Tag Archives: इकीसवीं शताब्दी में मार्क्सवाद की प्रासंगिकता

बेलगाम पूंजीवाद को लगाम

सामान्य

आलेख 

एक

 

बीसवीं शताब्दी का पूर्वार्ध पूंजीवाद के विकास का था. उस कालखंड में पूंजी का वर्चस्व पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ा; और मुनाफा जिसे कभी व्यावसायिक नैतिकता के अनुपालन में मर्यादित रखने की सलाह दी जाती थी, उसे आर्थिक विकास के नजरिये से देखा जाने लगा था. पूंजीवाद का अभीष्ट थाबाजार पर एकाधिकार और अधिकतम मुनाफा. यह कहीं न कहीं श्रम शोषण से जुड़ा मसला भी था. इतिहास की तह में जाकर देखें तो पता चलेगा कि श्रमशोषण की समस्या पूंजीवाद की पूर्ववर्ती अर्थव्यवस्थाओं में भी थी. सहयोगाधारित संगठनों को छोड़कर, जिनके बारे में 3000 वर्ष पहले तक की जानकारी उपलब्ध है—श्रमशोषण प्रायः हर युग की समस्या रही है. बल्कि लंबे युग तक इसे नियतिबद्ध मानते हुए गंभीरता से लिया ही नहीं गया. सहयोगाधिारित संगठनों ने इस समस्या का सार्थक समाधान खोजने की कोशिश की थी. उस समय तेली, रंगरेज, बुनकर, राजमिस्त्री, काष्ठकार जैसे दस्तकारों के प्रभावशाली संगठन थे. समाज में उनका खासा मानसम्मान था. हालांकि उसी युग में जिसे सहयोगाधारित संगठनों का स्वर्णकाल माना जाता है, समानांतर रूप में दासप्रथा भी कायम थी.े दास की निजी इच्छाओं का कोई महत्त्व न था. वह एकमात्र अपने स्वामी की इच्छा से नियंत्रित होता था. प्रकारांतर में उससे अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने के अधिकार छीन लिए जाते थे. कालांतर में जैसेजैसे छोटे राज्यों का विकास हुआ, श्रमिक संगठनों के लिए स्वतंत्र रूप में काम करना कठिन होता गया. अद्वितीय शिल्पी जो अपने कौशल के लिए दूरदूर तक जाने जाते थे, वे पूरी तरह राज्याश्रित होने लगे. स्वामी प्रसन्न तो इनामइकराम की भरमार, स्वामी अप्रसन्न तो मृत्युदंड तक की नौबत आ जाती थी. उसके विरुद्ध सुनवाई किसी अदालत में संभव न थी. संभव है सहयोगाधारित संगठन भी दासों की सेवाएं लेते हों. लेकिन शिल्पकार और पेशेवरों द्वारा गठित वे संगठन निजी लाभ के साथसाथ सामाजिक लाभ की वांछा से चलाए जाते थे. उनमें स्वामीश्रमिक संबंधों नहीं होते थे. समूह के अंदर कार्यों का सामान्य सहमति के आधार पर विभाजन और अन्योन्याश्रितता होती थी. श्रेणियों का यह गुण उन्हें समकालीन उत्पादक समूहों से श्रेष्ठतर और मानवीय सिद्ध करता है.

मशीनी क्रांति के आरंभ में श्रमिकों को उम्मीद थी कि पूंजीवाद का आगमन सामंती शक्तियों के पतन में सहायक होगा, फलस्वरूप श्रमिक को श्रम और शिल्पकार को उसके शिल्पकौशल का भरपूर प्रतिदेय प्राप्त होगा. वे अपने श्रमकौशल का मूल्यांकन करने को पूर्ण स्वतंत्र होंगे. इसमें कोई संदेह नहीं कि पूंजीवाद ने सामंतवाद की अनेक ज्यादतियों पर प्रहार किया. कठिन श्रम से मुक्ति दिलाने में भी नई प्रौद्योगिकी मनुष्य की मददगार बनी. औद्योगिक अर्थव्यवस्था ने बेगार जैसी कुप्रथाओं पर नियंत्रण लगाया था. श्रमिक को उसके श्रम के बदले नकद भुगतान किया जाने लगा. किंतु श्रम पर पूर्ण स्वत्वाधिकार; यानी श्रममूल्य के निर्धारण का अधिकार जो श्रमिक की पुरानी नीतिसम्मत मांग थी—पर पूंजीपतियों और सरमायेदारों का अधिकार यथावत था. वैज्ञानिक क्रांति ने उत्पादन वृद्धि के जो नए रास्ते ईजाद किए थे, उनका अधिकांश लाभ पूंजीपति के हिस्से आया था. कामगारों को तुलनात्मक रूप से बहुत कम, बल्कि नगण्य लाभ पहुंचा था. नई प्रौद्योगिकी समाज में आर्थिक असमानता की खाई को और गहरा करने में सहायक बनी, जिसके परिणामस्वरूप पूंजीवादी शोषण का दायरा लगातार बढ़ता गया.

नई अर्थव्यवस्था में व्यावसायिक और उत्पादक इकाइयों को प्रतिस्पर्धी बनने/बनाने की अपेक्षाओं के चलते मुनाफे को तय करने का अधिकार समाज एवं सरकार के हाथों से खिसककर, पूर्णतः पूंजीपति के हाथों में चला गया. कुछ अपवादों को छोड़कर पूंजीपतियों को मिला अधिकार असीमित था. विशेषकर श्रमिकसंबंधी विषयों को लेकर. श्रमअधिकारों के संरक्षण हेतु कुछ कानून अवश्य बनाए गए. लेकिन उनका रास्ता इतना लंबा, दुरूह और जटिलताओंभरा था कि साधारण श्रमिक द्वारा उनका लाभ उठाना तो दूर, समझना तक कठिन था. इस तरह प्रतिस्पर्धा का पहला शिकार बना था—श्रमिक. दूसरा वह शिल्पकर्मी जिसके पास सिवाय अपने शिल्पकर्म के उपार्जन का कोई और माध्यम नहीं था. नतीजा यह हुआ कि जो शिल्पकर्मी प्राचीन समाजों में अपने हुनर के लिए सराहे जाते थे, जिनका विशेष मानसम्मान था, वे बेरोजगारी का शिकार होने लगे. इससे उनका कलाकौशल भी दम तोड़ने लगा, जो उन्होंने पीढि़यों के संघर्ष के बूते प्राप्त किया था. उचित यही था कि जिस प्रकार उद्यमी अपने उत्पाद के मूल्यनिर्धारण को स्वतंत्र होता है, श्रमकौशल के मूल्यांकन की वैसी ही स्वतंत्रता श्रमिक और शिल्पकार को भी प्राप्त होती. व्यावसायिक और सामाजिक नैतिकता की दृष्टि से भी यही अपेक्षित था. परंतु प्रौद्योगिकीकरण ने श्रम और शिल्प दोनों के सक्षम और सस्ते विकल्प पेश किए थे. परिणामस्वरूप श्रमिक और कामगार वर्गाें के ऊपर बेरोजगारी की तलवार लटकने लगी थी. मशीनों ने मानवश्रम का विकल्प बनना शुरू किया तो बेरोजगारी संकट से घिरे, हतोत्साहित शिल्पकार और मजदूर पूंजीपतियों पर निर्भर होते चले गए. उनके शिल्प और श्रम के मूल्यांकन का अधिकार उन लोगों के हाथों में चला गया जो केवल और केवल अपने मुनाफे के लिए काम करते थे.यह पूंजी की सुदृढ़ता का पहला चरण था. दूसरे चरण की शुरुआत उपभोक्तावाद से होनी थी. जिसमें उत्पादन व्यक्ति की जरूरत के बजाय पूंजीवादी अर्थतंत्र की लाभकामना के निमित्त होता था. उसकी शुरुआत तो मशीनीकरण के साथ ही हो चुकी थी, मगर वास्तविक सफलता मध्य वर्ग के मजबूत आर्थिक शक्ति बनने के बाद संभव हो सकी.

स्वाधीन भारत में कल्याण राज्य की नींव रखी गई और आजादी का लाभ सभी वर्गों तक पहुंचाने के लिए मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया गया. सोचा गया कि राष्ट्रीय महत्त्व के जितने भी भारी उद्यम हैं, उनपर सरकार का अधिपत्य हो. इसके फलस्वरूप सार्वजनिक उद्यमों की स्थापना की गई थी. मगर कमजोर नेतृत्व, इच्छाशक्ति का अभाव, पूंजीपति और भ्रष्ट नौकरशाही के अनुचित गठजोड़ में फंसकर, वे लगातार घाटे का शिकार होने लगे. भारीभरकम पूंजी के आधार पर लगे सार्वजनिक उद्यमों पर पूंजीपतियों की कुदृष्टि थी. येनकेनप्रकारेण वे उनपर एकाधिकार चाहते थे. आजादी के तीसरे दशक बाद से राजनीति पर पूंजीपतियों का प्रभाव बढ़ने लगा था. इसलिए हुआ वही जो पूंजीपति तथा उनके चहेते भ्रष्ट नेता चाहते थे. बीसवीं शताब्दी के समाप्त होतेहोते यह मान लिया गया कि मिश्रित अर्थव्यवस्था के बूते दुनिया के साथ स्पर्धा कर पाना असंभव है. इसलिए उदारीकरण के बहाने भारतीय बाजारों को दुनियाभर के उद्यमों के लिए खोल दिया गया. इसी के साथ देशभर में प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित दोहन और शोषण की शुरुआत हो गई. पूंजीपतियों और वैश्विक कारपोरेट घरानों की गिद्धदृष्टि अर्से से इस देश के प्राकृतिक संसाधनों पर टिकी थी. उदारीकरण के साथ वे उन संसाधनों को औनेपौने दामों में खरीदने या जोड़तोड़ द्वारा हड़पने का स्वप्न देखने लगे. मिश्रित अर्थव्यवस्था के दौरान पिछले पचास वर्षों में जो बड़ेबड़े सार्वजनिक उद्यम खड़े किए गए थे, उनसे पीछा छुड़ाने के लिए विनिवेश पर खास जोर दिया गया. सरकार किसी भी दल की रही हो, अपनीअपनी तरह से सभी ने, कभी प्रकट रूप में तो कभी पिछले दरवाजे से, उदारवाद और विनिवेशीकरण को बढ़ावा दिया. यह अवधारणा बनी कि कारखाने चलाना सरकार का काम नहीं है. उसका काम केवल शासन और व्यवस्था संभालना है. नतीजा यह हुआ कि कुछ वोटबटोरू, लोकप्रिय योजनाओं को छोड़कर बाकी योजनाएं निजी हाथों की ओर खिसकने लगीं. यह काम पश्चिम की तर्ज पर किया गया, जिनकी पहचान विकसित देश के रूप में थी. जहां शिक्षा, भोजन, आवास और बेरोजगारी जैसी समस्याएं उतनी भयावह नहीं थीं, जितनी वे भारत सहित दूसरे विकासशील एवं अल्पविकसित देशों में. पिछली ढाई दशाब्दियों से तो पूरी अर्थव्यवस्था ही पूंजीवाद के नाम लिख जा चुकी है.

घोषित रूप से समाजवादी भारत में पूंजीवाद ने बड़े नाजुक अंदाज में, उदारवाद के नाम से प्रवेश किया था. चूंकि अर्थव्यवस्था के पूंजीकरण को लेकर समाज में अनेकानेक अंतर्विरोध थे पहला अंतर्विरोध यहां की जाति व्यवस्था के रूप में था, जिसमें व्यक्ति को अरुचि और अनिच्छा के बावजूद पैत्रिक पेशे की ओर ढकेल दिया जाता था. अंततः वह उसको अपनी नियति मानकर, परंपरा की लकीर पीटते हुए काम करता था. चूंकि उसके पास भविष्य को लेकर कोई बड़ा सपना नहीं होता था, इसलिए साधारणतः उसके काम में रचनात्मक कौशल और मौलिकता का अभाव रहता था. यह कमी कथित ऊंची जातियों में भी थी. ‘पंडिज्जी’ संबोधन सुन, फूलकर कुप्पा हो जानेवाले ब्राह्मणपुरोहित कथावाचन को ज्ञान, रटंत को शिक्षा और कर्मकांडों को सभ्यता एवं संस्कृति मानकर, एक पोथीपत्रा पढ़ते हुए ‘अंधों में काना सरदार’ वाली कहावत को चरितार्थ करते रहते थे. वास्तव में ज्ञान से उनका नाता केवल रटे हुए को रटाने तक सीमित था. उन अंतर्विरोधों को दूर करने, देश को बड़े परिवर्तन के लिए तैयार करने के बजाए आननफानन में उदारीकृत अर्थनीतियों को लागू किया था. उसका दुष्परिणाम यह हुआ कि भारत विश्वउत्पादकों के लिए मंडी बन गया. छोटेमोटे लाखों उद्यम, जिनसे देश के करोड़ों लोगों को रोजगार मिलता था, धीरेधीरे बंद होने लगे. सरकार किसी भी दल की रही हो, उसकी व्यापार नीति करीबकरीब एक समान और पूंजीपतियों की हितरक्षक रही है. आज ‘मेक इन इंडिया’ की हवा में भी लघु, कुटीर उद्यमों तथा छोटे व्यवसायों की सुध लेने वाला कोई नहीं है. अब तो इसे देखकर ऐसा लगता है कि वह खुद पर सवारी गांठ रहे सहसवार के नियंत्रण से भी बाहर जा चुका है.

पूंजीवाद को मिली इस अप्रत्याशित सफलता का राज? कौनसा विचार है जिसने नईपुरानी सभी पीढि़यों को अपने मोहपाश में जकड़ लिया है? जवाब है, कोई नहीं. पूंजीवाद की सफलता का एकमात्र रहस्य है कि वह अपने उपभोक्ताओं को विचारधाराओं के दबाव से मुक्त करता है. परंपरागत सामाजिक मूल्यों के के स्थान पर वह उत्पादकउपभोक्ता के संबंधों को ले आता हौ. ‘जिन चीजों से मनुष्य को सुख प्राप्त हो, उन्हें प्राप्त करने का उसे अधिकार है.’—यह धारणा पूंजीवाद का आदर्श है. यह धारणा मनुष्य और पशु के अंतर को मिटाती है. समाज को उत्पादक और उपभोक्ता में बांट देती है. उत्पादक का सुख अधिकतम मुनाफे में निहित होता है. इसलिए अपने सुख की तलाश में बाजार में पहुंचे उपभोक्ता, बहुसंख्यक होने के बावजूद, उत्पादक की अधिकतम लाभ में अपना सुख खोजने की मानसिकता के विरुद्ध कोई नैतिक दबाव नहीं बना पाते. 1751 में फ्रांस के अर्थशास्त्री फ्रांसिस केने ने पहली बार ‘लेजेज फेयर’ पद का उपयोग कर, उद्योगों को नियंत्रण मुक्त करने की सलाह दी थी. आगे चलकर एडम स्मिथ ने केने की इस मान्यता को तर्कसम्मत ढंग से आगे बढ़ाया. वे उद्योगों को नियंत्रण मुक्त करने की मांग कर रहे थे, क्योंकि उन्हें उद्यमों की स्वतंत्रता में ही राष्ट्र हित नजर आता था. वे भूल गए थे कि उत्पादकों को नियंत्रण मुक्त करने के पीछे एडम स्मिथ का ध्येय राष्ट्रीय उत्पादन में वृद्धि करना था, न कि अर्थव्यवस्था को कुछ पूंजीपतियों के हाथों में सौंप देना. इसलिए उसने ‘वैल्थ आ॓फ नेशन’ लिखा था, न कि ‘वैल्थ आ॓फ कैपीटलिस्ट’. नीतिनिर्माण की दृष्टि से तत्कालीन राजनीतिज्ञों की भूमिका किसी भी पूंजीपति की अपेक्षा अधिक सामथ्र्यशाली थी. वे राष्ट्रहित के अनुसार आवश्यक निर्णय लेने के लिए पूर्ण स्वतंत्र थे. मगर कुछ ही दिनों में औद्योगिक संस्थानों को दी गई स्वतंत्रता सरकार की सीमा बनने लगी. देशहित के निर्णय पूंजीवादी संस्थानों के निर्देश पर, उनके हितों को देखकर लिए जाने गले. भारत में यह आपाधापी के साथ, कतिपय भौंडे तरीके से हुआ.

हमारे नेतागण ‘मेक इन इंडिया’ का नारा लगाते हैं. 56 इंची सीने का दावा करते हैं, मगर इस तथ्य को नजरंदाज कर देते हैं कि भारतीय बाजार चीनी और दूसरे विदेशी उत्पादों से भरे पड़े हैं. इनमें चीन का तो इतना दबदबा है कि सस्ते खिलौने, इलेक्ट्रोनिक्स, मोबाइल, कंप्यूटर, टेलीविजन से लेकर छोटीछोटी चीजें जैसे दर्पण और बच्चों की काॅपी, कलम, पेंसिल, वर्कबुक तक चीन से आयात की जा रही हैं. मंडी में जाओ तो फल और सब्जियां तक आयातित मिल जाएंगी. उन्हें कौन बताए कि देशभक्ति हवा में नहीं तैरती, लोगों के व्यवहार में बसती है. वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं के इस दौर में जो देश बाजार में नहीं होता, उसकी हैसियत समाज में भी घट जाती है. ऐसा देश नागरिकों के आत्मसम्मान का सबब नहीं बन पाता. वैसे भी पुरानी कहावत है कि लोग जिसका खाते हैं, गुण भी उसी के गाते हैं. एक समय था जब देश में बाजार में जापान के उत्पाद छाये होते थे. उच्चगुणवत्ता युक्त वे उत्पाद भारतीयों के मन में जापानी प्रौद्योगिकी के बारे में एक सकारात्मक छवि का निर्माण करते थे. इसलिए जापानियों की कमर्ठता और अनुशासनप्रियता के किस्से उन दिनों आम हुआ करते थे. आजकल बाजार पर चीन का कब्जा है. इसलिए हम व्यवहार में देख सकते हैं कि जापान हमारे लिए एक भूला हुआ देश बनता जा रहा है. जनसाधारण तक चीन के जो उत्पाद पहुंचते हैं, वे घटिया गुणवत्ता के होते हैं. चीन के बारे में नागरिकों की राय भी एक गैर भरोसेमंद देश की है. दरअसल हम ऐसे राष्ट्रवादियों की सरकार के इकबाल में रह रहे हैं जहां बाजार में राष्ट्रीय उत्पादों का टोटा है. इसका नकारात्मक प्रभाव हमारे राष्ट्रीयताबोध पर पड़ा है. पिछले 14 वर्षों में देश से 61000 करोड़पतियों के पलायन की घटना भी इसी प्रवृत्ति की संकेतक है. ऐसी घटनाएं यदि सरकार की नींद खराब नहीं करतीं तो समझ लेना चाहिए कि वे सरकारें देश की होकर भी देश के लिए काम नहीं कर रही हैं. वे या तो अपने नेताओं के स्वार्थ के लिए काम कर रही हैं, अथवा उन पूंजीपतियों के लिए जो उन्हे सत्ताकेंद्र तक पहुंचाने में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं. इसके लिए वे अकेले जिम्मेदार भले न हों, लेकिन सुधार की कोशिश करने के बजाए इसे और आयातनिर्भर बना देना चाहते हैं. हमारी प्रथम दर्जे की प्रतिभाएं परराष्ट्रों के अर्थतंत्र को मजबूत करने के लिए नईनई योजनाएं बनाती हैं. और औसत दर्जे की प्रतिभाएं हैं, वे उनके लिए बाजार का काम देखती हैं. पिछले कुछ दशकों में भारतीय शिक्षा ने जितने सेल्समेन इस देश को दिए हैं, वह अपने आपमें विश्वरिकार्ड है.

वे दिन गए जब युद्ध सीमाओं पर लड़े जाते थे. दुनिया बदल चुकी है. इन दिनों राष्ट्र की भूमिकाएं अब राष्ट्राध्यक्ष तय नहीं करते. उन्हें मनमाफिक भूमिका निभाने के लिए पूंजीवादी कंपनियों की ओर से बाध्य किया जाता है. आदमी का मोल समाप्त हो चुका है. मोल संसाधनों का है. इसलिए नई युद्धनीतियां कूटनीतिपरक होती हैं. वे संसाधनों पर अधिकार को हड़पने के लिए बनाई जाती हैं. इस लड़ाई में चीन भारत से बहुत आगे है. हम भले ही सीमा पर चीन को उसकी गीदड़भभकियों से बाज आने की सलाह दे रहे हों, अर्थव्यवस्था के मैदान में वह हमारे घर में घुसकर हमें मात दे रहा है और हमारे नेता रेत में गर्दन दबाए शुतुरमुर्ग की भांति खुद को धोखा दिए जा रहे हैं. सतरहवीं शताब्दी में मानवमुक्ति के जितने भी शब्द, मुहावरे, उपकरण और औजार चुने गए थे, इस दैत्य के आगे, एकएक कर वे सभी बेअसर सिद्ध हो रहे हैं. कमी उन विचारों की नहीं, विचारहीनता को अपनी जीवनशैली बना चुके समाजों की थी. वे तार्किकता और उन निष्ठाओं से निरंतर परे हटते गए, जो उनके विकास की आधारशिला बनी थीं. इस संबंध में भारतीय विरोधाभास छिपे नहीं हैं. हमारे यहां पश्चिम से मशीनीकरण तो उधार लिया गया. लेकिन उन विचारों से पूरी तरह कन्नी काट ली, जो वहां मशीनीकरण की समस्याओं से जूझते हुए, उनके समाधान की चाहत में विकसित हुए थे. परिणामस्वरूप समाज तथा हमारे व्यवहार में विचारशून्यता पसरती गई, जो आगे चलकर उपभोक्तावाद के समाज में पैठ बनाने में मददगार बनी. मसलन जेरेमी बैंथम का उपयोगितावादी सिद्धांत निरे भोग का, कोरा उपभोक्तावादी दर्शन नहीं था. वह खुशियों पर खास वर्गों के एकाधिकार का विरोधी था. वह शताब्दियों से वंचित रहे समाज के अधिकारों का समर्थन करते हुए उसे मुख्य धारा में शामिल करने का पक्षधर था. उससे पहले राज्य धार्मिक आचारसंहिताओं से अनुशासित होते थे. बैंथम ने पहली बार विधि के न्याय का पक्ष लिया था. इसके लिए आधुनिक न्याय प्रणाली बैंथम की ऋणी है. सामाजिक न्याय की आधुनिक संकल्पना को हम बैंथम के उपयोगितावाद और विधि के दर्शन की अवधारणा के विकास के रूप में देख सकते हैं. उसका आदर्श कथन था—‘अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख.’ उपयोगितावादी विचारकों के अनुसार दुनिया में कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जिसका मानव कल्याण के हित में उपयोग वर्जित हो. जो है, जिसकी उपयोगिता है, उसपर समूची मनुष्यता का अधिकार है. न तो कोई व्यक्ति विशेष है, न ही तिरष्कृत. बाजार ने उपयोगितावाद को उपभोक्तावाद में बदल दिया, जिसमें ऐसा जताया जाता है कि जीवन का अभीष्ट केवल सर्वोत्तम का भोग करना है, उसके कोई और सरोकार नहीं हैं. विचार शून्यता के परिवेश में यह पूर्ण स्वाभाविक था.

बैंथम ने जनसाधारण तक सुख की समान उपलब्धता सुनिश्चित करने को राज्य का कर्तव्य बताया था. इसके लिए उसने कानून के राज्य का समर्थन किया. जिन दिनों पूरा यूरोप चर्च से अनुशासित होता था, कानून के राज्य की बात करना बहुत बड़ी बात थी. इसकी शुरुआत पूर्ववत्र्ती विचारकों द्वारा हो चुकी थी. बैंथम ने उसको विधिक आधार दिया, साथ ही लागू भी कराया. पूंजीवाद की मान्यता रही कि सुखसुविधाएं उसकी जिसकी जेब में पैसा है. जो उनके मूल्य का भुगतान कर सकता है. बैंथम के आदर्श था, ‘अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख.’ सिक्का शक्तिशाली पूंजीवाद का चला. बैंथम का सिद्धांत केवल अकादमिक क्षेत्रों तक सिमटकर रह गया. देखते ही देखते, ‘अधिकतम लोगों को अधिकतम सुख’ का विचार ‘संपन्नतम व्यक्तियों को अधिकतम वैभवविलास’ में बदल गया. पूंजी या धन को सुविधाओं के साथसाथ सुख को अर्जित करने का पैमाना मान लिया गया. सामाजिक लाभ की संकल्पना मौद्रिक लाभ तक सीमित होकर रह गई. इससे मानवसंबंधों पर पूंजी को वरीयता मिलने लगी. खुद की स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए पूंजीवाद ने समाज में जो भी, जब भी मिला, सभी का अपने स्वार्थानुकूल इस्तेमाल किया. कानून, न्याय, अदालत, व्यक्ति स्वातंत्रय, मानवाधिकार, उपभोक्ता अधिकार, लोकतंत्र सब पूंजीवाद के हितों के अनुकूल ढलते गए. उपयोगितावाद, सुखवाद और मानवतावाद जैसी विचारधाराएं उच्चमानवीय आदर्शों को केंद्र में रखकर गढ़ी गई थी. उनमें किसी भी प्रकार के वर्चस्ववाद को नकारने की सर्वसाधारणीय वांछा शुरू से ही स्पष्ट थी. पूंजीवाद एक और तो उपभोक्ता वस्तुओं की आधुनिकतम रेंज बाजार में उतारता रहा, संस्कृति के क्षेत्र में वह ‘प्राचीनतम को महानतम’ सिद्ध करने में सहायक बना. पोंगापंथी पुरोहित इस काम को लगातार अंजाम देते रहे. यंत्रों पर निर्भर समाज में भावुक और संवेदनशील होना अविवेकपूर्ण तथा दुर्बलता की निशानी कहा जाने लगा. मानवाधिकार, स्वतंत्रता, व्यक्तिस्वातंत्रय जैसी जितनी भी चेतनाप्रधान अभिव्यक्तियां थीं, उन सभी को पूंजीवाद ने अपनाया अवश्य, मगर पूरी तरह से निस्तेज कर, स्वार्थानुसार अनुकूलन करते हुए. ताकि वे अंधानुकरण और स्तुतिगान के अलावा कहीं और सहायक न हो सकें. मानवीकरण के इन माध्यमों का अपने पक्ष में अनुकूलन करते हुए पूंजीवादी अर्थतंत्र के लक्ष्य को मौद्रिक लाभ तक सीमित कर, केवल और केवल एक शब्द को स्थापित करता गया. उदारवादी अर्थतंत्र की दृष्टि में वह पवित्रतम, मार्गदर्शक, परमकल्याणकारी शब्द है—मुनाफा. आखिर ऐसा क्यों हुआ कि धर्मदर्शन, संस्कृति, परंपरा आदि मानवसभ्यता और जीवन को मर्यादित करने वाली जितनी भी संस्थाएं और संगठन थे, सब के सब पूंजी के आराधन में लग गए? यहां तक कि इसके लिए राष्ट्रीय हितों की बलि भी दी जाने लगी. इसके कारणों तक पहुंचने के लिए हमें भारतीय संस्कृति और सभ्यता की पड़ताल करनी पड़ेगी. विशेषकर डेढ़दो शताब्दी पहले के इतिहास में जाना होगा.

1857 के भारतीय स्वाधीनता संग्राम की बात करें. उस समय तक भारत लगभग 400 वर्ष पराधीनता में गुजार चुका था. प्रथम स्वाधीनता संग्राम के बाद भारत पर जब ब्रिटिश राज्य हुआ तथा मुस्लिमों के हाथ से सत्ता जाने पर भारतीय अभिजात वर्ग ने प्रशंसा व्यक्त की थी, जबकि शासक बदल जाने से भारतीयों की राजनीतिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था. वे पहले की तरह ही परतंत्र थे. वह परतंत्रता पहले से कहीं अधिक परेशान करने वाली इसलिए भी थी कि 1857 में लगभग 25 करोड़ भारतीयों पर मात्र कुछ हजार अंग्रेज शासन चला रहे थे. मुस्लिम शासकों के जमाने में यह बात नहीं थी. इसलिए कि इस्लामिक जिहादियों के भारत आक्रमण से पहले यहां सूफी संतों, औलियाओं के रूप में इस्लाम दस्तक दे चुका था. उसने जाति के आधार पर बुरी तरह से बंटे समाज के निचले वर्गों में काफी पैठ पैदा कर ली थी. उसके फलस्वरूप लोग इस्लाम के प्रति आकर्षित हो रहे थे. बाद में भी इस्लाम के शासकों ने भारतीय जनजीवन को प्रभावित करने की कोशिश नहीं की. चारपांच शताब्दी के इस्लामिक शासन में भारत का इलीट वर्ग राजनीतिक और आर्थिक लाभों के लिए मुस्लिम शासकों से जुड़ा था, जबकि जनसाधारण, विशेषकर समाज के निचले जातिवर्गों के लिए के लिए वह उनकी लुप्त अस्मिता की पहचान का मसला था, जिसे वे इस देश में जातीय विभाजन के कारण शताब्दियों से सहते आए थे. ब्राह्मण एवं पुरोहित वर्ग को केवल अपने धर्म एवं संस्कृति की चिंता थी. शासक का धर्म और चरित्र क्या है, इससे उन्हें कोई संबंध न था. मुगल शासकों के पराभव तथा उनके स्थान पर अंग्रेज शासकों के आने से इलीट वर्ग प्रसन्न था. इसलिए कि मुगल सभ्यता भारतीय सभ्यता के सापेक्ष पिछड़ी हुई थी, जबकि औद्योगिकीकरण के कारण यूरोपियन सभ्यता तीव्र गति से विकासमान थी. अंग्रेज इस देश में व्यापार के लिए आए थे. मगर उनके भारत आगमन से पहले ही यूरोपियन औद्योगिक क्रांति की खबरें शेष दुनिया को चमत्कृत कर रही थीं. भारत का अभिजात वर्ग उसके प्रति आकर्षित था और एक तरह से उस सभ्यता को अपनाने के लिए उतावला भी.

गौरतलब है कि भारत का प्राचीन गौरव कम न था. प्राचीन भारतीय सभ्यता अपनी समकालीन सभी सभ्यताओं के मुकाबले बहुत अधिक विकसित भले न हो, मगर उसे पिछड़ा हरगिज नहीं माना जा सकता. ढाईतीन हजार वर्ष पहले भारतीय मेधा ने विश्वमेधा को चमत्कृत करते हुए उसपर अपना प्रभाव छोड़ा था. लेकिन परतंत्रता के लंबे दौर में वह निरंतर क्षरणशील होकर अपना तेज खो चुकी थी. दूसरों को तो दूर उसे खुद अपनी वास्तविकता की पहचान तक न थी. अतः 1874 के आसपास जब यूरोपियनों ने अपनी सत्ता के स्थायित्व के लिए भारतीय सभ्यता और इतिहास को समझना आरंभ किया, तो सबसे ज्यादा चमत्कृत होने वालों में वे लोग थे, जिनपर इस सभ्यता के बौद्धिक नेतृत्व की जिम्मेदारी थी. इसलिए कि वे अपना कर्तव्य भुलाकर केवल चाटुकारिता को अपने आचरण में ढाल चुके थे; और सत्ता के इर्दगिर्द रहकर उसका लाभ उठाने में प्रवीण थे. उस समय तक दर्शन की जगह कर्मकांड छा चुका था. जातिवाद का बोलवाला था और रूढि़यों में जकड़ी सभ्यता अपने अतीत को पूरी तरह बिसराए हुए थी. पढ़ालिखा वर्ग अंग्रेजों की कृपा प्राप्त करने के लिए अपने ही देशवासियों पर जुल्म ढा रहा था. वह एक प्राचीन जाति और वर्ग में बंटी संस्कृति का अपेक्षाकृत विकसित संस्कृति के आगे समर्पण था. भारतीय समाज चूंकि छोटेछोटे जाति, वर्गों में बुरी तरह बंटा हुआ था. जाति व्यवस्था की जकड़ बहुत गहरी थी. इसलिए अंग्रेजों के आगमन पर खुश होने के विभिन्न वर्गों के अलगअलग कारण थे. अभिजात वर्ग अंग्रेजों की कृपा शासन के निकट रहने, उनके जैसी जीवनशैली प्राप्त करने के लिए चाहता था. औद्योगिकीकरण के बाद यूरोप की अर्थव्यवस्था का जादुई तेजी से विकास हुआ था. उच्च वर्गों की संपन्नता बहुत तेजी से बढ़ी थी. भारतीय सामंतवर्ग में उसके प्रति विशेष आकर्षण था. यूरोपीय उद्यमियों की भांति वे भी आननफानन में संपन्नता बटोर लेना चाहते थे; और इसके लिए कुछ भी करने को तैयार थे. समाज के पढ़ेलिखे वर्गों के एक तबके की श्रद्धा यूरोप में चले बौद्धिक आंदोलनों के कारण थी, जिसमें वे अपने मानसम्मान और अस्मिता की सुरक्षा का सपना देखते थे. नए विचारों की रोशनी में उत्पीडि़त वर्ग भी अपनी अस्मिता के संघर्ष को खड़ा करना चाहते थे. उसकी शुरुआत ज्योतिबा फुले महाराष्ट्र से कर ही चुके थे. उसके लिए अंग्रेजी शिक्षा नए विचारों के साथ मुक्तिसंदेश की वाहक बनी हुई थी.

