें शिव को संहार का देवता मानने के लिए विवश किया था. आदिवासी आज भी खुद को हिंदू धर्म से अलग मानते हैं. कहते हैं कि उनके पूर्वज वैदिक कर्मकांडों के कटु आलोचक; तथा ‘वर्ण-श्रेष्ठता की सैद्धांतिकी’ का विरोध करते थे.

यहां कुछ प्रश्न एकाएक खड़े हो जाते हैं. पहला यह कि सभ्यताकरण की अनिवार्यता के रूप में कार्य-विभाजन तो दूसरे देशों भी हुआ था. सभ्यताकरण की शुरुआत भी लगभग साथ-साथ हुई थी. अपने आदर्श समाज में प्लेटो ने भी लोगों को तीन वर्गों—स्वर्ण, रजत तथा कांस्य में बांटने की अनुशंसा की थी. भारत की भांति जापान, कोरिया, स्पेन तथा पुर्तगाल के लैटिन अमेरिकी उपनिवेशों, अफ्रीका आदि देशों में भी जातिप्रथा का प्रभाव था. जापान के ‘बराकुमिन’(burakumin) तथा कोरिया के ‘बीकजियोंग’(baekjeong) के हालात भारत के दलितों के समान ही थे. यमन में अल-अखदम(al-Akhdham, Khadem) की स्थिति भारतीय शूद्रां जैसी थी. उन्हें भी जाति-आधारित भेदभाव का सामना करना पड़ता था. इनके अलावा पाकिस्तान, चीन, नेपाल, बांग्लादेश, इंडोनेशिया आदि देशों का समाज भी छोटी-छोटी जातियों और वर्गों में विभाजित था. विभिन्न जातियों के बीच ऊंच-नीच की भावना भी प्रबल थी. फिर बाकी देशों विशेषकर पश्चिमी देशों के सभ्यताकरण तथा भारत के सभ्यताकरण के परिणामों के बीच भारी अंतर क्यों मिलता है?

इस रहस्य को सभ्यताओं के विकास की सामान्य पड़ताल द्वारा समझा जा सकता है. सुकरात ने जीवन और समाज में नैतिकता की व्याप्ति पर जोर दिया था. गुरु सुकरात के सपने को लेकर प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ में आदर्श समाज की परिकल्पना की थी. उसने किशोरावस्था के आरंभ से ही बच्चों को माता-पिता से दूर, उनकी पैत्रिक को पहचान छिपाकर, राज्य के संरक्षण में रखने की सिफारिश की थी. उसके आदर्श राज्य में बच्चों के पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा की संपूर्ण जिम्मेदारी राज्य की थी. एक उम्र तक शिक्षा का स्वरूप भी एक समान था. जबकि भारत में शिक्षा का स्वरूप वर्णानुसार परिवर्तनशील था. वैदिक ज्ञान केवल ब्राह्मण की संतान के लिए सुलभ था. क्षत्रिय और वैश्य की संतान को क्रमशः युद्ध-कौशल और व्यापारिक हिसाब-किताब से संबंधित शिक्षा देने का विधान था. शूद्र के लिए ज्ञान और शिक्षा के अवसर सर्वथा वर्ज्य थे. व्यक्ति की इच्छा और स्वतंत्रता का कोई महत्त्व नहीं था. पुत्र पिता की आजीविका को अपनाने के लिए बाध्य था. जबकि प्राचीन यूनान में सभी के लिए सैन्य शिक्षा एवं सेवा अनिवार्य थीं. तदोपरांत व्यक्ति की योग्यता तथा चारित्रिक विशेषताओं के अनुसार जिम्मेदारी सौंपी जाती थी. व्यक्ति को जन्म के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव न झेलना पड़े, इसके लिए प्लेटो ने साहसपूर्वक परिवार संस्था की भी उपेक्षा की थी. उसके बाद आए अरस्तु ने हालांकि प्लेटो की आदर्श राज्य संबंधी अनुशंसाओं को नकार दिया, परंतु जीवन और समाज में न्याय एवं नैतिकता के महत्त्व से उसे भी इन्कार न था. ‘श्रेष्ठ प्रजा ही श्रेष्ठ राज्य’ बना सकती है, कहकर उसने जीवन व्यक्तिमात्र के महत्त्व को स्थापित किया था. जिसे आधुनिक लोकतंत्र की आरंभिक प्रेरणा भी मान सकते हैं.

सच यह भी है कि सुकरात से लेकर अरस्तु तक सभी प्रमुख दार्शनिक दास प्रथा के समर्थक थे. और उसे उत्पादकता के स्तर को बनाए रखने के आवश्यक मानते थे. अरस्तु जैसा वैज्ञानिक सोच वाला विचारक जिसने प्राकृतिक विज्ञान के क्षेत्र में अद्भुत शोध किए थे, उत्पादकता में सुधार के लिए विज्ञान और तकनीक के प्रयोग हेतु कोई सुझाव नहीं देता. चूंकि दास के रूप में सस्ता श्रम आसानी से उपलब्ध था, जिसे वे विकास हेतु अपरिहार्य मान चुके थे—इस कारण उत्पादन वृद्धि हेतु विज्ञान और तकनीक के प्रयोग की ओर उनका ध्यान ही नहीं जाता. कुल मिलाकर विश्व के इन महानतम विचारकों द्वारा दास-पृथा को समर्थन, आगे चलकर में मानव-सभ्यता के विकास का अवरोधक सिद्ध हुआ. इस कमी के बावजूद प्राचीन यूनानी दर्शन में कुछ ऐसा अवश्य था, जो विचारकों की आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहा. वह था—मनुष्य को सभ्यता और संस्कृति के केंद्र में रखकर सोचना, तथा जीवन में नैतिकता को अत्यधिक महत्त्व देना, यही विशेषताएं आगे चलकर आधुनिक मानवतावादी दर्शनों की प्रेरणा बनी.

भारत में नैतिकता धर्म का उत्पाद उसका एक लक्षण मानी गई है. अधिकांश मामलों में तो धर्म और नैतिकता में कोई अंतर ही नहीं किया जाता. इसमें कोई बुराई भी नहीं है. एक प्रकार से धर्म भी मनुष्य की वैचारिक और आचरण की प्रतिबद्धता को दर्शाता है. बुराई तब उत्पन्न होती है जब उसकी प्रेरणा का आधार मानवेत्तर शक्तियों को मान लिया जाता है; तथा धर्म की आड़ लेकर कुछ लोग स्वार्थवश देवताओं को, जिनकी हैसियत मिथकीय पात्रों जैसी होती है—मनुष्य के सापेक्ष अतिरिक्त महत्त्व देने लगते हैं. कहने को प्रत्येक धर्म समानता के दावे के साथ जीवन में अपनी जगह बनाता है. परंतु उसकी समानता आभासी होती है. तरह-तरह की असमानताओं से जूझ रहे लोगों को फुसलाने के लिए धर्म ईश्वर के दरबार में बराबरी का भरोसा देता है. उसका वास्तविक जीवन में कोई महत्त्व ही नहीं है. वह जीवन और समाज में कुछ व्यक्ति अथवा व्यक्ति-समूहों के विशेषाधिकार को भी वैध ठहराता है. उसके प्रभाव में कुछ व्यक्तियों को सर्वेसर्वा और खास; जबकि बहुसंख्यक वर्ग को नगण्य एवं उपेक्षित मान लिया जाता है. भारतीय समाज की पहचान बन चुकी इस कुवृत्ति का दुष्परिणाम यह हुआ है कि जो कार्य अतिरिक्त श्रम की अपेक्षा रखते थे, उन्हें पूरी तरह शूद्रों तथा दासों के हवाले कर दिया गया. चूंकि संख्याबल में यह वर्ग तीनों शीर्षस्थ वर्गों की अपेक्षा अधिक था, समाज की जरूरत का उत्पादन उपलब्ध श्रम-शक्ति से आसानी से हो जाता था. इसलिए उत्पादन को बढ़ाने या उत्पादन प्रक्रिया को सरलीकृत करने का कार्य लंबे समय तक टलता रहा.

आने वाली शताब्दियों में यूनान का प्राचीन वैभव लुट-सा गया. प्लेटो का आदर्श राज्य चर्च के अधीन होकर धर्म के कुचक्र में हांफता हुआ नजर आया. इसके बावजूद वहां समय-समय पर स्वतंत्र मेधा का धनी ऐसे विचारक हुए जो प्राचीन चिंतकों से प्रेरणा लेकर राज्य को उसकी सीमा और कर्तव्य का एहसास कराते रहे. पंद्रहवीं शताब्दी की वैज्ञानिक क्रांति ने उत्पादन के वैकल्पिक साधनों का विकास किया. उससे पुरानी विचारधाराओं का नवोन्मेष हुआ, उसके साथ-साथ नए विचारों के सृजन में भी तेजी आई. मानव-मुक्ति के प्रश्न नए सिरे से अंगड़ाई लेने लगे. फलस्वरूप राज्य को चर्च के चंगुल से आजाद कराने लायक माहौल बना. नई वैचारिक चेतना ने सामंती व्यवस्था के सभी लक्षणों को जिनमें जाति भी शामिल थी, कठघरे में लाकर खड़ा कर दिया. जापान, कोरिया जैसे देशों में जहां जातिप्रथा अपने विकृत रूप में उपस्थित थी, वहां उसके संपूर्ण उन्मूलन के लिए सघन कार्यक्रम चलाए गए, जिन्हें वहां के राज्य का पूरा समर्थन मिला. अमेरिकी और फ्रांसिसी क्रांति की सफलता के पश्चात पश्चिम में व्यक्ति-स्वाधीनता की मांग जोर पकड़ने लगी थी. उसका असर उनके उपनिवेशों पर भी पड़ा. फलस्वरूप उन देशों में जाति का संपूर्ण उच्छेद संभव हो सका.

भारत में ऐसा नहीं हो सका. इसलिए कि यहां ज्ञान-विज्ञान को धर्म का अनुचर बना दिया गया था. ऊपर से धर्म की परिकल्पना इतनी अस्पष्ट थी कि हर कोई अपने स्वार्थ को धर्म का नाम दे सकता था. ‘महाभारत’ में कुरुक्षेत्र का भीषण युद्ध, एकलव्य का अंगूठा काट लेना और बाद में छल से उसकी हत्या कर देना जैसे अनेक धत्त्कर्म धर्म के नाम पर ही किए जाते हैं. पश्चिम, विशेषकर प्राचीन यूनानी दर्शन सुकरात और प्लेटो के नैतिकतावादी दर्शनों से प्रभावित था. इन दार्शनिकों ने नैतिकता को मनुष्यता के आदर्श के रूप में सामने रखा था. जबकि भारत में सबकुछ धर्म के अधीन था; और धर्म की संरचना ऐसी थी कि उसे सामंतवाद से अलग देख पाना असंभव था. जाति और धर्म ने एक-दूसरे के समर्थन से भारतीय समाज में जो विकृतियां पैदा की हैं, उनका समाधान आज तक नहीं हो पाया है. भारत में पिछले 2500 वर्षों से ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों पर शीर्षस्थ वर्गों का एकाधिकार रहा है. उत्पादक कर्म से दूर रहने के बावजूद उन्होंने अर्थव्यवस्था को अपने स्वार्थ के अनुरूप ढाला हुआ था. बदली वैश्विक परिस्थितियों के फलस्वरूप समाज के निचले वर्गों को आजादी तो मिली, मगर वह आधी-अधूरी थी. जातीय आधार पर थोपे गए बंधन उसकी स्वतंत्रता की बाधा बने थे. आर्थिक आवश्यकताओं के लिए वे शीर्षस्थ वर्गों पर निर्भर थे. यह उत्तरोत्तर बढ़ती समाजार्थिक विषमता का प्रमुख कारण बना.

