Tag Archives: जाति

भक्ति-वेदांत : बहुजन समाज को बौद्धिक दास बनाए रखने का ब्राह्मणवादी प्रपंच

सामान्य

जाति बहुजन के गले की फांस है, वही मुट्ठी-भर लोगों के लिए उनके विशेषाधिकारों का सुरक्षा-कवच है। ब्राह्मण तथा दूसरे सवर्ण नहीं चाहते कि जातिप्रथा समाप्त हो। वे तो चाहते हैं कि शूद्र सदैव शूद्र, दलित हमेशा दलित बना रहे। इसके लिए कदम-कदम पर साजिशें रची जाती हैं। यह षड्यंत्र जितना सामाजिक दिखता है, उससे कहीं ज्यादा मनोवैज्ञानिक है। जितना हिंसक है, उतना अहिंसक भी है। ब्राह्मणों की सदैव कोशिश होती है कि दलित और शूद्र दोनों दिलो-दिमाग से उनके अधीन बने रहें। वे जहां भी, जिस हालत में भी हैं, उसी को अपनी नियति मान लें। इसके लिए वे न केवल गैर-ब्राह्मणों की संस्कृति में जबरन दखलंदाजी करते हैं, बल्कि उनसे उनका इतिहास, उनके महापुरुष तक छीन लेते हैं। चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले ‘भक्तमाल’ से एक दृष्टांत—

‘रामानंद जी का एक ब्रह्मचारी शिष्य था। वह नित्य चून की चुटकी मांगकर लाता। उसी से ठाकुर का भोग लगता, और उसी से संतों का सत्कार किया जाता था। कुटिया के आसपास एक बनिया रहता था। उसने दस-बीस बार ब्रह्मचारी से सीधा लेने का आग्रह किया, किंतु स्वामी जी की आज्ञानुसार उसने कभी उस बनिये से भिक्षा लेना स्वीकार नहीं किया था। एक दिन मूसलाधार वर्षा हो रही थी। भिक्षा द्वारा अन्न-संग्रह करना भी आवश्यक था। उस दिन गुरु-आज्ञा का उल्लंघन कर, ब्रह्मचारी बनिये द्वारा दिया गया सीधा ले आया। गुरु ने उससे बने हुए पदार्थ को मूर्ति के सामने भोग के लिए रखा और ध्यान किया तो प्रभु की मूरत ध्यान में नहीं आई। इसपर उन्होंने शिष्य से पूछा—‘अरे! आज भीख कहां-कहां से मांगकर लाए हो?’

शिष्य ने सच बता दिया। तब गुरु ने उस दुकानदार के बारे बताया। मालूम हुआ कि वह अत्यंत नीच मनोवृत्ति का है। रुपये के लोभ से एक चमार से साझा कर, व्यापार करता था। स्वामीजी ने इसपर शिष्य को शाप दिया—‘चूंकि तूने गुरु की आज्ञा का उल्लंघन किया है, अतः तू हीन-कुल में जन्म ग्रहण करेगा। वही शिष्य दूसरे जन्म में रैदास नाम से एक चमार के घर के घर पैदा हुआ।’1 

इस मिथकीय आख्यान के निहितार्थों पर चर्चा बाद में, पहले दृष्टांत का अगला हिस्सा—

‘बालक रैदास को अपनी माता का दूध पीना तो दूर रहा, उसके शरीर का स्पर्श करना भी बुरा लगता था। गुरु सेवा के प्रभाव से उसे पिछले जन्म की सब याद बनी रही। वह सोचता यदि चमार के यहां भिक्षा मांगने से यह दंड मिला है, तब यदि दूध पी लूंगा तो न जाने क्या गति होगी! इसी बीच स्वामी रामानंद जी को आकाशवाणी हुई कि तुम्हारा शिष्य चमार के घर जन्मा है, उसकी सहायता करिए। सुनकर उनके हृदय को बड़ा कष्ट हुआ। वे तुरंत वहां पहुंचे जहां रैदास जन्मे थे। बच्चे के दूध न पीने के कारण माता-पिता बहुत दुखी थे। स्वामी रामानंद को देखते ही वे उनके पैरों पर गिर पड़े और प्रार्थना की कि कुछ ऐसा उपाय करिए जिससे बच्चा दूध पीने लगे। इसपर रामानंदजी ने बालक को वहीं राम नाम(रं रामाय नमः) की दीक्षा देकर अपना शिष्य बनाया। फलस्वरूप उसके सब पाप धुल गए; और वह मां का दूध पीने लगा। दूध पीते ही बच्चे का मानो पुनर्जन्म हो गया और वह स्वामी रामानंद को ईश्वर करके मानने लगा। उसका पूर्वजन्म की भूल का सारा संताप मिट गया।2

आगे दिए गए विवरण के अनुसार, बड़ा होने पर रैदास भक्ति में लीन रहते। घर आए साधु-संतों की पूजा, आदर-सत्कार करते। मजदूरी करके जो कमाते, उसे भिखारियों में बांटकर बचे हुए को आप खाते। धन और मोह-माया से पूरी तरह निर्लिप्त। आखिरकार, नाभादास के शब्दों में— 

‘भगवान की कृपा के फलस्वरूप श्रीरैदास जी ने इसी मर्त्य शरीर से परम-पद प्राप्त किया और राजसिंहासन पर बैठे। अपने शरीर में यज्ञोपवीत का चिन्ह दिखाकर, अपने लोगों को यह विश्वास दिलाया कि आप पूर्व जन्म में ब्राह्मण थे।’3

‘भक्तमाल’ को भक्तिभाव से पढ़ने वालों से पूछा जा सकता है कि जिस घर में चमड़ा पकाया जाता हो, जो वर्ण-व्यवस्था के हिसाब से अतिशूद्रों और चांडालों की बस्ती हो—वहां रामानंद जैसा ब्राह्मण भला कैसे जा सकता है? यह शंका भी जायज होगी कि एक अबोध शिशु कथित राम-मंत्र को कैसे हृदयंगम कर सकता है? सवाल यह भी है कि जन्म के तुरंत बाद मां की जाति के कारण उसका दूध त्याग देने वाला अबोध शिशु, उसके गर्भ में कैसे रहा था? और राम-नाम का रट्टा मारने से ही यदि ‘रैदास’ बनना संभव था, तो रामानंद के कथित 52 के 52 शिष्यों को रैदास जैसा महाज्ञानी बन जाना चाहिए था, फिर वे क्यों नहीं बन पाए? लेकिन भक्तिमार्ग आस्था पर टिका होता है। भक्त को सवाल उठाने की अनुमति वह नहीं देता। चूंकि मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है, इसलिए कह सकते हैं कि भक्तिमार्ग, जिसे कुछ लोग भक्ति-वेदांत भी कहते हैं—मनुष्य के विवेकीकरण का अवरोधक, समाज को अपने जाल में फंसाए रखने के लिए ब्राह्मणवादी प्रपंच हैं। 

2

रैदास ने कहीं भी रामानंद को अपना गुरु स्वीकार नहीं किया है। उन्होंने न केवल ब्राह्मणों द्वारा स्थापित वर्ण-व्यवस्था और धर्माडंबरों की आलोचना की, अपितु शूद्र होने के कारण जिन वेदों को पढ़ने का अधिकार उन्हें नहीं था, जिनके सुनने मात्र से दंड का सहभागी बनना पड़ता हो—उन्हें प्रामाणिक मानने से ही इन्कार कर दिया—

चारिउ वेदि किया खण्डोति

ताको विप्र करै दंडोति। 

            ***

जग में वेद वैद्य जानये

पढ़त समझ कुछ न आवत

रैदास की तरह कबीर को भी नहीं बख्शा गया। उनके जन्म के बारे में फैलाई गई कहानी, श्यामसुंदर दास के शब्दों में, कुछ इस प्रकार है—

‘काशी में एक सात्विक ब्राह्मण रहते थे। वे स्वामी रामानंद के बड़े भक्त थे। उनकी एक विधवा कन्या थी। उसे साथ लेकर एक दिन वे रामानंद के आश्रम पर गये। प्रणाम करने पर स्वामी रामानंद ने उसे पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया। ब्राह्मण देवता ने चौंककर जब पुत्री का वैधव्य निवेदन किया तब स्वामी ने सखेद कहा कि मेरा वचन तो अन्यथा नहीं हो सकता है। इतने से संतोष करो कि इससे उत्पन्न पुत्र बड़ा प्रतापी होगा। आशीर्वाद के फलस्वरूप जब उस ब्राह्मण कन्या को पुत्र उत्पन्न हुआ तो लोकलज्जा और लोकापवाद के भय से उसने उसे लहर तालाब के किनारे डाल दिया।4 वही बालक बाद में नीरू नामक जुलाहे के घर पला-बढ़ा और श्यामसुंदर दास के शब्दों में, ‘परम भगवद्भक्त कबीर’ हुआ। कबीर के सूर-तुलसी की तरह भक्तिमार्गी होने में किसी प्रकार का संदेह न रह जाए, इसलिए बाद में उन्हें रामानंद का शिष्य दर्शाने के लिए कहानी भी गढ़ी गई। यह बात अलग है कि रैदास की तरह कबीर भी ब्राह्मणों और पुरोहितों के कर्मकांडों, पूजा-पाखंडों के विरोधी बने रहे। वेदों की दुहाई देने वाले ब्राह्मणों तथा उनकी बनाई गई हर व्यवस्था पर उन्होंने जमकर कटाक्ष किया है। ‘वेद पढ़ते हैं और आत्मप्रशंसा करते हैं। लेकिन मन से संशय की गांठ आज भी नहीं छूटती— 

     पढ़ें वेद और करें बढ़ाई,

     संशय गांठि अजहुं नहिं जाई।।  

कबीर की कविता जीवन-सत्य की खोज की कविता है। उसके लिए बाह्याडंबरों का आमूल बहिष्कार आवश्यक है। धर्म और जाति के नाम पर मिथ्याभिमान वहां चल नहीं सकता—

कबिरा का घर सिखर पै जहां सिलहली गैल

पांव न टिकै पिपीलिका पंडित बांधै बैल

कबीर ज्ञान के शिखर पर विराजमान हैं। वहां का रास्ता फिसलन-भरा है। चींटी(बौद्धिक रूप से क्षुद्र लोगों) का वहां पहुंचना असंभव है; और पंडित उसे ज्ञानाडंबर और मिथ्याभिमान के जरिये प्राप्त करना चाहते हैं।  

3

सवाल है कि रैदास, कबीर जैसी प्रतिभाओं के ब्राह्मणीकरण के पीछे क्या ब्राह्मणों की उदारता है? क्या ऐसी कोशिशें वर्ण-व्यवस्था को लचीला दर्शाने के लिए की जाती है? क्या शूद्रातिशूद्र वर्ग के महापुरुषों-मनीषियों को ब्राह्मणत्व या कभी-कभी ‘ईश्वरत्व’ मिलने पर, बहुजन समाज को खुश होना चाहिए? प्रसन्न होना चाहिए कि उनमें से कम से कम एक व्यक्ति तो खुद को जाति की जलालत से बाहर निकालने में सफल हुआ? अगर बहुजन समाज ऐसा ही सोचता है, तो यह सचमुच ब्राह्मणवाद की जीत है। इसका मतलब होगा कि उसने जाति-व्यवस्था को, जो प्राकृतिक एवं सामाजिक न्याय दोनों के विपरीत है—स्वीकार कर लिया है। उस हालत में वे समझ ही नहीं पाएंगे कि किसी एक युग-प्रवर्त्तक महापुरुष के ब्राह्मणीकरण(अथवा ईश्वरीकरण), परिवर्तन की बनती हुई संभावनाओं को एकाएक खारिज कर देने जैसा है। ब्राह्मणीकरण के साथ ही वह ‘महापुरुष’ अपना सारा तेज गंवा देता है। अपने नए ‘अवतार’ में वह उन्हीं बातों का समर्थन करता हुआ नजर आता है, जिनके विरुद्ध कभी उसने आवाज उठाई थी। इस तरह एक उभरता हुआ आंदोलन असमय ही दम तोड़ने लगता है।

गैर-ब्राह्मण महापुरुषों का ब्राह्मणीकरण कर, उन्हें उनके समाज से छीन लेने की प्रवृत्ति और तरीका बहुत पुराना है। इसी प्रवृत्ति के चलते दो हजार वर्ष पहले ब्राह्मणों ने गौतम बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित किया था। यही प्रवृत्ति वाल्मीकि को ब्राह्मण संतान घोषित करते समय काम कर रही थी। इसके लिए वे संबंधित व्यक्ति के जीवन या कथित पूर्वजन्म/जन्मों के बारे में, कोई न कोई चमत्कारपूर्ण आख्यान गढ़ लेते है। लोकश्रुति या शास्त्रों के माध्यम से उसे प्रचारित भी कर लेते हैं। जरूरत पड़े तो उसे पुराणों और दूसरे धर्मग्रंथों में जगह देकर ब्राह्मण-परंपरा का हिस्सा बना लेते हैं। ऐसा करते समय वे मनमानी छूट लेते हैं। जिसके अंतर्गत संबंधित महापुरुष के क्रांतिकारी विचारों को तोड़-मरोड़कर इस तरह पेश किया जाता है कि अंततः वे ब्राह्मणवाद के पोषक, समर्थक और पूरक नजर आने लगते हैं। लोकश्रुतियों/शास्त्रों का हवाला देकर वे भोले-भाले लोगों को, यह विश्वास दिलाने लगते हैं कि उस महापुरुष की विशिष्ट मेधा तथा उसका योगदान, केवल उसकी अपनी प्रतिभा, श्रम और समर्पण का सुफल न होकर दैवीय अनुकंपा की देन है। उस अवस्था में उसके अनुयायी, महापुरुष के विचारों को पढ़ने-समझने तथा उनसे प्रेरणा लेने के बजाय, उन्हें पूजने लग जाते हैं। उन्हें लगता है कि उनके (गैर-ब्राह्मण)महापुरुष की इज्जत अफजाई के लिए ब्राह्मण खुद आगे आ रहे है। अतिविश्वास में वे यह भी मानने लगते हैं कि ब्राह्मणों की नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी जैसी कठोर नहीं है। इससे उनके मन में ब्राह्मणों तथा उनकी व्यवस्था के प्रति आक्रोश घटने लगता है। यानी एक महापुरुष का ब्राह्मणीकरण, चाहे वह झूठमूठ ही क्यों न हो, उसके समाज के ब्राह्मणीकरण के दरवाजे भी खोल देता है। इससे परिवर्तन की प्रक्रिया, जो महापुरुष द्वारा ब्राह्मणवाद को चुनौती के फलस्वरूप आरंभ हुई थी, धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती है। 

4

परिवर्तन के लिए समाज में परिवर्तन की इच्छा का होना भी आवश्यक है। वर्तमान के प्रति असंतोष जितना प्रबल होगा, उसे बदलने की इच्छा भी उतनी ही तीव्रतर होगी। उसके लिए उदात्त, सकारात्मक एवं यथार्थोन्मुखी प्रेरणाएं अपरिहार्य हैं। ब्राजील के शिक्षाशास्त्री पाब्लो फ्रेरा के शब्दों में—‘उत्पीडि़तों को अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष में सफल होने के लिए यथार्थवादी होना पड़ेगा। उन्हें उत्पीड़न के यथार्थ को ऐसी बंद दुनिया के रूप में हरगिज नहीं देखना चाहिए, जिससे निकल पाना असंभव है। उन्हें उसको ऐसी अवरोधक स्थिति के रूप में देखना चाहिए, जिसे वे बदल सकते हैं।’5 बहुजन मुक्ति के लिए भी ऐसी दृष्टि चाहिए जो धर्मशास्त्रों और सांस्कृतिक परंपराओं, रिवाजों में अंतनिर्हित सत्य की बहुजन-दृष्टि से पड़ताल कर सके। उनके बारे में स्थापित सत्य के विखंडन एवं नवोन्मेषण द्वारा वास्तविक और जनोन्मुखी सत्य को सामने ला सके। यहां छांदोग्योपनिषद का एक दृष्टांत द्रष्टव्य है—

‘विद्याध्ययन को उत्सुक सत्यकाम हरिद्रमुत गौतम के आश्रम में पहुंचा। शिष्य बनाने से पहले हरिद्रमुत ने आगंतुक से उसके कुल-गौत्र के बारे में पूछा। वापस आकर सत्यकाम अपनी मां से मिला। पूछने पर उसकी मां ने बताया—‘उन दिनों मैं घर-घर चक्की पीसने का काम करती थी। वहां किसके संसर्ग से तू मेरे गर्भ में चला आया, मुझे नहीं पता….’ सत्यकाम दुबारा हरिद्रमुत के आश्रम में पहुंचा। पूछने पर बोला—‘मेरी मां एक पिसनहारी है। उसका कहना है कि घर-घर जाकर काम करते हुए मैं कब उसके गर्भ में चला आया, उसे पता ही नहीं चला। मैं सत्यकाम हूं। मेरी मां का नाम जाबाला है। सो मैं सत्यकाम जाबालि हुआ।’ यह सुनकर हरिद्रमुत प्रसन्न होकर बोले—‘इतना सत्यभाषी बालक सिवाय ब्राह्मण के और कौन हो सकता है। जा समिधा ले आ। मैं तुझे दीक्षा दूंगा।’

यह कहानी प्राचीन वर्ण-व्यवस्था के उदात्त पक्ष के रूप में अकसर दोहराई जाती है। इस तरह कि पढ़ने-सुनने वाला गदगद् हो जाता है। सर्वपल्ली राधाकृष्णन सहित अनेक विद्वानों ने प्राचीन भारत के दर्शन एवं संस्कृति का विवेचन करते समय इसका उल्लेख किया है। उनके प्रभाव में मान लिया जाता है कि वर्ण-व्यवस्था की आरंभिक संकल्पना एकदम दोष-विहीन थी। सदियों से ब्राह्मणों के बताए झूठ को सच मानता आया बहुजन मानस इसके ठेठ ब्राह्मणवादी निहितार्थ को समझ ही नहीं पाता। हरिद्रमुत गौतम यह कहकर कि इतना सत्यभाषी बालक सिवाय ब्राह्मण के और कौन हो सकता है, पूरे गैर-ब्राह्मण समुदाय को मिथ्याभाषी घोषित कर देते हैं। यही नहीं वे घर-घर जाकर चक्की पीसने वाली गरीब-मजबूर स्त्री के यौन-शोषण को भी नजरंदाज कर देते हैं, जो उस समाज में स्त्री की दुर्दशा को दर्शाता है। धर्मशास्त्रों में इस तरह के प्रसंग भरे पड़े हैं। उन्हें समझने के लिए उनकी बहुजन दृष्टि से पड़ताल जरूरी है। फुले इसकी शुरुआत बहुत पहले कर चुके थे। बाद में डॉ. आंबेडकर, पेरियार आदि ने इसे विस्तार दिया। समकालीन बुद्धिजीवियों में कांचा इलैया, डॉ. धर्मवीर ऐसे ही मौलिक व्याख्याकार हैं।  

माओत्से-तुंग ने कहा था कि सत्ताएं बंदूक की गोली से निकलती हैं। यह उनका सच था। सत्ताएं बंदूक की गोली से निकल सकती हैं। मगर इतिहास उनका नहीं होता जिनके हाथों में तलवार होती है। इतिहास उनका होता है जिनके हाथों में कलम होती है। अगर तलवार के जोर पर कलम वाले हाथों को मनमाना इतिहास गढ़ने को मजबूर कर भी दिया जाए तो वह रचना अस्थायी होती है। मुक्त होते ही कलम वाले हाथ, इतिहास को नया रूप देने लगते हैं। अतएव ब्राह्मणवाद के स्वार्थपूर्ण और अवांछित हस्तक्षेप से बचने का एकमात्र रास्ता है कि बहुजन बुद्धिजीवी आगे आएं; वे अपनी मेधा को तराशें तथा धर्म और संस्कृति के नाम पर थोपे गए प्रतीकों-मिथों के निर्माण के पीछे ब्राह्मणवादी षड्यंत्र को समझते हुए, न्याय, स्वतंत्रता और समानतावादी दृष्टि से उनकी पुनर्व्याख्या करें। यह बहुजन अस्मिता और सम्मान की रक्षा का एकमात्र तरीका है। 

ओमप्रकाश कश्यप

  1.  रामानंदुजू कौ शिष्य ब्रह्मचारी रहे एक गहे वृत्ति चुटकीकी कहे तासों बानियों। 

करौ अंगीकार सीधो दस-बीस बार बरसे प्रबल धार तामें वापै आनियों।

भोग कों लगावै प्रभु ध्यान नहीं आवै अरे कैसे करि ल्यावै जाय पूछी नीच मानियों।

दियो शाप भारी बात सुनी न हमारी घटि कुल में उतारि देहि सोईं याको जानियों—श्रीभक्तमाल, नाभादास, भक्ति-रस-बोधिनी-टीका, व्याख्याकार श्रीरामकृष्णदेव गर्ग, श्री अखिल भारतीय  श्रीनिंबार्काचार्य पीठ, वृंदावनधाम, 1960।)

  • माता दूध प्यावै याकों छुयोऊ न भावै सुधि आवै सब पाछिली सुसेवा कों प्रताप है

भई नभ-बानी रामानंद मन जानी बड़ो दंड दियो मानी वेगि आयो चल्यौ आप है

दुखी पितु-मात देखि धाय लपटाये पाय कीजिए उपाय किये शिष्य गयो पाप है। 

स्तन पान किसी जियो जिलयो उन्हें ईस जाति निपट अज्ञानि फेरि भूले भयो ताप है। —वही

  • भगवत कृपा प्रसाद परम गति इहि तन पाई

राजसिंहासन बैठि ग्याति परतीति दिखाई—वही

  • श्यामसुंदर दास द्वारा संपादित ‘कबीर ग्रंथावली’ की प्रस्तावना, हिंदी समय।
  • पाब्लो फ्रेरा, उत्पीडि़तों का शिक्षाशास्त्र, रमेशचंद शाह द्वारा अनूदित, ग्रंथशिल्पी, नई दिल्ली।

जाति : आखिर क्यों नहीं जाती?