लगभग दो शताब्दियों के ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय समाज को अपने भीतर झांकने का अवसर मिला था. हालांकि उस समय भी समाज का एक वर्ग परिवर्तनों के विरोध में अड़ा था. जबकि पढ़ालिखा वर्ग अंग्रेजों से प्रभावित था. ज्ञानविज्ञान की यूरोपियन शैली उसको आकर्षित करती थी. यह प्रभाव इतना गहरा था कि औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के लिए भारत में वही रास्ते अपनाए गए जो अंग्रेजों के थे. यह स्वाभाविक भी था. ब्रिटिश साम्राज्यवाद के मूल में आर्थिक साम्राज्यवाद की लालसा थी. वह एक ऐसा राजनीतिक तंत्र था जो जनता की विकास की आकांक्षा तथा पंूजीपतियों की अतिमहत्त्वाकांक्षाओं के योग से बना था. अलगअलग दिखने के बावजूद उसमें अन्योन्याश्रितता का भाव था. उसकी कमी थी कि उसमें उत्पादन में भागीदारी सभी वर्गों की थी, मगर लाभानुपात शीर्ष की ओर तेजी से बढ़ता जाता था. इससे मध्यक्रम और निचले वर्गों में भारी असंतोष था. उस असंतोष के फलस्वरूप उपजे विद्रोह ने ही पश्चिम में प्रतिरोध के नए हथियारों को जन्म दिया था. देशी सभ्यता और संस्कृतिसमर्थक गांधी ने भी अंग्रेजों से काफी ग्रहण किया. उन्होंने समय रहते ही समझ लिया था कि इस नए किस्म के साम्राज्यवाद को गैरपरंपरागत हथियारों से ही चुनौती दी जा सकती है. ‘सत्याग्रह’ नामक उनका औजार थोरो के ‘सिविल डिसओविडियंस’ का भारतीयकरण था. उसने लोगों को अपनी शक्ति का आकलन करने तथा आजादी के लिए एकजुट होने के लिए प्रेरित किया. फलस्वरूप देशभर की जनता स्वाधीनता की मांग लेकर घरों से निकल पड़ी.

अच्छा नेता जनता का मार्गदर्शन करता है. लेकिन सबसे अच्छा नेता वह होता है जो लोगों को उनके भीतर छिपी शक्तियों से परचाता है. उन शक्तियों को बाहर लाकर उपयुक्त प्रेरणा जगाता हे. गांधी ने यही जादू इस देश की जनता के साथ किया था. ज्ञात हो कि धर्म, जातपात में बंटा भारतीय समाज कोई जड़ समाज नहीं था. कभी रहा भी नहीं है. परिवर्तन की कामना विशेषकर उत्पीडि़त वर्ग में हमेशा से विद्यमान रही है. उसके लिए शीर्ष नेतृत्व आवश्यक नहीं था. बल्कि जनता के भीतर से ही नेतृत्वकारी शक्तियां स्वयंस्फूर्त्त भाव से निकल आती थीं. वैदिक कर्मकांड के विरोध में जैन और बौद्ध दर्शन के उदय से बहुत पहले ही पूर्ण कस्सप, निगंठ नागपुत्त, अजित केशकंबली, संजय वेल्ट्ठिपुत्त, कौत्स, मक्खलि घोषाल आदि के बौद्धिक अवदान स्वरूप भौतिकवादी परंपरा इस देश में पनप चुकी थी. उनसे प्रेरणाओं के आधार पर ही जैन और बौद्ध दर्शन का विकास हुआ. जैन दर्शन का प्रसिद्ध ‘स्याद्वाद’ का सिद्धांत जिसे आज कुछ विद्वान क्वांटम थ्योरी के निष्कर्ष ‘अनिश्चितता का सिद्धांत’(थ्योरी आ॓फ अनसर्टेनिटी) से जोड़ते हैं, की मूल अवधारणा संजय वेल्ट्ठिपुत्त से प्राप्त हुई थी. साधना के आरंभिक दौर में महावीर स्वामी और मक्खलि घोषाल साथसाथ थे. कालांतर में दोनों अलगअलग हुए तो मक्खलि ने आजीवक संप्रदाय और महावीर स्वामी ने जैन धर्म की नींव डाली थी. मक्खलि घोषाल और बाकी विचारकों के बारे में भारतीय साहित्य में अधिक प्रसंग प्राप्त नहीं होते. लेकिन इतना महत्त्वपूर्ण उल्लेख हमें प्राप्त होता है कि बौद्ध धर्म के आरंभिक दिनों में आजीवक संप्रदाय को चाहनेवालों की संख्या बौद्ध धर्म से कहीं अधिक थी. मक्खलि के बारे में प्रसेनजित ने बुद्ध से एक बार कहा था कि वह उसे(मक्खलि को) उनसे अधिक बुद्धिमान मानता है. क्या इसके पीछे कोई सामाजिक कारण थे? इसे प्रमाणसहित कह पाना तो कठिन है. भारतीय समाज में व्याप्त जातीय भेदभाव को देखते हुए कुछ आकलन अवश्य लगाए जा सकते हैं. महावीर स्वामी और बुद्ध दोनों ही क्षत्रिय कुलों से आए थे. उन दिनों बलि, धार्मिक भेदभाव, अनावश्यक निषेधों की वजह से क्षत्रिय और ब्राह्मणों के बीच मनमुटाव बढ़ने लगे थे. इसलिए जब महावीर स्वामी और बुद्ध ने धर्मदर्शन में रुचि खोजने की कोशिश की तो तत्कालीन क्षत्रिय सम्राट उनकी ओर आकर्षित होते गए. आशय है कि न केवल आज बल्कि सहस्राब्दियों से भारतीय जनसमाज में परिवर्तन की वांछा रही है. उसके लिए उसे जब भी, जो भी अवसर मिला, उसका उपयोग किया है. चाहे वह निराकार की भक्ति हो अथवा सूफी परंपरा, कबीर हों या गांधी, जयप्रकाश नारायण हों या कांशीराम अथवा विश्वनाथ प्रताप सिंह समाज की परिवर्तन की चाहत, अलगअलग स्वरों से गूंजती रही है. इतिहास जनविद्रोहों से भरा पड़ा है. लेकिन यह भी सच है कि भारतीय दमित वर्गों का वास्तविक संघर्ष बाहरी लोगों से कम, अपने लोगों से अधिक रहा है. भारतीय समाज की परिवर्तन की उत्कट अभिलाषा का सबसे सार्थक उपयोग गांधी ने सत्याग्रह के दौरान किया था. जबकि डा॓. अंबेडकर जनमानस के मुक्तिस्वरों को आवाज दे रहे थे.

परंपरा और संस्कृति का गुणगान करनेवाला भारतीय समाज का अभिजात तबका अंग्रेजी शिक्षा और नई प्रौद्योगिकी से के प्रति भी आकर्षित था. इसलिए 1947 तक आतेआते भारत में अंग्रेजी राज और अंग्रेजी शिक्षा के समर्थकों की बड़ी फौज खड़ी हो चुकी थी. जिसे अपने अंग्रेजी ज्ञान पर गर्व था, वह अंग्रेजी ज्ञान एवं आधुनिक सभ्यता से वंचित अपने ही भाईबहनों को वह हेय दृष्टि से देखता था. उनीसवीं शताब्दी के अंतिम अंतिम दशकों में मध्यम मार्गी कांगेस की स्थापना मुख्यतः पढ़ेलिखे वर्ग को अंग्रेजी शासन से जोड़ने और जनाक्रोश पर नियंत्रण रखने के लिए की गई थी. एक प्रकार से वह अंग्रेजी शैली का ही संगठन था. धीरेधीरे वक्त बदला और जनता के दबावों में कांग्रेस को स्वराज की मांग पर उतरना पड़ा. उल्लेखनीय है कि ‘स्वराज्य’ और ‘स्वराज’ के आधार पर कांग्रेस में भी दो दल बन चुके थे. स्वराज्य की मांग करनेवाले कम संख्या में थे. उनमें से बड़ी संख्या उन नेताओं की थी, जो किसी न किसी प्रकार से ग्रामीण क्षेत्रों से आए थे और जिनकी प्रतिबद्धता अपने लोगों के साथ थी. कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में से एक दादा भाई नौरोजी हालांकि कांग्रेस की नर्म राजनीति की धारा का प्रतिनिधित्व करते थे. किंतु उनकी लिखी पुस्तक ‘पावर्टी एंड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया’ ब्रिटिश भारत की त्रासदी को बयान करती थी. पुस्तक में उन्होंने ‘ड्रैन थ्योरी’ को स्थापित किया था, जिसके अनुसार अंग्रेजों द्वारा विभिन्न रास्तों से भारतीय संपदा के दोहन तथा उसको इंग्लेंड ले जाने की बात कही थी. इस पुस्तक ने ब्रिटिश शासन के विरोध को तार्किक आधार प्रदान किया था. वे देश की अंग्रेजों से पूर्ण आजादी चाहते थे. ‘स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है.’ कहनेवाले तिलक इस वर्ग के अग्रणी नेताओं में से थे. उनके सापेक्ष गांधी चतुर बनिये की तरह अपनी और भारतीय समाज की स्वाधीनता की वांछा को तौल रहे थे. 1942 से पहले तक उनकी मांग ‘स्वराज’ तक सीमित थी. संभवतः पूरी तैयारी के बिना अंग्रेजों से कोई टकराव मोल लेना नहीं चाहते थे. वे मानते थे कि अंग्रेज इस देश का समाजार्थिक शोषण कर रहे हैं. ‘हिंद स्वराज’ का पहला संस्करण गुजराती में ‘हिंद स्वराज्य’ के नाम पर लिखा गया था. परंतु जब अंग्रेजों ने उस उस संस्करण को प्रतिबंधित कर दिया तो गांधी ने तुरंत पुस्तक का शीर्षक बदलकर उसका अंग्रेजी अनुवाद ‘इंडियन होमरूल’ नाम से प्रकाशित कराया, ‘हिंद स्वराज’ के नाम से प्रकाशित किया, जो कांग्रेस की मांग से मिलतीजुलती थी.

बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशक विश्वराजनीति में हलचल भरे थे. सोवियत संघ, जर्मनी, इटली, फ्रांस, चीन आदि देशों में राजनीतिक परिवर्तन जारी थे. इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण था, सोवियत संघ का कम्युनिज्म के घेरे में चले जाना. चीन में भी साम्यवादी शक्तियां प्रभावी थीं. वहां माओ के नेतृत्व में साम्राज्यवादी शक्तियों से संघर्ष जारी था. उसकी लाल सेना चीन के बड़े हिस्से को अपने अधिकार में चुकी थी. भारतीय बुद्धिजीवियों खासकर पढ़ेलिखे वर्ग पर साम्यवादी आंदोलन का गहरा प्रभाव था. उन्हें उसमें ब्रिटिश साम्राज्यवाद का तोड़ नजर आता था. बंगाल, केरल, पंजाब आदि प्रांतों के युवक सोवियत संघ जाकर वहां की राजनीतिक जमीन को समझने में लगे थे. रूस के साम्यवादियों का भी भारतीयों को भरपूर समर्थन था. वे इसे साम्यवादी आंदोलन की पूर्णता के रूप में देखते थे. इससे पूंजीवादी ताकतों में इस बात की चिंता स्वाभाविक थी कि यदि भारत भी साम्यवादी झंडे के नीचे आ जाता है तो एशिया के छोटेछोटे देशों को भी उसके प्रभाव में आते देर न लगेगी. वह यूरोप के बाकी देशों के लिए बड़ा खतरा हो सकता है, जिसके उस समय पूरे आसार थे. भारतीय स्वाधीनता आंदोलनकारियों की पहली खेप साम्यवादी रूस से काफी प्रेरित थी. उस समय के सभी प्रमुख नेता और बुद्धिजीवी उससे प्रभावित थे. महान समाज सुधारक राजा राममोहन राय स्वयं कार्ल मार्क्स से प्रेरित थे. वे मार्क्स से मिलने इंग्लेंड भी गए थे. लेकिन उनकी मार्क्स से मुलाकात न हो सकी थी. उस समय के प्रमुख नेता डा॓. हरदयाल, करतार सिंह सराबा आदि क्रांतिकारी नेताविचारकों पर रूस के साम्यवादी आंदोलन का असर था. भारत के सैकड़ों युवा रूसी जमीन पर रहकर क्रांति की शिक्षा ले रहे थे. यहां तक कि पूरी तरह भारतीयता के रंग में रंगे विवेकानंद पर भी साम्यवादी विचारधारा का प्रभाव था.

दूसरी ओर भारत में लाल झंडा न फहरने पाए, इसके लिए देश और विदेश में बड़ेबड़े कूटनीतिज्ञ सक्रिय थे. लाला लाजपत राय, भगत सिंह, राजगुरु जैसे क्रांतिकारियों के देश के युवावर्ग पर प्रभावी होने से रोकने के लिए बड़ा खेल खेलने की तैयारी हो रही थी. 1857 का संग्राम हिंदुओं और मुस्लिमों ने मिलकर लड़ा था. उस समय तक देश में सांप्रदायिक विभाजन जैसी बात न थी. अंगेज चाहते थे कि भारतीय अंग्रेजी सीखें. कम से कम इतनी कि सरकारी कामकाज में उनकी मदद ली जा सके, लेकिन साम्यवाद जैसी विचारधाराओं से उन्हें चिढ़ थी. सामरिक दृष्टि से भी अंग्रेज भारत को रूसी साम्यवाद के प्रभाव से बचाए रखना चाहते थे. इसलिए अंग्रेजी के प्रति सम्मोहित, मगर प्राचीन भारतीय संस्कृति में गहरी आस्था रखने वाले गांधी और रवींद्रनाथ ठाकुर जैसे व्यक्तित्वों को अतिरिक्त रूप से बढ़ावा दिया गया. यही कारण है कि महात्मा गांधी ने जब सत्याग्रह की शुरुआत की तो उन्हें अपने समय के सभी प्रमुख उद्यमियों का साथ मिला था. जमनालाल बजाज, घनश्यामदास बिड़ला, खेतान जैसे उद्यमियों और व्यापारियों से गांधी जी के आत्मीय संबंध थे. उनकी समृद्धि का अधिकांश विश्वयुद्धों की देन था. दोनों विश्वयुद्धों के दौरान गांधी भी, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में साम्राज्यवादियों के साथ थे. उल्लेखनीय है कि रूस ने अपनी स्वतंत्रता हिंसक क्रांति के माध्यम से ग्रहण की थी. चीन भी उसी दिशा में बढ़ रहा था. ऐसे में गांधीजी का अहिंसा का विचार केवल जमीनी सचाइयों की देन न होकर भारत को रूसी एवं चीनी प्रभाव से बचाने की कोशिश भी था. दूसरे शब्दों में गांधी की अहिंसा केवल साम्राज्यवादी अंग्रेजों का रक्षाकवच नहीं थी. वह भारतीय नवपूंजीपतियों एवं जमींदारों को उस भय से बचाने में सहायक थी, जो रूस तथा दूसरे देशों के रास्ते आ रहा था. दूसरे शब्दों में गांधी जितना काम भारतीयों के लिए कर रहे थे, उतना ही काम अंग्रेजों के लिए भी कर रहे थे. और चाहेअनचाहे वैसा ही काम भारतीय नवपूंजीपति वर्ग की रक्षा के लिए भी कर रहे थे, जिनके लिए स्वतंत्रता के मायने पश्चिमी प्रौद्योगिकी से गठजोड़ तथा उसके माध्यम से भारत की अर्थसत्ता पर कब्जा करने तक सीमित था.

यहां एक प्रश्न स्वाभाविक है कि महात्मा गांधी जो बडे़ उद्यमों में कटौती के पक्ष में थे, हाथ के उद्यमों तथा दस्तकारों को आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे, आखिर क्यों बिड़ला और बजाज जैसे उद्यमी उनके पीछे लगे हुए थे. बड़ी पूंजी का निषेध करनेवाले गांधी को अपने कार्यक्रमों के लिए पूंजीपतियों की ओर से चंदा आता था. साध्य एवं साधन दोनों की पवित्रता के समर्थक गांधी को उससे कोई विरोध क्यों नहीं था? क्या वह पूंजीपतियों का राष्ट्रप्रेम था? गांधीजी द्वारा चलाए गए स्वदेशी अभियान का लाभ सीधे पूंजीपतियों को पहुंचा था. खादी का लाभ उठाने वालों में बिरला घराना सबसे आगे था. बदले में वह उनका लाभ भी उठा रहा था. उल्लेखनीय है कि गांधीजी ने खादी को बढ़ावा देने के लिए मिल से बुने कपड़े का बहिष्कार किया था. बाद में अपनी राय में संशोधित करते हुए भारतीय मिलों से बुने कपड़े को उपयोग में लाने की छूट दे दी थी. यह गांधी की नीति में बड़ा परिवर्तन था. वे यदि इसकी अनुमति न देते तो भी मशीनीकरण की ओर बढ़ते भारत के कदम रुकनेवाले नहीं थे. इसलिए पूंजीपति गांधी जी का उतना ही समर्थन चाहते थे, जो उनको व्यावसायिक दृष्टि से लाभकारी हो. दरअसल गत शताब्दी के दूसरे दशक में जब दक्षिण अफ्रीका में सफलता के झंडे गाढ़कर गांधीजी हिंदुस्तान पहुंचे उस समय दुनिया में माक्र्स के विचारों की धूम मची हुई थी. रूसी क्रांति सफल हो चुकी थी. चीन का बड़ा भूभाग माओत्से तुंग की लाल सेना के अधिकार में था. लेनिन के सिपहसालार ट्राटस्की भारत में भी साम्यवादी क्रांति को सफल देखना चाहते थे. भारत के सैकड़ों युवा उससे उत्साहित थे. अंग्रेज अब सर्वविजेता कौम नहीं नहीं रह गई थी. भगत सिंह, सुभाष, नेहरू आदि पर साम्यवादी विचारों की छाया थी. अमेरिका में बसे भारतीय समानता और व्यक्ति स्वातंत्रय का संदेश भारत तक पहुंचा रहे थे. अब्राह्म लिंकन के नेतृत्व में वहां जो स्वाधीनता संग्राम लड़ा गया था, उसका अगला सफलतापूर्ण चरण फ्रांस में पूरा हुआ था. टामस पेन, थामस जेफरसन आदि ने, ने व्यक्ति मात्र की समानता, समानता और अधिकारों को लेकर आवाज उठाई थी. भारत में वही काम ज्योतिबा फुले और बाद में चलकर उनके सशक्त उत्तराधिकारी डा॓. अंबेडकर द्वारा किया गया. यही कारण है कि घबराए हुए भारतीय पूंजीपतियों ने धर्म भीरू और परंपरावादी गांधी की लुकाटी को चमकाते रहने में ही अपनी भलाई समझी थी. चूंकि आर्थिक और सामाजिक समानता के सवालों को राजनीतिक स्वतंत्रता के उत्साह में दबाया जा सकता था, इसलिए कांग्रेस ने सामाजिकआर्थिक स्वतंत्रता के प्रश्न को कोई महत्त्व नहीं दिया गया था. गांधी की राजनेता और धार्मिक संत की तस्वीर साथसाथ गढ़ी गई. भारतीय हिंदूमन जो सात सौ वर्ष की दासता से गुजर चुका था, अपनी पहचान को सम्मान देना चाहता था. इसलिए राष्ट्रीय भावनाओं की धार्मिक आर्थिकसामाजिक समानता जैसे शाश्वत मूल्यों पर संप्रदायवाद की जीत हुई. इस बीच भारतीय जनमानस पर गांधी का प्रभाव उत्तरोत्तर बढ़ता गया. गांधी तथा अन्य परंपरापोषी नेताओं की छत्रछाया में भारतीय उद्योगपति अपना काम करते रहे. कुल मिलाकर भारतीयता की बात करनेवाले हमारे तत्कालीन बड़े नेता, पूंजीवाद के प्रवेश को रोकने के बजाय उसकी पैठ बनाने में सहायक सिद्ध हुए.

स्वातंत्रयोत्तर भारत में पूंजी का हस्तक्षेप आजादी के समय से ही रहा. महात्मा गांधी की सफलता में उन पूंजीवादी ताकतों का बड़ा योगदान था. गांधीजी के आयोजनों में खर्च सामंतों और पूंजीवादी ताकतों का ही लगता था. स्वाधीनता आंदोलन में उन्होंने खादी का समर्थन किया था. स्वदेशी का जोरदार समर्थन करते हुए वे आगे बढ़े. दरअसल खादी और स्वदेशी में अंतर है. खादी की अवधारणा गांधीजी की गांव के आर्थिक स्वावलंबन से जुड़ी थी, जबकि स्वदेशी की सीमा में भारतीय उद्योग भी आ जाते थे. ‘हिंद स्वराज’ में गांधी ने मशीनों की आलोचना की थी. खादी मानवीय श्रम का सम्मान करती है. वह मानवीय कौशल को हस्तशिल्प और यंत्रशिल्प की स्पर्धा में भी मरने नहीं देती. व्यक्ति को उसके श्रम का पूरापूरा मूल्य मिले, यह व्यवस्था गांधी दर्शन में कहीं नहीं है. गांधीजी ने जब खादी का दर्शन दुनिया को दिया, वे चरखे के बारे में जानते नहीं थे. हिंद स्वराज पर अपने साक्षात्कार के दौरान उन्होंने यह स्वयं स्वीकारा था. उस समय तक खादी को ग्रामीण अर्थव्यवस्था के आधार के रूप में प्रस्तुत करने में कोई बड़ी आर्थिक समझ नहीं हो सकती. स्वयं गांधी जी ने इसका कोई दावा नहीं किया था. लेकिन गांधी की व्यापक लोकप्रियता के चलते इसका बड़े उद्योगों पर इसका असर पड़ना स्वाभाविक था. कालांतर में पूंजीपतियों के आग्रह या दबाव में ‘हिंद स्वराज’ के मूल कथ्य में कोई परिवर्तन न करनेवाले, पुस्तक के प्रथम संस्करण में आदमी को अपने हाथ का कताबुना कपड़ा पहनने का आग्रह करने वाले गांधी, 1931 में ‘भारतीय मिलों का कताबुना’ पहनने की अनुशंसा कर चुके थे. यानी खादी का स्थान स्वदेशी ले चुकी थी. स्वदेशी का मतलब है देश में बना हुआ. यह अपने आप में भावुक अवधारणा है. उसे बनाने के, बनाने का कारखाना लगाने के लिए किसका पैसा लगा है, तकनीक कैसी है, उसपर जोर नहीं देती. यानी स्वदेशी का समर्थन करते समय गांधीजी मशीनों की आलोचना के बारे में अपने तर्क को बहुत पीछे छोड़ चुके थे. यदि लंकाशायर का कोई पूंजीपति सस्ते श्रम की चाहत में भारत में कोई कारखाना, अत्याधुनिक श्रमविरोधी मशीनों के साथ लगाए तो उसका बुना कपड़ा स्वदेशी है. तथा गांधीजी का उससे विरोध नहीं था. इसलिए वे खादी की अपनी अवधारणा में संशोधन कर, स्वदेश निर्मित वस्तुओं के पक्ष में तर्क देने लग जाते हैं. भले ही लंकाशायर का वह पूंजीपति अपने देश के मुकाबले यहां के श्रमिकों को बहुत कम वेतन पर रख रहा हो. गांधी जी जीवन को धार्मिक नजरिये से देखते हैं. आर्थिक दृष्टिकोण उनके लिए अधिक महत्त्व नहीं रखता. जो पूंजीपति गांधीजी के आगेपीछे लगे थे, उन्हें इससे मतलब भी नहीं था. बल्कि प्रकारांतर में धार्मिक जड़ता उनके लिए मददगार ही थी.

गांधी बारबार धार्मिक आजादी की बात करते रहे. आर्थिक स्वावलंबन के लिए उन्होंने ग्राम स्वराज, खादी एवं ग्रामोद्योग का नारा दिया. वैसे भी उन दिनों शिक्षा और शहरों से कटे भारतीय गांवों के मशीनीकरण की संभावना भी नहीं थी. भीषण गरीबी के कारण लोगों का क्रयसामथ्र्य अत्यधिक कम था. उनमें निवेश करने से पूंजीपतियों को कोई तात्कालिक लाभ होनेवाला नहीं था. इसलिए इस बात को खूब उछाला गया. गांधी ब्रिटेन के सम्राट के बुलाने पर गए तो एक लंगोटी में थे. इसके लिए उनकी प्रशंसा भी की जाती है. बात है भी प्रशंसा की. उन्होंने कहा था कि वे भारत की जनता के प्रतिनिधि हैं. एक नेता को ऐसा ही होना चाहिए. ऐसे सुनने में भी अच्छा लगता है. लेकिन क्या इससे यह जाहिर नहीं होता कि इससे गरीबी का महिमा मंडन होता है. क्या इससे यह नहीं लगता कि कि गांधीजी ने गरीब भारत की अभावग्रस्तता को चुनौती मानने के बजाय उसको उसी रूप में स्वीकार कर लिया था. वैसे भी उनके ऐजेंडा में राजनीतिक आजादी प्रमुख थी. समाजार्थिक आजादी के सवालों को वे स्वातंत्र्योत्तर भारत में सुलझाना चाहते थे. इसलिए गांधीजी की वह घटना एक गरीब देश के स्वाभिमान का प्रतीक तो बन सकती है, लेकिन उसके माध्यम से गरीबी के महिमा मंडन का जो संदेश जाता है, उससे आगे चलकर नुकसान ही हुआ. प्रकारांतर में यह नामक एक और हथियार मिल गया. आशय है कि गांधी और गांधीवाद, मशीनीकरण को रोकने और त्याज्य बताने के बावजूद पूंजीवाद पर नकेल कसने में नाकाम रहे हैं. पूंजीवाद को नाथने के लिए गांधी ने ट्रस्टीशिप का विचार रखा था. ऊपर से देखने पर यह आदर्श विचार प्रतीत होता है. मगर व्यवहार में यह आर्थिक विभाजन को न्यायसम्मत मान देती है. वह दान की व्याख्या को जन्म देता है. जिसके आधार पर समाज में परजीवी वर्ग को फलनेफूलने का अवसर मिलता है. जिस ग्रामस्वराज को वे ग्रामीण परिवेश में फलतेफूलते देखना चाहते हैं, उसकी परिणति सामंतवाद में होती रही है. पूंजीवाद चूंकि लोकतंत्र का पक्ष लेता है, जिसमें उसका अपना हित भी है. जबकि सामंतवाद में पूंजीपतियों पर नियंत्रण केवल मनमानी और बलप्रयोग द्वारा होता था. इसलिए पूंजीवाद की सफलता के लिए सामंतवाद को पुराना, दकियानूसी शासन पद्धति वाला और लोकतंत्र विरोधी कहकर बदनाम करने का काम किया गया. बहरहाल सामंतवाद जिन कमजोरियों का शिकार था, उसका पतन स्वाभाविक था.

पूंजीवाद को नाथने की कोशिश गत दो सौ वर्षों में होती रही है. निश्चय ही इसका केंद्र यूरोप था. मगर उसकी धमक दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों तक सुनाई पड़ी थी. पूंजीवाद को नाथने के लिए साहचर्य, अराजकतावाद, श्रमिक संघवाद, संगठनवाद, सहजीवितावाद जैसे विचार आए. उन सभी की विशेषता थी कि वे श्रम को महत्त्व दिए जाने पर जोर देते थे. सभी का आग्रह था कि पूंजीस्वामी को पूंजी के आधार पर अतिरिक्त लाभ का अधिकारी बनाने से रोका जाए और आपसी व्यवहार में मौद्रिक विनिमय को न्यूनतम किया जाए. संक्षेप में ये सभी धनबल के स्थान पर श्रमबल को खड़ा कर देना चाहते थे. संगठन में ताकत है. पूंजीवाद के सुरसई आतंक पर केवल संगठित जनशक्ति रोक लगा सकती है, ऐसा इस वर्ग का विश्वास था. इनके बीच एक समानता यह भी है कि वे लोकतंत्र और व्यक्तिमात्र की इच्छाओं का समर्थन करते हैं. व्यक्ति और समाज से उनकी अपेक्षा होती है कि वे एकदूसरे की इच्छाओं का सम्मान करते हुए उपलब्ध संसाधनों के न्यायपूर्ण बंटवारे से सभी वर्गों के लिए काम करें. वे मानते हैं कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति की राय महत्त्वपूर्ण है. इसलिए निर्णय में सभी की साझेदारी होनी चाहिए. व्यक्ति की अपनी आवश्यकता भी होती है. इसके लिए उसको अपने अलावा दूसरों के उत्पाद पर भी निर्भर रहना पड़ता है. विडंबना यह है कि सुख, व्यक्तिगत आकांक्षाओं और मानवाधिकार को लेकर, समाजवाद के आधुनिक प्रकल्पों तथा पूंजीवाद में बहुत अंतर नहीं है. व्यक्ति कल्याण के जिस लक्ष्य को लेकर समाजवाद आगे बढ़ता है, पूंजीवाद भी उन्हीं के आधार पर अपना औचित्य सिद्ध करने में लगा रहता है. समाजवाद की भांति पूंजीवाद भी व्यक्तिस्वातंत्र्य एवं मानवाधिकार का बढ़चढ़कर गुणगान करता है, किंतु उसकी कमजोरी है कि वह इसको सस्थाओं के माध्यम से लागू करना चाहता है. संस्थाओं की जटिलता और नियमादि उनकी कार्यप्रणाली को जटिल बनाते हैं जिससे जनसाधारण के लिए संस्थाओं का लाभ उठा पाना बहुत कठिन होता है. इससे विशेषज्ञ संस्कृति को बढ़ावा मिलता है. उसके फलस्वरूप समाज में बौद्धिक आधार पर विभाजन को स्वीकृति मिलने लगती है. यही समाज के आर्थिक आधार पर विभाजन का बुनियादी आधार है, जिसे पूंजीवाद निहित स्वार्थ के लिए पोषितपल्लवित करता है.

पूंजीवाद में मनुष्य की नैतिक प्रेरणाओं को जगाने के लिए कोई कोई तंत्र नहीं होता. न ही वह इस तरह का कोई प्रयास करता है. इसके उलट पूंजीवाद सुखसुविधाओं के नाम पर ऐसे उपकरण और संसाधन बाजार में उतार देता है जो मनुष्य के भीतर अकेलेपन को संपूर्णता के साथ जी लेने का भ्रम पैदा करते हैं. इससे समाज में संवाद के अवसर घटते जाते हैं. परिणामस्वरूप विभिन्न इकाइयों के बीच संदेह और अविश्वास को बढ़ावा मिलता है. व्यक्ति के अकेलेपन को बांटने, उसकी भरपाई के नाम पर पूंजीवाद बहुत चतुराई से बाह्यः संस्थाओं को ले आता है. जिससे समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संदेह और अविश्वास स्थायी रूप लेने लगता है. इससे सामाजिक विक्षोभ पैदा होते हैं. उस समय वह मध्यस्थता का नाटक करते हुए ऐसे रेफरी की भूमिका में होता जिसका टीमों की हारजीत से कोई नाता नहीं होता. उसकी नजर अपने मुनाफे और प्रोत्साहनलाभ पर टिकी होती है. इसके बावजूद पूंजीवाद के समर्थक शांत नहीं बैठते. वे मनुष्य के अकेलेपन को बढ़ाने, समाज में अविश्वास और संदेह पैदा करने के लिए चोरीचोरी हर समय, हर कालखंड में काम करते रहते हैं. इसलिए कि अकेलेपन की अनुभूति और समाज से डरे हुए व्यक्ति को पूंजीवाद के चंगुल में फंसाना बहुत आसान होता है. उसे पूंजीवाद द्वारा खड़ी की गई संस्थाओं के मोहपाश में आसानी से फंसाया जा सकता है. पूंजीवाद के लिए मुनाफा ही मोक्ष है. उसकी हर बहस लाभ पर आकर दम तोड़ लेती है. स्वयं को वैज्ञानिक सोच और नवीतम ज्ञान का समर्थक बताने वाला, नवीनतम शोध एवं प्रौद्योगिकी के आधार पर अहर्निंश काम करने वाला पूंजीवाद, मुनाफे के लिए बुरी नजर से बचाने वाले ‘नजर सुरक्षा कवच’ तथा ‘शनियंत्र’ आदि बेचता है. पाखंड के कारोबार को तरहतरह से बढ़ावा देता है. मुनाफे के लिए उसे मौत को प्रायोजित करने का अवसर मिले वह उसके लिए भी सहर्ष तैयार रहता है.