इस संबंध में बड़ा रोचक विश्लेषण डॉ. देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय की पुस्तक ‘साइंस एंड टेक्नालॉजी इन एनशिएंट इंडिया’ में मिलता है. जार्डन क्लिड के लेख ‘दि अर्बन रिवोल्युशन’ का अध्ययन करते हुए वे लिखते हैं कि तीन प्रमुख प्राचीनतम सभ्यताओं भारत, मेसापोटामिया, मिस्र में लगभग 6000 से 3000 वर्ष पहले तक मानवीय अनुभव-कौशल के आधार पर प्राकृतिक विज्ञानों यथा रसायन, भौतिकी, जीवविज्ञान, वनस्पति विज्ञान का प्रयोग खूब प्रचलित था. कारीगर लोग चांदी और तांबे के अयस्क को पिघलाकर धातु-शोधन की कला में दक्ष थे. वे वायु की गति का अनुप्रयोग जानते थे. उनके द्वारा बनाए गए जहाज सुदूर सभ्यताओं तक निरंतर यात्रा करते रहते थे. बैलगाड़ी के उपयोग से यातायात सुलभ हुआ था. इससे खाद्यान्न को एक स्थान पर पहुंचाने और उसे सुरक्षित रखना संभव हुआ. सिंधु सभ्यता में 800 वर्गमीटर क्षेत्र में फैले अन्न भंडारगृह का पता चला है. मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की अनूठी भवन-संरचाएं तथा उनके लिए जिस प्रकार की पकी इंर्टों का उपयोग किया गया था, वह न केवल समकालीन सभ्यताओं में बेजोड़ था, बल्कि उसके पराभव के पश्चात एक हजार वर्षों बाद भी, जिसे उन्होंने सभ्यता के ‘अंधकार युग’ की संज्ञा दी है—संभव नहीं पाया था. कमियां उस सभ्यता में भी थीं. चट्टोपाध्याय साफ करते हैं कि प्राकृतिक विज्ञान के क्षेत्र में इतनी उपलब्धियों के बावजूद, तत्कालीन शासक वर्ग की विज्ञान-संबंधी प्राथमिकताएं प्रायोगिक गणित एवं ज्योतिष तक सीमित थीं. गणित का उपयोग उत्पादों के संवितरण, कराधान, भवन और भवन-सामग्री का निर्माण आदि के लिए किया जाता था, जबकि ज्योतिष की मदद मौसम पर नजर रखने और उसके अनुसार फसल-उत्पादन के लिए ली जाती थी. प्राकृतिक विज्ञान यथा जीवविज्ञान, वनस्पति विज्ञान, भौतिकी, रसायन आदि के अनुप्रयोग तथा उसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी केवल शिल्पकर्मियों की थी.

वैदिक मेधा भी इस अपसंस्करण का शिकार थी. आरंभिक भारत में बीजगणित का जितना उपयोग यज्ञ-वेदियों के निर्माण के लिए होता था, उतना ही उपयोग नौकाएं बनाने के लिए भी किया जाता था. हवा की गति को पहचानते हुए, महासागर के बीच हजारों किलोमीटर की लंबी यात्राएं करने वाली नौकाओं का निर्माण तथा उनके नाविकों द्वारा सफल यात्राएं बिना बीजगणित, सामुद्रिक विज्ञान, वनस्पतिशास्त्र और गतिज भौतिकी के ज्ञान के असंभव थीं. मगर व्यावहारिक ज्ञान के प्रति कृपणता दिखाते हुए ब्राह्मणों ने ज्ञान-विज्ञान और तकनीक की उन अनेक धाराओं में से केवल गणित को सहेजने का कार्य किया. वह भी सीमित अर्थों में, यज्ञ-वेदियों के निर्माण जैसे अनुत्पादक कार्य के लिए. बाकी का ज्ञान कर्मकारों पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी अंतरण के लिए छोड़ दिया गया. संस्कृत साहित्य में बुनकर, तंतुकार, कुंभकार, नाविक, हलवाह, रथवाह, धातुकर्मी जैसे पेशेवरों का उल्लेख मिलता है. उनका ज्ञान मुख्यतः अनुभव आधारित था. लंबे विश्लेषण के बाद चट्टोपाध्याय जोर देकर कहते हैं कि उस समय की सामाजिक-आर्थिक नीतियों में कुछ न कुछ ऐसा अवश्य था, जो प्राकृतिक विज्ञानों की उपेक्षा कारण बना था. इसके निहितार्थ को समझना कठिन नहीं है.

आर्य इस देश में प्रवासी थे. संभव है, भारत आने के बाद अनेक वर्षों तक खुद को दूसरे देश का मानते रहे हों. प्रवासी को अपनी मूल-संस्कृति से बेहद लगाव होता है. यह लगाव तब और बढ़ जाता है जब उन्हें ऐसे लोगों के बीच रहना पड़े जो उनसे कहीं विकसित सभ्यता के स्वामी हों. इसे उस समूह की हीनता-ग्रंथि भी कह सकते हैं. परंतु यह किसी भी व्यक्ति अथवा समूह के बारे में सच हो सकता है. भारत में यायावर कबीलों के रूप में आए आर्यों के साथ भी कदाचित ऐसा ही था. उनकी अर्थव्यवस्था का मुख्य स्रोत पशुपालन था. खेती करना उन्होंने द्रविड़ों से सीखा. बावजूद इसके उत्पादकता के अपने परंपरागत संसाधनों के प्रति उनका आकर्षण बना रहा. वैदिक ऋषियों की जीवनचर्या आश्रम-केंद्रित थी. सभी प्रमुख वनवासी ऋषियों के अपने-अपने आश्रम थे. उनकी आय का प्रमुख स्रोत पशु-संपदा थी. उसके लिए परस्पर झगड़े भी होते थे. मात्र एक गाय की खातिर वशिष्ट और विश्वामित्र के बीच हुआ लंबा संघर्ष तो जग-जाहिर है. स्वर्ग के रूप में ऐसी समानांतर परिकल्पना भी मिलती है, जहां दुधारू गाय, भरपूर संख्या में उपलब्ध हों, उसे गोलोक कहा गया है. मान्यता थी कि अच्छी दुधारू गाय समस्त कामनाओं की पूर्ति कर सकती है—‘कामधेनु’ का प्रतीक इसी सोच और पशु-केंद्रित अर्थव्यवस्था के महत्त्व को दर्शाता है. द्रविड़ों के संपर्क में आने के बाद आर्यों ने खेती करना सीखा. फिर भी पशु-पालन के प्रति आकर्षण एवं कृषि-कर्म के प्रति दुराव बना रहा. वर्ण-व्यवस्था कृषि-कर्म में लिप्त लोगों को शूद्र का दर्जा देकर तीसरे पायदान पर ढकेल देती है. उनकी अपेक्षा द्रविड़ क्रमवार विकास करते हुए कृषि-केंद्रित अर्थव्यवस्था को अपना चुके थे. वे उन लोगों के वंशज थे, जो सिंधु सभ्यता के पराभव के उपरांत यहां-वहां बिखर चुके थे. वे कृषि-कर्म में दक्ष थे. पुरातत्व से जुड़ी खोजें सिद्ध करती हैं कि सिंधु सभ्यता नागरीकरण के उन शिखरों तक पहुंच चुकी थी, जहां पहुंचने के लिए वैदिक जनों को आगे के एक हजार वर्ष खपाने पड़े. सिंधु सभ्यता की समृद्धि का प्रमुख संबल वहां के शिल्पकर्मी थे. अपने अनूठे शिल्पकर्म के बल पर वे, वैदिक सभ्यता के उभार के दौर में भी, अपनी आर्थिक-सामाजिक स्वतंत्रता को बचाए रखने में सफल हुए थे.

सिंधु सभ्यता के उत्खनन से चीनी के बर्तन प्राप्त हुए हैं. उनका उपयोग धातु-शोधन के कार्य हेतु किया जाता था. आज धातु-अयस्क को पिघलाने का काम बड़े-बड़े पूंजीपतियों के अधिकार में जा चुका है. खनिज-संपदा पर कब्जा करने के लिए पूंजीपतियों के बीच होड़ मची रहती है. उसके लिए आदिवासियों को निर्लज्जतापूर्ण ढंग से विस्थापित किया जा रहा है. जिस समय तक ये कारखाने नहीं लगे थे, उन दिनों धातु-शोधन करना मुख्यतः आदिवासियों तथा उन लोगों का कार्य था, जिन्हें बाद में निचली जाति का मान लिया गया. उनके द्वारा शोधित धातुओं(तांबा) से हल की फाल भी बनाई जाती थी, औजार भी. किंतु उनके हुनर और प्राकृतिक विज्ञानों के क्षेत्र में उनकी अनुभव-सिद्ध जानकारी का—वैदिक जनों की दृष्टि में कोई महत्त्व नहीं था. न ही उस परिवेश से निकलकर आए आधुनिक ब्राह्मणवादी बुद्धिजीवियों का ध्यान उस ओर गया. इसका दुष्परिणाम भारतीय समाज में ज्ञान-विज्ञान की निरंतर उपेक्षा के रूप में सामने आया. विशेषकर नए ज्ञान और शोध को लेकर. धर्म का स्वभाव होता है, वर्तमान और भविष्य की दुहाई देते हुए, अतीत की ओर बार-बार झांकना. उसपर हम भारतीय धर्म को कुछ ज्यादा ही अहमियत देते आए हैं, इसलिए हर नई समस्या का समाधान हमें अतीत की खोह में ले जाता है. समस्या सुलझने के बजाए और जटिल हो जाती है. इसका नुकसान बहुजनों को उठाना पड़ता है. अपनी विशिष्ट स्थिति का लाभ उठाकर अभिजन समूह हालात को अपने स्वार्थ के अनुरूप मोड़ने में कामयाब हो जाते हैं.

भारतीय संस्कृति में शूद्रों की उपस्थिति को लेकर जितने भी शोध सामने आए हैं, उनमें से अधिकांश वेदाध्ययन के अधिकार को शूद्रत्व की कसौटी मानते हैं. एक वर्ग कहता है कि शूद्रों को वेदाध्ययन और यज्ञादि कर्मकांडों में हिस्सेदारी का अधिकार था. दूसरा इससे इन्कार करता है. अपने-अपने मत के समर्थन में दोनों अपने तर्क लगभग एक जैसे ग्रंथों से जुटाते हैं. उन ग्रंथों से जो ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण से उसका महिमामंडन करते हुए रचे गए हैं. जिनका येन-केन-प्रकारेण उद्देश्य जाति-और वर्ण-व्यवस्था को बनाए रखना है, ताकि कुछ लोगों के विशेषाधिकार बने रहें. वेदाध्ययन और कर्मकांडों को लेकर स्वयं शूद्रों की दृष्टि क्या थी? क्या उन्हें वेदाध्ययन और कर्मकांडों से वंचित किए जाने बहुत क्षोभ था? क्या इनसे वंचित किए जाने का उनकी उत्पादकता पर कोई प्रभाव पड़ा था? अथवा वे किसी स्वतंत्र धर्म-दर्शन के अनुयायी थे तथा वैदिक कर्मकांडों को निरर्थक मानकर स्वयं ही उनसे सुरक्षित दूरी बनाए हुए थे? इस प्रकार के प्रश्नों को लेकर उनमें कोई बेचैनी नजर नहीं आती. कदाचित उनके लिए यह समस्या ही नहीं थी. उनमें से अधिकांश भारत के अतीत में सिवाय वैदिक सभ्यता और संस्कृति के कुछ ओर दिखाई ही नहीं देता. जो जानते-समझते हैं, वे इस सत्य पर पर्दा डाले रहते हैं. उन्हें डर लगा रहता है कि खुलते ही विशेषाधिकार छीने जा सकते हैं. जिन ग्रंथों के आधार वे इस निष्कर्ष तक पहुंचे हैं, उन्हीं के स्वतंत्र विवेचन द्वारा हम बड़ी आसानी से समझ सकते हैं कि समाज का बड़ा वर्ग, वैदिक कर्मकांडों की निरर्थकता को पहचानकर, स्वयं उनसे दूरी बनाए हुए था. उसमें वही लोग थे, जो अपने श्रम-कौशल के आधार पर जीविकोपार्जन करते थे. धर्म उनके लिए जीवनदायिनी प्रकृति के प्रति निजी आस्था और विश्वास  का मसला था. उस तरह दिखावे का नहीं जैसा वैदिक धर्म के अनुयायी कर रहे थे.

