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बेलगाम पूंजीवाद को लगाम

सामान्य

आलेख 

एक

 

बीसवीं शताब्दी का पूर्वार्ध पूंजीवाद के विकास का था. उस कालखंड में पूंजी का वर्चस्व पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ा; और मुनाफा जिसे कभी व्यावसायिक नैतिकता के अनुपालन में मर्यादित रखने की सलाह दी जाती थी, उसे आर्थिक विकास के नजरिये से देखा जाने लगा था. पूंजीवाद का अभीष्ट थाबाजार पर एकाधिकार और अधिकतम मुनाफा. यह कहीं न कहीं श्रम शोषण से जुड़ा मसला भी था. इतिहास की तह में जाकर देखें तो पता चलेगा कि श्रमशोषण की समस्या पूंजीवाद की पूर्ववर्ती अर्थव्यवस्थाओं में भी थी. सहयोगाधारित संगठनों को छोड़कर, जिनके बारे में 3000 वर्ष पहले तक की जानकारी उपलब्ध है—श्रमशोषण प्रायः हर युग की समस्या रही है. बल्कि लंबे युग तक इसे नियतिबद्ध मानते हुए गंभीरता से लिया ही नहीं गया. सहयोगाधिारित संगठनों ने इस समस्या का सार्थक समाधान खोजने की कोशिश की थी. उस समय तेली, रंगरेज, बुनकर, राजमिस्त्री, काष्ठकार जैसे दस्तकारों के प्रभावशाली संगठन थे. समाज में उनका खासा मानसम्मान था. हालांकि उसी युग में जिसे सहयोगाधारित संगठनों का स्वर्णकाल माना जाता है, समानांतर रूप में दासप्रथा भी कायम थी.े दास की निजी इच्छाओं का कोई महत्त्व न था. वह एकमात्र अपने स्वामी की इच्छा से नियंत्रित होता था. प्रकारांतर में उससे अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने के अधिकार छीन लिए जाते थे. कालांतर में जैसेजैसे छोटे राज्यों का विकास हुआ, श्रमिक संगठनों के लिए स्वतंत्र रूप में काम करना कठिन होता गया. अद्वितीय शिल्पी जो अपने कौशल के लिए दूरदूर तक जाने जाते थे, वे पूरी तरह राज्याश्रित होने लगे. स्वामी प्रसन्न तो इनामइकराम की भरमार, स्वामी अप्रसन्न तो मृत्युदंड तक की नौबत आ जाती थी. उसके विरुद्ध सुनवाई किसी अदालत में संभव न थी. संभव है सहयोगाधारित संगठन भी दासों की सेवाएं लेते हों. लेकिन शिल्पकार और पेशेवरों द्वारा गठित वे संगठन निजी लाभ के साथसाथ सामाजिक लाभ की वांछा से चलाए जाते थे. उनमें स्वामीश्रमिक संबंधों नहीं होते थे. समूह के अंदर कार्यों का सामान्य सहमति के आधार पर विभाजन और अन्योन्याश्रितता होती थी. श्रेणियों का यह गुण उन्हें समकालीन उत्पादक समूहों से श्रेष्ठतर और मानवीय सिद्ध करता है.

मशीनी क्रांति के आरंभ में श्रमिकों को उम्मीद थी कि पूंजीवाद का आगमन सामंती शक्तियों के पतन में सहायक होगा, फलस्वरूप श्रमिक को श्रम और शिल्पकार को उसके शिल्पकौशल का भरपूर प्रतिदेय प्राप्त होगा. वे अपने श्रमकौशल का मूल्यांकन करने को पूर्ण स्वतंत्र होंगे. इसमें कोई संदेह नहीं कि पूंजीवाद ने सामंतवाद की अनेक ज्यादतियों पर प्रहार किया. कठिन श्रम से मुक्ति दिलाने में भी नई प्रौद्योगिकी मनुष्य की मददगार बनी. औद्योगिक अर्थव्यवस्था ने बेगार जैसी कुप्रथाओं पर नियंत्रण लगाया था. श्रमिक को उसके श्रम के बदले नकद भुगतान किया जाने लगा. किंतु श्रम पर पूर्ण स्वत्वाधिकार; यानी श्रममूल्य के निर्धारण का अधिकार जो श्रमिक की पुरानी नीतिसम्मत मांग थी—पर पूंजीपतियों और सरमायेदारों का अधिकार यथावत था. वैज्ञानिक क्रांति ने उत्पादन वृद्धि के जो नए रास्ते ईजाद किए थे, उनका अधिकांश लाभ पूंजीपति के हिस्से आया था. कामगारों को तुलनात्मक रूप से बहुत कम, बल्कि नगण्य लाभ पहुंचा था. नई प्रौद्योगिकी समाज में आर्थिक असमानता की खाई को और गहरा करने में सहायक बनी, जिसके परिणामस्वरूप पूंजीवादी शोषण का दायरा लगातार बढ़ता गया.

नई अर्थव्यवस्था में व्यावसायिक और उत्पादक इकाइयों को प्रतिस्पर्धी बनने/बनाने की अपेक्षाओं के चलते मुनाफे को तय करने का अधिकार समाज एवं सरकार के हाथों से खिसककर, पूर्णतः पूंजीपति के हाथों में चला गया. कुछ अपवादों को छोड़कर पूंजीपतियों को मिला अधिकार असीमित था. विशेषकर श्रमिकसंबंधी विषयों को लेकर. श्रमअधिकारों के संरक्षण हेतु कुछ कानून अवश्य बनाए गए. लेकिन उनका रास्ता इतना लंबा, दुरूह और जटिलताओंभरा था कि साधारण श्रमिक द्वारा उनका लाभ उठाना तो दूर, समझना तक कठिन था. इस तरह प्रतिस्पर्धा का पहला शिकार बना था—श्रमिक. दूसरा वह शिल्पकर्मी जिसके पास सिवाय अपने शिल्पकर्म के उपार्जन का कोई और माध्यम नहीं था. नतीजा यह हुआ कि जो शिल्पकर्मी प्राचीन समाजों में अपने हुनर के लिए सराहे जाते थे, जिनका विशेष मानसम्मान था, वे बेरोजगारी का शिकार होने लगे. इससे उनका कलाकौशल भी दम तोड़ने लगा, जो उन्होंने पीढि़यों के संघर्ष के बूते प्राप्त किया था. उचित यही था कि जिस प्रकार उद्यमी अपने उत्पाद के मूल्यनिर्धारण को स्वतंत्र होता है, श्रमकौशल के मूल्यांकन की वैसी ही स्वतंत्रता श्रमिक और शिल्पकार को भी प्राप्त होती. व्यावसायिक और सामाजिक नैतिकता की दृष्टि से भी यही अपेक्षित था. परंतु प्रौद्योगिकीकरण ने श्रम और शिल्प दोनों के सक्षम और सस्ते विकल्प पेश किए थे. परिणामस्वरूप श्रमिक और कामगार वर्गाें के ऊपर बेरोजगारी की तलवार लटकने लगी थी. मशीनों ने मानवश्रम का विकल्प बनना शुरू किया तो बेरोजगारी संकट से घिरे, हतोत्साहित शिल्पकार और मजदूर पूंजीपतियों पर निर्भर होते चले गए. उनके शिल्प और श्रम के मूल्यांकन का अधिकार उन लोगों के हाथों में चला गया जो केवल और केवल अपने मुनाफे के लिए काम करते थे.यह पूंजी की सुदृढ़ता का पहला चरण था. दूसरे चरण की शुरुआत उपभोक्तावाद से होनी थी. जिसमें उत्पादन व्यक्ति की जरूरत के बजाय पूंजीवादी अर्थतंत्र की लाभकामना के निमित्त होता था. उसकी शुरुआत तो मशीनीकरण के साथ ही हो चुकी थी, मगर वास्तविक सफलता मध्य वर्ग के मजबूत आर्थिक शक्ति बनने के बाद संभव हो सकी.

स्वाधीन भारत में कल्याण राज्य की नींव रखी गई और आजादी का लाभ सभी वर्गों तक पहुंचाने के लिए मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया गया. सोचा गया कि राष्ट्रीय महत्त्व के जितने भी भारी उद्यम हैं, उनपर सरकार का अधिपत्य हो. इसके फलस्वरूप सार्वजनिक उद्यमों की स्थापना की गई थी. मगर कमजोर नेतृत्व, इच्छाशक्ति का अभाव, पूंजीपति और भ्रष्ट नौकरशाही के अनुचित गठजोड़ में फंसकर, वे लगातार घाटे का शिकार होने लगे. भारीभरकम पूंजी के आधार पर लगे सार्वजनिक उद्यमों पर पूंजीपतियों की कुदृष्टि थी. येनकेनप्रकारेण वे उनपर एकाधिकार चाहते थे. आजादी के तीसरे दशक बाद से राजनीति पर पूंजीपतियों का प्रभाव बढ़ने लगा था. इसलिए हुआ वही जो पूंजीपति तथा उनके चहेते भ्रष्ट नेता चाहते थे. बीसवीं शताब्दी के समाप्त होतेहोते यह मान लिया गया कि मिश्रित अर्थव्यवस्था के बूते दुनिया के साथ स्पर्धा कर पाना असंभव है. इसलिए उदारीकरण के बहाने भारतीय बाजारों को दुनियाभर के उद्यमों के लिए खोल दिया गया. इसी के साथ देशभर में प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित दोहन और शोषण की शुरुआत हो गई. पूंजीपतियों और वैश्विक कारपोरेट घरानों की गिद्धदृष्टि अर्से से इस देश के प्राकृतिक संसाधनों पर टिकी थी. उदारीकरण के साथ वे उन संसाधनों को औनेपौने दामों में खरीदने या जोड़तोड़ द्वारा हड़पने का स्वप्न देखने लगे. मिश्रित अर्थव्यवस्था के दौरान पिछले पचास वर्षों में जो बड़ेबड़े सार्वजनिक उद्यम खड़े किए गए थे, उनसे पीछा छुड़ाने के लिए विनिवेश पर खास जोर दिया गया. सरकार किसी भी दल की रही हो, अपनीअपनी तरह से सभी ने, कभी प्रकट रूप में तो कभी पिछले दरवाजे से, उदारवाद और विनिवेशीकरण को बढ़ावा दिया. यह अवधारणा बनी कि कारखाने चलाना सरकार का काम नहीं है. उसका काम केवल शासन और व्यवस्था संभालना है. नतीजा यह हुआ कि कुछ वोटबटोरू, लोकप्रिय योजनाओं को छोड़कर बाकी योजनाएं निजी हाथों की ओर खिसकने लगीं. यह काम पश्चिम की तर्ज पर किया गया, जिनकी पहचान विकसित देश के रूप में थी. जहां शिक्षा, भोजन, आवास और बेरोजगारी जैसी समस्याएं उतनी भयावह नहीं थीं, जितनी वे भारत सहित दूसरे विकासशील एवं अल्पविकसित देशों में. पिछली ढाई दशाब्दियों से तो पूरी अर्थव्यवस्था ही पूंजीवाद के नाम लिख जा चुकी है.

घोषित रूप से समाजवादी भारत में पूंजीवाद ने बड़े नाजुक अंदाज में, उदारवाद के नाम से प्रवेश किया था. चूंकि अर्थव्यवस्था के पूंजीकरण को लेकर समाज में अनेकानेक अंतर्विरोध थे पहला अंतर्विरोध यहां की जाति व्यवस्था के रूप में था, जिसमें व्यक्ति को अरुचि और अनिच्छा के बावजूद पैत्रिक पेशे की ओर ढकेल दिया जाता था. अंततः वह उसको अपनी नियति मानकर, परंपरा की लकीर पीटते हुए काम करता था. चूंकि उसके पास भविष्य को लेकर कोई बड़ा सपना नहीं होता था, इसलिए साधारणतः उसके काम में रचनात्मक कौशल और मौलिकता का अभाव रहता था. यह कमी कथित ऊंची जातियों में भी थी. ‘पंडिज्जी’ संबोधन सुन, फूलकर कुप्पा हो जानेवाले ब्राह्मणपुरोहित कथावाचन को ज्ञान, रटंत को शिक्षा और कर्मकांडों को सभ्यता एवं संस्कृति मानकर, एक पोथीपत्रा पढ़ते हुए ‘अंधों में काना सरदार’ वाली कहावत को चरितार्थ करते रहते थे. वास्तव में ज्ञान से उनका नाता केवल रटे हुए को रटाने तक सीमित था. उन अंतर्विरोधों को दूर करने, देश को बड़े परिवर्तन के लिए तैयार करने के बजाए आननफानन में उदारीकृत अर्थनीतियों को लागू किया था. उसका दुष्परिणाम यह हुआ कि भारत विश्वउत्पादकों के लिए मंडी बन गया. छोटेमोटे लाखों उद्यम, जिनसे देश के करोड़ों लोगों को रोजगार मिलता था, धीरेधीरे बंद होने लगे. सरकार किसी भी दल की रही हो, उसकी व्यापार नीति करीबकरीब एक समान और पूंजीपतियों की हितरक्षक रही है. आज ‘मेक इन इंडिया’ की हवा में भी लघु, कुटीर उद्यमों तथा छोटे व्यवसायों की सुध लेने वाला कोई नहीं है. अब तो इसे देखकर ऐसा लगता है कि वह खुद पर सवारी गांठ रहे सहसवार के नियंत्रण से भी बाहर जा चुका है.

पूंजीवाद को मिली इस अप्रत्याशित सफलता का राज? कौनसा विचार है जिसने नईपुरानी सभी पीढि़यों को अपने मोहपाश में जकड़ लिया है? जवाब है, कोई नहीं. पूंजीवाद की सफलता का एकमात्र रहस्य है कि वह अपने उपभोक्ताओं को विचारधाराओं के दबाव से मुक्त करता है. परंपरागत सामाजिक मूल्यों के के स्थान पर वह उत्पादकउपभोक्ता के संबंधों को ले आता हौ. ‘जिन चीजों से मनुष्य को सुख प्राप्त हो, उन्हें प्राप्त करने का उसे अधिकार है.’—यह धारणा पूंजीवाद का आदर्श है. यह धारणा मनुष्य और पशु के अंतर को मिटाती है. समाज को उत्पादक और उपभोक्ता में बांट देती है. उत्पादक का सुख अधिकतम मुनाफे में निहित होता है. इसलिए अपने सुख की तलाश में बाजार में पहुंचे उपभोक्ता, बहुसंख्यक होने के बावजूद, उत्पादक की अधिकतम लाभ में अपना सुख खोजने की मानसिकता के विरुद्ध कोई नैतिक दबाव नहीं बना पाते. 1751 में फ्रांस के अर्थशास्त्री फ्रांसिस केने ने पहली बार ‘लेजेज फेयर’ पद का उपयोग कर, उद्योगों को नियंत्रण मुक्त करने की सलाह दी थी. आगे चलकर एडम स्मिथ ने केने की इस मान्यता को तर्कसम्मत ढंग से आगे बढ़ाया. वे उद्योगों को नियंत्रण मुक्त करने की मांग कर रहे थे, क्योंकि उन्हें उद्यमों की स्वतंत्रता में ही राष्ट्र हित नजर आता था. वे भूल गए थे कि उत्पादकों को नियंत्रण मुक्त करने के पीछे एडम स्मिथ का ध्येय राष्ट्रीय उत्पादन में वृद्धि करना था, न कि अर्थव्यवस्था को कुछ पूंजीपतियों के हाथों में सौंप देना. इसलिए उसने ‘वैल्थ आ॓फ नेशन’ लिखा था, न कि ‘वैल्थ आ॓फ कैपीटलिस्ट’. नीतिनिर्माण की दृष्टि से तत्कालीन राजनीतिज्ञों की भूमिका किसी भी पूंजीपति की अपेक्षा अधिक सामथ्र्यशाली थी. वे राष्ट्रहित के अनुसार आवश्यक निर्णय लेने के लिए पूर्ण स्वतंत्र थे. मगर कुछ ही दिनों में औद्योगिक संस्थानों को दी गई स्वतंत्रता सरकार की सीमा बनने लगी. देशहित के निर्णय पूंजीवादी संस्थानों के निर्देश पर, उनके हितों को देखकर लिए जाने गले. भारत में यह आपाधापी के साथ, कतिपय भौंडे तरीके से हुआ.

हमारे नेतागण ‘मेक इन इंडिया’ का नारा लगाते हैं. 56 इंची सीने का दावा करते हैं, मगर इस तथ्य को नजरंदाज कर देते हैं कि भारतीय बाजार चीनी और दूसरे विदेशी उत्पादों से भरे पड़े हैं. इनमें चीन का तो इतना दबदबा है कि सस्ते खिलौने, इलेक्ट्रोनिक्स, मोबाइल, कंप्यूटर, टेलीविजन से लेकर छोटीछोटी चीजें जैसे दर्पण और बच्चों की काॅपी, कलम, पेंसिल, वर्कबुक तक चीन से आयात की जा रही हैं. मंडी में जाओ तो फल और सब्जियां तक आयातित मिल जाएंगी. उन्हें कौन बताए कि देशभक्ति हवा में नहीं तैरती, लोगों के व्यवहार में बसती है. वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं के इस दौर में जो देश बाजार में नहीं होता, उसकी हैसियत समाज में भी घट जाती है. ऐसा देश नागरिकों के आत्मसम्मान का सबब नहीं बन पाता. वैसे भी पुरानी कहावत है कि लोग जिसका खाते हैं, गुण भी उसी के गाते हैं. एक समय था जब देश में बाजार में जापान के उत्पाद छाये होते थे. उच्चगुणवत्ता युक्त वे उत्पाद भारतीयों के मन में जापानी प्रौद्योगिकी के बारे में एक सकारात्मक छवि का निर्माण करते थे. इसलिए जापानियों की कमर्ठता और अनुशासनप्रियता के किस्से उन दिनों आम हुआ करते थे. आजकल बाजार पर चीन का कब्जा है. इसलिए हम व्यवहार में देख सकते हैं कि जापान हमारे लिए एक भूला हुआ देश बनता जा रहा है. जनसाधारण तक चीन के जो उत्पाद पहुंचते हैं, वे घटिया गुणवत्ता के होते हैं. चीन के बारे में नागरिकों की राय भी एक गैर भरोसेमंद देश की है. दरअसल हम ऐसे राष्ट्रवादियों की सरकार के इकबाल में रह रहे हैं जहां बाजार में राष्ट्रीय उत्पादों का टोटा है. इसका नकारात्मक प्रभाव हमारे राष्ट्रीयताबोध पर पड़ा है. पिछले 14 वर्षों में देश से 61000 करोड़पतियों के पलायन की घटना भी इसी प्रवृत्ति की संकेतक है. ऐसी घटनाएं यदि सरकार की नींद खराब नहीं करतीं तो समझ लेना चाहिए कि वे सरकारें देश की होकर भी देश के लिए काम नहीं कर रही हैं. वे या तो अपने नेताओं के स्वार्थ के लिए काम कर रही हैं, अथवा उन पूंजीपतियों के लिए जो उन्हे सत्ताकेंद्र तक पहुंचाने में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं. इसके लिए वे अकेले जिम्मेदार भले न हों, लेकिन सुधार की कोशिश करने के बजाए इसे और आयातनिर्भर बना देना चाहते हैं. हमारी प्रथम दर्जे की प्रतिभाएं परराष्ट्रों के अर्थतंत्र को मजबूत करने के लिए नईनई योजनाएं बनाती हैं. और औसत दर्जे की प्रतिभाएं हैं, वे उनके लिए बाजार का काम देखती हैं. पिछले कुछ दशकों में भारतीय शिक्षा ने जितने सेल्समेन इस देश को दिए हैं, वह अपने आपमें विश्वरिकार्ड है.

वे दिन गए जब युद्ध सीमाओं पर लड़े जाते थे. दुनिया बदल चुकी है. इन दिनों राष्ट्र की भूमिकाएं अब राष्ट्राध्यक्ष तय नहीं करते. उन्हें मनमाफिक भूमिका निभाने के लिए पूंजीवादी कंपनियों की ओर से बाध्य किया जाता है. आदमी का मोल समाप्त हो चुका है. मोल संसाधनों का है. इसलिए नई युद्धनीतियां कूटनीतिपरक होती हैं. वे संसाधनों पर अधिकार को हड़पने के लिए बनाई जाती हैं. इस लड़ाई में चीन भारत से बहुत आगे है. हम भले ही सीमा पर चीन को उसकी गीदड़भभकियों से बाज आने की सलाह दे रहे हों, अर्थव्यवस्था के मैदान में वह हमारे घर में घुसकर हमें मात दे रहा है और हमारे नेता रेत में गर्दन दबाए शुतुरमुर्ग की भांति खुद को धोखा दिए जा रहे हैं. सतरहवीं शताब्दी में मानवमुक्ति के जितने भी शब्द, मुहावरे, उपकरण और औजार चुने गए थे, इस दैत्य के आगे, एकएक कर वे सभी बेअसर सिद्ध हो रहे हैं. कमी उन विचारों की नहीं, विचारहीनता को अपनी जीवनशैली बना चुके समाजों की थी. वे तार्किकता और उन निष्ठाओं से निरंतर परे हटते गए, जो उनके विकास की आधारशिला बनी थीं. इस संबंध में भारतीय विरोधाभास छिपे नहीं हैं. हमारे यहां पश्चिम से मशीनीकरण तो उधार लिया गया. लेकिन उन विचारों से पूरी तरह कन्नी काट ली, जो वहां मशीनीकरण की समस्याओं से जूझते हुए, उनके समाधान की चाहत में विकसित हुए थे. परिणामस्वरूप समाज तथा हमारे व्यवहार में विचारशून्यता पसरती गई, जो आगे चलकर उपभोक्तावाद के समाज में पैठ बनाने में मददगार बनी. मसलन जेरेमी बैंथम का उपयोगितावादी सिद्धांत निरे भोग का, कोरा उपभोक्तावादी दर्शन नहीं था. वह खुशियों पर खास वर्गों के एकाधिकार का विरोधी था. वह शताब्दियों से वंचित रहे समाज के अधिकारों का समर्थन करते हुए उसे मुख्य धारा में शामिल करने का पक्षधर था. उससे पहले राज्य धार्मिक आचारसंहिताओं से अनुशासित होते थे. बैंथम ने पहली बार विधि के न्याय का पक्ष लिया था. इसके लिए आधुनिक न्याय प्रणाली बैंथम की ऋणी है. सामाजिक न्याय की आधुनिक संकल्पना को हम बैंथम के उपयोगितावाद और विधि के दर्शन की अवधारणा के विकास के रूप में देख सकते हैं. उसका आदर्श कथन था—‘अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख.’ उपयोगितावादी विचारकों के अनुसार दुनिया में कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जिसका मानव कल्याण के हित में उपयोग वर्जित हो. जो है, जिसकी उपयोगिता है, उसपर समूची मनुष्यता का अधिकार है. न तो कोई व्यक्ति विशेष है, न ही तिरष्कृत. बाजार ने उपयोगितावाद को उपभोक्तावाद में बदल दिया, जिसमें ऐसा जताया जाता है कि जीवन का अभीष्ट केवल सर्वोत्तम का भोग करना है, उसके कोई और सरोकार नहीं हैं. विचार शून्यता के परिवेश में यह पूर्ण स्वाभाविक था.

बैंथम ने जनसाधारण तक सुख की समान उपलब्धता सुनिश्चित करने को राज्य का कर्तव्य बताया था. इसके लिए उसने कानून के राज्य का समर्थन किया. जिन दिनों पूरा यूरोप चर्च से अनुशासित होता था, कानून के राज्य की बात करना बहुत बड़ी बात थी. इसकी शुरुआत पूर्ववत्र्ती विचारकों द्वारा हो चुकी थी. बैंथम ने उसको विधिक आधार दिया, साथ ही लागू भी कराया. पूंजीवाद की मान्यता रही कि सुखसुविधाएं उसकी जिसकी जेब में पैसा है. जो उनके मूल्य का भुगतान कर सकता है. बैंथम के आदर्श था, ‘अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख.’ सिक्का शक्तिशाली पूंजीवाद का चला. बैंथम का सिद्धांत केवल अकादमिक क्षेत्रों तक सिमटकर रह गया. देखते ही देखते, ‘अधिकतम लोगों को अधिकतम सुख’ का विचार ‘संपन्नतम व्यक्तियों को अधिकतम वैभवविलास’ में बदल गया. पूंजी या धन को सुविधाओं के साथसाथ सुख को अर्जित करने का पैमाना मान लिया गया. सामाजिक लाभ की संकल्पना मौद्रिक लाभ तक सीमित होकर रह गई. इससे मानवसंबंधों पर पूंजी को वरीयता मिलने लगी. खुद की स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए पूंजीवाद ने समाज में जो भी, जब भी मिला, सभी का अपने स्वार्थानुकूल इस्तेमाल किया. कानून, न्याय, अदालत, व्यक्ति स्वातंत्रय, मानवाधिकार, उपभोक्ता अधिकार, लोकतंत्र सब पूंजीवाद के हितों के अनुकूल ढलते गए. उपयोगितावाद, सुखवाद और मानवतावाद जैसी विचारधाराएं उच्चमानवीय आदर्शों को केंद्र में रखकर गढ़ी गई थी. उनमें किसी भी प्रकार के वर्चस्ववाद को नकारने की सर्वसाधारणीय वांछा शुरू से ही स्पष्ट थी. पूंजीवाद एक और तो उपभोक्ता वस्तुओं की आधुनिकतम रेंज बाजार में उतारता रहा, संस्कृति के क्षेत्र में वह ‘प्राचीनतम को महानतम’ सिद्ध करने में सहायक बना. पोंगापंथी पुरोहित इस काम को लगातार अंजाम देते रहे. यंत्रों पर निर्भर समाज में भावुक और संवेदनशील होना अविवेकपूर्ण तथा दुर्बलता की निशानी कहा जाने लगा. मानवाधिकार, स्वतंत्रता, व्यक्तिस्वातंत्रय जैसी जितनी भी चेतनाप्रधान अभिव्यक्तियां थीं, उन सभी को पूंजीवाद ने अपनाया अवश्य, मगर पूरी तरह से निस्तेज कर, स्वार्थानुसार अनुकूलन करते हुए. ताकि वे अंधानुकरण और स्तुतिगान के अलावा कहीं और सहायक न हो सकें. मानवीकरण के इन माध्यमों का अपने पक्ष में अनुकूलन करते हुए पूंजीवादी अर्थतंत्र के लक्ष्य को मौद्रिक लाभ तक सीमित कर, केवल और केवल एक शब्द को स्थापित करता गया. उदारवादी अर्थतंत्र की दृष्टि में वह पवित्रतम, मार्गदर्शक, परमकल्याणकारी शब्द है—मुनाफा. आखिर ऐसा क्यों हुआ कि धर्मदर्शन, संस्कृति, परंपरा आदि मानवसभ्यता और जीवन को मर्यादित करने वाली जितनी भी संस्थाएं और संगठन थे, सब के सब पूंजी के आराधन में लग गए? यहां तक कि इसके लिए राष्ट्रीय हितों की बलि भी दी जाने लगी. इसके कारणों तक पहुंचने के लिए हमें भारतीय संस्कृति और सभ्यता की पड़ताल करनी पड़ेगी. विशेषकर डेढ़दो शताब्दी पहले के इतिहास में जाना होगा.

1857 के भारतीय स्वाधीनता संग्राम की बात करें. उस समय तक भारत लगभग 400 वर्ष पराधीनता में गुजार चुका था. प्रथम स्वाधीनता संग्राम के बाद भारत पर जब ब्रिटिश राज्य हुआ तथा मुस्लिमों के हाथ से सत्ता जाने पर भारतीय अभिजात वर्ग ने प्रशंसा व्यक्त की थी, जबकि शासक बदल जाने से भारतीयों की राजनीतिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था. वे पहले की तरह ही परतंत्र थे. वह परतंत्रता पहले से कहीं अधिक परेशान करने वाली इसलिए भी थी कि 1857 में लगभग 25 करोड़ भारतीयों पर मात्र कुछ हजार अंग्रेज शासन चला रहे थे. मुस्लिम शासकों के जमाने में यह बात नहीं थी. इसलिए कि इस्लामिक जिहादियों के भारत आक्रमण से पहले यहां सूफी संतों, औलियाओं के रूप में इस्लाम दस्तक दे चुका था. उसने जाति के आधार पर बुरी तरह से बंटे समाज के निचले वर्गों में काफी पैठ पैदा कर ली थी. उसके फलस्वरूप लोग इस्लाम के प्रति आकर्षित हो रहे थे. बाद में भी इस्लाम के शासकों ने भारतीय जनजीवन को प्रभावित करने की कोशिश नहीं की. चारपांच शताब्दी के इस्लामिक शासन में भारत का इलीट वर्ग राजनीतिक और आर्थिक लाभों के लिए मुस्लिम शासकों से जुड़ा था, जबकि जनसाधारण, विशेषकर समाज के निचले जातिवर्गों के लिए के लिए वह उनकी लुप्त अस्मिता की पहचान का मसला था, जिसे वे इस देश में जातीय विभाजन के कारण शताब्दियों से सहते आए थे. ब्राह्मण एवं पुरोहित वर्ग को केवल अपने धर्म एवं संस्कृति की चिंता थी. शासक का धर्म और चरित्र क्या है, इससे उन्हें कोई संबंध न था. मुगल शासकों के पराभव तथा उनके स्थान पर अंग्रेज शासकों के आने से इलीट वर्ग प्रसन्न था. इसलिए कि मुगल सभ्यता भारतीय सभ्यता के सापेक्ष पिछड़ी हुई थी, जबकि औद्योगिकीकरण के कारण यूरोपियन सभ्यता तीव्र गति से विकासमान थी. अंग्रेज इस देश में व्यापार के लिए आए थे. मगर उनके भारत आगमन से पहले ही यूरोपियन औद्योगिक क्रांति की खबरें शेष दुनिया को चमत्कृत कर रही थीं. भारत का अभिजात वर्ग उसके प्रति आकर्षित था और एक तरह से उस सभ्यता को अपनाने के लिए उतावला भी.

गौरतलब है कि भारत का प्राचीन गौरव कम न था. प्राचीन भारतीय सभ्यता अपनी समकालीन सभी सभ्यताओं के मुकाबले बहुत अधिक विकसित भले न हो, मगर उसे पिछड़ा हरगिज नहीं माना जा सकता. ढाईतीन हजार वर्ष पहले भारतीय मेधा ने विश्वमेधा को चमत्कृत करते हुए उसपर अपना प्रभाव छोड़ा था. लेकिन परतंत्रता के लंबे दौर में वह निरंतर क्षरणशील होकर अपना तेज खो चुकी थी. दूसरों को तो दूर उसे खुद अपनी वास्तविकता की पहचान तक न थी. अतः 1874 के आसपास जब यूरोपियनों ने अपनी सत्ता के स्थायित्व के लिए भारतीय सभ्यता और इतिहास को समझना आरंभ किया, तो सबसे ज्यादा चमत्कृत होने वालों में वे लोग थे, जिनपर इस सभ्यता के बौद्धिक नेतृत्व की जिम्मेदारी थी. इसलिए कि वे अपना कर्तव्य भुलाकर केवल चाटुकारिता को अपने आचरण में ढाल चुके थे; और सत्ता के इर्दगिर्द रहकर उसका लाभ उठाने में प्रवीण थे. उस समय तक दर्शन की जगह कर्मकांड छा चुका था. जातिवाद का बोलवाला था और रूढि़यों में जकड़ी सभ्यता अपने अतीत को पूरी तरह बिसराए हुए थी. पढ़ालिखा वर्ग अंग्रेजों की कृपा प्राप्त करने के लिए अपने ही देशवासियों पर जुल्म ढा रहा था. वह एक प्राचीन जाति और वर्ग में बंटी संस्कृति का अपेक्षाकृत विकसित संस्कृति के आगे समर्पण था. भारतीय समाज चूंकि छोटेछोटे जाति, वर्गों में बुरी तरह बंटा हुआ था. जाति व्यवस्था की जकड़ बहुत गहरी थी. इसलिए अंग्रेजों के आगमन पर खुश होने के विभिन्न वर्गों के अलगअलग कारण थे. अभिजात वर्ग अंग्रेजों की कृपा शासन के निकट रहने, उनके जैसी जीवनशैली प्राप्त करने के लिए चाहता था. औद्योगिकीकरण के बाद यूरोप की अर्थव्यवस्था का जादुई तेजी से विकास हुआ था. उच्च वर्गों की संपन्नता बहुत तेजी से बढ़ी थी. भारतीय सामंतवर्ग में उसके प्रति विशेष आकर्षण था. यूरोपीय उद्यमियों की भांति वे भी आननफानन में संपन्नता बटोर लेना चाहते थे; और इसके लिए कुछ भी करने को तैयार थे. समाज के पढ़ेलिखे वर्गों के एक तबके की श्रद्धा यूरोप में चले बौद्धिक आंदोलनों के कारण थी, जिसमें वे अपने मानसम्मान और अस्मिता की सुरक्षा का सपना देखते थे. नए विचारों की रोशनी में उत्पीडि़त वर्ग भी अपनी अस्मिता के संघर्ष को खड़ा करना चाहते थे. उसकी शुरुआत ज्योतिबा फुले महाराष्ट्र से कर ही चुके थे. उसके लिए अंग्रेजी शिक्षा नए विचारों के साथ मुक्तिसंदेश की वाहक बनी हुई थी.

लगभग दो शताब्दियों के ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय समाज को अपने भीतर झांकने का अवसर मिला था. हालांकि उस समय भी समाज का एक वर्ग परिवर्तनों के विरोध में अड़ा था. जबकि पढ़ालिखा वर्ग अंग्रेजों से प्रभावित था. ज्ञानविज्ञान की यूरोपियन शैली उसको आकर्षित करती थी. यह प्रभाव इतना गहरा था कि औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के लिए भारत में वही रास्ते अपनाए गए जो अंग्रेजों के थे. यह स्वाभाविक भी था. ब्रिटिश साम्राज्यवाद के मूल में आर्थिक साम्राज्यवाद की लालसा थी. वह एक ऐसा राजनीतिक तंत्र था जो जनता की विकास की आकांक्षा तथा पंूजीपतियों की अतिमहत्त्वाकांक्षाओं के योग से बना था. अलगअलग दिखने के बावजूद उसमें अन्योन्याश्रितता का भाव था. उसकी कमी थी कि उसमें उत्पादन में भागीदारी सभी वर्गों की थी, मगर लाभानुपात शीर्ष की ओर तेजी से बढ़ता जाता था. इससे मध्यक्रम और निचले वर्गों में भारी असंतोष था. उस असंतोष के फलस्वरूप उपजे विद्रोह ने ही पश्चिम में प्रतिरोध के नए हथियारों को जन्म दिया था. देशी सभ्यता और संस्कृतिसमर्थक गांधी ने भी अंग्रेजों से काफी ग्रहण किया. उन्होंने समय रहते ही समझ लिया था कि इस नए किस्म के साम्राज्यवाद को गैरपरंपरागत हथियारों से ही चुनौती दी जा सकती है. ‘सत्याग्रह’ नामक उनका औजार थोरो के ‘सिविल डिसओविडियंस’ का भारतीयकरण था. उसने लोगों को अपनी शक्ति का आकलन करने तथा आजादी के लिए एकजुट होने के लिए प्रेरित किया. फलस्वरूप देशभर की जनता स्वाधीनता की मांग लेकर घरों से निकल पड़ी.

