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बहुजन संस्कृति और सामाजिक न्याय

सामान्य
भारत के पास अनगिनत आख्यान हैं, इतिहास नहीं है.—हेनरी बर

 

‘संस्कृति’ समाजशास्त्र के सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाले शब्दों में से है. प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसके अलग-अलग संदर्भ होते हैं. कई बार परंपरा को संस्कृति समझ लिया जाता है. जबकि अनेक बार लोग संस्कृति और सामान्य व्यवहार के बीच अंतर नहीं कर पाते. जनसामान्य ‘संस्कृति’ को सलीके से परिभाषित भले ही न कर पाए, लेकिन यदि किसी व्यक्ति से उसके सामान्य व्यवहार, कार्यकलापों, सामाजिक-पारिवारिक जीवन की प्रेरणाओं के बारे में प्रश्न किया जाए तो बिना झिझके उसका एक ही उत्तर होगा—‘यही मेरी संस्कृति है.’ संस्कृति मनुष्य और समाज के संबंधों को न केवल व्याख्यायित करती है, अपितु उन्हें सफल एवं सार्थक भी बनाती है. संस्कृति के स्वरूप, उसकी अवधारणा, परिभाषा आदि को लेकर समाजविज्ञानियों के बीच मतभेद रहे हैं. कई बार लोग संस्कृति को मनुष्य के सामान्य व्यवहार से जोड़ने लगते हैं तो कई बार उसे सभ्यता के साथ गड्मड कर दिया जाता है. किसी व्यक्ति अथवा समाज के संदर्भ में संस्कृति उसके समग्र ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, कला, रोजमर्रा के व्यवहारों, संबंधों, रीति-रिवाजों, परंपराओं आदि का समुच्चय होती है.

संस्कृति का कोई एक स्रोत नहीं होता. मनुष्य संस्कृति के तत्व माता-पिता, गांव-पड़ोस, रीति-रिवाज, किस्से-कहानियों, साहित्य-कला, ज्ञान-विज्ञान आदि विविध स्रोतों से ग्रहण करता है तथा उन्हें अपनी अस्मिता और पहचान के रूप में सहेजकर रखता है. इस तरह कि वे उसके रोजमर्रा के व्यवहार, ज्ञान, सामाजिक संबंधों और मर्यादाओं का आधार बन जाते हैं. दूसरे शब्दों में संस्कृति उत्तराधिकार का विषय है. व्यक्ति अथवा समाज जिन आदतों को यत्नपूर्वक अपनी विरासत के तौर पर संभाले रहता है, जिनसे उसकी विशिष्ट पहचान बनती है, उनका समन्वित, समावेशी और लोकोपकारी रूप संस्कृति कहा जा सकता है. उनमें कला, साहित्य, अर्जित ज्ञान, रीति-रिवाज, परंपराएं, सामूहिक प्रवृत्तियां, खान-पान, आचार-व्यवहार आदि सब सम्मिलित होते हैं. इसके अलावा उसमें वे आदर्श और नियम भी समाहित होते हैं, जिन्हें कोई समाज खुद को दूसरों से अलग और बेहतर दिखाने तथा स्थायित्व की भावना के साथ अपनाता है. मनुष्य की भौगोलिक और परिस्थितिकीय विशेषताएं भी उसकी संस्कृति को प्रभावित करती हैं.

‘संस्कृति’ शब्द ‘सम्’ और ‘कृति’ की संधि से बना है. उसका आशय ऐसी अमूर्त्त सामाजिक संरचना से है, जिसमें सभी का साझा हो. संस्कृति और सभ्यता को प्रायः एक-दूसरे के पर्यायवाची के रूप में देखा जाता है. लेकिन दोनों में अंतर है. सभ्यता की कसौटी भौतिक जगत की उपलब्धियां तथा उनके फलस्वरूप जीवन में आए परिवर्तन को माना जाता है. सभ्यता संस्कृति से प्रभावित होती है, एक तरह से उसका हिस्सा भी है, लेकिन वह स्वयं संस्कृति नहीं होती. ऐसे ही जैसे भाषा ज्ञान की वाहक होती है, स्वयं ज्ञान नहीं होती. हां, भाषा का ज्ञान हो सकता है, जो मनुष्य की संपूर्ण ज्ञान-संपदा का मामूली हिस्सा है. इसी तरह मनुष्य अथवा समाज की भौतिक उपलब्धियां संस्कृति नहीं होतीं. सभ्यता को आमतौर पर संस्कृति का उत्पाद माना जाता है. लेकिन यह बात पूरी तरह सत्य नहीं है. सभ्यता और संस्कृति का संबंध अन्योन्याश्रित होता है, जिनमें संस्कृति का स्थान अपेक्षाकृत ऊपर माना जाता है. अपनी हर उपलब्धि के लिए सभ्यता संस्कृति की ऋणी रहती है. उसे हम संस्कृति का आवरण भी कह सकते हैं. परोक्षतः दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं. किसी समूह अथवा समाज की सभ्यता को उसकी संस्कृति अथवा संस्कृतियों का समुत्पाद भी कहा जा सकता है.

संस्कृति और व्यवहार में भी अंतर है. लोग संस्कृति को रोजमर्रा के आचरण के रूप में देखने की भूल कर बैठते हैं. यह गलत है. मनुष्य का नैमत्तिक व्यवहार कानून, समाज, बाजार आदि से प्रभावित हो सकता है. उसका अध्ययन मानव-व्यवहार के अंतर्गत आता है. इस तरह वह मनोविज्ञान की विषय-वस्तु है. संस्कृति व्यवहार भी नहीं होती. उसे व्यवहार की नियंत्रक शक्ति अवश्य कहा जा सकता है. कोई भी सामाजिक अथवा व्यक्तिगत व्यवहार संस्कृति का हिस्सा हो सकता है, उसे संस्कृति नहीं माना जा सकता. कारण यह कि व्यवहार मूर्त्त होता है, संस्कृति अमूर्त्त. होली के पर्व पर एक-दूसरे पर रंग डालना अथवा रक्षाबंधन के अवसर पर बहन द्वारा भाई को राखी बांधना, सहज सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवहार का हिस्सा हैं, स्वयं संस्कृति नहीं है. संस्कृति उनमें अंतर्निहित प्रेरणा है. ऐसी अंतश्चेतना जो मनुष्य को अधिकाधिक सभ्य तथा प्राणिमात्र के प्रति अधिकतम उपयोगी होने का उत्साह जगाती है. मनुष्य ऐसी प्रेरणाओं को अपनी-अपनी तरह से परिभाषित कर सकता है. उनके स्वरूप में थोड़ा-बहुत परिवर्तन ला सकता है, किंतु सामाजिक पहचान से जुड़े होने के कारण उन्हें पूर्णतः नकार नहीं सकता. कुल मिलाकर समाज अथवा व्यक्ति-विशेष के संदर्भ में संस्कृति को हम उसकी सामूहिक आदतों, स्वभाव, ज्ञान-विज्ञान, कला, साहित्य आदि के समुच्चय के रूप में देख सकते हैं.

अपने मूल विषय ‘बहुजन संस्कृति’ लौटने से पहले आवश्यक है कि ‘बहुजन’ की अवधारणा तय कर ली जाए. ‘बहुजन’ का अभिधार्थ ‘बहुसंख्यक जन’ अवश्य है, लेकिन इसका आधार मात्र संख्याबल नहीं है. संख्या के माध्यम से बहुजन को परिभाषित करने के अनेक खतरे हैं. इससे ‘बहुजन’ को संख्याबल समझ लिए जाने की संभावना बराबर बनी रहेगी. वह भीड़ को समाज का दर्जा देने के बराबर होगा. प्रकारांतर में वह अनेक भ्रांतियों को जन्म देगा. पुनश्चः ‘बहुजन’ और ‘बहुसंख्यक जन’ दोनों को एक मान लिया गया तो अल्पसंख्यक मुस्लिमों के मुकाबले हिंदू बहुजन होंगे तथा दलितों के सापेक्ष पिछड़ी जातियों के लोग. इस कसौटी पर आदिवासियों के मुकाबले गैर आदिवासी ‘बहुजन’ माने जाएंगे. यह विभाजन आगे भी बढ़ता जाएगा. एक समय ऐसा भी आ सकता है जब बहुजन की संकल्पना का आधार और उद्देश्य दोनों समाप्त हो जाएं. जैसे ‘बहुजन’ को ‘बहुसंख्यकजन’ नहीं कहा सकता, ऐसे ही ‘बहुजन’ के आधार पर ‘बहुजनवाद’ जैसी भी संकल्पना भी अनुचित कही जाएगी. उससे उसके ‘बहुसंख्यकवाद’ में बदलने की संभावना बनी रहेगी. अतएव ‘बहुजन’ की अवधारणा तय करने के लिए संख्या-तत्व को नजरंदाज करना ही उचित होगा.

फिर ‘बहुजन’ किसे माना जाए? इस शब्द का प्रथम उपयोग बौद्ध दर्शन में प्राप्त होता है. बुद्ध इसे परिभाषित नहीं करते, किंतु जिस संदर्भ में वे इसका प्रयोग करते हैं, उससे ‘बहुजन’ की अवधारणा साफ होने लगती है. भिक्षु संघ को संबोधित करते हुए वे कहते हैं—‘चरथ भिक्खवे चारिकम्-बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय.’ ‘हे भिक्षु! बहुजन कल्याण और बहुजन-हित के लिए निरंतर प्रयाण करते रहो.’ बुद्ध राज-परिवार में जन्मे थे. समकालीन राजाओं, विशेषकर श्रेष्ठिवर्ग पर उनका प्रभाव था. फिर भी वे भिक्षुसंघ से ‘बहुजन’ के कल्याण हेतु निरंतर प्रयत्नशील रहने की कामना करते हैं. आखिर क्यों? तत्कालीन सामाजिक स्थितियों को देखते हुए इसे समझ पाना कठिन नहीं है. उस समय तक वर्ण-व्यवस्था कट्टर रूप ले चुकी थी. कर्मकांड शिखर पर था. लोग जाति देखकर व्यवहार करते थे. इस मामले में सर्वाधिक मुखर ब्राह्मण थे. उनका दावा था कि उन पर सृष्टि-रचियता ब्रह्मा की विशेष कृपा है. जिसने उन्हें अपने मुख से पैदा किया है. निहित स्वार्थ के लिए उन्होंने प्राकृतिक शक्तियों अग्नि, वायु, आकाश, जल, पृथ्वी आदि का देवताकरण किया था और लगातार यह प्रचारित करते रहते कि वे यज्ञों के माध्यम से देवताओं के संपर्क में रहते हैं. दूसरा वर्ग क्षत्रियों का था, जिसे समाज की रक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. देवताओं की दुहाई देते-देते ब्राह्मण खुद देवता होने का गुमान करने लगे थे, जबकि क्षत्रिय राज्य के रखवाले से उसका स्वामी बन बैठे थे. स्वार्थ के लिए ब्राह्मण क्षत्रिय का महिमामंडन करता था, क्षत्रिय ब्राह्मण के पांव पखारता था.

तीसरा व्यापारी वर्ग था. पहले दो वर्गों की तरह अनुत्पादक वर्ग. उसका कार्य दूसरों के उत्पाद बेचकर मुनाफा कमाना था. मुनाफे का एक हिस्सा ब्राह्मण और क्षत्रिय को भेंट कर वह मस्त रहता था. शेष जनसमाज यानी चौथे वर्ग में किसान, मजदूर, शिल्पकार आदि सभी आते थे. उनपर समाज के विकास की जिम्मेदारी थी, परंतु थे सब दूसरों की मर्जी के दास. किसी को अपनी रुचि और हितों के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता न थी. किसान खेत में पसीना बहाता था, मगर फसल पर उसका अधिकार न था. वह राजा और सामंत की मान ली जाती थी. शिल्पकार अपनी कला से संस्कृति और सभ्यता को संवारने का काम करते थे, किंतु अपने ही श्रम-कौशल पर उनका अधिकार न था. उनके श्रमोत्पाद के मूल्यांकन का अधिकार व्यापारी वर्ग के पास था. शूद्र का कर्तव्य था राज्य के लिए कर और ब्राह्मण के लिए दान देना. वफादार रहना तथा उनके प्रत्येक आदेश  को कृपा-भाव के साथ ग्रहण करते हुए दासत्व का धर्म निभाना. इसी में उसकी मुक्ति है—ऐसा कहा जाता था.

संख्याबल में ऊपर के तीनों वर्ग शेष जनसमाज के सापेक्ष बहुत कम थे. कुल जनसंख्या का बमुश्किल पांचवा हिस्सा. लेकिन समाज के कुल संसाधनों पर उनका अधिकार था. इसलिए संख्या-बहुल होने के बावजूद निचले वर्ण के लोग ऊपर के तीन वर्गों की मनमानी सहने के लिए विवश थे. कार्य-विभाजन के नाम पर ब्राह्मणों ने समाज के बहुसंख्यक हिस्से को छोटी-छोटी जातियों और वर्गों में बांट दिया था. बहुजन के पास बुद्धि थी, हस्तकौशल था, अनथक परिश्रम करने का हौसला तथा ईमानदारी भी थी. नहीं था तो आत्मविश्वास और सपने जो जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं. ये सब सेवा-भाव की भेंट चढ़ चुके थे. निरंतर बढ़ते सामाजिक दबावों तथा यह भ्रम कि ईश्वर एकमात्र और सच्चा न्यायकर्ता है, कि इस जीवन में उन्हें जो खोना पड़ रहा है वह मृत्योपंरात जीवन में सहज प्राप्त होगा—के चलते वे पूर्णतः नियतिवादी हो चुके थे. अपने सामान्य हितों के बारे में निर्णय लेने के लिए भी वे समाज के शीर्षस्थ वर्गों पर निर्भर थे; तथा उन्हें अपना स्वामी, सर्वेसर्वा एवं मुक्तिदाता मानते थे. हालात ऐसे थे कि अपने प्रत्येक कार्य में स्वार्थ को आगे रखने वाले तीनों शीर्षस्थ वर्गों के बीच अभूतपूर्व एकता थी, जबकि चौथा और बहु-संख्यक वर्ग सामान्य हितों के लिए एक-दूसरे के साथ स्पर्धा करता हुआ, अपनी प्रभावी ताकत खो चुका था. ‘दिमाग’ और ‘हाथों’ की उस अघोषित-अवांछित स्पर्धा में लाखों हाथ, कुछ सौ या हजार दिमागों की मनमानी के समक्ष बेबस थे. ‘बहुजन’ से बुद्ध का आषय ऐसे ही लोगों से था, जो समाज के प्रमुख कर्ता और उत्पादक वर्ग का हिस्सा होने के बावजूद उपेक्षित, तिरष्कृत, उत्पीड़ित और इस कारण विपन्नता का जीवन जीने को विवश थे. अपने जीवन संबंधी महत्त्वपूर्ण निर्णयों के लिए वे ऐसे लोगों पर निर्भर थे जो उन्हीं के प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष समर्थन से शक्तिशाली होकर बहुजन-हितों के विपरीत कार्य करते थे.

कदाचित अब हम ‘बहुजन’ की अवधारणा तय करने की स्थिति में आ चुके हैं. अभी तक के विवरण जो छवि बनती है, उसके अनुसार ‘बहुजन’ समाज का प्रमुख उत्पादक वर्ग है, जो कभी जाति तो कभी धर्म के नाम पर आरंभ से ही अन्याय, असमानता और शोषण का शिकार रहा है. मानव सभ्यता उसके स्वेद-बिंदुओं की ऋणी है, फिर भी उसे किसी न किसी रूप में, उसके श्रम-लाभों से वंचित रखा गया है. वह खेतों में काम करने वाला मजदूर हो सकता है; और गली-नुक्कड़ पर जूते गांठने वाला मोची भी. स्त्री भी हो सकता है, पुरुष भी. आजीविका उसका धर्म है. वही उसका भरोसा भी. इसी कारण बुद्ध पूर्व भारत में वह आजीवक कहलाता था. उन दिनों प्रकृति पर उसे भरोसा था. वही उसकी श्रद्धा का पात्र भी थी. प्रकृति के प्रति सम्मान-भाव के साथ जिस दर्शन की रचना उसने की थी, विद्वत जगत में वह लोकायत के रूप में ख्यात हुआ. उसकी सहायता से शताब्दियों तक वे लोग आंडबर और याज्ञिक कर्मकांडों पर टिके वैदिक धर्म-दर्शन को चुनौती देता रहा. इस तरह बहुजन की अवधारणा हमें सामाजिक न्याय की भावना से जोड़ती है. अपने साथ-साथ दूसरों के कल्याण के लिए जिम्मेदार बनाती है. यही उसका उद्देश्य है और यही अभीष्ट भी है. हालांकि सामाजिक न्याय की अवधारणा को लेकर मत-वैभिन्न्य हो सकते हैं.

मार्क्स ने पूंजीवादी तंत्र में उत्पीड़ित वर्ग को ‘सर्वहारा’ का नाम दिया था. ‘सर्वहारा’ और ‘बहुजन’ की आर्थिक अवस्था में अधिक अंतर नहीं होता. दोनों ही शोषण का शिकार होते हैं. उनमें से किसी को भी अपने श्रम के मूल्यांकन का अधिकार नहीं होता. फिर भी दोनों की सामाजिक स्थिति में अंतर है. मार्क्स का जन्म ऐसे समाज में हुआ था जहां जाति, वर्ण और धर्म के आधार पर विभाजन न था. अतएव सर्वहारा की उसकी परिकल्पना ठेठ पूंजीवादी समाज में आर्थिक विपन्नता के शिकार श्रमिक-वर्ग के शोषण तथा उसके सामाजिक-सांस्कृतिक दुष्परिणामों तक सीमित थी. बहुजन की समस्याओं का मूल सामाजिक-सांस्कृतिक भेदभाव होते हैं. प्रकारांतर में वही उसकी समाजार्थिक दुरावस्था का कारण बनते हैं. मुख्यधारा से जुड़ने के लिए सर्वहारा को आर्थिक बाधाएं पार करनी पड़ती हैं. जबकि बहुजन को आर्थिक के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक समस्याओं से भी जूझना पड़ता है. चूंकि सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव की गति अत्यंत मंथर होती है, इसलिए बहुजन-कल्याण की राह हमेशा अनेकानेक चुनौतियों से भरी होती है. लोकतांत्रिक परिवेश का लाभ उठाकर सर्वहारा अपनी स्थिति में सुधार ला सकता है. पश्चिमी देशों में ऐसा हुआ भी है. जाति के संबंध में लोकतांत्रिक सरकारें भी अपेक्षानुरूप सफल नहीं हो पातीं. प्रतिगामी शक्तियां जाति को व्यक्ति का निजी मामला बताकर सामाजिक परिवर्तन को टालती रहती हैं. सामाजिक-सांस्कृतिक भेदभाव तथा अवसरों की कमी के कारण बहुजन के लिए आर्थिक विषमताओं के चक्रव्यूह को भेद पाना आसान नहीं होता. जटिल जाति-व्यवस्था तथा उसके साथ धर्म का चिरस्थायी गठजोड़, बहुजन के संघर्ष को कई गुना बढ़ा देते हैं.

‘बहुजन’ का प्रथम उल्लेख भले ही बौद्ध दर्शन में हुआ हो, इसकी भूमिका वैदिक संस्कृति की स्थापना के साथ ही बन चुकी थी. लगभग 1500 ईस्वी पूर्व मध्य एशिया से भारत पहुंचे पशुचारी कबीलों ने खुद को ‘आर्य’ कहा था. इसका अर्थ बताया जाता है—‘श्रेष्ठ’ अथवा ‘श्रेष्ठजन.’ इस संबोधन का आशय था—मूल भारतवासी अथवा उनसे हजारों वर्ष पहले से इस देश में बस चुके जनसमूहों की संस्कृति को हेय मान लेना. भारत के मूल निवासी कौन थे? विद्वान दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं में अग्रणी सिंधू सभ्यता को अनार्य सभ्यता मानते हैं. डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी अपने ग्रंथ ‘हिंदू सभ्यता’(राजकमल प्रकाशन, पांचवा संस्करण, 1975, पृष्ठ 46) में मोहनजोदड़ो से प्राप्त नरकंकालों के आधार पर सिंधू सभ्यता के निर्माताओं को चार नस्लों में बांटते हैं—आद्य-निषाद, भूमध्य सागर से संबंधित जन, अल्पाइन तथा मंगोल, किरात. आगे वे लिखते हैं कि आद्य-निषाद भारत महाद्वीप के निवासी थे. भूमध्यसागरीय लोग दक्षिण एशिया से आए थे. अल्पाइन पश्चिमी एशिया तथा मंगोल, किरात वर्ण के लोग पूर्वी एशिया से पलायन कर लंबी यात्रा के उपरांत भारत पहुंचे थे. इनके अलावा  अलग-अलग नस्ल के संसर्ग से जन्मीं संकर नस्लें भी थीं. ऋग्वेदादि ग्रंथों में आर्यजनों ने इन्हीं नस्लों के सापेक्ष जो उनसे सहस्राब्दियों पहले इस प्रायद्वीप पर आकर बस चुकी थीं; तथा अपने श्रम-कौशल के बल पर समृद्ध सभ्यता की स्वामिनी थीं—अपनी वर्ण-श्रेष्ठता का दावा किया है. यदि उनके दावे को स्वीकार कर लिया जाए तो समकालीन बाकी नस्लें जिनका उल्लेख ऊपर किया गया है, तुलनात्मक रूप से अश्रेष्ठ अथवा निकृष्ट सिद्ध होती हैं, लेकिन पुरातात्विक साक्ष्य इसे वैदिक ब्राह्मणों की आत्ममुग्धता से अधिक मानने को तैयार नहीं है. आज यह प्रमाणित है कि सिंधू घाटी की सभ्यता ऋग्वैदिक सभ्यता की अपेक्षा 1500-2000 पुरानी तथा उससे कहीं अधिक समृद्ध और सुव्यवस्थित थी. पुरातत्ववेत्ता सिंधू सभ्यता की शुरुआत 3200 ईस्वी पूर्व से मानते हैं. 2300 ईस्वी पूर्व से 1750 ईस्वी पूर्व तक वह सभ्यता अपने वैभव के शिखर पर थी. उसके बाद उसके पराभव का दौर शुरू हुआ. 1500 ईस्वी पूर्व में जब आर्यों ने जब भारत में प्रवेश किया, उस समय वह सभ्यता करीब-करीब मिट चुकी थी. उसके अवशेष हड़प्पा, मोहनजोदड़ो’, कालीबंगा, लोथल, मेहरगढ़ जैसे दर्जनों स्थानों पर आज भी सुरक्षित हैं. सिंधुवासियों को दुनिया की सबसे पुरानी और समृद्ध नागरिक सभ्यता की नींव रखने वाला बताया जाता है. पुरातत्ववेत्ता इस बात पर सहमत हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता का कुल क्षेत्रफल आधुनिक पाकिस्तान के क्षेत्रफल से भी अधिक था.

भारतीय इतिहास के संदर्भ में 1500 ईस्वी पूर्व से 700 ईस्वी पूर्व तक के समय को विद्वान ‘अंधकार युग’ मानते हैं. इसलिए कि उस कालखंड के बारे में हमें प्रामाणिक तौर पर कुछ भी ज्ञात नहीं है. विद्वानों के अनुसार ऋग्वेदादि श्रुति ग्रंथों का रचनाकाल भी यही कालखंड है. लेकिन ये ग्रंथ 700 ईस्वी पूर्व में भी लिखित रूप में मौजूद थे, यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता. दूसरी ओर यह प्रमाणित तथ्य है कि सिंधू सभ्यता के निर्माताओं को न केवल लिपि बल्कि संख्याओं, वास्तविक और प्रतीक मुद्रा तथा उनके अनुप्रयोगों की भी पर्याप्त जानकारी थी. उनके खेती के तरीके विकसित थे. इतने विकसित कि भारत में बीसवीं शताब्दी के आरंभ तक भी उनमें खास परिवर्तन नहीं हो पाया था. उनके पास सुनियोजित व्यापार-तंत्र और ऐसी भाषा थी, जिसके माध्यम से वे समकालीन सभ्यताओं से संवाद करने में सक्षम थे. जबकि आर्यजन महज घुमंतु पशुचारी कबीले थे. सभ्यता की दृष्टि से सिंधुवासियों से लगभग हजार साल पिछड़े हुए. इसके बावजूद यदि उन्होंने स्वयं को ‘आर्य’ यानी ‘श्रेष्ठजन’ कहा, तो इसके दो प्रमुख कारण हो सकते हैं. पहला या तो वे सिंधू घाटी की सभ्यता के प्राचीन वैभव तथा उसके महत्त्व से अपरिचित थे. अथवा यह संबोधन उन्होंने बहुत बाद में अनार्यजनों पर अपनी सांस्कृतिक विजय, वैदिक संस्कृति की स्थापना के समय चुना था. वे जानते थे कि अपनी संस्कृति को श्रेष्ठ बताए बिना जीत को स्थायी बनाना और मूल-भारतवासियों पर ‘आर्यत्व’ को थोप पाना असंभव है. ईसा पूर्व चौथी-पांचवी शताब्दी तक वह लक्ष्य ही बना रहा. यह भी संभव है कि ‘आर्य’ संबोधन मध्य एशिया से प्रयाण से पहले ही उनके साथ जुड़ा हो और उसका अभिप्राय ‘श्रेष्ठजन’ न होकर कुछ और हो. ऋग्वेद को प्राचीनतम वेद, हिंदुओं का पवित्रतम ग्रंथ, जिसकी रचना ब्राह्मणों द्वारा ब्राह्मणों के लिए की गई है—माना जाता है. उसके आरंभिक उद्गाता ऋषियों में सभी वर्णों के रचनाकार सम्मिलित हैं.

वेदादि ग्रंथों को ‘ब्राह्मण-ग्रंथ’ कहने की प्रवृत्ति बहुत बाद में, कदाचित यजुर्वेद की रचना के समय हुई. उस समय तक उस समय तक ‘पुरोहित’, ‘राजा’, सम्राट जैसे पदों का सांस्थानीकरण हो चुका था. धर्म और राजनीति दोनों ही व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति का माध्यम बन चुके थे. वैदिक कर्मकांड जो उससे पहले तक मुख्यतः आश्रमों तक सीमित थे, वे राजा-महाराजाओं तथा धनी व्यापारियों के घर-आंगन तक पहुंचकर वैभव-प्रदर्शन के काम आने लगे थे. ब्राह्मणों की पूरी मेधा यज्ञादि कर्मकांडों को विस्तार देने में जुटी थी. चतुर्भुजी ब्रह्मा के हाथ में ‘ऋग्वेद’ के बजाय ‘यजुर्वेद’ की प्रति का होना, वैदिक धर्म-दर्शन की परपंरा में कर्मकांडों के बढ़ते महत्त्व को दर्शाता है. ऐसे में ज्ञान की परंपरा का अवरुद्ध होना स्वाभाविक था. वही हुआ भी. उसके तुरंत बाद पौराणिक लेखन की बाढ़-सी आ गई, जिसने उस समय तक उपलब्ध ज्ञान-विज्ञान और ऐतिहासिक तत्वों का मिथकीकरण करने का काम किया.

ऋग्वेद में अनार्य पुरों के ध्वंस का जगह-जगह वर्णन है. लेकिन ऋग्वेद की रचना का जो काल है, उस समय तक सिंधु सभ्यता का पराभव हो चुका था. इसलिए संभावना यही बनती है कि ऋग्वैदिक आर्यों ने सिंधु-घाटी के उन नगरों और पुरों पर हमला किया था, जो प्रकृति की मार के चलते पहले से ही निष्प्रभ हो चुके थे. पराजित अनार्यों में से कुछ यहां-वहां छिटक गए. जो बचे उन्हें लेकर ब्राह्मणों ने चातुर्वर्ण्य समाज की नींव रखी. चातुर्वर्ण्य समाज की अवधारणा कदाचित आर्यों की प्राचीन स्मृति का हिस्सा थी. गौरतलब है कि प्राचीन मिस्र तथा पर्शिया में भी चातुर्वर्ण्य वर्ण-व्यवस्था प्रचलित थी. अवेस्ता(यसना, 19/17, फ्रे) में जिन चार वर्णों का उल्लेख मिलता है, वे हैं—असर्वण(पुरोहित वर्ग), अर्तेशत्रण(क्षत्रिय), डबेरियन(वैश्य) तथा वास्त्रोषण(शूद्र). ध्वनि के आधार पर आर्य शब्द ‘असर्वण’ के अपेक्षाकृत निकट है. अवेस्ता में ‘असर्वण’ को वर्ण-क्रम में पहला स्थान पर रखा गया है. संभव है ‘आर्य’ शब्द की उत्पत्ति पार्शियन ‘असर्वण’ से हुई हो; या फिर ‘आर्य’ की अवधारणा के मूल में इस शब्द का प्रभाव रहा हो. ‘अवेस्ता’ के अनुसार ‘अहुरमज्द’ एक प्रमुख देवता है. उसे सृष्टि निर्माता और उसका पालक माना गया है. मान्यतानुसार उसने कई द्वीपों की रचना की थी. भारत में प्रवेश के बाद ‘अहुरमज्द’ का ‘अहुर’ ही प्रकारांतर में ‘असुर का रूप ले लेता है. इससे एक संभावना यह भी बनती है कि भारत पहुंचे आर्य कबीले अपने मूल प्रदेश की संस्कृति का प्रतिपक्ष थे. ‘अहुरमज्द’ को सर्वोच्च पद का दिया जाना, उन्हें स्वीकार न था. इसलिए भारत पहुंचकर उन्हें जैसे ही अवसर मिला, ‘अहुरमज्द’ को नकारात्मक शक्तियों के प्रतीक असुर में ढाल दिया गया. भारत में आर्यों का आगमन अलग-अलग समय में टुकड़ियों के रूप में हुआ था. उधर ऋग्वेद में ‘असुर’ का प्रयोग अच्छे और बुरे दोनों अर्थों में हुआ है. इससे एक संभावना यह भी है कि अलग-अलग समय में आने वाली आर्य-टोलियां भिन्न समाज और संस्कृतियों से संबंधित थीं. यह भी संभव है कि ‘असुर’ शब्द का प्रयोग पहले ‘अच्छे’ के संदर्भ में होता हो, उसे ‘बुरे’ का प्रतीक और आर्यों का दुश्मन बाद में माना गया हो. मानव-संस्कृति के इतिहास में ऐसे बदलाव स्वाभाविक कहे जा सकते हैं. उन्हें हम समाज में निरंतर बदलते शक्ति-केंद्रों का परिणाम भी कह सकते हैं. आरंभ में गणेश को ‘विघ्नकर्ता’ देवता माना जाता था. प्राचीनतम उल्लेखों में उन्हें कर्मकांड और आडंबरों का विरोधी दर्शाया गया है. आगे चलकर वे हिंदुओं के प्रमुख देवता के रूप में प्रतिष्ठित होकर, ‘विघ्नहर्ता’ मान लिए जाते हैं. ऐसे ही शिव जो पहले अनार्यों के लोकनायक के रूप में प्रतिष्ठित थे, उन्हें देवताओं की तिकड़ी में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया.

शिव को संहार का देवता माना जाता है. यह मिथ शिव की अनार्य समूहों के बीच महत्ता को दर्शाता है. भारत में आर्यों का आगमन भले ही उस युग में हुआ हो जब प्राचीन सिंधु सभ्यता का वैभव लुट चुका था. तो भी भारत पहुंचने के बाद उनके लिए यहां के निवासियों पर जीत हासिल करना आसान नहीं रहा होगा. शिव पूरे सिंधु प्रदेश के प्रतिष्ठित लोकनायक थे. उस समय के सभी अनार्य समूहों पर उनका प्रभाव था. इसलिए भारत आने के साथ ही आर्यों को शिव के समर्थकों से जूझना पड़ा होगा. संस्कृत ग्रंथों में इस बात के प्रमाण हैं कि अनार्यों के साथ आरंभिक युद्धों में आर्यों को पराजय का सामना करना पड़ा था. बल्कि लंबे समय तक जीत उनके लिए सपना ही बनी थी. मजबूरी में आर्यों से सहमति और समझौते से काम लिया. वह समझौता था, अनार्य महानायक शिव को आर्य देवताओं के बराबर का दर्जा देना. उनके साथ वैवाहिक संबंध स्थापित करना. चूंकि वे शिव के पीछे निहित अनार्य कबीलों की जनशक्ति से परिचित हो चुके थे, और परोक्ष रूप में उसका डर भी उनके मनो-मस्तिष्क पर सवार रहता था, कदाचित उसी भय ने उन्हें शिव को संहार का देवता मानने के लिए विवश किया था. आदिवासी आज भी खुद को हिंदू धर्म से अलग मानते हैं. कहते हैं कि उनके पूर्वज वैदिक कर्मकांडों के कटु आलोचक; तथा ‘वर्ण-श्रेष्ठता की सैद्धांतिकी’ का विरोध करते थे.

यहां कुछ प्रश्न एकाएक खड़े हो जाते हैं. पहला यह कि सभ्यताकरण की अनिवार्यता के रूप में कार्य-विभाजन तो दूसरे देशों भी हुआ था. सभ्यताकरण की शुरुआत भी लगभग साथ-साथ हुई थी. अपने आदर्श समाज में प्लेटो ने भी लोगों को तीन वर्गों—स्वर्ण, रजत तथा कांस्य में बांटने की अनुशंसा की थी. भारत की भांति जापान, कोरिया, स्पेन तथा पुर्तगाल के लैटिन अमेरिकी उपनिवेशों, अफ्रीका आदि देशों में भी जातिप्रथा का प्रभाव था. जापान के ‘बराकुमिन’(burakumin) तथा कोरिया के ‘बीकजियोंग’(baekjeong) के हालात भारत के दलितों के समान ही थे. यमन में अल-अखदम(al-Akhdham, Khadem) की स्थिति भारतीय शूद्रां जैसी थी. उन्हें भी जाति-आधारित भेदभाव का सामना करना पड़ता था. इनके अलावा पाकिस्तान, चीन, नेपाल, बांग्लादेश, इंडोनेशिया आदि देशों का समाज भी छोटी-छोटी जातियों और वर्गों में विभाजित था. विभिन्न जातियों के बीच ऊंच-नीच की भावना भी प्रबल थी. फिर बाकी देशों विशेषकर पश्चिमी देशों के सभ्यताकरण तथा भारत के सभ्यताकरण के परिणामों के बीच भारी अंतर क्यों मिलता है?

इस रहस्य को सभ्यताओं के विकास की सामान्य पड़ताल द्वारा समझा जा सकता है. सुकरात ने जीवन और समाज में नैतिकता की व्याप्ति पर जोर दिया था. गुरु सुकरात के सपने को लेकर प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ में आदर्श समाज की परिकल्पना की थी. उसने किशोरावस्था के आरंभ से ही बच्चों को माता-पिता से दूर, उनकी पैत्रिक को पहचान छिपाकर, राज्य के संरक्षण में रखने की सिफारिश की थी. उसके आदर्श राज्य में बच्चों के पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा की संपूर्ण जिम्मेदारी राज्य की थी. एक उम्र तक शिक्षा का स्वरूप भी एक समान था. जबकि भारत में शिक्षा का स्वरूप वर्णानुसार परिवर्तनशील था. वैदिक ज्ञान केवल ब्राह्मण की संतान के लिए सुलभ था. क्षत्रिय और वैश्य की संतान को क्रमशः युद्ध-कौशल और व्यापारिक हिसाब-किताब से संबंधित शिक्षा देने का विधान था. शूद्र के लिए ज्ञान और शिक्षा के अवसर सर्वथा वर्ज्य थे. व्यक्ति की इच्छा और स्वतंत्रता का कोई महत्त्व नहीं था. पुत्र पिता की आजीविका को अपनाने के लिए बाध्य था. जबकि प्राचीन यूनान में सभी के लिए सैन्य शिक्षा एवं सेवा अनिवार्य थीं. तदोपरांत व्यक्ति की योग्यता तथा चारित्रिक विशेषताओं के अनुसार जिम्मेदारी सौंपी जाती थी. व्यक्ति को जन्म के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव न झेलना पड़े, इसके लिए प्लेटो ने साहसपूर्वक परिवार संस्था की भी उपेक्षा की थी. उसके बाद आए अरस्तु ने हालांकि प्लेटो की आदर्श राज्य संबंधी अनुशंसाओं को नकार दिया, परंतु जीवन और समाज में न्याय एवं नैतिकता के महत्त्व से उसे भी इन्कार न था. ‘श्रेष्ठ प्रजा ही श्रेष्ठ राज्य’ बना सकती है, कहकर उसने जीवन व्यक्तिमात्र के महत्त्व को स्थापित किया था. जिसे आधुनिक लोकतंत्र की आरंभिक प्रेरणा भी मान सकते हैं.

सच यह भी है कि सुकरात से लेकर अरस्तु तक सभी प्रमुख दार्शनिक दास प्रथा के समर्थक थे. और उसे उत्पादकता के स्तर को बनाए रखने के आवश्यक मानते थे. अरस्तु जैसा वैज्ञानिक सोच वाला विचारक जिसने प्राकृतिक विज्ञान के क्षेत्र में अद्भुत शोध किए थे, उत्पादकता में सुधार के लिए विज्ञान और तकनीक के प्रयोग हेतु कोई सुझाव नहीं देता. चूंकि दास के रूप में सस्ता श्रम आसानी से उपलब्ध था, जिसे वे विकास हेतु अपरिहार्य मान चुके थे—इस कारण उत्पादन वृद्धि हेतु विज्ञान और तकनीक के प्रयोग की ओर उनका ध्यान ही नहीं जाता. कुल मिलाकर विश्व के इन महानतम विचारकों द्वारा दास-पृथा को समर्थन, आगे चलकर में मानव-सभ्यता के विकास का अवरोधक सिद्ध हुआ. इस कमी के बावजूद प्राचीन यूनानी दर्शन में कुछ ऐसा अवश्य था, जो विचारकों की आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहा. वह था—मनुष्य को सभ्यता और संस्कृति के केंद्र में रखकर सोचना, तथा जीवन में नैतिकता को अत्यधिक महत्त्व देना, यही विशेषताएं आगे चलकर आधुनिक मानवतावादी दर्शनों की प्रेरणा बनी.