संस्कृत वाङ्मय के आधार पर अनार्यों की स्थिति का वर्णन करते हुए एक बात अकसर भुला दी जाती है, वह है उनकी आर्थिक स्वतंत्रता. समय के साथ हालांकि उसमें उतार-चढ़ाव आते रहते थे. बावजूद इसके अपने श्रम-कौशल के दम पर उनका बड़ा हिस्सा अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने में सफल हुआ था. एक तरह से प्राकृतिक विज्ञानों के अनुप्रयोग की जिम्मेदारी उन्हीं की थी. हालांकि ज्ञान-विज्ञान का अंतरण मुख्यतः अनुभव आधारित था. शिल्पकार वर्ग अपने पुत्र या उत्तराधिकारी को शिल्पकर्म से जुड़ी जानकारी देकर उऋण हो लेता था.़ अनुभवों की वंशानुगत अंतरण पद्धति में ज्ञान का लंबे समय तक संरक्षण और उसमें क्रमागत विकास असंभव था. ऊपर से निचले वर्गां में शिक्षा का अभाव, जिसने उन्हें अपने ही ज्ञान के प्रति उदासीन बना दिया था. फिर भी अपने संगठन-सामर्थ्य एवं बाहरी स्पर्धा के बल पर, शिल्पकार समूह अपनी आर्थिक स्वतंत्रता को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में सफल रहे थे. उस समय तक उत्पादन आवश्यकता केंद्रित था. मुनाफे की अवधारणा जन्मी नहीं थी. उत्पादक और उपभोक्ता के बीच सीधा संबंध था. उनके उत्पादों की स्थानीय और सुदूर बाजारों में बराबर मांग थी—इस कारण उनकी उपेक्षा असंभव थी. अनुकूल परिस्थितियां के चलते शिल्पकार वर्ग ने ईसा पूर्व चौथी-पांचवी शताब्दी तक अपनी समाजार्थिक स्वतंत्रता बनाए रखी. किंतु ‘मनुस्मृति’ तथा ‘अर्थशास्त्र’ की रचना के बाद समाज के चार्तुवर्ण्य विभाजन को राज्यों का समर्थन मिलने लगा था. चाणक्य शिल्पकार समूहों की स्वायत्तता को राज्य के लिए हानिकारक मानता था. ‘अर्थशास्त्र’ की रचना के बाद सहयोगाधारित व्यापारिक संघों पर तरह-तरह के प्रतिबंध थोपे जाने लगे. उसके चलते उत्पादक एवं उपभोक्ता के बीच एक नए व्यापारी वर्ग का उदय हुआ, जिसका प्रमुख कार्य उत्पादों को उसके उपभोक्ता-वर्ग तक पहुंचाना और बदले में अच्छा-खासा मुनाफा अपने लिए सुरक्षित रख लेना था. उससे मुनाफे की अवधारणा विकसित हुई. राज्य के संरक्षण में पनपे व्यापारी वर्ग ने कर्मकार वर्गों से उनके उत्पाद के मूल्यांकन का अधिकार छीन लिया. कालांतर में वह उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक दुर्दशा का कारण बना.

चाणक्य केंद्रीय सत्ता का समर्थक था. उसकी प्रमुख कृति ‘अर्थशास्त्र’ में किसी नए अर्थशास्त्रीय सिद्धांत की विवेचना नहीं है. वह विशुद्ध रूप से राजनीति का ग्रंथ है. पुस्तक के आरंभ के कई अध्याय राजा की सुरक्षा से संबंधित हैं. इसके लिए वह तरह-तरह के कूटनीतिक उपाय बताता है. राजनीति षड्यंत्रों के समय रहते पर्दाफाश तथा उनसे राज्य और राजा दोनों की सुरक्षा के लिए वह पूर्ववर्ती आचार्यों नारद, बृहश्पति, शुक्राचार्य आदि के ग्रंथों से उद्धरण प्रस्तुत करता है. इस कारण अर्थशास्त्र को ‘आन्वीक्षकी’ भी कहा गया है. सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य वंश का संस्थापक तथा अपने समय का सर्वाधिक शक्तिशाली सम्राट था. उसके पास पांच लाख से अधिक का सैन्यबल था. फिर चाणक्य को डर किस बात का था? क्यों राजा की सुरक्षा की चिंता करते हुए उसे अपनी पुस्तक के कई अध्याय ‘आन्वीक्षकी’ के नाम करने पड़े. सवाल यह भी है कि अर्थनीति विषयक साधारण जानकारी के बावजूद उस पुस्तक को ‘अर्थशास्त्र’ जैसा शीर्षक क्यों दिया गया? क्या महज इसलिए कि अरस्तु की ‘पॉलिटिक्स’ नामक पुस्तक उससे पहले आ चुकी थी; और वह भारत विजय का सपना लेकर निकले सिकंदर का गुरु था? अगर नहीं तो राजनीति-शास्त्र की पुस्तक के अवांतर नामकरण के लिए चाणक्य की जो आलोचना अपेक्षित थी, उससे आगे के विद्वान क्यों बचते रहे? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनके उत्तर भारतीय संस्कृति और इतिहास में नदारद हैं. लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों के निष्पक्ष विवेचन द्वारा उनके उत्तर खोजे जा सकते हैं.

सिंकदर का आक्रमण देश पर पहला सुगठित हमला था, जिसके पीछे आक्रमणकारी के साम्राज्यवादी मंसूबे एकदम साफ थे. चंद्रगुप्त के रण-कौशल से वह हमला नाकाम हो चुका था. उसके बहाने सत्ताधारी समूह जनता को यह समझाने में कामयाब रहे थे कि बाहरी आक्रमणों से सुरक्षा के लिए बड़े राज्यों का गठन अपरिहार्य है. लेकिन बड़े राज्यों की सफलता केंद्रोन्मुखी अर्थव्यवस्था के बिना संभव न थी. चंद्रगुप्त की सेना किसी भी तत्कालीन सम्राट से बड़ी थी. इतनी बड़ी सेना और राज्य के प्रबंधन हेतु भारी-भरकम मशीनरी का इंतजाम तभी संभव था, जब उत्पादन और वितरण के स्रोतों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में राज्य के सीधे नियंत्रण, अथवा उसके भरोसेमंद लोगों के अधीन लाया जाए. चाणक्य ने यही किया था. डॉ. रमेश मजूमदार ने अपनी पुस्तक ‘कॉआपरेटिव्स इन एन्शीएंट इंडिया’ में लगभग तीस प्रकार के सहयोगाधारित उत्पादक संगठनों का उल्लेख किया है. वे संगठन पूर्णतः स्वायत्त थे. यहां तक कि राजा को भी उनकी कार्यशैली में दखल देने का अधिकार न था. संगठन के मुखिया को राज-दरबार में सम्मानजनक स्थान प्राप्त होता था. आवश्यकता पड़ने पर राजा भी उनसे मदद लेता था. ऋग्वेद में भी ‘पणि’ का उल्लेख हुआ है, जो सहयोगाधारित व्यापारिक संगठनों की प्राचीनतम उपस्थिति को दर्शाता है. पणि पशुओं के व्यापारी थे. सहयोगाधारित व्यापार की यह परंपरा सिंधु सभ्यता की देन थी. उसके व्यापारिक काफिले बेबीलोन, मिस्र आदि देशों की निर्बाध यात्रा करते रहते थे. मामूली संसाधनों के भरोसे लंबी व्यापारिक यात्राएं करना बिना आपसी सहयोग के संभव ही नहीं था. सिंधु सभ्यता से लेकर मेसापोटामिया, मिस्र, ईरान आदि में मिली लगभग एक समान मुहरों से इन सभ्यताओं की बीच आपसी लेन-देन की बात पुष्ट होती है.

चाणक्य ने गौ-अध्यक्ष, नाव-अध्यक्ष, रथाध्यक्ष, सीताध्यक्ष जैसे पदों का विधान किया. उससे पहले गोपालक, नाविक, रथवाह, बुनकर, सार्थवाह, तैलिक आदि के अपने-अपने स्वतंत्र संगठन थे. चाणक्य ने नए पदों के सृजन द्वारा उनकी स्वायत्तता को मर्यादित कर, उन्हें  प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में राज्य के अधीन कर लिया गया था. इस तरह सोची-समझी नीति के तहत व्यापारी वर्ग को बढ़ावा दिया गया. ब्राह्मण धर्मसत्ता को संभाले था, जबकि क्षत्रिय का राजसत्ता पर कब्जा था. राज्य के समर्थन और संरक्षण में पनपे तीसरे व्यापारी वर्ग ने जो शेष दो वर्णों, ब्राह्मण एवं क्षत्रिय की भांति अनुत्पादक वर्ग था—उत्पादकता के स्रोतों पर अधिकार कर, अर्थसत्ता को भी अपने अधीन कर लिया गया. राजनीतिशास्त्र की कृति का ‘अर्थशास्त्र’ नामकरण वस्तुतः समाज के उत्पादक वर्गों की स्वायत्तता को, राजनीतिक तंत्र के अधीन लाने की कूटनीतिक चाल थी. उससे स्वतंत्र पेशे जाति का रूप लेने लगे. शिल्पकारों से अपनी मर्जी के उत्पादन तथा उत्पाद का मूल्यांकन का अधिकार छीन लिया गया. उत्पीड़न के शिकार लोग कभी भी विद्रोह कर, राज्य और राजा दोनों के लिए खतरा बन सकते हैं, चाणक्य को इसका अंदेशा कदाचित ज्यादा ही था. इसलिए वह एक ओर आन्वीक्षकी के तरह-तरह उपाय बताता है, कराधान प्रणाली को मजबूत करने के सुझाव देता है, साथ ही राजा की सुरक्षा और अनुशासन के नाम पर कठोर दंडविधान की अनुशंसा भी करता है. चाणक्य के अर्थशास्त्र में साधारण नागरिक की महत्ता राज्य के प्रति उसकी उपयोगिता से आंकी जाती थी. जो राज्य का नहीं है, वह कहीं का नहीं है.

अरस्तु चाणक्य का समकालीन था. उससे कुछ बड़ा. चाणक्य ने चंद्रगुप्त को शिक्षित किया था तो अरस्तु सिकंदर का गुरु था. दोनों के बीच यह मामूली समानता है. लेकिन दोनों के राजनीति विषयक चिंतन में जमीन-आसमान का अंतर है. चाणक्य के नजरों में राजा सर्वेसर्वा है, जबकि अरस्तु की ‘पॉलिटिक्स’ के केंद्र में मनुष्य है. नैतिकता को राज्य के गठन की आधारशिला मानने वाले अरस्तु का विचार था—‘श्रेष्ठ प्रजा ही श्रेष्ठ शासन को जन्म दे सकती है.’ ‘अर्थशास्त्र’ का मूल संदेश सर्वसत्तावादी है. चाणक्य को राजा के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता. उसकी निगाह में प्रजा और बाकी दरबारीगण केवल इसलिए आवश्यक हैं, क्योंकि वे राजा के होने को प्रासंगिक बनाते हैं. दूसरी ओर अरस्तु का दर्शन ‘न्याय’ का दर्शन है. उसके अनुसार प्रजा-कल्याण हेतु समर्पित भाव से काम करना, राजा का कर्तव्य है. वही राज्य के गठन का औचित्य भी है. ‘अर्थशास्त्र’ में प्रजा कल्याण राजा का कर्तव्य न होकर, ‘कृपाभाव’ है. बहरहाल, भारत में देशज कृति ‘अर्थशास्त्र’ को सराहा गया. वैसे भी दुनिया में हो रही ज्ञान-संबंधी हलचलों की ओर से आंखें मूंदे रहना ब्राह्मणों का स्वभाव रहा है. उनकी आत्ममुग्धता भी कमाल की थी. सिवाय खुद के कुछ देख ही नहीं पाती थी. ज्ञान के क्षेत्र में जो सर्वात्तम है, वह भारतीय है. और भारत में जो श्रेष्ठतम विचार है वह किसी न किसी ब्राह्मण के दिमाग की उपज है—इस भ्रांत धारणा ने उन्हें विदेशी ज्ञान-विज्ञान के प्रति सदैव उदासीन बनाए रखा. दुनिया में ऐसे अनेक यायावर जिज्ञासु रहे हैं, जिन्होंने अपना जीवन और श्रम दूसरे देशों और सभ्यताओं के बीच जाकर ज्ञान को सहेजने में लगाया है. मेगस्थनीज, ह्वेनसांग, फाह्यान, अल-बरूनी, इब्नबतूता, अल-मसूदी, अल-बरूनी जैसे सैकड़ों विद्वान थे, जो ज्ञान-विज्ञान की खोज के लिए हजारों मील की यात्रा करके भारत पहुंचे थे. लेकिन भारत का बुद्धिजीवी वर्ग इतना आत्ममुग्ध रहा कि उसने बाहरी देशों में चल रही ज्ञान की हलचलों की ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया. ब्राह्मणों की मेधा स्मृतियों, पुराणों और आरण्यकों की गुलाम रही. जबकि उनका श्रम वर्ण-व्यवस्था को चिरस्थायी बनाने में लगा रहा. परिणामस्वरूप देश में धर्म और जाति का ऐसा गठजोड़ बना कि सुधारवादी आंदोलनों की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा उनसे जूझने में खपता रहा. चूंकि उन आंदोलनों का नेतृत्व उच्च जाति के लोगों के पास था, जिनके अपने स्वार्थ जाति को सुरक्षित रखने में थे, इसलिए परिवर्तनकारी आंदोलनों के प्रति उनमें से अधिकांश का रवैया ढुलमुल ही रहा. प्राचीन संस्कृत वाङ्मय में शायद ही कोई उदाहरण हो जिसमें किसी पिता ने वर्णोचित गुणों के अभाव में अपनी संतान के वर्ण के अवमूल्यन की शिकायत की हो. जबकि जातिवाद को प्रश्रय देने, अयोग्य पुत्र को उत्तराधिकार के रूप में विरासत सौंपने के यहां अनगिनत उदाहरण हैं.