अच्छा नेता जनता का मार्गदर्शन करता है. लेकिन सबसे अच्छा नेता वह होता है जो लोगों को उनके भीतर छिपी शक्तियों से परचाता है. उन शक्तियों को बाहर लाकर उपयुक्त प्रेरणा जगाता हे. गांधी ने यही जादू इस देश की जनता के साथ किया था. ज्ञात हो कि धर्म, जातपात में बंटा भारतीय समाज कोई जड़ समाज नहीं था. कभी रहा भी नहीं है. परिवर्तन की कामना विशेषकर उत्पीडि़त वर्ग में हमेशा से विद्यमान रही है. उसके लिए शीर्ष नेतृत्व आवश्यक नहीं था. बल्कि जनता के भीतर से ही नेतृत्वकारी शक्तियां स्वयंस्फूर्त्त भाव से निकल आती थीं. वैदिक कर्मकांड के विरोध में जैन और बौद्ध दर्शन के उदय से बहुत पहले ही पूर्ण कस्सप, निगंठ नागपुत्त, अजित केशकंबली, संजय वेल्ट्ठिपुत्त, कौत्स, मक्खलि घोषाल आदि के बौद्धिक अवदान स्वरूप भौतिकवादी परंपरा इस देश में पनप चुकी थी. उनसे प्रेरणाओं के आधार पर ही जैन और बौद्ध दर्शन का विकास हुआ. जैन दर्शन का प्रसिद्ध ‘स्याद्वाद’ का सिद्धांत जिसे आज कुछ विद्वान क्वांटम थ्योरी के निष्कर्ष ‘अनिश्चितता का सिद्धांत’(थ्योरी आ॓फ अनसर्टेनिटी) से जोड़ते हैं, की मूल अवधारणा संजय वेल्ट्ठिपुत्त से प्राप्त हुई थी. साधना के आरंभिक दौर में महावीर स्वामी और मक्खलि घोषाल साथसाथ थे. कालांतर में दोनों अलगअलग हुए तो मक्खलि ने आजीवक संप्रदाय और महावीर स्वामी ने जैन धर्म की नींव डाली थी. मक्खलि घोषाल और बाकी विचारकों के बारे में भारतीय साहित्य में अधिक प्रसंग प्राप्त नहीं होते. लेकिन इतना महत्त्वपूर्ण उल्लेख हमें प्राप्त होता है कि बौद्ध धर्म के आरंभिक दिनों में आजीवक संप्रदाय को चाहनेवालों की संख्या बौद्ध धर्म से कहीं अधिक थी. मक्खलि के बारे में प्रसेनजित ने बुद्ध से एक बार कहा था कि वह उसे(मक्खलि को) उनसे अधिक बुद्धिमान मानता है. क्या इसके पीछे कोई सामाजिक कारण थे? इसे प्रमाणसहित कह पाना तो कठिन है. भारतीय समाज में व्याप्त जातीय भेदभाव को देखते हुए कुछ आकलन अवश्य लगाए जा सकते हैं. महावीर स्वामी और बुद्ध दोनों ही क्षत्रिय कुलों से आए थे. उन दिनों बलि, धार्मिक भेदभाव, अनावश्यक निषेधों की वजह से क्षत्रिय और ब्राह्मणों के बीच मनमुटाव बढ़ने लगे थे. इसलिए जब महावीर स्वामी और बुद्ध ने धर्मदर्शन में रुचि खोजने की कोशिश की तो तत्कालीन क्षत्रिय सम्राट उनकी ओर आकर्षित होते गए. आशय है कि न केवल आज बल्कि सहस्राब्दियों से भारतीय जनसमाज में परिवर्तन की वांछा रही है. उसके लिए उसे जब भी, जो भी अवसर मिला, उसका उपयोग किया है. चाहे वह निराकार की भक्ति हो अथवा सूफी परंपरा, कबीर हों या गांधी, जयप्रकाश नारायण हों या कांशीराम अथवा विश्वनाथ प्रताप सिंह समाज की परिवर्तन की चाहत, अलगअलग स्वरों से गूंजती रही है. इतिहास जनविद्रोहों से भरा पड़ा है. लेकिन यह भी सच है कि भारतीय दमित वर्गों का वास्तविक संघर्ष बाहरी लोगों से कम, अपने लोगों से अधिक रहा है. भारतीय समाज की परिवर्तन की उत्कट अभिलाषा का सबसे सार्थक उपयोग गांधी ने सत्याग्रह के दौरान किया था. जबकि डा॓. अंबेडकर जनमानस के मुक्तिस्वरों को आवाज दे रहे थे.

परंपरा और संस्कृति का गुणगान करनेवाला भारतीय समाज का अभिजात तबका अंग्रेजी शिक्षा और नई प्रौद्योगिकी से के प्रति भी आकर्षित था. इसलिए 1947 तक आतेआते भारत में अंग्रेजी राज और अंग्रेजी शिक्षा के समर्थकों की बड़ी फौज खड़ी हो चुकी थी. जिसे अपने अंग्रेजी ज्ञान पर गर्व था, वह अंग्रेजी ज्ञान एवं आधुनिक सभ्यता से वंचित अपने ही भाईबहनों को वह हेय दृष्टि से देखता था. उनीसवीं शताब्दी के अंतिम अंतिम दशकों में मध्यम मार्गी कांगेस की स्थापना मुख्यतः पढ़ेलिखे वर्ग को अंग्रेजी शासन से जोड़ने और जनाक्रोश पर नियंत्रण रखने के लिए की गई थी. एक प्रकार से वह अंग्रेजी शैली का ही संगठन था. धीरेधीरे वक्त बदला और जनता के दबावों में कांग्रेस को स्वराज की मांग पर उतरना पड़ा. उल्लेखनीय है कि ‘स्वराज्य’ और ‘स्वराज’ के आधार पर कांग्रेस में भी दो दल बन चुके थे. स्वराज्य की मांग करनेवाले कम संख्या में थे. उनमें से बड़ी संख्या उन नेताओं की थी, जो किसी न किसी प्रकार से ग्रामीण क्षेत्रों से आए थे और जिनकी प्रतिबद्धता अपने लोगों के साथ थी. कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में से एक दादा भाई नौरोजी हालांकि कांग्रेस की नर्म राजनीति की धारा का प्रतिनिधित्व करते थे. किंतु उनकी लिखी पुस्तक ‘पावर्टी एंड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया’ ब्रिटिश भारत की त्रासदी को बयान करती थी. पुस्तक में उन्होंने ‘ड्रैन थ्योरी’ को स्थापित किया था, जिसके अनुसार अंग्रेजों द्वारा विभिन्न रास्तों से भारतीय संपदा के दोहन तथा उसको इंग्लेंड ले जाने की बात कही थी. इस पुस्तक ने ब्रिटिश शासन के विरोध को तार्किक आधार प्रदान किया था. वे देश की अंग्रेजों से पूर्ण आजादी चाहते थे. ‘स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है.’ कहनेवाले तिलक इस वर्ग के अग्रणी नेताओं में से थे. उनके सापेक्ष गांधी चतुर बनिये की तरह अपनी और भारतीय समाज की स्वाधीनता की वांछा को तौल रहे थे. 1942 से पहले तक उनकी मांग ‘स्वराज’ तक सीमित थी. संभवतः पूरी तैयारी के बिना अंग्रेजों से कोई टकराव मोल लेना नहीं चाहते थे. वे मानते थे कि अंग्रेज इस देश का समाजार्थिक शोषण कर रहे हैं. ‘हिंद स्वराज’ का पहला संस्करण गुजराती में ‘हिंद स्वराज्य’ के नाम पर लिखा गया था. परंतु जब अंग्रेजों ने उस उस संस्करण को प्रतिबंधित कर दिया तो गांधी ने तुरंत पुस्तक का शीर्षक बदलकर उसका अंग्रेजी अनुवाद ‘इंडियन होमरूल’ नाम से प्रकाशित कराया, ‘हिंद स्वराज’ के नाम से प्रकाशित किया, जो कांग्रेस की मांग से मिलतीजुलती थी.

बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशक विश्वराजनीति में हलचल भरे थे. सोवियत संघ, जर्मनी, इटली, फ्रांस, चीन आदि देशों में राजनीतिक परिवर्तन जारी थे. इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण था, सोवियत संघ का कम्युनिज्म के घेरे में चले जाना. चीन में भी साम्यवादी शक्तियां प्रभावी थीं. वहां माओ के नेतृत्व में साम्राज्यवादी शक्तियों से संघर्ष जारी था. उसकी लाल सेना चीन के बड़े हिस्से को अपने अधिकार में चुकी थी. भारतीय बुद्धिजीवियों खासकर पढ़ेलिखे वर्ग पर साम्यवादी आंदोलन का गहरा प्रभाव था. उन्हें उसमें ब्रिटिश साम्राज्यवाद का तोड़ नजर आता था. बंगाल, केरल, पंजाब आदि प्रांतों के युवक सोवियत संघ जाकर वहां की राजनीतिक जमीन को समझने में लगे थे. रूस के साम्यवादियों का भी भारतीयों को भरपूर समर्थन था. वे इसे साम्यवादी आंदोलन की पूर्णता के रूप में देखते थे. इससे पूंजीवादी ताकतों में इस बात की चिंता स्वाभाविक थी कि यदि भारत भी साम्यवादी झंडे के नीचे आ जाता है तो एशिया के छोटेछोटे देशों को भी उसके प्रभाव में आते देर न लगेगी. वह यूरोप के बाकी देशों के लिए बड़ा खतरा हो सकता है, जिसके उस समय पूरे आसार थे. भारतीय स्वाधीनता आंदोलनकारियों की पहली खेप साम्यवादी रूस से काफी प्रेरित थी. उस समय के सभी प्रमुख नेता और बुद्धिजीवी उससे प्रभावित थे. महान समाज सुधारक राजा राममोहन राय स्वयं कार्ल मार्क्स से प्रेरित थे. वे मार्क्स से मिलने इंग्लेंड भी गए थे. लेकिन उनकी मार्क्स से मुलाकात न हो सकी थी. उस समय के प्रमुख नेता डा॓. हरदयाल, करतार सिंह सराबा आदि क्रांतिकारी नेताविचारकों पर रूस के साम्यवादी आंदोलन का असर था. भारत के सैकड़ों युवा रूसी जमीन पर रहकर क्रांति की शिक्षा ले रहे थे. यहां तक कि पूरी तरह भारतीयता के रंग में रंगे विवेकानंद पर भी साम्यवादी विचारधारा का प्रभाव था.

दूसरी ओर भारत में लाल झंडा न फहरने पाए, इसके लिए देश और विदेश में बड़ेबड़े कूटनीतिज्ञ सक्रिय थे. लाला लाजपत राय, भगत सिंह, राजगुरु जैसे क्रांतिकारियों के देश के युवावर्ग पर प्रभावी होने से रोकने के लिए बड़ा खेल खेलने की तैयारी हो रही थी. 1857 का संग्राम हिंदुओं और मुस्लिमों ने मिलकर लड़ा था. उस समय तक देश में सांप्रदायिक विभाजन जैसी बात न थी. अंगेज चाहते थे कि भारतीय अंग्रेजी सीखें. कम से कम इतनी कि सरकारी कामकाज में उनकी मदद ली जा सके, लेकिन साम्यवाद जैसी विचारधाराओं से उन्हें चिढ़ थी. सामरिक दृष्टि से भी अंग्रेज भारत को रूसी साम्यवाद के प्रभाव से बचाए रखना चाहते थे. इसलिए अंग्रेजी के प्रति सम्मोहित, मगर प्राचीन भारतीय संस्कृति में गहरी आस्था रखने वाले गांधी और रवींद्रनाथ ठाकुर जैसे व्यक्तित्वों को अतिरिक्त रूप से बढ़ावा दिया गया. यही कारण है कि महात्मा गांधी ने जब सत्याग्रह की शुरुआत की तो उन्हें अपने समय के सभी प्रमुख उद्यमियों का साथ मिला था. जमनालाल बजाज, घनश्यामदास बिड़ला, खेतान जैसे उद्यमियों और व्यापारियों से गांधी जी के आत्मीय संबंध थे. उनकी समृद्धि का अधिकांश विश्वयुद्धों की देन था. दोनों विश्वयुद्धों के दौरान गांधी भी, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में साम्राज्यवादियों के साथ थे. उल्लेखनीय है कि रूस ने अपनी स्वतंत्रता हिंसक क्रांति के माध्यम से ग्रहण की थी. चीन भी उसी दिशा में बढ़ रहा था. ऐसे में गांधीजी का अहिंसा का विचार केवल जमीनी सचाइयों की देन न होकर भारत को रूसी एवं चीनी प्रभाव से बचाने की कोशिश भी था. दूसरे शब्दों में गांधी की अहिंसा केवल साम्राज्यवादी अंग्रेजों का रक्षाकवच नहीं थी. वह भारतीय नवपूंजीपतियों एवं जमींदारों को उस भय से बचाने में सहायक थी, जो रूस तथा दूसरे देशों के रास्ते आ रहा था. दूसरे शब्दों में गांधी जितना काम भारतीयों के लिए कर रहे थे, उतना ही काम अंग्रेजों के लिए भी कर रहे थे. और चाहेअनचाहे वैसा ही काम भारतीय नवपूंजीपति वर्ग की रक्षा के लिए भी कर रहे थे, जिनके लिए स्वतंत्रता के मायने पश्चिमी प्रौद्योगिकी से गठजोड़ तथा उसके माध्यम से भारत की अर्थसत्ता पर कब्जा करने तक सीमित था.

यहां एक प्रश्न स्वाभाविक है कि महात्मा गांधी जो बडे़ उद्यमों में कटौती के पक्ष में थे, हाथ के उद्यमों तथा दस्तकारों को आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे, आखिर क्यों बिड़ला और बजाज जैसे उद्यमी उनके पीछे लगे हुए थे. बड़ी पूंजी का निषेध करनेवाले गांधी को अपने कार्यक्रमों के लिए पूंजीपतियों की ओर से चंदा आता था. साध्य एवं साधन दोनों की पवित्रता के समर्थक गांधी को उससे कोई विरोध क्यों नहीं था? क्या वह पूंजीपतियों का राष्ट्रप्रेम था? गांधीजी द्वारा चलाए गए स्वदेशी अभियान का लाभ सीधे पूंजीपतियों को पहुंचा था. खादी का लाभ उठाने वालों में बिरला घराना सबसे आगे था. बदले में वह उनका लाभ भी उठा रहा था. उल्लेखनीय है कि गांधीजी ने खादी को बढ़ावा देने के लिए मिल से बुने कपड़े का बहिष्कार किया था. बाद में अपनी राय में संशोधित करते हुए भारतीय मिलों से बुने कपड़े को उपयोग में लाने की छूट दे दी थी. यह गांधी की नीति में बड़ा परिवर्तन था. वे यदि इसकी अनुमति न देते तो भी मशीनीकरण की ओर बढ़ते भारत के कदम रुकनेवाले नहीं थे. इसलिए पूंजीपति गांधी जी का उतना ही समर्थन चाहते थे, जो उनको व्यावसायिक दृष्टि से लाभकारी हो. दरअसल गत शताब्दी के दूसरे दशक में जब दक्षिण अफ्रीका में सफलता के झंडे गाढ़कर गांधीजी हिंदुस्तान पहुंचे उस समय दुनिया में माक्र्स के विचारों की धूम मची हुई थी. रूसी क्रांति सफल हो चुकी थी. चीन का बड़ा भूभाग माओत्से तुंग की लाल सेना के अधिकार में था. लेनिन के सिपहसालार ट्राटस्की भारत में भी साम्यवादी क्रांति को सफल देखना चाहते थे. भारत के सैकड़ों युवा उससे उत्साहित थे. अंग्रेज अब सर्वविजेता कौम नहीं नहीं रह गई थी. भगत सिंह, सुभाष, नेहरू आदि पर साम्यवादी विचारों की छाया थी. अमेरिका में बसे भारतीय समानता और व्यक्ति स्वातंत्रय का संदेश भारत तक पहुंचा रहे थे. अब्राह्म लिंकन के नेतृत्व में वहां जो स्वाधीनता संग्राम लड़ा गया था, उसका अगला सफलतापूर्ण चरण फ्रांस में पूरा हुआ था. टामस पेन, थामस जेफरसन आदि ने, ने व्यक्ति मात्र की समानता, समानता और अधिकारों को लेकर आवाज उठाई थी. भारत में वही काम ज्योतिबा फुले और बाद में चलकर उनके सशक्त उत्तराधिकारी डा॓. अंबेडकर द्वारा किया गया. यही कारण है कि घबराए हुए भारतीय पूंजीपतियों ने धर्म भीरू और परंपरावादी गांधी की लुकाटी को चमकाते रहने में ही अपनी भलाई समझी थी. चूंकि आर्थिक और सामाजिक समानता के सवालों को राजनीतिक स्वतंत्रता के उत्साह में दबाया जा सकता था, इसलिए कांग्रेस ने सामाजिकआर्थिक स्वतंत्रता के प्रश्न को कोई महत्त्व नहीं दिया गया था. गांधी की राजनेता और धार्मिक संत की तस्वीर साथसाथ गढ़ी गई. भारतीय हिंदूमन जो सात सौ वर्ष की दासता से गुजर चुका था, अपनी पहचान को सम्मान देना चाहता था. इसलिए राष्ट्रीय भावनाओं की धार्मिक आर्थिकसामाजिक समानता जैसे शाश्वत मूल्यों पर संप्रदायवाद की जीत हुई. इस बीच भारतीय जनमानस पर गांधी का प्रभाव उत्तरोत्तर बढ़ता गया. गांधी तथा अन्य परंपरापोषी नेताओं की छत्रछाया में भारतीय उद्योगपति अपना काम करते रहे. कुल मिलाकर भारतीयता की बात करनेवाले हमारे तत्कालीन बड़े नेता, पूंजीवाद के प्रवेश को रोकने के बजाय उसकी पैठ बनाने में सहायक सिद्ध हुए.

स्वातंत्रयोत्तर भारत में पूंजी का हस्तक्षेप आजादी के समय से ही रहा. महात्मा गांधी की सफलता में उन पूंजीवादी ताकतों का बड़ा योगदान था. गांधीजी के आयोजनों में खर्च सामंतों और पूंजीवादी ताकतों का ही लगता था. स्वाधीनता आंदोलन में उन्होंने खादी का समर्थन किया था. स्वदेशी का जोरदार समर्थन करते हुए वे आगे बढ़े. दरअसल खादी और स्वदेशी में अंतर है. खादी की अवधारणा गांधीजी की गांव के आर्थिक स्वावलंबन से जुड़ी थी, जबकि स्वदेशी की सीमा में भारतीय उद्योग भी आ जाते थे. ‘हिंद स्वराज’ में गांधी ने मशीनों की आलोचना की थी. खादी मानवीय श्रम का सम्मान करती है. वह मानवीय कौशल को हस्तशिल्प और यंत्रशिल्प की स्पर्धा में भी मरने नहीं देती. व्यक्ति को उसके श्रम का पूरापूरा मूल्य मिले, यह व्यवस्था गांधी दर्शन में कहीं नहीं है. गांधीजी ने जब खादी का दर्शन दुनिया को दिया, वे चरखे के बारे में जानते नहीं थे. हिंद स्वराज पर अपने साक्षात्कार के दौरान उन्होंने यह स्वयं स्वीकारा था. उस समय तक खादी को ग्रामीण अर्थव्यवस्था के आधार के रूप में प्रस्तुत करने में कोई बड़ी आर्थिक समझ नहीं हो सकती. स्वयं गांधी जी ने इसका कोई दावा नहीं किया था. लेकिन गांधी की व्यापक लोकप्रियता के चलते इसका बड़े उद्योगों पर इसका असर पड़ना स्वाभाविक था. कालांतर में पूंजीपतियों के आग्रह या दबाव में ‘हिंद स्वराज’ के मूल कथ्य में कोई परिवर्तन न करनेवाले, पुस्तक के प्रथम संस्करण में आदमी को अपने हाथ का कताबुना कपड़ा पहनने का आग्रह करने वाले गांधी, 1931 में ‘भारतीय मिलों का कताबुना’ पहनने की अनुशंसा कर चुके थे. यानी खादी का स्थान स्वदेशी ले चुकी थी. स्वदेशी का मतलब है देश में बना हुआ. यह अपने आप में भावुक अवधारणा है. उसे बनाने के, बनाने का कारखाना लगाने के लिए किसका पैसा लगा है, तकनीक कैसी है, उसपर जोर नहीं देती. यानी स्वदेशी का समर्थन करते समय गांधीजी मशीनों की आलोचना के बारे में अपने तर्क को बहुत पीछे छोड़ चुके थे. यदि लंकाशायर का कोई पूंजीपति सस्ते श्रम की चाहत में भारत में कोई कारखाना, अत्याधुनिक श्रमविरोधी मशीनों के साथ लगाए तो उसका बुना कपड़ा स्वदेशी है. तथा गांधीजी का उससे विरोध नहीं था. इसलिए वे खादी की अपनी अवधारणा में संशोधन कर, स्वदेश निर्मित वस्तुओं के पक्ष में तर्क देने लग जाते हैं. भले ही लंकाशायर का वह पूंजीपति अपने देश के मुकाबले यहां के श्रमिकों को बहुत कम वेतन पर रख रहा हो. गांधी जी जीवन को धार्मिक नजरिये से देखते हैं. आर्थिक दृष्टिकोण उनके लिए अधिक महत्त्व नहीं रखता. जो पूंजीपति गांधीजी के आगेपीछे लगे थे, उन्हें इससे मतलब भी नहीं था. बल्कि प्रकारांतर में धार्मिक जड़ता उनके लिए मददगार ही थी.

गांधी बारबार धार्मिक आजादी की बात करते रहे. आर्थिक स्वावलंबन के लिए उन्होंने ग्राम स्वराज, खादी एवं ग्रामोद्योग का नारा दिया. वैसे भी उन दिनों शिक्षा और शहरों से कटे भारतीय गांवों के मशीनीकरण की संभावना भी नहीं थी. भीषण गरीबी के कारण लोगों का क्रयसामथ्र्य अत्यधिक कम था. उनमें निवेश करने से पूंजीपतियों को कोई तात्कालिक लाभ होनेवाला नहीं था. इसलिए इस बात को खूब उछाला गया. गांधी ब्रिटेन के सम्राट के बुलाने पर गए तो एक लंगोटी में थे. इसके लिए उनकी प्रशंसा भी की जाती है. बात है भी प्रशंसा की. उन्होंने कहा था कि वे भारत की जनता के प्रतिनिधि हैं. एक नेता को ऐसा ही होना चाहिए. ऐसे सुनने में भी अच्छा लगता है. लेकिन क्या इससे यह जाहिर नहीं होता कि इससे गरीबी का महिमा मंडन होता है. क्या इससे यह नहीं लगता कि कि गांधीजी ने गरीब भारत की अभावग्रस्तता को चुनौती मानने के बजाय उसको उसी रूप में स्वीकार कर लिया था. वैसे भी उनके ऐजेंडा में राजनीतिक आजादी प्रमुख थी. समाजार्थिक आजादी के सवालों को वे स्वातंत्र्योत्तर भारत में सुलझाना चाहते थे. इसलिए गांधीजी की वह घटना एक गरीब देश के स्वाभिमान का प्रतीक तो बन सकती है, लेकिन उसके माध्यम से गरीबी के महिमा मंडन का जो संदेश जाता है, उससे आगे चलकर नुकसान ही हुआ. प्रकारांतर में यह नामक एक और हथियार मिल गया. आशय है कि गांधी और गांधीवाद, मशीनीकरण को रोकने और त्याज्य बताने के बावजूद पूंजीवाद पर नकेल कसने में नाकाम रहे हैं. पूंजीवाद को नाथने के लिए गांधी ने ट्रस्टीशिप का विचार रखा था. ऊपर से देखने पर यह आदर्श विचार प्रतीत होता है. मगर व्यवहार में यह आर्थिक विभाजन को न्यायसम्मत मान देती है. वह दान की व्याख्या को जन्म देता है. जिसके आधार पर समाज में परजीवी वर्ग को फलनेफूलने का अवसर मिलता है. जिस ग्रामस्वराज को वे ग्रामीण परिवेश में फलतेफूलते देखना चाहते हैं, उसकी परिणति सामंतवाद में होती रही है. पूंजीवाद चूंकि लोकतंत्र का पक्ष लेता है, जिसमें उसका अपना हित भी है. जबकि सामंतवाद में पूंजीपतियों पर नियंत्रण केवल मनमानी और बलप्रयोग द्वारा होता था. इसलिए पूंजीवाद की सफलता के लिए सामंतवाद को पुराना, दकियानूसी शासन पद्धति वाला और लोकतंत्र विरोधी कहकर बदनाम करने का काम किया गया. बहरहाल सामंतवाद जिन कमजोरियों का शिकार था, उसका पतन स्वाभाविक था.

पूंजीवाद को नाथने की कोशिश गत दो सौ वर्षों में होती रही है. निश्चय ही इसका केंद्र यूरोप था. मगर उसकी धमक दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों तक सुनाई पड़ी थी. पूंजीवाद को नाथने के लिए साहचर्य, अराजकतावाद, श्रमिक संघवाद, संगठनवाद, सहजीवितावाद जैसे विचार आए. उन सभी की विशेषता थी कि वे श्रम को महत्त्व दिए जाने पर जोर देते थे. सभी का आग्रह था कि पूंजीस्वामी को पूंजी के आधार पर अतिरिक्त लाभ का अधिकारी बनाने से रोका जाए और आपसी व्यवहार में मौद्रिक विनिमय को न्यूनतम किया जाए. संक्षेप में ये सभी धनबल के स्थान पर श्रमबल को खड़ा कर देना चाहते थे. संगठन में ताकत है. पूंजीवाद के सुरसई आतंक पर केवल संगठित जनशक्ति रोक लगा सकती है, ऐसा इस वर्ग का विश्वास था. इनके बीच एक समानता यह भी है कि वे लोकतंत्र और व्यक्तिमात्र की इच्छाओं का समर्थन करते हैं. व्यक्ति और समाज से उनकी अपेक्षा होती है कि वे एकदूसरे की इच्छाओं का सम्मान करते हुए उपलब्ध संसाधनों के न्यायपूर्ण बंटवारे से सभी वर्गों के लिए काम करें. वे मानते हैं कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति की राय महत्त्वपूर्ण है. इसलिए निर्णय में सभी की साझेदारी होनी चाहिए. व्यक्ति की अपनी आवश्यकता भी होती है. इसके लिए उसको अपने अलावा दूसरों के उत्पाद पर भी निर्भर रहना पड़ता है. विडंबना यह है कि सुख, व्यक्तिगत आकांक्षाओं और मानवाधिकार को लेकर, समाजवाद के आधुनिक प्रकल्पों तथा पूंजीवाद में बहुत अंतर नहीं है. व्यक्ति कल्याण के जिस लक्ष्य को लेकर समाजवाद आगे बढ़ता है, पूंजीवाद भी उन्हीं के आधार पर अपना औचित्य सिद्ध करने में लगा रहता है. समाजवाद की भांति पूंजीवाद भी व्यक्तिस्वातंत्र्य एवं मानवाधिकार का बढ़चढ़कर गुणगान करता है, किंतु उसकी कमजोरी है कि वह इसको सस्थाओं के माध्यम से लागू करना चाहता है. संस्थाओं की जटिलता और नियमादि उनकी कार्यप्रणाली को जटिल बनाते हैं जिससे जनसाधारण के लिए संस्थाओं का लाभ उठा पाना बहुत कठिन होता है. इससे विशेषज्ञ संस्कृति को बढ़ावा मिलता है. उसके फलस्वरूप समाज में बौद्धिक आधार पर विभाजन को स्वीकृति मिलने लगती है. यही समाज के आर्थिक आधार पर विभाजन का बुनियादी आधार है, जिसे पूंजीवाद निहित स्वार्थ के लिए पोषितपल्लवित करता है.

पूंजीवाद में मनुष्य की नैतिक प्रेरणाओं को जगाने के लिए कोई कोई तंत्र नहीं होता. न ही वह इस तरह का कोई प्रयास करता है. इसके उलट पूंजीवाद सुखसुविधाओं के नाम पर ऐसे उपकरण और संसाधन बाजार में उतार देता है जो मनुष्य के भीतर अकेलेपन को संपूर्णता के साथ जी लेने का भ्रम पैदा करते हैं. इससे समाज में संवाद के अवसर घटते जाते हैं. परिणामस्वरूप विभिन्न इकाइयों के बीच संदेह और अविश्वास को बढ़ावा मिलता है. व्यक्ति के अकेलेपन को बांटने, उसकी भरपाई के नाम पर पूंजीवाद बहुत चतुराई से बाह्यः संस्थाओं को ले आता है. जिससे समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संदेह और अविश्वास स्थायी रूप लेने लगता है. इससे सामाजिक विक्षोभ पैदा होते हैं. उस समय वह मध्यस्थता का नाटक करते हुए ऐसे रेफरी की भूमिका में होता जिसका टीमों की हारजीत से कोई नाता नहीं होता. उसकी नजर अपने मुनाफे और प्रोत्साहनलाभ पर टिकी होती है. इसके बावजूद पूंजीवाद के समर्थक शांत नहीं बैठते. वे मनुष्य के अकेलेपन को बढ़ाने, समाज में अविश्वास और संदेह पैदा करने के लिए चोरीचोरी हर समय, हर कालखंड में काम करते रहते हैं. इसलिए कि अकेलेपन की अनुभूति और समाज से डरे हुए व्यक्ति को पूंजीवाद के चंगुल में फंसाना बहुत आसान होता है. उसे पूंजीवाद द्वारा खड़ी की गई संस्थाओं के मोहपाश में आसानी से फंसाया जा सकता है. पूंजीवाद के लिए मुनाफा ही मोक्ष है. उसकी हर बहस लाभ पर आकर दम तोड़ लेती है. स्वयं को वैज्ञानिक सोच और नवीतम ज्ञान का समर्थक बताने वाला, नवीनतम शोध एवं प्रौद्योगिकी के आधार पर अहर्निंश काम करने वाला पूंजीवाद, मुनाफे के लिए बुरी नजर से बचाने वाले ‘नजर सुरक्षा कवच’ तथा ‘शनियंत्र’ आदि बेचता है. पाखंड के कारोबार को तरहतरह से बढ़ावा देता है. मुनाफे के लिए उसे मौत को प्रायोजित करने का अवसर मिले वह उसके लिए भी सहर्ष तैयार रहता है.

इसी स्वार्थपरता के कारण पूंजीवाद की आलोचना उसके उभार के दिनों में ही होने लगी थी. इसके बावजूद वह विकासमान रहा. इसका कारण है कि पूंजीवाद ने समाज में मध्यवर्ग पैदा किया था. उससे पहले समाज में अमीर और गरीब का विभाजन था. उसकी विडंबना थी कि जो अमीर था, उसके पास जरूरत से इतना अधिक था, उसको बनाए रखना ही उसके लिए बड़ी चुनौती थी. दूसरी ओर गरीब था जिसके पास इतने अभाव थे कि जीवन को बचाए रखना बड़ी चुनौती होती थी. एक को सपनों की जरूरत इसलिए नहीं थी क्योंकि उसकी हर ख्वाइश तत्काल पूरी हो जाती थी. दूसरे के पास कोई सपना नहीं था. इसलिए कि घोर अभावों के बीच सपना देखने की उसकी हिम्मत ही नहीं होती थी. मामला सीधेसीधे ‘होने’ या ‘न होने’ का था, इसलिए उसे आसानी से नियतिबद्ध किया जाता था. लोगों के दिलों में यह बात बिठाई जा चुकी थी कि जो विशिष्ट तथा सुखसुविधा संपन्न वर्ग है, उसपर ईश्वर की विशेष अनुकंपा है. मध्यवर्ग ने व्यक्ति की खुशहाली को नियतिबद्ध मानने वाली धारणा पर प्रहार किया था. उसके पास सपने थे और संकल्प भी. ऊपर से खूबी यह कि वह अपनी सीमाओं के अतिक्रमण के लिए निरंतर प्रयत्नरत रहता था. मशीनीकरण और पूंजीवाद की सफलता में इस वर्ग का योगदान किसी से छिपा नहीं था. इसका उसे लाभ भी मिला था. इस वर्ग का बड़ा हिस्सा पूंजीवाद को कामयाब बनाने के लिए सतत प्रयत्नशील रहता था. मगर एक हिस्सा असंतोष का शिकार भी था. उसे हमेशा यह लगता था कि मात्र पूंजी और अपने निष्क्रिय योगदान के बल पर पूंजीपति जितना लाभ कमाता है, उसका उसे कोई अधिकार नहीं है. यह वर्ग लाभ में अपनी सम्मानजनक हिस्सेदारी चाहता था. इस वर्ग के असंतोष के कारण पश्चिम में अनेक पूंजीवादी आंदोलनों और विचारधाराओं का जन्म हुआ था. उन आंदोलनों और विचारधाराओं को पूंजीवाद उत्पादन व्यवस्था से जुड़े अन्य वर्गों का समर्थन भी प्राप्त हुआ.