भारत में नैतिकता धर्म का उत्पाद उसका एक लक्षण मानी गई है. अधिकांश मामलों में तो धर्म और नैतिकता में कोई अंतर ही नहीं किया जाता. इसमें कोई बुराई भी नहीं है. एक प्रकार से धर्म भी मनुष्य की वैचारिक और आचरण की प्रतिबद्धता को दर्शाता है. बुराई तब उत्पन्न होती है जब उसकी प्रेरणा का आधार मानवेत्तर शक्तियों को मान लिया जाता है; तथा धर्म की आड़ लेकर कुछ लोग स्वार्थवश देवताओं को, जिनकी हैसियत मिथकीय पात्रों जैसी होती है—मनुष्य के सापेक्ष अतिरिक्त महत्त्व देने लगते हैं. कहने को प्रत्येक धर्म समानता के दावे के साथ जीवन में अपनी जगह बनाता है. परंतु उसकी समानता आभासी होती है. तरह-तरह की असमानताओं से जूझ रहे लोगों को फुसलाने के लिए धर्म ईश्वर के दरबार में बराबरी का भरोसा देता है. उसका वास्तविक जीवन में कोई महत्त्व ही नहीं है. वह जीवन और समाज में कुछ व्यक्ति अथवा व्यक्ति-समूहों के विशेषाधिकार को भी वैध ठहराता है. उसके प्रभाव में कुछ व्यक्तियों को सर्वेसर्वा और खास; जबकि बहुसंख्यक वर्ग को नगण्य एवं उपेक्षित मान लिया जाता है. भारतीय समाज की पहचान बन चुकी इस कुवृत्ति का दुष्परिणाम यह हुआ है कि जो कार्य अतिरिक्त श्रम की अपेक्षा रखते थे, उन्हें पूरी तरह शूद्रों तथा दासों के हवाले कर दिया गया. चूंकि संख्याबल में यह वर्ग तीनों शीर्षस्थ वर्गों की अपेक्षा अधिक था, समाज की जरूरत का उत्पादन उपलब्ध श्रम-शक्ति से आसानी से हो जाता था. इसलिए उत्पादन को बढ़ाने या उत्पादन प्रक्रिया को सरलीकृत करने का कार्य लंबे समय तक टलता रहा.

आने वाली शताब्दियों में यूनान का प्राचीन वैभव लुट-सा गया. प्लेटो का आदर्श राज्य चर्च के अधीन होकर धर्म के कुचक्र में हांफता हुआ नजर आया. इसके बावजूद वहां समय-समय पर स्वतंत्र मेधा का धनी ऐसे विचारक हुए जो प्राचीन चिंतकों से प्रेरणा लेकर राज्य को उसकी सीमा और कर्तव्य का एहसास कराते रहे. पंद्रहवीं शताब्दी की वैज्ञानिक क्रांति ने उत्पादन के वैकल्पिक साधनों का विकास किया. उससे पुरानी विचारधाराओं का नवोन्मेष हुआ, उसके साथ-साथ नए विचारों के सृजन में भी तेजी आई. मानव-मुक्ति के प्रश्न नए सिरे से अंगड़ाई लेने लगे. फलस्वरूप राज्य को चर्च के चंगुल से आजाद कराने लायक माहौल बना. नई वैचारिक चेतना ने सामंती व्यवस्था के सभी लक्षणों को जिनमें जाति भी शामिल थी, कठघरे में लाकर खड़ा कर दिया. जापान, कोरिया जैसे देशों में जहां जातिप्रथा अपने विकृत रूप में उपस्थित थी, वहां उसके संपूर्ण उन्मूलन के लिए सघन कार्यक्रम चलाए गए, जिन्हें वहां के राज्य का पूरा समर्थन मिला. अमेरिकी और फ्रांसिसी क्रांति की सफलता के पश्चात पश्चिम में व्यक्ति-स्वाधीनता की मांग जोर पकड़ने लगी थी. उसका असर उनके उपनिवेशों पर भी पड़ा. फलस्वरूप उन देशों में जाति का संपूर्ण उच्छेद संभव हो सका.

भारत में ऐसा नहीं हो सका. इसलिए कि यहां ज्ञान-विज्ञान को धर्म का अनुचर बना दिया गया था. ऊपर से धर्म की परिकल्पना इतनी अस्पष्ट थी कि हर कोई अपने स्वार्थ को धर्म का नाम दे सकता था. ‘महाभारत’ में कुरुक्षेत्र का भीषण युद्ध, एकलव्य का अंगूठा काट लेना और बाद में छल से उसकी हत्या कर देना जैसे अनेक धत्त्कर्म धर्म के नाम पर ही किए जाते हैं. पश्चिम, विशेषकर प्राचीन यूनानी दर्शन सुकरात और प्लेटो के नैतिकतावादी दर्शनों से प्रभावित था. इन दार्शनिकों ने नैतिकता को मनुष्यता के आदर्श के रूप में सामने रखा था. जबकि भारत में सबकुछ धर्म के अधीन था; और धर्म की संरचना ऐसी थी कि उसे सामंतवाद से अलग देख पाना असंभव था. जाति और धर्म ने एक-दूसरे के समर्थन से भारतीय समाज में जो विकृतियां पैदा की हैं, उनका समाधान आज तक नहीं हो पाया है. भारत में पिछले 2500 वर्षों से ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों पर शीर्षस्थ वर्गों का एकाधिकार रहा है. उत्पादक कर्म से दूर रहने के बावजूद उन्होंने अर्थव्यवस्था को अपने स्वार्थ के अनुरूप ढाला हुआ था. बदली वैश्विक परिस्थितियों के फलस्वरूप समाज के निचले वर्गों को आजादी तो मिली, मगर वह आधी-अधूरी थी. जातीय आधार पर थोपे गए बंधन उसकी स्वतंत्रता की बाधा बने थे. आर्थिक आवश्यकताओं के लिए वे शीर्षस्थ वर्गों पर निर्भर थे. यह उत्तरोत्तर बढ़ती समाजार्थिक विषमता का प्रमुख कारण बना.

इस संबंध में बड़ा रोचक विश्लेषण डॉ. देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय की पुस्तक ‘साइंस एंड टेक्नालॉजी इन एनशिएंट इंडिया’ में मिलता है. जार्डन क्लिड के लेख ‘दि अर्बन रिवोल्युशन’ का अध्ययन करते हुए वे लिखते हैं कि तीन प्रमुख प्राचीनतम सभ्यताओं भारत, मेसापोटामिया, मिस्र में लगभग 6000 से 3000 वर्ष पहले तक मानवीय अनुभव-कौशल के आधार पर प्राकृतिक विज्ञानों यथा रसायन, भौतिकी, जीवविज्ञान, वनस्पति विज्ञान का प्रयोग खूब प्रचलित था. कारीगर लोग चांदी और तांबे के अयस्क को पिघलाकर धातु-शोधन की कला में दक्ष थे. वे वायु की गति का अनुप्रयोग जानते थे. उनके द्वारा बनाए गए जहाज सुदूर सभ्यताओं तक निरंतर यात्रा करते रहते थे. बैलगाड़ी के उपयोग से यातायात सुलभ हुआ था. इससे खाद्यान्न को एक स्थान पर पहुंचाने और उसे सुरक्षित रखना संभव हुआ. सिंधु सभ्यता में 800 वर्गमीटर क्षेत्र में फैले अन्न भंडारगृह का पता चला है. मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की अनूठी भवन-संरचाएं तथा उनके लिए जिस प्रकार की पकी इंर्टों का उपयोग किया गया था, वह न केवल समकालीन सभ्यताओं में बेजोड़ था, बल्कि उसके पराभव के पश्चात एक हजार वर्षों बाद भी, जिसे उन्होंने सभ्यता के ‘अंधकार युग’ की संज्ञा दी है—संभव नहीं पाया था. कमियां उस सभ्यता में भी थीं. चट्टोपाध्याय साफ करते हैं कि प्राकृतिक विज्ञान के क्षेत्र में इतनी उपलब्धियों के बावजूद, तत्कालीन शासक वर्ग की विज्ञान-संबंधी प्राथमिकताएं प्रायोगिक गणित एवं ज्योतिष तक सीमित थीं. गणित का उपयोग उत्पादों के संवितरण, कराधान, भवन और भवन-सामग्री का निर्माण आदि के लिए किया जाता था, जबकि ज्योतिष की मदद मौसम पर नजर रखने और उसके अनुसार फसल-उत्पादन के लिए ली जाती थी. प्राकृतिक विज्ञान यथा जीवविज्ञान, वनस्पति विज्ञान, भौतिकी, रसायन आदि के अनुप्रयोग तथा उसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी केवल शिल्पकर्मियों की थी.

वैदिक मेधा भी इस अपसंस्करण का शिकार थी. आरंभिक भारत में बीजगणित का जितना उपयोग यज्ञ-वेदियों के निर्माण के लिए होता था, उतना ही उपयोग नौकाएं बनाने के लिए भी किया जाता था. हवा की गति को पहचानते हुए, महासागर के बीच हजारों किलोमीटर की लंबी यात्राएं करने वाली नौकाओं का निर्माण तथा उनके नाविकों द्वारा सफल यात्राएं बिना बीजगणित, सामुद्रिक विज्ञान, वनस्पतिशास्त्र और गतिज भौतिकी के ज्ञान के असंभव थीं. मगर व्यावहारिक ज्ञान के प्रति कृपणता दिखाते हुए ब्राह्मणों ने ज्ञान-विज्ञान और तकनीक की उन अनेक धाराओं में से केवल गणित को सहेजने का कार्य किया. वह भी सीमित अर्थों में, यज्ञ-वेदियों के निर्माण जैसे अनुत्पादक कार्य के लिए. बाकी का ज्ञान कर्मकारों पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी अंतरण के लिए छोड़ दिया गया. संस्कृत साहित्य में बुनकर, तंतुकार, कुंभकार, नाविक, हलवाह, रथवाह, धातुकर्मी जैसे पेशेवरों का उल्लेख मिलता है. उनका ज्ञान मुख्यतः अनुभव आधारित था. लंबे विश्लेषण के बाद चट्टोपाध्याय जोर देकर कहते हैं कि उस समय की सामाजिक-आर्थिक नीतियों में कुछ न कुछ ऐसा अवश्य था, जो प्राकृतिक विज्ञानों की उपेक्षा कारण बना था. इसके निहितार्थ को समझना कठिन नहीं है.

आर्य इस देश में प्रवासी थे. संभव है, भारत आने के बाद अनेक वर्षों तक खुद को दूसरे देश का मानते रहे हों. प्रवासी को अपनी मूल-संस्कृति से बेहद लगाव होता है. यह लगाव तब और बढ़ जाता है जब उन्हें ऐसे लोगों के बीच रहना पड़े जो उनसे कहीं विकसित सभ्यता के स्वामी हों. इसे उस समूह की हीनता-ग्रंथि भी कह सकते हैं. परंतु यह किसी भी व्यक्ति अथवा समूह के बारे में सच हो सकता है. भारत में यायावर कबीलों के रूप में आए आर्यों के साथ भी कदाचित ऐसा ही था. उनकी अर्थव्यवस्था का मुख्य स्रोत पशुपालन था. खेती करना उन्होंने द्रविड़ों से सीखा. बावजूद इसके उत्पादकता के अपने परंपरागत संसाधनों के प्रति उनका आकर्षण बना रहा. वैदिक ऋषियों की जीवनचर्या आश्रम-केंद्रित थी. सभी प्रमुख वनवासी ऋषियों के अपने-अपने आश्रम थे. उनकी आय का प्रमुख स्रोत पशु-संपदा थी. उसके लिए परस्पर झगड़े भी होते थे. मात्र एक गाय की खातिर वशिष्ट और विश्वामित्र के बीच हुआ लंबा संघर्ष तो जग-जाहिर है. स्वर्ग के रूप में ऐसी समानांतर परिकल्पना भी मिलती है, जहां दुधारू गाय, भरपूर संख्या में उपलब्ध हों, उसे गोलोक कहा गया है. मान्यता थी कि अच्छी दुधारू गाय समस्त कामनाओं की पूर्ति कर सकती है—‘कामधेनु’ का प्रतीक इसी सोच और पशु-केंद्रित अर्थव्यवस्था के महत्त्व को दर्शाता है. द्रविड़ों के संपर्क में आने के बाद आर्यों ने खेती करना सीखा. फिर भी पशु-पालन के प्रति आकर्षण एवं कृषि-कर्म के प्रति दुराव बना रहा. वर्ण-व्यवस्था कृषि-कर्म में लिप्त लोगों को शूद्र का दर्जा देकर तीसरे पायदान पर ढकेल देती है. उनकी अपेक्षा द्रविड़ क्रमवार विकास करते हुए कृषि-केंद्रित अर्थव्यवस्था को अपना चुके थे. वे उन लोगों के वंशज थे, जो सिंधु सभ्यता के पराभव के उपरांत यहां-वहां बिखर चुके थे. वे कृषि-कर्म में दक्ष थे. पुरातत्व से जुड़ी खोजें सिद्ध करती हैं कि सिंधु सभ्यता नागरीकरण के उन शिखरों तक पहुंच चुकी थी, जहां पहुंचने के लिए वैदिक जनों को आगे के एक हजार वर्ष खपाने पड़े. सिंधु सभ्यता की समृद्धि का प्रमुख संबल वहां के शिल्पकर्मी थे. अपने अनूठे शिल्पकर्म के बल पर वे, वैदिक सभ्यता के उभार के दौर में भी, अपनी आर्थिक-सामाजिक स्वतंत्रता को बचाए रखने में सफल हुए थे.

सिंधु सभ्यता के उत्खनन से चीनी के बर्तन प्राप्त हुए हैं. उनका उपयोग धातु-शोधन के कार्य हेतु किया जाता था. आज धातु-अयस्क को पिघलाने का काम बड़े-बड़े पूंजीपतियों के अधिकार में जा चुका है. खनिज-संपदा पर कब्जा करने के लिए पूंजीपतियों के बीच होड़ मची रहती है. उसके लिए आदिवासियों को निर्लज्जतापूर्ण ढंग से विस्थापित किया जा रहा है. जिस समय तक ये कारखाने नहीं लगे थे, उन दिनों धातु-शोधन करना मुख्यतः आदिवासियों तथा उन लोगों का कार्य था, जिन्हें बाद में निचली जाति का मान लिया गया. उनके द्वारा शोधित धातुओं(तांबा) से हल की फाल भी बनाई जाती थी, औजार भी. किंतु उनके हुनर और प्राकृतिक विज्ञानों के क्षेत्र में उनकी अनुभव-सिद्ध जानकारी का—वैदिक जनों की दृष्टि में कोई महत्त्व नहीं था. न ही उस परिवेश से निकलकर आए आधुनिक ब्राह्मणवादी बुद्धिजीवियों का ध्यान उस ओर गया. इसका दुष्परिणाम भारतीय समाज में ज्ञान-विज्ञान की निरंतर उपेक्षा के रूप में सामने आया. विशेषकर नए ज्ञान और शोध को लेकर. धर्म का स्वभाव होता है, वर्तमान और भविष्य की दुहाई देते हुए, अतीत की ओर बार-बार झांकना. उसपर हम भारतीय धर्म को कुछ ज्यादा ही अहमियत देते आए हैं, इसलिए हर नई समस्या का समाधान हमें अतीत की खोह में ले जाता है. समस्या सुलझने के बजाए और जटिल हो जाती है. इसका नुकसान बहुजनों को उठाना पड़ता है. अपनी विशिष्ट स्थिति का लाभ उठाकर अभिजन समूह हालात को अपने स्वार्थ के अनुरूप मोड़ने में कामयाब हो जाते हैं.

भारतीय संस्कृति में शूद्रों की उपस्थिति को लेकर जितने भी शोध सामने आए हैं, उनमें से अधिकांश वेदाध्ययन के अधिकार को शूद्रत्व की कसौटी मानते हैं. एक वर्ग कहता है कि शूद्रों को वेदाध्ययन और यज्ञादि कर्मकांडों में हिस्सेदारी का अधिकार था. दूसरा इससे इन्कार करता है. अपने-अपने मत के समर्थन में दोनों अपने तर्क लगभग एक जैसे ग्रंथों से जुटाते हैं. उन ग्रंथों से जो ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण से उसका महिमामंडन करते हुए रचे गए हैं. जिनका येन-केन-प्रकारेण उद्देश्य जाति-और वर्ण-व्यवस्था को बनाए रखना है, ताकि कुछ लोगों के विशेषाधिकार बने रहें. वेदाध्ययन और कर्मकांडों को लेकर स्वयं शूद्रों की दृष्टि क्या थी? क्या उन्हें वेदाध्ययन और कर्मकांडों से वंचित किए जाने बहुत क्षोभ था? क्या इनसे वंचित किए जाने का उनकी उत्पादकता पर कोई प्रभाव पड़ा था? अथवा वे किसी स्वतंत्र धर्म-दर्शन के अनुयायी थे तथा वैदिक कर्मकांडों को निरर्थक मानकर स्वयं ही उनसे सुरक्षित दूरी बनाए हुए थे? इस प्रकार के प्रश्नों को लेकर उनमें कोई बेचैनी नजर नहीं आती. कदाचित उनके लिए यह समस्या ही नहीं थी. उनमें से अधिकांश भारत के अतीत में सिवाय वैदिक सभ्यता और संस्कृति के कुछ ओर दिखाई ही नहीं देता. जो जानते-समझते हैं, वे इस सत्य पर पर्दा डाले रहते हैं. उन्हें डर लगा रहता है कि खुलते ही विशेषाधिकार छीने जा सकते हैं. जिन ग्रंथों के आधार वे इस निष्कर्ष तक पहुंचे हैं, उन्हीं के स्वतंत्र विवेचन द्वारा हम बड़ी आसानी से समझ सकते हैं कि समाज का बड़ा वर्ग, वैदिक कर्मकांडों की निरर्थकता को पहचानकर, स्वयं उनसे दूरी बनाए हुए था. उसमें वही लोग थे, जो अपने श्रम-कौशल के आधार पर जीविकोपार्जन करते थे. धर्म उनके लिए जीवनदायिनी प्रकृति के प्रति निजी आस्था और विश्वास  का मसला था. उस तरह दिखावे का नहीं जैसा वैदिक धर्म के अनुयायी कर रहे थे.

संस्कृत वाङ्मय के आधार पर अनार्यों की स्थिति का वर्णन करते हुए एक बात अकसर भुला दी जाती है, वह है उनकी आर्थिक स्वतंत्रता. समय के साथ हालांकि उसमें उतार-चढ़ाव आते रहते थे. बावजूद इसके अपने श्रम-कौशल के दम पर उनका बड़ा हिस्सा अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने में सफल हुआ था. एक तरह से प्राकृतिक विज्ञानों के अनुप्रयोग की जिम्मेदारी उन्हीं की थी. हालांकि ज्ञान-विज्ञान का अंतरण मुख्यतः अनुभव आधारित था. शिल्पकार वर्ग अपने पुत्र या उत्तराधिकारी को शिल्पकर्म से जुड़ी जानकारी देकर उऋण हो लेता था.़ अनुभवों की वंशानुगत अंतरण पद्धति में ज्ञान का लंबे समय तक संरक्षण और उसमें क्रमागत विकास असंभव था. ऊपर से निचले वर्गां में शिक्षा का अभाव, जिसने उन्हें अपने ही ज्ञान के प्रति उदासीन बना दिया था. फिर भी अपने संगठन-सामर्थ्य एवं बाहरी स्पर्धा के बल पर, शिल्पकार समूह अपनी आर्थिक स्वतंत्रता को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में सफल रहे थे. उस समय तक उत्पादन आवश्यकता केंद्रित था. मुनाफे की अवधारणा जन्मी नहीं थी. उत्पादक और उपभोक्ता के बीच सीधा संबंध था. उनके उत्पादों की स्थानीय और सुदूर बाजारों में बराबर मांग थी—इस कारण उनकी उपेक्षा असंभव थी. अनुकूल परिस्थितियां के चलते शिल्पकार वर्ग ने ईसा पूर्व चौथी-पांचवी शताब्दी तक अपनी समाजार्थिक स्वतंत्रता बनाए रखी. किंतु ‘मनुस्मृति’ तथा ‘अर्थशास्त्र’ की रचना के बाद समाज के चार्तुवर्ण्य विभाजन को राज्यों का समर्थन मिलने लगा था. चाणक्य शिल्पकार समूहों की स्वायत्तता को राज्य के लिए हानिकारक मानता था. ‘अर्थशास्त्र’ की रचना के बाद सहयोगाधारित व्यापारिक संघों पर तरह-तरह के प्रतिबंध थोपे जाने लगे. उसके चलते उत्पादक एवं उपभोक्ता के बीच एक नए व्यापारी वर्ग का उदय हुआ, जिसका प्रमुख कार्य उत्पादों को उसके उपभोक्ता-वर्ग तक पहुंचाना और बदले में अच्छा-खासा मुनाफा अपने लिए सुरक्षित रख लेना था. उससे मुनाफे की अवधारणा विकसित हुई. राज्य के संरक्षण में पनपे व्यापारी वर्ग ने कर्मकार वर्गों से उनके उत्पाद के मूल्यांकन का अधिकार छीन लिया. कालांतर में वह उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक दुर्दशा का कारण बना.

चाणक्य केंद्रीय सत्ता का समर्थक था. उसकी प्रमुख कृति ‘अर्थशास्त्र’ में किसी नए अर्थशास्त्रीय सिद्धांत की विवेचना नहीं है. वह विशुद्ध रूप से राजनीति का ग्रंथ है. पुस्तक के आरंभ के कई अध्याय राजा की सुरक्षा से संबंधित हैं. इसके लिए वह तरह-तरह के कूटनीतिक उपाय बताता है. राजनीति षड्यंत्रों के समय रहते पर्दाफाश तथा उनसे राज्य और राजा दोनों की सुरक्षा के लिए वह पूर्ववर्ती आचार्यों नारद, बृहश्पति, शुक्राचार्य आदि के ग्रंथों से उद्धरण प्रस्तुत करता है. इस कारण अर्थशास्त्र को ‘आन्वीक्षकी’ भी कहा गया है. सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य वंश का संस्थापक तथा अपने समय का सर्वाधिक शक्तिशाली सम्राट था. उसके पास पांच लाख से अधिक का सैन्यबल था. फिर चाणक्य को डर किस बात का था? क्यों राजा की सुरक्षा की चिंता करते हुए उसे अपनी पुस्तक के कई अध्याय ‘आन्वीक्षकी’ के नाम करने पड़े. सवाल यह भी है कि अर्थनीति विषयक साधारण जानकारी के बावजूद उस पुस्तक को ‘अर्थशास्त्र’ जैसा शीर्षक क्यों दिया गया? क्या महज इसलिए कि अरस्तु की ‘पॉलिटिक्स’ नामक पुस्तक उससे पहले आ चुकी थी; और वह भारत विजय का सपना लेकर निकले सिकंदर का गुरु था? अगर नहीं तो राजनीति-शास्त्र की पुस्तक के अवांतर नामकरण के लिए चाणक्य की जो आलोचना अपेक्षित थी, उससे आगे के विद्वान क्यों बचते रहे? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनके उत्तर भारतीय संस्कृति और इतिहास में नदारद हैं. लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों के निष्पक्ष विवेचन द्वारा उनके उत्तर खोजे जा सकते हैं.

सिंकदर का आक्रमण देश पर पहला सुगठित हमला था, जिसके पीछे आक्रमणकारी के साम्राज्यवादी मंसूबे एकदम साफ थे. चंद्रगुप्त के रण-कौशल से वह हमला नाकाम हो चुका था. उसके बहाने सत्ताधारी समूह जनता को यह समझाने में कामयाब रहे थे कि बाहरी आक्रमणों से सुरक्षा के लिए बड़े राज्यों का गठन अपरिहार्य है. लेकिन बड़े राज्यों की सफलता केंद्रोन्मुखी अर्थव्यवस्था के बिना संभव न थी. चंद्रगुप्त की सेना किसी भी तत्कालीन सम्राट से बड़ी थी. इतनी बड़ी सेना और राज्य के प्रबंधन हेतु भारी-भरकम मशीनरी का इंतजाम तभी संभव था, जब उत्पादन और वितरण के स्रोतों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में राज्य के सीधे नियंत्रण, अथवा उसके भरोसेमंद लोगों के अधीन लाया जाए. चाणक्य ने यही किया था. डॉ. रमेश मजूमदार ने अपनी पुस्तक ‘कॉआपरेटिव्स इन एन्शीएंट इंडिया’ में लगभग तीस प्रकार के सहयोगाधारित उत्पादक संगठनों का उल्लेख किया है. वे संगठन पूर्णतः स्वायत्त थे. यहां तक कि राजा को भी उनकी कार्यशैली में दखल देने का अधिकार न था. संगठन के मुखिया को राज-दरबार में सम्मानजनक स्थान प्राप्त होता था. आवश्यकता पड़ने पर राजा भी उनसे मदद लेता था. ऋग्वेद में भी ‘पणि’ का उल्लेख हुआ है, जो सहयोगाधारित व्यापारिक संगठनों की प्राचीनतम उपस्थिति को दर्शाता है. पणि पशुओं के व्यापारी थे. सहयोगाधारित व्यापार की यह परंपरा सिंधु सभ्यता की देन थी. उसके व्यापारिक काफिले बेबीलोन, मिस्र आदि देशों की निर्बाध यात्रा करते रहते थे. मामूली संसाधनों के भरोसे लंबी व्यापारिक यात्राएं करना बिना आपसी सहयोग के संभव ही नहीं था. सिंधु सभ्यता से लेकर मेसापोटामिया, मिस्र, ईरान आदि में मिली लगभग एक समान मुहरों से इन सभ्यताओं की बीच आपसी लेन-देन की बात पुष्ट होती है.

चाणक्य ने गौ-अध्यक्ष, नाव-अध्यक्ष, रथाध्यक्ष, सीताध्यक्ष जैसे पदों का विधान किया. उससे पहले गोपालक, नाविक, रथवाह, बुनकर, सार्थवाह, तैलिक आदि के अपने-अपने स्वतंत्र संगठन थे. चाणक्य ने नए पदों के सृजन द्वारा उनकी स्वायत्तता को मर्यादित कर, उन्हें  प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में राज्य के अधीन कर लिया गया था. इस तरह सोची-समझी नीति के तहत व्यापारी वर्ग को बढ़ावा दिया गया. ब्राह्मण धर्मसत्ता को संभाले था, जबकि क्षत्रिय का राजसत्ता पर कब्जा था. राज्य के समर्थन और संरक्षण में पनपे तीसरे व्यापारी वर्ग ने जो शेष दो वर्णों, ब्राह्मण एवं क्षत्रिय की भांति अनुत्पादक वर्ग था—उत्पादकता के स्रोतों पर अधिकार कर, अर्थसत्ता को भी अपने अधीन कर लिया गया. राजनीतिशास्त्र की कृति का ‘अर्थशास्त्र’ नामकरण वस्तुतः समाज के उत्पादक वर्गों की स्वायत्तता को, राजनीतिक तंत्र के अधीन लाने की कूटनीतिक चाल थी. उससे स्वतंत्र पेशे जाति का रूप लेने लगे. शिल्पकारों से अपनी मर्जी के उत्पादन तथा उत्पाद का मूल्यांकन का अधिकार छीन लिया गया. उत्पीड़न के शिकार लोग कभी भी विद्रोह कर, राज्य और राजा दोनों के लिए खतरा बन सकते हैं, चाणक्य को इसका अंदेशा कदाचित ज्यादा ही था. इसलिए वह एक ओर आन्वीक्षकी के तरह-तरह उपाय बताता है, कराधान प्रणाली को मजबूत करने के सुझाव देता है, साथ ही राजा की सुरक्षा और अनुशासन के नाम पर कठोर दंडविधान की अनुशंसा भी करता है. चाणक्य के अर्थशास्त्र में साधारण नागरिक की महत्ता राज्य के प्रति उसकी उपयोगिता से आंकी जाती थी. जो राज्य का नहीं है, वह कहीं का नहीं है.

अरस्तु चाणक्य का समकालीन था. उससे कुछ बड़ा. चाणक्य ने चंद्रगुप्त को शिक्षित किया था तो अरस्तु सिकंदर का गुरु था. दोनों के बीच यह मामूली समानता है. लेकिन दोनों के राजनीति विषयक चिंतन में जमीन-आसमान का अंतर है. चाणक्य के नजरों में राजा सर्वेसर्वा है, जबकि अरस्तु की ‘पॉलिटिक्स’ के केंद्र में मनुष्य है. नैतिकता को राज्य के गठन की आधारशिला मानने वाले अरस्तु का विचार था—‘श्रेष्ठ प्रजा ही श्रेष्ठ शासन को जन्म दे सकती है.’ ‘अर्थशास्त्र’ का मूल संदेश सर्वसत्तावादी है. चाणक्य को राजा के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता. उसकी निगाह में प्रजा और बाकी दरबारीगण केवल इसलिए आवश्यक हैं, क्योंकि वे राजा के होने को प्रासंगिक बनाते हैं. दूसरी ओर अरस्तु का दर्शन ‘न्याय’ का दर्शन है. उसके अनुसार प्रजा-कल्याण हेतु समर्पित भाव से काम करना, राजा का कर्तव्य है. वही राज्य के गठन का औचित्य भी है. ‘अर्थशास्त्र’ में प्रजा कल्याण राजा का कर्तव्य न होकर, ‘कृपाभाव’ है. बहरहाल, भारत में देशज कृति ‘अर्थशास्त्र’ को सराहा गया. वैसे भी दुनिया में हो रही ज्ञान-संबंधी हलचलों की ओर से आंखें मूंदे रहना ब्राह्मणों का स्वभाव रहा है. उनकी आत्ममुग्धता भी कमाल की थी. सिवाय खुद के कुछ देख ही नहीं पाती थी. ज्ञान के क्षेत्र में जो सर्वात्तम है, वह भारतीय है. और भारत में जो श्रेष्ठतम विचार है वह किसी न किसी ब्राह्मण के दिमाग की उपज है—इस भ्रांत धारणा ने उन्हें विदेशी ज्ञान-विज्ञान के प्रति सदैव उदासीन बनाए रखा. दुनिया में ऐसे अनेक यायावर जिज्ञासु रहे हैं, जिन्होंने अपना जीवन और श्रम दूसरे देशों और सभ्यताओं के बीच जाकर ज्ञान को सहेजने में लगाया है. मेगस्थनीज, ह्वेनसांग, फाह्यान, अल-बरूनी, इब्नबतूता, अल-मसूदी, अल-बरूनी जैसे सैकड़ों विद्वान थे, जो ज्ञान-विज्ञान की खोज के लिए हजारों मील की यात्रा करके भारत पहुंचे थे. लेकिन भारत का बुद्धिजीवी वर्ग इतना आत्ममुग्ध रहा कि उसने बाहरी देशों में चल रही ज्ञान की हलचलों की ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया. ब्राह्मणों की मेधा स्मृतियों, पुराणों और आरण्यकों की गुलाम रही. जबकि उनका श्रम वर्ण-व्यवस्था को चिरस्थायी बनाने में लगा रहा. परिणामस्वरूप देश में धर्म और जाति का ऐसा गठजोड़ बना कि सुधारवादी आंदोलनों की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा उनसे जूझने में खपता रहा. चूंकि उन आंदोलनों का नेतृत्व उच्च जाति के लोगों के पास था, जिनके अपने स्वार्थ जाति को सुरक्षित रखने में थे, इसलिए परिवर्तनकारी आंदोलनों के प्रति उनमें से अधिकांश का रवैया ढुलमुल ही रहा. प्राचीन संस्कृत वाङ्मय में शायद ही कोई उदाहरण हो जिसमें किसी पिता ने वर्णोचित गुणों के अभाव में अपनी संतान के वर्ण के अवमूल्यन की शिकायत की हो. जबकि जातिवाद को प्रश्रय देने, अयोग्य पुत्र को उत्तराधिकार के रूप में विरासत सौंपने के यहां अनगिनत उदाहरण हैं.

यह ठीक है कि अपने जन्म के साथ ही जाति-प्रथा को भारी आलोचना का सामना करना पड़ा था. कई बार ऐसे अवसर भी आए जब लगा कि इस व्यवस्था के दिन लद चुके हैं. समाज सुधार के क्षेत्र में समय-समय चलाए गए आंदोलनों से उसे कुछ समय के लिए धक्का अवश्य लगा, परंतु धर्म के समर्थन तथा लंबे जाति-आधारित स्तरीकरण के कारण, जो हर जाति को किसी न किसी जाति से ऊपर होने का भरोसा देता है—ऐसा कभी नहीं हुआ कि उसका अस्तित्व सचमुच खतरे में पड़ा हो. सामंती लक्षणों से युक्त जाति हमेशा ही भारतीय समाज का कलंक बनी रही. जाति और धर्म की जकड़न में आत्मविश्वास गंवा चुके भारतीय समाज ने विकास की ऐसी उल्टी चाल चली कि समकालीन सभ्यताओं में सर्वाधिक विकसित सिंधु सभ्यता का जनक और ज्ञान, विज्ञान, इंजीनियरिंग, गणित, ज्योतिष, स्थापत्य आदि क्षेत्रों में बाकी देशों के मुकाबले अग्रणी स्थान रखने वाला भारत लगातार पिछड़ने लगा. शताब्दियों से जाति और धर्म के सहारे विशेष सुख-सुविधाओं से लाभान्वित रहा वर्ग, आज भी जाति को भारतीय संस्कृति की उत्कृष्ट देन मानता है; और तमाम आलोचनाओं-विरोधों के बावजूद  उसे किसी न किसी रूप में सुरक्षित रखना चाहता है. उनमें सबसे बड़ी संख्या ब्राह्मणों की ही है. आखिर जाति का उत्स क्या है?

प्रायः यह प्रश्न उठाया जाता है कि जातीय शोषण के विरुद्ध निरंतर संघर्ष के बावजूद भारतीय समाज उसकी जकड़न से बाहर आने में क्यों असमर्थ रहा. संख्या में कई गुना होने के बावजूद बहुजन समाज अल्प-संख्यक अभिजनों की समाजार्थिक दासता में बने रहने के लिए विवश क्यों हुआ? इस धारणा को चिरस्थायी बनाए रखने के लिए जाति-व्यवस्था के विरोधी भी कम जिम्मेदार नहीं हैं. अभी तक जातीयता के उपकार एवं अपकार के अध्ययन हेतु आदि स्रोत के रूप में ऋग्वेद को लेने की मान्यता रही है. ऋग्वेद जो ब्राह्मण मनीषा का आदि ग्रंथ है, उसे भारतीय प्रायद्वीप के बौद्धिक उठान का आदि ग्रंथ भी मान लिया जाता है. ऐसा करके हम आर्यों के आगमन से पूर्व के भारत के इतिहास को पूरी तरह उपेक्षित कर जाते हैं. जबकि मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, कालीबंगा, लोथल आदि स्थानों के उत्खन्न के पश्चात हम एक समृद्ध अनार्य सभ्यता से परिचित हो चुके हैं. उसपर प्रामाणिक लेखन और ऐसे साक्ष्य मौजूद हैं, जिनसे हम समानांतर सभ्यता का चिह्नन कर सकते हैं. ऋग्वेद को भारतीय मनीषा का आदि ग्रंथ मानने का दूसरा बड़ा नुकसान यह होता है कि वर्णाश्रम व्यवस्था का अध्ययन शूद्रों को यज्ञादि का अधिकार होने या न होने में सिमट जाता है. इस तरह हम आलोचना की ब्राह्मणवादी दृष्टि से बाहर नहीं निकल पाते. उदाहरण के लिए ‘शूद्र’ शब्द की व्याख्या को ले सकते हैं. अपने लेखों में विधुशेखर भट्टाचार्य इस शब्द को ‘क्षुद्र’ से व्युत्पत्तित बताते हैं. उनकी पूर्वाग्रहों में रची-बसी दृष्टि शूद्रों की सामाजिक अधिकारिता को वैदिक कर्मकांडों में हिस्सेदारी तक सीमित कर देती है. डॉ. रामशरण शर्मा ने संस्कृत गं्रथों में शूद्र की स्थिति को लेकर गहन अध्ययन किया है. उन्हें वामपंथी सोच का प्रगतिशील लेखक माना जाता है. परंतु शूद्र को लेकर वे भी जातीय पूर्वाग्रहों से बाहर नहीं निकल पाते. ‘शूद्र इन एन्शीएंट इंडिया’ में वे इसी सोच को विस्तार देते हैं.

ब्राह्मणवाद के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए अधिकांश विद्वान बौद्ध धर्म को प्रस्थान बिंदू मानते हैं. यह धारणा कदाचित डॉ. आंबेडकर द्वारा हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाने से बनी है. बौद्ध धर्म को ब्राह्मणवाद के विरोध का प्रस्थान बिंदू मानने वाले विद्वान प्रायः यह भूल जाते हैं कि बुद्ध का विरोध वर्ण-व्यवस्था से नहीं था. न ही वे जाति को अनावश्यक मानते थे. जाति और वर्ण-व्यवस्था के विरोध में उन्होंने कोई आंदोलन भी नहीं किया था. वे सिर्फ जाति-आधारित भेदभाव से मुक्ति चाहते थे. बुद्ध के पांच प्रमुख शिष्यों में से एक उपालि नाई जाति से था. कुछ भिक्षु निचली जाति इस कारण उनका उपहास भी उड़ाते थे. बुद्ध तक जब यह बात पहुंची तो उन्होंने उपालि की जाति पर कुछ नहीं कहा. न ही जाति को अनावश्यक माना. केवल जाति के आधार पर किसी को छोटा-बड़ा न मानने, भेदभाव न करने का उपदेश दिया. कुछ स्थानों पर तो वे वर्ण-व्यवस्था के पक्ष में खड़े होते दिखाई पड़ते हैं.

