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वायकम सत्याग्रह : अस्पृश्यता के विरुद्ध निर्याणक जंग

सामान्य

 (वायकम केरल का खूबसूरत नगर है। आजादी से पहले त्रावणकोर राज्य का हिस्सा था। और वहां राजा का शासन था। 1924 तक आधुनिक केरल, तमिलनाडु सहित दक्षिण के कई राज्यों में निचली जाति के सदस्यों को कुछ सार्वजनिक मार्गों पर चलने की आजादी नहीं थी। वायकम में शिव का प्राचीन मंदिर था। उससे जोड़ने वाली सड़कों पर चलना भी निचली जाति के शूद्रों और अस्पृश्यों  के लिए निषिद्ध था। माना जाता था कि उससे देवता और देवस्थान दोनों अपवित्र हो जाएंगे। सार्वजनिक मार्गों पर चलने के मानवतावादी अधिकार को लेकर जार्ज जोसेफ और उनके साथियों द्वारा आरंभ किया गया था। पहले चरण में सरकार आंदोलन को बलपूर्वक दबाने में सफल हो गई। हताशा की उस घड़ी में पेरियार को नेतृत्व के लिए आमंत्रित किया गया। उनके पहुंचते ही कार्यकर्ताओं में जान आ गई। आंदोलन के लिए पेरियार दो बार जेल गए। अंततः उनकी जीत हुई। पेरियार को ‘वायकम नायक’ की उपाधि मिली। 25-26 दिसंबर, 1958 को पेरियार ने अपने एक भाषण में उस घटना को याद किया था। उससे गांधी सहित तत्कालीन नेताओं और ब्राह्मणों की मानसिकता जाहिर होती है, अपितु संघर्ष की गंभीरता का भी अनुमान लगाया जा सकता है। भाषण का मूल तमिल ने अंग्रेजी अनुवाद ऐ. एस. वेणु ने किया है। हिंदी पाठ उसी का भाषांतर है)

आदरणीय अध्यक्ष महोदय,

 भाइयो और बहनो,

आपके साथियों की ओर से मुझे कन्याकुमारी जिले में आने का निमंत्रण कई बार दिया गया था। चूंकि मैं दूसरे जिलों के दौरों में व्यस्त था, इसलिए पहले नहीं आ सका था। जहां-जहां भी मैं गया, वहां मैंने देखा कि समाज में काफी जागृति आई है। हजारों की संख्या में लोग वहां जमा हुए थे। 

दस वर्ष पहले, यहां मार्तंडम में मैंने एक सभा को संबोधित किया था। उन दिनों आप स्थानीय राज्य के नागरिक थे। आपके ऊपर राजा का कानून चलता था, जबकि हम ब्रिटिश सरकार के नागरिक थे। बावजूद इसके आज भी हम सब ‘शूद्र’ हैं। हम द्रविड़ लोग अपमान-भरा जीवन जीते थे। यह हमारे साथ हुए धोखे का परिणाम  था। हमें आगे भी, हमेशा शूद्र बने रहना है। 

आज हम एक देश के नागरिक हैं। हम तमिलनाडु के तमिल हैं। आज हमें एक सूत्र में बांध दिया गया है।  हमारी एकता मजबूत हुई है। चूंकि हम सब एक ही देश के नागरिक हैं, इसलिए आज हम एक परिवार की तरह परस्पर जुड़े हुए हैं। हमें एक ही जाति माना गया है, अतएव अपने आदर्शों की प्राप्ति हेतु हम सभी को साथ-साथ, एकजुट होकर काम करना पड़ेगा।  

जहां तक मेरा संबंध है, 35 वर्ष पहले मैंने तमिलनाडु में एक आंदोलन का नेतृत्व किया था। उद्देश्य था, सामाजिक कुरीतियों, विशेषरूप से जातिभेद और घृणित छूआछूत को खत्म करना। हजारों वर्षों से हमें कुछ तयशुदा सार्वजनिक मार्गों पर चलने की अनुमति नहीं थी। जो लोग आज कम से कम पचास वर्ष के हैं, वे उन दिनों को याद कर सकते हैं। इस पीढ़ी के युवा अतीत की इन सच्चाईयों से अपरिचित हो सकते हैं।  

यदि उन दिनों आंदोलन नहीं हुआ होता, तो आज हममें से बहुत से लोग अनेक मार्गों पर चलने के अधिकार से वंचित होते। उन दिनों इस देश में बहुत बुरे हालात थे। सरकार कट्टरपंथी ब्राह्मणों के हाथों में थी। वर्णव्यवस्था अपने पूरे चरम पर थी। हमारे देश में, ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलनों के उभार द्वारा, गैर-ब्राह्मणों के अनेक अधिकारों की वापसी हुई है। ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलनों ने ब्राह्मण-आधिपत्य का सफलतापूर्वक मुकाबला किया है। गैर-ब्राह्मण आंदोलन को लोकप्रचलित रूप में ‘जस्टिस पार्टी’ के नाम से भी जाना जाता है, जिसका नामकरण उसकी पत्रिका ‘जस्टिस’ के आधार पर मिला था।  

ब्राह्मणों के भी अपने संगठन थे, जैसे कि ‘ब्राह्मण-समाज’ और ‘ब्राह्मण महासभा’। वे हमारे हितों के विरोध में काम करते थे; तथा वैध अधिकारों की प्राप्ति हेतु हमारे संघर्ष में बाधा बनकर खड़े थे। ब्राह्मण खुद को ‘सर्वोच्च  जाति’ का बताकर गर्व का अनुभव करते थे।  वे जोर देते थे कि उन्हें ‘ब्राह्मण’ संबोधित किया जाए। जबकि हम सभी को वे ‘शूद्र’ कहने पर अड़े रहते थे। ‘मनुस्मृति’ तथा दूसरे धर्मशास्त्रों में भी हमें केवल ‘शूद्र’ कहा गया है।  कितना अधिक अत्याचार और अपमान  हमें सहना पड़ता था! ऐसे विपरीत हालात ने हमारी प्रगति और जीवन दोनों को प्रभावित किया था।

यदि हमारे पास अपने संगठन के लिए ‘द्रविड़ कझ़गम’(द्रविड़ सभा) या ‘तमिल कझ़गम’ में से कोई एक चुनने का विकल्प न हो तो उसके लिए उपयुक्त नाम के रूप में केवल ‘शूद्र कझ़गम’(शूद्र पार्टी या शूद्र सभा) को चुनना होगा। यही कारण है, जिससे हमें ‘साउथ लिबरल फेडरेशन’ जिसे बाद में ‘जस्टिस पार्टी’ कहा जाता था—का नाम बदलकर ‘द्रविड़ कझ़गम’ रखना पड़ा था, ताकि हम दुनिया को बता सकें कि हम क्या हैं! हम द्रविड़ लोग गौरवशाली राष्ट्र हैं—यह दुनिया जानती है।  

वर्ष 1919 और 1920 में चले गैर-ब्राह्मणवाद आंदोलन(जस्टिस पार्टी) तथा मेरे प्रांत तमिलनाडु में हुए आंदोलनों के फलस्वरूप, सार्वजनिक मार्गों के उपयोग का अधिकार, बिना किसी जातिभेद के सभी नागरिकों को, न केवल तमिलनाडु, अपितु आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल में भी प्राप्त हो चुका है। 

‘जस्टिस पार्टी’ के हाथों में विहित शक्तियों के इस्तेमाल के फलस्वरूप सार्वजनिक मार्गों पर चलने का अधिकार भी सभी जातियों के लिए अमल में लाया गया था। यही नहीं, उन्हीं  दिनों ‘जस्टिस पार्टी’ द्वारा लाए गए एक विधेयक में तथाकथित निचली जातियों को ऐसे कुंओं से पानी लेने के अधिकार को भी शामिल किया गया था, जिन्हें उससे पहले विशेष रूप से ब्राह्मणों के इस्तेमाल के लिए आरक्षित रखा जाता था।  

ये सभी वे घटनाएं हैं जो गांधी के(भारतीय राजनीति में) सक्रिय होने से पहले ही घट चुकी थीं। यह कहना बेतुका और कपटपूर्ण है कि यह सब उपलब्धियां केवल गांधी की देन हैं। 

केवल इतना ही नहीं। ‘जस्टिस पार्टी’ के कार्यकर्ता ही वे लोग थे जिन्होंने, पंचायतों, नगर-निकायों, क्षेत्रीय मंडलों, जिला स्तरीय मंडलों तथा विधायिकाओं में, सभी जाति के लोगों प्रवेश हेतु, सर्वप्रथम रास्ता तैयार किया था। वह भी गांधी के भारतीय राजनीति में सक्रिय होने से बहुत पहले। उन्होंने ही, यहां तक कि  गांधी से भी पहले, तथाकथित निचली जातियों के प्रतिनिधियों को लगभग सभी निकायों में मनोनीत किया था। अतः यह कहना उचित नहीं है कि गांधी ने निचली जातियों जैसे कि पारिया के लिए, तथाकथित उच्च जातीय ब्राह्मणों के समकक्ष, विधायिकाओं में प्रवेश का अधिकार दिलाया था। सच तो यह है कि गांधी से भी बहुत पहले, तथाकथित निचली जातियां जैसे कि पारिया, चक्किलीस, पल्लार विधायिकाओं की सदस्य बन चुकी थीं। मैं चाहता हूं कि आप सब इस सत्य को भली-भांति आत्मसात कर लें।  

यह प्रमाणित सत्य है कि गांधी की योजना एकदम अलग थी। उच्च जातीय ब्राह्मणों की भांति वे भी सभी शूद्रों तथा अछूतों को, कुंओं और तालाबों से पानी लेने का समान अधिकार देने के पक्ष में नहीं थे। न ही वे अस्पृश्यों को उच्च जातियों की तरह मंदिर प्रवेश की अनुमति देने का समर्थन करते थे। सच तो यह है कि गांधी उच्च जातियों के विशेषाधिकारों को, आगे भी उन्हीं के अधीन रखने के पक्ष में थे। उन्होंने मनुस्मृति का समर्थन किया था। वे उच्च जातीय ब्राह्मणों तथा निम्न जातीय शूद्रों एवं अस्पृश्यों के लिए अलग-अलग मंदिर, तालाब, आवास तथा कुंए बनवाने के पक्ष में थे। यही गांधी की असली योजना थी।  मैं इसे जानता हूं। कोई मना करके दिखाए। आज गांधी के बारे में झूठा प्रचार किया जाता है। गांधीवाद और गांधी की जीवनशैली के बारे में तो बढ़-चढ़कर कहा गया है। 

मैं तमिलनाडु कांग्रेस समिति का सचिव था। अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की ओर से 48,000 रुपये की अनुदान राशि निचली जाति के शूद्रों यथा पारिया, चिक्कलीस, पल्लारों आदि के लिए अलग मंदिर और स्कूल बनवाने के लिए तमिलनाडु भेजी गई थी। इस बात का सख्त आदेश था कि ये अछूत लोग, उच्च जातिवाले हिंदुओं द्वारा विशेषरूप से इस्तेमाल किए जाने वाले स्थानों पर जाकर किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न न करें। 

उस समय तक जस्टिस पार्टी के नेता ऐसा आदेश लागू कर चुके थे, जो सभी वर्ग के विद्यार्थियों को, बगैर किसी जातीय पक्षपात के, सभी स्कूलों में अध्ययन करने का अधिकार देता था। उन्होंने सभी के एक साथ पढ़ने की व्यवस्था की थी। शिक्षा के क्षेत्र में जाति-आधारित प्रतिबंध बहुत पहले ही समाप्त किए जा चुके थे। इस सुधार को सख्ती से लागू किया गया था। ऐसा कानून बनाया गया था जो प्राइवेट स्कूलों को अपने यहां निश्चित अनुपात में शूद्र विद्यार्थियों को प्रवेश देने के लिए बाध्य करता था। ऐसा न करने पर स्कूल की सरकारी अनुदान की पात्रता समाप्त हो जाती थी।   

आदेश था कि निरीक्षण के समय अधिकारी स्कूल प्रशासन से पूछेंगे, ‘इस संस्था में कितने अछूत विद्यार्थी अध्ययन कर रहे हैं?’ यदि उत्तर नकारात्मक हो तो अधिकारी अगला सवाल करेगा, ‘क्यों?’ यदि कोई यह कहेगा कि संस्थान में प्रवेश के लिए किसी अछूत ने संपर्क नहीं किया है, तब अधिकारी कहेगा—‘तब तुम जाओ और कुछ अछूत विद्यार्थियों को अपने विद्यालय में भर्ती कराओ।’ मैं आपको उन व्यवस्थाओं के बारे में बता रहा हूं जो हमारे राज्य में, गांधी के आने से पहले ही लागू थीं। 

जिन दिनों तमिलवासी बहुत अधिक प्रगतिशील थे, आपके कन्याकुमारी जिले में स्थितियां बहुत खराब थीं। उच्च जाति वाले हिंदू निम्न जातीय अस्पृश्य हिंदुओं के अधिकारों को सह ही नहीं पाते थे। यहां तक कि उनकी छाया भी तथाकथित उच्चतम जाति के लोगों पर नहीं पड़ सकती थी।  यह आपके प्रांत की दर्दनाक त्रासदी थी। निचली जाति के शूद्रों को अपनी उपस्थिति और स्थान के बारे में, जहां वह छिपा होता था—दूर से ही चिल्लाकर बताना पड़ता था।  वे तो थिरु. नारायण सामी के अनथक और प्रशंसनीय प्रयास थे, जिससे शूद्रों में जागृति आई थी। वायकम आंदोलन के कारण हालात में बदलाव हुआ था। अछूतों को यहां काफी कुछ मिला है। यहां मौजूद युवा इन उपलब्धियों से अनजान हो सकते हैं। 

हमने छूआछूत के विरुद्ध, वायकम में हुए संघर्ष की कीमत चुकाई थी।  हम कई बार जेल भी गए थे। अनेक बार हमारी पिटाई हुई।  छूआछूत उन्मूलन के निमित्त हमारे बलिदानों के कारण हमें बदनाम भी किया गया।  

उन दिनों जेल में श्रेणियां नहीं होती थीं। उनके साथ बहुत बुरा वर्ताब होता था। अस्पृश्यता के कलंक को मिटाने के लिए वह सबकुछ हमने सहा; और आखिरकार परिवर्तन के वाहक बने। यह बदलाव कैसे संभव हुआ था? हमारी वर्तमान स्थिति क्या है? यदि आप इसपर विचार करेंगे, और सुधार की नई संभावना की तलाश करेंगे, तो आप निश्चित ही इस तथ्य को स्वीकार करेंगे कि जातिवाद तथा उसकी बुराइयों को मिटाने के लिए हमारी रफ्तार बहुत धीमी थी। हमें और अधिक ताकत, और तीव्र गति से आगे बढ़ना चाहिए। 

आपको वायकम आंदोलन के इतिहास की जानकारी होनी चाहिए। अत्यंत मामूली घटना वायकम आंदोलन की संवाहक बनी थी। 

कामरेड माधवन एक वकील थे। एक मुकदमे में उन्हें अपने मुव्वकिल की तरफ से माननीय न्यायाधीश के समक्ष पेश होना था। अदालत महाराजा त्रावणकोर के भवन परिसर में थी। उस समय महाराज के जन्मदिवस की तैयारियां चल रही थीं।  राजभवन का पूरा परिवेश ताड़ की पत्तियों द्वारा खूबसूरती के साथ आच्छादित था। ब्राह्मणों का मंत्रोच्चारण आरंभ हो चुका था। चूंकि कामरेड माधवन इझ़वा(नाडार) समुदाय से थे, इसलिए उन्हें भवन परिसर में प्रवेश करने या गुजरने; और अदालत पहुंचने की अनुमति नहीं मिली।  

उन्हीं दिनों जस्टिस पार्टी तमिलनाडु में जाति-प्रथा और छूआछूत उन्मूलन के लिए आंदोलन चला रही थी।  अंतर्जातीय विवाह के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया जा रहा था। स्कूलों को सभी जाति-वर्गों के लिए खोल दिया गया था। ‘अंतर्जातीय भोजन’ लोकप्रिय हो चुका था।  इस तरह के सुधारवादी कार्यक्रम जस्टिस पार्टी द्वारा पूरे तमिलनाडु में चलाए जा रहे थे। जब गांधी को जस्टिस पार्टी द्वारा तमिलनाडु में चलाए जा रहे कार्यक्रमों के बारे में पता चला, तब उन्होंने हमारी अन्य योजनाओं सहित उन कार्यक्रमों को भी अपने रचनात्मक आंदोलन में शामिल किया। 

उन दिनों जस्टिस पार्टी के कार्यक्रर्ताओं ने ब्राह्मणों के षड्यंत्रों को साहसपूर्वक उजागर किया था। परिणामस्वरूप वे सड़क पर अकेले चलते हुए भी घबराते थे। गैर-ब्राह्मण नेताओं जैसे कि डॉ. टी.  एम. नायर तथा सर पी. थियागराया ने शूद्रों और अस्पृश्यों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार हेतु लगातार, बड़े-बड़े कार्यक्रम चलाए, और राज्य में शक्तिशाली पदों पर आसीन हुए। ब्राह्मण जस्टिस पार्टी की सरकार के प्रति ज्यादा ईष्यालु थे। उन दिनों उनकी जमीन खिसकी हुई थी।  

उन दिनों ब्राह्मण धूर्ततापूर्वक एक ही बात बार-बार दोहराते थे—‘हम सत्ता के दलाल नहीं हैं’, ‘हम चुनावों का बहिष्कार करते हैं!’ इस तरह के झूठे और फरेबी नारों से वे लोगों को छलते रहे, निरंतर नई-नई साजिश रचते रहे। जस्टिस पार्टी की लोकप्रियता को देखते हुए गांधीजी ने छूआछूत की समस्या पर विचार करना आरंभ किया, क्योंकि तमिलनाडु में जस्टिस पार्टी को सत्ता से बाहर करने का वही एक तरीका था।  

उन दिनों मैं जस्टिस पार्टी के नेताओं से भली-भांति परिचित था।  अनेक पदों पर आसीन होने के कारण मेरे प्रति उनके मन में बड़ा सम्मान था। राजगोपालाचार्य मुझसे मिले थे और उन्होंने मुझे गांधी का अनुयायी बनने के लिए प्रवृत्त किया था। उनका कहना था कि गांधी अकेले अपरिहार्य सामाजिक सुधारों को आगे बढ़ाने में सक्षम हैं। मैंने इरोद नगर निगम से इस्तीफा दे दिया; और कांग्रेस में शामिल हो गया। कांग्रेस में मेरे प्रवेश से पहले किसी भी तमिलवासी को कांग्रेस पार्टी का सचिव या अध्यक्ष बनने का सम्मान नहीं मिला था।  तमिल कांग्रेस के इतिहास में मैं पहला तामिल था, जिसे तमिलनाडु कांग्रेस के इतिहास में इस पदों पर आसीन होने का अवसर मिला था। 

कामरेड टी. वी.  कल्याणसुंदरम्(थिरू वी. के.) स्कूल अध्यापक थे। डॉ.  पी.  वरदराजुलू(नायडू) ‘प्रापंच मित्रन’ के संपादक थे। बावजूद इसके ब्राह्मण उनपर विश्वास नहीं करते थे। कामरेड वी. ओ.  चिदंबरम(पिल्लई), अपने सभी संसाधनों को खर्च कर देने के बावजूद, कस्तूरी रंगा आयंगर पर आश्रित थे। 

इसलिए ब्राह्मणों ने उनका सम्मान नहीं करते थे।  वे मेरी उपेक्षा नहीं कर सकते थे, क्योंकि मैं पहले से ही बड़े पदों पर था और बड़े व्यापारिक समुदाय के बीच सम्मानित था। प्रत्येक मामले में, सभी तरह से राजगोपालाचार्य मुझपर भरोसा करते थे, और उनका मुझपर काफी विश्वास था। बदले में मैं भी उनपर विश्वास करता था और उस विश्वास की रक्षा को समर्पित था।  हम दोनों ने साथ-साथ काम किया था। मैंने एक सघन प्रचार कार्यक्रम चलाया था, परिणामस्वरूप ब्राह्मण एक बार पुनः सत्ता केंद्र पर लौट आए। अपने बुद्धिवादी विचारों की अभिव्यक्ति को लेकर मैं बहुत साहसी था। ईश्वर संबंधी अपने विचारों को मैंने खुलकर व्यक्त किया था, ‘यदि लोगों के स्पर्श मात्र से मूर्ति अपवित्र हो जाती है, तो ऐसी ईश्वर की हमें आवश्यकता नहीं है। ऐसी मूर्ति के टुकड़े-टुकड़े करके उसका इस्तेमाल अच्छी सड़कें बनाने के लिए किया जाना चाहिए।  नहीं तो उन्हें नदी किनारे रख देना चाहिए, जहां वे कपड़े धोने के काम आ सकें। मुझे प्रायः ब्राह्मणों द्वारा ही बोलने के लिए खड़ा किया जाता था, चूंकि मैं किसी शक्तिशाली पद या प्रतिष्ठा की दौड़ में नहीं था, ब्राह्मण उस समय चुप्पी साध लेते थे। 

ईश्वर, धर्म और जाति के बारे में मैं आज जो भी कहता हूं, ठीक वही मैं उन दिनों भी कहा करता था। मेरे भाषणों को सुनने के बाद राजगोपालाचार्य प्रायः मुझसे कहा कहते थे कि मैं बहुत सख्त भाषा का इस्तेमाल किया है। उत्तर में मैं उनसे अकसर यही कहता था कि जब तक लोग मूर्ख बने रहेंगे, तब तक आसान शब्दों में अपनी बात रखने का कोई औचित्य नहीं है।  मेरी बात सुनकर वे बस मुस्कुरा देते थे। इस तरह, हमने ब्राह्मणों के सत्ता केंद्रों पर आसीन होने की राह आसान की थी। 

एडवोकेट माधवन को अदालत जाते समय रोकने के बाद से ही इझ़वा समुदाय के नेता उसके विरुद्ध आंदोलन करना चाहते थे। केरल कांग्रेस समिति के अध्यक्ष के.  पी.  केशवमेनन, टी.  के.  महादेवन तथा दूसरे नेताओं ने मोर्चा संभाला। उन्होंने राजभवन में होने पूजा-पाठ के दिन विरोध प्रदर्शन की शुरुआत का निर्णय लिया। सर्वाधिक उपयुक्त स्थान के रूप में उन्होंने वायकम को चुना।  केवल वायकम ही ऐसा स्थान था, जहां चार प्रवेश-द्वारों वाला मंदिर था। चारों दरवाजों से एक-एक सड़क गुजरती थी। विरोध प्रदर्शन के लिए वह सर्वोपयुक्त स्थान था। इसलिए सत्याग्रह के निमित्त उन्होंने वायकम को चुना था।  

नियम यह था कि निम्न जाति के अछूत जैसे कि ‘’अवर्णस्थानांस’ तथा ‘अयीतक कर्णस’ उन सड़कों पर प्रवेश नहीं करेंगे। यदि कोई अछूत मंदिर की दूसरी दिशा में जाना चाहे तो उसे मंदिर से 400 से 600 मीटर की दूरी बनाकर चलना पड़ता था। इस तरह उसे डेढ़ किलोमीटर से अधिक रास्ता और तय करना पड़ता था। यहाँ तक कि ‘असारियों’, ‘वनियारों’ तथा जुलाहों को भी मंदिर के चारों ओर बनी सड़कों पर चलने की पाबंदी थी। दूसरे मंदिरों विशेषकर शचींद्रम पर भी यही नियम लागू था।  इस कानून का पालन पूरी शक्ति के साथ किया जाता  था।  

प्रमुख सरकारी कार्यालय, अदालत, पुलिस स्टेशन आदि वायकम मंदिर की दूसरी दिशा में, उसके प्रवेश द्वार के निकट थे। यहां तक कि सरकारी कर्मचारियों के स्थानांतरण के समय भी ध्यान रखा जाता था कि कोई अछूत कर्मचारी वहां स्थानांरित नहीं किया जाएगा, क्योंकि उन्हें मंदिर के आसपास बने रास्तों से गुजरने की अनुमति प्राप्त न थी।  यहां तक कि मजदूरों का दुकानों तक जाने के लिए भी, उन सड़कों से होकर गुजरना निषिद्ध था। 

जैसे ही वायकम सत्याग्रह आरंभ हुआ, राजा ने 19 नेताओं जिनमें एडवोकेट माधवन, बैरिस्टर केशव मेनन, टी. के. महादेवन, जार्ज जोसेफ आदि शामिल थे—को गिरफ्तार करने का आदेश सुना दिया। उन्हें विशिष्ट कैदी के रूप में रखा गया था। उन दिनों अंग्रेज अधिकारी पिट, पुलिस महानिदेशक के पद पर राजा के अधीन कार्यरत थे। उन्होंने आंदोलनकारियों से जुड़े मामलों को भली-भांति संभाल लिया था। 19 आंदोलनकारियों के जेल जाते ही वायकम आंदोलन पटरी से उतर चुका था। उन्हीं दिनों मुझे केशव मेनन तथा बैरिस्टर जार्ज जोसेफ की ओर से एक पत्र प्राप्त हुआ। 

‘आपको यहां आकर आंदोलन को नवजीवन देना चाहिए। अन्यथा हमारे पास राजा के सामने आत्मसमर्पण कर, उनसे क्षमा-याचना करने के अलावा दूसरा कोई उपाय न होगा। उस अवस्था में हमारा तो कोई नुकसान न होगा, परंतु एक महान कार्य अधूरा रह जाएगा। असल में वही हमारी चिंता का कारण है। इसलिए आप कृपया तत्काल पहुंचें और आंदोलन की जिम्मेदारी संभालें।’

यही बातें उन्होंने अपने पत्र में लिखीं थीं। उन्होंने मुझे स्वयं चुना था और मुझे पत्र लिखा था, क्योंकि उन दिनों मैं मुखर होकर छूआछूत के कलंक पर लगातार हमले कर रहा था। इसके अलावा न केवल उग्र प्रचारक अपितु सफल आंदोलनकारी के रूप में भी मैं जाना-पहचाना और स्थापित नाम था।  जब उन्होंने पत्र भेजा, मैं यात्रा पर निकला हुआ था।  पत्र इरोद से पुन:प्रेषित होकर मुझे मदुरै जिला के पन्नईपुरम स्थान पर प्राप्त हुआ। पत्र मिलते ही मैं वायकम जाने के लिए आगे की यात्रा स्थगित कर इरोद के लिए दौड़ा। एक पत्र लिखकर मैंने राजगोपालाचार्य से अनुरोध किया कि वे मेरे स्थान पर तमिलनाडु कांग्रेस के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाल  लें। अपने पत्र में मैंने वायकम सत्याग्रह की महत्ता के बारे में बताया था। मेरे लिए वह अच्छा अवसर था। इसलिए मैं उसे छोड़ना नहीं चाहता था। मैंने अपने दो साथियों के साथ वायकम के लिए प्रस्थान कर दिया। 

किसी तरह यह बात फैल गई कि मैं वायकम आंदोलन का नेतृत्व करने  के लिए आ रहा हूं। जब में नाव के रास्ते वायकम पहुंचा, पुलिस कमिश्नर और तहसीलदार ने हमारा स्वागत किया। 

हमें बताया गया कि राजा ने उन्हें हमारा स्वागत करने तथा हमारे ठहरने का प्रबंध करने का आदेश दिया है। मैं सचमुच बेहद अचंभित था। राजा मुझपर अत्यंत मेहरबान थे, क्योंकि जब भी उन्हें दिल्ली जाना होता था, वे इरोद में हमारे ही बंगले में ठहरते, जबकि उनके कर्मचारी हमारी सराय में आश्रय पाते थे। रेलगाड़ी पर सवार होने से पहले, जब तक वे इरोद में रहते, तब तक राजा तथा उनके कर्मचारियों का भरपूर स्वागत किया जाता था। वायकम में मुझे अप्रत्याशित आदर-सत्कार मिलने के पीछे यह कारण भी हो सकता था। जब वायकम के निवासियों को मेरे और राजा के संबंधों के बारे में पता चला, वे सभी अत्यंत प्रसन्न हुए।  

बावजूद इसके कि राजा ने मेरे साथ मेहमानों जैसा व्यवहार किया था, मैंने वायकम आंदोलन के समर्थन में अनेक सभाओं में हिस्सा लिया। मैंने छूआछूत जैसी घृणित प्रवृत्ति कि आलोचना की। मैंने कहा कि ऐसे  ईश्वर को जिसे लगता है कि वह अछूतों के स्पर्श-मात्र से अपवित्र हो जाएगा—मंदिर में रहने का अधिकार नहीं है। ऐसी मूर्ति को तुरंत हटा देना चाहिए और उसका इस्तेमाल कपड़े धोने के लिए किया जाना चाहिए। मेरे प्रचार के फलस्वरूप रोज नए-नए लोग आंदोलन से जुड़ने की इच्छा जताने लगे। प्रतिदिन नए-नए लोग आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए अलग-अलग स्थानों से आने लगे। उससे राजा की परेशानी बढ़ने लगी।  बावजूद इसके वह पांच-छह दिन शांत रहा।  मेरे भाषण को लेकर कई लोगों ने उससे शिकायत की। राजा मेरी और अधिक उपेक्षा नहीं कर सकता था। इसलिए, दस दिन के बाद उसने पुलिस अधिकारी को दंड संहिता की धारा 26 को, जो आज की धारा 144 जैसी ही थी, लागू करने की अनुमति दे दी।  

मेरे पास उस प्रतिबंध के उल्लंघन के अलावा अन्य कोई रास्ता नहीं था। तदनुसार मैंने प्रतिबंध का उल्लंघन कर, एक सभा को संबोधित किया। परिणामत: मुझे गिरफ्तार कर लिया गया। मेरे साथ मि. अय्युमुथु ने भी प्रतिबंध का उल्लंघन किया था। उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। हम सभी को एक महीने के कड़े दंड के साथ कारावास भेज दिया गया।  मुझे अरुविक्कुथ जेल में रखा गया। मेरे जेल चले जाने के बाद मेरी पत्नी नागम्मई, बहन एस. आर. कन्नमल तथा दूसरों ने मिलकर राज्य-भर में आंदोलन किया। जैसे ही मैं जेल से बाहर आया, एक बार फिर आंदोलन में कूद पड़ा। 

जब मैं जेल में था, आंदोलन में यकायक तेजी आ गई। अनेक लोगों ने अदालत से उन्हें जेल भेजने की फरियाद की। प्रचार-प्रसार में तेजी ने भी लोगों को वायकम सत्याग्रह में उतरने के लिए उत्साहित किया। दुश्मन उपद्रवों और गुंडागर्दी पर उतर आए थे। उपद्रवी तत्वों ने अफवाह फैलाकर हमारे आंदोलन को ठप्प कर देने के लिए अनेक चालें चलीं। उनके गंदे मनसूबों और कोशिशों का अंत नाकामी के रूप में सामने आया। यही नहीं जो लोग विदेशों में थे, उन्हें भी देश में जाति के नाम पर हो रहे दमन और अत्याचारों की जानकारी मिल गई। वे स्वेच्छापूर्वक दान देने लगे। प्रतिदिन ढेर सारे मनीआर्डर आने लगे। आंदोलनकारी स्वयंसेवकों के लिए बड़ा पंडाल बनवाया गया था। प्रतिदिन 300 से अधिक लोगों को भोजन खिलाया जाता था। अनेक किसान और प्रतिदिन सब्जियां और नारियल भेजते थे।  उन्हें एक साथ, एक साथ ढेर लगाकर रख दिया गया था। देखने में वह छोटी पहाड़ी जैसा नजर आता था।  पूरा स्थल वैवाहिक पंडाल जैसा दिखता था। 

उसी समय राजगोपालाचार्य ने मुझे एक पत्र लिखा।  आप हमारे देश को छोड़कर दूसरे राज्य में परेशानी खड़ी क्यों कर रहे हैं? आपके लिए इस तरह करना अनुचित है।  कृपया उसे छोड़कर, मुझसे अपना पद-भार वापस लेने के लिए तुरंत यहां पहुंचें। उस पत्र में यही बातें लिखी थीं। श्रीनिवास अय्यंगर मुझसे मिलने के लिए तमिलनाडु से आए थे। उन्होंने भी मुझसे वही सलाह दी जो राजगोपालाचार्य ने अपने पत्र में लिखी थीं। उस समय तक 1000 स्वयंसेवक वायकम आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए तैयार हो चुके थे। प्रतिदिन जगह-जगह बड़े-बड़े जुलूस, भजन-कीर्तन आदि होते थे।  आंदोलन गति पकड़ चुका था। 

समाचार पंजाब तक पहुंचा। वहां स्वामी श्रद्धानंद ने एक अपील की। उन्होंने लगभग 30 पंजाबियों को वायकम भेजा। उन्होंने आंदोलन के लिए 2000 रुपये की सहायता राशि का प्रस्ताव भेजा, साथ ही आंदोलन में हिस्सा ले रहे स्वयंसेवकों के भोजन के खर्च को वहन करने की सहमति जताई। यह देखकर ब्राह्मणों ने गांधी को लिखा। उन्होंने आरोप लगाया कि सिख हिंदुत्व के विरुद्ध युद्ध भड़का रहे हैं। गांधी के विचार भी सामने आए। उन्होंने कहा था कि मुस्लिम, सिख, ईसाई और बाकी लोग जो हिंदू नहीं हैं—वे आंदोलन में हिस्सा नहीं ले सकते। उनकी अपील के बाद मुस्लिम, ईसाई और सिखों ने खुद को आंदोलन से अलग कर लिया। राजगोपालाचार्य ने जोसफ जार्ज के नाम एक और पत्र भेजा। उसमें लिखा था कि उनके लिए हिंदुत्व से जुड़े मामले में हस्तक्षेप करना गलत है। लेकिन जोसेफ जार्ज ने राजगोपालाचार्य की सलाह पर कोई ध्यान नहीं दिया। जवाब में उन्होंने लिखा कि वे कांग्रेस से निष्कासन के लिए तैयार थे। उन्होंने जोरदार शब्दों में लिखा कि वे अपना आत्मसम्मान नहीं गंवाएंगे।  मिस्टर सेन, डाॅ. एम. ई. नायडु तथा दूसरे नेता  आंदोलनकारियों के साथ मजबूती से खड़े थे। लेकिन कुछ लोगों को भय था कि गांधी आंदोलन की निंदा करते हुए उसे मिल रहे दान, सहायता आदि पर रोक के लिए लिखेंगे। लेकिन उसी समय स्वामी श्रद्धानंद वायकम पहुंचे और उन्होंने वित्तीय सहायता का आश्वासन दिया।  

वायकम आंदोलन गांधी के विरोध के बावजूद शुरू किया गया था।  मुझे दुबारा गिरफ्तार करके छह महीने की सजा के लिए जेल भेज दिया गया था। कुछ नंबूदरी ब्राह्मणों तथा कट्टरपंथी हिंदुओं ने एकजुट होकर वायकम आंदोलन के विरोध करने की योजना बनाई। जिसे उन्होंने ‘शत्रु समाहार यज्ञ’(शत्रु मर्दन यज्ञ) का नाम दिया। काफी धनराशि खर्च करके उन्होंने यज्ञ किया। उसके बारे में मैंने कारावास में सुना। एक रात को अचानक मैंने गोलियों की आवाज सुनी। मैंने पहरा दे रहे सिपाही से पूछा, क्या जेल के निकट कोई उत्सव मनाया जा रहा है? उसने बताया कि राजा का निधन हो चुका है और उससे हुई हानि को दर्शाने के लिए बंदूकों की सलामी दी जा रही है। जब मुझे पता चला कि राजा का निधन हो चुका है, मेरा हृदय विषाद से भर गया। बाद में मुझे यह सोचकर प्रसन्नता हुई कि ब्राह्मणों और कट्टरपंथीं हिंदुओं द्वारा अपने दुश्मनों को नष्ट करने के लिए की गई प्रार्थना का असर महाराज की मृत्यु के रूप में सामने आया है। उनकी प्रार्थना ने वायकम आंदोलनकारियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है।  लोग भी खुश थे। उसके बाद, महाराजा के दाह-संस्कार के दिन हम सभी को रिहा कर दिया गया। हमारे दुश्मनों की चाल-ढाल और भाषा भी बदल गई। 

बाद में, महारानी ने आपसी बातचीत से समस्या का समाधान करने की इच्छा व्यक्त की।  वे समस्या पर मेरे साथ बातचीत करना चाहती थीं। लेकिन राज्य का दीवान, जो जाति से ब्राह्मण था—हमारी बातचीत के बीच में बाधक बन गया। बोला कि महारानी मुझसे सीधे बातचीत नहीं करेंगी। इसलिए उसने राजगोपालाचार्य को पत्र लिखा। राजाजी जानते थे कि प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा मेरे पक्ष में हैं, अतएव उसका श्रेय भी मुझी को प्राप्त होगा। इसलिए उन्होंने कपटपूर्ण ढंग से तय किया कि महारानी गांधी से बातचीत करेंगी। राजाजी की प्रपंच का ही परिणाम था कि गांधी का नाम वायकम सत्याग्रह के इतिहास में घसीट लिया गया। वायकम आंदोलन का श्रेय और प्रतिष्ठा किसे प्राप्त होती है, व्यक्तिगत रूप से मुझे इसकी चिंता नहीं थी। मैं निजी प्रशस्ति के लिए आंदोलन से नहीं जुड़ा था। मेरा एकमात्र उद्देश्य समस्या का सफल समाधान था।  

गांधी आए और उन्होंने महारानी से बातचीत भी की। महारानी निचली जाति के शूद्रों और अछूतों के लिए सभी मार्ग खोल देने को तैयार थीं। लेकिन, उन्होंने अपने डर के बारे में बताया। उन्हें लगता था कि मैं अछूतों के मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर आंदोलन को उसके बाद भी जारी रख सकता हूं। गांधी यात्री-भवन में पहुंचे, जहां मैं ठहरा हुआ था। उन्होंने मेरी राय जाननी चाही। मैंने कहा, ‘क्या अछूतों को सार्वजनिक मार्गों पर चलने का अधिकार प्राप्त होना बड़ी उपलब्धि नहीं है! यूं भी, क्या मंदिर प्रवेश कांग्रेस के आदर्शों में से एक नहीं है। जहां तक मेरी बात है, यह मेरे प्रमुख सरोकारों में से एक है। लेकिन, आप महारानी को खबर कर सकते हैं कि फिलहाल मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर आंदोलन खड़ा करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। मैं आगे क्या करूंगा, इसे तय करने से पहले माहौल शांत होने दीजिए। 

गांधी ने रानी को सूचना दी और उन्होंने मंदिर के चारों ओर बनी सड़कों के चलने का अधिकार, सभी वर्गों के लिए बहाल कर दिया। इस तरह निचली जाति के शूद्रों और अस्पृश्यों को, उच्च जातीय ब्राह्मणों और कट्टरपंथी हिंदुओं की तरह, सार्वजनिक मार्गों पर चलने के अधिकार की प्राप्ति हुई।  

मैं कुछ समय के लिए इरोद में देवस्थान समिति का अध्यक्ष था। जब मैं बाहर गया हुआ था, कामरेड एस. गुरुस्वामी, पोन्नंबलन तथा ईश्वरन ने मेरे कार्यालय में, दो आदि-द्रविड़ों को अपने माथे पर पवित्र राख(विभूति) मलने के लिए उकसाया। उसके बाद वे उन्हें मंदिर के भीतर ले गए। उन्हें देखते ही ब्राह्मण जोर-जोर से चिल्लाने लगे कि उन्होंने देवस्थान को अपवित्र कर दिया है। मजदूरों को वहीं बंद कर, उनके ऊपर मुकदमा दायर कर दिया गया। जिला न्यायालय में उन्हें दंडित किया गया। लेकिन एक अपील पर सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने उन्हें निर्दोष मानकर रिहा कर दिया। यह सब ब्रिटिश शासन के दौरान हुआ था।  

सुचिंद्रम(कन्याकुमारी, केरल) पहला स्थान था, जहां मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर पहला सार्वजनिक आंदोलन चलाया गया था। स्वाभिमान सम्मेलन का आयोजन भी मेरी अध्यक्षता में किया गया था। उसमें अनेक प्रस्ताव स्वीकृत किए गए थे, जिनमें जाति उन्मूलन तथा अस्पृश्यों के मंदिर प्रवेश के अधिकार को सुनिश्चित करने की मांग की गई थी।  

स्वाभिमान आंदोलन की अगली सभा का आयोजन इर्नाकुलम में हुआ था। उस सम्मेलन में जाति प्रथा की निंदा करते हुए हिंदुओं को सुझाव दिया गया था कि वे मुसलमान बन जाएं, क्योंकि इस्लाम में कोई जातिभेद नहीं है। कुछ और लोगों ने संशोधन प्रस्ताव के माध्यम से ईसाई बनने का सुझाव दिया था। अंत में लोगों को दोनों धर्मों में से किसी एक को अपनाने का विकल्प दिया गया।  

एक दिन लगभग 50 हिंदुओं(जो जाति से पुलायार थे) ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। यह सिलसिला  आगे बढ़ता गया, उसने रूढ़िवादी हिंदुओं और ब्राह्मणों को बुरी तरह डरा दिया था। 

एक दिन, अल्लेपी में इस्लाम अपना चुका एक व्यक्ति(जो पहले जाति से पुलायार था) नायर की दुकान से कुछ सामान खरीदने गया। वहां उसकी पिटाई कर दी गई। उस घटना की परिणति हिंदुओं और मुसलमानों के बीच बड़े टकराव के रूप में सामने आई। हिंदू-मुस्लिम दंगे हर जगह फैल गए। तत्कालीन दीवान, सर सी. आर. रामासामी अय्यर जो ब्राह्मण थे, ने उस  टकराव को बलपूर्वक दबा दिया था। बाद में राजा को बताया गया कि अधिकांश निचली जाति के अस्पृश्य हिंदू जैसे इझ़वा, पुलायार आदि मुसलमान बन रहे हैं। उन्हें यह सलाह भी दी गई कि इस भगदड़ से हिंदुत्व को बचाने का एकमात्र उपाय है कि सभी मंदिरों को अस्पृश्यों के प्रवेश के लिए खोल दिया जाए। उस दिन ब्राह्मण राजा की दीर्घायु के लिए यज्ञ कर रहे थे। उन दिनों यह परंपरा थी कि राजा अपने जन्मदिवस पर प्रजा के लिए कोई अच्छी घोषणा करता था। सो राजा ने अच्छे अवसर पर एक अच्छी घोषणा करने का निश्चय किया। उसने ऐलान किया कि उसके जन्मदिवस के अवसर पर सभी मंदिर सभी के लिए खोल दिए जाएंगे, जिनमें निचली जाति के हिंदू और अछूत भी शामिल हैं। संघर्ष का ऐसा ही इतिहास रहा है। इस तरह अछूतों को मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार प्राप्त हुआ। 

इतना सब हो जाने के बाद ही राजगोपालाचार्य और गांधी सामने आए और मंदिर प्रवेश के पक्ष में बयान दिया। यह कहना एकदम बकवास है कि ये बदलाव गांधी के कारण संभव हो पाए थे। सच तो यह है कि अछूतों के भले के लिए अणुमात्र काम भी गांधी ने नहीं किया। ये सब बातें आपको डाॅ. आंबेडकर द्वारा लिखित पुस्तक ‘कांग्रेस और गांधी ने अस्पृश्यों के लिए क्या किया है’ पढ़ने से ज्ञात हो जाएंगी।  

जिन दिनों में तमिलनाडु कांग्रेस का सचिव था, पार्टी फंड द्वारा चेरंमादेवी में गुरुकुलम(नि:शुल्क छात्रावास) का संचालन किया जाता था। सचिव के रूप में मैंने 10000 रुपये देने की अनुमति दी, और बतौर पहली किश्त 5000 रुपये का भुगतान भी कर दिया गया।  गुरुकुलम को चलाने की जिम्मेदारी वी. वी. एस.  अय्यर नामक एक ब्राह्मण की थी। उस गुरुकुलम में ब्राह्मण विद्यार्थियों की विशेष देखभाल की जाती थी। उन्हें अलग भोजन दिया जाता था। जबकि गैर-ब्राह्मण बच्चों को बाहर भोजन कराया जाता था। ब्राह्मण विद्यार्थियों को ‘उप्पम’ परोसा जाता था, जबकि अब्राह्मण बच्चों को केवल दलिया से संतोष करना पड़ता था। ये बातें मुझे ओमनदुर रामासामी रेडियार(मद्रास प्रांत के भूतपूर्व मुख्यमंत्री) के बेटे ने रोते-रोते बताई थीं।  मैंने राजगोपालाचार्य से इसकी शिकायत की। जब उन्होंने वी. वी. एस. अय्यर से मामले की तहकीकात की तो उसने आरोपों से न तो इन्कार किया, न ही खेद व्यक्त किया। बल्कि दृढ़ स्वर में सभी के साथ एक समान व्यवहार करने से इन्कार कर दिया। उसने कहा कि गुरुकुलम के आसपास कट्टरपंथी लोग रहते हैं, इसलिए वह कुछ नहीं कर सकता। इसपर मैंने कहा कि मैं बाकी 5000 तभी दूंगा जब गुरुकुलम में सुधार हो जाएगा। वह जंगली की तरह व्यवहार करने लगा। उसने रूखे शब्दों में मुझसे कहा, ‘क्या यही तुम्हारी राष्ट्रसेवा है?’ इस गंभीर मामले ने ही मुझे गैर-ब्राह्मणों(तमिलों) के लिए अलग से दल बनाने के लिए प्रोत्साहित किया था। 

इन दिनों भी आप देख सकते हैं कि कांग्रेस की सभाओं में केवल ब्राह्मणों को भोजन बनाने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है। जबकि उन्हीं दिनों जस्टिस पार्टी और स्वाभिमान आंदोलन के सम्मेलनों के लिए विरुदुनगर के नाडारों को भोजन बनाने के लिए नियुक्त किया गया था। 

मैं इन पुराने प्रसंगों को क्यों याद कर रहा हूं? आपको पता होना चाहिए कि जब तक हम इस तरह से आंदोलन नहीं करेंगे, तब तक हम समाज में व्याप्त असमानता को मिटाकर, उसे प्रगतिशील नहीं बना सकते।  

इसके अलावा, आप सभी को यह पता होना चाहिए कि किसी भी सामाजिक सुधार का श्रेय न तो कांग्रेस को जाता है, न ही गांधी को उसके लिए जिम्मेदार माना जाना चाहिए, हमारे पास इसके साक्ष्य हैं।  

आज भी, ‘द्रविड़यार कझ़गम’ के केवल हम ही वे लोग हैं जो सिर उठाकर पूछते हैं कि जब मेहनतकश किसानों और मजदूरों को निम्न जाति का समझा जाता है, तो आलसी ब्राह्मणों को ऊंची जाति का क्यों समझा जाना चाहिए। हमें ऐसे ईश्वर की आवश्यकता क्यों है जो शूद्रों की अवमानना करता है?

फिलहाल उन्होंने संविधान में जातिवाद के बचाव हेतु सभी सुरक्षा-उपाय कर लिए हैं। एक ब्राह्मण में इतना साहस है वह कहीं से भी यहां आता है और धृष्टतापूर्वक कुछ भी बोलकर, धमकी देकर चला जाता है। क्यों? इसलिए कि उनके हाथ में ताकत है।  

वे कहते हैं कि हम दब्बू रहकर सदैव शूद्र की तरह पेश आएं।  वे हमें जेल का डर दिखाकर आतंकित करते हैं। क्या किसी में उनसे सवाल करने की हिम्मत थी?

केवल हम वे लोग हैं निडर, निष्कपट और निर्बंध थे।  

यदि हमें हिंदुत्व हमें शूद्र मानता है तो सिवाय इसके कि हम हिंदू धर्म को ही नष्ट कर दें, दूसरा उपाय क्या है? हमारा ‘द्रविड़यार कझ़गम’ राजनीतिक संगठन नहीं है।  हम चुनावों में हिस्सा नहीं लेते।  हमें आपके मतों की आवश्यकता नहीं है। हम शासक वर्ग भी नहीं है। दूसरों को कुदाल को कुदाल कहने में संकोच हो सकता है? सत्ता चाहने वाले लोग निर्दोष मतदाताओं की चापलूसी कर सकते हैं। अपने स्वार्थ के लिए वे आपकी आंखों में धूल झोंक सकते हैं। किसी ताकत या पद-प्रतिष्ठा के लिए गांधी के नाम को बीच में घसीटकर मैं आपको धोखा नहीं दे सकता। मैं उस घृणित, निश्रेयस जीवन के लिए नहीं बना हूं। 

हमने अपने जीवन निर्वाह के लिए सार्वजनिक जीवन को पेशा या व्यापार नहीं बनाया है। फिर किसलिए, सोचो? आपके भीतर स्वाभिमान की भावना जगाने के लिए हम अपना भोजन खाते हैं, समय खर्च करते हैं, अपनी ऊर्जा खपाते हैं, क्यों?

1938 तक आपने देखा कि पूरी दुनिया में ज्ञान का बोलबाला था। परंतु यहां हम आज भी बर्बर लोगों की तरह हैं। हमारा ईश्वर, धर्म और धर्मशास्त्र हमें कूपमंडूकता से बाहर नहीं आने देते। सरकार स्वयं अविवेकी और असभ्य लोगों के हाथों में है। हमारे सिवाय किसी में भी सवाल उठाने हिम्मत नहीं है।  

ब्राह्मणों ने हमें वेश्यावृति द्वारा उत्पन्न संतान कहा था।  हमारी संतान को वेश्याओं की संतान क्यों कहा जाना चाहिए? इस अपमान के बारे में कोई नहीं सोचता। जो लोग राजनीति में सक्रिय हैं, इसकी परवाह नहीं करते। आंख मूंदकर वे वही सब करते और कहते हैं, जो ब्राह्मण उनसे कहते हैं। 

जब मैं वायकम सत्याग्रह का नेतृत्व कर रहा था, नीलांबन जमींदार के पुत्र, सेतुकुट्टी अकसर मुझसे मिलने और विचार-विमर्श के लिए आया करते थे। वे मुझे ‘नायकर सामी’ संबोधित करते थे। केवल यही नहीं, वे अपनी जाति को ऊंचा बताया करते थे, क्योंकि उनका जन्म नंबूदरी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे अकसर कहा करते थे कि मैं उन्हें नायर के जन्मा हुआ न समझ बैठूं। जबकि वे बीए तक पढ़े स्नातक थे। हमारे लोगों में इस मानसिकता की निंदा करने वाला कौन है?

पल-भर के लिए सोचिए कि इन अझ़वारों ने क्या किया था। उन्होंने अपनी पत्नियों से वेश्यावृति कराकर मोक्ष की कामना की थी। यह ‘भक्त विजयम’ पुराण में बताया गया है। 

एक शूद्र जो जाति से अझ़वार था, उसे अपनी पत्नी को वेश्यावृत्ति के पेशे की ओर प्रवृत्त होने की अनुमति देने के बाद स्वर्ग मिला था। नयांमारों ने अपनी पत्नियां ब्राह्मणों को भेंट की थीं। इन दिनों भी कट्टरपंथी लोग, बगैर किसी शर्म अथवा स्वाभिमान के, इन बातों का प्रचार-प्रसार करते हैं। जब मैं इन बातों की ओर इशारा करता हूं, तो मुझपर पुराणों(धर्मशास्त्रों) को ध्वस्त करने वाली बातें करने का आरोप लगाया जाता है। इनपर दूसरा कौन साहसपूर्वक बोलता है? इन पुराणों ने हमारी नैतिकता को नष्ट किया है। इसके अलावा हम और क्या कह सकते हैं?

