सर्जिकल स्ट्राइक : आतंकवाद उन्मूलन के नाम पर राजनीतिक दाव

युद्ध जो आ रहा है

पहला युद्ध नहीं है!

इससे पहले भी युद्ध हुए थे!

पिछला युद्ध जब ख़त्म हुआ

तब कुछ विजेता बने और कुछ विजित 

विजितों के बीच आम आदमी भूखों मरा

विजेताओं के बीच भी मरा वह भूखा ही!

यह कविता महान जर्मन कवि ब्रेष्ट ने 1936-38 के दौर में लिखी थी. उस समय तक दूसरे अतिविनाशकारी विश्वयुद्ध की भूमिका तैयार हो चुकी थी. जर्मन, इटली, जापान आदि देशों में राष्ट्रवादी भावनाएं उफान पर थीं. युद्ध हुआ. परिणाम भयावह थे. ऐसे, जिनकी किसी ने कभी कल्पना तक न की थी. दोनों महायुद्धों में 9 करोड़ लोगों की मौत हुई थी. उससे कई गुना घायल. महामारी और विस्थापन के शिकार हुए थे सो अलग. युद्ध से जितने घर-संपत्ति, खेत, व्यवसाय नष्ट हुए, जमीनें बंजर हुईं-उनका आकलन असंभव है. यही कारण है कि आरंभ में युद्धोन्माद में डूबे, हुंकार रहे देश, युद्ध समाप्त होते ही शांति राग अलापने लगे थे. भीषण तबाही ने दुनिया को कुछ वर्षों के लिए ही सही, एक-साथ रहना सिखा दिया था.

भारत इन दिनों ऐसे ही दौर से गुजर रहा है. उन दिनों जर्मनी, जापान और इटली में तानाशाही सरकारें थीं. साम्राज्यवादी लालसाएं हुंकार रही थीं. भारत में जनता द्वारा चुनी गई सरकार है. कहा जा सकता है कि हालात अलग-अलग है. पर क्या सचमुच ऐसा ही है! कुछ है जो वर्तमान सरकार को उन युद्धलोलुप निरंकुश तानाशाहों से जोड़ता है. जो लोग इन दिनों सरकार चला रहे हैं, उनका लोकतंत्र में विश्वास ही नहीं है. संविधान उनकी आंखों में चुभता है. वे नहीं चाहते कि चुनावों में जनता स्वतंत्र होकर निर्णय ले पाए. युद्ध का उन्माद पैदा कर वे लोगों के दिलो-दिमाग की ‘कंडीशनिंग’ कर देना चाहते हैं. उनके लिए युद्ध से ज्यादा जरूरी है, युद्धोन्माद. टेलीविजन को उन्होंने इसी काम के लिए लगाया हुआ है. इसी के लिए टेलीविजन और दूसरे मीडिया संस्थानों पर अनाप-शनाप पैसा विज्ञापन तथा दूसरी तरह से लुटाया जाता है. ऐसे वातावरण में युद्ध के विरोध में लिखना या बोलना, खतरे से खाली नहीं है. युद्धोन्माद भड़काने में जुटी शक्तियां आपको कभी भी राष्ट्रद्रोही घोषित कर सकती है.

घटना की शुरुआत 26 फरवरी को भारतीय वायुसेना द्वारा पाकिस्तान के बालाकोट क्षेत्र में चल रहे आतंकी ठिकानों पर हमले से हुई. भारत की ओर से दावा किया गया कि उसके निशाने पर जैशे-ए-मोहम्मद के आतंकी ठिकाने थे. हमले द्वारा वहां चलाए जा रहे आतंकवाद के प्रषिक्षण शिविर को तबाह कर दिया. खबर आई कि भारत के 12 लड़ाकू विमान पाकिस्तान में चालीस किलोमीटर तक भीतर गए; और 19 मिनट में कार्यवाही को समाप्त कर, सुरक्षित वापस लौट आए. सरकार ने हमले का शिकार हुए आतंकवादियों की संख्या नहीं बताई थी. तेज-तर्रार टेलीविजन चैनलों ने बाकी का काम कर लेना मुश्किल नहीं था. बिना किसी प्रमाण के उन्होंने भौंकना शुरू किया कि भारतीय वायुसेना के हमले में जैश-ए-मोहम्मद के 300 से ज्यादा आतंकवादी मारे गए हैं. उनमें मसूद अजहर का बहनोई यूसुफ अजहर भी शामिल है. पाकिस्तान का जवाब आया कि भारत के लड़ाकू विमान मुजफ्फराबाद सेक्टर में तीन से चार किलोमीटर तक घुस आए थे, लेकिन वायुसेना की त्वरित कार्यवाही के चलते उन्हें वापस लौटना पड़ा. पाकिस्तान ने भारतीय हमले में एक नागरिक के अलावा किसी और के हताहत होने या मारे जाने से इन्कार किया था. उधर जैश-ए-मोहम्मद के सूत्रों का कहना है कि यूसुफ अजहर हमले के समय वहां था ही नहीं.