यह ठीक है कि अपने जन्म के साथ ही जाति-प्रथा को भारी आलोचना का सामना करना पड़ा था. कई बार ऐसे अवसर भी आए जब लगा कि इस व्यवस्था के दिन लद चुके हैं. समाज सुधार के क्षेत्र में समय-समय चलाए गए आंदोलनों से उसे कुछ समय के लिए धक्का अवश्य लगा, परंतु धर्म के समर्थन तथा लंबे जाति-आधारित स्तरीकरण के कारण, जो हर जाति को किसी न किसी जाति से ऊपर होने का भरोसा देता है—ऐसा कभी नहीं हुआ कि उसका अस्तित्व सचमुच खतरे में पड़ा हो. सामंती लक्षणों से युक्त जाति हमेशा ही भारतीय समाज का कलंक बनी रही. जाति और धर्म की जकड़न में आत्मविश्वास गंवा चुके भारतीय समाज ने विकास की ऐसी उल्टी चाल चली कि समकालीन सभ्यताओं में सर्वाधिक विकसित सिंधु सभ्यता का जनक और ज्ञान, विज्ञान, इंजीनियरिंग, गणित, ज्योतिष, स्थापत्य आदि क्षेत्रों में बाकी देशों के मुकाबले अग्रणी स्थान रखने वाला भारत लगातार पिछड़ने लगा. शताब्दियों से जाति और धर्म के सहारे विशेष सुख-सुविधाओं से लाभान्वित रहा वर्ग, आज भी जाति को भारतीय संस्कृति की उत्कृष्ट देन मानता है; और तमाम आलोचनाओं-विरोधों के बावजूद  उसे किसी न किसी रूप में सुरक्षित रखना चाहता है. उनमें सबसे बड़ी संख्या ब्राह्मणों की ही है. आखिर जाति का उत्स क्या है?

प्रायः यह प्रश्न उठाया जाता है कि जातीय शोषण के विरुद्ध निरंतर संघर्ष के बावजूद भारतीय समाज उसकी जकड़न से बाहर आने में क्यों असमर्थ रहा. संख्या में कई गुना होने के बावजूद बहुजन समाज अल्प-संख्यक अभिजनों की समाजार्थिक दासता में बने रहने के लिए विवश क्यों हुआ? इस धारणा को चिरस्थायी बनाए रखने के लिए जाति-व्यवस्था के विरोधी भी कम जिम्मेदार नहीं हैं. अभी तक जातीयता के उपकार एवं अपकार के अध्ययन हेतु आदि स्रोत के रूप में ऋग्वेद को लेने की मान्यता रही है. ऋग्वेद जो ब्राह्मण मनीषा का आदि ग्रंथ है, उसे भारतीय प्रायद्वीप के बौद्धिक उठान का आदि ग्रंथ भी मान लिया जाता है. ऐसा करके हम आर्यों के आगमन से पूर्व के भारत के इतिहास को पूरी तरह उपेक्षित कर जाते हैं. जबकि मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, कालीबंगा, लोथल आदि स्थानों के उत्खन्न के पश्चात हम एक समृद्ध अनार्य सभ्यता से परिचित हो चुके हैं. उसपर प्रामाणिक लेखन और ऐसे साक्ष्य मौजूद हैं, जिनसे हम समानांतर सभ्यता का चिह्नन कर सकते हैं. ऋग्वेद को भारतीय मनीषा का आदि ग्रंथ मानने का दूसरा बड़ा नुकसान यह होता है कि वर्णाश्रम व्यवस्था का अध्ययन शूद्रों को यज्ञादि का अधिकार होने या न होने में सिमट जाता है. इस तरह हम आलोचना की ब्राह्मणवादी दृष्टि से बाहर नहीं निकल पाते. उदाहरण के लिए ‘शूद्र’ शब्द की व्याख्या को ले सकते हैं. अपने लेखों में विधुशेखर भट्टाचार्य इस शब्द को ‘क्षुद्र’ से व्युत्पत्तित बताते हैं. उनकी पूर्वाग्रहों में रची-बसी दृष्टि शूद्रों की सामाजिक अधिकारिता को वैदिक कर्मकांडों में हिस्सेदारी तक सीमित कर देती है. डॉ. रामशरण शर्मा ने संस्कृत गं्रथों में शूद्र की स्थिति को लेकर गहन अध्ययन किया है. उन्हें वामपंथी सोच का प्रगतिशील लेखक माना जाता है. परंतु शूद्र को लेकर वे भी जातीय पूर्वाग्रहों से बाहर नहीं निकल पाते. ‘शूद्र इन एन्शीएंट इंडिया’ में वे इसी सोच को विस्तार देते हैं.

ब्राह्मणवाद के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए अधिकांश विद्वान बौद्ध धर्म को प्रस्थान बिंदू मानते हैं. यह धारणा कदाचित डॉ. आंबेडकर द्वारा हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाने से बनी है. बौद्ध धर्म को ब्राह्मणवाद के विरोध का प्रस्थान बिंदू मानने वाले विद्वान प्रायः यह भूल जाते हैं कि बुद्ध का विरोध वर्ण-व्यवस्था से नहीं था. न ही वे जाति को अनावश्यक मानते थे. जाति और वर्ण-व्यवस्था के विरोध में उन्होंने कोई आंदोलन भी नहीं किया था. वे सिर्फ जाति-आधारित भेदभाव से मुक्ति चाहते थे. बुद्ध के पांच प्रमुख शिष्यों में से एक उपालि नाई जाति से था. कुछ भिक्षु निचली जाति इस कारण उनका उपहास भी उड़ाते थे. बुद्ध तक जब यह बात पहुंची तो उन्होंने उपालि की जाति पर कुछ नहीं कहा. न ही जाति को अनावश्यक माना. केवल जाति के आधार पर किसी को छोटा-बड़ा न मानने, भेदभाव न करने का उपदेश दिया. कुछ स्थानों पर तो वे वर्ण-व्यवस्था के पक्ष में खड़े होते दिखाई पड़ते हैं.

ईसा से पांच-छह से वर्ष पहले का समय, मनुष्यता के इतिहास का वह कालखंड है, जिसे मानवीय बुद्धि के विस्फोट के रूप में देखा जाता है. उस दौर में भारत में बुद्ध, महावीर स्वामी, चीन में कन्फ्यूशियस, बेबीलोन में सायरस, पर्शिया में जरथ्रुस्त तथा यूनान में सुकरात जैसे दार्शनिक पैदा हुए. उन सबने जीवन में नैतिकता को महत्त्व दिया. जबकि भारत की सभ्यता का विकास ब्राह्मणवाद की अधीनता तथा उसके वर्चस्व तले हुआ था. ब्राह्मण को नैतिकता, सामाजिक सौहार्द, बराबरी तथा न्याय-परंपरा में कभी विश्वास नहीं रहा. आरंभ से ही वह आधुनिकता विरोधी और धर्मसत्ता के प्रति दुराग्रहशील रहा है. आलोचना से बचने के लिए ब्राह्मणों ने असमानता को दैवीय घोषित किया. ऐसी स्थितियां रचीं कि जो दैवीय है, उसे न्यायसंगत भी मान लिया जाए. यह काम अकेले धर्म के भरोसे संभव नहीं था. इसलिए राजसत्ता को अपने पक्ष में लिया गया. भारत के सांस्कृतिक इतिहास में धर्म की विभिन्न धाराओं के बीच संघर्ष के सैकड़ों उदाहरण हैं. राजनीति के क्षेत्र में भी लोगों की महत्त्वाकांक्षाएं एक-दूसरे से टकराती रही हैं. परंतु धर्म और राजनीति का संघर्ष, विशेषकर राजनीति द्वारा धर्म से आजादी के संघर्ष का यहां कोई उदाहरण नहीं है. दधिचि का महिमामंडन उनकी दानशीलता के लिए किया जाता है. कहा जाता है कि उन्होंने धर्म के लिए जीवन की परवाह नहीं की और देवासुर संग्राम में देवताओं की जीत के लिए, जीते-जी अपनी हड्डियां तक दान कर दीं. लेकिन उस कथित त्रिकाल-दृष्टा महर्षि ने भी प्राणोत्सर्ग से पहले देवासुर संग्राम के औचित्य पर कोई सवाल नहीं किया था. न यह पूछा कि उस संग्राम में न्याय किस ओर है. जाहिर है, दधिचि का दान एक बूढ़े-मरणासन्न ब्राह्मण द्वारा ब्राह्मणवाद को बचाए रखने के लिए किया गया बलिदान था. धर्म उनके लिए राजनीति थी. ऐसा टोटम जिसपर बिना बुद्धि-विवेक के विश्वास कर लिया जाता है. भावनाओं में बहकर बहुजन भी वज्र के लिए देह गलाने वाले दधिचि के निर्णय को न्याय-अन्याय की कसौटी पर कस नहीं पाते. दधिचि के लिए देवताओं का पक्ष ही न्याय का पक्ष है. और जो देवताओं का पक्ष है, असलियत में वह ब्राह्मण का ही पक्ष है. पुराणों और उपनिषदों में भरे ऐसे आख्यान, वर्ण-व्यवस्था के लिए खाद-पानी का काम करते हैं.

दूसरी ओर पश्चिम में नैतिकता और मानवादर्शों के लिए आत्मबलिदान के अनेक उदाहरण हैं. प्लेटो का संबंध एथेंस के राज-परिवार से था. इस आधार पर वह स्वयं को राज्य का  उत्तराधिकारी भी मानता था. बावजूद उसने अपने गुरु सुकरात का अनुसरण करते हुए उसने सत्ता के आगे समर्पण करने के बजाए अपने विवेक और नैतिकता को हमेशा आगे रखा. उसके जीवन में एक या दो ऐसे अवसर आए जब उसे राजसत्ता के कोप से बचने के लिए भागना पड़ा. अरस्तु ग्रीक सेनानी सिकंदर का गुरु था. सिकंदर उसका सम्मान करता था. अरस्तु द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय तथा प्रयोगशालाओं के लिए सिकंदर की ओर से आवश्यक मदद प्राप्त होती थी. इसके बावजूद अरस्तु ने शक्तिशाली राज्य के बजाए नीति-केंद्रित राज्य का समर्थन किया था. अपनी स्वतंत्र लेखनी के कारण एक बार वह सिकंदर को भी जब वह युद्ध अभियान पर निकला हुआ था—नाराज कर बैठा था. जिससे सिकंदर ने उसे मृत्युदंड देने की ठान ली थी. यदि भारत से लौटते समय सिंकदर की असाममियक मृत्यु नहीं होती तो अरस्तु को दंडित किया जाना तय था.

यहां एक और सवाल खड़ा होता है. वर्ण-व्यवस्था के दबाव के चलते यदि शूद्रों को स्वतंत्र रूप से सोचने, अपनी कला को निखारने का यदि अधिकार ही नहीं था, तो उन्हें सभ्यता का वास्तविक निर्माता कैसे कहा जा सकता है. यदि उनका दिलो-दिमाग ब्राह्मणों तथा दूसरी शीर्ष जातियों के पूरी तरह अधीन था तो वे शिल्पकर्म के अद्भुत चितेरे, अनूठी स्थापत्य कला के धनी, कुशल आविष्कारक भला कैसे कहा जा सकता है? यह आशंका उन ग्रंथों को पढ़ते हुए विश्वास में बदलने लगती है, जिन्हें भारतीय मेधा के चमत्कार के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. जिन्हें विद्वान प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति की पड़ताल के लिए उदाहरण के रूप में पेश करते आए हैं. उनमें सर्वपल्ली राधाकृष्णन, राधाकुमुद मुखर्जी, डॉ. रामशरण शर्मा जैसे विद्वान भी शमिल हैं. उनके अध्ययन की एकमात्र विशेषता, जो वस्तुतः उनकी बौद्धिक दुर्बलता है, वह यह है कि वे सभी स्वनामधन्य विद्वान भारतीय सभ्यताकरण की शुरुआत वेदों से करते हैं. ऋग्वेद उनके लिए भारतीयता की पहचान का आदि-ग्रंथ है. वैदिक संस्कृति के व्यामोह में फंसकर वे उन तथ्यों की एकदम उपेक्षा कर जाते हैं, जो हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, लोथल जैसे प्राचीनतम स्थलों के उत्खन्न से प्राप्त हुए हैं.