इसके अतिरिक्त ब्राह्मण सरकारी पदों से भी चिपके हुए हैं। ब्रिटिश शासन से मुक्त होने के पश्चात समस्त शक्तियां ब्राह्मणों के हाथों में जा चुकी हैं। मैं इसके लिए गांधी को दोषी ठहराता हूं। हमें अनंतकाल तक शूद्र बनाए रखने के लिए बड़ी साजिश रची गई थी। आज(1958) सारी शक्तियां उनके अधीन हैं।  आज देश का राष्ट्रपति ब्राह्मण है। उपराष्ट्रपति ब्राह्मण है।  प्रधानमंत्री ब्राह्मण है। उपप्रधानमंत्री भी ब्राह्मण है।1 संसद का सभापति भी ब्राह्मण है। यह देखते हुए जब हम जाति-उन्मूलन के लिए गुहार लगाते हैं, तो वे हमे दोषी ठहराकर तीन वर्ष के लिए कारावास में भेज देते हैं। इन सबके लिए कौन चिंतातुर है? सार्वजनिक जीवन के अधिकांश शिखर व्यक्तित्व सरकार, जातिवाद, धर्मशास्त्रों, पुराणों, धर्म और ईश्वर की रक्षा करना चाहते हैं। वे जानते हैं कि अस्तित्व-रक्षा के लिए, उनके पास इसके अलावा  कोई और रास्ता नहीं है। 

कोई भी व्यक्ति जो वोट और भ्रष्टाचार के सहारे जिंदा है, वह धर्म, ईश्वर, सरकार और जाति के नाम पर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध आवाज नहीं उठाएगा। 

अंग्रेज हमें कम से कम बराबर अधिकार तो देते थे। आज सरकार ब्राह्मणों के हाथों में है, जो हमें वेश्या की संतान(शूद्र) कहते हैं। यही कारण है कि वे संवैधानिक व्यवस्था में भी स्वयं को आसानी से सुरक्षित पाते हैं। कानून के अनुसार वे लोग जो जाति को मिटाने की मांग करते हैं, उन्हें तीन वर्ष की सजा काटने के लिए तैयार रहना चाहिए। 

जातिप्रथा लाइलाज बीमारी है, जो हमारे समाज को शताब्दियों से खाए जा रही है। जिन दवाइयों का इस्तेमाल हम खाज-खुजली के इलाज के लिए करते हैं, उनसे केंसर का इलाज नहीं किया जा सकता। हमें शरीर का आपरेशन कर, उससे केंसर-प्रभावित हिस्से को अलग करना होगा। भिन्न बीमारियों के लिए इलाज भी अलग-अलग तरीके से होगा। हिंदू विधान के अनुसार हम 3000 वर्षों से अधिक से शूद्र हैं। 3000 वर्षों से हम वेश्या की संतान कहलाते आए हैं। हमारा संविधान इस बुराई को भरपूर संरक्षण देता है। 

हमें इस बुराई को जड़ से खत्म कर देना चाहिए। हमें इस उपहासजन्य स्थिति से बाहर निकाल आना चाहिए। यह सचमुच कठिनतम कार्य है। जब तक आप इसकी जड़ों पर उबलता हुआ पानी नहीं डालेंगे, तब तक इसका मिटना नामुमकिन है। सख्त कदम उठाए बिना हम जाति को नहीं मिटा सकते।  

न केवल तमिलनाडु, अपितु पूरे भारतवर्ष में और कोई ताकत नहीं है, जो हमारे बराबर हिम्मत जुटाकर अपनी आवाज बुलंद कर सके। जो लोग सत्ता के लालची हैं, वे कभी उसके विरोध का सपना नहीं देखेंगे। केवल वही लोग जो निःस्वार्थ और समर्पण भावना से जनता की सेवा में लगे हैं, अपने जीवन को जाति-व्यवस्था के उन्मूलन के लिए भी, दाव पर लगा सकते हैं। जो लोग विधायिकाओं में पहुंचे हैं, उन्होंने अभी तक क्या किया है? वे कुछ भी नहीं कर सकते? हम मामूली संदेश भेजकर भी जवाब प्राप्त कर सकते हैं।  बावजूद इसके हम तैयार नहीं हैं। 

कुछ दिन पहले नेहरू ने विधानसभाओं तथा दूसरे निर्वाचित संस्थानों पर एक दुखद टिप्पणी की थी। यहां तक कि उन्होंने धमकी दी थी कि वे रिटायर होकर संन्यास ग्रहण कर लेंगे। क्या हुआ? उन्होंने चुपचाप अपनी सारी टिप्पणियां पचा लीं और सत्ता से चिपके हुए हैं। यह महज लोकप्रियता हासिल करने के लिए पुरानी गांधीवादी चाल का प्रदर्शन था। हमारे साथ रहे ‘द्रविड़ मुनेत्र कझ़गम पार्टी के नेताओं ने भी, जब तक वे ‘द्रविड़यार कझ़गम’ में थे, विधानमंडलों में प्रवेश की निंदा की थी। यहां तक कि उन्होंने निर्वाचित प्रतिनिधियों और संस्थाओं पर हमला करने वाले लेख भी लिखे थे। बल्कि नेहरू और राजेंद्र प्रसाद ने तो विधायिकाओं के विरुद्ध बोला भी था। लेकिन आज उनके लिए वहां संभावनाएं हैं, इसलिए वे उनमें प्रवेश के अत्यंत इच्छुक हैं। वे अपने अतीत को भूल चुके हैं। अब वे साम-दाम-दंड-भेद द्वारा विधायिकाओं की शोभा बनना चाहते हैं। इसके लिए वे आंतरिक तोड़फोड़ से लेकर दूसरों का कच्चा चिट्ठा खोलने तक, किसी भी काम को तैयार हैं। किसी तरह, कैसे भी हर कोई ऊपर उठना चाहता है। कोई भी हमारी द्रविड़ अस्मिता के गौरव तथा उसकी युगों लंबी अवमानना को लेकर चिंतित नहीं है।  

पूरा देश पांच बीमारियों और तीन प्रेतों के जबड़ों में दबा हुआ है। मान लीजिए कि प्रेत वास्तव में नहीं होते; हमारा आशय है—

ईश्वर, जाति और लोकतंत्र—ये तीन प्रेत हैं। 

ब्राह्मण-समाचारपत्र-राजनीतिक दल-विधायिकाएं और सिनेमा—ये पांच बीमारियां हैं। ये बीमारियां मानव शरीर पर केंसर, कुष्ठ-रोग और मलेरिया की तरह धावा बोल रही हैं। यदि समाज को प्रगतिगामी बनाना है, तो इन बीमारियों से हमें जमकर संघर्ष करना; और इन्हें पूरी तरह नष्ट कर देना होगा। 

—ई.  वी. रामासामी पेरियार 

(हिंदी अनुवाद :  ओमप्रकाश कश्यप)

विदुथलाई, 8 ओर 9 जनवरी, 1959। इस भाषण का अंग्रेजी अनुवाद द्रड़ियार कझ़गम, चेन्नई द्वारा प्रकाशित ‘कलेक्टिड वर्क्स आफ पेरियार ईवीआर, 2005(तीसरा संस्करण) से लिया गया है। अंग्रेजी अनुवादक: ए. एस. वेणु।  

1. 1958 में जब यह भाषण दिया गया, उपप्रधानमंत्री पद खाली था। 

मई दिवस : संघर्ष की याद और संकल्पों का दिन

सामान्य

मई दिवस पर विशेष

यदि तुम सोचते हो कि हमें फांसी पर लटकाकर तुम मजदूर आंदोलन को, गरीबी, बदहाली और विपन्नता में कमरतोड़ परिश्रम करने वाले लाखों लोगों के आंदोलन कोकुचल डालोगे….अगर तुम्हारी यही राय है तो हमें खुशीखुशी फांसी के तख्ते पर चढ़ा दो। किंतु याद रहे, आज तुम एक चिंगारी को कुचल रहे हो, कल यहांवहां, तुम्हारे आगेपीछे, प्रत्येक दिशा से लपटें उठेंगीं। यह जंगल की आग है। तुम इसे कभी भी बुझा नहीं पाओगे। एक दिन आएगा, जब हमारी खामोशी उन आवाजों से कहीं ज्यादा ताकतवर होगी, जिनका तुम आज गला घोंट रहे हो ऑगस्ट स्पाइस।

मई दिवस’ के साथ कोई खुशनुमा प्रसंग नहीं जुड़ा है। न यह मजदूरों के लिए उत्सव मनाने का दिन है। फिर भी हर मेहनतकश के लिए इस दिन का महत्त्व है। यह उन्हें संगठन की ताकत का एहसास दिलाता है। उस हौसले की याद दिलाता है जिसके बल पर उनके लाखों मजदूर भाई अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर आए थे। चार्ल्स. रथेनबर्ग के शब्दों में, ‘मई दिवस वह दिन है जो मजदूरों के दिलों में उम्मीद तथा पूंजीपतियों के मन में खौफ पैदा करता है।’ यह अकेला दिन है जिसे मजदूरों के नाम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाता है। मजदूरों के लिए यह याद रखने का दिन है। ठीक ऐसे ही जैसे कोई जीवंत समाज अपनी आजादी के महानायकों के किस्सों को सहेजकर रखता है।

मशीनीकरण के बाद का दौर पूंजी के केंद्रीकरण का था। उसमें आदमी को भी मशीन मान लिया गया था। फैक्ट्रियों में काम के घंटे निर्धारित नहीं थे। उनीसवीं शताब्दी के आरंभ तक ‘कार्यदिवस’ का अर्थ था, सूरज निकलने से सूरज छिपने तक काम करना।1 मौसम के अनुसार दिन घटताबढ़ता तो काम के घंटे भी घटबढ़ जाते। हर कामगार को प्रतिदिन 14 से 16 घंटे काम करना पड़ता था। कभीकभी तो एक कार्यदिवस 18 घंटे तक पहुंच जाता था।2 कार्यघंटों को लेकर महिलाओं और पुरुषों, बच्चों और बड़ों में कोई भेद नहीं थाइसके आलावा मजदूरी बहुत कम थी। 16 से 18 घंटों तक काम करने के बावजूद मजदूरों को इतनी मजदूरी नहीं मिलती थी, जिससे वे सामान्य जीवन भी जी सकें। ऊपर से बार-बार आने वाली मंदी के कारण मजदूरों को बेरोजगारी का सामना करना पड़ता था। आड़े वक्त में सरकार भी उद्यमियों और पूंजीपतियों का ही पक्ष लेती थी। 1834 में ‘वर्किंगमेन्स एडवोकेट’ नामक अखबार ने छापा था, ‘डबलरोटी के पैकेटों को लानेले जाने के काम में लगे मजदूरों की हालत मिस्र के बंधुआ मजदूरों से भी बुरी थी। उन्हें दिन के 24 घंटों में 18 से 20 घंटे काम करना पड़ता था।’ मजदूर उसे 10 घंटों तक सीमित करने की मांग करते आ रहे थे। 1791 में फिलाडेफिया के बढ़इयों ने 10 घंटे के कार्यदिवस के लिए हड़ताल की थी। उसके बाद 1827 में ‘मेकेनिक्स यूनियन ऑफ़ फिलाडेफिया’, जिसे विश्व का पहला मजदूर संगठन कहा जा सकता है, के नेतृत्व में निर्माण कार्य के मजदूरों ने, 10 घंटों के कार्यदिवस की मांग को लेकर हड़ताल की थी।3 उनके बैनरों पर लिखा होता था—‘छह से छह तक, दस घंटे काम के, दो घंटे आराम के।’ 1830-40 के बीच उनकी मांग में और भी तेजी आ गई। उसके फलस्वरूप 1860 तक लगभग सभी देशों ने कार्यदिवस के औसत घंटों को 12 से घटाकर, 11 कर दिया था

मजदूर कार्यदिवस को 10 घंटों तक सीमित करने की मांग पर अड़े थे। 1837 में अमेरिका में उसे लेकर चक्काजाम जैसी स्थिति बन गई। आखिरकार संयुक्त राष्ट्र के राष्ट्रपति वेन बुरान ने सरकारी दफ्तरों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए प्रतिदिन 10 घंटे करने का आदेश जारी कर दिया। उसकी देखादेखी कारखाना मजूदरों ने यह कहते हुए कि उनसे भी सरकारी कर्मचारियों के बराबर काम लिया जाए, आंदोलन को और तेज कर दिया4 1853 में नएनए बने कैलीफोर्निया राज्य ने कार्यघंटों को सीमित करने से संबंधित पहला, मगर आधाअधूरा कानून बनाया था। मूल प्रस्ताव में दस घंटे के वैध कार्यदिवस के साथ, उससे अधिक काम लेने वाले नियोक्ताओं को दंडित किए जाने का प्रावधान था। उसकी काफी चर्चा भी हुई थी। प्रस्ताव कानून की शक्ल ले, उससे पहले ही उद्यमियों ने सरकार पर जोर डालकर, उसे कमजोर करने का षड्यंत्र रच दिया। जो कानून बना उसमें कहा गया था कि ‘राज्य की किसी भी अदालत में 10 घंटों के श्रम को, एक कार्यदिवस का श्रम माना जाएगा।’5 इस तरह दस घंटों के कार्यदिवस की घोषणा महज कानूनी अवधारणा तक सीमित थी। वह नियोक्ताओं को न तो कोई निर्देश देता था, न उसमें क़ानून के उल्लंघन पर किसी तरह के दंड काप्रावधान था। कानून की कमजोरी का लाभ उठाकर नियोक्ता मजदूरों के साथ खूब सौदेबाजी करते थे। मजदूर संगठन उस कानून में आवश्यक संशोधन की मांग कर रहे थे।

10 घंटे के कार्यदिवस की मांग अभी चल ही रही थी कि श्रमिकों ने 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग तेज कर दी। इस बार वह मांग सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं थी। बल्कि जहां-जहां भी श्रमिक उत्पीड़न का शिकार थे, वहांवहां वे अपनी मांग के समर्थन में सरकार और उद्योगों पर दबाव बनाने में लगे थे। 1856 में आस्ट्रेलिया के निर्माण मजदूरों ने, 8 घंटे की मांग को लेकर नारा गढ़ा था—‘8 घंटे काम, 8 घंटे मनोरंजन और 8 घंटे आराम।’ इस मांग को तब बल मिला जब अगस्त 1866 में ‘नेशनल लेबर यूनियन’ ने 8 घंटे की मांग का समर्थन किया। वह अमेरिका का पहला मजदूर संगठन था। अपने स्थापना समारोह में ही 8 घंटे के कार्यदिवस की मांग के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाते हुए संगठन की ओर कहा गया था कि पूंजीवादी दासता से श्रमिकों की मुक्ति हेतु वर्तमान समय की सबसे पहली और बड़ी जरूरत है, अमेरिका के सभी राज्यों में 8 घंटे के कार्यदिवस को वैध माना जाए। सितंबर 1866 में फर्स्ट इंटरनेशनल द्वारा अपने जिनेवा सम्मेलन में 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग, घोषणा के साथ ही अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गईफर्स्ट इंटरनेशनल का निष्कर्ष था—

काम के घंटों की वैध सीमा तय होना आवश्यक है। इसके अभाव में कामगार वर्गों की स्थिति में सुधार तथा शोषण से मुक्ति का कोई भी प्रयास सफल नहीं हो सकता…..एक वैध कार्यदिवस के लिए यह सभा 8 घंटों की सीमा के प्रस्ताव को मंजूर करती है।’6

1867 में ‘पूंजी’ का प्रथम खंड प्रकाशित हो चुका था। उससे पहले माना जाता था कि उत्पादकता सांस्कृतिक उपादानों पर निर्भर करती है। मार्क्स ने शताब्दियों से चली आ रही इस धारणा का खंडन किया था। कहा था कि संस्कृति स्वयं उत्पादकता के साधनों द्वारा तय होती है। उस पुस्तक में मार्क्स ने श्रमिक शोषण की विशद विवेचना की थी। पूंजीवादी शोषण के लगभग सभी पक्ष उसमें शामिल थे। उसका विश्लेषण इतना गहन था कि श्रमिक शोषण से जुड़ी छोटी-सेछोटी बात भी उसकी पैनी नजर से बच नहीं पाई थीमार्क्स ने ‘नेशनल लेबर यूनियन’ के 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग का समर्थन किया था। कहा था कि श्रमिकों को रंग-भेद की भावना से ऊपर उठकर, अपने अधिकारों के पक्ष में आवाज उठानी चाहिए। उन दिनों अमेरिका में मजदूर को प्रति सप्ताह 63 घंटे काम करना पड़ता थामार्क्स चाहता था कि संयुक्त राष्ट्र अमेरिका श्रमिक अधिकारों के समर्थन में 8 घंटों के वैध कार्यदिवस की घोषणा करेपूंजीपतिवर्ग दूसरों को दास बनाकर रखने की मानसिकता से बाहर आए। उसने लिखा था—

जब तक दासता उसके गणतंत्र को विरुपित करती रहेगी, तब तक श्रमिक मुक्ति की दिशा में उठाया गया कोई भी कदम नाकाम सिद्ध होगा। जब तक काले श्रमिकों की पहचान उनके रंग के आधार पर होगी, तब तक श्वेत मजदूरों के लिए भी शोषणमुक्ति संभव नहीं है….24 घंटे के सामान्य दिन में मनुष्य अपनी कार्यशक्ति का भरपूर इस्तेमाल सीमित घंटों तक ही कर सकता है। यहां तक कि एक घोड़ा भी, प्रतिदिन अधिकतम 8 घंटे काम कर सकता है। दिन के बाकी घंटों में 8 घंटे कार्यशक्ति को आराम करना चाहिए, बाकी घंटे उन्हें अपने भौतिक आवश्यकताओं स्नान, भोजन आदि के लिए मिलने चाहिए।’7

8 घंटे के कार्यदिवस की मांग असामयिक नहीं थी। उसके पीछे भरा-पूरा वैचारिक दर्शन था। उसे जमीन दी थी, पीयरे जोसेफ प्रूधों, मार्क्स, मिखाइल बकुनिन, एंगेल्स जैसे विचारकों ने। वे अर्थव्यवस्था के समाजीकरण की मांग कर रहे थे। उसके पीछे समानता और स्वतंत्रता का दर्शन था। मान्यता थी कि यदि सब बराबर हैं, तो सभी को अपनी जरूरत के अनुसार भोग करने का भी अधिकार है। इसलिए मार्क्स का कहना था—‘प्रत्येक से उसकी योग्यता के अनुसार। प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुरूप।’ समाजवाद की दिशा में सबसे क्रांतिकारी पहल प्रूधों ने की थी। वह अराजकतावादी चिंतक था। मानता था कि व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा गुलामी जितनी ही घातक है। उसका कहना था—‘व्यक्तिगत संपत्ति चोरी है। संपत्तिधारक व्यक्ति चोर है।’ वह संपत्ति को सामाजिक दासता का कारक मानता था—

यदि मुझसे कोई यह पूछे कि गुलामी क्या है? तो मैं उसका एक ही शब्द में उत्तर दूंगा—‘गुलामी, हत्या है!’ मेरा मंतव्य पूरी तरह सरल और स्पष्ट है। उसके लिए किसी अतिरिक्त प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य की चेतना, उसके मस्तिष्क तथा व्यक्तित्व को छीन लेने की शक्ति—उसके जीवनमृत्यु का फैसला करने की शक्ति के समान हैं। यह मनुष्य को गुलाम बनाती है। यह उसकी हत्या है, क्यों? अब यदि कोई मुझसे पूछे—‘संपत्ति क्या है?’ क्या मुझे इसका वैसा ही उत्तर नहीं देना चाहिए! कहना चाहिए कि यह डकैती है!’ इसमें गलत समझे जाने की कतई गुंजाइश नहीं है। दूसरा निष्कर्ष निश्चित रूप से पहले का ही रूपांतरण है?8

प्रूधों की धारा का ही दूसरा विचारक था, मिखाइल बकुनिन। उसका राजनीतिक दर्शन नागरिक स्वतंत्रता, समाजवाद, संघवाद, नास्तिकता और भौतिकवाद से मिलकर बना था। बकुनिन का मानना था कि किसी समाज में व्यक्ति अथवा व्यक्ति समूह को दिए गए विशेषाधिकार उसके बुद्धि-विवेक एवं संवेदनशीलता को मार देते हैं। विशेषाधिकार चाहे राजनीतिक हों अथवा आर्थिक, वे मनुष्य के समाजीकरण की धारा को अवरुद्ध करते हैं। उसे स्वार्थी और आत्मपरक बनाते हैं। मनुष्य की अधिकतम स्वतंत्रता का समर्थक बकुनिन लोकतंत्र का भी आलोचक था। उसका कहना था कि जब जनता पर लाठियां बरसाई जा रही हों तो लोगों को यह जानकर कोई प्रसन्नता नहीं होगी कि वे लोकतंत्र की लाठियां हैं। बुद्धिजीवियों और दार्शनिकों से उसकी अपील थी—

हमें अपने सिद्धांतों का प्रचार शब्दों के माध्यम से नहीं, कार्यों के माध्यम से करना चाहिए। यही प्रचार का सबसे लोकप्रिय, शक्तिशाली और अनूठा तरीका है….दुनिया में क्रांतिकारी गतिविधियों को बढ़ावा देने में सत्तावादी क्रांतिकारियों का बहुत कम योगदान रहा है। इसलिए कि वे जनमानस को आड़ोलित कर, क्रांति की ओर उन्मुख करने के बजाय, मात्र अपने दम पर, अपनी योग्यता, सत्ता और विचारों के माध्यम से क्रांति लाना चाहते थे….उन्हें क्रांति के समर्थन में फरमान जारी करके नहीं, अपितु जनता को अपने लक्ष्यप्राप्ति की दिशा में प्रोत्साहित करके, क्रांति को बढ़ावा देना चाहिए।’9

मई दिवस के आंदोलन का चरित्र मूलतः ‘अराजकतावादी’ था। बता दें कि अराजकतावाद का आशय, जैसा प्रचार किया जाता है, राज्य तथा उसकी शक्तियों का लोप हो जाना नहीं है। उसके मूल में यह विचार है कि राज्य जनता का चयन है। उसका गठन जनता द्वारा अपने सुख एवं सुरक्षा के लिए किया जाता है। वह जनता के तभी हितकारी हो सकता है, जब उसपर जनता का अधिकाधिक नियंत्रण हो। अराजकतावाद में राज्य की अधिकतम शक्तियां जनता की ओर अंतरित हो जाती हैं। परिणामस्वरूप राज्य की शक्तियां प्रतीकात्मक होकर रह जाती हैं। सरकार की आवश्यकता नहीं रह जाती, यदि हो भी तो वह न्यूनतम अधिकारों के साथ न्यूनतम शासन करती है।

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प्रूधों और बकुनिन का उल्लेख यहां इसलिए प्रासंगिक समझा गया क्योंकि मई दिवस आंदोलन की बागडोर मुख्यतः अराजकतावादियों के हाथों में थी, जो किसी भी प्रकार के सत्तावाद का विरोध करते थे। ‘अंतरराष्ट्रीय वर्किंग मेन्स ऐसोशिएसन’ जिसे ‘प्रथम इंटरनेशनल’ के नाम से भी जाना जाता है, समाजवादी संगठन था। उसके पीछे सोच था कि मजदूर चाहे किसी देश का हो, उसकी मूलभूत समस्याएं और चुनौतियां एक जैसी होती हैं, इसलिए उसके विरोध में लड़ाई भी संगठित होकर लड़ी जानी चाहिए। वे समाजवाद के समर्थक थे, किंतु उसके लिए रास्ता क्या हो, इसे लेकर उनमें मतभेद थे। उसमें से कुछ राबर्ट ओवन के अनुयायी थे, कुछ लुइस ब्लेंक के। कुछ का भरोसा संघवाद में था, तो कुछ अपना तारणहार गणतंत्र को मानते थे। यह विभाजन ऊपर की श्रेणी के बुद्धिजीवियों में भी था। हीगेल से प्रभावित कार्ल मार्क्स द्वंद्ववादी विचारधारा का समर्थक था। उसका मानना था कि सत्ता प्रतिष्ठानों और उत्पादन केंद्रों पर श्रमिक वर्गों का नियंत्रण होना चाहिए। बकुनिन किसी भी प्रकार के सत्तावाद का विरोधी था। उसे वह मनुष्य की स्वतंत्रता में बाधक मानता था। दोनों गुटों के मतभेद इतने बढ़े कि इंटरनेशनल की छठी कांग्रेस के बाद, दोनों के बीच विभाजन हो गया। अराजकतावादी बकुनिन के नेतृत्व में अलग हुए टुकड़े को ‘एंटी-आथरटेरियन इंटरनेशनल’ का नाम दिया गया था। ‘एंटी-आथरटेरियन इंटरनेशनल’ के नेता मानते थे कि ‘हड़ताल का संघर्ष का बेशकीमती हथियार’ है। इसलिए श्रमिकों को ‘महान एवं अंतिम चुनौती’ के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए। अराजकतावादी नेताओं के मनस् में नई वर्गहीन, समाजवादी आदर्शों से युक्त और सभी प्रकार यहां तक राज्य के वर्चस्व से भी मुक्त नए समाज का सपना कौंधता रहता था। 8 घंटे के कार्यदिवस से जुड़ी हड़ताल में इसी गुट के नेता थे, जो ‘बेहतर समाजवादी दुनिया’ के सपने के साथ जूझ रहे थे

1872 में ‘प्रथम इंटरनेशनल’ का कार्यालय, लंदन से न्यू यार्क शिफ्ट कर दिया गया था। इससे उसकी गतिविधियों में व्यवधान आया था। प्रभाव भी घटने लगा था। लेकिन मजदूर 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग पर अडिग थे। उसके लिए धरना, प्रदर्शन, हड़ताल चलते ही रहते थे। 1877 में मार्टिंग्स वर्ग, पश्चिमी वर्जिनिया में रेलवे कर्मचारियों ने हड़ताल का ऐलान कर दिया। मामला इतना बढ़ा कि उसपर काबू करने के लिए सेना बुलानी पड़ी। बलप्रयोग के कारण हड़ताल तो दब गई, परंतु उससे जो चिंगारियां फूटीं उसने बहुत जल्दी वाल्टीमोर, ओहियो, पेनसिल्वेनिया जैसे शहरों की रेलवे कंपनियों को अपनी गिरफ्त में ले लिया। धीरे-धीरे दूसरे उद्यमों से जुड़े मजदूर भी हड़ताल पर उतर आए। पहली बार मजदूरों ने सरकार और पूंजीपतियों को अपनी विराट शक्ति का एहसास कराया था। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा था। वह ऐसा जनउभार था, जिसका असर राष्ट्रव्यापी था

1884 का वर्ष अंतरराष्ट्रीय मजदूर आंदोलनों के इतिहास में बड़ा परिवर्तनकारी सिद्ध हुआ। उसी वर्ष फेडरेशन ऑफ़ आर्गनाइज्ड ट्रेड एंड लेबर यूनियंस, जिसे बाद में ‘अमेरिकन फेडरेशन ऑफ़ लेबर’ के कूटनाम से भी जाना गया—का शिकागो में चौथा राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ। 7 अक्टूबर, 1884 को आयोजित उस सम्मेलन में निम्नलिखित प्रस्ताव को स्वीकृति मिली थी—

‘‘फेडरेशन ऑफ़ आर्गनाइज्ड ट्रेड एंड लेबर यूनियंस ऑफ़ दि यूनाइटिड स्टेट्स एंड कनाडा’ तय करती है कि पहली मई तथा उसके बाद से 8 कार्यघंटों का एक कार्यदिवस, वैध कार्यदिवस के रूप में जाना जाएगा। हम सभी श्रमिक संगठनों से अपील करते हैं कि वे अपने-अपने नियमों को इस प्रकार निर्धारित करें कि वे इस प्रस्ताव के अनुकूल हों10

अमेरिकन फेडरेशन ऑफ़ लेबर’ स्वैच्छिक और संघीय आधार पर बना था। फेडरेशन के राष्ट्रीय सम्मेलन के निर्णय सिर्फ उससे जुड़े श्रमिक संगठनों पर लागू होते थे; वह भी तब जब श्रमिक संगठन उन निर्णयों का विधिवत समर्थन करें। 8 घंटे के प्रस्तावित कार्यदिवस की घोषणा में हड़ताल का संकल्प भी छिपा था। चूंकि हड़ताल के दौरान श्रमिकों के पास अपनी आजीविका का कोई साधन नहीं होता, इसलिए हड़ताल लंबी खिंचने पर मजदूरों को संगठन की आर्थिक मदद की जरूरत पड़ सकती थी। परोक्ष रूप में फेडरेशन का संकेत बड़ी हड़ताल की ओर था। उसके लिए सदस्य श्रमिक संगठनों का समर्थन और सहभागिता आवश्यक थी। उस समय फेडरेशन के सदस्यों की संख्या लगभग 50000 थी। राष्ट्रीय स्तर पर यह बहुत ज्यादा भी नहीं थी। सरकारों पर दबाव बनाने की स्थिति में तो वह संगठन बिलकुल भी नहीं था

उस दिनों अमेरिका का श्रमिक आंदोलन तीन प्रमुख धाराओं में बंटा हुआ था। उसके सबसे बड़े मजदूर संगठन का नाम था—‘आर्डर ऑफ़ दि नाइट्स ऑफ़ लेबर’ यानी योद्धाओं का संगठन।’ 1886 में सदस्य संख्या की दृष्टि से वह सबसे बड़ा मजदूर संगठन था। उसके लगभग 7 लाख से अधिक सदस्य थे। उसमें कई महिलाएं भी शामिल थीं। टेरेंस वी. पोव्देर्ली उसका नेता था। यह संगठन 1878 में ही 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग करता हुआ आ रहा था। उसकी ख्याति एक जुझारू संगठन की थी। 1886 में उसकी लोकप्रियता शिखर पर थी। इस कारण उसके सदस्यों की संख्या भी बढ़ती जा रही थी। उसके प्रमुख नेता हड़ताल के बजाए सरकार के साथ सहयोग और बातचीत करते हुए, उसका हल निकालना चाहते थे। हालांकि उसका एक हिस्सा हड़ताल के लिए तैयार था। नाइट ऑफ़ लेबरने 1886 की 8 घंटों के कार्यदिवस हेतु ऐतिहासिक हड़ताल में हिस्सा न लेने का निर्णय लिया था।. नतीजा यह हुआ कि उसका प्रभाव कम पड़ने लगा।। उसके बाद जितनी तेजी से उसकी सदस्य संख्या बढ़ी थी, उतनी ही तेजी से उसकी सदस्य संख्या और प्रतिष्ठा कम होने लगी थी। दूसरी धारा अराजकतावादियों की थी। उन्होंने 1883 में ‘इंटरनेशनल वर्किंग पिपुल्स एसोशिएसन’ का गठन किया था। वे लोग न केवल कानून अपितु राज्य की सत्ता को ही श्रमिक हितों में बाधक मानते थे। इसलिए वे सहयोग या बातचीत के बजाए, मांग को लेकर जोरदार संघर्ष छेड़ने के पक्ष में थे। उसके लिए मारक हथियारों के प्रयोग से भी उन्हें आपत्ति नहीं थी।

तीसरा संगठन ‘अमेरिकन फेडरेशन ऑफ़ लेबर’ था। इस संगठन के कई सदस्य मार्क्सवादी विचारधारा के थे। यह संगठन शुरू से ही आठ घंटों के कार्यदिवस की मांग करता आया था। आरंभ में इसका तरीका भी संवाद और सहयोग पर आधारित था। उसमें एक गुट ऐसा भी था जिसे बातचीत के तरीके पर शुरू से ही विश्वास न था। यह गुट आगे चलकर न केवल फेडरेशन के बाकी सदस्यों को हड़ताल के लिए तैयार करने में सफल रहा, अपितु अपने अनुषंगी संगठनों के कुछ गुटों को हड़ताल के लिए अपने साथ लाने में सफल रहा था

यह दिखाने के लिए कि 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग केवल घोषणा नहीं है, श्रमिक संगठन उसके बारे में पूरी तरह से गंभीर हैं, ‘फेडरेशन ऑफ़ लेबर’ ने अपरोक्ष तैयारियां आरंभ कर दी थीं। आने वाले वर्ष में श्रमिक नेताओं की जगह-जगह सभाएं आयोजित की गईं। हर जगह 8 घंटों के कार्यदिवस के संकल्प को दोहराया गया। उसे सबसे सुधारवादी कदम बताया जा रहा था। कहा जा रहा था कि उससे ‘पूंजीवाद’ की जड़ पर प्रहार होगा। हालांकि कुछ अराजकतावादी अब भी यह मानकर चल रहे थे कि 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग से श्रमिकों की हालत में सुधार होने की संभावना बहुत कम है। श्रमिक नेताओं में ऑगस्ट स्पाइस जैसे उग्र अराजकतावादी भी थे, जो 8 कार्यघंटों की मांग से सहमत थे, मगर श्रमिकों के कल्याण के लिए उन्हें अपर्याप्त मानते थे। स्पाइस का विचार था कि—‘हमारी समस्याओं का वास्तविक समाधान बुराई की जड़ पर सीधा प्रहार किए बगैर संभव नहीं है।’11 एक और अराजकतावादी सेमुअल फील्डेन ने हेमार्किट नरसंहार से एक वर्ष पहले अराजकतावादी अखबार ‘दि अलार्म’ में लिखा था—‘‘कोई आदमी चाहे दिन में आठ घंटे काम करे या दस घंटे, वह गुलाम है, गुलाम रहेगा।’12 फील्डेन ने कहा था कि मजदूरों की समस्या का एकमात्र समाधान है, ‘निजी संपत्ति का खात्मा और प्रतिस्पर्धा का अंत।’

8 कार्यघंटों की मांग को श्रमिकों का चौतरफा समर्थन मिल रहा था। मजूदर संगठन भी अपनी-अपनी तरह से सक्रिय थे। ‘कारपेंटरर्स एंड सिगार मेकर्स’, ‘नाइट्स ऑफ़ लेबर’ की सदस्य संख्या में दिन दूनी, रात चौगुनी वृद्धि हो रही थी। इसका अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है, कि फेडरेशन की घोषणा के बाद, श्रमिक संगठन ‘नाइट्स ऑफ़ लेबर’(मजदूरों के शूरवीर) की सदस्य संख्या 1884 में 70000 से 1885 तक 200000 और फिर 1886 तक 700000 हो चुकी थी13 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग नाइट आफ लेबर के कार्यक्रम का हिस्सा थी। आरंभ में वह उस मुद्दे पर हड़ताल के लिए बाकी सदस्यों का साथ देने को तत्पर था. मगर बाद में, कदाचित मजदूर संगठनों पर अराजकतावादियों के प्रभाव के चलते, नाइट ऑफ़ लेबरके नेता हड़ताल से कटने लगे थे. स्वयं पोव्देर्ली, फेडरेशन से जुड़ी यूनियनों से हड़ताल में भाग लेने को कहने लगा था।

दूसरे कई संगठनों में भी बढ़ती सदस्य संख्या को देखकर उत्साह था। उसका असर किसी एक शहर तक सीमित नहीं था, बल्कि अमेरिका के विभिन्न शहरों के श्रमिक इस मांग को लेकर जोश से भरे हुए थे। मजदूरों को अंदाजा था कि 8 कार्यघंटों की मांग के लिए होने वाली हड़ताल लंबी खिंच सकती है। इसलिए कुछ सरकार पर दबाव बनाने के लिए निर्धारित तिथि से पहले अल्पावधिक हड़तालों का सिलसिला शुरू हो चुका था। उन हड़तालों में ‘कुशल और अकुशल, काले और गोरे, स्त्री और पुरुष, नेटिव और प्रवासी सभी शामिल होते थे

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मजूदर संघर्ष का केंद्र शिकागो बना था। क्या इसके पीछे कोई खास कारण था? बिलकुल। अमेरिकी गृहयुद्ध(1861-1865) के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था को जोरदार झटका लगा था। वह भयानक मंदी के दौर से गुजर रही थी। 1873 से 1879 के बीच 18000 कंपनियां दिवालिया घोषित हो चुकी थीं। 8 राज्य और सैकड़ों बैंक तबाह हो चुके थे14 मगर जैसे ही मंदी का दौर समाप्त हुआ, अमेरिका खासकर उसके शिकागो शहर में जो उन दिनों बड़ा औद्योगिक केंद्र था—बाहर से आने वाले मजदूरों की संख्या अचानक बढ़ चुकी गई। इससे शहर की समस्याएं भी बढ़ी थीं। उन दिनों अमेरिका में प्रति सप्ताह औसत 63 घंटे काम का प्रावधान था15 मंदी से उबरने की छटपटाहट में जहां उद्योगपति अधिक से अधिक मुनाफा कमाना चाहते थे। वहीं श्रमिक संगठन अपने लिए बेहतर मजदूरी की मांग कर रहे थे। कारण यह था कि मंदी के बाद जिस अनुपात में मंहगाई में वृद्धि हो रही थी, उस अनुपात में वेतनवृद्धि नहीं हो पा रही थीतनाव तब और बढ़ गया था जब बाल्टिमोर एंड ऑहियो रेलरोड ने मंदी के बहाने मजदूरों की पगार में 10 की कटौती की घोषणा की नतीजा यह हुआ की जुलाई 25, 1877 से मजदूरों ने हड़ताल कर दी देखते ही देखते उसने पूरे अमेरिका को अपनी चपेट में ले लिया स्थानीय पुलिस और सुरक्षा बल हड़ताल पर काबू पाने में नाकाम रहे तो सेना बुलानी पड़ी दो सप्ताह चलने वाली उस हड़ताल ने सैकड़ों की जान ली थी करोड़ों डॉलर की संपत्ति को नुकसान पहुंचा था जार्ज शिलिंग नाम के एक मजदूर नेता ने उसे ‘सामाजिक और औद्योगिक ग़दर’ की संज्ञा की थी

महत्त्वपूर्ण बात यह कि ‘गृह युद्ध की समाप्ति के एक दशक के भीतर ही उद्योगपति शिकागो पुलिस को गैरभरोसेमंद बताने लगे थे। उनका मानना था कि सरकारी सुरक्षाबल मजदूरों के प्रति उदारता बरतते हैं। ऐसा न हो, इसके लिए सुरक्षा बलों की जगह अपने खर्च पर पेशेवर संगठन बनाने की कोशिश जारी थी। 1870 और 1880 के दशक में उन्होंने प्राइवेट सशस्त्र बलों की भर्ती शुरू कर दी थी। निजी तथा सरकारी सशस्त्र बलों की सुरक्षा के लिए मजबूत हथियार-घर और किले बनाए जा रहे थे16 इसके साथसाथ मजदूर संगठनों पर लगाम लगाने के प्रयत्न भी जारी थे। वे मजदूरों को डराने, धमकाने, उनके संगठनों को काली सूची में डालने जैसे काम कर रहे थे। श्रमिक संगठनों में फूट डालने के लिए जासूसों, ठगों, निजी सुरक्षा बलों, और भेदियों की भरती की जा रही थी। सीधे-साधे गरीब मजदूरों को अनार्किस्ट और कम्युनिस्ट जैसे नाम देकर नौकरी से हटाया जा रहा था। मंदी के नाम पर मजदूरों के वेतन की कटौती की जा रही थी।

इसके बावजूद मुख्य धारा के अखबार पूंजीपतियों का समर्थन कर रहे थे। शिकागो ट्रिबून, दि टाइम्स, जैसे बड़े अखबारों का किसी न किसी रूप में राजनीतिकरण हो चुका था। मजदूरों की ओर ‘सोशलिष्ट’ और ‘अनार्किस्ट’ जैसे कुछ जनवादी तेवर के अखबार थे। लेकिन तुलनात्मक रूप से उनकी पहुंच बहुत छोटे समूह तक थी। उदाहरण के लिए 1890 के दशक में शिकागो डेली न्यूज की पाठकसंख्या जहां 2,00,000 थी, वहीं सोशलिष्ट और अनार्किस्ट जैसे प्रतिबद्ध विचारधारा के अखबारों की संयुक्त पाठक संख्या महज 30,000 थी17 जैसेजैसे मई का महीना करीब आ रहा था, मजदूरों का जोश भी बढ़ता जा रहा था। 1886 के आरंभ में, जहां जाओ वहां, 8 घंटे के कार्यदिवस, मजदूर एकता और पूंजीपतियों के शोषण पर चर्चा होती सुनाई पड़ती थी। सड़कों पर, सेलूनों और बाजारों में जोशीले गीत सुनाई पड़ते थे —

लाखों मेहनतकश, जागे हुए है

आओ उन्हें मार्च करते हुए देखें

उधर देखो, तानाशाह कांप रहे हैं,

अरे! उनकी ताकत खत्म होने लगी है

ओ श्रमयोद्धाओं किलों को उड़ा दो

अपने उद्देश्य की खातिर लड़ो

लड़ो, ताकि तुम्हें और तुम्हारे

सभी पड़ोसियों को बराबर का हक मिल सके

उठो, इन निरंकुश कानूनों को दफन कर दो

ऐसे गीतों ने श्रमिकों की आंखों में सपने रोपने का काम किया था। सपने बराबरी और एकता के। समानता और स्वतंत्रता के। फेडरेशन ऑफ़ लेबर की 8 कार्यघंटों को कानूनी घोषित करने की मांग के साथ ही श्रमिक संगठन उसके लिए तैयारियों में जुटने लगे थे। कामगारों का जुझारूपन, लक्ष्यप्राप्ति के लिए बलप्रयोग से न हिचकने का संकल्प श्रम आंदोलनों को विस्तार दे रहा था। अराजकतावादी नेताओं में से अल्बर्ट पार्सन्स, जोहान्न मोस्ट, ऑगस्ट स्पाइस, लुईस लिंग्ग जैसे नाम घरघर के जानेपहचाने नाम बन चुके थे। 1885 में ही हड़तालों का सिलसिला आरंभ हो चुका था। अपनी एकजुटता दर्शाने के लिए मजदूर बेंड-बाजे के साथ परेड के निकलते थे। 1881-1884 के बीच अमेरिका में हड़ताल और तालाबंदी की घटनाओं का वार्षिक औसत लगभग 500 था। उनमें करीब 1,50,000 श्रमिकों ने हिस्सा लिया था। मगर 1885 में हड़ताल और तालाबंदी की घटनाओं की संख्या 700 तक पहुंच चुकी थी। उनमें 2,50,000 मजदूरों की भागीदारी थी। उससे अगले साल यानी 1886 में हड़तालों तथा तालाबंदी की संख्या पिछले साल, यानी 1885 के मुकाबले दुगुनी से भी ज्यादा, 1572 थी। उनमें 6,00,000 श्रमिकों की हिस्सेदारी थी। 1885 में जहां 2467 औद्योगिक संस्थान हड़ताल और तालाबंदी से प्रभावित थे, वहीं उससे अगले वर्ष में 11562 कारखाने प्रभावित हुए थे। ‘नाइट्स ऑफ़ लेबर’ के नेताओं ने हालांकि हड़ताल में भाग न लेने का खुला ऐलान कर दिया था बावजूद इसके उसके लगभग 7,00,000 सदस्यों में से 5,00,000 कामगार हड़ताल में सीधे तौर पर शामिल थे18

आसन्न संकट को सामने देख सावधान हो जाना मनुष्य का प्राकृतिक लक्षण है। संकट जितना अधिक बड़ा हो, वह उतनी ही अधिक शक्ति से उसका सामना करता है। 1870 और 1880 के बीच श्रमिक संगठनों की भी यही हालत थी। इसलिए एक और जहां पूंजीपति और राज्य मिलकर मजदूर एकता और उनके संगठनों को कमजोर करने में लगे थे, उनसे निपटने की तैयारियां की जा रहीं थीं, वहीं श्रमिक भी 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग को लेकर एकजुट हो रहे थे। इस बीच श्रमिक संगठनों में ही कुछ ऐसे नेता भी थे, जो मजदूर एकता में खलल डालकर, हड़ताल की संभावना का टालने या उसे कमजोर करने में लगे थेउनमें ऐसे लोग भी थे जिन्हें पूंजीपतियों ने इस काम के लिए नियुक्त किया था। लेकिन मजदूरों में जोश था। 1 मई से ठीक पहले एक गुमनाम प्रकाशक की ओर से छपा पर्चा मजूदरों में बांटा गया, जिसमें अपील थी—

    • मजदूर हथियारों के लिए!

    • महल के लिए युद्ध, झोपड़ी के लिए शांति, विलासितापूर्ण सुस्ती के लिए मौत

    • मजदूरी प्रथा दुनिया की बदहाली की एकमात्र वजह है। वह धनाढ्यों द्वारा समर्थित है। इसे नष्ट करने के लिए उन्हें या तो काम करना होगा, अथवा मरना होगा

    • एक पाउंड डायनामाइट, एक बुशेल मतदातापत्रों से बेहतर है!(बुशेल: 32 सेर या 25.4 किलोग्राम की माप)

    • पूंजीपति लकड़बघ्घों, पुलिस और लड़ाकुओं का समुचित सामना करने के लिए, अपने हाथों में हथियार लेकर, आठ घंटों की मांग उठाओ19

साफ है कि दोनों ओर से कमानें तन चुकी थीं। हड़ताल का केंद्र शिकागो था। लेकिन आंदोलन केवल वहीं तक सीमित नहीं था। न्यू यार्क, बाल्टीमोर, सिनसिनाटी, सेंट लुईस, वाशिंग्टन, डेट्रोइट, पिटसबर्ग, मिलवोकी, कैलीफोर्निया सहित दूसरे और भी कई शहरों में मजदूर भड़के हुए थे। अफवाहों का बाजार गर्म था। इतिहासकार और समाज-वैज्ञानिक एक और गृह युद्ध की संभावना जता रहे थे। पूंजीपतियों के प्रति घृणा चारों ओर पसरी हुई थी। मजदूर मान चुके थे कि कार्यघंटों को लेकर सरकार और कारखाना मालिकों ने उन्हें और रियायत मिलने वाली नहीं है। मैकार्मिक कंपनी ने अपने सैकड़ों कर्मचारियों को लॉकआउट के बहाने बाहर निकाल दिया था। बाहर किए गए कर्मचारी किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न न करें, इसके लिए 300 सुरक्षा कर्मियों को नियुक्त किया गया था। कंपनी के इस निर्णय को लेकर कर्मचारियों में खासी कड़वाहट थी। मैकार्मिक के लॉकआउट में ‘इंटरनेशनल कारपेंटरर्स यूनियन’ की बड़ी भूमिका था। उसके नेताओं में से एक लुइस लिंग्ग चरमपंथी था। वह निर्भीक और मुखर वक्ता था तथा जो डायनामाइट को ‘सच्चा औजार’ मानता था।

4

आखिर वह दिन भी आ पहुंचा जिसके लिए दोनों ही वर्गों ने भरपूर तैयारी की थी। सबसे ज्यादा क्रांतिधर्मा श्रमिक संगठन शिकागो में ही जमा हुए थे। विभिन्न संगठनों के बीच तालमेल बनाए रखने के लिए ‘8-घंटा समिति’ का गठन किया गया था। दूसरी ओर उग्र वामपंथी मजदूर संगठनों ने हड़ताल का मोर्चा संभालने के लिए ‘सेंट्रल लेबर यूनियन’ का गठन किया था। समन्वय की व्यवस्था ‘8-घंटा समिति’ और ‘सेंट्रल लेबर यूनियन’ के बीच भी थी। उन्होंने हड़ताल के संचालन के लिए एक संयुक्त मोर्चा बनाया हुआ था। ‘सेंट्रल लेबर यूनियन’ ने अभ्यास के लिए 1 मई से पहले रविवार के दिन लामबंदी प्रदर्शन किया था। उसमें कई श्रमिक संगठनों के लगभग 25000 मजदूरों ने हिस्सा लिया था। उसके साथ नाइट्स ऑफ़ लेबर, सोशलिष्ट लेबर पार्टी भी थीं। लेकिन नाइट्स ऑफ़ लेबर ने, शिकागो में एकदम अंतिम क्षण में खुद को प्रस्तावित हड़ताल से अलग कर लिया20 इससे नाराज उसका एक गुट, हड़ताल के सक्रिय समर्थन में उतर आया था। 1 मई का ‘दि आर्बीटर जाइटुंग’ हड़ताल के आवाह्न के साथ पाठकों तक पहुंचा था—

बहादुरो आगे बढ़ो! संघर्ष शुरू हो चुका है….साथियो! इन शब्दों पर ध्यान रखना—कोई समझौता नहीं। कापुरुष पीछे चले जाएं, बहादुर आगे आ जाएं। अब हम पीछे नहीं हट सकते। यह मई की पहली तारीख है….अपनी बंदूकों को साफ करो, कारतूसों को संभालकर रखो। पूंजीपतियों द्वारा किराये पर बुलाए गए हत्यारे, पुलिस और सैन्यबल, हत्या के लिए तैयार हैं। इन दिनों कोई भी मजदूर खाली जेब घर से बाहर कदम नहीं रखेगा।’21

उद्योगपतियों और व्यापारियों ने अपनी सुरक्षा के लिए निजी सुरक्षा बलों का गठन किया था। दूसरी ओर मजदूर संगठन भी 8 घंटे कार्यदिवस की मांग को अपने जीवन और मरण का सवाल बना चुके थे। पूंजीपतियों के सुरक्षाबलों का जवाब देने के लिए जर्मन तथा बोहेमियन समाजवादियों की ओर से शिकागो में ‘लेहर अंड वेहर वीरीन’(शैक्षिक एवं सुरक्षा समिति) का गठन किया गया था22 उद्देश्य था कि राज्य यदि श्रमआंदोलनों को रोकने के लिए बल का इस्तेमाल करे तो उसका उत्तर बलपूर्वक उसी अंदाज में दिया जा सके। साथी मजदूरों से संवाद करने के लिए श्रमिक संगठनों के पास ‘अलार्म’ और ‘आर्बीटर जाइटुंग’ जैसे समाचारपत्र थे। उनका सर्कुलेशन मुख्यधारा के अखबारों के मुकाबले बहुत कम था। मगर मजदूरों पर उनका प्रभाव दूसरे अखबारों की अपेक्षा कहीं ज्यादा था। उनकी भाषा आह्वानकारी होती थी। इसे एक उदाहरण के जरिये समझना उपयुक्त होगा। नवंबर-1884 में ‘इंटरनेशनल एसोशिएसन ऑफ़ वर्किंगमेन’ ने, स्थानीय श्रमिक संगठनों और संस्थाओं की मदद से समाजवाद को परिभाषित करने की कोशिश की थी23

1. निष्ठुर क्रांति तथा अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों की मदद से वर्तमान वर्गीय वर्चस्व को समाप्त करना

2. साम्यवादी संगठनों अथवा उत्पादन को लेकर मुक्त समाज की रचना

3. उत्पादक संगठनों के माध्यम से, बगैर लार्भाजन तथा लूट के बराबर श्रममूल्य के आधार पर वस्तुओं का विनिमय।

4. ऐसा शिक्षातंत्र खड़ा जिसमें स्त्रीपुरुष सभी धर्मरहित, वैज्ञानिक सूझबूझ तथा बराबरी के सिद्धांत के अनुरूप शिक्षा ग्रहण कर सकें।

5. लिंग अथवा जातीय भेदभाव से परे, सभी के लिए समान अधिकार

6. जनता के आपसी कार्यकलापों को संघों एवं कम्यूनों के बीच समझौतों के माध्यम से नियंत्रित करना

इस समाचार को 3 नवंबर 1884 के ‘अलार्म’ ने निम्नलिखित टिप्पणी के साथ प्रकाशित किया गया था—

दुनियाभर के मजदूर भाइयो! एक हो जाओ। साथियो! इस महान लक्ष्य तक पहुंचने के लिए जो सबसे आवश्यक है, वह है हमारा संगठन और हमारी एकता…..सो एकजुट होने का दिन आ पहुंचा है। हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो जाओ। ड्रम बजाकर बेखटके युद्ध की मुद्रा में आ जाओ—दुनिया के मजदूरो एक हो जाओ। तुम्हारे पास खोने के लिए जंजीरों के अलावा कुछ भी नहीं है, जीतने के लिए दुनिया पड़ी है।’24

जैसे ही पहली मई का दिन आया, मजदूरों ने अपने औजार रख दिए। उनके चेहरों पर विश्वास था। हर कोई अपने अधिकारों के लिए लड़ने का उद्धत था। श्रमिक आंदोलनों के इतिहास का वह सबसे अविस्मरणीय दिन था। शिकागो मजदूर क्रांति का केंद्र था। वहां मेकार्मिक हार्वेस्टर नामक कंपनी थी, जो खेती के औजार, मशीनें और ट्रक बनाने का काम करती थी। उसके आधे कामगार पहले ही दिन सड़क पर उतर आए। अकेले शिकागो में लगभग 40000 मजदूर हड़ताल पर थे25 उनके चेहरों पर जोश था। होठों पर गगनभेदी नारे थे—‘‘8 घंटे काम के। आठ घंटे आराम के। 8 घंटे हमारी मर्जी के।’ काम के घंटे घटाओ-मजदूरी बढ़ाओ।’ हड़ताल में 11562 कारखानों के मजदूर शामिल हुए थे26 शिकागो के अलावा केलीर्फोनिया जैसे दूसरे बड़े शहर भी हड़ताल में शामिल थे। पूरे अमेरिका में पांच लाख से अधिक मजदूर सड़कों पर थे। नेतागण अपने भाषण द्वारा मजदूरों को प्रोत्साहित कर रहे थे। अल्बर्ट पार्सन्स, ऑगस्ट स्पाइस, जोहन्न मोस्ट, लुईस लिंग्ग, सेमुअल फील्डेन जैसे अराजकतावादी नेताओं के भाषण आग उगल रहे थे। हड़ताल के बारे में एक अखबार ने लिखा था—‘फैक्ट्रियों और मिलों की ऊंची-ऊंची चिमनियों से उस दिन धुंआ नहीं निकला था। लगता था, जैसे छुट्टी के दिन, सब कुछ ठहरा हुआ हो।’27 उल्लेखनीय स्तर पर शांत रही पहले दिन की हड़ताल ने अमेरिका के श्रम आंदोलन के इतिहास में बड़ा अध्याय जोड़ दिया था

3 मई को हड़ताली फिर सड़क पर थे। इस बार मैकार्मिक हार्वेस्टर कंपनी के अलावा ‘लंबर शोवर’ के 6000 कर्मचारी भी सड़क पर थे। गौरतलब है कि मैकार्मिक कंपनी में 16 फरवरी, 1886 से लॉकआउट चल रहा था। उसके कर्मचारी पिछले तीन महीनों से काम न मिलने के कारण क्षुब्ध थे। सच तो यह है कि वे हताश हो चुके थे। इसलिए उनमें दो वर्ग बन चुके थे। हड़ताली मजदूर मैकार्मिक हार्वेस्टर से थोड़ा हटकर जमा हुए थे। कुछ और हड़ताली वहां पहले से ही जमा थे। कुल लगभग 15000 हडताली वहां जमा थे। हड़ताल का नेतृत्व कर रहे नेताओं में से एक ऑगस्ट स्पाइस ने जोरदार भाषण दिया था। अपने भाषण में उसने पूंजीवादी दमन, उसकी क्रूरताओं और कुटिलताओं पर चर्चा की थी। कहा था कि मजदूरों की हालत गुलामों से भी बदतर है। उसने मजदूरों से अपील की थी कि एकजुट होकर खड़े रहें। अपने मालिकों और हड़ताल तोड़ने वालों को बीच में न घुसने दें। मजदूर सावधान थे। हड़ताली मजदूर सड़क पर आकार मार्च करने लगे। इस बीच उनके बीच कुछ भेदिये भी आ मिले थे, जिन्हें मजदूरों ने वापस लौटने को विवश कर दिया था। मजदूरों का जुलूस शांतिपूर्वक आगे बढ़ रहा था। चारों तरफ से जत्थे निकलकर उसमें शामिल हो रहे थे। तभी हड़तालियों पर पत्थरों, ईंटों और लाठीडंडों से मार पड़ने लगी। मजदूर समझ पाएं, तभी 200 पुलिसकर्मियों का जत्था उनके सामने पहुंच गया। बिना किसी चेतावनी के लिए उसने मजदूरों पर लाठियों और बंदूकों से हमला कर दिया। उसमें चार मजदूरों की मृत्यु हो गई। अनेक घायल हो गए।28

3 मई की घटना के बारे में शिलिंग नामक मजदूर ने पीटर आल्टगोल्ड के सामने इस प्रकार बयान दिया था—‘‘मैकार्मिक कारखाने पर आयोजित प्रदर्शन सिर्फ लंबर शोवर्स यूनियन का ही प्रदर्शन नहीं था, वहां पर मैकार्मिक कारखाने के भी एक हजार से अधिक हड़ताली मजदूर थे। हालांकि ऑगस्ट स्पाइस वहां बोला था, पर उसने गड़बड़ी करने का नारा नहीं दिया था। उसने एकता का आह्वान किया था….गड़बड़ी तो तब शुरू हुई जब हड़तालभेदिये कारखाने से बाहर जाने लगे। हड़तालियों ने उन्हें देख लिया और भला-बुरा कहना, गालियां देना शुरू कर दिया जो यहां दोहराने लायक नहीं हैं। उस दृश्य की कल्पना करो। दो यूनियनों के छह हजार हड़ताली मजदूर बाहर सभा कर रहे हैं और उनकी नजरों के सामने से हड़ताल भेदिये चले जा रहे हैं। मैंने देखा वहां क्या हुआ। मैकार्मिक के हड़ताली कारखाने की ओर बढ़ने लगे। किसी ने उनसे कहा नहीं था। किसी ने उन्हें उकसाया नहीं था। उन्होंने सुनना बंद कर दिया था और वे फाटकों की ओर बढ़ रहे थे। हो सकता है उन्होंने कुछ पत्थर उठा रखे हों, हो सकता है उन्होंने भद्दी बातें कही हों। लेकिन उनके कुछ कहने से पहले की कारखाने की पुलिस ने गोलियां चलानी शुरू कर दीं। हे भगवान लगता है, जैसे कोई युद्ध हो। हड़ताली निहत्थे और पुलिस मानो चांदमारी कर रही हो, पिस्तौलें हाथभर की दूरी पर थीं। रायफलें भी तनी हुई थीं—धांय, धांय, धांय…..मजदूर ऐसे गिर रहे थे, जैसे लड़ाई का मैदान हो। जब उन्होंने टिककर खड़े होने की कोशिश की तो पुलिस वाले चढ़ दौड़े और लाठियों से पीटकर उन्हें अलग कर दिया। जब वे तितर-बितर होकर दौड़े तो पुलिसवालों ने उनका पीछा किया। पीछे से लाठियां बरसाईं। देखा नहीं जाता था। वह क्रूरता थी। बहशीपन था। भाग जाने का मन कर रहा था। लगता था कै हो जाएगी। और यही किया मैंने.’29

ऊपर के विवरण से स्पष्ट है कि हड़तालियों पर पुलिस का हमला न केवल आकस्मिक, अपितु पूर्वनिर्धारित षड्यंत्र जैसा था। क्रोधित ऑगस्ट स्पाइस अराजकतावादी दैनिक आर्बीटर जाइटुंग के कार्यालय में पहुंचा था। वहां उसने हड़तालियों के नाम एक पोस्टर जारी किया। उसका शीर्षक था—‘बदला।’ घटना के कुछ ही घंटों बाद सड़कें उन पोस्टरों से पटी हुई थीं—

‘‘तुम्हारे मालिकों ने अपने शिकारी कुत्ते, पुलिस भेज दी है। इस दोपहर उन्होंने मैकार्मिक के पास तुम्हारे छह साथियों को मार गिराया है। उन्होंने उन गरीब दुखियारों को मार गिराया है, क्योंकि तुम्हारी तरह उन्होंने भी अपने मालिकों के आगे झुकने से इन्कार कर दिया था….तुम वर्षों से अंतहीन असमानता को झेलते आ रहे हो। तुम उनके लिए मृत्युपर्यंत काम करते हो। उनके लिए तुम अपनी इच्छाओं के साथसाथ, अपनी और अपने बच्चों की भूख को अनंतकाल से दबाते आए हो। यहां तक कि अपने बच्चों को भी तुमने अपने मालिकों के लिए कुर्बान कर दिया है। तुम हमेशा से दुखियारे और आज्ञाकारी गुलाम रहे हो। क्यों? अपने सुस्त और चोर मालिकों के अंतहीन लालच और उनकी तिजोरियों को भर देने के लिए….