ईसा से पांच-छह से वर्ष पहले का समय, मनुष्यता के इतिहास का वह कालखंड है, जिसे मानवीय बुद्धि के विस्फोट के रूप में देखा जाता है. उस दौर में भारत में बुद्ध, महावीर स्वामी, चीन में कन्फ्यूशियस, बेबीलोन में सायरस, पर्शिया में जरथ्रुस्त तथा यूनान में सुकरात जैसे दार्शनिक पैदा हुए. उन सबने जीवन में नैतिकता को महत्त्व दिया. जबकि भारत की सभ्यता का विकास ब्राह्मणवाद की अधीनता तथा उसके वर्चस्व तले हुआ था. ब्राह्मण को नैतिकता, सामाजिक सौहार्द, बराबरी तथा न्याय-परंपरा में कभी विश्वास नहीं रहा. आरंभ से ही वह आधुनिकता विरोधी और धर्मसत्ता के प्रति दुराग्रहशील रहा है. आलोचना से बचने के लिए ब्राह्मणों ने असमानता को दैवीय घोषित किया. ऐसी स्थितियां रचीं कि जो दैवीय है, उसे न्यायसंगत भी मान लिया जाए. यह काम अकेले धर्म के भरोसे संभव नहीं था. इसलिए राजसत्ता को अपने पक्ष में लिया गया. भारत के सांस्कृतिक इतिहास में धर्म की विभिन्न धाराओं के बीच संघर्ष के सैकड़ों उदाहरण हैं. राजनीति के क्षेत्र में भी लोगों की महत्त्वाकांक्षाएं एक-दूसरे से टकराती रही हैं. परंतु धर्म और राजनीति का संघर्ष, विशेषकर राजनीति द्वारा धर्म से आजादी के संघर्ष का यहां कोई उदाहरण नहीं है. दधिचि का महिमामंडन उनकी दानशीलता के लिए किया जाता है. कहा जाता है कि उन्होंने धर्म के लिए जीवन की परवाह नहीं की और देवासुर संग्राम में देवताओं की जीत के लिए, जीते-जी अपनी हड्डियां तक दान कर दीं. लेकिन उस कथित त्रिकाल-दृष्टा महर्षि ने भी प्राणोत्सर्ग से पहले देवासुर संग्राम के औचित्य पर कोई सवाल नहीं किया था. न यह पूछा कि उस संग्राम में न्याय किस ओर है. जाहिर है, दधिचि का दान एक बूढ़े-मरणासन्न ब्राह्मण द्वारा ब्राह्मणवाद को बचाए रखने के लिए किया गया बलिदान था. धर्म उनके लिए राजनीति थी. ऐसा टोटम जिसपर बिना बुद्धि-विवेक के विश्वास कर लिया जाता है. भावनाओं में बहकर बहुजन भी वज्र के लिए देह गलाने वाले दधिचि के निर्णय को न्याय-अन्याय की कसौटी पर कस नहीं पाते. दधिचि के लिए देवताओं का पक्ष ही न्याय का पक्ष है. और जो देवताओं का पक्ष है, असलियत में वह ब्राह्मण का ही पक्ष है. पुराणों और उपनिषदों में भरे ऐसे आख्यान, वर्ण-व्यवस्था के लिए खाद-पानी का काम करते हैं.

दूसरी ओर पश्चिम में नैतिकता और मानवादर्शों के लिए आत्मबलिदान के अनेक उदाहरण हैं. प्लेटो का संबंध एथेंस के राज-परिवार से था. इस आधार पर वह स्वयं को राज्य का  उत्तराधिकारी भी मानता था. बावजूद उसने अपने गुरु सुकरात का अनुसरण करते हुए उसने सत्ता के आगे समर्पण करने के बजाए अपने विवेक और नैतिकता को हमेशा आगे रखा. उसके जीवन में एक या दो ऐसे अवसर आए जब उसे राजसत्ता के कोप से बचने के लिए भागना पड़ा. अरस्तु ग्रीक सेनानी सिकंदर का गुरु था. सिकंदर उसका सम्मान करता था. अरस्तु द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय तथा प्रयोगशालाओं के लिए सिकंदर की ओर से आवश्यक मदद प्राप्त होती थी. इसके बावजूद अरस्तु ने शक्तिशाली राज्य के बजाए नीति-केंद्रित राज्य का समर्थन किया था. अपनी स्वतंत्र लेखनी के कारण एक बार वह सिकंदर को भी जब वह युद्ध अभियान पर निकला हुआ था—नाराज कर बैठा था. जिससे सिकंदर ने उसे मृत्युदंड देने की ठान ली थी. यदि भारत से लौटते समय सिंकदर की असाममियक मृत्यु नहीं होती तो अरस्तु को दंडित किया जाना तय था.

यहां एक और सवाल खड़ा होता है. वर्ण-व्यवस्था के दबाव के चलते यदि शूद्रों को स्वतंत्र रूप से सोचने, अपनी कला को निखारने का यदि अधिकार ही नहीं था, तो उन्हें सभ्यता का वास्तविक निर्माता कैसे कहा जा सकता है. यदि उनका दिलो-दिमाग ब्राह्मणों तथा दूसरी शीर्ष जातियों के पूरी तरह अधीन था तो वे शिल्पकर्म के अद्भुत चितेरे, अनूठी स्थापत्य कला के धनी, कुशल आविष्कारक भला कैसे कहा जा सकता है? यह आशंका उन ग्रंथों को पढ़ते हुए विश्वास में बदलने लगती है, जिन्हें भारतीय मेधा के चमत्कार के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. जिन्हें विद्वान प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति की पड़ताल के लिए उदाहरण के रूप में पेश करते आए हैं. उनमें सर्वपल्ली राधाकृष्णन, राधाकुमुद मुखर्जी, डॉ. रामशरण शर्मा जैसे विद्वान भी शमिल हैं. उनके अध्ययन की एकमात्र विशेषता, जो वस्तुतः उनकी बौद्धिक दुर्बलता है, वह यह है कि वे सभी स्वनामधन्य विद्वान भारतीय सभ्यताकरण की शुरुआत वेदों से करते हैं. ऋग्वेद उनके लिए भारतीयता की पहचान का आदि-ग्रंथ है. वैदिक संस्कृति के व्यामोह में फंसकर वे उन तथ्यों की एकदम उपेक्षा कर जाते हैं, जो हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, लोथल जैसे प्राचीनतम स्थलों के उत्खन्न से प्राप्त हुए हैं.

ऊपर के विश्लेषण से हम एक और सामान्य निष्कर्ष निकाल सकते हैं. यह कि संस्कृति की पहचान प्रायः उन लोगों से होती है, जो किसी न किसी रूप में उसका मूल्य वसूलने में लगे रहते हैं. न कि उन लोगों से जो उसे बनाने से लेकर सहेज कर रखने में भारी भूमिका निभाते हैं. शिखर पर विराजमान लोग सांस्कृतिक उपादानों का संरक्षण इस प्रकार करते हैं कि संस्कृति निर्माण में बाकी लोगों की भूमिका गौण मान ली जाती है. भारत की प्राचीन संस्कृति जिसे वैदिक संस्कृति भी कहा जाता है, का नाम आते ही बड़े-बड़े आश्रमों में रहने वाले ऋषिकुलों, मंत्रोच्चार करते साधुओं यज्ञ-वेदि के समक्ष गूंजती ऋचाओं का ध्यान आ जाता है. उस समय का बाकी समाज कैसा था? उसकी रोजमर्रा की गतिविधियों, जीवनशैली, कला-कौशल और समाज की बेहतरी हेतु बहाए गए स्वेद-बिंदुओं की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता. हम उन राजाओं के बारे में जानते हैं, जिनके शासनकाल में सोमनाथ और खुजराहो जैसे मंदिर बने. ताजमहल, लालकिला, कुतुबमीनार जैसी इमारतें बनाने वाले शासकों के नाम भी इतिहास में दर्ज हैं. यह सब कहीं न कहीं हमारी संस्कृति का हिस्सा भी हैं. लेकिन सोमनाथ और खुजराहो के मंदिरों के असल रचनाकार कौन थे? लालकिले के लिए पत्थर तराशने  वाले, ताजमहल में प्राण-प्रतिष्ठा करने वालां के नाम तक नहीं जानते. शताब्दियों की बौद्धिक गुलामी ने हमारी मानसिक सरंचना ऐसी कर दी है कि हमारा मस्तिष्क, अपने ही इतिहास को उन लोगों की निगाह से देखने लगा है, जो हमारी दासता का कारण रहे हैं. ऋग्वेद में दर्जनों मंत्रों में इंद्र द्वारा असुरों के पुरों का ध्वंस करने का उल्लेख है. उसे पुरंदर की उपाधि भी असुर-नगरों को नष्ट करने के कारण प्राप्त होती है. लेकिन उन दुर्गों का वास्तविक निर्माता, वहां के निवासियों के लिए हथियार और आवश्यक सुख-साधन जुटाने वाले शिल्पकार वर्ग के बारे में यह ग्रंथ मौन रह जाता है.

बहुजन संस्कृति इन्हीं प्रच्छन्न दस्तावेजों की खोज का एक सिलसिला है.

© ओमप्रकाश कश्यप

 

ई वी रामास्वामी पेरियार : दि वाल्तेयर ऑफ ईस्ट

सामान्य

ईश्वर नहीं है..

ईश्वर नहीं है

ईश्वर हरगिज नहीं है….

जिसने ईश्वर को गढ़ा वह मूर्ख था

जो ईश्वर की वकालत करता है, वह महाधूर्त्त है

जो ईश्वर की पूजा करता है, वह असभ्य है.

ईश्वर नहीं है..

ईश्वर नहीं है

ईश्वर हरगिज नहीं है….

ईवी रामास्वामी पेरियार

भारत में जातीय शोषण में लगी शक्तियों की पैठ का आकलन इससे भी किया जा सकता है कि यहां सुधारवादी आंदोलनों की धारा बहुत प्रच्छन्न और अवमंदित रही है. ज्ञात इतिहास में ब्राह्मणवाद को पहली चुनौती बुद्ध की ओर से मिली. बुद्ध से भी पहले आजीवक और लोकायत जैसे प्रकृतिवादी दर्शन ब्राह्मणवाद के समानांतर अपनी उपस्थिति बनाए हुए थे. उस समय तक ब्राह्मणधर्म केवल आश्रमों तक सीमित था. वहीं से वह धीरेधीरे राजकुलों पर अपना प्रभाव जमाने की कोशिश कर रहा था. किसानों, शिल्पकारों, श्रमिकों तथा दासवर्ग के लिए न तो ब्राह्मणधर्म में कोई जगह थी, न ही उन्हें उसकी विशेष चिंता थी. फिर जैसेजैसे राज्य संगठित होते गए, लोगों पर अपना अनुशासन बनाए रखने के लिए धर्म और राजनीति परस्पर जुड़ते चले गए. बुद्ध के समय तक ब्राह्मणपुरोहित राज्यों पर अपनी पकड़ बना चुके थे. इसके साथसाथ जनता पर भी उनका प्रभाव बढ़ा था, जिसने उन्हें अतिरिक्त रूप से शक्तिशाली बना दिया था. अब वे राजाओं के आगे मनमानी करने, मनचाही मांगे रखने तथा उन्हें अपने स्वार्थ के अनुरूप निर्णय लेने को विवश कर सकते थे. राजा उनकी मनमानी से खिन्न भी होते थे. यज्ञ और दानादि पर होने वाले विपुल खर्च से उनपर आर्थिक बोझ भी पड़ता था. इसलिए बुद्ध ने कर्मकांड और बलिप्रथा का विरोध करते हुए, कर्मकांड विरोधी, उदार और मध्यममार्गी धर्मदर्शन का विचार लोगों के सामने रखा तो तत्कालीन राजाओं द्वारा उसका खुले मन से स्वागत किया गया. उसके फलस्वरूप ब्राह्मणधर्म को आने वाली कई शताब्दियां निर्वासन में गुजारनी पड़ीं. बुद्ध को वर्णव्यवस्था से शिकायत न थी. उनका विरोध जातिआधारित भेदभाव, शोषण और थोपी गई असमानता से था. उनका असली हमला यज्ञ के बहाने दी जाने वाली निरर्थक बलियों, तंत्रमंत्र, पूजापाखंड तथा कर्मकांड पर हुआ, जो आदमीआदमी के बीच द्वेष और भेदभाव परोसते थे. शोषणकारी जातिव्यवस्था को दैवी ठहराते थे. जनसाधारण की आय का बड़ा हिस्सा उसके विकास में काम आने बजाए आडंबरों पर व्यर्थ चला जाता था. बुद्ध के नैतिक आभामंडल के आगे ब्राह्मणवादी शक्तियां लंबे समय तक निस्तेज रहीं.

ब्राह्मणधर्म को दूसरी चुनौती संत कवियों की ओर से मिली. आरंभिक संत कवि समाज के निचले वर्गों से आए थे. अन्य धर्मों में धर्मग्रंथों को पढ़नेपढ़ाने का काम पवित्र माना जाता है, भारत में वेदादि ग्रंथों का पाठ बहुसंख्यक वर्ग के लिए निषिद्ध था. शूद्र वेदाध्ययन की कोशिश करे तो उसके कानों में पिघला सीसा डालने का शास्त्रोक्त दंडविधान था. देवालयों में पूजनअर्चन तो दूर, उनकी सीढ़ियां चढ़ना भी उनके लिए निषिद्ध था. जातीय शोषण झेलते आए उन कवियों ने आडंबरों को धता बताते हुए, निराकार ईश्वर की अराधना पर जोर दिया. मंदिरप्रवेश पर पाबंदी को उन्होंने यह कहकर चुनौती दी कि ईश्वर मंदिरमस्जिद में नहीं, मनुष्य के हृदय में वास करता है. धर्म के नाम पर दिखावा करने वालों को ललकारा. मूर्ति पूजा के विरुद्ध विद्रोही तेवर अपनाते हुए कबीर ने कहा कि यदि पत्थर पूजने से ईश्वर प्राप्त होता है तो वे पहाड़ पूजने को तैयार हैं. रैदास ने समानता पर आधारित समाज का सपना देखा था. ऐसे ‘बेगमपुरा’ की कल्पना की थी, जहां ऊंचनीच, दुखक्लेश, कष्टशोकों का सर्वथा अभाव है. सभी स्वतंत्र हैं. आमजन ने संतकवियों के जीवनदर्शन को हृदयंगम किया. जातीय शोषण के शिकार लोग उनके अनुयायी बनने लगे. रैदास, कबीर, दादू आदि संतकवियों से प्रेरणा लेकर गुरु नानक ने सिख धर्म की स्थापना की. पूरी दुनिया को समानता का संदेश दिया. परंतु जाति की जकड़बंदी ऐसी कि बड़ेबड़े महात्माओं के प्रयत्न उसके आगे नाकाफी सिद्ध हुए.

जातीय उत्पीड़न के शिकार लोग विवश होकर धर्मांतरण की राह अपनाने लगे थे. कबीर के अनुयायियों में हिंदुमुसलमान दोनों थे. उनकी एकता से सवर्ण हिंदुओं के आगे अल्पसंख्यक हो जाने का खतरा मंडराने लगा. तात्कालिक समाधान यह था कि शूद्रों के हिंदू धर्म से पलायन को रोका जाए. जो दूर जा चुके हैं, उन्हें वापस लाया जाए. उधर संतत्व की लोकप्रियता देख उच्च जाति के कवियों ने भी ‘भक्ति’ का महिमामंडन शुरू कर दिया था. वे अपने संस्कार तथा देवता भी साथ लेकर आए थे. संत कवियों के नेतृत्व में चल रहे सुधारवादी आंदोलनों की धारा को कुंद करने के लिए उन्होंने वही किया जो दो हजार वर्ष पहले उनके पूर्वजों ने बौद्ध धर्म के साथ किया था—बुद्धत्व की प्रखरता कम करने के लिए तंत्रमंत्र तथा कर्मकांडों का बौद्ध धर्म में प्रक्षेपण. साथ में बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित करना. उसके परिणामस्वरूप ब्राह्मणधर्म के पूजापाखंड, तंत्रमंत्र और अन्यान्य आडंबरों को बौद्ध धर्म में प्रवेश मिला. गौतम बुद्ध ने मूर्ति पूजा का विरोध किया था, परंतु ब्राह्मण धर्म के प्रभाव में उनकी मूर्तियां जगहजगह लगने लगीं.

भक्त कवियों ने निराकार को छोड़ साकार का गुणगान किया. उस समय तक वैदिक देवता अप्रासंगिक हो चुके थे. देवराज इंद्र के चारित्रिक विचलन को लेकर अनेक कहानियां प्रचलित थीं. उनके आधार पर ब्राह्मण धर्म को पुनः स्थापित करना असंभव था. अतएव तात्कालिक जरूरत को समझते हुए राम और कृष्ण जैसे नए देवीदेवता गढ़े गए. उनकी प्राचीनता स्थापित करने के लिए उन्हें मिथकों के सहारे, अनार्य देवता शिव और गणपति से जोड़ा गया. ध्यातव्य है कि गणपति कोई देवता न होकर प्राचीन जनसमाजों में प्रचलित गणतंत्र का प्रतीक हैं. लगभग 2300 वर्ष पहले बड़े राज्यों की स्थापना पर जोर दिया जाने लगा था. वह राजशाही और सर्वसत्तावाद का दौर था. समाज ब्राह्मण और गैरब्राह्मण में बंट चुका था. ब्राह्मण शक्ति और सम्मान का प्रतीक था. गैरब्राह्मण जिसमें बड़ी संख्या मेहनतकशों तथा शिल्पकार वर्ग की थी. उन लोगों की थी जो कभी सफल गणतंत्र के संचालक और अनुयायी रहे थे. उन्हें सत्ता, संसाधन तथा उनके लाभों से काटकर पूर्णतः पराश्रित बना दिया गया. सर्वसत्तावाद को वैध ठहराने के लिए गणतंत्र और उससे जुड़े प्रतीकों का जमकर विरूपण किया गया. सूर, तुलसी, मीरा, नरसी मेहता आदि ने ईश्वर के अवतारवाद को स्थापित करने में मदद की. राम वाल्मीकि रामायण के कथानायक थे. उसका मूल कथानक ऋग्वेद में वर्णित राजा सुदास और दस अनार्य कबीलों के युद्ध का पुनर्कथन था, जिसे किसी अज्ञात लेखक ने सबसे पहले ‘पुलत्स्यवध’ शीर्षक से रचा था. उसी कथानक को तुलसी ने नए कलेवर में ‘रामचरितमानस’ के रूप में लिखा, जिसमें उन्होंने राम को भगवान के रूप में प्रचारित किया. धर्म के नाम पर वर्गीय स्वार्थों का समर्थन करने वाली मिथ कथाओं की रचना के साथसाथ इतिहास और संस्कृति के विरुपण का दौर भी चलता रहा. वर्चस्ववादियों ने उनकी मनमाने ढंग से व्याख्या की. तथ्यों को जमकर तोड़ामरोड़ा. स्वार्थ के लिए नएनए झूठ गढ़े गए. झूठ को सच बनाया गया. ऐसी संस्कृति की रचना की गई, जिसमें जो जितना अधिक श्रम करता था, सही मायने में उत्पादक वर्ग था, सामाजिक पायदान पर उसे उतना ही कम मानसम्मान हासिल था. जो चालाक और अनुत्पादक होकर दूसरों के श्रम पर जीता था, उसे समस्त संसाधनों का स्वामी और कर्ताधर्ता घोषित कर दिया गया.

भारतीय संस्कृति के इतिहास में हम पढ़ते आए हैं कि हजारों वर्ष पहले आर्यों ने भारत भूमि में प्रवेश किया था. बालगंगाधर तिलक जैसे लेखकों का यही मानना था. भारत पहुंचने के बाद उनका यहां के शांतिप्रिय कबीलों के साथ संघर्ष हुआ. कुछ लड़ाइयों में आर्य विजयी रहे. जहां सीधे विजय असंभव थी, वहां संधियों से काम चलाया गया. उसके लिए जो भी समझौते आवश्यक थे, किए गए. ऋग्वेद के अनुसार शिव अनार्य देवता हैं. मूलनिवासियों की सुविचारित युद्धशैली और नायकप्रधान सेना थी. इसलिए आरंभिक युद्धों में आर्यों को पराजय का सामना करना पड़ा था. सीधी लड़ाई से बचने के लिए उन्होंने कदमकदम पर कूटनीति को अपनाया. असुरों के नायक शिव को अपने पक्ष में करने के लिए आर्य सम्राट हिमवंत की पुत्री गौरी का विवाह उनके साथ कराया गया. फलस्वरूप शिव को ‘महादेव’ का दर्जा प्राप्त हुआ. शिव के देवताओं के पक्ष में जाते ही असुर बिखरने लगे. प्रकारांतर में देवताओं की कूटनीति को समझे बिना ‘भोले’ शिव भारत की मूल संस्कृति की कीमत पर, आर्य संस्कृति के सबसे सशक्त संवाहक सिद्ध हुए.

दूसरा उदाहरण कृष्ण का है. उनका आदिउल्लेख ऋग्वेद में मिलता है. तदनुसार उन्होंने अनार्य योद्धा और यदुओं के नायक के रूप में, दस सहò यदुसैनिकों के साथ इंद्र से टक्कर ली थी. इंद्र द्वारा छलपूर्वक पराजित यदु कबीला उत्तरपश्चिम की ओर विस्थापित हो गया. अगले 1500 वर्ष के अंतराल में उसके वंशज यमुना किनारे की उपजाऊ जमीन को खेती योग्य बनाकर खासी शक्ति और समृद्धि प्राप्त कर चुके थे. उनकी उपेक्षा करना संभव न था. इसलिए इंद्र के हाथों छलपूर्वक मारे गए कृष्ण को देवता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया. ‘देवराज’ के माथे से कृष्णहत्या का कलंक मिटाने के लिए महाभारत सहित पौराणिक ग्रंथों में भील को कृष्ण का हत्यारा घोषित किया गया. उसके लिए कुछ कथाएं और उपकथाएं गढ़ी गईं. इससे दो उद्देश्य साधे गए. सुदास के विरुद्ध संग्राम में भीलों ने यदु कबीले का साथ दिया था. दोनों अनार्य जातियां थीं. भील कबीले के नायक द्वारा हत्या दिखाकर एक तो इंद्र को उस कलंक से मुक्ति दिलाई गई. दूसरे यदु कबीले और भीलों की एकता को हमेशाहमेशा के लिए समाप्त कर दिया गया. राम और कृष्ण का देवत्व सिद्ध करने के लिए भक्त कवियों ने नएनए मिथ गढ़े. परिणामस्वरूप मंदिरों और धर्मालयों की खोई प्रतिष्ठा पुनः वापस लौटने लगी.

संतकाल के बाद सुधारवाद की अगली आहट उनीसवीं शताब्दी के साथ सुनाई पड़ती है. उसके पीछे पश्चिम से आए विचारों और नई शिक्षा की प्रेरणाएं थीं. उन्नीसवीं शताब्दी के सुधारवादियों को हम दो वर्गों में बांट सकते हैं. पहला धार्मिक सुधारवादी. दूसरा सामाजिक सुधारवादी. पहले वर्ग के सुधारक समाज के उच्च वर्गों से आए थे. उनकी प्राथमिकता हिंदू धर्म को उन कुरीतियों से मुक्ति दिलाना था, जो दलितों और पिछड़ों को धर्मांतरण के लिए प्रेरित कर रही थीं. धार्मिक सुधारवादियों में महर्षि दयानंद, रामकृृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद आदि के नाम लिए जा सकते हैं. उन्होंने सामाजिक भेदभाव पर सवाल उठाए. ऊंचनीच की भावना से मुक्ति का आवाह्न किया. लेकिन येनकेनप्रकारेण वे वर्णव्यवस्था के समर्थक बने रहे. जातियों को वैध ठहराने तथा शूद्रों को वैदिक संस्कृति से जोड़ने के लिए प्राचीन मिथकों का सहारा लिया गया. कुल मिलाकर जातिभेद को कम करने, ऊंचनीच की खाई को पाटने में वे सभी नाकाम रहे. जाति और धर्म के बीच शक्तिशाली गठजोड़ सामाजिक वैषम्य को प्राकृतिक बताया. जो भी हो, सुधारवादियों की असफलता ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि भारतीय समाज में जाति जीवन के प्रत्येक पक्ष को प्रभावित करती है. यहां तक कि आंदोलनों की सफलताअसफलता, उसकी दशादिशा पर भी उसके प्रवत्र्तकों की जाति का प्रभाव पड़ता है.

जाति के आधार पर सामाजिक सुधारवादियों को पुनः दो हिस्सों में बांटा जा सकता है. पहले वे जो ऊंची जातियों से आए थे. उनका असली उददेश्य हिंदू धर्म के बिखराव को रोकना था. सुधार की उनकी संकल्पना धर्म और जाति की सीमा में, उनके मूलभूत ढांचे को चुनौती दिए बिना, केवल रूढ़ियों पर प्रहार तक सीमित थी. व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव की न तो उनकी इच्छा थी, न कार्ययोजना, न ही उनकी वैचारिक चेतना में उसके लिए खास जगह थी. केशवचंद सेन(प्रार्थना समाज), डाॅ. आत्माराम पांडुरंग(ब्रह्म समाज), गोपाल भंडारकर, जस्टिस रानाडे(सर्वेंट्स आॅफ इंडिया सोसाइटी) आदि ने जातिप्रथा पर सवाल उठाते हुए उसके उन्मूलन की मांग की. परंतु उनके आंदोलन का मुख्य ध्येय छूआछूत और जातिआधारित भेदभाव को कम करने; तथा शूद्रों के प्रति थोड़ा नर्म रुख अपनाने तक सीमित था. शूद्रों के अधिकारहनन तथा उनपर होने वाले अत्याचारों की ओर से लगभग सभी मुंह मोड़े रहे. सच तो यह है कि शताब्दियों से प्राप्त सुखसुविधाओं तथा विशेषाधिकारों को पूरी तरह से छोड़ने को उनमें से कोई भी तैयार न था. इसलिए उनके आंदोलन बहुत कम प्रभावकारी सिद्ध हुए.

दूसरे वर्ग के समाज सुधारक समाज के निम्नस्थ वर्गों से आए थे. जाति आधारित भेदभाव और दमन के कड़वेकसैले अनुभव उन्हें पीढ़ियों से प्राप्त थे. नई शिक्षा और विचारचेतना ने उन्हें यह समझ दी थी कि वे शोषण के असली कारणों को समझ, उनका समाधान खोजते हुए समाज को उसके अनुरूप चेता सकें. उन्होंने जाति के साथसाथ उसको प्रश्रय देने वाले धर्म को भी अपना निशाना बनाया. यह मानते हुए कि अकेले धर्म, धार्मिक नैतिकता या नैतिकता के भरोसे सामाजिक न्याय को समर्पित आदर्श समाज की रचना असंभव है, डाॅ. आंबेडकर आदि विद्वानों विधिआधारित राज्य की आवश्यकता पर जोर दिया. ज्योतिराव फुले ने समाज को धार्मिक अंधविश्वासों से बाहर लाने के लिए शिक्षा और स्त्रीसमानता पर जोर दिया. उसके फलस्वरूप आधुनिक भारत की नींव रखी गई. यह आंदोलन जैसेजैसे आगे बढ़ा, ब्राह्मणवादी अभिजन संस्कृति के समानांतर जनसंस्कृति को बढ़ावा देने की मांग समाज में जोर पकड़ने लगी. ऐसी संस्कृति जिसमें सभी के लिए सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक स्वतंत्रता हो. लोग समानता और सहभागिता के आधार पर जीवनयापन करते हों. जो किसी भी प्रकार के स्तरीकरण से सर्वथा मुक्त हो. वे कबीर और रैदास की परंपरा के लोग थे. इस श्रेणी के विचारकों में सबसे पहला नाम महात्मा ज्योतिराव फुले का आता है. फुले ने धार्मिक प्रतीकों और मिथकों की नई व्याख्या की. धर्म और संस्कृति के नाम पर प्रचलित आडंबरों का पर्दाफाश किया. अंग्रेजी शिक्षा पर जोर दिया. पत्नी सावित्रीबाई फुले और फातिमा बी के साथ मिलकर उन्होंने कई स्कूलों की शुरुआत की. फुले के सहयोगियों में गोपाल बाबा वालंग्कर(मृत्यु सन 1900), शिवराम जनबा कांबले(1875—1942) शामिल थे. फुले के प्रेरणास्रोतों में कबीर, रैदास आदि संत कवि तथा शिवाजी सम्मिलित थे. शिवाजी की जाति कुन्बी, पिछड़ी जातियों में गिनी जाती है. अपनी प्रतिभा, रणकौशल और जुझारूपन के बल पर शिवाजी ने स्वतंत्र साम्राज्य खड़ा किया था. परंतु स्थानीय ब्राह्मण एक शूद्र को राजपद सौंपने को तैयार न थे. इस काम को काशी के ब्राह्मणों की मदद से संपन्न कराया गया. फुले के बाद आंदोलन को गोपाल गणेश अगरकर, डाॅ. भीमराव आंबेडकर, ईवीएस रामास्वामी पेरियार ने विस्तार दिया. उसे शिवाजी के वंशज शाहू जी महाराज का संरक्षण तथा निचली जातियों का भरपूर समर्थन मिला. डाॅ. आंबेडकर अपने समय के सर्वाधिक प्रतिभाशाली व्यक्तियों में से थे. उन्होंने वंचितों और उत्पीड़न के शिकार लोगों को संगठित करने, उनके अधिकारों की संरक्षा हेतु स्वतंत्र भारत के संविधान में युगांतरकारी व्यवस्था करने जैसे क्रांतिकारी कार्य किए.

वर्णव्यवस्था जिसे आर्यों की देन कहा जाता है, को वे अपने मूल प्रदेश से लेकर आए थे. इस तर्क के आधार पर ब्राह्मण जो वर्णव्यवस्था के शिखर पर हैं, मूलतः विदेशी सिद्ध हुए. इस विचार का प्रयोग अभी तक केवल अकादमिक क्षेत्रों तक सीमित था. पहली बार फुले ने उसका उपयोग दलितों और पिछड़ों में जातीयचेतना जगाने के लिए किया. वेदों तथा अन्य धर्मशास्त्रों के उल्लेख से उन्होंने ब्राह्मणों को बाहरी घोषित किया तथा शूद्रों एवं दलितों को यहां का मूलनिवासी. फुले की यह सैद्धांतिकी उनकी पुस्तक ‘गुलामगिरी’(1873) में सामने आई. उसके आधार पर 1892 में ‘मद्रास समाजसुधार संघ’ की स्थापना हुई. उसने जाति और वर्ण के आधार पर गैरब्राह्मणों के शोषण की ओर लोगों का ध्यान आकर्पित कराया. अस्पृश्यता को हिंदू समाज का कलंक मानते हुए उसे मिटाने का संकल्प लिया. संघ के नेताओं को उम्मीद थी कि गांधी के नेतृत्व में दक्षिण में तेजी से पांव पसार रही कांग्रेस सामाजिक न्याय के मुद्दे पर उनका साथ देगी. लेकिन उन्हें निराशा ही हाथ लगी. अंततः संघ ने अपने बल पर जातिवाद, ब्राह्मण वर्चस्व और दलितों के साथ हो रहे अत्याचारअनाचार के विरुद्ध संघर्ष तेज किया. उसने वर्षों से उत्पीड़न का शिकार रही जातियों में असंतोष का संचार किया. कांग्रेस की भाांति ‘मद्रास समाजसुधार संघ’ के भी ‘नरम दल’ और ‘गरम दल’ नामक दो वर्ग थे. ‘नरमदल’ वाले जनतंत्र में भरोसा रखते थे. उन्होंने आंदोलन का रास्ता अपनाया. गर्मदल वाले प्रांत में ब्राह्मण वर्चस्व के विरुद्ध संघर्ष छेड़े रहे. आगे चलकर उसके नेताओं ने ‘जस्टिस पार्टी’ का गठन किया और जनता में व्याप्त असंतोष का लाभ उठाते हुए सत्ता हासिल की. वह राजनीतिक स्वतंत्रता से सामाजिक स्वाधीनता पर जोर देती थी. इस कारण अंग्रेजों के प्रति उसके नेताओं के मन में सहानुभूति थी. उसके समर्थकों में बड़ी संख्या तमिलनाडु की मध्यम और पिछड़ी जातियों की थी. उन्हें समाज के बड़े वर्गों का समर्थन भी उन्हें प्राप्त था. सरकारी पदों पर ब्राह्मणों के वर्चस्व को रोकने के लिए ‘जस्टिस पार्टी’ ने ब्राह्मणों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण देने की व्यवस्था की.

दर्जनों आंदोलनों तथा सैकड़ों महापुरुषों के अनथक योगदान के बावजूद स्वातं×यपूर्व भारत में अपेक्षित जातीय सुधार संभव न हो सके. दरअसल आमूल परिवर्तन की पहली और महत्त्वपूर्ण शर्त संबंधित वर्गों में उसके प्रति जागरूकता तथा उसकी स्वयंस्फूत्र्त कामना है. जिस समाज में परिवर्तन के प्रति सामान्य चेतना का अभाव हो वहां परिवर्तन, केवल दिखावे के लिए ऊपर से थोप दिए जाते हैं. उनकी रूपरेखा, लोकहित के बजाए शीर्ष पर मौजूद मुट्ठीभर लोगों की स्वार्थसिद्धि हेतु बनाई जाती है. इस कारण जनता भी उन आंदोलनों की ओर से उदासीन बनी रहती है. नतीजन वास्तविक परिवर्तन हमेशा अलभ्य बना रहता है. देखा यही गया है कि जो समाज में मसीहा बनकर आता है, वह अंततः मठाधीश बनकर रह जाता है. अनुयायी पत्थर को देवता में तब्दील कर देते हैं. इसलिए जागरूक जनता अपने विकास की जिम्मेदारी खुद संभालती है, किसी मसीहा का इंतजार नहीं करती. भारत स्वयं इसका उदाहरण है. फुले, आंबेडकर, पेरियार जैसे नेताओं ने लोगों को उनके इतिहास और सामथ्र्य का बोध कराया तो वे स्वतः संगठित होने लगे.

ई वी रामास्वामी पेरियार : दि वाल्तेयर आॅफ ईस्ट

यूनेस्को ने पेरियार को ‘पूरब का सुकरात’ कहकर सम्मानित किया था. समर्थक उन्हें आधुनिक संत मानते हैं. भारतीय राजनीति में अपने विद्रोही तेवरों के साथ उन्होंने जिस तर्कशक्ति का आगाज किया, उसके लिए यह उपमा सही बैठती है. किंतु जिस निर्भीकता, साहस और बुद्धिमत्ता के साथ उन्होंने निरर्थक कर्मकांडों तथा जड़परंपराओं को चुनौती दी, धर्म के नाम पर गुरुडम फैलाने वालों को ललकारा, उनका योगदान उन्हें महान फ्रांसिसी चिंतक वाल्तेयर के समकक्ष ठहराता है. उन्होंने समाज में धर्म के आधार पर हो रहे शोषण को समझा. जाना कि धर्म किस प्रकार लोगों के दिलोदिमाग का बेमेलकारी सभ्यता एवं संस्कृति से अनुकूलन करता है. असमानता को नियति बताकर उन्हें बौद्धिक स्तर पर पंगु बनाता है. लोकप्रिय राजनीति में जबकि अधिकांश नेता ईश्वर या उसके नाम पर होने वाले कर्मकांडों में निजी अविश्वास के बावजूद खुद को नास्तिक कहने का साहस नहीं जुटा पाते—पेरियार ने स्वयं को न केवल ईश्वरविरोधी कहा, बल्कि धार्मिक रूढ़ियों, पाखंड और बौद्धिक जड़ताओं के विरुद्ध आवाज भी उठाई. लोकप्रियता के तमाम खतरे उठाते हुए उन्होंने जोरदार शब्दों में ईश्वरीय सत्ता को नकारा. साथ ही समानता, सहयोग और सामंजस्य पर आधारित समाज की संरचना पर बल दिया. छूआछूत जैसी घृणित पृथा के लिए उन्होंने ईश्वर में आस्था को दोषी माना. विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग पर हमला करते हुए उन्होंने कहा कि समाज का बहुत छोटासा हिस्सा धर्म और जाति के नाम पर राज्य के अधिकांश संसाधनों और महत्त्वपूर्ण पदों पर अधिकार जमाए रहता है. उसके लिए वर्गीय स्वार्थ ही सबकुछ हैं. अपने सामाजिकसांस्कृतिक और राजनीतिक अधिकारों का उपयोग वह अपने वर्गीय स्वार्थों की सिद्धि के लिए करता है. उनका इशारा ब्राह्मणों की ओेर था, जो मद्रास प्रेसीडेंसी की कुल जनसंख्या का मात्र 3.2 प्रतिशत होने के बावजूद प्रांत के 70 प्रतिशत संसाधनों और सरकारी पदों पर विराजमान थे. उसके परिणामस्वरूप बहुसंख्यक वर्ग घोर विपन्नता और दमनकारी हालात में जीने के लिए बाध्य था. छूआछूत जैसी निकृष्ट प्रथा के लिए उन्होंने भारतीयों की अंधश्रद्धा को दोषी माना. शूद्रों के मंदिर प्रवेश पर रोकथाम को लेकर उनका कहना था—

‘‘इस देश में जब तक ईश्वर का अस्तित्व रहेगा, तब तक छुआछूत भी कायम रहेगी. यह ऐसा घिनौना आविष्कार है, जिसकी मदद से अछूतों को जानवरों से भी बदतर माना जाता है. मंदिर बनाने की प्रक्रिया से लेकर मूर्ति स्थापना तक अस्पृश्यों के आगमन से न तो वह जगह अपवित्र होती है, न मूर्तियां. लेकिन मंदिर बनने के बाद, मूर्तियों में प्राणप्रतिष्ठा होते ही अछूतों के लिए वह स्थान निषिद्ध मान लिया जाता है.’’

उनका पूरा नाम इरोड वेंकट रामास्वामी नायकर था. प्रशंसक उन्हें ईवी रामास्वामी पेरियार भी कहते हैं. ‘पेरियार’ उनकी उपाधि थी. उसका अर्थ है—श्रेष्ठतम; यानी महानअग्रज….दि ग्रेट मेन. 1923 में धर्म और जाति को तिलांजलि देते हुए यह संबोधन उन्होंने अपने नाम के साथ जोड़ा था. एक सभा में उन्होंने उपस्थित जनसमुदाय से आग्रह किया वे जातिसूचक शब्दों को त्याग दें. वे उम्र में फुले से 52 वर्ष कम तथा आंबेडकर से 12 वर्ष अधिक थे. उन्होंने लंबा तथा संघर्षपूर्ण जीवन जिया. पेरियार आंबेडकर की तरह उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं थे, किंतु अपने अनुभव एवं स्वाध्याय के बल पर उन्होंने जो ज्ञान अर्जित किया; उसके आधार पर जैसा आत्मविश्वास उनमें था, उसे देखते हुए वे समकालीन बुद्धिजीवियों में अग्रणी सिद्ध होते हैं. तर्कशक्ति और विवेचनसामर्थ्य में वे बेमिसाल थे. चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य उनके मित्र थे. लेकिन दोनों के बीच विचारवैभिन्न्य बहुत बड़ा था. उन्होंने अपने लाखों प्रशंसक और आलोचक तैयार किए. तर्क के समय वे अपने प्रतिद्वंद्वियों पर हमेषा भारी पड़ते थे. वैचारिक स्तर पर हम उन्हें आंबेडकर की अपेक्षा फुले के अधिक करीब पाते हैं. दोनों के बीच एक अंतर यह भी है कि आंबेडकर समाज सेवा में सफल होकर राजनीति में आए थे, उनके लिए राजनीति समाजसेवा ही थी. पेरियार पहले राजनीति में थे. सीमित समय में जितनी सफलता संभव थी, प्राप्त की. किंतु सक्रिय राजनीति उन्हें लंबे समय तक बांध कर न रख सकी. जल्दी ही वे उससे ऊब गए और समाजसेवा में लौट आए. लक्ष्य दोनों का एक ही था—समाज के विपन्न, उत्पीड़ित और असमानता के शिकार वर्गाें के अधिकारों के लिए संघर्ष करना. दोनों ने अपनेअपने क्षेत्र में युगांतरकारी कार्य किए और सामाजिक परिवर्तन के संवाहक बने.