सामान्य

जो लोग धर्म के नशे को पचा लेते हैं, उनपर जाति का जहर असर नहीं करता. लेखक

भारतीय समाज की दो समस्याएं असाध्य मान ली गई हैं. उनमें पहली का उद्गम क्षेत्र भारत है. वह यहीं जन्मी, विकसी और करीब ढाईतीन हजार वर्षों से हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा है. वह हमारी रगरग में इस कदर व्याप्त है कि उससे मुक्ति असंभव जान पड़ती है. दूसरी को हमने इतने ही दशक पहले अपनाया था. इस अवधि में ही समर्थक और आलोचक सब उसे विकल्पहीन मानने लगे हैं. पहली कार्यविभाजन की प्राचीनतम पद्धति है, जिसे धर्माचार्यों ने स्वार्थसिद्धि का माध्यम बनाया तो राजनीतिज्ञों तथा व्यापारियों ने उसका अपनीअपनी तरह से उपयोग किया. दूसरी धनबल पर टिकी है. मानती है कि स्पर्धा अधिकतम उत्पादन की; तथा अधिकतम उत्पादन सुनिश्चित विकास की कुंजी है. लेकिन भीषण आर्थिक वैषम्य, अशिक्षा तथा धर्मभीरूता में लिपटे समाजों में विकास केवल विशेषाधिकार संपन्न व्यक्तियों तक सिमट जाता है. इनमें पहली समस्या जाति है, दूसरी पूंजीवादी अर्थतंत्र जिसे हम अर्थव्यवस्था का उदारीकरण कहकर जी बहला लिया करते हैं. दोनों प्रकट में भले ही अलग नजर आएं, परोक्ष में एकदूसरे की पूरक और संवर्धक हैं.

जाति’ का अंग्रेजी पर्याय caste है. यह लैटिन मूल के शब्द castus से बना है. उसका अर्थ होता हैpure, clean, chaste यानी ‘शुद्ध’, ‘स्वच्छ’, ‘पवित्र’ आदि. अपने प्रचलित अर्थ में ‘जाति’ की अवधारणा स्पेनिश और पुर्तगाली भाषा के शब्द casta के अपेक्षाकृत करीब है. पुर्तगाली भाषा में उसका अर्थ हैᅳ‘नस्ल’, वंशावली’, ‘वर्ण’. उसमें रक्तशुद्धता का भाव भी शामिल है. लंबी यात्रा के बाद भारत पहुंचने पर पुर्तगालियों की जब यहां की जातिव्यवस्था से मुठभेड़ हुई तो उन्हें लगा कि casta की भांति जाति भी ‘कुलीनता’ और ‘रक्तशुद्धता’ को दर्शाती है. पुर्तगालियों द्वारा caste पुकारने से ही जाति को अपना आंग्ल पर्यायवाची मिला. जातिवर्ण तथा रक्तशुद्धता के अंतःसंबंध को लेकर हिंदुओं के बीच सिद्धांत और व्यवहार का अंतर प्राचीनकाल से रहा है. यह सही है कि ‘जाति’ और ‘वर्ण’ में ‘रक्तशुद्धता’ की अवधारणा के लिए सिद्धांततः कोई स्थान नहीं है. ‘ब्रह्मा’ या ‘विराटपुरुष’ का मिथ, जिसके आधार पर जातिप्रथा की संपूर्ण इमारत खड़ी हैस्वयं इसका विरोध करता है. ऋग्वेद के ‘पुरुषसूक्त’ के अनुसार सभी जातियों का जन्म ब्रह्मा के शरीर के विभिन्न अंगों हुआ है. उसके मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, उदर से वैश्य तथा पैरों से शूद्रों का निकास बताया जाता है.

अब यह तो संभव नहीं है कि शरीर के एक हिस्से में ‘कुलीन’ रक्त का प्रवाह हो तथा दूसरे में ‘दूषित’ रक्त का. जब सब एक ही विराटपुरुष की संतान हैं तो सबका रक्त एक ही होगा. महाभारत में भृगु और भरद्वाज का संवाद इसकी पुष्टि करता है. चर्चा के आरंभ में भृगु वर्णविभाजन का स्थूल आधार व्यक्त करते हैं. वे ब्राह्मण को श्वेत, क्षत्रिय को रक्तिम, वैश्य को पीत तथा शूद्र को श्यामवर्णी बताते हैं. भरद्वाज तत्काल प्रतिप्रश्न करते हैं कि सभी वर्णों के लोगों में लालच, क्रोध, ईर्ष्या, इच्छा, भय, क्षुधा, चिंता, थकान आदि एक समान होते हैं. सभी वर्णों में सभी रंग के मनुष्य देखने को मिलते हैं. ऐसे में उन्हें रंग के आधार पर अलग कैसे किया जा सकता है. इसपर भृगु कहते हैं कि पहले वर्णों में कोई अंतर नहीं था. आगे चलकर विभिन्न कर्मों के कारण वर्णभेद पनपाᅳ‘ब्रह्मा से उत्पन्न होने के कारण यह सारा जगत ब्रह्म हैसर्वे ब्राह्ममिदं जगत्’(शांतिपर्व12/181/10). इसका आशय यह नहीं है कि आर्यजन रक्तशुद्धता के विचार से सर्वथा मुक्त थे? विराट जनसमाज के समक्ष अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए शासक वर्ग जिन माध्यमों को अपनाता है, उनमें रक्तशुद्धता का ‘मिथ’ भी है. ‘मिथ’ इसलिए कि विभिन्न संस्कृतियों के बीच रक्तसंबंधों का आदानप्रदान हजारों वर्षों से होता रहा है. ऐसे में रक्तशुद्धता का दावा भ्रांति से आगे नहीं जाता. बावजूद इसके अपना मन समझाने के लिए शीर्षस्थ वर्ग ऐसी भ्रांति जानेअनजाने पाले ही रखते हैं. गौत्र की अवधारणा, अनुलोमप्रतिलोम विवाह, उपनयन संस्कार जैसी विशेषताएं बतातीं हैं कि आर्य भी उसके अपवाद न थे.

कार्यविभाजन के आधार पर समाज को अलगअलग वर्गों में बांटने का सिद्धांत प्रायः सभी प्राचीन सभ्यताओं में लागू था. अफ्रीका, चीन, मंगोलिया, जापान आदि देशों में भी वर्णविभाजन के प्रमाण हैं. लेकिन वह वंशगत नहीं था. प्लेटो ने मनुष्य की प्रतिभा, रुचि, गुण, शारीरिक बल और मनोविज्ञान के आधार पर उन्हें ‘स्वर्ण’, ‘रजत’ एवं ‘लौह’ वर्गों में बांटा है. उसने बच्चों का भरणपोषण उनकी पैत्रिक पहचान को छिपाते हुए, राज्य के नियंत्रण में इस प्रकार करने की अनुशंसा की है कि जैविक मातापिता भी अपनी संतान को पहचान न सकें. यह जानकारी भी आपको हैरान कर सकती है कि जिस चातुर्वर्ण्य व्यवस्था को आर्यों ने भारत में लागू किया, ठीक वैसी ही वर्णव्यवस्था आर्यों के मूल देश प्राचीन पर्शिया में भी मौजूद थी. दोनों के बीच आश्चर्यजनक समानताएं हैं. प्रोफेसर रमेश चंद्र की पुस्तक ‘कास्ट सिस्टम इन इंडिया’ में इसपर विचार किया गया है. प्राचीन पर्शिया में भी समाज को चार वर्णों(pishtras) में बांटा गया था. उनके नाम हैंᅳ‘अथर्वा’ या पुजारी(Athravas or Priest), रथेस्थस्स या योद्धा(Rathaesthas or Warrior) वास्त्रय श्युआंत्स(Vastrya Fshuyants) अथवा उपार्जक तथा हाउटिस(Huitis or Manual Workers) यानी मेहनतकश मजदूर. भारत में आकर ये क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बन जाते हैं.

प्रमाण बताते हैं कि वर्णव्यवस्था की नींव समाज में कार्यविभाजन की जरूरत के आधार पर रखी गई. आरंभ में उसके प्रति सर्वसम्मति थी. लोग अपनी रुचि और कार्यक्षमता के अनुसार काम चुनते थे. संतान को भी मनचाहा काम चुनने की स्वतंत्रता थी. काम के आधार पर ऊंचनीच या पक्षपात नहीं होता था. वर्णव्यवस्था का दैवीकरण बहुत बाद की घटना है. ऊंचनीच की भावना भी दैवीकरण के साथ ही जुड़ी. चातुर्वर्ण्य का विचार तो आर्य अपने मूलदेश से लेकर आए थे. ‘पुरुषसूक्त’ की रचना उन्होंने यहां भलीभांति जम जाने के बाद की. वर्णव्यवस्था को स्थायी बनाने के लिए आवश्यक था कि उसे ‘दैवीविधान’ बनाकर किसी भी प्रकार की शंका और सवालों से मुक्त कर दिया जाए. यही उन्होंने किया भी. वेद ने रास्ता दिखाया था, भेदभाव की नींव उपनिषदों, पुराणों और स्मृतियों द्वारा रखी गई. बृहदारण्यक उपनिषद(1.4.11-14) में कहा गया है कि ब्राह्मण का जन्म सबसे पहले हुआ. लेकिन अकेले ब्राह्मण द्वारा सृष्टि का संचालन संभव न था. इसलिए उसकी मदद के लिए क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रादि वर्णों की रचना की गई. ‘विराटपुरुष’ की कल्पना से जब रक्तशुद्धता के मिथ पर संकट दिखाई पड़ने लगा तो बचाव के लिए उपनयन संस्कार का सहारा लिया गया. उसे मनुष्य का दूसरा जन्म(द्विज) कहा गया. मान लिया गया कि जन्म के समय भले ही सब जातक एक जैसे हों, द्विजीकरण द्वारा शुद्ध कर उन्हें दूसरों से विशिष्ट बनाया जा सकता है. उपनयन संस्कार तथाकथित कुलीन अर्थात ऊपर के तीन वर्गों वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण तक मान्य था(जातिगोत्रादि कर्माणि शुक्लध्यानस्य हेतवः। येषां स्युस्ते त्रयो वर्णाः शेषाः शूद्राः प्रकीर्तिताः।।). उसके माध्यम से समाज की तीन प्रमुख विशेषाधिकार संपन्न शक्तियों धार्मिक(ब्राह्मण, पुरोहित), राजनीतिक(क्षत्रिय) तथा आर्थिक (वैश्य) को एक सूत्र में बांध दिया गया. वैश्य और क्षत्रिय ब्राह्मणकेंद्रित संस्कृति के अधीन होते चले गए. इसे स्थायी बनाने के लिए अनेक नियम बनाए गए. विवाह की अनुलोमप्रतिलोम व्यवस्था भी जातिव्यवस्था को स्थायी बनाने में मददगार बनी. वर्णसंकरता ने अनेक जातियों को जन्म दिया. समाज की मान्यता मिली तो हर नए पेशे के साथ नई जाति भी जुड़ती गई.

निचली जातियों का बड़ा हिस्सा जातिव्यवस्था के लिए मनु को जिम्मेदार ठहराता है. ‘मनुस्मृति’ का दहन उसी आक्रोश की अभिव्यक्ति है. जबकि साक्ष्य बताते हैं कि मनु जातिपृथा का मूल अभिकल्पक नहीं था. जाति तो उससे पांच सौ वर्ष पहले से ही मौजूद थी. तब मनु ने ऐसा क्या किया था कि जाति व्यवस्था के सताए लोग उससे घोर नफरत करते हैं? इसके लिए उस समय के इतिहास को समझना आवश्यक है. 2500 वर्ष पहले बुद्ध का उदय भारतीय इतिहास की क्रांतिकारी घटना थी. बुद्ध ने वर्णव्यवस्था को चुनौती नहीं दी थी. मगर भिक्षु संघ के दरवाजे, समाज के सभी वर्गों के लिए खोलकर, जातिआधारित भेदभाव को मिटाने की क्रांतिकारी पहल जरूर की थी. बुद्ध के पांच प्रमुख शिष्यों में उपालि नाम का शूद्र(नाई) भी सम्मिलित था. उनके एक अन्य प्रमुख शिष्य मोग्गलायन को पूर्वजन्म में मछुआरा बताया गया है. बहरहाल, जैसेजैसे बौद्ध धर्म का प्रभाव बढ़ा, जातिआधारित भेदभाव में कमी आने लगी. उससे लोगों का मिलनाजुलना बढ़ा. फलस्वरूप कर्मकार जातियां जो अर्थव्यवस्था की रीढ थीं, परस्पर संगठित होने लगी थीं. उनके संगठन देशदेशांतर तक व्यापार करते थे. डा. रमेश मजूमदार के अनुसार शिल्पकार वर्गों के अलगअलग लगभग 31 व्यापारिक संगठन थे. अपने आप में पूरी तरह आत्मनिर्भर. इससे वर्णव्यवस्था की मूल अवधारणा कि शूद्र का कार्य द्विजों की सेवा के लिए हैंधूमिल पड़ने लगी थी. पुरोहित वर्ग की दृष्टि में यह वर्णव्यवस्था को ही चुनौती थी. इससे उसका क्षुब्ध होना स्वाभाविक था. अतः बौद्ध धर्म के पराभव के दिनों में ब्राह्मणवादी शक्तियों को जैसे ही अवसर मिला, वर्णव्यवस्था को मजबूत करने के लिए मनु ने ऐसे विधान की रचना की जिसमें ब्राह्मणों के विशेषाधिकार को कोई चुनौती न दे सके. इस तरह ‘मनुस्मृति’ जातिविधा को जन्म देने वाला ग्रंथ न होकर, जातिआधारित भेदभाव, सामाजिकराजनीतिक असमानता को बढ़ावा देने तथा समाज के बहुसंख्यक वर्ग से उसकी स्वतंत्रता छीन लेने का षड्यंत्र है. बौद्ध धर्म के अवसान के बाद पाल वंश के शासकों को छोड़कर जो बौद्ध थे, अधिकांश ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में मनुस्मृति के दंड विधान को ही लागू किया था.

जाति आधारित भेदभाव पर बड़ी चोट मध्यकाल में संत कवियों द्वारा की गई. कबीर, रैदास, नानक जैसे कवियों ने सामाजिक असमानता एवं जातिगत भेदभाव पर खुलकर प्रहार किया था(रैदास बांभन मत पूजिए जो होवे गुन हीन । पूजिए चरन चंडाल के जो हो ज्ञान प्रवीन ।।संत रविदास). उसका प्रभाव भी पड़ा. लेकिन संत कवियों का ध्यान केवल सामाजिक असमानता तक सीमित था. वे जरूरत से ज्यादा भले थे. संतोष को परम धन मानते थे. उनकी न तो महत्त्वाकांक्षाएं थीं, न ही सपने. वे ‘रूखीसूखी खाकर ठंडा पानी पीने’ में जीवन की सिद्धि मानते और ‘चदरिया’ को ‘ज्यों की त्यों धर’ देने की कामना करते थे. कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो लौकिक सुख को लेकर स्वतंत्रता एवं समानता की कोई अवधारणा उनके दिमाग में थी ही नहीं. दैन्य उनके लिए आभूषण था. भूल गए थे कि मन के सुख से केवल दिलासा दी जाती है. पेट की भूख नहीं मिटाई जा सकती. इसलिए द्विज वर्गों को सामाजिक आंदोलन को भक्ति धारा में बदल देने में देर न लगी. शताब्दियों पश्चात जातीय भेदभाव और सामाजिक पराधीनता के विरुद्ध वास्तविक चेतना महामना ज्योतिबा फुले और डा. अंबेडकर के जीवनकर्म में दिखाई पड़ती है. फुले हिंदू धर्म की रूढ़ियों, अंधविश्वासों, जातीय असमानता और उत्पीड़न को बढ़ावा देने वाले कारकों से आजीवन जूझते रहे. यह जानते हुए कि अशिक्षा पुरोहितवाद के पनपने का मुख्य कारण हैं उन्होंने शिक्षा, विशेषकर स्त्रीशिक्षा पर जोर दिया. अंबेडकर जाति को हिंदू धर्म के लिए घातक मानते हुए उसका संपूर्ण उच्छेद चाहते थे. जब उन्हें लगा कि हिंदू धर्म की संरचना ही ऐसी है कि वह जाति से मुक्त होकर रह ही नहीं सकता तो उन्होंने हिंदू धर्म का त्याग करने का निश्चय किया था.

जातीय भेदभाव के उन्मूलन के संदर्भ में गांधी की भूमिका को भी रेखांकित किया जाता है. सही है कि छुआछूत उन्मूलन और तथाकथित हरिजनों के उद्धार के लिए गांधी के प्रयासों में कुछ ईमानदारी थी. दबाव में ही सही, वे जाति जैसी कुपृथा के विरोध में आ चुके थे. तो भी जातीय उन्मूलन के क्षेत्र में गांधी की भूमिका उदार परंपरावादी हिंदू जैसी थी, जो घिर जाने पर केवल उतने सुधार की सहमति देता है, जिससे ‘धर्म की हानि’ न हो. धर्म गांधी के लिए सबकुछ था. उससे मुक्ति की बात वे सोच भी नहीं सकते थे. उनका जातिसंबंधी चिंतन पीड़ित वर्गों के प्रति सहानुभूति और राजनीतिक मजबूरियों के तहत जन्मा था. जाति और वर्णव्यवस्था से उन्हें तभी तक शिकायत थी, जब तक वे सामाजिक भेदभाव तथा दुर्बल वर्गों के प्रति अत्याचार के जनक हैं. डा. अंबेडकर जाति का संपूर्ण विनाश चाहते थे. इसके पर्याप्त कारण थे. काफी पढ़लिख जाने तथा सफलता के शिखर तक पहुंचने के बावजूद जाति के कारण उन्हें जो अपमान झेलना पड़ता था, उसकी पीड़ा वर्णनातीत थी. वे महाराष्ट्र के वासी थे. पेशबाई दौर में ब्राह्मण पुरोहितों द्वारा जातीय उत्पीड़न के किस्से उनसे छिपे न थे. इसलिए सामाजिक स्वतंत्रता का मसला उनके लिए राजनीतिक आजादी से बड़ा था. राजनीति उनके लिए सामाजिक मानसम्मान और अपने अधिकारों को वापस पाने का साधन मात्र थी.

दरअसल वह एक दौर था जब समाज के सभी वर्गों में परिवर्तन की चाहत जगी थी. पश्चिम में फुले और डा. अंबेडकर तो दक्षिण में पेरियार मोर्चा संभाले हुए थे. फिर उत्तरी भारत उससे कैसे अछूता रहता! लेकिन उसका स्वरूप बदला हुआ था. उत्तर में जातिवादी चेतना ‘त्रिवेणी संघ’ के बैनर तले बिहार में देखने को मिली थी, जिसका गठन 1930 में तीन प्रमुख पिछड़ी जातियों, कुर्मी, कुशवाहा और यादवों ने मिलकर किया था. उन्हें लगता था कि कांग्रेस आंतरिक चुनावों में द्विज जातियों को बढ़ावा देकर उनके हितों पर कुठाराघात कर रही है. लेकिन उनमें और दक्षिण तथा महाराष्ट्र मे उभरे अस्मितावादी आंदोलनों में अंतर था. महाराष्ट्र और दक्षिण में उभरे अस्मितावादी आंदोलन दलित और अंत्यज्य जातियों की चेतना का परिणाम थे. उनके लिए सामाजिक समानता और स्वतंत्रता पहले थी. राजनीति को वे औजार की तरह इस्तेमाल कर रहे थे. पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार के अस्मितावादी आंदोलनों का प्रथम लक्ष्य राजनीतिक सत्ता प्राप्त करना था. उनमें से यादव खुद को कृष्ण का तथा कुर्मी राम का वंशज बनाते थे. ये जातियां किसान और मेहनतकश वर्गों से आती थीं; और आर्थिक स्तर पर करीबकरीब आत्मनिर्भर थीं. अपने जनबल पर उन्हें भरोसा था. इसलिए 1937 के प्रांतीय स्तर के चुनावों में कांग्रेस के सहयोग के बावजूद चुनाव हार जाने पर भी ‘त्रिवेणी संघ’ के नेताओं के हौसले बुलंद थे. उसके एक बड़े नेता की प्रतिक्रिया थीᅳ‘हमने वोट के मैदान में हार पाई है. लाठी के मैदान में नहीं.’