यदि तुम इंसान हो, यदि तुम अपने उन पूर्वजों की संतान हो, जिन्होंने तुम्हें आजाद करने के लिए अपनी कुबार्नियां दी हैं, तो महाशक्तिशाली हरकुलिस की तरह उठो। और उन छिपे हुए राक्षसों का अंत कर दो, जो तुम्हें मिटा देना चाहते हैं। हथियार उठाओ….हम तुमसे कहते हैं….हथियार उठा लो।’’30

5

4 मई की सुबह ‘दि आर्बीटर जाइटुंग’ के मुख्य पृष्ठ पर मोटे अक्षरों में छपा था—

खून! असंतुष्ट मजदूरों की सेवा के लिए सिर्फ गोली और बारूद….यह है कानून और पुलिस! वे महलों में महंगी शराब से अपने जाम भरकर कानून और पुलिस के खूनी दरिंदों के स्वास्थ्य की कसमें उठा रहे हैं। गरीब और दुखियारो, अपने आंसू पोंछ डालो। अपनी ताकत को पहचानकर उठे खड़े हो और इस बेईमान शासन को धूल में मिला दो।’31

रातभर में पोस्टरों और पर्चों की एक और खेप सड़कों पर आ चुकी थी। लिखा था—‘मजदूरो, हथियार बांध लो। पूरी ताकत के साथ मोर्चे पर डट जाओ।’ पूरा शहर अफवाहों से भरा हुआ था। दोपहर होते-होते हेमार्किट चौक पर भीड़ जुटने लगी। उपस्थित श्रमिकों में बहुत से बेरोजगार थे। भूख से व्याकुल थे। अनेक लोग ऐसे भी थे, जिनके पास सिर छिपाने के लिए कोई ठिकाना तक नहीं था। सैकड़ों ऐसे थे जिनके सिर पर महीनों से मंदी की तलवार लटकी हुई थी। ऐसा लग रहा था कि जो वे कर रहे या करने जा रहे हैं, खुद को और अपने परिवार को बचाए रखने के लिए, उसके अलावा उनके पास दूसरा कोई रास्ता ही नहीं है। उनके पूंजीपति मालिक उन्हें रोजगार देते हैं। लेकिन उनके सपने देखने के अधिकार को छीन लेना चाहते है। यदि कोई सपना बचता-बचाता कहीं से चला आए तो वे उसे नोंचने पर उतारू हो जाते हैं। उनके नेताओं ने उन्हें सपना देखना सिखाया है। अपने ऊपर विश्वास करना सिखाया है। बताया है कि अपनी तमाम लाचारी, बेकारी, हताशा, विपन्नता और दैन्य के बावजूद वे इन्सान हैं। सपने देखने का हक उन्हें भी है। संगठन उनके सपनों के पूरा होने का भरोसा दिलाता है। सपने पूरे हों न हों, लेकिन वे सपनों को छोड़ना नहीं चाहते। 8 घंटे का कार्यदिवस तो असल में बहाना है। हड़ताल तो सपनों को बचाने के लिए है। जीवन रहे या जाए, बस सपने बचे रहें

पूरा शहर दो हिस्सों में बंट चुका था। एक ओर मजदूर थे। भूख और बेरोजगारी के मारे हुए, ठंडे, गरीब और बदहाल। उन्हीं के सामने, उनकी ओर बंदूकें थामें, पुलिस के सिपाही और सुरक्षाबल थे। उनमें और मजदूरों में ज्यादा अंतर नहीं था। बल्कि उन्हीं के बीच से निकलकर आए थे। उन्हीं के भाई-बंधुपड़ोसीरिश्तेदार थे। मालिकों ने उन्हें बंदूकें और लाठियां थमायी थीं। उन हथियारों का असर था कि अब वे अपने ही भाई-बंधुपड़ोसी या रिश्तेदारों को पहचानने को भी तैयार न थे। मालिकों के इशारे पर वे कुछ भी कर सकते थे। दूसरी ओर बड़े-बड़े उद्योगपति, व्यापारी, पूंजीपति, राजनेता और व्यापारी थे। उनके पास धन था। ताकत थी। अखबार थे, जिनके मदद से वे अपने झूठ को भी सच बनाते आए थे। अपने वर्चस्व को बचाने के लिए वे कुछ भी करने को तैयार थे।

अचानक आसमान घिर आया। तेज हवाएं चलने लगीं। ऊपर काले बादलों की मोटी परत छा गई। फिर बूंदाबांदी होने लगी। मानो मौसम उन्हें सावधान कर देना चाहता हो। मैदान पर उस समय मात्र तीन हजार लोग थे। जिनमें स्त्री-पुरुष, बच्चेबड़े सभी शामिल थे। मजदूर नेता भाषण दे रहे थे। उनके भाषण में हिंसा की कोई बात नहीं थी। पार्संस ने अर्थव्यवस्था पर बात रखी थी। समानांतर से रूप से उसी समय कारखाना मालिकों की भी गुप्त बैठक चल रही थी। गोपनीय ढंग से आदेश आ-जा रहे थे। घटना स्थल से थोड़ी दूर पर पुलिस स्टेशन था। वहां पुलिस कप्तान पूरे दल-बल के साथ मौजूद था। इस बीच मौसम कुछ और खराब हुआ था। झील की ओर से आती तेज-ठंडी हवाएं चल रही थीं। उससे पहले कि तूफान आए लोग घर लौट जाना चाहते थे।

उस समय शिकागो के मेयर कार्टर एच. हरीसन थे। अपनी लोकप्रियता के दम पर चौथी बार मेयर चुना गया था। हरीसन झुकाव मजदूरों की ओर था। शिकागो को वह अपनी ‘दुल्हन’ मानता था। वह चाहता था कि मजदूर उसपर भरोसा करें—‘मैं चाहता हूं कि लोग यह जान लें कि उनका मेयर यहीं पर है।’32 कार्यघंटों के लिए चल रहे आंदोलन के दौरान उसने अपनी ओर से तनाव को कम करने की पूरी कोशिश की थी। उसने यह कहते हुए कि मजदूर भी शिकागो के नागरिक हैं, सुरक्षा बलों को बुलाने से इन्कार कर दिया था। लेकिन मेयर होने के बावजूद सब कुछ उसके नियंत्रण में नहीं था। अनजाना भय उसे खाए जा रहा था। घबराया मेयर कभी निकट के पुलिस स्टेशन पर जाता तो कभी हेमार्किट चौक पर लौट आता था। थाने में कुछ सिपाही तैयार बैठे थे। कुछ काली पोशाक पहले लोग भी वहां थे।33 बावजूद इसके मेयर के लिए मजदूरों की सभा ‘अनुशासित’ थी। उसके नेताओं के भाषण अहिंसक थे।

10 बजे, मेयर हरीसन अपने बुझे हुए सिगार को चबाता हुआ पुलिस स्टेशन पहुंचा। और वहां मौजूद पुलिस अधिकारी से बोला—‘ऐसा कुछ भी होने की संभावना नहीं है, जिससे हस्तक्षेप की जरूरत पड़े।’ इसके बाद वह घर चला गया। मानो सब मेयर के वहां से चले जाने की प्रतीक्षा में हों। उसके जाने के 15 मिनट के भीतर ही पुलिस इंस्पेक्टर ने अपने सहायक से सारी पुलिस को आगे बढ़ने को कहा। उसमें 176 अधिकारी थे। आदेश मिलने पर वे घटनास्थल की ओर बढ़ने लगे। पुलिस इंस्पेक्टर बोनाफाइड को संभवतः उसे किसी बड़े अधिकारी, कदाचित मेयर से भी ऊंचे अधिकारी, का आदेश मिला था, जो निस्संदेह दंगा कराना चाहता था34

उस समय फील्डेन का भाषण चल रहा था। हड़ताली घर वापसी की तैयारी कर रहे थे। बारिश के कारण अधिकांश जा भी चुके थे। मैदान पर अब केवल 500 लोग जमा थे। फील्डेन आखिरी वक्ता था। वह अपने भाषण को समेटना चाहता था। पुलिस इंस्पेक्टर को करीब आते देख उसने कहा—‘यहां सब कुछ शांतिपूर्वक है। बस कुछ मिनट दीजिए, हम सब जाने ही वाले हैं।’ उसके बाद वह वहां उपस्थित लोगों की ओर मुड़ा और अपने भाषण का समापन करते हुए कहने लगा, ‘और अंत में….तभी उसने पुलिस के दस्ते को आंदोलनकारियों की ओर बढ़ते हुए देखा। मंच से कुछ फुट दूर रहने पर इंस्पेक्टर ने सिपाहियों को रुकने का आदेश दिया ओर स्वयं मंच की ओर बढ़ा। फील्डेन के पास पहुंचकर उसने जोर से कहा—‘मैं तुम्हें गिरफ्तार करता हूं।’

मैं लोगों की ओर से तुम्हें अभी इसी क्षण यहां से शांतिपूर्वक हट जाने का आदेश देता हूं।’ उसकी बात सुनते ही वहां शांति पसर गई। अब केवल हवाओं का शोर था जो झील से होकर आ रही थीं। आसमान में बादल मंडरा रहे थे।

किसलिए कैप्टन, यहां सब शांतिपूर्वक चल रहा है।’ फील्डेन ने कहा। फील्डेन ने गलत नहीं कहा था। बैठक पिछले सात-आठ घंटों से शांतिपूर्वक जारी थी। किसी भी पक्ष ने शिकायत का अवसर नहीं दिया था। एक सफल बैठक के शांतिपूर्वक समापन के अवसर पर फील्डेन इसके अलावा कुछ और कह ही नहीं सकता था। बावजूद इसके पुलिस की ओर से जो फील्डेन का जो बयान अदालत के सामने पेश किया गया, वह उपर्युक्त बयान से पूर्णतः भिन्न था। पुलिस रिकार्ड के अनुसार फील्डेन के शब्द थे, ‘यहां कुछ शिकारी कुत्ते हैं! जाओ, अपना काम करो और मैं अपना काम करूंगा।’ फील्डेन के बयान के बाद वहां पुनः शांति छा गई। हालांकि भविष्य में क्या होने वाला है, कुछ लोग यह अवश्य जानते थे

और तब अचानक, एक भयानक विस्फोट हुआ। तेज रोशनी में कुछ चेहरे दमके, और वातावरण दुर्गंध से भर गया। पुलिस की टुकड़ी की दायीं ओर से फैंका गया, हवा में लहराता हुआ बम स्पीकर स्टेंड से कुछ फुट दूरी पर फटा था। इसी के साथ वहां अव्यवस्था फैल गई। क्या हुआ किसी की कुछ समझ में नहीं आया। बम किसी अराजकतावादी ने फैंका था अथवा किसी उपद्रवी ने, अथवा पूंजीपतियों ने मिलकर हड़ताली नेताओं के विरोध में साजिश रची थी। या किसी सिरफिरे का काम था—इस बारे में अंत तक कुछ पता नहीं चला। हड़बड़ी में पुलिस ने भी फायरिंग शुरू कर दी। उधर मजदूर भी गोलियां बरसाने लगे। बम का धुंआ फैलने से कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था। पुलिस मजदूरों के साथ अपने साथियों पर भी गोली चला रही थी। बदहवासी का वह आलम 2-3 मिनट में समाप्त हो गया। उसके बाद किसी की लाश जमीन पर पड़ी थी। कोई घायलों में अपने मित्र, परिचित या रिश्तेदार को खोज रहा था। कोई खुद घायल पड़ा कराह रहा था। कानून की तरफ से 7 पुलिसकर्मियों की मृत्यु हुई थी। 67 घायल हुए थे35 मजदूरों की ओर से मरने वालों तथा हताहतों की संख्या उससे कई गुना था। परंतु सचमुच कितनी थी, यह कभी पता नहीं चल सका। अगले दिन के अखबारों ने मुख्यपृष्ठ पर उस घटना को जगह दी थी। सभी ने अराजकतावाद को अमेरिकी लोकतंत्र के लिए खतरा बताया था।

आठ अराजकतावादी नेता, अल्बर्ट पार्संस, ऑगस्ट स्पाइस, सेमुअल फील्डेन, ऑस्कर नीबे, माइकल श्वाब, जार्ज एंजिल, एडोल्फ फिशर तथा लुईस लिंग्ग को गिरफ्तार कर दिया गया। आठों मामूली मजदूर और कारीगर थे। अल्बर्ट पार्संस, प्रिंटिंग प्रेस का मजदूर था; और ‘अलार्म’ नाम का अख़बार निकलता गस्ट स्पाइस फर्नीचर तैयार करने वाला बढ़ई। फिशर भी प्रिंटिंग प्रेस में काम करता था। जार्ज एंजिल खिलौने बेचता था। ऑस्कर नीबे के अनुसार, एंजिल मजदूर वर्ग के संघर्ष का एक बहादुर सिपाही था। वह मेहनतकशों की मुक्ति के लिए जीजान लड़ा देने वाला बागी था।’ सेमुअल फील्डेन कारखाने में सामान की ढुलाई करने वाला साधारण मजदूर था। वह कहा करता था, ‘लिखनेपढ़ने वालों के बीच से अगर कोई क्रांतिकारी बन जाए तो आमतौर पर उसे गुनाह नहीं माना जाता। लेकिन अगर कोई गरीब क्रांतिकारी बन जाए तो वह भयंकर गुनाह हो जाता है।’ लुईस लिंग्ग बढ़ई था। विचारों से अराजकतावादी लिंग्ग के क्रांति रग-रग में बसी थी। वह कहा करता था, ‘मजदूरों को दबाने के लिए ताकत का इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए उसका जवाब भी ताकत से ही दिया जाना चाहिए।’ माइकल श्वाब बुकबाइंडर था। ऑस्कर नीबे साधारण मजदूर संगठनकर्ता था। दिल का साफ और सरल। उसकी खमीर बेचने वाली एक दुकान में भागीदारी थी।

आठों पर हत्याओं का आरोप था। लेकिन एक को भी बम फैंकने का आरोपी नहीं बताया गया था। बम वास्तव में किसने फैंका था, यह कभी पता नहीं चल सका। साफ था कि अदालत को उन नेताओं के कारनामे से ज्यादा उनकी विचारधारा से चिढ़ थी। हालांकि केवल ऊपर दिए गए नामों में से मात्र 3 नेता ही घटनास्थल पर मौजूद थे। बावजूद इसके जज जोसेफ ई. गैरी की अध्यक्षता में जूरी का गठन किया गया था, जो एक प्रतिक्रियावादी राजनेता था। अदालत ने उन सभी को फांसी की सजा सुनाई। यह वही अमेरिका था जिसने अपने संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ससम्मान अपने संविधान में जगह दी थी, और उसके लिए अपनी पीठ थपथपाता था। उसी अमेरिका में 8 लोगों को फांसी की सजा इसलिए सुनाई गई थी, क्योंकि वे खास विचारधारा में विश्वास रखते थे। लोकतांत्रिक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सबसे बड़े दावेदार अमेरिका के लिए तो वह कलंक जैसा था यह हुआ क्योंकि वहां का लोकतंत्र पूंजीपतियों के कब्जे में जा चुका था। जूलिस ग्रिनेल्ल जिसकी राजनीतिक संपर्क किसी से छिपे न थे, को मुदकमे का एटोर्नी बनाया गया था। जूरी के सामने अपने तर्क का समापन उसने इन शब्दों में किया था—

यह कानून की परीक्षा है, अराजकता की परीक्षा है। इन लोगों को जिन्हें सामने लाया गया है, जिन्हें इस महान जूरी द्वारा अभियुक्त ठहराया गया है, और चिन्हित किया गया है, क्योंकि वही नेता थे। ये उन हजारों लोगों से बड़े अपराधी नहीं हैं जो इनका अनुसरण करते हैं। जूरी के माननीय सदस्यो, इन लोगों को दंडित करो। फांसी पर लटकाकर इन्हें दूसरों के लिए नजीर बनाओ, और हमारी संस्थाओं और हमारे समाज की रक्षा करो36

11 नवंबर 1887 को पार्सन्स, स्पाइस, जार्ज एंगेल्स और एडोल्फ फिशर को मृत्युदंड दे दिया गया। लुईस लिंग्ग ने जल्लाद को फांसी लगाने का मौका तक नहीं दिया। उसने अपने मुंह में विस्फोटक दबाकर खुद को उड़ा दिया था। विस्फोटक सिगार की आकृति में लाया गया था। लाने वाला लिंग्ग का करीबी दोस्त था। जिस दिन उन्हें दफनाया गया, उस दिन उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए 600000 लोग शिकागो की सड़कों पर थे। फील्डेन, नीबे और श्वाब की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया। पूंजीवादी मीडिया ने, जिसे बुद्धिजीवियों ने मुख्यधारा का मीडिया कहना आरंभ कर दिया था, अराजकतावाद, समाजवाद आदि की इतनी आलोचना की कि इन्हें अमेरिका के लिए निषिद्ध मान लिया गया। मुदकमें के दौरान आठों अभियुक्तों को अदालत को संबोधित करने का अवसर मिला था। फील्डेन ने तीन घंटे समाजवाद सहित मजदूरों की समस्या पर भाषण दिया था। उसने कहा था—

‘‘आज, ठंडी मनभावन हवाओं के साथ शरत्काल की रुपहली किरणें हर आजाद ख्याल इंसान के चेहरे को स्पर्श कर रही हैं। लेकिन मैं यहां अपने चेहरे को फिर कभी सूर्य-रश्मियों में स्नान न कराने के लिए खड़ा हूं। मैं अपने साथियों से प्यार करता हूं। मैं अपने आप से प्यार करता हूं। मैं धोखेबाजी, बेईमानी और अन्याय से नफरत करता हूं। यदि इससे कुछ भला होगा, तो मैं मुक्त भाव से इन्हें अपना लूंगा।’

स्पाइस का भाषण जोशीला था—

यदि तुम सोचते हो कि हमें फांसी पर चढ़ा देने से तुम मजदूर आंदोलन को दबा दोगे, तब बुलाओ अपने जल्लाद को….तुम इसे नहीं समझ सकते।’

नीबे;

ठीक है, यह सब अपराध था मैं मान लेता हूं: मैंने मजदूर आंदोलनों को संगठित किया था। मैं कार्यघंटों को सीमित कराने को, मजदूरों की शिक्षा को, श्रमिकों के अखबार दाई आर्बीटर जाइटुंग को नए सिरे से आरंभ करने को समर्पित था। इसका कोई प्रमाण नहीं है कि बम फेंकने से मेरा कोई संबंध है, या मैं उसके पास था, या मैंने कुछ वैसा किया था।’

फिशर;

इन मांगों के लिए जितने ज्यादा लोग फांसी पर चढ़ाए जाएंगे, विचार उतनी ही जल्दी हकीकत बन जाएंगे

पार्संस;

मैं उनमें से एक हूं, यद्यपि मैं वृत्तिकदास हूं, जो मानता है कि यह मेरे लिए अपराध है, मेरे पड़ोसी के लिए गलत है….मेरे लिए यह….गुलामी से पीछा छुड़ाने अपना स्वामी आप बनने के लिए था….अनंत आकाश के नीचे यह मेरा इकलौता अपराध है।

एंजिल;

मैं भी ऐसे बहुत कुछ ऐसे व्यक्ति की तरह हूं, वर्तमान से टकराने से बचने की सोचता है। प्रत्येक विचारशील व्यक्ति को ऐसी सत्ता से जूझना चाहिए तो एक आदमी को कुछ ही वर्षों में विलासी और जमाखोर बना देती है, दूसरी ओर हजारों बेरोजगार आवारा और भिखमंगे बना दिए जाते हैं।’

श्वाब ने अराजकतावाद को परिभाषित करते हुए कहा था—

ऐसे समाज में जिसमें केवल सरकार को नीतिसंगत कहा जाता हो, ऐसे समाज में(बदल देना) जिसमें सभी मनुष्य सामान्य हितों के लिए नीतिसंगत कार्य करें और ऐसी चीजों से घृणा करें जो सचमुच घृणा के योग्य हैं

लिंग्ग पूरी अदालती कार्रवाही के दौरान सबसे निर्भीक सबसे विद्रोही बनकर उभरा था। अपने दिलेर और तिरस्कारपूर्ण भाषण में उसने कहा था—

मैं फिर याद दिलाता हूं कि मैं आज के ‘कानून’ का दुश्मन हूं। और मैं फिर से यह दोहराता हूं कि जब तक भी मेरे शरीर में सांस रहेगी, अपनी पूरी शक्तियों के साथ में इससे जूझता रहूंगा। मैं साफ तौर पर, सबके सामने कहता हूं कि मैं बलप्रयोग का हिमायती था। मैंने कैप्टन स्काक से कहा था(जिसने उसे गिरफ्तार किया था) और मैं आज भी उसपर कायम हूं, ‘यदि तुम हम पर गोली चलाओगे, हम तुम्हें बम से उड़ा देंगे। ओह! तुम्हें हंसी आ रही है! शायद तुम सोचते हो, ‘तुम और ज्यादा बम नहीं फेंक सकते।’ परंतु मुझे यह विश्वास है कि मैं फांसी के फंदे पर पर भी इसी तरह खुशी-खुशी चढ़ जाऊंगा और मुझे आपको आश्वस्त करना चाहिए कि सैकड़ों, हजारों लोग ऐसे होंगे जो मेरे इन शब्दों को याद रखेंगे, वे बम फैंकना जारी रखेंगे। इस उम्मीद के साथ मैं आपको कहना चाहूंगा कि मैं आपसे घृणा करता हूं! आपके ‘आदेश’ आपके कानून, बलप्रयोग पर टिकी आपकी सत्ता से नफरत करता हूं। इसके लिए मुझे फांसी पर लटका दिया जाए।’

उन आठों ने अदालत के सामने जो कहा था, वह मुख्यधारा के अखबारों में ठीक उसी भावना के साथ भले ही न आया हो, लेकिन बाद में इश्तहारों, पर्चों और पोस्टरों के रूप में लोगों के बीच फैल गया आज भी उनके विचार लोगों को प्रभावित करते हैं दुख की बात यह नहीं है कि लाखों मजदूरों के समर में उतरने के बावजूद अमेरिका में 1 मई, 1886 की क्रांति की नाकाम क्यों रही थी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जिस अमेरिका ने अब्राह्मम लिंकन के नेतृत्व में दासता को शिकस्त दी थी जिसके पास थॉमस जेफरसन और मानव थॉमस पेन ने द्वारा तैयार किया गया आधुनिकतम संविधान था ऐसा संविधान जो नागरिक अधिकारों को राज्य के अधिकारों जितना ही महत्त्व देता था—वह सातआठ दशक के भीतर ही वह अप्रासंगिक क्यों होने लगा था क्यों उनके विरुद्ध मजदूरों को कामगारों को खड़ा होना पड़ा जो लोकतंत्र से सर्वाधिक उम्मीद पाले रहते हैं, और जिन्हें उसकी सर्वाधिक आवश्यकता पड़ती है—वहां अराजकतावाद को जमीन कैसे मिली इस प्रश्न का उत्तर कुछ जटिल हो सकता है लेकिन यदि हम इसका उत्तर खोज लें तो भारतीय समाज में उभर रहे असंतोष, जिसे कुछ लोग भीड़तंत्र भी कह रहे हैं, का जवाब मिल सकता है

इस बारे में हम अभी सिर्फ इतना कहना आवश्यक समझते हैं कि अराजकतावाद लोकतंत्र का पुरोगामी दर्शन हैं। लोकतंत्र को न संभाल सकने वाली जनता, अराजकतावादी समाज गढ़ ही नहीं सकती। उसे संभालने के लिए लोकतंत्र से कहीं अधिक प्रबुद्ध जनता चाहिए। उस अवस्था में सत्ता परिवर्तन के लिए हिंसा गैर जरूरी हो जाती है। दूसरे शब्दों में अराजकतावाद का रास्ता लोकतंत्र की बहुविध सफलता से निकल सकता है। ऐसे लोकतंत्र से जो अपने नागरिकों के प्रबोधीकरण को भी आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक विकास जितना ही महत्त्व देता है। अमेरिकी क्रांति की असफलता के पीछे भी उसमें हिस्सेदारी कर रहे नेताओं तथा उनके अनुयायियों की अधूरी समझ थी। वे राज्य की आवश्यकता को समाप्त करने के बजाय, राज्य को ही समाप्त कर देना चाहते हैं। जबकि अराजकतावाद में राज्य समाप्त नहीं होता, अपनी खूबियों के साथ वह नागरिकों के रोजमर्रा के व्यवहार का हिस्सा बन जाता है। वह नागरिकीकरण की उच्चतम अवस्था है। इस बात को शिकागो के भोले-भाले मजदूर समझ ही नहीं पाए थे। इसलिए पूंजीवाद के शिकंजे में जकड़े हुए अमेरिकी राज्य की शक्ति द्वारा कुचल किए गए। अच्छा जनतंत्र चलाने की जिम्मेदारी नेताओं से ज्यादा जनता की होती है। जो जनता नेताओं पर जितनी कम निर्भर होगी, वह उतनी ही लोकतांत्रिक बन सकेगी
अमेरिका में 8 घंटे के कार्यदिवस की मांग 1836 से आरंभ हुई थी। 1864 में वह अमेरिकी मजदूरों की प्रमुख मांग बन चुकी थी। आखिरकार 1916 एडमसन एक्ट के माध्यम से अमेरिका रेलरोड वर्कर्स के लिए पहली बार 8 घंटे का कार्यदिवस लागू किया गया। फैक्ट्री मजदूरों को यह अधिकार मिला, फेयर लेबर स्टेंडर्डस् एक्ट—1938 के लागू होने के बाद। इस तरह से देखा जाए तो 8 घंटे के कार्यदिवस के लिए मजदूरों को एक शताब्दी से भी लंबा संघर्ष करना पड़ा था। चलतेचलते एक अवांतरसी चर्चा अमेरिका में धर्मसंसद का आयोजन 1893 में किया गया था कहा यह गया था कि धर्मसंसद का आयोजन क्रिस्ठोफर कोलंबस के अमेरिकी महाद्वीप पर पहुंचने की 400वीं सालगिरह के तौर पर मनाया गया था लेकिन क्या यही एकमात्र कारण था? ध्यान रहे कि हेमार्केट नरसंहार के दौरान ज्यादा नुकसान मजदूर पक्ष को उठाना पड़ा था लेकिन उससे न तो मजदूर अपनी मांगों को लेकर पीछे हटे थे न वहां समाजवादी आंदोलन में कमी आई थी फिर 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग और धर्मसंसद का क्या संबंध? सही मायने में तो यह शोध का विषय है। लेकिन जो लोग धर्म के अभिजन चरित्र को जानते हैं, जिन्होंने वोलनी, मोसका और परेतो को पढ़ा है, उनके लिए इस पहेली को सुलझा पाना कठिन नहीं होगा। आखिर क्या कारण है कि जिस अमेरिका में 8 घंटे के कार्यदिवस की मांग के समर्थन में सबसे बड़ी वर्गक्रांति ने जन्म लिया था, उस देश में वह मांग 1937 में मानी गई, जबकि दुनिया के छोटेबड़े दर्जनों देश 191819 में ही इसे मान चुके थे?
© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

1. अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग, दि हिस्ट्री ऑफ़ मे डे, इंटरनेशनल पंपलेट, 14, 799 ब्रोडवे, न्यू यार्क, पृष्ठ 3

2. वही पृष्ठ 3

3. वही, पृष्ठ 3

4. वही, पृष्ठ 4

5. जे. डेविड सेकमेन, मे डे एंड दि स्ट्रगल फॉर दि एट आवर डे इन कैलीफोर्निया

6. अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग, दि हिस्ट्री ऑफ़ मे डे, इंटरनेशनल पंपलेट, 14, 799 ब्रोडवे, न्यू यार्क, पृष्ठ 6

7. कार्ल मार्क्स, पूंजी, अध्याय 10, प्रोग्रेस पब्लिशर, मास्को, 2015, पृष्ठ 162,

8. संपत्ति क्या है? पियरे जोसेफ प्रूधों

9. मिखाइल बकुनिन, लेटर टू फ्रेंचमेन, ऑन दि प्रजेंट क्राइसिस, 1870

10. अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग, दि हिस्ट्री ऑफ़ मे डे, इंटरनेशनल पंपलेट, पृष्ठ 8

11. पॉल एवरिच, दि हेमार्किट ट्रेजेडी, प्रिंस्टन यूनीवर्सिटी प्रेस, पृष्ठ 182

12. पॉल एवरिच, पृष्ठ 182

13 अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग, दि हिस्ट्री ऑफ़ मे डे, इंटरनेशनल पंपलेट, 14, 799 ब्रोडवे, न्यू यार्क। पृष्ठ 10

14 दि इकोनॉमिक्स पर्फोमेंस इंडेक्स, इंटरनेशनल मोनेटरी फंड, वादिम खरामोव एंड जॉन राइडिंग्स ली, अक्टूबर 2013

15. माइकल हुबरमेन, वर्किंग हावर्स ऑफ़ दि वर्ल्ड यूनाइट?, न्यू इंटरनेशनल एवीडेंस ऑन वर्कटाइम, 1870-1900, पृष्ठ-19

16. डेविड मोबर्ग, एंटीयूनियनिज्म, एन्साइक्लोपीडिया ऑफ़ शिकागो, http://www.encyclopedia.chicagohistory.org/pages/55.html

17. जेनिस एल. रीफ, प्रेस एंड लेबर इन 1880, एन्साइक्लोपीडिया ऑफ़ शिकागो, http://www.encyclopedia.chicagohistory.org/pages/11407.html

18. अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग, दि हिस्ट्री ऑफ़ मे डे, इंटरनेशनल पंपलेट, 14, 799 ब्रोडवे, न्यू यार्क, पृष्ठ 10-11.

19. ऐरिक चेज द्वारा उद्धृत, दि ब्रीफ ओरीजिंस ऑफ़ मे डे, 1993

20. लुईस एडामिक, डायनामाइट : स्टोरी ऑफ़ क्लास वायलेंस इन अमेरिका, 1931, पृष्ठ-69

21. लुईस एडामिक, पृष्ठ-69

22. न्यू यार्क टाइम्स, 20 जुलाई 1886

23. पॉल एवरिच, दि हेमार्किट ट्रेजेडी, पृष्ठ 75

24. पॉल एवरिच, दि हेमार्किट ट्रेजेडी, पृष्ठ 75

25. ऐरिक चेज द्वारा उद्धृत, दि ब्रीफ ओरीजिंस ऑफ़ मे डे, 1993(कुछ स्थानों पर यह संख्या 400000 दी है)

26. अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग, पृष्ठ-11

27. मिशेल जे. स्काक, अनार्की एंड अनार्किस्ट, एफ. जे. स्कल्ट एंड कंपनी, न्यू यार्क, 1889, पृष्ठ-83

28. अनार्किस्ट ओरीजिन ऑफ़ मे डे, लीफलेट बाई वर्कर्स सोल्डरिटी मूवमेंट.

29. हॉवर्ड फ़ास्ट, शिकागो के शहीद मजदूर नेताओं की कहानी, राहुल फाउंडेशन, पृष्ठ-16

30. लुईस एडामिक, डायनामाइट : स्टोरी ऑफ़ क्लास वायलेंस इन अमेरिका, 1931, पृष्ठ-70

31. लुईस एडामिक, डायनामाइट, पृष्ठ-71

32. लुईस एडामिक, डायनामाइट, पृष्ठ-71

33. लुईस एडामिक, डायनामाइट, पृष्ठ-71

34. लुईस एडामिक, डायनामाइट, पृष्ठ-74

35. उपर्युक्त, पृष्ठ-74

36. उपर्युक्त, पृष्ठ-72

महात्मा ज्योतिबा फुले और ‘सत्यशोधक समाज’

सामान्य

अच्छे विचार जब तक उनपर अमल न किया जाए, महज अच्छे सपनों की तरह होते हैं….केवल कर्म ही हैं, जो किसी विचार को मूल्यवान बनाते हैं.—इमर्सन

वर्ष 1873, सिंतबर महीने का 24वां दिन. महाराष्ट्र का मुंबई के बाद दूसरे सबसे बड़े महानगर पुणे का जूनागंज मुहल्ला, मकान नंबर 527. सभागार में पुणे सहित महाराष्ट्र के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से पहुंचे करीब 60 लोग जमा थे. उन्हें ज्योतिबा ने आमंत्रित किया था. बाकी का आना जारी था. ज्योतिबा स्वयं अतिथियों की अगवानी करने में लगे थे. उस समय तक उनकी प्रतिष्ठा शिखर पर पहुंच चुकी थी. पूरा महाराष्ट्र, खासकर पुणे ज्योतिबा को लेकर दो हिस्सों में बंटा हुआ था. एक ओर वे लोग थे जो उनके विकास-पुरुष कहकर उनका सम्मान करते थे. महाराष्ट्र में शिक्षा-क्रांति के जन्मदाता के रूप में उनका सम्मान करते थे. दूसरी ओर थे कट्टरपंथी ब्राह्मण, जिन्हें बदलाव के नाम से ही चिढ़ थी. साथ में वे लोग भी थे, जो अपना दिलो-दिमाग ब्राह्मणवाद के आगे गिरवी रख चुके थे. समाज में व्याप्त अशिक्षा, आडंबरवाद और जातीय विषमता के विरोध में संघर्ष करते हुए फुले को 25 वर्ष से अधिक हो चुके थे. इस बीच उनके संघर्ष का दायरा बढ़ा था. अब उन्हें लगता है कि आगे के सफर के लिए कुछ सहयोगियों को साथ रखना जरूरी होगा. काम समाज का है तो जितने ज्यादा से ज्यादा लोग साथ निभाएं उतना ही अच्छा.

इसी पर विचार करने के लिए महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों से बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को आमंत्रित किया गया था. सभा में ज्योतिबा ने जोरदार भाषण दिया. कहा कि समाज को जातिवाद, पुरोहितवाद, अंधविश्वास और अशिक्षा के दुष्चक्र से बाहर लाने के लिए लोगों को जागरूक करना होगा. यह काम अभी तक सब अपने-अपने स्तर पर करते आ रहे हैं. इस बीच उनके विरोधी संगठित हुए हैं. इसलिए आंदोलन को मजबूती से आगे बढ़ाने के लिए उन्हें मजबूत संगठन की आवश्यकता है. उपस्थित लोगों ने हर्षध्वनि के साथ प्रस्ताव पर मुहर लगा दी. संगठन को नाम दिया गया—‘सत्यशोधक समाज’. ज्योतिबा ने नवगठित संगठन के अध्यक्ष और खजांची का पद-भार संभाला. सचिव का दायित्व सौंपा गया—नारायणराव गोपालराव कडलक को. ज्योतिबा के तीन ब्राह्मण मित्रों विनायक बापूजी भंडारकर, विनायक बापूजी डांगले और सीताराम सखाराम दतार की भी संगठन के निर्माण में प्रमुख भूमिका थी. समाज के तीन प्रारंभिक उद्देश्य थे. पहला—ईश्वर एक है, सब उसकी संतान हैं. दूसरा—जैसे माता-पिता से संवाद के लिए किसी बिचौलिए की आवश्यकता नहीं पड़ती, वैसे ही ईश्वर की अराधना के लिए भी किसी मध्यस्थ यानी पुरोहित की जरूरत नहीं है. तीसरा—किसी भी जाति, धर्म को मानने वाला कोई भी व्यक्ति जो समाज के उद्देश्य और लक्ष्य के प्रति एक-भाव रखता हो, उसका सदस्य बन सकता है.

उस समय देश-भर में राजा राममोहनराय का ‘ब्रह्म समाज’, केशवचंद सेन का ‘प्रार्थना समाज’, महादेव गोविंद रानाडे का ‘पुणे सार्वजनिक सभा’—जैसे अनगिनत संगठन समाज-सुधार के क्षेत्र में कार्यरत थे. ऐसे में नए संगठन की क्या आवश्यकता थी? दरअसल उस समय तक जितने भी संगठन समाज सुधार के क्षेत्र में काम कर रहे थे, सभी द्विजों द्वारा, द्विजों की हित-सिद्धि हेतु बनाए गए थे. उनके लिए बस इतना समाज-सुधार अभीष्ट था कि चमार के घर में जन्म लेने वाला चमार रहे, जूते गांठे, मरे पशुओं की खाल निकाले, जरूरत पड़ने पर जमींदार की बेगार बजाए, उसी से संतुष्ट रहें. बस इतना हो कि काम के आधार पर उन्हें कोई ओछा न माने. किसी तरह का दुव्र्यवहार उसके साथ न हो. शिक्षा के मामले में राजा राममोहनराय सहित उस समय के द्विज समाज सुधारकों का सोच था कि पहले ऊंची जातियां पढ़-लिख जाएं. वे पढ़-लिख जाएंगी तो नीचे तक शिक्षा अपने आप चली जाएगी. यह अर्थशास्त्र के प्रचलित सिद्धांत—‘ट्रिकिल डाउन थियरी’ जैसा था, जिसे हिंदी में ‘रिसाव का सिद्धांत’ कह दिया जाता है. उसके अनुसार ऊपर के स्तर पर समृद्धि होगी तो बूंद-बूंद रिसकर नीचे भी आएगी. इस सिद्धांत की आलोचना उसकी शुरुआत से ही होने लगी थी. बावजूद इसके अधिकांश समाज-सुधारक ‘रिसाव के सिद्धांत’ पर भरोसा कर, काम करते रहे. उनसे पूछा जा सकता था कि शताब्दियों तक कथित विश्व-गुरु रहने के बावजूद भारत में निचली जातियां अज्ञान के अंधकार में क्यों दबी थीं? ऊपर के वर्गों की शिक्षा, उनकी ज्ञान-संपदा और चालाकियां निचले वर्गों तक क्यों अंतरित नहीं हुईं? यह भी पूछा जा सकता था के ‘महासागर’ के लोकहित में पुनः-पुनः उमगने, सभी को साथ लेकर चलने से किसने रोका था? जो लोग 2000-2500 वर्षों में तक ऊपर के वर्गों की समृद्धि और ज्ञान संपदा नीचे रिसने से रोके रहे, क्या वे उनके कहने भर से एकाएक मान जाएंगे? ज्योतिबा का स्पष्ट मत था कि वे नहीं मानने वाले. ब्राह्मण तो हरगिज नहीं, क्योंकि वर्तमान वर्ण-व्यवस्था उनके आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक हितों की पूर्ति करती है. शताब्दियों से बिना कुछ किए-धरे मिल रहे मान-सम्मान, जिसे वे दैवीय कहते हैं, को छोड़ना उनके लिए संभव नहीं. इसलिए बहुजन शूद्र-अतिशूद्रों को अपने विकास के लिए प्रयास स्वयं ही करने होंगे. इसके लिए एक सशक्त संगठन की जरूरत थी. ऐसे सक्रिय, जुझारू और ईमानदार लोगों की जरूरत थी जो संगठन के आदर्शों की प्रति समर्पित होकर लगातार काम कर सकें. उससे पहले जितने भी संगठन थे, सभी समाज के शीर्ष वर्ग के सदस्यों ने गठित किए थे. ‘सत्यशोधक समाज’ ऐसा संगठन था जिसकी स्थापना समाज के बहुजन शूद्रों अतिशूद्रों ने अपने अधिकारों की बहाली के लिए स्वयं की थी. ‘सत्यशोधक समाज’ के पहले वर्ष की रिपोर्ट में कहा गया था कि उसकी स्थापना—

‘ब्राह्मण, पंडित, जोशी, उपाध्याय-पुरोहित आदि लोगों, जो अपने स्वार्थी (धर्म)ग्रंथों द्वारा हजारों वर्षों से शूद्रों को नीच समझकर लूटते आ रहे हैं—से मुक्त करने के लिए की गई है. इसलिए उपदेश और ज्ञान के द्वारा लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने; अर्थात धर्म एवं व्यवहार से संबंधित ब्राह्मणों के छदम्, स्वार्थी ग्रंथों से जनसाधारण को मुक्ति दिलाने हेतु कुछ जागरूक शूद्रों ने इस समाज की स्थापना की है.’

‘सत्यशोधक समाज’ पूरी तरह से गैर-राजनीतिक संगठन था. राजनीतिक सवालों पर बोलना उसमें सख्त मना था.  यह फुले का जनता पर प्रभाव और अनूठी कार्यशैली थी कि ‘सत्यशोधक समाज’’ को पांव जमाते देर न लगी. स्थापना के कुछ ही महीनों में मुंबई और पुणे के शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में उसकी शाखाएं स्थापित होने लगीं. उसका प्रभाव लगभग सभी शूद्र ओर अतिशूद्र जातियों पर था, फिर भी माली और कुन्बी जातियों का उत्साह सबसे बढ़-चढ़कर था. वे ‘सत्यशोधक समाज’ के आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही थीं. 1874 में समाज की मुंबई शाखा का उद्घाटन किया गया. उसके पीछे मुख्य योगदान तेलूगु के कमाठी और माली जाति के सदस्यों का था. 1884 में समाज का विस्तार जुन्नार परिक्षेत्र और पश्चिमी पुणे, अहमदनगर के इंदापुर तहसील और थाणे तक फैल गया. अगले दो वर्षों में वह लगभग सभी मराठी भाषी क्षेत्रों तक फैल चुका था. एक वर्ष पूरा होते-होते उसके 232 औपचारिक सदस्य बन चुके थे. लोगों ने शादी-विवाह, नामकरण जैसे अवसरों पर ब्राह्मण पुरोहितों को बुलाना छोड़ दिया था. ‘सत्यशोधक समाज’ के सिद्धांतों पर ज्योतिबा फुले के विचारों की स्पष्ट छाया थी. उनका मानना था कि विवाह के समय पंडित-पुरोहित अपने स्वार्थ को ध्यान में रखकर शूद्रों को बरगलाते हैं. उनका पूरा ध्यान यजमान से अधिक से अधिक दक्षिणा वसूलने पर रहता है. शूद्रों-अतिशूद्रों का हित इसी में है कि ऐसे अवसरों पर ब्राह्मण पुरोहित को दूर रखा जाए. इस लक्ष्य में ‘सत्यशोधक समाज’ को सफलता भी मिली थी. सतारा निवासी गोविंदराव बापूजी भिलारे ने ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना के पहले वर्ष में छह विवाह, तथा दूसरे वर्ष में पांच विवाह बगैर ब्राह्मण पुरोहित की उपस्थिति के कराए थे. ‘सत्यशोधक समाज’ की पद्धति के अनुरूप पहला विवाह, 25 दिसंबर, 1873 को पेठ जूनागंज, पूना के रहने वाले सीताराम जवाजी आल्हाट और राधाबाई ग्यानोबा निंबणकर के बीच संपन्न हुआ था. उसमें अन्य लोगों के अलावा सावित्रीबाई फुले और श्रीमती बजूबाई ग्यानोबा निंबणकर ने भी वर-वधु की आर्थिक मदद की थी. दूसरा विवाह ग्यानोबा कृष्णाजी ससाने, मुकाम हड़पसर, पूना का काशीबाई, पुत्री श्री नारायणराव विठोजी शिंदे, निवासी पर्वती, पूना के बीच संपन्न हुआ था. इस बार भी समाज के सदस्यों ने नव-दंपति को उपहार आदि देकर सम्मानित किया था.

‘सत्यशोधक समाज’ द्वारा सामाजिक कार्यक्रमों में ब्राह्मण पुरोहित की अनिवार्यता को खत्म करने से स्वयं ब्राह्मण समाज उनसे बुरी तरह नाराज था. वे अपनी पुनर्वापसी के लिए तरह-तरह के प्रयास कर रहे थे. ग्यानोबा ससाने और काशीबाई का विवाह पहले हड़पसर में होना था. लेकिन एक दुष्ट दलाल ने ऊल-जुलूल बातों द्वारा लड़के के रिश्तेदारों और दोस्तों के दिमाग में भ्रम पैदा कर दिया था. उससे बचने के लिए ज्योतिबा ने विवाह को पूना में कराने का सुझाव दिया. वहां भी लोगों को भड़काने वाले कम न थे. पंडितों के बहकावे में आकर मारुति सटवाजी फुले तथा तुकाराम खंडोजी फुले ने दोनों पक्षों को भड़काने के लिए अफवाह फैलाई कि, ‘हमारे दुर्बल बच्चों के विवाह इन लोगों के जानते-बूझते हुए हैं. उनमें से एक दुलहन उम्र में दो वर्ष की थी, जो ब्याह के कुछ ही दिनों में मर गई. इस लापरवाही के लिए तुकाराम सोनाजी भुजबल को करीब 400 रुपये का नुकसान सहना पड़ा.’ आखिकर ‘सत्यशोधक समाज’ के कार्यकर्ता बाबाजी राणोजी फुले के हस्तक्षेप से वह विवाह पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार संपन्न हो सका. इसके बावजूद ब्राह्मणों ने हार नहीं मानी थी. उन्होंने शूद्र-अतिशूद्रों को यह कहकर भड़काना शुरू कर दिया था कि बिना पुरोहित के उनकी प्रार्थनाएं ईश्वर तक नहीं पहुंच पाएंगीं. घबराए हुए लोग फुले के पास गए. फुले ने उन्हें समझाया कि जब तमिल, बंगाली, मलयाली, कन्नड, फारसी आदि गैर-संस्कृत भाषी लोगों की प्रार्थनाएं ईश्वर तक पहुंच सकती हैं, तब उनकी प्रार्थना कैसे अनसुनी रह सकती है. हम अपने माता-पिता, अभिभावक से सीधे संवाद करते हैं. इसलिए ईश्वर को अपना पिता मानने वालों को भी उससे डरने, घबराने तथा पूजा-अर्चना के लिए पुरोहित को बीच में लाने की आवश्यकता कतई नहीं है. फिर भी यदि कोई पूजा-पाठ जैसे कार्यों में पुरोहित की भूमिका को आवश्यक समझता है, तो वह अपनी ही जाति के अनुभवी व्यक्ति को यह जिम्मेदारी सौंपकर अपने मन को समझा सकता है.

धीरे-धीरे ही सही, लोग ज्योतिबा की बातों को समझने लगे थे. तीसरे वर्ष के दौरान उसकी सदस्य संख्या बढ़कर 316 तक पहुँच चुकी थी. दूसरी ओर उनके विरोधी भी शांत न थे. एक परिवार में शादी होने वाली थी. पुरोहितों ने उस घर में पहुंचकर डराया कि बिना ब्राह्मण एवं संस्कृत मंत्रों के हुआ विवाह ईश्वर की दृष्टि में अशुभ माना जाएगा. उसके अत्यंत बुरे परिणाम होंगे. गृहणी सावित्रीबाई फुले को जानती थी. फुले को पता चला उन्होंने ‘सत्यशोधक समाज’ के बैनर तले विवाह संपन्न कराने का ऐलान कर दिया. सैकड़ों सदस्यों की उपस्थिति में वह विवाह खुशी-खुशी संपन्न हुआ. प्रत्येक व्यक्ति कोई न कोई उपहार लेकर पहुंचा था. उस घटना के बाद ब्राह्मण सतर्क हो गए. एक अन्य घटना में ब्राह्मणों ने दूल्हे के पिता को धमकी दी. लोगों को यह कहकर भड़काया कि फुले उन्हें ईसाई बना देना चाहते हैं. लेकिन ज्योतिबा के लिए ऐसी चुनौतियां नई नहीं थीं. न ही वे धमकियों से डरने वाले थे. अप्रिय घटना से बचने के लिए उन्होंने प्रशासन से मदद मांगी. पुलिस आई और उसकी निगरानी में वह विवाह सफलतापूर्वक संपन्न हुआ.

‘सत्यशोधक समाज’ के दूसरे वर्ष की रिपोर्ट के अनुसार तब तक उसके में एक और घटना का उल्लेख किया गया है. विट्ठल नामदेव गुठाड़ पुणे के व्यापारी थे. गुठाड़ ने समाज की पद्धति के अनुसार ब्राह्मण को बुलाए बिना ही गृहप्रवेश कर लिया. इससे ब्राह्मणों ने उनके व्यापारिक हिस्सेदार को इतना भड़काया कि उसने हिस्सेदारी तोड़ दी. विरोधी इतने से ही शांत नहीं हुए. उन्होंने गुठाड़ के कामकाज में इतनी परेशानियां पैदा कीं कि उनका व्यापार घाटे में आ गया. हालात यहां तक पहुंच गए कि बच्चे के स्कूल की फीस जमा करने में मुश्किल होने लगी. मामला जब ‘सत्यशोधक समाज’ के सदस्यों के संज्ञान में पहुंचा तो उन्हें गुठाड़ के प्रति चिंता होने लगी. आखिरकार उनकी मदद के लिए गंगाराम भाऊ म्हस्के ने बच्चे के स्कूल की फीस के लिए तीन रुपये प्रतिमाह छात्रवृत्ति देने का ऐलान कर दिया. पांच माह तक गुठाड़ ने वह छात्रवृत्ति ली. बाद में जब उनका व्यापार पटरी पर लौट आया तो उन्होंने म्हस्के का आभार व्यक्त करते हुए और अधिक मदद लेने से इन्कार कर दिया.

केवल शिक्षा ही नहीं, सामाजिक मदद के लिए भी ‘सत्यशोधक समाज’ के सदस्य हमेशा आगे रहते थे. सितंबर 1875 में अतिवृष्टि के कारण अहमदाबाद में जल-प्रलय जैसे हालात पैदा हो चुके थे. परिणामस्वरूप हजारों लोगों के आगे जीवन का संकट पैदा हो गया. भीषण बारिश के कारण उनके कपड़े, अनाज, घर आदि सब-कुछ नष्ट हो चुका था. ऐसे आपदाग्रस्त लोगों की मदद के लिए ‘सत्यशोधक समाज’ के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ.  विश्राम रामजी घोले ने सदस्यों से मदद के लिए आगे आने का आवाह्न किया. उसके बाद कुल 195 रुपये की रकम चंदे के रूप में जमा की गई. वह धनराशि अहमदाबाद के कलेक्टर को बाढ़-पीड़ितों की मदद के लिए भेज दी गई. उसकी देखा-देखी ‘सत्यशोधक समाज’ की मुंबई शाखा भी सक्रिय हुई. वहां भी 130 रुपये चंदा के रूप में उगाहकर अहमदाबाद के कलेक्टर के पास भेज दिए गए.