पेरियार चाहते तो बाकी राजनीतिज्ञों की भांति मानसम्मान और पदप्रतिष्ठा से भरा जीवनयापन कर सकते थे. राजनीति उनके लिए सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मात्र थी. वहां भी उन्होंने संघर्ष का रास्ता चुना. जब लगा कि परंपरागत राजनीति से सामाजिक न्याय के लक्ष्य को प्राप्त करना कठिन है, सक्रिय राजनीति से अविलंब नाता तोड़, वे सामाजिक आंदोलनों की डगर पर चल पड़े. आजीवन उन लोगों के लिए संघर्षरत रहे जो धर्म के नाम पर, जाति, वर्ण तथा लिंग के नाम पर असमानता, दैन्य और अपमान से भरपूर जीवन जीने को विवश थे. कबीर, रैदास, नारायण गुरु, फुले आदि से प्रेरणा लेते हुए उन्होंने द्रविड़ अस्मिता के मुद्दे को ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ का केंद्रीय मुद्दा बनाया. वैज्ञानिक चेतना से भरपूर, अकाट्य तर्कों के बल पर वे दलितपिछड़ी जातियों के अंतर्मन में छिपे आक्रोश को हवा देने में कामयाब हुए. उनके अस्मितावादी आंदोलनों को व्यापक जनसमर्थन हासिल हुआ. फलस्वरूप वहां सामाजिक परिवर्तन की बड़ी इबारत लिखी गई. अकेले पेरियार ने दक्षिण में वह कर दिखाया, जिससे आगे चलकर संपूर्ण भारत में सामाजिक न्याय का रास्ता प्रशस्त हुआ.

रामास्वामी का जन्म 17 सितंबर, 1879 को मद्रास प्रेसीडेंसी के कोयंबटूर जिले के इरोड नामक कस्बे में हुआ था. पिता का नाम था, वेंकटप्पा नायडु तथा माता थीं—चिन्ना थ्याम्मल. कुल चार भाईबहनों में बड़े भाई ई वी कृष्णास्वामी थे. बहनें पोन्नुथेई और कन्नामल रामास्वामी से छोटी थीं. रामास्वामी का परिवार कन्नड़ मूल का था. जाति बलीजा, जिसे वहां पिछड़े वर्ग में गिना जाता था. ‘नायकर’ उनका गौत्र नाम था. रामास्वामी के मातापिता पारंपरिक रीतिरिवाजों में विश्वास रखते थे. आगे चलकर स्वयं को ठेठ नास्तिक घोषित करने वाले रामास्वामी पेरियार आरंभ में अपने परिजनों की भांति आस्थावादी थे. उनका बचपन अनुभवसमृद्ध था. जन्म के समय उनके परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य थी. पिता साधारण व्यापारी थे. नौ वर्ष की अवस्था तक उनका जीवन संघर्षपूर्ण परिस्थितियों में बीता. धीरेधीरे हालात सुधरे. व्यापार जमने लगा. 1888 तक उनके पिता की गिनती इरोड के सबसे धनाढ्य व्यापारी के रूप में होने लगी थी. पिता चाहते थे कि रामास्वामी उनके व्यापार को आगे बढ़ाएं. लेकिन रामास्वामी के जीवन का लक्ष्य कुछ और ही था. इसके संकेत बचपन में ही मिलने लगे थे. उनकी स्कूली शिक्षा मात्र पांच वर्ष चल सकी. पहले तीन वर्ष उन्होंने एक नर्सरी स्कूल में बिताए. विद्रोही स्वभाव के कारण जातीय दंभ के शिकार लड़कों से उनका झगड़ा होता रहता था. इसलिए प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद उनके पिता ने उन्हें ननिहाल पढ़ने के लिए भेज दिया था.

उन दिनों समाज जाति के आधार पर बुरी तरह से विभाजित था. स्कूलों में उच्च जाति के बच्चे निचली जाति के विद्यार्थियों से दूरी बनाए रखते थे. घर और स्कूल दोनों में उन्हें यही सिखाया जाता था. बालक रामास्वामी विद्रोही स्वभाव का था. उनके मित्रों में अगड़ीपिछड़ी सभी जातियों के बच्चे शामिल थे. पुराने मिजाज के मातापिता चाहते थे कि उनका बेटा सामाजिक मर्यादाओं का पालन करे. स्कूल और स्कूल से बाहर छोटी जाति के विद्यार्थियों से दूरी बनाकर रखे. मगर बालक रामास्वामी पर उनकी बातों का कोई असर न पड़ा. स्कूल के आसपास गरीब लोगों की बस्तियां थीं. मातापिता और अध्यापक के निर्देशों की परवाह किए बिना किशोर रामास्वामी उन बस्तियों में चला जाता, और वहां बच्चों के साथ खेलने लगता. बच्चों के बीच झगड़े भी होते. उस समय उसे डांट पड़ती. कभीकभी मार भी खानी पड़ती. एक बार बालक रामास्वामी अछूत बच्चों के साथ खेलते हुए पकड़ा गया. दंडस्वरूप उसके दोनों पैरों में लोहे की दो राॅडें बांध दी गईं. इसके बावजूद उसके आचरण में कोई सुधार नजर न आया तो पिता ने बेटे के और पढ़नेलिखने की उम्मीद छोड़ दी. विद्रोही मानसिकता के चलते वे औपचारिक पढ़ाई के क्षेत्र में कुछ खास हासिल न कर सके.

उस समय पेरियार की अवस्था मात्र ग्यारह वर्ष थी. वे पिता के साथ व्यवसाय में हाथ बंटाने लगे. 1911 में पिता के निधन के बाद उन्होंने अपने पैत्रिक व्यवसाय को भलीभांति संभाल लिया. अगले बीस बर्ष उन्होंने व्यापार करते हुए बिताए. व्यापार करते हुए उन्होंने दुनियादारी सीखी. समाज में व्याप्त ऊंचनीच और उसके कारणों को समझा. अपने परिश्रम और बुद्धिबल के आधार पर पेरियार खुद को कुशल व्यापारी सिद्ध करने में कामयाब रहे. फलस्वरूप समाज और स्थानीय व्यापारियों में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ने लगी. उन्हीं दिनों उनका स्थानीय नेताओं से संपर्क बढ़ा. उन संपर्कों के बल पर राजनीति की राह आसान होती गई. उन दिनों मद्रास की राजनीति में परिवर्तन का दौर चल रहा था. पूरे भारत में स्वतंत्रता की मांग बढ़ती जा रही थी. उसने वंचित एवं उत्पीड़ित समुदायों के मन में अस्मितावादी चेतना का संचार किया था. अपने प्रवचनों में गांधी छूआछूत और जातीय भेदभाव का खंडन करते थे. प्रकट रूप में सभी बड़े कांग्रेसी नेता उनका समर्थन करते थे. इसलिए उस समय के सामान्य युवा की भांति पेरियार भी गांधी और कांग्रेस के आकर्षण में बंधते चले गए.

पेरियार का विवाह 19 वर्ष की अवस्था में विधिविधान के साथ, नागम्मई के साथ संपन्न हुआ. नागम्मई उनसे उम्र में पांच वर्ष छोटी थीं. उनका विवाह भी असाधारणसी घटना थी. उस समय की परंपरा थी कि किशोरावस्था पार करतेकरते लड़केलड़कियों के विवाह हो जाया करते थे. पेरियार के पिता ने अपने ही जैसे धनाढ्य व्यापारी की कन्या को उनके लिए चुना था. पेरियार तक बात पहुंची तो उन्होंने उस रिष्ते से इन्कार कर दिया. बजाय व्यापारी की बेटी के उन्होंने ननिहाल के पक्ष की दूर के रिश्तेदार की बेटी से विवाह करने की इच्छा जाहिर की, जिससे वे मिल चुके थे. लड़की के मातापिता की आर्थिक स्थिति उनके परिवार की अपेक्षा बहुत कमजोर थी. मगर पेरियार के पिता उस समय तक उनके दृढ़निश्चयी स्वभाव को समझ चुके थे. न चाहते हुए भी उन्होंने नागम्मई से विवाह की सहमति दे दी. विवाह के समय भी पेरियार ने उन परंपराओं का विरोध किया, जिनपर ब्राह्मणत्व की छाप थी. वे नहीं चाहते थे कि उनकी पत्नी सामान्य स्त्री की तरह फिजूल के पूजापाठ में समय बरबाद करे. लेकिन नागम्मई नियमित मंदिर जाने वाली आस्थावान स्त्री थीं. पेरियार ने उन्हें समझाने की कोशिश की. आरंभ में नागम्मई पर उनकी सलाह बेअसर रही. उसके बाद पेरियार ने वह किया, जो किसी को भी चैंका सकता है. जिस रास्ते से नागम्मई मंदिर के लिए निकलतीं, अपने कुछ साथियों के साथ पेरियार भी वहां खड़े हो जाते और अपनी ही पत्नी पर छींटाकशी करने लगते. तंग आकर उन्होंने मंदिर जाने की जिद छोड़ दी. पति के साथ रहते हुए नागम्मई का मन बिलकुल बदल गया. पति की सलाह पर उन्होंने अपने बहुमूल्य गहने तक त्याग दिए. आगे चलकर वे पेरियार के प्रत्येक आंदोलन में उनकी सच्ची सहधर्मिणी सिद्ध हुईं. वायकम आंदोलन में पेरियार को गिरफ्तार कर लिया तो नागम्मई संघर्ष में उतर आईं. विवाह के कुछ वर्ष पश्चात नागम्मई ने एक पुत्री का जन्म दिया. तब तक पेरियार खुद को समाजकल्याण के लिए समर्पित कर चुके थे. मात्र पांच महीने की थी, जब वह बच्ची बीमार पड़ी और देखभाल के अभाव में चल बसी. वह उनकी पहली और अंतिम संतान थी. 1933 में नागम्मई का भी निधन हो गया. आगे चलकर रामास्वामी पेरियार ने दूसरी शादी भी की परंतु उससे कोई संतान न हुई.

अभी तक रामास्वामी नायकर के बारे में जो चर्चा हुई है, वे साधारणसी बातें हैं. पेरियार सफल व्यापारी पिता की महत्त्वाकांक्षी संतान थे. लेकिन यदि वे केवल व्यापार तक सिमटे रहते तो उन हजारोंलाखों धनपशुओं में से एक होते जो ताजिंदगी धनार्जन में लिप्त रहकर अंततः उसी की कामना में दम तोड़ देते हैं. अथवा ज्यादा से ज्यादा उन लोगों में से होते, जिनका काम बातों के बल पर चाय के प्याले में तूफान उठाते रहना है. तब वे ‘पेरियार’ न बन पाते. ऐसे रामास्वामी के लिए भला हम भी क्यों कागज काले कर रहे होते! समय की जरूरतों ने आंबेडकर को अर्थशास्त्री से समाजविज्ञानी और विधिशास्त्री बना दिया था. सामाजिक दबावों ने ही पेरियार को उन रास्तों की ओर मोड़ दिया, जिस दिशा में बढ़ने की उससे पहले उन्होंने कभी कल्पना तक न की होगी.

पेरियार के नेतृत्व में उनका पैत्रिक व्यवसाय तेजी से बढ़ रहा था. 1920 में ‘मद्रास पे्रसीडेंसी ऐसोशिएसन’ का गठन हुआ. पेरियार तब तक स्थानीय नेताओं से संपर्क बना चुके थे. जिस समाज से वे आए थे, उसमें सक्रिय राजनीति से जुड़ने की कोई परंपरा न थी. सवर्ण वर्चस्व वाली राजनीति में पिछड़े वर्गों को ऐसा अवसर मिल भी नहीं पाता था. परंतु पेरियार उन युवाओं में से न थे जो परिवेश और परिस्थितियों के दास बन जाते हैं. वे उन विरले लोगों में से थे जो तमाम चुनौतियों से टकराकर स्थितियों को अपने अनुसार मोड़ने का सामथ्र्य रखते हैं. युवावस्था में ही उनकी राजनीति में रुचि बढ़ने लगी थी. उन दिनों कांग्रेस राजनीति का प्रवेश द्वार थी. बड़ेबड़े नेता, जिन्होंने आगे चलकर कांग्रेस के साथ और उसके विरोध में अपनी राजनीति को चमकाया, कांग्रेस से ही निकले थे. युवा रामास्वामी को भी कांग्रेस से उम्मीदें थीं. इसलिए 1920 में उन्होंने कांगे्रस की सदस्यता ग्रहण कर ली. उसी वर्ष गांधी जी ने ‘असहयोग आंदोलन’ की शुरुआत की थी. पेरियार को कांग्रेस का उदारवादी रवैया, विशेषकर छूआछूत उन्मूलन के लिए चलाए जा रहे कार्यक्रम पसंद थे. इस कारण वे कांगे्रस और गांधीजी से प्रभावित भी थे. असहयोग आंदोलन के दौरान गांधीजी ने औपनिवेशिक सरकार के साथ किसी भी प्रकार का सहयोग का आवाह्न किया. कांग्रेसजनों और आम जनता से अपील की कि वे उन सभी पदों और सुविधाओं का त्याग कर दें, जो किसी भी रूप में सरकार की ओर से प्राप्त हुए हैं. पेरियार के व्यवसाय का सरकार से कोई सीधा संबंध न था. तो भी गांधीजी के आवाह्न पर उन्होंने अपने जमेजमाए व्यापार को छोड़ दिया और पूरी तरह से असहयोग आंदोलन से जुड़ गए. अपने खजाने के दरवाजे भी आंदोलन के लिए खोल दिए. उनके नेतृत्व में मद्रास में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का सफल आंदोलन हुआ. विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई. खादी को प्रोत्साहन देने के लिए वे न केवल खुद मोटे खद्दर के कपड़े पहनने लगे, बल्कि अपने परिवार और परिजनों को भी उसके लिए प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया. खादी के समर्थन में उनका कहना था—

यदि प्रत्येक व्यक्ति खादी को अपना ले तो देश में बेरोजगारी और भुखमरी की कोई समस्या न रहे’

कुशल प्रबंधन क्षमता, नेतृत्वकला और वक्तृत्वकौशल के बल पर वे तमिलनाडु की राजनीति में जगह बनाने में सफल हुए. उनकी निष्ठा और लगन को देखते हुए उन्हें कांग्रेस का प्रांतीय अध्यक्ष बना दिया गया. उस पद पर वे लगातार दो वर्षों तक बने रहे. उस समय तक वे वैचारिक स्तर पर परिपक्व हो चुके थे. उनकी प्रतिबद्धताएं भी सामने आने लगी थीं. कांग्रेस बुर्जुआ पार्टी थी. पेरियार के लिए वहां सबकुछ आसान न था. हालांकि एक नेता के रूप में कांग्रेस के भीतर उनकी प्रतिष्ठा, मानसम्मान और पैठ में निरंतर बढोत्तरी हो रही थी. पेरियार सामाजिक भेदभाव और जातिआधारित ऊंचनीच से आहत थे. राजनीति के माध्यम से वे उन जड़ताओं पर प्रहार करना चाहते थे. मगर कांग्रेसजनों का असहयोगी रवैया देख उन्हें लगता था कि जिस कार्य के लिए वे राजनीति से जुड़े हैं, उसे पूरा नहीं कर पा रहे हैं. कांग्रेस के नेता किसी भी बड़े सामाजिक परिवर्तन के लिए तैयार ही नहीं हैं.

यह स्वाभाविक था. अपने गठन के समय से ही कांग्रेस अभिजनों की पार्टी थी. उसकी स्थापना कुछ अभिजात्यों द्वारा अपने वर्गीय हितों की सुरक्षा हेतु की गई थी. कांग्रेस के संस्थापक ह्यूम का विचार था कि इससे समाज के पढ़ेलिखे वर्गों में अंग्रेज सरकार के प्रति आक्रोश कम होगा. इससे 1857 जैसी क्रांति की संभावनाएं क्षीण होंगी. ह्यूम को तत्कालीन अंग्रेज शासकों का समर्थन प्राप्त था. लगभग पचास वर्षों तक कांग्रेसी नेता, अंगे्रज सरकार को बड़ी चुनौती दिए बिना, अपना उद्देश्य साधने में लगे रहे. गांधी ने उसका कायाकल्प करने की कोशिश की. उनके कार्यकाल में कांग्रेस और जनता के बीच की दूरी में कुछ कमी आई. फिर भी उसके अधिसंख्यक नेता अभिजन मानसिकता से बाहर न आ सके. परिणामस्वरूप दलितों और पिछड़ों को लेकर कांग्रेस का रवैया ज्यों का त्यों बना रहा. पेरियार चाहते थे कि सरकार पढ़ीलिखी अभिजात्य संतानों के लिए ब्रिटिश इंडिया की नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करे. कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण करते समय उन्हें विश्वास था कि जैसेजैसे कांग्रेस में वंचित और पिछड़े वर्ग के नेताओं की संख्या बढ़ेगी, उसके बड़े नेता देशहित में भेदभाव से ऊपर उठकर काम करने लगेंगे. अपने भाषणों में गांधीजी समेत कांग्रेस के सभी बड़े नेता यह आश्वासन भी देते थे. हकीकत इससे जुदा थी. कुछ ही अवधि में पेरियार को कांग्रेसी नेताओं की कथनी और करनी का अंतर समझ आने लगा. उन्हें यह देखकर हैरानी होती कि सार्वजनिक मंचों पर समानता और समरसता की बात करने वाले कांग्रेस के बड़े नेता भी भीतर से घोर जातिवादी हैं. समाज में व्याप्त ऊंचनीच को कम करने की उनकी न तो कोई योजना है, न ही संकल्प. कांगे्रसी नेता भी पेरियार के विचारों और उनकी प्रतिबद्धता को लेकर सशंकित रहते थे. पेरियार के वकृत्व कौशल और जनता में उनकी पैठ के कारण वे भीतर ही भीतर उनसे डरते थे. तो भी उन्हें लगता था कि पद और प्र्रतिष्ठा का प्रलोभन उन्हें कांग्रेस से, जो उन दिनों देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी थी, जोड़े रखेगा.

1924 तक पेरियार राजनीति में पैर जमा चुके थे. इस अवधि में उन्होंने खुद को बौद्धिक स्तर पर परिपक्व किया था. समकालीन राजनीति को उन्होंने समाज और संस्कृति के संदर्भ में समझने की कोशिश की. वे चाहते थे कि कांग्रेस सामाजिक सुधार के लिए ऐसे रचनात्मक कार्योें को अपनाए जिनसे समाज के दमितउत्पीड़ित जन को जातीय शोषण से मुक्ति मिले. वे मानसम्मान से भरपूर जीवन जी सकें. उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता विकसित हो. परंतु उन्हें लग रहा था कि जिन सामाजिक लक्ष्यों की पूर्ति वे राजनीति के माध्यम से चाहते हैं, और स्वतंत्र भारत को लेकर जनसाधारण की जो उम्मीदें हैं, प्रचलित राजनीति के माध्यम से उनकी पूर्ति असंभव है. ब्राह्मणवाद जिसने समाज को शताब्दियों से जकड़ा हुआ है, और जिससे समाज के बड़े समूह की स्वतंत्रता आहत है, वही कांग्रेस की नीतियों का नियामक, वास्तविक कर्ताधर्ता है. बावजूद इसके पेरियार कांग्रेस के कार्यक्रमों में सक्रिय हिस्सा लेते रहे. उनकी इच्छा थी कि कांग्रेस समाजार्थिक आधार पर पिछड़े और धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यकों की शिक्षा एवं रोजगार की मांग को सरकार के सामने रखे. उन्होंने इस आशय का एक मसौदा तैयार किया था, जिसे वे कांग्रेस के 1920 में थिरुमलई में होने वाले प्रांतीय अधिवेशन में प्रस्तुत करना चाहते थे. उस सम्मेलन की अध्यक्षता एस. श्रीनिवास अयंगर कर रहे थे. उन्होंने पेरियार के प्रस्ताव पर यह कहते हुए विचार करने से इंकार कर दिया था कि उससे समाज में जातीय दुराग्रह तीव्र होंगे और सामाजिक विद्वेष बढ़ेगा. पेरियार के लिए यह निराशाजनक था. फिर भी उन्होंने उम्मीद बनाए रखी. उन्हें लगता था कि आज नहीं तो कल, कांग्रेस के नेता वृहद लोकहित में उनके प्रस्ताव पर विचार करने को तैयार हो जाएंगे.

1922 में कांग्रेस के त्रिरुपुर अधिवेशन में उन्होेंने अपने प्रस्ताव को दुबारा पेश करने की कोशिश की. उस बार भी कांग्रेस के बड़े नेताओं के वर्गीय स्वार्थ आड़े आ गए. प्रस्ताव की उपेक्षा होते देख पेरियार उग्र हो गए. मुद्दे को लेकर उनकी वरिष्ठ नेताओं से जमकर बहस हुई. उच्च जातिवर्ण से आए नेता पुराणों और धर्मशास्त्रों की दुहाई देने लगे. हिंदू धर्म का कुटिल चेहरा एक बार फिर पेरियार के सामने था. क्षुब्ध होकर उन्होंने शोषणउत्पीड़न और उपेक्षा का शिकार रहे लोगों के लिए, न्याय का समर्थन करने वाले नेताओं को एक मंच पर आने का आवाह्न किया. वर्णव्यवस्था के समर्थक ग्रंथों रामायण, मनुस्मृति आदि की होली जलाने का निश्चय कर लिया. अगले वर्ष 1923 में एक बार फिर उन्होंने प्रस्ताव पर विचार करने का अनुरोध किया. उससे उच्च जाति के नेता बिफर गए. एक बार फिर जोरदार बहस हुई. मगर चली उच्च जाति के नेताओं की ही. प्रस्ताव एक बार फिर ठुकरा दिया गया. यही दौर था जब गांधी से उनके मतभेद सामने आ चुके थे. पेरियार का कहना था कि कांग्रेस के शिखर पुरुष गांधी स्वयं वर्णभेद की मानसिकता से ग्रस्त हैं. राजनीतिक मजबूरियों के तहत उनके नेतृत्व में कांग्रेस कुछ रचनात्मक कार्यों को अपनाने के विवश हुई थी, लेकिन पहले से चली आ रही व्यवस्था में आमूल परिवर्तन के लिए वह कदापि तैयार नहीं हैं. गांधी का सुधारवाद तात्कालिक उदारता के अलावा कुछ नहीं है.

पेरियार का सोच निराधार न था. तमिलनाडु की कुल जनसंख्या में ब्राह्मण मात्र 3.2 प्रतिशत थे. इतनी कम संख्या के बावजूद प्रांत के तीनचैथाई संसाधनों पर उन्हीं का अधिकार था. धर्मशास्त्रों में कृषिकर्म को वैश्य के लिए निर्दिष्ट किया गया था. ब्राह्मणों के लिए खेती निषिद्ध कर्म है. बावजूद इसके प्रांत के बड़े जमींदारों में अधिसंख्यक ब्राह्मण थे. लोग इसे लेकर सवाल न करें, इसके लिए बड़े जमींदारों ने शहरों में ठिकाना बनाया हुआ था. सरकारी पदों पर अधिसंख्यक ब्राह्मण काबिज थे. 1912 में 55 प्रतिशत डिप्टी कलेक्टर तथा 72.6 प्रतिशत जिला मुंसिफ ब्राह्मण ही थे. अनंतपुर में एक ऐसा ब्राह्मण परिवार था, जिसने सत्ता से अपनी निकटता का लाभ उठाते हुए समस्त सरकारी पदों को हथिया लिया था. यह देख स्थानीय लोगों में भारी असंतोष व्याप्त था. ब्राह्मणों के वर्चस्ववादी रवैये के विरोध की बात नई न थी. इस बेईमानी के विरोध में 1896 में एक दर्जन से अधिक लोगों ने अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया था. दूसरा उदाहरण नैल्लोर के एक ब्राह्मण परिवार का था. उसके पचास सदस्यों ने सरकारी नौकरियों पर कब्जा किया हुआ था. उसके विरोध में भी एक दर्जन से अधिक स्थानीय नागरिकों ने यूरोपीय अधिकारियों के समक्ष अपनी शिकायत पेश की थी. यह तब था, जब स्थानीय कलेक्टर सरकारी नौकरियों में सभी वर्गों को समान प्रतिनिधित्व देने की मांग उठा चुका था. इसे लेकर वहां जनमानस में गुस्सा था. दक्षिण में ब्राह्मणों के अलावा बाकी जातियों को भी प्रशासनिक नौकरियों में हिस्सेदारी की मांग वर्षों पुरानी थी. 1840 में यानी प्रथम स्वाधीनता संग्राम से भी बहुत पहले वहां ब्राह्मणेत्तर वर्गों को सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व देने की मांग उठ चुकी थी. उस वर्ष तमिलनाडु के 32 पंचलारों ने मांग की थी कि सरकारी नौकरियों में समाज के बाकी वर्गांे को भी उचित प्रतिनिधित्व दिया जाए. ब्राह्मण एक ओर दावा करते थे कि सरकार उन्हें उनकी योग्यता के आधार पर नियुक्तियां देती है. दूसरी ओर शिक्षा और दूसरे मामलों में दलितों और पिछड़ों के साथ कदमकदम पर पक्षपात किया जाता था. उनके लिए शिक्षा की कोई व्यवस्था न थी. मिशनरियों के आने से दलितों को शिक्षा का अवसर मिला था. ब्राह्मण और अन्य सवर्ण उनका भी विरोध करते थे. पेरियार का विचार था कि सामाजिक समानता हेतु दलितों और पिछड़ों में आर्थिक आत्मनिर्भरता अत्यावश्यक है. उसके लिए जरूरी है कि सरकारी नौकरियों में सभी वर्गों की समान हिस्सेदारी हो. इसलिए पेरियार की मांग थी कि कांगे्रस सरकार पर दबाव बनाए, ताकि बहुजन समाज के लोग सरकारी पदों तक पहुंच सकें. ब्राह्मण वर्चस्व को तोड़ने के लिए वे चाहते थे कि दलितों और पिछड़ों को उनकी संख्या के अनुपात में आरक्षण दिया जाए. इसके लिए उन्होंने एक मसौदा तैयार किया था; जिसे वे औपनिवेशिक सरकार तक पहुंचाना चाहते थे. यह क्रांतिकारी विचार था. उसकी भनक लगते ही कांग्रेसी नेताओं में खलबली मच गई. पेरियार चाहते थे कि गांधी सहित प्रांत के बड़े कांग्रेसी नेता उनका साथ दें. लेकिन न तो गांधी ने उनकी मांग की ओर ध्यान दिया, न ही कांग्रेस का दूसरा कोई नेता उनके समर्थन में आया. उससे पेरियार का कांग्रेस के प्रति रहासहा मोह भी जाता रहा. यह मानते हुए कि कांग्रेस के साथ रहते हुए उद्देश्यपूर्ति असंभव है, उन्होंने तत्क्षण कांग्रेस से अलग होने का फैसला कर लिया.

पिछड़ों और दलितों की राजनीतिक सहभागिता को रोकने की चालें केवल दक्षिण भारत तक सीमित नहीं थी. उत्तर भारत के नेता भी इसके शिकार थे. ‘त्रिवेणी संघ’ का गठन पटना में तीन प्रमुख खेतिहर जातियों कुर्मी, कुशवाहा और यादव के नेताओं द्वारा 1934 में किया गया था. उन्हें भी उसी समस्या से जूझना पड़ा था जिनसे दक्षिण भारत पेरियार गुजर चुके थे. उसके संस्थापक नेता यदुनंदन प्रसाद मेहता ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए ‘त्रिवेणी संघ का बिगुल’ में कांग्रेस के बारे में अपने अनुभवों को साझा किया है—‘पहले ऐलान किया गया कि योग्य व्यक्तियों को लिया जाएगा. जब इन बेचारों ने योग्य व्यक्तियों को ढूंढना शुरू किया तो कहा गया कि खद्दरधारी होना चाहिए. जब खद्दरधारी सामने लाए गए तो कहा गया कि जेल यात्रा कर चुका हो. जब ऐसे भी आने लगे तो कहा गया कि वहां क्या सागभंटा बोना है. किसी को कहा जाता कि वहां क्या भैंस दुहनी हैं? तो किसी को व्यंग्य मारा जाता कि वहां क्या भेड़ें चरानी हैं? किसी को यह कहकर फटकार दिया जाता कि वहां क्या नमकतेल तौलना है.’ कांग्रेस के बड़े नेताओं में से एक तिलक के भी ठीक ऐसे ही विचार थे. यह तब है जब कांग्रेस पूरे देश और समाज का प्रतिनिधित्व करने का दावा करती थी. देश का प्रमुख दल होने के बावजूद कांग्रेस पर वर्गचरित्र हावी था. थोड़े ही समय में पेरियार ने समझ लिया कि कांग्रेस मुख्यतः सवर्ण हितों का सरंक्षण करती है. कोई उम्मीद न देख उन्होंने नवंबर 1925 में कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया. इसी के साथ उन्होंने स्वयं को सक्रिय राजनीति से भी अलग कर लिया. पेरियार की ओर से वह सोचासमझा निर्णय था. उनका मानना था कि वर्तमान राजनीति का चरित्र सामाजिक न्याय भावना से कोसों परे है. यदि कांग्रेस नहीं तो क्या? इसपर पेरियार ने ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ का शुभारंभ किया. कुछ ही वर्षों में उस आंदोलन का असर पूरे प्रांत में दिखने लगा था. लोग तेजी से उसके साथ जुड़ रहे थे. पेरियार के लिए वह समय अपनी वैचारिकी के साथ आगे बढ़ने का था.

पेरियार की वैचारिकी के आधार पर हम उन्हें आंबेडकर और फुले का समिश्रण कह सकते हैं. फुले की भांति पेरियार ने भी धार्मिक जड़ताओं पर तीखे प्रहार किए. स्त्रीपुरुष समानता और शिक्षा पर जोर दिया. आंबेडकर से प्रेरणा लेते हुए उन्होंने पिछड़ों और दलितों का अपने मानसम्मान एवं अधिकारों के लिए एकजुट होने का आवाह्न किया. यह मानते हुए कि भारतीय समाज में जाति विकास और सामाजिक समरसता की सबसे बड़ा अवरोधक है, उन्होंने न केवल जाति पर, बल्कि उसे आश्रय देने वाले धर्म पर भी तीखे प्रहार किए. यह उनका दुस्साहसी कदम था. धर्म का विरोध आंबेडकर ने भी किया था, लेकिन उनका विरोध मुख्यतः हिंदू धर्म के जातिवादी ढांचे पर था. ब्राह्मणवाद पर था, जिससे वह अनुशासित होता था. आलोचना से पहले उन्होंने हिंदू धर्म के साथसाथ दूसरे धर्मों का भी विशद् अध्ययन किया था. लंबे चिंतनमनन के उपरांत उन्होंने तुलनात्मक रूप से उदार, बौद्ध धर्म की राह ली थी. हालांकि उन जैसे मेधा के धनी और प्रकांड विद्वान के लिए धर्म किसी भी रूप में अनावश्यक था. दरअसल जिस समाज का वे नेतृत्व कर रहे थे, वह शताब्दियों से धर्म के प्रभावक्षेत्र में जीते हुए उसके साथ अनुकूलन कर चुका था. धर्मविहीन जीवन की कल्पना भी उसके लिए असंभव थी. इसलिए कदाचित एक तात्कालिक व्यवस्था के रूप में धर्मांतरण को अपनाया था. पेरियार जीवन में धर्म की जकड़बंदी को कहीं वृहद् संदर्भ में देख रहे थे. वे मानते थे कि धर्म व्यक्ति को न केवल बौद्धिक रूप से विपन्न करने के साथसाथ सांस्कृतिक वर्चस्ववाद को वैधता प्रदान करता है. वह बेमेलकारी सभ्यता को ईश्वरीय वरदान की तरह अपनाने के लिए प्रेरित करता है. वाल्तेयर ने धर्म को रस्सी और ईश्वर को खूंटे की संज्ञा दी थी. यह उक्ति भारत के संदर्भ में एकदम वह दार्शनिक था. पेरियार के लिए, खासकर भारत जैसे देश में जहां लोकतंत्र लोकप्रिय राजनीति के भरोसे टिका हो—ऐसा करना आसान नहीं था. बड़ेबड़े नेता, जिनका ईश्वरीय सत्ता में खास विश्वास नहीं रहा, लोकदिखावे के लिए, इस डर से कि भारतीय जनता नास्तिक को स्वीकार नहीं करेगी, आस्तिक होने का दिखावा करते आए हैं. बावजूद इसके पेरियार ने खुद को खुलेआम नास्तिक कहा और नीत्शे की भांति ईश्वर की अवधारणा पर तीखे सवाल उठाए. अपने राजनीतिक भविष्य को ताक पर रख, अपने भाषणों तथा कार्यक्रमों के जरिये आजीवन नास्तिकता का प्रचार करते रहे.

ओमप्रकाश कश्यप

भारत में आर्थिक सहकार की परंपरा

सामान्य

सहकार का विचार भारतीय समाज के लिए अनजाना नहीं है. यह उस समय का है जब भारत ने सभ्यता का पहला पाठ पढ़ना सीखा. यदि हम यह मानकर चलें कि भारतीय सभ्यता, विश्व की प्रचीनतम और परिष्कृत सभ्यताओं में से एक है तो यह कहना भी अतार्किक न होगा कि सहकारी आर्थिक संगठन की पर्याय श्रेणियों का सर्वप्रथम उद्भव भारत में ही हुआ. आर्थिक सहकारिता का विचार यहीं से दुनिया के बाकी देशों में फैला और अपनी बहुआयामी उपयोगिता के कारण सर्वत्र स्वीकारा भी गया. यूनानी सभ्यता के पैरोकार उस सभ्यता के भारतीय सभ्यता के समकालीन होने का दावा कर सकते हैं, परंतु यह निर्विवाद सत्य है कि प्राचीन यूनानी सभ्यता अथवा उसकी समकालीन अन्य सभ्यताओं में साहचर्य आधारित उद्यमों का उतना विकास नहीं हो पाया था, जितना की भारत में. कारण यह था कि यूनानी राजसत्ता सहकार आधारित उद्यमों को अपनी स्वयंप्रभुता के लिए चुनौती मानती थी. दूसरी ओर भारत में राजनीति और सहकार आधारित उद्यमों के बीच सदैव अच्छा तालमेल बना रहा. कुछ यूनानी विचारकों की भांति चंद्रगुप्त मौर्य का महामंत्री कौटिल्य श्रेणियों की स्वायत्तता को शासन की स्वयंप्रभुता के लिए खतरे के रूप में देखता था, परंतु उसने भी श्रेणियों की आर्थिकसामाजिक उपयोगिता को देखते हुए उन्हें मुक्त व्यापार करने की अनुमति प्रदान करने की अनुशंसा की थी. इसलिए मौर्य प्रशासन में श्रेणियों का तीव्र विकास संभव हो सका.

जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है भारत में श्रेणियों का उद्भव वैदिक काल से ही देखने को मिल जाता है. मोहनजोदारो, हड़प्पा आदि सिंधु घाटी की सभ्यता का प्रतीक कहे जाने वाले प्राचीन स्थानों की खुदाई से जो अवशेष प्राप्त हुए हैं, उनके अनुसार तो प्रागैतिहासिक काल के भारतीय व्यापारी प्राचीन रोम, यूनान, मिश्र और सुमेर आदि अपनी समकालीन सभ्यताओं के व्यापारियों के साथ संबंध बनाए हुए थे. महाकाव्यकाल तक आतेआते सहयोगाधारित व्यापारिक समूह और भी मजबूत हो चुके थे. सभी जानते हैं कि महाभारत के युद्ध की परिणति अंततः विखंडित भारत के रूप में होती है. परीक्षित के बाद देश राजनीतिक रूप से अनेक छोटेछोटे राज्यों में विभाजित हो चुका था. विकास और लोकसशक्तीकरण के नाम पर आर्थिक एवं राजनीति शक्तियां अपनी मनमानी करने लगीं थीं, जिससे भारत कुछ वर्षों के लिए संभवतः कमजोर पड़ा. उस दौर के इतिहास की अनेक कड़ियां आज भी अनसुलझी हैं. बाद के भारत का प्रामाणिक रूप से उपलब्ध इतिहास ईसा से लगभग छह सौ वर्ष पहले का है. इसी कालखंड में संसार के दो महत्त्वपूर्ण उदारवादी धर्मों, जैन एवं बौद्धधर्म का उद्भव हुआ. प्रसंगवश बता दें कि इन दोनों ही धर्मों का उदय वैदिक धर्म में कर्मकांडों के अतिरेक के विरोधस्वरूप हुआ था, जो समाज के धूर्त और प्रपंची परजीवी पुरोहित वर्ग की देन थे. यह परजीवी वर्ग निहित स्वार्थों के लिए धर्म और राजनीति का गठजोड़ करने में सफल रहा था. जनसामान्य को लुभाए रखने के लिए इसी वर्ग ने एक के बाद एक कर्मकांडों की अंतहीन शृंखला आरंभ की, जिसके परिणामस्वरूप पूरा समाज बौद्धिकता से कटकर नियतिवाद और आंडबरवाद के चंगुल में फंसता गया, जिसने प्रकारांतर में बौद्ध और जैन दर्शनों के उद्भव की जमीन तैयार की.

बौद्धधर्म ने तर्क का सहारा लेते हुए मानव की सत्ता को सर्वोच्च माना और धर्म के नाम पर चलाई जा रही निरर्थक बहसों से दूर रहने की सलाह दी. यही नहीं उसने ईश्वर और आत्मा जैसे पदों की व्याख्या से दूर रहते हुए, अपने चिंतन को व्यावहारिक धरातल तक सीमित रखा, जिसका जनसामान्य द्वारा स्वागत किया गया. इस बीच दोनों धर्मों के अनुयायियों के बीच वर्चस्व का संघर्ष भी हुआ, जिसमें जनसाधारण का समर्थन बौद्धधर्म के प्रति बना रहा. अपने वैज्ञानिक सोच के कारण ही वह धर्म की सीमाओं को लांघकर दुनियाभर में फैला. विश्वविजय केवल तीरतलवारों और बंदूक की नोक के दम पर ही नहीं, अध्यात्म के बल पर भी सच हो सकती है, यह उसने संभव कर दिखाया.