भारतीय विमानों ने जहां हमला किया, उस इलाके को जाबा कहते हैं. जाबा एक बड़ा गांव है. वहां के निवासी मुख्यतः भेड़ पालने का धंधा करते हैं. वहां के ग्रामीणों के माध्यम से जो सूचनाएं मिली हैं, उनके अनुसार इलाके में पहले कभी आतंकी प्रषिक्षण केंद्र हुआ करता था, जिसे बाद में बंद करा दिया गया था. जाबा और मानशेरा पाकिस्तान की सीमा से सटा इलाका है, जो 2005 में भूकंप के कारण भीषण तबाही झेल चुका है. पाकिस्तान की ओर से बताया यह भी गया है कि भारतीय लड़ाकू विमानों ने केवल अंतरराष्ट्रीय सीमा को पार किया था, जो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से बाहर है. उसने भारतीय विमानों द्वारा ‘लाइन ऑफ कंट्रोल’ को पार करने से भी इन्कार किया है. साथ ही वहां किसी प्रकार के आतंकी प्रषिक्षण षिविर होने से इन्कार किया है. यह उनकी कूटनीतिक चाल हो सकती है. पाकिस्तान के सैन्य-प्रवक्ता ने दावा किया कि वह बदला लेगा. कैसे और कब? यह स्वयं पाकिस्तान तय करेगा.

पाकिस्तान इतनी जल्दी फैसला ले लेगा यह उमीद बहुत कम लोगों को थी. लेकिन युद्धोन्मादी दोनों तरफ हैं. इसलिए 27 फरवरी की तड़के पाकिस्तान के एफ-16 लड़ाकू विमानों ने, तीन अलग-अलग दिशाओं से जम्मू कश्मीर की ओर उड़ान भरी और भारतीय सीमा में घुस आए. वहां पहले से ही तैनात मिग-2000 विमानों से उनका सामना हुआ. हमले में पाकिस्तान का एक एफ-16 मार गिराया गया. भारत का एक मिग विमान क्षतिग्रस्त हुआ, जो भारत के अनुसार स्वयं क्षतिग्रस्त हुआ था. कश्मीर के बडगाम क्षेत्र में एक हेलीकॉप्टर भी गिरा, जिसमें वायुसेना के 6 जवान शहीद हो गए. पाकिस्तान का दावा है कि दो भारतीय पायलेट उसके कब्जे में हैं. भारत ने पाकिस्तान से जिनेवा संधि के अनुसार पायलेट को लौटाने के लिए कहा है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने बातचीत का प्रस्ताव सामने रखा है. यह कूटनीतिक युद्ध है, जिसमें अभी तक बाजी पाकिस्तान के हाथ लगी है. भारतीय पायलेट की गिरफ्तारी दिखाकर वह अपनी जीत के दावे कर सकता है. भारत सरकार के पास सिवाय बड़बोले मीडिया के कुछ नहीं है. अमेरिका, चीन, आस्ट्रेलिया, यूरोपीय संघ आदि जो उससे पहले पाकिस्तान को आतंकवाद रोकने के लिए नसीहतें दिया करते थे, अब दोनों देशों से युद्ध बंद करने की अपील कर चुके हैं. जाहिर है हालिया हमलों को लेकर भारत और पाकिस्तान के अपने-अपने दावे हैं. ऐसा अकसर होता है. खासकर उन युद्धों में जो चंद लोगों की मर्जी से, उन्हीं की स्वार्थपूर्ति के लिए लड़े जाते हैं.