इस बीच कुछ लोगों ने यह कहना आरंभ कर दिया कि बगैर ब्राह्मण पुरोहित की मौजूदगी के होने वाले विवाह  हिंदू रीति-नीति या कानून, किसी भी आधार पर मान्य नहीं हैं. इस कारण लोगों के मन में शंका उत्पन्न होने लगी थी. उसके समाधान के लिए ‘सत्यशोधक समाज’ के अध्यक्ष की ओर से एक पत्र उच्च न्यायालय के एक अधिकारी राघवेंद्रराव रामचंद्रराव को पत्र लिखकर उन विवाहों की वैधता के बारे में राय देने का अनुरोध किया. जवाब में राघवेंद्रराव ने कानूनी प्रमाणों के आधार पर बताया कि ‘सत्यशोधक समाज’ की पद्धति के अनुसार हो रहे सभी विवाह कानून सम्मत हैं. ज्योतिबा समझते थे कि सामाजिक रूढ़ियों से जूझने के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता अपरिहार्य है. शूद्रों में रचनात्मक प्रतिभा का विकास हो, वे लिखने-पढ़ने के लिए आगे आएं, इसके लिए ‘सत्यशोधक समाज’ ने ऐलान किया कि खेती की उन्नति के उपायों के बारे में शूद्रों में से जो-जो व्यक्ति मौलिक पुस्तक की रचना करेंगे, उनमें से प्रत्येक को डॉ. विश्राम रामजी घोले और रामशेट बापूशेट उरवणे की ओर से 25-25 रुपये का पुरस्कार दिया जाएगा.

अधिकांश शूद्र-अतिशूद्र खेती या दूसरे मेहनत-मजदूरी वाले कामों में जुटे थे. कई बार बच्चों को परिवार के काम में हाथ बंटाना पड़ता था. इस कारण वह दिन में स्कूल जाने के लिए समय नहीं निकाल पाता था. ऐसे युवकों की पढ़ाई अवरुद्ध न हो इसके लिए भांबुर्डे नामक गांव में रात्रि-पाठशाला की शुरुआत की गई थी. समाज को रात्रि-पाठशाला के कामकाज के बारे में शिकायत मिली तो उसने तत्काल, 3 महीने की अवधि के लिए कृष्णराव नामक व्यक्ति को नियुक्त कर दिया. उसका काम था, पाठशाला का नियमित निरीक्षण कर, उसकी रिपोर्ट समाज को देना. शिक्षा के प्रति जागरूकता की कमी के चलते शूद्र और अतिशूद्र परिवारों के बच्चे स्कूल से कन्नी काट जाते थे. इसे देखते हुए समाज ने पांच रुपये प्रतिमाह की वृत्तिका पर एक पट्टेवाले को नौकरी पर रखा. उसका काम था, बच्चों में शिक्षा के प्रति जागरूकता लाना तथा उन्हें सही समय पर स्कूल पहुंचाना. उच्च शिक्षा के लिए भी ‘सत्यशोधक समाज’ की ओर से व्यवस्था की गई थी. विश्राम रामजी घोले ने समाज की ओर से इंजीनियरिंग कालेज के समक्ष एक प्रतिवेदन पेश किया गया था. प्रतिवेदन में शूद्र विद्यार्थियों को निःशुल्क शिक्षा देने की प्रार्थना की गई थी. उसका सकारात्मक असर हुआ. 1876 में इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रधानाचार्य मिस्टर कूक ने 2-3 गरीब विद्यार्थियों को निःशुल्क शिक्षा के लिए भर्ती किया था. बच्चों में भाषण कला के विकास के लिए भी 2 मई 1876 को व्याख्यान प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था. व्याख्यान के लिए दो विषय निर्धारित किए गए. पहला था—‘हिंदुस्तान की जातिभेद समस्या से व्यावहारिक लाभ और हानि’. और दूसर था ‘मूर्तिपूजा से लाभ और हानि’. ‘जातिभेद समस्या से व्यावहारिक लाभ और हानि’ विषय पर व्याख्यान के लिए द्वारकानाथ त्रिंबक सोनार को पहला और गणपत तुकाराम कुंहाड़े को दूसरा स्थान प्राप्त हुआ. प्रथम विजेता को समाज की ओर से 10 रुपये तथा द्वितीय विजेता को डॉ. विश्राम रामजी घोले घोले की ओर से 5 रुपये की सम्मान राशि दी गई थी. दूसरे विषय पर दामोदर बापूजी शिंपी को समाज के फंड से दस रुपये तथा आनंदराव रणछोड़ को रामशेट बापूशेट तुरवणे की ओर से 5 रुपये की सम्मान राशि प्रदान की गई थी. एक और वक्ता गोपाल विश्राम घोले को प्रोत्साहन पुरस्कार के रूप में ज्योतिराव की ओर से 3 रुपये प्रदान किए गए थे. ‘सत्यशोधक समाज’ गरीब बच्चों को पढ़ाई की ओर उन्मुख करने के छात्रवृत्ति आदि के रूप में तरह-तरह से मदद करता था.

‘सत्यशोधक समाज’ की गतिविधियों से प्रसन्न होकर लोग तरह-तरह से उसकी मदद के लिए आगे आ रहे थे. हरीरामजी चिपलूनकर ब्राह्मण थे. वे समाज के सदस्य भी नहीं थे. बावजूद इसके उन्होंने शूद्र विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति के लिए प्रतिवर्ष 60 रुपये देने की घोषणा की थी. रामचंद्र मनसाराम ढवारे नाईक पुणे के बड़े ठेकेदार माने जाते थे. उनकी बेतालपेठ में दुमंजिली इमारत थी. उस इमारत को एक मारवाड़ी सेठ 16 रुपये प्रतिमाह पर किराये पर लेने को सहमत था. ‘सत्यशोधक समाज’ को अपने कामकाज के लिए ऐसे ही स्थान की आवश्यकता थी. अध्यक्ष विश्राम रामजी घोले ने तत्काल रामचंद्र नाईक को पत्र लिखकर उस इमारत को सत्यशोधक के कामकाज के लिए देने का अनुरोध किया. रामचंद नाईक ने मात्र 10 रुपये प्रतिमाह के किराये पर वह इमारत समाज को सौंप दी. यही नहीं, उन्होंने समाज के कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए 20 रुपये का चंदा भी अपनी ओर से दिया. बाहर से आए शूद्र विद्यार्थियों के भोजन, आवास और अध्ययन की व्यवस्था के लिए समाज ने छात्रावास के निर्माण का फैसला किया था.

शूद्रों और अतिशूद्रों के बीच शिक्षा का प्रचार-प्रसार ज्योतिबा के जीवन का प्रमुख उद्देश्य था. इसके लिए उन्होंने स्वयं कई पाठशालाओं की स्थापना की थी. इसी को आगे बढ़ाते हुए ‘सत्यशोधक समाज’ ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के प्रसार के लिए काम कर रहा था. समाज की ओर से पूना से पांच किलोमीटर दूर हड़पसर में एक विद्यालय की स्थापना की गई थी. सरकारी विद्यालयों में गरीब बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दिलाने के लिए उसने संबंधित अधिकारियों को कई पत्र लिखे थे. उसके फलस्वरूप ‘सार्वजनिक निर्देश’ विभाग के निदेशक के.एम. चेटफील्ड ने एक आदेश के द्वारा सरकारी स्कूलों के लिए एक आदेश जारी किया गया, जिसके अनुसार उनमें पांच प्रतिशत स्थान गरीब शूद्र बच्चों के लिए आरक्षित कर दिए गए थे.

जुलाई 1875 में महर्षि दयानंद, महादेव गोविंद रानाडे के आमंत्रण पर पूना गए थे. उस समय तक ‘आर्यसमाज’ की स्थापना को 15 महीने बीत चुके थे. दयानंद उसके प्रचार के लिए देश-भर की यात्रा कर रहे थे. दो महीने के पूना प्रवास के दौरान दयानंद वहां ‘आर्यसमाज’ के प्रचार के लिए कई सभाएं कर चुके थे. उनके कई विचार ‘प्रार्थना समाज’ और रानाडे के ‘पूना सार्वजनिक सभा’ के सिद्धांतों से मेल खाते थे. इसलिए रानाडे सहित कुछ और सुधारवादियों ने दयानंद के सम्मान में जुलूस निकालने का निर्णय लिया. पुरातनपंथियों के लिए वह सीधी चुनौती थी. वे उसके विरोध पर आमादा हो गए. जुलूस के लिए 5 सिंतबर 1875 का दिन तय किया गया था. रानाडे उसकी तैयारी में जुटे थे. जुलूस के लिए पुलिस को भी सूचना दी जा चुकी थी. इस बीच सूचना मिली कि जुलूस में विघ्न डालने के लिए कट्टरपंथी बड़े पैमाने पर विरोध की तैयारी में जुटे हैं. स्थिति से निपटने के लिए जुलूस से एक दिन पहले, सुधारवादियों ने ज्योतिबा फुले से संपर्क किया. ‘आर्यसमाज’ का जाति और छूआछूत विरोधी अभियान, ‘सत्यशोधक समाज’ के मूल सिद्धांतों से मेल खाता था. इसलिए ज्योतिबा उनके साथ सहयोग करने के लिए तैयार हो गए. अगले दिन जुलूस निकला. दयानंद हाथी पर सवार थे. आगे-आगे उनके समर्थक नाचते-गाते, ढोल बजाते हुए चल रहे थे. ज्योतिबा स्वयं रानाडे के साथ जुलूस में शामिल थे. उनके पीछे ‘सत्यशोधक समाज’ के सैकड़ों कार्यकर्ता थे. उधर कट्टरपंथी किसी भी तरह से जुलूस में व्यवधान डालने पर आमादा थे. वे नहीं चाहते थे कि पूना में ऐसे किसी नए आंदोलन को जन्म मिले, जो ‘सत्यशोधक समाज’ की भांति उनकी हजारों वर्ष पुरानी सत्ता को चुनौती देता हो. दयानंद का उपहास उड़ाने के लिए उन्होंने एक गधे को सजाकर उसे ‘गदर्भानंद’ का नाम दिया था. जैसे ही महर्षि दयानंद का जुलूस अपने नियत स्थल पर पहुंचा, कट्टरपंथी भी सजे-धजे ‘गदर्भानंद’ के साथ उनके सामने पहुंच गए. दोनों के बीच टकराव हो गया. टकराव बड़ी हिंसा का रूप ले, उससे पहले ही पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया. उपद्रवी यहां-वहां शरण लेने के लिए भागने लगे. उसके बाद दयानंद ने वहां अपना प्रवचन दिया.

‘आर्यसमाज’ वेदों को प्रामाण्य मानता था, ठीक ऐसे ही जैसे मुस्लिम कुरआन को दैवीय ग्रंथ मानते हैं. महाराष्ट्र, विशेषकर पूना में पेशवाओं के समर्थन के कारण ब्राह्मण अत्यंत शक्तिशाली बन चुके थे. इस कारण वहां जातिवाद की जड़ें भी बहुत गहरी थीं. ‘गुलामगिरी’, ‘तृतीय रत्न’ जैसी रचनाओं के माध्यम से ज्योतिबा तथा उनके द्वारा गठित ‘सत्यशोधक समाज’, जातिभेद और पुरोहितवाद को नकारकर—ब्राह्मणवाद को सीधी चुनौती दे रहे थे. दूसरी ओर वेदों को सर्वोपरि बताकर ‘आर्यसमाज’ छद्म रूप से ब्राह्मणवाद को संरक्षण देता था. इस कारण शूद्रों और अतिशूद्रों के मन में उसके प्रति संदेह का भाव था. ब्राह्मणों के लिए हर वह व्यक्ति जो उनके जातीय वर्चस्व को चुनौती दे, उसे वे देश और धर्म दोनों का दुश्मन मानते थे. यही कारण है कि पूना में दो महीनों तक लगातार प्रचार करने और जाति-भेद को नकारने के बावजूद, ‘आर्यसमाज’ को महाराष्ट्र में अपेक्षित सफलता न मिल सकी.

ज्योतिराव अपना संदेश लोगों तक कैसे पहुंचाते थे, इसका एक रोचक किस्सा रोजलिंड ओ’ हेनलान ने अपनी पुस्तक ‘कास्ट कनफिलिक्ट एंड आइडियालाजी’(पृष्ठ-251) में दिया है. यह एक घटना को लेकर है, जिसके बारे में फुले के व्यापारिक सहयोगी और मित्र ज्ञानोबा ससाने ने बताया था—‘एक बार की बात है. फुले अपने मित्र ज्ञानोबा ससाने के साथ पुणे के बाहर स्थित एक बगीचे के भ्रमण के लिए गए. वहां एक कुआं था, जिससे उस बगीचे की सिंचाई होती थी. जैसे ही दोपहर का अवकाश हुआ, सभी कर्मचारी खाना खाने चले गए. यह देख फुले कुएं तक पहुंचे और कुएं के डोल को चलाने लगे. इसके साथ-साथ वे गीत गाने लगे. उन्हें गीत गाता देख वहां काम करने वाले मजदूर हंसने लगे. इसपर फुले ने बताया कि इसमें हंसने की बात क्या है? मजदूर लोग काम करते हुए अकसर गाते-बजाते हैं, केवल मेहनत से जी चुराने वाले फुर्सत के समय वाद्ययंत्रों का शौक फरमाते हैं. असली मेहनतकश जैसा काम करता है, वैसा ही अपना संगीत गढ़ लेता है.’

ज्योतिबा फुले आजन्म सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करते रहे. उनका सपना ऐसे समाज की स्थापना का था, जो सर्व-समानता के सिद्धांत पर आधारित हो. इसके लिए आजीवन संघर्ष करते रहे. 11 मई 1888 को ‘सत्यशोधक समाज’ और नगर के प्रमुख सुधारवादी नेताओं ने उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि से अलंकृत किया. हालांकि उनके व्यक्तित्व और कृतित्व कोई भी उपाधि छोटी पड़ जाती है.

ओमप्रकाश कश्यप

क्रांतिकारी कवि, लेखक, नाटककार और समाजसुधारक : अन्नाभाऊ साठे

सामान्य

आगे बढ़ो! जोरदार प्रहार से दुनिया को बदल डालो। ऐसा मुझसे भीमराव कह कर गए हैं। हाथी जैसी ताकत होने के बावजूद गुलामी के दलदल में क्यों फंसे रहते हो। आलस त्याग, जिस्म को झटककर बाहर निकलो और टूट पड़ो।1                                                                

                                                    अन्नाभाऊ साठे

अन्नाभाऊ साठे कौन थे, क्या थे? कहां के थे? बहुत कम लोग जानते हैं। खासकर हम हिंदी वालों में। ‘अन्ना’ नाम सुनकर हमारे मस्तिष्क में सिर्फ अन्ना हजारे की तस्वीर बनती है। क्योंकि निहित स्वार्थ के अनुरूप खबरें गढ़ने वाला पूंजीवादी मीडिया, इस नाम को किसी न किसी बहाने बार-बार हमारे बीच ले आता है। सुनकर शायद हैरानी हो कि अन्नाभाऊ से जुड़े एक प्रश्न ने नेहरू जी को भी उलझन में डाल दिया था। उन दिनों रूस और भारत की गहरी मैत्री थी। नेहरू जी वहां पहुंचे हुए थे। यात्रा के बीच एक व्यक्ति ने अकस्मात पूछ लियाᅳ‘आपके यहां गरीबों और वंचितों की कहानी कहने वाला एक कलाकार और समाज सुधारक अन्नाभाऊ साठे है….कैसा है वह?’

नेहरू जी चुप्प। उन्होंने ऐसे किसी अन्नाभाऊ साठे के बारे में नहीं सुना था। देश लौटे। यहां पता लगाना शुरू किया। पर मुश्किल। काफी कोशिश के बाद पता चला कि मुंबई की चाल में ऐसा ही आदमी रहता है। कद पांच फुट, रंग तांबई, बदन इकहरा। आंखों में चमक। सीधे दिल में उतर जाने वाली तेज, जोशीली आवाज। लिखता, गाता-बजाता, तमाशे करता है। मजदूर आंदोलनों में हिस्सा लेकर उनकी बात उठाता है। बोलने के लिए खड़ा होता है तो बड़ी से बड़ी भीड़ में भी सन्नाटा छा जाता है। लोकप्रियता ऐसी कि तमाशा करे तो दर्शकों का हुजूम उमड़ पड़ता है। अमीरी-गरीबी के बीच भारी अंतर को वह मार्क्सवादी नजरिये से देखता है। लेकिन जातिवाद और छूआछूत की व्याख्या के समय उसे सिर्फ आंबेडकर याद आते हैं। जो सामाजिक न्याय के लिए वर्ग-क्रांति को आवश्यक मानता है।

मराठी साहित्य और कला-जगत के शिखर पुरुष अन्नाभाऊ साठे का जन्म 1 अगस्त 1920 को महाराष्ट्र के सांगली जिले की वालवा तहसील के वाटेगांव के मांगबाड़ा में हुआ था। उनके बचपन का नाम तुकाराम था। पिता का नाम भाऊराव और मां का नाम था बालूवाई। जाति थी मांग(मातंग)। अछूत और देश की सर्वाधिक विपन्न जातियों में से एक, जिसका कोई स्थायी धंधा तक नहीं था। पेट भरने के लिए उस जाति के सदस्य शादी-विवाह, पर्व-त्योहार के अवसर पर ढोल और तुरही बजाते। नाच-गाकर लोगों का मनोरंजन करते। रस्सी बुनते। उससे जो आय हो जाती उससे जैसे-तैसे गृहस्थी चलाते थे। लेकिन ये काम हमेशा तो मिलने वाले नहीं थे। इसलिए बाकी समय में वे मेहनत-मजदूरी वाला कोई भी काम कर लेते थे। अछूत होने के कारण गांव में रहने की मनाही थी। सो गांव-बाहर रहते। चैन वहां भी नहीं था। गांव में जब भी कोई अपराध होता तो शक ‘मांगबाड़ा’ पर ही जाता। शर्म की बात यह कि मानव-मात्र के अधिकारों की सुरक्षा का दावा करने वाली औपनिवेशिक सरकार ने पूरी ‘मांग’ जाति को ‘क्रिमिनल ट्राइव एक्टᅳ1871’ के अंतर्गत अपराधी घोषित किया हुआ था। कुछ ‘समझदार’ किस्म के ग्रामीण किसी ‘मांग’ को ही गांव की चौकीदारी सौंप देते थे। कहीं-कहीं यह कहावत भी चलती थी कि मांग के घर में आटे का बर्तन भले खाली हो, दीवार पर बंदूक जरूर टंगी होती है।  

अन्ना के पिता मुंबई में एक अंग्रेज के घर माली का काम करते थे। बाकी परिवार गांव में रहता था। भाऊराव नौकरी करते थे, इस कारण बाकी सजातीय परिवारों की अपेक्षा उनकी आर्थिक हैसियत थोड़ी अच्छी थी। फिर भी जीवन संघर्षमय था। भाऊराव बेटे को पढ़ाना चाहते थे। एक बार छुट्टी लेकर गांव पहुंचे तो अन्ना की मां ने उनका स्कूल में दाखिला कराने की सलाह दी। लेकिन स्कूल मास्टर कुलकर्णी ‘अपराधी’ जाति के बालक को दाखिला देने को तैयार न था। काफी अनुनय-विनय के बाद वह राजी हुआ। फिर भी जाति-द्वेष बना रहा। अपमान और तिरस्कार भरे माहौल में अन्नाभाऊ ने कुछ दिन जैसे-तैसे काटे। शीघ्र ही उनका स्वाभिमानी मन वहां से ऊब गया। आखिर प्राथमिक शिक्षा पूरी होने से पहले ही, स्कूल को हमेशा के लिए अलविदा कह, वे जीवन की पाठशाला में भर्ती हो गए। उसके बाद कुछ दिन यायावरी और सिर्फ यायावरी चली। जो सीखा जीवनानुभवों से सीखा। जितना सीखा उतना समाज को लगातार लौटाते भी रहे।

उन दिनों मनोरंजन का प्रमुख साधन गाना-बजाना था। अन्ना का दिमाग तेज था। याददाश्त गजब की। बचपन से ही अनेक लोकगीत उन्हें उन्हें कंठस्थ थे। वे गा-बजाकर अपना और दूसरों का मनोरंजन करते। खेल ही खेल में यदा-कदा कुछ नया भी रच देते थे। यही नहीं, वे तलवार, भाला, दांडपट्टा, कटार आदि चलाने में भी सिद्धहस्त थे। इन हथियारों का प्रयोग अवसर विशेष पर शौर्यकला का प्रदर्शन करने के लिए किया जाता था। असल में वे सामंतों के मनोरंजन का साधन थे। वैभव और शौर्य लुटा चुके जमींदार, सामंत शौर्यकलाओं का मंचन देखकर ही आत्मतुष्ट हो जाया करते थे। बात-बात पर न्याय, नैतिकता, धर्म और संस्कृति की दुहाई देने वाले पंडितजन, जाति के नाम पर आदमी-आदमी में भेद के सवाल पर चुप्पी साध जाते थे।

उन दिनों देश में स्वाधीनता आंदोलन की गर्मी थी। क्रांतिकारी गतिविधियों में तेजी आई हुई थी। अंग्रेजों का भारतीयों पर संदेह बढ़ता ही जा रहा था। ऊपर से 1930 के दशक की भीषण आर्थिक मंदी का असर। एक दिन भाऊराव को नौकरी से हाथ धोना पड़ा। हताश-निराश भाऊराव गांव पहुंचे। यह सोचकर कि वहां जैसे बाकी लोग जीते हैं, वैसे वे भी दिन बिता लेंगे। लेकिन गांव पहुंचते ही एक नई आफत से सामना हुआ। उस वर्ष पूरे महाराष्ट्र में सूखा पड़ा था। अकाल जैसे हालात बन चुके थे। उन दिनों मुंबई औद्योगिक नगरी के रूप में तरक्की कर रही थी। लोग रोजगार की तलाश में उसकी ओर आ रहे थे। रोजी-रोटी के सवालों से जूझ रहे भाऊराव साठे ने भी मुंबई जाने का फैसला कर लिया। मगर किराये के लिए जरूरी पैसे उनके पास न थे। बस मुंबई पहुंचने की ललक थी, जो देखते ही देखते उनका संकल्प बन गई। किराये का इंतजाम न हुआ तो परिवार को साथ ले, एक दिन पैदल ही मुंबई की ओर निकल पड़े। गांव-गांव भटकते, खाते-कमाते, पैदल चलते-चलते पूरा परिवार किसी तरह पूना पहुंचा। वहां वे लोग एक ठेकेदार के लिए पत्थर तोड़ने का काम करने लगे। अन्ना भी काम में उनकी मदद करता। लगातार मेहनत से वह कमजोर पड़ने लगा था। ठेकेदार अपने मजदूरों को बंधुआ समझता था। आखिरकार एक पठान की मदद से भाऊराव परिवार को लेकर वहां से निकल लिए। आगे फिर वही पैदल यात्रा। वही संघर्ष और जहालत से भरा जीवन। वाटेगांव से मुंबई करीब 255 किलोमीटर था। इस दूरी को पैदल पाटने में ही दो महीने गुजर गए।2

रास्ते में कुछ कड़वे अनुभव भी हुए। एक बार की बात। चलते-चलते अन्ना को भूख लग आई थी। सामने पके आमों से लदा एक पेड़ देखा तो भूख और भड़क उठी। उसी बेचैनी में उन्होंने पेड़ के मालिक से पूछे बगैर दो-चार आम तोड़ लिए। अचानक मालिक ने आकर उन्हें दबोच लिया। घबराए अन्ना ने आम वापस लौटाने की पेशकश की, लेकिन वह माना नहीं। डरा-धमकाकर आमों को दुबारा डाल से लटकाने की जिद करने लगा।3 इस तरह की अपमानजनक घटनाओं से जन्मे आक्रोश का असर रचनात्मक निखार के साथ अन्नाभाऊ की करीब-करीब हर रचना में है। उनकी बहुप्रसिद्ध कहानी ‘खुलांवादी’ का एक पात्र कहता हैᅳ

‘ये मुरदा नहीं, हाड़-मांस के जिंदा इंसान हैं। बिगडै़ल घोड़े पर सवारी करने की कूबत इनमें है। इन्हें तलवार से जीत पाना नामुमकिन है।’

मुंबई पहुंचते समय तुकाराम उर्फ अन्नाभाऊ की उम्र महज 11 वर्ष थी। गांव में जहां अछूत होने के कारण कोई काम न देता था, मुंबई में काम की कमी न थी। सो घर चलाने के लिए मुंबई में अन्ना ने कुलीगिरी की। होटल में बर्तन धोने से लेकर वेटर तक का काम किया। घरेलू नौकर रहे, कुत्तों की देखभाल के लिए एक अमीर की चाकरी की। घर-घर जाकर सामान बेचा। कुछ और काम न मिलने पर बूट-पालिश पर हाथ भी आजमाया। इस बीच फिल्म देखने का शौक पैदा हुआ। मूक फिल्मों का जमाना था। पर शौक ऐसा कि अपनी मामूली आमदनी का बड़ा हिस्सा टिकट खरीदने पर खर्च कर देते थे। जीवन-संघर्ष के बीच अक्षर जोड़ना और पढ़ना-लिखना सीखा। फिल्मी पोस्टरों और दुकानों के आगे लगे होर्डिंग्स से पढ़ना-लिखना सीखने में मदद मिली। चेंबुर, कुला, मांटुगा, दादर, घाटकोपर वगैरह….मुंबई में काम के अनुसार उनके ठिकाने भी बदलते रहे।

अन्ना भाऊ के निकट रिश्तेदार बापू साठे एक ‘तमाशा’ मंडली चलाते थे। गाने-बजाने का शौक अन्ना को उन्हीं तक ले गया। वे ‘तमाशा’ से जुड़ गए। इस बीच एकाएक ऐसी घटना हुई जिससे अन्नाभाऊ के सोचने का ढंग ही बदल गया। तमाशा मंडली को एक गांव में कार्यक्रम करना था। तमाशा शुरू होने से पहले उसके मंच पर महाराष्ट्र में ‘क्रांतिसिंह’ के नाम से विख्यात नाना पाटिल वहां पहुंचे। वहां उन्होंने ब्रिटिश सरकार की शोषणकारी नीतियों का खुलासा करने वाला जोरदार भाषण किया। मिलों में हो रहे शोषण के लिए पूंजीपतियों और सरमायेदारों की कारगुजारी पर भी बात की। भाषण सुनने के बाद अन्ना भाऊ को अब तक का गाया-सुना अकारथ लगने लगा। छुटपन में वे ‘भगवान विठ्ठल’ की सेवा में अभंग गाया करते थे। उनमें जातीय ऊंच-नीच को धिक्कारा गया था। बराबरी का संदेश भी था। अब समझ में आया कि गरीबी सामाजिक समानता की राह में सबसे बड़ी बाधक है। आर्थिक असमानता केवल नियति की देन नहीं है। उसका कारण वे लोग हैं जो देश और समाज के धन पर कुंडली मारे बैठे हैं। यह भी समझ में आया कि गाने-बजाने का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं है। उससे सोये हुए समाज को जगाया भी जा सकता है। उसी दिन अन्ना के ‘लोकशाहिर’(लोककवि) अन्ना भाऊ बनने की नींव पड़ी। समाज में अमीर-गरीब की खाई को वे कम्युनिस्ट विचारधारा की कसौटी से परखने लगे। यही उन्हें कालांतर में कम्युनिस्ट पार्टी तक ले गया। 

तमाशा में उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का भरपूर अवसर मिला। ‘तमाशा’ में वे कोई भी वाद्य बजा लेते। किसी भी प्रकार की भूमिका कर लेते थे। निरंतर सीखने और नए-नए प्रयोग करने की योग्यता ने उन्हें रातों-रात तमाशा मंडली का महानायक बना दिया। कुछ दिनों बाद अपने दो साथियों के साथ मिलकर अन्ना ने 1944 में ‘लाल बावटा कलापथक’(लाल क्रांति कलामंच) नामक नई तमाशा मंडली की शुरुआत की। जिसके तहत उन्होंने कई क्रांतिकारी कार्यक्रम पेश किए। उस समय तक देश में आजादी के प्रति चेतना जाग्रत हो चुकी थी। ‘तमाशा’ जनता से संवाद करने का सीधा माध्यम था। ‘लाल बावटा’ के माध्यम से अन्नाभाऊ मजदूरों के दुख-दर्द को दुनिया के सामने लाते, लोगों को स्वतंत्रता का महत्त्व समझाते थे। इससे वे मजदूरों के बीच तेजी से लोकप्रिय होने लगे। अपनी मंडली को लेकर वे महाराष्ट्र के गांव-गांव तक पहुंचे। वहां लोगों को आजादी के लिए तैयार रहने और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने का आवाह्न किया। लोग उन्हें ‘शाहिर अन्ना भाऊ साठे’ और ‘लोकशाहिर’ कहकर पुकारने लगे। 

आगे चलकर सरकार ने ‘तमाशा’ पर प्रतिबंध लगा दिया। जिसके तहत ‘लाल बावटा’ को भी बंद करना पड़ा। लेकिन अन्ना भाऊ के भीतर छिपा कलाकार इतनी जल्दी हार मानने को तैयार न था। उन्होंने अपने विचारों को लोकगीतों में ढालना आरंभ कर दिया। तमाशा मंडली छोड़ वे एक मिल में काम करने लगे। वहां मजदूरों की समस्याओं से सीधा परिचय हुआ। कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रति लगाव तो ‘क्रांतिसिंह’ नाना पाटिल का भाषण सुनने के बाद से ही था। मिल में मजदूरी करते हुए वे कम्युनिस्ट पार्टी के भी संपर्क में आए और उसके सक्रिय सदस्य बन गए। लोकगीतों के माध्यम से कम्युनिस्ट विचारधारा का प्रचार-प्रसार करने लगे। पार्टी के लिए दरियां बिछाने से लेकर भाषण देने तक का काम किया। इसी बीच विवाह हुआ। लेकिन पहला विवाह ज्यादा जमा नहीं। दूसरा विवाह एक परित्यक्त स्त्री से किया। संतान भी हुई, लेकिन वह संबंध भी ज्यादा दिन टिक न सका।

उद्योगनगरी के रूप में पनपती मुंबई हजारों मजदूरों, किसानों की शरण-स्थली थी। गांव में गरीबी, बेरोजगारी और सामंती उत्पीड़न से त्रस्त मजदूर वर्ग बेहतर जीवन की आस में उसकी ओर खिंचे चले आते थे। उनके लिए वही एक उम्मीद थी। लेकिन बेतरतीव मशीनीकरण ने लोगों की समस्या में इजाफा किया था। एक ओर बड़ी-बड़ी स्लम बस्तियां उभर रही थीं, दूसरी ओर ऊंची-ऊंची अट्टालिकाएं। अमीर-गरीब के बीच निरंतर बढ़ते अंतराल से उन्हें लगने लगा था कि जिन सपनों के लिए उन्होंने अपना गांव-घर छोड़ा था, वे मुंबई आकर भी फलने वाले नहीं है। उस समय तक रूस को आजाद हुए करीब 25 वर्ष बीत चुके थे। अन्नाभाऊ सोवियत संघ की तरक्की के बारे में सुनते, प्रभावित होते। रूस की क्रांतिगाथाएं सुनकर मन उमंगित होने लगता। 1943 के आसपास उन्होंने स्तालिनग्राद को लेकर एक पावड़ा(शौर्यगीत) लिखा। उस पावड़े का अनुवाद रूसी भाषा में भी हुआ। उसके बाद तो अन्नाभाऊ की कीर्ति-कथा देश-देशांतर तक व्यापने लगी।

इस बीच उन्होंने कई उपन्यास और कहानियां लिखीं। कम्युनिस्ट पार्टी के साहित्य को पढ़ा। उन्हें समझ आने लगा कि सामाजिक और आर्थिक विकास परस्पर अन्योन्याश्रित हैं। वगैर एक के दूसरे को साधना संभव नहीं। खासकर भारत जैसे समाजों में जहां जाति मजबूत सामाजिक संस्था के रूप में वर्षों से अपनी पकड़ बनाए हो। धर्म उसका समर्थन करता हो। लोग मानते हों कि वे वही हैं, जो उन्हें होना चाहिए। जहां तथाकथित ईश्वरीय न्याय को ही सर्वश्रेष्ठ न्याय माना जाता हो। बड़ा वर्ग मानता हो कि समाज में जो जहां, जैसा हैᅳसब ईश्वरेच्छा से है। भारतीय समाज में ऊंच-नीच, अमीर-गरीब की बेशुमार खाइयां हैं। बावजूद इसके वर्ग-संघर्ष के लिए यह सबसे अनुपजाऊ धरा है। लोगों की यथास्थितिवादी मनोवृति, परिवर्तन की हर संभावना को विफल कर देती है। जब कभी उसके विरुद्ध आवाज उठी, धार्मिक संस्थाएं लोगों को नियतिवाद का पाठ पढ़ाने के लिए सामने आ गईं। गौतम बुद्ध ने जाति को चुनौती दी। उनका आभामंडल इतना प्रखर था कि उनके रहते प्रतिक्रियावादी शक्तियां वर्षों तक सिर छुपाए रहीं। उनके जाते ही देश में फिर ब्राह्मणवादी साहित्य की बाढ़-सी आ गई। नियतिवाद को शास्त्रीय मान्यता देने के लिए पुराणों और स्मृतियों की रचना की गई। शताब्दियों के बाद संत कवियों ने जाति को ललकारा तो तुलसीदास अपनी रामचरितमानस लेकर आ गए। सामाजिक समानता का सपना शताब्दियों के लिए पुनः नेपथ्य में खिसक गया। धर्म जाति का सुरक्षा-कवच है। इस रहस्य से पर्दा उठा उनीसवीं शताब्दी में। नई शिक्षा और विचारों के आलोक में लोगों ने जाना कि वगैर धर्म को चुनौती दिए जाति से मुक्ति असंभव है। कि आर्थिक और सामाजिक समानता के लिए सांस्कृतिक वर्चस्व से बाहर निकलना जरूरी है। इस संबंध में सबसे पहली पुकार ज्योतिराव फुले की थी। पुकार क्या मानो मुक्ति-मंत्र था। उस मुक्ति-मंत्र को सिद्धि-मंत्र में बदला डाॅ. आंबेडकर ने। जाति का दंश डाॅ. आंबेडकर ने भी झेला था और अन्नाभाऊ ने भी। साम्यवादी चेतना जहां अन्नाभाऊ के लोकगीतों को ओज से भरपूर बनाती थी, वहीं आंबेडकर से उन्हें हालात से टकराने की प्रेरणा मिलती थी। मार्क्स और आंबेडकर, अन्नाभाऊ के लिए दोनों ही प्रेरणास्रोत थे।

एक क्रांतिधर्मी कलाकार की तरह अन्नाभाऊ ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन तथा गोवा मुक्ति आंदोलन के लिए काम किया। जनता के हित में एक कलाकार के रूप में वे हर आंदोलन में आगे रहे। उनके लिखे पावड़े, लावणियां मुक्ति आंदोलनों को ऊर्जा प्रदान करते रहे। 1945 में अन्ना भाऊ ने साप्ताहिक ‘लोकयुद्ध’ के लिए पत्रकार के रूप में काम करना आरंभ किया। अखबार साम्यवादी विचारधारा को समर्पित था। आम आदमी के संघर्ष, उसकी पीड़ा और उसके अभावों को वे एक पत्रकार के रूप में लगातार उठाते रहे। इसने उन्हें जनसाधारण के बीच नायकत्व प्रदान किया। अखबार के लिए काम करते हुए उन्होंने अक्लेची गोष्ट, खाप्पया चोर, मजही मुंबई जैसे नाटक लिखे। सरकार ने ‘तमाशा’ पर प्रतिबंध लगाया तो अन्नाभाऊ ने ‘लाल बावटा’ के लिए लिखे गए नाटकों को आगे चलकर उन्होंने लावणियों और पावड़ा जैसे लोकगीतों में बदल दिया। तमाशे में वे अकेले गाते थे, लोकगीत बनने के बाद वे जन-जन की जुबान पर छाने लगे। अन्नाभाऊ की रचनाओं पर 12 फिल्में बनीं जो सफल मानी जाती हैं।

निरंतर संघर्षमय जीवन जीते हुए अन्नाभाऊ ने 14 लोकनाटक, 35 उपन्यास और 300 से ऊपर कहानियां लिखी। लगभग 250 लावणियां उन्होंने लिखीं। लगभग छह फिल्मों की पटकथाएं और यात्रा वृतांत लिखा। उनकी लिखी 14 कहानियों/उपन्यासों का फिल्मांकन भी हुआ। यात्रा वृतांत ‘मेरी रूस यात्रा’ को दलित साहित्य का पहला यात्रा-वृतांत होने का गौरव प्राप्त है। उनके उपन्यासों और नाटकों की देश-विदेश में खूब चर्चा हुई। 1959 में प्रकाशित ‘फकीरा’ उपन्यास को खूब सराहा गया। इसे उन्होंने डाॅ. आंबेडकर को समर्पित किया था। यह उपन्यास इसी नाम के मातंग जाति के क्रांतिकारी की शौर्यकथा है, जिसमें उसका सामाजिक जीवन भी समाया हुआ है। इस उपन्यास का 27 देशी-विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ। 1961 में इसे महाराष्ट्र सरकार के शीर्ष पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी दूसरी रचनाएं भी रूसी, फ्रांसिसी, चेक, जर्मनी आदि भाषाओं में अनूदित हुईं। अन्नाभाऊ द्वारा लिखित पुस्तकों में फकीरा, वारण का शेर, अलगुज, केवड़े का भुट्टा, कुरूप, चंदन, अहंकार, आघात, वारणा नदी के किनारे, रानगंगा आदि उपन्यास; चिराग नगर के भूत, कृष्णा किनारे की कथा, जेल में, पागल मनुष्य की फरारी, निखारा, भानामती, आबी आदि 14 कहानी संग्रह; इनामदार, पेग्यां की शादी, सुलतान आदि नाटक हैं। उनके लिखे लोकनाटकों में तमाशा(नौटंकी), दिमाग की काहणी, खाप्पया चोर, देशभक्ते घोटाले, नेता मिल गया, बिलंदर पैसे खाने वाले, मेरी मुंबई, मौन मोर्चा आदि प्रमुख हैं। उन्होंने कई फिल्मों की पटकथाएं भी लिखीं, जिनमें फकीरा, सातरा की करामात, तिलक लागती हूं रक्त से, पहाड़ों की मैना, मुरली मल्हारी रायाणी, वारणे का बाघ तथा वारा गांव का पाणी प्रमुख हैं।

मुंबई में रहते हुए अन्नाभाऊ ने तरह-तरह के काम किए, पैसा भी कमाया, लेकिन गरीबी से पीछा नहीं छूटा। वे 22 वर्ष तक घाटकोपर की खोलियों में रहे। यहां एक सवाल उठ सकता है। कई बड़े अभिनेताओं और फिल्म निर्माताओं से अन्नाभाऊ का संपर्क था। उनकी कहानियों पर फिल्में बन चुकी थीं। उपन्यास ‘फकीरा’ का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका था। बावजूद इसके क्यों अपने लिए ठीक-ठाक घर का इंतजाम न कर सके? इस तरह की जिज्ञासा अन्नाभाऊ के एक मित्र को भी थी। वर्षों तक घाटकोपर की चाल में रहते देख उसने अन्नाभाऊ से पूछा थाᅳ

‘आपकी अनेक पुस्तकों का देशी-विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ है। फिल्मों की पटकथाएं भी आपने लिखी हैं। आपकी कई कहानियों और उपन्यासों पर फिल्में बन चुकी हैं। ‘फकीरा’ के रूसी भाषा में अनुवाद से रायल्टी भी मिली होगी। उससे आप बड़ा-सा बंगला क्यों नहीं बनवा लेते?’

इसपर अन्नाभाऊ ने हंसते हुए कहा थाᅳ

‘ठीक कहते हो। लेकिन बंगले में आरामकुर्सी पर बैठकर लिखते समय मैं गरीबी की सिर्फ कल्पना कर सकता हूं। गरीबी की पीड़ा और उसका दर्द तो भूखे पेट रहकर ही अनुभव किया जा सकता है।’ 

अनुभूति की इसी प्रामाणिकता के लिए अन्नाभाऊ ने गरीब-मजदूरों के बीच रहते थे। बिना किसी अहमन्यता, बगैर किसी विशिष्टताबोध के। 1968 में राज्य सरकार कुछ मेहरबान हुई। अन्नाभाऊ के रहने के लिए छोटा-सा घर उपलब्ध करा दिया गया। लेकिन गरीब मजदूरों के बीच, उन्हीं की तरह रहने वाले उस जिंदादिल इंसान को नया ठिकाना रास नहीं आया। एक साल के भीतर ही, 18 जुलाई 1969 को वह महान कलाकार मुंबई को हमेशा के लिए अलविदा कह, दुनिया से चला गय

1 अगस्त 2002 को भारत सरकार ने उनके 82वें जन्म दिवस पर डाक टिकट जारी किया। सरकार का यह प्रयास एक शाश्वत विद्रोही, प्रखर प्रतिभा को मूर्तियों में कैद कर देने जैसा ही माना जाएगा, क्योंकि दर्जनों सरकारी अकादमियां और सांस्कृतिक संस्थाएं होने के बावजूद अन्नाभाऊ के कृतित्व का एकांश भी हिंदी में उपलब्ध नहीं है। परिणामस्वरूप हिंदी के लेखक इस मराठी कला-संस्कृति और साहित्य की महानतम प्रतिभा के लेखकीय और कलात्मक अवदान से वंचित हैं।

अन्नाभाऊ की रूस यात्रा : एक सपने का सच होना

अन्नाभाऊ का जन्म सोवियत क्रांति के तीन वर्ष बाद हुआ था। किसी देश के बनने में तीन वर्ष की अवधि बहुत ज्यादा नहीं होती। इसलिए कह सकते हैं कि अन्नाभाऊ की जीवनयात्रा और सोवियत रूस की विकास यात्रा एक-दूसरे की सहगामी थीं। रूस रूपहले सपने की तरह अन्नाभाऊ की आंखों में बसता था। वे प्रायः सोचते, काश! श्रमिक क्रांति के बाद रूस के समाज में आए बदलावों को करीब से देख पाते। यह चाहत तब और प्रबल हो जाती जब रूस की शानदार प्रगति का कोई समाचार उन तक पहुंचता। रूस यात्रा की उनकी अभिलाषा कितनी गहरी थी, इसका वर्णन उन्होंने अपने यात्रा-वृतांत में स्वयं किया हैᅳ

‘मेरी अंतःप्रेरणा थी कि अपने जीवन में मैं एक दिन सोवियत संघ की अवश्य यात्रा करूंगा। यह इच्छा लगातार बढ़ती ही जा रही थी। मेरा मस्तिष्क यह कल्पना करते हुए सिहर उठता था कि मजदूर-क्रांति के बाद का रूस कैसा होगा। लेनिन की क्रांति और उनके द्वारा मार्क्स के सपने को जमीन पर उतारने की हकीकत कैसी होगी! कैसी होगी वहां की नई दुनिया, संस्कृति और समाज की चमक-दमक! मैं 1935 में ही कई जब्तशुदा पुस्तकें पढ़ चुका था। उनमें से ‘रूसी क्रांति का इतिहास’ और ‘लेनिन की जीवनी’ ने मुझे बेहद प्रभावित किया था। इसलिए मैं रूस के दर्शन को उतावला था।’4

रूस यात्रा से पहले उन्होंने दो बार पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था। पहली बार उनके आवेदन को बगैर कारण बताए निरस्त कर दिया गया था। असल में सरकार अन्नाभाऊ जैसे प्रतिभा-संपन्न कलाकार को, जिसकी लोकमानस पर गहरी पकड़ हो, जो जनता से उसी की भाषा में संवाद करने का हुनर जानता होᅳरूस भेजने से घबराती थी। इस बारे में जब उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री से संपर्क किया, तो उनका उत्तर भी तिरस्कार भरा थाᅳ‘तुम हमारे प्रति शत्रु-भाव रखते हो। यह हमारी उदारता है जो तुम अभी तक बाहर हो; अन्यथा तुम जेल की सलाखों के पीछे होते।’5 शत्रु-भाव! माने जनवादी चेतना। अन्नाभाऊ जनता से उसी भाषा में संवाद करने में निपुण थे। अपने कई लोकगीतों में अन्नाभाऊ ने मुंबई में बसे श्रमिक वर्ग के जीवन की त्रासदियों का जीवंत चित्रण कर, उनके स्वप्न-भंग की स्थिति को दर्शाया था। ऐसी रचनाएं किसी भी गैरजिम्मेदार सरकार के लिए बेचैनी का कारण बन सकती थीं।

प्रसंगवश उनकी दो लावणियों का उल्लेख किया जा सकता है। ‘मुंबईची लावणी’(मुंबई की लावणी) तथा ‘माझी मैना गावावीर राहिली’(मेरी प्रिया गांव में रहती है)। उनीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मुंबई में औद्योगिकीकरण की शुरुआत हुई थी। उससे रोजगार की तलाश में गांवों से श्रमिकों और कामगारों का पलायन आरंभ हुआ। उनमें से अधिकांश वे थे जिन्हें गांवों में भीषण गरीबी और सामंती उत्पीड़न का सामना करना पड़ता था। जो वहां रोजगार के अभाव में फाकाकशी का जीवन जीते थे। सामंती उत्पीड़न से मुक्ति और उपयुक्त रोजगार की साध लेकर वे मुंबई पहुंचे थे। वहां पहुंचकर पता चला कि हालात में लगभग ज्यों के त्यों हैं। केवल उत्पीड़क चेहरों में बदलाव आया है। गांव में वे सामंती उत्पीड़न और जातिवाद का शिकार थे। शहर में जातिभेद ज्यादा अंतर नहीं आया है, जबकि सामंत की जगह पुलिस और कानून के नाम पर बनी संस्थाओं ने ले ली है। ‘मुंबईची लावणी’ में इसी पर कटाक्ष किया गया थाᅳ

‘‘मुंबई में शिखर पर मालाबार की पहाड़ियां हैं….वह इंद्रपुरी है, इंद्र देवता की नगरी….वह धनकुबेरों की बस्ती है….रात-दिन सुख में आकंठ डूबे रहने वाले श्रीमंत लोग वहां रहते हैं….दूसरी और परेल हैं, जहां गरीब, मजदूर, कबाड़ी, भिखारी डेरा डाले हुए हैं। वे रात-दिन पसीना बहाते हैं। कड़ी मेहनत के बाद जो मिल जाता है, उसे खा लेते हैं। तीन बत्ती, गोलपीठ और फोरस रोड पर, जिंदा रहने की कीमत पर, न जाने कितने शरीर रोज खरीदे-बेचे जाते हैं।’’

दूसरी लावणी ‘माझी मैना गावावीर राहिली’ में उन मजदूरों की विरह-वेदना और पीड़ा समाई थी, जो घर-परिवार को छोड़कर नए सपने और उम्मीदें लेकर मुंबई आए थे। वहां पहुंचकर वे स्वप्न-भंग की अवस्था में जी रहे थे। इंग्लेंड में अनियोजित मशीनीकरण से पनपी ऐसी ही विषमता ने कार्ल मार्क्स को भी उद्वेलित किया था, जिससे वे पूंजीवाद के विशद अध्ययन को उन्मुख हुए। फलस्वरूप दुनिया को ‘दि कैपीटल’ जैसा महान ग्रंथ प्राप्त हुआ था। गरीब-मजदूरों का दुख-दर्द देख अन्नाभाऊ का संवेदनशील मन आहत होता तो कहानी, उपन्यास और लोकगीतों के रूप में बाहर आता था। उनकी रचनाएं मुंबइया जीवन की हकीकत बयान करती थीं। ऐसा कलाकार लोगों के दिल पर भले ही राज कर ले, उस सरकार को, जिसमें श्रीमंतों का आधिक्य हो, कतई रास नहीं आता। अपने सरोकारों के कारण अन्नाभाऊ भी सरकार की आंखों की किरकिरी बने रहते थे।

बहरहाल, अन्नाभाऊ को रूस जाने का दूसरा अवसर 1948 में मिला था। इस बार उन्हें ‘विश्वशांति सम्मेलन’ के लिए आमंत्रित किया गया था। इस बार अभिनेता मित्र बलराज साहनी ने उनके लिए टिकटों का इंतजाम भी कर दिया था। लेकिन अन्यत्र व्यस्तता के कारण वे समय न निकाल सके। 1961 में अन्नाभाऊ के उपन्यास ‘फकीरा’(1959) को महाराष्ट्र सरकार का सर्वाेच्च सम्मान प्राप्त हुआ। उस समय तक परिस्थितियां थोड़ी अनुकूल होने लगीं थीं। सरकार के मन में भी कम्युनिस्टों के प्रति पूर्वाग्रह में कमी आई थी। इस बार ‘भारत-सोवियत सांस्कृतिक समिति’ ने उनकी रूस-यात्रा का कार्यक्रम बनाया। दोनों सरकारें यात्रा के लिए राजी थीं, इससे पासपोर्ट-वीसा जैसी समस्या न थी। मगर किराये के लिए पैसों की किल्लत पहले जैसी बनी थी। फिर भी इस बार हालात कुछ अलग थे। अन्नाभाऊ को रूस यात्रा का निमंत्रण मिलने का समाचार जैसे ही प्रकाशित हुआ, स्वयं अन्नाभाऊ के शब्दों में ‘रुपयों की मानो बौछार-सी होने लगी। देखते ही देखते आधे खर्च का इंतजाम हो गया।’ जनता की सहानुभूति देख, अपनी इस मान्यता, ‘जो कलाकार जनता के लिए जीता है, जनता उसके पीछे दीवार बनकर खड़ी होती हैᅳपर उनका विश्वास और भी दृढ़ हो गया।

मुंबई से दिल्ली के रास्ते रूस जाने के लिए जब वे जहाज में बैठे तो अपनी साधारण वेशभूषा के कारण बाकी यात्रियों के बीच अलग नजर आ रहे थे। इस बात का उन्हें एहसास भी था। लेकिन यात्रा के दौरान विमान में ऐसी घटना घटी जिससे उनका सारा मलाल जाता रहा। उन्होंने स्वयं लिखा हैᅳ

‘‘उस उड़ान में सम्मेलन में हिस्सा लेने रूस जा रहे, श्रीलंकाई प्रतिनिधि भी सम्मिलित थे। उन्हीं में से एक जो संसद संदस्य और कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्य समाचारपत्र का संपादक थेᅳने मुझे पहचान लिया। उसी महीने साहित्यिक पत्रिका ‘मनोहर’ में मेरा सचित्र परिचय मेरे तमाशे ‘खाप्पया चोर’ के चित्र के साथ प्रकाशित हुआ था। विमान के उड़ान भरने के कुछ ही समय बाद एक यात्री ने मुझे पहचान लिया। पत्रिका का अंक हवा में लहराते हुए उसने चुनौती दी कि ‘खाप्पया चोर’ को जो उड़ान के दौरान हवाई जहाज में ही मौजूद है, कौन पहचानेगा? उसके बाद यात्री उसे लेकर फुसफुसाने लगे। अंत में मुझे मेरे श्रीलंकाई मित्र के साथ पहचान लिया गया।’7

उस समय तक अन्नाभाऊ का दूसरा उपन्यास ‘चित्रा’ भी रूसी भाषा में अनूदित हो चुका था। इसके अलावा उनकी कई कहानियां भी अनूदित होकर रूस पहुंच चुकी थीं। जिनमें उनकी कहानी ‘सुलतान’ भी थी। ‘सुलतान’ एक कैदी पर आधारित कहानी थी, जिससे लेखक की मुलाकात अमरावती की सेंट्रल जेल में हुई थी। अन्नाभाऊ के रूस पहुंचने से पहले सुलतान वहां चर्चित हो चुकी थी। इसलिए अगले दिन के अखबारों की मुख्य खबर थीᅳ”मशहूर कहानी ‘सुलतान’ का लेखक रूस में।” अन्नाभाऊ का लिखा नाटक ‘स्तालिनग्राद’ भी वहां चर्चा का विषय था।

मास्को में उन्होंने होटल के वेटरों, माली, फोटोग्राफर, ड्राइवर, लिफ्ट आपरेटर से दोस्ती की, और वहां के जनजीवन के बारे में जानकारी हासिल की। लेनिनग्राद में उन्होंने संग्रहालय में चंद्रगुप्त मौर्य के कार्यकाल के अनेक सिक्के देखे। रूस में नेहरू की लोकप्रियता को दर्शाती एक घटना का उल्लेख उनके यात्रा-वृतांत में है। जो नेहरू के प्रति उनके दिल में छिपे सम्मान को दर्शाता हैᅳ

‘‘मैं होठों के बीच सिगरेट दबाए रेड स्कवायर से क्रेमलिन की ओर बढ़ रहा था। मेरे पास माचिस नहीं थी और मैं उसके लिए इधर-उधर देख रहा था। सहसा एक आदमी मेरे सामने आकर खड़ा हो गया। उसने लाइटर से मेरी सिगरेट सुलगा दी। मेरे लिए वह अप्रत्याशित था।

‘क्या तुम भारतीय हो?’ उस आदमी ने पूछा।

‘जी हां….’ कहकर मैंने उसे धन्यवाद देना चाहा। लेकिन अगले ही पल उसने मुझे अपनी बाहों में भर लिया और कहने लगाᅳ

‘कैसे हैं नेहरू जी?’