क्रमश:

ओमप्रकाश कश्यप

अराजकतावादी दर्शन और केजरीवाल का ‘स्वराज’

सामान्य

ऐसा चाहूं राज मैं यहां मिले सभन को अन्न
छोटे-बड्डे सभ सम्म बसें, रविदास रहे प्रसन्न
रविदास

अरविंद केजरीवाल स्वयं को अराजकतावादी मानते हैं. उनकी नीयत पर संदेह करने की मेरी कोई मंशा नहीं है. कुछ दिनों पहले उनके द्वारा केंद्र सरकार के विरोध में दिए गए धरने और जनलोकपाल बिल को लेकर केंद्र को चुनौती देने, गैस दोहन जैसे मामलों में मुकेश अंबानी सहित तीन केंद्रीय मंत्रियों के विरुद्ध एफआईआर की सिफारिश करने जैसे मामलों से उन्होंने सिद्ध भी किया है कि वे लोकतंत्र के परंपरागत ढांचे में विश्वास नहीं करते. अपनी मांगों के समर्थन अति की सीमा तक जा सकते हैं. मैं यह भी कहना चाहता हूं कि जनतंत्र में जिदें नहीं जनसहमति चलती है. इसके बावजूद यदि केजरीवाल स्वयं को अराजकतावादी मनवाने पर तुले हैं, तब मेरे सामने यह मान लेने के सिवाय कोई विकल्प नहीं है कि खुद को अराजकतावादी घोषित करने अथवा वैसा आचरण करने से पहले उन्होंने इस दर्शन को भली-भांति पढ़ लिया होगा. मेरी अपेक्षा अन्यथा भी नहीं है. वे विनम्र हैं, सुशिक्षित हैं. जनलोकपाल आंदोलन तथा चुनावी सभाओं में भाषण के जरिये उन्होंने लोगों के मन पर जो छाप छोड़ी है, उससे इसमें कोई संदेह नहीं कि वे पूर्ण अराजकतावादी भले न हों, किंतु लोकतांत्रिक आस्था से गहरे जुड़े हैं. यदि यह निष्ठा आगे भी बनी रही तो जनता का प्यार और विश्वास निस्संदेह आगे भी उनमें बना रहेगा. जिद और संकल्प के बीच न्यूनतम दूरी रखने की उनकी राजनीतिक शैली को देखकर अराजकतावाद नए सिरे से विमर्श में आया है. यह बात अलग है कि कतिपय पूर्वाग्रहों के कारण हमारे यहां अ-राजकता को अच्छे अर्थों में नहीं लिया जाता. प्रायः उसे अव्यवस्था, अशांति, उपद्रव-ग्रस्त राज्य तथा शासन की नाकामी का पर्याय मान लिया जाता है. ऐसे में यदि कोई मुख्यमंत्री स्वयं को खुलेआम अराजकतावादी कहता है, तो वह अलोकप्रिय होने का खतरा उठाता है. साथ ही विपक्षी दलों को अवसर देता है कि अराजकता और अराजकतावाद के बारे में प्रचलित जन-पूर्वाग्रहों का लाभ उठाकर उसकी छवि को मलिन करने की कोशिश कर सकें. इस आधार पर केजरीवाल की खूब आलोचना भी हुई है. लेकिन यहां बात व्यक्तिगत प्रशंसा या आलोचना की नहीं, अराजकतावाद को लेकर है. अराजकतावाद अंग्रेजी राजनीतिक दर्शन ‘अनार्की’ का पर्याय है. जिसका सामान्य अर्थ है—‘बिना राजा का राज्य.’ यह विचार लगभग उतना ही पुराना है, जितना समाज. यह आश्चर्यजनक सत्य जैसी स्थिति है कि अ-राजकता राज्य से पहले ही अवस्था है. अराजकतावाद के आलोचक यह भी भूल जाते हैं कि लाला हरदयाल, सरदार भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के अलावा गांधी और जयप्रकाश नारायण जैसे बड़े नेता जिनकी लोकतांत्रिक निष्ठा असंद्धिग्ध थी, ने भी स्वयं को समय-समय पर अराजकतावादी घोषित किया था. क्रांतिकारी ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए अराजकतावाद का नारा देते थे तो गांधी समेत आधुनिक नेता सर्वसाधारण से अपनी निकटता तथा उसके कल्याण से जुड़े मुद्दों के प्रति अपनी निष्ठा दर्शाने के लिए स्वयं को अराजकतावादी कहने का खतरा उठाते थे. प्रश्न उठता है कि क्या सचमुच अराजकता या अराजकतावाद अशांति, अव्यवस्था और सामाजिक उच्छ्रंखलता का प्रतीक है? क्या शासन के अधीन, चिर-शासित रहना ही मानव-नियति है?

राजनीतिक दर्शन के रूप में अराजकतावाद लोकतंत्र जितना ही पुराना, किंतु जनोन्मुखता को लेकर उससे आगे का परमलोकतंत्रवादी दर्शन है. यह मनुष्य की अच्छाई पर भरोसा करता है. मानता है कि मनुष्य मूलतः निष्कपट, न्यायप्रिय, शांतिप्रिय और विवेकवान प्राणी है. यदि उसके व्यवहार में गिरावट आती है, तो उसके पीछे समाज में व्याप्त असमानता, अविश्वास और अन्यायकारी स्थितियां हैं. परिस्थितियां अनुकूल हों, समाज में न्यायकारी और समानतापूर्ण वातावरण हो तो प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन को शांतिपूर्वक ढंग से बिताना पसंद करेगा. ऐसे में बाहरी शासन की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी. अराजकतावादी मानते हैं कि शासन अथवा कानून के नाम पर राज्य की उपस्थिति जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप है. ताकत का प्रतीक होने के कारण उसका झुकाव शक्तिशाली वर्गों की ओर होता है. इससे जनसाधारण के लिए मुश्किलें और भी बढ़ जाती हैं. उल्लेखनीय है कि शासन को लेकर यह समझ आज नहीं बनी. ईसापूर्व छठी शताब्दी में जन्मा चीनी विद्वान लाओत्से अराजकतावादी था. उसके शिष्य झुआंग्जी ने राजशाही और दूसरे सर्वसत्तावादी तंत्रों की आलोचना करते हुए लिखा था कि न्याय और कानून के नाम पर गठित अतिवादी राज्य, ‘मामूली चोर को जेल में डाल देता है, जबकि बड़े-बड़े डाकू, बटमार खुलेआम घूमते रहते हैं.’ पश्चिम के देश भी अराजकतावाद(अनार्की) की प्रशंसा के मामले में पीछे नहीं हैं. अराजकतावाद के उद्गम की खोज करते ‘क्रिश्चन अनार्किस्ट’ ईसा मसीह तक चले जाते हैं. जार्ज बुडकाक ने अपनी पुस्तक ‘अनार्किस्म: ए हिस्ट्री आ॓फ लिबरटेरियन आइडियाज एंड मूवमेंट’ में फ्रांसिसी इतिहासकार जार्ज लेकार्शियर को उद्धृत करते हुए लिखा है, ‘अराजकतावाद के वास्तविक संस्थापक ईसा मसीह थे. प्रथम अराजकतावादी समाज की स्थापना उनके अनुयायियों द्वारा की गई थी.’1 अराजकतावाद के माध्यम से राज्य नामक संस्था के निषेध के पीछे विद्वानों की यह धारणा रही है कि राज्यसत्ता का स्वरूप चाहे जैसा हो, उसकी निगाह अपने स्वार्थ से आगे नहीं जा पाती. सत्ता की अंतिम परिणति शोषण के रूप में सामने आती है. जितनी बड़ी सत्ता, उतना ही भयावह शोषण. उसके शोर में जनसाधारण की न्याय के लिए उठी आवाज नक्कारखाने में तूती बनकर रह जाती है. बीसवीं शताब्दी के महान मानवाधिकारवादी चिंतक थामस पेन ने राज्य का वैसा निषेध नहीं किया, जैसा अराजकतावादी करते थे, मगर उसने राज्य को एक आवश्यक बुराई स्वीकार किया—‘कुछ विद्वान समाज और सरकार दोनों को एक होने की भ्रांति पाल लेते हैं, अथवा दोनों के बीच बहुत कम अंतर कर पाते हैं. जबकि दोनों न केवल अलग हैं, बल्कि उनका उद्गम स्रोत भी अलग-अलग है. प्रत्येक राज्य में समाज मनुष्यता का आशीर्वाद है, लेकिन सरकार, भले ही सर्वश्रेष्ठ राज्य में क्यों न हो, एक आवश्यक बुराई है और निकृष्ट राज्य में तो वह असहनीय हो सकती है.’2

भारत में अराजकतावाद के समर्थक विद्वान उसकी खोज के लिए वेदों तक चले जाते हैं. वे दावा करते हैं कि लोकप्रशासन अथवा पूर्ण विकेंद्रीकृत राज्य के संकेतों की वैदिक साहित्य में भरमार है, ‘वेदों से पता चलता है कि बिलकुल आरंभिक काल में भी….राष्ट्रीय जीवन के सब कार्य सार्वजनिक समूहों और संस्थाओं आदि के द्वारा हुआ करते थे. इस प्रकार की सबसे बड़ी संस्था हमारे पूर्वजों की समिति थी.’ (हिंदू राजतंत्र: काशीप्रसाद जायसवाल). महाभारत के शांतिपर्व में युधिष्ठिर ने कहा है कि पहले न राजा था न राज्य. लोग मिल-जुलकर काम चला लेते थे. स्थानीय तंत्र इतना सुगठित था कि बाहरी प्रशासन की आवश्यकता ही नहीं थी. आशय है कि अराजकतावादी यानी ‘बिना राजा का राज्य’ एक प्राचीनतम अवधारणा है. इसका इतिहास सभ्यता के इतिहास जितना ही पुराना है. अराजकतावाद को सबसे सुंदर ढंग से थोरो ने अभिव्यक्त किया है—‘‘मेरा दृढ़ विश्वास है कि—सरकार वही सर्वोत्तम है जो न्यूनतम शासन करे. प्रत्येक सरकार को मैं इस रास्ते पर निरंतर प्रयत्नरत देखना चाहता हूं. उसका लक्ष्य उस ऊंचाई को प्राप्त करना होना चाहिए, जिसके बारे में मुझे विश्वास है कि—सरकार वही सर्वश्रेष्ठ है जो कतई शासन नहीं करती.’ नागरिकों को उसके लिए तैयार रहना चाहिए. सही मायने में वही ऐसी सरकार होगी, जिसको उन्हें प्राप्त ही चाहिए.’3

अराजकतावाद परिपक्व नागरिक तंत्र का पर्याय है. उसमें नागरिक आपसी समझौते, सहयोग और स्वेच्छा के आधार पर परस्पर जुड़े होते हैं. सभी का ध्येय होता है समेकित विकास. आपसी जरूरतों, भावनाओं का सम्मान करते हुए विकासरत रहना. फिर क्या कारण है कि लोग राज्य-सत्ता को अपरिहार्य मान लेते हैं? क्यों उन्हें लगता है कि बगैर राजा के राज्य चल ही नहीं सकता है? क्यों वे स्वयं को भेड़ मान लेते हैं, जिन्हें घेरने के लिए गड़हरिया का होना उन्हें जरूरी लगता है? क्या यह आत्मविश्वास की कमी है? क्या यह सत्ता के आगे समर्पण की भावना है, अथवा ऐसा ही कुछ और? सवाल यह भी है कि अराजकतावाद यदि लोकतंत्र से आगे की व्यवस्था है तो पिछली शताब्दियों में उसके समाजवाद, साम्यवाद यहां तक कि लोकतंत्र जैसी समानधर्मा विचारधाराओं के मुकाबले पिछड़ जाने की वजह क्या है? इसके अनेक कारण हो सकते हैं. उनमें से एक यह है कि समाज सहस्राब्दियों से शासक और शासित में बंटा रहा है. लंबे समय तक शासित-शोषित रहा मनुष्य, इस विभेदकारी व्यवस्था से अनुकूलन कर चुका है. निरंतर शासित होने से उसका आत्मविश्वास क्षीण हुआ है. ऊपर से शासकवर्ग, जिनमें धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक तीनों शक्तियां सम्मिलित हैं, द्वारा उसे बार-बार समझाया जाता है कि शांतिपूर्ण जीवन के लिए बाहरी नियंत्रण आवश्यक है! कि अकेला व्यक्ति सुरक्षित नहीं रह सकता! इस तरह वे अनजाने ही मानव-समाज की गरिमा पदावनत कर उसकी गणना पशु समाज के तुल्य रखकर करने लगते हैं. अपने समर्थन में वे उन मनोवैज्ञानिकों तर्कों का सहारा लेते हैं जिनका मानना है कि मनुष्य में नकारात्मक प्रवृत्तियां जन्मजात होती हैं. कि शासक होना जन्मजात गुण है. और जिनमें शासक होने की योग्यता नहीं है, शासित होना उनकी नियति है. उनपर नियंत्रण के लिए पुलिस और कानून बल आवश्यक है. ‘सद् रक्षणाय—खल निग्रहाय’ तथा ‘परित्राणाय् साधुनाम् विनाशाय् च दुष्कृताम्’ जैसे कथन, मनुष्य और उसकी स्वाभाविक अच्छाइयों पर इसी अविश्वास के चलते अस्तित्व में आए हैं. उसमें सुधार के बजाय दंड पर जोर दिया जाता है. वेदों में अनार्यों से समझौता या उनके सुधार की संभावना तलाशने के बजाय सीधे-सीधे उन्हें मिटा देने की प्रार्थनाएं इंद्र से की गई हैं. विभेदकारी व्यवस्था से अनुकूलन हेतु कभी धर्म का सहारा लिया जाता है, कभी राष्ट्र-भक्ति का तो, कभी विकास और सुख-शांति का. इस तरह सत्ता की मौजूदगी को सुख, शांति और सामाजिक विकास की आवश्यकता के रूप में देखने की सहस्राब्दियों लंबी परंपरा रही है. उसका जनमानस पर इतना गहरा प्रभाव है कि उनके बिना भी सफल नागरिक जीवन जिया जा सकता है, ऐसी कल्पना तक संभव नहीं लगती. यहां हम रूसो को याद करना चाहेंगे. उसका कहना था कि मनुष्य आजाद जन्मा है, लेकिन हर जगह वह बेड़ियों में है. इस कथन का निहितार्थ यह भी है कि मानवीय स्वतंत्रता की अवरोधक ये बेड़ियां राज्य और समाज द्वारा विनिर्मित होती हैं. ये ऐसे समाज के लिए बड़ी चुनौती हैं जो मानवाधिकारों के सम्मान का दावा करते हुए मनुष्य की नैसर्गिक स्वतंत्रता को अधिकतम लौटा देना चाहता है. उनकी धारणा जान लाक, रूसो, बैंथम जैसे विचारकों की मान्यता के भी विपरीत है, जो बालक के मस्तिष्क को कोरी स्लेट, उसे निश्छल, निर्मैल्य, निष्पाप, निष्पक्ष, पवित्र आदि मानते थे. यूं भी नकारात्मक वृत्तियों को नैसर्गिक कहकर, उन्हें मानव-व्यवहार की स्थायी विशेषता मान लेना, मानव-व्यक्तित्व पर परिवेश के प्रभाव के साथ-साथ उसके आत्मोत्थान की संभावना तथा उसके लिए की जाने वाली नैतिकतावादी कोशिशों को भी नजरंदाज कर देना है. इसे अधिसत्तावादियों की चाल भी कह सकते हैं, जो मनुष्य से सामान्य जीवन और चयन के नैसर्गिक अधिकारों को पहले ही छीन लेती है. उस अन्याय से मनुष्य जब छटपटाता है, प्रतिकार की सोचता है तो उसके सोच और आजादी के लिए किए जाने वाले प्रतिकार को नकारात्मक कहकर उसका मनोबल गिराने की कोशिश की जाती है.

अराजकतावाद में शासन अथवा बाह्यः सत्तातंत्र का आकार सिकुड़ता जाता है. उसकी जिम्मेदारी सहयोगाधारित संस्थाएं एवं प्रबुद्ध नागरिक संगठन संभाल लेते हैं. आदर्श अराजकतावादी राज्य में शासनतंत्र की उपस्थिति शून्य अथवा नगण्य हो जाती है. वहां व्यक्तिमात्र की क्षमताओं, विशेषताओं को समष्ठि और व्यैक्तष्ठि में उपयोग करने तथा उनके बीच समन्वय स्थापित करने पर जोर दिया जाता. जिसमें सामूहिक नैतिकता और विवेक कानून के सार्थक विकल्प की तरह काम करते हैं. वह एक दुष्कर लक्ष्य है. जिसके लिए अभिजन मानसिकता तथा उसे बढ़ावा देने वाले तंत्र का सर्वत्र बहिष्कार अनिवार्य होता है. अराजकतावादी राज्य की शक्तियां उसके नागरिकों में केंद्रित होती हैं. उल्लेखनीय है कि सरकार को ताकत उसके नागरिकों की ओर से प्राप्त होती है. लोग अपनी शांति के लिए, सुरक्षा के लिए, अपनी स्वतंत्रता और निर्णयाधिकार का थोड़ा-थोड़ा हिस्सा सरकार नामक सामूहिक तंत्र को सौंप देते हैं. वे सरकार अथवा निर्वाचित प्रतिनिधियों पर भरोसा करते हैं. यह मान लेते हैं कि उनका अपना होने का दावा कर संसद अथवा विधायिकाओं तक पहुंचे जनप्रतिनिधि ऐसे निर्णय लेंगे, जैसा अपने कल्याण के लिए वे स्वयं लेना चाहते हैं. उनका निर्णय इस सहज विश्वास की अभिव्यक्ति होता है कि निर्वाचित प्रतिनिधि अपने निर्वाचकों की सामान्य इच्छा का अधिवक्ता सिद्ध होगा. प्रायः वे मान लेते हैं कि उनके प्रतिनिधि स्वार्थ-भाव से कोसों दूर हैं. उस समय वे इस सामान्य-बोध से परे होते हैं कि घोड़े को सही दिशा देने, उसे अनुकूल गति तक साधने के लिए सवार को लगाम अपने हाथों में रखनी पड़ती है. जनता की बेध्यानी अथवा अपने प्रतिनिधियों पर अंध-विश्वास अथवा अतिविश्वास को निर्वाचित प्रतिनिधि दूसरे ही अर्थ में लेते हैं. यह भूलकर कि वे जनप्रतिनिधि हैं, उन्हें उनके अधिकार एवं शक्तियां जनता की ओर से प्राप्त हैं, यह मानने लगते हैं कि उन्हें जनता ने उनके गुणों और शक्तियों से सम्मोहित होकर अपना प्रतिनिधि स्वीकार किया है. यानी उनकी शक्तियां और अधिकार जनता का संदाय न होकर उनकी अपनी खूबियां हैं. वे यह भुला देते हैं कि जिस ज्ञान, कार्यकौशल अथवा व्यवहार-कुशलता के बूते वे उस स्थान तक पहुंचे हैं, वह समाज की सम्मिलित चेतना की धरोहर है और समाज में अनेक व्यक्ति खूबियों के मामले में उनसे कहीं आगे हो सकते हैं. बावजूद इसके वे स्वयं को जनता का भाग्य-विधाता मानने की भूल लगातार करते जाते हैं. यह स्थिति जनमानस में उनके और लोकतंत्र के प्रति अनास्था को बढ़ावा देती है.

लोकतंत्र में जनता अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ ले, सत्ता का नियामक होने के बजाय उसपर आश्रित होकर रह जाए, वहां यही होता है. सवार यदि लगाम को ढीला छोड़कर ऊंघने लगे तो घोड़ा मनमानी करेगा ही. स्वाभाविक रूप से उसे जिधर हरियाली दिखाई देगी, उस दिशा में मुड़ जाएगा. इस तरह आगे की यात्रा घोड़े की मर्जी पर निर्भर होकर रह जाएगी—इस तथ्य को जनता समझे न समझे, सरकार में बैठे हुए लोग भली-भांति जानते हैं. बेलगाम दौड़ते रहने के लिए वे जनता की आंखों पर पट्टी बांधने, उसे तरह-तरह से भरमाए रखने का प्रयास करते हैं. प्राचीन समाजों में जाति और धर्म जैसी संस्थाओं की खोज जनसाधारण को भरमाए रखने के लिए ही की गई थीं. समाजीकरण के लिए जरूरी नैतिकताओं को स्थायित्व देने के लिए धर्म का सहारा लिया गया था. आरंभ में एक समान आस्था, लोकविश्वास तथा सामाजिक आचारसंहिता के समर्थक एक ही धर्म के अनुयायी कहे गए. मगर कुछ ही अवधि में धर्म ने स्वयं को अभिजन हितों का संरक्षक और व्याख्याता सिद्ध कर दिया. प्रकट में वह सांसारिक सुखों को हेय बताकर उनकी उपेक्षा करता था, किंतु उसके मापदंड सामान्य जन और विशिष्ट जन के लिए अलग-अलग थे. जो धर्म जनसाधारण को त्याग और तपश्चर्य का उपदेश देकर संसार को निस्सार, मनुष्य के सहज रागानुराग को माया और भव-प्रपंच बताता था, वही राजा, पुरोहित आदि को दैवी-सत्ता का प्रतिनिधि मानकर उनके लिए असीमित अधिकार एवं भोगविलास के रास्ते खोल देता था. कहने को तो धर्म और समानता के नाम पर कुछ शास्त्रीय प्रावधान भी थे. अपेक्षा की जाती थी कि शिखर पर बैठे लोग उनका पालन करेंगे. मगर व्यवहार में सबकुछ शीर्षस्थ वर्गों द्वारा उनकी मर्जी पर निर्भर था. इसलिए विचलन की अवस्था में विक्षोभ की संभावना न्यूनतम थी. यही कारण था कि अर्जन, उपार्जन से लेकर भोग के स्तर तक समाज में आर्थिक-सामाजिक विषमता लगातार बनी रही. उसी के आधार पर बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में विद्वानों की धारणा बनी कि केवल धर्म अथवा उसकी नैतिकतावादी अवधारणाओं की मदद द्वारा जनसाधारण को खुशहाल, न्यायपूर्ण एवं समान जीवन दे पाना असंभव है. उसके लिए राजनीतिक आधार पर प्रयास करने होंगे. अराजकतावादी विचारधाराओं का नए सिरे से चर्चा में आना इसी सोच का परिणाम था. यह मानते हुए कि सत्ता का स्वरूप कोई भी हो, उसकी अंतिम परिणति शोषण में होती है, राज्य की शक्तियों को विक्रेंद्रीकृत कर पुनः जनता को लौटाने के सुझाव दिए जाने लगे. निहितार्थ था कि किसी को इतने अधिकार ही न दिए जाएं जिससे वह अपने दायित्वों को भुलाकर कालांतर में मनमानी करने लग जाए. अंतरराष्ट्रीय कानून, बाह्यः सुरक्षा, व्यापार आदि मामले में यदि किसी व्यक्ति या संस्था को अतिरिक्त अधिकार देना अत्यावाश्यक हो तो नागरिक संस्थाओं को इतना सजग और चेतना-संपन्न बनाया जाए कि जनहित के मुद्दों से विचलन अथवा मनमानी की अवस्था में उसपर तत्क्षण नियंत्रण संभव हो सके.

एक राजनीतिक दर्शन के रूप में अराजकतावाद पश्चिम से आयातित है. उसका जन्म उस दौर में हुआ था, जब औद्योगिक क्रांति के आगमन के पश्चात सामंतवाद सवालों के घेरे में था; तथा जिस अपेक्षा के साथ लोगों ने उसका स्वागत किया था, वह पूरी नहीं हो पाई थी. बल्कि उच्छ्रंखल पूंजीवाद के रूप में एक नए किस्म का सामंतवाद जन्म ले चुका था, जो पहले की अपेक्षा कहीं अधिक खतरनाक था. आर्थिक स्तरीकरण में तेजी आने से ऊपर से नीचे तक असंतोष व्याप्त था. उल्लेखनीय है कि पश्चिम में औद्योगिक क्रांति की सफलता सुखवादी विचारधारा से जुड़ी तथा उसपर निर्भर थी. वह मानवीय स्वतंत्रता का सम्मान करती थी. धर्म की विभेदकारी नीतियों, लोगों को लोक-परलोक संबंधी भ्रांतियों में उलझाकर खुद को सुख और विलासी जीवन जीने की प्रवृत्ति का विरोध वहां 16वीं से, वैज्ञानिक प्रबोधन के साथ ही होने लगा था. कालांतर में मशीनीकरण ने रफ्तार पकड़ी तो ऐसा धर्म जो लोगों को सांसारिक सुखों से बचने की सीख देता था, पूंजीपतियों और कारखानेदारों के आड़े आने लगा. धर्म सांसारिक सुखों के बजाय दिव्य आनंद को जीवन का लक्ष्य मानता था. जबकि साधारण कारखानों के उत्पाद केवल सुख की अनुभूति करा सकते थे. उनकी तेज खपत के लिए आवश्यक था कि अधिकाधिक लोग अधिकाधिक उपभोग करें. उसके लिए धर्म की सांसारिक सुखों को हेय समझनेवाली प्रवृत्ति पर हमले किए गए. इससे सुखवादी विचारों को नया आधार मिला. लेकिन समानता-आधारित समाज की स्थापना में धर्म की ओर से दी जाने वाली चुनौतियां केवल यहीं तक सीमित नहीं थीं. उसका विकास सामंतवाद और राजशाही के संरक्षण में हुआ था. धर्म पर उनका गहरा प्रभाव था. इस कारण वह समाजार्थिक, राजनीतिक असमानता का भी पोषण करता था. वह एक ओर तो ‘कण-कण में भगवान’, ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंजिंचज्जगत्यां जगत्’ के नारे लगाता था, वहीं दूसरी ओर वह राजा को दैवीय प्रतिनिधि बनाकर उसे असीमित अधिकार सौंप देता था. औद्योगिक विकास के दौर में निहित स्वार्थ के लिए पूंजीपतियों ने धर्म की सांसारिक सुखों को हेय बनाने वाली प्रवृत्ति को तो चुनौती दी, किंतु उसकी नियतिवादी स्थापनाओं को ज्यों का त्यों अपना लिया. यानी मनुष्य असीमित भोग को तो उत्सुक हो, किंतु समाजार्थिक विषमता के कारणों की ओर से आंखें मूंदे रहे, इससे श्रम के मूल्यांकन का अधिकार जो उसका एकमात्र स्वामी होने के कारण संबंधित व्यक्ति के पास होना चाहिए, उत्पादक के हाथों में चला गया. परिणामस्वरूप पूंजी-केंद्रित साम्राज्यों के उभार को बढ़ावा मिला. उन्होंने धर्म-संस्थानों को मोटे चंदे देकर अपने बस में कर लिया. परिणामस्वरूप सांसारिक सुखों को हेय बतानेवाली प्रवृत्ति को छोड़कर धर्म स्वयं उसकी व्यवस्था में जुट गया. पुरोहितों ने ऐसे अनेक कर्मकांड निर्धारित किए जिनके द्वारा सांसारिक सुखों में वृद्धि का दावा किया जा सकता था. धर्म ने प्रेय को लेकर व्यवस्थाओं में छूट अवश्य दी थी, किंतु नियतिवादी सोच से वह अब भी पूरी तरह बंधा हुआ था. इस आधार पर हो रहे शोषण से उसको कोई शिकायत न थी. चूंकि वह शोषण के कारणों पर विचार ही नहीं करता था, इसलिए धार्मिक व्यापार में लगी शक्तियां आसानी यह समझाने में सफल हो गईं कि जिन सुखों को समाज में चल रही स्पर्धा अथवा अन्य किसी कारण से पाने में असमर्थ है, उसको दैवी कृपा से आसानी से पाया जा सकता है. इससे उनकी धर्म की दुकानदारी पहले से ज्यादा भी जमने लगी. वर्चस्वकारी ताकतों का स्वार्थाधारित धार्मिक-आर्थिक गठजोड़ लगातार मजबूत होता गया. कई बार वह इतना शक्तिशाली हो जाता था कि राजनीतिक शक्तियों को भी अपने समर्थन में झुका सकता था.

वैज्ञानिक चेतना एवं नए विचारों की रोशनी में धर्म की वह चतुराई विचारकों की समझ में आने लगी थी. इसलिए ब्रूनो बायर, लुडबिग फायरबाख आदि हीगेल समर्थक विचारकों ने सीधे-सीधे धर्म को शोषण का हथियार माना. लेकिन बू्रनो और फायरबाख ने धर्म की आलोचना चाहे जितनी तल्ख भाषा और अकाट्य तर्कों के साथ की हो, उससे पूंजीपतियों तथा उनके समर्थक राजतंत्रों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा था. क्योंकि उन दोनों की पैठ बौद्धिक हलकों में विशेषकर उन अभिजन बुद्धिजीवियों तक सीमित थी, जो एकाधिकारवादी शक्तियों की मौखिक आलोचना चाहे जितनी कर कर लें, प्रकट में वे उनसे बहुत दूर नहीं जा सकते थे. वे स्वयं एकाधिकारवादी सोच का शिकार होते हैं, तथा अपने बौद्धिक साम्राज्य को फैलते हुए देखना चाहते हैं. उनकी स्वाभाविक चेतना अभिजनोन्मुखी होती है. ऐसे विचारकों से एकाधिकारवादी शक्तियों को कोई नुकसान न था. इसलिए ब्रूनो और फायरबाख के क्रांतिकारी चिंतन का उतना असर नहीं हुआ, जितना कार्ल मार्क्स के विचारों का. मार्क्स संभवतः पहला विचारक था जिसने अर्थसत्ता और राजसत्ता को परस्पर पूरक मानते हुए वैकल्पिक समानतावादी समाज की परिकल्पना की थी. उसने सर्वहारा वर्ग से आवाह्न भी किया था कि वह संगठित प्रतिरोध द्वारा वर्चस्वकारी सत्ताओं को बेदखल कर शक्तिकेंद्रों को हथिया ले. मार्क्स प्रणीत ऐतिहासिक-भौतिकवाद का सिद्धांत बताता था कि किसी समाज में राजनीति की दशा-दिशा उस समाज की उत्पादन प्रणाली पर निर्भर करती है. इस विचार को सर्वत्र सराहना मिली. कालांतर में मार्क्स के चिंतन के आधार पर जो दल बने उनपर मुख्यतः ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ का असर था, जिसके पीछे हीगेल के द्वंद्ववादी दर्शन की प्रेरणा थी. मार्क्स की आंखों में वर्गहीन समाज की स्थापना का सपना था, किंतु वर्ग-संघर्ष की अवधारणा जो सर्वहाराक्रांति का मुख्य आधार थी, कम से कम इस मायने में परंपरागत राजनीति से प्रेरित थी कि बदलाव हेतु सत्ता में आने के लिए दूसरों को उससे बेदखल करना जरूरी है. मार्क्स सर्वहारा क्रांति को वास्तविक परिवर्तन यानी वर्गहीन समाज की स्थापना की दिशा में पहला कदम मानता था. पेरिस क्रांति की असफलता श्रमिक संगठनों की प्रशासन संबंधी मामलों में अनुभवहीनता का परिणाम थी. मार्क्स समझ चुका था कि सर्वहारा क्रांति द्वारा सत्ता तो प्राप्त की जा सकती है, किंतु उसको स्थायी बनाने और साम्यवादी लक्ष्य के अनुरूप वर्गहीन समाज की स्थापना के लिए लोगों को पूंजीवाद की कमजोरियों तथा उसके शोषण के तरीकों के बारे में समझाना पड़ेगा. यही कारण था जिससे ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ में वर्ग-संघर्ष का आवाह्न करने वाला मार्क्स परिवर्ती जीवन में, पूंजीवादी शोषण के तरीकों और उनके बहुआयामी प्रभाव की ही गवेषणा करता है.

सैद्धांतिक दृष्टि से देखा जाए तो मार्क्स के वर्गहीन समाज और अराजकतावादी समाज में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है. सिवाय इसके कि मार्क्स जहां सत्ता को श्रमिक संगठनों के हाथों में सौंपकर कदाचित उसे बचाए रखना चाहता है, या वर्गहीन समाज की स्थापना के लक्ष्य की प्राप्ति तक—सर्वहारा के अधीन सत्ता रहने का समर्थन करता है. मार्क्स वर्गहीन समाज की स्थापना के समर्थन में जोरदार साम्यवादी तर्क देता है, जबकि अराजकतावाद का आदर्श राज्य की आवश्यकता के तिरोहण में है. दूसरे द्वंद्ववाद समर्थक मार्क्स क्रांति के लिए वर्ग संघर्ष को आवश्यक मानता है. इसके लिए उसे हिंसा के उपयोग से भी गुरेज नहीं है. जबकि कुछ आरंभिक अराजकतावादी विचारकों को छोड़ दें तो अधिकांश इस लक्ष्य को समाज के विवेकीकरण, संगठन और व्यापक लोकचेतना के माध्यम से प्राप्त करना चाहते हैं. वे चाहते हैं कि समाज बौद्धिकरूप से परिपक्व हो, ताकि उसको बाहरी नियंत्रण की आवश्यकता ही न हो. इसके लिए उसका ज्ञान की बहुविध शाखाओं में पारंगत होना आवश्यक है. साथ में इस विश्वास को वापस लौटाना कि शासन आवश्यक बुराई है और समाज बिना शासकवर्ग भी सुगठित हो सकता है. इस तरह साम्यवाद और अराजकतावाद के व्यावहारिक भेद सामने आ जाते हैं. मार्क्स का समकालीन और श्रमिक आंदोलन में वर्षों तक साथ रहा अराजकतावादी मिखाइल बकुनिन उसका मुखर आलोचक था. बकुनिन को सत्तावाद की परिकल्पना ही दोषपूर्ण लगती थी. उसका मानना था कि सत्ता चाहे एक के अधिकार में हो या पचास के, शिखर पर मौजूद लोग अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते ही हैं. मार्क्सवादियों की आलोचना करते हुए उसने लिखा था, ‘वे केवल तानाशाही फैला सकते हैं. संभव है उनकी तानाशाही के साथ कुछ जनभावनाएं भी जुड़ी हुई हों. इसके बावजूद उसके विरोध में हमारी एकमात्र और जोरदार प्रतिक्रया होगी कि तानाशाही चाहे जिसकी और जैसी भी हो, तानाशाह का एकमात्र उद्देश्य होता है, येन-केन-प्रकारेण खुद को सत्ता-शिखर पर टिकाए रहना. यह व्यापक जनसहमति और तानाशाह द्वारा आरोपित दासता को स्वीकारे बगैर असंभव है. स्वतंत्रता प्राप्त करने का एकमात्र रास्ता स्वतंत्रता है. तदनुसार विद्रोह के लिए चिर-तत्पर एवं नीचे-से ऊपर तक कारगर और मुक्त श्रम-संगठनों का स्वतंत्र आचरण जरूरी है.’4 बकुनिन की कल्पना ऐसे राज्य की थी जिसमें निर्णायाधिकार पूरी तरह नागरिक-संगठनों के अधीन हों. उसके अनुसार अराजकतावाद स्वयं-अनुशासित, विवेकवान, सर्व-समन्वयी, साहचर्य आधारित समाज का मुक्ति-स्वप्न है, जिसमें राज्य की शक्तियां या तो पूरी तरह क्षीण हो जाती हैं, अथवा बड़ी मात्रा में क्षीण होकर निःशेष होने की तरफ बढ़ रही होती हैं.