युद्ध और राजनीति का बहुत पुराना संबंध है. सामान्यतः इसके दो रूप सामने आते हैं. पहला युद्ध के माध्यम से तय होने वाली राजनीति. वह राजनीति जिसके लिए युद्ध आवश्यक मान लिया जाता है. दूसरा युद्ध या उसके नाम पर होने वाली राजनीति. 1971 में बांग्लादेश के मुक्ति-संग्राम में भारत सीधे-सीधे बांग्लादेश की मुक्ति सेना की मदद कर रहा था. युद्ध हुआ तो उसमें भी भारत की भूमिका थी. उस समय भविष्य की राजनीति को तय करने के लिए युद्ध अपरिहार्य मान लिया गया था. उस युद्ध के अनुकूल परिणाम निकले. एक स्वतंत्र देश का उदय विश्व मानचित्र पर हुआ. पाकिस्तान की ताकत आधी रह गई. अमेरिका द्वारा इराक पर हमला भी इसी तरह का था. उसमें भी अमेरिका सद्दाम को हटाकर अपना कोई पिटठु वहां बिठाना चाहता था. सद्दाम के पराभव के बाद अमेरिका उसमें कामयाब हुआ. वह युद्ध भी पहली श्रेणी में आता है.

पाकिस्तान में छिपे आतंकवादियों के विरुद्ध पहली सर्जिकल स्ट्राइक  29 सितंबर 2016 को हुई थी. दूसरी हाल में 26 फरवरी 2019 को. दोनों बार जनता के बीच सरकार से ज्यादा मोर्चा मीडिया ने संभाला. इन अवसरों का उपयोग उसने देश में युद्धोन्माद भड़काकर अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए किया है. गौरतलब है कि भारत द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक हालांकि घोषित युद्ध नहीं हैं. लेकिन उनके माध्यम से मीडिया ने पाकिस्तान के विरुद्ध राजनीति का ऐसा उन्माद खड़ा किया गया है कि आतंकवाद और उसके पैदा करने वाले कारकों पर विचार बहुत पीछे छूट गया है. केवल युद्धोन्माद शेष है. सरकार सर्जिकल स्ट्राइक के माध्यम से देश का सांप्रदायिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण करना चाहती है. भाजपा नेताओं के भी ऐसे ही बयान आए हैं. वे इन घटनाओं को मोदी और भाजपा के प्रचार के नजरिये से देख रहे हैं. कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वीएस येदुरप्पा कह चुके हैं कि सर्जिकल स्ट्राइक  ने प्रधानमंत्री मोदी के पक्ष में लहर पैदा कर दी है. इससे उन्हें प्रदेश की 28 लोकसभा सीटों में से 22 सीटें जीतने में मदद मिलेगी. यह दिखाता है कि आगामी चुनावों में उतरने के लिए भाजपा को ऐसा ही सनसनीखेज मुद्दा चाहिए.

पिछले आम चुनावों में मोदी को ‘विकास पुरुष’ की तरह पेश किया गया था. विकास का नारा ‘टांय-टांय फिस्स’ हो चुका है. काठ की हांडी की जगह इस नारे का इस्तेमाल भी दुबारा संभव नहीं है. बीते पांच वर्षों में देश का विकास तो हुआ है. परंतु उसका लाभ सरकार के चहीते गिने-चुने उद्यमियों को पहुंचा है. आम आदमी की क्या स्थिति है, इसे बेरोजगारों की बढ़ती संख्या और बंद होते छोटे व्यवसायों से देखा जा सकता है. भाजपा जानती है कि ‘विकास पुरुष’ का मुद्दा इस बार चलने वाला नहीं है. मतदाताओं को भरमाने के लिए भाजपा को अपने नायक की नई छवि गढ़ना चाहती है. आगामी चुनावों में संभव है, मोदी जी को ‘लौहपुरुष’ जैसे किसी नए तमगे के साथ चुनावों में उतारा जाए. सो संभावना इस बात की है कि चुनावों तक सीमा पर तनाव की स्थिति कायम रहेगा. यदि विपक्ष इसपर कुछ बोलना चाहे तो उसे देशद्रोही बताकर जनता में सहानुभूति की कोशिश की जाए.