ऊपर के विश्लेषण से हम एक और सामान्य निष्कर्ष निकाल सकते हैं. यह कि संस्कृति की पहचान प्रायः उन लोगों से होती है, जो किसी न किसी रूप में उसका मूल्य वसूलने में लगे रहते हैं. न कि उन लोगों से जो उसे बनाने से लेकर सहेज कर रखने में भारी भूमिका निभाते हैं. शिखर पर विराजमान लोग सांस्कृतिक उपादानों का संरक्षण इस प्रकार करते हैं कि संस्कृति निर्माण में बाकी लोगों की भूमिका गौण मान ली जाती है. भारत की प्राचीन संस्कृति जिसे वैदिक संस्कृति भी कहा जाता है, का नाम आते ही बड़े-बड़े आश्रमों में रहने वाले ऋषिकुलों, मंत्रोच्चार करते साधुओं यज्ञ-वेदि के समक्ष गूंजती ऋचाओं का ध्यान आ जाता है. उस समय का बाकी समाज कैसा था? उसकी रोजमर्रा की गतिविधियों, जीवनशैली, कला-कौशल और समाज की बेहतरी हेतु बहाए गए स्वेद-बिंदुओं की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता. हम उन राजाओं के बारे में जानते हैं, जिनके शासनकाल में सोमनाथ और खुजराहो जैसे मंदिर बने. ताजमहल, लालकिला, कुतुबमीनार जैसी इमारतें बनाने वाले शासकों के नाम भी इतिहास में दर्ज हैं. यह सब कहीं न कहीं हमारी संस्कृति का हिस्सा भी हैं. लेकिन सोमनाथ और खुजराहो के मंदिरों के असल रचनाकार कौन थे? लालकिले के लिए पत्थर तराशने  वाले, ताजमहल में प्राण-प्रतिष्ठा करने वालां के नाम तक नहीं जानते. शताब्दियों की बौद्धिक गुलामी ने हमारी मानसिक सरंचना ऐसी कर दी है कि हमारा मस्तिष्क, अपने ही इतिहास को उन लोगों की निगाह से देखने लगा है, जो हमारी दासता का कारण रहे हैं. ऋग्वेद में दर्जनों मंत्रों में इंद्र द्वारा असुरों के पुरों का ध्वंस करने का उल्लेख है. उसे पुरंदर की उपाधि भी असुर-नगरों को नष्ट करने के कारण प्राप्त होती है. लेकिन उन दुर्गों का वास्तविक निर्माता, वहां के निवासियों के लिए हथियार और आवश्यक सुख-साधन जुटाने वाले शिल्पकार वर्ग के बारे में यह ग्रंथ मौन रह जाता है.

बहुजन संस्कृति इन्हीं प्रच्छन्न दस्तावेजों की खोज का एक सिलसिला है.

© ओमप्रकाश कश्यप

 

संस्कृति की लोकयात्रा : बरास्ता महिषासुर आंदोलन

सामान्य

संस्कृति’ शब्द ‘कृति’ के आगे ‘सम्’ उपसर्ग लगाने से बना है. ‘संस्कृति’ का अभिप्राय है, जिसे बनाने और आगे बढ़ाने में समाज के सभी वर्गों का योगदान बराबर हो. जिसमें सभी की समान सहभागिता हो. उसके लिए आवश्यक है कि समाज में सभी बराबर हों तथा प्रत्येक को अपना पक्ष प्रस्तुत करने की पूर्ण स्वतंत्रता हो. व्यक्ति की चारित्रिक विविधताओं का सम्मान करते हुए संस्कृति सदस्य इकाइयों के मन, विचार, रीतिरिवाज के सामंजस्यीकरण का काम करती है, ताकि आगंतुक पीढ़ियां समाज के आदर्श, रीतिरिवाज तथा ज्ञानानुभवों का लाभ उठा सकें. समाजशास्त्र की दृष्टि से ‘अनेकता में एकता’ की व्याप्ति समाज की उदारता का परिचायक होती है. वह समाजीकरण के उच्चतम स्तर की संकेतक है. उदार संस्कृति नैतिकता से सदैव सामंजस्य बनाए रखती है. दोनों के लक्ष्य में बहुत अधिक अंतर नहीं होता. नैतिकता जिन कसौटियों का निर्माण करती है, संस्कृति विभिन्न प्रतीकों, परंपराओं एवं संस्कारों के माध्यम से समाज में उन्हें लोगों के आचरण का हिस्सा बनाने के लिए प्रयत्नरत रहती है. समानता और स्वतंत्रता ऐसी ही कसौटियां हैं, जो न केवल समाजीकरण का आधार, अपितु उसकी सभ्यता का मापदंड भी हैं. मनुष्य उनसे प्यार करता है, यथासंभव उन्हें सुरक्षित रखना चाहता है. उन पर कोई आंच न आए, उसके लिए वह अपनी स्वतंत्रता के थोड़ेसे हिस्से का बलिदान कर समाज के अनुशासन में बंधने को स्वीकार होता है. इस उम्मीद के साथ कि समाज उसके साथ समानतापूर्ण व्यवहार करेगा. जिस सुख को वह अकेले प्राप्त करने में असमर्थ है, समाज में रहते हुए वह सुख आसानी से और लगातार प्राप्त होता रहेगा. समाज तथा उसे नियंत्रित करने वाले विधान, चाहे वह नैतिक हो या कानूनी—की चुनौती होती है कि वह मनुष्य की इन अपेक्षाओं पर खरा उतरकर उसके मानवीकरण के लिए उत्प्रेरक का काम करे.

अनेकता में एकता’ का दावा करने वाली भारतीय संस्कृति को इस कसौटी पर परखें तो बहुत उम्मीद नहीं बंधती. ऊपर से एक नजर आने या एक बताई जानी वाली इस संस्कृति के कई चेहरे, अनेक रंग तथा अनगिनत रूपविधान हैं. उनके बीच प्रतिद्विंद्वता बनी ही रहती है. कुछ ऐसे बिंदू भी हैं, जहां उसके दो मुख्य रूपाकारों को साथसाथ रखना, उनके अंतर्विरोधों पर पर्दा डालना न केवल कठिन, बल्कि असंभवसा हो जाता है. उस समय लगने लगता है कि सांस्कृतिक एकता का भारतीय रूपक मात्र एक छद्म, एक दिखावा है. सामाजिक असमानता, ऊंचनीच एवं भेदभाव को मान्यता देते हुए भारतीय संस्कृति समाज के मुट्ठीभर लोगों के हाथों में इतने अधिकार सौंप देती है, जिनसे वे बाकी जनसमूहों पर अपनी मर्जी लाद सकें. वे सदैव इस प्रयास में रहते हैं कि दमित वर्गों की सांस्कृतिक एकता का जो सूत्र उन वर्गों को सुदूर अतीत में जाकर जोड़ता तथा उनके बीच आत्मगौरव का संचार करता है, वह पूर्णतः छिन्नभिन्न हो जाए तथा अलगअलग टुकड़ों में बंटे या बांट दिए गए सामान्यजन, वर्चस्वकारी संस्कृति की अधीनता को चिरकाल तक स्वीकारने को विवश बने रहें. ‘अनेकता में एकता’ का नारा उनकी इसी प्रवृत्ति का परिचायक है. जाति और धर्म भारतीय संस्कृति के ऐसे ही औजार हैं. उनके दबाव में बहुसंख्यक लोग शोषण और असमानता को अपनी नियति मानने लगते हैं. ऐसे में ‘अनेकता में एकता की खोज’ का नारा उदात्त कल्पना से अधिक महत्त्व नहीं रखता. प्राकृतिक न्याय की भावना के विपरीत भारतीय संस्कृति कुछ लोगों को जन्म से विशेषाधिकार घोषित कर बाकी को उनका सेवादार बनाने का समर्थन करती है. मनुष्य की रुचि, स्वभाव, व्यक्तिगत योग्यता उसके लिए कोई महत्त्व नहीं रखती. अभिजन हितों के संरक्षण की सतत चाहत के दौरान स्वतंत्रता एवं समानता जैसे समाजीकरण के मूलभूत सिद्धांत बहुत पीछे छूट जाते हैं. चूंकि ब्राह्मण को धर्म और संस्कृति में शीर्ष स्थान पर रखा गया है, और नीतियां उसी की इच्छा और स्वार्थ के स्तर से तय होती हैं, इस कारण सांस्कृतिक वर्चस्ववाद को उसके आलोचकों द्वारा ‘ब्राह्मणवाद’ की संज्ञा दी गई है, जो उचित ही है.

सवाल है कि सबकुछ जानतेबूझते हुए भी बहुसंख्यक वर्ग सांस्कृतिकसामाजिक अधीनता को स्वीकार क्यों करता है? क्यों वह वर्ग स्वयं को उस समाज का हिस्सा माने रहता है जो स्वतंत्रता एवं समानता जैसी समाजीकरण की मूलभूत शर्तों पर ही खरा नहीं उतरता. सुदूर अतीत में क्यों उसने मुट्ठीभर वर्चस्वकारियों को बौद्धिक एवं सांस्कृतिक स्तर पर श्रेष्ठ मानकर अपने जीवन, यहां तक कि खानपान और रहनसहन जैसे रोजमर्रा के कार्यकलापों को भी उनके हवाले कर दिया था? क्या वह वर्ग बौद्धिक स्तर पर सचमुच इतना पिछड़ा हुआ था कि रोजमर्रा के सामान्य प्रश्नों का समाधान भी अपने बूते न खोज सके? असलियत ठीक इसके उलट है. दमित वर्गों में कमी न तो योग्यता की थी, न ही कार्यकौशल की. ये गुण तो उनमें भरपूर थे. समाज की समृद्धि तथा शिखर का वैभवविलास इन्हीं वर्गों के हुनरमंदों और मेहनतकशों के श्रमकौशल की देन था. कमी अपने बुद्धिचातुर्य और सृजनसामर्थ्य का उपयोग अपने और अपने जैसे दूसरे लोगों के लिए करने के बजाय, अपना निर्णयसामर्थ्य दूसरों के हक में बलिदान कर देने की थी. मेहनत को अपना धर्म और विपन्नता को नियति मान लेना उन्हें इतना महंगा पड़ा कि गुलामी का दौर पीढ़ीदरपीढ़ी चलता रहा.

यह सब उन्होंने अपनी मर्जी से नहीं किया था. बल्कि सब कुछ ब्राह्मणवादियों की सोचीसमझी कार्ययोजना का हिस्सा था. जब तक अर्थव्यवस्था पशुबल तथा जंगलों पर निर्भर थी, तब तक ब्राह्मणवाद को पनपने का अवसर नहीं मिल पाया था. अस्थिर जीवन में न तो स्थायी देवताओं के लिए गुंजाइश थी, न ही ईश्वर की. पशु, पक्षी, पेड़, पौधे आदि में से जिससे भी सामूहिक मन मिल जाए, उसी को कबीला अपना ‘टोटम’ मान लेता था. सो जब तक यायावरी जीवन रहा, तब तक ‘टोटमवाद’ भी समाज में जगह बनाए रहा. कालांतर में समाज ने जैसे ही कृषिआधारित अर्थव्यवस्था की ओर कदम रखा, कार्यविभाजन के नाम पर ब्राह्मण को समस्त संसाधनों का स्वामी तथा क्षत्रिय को उनका संरक्षक घोषित कर दिया गया. कहा यह गया कि कार्यविभाजन पूरी तरह से योग्यता पर आधारित होगा. कुछ समय के लिए विभिन्न वर्गों के बीच आवागमन चला. ब्राह्मण की संतान ने क्षत्रिय और वैश्य का धंधा अपनाया तो उसका उल्टा भी देखने को मिला. मगर कोई भी आसानी से प्राप्त सुविधाओं को छोड़ने को तैयार न था. धीरेधीरे वर्णाश्रम व्यवस्था रूढ़ होकर जाति में ढलने लगी. इसी के साथ समाज के कुल संसाधनों पर मुट्ठीभर लोगों का अधिपत्य होने लगा. आजीविका के लिए दूसरे वर्गों पर निर्भरता ही बहुसंख्यक वर्ग की लंबी दासता तथा उत्पीड़न का कारण बनी. वर्चस्व को स्थायी बनाने के लिए अभिजात शीर्षस्थों ने हर वह काम किया, जिसे वे कर सकते थे. उत्पादकता पर समाज के बाकी वर्गों का दावा न रहे, इसके लिए नियति को बीच में लाया गया. इस कार्य में धर्म उनका मददगार बना. उसकी सहायता से लोगों के दिमाग में यह भर दिया गया कि उनकी दुर्दशा उनके पूर्वजन्म के कर्मों की देन है. यदि वे समाज द्वारा तय मर्यादा का पालन नहीं करते हैं तो कर्मफल के रूप में त्रासदी का सिलसिला आगे भी चलता रहेगा.