‘वह बिलकुल ठीक हैं,’ मैंने बताया, ‘आज वे यूएनओ में भाषण देने जा रहे हैं।’ सुनकर वह व्यक्ति बेहद प्रसन्न हुआ और नेहरू जी को धन्यवाद देता हुआ वहां से प्रस्थान कर गया।’’

‘भारत-रूस सांस्कृतिक समिति’ द्वारा रूस की यात्रा के लिए गठित प्रतिनिधिमंडल में अन्नाभाऊ सबसे साधारण और सामान्य दिखने वाले इंसान थे। परंतु रूस की यात्रा पूरी होते-होते अन्नाभाऊ के बारे में उनके सहयात्रियों की धारणा एकदम बदल चुकी थी। प्रतिनिधिमंडल में मद्रास निवासी गिटारवादक जैकोब जिम भी शामिल था। स्तालिनग्राद से अजरबेजान की राजधानी बाकू की ओर वायुयान से जाते समय जैकोब ने अन्नाभाऊ से कहा थाᅳ‘साठे जी, जब हम आपसे पालम एयरपोर्ट पर मिले तो सोचते थे कि आप इस देश से अनजान होंगे और हमारे बीच जम नहीं पाएंगे। लेकिन वह हमारी चूक थी। आप इस देश में बहुत प्रसिद्ध हैं। और निस्संदेह आप अच्छे लेखक हैं। आपके ओजस्वी भाषणों से मैंने बहुत कुछ ग्रहण किया है।’8

अन्नाभाऊ की 40 दिनों की रूस यात्रा अनेक अनुभवों से भरी थी। उनके लिए वह यात्रा एक सपने से गुजरने जैसी थी। एक समानता पर आधारित स्वतंत्र समाज का सपना जो वर्षों से उनके मानस में जड़ जमाए हुए था। रूस में उन्होंने विचार को वास्तविकता में बदलते हुए देखा। जाना कि संकल्प बड़े और नीयत अच्छी हो तो आदर्श और यथार्थ के बीच की दूरी कम होने लगती है। स्वप्न हकीकत में ढलने लगते हैं।

वर्ग-संघर्ष और सामाजिक न्याय को एक साथ साधने वाला जमीनी लेखक

अपनी किशोरावस्था से ही अन्नाभाऊ वामपंथ के संपर्क में आए थे। सामाजिक विषमता और छूआछूत को उन्होंने बचपन से देखा-भोगा था। इसलिए छूआछूत और सामाजिक विषमता के विरुद्ध भारत में संघर्ष कर रहे डाॅ. आंबेडकर के प्रति उनकी श्रद्धा भी स्वाभाविक थी। उपन्यास ‘फकीरा’ को जो इसी नाम के मातंग जाति के क्रांतिकारी के जीवन पर आधारित था, उन्होंने डाॅ. आंबेडकर को समर्पित किया था। उनका समूचा लेखन उनके जीवनानुभवों का दस्तावेज है। एक कहानी संग्रह की प्रस्तावना में उन्होंने अपने इस द्रष्टिकोण को बड़ी बेबाकी से प्रस्तुत किया हैᅳ

‘जो जीवन मैंने जिया, जीवन में जो भी भोगा, वही मैंने लिखा….मैं कोई पक्षी नहीं हूं जो कल्पना के पंखों पर उड़ान भर सकूं। मैं तो मेडक की तरह हूं, जमीन से चिपका हुआ।’

एक प्रसिद्ध दोहे में उन्होंने हिंदुओं के शेषनाग के मिथ पर टिप्पणी करते हुए लिखा थाᅳ‘यह पृथ्वी शेषनाग के मस्तक पर नहीं टिकी है। अपितु वह दलितों, काश्तकारों और मजदूरों के हाथों में सुरक्षित है।’ उनका कहना था कि कला शिवजी की तीसरी आंख की तरह होती है, जो संसार को भेदती हुई सभी मिथों को जलाकर भस्म कर देती है। इस आंख को सदैव सतर्क रहना चाहिए, तथा मनुष्य के हितों की देखभाल करनी चाहिए। अन्नाभाऊ के सरोकार मानवीय थे। उनके लेखन में कल्पनातत्व सिर्फ उतना है, जितना रचनात्मक बने रहने के लिए आवश्यक होता है। वे रूसी लेखकों में गोर्की से बेहद प्रभावित थे, जिन्होंने हाशिये के पात्रों को मुख्यधारा के साहित्य में जगह दी थी। अन्नाभाऊ भी अपनी लावणियों, लोकगीतों, कहानियों, उपन्यासों आदि के माध्यम से आम आदमी की चिंताओं और सरोकारों को जगह देते हैं। विशेषरूप से अछूत जातियों की समस्याओं तथा उनके चरित्र के उदात्त पहलुओं को बार-बार उठाते हैं। यही कारण है कि लिखते समय उन्होंने कल्पना का कम से कम सहारा लिया है। ‘मेरे सभी पात्र जीते-जागते समाज का हिस्सा हैं। यह उनका दावा भी था।

अन्नाभाऊ को लेकर एक घटना का उल्लेख सुप्रसिद्ध अभिनेता ए. के. हंगल ने अपने संस्मरणों में भी किया है, जिससे उनके सरोकार स्पष्ट नजर आते हैंᅳ

‘‘एक दिन वह(अन्नाभाऊ) मेरे कमरे पर पहुंचा। उसके हाथों में उसका लिखा एक नाटक भी था। उस समय वह बेहद निरुत्साहित था। उसने बताया कि वह उस नाटक को एक प्रसिद्ध मराठी लेखक के पास उसकी राय जानने के लिए लेकर गया था। उस लेखक ने नाटक को नापसंद किया और तिरस्कारपूर्ण ढंग से कहाᅳ‘जाओ, जाकर मजदूरों के लिए ‘तमाशे’ और ‘पावड़े’ लिखो।

मैं उसकी मदद करना चाहता था। इसलिए मैंने स्वेच्छा से उसके नाटक का हिंदी अनुवाद किया, जो ‘इनामदार’ के नाम से मंचित हुआ। आर. एम. सिंह उसके निर्देशक थे। उसके बाद हम दोनों मित्र बन गए।

एक दिन साहसी मनोस्थिति में मैंने अपना एक नाटक निकाला, जिसे मैंने 15 वर्ष पहले लिखा था। उसपर मैंने अन्नाभाऊ की प्रतिक्रिया जाननी चाही। नाटक ‘छूआछूत’ पर आधारित था, जो उन दिनों की बड़ी समस्या थी। अन्नाभाऊ ने नाटक की पांडुलिपि को धैर्यपूर्वक सुना, बोलाᅳ

‘कामरेड, इसे फाड़कर फेंक दें, यह नाटक नहीं है।’ मैंने उसका विरोध किया और आलोचना का कारण जानना चाहा। इसपर उसका उत्तर थाᅳ‘आप ब्राह्मण के घर जन्मे हैं, दलित की पीड़ा  महसूस कर ही नहीं सकते।’

‘लगभग सभी यहूदी पूंजीपति थे। कार्ल मार्क्स भी यहूदी था, जिसने पूंजीवाद की बखिया उधेड़ दी थी।’ मैंने मजाकिया लहजे में कहा; और पांडुलिपि को किनारे रख दिया। उसके बाद हम दोनों खुले मन से हंसने लगे।

अन्नाभाऊ तेज-तर्रार आलोचक था, लेकिन वह खुद को भी नहीं बख्शता था।’’9

हंगल साहब के नाटक पर अन्नाभाऊ की टिप्पणी उनका पूर्वाग्रह भी हो सकती है। सहानुभूति और स्वानुभूति के लेखन को लेकर हिंदी साहित्य में भी खासी बहस होती होती है। पल-भर के लिए मान लिया जाए कि अन्नाभाऊ पूर्वाग्रह-ग्रस्त थे, तब उस प्रसिद्ध मराठी लेखक को भी पूर्वाग्रस्त मानना पड़ेगा, जिसने अन्नाभाऊ के नाटक को तिरस्कार पूर्ण ढंग से लौटा दिया था।

अन्नाभाऊ ने अपनी कहानियों और उपन्यासों में गरीबी और जातीय उत्पीड़न के सताए लोगों को जगह दी थी। ऐसे लोग जो साहित्य में उपेक्षित थे। उनकी कहानियों में महार, मांग, रामोशी, बालुतेदार और चमड़े का काम करने वाले पात्र समाए हुए हैं। न केवल उनकी जीवंत उपस्थिति है, अपितु उनकी पीड़ाओं और संघर्ष को भी सम्मान के साथ सहेजा गया है। अन्नाभाऊ की एक बहुत ही मार्मिक कहानी हैᅳ‘तीन भाकरी’। गांव में दो औरतें रहती हैं। उनके बीच सास-बहू का रिश्ता है। दोनों मेहनत-मजदूरी करती हैं। अगर किसी दिन मेहनत से चूक जाएं तो घर का चूल्हा ठंडा पड़ा रहता है। बेहद गरीबी का जीवन जी रही वे औरतें आपस में हमेशा लड़ती रहती हैं। गांव के लोग अशिक्षित, रूढ़िवादी और भूत-प्रेत में विश्वास रखने वाले हैं। दोनों स्त्रियां अछूत हैं। इस कारण गांव-भर की उपेक्षा और तिरस्कार का शिकार हैं। एक दिन सांताजी, कहानी का एक पात्र बताता है कि दोनों भुखमरी की कगार पर हैं। उनके पास कुछ भुट्टे थे, जिससे केवल तीन रोटियां बन सकती हैं। दोनों स्त्रियां पेशोपेश में हैं कि रोटियों का बंटवारा कैसे होगा। दोनों सोचती है कि अगर वह रोटी बनाए तो दो रोटियों पर उसका अधिकार होगा। बहू का भी यही विचार था। परिणाम यह होता है कि दोनों सोचते-सोचते लेट जाती हैं। अगले दिन भूख के कारण उनके प्राण चले जाते हैं।

उनकी सुप्रसिद्ध कहानी ‘सुलतान’ जो एक कैदी की कहानी पर केंद्रित हैᅳके प्रमुख पात्र सुलतान का मानना है कि मनुष्य को उसकी जरूरत की चीजें रोटी, कपड़ा और मकान आसानी से प्राप्त होनी चाहिए। लेकिन गरीबी के कारण उसका सोच आगे नहीं बढ़ पाता। अंततः वह केवल इसलिए जेल चला जाता है क्योंकि मनुष्य को वहां उसकी न्यूनतम आवश्यकता की तीनों चीजें आसानी से उपलब्ध होती हैं। कुछ ऐसा ही दूसरी कहानी के पात्र भोमक्या और गोपिकाबाई भी करते हैं। भुखमरी से बचने के लिए भोमक्या सुलतान की तरह जेल चला जाता है तो गोपिकाबाई एक किसान की शरण ले लेती है। भोमक्या या सुलतान में से कोई भी अपराधी मनोवृत्ति का नहीं था। उन्होंने जेल में रहना केवल इसलिए पसंद किया था, क्योंकि वहां उनकी न्यूनतम आवश्यकताएं आसानी से पूरी हो जाती थीं। अन्नाभाऊ जेल जाने को भुखमरी की समस्या का समाधान नहीं मानते। बल्कि जेल को ऐसा ठिकाना मानते हैं, जहां नागरिक जीवन और मनुष्य का विकास एक साथ ठहर जाते हैं।

एक और कहानी ‘सांवला’ का उल्लेख यहां आवश्यक है। कथानायक सांवला पुरुषसत्तात्मक समाज में स्त्री के पक्ष में सवाल उठाता है। रामोशी और मांग जाति के अपने मित्रों के साथ वह ब्रिटिश सत्ता से टकराता है। वे सभी अपने कार्य के प्रति ईमानदार हैं। इस बीच सांवला और उसके साथियों को काशी नाम की युवती के बारे में पता चलता है। ससुराल में दहेज-उत्पीड़न की शिकार है। अपने साथियों के साथ सांवला काशी को उसके सास-ससुर के चंगुल से मुक्ति दिलाने के लिए संघर्ष करता है। इसपर उसके सास-ससुर सांवला पर काशी के साथ बलात्कार का आरोप लगा देते हैं। आरोप से क्षुब्ध सांवला काशी से ससुर से कहता हैᅳ

‘दादा पाटिल! क्या आप सोचते हैं कि सिर्फ आप ही बेदाग चरित्र वाले हैं, क्या आप हमें चरित्रहीन मानते हैं, आपसे किसने यह कहा है?

‘लोग कहते हैं कि सभी मांग बलात्कारी होते हैं।’ यह सुनकर सांवला को क्रोध आ जाता है। वह कहता है, ‘कौन हैं वे लोग, मुझे बताओ। मैं उनकी पूरी दुनिया को जलाकर भस्म कर दूंगा।’ कहानी स्त्री समानता और स्वाधीनता के पक्ष में समाप्त होती है।

ऐसे विद्रोही चरित्रों से अन्नाभाऊ की कहानियां भरी पड़ी हैं।

अन्नाभाऊ के रचनाकर्म का कोई भी उल्लेख उनके उपन्यास ‘फकीरा’ के बिना संभव नहीं है। उनके अधिकांश कथापात्रों की तरह इस उपन्यास का कथापात्र फकीरा भी वास्तविक जीवन से उठाया गया है। वह जाति से मांग और शाश्वत विद्रोही है। फिर भी मानवीय है। अवसर आने पर वह अपने पिता के हत्यारों को मारने के बजाय, उन्हें महज दंड देकर छोड़ देता है। उपन्यास जहां सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार करता है, वहीं जाति के जंजाल में फंसी अछूत जातियों की पीड़ा को भी सामने लाता है। महाराष्ट्र में मांग और महार कहीं-कहीं प्रतिद्विंद्वी जातियों के रूप में सामने आती हैं। इस उपन्यास में अन्नाभाऊ इन दोनों अछूत जातियों की एकता पर भी जोर देते हैं।

कुल मिलाकर अन्नाभाऊ का समस्त रचनाकर्म समाज में हाशिये पर पड़े लोगों के संघर्ष और चारित्रिक विशेषताओं को सामने लाता है। यह दुख की बात है कि उनके रचनाकर्म का हिंदी अनुवाद उनके निधन के 50 वर्ष बाद भी अनुपलब्ध है। अन्नाभाऊ की आस्था मार्क्स और आंबेडकर दोनों में थी। वे दोनों को साथ-साथ साधना चाहते थे। जबकि अधिकांश दलित लेखक मार्क्स और मार्क्सवादी लेखन की उपेक्षा करते आए हैं। अन्नाभाऊ के रचनाकर्म के हिंदी में न आने के पीछे कदाचित यह भी बड़ा कारण है। लेकिन इससे अन्नाभाऊ के प्रति जो अन्याय हुआ है, उसकी भरपाई असंभव है।

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

1.         जग बदल घालूनी घाव

            सांगुनी गेले मला भीमराव

            गुलामगिरीच्या या चिखलात

            रुतुन बसला का ऐरावत

            अंग झाडूनी निघ बाहेरी- जनगीत, साहित्यरत्न लोकशाहीर अन्नाभाऊ साठे

2          My Journey to Russia, Translated by Dr. Ashwin Ranjanikar, New Voices Publications, Juna           Bazar, Aurangabad, 2014, Page-5 & 47.

3.         Dr. Sunil Bhise, Annabhau Sathe: A Socialist Thinker, as quoted from Kathale       Nanasaheb,       2001,    (2nd Edition), ‘Annabhau Sathe : Jeevan Aani Sahitya’, Samata Sainik Dal Prakashan, Parasaran Vyavastha, P-32.

4.         My Journey to Russia, Page-9

5.         Ibidजन

6.         दलित-क्रांति के कवि अण्णा भाऊ साठे, by अमरित लाल उइके http://amritlalukey.blogspot.com/2011/11/anna-bhau-    sathhe.html

7.         My Journey to Russia, Page-12

8.         Ibid page-31

9.        A. K. Hangal, in Life and Times of A. K. Hangal, Sterling Paperbacks,1999, Page 80-81

‘हिंद स्वराज’ का बहुजन पाठ

सामान्य

‘हिंद स्वराज’ गांधी विचार की प्रतिनिधि पुस्तक है। गांधी ने इसकी रचना 1909 में समुद्री यात्रा के दौरान की थी। उन दिनों वे दक्षिणी अफ्रीका में भारतीयों की अस्मिता की लड़ाई के लिए संघर्ष कर रहे थे। वहां सत्याग्रह को आरंभिक सफलताएं मिलने से उनकी ख्याति देश-देशांतर तक फैलने लगी थी। कुशल पत्रकार, संपादक और जनसंवादन कला के धनी गांधी ने ‘हिंद स्वराज’ मूल रूप से गुजराती में लिखा और अपने अखबार ‘इंडियन ओपीनियन’ में छाप दिया। अगले ही वर्ष वह पुस्तक रूप में भी बाजार में आ गया। फिर जैसी उम्मीद थी, वही हुआ। पुस्तक अंग्रेज सरकार द्वारा जब्त कर ली गई। पहले संस्करण के लगभग छह वर्ष पश्चात 1915 में नया अंग्रेजी अनुवाद आया तो अंग्रेजों ने उसकी अनदेखी कर दी। देखते ही देखते पुस्तक विमर्श के क्षेत्र में छा गई।

पूरी पुस्तक बीस अध्यायों में बंटी, संवाद शैली में है। गांधी जी ने इस शैली का उपयोग क्यों किया? यह सोचने की बात नहीं। भारतीय उपनिषदों में यह शैली खूब चली है। केनोपनिषद् तो पूरा का पूरा संवाद-शैली में ही है। सुकरात और उसके प्रिय शिष्य प्लेटो की यह प्रिय शैली रही है। हालांकि धीरे-धीरे इस शैली का प्रचलन बुद्धिजीवियों में कम होता गया था। जिन दिनों गांधी जी ने ‘हिंद स्वराज’ की रचना की थी, यह गंभीर लेखन के क्षेत्र में बहुत लोकप्रिय शैली भी नहीं थी। कदाचित गांधी का इरादा गंभीर पुस्तक लिखने का था भी नहीं। ‘हिंद स्वराज’ लिखने से करीब एक वर्ष पहले उन्होंने जाॅन रस्किन की पुस्तक ‘अनटू दि लाॅस्ट’ का ‘सर्वोदय’ शीर्षक से गुजराती अनुवाद भी किया था, जो ‘इंडियन ओपीनियन’ में प्रकाशित हुआ था। ‘हिंद स्वराज’ में गांधी आधुनिकता का पर्याय मान ली गई पश्चिमी संस्कृति की प्रशंसा करते हैं। इसके लिए वे वकील, डॉक्टर, रेल, अदालत आदि की आलोचना करते हैं। यहां तक कि ब्रिटिश संसद पर भी आक्षेप लगाते हैं। कदाचित इसीलिए ‘हिंद स्वराज’ को खूब प्रचार मिला। पुस्तक के अनगिनत प्रशंसक थे तो आलोचक भी कम न थे। अनेक देशी-विदेशी विद्वानों ने ‘हिंद स्वराज’ की प्रशंसा की, वहीं गोखले ने उसे अधकचरी पुस्तक माना और उम्मीद जाहिर की कि भारत लौटने के बाद गांधी स्वयं उस पुस्तक को खारिज कर देंगे।

रस्किन के अतिरिक्त ‘हिंद स्वराज’ पर रूसो, कारपेंटर और थोरो के विचारों की छाया भी देख सकते हैं। पुस्तक के बारे में गांधी की टिप्पणियों से पता चलता है कि वे इस पुस्तक को लेकर अतिरिक्त रूप से मोहाग्रस्त थे। एक जगह उन्होंने लिखा है—‘यह पुस्तक इतनी निर्दोष है कि बच्चों के हाथ में यह दी जा सकती है। यह पुस्तक द्वैषधर्म की जगह प्रेमधर्म सिखाती है, हिंसा की जगह आत्म-बलिदान को स्थापित करती है और पशुबल के खिलाफ आत्मबल को खड़़ा करती है।’ अगर गांधी की संपूर्ण राजनीति को देखें तो उसके पीछे गांधी के कथित आत्मबल की ही प्रेरणा है। यह बात अलग है उस आत्मबल की शक्ति गांधी की अपनी कम, उनके प्रायोजकों की अधिक थी, जिन्होंने गांधी को देखते ही देखते भारतीय राजनीति के महानायक का दर्जा दे दिया था। हजारों वर्षों से दमन और शोषण का शिकार रही दलित और पिछड़ी जातियों में पनप रही जातीय चेतना, जो कभी भी वर्ग-चेतना का रूप ले सकती थी—से बचाव के लिए उन्हें सुरक्षित आड़ की आवश्यकता थी। गांधी और गांधीवाद दोनों इस भूमिका के लिए एकदम खरे थे।

‘हिंद स्वराज’ में कोई क्रमबद्ध चिंतन नहीं है। कुछ छिटपुट गांधी-विचार टिप्पणियों के रूप में आए है। बावजूद इसके ‘हिंद स्वराज’ के प्रति गांधी का विश्वास इतना दृढ़ था कि उसके प्रकाशन के तीन दशक बाद जब किसी पत्रकार ने पूछा कि क्या आप इसमें कोई फेरबदल करना चाहेंगे तो गांधी ने लिखा—‘यह पुस्तक अगर आज मुझे लिखनी हो तो कहीं-कहीं मैं इसकी भाषा को बदलूंगा। लेकिन इसे लिखने के बाद तीस वर्ष जो मैंने आंधियों में बिताए हैं, उनमें मुझे इस पुस्तक में बताए गए विचारों में फेरबदल का कोई कारण नहीं मिला।’1 ‘हिंद स्वराज’ को गांधी विचार का प्रतिनिधि दस्तावेज मानने के पीछे गांधी का यही विश्वास था। बहरहाल, पुस्तक का पांचवां अध्याय ‘इंग्लेंड की हालत’ पर है। हम अपना विमर्श इसी अध्याय से आरंभ करेंगे। चौथे अध्याय में ‘पाठक’ के यह कहने पर कि इंग्लेंड की पार्लियामेंट सब ‘पार्लियामेंटों की माता’ तो बेशक हमें उसकी नकल करनी चाहिए—अगले अध्याय में गांधी ‘इंग्लेंड की हालत’ पर विचार करते हैं। शीर्षक से उम्मीद जगती है कि गांधी इसमें इंग्लेंड के समाज, वहां के जन-जीवन तथा समाजार्थिक परिस्थितियों पर विचार करेंगे। मगर उनपर कोई बातचीत किए बगैर गांधी सीधे इंग्लेंड की पार्लियामेंट पर चर्चा करने लगते हैं। वे लिखते हैं—

‘इंग्लेंड में आज जो हालत है, वह सचमुच तरस खाने लायक है। मैं तो भगवान से यही मानता हूं कि हिंदुस्तान की ऐसी हालत कभी न हो। जिसे आप पार्लियामेंटों की माता कहते हैं, वह पार्लियामेंट तो बांझ और बेसवा है। ये दोनों शब्द बहुत कड़े हैं, तो भी उसपर बहुत अच्छी तरह से लागू होते हैं। मैंने उसे बांझ कहा, क्योंकि अब तक पार्लियामेंट ने अपने आप एक भी अच्छा काम नहीं किया। अगर उसपर दबाव डालने वाला कोई न हो तो वह कुछ भी न करे, ऐसी उसकी कुदरती हालत है और वह बेसवा है, क्योंकि जो मंत्री मंडल उसे रखे, उसके पास वह रहती है। आज उसका मालिक एसक्विथ है, कल वालफर होगा और परसों को तीसरा।’’2

उपर्युक्त टिप्पणी को पढ़ते हुए कुछ प्रश्न एकाएक दिमाग में एकाएक आ सकते हैं। मसलन क्या गांधी ब्रिटिश पार्लियामेंट की सुस्ती या नकाराकन के लिए उसकी आलोचना कर रहे थे? क्या उनकी आलोचना ब्रिटिश पार्लियामेंट तक सीमित थी, अथवा उसका दायरा अथवा उनकी आलोचना पूरी संसदीय प्रणाली को लेकर है? क्या ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री हर्बर्ट हेनरी एसक्विथ का आचरण गैर-जिम्मेदाराना और तानाशाही पूर्ण था? संसदीय प्रणाली में पार्लियामेंट की जनता के प्रति जो जवाबदेही होनी चाहिए, क्या ब्रिटिश पार्लियामेंट उसमें नाकाम थी? यदि गांधी की आलोचना केवल पार्लियामेंट की सुस्ती को लेकर है, तो एक सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या उन दिनों ब्रिटिश पार्लियामेंट सचमुच निष्क्रिय और नाकारा थी? एसक्विथ अप्रैल 1908 से दिसंबर 1916 तक यूनाईटिड किंग्डम के प्रधानमंत्री थे। उन्हें संसदीय सुधार के लिए जाना जाता है। हालांकि 1914 में ब्रिटेन को प्रथम विश्वयुद्ध में ढकेलने के लिए एसक्विथ की आलोचना की जाती है। चूंकि 1914 की घटना ‘हिंद स्वराज’ लिखे जाने के बाद की है, इसलिए हमारे लिए ब्रिटिश पार्लियामेंट और एसक्विथ द्वारा नवंबर 1909; यानी ‘हिंद स्वराज’ लिखे जाने के पहले लिए गए निर्णय ही महत्त्वपूर्ण होंगे।

लेबर पार्टी के सत्ता में आने से पहले यूनाइटिड किंग्डम में कंसरबेटिव पार्टी की सरकार थी। उसने 1902 में शिक्षा अधिनियम पास किया था, जिसके फलस्वरूप वहां शैक्षिक क्रांति को बढ़ावा मिला। उस अधिनियम के फलस्वरूप 1914 तक यानी केवल 12 वर्ष के अंतराल में इंग्लेंड में 1000 नए माध्यमिक विद्यालय खोले गए थे, जिनमें से 349 स्कूल केवल लड़कियों के लिए थे।3 उसके अगले वर्ष कंजरवेटिव सरकार ने ‘एंप्लायमेंट आफ चिल्ड्रन अधिनियम-1903 को मंजूरी दी थी, जिनमें कारखानों में काम कर रहे बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा के लिए आवश्यक कानून बनाए गए थे। उस कानून के अनुसार 10 वर्ष के कम के किसी भी बच्चे को फैक्ट्री के काम में नहीं लगाया जा सकता था। बच्चों को ऐसा कोई भी काम सौंपने की मनाही थी, जिसकी परिस्थितियां उनके स्वास्थ्य के प्रतिकूल हों। यही नहीं, काम के साथ-साथ-साथ उनकी शिक्षा की व्यवस्था भी की गई थी।4 1905 में वही संसद ‘बेरोजगारी श्रमिक अधिनियम—1905 के माध्यम से ‘आपदा समिति’ का गठन करती है, आपदा समिति का काम स्थानीय निकायों एवं व्यापरिक निगमों में बेरोजगारों की अधिकाधिक भर्ती के अनुदान आदि की अनुशंसा करना था। ऐसी संसद को, जो प्रतिवर्ष लोककल्याण की दिशा में नए-नए कानून बना रही थी, उसपर अमल भी कर रही थी, गांधी ‘बांझ’ ओर ‘बेसवा’ कह जाते हैं। गौरतलब है कि भारत में गरीब बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा, जो बच्चे किसी कारणवश स्कूल नहीं जा पाते, मिल-कारखानों-खदानों आदि में काम करने को विवश होते हैं—उनके लिए काम के दौरान शिक्षा की मांग कांग्रेस या उसके किसी बड़े नेता के आंदोलन का हिस्सा नहीं थी। कांग्रेस अभिजात्य वर्ग के पढ़े-लिखे युवाओं को सरकारी नौकरियों की हिस्सेदारी की मांग तो कर रही थी, लेकिन किसान और मजदूरों की बेरोजगारी उसके लिए कोई मुद्दा न थी। उसके नेताओं का विचार था की जाति प्रथा के चलते सबके लिए उनके पैतृक व्यवसाय निर्धारित है, ऐसे में बेरोजगारी भारत के लिए बड़ा मुद्दा हो ही नहीं सकती।

बहरहाल, हम पुन: इंग्लेंड की संसद पर लौटकर आते हैं, जिसपर गांधी ने बेसवा’ और नाकारा होने जैसे आरोप लगाए हैं। यूनाइटिड किंग्डम में 1906 में एसक्विथ के नेतृत्व वाली, ‘लेबर पार्टी’ बहुमत के साथ सरकार बनाती है। उसके बाद वहां सामाजिक और प्रशासनिक सुधारों का सिलसिला और गति पकड़ लेता है। गांधी नशाबंदी के समर्थक थे। भारत लौटने के बाद वे इसके लिए आंदोलन भी चलाते हैं। जन्म के समय होने वाली बाल मृत्युदर पर नियंत्रण हेतु 1907 में इंग्लेंड सरकार ने ‘नोटिफिकेशन आफ बर्थ अधिनियम’ लागू किया था। उसके अनुसार शिशु के जन्म के 36 घंटों के भीतर उसकी सूचना सरकार को देना अनिवार्य कर दिया गया था। 1908 में एसक्विथ सरकार इग्लेंड और वॉल्स के शराब और जुआखानों की लाइसेंसिंग का नया कानून बनाते हैं, परिणामस्वरूप इंग्लेंड और वॉल्स के 100000 पबों में से एक तिहाई बंद करा दिए जाते हैं। इसके अलावा एजुकेशन(एडमिनस्ट्रिेटिव प्रोवीजन) एक्ट-1907, ‘प्रोबेशन आफ ओफेंडर्स एक्ट-1907, चिल्ड्रन एंड यंग पर्सन एक्ट-1908, आइरिश यूनीवर्सिटीज एक्ट-1908, ओल्ड एज पेंशन एक्ट-1908, लेबर एक्सचेंज एक्ट-1909 जैसे दर्जनों सुधारवादी कानून वहां की एसक्विथ के नेतृत्व वाली सरकार बनाती है। यही नहीं, छोटे किसानों को बड़े जमींदारों के चंगुल से बचाने के लिए एसक्विथ सरकार ने 1906 से 1908 के बीच भू-सुधार हेतु अनेक लोकोपयोगी कानून बनाए थे। उनमें एग्रीकल्चर होल्डिंग एक्ट-1906, स्माल होल्डिंग एंड एलाटमेंट एक्ट-1907, कसोलिडेशन एक्ट-1907 जैसे कानून शामिल थे। ‘स्माल होल्डिंग एंड एलाॅटमेंट एक्ट-1907’ में सुधार करते हुए ‘स्माल होल्डिंग एंड एलाटमेंट एक्ट-1908’ नामक नया कानून बनाया गया, उसके तहत 1908 से 1914 के बीच लगभग दो लाख एकड़ कृषि भूमि का अधिग्रहण किया, जिसे 14000 लघु-जोतों में बांटकर छोटे किसानों को मदद पहुंचाई गई। आशय है कि 1900 से लेकर 1909 के वे दिन जब गांधी ‘हिंद स्वराज’ में ब्रिटिश संसद पर बांझ और बेसवा होने का आरोप लगा रहे थे, ब्रिटिश जनता की दृष्टि से ब्रिटिश संसद उत्तरदायी सरकार की भूमिका निभा रही थी। सरकार ने नियंत्रित पूंजीवादी व्यवस्था लागू की थी। यही नहीं 1909 में लेबर पार्टी सरकार की ओर से संसद के आगे जो फाइनेंस बिल(बजट) पेश किया गया था, उसे उन्होंने बुद्धिजीवियों ने ‘जनता का बजट’ की संज्ञा दी थी। भारत में उसी तरह के कानून बनाने की आवश्यकता के बजाय गांधी ब्रिटिश पार्लियामेंट पर ही आरोप लगाने लगते हैं।

भारत के संबंध में भी ब्रिटिश संसद ने ऐसे कई युगांतरकारी निर्णय लिए थे, जो आगे चलकर इस देश को आधुनिक राज्य बनाने में सहायक सिद्ध हुए। चार्टर अधिनियम-1813 में भारत में शिक्षा सुधारों की नींव रखी गई थी। शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कंपनी के बजट में न्यूनतम एक लाख रुपये का प्रावधान किया गया। उसके फलस्वरूप शूद्रों और अतिशूद्रों के लिए शिक्षा प्राप्ति के रास्ते प्रशस्त हुए। उससे पहले देश में मनुस्मृति का विधान लागू था। उसके अनुसार संपूर्ण शिक्षा का अधिकार केवल ब्राह्मणों तक सीमित था। गैर-ब्राह्मण सवर्ण केवल अपने व्यवसाय से संबंधित शिक्षा ग्रहण कर सकते थे। जिन्हें इसमें संदेह है वे विश्वामित्र और वशिष्ट के संघर्ष को याद कर सकते हैं। शूद्रों और अतिशूद्रों के लिए शिक्षा पूरी तरह निषिद्ध थी।

चार्टर अधिनियम-1813 केवल 20 वर्षों के लिए लाया गया था। 1833 में लागू अगले चार्टर में विधि संहिता के निर्माण हेतु विधि आयोग बनाने की अनुशंसा की गई थी। उसके अधीन जो कानून बने, वे सभी भारतीयों यहां तक कि भारत में रह रहे अंग्रेजों पर भी लागू होते थे। उस अधिनियम के बाद प्रशासनिक सेवाओं को पूरी तरह से स्पर्धात्मक बना दिया गया था। जाति, धर्म, संप्रदाय से परे कोई भी उनमें हिस्सा ले सकता था। उससे पहले तीन-चार प्रतिशत ब्राह्मण आबादी 70 प्रतिशत सरकारी पदों पर कब्जा जमाए हुए थी। नए अधिनियम के लागू होने के बाद शूद्रों ओर अतिशूद्रों के लिए सरकारी नौकरियों में जाने का रास्ता साफ हो गया। चार्टर अधिनियम-1853 में स्थानीय प्रशासन में भारतीयों को जगह देने की अनुशंसा की गई थी। 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेज समझ चुके थे कि ताकतवर जातियों को संतुष्ट किए बिना उनका इस देश में टिके रहना संभव नहीं है। इसलिए 1858 में भारत को ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बनाते समय इंग्लेंड की महारानी ने जो घोषणा की थी, उसमें जमींदारों और राजे-रजबाड़ों के विशेषाधिकारों की सुरक्षा का आश्वासन दिया गया था। तथापि ब्रिटिश सरकार की प्रशासनिक नीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया था। उसके फलस्वरूप शूद्रों और अतिशूद्रों में अपने अधिकारों के प्रति चेतना बढ़ी और पूरे भारत में सामाजिक सुधार के आंदोलनों में तेजी आई।

ऐसी संसद को गांधी किस आधार पर ‘बांझ’ और ‘बेसवा’ कहते हैं, यह बात समझ से परे है। हालांकि आगे चलकर उन्होंने पार्लियामेंट के लिए ‘वेश्या’ शब्द को बदलने की इच्छा व्यक्त की थी। इसलिए नहीं कि ब्रिटिश संसद को लेकर उनके विचारों में किसी प्रकार का परिवर्तन आया था, या संसदीय प्रणाली में उनके विश्वास में वृद्धि हुई थी, अपितु इसलिए कि उनकी एक अंग्रेज महिला मित्र को पार्लियामेंट के लिए ‘वेश्या’ शब्द अच्छा नहीं लगा गया था। ‘हिंद स्वराज’ के अंग्रेजी अनुवाद की प्रस्तावना में उन्होंने लिखा था—

‘‘इस समय इस पुस्तक को इसी रूप में प्रकाशित करना मैं आवश्यक समझता हूं। परंतु यदि इसमें, मुझे कुछ भी सुधार करना हो, तो मैं केवल एक शब्द सुधारना चाहूंगा। एक अंग्रेज महिला मित्र को मैंने वह शब्द बदलने का वचन दिया है। पार्लियामेंट को मैंने वेश्या कहा है। यह शब्द उस बहन को पसंद नहीं है। उनके कोमल हृदय को इस शब्द के ग्राम्यः भाव से दुख पहुंचा है।’’

पार्लियामेंट के लिए उन्होंने ‘वेश्या’ जैसा तीखा शब्द क्यों इस्तेमाल किया? इसपर चौंकने की आवश्यकता नहीं है। जिन दिनों ‘हिंद स्वराज’ की रचना हुई, गांधी की संसदीय शासन प्रणाली में कोई आस्था नहीं थी। बजाय संसदीय लोकतंत्र के उनका आदर्श रामराज्य था। भारत के लिए वे रामराज्य की ही परिकल्पना करते थे। उनकी कल्पना का रामराज क्या था, इसे निम्नलिखित उद्धरण से समझा जा सकता है—

‘हम राज को रामराज तभी कह सकते हैं, जब राजा और प्रजा दोनों पवित्र हों। जब दोनों त्यागवृत्ति रखते हों, जब दोनों के बीच पिता ओर पुत्र जैसे संबंध हों। हम यह बात भूल गए, इसलिए डेमोक्रेसी की बात करते हैं। आज ‘डेमोक्रेसी’ का जमाना है। जहां प्रजा की बात सुनी जाती हो। जहां प्रजा के प्रति प्रेम का प्राधान्य हो—कहा जा सकता है कि वहां डेमोक्रेसी है। मेरी कल्पना के ‘रामराज्य’ में सिरों की गिनती अथवा हाथों की गिनती से प्रजा के मत को नहीं मापा जा सकता। जहां इस तरह से मत लिए जाते हों, उसे मैं प्रजा का मत नहीं मापता। ऋषियों-मुनियों ने तपस्या करके यह देखा कि जो व्यक्ति तपश्चर्या करते हों और प्रजा के कल्याण की भावना रखते हों, उनका मत प्रजा का मत कहला सकता है। इसी का नाम सच्ची डेमोक्रेसी है। यदि मुझ जैसा व्यक्ति व्याख्यान देकर आपका मत चुराकर ले जाए तो उस मत से प्रकट होने वाली डेमोक्रेसी नहीं है। मेरी डेमोक्रेसी तो रामायण में लिखी पड़ी है, और मैंने जिस सीधे-सादे ढंग से रामायण को पढ़ा है, रामचंद्रजी उसी के अनुसार राज करते थे।5

हम समझ सकते हैं ‘रामराज्य’ की गांधीवादी अवधारणा में आम-मताधिकार के लिए कोई स्थान नहीं है। वहां एक प्रकार का मुनितंत्र है। चूंकि ऋषि-मुनि बनने का अधिकार ब्राह्मणों तक सीमित था, इसलिए परोक्ष रूप में गांधी सीधे-सीधे ब्राह्मण-तंत्र की अनुशंसा कर मनु के विधान का समर्थन कर रहे होते हैं। 19 सितंबर 1929 के ‘यंग इंडिया’ में वे पुनः लिखते हैं—‘रामराज्य से मेरा अभिप्रायः हिंदू राज्य से नहीं है। मेरा आशय दैवीय राज्य से, ईश्वरीय राज्य से है….भले ही राम इस धरती पर जीवित रूप में कभी थे या नहीं थे, प्राचीन रामराज्य का आशय सच्चे जनतंत्र से है। जिसमें गरीब से गरीब आदमी भी कम से कम खर्च में न्याय प्राप्त कर सके। रामराज्य में तो बताया गया है कि कुत्ते को भी न्याय प्राप्त हुआ था(यंग इंडिया, 19 सितंबर, 1929)….रामराज्य का मेरा सपना ऐसे राज्य का है जिसमें राजा और रंक दोनों को बराबर अधिकार प्राप्त हों।’(अमृत बाजार पत्रिका, 2 अगस्त, 1934)6

गांधी के लिए रामराज्य आदर्श है, मगर बहुजनों के लिए ऐसे राज्य का कोई महत्त्व नहीं है, जहां का राजा मात्र ब्राह्मण की शिकायत पर, वगैर अपने विवेक का इस्तेमाल किए, वेदाध्ययन के इच्छुक शूद्र को मृत्युदंड देने को अपना पुनीत कर्तव्य मानता हो। अथवा व्यक्ति मात्र के आक्षेप पर अपनी गर्भवती पत्नी को घर से निकाल दे। गांधी राजनीति को ईश्वरीय आस्था और धार्मिक आदर्शों के आधार पर चलाना चाहते थे। इसकी प्रेरणा उन्हें ईसाई धर्म खासतौर पर जाॅन रस्किन जैसे समाजवादियों की ओर से प्राप्त हुई थी, जो समाजवाद का मूल ईसाई धर्म की उदारवादी मान्यताओं में खोजते थे। गांधी का हिंदू मन ‘रामराज्य’ में समाजवादी आदर्श खोजने लगता है। वे भूल जाते हैं कि ईसाई धर्म में जाति-आधारित विभाजन नहीं है। वहां जन्म के आधार पर मनुष्य को जीवन के मूल-भूत अधिकारों, उसकी स्वतंत्रता और समानता के अधिकार से वंचित नहीं किया जाता था। जबकि हिंदू धर्म की नींव ही जाति-व्यवस्था पर टिकी है। चूंकि ब्रिटिश संसद ने एक के बाद एक प्रशासनिक सुधारों के माध्यम से भारत में जाति-आधारित विभाजन पर चोट की थी, इसलिए गांधी को वहां की संसद से शिकायत थी। यह शिकायत इतनी बड़ी थी कि वे उसे वेश्या तक कह जाते हैं।

भारत में आधुनिकीकरण की शुरुआत 19वीं शताब्दी से होती है। वही समय औद्योगिकीकरण की शुरुआत का भी है। आवाजाही को सुगम बनाने के लिए रेलगाड़ी की शुरुआत होती है। स्वास्थ्य की देखभाल के लिए अस्पताल बनाए जाते हैं। उससे पहले जो वैद्य आदि हुआ करते थे, वे ऊंची जातियों से आते थे। जातीय शुचिता के नाम पर वे निचली जातियों के मरीजों के इलाज से बचते थे। मजबूर होकर उन्हें तांत्रिकों और ओझाओं की शरण में जाना पड़ता था, जो उनका शोषण करता था। अस्पतालों, वकीलों और स्कूलों के खुलने से शूद्रों और अतिशूद्रों के मन में न्याय की उम्मीद जगी थी। रेलों ने गरीब मजदूरों, कामगारों और शिल्पकारों को यह अवसर दिया था कि वे गांवों के सामंती उत्पीड़न से बचने के लिए वैकल्पिक रोजगार के लिए शहरों की ओर जा सकें। सरकारी अस्पतालों में सभी वर्ग के लोग आ जा सकते थे। उससे जातिवाद पर चोट पड़ी थी। गांधी आधुनिक समाज के सभी प्रतीकों जैसे अदालत, रेल, अस्पताल, वकील, डॉक्टर आदि की आलोचना करते हुए उन्हें सभ्यता के संकट के रूप में देखते हैं। उन्हें समाज के हजारों वर्षों तक गरीब, विपन्न और एक जैसे हालात में रहने से कोई दुख नहीं है। अपितु उनके लिए यह गौरव की बात है। इसलिए वे गरीबी का महिमामंडन तक कर जाते हैं—

‘हजारों साल पहले जो काम हल से लिया जाता था, उससे हमने काम चलाया। हजारों साल पहले जैसे झोंपड़े थे, उन्हें हमने कायम रखा। हजारों साल पहले जैसी हमारी शिक्षा थी, वही चलती आई….ऐसा नहीं है कि हमें यंत्र-वगैरह की खोज करना नहीं आता था। लेकिन हमारे पूर्वजों ने देखा कि यंत्र वगैरह की खोज करेंगे तो गुलाम बनेंगे, और अपनी नीति को छोड़ देंगे।’7

जिन दिनों गांधी इन पंक्तियों को लिख रहे थे, उससे करीब एक हजार पहले से ही भारत किसी न किसी विदेशी शासक का गुलाम था। उससे पीछे के हजार वर्षों में भारत में वैज्ञानिक और तकनीकी क्रांति लगभग शूण्य थी। जाति-व्यवस्था के कारण भारत में सस्ता श्रम लगभग बेगार के रूप में गांव-गांव मौजूद था। मशीनी क्रांति पर आक्षेप लगाकर गांधी जाति-व्यवस्था के समर्थक और यथास्थितिवादी नजर आते हैं। गांधी के शिष्य भी उन्हीं की तरह परिवर्तन-विरोधी थे। विनोबा को आम-मताधिकार से शिकायत थी। नेहरू और उनके खानसामा दोनों को एक ही वोट का अधिकार हो—यह उन्हें विचित्र लगता था। गांधी के दूसरे शिष्य भी ऐसे थी। नवजीवन ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित ‘हिंद स्वराज’ के हिंदी अनुवाद की भूमिका में काका कालेलकर लिखते हैं—‘उनकी रेलें, उनकी चिकित्सा और रुग्णालय, उनके न्यायालय और न्याय-दान पद्धति आदि सब बातें अच्छी संस्कृति के लिए आवश्यक नहीं हैं, बल्कि विघातक ही हैं…’ ऐसे गांधीवादियों को कौन समझाए कि रेल, चिकित्सा प्रणाली, न्यायालय आदि अनायास हुई खोजेें नहीं थीं। अपितु इसके पीछे यूरोपीय बौद्धिक चेतना और वैज्ञानिक क्रांति का योगदान था। न्यूटन और काॅपरनिकस जैसे वैज्ञानिकों की उत्कट मेधा और समर्पण था। उससे पहले यूरोप का हाल भारत जैसा ही था। गौरतलब है कि यूरोप की औपनिवेशिक नीतियों की आलोचना दुनिया-भर में हुई थी। लेकिन वहां की बौद्धिक और प्रौद्योगिकीय क्रांति से किसी को शिकायत न थी। यहाँ तक कि मार्क्स जैसे ठेठ समाजवादी को भी नहीं। यूरोप की बौद्धिक क्रांति का असर दुनिया के सभी अगड़े-पिछड़े समाजों पर पड़ा था। ऐसे में यूरोपीय सभ्यता, संस्कृति की आंख-मूंदकर आलोचना करने नैतिकता की दृष्टि से उचित न था।

शिक्षा-नीति के बारे में भी गांधी के विचार इतने ही दक़ियानूसी हैं। हालांकि ऐसे कई लोग आज भी मिल जाएंगे जो गांधी की बुनियादी शिक्षा-नीति को आदर्श मानकर उसका महिमा मंडन करते हैं। लेकिन ऐसा केवल वही सोच सकता है, जिसे भारतीय सभ्यता और संस्कृति में सबकुछ साफ-सुथरा, उजला-उजला और पाक-साफ नजर आता हो। इस पर बात करने से पहले गांधी के शिक्षा पर विचार को जान लेना उचित होगा। वे लिखते हैं—‘बहुत से लोग उस(अक्षर-ज्ञान) का बुरा प्रयोग करते हैं, यह तो हम देखते ही हैं। उसका अच्छा प्रयोग प्रमाण में कम ही लोग करते हैं। यह बात अगर ठीक है तो इससे यह साबित होता है कि अक्षर-ज्ञान से दुनिया को फायदे के बदले नुकसान ही हुआ है….एक किसान ईमानदारी से खुद खेती करके रोटी कमाता है। उसे मामूली तौर पर दुनियावी ज्ञान है। अपने मां-बाप के साथ कैसे बरतना, अपनी स्त्री से कैसे बरतना, अपने बच्चों के साथ कैसे पेश आना, जिस देहात में वह बसा हुआ है वहां उसकी चाल-ढाल कैसी होनी चाहिए, इन सबका उसे काफी ज्ञान है। वह नीति के नियम समझता है और उनका पालन करता है, लेकिन वह अपने दस्तखत करना नहीं जानता। इस आदमी को अक्षर-ज्ञान देकर आप क्या करना चाहते हैं? उसके सुख में आप कौन-सी बढ़ती करेंगे? क्या उसकी झोपड़ी या उसकी हालत के बारे में आप उसके मन में असंतोष पैदा करना चाहते हैं? ऐसा करना हो तो भी उसे अक्षर-ज्ञान की आवश्यकता नहीं है।’8

शिक्षा के बारे में ये ऐसे व्यक्ति के विचार हैं जिसे जीते-जी महात्मा मान लिया गया था। गांधी को लगता था कि ज्ञान का सभी लोग सही प्रयोग नहीं कर सकते। वे सही प्रयोग करें, इसके लिए उन्हें और अधिक शिक्षित-प्रेरित करने से अच्छा है कि उन्हें अक्षर ज्ञान से ही वंचित कर दिया जाए। यहां गांधी दलित-बहुजनों का जिक्र नहीं करते। बात उन्होंने सामान्य तौर पर ही कही है। लेकिन संदेश वही है जो मनुस्मृति और दूसरे हिंदू धर्मशास्त्रों का है। यही कि ज्ञान पर कुछ वर्गों का एकाधिकार रहे। जनसाधारण दुनियावी ज्ञान से अलग-थलग बना रहे, वही अच्छा है। यदि वह पढ़-लिख जाएगा तो अन्याय का विरोध करेगा, धर्म-शास्त्रों को स्वयं पढ़कर उसका अर्थ निकालने लगेगा, पंडे-पुरोहित के जाल में आसानी से फंस न सकेगा। जिन दिनों गांधी यह सब लिख रहे थे, उन दिनों गांव-गांव में महाजनी तंत्र का जाल फैला हुआ था। वे एक के बदले चार चढ़ाकर बही में किसानों और मजदूरों से अंगूठा लगवा लिया करते थे। ओने-पौने ब्याज वसूलते थे। जिस गुजरात से गांधी आते हैं वहां महाजनी प्रथा और भी चरम पर थी। उनके शोषण और षड्यंत्र की ओर इशारा करने, लोगों को उसके विरुद्ध जागरूक करने के लिए शिक्षा की अनिवार्यता पर ज़ोर देने के बजाए, वे अक्षर-ज्ञान की आवश्यकता को ही नकार देते हैं।

इसलिए ‘हिंद स्वराज’ का आदर्श बहुजनों का आदर्श नहीं हो सकता। बहुजन अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले लगभग सभी महामानवों ने शिक्षा को जरूरी माना था। ज्योतिराव फुले, पेरियार, डॉ. आंबेडकर, स्वामी अछूतानंद, महामना अय्यंकालि, पोइकाइल योहन्नान आदि जितने भी बहुजन-चिंतक और आंदोलनकारी हैं उन सभी ने वर्चस्वकारी संस्कृति से मुक्ति के लिए शिक्षा पर ज़ोर दिया था। उसके लिए आंदोलन चलाए थे। सड़कों पर संघर्ष किया था। उन्हें अपना महानायक मानने वाले बहुजन, भारतीय सभ्यता और संस्कृति की आड़ में वर्ण-व्यवस्था के पोषक और समर्थक गांधी को अपना नायक भला कैसे मान सकते हैं।

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ :

1. अंग्रेजी मासिक ‘आर्यन पाथ’ के सिंतबर 1938 में ‘हिंद स्वराज अंक’ के लिए भेजा गया संदेश।

2. हिंद स्वराज, अध्याय 5, इंग्लैंड की हालत।

3. जी. आर. शीर्ले, ए न्यू इंग्लेंड? पीस एंड वार, 1886-1918(2005), आक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी प्रेस, पृष्ठ 333-334

4. http://www।educationengland।org।uk/documents/acts/1903-employment-children-act।pdf

5. संपूर्ण गांधी वाङ्मय खंड 35, 1927-28, पृष्ठ 508-509, ‘गांधीजी हिंद स्वराज से नेहरू तक’ में देवेंद्र स्वरूप द्वारा उद्धृत, पृष्ठ 76)

6. https://www।mkgandhi।org/momgandhi/chap67।htm

7. हिंद स्वराज, अध्याय 18, शिक्षा।

8. वही

गठबंधन की मर्यादा, मर्यादाओं का गठबंधन

सामान्य

आलेख

इस बात की उम्मीद बहुत कम लोगों को रही होगी कि विपक्ष भाजपा के विरुद्ध सफल गठबंधन बनाने में कामयाब हो पाएगा। जो थोड़ी-बहुत उम्मीद बनी थी, उसके लिए भी विपक्ष जिम्मेदार था। प्रायः सभी विपक्षी नेता भाजपा को मिलकर हराने का दावा कर रहे थे। एकजुट विपक्ष के लिए यह लक्ष्य बहुत कठिन भी नहीं है। सब जानते हैं कि पिछले चुनावों में भाजपा ने कुल मतदान का लगभग तीस प्रतिशत पाकर धमाकेदार जीत हासिल की थी। उन मतदाताओं का बड़ा प्रतिशत ऐसा है जो भाजपा का कटृटर समर्थक है। इस वर्ग को भाजपा के हिंदू-मुसलमान, मंदिर-मस्जिद, गाय-गोबर, पाकिस्तान-हिंदुस्तान जैसे खेलों से रोमांच हो आता है। चुनाव के दौरान यही वर्ग आंख मूंद कर भाजपा के खेमे की ओर खिंचा चला आता है। इस वर्ग का समर्थन पाने के लिए भाजपा सांप्रदायिकता की फसल उगाती है, प्राचीन भारतीय संस्कृति का गौरव-गान सुनाती है, समय-असमय पाकिस्तान को गालियां देती है। इसमें जो एकदम नई चीज जोड़ी है, वह है सवर्ण गरीबों के नाम पर दस प्रतिशत आरक्षण। आरक्षण की  पुरानी रोस्टर प्रणाली में घालमेल कर, नया रोस्टर लागू करने को भी इसी से जोड़ा जा सकता है। भाजपा को उम्मीद है कि नोटबंदी, बेरोजगारी, अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में असफलता, भीषण व्यापारिक मंदी से जो मतदाता छिटक गए हैं—नए रोस्टर और सवर्ण आरक्षण से उसकी भरपाई आसानी से हो जाएगी। वैसे भी जब हार-जीत एक-दो प्रतिशत मतों के ऐर-फेर पर आ टिके तो छोटे-छोटे प्रलोभन, यहां तक कि जुमले भी कारगर दिखने लगते हैं। भाजपा इस मामले में उस्ताद पार्टी है। 2014 में गुजरात-मॉडल का मिथ खड़ा करना तथा उसके नाम पर उत्तर से दक्षिण तक मतदाताओं के ध्रुवीकरण में सफलता प्राप्त कर लेना, उसके प्रचारतंत्र और चुनावी कौशल का नतीजा था—जो आज भी किसी विपक्षी दल में नजर नहीं आ रहा है। सवर्णों को दस प्रतिशत आरक्षण के नाम पर भाजपा ने जो पासा फेंका है, उसकी काट विपक्षी दल अभी तक नहीं सोच पाए हैं। इसे लेकर दलितों और पिछड़ों में जो आक्रोश है, वह उन्हें नजर नहीं आ रहा है। यहां तक कि दलितों और पिछड़ों की राजनीति करने वाले विपक्षी दल समाजवादी पार्टी और बसपा भी उसका तोड़ नहीं ढूंढ पाए हैं। विरोध करने पर उन्हें अपने सवर्ण मतदाताओं के खिसक जाने का खतरा है, जो पिछले चुनावों में ही उनसे दूर छिटक  चुका है, उसके वापस लौटने संभावना कम से कम 2019 तक तो नहीं है।

भाजपा के प्रतिबद्ध मतदाताओं का बड़ा हिस्सा अगड़ी जातियों, बनिया, ब्राह्मण और क्षत्रिय का है। बाकी उन पिछड़ों का जो भाजपा के हिंदुस्तान-पाकिस्तान और हिंदू-मुस्लिम खेल में फंसकर दुनिया-बाहर की सोच ही नहीं पाते। यदि प्रतिबद्ध या अंधसमर्थक मतदाताओं की संख्या के अनुपात से देखा जाए तो भाजपा इन दिनों देश का सफलतम दल है। उसके पास, विशेष रूप से उत्तर और मध्य भारत में जिसे हिंदी पट्टी भी कहा जाता है—कुल मतदाताओं का करीब 24-26 प्रतिशत ऐसा है, जो ठोकर खाकर, नुकसान सहकर भी उसके खेमे में बना रहता है। उसमें दो-चार प्रतिशत मतदाता कहीं से छिटककर, नाराज होकर अथवा किसी और कारण से आकर मिल जाएं तो उसके लिए जीत आसान हो जाती है। 2014 में ऐसा ही हुआ था। उन दिनों गुजरात-मॉडल के नाम पर विकास का ऐसा मिथ खड़ा किया गया था, जिसकी काट न तो भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी कांग्रेस के पास थी, न ही समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के पास—जिनकी राजनीति जातीय समीकरणों और परंपरागत टोने-टोटकों पर निर्भर थी। विपक्षी दलों की असावधानी या आत्मव्यामोह के कारण ही उनसे नाराज दलित-पिछड़े मतदाताओं का एक हिस्सा भाजपा की झोली में जा गिरा था। बाकी मतदाता कांग्रेस तथा क्षेत्रीय पार्टियों के बीच बंट गए। परिणाम यह हुआ कि कुल पड़े मतों के एक-तिहाई से भी कम वोट पाकर भाजपा बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता पर सवार हो गई। यही नहीं, अप्रत्याशित सफलता से उत्साहित होकर वह कांग्रेस-मुक्त भारत का सपना भी देखने लगी थी। इस भ्रम को बनाने में सहचर पूंजीवाद(क्रोनी कैपीटलिज्म) के बल पर पल रहे मीडिया का बड़ा योगदान था। पांच राज्यों में हुए मतदान के बाद से भाजपा आसमान से जमीन पर आ गिरी है। उसके कांग्रेस-मुक्त भारत के अभियान को झटका लगा है। फिलहाल उसकी चिंता 2019 के लोकसभा चुनाव हैं।

पिछले चुनावों में भाजपा की जीत में बड़ी भूमिका उत्तर प्रदेश और बिहार की थी। इन दोनों राज्यों से उसे 102 लोकसभा सीटें प्राप्त हुई थीं। उत्तर प्रदेश में मत-प्रतिशत के हिसाब से देखा जाए तो मुस्लिम, यादव और कुछ पिछड़ी जातियों को मिलाकर समाजवादी पार्टी दूसरे स्थान पर थी। उन चुनावों में सपा को करीब 22 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे। 2009 के चुनावों के मुकाबले उन चुनावों में समाजवादी पार्टी को मात्र 1 प्रतिशत वोटों का नुकसान हुआ था, मगर इस एक प्रतिशत वोटों का खामियाजा उसे 18 लोकसभा सीटों से चुकाना पड़ा था। बसपा को 2009 के मुकाबले 7.8 प्रतिशत मतों का घाटा हुआ था। यह नुकसान इतना बड़ा था कि 19.6 प्रतिशत वोट हासिल करने के बावजूद, उससे पहले 20 सांसदों वाली पार्टी शून्य पर आ गिरी थी। चौथे स्थान पर रही कांग्रेस को उन चुनावों में मात्र 7.5 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे, नुकसान करीब 11 प्रतिशत मतों का हुआ था। परिणामस्वरूप 2009 के चुनावों में 21 लोकसभा सीटों वाली पार्टी को केवल दो सीटों से संतोष करना पड़ा था।

बिहार की बात करें तो भाजपा ने पिछले चुनावों में उससे पहले के चुनावों के मुकाबले 15.47 प्रतिशत अधिक मत प्राप्त कर, 22 लोकसभा सीटें प्राप्त की थीं। इससे उसे 2009 के मुकाबले 10 सीटों का फायदा हुआ था। इस जीत में उसका साथ रामविलास पासवान की ‘लोक जनशक्ति पार्टी’ तथा उपेंद्र कुशवाहा की ‘राष्ट्रीय लोक समता पार्टी’ का साथ और सहयोग मिला था। भाजपा के साथ आने का लाभ इन दलों को भी मिला था। भाजपा के सहयोग से चुनावों में मात्र 6.4 प्रतिशत वोट पाने वाले ‘लोक जनशक्ति पार्टी’ को छह सीटें; तथा उपेंद्र कुशवाहा के दल को मात्र 3 प्रतिशत वोट और 3 लोकसभा सीटें प्राप्त हुई थीं। चुनावों में 8.4 प्रतिशत मत प्राप्त करने वाली कांग्रेस को मात्र 2 प्रतिशत मतों का नुकसान हुआ था। इसके ऐवज में उसे अपनी दोनों लोकसभा सीटें गंवानी पड़ी थीं। सबसे बड़ी त्रासदी लालू यादव के दल के साथ थी। उन चुनावों में राजद को कुल 20.1 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे, जो उससे पिछले चुनावों के मुकाबले 0.8 प्रतिशत अधिक थे। बावजूद इसके उसे चार लोकसभा सीटों का नुकसान हुआ था। बहुजन समाज पार्टी की तरह उनका दल भी लोकसभा में शून्य सांसदों वाला दल बन चुका था।

पिछले कुछ वर्षों से मतों का ध्रुवीकरण हुआ है। प्रत्येक राजनीतिक दल के पास उसके समर्थक मतदाताओं का एक हिस्सा है, जिसे उसका आधार वोट भी कह सकते हैं। वह आसानी से इधर-उधर नहीं होता। अपने इसी प्रतिबद्ध मतदाता समूह के भरोसे राजनीतिक दल चुनावों में मोलभाव करने में सफल होते हैं। बचा हुआ यानी चलायमान वोटर ही वह हिस्सा है, जिसको लुभाने के लिए सरकार और राजनीतिक दल घोषणापत्रों के जरिये तरह-तरह के प्रलोभन देते हैं। सरकारें चुनावों से ठीक पहले नई योजनाओं का ऐलान करती हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार की बात करें तो पिछले चुनावों में चलायमान वोटर के रूप में, असंतुष्ट पिछड़े और अतिपिछड़े मतदाताओं का एक हिस्सा भाजपा के था। इसके अलावा लगभग पूरा सवर्ण मतदाता उसके साथ था। लेकिन नोटबंदी और जीएसटी के बाद व्यापारिक मंदी, सामाजिक अस्थिरता और बढ़ती बेरोजगारी से उसका पार्टी से मोह-भंग हुआ है। 10 प्रतिशत सवर्ण आरक्षण द्वारा पार्टी ने इस वर्ग को दुबारा लुभाने की कोशिश की है। वही भाजपा की उम्मीद है। इस बीच राजनीति में राहुल गांधी का बढ़ता प्रभाव, प्रियंका गांधी का कांग्रेस में औपचारिक रूप से शामिल होना सवर्ण मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करेगा, इससे उनके एक हिस्से की कांग्रेस की ओर वापसी तय है। भाजपा द्वारा उठाए गए कदमों से पिछड़ों और दलितों में भी उसके प्रति असंतोष पनपा है। इससे लगता है कि सपा-बसपा अपने पारंपरिक वोट बैंक को अपने साथ रखने में कामयाब होंगे। कुल मिलाकर आगामी चुनावों में भाजपा का मत-प्रतिशत गिरना तय है। सवाल है कि क्या इतने से विपक्ष आगामी चुनावों में अपनी वापसी तय कर सकता है?