जैन धर्म के प्रवर्त्तक महावीर स्वामी एवं गौतम बुद्ध दोनों ही क्षत्रिय कुल में जन्मे थे, किंतु उनके द्वारा प्रवर्त्तित जैन और बौद्ध दोनों ही धर्मों को व्यापारी वर्ग का भरपूर समर्थन प्राप्त हुआ. जैन धर्म चूंकि अहिंसा पर अधिक जोर देता था, इस कारण अपेक्षाकृत कम व्यावहारिक था. इसलिए उसको सीमित लोकव्याप्ति मिली. दूसरी ओर व्यावहारिक होने के कारण बौद्धधर्म का प्रसार बहुत तेजी से हुआ. इसके पीछे एक कारण संभवतः यह भी रहा कि ब्राह्मण धर्म के हिमायती खुद तो अमर्यादित भोग में लिप्त रहते थे, किंतु जनसामान्य से वे उपभोग को सीमित रखने की अपेक्षा रखते थे. भोगवादी जीवन को हेय माना जाता था. उपभोग के प्रति जनसाधारण की उदासीनता तेजी से बढ़ते व्यापारी एवं उत्पादक वर्गों के लिए घाटे का सौदा थी. इसलिए नएउभरते बौद्धधर्म को व्यापारी वर्ग का भी भरपूर समर्थन प्राप्त हुआ.

भारत में श्रेणियों का वास्तविक उद्भव एवं विकास छह सौ ईसा पूर्व से लेकर 1000 ईस्वी पश्चात तक है. इतिहास में लगभग यही कालखंड बौद्धधर्म की और उसके विकास का भी रहा है. उस युग में संगठित व्यापारी श्रेणियों के माध्यम से दूरदराज के देशों तक अपने व्यापार को विस्तार दे रहे थे. वहीं अपेक्षाकृत छोटे व्यापारी और उद्यमी साहचर्य के सिद्धांत के अनुरूप संगठित होकर, अपने उत्पादों को देश के कोनेकोने तक पहुंचा रहे थे. भारतीय इतिहास का यह कालखंड आर्थिक विकास के साथसाथ सुरुचि एवं सांस्कृतिक समृद्धि के लिए भी जाना जाता है. वर्णाश्रम व्यवस्था हिंदुत्व की देन थी. बौद्धधर्म में उसके और जातिप्रथा के लिए कोई स्थान नहीं था. वर्णाश्रमवादियों के प्रभाव के चलते भारतीय समाज में विभिन्न जातियों के मध्य आपसी व्यवहार को लेकर में जो अनुशासन अथवा निषेद्ध प्रचलन में थे, बौद्धधर्म उनका बहिष्कार करता था. उसके तेजी से लोकप्रिय होते जाने का यह भी एक कारण था. अंतद्वंद्वों की कमी के कारण आंतरिक और बाहरी व्यापार में तेजी आई. शताब्दियों से जातिवादी अनुशासन में बंधकर समाज के शीर्षस्थ वर्ग को सेवा देती आईं शूद्रवर्ग की शिल्पकार जातियां अनुकूल अवसर पाकर संगठित होने लगीं.

कुलीनचित्त’ नामक जातक में ‘बड्ढकिगम्’ नामक एक बस्ती का उल्लेख है, जो वाराणसी के करीब थी. उसमें 500 बढ़ई परिवार निवास करते थे. ऐसे ही एक अन्य जातक में ‘महाबड्ढकिगम्’ नामक बस्ती का जिक्र आता है,जहां एक हजार शिल्पियों के प्रवास करने का वर्णन किया है. बौद्ध साहित्य में 18 प्रकार की शिल्पी श्रेणियों का उल्लेख मिलता है. जिनका स्वतंत्र अस्तित्व था और जिन्हें राज्य द्वारा भी पर्याप्त अधिकार प्राप्त थे. स्पष्ट है कि तब तक कर्मकारों की न केवल अलगअलग श्रेणियाँ बन चुकी थीं. बल्कि उसमें उनके संगठन भी कायम थे. ये संगठन इतने कार्यक्षम थे कि राज्यसत्ता के समानांतर अपने हित के लिए, आवश्यक नियम बना सकते थे. कतिपय विवादों में निर्णय का अधिकार भी उन्हें प्राप्त था.

विनय पिटक में उल्लिखित है कि चौर कर्म करने वाली स्त्री को भिक्षुणी बनाने से पहले संघ, गण अथवा उसकी श्रेणि से उसकी अनुमति ले ली जाए. ध्यान देने की बात है कि तब तक अंतरद्विपीय व्यापार शुरू हो चुका थाशिल्पकार और व्यापारी दोनों यह मान चुके थे कि व्यापार को बढ़ाने—उसकी सुरक्षा और समृद्धि के लिए संगठित होकर रहना अत्यावश्यक था. यह आर्थिकराजनीतिक शक्तियों के सहसंबंधों के विकसित होने की शुरुआत थी. हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस प्रकार के संगठन उसी तरह सहकार में लिप्त थे—जिस तरह कि आज के सहकारी संगठन. हम केवल यह मान सकते हैं कि उस संगठनों में आधुनिक सहकारिता के बीजतत्व मौजूद थे. लोग सहयोग की महत्ता को स्वीकार कर चुके थे. बौद्धधर्म के आगमन के सौडेढ़ सौ वर्षों में ही सामाजिकता की भावना का तीव्रतर विकास हुआ.

इस युग में अनेक महान ग्रंथों की रचना हुई. बौद्धधर्म के प्रचारप्रसार के लिए भी अनेक ग्रंथ लिखे गए. वैदिक परंपरा भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी. उसमें तात्विक चिंतन का कार्य जारी था. दार्शनिक चिंतन के क्षेत्र में भी इस दौरान मौलिक कार्य हुए. गौतम मुनि के न्याय, कणाद के वैशेषिक दर्शन की नींव रखी गई. वैदिक सहिंताओं के नवान्वेषण की परंपरा में कपिल मुनि का सांख्य, जैमिनी का पूर्व मीमांसा एवं वेद व्यास का उत्तर मीमांसा(ब्रह्मसूत्र) दर्शन प्रकाश में आए. इसी दौर में छठा भारतीय दर्शन योग के नाम से पातंजलि की मेधा का उपहार बना. दर्शन और अध्यात्म के अतिरिक्त लोकव्यवहार के क्षेत्र में भी मौलिक रचनाएं प्रकाश में आईं. अनेक उपनिषदों, पुराणों, स्मृतियों की रचना का साक्षी यह कालखंड रहा. कौटिल्य, कणाद, याज्ञवल्क्य, कात्यायन, कपिल, इस दौर के अतिमहत्त्वपूर्ण ग्रथों में कौटिल्य रचित अर्थशास्त्र का नाम बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है. ईसापूर्व चौथी शताब्दी में एक जिद्दी और धुन के पक्के ब्राह्मण विष्णुगुप्त चाणक्य, जिन्हें कूटनीतिक निपुणता के कारण कौटिल्य कहकर सम्मानित किया जाता है, ने मगध के सम्राट महानंद को गद्दी से उतारकर चंद्रगुप्त मौर्य के अधीन नए और कहीं विशाल राज्य की नींव डाली. इस कारण उनकी प्रतिष्ठा समाज के बीच आज भी बनी हुई है. अपने अर्थनीति एवं राजनीति संबंधी विचारों को लेकर उन्होंने ‘अर्थशास्त्र’ नामक पुस्तक की रचना की, जो अपने समय के महत्त्वपूर्ण ग्रंथों में से एक है. तत्कालीन भारत की राजनीति, अर्थशास्त्र एवं व्यवहारशास्त्र संबंधी विचारों को जानने के लिए अर्थशास्त्र की मान्यता इतनी बड़ी है कि बिना उसके उस कालखंड की चर्चा ही असंभव है.

अर्थशास्त्र अर्थनीति और राजनीति पर केंद्रित महान रचना है. हालांकि उसमें केंद्रीय सत्ता की भूमिका को अत्यधिक महत्त्व दिया गया है. लेकिन यह मान लेना कि उस समय स्थानीय तंत्र पूरी तरह नाकाम हो चुके थे, अनुचित होगा. उन दिनों केंद्रीय सत्ता की सर्वोच्चता के बावजूद समाज में सक्रिय निजी तंत्र की प्रभावी मौजूदगी थी, विशेषकर आर्थिक कार्यकलापों को लेकर. समाज की प्रमुख आर्थिकव्यापारिक गतिविधियां श्रेणियों के अधीन थीं. मौर्यकालीन भारत में उत्पादन की गतिविधियां निजी क्षेत्र द्वारा नियंत्रित थीं. उपभोक्ता वस्तुओं का निर्माण विपुल मात्र में किया जाता था. उस युग में श्रेणियों की शक्ति और उनकी पहुंच का अनुमान केवल इसी बात से लगाया जा सकता है कि महाकूटनीतिज्ञ चाणक्य उनकी सत्ता को संदेह की दृष्टि से देखते था; उसका मानना था कि सम्राट को उनसे सतर्क रहना चाहिए. राधाकुमुद मुखर्जी आदि विद्वानों के हवाले से विक्रमादित्य खन्ना लिखते हैं कि—

ऐसी संभावना है कि चाणक्य श्रेणियों की उपस्थिति को लेकर काफी शंकाकुल थे. श्रेणि से उनका आशय एक ऐसी स्वयंभू सत्ता से था, जिसके बहुत से सक्रिय सदस्य हों, अच्छे संसाधन तथा सदस्यों के मन में संगठन के प्रति समर्पण की उदात्त भावना हो. कौटिल्य ऐसे संगठनों, जो किसी खास उद्देश्य के लिए प्रयत्नपूर्वक गठित किए गए हों, को चंद्रगुप्त के नवगठित साम्राज्य की एकता के लिए एक बड़े खतरे के रूप में देखते थे. बावजूद इसके श्रेणियों के गठन को हतोत्साहित करने के लिए वे कोई कानून नहीं बना सके. क्योंकि एक तो श्रेणियां मौर्य साम्राज्य की स्थापना से भी बहुत पहले से समाज और शासन में अपनी पैठ बना चुकी थीं. दूसरे उन्हें लगता था कि नवगठित साम्राज्य को मजबूत एवं वैभवशाली बनाए रखने के लिए श्रेणियों का सहयोगसमर्थन आवश्यक है. यह मानने के भी पर्याप्त कारण हैं कि राज्य की आर्थिक संपन्नता, विकास एवं नागरिक समर्थन, जो सम्राट को लोकप्रिय एवं उसकी सत्ता की सर्वोच्चता बनाए रखने के लिए अनिवार्य था, हासिल करने के लिए वे व्यापारिक संगठनों को पर्याप्त महत्त्व देते थे. यह स्वाभाविक ही था, क्योंकि मौर्यकाल में सहयोगाधारित स्वतंत्र आर्थिकवाणिज्यिक संगठन/श्रेणियां आर्थिक विकास के सर्वाधिक सक्षम एवं कारगर ऊर्जास्रोत थे. अतः उनके साथ किसी भी प्रकार की उदासीनता या अभद्रतापूर्ण व्यवहार असमीचीन था. राज्य की समृद्धि के उनका उनका सहयोग तो आवश्यक था, लेकिन किसी भी प्रकार से उनकी संगठित ताकत साम्राज्य की अस्थिरता का कारण न बने, इसलिए उनपर नजर रखना अत्यावश्यक था.’1

यही कारण है कि कौटिल्य द्वारा ‘अर्थशास्त्र’ में ‘सामुत्थायक’ अर्थात साथ मिलकर सभी का समान उत्थान करने वाले समुदायों को कायम रखने की व्यवस्था की गई. सामुत्थायक का अभिप्राय ऐसे समूहों से था, जिनका संगठन परस्पर मिलकर (सामुत्थान द्वारा) किया गया है. ‘अर्थशास्त्र’ में इस प्रकार के सामुत्थानकों (सहकारी समूहों) का भी उल्लेख है, जो मुख्यतः मजदूर संगठन थे. सामुत्थानकों में मजदूर सम्मिलित कार्य करते थे. उस कार्य से हुई आय या मजदूरी परस्पर बाँट ली जाती थी—

एक समान कार्य करने वाले श्रमिकगण एकजुट होकर एकलशक्ति की तरह, साथसाथ संवाद करते हुए कार्य करें तथा उस कार्य से हुई आमदनी को परस्पर बराबरबराबर बांट लें.’2

मौर्यकाल से पहले ही शिल्पकारों के स्वतंत्र संगठन बनने लगे थे. वे संगठन अपने आप में स्वायत्त थे. सामूहिक हितों को देखते हुए वे परस्पर मिलजुलकर निर्णय लेते थे. उनका सुदूर रोम व्यापारिक संगठनों के साथ तालमेल था. यहां यह उल्लेखनीय है कि आपस में व्यापारिक तालमेल होने के बावजूद रोम के व्यापारिक समूहों की आंतरिक संरचना भारतीय श्रेणियों की संरचना से भिन्न थी. उन्हें संभवतः उतनी स्वायत्ता प्राप्त नहीं थी, जो उनके समकालीन भारतीय शिल्पकार संगठनों को प्राप्त थी. न ही वे निर्णय लेने के बारे में सामूहिक राय को उतना महत्त्व देते थे. यह बात चौंका देने वाली हो सकती है कि भारत के सहकारआधारित व्यापारिक संगठनों की क्षमता एवं कार्यकुशलता से परिचित होने तथा उनके साथ दीर्घकालीन व्यापारिक संबंध होने के बाद भी, रोम के व्यापारियों ने भारतीय श्रेणियों के समानांतर स्वतंत्र आर्थिक संगठनों के गठन से परहेज क्यों रखा?

ऐसा प्रतीत होता है कि मौर्यकालीन भारत एवं तत्कालीन रोमन साम्राज्य की परिस्थितियां एकदम अलग थीं. हालांकि दोनों साम्राज्यों को स्वायत्त व्यापारिक संगठनों के बारे में पर्याप्त जानकारी थी. संभवतः दोनों ही मानते थे कि स्वाधीन व्यापारिक संगठनों का प्रसार, प्रजा की साम्राज्य के प्रति निष्ठा और सेवाभावना को प्रभावित कर सकता है. बावजूद इसके मौर्यों ने पहले से चले आ रहे स्वायत्त व्यापारिक संगठनों को आगे भी कार्य करते रहने की अनुमति प्रदान की, जबकि रोमन साम्राज्य ऐसा कर पाने में असमर्थ रहा. इससे कोई भी यह अनुमान लगा सकता है कि मौर्य शासकों को पहले से चले आ रहे शिल्पकार संगठनों का समर्थन प्राप्त था. इसलिए उन्होंने यह ध्यान रखते हुए कि वे राज्य के लिए किसी प्रकार का खतरा न बन सकें, उन्हें स्वतंत्रतापूर्वक कार्य करते रहने की अनुमति प्रदान की थी. उस समय रोम में ऐसे स्वाधिकार संपन्न और व्यापारिक संगठन विकसित नहीं हो पाए थे, जिनपर भरोसा किया जा सके.’3

यहां यह मान लेना कि तत्कालीन रोम में सहयोगाधारित संगठनों का एकदम अभाव रहा, अनुचित होगा. भारत की तरह वहां भी सहयोगाधारित स्वायत्त संगठन बने थे, परंतु वे छोटे स्तर थे, उनका प्रमुख लक्ष्य केवल मुनाफा कमाना था. भारतीय शिल्पकार संगठनों जैसी सामूहिक चेतना का उनमें अभाव था. इसलिए रोमन साम्राज्य को किसी भी प्रकार का नुकसान पहुंचा सकने की उनकी क्षमता लगभग शूण्य ही थी. उधर अपनी साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाओं के बावजूद रोमन साम्राज्य अपने आप से ही भयभीत था. इसलिए वहां उस तरह के स्वशासी शिल्पकार संगठन विकसित नहीं हो सके, जैसे कि उसके समकालीन भारत में बहुत पहले से चले आ रहे थे. रोमन साम्राज्य को इसका नुकसान भी उठाना पड़ा. स्वायत्त शिल्पकार संगठनों को हतोत्साहित करने का ही परिणाम था कि कालांतर में रोमन साम्राज्य आर्थिक संकट का शिकार होता चला गया. दूसरी ओर कौटिल्य की सूझबूझ और चंद्रगुप्त के राजनीतिक कौशल का लाभ मौर्य साम्राज्य को मिला, जिससे वह तेजी से विकासशील शिल्पकार संगठनों का पूरा लाभ अपनी समृद्धि के लिए उठा सका. हालांकि कौटिल्यकृत ‘अर्थशास्त्र’ में श्रेणियों पर नियंत्रण या उनपर नजर रखने स्पष्ट उल्लेख कहीं नहीं है, तथापि इस बात की पर्याप्त संभावना है कि कौटिल्य के निर्देश पर सम्राट ऐसी सावधानियों का पालन करता था.

अर्थशास्त्र द्वारा यह भी बोध होता कि बुद्ध द्वारा निर्वाण प्राप्ति के सवाडेढ़ सौ वर्ष बाद ही समाज में पारस्परिकता का विकास बहुत तीव्रता से हुआ था. उस युग में एक ओर जहाँ बड़े व्यापारी अपने संगठन के माध्यम से देशदुनिया में अपने कार्यव्यापार का विस्तार कर रहे थे, वहीं अपेक्षाकृत छोटे व्यापारिक समूह सहकल्याण में ही जीवन की सार्थकता के दर्शन कर रहे थे. धनार्जन की भूख के साथ धन को त्यागने, उससे दूर रहने, अतिरिक्त धन को दान कर देने की प्रवृत्तियां जोर पकड़ती जा रही थीं. इनके साथसाथ अपरिग्रह, अस्तेय जैसी कल्याणकारी विचारधाराओं की मान्यता तेजी से बढ़ रही थी. आवश्यकता से अधिक धनसंचय को हेय मानकर उसका लगातार निषेद्ध किया जा रहा था. श्रीमद्भागवत में कहा गया—

जितने से पेट भरे उतना ही पाने का लोगों को अधिकार है. इससे अधिक रखने वाला चोर है.’4

प्रोफेसर आर.सी. मजुमदार के चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में सहकार पर आधारित संगठनों की मौजूदगी का उल्लेख अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ Cooperate life in Ancient Indiaमें किया है, जिसमें उन्होंने 27 प्रकार के संगठनों का उल्लेख किया है, जिन्हें श्रेणि, समिति, पुग, पाणि व्रात्य आदि विभिन्न नामों से संबोधित किया जाता था. कात्यायन ने भी कई प्रकार की समितियों, जो अलगअलग नामों से पुकारी जाती थीं, का उल्लेख किया है, जिसमें परस्पर विश्वास और उसके साथसाथ सामूहिक कल्याण की भावना से काम करने पर जोर दिया गया है.

भारतीय वाङ्मय में स्मृतियों का अत्यंत सम्मानीय स्थान है. इनमें तत्कालीन समाज के आचारव्यवहार पर न केवल गंभीर चिंतन है, बल्कि उसकी मौलिक गवेषणा के साथसाथ जीवन के लिए उनकी अपरिहार्यता सिद्ध करने वाली व्याख्याएँ भी मौजूद हैं. स्मृति ग्रंथों में भी शुक्रनीति, याज्ञवल्क्य स्मृति आदि का कार्यकाल अर्थशास्त्र से पहले का है. मनुस्मृति हालाँकि बाद की रचना है, तथापि राजनीतिक कारणों से उसको दूसरी स्मृतियों की अपेक्षा अधिक प्रसिद्धि मिली है. यद्यपि जिन कारणों से उसको राजनीतिक चर्चा में रखा जाता है, वे याज्ञवल्क्य स्मृति में अधिक तीव्रता या कहें कि कटुता के साथ विद्यमान हैं. जैसा कि पहले कहा गया है मनुस्मृति की रचना कौटिल्य का अर्थशास्त्र लिखे जाने के बाद हुई. मगर यदि यह मान लिया जाए कि उसकी ऋचाएं, लिखे जाने से पहले से ही लोकअनुश्रुति में प्रचलित थीं, तब मनुस्मृति के अनुसार भी समितियों को स्वायत्तता प्राप्त थी. एक प्रसंग में मनु ने लिखा भी है कि—

गांव या देश के संघों के साथ समझौता करने के बाद, यदि कोई व्यक्ति किसी लोभ या स्वार्थ के कारण उस समझौते की अवमानना करे तो ऐसे व्यक्ति को जेल में डाल दिया जाए और उसपर जुर्माना भी किया जाए.5

उल्लेखनीय है कि मनु ने समाज को चार वर्गों में विभाजित करते हुए राजनय एवं दंडनीति संबंधी व्याख्या में विभिन्न वर्गों के अपराधियों के लिए अलगअलग सजाएं सुनिश्चित की हैं, जिनमें ब्राह्मण को या तो सजा से पूरी तरह मुक्त रखा गया है, अथवा चारों वर्णों में उसके लिए न्यूनतम सजा का प्रावधान किया गया है. इसके लिए मनु की आलोचना भी की जाती है. किंतु श्रेणि के साथ किए समझौते के उल्लंघन को लेकर उसने वर्णभेद की ओर इशारा नहीं किया है. इसका कारण यह हो सकता है कि या तो वह इन आर्थिक संगठनों को वर्णाश्रम धर्म के बाहर मानता था. इसलिए उसपर विचार करते समय उसने विशुद्ध आर्थिक हितों पर ध्यान दिया था अथवा यह मानते हुए कि अधिकांश श्रेणियां ब्राह्मणेत्तर व्यापारी वर्ग अथवा शिल्पकारों द्वारा संचालित की जा रही थीं, जिनमें प्रायः एक ही वर्ण के लोग सम्मिलित होते थे, ऐसी संस्थाओं से उसके द्वारा पोषित वर्णव्यवस्था को कोई खतरा नहीं है, उसने वर्णाश्रम व्यवस्था के प्रतिबंधों को श्रेणियों पर लागू करने में उदासीनता बरती. एक तरह से इसका उसको लाभ ही हुआ. व्यापारी वर्ग जो उन दिनों अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत बना चुका था, तथा जिसका जनमानस पर गहरा प्रभाव भी था, वह उसके समर्थन में बना रहा.

इसका परिणाम यह हुआ कि मनुस्मृतिकाल में इन व्यापारिक संघों की महत्ता और भी बढ़ी. जिसके परिणामस्वरूप गाँव अथवा देश के साथ किए समझौते के उल्लंघन को केवल श्रेणि या वर्ग तक सीमित कर दिया गया. इस बात से ये संकेत भी मिलते हैं कि धीरेधीरे ही सही उस युग में विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था की रूपरेखा बन रही थी. मनुस्मृति के टीकाकार मेधातिथि और कुल्लूक भट्ट ने अपने ग्रंथों में इसका स्पष्ट उल्लेख किया है. याज्ञवल्क्य स्मृति में भी गणों की महत्ता को अक्षुण्ण रखने तथा उनसे विश्वासघात करने वाले अथवा उन्हें किसी भी प्रकार का नुकसान पहुंचाने वाले व्यक्ति से समस्त संबंध तोड़ लेने के निर्देश दिए गए हैं. यह बात भी ध्यान देने की है कि है कि भारत के संदर्भ में श्रेणियों का योगदान केवल आर्थिक कार्यक्रमों तक ही सीमित नहीं था. बल्कि उनकी व्याप्ति धार्मिक और सामाजिक सभी क्षेत्रों में बराबर बनी हुई थी. अतएव याज्ञवल्क्य स्मृति का संदेश सभी के लिए एकसमान है.

सामूहिकता की भावना को सामाजिकता की अनिवार्यता बताते हुए तत्कालीन ऋषियोंमुनियों ने उसपर बहुत जोर दिया है. उनका अपना आचरण भी सहयोगी और परस्पर समर्पित जीवन की मिसाल था. आश्रमों का जीवन न्यूनतम आवश्यकता और सुखदुःख में समान सहभागिता के सिद्धांत पर आधारित होता था. उनकी अर्थव्यवस्था पशुशक्ति, शिल्पकर्म और कृषिकर्म पर आधारित थी, जिसमें आश्रमप्रमुख या गुरु के साथ सभी आश्रमवासी मिलजुलकर खेती करते थे. उससे होने वाली आय से ही सभी का भरणपोषण होता था. कई स्थानों पर आश्रमों को गाय, स्वर्णादि दृव्य दान में देने का भी उल्लेख है. बावजूद इसके समाज में प्रतिष्ठा उन्हीं आश्रमों की थी, जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होते थे. उल्लेखनीय है कि भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में व्यक्तिगत और आर्थिक उपलब्धियों को उल्लेखनीय कभी माना ही नहीं गया. उनके स्थान पर यहां मोक्ष अर्थात मुक्ति की कामना पर जोर दिया गया है. जिसे सभी वर्गों के बीच समान रूप से मान्यता प्राप्त है. याज्ञवल्क्य स्मृति में गण के अधिकारों को प्रमुखता दी गई है. उसके अनुसार—

समूह द्वारा जो कानून अथवा नियम बनाए गए हों, यदि राजा के अपने कानूनों द्वारा उनका विरोध न होता हो तो राजकीय कानूनों के समान उनकी भी संरक्षा की जानी चाहिए. यदि कोई व्यक्ति गण के अधिकार को बाधा पहुंचाए अथवा उसके साथ किए गए किसी समझौते का उल्लंघन करे, तो उसपर पर्याप्त जुर्माना किया जाना चाहिए. सामूहिक हितों को ध्यान में रखते हुए सबको समूह द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करना चाहिए. जो भी इसका उल्लंघन करे अथवा पालन करने में आनाकानी करे, तो उस पर जुर्माना किया जाना चाहिए. राजा को चाहिए कि सामूहिक कार्य से उसके पास पहुँचे लोगों के काम पूरा होने पर, विदा होते समय उनको दान और मान के साथ विदा करे. उधर समूह के कार्य से राजा के पहुँचे लोगों का भी कर्तव्य है कि वे सामूहिक हित से प्राप्त धन को समूह को अर्पण कर दें. जो स्वयं अर्पण न करें उसपर ग्यारह गुना दंड लगाया जाए. इन समूहों के कार्यचिंतक ऐसे व्यक्ति होने चाहिए, जो धर्म के ज्ञान, शुचि एवं लोक से परे हों. समूह का हित चाहनेवालों को चाहिए कि उनके वचन को क्रियान्वित करें. यह विधि, श्रेणि, निगम और पाषंड सभी प्रकार के समूहों के लिए है. राजा इसके भेद की रक्षा करे—जो परंपरा चली आ रही हो, उसका सभी से पालन कराए.6

यह बात भी ध्यान में रखने की है कि उन दिनों उत्पादन मूलतः आवश्यकता केंद्रित था. आमतौर पर जीवन में नित्यप्रति काम आने वाली वस्तुओं का उत्पादन स्थानीय शिल्पकारों, कारीगरों द्वारा ही कर लिया जाता था. उनके लिए स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कच्चेमाल का ही प्रयोग किया जाता था. हालांकि जैसेजैसे मनुष्य की रुचि एवं संसाधनों का विकास हो रहा था, माल की खपत के लिए दूसरे बाजारों की खोज के साथ ही आयातित कच्चेमाल का प्रयोग भी आम हो चला था. फिर भी कच्चेमाल के स्रोत उन दिनों शिल्पकेंद्रों के विकास का प्रमुख कारण रहे. तत्कालीन समाज में शिल्पकार और कारीगर समाज का महत्त्वपूर्ण हिस्सा थे. तथापि जैसेजैसे जातिप्रथा अपना संकुचित रूप धारण करती चली गई, शिल्पकारों की प्रतिष्ठा भी उत्तरोत्तर घटती चली गई. धर्मशास्त्रों में यह भी उल्लिखित है कि स्थानीय उद्योगों एवं व्यवसायों से जुड़ी जातियां व्यवस्थित एवं धनवान थीं. उनके अनेक और मजबूत संगठन थे, जिन्हें उनकी संरचना और कार्यशैली के अनुसार विभिन्न नामों से पुकारा जाता था.

कौटिल्य ने भले ही आर्थिक समितियों को संदेह की दृष्टि से देखते हुए सम्राट को उनसे सावधान रहने को कहा हो, किंतु उनके पूर्ववर्ती एवं परिवर्ती चिंतकों ने श्रेणि आदि सभी आर्थिकवाणिज्यिक संगठनों को सामाजिक विकास के लिए अपरिहार्य माना था. आलोचना के बावजूद कौटिल्य भी श्रेणियों को समाप्त करने के पक्ष में नहीं थे. वे उनको राज्य के विकास के लिए अपरिहार्य मानते थे. यही कारण है कि उन्होंने श्रेणियों को प्रोत्साहित करने के लिए राजा को आवश्यक निर्देश दिए. अर्थशास्त्र में उसके लिए आवश्यक व्यवस्थाएं कीं. आर्थिक समितिकरण की आवश्यकता मात्र उद्यमियों एवं व्यापारियों के हित में ही नहीं थी. बल्कि उसका उद्देश्य आम जन को भी शोषण से सुरक्षित रखना था, जिसमें उन्हें पूर्ण सफलता प्राप्त हुई थी.

प्राचीन भारत के अर्थशास्त्रियों में शुक्राचार्य और बृहश्पति के नाम बहुत सम्मान के साथ लिए जाते हैं. दोनों ही प्रखर विद्वान और कालजयी चिंतक थे, जिन्होंने आर्थिक समितियों पर खुलकर विचार किया था, उनकी उपयोगिता को दर्शाते हुए उनकी स्थापना एवं विकास पर जोर दिया तथा राज्य को उन्हें यथासंभव सहायता उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिए. अर्थशास्त्र के आदि आचार्य माने जाने वाले बृहश्पति ने आर्थिक विषयों को अपने विवेचन, चिंतन का मुख्य आधार बनाया. यह बात अलग है कि उनका अधिकांश चिंतन भारतीय समाज में व्याप्त वर्णवाद को प्रश्रय देने वाला और परंपरावादी किस्म का है. हमें यह मानने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि वर्णाश्रम धर्म को लेकर आचार्य बृहश्पति ने भी तत्कालीन वर्णभेद संबंधी मान्यताओं का समर्थन किया. शायद इसी कारण उन्हें पर्याप्त प्रतिष्ठा से वंचित रहना पड़ा है. उनका आर्थिक चिंतन तत्कालीन वर्चस्ववादी शक्तियों की अपेक्षाओं के अनुकूल था, जिससे तर्काधारित ज्ञानविज्ञान के प्रति जिज्ञासा के स्थान पर रूढ़िवाद को पांव जमाने का अवसर मिला. बावजूद इसके उनकी अप्रतिम मेधा का लोहा हमें मानना ही होगा. उन्हें अर्थशास्त्र में व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया है. एक स्थान पर वे लिखते हैं कि—

दान करना चाहिए….पचीस वर्षों तक अध्ययनमनन आदि करना चाहिए, तत्पश्चात धनोपार्जन. सम्राट को कृषि, गोकुल तथा वाणिज्य की सुरक्षा करनी चाहिए….नीति के चार उपाय हैं—साम दाम दंड और भेद….इनके अतिरिक्त तीन और भी हैं—माया, उपेक्षा एवं वध….धन को उसी प्रकार अर्जित करना चाहिए जिस प्रकार हाथी से हाथी पकड़ा जाता है….धन जगत का मूल हैइस कारण सब इसकी कामना करते हैं, जिसके पास धन हो उसके पास मित्रहितैषीधर्मविद्यागुणविक्रमादि सब मौजूद होते हैं….’7

बृहश्पति के आर्थिक विचारों में साम्राज्यवादी ढाँचे को मजबूत बनाए रखने की भावना प्रकट हुई हैब्राह्मणवादी विचारधारा का समर्थन करते हुए वे वर्णाश्रम धर्म की रक्षा करने का आह्नान करते हैं. सामाजिक स्तरीकरण को प्राकृतिक बताते हुए वे अन्याय और अनाचार का पक्ष लेने से भी नहीं चूकते. दुष्ट एवं दोषी ब्राह्मण को भी अबध्य बताकर वे समाज के एक वर्ग को अतिरिक्त रूप से अधिकारसंपन्न बनाने का कार्य करते हैं. यह वर्गीय दृष्टि आज के वैज्ञानिक समाज में भले ही अर्थहीन हो चुकी हो, किंतु एक समय में स्थिति इतनी ज्यादा पेचीदा और गंभीर थी कि भारतीय समाज में एक पराश्रित/परजीवी किस्म का वर्ग, शताब्दियों तक दूसरों की मेहनत और संसाधनों के दम पर मौज उड़ाता रहा.

भारत के प्राचीन अर्थशास्त्रियों में शुक्राचार्य का योगदान भी उल्लेखनीय है. मौलिकता की दृष्टि से उनका योगदान आचार्य बृहश्पति से भी बढ़कर है. उनका अर्थदर्शन कहीं अधिक आधुनिक एवं तर्काधारित है. इसी कारण वे भारतीय आर्थिक चिंतन के पितामह माने जाते हैं. भारतीय धर्मशास्त्रों के अनुसार शुक्राचार्य को असुरों का गुरु माना गया है. लोकश्रुति में असुर को देवविरोधी और घृणा का पात्र माना गया है, वस्तुतः असु़र(+सुर)से तात्पर्य उन लोगों से था, जो वैदिक कर्मकांड के विरोधी थे. ध्यातव्य है कि वैदिक सभ्यता मुख्यतः पशुचारण व्यवस्था थी. जबकि असुर, जिनमें अधिकांश संख्या भारत के मूलनिवासियों की ही थी, कृषिकर्म में पूर्ण दक्षता प्राप्त कर चुके थे. इसलिए उनकी अर्थव्यवस्था में स्थायित्व अधिक था. उनके विचारों में यथास्थतिवाद एवं परंपरा के पोषण की अपेक्षा व्यावहारिकता अधिक है. शायद इसी कारण हमें आचार्य बृहश्पति की अपेक्षा शुक्राचार्य के विचार कहीं अधिक व्यावहारिक एवं तर्कसंगत नजर आते हैं. अर्थशास्त्रीय मान्यताओं की सैद्धांतिक पुष्टि के लिए सर्वप्रथम शुक्राचार्य ने ही मूल्य की परिभाषा की थी, जो आज करीब 2600 वर्ष बाद भी लगभग ज्योंकीत्यों प्रचलन में है. मूल्य का 2600 वर्ष पूर्व इतना सटीक एवं प्रामाणिक विवेचन किसी अन्य विद्वान ने नहीं किया. मूल्य को परिभाषित करते हुए शुक्राचार्य ने लिखा है कि—

जिसके माध्यम से कोई वस्तु प्राप्त होती है, वही उसका मूल्य है. अर्थ अथवा मूल्य वस्तु के सुलभ अथवा असुलभ होने तथा गुण या अगुण और लोगों की कामना अथवा इच्छा के अनुसार घटताबढ़ता रहता है.’8

आचार्य शुक्र मूल्य को दो तरह देखते थे—एक तो मूल्य अथवा मूल्यक, दूसरा अर्थक. मूल्य अथवा मूल्यक वह खर्च था जो किसी वस्तु को खरीदने के लिए किया जाता है, जिसे क्रेता वांछित वस्तु के बदले में विक्रेता की सहमति होने पर उसे प्रदान कर वस्तु का स्वामित्व खरीदता है. वस्तु का मूल्य उसकी उपलब्धता एवं मांग के आधार पर घटताबढ़ता रहता है. अर्थ की विशेषता वस्तु की उपयोगिता में निहित रही है. कोई वस्तु जिस कार्य के निर्मित एवं अपेक्षित है, उसे पूरा करने में जितनी सामथ्र्यवान वह उतनी ही मूल्यवान भी समझी जाएगी. दूसरे शब्दों में कोई वस्तु जितनी अधिक उपयोगी होगी, वह उतनी ही अधिक मूल्यवान मानी जाएगी. कात्यायन और शुक्राचार्य की भांति आचार्य कामंदक भी विद्वान अर्थशास्त्री थे. हालांकि अर्थशास्त्र संबंधी उनकी स्थापनाएं बहुत कुछ आध्यात्मिक किस्म की हैं. उन्होंने अर्थशास्त्र को धर्म का ही उपांग माना है. उनका मानना था कि अर्थशास्त्र में धर्म की प्रतिष्ठा होनी चाहिए. दूसरे शब्दों में अर्थिक महत्त्व के विषयों की विवेचना के लिए धार्मिक मान्यताओं तथा रीतिरिवाजों का पूरा ध्यान रखना चाहिए.

ये तमाम अवधारणाएं अलगअलग दीखती हुई भी एक दूसरे से संबंधित हैं तथा तत्कालीन समाज के भीतर प्रचलित अलगअलग वैचारिक धाराओं तथा अपने समाज की परिस्थतियों का खुलासा करती हैं. आचार्य बृहश्पति देवताओं के गुरु थे. देवसमाज असुरों के समाज की अपेक्षा संगठित तथा आर्थिक रूप से संपन्न था. अपने आप में संपूर्णता का बोध लिए हुए, जो बाकी समाजों को खुद से हेय मानता था और इसी आधार पर दूसरों पर अपनी संस्कृति लादने के लिए सतत प्रयत्नशील रहता था. इसलिए उनके चिंतन में व्यावहारिकता के स्थान पर उपदेशात्मकता अधिक नजर आती है. इसके विपरीत शुक्राचार्य जिस असुर समाज के निर्देशन का गुरुत्वभार संभाले हुए थे, वहां पर आंतरिक लोकतंत्र की भावना बहुत प्रिय थी. शिल्पकलाओं के विकास में इस वर्ग का योगदान सराहनीय रहा है, जो कालांतर में व्यापारिक विकास का मुख्याधार बनीं. स्पष्ट है कि आर्थिक एवं सामाजिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए पारस्परिक सहयोग की परंपरा बहुत पहले शुरू हो चुकी थी. कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी श्रेणियों का वर्णन है, जिन्हें आधुनिक सहकारिताओं का आदिकालीन रूप में माना जा सकता है. यही नहीं कौटिल्य मजदूर समितियों का भी उल्लेख करते हैं, जो परस्पर संगठित होकर कार्य करते थे और प्राप्त मजदूरी को आपस में बाँट लेते थे—

एक साथ रहने, साथसाथ कार्य करने वाले शिल्पकर्मी समुत्थान अर्थात अपने समूह के कल्याण के लिए एकजुट होकर व्यापारकर्म अपनाते हैं और उससे हुई आय को आपस में बांट लिया करते हैं.’9

इस प्रकार समुत्थारक का आशय ऐसे गतिवान संगठन से है जिसके सदस्य परस्पर संगठित होकर सामूहिक लक्ष्यों के लिए कार्य करते थे. नारद स्मृति हालांकि बाद की रचना है, जिसमें व्यावहारिक जीवन की अनेक समस्याओं पर विचार किया गया है. उसमें भी सहयोग एवं सहकार की महत्ता पर प्रकाश डाला गया है. वहाँ भी समुत्थान की उपयोगिता पर बल देते हुए संगठित होने तथा एकदूसरे के कल्याण के लिए सहकार करने की आवश्यकता पर जोर दिया है—

वणिकगण जहाँ संगठित होकर कार्य करते हैं, उसे संभूय समुत्थान कहा जाता है. लाभ की कामना से जब कोई कार्य अपनी ओर से किया जाए तो उसका आधार अपनी ओर से लगाया हुआ धन ही होता है. इसी हिस्से के आधार पर प्रत्येक हिस्सेदार को लाभ का उपयुक्त अंश प्रदान किया जाना चाहिए. लाभ, व्यय और वृद्धि—तीनों का अंश प्रत्येक हिस्सेदार पर उसके हिस्से के अनुसार पड़ना चाहिए.’10

समूह की सफलता के लिए यह भी आवश्यक है कि उसके सदस्यों के बीच एकता के साथसाथ उनका मानसिक स्तर एक जैसा हो, उनमें अटूट विश्वास एवं संपूर्ण सांगठनिक चेतना हो. इससे आपस में तालमेल कायम रखने के साथसाथ कार्यक्रमों के निर्माण एवं उनके संचालन में मदद मिलती है. नारद स्मृति में चतुर एवं कुशल व्यापारियों को, मूर्ख और आलसी व्यक्तियों के साथ मिलाकर काम न करने की सीख दी गई है. इसके स्थान पर अपना लाभहित देखते हुए आचरण करने का फैसला किया गया है. आधुनिक अर्थशास्त्री भी अपना लाभहित देखते हुए आचरण करने की सलाह देते हैं. सामूहिकता की भावना को सामाजिकता की अनिवार्यता बताते हुए तत्कालीन ऋषियोंमुनियों ने उसपर बहुत जोर दिया है. उल्लेखनीय है कि भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में आर्थिक उपलब्धियों को बहुत ज्यादा उल्लेखनीय कभी माना ही नहीं गया. उनके स्थान पर मुक्ति की कामना पर जोर दिया गया है. लेकिन यह मान लेना कि व्यावहारिक स्तर पर भारतीय मनीषी पूर्णतः निरपेक्ष एवं चिंतनशूण्य थे, लौकिक विषयों की ओर उनका कोई रुझान ही नहीं था, अनुचित होगा. अगर ऐसा होता तो भारतीय कलाओं का विकास अधूरा ही रह जाता. बौद्धधर्म के विकास के पीछे वैदिक धर्माचार्यों द्वारा थोपे गए कर्मकांडों के अतिरिक्त भारतीय समाज के कुछ उपभोक्तावादी संस्कार भी थे. दरअसल भारतीय मेधा बहुआयामी रही है. उसने जहां विराट से लेकर शूण्य तक को अपनी विचारणा का विषय बनाया, वहीं उसके चिंतनमनन में लौकिक विषयों को लेकर चमत्कृत कर देने वाली, बहुरंगी और विविधतापूर्ण उपलब्धियां भी मौजूद हैं.