इसी स्वार्थपरता के कारण पूंजीवाद की आलोचना उसके उभार के दिनों में ही होने लगी थी. इसके बावजूद वह विकासमान रहा. इसका कारण है कि पूंजीवाद ने समाज में मध्यवर्ग पैदा किया था. उससे पहले समाज में अमीर और गरीब का विभाजन था. उसकी विडंबना थी कि जो अमीर था, उसके पास जरूरत से इतना अधिक था, उसको बनाए रखना ही उसके लिए बड़ी चुनौती थी. दूसरी ओर गरीब था जिसके पास इतने अभाव थे कि जीवन को बचाए रखना बड़ी चुनौती होती थी. एक को सपनों की जरूरत इसलिए नहीं थी क्योंकि उसकी हर ख्वाइश तत्काल पूरी हो जाती थी. दूसरे के पास कोई सपना नहीं था. इसलिए कि घोर अभावों के बीच सपना देखने की उसकी हिम्मत ही नहीं होती थी. मामला सीधेसीधे ‘होने’ या ‘न होने’ का था, इसलिए उसे आसानी से नियतिबद्ध किया जाता था. लोगों के दिलों में यह बात बिठाई जा चुकी थी कि जो विशिष्ट तथा सुखसुविधा संपन्न वर्ग है, उसपर ईश्वर की विशेष अनुकंपा है. मध्यवर्ग ने व्यक्ति की खुशहाली को नियतिबद्ध मानने वाली धारणा पर प्रहार किया था. उसके पास सपने थे और संकल्प भी. ऊपर से खूबी यह कि वह अपनी सीमाओं के अतिक्रमण के लिए निरंतर प्रयत्नरत रहता था. मशीनीकरण और पूंजीवाद की सफलता में इस वर्ग का योगदान किसी से छिपा नहीं था. इसका उसे लाभ भी मिला था. इस वर्ग का बड़ा हिस्सा पूंजीवाद को कामयाब बनाने के लिए सतत प्रयत्नशील रहता था. मगर एक हिस्सा असंतोष का शिकार भी था. उसे हमेशा यह लगता था कि मात्र पूंजी और अपने निष्क्रिय योगदान के बल पर पूंजीपति जितना लाभ कमाता है, उसका उसे कोई अधिकार नहीं है. यह वर्ग लाभ में अपनी सम्मानजनक हिस्सेदारी चाहता था. इस वर्ग के असंतोष के कारण पश्चिम में अनेक पूंजीवादी आंदोलनों और विचारधाराओं का जन्म हुआ था. उन आंदोलनों और विचारधाराओं को पूंजीवाद उत्पादन व्यवस्था से जुड़े अन्य वर्गों का समर्थन भी प्राप्त हुआ.

क्रमश:

ओमप्रकाश कश्यप

मार्क्सवाद : आलोचना के बिंदू

सामान्य

हर विलक्षण परिवर्तनकामी बुद्धिजीवी की भांति मार्क्स को भी अपने जीवनकाल में आलोचनाओं और विरोधों का सामना करना पड़ा था. अपने उग्र विचारों और क्रांतिकारी लेखन के लिए उसे फ्रांस, प्रूशिया, बेल्जियम, कोलोन आदि से खदेड़ा जाता रहा. मगर अपने विचारों के प्रति पूरी तरह से आस्थावान और संघर्षशील मार्क्स हर बार श्रमिक क्रांति के पक्ष में आवाज उठाता रहा. इसका उसको नुकसान भी उठाना पड़ा. उसके बेटेबेटियां समय पर बीमारियों का उपचार न होने के कारण चल बसे. स्वयं मार्क्स फेफड़े की कमजोरी का शिकार था, जिसके कारण उसको अपनी युवावस्था में सेना की नौकरी से हाथ धोना पड़ा था. मगर अपने और अपने परिवार के उपचार के लिए न तो उसके पास पर्याप्त धन था, न ही समय. रातदिन उसका बस एक ही काम था. लेखन और केवल लेखन. सार्थक और प्रतिबद्ध लेखन. अपने जीवनकाल में उसने विपुल मात्रा में साहित्यरचना की. प्रतिबंधों, आलोचनाओं और विरोध से घबराये बिना उसने वही लिखा जो उसको युक्तिसंगत लगा. अपने प्रतिबद्ध लेखन के कारण ही उसके विचारों की प्रासंगिकता मृत्यु के 127 वर्ष बाद भी अक्षुण्ण है. यही नहीं बुर्जुआ पक्ष के बुद्धिजीवियों और उसके प्रेस ने मार्क्स और उसके विचारों की जितनी आलोचना की, वह लोगों के दिल में उतनी ही गहरी जगह बनाता गया.

मार्क्सवाद के आलोचक इस विचार से अपनी असहमति अनेक स्तरों पर दर्शाते हैं. अधिकांश का मानना है कि पूंजीवाद धन के अर्जन एवं उसके वितरण की अधिक उपयोगी एवं न्यायिक व्यवस्था है. उनके अनुसार पूंजीवाद व्यक्तिमात्र के अधिकारों एवं हितों की ओर अधिक ध्यान देता है. श्रमिक को यह भरोसा होने पर कि उसके श्रम का पूरा लाभ मिलेगा, वह अपनी संपूर्ण क्षमता से कार्य करता है. स्पर्धात्मक वातावरण में प्रत्येक व्यक्ति को दूसरों से आगे निकलने का अवसर प्राप्त होता है. यह विश्वास होने पर कि श्रमकौशल का पूरा लाभ उसी को मिलेगा, श्रमिक अधिक परिश्रम और तन्मयता के साथ काम करता है, जिससे अधिकतम उत्पादकता संभव है. पूंजीवादी व्यवस्था में अर्जित संपत्ति पर श्रमिक का अपना अधिकार होता हैइस कारण पूंजीवाद के समर्थक उसको साम्यवाद और समाजवाद से अधिक कारगर व्यवस्था मानते हैं. पूंजीवादी तंत्र में उद्योगपति को भी यह विश्वास होता है कि नए शोध और तकनीक का लाभ सीधे उसको मिलने वाला है. इसलिए वह नए शोध और अन्वेषणों पर भी पूरापूरा ध्यान देता है. उद्योगपति की समृद्धि का एक हिस्सा वेतन एवं अन्य परिलब्धियों के माध्यम से समाज के निचले हिस्सों में भी अंतरित होता रहता है, जिससे समाज का आर्थिक स्तर लगातार ऊपर उठता जाता है. उनके अनुसार साम्यवाद और समाजवाद में श्रमिक को कड़े अनुशासन में कार्य करना पड़ता है. बावजूद इसके उसे उत्पादनलाभों से वंचित रखा जाता. इसलिए वहां पर श्रमिक मुक्त मन से उत्पादनव्यवस्था में हिस्सा नहीं ले पाता. जिससे वहां उत्पादकता का स्तर लगातार गिरता चला जाता है. कुछ विद्वान मानते हैं कि मार्क्सवाद व्यक्ति के नकारात्मक सोच को दर्शाता है. यह समन्वय और सहयोग द्वारा मिलजुलकर विकासमार्ग पर अग्रसर होने के बजाय हिंसक क्रांति पर जोर देता है. परिणामस्वरूप समाज में अस्थिरता और अराजकता बढ़ती है और समाज की ऊर्जा गैररचनात्मक कार्यों में खपने लगती है.

धर्म के प्रति अपने लगभग कट्टरपंथी रवैये के कारण भी मार्क्सवाद की आलोचना की जाती है. विद्वानों के अनुसार कल्याण सरकार का पहला कर्तव्य है कि वह व्यक्तिमात्र के विश्वास तथा अधिकारों की रक्षा करे. धर्म व्यक्ति की निजी आस्था और विश्वास का प्रश्न है, जिसको शेष समाज पर नहीं थोपा जाना चाहिए, न ही व्यक्तिमात्र की आस्था और विश्वास की अवमानना करना नीतिसंगत है. इतिहास के समाजार्थिक अध्ययनविश्लेषण के बाद मार्क्स इस नतीजे पर पहुंचा था कि धर्म का उपयोग वर्गीय ताकतों द्वारा अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए जानबूझकर किया जाता है. वह व्यक्ति को अपने अधिकारों और सामथ्र्य से उदासीन बनाता है. मृत्यु के बाद सुख की कामना व्यक्ति को भाग्यवादी तथा पलायनोन्मुखी बनाती है. अपनी दुर्दशा के लिए वह अपने भाग्य को दोषी ठहराने लगता है. परिणामस्वरूप उन शक्तियों की ओर से उसका ध्यान पूरी तरह हट जाता है, जो वास्तव में उसकी दुर्दशा के लिए जिम्मेदार हैं. कहा जा सकता है कि मार्क्सवाद निजता को उस समय तक कोई कोई महत्त्व नहीं देता, जबतक कि वह मनुष्य को अपने कर्तव्यों से उदासीन बनाती है. उसको शेष समाज से इतर, सिर्फ अपने बारे में सोचने के लिए प्रेरित करती है.

कुछ विद्वानों का आरोप है कि समाजवाद और साम्यवाद दोनों में व्यक्ति को समाज के पक्ष में अपने हितों का बलिदान करना पड़ता है. चूंकि किन्हीं भी दो व्यक्तियों के हित एक समान नहीं हो सकते, इसलिए साम्यवाद जैसी व्यवस्था हालांकि हितों के सामान्यीकरण का नारा लगाती हैं, मगर प्रकट में वह जनसाधारण के हितों से खिलवाड़ ही करती है. वृहद समाज के हितों की रक्षा का नारा लगाने वाला साम्यवाद असल में किसी भी व्यक्ति के हितों की पूरी तरह रक्षा नहीं कर पाता. वहां व्यक्ति को समूह के आगे नगण्य और उपेक्षित मान लिया जाता है. इसी आधार पूंजीवाद के समर्थक कुछ विद्वान मार्क्सवाद को नागरिक अधिकारों का हनन करने वाली विचारधारा स्वीकार करते हैं. कुछ लेखकों के अनुसार मार्क्स का अर्थचिंतन हीगेल की विचारधारा का विस्तार है. उनके अनुसार मार्क्स अपने विचारों को लेकर सुश्निश्चित नहीं था. उनको लेकर उसके मन में सदैव असंतोष बना रहा. उसको लगने लगा था कि आर्थिक प्रगति की पूर्वस्थापित योजनाएं अतार्किक एवं अवास्तविक हैं. वैचारिक आस्था के अभाव में वह अपनी महत्त्वाकांक्षी पुस्तक ‘पूंजी’ के बाकी दो खंडों को अपने जीवनकाल में पूरा करने में असमर्थ रहा था.

1930 की भयानक मंदी के चलते अनेक देशों ने मार्क्सवाद के प्रति उत्सुकता प्रकट की थी. जनाक्रोश से बचने के लिए मंदी से प्रभावित देशों की सरकारों ने सुरक्षात्मक कदम उठाने आरंभ कर दिए थे. तात्कालिक कार्रवाही से दुनिया पर छाये मंदी के बादल छंटने लगे, नतीजा यह हुआ कि मार्क्सवाद अनेक छोटे देशों का सरकारी धर्म बनतेबनते रह गया. उधर साम्यवादी देशों की हालत भी बहुत अच्छी न थी. उनीसवीं शताब्दी में ही साम्यवाद को अपना चुके देशों में राजनीतिक उथलपुथल और आर्थिक मंदी के कारण हालात बिगड़ने लगे थे. इससे वहां की जनता का मार्क्सवाद से मोहभंग होने लगा. यहां ‘मोहभंग’ शब्द शायद अनुपयुक्त प्रयोग है. कुछ विद्वान मार्क्स की धर्मसंबंधी अवधारणा में भी विरोधाभास खोजते हैं. उनके अनुसार मार्क्स परंपरागत धर्म का प्रतिकार करता है, मगर अपनी विचारधारा मार्क्सवाद को धार्मिक आस्था की भांति आरोपित करता है. यह विरोधाभासी स्थिति है, जो मार्क्स के विचारों की वैज्ञानिकता पर सवाल खड़े करती है.

मार्क्स के आलोचकों में से एक कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर लेविस एस. फ्यूअर(19122002) का मानना है कि स्वयं मार्क्सवाद में धर्म की अनेक विशेषताएं सुरक्षित हैं. फ्यूअर के अनुसार मार्क्सवाद के समर्थक उसको बड़े ही सुनियोजित तरीके से आस्था और विश्वास के रूप में जनमानस में रोपने का प्रयास करते हैं, न कि ऐसे सत्य के रूप में जिसको प्रयोगों के आधार पर जांचापरखा गया हो. फ्यूअर के अनुसार मार्क्सवाद और ईसाइयत में सिर्फ इतना अंतर है कि मार्क्सवाद इसी जीवन को सुखमय बनाने का दावा करता है, जबकि ईसाई धर्म मृत्यु के बाद सुखप्राप्ति का विश्वास दिलाता है. तर्क की कसौटी पर दोनों ही कच्चे हैं. वस्तुतः मार्क्स ने अपने जीवनकाल में ही बुद्धिजीवियों का आवाह्न किया था कि वे मार्क्सवाद के प्रचार में अपना अधिकाधिक योगदान दें. रूस, चीन, कोरिया आदि देशों में मार्क्सवाद से प्रेरित होकर अनेक विद्वान लेखक, साहित्यकार उसकी ओर आकर्षित भी हुए थे. क्रांति के बीच और उसके बाद जिस प्रकार का प्रचार साहित्य बांटा, उसने मार्क्सवाद को एक धार्मिक सत्ता की तरह ही स्थापित करने का प्रयास किया था. अंतर सिर्फ इतना है कि ईसाइयत परमात्मा और पैगंबरवाद में भरोसा करती है. डार्विन के विकासवाद से प्रेरित मार्क्स इस प्रकार की किसी अलौकिक शक्ति की उपस्थिति को सरासर नकारता है. इसके बावजूद फ्यूअर ने मार्क्सवाद की उपयोगिता को स्वीकारा था.

कार्ल पोपर ने भी मार्क्स के विचारों पर अवैज्ञानिक होने का आरोप लगाया है. उसके अनुसार मार्क्स के विचार प्रभावी और दिल को भले ही लगें, मगर वे तार्किकता से परे हैं. पोपर ने मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद की भी आलोचना की है. उसके अनुसार मार्क्स का विकासवादी चिंतन कुछ पूर्वनिर्धारित मान्यताओं से प्रभावित है. पूंजीवाद की आलोचना करते समय मार्क्स अत्यधिक आक्रामक हो जाता है, जिससे निष्पक्ष विवेचना की संभावना घट जाती है. जैसा कि पहले भी संकेत किया गया है, मार्क्स और ऐंगल्स का विचार था कि मार्क्सवाद की सफलता यूरोप के विकसित देशों में ही संभव है. जिस समय व्लादिमिर लेनिन ने सोवियत रूस की राजनीति में कदम रखा, वह आर्थिकरूप से बेहद पिछड़ा देश था. लेनिन के राजनीतिक सहयोगी ट्रोटस्की ने ‘स्थायी क्रांति’ की अभिकल्पना प्रस्तुत की थी, जिसमें उसने कहा था कि रूस जैसी कृषिआधारित व्यवस्था और विस्तृत भूभाग वाले देश में भी मार्क्सवादी क्रांति संभव है. बाद में सोवियत संघ की स्थापना से उसने अपने विचारों की प्रामाणिकता सिद्ध भी कर दी थी.

कुछ विद्वानों ने मार्क्स के ऐतिहासिक द्वंद्ववाद के विचार को भी कठघरे में खड़े करते हुए आरोप लगाया था कि वह तर्क से सिद्ध करने के बजाय, केवल स्थापनाएं देता है, जो विमर्श के दौरान कहीं टिक ही नहीं पातीं. निष्कर्ष तक पहंुचने की हड़बड़ी उसकी पूरी मेहनत पर पानी फेर देती है. केवल दक्षिणपंथी विचारक ही मार्क्स से असंतुष्ट हों, ऐसा नहीं है. कतिपय वामपंथियों ने भी उसके विचारों के प्रति अपनी असहमति दर्ज की है. इनमें से एक उसका समकालीन हेनरी जाॅर्ज था, जिसका मानना था कि मार्क्स के विचारों को शायद ही कभी परखा गया है. हेनरी जाॅर्ज ने मार्क्स के विचारों पर कृत्रिमता का आरोप लगाया था. मार्क्स के विचारों से उसका समकालीन रूसी अराजकतावादी मिखाइन बेकुनिन भी असहमत था. बेकुनिन और मार्क्स में व्यक्तिगत स्तर पर तो मतभेद भी ही. ये मतभेद ‘प्रथम इंटरनेशनल’ के दौरान खुलकर सामने आए थे. मार्क्स का मानना था कि बेकुनिन इंटरनेशनल का उपयोग निजी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए करना चाहता है, जबकि बेकुनिन ने मार्क्स पर फ्रांसिसी राजनीति का यहूदीकरण करने के आरोप लगाए थे. दोनों में परस्पर सैद्धांतिक मतभेद भी थे. बेकुनिन की मान्यता थी कि भविष्य के संगठनों का निर्माण पूर्णत नीचे से ऊपर की ओर होना चाहिए. उसने परिकल्पना की थी कि श्रमिक पहले स्वैच्छिक मजदूर संघों में संगठित होंगे. उन मजदूर संघों के स्वतंत्र श्रमिकबस्तियां(कम्यून) होंगी. तदनंतर वे क्षेत्र, प्रांत, राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक संगठित शक्ति का रूप ले लेंगे और इस तरह संपूर्ण समाजवाद का आगमन होगा. मार्क्स के कथन ‘एक अच्छे दिन काम करने के एवज में आकर्षक, न्यायोचित वृत्तिका’ के समानांतर उसका कहना था‘वृत्तिका प्रणाली का उन्मूलन.’ स्पष्ट है कि श्रमिकसंघवादी बेकुनिन श्रमिक संघों को राजनीतिकआर्थिक शक्तियों से लैस करना चाहता था. उसका मानना था किजब दुनियाभर के उद्योगों का संचालन श्रमिकों द्वारा अपने भले के लिए किया जाएगा, उस समय भीषण बेरोजगारी, युद्ध, सामाजिक अंतद्र्वंद्व यहां तक कि बड़े अपराध और गंभीर सामाजिक समस्याओं के बने रहने का कोई आधार ही नहीं रहेगा.

मार्क्स के चिंतन की व्यापकता से इनकार नहीं किया जा सकता, मगर यह भी सत्य है कि मार्क्स के बाद से करीब सवा सौ वर्ष के अंतराल में समाज में व्यापक परिवर्तन आया है. इनमें से एक बदलाव प्रेस की स्वतंत्रता और उसकी शक्ति से भी जुड़ा है. हाल के दशकों में मीडिया जितना ताकतवर होकर उभरा है, इसके बारे में मार्क्स और ऐंगल्स ने शायद कल्पना भी न की थी. मीडिया और शिक्षा की मिलीजुली ताकत ने उपभोक्ता को भी अपने हितों के प्रति जागरूक किया है. उत्पाद से जुड़ी सूचनाएं अब केवल उत्पादक की संपत्ति नहीं है. बल्कि व्यापक लोकहित में उसको उन्हें सार्वजनिक भी करना पड़ सकता है. बाजारोन्मुखी व्यवस्था में संबंधों में परिवर्तन अवश्य हुआ है. अपने दैनिक जीवन में उपभोक्ता और उत्पादकों का सम्मिलन न केवल आर्थिक बल्कि सामाजिक संबंधों को भी प्रभावित करता है, जिसके आधार पर हमारे जीवन का स्वरूप तय होता है. हालांकि अब भी उपभोक्ता और उत्पादक के संबंधों में उत्पादक का हाथ ऊपर होता है. वही तय करता है कि उपभोक्ता के साथ मेलमुलाकात के समय कहां तक समझौता किया जाए. बावजूद इसके यह भी सच है कि

यदि सिस्टम जैसा कुछ होता है तो मार्क्स का समकालीन पूंजीवादी तंत्र आधुनिक पूंजीवाद तंत्र की अपेक्षा अधिक ताकतवर और खुल्लमखुल्ला वर्गविभाजित था. उन दिनों वह सचमुच ‘उनका’ यानी उत्पादक का तंत्र था, जबकि आजकल यह हमारा तंत्र है. मार्क्स और एंेगल्स इस मायने में एकदम सही थे कि ‘सर्वहारा का मुक्तियज्ञ पूरी तरह से उसका अपना आयोजन होना चाहिए.’

स्पष्टरूप से मार्क्सवाद की अभिकल्पना यह सोचकर की गई थी कि मानवीय व्यवस्था के रूप में यह एक दिन पूंजीवाद को अपदस्थ कर उसका स्थान ले लेगा. दरअसल यह ‘स्थान ले लेना’ ही मार्क्सवाद की दुर्बलता है. इससे कई बार यह संकेत भी मिलता है मार्क्सवाद केवल सत्ताओं के विकल्प की बात करता है. वास्तविक परिवर्तन उसका लक्ष्य है ही नहीं. मार्क्स और ऐंगल्स निःसंदेह विलक्षण प्रतिभाशाली थे, जिन्होंने सर्वहारा वर्ग का आवाह्न किया था कि अपने हितों की पहचान करे. संगठित होकर विरोध की रूपरेखा तैयार करे. पूंजीवाद के विरुद्ध संघर्ष में सफलता के लिए प्रतिबद्ध साहित्य के अध्ययन की ओर प्रवृत्त हो और पूरी तैयारी के साथ पूंजीवाद की जड़ों पर प्रहार करें. मगर कब तक? लेखकद्वय संभवतः यह सोच भी नहीं पाए थे कि मार्क्सवादी विचारधारा से लैस मजदूर, पूंजीवाद को उखाड़ फैंकने के बजाय उसके समर्थन में भी जा सकता है. ऐसा इतिहास में होता भी रहा है. मजदूर संगठनों की असफलता के पीछे इस तरह के ढेरों उदाहरण आसानी से खोजे जा सकते हैं.

अंत में एक प्रश्न. हालांकि यह सिर्फ आकलन करने की कोशिश है. प्रश्न यह है कि मार्क्स और ऐंगल्स यदि अपने विचारों के साथ दुबारा जन्म ले लें तो उनकी और उनके विचारों की प्रासंगिकता होगी? यानी क्या समाज को आज भी मार्क्स और ऐंगल्स की जरूरत है. यह बात गांधी अथवा किसी और महापुरुष को लेकर भी उठाया जाता सकता है. इसमें तो कोई दो राय नहीं कि मार्क्स और ऐंगल्स का दर्शन आज की स्थितियों में बहुत प्रामाणिक लगता है. तो भी मार्क्स और ऐंगल्स के दर्शन की वापसी की स्थिति में उसके हम आंशिक रूप में ही उसके साथ होंगे. शायद इसलिए कि लगभग डेढ़दो शताब्दी के अंतराल पूंजीवाद ने हमारे सोच और व्यवहार दोनों को ही आमूल बदला है. यह बदलाव इतना व्यापक और सूक्ष्म है कि पूंजीवाद के धुर विरोधी विचारक भी अपने व्यवहार से उसका समर्थन करते हुए देखे जा सकते हैं.

मेरे विचार में ‘कम्युनिस्ट’ मेनीफेस्टो जैसे विचारों की आज कोई प्रासंगिकता नहीं है. हां मार्क्स की पूंजी का बहुतसा हिस्सा आज भी प्रासंगिक है; और बना रहेगा. कहा जा सकता है कि हमें युवा मार्क्स नहीं, अनुभवी मार्क्स की आवश्यकता है. हमें आवश्यकता है मार्क्स और ऐंगल्स की विलक्षण मेधाओं की. पुनर्जन्म अप्रामाण्य है, फिर भी यदि मार्क्स घूमतेफिरते हमारे युग में लौट आएं तो हमारा आग्रह यह भी हो सकता है कि वह पूंजी का आधुनिक संदर्भयुक्त ग्रंथ दुबारा से लिखे. हम यह भी चाहेंगे कि उसमें पूंजीवाद की समालोचना हो, सिर्फ आलोचना नहीं. मार्क्स से यदि मुलाकात हो तो हम चाहेंगे कि वह धर्म की आलोचना को सस्ते में ही न निपटा दे. बल्कि उसपर तथ्यों के साथ विचार करे. यह भी विचारे कि क्या धार्मिक प्रभावों का कोई अनुकूल लाभ उठाया जा सकता है. हालांकि यह एक मुश्किल पाठ होगा. तो भी मार्क्सवाद की प्रासंगिकता को अगली शताब्दी तक ले जाने के लिए यह छोटासा मूल्य होगा. यदि यह काम ईमानदारी से किया जाए तो उसके फल भी दूरगामी महत्त्व के होंगे. और अंत में मार्क्स के बारे में महान क्यूबाई क्रांतिकारी चे’ ग्वेरा के विचार जानना उसके विचारों की समकालीनता को दर्शाने के लिए पर्याप्त होगा

मार्क्स की प्राथमिकता थी कि वह सामाजिक विचारों के इतिहास में ठोस गुणात्मक एवं तात्कालिक परिवर्तन ला सके. इसके लिए उसने इतिहास की नई व्याख्या की, उसकी गतिशीलता को समझा, भविष्य का आकलन किया, साथ ही उसने क्रांतिकारी संकल्पना भी दुनिया के सामने रखी किकेवल संसार की व्याख्या से काम नहीं चलेगा, इसको बदलना ही चाहिए.’

और अंत में सिर्फ इतना कि हम मार्क्स के समाज को बदलने के नारे से असहमत हो सकते हैं, उसके क्रांतिकारी विचारों से अपनी असहमति दर्शा सकते हैं, उन्हें हिंसक बताकर उनसे नफरत कर सकते हैं. यही नहीं उसके पूंजीवाद विरोध को हम एकतरफा, वैचारिक दुराग्रह का प्रतीक भी मान सकते हैं. हम यह भी कह सकते हैं कि पचास साल में पूंजीवाद के खात्मे की मार्क्स की भविष्यवाणी झूठ सिद्ध हो चुकी है, इसलिए उसके पूंजीवादविरोध में कोई दम नहीं है. लेकिन उसके दृष्टिकोण से, सर्वहारा वर्ग के कल्याण की उसकी सदेच्छा तथा उसके प्रति समर्पण हेतु किए गए सतत संघर्ष के लिए, उन कष्टों के लिए जो अपने विचारों पर दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ते हुए मार्क्स और उसके परिवार को उठाने पड़े थे, हमें उसका सम्मान करना ही पड़ेगा. इसलिए यदि दुनियाभर में करोड़ों मजदूर, उसके नाम का एक साथ नारा लगाते हैं, जीजान से उसको चाहते हैं, उसको अपना सच्चा हितैषी, गुरु और पथप्रदर्शक मानते हैं, तो हमें यह मानना ही पड़ेगा कि वह सच्चा मनुष्यता का सच्चा हितैषी, महान विचारक, अर्थशास्त्री, समाजविज्ञानी और अपने समय का महान चिंतक था. मानवीय सभ्यता के उन महानतम चिंतकों में से एक जो शताब्दियों के अंतराल में कभीकभी ही जन्मते हैं. इसलिए मार्क्स की मेधा, उसके संघर्ष, सोच, दूरदृष्टि, मानवप्रेम, उसकी जीवनसंगिनी जेनी और मित्र एंगल्स को हमारा नमन! शतसहस्र नमन!

ओमप्रकाश कश्यप

इकीसवीं शताब्दी में मार्क्सवाद की प्रासंगिकता

सामान्य

कुछ देर के लिए मार्क्स को एक सरल रेखा मान लिया जाए तो पूरी दुनिया, उसके दोनों तरफ बंटी मिलेगी. एक दिशा में मार्क्स के समर्थक होंगे, जिनके लिए मार्क्स का एकएक शब्द पवित्र और बौद्धिक चेतना की धरोहर है. वे मार्क्स के नाम पर, उसके विचारों के लिए अपने खून का एकएक कतरा बलिदान करने को तत्पर होंगे. दूसरी ओर मार्क्स के आलोचक हैं. जिनके लिए मार्क्स एक दुर्भावना, एक जिद, एक नासमझीभरा, अड़ियल और प्रतिगामी विचार है. हाल ही में बीबीसी रेडियो सेवा द्वारा ब्रिटेन के सर्वाधिक सम्मानित और प्रतिभाशाली दार्शनिकों का सर्वे कराया गया. उस सर्वे में साम्यवादी मार्क्स ख्याति के मामले में सबसे ऊंचे पायदान पर था. दार्शनिक के रूप में दुनियाभर में पहचाने वाले नाम यथा प्लेटो, अरस्तु, कांट, डेविड ह्यूम, देकार्त, जान ला॓क जैसे विचारक ख्याति के मामले मे उसके आसपास भी नहीं ठहरते. हीगेल मार्क्स का गुरु, जिससे उसने भौतिक द्वंद्ववाद का सिद्धांत ग्रहण किया था, आश्चर्यजनकरूप से इस सूची में कहीं भी नहीं है. और तो और मार्क्स के समकालीन प्रतिभाशाली दार्शनिकों में से एक भी इस सूची में स्थान पाने में असमर्थ रहा है. आखिर ऐसी कौनसी बात है, जो मार्क्स को अपने समकालीन और पूर्ववर्ती विचारकों से अलग सिद्ध करती है. मार्क्स ने एक साथ धर्म, दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्र, इतिहास की गवेषणाएं की हैं. मगर मार्क्स खुद क्या है? दार्शनिक अथवा अर्थशास्त्री? ये सामान्य जिज्ञासा से जुड़े कुछ जरूरी प्रश्न हैं. हालांकि बहुतसे लोगों के लिए मार्क्स एक खलनायक भी है, जो अपने विचारानुकूल समाज के गठन के लिए खुल्लमखुल्ला हिंसा का सहारा लेता है. मगर वे भूल जाते हैं कि सामाजिक परिवर्तन के लिए मार्क्स द्वारा हिंसा का समर्थन उस तरह से नहीं है, जैसे कि पहले राजामहाराजा अपनी सनक में पड़ोसी राजा पर हमला बोल देते थे. मार्क्स की हिंसा मर्यादित है. वह समाज के बड़े वर्ग के कल्याण के लिए विशेष परिस्थितियों में जब बाकी सभी उपाय असफल सिद्ध हो चुके हों, केवल बुर्जुआ वर्ग को सत्ताच्युत करने के लिए हिंसा का समर्थन करना पसंद करता है. दूसरे पूंजीवादी चंगुल से मुक्ति के लिए हिंसा का समर्थन पेरिस कम्यून की असफलता से पहले की घटना है. पेरिस कम्यून की असफलता के बाद उसके विचारों में बदलाव आया था.

मार्क्स अपने समय की सबसे विवादित हस्तियों में से एक है. उसका रचनात्मक अवदान केवल अकादमिक चिंतनलेखन तक सीमित नहीं था. उसके लेखन में संघर्ष की लौ थी. हालांकि श्रमिकों के पक्ष में आवाज उठाने वाला वह पहला दार्शनिकलेखक नहीं था. उससे पहले रूसो जनसामान्य का सबसे बड़ा पैरोकार बनकर उभरा था. राबर्ट ओवेन, विलियम किंग, जोसेफ ब्लेंक आदि दार्शनिक चिंतक भी पूंजीवादी शोषण से उबरने के लिए श्रमिकों मजदूरों को और अधिक सुविधा दिए जाने की मांग कर चुके थे. इसी श्रेणी में चार्टिस्ट आंदोलनकारियों का नाम भी लिया जा सकता है, जिन्होंने जनाधिकारिता के लिए बड़े पैमाने पर वर्षों तक चलने वाला संघर्ष किया था. जनसाधारण के लिए लोकतांत्रिक अधिकारों के पक्ष में 1838 में एफ. ओ’क्रोनर एवं विलियम ला॓वेट के नेतृत्व में चले वर्षों लंबे संघर्ष में सैकड़ों चार्टिस्ट आंदोलनकर्मियों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया था. हजारों को निष्कासन की सजा मिली थी.

स्मरणीय है कि सोहलवीं शताब्दी में आरंभ हुए प्रौद्योगिकीकरण की रफ्तार उनीसवीं शताब्दी आतेआते अत्यधिक तीव्र हो चुकी थी. परंपरागत शिल्पकारों पर मशीनीकरण की मार तथा उनके संरक्षण के लिए सरकार की ओर से कोई योजना न होने के कारण ब्रिटेन समेत प्रायः सभी यूरोपीय देशों में बेरोजगारी का संकट बढ़ा था. गांवों में स्थिति और भी शोचनीय थी. क्योंकि कारखानों में बने सस्ते माल की आमद से स्थानीय उद्योगधंधे पूरी तरह चौपट हो चुके थे. भीषण गरीबी के कारण मातापिता अपने बच्चों को उन नारकीय परिस्थितियों में काम पर भेजने के लिए विवश थे, जहां सामान्य स्थितियों काम करने की उनकी हिम्मत भी जवाब दे जाती थी. बाकी मजदूरों, कामगारों यहां तक कि साधारण नौकरीपेशा लोगों की हालत भी संतोषजनक नहीं थी. काम के अत्यधिक बोझ के कारण वे सदैव तनाव में रहते थे. इससे उनकी कार्यकुशलता नकारात्मक रूप से प्रभावित हुई थी. सरकार और प्रशासन पूंजीपतियों के सतत दबाव में रहते थे, इसलिए उनसे मनचाहे फैसले करा लेना, स्थानीय पूंजीपतियों के लिए बहुत आसान था. पूंजी का असमान वितरण, भीषण बेरोजगारी, नगरों में पर्यावरणसंबंधी लगातार बढ़ती समस्याएं आदि अनेक ऐसे कारण थे, जिन्होंने विचारकों के एक बड़े वर्ग को उद्वेलित किया था. पूंजीवाद प्रेरित औद्योगिकीकरण के विरोध में अनेक आंदोलन भी हो चुके थे, जिनमें लाखों श्रमिकों ने सहभागिता की थी. जिन्हें समाज के लाखों श्रमिकों का समर्थन मिला था.