2014 के चुनावों में बड़ी दिखने वाली हार-जीत के पीछे मात्र दो-तीन प्रतिशत मतों के अंतरण से समाजवादी पार्टी और बसपा को जो धक्का लगा था, वह इन दोनों दलों के लिए अस्तित्व का सवाल बन चुका है। इस कारण अपने वर्षों पुराने मतभेद भुलाकर सपा-बसपा को एक मंच पर आना पड़ा है। उम्मीद थी कि कांग्रेस भी इस गठबंधन का हिस्सा बनेगी, परंतु कांग्रेसी जनों के अतिउत्साह और सपा-बसपा के नेताओं की अतिमहत्त्वाकांक्षा के कारण, गठबंधन या महागठबंधन की बात अब खटाई में पड़ती दिख रही है। कांग्रेस की ओर से गठबंधन को लेकर तरह-तरह के बयान आ रहे हैं। जनवरी में कांग्रेस महासचिव और उत्तर प्रदेश के प्रभारी गुलाम नबी आजाद ने एक बयान देकर संभावना व्यक्त की थी कि कांग्रेस प्रदेश की सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी। हालांकि उन्होंने यह भी कहा था कि वे गठबंधन में शामिल होना चाहते हैं। अपने कार्यकर्ताओं पर बात डालते हुए उन्होंने कहा था कि कांग्रेस के समर्थक प्रदेश में 25 सीटें चाहते हैं। 21 सीटें भी मिल जाएं तो पार्टी उन्हें मनाकर गठबंधन के साथ चलने को तैयार है। बात समझौते की दिशा में आगे बढ़ सकती थी, मगर जनवरी में की गई  साझा प्रेस कान्फ्रेंस में सपा और बसपा के संयुक्त ऐलान, जिसमें उन्होंने 38-38 सीटें अपने लिए रखने और तीन आरएलडी को देने की घोषणा की थी, ने कांग्रेस से समझौते की दिशा पर संशय खड़ा कर दिया है। सपा-बसपा के इस ऐलान के पीछे चाहे जो कारण हों, उनका बयान बिना जमीनी हकीकत को समझे, हड़बड़ी में दिया गया बयान ही माना जाएगा। अच्छी बात यह है कि अपने हालिया साक्षात्कार में राहुल गांधी ने गठबंधन की संभावनाएं बनाए रखी हैं। इधर 2014 में एनडीए के घटक रहे, उत्तर प्रदेश में ओमप्रकाश राजभर और बिहार में उपेंद्र कुशवाहा भी नाराज दिख रहे हैं। बिहार में उपेंद्र कुशवाहा का राजद के साथ जाना लगभग तय है। उत्तर प्रदेश में ओमप्रकाश राजभर भी गठबंधन में शामिल हो सकते हैं। यह हुआ तो प्रदेश में भाजपा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। क्या इसके लिए सपा-बसपा अपने पुरानी घोषणा में संशोधन करने को तैयार होंगे?

अब बात कांग्रेस की करते हैं, जिसकी स्थिति उत्तर प्रदेश और बिहार में लगभग एक जैसी है। 2014 में कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में 7.5 प्रतिशत और बिहार में 8.4 प्रतिशत वोट मिले थे। बावजूद इसके कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने का निर्णय कदाचित इसलिए लिया है कि उसे लगता है कि राहुल गांधी के नए अवतार तथा प्रियंका गांधी के महासचिव बन जाने से वह न केवल अपने खोये हुए मत-प्रतिशत को वापस प्राप्त करने में कामयाब हो जाएगी, बल्कि कुछ अतिरिक्त वोट भी उसे प्राप्त हो जाएंगे। फलस्वरूप वह उससे अधिक सीट पाने में कामयाब होगी, जितनी गठबंधन में मिलने की संभावना थी। हालांकि उत्तर प्रदेश की जो वर्तमान स्थिति है, उससे यह संभव नहीं दिख रहा है। बिहार में यदि अचानक कोई अनहोनी न हुई तो कांग्रेस और राजद का गठबंधन में शामिल होना तय है। जीतनराम मांझी गठबंधन में बने रहने का ऐलान कर चुके हैं। लालू यादव लंबे समय ये जेल में हैं। बीमार हैं। इस कारण आम मतदाता की सहानुभूति उनके साथ है। ऊपर से नितीश के शासनकाल में प्रदेश में जो अराजकता बढ़ी है, उससे भी जनता नाराज है। पिछले चुनावों में नितीश कुमार के साथ रहे शरद यादव अब उनसे अलग हो चुके हैं। उपेंद्र कुशवाहा पर जिस तरह पिछले दिनों लाठियां पड़ी हैं, उससे लगता है कि वे भी एनडीए का साथ छोड़कर राजद के साथ जाने वाले हैं। वहां तेजस्वी यादव एक मंजे हुए नेता की तरह राजनीति कर रहे हैं। उन्हें लालू यादव का सही उत्तराधिकारी कहा जाने लगा है। इसका लाभ गठबंधन को मिलना तय है। सवाल है कि जिस गठबंधन की संभावना बिहार में लगभग पक्की है, वह उत्तर प्रदेश में क्यों नाकाम होता दिख रहा है। क्या इसके लिए केवल सपा और बसपा को दोष दिया जाना चाहिए?

कांग्रेस को लगता है कि सपा, बसपा और राजद का जो मतदाता वर्ग है, किसी जमाने में वह उसका प्रतिबद्ध मतदाता हुआ करता था। उसे यह भी लगता है कि राहुल और प्रियंका अपने परंपरागत वोट बैंक को वापस लाने में कामयाब होंगे। लेकिन जहां तक आम मतदाता का सवाल है, वह आसानी से समझ चुका है कि कांग्रेस और भाजपा के माइंड सेट में कोई खास अंतर नहीं है। माइंडसेट को बदलना आसान नहीं था। कांग्रेस ने खुद को कभी बदलने की कोशिश भी नहीं की। जब लगा कि मीडिया कांग्रेस का हिंदू विरोधी चरित्र गढ़ रहा है, बजाय अपने परंपरागत वोटर को साधने के, राहुल गांधी मंदिर और मानसरोवरों की यात्रा पर निकल पड़े। आज भाजपा खुले आम अपने आपको सवर्णों की हित-रक्षक मानती है। अंतर केवल इतना है कि भाजपा जो काम डंके की चोट पर कहती-करती थी, कांग्रेस यही काम तुष्टीकरण की नीति के अंतर्गत, समाज-कल्याण के नारे के साथ किया करती थी। 1991 में मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के बाद उत्तरी भारत में दलित और पिछड़ी जातियां मंडल-समर्थक दलों के पीछे एकजुट होने लगी थीं। कांग्रेस उस समय भी अपनी तुष्टिकरण की नीति से बाहर न आ सकी। संविधान 1950 में लागू हुआ था। उसमें सामाजिक रूप से पिछड़ी जातियों के लिए नौकरी में आरक्षण का प्रावधान था। कांग्रेस न केवल मंडल आयोग की अनुशंसाओं को लागू करने से बचती रही, अपितु 1991 के बाद भी उसने नौकरियों में पिछड़ी जातियों के अनुपात को संतुलित करने के लिए कुछ नहीं किया। नतीजा पिछड़ी जातियों के कांग्रेस से मोहभंग के रूप में सामने आया। फिर जैसे ही पिछड़ी जातियों को विकल्प दिखाई दिया, वे कांग्रेस से छिटककर क्षेत्रीय दलों के खाते में चली गईं। उत्तर प्रदेश, बिहार और कर्नाटक जैसे राज्यों में जहां इन जाति-वर्गों का बहुमत है, वहां कांग्रेस का मत-प्रतिशत 10  प्रतिशत से भी कम तक सिमट गया।

2014 में इन जातियों ने पिछड़ों और अतिपिछड़ों ने भाजपा का साथ दिया था तो इसलिए कि मीडिया के बूते भाजपा ने ‘गुजरात मॉडल’ का जो मिथ खड़ा किया था, उसका प्रलोभन बड़ा था। इन जातियों को लगा था कि सरकारी नौकरियों के निरंतर सिकुड़ते आधार की भरपाई प्राइवेट सेक्टर से हो जाएगी। लेकिन ऐसा होना तो दूर भाजपा के आने से जमे-जमाए उद्योग जगत की भी कमर टूट गई। शहरों और कस्बों में जो लोग दूर देहात से आकर छोटा-मोटा धंधा करते थे, चीनी उत्पादों की बेलगाम आमद ने उन्हें धंधा बंद कर, अपने ठिकानों की ओर लौटने को मजबूर कर दिया। छोटे उद्यमियों और उनके साथ काम करने वाले मजदूरों की संख्या करोड़ों में है। निश्चय ही आने वाले चुनावों में वे अपने वोट का प्रयोग भाजपा को सबक सिखाने के लिए करेंगे। लेकिन किसके पक्ष में? यदि विपक्ष इसी तरह से बंटा रहा तो इसकी भी संभावना है कि भाजपा विरोधी उनका वोट विपक्षी दलों में बंटकर निष्प्रभावी हो जाए

कांग्रेस यदि स्वयं को बड़ा दल मानती है, और वह है भी, क्योंकि आजादी के आन्दोलन से उसका नाम जुड़ा है। आज़ादी के बाद लंबे समय तक उसी की सरकार रही है। यदि आजादी के बाद भी लोगों के लिए न्यूनतम मजदूरी और रोजी-रोटी जैसे सवाल की सबकुछ हैं तो इसकी जिम्मेदारी कांग्रेस के ऊपर भी जाती है। कदाचित बाकी दलों से अधिक जाती है। इसलिए उससे अधिक समझदारी और जिम्मेदार आचरण की उम्मीद की जा सकती है। यदि कांग्रेस उत्तर प्रदेश और बिहार में, थोड़ा पीछे हटकर समझौता करके गठबंधन को स्वीकारती है, तो इसका लाभ बाकी प्रदेशों में मिलना तय है। दलित मतदाताओं के बीच मायावती का प्रभाव केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है, अपितु राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र जैसे कई प्रदेश हैं, जहां का दलित मतदाता मायावती को अपना नेता मानता है। यही बात समाजवादी पार्टी के साथ है। बाकी प्रदेशों में यादव वोट बैंक भले ही बड़ा न हो, लेकिन मुस्लिम आज भी समाजवादी पार्टी को अपने लिए सबसे भरोसेमंद मानता है। इसलिए समाजवादी का साथ कांग्रेस की मुस्लिम मतदाताओं के बीच विश्वसनीयता को बढ़ाने में सहायक होगा। या कम से कम उसके बंटने की संभावना कम हो जाएगी।

कुल मिलाकर गठबंधन में राजद, सपा, बसपा और कांग्रेस का साथ आना न केवल 2019 की जीत को आसान बनाने के लिए आवश्यक है, अपितु देश में बढ़ रही सांप्रदायिकता को रोकने के लिए भी जरूरी है। गठबंधन की संभावना को ये पार्टियां गंभीरता से भले ही न लें, लेकिन भाजपा उसे पूरी गंभीरता से ले रही है। उसकी निगाह में गठबंधन बन चुका है। इसलिए प्रस्तावित गठबंधन के जितने भी बड़े नेता हैं, सब सीबीआई के रडार पर हैं. सपा, बसपा, कांग्रेस, त्रणमूल कांग्रेस के पुराने खाते खंगाले जा रहे हैं। देश में भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा है। लेकिन यदि किसी दल को भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई केवल चुनाव के दिनों में याद आती हो तो समझ लेना चाहिए कि वह स्वयं भ्रष्टाचार में लिप्त है। भ्रष्टाचार केवल आर्थिक नहीं होता, सामाजिक,  सांस्कृतिक और राजनीतिक भी होता है। इस दृष्टि से भाजपा ने स्वयं को एक नहीं अनेक बार भ्रष्ट पार्टी सिद्ध किया है। आवश्यकता इसे समझने और मतदाता को समझाने की है। यह काम जितना संगठित तरीके से होगा, उतना ही फलदायक सिद्ध होगा।

ओमप्रकाश कश्यप


‘दुर्गा चरित्र’ के बहाने मिथ-चर्चा

सामान्य

मिथ हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं. वे वास्तविक हों, न हों, अनगिनत मनुष्यों का अटूट विश्वास उन्हें वास्तविक से कहीं ज्यादा प्रभावशाली बना देता है. आंखों-देखी झूठ मानी जा सकती है, परंतु मिथ में अंतर्निहित या उसके माध्यम से दिया गया संदेश, यदि व्यक्ति का मिथ पर विश्वास है, उसके लिए परमसत्य होता है. यही विश्वास किसी मिथ को दीर्घजीवी और शक्तिशाली बनाता है. मिथ आमतौर पर संस्कृति का हिस्सा होते हैं. कई बार उनकी उपस्थिति को ज्ञान-विज्ञान के दूसरे क्षेत्रों पर भी थोप दिया जाता है. ऐसे मिथों की उम्र सीमित होती है. जबकि धर्म और संस्कृति के नाम पर गढ़े गए मिथ व्यावहारिक जीवन में वास्तविक पात्रों के मुकाबले अधिक शक्तिशाली तथा प्रभावी सिद्ध होते हैं. विशेषकर पारंपरिक समाजों में जो किसी कारण आधुनिक चेतना और शिक्षा से वंचित हैं. ऐसा उन समाजों में भी देखने को मिलता है जो अपनी प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति को लेकर श्रेष्ठताबोध से पीड़ित हों. ऐसे लोग अपने अधिकांश निर्णय, विशेषरूप से परिवार एवं समाज से जुड़े मामलों में, परंपरा और संस्कृति के आधार पर लेते हैं. वहां मिथ बड़ी आसानी से लोगों के सामान्य व्यवहार का हिस्सा बन जाते हैं. संस्कृति स्वयं ऐसे मूल्यों एवं परंपराओं के सहारे गढ़ी जाती है, जिनकी जड़ें सुदूर अतीत तक फैली हों. कभी-कभी इतिहास भी इनकी जकड़ में आ जाता है. हालांकि यह तभी होता है जब संस्कृति पर वर्गीय चरित्र हावी हों.

अशिक्षित समाज अपनी परंपरा एवं संस्कृति को स्मृति के सहारे सहेजता है. ऐसे में मिथों का जानकर अथवा उनकी व्याख्या का दावा करने वाला वर्ग, उन प्रतीकों को संस्कृति का हिस्सा बनाने में सफल हो जाता है, जिनसे उसके स्वार्थ जुड़े हुए हों. उन्हें लेकर कुछ कहानियां गढ़ ली जाती हैं. बार-बार सुने-सुनाए जाने तथा लोगों का विश्वास हासिल कर लेने के पश्चात वे मिथ में ढल जाती हैं. मिथों को लेकर समाज प्रायः दो वर्गों में बंटा होता है. एक वर्ग हमेशा ऐसे मिथों को जीवन की मुख्य प्रेरणा तथा जीवनीशक्ति के रूप में प्रस्तुत करने में लगा रहता है. उसके सदस्य संख्या में कम परंतु समाज में शिखर हैसियत वाले लोग होते हैं. दूसरा वर्ग मिथों की अद्वितीयता में विश्वास रखने वाला, उन्हें अपनी प्रेरणा और मार्गदर्शक मानने अधिसंख्यक लोगों का होता है. समाज की प्रमुख उत्पादक शक्ति होने के बावजूद सामाजिक संरचना में उनका स्थान गौण होता है. उनके लिए आजीविका से जुड़े प्रश्न बेहद महत्त्वपूर्ण होते हैं. उनमें वे इतने उलझे होते हैं कि मिथों की अंतर्रचना तथा उनकी सामाजिकी के बारे में शंका करने या सवाल उठाने का समय ही नहीं मिल पाता. समाज से जुड़े से रहने की इच्छा भी थोपे गए मिथों को अपनाने के लिए विवश कर सकती है. जनसाधारण की आस्था एवं विश्वास के बल पर मिथ पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपनी जगह बनाते जाते हैं. प्रचलित परिभाषा में वे लोगों की प्रमुख मार्गदर्शक शक्ति, उनका धर्म बन जाते हैं. अपनी जरूरत तथा आस्था के अनुसार समाज उनके साथ ऐसे मूल्य जोड़ता चला जाता है, जिन्हें वह अपने स्थायित्व के लिए अत्यावश्यक मानता है. सांस्कृतिक मूल्य का परिवर्तनशील होते हैं. हालांकि उसकी गति बहुत धीमी होती है. सामाजिक मूल्यों में पर्याप्त लचीलापन समाज हित में होता है. फिर भी कभी शिक्षा की कमी तो कभी अंध-श्रद्धा के कारण जनसाधारण, यहां तक कि कुछ विशिष्ट जन भी—उन मूल्यों को मिथों में अधिष्ठित तथा उन्हीं से उत्पत्तित माने रहता है.

कभी-कभी परंपरा के प्रति दुराग्रहों का आवेग स्थापित जीवनमूल्यों को भी मिथ बना देता है. महाभारत में हम भीष्म की प्रतीज्ञा को मिथ बनते हुए देखते हैं. भीष्म का पूरा जीवन वचनबद्धता का अतिरेक है. आगे चलकर वही महाभारत का कारण बनता है. कुरुक्षेत्र में अर्जुन को कमजोर पड़ते देख कृष्ण युद्ध में शस्त्र न उठाने की अपनी ही प्रतीज्ञा तोड़, भीष्म को संदेश देना चाहते हैं कि दुराग्रह किसी भी सद्गुण को अवगुण बना सकते हैं. आपत्काल में स्थापित नियमों और परंपराओं पर पुनर्विचार किया जा सकता है. लेकिन भीष्म के लिए उसकी प्रतीज्ञा ही परमसत्य है. महाभारत की कथा भीष्म की सफलताओं और असफलताओं से भरी पड़ी है. वह महाभारत का सबसे दुखी पात्र है. अत्यंत बलशाली होने के बावजूद जिस वर्ग में वह रहता है, उसी को पराजय का सामना करना पड़ता है. एक सद्गुण को मिथ की तरह जीने की सजा न केवल भीष्म, बल्कि पूरे हस्तिनापुर को झेलनी पड़ती है. धर्मयुद्ध में विजेता का पक्ष देवता तथा न्याय का पक्ष भी होता है. वर्चस्वकारी संस्कृति के समर्थक कृष्ण को ईश्वर का दर्जा देते हैं. ऐसे लोग विजेता के पक्ष को अपना पक्ष माने रहते हैं. निहित स्वार्थ के लिए ऐसे ही लोग भीष्म को त्याग और वीरता का पर्याय घोषित कर देते हैं. उसके चलते सरोकारविहीन ‘वचनबद्धता’ प्रतीज्ञा का आदर्श मान ली जाती है.

राम, कृष्ण, शिव, महादेव, गणेश, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, हनुमान आदि भारतीय संस्कृति के स्थापित मिथ हैं. इनमें तात्कालिक जीवनमूल्यों को जिन्हें सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की लालसा में गढ़ा गया था—इस तरह केंद्रीभूत किया गया है कि शताब्दियों के बाद भी वे चरित्र हमारे मनस् में रूढ़ बने हुए हैं. अंध-आस्था के योग से वे मिथ इतने प्रभावशाली हो चुके हैं कि स्वार्थवश अथवा अज्ञानता के कारण काल्पनिक प्रतीकों के आगे हमें यह जीता-जागता संसार भी भ्रम और माया लगता है. उनपर थोपे गए चरित्र से मामूली विक्षेप भी हमें उत्साही कर्म लगता है. ऐसे ही परिवेश में सांप्रदायिकता पनपती है तथा मिथों के दुरुपयोग की संभावना बराबर बनी रहती है. इन्हीं मिथों में से एक दुर्गा, ‘नारी-शक्ति’ का प्रतीक है. मिथ के रूप में उसकी जो भूमिका शास्त्रों(मार्कंडेय पुराण) में तय है, उसमें स्त्री-सुलभ गुणों का कोई योग नहीं है. शत्रु-हंता के रूप में उसे शिव की अर्धांगिनी के रूप में दर्शाया जाता है. उसका मूल चरित्र चामुंडा के करीब है, जो स्वयं असुरों की मातृदेवी से अनुप्रेत है. ज्यादा दिन नहीं हुए हैं जब दलितों की भांति चामुंडा का स्थल गांव-बाहर हुआ करता था. वे ग्रामदेवी की भांति पूजी जाती थीं. उनकी प्रतिष्ठा निचली और किसान जातियों में थी. ब्राह्मण और क्षत्रिय स्थापित पुरुष देवताओं की ही पूजा करते थे.

हिंदू संस्कृति में गृहस्थी पालन भी धर्माचरण है. हनुमान जैसे अर्धदेवता को छोड़ दें तो लगभग सभी देवता विवाहित हैं. उनकी पत्नियां ठीक उसी प्रकार पति-अनुगामिनी हैं, जैसी सामान्य भारतीय पत्नियां होती हैं. परमशक्तिशाली त्रिदेव की पत्नियों पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती की भी यही स्थिति है. हनुमान को रूद्र का अवतार माना गया है, लेकिन रामायण आदि ग्रंथों में जिस तरह से उसका चित्रण है, उससे जाहिर होता है कि हनुमान की शक्तियां उसकी अपनी नहीं हैं. वे किसी न किसी देवता का वरदान हैं. यह तर्क शौर्य की देवी दुर्गा पर भी लागू होता है. मार्कंडेय पुराण के अनुसार उसका जन्म विष्णु की नाभि से हुआ है. असुरों से लड़ने में सक्षम बनाने के लिए विभिन्न देवताओं ने उसे अपनी शक्तियां अंतरित की थीं. पुराणों में जगह-जगह पार्वती, लक्ष्मी और दुर्गा को समकक्ष माना गया है. ऐसा एकेश्वरवाद की भावना के चलते हुआ. भारत में कुछ उपनिषदें भले ही एकेश्वरवाद का समर्थन करती हों, व्यवहार में वह बहुदेववाद ही प्रचलन में रहा है. पंडित-पुरोहितों के स्वार्थ जो उससे जुड़े थे. मगर सूफी मत के रूप में दक्षिण भारत पहुंचा इस्लाम का एकेश्वरवादी दर्शन भारतीय समाज में भी जगह बनाने लगा था. हिंदू धर्म में रहकर जातीय उत्पीड़न से त्रस्त लोगों को सूफियों का एकेश्वरवाद बहुत पंसद आया था. उसकी प्रेरणा से दक्षिण में भी संत आंदोलन का सूत्रपात हुआ. आगे चलकर, हिंदुओं का इस्लाम की ओर पलायन रोकने के लिए ही शंकराचार्य को एकेश्वरवाद के समर्थन में आना पड़ा. यह भी कह सकते हैं कि इस्लाम के राजनीतिक, धार्मिक हमले से बचने के लिए वैष्णव, शैव, पाशुपत, तांत्रिक, पुराणिक, स्मार्त्त आदि मतावलंबियों को एकजुट होकर, निजी पहचान के संकट पर भी, वेदांत का समर्थन में आना पड़ा था.

दुर्गा की कथा मार्कंडेय पुराण में ‘देवी महात्म्य’ के अंतर्गत शामिल की गई है. मार्कंडेय पुराण को एफ. ईडन पार्जिटर ने लगभग नवीं शताब्दी की रचना माना है. ‘देवी महात्म्य’ की उपलब्ध प्रतियों में सबसे पुरानी प्रति नबारी लिपि में है, जिसे हरप्रसाद शास्त्री ने ‘रायल लायब्रेरी ऑफ नेपाल’ से प्राप्त किया था. उसपर 998 ईस्वी की तिथि अंकित है. तदनुसार पार्जिटर इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि मार्कंडेय पुराण का लेखनकाल नवीं या दसवीं शताब्दी होना चाहिए. पुराणों का रचनाकाल ईसापूर्व तीसरी-चौथी शताब्दी से 1000 ईस्वी तक फैला हुआ है. इसकी संभावना है कि पुराणों की रचना बौद्ध एवं जैन कथाओं की प्रेरणा से हुई थी. हालांकि रामायण एवं महाभारत में सैकड़ों उपकथाएं प्राप्त होती हैं, लेकिन जिस रूप में वे आज हमें प्राप्त हैं, वह ईसा पूर्व दूसरी-तीसरी शताब्दी से पहले का नहीं है. जाहिर है, कहानी की ताकत को पहचानकर उसकी पहुंच का उपयोग ब्राह्मणों ने अपने धर्म-दर्शन के प्रचार-प्रसार के लिए किया. चूंकि आरंभिक वैदिक धर्म केवल और केवल ब्राह्मणों द्वारा ब्राह्मणों के लिए रचा गया था, इसलिए पुराणादि ग्रंथ प्रकारांतर में ब्राह्मणवाद के प्रचार-प्रचार का माध्यम बन जाते हैं. उनकी कहानियां पाठक का मनोरंजन तो करती हैं, परंतु खास संदेश नहीं दे पातीं. इसके विपरीत जातक कथाओं तथा जैन कथाओं में, भले ही बुद्ध के माध्यम से हो, एक नैतिक संदेश छिपा हुआ रहता है.

आरंभिक संस्कृत ग्रंथों में मुख्यतः ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्गों की उपस्थिति है. बाकी वर्ग या तो उपेक्षित हैं अथवा उनका उपयोग वहीं तक सीमित है, जहां तक वे ब्राह्मणवाद का समर्थन करते हों. उससे प्रतीत होता है कि आरंभिक ऋषिगण आत्ममुग्ध समाज का हिस्सा थे. और बाकी जनसमाज से कटे-छंटे रहते थे. यज्ञ बलि के लिए पशु अथवा अन्य समिधा की आवश्यकता पड़ती तो उसके लिए राजाओं से मांग लिया करते थे. जो पुनः अपनी प्रजा से जुटाता था. बाद के ग्रंथों में जिनमें मार्कंडेय पुराण भी है, वैश्य वर्ण से जुड़ी कहानियां भी आती हैं. इस पुराण का मुख्य भाग ईसा से तीसरी-चौथी शताब्दी की रचना हैं. जब वैश्य समुदाय मजबूत आर्थिक शक्ति के रूप में खुद को स्थापित कर चुका था. यदि ऋषिगण अलग-थलग रहते थे तो प्रजा का क्या धर्म था? ब्राह्मण ग्रंथों में इसकी कोई चर्चा नहीं है. क्योंकि उस ओर उस समय के बुद्धिजीवी ब्राह्मणों का ध्यान ही नहीं था. लेकिन बौद्ध और जैनग्रंथों में छह भौतिकवादी संप्रदायों का कई जगह उल्लेख किया गया है. वे आजीवक और लोकायत मत के प्रवर्त्तक थे तथा आजीविका को प्रमुख मानते थे. ऋषियों के आश्रम उनके लिए ऐसे ही रहे होंगे जैसे कुछ यायावर कबीले आकर गांव बाहर डेरा डाल लें.

अपने धर्म-दर्शन के प्रचार के लिए बुद्ध ने क्षत्रियों के अलावा उन वर्गों पर ज्यादा ध्यान दिया था, जो ब्राह्मण धर्म से बाहर थे. या बुद्ध के विचारों से सहमत होकर उनके दर्शन की ओर आकृष्ट हुए थे. बुद्ध ने अपने उपदेशों के लिए पालि को इस्तेमाल किया था, जो उन दिनों आमजन की भाषा थी. श्रेष्ठताबोध से दबे ब्राह्मण संस्कृत के दायरे से बाहर आने की हिम्मत न जुटा सके. पुराकथाओं में उन्होंने सृष्टि निर्माण का ठेठ ब्राह्मणवादी नजरिया पेश किया. मार्कंडेय पुराण में मनु और इंद्र के उत्तराधिकारियों की चर्चा है. इनके बीच देवी महात्म्य का सम्मिलित होना अवांतर कथा जैसा है. इसलिए पार्जिटर उसे प्रक्षिप्त मानता है. देवी महात्म्य गीता की तरह सात सौ पदों में फैला हुआ है. पार्जिटर ने यह संभावना भी व्यक्त की है कि मार्कंडेय के अनुयायी उन्हें अपने समय के व्यास के सदृश सिद्ध करना चाहते थे. दूसरे यदि मार्कंडेय पुराण का मूल हिस्सा तीसरी-चौथी शताब्दी की है तब भी दो मुख्य प्रश्न विचार के लिए आवश्यक है. यदि मार्कंडेय पुराण तीसरी-चौथी शताब्दी की रचना है तो क्या उस समय ‘दुर्गा महात्म्य’, भले की स्वतंत्र कृति के रूप में—मौजूद था?  मेरा अनुमान है कि दुर्गा और काली का रूप अन्यत्र देखने को नही मिलता. दुर्गा की महत्ता कदाचित उस दौर में मिली जब पुरुष सत्तात्मक राज्य उजड़ने लगे थे. उनके राजाओं का वैभव क्षीण पड़ चुका था. वह महमूद गजनवी के आने का था. एक के बाद एक हिंदू राजा पराजित हो रहे थे. उस समय लगा कि कदाचित असुर शक्ति से लैस, कोई स्त्री-शक्ति ही उनकी रक्षा कर सकती है. दुर्गा की रचना उन्होंने इसी उद्देश्य से की, बाद में उसे मार्कंडेय पुराण का हिस्सा बना दिया गया.

छंदों की संख्या के कारण ‘दुर्गा महात्म्य’ को ‘दुर्गा सप्तशती’ भी कह दिया जाता है. उसके हिंदी अनुवाद गद्य और पद्य में पहले भी आ चुके हैं. जहां तक मुझे याद पड़ता है, डॉ. राष्ट्रबंधु ने भी ‘दुर्गा सप्तशती’ का काव्यानुवाद किया था. उस अनुवाद के बारे में इससे अधिक जानकारी मुझे नहीं है. इस काम को लेकर हाल ही में एक और नाम जुड़ा है. वह हैं—डॉ. रामपुनीत ठाकुर ‘तरुण’ तथा पुस्तक का शीर्षक है—‘दुर्गाचरित.’ पुस्तक को छापा है, समीक्षा प्रकाशन मुजफ्फरपुर. डॉ. तरुण हिंदी के सिद्ध-हस्त कवि हैं. उनके इस अनुवाद को देख कर इसपर विश्वास होने लगता है. अनुवाद सहज, सरल एवं बोधगम्य है. चौपाई, दोहा आदि रामायण के प्रचलित छंदों में लिखे जाने से पुस्तक की पठनीयता में इजाफा हुआ है. पाठक बड़ी सहजता से पाठ को आत्मसात करता चला जाता है. फिर भी कुछ प्रश्न ‘दुर्गा चरित’ को पढ़ते समय दिमाग में कौंध सकते हैं. जैसे कि कोई लेखक या रचनाकार ऐसी पुस्तकों का चयन ही क्यों करता है, जिनमें उसे मौलिक प्रयोग के न्यूनतम अवसर उपलब्ध हों? दूसरे क्या ऐसी पुस्तकों में लेखक को अपनी ओर से कहने-जोड़ने का क्या कोई अवसर उपलब्ध नहीं होता? इनमें सबसे पहला प्रश्न तो आस्था का है. कदाचित लेखक की अपनी आस्था ही उसे ऐसे ग्रंथों की ओर ले जाती है. स्वयं तुलसीदास इसी भावना के साथ रामचरितमानस की ओर आकृष्ट हुए थे.

मातृशक्ति के रूप में दुर्गा का मिथ हमें हजारों साल पुरानी उस संस्कृति की याद दिलाता है, जो मातृशक्ति प्रधान थी. सिंधू सभ्यता के उत्खनन से जो मूर्तिशिल्प प्राप्त हुए हैं, उनमें एक प्रसिद्ध मातृदेवी की मूर्ति है. ध्यातव्य है कि मातृदेवी की प्रतिमा से मिली-जुली प्रतिमाएं लगभग सभी सभ्यताओं में प्राप्त हुई हैं. उससे दो निष्कर्ष निकाले जाते हैं. पहला आरंभिक संस्कृतियां आपस में जुड़ी हुई थीं. उनके बीच व्यापारिक-सांस्कृतिक संबंध थे. दूसरे यह कि संस्कृति का सीधा संबंध उत्पादन व्यवस्था से होता है. चूंकि आदिम सभ्यताओं में उत्पादन का तौर-तरीका लगभग मिलता-जुलता था, इसलिए उनकी पूजा पद्धतियां, अध्यात्म चेतना आदि में भी अप्रत्याशित समानताएं नजर आती हैं.

जैसा कि ऊपर कहा गया है, प्रस्तुत अनुवाद सरल, सहज और बोधगम्य है. इसके लिए कवि बधाई का पात्र है. मुझे यहां विनोबा की याद आ रही है. संत ज्ञानेष्वर की ‘ज्ञानेश्वरी’ की महाराष्ट्र में बड़ी प्रतिष्ठा है. विनोबा की मां ने उसका सरल मराठी में अनुवाद करने को कहा. मां की इच्छापूर्ति के लिए विनोबा ने ‘ज्ञानेश्वरी’ को सरल ‘गीताई’ के रूप में अनुदित किया. जब वह पुस्तक प्रकाशित होकर बाजार में आई, तब तक मां दुनिया छोड़ चुकी थी. परंतु ‘गीताई’ के रूप में ‘ज्ञानेश्वरी’ महाराष्ट्र के घर-घर तक पहुंच गई. इसे अनुवाद की ताकत भी कह सकते हैं. फिर भी एक बात अखरती है. रचनाकार के लिए आवश्यक है कि उसकी रचना नए विमर्श का दरवाजा खोले. यदि धर्म उसका केंद्रीय विषय है तब भी वह केवल श्रद्धालुओं तक सिमटकर न रह जाए. उसमें साहित्य और दर्शन के विद्यार्थियों के लिए भी संभावना हो. अनूदित पुस्तकों में प्रयोग के सीमित अवसर होते हैं. इसलिए उनमें भूमिका का महत्त्व रचना जैसा ही है. भूमिका में लेखक-रचनाकार न केवल रचना की ऐतिहासिकी पर विचार करता है, अपितु उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका तथा नए अनुवाद, प्रस्तुतीकरण के औचित्य पर भी अपना पक्ष रचता है. प्राचीन पुस्तकों के अनुवाद के लिए ‘एशियाटिक सोसाइटी ऑफ कलकत्ता’ कुछ मार्गदर्शक नियम बनाए थे. उनमें से एक पुस्तक का विस्तृत विवेचनात्मक परिचय भी था. ‘दुर्गा चरित’ सहज अनुवाद की शर्त को तो पूरा करती है, परंतु उसमें सिवाय शैली के, नएपन का अभाव है. अतएव उन लोगों के लिए जो ‘दुर्गामहत्म्य’ के कवित्व का आनंद लेना चाहते हैं, मगर संस्कृत का ज्ञान नहीं रखते, उन्हें यह पुस्तक खूब पसंद आएगी. लेकिन विद्यार्थियों और आलोचकों के लिए पुस्तक में आत्मतुष्टि के बहुत कम अवसर हैं.

फिर भी सहज, सरल अनुवाद और शैलीगत प्रबंध के लिए कवि बधाई का पात्र है.

ओमप्रकाश कश्यप



ओमप्रकाश कश्यप

जी-571, अभिधा, गोविंदपुरम

गाजियाबाद-201013

भविष्यलोक : एक नास्तिक का स्वप्न

सामान्य

(आज रामास्वामी पेरियार का जन्मदिवस है, भारत को आधुनिक राज्य बनाने में जितनी भूमिका डॉ. आंबेडकर की है, उतनी ही पेरियार की भी है. अपनी—अपनी भूमिका में दोनों महान हैं. डॉ. आंबेडकर साधारण परिवार से आए थे, अपने श्रम, स्वाध्याय, विद्वता, त्याग और विवेक के बल पर वे इस देश के निर्माता बने. समाज के बड़े वर्ग को जगाने का काम किया. पेरियार के पिता धनी व्यापारी थे. जीवन के आरंभिक वर्षों में धन उन्होंने भी खूब कमाया. धीरे—धीरे उसकी ओर से निस्पृह होते चले गए. आगे चलकर कांग्रेस से जुड़े. बहुत जल्दी समझ में आ गया कि कांग्रेस के सुधार की एक सीमा है. वह समाज के निचले हिस्सों के भले के लिए उतना की कर सकती है, जितना उपकार—भाव के साथ संभव है. पेरियार ने राजनीति को छोड़ा और केवल जनता पर भरोसा किया. खुद को जनांदोलनों के लिए समर्पित कर दिया. राजनीति से दूर रहते हुए बड़े आंदोलन चलाना, जिनसे आगे चलकर पूरे देश की राजनीति प्रभावित हुई, पेरियार जैसी हस्ती के लिए ही संभव था.

आदर्श समाज को लेकर हर महापुरुष का एक सपना रहा है. पश्चिम में प्लेटो से लेकर थॉमस मूर और आल्डोस हक्सले तक. भारत में संत रविदास ने भी समानता, सहयोग और स्वतंत्रता पर आधारित सपना देखा था, जिसे हम बेगमपुराके नाम से जानते हैं. आने वाली दुनियामें रामास्वामी पेरियार भी इसी प्रकार का सपना देखते हैं. यह आलेख उनके भाषण के अंग्रेजी अनुवाद(प्रो. ए. एस. वेणु)  का अनुवाद है, जो उन्होंने आत्मसम्मान आंदोलनके एक कार्यक्रम दिया था. वैज्ञानिक सोच के प्रसारक ईवी रामास्वामी इसमें ऐसे अनेक आष्विकारों की कल्पना करते हैं, जो आज हमारे सामने हैं. इससे उनकी दूरंदेशी का अनुमान लगाया जा सकता है. ओजस्वी विचारकों के कारण पेरियार को यूनेस्को ने दक्षिण एशिया का सुकरातकहा तो कुछ विद्वानों ने उन्हें भारत का वाल्तेयरमाना है. कुछ विद्वान उनकी तुलना रूसो से करते हैं. यह भाषण पुस्तकाकार भी प्रकाशित हुआ, जिसकी समीक्षा सुप्रसिद्ध अंग्रेजी दैनिक दि हिंदूमें छपी थी, जहां उनकी तुलना बीसवीं ताब्दी का एच.जी.वेल्स कहा गया था. लेख में गांधी का नाम नहीं है. उनकी ओर संकेत-भर है. परंतु इससे गांधी और पेरियार के सोच का अंतर पूरी तरह सामने आ जाता है.

यह लेख एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित हुआ था. पेरियार की भूमिका के साथ, जो लेख जितनी ही महत्त्वपूर्ण है.  परियार के जन्मदिन पर उन्हें याद करते हुए उन्हीं के लेख का अनुवाद प्रस्तुत कर रहे हैंओमप्रका कश्यप)

 

प्राक्कथन

कल की दुनिया कैसी थी? आज की दुनिया कैसी है? आने वाले कल की दुनिया कैसी होगी? समय के साथ-साथ, शताब्दियों के अंतराल में कौन-कौन से परिवर्तन होंगे? केवल तर्कवादी इन बातों को सही-सही समझ सकता है. धर्माचार्य के लिए इन्हें समझना अत्यंत कठिन है. यह बात मैं किस आधार पर कह रहा हूं?

धर्माचार्य मात्र उतना जानते हैं, जितना उन्होंने धर्मशास्त्रों और ऊटपटांग पौराणिक साहित्य को रट्टा लगाते हुए समझा है. उन सब चीजों से जाना है, जो ज्ञान और तर्क की कसौटी पर कहीं नहीं ठहरतीं. उनमें से कुछ केवल भावनाओं में बहकर सीखते-समझते हैं. दिमाग के बजाए दिल से सोचते हैं. अंध-श्रद्धालु की तरह मान लेते हैं कि उन्होंने जो सीखा है, वही एकमात्र सत्य है. बुद्धिवादियों का यह तरीका नहीं है. वे ज्ञानार्जन को महत्त्व देते हैं. अनुभवों से काम लेते हैं. उन सब वस्तुओं से सीखते हैं, जो उनकी नजर से गुजर चुकी हैं. प्रकृति में निरंतर हो रहे परिवर्तनों, जीव-जगत की विकास-प्रक्रिया से भी वे ज्ञान अर्जित करते हें. इसके साथ-साथ वैज्ञानिक शोधों, महापुरुषों के ज्ञान, व्यक्तिगत खोजबीन, उपलब्ध शोधकर्म को भी वे आवश्यकतानुसार और विना किसी पूर्वाग्रह के ग्रहण करते हैं.

धर्माचार्य सोचता है कि परंपरा-प्रदत्त ज्ञान ही एकमात्र ज्ञान है. उसमें कोई भी सुधार संभव नहीं है. अतीत को लेकर जो पूर्वाग्रह और धारणाएं प्रचलित हैं, वे उसमें किसी भी प्रकार के बदलाव के लिए तैयार नहीं होते. दूसरी ओर तर्कवादी मानता है कि यह संसार प्रतिक्षण आगे की ओर गतिमान है. सबकुछ तेजी से बदल रहा है. इसलिए वह अधुनातन और श्रेष्ठतर के स्वागत को सदैव तत्पर रहता है. मेरा आशय यह नहीं है कि दुनिया-भर के सभी धर्माचार्य एक जैसे हैं. लेकिन जहां तक ब्राह्मणों का सवाल है, वे सब के सब  बुद्धिवाद का विरोध करते हैं. परंपरा नएपन की उपेक्षा करती है. वह लोगों को तर्क और मुक्त चिंतन की अनुमति नहीं देती. न ही शिक्षा-तंत्र और परीक्षा-विधि को उन्नत करने में उन्हें कोई मदद पहुंचाती है. उलटे वह लोगों के पूर्वाग्रह रहित चिंतन में बाधा उत्पन्न करती है. यह जानते हुए भी परंपरा-पोषक धर्माचार्य अज्ञानता के दलदल में बुरी तरह धंसे हैं, पुराणों के दुर्गंधयुक्त कीचड़ में वे आकंठ लिप्त हैं. अंधविश्वाश और अवैज्ञानिक विचारों ने उन्हें खतरनाक विषधर बना दिया है.

हमारे धार्मिक नेता, विशेषकर हिंदू धर्म के अनुयायी धर्माचार्यों से भी गए-गुजरे हैं. यदि धर्माचार्य लोगों को 1000 वर्ष पीछे लौटने की सलाह देता है, तो नेता उन्हें हजारों वर्ष पीछे ढकेलने की कोशिश में लगे रहते हैं. ये जनता को सदियों पीछे ढकेल भी चुके हैं. बुद्धिवाद न तो धर्माचार्यों को रास आता है, न ही हमारे हिंदू नेताओं को. उन्हें केवल अवैज्ञानिक, मूर्खतापूर्ण और बुद्धिहीन वस्तुओं से लगाव है.

अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं, ये लोग नई दुनिया में भी उम्मीद लगाए रहते हैं कि आने वाला समय उन जैसे असभ्य और गंवारों का होगा. ‘स्वर्णिम अतीत’(ओल्ड इज गोल्ड) की परिकल्पना पर वही व्यक्ति विश्वास कर सकता है, जिसने नए परिवर्तन को न तो समझा हो, न उसकी कभी सराहना की हो. केवल अकल के अंधे लोग उनका अनुसरण कर सकते हैं.

हम जैसे तर्कवादी लोग पुरातन को पूर्णतः खारिज नहीं करते. उसमें जो अच्छा है, हम उसका स्वागत करते हैं. उसे अपनाने के लिए भी अच्छाई और नएपन में विश्वास करना अत्यावश्यक है. तभी हम नए और अधुनातन सत्य की खोज कर सकते हैं. समाज तभी प्रगति कर सकता है, जब हम नए और बेहतर समाज की रचना के लिए नवीनतम परिवर्तनों के स्वागत को तत्पर हों.

लोग चाहे वे किसी भी देश  अथवा संस्कृति के क्यों न हों, पुरातन से संतुष्ट कभी नहीं थे. उनकी दृष्टि सदैव अधुनातन ज्ञान एवं प्रगति पर केंद्रित रही हैं. वे जिज्ञासु और निष्पक्ष थे. इसी कारण वे विस्मयकारी वस्तुओं की खोज कर पाए. आज दुनिया के हर कोने के लोग मानवोपयोगी आविष्कारों का लाभ उठा रहे हैं. इसलिए यह आलेख केवल उन लोगों के लिए है जो सत्य को अनुभव करना जानते हैं. उसे आत्मसात् करने को तत्पर हैं. ऐसे ही लोग शताब्दियों आगे के परिवर्तनों की कल्पना कर सकते हैं.  

 

भविष्यलोक : एक नास्तिक का स्वप्न

अतीत के विहंगावलोकन और महान इतिहासकारों की राय से पता चलता है कि आने वाले समय में राजशाही का अंत हो जाएगा. बहुमूल्य सोना-चांदी, हीरे-जवाहरात प्रभु वर्ग का विशेषाधिकार नहीं रह पाएंगे. उस दुनिया में न तो शासक की आवश्यकता होगी, न शासन की. न राजा होगा, न ही राज्य. लोगों की आजीविका और सुख-शान्ति पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं होगा, जैसा आजकल का चलन है. आज रोजी-रोटी के लिए किया जाने वाला श्रम अत्यधिक है, अपनी ही मेहनत का सुख प्राप्त करने के अवसर अपेक्षाकृत अत्यंत सीमित. जबकि हमारे पास खेती-किसानी और सुखामोद, यहां तक कि वैभव-सामग्री जुटाने के विपुल संसाधन हैं. दूसरी ओर भूख, गरीबी और दैन्य के सताए लोग बड़ी संख्या में हैं. ऐसे लोगों के पास सामान्य सुविधाओं का अभाव हमेशा बना रहता है. उनके पास न तो भरपेट भोजन है, न ही जीवन का कोई सुख. हालांकि दुनिया में अवसरों की भरमार है. उनसे कोई भी व्यक्ति अपनी रुचि के अनुसार जीवन के लक्ष्य निर्धारित कर सकता है, अपने आप को ऊंचा उठा सकता है. फिर भी ऐसे लोग बहुत कम हैं जो उन सबका आनंद उठा पाते हैं. कच्चे माल और उत्पादन के क्षेत्र तेजी से विकास की ओर अग्रसर हैं. दूसरी ओर ऐसे लोग भी अनगिनत हैं जो मामूली संसाधनों के साथ गुजारा करने को विवश हैं. समाज में जीवन की मूलभूत अनिवार्यताएं होती हैं. उनके अभाव में जीवन बहुत कठिन हो जाता है. बहुत-से लोग न्यूनतम सुविधाओं के लिए तरसते हैं. बड़ी कठिनाई में वे जीवनयापन कर पाते हैं. हमारे पास कृषि भूमि की कमी नहीं. बाकी संसाधन भी पर्याप्त मात्रा में है. मगर ऐसे लोग भी हैं जिनके पास जमीन का एक टुकड़ा तक नहीं है. ऐसी दुनिया में एक ओर सुख-पूर्वक जीवनयापन के भरपूर संसाधन मौजूद हैं, दूसरी ओर भुखमरी गरीबी, और दुश्चिंताओं की भरमार है. उनके कारण समाज में चुनौतियां ही चुनौतियां हैं.

क्या इन सबके और ईश्वर के बीच कोई संबंध है?

क्या इन सबके और मनुष्य के बीच कोई तालमेल है?

ऐसे लोग भी हैं जो सांसारिक कार्यकलापों को ईश्वर से जोड़ते हैं. परंतु हमें ऐसा कोई नहीं मिलता जो दुनिया की बुराइयों के लिए ईश्वर को जिम्मेदार ठहराता हो. तो क्या यह मान लिया जाए कि आदमी नासमझ है, उसमें इन बुराइयों से निपटने का सामर्थ्य ही नहीं है?