निचले वर्गों में उभर रही जातीय चेतना अपने समय के कदाचित सबसे दूरदृष्टा नेता गांधी से छिपी न थी. वे समझने लगे थे कि लोग यदि जाति के आधार पर इसी प्रकार लामबंद होने लगे तो आजादी के बाद देश को एक रखना कठिन हो जाएगा. चूंकि द्विज जातियों की संख्या, देश की कुल जनसंख्या का बामुश्किल 15 प्रतिशत थी, इसलिए बात बढ़ने पर द्विज जातियों के अल्पसंख्यक हो जाने का भी खतरा था. इसी आशंका ने गांधी को हरिजनोद्धार के लिए विशेष कार्यक्रम चलाने के लिए प्रेरित किया था. स्वतंत्र भारत में जिस व्यक्ति ने सही मायने में जातिउन्मूलन के लिए खुलकर आवाज उठाई, उसका नाम थाराममनोहर लोहिया. लोहिया का नारा ‘पिछड़े पावैं सौ में साठ’ खूब लोकप्रिय हुआ. उनपर जातिवादी होने का आरोप लगाया गया. उन लोगों की ओर से लगाया गया, जो जाति के नाम पर, पीढ़ीदरपीढ़ी मलाई मारते आए थे. उन्हें ‘कुजात गांधीवादी’ कहा गया. उन लोगों ने कहा जो गांधी के नाम पर मठाधीश बनते जा रहे थे. मगर प्रखर मेधावी लोहिया के तर्क इतने अकाट्य होते थे कि उनके विरोधियों द्वारा भी उनकी अपेक्षा संभव न थी. उस समय तक कांग्रेस के नेतृत्व में विप्र जातियां राजनीति पर पकड़ बना चुकी थीं. देश के अधिकांश संसाधन उनके अधिकार में थे. ऊपर से पूंजीपति घरानों का साथ. नतीजा यह हुआ कि लोहिया जैसे ईमानदार और प्रतिबद्ध नेता पीछे छूटते रहे. उन्हें और उनके समानधर्मा नेताओं की विद्वता को तो खूब सराहा गया, परंतु राजनीति में वे लगातार पिछड़ते रहे.

और वामपंथी? वे कहां थे? आजादी की लड़ाई में आम जनता की हिस्सेदारी एक सपने के साथ थी. सपना था न्याय और बराबरी का. जनाकांक्षाओं का दबाव और लोगों में स्वशासन की वांछा इतनी प्रबल थी कि गांधी जैसा व्यक्ति भी स्वयं को अराजकतावादी कह उठता था. वर्गहीन समाज का वामपंथी नारा कहीं न कहीं जातिवर्ग विहीन समरस समाज की संकल्पना से भी मेल खाता था. इसलिए आरंभ में वामपंथी राजनीतिज्ञों बुद्धिजीवियों को खूब सराहना मिली. विशेषकर बीसवीं शताब्दी के आरंभ से लेकर 1930 तक, वामपंथी विचारधारा किसी न किसी रूप में भारतीय राजनीति को, कुछ हद तक कांगे्रस से भी ज्यादाप्रभावित करती रही. इस देश को उसने लाला हरदयाल, करतार सिंह सराबा, मानवेंद्रनाथ राय, भगत सिंह जैसे प्रखर नेता और बुद्धिजीवी दिए. विवेकानंद और वीर सावरकर के आरंभिक विचारों पर भी वामपंथ की क्रांतिकारी चेतना का प्रभाव था. बावजूद इसके वामपंथी देश के पिछड़े और दलित मतदाताओं की व्यापक सहानुभूति कभी अर्जित न कर सके. क्योंकि जाति जो इस देश में असमानता और अन्याय का बड़ा कारण थी, जिसके आधार पर समाज बुरी तरह बंटा हुआ थावे उस ओर से चुप्पी साधे रहते थे. इसका कारण भी किसी से छिपा न था. भारत के अधिकांश वामपंथी नेता उन वर्गों से आए थे, जो जातिविशेष में जन्म लेने के कारण ही विशेषाधिकार संपन्न मान लिए जाते हैं. भारतीय परिदृश्य में वर्गहीन समाज की रचना जाति को चुनौती दिए बगैर संभव न थी. उच्च जातियों से निकले वामपंथी वर्गहीन समाज का नारा तो उछालते थे, परंतु जाति के सवाल पर प्रायः मौन साध जाते थे. हालांकि उनमें से कुछ अपने नाम के आगे जातिसूचक शब्द लगाना छोड़ चुके थे. मगर मानसिकता ज्यों की त्यों थी. जाति के नाम पर जो विशेषाधिकार उन्हें प्राप्त थे, उन्हें वे छोड़ना न चाहते थे. संभव है इसमें उनका परिवेश भी बाधक बनता हो. आमूल परिवर्तन हेतु काम करने की न तो उनकी वांछा थी, न ही योजना. इस कारण वामपंथ इस देश में आमतौर पर उत्तेजना की राजनीति का वाहक रहा. 1990 के बाद आर्थिक उदारीकरण ने रफ्तार पकड़ी तो अधिकांश वामपंथी, वैकल्पिक अर्थव्यवस्था की रूपरेखा प्रस्तुत करने के बजाए, केवल प्रतिक्रियावादी नजर आए. आर्थिक संकट का भय दिखाकर सरकार ने मजदूर संगठनों पर दबाव बनाना आरंभ कर दिया. वामपंथी उसका माकूल जवाब देने में असमर्थ रहे. नतीजा यह हुआ कि वामपंथियों के प्रति जनता की रहीसही सहानुभूति भी कम होने लगी.

वामपंथ का अर्थ यदि समाज के वंचित वर्गों के अधिकारों की लड़ाई लड़ना है तो भारतीय वामपंथ के सच्चे उत्तराधिकारी और कार्यकर्ता डा. अंबेडकर थे. लेकिन जिन वर्गों के अधिकारों की लड़ाई डा. अंबेडकर लड़ रहे थे, वे शताब्दियों से गरीबी और अशिक्षा के अंधकार में डूबे थे. वामपंथ की भारीभरकम शब्दावलि को समझने का बौद्धिक सामर्थ्य उन वर्गों में नहीं था. डा. अंबेडकर न उन वर्गों की समस्याओं को न केवल समझा, बल्कि उनसे उन्हीं की भाषा में संवाद करते हुए दलित चेतना हेतु कई जनांदोलनों का सफल नेतृत्व किया. उचित होता कि खुद को मार्क्सवादी या वामपंथी नेता कहने वाले नेता और बुद्धिजीवी भी भारतीय परिवेश के अनुसार वामपंथ का कायाकल्प करते. उससे स्थानीय मुद्दों को जोड़ते. उन पिछड़े और दलित वर्गों की आवाज बनते जो मार्क्स के शब्दों में सही मायने में ‘सर्वहारा’ थे. रूस, चीन, जर्मनी, इटली आदि जिन देशों में भी मार्क्सवाद या मार्क्सवादी वामपंथ ने सफलता प्राप्त की, उसमें स्थानीय नेताओं की प्रतिभा और संघर्ष का भारी योगदान था. उन्होंने मार्क्सवाद की व्याख्या अपने देश तथा जमीनी हकीकत के अनुसार की थी और वर्ग संघर्ष के सिद्धांत को जहां, जितना आवश्यक समझा उतना बदला भी था. किंतु भारत में वामपंथियों के जातीय संस्कार आमूल परिवर्तन की राह अवरुद्ध करते रहे. वे भारतीय ‘सर्वहारा’ जिसकी निगाहों में वर्गहीन समाज की रचना का सपना रैदास के समय से ही जुड़ चुका था, के मानस को पढ़ने में असफल रहे.

वर्णव्यवस्था में निचले स्तर पर मानी गई जातियों को भरोसा था कि स्वतंत्र भारत में उन्हें एक समानताआधारित समाज में रहने का अवसर मिलेगा. डा. अंबेडकर के मार्गदर्शन में जो संविधान बना, उसमें इसके प्रावधान भी किए गए थे. कोई उपेक्षित महसूस न करे, स्वतंत्र भारत की सरकार को सभी अपना मानें, इसीलिए यहां लोकतंत्र को अपनाया गया. निश्चय ही लोकतंत्र की भावना के अनुसार संविधान का निर्माण महत्त्वपूर्ण बात थी. परंतु असली चुनौती थी, समाज और शासन को संविधान की भावना के अनुरूप ढालना. यह चुनौती आज भी कायम है. भारत का अभिजन अंग्रेजी शासन में भी लाभ की अवस्था में था और मुगलकाल में भी. शासक चाहे देशी हो या विदेशी, जाति के आधार पर प्राप्त विशेषाधिकार बने रहें तो उसे किसी से शिकायत न होती थी. इस कारण भारत पर राज करना, विदेशी आक्रामकों के लिए कभी मुश्किल नहीं रहा. ऐेसे ही स्वार्थी लोगों के भरोसे मुगल कामयाब हुए थे. उन्हीं के भरोसे साठसत्तर हजार अंग्रेज चालीस करोड़ भारतीयों को दो सौ वर्षों तक गुलाम बनाने में कामयाब हुए थे. ऐसे लोग आजादी से पहले से ही सत्ता सुख भोगते आए थे. जोड़तोड़ की राजनीति के सहारे आज भी वही वर्ग सत्ता में है. जबकि आजादी ऐसे लोगों के संकल्पों की देन न होकर देश की बहुसंख्यक जनता के सपनों और संघर्षों का सुफल थी, जिसने उस संग्राम में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया था. जाहिर है, आजादी के साथ जुड़े जनसाधारण के सपनों और उम्मीदों को उपेक्षित किया गया है. लोकतंत्र के फलनेफूलने के लिए जो निष्ठा और परिवेश चाहिए, समाज को उसके अनुरूप ढालने, लोगों के सोच को लोकतांत्रिक बनाने के प्रति उदासीनता बरती गई. ऐसे में जाति भला कैसे जाती!

सवाल है कि क्या किया जाए? क्या जाति ऐसी फांस है जो हमेशाहमेशा भारतीय समाज के गले में अटकी रहेगी? यदि यह व्याधि है तो क्या इसका सही उपचार संभव है? जाति के नाम पर जो उल्टा चक्र चल चुका है, उसे देखकर तो बड़े से बड़ा आशावादी भी नहीं कह सकता कि जाति निकट भविष्य में जाने वाली है. तस्वीर सामने है. शताब्दियों से जिन लोगों ने जाति के आधार पर भेदभाव, उत्पीड़न और अत्याचार सहा है, कोई और विकल्प न देख वे भी जाति को ही अपने संगठन का आधार बनाए हुए हैं. वे भी क्या करें! पीढ़ीदरपीढ़ी जाति के गुलाम रहने के कारण उनकी मानस रचना ही ऐसी हो चुकी है कि स्वजातीय संगठनों और नेताओं के अलावा उन्हें दूसरा कोई उद्धारक नजर नहीं आता. उन पर जातिवादी होने का आरोप वे लगा रहे हैं जो पीढ़ीदरपीढ़ी जाति के आधार पर मलाई मारते आए हैं. जाति को मिटाना कोई नहीं चाहता. न वे जो उसके आधार पर शोषण का शिकार रहे हैं. न ही वे लोग जिन्हें जाति के कारण समाज ने सिरमाथे बिठाकर रखा है. जातीय शोषण का शिकार रहे वर्गों को लगता है कि जाति की सहायता से वे ‘अपने’ लोगों से जुड़ सकते हैं. उधर सवर्ण सोचते हैं कि जाति रही तो उतारचढ़ावों के बावजूद समाज में उनकी विशिष्ट पहचान भी रहेगी.

धर्म जाति का सुरक्षाकवच बनकर रहा है. इसलिए जो लोग किन्हीं दबावों के कारण जाति के समर्थन में खुलकर नहीं बोल पाते, वे उसे बचाने के लिए धर्म की मदद लेने लगते हैं. जानते हैं कि धर्म रहा तो जातिवाद के विरुद्ध लंबी लड़ाई और प्रभावी लड़ाई असंभव होगी. यदि धर्म जीता तो जाति भी बनी रहेगी. लोग कुछ दिन भले ही छटपटा लें, धर्म से ज्यादा दूर नहीं जा सकते. इसलिए वे बारबार दोहराते हैं कि धर्म उनके साथ है. नेता लोग संविधान की कसम खाते हैं, जिसमें वर्गविहीन समाज की स्थापना पर जोर दिया गया है. मगर चाहते यही हैं कि जाति बनी रहे. ताकि उसके नाम से लोगों को आसानी से फुसलाया जा सके. उन्हें लोकतंत्र से ज्यादा भरोसा जाति पर है. जाति न न रही तो धर्म, क्षेत्रीयता के अलावा बाकी जो भी मुद्दे लेंगे वे वास्तविक होंगे. उनमें अगर असफल हुए तो जनता उनसे सवाल करेगी….करती ही जाएगी. इसलिए वे धर्म और जाति को जो लोगों की प्रश्नाकुलता को मारने के बेजोड़ नुस्खे हैंबीच में ले आते हैं. पूंजीपतियों के लिए उनका धर्मईमान, जातिगौत्र सब कुछ पैसा है. उसके लिए समाज को एकात्म होते वे भी नहीं देखना चाहते. सोचते हैं कि जाति रही तो समाज बंटा रहेगा. समाज बंटा रहा तो वह कमजोर भी रहेगा. कमजोर रहा तो पूंजीवादी शोषण की ओर लोगों का कम ध्यान जाएगा. उसने आदर्श उपभोक्ता बनाने में आसानी रहेगी. ऐसा व्यक्ति जबजब बाजार से निराश लौटेगा, महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी जैसे मुद्दों के लिए सरकार को कोसेगा और संकट में पड़ी सरकार से मनचाहे फैसले कराए जा सकेंगे.

फिर जाति से मुक्ति का रास्ता? पुरानी बीमारी किसी एक उपचार से नहीं जाती. उसे बाहरी इलाज और आंतरिक अनुशासन दोनों की जरूरत पड़ती है. वह तभी संभव है जब पूरा परिवार साथ दे. यही बात समाज के साथ भी है. बंटा हुआ समाज स्वयं एक बीमारी है. इसलिए जाति, वर्ग, पूंजी, धर्म और संस्कृति समाज को बांटने वाले जितने भी कारक सब को मनुष्यता की कसौटी पर कसा जाना चाहिए. और जो भी मनुष्यों को आपस में भेद करना सिखाता है, उसका अविलंब बहिष्कार किया जाना चाहिए. लोकतंत्र में संख्याबल महत्त्व रखता है. सत्ता हाथ में न हो तब भी संख्याबल के आधार पर काम कराए जा सकते हैं. जाति का मूल स्वरूप सामंतवादी होता है. उसकी एकमात्र काट सच्चे लोकतंत्र में है. ऐसे लोकतंत्र में है जिसमें सरकार की भूमिका केवल प्रतीकात्मक हो. इसलिए जाति से मुक्ति का एकमात्र रास्ता यही है कि आभासी लोकतंत्र को वास्तविक लोकतंत्र में बदला जाए. छोटेछोटे जातिसमूहों का उनके हितों के आधार पर एकीकरण करते हुए बड़े समूहों में बदला जाए. नागरीकरण के जरिये इस तरह जोड़ा जाए कि लोग निजी के बजाय सामूहिक पहचान को वरीयता देने लगें. यहां निजी पहचान से ध्यान हटाने का अभिप्राय अपने व्यक्तित्व को विलीन कर देना नहीं है. उससे तो समाजीकरण का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है. लोकतंत्र जनताकरण की सतत प्रक्रिया है. उसमें लोग छोटेछोटे हितों के साथ घुलमिलकर बड़े हितों की पहचान करते हैं. फिर उन्हें सीधे अथवा अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से पाने के लिए संकल्पबद्ध होते हैं. बाहरी पहचान जिससे उनके व्यक्तित्व, उत्पादकता या बुद्धिविवेक का सीधा संबंध न हो, को बिसरा देते हैं. फलस्वरूप नागरिकों की पहचान उसकी योग्यता, ज्ञानानुभव, कार्यक्षमता और मनुष्यता के प्रति समर्पण भाव से होने लगती है. ऐसे ही लोग लोकतंत्र में अपने सच्चे प्रतिनिधि चुनने में सफल हो सकते हैं. उस समय वे जो प्रतिनिधि चुनते हैं, वे केवल प्रतिनिधित्व करते हैं, शासक बनने का साहस नहीं कर पाते. तो जातिउन्मूलन का सही रास्ता समाज के लोकतांत्रिकरण में है. जातिआधारित संगठन संख्याबल का महत्त्व समझाने के लिए तो उपयोगी हो सकते हैं, मुक्त समाज की स्थापना और किसी बड़े लक्ष्य की प्राप्ति उनके द्वारा असंभव है.

© ओमप्रकाश कश्यप

विचारहीन राजनीति और परिवर्तन का स्वप्न

सामान्य

हम ऐसे दौर में हैं जब राजनीति को परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम मान लिया गया है. सदियों से दमितशोषित रहे वर्ग अपनी पहचान पाने को आकुल हैं, लोकतांत्रिक निजाम में सब अपने लिए सुरक्षित स्थान चाहते हैं. इसके लिए वे राजनीति को परिवर्तनकारी ‘टूल’ की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन उसका उपयोग कैसे किया जाए? जिन सपनों को राजनीति के माध्यम से साकार करना है, उन्हें लोकस्वीकृति कैसे दिलाई जाए? इस बारे में किसी के पास कोई स्पष्ट दिशा नहीं है. जहां दृष्टि है, वहां प्रतिबद्धता का अभाव है. नतीजा, नए वर्गों के प्रवेश तथा आशाओं, अपेक्षाओं के बावजूद राजनीति का चेहरा ज्यों का त्यों है. आरक्षण, भ्रष्टाचार, जातिवाद, क्षेत्रीयता जैसे वही पुराने घिसेपिटे मुद्दे हैं. पिछले कुछ दशकों से देश की राजनीति इन्हीं के इर्दगिर्द चकराती रहती है. ये इतने लोकलुभावन और सदाबहार हैं कि कोई दल इन्हें छोड़ना नहीं चाहता. यह मान लिया गया है कि वैचारिक राजनीति के दिन लद चुके हैं. ‘समाजवाद’, ‘साम्यवाद’, ‘गांधीवाद’ आदि को लेकर जो बहसें बीसवीं शताब्दी में सुर्खियां बना करती थींउनसे किनारा कर लिया गया है. तात्कालिकता में विश्वास ऐसा बढ़ा है कि दीर्घकालिक हित के अलोकप्रिय मुद्दों को कोई छूना तक नहीं चाहता. लोकप्रियता की राजनीति, अपनी पूरी चमकदमक, टोनोंटोटकों के साथ लगातार हमें भरमाए रखती है. संविधान पर दिए गए अपने भाषण में डॉ. अंबेडकर ने जिस सामाजिक लोकतंत्र की कामना की थी, उसे पूरी तरह भुला दिया गया है. प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में, देश की राजनीति पर आरएसएस जैसे उन जड़संस्कृतिवादी संगठनों का दबदबा है, जो तर्क के बजाय आस्था से काम लेने का प्रचार करते हैं, संस्कृति की आड़ में संप्रदाय और वर्गविरोध की राजनीति करना जिनकी फितरत है. हालांकि बहुसंख्यक वर्ग ऐसे संगठनों को पसंद नहीं करता, लेकिन वे मीडिया और दूसरे माध्यम से विभेदकारी राजनीति को गरमाए रहते हैं. धर्मसत्ता, अर्थसत्ता और राजसत्ता की तिकड़ी के समर्थन से वे प्रायः कामयाब भी होते हैं.

धर्म केंद्रित संस्कृति के अलावा जातिवाद भारतीय समाज एवं राजनीति की बड़ी विकृति है. हिंदू धर्म जातिवाद को पोषता है. जाति समाज के छोटे से हिस्से के लिए विशेषाधिकारों का गुलदस्ता है, वहीं बहुसंख्यक वर्ग के लिए अपने विवेक, पसंदों, इच्छाओं, सपनों और तर्कशक्ति को दूसरों के हाथों में सौंपकर खुद धर्म और संस्कृति की कारा को घर समझ लेने वाली स्थिति है. उसमें हालात से अनुकूलित लोग चमत्कारों की आस में जीते हैं, जबकि उन्हीं की खूनपसीने की कमाई के सहारे शिखर पर विद्यमान अभिजन शेष जनसमाज को अपने चंगुल में फंसाए रखने के लिए निरंतर बरगलाते रहते हैं. परिवर्तन की वांछाओं के दमन के लिए वे धर्म और संस्कृति को आगे कर देते हैं. जो जाति सहित अन्यान्य विभेदकारी व्यवस्थाओं का सुरक्षाकवच है. राजनीति की अपेक्षा धर्म और संस्कृति की परिवर्तनदर बहुत धीमी, आनुपातिक रूप से नगण्य होती है. अतएव राजनीति के सहारे परिवर्तन का सपना देखने वाले लोग, धर्म को अपना हथियार बनाते हैं. धर्म और सामंतवाद में कोई खास अंतर नहीं है. दोनों के अधिकांश लक्षण एकदूसरे से मिलतेजुलते हैं. दोनों ही वर्चस्ववाद को प्रश्रय देते तथा मौलिकता से घबराते हैं. अंतर केवल इतना है कि धर्म पहले दिमाग पर कब्जा करता है, फिर शरीर पर कब्जे को आसान बनाता है, जबकि सामंतवाद का प्रथम प्रहार मनुष्य के शरीर पर होता है और वहां से दिलोदिमाग को जकड़ता चला जाता है. इसलिए जो लोग धर्म को बीच में लाकर अथवा उसके सहारे से राजनीति करना चाहते हैं, वे प्रकारांतर में दैवी सत्ता के नाम पर सामंती प्रतीकों को ही थोप रहे होते हैं. ऐसे लोग या तो मूर्खता की हद तक भोले और नेतृत्व के गुणों से शून्य हो सकते हैं; अथवा अत्यंत स्वार्थी. इसलिए उनकी राजनीति भी स्वार्थपरक होती है. इसी कारण परिवर्तनकामी लोग धर्म और धार्मिक विश्वासों को राजनीति से दूर रखते हैं. उन्हें निजी विश्वासों की सीमारेखा से भीतर नहीं आने देते.