पूंजीवादी शोषण से उबरने के लिए विद्वानों के अलगअलग सुझाव थे. विचारकों का एक दल सहकारिता के माध्यम से पूंजीवादी उत्पीड़न से उबरने का सपना देख रहा था. इस वर्ग में विलियिम किंग, राबर्ट ओवेन फ्यूरियर जैसे विचारक थे. साहित्यिक प्रेरणाएं भी परिवर्तनकारी आंदोलनों के साथ थीं. उनमें सबसे अग्रणी थे, उस समय के महान उपन्यासकार चाल्र्स डिकेन्स, जिन्होंने अपने उपन्यास ‘दि क्रिसमस कैरोल’ में ब्रिटिश समाज में पनप चुके सूदखोर वर्ग का सशक्त चित्रण किया था. रिकार्डो और एडम स्मिथ आदि अर्थशास्त्रियों का मानना था कि सिर्फ औद्योगिक समृद्धि द्वारा गरीबी से लड़ा जा सकता है. सरकार को चाहिए कि उत्पादन और विपणन से जुड़े मामले पूंजीपतियों और उद्यमियों के हवाले कर दे, ताकि वे परिस्थितियों के अनुकूल निर्णय लेने में सक्षम हों.

संगठित आंदोलन को मुक्ति का आधार मानने वाले विचारकों के भी दो अलगअलग वर्ग थे. उनमें से एक धड़ा सहकारिता आंदोलन के समर्थक विद्वानों एवं कार्यकर्ताओं का था, जो सफलता के लिए सहयोग को स्पर्धा से अधिक कारगर और उपयोगी मानते थे. दूसरे धड़े के विचारक मानते थे कि पूंजीवाद से मुक्ति के लिए पूंजीपतियों को कमजोर करना जरूरी है. यह केवल संगठित ताकत के बल पर संभव है. इसके लिए हिंसा का सहारा लेने में भी उन्हें संकोच नहीं था. प्रूधों, मार्क्स, ब्लेंक, बकुनाइन, ऐंगल्स आदि विद्वान पूंजीवाद के उग्र विरोधियों में आते थे.

उल्लेखनीय है कि मार्क्स से पहले ही हीगेल द्वंद्ववाद की सार्थकता को स्थापित कर चुका था. विचारक उसके विचारों की भांतिभांति से व्याख्या कर रहे थे. बल्कि उसके विचारों की व्याख्या के लिए ही दार्शनिकों के अलगअलग गुट बन चुके थे. ऐसे में मार्क्स ने द्वंद्ववाद की विशुद्ध भौतिकवादी दृष्टिकोण से विवेचना कर, सत और असत् का भौतिकीकरण कर दिया. मार्क्स के दर्शन में श्रमिक वर्ग ‘सत्’ का पर्याय था, जो अपने श्रमकौशल के आधार पर उत्पादन कार्य में प्रमुख भूमिका निभाता है. जो सही मायने में उत्पादक है. पूंजीपति वर्ग ‘असत्’ का प्रतीक है, जो दूसरों के श्रम को अपना बताकर मुनाफे का अधिकांश हिस्सा स्वयं हड़प जाता है, जिससे धनी लगातार धनवान तथा गरीब लगातार अधिक गरीब होता जाता है. परिणामस्वरूप समाज में अस्थिरता और असमानता बढ़ती है.

समाज में व्याप्त आर्थिक वैषम्य से निपटने के लिए भी विद्वानों के अलगअलग विचार थे. एक वर्ग का मानना था कि समाज में आर्थिक समानता स्थापित करना सरकार का दायित्व है, अतः सरकार को श्रमिकों के हितों की सुरक्षा हेतु समुचित कानून बनाने चाहिए. दूसरे वर्ग का विश्वास था कि पूंजीवाद का सामना केवल संगठित शक्ति द्वारा ही संभव है. इस वर्ग का सुझाव था कि श्रमिकों, छोटे उद्यमियों और व्यवसायियों को अपनेअपने संगठन बनाकर सहकार के माध्यम से पूंजीवाद के विरुद्ध सार्थक समर छेड़ा जा सकता है. इनसे अलग एक वर्ग कतिपय उदारपंथी विचारकों का था, उनका मानना था कि मनुष्यता के नाते पूंजीपति को स्वयं आगे आकर समाज के बड़े वर्ग के पक्ष में अतिरिक्त संपत्ति का परित्याग करना चाहिए. बहुत बाद में गांधी जी ने इसी भावना को ‘ट्रस्टीशिप’ के सिद्धांत के रूप में प्रकट किया था.

मार्क्स का विचार था कि स्वार्थी पूंजीपतियों को मनाना, उन्हें नैतिक जीवन जीने के लिए प्रेरित करना आसान नहीं है. ऐसे में शोषण से मुक्ति का एक ही उपाय है कि श्रमिकवर्ग संगठित होकर स्वार्थी पूंजीपतियों के विरुद्ध संघर्ष की घोषणा कर दे. जिस दौर में मार्क्स यह घोषणा कर रहा था, वही दौर अस्मितावादी आंदोलन के उदय का भी था. फ्रांस में लोकतंत्र की स्थापना हो चुकी थी. उसकी देखादेखी यूरोप के अन्य देशों में भी लोकतंत्र की मांग जोर पकड़ रही थी. ऐसे में मार्क्स का दर्शन लोगों को पे्ररित करने के लिए पर्याप्त था. अतएव जहांजहां मशीनीकरण जोर पकड़ चुका था, जहांजहां सामंत और जागीरदारी प्रथा शेष थी, वहां पर श्रमिक वर्ग माक्र्सवादी विचारधारा के अनुरूप संगठित होता चला गया. दूसरी ओर अमेरिका और यूरोप के दिन देशों में पूंजीवाद अपनी जड़ जमाए था, वहां मार्क्सवादी विचारधारा के ठीक विपरीत प्रतिक्रिया हुई. मीडिया और सरकार के सहयोग से वहां मार्क्स के कटुआलोचकों का वर्ग पनपा. मगर इस द्वंद्वात्मकता में मार्क्स की चर्चा दोनों ही पक्षों में होती रही.

मार्क्स के विचारों की वर्तमान संदर्भों में क्या प्रासंगिकता है! उसको अर्थशास्त्री माना जाए या दार्शनिक? या फिर राजनीतिक चिंतक? मार्क्स की ख्याति एक दार्शनिक के रूप में भी रही है. हालांकि उसका दर्शन के क्षेत्र में विशेष मौलिक योगदान बहुत कम है. धर्म को लेकर आलोचना फायरबाख और बायर से प्रभावित है. द्वंद्ववाद पर हीगेल उससे पहले ही गंभीर चिंतन कर चुका था, और वह दर्शनशास्त्र की प्रामाणिक धारा के रूप में मान्य हो चुका था. तत्वमीमांसा से वह कोसों दूर था. तो फिर वह कौनसी बात है, जो मार्क्स को जनसाधारण एवं बुद्धिजीवियों के बीच एकाएक जनता का नायक बना देती है. मार्क्स मूल रूप से अर्थशास्त्री था. बल्कि कहना चाहिए कि एडम स्मिथ के बाद मार्क्स ही वह अर्थशास्त्री है, जिसने पूरी दुनिया को प्रभावित करने में सफलता प्राप्त की थी. सच तो यह है कि मार्क्स का अर्थचिंतन एडम स्मिथ के मुक्त अर्थतंत्र को उसका खरा जवाब था. एडम स्मिथ ने अपने सिद्धांत ‘लेजेज फेयर’ द्वारा सरकारों से पूंजीपतियों के रास्ते से हट जाने का आवाह्न किया था. कहा था कि उद्योगों से सरकारी नियंत्रण हटाओ. पूंजीपतियों को निर्बंध ‘अपना काम करने दो.’

एडम स्मिथ की खुली अर्थव्यवस्था के विचार की आलोचना करते हुए मार्क्स ने कहा था कि औद्योगिक उदारता श्रमशोषण के दम पर ही संभव है. नियंत्रणहीन पूंजीवाद को उसने पूंजी का अराजक खेल माना, जिसमें उद्योगपतियों की भले चांदी कटे, मगर मजदूरों का शोषण बढ़ता ही जाता है. स्पर्धा में बने रहने के लिए पूंजीपति वर्ग मजदूरों की मजदूरी कम करता जाता है. कम वृत्तिका और महंगाई मिलकर मजदूरों और कामगारों के जीवन को उत्तरोत्तर कठिन बनाती है. नई प्रौद्योगिकी सिर्फ अमीरों का बैंक बैलेंस बढ़ाती है. और मजदूर की गरीबी, बेबसी तथा दुर्दशा. स्मिथ के कथन कि ‘उन्हें अपना काम करने दो’ के बदले में मार्क्स का कहना था कि ‘श्रमिकों को उनका हक दो’. हालांकि वह यह भी मानता था कि स्वार्थ में डूबे पूंजीपति श्रमिकों को उनका अधिकार आसानी से देने को तैयार नहीं होंगे. इसलिए वह संगठित विरोध का हिमायती था. उसने आवाह्न किया था कि शोषणकारी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के लिए दुनिया के मजदूरो एक हो जाओ. तुम्हारे पास हुनर है. काम करने का सामथ्र्य, इच्छाशक्ति और लग्न है. साथ में वर्षों का अनुभव भी. अपनी ताकत, संगठन की ताकत, अपने कौशल और क्षमताओं को पहचानो, एकजुट होकर उत्पादनव्यवस्था को अपने हाथ में ले लो. कौटिक हाथ मिलकर अपने भविष्य का स्वयं निर्माण करो. उत्पादन का माध्यम बनने से, दूसरों के लिए पसीना बहाने से अच्छा है कि स्वयं उत्पादक बनो. आगे बढ़ो. तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है, मगर जीतने के लिए पूरी दुनिया पड़ी है. कफ और बलगम भरी छाती से निकले मार्क्स के ये भरभराते शब्द विश्वभर के कोटिक श्रमिकों के कंठ से निकली आवाज बन गए. ईसाइयों ने इन शब्दों को पवित्र बाइबिल की वाणी माना, हिंदु ने गीता की अमर सूक्तियां. मुस्लिमों इन्हें कुरआन की महान आदेश मानकर संगठित होने लगे. मार्क्सवाद जनमन की भाषा बन गया.

इकीसवीं शताब्दी में मार्क्सवाद की प्रासंगिकता क्या है? बाजारवाद के इस दौर में जब पूंजीवाद बेलगाम और करीबकरीब अराजक हो चुका है, मार्क्स के विचार कितनी दूर तक हमारा साथ दे सकते हैं? इस बारे में परस्परविरोधी मत सुने जा सकते हैं. मार्क्सवाद के आलोचकों ने बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ही मान लिया था कि उसका पतन अवश्यंभावी है. मार्क्सवाद के सबसे बड़े गढ़ सोवियत संघ का बिखरना उन्हें अपने निष्कर्ष पर मुहर लगने जैसा प्रतीत होता है. उन्होंने बारबार कहा था, बल्कि आज भी यही दावा करते हैं कि मार्क्सवाद के दिन लद चुके हैं. समाजवाद का सपना बीते जमाने की बात हुई. उनके अनुसार यह जानकर भी जो उससे उम्मीद लगाए बैठे हैं, वे स्वप्नदृष्टा, कल्पनाजीवी हैं. उन भोले बच्चों की तरह हैं जिनकी दुनिया लालीपाप में समाई होती है. पर क्या संभव है किसी विचार का यूं ही एकाएक मर जाना?

यदि कोई पेरिस कम्यून की असफलता या सोवियत संघ के बिखरते जाने जैसी घटनाओं से ही उस विचार को अप्रासंगिक और समयबाह्यः मान बैठे और पूंजीवाद की सार्वकालिक जीत का दावा करने लगे तो यह उसकी नादानी ही कही जाएगी. इसलिए कि साम्यवाद नैतिकता और आदर्शवादी पहचान से युक्त एक अवस्था है, जिसकी संकल्पना लोकगीतों, धार्मिकसामाजिक आख्यानों, कविलेखकोंसाहित्यकारों के मानवतावादी सोच से प्रेरणा पाती है. पेरिस कम्यून में श्रमिक संगठनों और नागरिक सेना की जीत के फलस्वरूप जो अल्पकालिक सरकार बनी थी, उसके अपने मतभेद और आपसी अविश्वास थे. साथ में क्रांति का श्रेय लेने की, दूसरों पर छा जाने की आदिम लालसा भी थी. जो एक तरह से प्राचीन साम्राज्यवाद, सामंतवाद, कुलीनतावाद, ब्राह्मणवाद, यहां तक कि पूंजीवादी वर्चस्व का पर्याय थी.

क्रांति के जुनून में उन्होंने सबकुछ उलटपलट तो दिया था, जोशजोश में जनोन्मुखी व्यवस्था कायम करने की शुरुआती कोशिश भी की. किंतु आपसी मतभेद और तनाव के कारण वे ऐसा कोई तंत्र विकसित करने में असफल सिद्ध हुए थे, जो साम्यवादी मान्यताओं के अनुरूप एक दीर्घगामी व्यवस्था के गठन में सहायक बनता. पेरिसक्रांति के दो प्रमुख सूत्रधारों, मार्क्स और बेकुनिन के मतभेद तो जगजाहिर हैं ही. मार्क्स को लगता था कि क्रांति की सफलता के बाद बेकुनिन अपनी राजनीतिक ताकत को बढ़ाना चाहता है. जबकि बेकुनिन का मानना था कि मार्क्स की बढ़ती हुई भूमिका पेरिस में यहूदीवाद को बढ़ावा देगी. इसी प्रकार के मतभेदों के चलते साम्राज्यवादीपूंजीवादी ताकतों के मनसूबों को भांपने में असफल रहे थे. परिणाम यह हुआ था कम्यून पर फिर सशस्त्र सेनाओं का हमला हुआ और राजशाही दुबारी सत्ता पर काबिज होने में कामयाब हुई. व्लादिमिर लेनिन के पेरिस कम्यून की असफलता के कारणों को चिह्नित किया है. एक समाचारपत्र में लिए लिखे गए लेख ‘पेरिस कम्यून का पाठ’ में उसने लिखा था कि कम्यून के नेताओं की

केवल दो बड़ी गलतियों ने उस दमदमाती ऐतिहासिक विजय के लाभों पर पानी फेर दिया. सच तो यह है कि सर्वहारा वर्ग के नेता आधे रास्ते पर ही आराम फरमाने लगे थे. अवैद्य कब्जाधारकों की संपत्ति का अधिग्रहण करके न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के करने के बजाय वे कुछ लोकप्रिय राष्ट्रीय मुद्दों के पक्ष में माहौल बनाने का प्रयास करते रहे. बैंक और ऐसे ही दूसरे अन्य संस्थानों का अधिग्रहण, जो बहुत जरूरी था, नहीं किया गया. सर्वहारा वर्ग के शासकों की दूसरी बड़ी भूल उनकी अतिशय दयालुता थी, जिसके कारण अपने दुश्मनों को कुचलने के बजाय वे उनके साथ दयालुतापूर्ण व्यवहार कर, उनके हृदयपरिवर्तन की उम्मीद करते रहे. जनक्रांति में सीधी सैन्य कार्रवाही की उपयोगिता को उन्होंने बहुत कम करके आंका था. बजाय इसके कि पेरिस के पूर्वशासकों से अपनी सुरक्षा के ठोस और पुख्ता इंतजाम करते, उन्होंने उन्हें आराम से दुबारा ताकत बटोरने का पूरापूरा अवसर दिया, जो मई महीने के भीषण खूनखराबे का कारण बना.’

 

कुछ ऐसा ही रूस में हुआ था. पेरिस क्रांति की असफलता ने मार्क्स को अपनी मान्यताओं पर पुनर्विचार का अवसर दिया था. सशस्त्र विद्रोह से उसका विश्वास घटा था. राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक अधिनायकवाद से दीर्घकालिक मुक्ति के नए रास्तों की खोज का सुफल ‘दि कैपीटल’ के रूप में सामने आया था, जिसे उसने इतिहास, दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्र, विज्ञान आदि गहन अध्ययन के बाद लिखा था. पुस्तक में उसने वर्गहीन समाज की परिकल्पना की थी. स्मरणीय है कि पेरिस कम्यून को मार्क्स ने ‘सर्वहारा का अधिनायकवाद’ की संज्ञा दी थी. वह उसको साम्यवाद की स्थापना की दिशा में पहला चरण मानता था. साम्यवाद की परिकल्पना इस सोच पर आधारित थी कि द्वंद्व की स्थिति विपरीत शक्तियों में ही संभव है. उनसे बचाव का एक ही उपाय है कि समाज में शक्तिकेंद्र ही न रहें. इसलिए श्रमिक वर्ग सत्ता को हाथ में ले. मगर सत्ता हस्तांतरण से ही उसका काम पूरा नहीं हो जाता. उसके लिए आवश्यक है कि समाज में वर्गहीनता की स्थापना के प्रयास भी साथ ही आरंभ कर दिए जाएं. एक समरस समाज की स्थापना, साम्य की स्थापना उनका ध्येय हो, ऐसा उसने कहा था.

रूस में जो हुआ, वह क्रांति का पहला चरण था. वहां लेनिन के नेतृत्व में जारशाही के विरुद्ध संघर्ष का आवाहन किया गया था. जिसमें मजदूर वर्गों को जीत मिली और जारशाही के स्थान पर श्रमिकों की सरकार अस्तित्व में आई. अपने दायित्व को समझते उसने समाज के पुननिर्माण पर जोर दिया. उसका सुखद परिणाम भी मिला. क्रांति के समय रूस की हालत भारत से कहीं बदतर थी. देखते ही देखते वहां विकास का ऐसा दौर चला कि पचाससाठ वर्षों में उसने स्वयं को विश्व की दूसरी महाशक्ति के रूप में स्थापित कर लिया. बस यही उसकी विड़बना थी. क्रांति का पहला चरण पार कर सत्ता पर अधिकार जमा लेने के बाद उसकी कोशिश द्वंद्व की समस्त संभावनाओं को मेटने के लिए जहां वर्गहीन समाज की स्थापना करना था, वहीं उसने खुद को द्वंद्व में झोंकना प्रारंभ कर दिया. सोवियत सरकार असल में तलवार से तराजू का काम लेना चाहती थी. घोषित रूप उसका लक्ष्य साम्यवाद था, मगर असल में थी विरोधियों को परास्त कर, नंबर एक पर बने रहने की कामना. वह दुहाई न्याय की देती थी, मगर अपने नागरिकों के खूनपसीने की कमाई को, हथियारों और अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को विस्तार देने पर खर्च कर रही थी.

इन परिस्थितियों में भी रूस लंबे समय तक साम्यवादी बना रहा तो इसलिए कि मार्क्स ने अपने समर्थक लेखकोंबुद्धिजीवियों का बड़ा वर्ग पैदा किया था, जिनमें गोर्की, चेखव, टालस्टाय, दोस्तोयवस्की आदि महान साहित्यकार सम्मिलित थे. जो साम्यवादी विचारधारा के अनुरूप लगातार सारगर्भित और प्रतिबद्ध लेखन कर रहे थे. इससे वहां के जनमानस में साम्यवाद के प्रति आस्था बनी रही. बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में प्रतिबद्ध साहित्य की चमकदमक खासकर उसमें नए चेहरों की आमद घटती चली गई. वहीं सरकार ने खुद को और भी महत्त्वाकांक्षी बना लिया था. साम्यवादी नीतियों के अनुरूप वर्गहीन समाज की स्थापना पर जोर देने के बजाय, सरकार अपने संसाधन पूंजीवाद के पर्याय बन चुके अमेरिका को परास्त करने पर तुली हुई थी. यह मजदूरों के दम पर बनी सरकार का वैभव प्रेम था. ब्राजील के दर्शनशास्त्री पाउलो फ्रेरा ने बड़े काम की बात कही है. ‘उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र’ में उसने लिखा है कि आमूल परिवर्तन के पहले दौर में, जिसको परिवर्तन की अपरिपक्व अवस्था भी कहते हैं, उत्पीड़ित अवसर मिलते ही वही करता है, जैसा उसने उत्पीड़क को करते हुए देखा है. इस अवस्था में उत्पीड़क और उत्पीड़ित की सिर्फ भूमिकाएं और सिर्फ चेहरे बदलते हैं, स्थितियां नहीं. इसलिए परिवर्तनकामी शक्तियों को, उन शक्तियों को समाज में वास्तविक परिवर्तन की चाहत रखती हैं, प्रारंभिक सफलता के साथ ही रुक नहीं जाना चाहिए. बल्कि आमूल परिवर्तन की कोशिश पहली सफलता के साथ ही आरंभ कर देनी चाहिए. सोवियत संघ के शासकों से भी यही अपेक्षित था कि वे साम्राज्यवादी गतिविधियों में उलझने के बजाय एक नीतिआधारित समाज की स्थापना पर जोर देते. ताकि वर्गहीन समाज की स्थापना संभव हो सके.

रूसी शासक यह भूल चुके थे कि जनता की सोचने की शक्ति भले ही धीमी हो, मगर उसमें छोटे वैचारिक परिवर्तन भी दूरगामी महत्त्व के सिद्ध होते हैं. पूंजीवादी सरकार में हथियारों के निर्माण से लेकर शोध तक का सारा काम पूंजीपति करते हैं. इसके लिए वे श्रमिकों का ऐसे ही शोषण करते हैं, जैसे कि बाकी अन्य उद्योग. लेकिन उनमें काम करने वाला श्रमिक बिना किसी वैचारिक प्रतिबद्धता के, सिर्फ आजीविका की खोज में उनके साथ जुड़ता है. असहमति अथवा असंतुष्टि की अवस्था में वह जब चाहे तब उसको छोड़कर अन्य उद्योग के साथ जुड़ सकता है. कानून उसके इस अधिकार की रक्षा करता है. हालांकि दूसरी जगह भी उसका शोषण होता है, और भौतिक स्थितियां उसके लिए बहुत अधिक बदलती भी नहीं है. तो भी एक उत्पादक को छोड़ आने का जो संतोष है, साथ ही चयन का आनंद और इसके पीछे निहित अस्मिताबोध श्रमिक का अपना और निजी होता है. इससे अधिक वह सामान्यतः अपेक्षा भी नहीं करता. इससे उसका आक्रोश एक सीमा से बाहर नहीं जा पाता.

सोवियत संघ में यद्यपि उपभोग को बढ़ावा देने वाली प्रौद्योगिकी को प्रतिबंधित किया गया था. मगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हथियारों की स्पर्धा और उसमें आगे निकलने की होड़ में वहां की सरकारें राष्ट्रीय आय का बड़े पैमाने पर निवेश कर रही थीं. इस होड़ का नागरिकों के वास्तविक कल्याण से कोई लेनादेना नहीं था. इससे वहां सामाजिक विकास की रफ्तार उतनी नहीं पहुंच पाई थी, जितनी कि साम्यवादी व्यवस्था में अपेक्षित थी. सोवियत नागरिक स्वयं को भावनात्मक रूप से ठगा हुआ महसूस कर रहे थे. इसपर टिप्पणी करते हुए सुविख्यात चिंतक किशन पटनायक ने लिखा था‘आधुनिकतावादी दिमाग, आधुनिक टेक्नालाजी(यंत्रेश्वर) के बारे में इतना ज्यादा अंधविश्वासी है कि उसके विकल्प की संभावनाओं पर सोच नहीं पाता. एक वैकल्पिक यंत्रप्रणाली की तलाश वह कर नहीं सकता. सोवियत रूस में यही हुआ. रूसी कम्युनिस्टों ने कुछ प्रकार की, खासकर उपभोग की टेक्नोलाॅजी को बड़े पैमाने पर प्रतिबंधित किया. लेकिन वैकल्पिक टेक्नोलाॅजी की तलाश के लिए उनका दिमाग तैयार नहीं था. अंततोगत्वा उनके दिमाग पर आधुनिकता का दबाव इतना गहरा हुआ कि रूस साम्यवाद छोड़ने को तैयार हो गया.’

सोवियत संघ में समस्त उत्पादन व्यवस्था श्रमिक संगठनों के और अंततः राज्य के अधीन थी, जिसका उपयोग उनके नेता अपने राजनीतिक मंसूबों को पूरा करने के लिए करते थे. आम मजदूर के लिए कुछ खास नहीं बदला था. उसके लिए शोषणकारी स्थितियों में अपेक्षित सुधार हो ही नहीं पाया था. इसलिए उस व्यवस्था से उनका हताश होना स्वाभाविक ही था. ऊपर से तयशुदा उत्पादन करना मजबूरी. यही कारण है कि वहां श्रमिकों के मन में व्यवस्था के प्रति आक्रोश बढ़ता ही गया. परिणाम सोवियत संघ के विघटन के रूप में सामने आया. बावजूद इसके सोवियत संघ के बिखराव को, मानवाधिकार के पतन के रूप में देखना अनुचित होगा. बस इतना कहा जा सकता है कि सोवियत नेताओं की निजी महत्त्वाकांक्षाओं और अदूरदर्शिता के कारण समाजवाद का प्रयोग वहां उतनी अपेक्षा के साथ सफल न हो सका.

दरअसल मार्क्सवाद की मौत का दावा वे करते हैं जो मानते हैं कि साम्यवाद का उद्भव मार्क्स के जन्म अथवा उसके विवेकीकरण के बाद की घटना है. जबकि ऐसा नहीं है. मार्क्स से पहले भी साम्यवाद था. लोग उपलब्ध सुविधाओं और संसाधनों का मिलजुल कर उपयोग करते थे. स्वयं मार्क्स ने ऐतिहासिक भौतिकवाद की अवधारणा इसी मान्यता के आधार पर प्रस्तुत की है. मार्क्सवाद का अभिप्राय अर्थसत्ता का विकेंद्रीकरण, धर्मसत्ता का विलोपीकरण तथा राजसत्ता का लौकिकीकरण है. ये विचार मार्क्स से ढाई हजार वर्ष पहले जन्मे प्लेटो ने भी व्यक्त किए थे. प्रत्येक धर्म अपना औचित्य सिद्ध करने के लिए इसी प्रकार की लोककल्याणकारी प्रार्थनाओं की अपने विस्तार की सीढी बनाता है. दूसरे शब्दों में मार्क्स के आलोचक वे हैं जो गलत तरीके से संसाधनों पर अधिपत्य जमाए हैं. जो सारा का सारा मुनाफा स्वयं लील जाना चाहते हैं. जो अपनी पूंजी और ताकत के दम पर वर्चस्व बनाए रखना चाहते हैं. जिन्हें दूसरों के श्रमकौशल पर जीने की, परजीवी होने की आदत पड़ चुकी है. मार्क्स के आलोचक वे हैं, जिन्होंने अपनी संपन्नता दूसरों के श्रम पर अर्जित की है. इसके कारण उन देशों के समाज में भारी आर्थिक असमानता है. ऐसे उदाहरण पूंजीवादी देशों में हर जगह हैं.

अमेरिका का ही उदाहरण लें, वहां पूंजीवाद के बाद स्थिति कितनी बिगड़ी है, वह सामने भले ही न आ पाती हो, क्योंकि जनता और बाकी शक्तियों के बीच पुल की भूमिका निभानेवाला मीडिया, पूंजीपतियों का पक्ष लेता है, और उनके हितों के अनुरूप खबरों की मार्केटिंग करता है. जबकि हालात कितने विकट हैं, यह देखकर मन संताप से भर जाता है. बेलगाम पूंजीवाद समाज को सर्वाधिक अमीर और भीषण गरीब लोगों में बांट रहा है, जो अमीर है, वही उत्पादक है. गरीब के श्रम का उपयोग कर वह उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन करता है. गरीब प्राप्त वृत्तिका का बड़ा हिस्सा उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद पर निवेश करता है. मजदूरी के रूप में उसको सिर्फ उतना ही मिल पाता है, जिससे वह अगले लिए काम पर जा सके. कई बार तो प्राप्त वृत्तिका उसकी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी अपर्याप्त सिद्ध होती है.

एक रिपोर्ट के अनुसार 1994 में अमेरिका की 500 प्रमुख कंपनियां उस देश की कुल 92 प्रतिशत आमदनी पर कब्जा जमाए थीं, जबकि विश्वस्तर की 1000 सबसे बड़ी कंपनियों की सालाना आमदनी आठ अरब डालर है, जो दुनिया के कुल लाभ का एक तिहाई है. अमेरिका में ही केवल आधा प्रतिशत सर्वाधिक धनी कंपनियों के अधिकार क्षेत्र में वहां की 50 प्रतिशत संपत्ति आती है. यही नहीं अमीरों की अमीरी निरंतर बड़ती जा रही है. अमेरिका की सबसे धनी एक प्रतिशत जनसंख्या, वहां की राष्ट्रीय आय में 1978 में जहां केवल 17.6 प्रतिशत हिस्सेदारी रखती थी, वह मात्र दस वर्ष अर्थात 1989 में बढ़कर 36.3 प्रतिशत हो चुकी थी. स्मरणीय है कि पश्चिमी समाज में यही वह समय है, जिसे पूंजीवाद का सबसे सुनहरा दौर माना जाता है.

पूंजीवादी अमेरिका में पूंजी का कुछ हाथों में लगातार सिमटते जाना एक राष्ट्रीय समस्या बन चुका है. 2007 में वहां आई भीषण मंदी का खेल हम देख ही चुके हैं, जिसमें पचास से ऊपर भीमकाय बैंक दिवालियेपन का शिकार हुए थे. उससे पहले वहां बड़ी कंपनियों द्वारा छोटे उद्यमों के अधिग्रहण का दौर चला था, जो 1995 अपने चरमबिंदू पर था. मनोरंजन क्षेत्र की दिग्गज कंपनियां वाल्ट डिजनी, वाशिंगटन हाउस, दवा उद्योग की ग्लैक्सो, कागज उद्योग की स्का॓ट पेपर अपनेअपने क्षेत्र की वे महारथी कंपनियां थीं, जिन्होंने अपनी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों को एकाएक निगल लिया था. चेज मेनहट्टन और केमीकल बैंक ने उसी वर्ष मिलकर, 297 अरब डा॓लर की भारीभरकम पूंजी के साथ, अमेरिका के सबसे बड़े बैंकिंग समूह की आधारशिला रखी थी. पूंजीवाद के चरमोत्कर्ष काल में सबकुछ चमकतादमकता हो, यह बात भी नहीं है. बहुत कुछ ऐसा भी था जो चमचमाती रोशनी के पीछे गहराये अंधेरे की हकीकत बयान करता था. अधिग्रहण के उस दौर में छोटी मछलियां आराम से बड़ी मछलियों का शिकार बन रही थीं. उसी वर्ष मित्शुबिशी बैंक और बैंक आफ टोकियो जो दुनिया के सबसे बड़े बैंकों में से थे, दिवालिया घोषित किए गए थे. अधिग्रहण और विलय का यह खेल यूरोपीय देशों में भी फैला और ब्रिटेन, स्विटजरलेंड, जर्मनी आदि अनेक देशों में पूंजी के बड़े मगरमच्छ छोटी मछलियों को निगलने लगे. इससे मार्क्स और ऐंगल्स की यह भविष्यवाणी सच सिद्ध हो रही थी कि पूंजी का सहज स्वभाव केंद्र की ओर खिसकते जाने का होता है. इस प्रकार वह कुछ समूहों तक सिमटकर रह जाती है. अधिग्रहण और विलयीकरण के इस खेल में हर बार कुछ कंपनियां बंद कर दी जाती हैं, जिसका कुफल उनमें कार्यरत श्रमिकों को बेरोजगारी के रूप में भोगना पड़ता है. स्पष्ट है कि

केंद्र की ओर पूंजी का सतत जमाव उत्पादन में किसी प्रकार की वृद्धि नहीं करता, बल्कि इसका उल्टा ही होता है.’

बेरोजगारी का जिक्र हुआ है तो मार्क्स को एक बार पुनः याद करना पड़ेगा. कम्यूनिस्ट मेनीफेस्टो में उसने कहा था कि बुर्जुआ वर्ग लंबे समय तक सत्ता पर काबिज नहीं रह पाएगा. इसलिए कि वह गरीब और विपन्न वर्गों को अपने दम पर अपने राज्य में सहने की सहूलियत नहीं देता, बल्कि उनके बल पर अपने लिए सुविधाओं का अंबार लगा लेता है. इससे श्रमिक वर्ग के मन में आक्रोश पैदा होता है, जो लगातार बढ़ता जाता है, जो एक दिन बुर्जुआ वर्ग के सत्ताच्युत होने का कारण बनता है. हालांकि पूंजीवादी देशों में ऐसी खबरें प्रायः छनछनकर ही सामने आ पाती हैं. पूंजीपतियों से अस्थिमज्जा प्राप्त मीडिया तथा उन्हीं के दम पर पलने वाली सरकारें, उनपर पर्दा डालने का काम करती हैं. 2007 में छाई मंदी से ठीक पहले पूंजीवाद के समर्थक अर्थशास्त्रीविचारक उदार आर्थिक नीतियों का गुणगान करते नहीं थकते थे. 1995-1996 के पूंजीवाद के सुनहरे दौर में जब बड़ी कंपनियां अपेक्षाकृत छोटी कंपनियों का अधिग्रहण कर अपने विस्तारवादी मंसूबों को अंजाम दे रही थीं, उस समय संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक बेरोजगारों की संख्या 12 करोड़ से भी अधिक थी. ये वे आंकड़े थे, जो पूंजीपतियों के आसरे फलनेफूलने वाले मीडिया ने दिए थे. वास्तविक स्थिति और भी भयावह एवं चिंताजनक है. यदि अस्थायी और ठेके पर अल्पावधि के लिए काम करने वाले कर्मचारियों को भी बेरोजगारों की श्रेणी में रख लिया जाए तो दुनिया के कुल बेरोजगारों की संख्या एक अरब से ज्यादा हो सकती है.