प्राणीमात्र के बीच मनुष्य सर्वाधिक बुद्धिमान है. यह आदमी ही है, जिसने ईश्वर, धर्म, दर्शन, अध्यात्म को गढ़ा है. कहा यह भी जाता है कि असाधारण मनुष्य ईश्वर का साक्षात्कार करने में सफल हुए थे. कुछ लोगों के बारे में तो यह दावा भी किया जाता है कि वे ईश्वर में इतने आत्मलीन थे कि स्वयं भगवान बन चुके थे. मैं बड़ी हिम्मत के साथ पूछता हूं—आखिर क्यों ऐसे महान व्यक्तित्व भी दुनिया में व्याप्त तमाम मूर्खताओं को उखाड़ फेंकने में नाकाम रहे? क्या इससे स्पष्ट नहीं होता कि लोग अपने सामान्य बोध से यह नहीं समझ पाए कि सांसारिक चीजों का ईश्वर, धर्म, आध्यात्मिक निर्देश, न्याय, मर्यादा, शासन आदि से कोई संबंध नहीं है. ये सिर्फ इसलिए हैं क्योंकि अधिकांश लोग स्वतंत्र रूप से सोचने तथा निर्णय लेने में अक्षम हैं?

पश्चिमी देशों में अनेक विद्वानों ने बुद्धि को महत्त्व देते हुए तर्कसंगत ढंग से सोचना आरंभ किया. उन विचारों की मदद से उन्होंने विलक्षण ज्ञान के साथ-साथ चामत्कारिक आविष्कार किए हैं. उसके फलस्वरूप वे अपनी आध्यात्मिकता के परिष्कार के साथ-साथ, अंधविश्वासों और आत्म-वंचनाओं का समाधान खोजने में भी कामयाब रहे. अंततः वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि प्राचीन ढकोसले ज्यादा दिन टिकने वाले नहीं हैं. यही कारण है कि उन्होंने नए युग पर ध्यान-केंद्रित करना आरंभ कर दिया है.

हम क्यों जन्मे हैं? आम आदमी को आज भी रोजी-रोटी के लिए संघर्ष क्यों करना पड़ता है? क्यों लोग भूख और गरीबी के कारण अकाल मौत मरते हैं? जबकि दुनिया में संसाधनों का प्राचुर्य है. ये मानव-मस्तिष्क को स्तब्ध कर देने वाले प्रश्न हैं. आज हालात बदल रहे हैं. आजकल बुद्धिवादी तरीके से अनेक चीजों का वास्तविक रूप हमारे सामने है. कालांतर में यही तरीका न केवल परिवर्तन का वाहक बनेगा, बल्कि सामाजिक क्रांति को भी जन्म देगा. एक समय ऐसा आएगा जब धन-संपदा को सिक्कों में नहीं आंका जाएगा. न सरकार की जरूरत रहेगी. किसी भी मनुष्य को जीने के लिए कठोर परिश्रम नहीं करना पड़ेगा. ऐसा कोई काम नहीं होगा जिसे ओछा माना जाए; या जिसके कारण व्यक्ति को हेय दृष्टि से देखा जाए. आज सरकार के पास असीमित अधिकार हैं. किंतु भविष्य में ऐसी कोई सरकार नहीं होगी, जिसके पास अंतहीन अधिकार हों. दास प्रथा का नामोनिशान नहीं बचेगा. जीवनयापन हेतु कोई दूसरों पर आश्रित नहीं रहेगा. महिलाएं आत्मनिर्भर होंगी. उन्हें विशेष संरक्षण, सुरक्षा और सहयोग की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी.

आने वाली दुनिया में मनुष्य को सुख-पूर्वक जीवन-यापन करने के लिए एक अथवा दो घंटे का समय पर्याप्त होगा. उससे वह उतना ही वैभवशाली जीवन जी सकेगा, जैसा संत-महात्मा, जमींदार, शोषण करने वाले धर्मगुरु और तत्वज्ञानी जीते आए हैं. सामान्य सुख-सुविधाओं तथा समस्त आनंदोपभोग के लिए मात्र दो घंटे का श्रम पर्याप्त होगा. मनुष्य के सामान्य रोग जैसे पैरों का दर्द, कान, नाक, पेट, हड्डी आदि के विकार तथा अन्यान्य रोग सहन नहीं किए जाएंगे. आने वाली नई दुनिया में अकेले मनुष्य की दुश्चिंताएं और कठिनाइयाँ समाज द्वारा सही नहीं जाएंगीं. उस दुनिया में समाज एकता और सहयोग के आधार पर गठित होगा.

युद्ध जो इन दिनों आम हैं, भविष्य में उनके लिए कोई जगह नहीं होगी. लोगों को युद्ध में जान देने के लिए मजूबर नहीं किया जा सकेगा. हत्या और लूटमार की घटनाओं में उल्लेखनीय गिरावट होगी. कोई बेरोजगार नहीं रहेगा. न कहीं भोजन और आजीविका के लिए मारामारी होगी. लोग काम की तलाश अपने आप को सुखी और स्वस्थ रखने के लिए करेंगे. बहुमूल्य वस्तुएं, मनोरम स्थल, मनभावन दृश्य और दमदार प्रदर्शनियां, जहां लोग मिल-जुलकर जीवन का आनंद ले सकें—सभी को समान रूप से सदैव उपलब्ध होंगी. आने वाली दुनिया में साहूकार, निजी व्यापारी, उद्योगपति और पूंजीपतियों के अधीन चल रही संस्थाओं के लिए कोई जगह नहीं होगी. केवल लाभ की कामना के साथ करने वाला कोई एजेंट, ब्रोकर या दलाल आने वाली दुनिया में नजर नहीं आएगा.

सहयोगाधारित विश्व-राज्य में जल, थल और वायुसेना बीते जमाने की चीजें बन जाएंगी. बस्तियों को तबाह कर देने वाले युद्धक जहाज और हथियार खुद नष्ट कर दिए जाएंगे. आजीविका के लिए रोजगार की तलाश आसान और मानव-मात्र की पहुंच में होगी. सुखामोद में चौतरफा वृद्धि होगी. ज्ञान-विज्ञान की मदद से मनुष्य की औसत आयु में बढ़ोत्तरी होगी. जनसंख्या बृद्धि की चाहे जो रफ्तार हो, आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता तथा उन्हें जुटाने में लगने वाला श्रम मूल्य न्यूनतम स्तर पर होगा. मशीनी-क्रांति उसे सहज-संभव कर दिखाएगी.

मिसाल के तौर पर, कभी वे दिन थे जब एक कारीगर एक मिनट में औसतन 150 धागे बुन पाता था. आज ऐसी मशीनें हैं जो किस्म-किस्म के कपड़े 45,000 धागे प्रति मिनट की रफ्तार से आसानी से बुन लेती हैं. इसी तरह पहले कारीगर के लिए प्रति मिनट 2-3 सिगरेट बनाना भी मुश्किल हो जाता था. आज एक मशीन प्रति मिनट में ढाई हजार सिगरेट बना देती है. आज मशीन के डेशबोर्ड पर केवल तंबाकू की पत्तियां, कागज आदि रखने की जरूरत होती है. सिगरेट बनाने से लेकर उनके पैकेट बनाने, फिर पैक करने तक का काम मशीनें करती हैं. वहां से उन्हें आसानी से बाहर भेजा जा सकता है. इसके अलावा खराब सिगरेटों को अलग करने से लेकर नष्ट करने तक का काम मशीनें स्वत: कर लेती हैं. आज जीवन के सभी क्षेत्रों में मशीनों के जरिये आसानी से काम हो रहा है. प्रौद्योगिकी विषयक ज्ञान में तीव्र वृद्धि हो रही है. तकनीक की मदद से आने वाली दुनिया में ऐसा संभव होगा जब कोई आदमी सप्ताह में मात्र दो श्रम करके साल-भर के लिए जरूरी वस्तुओं का उपार्जन कर सकेगा.

इस बात से डरने की जरूरत नहीं है कि लोग इससे सुस्त और आराम पसंद हो जाएंगे. इस तरह की चिंता किसी को भी नहीं करनी चाहिए. यही नहीं जैसे-जैसे जीवनोपयोगी वस्तुएं के उपार्जन के तरीकों और संसाधनों का विकास होगा, और जैसे-जैसे सुख-सुविधाओं की मांग बढ़ेगी, स्वाभाविक रूप से मनुष्य के श्रम और क्षमताओं का लोकहित में पूरे वर्ष उपयोग करने के लिए आवश्यक कदम भी उठते रहेंगे. ऐसी योजनाएं बनाई जाएंगी जिससे मनुष्य के खाली समय का सार्थक सदुपयोग संभव हो सके. आधुनिकतम मानवोपयोगी आविष्कारों की कोई सीमा नहीं होगी. सभी लोगों को काम मिलेगा, विशेषरूप से गुणी, प्रतिभाशाली और मनुष्यता के हित में आधुनिक सोच से काम लेने वालों के लिए काम की कोई कमी नहीं होगी. मजदूर केवल मजदूरी के लिए काम नहीं करेगा, बल्कि वह अपने मानसिक विकास के लिए भी काम को समर्पित होगा. उससे प्रत्येक व्यक्ति व्यस्त रहेगा. केवल लार्भाजन के लिए कोई उत्पादन नहीं किया जाएगा.

अपने से बड़ों को काम करते देख छोटे भी समाज हित में बहुउपयोगी योगदान देने को आश्चर्यजनक रूप से तत्पर होंगे. ठीक है, कुछ लोग सोच सकते हैं कि उनके कुछ उत्तराधिकारी सुस्त और आराम-पसंद होंगे. मैं ऐसा नहीं मानता. यह सोचते हुए कि कुछ लोग आलसी और निकम्मे हो सकते हैं, वे समाज के लिए बोझ नहीं रहेंगे. समाज की प्रगति पर उनसे न्यूनतम प्रभाव पड़ेगा. यदि कोई जानबूझकर सुस्त रहने की जिद ठाने रहता है, तो वह उसके लिए नुकसानदेह होगा, न कि पूरे समाज के लिए. सच तो यह है कि आने वाले समय में कोई भी खुद को आलसी और सुस्त कहलवाने में लज्जित महसूस करेगा. लोगों में समाज के लिए कुछ न कुछ उपयोगी करने की स्पर्धा बनी रहेगी. उनके लिए अपेक्षाकृत अधिक काम होगा. और किसी काम को करने वाले हाथों की कमी नहीं रहेगी. कोई किसी काम को पूरा न करने का दोष अपने सिर नहीं लेना चाहेगा.

आप पूछ सकते हैं कि क्या कुछ आदमी ऐसे भी होंगे जिन्हें ओछे और गंदे कार्यों पर लगाया जाएगा? अभी तक गंदे और खराब कार्यों से हमारा जो मतलब रहा है, आने वाली दुनिया में उन्हें ऐसा नहीं माना जाएगा. न उनके कारण किसी को हेय दृष्टि से देखा जा सकेगा. आनी वाले समय में झाडू़ लगाना, मैला उठाना, झूठे बर्तन धोने, कप-प्लेट धोने जैसे कार्यों के लिए मशीनों की मदद ली जाएगी. आदमी से उम्मीद की जाएगी कि तकनीकी कौशल प्राप्त कर, मषीनों का उपयोग करना सीखे. सिर पर भारी बोझा ढोने, खींचने या गड्ढा खोदने के लिए मानव-श्रम की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. किसी भी कार्य को असम्मानजनक नहीं माना जाएगा. कवियों, कलाकारों, कलमकारों और मूर्तिकारों के बीच नई दुनिया गढ़ने के लिए स्पर्धा रहेगी. अच्छे आदमियों को अच्छे काम सौंपे जाएंगे, ताकि वे नाम और नामा दोनों कमा सकें.

कोई भी व्यक्ति आत्मगौरव, चरित्र और मान-मर्यादा से शून्य नहीं होगा. चूंकि व्यक्तिगत लाभ के सभी रास्ते बंद कर दिए जाएंगे, इसलिए कोई भी आदमी गलत चाल-चलन में नहीं पड़ेगा. ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होगा जिसका झुकाव अनुचित और अनैतिक कार्य की ओर हो. ये शर्तें प्रत्येक व्यक्ति को उच्च नैतिक मापदंडों के अनुसरण की प्रेरणा देंगीं. उसे अधिक सुसभ्य और संवेदनशील बनाएंगी. यदि कहीं ऊंच-नीच, विशेषाधिकार और अधिकारविहीनता दिखेगी, वहां घृणा, जुगुप्सा, और विरक्ति के कारण भी मौजूद होंगे—और जहां ये चीजें अनुपस्थित होंगी, वहां अनैतिकता के लिए कोई स्थान न होगा. नए विश्व में किसी को कुछ भी चुराने या हड़पने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी. पवित्र नदियों जैसे कि गंगा के किनारे रहने वाले लोग उसके पानी की चोरी नहीं करेंगे. वे केवल उतना ही पानी लेंगे, जितना उनके लिए आवश्यक है. भविष्य के उपयोग के लिए वे पानी को दूसरों से छिपाकर नहीं रखेंगे. यदि किसी के पास उसकी आवश्यकता की वस्तुएं प्रचुर मात्रा में होंगी, वह चोरी की सोचेगा तक नहीं. इसी प्रकार किसी को झूठ बोलने, धोखा देने या मक्कारी करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, क्योंकि उससे उसे कोई प्राप्ति नहीं हो सकेगी. नशीले पेय किसी को नुकसान नहीं पहुंचाएंगे. न कोई किसी की हत्या करने का ख्याल दिल में लाएगा. बक्त बिताने के नाम पर जुआ खेलने, शर्त लगाने जैसे दुर्व्यसन समाप्त हो जाएंगे. उनके कारण किसी को आर्थिक बरबादी नहीं झेलनी पड़ेगी.

पैसे की खातिर अथवा मजबूरी में किसी को वेष्यावृत्ति के लिए विवश नहीं होना पड़ेगा. स्वाभिमानी समाज में कोई भी दूसरे पर शासन नहीं कर पाएगा. कोई किसी से पक्षपात की उम्मीद नहीं करेगा. ऐसे समाज में जीवन और काम-संबंधों को लेकर लोगों का दृष्टिकोण उदार एवं मानवीय होगा. वे अपने स्वास्थ्य की देखभाल करेंगे. प्रत्येक व्यक्ति में आत्मसम्मान की भावना होगी. स्त्री-पुरुष दोनों एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करेंगे और किसी का प्रेम बलात् हासिल करने की कोशिश नहीं की जाएगी. स्त्री-दासता के लिए कोई जगह नहीं होगी. पुरुष सत्तात्मकता मिटेगी. दोनों में कोई भी एक-दूसरे पर बल-प्रयोग नहीं करेगा. आने वाले समाज में कहीं कोई वेष्यावृत्ति नहीं रहेगी.

मानसिक अपंगता के शिकार लोगों को विशेषरूप से देखभाल की जरूरत पड़ सकती है. बावजूद इसके ऐसे व्यक्तियों को तभी बंद किया जा सकेगा, जब वे दूसरे लोगों के लिए परेशानियां खड़ी कर रहे हों. स्त्री-पुरुष दोनों पर किसी प्रकार के प्रतिबंध लागू करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. क्योंकि वे दोनों ही संबंधों की अच्छाई-बुराई की ओर से सावधान रहेंगे.

यातायात के साधन मुख्यतः हवाई होंगे और वे तीव्र से काम करेंगे. संप्रेषण प्रणाली बिना तार की होगी. सबके लिए उपलब्ध होगी और लोग उसे अपनी जेब में उठाए फिरेंगे. रेडियो प्रत्येक के हेट में लगा हो सकता है. छवियां संप्रेषित करने वाले उपकरण व्यापक रूप से प्रचलन में होंगे. दूर-संवाद अत्यंत सरल हो जाएगा और लोग ऐसे बातचीत कर सकेंगे मानो आमने-सामने बैठे हों. आदमी किसी से भी कहीं भी और कभी भी तुरंत संवाद कर सकेगा. शिक्षा का तेजी से और दूर-दूर तक प्रसार करना संभव होगा. एक सप्ताह तक की जरूरत का स्वास्थ्यकर भोजन संभवतः एक केप्सूल में समा जाएगा जो सभी को सहज उपलब्ध होंगे

मनुष्य की आयु सौ वर्ष अथवा उससे भी दो गुनी हो चुकी होगी.

नपुंसक स्त्री या पुरुष को संतान के लिए संभोग करने की जरूरत नहीं पड़ेगी. यही नहीं पषुओं की उन्नत नस्ल के लिए ताकतवर और सुदृढ़ सांड विशेषरूप से लाए जाएंगे, स्वस्थ्य और बुद्धिमान पुरुषों को वीर्य-दान के लिए तैयार किया जाएगा, तथा उसे वैज्ञानिक ढंग से स्त्री के गर्भाशय में स्थापित किया जाएगा. वह ऐसा रास्ता होगा जिससे आने वाली संतान शारीरिक एवं मानसिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ एवं तेजवंत होगी. बच्चे के जन्म की प्रक्रिया सरल होगी, जिसके लिए दंपति को संभोग की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. जनता के इच्छा और सहयोग से जनसंख्या-नियंत्रण का काम आसान हो जाएगा.

दैनिक उपभोग की वस्तुएं जैसी वे आज हैं, भविष्य में उससे अलग हांगीं. उदाहरण के लिए वाहनों का भार उल्लेखनीय रूप से कम हो जाएगा. उससे पैट्रोल की खपत में कमी आएगी. भविष्य की कारें बिजली अथवा दुबारा चार्ज होने वाली बैटरियों से चल सकेंगी. बिजली का उपयोग इस प्रकार किया जाएगा ताकि प्रत्येक व्यक्ति उसका लाभ उठा सके. वह मनुष्यता के लिए बहुउपयोगी होगी. इस तरह के अनेक वैज्ञानिक सुधार देखने में आएंगे. विज्ञान का बड़ी तेजी से विकास होगा, उसके माध्यम से नए-नए और उपयोगी आविष्कार सामने आएंगे.

उस दुनिया में आविष्कारों के दुरुपयोग के लिए कोई गुंजाइष नहीं होगी. आजकल संपत्ति, कानून और व्यवस्था की देखभाल, न्याय, प्रशासन, शिक्षा आदि के सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार संभालती है. इसके लिए सरकार के अलग-अलग विभाग हैं. आगे चलकर ये सब माध्यम अनावश्यक और अप्रचलित हो जाएंगे. इन कार्यों के लिए आजकल प्रचलित प्रणालियां कालांतर में अर्थहीन लगने लगेंगी.

संभव है आने वाली दुनिया में भी कोई व्यक्ति ईश्वर को समझने की चाहत रखे.

ईश्वर की संकल्पना स्वतः और स्वाभाविक रूप से नहीं जन्मी है. यह विश्वास की प्रक्रिया है, जो बड़ों द्वारा छोटों में अंतरित और उपदेशित की जाती है. आने वाली दुनिया में ईश्वर की चर्चा तथा कर्मकांड करने वाले लोग नगण्य होंगे. यही नहीं ईश्वर के नाम पर जितने चमत्कारों का दावा किया जाता है, कालांतर में वे लुप्त हो जाएंगे. मनुष्य ईश्वर की चर्चा करेगा किंतु बिना किसी अलौकिताबोध के. आज आदमी यह सोचकर ईश्वर को याद करता है, क्योंकि उसे उसकी आवश्यकता बताई जाती है. यदि हम काम करते समय अचानक बीच में आ जाने वाली बाधाओं के रहस्य को समझ लें, यदि मनुष्य की सामान्य जरूरतें उसकी आवश्यकता के अनुसार समय रहते आसानी से पूरी हो जाएं, तब उसे ईश्वर और सृष्टि की परिकल्पना की आवश्यकता ही न पड़े. स्वर्ग की परिकल्पना अवैज्ञानिक और अप्रामाणिक है. यदि मानव-मात्र के लिए धरती पर ही स्वर्ग जैसा वातावरण उपलब्ध हो जाए, तब उसे स्वर्ग जैसी आधारहीन कल्पना की आवश्यकता ही नहीं पड़े. न ही स्वर्ग मिलने की चाहत उसे परेशान करे. यही मानवीय बोध की चरमसीमा है. ज्ञान-विज्ञान और विकास के क्षेत्र में ईश्वर के लिए कोई स्थान नहीं है.

यदि व्यक्ति में खुद को जानने की योग्यता हो तो उसे ईश्वर की जरूरत ही नहीं है. यदि मनुष्य इस दुनिया को ही अपने लिए स्वर्ग मान ले तो वह स्वर्ग के आकाश में; तथा नर्क के पाताल में स्थित होने की जैसी भ्रामक बातों पर विश्वास ही नहीं करेगा. जागरूक और विवेकवान व्यक्ति इत तरह के अतार्किक सोच को तत्क्षण नकार देगा. जहां व्यक्तिगत इच्छाओं का लोप हो जाता है, वहां ईश्वर भी मर जाता है. जहां विज्ञान जिंदा हो, वहां ईश्वर को दफना दिया जाता है.

सामान्य धारणा में अपरिवर्तनीयता या अनश्वरता के बारे ठोस परिकल्पनाएं संभव हैं. इसका आशय क्या है? इसमें भ्रम पैदा करने वाले कारक कौन से हैं? अनश्वरता को लोग ईश्वर के पर्याय और गुण के रूप में देखते आए हैं. वैज्ञानिकों की दृष्टि में इस तरह का अर्थ निकालना मूर्खता है. हम अपने निजी अनुभवों को दूसरों को बताने में प्रायः संकोची रहे हैं. इसलिए दूसरों के अनुभव और विचार हमारे मस्तिष्क पर प्रभावी हो जाते हैं. हम अपनी अज्ञानता का प्रदर्शन करते हैं, जो प्रायः हमारी नहीं होती. जबकि वे दुनिया के जन्म और उसकी ऐतिहासिक सहनशीलता को समझने का आदर्श माध्यम हो सकती है. इन हालात में जबकि दुनिया के अनेक रहस्य हमें अभी तक अज्ञात हैं, आभार ज्ञापन के बहाने ही सही, कोई भी बुद्धिवादी ईष्वर की पूजा नहीं करेगा.

कोई भी व्यक्ति ज्ञानार्जन द्वारा अपने जीवन में सुधार ला सकता है. यही दुनिया का नियम है. जब कोई तर्कबुद्धि से घटनाओं की सही व्याख्या नहीं कर पाता, तब वह चुपचाप अज्ञानता के वृक्ष के नीचे शरण लेकर ईश्वर को पुकारने लगता है. इस तरह के अबौद्धिक कार्यकलाप आने वाले समय में सर्वथा अनुपयुक्त माने जाएंगे.

 आने वाले समय में न तो स्वर्ग होगा, न नर्क. क्योंकि उसमें सनातन पाप या पुण्य के लिए के लिए कोई स्थान नहीं होगा. किसी को किसी की मदद की जरूरत नहीं पड़ेगी. सिवाय पागल के कोई दूसरों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहेगा. इसलिए स्वर्ग और नर्क की परिकल्पना भविष्य में मनुष्यता के लिए अर्थहीन मान ली जाएगी.

इस तरह की आदर्श दुनिया अचानक नहीं गढ़ी जा सकती. धीर-धीरे, कदम-दर कदम आगे बढ़ते हुए मेहनती लोगों द्वारा, क्रमिक परिवर्तन के बाद, लंबे अंतराल में इस तरह की दुनिया अवश्य बनाई जा सकती है. समाज की विभिन्न समस्याओं के समाधान तथा मानवमात्र के बेहतर जीवन के लिए, नई दुनिया की संरचना के लिए यह रास्ता आदर्श होगा.

उस समाज में कोई यह नहीं पूछेगा, ‘हम क्या करें? जब सबकुछ ईश्वर की मर्जी से संचालित है.’ मनुष्यता की जो भी कमियां सामने आएंगी, लोग उनपर शांत नहीं बैठेंगे. लक्ष्य तक पहुंचने के लिए वे उनका समाधान अवश्य करेंगे. नियति और दुर्भाग्य की कोई बात नहीं होगी. प्रत्येक कार्य संपूर्ण आत्मविश्वास के साथ किया जाएगा. समाज में जो भी बुराइयां सामने आएंगी, बेहतर समाज की रचना के लिए उनका निदान तत्क्षण और निपुणता के साथ किया जाएगा.

प्राचीन रीति-रिवाजों और पंरपराओं में अंध-आस्था ने लोगों के सोचने समझने, तर्क-बुद्धि से काम लेने की प्रवृत्ति का लोप कर दिया है. ये चीजें दुनिया की प्रगति में बाधक बनी हुई हैं. कुछ लोगों के स्वार्थ इनसे जुड़े हैं. निहित स्वार्थ के लिए वही लोग, जो इन पुरानी और बकवास चीजों से ही कमाई करते रहते हैं. ऐसे लोग ही नई दुनिया की संरचना का विरोध करते हैं. उस दुनिया का विरोध करते हैं जिसमें खुशियों की, सुख-शांति की भरमार होगी. लोगों के विकास की प्रचुर संभावनाएं भी रहेंगी. बावजूद इसके जो मनुष्य के अज्ञान तथा कुछ लोगों के स्वार्थ के विरुद्ध खुलकर खड़े होंगे, वही नई दुनिया की रचना करने में समर्थ होंगे. नई दुनिया के निर्माताओं को मजबूत करते के लिए हमें उनके साथ, उनकी कतार में शामिल हो जाना चाहिए. युवाओं और बुद्धिवादियों के लिए उचित अवसर है कि वे नए विश्व की रचना हेतु अपने प्रयासों को अपने विचार, ऊर्जा और सपनों को समर्पित कर दें.

ई वी रामास्वामी पेरियार(1944)

छोटा मंदिर—बड़ा मंदिर/पचीस लघुकथाएं

सामान्य

1/छोटा मंदिरबड़ा मंदिर

एकांत देख बड़े मंदिर का ईश्वर अपने स्थान से उठा.

बैठेबैठे शरीर अकड़ा, पेट अफरा हुआ था. डकार लेतेलेते नजर सामने खड़ी कृषकाय आकृति पर नजर पड़ी. बड़े मंदिर का ईश्वर कुछ पूछे उससे पहले ही वह बोल पड़ी—

हम दोनों एक हैं.’

होंगे, मुझे क्या!’ बड़े मंदिर के ईश्वर ने तपाक से कहा.

बस्ती में अकाल पड़ा है. लोगों के पा अपने पेट के लिए कुछ नहीं है तो मेरे लिए कहां से लाएंगे.’

इसमें मैं क्या कर सकता हूं.’

इस मंदिर में रोज अकूत चढ़ावाहै. मामूली हिस्सा भी मिल जाए तो हमारा काम चल जाएगा.’

चढ़ावे का हिसाब तो पुजारी रखता है.’

पुजारी तुम्हारा कहना नहीं टाल पाएगा.’

पर मैं उससे क्यों कहने लगा?’

इतनी रात गए कौन है?’ कहता हुआ पुजारी बाहर आया. छोटे मंदिर के ईश्वर को देख त्योरियां चढ़ गईं.

यह छोटे मंदिर का ईश्वर है. आपके पास मदद के लिए आया है.’ बड़े मंदिर के ईश्वर ने बताया.

चल हटशहर में सैकड़ों मंदिर हैं. हर मंदिर का ईश्वर फरियादी बनकर आ गया तो मेरा क्या होगा?’ कहते हुए पुजारी ने धक्का देकर छोटे मंदिर के ईश्वर को बाहर निकाल दिया. बड़े मंदिर का ईश्वर चुपचाप अपनी मूर्ति में समा गया.

2/वयं ब्रह्माव

तानाशाह हंटर फटकारता है. लोग सहमकर जमीन पर बिछ जाते हैं. कुछ पल बाद उनमें से एक सोचता है—‘तानाशाही की उम्र थोड़ी है. जनता शाश्वत है.’ उसके मन का डर फीका पड़ने लगता है.

अहं ब्रह्मास्मिः!’ कहते हुए वह उठ जाता है. उसकी देखादेखी कुछ और लोग खड़े हो जाते हैं. सहसा एक नाद आसमान में गूंजता है

वयं ब्रह्माव.’ एकदूसरे की देखादेखी बाकी लोग भी खड़े हो जाते हैं. जनता को खड़े देख तानाशाह के हाथ से हंटर छूट जाता है. वह जमीन पर पसर जाता है.

3/तानाशाह

तानाशाह ने हंटर फटकारा —‘मैं पूरे राज्य में अमनचैन कायम करने की घोषणा करता हूं. कुछ दिन के बाद तानाशाह ने सबसे बड़े अधिकारी को बुलाकर पूछा—‘घोषणा पर कितना अमल हुआ?’

आपका इकबाल बुलंद है सर! पूरे राज्य में दंगाफसाद, चोरी चकारी, लूटमार पर लगाम लगी है. आपकी इच्छा के बिना लोग सांस तक लेना पसंद नहीं करते.’ तानाशाह खुश हुआ. उसने अधिकारी को ईनाम दिया. कुछ दिनों के बाद एक गुप्तचर ने तानाशाह को खबर दी—‘लोगों के दिलोदिमाग में हलचल मची है सर!’

तानाशाह को एटमबम से इतना डर नहीं लगता था, जितना लोगों के सोचने से. परंतु डर सामने आ जाए तो तानाशाह कैसा—

आदमी हैं तो दिलोदिमाग दोनों होंगे.’ तानाशाह ने लापरवाही दिखाई. गुप्तचर के जाते ही तानाशाह ने अधिकारी को तलब किया—‘हमें खबर मिली है कि लोगों के दिलोदिमाग में हलचल मची है. लोग जरूरत से ज्यादा सोचें, यह हमें हरगिज पसंद नहीं है.’

आदेश दें तो सबको जेल में डाल दूं. चार दिन भीतर रहेंगे तो अकल ठिकाने आ जाएगी.’

नहीं, तुम उनसे बस इतना करो कि जैसे हम हमेशा अपने बारे में सोचते हैं, वे भी केवल हमारे बारे में सोचें.’ तानाशाह ने हंटर फटकारा. कुछ दिन के बाद गुप्तचर फिर हाजिर हुआ.

सर! लोग कुछ ज्यादा ही सोचने लगे हैं.’

हमारे बारे में ही सोचते हैं न.’ तानाशाह हंसा. मानो गुप्तचर का मखौल उड़ा रहा हो.

जी, बस आप ही के बारे में सोचते हैं.’

उनके भाग्यविधाता जो ठहरे.’ तानाशाह ने हंटर फटकारा. गुप्तचर की आगे कुछ कहने की हिम्मत न हुई. वह चलने को हुआ. सहसा पीछे से तानाशाह ने टोक दिया—

जरा बताओ तो वे हमारे बारे में क्या सोचते हैं?’

जीमैंने लोगों को कहते सुना है….’

रुक क्यों गए, जल्दी बताओ?’

सब यही कहते हैं कि तानाशाह बुरा आदमी है.’

तानाशाह का चेहरा सफेद पड़ गया. हंटर हाथ से छूट गया. सहसा वह चिल्लाया—‘हरामखोरों को जेल में डाल दो. मैंने कहा था, मुझे सोचनेसमझने वाले लोग नापसंद हैं. सबको जेल में डाल दो.’

आजकल वह पागलखाने में है.

4/समाधान

तानाशाह ने पुजारी को बुलाया—‘राज्य में सिर्फ हमारा दिमाग चलना चाहिए. हमें ज्यादा सोचने वाले लोग नापसंद हैं.’

एकदो हो तो ठीक, पूरी जनता के दिमाग में खलबली मची है सर!’ पुजारी बोला.

तब आप कुछ करते क्यों नहीं?’

मुझ अकेले से कुछ नहीं होगा.’

फिर….’ इसपर पुजारी ने तानाशाह के कान में कुछ कहा. तानाशाह ने पूंजीपति को बुलवाया. पूंजीपति का बाजार पर दबदबा था. अगले ही दिन से बाजार से चीजें गायब होने लगीं. बाजार में जरूरत की चीजों की किल्लत बढ़ी तो लोग परेशान होने लगे. रोजमर्रा की चीजों के लिए एकदूसरे से झगड़ने लगे. एकदूसरे पर अविश्वास बढ़ गया. समाज में आपाधापी, मारकाट और लूटखसोट बढ़ गई. मौका देख पुजारी सामने आया. लोगों को संबोधित कर बोला—

हमारी धरती सोना उगल रही है. कारखाने रातदिन चल रहे हैं. फिर भी लोग परेशान हैं, जरा सोचिए, क्यों?’

आप ही बताइए पुजारी जी….’

ईश्वर नाराज है. उसे मनाइए, सब ठीक हो जाएगा.’

जैसा सोचा था, वही हुआ. मंदिरों के आगे कतार बढ़ गई. कीर्तन मंडलियां संकट निवारण में जुट गईं.

तानाशाह खुश है. पुजारी और पूंजीपति दोनों मस्त हैं.

5/अच्छे दिन

चारों ओर बेचैनी थी. गर्म हवाएं उठ रही थीं. ऐसे में तानाशाह मंच पर चढ़ा. हवा में हाथ लहराता हुआ बोला—

भाइयो और बहनो! मैं कहता हूं….दिन है.’

भक्तगण चिल्लाए—‘दिन है.’

मैं कहता हूं….रात है.’

भक्तगण पूरे जोश के साथ चिल्लाए—‘रात है.’

हवा की बेचैनी बढ़ रही थी. बावजूद उसके तानाशाह का जोश कम न हुआ. हवा में हाथ को और ऊपर उठाकर उसने कहा—‘चांदनी खिली है. आसमान में तारे झिलमिला रहे हैं.’

पूनम की रात है….आसमान में तारे झिलमिला रहे हैं.’ भक्तों ने साथ दिया.

अच्छे दिन आ गए….’ भक्तगण तानाशाह के साथ थे. दुगुने जोश से चिल्लाए—

अच्छे दिन आ…’ यही वह बात थी, जिसपर हवा आपा खो बैठी. अनजान दिशा से तेज झंझावात उमड़ा और तानाशाह के तंबू को ले उड़ा.

6/संविधान

आखिर जनता ने ठान लिया कि वह अपनी आस्था का ग्रंथ स्वयं चुनेगी. सारे धर्मग्रंथ उस दिन की प्रतीक्षा करने लगे. हर किसी को अपने देवता, अपने मसीहा की श्रेष्ठता पर भरोसा था. उनमें से प्रत्येक को अपने देवता की सर्वोच्चता पर गुमान था—

मेरा देवता सबसे पवित्र है. वह सबको बराबर मानता है. सबके साथ एक जैसा व्यवहार करता है.’ एक धर्मग्रंथ बोला.

मेरा मसीहा करुणानिधान है. वह हमारे पिता जैसा है. हमेशा हमारे भले की सोचता है.’ दूसरे ने दावा किया.

मेरा देवता सर्वाधिक शक्तिशाली है. उसके पास दिव्य अस्त्रशस्त्रों की भरमार है. पलक झपकते नई दुनिया को बना सकता है और मिटा भी सकता है.

एकएक कर सभी धर्म ग्रंथ आए. इतने कि आदमी गिनती करना भूल गया. आखिर में उसकी निगाह एक पुस्तक पर पड़ी.

क्या तुम अपने देवता के बारे में नहीं बताओगे?’

मेरा कोई देवता नहीं है.’

यदि देवता नहीं है तो तुम धर्मग्रंथ कैसे हुए?’

लाखों लोग मुझमें विश्वास रखते हैं. उन्हीं में से कुछ मुझे अपना मार्गदर्शक भी मानते हैं.’

यदि देवता नहीं तो ताकत कहाँ से पाते हो.’

जनता से?’

आखिर तुम हो कौन?’

संविधान.’

संविधान के पीछे नैतिकता का बल, न्याय की चाहत और जनता का विश्वास था. इसलिए बाकी सब धर्म ग्रंथ कन्नी काटते हुए वहां से खिसक गए.

7/एंटीक

मंदिर में अपनी मूर्ति के बराबर एक और मूर्ति देख ईश्वर चौंका. पुजारी के आते ही पूछा—

यह किसलिए?’

छोड़िए, क्या करेंगे जानकर?’ पुजारी ने टालने की कोशिश की.

इस मंदिर का देवता मैं हूं. यहां क्या हो रहा है, उसके बारे में मुझे ही मालूम न हो, यह ठीक नहीं है.’

महाराज कंपटीशन का जमाना है….ग्राहक उस शोरूम में ज्यादा जाते हैं, जिसमें ज्यादा वैराइटीज हों.’

तुम मुझे ‘वेराइटी’ मानते हो?’ ईश्वर ने नाराजगी जताई.

मैंने तो बस हकीकत बयां की है. बराबर की बस्ती में बहुत बड़ा मंदिर बना है. एक ही छत के नीचे सैकड़ों देवताओं के दर्शन हो जाते हैं. हर किस्म का श्रद्धालु वहां जाता है. जबकि यहां आने वाले गिनती के हैं. हम दोनों की तरक्की के लिए यहां दोचार ईश्वर और आ जाएं तो क्या बुराई है?’

पुजारी ने लाख समझाया, लेकिन उस मंदिर का ईश्वर अपनी बगल में दूसरे देवता की मूर्ति रखने को तैयार न हुआ. पुजारी भुनभुनाता हुआ घर लौट गया. ईश्वर हमेशा की तरह आत्ममुग्धता में खो गया. लेकिन पुजारी तो पुजारी था. जो पत्थर को देवता बना सकता है, वह खुद को देवता समझने लगे पत्थर को उसकी औकात की याद भी दिला सकता है. अगले दिन पुजारी ने मंदिर में कीर्तन का ऐलान कर दिया. कीर्तन समाप्त हुआ तो उसके लिए आई मूर्तियां मंदिर की शोभा बढ़ाने लगीं. पुरानी मूर्ति नई मूर्तियों के पीछे दबसी गई.

अगले दिन श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना थी. नए श्रद्धालु तरहतरह का चढ़ावा लेकर आए थे. रात हुई. चढ़ावे को समेट पुजारी गुनगुनाते हुए, मग्नमन बाहर निकला. तभी पुराने ईश्वर ने उसे टोक दिया—‘बहुत निष्ठुर हो. मैंने बीसियों वर्ष तुम्हारा साथ दिया था. अपने ही मंदिर में किनारा करते हुए तुम्हें जरा भी नहीं सोचा!’

सुनकर पुजारी हंसा—‘भगवन! धर्म का धंधा सोचने से नहीं, सोच पर पर्दा डालने से चलता है. नई मूर्तियां चीन से आयातित हैं. निखालिस मूर्तियां. कुछ तो इतनी क्यूटकि भक्तजन उनके साथ सेल्फी लेते दिखे.’ कहकर वह आगे बढ़ा. फिर चलतेचलते पलटकर बोला—‘पर तुम चिंता मत करो. इस धंधे में ‘एंटीक’ की बड़ी महिमा है. जल्दी ही यहां भव्य मंदिर बनेगा. वहां आसन पर तुम मजे से लोट लगाना.’

ईश्वर निरुत्तर. पुजारी गुनगुनाते हुए आगे बढ़ गया.

8/तानाशाहदो

बड़े तानाशाह के संरक्षण में छोटा तानाशाह पनपा. मौका देख उसने भी हंटर फटकारा—‘सूबे में वही होगा, जो मैं चाहूंगा. जो आदेश का उल्लंघन करेगा, उसे राष्ट्रद्रोह की सजा मिलेगी.’ हंटर की आवाज जहां तक गई, लोग सहम गए. छोटा तानाशाह खुश हुआ. उसने फौरन आदेश निकाला—‘गधा इस देश का राष्ट्रीय पशु है, उसे जो गधा कहेगा. उसे कठोर दंड दिया जाएगा.’

आदेश के बाद से सूबे में जितने भी गधे थे सब ‘गदर्भराज’ कहलाने लगे. उन्हें बांधकर रखने पर पाबंदी लगा दी गई. कुछ गधे तो फूल कर कुप्पा हो गए. वे मौकेबेमौके जहांतहां दुलत्ती मारने लगे. पूरे सूबे में अफरातफरी मच गई. कुछ दिनों के बाद छोटे तानाशाह ने एक भाषण में कहा—‘पिछली सरकारें, इतने वर्षों में कुछ नहीं कर पाई थीं. हमनें आने के साथ ही ‘गधा’ को ‘गदर्भराज’ बना दिया. इसे कहते हैं—‘सबका साथ—सबका विकास.’

भक्तगण जयजयकार करने लगे. ठीक उसी समय गधों का एक रेला आया. लोग उनके सम्मान में खड़े हो गए. अकस्मात एक गधा मंच के पीछे से आया और छोटे तानाशाह को एक दुलत्ती जड़ दी. छोटा तानाशाह जमीन बुहारने लगा.

इसे समझा देना. हर गधा, ‘गधा’ नहीं होता. कहकर वह वहां से नौदो ग्यारह हो गया.

9/ ईश्वर का पलायन

ईश्वर को जिज्ञासा हुई. 140 करोड़ की आबादी वाला भारत देश जिस संविधान के भरोसे चलता है, उसमें अपने अस्तित्व को खोजा जाए. उसे ज्यादा पढ़नेलिखने का अभ्यास तो था नहीं. फिर भी आखरआखर पूरा संविधान बांच डाला. ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को देखते ही उसका माथा ठनका. पुरोहित आया तो ईश्वर ने उसे आड़े हाथों लिया—‘तुम तो कहते थे कि देश में सारा कामकाज धर्मभरोसे चलता है. यहां तो पूरी सरकार धर्मनिरपेक्ष रहने का दावा करती है.’

महाराज! वह गफलत में लिखी गई ‘किताब’ है, भक्तगण उसे बदलने की कोशिश कर रहे हैं.’

तो बदलते क्यों नहीं….’

इतना आसान नहीं है. लोग नाराज हो जाएंगे.’ ईश्वर ने झूठ पकड़ लिया—

यानी लोग चाहते हैं कि सरकार धर्म की ओर से तटस्थ रहे.’

पुरोहित चुप. ईश्वर को लगा कि वह गफलत में था. उसका मन ग्लानि से भर गया. उसी रात सारा तामझाम समेट वह मंदिरों से कूंच कर गया. उस दिन के बाद से भक्त लोगों को धर्मनिरपेक्ष शब्द से चिढ़ होने लगी है. ‘सेकुलर’ शब्द उन्हें गालीजैसा लगता है.

कुछ भी हो, जनता इससे खुश है….

10/सबसे बड़ा देवता

स्कूल में निरीक्षण पर निकले प्रधानाचार्य का बच्चों का टेस्ट लेने का मन हुआ तो बराबर की कक्षा में घुस गए. बच्चे सम्मान में खड़े हो गए. प्रधानाचार्य कभी विज्ञान पढ़ाया करते थे. पर थे पूरी तरह धार्मिक. कक्षा में बच्चों को पढ़ाते कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, घर जाकर शेषनाग को जल चढ़ाते—

बच्चो! हिंदू धर्म के तीन सबसे बड़े देवताओं के नाम कौन बताएगा?’

ब्रह्माविष्णुमहेश….सारे बच्चे एक साथ बुदबुदाने लगे. सिवाय एक बालक के जो कक्षा में सबसे पीछे, शांत बैठा था. मानो चोर पकड़ा गया हो. प्रधानाचार्य उसी की ओर इशारा करके बोले—‘ऐ तुम, हां तुम….हिंदुओं के तीन प्रमुख देवताओं के नाम बताओ?’

ब्राह्मण….!’ लड़के ने झट कहा. बच्चे उसके ‘अज्ञान’ पर हंसने लगे. कक्षाध्यापक की उंगलियां बैंत पर कस गईं. अपने धैर्य की छाप छोड़ने के लिए प्रधानाचार्य ने आराम से पूछा—‘कैसे?’

घर में मां सत्यनारायण की कथा कराती है. कथा शुरू करने से पहले पडिंज्जी देवताओं को बुलाते हैं. कथा समाप्त होते ही देवताओं को अपनेअपने घर भेज देते हैं. देवता उनके इशारे पर ऐसे नाचते हैं, जैसे मदारी के इशारे पर बंदर. फिर सबसे शक्तिशाली कौन हुआ. देवता या ब्राह्मण!.’

बच्चे तो बच्चे थे. फिर हंसने लगे. पर प्रधानाचार्य को कोई बोल न सूझा.

11 /राजा बदरंगा है

तानाशाह को नएनए वस्त्रों का शौक था. दिन में चारचार पोशाकें बदलता. एक दिन की बात. कोई भी पोशाक उसे भा नहीं रही थी. तुरंत दर्जी को तलब किया गया.

हमारे लिए ऐसी पोशाक बनाई जाए, जैसी दुनिया के किसी बादशाह ने, कभी न पहनी हो.’ तानाशाह ने दर्जी से कहा. दर्जी बराबर में रखे हंटर को देख पसीनापसीना था. हिम्मत बटोर जैसेतैसे बोला—

हुजूर, आप तो देशविदेश खूब घूमते हैं. कोई ऐसा देश नहीं, जहां आपके चरण न पड़े हों. वहां जो भी अच्छा लगा हो, बता दीजिए. ठीक वैसी ही पोशाक मैं आपके लिए सिल दूंगा.’

तानाशाह को जहां, जिस देश में, जो पोशाक पसंद आई थी, सब दर्जी को बता दीं. उन सबको मिलाकर दर्जी ने जो पोशाक तैयार की, तानाशाह ने उसे पहनकर एक ‘सेल्फी’ ली और सोशल मीडिया पर डाल दी.

पहली प्रतिक्रिया शायद किसी बच्चे की थी. लिखा था—‘राजा बदरंगा है.’

12/अछूत

ईश्वर पुजारी को रोज चढ़ावा समेटकर घर ले जाते हुए देखता. उसे आश्चर्य होता. दिनभर श्रद्धालुओं को त्याग और मोहममता से दूर रहने का उपदेश देने वाला पुजारी इतने सारे चढ़ावे का क्या करता होगा? एक दिन उसने टोक ही दिया—‘तुम रोज इतना चढ़ावा घर ले जाते हो. अच्छा है, उसे मंदिर के आगे खड़े गरीबों में बांट दिया करो. कितनी उम्मीद लगाए रहते हैं.’

रहने दो प्रभु. तुम क्या जानो इस दुनिया में कितने झंझट हैं. एक दिन मंदिर से बाहर जाकर देखो तब पता चले.’

ईश्वर को बात लग गई. उसने पुजारी से एक दिन मंदिर बंद रखने का आग्रह किया, ‘कल तुम्हें खुद कुछ नहीं करना पड़ेगा. मैं खुद इंतजाम करूंगा.’ पुरोहित सोच में पड़ गया. परंतु यह सोचकर कि लोग ईश्वर को मंदिर से निकलते देखेंगे तो अगले दिन दो गुना चढ़ावा आएगा, वह एक दिन कपाट बंद रखने को राजी हो गया. अगले दिन ईश्वर ने कमंडल उठाया. मंदिर की देहरी पर पहुंचा था कि भीतर से आवाज आई. आवाज में आदेश था. ईश्वर के पांव जहां के तहां जम गए—‘सुनो! सबसे पहले उत्तर दिशा में जाना. उस ओर सेठों की बस्ती है. जो भी नकदी मिले संभाल कर रखना. फिर पश्चिम दिशा में जाना. उस ओर क्षत्रियों की बस्ती है. वे दान देने में कंजूस होते हैं. उनसे धनधान्य जो भी मिले, मना मत करना. जब तक पूर्व दिशा में पहुंचोगे, गृहणियां भोजन की तैयारी कर चुकी होंगी. वहां से जो भी भोजन मिले, संभाल कर रख लेना.’ ईश्वर चलने को हुआ. पीछे से पुजारी ने फिर टोक दिया—‘सुनो! दक्षिण दिशा की ओर जाओ तो किसी को छूना मत. नकदी मिले तो दूर से लेना. भोजन मिले तो हाथ मत लगाना.’

क्यों!’

वे लोग अछूत हैं . किसी ने छू भी लिया तो अपवित्र हो जाओगे.’ ईश्वर को गुस्सा आया. उसने कमंडल फ़ेंक दिया. उसके बाद मंदिर से बाहर निकला तो कभी नहीं लौटा.

13/गैरजिम्मेदार

रात हुई तो बड़े मंदिर का ईश्वर टहलने के इरादे से बाहर निकला. उससे कुछ दूरी पर छोटा मंदिर भी था. बड़े मंदिर के ईश्वर को निकलते देख छोटे मंदिर के ईश्वर की भी टहलने की इच्छा हुई. उस समय तक रात हो चुकी थी. सड़कें सुनसान थीं. दोनों ईश्वर टहलतेटहलते दूर तक निकल गए. बड़े मंदिर का ईश्वर आगे था, छोटे मंदिर का ईश्वर पीछे. सहसा अंधेरे को चीरती चीख उभरी. बड़े मंदिर के ईश्वर के पांव ठिठके.

यह तो छोटे मंदिर के इलाके की स्त्री है.’ सोचते हुए बड़े मंदिर का ईश्वर तत्क्षण आगे बढ़ गया. पीछेपीछे चल रहे छोटे मंदिर के ईश्वर के पांव भी ठिठके.

सबसे ज्यादा चढ़ावा पाने के बावजूद जब वही कुछ नहीं कर रहा तो मैं चक्कर में क्यों पडूं!’ सोचते हुए छोटे मंदिर का ईश्वर भी आगे बढ़ गया. वहीं सड़क किनारे एक कुत्ता आराम कर रहा था. चीखें सुनकर उससे रहा नहीं गया. वह अपने परिवार के साथ उठा और लुटेरों पर टूट पड़ा. एकाएक आक्रमण से लुटेरों के औसान बिगड़ गए और वे वहां से भाग छूटे. उसके बाद कुत्ते की दृश्टि बड़े मंदिर और छोटे मंदिर के ईष्वरों पर पड़ी. वह उनपर भौंकने लगा. बड़े मंदिर के ईश्वर को इसपर हैरानी हुई—‘पहचाना नहीं, हम यहां से रोज गुजरते हैं.’

जानता हूं, पर असलियत आज ही समझ में आई है.’ कुत्ता पूरी ताकत लगाकर भौंकने लगा. दोनों ईष्वरों को धोती समेटकर भागना पड़ा.

14/भक्तगण

गाय और भैंस के बीच गहरी दोस्ती थी. दोनों साथसाथ चरतीं. साथसाथ उठतीबैठतीं. साथसाथ जुगाली करती थीं. अचानक भैंस ने गाय से दूरी बनाना शुरू कर दिया. गाय ने एकदो दिन देखा. कारण समझ न आया तो टोक दिया—‘बहन मुझसे कुछ भूल हुई है?’

ऐसा कुछ भी नहीं है.’ भैंस बोली. लेकिन उसके व्यवहार में परिवर्तन न आया. एक दिन की बात. चुगने के बाद दोनों नदी पर पहुंची. गाय पानी पीने लगी. भैंस भी उससे कुछ दूर हटकर पानी पीने लगी. जहां गाय थी, वहां की जमीन चिकनी थी. पानी गहरा. अचानक उसके पांव फिसले और वह नदी में गिरती चली गई. वहां गड्ढ़ा था. गाय बाहर आने को छटपटाने लगी. मगर जमीन चिकनी होने के कारण नाकाम रही. काफी परिश्रम के बावजूद सफलता न मिली तो वहीं, पसर गई.

भैंस ने गाय की हालत देखी तो रहा न गया. उसने इधरउधर गर्दन घुमाई. जब देखा कि आसपास कोई नहीं है, वह गाय के पास गई और उसके गले में पड़ी रस्सी को सींग में फंसा बाहर खींचने लगी. कठिन परिश्रम के बाद वह गाय को बाहर निकालने में सफल हो गई. भैंस बुरी तरह थक चुकी थी, इसलिए वहीं जमीन पर पसर गई—

तभी न जाने किधर से ‘भक्तों’ का रेला उमड़ा. सब हाथ में डंडे, बर्छी, भाले उठाए थे. उनमें से एक चिल्लाया—‘वो देखो! भैंस ने गाय को मार डाला.’ विवेकहीन भीड़ ‘मारोमारो’ के नारे लगाने लगी. इससे पहले कि गाय कुछ करे, अनगिनत लाठियां भैंस की पीठ पर एक साथ पड़ीं. उसने वहीं दम तोड़ लिया.

भक्तगण जिधर से आए थे—‘गौमाता की जय’ कहते हुए, वापस लौट गए.

15/ठूंठ

शिक्षा पूरी करने के बाद स्नातक भविष्य की योजना बनाता हुआ वापस लौट रहा था. रास्ते में एक साधु से टकरा गया.

क्या सोच रहे हो?’ साधु ने प्रश्न किया. अपने चारों ओर निहारते हुए स्नातक बोला—

यह दुनिया कितनी विविधवर्णी है. जिस रास्ते से मैं आया हूं उसपर नदीझरने, समंदरपहाड़, फूल, पत्तियां, लताएं, भांतिभांति के अनगिनत और विचित्र जीव दिखाई पड़े.’

सब देखा, पर जो देखना था, वह अनदेखा ही रहा.’

क्या?’ स्नातक ने पूछा.

तुमने जो देखा, वह तो नजर का धोखा है, माया है. काश! तुम उस महान रचनाकार को भी देख पाते?’

जिसका साक्षात अनुभव हुआ हो, उसे माया कैसे मान लूं? रचनाकार तो अपनी कृति से पहचाना जाता है, इसलिए मैंने जो देखा, मेरे लिए वही ईश्वर है.’

तुम्हारा ज्ञान अधूरा है. मेरे साथ कणकण में छिपे उस महान रचनाकार को पहचानने का प्रयत्न करो.’ साधु ने पेड़ की ओर इषारा किया—‘साधारण दृष्टि से फूल, पत्तियां, बीज, शाखाएं, तना, यानी जो दिख रहा है, वह वृक्ष है. उसके पीछे जो अदृश्य है, वही ईश्वर सृष्टि का वास्तविक कर्ताधर्ता है.’

जो अदृश्य केवल अनुमान पर आधारित है. आप उसपर विश्वास करें. मैं भी कर सकता हूं. लेकिन उसके लिए मैं जो दिखता है, उसे नहीं नकार सकता.’ साधु स्नातक के अज्ञान को दोष देने लगा. इसपर वह साधु को उस तने के पास ले गया, जो पत्ते झड़ जाने के बाद ठूंठ में बदल चुका था—‘कभी यह भी हराभरा रहा होगा. लेकिन इसके तने को गुमान था कि वही सबकुछ है. नाराज होकर एक दिन पत्तियों ने साथ छोड़ दिया. वे झड़ गईं. उसके बाद जो बचा वही यह ठूंठ है. प्रकृति में जो दिखता है, यदि उससे बाहर सच की खोज करोगे तो सिवाय ठूंठ के कुछ हाथ नहीं लगने वाला.’