अराजकतावाद की सफलता स्वयं अनुशासित, विवेकवान, अंत:प्रज्ञायुक्त तथा समन्वयकारी, सहयोगी संगठनों पर निर्भर है. यह चाहे जितना जरूरी हो, किंतु एक दुष्कर कार्य था. इसके अनेक कारण, उनमें धर्म भी एक है. सत्ता के विकेंद्रीकरण द्वारा विकासगति अवरुद्ध न हो, इसके लिए जनविवेकीकरण आवश्यक था. चूंकि धर्म मनुष्य की विभेदकारी सत्ताओं के अनुकूलन में भारी भूमिका निभाता है. इसलिए यह मानते हुए कि स्वतंत्र समतावादी और सहयोगकारी संगठनों के गठन के लिए लोगों को धर्म के चंगुल से बाहर लाना आवश्यक है, बकुनाइन ने ‘गाड आफ स्टेट’ जैसी क्रांतिकारी पुस्तक लिखी थी, जो मार्क्स की ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ जितनी ही महत्त्वपूर्ण और प्रभावशाली रचना है. इसके बावजूद मार्क्स का प्रभाव गहरा बना रहा तो इसलिए कि मजदूर संगठनों पर उसका प्रभाव अधिक था. श्रमिक उसे अपना परमहितैषी मानते थे. इसलिए ‘प्रथम इंटरनेशनल’ के दौरान बकुनिन के साथ स्पर्धा में जीत मार्क्स की हुई थी. 1876 में बकुनिन की मृत्यु हुई. उसके सातवें वर्ष में मार्क्स भी चल बसा. 1895 में पूंजी के ऐंगल्स के संपादन में ‘पूंजी’ का दूसरा खंड सामने आया. उस समय तक 1871 में मात खाए श्रमिक संगठन पुनः सक्रिय होने लगे थे. इसलिए मार्क्स का पुनः सक्रिय हो उठना स्वाभाविक ही था. सर्वहारा क्रांति में एक राजनीतिक अपील थी. उसकी अपेक्षा अराजकतावाद अपेक्षाकृत भावुक और आदर्शोन्मुखी चिंतन था. चूंकि परिवर्तनकामी दलों, सर्वहारा संगठनों का नेतृत्व कर रहे नेताओं की निजी महत्त्वाकांक्षाएं उफान पर थीं, इसलिए वे मार्क्सवाद की ओर झुकते गए, जिसमें जोरदार राजनीतिक अपील थी और जो अपेक्षाकृत शीघ्र परिणाम, यहां तक कि बुर्जुआ शक्तियों के तख्तापलट तक का आश्वासन देता था. राजनीतिक अपील होने के कारण उग्र परिवर्तनकामी दलों ने मार्क्सवाद की शरण में जाना आसान समझा. उसी के आधार पर रूस, चीन, जर्मनी, अफ्रीका आदि देशों में श्रमिक नए सिरे से संगठित होने लगे थे. इस बार उनका नेतृत्व लेनिन, लियोन ट्राट्स्की जैसे महत्त्वाकांक्षी नेताओं के हाथों में था. बीसवीं शताब्दी का आरंभ मार्क्सवाद की जीत से हुआ था. और शताब्दी के मध्य तक आते-आते मार्क्सवाद दुनिया के आधे से अधिक देशों पर छा चुका था.

इसमें कोई संदेह नहीं कि साम्यवाद मानवीय स्वतंत्रता और समानता का सपना देखने वालों के लिए आदर्श सपना था, लेकिन जिन महत्त्वाकांक्षाओं के साथ उसको लाया जा रहा था, उनके पीछे राजनीतिक चेतना अधिक थी. इससे शीर्ष के स्तर पर सुख, सम्मान, प्रतिष्ठा की चाहत और वर्चस्ववादी मानसिकता पनपने लगी. दूसरे शब्दों में परिवर्तनकामी राजनीति के नारे के साथ सत्तारूढ़ हुए दलों में वे सब विकृतियां आने लगी थीं, जिनके विरुद्ध उन्होंने संघर्ष आरंभ किया था. परिणामस्वरूप साम्यवादी लक्ष्य के बीच निरंतर दूरी बढ़ने लगी. नतीजा यह हुआ कि कुछ ही वर्षों में साम्यवादी सपने का रंग फीका पड़ने लगा. इससे पूंजीवादी शक्तियों को बढ़ावा मिला. जनसाधारण की धर्म के प्रति आस्था को देखते हुए उन्होंने मार्क्सवाद का फैलाव रोकने के लिए से लोगों की धार्मिक आस्था को हथियार बनाया. पूंजीवादी-साम्राज्यवादी ताकतें मार्क्स के कथन, ‘धर्म अफीम है’ को आधार बना, उसे धर्म-विरोधी घोषित कर, निरंतर उसकी आलोचना करने लगीं. इसमें उन्हें कामयाबी भी मिली. अराजकतावाद से लड़ने के लिए उन्होंने मानवीय कमजोरियों को हथियार बनाया. उनके द्वारा बार-बार यह प्रचारित किया गया कि केवल कानून के राज्य में शांति और खुशहाली संभव है. सघन प्रचार तंत्र का लाभ उठाकर पूंजीवादी ताकतें मार्क्स और मार्क्सवाद को धर्मविरोधी तथा अराजकतावाद को शांति और व्यवस्था विरोधी सिद्ध करने में कामयाब हुईं.

आज व्यक्ति उपभोक्तावाद और धर्म दोनों के चंगुल में है. उपभोक्तावाद इस जन्म के सुखों के लिए व्यक्ति को अकेला होने का बोध कराता है. धर्म कहता है कि मृत्यु बाद केवल आत्मा होगी, संगी, साथी, परिजन काम नहीं आएंगे, इसलिए तरह वह परलोक के नाम पर व्यक्ति को अकेला बना देता है. यह अकेलेपन का बोध, अपने आसपास रह रहे नागरिकों के प्रति अविश्वास अराजकतावाद का आदर्श है. अराजकतावादी समाज को गढ़ने में सबसे बड़ा दुश्मन है, यह लोगों को सार्वजनिक हितों के लिए एकजुट होने से रोकता है. इसलिए अरविंद केजरीवाल यदि स्वयं को अराजकतावादी मानते हैं तो उन्हें तय करना होगा कि क्या उन्हें सचमुच अपने नागरिक बोध में विश्वास है. यदि हां तो धर्म और पूंजीवाद ने अपने-अपने स्वार्थ के कारण नागरिकों के बीच जो अविश्वास और दूरियां कायम कर दी हैं, उन्हें पाटने के लिए कौन-सा वैकल्पिक कार्यक्रम उनके पास है? उनके ‘स्वराज’ में पंचायती राज्य का सपना है, जिसे भारत में अकसर नारे की तरह उछाला जाता है. व्यावहारिक धरातल पर यह हर बार असफल सिद्ध हुआ कार्यक्रम है. गांधी, नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक पंचायती राज्य की मांग करते आए थे. लेकिन जैसे ही ये मांगे उठती हैं, सहस्राब्दियों से जातीय शोषण और उत्पीड़न का शिकार रहे लोगों के मन में संदेह उभर आता है. पंचायती राज्य का सीधा आशय आर्थिक और राजनीतिक शक्तियों, अधिकारों के विकेंद्रीकरण से है. यदि वे सचमुच विकेंद्रीकरण और स्वराज में विश्वास रखते हैं, तब उन्हें समझाना होगा कि ‘स्वराज’ जिम्मेदारी का विधान है. उसमें आलसी घुड़सवार होने से काम नहीं चल सकता. उसके लिए जनता को बौद्धिक और शारीरिक दोनों किस्म की सक्रियता चाहिए. इसलिए केजरीवाल के ‘स्वराज’ में कोई कार्यक्रम नजर नहीं आता. वे सत्ता को विकेंद्रीकृत कर जनता को अधिकार संपन्न करना चाहते हैं, बहुत अच्छा विचार है. जिन देशों में विकेंद्रीकृत शासन है, वहां स्थानीय तंत्र मजबूत हैं. चीन में कम्यून, श्रीलंका, जर्मनी और इजरायल में ‘किबुत्ज’, रूस में ‘सोवियत’ आदि स्थानीय निकायों के ही नाम हैं. भारत में ऐसे प्रयोग नाकाम हैं तो इसलिए कि यहां की दो-तिहाई जनता जिसमें शूद्र और दलित दोनों सम्मिलित हैं, जातीय शोषण के शिकार रहे हैं.

जनता यदि केजरीवाल में अपना नायक देखती है तो उसे समझना चाहिए कि ऊपर से थोपा हुआ विकास नीचे तक आते-आते चुकने लगता है. अराजकतावादी समाज के गठन के लिए आवश्यक है कि जनता स्वयं अपना नेतृत्व संभाले. नेता की भांति आचरण करते हुए अपने प्रतिनिधियों को जरूरी निर्देश दे. लोकतंत्र में सफलता केवल श्रेष्ठतम प्रतिनिधियों को संसद भवन तक पहुंचा देने से पूरी नहीं हो जाती. निर्वाचित प्रतिनिधि श्रेष्ठतम कार्य करें, इसी में लोकतंत्र की सफलता है. संसार का कल्याण है. यह तभी संभव है जब जनता भी अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति सचेत हो. जनप्रतिनिधियों से श्रेष्ठतम काम लेना भी जनता का दायित्व है. अभी तक जनता यह मानकर चलती रही है कि उसके प्रतिनिधि अपने दायित्वों के प्रति जागरूक रहकर निष्ठापूर्वक उनका पालन करेंगे. किंतु व्यवहार में उसका उल्टा हुआ है. देखा यह गया है कि जनता के प्रतिनिधि संसद में जाकर अपना कर्तव्य बिसरा देते हैं. चूंकि अधिकांश मामलों में ऐसा होता है, इसलिए माना जाना चाहिए कि जिन्हें जनता श्रेष्ठतम के नारे के साथ चुनती है, वे संसद में जाकर वैसे नहीं रह जाते. वहां जाते ही उनपर अभिजन संस्कार हावी होने लगते हैं. स्वयं को जनता का सेवक बताकर चुनकर आए लोग खुद को उसका मालिक समझने लगते हैं. चूंकि अधिकांश मामलों में ऐसा होता है, अधिकांश अपना कर्तव्य बिसार देते हैं, इसलिए माना जाना चाहिए कि जिन्हें जनता श्रेष्ठतम के नारे के साथ चुनती है, वे संसद जाकर श्रेष्ठतम नहीं रह जाते. वे स्वयं को आमजन से ऊपर समझने लगते हैं. चूंकि अधिकांश मामलों में हमारे ‘श्रेष्ठतम’ साधारण या उससे भी कम, अर्थात ‘निकृष्टतम’ सिद्ध होते हैं. जनता को यह भी समझना होगा कि श्रेष्ठतम प्रतिनिधि जैसी अवधारणा में ही खोट है. इसलिए यदि जनता को शासन का श्रेष्ठतम रूप चाहिए तो उसे स्वयं सक्रिय रहकर श्रेष्ठतम निगरानी व्यवस्था कायम करनी पड़ेगी. ताकि तयशुदा लीक से हटने की किसी जनप्रतिनिधि की हिम्मत ही न पड़े. इसे यूं भी कह सकते हैं कि ‘श्रेष्ठतम प्रतिनिधि’ एक भ्रांत अवधारणा है. केवल श्रेष्ठतम जनता ही शासन को श्रेष्ठतम स्तर तक ले जाती है.

यहां एक पेंच है. आम जनता अपनी रोजी-रोटी का इंतजाम करे या शासन चलाए? किसान यदि अपना वक्त शासन-प्रशासन की देखभाल करेगा तो हल चलाने के लिए समय कहां से निकाल पाएगा? ऐसी शंकाएं वाजिब हैं, लेकिन यदि आपने इस सिद्धांत कि श्रेष्ठतम जनता ही श्रेष्ठतम शासन दे सकती है’—को भली-भांति समझ लिया है तो मुझे पूरा विश्वास है कि आपके लिए शासन संबंधी कोई समस्या ही नहीं होगी. इसलिए आपके दिमाग में यह विचार आना ही नहीं चाहिए. यदि जनता ही शासन है और प्रतिनिधित्व के शासन को उसकी कमजोरी के कारण नकार चुकी है, तो किसी बाहरी शासन की आवश्यकता ही नहीं रह जाती. फिलहाल ‘बिना राजा का राज’ या ‘बिना शासन के शासन’ जैसी अवधारणा दूर की कौड़ी या फिर दिमागी शगल लग सकती है. वह इसलिए कि गत चार-पांच हजार वषों के बीच जनता शासित होते-होते, अपने आपको, अपनी शक्ति और योग्यता को बिसरा चुकी है. इन चार-पांच हजार वर्षों में उसने हर प्रकार की राज्य प्रणाली को आजमाया है. पहले कबीलाई शासन देखा, राजा आए, फिर महाराजाधिराज और चक्रवर्तित्व का जमाना आया. उसके बाद औपनिवेशिक शासन और अब लोकतंत्र, उसे सभी में छला गया है. लेकिन लोकतंत्र में छला जाना जनता को ज्यादा मर्माहत करता है, क्योंकि वह अपनों द्वारा छले जाने की प्रतीति कराता है. उसमें सत्ता जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथों में रहती है. यह अपेक्षा की जाती है कि निर्वाचित प्रतिनिधि अपने मतदाताओं के प्रति जिन्होंने उनपर भरोसा करते हुए अपना प्रतिनिधित्व सौंपा है, ईमानदार होंगे तथा उनके विकास एवं समस्याओं के समाधान हेतु पूर्णतः प्रतिबद्ध होंगे. लेकिन सत्ता प्राप्त होते ही प्रतिनिधि अपनी स्वार्थ-सिद्धि के आयोजनों में जुट जाते हैं. उससे जनता को अपने ही प्रतिनिधियों द्वारा छले जाने की आत्महंता पीड़ा से गुजरना पड़ता है.

केजरीवाल के प्रस्तावित ‘स्वराज’ की कमजोरी है कि उसमें, जनविवेकीकरण और सत्ता के वास्तविक विकेंद्रीकरण की कोई योजना नहीं है. इसलिए वे भीड़ तो जुटा लेते हैं, उसे विवेकवान जनशक्ति में परिवर्तित करने का रास्ता उनके पास नहीं है. रही फेसबुकिया समर्थन और अभियान की बात, जिसे वे युवा चेतना से जोड़ते हैं, वह स्वयं दिग्भ्रमित है. कुछ समय पहले तक युवाओं को अपना मसीहा मोदी में नजर आता था, दिल्ली में ‘आआप’ की अप्रत्याशित जीत के बाद अब वह केजरीवाल को मसीहा के रूप में देखने लगे हैं. दूसरे जिस सोशल साइटस पर उनका प्रभाव है, असल में वह सामाजिकता से कोसों दूर है. वह असल से बहुत दूर ऐसा वर्चुअल समाज है जिसका वास्तविकता से कोई नाता नहीं है. फिर उसकी डोर पूरी तरह पूंजीपतियों के हाथों में है. अभी तक वे इसमें छूट दे रहे थे तो इसलिए वह उत्पाद को घर-घर पहुंचाने के लिए सबसे सस्ता और प्रभावी माध्यम है. सरकार के प्रति असंतोष एवं जनाक्रोश को भड़काकर अपना उल्लू सीधा करना उनका पुराना शगल है. जैसे ही उन्हें उससे अपने अस्तित्व पर संकट महसूस होगा, वे युवा आक्रोश को एकदम विपरीत दिशा में मोड़ देंगे. अतएव केजरीवाल समेत दूसरे लोगों की परिवर्तनकामी आंदोलनों या राजनीति की सफलता इसपर निर्भर करेगी कि समाज की वर्चुअल एकता को वास्तविक समाज की एकता में कैसे ला पाते हैं. इसके लिए परंपरागत शक्तियों के साथ आधुनिक पूंजीवादी शक्तियों से भी लोहा लेना पड़ेगा. इसमें कामयाबी ही उनकी अराजक होने की वास्तविक पहचान होगी. लोकतंत्र में नागरिक की हैसियत केवल केवल टैक्स भरने और बूथ पर जाकर ठप्पा लगाने तक सीमित नहीं है? उसे सरकार के काम पर निगरानी करने और आवश्यकता पड़ने पर उसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार मिलना चाहिए. उसको यह अधिकार भी होना चाहिए कि यदि कहीं अव्यवस्था और अनाचार देखे तो उसे उन अधिकारियों तक पहुंचा सके, जिन्हें उसके लिए नियुक्त किया गया है. यह नागरिक प्रशासन की वह उच्चतम अवस्था है जिसमें राज्य की आवश्यकता न्यूनतम हो जाती है. अ-राजकता ही क्यों, विवेकवान नागरिक तो लोकतंत्र के लिए भी जरूरी हैं. आआप के आंदोलन के माध्यम से जो विचार स्पष्ट रूप से सामने आया है, वह है जनसाधारण का प्रशासन में दखल बढ़ाने का विचार. यह अपने आपमें एक विचार है. हालांकि आआप के नेता इसे किसी विशेष विचारधारा से जोड़ने से इन्कार करते हैं. शायद वे स्थापित विचारधाराओं का हश्र देख खतरा उठाने से डरते हैं. हो सकता है इसमें भी कोई राजनीति हो. लेकिन सुदीर्घ और परिवर्तनकारी राजनीति के लिए ठोस विचारधारा आवश्यक है. आआप को यदि कभी खतरा होगा तो इसी वैचारिक ढुलमुलपन के कारण. यह संभव है कि विचारधारा की शरण लेने से आआप की विकासगति धीमी पड़ जाए. क्योंकि विचारधारा को लोकमानस में जगह बनाने और कारगर बनने में समय लगता है. उसमें व्यवधान भी आ सकता है. इसके बावजूद वह परिवर्तन स्थायी होगा. फिर भी यदि केजरीवाल के आने से राजनीति में थोड़ी-सी भी संवेदनशीलता आई है तो इसके लिए उनकी प्रशंसा करनी चाहिए. उन्हें यह भी श्रेय दिया जाना चाहिए कि आगामी लोकसभा चुनावों में चेहरों की लड़ाई को उन्होंने विकल्प देने की कोशिश की है. इसलिए जरूरी है कि आआप में जो अच्छा हो रहा है उसका समर्थन करते हुए उसपर नैतिक दबाव बनाना चाहिए ताकि विचलन की संभावना न्यूनतम रहे और यदि अपनी ही कमजोरी ये यह प्रयोग ढहता भी है तो भविष्य में नई वैचारिकता, नए आंदोलन को जमीन देने के लिए तैयार रहे. अंत में 14 अगस्त 2013 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित एक रिपोर्ट, अफ्रीका के जनजातीय समाज की एकता और एक-दूसरे के प्रति उदात्त समर्पण का अनूठा उदाहरण है—

दक्षिण अफ्रीका की झोसा प्रजाति के बच्चों के साथ एक मानव विज्ञानी ने एक गेम खेला. उन्होंने बच्चों से थोड़ी दूर एक फलों से भरी डलिया रख दी. बच्चों से कहा कि आपमें से जो भी इन फलों तक पहले पहुंचेगा मैं यह सारे फल उसे दे दूंगा. इस पर सभी बच्चे हाथ पकड़कर एक साथ उस डलिया तक गए. यह पूछने पर कि उन्होंने ऐसा क्यों किया जबकि उनमें से कोई एक जीत सकता था. इस पर बच्चों ने जवाब दिया उबन्टू. झोसा प्रजाति में इसका अर्थ होता है कि हम एक हैं. उनका कहना था कि अगर बाकि सब दुखी हैं तो हममें से कोई एक खुश कैसे हो सकता है. वे सारे घेरा बनाकर फल खाने के लिए बैठ गए.

क्या स्पर्धा को विकास का मूलमंत्र मानने वाले आधुनिक पूंजीवादी समाजों में यह संभव है?

 – ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भानुक्रमणिका:

1. The true founder of anarchy was Jesus Christ and… the first anarchist society was that of the apostles.”-GEORGE WOODCOCK, Anarchism : A History Of Libertarian Ideas And Movements, P 37.
2. Some writers have so confounded society with government, as to leave little or no distinction between them; whereas they are not only different, but have different origins … Society is in every state a blessing, but Government, even in its best state, is but a necessary evil; in its worst state, an intolerable one. -Thomas Paine,Common Sense.
3. “I heartily accept the motto, – “That government is best which governs least;” and I should like to see it acted up to more rapidly and systematically. Carried out, it finally amounts to this, which I also believe, – “That government is best which governs not at all;” and when men are prepared for it, that will be the kind of government which they will have.” -Henry David Thoreau, On the Duty of Civil Disobedience.
4. They [the Marxists] maintain that only a dictatorship — their dictatorship, of course — can create the will of the people, while our answer to this is: No dictatorship can have any other aim but that of self-perpetuation, and it can beget only slavery in the people tolerating it; freedom can be created only by freedom, that is, by a universal rebellion on the part of the people and free organization of the toiling masses from the bottom up. -Mikhail Bakunin, Statism and Anarchism.

सामाजिक नैतिकता और सहकार

सामान्य

सामाजिकता की पहली जरूरत है, मानवीय आचरण. नैतिकता का अनुसरण. मनुष्य होकर मनुष्य जैसा व्यवहार. समाज द्वारा निर्धारित मर्यादाओं का पालन. सबके साथ जीते हुए, दूसरों के सुखदुख में सहभागिता की पवित्र भावना. मिलबांटकर खाने, न्याय और समानता की स्थापना के लिए अथक प्रयास करने, लोककल्याण के सपने के साथ जीने का परमपुनीत संकल्प. इनमें से प्रत्येक अपने आप में महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है. यह मानवमात्र के लिए उसके जीवन का पवित्र लक्ष्य भी है. धर्म, साहित्य, विविध कलाएं, सांस्कृतिक प्रतीक, समस्त ज्ञानविज्ञान, रीतिरिवाज, नैतिक मान्यताएं एवं कर्मकांडये सभी मनुष्य की, सामाजिकता के शुद्धतम स्वरूप को बनाए रखने की चिरंतन कवायद का खूबसूरत हिस्सा हैं. ये मानवजीवन की उत्कृष्टता के आकलन हेतु तय कसौटियां भी हैं. इनमें से धर्म मनुष्य की सृष्टि के रहस्यों को जानने की आदिम लालसा और तज्जनित आध्यात्मिक विश्वास की परिणति है. इसके बावजूद मानवीय जिज्ञासा का यही एक पड़ाव नहीं. सभ्यता की सुदीर्घ यात्रा में वह जैसेजैसे प्रकृति के रहस्यों से परिचित होता गया, उसकी यह अवधारणा निरंतर सुदृढ़ होती गई कि मात्र अध्यात्मचिंतन से लौकिक कल्याण असंभव है. केवल तात्विक ज्ञान से व्यावहारिक उलझनों को सुलझा पाना संभव नहीं. क्योंकि तर्क की समाप्ति अक्सर किसी तर्क पर ही होती है. तर्क की विरामावस्था ने धर्म को जन्म दिया. इस तरह वह मनुष्य के बुद्धिकौशल की विरामावस्था थी. अल्पकालिक ठहराव था. ताकि वह अगले वौद्धिक उपक्रम की तैयारी कर सके. हुआ विपरीत. स्वार्थी लोगों ने ठहराव को ही लक्ष्य मान लिया और उसी को सिद्धि बताने लगे. बाकी लोगों को भी उनकी बातों पर विश्वास करना पड़ा. इसलिए कि अपनी स्थिति का लाभ उठाते हुए तब तक उन्होंने संसाधनों पर अधिकार जमा लिया था और बाकी लोग अपनी आवश्यकताओं के लिए उनपर निर्भर थे. उन्होंने ऐसे नियम बनाए कि मेहनत और कर्मकौशल के बल पर जीने वाला समूह उनके अधीन होता गया. इसके लिए सामाजिक नियमों को शक्तिशाली बनाया गया.

उल्लेखनीय है कि सामाजिकता केवल मनुष्य की अनिवार्यता नहीं है. वह समाज के लिए भी उतनी ही आवश्यक है. इसलिए कि मनुष्य और समाज का संबंध अन्योन्याश्रित है. न मनुष्य का समाज के बगैर काम चल पाता है, न समाज का मनुष्य के बिना. इस सत्य को समझ लेना दोनों के लिए जरूरी है. यह भी कि मनुष्य द्वारा समाज का गठन सुख के स्थायित्व के लिए किया गया है. यदि कोई समाज अपनी सदस्य इकाइयों के हितों की रक्षा करने में नाकाम रहता है, तब तक उसके गठन का उद्देश्य भी अधूरा रह जाता है. इस तथ्य की आमतौर पर उपेक्षा की जाती है. यह कमी समाज की नहीं, उन लोगों की है जिनके हाथों में समाज की बागडोर होती है. वे समाज के संसाधनों तथा उसकी गतिविधियों को निहित स्वार्थ के अनुकूल ढालने लगते हैं.

मनुष्य हो अथवा समाज सभी को अपना लक्ष्य स्वयं तय करना पड़ता है. चूंकि समय कसौटियां खुद विनिर्मित करता है. अतएव धर्म आदि के अतिरिक्त मानवव्यवहार को नियंत्रित और मर्यादित करने के लिए दूसरी संस्थाएं भी बनती चली गईं. विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक संस्थाओं और कर्मकांडों का विकास हुआ. आचारविचार तय किए गए. इसी के साथ लोगों का यह विश्वास भी मजबूत होता चला गया कि सामाजिक एकता का आधार मनुष्य का नैतिकता में विश्वास है, न कि धर्म अथवा छद्म पारलौकिक सभ्यता के नाम पर बने कर्मकांड, रीतिरिवाज, परंपराएं इत्यादि. यह भी अनुभव किया गया कि खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए धर्म को नैतिकता का हाथ थामना ही पड़ता है. बिना नैतिकता के लक्ष्यसिद्धि असंभव है.

और यह भी कि नैतिकता का साथ न हो तो धर्म की कोई प्रासंगिकता ही न रहे. लोककल्याण के लक्ष्य के बगैर परलोकसिद्धि भी निरर्थक एवं बेमानी है. यह नैतिकता ही है जो मानवीय आचरण के निरंतर नए मानक गढ़कर, धर्म की राह को आसान एवं अनुकरणीय बनाती है. मानव जीवन का वास्तविक लक्ष्य निर्धारित करती है. उसको आगे बढ़ने की सतत प्रेरणा देती है और सबके साथ मिलजुलकर रहना सिखाती है. बिना इसके न तो किसी सामाजिक संस्था का विकास संभव है, न कोई धार्मिक संस्था इसके अभाव में टिक सकती है. यही कारण है कि दुनिया में अनेक धर्म और उनके विभिन्न संप्रदाय होने के बावजूद उनकी मूलभूत अवधारणाएं, नैतिक मान्यताएं लगभग एक समान हैं. यही नहीं सृष्टिसंबंधी उनके सोच में भी एक सामान्य एकरूपता है, जो उनको आपस में जोड़ती है. विभिन्न समाजों के धार्मिक प्रतीकों में यदि कहीं अंतर है, तो उसका मूल उनकी भिन्न भौगोलिक परिस्थितियांे और सामाजिक रीतिरिवाजों में निहित है. चूंकि समाज से परे धर्म की कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है, अतएव अपने घेरे से बाहर निकलते ही नैतिकता के पक्ष में बयान देना प्रत्येक धर्मावलंबी की मजबूरी बन जाता है. उपर्युक्त विश्लेषण के आधार पर हम कह सकते हैं कि नैतिकता धर्म का अनिवार्य लक्षण है, वही उसको प्रासंगिक बनाता है.

मनुष्यता का आशय उन आदर्शों, मानकों पर खरा उतरना है, जिन्हें कोई समाज अपनी एक इकाई होने के नाते अपने सदस्यविशेष के लिए निर्धारित करता है. साथ ही अपेक्षा करता है कि सदस्य इकाइयां उनका पालन पूरी निष्ठा के साथ, उन्हें जीवनमूल्य की गरिमा प्रदान करते हुए करें. यही मानवीयता की कसौटी भी है. इसलिए सामान्य संदर्भों में नैतिकता और मनुष्यता को परस्पर पर्याय मान लिया जाता है. सर्वकल्याण की यह भावना वैदिक साहित्य का मूलाधार रही है. अथर्ववेद का दशम् खंड मनुष्यता की प्रशस्ति एवं विश्वकल्याण की पुनीत भावना से भरपूर है. इस कारण उसका नाम ही नृ सूक्त है. इस खंड के सातवें, स्कंभ नामक सूक्त में विश्व के मौलिक ढांचे की व्याख्या की गई है. यह मानते हुए कि सत्ता का उच्चतम रूप भी परमकल्याणकारी है, वेदमंत्रों के उद्गाता ऋषि मानवसंस्कृति की महानता का वर्णन करता समय मनुष्यमात्र के लिए नैतिक आचरण की अनिवार्यता पर जोर देते रहे हैं. लंबी साधना एवं चिंतनमनन के उपरांत अथर्ववेद का एक उद्गाता ऋषि इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि—

ये पुरुषे ब्रह्मे विदुस्ते विदुः परमेष्ठिनम्!

तसमाद् वे विद्वान पुरुषमिदं ब्रह्मेति मन्यते!

इन ऋचाओं का आशय है कि मानवता इस विभिन्नता से भरे हुए व्यापक विश्व का सांस्कृतिक स्वरूप है. उसको ठीक प्रकार से जानने का अभिप्राय है, परमसत्ता के सर्वोत्कृष्ट रूप को जानना. उसके करीब जाना. उसकी सघन अनुभूति करना. उससे प्यार करना और स्वयं को उससे परचाना. उसके साथसाथ तालमेल बनाते हुए चलना. उन आदर्शों का पालन करना जो परमसत्ता के चारित्रिक लक्षण के रूप में प्रकट होते हैं. उदात्त जीवनमूल्यों को अपने दैनिक आचरण का अभिन्न हिस्सा बना लेना. उन्हें अपने जीवन की कसौटी की तरह व्यवहार में लाना. अपने व्यवहार और आचरण से दूसरों को किसी भी प्रकार का कष्ट न होने देना, यही मानवमात्र का कर्तव्य है, और उसके जीवन की सिद्धि भी.

आखिर मनुष्यता की सिद्धि संभव कैसे हो? कैसे उसकी और बढ़ा जाए? कैसे उसकी प्राप्ति को आसान और चिरस्थायी बनाया जाए? कैसे जाना जाए कि कोई कार्य कितना मानवीय है? मानवीय आचरण की कसौटी क्या हो? विचलन और विसंगतियों के दौर से कैसे सुरक्षित निकला जाए? फिर जीवन कोरा सिद्धांत तो नहीं! मनुष्य अपने अनुभवों से भी सीखता है. न जाने कितने समझौते, कितने सबक जीवन की पाठशाला को समृद्ध बनाते हैं, उन्हीं से आने वाली पीढ़ियां प्रेरणा भी लेती हैं. ऊपर से मानवीय संवेदनाओं की अलग ही रीति ठहरी. वे बुद्धि के नियंत्रण एवं सैद्धांतिक मर्यादाओं को अनावश्यक मानते हुए प्रेम और सहृदयता को अपनाने पर जोर देती हैं. तर्क को गैरजरूरी बताकर सहानुभूतिपूर्ण निर्णय का पक्ष लेती हैं. भले ही उनसे प्रचलित नियमों, मान्यताओं का उल्लंघन होता हो.

वस्तुतः मनुष्य के सामान्य जीवनदर्शन, नैतिकता के सर्वमान्य रूप की व्याख्या कर पाना इतना आसान भी नहीं है. न इनके बीच के अंतर को इतनी आसानी से व्यक्त किया जा सकता है. नैतिकता न तो अतार्किक और लिजलिजी भावुकता है, न कोरी संवेदनहीनता. वह तो स्थितियों, परिस्थितियों के अनुरूप सतत परिवर्तनशील सत्ता है, जो मानवता के विकास के लिए सतत लक्ष्यनिर्धारण करती रहती है और इस प्रकार सदैव बृहद लोककल्याण के प्रति समर्पित होती है. मनुष्यता की समृद्धि के लिए विवेकवान संवेदनशीलता आवश्यक है. यही नैतिकता का अभीष्ट है. जीवन के व्यवहारपक्ष को नियंत्रितमर्यादित करने के लिए ही नैतिकता का जन्म हुआ है. ज्ञान के विविध उपकरण, समस्त मानवीय कलाएं, साहित्य सभी आदिकाल से नैतिकता के अनुगामक रहे हैं. यह एक बहुआयामी पद है. इसीलिए इसकी अभिव्यक्ति तथा इसको सहजग्राह्यः बनाने के लिए विविध कलाओं का विकास हुआ, सांस्कृतिक मानक गढ़े जाते रहे हैं.

अक्षर को तो प्रायः सभी सभ्यताओं ने आदि, अनश्वर और ब्रह्मस्वरूप स्वीकार किया गया. लेकिन आगे जब शब्दों की खोज एवं उनकी ताकत को पहचाना गया, आखरआखर सहेजकर विराट ग्रंथावलियां रची गईं, तब उनकी परख के लिए पहली कसौटी नैतिकता को ही बनाया गया. उसको ज्ञान के विस्तार, उसकी व्याप्ति और मानवीय आकांक्षाओं का आदि प्रेरक बताया गया. नैतिकता के विविध रूपों की व्याख्या तथा मानवमात्र के दिशानिर्देशन के लिए वेदादि ग्रंथों महाकाव्यों की रचना हुई. कहानियों और दृष्टांतों का जन्म हुआ. इतिहासोपनिषद कोरे ज्ञान और कर्मकांडों में निपुणता के स्थान पर अंतश्चेतना के विस्तार पर जोर देता है. मानसवेद को सर्वोच्च बताता हुआ वह कहता है—

यदि तुम ऋग्वेद के अध्येता हो तो तुमने अधिक से अधिक देवताओं के बारे में जाना होगा. यदि तुमने यजुर्वेद का अध्ययन किया है तो तुम याज्ञिक कर्मकांड के बारे में विस्तार से जानते होगे. यदि तुमने सामवेद का प्रणयन किया है तो तुम्हें जीवन के व्यवहार एवं उसकी रागात्मकता से संबंधित सामान्य बातों का बोध हो चुका होगा. किंतु मानवमात्र में ब्रह्म के दर्शन करने के लिए आवश्यक है कि तुमने अपने अंतर्मन के मानसवेद का विधिवत अध्ययन किया हो.’