संयुक्त राष्ट्र की उस रिपोर्ट के अनुसार पश्चिमी यूरोप में बेरोजगारों की संख्या दो करोड़ से भी अधिक थी, जो वहां की कुल जनसंख्या का करीब 10.6 प्रतिशत हैं. यही हाल यूरोप के ‘लौहपुरुष’(स्ट्रांग मैन) कहे जाने वाले जर्मनी का था, वहां हिटलर के पतन के बाद पहली बार बेरोजगारों की संख्या में जबरदस्त वृद्धि हुई थी और वह एक झटके में पचास लाख को पार कर चुकी थी. इनमें भी सबसे अधिक आश्चर्यजनक जापान की हालत है. अपनी वैज्ञानिक और तकनीकी क्रांति से पूरे विश्व को चैंका देने वाले जापान में 1930 के बाद पहली बार बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई. हालांकि सरकारी आंकड़े वहां तीन प्रतिशत बेरोजगारी की बात स्वीकारते हैं, मगर वास्तविक बेरोजारों की संख्या का, कुल जनसंख्या का आठ से दस प्रतिशत होना, चिंताजनक स्थिति है. बढ़ती बेरोजगारी ने इस बार उन क्षेत्रों को भी प्रभावित किया है, जो इससे पहले रोजगार की दृष्टि से अत्यंत सुरक्षित और लाभदायक समझे जाते थे. इनमें अध्यापक, नर्स, डाॅक्टर, बैंक कर्मचारी, वकील आदि सम्मिलित हैं, जो अपनी व्यावसायिक योग्यता के दम पर रोजगार पाते रहे थे. 2007 के बाद तो बेरोजगारी ने युवाओं की कमर ही तोड़ दी है. अमेरिका, यूरोप आदि के देशों में बैंकों और बड़े उद्योगों के बंद अथवा दिवालिया होने के बाद दुनियाभर के श्रमिकोंकामगारों को छंटनी का शिकार होना पड़ा. उनकी संख्या करोड़ों में है.

उदार अर्थनीति की विडंबना है कि आर्थिक प्रगति का लाभ जहां चंद विकसित देश ही उठा पा रहे थे, जबकि छंटनी और दिवालियेपन का असर प्रायः छोटी और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को ही झेलना पड़ा है. इससे मार्क्स का यह कथन एक बार फिर प्रासंगिक लगने लगा, जिसमें उसने कहा था कि पूंजीवाद एक वैश्विक व्यवस्था के रूप में विकसित होगा. मगर विश्वबाजार का अस्तित्व लंबे समय तक टिके रहने वाला नहीं है. इसका अंत सुनिश्चित है. यह हमारे समय का बेहद निर्णायक समय है. सच तो यह है कि हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जिसमें कुछ भी निजी अथवा स्थानीय नहीं है. हमारी अर्थव्यवस्था, राजनीति, संस्कृति यहां तक कि कूटनीति भी स्थानीय नहीं है. सबकुछ वैश्विक और अंतरराष्ट्रीय है. प्रौद्योगिकी प्रेरित अंतरराष्ट्रीयकरण ने हमारी संवेदनाओं को भौंथरा किया है. आजकल युद्ध के समाचार भी तब तक रोमांचित नहीं करते, जब तक कि उनमें अंतरराष्ट्रीयता का पुट न हो. वैसे युद्ध अब राजनीतिक मसला नहीं रहा. बीसवीं शताब्दी ने जितने युद्ध झेले, उनके पीछे बाजार का अधिक हाथ था, जिनमें करोड़ों की जानें गईं. इनमें सबसे आखिरी युद्ध अमेरिका और इराक के बीच था, जिसमें एक महादेश की पूंजीवादी आकांक्षाओं ने अपने से कहीं छोटे देश को पहले तो बदनाम करने की साजिश की. फिर दादागिरी दिखाते हुए उसपर हमला बोल दिया.

यह दादागिरी राजनीति प्रेरित नहीं थी. न उसको देश के नागरिकों का समर्थन प्राप्त था. समर्थन था, पूंजीपतियों का, जो युद्ध में अपनेअपने लाभ देख रहे थे. एक वर्ग को युद्ध की तबाही के बाद उस देश में नवनिर्माण के लिए ठेके मिलने की उम्मीद थी. कुछ का धंधा हथियार बनानेबेचने का था. वे मानते थे कि युद्ध नवनिर्मित रासायनिक हथियारों के प्रदर्शन का अच्छा अवसर सिद्ध होगा, बाद में उनके ग्राहक भी आएंगे. इन महत्त्वाकांक्षाओं ने एक फलतेफूलते देश को तबाही के गर्त में ढकेल दिया. हैरानी की बात है कि जनता और बुद्धिजीवी उस युद्ध को केवल राजनीतिक मसला समझे रहे. युद्ध के वास्तविक जिम्मेदार व्यक्ति कभी सामने आ ही नहीं पाए. युद्ध से नाराज जनता ने बुश महाराज से कुर्सी तो छीन ली. नई उम्मीदों के साथ नया चेहरा राजनीति में आया. मगर पूंजीवादी मंसूबे खत्म नहीं हुए. यानी युद्ध की संभावनाओं और उससे जुड़ी पूंजीवादी आकांक्षाओं का कोई निदान आज तक नहीं खोजा जा सका.

समस्या है कि पूंजीवाद के इस खेल से बचा कैसे जाए? इसका एक ही हल है. किसी भी तरह किसान, मजदूर और कामगार वर्ग अपनेअपने हितों की रक्षा में एकजुट हों. अपनी वास्तविक जरूरतों का आकलन करें. उपलब्ध संसाधनों को जांचे परखें. तत्पश्चात अनुकूल प्रौद्योगिकी का चयन कर उत्पादन की जिम्मेदारी स्वयं संभालें. प्रौद्योगिकी भी ऐसी हो जो समूह के सदस्यों की कुशलता का उपयोग कर, उन्हें आर्थिकसामाजिक रूप में आत्मनिर्भर बनाती हो. लेकिन क्या यह इतना ही आसान है? आजकल सामान्य समझबूझ वाला बुद्धिजीवी भी मानता है कि उद्योगों को बंधनमुक्त होना चाहिए. सरकार उनपर कम से कम नियंत्रण रखे. वैश्विक अर्थव्यवस्था का विकास हो, ताकि उद्योगों को हर जगह एक जैसा वातावरण मिले. सभी देशों में लाइसेंस और परमिट की एकसी शर्तें, एक जैसे विधान हों. व्यवस्था हो कि उद्योगों को समाज के बहुसंख्यक वर्ग के विकास के लिए काम करने की पूरीपूरी छूट मिले. साथ में आवश्यक सुविधाएं भी. ऐसे में कैसे संभव है, पूंजीवाद के संकट से बच पाना. खासकर तब जब पूंजीवाद लगातार मजबूत और हिंò होता जा रहा हो. श्रमिक शोषण के नएनए रास्ते खोजे जा रहे हों. शोध का क्षेत्र पूंजीपतियों के हाथ में चले जाने से सारी प्रतिभाएं, सारे के सारे पेटेंट पहले से ही उनके हाथों में जा ही चुके हैं. पूंजीपतियों के लिए तो वैश्वीकरण भी एक अवसर है. यह वैश्वीकरण भी निरापद कहां है? इससे बड़ी विडंबना भला और क्या होगी कि पिछली शताब्दी में भूमंडलीकरण एवं अर्थव्यवस्था के अंतरराष्ट्रीयकरण की तमाम सूचनाओं के बावजूद भारत में आर्थिक विसंगतियां सिर चढ़कर बोल रही हैं. देश में रोजगार के जितने अवसर बढ़े हैं, बेरोजगारों की संख्या उससे कहीं अधिक बढ़ी है. उससे कहीं तेजी से देश में आर्थिक असमानता बढ़ती जा रही है.

पूंजीवाद के अंतरराष्ट्रीय फैलाव के कारण विभिन्न देशों के आंतरिक और बाह्यः तनावों में भी वृद्धि हुई है. राज्यों के विरोधाभास और भी खुलकर सामने आए हैं. पूंजी का खिंचाव अतिविकसित देशों की ओर बढ़ता ही जा रहा है. हालात को समझने के लिए सिर्फ एक उदाहरण पर्याप्त होगा. 1987 में संयुक्त राज्य अमेरिका अपने कुल सालाना बजट का मात्र छह प्रतिशत हिस्सा निर्यात के माध्यम से जुटाता था. 1997 में निर्यात का हिस्सा बढ़कर 13 प्रतिशत यानी दुगुने से भी अधिक हो चुका था. इकीसवीं शताब्दी की दहलीज पर सरकार की योजना 22 प्रतिशत के लक्ष्य को पाने की है. इससे अमेरिका जैसे विकसित देशों की अर्थव्यवस्था के रहस्य को समझा जा सकता है. विकसित देशों के पास तो पूंजी है, संसाधन हैं, इसलिए वे अपने उत्पादों के लिए बाजार की सतत खोज में रहते हैं. ऐसी तकनीक की खोज में रहते हैं, जिसकी स्थापना लागत भले ही अधिक हो, मगर जिसके माध्यम से उत्पादन व्यवस्था का अधिकाधिक स्वचालीकरण कर सकें. स्वचालीकरण की तीव्र प्रक्रिया में स्थापना लागत भले ही अपेक्षाकृत अधिक हो, मगर उत्पादनवृद्धि और प्रचालन लागत में भारी कमी से उद्योगपति को दीर्घकालिक लाभ मिलता है. दूसरी ओर श्रमिकों पर निर्भरता में लगातार गिरावट आती है. इससे पूंजीपति लगातार ताकतवर होता है और श्रमिक कमजोर.

इस स्थिति को मार्क्स ने 1848 में ही भांप लिया था. कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो में उसने लिखा था

सघन मशीनीकरण तथा श्रमविभाजन की त्वरित प्रक्रिया में सर्वहारा काम के दौरान अपनी समस्त कार्यकौशल और विशिष्टताएं खो बैठता है. इसका प्रतिकूल प्रभाव उसकी कार्यक्षमता पर पड़ता है. उसका उल्लास धीरेधीरे कम होने लगता है. एक दिन वह मशीनों का आश्रित बनकर रह जाता है. पूंजीवादी समाजों में श्रमिक के कौशल को कुंद करने, उसको मशीनों का दास बनाने की सर्वाधिक सरल और प्रचलित चाल है. इससे श्रमिक की उत्पादन लागत को लगभग पूरी तरह से, उसकी रोजमर्रा की आवश्यकताओं तक, सिर्फ उन आवश्यकताओं तक जिनसे वह अपना भरणपोषण कर, कलकारखानों के लिए मजदूरों की नई फसल पैदा कर सके, सीमित कर दिया जाता है. चूंकि किसी उपभोक्ता वस्तु, साथ ही उसके श्रम की कीमत उत्पादन लागत के तय होती है. अतएव जैसेजैसे श्रमिक का उत्पादन से मोहभंग बढ़ता है, काम के प्रति उसका विकर्षण बढ़ता जाता है. दूसरी ओर उसकी वृत्तिका भी उसी अनुपात में गिरती चली जाती है. इसी के साथ कामगार के ऊपर, चाहे वह कार्यघंटों में हुई बढ़ोत्तरी के कारण हो या तय समयसीमा में अधिक काम देने के दबाव का मामला, अथवा उच्च उत्पादनक्षमता युक्त मशीनरी के साथ काम करने के कारण उसके साथ तालमेल बनाए रखने की चुनौतीश्रम का दबाव भी लगातार बढ़ता जाता है.

सोवियत संघ के अवसान के बाद भारत आदि देशों में अमेरिकापरस्त अर्थशास्त्रियों एवं बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग पैदा हुआ है, जिसने पूंजीवाद को लगभग अपरिहार्य और विकल्पहीन मान लिया है. स्वयं अमेरिका की क्या स्थिति है, इस बारे में बहुत अधिक समाचार मीडिया में नहीं दिए जाते हैं. यह भी कहा जा सकता है कि अपने पूंजीवादी संबंधों की लाज रखने के लिए मीडिया उनपर पर्दा डाले रखता है. वस्तुतः आधुनिक अमेरिका की वही हालत है, जो मार्क्स के समय में तत्कालीन सर्वाधिक विकसित पूंजीवादी देश ब्रिटेन की थी. अंतर केवल इतना है कि ब्रिटेन अपने उपनिवेशों के दोहन के लिए राजनीति का सहारा लेता था, अमेरिका यह काम अपनी अर्थसत्ता के माध्यम से करता है. उसने पूरी दुनिया में अपने आर्थिक उपनिवेश बसाए हुए हैं, जिनपर वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक जैसी संस्थाओं के माध्यम से राज करता है. उपनिवेशों के शोषण में बौद्धिक संपदा जैसे कानून उसके मददगार सिद्ध होते हैं. इसके बावजूद हालात संतोषजनक नहीं हैं. आक्रोश भीतर ही भीतर भड़क रहा है. इसके पीछे अमेरिकी अर्थव्यवस्था की वे विसंगतियां हैं, जो धीरेधीरे सामने आ रही हैं. ऐलेन वुड के अनुसार अमेरिका में

गत बीस वर्षों के दौरान अमेरिकी श्रमिकों की वास्तविक मजदूरों में बीस प्रतिशत तक की भारी गिरावट दर्ज हुई है, दूसरी ओर उन्हें पहले की अपेक्षा प्रतिदिन दस प्रतिशत अधिक काम करना पड़ता है. कहा जा सकता है कि अमेरिका की औद्योगिक क्रांति वहां के श्रमिक वर्ग के हितों पर कुठाराघात के बाद संभव हो सकी है. उदाहरणार्थ, एक अमेरिकी कर्मचारी को एक वर्ष में औसतन 168 घंटे ओवरटाइम करना पड़ता है, जो एक महीने के कार्य के बराबर है. अमेरिकी आॅटोमोबाइल उद्योग के लिए यह विशेषरूप में सही है, जहां एक कार्यदिवस में नौ घंटे और सप्ताह में छह दिन कार्य करने का प्रावधान है. अमेरिकी मजदूर संगठनों के अनुसार यदि वहां कार्यसप्ताह को चालीस घंटों तक सीमित कर दिया जाए तो मात्र इसी से 59,000 नए रोजगार अवसर पैदा किए जा सकते हैं.’


ऐसा नहीं है कि अपने शोषण के विरोध में श्रमिकों में कोई चेतना या सुगबुगाहट न हो. बल्कि वहां आवाजें उठने लगी हैं. करीब पंद्रह वर्ष पहले 24 अक्टूबर, 1994 को टाइम पत्रिका में प्रकाशित एक आलेख में पूंजीवादी शोषण के विरोध में बढ़ते श्रमिकआक्रोश का उल्लेख किया गया था, जिसमें उन्होंने उदारवाद प्रेरित आर्थिक विस्तार को अपने हितों के प्रतिकूल बताया था. लेख में बताया गया था कि काम के अत्यधिक बोझ के कारण, श्रमिकों की दिनचर्या कारखाने में काम तथा ओवरटाइम करने के बाद घर जाकर नहानेखानेसोने और अगली सुबह फिर कारखाने के लिए दौड़ लगाने तक सिमट चुकी है. इसने वहां के सामाजिक जीवन को भी प्रभावित किया है. इससे जहां शिशु जन्म दर में गिरावट दर्ज की गई है, वहीं तलाक की घटनाओं में भी अप्रत्याशित तेजी आई है. जबकि 1980 तक लगातार विकासमान रही जीवनसंभाव्यता, उसके बाद लगभग स्थिर हो गई है. यह स्थिति अमेरिकी समाज के विकास की विडंबना को दर्शाती है. ब्रिटेन का हाल भी इससे भिन्न नहीं है. जब मादाम थैचर वहां की प्रधानमंत्री थीं तो उद्योगों में 25 लाख रोजगार अवसरों में गिरावट दर्ज की गई थी. बावजूद इसके वहां कारखानों के उत्पादनसामर्थ्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है. कामगारों की संख्या में हुई भारी गिरावट के बावजूद उत्पादन स्तर पूर्ववत रहने का कारण केवल उन्नत मशीनों का उपयोग नही है, बल्कि मजदूरों का शोषण भी है. अत्याधुनिक तकनीक भी श्रमिकों के लिए राहतकारी सिद्ध नहीं हुई है. उनकी मुश्किलें बढ़ती ही जा रही हैं. श्रमिकों एवं आम जनता को भुलावे में रखने के लिए नए उपकरणों को बड़ी तेजी से एक के बाद कर उतारा जा रहा है. ऐसे उत्पादों के निर्माण पर जोर दिया जा रहा है, जिनका वास्तविक विकास से कोई संबंध ही न हो. लोकतांत्रिक खुलेपन का उपयोग फैशन और नईनई उपभोक्तावस्तुओं के साथ, लोगों को मोबाइल और इंटरनेट पर खुली सेक्ससामग्री परोसने के लिए किया जा रहा है. तंत्रमंत्र और जादूटोने की बढ़ती लोकप्रियता का लाभ उपभोक्तासामग्री के प्रचारप्रसार के लिए किया है. इसका दुष्परिणाम यह है कि समाज में आर्थिक विषमता लगातार बढ़ रही है.

अमेरिका की भांति ब्रिटेन में भी श्रमिकों को अधिक देर तक कार्य करने के लिए बाध्य किया जाता है. उन्हें उस अवधि का वेतन भी नहीं दिया जाता. यही हाल यूरोप के बाकी देशों का है. वहां भी बड़ी औद्योगिक कंपनियां छोटे उत्पादकों को लीलती जा रही हैं. सबसे धनी और निर्धनतम व्यक्ति के बीच आय का अंतर लगातार बड़ता जा रहा है. भारत समेत ऐशियाई देशों में पूंजीवादी व्यवस्था को लागू हुए अधिक दिन नहीं हुए हैं. पश्चिम का अंधानुकरण करते हुए भारत ने उदार अर्थव्यवस्था को अपनाकर, गत पचीसतीस वर्ष से पूंजीपतियों को मनमानी करने का अधिकार दे दिया है. इससे पूंजी का तेजी से केंद्र की ओर खिंचाव जारी है. पिछले एक दशक में जहां देश में अरबपतियों की संख्या में कई गुना वृद्धि हुई है, वहीं पैंतीस करोड़ नागरिकों को प्रतिदिन बीस रुपये से भी कम आय में जीवनयापन करना पड़ता है. बढ़ते जनाक्रोश के दुष्परिणामस्वरूप पिछले कुछ दिनों से देश में नक्सलवादी गतिविधियां बढ़ी हैं. सरकार और पूंजीपतियों के दबाव में अपनी जमीन और संसाधन लुटा चुके हजारों लोग विद्रोह में व्यवस्था के विरुद्ध हथियारबंद हो उठे हैं. छोटे कारखानों में मजदूरी की बुरी हालत है. वहां बिना किसी नोटिस के कार्यघंटों में 50 प्रतिशत तक वृद्धि हो चुकी थी. इससे पहले जहां श्रमिकों को केवल आठ घंटे काम करना पड़ता था, अब बारह घंटे उतने ही वेतन में काम करना उनकी विवशता बनती जा रही है. यही हालात एशिया के बाकी देशों में हैं. पश्चिम भी इनसे बचा नहीं है. मीडिया पूंजी की इस तानाशाही के विरुद्ध आवाज उठाने के बजाय उसके महिमामंडन में लगा रहता है. स्थिति पर गंभीरतापूर्वक विचार किए बिना उसका प्रयास मार्क्सवाद कठघरे में खड़ा करने का होता है, जिससे अंततः पूंजीवाद ही मजबूत होता है.

यह मार्क्स और ऐंगल्स ही थे, जिन्होंने हमारा परिचय सामाजिक विकास के इस सर्वमान्य और महत्त्वपूर्ण नियम से कराया था, जिसके अनुसार समाज का वर्तमान ढांचा पूंजीपतियों के अनुकूल विकसित हुआ है. यह उसी अवस्था में स्थिर रह सकता है, जब तक समाज की उत्पादक शक्तियां सुरक्षित हैं. कोई भी समाज इससे उस समय तक बच नहीं सकता, जब तक कि वह अपने समस्त संसाधन इस व्यवस्था के विकास के लिए, पूंजीवाद की समृद्धि के निमित्त झोंक नहीं देता. पूंजीवाद के समर्थक अक्सर इस बात का दावा करते हैं कि बाजार की समृद्धि का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचता है. क्योंकि बाजार सभी को अपनी वस्तु का मूल्यांकन करने तथा उसके अनुसार उसका मूल्य वसूलने का आश्वासन देता है. उनके अनुसार यह व्यवस्था श्रमिक के लिए अधिक लाभकारी है. इसमें वह स्पर्धा का लाभ उठाकर अपने लिए ऐसे नियोक्ता की तलाश की तलाश कर सकता है, जहां उसको अधिकतम वृत्तिका की संभावना हो. यह एक दिवास्वप्न ही है. उन्हें जिस गुण में पंूजीवाद की सार्थकता नजर आती है, दरअसल वही उसकी कमजोरी है. नियम है कि बाजार में पूंजी की ताकत ही सर्वोपरि होती है. इसलिए वहां छोटी पूंजी को बड़ी पूंजी के आगे परास्त होना पड़ता है. किसान और श्रमिक के पास अपना श्रम या वे छोटे संसाधन पूंजी के रूप में होते हैं, जो बाजार में किसी प्रकार की ताकत बनने में नाकाम होते हैं. परिणामस्वरूप अपने मूल्यांकन के लिए वे सदैव दूसरों पर निर्भर रहते हैं, जहां उनकी योग्यता का न्यूनतर मूल्यांकन किया जाता है. यह स्थिति पूंजीवादी शोषण को जन्म देती है.

पूंजी की तानाशाही के चलते हम सिर्फ यह सोचकर तसल्ली कर सकते हैं कि किसी भी अन्य विधान की भांति पूंजीवाद का भी जन्म हुआ है. वह भी दूसरी विचारधाराओं की भांति इतिहास के साथ विकसित हुआ है, और आज वह जिस अवस्था में है, वह उसके चढ़ाव की चरम अवस्था है. यहां से उसका पतन अवश्यंभावी है. यही ऐतिहासिक भौतिकवाद की अवधारणा है. यही मार्क्स के चिंतन का लक्ष्यबिंदू है. जब हम इस वैज्ञानिक तथ्य को समझ लेते हैं, तो यह समझना भी आसान हो जाता है कि इतिहास घटनाओं की भावहीन, अतार्किक, अनियोजित और आकस्मिक व्यवस्था नहीं है, जिसको चंद लोग अपनी मनमर्जी से हांक सकें. न ही यह कुछ लोगों की गतिविधियों का परिणाम है. बल्कि यहां जो घटता है, वह एक नैसर्गिक व्यवस्था के अनुसार संचालित होता है, जिसकी सुसंगत व्याख्या संभव है.

मार्क्स के ये विचार चाल्र्स डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत से प्रेरित थे, जिसने जीवजगत को परिवर्तनशील माना था. अपने अध्ययन द्वारा वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि जीवजंतुओं का भी अपना भूतवर्तमान और भविष्य होता है. विकासक्रम के दौरान उन्हें एक सतत परिवर्तनशील एवं विकासमान प्रक्रिया से अनिवार्यतः गुजरना पड़ता है. डार्विन की वैज्ञानिक खोज की सामाजिक विकास के संदर्भ में व्याख्या करते समय मार्क्स एवं ऐंगल्स का मानना था कि इस सृष्टि में पूर्णतः स्थायी और अपरिवर्तनशील सत्ता की कल्पना मात्र एक भ्रम है. इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है, जो पूरी तरह स्थायी एवं अपरिवर्तनीय हो. सामाजिकतंत्र, चाहे जो भी हो, वह मानवीय भावनाओं के सीमित स्वरूप का प्रदर्शन करता है. अपने भरणपोषण के लिए प्रत्येक समाज उत्पादकता के संसाधनों को अपनाता है. उसके लिए जिन संसाधनों को वह चुनता है, उन्हीं पर उसके विकास की दिशा एवं गति निर्भर करती है. ऐतिहासिक भौतिकवाद का विवेचन करता हुआ मार्क्स अंततः इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि वर्तमान समाजों का अभी तक तक इतिहास वर्ग, संघर्ष का इतिहास रहा है.

मजदूर कोरी वितंडा नहीं चाहता. मार्क्स ने उसके हक की बात कही थी. अपने सुख, प्रतिष्ठा और परिवार के भविष्य को दाव पर लगाकर उसने उनके लिए संघर्ष किया था. मजदूर इस तथ्य को जानता है. अतएव मार्क्स उसके लिए देवता हैं. सच तो यह है कि मार्क्स ने हीगेल का द्वंद्ववाद का मानवीकरण किया था. वह उसको आकाश से उतारकर जमीन पर ले आया था. एक तत्ववादी चिंतन को विशुद्ध यथार्थ, लोकोपयोगी चिंतन के रूप में ढाल दिया था. उसका मानना था कि पूंजीवाद का खात्मा श्रमिकों द्वारा उत्पादनतंत्र पर कब्जा कर लेने मात्र से संभव नहीं है. उनके वास्तविक कल्याण के लिए व्यवस्था में आमूल बदलाव जरूरी है. ऐसी व्यवस्था की नींव रखनी होगी जो वर्गहीनता की समर्थक हो. तभी सामाजिकआर्थिक ऊंचनीच की खाई को पाटा जा सकता है. मार्क्स के आलोचकों का सोच केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित है. वे व्यवस्था परिवर्तन के संकल्प से दूर हैं. ऐसे आलोचकों द्वारा मार्क्स की आलोचना की कोई भी बात, उसके चेलेचपाटों की समझ में नहीं आतीं. उन्हें तो गोपियों जैसी साकार भक्ति चाहिए. उद्धव का ज्ञानयोग उनके किसी काम कर नहीं.

मार्क्स अर्थव्यवस्था, राजनीति और समाजनीति में व्यापक परिवर्तन चाहता था. वह चाहता था कि अर्थनीति का ढांचा मुनाफे के आधार पर नहीं, मानवीय विकास और संवेदनाओं के अनुसार तय किया जाए. मार्क्स के अनुयायी दुनिया को उसी की निगाह से देखते हैं, सिर्फ उसको चाहते हैं. यही उनके लोकप्रिय अथवा अलोकप्रिय होने का कारण है. यही वह गुण है जिसने पूरी दुनिया को दो धु्रवों में बांट रखा है. मार्क्स के चिंतन में सर्वभक्षक पूंजीवाद का विकल्प उपलब्ध है, जिसने पूरी दुनिया की संपदा का प्रवाह विकसित देशों की ओर मोड़ दिया है. कहने को तो तमाम अंतरराष्ट्रीय संधियां देशों के बीच मुक्त व्यापार की बात करती हैं. प्रत्येक देश को यह अधिकार देतीं है कि वह अपने संसाधनों का उपयोग कर अपने उत्पादक सामथ्र्य का अधिक से लाभ उठा सके. मगर व्यवहार में विकसित देशों की अत्याधुनिक तकनीक और विपुल साधनों के आगे स्पर्धा में वे टिक ही नहीं पाते हैं. इसलिए उदार अर्थव्यवस्था का लाभ केवल विकसित देशों के लाभाधिकार तक सीमित होकर रह जाता है. ऐसे में मार्क्स का विश्लेषण हमें पूंजीवाद को गहराई से समझने और उसका सार्थक विकल्प खोजने में मदद कर सकता है.

मार्क्स का सारा जोर पूंजीवाद के चरित्र और उसकी विवेचना को लेकर था. इसी संकल्पना के साथ उसने ‘पूंजी’ की रचना की थी. मार्क्स के निधन के बाद से पिछले 127 वर्षों में पूंजीवाद के चरित्र में व्यापक बदलाव आया है. तो भी उसका मूल चरित्र लगभग वही है, जो उनीसवीं शताब्दी के दौरान था. बल्कि कई मायने में वह पहले से अधिक ताकतवर, क्रूर, उत्पीड़क एवं दुःखदायी हुआ है. स्वचालित प्रौद्योगिकी ने पूंजीपति को पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली तथा निष्ठुर बनाया है. इसकी मार्क्स के जीवनकाल में केवल शुरुआत ही हो पाई थी. हाल के वर्षों में कंप्यूटरआधारित तकनीक ने मशीनों को इतना कार्यक्षम और स्वचालित बना दिया है, कि अनेक क्षेत्र ऐसे हैं, जहां मशीनों का नियंत्रण रिमोट के माध्यम से संभव है. उन स्थानों में श्रमिक का कार्य केवल तैयार माल को सुरक्षित रखने या उसको गंतव्यस्थल तक लानेले जाने में सिमट गया है. वह मानवी हस्तकौशल एवं उसके तकनीकी ज्ञान की उपेक्षा करती है. चूंकि मशीनें तकनीकी कौशल की भरपाई आसानी से कर देती हैं, इसलिए पूंजीपति के लिए श्रमिक की भूमिका उत्पादनकार्य में मात्र सहायक तक सिमटकर रह जाती है. उन्नत प्रौद्योगिकी ने श्रमिकों के मन से ‘उत्पादकशक्ति’ होने की अनुभूति को छीनकर उन्हें कुंठाग्रस्त करने का काम किया है. श्रम का शोषण करना, अधिलाभ के बड़े हिस्से पर उत्पादक का अधिकार, अपने से छोटे उद्यमियों को स्पर्धा में परास्त कर बाजार पर एकाधिकार कायम कर लेने की इच्छा आदि आधुनिक पूंजीवाद के कुछ ऐसे अवगुण हैं, जो आज भी उनीसवीं शताब्दी के पूंजीवाद से मेल खाते हैं, जिनमें कतई सुधार नहीं हुआ है. इससे भी बड़ी बात यह हुई है कि पूंजीपतियों ने लंबी पहुंच वाले संचारमाध्यमों पर कब्जा करके प्रतिपक्ष की आवाज को न उभरने देने का पूरापूरा प्रबंध कर लिया है. कहा जा सकता है कि जिस वैज्ञानिक समाजवाद की परिकल्पना मार्क्स ने की थी, उसकी पहले से कहीं अधिक आवश्यकता आज है.

बावजूद इसके यह एक सामान्य जिज्ञासा का सवाल है कि मार्क्स की आज के संदर्भों में कितनी प्रासंगिकता है. क्या उसके विचारों को इकीसवीं शताब्दी में भी ज्यों का ज्यों अपनाया जा सकता है. दरअसल किसी भी कालखंड में मार्क्स के विचारों को संपूर्णता से आत्मसात नहीं किया गया. इसके कारण स्वयं मार्क्स के लेखन में ही सुरक्षित हैं. ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ में वह मजदूरों का सक्रिय क्रांति के लिए आवाह्न करता है. अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हिंसा का सहारा लेने में भी उसको संकोच नहीं है. पेरिस की रक्तरंजित क्रांति और तदनंतर कम्यून की स्थापना के पीछे भी माक्र्सवादी प्रेरणाएं ही थीं. मार्क्स के विचारों के आधार पर ही श्रमिक आंदोलन की नींव रखी गई. यद्यपि बाद में उसका हिंसक क्रांति से मोहभंग होता है और वह आमूल परिवर्तन के लिए, पूंजीवाद से साम्यवाद तक की यात्रा को दो हिस्सों में बांट देता है. उसके अनुसार क्रांति के पहले चरण में श्रमिक संगठन समस्त राजनीतिक और उत्पादनतंत्रों पर अपना अधिकार जमा लेंगे. उसके बाद वे आमूल परिवर्तन के लिए वर्गहीन समाज की स्थापना के लिए प्रयासरत होंगे.

इतनी स्पष्टता के बावजूद मार्क्स के विचारों को लेकर उसके समर्थकों के बीच आज भी भारी मतभेद हैं. मार्क्स का राजनीतिकआर्थिक दर्शन दुनियाभर में ‘मार्क्सवाद ’ के नाम से जाना जाता है, जिसमें वह ऐतिहासिक द्वंद्ववाद के आधार पर पूंजीवाद की तीखी आलोचना करता है. परिवर्तन के लिए वर्गसंघर्ष को अवश्यंभावी मानते हुए उसमें सर्वहारावर्ग की जीत की ओर संकेत करता है. दावा करता है कि पूंजीवाद का अंत निश्चित है, वह अपनी ही कमजोरियों का शिकार होकर एक दिन धराशायी हो जाएगा. मार्क्स के इस विश्वास के बावजूद एक स्वाभाविकसा प्रश्न यहां उभरता है कि क्या ‘मार्क्सवाद ’ उसकी मान्यताओं का सहीसही प्रतिनिधित्व करता है. इस प्रकार की बहसें नई नहीं हैं. मार्क्स के जीवनकाल में ये आरंभ हो चुकी थीं. शायद ऐसी ही किसी बहस से तंग आकर अपनी मृत्यु से कुछ दिन पहले मार्क्स ने अपने साले पाल ला॓फर्ग और फ्रांस के चर्चित श्रमिक नेता जूल्स जूडे पर ‘क्रांतिकारी नारों की सौदेबाजी’ तथा उनका श्रमिकों की संगठित शक्ति में अविश्वास होने का आरोप लगाया था. उल्लेखनीय है कि जूडे ने अपने सहयोगियों से पार्लियामेंट हा॓ल से वर्गसंघर्ष की शुरुआत करने का प्रस्ताव रखा था, जिसका उसके साथियों ने जो संसदीय तरीकों में विश्वास रखते थे और मिलजुलकर रास्ता निकालने की नीति के समर्थक थे,जमकर विरोध किया था. इस घटना के बाद कुछ लोगों द्वारा यह आरोप लगाने पर कि जूडे ने जो किया, उसके पीछे मार्क्स की ही प्रेरणा थी, मार्क्स ने अपनी प्रतिक्रिया ऐंगल्स को संबोधित एक पत्र में व्यक्त की थी. उसने लिखा था कि

‘‘यदि यही मार्क्सवाद है तो मैं मार्क्सवादी नहीं हूं.’’