साधु निरुत्तर हो गया.

16/ विद्रोही

तानाशाह का आदेश था, जिसकी मुस्कान एक इंच से अधिक होगी, उसे दंडित किया जाएगा. आदेश पाते ही तानाशाह के सैनिक पूरे राज्य में फैल गए. जो भी हंसता दिखाई पड़ता, उसे जेल के हवाले कर दिया जाता. कुछ ही दिनों में सारी जेलें भर गईं, लेकिन अपराधियों की संख्या बढ़ती ही जा रही थी. एक दिन तानाशाह ने उन सबको दंड सुनाने का फैसला लियाण् सभी कैदियों को खुले स्थान पर लाया गयाण् मैदान खचाखच भर गयाण् दंड सुनाने के लिए तानाशाह मंच पर चढ़ा. लोग गर्दन झुकाए चुपचाप खड़े थे—

प्रत्येक को पचास कोड़े लगाए जाएं.’ तानाशाह ने आदेश दिया. सैनिक कोड़े लेकर जनसमूह की ओर बढ़े. अचानक एक बालक जोर.जोर से हंसने लगा.

कौन बदतमीज है. तानाशाह गुस्से से चिल्लाया. सैनिकों ने बालक को पकड़कर तानाशाह के सामने खड़ा कर दिया—

तुम हंसे क्यों?’

इन लोगों को देखकर, जो इतनी संख्या में और निर्दोष होने के बावजूद गर्दन झुकाए खड़े हैं.’

तुम्हें कोड़ों से डर नहीं लगता?’ तानाशाह ने पूछा.

मैं किसी से नहीं डरता .’

इसके इरादे खतरनाक हैं. इसे मैं अपने हाथों से दंड दूंगा.’ तानाशाह क्रोध से चिल्लाया. उसने बराबर में खड़े सैनिक से हंटर छीन लिया. जैसे लोगों के स्वाभिमान ने अंगड़ाई ली हो. सोयी आत्माएं एक साथ जागी हों. झुकी गर्दनें एकाएक तन गईं. तानाशाह का हंटर बालक की पीठ पर पड़े उससे पहले ही लोगों ने हल्ला बोल दिया.

कुछ देर बाद वहां न तानाशाह था, न उसके सैनिक.

17/ज्ञान

यह सोचते हुए कि दुनिया बदलने का समय आ चुका है, ईश्वर ने अपना पूरा शृंगार किया. गदाशंखचक्र, धनुषवाणकृपा….सारे हथियार संभाले और मृत्युलोक की ओर प्रयाण कर गया. पहली मुलाकात स्कूल जाते बच्चों से हुई—

बहरूपिया.’ ईश्वर की विचित्र भेषभूषा को देख एक बालक ने टिप्पणी की. उसके साथी हंसने लगे.

मूर्खो! मैं ईश्वर हूं.’ ईश्वर चिल्लाया. उसके हाथ धनुषवाण तक पहुंच गए.

तो यहां क्या क्या रहे हैं, जाकर मंदिर संभालिए.’ बालक के स्वर में कटाक्ष था.

मैं दुनिया बदलने निकला हूं.’

गुरुजी तो कहते हैं कि अच्छी दुनिया बनाने के लिए अच्छे विचार जरूरी हैं. देखो, इस पुस्तक में भी यही लिखा है.’ कहकर बालक ने पुस्तक आगे बढ़ा दी. ईश्वर ने दोचार पन्ने पलटे. कुछ समझ में नहीं आया तो पुस्तक को एक ओर फेंक दिया.

समझ गया, तुम सचमुच ईश्वर हो.’ बच्चे हंसने लगे, ‘ज्ञान का तिरष्कार करना तुम्हारी पुरानी आदत है.’

क्या बकते हो?’ ईश्वर का चेहरा तमतमा गया.

गुरुजी कहते हैं, तुमने निर्दोष शंबूक को मारा था….उस दिन शंबूक को मारने के बजाय यदि उससे ज्ञान लिया होता तो पुस्तक की ऐसी उपेक्षा न करते.’

ईश्वर पानीपानी हो गया.

18/बड़ा कौन?

बस्ती के लोग मुखिया के चयन को जमा हुए. उसी समय एक दार्शनिक उधर से गुजरे. उन्हें देख सभी के चेहरे खिल उठे—

आप गुणी इंसान हैं. आ ही गए हैं तो मुखिया चुनने में हमारी मदद कीजिए.’ लोगों ने प्रार्थना की.

मुखिया चुनने का अधिकार तो सिर्फ आपका है?’ दार्शनिक बोले. लोगों के जोर देने पर दार्शनिक ने उनसे एक प्रश्न किया—‘तानाशाह और ईश्वर, दोनों में बड़ा कौन है?’

सुनते ही लोगों की बुद्धि चकरा गई. भला यह भी कोई सवाल हुआ. सवाल हो भी तो इसका मुखिया के चुनाव से क्या संबंध? सुना है, दार्शनिक आधे पागल होते हैं. परंतु यह तो पूरा का पूरा पागल है.’

जो लोग तानाशाह को बड़ा मानते हैं, वे अपने हाथ उठा लें.’ कुछ देर बाद दार्शनिक ने पूछा. एक भी हाथ ऊपर नहीं उठा.

अब वे लोग हाथ ऊपर करें, जो ईश्वर को बड़ा मानते हैं?’ इसपर सारे लोगों ने हाथ खड़े कर दिए. किंतु एक आदमी शांत बैठा रहा.

तुम क्या फैसला है? ईश्वर या तानाशाह?’

दोनों एक जैसे हैं. जीहुजूरी तानाशाह को पसंद है, ईश्वर को भी. अपनी आलोचना न ईश्वर सुन पाता है, न ही तानाशाह. नाराज होने पर तानाशाह बंदूक तान देता है, और ईश्वर….उसके पास तो अनगिनत हथियार हैं. दोनों को मनमानी पसंद है. दूसरों पर अपना फैसला लादने में दोनों को खुशी मिलती है.’

इस आदमी में मुखिया बनने का आवश्यक गुण मौजूद है.’ दार्शनिक ने कहा और आगे बढ़ गया.

19/असलियत


रोज की तरह पुजारी मूर्ति साफ करने लगा. अचानक हाथ चूका. झाड़न ईश्वर की आंख में जा लगी. वह दर्द से तिलमिलाने लगा. सुबह से शाम तक एक जगह, एक ही मुद्रा में बैठे रहने से उसका धैर्य पहले ही जवाब दे चुका था. पुजारी की हरकत ने आग में घी डालने का काम किया—
देखकर हाथ नहीं चला सकते?’
क्षमा करें भगवन. भक्तों के आने का समय हो चुका है, जल्दीजल्दी में….’
केवल आज की बात नहीं है, तुम दिनोंदिन लापरवाह होते जा रहे हो. मत भूलो कि….’ ईश्वर क्रोध में था.
बसबस….अब तुम कहोगे—सतयुग में बस मैं ही मैं था. त्रेता में मैंने रावण को मारा था, द्वापर में पूरा महाभारत मुझ अकेले ने लड़ा था. इस अवतार में मैंने ये किया था, उस अवतार में मैंने वो किया था….’
इसमें झूठ क्या है?’ ईश्वर बोला.
छोड़िए भगवन! मंदिर में बैठेबैठे चार कहानियां क्या सुन लीं, खुद को पंडित समझने लगे….उनमें असलियत कितनी है, यह केवल मैं जानता हूं….मुंह मत खुलवाओ.’
हकीकत से ईश्वर भी वाकिफ था. इसलिए चुप्पी साध गया.

20/ सिफारिश

अनुचर ने भूतआत्माओं को देवता का संदेश सुनाया—‘जल्दी ही तुम्हें इधरउधर भटकने से मुक्ति मिलने वाली है.’ भूतआत्माएं आश्चर्य से अनुचर की ओर देखने लगीं.

देवता तुमपर प्रसन्न हैं. इस बार तुम्हें लड़की के रूप में मृत्यलोक भेजा जाएगा.’

अनुचर के प्रस्थान करने के बाद एक भूतआत्मा दूसरी से बोली—

सुना है, भारत खंड में हरियाणा नामक प्रदेश है. वहां ‘बेटी बचाओ—बेटी पढ़ाओ’ आंदोलन चल रहा है. उस प्रदेश में जन्म हुआ तो जीवन धन्य हो जाएगा.’

देवता हमारी बात मानेंगे?’

देवता खुशामदपसंद हैं. प्रार्थना करने पर मान ही जाएंगे.’ कहकर भूतआत्मा मुस्कराने लगी.

बुलावा आया तो दोनों भूतआत्माएं देवता से मिलने पहुंचीं. वहां अलगअलग प्रांत के कक्ष बने थे. सबसे अधिक भीड़ हरियाणा वाले कक्ष थी. अधिकांश लड़की के रूप में जन्म लेने वाली आत्माएं.

इतनी भीड़ में हमारा नंबर आएगा.’ भूतआत्माएं परेशान हो गईं. तभी वह अनुचर नजर आया. दोनों भूतआत्माएं लपककर उसके पास पहुंची—‘क्या तुम देवता से सिफारिश कर सकते हो कि वह हमें हरियाणा में भेजने की कृपा करें.’

उसकी आवश्यकता नहीं पड़ेगी….तुम्हारा वहां जाना तय है.’ अनुचर ने हंसकर बताया.

क्यों?’

अब वहां कोई नहीं जाना चाहता.’ दोनों भूतआत्माओं की समझ में कुछ नहीं आया. तभी कुछ आत्माएं हाथ में दफ्ती लिए नजर आईं. उनपर नारे लिखे थे. भूतआत्माएं उन्हें पढ़ें उससे पहले ही एक स्क्रीन पर किसी नेता का भाषण दिखाया जाने लगा. पता चला कि हरियाणा का ही कोई नेता है. वह कह रहा था—‘हम आज भी कहते हैं—बेटी बचाओबेटी पढ़ाओ. लेकिन सड़क चलती लड़की की इज्जत की गारंटी नहीं है. जिन लड़कियों को इज्जत प्यारी है, वे घर रहकर चौकाचूल्हा देखें.’

हम भूतआत्मा के रूप में ही भलीं.’ कहते हुए वे दोनों उन आत्माओं में शामिल हो गईं जो हरियाणा न जाने की जिद ठाने थीं.

21/ अवसर

तानाशाह ने सुना कि ईश्वर के पास असीम ताकत होती है. उससे वह कुछ भी कर सकता है. दिव्य अस्त्रशस्त्र होते हैं. उनसे वह दुश्मन को तबाह कर सकता है. उसी दिन से उसने सर्वशक्तिमान बनने की ठान ली. जिन कारखानों में मशीनें बनती थीं, उनमें टेंक बनने लगे. जिनसे वस्त्रों की आपूर्ति होती थी, वहां सैनिकों के लिए बुलेट प्रूफ जॉकटें बनने लगीं. जिस धनराशि से अस्पतालों की औषधियां खरीदी जाती थीं, उनसे गोलाबारूद खरीदे जाने लगे. उस साल अकाल पड़ा. फसल तबाह होने से किसान आत्महत्या करने लगे. बात तानाशाह तक पहुंची—

मजबूत देश बनाने के लिए कुर्बानियां जरूरी हैं.’ तानाशाह ने कहा.

देश की असली ताकत तो जनता में होती है. लोग ही तबाह हो जाएंगे तो देश मजबूत कैसे बनेगा?’ जिस लेखक ने यह लिखा. उसे राज्यद्रोही बनाकर कारावास में ढकेल दिया गया. कुछ दिनों बाद भूख महामारी में बदल गई.

मरने वालों में किस धर्म के ज्यादा हैं?’ नया मृत्यु संदेश लेकर आए मंत्री से तानाशाह ने पूछा—

बराबर हैं?’ तानाशाह चिंता में पड़ गया. थोड़ी देर बाद उसका चेहरा फिर सपाट था—

हमारी संख्या उनसे कहीं अधिक है. दोनों बराबर भी मरे तो ज्यादा नुकसान न होगा, पर देश को विधर्मियों से मुक्ति मिल जाएगी.’

22/नाटक

चमत्कार हुआ. तानाशाह ने घोषणा की—‘आज से तानाशाही खत्म. आगे जनता की मर्जी का राज चलेगा.’ सुनकर ‘भक्तों’ ने जयकारा लगाया. आलोचक मौन हो गए. अधिकारी जोरशोर से चुनाव की तैयारियों में जुट गए. चुनाव के दिन चप्पेचप्पे पर पुलिस तैनात थी. मतदाताओं की सुविधा के लिए हर तरह का इंतजाम था. उत्साहित जनता मुंहअंधेरे मतदानकेंद्रों पर जा डटी.

चुनाव शुरू हुआ. पहला मतदाता भीतर गया; और शोर मचाते हुए तत्क्षण बाहर निकल आया—‘हर बटन पर तानाशाह की तस्वीर छपी है. यह कोई चुनाववुनाव नहीं है.’ लोग कुछ समझ पाएं उससे पहले ही सुरक्षाकर्मियों ने उसे दबोच लिया. वे उसे घसीटते हुए भीतर ले गए. कुछ देर बाद वोट पड़ने की आवाज आई.

चलिए अब आप भी मतदान कीजिए.’ पहले मतदाता को बाहर का रास्ता दिखाते हुए सुरक्षाकर्मियों ने कहा.

उस आदमी ने बताया, मशीन सारे वोट एक ही उम्मीदवार को दे रही है.’

खामोश!’ इंतजाम में लगा बड़ा अधिकारी चिल्लाया—‘तुम्हारा काम केवल वोट डालना है. मशीन ने कैसे वोट दिया, किसे वोट दिया, यह जानने का अधिकार तुम्हें नहीं हैये देखो, सरकार की ओर से भी यही लिखा है न!’ प्रमाण के लिए अधिकारी ने अखबार आगे कर दिया.

फिर हमारी क्या जरूरत है, तुम्हीं लोग काफी हो.’ इस बार कई लोग एक साथ बोल पड़े.

जनता लोकतंत्र चाहती है, तो हमने सोचा, यह नाटक भी सही.’ पीछे खड़ा तानाशाह, जो चुनाव का जायजा लेने निकला था, बोला.

23/ईश्वर की जात

ईश्वर विचारमग्न आगे बढ़ रहा था. चलतेचलते प्यास लगी. उसने इधरउधर देखा. तभी सामने से पुजारी आता दिखाई पड़ा. माथे पर चौड़ा तिलक. कंधे पर पोटली, दाएं हाथ में बड़ासा लोटा थामे. ईश्वर की उम्मीद बढ़ी—‘पानी मिलेगा?’

पुजारी ने ऊपर से नीचे तक देखा, ‘पहले जात बताओ?’

ईश्वर चकराया. देर तक कोई उत्तर न सूझा. प्यास गला जकड़ने लगी थी.

नाम क्या है?’ पुजारी ने अगला सवाल किया.

ईश्वर.’

ऊंह! आजकल नाम से कुछ पता नहीं चलता.’ पुजारी खुद पर झुंझलाया, ‘बाप का नाम?’

मेरा कोई पिता नहीं है.’

यह क्यों नहीं कहते कि वर्णसंकर यानी शूद्र हो!’

भूल गए, मैं वही ईश्वर हूं. जिसकी तुम सुबहशाम रोज आरती उतारते हो.’

चलो मान लिया कि तुम सचमुच के ईश्वर हो. फिर भी मैं तुम्हें पानी क्यों दूं. आज पानी मांग रहे हो, कल दूध, परसों दहीमक्खन, आगे चलकर चढ़ावे में हिस्सा भी मांगने लगोगे. मेरा काम तुम्हारी मूरत से चल जाता है. तुम अपना रास्ता नापो….’ ईश्वर को हटा पुजारी आगे बढ़ गया.

24/देवता का भय

भीषण दरिद्रता, भूखप्यास, गरीबी देखकर अकुलाए एक भलेमानुष ने दुनिया बचाने की ठान ली. समाधान की खोज में चलताचलता वह क्षीरसागर तक पहुंचा. आंखों के सामने दूध का समंदर लहराते देख उसके आनंद का पारावार न रहा—

यहां मेरी चिंताओं का समाधान संभव है?’ आदमी ने सोचा. तभी उसकी दृष्टी शेषनाग पर आंखें मूंदकर लेटी भव्य आकृति पर पड़ी. उसने विनीतभाव से कहा—

जहां से मैं आया हूं वहां भूख का तांडव मचा है. भरपेट भोजन न मिलने से बड़ों की अंतड़ियां सिकुड़ चुकी हैं. मासूम बच्चे माताओं के स्तन से चिपकेचिपके दम तोड़ रहे हैं. इस महासागर से थोड़ासा दूध मिल जाए तो लाखों मासूमों की जान बच सकती है.’

देवता के अधरों पर मुस्कान तैर गई. उसी को सहमति मान भलामानुष धरती की ओर दूध उलीचने लगा. अकस्मात कुछ पंडितजनों की टोली उधर से गुजरी. आदमी को क्षीरसागर के किनारे देख वे चौंक पड़े. उनमें से कई की भृकुटियां तन गईं—‘महाराज! जिस तेजी से यह दूध उलीच रहा है, उससे तो कुछ देर में क्षीरसागर भी खाली कर देगा.’

धरती की भूख मिटाने के लिए यह परमावश्यक है.’ शेषनाग पर लेटे देवता ने कहा.

सोच लीजिए भगवन्! लोग जब तक भूखेप्यासे हैं, तभी तक आपका नाम लेते हैं. भूख और गरीबी न रही तो तुम्हारे साथसाथ हमें भी कोई नहीं पूछेगा.’ देवता ने कुछ देर सोचा. अचानक उसने करवट बदली और मुंह दूसरी ओर कर लिया. भक्तों के लिए इतना इशारा काफी था. ‘असुरअसुर’ कहकर वे उस आदमी पर टूट पड़े.

उस दिन धर्म और भूख के रिश्ते से एक और पर्दा हटा.

25/गाय और ईश्वर

गाय जल्दी से जल्दी बस्ती से चूर निकल जाना चाहती थी. अचानक ईश्वर सामने आ गया—‘जंबूद्वीप में सब कुशल तो हैं?’ ईश्वर ने पूछा. उखड़ी सांसों पर काबू पाने का प्रयत्न करते हुए गाय ने उत्तर दिया—

कुछ भी ठीक नहीं है. लोग धर्म में शांति की खोज करते हैं, जो सर्वाधिक अशांत क्षेत्र है. ऐसी तकनीक के भरोसे बुद्धिमान होना चाहते हैं, जो उन्हें दिमागी तौर पर पंगु बनाने के लिए तैयार की गई है. चाहते सब हैं कि भ्रष्टाचार मिटे, परंतु हवस कोई छोड़ना नहीं चाहता.’

किसी महापुरुष ने कहा है—दुनिया से भागने से अच्छा है, उसे बदलो. वैसे भी भारतवासी तुम्हारी पूजा करते हैं. उन्हें छोड़कर जाना उचित न होगा.’ ईश्वर ने समझाया. गाय झुंझला पड़ी—

आदमी को मेरा दूध और चमड़ी चाहिए. इन दिनों हालात और भी बुरे हैं. हर दंगेफसाद में मेरा नाम घसीट लिया जाता है. जो कुछ नहीं कर पाता सकता, वह गौरक्षक बना फिरता है. मैं ऐसी जगह एक पल भी ठहरना नहीं चाहती.’

मुझसे कहतीं. मैं कभी का ठीक कर देता.’ ईश्वर बोला. गाय का गुस्सा भड़क उठा.

चुप रहो. सारे फसाद की जड़ केवल तुम हो. मंदिर में पड़ेपड़े रोटियां तोड़ते रहते हो. मेहनत न खुद करते हो न भक्तों से करने को कहते हो. तमाशबीन बनकर ईश्वर होने का दावा करने से तो अच्छाहै किसी कुआपोखर में डूब मरो. लोग कुछ दिन हैरानपरेशान रहेंगे. बाद में अपने भरोसे सबकुछ ठीकठाक कर लोगे.

ईश्वर स्तब्ध. वह कुछ उत्तर दे, उससे पहले गाय आगे बढ़ गई.

ओमप्रकाश कश्यप

बहुजन संस्कृति और सामाजिक न्याय

सामान्य
भारत के पास अनगिनत आख्यान हैं, इतिहास नहीं है.—हेनरी बर

 

‘संस्कृति’ समाजशास्त्र के सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाले शब्दों में से है. प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसके अलग-अलग संदर्भ होते हैं. कई बार परंपरा को संस्कृति समझ लिया जाता है. जबकि अनेक बार लोग संस्कृति और सामान्य व्यवहार के बीच अंतर नहीं कर पाते. जनसामान्य ‘संस्कृति’ को सलीके से परिभाषित भले ही न कर पाए, लेकिन यदि किसी व्यक्ति से उसके सामान्य व्यवहार, कार्यकलापों, सामाजिक-पारिवारिक जीवन की प्रेरणाओं के बारे में प्रश्न किया जाए तो बिना झिझके उसका एक ही उत्तर होगा—‘यही मेरी संस्कृति है.’ संस्कृति मनुष्य और समाज के संबंधों को न केवल व्याख्यायित करती है, अपितु उन्हें सफल एवं सार्थक भी बनाती है. संस्कृति के स्वरूप, उसकी अवधारणा, परिभाषा आदि को लेकर समाजविज्ञानियों के बीच मतभेद रहे हैं. कई बार लोग संस्कृति को मनुष्य के सामान्य व्यवहार से जोड़ने लगते हैं तो कई बार उसे सभ्यता के साथ गड्मड कर दिया जाता है. किसी व्यक्ति अथवा समाज के संदर्भ में संस्कृति उसके समग्र ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, कला, रोजमर्रा के व्यवहारों, संबंधों, रीति-रिवाजों, परंपराओं आदि का समुच्चय होती है.

संस्कृति का कोई एक स्रोत नहीं होता. मनुष्य संस्कृति के तत्व माता-पिता, गांव-पड़ोस, रीति-रिवाज, किस्से-कहानियों, साहित्य-कला, ज्ञान-विज्ञान आदि विविध स्रोतों से ग्रहण करता है तथा उन्हें अपनी अस्मिता और पहचान के रूप में सहेजकर रखता है. इस तरह कि वे उसके रोजमर्रा के व्यवहार, ज्ञान, सामाजिक संबंधों और मर्यादाओं का आधार बन जाते हैं. दूसरे शब्दों में संस्कृति उत्तराधिकार का विषय है. व्यक्ति अथवा समाज जिन आदतों को यत्नपूर्वक अपनी विरासत के तौर पर संभाले रहता है, जिनसे उसकी विशिष्ट पहचान बनती है, उनका समन्वित, समावेशी और लोकोपकारी रूप संस्कृति कहा जा सकता है. उनमें कला, साहित्य, अर्जित ज्ञान, रीति-रिवाज, परंपराएं, सामूहिक प्रवृत्तियां, खान-पान, आचार-व्यवहार आदि सब सम्मिलित होते हैं. इसके अलावा उसमें वे आदर्श और नियम भी समाहित होते हैं, जिन्हें कोई समाज खुद को दूसरों से अलग और बेहतर दिखाने तथा स्थायित्व की भावना के साथ अपनाता है. मनुष्य की भौगोलिक और परिस्थितिकीय विशेषताएं भी उसकी संस्कृति को प्रभावित करती हैं.

‘संस्कृति’ शब्द ‘सम्’ और ‘कृति’ की संधि से बना है. उसका आशय ऐसी अमूर्त्त सामाजिक संरचना से है, जिसमें सभी का साझा हो. संस्कृति और सभ्यता को प्रायः एक-दूसरे के पर्यायवाची के रूप में देखा जाता है. लेकिन दोनों में अंतर है. सभ्यता की कसौटी भौतिक जगत की उपलब्धियां तथा उनके फलस्वरूप जीवन में आए परिवर्तन को माना जाता है. सभ्यता संस्कृति से प्रभावित होती है, एक तरह से उसका हिस्सा भी है, लेकिन वह स्वयं संस्कृति नहीं होती. ऐसे ही जैसे भाषा ज्ञान की वाहक होती है, स्वयं ज्ञान नहीं होती. हां, भाषा का ज्ञान हो सकता है, जो मनुष्य की संपूर्ण ज्ञान-संपदा का मामूली हिस्सा है. इसी तरह मनुष्य अथवा समाज की भौतिक उपलब्धियां संस्कृति नहीं होतीं. सभ्यता को आमतौर पर संस्कृति का उत्पाद माना जाता है. लेकिन यह बात पूरी तरह सत्य नहीं है. सभ्यता और संस्कृति का संबंध अन्योन्याश्रित होता है, जिनमें संस्कृति का स्थान अपेक्षाकृत ऊपर माना जाता है. अपनी हर उपलब्धि के लिए सभ्यता संस्कृति की ऋणी रहती है. उसे हम संस्कृति का आवरण भी कह सकते हैं. परोक्षतः दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं. किसी समूह अथवा समाज की सभ्यता को उसकी संस्कृति अथवा संस्कृतियों का समुत्पाद भी कहा जा सकता है.

संस्कृति और व्यवहार में भी अंतर है. लोग संस्कृति को रोजमर्रा के आचरण के रूप में देखने की भूल कर बैठते हैं. यह गलत है. मनुष्य का नैमत्तिक व्यवहार कानून, समाज, बाजार आदि से प्रभावित हो सकता है. उसका अध्ययन मानव-व्यवहार के अंतर्गत आता है. इस तरह वह मनोविज्ञान की विषय-वस्तु है. संस्कृति व्यवहार भी नहीं होती. उसे व्यवहार की नियंत्रक शक्ति अवश्य कहा जा सकता है. कोई भी सामाजिक अथवा व्यक्तिगत व्यवहार संस्कृति का हिस्सा हो सकता है, उसे संस्कृति नहीं माना जा सकता. कारण यह कि व्यवहार मूर्त्त होता है, संस्कृति अमूर्त्त. होली के पर्व पर एक-दूसरे पर रंग डालना अथवा रक्षाबंधन के अवसर पर बहन द्वारा भाई को राखी बांधना, सहज सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवहार का हिस्सा हैं, स्वयं संस्कृति नहीं है. संस्कृति उनमें अंतर्निहित प्रेरणा है. ऐसी अंतश्चेतना जो मनुष्य को अधिकाधिक सभ्य तथा प्राणिमात्र के प्रति अधिकतम उपयोगी होने का उत्साह जगाती है. मनुष्य ऐसी प्रेरणाओं को अपनी-अपनी तरह से परिभाषित कर सकता है. उनके स्वरूप में थोड़ा-बहुत परिवर्तन ला सकता है, किंतु सामाजिक पहचान से जुड़े होने के कारण उन्हें पूर्णतः नकार नहीं सकता. कुल मिलाकर समाज अथवा व्यक्ति-विशेष के संदर्भ में संस्कृति को हम उसकी सामूहिक आदतों, स्वभाव, ज्ञान-विज्ञान, कला, साहित्य आदि के समुच्चय के रूप में देख सकते हैं.

अपने मूल विषय ‘बहुजन संस्कृति’ लौटने से पहले आवश्यक है कि ‘बहुजन’ की अवधारणा तय कर ली जाए. ‘बहुजन’ का अभिधार्थ ‘बहुसंख्यक जन’ अवश्य है, लेकिन इसका आधार मात्र संख्याबल नहीं है. संख्या के माध्यम से बहुजन को परिभाषित करने के अनेक खतरे हैं. इससे ‘बहुजन’ को संख्याबल समझ लिए जाने की संभावना बराबर बनी रहेगी. वह भीड़ को समाज का दर्जा देने के बराबर होगा. प्रकारांतर में वह अनेक भ्रांतियों को जन्म देगा. पुनश्चः ‘बहुजन’ और ‘बहुसंख्यक जन’ दोनों को एक मान लिया गया तो अल्पसंख्यक मुस्लिमों के मुकाबले हिंदू बहुजन होंगे तथा दलितों के सापेक्ष पिछड़ी जातियों के लोग. इस कसौटी पर आदिवासियों के मुकाबले गैर आदिवासी ‘बहुजन’ माने जाएंगे. यह विभाजन आगे भी बढ़ता जाएगा. एक समय ऐसा भी आ सकता है जब बहुजन की संकल्पना का आधार और उद्देश्य दोनों समाप्त हो जाएं. जैसे ‘बहुजन’ को ‘बहुसंख्यकजन’ नहीं कहा सकता, ऐसे ही ‘बहुजन’ के आधार पर ‘बहुजनवाद’ जैसी भी संकल्पना भी अनुचित कही जाएगी. उससे उसके ‘बहुसंख्यकवाद’ में बदलने की संभावना बनी रहेगी. अतएव ‘बहुजन’ की अवधारणा तय करने के लिए संख्या-तत्व को नजरंदाज करना ही उचित होगा.

फिर ‘बहुजन’ किसे माना जाए? इस शब्द का प्रथम उपयोग बौद्ध दर्शन में प्राप्त होता है. बुद्ध इसे परिभाषित नहीं करते, किंतु जिस संदर्भ में वे इसका प्रयोग करते हैं, उससे ‘बहुजन’ की अवधारणा साफ होने लगती है. भिक्षु संघ को संबोधित करते हुए वे कहते हैं—‘चरथ भिक्खवे चारिकम्-बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय.’ ‘हे भिक्षु! बहुजन कल्याण और बहुजन-हित के लिए निरंतर प्रयाण करते रहो.’ बुद्ध राज-परिवार में जन्मे थे. समकालीन राजाओं, विशेषकर श्रेष्ठिवर्ग पर उनका प्रभाव था. फिर भी वे भिक्षुसंघ से ‘बहुजन’ के कल्याण हेतु निरंतर प्रयत्नशील रहने की कामना करते हैं. आखिर क्यों? तत्कालीन सामाजिक स्थितियों को देखते हुए इसे समझ पाना कठिन नहीं है. उस समय तक वर्ण-व्यवस्था कट्टर रूप ले चुकी थी. कर्मकांड शिखर पर था. लोग जाति देखकर व्यवहार करते थे. इस मामले में सर्वाधिक मुखर ब्राह्मण थे. उनका दावा था कि उन पर सृष्टि-रचियता ब्रह्मा की विशेष कृपा है. जिसने उन्हें अपने मुख से पैदा किया है. निहित स्वार्थ के लिए उन्होंने प्राकृतिक शक्तियों अग्नि, वायु, आकाश, जल, पृथ्वी आदि का देवताकरण किया था और लगातार यह प्रचारित करते रहते कि वे यज्ञों के माध्यम से देवताओं के संपर्क में रहते हैं. दूसरा वर्ग क्षत्रियों का था, जिसे समाज की रक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. देवताओं की दुहाई देते-देते ब्राह्मण खुद देवता होने का गुमान करने लगे थे, जबकि क्षत्रिय राज्य के रखवाले से उसका स्वामी बन बैठे थे. स्वार्थ के लिए ब्राह्मण क्षत्रिय का महिमामंडन करता था, क्षत्रिय ब्राह्मण के पांव पखारता था.

तीसरा व्यापारी वर्ग था. पहले दो वर्गों की तरह अनुत्पादक वर्ग. उसका कार्य दूसरों के उत्पाद बेचकर मुनाफा कमाना था. मुनाफे का एक हिस्सा ब्राह्मण और क्षत्रिय को भेंट कर वह मस्त रहता था. शेष जनसमाज यानी चौथे वर्ग में किसान, मजदूर, शिल्पकार आदि सभी आते थे. उनपर समाज के विकास की जिम्मेदारी थी, परंतु थे सब दूसरों की मर्जी के दास. किसी को अपनी रुचि और हितों के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता न थी. किसान खेत में पसीना बहाता था, मगर फसल पर उसका अधिकार न था. वह राजा और सामंत की मान ली जाती थी. शिल्पकार अपनी कला से संस्कृति और सभ्यता को संवारने का काम करते थे, किंतु अपने ही श्रम-कौशल पर उनका अधिकार न था. उनके श्रमोत्पाद के मूल्यांकन का अधिकार व्यापारी वर्ग के पास था. शूद्र का कर्तव्य था राज्य के लिए कर और ब्राह्मण के लिए दान देना. वफादार रहना तथा उनके प्रत्येक आदेश  को कृपा-भाव के साथ ग्रहण करते हुए दासत्व का धर्म निभाना. इसी में उसकी मुक्ति है—ऐसा कहा जाता था.

संख्याबल में ऊपर के तीनों वर्ग शेष जनसमाज के सापेक्ष बहुत कम थे. कुल जनसंख्या का बमुश्किल पांचवा हिस्सा. लेकिन समाज के कुल संसाधनों पर उनका अधिकार था. इसलिए संख्या-बहुल होने के बावजूद निचले वर्ण के लोग ऊपर के तीन वर्गों की मनमानी सहने के लिए विवश थे. कार्य-विभाजन के नाम पर ब्राह्मणों ने समाज के बहुसंख्यक हिस्से को छोटी-छोटी जातियों और वर्गों में बांट दिया था. बहुजन के पास बुद्धि थी, हस्तकौशल था, अनथक परिश्रम करने का हौसला तथा ईमानदारी भी थी. नहीं था तो आत्मविश्वास और सपने जो जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं. ये सब सेवा-भाव की भेंट चढ़ चुके थे. निरंतर बढ़ते सामाजिक दबावों तथा यह भ्रम कि ईश्वर एकमात्र और सच्चा न्यायकर्ता है, कि इस जीवन में उन्हें जो खोना पड़ रहा है वह मृत्योपंरात जीवन में सहज प्राप्त होगा—के चलते वे पूर्णतः नियतिवादी हो चुके थे. अपने सामान्य हितों के बारे में निर्णय लेने के लिए भी वे समाज के शीर्षस्थ वर्गों पर निर्भर थे; तथा उन्हें अपना स्वामी, सर्वेसर्वा एवं मुक्तिदाता मानते थे. हालात ऐसे थे कि अपने प्रत्येक कार्य में स्वार्थ को आगे रखने वाले तीनों शीर्षस्थ वर्गों के बीच अभूतपूर्व एकता थी, जबकि चौथा और बहु-संख्यक वर्ग सामान्य हितों के लिए एक-दूसरे के साथ स्पर्धा करता हुआ, अपनी प्रभावी ताकत खो चुका था. ‘दिमाग’ और ‘हाथों’ की उस अघोषित-अवांछित स्पर्धा में लाखों हाथ, कुछ सौ या हजार दिमागों की मनमानी के समक्ष बेबस थे. ‘बहुजन’ से बुद्ध का आषय ऐसे ही लोगों से था, जो समाज के प्रमुख कर्ता और उत्पादक वर्ग का हिस्सा होने के बावजूद उपेक्षित, तिरष्कृत, उत्पीड़ित और इस कारण विपन्नता का जीवन जीने को विवश थे. अपने जीवन संबंधी महत्त्वपूर्ण निर्णयों के लिए वे ऐसे लोगों पर निर्भर थे जो उन्हीं के प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष समर्थन से शक्तिशाली होकर बहुजन-हितों के विपरीत कार्य करते थे.

कदाचित अब हम ‘बहुजन’ की अवधारणा तय करने की स्थिति में आ चुके हैं. अभी तक के विवरण जो छवि बनती है, उसके अनुसार ‘बहुजन’ समाज का प्रमुख उत्पादक वर्ग है, जो कभी जाति तो कभी धर्म के नाम पर आरंभ से ही अन्याय, असमानता और शोषण का शिकार रहा है. मानव सभ्यता उसके स्वेद-बिंदुओं की ऋणी है, फिर भी उसे किसी न किसी रूप में, उसके श्रम-लाभों से वंचित रखा गया है. वह खेतों में काम करने वाला मजदूर हो सकता है; और गली-नुक्कड़ पर जूते गांठने वाला मोची भी. स्त्री भी हो सकता है, पुरुष भी. आजीविका उसका धर्म है. वही उसका भरोसा भी. इसी कारण बुद्ध पूर्व भारत में वह आजीवक कहलाता था. उन दिनों प्रकृति पर उसे भरोसा था. वही उसकी श्रद्धा का पात्र भी थी. प्रकृति के प्रति सम्मान-भाव के साथ जिस दर्शन की रचना उसने की थी, विद्वत जगत में वह लोकायत के रूप में ख्यात हुआ. उसकी सहायता से शताब्दियों तक वे लोग आंडबर और याज्ञिक कर्मकांडों पर टिके वैदिक धर्म-दर्शन को चुनौती देता रहा. इस तरह बहुजन की अवधारणा हमें सामाजिक न्याय की भावना से जोड़ती है. अपने साथ-साथ दूसरों के कल्याण के लिए जिम्मेदार बनाती है. यही उसका उद्देश्य है और यही अभीष्ट भी है. हालांकि सामाजिक न्याय की अवधारणा को लेकर मत-वैभिन्न्य हो सकते हैं.

मार्क्स ने पूंजीवादी तंत्र में उत्पीड़ित वर्ग को ‘सर्वहारा’ का नाम दिया था. ‘सर्वहारा’ और ‘बहुजन’ की आर्थिक अवस्था में अधिक अंतर नहीं होता. दोनों ही शोषण का शिकार होते हैं. उनमें से किसी को भी अपने श्रम के मूल्यांकन का अधिकार नहीं होता. फिर भी दोनों की सामाजिक स्थिति में अंतर है. मार्क्स का जन्म ऐसे समाज में हुआ था जहां जाति, वर्ण और धर्म के आधार पर विभाजन न था. अतएव सर्वहारा की उसकी परिकल्पना ठेठ पूंजीवादी समाज में आर्थिक विपन्नता के शिकार श्रमिक-वर्ग के शोषण तथा उसके सामाजिक-सांस्कृतिक दुष्परिणामों तक सीमित थी. बहुजन की समस्याओं का मूल सामाजिक-सांस्कृतिक भेदभाव होते हैं. प्रकारांतर में वही उसकी समाजार्थिक दुरावस्था का कारण बनते हैं. मुख्यधारा से जुड़ने के लिए सर्वहारा को आर्थिक बाधाएं पार करनी पड़ती हैं. जबकि बहुजन को आर्थिक के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक समस्याओं से भी जूझना पड़ता है. चूंकि सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव की गति अत्यंत मंथर होती है, इसलिए बहुजन-कल्याण की राह हमेशा अनेकानेक चुनौतियों से भरी होती है. लोकतांत्रिक परिवेश का लाभ उठाकर सर्वहारा अपनी स्थिति में सुधार ला सकता है. पश्चिमी देशों में ऐसा हुआ भी है. जाति के संबंध में लोकतांत्रिक सरकारें भी अपेक्षानुरूप सफल नहीं हो पातीं. प्रतिगामी शक्तियां जाति को व्यक्ति का निजी मामला बताकर सामाजिक परिवर्तन को टालती रहती हैं. सामाजिक-सांस्कृतिक भेदभाव तथा अवसरों की कमी के कारण बहुजन के लिए आर्थिक विषमताओं के चक्रव्यूह को भेद पाना आसान नहीं होता. जटिल जाति-व्यवस्था तथा उसके साथ धर्म का चिरस्थायी गठजोड़, बहुजन के संघर्ष को कई गुना बढ़ा देते हैं.

‘बहुजन’ का प्रथम उल्लेख भले ही बौद्ध दर्शन में हुआ हो, इसकी भूमिका वैदिक संस्कृति की स्थापना के साथ ही बन चुकी थी. लगभग 1500 ईस्वी पूर्व मध्य एशिया से भारत पहुंचे पशुचारी कबीलों ने खुद को ‘आर्य’ कहा था. इसका अर्थ बताया जाता है—‘श्रेष्ठ’ अथवा ‘श्रेष्ठजन.’ इस संबोधन का आशय था—मूल भारतवासी अथवा उनसे हजारों वर्ष पहले से इस देश में बस चुके जनसमूहों की संस्कृति को हेय मान लेना. भारत के मूल निवासी कौन थे? विद्वान दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं में अग्रणी सिंधू सभ्यता को अनार्य सभ्यता मानते हैं. डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी अपने ग्रंथ ‘हिंदू सभ्यता’(राजकमल प्रकाशन, पांचवा संस्करण, 1975, पृष्ठ 46) में मोहनजोदड़ो से प्राप्त नरकंकालों के आधार पर सिंधू सभ्यता के निर्माताओं को चार नस्लों में बांटते हैं—आद्य-निषाद, भूमध्य सागर से संबंधित जन, अल्पाइन तथा मंगोल, किरात. आगे वे लिखते हैं कि आद्य-निषाद भारत महाद्वीप के निवासी थे. भूमध्यसागरीय लोग दक्षिण एशिया से आए थे. अल्पाइन पश्चिमी एशिया तथा मंगोल, किरात वर्ण के लोग पूर्वी एशिया से पलायन कर लंबी यात्रा के उपरांत भारत पहुंचे थे. इनके अलावा  अलग-अलग नस्ल के संसर्ग से जन्मीं संकर नस्लें भी थीं. ऋग्वेदादि ग्रंथों में आर्यजनों ने इन्हीं नस्लों के सापेक्ष जो उनसे सहस्राब्दियों पहले इस प्रायद्वीप पर आकर बस चुकी थीं; तथा अपने श्रम-कौशल के बल पर समृद्ध सभ्यता की स्वामिनी थीं—अपनी वर्ण-श्रेष्ठता का दावा किया है. यदि उनके दावे को स्वीकार कर लिया जाए तो समकालीन बाकी नस्लें जिनका उल्लेख ऊपर किया गया है, तुलनात्मक रूप से अश्रेष्ठ अथवा निकृष्ट सिद्ध होती हैं, लेकिन पुरातात्विक साक्ष्य इसे वैदिक ब्राह्मणों की आत्ममुग्धता से अधिक मानने को तैयार नहीं है. आज यह प्रमाणित है कि सिंधू घाटी की सभ्यता ऋग्वैदिक सभ्यता की अपेक्षा 1500-2000 पुरानी तथा उससे कहीं अधिक समृद्ध और सुव्यवस्थित थी. पुरातत्ववेत्ता सिंधू सभ्यता की शुरुआत 3200 ईस्वी पूर्व से मानते हैं. 2300 ईस्वी पूर्व से 1750 ईस्वी पूर्व तक वह सभ्यता अपने वैभव के शिखर पर थी. उसके बाद उसके पराभव का दौर शुरू हुआ. 1500 ईस्वी पूर्व में जब आर्यों ने जब भारत में प्रवेश किया, उस समय वह सभ्यता करीब-करीब मिट चुकी थी. उसके अवशेष हड़प्पा, मोहनजोदड़ो’, कालीबंगा, लोथल, मेहरगढ़ जैसे दर्जनों स्थानों पर आज भी सुरक्षित हैं. सिंधुवासियों को दुनिया की सबसे पुरानी और समृद्ध नागरिक सभ्यता की नींव रखने वाला बताया जाता है. पुरातत्ववेत्ता इस बात पर सहमत हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता का कुल क्षेत्रफल आधुनिक पाकिस्तान के क्षेत्रफल से भी अधिक था.

भारतीय इतिहास के संदर्भ में 1500 ईस्वी पूर्व से 700 ईस्वी पूर्व तक के समय को विद्वान ‘अंधकार युग’ मानते हैं. इसलिए कि उस कालखंड के बारे में हमें प्रामाणिक तौर पर कुछ भी ज्ञात नहीं है. विद्वानों के अनुसार ऋग्वेदादि श्रुति ग्रंथों का रचनाकाल भी यही कालखंड है. लेकिन ये ग्रंथ 700 ईस्वी पूर्व में भी लिखित रूप में मौजूद थे, यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता. दूसरी ओर यह प्रमाणित तथ्य है कि सिंधू सभ्यता के निर्माताओं को न केवल लिपि बल्कि संख्याओं, वास्तविक और प्रतीक मुद्रा तथा उनके अनुप्रयोगों की भी पर्याप्त जानकारी थी. उनके खेती के तरीके विकसित थे. इतने विकसित कि भारत में बीसवीं शताब्दी के आरंभ तक भी उनमें खास परिवर्तन नहीं हो पाया था. उनके पास सुनियोजित व्यापार-तंत्र और ऐसी भाषा थी, जिसके माध्यम से वे समकालीन सभ्यताओं से संवाद करने में सक्षम थे. जबकि आर्यजन महज घुमंतु पशुचारी कबीले थे. सभ्यता की दृष्टि से सिंधुवासियों से लगभग हजार साल पिछड़े हुए. इसके बावजूद यदि उन्होंने स्वयं को ‘आर्य’ यानी ‘श्रेष्ठजन’ कहा, तो इसके दो प्रमुख कारण हो सकते हैं. पहला या तो वे सिंधू घाटी की सभ्यता के प्राचीन वैभव तथा उसके महत्त्व से अपरिचित थे. अथवा यह संबोधन उन्होंने बहुत बाद में अनार्यजनों पर अपनी सांस्कृतिक विजय, वैदिक संस्कृति की स्थापना के समय चुना था. वे जानते थे कि अपनी संस्कृति को श्रेष्ठ बताए बिना जीत को स्थायी बनाना और मूल-भारतवासियों पर ‘आर्यत्व’ को थोप पाना असंभव है. ईसा पूर्व चौथी-पांचवी शताब्दी तक वह लक्ष्य ही बना रहा. यह भी संभव है कि ‘आर्य’ संबोधन मध्य एशिया से प्रयाण से पहले ही उनके साथ जुड़ा हो और उसका अभिप्राय ‘श्रेष्ठजन’ न होकर कुछ और हो. ऋग्वेद को प्राचीनतम वेद, हिंदुओं का पवित्रतम ग्रंथ, जिसकी रचना ब्राह्मणों द्वारा ब्राह्मणों के लिए की गई है—माना जाता है. उसके आरंभिक उद्गाता ऋषियों में सभी वर्णों के रचनाकार सम्मिलित हैं.

वेदादि ग्रंथों को ‘ब्राह्मण-ग्रंथ’ कहने की प्रवृत्ति बहुत बाद में, कदाचित यजुर्वेद की रचना के समय हुई. उस समय तक उस समय तक ‘पुरोहित’, ‘राजा’, सम्राट जैसे पदों का सांस्थानीकरण हो चुका था. धर्म और राजनीति दोनों ही व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति का माध्यम बन चुके थे. वैदिक कर्मकांड जो उससे पहले तक मुख्यतः आश्रमों तक सीमित थे, वे राजा-महाराजाओं तथा धनी व्यापारियों के घर-आंगन तक पहुंचकर वैभव-प्रदर्शन के काम आने लगे थे. ब्राह्मणों की पूरी मेधा यज्ञादि कर्मकांडों को विस्तार देने में जुटी थी. चतुर्भुजी ब्रह्मा के हाथ में ‘ऋग्वेद’ के बजाय ‘यजुर्वेद’ की प्रति का होना, वैदिक धर्म-दर्शन की परपंरा में कर्मकांडों के बढ़ते महत्त्व को दर्शाता है. ऐसे में ज्ञान की परंपरा का अवरुद्ध होना स्वाभाविक था. वही हुआ भी. उसके तुरंत बाद पौराणिक लेखन की बाढ़-सी आ गई, जिसने उस समय तक उपलब्ध ज्ञान-विज्ञान और ऐतिहासिक तत्वों का मिथकीकरण करने का काम किया.

ऋग्वेद में अनार्य पुरों के ध्वंस का जगह-जगह वर्णन है. लेकिन ऋग्वेद की रचना का जो काल है, उस समय तक सिंधु सभ्यता का पराभव हो चुका था. इसलिए संभावना यही बनती है कि ऋग्वैदिक आर्यों ने सिंधु-घाटी के उन नगरों और पुरों पर हमला किया था, जो प्रकृति की मार के चलते पहले से ही निष्प्रभ हो चुके थे. पराजित अनार्यों में से कुछ यहां-वहां छिटक गए. जो बचे उन्हें लेकर ब्राह्मणों ने चातुर्वर्ण्य समाज की नींव रखी. चातुर्वर्ण्य समाज की अवधारणा कदाचित आर्यों की प्राचीन स्मृति का हिस्सा थी. गौरतलब है कि प्राचीन मिस्र तथा पर्शिया में भी चातुर्वर्ण्य वर्ण-व्यवस्था प्रचलित थी. अवेस्ता(यसना, 19/17, फ्रे) में जिन चार वर्णों का उल्लेख मिलता है, वे हैं—असर्वण(पुरोहित वर्ग), अर्तेशत्रण(क्षत्रिय), डबेरियन(वैश्य) तथा वास्त्रोषण(शूद्र). ध्वनि के आधार पर आर्य शब्द ‘असर्वण’ के अपेक्षाकृत निकट है. अवेस्ता में ‘असर्वण’ को वर्ण-क्रम में पहला स्थान पर रखा गया है. संभव है ‘आर्य’ शब्द की उत्पत्ति पार्शियन ‘असर्वण’ से हुई हो; या फिर ‘आर्य’ की अवधारणा के मूल में इस शब्द का प्रभाव रहा हो. ‘अवेस्ता’ के अनुसार ‘अहुरमज्द’ एक प्रमुख देवता है. उसे सृष्टि निर्माता और उसका पालक माना गया है. मान्यतानुसार उसने कई द्वीपों की रचना की थी. भारत में प्रवेश के बाद ‘अहुरमज्द’ का ‘अहुर’ ही प्रकारांतर में ‘असुर का रूप ले लेता है. इससे एक संभावना यह भी बनती है कि भारत पहुंचे आर्य कबीले अपने मूल प्रदेश की संस्कृति का प्रतिपक्ष थे. ‘अहुरमज्द’ को सर्वोच्च पद का दिया जाना, उन्हें स्वीकार न था. इसलिए भारत पहुंचकर उन्हें जैसे ही अवसर मिला, ‘अहुरमज्द’ को नकारात्मक शक्तियों के प्रतीक असुर में ढाल दिया गया. भारत में आर्यों का आगमन अलग-अलग समय में टुकड़ियों के रूप में हुआ था. उधर ऋग्वेद में ‘असुर’ का प्रयोग अच्छे और बुरे दोनों अर्थों में हुआ है. इससे एक संभावना यह भी है कि अलग-अलग समय में आने वाली आर्य-टोलियां भिन्न समाज और संस्कृतियों से संबंधित थीं. यह भी संभव है कि ‘असुर’ शब्द का प्रयोग पहले ‘अच्छे’ के संदर्भ में होता हो, उसे ‘बुरे’ का प्रतीक और आर्यों का दुश्मन बाद में माना गया हो. मानव-संस्कृति के इतिहास में ऐसे बदलाव स्वाभाविक कहे जा सकते हैं. उन्हें हम समाज में निरंतर बदलते शक्ति-केंद्रों का परिणाम भी कह सकते हैं. आरंभ में गणेश को ‘विघ्नकर्ता’ देवता माना जाता था. प्राचीनतम उल्लेखों में उन्हें कर्मकांड और आडंबरों का विरोधी दर्शाया गया है. आगे चलकर वे हिंदुओं के प्रमुख देवता के रूप में प्रतिष्ठित होकर, ‘विघ्नहर्ता’ मान लिए जाते हैं. ऐसे ही शिव जो पहले अनार्यों के लोकनायक के रूप में प्रतिष्ठित थे, उन्हें देवताओं की तिकड़ी में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया.

शिव को संहार का देवता माना जाता है. यह मिथ शिव की अनार्य समूहों के बीच महत्ता को दर्शाता है. भारत में आर्यों का आगमन भले ही उस युग में हुआ हो जब प्राचीन सिंधु सभ्यता का वैभव लुट चुका था. तो भी भारत पहुंचने के बाद उनके लिए यहां के निवासियों पर जीत हासिल करना आसान नहीं रहा होगा. शिव पूरे सिंधु प्रदेश के प्रतिष्ठित लोकनायक थे. उस समय के सभी अनार्य समूहों पर उनका प्रभाव था. इसलिए भारत आने के साथ ही आर्यों को शिव के समर्थकों से जूझना पड़ा होगा. संस्कृत ग्रंथों में इस बात के प्रमाण हैं कि अनार्यों के साथ आरंभिक युद्धों में आर्यों को पराजय का सामना करना पड़ा था. बल्कि लंबे समय तक जीत उनके लिए सपना ही बनी थी. मजबूरी में आर्यों से सहमति और समझौते से काम लिया. वह समझौता था, अनार्य महानायक शिव को आर्य देवताओं के बराबर का दर्जा देना. उनके साथ वैवाहिक संबंध स्थापित करना. चूंकि वे शिव के पीछे निहित अनार्य कबीलों की जनशक्ति से परिचित हो चुके थे, और परोक्ष रूप में उसका डर भी उनके मनो-मस्तिष्क पर सवार रहता था, कदाचित उसी भय ने उन्हें शिव को संहार का देवता मानने के लिए विवश किया था. आदिवासी आज भी खुद को हिंदू धर्म से अलग मानते हैं. कहते हैं कि उनके पूर्वज वैदिक कर्मकांडों के कटु आलोचक; तथा ‘वर्ण-श्रेष्ठता की सैद्धांतिकी’ का विरोध करते थे.

यहां कुछ प्रश्न एकाएक खड़े हो जाते हैं. पहला यह कि सभ्यताकरण की अनिवार्यता के रूप में कार्य-विभाजन तो दूसरे देशों भी हुआ था. सभ्यताकरण की शुरुआत भी लगभग साथ-साथ हुई थी. अपने आदर्श समाज में प्लेटो ने भी लोगों को तीन वर्गों—स्वर्ण, रजत तथा कांस्य में बांटने की अनुशंसा की थी. भारत की भांति जापान, कोरिया, स्पेन तथा पुर्तगाल के लैटिन अमेरिकी उपनिवेशों, अफ्रीका आदि देशों में भी जातिप्रथा का प्रभाव था. जापान के ‘बराकुमिन’(burakumin) तथा कोरिया के ‘बीकजियोंग’(baekjeong) के हालात भारत के दलितों के समान ही थे. यमन में अल-अखदम(al-Akhdham, Khadem) की स्थिति भारतीय शूद्रां जैसी थी. उन्हें भी जाति-आधारित भेदभाव का सामना करना पड़ता था. इनके अलावा पाकिस्तान, चीन, नेपाल, बांग्लादेश, इंडोनेशिया आदि देशों का समाज भी छोटी-छोटी जातियों और वर्गों में विभाजित था. विभिन्न जातियों के बीच ऊंच-नीच की भावना भी प्रबल थी. फिर बाकी देशों विशेषकर पश्चिमी देशों के सभ्यताकरण तथा भारत के सभ्यताकरण के परिणामों के बीच भारी अंतर क्यों मिलता है?

इस रहस्य को सभ्यता