भाजपा और स्वयं मोदी जी को लगता है कि इससे आने वाले आम चुनावों में उनकी जीत सुनिश्चित हो जाएगी. इसलिए स्वयं प्रधानमंत्री भी चुनाव प्रचार में लगे हैं. यह युद्ध के नाम पर होने वाली राजनीति की दूसरी स्थिति है, जिसमें युद्ध हो या न हो, उसके नाम पर राजनीति जमकर की जाती है. यहां तक युद्ध की आशंकाओं के बीच भी राजनीति की संभावनाएं तलाशी हैं. प्रधानमंत्री के 26, 27 और 28 के कार्यक्रमों को ही देख लिया जाए तो बात समझ में आ जाती है. 26 फरवरी को उन्होंने राष्ट्रपति भवन में ‘गांधी शांति पुरस्कार’ वितरण समारोह में हिस्सा लिया. उसके बाद वे ‘इस्कान’ मंदिर जाकर तीन मीटर लंबी और 800 किलो की भव्य गीता का विमोचन किया. दोनों ही प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में युद्ध से जुड़े हैं. शांति युद्ध का प्रतिकार है तो गीता युद्ध को 18 अक्षौहिणी सेनाओं को होम कर देने वाले भीषण युद्ध को धर्मयुद्ध की तरह पेश कर, उसे ब्राह्मणीकरण के महाभियान का हिस्सा बना देती है. इस्कान मंदिर जाते हुए प्रधानमंत्री द्वारा दिल्ली मेट्रो में सफर, सारे मामले को देखकर लगता है कि सर्जिकल आपरेशन और उसके आसपास जुड़ी हुई घटनाएं, मोदी जी की छवि-निर्माण का हिस्सा थीं. पुनः 28 फरवरी को ‘मेरा बूथ सबसे मजबूत’ कार्यक्रम में पार्टी कार्यकताओं को अपने सीधे संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा है कि विपक्ष पाकिस्तान और आतंकवाद के मुद्दे पर राजनीति न करे. कदाचित वे कहना चाहते हैं कि पाकिस्तान, आतंकवाद और राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों पर कहना-बोलना केवल उनकी पार्टी का कॉपीराइट है. इसका लाभ चुनावों में कितना मिलता है, यह सोचने की बात है. क्योंकि इसका असर शहरों से बाहर कम ही नजर रहता है. जहां भाजपा पहले से ही मजबूत दिखाई पड़ती है. हालांकि सांप्रदायिक विभाजन जैसे कुछ मुद्दे ऐसे हैं जो ग्रामीण हलकों में भी प्रभावशाली सिद्ध हो सकते हैं.

राजनीति किसी भी रूप में हो, उसके कुछ न कुछ निहितार्थ अवश्य होते हैं. ऐसे में जब सर्जिकल स्ट्राइक  एक और दो दोनों को लेकर पाकिस्तान और भारत की ओर से अलग-अलग दावे हो रहे तो सवाल उठता है, कि उसका उद्देश्य क्या है? अगर यह कार्यवाही युद्ध में बदलती है तो उसके भारत और पाकिस्तान के लिए क्या परिणाम हो सकते हैं, इस लेख में हम इसी पर विचार करने की कोशिश करेंगे. चूंकि इसकी पहल भारत द्वारा चुनावों से ठीक पहले की गई है तो यह भी देखना होगा कि इसके बहाने सरकार और भाजपा की असल मंशा क्या है? विशेषरूप से बदलते सामाजिक परिदृश्य में देश में जब दलित और पिछड़े भाजपा के हाथों छले जाने का अनुभव कर रहे हों.