इस तरह मार्क्स के जीवनकाल में ही उसके विचारों के आधार पर समर्थकों के दो दल बन चुके थे. इनमें से एक वर्ग मार्क्स की उपभोक्ता सामग्री, उत्पादन, पूंजी, श्रम आदि को लेकर तर्कसम्मत गवेषणासामथ्र्य का प्रशंसक था, जिसके आधार पर उसने ‘दि कैपीटल’ नामक ग्रंथ की रचना की थी. यह पुस्तक साम्यवादी राज्य की अभिकल्पना प्रस्तुत करती थी. मार्क्स के प्रशंसकों का दूसरा वर्ग ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ के साथ गहराई से जुड़ा था और मानता था कि समाजवाद की स्थापना के लिए क्रांति अपरिहार्य है. उसके अलावा परिवर्तन का कोई दूसरा रास्ता नहीं है. मार्क्स की मृत्यु के छह वर्ष उपरांत ऐंगल्स ने ‘दूसरा इंटरनेशनल’ की स्थापना की तो उसने भी राजनीतिक प्रतिरोध की नीति को अपनाया था. ‘दूसरा इंटरनेशनल’ को मार्क्स के सहयोग से स्थापित ‘प्रथम इंटरनेशनल’ की अपेक्षा अधिक सफलता प्राप्त हुई थी. रूस में साम्यवादी क्रांति के बीजतत्व ‘दूसरा इंटरनेशनल’ तथा प्रथम विश्वयुद्ध की असंगतियों से उपजे असंतोष का ही परिणाम थे. लेनिन ने स्वयं को मार्क्स के दर्शन और राजनीतिक चिंतन का असली उत्तराधिकारी घोषित करते हुए रूस में बोल्शेविक क्रांति की नींव रखी. दरअसल लेनिन की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं बड़ी थीं. उसने मार्क्स से उतना ही ग्रहण किया था, जितना उसको अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए आवश्यक लगता था. मार्क्स का साम्यवाद सर्वहारा क्रांति से आगे की अवस्था थी. मगर रूस में बोल्शेविक क्रांति पहले चरण पर ही ठहर चुकी थी. बजाय इसके कि मार्क्स के विचारों पर पूरी तरह अमल करते हुए पूर्ण साम्यवाद की स्थापना के प्रयास किए जाएं, रूसी सरकार ने खुद को मारक हथियारों की दौड़ में शामिल कर लिया था. सर्वहारा कल्याण के अनुकूल वैकल्पिक प्रौद्योगिकी की खोज और उसके आधार पर साम्यवाद की स्थापना की ओर किसी का ध्यान ही नहीं था. इससे वहां के नागरिकों के मन में असंतोष पनपा जो अंततः सोवियत संघ के बिखराव का कारण बना. फिर भी यदि करीब अस्सी वर्ष तक रूस में साम्यवाद बना रहा तो इसके पीछे चेखव, गोर्की, दोस्तोयवस्की, अलेक्जांद्र पुश्किन, इवान तुर्गनेव जैसे महान लेखकों का हाथ था, जिसने उस व्यवस्था का एक रूमानी सपना अपने समाज को दिखाया था, जिसकी वास्तविक स्थापना के लिए रूसी समाज दशकों तक प्रतीक्षा करता रहा.

मार्क्स का मानना था कि साम्यवादी क्रांति विकसित औद्योगिक समाजों में ही सफल होगी. फ्रांस, जर्मनी, इंग्लेंड जैसे देशों को जहां औद्योगिक क्रांति फैल चुकी थी उसने साम्यवादी क्रांति के लिए सर्वाधिक उपयुक्त बताया था. उसका मानना था कि विकसित समाजों में औद्योगिकीकरण के कारण समाज में आर्थिक असमानताओं में वृद्धि होती जाएगी, जो सर्वहारावर्ग को अपनी स्थिति में परिवर्तन के लिए एकजुट होने तथा उत्पीड़क पूंजीपतियों के विरुद्ध संघर्ष छेड़ने की प्रेरणा देगी. इससे भिन्न व्लादिमिर लेनिन का विचार था कि साम्राज्यवादी शोषण तथा अनियोजित एवं असमान आर्थिक विकास के चलते सर्वहारा क्रांति के लिए पिछड़े देशों में अधिक संभावनाएं हैं. उसका मानना था कि पूंजीवाद जनित उत्पीड़क स्थितियों तथा आर्थिक असमानता का यह दबाव अपेक्षाकृत छोटे और पिछड़े समाजों में सर्वहारा क्रांति की अधिक संभावना पैदा करेगा. वहीं से क्रांति की हवा विकसित देशों की ओर बहेगी, जहां का समाज समाजवाद की स्थापना के तैयार है, तदनंतर वह रूस की ओर बढ़ेगी. ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ के रूसी संस्करण की भूमिका में भी मार्क्स ने कुछ ऐसी ही संभावना व्यक्त की थी. इस संभावना पर विचार करते हुए कि सार्वजनिक भूस्वामित्व का अभ्यस्त रूसी समाज क्या साम्यवाद के ऊंचे आदर्शों को अपनाने के आसानी से तैयार होगा, उसने लिखा था कि संभावना यही है कि यदि रूसी क्रांति पश्चिम में सर्वहारा क्रांति के लिए प्रेरणा बनती है तो भूमि पर सार्वजनिक अधिकार का मुद्दा साम्यवाद के विकास का आधारभूत सिद्धांत सिद्ध होगा, इसलिए कि वह साम्यवाद का ही एक रूप है.

मार्क्स का यह विचार कि रूस पश्चिम की साम्यवादी क्रांति का प्रेरणास्रोत बन सकता है, लेनिन और उसके सहयोगी ट्राटस्की के चिंतनकर्म का आधार बना. ट्राटस्की और उसके सहयोगी इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि पश्चिम में साम्यवादी क्रांति की असफलता रूसी क्रांति और कालांतर में पश्चिमी देशों में सर्वहारा क्रांति को प्रेरित करेगी और इस तरह रूस वैश्विक सर्वहारा क्रांति का सूत्रधार बनेगा. इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए स्टालिन ने ‘एक देशीय समाजवाद’ की परिकल्पना से छलांग लगाकर विश्वव्यापी सर्वहारा क्रांति के लिए संघर्ष छेड़ने का आवाह्न किया था. स्टालिन का यह सोच 1930 में लाखों सर्वहारा मजूदरों की मौत का कारण बना, जिसके कारण स्टालिन के विरुद्ध जनाक्रोश फैला. महान रूसी लेखक सोल्झेनित्सिन ने जब स्टालिन के शासनकाल में चलने वाले कारावास शिविरों की अमानवीय स्थितियों का बयान अपने उपन्यास ‘दि गुलाग आर्किपैलेगो’ में किया तो उनको रूसी शासकों की ओर से तरहतरह की प्रताड़नाएं दी गईं. इस उपन्यास के लिए सोल्झेनित्सिन को निर्वासन की सजा भी भुगतनी पड़ी. स्टालिन की मृत्यु के बाद रूस की बागडोर जब निकिता ख्रुश्चेव के हाथों में आई तो उसने स्टालिनवाद को विकार मानते हुए, पूरी तरह नकार दिया. सोल्झेनित्सिन का निर्वासन भी समाप्त हुआ. इस तरह उस रक्तरंजित युग का अंत हुआ, जिसमें स्टालिन के नेतृत्व में साम्यवाद अधिनायकवाद का रूप ले चुका था,

रूस की भांति चीन भी कृषिआधारित अर्थव्यवस्था पर निर्भर था. वहां साम्यवादी क्रांति का अलख जगाने वाला माओ जि दांग था. ‘चीनी साम्यवादी पार्टी’ के स्थापक चेन दुजियु तथा दझाओ के साथ मिलकर उसने चीन में साम्यवादी क्रांति के पक्ष में माहौल बनाने के लिए लंबा संघर्ष किया था. वस्तुतः 1925 तक मार्क्सवादी चीनी नेता मानते आ रहे थे कि शहरी मजदूर ऐतिहासिक द्वंद्ववाद की भावना को समझकर अपने वर्गीय हितों के लिए आसानी से संगठित हो सकते हैं. इसलिए उनकी वर्गचेतना ही चीन में साम्यवादी क्रांति का सूत्रधार बनेगी. माओ किसान का बेटा था. साम्यवादी पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने से पहले वह छह महीने तक एक क्रांतिकारी संगठन में काम कर चुका था. उसके बाद मार्क्सवाद के अध्ययन के लिए वह उससे अलग हो गया. बीजिंग में अध्ययन के दौरान उसकी भेंट ली दझाओ और चेन दुजियु से हुई. तीनों क्रांति के समर्थक थे तथा लक्ष्यप्राप्ति के लिए हिंसा का सहारा लेने से भी उन्हें परहेज नहीं था.

साम्यवादी क्रांति के लिए संघर्ष करते हुए माओ इस नतीजे पर पहुंचा कि क्रांति की सफलता के लिए शहरी मजदूरों के बजाय किसानों पर अधिक विश्वास करना चाहिए. इस विचार के लिए माओ को अनेक नेताओं और बुद्धिजीवियों की आलोचना का पात्र बनना पड़ा. परंतु आलोचनाओं से हतोत्साहित हुए बिना माओ किसानों को साथ लेकर माक्र्सवादी क्रांति की सफलता के लिए संघर्ष करता रहा. चीन के गांवों में विद्रोही किसानों को एकजुट करते हुए उसने चीनी सोवियत रिपब्लिक की नींव रखी. उसकी लालसेना ने चियांग केई शेक के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी सेना पर हमले आरंभ कर दिए. राष्ट्रवादी सेना की ताकत बड़ी थी. उसको जापान जैसे पड़ोसी देशों का समर्थन भी प्राप्त था. माओ ने छापामार युद्ध की शैली को अपनाया, जिसमें लालसेना को भारी सफलता मिली. बढ़ी हुई ताकत से वह जापानी मदद से लैस राष्ट्रवादी सेना को पराजित करने में सफल रहा. इस जीत ने उसको चीनी मजदूरों और किसानों का निर्विवाद नेता बना दिया. 1931 में उसे चीन की साम्यवादी पार्टी का नेता चुन लिया गया, इस पद पर वह अगले 45 वर्षांे तक बना रहा. अपने उग्र भाषणों से माओ ने चीनी जनता का दिल जीतने में सफलता प्राप्त की. धीरेधीरे उसकी ताकत बढ़ती गई. एक दिन ऐसा आया जब उसकी ख्याति चीन की सरहदों को पार कर सोवियत संघ पर छाने लगी. सोवियत संघ ने उसके आगे मदद का प्रस्ताव रखा. उस पेशकश को ठुकराते हुए वह अपने ही दम पर मुक्तिसंघर्ष को आगे बढ़ाता रहा.

अंततः 1949 में लंबे गृहयुद्ध के बाद माओ के नेतृत्व में चीन में साम्यवादी सेना को जीत हासिल हुई. उस समय रूस की ओर से नई सरकार को समर्थन के साथसाथ सहयोग की पेशकश गई. परिणाम की चिंता किए बिना ही माओ ने सोवियत संघ पर आरोप लगाया कि वहां साम्यवादियों के बीच कुछ ‘बुर्जुआ’ घुसपैठ कर चुके हैं. इस आलोचना से नाराज होकर सोवियत संघ ने 1960 में चीन को दी जाने वाली तकनीकी मदद से हाथ खींच लिया. उससे घबराए बिना माओ अपने दम पर चीन को समृद्धि की ओर आगे बढ़ाता रहा. उसकी दृढ़ आस्था थी कि तीसरे देशों में जहां औद्योगिक क्रांति अभी तक सफल नहीं हो पाई है, वहां कृषक संघों की मदद से सर्वहारा क्रांति को सफल बनाया जा सकता है. माओ की सफलता से मार्क्सवाद और लेनिनवाद की कमजोरियों को उजाकर किया था. यहां बताना प्रासंगिक होगा कि लेनिन के नेतृत्व में सोवियत संघ की सरकार द्वारा पूंजीवाद के विरुद्ध संघर्ष का नारा देते हुए जनाधिकारों की व्यापक उपेक्षा की गई थी. इसकी भरपाई के लिए माओ ने चीन के अतीत और संस्कृति का सहारा लिया. परिणामस्वरूप वह चीनी समाज को एकता के सूत्र में बांधे रखने में सफल हुआ. उसके विचारों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माओवाद के नाम से जाना जाता है, जो साम्यवाद की ही सहोदर विचारधारा है.

इकीसवीं शताब्दी में मार्क्सवाद की प्रासंगिकता

कुछ देर के लिए मार्क्स को एक सरल रेखा मान लिया जाए तो पूरी दुनिया, उसके दोनों तरफ बंटी मिलेगी. एक दिशा में मार्क्स के समर्थक होंगे, जिनके लिए मार्क्स का एकएक शब्द पवित्र और बौद्धिक चेतना की धरोहर है. वे मार्क्स के नाम पर, उसके विचारों के लिए अपने खून का एकएक कतरा बलिदान करने को तत्पर होंगे. दूसरी ओर मार्क्स के आलोचक हैं. जिनके लिए मार्क्स एक दुर्भावना, एक जिद, एक नासमझीभरा, अड़ियल और प्रतिगामी विचार है. हाल ही में बीबीसी रेडियो सेवा द्वारा ब्रिटेन के सर्वाधिक सम्मानित और प्रतिभाशाली दार्शनिकों का सर्वे कराया गया. उस सर्वे में साम्यवादी मार्क्स ख्याति के मामले में सबसे ऊंचे पायदान पर था. दार्शनिक के रूप में दुनियाभर में पहचाने वाले नाम यथा प्लेटो, अरस्तु, कांट, डेविड ह्यूम, देकार्त, जान ला॓क जैसे विचारक ख्याति के मामले मे उसके आसपास भी नहीं ठहरते. हीगेल मार्क्स का गुरु, जिससे उसने भौतिक द्वंद्ववाद का सिद्धांत ग्रहण किया था, आश्चर्यजनकरूप से इस सूची में कहीं भी नहीं है. और तो और मार्क्स के समकालीन प्रतिभाशाली दार्शनिकों में से एक भी इस सूची में स्थान पाने में असमर्थ रहा है. आखिर ऐसी कौनसी बात है, जो मार्क्स को अपने समकालीन और पूर्ववर्ती विचारकों से अलग सिद्ध करती है. मार्क्स ने एक साथ धर्म, दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्र, इतिहास की गवेषणाएं की हैं. मगर मार्क्स खुद क्या है? दार्शनिक अथवा अर्थशास्त्री? ये सामान्य जिज्ञासा से जुड़े कुछ जरूरी प्रश्न हैं. हालांकि बहुतसे लोगों के लिए मार्क्स एक खलनायक भी है, जो अपने विचारानुकूल समाज के गठन के लिए खुल्लमखुल्ला हिंसा का सहारा लेता है. मगर वे भूल जाते हैं कि सामाजिक परिवर्तन के लिए मार्क्स द्वारा हिंसा का समर्थन उस तरह से नहीं है, जैसे कि पहले राजामहाराजा अपनी सनक में पड़ोसी राजा पर हमला बोल देते थे. मार्क्स की हिंसा मर्यादित है. वह समाज के बड़े वर्ग के कल्याण के लिए विशेष परिस्थितियों में जब बाकी सभी उपाय असफल सिद्ध हो चुके हों, केवल बुर्जुआ वर्ग को सत्ताच्युत करने के लिए हिंसा का समर्थन करना पसंद करता है. दूसरे पूंजीवादी चंगुल से मुक्ति के लिए हिंसा का समर्थन पेरिस कम्यून की असफलता से पहले की घटना है. पेरिस कम्यून की असफलता के बाद उसके विचारों में बदलाव आया था.

मार्क्स अपने समय की सबसे विवादित हस्तियों में से एक है. उसका रचनात्मक अवदान केवल अकादमिक चिंतनलेखन तक सीमित नहीं था. उसके लेखन में संघर्ष की लौ थी. हालांकि श्रमिकों के पक्ष में आवाज उठाने वाला वह पहला दार्शनिकलेखक नहीं था. उससे पहले रूसो जनसामान्य का सबसे बड़ा पैरोकार बनकर उभरा था. राबर्ट ओवेन, विलियम किंग, जोसेफ ब्लेंक आदि दार्शनिक चिंतक भी पूंजीवादी शोषण से उबरने के लिए श्रमिकों मजदूरों को और अधिक सुविधा दिए जाने की मांग कर चुके थे. इसी श्रेणी में चार्टिस्ट आंदोलनकारियों का नाम भी लिया जा सकता है, जिन्होंने जनाधिकारिता के लिए बड़े पैमाने पर वर्षों तक चलने वाला संघर्ष किया था. जनसाधारण के लिए लोकतांत्रिक अधिकारों के पक्ष में 1838 में एफ. ओ’क्रोनर एवं विलियम ला॓वेट के नेतृत्व में चले वर्षों लंबे संघर्ष में सैकड़ों चार्टिस्ट आंदोलनकर्मियों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया था. हजारों को निष्कासन की सजा मिली थी.

स्मरणीय है कि सोहलवीं शताब्दी में आरंभ हुए प्रौद्योगिकीकरण की रफ्तार उनीसवीं शताब्दी आतेआते अत्यधिक तीव्र हो चुकी थी. परंपरागत शिल्पकारों पर मशीनीकरण की मार तथा उनके संरक्षण के लिए सरकार की ओर से कोई योजना न होने के कारण ब्रिटेन समेत प्रायः सभी यूरोपीय देशों में बेरोजगारी का संकट बढ़ा था. गांवों में स्थिति और भी शोचनीय थी. क्योंकि कारखानों में बने सस्ते माल की आमद से स्थानीय उद्योगधंधे पूरी तरह चौपट हो चुके थे. भीषण गरीबी के कारण मातापिता अपने बच्चों को उन नारकीय परिस्थितियों में काम पर भेजने के लिए विवश थे, जहां सामान्य स्थितियों काम करने की उनकी हिम्मत भी जवाब दे जाती थी. बाकी मजदूरों, कामगारों यहां तक कि साधारण नौकरीपेशा लोगों की हालत भी संतोषजनक नहीं थी. काम के अत्यधिक बोझ के कारण वे सदैव तनाव में रहते थे. इससे उनकी कार्यकुशलता नकारात्मक रूप से प्रभावित हुई थी. सरकार और प्रशासन पूंजीपतियों के सतत दबाव में रहते थे, इसलिए उनसे मनचाहे फैसले करा लेना, स्थानीय पूंजीपतियों के लिए बहुत आसान था. पूंजी का असमान वितरण, भीषण बेरोजगारी, नगरों में पर्यावरणसंबंधी लगातार बढ़ती समस्याएं आदि अनेक ऐसे कारण थे, जिन्होंने विचारकों के एक बड़े वर्ग को उद्वेलित किया था. पूंजीवाद प्रेरित औद्योगिकीकरण के विरोध में अनेक आंदोलन भी हो चुके थे, जिनमें लाखों श्रमिकों ने सहभागिता की थी. जिन्हें समाज के लाखों श्रमिकों का समर्थन मिला था.

पूंजीवादी शोषण से उबरने के लिए विद्वानों के अलगअलग सुझाव थे. विचारकों का एक दल सहकारिता के माध्यम से पूंजीवादी उत्पीड़न से उबरने का सपना देख रहा था. इस वर्ग में विलियिम किंग, राबर्ट ओवेन फ्यूरियर जैसे विचारक थे. साहित्यिक प्रेरणाएं भी परिवर्तनकारी आंदोलनों के साथ थीं. उनमें सबसे अग्रणी थे, उस समय के महान उपन्यासकार चाल्र्स डिकेन्स, जिन्होंने अपने उपन्यास ‘दि क्रिसमस कैरोल’ में ब्रिटिश समाज में पनप चुके सूदखोर वर्ग का सशक्त चित्रण किया था. रिकार्डो और एडम स्मिथ आदि अर्थशास्त्रियों का मानना था कि सिर्फ औद्योगिक समृद्धि द्वारा गरीबी से लड़ा जा सकता है. सरकार को चाहिए कि उत्पादन और विपणन से जुड़े मामले पूंजीपतियों और उद्यमियों के हवाले कर दे, ताकि वे परिस्थितियों के अनुकूल निर्णय लेने में सक्षम हों.

संगठित आंदोलन को मुक्ति का आधार मानने वाले विचारकों के भी दो अलगअलग वर्ग थे. उनमें से एक धड़ा सहकारिता आंदोलन के समर्थक विद्वानों एवं कार्यकर्ताओं का था, जो सफलता के लिए सहयोग को स्पर्धा से अधिक कारगर और उपयोगी मानते थे. दूसरे धड़े के विचारक मानते थे कि पूंजीवाद से मुक्ति के लिए पूंजीपतियों को कमजोर करना जरूरी है. यह केवल संगठित ताकत के बल पर संभव है. इसके लिए हिंसा का सहारा लेने में भी उन्हें संकोच नहीं था. प्रूधों, मार्क्स, ब्लेंक, बकुनाइन, ऐंगल्स आदि विद्वान पूंजीवाद के उग्र विरोधियों में आते थे.

उल्लेखनीय है कि मार्क्स से पहले ही हीगेल द्वंद्ववाद की सार्थकता को स्थापित कर चुका था. विचारक उसके विचारों की भांतिभांति से व्याख्या कर रहे थे. बल्कि उसके विचारों की व्याख्या के लिए ही दार्शनिकों के अलगअलग गुट बन चुके थे. ऐसे में मार्क्स ने द्वंद्ववाद की विशुद्ध भौतिकवादी दृष्टिकोण से विवेचना कर, सत और असत् का भौतिकीकरण कर दिया. मार्क्स के दर्शन में श्रमिक वर्ग ‘सत्’ का पर्याय था, जो अपने श्रमकौशल के आधार पर उत्पादन कार्य में प्रमुख भूमिका निभाता है. जो सही मायने में उत्पादक है. पूंजीपति वर्ग ‘असत्’ का प्रतीक है, जो दूसरों के श्रम को अपना बताकर मुनाफे का अधिकांश हिस्सा स्वयं हड़प जाता है, जिससे धनी लगातार धनवान तथा गरीब लगातार अधिक गरीब होता जाता है. परिणामस्वरूप समाज में अस्थिरता और असमानता बढ़ती है.

समाज में व्याप्त आर्थिक वैषम्य से निपटने के लिए भी विद्वानों के अलगअलग विचार थे. एक वर्ग का मानना था कि समाज में आर्थिक समानता स्थापित करना सरकार का दायित्व है, अतः सरकार को श्रमिकों के हितों की सुरक्षा हेतु समुचित कानून बनाने चाहिए. दूसरे वर्ग का विश्वास था कि पूंजीवाद का सामना केवल संगठित शक्ति द्वारा ही संभव है. इस वर्ग का सुझाव था कि श्रमिकों, छोटे उद्यमियों और व्यवसायियों को अपनेअपने संगठन बनाकर सहकार के माध्यम से पूंजीवाद के विरुद्ध सार्थक समर छेड़ा जा सकता है. इनसे अलग एक वर्ग कतिपय उदारपंथी विचारकों का था, उनका मानना था कि मनुष्यता के नाते पूंजीपति को स्वयं आगे आकर समाज के बड़े वर्ग के पक्ष में अतिरिक्त संपत्ति का परित्याग करना चाहिए. बहुत बाद में गांधी जी ने इसी भावना को ‘ट्रस्टीशिप’ के सिद्धांत के रूप में प्रकट किया था.

मार्क्स का विचार था कि स्वार्थी पूंजीपतियों को मनाना, उन्हें नैतिक जीवन जीने के लिए प्रेरित करना आसान नहीं है. ऐसे में शोषण से मुक्ति का एक ही उपाय है कि श्रमिकवर्ग संगठित होकर स्वार्थी पूंजीपतियों के विरुद्ध संघर्ष की घोषणा कर दे. जिस दौर में मार्क्स यह घोषणा कर रहा था, वही दौर अस्मितावादी आंदोलन के उदय का भी था. फ्रांस में लोकतंत्र की स्थापना हो चुकी थी. उसकी देखादेखी यूरोप के अन्य देशों में भी लोकतंत्र की मांग जोर पकड़ रही थी. ऐसे में मार्क्स का दर्शन लोगों को पे्ररित करने के लिए पर्याप्त था. अतएव जहांजहां मशीनीकरण जोर पकड़ चुका था, जहांजहां सामंत और जागीरदारी प्रथा शेष थी, वहां पर श्रमिक वर्ग माक्र्सवादी विचारधारा के अनुरूप संगठित होता चला गया. दूसरी ओर अमेरिका और यूरोप के दिन देशों में पूंजीवाद अपनी जड़ जमाए था, वहां मार्क्सवादी विचारधारा के ठीक विपरीत प्रतिक्रिया हुई. मीडिया और सरकार के सहयोग से वहां मार्क्स के कटुआलोचकों का वर्ग पनपा. मगर इस द्वंद्वात्मकता में मार्क्स की चर्चा दोनों ही पक्षों में होती रही.

मार्क्स के विचारों की वर्तमान संदर्भों में क्या प्रासंगिकता है! उसको अर्थशास्त्री माना जाए या दार्शनिक? या फिर राजनीतिक चिंतक? मार्क्स की ख्याति एक दार्शनिक के रूप में भी रही है. हालांकि उसका दर्शन के क्षेत्र में विशेष मौलिक योगदान बहुत कम है. धर्म को लेकर आलोचना फायरबाख और बायर से प्रभावित है. द्वंद्ववाद पर हीगेल उससे पहले ही गंभीर चिंतन कर चुका था, और वह दर्शनशास्त्र की प्रामाणिक धारा के रूप में मान्य हो चुका था. तत्वमीमांसा से वह कोसों दूर था. तो फिर वह कौनसी बात है, जो मार्क्स को जनसाधारण एवं बुद्धिजीवियों के बीच एकाएक जनता का नायक बना देती है. मार्क्स मूल रूप से अर्थशास्त्री था. बल्कि कहना चाहिए कि एडम स्मिथ के बाद मार्क्स ही वह अर्थशास्त्री है, जिसने पूरी दुनिया को प्रभावित करने में सफलता प्राप्त की थी. सच तो यह है कि मार्क्स का अर्थचिंतन एडम स्मिथ के मुक्त अर्थतंत्र को उसका खरा जवाब था. एडम स्मिथ ने अपने सिद्धांत ‘लेजेज फेयर’ द्वारा सरकारों से पूंजीपतियों के रास्ते से हट जाने का आवाह्न किया था. कहा था कि उद्योगों से सरकारी नियंत्रण हटाओ. पूंजीपतियों को निर्बंध ‘अपना काम करने दो.’

एडम स्मिथ की खुली अर्थव्यवस्था के विचार की आलोचना करते हुए मार्क्स ने कहा था कि औद्योगिक उदारता श्रमशोषण के दम पर ही संभव है. नियंत्रणहीन पूंजीवाद को उसने पूंजी का अराजक खेल माना, जिसमें उद्योगपतियों की भले चांदी कटे, मगर मजदूरों का शोषण बढ़ता ही जाता है. स्पर्धा में बने रहने के लिए पूंजीपति वर्ग मजदूरों की मजदूरी कम करता जाता है. कम वृत्तिका और महंगाई मिलकर मजदूरों और कामगारों के जीवन को उत्तरोत्तर कठिन बनाती है. नई प्रौद्योगिकी सिर्फ अमीरों का बैंक बैलेंस बढ़ाती है. और मजदूर की गरीबी, बेबसी तथा दुर्दशा. स्मिथ के कथन कि ‘उन्हें अपना काम करने दो’ के बदले में मार्क्स का कहना था कि ‘श्रमिकों को उनका हक दो’. हालांकि वह यह भी मानता था कि स्वार्थ में डूबे पूंजीपति श्रमिकों को उनका अधिकार आसानी से देने को तैयार नहीं होंगे. इसलिए वह संगठित विरोध का हिमायती था. उसने आवाह्न किया था कि शोषणकारी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के लिए दुनिया के मजदूरो एक हो जाओ. तुम्हारे पास हुनर है. काम करने का सामथ्र्य, इच्छाशक्ति और लग्न है. साथ में वर्षों का अनुभव भी. अपनी ताकत, संगठन की ताकत, अपने कौशल और क्षमताओं को पहचानो, एकजुट होकर उत्पादनव्यवस्था को अपने हाथ में ले लो. कौटिक हाथ मिलकर अपने भविष्य का स्वयं निर्माण करो. उत्पादन का माध्यम बनने से, दूसरों के लिए पसीना बहाने से अच्छा है कि स्वयं उत्पादक बनो. आगे बढ़ो. तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है, मगर जीतने के लिए पूरी दुनिया पड़ी है. कफ और बलगम भरी छाती से निकले मार्क्स के ये भरभराते शब्द विश्वभर के कोटिक श्रमिकों के कंठ से निकली आवाज बन गए. ईसाइयों ने इन शब्दों को पवित्र बाइबिल की वाणी माना, हिंदु ने गीता की अमर सूक्तियां. मुस्लिमों इन्हें कुरआन की महान आदेश मानकर संगठित होने लगे. मार्क्सवाद जनमन की भाषा बन गया.

इकीसवीं शताब्दी में मार्क्सवाद की प्रासंगिकता क्या है? बाजारवाद के इस दौर में जब पूंजीवाद बेलगाम और करीबकरीब अराजक हो चुका है, मार्क्स के विचार कितनी दूर तक हमारा साथ दे सकते हैं? इस बारे में परस्परविरोधी मत सुने जा सकते हैं. मार्क्सवाद के आलोचकों ने बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ही मान लिया था कि उसका पतन अवश्यंभावी है. मार्क्सवाद के सबसे बड़े गढ़ सोवियत संघ का बिखरना उन्हें अपने निष्कर्ष पर मुहर लगने जैसा प्रतीत होता है. उन्होंने बारबार कहा था, बल्कि आज भी यही दावा करते हैं कि मार्क्सवाद के दिन लद चुके हैं. समाजवाद का सपना बीते जमाने की बात हुई. उनके अनुसार यह जानकर भी जो उससे उम्मीद लगाए बैठे हैं, वे स्वप्नदृष्टा, कल्पनाजीवी हैं. उन भोले बच्चों की तरह हैं जिनकी दुनिया लालीपाप में समाई होती है. पर क्या संभव है किसी विचार का यूं ही एकाएक मर जाना?

यदि कोई पेरिस कम्यून की असफलता या सोवियत संघ के बिखरते जाने जैसी घटनाओं से ही उस विचार को अप्रासंगिक और समयबाह्यः मान बैठे और पूंजीवाद की सार्वकालिक जीत का दावा करने लगे तो यह उसकी नादानी ही कही जाएगी. इसलिए कि साम्यवाद नैतिकता और आदर्शवादी पहचान से युक्त एक अवस्था है, जिसकी संकल्पना लोकगीतों, धार्मिकसामाजिक आख्यानों, कविलेखकोंसाहित्यकारों के मानवतावादी सोच से प्रेरणा पाती है. पेरिस कम्यून में श्रमिक संगठनों और नागरिक सेना की जीत के फलस्वरूप जो अल्पकालिक सरकार बनी थी, उसके अपने मतभेद और आपसी अविश्वास थे. साथ में क्रांति का श्रेय लेने की, दूसरों पर छा जाने की आदिम लालसा भी थी. जो एक तरह से प्राचीन साम्राज्यवाद, सामंतवाद, कुलीनतावाद, ब्राह्मणवाद, यहां तक कि पूंजीवादी वर्चस्व का पर्याय थी.