अंतर्मन का मानसवेद, यानी आत्मा की आवाज. अर्थात स्वयं की और उसके बहाने विराट विश्वात्मा की पहचान. परमविराट की निस्सीम विराटता की सघन आनंदानुभूति. चौतन्य का महाजागरण—अंतर्मन का मानसवेद, यानी एक ऐसी आवाज जो सहअस्तित्व और सद्भावना का संदेश देती हो, जो लोगों को मिलजुलकर रहना, एकदूसरे के लिए जीना सिखाती हो. जो प्रकृति और पुरुष की महायुति, जिससे यह समूची सृष्टि उपजी है. माने मनुष्यता की शीर्षस्थ स्थिति. नैतिकता का उच्चतम आयाम, येनकेनप्रकारेण जिसका आशय मानवीय आचरण की सर्वोच्च गरिमा से है. उस संस्कारशीलता से है जो मनुष्य होने के नाते मनुष्यमात्र को उसके समाज की ओर से विरासत में प्राप्त होती है और आने वाली पीढ़ियों के लिए मानक निर्धारित करती करती है.

भारतीय वांङमय में भी कहा गया है कि—

अठारह पुराणों का संदेश व्यास के मात्र दो वाक्यों में सन्निहित हैकि परोपकार पुण्य है; और दूसरों को पीड़ा पहुचाना महापाप.’

तो परोपकार कैसे संभव हो? कैसे दूसरों को पीड़ा पहुंचाए बिना अपने लिए लाभसाधना संभव की जाए? जिसके पास विपुल संसाधन है, धनसंपदा जिसको विरासत में मिली हो, जिसे समाज में आगे बढ़ने पर कोई रोकटोक नहीं, बल्कि पूरा समाज जिसके पक्ष में खड़ा हो, कदमकदम पर मदद के लिए तैयार, उसके लिए तो यह कतई असंभव, अनहोनी बात नहीं. विरासत के दम पर खूब दिखाए दानवीरता. कमाए नाम, साथ में नामा भी. मगर जो संसाधनों के अभाव में जी रहा हो, जिसके लिए जिंदगी कदमकदम संघर्ष हो, जिसे सामाजिक नियमोंविसंगतियों ने मिलकर सदैव प्रताड़ितलांछित किया हो, जीवनारंभ में ही जिसको संसाधनों से वंचित कर दिया गया हो. जो अपने जन्म से ही वर्णव्यवस्था का शिकार रहा हो. जीवन के सामान्य अधिकार भी जिससे बलात् छीन लिए गए हों. वह आम आदमी जिसे कदमकदम पर रोजीरोटी के संघर्ष से गुजरना पड़ता हो. गरीबी की मार खाना, भूख से समझौता करते रहना जिसकी नियति है. वह क्या करे? कैसे जिंदगी की रोजमर्रा की समस्याओं से निजात पाए? कैसे पूरा करे अपने और अपनों के सपने? रोजमर्रा के संघर्ष में कैसे जीते जिंदगी की जंग!

जिंदगी दान पर नहीं चलती, न जीवन के लक्ष्य दूसरों की अनुकंपा के सहारे तय किए जाते हैं. चौरिटी के आसरे तन की भूख मिटाई जा सकती है, मन की नहीं. लंबे समय तक दूसरों की दया के सहारे जीना, अपने ही हाथों अपनी आत्मा का गला घोट लेना, अस्मिता को नीलाम कर देना है. सच्चा सुख अपने बूते जीवन का सफर तय करने में है. सपनों में नएनए रंग भरना, उनके अनुकूल संकल्प धारण करना, फिर अपने सपनों को सच का कलेवर प्रदान करना ही मानवीय जिजीविषा की परख है. उसी से जीवन में सफलता का स्तर तय होता है. सफलता भी ऐसी नहीं जो केवल खुद को सुख देती हो. ऐसी कामयाबी से भौतिक सुख तो जुटाए जा सकते हैं. सत्तासमृद्धि से नाता जोड़कर दूसरों पर रौब भी गांठा जा सकता है. पर उससे सचमुच की आत्मतुष्टि प्राप्त हो, मन को मनुष्यता के कल्याण का किंचित संतोष प्राप्त हो सके, जरूरी नहीं है. लेकिन ऐसी कामयाबी जिसमें सभी का साझा हो, जो अधिकाधिक व्यक्तियों के लिए सुखकारी हो, जिसके माध्यम से अधिक से अधिक लोगों के सपनों में रंग भरा जा सके, उन्हें नएनए सपने देखने की प्रेरणा दी जा सके, ऐसी सफलता का वरण कैसे किया जाए? यह असंभवसी बात संभव कैसे हो? संसाधनों के अभाव की खाई को कैसे पाटा जाए? न्यूनतक संसाधनों से अधिकतम लाभ कैसे कमाया जाए. कैसे अपनी अस्मिता का सौदा किए बगैर बाजार में अपनी मौजूदगी बनाई जाए. कैसे सच की जाएं कामनाएं, कामनाओं में छिपे सपने. हकीकत की दूरियां, कैसे पाटा जाए उन्हें? कैसे उनको अपने अनुकूल बनाया जाए?

प्रश्न शाश्वतसे हैं. पर उत्तर भी आसान है. दरअसल प्रकृति समस्याएं ही नहीं देती, उनके समाधान भी साथ लाती है. कदमकदम पर अंतहीन समस्याएं हैं तो उनके उतने समाधान भी हैं. दमतोड़ू मुसीबतें हैं तो तनमन को सहलाने, उत्साह बढ़ाने वाले अनमोल कारक भी हैं. जैसे गलबहियां डाले रहते हों दोनों. आगेपीछे इसलिए रहते हैं ताकि मनुष्य के धैर्य और बुद्धिबल की परीक्षा ले सकें. सृष्टि का रचाव भी इसी से है. मनुष्य ने तो सहकार को मात्र कुछ सहस्राब्दी पहले पहचाना, अस्तित्व की लड़ाई में अपने स्वभाव का हिस्सा बनाया. परंतु प्रकृति का तो समूचा व्यवहार ही सहयोग एवं सहकार की उच्चतम भावना से बंधा है. धरतीआकाश, पर्वतझील, हवा और गंध, नदी और किनारे, अग्नि और तेज, सूरज और चंद्रमा, गीत और नाद वगैरहवगैरह….जरा इनकी गति और युति को पहचानिए. दिखने में इन सबके बीच भिन्नता नजर आती है. लगता है कि सब अलगअलग मायारूप सृष्टि का हिस्सा बने हुए हैं. मगर उनकी भिन्नता, उनका आभासी द्वैत दरअसल हमारी ज्ञानेंद्रियों की सीमा है. प्रकृति की विराटता उसके गहन अंतर्संबंधों की परख कर सके, वैसी दिव्यता हमारी ज्ञानेंद्रियों को प्राप्त नहीं. ध्यान से देखा जाए तो उन सबके बीच एक अटूट तारतम्य नजर आता है. बाहरी आवरण है, जो भिन्नता की प्रतीति बनाए हुए है. सहअस्तित्व की भावना के साथ सब परस्पर जुड़े हुए हैं. सबके सब साथसाथ सहकार करते, संसार रचते रहते हैं. बहुरंगी और बहुआयामी संसार. मानो कहते हों कि सहकार है तो सृष्टि है. सृष्टि है तो जीवन है. जिंदगी का स्वत्व, उसका उल्लास है. जीवन है तो सुखदुःख हैं, समस्याएं हैं. परस्पर सहयोग है तो समस्याओं के समाधान भी हैं. सहकार है तो विकास की लंबी संभावनाएं हैं. उन संभावनाओं तक पहुंचने का सुनिश्चित रास्ता भी है. रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए वांछित आत्मबल है.

कुछ लोग सहकार को मानवीय सभ्यता की श्रेष्ठतम उत्पत्ति मानते हैं. मुझे इस मान्यता से संतोष नहीं होता. मुझे लगता है कि इसमें सहकार की पहुंच और उसकी उपादेयता को हल्का करने की कोशिश की गई है. वस्तुतः सहकार मानवीय सभ्यता की उत्पत्ति नहीं, बल्कि मानवीय सभ्यता सहकार की उपज, उसका बहुआयामी विस्तार है. यही सहकार पहले जीवन के लोकव्यवहार का हिस्सा बना. आदिम मनुष्य पहले प्राकृतिक जरूरतों के लिए संपर्क में आया. फिर साथसाथ रहने से वुद्धिविवेक जन्मा तो सहयोग का वास्तविक महत्ता भी समझ आने लगी. प्राणी अकेला हो तो जंगली जानवर चुटकी में शिकार कर जाते. लेकिन समूह में हो तो बड़े से बड़े शिकार को पछाड़ आते. आदमी जब अलगथलग रहता था, तो जीवन सिर्फ संघर्ष था. साथसाथ रहने लगा तो जिंदगी उत्सव बनने लगी. जरूरतें बढ़ीं तो उसका अस्तित्व दूसरे क्षेत्रों में भी पांव पसारने लगा. जैसेजैसे सहकार को पहचाना, जीवन आसान होता गया.

सहयोग

एक परिभाषा में अरस्तु ने भले ही मनुष्य को विवेकशील प्राणी की संज्ञा दी हो, मगर समाजविज्ञानी और हम सब आपसी व्यवहार में अक्सर यह दोहराते रहते हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है. और यह सही भी है. अकेले व्यक्ति से न तो समाज बनता है, न परिवार. किसी भी व्यक्ति के अस्तित्व की उपयोगिता दूसरों की उपस्थिति में ही देखी जा सकती है. सहअस्तित्व और सामाजिकता की भावना के सम्मान हेतु हम परस्पर सहयोग करते हैं. इसी के आधार पर हमारे संबंधों की व्याख्या की जाती है. मानवसमूहों के बीच अंतर्संबद्धता समाज में मुख्यतः दो स्तरों पर दृष्टिमान होती है. पहली परिवार के रूप में, जहां व्यक्ति संबंधों के निर्वाह के लिए सहयोग के लिए बाध्य होता है. व्यक्ति की सीमाएं, भविष्य के प्रति डर और अनिश्चितता का भाव उसको परिवार और उससे बाहर, समाज के दूसरे लोगों पर निर्भर होने को बाध्य करता है. इस आधार पर नए सहयोगाधारित संबंधों का जन्म होता है. पितापुत्र, पतिपत्नी, भाईबहन आदि संबंधों के विभिन्न रूप परिवार के भीतर पारस्परिक सहयोग के स्तर को ही अभिव्यक्त करते हैं, तो सामूहिक कल्याण के आधार पर गठित किए गए श्रमसंगठन, किसान संघ जैसे उदाहरण सामाजिक सहकार की श्रेणी में आते हैं.

संबंधों की यह भावना परिवार और समूह के सदस्यों के बीच ‘हम’ की भावना का विस्तार करती है. यही भावना सहकार का मूलाधार है. ‘हम’ अथवा ‘अपनत्व’ की यह भावना जितनी प्रगाढ़ होगी, सहकारसंबंध उतने ही दीर्घजीवी और प्रभावी होंगे. परंतु क्या व्यापारिक संबंधों को सहयोगाधारित संबंधों की श्रेणी में गिना जा सकता है. इस प्रश्न का प्रारंभिक उत्तर तो ‘हां’ ही होगा. व्यापार भी एक प्रकार का सहयोग ही है, जिसमें दो व्यक्ति अथवा समूह पूंजी अथवा वस्तुओं के आदानप्रदान के आधार पर अपनी जरूरतों को पूरा करते हैं. लेकिन व्यापारिक संबंधों की प्रगाढ़ता प्रायः पूंजीगत अथवा सीमित कालावधि वाले लाभों तक सीमित होती है. जरासा असंतुलन या परिस्थितिगत बदलाव उन संबंधों में भूचाल लाने में सक्षम होता है. इसके विपरीत पारिवारिक संबंधों में पूंजीगत लाभों की भूमिका गौण होती है. भरणपोषण के लिए धन प्रत्येक परिवार की आवश्यकता होता है, किंतु वह सामान्यतः मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति ही कर पाता है. बाकी जरूरतों की पूर्ति के लिए उसको परिवार के शेष सदस्यों पर निर्भर रहना पड़ता है. उन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वह अपनी आय का बंटवारा भी सहर्ष स्वीकार लेता है.

अपनत्व की भावना व्यापारिक संबंधों के निर्वाह और उनकी सफलता के लिए भी जरूरी होती है. संयुक्त मंच पर अक्सर दो व्यापारिक समूह भी अपनेपन का इजहार करते हुए नजर आ सकते हैं. मगर उनके संबंध प्रायः बड़े पूंजीलाभ की कामना तक सीमित हो हैं. इसलिए उनकी औसत आयु कम ही होती है. चूंकि व्यापारिक प्रतिद्विंद्वता कभी भी उनके संबंधों का खेल बिगाड़ सकती है, उनकी अपेक्षा वे संबंध अपेक्षाकृत दीर्घजीवी और स्थायी होते हैं जो जिनका आधार पूंजी अथवा आर्थिक मामलों से बढ़कर होता है. ऐसे संबंध जो मनुष्य की आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने के साथसाथ उसकी सामाजिक एवं भावनात्मक जरूरतों की भी पूर्ति करते हों, वे अधिक स्थायी और व्यापकता लिए होते हैं. सहकारिता का गठन स्वेच्छिक सहभागिता के सिद्धांत के आधार पर किया जाता है. उसके संचालन में उसके सदस्यों का बहुआयामी सहयोग भी होता है. वे अपेक्षाकृत सहकारी समूह मनुष्य सामान्य जरूरतों और उनके सहयोग पर निर्भर होते हैं. यही कारण है कि उनके साथ जुड़ने के पश्चात व्यक्ति की भौतिक एवं भावनात्मक जरूंरतों की एकसाथ भरपाई संभव है.

सहकारी संबंधों को प्रायः अलाभकारी संगठन माना जाता है. अभिप्रायः यह नहीं है कि सहकारी संगठनों को पूंजी से चिढ़ होती है अथवा वे आर्थिक उपलब्ध्यों को कम महत्त्व देते हैं. सहकारी समूहों की महत्ता इसमें है कि वे मनुष्य की भौतिक एवं भावनात्मक आवश्यताओं में संतुलन रखते हुए विभिन्न प्रतिरोधी व्यक्तित्वों के बीच अनुकूलन का काम करते हैं. वे स्पर्धा की भावना का न्यूनीकरण करते हैं, ताकि उनमें खप रही ऊर्जा का उपयोग रचनात्मक कार्यों के लिए किया जा सके. सहकार के माध्यम से विकास के अवसरों और संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव होता है. इसके द्वारा अलगअलग स्रोत पर उपलब्ध संसाधनों को सदस्यों की मर्जी और सहयोग के आधार पर सभी के कल्याण के काम में लाया जा सकता है. विकास के समान बंटवारे और सामूहिकता की भावना से सामाजिक अंतद्वंद्वों का शमन होता है. जिससे प्रकारांतर में समाज के विकास को गति मिलती है. सहकारी समूह से जुड़ने के पश्चात मनुष्य को न केवल अपनी आर्थिक चिंताओं से मुक्ति मिलने की संभावना बढ़ जाती है, साथ ही भावनात्मक संतुष्टि और संबंधों की व्यापकता का अपेक्षाकृत स्थायी प्रभाव भी सहकारी समूहों में देखने को मिलता है. यही कारण है कि सभ्यता के आरंभ से ही समाज में सहयोग की उपस्थिति किसी न किसी स्तर पर हमेशा ही रही है.

सहकार की उपस्थिति

सहयोग की भांति सहकार भी मानवसमाज से उसकी उत्पत्ति के समय से ही जुड़ा है. उसके इतने विविध रूप हैं कि उनपर एक स्वतंत्र गं्रथ की रचना की जा सकती है. हालांकि जिस सहकारिता आंदोलन से आज हम सब परिचित हैं, उसका उद्भव उनीसवीं शताब्दी के दौरान यूरोप में हुआ था. बावजूद इसके यह भी एक जानामाना तथ्य है कि सहकारिता का मूलदेश होने का दावा भारत समेत अनेक देश करते रहे हैं. इंग्लेंड के कस्बे रोशडेल में प्रवेश करते समय एक रेलवे पुल पर रोशडेल का परिचय देते हुए, चमचमाते अक्षरों में लिखा गया है—

रोशडेल: सहकारिता आंदोलन की जन्मस्थली.’

इसी प्रकार रोशडेल मैट्रोपोलिटन काउंसिल की बेवसाइट पर अपने नगर का परिचय देते हुए बड़े अभिमान के साथ लिखती है—

विश्वव्यापी सहकारिता आंदोलन का घर.’

दुनिया की पहली सफल सहकारी समिति होने का गौरव भले ही लंदन की रोशडेल इक्वीटे्विल पायनियर्स को प्राप्त हो, मगर इंग्लेंड के ही विद्वानों का दावा है कि वहां पर पारस्परिक सहयोग एवं सहकारिता के आधार पर संगठित होने की शुरुआत उससे करीब तीन शताब्दी पहले, 1530 में म्युचुअल फायर इंस्योरेंस कंपनियों के रूप में हो चुकी थी. ये कंपनियां अपने सदस्यों को अग्निकांड से होने वाली हानि से सुरक्षा कवर प्रदान करती थीं. विश्व की आर्थिक महाशक्ति और पूंजीवाद के गढ़ कहे जाने वाले अमेरिका, जहां लगभग चालीस प्रतिशत नागरिक सहकारी समितियों से संबद्ध हैं, का दावा है कि वहां भी सहयोगाधारित बीमा व्यवसाय 1752 में ही आरंभ हो चुका था. इसी तरह के दावे और भी देशों के हैं. बल्कि देशों के भीतर भी सहकारिता आंदोलन की जन्मस्थली का श्रेय लेने की होड़ मची हुई है. इसमें सबसे ताजा उदाहरण इंग्लेंड का है. 7 अगस्त, 2007 को ‘दि गार्जियन’ में प्रकाशित एक सेवरिन काॅरेल की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि उपभोक्ता सहकारी आंदोलन की वास्तविक शुरुआत लगभग 240 वर्ष पहले, इंग्लेंड के ही फेनविक नामक कस्बे के निकट एक गांव से हुई थी.

दो प्रमुख इतिहासकारों जा॓न मैक्फेजीन(John McFadzean) तथा जा॓न स्मिथ (John Smith) की शोध के हवाले से रोशडेल के दावे को खारिज करते हुए का॓रेल कुछ इस तरह लिखते हैं कि—

इतिहास की पुस्तकों में गलत छपा है. सहकारी आंदोलन का जन्म लगभग 240 वर्ष पहले स्का॓टलेंड के एक गांव से हुआ था. वह गांव फेनविक नामक कस्बे से एकदम छूता हुआ था, जिसकी ख्याति वहां के जूता उद्योग, ऊनी और मलमल के कपड़ों और कृषि फार्महाउसों के कारण थी. उस दिन तारीख थी, 14 मार्च 1761. स्थान था स्थानीय शिल्पी जा॓न वा॓कर का एक कमरा, जो एक कपड़ा कारखाने में काम करता था. वाॅकर का घर अपने ही जैसे छोटेछोटे झोंपड़ेनुमा घरों से घिरा हुआ था. आसपास में जुलाहों और मजदूरों की बस्ती थी, स्थानीय खेतों और कारखानों में काम करते थे. उनमें से अनेक इंग्लेंड के विविध प्रांतों से रोजीरोटी की तलाश में वहां आकर बसे थे. उन्हें एक ही चीज एक दूसरे से जोड़ती थी, वह थी उनकी गरीबी. वा॓कर ने वह कमरा एकदम ताजा, एक विशिष्ट उद्देश्य के लिए हाल ही में चूने से पुतवाया था.

उस दिन जा॓न वा॓कर के उस कमरे में कुछ स्थानीय जुलाहे दलिया के एक बोरे को ढकेलते हुए दाखिल हुए. वे संख्या में कुल पंद्रह थे. भीतर जाकर उन्होंने एकदूसरे की ओर देखा. बिलकुल शांत मन से एकदूसरे से हाथ मिलाते हुए उन्होंने एक संयुक्त प्रतिज्ञापत्र पर हस्ताक्षर किए. पीले रंग के उस प्रतिज्ञापत्र पर लिखा था—

हम सदैव एकदूसरे के प्रति ईमानदार और भरोसेमंद रहेंगेहम एकदम सच्चा और खरा व्यवसाय करेंगेतथा माल की बिक्री बिलकुल वाजिब दाम पर इस तरह से करेंगे कि वह न तो क्रय मूल्य से कम होगा, न बहुत ज्यादा.’

यह एक क्रांतिकारी कदम था. खेती के अलावा मलमल, कपड़े और जूता बनाने वाले कारखानों में काम करने वाले फेनविक के निवासियों में से अधिकांश गरीब बुनकर और मजदूर थे, जो संगठित प्रयास के माध्यम से अपनी रोजमर्रा की समस्याओं का निदान चाहते थे. उनके बारे में टिप्पणी करते हुए विद्वान शोधकर्ता मेक्फेजीन का कहना है कि—

कामगारों के सबसे निचले वर्ग में आने वाले वे लोग अपने पैरों पर खड़े होने का प्रयास कर रहे थे; और उनमें यह योग्यता भी थी कि एक पुख्ता, विधिवत रूप से गठित सहकारी उद्यम के लिए जरूरी संसाधन जुटाकर उसका संचालन कर सकें, जो उनसे कुछ ही कदम की दूरी पर था, जिसकी उनसे पहले किसी ने कल्पना भी नहीं की थी.’

स्का॓टलेंड के राष्ट्रीय पुस्तकालय में ‘दि फेनविक बुनकर समिति’ से संबंधित उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि उपभोक्ता भंडार की स्थापना के कुछ ही समय बाद समिति ने अपने सदस्यों तथा उनके परिजनों को आसान शर्तों पर दस से बारह शिलिंग तक का लघुअवधि ऋण देना आरंभ कर दिया था. समिति की 1764 की एक बही में स्थानीय नागरिक मार्गेट मिशेल को दिए ऋण का ब्यौरा दर्ज करते हुए लिखा गया है—

फेनिक की मार्गेट मिशेल को उनकी जरूरत के लिए दिया गया—एक शिलिंग.’

कम समय में ही ‘फेनविक बुनकर समिति’ ने आशातीत सफलता प्राप्त की थी. चूंकि फेनविक के आसपास बुनकरों की भारी संख्या था और कस्बा कपड़ा उद्योग में तेजी से विश्वस्तर पर अपनी पहचान बनाता जा रहा था, इसलिए समिति ने करघों तथा कच्चे माल को खरीद कर उन्हें अपने सदस्य इकाइयों में बांटना आरंभ कर दिया. इसके थोड़े ही अर्से के बाद, 1769 में समिति ने खाद्यसाम्रगी की थोक बिक्री के क्षेत्र में कदम रखा, तथा उसमें भी सफलता प्राप्त की.

तय शर्तों के अधीन समिति का मुनाफा सदस्यों के बीच बांट दिया जाता था. इस बारे में जाॅन स्मिथ जोर देकर कहते हैं कि सदस्य इकाइयों के बीच लाभांश बांटने की वह व्यवस्था कुछ ऐसी ही थी, जैसी खोज का श्रेय रोशडेल पायनियर्स को दिया जाता है. यही नहीं, बदलती वैश्विक परिस्थितियों में शिक्षा की महत्ता को स्वीकारते हुए समिति ने सहभागिता के आधार पर 1808 में एक पुस्तकालय की स्थापना की, ताकि सदस्यगण, विशेषकर युवा पीढ़ी नए विश्व की चुनौतियों के अनुरूप स्वयं को तैयार कर सके. कुछ ही समय में पूरा फेनविक गांव सहकारिता आंदोलन से जुड़ गया. विकास की नई योजनाओं पर विचार करने तथा आपसी मामलों के निपटान के लिए गरीब श्रमिकों ने ‘फेनविक संसद’ का गठन किया था, जिसकी बैठक खुले प्रांगण में होती थी. बैठक में भाग लेने वालों की सुविधा के लिए ऐसे स्थान को चुना गया था, वह चौराहे पर पड़ता पर पड़ता था, ताकि सभी को वहां पहुचने में आसानी रहे. सदस्यों की सुविधा के लिए बैठकस्थल पर पेयजल का समुचित प्रबंध किया गया था. सहकारिता की ऐसी अलबेलीअनूठी शुरुआत करने के बावजूद फेनविक के बुनकरों और कामगारों को उसका श्रेय लेने से वंचित क्यों रखा गया? इस बारे में मेक्फेजीन का कहना है कि फेनविकवासियों ने—

अपने कार्य का शुभारंभ बहुत ही शालीन, लगभग गुपचुप तरीके से किया था. बैठक के दौरान बाहर से आने वालों पर नजर रखने के लिए उन्होंने चौकीदार तैनात किए गए थे. क्योंकि स्थानीय जमींदार नहीं चाहते थे कि उनके श्रमिककामगार एक ही स्थान पर इकट्ठे होकर खुद को और संगठित करने, ताकत बटोरने, अपने भीतर नया आत्मविश्वास पैदा करने, स्वयं को पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाने अथवा अपना भविष्य अपने ही हाथों से संवारने के बारे में कोई योजना बनाएं.’

फेनविक के दुर्भाग्य एक कारण वहां की भौगोलिक परिस्थिति भी थी. वहां विकास के संसाधनों का अभाव था. बावजूद इसके इस तथ्य को अस्वीकारा नहीं जा सकता कि जिस सहकारिता आंदोलन ने उनीसवीं शताब्दी से पूरे विश्व को प्रभावित करना आरंभ किया और देखते ही देखते वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया उसकी वास्तविक शुरुआत और सैद्धांतिक अधिरचना फेनविक में ही हुई थी, जिसका श्रेय फेनविक और उन गरीब बुनकरों, कामगारों को मिलना ही चाहिए, जिन्होंने अपने संगठन के बल पर जमींदारों और कारखानेदारों के वर्चस्व तथा एकाधिकार को चुनौती देने का पहला संगठित और सारगर्भित प्रयास किया था.

आधुनिक सहकारिता आंदोलन के शुभारंभ का श्रेय रोशडेल पायनियर्स को दिया जाता है, इसलिए कि रोशडेल के उन बुनकरों ने सदस्यों के बीच सहकारिता के उपयोग के आधार पर लाभांश के बंटवारे की अनूठी व्यवस्था दुनिया के सामने रखी. अपने सिद्धांतों और संकल्पनिष्ठा के बल पर उन्हें अभूतपूर्व सफलता भी प्राप्त हुई. बावजूद इसके यह भी एक इतिहाससम्मत तथ्य है कि रोशडेल पायनियर्स के टोड लेन स्थित उपभोक्ता भंडार की शुरुआत से काफी पहले फेनविक के गरीब बुनकर उपभोक्ता सहकारिता के आंदोलन का शुभारंभ कर चुके थे. यही नहीं, 1826 से 1835 के बीच ब्रिटेन के 250 से अधिक कस्बों और गांवों में सहकारी समितियां बन चुकी थीं. उनमें से एक ‘रोशडेल फ्रैंडली सोसाइटी’ भी थी, जिसकी असफलता से सबक लेते हुए उसके एक सदस्य चाल्र्स हावर्थ ने लाभांश के न्यायोचित बंटवारे की ‘डिवीडेंड’ जैसी व्यवस्था की परिकल्पना कर, रोशडेल से ही सहकारिता के नए युग का शुभारंभ किया. गांवगांव में तेजी से खुलते उपभोक्ता भंडारों की संख्या को देखते हुए नेपोलियन ने इंग्लंेड को ‘परचूनियों का देश’ कहकर उसपर कटाक्ष भी किया था.

सहकारिता आंदोलन का शुभारंभ चाहे रोशडेल से हो अथवा फेनविक से, इंग्लेंडवासियों को अपनी उस वैश्विक देन पर सदैव गर्व रहा है—

इसे आप परंपरागत ब्रिटिशस्वप्न का छूंछा हिस्सा; अथवा उसके शाही परिधान का लंगोटनुमा अवशेष भी मान सकते हैं. किंतु उसकी संरचना इतिहास बदलने और पूंजीवाद को ठोकर मारने के लिए की गई थी. इस मंजिल तक पहुंचने के लिए दूसरे देशों ने घृणित मारकाट और खूनखराबे का सहारा लिया, हम इंग्लेंडवासियों ने इसको प्राप्त करने के लिए सस्ते आटे और मक्खन जैसी वस्तुओं की बिक्री से शुरुआत की. इसपर टिप्पणी करते हुए नेपोलियन हमें ‘परचूनियों का देश’ कहा, पर हमें कतई आश्चर्य नहीं हुआ.’

सहकारिता आंदोलन के शुभारंभ का श्रेय चाहे जिस देश को मिले, इसके विश्वव्यापी प्रसार के लिए रोशडेल और फेनविक के गरीब बुनकरों एवं कामगारों के योगदान को भुला पाना असंभव होगा. इसलिए जब तक समानतावादी विचारों की मांग रहेगी, जब तक मानवमन में यह विश्वास रहेगा कि सभी मनुष्य परस्पर बराबर हैं, कोई छोटाबड़ा नहीं, जब तक समाज में व्याप्त ऊंचनीच की आलोचना होती रहेगी और उससे आहत समाजविज्ञानी, कलाकार और बुद्धिजीवी उसके विरुद्ध आवाज उठाते रहेंगे, जब तक विकास के लिए स्थानीय संसाधनों के बेहतर दोहन की प्रासंगिकता बनी रहेगी, और जब तक पूंजीवाद का असमानतावादी, स्वार्थी चेहरा जनसाधारण को मुंह चिढ़ाता रहेगा, तब तक, हां तब तक फेनविक और रोशडेल के उन गरीब बुनकरों को बराबर याद किया जाता रहेगा, जिन्होंने अपने संगठन के दम पर पूंजी के साम्राज्य से टकराने का न केवल साहस किया था, बल्कि अपनी कामयाबी से उसको लगातार छकाने का अप्रतिम उदाहरण भी प्रस्तुत किया था.

© ओमप्रकाश कश्यप

धर्म एवं निरंकुश पूंजीवाद

सामान्य

धर्म एवं अभिजन संस्कृति– – चार

जीवन की अंतहीन मुश्किलों से बचाव के लिए जनसाधारण के पास केवल तीन रास्ते होते हैं. पहला शराब की दुकान की ओर निकल जाना, दूसरा धर्म की शरण लेना और तीसरा सामाजिक क्रांति के रास्ते राह प्रशस्त करना.1मिखाइल बकुनिन

पंद्रहवीं शताब्दी में यूरोप और एशियाई देशों में जो परिवर्तनकामी आंदोलन खड़े हुए उनमें परिस्थितिगत अंतर भले हो, मगर लक्ष्य सभी का कमोबेश एक था. वह अस्वाभाविक भी नहीं था. इसलिए कि अर्थव्यवस्था के वैकल्पिक साधनों के अभाव में सभी देशों की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित थी. कृषिकर्म के लिए सबको प्रकृति पर आश्रित रहना पड़ता था. हालांकि भौगोलिक परिस्थितियां भिन्न थी और तज्जनित चुनौतियां भी. किंतु उत्पादन के साधनों में समानता के कारण उनके विकास का स्तर लगभग समान था. थोड़ाबहुत अंतर रहा तो उसका कारण भौगोलिक और स्थानीय परिस्थितियां थीं. दुनिया के सभी समाजों में आरंभिक अभिजन या तो भूस्वामी थे, अथवा वे लोग जो किसी न किसी कारणवश धर्म के संरक्षण और प्रसार से जुड़े थे. जिन्होंने जनसाधारण के हृदय में पैठे डर, प्रकृतिआधारित जीवन की अनिश्चितता एवं सत्ता से निकटता का लाभ उठाकर अपनी स्थिति मजबूत की थी. पंद्रहवीं शताब्दी की वैज्ञानिक और तज्जनित औद्योगिक क्रांति ने वैकल्पिक अर्थव्यवस्था के रास्ते उपलब्ध कराए. फलस्वरूप उन लोगों को जो अपने हस्तकौशल और बुद्धिबल के आधार पर सामंती व्यवस्था में आश्रित जैसा जीवन बिता रहे थे. अपने बुद्धिकौशल का बाजिब मूल्य वसूलने तथा स्वतंत्र होकर आगे बढ़ने का अवसर मिला. औद्योगिक आवश्यकता के चलते मध्य वर्ग की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई. वही प्रकारांतर में परिवर्तनकामी आंदोलनों का प्रमुख सूत्रधार बना. उन आंदोलनों का पहला लक्ष्य था सामंती ताकतों के चंगुल से आमजन की मुक्ति. यद्यपि सामंतवाद के मूल में आर्थिक असमानता थी, तथापि इस लक्ष्य को केवल आर्थिक विकास के बूते प्राप्त करना असंभव था. इसलिए कि लंबे समय तक उत्पीड़नकारी स्थितियों में जीवन जीने वाला जनसाधारण उस व्यवस्था से अनुकूलन कर चुका था. शोषण को वह अपनी नियति मानने लगा था. धर्म, संस्कृति एवं समाज के नाम पर उत्पीड़क शक्तियों ने नियमों, विधानों की एकतरफा व्यवस्था खड़ी की थी. उसमें अधिकारों का जखीरा अभिजन वर्ग के पास था और कर्तव्य की पोटली गैर अभिजन के. समानता की चर्चा रूमानियत भरे किस्सेकहानियों जैसी थी, जो मन को लुभाती हैं, तसल्ली देती हैं, मगर हकीकत से कोसों दूर होती हैं. उनसे मुक्ति का एकमात्र उपाय था, लोगों को आर्थिक एवं सामाजिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना. ऐसा वैचारिक तेज प्रदान करना, जिसके सहारे वे सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक वर्चस्ववाद की चुनौतियों को झेल सकें. इसी सामान्य ध्येय के साथ उस दौर के परिवर्तनकामी आंदोलनों का कारवां आगे बढ़ा था. उन आंदोलनों के अपने संघर्ष, परिस्थितियां और तनाव थे. कई जगह उनके लक्ष्य गड्मड थे. परिवर्तनकामी आंदोलनों की वास्तविक पहचान उनीसवीं शताब्दी में मार्क्स साथ ही संभव हो सकी. अपनी विलक्षण मेधा से मार्क्स ने पूंजीवादी, सामंतवादी अर्थव्यवस्था का विशद्गंभीर विवेचन किया. फलस्वरूप उसके शोषणकारी चरित्र को समझना आसान होता गया.