प्राचीन भारतीय मुनियों की अंतर्दृष्टि एक ओर तो विराट ब्रह्मांड के सूक्ष्मतम रहस्यों की पड़ताल में लगी थी, वहीं उसका दूसरा हिस्सा लौकिक विषयों को लेकर निरंतर शोध और संभावनाओं की तलाश में जुटा था. इनमें वैदिक और द्राविड़ दोनों ही सभ्यताओं का समान योगदान था. बल्कि यह कहना उचित होगा कि दोनों ही सभ्यताएं परस्पर समानांतर, कहीं एकदूसरे की पूरकसहयोगी बनकर साथसाथ आगे बढ़ती हुई, कहीं परस्पर तिर्यक—एकदूसरे को काटती हुईसी, सामाजिक विकास के कार्य में लगी रहती थीं. कालांतर में बड़े व्यापारिक संघों को स्वयंप्रभुता के लिए खतरे के रूप में देखता था, परंतु उसने भी श्रेणियों की आर्थिकसामाजिक उपयोगिता को देखते हुए उन्हें मुक्त व्यापार करने की अनुमति देने की अनुशंसा की थी. इसलिए मौर्य प्रशासन में श्रेणियों का तीव्र विकास संभव हो सका. मौर्यशासन से श्रेणियों ने विकास की जो रफ्तार पकड़ी वह गुप्तकाल तक बनी रही. बल्कि अपने पूर्ववर्ती शासनों की अपेक्षा विकेंद्रीकृत शासनव्यवस्था होने के कारण वह श्रेणियों के विकास के लिए और भी अनुकूल सिद्ध हुई. इस अवधि में व्यापार संगठनों एवं राजदरबार के संबंध परस्पर अन्योन्याश्रित रहे, जिससे राज्य का त्वरित विकास संभव हुआ, साथ ही श्रेणियों को अभूतपूर्व प्रतिष्ठा प्राप्त हुई.

गौतम बुद्ध ने सामाजिकआर्थिक विकास में श्रेणियों के योगदान को देखते हुए उनकी मुक्त कंठ से प्रशंसा की है. जातक कथाओं में उस समय की प्रतिष्ठित श्रेणियों का ससम्मान उल्लेख किया गया है. आगे चलकर गुप्त सम्राट स्कंदगुप्त का एक लेख देखने में आया है, जिसमें तेलियों की श्रेणि के पास अक्षयनिधि जमा कराने का उल्लेख मिलता है. लेख के अनुसार इंद्रपुर में निवास करने वाली तेलियों की एक श्रेणि के पास सम्राट स्कंदगुप्त द्वारा धन जमा कराया गया था. उद्देश्य मात्र इतना था कि उस धन से प्राप्त ब्याज से सूर्य मंदिर के दीपक के लिए तेल का खर्च चलता रहे. इस लेख के अनुसार आदेश था कि भले ही तैलिक श्रेणि स्थानापन्न होकर अन्यंत्र जा बसे, वहीं अपना व्यवसाय आदि करें, मगर राजा की ओर से जमा कराया गया धन उसी के पास जमा रहे. उस समय के प्रसिद्ध ग्रंथों यथा अर्थशास्त्र, याज्ञवल्क्य स्मृति, नारद स्मृति, नीति वाक्यामृत आदि में श्रेणियों के योगदान की चर्चा की गई है. इससे स्पष्ट है कि प्राचीन भारत में समाजव्यवस्था के अंतर्गत श्रेणियों और निगमों को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था. अथर्ववेद के एक सूक्त के अनुसार—

राज्य, संस्था या समाज मनुष्य के क्रमिक विकास का परिणाम हैं. राज्य संस्था से पूर्व विराट(राज्यविहीन या अराजक) दशा थी. उस दशा के होने से भय होता था कि क्या सदैव यही दशा रहेगी. क्योंकि वह दशा भयावह थी, अतः उत्क्रांति होकर, ग्रहिपत्य संगठन बने. मनुष्यों का सबसे पहला संगठन परिवार के रूप में था. पारिवारिक दशा में उन्नति होकर ‘आहवनीय’ दशा आई. इस दशा में ग्रहों (परिवारों) के स्वामियों (गृहपतियों) का एक स्थान पर आह्नान किया जाता था. आहवनीय के नेताओं को वेदों में ग्रामणी कहा गया है. आहवनीय (ग्राम) से उत्क्रांति होकर ‘दक्षिणाग्नि’ दशा आई. यह गाँव की अपेक्षा अधिक बड़ा संगठन था. निरुक्त में अग्नि का अर्थ अग्रणी किया गया है. इस दक्षिणाग्नि दिशा में उत्क्रांति होकर सभा और समिति, संस्थाओं का निर्माण हुआ.’11

इस तरह समितिकरण की शुरुआत को हम विकासक्रम की अधिक परिपक्व अवस्था भी कह सकते है. जिसके आधार पर अपरिग्रह के महत्त्व को दर्शाते हुए, ‘सैकड़ों हाथों से अर्जन करने और हजारहजार हाथों से विसर्जित करने यानी बांटने.’ की उदात्त भावना भारतीय संस्कृति के पवित्र लोकादर्शों में सम्मिलित रही है. लोकतंत्र जिस सांगठनिता एवं समानता के उच्चादर्श के साथ आज प्रचलित है, वैसा तब भले ही न हो, उसका सीमित और अपरिष्कृत रूप की उस समय प्रचलित हो, किंतु प्राणिमात्र के प्रति समानता का आदर्श उस समय के प्रायः सभी ग्रंथों में मौजूद रहा है. उसी के अनुसार उस समय के आर्थिक सिद्धांत गढ़े गए है. उसी के आधार पर किसान अन्न उगाते समय समस्त प्राणियों के पोषण की कामना करता है, शिल्पकार अपने शिल्प के माध्यम से सबके काम आना चाहता है और मनस्वी कामना करता है कि वह सबके हित का सोचे, सबके कल्याण का सपना देखे और उसके लिए प्राणप्रण से संकल्प साधना को समर्पित होवे. तदनुसार बिना किसी वर्गभेद के समाज के एक समान कल्याण की कामना को समर्पित शास्त्रीय व्यवस्थाएं पूरे समाज को परिवार की भांति मानकर सबके उपकार का संकल्प रचती हैं. तभी तो वाणी के स्तर पर भी किसी का अकल्याण न हो, ऐसी हमारे यहां मान्यताएं थीं और सबके अनुपालन के लिए पर्याप्त शास्त्रीय व्यवस्थाएं भी थीं. एक वैदिक प्रार्थना देखिए—

हम सब समान गति, समान कर्म, समान ज्ञान एवं एक समान नियम अपनाते हुए, सबका कल्याण करने वाली वाणी बोलें.12

इसी प्रकार की एक पवित्र सद्कामना अथर्वेद के उद्गाता कवि की है—

हमारा साथसाथ रहनसहन हो—संकट में हम एकदूसरे के मददगार हों—एक साथ रहकर भरणपोषण करें.’13

और यह सब अचानक न होकर मनीषियों के शताब्दियों लंबे चिंतन की परिणति थी. प्राचीन भारत में सहकार की स्थिति को बल मिला था, उन जनतांत्रिक संस्थाओं के कारण जिनकी उपस्थिति ग्रामीण भारत में प्राचीनकाल से ही रही है. हम इस पर गर्व कर सकते हैं कि सामंतवाद के कठिन दौर में भी हमारे गांव आंतरिक लोकतंत्र का श्रेष्ठतम उदाहरण बने रहे. गांव की आंतरिक व्यवस्था को बनाए रखने, आपसी झगड़ों को सुलझाने, आर्थिक एवं सामाजिक नीतियां तय करने जैसे कार्य गांव पंचायतों तथा जनतांत्रिक ढंग से चुनी गई ऐसी ही अन्य व्यवस्थाओं पर निर्भर रहा है. ईसा से भी लगभग दो शताब्दी पहले तक भारत में ऐसी संस्थाओं यथा ग्रामसभा, ग्राम परिषद, ग्राम पंचायत, क्षेत्रीय पंचायत आदि स्थानीय निकायों की सार्थक एवं सक्रिय उपस्थिति थी, जो आंतरिक झगड़ों का निपटान करने, करों की वसूली तथा स्थानीय प्रशासन का दायित्व संभालती थीं.

ईसा से छह शताब्दी पूर्व परंपरागत ब्राह्मण धर्म अपनी ही कमजोरियों के कारण अपनी प्रासंगिकता खोने लगा था. बलि, बोझिल कर्मकांड एवं यज्ञों का अतिरेक उसकी प्रतिष्ठा और छवि को कलंकित करने में सहायक बने थे. उसके स्थान पर बौद्धधर्म तेजी से अपना स्थान बनाता जा रहा था, जो राजनीतिक रूप से राजामहाराजाओं का संरक्षण पाने के बावजूद धर्म के मामले में केंद्रीय सत्ता का विरोधी था. श्रेणियां चूंकि सत्ता एवं संसाधनों के विकेंद्रीकरण में सहायक थीं, संभवतः इसीलिए गौतम बुद्ध ने श्रेणियों के विकास पर जोर दिया था. बौद्धधर्म की संरचना एवं उसका प्रसार भी श्रेणियों के विकास में सहायक बना था. इस संबंध में विक्रमादित्य खन्ना के विचार दृष्टव्य हैं, जो उन्होंने किरन कुमार थपल्याल के हवाले से व्यक्त किए हैं—

बौद्ध धर्म एवं जैनधर्म, जिनका प्रादुर्भाव ईसापूर्व छठी शताब्दी में हुआ था, अपने पूर्ववत्ती ब्राह्मण धर्म की अपेक्षा अध्कि उदार एवं समतावादी थे. जिससे श्रेणियों को अपने विकास के लिए अपेक्षाकृत बेहतर एवं अनुकूल अवसर प्राप्त हों. ब्राह्मण धर्म के प्रभाव के चलते यज्ञों में बलि देने की घटनाएं तेजी से बढ़ी थीं, परिणामस्वरूप समाज की बहुत बड़ी पूंजी व्यर्थ चली जाती थी. बौद्ध तथा जैन धर्म यज्ञों नहीं करते थे. दोनों ही धर्मों में अपने से निचले वर्ग के साथ भोजन न करने की ब्राह्मणवादी शुचिताओं, निषेधों के लिए कोई स्थान नहीं था. व्यापार के सिलसिले में लंबी यात्राएं करना उनके लिए वर्जित नहीं था.’14

चंद्रगुप्त मौर्य यद्यपि हिंदू सम्राट था, लेकिन अशोक ने स्वयं को बौद्ध घोषित कर ब्राह्मणधर्म द्वारा पोषित कर्मकांडों पर अंकुश लगाने का कार्य किया था. यज्ञों में पशुबलि पर रोक लगाकर उसने स्वयं को न केवल अधिक मानवतावादी सम्राट सिद्ध किया था, बल्कि उस बहुमूल्य पशुशक्ति का भी संरक्षक घोषित किया था, जो उस समय भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मूलाधार थी. जातीय निषेधों के कमजोर पड़ने से समाज में आपसी संवाद एवं सहयोग की परंपरा को बल मिला, जिसके फलस्वरूप स्थानीय संस्थाएं और अधिक मजबूत बनकर उभरने लगीं. मौर्यकाल(322 .पू.) में गांवों में पंचायत की मौजूदगी थी, जिसका गठन गांव के पांच चुने हुए व्यक्तियों से किया जाता था. वह गांव की सुरक्षा तथा स्थानीय प्रशासन संबंधी अन्य मामलों की देखरेख करती थी. उसके सारे पद स्वैच्छिक होते थे. लोग समाजसेवा की भावना के साथ उन जिम्मेदारियों का वहन करते थे. गुप्तकाल(320 . से 600ई तक) के दौरान भी स्थानीय प्रशासन व्यवस्था मजबूत थी. उन दिनों भी ग्राम प्रमुख को ग्रामिका कहा जाता था. दस गांवों पर नियंत्रण तथा उनके आपसी व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए दस ग्रामिका अथवा महत्तर सभा होती थी.

ईसा से छह सौ वर्ष पश्चात देश में पालवंश का शासन था, उन दिनों गांव का मुखिया पाटक कहलाता था. गांव पंचायत के सदस्य गांव के वरिष्ठजन होते थे. उन्हीं के बीच से एक वरिष्ठ एवं योग्य सदस्य को ग्रामपति अथवा मुखिया चुन लिया जाता था. उससे ऊपर दस गांवों की एक सभा होती थी, जिसको महत्तर सभा अथवा दस ग्रामिका के नाम से पुकारा जाता था. उसका मुखिया दसग्रामिका कहलाता था. स्थानीय प्रशासन की यह व्यवस्था ईसा पूर्व दो हजार वर्ष से भी पुरानी है. इसके संकेत वैदिक ग्रंथों से लेकर कौटिल्य के अर्थशास्त्र तथा गुप्तकाल के साहित्य में मिलते हैं. विकेंद्रीकृत शासनव्यवस्था शिल्पकलाओं के विकास में सहायक सिद्ध हुई थी.

ईसा से पांचवी शताब्दी पूर्व के ग्रंथ गौतम धर्मसूत्र में इस बात के स्पष्ट उल्लेख है कि उस समय—

किसानों, व्यापारियों, पशुचारकों, साहूकारों तथा शिल्पकर्मियों के भी संगठन थे तथा उन्हें यह अधिकार प्राप्त था कि अपने वर्ग के कल्याण के लिए जरूरी नियम बना सकें. यहां तक कि सम्राट भी आवश्यक मसलों को लेकर संबंधित वर्ग के प्रतिनिधि से परामर्श करता था.’15

जातक कथाओं में अठारह प्रकार की श्रेणियों तथा श्रेणिप्रमुखों का उल्लेख आता है. वे बारबार विभिन्न व्यवसायों की वंशानुगतता की ओर भी संकेत करती हैं, जिसके अनुसार पुत्र अपने पिता के व्यवसाय को अपना लेता था. यहां तक कि व्यक्ति के परिवार, कुल आदि की पहचान भी उसकी श्रेणि या व्यवसाय से होती थी और लोग उनका उपयोग अपने नाम के साथ सम्मानसूचक शब्दों की भांति करते थे. वंशानुगतता भारतीय श्रेणियों का विशिष्ट गुण था. यही परंपरा भारतीय श्रेणियों को पश्चिम के उद्यमी संगठनों से अलग सिद्ध करती है. एक स्वाभाविक प्रश्न यहां जन्म लेता है कि देश में लगभग ढाई हजार वर्ष पहले ही कामयाब जनतंत्र लोकतांत्रिक शासन प्रणाली होने के बावजूद वे कौनसे कारण थे कि भारतीय समाज भटकाव का शिकार हुआ. अपने भटकाव के दौरान समाज न केवल अपनी स्थिति से गिरा, बल्कि उसको इसके लिए आर्थिक हानि भी उठानी पड़ी. कारण कई हैं और उनमें से अधिकांश उसी परांपरा एवं संस्कृति की देन हैं, जिन्हें वैदिक परंपरा सांस्कृतिक समृद्धि के प्रतीक मानती आई है. यानी समाज का चातुवर्ण्य विभाजन जो कालांतर में अनगिनत जातियों और वर्गों में बदल चुका है.

वस्तुतः ज्ञान के प्रत्येक सूत्र को वेदों में तलाशने की प्रवृत्ति ने भी समाज का नुकसान ही किया. क्योंकि निहित स्वार्थों के कारण समाज का एक वर्ग नए ज्ञान के प्रति उत्सुक्ता और उसके लिए बदलाव की हर स्वाभाविक प्रवृत्ति का निषेध, यह कहकर करता रहा कि उसमें नया कुछ भी नहीं है, वह तो हमारे शास्त्रों में पहले से ही उपलब्ध है. यह मनुष्य की विवेकशीलता की अवमानना जैसा,प्रतीक था, भारत की उस गुलाम मानसिकता का जो वर्तमान से उबरने की छटपटाहट में बारबार अतीत की ओर पलायन कर रही थी. अतएव सहकार की भावना का जो उभार प्राचीन भारत में देखने को मिलता है, मध्यकाल में आकर वह सहसा अवरुद्ध हो जाता है. परंतु वह ठहरता नहीं है, अवमंदन की स्थिति में भी वह सतत आगे बढ़ता जाता है. भारत में वैदिककाल से ही साहचर्य आधारित उद्यमों को सामाजिक संबंधों के विकास एवं उनके स्थायित्व के लिए, एक अनिवार्य उपक्रम के रूप में स्वीकारा गया. प्रायः सभी सम्राटों ने साहचर्य आधारित समूहों की उपयोगिता को स्वीकारते हुए उन्हें अपने राज्य में सम्मानजनक स्थान दिया, तथापि उनकी भिन्न राजनीतिकसामाजिक विचारधारा का प्रभाव श्रेणियों के विकास पर भी निरंतर पड़ा. जैसे मौर्यशासन के अंतर्गत जब केंद्रीय सत्ता अपेक्षाकृत मजबूत थी, उन दिनों श्रेणियों को अपने विकास के लिए उतने अनुकूल अवसर नहीं मिल पाए थे, जितने कि आगे चलकर गुप्तकाल के दौरान उन्हें मिले, जो अपेक्षाकृत विकेंद्रीकृत शासनव्यवस्था थी.

कालांतर में जैसेजैसे समाज का विकास हुआ, मनुष्य की जरूरतें बढ़ीं, नई खोजों ने मानवीय सभ्यता के नए पथों को प्रशस्त किया, तब सहकारिता भी अलगअलग रूपों में पनपती चली गई. उसका स्वरूप और अधिक जटिल तथा विस्तृत होता चला गया, जो बदली हुई परिस्थतियों में स्वाभाविक ही था. बदलते वक्त के साथ सहकारी संस्थाओं के व्यवसाय में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई तथा वे उत्तरोत्तर बहुउद्देश्यीय संगठन के रूप में ढलती चली गईं. लेकिन प्राचीन भारत में, विशेषकर ईसा पूर्व पांचवीं शताब्दी से लेकर ईसा पश्चात छठी शताब्दी तक सहकारी संबंधों का जितना विकास हुआ, उतना आगे के वर्षों में न हो सका. वस्तुतः उसके बाद के वर्षों में भारत आंतरिक रूप से निरंतर कमजोर पड़ने लगा था. विदेशी आक्रमणों के कारण यहां का सामाजिक ढांचा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका था. प्रारंभिक भारतीय समाज में जो खुलापन तथा नए ज्ञान को आत्मसात करने की ललक थी, बाद के वर्षों में उसका स्थान रूढ़ियों एवं जड़ परंपराओं ने ले लिया था. गुलाम मानसिकताओं की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि हताशा के क्षणों में वे अक्सर अतीतोन्मुखी बनकर जीने लगती हैं, परिणामस्वरूप विकास उनके लिए छलावा बन जाता है.

जो भी हो, सहकारिता जिस स्वतन्त्रय चेतना की अपेक्षा रखती है, बदलती परिस्थितियों एवं राजनीतिक अस्थिरता के चलते, आगे के वर्षों में वह लगातार शिथिल पड़ती गई. इसके बावजूद अनौपचारिक रूप में सहकारिता का प्रभाव हमेशा बना रहा. विशेषकर खेतिहर ग्रामीण समाज मेंफसल की कटाईबुवाई, शादीविवाह, सुखदुःख के बीच सहयोग की उपस्थिति प्रत्येक वर्गजाति में सदैव और हरेक स्तर पर बनी रही. सामंतवाद ने स्वयं को स्थायित्व बनाने के लिए इस देश की जाति आधारित परंपराओं का सहारा लिया. परिणाम यह हुआ कि जैसेजैसे सामंतवाद का प्रभाव समाज पर बढ़ा, सहकार आधारित संगठनों की चमक फीकी पड़ती चली गई.

कहने को तो वर्णव्यवस्था की संकल्पना भी समाज में, मनुष्य की कार्यक्षमता के अधिकतम उपयोग और उसकी सामुदायिक एकता को बनाए रखने की कामना की देन थी. उसमें उत्पादन और वितरण से लेकर वैचारिक दायित्वों के निर्वहन की पूरीपूरी व्यवस्था थी. लेकिन कालांतर में धीरेधीरे वर्णव्यवस्था में उच्च स्तर पर मौजूद लोग अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर शेष समाज पर हावी होते चले गए. आगे चलकर वर्ण व्यवस्था ने ‘जाति व्यवस्था’ जैसी विकृति का रूप धारण कर लिया, जिसमें मौलिक प्रतिभाओं को या तो दरकिनार किया जाने लगा अथवा उन्हें इतना उपेक्षित किया गया कि वे कुंठा की शिकार होने लगीं. ऐसे में स्वाभाविक ही था कि दोयम दर्जे की प्रतिभाएं प्रायः हर क्षेत्र पर हावी होती चली जाएं; और यही हुआ भी. ध्यातव्य है कि प्राचीन भारत में सहकारिता अपने वर्तमान स्वरूप से कतई भिन्न थी. इसका कारण यह है कि तत्कालीन समाज में व्यक्ति चेतना सामाजिक चेतना की अपेक्षा कमजोर रहती थी. दूसरे शब्दों में उस समय तक व्यक्तिवाद उतना प्रभावकारी नहीं हुआ था जितना कि वह इन दिनों है. कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो वह साम्राज्यवाद के अधिपत्य का युग था. अतएव ग्रामीण समाज, यहाँ तक कि ग्राम पंचायतों का स्वरूप भी उसी का विस्तार था और उनमें सीमित जनतांत्रिकता थी. साफ शब्दों में कहें तो वह एक प्रकार का कुलीनतंत्र था, जिसमें समाज के खास वर्गों के लोग ही हिस्सा ले सकते थे.

निःसंदेह, सहकारिता का वर्तमान स्वरूप उनीसवीं शताब्दी की ही देन है—जब दुनियाभर में व्यक्तिस्वातन्त्रय एवं लोकतांत्रिक विचारों का प्रभाव बढ़ा. इसके बावजूद भारतीय समाज के उन प्राचीन सहकारी संगठनों को भूल पाना आसान नहीं है, क्योंकि सीमित जनतांत्रिकता के बावजूद उनमें जो खुलापन एवं पारदर्शिता थी, वह आज के लोकतांत्रिक समाजों में भी दुर्लभ है. शायद यही कारण है कि राजशाही और सामंतवाद के कठिनतम दौर में भी उन्होंने अपनी उपयोगिता बनाए रखी. इसका अभिप्राय यह नहीं है कि मध्यकाल में सहकारिता आंदोलन बिल्कुल बेअसर था. लेकिन यह भी सच है कि उसमें इस बीच कोई बहुत सैद्धांतिक विकास नजर नहीं आता. मध्यकाल में आर्थिक सुधार के कार्यक्रम तो चलाए गएव्यापारी संगठन भी अवसरानुकूल अपना कार्य करते रहे….परंतु बाह्यः दबावों तथा राजनीतिक उथलपुथल के कारण व्यापारिक समूहों की आजादी या तो छीन ली थी अथवा उसे इतना सीमित कर दिया था कि वह लगभग बेअसर हो चुकी थी. वैसे भी मध्यकाल की उपलब्धियां कला, साहित्य और स्थापत्य के क्षेत्र में अधिक प्रभावशाली हैं. निरंतर बाहरी आक्रमणों और बिखरी राजशक्ति के कारण जनजीवन में अनिश्चितता बढ़ी, जिसने लोगों को भाग्यवादी बनाने का काम किया. दर्शन को कर्मकांड का जामा पहनाकर उसे धर्म में ढालने की कोशिश तो वैदिककाल में ही प्रारंभ हो चुकी थी. उसी को मान्यता दिलाने के लिए यजुर्वेद की रचना की गई थी. आगे चलकर दर्शन को छिछले कर्मकांड में ढालने की षड्यंत्रकारी प्रवृत्ति का जोरदार विरोध उपनिषदों के रूप में देखने को मिला, जिसने कुछ वर्षों के लिए वैदिक समाज की ज्ञान एवं चिंतनआधारित परंपरा को पुनर्जीवित करने का काम किया.

इस बीच एक वर्ग निहित स्वार्थों के लिए समाज को बौद्धिक एवं गैरबौद्धिक वर्गों विभाजित करने में सफल रहा था. वह यह समझाने में भी सफल हुआ था कि समाज में एक गैरबौद्धिक यानी जनसामान्य वर्ग भी है, जो कठिन परिश्रम द्वारा जीवनयापन करने के लिए अभिशप्त है, जिसका कार्य समाज के शीर्षस्थ वर्ग की सेवा करना था—जिसका मनुष्यता की ज्ञानआधारित परंपरा से कोई लेनादेना नहीं है. वह वर्ग मात्र कर्मकांड के जरिए ही मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है. कहने की आवश्यकता नहीं कि बौद्धिकता पर दावा करने वाला वर्ग, दूसरों के श्रम पर मौज उड़ाने वाले धूर्त परिजीवियों का था. यह वर्ग शारीरिक श्रम से दूर रहता था, बावजूद इसके समाज के अधिकांश संसाधनों पर इसी का कब्जा था.

परिवार या जन्म के आधार पर समाज का विभाजन पूर्णतः अस्वाभाविक तथा मनुष्यता के सिद्धांतों के विपरीत था, जिसने समाज के बड़े वर्ग के मानस में कुंठा परोसने का कार्य किया. बाद में धर्म और राजनीति के गठजोड़ ने इसके ऊपर उठने वाले समस्त प्रश्नों को नेपथ्य में ढकेल दिया. ज्ञान की परंपरा से कटने का परिणाम यह हुआ की जनसाधारण का नैसर्गिक पराक्रम और आत्मविश्वास शिथिल होते चले गए. उनके स्थान पर कुंठा और हताशा का प्रसार बढ़ने लगी. अतएव वैसी चेतना जो सहकार संवर्धन के लिए प्रेरक शक्ति बनकर, सामाजिकता को गतिमान बनाती है, उसका समाज से लोप होता चला गया. तो भी समयसमय पर, अलगअलग क्षेत्रों में राजाओं ने कुछ ऐसे फैसले अवश्य लिए जिनसे जनसाधारण को लाभ पहुंचा; और जो सहकार की मूल भावना के अनुकूल भी थे. यह बात अलग है कि पर्याप्त जनचेतना के अभाव में उनका लाभ समाज के शीर्षस्थ वर्गों तक ही सिमटकर रह गया.

उस समय के आर्थिक सुधारकों में अलाउद्दीन खिलजी का नाम बहुत महत्त्वपूर्ण है. भारतीय इतिहास में इस बादशाह की अपनी घोर स्त्री लोलुपता के लिए यद्यपि खूब छीछालेदार हुई है. परंतु इससे अलग उसका एक चेहरा ओर भी था, जो उसको न्यायप्रिय और दूरदर्शी बादशाह का दर्जा प्रदान करता है. अलाउद्दीन खिलजी ने आमजनता के हित में आवश्यक वस्तुओं के मूल्यनियंत्रण की प्रणाली शुरू की. मुनाफाखोरी को उसने अपराध का दर्जा देते हुए उसके लिए कठोर दंड की व्यवस्था की. फलस्वरूप उसके राज्य में मुनाफाखोरी घटी. आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए उसने आम उपयोग की वस्तुओं की राशनिंग की व्यवस्था की. बेईमान दुकानदार लोगों को ठग न पाएं, इसके लिए उसने नए बाट बनाकर मापतोल प्रणाली को विश्वसनीय बनाया.

मध्यकाल का एक और बादशाह जिसका उल्लेख यहां अनुचित न होगा, का नाम था—मुहम्मद तुगलक! यद्यपि वह इतिहास में अपने तानाशाहीपूर्ण आचरण और कठोरतम आदेशों के लिए कुख्यात है. लेकिन आमजन के सुखसुविधा के लिए उसने भी कई उल्लेखनीय काम किए थे. अलाउद्दीन की भांति मुहम्मद तुगलक ने भी नई मुद्रा का चलन कर एक क्रांतिकारी शुरुआत की. उसने जमाखोरी को हराम घोषित कर उसकी रोकथाम के लिए कठोर कानून बनाए, जिनके फलस्वरूप वह जमाखोरों पर लगाम लगाने में कामयाब रहा. उसने व्यापारियों को निर्देश दिया कि वे अपने मुनाफे लिए आमजनता की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखें. प्रजा के कल्याण को ध्यान में रखते हुए उसने व्यापारियों को कम से कम मुनाफे के साथ व्यापार करने को बाध्य कर दिया था.

मध्ययुग के जिस बादशाह का उल्लेख किए बिना उस युग के आर्थिक परिवेश की सटीक व्याख्या असंभव है, वह था—शेरशाह सूरी. एक उदार, दूरदर्शी और पराक्रमी सम्राट! शेरशाह प्रजा का बहुत ही प्यारा बादशाह था. अपने राज्य के विस्तार के लिए उसने अनेक युद्ध लड़े थे. एक मामूली परिवार से निकलकर बाहशाह की गद्दी पर बैठा वह महान योद्धा आजीवन संघर्ष करता रहा. प्रजा के कल्याण को ध्यान में रखते हुए उसने कई विकास कार्यक्रम चलाए. सुखसमृद्धि के लिए उसने सड़कें बनवाईंभूमि की मापजोख कर लगान की आसान विधि की शुरुआत की. किसानों को मदद पहुंचाने के लिए भी उसने कई योजनाएं बनाई थीं. यही नहीं अंतःप्रांतीय व्यापार को प्रोत्साहित करने के लिए शेरशाह ने कारीगरों, उद्यमियों के कल्याण लिए विशेष कार्ययोजनाएं बनाईं, जिनका सकारात्मक परिणाम भी निकला.

शेरशाह के बाद जिस बादशाह ने सामाजिक कल्याण के कामों को सर्वाधिक बढ़ावा दिया, वह था—मुगल बादशाह अकबर! उसके एक दरबारी राजा टोडरमल को भूमिसुधार कार्यक्रमों को नए सिरे से लागू करने का श्रेय जाता है. टोडरमल ने भूमि की नए सिरे से मापजोख कर लगान की नई दरें लागू कीं. छोटे और मझोले कारीगरों को पुरस्कार, प्रोत्साहन आदि के जरिए आगे बढ़ाया. उस समय भी श्रेणियां या व्यापारिक संगठन देशदेशांतर तक अपना काम करते थे. हालांकि समाज के बीच उनकी अब पुरानी प्रतिष्ठा शेष नहीं थी. हालांकि लगभग पूरा भारतवर्ष उन दिनों मुगल साम्राज्य के अधीन था, किंतु अंतर्राराज्यीय संगठित व्यापार के संवर्धन के लिए शासन के पास संभवतः कोई बड़ी योजना नहीं थी. छोटेछोटे जनपदों में बंटे देश में उन दिनों नया काम नहीं हो सका.

अकबर के बाद भी भारत में यद्यपि बड़ेबड़े साम्राज्यों का उदय हुआ—मगर सामूहिकता या सहकारिता का बहुत ज्यादा विकास वहीं हो पाया. हां, उस दौर में भी श्रेणियां प्रच्छन्न रहकर अर्थव्यवस्था के सातत्य में महत्त्वपूर्ण योगदान कर अपना औचित्य सिद्ध करती रहीं. संगठित उद्यमों के विकास में आए ठहराव का एक कारण संभवतः यह हो सकता है कि उन दिनों समाज में सामंती मूल्यों का बोलबाला था. उद्योगधंधे ठप्प पड़े थे….बारबार पड़नेवालों अकालों ने जनमानस को हताश बना दिया था. प्रजा में जागरूकता का अभाव था. जाति और धर्म जैसे नकारात्मक मूल्यों ने समाज को बुरी तरह बाँटा हुआ था.

बौद्धिकता की दृष्टि से वह युग क्रांतिकारी भले ही न हो, लेकिन साहित्य, खगोलविज्ञान, आयुर्वेद, वास्तुकला जैसे अनेक ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें उस युग की उपलब्धियां चैंका देने वाली हैं. यह बात अलग है कि उस युग के अधिकांश विद्वानों का चिंतन शासनोन्मुखी था. समूचा साहित्य, कलाएँ, वास्तुनिर्माण, भूसंपदा आदि बादशाह को प्रसन्न करने का माध्यम थे. उनका उपयोग राजा की मर्जी से और उसके सुख के लिए ही संभव था. राजशाही और सामंतवादी चिंतन का प्रभाव उस समय के साहित्य और इतिहास पर भी पड़ा. हालांकि कुछ विद्वान उस युग में बादशाह को उसके कर्तव्य की याद दिलाते रहते थे. ग्यारहवीं शताब्दी में जन्मे प्रसिद्ध अर्थशास्त्री सोमदेव सूरि, प्रजा की खुशहाली को राजा के सुखसमृद्धि से जोड़कर देखते हैं—

जहाँ राजा ही निर्धन होगा, वहाँ प्रजा कैसे धनी हो सकती हैजहाँ समुद्र ही प्यासा होगा वहाँ संसार में जल कैसे पाया जा सकता है.16

सोमदेव सूरि ने पशुओं के साथ मित्रवत व्यवहार करने, व्यापारियों और उद्योगसमूहों की रक्षा करने पर जोर दिया है. किंतु ये बदलाव वे राज्य के संरक्षण में ही चाहते थे. यह उनके चिंतन की सीमा थी. स्वतंत्र कार्यकारी समूह, जिनका नियंत्रण जनतांत्रिक परंपराओं और भावनाओं के अनुरूप हो, जो केवल अपने समूह के हितों को ध्यान में रखकर नीतियां बनाने, काम करने के लिए बाध्य हों, जिसमें पूरे समूह की सहभागिता हो, का उस युग में कोई अस्तित्व था ही नहीं.

इस युग में कबीर, सूर, तुलसी, नानक और रविदास जैसे कवि भी हुए—भक्त कवियों की सुदीर्घ परंपरा चली, मगर उन सभी ने इस संसार को माया और अस्सार बताते हुए, एक स्वर से धन के परित्याग की भावना पर ही जोर दिया. हताश और मानसिक रूप से हार माने बैठा जनमानस, अपनी स्थिति में सुधार के लिए किसी चमत्कार की उम्मीद लगाए बैठा था. अपरिग्रह, अस्तेय और अहिंसा को उस युग के दर्शनों में केंद्रीय विचार की मान्यता मिलती रही. इस सब से हिंदू समाज का कितना हित हुआ और कितना अहित, यह हमेशा ही बहस का मुद्दा रहा है. एक तरह से यह गरीबी, धर्मांधता और रूढ़ियों में जकड़ी हताश जनता को झूठी तसल्ली देने की ही कोशिश थी.

आइने अकबरी’ नामक ग्रंथ में भी अकबर के दरबारी और मंत्री अबुल फजल, कृषि, व्यापार, भूमि आदि की व्यवस्था के उपाय तो सुझाते हैं, मगर स्वचेतित कार्यशील समूहों को बढ़ावा देने की युक्ति या परंपरा से सीख लेने की ललक का उनमें अभाव था. वस्तुतः अकबर के दरबार के नवरत्नों में से अधिकांश वे हताश योद्धा, बुद्धिजीवी आदि थे, जिन्हें सम्राट ने स्वयं को बहुसंख्यक हिंदू समाज का प्रतिनिधि सिद्ध करने के लिए चुना था. उन दिनों पूरा समाज शासक और शासित, नामक दो वर्गों में बंटा हुआ था, जिनके बीच आपसी सामाजिक व्यवहार लगभग शून्य था. जीवन का धर्म में अनावश्यक हस्तक्षेप था और धार्मिक शक्तियां ऐसे किसी भी वाद या विचार को आगे लाने से बचती थीं, जो परंपरा और पुरातन के संदर्भ में सवाल उठाता हो. आपसी संवाद के अभाव में समाज में बौद्धिक ठहराव की स्थिति बनी हुई थी.