क्रांति के जुनून में उन्होंने सबकुछ उलटपलट तो दिया था, जोशजोश में जनोन्मुखी व्यवस्था कायम करने की शुरुआती कोशिश भी की. किंतु आपसी मतभेद और तनाव के कारण वे ऐसा कोई तंत्र विकसित करने में असफल सिद्ध हुए थे, जो साम्यवादी मान्यताओं के अनुरूप एक दीर्घगामी व्यवस्था के गठन में सहायक बनता. पेरिसक्रांति के दो प्रमुख सूत्रधारों, मार्क्स और बेकुनिन के मतभेद तो जगजाहिर हैं ही. मार्क्स को लगता था कि क्रांति की सफलता के बाद बेकुनिन अपनी राजनीतिक ताकत को बढ़ाना चाहता है. जबकि बेकुनिन का मानना था कि मार्क्स की बढ़ती हुई भूमिका पेरिस में यहूदीवाद को बढ़ावा देगी. इसी प्रकार के मतभेदों के चलते साम्राज्यवादीपूंजीवादी ताकतों के मनसूबों को भांपने में असफल रहे थे. परिणाम यह हुआ था कम्यून पर फिर सशस्त्र सेनाओं का हमला हुआ और राजशाही दुबारी सत्ता पर काबिज होने में कामयाब हुई. व्लादिमिर लेनिन के पेरिस कम्यून की असफलता के कारणों को चिह्नित किया है. एक समाचारपत्र में लिए लिखे गए लेख ‘पेरिस कम्यून का पाठ’ में उसने लिखा था कि कम्यून के नेताओं की

केवल दो बड़ी गलतियों ने उस दमदमाती ऐतिहासिक विजय के लाभों पर पानी फेर दिया. सच तो यह है कि सर्वहारा वर्ग के नेता आधे रास्ते पर ही आराम फरमाने लगे थे. अवैद्य कब्जाधारकों की संपत्ति का अधिग्रहण करके न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के करने के बजाय वे कुछ लोकप्रिय राष्ट्रीय मुद्दों के पक्ष में माहौल बनाने का प्रयास करते रहे. बैंक और ऐसे ही दूसरे अन्य संस्थानों का अधिग्रहण, जो बहुत जरूरी था, नहीं किया गया. सर्वहारा वर्ग के शासकों की दूसरी बड़ी भूल उनकी अतिशय दयालुता थी, जिसके कारण अपने दुश्मनों को कुचलने के बजाय वे उनके साथ दयालुतापूर्ण व्यवहार कर, उनके हृदयपरिवर्तन की उम्मीद करते रहे. जनक्रांति में सीधी सैन्य कार्रवाही की उपयोगिता को उन्होंने बहुत कम करके आंका था. बजाय इसके कि पेरिस के पूर्वशासकों से अपनी सुरक्षा के ठोस और पुख्ता इंतजाम करते, उन्होंने उन्हें आराम से दुबारा ताकत बटोरने का पूरापूरा अवसर दिया, जो मई महीने के भीषण खूनखराबे का कारण बना.’

 

कुछ ऐसा ही रूस में हुआ था. पेरिस क्रांति की असफलता ने मार्क्स को अपनी मान्यताओं पर पुनर्विचार का अवसर दिया था. सशस्त्र विद्रोह से उसका विश्वास घटा था. राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक अधिनायकवाद से दीर्घकालिक मुक्ति के नए रास्तों की खोज का सुफल ‘दि कैपीटल’ के रूप में सामने आया था, जिसे उसने इतिहास, दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्र, विज्ञान आदि गहन अध्ययन के बाद लिखा था. पुस्तक में उसने वर्गहीन समाज की परिकल्पना की थी. स्मरणीय है कि पेरिस कम्यून को मार्क्स ने ‘सर्वहारा का अधिनायकवाद’ की संज्ञा दी थी. वह उसको साम्यवाद की स्थापना की दिशा में पहला चरण मानता था. साम्यवाद की परिकल्पना इस सोच पर आधारित थी कि द्वंद्व की स्थिति विपरीत शक्तियों में ही संभव है. उनसे बचाव का एक ही उपाय है कि समाज में शक्तिकेंद्र ही न रहें. इसलिए श्रमिक वर्ग सत्ता को हाथ में ले. मगर सत्ता हस्तांतरण से ही उसका काम पूरा नहीं हो जाता. उसके लिए आवश्यक है कि समाज में वर्गहीनता की स्थापना के प्रयास भी साथ ही आरंभ कर दिए जाएं. एक समरस समाज की स्थापना, साम्य की स्थापना उनका ध्येय हो, ऐसा उसने कहा था.

रूस में जो हुआ, वह क्रांति का पहला चरण था. वहां लेनिन के नेतृत्व में जारशाही के विरुद्ध संघर्ष का आवाहन किया गया था. जिसमें मजदूर वर्गों को जीत मिली और जारशाही के स्थान पर श्रमिकों की सरकार अस्तित्व में आई. अपने दायित्व को समझते उसने समाज के पुननिर्माण पर जोर दिया. उसका सुखद परिणाम भी मिला. क्रांति के समय रूस की हालत भारत से कहीं बदतर थी. देखते ही देखते वहां विकास का ऐसा दौर चला कि पचाससाठ वर्षों में उसने स्वयं को विश्व की दूसरी महाशक्ति के रूप में स्थापित कर लिया. बस यही उसकी विड़बना थी. क्रांति का पहला चरण पार कर सत्ता पर अधिकार जमा लेने के बाद उसकी कोशिश द्वंद्व की समस्त संभावनाओं को मेटने के लिए जहां वर्गहीन समाज की स्थापना करना था, वहीं उसने खुद को द्वंद्व में झोंकना प्रारंभ कर दिया. सोवियत सरकार असल में तलवार से तराजू का काम लेना चाहती थी. घोषित रूप उसका लक्ष्य साम्यवाद था, मगर असल में थी विरोधियों को परास्त कर, नंबर एक पर बने रहने की कामना. वह दुहाई न्याय की देती थी, मगर अपने नागरिकों के खूनपसीने की कमाई को, हथियारों और अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को विस्तार देने पर खर्च कर रही थी.

इन परिस्थितियों में भी रूस लंबे समय तक साम्यवादी बना रहा तो इसलिए कि मार्क्स ने अपने समर्थक लेखकोंबुद्धिजीवियों का बड़ा वर्ग पैदा किया था, जिनमें गोर्की, चेखव, टालस्टाय, दोस्तोयवस्की आदि महान साहित्यकार सम्मिलित थे. जो साम्यवादी विचारधारा के अनुरूप लगातार सारगर्भित और प्रतिबद्ध लेखन कर रहे थे. इससे वहां के जनमानस में साम्यवाद के प्रति आस्था बनी रही. बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में प्रतिबद्ध साहित्य की चमकदमक खासकर उसमें नए चेहरों की आमद घटती चली गई. वहीं सरकार ने खुद को और भी महत्त्वाकांक्षी बना लिया था. साम्यवादी नीतियों के अनुरूप वर्गहीन समाज की स्थापना पर जोर देने के बजाय, सरकार अपने संसाधन पूंजीवाद के पर्याय बन चुके अमेरिका को परास्त करने पर तुली हुई थी. यह मजदूरों के दम पर बनी सरकार का वैभव प्रेम था. ब्राजील के दर्शनशास्त्री पाउलो फ्रेरा ने बड़े काम की बात कही है. ‘उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र’ में उसने लिखा है कि आमूल परिवर्तन के पहले दौर में, जिसको परिवर्तन की अपरिपक्व अवस्था भी कहते हैं, उत्पीड़ित अवसर मिलते ही वही करता है, जैसा उसने उत्पीड़क को करते हुए देखा है. इस अवस्था में उत्पीड़क और उत्पीड़ित की सिर्फ भूमिकाएं और सिर्फ चेहरे बदलते हैं, स्थितियां नहीं. इसलिए परिवर्तनकामी शक्तियों को, उन शक्तियों को समाज में वास्तविक परिवर्तन की चाहत रखती हैं, प्रारंभिक सफलता के साथ ही रुक नहीं जाना चाहिए. बल्कि आमूल परिवर्तन की कोशिश पहली सफलता के साथ ही आरंभ कर देनी चाहिए. सोवियत संघ के शासकों से भी यही अपेक्षित था कि वे साम्राज्यवादी गतिविधियों में उलझने के बजाय एक नीतिआधारित समाज की स्थापना पर जोर देते. ताकि वर्गहीन समाज की स्थापना संभव हो सके.

रूसी शासक यह भूल चुके थे कि जनता की सोचने की शक्ति भले ही धीमी हो, मगर उसमें छोटे वैचारिक परिवर्तन भी दूरगामी महत्त्व के सिद्ध होते हैं. पूंजीवादी सरकार में हथियारों के निर्माण से लेकर शोध तक का सारा काम पूंजीपति करते हैं. इसके लिए वे श्रमिकों का ऐसे ही शोषण करते हैं, जैसे कि बाकी अन्य उद्योग. लेकिन उनमें काम करने वाला श्रमिक बिना किसी वैचारिक प्रतिबद्धता के, सिर्फ आजीविका की खोज में उनके साथ जुड़ता है. असहमति अथवा असंतुष्टि की अवस्था में वह जब चाहे तब उसको छोड़कर अन्य उद्योग के साथ जुड़ सकता है. कानून उसके इस अधिकार की रक्षा करता है. हालांकि दूसरी जगह भी उसका शोषण होता है, और भौतिक स्थितियां उसके लिए बहुत अधिक बदलती भी नहीं है. तो भी एक उत्पादक को छोड़ आने का जो संतोष है, साथ ही चयन का आनंद और इसके पीछे निहित अस्मिताबोध श्रमिक का अपना और निजी होता है. इससे अधिक वह सामान्यतः अपेक्षा भी नहीं करता. इससे उसका आक्रोश एक सीमा से बाहर नहीं जा पाता.

सोवियत संघ में यद्यपि उपभोग को बढ़ावा देने वाली प्रौद्योगिकी को प्रतिबंधित किया गया था. मगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हथियारों की स्पर्धा और उसमें आगे निकलने की होड़ में वहां की सरकारें राष्ट्रीय आय का बड़े पैमाने पर निवेश कर रही थीं. इस होड़ का नागरिकों के वास्तविक कल्याण से कोई लेनादेना नहीं था. इससे वहां सामाजिक विकास की रफ्तार उतनी नहीं पहुंच पाई थी, जितनी कि साम्यवादी व्यवस्था में अपेक्षित थी. सोवियत नागरिक स्वयं को भावनात्मक रूप से ठगा हुआ महसूस कर रहे थे. इसपर टिप्पणी करते हुए सुविख्यात चिंतक किशन पटनायक ने लिखा था‘आधुनिकतावादी दिमाग, आधुनिक टेक्नालाजी(यंत्रेश्वर) के बारे में इतना ज्यादा अंधविश्वासी है कि उसके विकल्प की संभावनाओं पर सोच नहीं पाता. एक वैकल्पिक यंत्रप्रणाली की तलाश वह कर नहीं सकता. सोवियत रूस में यही हुआ. रूसी कम्युनिस्टों ने कुछ प्रकार की, खासकर उपभोग की टेक्नोलाॅजी को बड़े पैमाने पर प्रतिबंधित किया. लेकिन वैकल्पिक टेक्नोलाॅजी की तलाश के लिए उनका दिमाग तैयार नहीं था. अंततोगत्वा उनके दिमाग पर आधुनिकता का दबाव इतना गहरा हुआ कि रूस साम्यवाद छोड़ने को तैयार हो गया.’

सोवियत संघ में समस्त उत्पादन व्यवस्था श्रमिक संगठनों के और अंततः राज्य के अधीन थी, जिसका उपयोग उनके नेता अपने राजनीतिक मंसूबों को पूरा करने के लिए करते थे. आम मजदूर के लिए कुछ खास नहीं बदला था. उसके लिए शोषणकारी स्थितियों में अपेक्षित सुधार हो ही नहीं पाया था. इसलिए उस व्यवस्था से उनका हताश होना स्वाभाविक ही था. ऊपर से तयशुदा उत्पादन करना मजबूरी. यही कारण है कि वहां श्रमिकों के मन में व्यवस्था के प्रति आक्रोश बढ़ता ही गया. परिणाम सोवियत संघ के विघटन के रूप में सामने आया. बावजूद इसके सोवियत संघ के बिखराव को, मानवाधिकार के पतन के रूप में देखना अनुचित होगा. बस इतना कहा जा सकता है कि सोवियत नेताओं की निजी महत्त्वाकांक्षाओं और अदूरदर्शिता के कारण समाजवाद का प्रयोग वहां उतनी अपेक्षा के साथ सफल न हो सका.

दरअसल मार्क्सवाद की मौत का दावा वे करते हैं जो मानते हैं कि साम्यवाद का उद्भव मार्क्स के जन्म अथवा उसके विवेकीकरण के बाद की घटना है. जबकि ऐसा नहीं है. मार्क्स से पहले भी साम्यवाद था. लोग उपलब्ध सुविधाओं और संसाधनों का मिलजुल कर उपयोग करते थे. स्वयं मार्क्स ने ऐतिहासिक भौतिकवाद की अवधारणा इसी मान्यता के आधार पर प्रस्तुत की है. मार्क्सवाद का अभिप्राय अर्थसत्ता का विकेंद्रीकरण, धर्मसत्ता का विलोपीकरण तथा राजसत्ता का लौकिकीकरण है. ये विचार मार्क्स से ढाई हजार वर्ष पहले जन्मे प्लेटो ने भी व्यक्त किए थे. प्रत्येक धर्म अपना औचित्य सिद्ध करने के लिए इसी प्रकार की लोककल्याणकारी प्रार्थनाओं की अपने विस्तार की सीढी बनाता है. दूसरे शब्दों में मार्क्स के आलोचक वे हैं जो गलत तरीके से संसाधनों पर अधिपत्य जमाए हैं. जो सारा का सारा मुनाफा स्वयं लील जाना चाहते हैं. जो अपनी पूंजी और ताकत के दम पर वर्चस्व बनाए रखना चाहते हैं. जिन्हें दूसरों के श्रमकौशल पर जीने की, परजीवी होने की आदत पड़ चुकी है. मार्क्स के आलोचक वे हैं, जिन्होंने अपनी संपन्नता दूसरों के श्रम पर अर्जित की है. इसके कारण उन देशों के समाज में भारी आर्थिक असमानता है. ऐसे उदाहरण पूंजीवादी देशों में हर जगह हैं.

अमेरिका का ही उदाहरण लें, वहां पूंजीवाद के बाद स्थिति कितनी बिगड़ी है, वह सामने भले ही न आ पाती हो, क्योंकि जनता और बाकी शक्तियों के बीच पुल की भूमिका निभानेवाला मीडिया, पूंजीपतियों का पक्ष लेता है, और उनके हितों के अनुरूप खबरों की मार्केटिंग करता है. जबकि हालात कितने विकट हैं, यह देखकर मन संताप से भर जाता है. बेलगाम पूंजीवाद समाज को सर्वाधिक अमीर और भीषण गरीब लोगों में बांट रहा है, जो अमीर है, वही उत्पादक है. गरीब के श्रम का उपयोग कर वह उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन करता है. गरीब प्राप्त वृत्तिका का बड़ा हिस्सा उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद पर निवेश करता है. मजदूरी के रूप में उसको सिर्फ उतना ही मिल पाता है, जिससे वह अगले लिए काम पर जा सके. कई बार तो प्राप्त वृत्तिका उसकी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी अपर्याप्त सिद्ध होती है.

एक रिपोर्ट के अनुसार 1994 में अमेरिका की 500 प्रमुख कंपनियां उस देश की कुल 92 प्रतिशत आमदनी पर कब्जा जमाए थीं, जबकि विश्वस्तर की 1000 सबसे बड़ी कंपनियों की सालाना आमदनी आठ अरब डालर है, जो दुनिया के कुल लाभ का एक तिहाई है. अमेरिका में ही केवल आधा प्रतिशत सर्वाधिक धनी कंपनियों के अधिकार क्षेत्र में वहां की 50 प्रतिशत संपत्ति आती है. यही नहीं अमीरों की अमीरी निरंतर बड़ती जा रही है. अमेरिका की सबसे धनी एक प्रतिशत जनसंख्या, वहां की राष्ट्रीय आय में 1978 में जहां केवल 17.6 प्रतिशत हिस्सेदारी रखती थी, वह मात्र दस वर्ष अर्थात 1989 में बढ़कर 36.3 प्रतिशत हो चुकी थी. स्मरणीय है कि पश्चिमी समाज में यही वह समय है, जिसे पूंजीवाद का सबसे सुनहरा दौर माना जाता है.

पूंजीवादी अमेरिका में पूंजी का कुछ हाथों में लगातार सिमटते जाना एक राष्ट्रीय समस्या बन चुका है. 2007 में वहां आई भीषण मंदी का खेल हम देख ही चुके हैं, जिसमें पचास से ऊपर भीमकाय बैंक दिवालियेपन का शिकार हुए थे. उससे पहले वहां बड़ी कंपनियों द्वारा छोटे उद्यमों के अधिग्रहण का दौर चला था, जो 1995 अपने चरमबिंदू पर था. मनोरंजन क्षेत्र की दिग्गज कंपनियां वाल्ट डिजनी, वाशिंगटन हाउस, दवा उद्योग की ग्लैक्सो, कागज उद्योग की स्का॓ट पेपर अपनेअपने क्षेत्र की वे महारथी कंपनियां थीं, जिन्होंने अपनी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों को एकाएक निगल लिया था. चेज मेनहट्टन और केमीकल बैंक ने उसी वर्ष मिलकर, 297 अरब डा॓लर की भारीभरकम पूंजी के साथ, अमेरिका के सबसे बड़े बैंकिंग समूह की आधारशिला रखी थी. पूंजीवाद के चरमोत्कर्ष काल में सबकुछ चमकतादमकता हो, यह बात भी नहीं है. बहुत कुछ ऐसा भी था जो चमचमाती रोशनी के पीछे गहराये अंधेरे की हकीकत बयान करता था. अधिग्रहण के उस दौर में छोटी मछलियां आराम से बड़ी मछलियों का शिकार बन रही थीं. उसी वर्ष मित्शुबिशी बैंक और बैंक आफ टोकियो जो दुनिया के सबसे बड़े बैंकों में से थे, दिवालिया घोषित किए गए थे. अधिग्रहण और विलय का यह खेल यूरोपीय देशों में भी फैला और ब्रिटेन, स्विटजरलेंड, जर्मनी आदि अनेक देशों में पूंजी के बड़े मगरमच्छ छोटी मछलियों को निगलने लगे. इससे मार्क्स और ऐंगल्स की यह भविष्यवाणी सच सिद्ध हो रही थी कि पूंजी का सहज स्वभाव केंद्र की ओर खिसकते जाने का होता है. इस प्रकार वह कुछ समूहों तक सिमटकर रह जाती है. अधिग्रहण और विलयीकरण के इस खेल में हर बार कुछ कंपनियां बंद कर दी जाती हैं, जिसका कुफल उनमें कार्यरत श्रमिकों को बेरोजगारी के रूप में भोगना पड़ता है. स्पष्ट है कि

केंद्र की ओर पूंजी का सतत जमाव उत्पादन में किसी प्रकार की वृद्धि नहीं करता, बल्कि इसका उल्टा ही होता है.’

बेरोजगारी का जिक्र हुआ है तो मार्क्स को एक बार पुनः याद करना पड़ेगा. कम्यूनिस्ट मेनीफेस्टो में उसने कहा था कि बुर्जुआ वर्ग लंबे समय तक सत्ता पर काबिज नहीं रह पाएगा. इसलिए कि वह गरीब और विपन्न वर्गों को अपने दम पर अपने राज्य में सहने की सहूलियत नहीं देता, बल्कि उनके बल पर अपने लिए सुविधाओं का अंबार लगा लेता है. इससे श्रमिक वर्ग के मन में आक्रोश पैदा होता है, जो लगातार बढ़ता जाता है, जो एक दिन बुर्जुआ वर्ग के सत्ताच्युत होने का कारण बनता है. हालांकि पूंजीवादी देशों में ऐसी खबरें प्रायः छनछनकर ही सामने आ पाती हैं. पूंजीपतियों से अस्थिमज्जा प्राप्त मीडिया तथा उन्हीं के दम पर पलने वाली सरकारें, उनपर पर्दा डालने का काम करती हैं. 2007 में छाई मंदी से ठीक पहले पूंजीवाद के समर्थक अर्थशास्त्रीविचारक उदार आर्थिक नीतियों का गुणगान करते नहीं थकते थे. 1995-1996 के पूंजीवाद के सुनहरे दौर में जब बड़ी कंपनियां अपेक्षाकृत छोटी कंपनियों का अधिग्रहण कर अपने विस्तारवादी मंसूबों को अंजाम दे रही थीं, उस समय संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक बेरोजगारों की संख्या 12 करोड़ से भी अधिक थी. ये वे आंकड़े थे, जो पूंजीपतियों के आसरे फलनेफूलने वाले मीडिया ने दिए थे. वास्तविक स्थिति और भी भयावह एवं चिंताजनक है. यदि अस्थायी और ठेके पर अल्पावधि के लिए काम करने वाले कर्मचारियों को भी बेरोजगारों की श्रेणी में रख लिया जाए तो दुनिया के कुल बेरोजगारों की संख्या एक अरब से ज्यादा हो सकती है.

संयुक्त राष्ट्र की उस रिपोर्ट के अनुसार पश्चिमी यूरोप में बेरोजगारों की संख्या दो करोड़ से भी अधिक थी, जो वहां की कुल जनसंख्या का करीब 10.6 प्रतिशत हैं. यही हाल यूरोप के ‘लौहपुरुष’(स्ट्रांग मैन) कहे जाने वाले जर्मनी का था, वहां हिटलर के पतन के बाद पहली बार बेरोजगारों की संख्या में जबरदस्त वृद्धि हुई थी और वह एक झटके में पचास लाख को पार कर चुकी थी. इनमें भी सबसे अधिक आश्चर्यजनक जापान की हालत है. अपनी वैज्ञानिक और तकनीकी क्रांति से पूरे विश्व को चैंका देने वाले जापान में 1930 के बाद पहली बार बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई. हालांकि सरकारी आंकड़े वहां तीन प्रतिशत बेरोजगारी की बात स्वीकारते हैं, मगर वास्तविक बेरोजारों की संख्या का, कुल जनसंख्या का आठ से दस प्रतिशत होना, चिंताजनक स्थिति है. बढ़ती बेरोजगारी ने इस बार उन क्षेत्रों को भी प्रभावित किया है, जो इससे पहले रोजगार की दृष्टि से अत्यंत सुरक्षित और लाभदायक समझे जाते थे. इनमें अध्यापक, नर्स, डाॅक्टर, बैंक कर्मचारी, वकील आदि सम्मिलित हैं, जो अपनी व्यावसायिक योग्यता के दम पर रोजगार पाते रहे थे. 2007 के बाद तो बेरोजगारी ने युवाओं की कमर ही तोड़ दी है. अमेरिका, यूरोप आदि के देशों में बैंकों और बड़े उद्योगों के बंद अथवा दिवालिया होने के बाद दुनियाभर के श्रमिकोंकामगारों को छंटनी का शिकार होना पड़ा. उनकी संख्या करोड़ों में है.

उदार अर्थनीति की विडंबना है कि आर्थिक प्रगति का लाभ जहां चंद विकसित देश ही उठा पा रहे थे, जबकि छंटनी और दिवालियेपन का असर प्रायः छोटी और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को ही झेलना पड़ा है. इससे मार्क्स का यह कथन एक बार फिर प्रासंगिक लगने लगा, जिसमें उसने कहा था कि पूंजीवाद एक वैश्विक व्यवस्था के रूप में विकसित होगा. मगर विश्वबाजार का अस्तित्व लंबे समय तक टिके रहने वाला नहीं है. इसका अंत सुनिश्चित है. यह हमारे समय का बेहद निर्णायक समय है. सच तो यह है कि हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जिसमें कुछ भी निजी अथवा स्थानीय नहीं है. हमारी अर्थव्यवस्था, राजनीति, संस्कृति यहां तक कि कूटनीति भी स्थानीय नहीं है. सबकुछ वैश्विक और अंतरराष्ट्रीय है. प्रौद्योगिकी प्रेरित अंतरराष्ट्रीयकरण ने हमारी संवेदनाओं को भौंथरा किया है. आजकल युद्ध के समाचार भी तब तक रोमांचित नहीं करते, जब तक कि उनमें अंतरराष्ट्रीयता का पुट न हो. वैसे युद्ध अब राजनीतिक मसला नहीं रहा. बीसवीं शताब्दी ने जितने युद्ध झेले, उनके पीछे बाजार का अधिक हाथ था, जिनमें करोड़ों की जानें गईं. इनमें सबसे आखिरी युद्ध अमेरिका और इराक के बीच था, जिसमें एक महादेश की पूंजीवादी आकांक्षाओं ने अपने से कहीं छोटे देश को पहले तो बदनाम करने की साजिश की. फिर दादागिरी दिखाते हुए उसपर हमला बोल दिया.

यह दादागिरी राजनीति प्रेरित नहीं थी. न उसको देश के नागरिकों का समर्थन प्राप्त था. समर्थन था, पूंजीपतियों का, जो युद्ध में अपनेअपने लाभ देख रहे थे. एक वर्ग को युद्ध की तबाही के बाद उस देश में नवनिर्माण के लिए ठेके मिलने की उम्मीद थी. कुछ का धंधा हथियार बनानेबेचने का था. वे मानते थे कि युद्ध नवनिर्मित रासायनिक हथियारों के प्रदर्शन का अच्छा अवसर सिद्ध होगा, बाद में उनके ग्राहक भी आएंगे. इन महत्त्वाकांक्षाओं ने एक फलतेफूलते देश को तबाही के गर्त में ढकेल दिया. हैरानी की बात है कि जनता और बुद्धिजीवी उस युद्ध को केवल राजनीतिक मसला समझे रहे. युद्ध के वास्तविक जिम्मेदार व्यक्ति कभी सामने आ ही नहीं पाए. युद्ध से नाराज जनता ने बुश महाराज से कुर्सी तो छीन ली. नई उम्मीदों के साथ नया चेहरा राजनीति में आया. मगर पूंजीवादी मंसूबे खत्म नहीं हुए. यानी युद्ध की संभावनाओं और उससे जुड़ी पूंजीवादी आकांक्षाओं का कोई निदान आज तक नहीं खोजा जा सका.

समस्या है कि पूंजीवाद के इस खेल से बचा कैसे जाए? इसका एक ही हल है. किसी भी तरह किसान, मजदूर और कामगार वर्ग अपनेअपने हितों की रक्षा में एकजुट हों. अपनी वास्तविक जरूरतों का आकलन करें. उपलब्ध संसाधनों को जांचे परखें. तत्पश्चात अनुकूल प्रौद्योगिकी का चयन कर उत्पादन की जिम्मेदारी स्वयं संभालें. प्रौद्योगिकी भी ऐसी हो जो समूह के सदस्यों की कुशलता का उपयोग कर, उन्हें आर्थिकसामाजिक रूप में आत्मनिर्भर बनाती हो. लेकिन क्या यह इतना ही आसान है? आजकल सामान्य समझबूझ वाला बुद्धिजीवी भी मानता है कि उद्योगों को बंधनमुक्त होना चाहिए. सरकार उनपर कम से कम नियंत्रण रखे. वैश्विक अर्थव्यवस्था का विकास हो, ताकि उद्योगों को हर जगह एक जैसा वातावरण मिले. सभी देशों में लाइसेंस और परमिट की एकसी शर्तें, एक जैसे विधान हों. व्यवस्था हो कि उद्योगों को समाज के बहुसंख्यक वर्ग के विकास के लिए काम करने की पूरीपूरी छूट मिले. साथ में आवश्यक सुविधाएं भी. ऐसे में कैसे संभव है, पूंजीवाद के संकट से बच पाना. खासकर तब जब पूंजीवाद लगातार मजबूत और हिंò होता जा रहा हो. श्रमिक शोषण के नएनए रास्ते खोजे जा रहे हों. शोध का क्षेत्र पूंजीपतियों के हाथ में चले जाने से सारी प्रतिभाएं, सारे के सारे पेटेंट पहले से ही उनके हाथों में जा ही चुके हैं. पूंजीपतियों के लिए तो वैश्वीकरण भी एक अवसर है. यह वैश्वीकरण भी निरापद कहां है? इससे बड़ी विडंबना भला और क्या होगी कि पिछली शताब्दी में भूमंडलीकरण एवं अर्थव्यवस्था के अंतरराष्ट्रीयकरण की तमाम सूचनाओं के बावजूद भारत में आर्थिक विसंगतियां सिर चढ़कर बोल रही हैं. देश में रोजगार के जितने अवसर बढ़े हैं, बेरोजगारों की संख्या उससे कहीं अधिक बढ़ी है. उससे कहीं तेजी से देश में आर्थिक असमानता बढ़ती जा रही है.

पूंजीवाद के अंतरराष्ट्रीय फैलाव के कारण विभिन्न देशों के आंतरिक और बाह्यः तनावों में भी वृद्धि हुई है. राज्यों के विरोधाभास और भी खुलकर सामने आए हैं. पूंजी का खिंचाव अतिविकसित देशों की ओर बढ़ता ही जा रहा है. हालात को समझने के लिए सिर्फ एक उदाहरण पर्याप्त होगा. 1987 में संयुक्त राज्य अमेरिका अपने कुल सालाना बजट का मात्र छह प्रतिशत हिस्सा निर्यात के माध्यम से जुटाता था. 1997 में निर्यात का हिस्सा बढ़कर 13 प्रतिशत यानी दुगुने से भी अधिक हो चुका था. इकीसवीं शताब्दी की दहलीज पर सरकार की योजना 22 प्रतिशत के लक्ष्य को पाने की है. इससे अमेरिका जैसे विकसित देशों की अर्थव्यवस्था के रहस्य को समझा जा सकता है. विकसित देशों के पास तो पूंजी है, संसाधन हैं, इसलिए वे अपने उत्पादों के लिए बाजार की सतत खोज में रहते हैं. ऐसी तकनीक की खोज में रहते हैं, जिसकी स्थापना लागत भले ही अधिक हो, मगर जिसके माध्यम से उत्पादन व्यवस्था का अधिकाधिक स्वचालीकरण कर सकें. स्वचालीकरण की तीव्र प्रक्रिया में स्थापना लागत भले ही अपेक्षाकृत अधिक हो, मगर उत्पादनवृद्धि और प्रचालन लागत में भारी कमी से उद्योगपति को दीर्घकालिक लाभ मिलता है. दूसरी ओर श्रमिकों पर निर्भरता में लगातार गिरावट आती है. इससे पूंजीपति लगातार ताकतवर होता है और श्रमिक कमजोर.

इस स्थिति को मार्क्स ने 1848 में ही भांप लिया था. कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो में उसने लिखा था

सघन मशीनीकरण तथा श्रमविभाजन की त्वरित प्रक्रिया में सर्वहारा काम के दौरान अपनी समस्त कार्यकौशल और विशिष्टताएं खो बैठता है. इसका प्रतिकूल प्रभाव उसकी कार्यक्षमता पर पड़ता है. उसका उल्लास धीरेधीरे कम होने लगता है. एक दिन वह मशीनों का आश्रित बनकर रह जाता है. पूंजीवादी समाजों में श्रमिक के कौशल को कुंद करने, उसको मशीनों का दास बनाने की सर्वाधिक सरल और प्रचलित चाल है. इससे श्रमिक की उत्पादन लागत को लगभग पूरी तरह से, उसकी रोजमर्रा की आवश्यकताओं तक, सिर्फ उन आवश्यकताओं तक जिनसे वह अपना भरणपोषण कर, कलकारखानों के लिए मजदूरों की नई फसल पैदा कर सके, सीमित कर दिया जाता है. चूंकि किसी उपभोक्ता वस्तु, साथ ही उसके श्रम की कीमत उत्पादन लागत के तय होती है. अतएव जैसेजैसे श्रमिक का उत्पादन से मोहभंग बढ़ता है, काम के प्रति उसका विकर्षण बढ़ता जाता है. दूसरी ओर उसकी वृत्तिका भी उसी अनुपात में गिरती चली जाती है. इसी के साथ कामगार के ऊपर, चाहे वह कार्यघंटों में हुई बढ़ोत्तरी के कारण हो या तय समयसीमा में अधिक काम देने के दबाव का मामला, अथवा उच्च उत्पादनक्षमता युक्त मशीनरी के साथ काम करने के कारण उसके साथ तालमेल बनाए रखने की चुनौतीश्रम का दबाव भी लगातार बढ़ता जाता है.

सोवियत संघ के अवसान के बाद भारत आदि देशों में अमेरिकापरस्त अर्थशास्त्रियों एवं बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग पैदा हुआ है, जिसने पूंजीवाद को लगभग अपरिहार्य और विकल्पहीन मान लिया है. स्वयं अमेरिका की क्या स्थिति है, इस बारे में बहुत अधिक समाचार मीडिया में नहीं दिए जाते हैं. यह भी कहा जा सकता है कि अपने पूंजीवादी संबंधों की लाज रखने के लिए मीडिया उनपर पर्दा डाले रखता है. वस्तुतः आधुनिक अमेरिका की वही हालत है, जो मार्क्स के समय में तत्कालीन सर्वाधिक विकसित पूंजीवादी देश ब्रिटेन की थी. अंतर केवल इतना है कि ब्रिटेन अपने उपनिवेशों के दोहन के लिए राजनीति का सहारा लेता था, अमेरिका यह काम अपनी अर्थसत्ता के माध्यम से करता है. उसने पूरी दुनिया में अपने आर्थिक उपनिवेश बसाए हुए हैं, जिनपर वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक जैसी संस्थाओं के माध्यम से राज करता है. उपनिवेशों के शोषण में बौद्धिक संपदा जैसे कानून उसके मददगार सिद्ध होते हैं. इसके बावजूद हालात संतोषजनक नहीं हैं. आक्रोश भीतर ही भीतर भड़क रहा है. इसके पीछे अमेरिकी अर्थव्यवस्था की वे विसंगतियां हैं, जो धीरेधीरे सामने आ रही हैं. ऐलेन वुड के अनुसार अमेरिका में

गत बीस वर्षों के दौरान अमेरिकी श्रमिकों की वास्तविक मजदूरों में बीस प्रतिशत तक की भारी गिरावट दर्ज हुई है, दूसरी ओर उन्हें पहले की अपेक्षा प्रतिदिन दस प्रतिशत अधिक काम करना पड़ता है. कहा जा सकता है कि अमेरिका की औद्योगिक क्रांति वहां के श्रमिक वर्ग के हितों पर कुठाराघात के बाद संभव हो सकी है. उदाहरणार्थ, एक अमेरिकी कर्मचारी को एक वर्ष में औसतन 168 घंटे ओवरटाइम करना पड़ता है, जो एक महीने के कार्य के बराबर है. अमेरिकी आॅटोमोबाइल उद्योग के लिए यह विशेषरूप में सही है, जहां एक कार्यदिवस में नौ घंटे और सप्ताह में छह दिन कार्य करने का प्रावधान है. अमेरिकी मजदूर संगठनों के अनुसार यदि वहां कार्यसप्ताह को चालीस घंटों तक सीमित कर दिया जाए तो मात्र इसी से 59,000 नए रोजगार अवसर पैदा किए जा सकते हैं.’