प्रौद्योगिकीकरण की शुरुआत तक आर्थिक संबंधों के विकास के लिए व्यक्ति की जरूरतें जिम्मेदार थीं. वे उत्पादक और उपभोक्ता के लाभ एवं सहयोगभावना पर निर्भर रहती थीं. कालांतर में जब धर्म, राजनीति और अर्थसत्ता का गठबंधन बना तो अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए शीर्षस्थ शक्तियां अपनी पसंद के व्यक्तियों को केंद्र में लाने लगीं. प्रतिभा की उपेक्षा का सर्वाधिक नुकसान जिज्ञासातत्व को उठाना पड़ा था. ईसा से पांचछह सौ वर्ष पहले मौलिक प्रतिभा का जो अद्भुत प्रस्फुटन भारत, यूनान और चीन में लगभग एक समान दिखाई पड़ता था, सहस्राब्दी के समापन तक वह शिथिल पड़ा तो शताब्दियों तक अपने पुराने वैभव को प्राप्त न कर सका. उसने करवट ली सोलहवी शताब्दी में. उसके बाद तो फ्रांसिस बेकन, जान लाक, रेने देकार्त्त, वाल्तेयर, रूसो, प्रूधों आदि के मौलिक चिंतन द्वारा समाज में नई ज्ञानशैलियों का आगमन हुआ. धार्मिक सुधार की वास्तविक कोशिश पंद्रहवीं शताब्दी से हुई, जब तर्क एवं लोककल्याण को प्रधानता देते हुए मार्टिन लूथर ने बाईबिल की 95 उत्पत्तियों का चयन कर उन्हें एक पोस्टर के रूप में चर्च के दरवाजे पर टांग दिया. यह एक क्रांतिकारी कदम था, जिसने कट्टरपंथ की चूलें हिलाने का काम किया. धर्मग्रंथों की आलोचना आज भले सामान्यसी बात मानी जाए, मगर उस जमाने में वह युगप्रवर्तनकारी कदम था. उन पदावलियों में लूथर ने धर्म के नाम पर पादरी वर्ग द्वारा जनसाधारण के शोषण की ओर संकेत किया था. यह कहते हुए कि चर्च के अपने आदमी ही धर्म के वास्तविक संदेश को आमजन तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं, उनका ध्यान केवल ओर केवल गरीबों से चंदा, दान आदि के नाम पर धन ऐंठने पर है—उसने यूरोपभर में खलबली मचा दी थी. लूथर का सीधासा प्रश्न था‘चर्च के नाम पर गरीबों से धन उगाहने के बजाय, पोप जिसका धन सम्राट से भी कहीं ज्यादा है, अपने धन से एक विशाल और भव्य चर्च का निर्माण क्यों नहीं करा लेता?2 लूथर के उत्तरवर्ती विचारक जान काल्विन का जोर भी धर्म के नाम पर समाज में व्याप्त कट्टरपंथ और शोषण से जनसामान्य की मुक्ति पर था. उसने यह कहकर कि सृष्टि में कुछ भी ऐसा नहीं है जो मनुष्य के लिए वर्जित हो, ईसाइयों की ‘पवित्र अपराध’ वाली सैद्धांतिकी पर खुला प्रहार किया था. जियोदार्नो ब्रूनो और काल्विन में यद्यपि परस्पर अनबन थी, लेकिन ब्रूनो ने भी धर्म के कट्टरपंथी रवैये की आलोचना की थी. इससे चिढ़कर धार्मिक अतिवादियों ने उसे जिंदा जला दिया गया था. मार्टिन लूथर, काल्विन, जियोदार्नो ब्रूनो के प्रयासों का इतना असर हुआ कि चर्च की व्यवस्था में सुधार की मांग जोर पकड़ने लगी. कुछ ही अवधि में वह प्रगतिशील और परंपरागत चर्च में बंट गया.

भारत में परिस्थितियां भिन्न थीं. शताब्दियों लंबी दासता ने भारतीयों से न केवल उनका आत्मबल छीना था, बल्कि अतीत की उसकी उपलब्धियों की ओर से भी ध्यान हटा दिया था. कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो पूरी अठारहवीं तथा उनीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक इस देश की मेधा आमतौर पर वही पढ़गुन रही थी, जो अंग्रेज बुद्धिजीवी उसको पढ़ा रहे थे. देश की इस समाजार्थिक दुर्दशा के लिए केवल बाह्यः शक्तियां जिम्मेदार न थीं. कुछ बड़े कारण थे—समाज का जातीय आधार पर विभाजन तथा धर्म के नाम पर फलताफूलता कर्मकांड जो व्यक्ति के विवेक का हनन कर, उसको अंधानुयायी बनाते थे. उल्लेखनीय है कि समाज के बहुआयामी विकास एवं मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु समाज के विभाजन का सुझाव प्लेटो ने भी दिया था. उसके द्वारा आकल्पित नगरराज्य की विशेषता थी कि उसमंे व्यक्ति की पैत्रिक पहचान खत्म कर दी जाती थी. ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो ने बच्चों का पालनपोषण मातापिता से अलग, राज्य के संरक्षण में करने की अनुशंसा की थी. संपत्ति राज्य के अधीन थी. इस कारण जाति, कुल या संपत्ति के आधार पर किसी व्यक्ति का सत्तासीन होना मुश्किल था. उस व्यवस्था में व्यक्ति के गुणों का महत्त्व था. व्यक्ति की योग्यता के आधार पर व्यापक समाजहित में उसे जिम्मेदारियां सौंपी जाती थीं. फलस्वरूप योग्यतम व्यक्ति समाजहित में अपना अधिकतम योगदान दे पाने में सक्षम होगा—ऐसी परिकल्पना प्लेटो की थी. वह व्यवस्था कामयाब न हो सकी तो इसलिए कि तत्कालीन यूनान छोटेछोटे राज्यों में बंटा था. उनके बीच हमेशा युद्ध की स्थिति बनी रहती थी. प्लेटो के नीतिवादी सोच का प्रभाव अरस्तु पर पड़ा. आगे भी वह किसी न किसी रूप में आने वाले विचारकों को प्रभावित करता रहा.

भारत में सामाजिक समानता सैद्धांतिक स्तर पर भी संभव न थी. इसलिए कि जातीय आधार पर समाज को अलगअलग हिस्सों में बांट देने के बीजतत्व वेदों में मौजूद थे, जिन्हें दैवीय माना जाता था. उन्हीं की स्तुति करते हुए चारणनुमा पुरोहितवर्ग ने सत्ता के इर्दगिर्द रहकर अपनी स्थिति मजबूत कर ली थी. स्वार्थ की एकरूपता के कारण उन्हें राजसत्ता का भी भरपूर समर्थन मिला. इससे पूरा समाज आर्थिक, सामाजिक स्तर पर बंटता चला गया. ऊंचनीच की खाइयों में बंटे समाज में एक वर्ग वह था, जिसके पास अधिकार ही अधिकार थे, कोई चुनौती न थी. दूसरा वर्ग अधिकारशून्य अवस्था में पहले वर्ग के लिए रातदिन खटता रहता था. आज वर्णविभाजन के औचित्य को लेकर उसके अंधभक्त चाहे जितने तर्क दें, मगर राज्य जब उत्तराधिकार में दिए जाते हों, समस्त भूमि ब्राह्मणों की घोषित हो, जीवन विवेक के बजाय रूढ़ियों, जड़ परंपराओं तथा कर्मकांडों द्वारा अनुशासित होता हो, ज्ञानार्जन के अवसरों और संसाधनों पर समाज के मुट्ठीभर लोगों का अधिकार हो, दूसरे वर्ग को उससे बलात् अलग रखा जाता हो—तब समानताआधारित समाज की स्थापना महज दिवास्वप्न थी. वर्गीय शोषण की अवधि इतनी लंबी थी कि उत्पीड़क अपनी दुरवस्था को ही अपनी नियति मानने लगा था. ऐसी स्थिति में परिवर्तन की मांग तो दूर यदि उसकी बात भी चले तो पहला विरोध अपने ही लोगों का झेलना पड़ता था.

पंद्रहवी शताब्दी ने यूरोप और भारत दोनों में परिवर्तन के साथ दस्तक दी थी. मगर यूरोप की वैचारिक क्रांति वैकल्पिक अर्थव्यवस्था के कंधों पर सवार होकर आई थी. इसीलिए उससे कामयाबी की इबारत लिखी जा सकी. उसी कालखंड के दौरान भारत में हुई सामाजिक क्रांति, जिसे भक्ति आंदोलन जैसे ठूंठ नाम से नवाजा जाता है, का लक्ष्य जाति और धर्म के तले पिस रहे वर्गों में आत्मचेतना का विस्तार करना था. भक्त कवियों का नेतृत्व संत कवियों के हाथों में था. मगर जिस समाज का वे प्रतिनिधित्व करते थे, वह समाजार्थिक रूप से प्रभु वर्ग पर आश्रित था. वह क्रांति अंततः असफल हुई तो इसलिए कि सामाजिक समानता का सपना देखने वाले संतकवियों के पास शोषित वर्ग की आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए कोई रास्ता ही न था. उनमें से अधिकांश अशिक्षित या अल्पशिक्षित थे. कबीर, दादू आदि आरंभिक संत कवि उस वर्ग से थे जिसे वेदादि ग्रंथों को पढ़ने की मनाही थी. मंदिर की सीढ़ियां वे नहीं चढ़ सकते थे. यदि वे किसी को छू भी लें तो सरेआम अपमानित और दंडित होना पड़ता था. दलित वर्ग के आत्मविश्वास को वापस लाने के लिए उन्होंने लोगों को समझाया कि देवता न तो मंदिर की दीवारों में है, न ही पंडितों द्वारा रचे गए धर्म ग्रंथों में. इसलिए वे अपना परमात्मा यदि देवालय के अंधेरे बंद कोने में खोजने के अभ्यस्त हैं तो यह नादानी उन्हीं को करने दो. ‘पत्थर पूजने से तो घर की चक्की को पूजना बुद्धिमानी है.’ परमात्मा को खोजने के लिए बाहर जाने की जरूरत नहीं है. वह मानवमात्र के हृदय में वास करता है. इस तरह संत कवियों ने मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने और सामाजिक संबंधों में नैतिकता की वापसी पर जोर दिया. उन्होंने धर्म और जाति के नाम पर भेदभाव का भी विरोध किया. संत कवियों की नीयत और सामथ्र्य पर संदेह करने की गुंजाइश नहीं है. मगर यह मानना पड़ेगा कि उनके चिंतन का दायरा उनके अनुभवक्षेत्र तक सीमित था. यह अनुभव क्षेत्र जातिवादी समाज में रहते हुए बना था. जिसके कारण कबीर जैसे क्रांतिधर्मा कवि को भी ब्राह्मणकुल में जन्म न लेने का अफसोस था—‘पूरब जनम हम बांभन होते, ओछे करम तप हीना. रामदेव की पूजा चूका पकरि जुलाहा कीना.’ हालांकि कबीर अपनी इस कुंठा से जल्दी ही बाहर निकल आते हैं. मगर इससे इतना तो प्रमाणित होता है कि संत कवियों की चेतना भी समाज के जातिवादी चरित्र से प्रभावित थी. आमूल परिवर्तन हेतु समाजार्थिक एवं राजनीतिक स्तर पर जिस क्रांतिधर्मी चेतना और बोध की जरूरत पड़ती है, उसका उनके पास अभाव था. उनकी आरंभिक पैठ भी समाज के निचले वर्गों तक सीमित थी, जो आर्थिक रूप से विपन्न और पूरी तरह पराश्रित थे. इसलिए ब्राह्मण समेत तथाकथित ऊंची जातियों ने आरंभ में संत कवियों की न केवल उपेक्षा की, बल्कि उन्हें तरहतरह से अपमानित करने का प्रयास भी किया. इस कारण उनकी सुधारवादी चेतना केवल जाति और धर्म की जकड़न से मुक्ति की मांग से आगे न बढ़ सकी. ऐसा केवल भारत तक सीमित न था. यूरोप में भी आरंभिक परिवर्तनकामी आंदोलन धार्मिक सुधारवाद तक सीमित थे.

वेंदांतियों के मायावाद तथा सूफी परंपरा से प्रभावित संत कवियों ने सांसारिक सुखों के प्रति उपेक्षा का रवैया अपनाया. कबीर जैसे युगदृष्टा कवि ने ‘रूखीसूखी खाकर ठंडा पानी पीने’ में ही भलाई समझी तो रविदास ने इस देह और भोगविलास को झूठा बताकर सादगी और संतोष के साथ जीवनयापन का उपदेश दिया. झूठ रे यहु तन झूठी माया/झूठा रे मंदिर भोगविलासा.’कहकर कबीर की बात को ही पानी दिया. अपनी तरह से संत कवियों ने जीवन में अर्थ की महत्ता को कम करने का भरसक प्रयास किया. मगर सांप को सामने देख आंख मूंदकर रस्सीरस्सी रटने से जैसे सांप रस्सी नहीं बन जाता, वैसे ही संत कवि के जीवन में मोहमाया का तिरस्कार करने से समाज में वैसा होना संभव न था. कम से कम उस समय तक तो नहीं, जब तक समाज में भारी आर्थिक विषमता हो. एक वर्ग दूसरे के श्रम और संसाधनों पर विलासितापूर्ण जीवन जीता हो; और दूसरे वर्ग को पूरे दिन पसीना बहाने के बावजूद भरपेट रोटी के लिए शीर्षस्थ वर्ग पर आश्रित रहना पड़ता हो. उपदेश से आक्रोश का शमन एक बार तो संभव है, जिंदगीभर नहीं. मनुष्य सामान्यतः अपने से ऊपर के वर्ग को ललचायी दृष्टि से देखता है, उस जैसा होना चाहता है, जहां तक संभव हो उसका अनुसरण भी करता है. अतएव संत कवियों की वाणी गरीब मन को तसल्ली तो देती रही, मगर वह समाज के चरित्र में न ढल सकी. जिन वर्गों में संत कवियों की पैठ बनी, उनके आर्थिक रूप से परावलंबी होने के कारण, भक्ति आंदोलन बहुत जल्दी सामंतवादी शक्तियों का शिकार हो गया. निराकार भक्ति के रूप में अध्यात्म चेतना के प्रति झुकाव से आरंभ हुआ वह आंदोलन कुछ ही शताब्दियों में साकार भक्ति में ढलकर उन सब कुरीतियों, परंपराओं, बौद्धिक जड़ताओं का समर्थक और बढ़ानेवाला सिद्ध हुआ, जिनके विरोध में वह खड़ा हुआ था. जीवन की मूलभूत समस्याओं के प्रति पलायनवादी दृष्टिकोण के कारण वह समाज के प्रभुवर्ग के आगे निर्णायक चुनौती न बन सका. समाज की नेतृत्वकारी मेधा धर्म को जीवनपद्धति का आधार मानती रही. ‘धर्मो रक्षति रक्षतः’—धर्म की रक्षा में ही सबकी रक्षा है, कहने वाले लोग समाज में अग्रणी बने रहे. चूंकि शताब्दियों से धर्म लोगों की जीवनशैली को अनुशासित करता आया था, इसलिए जीवन में उसके अभाव की वे कल्पना भी नहीं कर पाते थे. नैतिकता को धर्म के अधीन, उसपर आश्रित मानने का चलन था. सच इसके उलट है. नैतिक मूल्य मानवमात्र के लिए कहीं अधिक कल्याणकारी एवं शाश्वत हैं. अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए दुनिया के हर धर्म ने इन्हें अपनाया था.

उल्लेखनीय है कि दुनिया के किसी भी ज्ञात धर्म का आधार चारपांच हजार वर्ष से पुराना नहीं है. दूसरी ओर मानवमन में नैतिकताबोध का विकास उसके विवेकबोध के जन्म से जुड़ी घटना है. अपनी सीमाओं के भीतर धर्म यदाकदा आम जनमानस में नैतिक मूल्यों की स्थापना तथा उन्हें बनाए रखने का माध्यम जरूर बना, मगर अधिकांश मामलों में वह समाज के विभिन्न वर्गों के बीच दूरी और वैमनस्य को ही बढ़ावा देता रहा. संदेह ज्ञान का मूल, जिज्ञासा का आधार है. ‘संदेह से हम जांचपड़ताल की और उन्मुख होते हैं, जांचपड़ताल हमें सत्य तक ले जाती है.’—पीटर अबेलार्ड का हजार वर्ष पुराना कथन आज भी पहले जितना ही प्रासंगिक है. उल्लेखनीय है कि परंपराओं पर संदेह हो सकता है, लेकिन जहां परंपराओं की अंधस्वीकृति है, वहां संदेह के लिए बहुत कम गुंजाइश रह जाती है. परंपरा को अंधस्वीकृति देने वाला समाज ज्ञान की परंपरा से कट जाता है. उस अवस्था में वह अपने बौद्धिक परिष्कार की ओर बहुत कम ध्यान दे पाता है. वह मनुष्य और उसके कल्याण के बीच में ईश्वर को ले आता है. चूंकि ईश्वर का अपना कोई अस्तित्व नहीं है, इसलिए उसके नाम पर पुरोहितों, पेशेवर कथावाचकों और कर्मकांडियों की पूरी जमात बीच का स्थान ले लेती है. धर्म पुरोहित वर्ग के हाथों का सम्मोहनास्त्र है, जिसका उपयोग वह शोषण के वास्तविक कारणों की ओर से ध्यान हटाने के लिए करता है. इससे व्यक्ति और कल्याण के बीच दूरी निरंतर बढ़ती जाती है. सामंतवाद के फलनेफूलने का कारण भी यही है.

भक्ति आंदोलन की निराकारवादी धारा किसी न किसी रूप में वर्चस्ववाद का निषेध करती थी. इसलिए आरंभिक संत कवि ईश्वर के प्रति बेपरवाह से थे. उनका सारा जोर आचरण की पवित्रता पर था. कबीर, रविदास, दादूदयाल, नानक जैसे संतकवियों की ओजपूर्ण वाणी के फलस्वरूप समाज में जातिबंधन शिथिल पड़े. मगर भक्ति आंदोलन की लोकप्रियता का लाभ उठाकर संत कवियों के उत्तराधिकारी के रूप में जो नए कवि उसमें दाखिल हुए उनमें अधिकांश सवर्ण जातियों से थे, पारंपरिक धर्म और शिक्षा प्रणाली से निकले हुए. वे एक ओर तो भक्ति आंदोलन की रसात्मकता से प्रभावित थे, दूसरे उनपर भारतीय वर्णव्यवस्था, परंपरा तथा धार्मिक कर्मकांडों का भी प्रभाव था. उनकी साधना व्यक्ति केंद्रित थी. भक्ति आंदोलन के मुख्य प्रवत्र्तक कवियों सूर और तुलसी ने तो ज्ञानमार्गी परंपरा की जमकर खिल्ली उड़ाई थी. जिससे प्रकारांतर में कर्मकांडों तथा वर्णव्यवस्था को नया जीवन प्राप्त हुआ. एक नियतिवादी द्रष्टिकोण जो पुराणों, स्मृति और ब्राह्मणग्रंथों के प्रभावस्वरूप फैला था, वह और भी प्रगाढ़ होता गया.

पंद्रहवीं शताब्दी तक पश्चिमी सभ्यता का हाल भी करीबकरीब ऐसा ही था. यूनानी सभ्यता के दौर से चली आ रही दास प्रथा कृषि मजदूरों, छोटे किसानों के शोषण का माध्यम बनी थी. जो भूसामंत थे, जमींदार थे, येन केनप्रकारेण राजसत्ता पर उन्हीं का दखल था. चूंकि आरंभिक दार्शनिक विचारक आदि भी कुलीन परिवारों से आए थे, इसलिए उनके द्वारा दासप्रथा का समर्थन स्वाभाविक ही था. प्लेटो के अलावा जिसने निकृष्ट कहकर दासप्रथा की आलोचना की थी—उस समय के सभी प्रमुख विचारक उसके समर्थक थे. अपनी विद्वता दर्शाने के लिए यूनानी शासक जानेमाने दार्शनिकों को अपने राज्य में ससम्मान रखते थे. इससे केंद्रीय सत्ता इतनी भड़कीली और भारीभरकम दिखने लगती थी कि उसके काले, अंधियारे कोनों पर किसी की निगाह तक नहीं जाती थी. चालाक सम्राट दार्शनिकों, विद्वानों के सान्निध्य के नाम पर शेष समाज के साथ मनमाना व्यवहार करते थे. इस कमी को प्लेटो ने समझा था. इसलिए उसने कहा था कि सत्ता दार्शनिकों के समूह द्वारा संचालित होनी चाहिए. दार्शनिक समूह से उसका आशय मानवीय उच्च गुणों से संपन्न व्यक्तियों के निर्वाचित मंडल से था. पर वह प्लेटो का आदर्शलोक था, जिसका खाका उसने अपने ग्रंथ ‘रिपब्लिक’ में खींचा था. व्यवहार में किसानों, दासों एवं मजदूरवर्ग का शोषण सामान्य बात थी. उन्हें शोषणकारी व्यवस्था के प्रति भरोसेमंद और समर्पित बनाए रखने का काम धर्मसत्ता का था.

भारत में यह जिम्मेदारी पुरोहित वर्ग की थी. यहां जनसाधारण के पास मौलवियों, धर्मावलंबियांे की शरण लेने के अलावा और कोई रास्ता न था. वे सांसारिक सुखों के प्रति स्वाभाविक मोहासक्ति को उसके कष्टों, अभावों आदि का कारण बताकर वास्तविक समस्या पर परदा डालने का काम करते. दूसरी ओर उन्हीं सुखों की प्रचुरता के नाम पर स्वर्ग का महिमामंडन करने लगते थे. चार्वाक, लोकायतों एवं आजीवकों द्वारा जीवन में भौतिक सुखों को महत्ता देने के लिए उनकी तीखी आलोचना करने वाले वेदांती, स्वर्ग में उनकी अफरात बताकर उसका महिमामंडन करते न अघाते थे. यह सीधा षड्यंत्रकारी सोच था. जिसके चलते स्वादिष्ट भोजन, अच्छे वस्त्राभूषण, रहनसहन, आमोदप्रमोद आदि जो इहलोक में विलासिता और इंद्रिय सुख के नाम पर त्याज्य एवं मुक्ति में बाधक समझे जाते हों, वे कथित स्वर्ग में प्रवेश करते ही श्रेष्ठ और सर्वोत्तम मान लिए जाते थे. स्वर्ग नाम की छलना की अवधि भी सीमित काल के लिए थी. आत्मा वहां उतने ही समय तक वास कर सकती थी, जो उसने अपने सद्कर्मों के जरिये अर्जित की है. इससे अधिकतम पुण्यार्जन के लिए व्यक्ति पूरा जीवन अभाव, संत्रास उत्पीड़न और शोषण के बीच बिता देता था.

उल्लेखनीय है कि स्वर्ग के ये सुख उस आत्मा के लिए भोग्य थे, जो कथित रूप प्रलोभन रहित, अचंचल, निर्व्यसना, निर्लेप आदि है. असल में यह समाज के प्रभुवर्ग द्वारा सामान्यजन को जीवन के मूलभूत सुखों से वंचित कर, उसको अपना आर्थिक, सामाजिक रूप से आश्रित बनाए रखने की चाल रही है. पश्चिम इस षड्यंत्र के प्रति जल्दी जागरूक हुआ. पंद्रहवीं शताब्दी की वैज्ञानिक क्रांति के साथ आए वैचारिक उभार के फलस्वरूप धर्म के सांस्थानीकरण तथा उसके माध्यम से समाज के बहुतायत के शोषण उत्पीड़न के विरोध में वहां जोरदार आवाज उठी. शुरुआत वाल्तेयर ने की जो वोलनी, मैक्स बेबर, प्रूधों, रूसो, फायरबाख, बू्रनो बायर से लेकर कार्ल मार्क्स तक लगातार दमदार होती गई. अठारहवीं शताब्दी में बौद्धिक आंदोलनों को मिली सफलता का एकमात्र कारण भी यही था लोग पूंजी और धर्म के संयोग से बने सामंती शोषण से तंग आ चुके थे. शोषण की जमीन पर टिके अभिजात्यवर्ग की आलोचना होने लगी थी. लोग यह समझने लगे थे कि संगठित जनशक्ति के बल पर प्रभुवर्ग के आतंक और अनाचार से मुक्ति संभव है. इस एहसास ने उन्हें उत्पीड़क वर्ग की आंख में आंख डालकर बात करने का हौसला दिया था. वोलनी की पुस्तक ‘दि रयून’ का एक संवाद देखिए जिसमें जनचेतना के उभार को स्पष्ट किया है—

जनता : सम्राट सिवाय जनता के शुभत्व के कुछ नहीं है. वास्तविक संप्रभुता केवल कानून के राज्य में संभव है.

राजप्रतिनिधि : कानून सिर्फ आपको आज्ञाकारी बना सकता है.

जनता : लोकेच्छा से परे कानून कुछ नहीं है. और हम लोकहित में नया कानून गढ़ेंगे.

राजप्रतिनिधि : तब तुम देशद्रोही कहे जाओगे.

जनता : नागरिक धोखा नहीं देते. केवल तानाशाह देशद्रोही है.

राजप्रतिनिधि : सम्राट हमारी ओर है, वह तुम्हें आत्मसमर्पण को विवश कर देगा.

जनता : सम्राट राष्ट्र से भिन्न नहीं है. हमारा सम्राट आपका साथ हरगिज नहीं देगा. तुम केवल उसके प्रेत से संतोष करो.

कुछ देर बाद इस संवाद में सेनाध्यक्ष भी शामिल हो जाता है. वह कहता है कि जनता डरपोक होती है. वह अपने सिपाहियों को आदेश देता है कि जनता को सबक सिखाएं. इसपर जनता सिपाहियों से कहती है—

सिपहियो, तुम तो हमारा ही खून हो. क्या तुम अपने भाइयों और सगेसंबंधियों पर वार करोगे? यदि जनता ही नहीं रही तो सेना का भरणपोषण कौन करेगा?’ इतना सुनते ही सैनिक हथियार डाल देते हैं—

हम तो जनता में से ही एक हैं, आप हमें हमारे दुश्मन से मिलवाएं.’

यहां लगता है कि जनता जीत गई. लेकिन उत्पीड़क अभिजन के पास एक और हथियार अभी बाकी है. वह है धर्म का. धर्म के नाम पर व्याप्त रूढ़ियों तथा अंधविश्वास का. सेनानायक के परास्त होते ही धर्माधिकारी उपस्थित हो जाता है. वह राजप्रतिनिधि को आवासन कहता है कि जनता अंधविश्वासी है. हम उससे ईश्वर और धर्म के नाम पर निपट लेंगे. धर्माचार्य लोगों को समझाता है—

प्यारे भाइयो, परमात्मा ने हमें आदेश दिया है कि तुमपर शासन करें.’

जनता : जरा अपना परिचयपत्र तो दिखाओ जो तुम्हें परमात्मा ने दिया है.

पुजारी : तुम्हें विश्वास करना चाहिए? सवालजवाब करना धर्मभ्रष्ट होने की निशानी है.

जनता : क्या तुम बिना किसी तर्क के शासन करते हो.

पुजारी : शांति परमात्मा से मिलेगी….धर्म विनम्र और आज्ञाकारी बनाता है.

जनता : शांति न्याय से मिलती है. आज्ञाकारी होने का अर्थ है, अपने कर्तव्य का पालन करना.

पुजारी : इस संसार में दुख ही दुख हैं.

जनता : हमें कुछ उदारहण दो.

पुजारी : क्या तुम बिना सम्राट अथवा परमात्मा के रहोगे?

जनता : हम बिना उत्पीड़क के खुश रहेंगे.

पुजारी : तुम्हें मध्यस्थ और बीच के संवादी की आवश्यकता पड़ेगी.

जनता : परमात्मा और सम्राट के बीच मध्यस्थ! राजदूतो और पुजारियो, तुम्हारी सेवाएं बहुत ही खर्चीली हैं. आप हमें हमारे हाल पर छोड़ दें. आगे अपने मसले हम स्वयं संभाल लेंगे.

इसी के साथ अभिजन अल्पसंख्यक यह मान लेते हैं कि वे परास्त हुए. लोग जाग चुके हैं. उनका जादू अब और नहीं चलने वाला. उनके चिंता प्रकट करने पर जनता की ओर से जवाब मिलता है—‘घबराओ मत, तुम सुरक्षित हो. चूंकि अब हम जाग चुके हैं, इसलिए हम आगे कोई हिंसा नहीं करेंगे. हम सिर्फ अपने अधिकारों का दावा करेंगे. हम आपसे भले ही नाराज हों, लेकिन हम इसको भूल जाना चाहते हैं. हम गुलाम थे. हम चाहें तो शासन भी कर सकते हैं. लेकिन हम अपनी मुक्ति और स्वाधीनता चाहते हैं, जो न्यायपूर्ण है.

वोलनी की यह पुस्तक अठारहवीं शताब्दी के समापन पर उस समय आई जब फ्रांस क्रांति के दौर से गुजर रहा था. फ्रांसिसी क्रांति को उत्प्रेरित करने के लिए इसने चिंगारी का कार्य किया. पूरा यूरोप उससे प्रभावित हुए बिना न रह सका. दरअसल उनीसवीं शताब्दी जो भारत में पुनर्जागरण का दौर है, उस समय तक पश्चिम में राबर्ट ओवेन, पियरे जोसेफ प्रूधों, जाॅन स्टुअर्ट मिल, कार्ल मार्क्स, मिखाइल बकुनिन के विचार बौद्धिक जगत पर अपनी पकड़ बना चुके थे. पूंजीवाद के प्रति समालोचकीय समझ समाज में विकसित हो चुकी थी. धर्म के नाम पर शताब्दियों से सत्ता पर काबिज विशेषाधिकार प्राप्त लोगों पर सवाल किए जाने लगे थे. वाल्तेयर ने ईश्वर को ऐसा घेरा बताया था, जिसका केंद्र हर जगह है, मगर परिधि नदारद है. इससे कुछ और आगे बढ़ते हुए फायरबाख ने ईश्वर को ‘व्यक्तिगत अनुभूति’ तक सीमित कर दिया था—‘ईश्वर प्राणिमात्र की व्यक्तिगत अवधारणा है….वह मानवीय संचेतना एवं अनुभूतियों के दायरे से बाहर है.’ फायरबाख ने धर्म को लेकर व्यक्ति के आचरण को पहेलीनुमा माना था. उसका कहना था कि खुद को धर्म के सांचे में ढालने का प्रयत्न करतेकरते व्यक्ति अपनी ही कल्पनाओं का मूर्तिकरण करने लग जाता है. ‘दि एसेंस आफ क्रिश्चनिटी’ में उसने ईसाई धर्म के नैतिकतावादी द्रष्टिकोण की प्रशंसा भी की थी. फायरबाख का धर्मसंबंधी विश्लेषण उसके शोषणकारी रूप की अकादमिक व्याख्या थी. उसके विचार अकादमिक क्षेत्र और बुद्धिजीवियों के काम के थे.

मार्क्स की चिंतनशैली में ‘एक्टीविस्ट’ जैसी प्रहारात्मकता थी. फायरबाख द्वारा ईश्वर को मानवीय संचेतना की उत्पत्ति कहना उसे रुचा नहीं. प्राचीन दर्शन, इतिहास, राजनीति तथा अर्थशास्त्र के गहन अध्ययन द्वारा वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि अपने व्यापक प्रभाव में धर्म केवल अंतश्चेतना की विषयवस्तु नहीं रह जाता, बल्कि वह समाज के शीर्षस्थ वर्ग के हाथों में शोषण का हथियार बनकर उभरता है, जिसकी प्रहारात्मकता दूसरे किसी भी हथियार से कहीं अधिक घातक तथा दूरगामी होती है. वह ऐसा सम्मोहनास्त्र है, जिसके माध्यम से वह जनसाधारण का ध्यान उसकी दुर्दशा से हटाकर अंधी, बंद सुरंग की ओर मोड़ देता है, जहां आजीवन प्रयास के बावजूद उसे कुछ नहीं मिल पाता. मार्क्स ने धर्म को सीधे ‘अफीम’ की संज्ञा दी थी. अपने चिंतन द्वारा वह समकालीन हीगेलियन दार्शनिकों ब्रूनो बायर, प्रूधों, फायरबाख आदि के विचारों को आकादमिक क्षेत्र से बाहर ले आया था. इसके फलस्वरूप वे आगे चलकर सर्वहारा के विद्रोह का आधार बन सके. उससे पहले तक धर्म की आलोचना करीबकरीब आकादमिक ही थी. छायावादी गीतों की भांति केवल उच्चशिक्षित अभिजात वर्ग उसे समझ सकता था. ऐसी अकादमीय आलोचनाएं समाज में आक्रोश के शमन हेतु सेफ्टी वाल्व जैसा काम करती थी. इसलिए उन्हें जरूरी माना जाता था. मार्क्स ने धर्म की मदद से जनसाधारण के शोषण की जो तस्वीर पेश की वह तर्कों पर आधारित थी, उससे शीर्षस्थ वर्ग का तिलमिला उठना स्वाभाविक ही था. ‘थीसिस आन फायरबाख’ के रूप में लिखे गए अपने संक्षिप्त नोट्स जो किसी बड़ी पुस्तक की रूपरेखा लगते हैं, में एक दार्शनिक की भांति फायरबाख के विचारों की आलोचना करतेकरते उसका एक्टीविस्ट सामने आ जाता है. उसकी शैली में अन्वीक्षण, विश्लेषण, तर्क और प्रहारात्मकता एक साथ मौजूद है—

प्राचीन भौतिकवाद का दृष्टिकोण शिष्ट नागरिक समाज गढ़ना था, जबकि आधुनिक दृष्टिकोण मानवीय समाज अथवा सामाजिक मनुष्यता का लक्ष्य पाना है.3

मार्क्स अपने उद्देश्य को न तो गोलमोल शब्द देता है, न ही उसे छिपाता है. उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता स्फटिकसी चमकती है. ‘थीसिस आॅन फायरबाख’ में फायरबाख के भाववादी तर्कों का आकलन यथार्थ की जमीन पर करते हुए उसने बुद्धिजीवियों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं का सीधेसीधे आह्वान किया था—‘अभी तक दार्शनिकों ने संसार की तरहतरह से व्याख्या की है, जरूरत इसको बदलने की है.’4 मार्क्स के तर्क दमदार थे. उसकी बातें दिल को छूती थीं. श्रमिक वर्ग को उस समय ऐसे ही ओजस्वी दर्शन की आवश्यकता थी. इसलिए उसने मार्क्स के विचारों को हाथोंहाथ लिया. ‘दुनिया के मजदूरो एक हो जाओ, तुम्हारे पास खोने के लिए अपनी जंजीरों के अलावा कुछ नहीं है, जीतने के लिए पूरी दुनिया पड़ी है.’—नई दुनिया का सपना देखने वालों के लिए मार्क्स के ये शब्द बीजमंत्र बन गए. एक कंठ से दूसरे कंठ तक उभरते हुए नारे पूंजीपतियों को चेतावनी देने लगे. एक समय ऐसा भी आया जब विश्व के आधे देश मार्क्स के वर्गहीन समाज की स्थापना के लक्ष्य को समर्पित हो चुके थे. समाज के दबकुचलेसताए हुए लोगों के लिए वह एक उम्मीद था. उसके शब्दों में बेलाग प्रहारात्मकता थी. पूंजीपतियों, धर्मप्रमुखों एवं सामंतों का उनसे तिलमिला उठना स्वाभाविक ही था. मार्क्स के विचार और वर्गहीन समाज की स्थापना का सपना, उसका आदर्श लोगों के निशाने पर आ गया. इस काम में सर्वाधिक मदद की धर्म ने.