एक तरह से वह सामाजिक विकास के ठहराव का भी युग था….उस युग में यद्यपि देश को बाहरी आक्रमणों का सामना भी करना पड़ा. उपनिषदों, आरण्यकों की मौलिकता, स्मृतियों के कर्मकांड और पुराणों की गल्पकथाओं में सिमटकर रह गई. बौद्ध धर्म की तार्किकता का स्थान तांत्रिकों तथा आश्रमों में पलने वाले व्यभिचारों ने ले लिया. पुराण आदि ग्रंथ वर्गविशेष द्वारा अपने वर्गीय हितों के समर्थन एवं सुरक्षा हेतु लिखे जा रहे थे, अतएव इनके माध्यम से ऐसी शास्त्रीय व्यवस्थाएँ परोसी जा रहीं थीं जिनसे समाज का बड़ा हिस्सा, चिंतन और कर्म के लिए दूसरों पर निर्भर होकर रह जाए. और उसका असर भी हो रहा था. यही कारण है कि इस आठनौ सौ वर्ष के अंतराल में एक भी ऐसा मौलिक विचारक, अन्वेषक भारत में नहीं जन्मा, जो अपने चिंतन या कर्म द्वारा वैश्विक ख्याति अर्जित कर सके. अनेक राज्यों, भौगोलिक सीमाओं में बंटा भारतीय समाज, कभी बाहरी आक्रामकों के इशारे पर, कभी अपने ही स्वार्थी सम्राट के कहने पर आपस में लड़ताझगड़ता रहा. सत्ता और ताकत के लिए यहां दुश्मनों से मिलकर अपनों को तबाह कर देने की नीति सैकड़ों वर्ष तक चली. परिणाम सैकड़ों वर्षों लंबी गुलामी. धर्मभीरूता और कुंठित समाज.

वाराहमिहिर या आर्यभट्ट का योगदान महत्त्वपूर्ण हो सकता है, और है भी. लेकिन एक तो उनकी कोटि के विद्वानों की संख्या उंगलियों पर गिने जाने योग्य है, दूसरे ज्ञान की परंपरा को बिना किसी पूर्वाग्रह, जातिभेद के आगे बढ़ाने का जो साहस और आत्मविश्वास चाहिए, भारतीय बुद्धिजीवियों में उसका सरासर अभाव था. इसीलिए वहां वाराहमिहिर, आर्यभट्ट अथवा उनके उत्तराधिकारियों में से एक भी न्यूटन, का॓परनिकस, गैलीलियो जितना योगदान अपने समाज को दे पाने में असमर्थ रहा. वैसे भी इतने बड़े समयांतराल में दोतीन मेधाओं की मौजदूगी अपवाद ही कही जाएगी—आश्वस्तिकारक नहीं. समाज के जातीय आधार पर विभाजन के ही कारण यहां पर मनुष्यता की रक्षा के लिए वैसे वौद्धिक आंदोलन जन्म नहीं ले पाए, जो यूरोप के देशों में जन्में और प्रकारांतर में पूरी दुनिया में फैले.

भारत में मुगल शासन के दौरान भी स्थानीय प्रशासन काफी मजबूत स्थिति था. उन्होंने बिना किसी छेड़छाड़ के परंपरा से चली आ रही स्थानीय प्रशासन की व्यवस्थाओं की स्वायत्तता को बनाए रखा. उन दिनों दस्तकारी, शिल्पकला, स्थापत्य, आभूषण आदि उद्योगों में पर्याप्त संभावनाएं जागी हुई थीं. उन दिनों भी किसी संस्था में यह सभी पद पूर्णतः बने हुए थे. जहांगीर के पश्चात मुगल साम्राज्य कमजोर पड़ने लगा था, जिससे स्थानीय जमींदार, राजेरजबाड़े सिर उठाने लगे थे. राजनीतिक अराजकता के उस माहौल में ईस्ट इंडिया कंपनी को अपना राज कायम करने का अवसर मिला. कहने की आवश्यकता नहीं कि कंपनी के मददगारों में यहीं के राजेरजबाड़े थे, जो किसी न किसी कारण असंतुष्ट रहते थे. यही कारण था कि प्लासी की लड़ाई में मुट्ठीभर अंग्रेज सेना अपने से दस गुना बड़ी सुराजुद्दौला की सेना पर भारी पड़ी. उसके बाद से अठारह सौ सतावन तक देश का इतिहास आपसी लड़ाई और व्यापार एकतरफा शोषण एवं संसाधनों की लूट का रहा. परंतु सन अठारह सौ सतावन के सैनिक एवं उससे पहले के किसान विद्रोहों ने अंग्रजों को जता दिया था कि वे अपने तानाशाही पूर्ण रवैये के साथ इस देश पर अधिक दिन तक राज नहीं कर पाएंगे. निश्चित रूप से फ्रांस समेत पूरे यूरोप में चल रहे नवजागरण के आंदोलनों का भी प्रभाव था कि अंग्रेज शासक इस देश के आधारभूत ढांचे में सुधार के लिए तैयार हुए.

अठारह सौ पिचासी के पश्चात ब्रितानी सरकार ने स्थानीय प्रशासन का पुनर्गठन किया, लेकिन उसने प्रशासन के लोकतांत्रिक स्वरूप को बनाए रखा. उसने प्रशासन की तीन स्तरीय व्यवस्था कायम की, जिसमें स्थानीय बोर्ड, जिला स्तरीय बोर्ड तथा एक केंद्रीय बोर्ड सम्मिलित थे. तीनों ही स्तर पर नियुक्तियां शिक्षित व्यक्तियों के बीच से वयस्क मताधिकार द्वारा की जाती थीं. सभी पद स्वैच्छिक थे. अगले पृष्ठ पर दी गई तालिका में इन व्यवस्थाओं पर एक विहंगम दृष्टि डाली गई है.

कहने का आशय यह है कि भारत में आदिकाल से ही स्थानीय लोकतंत्र मजबूत रहा है. हालांकि सामंतवाद का एक दौर ऐसा भी आया जब स्थानीय व्यवस्थाएं जाति और धर्म के आधार पर बंटती चली गईं. बावजूद इसके देश में ऐसा समय कभी नहीं आया जबकि संगठन की अनिवार्यता को नकारा गया हो. चाहे वह जातीय पंचायतों के रूप में हो अथवा व्यापारिक श्रेणियों के रूप में, भारतीय समाज में सांगठनिकता ने सदैव अपनी उपस्थिति बनाए रखी. स्थानीय जनतंत्र की मिसाल के रूप में जहां प्रत्येक जाति की अपनी अलग पंचायत होती थी, वहीं शिल्पकारों, श्रेष्ठियों के अपने व्यावसायिक संगठन थे. प्राचीन समाज में श्रेणियों की महत्ता मात्र इसी से परखी जा सकती है कि उस समय में कतिपय चोरों की भी अपनी श्रेणियां थीं. हां तक कि धार्मिक मामलों की देखरेख का कार्य भी श्रेणियों के जिम्मेदारी थी. महस्थानगढ़ और मैनामती में बने बौद्ध स्तूपों इस बात का प्रमाण हैं कि उन दिनों धार्मिक संस्थाएं भी सामूहिक कल्याण के कार्यक्रमों यथा शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति के प्रचारप्रसार के कार्यों में समानरूप से रुचि लेती थीं.

प्राचीन भारत में सहकारिता के समानधर्मा संस्थानों/संगठनों की स्थिति17

अवधि

संथान

संगठन

सेवा की प्रकृति

से

तक

322 ईस्वी पूर्व

ग्रामीण परिषद

प्रतिष्ठित परिवारों के सदस्य

स्वैच्छिक

322 ईस्वी पूर्व

320 ईस्वी

पंचायत

समाज के वरिष्ठ लोग

स्वैच्छिक

321 ईस्वी

600 ईस्वी

ग्रामिका

ग्राम प्रमुख या मुखिया

स्वैच्छिक

601 ईस्वी

900 ईस्वी

दस ग्रामिका या पातक

दस गांवों का मुखिया

स्वैच्छिक

901 ईस्वी

1200 ईस्वी

ग्रामपति

ग्रामप्रमुख या मुखिया

स्वैच्छिक

1201 ईस्वी

1300 ईस्वी

पंचायत

प्रतिष्ठित वरिष्ठजन

स्वैच्छिक

1301 ईस्वी

1526 ईस्वी

पंचायत

प्रतिष्ठा, आयु एवं अनुभव के आधार पर निर्वाचित व्यक्ति

स्वैच्छिक

1527 ईस्वी

1757 ईस्वी

परगना

निर्वाचित अधिकारी

स्वैच्छिक

1758 ईस्वी

1885 ईस्वी

जमींदारी

शाही नुमाइंदा

कमीशन आधार पर

श्रेणियां, भारत में जिनका इतिहास लगभग चार हजार वर्ष पुराना है, न केवल इस देश बल्कि दुनिया के अनेक देशों में कतिपय संगठनात्मक अंतर के बावजूद समानरूप से प्रचलित थीं. पुराने मिश्र में उन्हें ‘कोयनन’(Koinon)कहा जाता था, जो रोम के ‘कालेजिया’(Collegia)से प्रेरित था. चीन में ईसापूर्व तीसरी शताब्दी, हान साम्राज्य से गिल्ड की उपस्थिति के संकेत मिलते हैं. वहां उन्हें ‘हंगुई’ (Hanghui)कहा जाता था. इटली में मध्यकाल में व्यापारियों के संगठन बहुत मजबूत माने जाते थे. वहां उन्हें अर्स(ars)की संज्ञा दी गई थी. जर्मनी में ‘जुंफ’(Zunft)फ्रांस में मेटायर(Métier)ईरान में सेंफ अथवा सिंफ(senf, sinf)तथा इंग्लैंड क्राफ्ट, गिल्ड, अरब तथा तुर्की आदि देशों में उन्हें फुतुवा (futuwwah or fütüvvet)आदि नामों से पुकारा जाता था. उनके संगठनात्मक स्तर पर थोड़ी भिन्नता थी, परंतु सामूहिक कल्याण की उनकी भावना उन्हें एक जैसा स्तर प्रदान करती थी.

आधुनिक सहकारिता आंदोलन का भारत में आगमन उन्नीसवीं शताब्दी में हुआ. निश्चित रूप से इसके पीछे पश्चिम की प्रेरणाएं थीं. इसका श्रेय नवजागरण और उन सुधारवादी आंदोलनों को भी जाता है, जिन्होंने सोए हुए जनमानस का परिचय अपने गौरवमय अतीत से कराया जिससे जनता का अस्मिताबोध प्रखर हुआ. इनमें राजा राममोहन राय, बंगाली अर्थशास्त्री शशिपद बनर्जी, गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर, आचार्य विनोबा भावे, महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, गोविंद रानाडे, विवेकानंद आदि प्रमुख थे. आधुनिक मनीषियों में पी.जी. कुरियन जैसे सहकारिता पुरुष सम्मिलित हैं, जिन्होंने भारतीय आंदोलन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में मदद की है.

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भानुक्रमणिका

1. Chanakya appeared quite suspicious of the sreni. He was generally concerned with any entity that had many members, good resources and a strong sense of group loyalty as the sreni did. He probably viewed them as potential threats to the cohesion of the recently formed empire, which was knit together with some considerable effort. However, the sreni could not simply be outlawed because they existed before the Mauryans and the support of the sreni was probably needed to increase the chances of unity in the empire. Moreover, it is likely that Chanakya was cognizant of the importance of economic prosperity to maintaining the support of the citizenry – a matter of paramount importance to the emperor and to maintaining unity. The sreni were the engines of economic growth and could not be dealt with in the same manner as a hostile regional monarch. Thus, regulating the sreni was a matter of balance for Chanakya – their support was needed, but they could not be permitted to destabilize the empire and hence needed to be watched carefully. Vikramaditya Khanna in The Economic History of the Corporate Form in Ancient India.

2. संद्यभृता संभूय समुत्थारा वा यथा

संभाषित वेतनं सम वा विभजरेन। रामशास्त्री द्वारा प्रणीत: कौटिल्य अर्थशास्त्र: नाम पुस्तक बुक नं VI, अध्याय 14, पृष्ठ संख्या-64.

3. It appears that the Mauryans and the Romans were in quite different situations. Both empires could have been concerned about alternative entities (e.g., sreni) that might attract the public’s loyalty away from the Empire, but the Romans did not, it appears, have to contend with pre-existing private commercial entities as the early Mauryan Empire did. One might speculate this would lead the Mauryans to be more concerned about keeping the support of the pre-existing private commercial entities (the sreni) while carefully watching that they do not threaten the cohesion of the Empire. The Romans did not have such entities to contend with and hence could have prevented any threat to the cohesion of their Empire by not permitting such entities to develop.- Vikramaditya Khanna.

4.  यावद् भ्रियेत जठरं तावत् स्वत्वं हि देहिनाम्।
अधिकं योऽभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति।। श्रीमद्भागवत, 7/14/8.

5. यो ग्रामदेश संघानां कृत्वा सत्येन संविदाय

विसंवदेन्नरो लोभात्त राष्ट्रा द्विप्रवासयेत। मनुस्मृति.

6. निज धर्माधिरोधेन यस्तु सामयिको भवेत सोऽपि यत्नेन संरक्ष्यो धर्मोराज कृतश्च यः।

गणद्रव्यं हरेद यस्तु संविदं लंग्येत्च यः सर्वस्वरण कृतवातं राजद्विप्रवास येत्।

कर्तव्यं वचनं सर्वे समूहितवामिनाम्—यस्तत्र विपरीत रयात् सदाप्य प्रथम दमम्।

समूह कार्य अयातनान् कृत कर्मान विसर्जयेत, सदानमान सत्कारै पूजयित्वा महीपति।

समूहकार्येप्रहितो यल्लभेत तदर्पयेत—एकादश गुणंदाम्यो मद्यसौ नार्पयते स्वयम्।

धर्मज्ञाः शुचयोऽलुब्धा भवेयु कार्यचिंतका, कर्तव्यंवचनं तेषां समूह हितवादिनाम्।

श्रेणिनैगम्पाषिंड गणानाप्ययं विधिः भैद×चैषां नृपो रक्षेत पूर्ववृतिं च पालयेत।याज्ञवलक्य: 2/186-192

7. ब्राहस्पत्य अर्थशास्त्र—लाला कन्नोमल: 3/38

8. ये न व्ययेन संसि(स्त द्रव्यपस्तस्य मूल्यकम्

सुलभा सुलभत्वाच्चा गुणत्वगुण संश्रयै

यथा कामात्पदार्थानामघं हीनाधिकं भवेतः। शुक्रनीति 2/348-349

9. संघभृता संभूय समुत्थारां वा

यधा संभाषितं वेतनं समं वा विभजरेन, –आर. शाम शास्त्री, कौटिल्य अर्थशास्त्र.

10. वणिक प्रभृतयो यग कर्म सम्भूय कुर्वते

तत्सम्भूयसमुत्थानं व्यवहार पदं स्मृतम्

फलहेतो रूपायेन कर्म संम्भूय कुर्वताम्। —नारद स्मृति.

11. अर्थवेद-8/10/1, प्राचीन भारत की शासन संस्थाएँ एवं राजनीतिक विचार : डा॓. सत्यकेतु विद्यालंकार—पृ. 277.

12. समंन्च: सव्रताभूत्वा वाचं वदत भद्रया। अर्थवेद।

13. सहजाववजु सहसौ भुजुक्तु सहवीर्य करवाव है। अर्थवेद।

14. ….that Buddhism and Jainism, which emerged in the 6th century BC, were more egalitarian than Brahmanism that preceded them and provided a better environment for the growth of guilds. Material wealth and animals were sacrificed in the Brahmanical yajnas. The Buddhists and Jains did not perform such yajnas. Thus, material wealth and animals were saved and made available for trade and commerce. Since the Buddhists and Jains disregarded the social taboos of purity/pollution in mixing and taking food with people of lower varnas, they felt less constrained in conducting long distance trade. – Dr. Vikrmaditya Khanna.

15. …cultivators, traders, herdsmen, moneylenders, and artisans have authority to lay down rules for their respective classes and the king was to consult their representatives while dealing with matters relating to them.- Gautama Dharmasutra (c. 5th century BC) as qouted by Dr. Vikrmaditya Khanna.

16. समुद्रस्य पिपासायाँ कुतो जगति जलानि।नीति वाक्यामृत-817.

17. सैम्युअल हसन की पुस्तक Voluntarism and Rural Development in Bangladesh’ The Asian Journal of Public Administration, Vol. 15, No. 01, 1992, pp. 82-108.(संशोधित) से उद्धृत.

वाल्तेयर : अनूठा और निर्भीक कलमकार

सामान्य
[वाल्तेयर कदकाठी में छोटा, देखने में बेहद कमजोर और दुबलापतला था, लेकिन उसमें कमाल की फुर्ती थी. तेज दिमाग और प्रखर मेधा के बल पर उसका व्यक्तित्व पूरी जिंदगी चमचमाता रहा. अपने जीवन में उसने हर बौद्धिक चुनौती का साहसपूर्वक ढंग से सामना किया. यह सही है कि जीवन में उसको कई बार समझौते भी करने पड़े. जो उसके प्रशंसकों को बहुत नागवार गुजरते है. वे चाहते हैं कि वाल्तेयर भी ब्रूनो (Bruno) और सर्वेतिस(Servetus) की भांति, जिन्हें कट्टरपंथियों ने आग में जीवित जला दिया गया था, अपने विचारों पर अटल रहता. लेकिन महान व्यक्तित्वों का आकलन इस प्रकार नहीं किया जाता. अपनेअपने स्थान पर सभी महत्त्वपूर्ण एवं महान हैंवाल्तेयर भावुक और दयालु था. उसके दिल में दूसरों के लिए प्यार समाया हुआ था. तन से वह दूसरों के लिए समर्पित था. इतिहास के उन महानायकों में जिन्होंने पश्चिमी समाज से कट्टरता और निर्दयता को समाप्त करने में प्रमुख भूमिका निभाई, कोई भी वाल्तेयर की बराबरी नहीं कर सकता. — क्लेरेंस डैरो ]

वह बहुमुखी प्रतिभा का धनी था। तेज और धारदार शब्दों का उपयोग वह इतनी कुशलता से करता कि वाक्य नश्तर का काम करने लगते। वह सबसे अलग, एकदम विशिष्ट, अप्रतिम और विलक्षण प्रतिभाशाली था। किंतु किसी भी प्रकार के विशिष्टताप्रदर्शन से उसको नफरत थी। हमेशा वह आम आदमी की तरह रहा। पूरी जिंदगी उसी के अधिकारॊं के लिए संघर्ष करता रहा। राजनीतिक भ्रष्टाचार, झूठ, धार्मिक पाखंड, आडंबरवाद का वह प्रबल विरोधी था, और अपनी कलम के माध्यम से लगातार उनके विरुद्ध लिखता रहा। इसके लिए उसको कड़े सामाजिक विरोध एवं आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। उसने सहे। जनसरोकारों के प्रति अपने तीव्र समर्पण एवं प्रबल आग्रहशीलता के कारण वह हर प्रतिवाद का सामना करता गया। हालांकि इसके लिए उसको अनेक कष्ट उठाने पड़े। वह अपने समय का सबसे बड़ा प्रगतिशील, जनसरोकारों के प्रति पूर्णतः समर्पित इंसान था। वह फ्रांसिसी पुनर्जागरणकाल का जानामाना लेखक, निबंधकार, आस्थावादी दार्शनिक, कवि और उपन्यासकार था। उसकी लेखनशैली व्यंग्यात्मक और इतनी मारक थी कि केवल इसी के कारण उसे अपने समय का सबसे प्रतिभाशाली साहित्यकार कहा गया। जनसाधारण के कल्याण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता एवं व्यापक सरोकारों के कारण उसको मनुष्यता का कलमकार माना जाता रहा है। बयासी वर्ष के लंबे जीवनकाल में उसने कलम से तलवार का काम लिया, जिससे उसको बेशुमार ख्याति मिली। अपनी मौलिकता, जनप्रतिबद्धता एवं जूझारूपन के कारण वह अपने समय का सबसे ख्यातिलब्ध साहित्यकार और विचारक बना। हजारॊं लेखकॊं, साहित्यकारों कॊ उसने प्रभावित किया। विगत तीन शताब्दियों से वह वुद्धिजीवियों, समाजविज्ञानियों, साहित्यकारों और मानवतावादियों का प्रेरक बना हुआ है।

बड़े जनसरोकारों वाले उस विलक्षण प्रतिभाशाली, महान साहित्यकार का पूरा नाम था—फ्रांकोइस मेरी ऐरोएट(François-Marie Arouet)। मगर पूरी दुनिया में उसे प्रसिद्धि मिली वाल्तेयर के नाम से। प्रसिद्धि भी ऐसीवैसी नहींअपनी रचनाओं और मुखर विचारों के कारण वह अपने जीवनकाल में ही किवदंती बन चुका था।

वाल्तेयर ने साहित्य की प्रायः सभी विधाओं में लिखा। अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के बावजूद वह किसी भी प्रकार के दुराग्रहों से काफी दूर था। इसी कारण उसको उन लोगों की भी वौद्धिक स्वीकृति मिली, जो स्वयं को वैचारिक आधार पर उसका विरोधी बताते थे। अपनी मान्यताओं को विमर्श के लिए खुला छोड़कर उसने साहित्य में वैचारिक अभिव्यक्ति के अधिकार को सुरक्षित रखा। विद्वानों के बीच वैचारिक असहमति संभव है। किंतु वाल्तेयर को प्रायः सभी विद्वानों ने बेहद प्रतिभाशाली लेखक, विचारक, दार्शनिक, कवि, नाटककार और निबंधकार माना है। अपने समय के परिवर्तनवादियों में वह सर्वाधिक प्रतिभावान, मुखर और प्रखर बुद्धिजीवी था; जिसने निर्भीकतापूर्वक अपने विचारों को अभिव्यक्ति प्रदान की। जो उसे सत्य लगा उसके लिए वह निरंतर संघर्ष करता रहा। इसके लिए उसको सरकार और समाज, दोनों के विरोध का सामना करना पड़ा। मगर वह किसी भी दबाव के आगे झुका नहीं।

वाल्तेयर का जन्म 21 नवबर, 1694 को पेरिस में हुआ था। माता का नाम था— मेरी एरोएट डी’ ओमर्द (Marie Marguerite D’Aumard) और पिता थे फ्रांकोइस एरोएट डी’ ओमर्द (François- Arouet D’Aumard)। पिता सामान्य नोटरी का काम करते थे। मामूलीसी जायदाद उनके पास थी; यानी जन्म के समय वाल्तेयर के पास ऐसा कुछ भी नहीं था जो उसको विशिष्ट बनाता या फिर विशिष्ट बनने के लिए प्रेरणा देता। ऊपर से फ्रांस की तात्कालिक राजनीतिकसामाजिक स्थिति। वह इतनी शोचनीय, इतनी बदहाल थी कि लोग मानो नरकवास कर रहे थे। उस समय फ्रांस पर सोलहवें लुई का शासन था। शासकों के विलासी और भोगविलास और अंतहीन लिप्साओं से भरे जीवन के कारण फ्रांस अपनी पुरानी प्रतिष्ठा खो चुका था। चारों ओर भीषण गरीबी का साम्राज्य था और उससे भी अधिक था वैचारिकता का अभाव। मानसिक जड़ता, अज्ञानता से समझौता कर लेना। लॊग मानॊ मानसिक दिवालियेपन का शिकार थे। पढ़ेलिखे लोग भी जादूटोने तथा चमत्कारों पर विश्वास करते, पाखंडों में जीते थे। समाज के सूझबूझ वाले लोग बहुत कम संख्या में थे; जो थे उनपर अशिक्षा के मारे लोग विश्वास ही नहीं करते थे। वे प्रायः उनका मजाक उड़ाते और उनपर हंसते। दूसरी ओर पाखंडियों और आडंबरवादियॊं का नाम पूरे सम्मान के साथ लिया जाता। शासक वर्ग ऐसे लोगों को अपने विश्वास में रखता था। क्योंकि वे ही लोग सत्ता को विलासिता का जीवन जीने के संसाधन उपलब्ध कराते थे। इसके परिणामस्वरूप वे लोग राजसत्ता को अपने इशारे पर नचाते थे।

फ्रांस की तात्कालिक दयनीय अवस्था पर टिप्पणी करते हुए एक जगह लिखा गया है—

सभी मानो किसी चमत्कार की उम्मीद लगाए हुए थे। डा॓क्टर मरीज की जेब पर नजर रखते तथा मौका मिलते ही उसकी खाल उतारने से तैयार रहते थे। वकील अपने आसामियों को फंसाकर रखते थे। गरीबों से उनकी दोस्ती उन्हें अपना आसामी बनाने तक थी। कानूनी कार्रवाही बेहद जटिल, खर्चीली तथा लंबी थी। केवल पुजारी, डा॓क्टर, वकीलों के मजे थे, उनकी अमीरी निरंतर बढ़ती जा रही थी। गरीबों के लिए न्याय कठिन और खर्चीला था। जबकि अपराधियों को आसानी से कानूनी शरण मिल जाती थी।’

इसी तथ्य को जोसफ लुईस अपने एक आलेख में कुछ इस प्रकार व्यक्त करते हैं कि—‘फ्रांस में जिन दिनों वाल्तेयर का जन्म हुआ, वहां की स्थिति बहुत ही खराब और दयनीय थी। और ऐसा कई पीढ़ियों से चला आ रहा था। मालूम होता था कि वहां पर दयनीय परिस्थितियों के साथ गरीबी, चमत्कारप्रियता लापरवाही, अन्याय, शोषण आदि की बहार आई हुई थी।’

जन्म के साथ ही वाल्तेयर ने दर्शा दिया था कि वह दूसरों से कुछ अलग है। एकदम खास। नवजात वाल्तेयर जन्म के समय बहुत ही दुबलापतला, कमजोर और रक्ताल्पता का शिकार था। उसका वजन इतना कम था कि किसी को भी उसके बचने की आस नहीं थी। यहां तक कि उसकी देखभाल कर रहे डाक्टर और नर्स भी उम्मीद छोड़ चुके थे। पादरियों ने शिशु वाल्तेयर की हालत देखकर उसका तत्काल बप्तसिमा करा देने का निर्देश दिया था, ताकि ईसाई मान्यताओं के अनुरूप उसकी आत्मा की रक्षा संभव हो सके। उपचार चलता रहा और नर्स समेत वाल्तेयर के मातापिता उसको बचाने के प्रयास करते रहे। बालक अपनी कमजोरी से जूझता रहा।

धीरेधीरे वाल्तेयर बड़ा होने लगा। बावजूद इसके रहा वह दुबलापतला कमजोर और पीतवर्ण ही। बचपन की इस कमजोरी ने वाल्तेयर के दिलोदिमाग पर आजीवन अधिकार बनाए रखा। मृत्यु की सन्निकटता की अनुभूति उसको हमेशा डराती रही। जन्म के समय दुर्बल होने का कारण संभवतः यह था कि उस रूप में प्रकृति वाल्तेयर को संभवतः विषम परिस्थितियों में रहने, कष्ट सहने और जूझते रहने का अभ्यास कराना चाहती थी या फिर नियति ने वाल्तेयर को गढ़ते समय दिमाग तो दिया, जिससे वह अपने समय का महानतम मूर्धन्य तो बना, लेकिन देह से वह कभी स्वस्थ नहीं रह सका।

वाल्तेयर की बौद्धिक प्रखरता विद्यार्थी जीवन से ही उसके सामने आने लगी थी। स्कूल में वह सबसे अलगथलग रहता। अपने आप में मग्न, सोच में डूबा हुआ, अधिकांश समय अकेला। किशोर वाल्तेयर की आंखें शूण्य में कुछ खोजती रहतीं। उसकी प्रश्नाकुलता गजब की थी। चलताचलता वह स्वयं से ही प्रश्न करता और खुद ही जवाब खोजने का प्रयत्न करता। दूसरे विद्यार्थी खेलकूद में हिस्सा लेते, एकदूसरे के साथ शरारत, हंसीमजाक छीनाझपटी से दिल बहलाते। किंतु इन बातों में वाल्तेयर की जरा भी रुचि नहीं थी। उस समय वह या तो एकांत में बैठा कुछ सोच रहा होता अथवा अपने अध्यापकों से किसी समस्या के निदान के लिए बातचीत कर रहा होता। उसकी स्मृति बहुत तेज थी। एक बार जो बात उसके मस्तिष्क में समा जाती, वह हमेशा उसका हिस्सा बनी रहती थी। वाल्तेयर की दुबली काया को देखकर उसके अध्यापक चाहते थे कि वह भी खेलकूद में हिस्सा ले, ताकि उसकी सेहत में कुछ सुधार आए। एक बार एक अध्यापक ने वाल्तेयर से कहा भी कि पढ़ने के साथ वह खेलकूद और मनोरंजन पर भी ध्यान दे। उस समय वाल्तेयर ने जो उत्तर दिया वह वाल्तेयर के भीड़ से अलग होने को दर्शाती है। जबकि वाल्तेयर तो भीड़ से बहुतबहुत अलग था। प्रश्न का उत्तर देते हुए उसने कहा था—

इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति को अपने ही तरीके से छलांग लगानी चाहिए।

और सचमुच वाल्तेयर हर मामले मौलिक बना रहना चाहता था। इसमें उसको कामयाबी भी मिली। कुछ ही वर्षों में अपनी प्रतिभा के दम पर वाल्तेयर ने समस्त अध्यापकों को अपने बस में कर लिया था। उसकी प्रश्नाकुलता जो कभी उसकी आलोचना का कारण बनी थी, वही उसकी ख्याति का कारण बनी। वाल्तेयर की विलक्षण मेधा से चमत्कृत एक अध्यापक ने टिप्पणी की थी कि क्या गजब है—

अदभुत, यह लड़का छोटीसी अवस्था में ही बड़ेबड़े सवाल हल कर लेना चाहता है।’

जीवन के प्रारंभिक वर्ष वाल्तेयर ने पेरिस में ही बिताए। पेरिस हालांकि फ्रांस का बड़ा और प्रसिद्ध नगर था, किंतु वहां का आकादमिक जीवन उसकी अपेक्षाओं के अनुकूल नहीं था। का॓लिज में शिक्षा के नाम पर केवल रूढ़ परंपराओं का पोषण होता था। नया करने या सीखने की गुंजाइश वहां बहुत ही कम थी। इसलिए अपने समय के प्रबलतम जिज्ञासु और जन्मजात प्रतिभा के धनी वाल्तेयर को अपने का॓लिज जीवन से निराशा ही हाथ लगी। फ्रांस के प्रसिद्ध ‘लाओसे ला॓ ग्रांड का॓लिज’ में आठ वर्ष से अधिक अध्ययन करने के बाद भी वाल्तेयर की सहज प्रतिक्रिया थीµ

वहां मुझे सिर्फ दो ही चीजें सीखने को मिलीं। एक लैटिन और दूसरी मूर्खता!’

वाल्तेयर बचपन से ही अत्यंत स्वाभिमानी और हाजिर जवाब था। जिन दिनों की यह घटना है उन दिनों वह रोजगार के लिए संघर्ष से गुजर रहा था। यह वाल्तेयर की निर्विवाद जनपक्षधरता को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त होगी। दिसंबर 1725 की एक शाम को नगर की प्रसिद्ध नाट्यशाला में वाल्तेयर न जाने किस बात पर उत्तेजित होकर जोरजोर से बोलने लगा। यह देख फ्रांसिसी राजनयिक केवेलियर दि’ रोहन कबोट ने टोक दिया। उन दिनों फ्रांस में नाम के पीछे ‘दि’ लगा होना सामाजिक और राजनीतिक प्रतिष्ठा का विषय माना जाता था। इस बात का रोहन महोदय को बहुत गुमान था। इसलिए वे गुस्से में वाल्तेयर के पास पहुंचे और उससे नाराजगी भरा सवाल किया—

श्रीमान्! मोंन्सायर दि वाल्तेयर, आपका पूरा नाम क्या है?’

वाल्तेयर ने भी वैसा ही जलाकटासा जबाव दिया—‘मात्र ऐसा आदमी जो अपने महान नाम के पीछे किसी भी प्रकार की पूंछ लगाने की आवश्यकता स्वीकारने को कभी तैयार नहीं रहा। लेकिन अच्छी तरह जानता है कि जिन नामों के साथ ‘दि’ जुड़ा है, उनको किस प्रकार सम्मानित किया जाता है।’

वाल्तेयर के शब्दों में गहरा कटाक्ष था। मि. कबोट नाराज होकर वहां से चले गए। वाल्तेयर के इस जवाब को फ्रांस के अमीरों ने अपने ऊपर हमला माना। वे उसके विरोध पर उतर आए। पूरे फ्रांस में बाबेला मच गया। इसी मुखरता के कारण वाल्तेयर को देशनिकाले की सजा मिली। निष्कासन का दंड वाल्तेयर के लिए नया नहीं था। वह इससे भी पहले भी कई बार निष्कासन की सजा झेल चुका था। कह सकते हैं कि इस सजा का वह अभ्यस्त हो चुका था। एक बार धर्म और धार्मिक प्रवृत्ति की आलोचना के कारण तथा दूसरी बार युवा राजा के प्रति व्यंग्यात्मक टिप्पणियों की वजह से। वाल्तेयर मनुष्यता को सर्वोपरि मानता था। धर्म में उसकी अनास्था थी। इसीलिए उसने धर्म की पारंपरिक अवधारणा पर अनेक स्थानों पर कटाक्ष किया है। धार्मिक कट्टरपंथियों के लगातार विरोध तथा तज्जनित निष्कासनों के कारण वाल्तेयर को अनेक कष्टों का सामना करता रहा। धर्म के प्रति अनास्था एवं विद्रोही स्वभाव के बावजूद वाल्तेयर की लेखन ऊर्जा बराबर बनी रही। धर्म और ईश्वर के प्रति वाल्तेयर की भावना को इन टिप्पणियों से समझा जा सकता है—

ईश्वर एक ऐसा पहिया है, जिसकी धुरी हर जगह है, परंतु उसका घेरा (विस्तार) नदारद है।’

वाल्तेयर का कहना था कि धर्म का उपयोग प्रायः वही लोग करते हैं, जो किसी न किसी प्रकार के ज्ञानविज्ञान एवं आधुनिकताबोध से कटे रहना चाहते हैं, जिन्हें अपना हित परंपरा के पोषण में ही नजर आता है। इसलिए बदलाव की संभावनामात्र से उन्हें डर लगने लगता है। यथास्थिति की राह में कोई बाधा न आए इसके लिए उन्होंने परमात्मा नामक मिथक की सर्जना की है। उसी के नाम पर वे रातदिन अपना उल्लू सीधा करने में लगे रहते हैं।

एक अन्य स्थान पर ईश्वर पर कटाक्ष करते हुए वाल्तेयर ने लिखा है—

परमात्मा सदैव ताकतवर के समर्थन में खड़ा होता है।

अपनी दो टूक अभिव्यक्तियों के कारण वाल्तेयर ने खूब बदनामी मोल ली। जाहिर है कि इससे उसको लाभ भी पहुंचा। उन उक्तियों के कारण वह कुछ ही वर्षों में धार्मिकसामाजिक स्वतंत्रता का सबसे बड़े समर्थक के रूप में जाना गया। वाल्तेयर की बातों में तार्किकता थी, इसलिए उसके समर्थकों की संख्या भी बड़ी तेजी से बढ़ रही थी। धीरेधीरे उसे अपनी आलोचना सहने का अभ्यास होता चला गया, यहां तक कि उसको मजा भी आने लगा। वालतेयर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करता था। अपने सिद्धांतों में उसकी दृढ़ आस्था थी। इसीलिए एक टिप्पणी में उसने व्यक्त किया है कि—

अपनी पूरी जिंदगी में मैने ईश्वर से एक ही चीज की कामना की है, यह कि वह लोगों को मेरे दुश्मनों पर हंसना सिखाए।’

वाल्तेयर की प्रखर बौद्धिकता की धमक उसके छात्र जीवन से ही सुनाई देने लगी थी, जिसका प्रभाव उसके अध्यापकों पर भी पड़ा। उनमें से कई उसके प्रशंसक थे तो कई आलोचक भी। वाल्तेयर के एक अध्यापक जो उसे नापसंद करते थे, एक दिन उसकी हाजिरजवाबी से चिढ़कर उन्होंने कहा था—

शैतान, तुम एक दिन फ्रांस में अव्वल दर्जे की बहसबाजी का नमूना लेकर आओगे।’

जो हो, वाल्तेयर की प्रतिभा अपना रंग दिखाने में लगी थी, किंतु उसके पिता का सपना तो पुत्र को लेकर कुछ ओर ही था। वे वाल्तेयर को वकील बनाना चाहते थे; जिसकी ओर उसका रुझान ही नहीं था। वह अपने साथियों के साथ या तो नाटकों की रिहर्सल करने में लीन रहता अथवा ऐसे ही किसी और काम में, जो नकद आमदनी की संभावना न्यूनतम होने के कारण उसके पिता की नजरों में व्यर्थ थे। तब तक वाल्तेयर के पिता को उसकी अद्वितीय प्रतिभा का अंदाजा हो चुका था, लेकिन वाल्तेयर अपनी प्रतिभा को यूं बेकार करे, यह उनको स्वीकार न था। एक बार वाल्तेयर के एक मित्र के जरिये उन्होंने कहवाया था कि वह जल्दी से घर वापस लौट आए। आने के साथ ही वह उसके लिए एक अच्छे से सरकारी पद का इंतजाम कर देंगे। इसपर बाल्तेयर ने उसी मित्र के माध्यम से पिता से कहलवाया—

‘‘मेरे पिता से कहना, ‘मैं ऐसा पद नहीं चाहता जो खरीदाबेचा जा सके। मैं अपने लिए ऐसी जगह बनाऊंगा जो अमूल्य होगी।’

उस समय वाल्तेयर ने अनजाने या आवेश में पिता से जो कहलवाया था, वह कालांतर में सच सिद्ध हुआ। साहित्य के प्रति वाल्तेयर का रुझान लगातार गहराता जा रहा था। उसकी नाटकों में उसकी विशेष रुचि थी। स्नात्तक करने के बाद वाल्तेयर को अपने करियर की चिंता हुई। उस जैसे निर्भीक और सच कहने वाले कलमकार को कौन भला नौकरी देता। वैसे भी वाल्तेयर जैसे स्वतंत्र प्रवृत्ति वाले जीव को नौकरी या व्यवसाय निभने वाले नहीं थे। इसलिए उसने करियर के रूप में लेखन को ही महत्ता दी। उससे आय की संभावना कम थी। उतनी तो बिलकुल नहीं, जितनी की कामना वाल्तेयर के मातापिता अपने प्रतिभाशाली पुत्र के लिए करते आ रहे थे। स्वतंत्र लेखन से जीविका चला पाना उस युग में आसान भी नहीं था। अतएव वाल्तेयर द्वारा करियर के रूप में लेखन को प्राथमिकता देने के निर्णय से उसके मातापिता, विशेषकर उसके पिता को निराशा ही हाथ लगी थी। वाल्तेयर की मां पुत्र की इच्छा का सम्मान करने वाली थीं। वे वाल्तेयर को लेखन के लिए निरंतर उत्साहित करती रहीं। वाल्तेयर की अपनी मां के प्रति आजीवन अटूट ऋद्धा रही और पिता के प्रति किंचित नफरत भी। मां के प्रति गहन अनुराग का वर्णन उसकी अनेक पुस्तकों में आया है।