भारत जैसे देशों में जहां धर्म जीवनसंस्कृति में गहरे तक रचाबसा हो तथा मानवीय विवेक जातिपाश से बाहर आने के बजाय उसी को अपनी नियति मान बैठा हो, वहां वास्तविक परिवर्तन लंबे समय तक महज सपना बना रहता है. भारत में जाति ऐसी सचाई है जो समाज के हर पढ़ेलिखे और अनपढ़ की समझ में तुरंत और एकसमान आती है. जाति का इतिहास जितना पुराना है, लगभग उतना ही लंबा इतिहास इससे मुक्ति की छटपटाहट का भी है. बावजूद इसके यह हर समय, हर समाज में किसी न किसी न किसी रूप में विद्यमान रही है. हाल में तो यह मान लिया गया है कि जाति से एकाएक मुक्ति असंभव है. बुद्धिजीवियों का एक वर्ग तो जाति को भारतीय समाज की कड़वी हकीकत के रूप में स्वीकार कर चुका है. इसलिए वह जाति से मुक्ति के बजाय उसकी मदद से मुक्ति का सपना देखता है. जिसे समाज की विकृति माना जाता है, उसी के सहारे शताब्दियों से वंचना और उत्पीड़न का शिकार रहे वर्गों को एकजुट करने की कवायद की जा रही है. जाति के नाम पर सामाजिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने वाला दूसरा वर्ग राजनीतिज्ञों का है. उनके लिए जनसाधारण की कीमत एक अदद वोट तक सीमित होती है. उस ‘वोट’ को अपने पक्ष में करने के लिए वे तरहतरह के उपक्रम करते रहते हैं, जिनमें जाति भी एक है. धर्म और जाति के नाम पर मतदाताओं ध्रुवीकरण करना भारतीय राजनीतिज्ञों का सबसे पसंदीदा चलन है. आजादी से पहले और कुछ दशक बाद तक जातिविहीन समाज की स्थापना के लिए जो आंदोलन चले थे, समरस और वर्गहीन समाज की स्थापना का जो लक्ष्य रखा गया थाउनका अब कोई जिक्र तक नहीं करता. इसका परिणाम यह हुआ है कि आजादी के संघर्ष के दौरान प्रभाव खोने वाली जातिव्यवस्था इन दिनों पुनः अपनी केंद्रीय भूमिका है. सवाल है कि जाति को औजार बनाने का समाज को क्या लाभ पहुंचा है? क्या इससे समाज में दलित और शोषित वर्ग के मानसम्मान और सुखसमृद्धि में बढ़ोत्तरी हुई है. और यदि सुखसमृद्धि में सचमुच कुछ वृद्धि हुई तो क्या वह जाति को अस्मिता संघर्ष का औजार बनाए बिना असंभव थी?

यह ठीक है कि पिछली कुछ शताब्दियों में समाज के दलितशोषित वर्गों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में सुधार आया है. यह सुधार इतना बड़ा है जिसकी आज से सौ वर्ष पहले इसकी कल्पना तक असंभव थी. इसके साथसाथ जाति को टूल बनाकर पोषने के दुष्परिणाम भी कम सामने नहीं आए हैं. इससे जातियों के बीच ही असमानताओं के छोटेबड़े ऐसे अनेकानेक टापू बनने लगे हैं, जो समाज में दूसरे कारण से व्याप्त असमानताओं से किसी भी भांति कम नहीं हैं. हालांकि उपजातियों की संख्या घटी है. लेकिन ऐसा किसी सामाजिक सुधारभावना के चलते संभव नहीं हुआ है. बल्कि लोकतंत्र की मजबूरियों के चलते छोटेछोटे जातिसमूह परस्पर एकजुट होने लगे हैं. जो जातियां ऐसा करने में सफल हुईं, उन्हें विकास के अपेक्षाकृत अधिक अवसर भी मिले हैं. मगर जिस समाजार्थिक समानता के ध्येय से परिवर्तनकामी बुद्धिजीवियों ने जाति को एक औजार की भांति स्वीकार करना आरंभ किया था, वह भीतर ही भीतर दूसरे घाव करने लगा है. उससे अविश्वास और वर्गभेद की अलंघ्य दीवारें खड़ी होने लगी हैं.

जाति स्वयं में नकारात्मक व्यवस्था है. मनुष्य की योग्यता और रुचियों का ध्यान रखे बिना यह उसके चयन के अधिकार को बाधित करती है. यह श्रम के विभिन्न रूपों में न केवल भेद करती है, बल्कि उन्हीं के आधार पर समाज में अलंघ्य दूरियां पैदा कर देती है. इसके चलते शिखरस्थ वर्ग के प्रतिनिधियों के उत्तराधिकारी बिना किसी योग्यता के शिखर पर बने रहते हैं. जबकि निम्नस्थ वर्ग के प्रतिभाशाली प्रतिनिधियों को भी को अपनी योग्यता के सदुपयोग से वंचित कर दिया जाता है. इससे न केवल उस व्यक्ति बल्कि समाज की भी हानि होती है. वह मुट्ठीभर लोगों को जन्म के साथ ही शासकीय गुणों से संपन्न मानकर शेष जनता को शासित घोषित कर देती है. कुल मिलाकर देखा यही गया है कि लोकतंत्र में जाति लोगों को संगठित करने का औजार तो बन सकती है. बनती भी है, किंतु न्याय, समानता और समरस विकास जैसे जीवनमूल्य उसके सहारे संभव नहीं हैं. जाति सामाजिक अंतर्द्वंद्वों का बड़ा कारण है. जातीय अस्मिताओं का कड़ा संघर्ष विभिन्न जातिसमूहों को अनावश्यक स्पर्धा की ओर ले जाता है. इससे कथित जातीय पायदान के निचले स्तर पर मौजूद जातियों को, संख्या में अधिक होने के बावजूद परिवर्तनकारी शक्ति में ढालना कठिन हो जाता है.

लोकतंत्र में संख्याबल बहुत मायने रखता है. अतः उसके आधार पर खुद को निर्णायक शक्ति के रूप में ढालने में असमर्थ जातियां, ऐसे जातिसमूहों से गठजोड़ कर लेती हैं, जिनकी आर्थिकराजनीतिक ताकत अपेक्षाकृत अधिक है. हड़बड़ाहट में वे ऐसे दलों के समर्थन में उतर आती हैं, जिनपर सवर्णों का वर्चस्व है तथा जिनका न्याय, समानता, वर्गहीन समाज, विकास में साझेदारी जैसे मूल्यों पर कोई विश्वास नहीं है. जो जाति जैसी क्रूरतम और विभेदकारी संस्था को बनाने तथा उसे निरंतर पालनेपोसने के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार हैं. इससे उनकी समस्त जातीय चेतना निर्णायक शक्ति बनने के बजाय वर्चस्ववादी शक्तियों की पिछलग्गू बनकर रह जाती है. संवैधानिक व्यवस्था, सामाजिक आंदोलन के प्रभाव अथवा अन्यान्य परिस्थितियों के चलते भी, गैर सवर्ण नेता प्रायः संसद और विधायिकाओं में प्रवेश करते रहते हैं. किंतु अपने संस्कार, आत्मविश्वास की कमी, विशिष्ट मतदाता वर्ग की संसाधनों के लिए वर्चस्वकारी वर्गों पर निर्भरता तथा दलीय राजनीति के चलते वे विधायिकाओं में सार्थक भूमिका निभाने में असमर्थ रहते हैं. लोकतंत्र में संख्याबल का महत्त्व होता है, किंतु सदैव वही निर्णायक हो, यह आवश्यक नहीं है. बहुमत की आवश्यकता संसद में भी पड़ती है, जहां लोग दलीय आधार पर बंटे हो सकते हैं. कुल मिलाकर राजनीति में गैर सवर्णों के लिए सम्मानजनक अवसरों की कमी पहले भी थी. इन दिनों भी वे हाशिये पर हैं. वे राष्ट्रवाद को स्वतंत्रता, समानता और सामंजस्य जैसे आधुनिक जीवनमूल्यों पर खतरे के रूप में देखते हैं. जबकि यथास्थितिवादी परिवर्तन की वांछाओं को कुचलने के लिए सामदामदंडभेद यानी हर तरह के उपाय आजमा रहे हैं. सांस्कृतिकरण के बहाने वे भारत की पुरानी वर्णाश्रमी व्यवस्था को नए रूप में लौटाना चाहते हैं. इसके लिए हिंसा भी उनके लिए वज्र्य नहीं है. पिछले कुछ वर्षों में जातीय झगड़ों में जिस तेजी से इजाफा हुआ है और गैर सवर्णों पर हमले बढ़े हैं, उससे मामले की गंभीरता को समझा जा सकता है.

जाति विचारहीन राजनीति को बढ़ावा देने वाले कारकों में प्रमुख है. वह विकास पर प्रतिकूल असर डालती है. थोपी गई जाति के प्रति मनुष्य का समर्पण दूसरी थोपी गई चीजों के प्रति अनुकूलन पैदा करता है. जैसे पिछले कुछ दशकों में तमाम कड़वे अनुभवों के बावजूद यह धारणा बन चुकी है कि विदेशी पूंजी होगी, तब विकास होगा. इसके चलते अंदरूनी संसाधनों के सदुपयोग से किनारा कर लिया गया है. जबकि सभी जानते हैं कि विदेशी पूंजी अतिरिक्त लाभ की सुनिश्चितता के बगैर न तो आती है, न ही उसके अभाव में ठहरती है. इस संबंध में पूंजीपति और चूहों में अधिक अंतर नहीं होता. बाढ़ के समय जैसे चूहे घर छोड़ने वालों में अग्रणी होते हैं, वैसे ही लाभ के अवसर कम होते देख विदेशी पूंजी भी पलायन करने लगती है. इसके बावजूद 2014 का चुनाव ऐसे व्यक्ति के नेतृत्व में लड़ा गया, जो विकास को विदेशी पूंजी की अनिवार्यता से जोड़ता है. सरकार बनने के पहले बीस महीनों में करीब तीस देशों की यात्राएं, उनके इसी विश्वास की पुष्टि करती हैं. चुनावों में मतदाताओं के बीच भाजपा समर्थक मीडिया और पूंजीपतियों ने विकास का ऐसा रुपहला सपना पेश किया था कि लोग गच्चा खा गए. विकास के अलावा उन चुनावों में जो दूसरा महत्त्वपूर्ण कारक थी, वह थी जाति. भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने खुद को बारबार पिछड़े वर्ग का बताकर अतिपिछड़ी जातियों के बीच ऐसी जगह बनाई कि वे वर्ग जो कांग्रेस से उम्मीदें खोकर बसपा और सपा के बीच गैंद की तरह ठोकर खाते रहते थे, एकमुश्त भाजपा के खाते में चले गए. भूल गए कि भाजपा की नीतियां संघ के कार्यालय में बनती हैं, जिसका ‘सामाजिक न्याय’ की वैचारिकी में कतई विश्वास नहीं है. वर्णाश्रम व्यवस्था आज भी उसके लिए आदर्श है.

भारतीय जनसमाज में परिवर्तन की चाहत को शिखरस्थ वर्ग अपने अस्तित्व पर संकट के रूप में देखते हैं. 2014 में सत्ता परिवर्तन के बाद उनके हौसले बुलंद हुए हैं. केंद्र में अपनी सरकार है, ऐसा मानकर वे आक्रामक मुद्रा अपनाए हुए हैं. सामाजिक यथास्थिति बनाए रखने तथा परिवर्तन की इच्छाओं के दमन के लिए संस्कृति और राजनीति दोनों स्तर पर प्रयत्न किए जा रहे हैं. उनकी आक्रामकता देख परिवर्तन की चाहत रखने वाले वर्गों में यह विश्वास आम हो चला है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नारा समानता, स्वतंत्रता तथा समरसता जैसे आधुनिक जीवनमूल्यों के परिवर्तनकारी उष्मा के क्षरण हेतु उछाला गया है. उसके पीछे वे लोग हैं जो वर्णव्यवस्था का लाभ उठाकर शताब्दियों से सत्तासुख भोगते आए हैं; और निहित स्वार्थ के लिए उसे बनाए रखना चाहते हैं. इसलिए भाजपा और उसके सहयोगी दल जब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का राग अलापना आरंभ करते हैं, तो उन वर्गों के जो राजनीति को परिवर्तनकारी औजार के रूप में इस्तेमाल करने के पक्ष में हैंकान खड़े हो जाते हैं.

जातिव्यवस्था के प्रति यथास्थितिवादी दृष्टिकोण तथा विकास को लेकर दिशाहीनता केवल भाजपाई राजनीति का लक्षण नहीं है. परिवर्तन का संकल्प लेकर उतरने वाले सभी दलों की कमोबेश यही हालत है. 130 वर्ष पुरानी कांग्रेस स्वयं को देश के स्वाधीनता संग्राम से जोड़ती है. उस समय वह भूल जाती है कि स्वतंत्रता मिलने के साथ ही गांधी ने कांग्रेस को भंग करने की सिफारिश की थी. तब जवाहरलाल नेहरू सहित बाकी कांग्रेसी नेता, जो स्वतंत्रता संग्राम में दिए गए योगदान का मानदेय सत्ता की सीढि़यां चढ़कर प्राप्त करना चाहते थे, उसके लिए तैयार नहीं थे. आरंभ में कांग्रेस स्वयं देश के अभिजनों की पार्टी थी. उसमें बदलाव गांधीजी के नेतृत्व के दौरान आया. स्वयं गांधीजी वर्णाश्रम धर्म को श्रेष्ठ मानते थे. उनकी ओर से ‘प्रथम सत्याग्रही’ के गौरव से नवाजे गए विनोबा आम मताधिकार के सख्त विरोधी थे. नेहरू और उनके खानसामा दोनों का एक ही वोट हो, यह सुनकर उन्हें बड़ा अजीब लगता था. कांग्रेस के अधिकांश नेता भी तथाकथित ऊंची जातियों से आए थे, जो गैर सवर्णों के शोषणउत्पीड़न का शिकार थे. आगे भी कांग्रेस का चरित्र छदम् सेकुलरवादी और छद्म समानतावादी बना रहा.

राजनीति की सफलता लोकहित में किए गए प्रयासों से आंकी जाती है. इस बात से आंकी जाती है कि न्याय को सामाजिक लक्ष्य बनाने के लिए उसने कितने कारगर प्रयास किए हैं. इस आधार पर शासन के लक्ष्यों दो वर्गों में बांटा जा सकता है. लघु आयामी, तथा दीर्घ आयामी. लघु आयामी लक्ष्य आमजन की दैनंदिन की समस्याओं, शांतिव्यस्वस्था और अनुशासन से जुड़ा होता है. यह सुनिश्चित करने से होता है कि लोककल्याण के लिए बनाई गई योजनाओं का कार्यावन नियमानुसार हो रहा है अथवा नहीं. इसके लिए सरकार कुछ नागरिक संस्थाओं का गठन करती है; और स्वयं मुख्य कार्यकारी संस्था की भूमिका निभाती है. उसका दायित्व लोगों की रोजमर्रा की सुविधाओं का ध्यान रखा जाता है. दीर्घायामी योजनाओं का निर्माण और कार्यान्वन इस बात पर निर्भर करता है, कि हम कैसा समाज चाहते हैं? उसके लिए संसाधनों की उपलब्धता, नागरिकों की अपेक्षा, बाहरी दबावों आदि को ध्यान में रखकर योजनाएं बनाई जाती हैं. देश और समाज के दूरगामी हितों को देखते हुए विकास के लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं. लोकप्रिय राजनीति आज, अभी और स्थानीयता के बूते पनपती है. उनमें दीर्घायामी योजनाएं बनाने तथा उनका सफल संचालन हेतु आवश्यक धैर्य का अभाव होता है. जबकि लोकतंत्र में नागरिकों की अपेक्षाओं पर खरा उतरना सरकार की जिम्मेदारी होती है. इसे हम उनका कर्तव्य भी मान सकते हैं.

भारतीय राजनीति की विडंबना है कि यहां नेतागण लोकप्रिय राजनीति की सीढि़यां चढ़कर शिखर तक पहुंचते हैं. लोग उनसे उम्मीद करते हैं. शायद सबसे ज्यादा उम्मीद करते हैं. बावजूद इसके राजनेताओं के बारे में आम राय अच्छी नहीं है. साफ है कि लोग नेताओं को इसलिए चुनते हैं क्योंकि उनके पास दूसरा कोई विकल्प नहीं होता. जनता की इस मजबूरी का लाभ नेतागण अपनी तरह से उठाते हैं. वे सपना देखते हैं कि जनता उनकी अंधसमर्थक बनी रहे. लोग उन्हें हमेशा अपने कंधों पर उठाए रखें. हालात उन दिनों की याद दिलाते हैं, जब राजशाही के दौर में कोई महत्त्वाकांक्षी सरदार या सामंत अपने नेतृत्व में सेना जुटाकर एकाध किला फतह कर लेता था. चूंकि उसके पास नया करने को कुछ नहीं होता था, इसलिए अपने आका की नएपन की चाहत को पूरा करने के लिए उसके चारणवृंद प्रशस्तिगायन के ऐसे आयोजन रचते रहते थे, जिनका जनता के विकास से कोई संबंध नहीं होता था. गणतंत्र में नीतियां लोगों के सपनों और जरूरतों के आधार पर बदलती हैं. लेकिन यहां बदलाव की कोई गुंजाइश नजर नहीं आती. चारों ओर विचारहीनता का आलम है. बस किसी तरह सत्ता प्राप्त कर लेना चाहते हैं. चूंकि परिवर्तनकारी सत्ता का स्वरूप कैसा हो, इसका खाका किसी के भी पास नहीं है, इसलिए वंचित समूह के प्रतिनिधि सत्ता में आते ही इसकी चकाचौंध में खो जाते हैं. उस समय उन्हें वह लक्ष्य बिलकुल याद नहीं रहता, जिसका वायदा कर वे सत्ता में आए हैं.

राजनीति के शिखर पर भले ही कुछ लोगों का अधिकार हो. पीढ़ीदरपीढ़ी सत्ता भोगने के बाद अब वे इसके अभ्यस्त हो चुके हों, फिर भी यह मान लिया गया है कि राजनीति अब इलीट कर्म नहीं रही. कम से कम वैसी तो नहीं जैसी पहले थी. यदि पिछले बीसतीस वर्षों के इतिहास की पड़ताल ही कर ली जाए तो इस दौरान उन क्षेत्रों के लोगों ने राजनीति में अपनी जगह पुख्ता की है, जो पहले इससे बहिष्कृत थे. हां, सक्रिय राजनीति में आने के बाद उनका तेज अवश्य घटा है. राजनीति का अतिरेक भी दिखाई पड़ता है. पहले जो काम सामाजिक संगठनों की मदद से हो जाते थे, अब उनके लिए भी राजनीति करनी पड़ती है. इसलिए गलीमुहल्लों में छुटभइये नेताओं की पूछ बनी रहती है. अवसर का लाभ उठाते हुए सामाजिक संगठन भी राजनीति से संपर्क बढ़ा रहे हैं. राजनीतिकरण का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा है, उन दमितशोषितों पर जो सदियों से उत्पीड़न और उपेक्षा का शिकार थे. लोकतांत्रिक अवसरों का लाभ उठाकर अब वे सत्ता के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं. वे सत्ता में हिस्सेदारी चाहते हैं.

आधुनिक राजनीति मोटे तौर पर दो लोकप्रिय मुहावरों के आसपास घूमती है. विकास और भ्रष्टाचार. बाजार का जादू लोगों के सिर पर इतना चढ़कर बोल रहा है कि लोग दन से विकास की मंजिलें पार कर लेना चाहते हैं. विकास का स्वरूप कैसा हो, उसके लिए संसाधन कैसे जुटाए जाएंगे, यह कोई विचार नहीं करता. विकास हो, चाहे उधार से, या बाहर की पूंजी से. ‘जब तक जियो, सुख से जियो. कर्ज लेकर भी घी पियो.’जैसी भौतिकवादी विचारधारा के लिए चार्वाक पंथियों की खिल्ली उड़ाई जाती है. हालांकि संभावना इसी बात की है कि यह उक्ति चार्वाकपंथियों की आलोचना में, उनपर कटाक्ष करने की नीयत से गढ़ी गई हो. जो हो संस्कृति और सभ्यता के बीच चौड़ी खाई के चलते यह भुला दिया गया है कि विकास के मायने क्या हैं? इस बारे में कोई स्पष्ट सोच लोगों के पास नहीं है. यदि पिछले दोतीन दशकों के बारे में सोचा जाए तो लोगों के पास संसाधनों की रेलपेल हुई है. टेलीविजन, मोबाइल, इंटरनेट ने दुनिया को एक कर दिया है. इनकी पहुंच से देश का कोई कोना, कोई घर नहीं बचा है. ध्यान करें, इन्हें विकास के प्रतीक के तौर पर ही परोसा गया था. जिन दिनों संचार क्रांति का गुब्बारा फूलने लगा था, उन दिनों उसका गुणगान किया जा रहा था. लेकिन आज उसकी पैठ केवल फेसबुक, वाटअप, ईमेल और चैटिंग तक सिमट गई है. इन संसाधनों ने लोगों का प्रबोधीकरण किया हो, उनका मानसिक स्तर ऊपर उठा हो यह बात इनका बड़े से बड़ा समर्थक भी कह सकता. फिर भी विकास और भ्रष्टाचार इतने बड़े मुद्दे हैं कि इनके सहारे सत्ता की अदलाबदली आसानी से की जा सकती है.