उल्लेखनीय है कि मार्क्स धर्म का वैसा विरोधी नहीं था, जैसा उसको उसके विरोधियों ने सिद्ध करने की कोशिश की. उसका मकसद किसी आध्यात्मिक समस्या का समाधान करना भी नहीं था. वह धर्म के पलायनवादी पक्ष को सामने रखकर बुर्जुआ समाज की नीयत को उजागर करना चाहता था. वह उस स्वामी संस्कृति का आलोचक था जो एक व्यक्ति को बिना श्रम किए मालिक होने का अधिकार देती है. दूसरी ओर श्रमिक से उसके श्रम का वास्तविक मूल्य तक हड़प लेती है. जिसमें उत्पादन का आधार व्यक्ति अथवा समाज की जरूरतें नहीं, बल्कि कारखानेदार का मुनाफा होता है. अपने मुनाफे के लिए जहां वह अनापशनाप वस्तुओं की खेप बाजार में उतार देता है, वहीं व्यक्ति की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने वाली कम मुनाफादेय वस्तुओं के उत्पादन से मुंह मोड़ लेता है. धर्म की शोषणकारी भूमिका की ओर संकेत करने वाला मार्क्स अकेला भी न था. उससे पहले भी अनेक विचारकों ने धर्म की प्रतिक्रियावादी भूमिका को आलोचकीय दृष्टि से देखा था. मगर मार्क्स का विश्लेषण उन सबसे हटकर तथ्यपरक, तर्कसंगत एवं वैज्ञानिक था. अपने पूर्ववर्त्तियों से आगे बढ़कर उसने धनपतियों, भूसामंतों के वर्गीय चरित्र पर सीधा प्रहार किया था. उससे सर्वहारा को एकजुट होने की प्रेरणा मिली. इससे पहले औद्योगिक सहकारिताओं की टक्कर से भी पूंजीवादी ताकतों को संगठित जनशक्ति के सामथ्र्य का एहसास हो चला था. अपनी प्रवृत्ति में गैरस्पर्धात्मक होते हुए भी सहकारिताएं पूंजीवाद के समानांतर अपने विकास में भरोसा रखती थीं. जबकि मार्क्स का साम्यवादी चिंतन वर्गहीन समाज की स्थापना के लिए सर्वहारा के संगठित प्रतिरोध द्वारा पूंजीवाद को उखाड़ फैंकने का सीधेसीधे आवाह्न करता था. इसलिए पूंजीपतियों द्वारा मार्क्स का विरोध स्वाभाविक ही था. अपनेअपने हितों को दांव पर लगा देख धर्मसत्ता और राजसत्ता ने भी उनकी मदद की. तत्कालीन परिस्थितियों ने भी उन्हें सहारा दिया. उस समय तक एडम स्मिथ द्वारा Laissez-faire के आधार पर अर्थनीति की समीक्षा को करीब डेढ़ सौ वर्ष से अधिक हो चुका था. मगर उसके सही परिणाम आगे आने वाले थे.

                                                                                      जारी…..

© ओमप्रकाश कश्यप

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1. There are but three ways for the populace to escape its wretched lot. The first two are by the routes of the wine-shop or the church; the third is by that of the social revolution.- M.A. Bakunin.

2. Why does not the pope, whose wealth is today greater than the wealth of the richest Crassus, build this one basilica of St. Peter with his own money rather than with the money of poor believers?”- Martin Luther’s “95 Theses”

3. The standpoint of the old materialism is civil society; the standpoint of the new is human society or social humanity.KARL MARX THESES ON FEUERBACH, Translated: by Cyril Smith.

4. Philosophers have hitherto only interpreted the world in various ways; the point is to change it.Ibid.

 

श्रमिकसंघवाद (‘सिंडीकेलिज्म’)

सामान्य
समाजवाद के आधुनिक विकल्प

पूंजीवाद के वर्चस्वकारी रवैये की प्रतिक्रिया में उससे मुक्ति पाने के जनांदोलनों की शुरुआत अठारहवीं शताब्दी में ही हो चुकी थी. यही वह दौर था, जब व्यक्तिस्वातंत्रय और उपयोगितावाद की मांग ने जोर पकड़ा. दोनों विचारधाराओं का ध्येय धर्मसत्ता और सामंतवाद के चंगुल में शताब्दियों से पिसते आ रहे जनसामान्य के लिए मुक्ति की राह प्रशस्त करना था. दोनों समाजवाद की मूल भावना से भी मेल खाती थीं, जो उन दिनों पूंजीवाद के विरुद्ध तेजी से उभरती विचारधारा थी. उपयोगितावाद के समर्थकों का मानना था कि सृष्टि में कुछ भी अनुपयोगी नहीं है. सुख प्राप्त करना व्यक्तिमात्र का अधिकार है. इसे आगे बढ़ाते हुए स्वाधीनतावादी विद्वान व्यक्तिमात्र को अपनी रुचि के अनुसार कार्य चुनने तथा सुख के अवसर जुटाने के अवसर देने के समर्थक थे. उल्लेखनीय है कि विश्व के प्रायः सभी समाजों में बुद्धिजीवियों का एक वर्ग भौतिक सुख के प्रति नकारात्मक सोच रखते हुए, त्याग और दीनताबोध का अतिरिक्तरूप से महिमामंडन करता रहा है. इससे संसार को माया कहकर इससे पलायन का उपदेश देने वाले, मोक्ष की कामना में शरीर को तरहतरह की प्रताड़ना देने वाले तांत्रिकों, धर्माचार्यों को बढ़ावा मिला. इसी विचारधारा के समर्थन से प्रायः सभी समाजों में पुरोहितवर्ग का उदय हुआ जो प्रकटरूप में भौतिक सुखों का तिरष्कार करते थे, किंतु उनका अपना जीवन त्यागतपश्चर्य की स्वनिर्मित आचारसंहिता का उल्लंघन करता था. यहां यह जानना भी प्रासंगिक है कि व्यक्तिस्वातंत्र्य की मांग सामंतवाद के चंगुल में शताब्दियों से पिसते आ रहे लोगों को देखकर जन्मी थी, जिसने बुद्धिजीवियों के बड़े वर्ग को प्रभावित किया. प्रकारांतर में उसको पूंजीवाद का भी भरपूर समर्थन प्राप्त हुआ. दरअसल पूंजीवाद के विकल्प की खोज के लिए बुद्धिजीवियों का उछाह इतना था कि एक के बाद एक नई विचारधाराएं सामने आ रही थीं. ध्येय सभी का एक थाकिसी भी भांति पूंजीवाद के जिन्न को बोतल में बंद करना. साम्यवाद, समाजवाद, अराजकतावाद, सामूहिकतावाद, राज्यप्रेरित समाजवाद, गणतांत्रिक समाजवाद सहित अनेक विचारधाराएं उस दौर में लगभग साथसाथ जन्मीं. चूंकि सभी विचारधाराओं का ध्येय एक था तथा सभी पर मार्क्सवाद का गहरा प्रभाव भी था, इसलिए उन सब में कुछ समानताएं भी थी. कुछ विचारधाराओं का अंतर तो इतना मामूली कि बस शब्दों का ऐरफेर जान पड़ता है. ‘श्रमिकसंघवाद’ अथवा ‘सिंडीकेलिज्म’ इसी प्रकार की एक विचारधारा थी, जिसका उदय राज्याश्रित समाजवाद तथा पूंजीवादी शोषण से मुक्ति पाने की कामना के साथ हुआ था. असल में यह एक राजनीतिकआर्थिक दर्शन है, जिसका ध्येय समाज को पूंजीवाद के चंगुल से छुटकारा दिलाना है. प्रकारांतर में यह व्यवस्था राज्य द्वारा पे्ररितअनुशासित समाजवाद का भी विरोध करती है. अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए श्रमिकसंघवाद श्रमिक संघों, मजदूर संगठनों तथा औद्योगिक श्रमिकयूनियनों का उपयोग करता है. इसमें श्रमिक आगे बढ़कर उत्पादनतंत्र को अपने हाथों में ले लेते हैं. उत्पादन केंद्रों का संचालन श्रमिकों द्वारा सामूहिक लाभ की अवधारणा के साथ किया जाता है, जहां औद्योगिक स्पर्धा, एकाधिकार की भावना का नामोनिशां नहीं होता. अराजकतावाद की भांति श्रमिकसंघवाद भी राज्य को मानवीय स्वतंत्रता का अवरोधक मानता है. उसका विश्वास है कि सत्ता का कोई भी रूप वर्चस्वकामना से मुक्त नहीं हो सकता. जहां वर्चस्व की कामना है, वहां आर्थिकसामाजिक असमानताएं हैं. जहां असमानता है, वहां शोषणकारी प्रवृत्तियां हैं. जहां शोषणकारी प्रवृत्तियां हैं, वहां शोषणकारी शक्ति के प्रतीक सत्ताशिखर पर विराजमान लोग, राज्य के संसाधनों का अपने वर्गीय हितों के अनुरूप दोहन करने लगते हैं. कालांतर में राज्य पूंजीवाद का सहायक बनकर, श्रमिकों का विरोधी बन जाता है. इसलिए राज्यसत्ता का विरोध करते हुुए श्रमिकसंघवाद, उसे श्रमिक संगठनों के लोकतांत्रिक संगठनों द्वारा अनुशासित किए जाने का सुझाव देता है.

सिंडीकेलिज्म’ फ्रांसिसी शब्द है, जिसका अर्थ है—‘व्यापारिक संगठनवाद’. यानी वह विचारधारा जो संगठित श्रमशक्ति, जो वास्तविक उत्पादक और उपभोक्ता है, द्वारा राज्य और पूंजीवाद की मनमानियों से ऊपर उठकर समस्त आर्थिकराजनीतिक सत्ताकेंद्रों पर अधिकार जमा लेने का पक्ष लेती है तथा उत्पादन को संगठन के हित में उपयोग करने का समर्थन करती है. बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में इसे अराजकतावादीश्रमिकसंघवाद भी कहा जाने लगा था. ‘श्रमिकसंघवाद’ राज्य और पूंजीवाद दोनों की अधिसत्ता के विरुद्ध है. उसका प्रथम लक्ष्य है, राजनीति के बजाय व्यवसाय के नाम पर व्यक्तियों और संगठनों को एकजुट करना, तदनंतर आमूल परिवर्तन के हेतु सदैव तैयार रहना. इस विचारधारा के अनुसार आर्थिक अल्पतंत्र तथा राज्य प्रेरित अधिनायकवाद से मुक्ति के लिए श्रमसंगठन सर्वाधिक सशक्त माध्यम हैं. बहुसंख्यक श्रमिक वर्ग के हितों की रक्षा केवल उनकी संगठित शक्ति और लोकतांत्रिक निर्णयप्रक्रिया द्वारा संभव है. उत्पादन कार्य श्रमसंगठनों के परस्पर सहयोग और श्रमअंतरण के आधार पर संपन्न किया जाए तो उसके बेहतर परिणाम निकलेंगे.

श्रमसंगठनवाद का जन्म फ्रांस में राजनीति प्रेरित समाजवाद के विरोधस्वरूप हुआ था. अल्प समय में ही विश्वभर के समाजवादी दलों ने स्वयं को इसको जोड़ लिया. ‘सिंडीकेलिज्म’ के माध्यम से सभी का एक ही ध्येय था, श्रमिक संघों को संगठन एवं क्रांति के लिए प्रेरित करना और उनकी सहायता से पूंजीवाद को उखाड़ फेंकना. तदनंतर ऐसी समानताधर्मी व्यवस्था का गठन करना जिसमें श्रमिक को उसके द्वारा किए गए कार्य का पूरा पारिश्रमिक प्राप्त हो सके. श्रम के प्रति सम्मान की भावना हो तथा शारीरिकबौद्धिक श्रम के बीच कहीं भी, किसी भी प्रकार का स्तरीकरण जन्म न ले सके. ‘श्रमिकसंघवाद’ की समानधर्मा विचारधारा समाजवाद गणतंत्र का पक्ष लेती थी, वह राज्य को यह अधिकार देती थी कि वह समस्त संसाधनों पर अधिकार कर, लोगों से उनकी क्षमता के अनुरूप काम लेते हुए, उन्हें उनकी आवश्यकता के अनुसार समिधा उपलब्ध कराए. समाजवाद लोकतंत्र और राज्य दोनों का समर्थक था. श्रमिक संघवाद के समर्थकों को लगता था कि राज्य अपने कर्तव्य का पालन करने में असमर्थ रहा है. गणतांत्रिक प्रक्रिया के सहारे सत्ता में आए कथिक सेवाव्रती नेतागण बहुत शीघ्र अपना कर्तव्य भूल जाते हैं. इसलिए श्रमिकसंघवाद राज्य और संसदीय गणतंत्र दोनों का निषेध करता है. इसके स्थान पर वह समस्त सत्ता श्रमिकसंघों को सौंपे जाने का पक्ष लेता है. समाजवाद, अराजकतावाद और समाजवाद की भांति श्रमिकसंघवाद भी मानता है कि श्रमिक वास्तविक उत्पादक हैं, इसलिए उत्पादन का लाभ उनको मिलना ही चाहिए. श्रमिकसंघवाद का विकास समाजवादी ढांचे की असफलता के फलस्वरूप हुआ था. जर्मनी में वामपंथी आंदोलन उनीसवीं शताब्दी में ही जोर पकड़ चुका था. लेकिन इसी शताब्दी के अंत तक समाजवादी नेताओं के बीच तीखे मतभेद जन्म ले चुके थे. 1912 के चुनावों में वहां सोशिलिस्ट पार्टी को एकतिहाई सीटें मिली थीं. समाजवादी धड़ों की इस सफलता में पुनरुत्थानवादी लेखकविचारक आ॓गस्ट बेबल का बड़ा योगदान था. उसकी मृत्यु के उपरांत समाजवादी दलों में फूट पड़ने लगी थी, जिससे ‘जर्मन सोशिलिस्ट’ पार्टी दो हिस्सों में बंट गई. इससे समाजवादी आंदोलन को तात्कालिक रूप से धक्का पहुंचा.

मार्क्स ने अपने जीवन के अंतिम दिन इंग्लेंड में बिताए थे. वहीं रहकर उसने अपने वृहदग्रंथ ‘पूंजी’ का लेखन भी किया था. इसके बावजूद वह इंग्लेंड में मार्क्सवाद का बहुत कम प्रभाव छोड़ पाया था. पूंजीवाद को जोरदार टक्कर देने के लिए वहां सहकारिता आंदोलन पनपा था, जिसने दुनियाभर के परिवर्तनकामियों नेताओं, विचारकों, लेखकों, साहित्यकारों और कार्यकर्ताओं को प्रेरित किया था. 1848 में जब मार्क्स कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो द्वारा श्रमिकों को नए सिरे से एकजुट होने और संगठित विरोध के आवाह्न कर रहा था, इंग्लेंड ‘रोशडेल पायनियर्स’ के नेतृत्व में सहकार की सफल, अहिंसक, परस्पर सहयोगकारी, लोकतांत्रिक डगर पर कदम बढ़ा चुका था. यूरोपीय देशों में चल रहे समाजवादी आंदोलनों से फ्रांस भी अछूता नहीं था. रूसो, चाल्र्स फ्यूरियर, प्रूधों जैसे महान विचारकों जिन्होंने पूंजीवाद विरोध की वैश्विक पृष्ठभूमि तैयार करने का काम किया, वहीं जन्मे थे. श्रममुक्ति एवं श्रमस्वालंबन के लिए चलाए जा रहे आंदोलन के फलस्वरूप फ्रांस में जो समाजवादी आंदोलन जन्मा, उसपर प्रूधों का काफी प्रभाव था. उसको वहां पर ‘क्रांतिकारी श्रमिकसंघवाद’ अथवा ‘श्रमिकसंघवाद’ कहा गया, जो कालांतर में केवल श्रमिकसंघवाद के नाम से पहचाना जाने लगा. नए नाम के बावजूद श्रमिकसंघवाद समाजवाद की प्रारंभिक स्थापनाओं के बेहद करीब था. श्रम, सहयोग, एकता, अखंडता और सीधी कार्रवाही और लोकतांत्रिक संगठन उसके प्रमुख उद्देश्य थे, हालांकि इसमें कुछ सैद्धांतिक कमजोरियां भी थीं. वहीं इसके विकास में अवरोधक बनीं.

अराजकतावाद और समाजवाद यह व्यवस्था करते हैं कि एक बार सत्ताकेंद्रों पर अधिकार जमा लेने के बाद समाजवादी विचारधारा के अनुकूल संस्थाओं का गठन किया जाएगा, जो प्रकारांतर में अर्थिक एवं राजनीतिक गतिविधियों को संभाल लेंगी. उनसे भिन्न श्रमिकसंघवाद श्रमिकसंघों को महत्त्वपूर्ण दायित्व सौंपे जाने का पक्ष लेता है. वह नए श्रमसंगठनों का गठन करने तथा कार्यरत श्रमिकसंघों को अधिक अधिकार दिए जाने का समर्थन करता है. अपने इसी सोच के अनुरूप उसने अपनी सैद्धांतिकी विकसित की थी, जिसके आधार पर फ्रांस में श्रमिकसंघवाद की नींव रखी गई. इसके आशय को समझने के लिए फ्रांस के व्यापारिक संघों, संगठनों की गतिविधियों पर विचार करना प्रासंगिक होगा. फ्रांस में श्रमिकसंघवाद का उदय असल में वहां की आर्थिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों की देन था. अराजकतावादी बकुनिन के समर्थकों का भी उनमें प्रमुख योगदान था. उन्हीं के प्रभावस्वरूप फ्रांस में ‘प्रथम इंटरनेशनल’ को अप्रत्याशित सफलता प्राप्त हुई थी. 1869 में ही ‘प्रथम इंटरनेशनल’ के फ्रांसिसी सदस्यों की संख्या 2,50,000 को पार कर चुकी थी. जाहिर है कि अपनी संगठित शक्ति के बल पर श्रमिक संगठनों का आत्मविश्वास बहुत बढ़ा हुआ था. इसका पहला सुखद परिणाम 1871 की पेरिस क्रांति के रूप में सामने आया. लेकिन बिना किसी पूर्वयोजना के एकाएक सत्ताशिखर पर काबिज हुए श्रमसंगठन लंबे समय तक अपनी स्थिति को बनाए नहीं रह सके; और ‘पेरिस कम्यून’ का वह प्रथम समाजवादी प्रयोग तीन महीने से भी कम समय में विफल हो गया. बहरहाल फ्रांसिसी श्रमिक आंदोलन की उपलब्धियों से इन्कार नहीं किया जा सकता. यह स्थिति तब थी, जब फ्रांसिसी समाजवादी आंदोलन स्वयं कई विचारधाराओं और गुटों में बंटा था तथा फ्रांस और जर्मनी के बीच युद्ध के कारण उसमें 1870—1877 के बीच बड़ा व्यवधान आ चुका था. 1875 के आसपास फ्रांसिसी समाजवादी आंदोलन के दो प्रमुख धड़े थे. एक धड़ा संसदीय लोकतंत्र के समर्थकों का था और दूसरा ‘साम्यवादीअराजकतावादी’ विचारकों का. दूसरा धड़ा राज्य को अपने लक्ष्य की प्राप्ति में सबसे बड़ा दुश्मन मानता था. वे संसदीय लोकतंत्र में चारों से उठ रही सुधारवाद की मांगों की यह कहकर उपेक्षा करते आ रहे थे कि सामाजिक क्रांति के माध्यम से राज्य को सदा के लिए खत्म किया जा सकता है. जब राज्य ही नहीं रहेगा तो संसदीय सुधारों का भी कोई अर्थ ही न रह जाएगा. राज्यसत्ता के विरोधी विचारक दूसरों से संख्याबल में भले ही कम हों, परंतु बौद्धिक प्रखरता में वे अपने प्रतिपक्षियों से कहीं आगे थे. उनमें पू्रधों और बकुनिन प्रमुख थे. उनके विचारों के फलस्वरूप फ्रांस में समाजवादी आंदोलन को भारी सफलता तो मिली थी, लेकिन वह अपने ही अंतर्विरोधों का शिकार होकर रह गया. समाजवादियों का वह धड़ा जो यह मान रहा था कि समाजवादी विचारधारा पर आधारित समाज की स्थापना के पश्चात राज्य नेपथ्य में चला जाएगा, वह स्वयं भारी अंतद्र्वंद्वों का शिकार था. परिणाम यह हुआ कि 1882 में समाजवादी आंदोलनों दो धड़ों में विभाजित हो गया. एक का नेता ज्यूस्ड को बनाया गया. मार्क्स के विचारों का समर्थक ज्यूस्ड अवसरवादी राजनीतिज्ञ पा॓ल बूस का अनुयायी था. मार्क्सवाद को वह वहीं तक अपनाना चाहता था, जहां तक वह उसकी स्वार्थसिद्धि में सहायक हो. 1890 तक आतेआते बूस के साथ उसके जैसे स्वार्थी, कट्टरपंथी और अवसरवादी नेता जुड़ते चले गए. दूसरा वर्ग स्वतंत्र समाजवादियों का था, जिनमें जोर्स, विवायनी, मिलरेंड आदि सम्मिलित थे.

दोनों धड़ों के बीच विवाद लगातार बढ़ते ही जा रहे थे. इससे फ्रांसिसी का परेशान होना स्वाभाविक था. अंततः श्रमसंगठनों ने आपसी सहमति से एक युगांतरकारी निर्णय लिया, जिसके द्वारा श्रमिकहितों को राजनीति से दूर रखने का निर्णय लिया गया. इसके अनुकूल परिणाम कुछ ही समयावधि में सामने आने लगे. आगे चलकर इससे श्रमिक संगठनों को नई ताकत और ऊर्जा हासिल हुई. प्रकारांतर में यही घटना श्रमिकसंघवाद के उद्भव का कारण बनी. बदलती वैश्विक परिस्थितियों ने 1905 में फ्रांसिसी समाजवादी पार्टी के दोनों धड़ों को फिर से एक हो जाने के लिए बाध्य कर दिया. इसका परिणाम ‘यूनाइटेड सोशियलिस्ट पार्टी’ के रूप में सामने आया. उस समय कुछ बुद्धिजीवी ऐसे भी थे जिन्होंने किसी पार्टीविशेष से जुड़ने के बजाय स्वतंत्र रहना पसंद किया था. 1914 में चुनावों में ‘यूनाइटेड सोशियलिस्ट पार्टी’ को 102 सीटें मिली. उनके अलावा 30 समाजवादी निर्दलीय जीतकर आए. दोनों की सम्मिलित संख्या 132, कुल 590 सीटों में बहुमत के अनुसार कम थी, तो भी वह समाजवादी खेमे की अप्रत्याशितअभूतपूर्व विजय थी, जिसने फ्रांस में समाजवादी विचारधारा को पांव जमाने में मदद मिली. समाजवादी होना, फ्रांस की राजनीति में प्रवेश करने के लिए अनिवार्य होता चला गया. लेकिन विडंबना यह रही थी कि समाजवादी झंडे के नीचे चुनाव लड़कर संसद में पहुंचे नेतागण अपने आचरण और व्यवहार में समाजवादी विचारधारा के क्रमशः दूर होते जाते थे. राजनेता ही क्यों पत्रकारों का भी यही हाल था. समाजवादी पत्रिका के संपादक मिर्लेंड का चरित्र तो मानो राजनीतिक अवसरवाद का पक्का उदाहरण था. इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि श्रमिक वर्ग के हितों की राजनीति करने वाले नेताओं का राजनीति से मन उचटता चला गया और वे संगठन की ओर वापस लौटने लगे. इसके फलस्वरूप श्रमिकसंघवाद को नएनए क्षेत्रों में पांव जमाने का अवसर मिला—श्रमिकसंघवाद की दृढ़ मान्यता थी कि श्रमिक वर्ग ही प्रमुख उत्पादक शक्ति है. यह पूंजीवाद की उस अवधारणा का विरोध करता था, जो उसको मात्र उपभोक्ता मानती आई है. उसके नेताओं का जोर कार्य की परिस्थितियों में सुधार के साथ उद्योगों को पुनर्गठित करने पर था—

वह औद्योगिक कार्रवाही को राजनीतिक कार्रवाही के विकल्प के रूप में स्थापित करना तथा विभिन्न व्यापारसंघों एवं श्रमिक संगठनों को ऐसे उद्देश्यों के निमित्त उपयोग करना चाहता था, जिन्हें पारंपरिक समाजवाद संसदीय लोकतंत्र के माध्यम से पूरा करने का सपना देखता रहा है.’

फ्रांस में ‘सिंडीकेलिज्म’ शब्द असल में ट्रेड यूनियनिज्म के पर्याय के रूप में प्रयोग किया जाता है. आगे चलकर फ्रांसिसी श्रमिक संगठनवादी दो भागों में बंटते चले गए. पहला वर्ग सुधारवादियों का था, जो वर्तमान व्यवस्था को ही श्रमिकोन्मुखी एवं उदार बनाना चाहते थे. दूसरा वर्ग क्रांतिधर्मा ‘ट्रेड यूनियनिस्ट’ का था. उनका मानना था कि राज्य की मनमानी के चलते श्रमिक कल्याण के वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त कर पाना असंभव है. इसके लिए श्रमिक संघों को राजनीतिक संस्थाओं के विकल्प के रूप में इस्तेमाल करना होगा. यह दूसरा वर्ग ही आधुनिक ‘सिंडीकेलिज्म’ से संबद्ध माना जा सकता है. फ्रांसिसी श्रमिकसंघवादियों का मूल संगठन 1895 में स्थापित ‘कन्फेडरेशन जनरल आॅफ लेबर’ था, जिसमें आरंभ में 700 से अधिक मजदूर संघ सम्मिलित थे. उनके सदस्यों की संख्या लाखों में थी. इसके बावजूद इस संगठन के महत्त्व को 1902 में ही स्वीकारा जा सका. आरंभ में उसके सदस्यों की संख्या सीमित ही थी—लगभग पांच लाख. परंतु युद्ध की संकटकालीन परिस्थितियों में उसने अपने हजारों समर्थक पैदा कर लिए थे. वाल्डेक रूसो ने 1884 में श्रमिकसंघों को मान्यता देकर ‘श्रमिकसंघवाद’ को नई पहचान दी. उसके बनाए गए कानून में प्रत्येक श्रमिकसंघ की स्वायत्तता को, चाहे वह छोटा हो अथवा बड़ा, उसकी सदस्य संख्या से निरपेक्ष रहते हुए, महत्त्व दिया गया था. प्रत्येक श्रमिकसंघ में राजनीति से दूर रखने का निर्णय लिया गया था. इस निर्णय के पीछे मान्यता थी कि समाजवादी विचारधारा के बीच राजनीति की घुसपैठ संगठन को तोड़ने का काम करेगी. श्रमिकसंघवादियों की मान्यता थी कि कि वर्गसंघर्ष की लड़ाई औद्योगिक प्रविधियों द्वारा लड़ी जानी चाहिए, न कि राजनीतिक प्रविधियों द्वारा. ये औद्योगिक माध्यम क्या हो सकते हैं, इनके लिए उसने औद्योगिक हड़ताल, धरना, प्रदर्शन, पोस्टर और प्रचार को चुना है. उसके अनुसार तोड़फोड़ की कारर्वाही, मशीनरी को नुकसान पहुंचाना असल में श्रमविरोधी कार्रवाही हैं. इससे औद्योगिक संपदा को तो नुकसान पहुंचता ही है, श्रमिक संघों की ऊर्जा का भी दुरुपयोग होने लगता है, जो श्रमिकों में नकारात्मक भावनाएं जगाता है. श्रमिकसंघवाद की सफलता समस्त श्रमिकों, कामगारों, शिल्पकर्मियों को एक बड़े संगठन में ढाल देने तथा उसका अपने वर्गीय हितों के अनुसार उपयोग करने में निहित है. ऐसा संगठन जो नौकरशाही को जन्म देने वाली प्रत्येक व्यवस्था का विरोध करता है, और इस प्रकार वह जनकल्याण एवं विकास से जुड़ी समस्त गतिविधियों पर अपना नियंत्रण रखता है. नौकरशाही और पूंजी के वर्चस्व का निरंतर विरोध करते हुए वह संगठन पूंजीवाद के निर्मूलीकरण की ओर अग्रसर होता है. मानवीय स्वभाव की भिन्नता के आधार पर श्रमिकसंघवादी विचारककार्यकर्ता यह मानते हैं कि आम श्रमिक क्रांतिकारी नहीं हो सकता. आवश्यकता पड़ने पर उसे हड़ताल के लिए प्रेरित अवश्य किया जा सकता है. जिसके माध्यम से क्रांति के लक्ष्य को अपेक्षाकृत आसानी से प्राप्त किया जा सकता है.

श्रममुक्ति के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए श्रमिकसंघवादियों की योजना क्या है? किस प्रकार वे अराजकतावाद और समाजवाद से भिन्न हैं? अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए वे कौनसा मार्ग अपनाते हैं? जैसे कुछ प्रश्नों को जानने की जिज्ञासा यहा स्वतः उत्पन्न हो जाती है. श्रमक्रांति के ये पक्षकार हिंसक क्रांति का समर्थन नहीं करते अपनी लक्ष्यसिद्धि के लिए श्रमिकसंघवादी अभी तक हड़ताल का सहारा लेते आए हैं. कहा जा सकता है कि यही उनका सबसे ताकतवर हड़ताल है. विशेष उद्देश्य के लिए विशिष्ट हड़ताल, जिसको वे पूर्वाभ्यास कहते हैं. यह पूर्वाभ्यास एकजुट होकर संगठन में उत्साह भरने तथा उसके सदस्यों को अपने अधिकारों के प्रति सचेत करने के लिए आवश्यक होता है. संघर्ष में सफलता की स्थिति से भी वे संतुष्ट नहीं होते. श्रमिकसंघवादी मानते हैं कि हड़ताल अथवा पूर्वाभ्यास द्वारा उनका लक्ष्य सिर्फ तात्कालिक मांगें पूरे किए जाने तक सीमित नहीं है. न ही वे मालिकमजदूरों के संबंध में सुधार को अपना लक्ष्य मानते हैं. उनका वास्तविक उद्देश्य पूर्वाभ्यास अथवा हड़ताल के माध्यम से उद्योगों से स्वामित्व की परंपरा को पूरी तरह समाप्त कर, संपूर्ण श्रममुक्ति होता है. उनका लक्ष्य होता है कि हड़ताल द्वारा उत्पादन को पूरी तरह ठप्प कर, पूंजीवाद की रीढ़ तोड़ दी जाए. तदनंतर उद्योगतंत्र पर अपना अधिकार कर, उसका संचालन श्रमकल्याण के मानकों के अनुरूप किया जाए. जहां उत्पादनकर्म लाभ के लिए न होकर सदस्यगणों की आवश्यकता के अनुसार हो. उत्पादनवितरण दौरान किसी भी प्रकार के आर्थिक विषमता घटना को न पनपने दिया जाए, बल्कि जिन क्षेत्रों में पहले से ही आर्थिक असमानता व्याप्त है, वहां उसकी खाई को पाटने के समुचित प्रयत्न किए जाएं.

श्रमिकसंघवाद के व्याख्याकार जार्ज सोरेल(2 नवंबर, 1847—29 अगस्त 1922) उसको ऐसे मिथक के रूप में जनमानस में स्थापित करना चाहता था, जो समाजवाद की स्थापना के लिए अपरिहार्य है. यह मानते हुए कि जनसाधारण की धर्म के प्रति गहरी अभिरुचि होती है, उसने आमहड़ताल को एक ऐसी पौराणिक कथा के रूप में समझने की सलाह दी थी, जिसमें भरपूर आशावाद और मानवकल्याण की संभावना निहित होती है. सोरेल के तर्क को सीधी कार्रवाही में विश्वास रखने वाले श्रमिकसंघवादियों ने पूरी तरह नकार दिया था. उनका कहना था कि यदि आमहड़ताल को मात्र गल्पकथा अथवा मिथक मान लिया तो हड़ताल में जुटे आंदोलनकारियों की संपूर्ण ऊर्जा ही निरर्थक चली जाएगी. लोग उसका व्यर्थ महिमामंडन करेंगे. हो सकता है भावुक प्रवृत्ति के लोग उन मिथकों की अतिश्योक्तिपूर्ण व्याख्या करते उन्हें अपनी स्मृति का स्थायी हिस्सा बनाने का प्रयास करें, लेकिन मिथकीकरण की कृत्रिमता में श्रमसंघवादी आंदोलन अंततः निस्तेजनिष्प्रभ ही होगा. श्रमिकसंघवाद की आलोचना कर रहे कुछ समाजवादी विचारकों का मानना था कि पूंजीवाद के विरुद्ध लड़ाई संसदीय बहुमत प्राप्त करके ही जीती जा सकती है. इसके लिए श्रमिकों में लोकतांत्रिक चेतना का उदय आवश्यक है, ताकि वे राजनीति में अपने प्रतिनिधि उतार सकें अथवा चुनाव मैदान में पहले से मौजूद प्रतिनिधियों में से अपने वर्गीय हितों के समर्थक प्रतिनिधियों का चयन कर सकें. वे हड़ताल द्वारा सरकार पर दबाव बनाए जाने की श्रमिकसंघवादियों की रणनीति का विरोध करते थे. दूसरी ओर अधिकांश श्रमिकसंघवादियों के लिए नेताओं की कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी ही संद्धिग्ध थी. वे ऐसे किसी भी सुधार का विरोध करते थे, जिसमें राज्य और राजनीतिज्ञों की भागीदारी हो. और इस प्रकार वे प्रकारांतर में अराजकतावाद का समर्थन करते थे. हालांकि वे अपने लक्ष्यों में उतने स्पष्ट नहीं थे, जितने कि प्रविधियों में. श्रमिकसंघवाद के समर्थन के लिए भविष्य का स्पष्ट खाका भी उनके पास नहीं था. कहा जा सकता है कि श्रमिकसंघवाद अधूरा दर्शन था, जिसके बारे में श्रमिकसंघवादी विचारक ही अस्पष्ट थे.