आरंभ में सामाजिक विभाजन त्रिस्तरीय था. ब्राह्मण और क्षत्रिय के अलावा बाकी सब शूद्र थे. ढाई हजार वर्ष पहले बौद्ध धर्म के उद्भव के पश्चात, समाज में नए शिल्पकार वर्ग का उदय हुआ जो व्यापार के माध्यम से धनार्जन में निपुण था. धीरेधीरे अनुकूल अवसर मिलते ही वह वर्ग इतना सशक्त हो गया कि ऊपर के दोनों वर्गों द्वारा उनकी उपेक्षा करना संभव न रहा. तब त्रिस्तरीय वर्णाश्रम व्यवस्था के स्थान पर चातुर्वर्ण्य समाज को मान्यता देनी पड़ी. लोग असलियत को समझे बिना केवल परंपरापोषी तथा अनुगामी बने रहें, इसके लिए मनु के विधान में शिक्षा एवं संसाधनों पर कुछ वर्गों का विशेषाधिकार घोषित किया गया. ब्राह्मण व्यवस्था के शिखर पर था और समाजहित में सोचने तथा नियम बनाने का अधिकार केवल उसके पास था. उचित यही था कि वह समाज के विश्वास और सौंपे गए कर्तव्यों पर खरा उतरता. लेकिन संस्कृति के हर प्रतीक, रूपक, घटना और चरित्र की व्याख्या उसने केवल अपने स्वार्थ को केंद्र में रखकर की. बाकी दो वर्गों की मदद से उसने खुद को इतना शक्तिशाली बना लिया कि चौथा वर्ग जो संख्या में बाकी तीन वर्गों की कुल संख्या का कई गुना था, वह शक्ति एवं संसाधनों के मामले में निरंतर कमजोर पड़ता गया. धीरेधीरे लोग हालात से समझौता करने लगे. आज स्थिति यह है कि भारतीय संस्कृति में शोषित एवं शोषक दोनों के चेहरे एकदम साफ नजर आते हैं. पाखंडी पंडितों द्वारा दिया गया परलोक का प्रलोभन यथास्थितिवादियों के लिए इतना फला है कि लोग कल के मिथ्या सुख के बदले अपने आज का सुखचैन और कमाई खुशीखुशी अर्पण कर देते हैं.

अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए ब्राह्मणवाद धर्म और संस्कृति को औजार बनाता है. उनके माध्यम से वह लोगों के दिलोदिमाग पर कब्जा जमाता है, फिर निरंतर उनका भावनात्मक और शारीरिक शोषण करता है. फासीवाद लोगों के दिलोदिमाग में भय का संचार करता है. इतना भयभीत कर देता है कि जनसाधारण अपने विवेक से काम लेना छोड़, केवल आदेश को ही कर्तव्य समझने लगता है. ताकत का भय दिखाकर वह लोगों को उसकी मनमानियां सहने के लिए मजबूर कर देता है. फासीवाद की उम्र अपेक्षाकृत कम होती है. वह व्यक्ति के दिलोदिमाग पर कब्जा तो करता है, लेकिन ऐसा कोई माध्यम उसके पास नहीं होता, जो देर तक प्रभावशाली हो. सत्ता बदलते ही उसका स्वरूप बदल जाता है. नहीं तो जनता स्वयं खड़ी होकर राजनीति के उस खरपतवार को समाप्त कर देती है. संस्कृति व्यक्ति को समाज का प्रदाय होती है और राजनीति उसका अपना वरण. सामाजिक इकाई के रूप में मनुष्य शेष सामाजिक इकाइयों के सहयोगसमर्थन से अपने लिए राजनीतिक दर्शन का चयन कर सकता है, अथवा वर्तमान स्वरूप में आवश्यक बदलाव प्रस्तावित कर सकता है, जिन्हें वह अपने लिए तात्कालिक रूप से आवश्यक मानता है. संस्कृति में त्वरित परिवर्तन संभव नहीं होते.

निर्ब्राह्मणीकरण : क्यों और कैसे

संस्कृति के निर्ब्राह्मणीकरण जरूरत पर चर्चा करने से पहले आवश्यक है कि ब्राह्मणीकरण की प्रक्रिया को समझ लिया जाए. इसे तुलसी से बेहतर शायद हमें कोई नहीं समझा सकता. उनकी प्रमुख कृति ‘रामचरितमानस’ को साहित्य के रूप में पढ़नेपढ़ाने की परिपाटी रही है. विद्यालयों, महाविद्यालयों से लेकर शोध के उच्चतम स्तर तक उसे साहित्य के गौरव से नवाजा जाता है. लोकजीवन में भी ‘मानस’ की चौपाइयां रूढ़ि, परंपरा और भाग्यवाद से डरेसहमे लोगों के मार्गदर्शन के काम आती हैं. सवाल है कि क्या यह पुस्तक साहित्यकर्म को साधती हैं? क्या इसे ऐसी ही मंशा के साथ रचा गया था? क्या यह मनुष्य के मौलिक सोच को विस्तार देने, उसे प्रश्नाकुल बनाने का काम करती है? यदि धार्मिक आग्रहों से परे हटकर सोचा जाए तो क्या इस पुस्तक को साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है? हमारा आक्षेप तुलसी के काव्यसामर्थ्य पर नहीं है. उनमें भरपूर कवित्व रहा होगा. लेकिन वे कविधर्म को भी समझते थे, यह बात दावे के साथ नहीं कही जा सकती. यहां हम केवल उनकी काव्यरचना के मर्म तथा उद्देश्य पर विचार करने जा रहे हैं.

संस्कृत में साहित्य को परिभाषित करते हुए कहा गया है—‘सहितस्य भावः साहित्यम्.’ अर्थात जो सभी को साथ लेकर चले, जिसमें सभी के हितसाधन का भाव हो—वही ‘साहित्य’ है. साहित्य का विचारक्षेत्र न केवल संपूर्ण प्राणिजगत, अपितु जड़, चेतन और वह सबकुछ है, जिससे प्राणिमात्र का हित प्रत्यक्ष या परोक्ष किसी भी रूप में जुड़ा है. लेकिन तुलसी जब कहते हैं—‘पूजिये विप्र ज्ञानगुन हीना. पूजिये न शूद्र ज्ञान परवीना.’(ज्ञानगुण विहीन ब्राह्मण भी पूजनीय है. ज्ञान और गुण की खान होने के बावजूद शूद्र की पूजा नहीं की जानी चाहिए); अथवा जब वह लिखते हैं—‘शापत ताड़त परुष कहंता. विप्र पूजि अस गावहिं संता.’(संतजन कहते हैं कि शाप देने वाला, प्रताड़ित करने वाला, अपशब्द कहने वाला ब्राह्मण भी पूजा के योग्य है)—उस समय वे स्वयं को लोककवि के बजाय ‘द्विजजनों का चारण’ सिद्ध कर रहे होते हैं. संवेदना साहित्य की पूंजी होती है. सर्वहित की भावना उसे निष्पक्ष बने रहने को प्रेरित करती है. तुलसी का यह लिखना—‘अधम जाति में विद्या पाए. भयहु यथा अहि दूध पिलाए.’(अधम जाति में जन्मे व्यक्ति को शिक्षा देना विषधर को दूध पिलाने जैसा अपकर्म है)—भी घोर आपत्तिजनक है. साहित्यकार का कर्तव्य ऐतिहासिक तथ्यों को ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर देना नहीं है. वस्तुनिष्ठ विवेचन इतिहासकार के लिए जरूरी हो सकता है. साहित्यकार का काम प्रत्येक घटना और चरित्र पर मानवतावादी दृष्टि से विचार करना तथा उन्हें इस तरह प्रस्तुत करना है, ताकि वे मनुष्यता का अधिकतम हित साध सकें. ‘रसेन सहितं साहित्यम्’—यानी साहित्य वह है जिसमें रागात्मकता और सर्वहित का भाव हो.’ साहित्यत्व की कसौटी पर न केवल ‘रामचरितमानस’ बल्कि तुलसी का बाकी साहित्य भी कहीं नहीं टिकता. शंबूक की हत्या का प्रसंग हो या स्त्री और शूद्रों को लेकर तुलसी की दृष्टि, इन सबसे वे ब्राह्मणवाद के सबसे मुखर कवि नजर आते हैं. ऐसी विभेदकारी व्यवस्थाओं के बावजूद ‘रामचरितमानस’ को पंचम वेद के रूप में समाज में प्रचलित करना ही साहित्य और संस्कृति दोनों का ब्राह्मणीकरण है.

जो काम तुलसी ने ‘रामचरितमानस’ में किया, वही सूर तथा कृष्ण भक्ति परंपरा के अन्य कवियों ने कृष्ण को ब्राह्मणवादी परंपरा में ढालकर किया. ऋग्वेद के आठवें मंडल में इंद्रकृष्णासुर संग्राम का वर्णन है. ऋग्वैदिक कृष्ण यदु कबीले का मुखिया है. वह द्रुतगामी(तीव्रता से प्रयाण करने वाला), दस सहस्र सेनाओं का नायक, चतुर योद्धा, कुशल रणनीतिकार भी है जो अंशुमति (यमुना) नदी के तट पर दीप्तिमान होकर निर्भीक विचरण करता है(ऋग्वेद-8/96/13-15). ऋग्वेद में देवताओं के लिए ‘देव’ तथा ‘असुर’ दोनों प्रकार के संबोधन मिलते हैं. वहां असुर का अर्थ देवता और अनिष्ठ दूर करने वाला भी है. कुछ स्थानों पर ‘वरुण’ को भी ‘असुर’ कहा गया है. मित्र अर्थात सूर्य के लिए ‘सुर’ और ‘असुर’ दोनों प्रकार के संबोधन ऋग्वेद में प्राप्त होते हैं. इससे अनुमान लगाया जाता है कि आरंभिक ऋग्वैदिक काल में देवताओं के लिए ‘सुर’ संबोधन उतना रूढ़ नहीं हुआ था, जितना आगे चलकर देखने को मिला. ‘कृष्ण’ के प्रति ‘कृष्णासुर’ संबोधन को भी इसी रूप में लेना चाहिए. ऋग्वैदिक कृष्ण आर्यअनार्य संघर्ष में भील तथा दूसरी जनजातियों के साथ मिलकर इंद्र को टक्कर देता है. ऋग्वेद में ही दस गणराज्यों तथा सुदास के बीच घमासान युद्ध का भी उल्लेख है. उसमें सुदास देवताओं की मदद से विजयी होता है. सुदास आर्य सम्राट था. जबकि प्रतिपक्ष में आर्यअनार्य दोनों सम्मिलित थे. इससे संकेत मिलता है कि वर्चस्व की लड़ाई आर्य राजाओं के बीच भी थी. कृष्णासुरइंद्र संग्राम में भी आर्यों की विजय होती है. ये तथ्य ऋग्वैदिक कृष्ण को अनार्य नायक सिद्ध करते हैं.