ऐसा नहीं है कि अपने शोषण के विरोध में श्रमिकों में कोई चेतना या सुगबुगाहट न हो. बल्कि वहां आवाजें उठने लगी हैं. करीब पंद्रह वर्ष पहले 24 अक्टूबर, 1994 को टाइम पत्रिका में प्रकाशित एक आलेख में पूंजीवादी शोषण के विरोध में बढ़ते श्रमिकआक्रोश का उल्लेख किया गया था, जिसमें उन्होंने उदारवाद प्रेरित आर्थिक विस्तार को अपने हितों के प्रतिकूल बताया था. लेख में बताया गया था कि काम के अत्यधिक बोझ के कारण, श्रमिकों की दिनचर्या कारखाने में काम तथा ओवरटाइम करने के बाद घर जाकर नहानेखानेसोने और अगली सुबह फिर कारखाने के लिए दौड़ लगाने तक सिमट चुकी है. इसने वहां के सामाजिक जीवन को भी प्रभावित किया है. इससे जहां शिशु जन्म दर में गिरावट दर्ज की गई है, वहीं तलाक की घटनाओं में भी अप्रत्याशित तेजी आई है. जबकि 1980 तक लगातार विकासमान रही जीवनसंभाव्यता, उसके बाद लगभग स्थिर हो गई है. यह स्थिति अमेरिकी समाज के विकास की विडंबना को दर्शाती है. ब्रिटेन का हाल भी इससे भिन्न नहीं है. जब मादाम थैचर वहां की प्रधानमंत्री थीं तो उद्योगों में 25 लाख रोजगार अवसरों में गिरावट दर्ज की गई थी. बावजूद इसके वहां कारखानों के उत्पादनसामर्थ्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है. कामगारों की संख्या में हुई भारी गिरावट के बावजूद उत्पादन स्तर पूर्ववत रहने का कारण केवल उन्नत मशीनों का उपयोग नही है, बल्कि मजदूरों का शोषण भी है. अत्याधुनिक तकनीक भी श्रमिकों के लिए राहतकारी सिद्ध नहीं हुई है. उनकी मुश्किलें बढ़ती ही जा रही हैं. श्रमिकों एवं आम जनता को भुलावे में रखने के लिए नए उपकरणों को बड़ी तेजी से एक के बाद कर उतारा जा रहा है. ऐसे उत्पादों के निर्माण पर जोर दिया जा रहा है, जिनका वास्तविक विकास से कोई संबंध ही न हो. लोकतांत्रिक खुलेपन का उपयोग फैशन और नईनई उपभोक्तावस्तुओं के साथ, लोगों को मोबाइल और इंटरनेट पर खुली सेक्ससामग्री परोसने के लिए किया जा रहा है. तंत्रमंत्र और जादूटोने की बढ़ती लोकप्रियता का लाभ उपभोक्तासामग्री के प्रचारप्रसार के लिए किया है. इसका दुष्परिणाम यह है कि समाज में आर्थिक विषमता लगातार बढ़ रही है.

अमेरिका की भांति ब्रिटेन में भी श्रमिकों को अधिक देर तक कार्य करने के लिए बाध्य किया जाता है. उन्हें उस अवधि का वेतन भी नहीं दिया जाता. यही हाल यूरोप के बाकी देशों का है. वहां भी बड़ी औद्योगिक कंपनियां छोटे उत्पादकों को लीलती जा रही हैं. सबसे धनी और निर्धनतम व्यक्ति के बीच आय का अंतर लगातार बड़ता जा रहा है. भारत समेत ऐशियाई देशों में पूंजीवादी व्यवस्था को लागू हुए अधिक दिन नहीं हुए हैं. पश्चिम का अंधानुकरण करते हुए भारत ने उदार अर्थव्यवस्था को अपनाकर, गत पचीसतीस वर्ष से पूंजीपतियों को मनमानी करने का अधिकार दे दिया है. इससे पूंजी का तेजी से केंद्र की ओर खिंचाव जारी है. पिछले एक दशक में जहां देश में अरबपतियों की संख्या में कई गुना वृद्धि हुई है, वहीं पैंतीस करोड़ नागरिकों को प्रतिदिन बीस रुपये से भी कम आय में जीवनयापन करना पड़ता है. बढ़ते जनाक्रोश के दुष्परिणामस्वरूप पिछले कुछ दिनों से देश में नक्सलवादी गतिविधियां बढ़ी हैं. सरकार और पूंजीपतियों के दबाव में अपनी जमीन और संसाधन लुटा चुके हजारों लोग विद्रोह में व्यवस्था के विरुद्ध हथियारबंद हो उठे हैं. छोटे कारखानों में मजदूरी की बुरी हालत है. वहां बिना किसी नोटिस के कार्यघंटों में 50 प्रतिशत तक वृद्धि हो चुकी थी. इससे पहले जहां श्रमिकों को केवल आठ घंटे काम करना पड़ता था, अब बारह घंटे उतने ही वेतन में काम करना उनकी विवशता बनती जा रही है. यही हालात एशिया के बाकी देशों में हैं. पश्चिम भी इनसे बचा नहीं है. मीडिया पूंजी की इस तानाशाही के विरुद्ध आवाज उठाने के बजाय उसके महिमामंडन में लगा रहता है. स्थिति पर गंभीरतापूर्वक विचार किए बिना उसका प्रयास मार्क्सवाद कठघरे में खड़ा करने का होता है, जिससे अंततः पूंजीवाद ही मजबूत होता है.

यह मार्क्स और ऐंगल्स ही थे, जिन्होंने हमारा परिचय सामाजिक विकास के इस सर्वमान्य और महत्त्वपूर्ण नियम से कराया था, जिसके अनुसार समाज का वर्तमान ढांचा पूंजीपतियों के अनुकूल विकसित हुआ है. यह उसी अवस्था में स्थिर रह सकता है, जब तक समाज की उत्पादक शक्तियां सुरक्षित हैं. कोई भी समाज इससे उस समय तक बच नहीं सकता, जब तक कि वह अपने समस्त संसाधन इस व्यवस्था के विकास के लिए, पूंजीवाद की समृद्धि के निमित्त झोंक नहीं देता. पूंजीवाद के समर्थक अक्सर इस बात का दावा करते हैं कि बाजार की समृद्धि का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचता है. क्योंकि बाजार सभी को अपनी वस्तु का मूल्यांकन करने तथा उसके अनुसार उसका मूल्य वसूलने का आश्वासन देता है. उनके अनुसार यह व्यवस्था श्रमिक के लिए अधिक लाभकारी है. इसमें वह स्पर्धा का लाभ उठाकर अपने लिए ऐसे नियोक्ता की तलाश की तलाश कर सकता है, जहां उसको अधिकतम वृत्तिका की संभावना हो. यह एक दिवास्वप्न ही है. उन्हें जिस गुण में पंूजीवाद की सार्थकता नजर आती है, दरअसल वही उसकी कमजोरी है. नियम है कि बाजार में पूंजी की ताकत ही सर्वोपरि होती है. इसलिए वहां छोटी पूंजी को बड़ी पूंजी के आगे परास्त होना पड़ता है. किसान और श्रमिक के पास अपना श्रम या वे छोटे संसाधन पूंजी के रूप में होते हैं, जो बाजार में किसी प्रकार की ताकत बनने में नाकाम होते हैं. परिणामस्वरूप अपने मूल्यांकन के लिए वे सदैव दूसरों पर निर्भर रहते हैं, जहां उनकी योग्यता का न्यूनतर मूल्यांकन किया जाता है. यह स्थिति पूंजीवादी शोषण को जन्म देती है.

पूंजी की तानाशाही के चलते हम सिर्फ यह सोचकर तसल्ली कर सकते हैं कि किसी भी अन्य विधान की भांति पूंजीवाद का भी जन्म हुआ है. वह भी दूसरी विचारधाराओं की भांति इतिहास के साथ विकसित हुआ है, और आज वह जिस अवस्था में है, वह उसके चढ़ाव की चरम अवस्था है. यहां से उसका पतन अवश्यंभावी है. यही ऐतिहासिक भौतिकवाद की अवधारणा है. यही मार्क्स के चिंतन का लक्ष्यबिंदू है. जब हम इस वैज्ञानिक तथ्य को समझ लेते हैं, तो यह समझना भी आसान हो जाता है कि इतिहास घटनाओं की भावहीन, अतार्किक, अनियोजित और आकस्मिक व्यवस्था नहीं है, जिसको चंद लोग अपनी मनमर्जी से हांक सकें. न ही यह कुछ लोगों की गतिविधियों का परिणाम है. बल्कि यहां जो घटता है, वह एक नैसर्गिक व्यवस्था के अनुसार संचालित होता है, जिसकी सुसंगत व्याख्या संभव है.

मार्क्स के ये विचार चाल्र्स डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत से प्रेरित थे, जिसने जीवजगत को परिवर्तनशील माना था. अपने अध्ययन द्वारा वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि जीवजंतुओं का भी अपना भूतवर्तमान और भविष्य होता है. विकासक्रम के दौरान उन्हें एक सतत परिवर्तनशील एवं विकासमान प्रक्रिया से अनिवार्यतः गुजरना पड़ता है. डार्विन की वैज्ञानिक खोज की सामाजिक विकास के संदर्भ में व्याख्या करते समय मार्क्स एवं ऐंगल्स का मानना था कि इस सृष्टि में पूर्णतः स्थायी और अपरिवर्तनशील सत्ता की कल्पना मात्र एक भ्रम है. इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है, जो पूरी तरह स्थायी एवं अपरिवर्तनीय हो. सामाजिकतंत्र, चाहे जो भी हो, वह मानवीय भावनाओं के सीमित स्वरूप का प्रदर्शन करता है. अपने भरणपोषण के लिए प्रत्येक समाज उत्पादकता के संसाधनों को अपनाता है. उसके लिए जिन संसाधनों को वह चुनता है, उन्हीं पर उसके विकास की दिशा एवं गति निर्भर करती है. ऐतिहासिक भौतिकवाद का विवेचन करता हुआ मार्क्स अंततः इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि वर्तमान समाजों का अभी तक तक इतिहास वर्ग, संघर्ष का इतिहास रहा है.

मजदूर कोरी वितंडा नहीं चाहता. मार्क्स ने उसके हक की बात कही थी. अपने सुख, प्रतिष्ठा और परिवार के भविष्य को दाव पर लगाकर उसने उनके लिए संघर्ष किया था. मजदूर इस तथ्य को जानता है. अतएव मार्क्स उसके लिए देवता हैं. सच तो यह है कि मार्क्स ने हीगेल का द्वंद्ववाद का मानवीकरण किया था. वह उसको आकाश से उतारकर जमीन पर ले आया था. एक तत्ववादी चिंतन को विशुद्ध यथार्थ, लोकोपयोगी चिंतन के रूप में ढाल दिया था. उसका मानना था कि पूंजीवाद का खात्मा श्रमिकों द्वारा उत्पादनतंत्र पर कब्जा कर लेने मात्र से संभव नहीं है. उनके वास्तविक कल्याण के लिए व्यवस्था में आमूल बदलाव जरूरी है. ऐसी व्यवस्था की नींव रखनी होगी जो वर्गहीनता की समर्थक हो. तभी सामाजिकआर्थिक ऊंचनीच की खाई को पाटा जा सकता है. मार्क्स के आलोचकों का सोच केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित है. वे व्यवस्था परिवर्तन के संकल्प से दूर हैं. ऐसे आलोचकों द्वारा मार्क्स की आलोचना की कोई भी बात, उसके चेलेचपाटों की समझ में नहीं आतीं. उन्हें तो गोपियों जैसी साकार भक्ति चाहिए. उद्धव का ज्ञानयोग उनके किसी काम कर नहीं.

मार्क्स अर्थव्यवस्था, राजनीति और समाजनीति में व्यापक परिवर्तन चाहता था. वह चाहता था कि अर्थनीति का ढांचा मुनाफे के आधार पर नहीं, मानवीय विकास और संवेदनाओं के अनुसार तय किया जाए. मार्क्स के अनुयायी दुनिया को उसी की निगाह से देखते हैं, सिर्फ उसको चाहते हैं. यही उनके लोकप्रिय अथवा अलोकप्रिय होने का कारण है. यही वह गुण है जिसने पूरी दुनिया को दो धु्रवों में बांट रखा है. मार्क्स के चिंतन में सर्वभक्षक पूंजीवाद का विकल्प उपलब्ध है, जिसने पूरी दुनिया की संपदा का प्रवाह विकसित देशों की ओर मोड़ दिया है. कहने को तो तमाम अंतरराष्ट्रीय संधियां देशों के बीच मुक्त व्यापार की बात करती हैं. प्रत्येक देश को यह अधिकार देतीं है कि वह अपने संसाधनों का उपयोग कर अपने उत्पादक सामथ्र्य का अधिक से लाभ उठा सके. मगर व्यवहार में विकसित देशों की अत्याधुनिक तकनीक और विपुल साधनों के आगे स्पर्धा में वे टिक ही नहीं पाते हैं. इसलिए उदार अर्थव्यवस्था का लाभ केवल विकसित देशों के लाभाधिकार तक सीमित होकर रह जाता है. ऐसे में मार्क्स का विश्लेषण हमें पूंजीवाद को गहराई से समझने और उसका सार्थक विकल्प खोजने में मदद कर सकता है.

मार्क्स का सारा जोर पूंजीवाद के चरित्र और उसकी विवेचना को लेकर था. इसी संकल्पना के साथ उसने ‘पूंजी’ की रचना की थी. मार्क्स के निधन के बाद से पिछले 127 वर्षों में पूंजीवाद के चरित्र में व्यापक बदलाव आया है. तो भी उसका मूल चरित्र लगभग वही है, जो उनीसवीं शताब्दी के दौरान था. बल्कि कई मायने में वह पहले से अधिक ताकतवर, क्रूर, उत्पीड़क एवं दुःखदायी हुआ है. स्वचालित प्रौद्योगिकी ने पूंजीपति को पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली तथा निष्ठुर बनाया है. इसकी मार्क्स के जीवनकाल में केवल शुरुआत ही हो पाई थी. हाल के वर्षों में कंप्यूटरआधारित तकनीक ने मशीनों को इतना कार्यक्षम और स्वचालित बना दिया है, कि अनेक क्षेत्र ऐसे हैं, जहां मशीनों का नियंत्रण रिमोट के माध्यम से संभव है. उन स्थानों में श्रमिक का कार्य केवल तैयार माल को सुरक्षित रखने या उसको गंतव्यस्थल तक लानेले जाने में सिमट गया है. वह मानवी हस्तकौशल एवं उसके तकनीकी ज्ञान की उपेक्षा करती है. चूंकि मशीनें तकनीकी कौशल की भरपाई आसानी से कर देती हैं, इसलिए पूंजीपति के लिए श्रमिक की भूमिका उत्पादनकार्य में मात्र सहायक तक सिमटकर रह जाती है. उन्नत प्रौद्योगिकी ने श्रमिकों के मन से ‘उत्पादकशक्ति’ होने की अनुभूति को छीनकर उन्हें कुंठाग्रस्त करने का काम किया है. श्रम का शोषण करना, अधिलाभ के बड़े हिस्से पर उत्पादक का अधिकार, अपने से छोटे उद्यमियों को स्पर्धा में परास्त कर बाजार पर एकाधिकार कायम कर लेने की इच्छा आदि आधुनिक पूंजीवाद के कुछ ऐसे अवगुण हैं, जो आज भी उनीसवीं शताब्दी के पूंजीवाद से मेल खाते हैं, जिनमें कतई सुधार नहीं हुआ है. इससे भी बड़ी बात यह हुई है कि पूंजीपतियों ने लंबी पहुंच वाले संचारमाध्यमों पर कब्जा करके प्रतिपक्ष की आवाज को न उभरने देने का पूरापूरा प्रबंध कर लिया है. कहा जा सकता है कि जिस वैज्ञानिक समाजवाद की परिकल्पना मार्क्स ने की थी, उसकी पहले से कहीं अधिक आवश्यकता आज है.

बावजूद इसके यह एक सामान्य जिज्ञासा का सवाल है कि मार्क्स की आज के संदर्भों में कितनी प्रासंगिकता है. क्या उसके विचारों को इकीसवीं शताब्दी में भी ज्यों का ज्यों अपनाया जा सकता है. दरअसल किसी भी कालखंड में मार्क्स के विचारों को संपूर्णता से आत्मसात नहीं किया गया. इसके कारण स्वयं मार्क्स के लेखन में ही सुरक्षित हैं. ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ में वह मजदूरों का सक्रिय क्रांति के लिए आवाह्न करता है. अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हिंसा का सहारा लेने में भी उसको संकोच नहीं है. पेरिस की रक्तरंजित क्रांति और तदनंतर कम्यून की स्थापना के पीछे भी माक्र्सवादी प्रेरणाएं ही थीं. मार्क्स के विचारों के आधार पर ही श्रमिक आंदोलन की नींव रखी गई. यद्यपि बाद में उसका हिंसक क्रांति से मोहभंग होता है और वह आमूल परिवर्तन के लिए, पूंजीवाद से साम्यवाद तक की यात्रा को दो हिस्सों में बांट देता है. उसके अनुसार क्रांति के पहले चरण में श्रमिक संगठन समस्त राजनीतिक और उत्पादनतंत्रों पर अपना अधिकार जमा लेंगे. उसके बाद वे आमूल परिवर्तन के लिए वर्गहीन समाज की स्थापना के लिए प्रयासरत होंगे.

इतनी स्पष्टता के बावजूद मार्क्स के विचारों को लेकर उसके समर्थकों के बीच आज भी भारी मतभेद हैं. मार्क्स का राजनीतिकआर्थिक दर्शन दुनियाभर में ‘मार्क्सवाद ’ के नाम से जाना जाता है, जिसमें वह ऐतिहासिक द्वंद्ववाद के आधार पर पूंजीवाद की तीखी आलोचना करता है. परिवर्तन के लिए वर्गसंघर्ष को अवश्यंभावी मानते हुए उसमें सर्वहारावर्ग की जीत की ओर संकेत करता है. दावा करता है कि पूंजीवाद का अंत निश्चित है, वह अपनी ही कमजोरियों का शिकार होकर एक दिन धराशायी हो जाएगा. मार्क्स के इस विश्वास के बावजूद एक स्वाभाविकसा प्रश्न यहां उभरता है कि क्या ‘मार्क्सवाद ’ उसकी मान्यताओं का सहीसही प्रतिनिधित्व करता है. इस प्रकार की बहसें नई नहीं हैं. मार्क्स के जीवनकाल में ये आरंभ हो चुकी थीं. शायद ऐसी ही किसी बहस से तंग आकर अपनी मृत्यु से कुछ दिन पहले मार्क्स ने अपने साले पाल ला॓फर्ग और फ्रांस के चर्चित श्रमिक नेता जूल्स जूडे पर ‘क्रांतिकारी नारों की सौदेबाजी’ तथा उनका श्रमिकों की संगठित शक्ति में अविश्वास होने का आरोप लगाया था. उल्लेखनीय है कि जूडे ने अपने सहयोगियों से पार्लियामेंट हा॓ल से वर्गसंघर्ष की शुरुआत करने का प्रस्ताव रखा था, जिसका उसके साथियों ने जो संसदीय तरीकों में विश्वास रखते थे और मिलजुलकर रास्ता निकालने की नीति के समर्थक थे,जमकर विरोध किया था. इस घटना के बाद कुछ लोगों द्वारा यह आरोप लगाने पर कि जूडे ने जो किया, उसके पीछे मार्क्स की ही प्रेरणा थी, मार्क्स ने अपनी प्रतिक्रिया ऐंगल्स को संबोधित एक पत्र में व्यक्त की थी. उसने लिखा था कि

‘‘यदि यही मार्क्सवाद है तो मैं मार्क्सवादी नहीं हूं.’’

इस तरह मार्क्स के जीवनकाल में ही उसके विचारों के आधार पर समर्थकों के दो दल बन चुके थे. इनमें से एक वर्ग मार्क्स की उपभोक्ता सामग्री, उत्पादन, पूंजी, श्रम आदि को लेकर तर्कसम्मत गवेषणासामथ्र्य का प्रशंसक था, जिसके आधार पर उसने ‘दि कैपीटल’ नामक ग्रंथ की रचना की थी. यह पुस्तक साम्यवादी राज्य की अभिकल्पना प्रस्तुत करती थी. मार्क्स के प्रशंसकों का दूसरा वर्ग ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ के साथ गहराई से जुड़ा था और मानता था कि समाजवाद की स्थापना के लिए क्रांति अपरिहार्य है. उसके अलावा परिवर्तन का कोई दूसरा रास्ता नहीं है. मार्क्स की मृत्यु के छह वर्ष उपरांत ऐंगल्स ने ‘दूसरा इंटरनेशनल’ की स्थापना की तो उसने भी राजनीतिक प्रतिरोध की नीति को अपनाया था. ‘दूसरा इंटरनेशनल’ को मार्क्स के सहयोग से स्थापित ‘प्रथम इंटरनेशनल’ की अपेक्षा अधिक सफलता प्राप्त हुई थी. रूस में साम्यवादी क्रांति के बीजतत्व ‘दूसरा इंटरनेशनल’ तथा प्रथम विश्वयुद्ध की असंगतियों से उपजे असंतोष का ही परिणाम थे. लेनिन ने स्वयं को मार्क्स के दर्शन और राजनीतिक चिंतन का असली उत्तराधिकारी घोषित करते हुए रूस में बोल्शेविक क्रांति की नींव रखी. दरअसल लेनिन की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं बड़ी थीं. उसने मार्क्स से उतना ही ग्रहण किया था, जितना उसको अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए आवश्यक लगता था. मार्क्स का साम्यवाद सर्वहारा क्रांति से आगे की अवस्था थी. मगर रूस में बोल्शेविक क्रांति पहले चरण पर ही ठहर चुकी थी. बजाय इसके कि मार्क्स के विचारों पर पूरी तरह अमल करते हुए पूर्ण साम्यवाद की स्थापना के प्रयास किए जाएं, रूसी सरकार ने खुद को मारक हथियारों की दौड़ में शामिल कर लिया था. सर्वहारा कल्याण के अनुकूल वैकल्पिक प्रौद्योगिकी की खोज और उसके आधार पर साम्यवाद की स्थापना की ओर किसी का ध्यान ही नहीं था. इससे वहां के नागरिकों के मन में असंतोष पनपा जो अंततः सोवियत संघ के बिखराव का कारण बना. फिर भी यदि करीब अस्सी वर्ष तक रूस में साम्यवाद बना रहा तो इसके पीछे चेखव, गोर्की, दोस्तोयवस्की, अलेक्जांद्र पुश्किन, इवान तुर्गनेव जैसे महान लेखकों का हाथ था, जिसने उस व्यवस्था का एक रूमानी सपना अपने समाज को दिखाया था, जिसकी वास्तविक स्थापना के लिए रूसी समाज दशकों तक प्रतीक्षा करता रहा.

मार्क्स का मानना था कि साम्यवादी क्रांति विकसित औद्योगिक समाजों में ही सफल होगी. फ्रांस, जर्मनी, इंग्लेंड जैसे देशों को जहां औद्योगिक क्रांति फैल चुकी थी उसने साम्यवादी क्रांति के लिए सर्वाधिक उपयुक्त बताया था. उसका मानना था कि विकसित समाजों में औद्योगिकीकरण के कारण समाज में आर्थिक असमानताओं में वृद्धि होती जाएगी, जो सर्वहारावर्ग को अपनी स्थिति में परिवर्तन के लिए एकजुट होने तथा उत्पीड़क पूंजीपतियों के विरुद्ध संघर्ष छेड़ने की प्रेरणा देगी. इससे भिन्न व्लादिमिर लेनिन का विचार था कि साम्राज्यवादी शोषण तथा अनियोजित एवं असमान आर्थिक विकास के चलते सर्वहारा क्रांति के लिए पिछड़े देशों में अधिक संभावनाएं हैं. उसका मानना था कि पूंजीवाद जनित उत्पीड़क स्थितियों तथा आर्थिक असमानता का यह दबाव अपेक्षाकृत छोटे और पिछड़े समाजों में सर्वहारा क्रांति की अधिक संभावना पैदा करेगा. वहीं से क्रांति की हवा विकसित देशों की ओर बहेगी, जहां का समाज समाजवाद की स्थापना के तैयार है, तदनंतर वह रूस की ओर बढ़ेगी. ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ के रूसी संस्करण की भूमिका में भी मार्क्स ने कुछ ऐसी ही संभावना व्यक्त की थी. इस संभावना पर विचार करते हुए कि सार्वजनिक भूस्वामित्व का अभ्यस्त रूसी समाज क्या साम्यवाद के ऊंचे आदर्शों को अपनाने के आसानी से तैयार होगा, उसने लिखा था कि संभावना यही है कि यदि रूसी क्रांति पश्चिम में सर्वहारा क्रांति के लिए प्रेरणा बनती है तो भूमि पर सार्वजनिक अधिकार का मुद्दा साम्यवाद के विकास का आधारभूत सिद्धांत सिद्ध होगा, इसलिए कि वह साम्यवाद का ही एक रूप है.

मार्क्स का यह विचार कि रूस पश्चिम की साम्यवादी क्रांति का प्रेरणास्रोत बन सकता है, लेनिन और उसके सहयोगी ट्राटस्की के चिंतनकर्म का आधार बना. ट्राटस्की और उसके सहयोगी इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि पश्चिम में साम्यवादी क्रांति की असफलता रूसी क्रांति और कालांतर में पश्चिमी देशों में सर्वहारा क्रांति को प्रेरित करेगी और इस तरह रूस वैश्विक सर्वहारा क्रांति का सूत्रधार बनेगा. इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए स्टालिन ने ‘एक देशीय समाजवाद’ की परिकल्पना से छलांग लगाकर विश्वव्यापी सर्वहारा क्रांति के लिए संघर्ष छेड़ने का आवाह्न किया था. स्टालिन का यह सोच 1930 में लाखों सर्वहारा मजूदरों की मौत का कारण बना, जिसके कारण स्टालिन के विरुद्ध जनाक्रोश फैला. महान रूसी लेखक सोल्झेनित्सिन ने जब स्टालिन के शासनकाल में चलने वाले कारावास शिविरों की अमानवीय स्थितियों का बयान अपने उपन्यास ‘दि गुलाग आर्किपैलेगो’ में किया तो उनको रूसी शासकों की ओर से तरहतरह की प्रताड़नाएं दी गईं. इस उपन्यास के लिए सोल्झेनित्सिन को निर्वासन की सजा भी भुगतनी पड़ी. स्टालिन की मृत्यु के बाद रूस की बागडोर जब निकिता ख्रुश्चेव के हाथों में आई तो उसने स्टालिनवाद को विकार मानते हुए, पूरी तरह नकार दिया. सोल्झेनित्सिन का निर्वासन भी समाप्त हुआ. इस तरह उस रक्तरंजित युग का अंत हुआ, जिसमें स्टालिन के नेतृत्व में साम्यवाद अधिनायकवाद का रूप ले चुका था,

रूस की भांति चीन भी कृषिआधारित अर्थव्यवस्था पर निर्भर था. वहां साम्यवादी क्रांति का अलख जगाने वाला माओ जि दांग था. ‘चीनी साम्यवादी पार्टी’ के स्थापक चेन दुजियु तथा दझाओ के साथ मिलकर उसने चीन में साम्यवादी क्रांति के पक्ष में माहौल बनाने के लिए लंबा संघर्ष किया था. वस्तुतः 1925 तक मार्क्सवादी चीनी नेता मानते आ रहे थे कि शहरी मजदूर ऐतिहासिक द्वंद्ववाद की भावना को समझकर अपने वर्गीय हितों के लिए आसानी से संगठित हो सकते हैं. इसलिए उनकी वर्गचेतना ही चीन में साम्यवादी क्रांति का सूत्रधार बनेगी. माओ किसान का बेटा था. साम्यवादी पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने से पहले वह छह महीने तक एक क्रांतिकारी संगठन में काम कर चुका था. उसके बाद मार्क्सवाद के अध्ययन के लिए वह उससे अलग हो गया. बीजिंग में अध्ययन के दौरान उसकी भेंट ली दझाओ और चेन दुजियु से हुई. तीनों क्रांति के समर्थक थे तथा लक्ष्यप्राप्ति के लिए हिंसा का सहारा लेने से भी उन्हें परहेज नहीं था.

साम्यवादी क्रांति के लिए संघर्ष करते हुए माओ इस नतीजे पर पहुंचा कि क्रांति की सफलता के लिए शहरी मजदूरों के बजाय किसानों पर अधिक विश्वास करना चाहिए. इस विचार के लिए माओ को अनेक नेताओं और बुद्धिजीवियों की आलोचना का पात्र बनना पड़ा. परंतु आलोचनाओं से हतोत्साहित हुए बिना माओ किसानों को साथ लेकर माक्र्सवादी क्रांति की सफलता के लिए संघर्ष करता रहा. चीन के गांवों में विद्रोही किसानों को एकजुट करते हुए उसने चीनी सोवियत रिपब्लिक की नींव रखी. उसकी लालसेना ने चियांग केई शेक के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी सेना पर हमले आरंभ कर दिए. राष्ट्रवादी सेना की ताकत बड़ी थी. उसको जापान जैसे पड़ोसी देशों का समर्थन भी प्राप्त था. माओ ने छापामार युद्ध की शैली को अपनाया, जिसमें लालसेना को भारी सफलता मिली. बढ़ी हुई ताकत से वह जापानी मदद से लैस राष्ट्रवादी सेना को पराजित करने में सफल रहा. इस जीत ने उसको चीनी मजदूरों और किसानों का निर्विवाद नेता बना दिया. 1931 में उसे चीन की साम्यवादी पार्टी का नेता चुन लिया गया, इस पद पर वह अगले 45 वर्षांे तक बना रहा. अपने उग्र भाषणों से माओ ने चीनी जनता का दिल जीतने में सफलता प्राप्त की. धीरेधीरे उसकी ताकत बढ़ती गई. एक दिन ऐसा आया जब उसकी ख्याति चीन की सरहदों को पार कर सोवियत संघ पर छाने लगी. सोवियत संघ ने उसके आगे मदद का प्रस्ताव रखा. उस पेशकश को ठुकराते हुए वह अपने ही दम पर मुक्तिसंघर्ष को आगे बढ़ाता रहा.

अंततः 1949 में लंबे गृहयुद्ध के बाद माओ के नेतृत्व में चीन में साम्यवादी सेना को जीत हासिल हुई. उस समय रूस की ओर से नई सरकार को समर्थन के साथसाथ सहयोग की पेशकश गई. परिणाम की चिंता किए बिना ही माओ ने सोवियत संघ पर आरोप लगाया कि वहां साम्यवादियों के बीच कुछ ‘बुर्जुआ’ घुसपैठ कर चुके हैं. इस आलोचना से नाराज होकर सोवियत संघ ने 1960 में चीन को दी जाने वाली तकनीकी मदद से हाथ खींच लिया. उससे घबराए बिना माओ अपने दम पर चीन को समृद्धि की ओर आगे बढ़ाता रहा. उसकी दृढ़ आस्था थी कि तीसरे देशों में जहां औद्योगिक क्रांति अभी तक सफल नहीं हो पाई है, वहां कृषक संघों की मदद से सर्वहारा क्रांति को सफल बनाया जा सकता है. माओ की सफलता से मार्क्सवाद और लेनिनवाद की कमजोरियों को उजाकर किया था. यहां बताना प्रासंगिक होगा कि लेनिन के नेतृत्व में सोवियत संघ की सरकार द्वारा पूंजीवाद के विरुद्ध संघर्ष का नारा देते हुए जनाधिकारों की व्यापक उपेक्षा की गई थी. इसकी भरपाई के लिए माओ ने चीन के अतीत और संस्कृति का सहारा लिया. परिणामस्वरूप वह चीनी समाज को एकता के सूत्र में बांधे रखने में सफल हुआ. उसके विचारों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माओवाद के नाम से जाना जाता है, जो साम्यवाद की ही सहोदर विचारधारा है.

 

ओमप्रकाश कश्यप