श्रमिकसंघवादियों की राय में राज्य पूंजीवादी संस्था है, उसका गठन ही पूंजीवादी शोषण के निमित्त पूंजीवाद की पहल पर, उसकी शर्तों के अनुसार किया जाता है. राज्य की अधिसत्ता के चलते श्रमिकवर्ग आतंक के वातावरण में जीने को विवश होता है. अपनी अधिसत्ता के साथ यदि कोई राज्य श्रमकल्याण का दावा भी करे तो वह निरर्थक और झूठा ही होगा—इस कारण वे राज्यप्रेरित समाजवाद का भी विरोध करते हैं. इसका विकल्प क्या हो? श्रमिकसंघवादी उद्योगों की स्वायत्तता चाहते हैं. उद्योग पर उनका नियंत्रण हो जो स्वयं काम करते हैं—श्रमिकसंघवाद का दर्शन इसी अवधारणा पर टिका हुआ है. लेकिन समाज केवल उत्पादन व्यवस्था पर ही तो निर्भर नहीं. व्यक्ति और समाज के अनगिनत संबंधों की शृंखला तथा उनके बीच जटिल अंतक्र्रियाओं का नियंत्रण भी राज्य को करना पड़ता है. यहां तक कि विभिन्न औद्योगिक संस्थानों के व्यापारिक संबंधों के निर्वहन के लिए भी अलग व्यवस्था की आवश्यकता पड़ती है. नए समाज में इन संबंधों, अंतक्रियाओं का नियंत्रण किस प्रकार संभव होगा? इस बारे में श्रमिकसंघवाद मौन रह जाता है. दुनिया के मजदूर एक हैं, उनकी समस्याएं एक हैं. सभी समस्याएं राज्य और पूंजीवाद की देन हैं. जब न राज्य होगा, न पूंजीवाद तब सेना, न्यायपालिका तथा पुलिसबल की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी. श्रमिकसंघवादी इन सब संस्थाओं को साम्राज्यवाद का प्रतीक मानते हुए उनका विरोध करते हैं. उनके द्वारा पुलिस, न्यायपालिका एवं सैन्यबलों का विरोध इसलिए भी स्वाभाविक था, क्योंकि हड़ताल के दौरान सेना एवं पुलिस राज्य और पूंजीपतियों के हितों की रक्षा का काम करते हैं. चूंकि वे निरंकुशतावादी शासन की उपज होते हैं, अतएव वे तानाशाही को बनाए रखने में मददगार होते हैं. श्रमिकसंघवादी विचारकों के लिए राजनीतिक सीमाएं कोई मायने नहीं रखतीं. उनके अनुसार राज्य द्वारा सेनाओं के ऊपर अंधाधुंध खर्च करना भी औचित्यविहीन है. दूसरी ओर आम हड़ताल तथा प्रकारांतर में विरोधी शक्तियों से सतत संघर्ष, श्रमिक हितों के लिए अनिवार्य हैं. श्रमिकसंघवादी यद्यपि शांतिकामी नहीं हैं, तथापि वे दो विरोधी राज्यों के बीच युद्ध का इस आधार पर विरोध करते हैं, क्योंकि उसके द्वारा श्रमिक को कोई लाभ नहीं पहुंचता. उल्टे युद्ध की स्वाभाविक परिणति के रूप में जन्मीं बेरोजगारी, महंगाई, महामारी जैसी समस्याएं आम जनता के क्लेश का कारण बन जाती हैं. युद्ध के बाद पूंजीवाद और अधिक ताकतवर होकर सामने आता है. इससे समाज में आर्थिक असमानता बढ़ती है. श्रमिकसंघवाद के दर्शन को बीसवीं शताब्दी के महानतम दार्शनिकों में से एक बर्ट्रेंड रसेल ने ‘सिंडीकेलिस्ट रेलवेमैन’ में प्रकाशित एक लेखांश के माध्यम से प्रस्तुत किया है—

श्रमिकसंघवाद, सामूहिकतावाद तथा अराजकतावाद का प्रारंभिक उद्देश्य समाज में व्याप्त आर्थिक असमानता, तज्जनित ऊंचनीच की भावना तथा अन्यान्य वस्तुओं पर निजी अधिकारिता को पूरी तरह समाप्त करना है. लेकिन जहां सामूहिकतावाद निजी अधिकारिता को सर्वाधिकारिता में, अराजकतावाद उसको ‘प्रत्येक की अनाधिकारिता’ में बदलने का लक्ष्य रखता है, वहीं श्रमिकसंघवाद का लक्ष्य संगठित श्रमशक्ति को पूर्ण स्वामित्व दिए जाने से है. तदनुसार यह विशुद्ध रूप से सामाजिक अर्थसंहिता और समाजवाद द्वारा प्रस्तावित वर्गसंघर्ष की श्रमसंगठनवादी व्याख्या है. अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए यह संसदीय कार्रवाही का पूरी तरह बहिष्कार करता है, जिसपर सामूहिकतावाद(सहकार) का समूचा दर्शन आधारित है तथा अराजकतावाद जिसके अत्यधिक निकट है, हालांकि अराजकतावाद की अपेक्षा इसकी कार्रवाही का क्षेत्र बहुत कुछ सीमित भी है.’

प्रसिद्ध ‘टाइम’ पत्रिका के 25 अगस्त 1911 को प्रकाशित इस आलेख से न केवल श्रमिकसंघवाद को समझता जा सकता है, बल्कि उसका अपनी समानधर्मा विचारधाराओं यथा अराजकतावाद तथा सामूहिकतावाद से अंतर भी इस उद्धरण द्वारा स्पष्ट हो जाता है. यद्धपि यह अंतर इतना सूक्ष्म है, खासकर सामूहिकतावाद और श्रमिकसंघवाद में कि उनके बीच स्पष्ट विभाजनरेखा खींच पाना कठिन है. उल्लेखनीय है कि फ्रांस में जहां पर श्रमिकसंघवाद का दर्शन विकसित हुआ, वहां श्रमिक संगठन बहुत शक्तिशाली थे. निरंकुश राजशाही के आतंक तले पनपे उन संगठनों में संघर्ष की पर्याप्त जिजीविषा थी. वे पूंजीवाद और राज्यसत्ता दोनों का उन्मूलन करना चाहते थे. उनके आंदोलन को ही ‘सिंडीकेलिज्म’ कहा गया. वह समाजवाद नहीं था, सच में तो वह समाजवाद का धुर विरोधी दर्शन था. दोनों का प्रथम मतवैभिन्न्य राज्य की अनिवार्यता को लेकर था. समाजवाद का सपना ऐसा निष्पक्ष राज्य था जो अपने नागरिकों के बीच कल्याण के समान बंटवारे की भूमिका निभाए. जबकि श्रमिकसंघवादी विचारक राज्य के पूर्ण उन्मूलन के पक्ष में थे. पूंजीवाद के उन्मूलन हेतु उनके पास एक ही हथियार था. वह हथियार था, हड़ताल! वे चाहते थे व्यापक जनहड़ताल द्वारा पूंजीपतियों को घुटने टेकने को विवश कर देना. इसमें उन्हें प्रारंभिक सफलताएं भी मिली थीं. विकास के आरंभिक दौर की कई बड़ी हड़तालें श्रमसंघवादियों के आंदोलन के नाम इतिहास में दर्ज हैं. उनमें अक्टूबर 1910 की इंग्लेंड की प्रसिद्ध रेलवे हड़ताल भी सम्मिलित है. वर्षों तक चलने वाली इस हड़ताल ने इंग्लेंड का जनजीवन ठप्प कर दिया था. स्पष्ट है कि श्रमिकसंघवाद ने समयसमय पर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया है और कालांतर में यदि पूंजीवाद ने श्रमिक हितों के प्रति यत्किंचित उदारवादी रवैया अपनाया तो उसके पीछे श्रमिकसंघवादियों के आंदोलन का योगदान था. यहां एक स्वाभाविकसा प्रश्न सामने आता है कि समाजवाद के इन तीनों अपररूपों के पारस्परिक संबंध कैसे हैं? जहां तक अराजकतावाद का प्रश्न है, वह श्रमसंघवादियों से सहानुभूति रखता है, बशर्ते उनके द्वारा बुलाई गई हड़ताल को हिंसक क्रांति का विकल्प न मान लिया जाए. उल्लेखनीय है कि अराजकतावाद भी श्रमिकसंघवादियों की भांति राज्यसत्ता का पूर्ण उन्मूलन चाहता है. मगर उसका रास्ता हिंसक क्रांति से होकर गुजरता है. इससे अलग श्रमिकसंघवादी हड़ताल जैसी सामान्य प्रविधियों से काम निकालना चाहते हैं. इसके बावजूद अराजकतावादियों के लिए श्रमिकसंघवाद अपने तात्कालिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सर्वोचित माध्यम है. रुडोल्फ रा॓कर ने श्रमिकसंघवाद की कार्यपद्धति की ओर संकेत किया है कि श्रमिकों यानी—

वास्तविक उत्पादकों द्वारा समस्त उद्यमों का प्रबंधनदायित्व कुछ इस प्रकार संभाल लेने के पश्चात कि विभिन्न समूह, कारखाने, उद्योगशाखाएं समाज की वृहद आर्थिक संरचना के स्वतंत्र सदस्य की गरिमा को प्राप्त कर आवश्यक वस्तुओं का सुव्यवस्थित उत्पादनवितरण करने लगें….उनमें आर्थिक उत्पीड़न की अनगिनत बेड़ियों में जकड़े श्रमिक को मुक्त कराने का संकल्प निहित होना चाहिए.’

श्रमिकसंघवाद के अराजकतावादीसाम्यवादी नजरिये को समझने के लिए हमें इतिहास की गोद में जाना पड़ेगा. करीब डेढ़ सौ वर्ष पहले यानी 1860 के आसपास समाजवादी आंदोलन अपनी रूपरेखा गढ़ ही रहा था. उस समय ‘अंतरराष्ट्रीय वर्किंग मैन ऐसोशिएसन जिसको ‘प्रथम इंटरनेशनल’ के नाम से भी जाना जाता है, क्रांतिधर्मी श्रमिकों का बड़ा संगठन बनता जा रहा था. उनका आंदोलन जैसेजैसे आगे बढ़ रहा था, समाजवादी मार्क्स तथा अराजकतावादी मिखाइल बकुनिन के समर्थकों के बीच तनाव बढ़ रहा था. उस समय तक एक बुद्धिजीवी के रूप में मार्क्स की धाक थी. उसने बकुनिन तथा उसके समर्थकों को ‘प्रथम इंटरनेशनल’ से बाहर जाने पर विवश कर दिया. इसका श्रमिक आंदोलन पर दूरगामी प्रभाव पड़ा. 1871 में पेरिस में कामगारों ने विद्रोह कर, राजसत्ता को बेदम कर दिया और सत्ता की बागडोर अपने हाथों में ले ली. बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में, श्रमिकसंघवादियों को उल्लेखनीय सफलता मिली. श्रमसंघवादियों के पहले अंतरराष्ट्रीय संगठन का गठन 1922 में बर्लिन में किया गया, जिसमें अर्जेंटीना, चिली, डेनमार्क, बलगारिया, मैकिस्को, जर्मनी, पुर्तगाल, स्पेन, फ्रांस, नीदरलेंड आदि देशों के श्रमिकसंगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था. उन्हें लग रहा था कि राज्यसत्ता के विरोध में उपजा साम्यवाद अंततः सत्ताधारी जैसा ही आचरण कर रहा है. श्रमसंघवादियों के खाते में उससे पहले भी कई उपलब्धियां दर्ज हो चुकी थीं. उनमें सबसे बड़ी उपलब्धि थी, ब्रिटेन की 1910 से 1914 के बीच चली हड़ताल, जिसको इतिहास में ‘महान अशांति’ के नाम से जाना जाता है. इस हड़ताल के महानायक टा॓म मान तथा उसके श्रमिकसंघवादी सहयोगी थे. आमहड़ताल की शुरुआत ब्रिटेन की सोशलिस्ट पार्टी के आवाह्न पर हुई थी. सोशिलिस्ट लेबर पार्टी की सदस्य संख्या कम ही थी, लेकिन उसके नेताओं का श्रमिकों पर गहरा प्रभाव था. इसलिए पूंजीवादी शोषण के विरुद्ध एक वर्ग आगे आया तो बाद में एक के बाद एक, नए मोर्चे खुलते चले गए. ‘महान अशांति’ के नाम से विख्यात वह हड़ताल ब्रिटेन की सबसे बड़ी हड़ताल थी, जिसमें छोटीबड़ी 872 हड़तालें शामिल थीं. उस हड़ताल को स्कूल, खनन, यातायात, इंजीनियरिंग, कपड़ा उद्योग आदि उत्पादकता के लगभग सभी क्षेत्रों के श्रमिकों का समर्थन प्राप्त था. वह हड़ताल श्रमिकों में यह भावना पैदा करने में सफल रही कि अपने संगठन के बल पर वे पूंजीवाद को घुटने टेकने के लिए विवश कर सकते हैं. श्रमिक संघवाद का उदय उसी आत्मविश्वास की परिणति बना. बीसवीं शताब्दी के चौथे दशक तक श्रमिकसंघवादी पूरे यूरोप में सक्रिय रहे, लेकिन उसके बाद बदली हुई वैश्विक परिस्थितियों में यह आंदोलन ठंडा पड़ता गया. अपनी उद्देश्यपरकता के बल पर यह आंदोलन दुनियाभर के श्रमिक संगठनों, समाजवादी विचारकों, दार्शनिकों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कराने में सफल रहा था. हालांकि अपनी सीमाओं के चलते यह समाज में अपना समुचित स्थान नहीं बना पाया. इसका कारण संभवतः यह था कि श्रमिकसंघवाद आर्थिक उत्पादनकेंद्रों को अतिरिक्तरूप से महत्त्व देता है. यह मान लेता है कि अर्थव्यवस्था के òोतों तथा आर्थिक उत्पादन केंद्रों पर अधिपत्य कर लेने के उपरांत श्रमिकों की सभी समस्याएं समाप्त हो जाएंगी. इस सीमित दृष्टि को आधार बनाकर अनेक बुद्धिजीवियों ने इसकी आलोचना भी की है. रोजा लेक्समबर्ग ने श्रमिकसंघवादियों पर मार्क्सवाद की मूल अवधारणा से दूर जाने का भी आरोप लगाया था. उसके अनुसार—

आधुनिक सर्वहारा वर्ग का संघर्ष किसी पूर्वनिर्धारित सिद्धांत अथवा परिकल्पना के आधार पर जैसा कुछ पुस्तकों अथवा विचारधाराओं के आधार पर तय किया गया है, आगे नहीं बढ़ाएगा. श्रमिकों का आधुनिक संघर्ष इतिहास और सामाजिक प्रगति का सहज हिस्सा है और इतिहास के बीच में, प्रगतिधारा के बीच में, संघर्ष के बीच में हम लगातार यह सीखते रहे हैं कि हमें अपने संघर्ष को किस प्रकार आगे बढ़ाना चाहिए.’

स्वयं श्रमिकसंघवाद में भी, उसके एक शताब्दी के इतिहास में अनेक परिवर्तन हुए हैं. व्यावसायिक संगठनवादी आंदोलन के विकल्प के रूप में जन्मा श्रमिकसंघवाद अपने लक्ष्य को पाने के लिए केवल हड़ताल और श्रमिक आंदोलन को पर्याप्त मानता था. वह श्रमिकों को अपने आर्थिक हितों के लिए संगठित संघर्ष की प्रेरणा देता था. बहुत जल्दी श्रमिक संघवादियों को लगने लगा था कि सिर्फ सैद्धांतिक व्यवस्था कर देने मात्र से समस्या का समाधान संभव नहीं है. पूंजीपति आसानी से उस हड़ताल को तोड़ सकते हैं. अपनी पूंजी के दम पर वे राज्य को श्रमिकविरोधी कदम उठाने के लिए बाध्य कर सकते हैं. अतः लक्ष्यप्राप्ति के लिए कुछ ठोस प्रयास आवश्यक हैं. श्रमिकसंघवादियों का एक समूह मानता था कि उत्पादनतंत्र पर कब्जा करने के लिए बलप्रयोग आवश्यक है. उन्हीं की प्रेरणा से अराजकश्रमिकसंघवाद की अवधारणा का विकास हुआ. अराजकतावादी श्रमिकसंघवाद पद का आशय ऐसे श्रमिक आंदोलन से है, जो येनकेनप्रकारेण, यहां तक कि हिंसा के प्रयोग द्वारा भी, पूंजीवाद को समाप्त करने के लिए कटिबद्ध हो. इसके समर्थकों का मानना है कि लघु शैक्षिक समूहों से लेकर बड़े औद्योगिक क्रांतिधर्मी संगठनों तक, स्वाधीनतावादी जनसमूहों को अपने लक्ष्य के मद्देनजर निरंतर संघर्षरत रह उस समय तक आगे बढ़ते रहना चाहिए, जब तक कि समस्त उत्पादन केंद्रों पर उसका अधिकार न हो जाए. मगर पूंजीवाद के विरुद्ध लंबी लड़ाई बिना जनसमर्थन के लिए असंभव है. उसके लिए संगठन का लोकतांत्रिक होना अनिवार्य है. उसके अभाव में संघर्ष के अपने लक्ष्य से भटकने तथा तानाशाही में ढल जाने का खतरा बना रहता है, यह स्थिति पहले से भी खतरनाक हो सकती है. इससे बचाव हेतु सभी प्रमुख निर्णय कार्यालयीन सभाओं में न लेकर बड़ी सर्वसदस्यीय बैठक के बीच लिए जाने चाहिए. परंपरागत श्रमिक संघवाद यह नहीं बताता था कि उत्पादन केंद्रों पर अधिकार करने का मार्ग कौनसा होगा. लेकिन अराजकतावादी श्रमिकसंघवाद में उत्पादन केंद्रों पर कब्जा करने के लिए हिंसात्मक क्रांति का सहारा लेने की छूट दी जाती है. इसके समर्थक ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ से प्रेरित हैं, जिसके बारे में स्वयं मार्क्स भी आशंकित था. विश्वभर में आजकल अराजकतावादीश्रमिकसंघवाद का ही अधिक प्रचलन है. स्पेन, आट्रेलिया, फ्रांस, इंग्लेंड, डेनमार्क, नीदरलेंड आदि देशों के श्रमिक आज भी भारी संख्या में श्रमिकसंघवादी संगठनों से जुड़े हुए हैं. सभी स्थानों पर उसकी स्थिति पूंजीवाद के सशक्त विपक्ष की है.

©ओमप्रकाश कश्यप

प्लेटो का समाजार्थिक दर्शन : न्याय की अवधारणा

सामान्य

रिपब्लिक’ में प्लेटो ने अपने राजनीतिक दर्शन के मूलभूत तत्वों की रूपरेखा प्रस्तुत की थी. गंभीर चिंतन के उपरांत वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि समाज के गठन का उद्देश्य अयाचित और किसी कल्याणभाव से प्रेरित नहीं है. यह सीधेसीधे व्यक्ति के स्वार्थ से जुड़ा है. चूंकि अकेले मनुष्य के लिए जीवन की अनेक दुश्वारियां थीं, इसलिए उसने समूह में रहना सीखा. समूह को स्थायित्व प्रदान करने, उसमें शांतिव्यवस्था बनाए रखने, विकास और सुखानंद के लिए उसने कुछ नियमों का विन्यास किया. कालांतर में ये नियम सभ्यता का प्रतीक बनकर जटिल सामाजिक संबंधों में ढलते चले गए. आज से करीब पांच हजार वर्ष पहले मनुष्य व्यापार में तरक्की कर चुका था. उसने नौकाओं और भारी जलयानों की सहायता से लंबी समुद्री यात्रएं करना सीख लिया था. दुर्गम स्थानों की यात्रा के लिए वह पशुओं की मदद लेता था. रास्ते में हिंस्र पशुओं और दस्युओं का खतरा था. उनसे निपटने के लिए उसने भाड़े के सैनिक रखने आरंभ किए.

सैन्यबल और धनसंपदा दोनों ही ताकत का प्रतीक थीं, व्यक्ति के पास जब इनका प्राचुर्य हुआ तो उसकी महत्त्वाकांक्षाएं अंगड़ाई लेने लगीं. प्रारंभ में जिन स्थानों से उसको वाणिज्यिक लाभ पहुंचता था, उन स्थानों पर सीधे अथवा अपने सहयोगियों की सहायता से अपने उपनिवेश कायम करने लगा. प्रारंभ में जो राज्य बने उनका क्षेत्रफल बहुत कम, नगरविशेष की सीमा तक होता था. निश्चितरूप से तत्कालीन नगरराज्य की स्थापना एक स्वतंत्र एवं आत्मनिर्भर आर्थिकराजनीतिक इकाई के रूप में की गई होगी. शीघ्र ही मनुष्य को लगने लगा था कि विकास की निरंतरता के लिए संबंधों का विस्तार अत्यावश्यक है. ऐसी कार्यकारी संस्थाओं की आवश्यकता है जिनके द्वारा संबंधों को मर्यादित और नियंत्रित किया जा सके. इससे नए राजनीतिक दर्शन की आवश्यकता महसूस की जाने लगी.

आदिम मानवीय जिज्ञासा केवल जीवन और प्रकृति के रहस्यों के अन्वेषण तक सीमित थी, जिसके कारण दर्शनों का विस्तार हुआ. बहुत शीघ्र मनुष्य को लगने लगा कि केवल पराभौतिक सत्ता की खोज से काम चलने वाला नहीं है. जीवन को अधिक सुविधासंपन्न बनाने तथा प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए प्रकृति को समझना भी अनिवार्य है. इसलिए बुद्धिजीवियों का ध्यान इहलौकिक सत्यों के अन्वेषण की ओर गया, जिससे ज्ञानविज्ञान की खोज के नए रास्तों का विकास हुआ. ईसा से 426 वर्ष पहले जन्मे यूनानी दार्शनिक वैज्ञानिक डेमोक्रिटिस ने लोकभ्रांतियों का खंडन करते हुए घोषणा की कि चंद्रमा पर दिखने वाली छाया वस्तुतः उसकी सतह पर बने ऊबड़खाबड पठार हैं. उसने नीहारिकाओं का रहस्योद्घाटन करते हुए बताया कि रात में आसमान में नजर आने वाली दूधिया नदी, वास्तव में तारों का प्रकाश है, जो अरबों की संख्या में विराट अंतरिक्ष में फैले हुए हैं.

हालांकि लोकमानस सूर्य, चंद्र आदि ग्रहनक्षत्रों की भावनात्मक कहानियां आगे भी गढ़ता रहा, तो भी डेमोक्रिटिस के लेखन से आने वाले विचारकों को एक नई दिशा मिली. लोगों को लगा कि विश्वसमाज और उसकी उत्पत्ति की तह में जाने का एक तरीका यह भी हो सकता है, जो दूसरे की अपेक्षा कहीं अधिक वस्तुनिष्ठ और तर्कसम्मत है. इससे आगे चलकर विज्ञान के विकास को नई दिशा मिली. देखा जाए तो वह समय दुनिया की सभी बड़ी सभ्यताओं भारत, यूनान, मिश्र, चीन में वैचारिक क्रांति के उद्घोष का था, जिसमें महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, सुकरात, कन्फ्यूशियस, अजित केशकंबलि आदि का प्रादुर्भाव हुआ, जिन्होंने अपने मौलिक चिंतन से प्रचलित धर्मदर्शन की जड़ता और उसके पोंगापंथी सोच पर तीखा प्रहार किया. लगभग यही वह दौर था जब व्यवस्थित राजनीतिक दर्शन पर विचार किया गया, जो धार्मिक आग्रहों से पूरी तरह स्वतंत्र था.

यह नया चिंतन विज्ञानवादी सोच के साथसाथ उभर रहा था. राज्य की उत्तरोत्तर बढ़ती महत्ता को पहचानकर डेमोक्रिटिस ने ही सपना देखा था कि कोई तो होगा जो राज्य के मामलों को दूसरे सभी मामलों पर तजरीह देगा. कुछ इस तरह कि सबकुछ संतुलितसा लगे. जो न तो वास्तविकता से बहुत परे, विवादपूर्ण हो, न ही किसी सार्वजनिक शुभ से इतर विषयों पर जोर देता हो. उसकी निगाह में राज्य का प्रबंधन किसी भी अन्य कार्य से अधिक महत्त्वपूर्ण और श्लाघनीय कर्म था. उसके अनुसार ऐसे राज्य के लिए जिसको सही ढंग से व्यवहृत किया जा रहा है

विकास का सर्वोत्तम रास्ता है कि सबकुछ इसी(राज्य)पर निर्भर हो. यदि राज्य की सुरक्षा हुई तो बाकी सब सुरक्षित रहेगा; और यदि राज्य को नष्ट किया गया तो शेष सभी नष्ट हो जाएगा.’

डेमोक्रिटिस का यही सोच आगे चलकर प्लेटो, अरस्तु आदि के राजनीतिक चिंतन की प्रेरणा बना. पश्चिमी समाज में सुकरात की स्थिति एक धार्मिक आचार्य के तुल्य है. उसने हालांकि स्वयं कुछ नहीं लिखा था, लेकिन एक मसीहा की भांति उसका गहरा प्रभाव पूरे यूरोपीय चिंतन पर बना हुआ है. सुकरात के बारे में दुनिया जो भी जानती है, वह प्लेटो सहित सुकरात के अन्य शिष्यों, समकालीनों के माध्यम से ही. तो भी यह सुकरात के सोच का अनूठापन ही था कि उसको प्लेटो जैसे विचारकों ने अपना गुरु माना. धर्मदर्शन के क्षेत्र में जिस आदर्शवाद का पक्ष सुकरात लेता था, प्लेटो ने उसी के माध्यम से अपने राजनीतिक दर्शन की परिकल्पना की. यही कारण है कि प्लेटो का राजनीतिक दर्शन धार्मिक टच लिए हुए है. सुकरात का उल्लेख उसने तेजस्वी विद्वान व्यक्ति के रूप में किया है, जो ‘शुभ’ को पहचानने तथा उसका अनुसरण करने की आवश्यकता पर जोर देता है. वह ईश्वर की परंपरागत अवधारणा से भिन्न, यद्यपि उसकी कुछ समानताएं लिए हुए है. प्लेटो एथेंस की राजनीतिक उथलपुथल का साक्षी रहा था.

सुकरात से करीब 40 वर्ष छोटे प्लेटो ने एथेंस और स्पार्टा के बीच तीस वर्ष तक चलने वाले युद्ध को अपनी आंखों से देखा था. वह 429 ईस्वी पूर्व की एथेंस की प्लेग का भी साक्षी रहा था, जिसमें उसके महान योद्धा और राजनीतिज्ञ पेरीक्लीस समेत अनेक बहादुर सैनिकों को जान गंवानी पड़ी थी. 401 ईस्वी पूर्व में एथेंस की हार के बाद वहां के सम्राट को अपदस्थ कर विजयी स्पार्टा ने वहां तीस सदस्यीय संसद की स्थापना की थी. उसके बाद कुछ समय तक सबकुछ ठीकठाक चलता रहा, मगर उसके बाद एथेंस में भ्रष्टाचार और तानाशाही का बोलबाला हो गया. इस तरह प्लेटो ने राजशाही और कुलीनतंत्र दोनों का अनुभव था. गणतंत्र के नाम पर गठित परिषद के सदस्य निजी अहं के शिकार होकर मनमानी करने लगे. परिषद कुलीनतंत्र की हठधर्मी का माध्यम बन चुकी है.

इन दोनों राजनीतिक प्रणालियों से निराश प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ में दार्शनिक सम्राट की अनिवार्यता पर जोर दिया था. वह स्वयं एक अभिजात परिवार से था, एथेंस के सम्राट से उसका संबंध था, इस कारण वह स्वयं को एथेंस की राजनीति का उत्तराधिकारी भी मानता था. उसको सक्रिय राजनीति में योगदान देने का अवसर तो कभी न मिल सका, तो भी राजनीति उसके दिलोदिमाग पर सदैव हावी रही. ‘रिपब्लिक’ में जिस आदर्शलोक का सपना वह देखता है और उसके लिए जिस राजनीतिक दर्शन की परिकल्पना करता है, वह सक्रिय राजनीति में हिस्सा न ले पाने से उत्पन्न कुंठा की उपज था.

प्लेटो को लगता था कि राजनीतिक पदों पर जिम्मेदारी का निर्वहन चुनौतीभरा काम होता है. महत्त्वपूर्ण कर्तव्यों के निष्पादन के लिए उपयुक्त व्यक्ति पर्याप्त संख्या में सर्वदा उपलब्ध हों, यह संभव भी नहीं होता. इसलिए किसी भी राज्य के सामने, जो नागरिक हितों को सर्वोपरि समझता है, बड़ी समस्या ईमानदार, दूरदृष्टा, साहसी और नीतिवान राजनीतिज्ञों के चयन की होती है. प्लेटो को विश्वास था कि शिक्षा के माध्यम से अच्छे राजनीतिज्ञ तैयार किए जा सकते हैं. उसने द्वारा ‘अकादमी’ की स्थापना इसी उद्देश्य के निमित्त की गई थी. पलभर के लिए एकदम हाल के युग में लौटकर याद करने की कोशिश करें. कुशलनीतिवान राजनीतिज्ञों की उपलब्धता की समस्या को लेकर ब्रिटिश की तत्कालीन प्रधानमंत्री मारर्गेट थैचर ने भी अपने एक बयान में कहा था कि उन्हें राजकर्म के कुशल संपादन के लिए केवल छह व्यक्तियों की आवश्यकता है, जो निपुण एवं नीतिवान हों. पर ऐसे लोग इतनी संख्या में कभी एक साथ नहीं मिल पाते.

यही समस्या प्लेटो के सामने भी थी. इसलिए उसने शिक्षा के माध्यम से भावी राजनीतिज्ञों की पीढ़ी तैयार करने पर जोर दिया था. ‘रिपब्लिक’ की रचना में प्लेटो के गुरु सुकरात के अलावा उसके और भी कई समकालीन एवं पूर्ववर्त्ती दार्शनिकों का योगदान था. उनमें पाइथागोरेस के अनुयायी, पेरामेनीडिस, डेमोक्रिटिस, हेराक्लाटस आदि प्रमुख थे. इनमें से प्लेटो पर सर्वाधिक प्रभाव, ईसा से पांच शताब्दी पहले जन्मे यूनानी दार्शनिक पेरामेनीडिस का पड़ा था. उसका मानना था कि ‘सत्य को अनतिंम तथा अपरिवर्तनीय होना चाहिए.’

पेरामेनीडिस शब्दों की ताकत पर भरोसा करता था. उसका विचार था कि यदि भाषा में अभिव्यक्तिसामथ्र्य है तो उसके द्वारा हम जिस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं, यानी लगातार विमर्श के माध्यम से जो ज्ञान में प्राप्त होता है, वह भी सच होना चाहिए. पेरामेनीडिस के दर्शन का स्रोत ‘दि नेचर’ शीर्षक से लिखी गई एक कविता है. कहा जाता है कि उस कविता में लगभग 3000 पद थे. उनमें से अधिकांश पद अब गायब हो चुके हैं. मूल भी कविता अनुपलब्ध है. उसका सिर्फ संदर्भ प्राप्त होता है. अपनी कविता में पेरामनीडिस ने कहा था कि आप उस वस्तु के बारे में नहीं जान सकते जिसका कोई अस्तित्व ही न हो. इसका अभिप्राय है कि मनुष्य का ज्ञान केवल अस्तित्वमान प्रत्ययों की व्याख्याविश्लेषण तक संभव है. इस आधार पर पेरामेनीडिस को पहला तत्वविज्ञानी भी कहा जा सकता है, जो कालांतर में भौतिकवादी दर्शन की प्रेरणा बना.

पेरामेनीडिस के अलावा प्लेटो पर सर्वाधिक प्रभाव उससे कुछ ही वर्ष पहले जन्मे हेराक्लाट्स का पड़ा था. यूनानी दर्शन के पितामह थेल्स से प्रभावित हेराक्लाट्स जल को ही सृष्टि का मूलाधार मानता था. उसका मानना था कि सबकुछ गतिमान है. दो व्यक्ति यदि आगे पीछे जा रहे हैं तो पीछे मौजूद व्यक्ति कभी पहले को नहीं पकड़ पाएगा. इसलिए कि उनकी यात्र का भौतिक जगत के अलावा एक आयाम और भी है—वह है समय, जो सदैव गतिमान रहता है. जिस समय पीछे चल रहा व्यक्ति आगे वाले के बराबर पहुंचेगा, उस समय तक आगे वाला व्यक्ति समय के प्रवाह में कुछ और आगे निकल चुका होगा. हेराक्लाइटस की प्रसिद्ध उक्ति है—‘सबकुछ प्रवाहमान है.’ किवदंति है कि उसने यह नदी में खड़े होकर, उसके प्रवाह को देखते हुए कहा था. हेराक्लाइट्स के अनुसार—

यह विश्व, जो सभी के लिए एक समान है, इसमें जो कुछ है सभी सनातन है—वह न तो ईश्वरनिर्मित है, न ही मानवनिर्मित. जो कुछ आज है वह अखंड ज्योति के समान, परिवर्तनशीलता के बीच, हमेशाहमेशा के लिए रहने वाला है.’

हेराक्लाइट्स के चिंतन में भौतिकवादी विचारधारा के बीजतत्व मौजूद हैं, जिन्होंने प्लेटो, अरस्तु समेत आने वाली पीढ़ी के अनेक दार्शनिकों को प्रभावित किया था. उसके बारे में यह बात भी चौंका सकती है कि वह युद्ध का समर्थक था. यहां तक कि न्याय की स्थापना के लिए भी वह युद्ध को अनिवार्य मानता था. युद्ध का जैसा दुराग्रही समर्थन हेराक्लाइट्स ने किया, वैसा शायद ही किसी और विचारक ने किया हो—

युद्ध आमखास, राजाओं तथा राजाओं के राजा का जनक है. युद्ध ने ही कुछ को भगवान, कुछ को इंसान, कुछ को दास, कुछ को स्वामी बनाया है. हमें मालूम होना चाहिए कि युद्ध से हम सभी का नाता है. विरोध न्याय का जन्मदाता है, प्रत्येक वस्तु संघर्ष से ही जन्मती तथा उसी से अंत को प्राप्त होती है.’

हेराक्लाइट्स तथा पारमेनीडिस की विचारधारा के प्रभाव में कालांतर में जिस विचारधारा ने यूनानी बुद्धिजीवियों का दिल जीता, उसके अनुसार ठोस और दृश्यमान जगत को अस्थायी एवं क्षणभंगुर माना गया है. इस विचारधारा के अनुसार दृश्यमान जगत स्वयं में अवास्तविक और मायावी है, जैसा कि आगे चलकर भारतीय वेदांतियों की मान्यता रही.