भ्रष्टाचार की परिभाषा अपने आप में सुस्पष्ट नहीं है. कमाई के अवैधानिक तरीकों को भ्रष्टाचार कहा जाता है. लेकिन यह परिभाषा केवल सरकारी निकायों तक सीमित है. निजी संस्थानों में अवैधानिक कमाई पर या तो ध्यान नहीं दिया जाता अथवा वित्तीय अनियमितता कहकर उनका प्रभाव हल्का कर दिया जाता है. लेकिन लोकप्रिय राजनीति में भ्रष्टाचार भी बड़ा मुद्दा है. इतना बड़ा कि इसी को आधार बनाकर पिछले चुनावों में दिल्ली में आम ने 15 वर्षों से जमीजमाई कांग्रेस पार्टी को किनारे होने को मजबूर कर दिया. करीब सवा सौ वर्ष पुरानी पार्टी आज सत्ता में वापसी के लिए हांफ रही है. केंद्र में यह काम भाजपा के द्वारा हुआ. भ्रष्टाचार के साथसाथ विकास को मुद्दा बनाकर उसने दस वर्षों की जमी कांग्रेस सरकार को पटखनी दी. कांग्रेस को लगी चोट इतनी गहरी थी कि वह संसद में विपक्षी नेता का पद पाने में नाकाम रही. हाल में संपन्न हुआ बिहार का चुनाव भी विकास और जातिवाद के बीच फंसा था.

हमारी सरकारें भ्रष्टाचारभ्रष्टाचार इसलिए चिल्लाती हैं क्योंकि इससे वे प्रकारांतर में वे उन्हीं लोगों को कठघरे में खड़ा करने में कामयाब हो जाती हैं, जिनके सहयोग से वे सत्ता में पहुंचती हैं. क्या विकास और भ्रष्टाचार अलगअलग मुद्दे हैं? दिखने में दोनों परस्पर विपरीत नजर आते हैं. मगर असल में दोनों एक ही सिक्के के पहलू हैं. सरकारों की कमी है कि वे भ्रष्टाचार को आर्थिक अपराध मानकर विचार करती हैं. जबकि वह नैतिक मसला भी है. जब कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार करता है तो वह आर्थिक अपराध से पहले नैतिक पराभव का शिकार होता है. वह मान लेता है कि सुख और सुविधाएं बटोरने का एकमात्र माध्यम धन है. सेवाओं के आदानप्रदान में यदि धन का हस्तक्षेप कम कर दिया जाए तो भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई जा सकती है. वह सिक्का विचारहीनता का है. राजनीति में विचार न होने के कारण दोनों मुद्दे अकस्मात प्रभावी हो जाते हैं. हैरानी यह है कि दोनों ही मुद्दे आधुनिक विकासवादी अवधारणा की देन हैं. समस्या विचार के हाशिये पर पहुंच जाने की है.

विकास अपने आप में भ्रामक अवधारणा है. आवश्यक नहीं कि उसका असर मनुष्य और समाज के लिए सदैव सकारात्मक ही हो. परिवर्तन की दिशा जो भी हो, विकास की दिशा उसी ओर होती है. ‘कुविकास’ या ‘अविकास’ जैसी कोई अवधारणा नहीं है. शरीर में यदि कूबड़ निकल आए तो वह भी विकास माना जाएगा. इसलिए अर्थक्षेत्र के पुरोधा इस भ्रामक अवधारणा को अपने और व्यापार के बीच में नहीं आने देते. इसके बजाए वे ‘प्रगति’ पर ध्यान देते हैं, जो वांछित दिशा में सप्रयास प्रयत्नों की उन्नति को दर्शाती है. कहा जा सकता है कि समाज ‘जटिल’ संरचना है. सरकार जो विकास योजनाएं बनाती है, उनका एक छोर जनता में उनकी स्वीकार्यता और संसाधनों की उपलब्धता आदि पर भी पड़ता है. पूंजीपति जिस तरह अपने श्रमिकों और अन्य कर्मचारियों से काम लेता है, सरकार वैसा नहीं कर सकती. इसलिए सामाजिक प्रगति को मापने के लिए कोई मीटर नहीं बनाया जा सकता. क्योंकि नागरिकगण न तो जड़ पदार्थ हैं, न ही मशीन कि उनसे जब, जैसा चाहे काम लिया जा सके. वे परंपरा और संस्कृति से भी प्रभावित होते हैं. अपने अधिकांश निर्णय परंपरा और संस्कृति को केंद्र में रखकर ही लेते हैं. ऊपर से प्रकृति भी अपना खेल खेलती है. इसके अलावा जनसंख्या वृद्धि जैसे कारण, जिनसे विकास योजनाओं पर प्रतिकूल दबाव बना रहता है. इस कारण सरकार द्वारा आरंभ की गई योजनाओं के ठीक वही परिणाम नहीं निकलते जिन्हें ध्यान में रखकर उन्हें बनाया और लागू किया जाता है.

सरकारी तर्क अपनी जगह सही हो सकते हैं. लेकिन एक तरह से तो यह सरकार द्वारा अपनी ही जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की कोशिश कही जाएगी. दरअसल सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है. प्रायः सभी योजनाओं के मूल में सामाजिक विकास की भावना निहित होती है. एक उदाहरण लेते हैंमान लेते हैं एक पूंजीवादी उद्यम को शीतल पेय बनाने के लिए सरकार लाइसेंस देती है. उस समय उस उद्यम के पास अगले पांच से दस वर्ष तक अनुमानित प्रगति की रिपोर्ट होती है. लागू करने के बाद प्रायः हर वर्ष या त्रैमासिक आधार पर उसकी समीक्षा की जाती है. अपने आंकड़ों को लेकर कंपनी आश्वस्त होती है. कोई गड़बड़ न हो इसके लिए उनका निरंतर अवलोकनपुनरावलोकन किया जाता है. अनुमानित आंकड़े परियोजना प्रस्ताव का हिस्सा होते हैं, जिनकी एक प्रति, समयसमय पर प्रकाशित होने वाली प्रगति रिपोर्ट के अलावा सरकार को भी सौंपी जाती है.

कोई भी कारखाना केवल मशीनों के बल पर नहीं चलता. उसके लिए तकनीशियनों और कामगारों की जरूरत भी पड़ती है. जो जनता के बीच से ही आते हैं. सामान्य नागरिकों की भांति वे भी परंपरा, संस्कृति और प्राकृतिक कारणों से प्रभावित होते हैं. उद्योग की परियोजना के समय इन सबका ध्यान भी रखा जाता है. कारखाना मालिक इस सबको ध्यान में रखकर ही अपनी अपनी प्रगति रिपोर्ट परिकल्पित करता है. सरकार ऐसा क्यों नहीं कर सकती? कहा जा सकता है कि सरकार, कल्याणकारी उपक्रम है. उसका ध्येय मुनाफा कमाना नहीं है. सरकार का यह सोच प्रकारांतर में पूंजीपति को निष्प्राण यंत्र की भांति उपयोग करने की अनुमति दे देता है. सरकार विकास को प्रगति के पर्याय के रूप में पेश करती है. लेकिन वह उस अनिश्चितता और दुष्परिणामों के बारे में नहीं बताती, जो विकास के साथ स्वाभाविक रूप से जुड़े होते हैं. उदाहरण के लिए शीतल पेय का कारखाना लगाने से पारिस्थिकीय संबंधी संकट पैदा हो सकते हैं. उसके लिए भूजल का भारी मात्रा में दोहन करना पड़ता है. इससे जलस्तर में तीव्र गिरावट आती है. कारखाना मालिक अपनी प्रगति रिपोर्ट तो सार्वजनिक करता है, सरकार भी उसके आंकड़ों को उपयुक्त स्थान पर दर्शाती है, लेकिन कारखाने के कारण जो परिस्थितिकीय एवं पर्यावरण संबंधी संकट उस क्षेत्र में पैदा हो रहे हैं, उसपर न कारखाना मालिक ध्यान देता है, न ही सरकार. जबकि इसके लिए सरकार के पास पूरा अमला होता है. समयसमय पर वे अपनी रिपोर्ट भी देते हैं. लेकिन वह सार्वजनिक नहीं की जाती. सरकार विकास के साथ जुड़े उन नकारात्मक प्रभावों के अध्ययन से भी बच जाती है, जो बिना सोचेसमझे आरंभ की गई अनेकानेक योजनाओं से स्वाभाविक रूप से जुड़े होते हैं.

एक अन्य उदाहरण सिगरेट के कारखाने का लिया जा सकता है. सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, सरकार इसे लेकर निरंतर प्रचार करती है. हर वर्ष करोड़ों रुपये के विज्ञापन इसके प्रचारप्रसार पर खर्च किए जाते हैं. लेकिन सिगरेट के कारखाने को अनुमति देते समय सरकार की दृष्टि मुट्ठीभर रोजगार और रिवेन्यु पर केंद्रित रहती है. सिगरेट का कारखाना लोगों के स्वास्थ्य, सामाजिक जीवन और परिस्थितिकी पर क्या प्रभाव डालता है, सरकार उसकी ओर से मुंह मोड़े रहती है. हम इस बात पर गर्व करते हैं कि प्रवासी भारतीय विदेशी मुद्रा का बड़ा स्रोत हैं. प्रवासी भारतीयों ने अपने आपको सिद्ध भी किया है. पिछले वर्ष उन्होंने 72 अरब डालर की पूंजी मनीआर्डर के माध्यम से भारत में भेजी, जो दुनिया में सबसे अधिक है. मगर इसका दूसरा पहलू भी है. वह यह कि हम अपने आला दर्जे के दिमाग निर्यात कर देते हैं और दोयम दर्जे की प्रतिभाओं से काम चलाते हैं. देश की सत्ता अव्वल दर्जे के धूर्त राजनीतिज्ञों के हाथों में तथा कामकाज दोयम दर्जे की प्रतिभा के हाथों में रह जाता है.

विकास को लेकर वर्तमान सरकार और उसके मुखिया अनेकानेक अंतर्विरोधों के शिकार हैं. उनके अंतर्विरोध उनकी विचारधारा की देन हैं जो सांस्कृतिक वर्चस्ववाद को अपना अभीष्ट मानती है. युवावस्था में संघ की विचारधारा को समर्पित कर देने, फिर कई दशकों तक उसके साथ जीने के क्रम में वे उसे पूरी तरह आत्मसात् कर चुके हैं. इसलिए जो राजनीति वे इन दिनों कर रहे हैं, वह खुद भी अंतर्विरोधों से भरी है. वे भारत का नवोन्मेष चाहते हैं. इसके लिए ‘डिजिटल इंडिया’, ‘मेक इन इंडिया’, ‘अतुल्य भारत’ जैसे नारे उनके नेतृत्व में गढ़े गए हैं. वे चाहते हैं कि देश ज्ञानविज्ञान के क्षेत्र में आगे जाए. इसके लिए वे अमेरिका, रूस, फ्रांस, आस्ट्रेलिया, यानी जहां से भी नवीनतम प्रौद्योगिकी खरीदने के प्रयास में हैं. दूसरी ओर ज्ञान और विज्ञान के क्षेत्र में ऐसे व्यक्तियों को महत्त्वपूर्ण पदों पर बिठाया गया है, जो भारत को लेकर किसी न किसी किस्म के ‘नास्टेल्जिया’ के शिकार हैं और अपनी शक्ति या संसाधनों का उपयोग उस नास्टेल्जिया को साकार करने में लगाना चाहते हैं. इस कारण वे आरएसएस जो विशुद्ध जातिवादी संगठन है, के भी करीब हैं. बारहवीं पास स्मृति ईरानी को भारत सरकार के मानव संसाधन जैसा महत्त्वपूर्ण मंत्रालय सौंप देना, दीनानाथ बत्रा को एनसीईआटी, पी. सुदर्शन राव को भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद का प्रमुख(राव साहब पद पर वेतन की व्यवस्था न होने के कारण इस्तीफा दे चुके हैं) बना देते हैं, जिसका संबंध भारतीय समाज के विवेकीकरण से कम है. ये अंतर्विरोध तभी तक अंतर्विरोध कहे जा सकते हैं जब तक हम उनके बारे में लोकतांत्रिकसमानतावादी समाज की, जैसा भारतीय संविधान में संकल्पित है, विचार करते हैं. इसलिए संघ के नेताओं को संविधान से ही शिकायत है. अवसर मिलते की वे संविधान को ही बदल देना चाहते हैं. हालांकि इसकी संभावना न्यूनतम है.

यह अच्छी बात है कि हमारे प्रधानमंत्री समयसमय पर लोगों से संवाद करते हैं. अपने ‘मन की बात’ उन तक पहुंचाते हैं. लेकिन विकास के संदर्भ में देखा जाए तो वे सर्वाधिक संशयमना प्रधानमंत्री लगते हैं. संशय लंबा है. इसके बने रहने का मुख्य कारण यह भी है कि वे स्वयं उसके बारे में अनजान हैं. यह शायद उनकी प्रवृत्ति है. उनका मिजाज प्रचारक का रहा है. प्रचारक की विशेषता होती है कि वह अपने विचारों को दूसरों तक पहुंचाने को उत्सुक रहता है. कुशल सेल्समेन की भांति वह अपने उत्पाद की खूबियों को ग्राहक के सामने रखता है. उत्पाद की कमजोरियां क्या हैं, इसपर वह अधिक ध्यान नहीं देता. कई बार तो जानकर भी वह अनजान बना रहता है. यह उसके पेशे की मांग भी है. इसलिए उसकी सबसे अच्छी भूमिका तब होती है, जब वह अपने ‘प्राडक्ट’ के बारे में ग्राहकों से संवाद कर रहा होता है. सवाल है कि जिस विचारधारा के वे प्रचारक है, वैसे प्रचारक तो उनकी पार्टी के पास और भी बहुत हैं. फिर मोदी जी में ऐसा क्या है? इस सचाई के बारे में संभवतः मोदी जी भी अनजान हैं.

दरअसल भारत की जाति केंद्रित राजनीति में आरएसएस और भाजपा की विचारधारा का प्रचार करते, करते वे स्वयं कब ब्रांड मान लिए गए, इस बात से संभवतः वे स्वयं भी अनजान हैं. गुजरात के दंगों के दौरान उनकी छवि कटटर हिंदुत्ववादी नेता की बनी. लेकिन आम चुनावों में सफलता के लिए कट्टर हिंदुत्ववादी होना कारगर नहीं था. भारतीय राजनीति की यह विशेषता है कि यहां कट्टरता सीधेसीधे कामयाब नहीं हो सकती. भारतीय मतदाता को कट्टरता स्वीकार ही नहीं है. यहां अटलविहारी बाजपेयी को कामयाबी तब मिलती है जब वे उग्र हिंदूवाद चोला उतारकर समन्वयवादी का मुखौटा पहन लेते हैं. प्रधानमंत्री बनने के इच्छुक लालकृष्ण अडवाणी नाकाम होते हैं, क्योंकि रथयात्रा के दौरान उन्होंने अपनी छवि उग्र हिंदुवादी की गढ़ ली थी. अयोध्या में मस्जिद के अवशेषों को गिराने का दाग उनपर लगा था. आगे चलकर इस दाग को मिटाने के लिए उन्होंने पाकिस्तान जाकर जिन्ना की मजार पर चादर चढ़ाकर इस दाग को मिटाने की कोशिश की. बस यहीं आरएसएस की निगाह में वे खलनायक मान लिए गए. इसलिए ऐसे चेहरे की तलाश की जाने लगी, जो संघ की विचारधारा का आंख मूंदकर समर्थन करता हो. दाग मोदी पर भी था. गुजरात दंगों का. लेकिन उनके मातृसंगठन के लिए यह उनकी विशेषता थी.

आरएसएस की निगाह में ‘ब्रांड’ मोदी का पिछड़ा होना उनकी बड़ी खूबी थी. इसलिए चुनावों के दौरान कई मिथक उस ब्रांड के साथ जोड़े गए. पहला मिथक विकास का था. मंदी की शिकार अर्थव्यवस्था में भारत का युवा चमत्कार की उम्मीद पाले हुए था. विकास का नारा उसे एक उम्मीद में बदल देता था. लेकिन केवल विकास के नाम पर बहुमत का जुगाड़ असंभव था. इसलिए कि कांग्रेस विकास के नाम पर ही राजनीति कर रही थी. उसके पास मनमोहन सिंह जैसा नेता था, जिसे आर्थिक सुधारों का सबसे बड़ा नक्काश माना जाता है. इसलिए विकास के साथसाथ मोदी जी के पिछड़े वर्ग से संबंधित होने ने उन्हें भारतीय राजनीति में स्वीकार्य चेहरा बना दिया. अपनी कुशल सेल्समेनी के बल पर मोदीजी अपनी छबि बनाने में कामयाब भी रहे.

कारपोरेट घरानों से निकटता, मीडिया के समर्पण, धार्मिक कट्टरपंथ, जातिवाद सांप्रदायिकता और पूंजीवाद के साथ मिलकर उन्होंने ऐसा कोलाज रचा कि धर्म और कट्टर राष्ट्रवाद को आसानी से खपा लिया गया. पूंजीवाद के नेतृत्व में धर्म, संस्कृति और राजनीति का ऐसा कोलाज शायद ही किसी और देश में रचा गया हो. धार्मिक धु्रवीकरण और पूंजीवादी संस्थाओं से अपनी निजता के आधार पर मोदी जी ने इतनी लोकप्रियता बटोरी कि केंद्रीय चुनावों में सफलता के लिए अपने चुनावी राजनीति के तहत हर प्रयोग को दोहरा चुकी भाजपा के लिए वाजपेयी के बाद नरेंद्र मोदी सबसे उपयुक्त उम्मीदवार सिद्ध हुए. उन्हें सबसे उपयुक्त और प्रभावी नेता मान लिए गए. राजनीति में ‘मोदीत्व’ को अपरिहार्य मानते हुए संघ की ओर से पार्टी के जमेजमाए नेताओं, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गज भी किनारे करते देर नहीं लगी. चालीस वर्षों तक संघ के प्रचारक रहे मोदी को अपना उम्मीदवार बनाते देर नहीं की. और मोदी जी ने भी अपनी इस तरह मार्किटिंग की कि पूरा का पूरा विपक्ष भौंचक्का रह गया. जाति और वर्ग के धु्रवीकरण के बीच में उलझी भारतीय राजनीति इस तरह के मुखौटे का होना, संघ की नजरों में समय की मांग थी.

मुखौटे की विशेषता होती है कि वह अवसर विशेष के लिए बनाया जाता है. काम निकलते ही वह बोझ लगने लगता है. तो जिन लोगों ने मोदी जी को अपना नेता माना है, और उन्हें लोकतंत्रात्मक शक्तियां प्रदान की हैं, उनकी संस्कृति ऐसी नहीं है कि एक शूद्र को सत्ता सौंपकर उसके अधीन काम कर सकें. वे मनु महाराज को अपना आराध्य मानने वाले और शंबूक की हत्या करनेवाले लोग हैं. मोदी जी को प्रधानमंत्री बनाने का एक ही उनका मकसद है, येनकेनप्रकारेण वर्चस्वकारी संस्कृति को आगे बढ़ाना. जिन लोगों की दूरदर्शन धारावाहिकों में रुचि है, वे आसानी परख सकते हैं. हर सीरियल में हनुमान चालीसा का पाठ हो तो सेंसर बोर्ड अपने आंख, नाक और कान सब बंद कर लेता है. पिछले दिनों एक अच्छी बात अवश्य हुई है. विदेशी पूंजी की तरफ से निराश होकर सरकार ने नव उद्यमियों के प्रोत्साहन हेतु ‘स्टार्टअप’ योजना लागू करना. यदि ढंग से, इस देश की जनशक्ति में विश्वास करते हुए इस योजना का कार्यान्वन किया जाए तो गिरती अर्थव्यवस्था के दौर में चमत्कारी सिद्ध हो सकती है. प्रधानमंत्री यदि कुछ दिनों के लिए विदेशयात्राओं का मोह छोड़कर इसी योजना को आगे बढ़ाने के लिए काम करें तो विकास को सही मायने में ‘प्रगति’ से जोड़ा जा सकता है. लेकिन इसके लिए उन्हें अपने उन नेताओं पर नकेल कसनी होगी जो सांप्रदायिकता की राजनीति करते हैं, जाति के नाम पर लोगों को भड़काते हैं और किसी न किसी बहाने देश को एक हजारबारह सौ वर्ष पीछे ढकेल देना चाहते हैं. वे ऐसा करेंगे या कर पाएंगे, इसकी संभावना बहुत कम है.