कृष्ण का दैवीकरण उसके लगभग एक सहस्राब्दी बाद ही संभव हो सका. आर्यों से युद्ध में पराजित यदु, पुरू, यक्ष, अज आदि प्राचीन कबीले उत्तरपश्चिम की ओर प्रयाण कर जाते हैं. 1000-1500 ईसा पूर्व में गंगायमुना के दोआब में पुनः विकसित संस्कृति उभरती है. यदु कबीले के वंशजों ने मथुरा और उसके आसपास बड़े राज्यों की स्थापना की थी. उन्हें अब भी अपने महानायक कृष्ण में आस्था थी. ईसा पूर्व चौथी शताब्दी से ही भारत पर विदेशी आक्रमण होने लगे थे. तब ब्राह्मणवादी सत्ताओं को बड़े राज्य बनाने की सुध आई. यह कार्य यदुओं को, जो उस समय तक संगठित ताकत का रूप ले चुके थे, साथ लिए बिना संभव न था. सांस्कृतिक दूरियों को मिटाने के लिए यदुओं के आर्यकरण की शुरुआत हुई. उस समय तक वैदिक देवता इंद्र अपनी व्यभिचारी प्रवृत्ति के कारण काफी बदनाम हो चुका था, और उसके साथ यदुओं की अनेक कड़वी स्मृतियां जुड़ी थीं, इसलिए वह सम्मिलन इंद्र के प्रधान देवता पद पर रहते हुए असंभव था. अतः पुराने देवताओं विशेषकर इंद्र का मोह छोड़ते हुए आर्यों ने त्रिवेद(चौथे वर्ग की भांति चौथा वेद भी बहुत बाद में, ईस्वी संवत आरंभ होने के आसपास रचा गया) और त्रिवर्ण की युति के आधार पर त्रिदेवों ब्रह्मा, विष्णु और शिव जैसे नए देवताओं की कल्पना की. इस कल्पना में भी अनार्य जातियों को ब्राह्मणीकरण की परिसीमा में लाने के बंदोबस्त थे. देवत्रयी में ‘शिव’ शस्त्र संधान में पारंगत किरात, भील, यक्ष, शंबर आदि अनार्य जातियों के सर्वमान्य मुखिया और अजेय महानायक का प्रतिनिधित्व करते थे. उन्हें त्रिदेवों में ‘संहार का देवता’ घोषित किया गया है. ‘संहार का देवता’ ही क्यों? दरअसल देवत्रयी में शिव भारत की जिन आदिम जातियों का प्रतिनिधित्व करते थे, वे युद्धकला में निपुण थीं. शिव को नाराज करना संगठितशक्तिशालीयुद्धकला में पारंगत आदिमजातियों की शत्रुता मोल लेना था, जो विदेशी आक्रामकों का भय झेल रही सत्ताओं के लिए आसान नहीं था. यह तत्कालीन ब्राह्मणों के हृदय में आदिम जातियों के प्रति बैठे भय को भी दर्शाता है.

देवत्रयी में दूसरा स्थान विष्णु को मिला. उन्हें सृष्टि का पालक देवता कहा गया. इस कार्य के लिए वे अवतार भी लेते हैं. अवतारवाद किसी सम्राट द्वारा सीधे अथवा दैवी व्यक्तित्व के नेतृत्व में बड़े राज्य की स्थापना तथा उसमें नई(धार्मिक) व्यवस्था लागू करने का प्रतीक है. ‘कृष्ण’ को देवत्व से नवाजने के लिए उन्हें विष्णु का अवतार घोषित किया गया. ब्रह्मा को सृष्टि का रचियता कहा गया. वह ब्राह्मण का प्रतीक था. चूंकि ब्राह्मण उत्पादकता से जुड़ा कोई कार्य नहीं करते इसलिए त्रिदेवों में सृष्टि रचना के बाद ब्रह्मा की भूमिका भी निष्क्रय रह जाती है. कृष्ण का आर्यकरण उनके चरित्र में आमूल परिवर्तन का वाहक बना. ‘महाभारत’ में कृष्ण का जो रूप मिलता है, वह लगभग एक ईस्वी पूर्व की ब्राह्मणवादी कल्पना है. चाणक्य बड़े राज्यों का समर्थक था. ‘अर्थशास्त्र’ में उसने गणराज्यों की आलोचना की. लिखा है कि गणराज्यों में युवा जुए के व्यसनी हो जाते हैं. कृष्ण की प्राचीन स्मृतियां गणराज्यों के मुखियापद से जोड़ती हैं. जबकि महाभारत में उसे चाणक्य की भांति ‘वृहद राष्ट्र्र’ का प्रबल समर्थक दर्शाया गया है. नए अवतार में कृष्ण से वह सब कराया जाता है, जिसके विरोध में उसने इंद्र से संघर्ष किया था. ‘महाभारत’ के युद्ध में भील योद्धा एकलव्य तथा असुर महायोद्धा बर्बरीक दोनों ही कौरवों के पक्ष में युद्ध करने को उद्धत थे. अवतरित कृष्ण एकलव्य की छलपूर्वक हत्या करता है, साथ ही अनार्य महायोद्धा बर्बरीक को भी आत्महत्या के लिए उकसाता है. कृष्ण का यह रूपांतरण यदुओं तथा अनार्य जातियों के बीच द्वेषभाव बढ़ाने के लिए आवश्यक था. आशय है कि यदुओं को कृष्ण के ब्राह्मणीकरण की कीमत चुकाने के लिए उन्हीं देवताओं की शरणागत होना पड़ा था, जिनके सेनापति इंद्र ने उनके पूर्वज कृष्णासुर की हत्या की थी; और जिसके कारण उन्हें अपने मूल स्थान को छोड़ उत्तरपश्चिम में प्रवजन करना पड़ा था.

कृष्ण का उदाहरण हमने ऊपर दिया. देखा कि ब्राह्मणीकरण की प्रक्रिया केवल घटनाओं के वर्गीय प्रस्तुतीकरण तक सीमित नहीं रहती. उसमें चरित्रों के साथ भी जमकर घालमेल किया जाता है. हर अच्छी बात का उत्स देवताओं को बताने की धुन में सत्य के साथ मनमाना व्यवहार किया जाता है. प्रायः दावा किया जाता है कि देवता सात्विक होते हैं. कि मनसावाचाकर्मणा सात्विकता के विभिन्न रूप देवताओं की प्रेरणा से ही बने हैं. कि शुभत्व का एकमात्र स्रोत देवगण हैं. सात्विकता देवताओं में है, इसी कारण वह संसार में भी है. ये बातें ऋग्वेद में वर्णित देवताओं के चरित्र तथा उत्तरवर्ती गं्रथों में देवसभा एवं अमरपुरी के वैभवपूर्ण उल्लेखों से मेल नहीं खाती. बावजूद इसके उदार एवं करुणामय मनुष्य को ‘देवता’ संबोधित करने की प्रथा प्राचीनकाल से चलती आई है. जबकि परंपरा में जो धत्तकर्म दैत्य के बताए जाते हैं, असलियत में वही कार्य ब्राह्मणवादियों के देवता भी करते हैं. उनके देवता कदमकदम पर छल करते हैं, दूसरों की स्त्रियों को बलत्कृत करते हैं. भेंटपूजा पाकर प्रसन्न होते हैं. यदि मनमाफिक चढ़ावा न मिले तो कुपित हो जाते हैं. तुलना करें तो उनके देवता और नकचढ़े सामंत में कोई अंतर ही नहीं है. क्या यह महज संयोग है कि बृहश्पति जो देवताओं के गुरु हैं, वही लोकायत दर्शन के प्रणेता भी हैं? देवसभाओं में अप्सराओं का नृत्यगायन, देवताओं की मौजमस्ती तथा सोमपान, चार्वाकों की ‘खाओपीओ मौज करो’ की विचारधारा को ही प्रतिबिंबित करता है. यानी ‘देवगुरु’ का दर्शन देवताओं की दिनचर्या से ही प्रेरित है. यह भी हो सकता है कि स्वयं देवता अपने गुरु के दर्शन के अनुगामी बने हों.

दूसरी ओर असुर गुरु शुक्राचार्य हैं, जिन्हें इतिहास, दंडनीति, नीतिशास्त्र का आदि व्याख्याकार बताया गया है. देवविधान में दंड की मात्रा पूर्णतः दंडाधिकारी की मनमानी पर निर्भर करती है. जबकि दंडविधान में अपराध की समीक्षा की संभावना भी निहित रहती है. जाहिर है सभ्यता के इन क्षेत्रों में भी असुर आर्यजनों से काफी आगे थे. लंका पहुंचे हनुमान को वहां एक भी दास दिखाई नहीं पड़ता. जबकि अयोध्या, मिथिला आदि में दासदासियों की भरमार है. अनार्यों की समृद्ध सभ्यता के बारे में ऋग्वेद में पर्याप्त वर्णन हैं. वे अपनी बढ़ीचढ़ी सभ्यता के साथ दुर्गों में रहते थे. उनके दुर्ग लोहे(2/58/8) के, पत्थर(4/30/20) के, लंबेचौड़े गौओं से भरे हुए(8/6/23) थे. सौ खंबों वाले(शतभुजी 1/16/8, (7/15/14) दुर्ग का उल्लेख भी ऋग्वेद में है. ‘महाभारत’ की ख्याति प्राचीन भारतीय राजनीतिक दर्शन पर गंभीर विमर्श के कारण भी है. हस्तिनापुर का राज्य संभालने से पहले युधिष्ठिर भीष्म के पास राजनीति का ज्ञान लेने जाता है. शुक्राचार्य के ज्ञान की महिमा इससे भी जानी जा सकती है कि युधिष्ठिर को राजनीति का पाठ पढ़ाने वाले भीष्म शुक्राचार्य के ही शिष्य हैं. उनके शिष्यों में दूसरा नाम पृथु का भी आता है, जिसे प्रथम निर्वाचित सम्राट वेन का पुत्र तथा पृथ्वी का प्रथम मनोनीत सम्राट कहा गया है. दूसरे किस्सेकहानियों की भांति शुक्राचार्य से जुड़ी कहानियां भी मिथ हो सकती हैं. कदाचित उनमें से अनेक हैं भी. फिर भी उनकी अपनी महत्ता है. क्योंकि भारत जैसे समाजों में जहां तर्कबोध, विज्ञानबोध की कमी हो, जनजीवन मिथों से ही प्रेरणा लेता है. बहरहाल आचार्य बृहश्पति तथा शुक्र के क्रमशः चार्वाक पंथ और दंडनीति का व्याख्याकार होने से क्या यह नहीं लगता कि ब्राह्मणवादी लेखकों ने अपने ग्रंथों में सुरों और असुरों की चारित्रिक विशेषताओं को पूरी तरह उल्टापल्टा है. कई बार तो ठीक 180 डिग्री का मोड़ देकर पेश किया है.

ऐसी उपलब्धियों के बावजूद असुरों को कामी, लोभी, लालची, व्यसनी और झगड़ालू दर्शाने वाले विवरण धर्मग्रंथों में भरे पड़े हैं. दुर्व्यसन के लिए ‘आसुरी वृत्ति’ लोकप्रचलित मुहावरा है. ‘सात्विक’ देवता चाहे जो दुराचरण करें, उनका देवत्व नष्ट नहीं होता. प्रायः उसे ‘लोककल्याण के निमित्त’, ‘धर्मसंस्थापनार्थायः’ मान लिया जाता है. असुर सम्राट जलंधर की भार्या वृंदा के साथ दुराचरण करने के बावजूद विष्णु का देवत्रयी में सम्मानजनक स्थान बना रहता है. ना ही ऋषिपत्नी अहिल्या के साथ बलात्कार करने पर इंद्र का देवत्व संकट में पड़ता है. उल्टे अहिल्या को ही शिलाखंड जैसा जीवन जीना पड़ता है. भाषा का खेल भी खूब खेला जाता है. देवता नशा करें तो ‘सोमपान’ और असुर करें तो मदिरापान. सोमपान से देवताओं की सात्विकता पर संकट नहीं आता, परंतु मदिरापान से असुर बदचलन और तिरस्कारयोग्य मान लिए जाते हैं. कारण समझने के लिए ज्यादा माथापच्ची की आवश्यकता नहीं है. समस्त धर्मग्रंथ ब्राह्मणों द्वारा रचे गए हैं. उनके अपने हित विभेदकारी व्यवस्था से जुड़े थे. इसलिए उनके द्वारा गढ़ी गई संस्कृति में समानता एवं सर्वसम्मति के अवसर बहुत कम हैं. जिधर देखो उधर उसका सर्वसत्तावादी रूप नजर आता है. यह सर्वसत्तावाद कदाचित अनार्य संस्कृति के अग्रपुरुषों को भी ललचाने लगा था. इसलिए जब आर्यों का आक्रमण हुआ तो अनेक अनार्य योद्धा भी उनके साथ मिल गए. सुदास और दस राजाओं का युद्ध आर्यों के बीच वर्चस्व की लड़ाई थी. उसमें सुदास का नेतृत्व वशिष्ट तथा दसराज्ञों का नेतृत्व विश्वामित्र द्वारा किया गया था. मगर दस राजाओं में अज, शिब्रु, शिम्यु, यदु, यक्षु आदि अनार्य कबीले भी सम्मिलित थे. इस तरह भारत को आर्यवर्त्त बनाने में अनार्य योद्धाओं का भी भरपूर योगदान था. हिरण्यकश्यपु पुत्र प्रहलाद भी इन्हीं में आता है. उसने विष्णु को अपना ईष्ट मानकर अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह में ब्राह्मणवादियों का साथ दिया था. विभीषण, हनुमान, जटायु जैसे पात्र महाकाव्यीन लेखकों की कल्पना की उपज रहे होंगे. संभव है उनसे मिलतेजुलते पात्र समाज में सचमुच रहे हों, जिन्होंने आर्यसंस्कृति से प्रभावित होकर उनके साथ मिलना स्वीकार किया हो. आर्यों की श्रेष्ठता को दर्शाने के लिए ऐसे मिथकीय पात्रों की कल्पना आवश्यक थी. जिसमें उन्हें भरपूर सफलता भी मिली थी. ब्राह्मणीकरण की यह प्रक्रिया बहुत धीमे, युगों तक चली थी. इसके लिए आर्यों को अनगिनत युद्ध लड़ने पड़े और समझौते भी करने पड़े.