भावुकता वाल्तेयर के व्यक्तित्व का प्रमुख हिस्सा थी। कविता लिखने में उसके संवेदनशील मन को खूब आनंद आता। बाकी बचे समय में वह नाटक देखना पसंद करता। उसकी रचनाओं की सराहना होने लगी थी। लेकिन जब उसने देखा कि लोगों पर सीधी तथा कलात्मक ढंग से कही गई बात का असर कम पड़ता है, तो वह व्यंजनात्मक शैली में लिखने लगा। कविता और नाटक के साथ उसने साहित्य की दूसरी विधाओं पर भी साधिकार लिखना प्रारंभ कर दिया। दूसरी ओर उसके पिता अभी तक इसी प्रयास में थे कि उनका बेटा साहित्य को छोड़ वकालत की दुनिया में जाए। इसलिए उन्होंने वाल्तेयर को समझाबुझाकर दुबारा वकालत पढ़ने के लिए भेज दिया। तब तक व्यंजनामूलक शैली तथा यथार्थपरक रचनाओं के कारण उसकी ख्याति दूरदराज तक फैल चुकी थी। कविता के अलावा उसने निबंध, उपन्यास, गल्प आदि खूब मात्र में लिखे, जिनमें समाज के प्रति उसका मानववादी दृष्टिकोण साफ झलकता है। लेकिन सचाई और सपाटबयानी शासकों को क्यों सहन होती। सो वाल्तेयर को उसका दंड भी सहना पड़ा।

वाल्तेयर को दंडित करने के लिए राजनीति को माध्यम बनाया गया। उसने पंद्रहवें लुई और फिलिप द्वितीय के बारे में एक आलेख लिखा था, जिसमें दोनों की राजनीतिक कार्यशैली पर आलोचनात्मक टिप्पणियां की गई थीं। उसी को विवादास्पद मानकर वाल्तेयर को सजा सुना दी गई। बेसटाइल नामक स्थान पर जेल में रहते हुए उसने पिता द्वारा दिए गए नाम ऐरोएट(François-Marie Arouet) के स्थान पर वाल्तेयर उपनाम को अपनाया। फिर यह सोचते हुए कि शायद नया नाम अपनाने के बाद दुर्भाग्य उसका पीछा छोड़ दे, उसने ‘ओडिपि’ नामक महान नाटक की रचना की। फ्रांस के बुद्धिजीवियों के बीच उस नाटक का खूब स्वागत हुआ। लोग प्रतिभाशाली वाल्तेयर को जेल में रखने के लिए सरकार की आलोचना करने लगे। अपनी आलोचनाओं से विचलित शासकवर्ग ने वाल्तेयर से कहा कि यदि वह समझदारी दिखाए तो उसको रिहा किया जा सकता है। इसपर वाल्तेयर ने कटाक्ष करते हुए कहा,

मुझे बेहद प्रसन्नता होगी, अगर आप मुझे आजाद कर मेरा सम्मान वापस दिलाने का आदेश देते हैं। मैं उम्मीद ही करूंगा कि भविष्य में आपको मुझे दुबारा जेल न भिजवाना पड़े।

इससे सरकार चिढ़ गई। तब तक वाल्तेयर भी खुद को मानसिक रूप से आने वाली परिस्थितियों के लिए तैयार कर चुका था। इसलिए उसकी कलम आगे भी अबाध और निडर बनी रही। सचाई की ताकत, प्रतिबद्धता और जीवनमूल्यों के प्रति ईमानदारीभरा समर्पण, उसकी कलम को निरंतर ऊर्जावान बनाने में कारगर रहा। जेल से छूटने के कुछ ही दिन बाद सफाई का अवसर दिए बिना ही, एक गोपनीय आदेश के माध्यम से वाल्तेयर को फ्रांस से निष्कासित कर दिया गया। इस घटना के बाद वाल्तेयर को फ्रांस की न्याय व्यवस्था की कमजोरियों का पता चला। उसे एहसास हुआ कि फ्रांस की सरकार भी इंग्लैंड की भांति घोर परंपरावादी है। न्याय और व्यवस्था के नाम पर कमजोरों का वहां भी शोषण होता है। वहां भी न्यायाधीशगण सत्ता के दबाव के आगे अपने फैसले बदलते रहे हैं। इसी दौरान उसको राजनीतिक एवं धार्मिक सत्ता के गठजोड़ की जानकारी मिली। इससे उसके मन में समाज के गरीब एवं वंचित वर्ग के प्रति सहानुभूति उमड़ने लगी।

निष्कासन के पश्चात वाल्तेयर इंग्लेंड चला गया। यह उसके जीवन का क्रांतिकारी मोड़ था। इंग्लैंड का खुला बौद्धिक वातावरण उसको खूब पसंद आया। उसे लगा कि वह वहां रहकर अपने विचारों को ईमानदारी से अभिव्यक्त कर सकता है। उत्साह से भरे अगले कुछ महीने उसने अंग्रेजी सीखने में लगाए। प्रतिभाशाली तो वह था ही। मात्र छह महीने में वह धाराप्रवाह अंग्रेजी लिखनेपढ़ने लगा। इससे उसको अंग्रेजी में उपलब्ध पुस्तकों को पढ़ने का अवसर मिल सका। वाल्तेयर वहां अनेक बड़े लेखकों और बुद्धिजीवियों से मिला। शेक्सपियर से तो वह शुरू से ही बेहद प्रभावित था और फ्रांस में रहकर उसके जैसा बनने का सपना देखता था। ब्रिटेन में रहते हुए उसे शेक्सपियर के नाटकों के अध्ययन का अवसर मिला. उसके कुछ नाटकों को उसने फ़्रांसिसी थियेटर के लिए तैयार भी किया. जल्द ही वह शेक्सपियर के प्रमुख आलोचकों में शामिल हो गया. शेक्सपियर के लिए नाटक उसके दर्शकों के लिए कलात्मक मनोरंजन थे. उसके लिए कला केवल कला थी, जबकि वाल्तेयर साहित्य और कला को परिवर्तन हेतु इस्तेमाल करना चाहता था. आगे चलकर उसने स्वयं को शेक्सपियर से बड़ा लेखक दर्शाने की कोशिश भी की।

वाल्तेयर वैज्ञानिक नहीं था, किंतु वैज्ञानिक ज्ञान में उसकी रुचि थी। सर आइजक न्यूटन की प्रकाशसंबंधी खोजों को जानने के बाद वाल्तेयर ने उसकी भूरिभूरि प्रशंसा की। न्यूटन द्वारा किए गए वैज्ञानिक आविष्कारों से परिचय के पश्चात उसकी विज्ञान में रुचि का और भी विस्तार हुआ। यही नहीं इंग्लैंड में रहते हुए वह उस समय के एक और महान वैज्ञानिक, दार्शनिक लाइबिनित्ज के संपर्क में भी आया, जो उन दिनों अपने परमाणु सिद्धांत के कारण चर्चा के शिखर पर थे। लाइबिनित्ज का परमाणु सिद्धांत दार्शनिकता से भरपूर था। वाल्तेयर पर उनके विचारों का प्रभाव भी पड़ा, उसके भीतर वैज्ञानिक सोच का उदय हुआ।

तीन वर्ष के निष्कासन के पश्चात वाल्तेयर पेरिस लौट आया तथा लंदन के अनुभवों के आधार पर ‘फिला॓स्फीकल लेटरर्स आ॓न दि इंग्लिश’ शीर्षक से एक पुस्तक तैयार की। जिसमें फ्रांस तथा इंग्लेंड के सामाजिक परिवेश, मानवाधिकार, लोकतांत्रिक मूल्यों, विशेषकर धार्मिक सहिष्णुता का तुलनात्मक अध्ययन किया गया था। उस पुस्तक के माध्यम से वाल्तेयर ने फ्रांसिसी समाज की आलोचना की थी, जिससे उसके विरोधियों को तत्कालीन शासकों को भड़काने का एक ओर अवसर मिल गया। पुस्तक ने छपते ही बवंडर का काम किया। वहां के धर्माधिकारियों, शासकों को वह बहुत नागवार गुजरी। उसे लेकर जगहजगह विरोध प्रदर्शन किए जाने लगे। अनेक स्थानों पर उस पुस्तक को आग में झोंक दिया गया। मामला यहीं शांत नहीं हुआ। धार्मिक शक्तियों के दबाव ने वाल्तेयर को एक बार पुनः पेरिस छोड़ने को विवश कर दिया गया। वहां से वह ‘दि कायरे’ चला गया।

लगातार भागदौड़ करने से वह उकता गया था। उसका स्वास्थ्य भी गिरने लगा था। अब वह कुछ दिनों तक एक ही स्थान पर जमे रहकर काम करना चाहता था। दि कायरे का वातावरण उसको अपने अनुकूल जान पडा। वहां रहते हुए वाल्तेयर ने शीर्षस्थ बुद्धिजीवियों से संबंध स्थापित किए। इसी क्रम में मारक्वाइज़ के संपर्क में आया। उसके साथ कार्य करते हुए उसने पंद्रह वर्षों के दौरान इकीस हजार से भी दुर्लभ पुस्तक और पांडुलिपियां जमा कीं। उनपर काम करते हुए वाल्तेयर तथा मारक्वाइज़ कई नए प्रयोग किए।

वाल्तेयर ने साहित्य की प्रायः सभी विधाओं में लिखा। साहित्य एवं विज्ञान के अतिरिक्त वाल्तेयर की इतिहास में भी रुचि थी। उसने फ्रांस के समाज का ऐतिहासिक दृष्टि से भी अध्ययन किया तथा कायरे में रहते हुए एक विशिष्ट पुस्तक की रचना की— जिसका नाम है: दि ऐस्से अपा॓न दि सिविल वार इन फ्रांस। इस पुस्तक में वाल्तेयर ने एक बार फिर धार्मिक रूढ़ियों पर जमकर प्रहार किया। उसने धर्म को चर्च के दायरे से बाहर लाने पर जोर दिया। इन्हीं महीनों के दौरान उसने एक और महत्त्वपूर्ण निबंधात्मक पुस्तक लिखी—किंग चार्ल्स बारह! इस पुस्तक ने वाल्तेयर की प्रसिद्धि को आगे ले जाने में काफी मदद की। इस पुस्तक तक आतेआते वाल्तेयर धर्म का कटु आलोचक बन चुका था। हालांकि उसकी आलोचनात्मक कटुता केवल धर्म के सांस्थानिकीकरण, राजनीतिक अदूरदर्शिता तथा समाज के उच्च स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार एवं लूटखसोट को लेकर थी। ईश्वरवादियों का उपहास करते हुए उसने कहा था कि—

ईश्वर एक जोकर या मजाकिया है। जो उन लोगों के लिए तमाशा दिखाता है, जिन्हें हंसने से भी डर लगता है।’

यही नहीं बाईबिल में व्यक्त धार्मिक अवधारणाओं के प्रति अपनी अप्रसन्नता व्यक्त करते उसने इस पुस्तक में उन्हें तर्क पर कसने का प्रयास भी किया।

1733 . में वाल्तेयर मादाम चैटली के संपर्क में आया, ‘वह (मादाम चैटली) एक सुशिक्षित एवं प्रतिभाशाली महिला थी तथा आनंदमय जीवन को प्राथमिकता देती थी। उसके लिए भरपूर परिश्रम करने से भी उसको परहेज नहीं था। चैटली को अनेक विषयों का ज्ञान था। संभवतः ऐसी कोई पुस्तक नहीं थी जिसको वह पढ़ और समझ न सके। गणित, ज्योतिष और दर्शनशास्त्र का तो उसने गहन अध्ययन किया था। वाल्तेयर तथा मादाम चैटली के स्वभाव में भी काफी अंतर था। वाल्तेयर संवेदनशील, बहुत जल्दी उत्तेजित हो जाने वाला, कोमल दिल वाला इंसान था, जबकि मादाम चैटली एक जटिल तथा अपनी बात पर अड़ी रहने वाली, एक तुनकमिजाज महिला थी। कभीकभी उनके बीच झगड़ा भी हो जाता था। फिर भी दोनों एकदूसरे के प्रति समर्पित थे। वे साथसाथ गणित, ज्योतिष, इतिहास, दर्शन, धर्म का अध्ययन करते थे। संभवतः वे अपने समय के सर्वाधिक प्रतिभाशाली दंपति थे।’

वाल्तेयर तथा उसके दोस्त मारक्वाइज़ की रुचि मेटाफिजिक्स नामक विज्ञान में थी। इसमें जीवन और मृत्यु, ईश्वर की सत्ता के बारे में अनेक सवाल उठाए गए हैं। अपने मित्र मारक्वाइज़ की मौत के बाद वह बर्लिन चला गया। वहां उसके अच्छे दिनों की शुरुआत हुई जब राजा ने उसे बुलाकर अच्छे वेतन पर नौकरी पर रखने का प्रस्ताव किया। वाल्तेयर ने उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया। मगर उसकी परेशानियां सदाबहार थीं। उनका अंत संभव भी नहीं था। बर्लिन में रहते हुए वाल्तेयर को फिर एक मुकदमे का सामना करना पड़ा। उसने एक पुस्तक लिखी थी– Diatribe du docteur Akakia। वाल्तेयर की इस पुस्तक में भी शासकों के ऊपर करारा व्यंग्य किया गया था; जिसपर खूब हंगामा हुआ था। यहां तक कि वाल्तेयर का मित्र फ्रेडरिक ही उस पुस्तक से इतना चिढ़ गया कि उसने उस पुस्तक की सारी प्रतियां खरीदकर उन्हें आग के हवाले कर दिया।

वाल्तेयर वहां से एक बार फिर पेरिस की ओर प्रस्थान कर गया। लेकिन पेरिस में उसके प्रवेश पर लुई पंद्रहवें द्वारा पहले से ही रोक लगाई जा चुकी थी। इसलिए वाल्तेयर को वहां से जिनेवा जाना पड़ा, जहां उसने कुछ जमीन खरीदी हुई थी। जिनेवा में उसको प्रवेश की सशर्त अनुमति ही मिल पाई। बावजूद इसके वह प्रसन्न था। अब वह कुछ दिन एक स्थान पर ठहरकर एकांत में पढ़नालिखना चाहता था। किंतु परेशनियां अब भी उसका पीछा कर रही थीं। जिनेवा में यह आफत एक अलग रूप धरकर आई, जब जिनेवा प्रशासन ने वाल्तेयर के नाटकों के मंचन पर रोक लगा दी। उसके लिए यह सचमुच का आघात था, तो भी उसकी सृजनात्मकता अपना कार्य करती रही।

भारी तनाव और संकट से भरे समय में 1759 में वाल्तेयर ने अपने विश्वचर्चित उपन्यास ‘कांदीद’ की रचना की। इस उपन्यास में लाइबिन्त्जि के दार्शनिक सिद्धांत पर कटाक्ष किया गया है। उपन्यास ने उसको विश्वव्यापी ख्याति प्रदान की। इस पुस्तक का दुनिया की प्रायः सभी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। मगर इससे भी अधिक यह एक व्यंग्य रचना है। जिसमें धर्मरहित समाज की कल्पना की गई है। न्यूटन से प्रभावित होकर भी वाल्तेयर ने एक पुस्तक की रचना कि, जिसमें उसको भरपूर सराहना मिली। आइरनी’ वाल्तेयर की सुप्रसिद्ध नाट्य कृति है।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी वाल्तेयर ने साहित्य की प्रायः हर विधा पर काम किया और अपनी प्रतिभा की छाप छोड़ी। उसकी रचनाओं में निबंध, उपन्यास, नाटक, बीस हजार से अधिक पत्र, वैज्ञानिक और ऐतिहासिक आलेख आदि शामिल हैं। वाल्तेयर को लेकर जा॓न इवरसन की टिप्पणी उसके व्यक्तित्व को समझने में हमारी और भी मदद कर सकती है—

वाल्तेयर, जो सतरहवीं और अठारहवीं शताब्दी के बीच उभरा और शताब्दियों तक पूरी दुनिया पर छाया रहा, न तो कोई अजूबा इंसान था, न ही महान योद्धा। इनके स्थान पर वह एक अग्रणी चिंतक और प्रतिभाशाली रचनाकार था, जिसने अपने समय और साहित्य को सर्वाधिक प्रभावित किया। और जो पूरी दुनिया को लेकर अपने समय और समाज के साथ सतत संवाद करता रहा।’

वाल्तेयर की मृत्यु लंबी बीमारी के कारण मई 1778 को उसकी मृत्यु हुई। उस समय भी उसका मस्तिष्क पूरी तरह सक्रिय था। उसकी शवयात्रा बड़ी धूमधाम से निकाली गई। मृत्यु के आभास पर वाल्तेयर ने लिखा कि—

मैं ईश्वर की प्रार्थना करते हुए मृत्यु का वरण कर रहा हूं। मेरे मन में किसी के भी प्रति लेशमात्र घृणाभाव नहीं है। मुझे सिर्फ अंधविश्वासों से नफरत है।’

अठारहवीं शताब्दी का मानवता का सबसे महान समर्थक वह जब मरा तो फ्रांस और यूरोप के लाखों लोगों की आंखें नम थीं। हजारों ने यह महसूस किया कि वाल्तेयर के रूप में उन्होंने अपना सबसे बड़ा हितैषी, विद्वान और महान साहित्यकार खो दिया है। वाल्तेयर का संघर्ष अकारथ नहीं गया। उसकी मृत्यु के बाद उसके समर्थकों का एक बड़ा वर्ग दुनियाभर में पैदा हुआ, जिसने आम आदमी के हितों के संघर्ष को आगे बढ़ाने का काम किया।

विचारधारा

वाल्तेयर के समय फ्रांस में धर्म और राजसत्ता का स्वार्थप्रेरित तालमेल अपने चरम पर था। लोगों का अपने ऊपर से विश्वास टूट चुका था। अपने हालात से वे परेशान तो निश्चय ही थे, मगर बदलाव के लिए किसी बाहरी शक्ति से चामत्कारिक सहायता की उम्मीद लगाए रहते थे। प्रशासनिक स्तर पर चाटुकारिता को नैतिकता मान लिया गया था। सारे सामाजिक निर्णय धर्मसत्ता के दबाव में लिए जाते थे। आम जनजीवन जहां अभावों से भरा पड़ा था, वहीं पुजारी और सामंतवर्ग विलासिता भरा जीवन जीते थे। नागरिकों को त्याग, तपश्चर्य, अस्तेय एवं अपरिग्रह की सीख देनेवाले मठाधीशों का जीवन अपने ही विचारों की खिल्ली उड़ाता था। वे वाचाल अपने ही स्वार्थ में डूबे मूढ़ और घोर परंपरावादी लोग थे, जो अपने सुख के लिए सामाजिक यथास्थिति को बनाए रखना चाहते थे। फ्रांस की आर्थिक स्थिति जर्जर थी। भ्रष्टाचार और राजनीतिक अवसरवाद वहां अपने चरम पर था। इसके कारण देश दिवालियेपन के कगार पर था। समाज में अन्याय और अनाचार अपनी सीमाएं पार करता जा रहा था। सच कहना और न्यायपूर्ण ढंग से आचरण करना अपने सिर पर आफत को निमंत्रण देना था।

अपनी इंग्लैंड यात्रा के दौरान वाल्तेयर वहां के समाज का वैचारिक खुलापन देखकर बहुत प्रभावित हुआ था। उसने अनुभव किया था कि सबके विकास के लिए वैचारिक स्वतंत्रता अनिवार्य है। चूंकि वैचारिक स्वतंत्रता के आड़े सबसे पहले धर्म ही आता था, क्योंकि धर्म की सत्ता परंपराओं पर टिकी हुई थी और पादरीवर्ग जिसपर धर्म की रक्षा तथा उसके प्रचारप्रसार का दायित्व था, उन परंपराओं में किसी भी प्रकार का संशोधन करने को तैयार नहीं था। अतः इंग्लैंड से लौटने के बाद वाल्तेयर ने स्वयं को वैचारिक लेखन के लिए समर्पित कर दिया। हालांकि इसके लिए उसने साहित्य की प्रचलित विधाओं का सहारा भी लिया, किंतु उसका लक्ष्य एकदम साफ और अपने उद्देश्य के प्रति समर्पित था। उसने सामाजिक मूल्यों की स्थापना को अपने चिंतन के केंद्र में रखा और बिना किसी भय के अपनी अभिव्यक्ति को विस्तार दिया।

अपनी रचनाओं के माध्यम से वाल्तेयर ने ईश्वर के अस्तित्व को चुनौती दी। धर्म के सत्तावाद पर भी उसने कसकर निशाना साधा। इसके लिए उसे समाज की यथास्थिति की समर्थक, प्रतिगामी शक्तियों के भारी विरोध का सामना भी करना पड़ा। वह जेल गया, निष्कासन के दंड को भोगा। मगर उसने हार नहीं मानी और आजीवन अपने विचारों पर डटा रहा। उसने कलम की ताकत का भरपूर उपयोग किया। सतत और उद्देश्यपूर्ण लेखन के द्वारा वह अपने लक्ष्य तक पहुंचने में सफल भी हुआ।

वाल्तेयर ने विपुल साहित्य की रचना की। किंतु उसकी महानता का यही एक कारण नहीं है। उसकी महानता इसमें है कि उसने जनसाधारण को अपने चिंतन के केंद्र में रखा। जनकल्याण के लिए जैसा उसको उपयुक्त लगा उसी तरह उसको अभिव्यक्ति दी। पूरी ईमानदारी और कलात्मकता के साथ। वह स्वतंत्रता को विकास की प्रारंभिक शर्त मानता था। अपने सिद्धांतों की अभिव्यक्ति के लिए वह कभी झुका नहीं। वह इस तथ्य से आहत था कि दुनिया का प्रत्येक धर्म स्वयं को नैतिक मानते हुए स्वतंत्रता का समर्थन तो करता है, किंतु व्यवहार में उसका आचरण एकदम तानाशाही भरा होता है।

वाल्तेयर मनुष्य की सर्वांगीण स्वतंत्रता का समर्थक था। आजादी को उसने विकासमान जीवन की अनिवार्यता के रूप में स्वीकार किया है। उसके लिए वह हर संघर्ष को जायज मानता था और गुलामी से मुक्ति के लिए वह किसी भी प्रकार के प्रयास का समर्थन करने को तैयार था। उसका अपना लेखन राजनीतिक भ्रष्टाचार और वर्चस्ववाद के विरुद्ध एक सार्थक अभियान है। आततायी सत्ता के विरोध द्वारा राजनीति की पवित्रता बनाए रखने के लिए वह आमजन को विद्रोह का अधिकार भी देने को तैयार था, जिसे राजनीतिक गुलामी के जोर पर वर्षों से दबाकर रखा गया है। उसने आवाह्न किया था कि—

यदि मनुष्य आजाद जन्मा है, तो उचित सही है कि वह सदैव आजाद रहेऔर यदि कहीं निष्ठुरता अथवा तानाशाही है तो उसेे उखाड़ फेंकने का अधिकार भी उसको होना चाहिए।’

वाल्तेयर ने यह भी अनुभव किया था कि स्वार्थी धर्मसत्ता एवं राजसत्ता के बीच धर्मसत्ता कहीं अधिक व्यापक एवं असरकारी है। शायद इसलिए कि धर्म जीवन के साथ अधिक गहराई एवं व्यापक संदर्भों में जुड़ा होता है। मनुष्य को जन्म के साथ ही धर्म की अपरिहार्यता की शिक्षा दी जाती है, और चाहेअनचाहे उसके नियमों का पालन करने का निर्देश भी दिया जाता है। राजसत्ता का विरोध संभव और सभ्य समाजों में मान्य भी रहा है। मगर धर्मसत्ता मनुष्य से उसका विरोध करने का अधिकार ही छीन लेती है। वह केवल अंधअनुसरण की अपेक्षा रखती है। ऐसा न कर पाने पर वह सामाजिक रूप से दंड का प्रावधान रखती है। धर्म का यही तानाशाही भरा रवैया उसको यथास्थितिवादी बनाए रखकर, विकास के अवरोधक के रूप में खड़ा कर देता है। धर्म की इसी कमजोरी के कारण वाल्तेयर ने उसको अपनी आलोचना का विषय बनाया और उसके नाम पर होने वाले अन्याय, अनाचार एवं अन्य दुरभिसंधियों का विरोध करते हुए, तर्कपूर्ण ढंग से जीवन में धर्म की आवश्यकता का निषेध किया है।

डा॓क्टरीन आ॓फ फला॓सफी’ में उसके विचार खुलकर सामने आए हैं। इस पुस्तक में वाल्तेयर ने फ्रांस की तत्कालीन राजनीतिकधार्मिक अराजकता और सर्वसत्तावाद की आलोचना करते हुए समाज में मनुष्य की आजादी का पक्ष लिया है। अपनी पैनी व्यंग्यात्मक शैली मे उसने धर्मसत्ता और उसपर नियंत्रण रखने वाले लोगों की विकट आलोचना की है। इसके लिए उसने बाईबिल को भी नहीं छोड़ा था। वह स्वयं को नास्तिक मानता था। ईश्वरीय सत्ता के बारे में उसका मानना था कि ईश्वर की कल्पना, स्वार्थी और परजीवी किस्म के लोगों ने अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए की है। धर्म उनके पापकर्म के लिए आड़ का काम करता है और उनके द्वारा गढ़ा गया ईश्वर उनके अनाचारों को पोषणसंरक्षण प्रदान करता है।

जनसाधारण की ईश्वरसंबंधी अवधारणा का उपहास करते हुए उसने लिखा है कि—

ईश्वर एक ऐसे वृत के समान है, जिसका केंद्र अनंत है और विस्तार शून्य।

वाल्तेयर आजीवन लेखन के प्रति समर्पित रहा था। उसने अनेक पुस्तकें, विपुल मात्र में लेख आदि लिखे। लेकिन यह सब ना होकर केवल कांदीद ही उसकी एकमात्र पुस्तक होती तो भी वाल्तेयर की महानता एवं प्रतिष्ठा इतनी ही होती। जीवन के अंतिम दिनों में लिखा गया वाल्तेयर का यह उपन्यास तत्कालीन समाज के बौद्धिक दिवालियेपन पर गहरा कटाक्ष करता है। इसमें राजनीति की स्वार्थपरता और अदूरदर्शिता को व्यंजनात्मक शैली में बहुत ही खूबसूरती एवं कलात्मकता के साथ अभिव्यक्ति प्रदान की गई है। यही नहीं धर्मसत्ता पर विराजमान पंडेपादरियों पर भी वाल्तेयर ने खूब कटाक्ष किया है।

हालांकि धर्म पर लगातार प्रहार के कारण वाल्तेयर ने अपने अनेक दुश्मन भी बना लिए थे। धार्मिक और सामाजिक मामलों को लेकर वह जो सोचता, वही लिखता था। जो उसको अच्छा लगता था उसका वह सम्मान करता था। उसने साहित्य की प्रायः सभी विधाओं में काम करते हुए दुनियाभर में प्रसिद्धि बटोरी और अपने असंख्य समर्थक पैदा किए। वाल्तेयर के विचारों से प्रगतिशील आंदोलन को और अधिक गति मिली। उसने भले ही बड़ेबड़े वैचारिक ग्रंथ न लिखे हों, मगर उसके विचार एवं मौलिक अवधारणाएं, उसकी रचनाओं में इतने प्रभावी ढंग से पिरोयी होती थीं कि वे जनमानस पर सीधे असर करती थीं। वाल्तेयर के नाटकों और लेखों ने तत्कालीन फ्रांस में जनचेतना लाने का कार्य किया। वह उन विद्वानों में से था, जिसने अठारवीं शताब्दी को सर्वाधिक प्रभावित किया। वाल्तेयर का मानना था कि जब—

सरकार जब गलत रास्ते पर हो तो और सुधरने की कोई संभावना ही शेष न हो, तो सभ्य बने रहना बहुत खतरनाक सिद्ध होता है।’

जिनेवा प्रवास के दौरान वाल्तेयर ने एक बड़े आश्रम (Ferney) की स्थापना की थी, जो जिनेवा से मात्र पांच किलोमीटर की दूरी पर था। उन दिनों जिनेवा एक स्वतंत्र राज्य था। उस आश्रम में किसी भी धर्म या विश्वास को मानने वाला, अमीरगरीब कोई भी आजा सकता था। जब तक मन हो वहां ठहर सकता था। इसलिए उस आश्रम में मेहमानों का आगमन होता ही रहता था। आश्रम में भोजनादि की सेवाएं निःशुल्क प्रदान की जाती थीं। करीब साठ सेवक उनके भोजन के लिए तैनात रहते थे। आश्रम का जीवन अनुशासित था। समय का वहां विशेष ध्यान रखा जाता था। प्रत्येक रविवार को वाल्तेयर आश्रम के लोगों को संबोधित करता था, उस समय वह अपनी गोद में एक बच्चे को रखता था, जिसे उसने गोद लिया हुआ था। इस प्रकार वाल्तेयर समाज के सामने एक आदर्श प्रस्तुत करता था। आगे चलकर आश्रम में एक चर्च की स्थापना भी की गई। जिसमें सहजीवन को प्राथमिकता दी जाती थी।

वाल्तेयर के आश्रम की तुलना हम ओवेन द्वारा स्थापित आश्रमों से कर सकते हैं। ओवेन के समय तक आतेआते समाजवादी चेतना परिपक्व होने लगी थी। इसीलिए उसके द्वारा स्थापित आश्रमों में सहजीवन का अधिक परिष्कृत एवं सफल रूप देखने को मिलता है। बावजूद इसके वाल्तेयर ने जिस नैतिकता आधारित जीवन पद्धति का आरंभ अपने आश्रम के माध्यम से किया, तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।

वाल्तेयर को प्रकृति से कोई मोह नहीं था। उसका बस एक ही काम था। लिखना, लिखना और लिखना, मनुष्यता की स्थापना के लिए लगातार लिखना। इसलिए अपने जीवनकाल में उसने विपुल साहित्य की रचना की है। मन से उदार प्रवृत्ति का था। यहां तक कि खुद को नुकसान पहुंचाने वालों के प्रति भी वह नर्म और मेहरबान था। क्लेरेंस डेरो ने अपने आलेख में आश्रम की एक घटना का उल्लेख किया है, जो वाल्तेयर की उदारता को दर्शाती है। घटना कुछ इस प्रकार है—

एक बार आश्रम के दो नौकरों को चोरी के इल्जाम में पकड़ लिया गया। पुलिस की सख्त पूछताछ के दौरान उन्होंने अपना अपराध भी स्वीकार कर लिया। वाल्तेयर को यह सूचना मिली तो वह उद्धिग्न हो गया। उसने फौरन आश्रम के प्रबंधक बुलाया और कहा कि वह नौकरों से कहे कि वे किसी भी प्रकार भाग जाएं। यही नहीं उसने उन दोनों को भागकर किसी सुरक्षित स्थान तक पहुंचने के लिए आवश्यक धन की व्यवस्था भी की। इसके लिए वाल्तेयर का कहना था कि—

यदि गिरफ्तार करने के पश्चात पुलिस उनपर मुकदमा चलाती है तो उसमें इतना सामर्थ्य नहीं है कि वह उन्हें सजा से बचा सके।’

लेखन के आरंभिक वर्षों में वाल्तेयर शेक्सपियर से काफी प्रभावित था। 1720 में ब्रिटेन में निर्वासित जीवन जीते हुए उसने शेक्सपियर के नाटकों में रुचि लेना आरंभ किया था। उसके नाटकों की कलात्मकता, उत्कृष्ट शैली से वह प्रभावित हुए बिना न रह सका। यह प्रभाव 1728 में फ्रांस लौटने के बाद भी बना रहा। आरंभ में वह न केवल शेक्सपियर की शैली को अपनाना चाहता था, बल्कि उसके कुछ चर्चित नाटकों का फ्रांसिसी थियेटर के लिए पुनर्लेखन भी किया था। धीरेधीरे शेक्सपियर के प्रति उसके मन में मतभेद उभरने लगे। उन दिनों ब्रिटेन में शेक्सपियर की प्रतिष्ठा बढ़ रही थी। वाल्तेयर की आलोचना ने उसकी ख्याति को नुकसान भी पहुंचाया। शेक्सपियर के नाटक इंग्लेंड के अभिजात वर्ग के मनोरंजन के लिए थे। जबकि वाल्तेयर का विश्वास मानवमात्र की स्वतंत्रता में था। शेक्सपियर को नाटक लिखने में अद्वितीय ख्याति मिली। एक कांदीद नामक उपन्यास को छोड़कर वाल्तेयर की कोई भी अन्य पुस्तक लोकप्रियता के मामले में शेक्सपियर की पुस्तकों की बराबरी नहीं कर सकी। किंतु मनुष्यता, स्वाधीनता एवं जीवन में नैतिकता के समर्थक के रूप में वाल्तेयर की प्रतिष्ठा शेक्सपियर से कहीं आगे है। शेक्सपियर का लेखन जनरुचि विशेषकर औद्योगिकीकरण के फलस्वरूप तेजी से उभरते जा रहे मध्यवर्ग के मनोरंजन की शर्तों को पूरा करता था। इसी वर्ग ने शेक्यपियर को विश्व के साहित्यकारों में अमर बनाने का काम किया। उसके सापेक्ष वाल्तेयर कर लेखन मनुष्यमात्र के सरोकारों को लेकर प्रतिबद्ध लेखन था। शेक्सपियर के लिए कला प्रमुख थी, जबकि वाल्तेयर के लिए जीवनमूल्य। इतिहास में वाल्तेयर की भूमिका एक शाश्वत जिद्दी किस्म के इंसान की है। उसने सत्ता, चाहे वह धर्म की हो अथवा राज्य की, सभी के विरुद्ध अपनी कलम का इस्तेमाल किया।

वाल्तेयर के एक बेहद चर्चित नाटक के गीत का आशय है—

उठोउठो! और अपनी शृंखलाएं तोड़ डालो!’

वाल्तेयर की महानता इसमें भी है कि उसने जीवनभर जो भी लिखा, उसको पहले अपने तर्क की कसौटी पर कसा, फिर उपयुक्त पाए जाने पर उसको जनता तक पहुंचाने का ईमानदार प्रयास भी किया। इसके लिए उसने कविता और नाटक जैसी लोकरुचि की विधाओं को अपनाया। अपने विचारों को जनजन तक पहुंचाने के लिए उसने परचों का सहारा लिया। उसने जनहित से संबंधित मुद्दों पर अनगिनत परचे छपवाकर जनता में प्रचारित किए। अपने विचारों को स्पष्ट करने के लिए वाल्तेयर ने सहजसरल भाषा का सहारा लिया, जिससे उसको बेशुमार ख्याति मिली। राजनीति और धर्मसत्ता के प्रबल अंतर्विरोधों को स्पष्ट करने के लिए उसने व्यंजना का सहारा लिया, जिससे उसकी लोकप्रियता उत्तरोत्तर बढ़ती चली गई। वाल्तेयर के सरोकार पूरी तरह मानवीय थे। उसके लंबे जीवन में एक भी उदाहरण ऐसा नहीं है, जब उसने अपने सिद्धांतों के प्रति समझौतावादी रुख अपनाया हो या अपनी आलोचना से घबराकर वह किसी भी प्रकार के समर्पण को तैयार हो गया हो। वह एक उदार, प्रतिभाशाली, सरल और विवेकवान इंसान था।

वाल्तेयर की सबसे बड़ी विशेषता थी उसकी सचाई, सच कहने का स्वाभाव। हालांकि अपनी स्पष्टोक्तियों के कारण उसको अनेक बार परेशानियों का सामना करना पड़ा था। एक बार एक परिहास के दौरान वाल्तेयर के सचिव ने उससे पूछा था—

सर क्या होता यदि आपका जन्म स्पेन में हुआ होता?’

इसपर वाल्तेयर ने जवाब दिया—

तब मैं प्रतिदिन प्रतिदिन चर्च जाया करता। एक दिन वहां पादरी के चोगे को चूमता और उसके सारे शिक्षण संस्थानों को आग के हवाले कर देता।’

मानवीय आत्मसम्मान के लिए संघर्ष करने वालों में वाल्तेयर का नाम सर्वोपरि है। उसके योगदान को लेकर क्लेरेंस डेरो ने एक बड़ी भावपूर्ण टिप्पणी की है—

पश्चिमी जगत से हिंसा और कटुता को दूर कर उसको उदार एवं मानवीय बनाने वाले महानायकों में दूसरा कोई महानायक नहीं है, जिसका नाम और काम वाल्तेयर की बराबरी कर सकें।’

वाल्तेयर की मेधा निःसंदेह अनुपम थी। मनुष्यता के इतिहास में उसका योगदान महानतम और अविस्मरणीय की श्रेणी में आता है। रूसो भी वाल्तेयर का समकालीन था। दोनों में परस्पर संपर्क था। दोनों ही अपनी किस्म के विशिष्ट विद्वान, मानवीयता के समर्थक और आलोचक थे। रूसो की सर्वाधिक चर्चित पुस्तक ‘दि सोशल कांट्रेक्ट’ की वाल्तेयर ने जमकर आलोचना की थी। वाल्तेयर के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर क्लेरेंस डेरो ने बहुत सटीक टिप्पणी की है—

वाल्तेयर कदकाठी में छोटा, देखने में बेहद कमजोर और दुबलापतला था, लेकिन उसमें कमाल की फुर्ती थी. तेज दिमाग और प्रखर मेधा के बल पर उसका व्यक्तित्व पूरी जिंदगी चमचमाता रहा. अपने जीवन में उसने हर बौद्धिक चुनौती का साहसपूर्वक ढंग से सामना किया. यह सही है कि जीवन में उसको कई बार समझौते भी करने पड़े. जो उसके प्रशंसकों को बहुत नागवार गुजरते है. वे चाहते हैं कि वाल्तेयर भी ब्रूनो (Bruno) और सर्वेतिस(Servetus) की भांति, जिन्हें कट्टरपंथियों ने आग में जीवित जला दिया गया था, अपने विचारों पर अटल रहता. लेकिन महान व्यक्तित्वों का आकलन इस प्रकार नहीं किया जाता. अपनेअपने स्थान पर सभी महत्त्वपूर्ण एवं महान हैंवाल्तेयर भावुक और दयालु था. उसके दिल में दूसरों के लिए प्यार समाया हुआ था. तन से वह दूसरों के लिए समर्पित था. इतिहास के उन महानायकों में जिन्होंने पश्चिमी समाज से कट्टरता और निर्दयता को समाप्त करने में प्रमुख भूमिका निभाई, कोई भी वाल्तेयर की बराबरी नहीं कर सकता.

ओमप्रकाश कश्यप.