© ओमप्रकाश कश्यप

जाति और सामाजिक गतिशीलता

सामान्य

जीवन सभी का होता है. इतिहास भी सभी का होता है. जो लोग अपने इतिहास के प्रति उदासीन होते हैं, वे लुटेरों और आक्रामकों के इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं. लेकिन तब उनकी भूमिकाएं बदल जाती हैं. लुटेरे और आक्रामक इतिहास में दयालु और देशभक्त बन जाते हैं. जबकि कमजोर और अपने इतिहास के प्रति उदासीन सीधेसादे लोग लुटेरे, बेईमान और संस्कृति के दुश्मन घोषित कर दिए जाते हैं. इसीलिए गुणीजन कहते हैं, अपना इतिहास स्वयं लिखने की आदत डालो. लिखेलिखाए इतिहास पर भरोसा मत करो. यदि उसे पढ़ना मजबूरी है तो उसके पात्रों की भूमिका को बदलकर पढ़ो. उपलब्ध इतिहास का सच जानना है तो उसकी भूमिकाएं बदलकर पढ़ो.

भारतीय समाज, विशेषकर हिंदुओं में जाति के प्रश्न बहुत पुराने हैं. यह ऐसी हकीकत है जिसके कारण हिंदू धर्म को अनेकानेक आलोचनाएं झेलनी पड़ी हैं. इसका सहारा लेकर कथित ऊंची जातियां शताब्दियों से निम्नस्थ जातियों का शोषण करती आई हैं. इस कारण कुछ आलोचक जातिप्रथा को भारतीय समाज का कलंक मानते हैं. वे गलत नहीं हैं. आज भी समाज में जो भारी असमानता और ऊंचनीच है, आदमीआदमी के बीच गहरा भेदभाव हैजाति उसका बड़ा कारण है. समाजार्थिक समानता के लक्ष्य की यह आज भी सबसे बड़ी बाधा है. जातीय उत्पीड़न के शिकार समाज के दोतिहाई से अधिक लोग, निरंतर इसकी जकड़बंदी से बाहर आने को छटपटाते रहे हैं. यदाकदा उन्हें आंशिक सफलता भी मिली है. मगर आत्मविश्वास की कमी और बौद्धिक दासता की मनःस्थिति उन्हें बारबार कथित ऊंची जातियों का वर्चस्व स्वीकारने को बाध्य करती रही है. भारतीय समाज में जातिविधान इतना अधिक प्रभावकारी है कि सिख और इस्लाम जैसे धर्म भी, जिनमें जाति के लिए सिद्धांततः कोई स्थान नहीं हैइसके प्रभाव से अछूते नहीं हैं. इनमें सिख धर्म का तो जन्म ही जाति और धर्म पर आधारित विषमताओं के प्रतिकारस्वरूप हुआ था, जबकि इस्लाम की बुनियाद बराबरी और भाईचारे पर रखी गई थी. भारत में आने के बाद इस्लाम पर भी जातिभेद का रंग चढ़ चुका है.

जाति आधारित विभाजन पूरी तरह अमानवीय है. यह मनुष्य की नैसर्गिक स्वतंत्रता में अवरोध उत्पन्न करता है. जाति और वर्ण की संकल्पना सामान्य मनोविज्ञान के भी विपरीत है, जिसके अनुसार जन्म के समय सभी शिशु एक समान होते हैं. उनका मस्तिष्क कोरी सलेट जैसा होता है. एकदम साफ. इबारत उसपर बाद में लिखी जाती है. ब्राह्मण और शूद्र के शिशुओं को यदि एक साथ, एक ही जंगल में छोड़ दिया जाए और उनसे किसी भी प्रकार का संपर्क न रखा जाए; तो समान अवधि के उपरांत दोनों की बौद्धिक परिपक्वता का स्तर लगभग एकसमान होगा. जो भी अंतर होगा, उसके पीछे उनकी देहयष्टि का योगदान होगा. लगभग वैसा ही विकास जैसा पशुओं और वन्य प्राणियों में दिखाई पड़ता है. जाहिर है मनुष्य अपने गुणकर्म और प्रवृत्तियां समाज में रहते हुए ग्रहण करता है. जातिव्यवस्था के अनुसार मान लिया जाता है कि फलां शिशु ‘पंडित’ के घर में जन्मा है, इसलिए उसमें जन्मजात पांडित्य है. जबकि शूद्र के घर में जन्म लेने वाले शिशु सामान्य बुद्धिविवेक से भी वंचित मान लिए जाते हैं. इसलिए उनका काम बताया जाता हैविप्र वर्ग की सेवा करना, उनकी चाकरी करते हुए जीवन बिताना. यह थोपी हुई दासता है, परंतु हिंदू परंपरा में इसे धर्म बताया गया है. बिना कोई शंका किए, चुपचाप परंपरानुसरण करते जाने को पुरुषार्थ की संज्ञा दी जाती रही है. इस तरह जो धर्म बुद्धिमत्तापूर्ण व्यवहार की अपेक्षा के साथ ब्राह्मण को शीर्ष पर रखता है, और प्रकांतर में मानवीय विवेक का सम्मान करता हैव्यवस्था बनते ही समाज के अस्सी प्रतिशत लोगों से बौद्धिक हस्तक्षेप और पसंदों का अधिकार छीनकर, पूरे समाज को नए ज्ञान का विरोधी बना देता है. हिंदू धर्म की यही विडंबना समयसमय पर उसके बौद्धिक एवं राजनीतिक पराभव का कारण बनी है. आज भी समाज में जो भारी असमानता और असंतोष है, उसके मूल में भी जाति ही है. जाति का लाभ उठा रहे वर्गों और जातीय उत्पीड़न का शिकार रहे लोगों के बीच अविश्वास की खाई इतनी गहरी है कि संस्कृति को लेकर जरासी बहस भी चले तो जनता का बड़ा हिस्सा उसपर संदेह करने लगता है. इससे कई बार धार्मिकसांस्कृतिक सुधारवादी आंदोलन भी खटाई में पड़ जाते हैं.

वैसे भी पांडित्य, चिंतनमनन और स्वाध्याय की उपलब्धि होता है. वह न तो बैठेठाले आ सकता है, न ही व्यक्ति का जन्मजात गुण हो सकता है. कथित दैवी अनुकंपा भी जड़बुद्धि व्यक्ति को पंडित नहीं बना सकती. दूसरी ओर जाति है कि उसके माध्यम से एक वर्ग जन्मजात पांडित्य के दावे के साथ हाजिर होता है तो दूसरा वर्ग ‘शासक’ के रूप में. फिर निहित स्वार्थ के लिए ये दोनों वर्ग संगठित होकर शेष समाज के लिए शोषक की भूमिका में आ जाते हैं. ‘पांडित्य’ को यदि ज्ञान का पर्याय भी मान लिया जाए तो वह स्वाभाविक रूप से व्यवहार का विषय होगा, अनुभव का विषय होगा, प्रदर्शन की वस्तु वह हरगिज नहीं हो सकता. यदि हम प्राचीन पुराणों और टीकाओं की बात करें तो उनमें दर्शित ज्ञान प्रदर्शन और महिमामंडन से आगे नहीं बढ़ पाता. पूरी की पूरी ब्राह्मण मेधा, कुछ अपवादों को छोड़कर, देवताओं के नखसिख वर्णन और उनके छलप्रपंच भरे काल्पनिक विजय अभियानों के बखान में लगी रहती है. मनुष्य का अस्तित्व, जिसने विषम परिस्थितियों से जूझकर, आपदाओं से निरंतर संघर्ष करते हुए इस धरती को रहने लायक बनाया है, इन ग्रंथों में बस एक दास जितना है. उपनिषदों में अवश्य कुछ श्रेष्ठ, श्रेष्ठतर और श्रेष्ठतम है, मगर उनमें भी जबरदस्त दोहराव है. बाकी सब आत्मरति और मनःरंजन का विषय तो हो सकता है. समाज का वास्तविक हित उससे सध ही नहीं सकता. इस वास्तविकता को जातिव्यवस्था के शीर्ष पर मौजूद लोग जानते जरूर थे, मगर निहित स्वार्थ की खातिर सत्य की ओर से मुंह फेरे रहते थे. उन्होंने शूद्रों के लिए धर्मग्रंथों का अध्ययन केवल इसलिए निषिद्ध नहीं किया कि वे उन्हें अपात्र मानते थे. डर यह भी था कि शूद्र यदि वेदादि धर्मग्रंथ पढे़ंगे तो उनमें दर्ज देवों की सत्ता लोलुपता, वासनाएं, साधारण सम्राट की तरह किए गए छलप्रपंच पर विमर्श करने का अधिकार भी उन्हें मिल जाएगा. क्योंकि धर्म और शास्त्र के नाम पर मनमानी तभी तक चल सकती है, जब तक सामनेवाला अनपढ़ हो, या उसे जानबूझकर अनपढ़ रखा गया हो. जब व्यक्ति जानने लगता है तो सवाल भी उठाने लगता है. संभवतः वे भूल गए थे कि नदी की तरह विचार भी निरंतर गतिशील रहने पर ही शुद्ध रह पाते हैं. ठहराव आते ही उनमें अशुद्धियां पनपने लगती हैं. आलोचना, विमर्श न हो तो परंपरा के नाम पर आडंबरों को खुली छूट मिल जाती है. जाति, धर्म और संस्कृति के नाम पर इस देश में यही हुआ. आड़ंबरपूर्ण शास्त्रीयता धीरेधीरे सभ्यता और संस्कृति के पाखंड में ढलती चली गई. ऐसा नहीं कि इसका विरोध नहीं हुआ. आडंबरवाद को प्रत्येक युग में लताड़ा गया, किंतु सत्ता के शिखर पर मौजूद लोग विरोध को हमेशा नजरंदाज करते रहे. विरोध में रचे गए साहित्य और कलाओं को पुराने जमाने के ‘गजनवियों’ द्वारा निमर्मतापूर्वक मिटाया जाता रहा.

कुछ देर के लिए यदि मान भी लिया जाए कि वर्णविभाजन तत्कालीन समाज में कार्यविभाजन के लिए आवश्यक था. हमारे पूर्वजों ने समाज की आवश्यकताओं, सुख एवं संसाधनों की वृद्धि हेतु बड़े ही बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से उसे चार वर्णों में विभाजित किया था. उनका ध्येय समाज के संपूर्ण सुख एवं संसाधनों में वृद्धि करना था. दूसरे शब्दों में जाति और वर्ण को यदि कार्यविभाजन की बेहतरीन पद्धति मान लिया जाए तो उन्हें अर्थशास्त्र का विषय होना चाहिए था. धर्म और संस्कृति का हिस्सा बनाने का कोई औचित्य नहीं रह जाता. यदि यह कहा जाए कि प्राचीनकाल में सभी कुछ धर्म और संस्कृति का हिस्सा था….कि ‘अर्थशास्त्र’ में अर्थनीति, राजनीति, व्यवहारशास्त्र आदि सभी कुछ हैतो भी जातीयता की संकल्पना के चारपांच हजार वर्षों में उसपर कभी तो अर्थशास्त्रीय दृष्टिकोण से विचार किया जाना था? आकलन किया जाता कि कार्यविभाजन की उस परंपरागत भारतीय प्रणाली की समसामयिक उपयोगिता कैसी और कितनी है? निष्पक्ष समीक्षा के बाद ही उन्हें बनाए रखने या हटाने का निर्णय लेना चाहिए था. जैसे यूनान में हुआ था. प्लेटो ने मनुष्यों को स्वर्ण, रजत और लौह वर्गों में बांटा था. उसने जन्म को उसके लिए आधार नहीं बनाया था. उसके द्वारा किए गए वर्गीकरण का आधार व्यक्ति के अपने गुण और प्रवृत्तियां थीं. तो भी अरस्तु को अपने गुरु का यह विचार जमा नहीं. उसने यह मानते हुए कि मानवव्यक्तित्व जटिल रचना है, और उसका इस तरह सरलीकरण नहीं किया जाना चाहिए, प्लेटो द्वारा किए गए वर्गीकरण को अनुपयुक्त मानकर उसे आधी शताब्दी से भी कम समय में नकार दिया था. भारत में ऐसा नहीं हुआ. इसलिए नहीं हुआ क्योंकि उस अवैज्ञानिक कार्यविभाजन को शिखरस्थ वर्गों का समर्थन प्राप्त था. सत्ताधारी वर्गों के स्वार्थ उससे जुड़े थे. उसके बहाने वे समाज के अधिकांश संसाधनों पर कब्जा जमाए रखते थे. इसलिए एक के बाद एक स्मृतिग्रंथ वर्णव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए रचे गए. सांस्कृतिक वैविध्य के मुखौटे में जातीय भेदभाव को बचाया गया.

गौरतलब है कि कार्यविभाजन समाज की आवश्यकता है. मनुष्य की अनेकानेक भौतिकअभौतिक आवश्यकताएं उससे जुड़ी होती हैं. इसलिए वही कार्यविभाजन श्रेष्ठ माना जाता है, जो मनुष्य की अधिकतम उत्पादकता को सामने लाए और जरूरत पड़ने पर उसमें सुधार भी कर सके. उत्पादकता के आकलन के नियम आज के नहीं है. कम से कम दो शताब्दियों से तो उनपर खुलकर विचार किया जा रहा है. जातिव्यवस्था उनके आगे कहीं नहीं टिकती. इसलिए वह आधुनिक विमर्श से बाहर है. केवल चलन में है. वह भी इसलिए कि जो वर्ग इससे लाभान्वित हैं, वे इसे छोड़ना नहीं चाहते. प्रत्यक्ष या परोक्ष हठ के द्वारा इसे अपनाए हुए हैं. अच्छा होता जातिव्यवस्था का मूल्यांकन भी व्यक्ति की सामाजिकआर्थिक और भौतिक जरूरतों के आधार पर किया जाता. यदि ऐसा होता तो उसकी परिभाषाओं पर बहस होती. उसकी समाजेतिहासिकता को बहुत पहले विमर्श में शामिल किया जाता. तब उन विसंगतियों से बचा जा सकता था, जो वर्ण के जाति में रूढ़ होने के साथसाथ जन्मीं और लगातार बढ़ती गईं. मगर भारत में कार्य(वर्ण) विभाजन को सामाजिकसांस्कृतिक सवाल बनाकर जानबूझकर समीक्षा से काट दिया. नतीजा यह हुआ कि जाति और वर्ण को लेकर पूरा समाज दो हिस्सों में बंट गया. एक वे जो उसका समर्थन करते हैं, दूसरे वे जो शताब्दियों तक जातीय शोषण का शिकार रहने के बाद आज उससे नफरत करते हैं. संख्या जातिव्यवस्था के आलोचकों की अधिक और निर्णायक है. लोकतांत्रिक दौर में विचार बहुमत को प्रभावित ही नहीं करते, उससे प्रभावित भी होते हैं, इसलिए जातिसमर्थकों के स्वर दबेदबे होते हैं. चूंकि मन से वे जातिभेद के समर्थक हैं तथा किसी न किसी रूप में उससे लाभान्वित भी हैं, इसलिए उनका अपना जीवन और चिंतन अंतर्विरोधों से भरा होता है. समाज का यह वर्ग आज भी जाति को अपनी अस्मिता का पर्याय समझता है; और वह चाहता है कि दूसरे वर्ग भी जाति की मर्यादाओं को समझें, इसलिए उन वर्गों के पास जो जातिअनुक्रम में निचले स्तर पर हैं, सीधे विरोध के अलावा और कोई रास्ता रह ही नहीं जाता. यह विरोध कभी धर्मांतरण के रूप में सामने आता है तो कभी जातीय संघर्ष के रूप में.

सवाल है कि चौतरफा विरोध और आलोचनाओं के बावजूद जाति जीवित क्यों है? विरोधों में डटे रहने की खुराक उसे कहां से मिलती है? प्रश्न भले ही नए लगें, इनका उत्तर अनजाना नहीं है. जैसा ऊपर कहा गया है, जाति यदि सचमुच कार्यविभाजन की जरूरत होती तो वह अर्थशास्त्र के विमर्श का विषय भी होती; या देरसवेर अर्थशास्त्रीय दृष्टिकोण से उसकी समीक्षा की जाती. उस अवस्था में उसे बहुत पहले अप्रासंगिक मान लिया गया होता. मगर ऐसा कभी नहीं किया गया. इसलिए कि वह कार्यविभाजन की प्रणाली थी ही नहीं. असल में वह अभिजन हितों की सुरक्षा के लिए की गई असमानताकारी और स्वार्थपरक व्यवस्था थी, जिसमें शक्तिशाली वर्ग केवल अपनी जरूरतों के हिसाब से लोगों को अलगअलग पेशे में बांट रहे थे. फिर जैसेजैसे उस वर्ग की जरूरतें बढ़ी, जातियों की संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी होती गई. वह एक चालाकीभरा कदम था. उन अनेक कदमों में से एक जिन्हें अभिजन वर्ग शेष समाज पर अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए उठाता है. आर्थिकसामाजिक असमानता से ग्रस्त समाजों में मुट्ठीभर अभिजन सत्ताप्रतिष्ठानों पर कब्जा जमाए होते हैं. बाकी जनसमाज उनसे कहीं अधिक शक्तिशाली होने के बावजूद, बंटा होने के कारण अपनी वास्तविक शक्ति से अपरिचित होता है. शीर्षस्थ अभिजन उसे छोटेछोटे वर्गों में बांटकर उसकी प्रभावी शक्ति को कमजोर कर देते हैं, और उस बंटी हुई शक्ति को अपने हितों की सुरक्षा के लिए काम में लाते हैं. इससे गैरअभिजन वर्ग की शक्तियां अपने ही समूहों से टकराकर जाया होती रहती हैं. बंटा हुआ जनसमाज अपने ही सदस्यों पर संदेह करना है. चूंकि उत्पादकता के अधिकांश संसाधनों पर अभिजन समुदाय का अधिकार होता है, इसलिए रोजीरोटी की मजबूरियां भी गैरअभिजन समाज को अभिजनों के आदेशानुपालन हेतु विवश करती हैं. इस काम में धर्म और संस्कृति मददगार बनते हैं. अतः इस प्रश्न के उत्तर में कि जाति को विरोधों के बीच डटे रहने की खुराक कहां से मिलती है, विश्वासपूर्वक कहा जा सकता हैधर्म और संस्कृति से.

ऋग्वेद का पुरुषसूक्त जातिभेदवर्गभेद का बीजमंत्र है. उसमें लिखा है कि ब्राह्मण, ब्रह्मा के मुख से, क्षत्रिय भुजाओं से, वैश्य उदर से तथा शूद्र उसके पैरों से जन्मे हैंꟷ‘ब्राह्मणोऽस्य मुखामासीद्वाहू राजन्यः कृतः. ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत.’ ब्रह्मा यहां समाज का प्रतीक हैं. इसका लक्ष्यार्थ है कि समाज में ज्ञान, व्यापार तथा सेवाकर्म चार प्रमुख अंग होते हैं. रूपक के चयन में भी चतुराई देखी जा सकती है. यदि सीधेसीधे कार्यविभाजन किया जाता तो देरसवेर लोगों का ध्यान उसके औचित्य पर भी जाता. ऐसा न हो इसलिए अभिजन वैदिक मनीषियों ने उसे सांस्कृतिक रूपक के माध्यम से प्रस्तुत किया था. ताकि उसको आस्था और विश्वास की साम्रगी के रूप में देखा जाए. आलंकारिक भाषा केवल कविता में ही फबती है. बौद्धिक विमर्श को उससे दूर रखने की सलाह दी जाती है. दरअसल मिथकों और बिंबों की विशेषता होती है कि उन्हें सामान्य विवेक के सहारे मनचाहा आकार दिया जा सकता है. वे सर्वसाधाराण की चेतना का हिस्सा भले हों, मगर समयसमय पर उनकी ऐसी व्याख्याएं होती रहती हैं जो उनकी मूल संकल्पना से एकदम अलग होती हैं. जैसे इंद्र का मिथक. वह एक ओर देवराज है. दूसरी ओर देवताओं में ही सबसे बड़ा खलनायक. गिरे हुए चरित्र का स्वामी, जिसे अपने सिंहासन के खिसकने का भय हमेशा सताता रहता है. इसकी प्रतीकात्मकता को देखें तो सत्ता छिन जाने का भय केवल इंद्र का भय नहीं था. यह हर उस राजा का डर हो सकता है, जो प्रजा कल्याण से दूर, केवल भोगविलास में लिप्त रहता है. बावजूद इसके देवराज इंद्र के मिथक के जरिये उस ओर हमारा ध्यान नहीं जाता. इसलिए कि वह भौतिक जगत का न होकर, सांस्कृतिक विमर्श का हिस्सा है; और संस्कृति को प्रायः आस्था और विश्वास का विषय माना जाता है. इंद्र उन देवताओं का सम्राट है जिन्हें मत्र्य जीवन के कष्टों का सामना नहीं करना पड़ता. मिथकों के विरूपण या उनकी नवव्याख्याओं के पीछे सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही प्रकार के दृष्टिकोण हो सकते हैं. कुल मिलाकर मिथक उससे अपने परंपरागत संदर्भों से कट सकता है. अतएव मिथक को यथार्थ मानना, ‘ईश्वर की मूर्ति है, इसलिए ईश्वर भी है’जैसा ही भ्रांत धारणा है. इसके बावजूद परंपरावादियों का जातीय विभाजन को लेकर ब्रह्मा के मिथक में विश्वास आज भी बना हुआ है. गीता में कृष्ण स्वयं को विराट पुरुष के रूप में पेश कर, वर्णभेद की इसी संकल्पना को आगे बढ़ाते हैंꟷ‘चातुर्वर्णमरूपक मयास्रष्ठं गुणकर्म विभागभ्य’….‘मैंने चार प्रकार के मनुष्यों की रचना की है. उनके गुण, स्वभाव के आधार पर उन्हें वर्णों में विभाजित किया है.’ दबे स्वर में ही सही, परंपरावादी आज भी इन घिसेपिटे तर्कों को आगे बढ़ाकर असमानताकारी जातिव्यवस्था के पोषण में लगे रहते हैं.