स्वाभाविकसा प्रश्न है कि असुर सभ्यता यदि इतनी ही विकसित थी, तो उसका पतन कैसे हुआ? इसका एक कारण यह जान पड़ता है कि आर्यों के आगमन के पूर्व विभिन्न कबीलों के बीच गणतांत्रिक व्यवस्था थी. भूक्षेत्र समृद्ध था. इसलिए सभी अपनेअपने प्रांत में सुखपूर्वक रहते थे. खेती में वे पारंगत थे. हड़प्पा सभ्यता में मिले भंडारगृहों से संभावना जगती है कि किलों का उपयोग सामरिक उद्देश्यों के बजाय, बचे हुए अनाज के भंडारण हेतु किया जाता था. खुद को सुरक्षित मान वे प्रायः निश्चिंत रहा करते थे. इसलिए जब आर्यों की ओर से आक्रमण हुआ तो वे एकाएक स्वयं को संभाल न सके. कालांतर में आर्यों के संपर्क में आकर उनमें भी साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाएं पनपने लगी थीं. इसलिए आक्रामकों का एकजुट सामना करने के बजाए वे बंटकर अपने ही लोगों के विरुद्ध मोर्चा संभालने लगे. दुष्परिणाम यह हुआ कि उन्हें समृद्ध सिंधु प्रदेश छोड़, उत्तरपश्चिम और दक्षिण की ओर पलायन करना पड़ा. परास्त होकर या आर्यों के आक्रमण के भय से अनेक अनार्य जातियों ने समझौता कर लिया. धीरेधीरे वे ब्राह्मणीकरण के दायरे में सिमटने लगे. बावजूद इसके इतिहास में कभी ऐसा नहीं हुआ जब सभी ने ब्राह्मणीकरण के आगे हथियार डाल दिए हों. न ही कभी ऐसा हुआ जब किसी युद्ध में सारे आर्य या अनार्य किसी एक पक्ष में रहे हों. रावण, महिषासुर, हिरण्याक्ष, हिरण्यकश्यपु, बालि, बलि जैसे कुछ स्वाभिमानी अनार्य सम्राटों की लंबी कतार है, जो अपने मानसम्मान की खातिर आर्यों से आजीवन संघर्ष करते रहे. यदि उस संघर्ष का निष्पक्ष भाव से दस्तावेजीकरण किया गया होता तो भारतीय संस्कृति का स्वरूप कदाचित उतना विभेदकारी नहीं होता, जितना कि आज है.

अनार्य संस्कृति के पराभव का मूल कारण उसके राजाओं की सैन्य दुर्बलता न होकर, अपनी संस्कृति और इतिहास के दस्तावेजीकरण की ओर से उदासीन हो जाना था. जबकि आर्यगण जिन दिनों तक लेखनकला का विकास नहीं हुआ था, उन दिनों भी स्मृतिभरोसे इस कर्तव्य को निभाते रहे. लेखनकला का विस्तार होने के पश्चात उन्होंने प्रत्येक ऐतिहासिक प्रसंग का वर्णन अपने स्वार्थ को ध्यान में रखकर किया. यहां तक कि असुरों की उपलब्धियों और खोजों को भी अपने नाम करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी. उन्होंने संस्कृति को मूल माना और पीढ़ीदरपीढ़ी अनेकानेक प्रतिभाशाली लेखक अपने नाम से स्वतंत्र ग्रंथ रचने का मोह छोड़, बिना किसी यशलाभ की अपेक्षा के, पहले से उपलब्ध धर्मशास्त्रों में ही जोड़घटाव करते रहे. अनेक लोगों द्वारा, अलगअलग समय में लिखे जाने के कारण धर्मशास्त्रों में भारी दोहराव है. अंतर्विरोध और असंगतियां भी हैं. परंतु वे इन्हें कमजोरी नहीं मानते. तर्कशीलता के अभाव को ढांपने के लिए उन्होंने आस्था और विश्वास पर जोर दिया. धर्मशास्त्रों पर किसी भी प्रकार के अविश्वास को पाप मानते हुए वे शब्द के स्वयंप्रमाण होने की घोषणा करते रहे. इससे नए ज्ञान के अवसर कम हुए. मनुष्य की स्वाभाविक प्रश्नाकुलता पर भी विराम लगा. लेकिन ब्राह्मणवाद या जिस सर्वसत्तावादी ध्येय के निमित्त उन शास्त्रों की रचना हुई थी, उसमें उन्हें भरपूर कामयाबी मिली.

ब्राह्मणवाद : वर्चस्व की सनातनी परंपरा

संस्कृति मनुष्य की सामाजिक संरचना का आधार होती है. समाज में मनुष्य की पहचान संस्कृति के अलावा शिक्षा, उत्पादन के साधनों आदि से भी होती है. बावजूद इसके समाज का बड़ा हिस्सा अपनी सांस्कृतिक पहचान को ही वास्तविक पहचान माने रहता है. इसलिए वह सांस्कृतिक परिवर्तन के लिए एकाएक तैयार नहीं होता. यहां तक कि सांस्कृतिक अंतर्विरोधों, असमानताओं के आगे, उन्हें स्वाभाविक मान समर्पण किए रहता है. परिवर्तन संस्कृति में भी होते हैं. लेकिन वे कभी भी उस सीमा तक नहीं जा पाते कि समाज का तानाबाना ही छिन्नभिन्न हो जाए. चूंकि सांस्कृतिक प्रतीकों यहां तक कि विरोधाभासों, अंतर्विरोधों के प्रति भी मनुष्य का समर्पण स्वैच्छिक होता है, इसलिए सांस्कृतिक दासता राजनीतिक दासता की अपेक्षा कहीं अधिक टिकाऊ एवं प्रभावशाली होती है. लंबे समय तक केवल संस्कृतियां राज करती हैं. अतः दीर्घ काल तक राज करने की इच्छा रखनेवाला राजनीतिक हमलावर सबसे पहले विजित संस्कृति की उन विशेषताओं पर हमला बोलता है, जो उसे स्वतंत्र संस्कृति की मान्यता दे सकती हैं. यह कार्य आरंभ में बल प्रयोग द्वारा, बाद में सहमति तथा तरहतरह की कूटनीतिक चालों द्वारा किया जाता है. संस्कृति और मनुष्य का संबंध इतना गहरा होता है कि मनुष्य संस्कृति के अंतर्विरोधों को भी अपने व्यक्तित्व का हिस्सा मानकर आत्मसात कर लेता है. भारतीय संस्कृति का ब्राह्मणवाद के ढांचे में ढल जाना इसी प्रवृत्ति को दर्शाता है.

हिंदुत्व ब्राह्मणवाद का रुपहला पर्याय है. शानदार खिड़की जिसके पीछे वह अपने कुटिल चेहरे को छिपाए रखता है. इस हिंदुत्व को न्यायालय ने जीवनपद्धति भी माना है. दोष न्यायालय का नहीं है. लोकतंत्र में लोगों की इच्छा का महत्त्व होता है. यदि समाज का बहुसंख्यक वर्ग ब्राह्मणवाद की विभेदकारी व्यवस्थाओं के प्रति आंख मूंदकर, चाहेअनचाहे उसके रंग में रंगा हुआ है, तो न्यायालय इसमें क्या कर सकता है! उसका काम तो सिरों की गिनती करने से चल जाता है. अदालत के लिए वही सत्य होता है, जिसके पक्ष पर्याप्त साक्ष्य हों. गवाह बेमन से गवाही दे, या जानबूझकर गलतबयानी करे, चाहे सवाल को ढंग से समझे बिना सिर्फ हांहू करता जाए तो न्यायालय क्या करे! आदमी आलू भी खरीदने जाता है तो मंडी में चार जगह देखता है. मोलभाव और जांचपरख करता है. चाहे एक वक्त की खरीदारी हो या एक सप्ताह की—एकएक आलू को छांटकर खरीदता है. लेकिन धर्म जो उसके अपने और आने वाली पीढ़ियों के जीवन को प्रभावित करता है, उसके बारे में कभी कोई सवालजवाब नहीं करता. सवाल करना भी पाप समझता है. बात आ पड़े तो बिना सवालजवाब किए ही मरनेमारने पर उतारू हो जाता है, क्यों? कदमकदम पर एकदूसरे की आलोचना करने वाले, सर्वश्रेष्ठ होने का दावा करने वाले धर्मों में एक मुद्दे पर कमाल की सहमति होती है. मुद्दा है जन्म के साथ ही मनुष्य का धर्म तय कर दिया जाना. हर धर्म अपने समर्थकों के सिर गिनता है. सिर में मस्तिष्क भी हो, और मस्तिष्क अपना काम भी करे, इस ओर वह कभी ध्यान नहीं देता. जानता है कि इस ओर ध्यान देना शुरू किया तो चार दिन में सारी दुकानदारी बैठ जाएगी. इसलिए पुरानी शराब की भांति हर धर्म नशे के सामर्थ्य और उसके बहाने अपने कारोबार को बढ़ाता चला जाता है.

बहरहाल, बात हिंदुत्व और उसे जीवनपद्धति बताए जाने की हो रही थी. हिंदुत्व यदि जीवनपद्धति है तो मनुष्य को जो आजादी अपनी जीवनपद्धति को चुनने की होनी चाहिए, वैसी आजादी क्या यह धर्म देता है? कथित सनातनी हो या गैरसनातनी, हिंदू परिवारों की सामान्य जीवनचर्या मिलीजुली होती है. हर परिवार में कोई आला या कोना ‘मंदिर’ के नाम पर आरक्षित होता है. प्रत्येक घर में मूर्तियों को नहलाया जाता है. सुबहशाम की आरती, पूजाबंदन बिना नागा चलता है. जब तक पत्थर की मूर्ति से छुआ न लें, घर के सदस्य विशेषकर स्त्रियां अन्नजल तक ग्रहण नहीं करतीं. मंदिर में कागज, पत्थर, कांच, मिट्टी, लकड़ी या प्लास्टिक के आड़ेतिरछे, भांतिभांति के देवता आसन जमाए रखते हैं. हर घर में साल में एकदो बार ‘सत्यनारायण कथा’ कही जाती है. पंडित सारे कर्मकांड रचता है. परंतु कभी नहीं बताता कि बाबा ‘सत्यनारायण’ कौन हैं? उनका खानदान क्या है? किस हिंदू धर्मशास्त्र में उनका उल्लेख है? फिर भी डरीसहमी कुलललनाएं इस कथा के श्रवण से खुद को धन्य मानती रहती हैं. अब यह मत कहिए कि संकट के समय जरूरतमंद की मदद करना, सादा जीवन जीना, जीवमात्र पर दया करना, चोरीचकारी से परहेज रखना, सत्य वाचन, मातापिता का सम्मान करना और बुराइयों से दूर रहना हिंदुत्व हमें सिखाता है. ये सब बातें तो नैतिकता के हिस्से आती हैं. वही समाजीकरण का मुख्य आधार भी हैं. समाज के बीच जगह बनाने के लिए प्रत्येक धर्म चाहे वह मूर्तिपूजकों का हो या मूर्तिभंजकों का, इन सदाचारों को अपनाता है. इन्हें अपनाए बिना उसकी गति नहीं है. इसलिए अभिव्यक्ति का तरीका चाहे जो हो, हर धर्म में यही सदाचार सिखाए जाते हैं. इसे धर्म की धूर्त्तता कहें या बेईमानी, वह नैतिकता से उधार लिए इन सदाचारों को अपना बनाकर पेश करता है. इस तरह पेश करता है मानो धर्म है तो सदाचार हैं. असल में होता इसका उलटा है