कुछ विद्वानों के अनुसार पुरुषसूक्त ऋग्वेद का प्रक्षेपित हिस्सा है. इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता. ऋग्वेद आर्यों की कई शताब्दियों की यादों को समेटे हुए है. उसका आरंभिक हिस्सा तब का है जब आर्य भारतभूमि पर पांव जमाने का प्रयास ही कर रहे थे. उस समय तक वर्णव्यवस्था इतनी जटिल नहीं हुई थी. वैसे भी ब्रह्मा प्राचीनतम देवता नहीं है. भारत में शिव और बाकी सभ्यताओं में सूर्य प्राचीनतम देवता रहे हैं. आरंभ में शूद्र राजन्य और ब्राह्मण केवल तीन वर्ण थे. इसके साथ ही ऋक्, यर्जु, साम तीन वेद. वेद त्रयी और वर्णत्रयी का साम्य था. कालांतर में जब शूद्रों के एक वर्ग ने स्वयं को आर्थिक रूप से संपन्न कर लिया तो उसकी उपेक्षा कर पाना असंभव हो गया. चौथे वर्ग की कल्पना करनी पड़ी. यजुर्वेद में वैश्य और क्षत्रियों को सजातीय कहा गया है. इसलिए जब तक वेद तीन रहे, तब तक तीन वर्ण भी मान्य रहे होंगे. कालांतर में चौथे वर्ण को मान्यता मिली तो अथर्ववेद के रूप में चौथे वेद को भी स्वीकार किया जाने लगा. हालांकि इनमें पहले क्या हुआ? पहले चौथे वर्ण को मान्यता मिली या चौथे वेद को यह शोध का विषय है. कल्पना की जा सकती है कि दोनों का समय आसपास का रहा होगा. ऐसे में परमपुरुष की अवधारणा; यानी पुरुष सूक्त की रचना ईसा से पांच से आठ सौ वर्ष पहले तक की हो सकती है.

आरंभ में वर्ण इतने रूढ नहीं थे. आरंभिक ग्रंथों में अनुलोम और विलोम दोनों ही प्रकार के अंतरण के उदाहरण मिलते हैं. यह अंतरण तत्कालीन परिस्थितियों में जब आर्य और मूल निवासी घुलनेमिलने की कोशिश में थे, स्वाभाविक था. आर्यों ने भारत भूमि पर आक्रामक के रूप में प्रवेश किया. वे यहां पहले से रह रहे मूल निवासियों की अपेक्षा निपुण लड़ाके, रणकौशल में पारंगत थे. उत्तरी एशिया से भारत तक पहुंचने में उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. उनकी अपेक्षा इस देश के मूल निवासी शांतिप्रिय और अपने संतोष के साथ जीवन जीने वाले थे. मूल निवासी अनेक कबीलों में बंटे थे, किंतु लंबे समय तक साथ रहने के बाद वे सहअस्तित्व की कला में निपुण होने लगे थे. धर्मशास्त्रों में देवासुर संग्राम के अनेक उल्लेख हैं, मगर ऐसा कोई उल्लेख नहीं है जो दैत्यों के आपसी वैमनस्य को दर्शाता हो. बहरहाल एक लंबी संघर्षपूर्ण यात्रा के अनुभव के बाद आर्यों का कुशल रणनीतिकार के रूप में उभरना स्वाभाविक था. बावजूद इसके भारत के मूल निवासियों को अपने साथ जोड़ना, उनपर अपना सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करना आसान नहीं था. हड़प्पा और मोनजोदाड़ो से प्राप्त अवशेष बताते हैं कि भारतीय मूल निवासी एक समृद्ध संस्कृति के वासी थे. कदाचित उनकी समृद्धि ही आर्यों को मध्यएशिया से भारत तक खींच कर लाई थी. यात्रा के दौरान आर्यों ने जहां आवश्यक समझा, वहां युद्ध किया. जहां लगा कि युद्ध के माध्यम से ऐच्छिक परिणाम तक पहुंचना असंभव है, वहां उन्होंने युद्धेत्तर नीतियों का सहारा लिया.

उदाहरण के लिए शिव भारत की आदिम जातियों के आराध्य थे. उनका सभी समूहों पर प्रभाव था. मूल निवासी कबीलों को प्रसन्न करने के लिए शिव को प्रसन्न करना अनिवार्य था. इसके लिए आर्यों ने उनके साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किए. उन्हें महादेव की पदवी दी. पार्वती आर्य सम्राट हिमवान की पुत्री थी. शिव को अपना जामाता बना लेने के बाद आर्यों की मुश्किलें आसान होने लगीं. शिव का स्थानीय कबीलों के सर्वमान्य मुखिया थे. मिलीजुली सभ्यता की खातिर उन्होंने आर्यों तथा प्राचीन कबीलों के मध्यस्थ का काम किया. शिव के सहयोगी के रूप में भूत, पिशाच, प्रेत आदि को हम भारत के आदिम कबीलों के प्रतीक के रूप में देख सकते हैं. चतुराईपूर्वक आर्यों ने शिव को तो अपनाया, उन्हें अपने आराध्य और ‘महादेव’ का दर्जा दिया. अपनी प्रवृत्ति के अनुसार उनसे हितसाधन किया. लेकिन शिव के सहयोगी भारत की प्राचीन कबीलों को, जिनके वे नेता और आराध्य थे, पूरी तरह उपेक्षा की. उन्हें असभ्य मानते हुए भूत, प्रेत, कापालिक आदि कहा गया. नतीजा यह हुआ कि शिव का तो दैवीकरण हुआ, किंतु उनके सहयोगी कबीलों की पूरी तरह उपेक्षा हुई. उन्हें ऐसा ही दर्शाया जैसा विकसित सभ्यता पर गर्वाए सत्ताधीश करते हैं. बख्शा शिव को भी नहीं गया. उन्हें आक, धतूरा खाने वाला, भभूत लगाकर रमने वाले अवधूत की तरह दर्शाया गया. इससे सृष्टि को चलाने की जिम्मेदारी ‘ब्राह्मण ब्रह्मा’ तथा उसके सहयोगी ‘क्षत्रिय विष्णु’ पर आ गई. इसके बावजूद एक डर उनके मन में हमेशा बना रहा. उस डर ने ही शिव को मृत्यु के देवता का पद देने को बाध्य किया. शिव की तीसरी आंख दरअसल जनसंस्कृति के वाहक उन कबीलों की सम्मिलित ताकत और विद्रोह शक्ति का प्रतीक है, जिन्हें भूत, प्रेत, कापालिक आदि कहा जाता है और जिनके मुखिया शिव थे. किसी भी राष्ट्र की शक्ति उसकी जनता में निहित होती है. राज्य केवल उसका प्रतीक होता है. जनता यदि कुपित हो जाए तो बड़ी से बड़ी सामरिक शक्ति को मिट्टी में मिला सकता है. चूंकि शिव के पीछे कबीलों की शक्ति थी, इसलिए उन्हें महादेव, मृत्यु का देवता जैसा पद दिया गया. उनकी तीसरी आंख खुलने का अभिप्राय था, समर्थक कबीलों के साथ विद्रोह पर उतर आना, जिनसे अल्पसंख्यक अभिजात तथा उनके कथित देवता भय खाते थे.

महाकाव्य काल में ही वर्ण जातियों में ढलने लगे थे. व्यक्ति के अपने कौशल का कोई महत्त्व नहीं रह गया था. कर्ण और एकलव्य ऐसे ही उदाहरण हैं. जो उस समय की व्यवस्था के अनुसार क्षत्रिय नहीं थे. लेकिन दोनों ने ही स्वयं को धनुर्विद्या में अत्यंत निपुण बना लिया था. महाभारत युद्ध में दुर्योधन के पक्ष में होने के बावजूद कर्ण को बारबार आहत और अपमानित होना पड़ता है. वहीं एकलव्य के वाणकौशल से विस्मित द्रोणाचार्य उसका अंगूठा ही मांग लेता है. हालांकि इस युग तक जाति को रूढ बनाने का विरोध भी जारी रहा. लोग जातिविहीन सभ्यता की याद भी दिलाते रहते थे, जैसे महाभारत के शांतिपर्व में कहा गयाꟷ‘असलियत में वर्णविभाजन जैसी कोई चीज नहीं है. यह पूरी सृष्टि ब्रह्म है, क्योंकि इसे ब्रह्मा ने बनाया है.’ इस प्रसंग की यदि एकलव्य और कर्ण के प्रकरण से तुलना की जाए तो उस सभ्यता के विरोधाभास सामने आने लगते हैं. लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि ‘जय’ से ‘विजय’, ‘विजय’ से ‘भारत’ और फिर ‘महाभारत’ तक की यात्रा अनेक विरोधाभासों से भरी है. इसलिए कि हर मनीषी ने सत्य को अपनी तरह से देखा और उसे प्रक्षेपण का हिस्सा बना दिया.

बाद के धर्मग्रंथों में रक्तशुद्धता एवं कुलीनता पर काफी जोर दिया गया, लेकिन आरंभ में ऐसा न था. आर्यों के आगमन के साथ ही उनका यहां रह रही प्राचीन जातियों के साथ सम्मिलन शुरू हो चुका था. भारत में आर्यों का आगमन एक समूह में नहीं रहा. वे अनेक बार टुकड़ोंटुकड़ों में आए थे. इस बात की प्रबल संभावना है कि जो आरंभिक कबीले भारत तक पहुंचे हों उनमें स्त्री सदस्यों की संख्या आनुपातिक रूप से कम रही हो; या हो सकता है कि लंबी यात्रा के पश्चात भारत तक पहुंचने में उनका लिंगानुपात गड़बड़ा गया हो. इसलिए आरंभ में ही हम अंतवर्गीय संबंधों की बहुलता देखते हैं. व्यवस्था की गई कि स्त्री किसी भी वर्ग की हो, उससे उत्पन्न संतान पिता के गौत्र की होगी. मनुस्मृति में कहा गया, ‘वैध दांपत्य में बंधने के बाद स्त्री अपने पति के वर्ण में सम्मिलित हो जाती है, ठीक ऐसे ही जैसे नदी सागर में मिलकर उसके गुणों को धारण कर लेती है.’(मनुस्मृति 9/22). उदाहरण कई हैं. वशिष्ट की पत्नी अक्षमाला निम्न जाति की स्त्री थी. इसी प्रकार सारंग मुनि की पत्नी भी निम्न वर्ण से आती थी. भविष्य पुराण के अनुसार शृंग ऋषि हरिणी के गर्भ से उत्पन्न थे. पराशर चांडाल स्त्री की संतान हैं, व्यास केवट पुत्री मत्स्यगंधा की. वशिष्ट वेश्या के गर्भ से जन्मते हैं. अपनी लग्न और प्रतिभा के बल पर वे ब्राह्मण बनते हैं. भिन्न वर्णों के बीच विवाह सामान्य थे. क्षत्रिय सम्राट ययाति की एक पत्नी देवयानी ब्राह्मणसुता थी, दूसरी असुर राज की बेटी. बाद में रक्त शुद्धता की अवधारणा विकसित होने पर, आर्यों ने प्राचीन अंतर्जातीय संबंधों को वैध बनाने अथवा चमत्कार सिद्ध करने के लिए उन्हें मिथकीय आख्यानों का हिस्सा बना लिया. लोग उन दिनों चमत्कार पर भरोसा भी खूब करते थे. यदि आकस्मिक रूप से कुछ हो जाए तो उसे दैवी कृपा मानकर चुपचाप स्वीकार कर लेते थे. इसके फलस्वरूप लोकमहत्त्व के विभिन्न मुद्दों को लेकर ब्राह्मणवादी नजरिये से कहानियां गढ़ी जाने लगीं.

अपनी प्रतिभा और लगन के बल पर दूसरे वर्ग में अंतरण के भी अनेक उदाहरण धर्मग्रंथों में उपलब्ध हैं. विश्वामित्र के क्षत्रिय कुल से ब्राह्मण वर्ग में दाखिल होने का किस्सा तो जानापहचाना है. क्षत्रिय दिवोदास का पुत्र मैत्रेय ब्राह्मण बनता है. हरिवंश पुराण के अनुसार वैश्य पुत्र नाभाग और अरिष्ट ब्राह्मण कुल में शामिल होते हैं. वर्णअंतरण को लेकर सत्यकाम जाबाल का किस्सा भी खूब चर्चित है. सत्यकाम दासीपुत्र था. उसने गुरु की शरण में जाकर शिक्षा लेने की इच्छा व्यक्त की तो गुरु ने उसका नाम, गौत्र आदि पूछा. सत्यकाम ने घर आकर यही प्रश्न अपनी मां से किया. तब मां ने बताया, ‘पुत्र, दासी होने के कारण मुझे अनेक घरों में काम के लिए जाना पड़ता है. एक घर से दूसरे घर की यात्रा के दौरान तू कब मेरे गर्भ में आ गया, मुझे नहीं पता. तू सत्यकाम है. मेरा नाम जाबाला है. सो तू सत्यकाम जाबाल हुआ.’ सत्यकाम यही बात गुरु से बता देता है. गुरु उसके सत्यवाचन से प्रसन्न होकर दीक्षा देने के लिए तैयार हो जाते हैं. यही सत्यकाम जाबाल आगे चलकर वेदमंत्रों के रचियता के रूप में उभरता है.

जाति प्रथा चलते ही यह संभव हुआ कि पंडित के घर पंडितजी जन्म लेने लगे. यदि सबकुछ बिना किए जन्म ही से प्राप्त है तो कुछ और पाने के लिए गुणवत्ता को क्यों बढ़ाया जाए! इसलिए तप और स्वाध्याय का अभिप्राय रामराम जपने तक सिमट गया और अध्यापन कर्मकांड तक. लोग सोलह पृष्ठ की पंजिका पढ़कर ‘पंडित’ कहलाने लगे. बिना ‘सत्य’ और ‘सत्यनारायण’ वाली ‘सत्यनारायण की कथा’ घरघर बंचीबंचवाई जाने लगी. उन कहानियों में आदमी की पहचान जाति से जुड़ी थी. जानते सब थे कि जन्म आधारित वर्गीकरण मनुष्य के मूल स्वभाव के विरुद्ध है. दो व्यक्ति कभीभी पूरी तरह से एक हो ही नहीं सकते. इसलिए किसी एक की परिस्थितियों पर विचार कर हूहू वही निर्णय दूसरे के लिए नहीं लिया जा सकता. चूंकि यह मनुष्य की प्रवृत्ति के विरुद्ध है, समाजीकरण की धारा के विरुद्ध है, इसलिए व्यक्ति केवल परंपराएं ढोता रहा. समाज जड़ और लोग यथास्थितिवादी बन गए. जाति ने लोगों से उनका विवेक, चयन का अधिकार छीनकर उन्हें एक नशा थमा दिया. बिना कुछ किएधरे खास होने का नशा. जाति आधारित विभाजन की खूबी है कि उसमें हर कोई खास होता है. हालांकि खासियत के लिए उसका अपना कोई योगदान नहीं होता. बस अपनी लकीर के बराबर में मनमाफिक थोड़ी छोटी लकीर खींच लेता है. इसलिए कि वह जातीय पायदान पर अपने से नीचे के किसी कम खास की उपस्थिति मानकर मन को तसल्ली देने लगता है. दूसरा चाहे उसका विरोध करे, और विरोध होता ही है, फिर भी वह खुद को ‘अपने मुंह मिंया मिट्ठू’ बनने से रोक नहीं पाता. चूंकि जाति पर उसका जोर नहीं चलता, इसलिए जिस जाति वर्ग में वह जन्म लेता है, उसे अपनी नियति मानकर जीवन से समझौता किए रहता है. इससे भाग्यवाद और नियतिवाद को बढ़ावा मिलता है, जो परिवर्तनकामी आंदोलनों की आंच पर राख डालते रहने का काम करता है.

विद्वानों ने जातिप्रथा की आलोचना की. कहा कि जाति ऐसी व्यवस्था है जिसमें व्यक्ति अपनी मर्जी से शामिल नहीं होता. जन्म व्यक्ति की जाति निर्धारित करता है, फिर मनुष्य मृत्युपर्यंत उसके चंगुल से निकल नहीं पाता. दूसरे शब्दों में जाति व्यक्ति की नैसर्गिक स्वतंत्रता का हनन करती है. यह कार्यविभाजन की असमानताकारी निकृष्ट शैली है. यह व्यक्ति के चयन के अधिकार को बाधित करती है. जन्मना जाति मनुष्य का कुदरत के नाम पर लगाया गया बदसूरत ठप्पा है, जो मनुष्यता का अवमूल्यन करता है. कहीं आनेजाने, पेशा बदल देने से व्यक्ति की जाति में कोई बदलाव नहीं आता. फिर भी कुछ विद्वान जाति के जड़ स्वभाव के कारण ही उसे पसंद करते रहे. जाति उनके द्वारा भारतीय समाज और संस्कृति के महिमामंडन का कारण बनी. उनमें प्रायः वही लोग थे, जो समाज के शीर्ष पर विराजमान, समस्त संसाधनों पर कुंडली मारे नजर आते हैं. समयसमय पर ऐसे कार्यकर्ता और विद्वान भी हुए हैं जिन्होंने जाति प्रथा का जमकर विरोध किया. जाति और जन्म के आधार पर पक्षपात करनेवालों को बुरी तरह से लताड़ा. समयसमय पर जातिविरोधी आंदोलन चले. कह सकते हैं जाति का जब से जन्म हुआ, जब से उसने समाज को जकड़ना आरंभ किया, तभी से उसपर हमले आरंभ हो चुके थे.

ज्ञात इतिहास में जाति प्रथा को सबसे पहली चुनौती गौतम बुद्ध ने दी थी. उन्होंने भिक्षु संघ की स्थापना की, जिसमें जाति संबंधी किसी भी प्रकार का पक्षपात न था. मध्यकाल में संत कवियों ने जाति को भारतीय समाज का कलंक मानते हुए जन्म के आधार पर आदमीआदमी में भेद करने वालों को धिक्कारा. तीखे शब्दों में उनकी आलोचना कीꟷ‘जो तू कहे बाहमन का जाया, और मार्ग ने क्यों न आया.’(कबीर). बावजूद इसके जाति का बाल भी बांका न हुआ. इसलिए कि बहुत पहले से इसे रोजीरोटी से जोड़ दिया गया था. उस व्यवस्था में समस्त संसाधनों पर कथित ऊंची जातियों का कब्जा था. क्षत्रिय को हथियार उठाने का अधिकार दिया गया था. ब्राह्मण को सलाह देने का. इन दोनों ने बाकी वर्गों को उभरने ही नहीं दिया. जिसने विरोध किया, उसको दंडित किया गया. धीरेधीरे ये जातियां व्यवस्था से अनुकूलित होती गईं. धर्म ने इसमें मदद की. पिछला जन्म किसी ने देखा नहीं था, न उसका कोई प्रमाण ही था. बावजूद इसके हिंदुओं में कर्मसिद्धांत की ऐसी आंधी चली कि अच्छेअच्छों के विवेक को उड़ाकर ले गईं. लोग लकीर पीटने के अभ्यासी होते चले गए. शताब्दियों तक ऐसा ही चलता रहा.

गौरतलब है कि गौतम बुद्ध ने जाति व्यवस्था के विरोध में सीधे कुछ नहीं कहा था. केवल भिक्षुसंघ में सभी जातिवर्ग के लोगों को प्रवेश देकर बराबरी का संदेश दिया था. लेकिन उसका चामत्कारिक असर हुआ. धार्मिक बंधन शिथिल पड़ने से लोग, विशेषकर कर्मकार जातियां भविष्य के बारे में नए सिरे से सोचने को उद्धत हुए. संसाधनों की कमी को उन्होंने अपने संगठनसामथ्र्य से पाटा. भारतीय शिल्पकार संगठन हालांकि पहले से ही अंतद्र्वीपीय बाजार में आगे थे. गौतम बुद्ध के समय में उसमें बहुत तेजी से वृद्धि हुई. तेली, चर्मकार, बुनकर, काष्ठकार, रंगरेज, राजमिस्त्री, गुड़ बनाने वाले, रथवाह आदि जितने भी शिल्पकार वर्ग थे, उन सबके अपनेअपने व्यावसायिक संगठन थे. वैदिक परंपरा में प्रतिवर्ष लाखों पशुओं की यज्ञों में दी जानेवाली बलियों के कारण तत्कालीन समाज की अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ा था. बौद्ध और जैन दर्शन के प्रभाव में बलि में कमी आई थी. बचा हुआ पशुधन किसानों और पशुपालन द्वारा आजीविका चलाने वाली जातियों के लिए आर्थिक रूप से बहुत मददगार सिद्ध हुआ था. इसका प्रभाव उस समय के व्यापार पर पड़ा था. उसमें तेजी आई. सहयोगाधारित उन व्यापारिक संगठनों को श्रेणि, पूग, गिल्ड, व्रात्य, संघ आदि कहा जाता था. चंद्रगुप्त मौर्य तक तो श्रेणियां खुद को प्रमुख आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित कर चुकी थीं. श्रेणियों की शक्ति का आकलन इससे भी किया जा सकता था कि कौटिल्य उनके संगठनों को राज्य पर संकट की संभावना के रूप में देखता है. इसलिए उसने श्रेणियों पर नजर रखने की अनुशंसा ‘अर्थशास्त्र’ में की थी. श्रेणियों की आर्थिक हैसियत ऊंची थी. वे जरूरतमंद राजाओं की आर्थिक मदद भी खूब करती थीं. ईसा पूर्व दोतीन सौ वर्ष के समय को अनेक विद्वान भारत का स्वर्णकाल मानते हैं. उसके पीछे शिल्पकार संगठनों का बड़ा योगदान था. अर्थव्यवस्था विकेंद्रीकृत थी. गांव संपन्न, आत्मनिर्भर इकाई. धीरेधीरे श्रेणियों का पतन होने लगा. दूसरीतीसरी शताब्दी में उनके कारोबार में मंदी आने लगी थी. इसका पहला कारण बौद्ध धर्म के कमजोर पड़ते ही जातिवादी बंधनों का एक बार फिर मजबूत हो जाना था. व्यापारी संगठन को चलाने के लिए अनेक प्रकार के शिल्पकारों की जरूरत पड़ती थी. पहले वे अपनी जातीय शुचिता को बिसराकर साथसाथ काम करते थे. जातीय अनुशासन मजबूत होने से एकजुट होकर काम करना कठिन हो गया. देश छोटेछोटे राज्यों में बंटने लगा था. खुलकर व्यापार करना कठिन होता गया. श्रेणियों के कारोबार में कमी आई. शिल्पकार संगठन बिखरने से लोग एक बार फिर अपनीअपनी जाति के दड़बों में लौटने लगे. इस तरह जातीयता के बंधनों के शिथिल पड़ने की जो शुरुआत बुद्ध के समय हुई थी, उसपर पानी फिरने लगा. आगे चलकर वर्णव्यवस्था और भी रूढ़ होने लगी. उससे नईनई जातियां बनने लगीं. जातीय शुचिता के नाम पर भेदभाव परोसा जाने लगा.

मध्यकाल में जाति विरोधी आंदोलन के सूत्रधार संतकवि थे. संत रैदास, कबीर, दादू, आदि समाज के निचले वर्गों से आए थे. जो जातीय उत्पीड़न का शिकार थे. इसलिए उन्होंने जातिआधारित ऊंचनीच को अपनी समानताधारित समाज की स्थापना के सपने का अवरोधक माना था. लेकिन समानता से उनका आशय बस इतना था कि गरीबगरीब रहे, अमीरअमीर और सब अपनेअपने संतोष के साथ जीना सीख लें. बावजूद इसके संत कवि जातीय उत्पीड़न का शिकार रहे लोगों की उम्मीद का केंद्र थे. इसलिए वे संत कवियों के आसपास जुटने लगे. जातिभेद को बढ़ावा देने के लिए संत कवियों ने ब्राह्मणों एवं जाति के पैरोकारों को ललकारा. लेकिन कुछ खास नहीं कर पाए. बहुत जल्दी उनके आंदोलन को संस्कृति का हिस्सा बनाकर हिंदू धर्म में समाहित कर लिया गया. सामंतवादी दौर में उनकी आर्त्त पुकार झोपडि़यों और चौराहों पर दम तोड़ने लगी. जाति को सामाजिक असमानता एवं अंतर्द्वंद्वों का कारण मानते हुए विवेकानंद, दयानंद आदि ने भी उसकी आलोचना की. लेकिन परिणाम लगभग शून्य ही निकला. उनकी असफलता के कारण एकदम स्पष्ट थे. वे विचारक चाहते थे कि कथित ऊंची जातियां अपने से निम्न जातियों के प्रति करुणाभाव लाएं और अपने मन से ऊंचनीच की भावना को निकाल फैंकें. प्रकारांतर में जाति उन्मूलन उनके लिए शीर्षस्थ जातियों की कृपा पर टिका ऐच्छिक प्रश्न था. विचारक शीर्ष जातियों से अपेक्षा करते थे कि वे अपना बड़प्पन दिखाते हुए जातीय भेदभाव को दिल से निकाल फेंकें और पिछड़े वर्गों के साथ करुणा के साथ पेश आएं. यह ठीक ऐसा ही था, जैसे ‘ट्रस्टीशिप’ के सहारे गांधी जी ने जमींदारों और पूंजीपतियों से दुर्बल और आर्थिक रूप से विपन्न लोगों के पक्ष में, अपने संपत्ति अधिकार समाज को सौंप देंने का आवाह्न किया था. जबकि मुफ्त में मिलने वाला सम्मान हो या सुविधाएं, शिखरस्थ वर्ग अपनी मर्जी से कुछ भी छोड़ने को तैयार न थे. अतएव इन महापुरुषों की सदेच्छाओं तथा वक्त की जरूरत होने के बावजूद जाति की सामाजिक सत्ता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा. फिर भी उन महापुरुषों के प्रयास निरर्थक नहीं गए. उनके अनथक प्रयत्नों के फलस्वरूप समाज में थोड़ी हलचल अवश्य मची. लोग धर्म और जाति के नाम पर होने पाखंड के प्रति एकजुट होने लगे. जिससे समाज सुधार के आंदोलनों को प्रेरणा मिली. उसके फलस्वरूप विचारकों का ध्यान निचले वर्गों समस्याओं की ओर गया.

जाति विरोधी प्रयासों की असफलता के कुछ कारण एकदम साफ थे. जातीय संरचना के संगठन से जुड़ी, उसके बनाए रखने की समर्थक जातियों की मूल प्रवृत्ति कछुए के समान थी. परिस्थितियां प्रतिकूल हों तो वे कछुए की भांति अपने अंगप्रत्यंगों को धर्म के कवच में ढक लेती थीं. परिस्थितियां अनुकूल होते ही अपने पैने नखदंतों के साथ वे अपने आलोचकों पर आक्रामक होकर जातीयता के बंधनों को और भी कसने लगती थीं. जैसा लगभग 1900 वर्ष पहले बौद्ध धर्म के अवसान के समय देखने को मिला. बुद्ध ने जाति का सीधे विरोध नहीं किया था. मगर उनके बौद्ध विहारों के दरबार सभी जातिवर्गों के लिए खुले थे. उन्होंने हिंदू धर्म में व्याप्त कुरीतियों और बलिप्रथा के माध्यम से उसपर गहरी चोट की. बावजूद इसके बौद्ध दर्शन ने जितनी चोट वैदिक धर्मदर्शन पर की थी, उतनी चोट जाति प्रथा पर नहीं कर सका. उनका विरोध मुख्यतः हिंदू धर्म में व्याप्त कर्मकांड तथा बलि प्रथा से था. जो सामाजिक असमानता को सांस्थानिक बनाते थे. इसलिए जाति उन्हें अपनी संघीय मान्यताओं की अवरोधक लगी. चूंकि बौद्ध दर्शन धर्म की अधीनता में जाति व्यवस्था का विरोध करता था, इसलिए उसका जाति पर वास्तविक प्रभाव बहुत ही कम पड़ा.

जाति और सामाजिक गतिशीलता

जाति हिंदू धर्म की मानस रचना है. उसका पूरा कारोबार धर्म के सहारे चलता है. हिंदू धर्म मजबूत, तो जाति मजबूत. हिंदू धर्म शिथिल तो जाति बंधन शिथिल. बौद्ध धर्म ने हिंदू धर्म को पाश्र्व में ढकेला तो जाति भी नेपथ्य में जाने लगी थी. अठारहवीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य के कमजोर होने के साथ हिंदू धर्म ने अपनी जड़ें दुबारा मजबूत कीं तो जाति भी सिर उठाने लगी. महाराष्ट्र, दक्षिण भारत, बंगाल यानी जहांजहां हिंदू धर्म पुनर्जागरण की ओर बढ़ा, वहांवहां जाति भी पांव पसारने लगी. हिंदू धर्माचार्यों में से अनेक आज भी जाति को हिंदू धर्म का आभूषण समझते हैं. उन्हें आज भी लगता है कि जाति के न रहने पर धर्म संकट में पड़ सकता है. इसलिए आजादी के सातवें दशक में भी दलितों को मंदिर की चौखट पर देख उन्हें अपना धर्म संकट में नजर आने लगता है. विषम परिस्थितियों में भी वे शांत नहीं बैठते. जबतब जाति विरोधी आंदोलन होते हैं, जब उनमें लगे लोगों को लगता है कि वे बस जीतने ही वाले हैं, जाति का जनाजा अब उठा कि बस अब उठा; तब तब वे ऐसी चाल चलते हैं कि परिवर्तन और सुधार की सारी संभावनाओं पर पानी फिर जाता है. जाति समर्थक लोग धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीयता की आड़ में, बहुत तसल्ली के साथ जाति को तरहतरह से मजबूत कर, सामाजिक व्यवहार के केंद्र में बनाए रखने हेतु जुटे होते हैं. उनके प्रयास बहुत ही महीन, आसानी से न समझ में आनेवाले होते हैं. जिन दिनों बौद्ध धर्म प्रभाव में था, उन दिनों पुराणों और स्मृतियों के लेखन में तेजी आई थी. मध्यकाल में किस्सेकहानियों के माध्यम से ब्राह्मणवाद में जान फूंकी गई तो भक्ति साहित्य में जाति को बचाए रखने का काम तुलसी, सूरदास, मीरा, हरिदास जैसे भक्त कवियों ने किया. इन दिनों कानून के दखल से जाति संबंधी आचारविचार शिथिल पड़े हैं तो जातिवादी संगठन उसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का कवच पहनाने की तैयारी में लगे हैं. धर्म और जाति के इस नाभिनाल संबंध को सर्वप्रथम महामना ज्योतिबा फुले ने समझा था. इसलिए उन्होंने जाति के मूल यानी धर्म की विकृतियों पर प्रहार किया. उनके आंदोलन को जमीन शाहू जी महाराज ने दी. दलितोंशोषित वर्गों को आत्मविश्वास से लैस करने, अपने अधिकारों के लिए खड़े होने तथा दलित आंदोलन को सही दिशा देकर नई युगचेतना लाने का सबसे महत्त्वपूर्ण काम डॉ. अंबेडकर ने किया. फलस्वरूप अस्मितावादी आंदोलनों को जमीन मिली. दबेकुचले लोग अपने अधिकारों के लिए आगे आने लगे.

पहले जाति प्रथा की आलोचना वे लोग करते थे जो खुद जातीय उत्पीड़न और असमानता का शिकार थे. तब उत्पीडि़त वर्ग जाति का उच्छेद चाहता था. उसके लिए ‘जातितोड़क’ आंदोलन चलाए गए थे. स्वयं डॉ. अंबेडकर ने ‘जाति का उच्छेद’ पुस्तक लिखकर जाति और जातिवादी शोषण दोनों को कठघरे में खड़ा कर दिया था. अब हालात बदले हुए हैं. जातीय शोषण का शिकार रहे वर्ग अब जाति को ही हथियार बना रहे हैं. ऐसा नहीं है कि जातिआधारित शोषण समाप्त हो चुका है? या उन्होंने उन्होंने जाति के नाम पर सामाजिक ऊंचनीच से समझौता कर लिया है. जातीय आधार पर ऊंचनीच की भावना तो आज भी बरकार है. लेकिन वह केवल सामाजिक संबंधों तक सीमित है. लोकतंत्र ने जाति आधारित भेदभाव को सिद्धांततः समाप्त किया है. अस्पृश्यता आज एक कानूनी अपराध है, भले ही सामाजिक स्तर पर उसके अवशेष आज चिंता का विषय हों. कानून हालांकि बराबरी का अधिकार देता है, लेकिन सामाजिक और आर्थिक स्तर पर भेदभाव पूरी तरह बना हुआ है. इसलिए नए परिवेश में जातीय शोषण का शिकार रहे वर्गों को अपनी रणनीतियों में संशोधन करना पड़ा है. दलितों और पिछड़ों की समझ में आ चुका है कि केवल कानूनी प्रावधान होने से समानता के लक्ष्य को प्राप्त कर पाना असंभव है. कल्याण राज्य की अवधारणा के चलते सरकार से कुछ उम्मीद की जा सकती है, लेकिन अपनी पैठ और राजनीतिक हैसियत का लाभ उठाकर सत्ता में बारीबारी से वही लोग आते रहते हैं, जो जातीय शोषण के लिए जिम्मेदार हैं. ऐसी परिस्थितियों में शोषित वर्ग का नया संघर्ष आनुपातिक हिस्सेदारी को लेकर है. दलित और पिछड़े वर्ग अब संसाधनों और अवसरों में आनुपातिक हिस्सेदारी की मांग कर रहे हैं. चूंकि यह मांग न्याय सम्मत है, इसलिए संवैधानिक स्थितियां भी उनके पक्ष में हैं. इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा है. जाति को लेकर हीनताबोध समाप्त हो चुका है. दबीकुचली जातियां पहले सरकार और शीर्षस्थ वर्गों से अपनी जरूरतों की भरपाई की उम्मीद करती थीं, दैन्य दिखाती थीं, उनसे विकास के समुचित अवसरों की मांग करती थीं. अब उन्हें लगता है कि दैन्य दिखाने, गिड़गिड़ाने की अपेक्षा संगठित संघर्ष द्वारा, अपने अधिकारों को ससम्मान प्राप्त किया जा सकता है.

पेशागत आधार पर भी जातीय विभाजन बेमानी सिद्ध हो रहा है. ब्राह्मण चमड़े का काम करने लगे हैं. जबकि चर्मकार जाति के होनहार पढ़लिखकर दूसरों को पढ़ाने लगे हैं. दूसरी दबीकुचली जातियां भी मुख्यधारा की ओर बढ़ रही हैं. गति बहुत धीमी है, मगर जैसेजैसे लोग शिक्षित हो रहे हैं, उनमें अपने अधिकारों के प्रति चेतना भी बढ़ती जा रही है. यदि आधुनिक समाज में परिवर्तन की ललक है और कुछ समूह तेजी से विकास की ओर अग्रसर हैं तो इसका एक कारण यह भी है कि वे लोग जो शताब्दियों तक शोषितउत्पीडि़त होते आए थे, जिन्होंने पीढ़ीदरपीढ़ी जातीय आधार पर भेदभाव, उत्पीड़न, और असमानता का दंश सहा है, जिन्हें जाति के आधार पर विकास के अवसरों से वंचित रखा गया थाअब संगठित होकर विकास में साझेदारी चाहते हैं. प्रौद्योगिकी के अलावा जाति आज सामाजिक गतिशीलता की सबसे बड़ी उत्पेरक है. कुछ मामलों में तो यह प्रौद्योगिकी से अधिक प्रभावशाली है. आधुनिक प्रौद्योगिकी की क्षमताएं अनंत हैं. मगर पूंजीपतियों के नियंत्रण के कारण वह फैशन का हिस्सा बन चुकी है. वह मनुष्य को तकनीक के स्तर पर समृद्ध, किंतु मनोभौतिक स्तर पर बौद्धिकविपन्न बना रही है. एक तरह से जीतेजागते मनुष्यों को मशीन में तबदील कर रही है. दूसरी ओर जाति नएनए विमर्श छेड़कर मानवसमाज को नए विचारों से लैस कर रही है. जाति के पीछे कोई कल्याणकारी विचारधारा नहीं है. हो भी नहीं सकती. किंतु जाति के माध्यम से संघर्षरत आंदोलनकारियों को लगता है कि केवल संगठित प्रतिकार ही उन्हें समाजार्थिक शोषण से मुक्ति दिला सकता है. कुछ लोग जाति के उभार से खिन्न हैं. वे लगातार आरोप लगा रहे हैं कि जातिवादी आंदोलन देश को शताब्दियों पीछे ले जाने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसा सोचने वालों में वही लोग हैं जिन्हें अस्मितावादी आंदोलनों से खतरा है. जो जाति के नाम पर संगठित होते युवाओं को संस्कृति और राष्ट्र के वास्ते जाति से अलग होने को उपदेश दे रहे हैं. जबकि जाति स्वयं उनके आचारव्यवहार का हिस्सा है. समाचारपत्रों में छपने वाले वैवाहिक विज्ञापनों से उनकी मनस्थिति और द्वैध को आसानी से समझा जा सकता है. कुल मिलाकर जातीय शोषण का शिकार रहे वर्गों के लिए आज जाति ही सबसे बड़ा हथियार है. वे कांटे से कांटा निकालना चाहते हैं. जाति उन्हें संगठित होने में मदद करती है. इसलिए कार्यविभाजन की अवैज्ञानिक शैली होने के बावजूद अधिकांश मानवसमूह जाति को संगठनकारी औजार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं.

इन दिनों एक ओर तो विभिन्न जातियों के बीच अस्मिता की पहचान को लेकर होड़ मची हुई है. दूसरी ओर आरएसएस जैसे संगठन धर्म और संस्कृति को रोपने में लगे हुए हैं. इसलिए जो लोग भारतीय समाज को जातिमुक्त देखना चाहते हैं, उन्हें धर्म की संकल्पना में आमूलचूल बदलाव करना पड़ेगा. जो समझते हैं कि हिंदू धर्म अपने वर्तमान स्वरूप में, लुंजपुंज देवताओं की फौज के रूप में रहे और जाति चली जाए? वे या तो बहुत भोले हैं या जाति व्यवस्था के उन्मूलन के प्रति अगंभीर हैं. बहुजन राजनीति के पैरोकार इस तथ्य को बाखूबी समझते हैं. इसलिए वे इस बार जाति के सवालों को सीधे नहीं उठा रहे हैं. देखा जाए तो उठा ही नहीं रहे हैं. शताब्दियों से जो जाति के औचित्य पर सवाल उठाते थे, अब उन्होंने इसे भारतीय समाज की हकीकत के रूप में, भले ही अस्थायी तौर पर, स्वीकार कर लिया है. इसलिए जाति के आधार पर सवाल उठाने के बजाय उसके आधार पर हुए समाजार्थिक शोषण और गैरबराबरी पर सवाल उठाए जा रहे हैं. जाति का सहारा लेकर शोषित और वंचित वर्गों को संगठित किया जा रहा है. लंबे अर्से के बाद यह समझ लिया है कि लोकतंत्र में राजनीतिक सहभागिता सामाजिक अन्याय को मेटने वाले प्रमुख उपकरणों में से है. इससे आर्थिक समानता के उस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है, जो मनुष्यता का अभीष्ट है. इस विभेदकारी समस्या के निदान के लिए शिक्षा और संसाधनों में साझेदारी की आवाज बुलंद की जा रही है. चूंकि इस बार जाति भी समानता के संघर्ष का एक हथियार है, इसलिए उससे सबसे अधिक तखलीफ उन लोगों को हो रही है, जो अभी तक जाति प्रथा का लाभ उठाते आए हैं. और जिसका सहारा लेकर उन्होंने बहुसंख्यक समाज को अपना आश्रित बनाए रखा है.

एक समय था जब आर्थिक सुदृढ़ीकरण देश के विकास की धुरी था. विशेषकर देश की आजादी के समय. तब आर्थिक उन्नति को लेकर नईनई योजनाएं बनाई जा रही थीं. इन दिनों सामाजिक न्याय जैसी समसामयिक अवधारणा विकास के साथ जुड़ चुकी है. विकास हो और उसका लाभ देश के सभी वर्गों तक पहुंचेꟷ˹ऐसी अपेक्षा की जाती है. सामाजिक न्याय के संघर्ष में जाति एक तात्कालिक माध्यम बन सकती है. लेकिन यह एकदम आसान भी नहीं है. जाति की अवधारणा ही अपने आप में नकारात्मक है. अतएव जाति को औजार की तरह इस्तेमाल कर रहे वर्गों और समूहों को समझना चाहिए कि औजार केवल माध्यम होता है. वह लक्ष्य को अपेक्षाकृत सुगम तो बनाता है, लेकिन स्वयं लक्ष्य नहीं होता. इसलिए अस्मितावादी आंदोलनों की मूल प्रवृत्ति छोटे जातिसमूहों को बड़े जाति समूहों में ढालने, जन से बहुजन और बहुजन से सर्वजन की ओर ले जाने वाली होनी चाहिए. ऐसा होगा, तभी जाति के कलंक से मुक्ति पाई जा सकती है. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का सामना वैकल्पिक जनसंस्कृति और श्रमसंस्कृति के उभार द्वारा आसानी से किया जा सकता है. वह ऐसी संस्कृति होगी जिसमें लोग धर्म के आधार पर नहीं हितों की समानता के आधार पर एकजुट होंगे तथा परस्पर सहयोग करते हुए आगे बढ़ेंगे. उस समय धर्म और उसपर टिकी विभेदक संस्कृति उनके रास्ते के सबसे बड़े अवरोधक होंगे. तब यह याद रखना उन्हें विशेष बल देगा कि प्रकृति ने अधिकार तो सभी को दिए हैं, बराबर दिए हैं, मगर विशेषाधिकार संपन्न किसी को भी नहीं बनाया है.

© ओमप्रकाश कश्यप