यह दावा किया जा रहा है कि भारत एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था है. बात सच हो सकती है. लेकिन इसका दूसरा पक्ष बेहद भयावह है. पिछले कुछ ही वर्षों में देश में गरीबी और अमीरी का अनुपात तेजी से बढ़ा है. पहले 2008 की भीषण आर्थिक मंदी और बाद में नोटबंदी के बाद तबाह हुए उद्योग अभी सांस नहीं ले पा रहे हैं. दूसरी ओर यह भी सच है कि इस अवधि में देश के बड़े उद्योगपतियों की पूंजी में तेजी से इजाफा हुआ है. विदेशी पूंजी को आमंत्रित करने के नाम पर रक्षा क्षेत्र में शत-प्रतिशत एफटीआई की अनुमति सरकार दे चुकी हो. भाजपा के आने के बाद दलितों और अल्पसंख्यकों पर हमलों की संख्या में वृद्धि हुई है. भाजपा के सवर्ण आरक्षण को जिस तत्परता से लागू किया है, उतनी तत्परता वह दलितों और पिछड़ों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए नहीं उठा पा रही है. जाहिर था, आने वाले चुनावों में विपक्ष इन्हीं मुद्दों को प्रमुखता से उठाता. किसानों की आत्महत्या का मुद्दा भी बड़ा था. इस मुद्दे को भी केंद्र सरकार  किसानों के खाते में 500 रुपये महीने की मामूली राशि पहुंचाकर हल्का करने की कोशिश कर चुकी है.

भाजपा सरकार की चालाकियां विपक्ष से छिपी नहीं है. भाजपा के लिए नीति-निर्माण और दिशा-निर्देश का काम संघ करता है, जिसकी जड़ें पिछले पांच वर्षों में और भी गहरी हुई हैं. संघ लघु-अवधि और दीर्घावधि दोनों लक्ष्यों पर साथ-साथ काम करता है. उनकी दीर्घावधि योजना भारत को हिंदू राष्ट्र में ढालने की है, जिसके लिए वह सुनियोजित तरीके से काम करता आ रहा है. संगठन विपक्ष के पास भी हैं. लेकिन उनके पास संघ की लघु-अवधि योजनाओं के विरोध में आवाज उठाने और समयानुसार करने की क्षमता तो है, लेकिन ऐसा कोई दीर्घायामी कार्यक्रम या वैकल्पिक विचार नहीं है, जो उसकी बहुजन-विरोधी और समाज को बांटने वाली नीतियों का पर्दाफाश करते हुए समानांतर जनांदोलन को खड़ा कर सके. इसकी बहुत कुछ जिम्मेदारी बहुजन बुद्धिजीवियों की है.

मुश्किल यह है कि अभी तक बहुजन एकता केवल जातीय शोषण से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित है. इसकी अपनी सीमाएं हैं. भारत में जातिवाद का कोढ़ ढाई-तीन हजार वर्ष पुराना है. यह सामाजिक के साथ-साथ आर्थिक शोषण का मसला भी है. इसलिए बहुजन बुद्धिजीवियों को संघ की कुटिल नीतियों का सही-सही जवाब देना है तो उसको अपनी एकता के लिए सामाजिक, सांस्कृतिक के साथ-साथ आर्थिक असमानता तथा उसके आधार पर होने वाले शोषण को भी अपने कार्यक्रम का हिस्सा बनाना पड़ेगा. पूंजीवाद की चकाचौंध के बीच समाजवाद को यद्दपि पुराना और अप्रासंगिक विचार मान लिया गया है, लेकिन एक रुपहले सपने की तरह वह आज भी करोड़ों लोगों की आंखों में बसता है. संघ के उग्र पूंजीवाद, सांप्रदायिकता, राष्ट्रवाद के नाम पर फासिज्म थोपने की साजिश से बचाव का एक रास्ता ऐसे ही किसी समानता-आधारित, समरस समाज के सपने को संकल्प में बदले की चाहत ओर इच्छा शक्ति से दिया जा सकता है. इसके लिए बहुजन समाज को न केवल बाहर बल्कि भीतर से भी बदलना होगा.

फिलहाल, आतंकवादी ठिकानों के बहाने पूरे विपक्ष को एक साथ साधने के लिए मोदीजी अपनी चाल तो चल ही चुके हैं. यह मोदी और भाजपा का ऐसा राजनीतिक दाव है जो आगे चलकर आत्मघाती भी हो सकता है.

ओमप्रकाश कश्यप

त्रिवेणी संघ : संगठन की ताकत का पहला एहसास

अपनी स्वतंत्रता को किसी व्यक्ति के, चाहे वह कितना महान क्यों न हो, चरणों में रखने से बचना, या उस पर भरोसा करते हुए उसे ऐसी शक्तियां देना कि वह लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए ही खतरा बन जाए, इस स्थिति से बचना. एक महान शख्सियत के प्रति कृतज्ञ होने में कोई बुराई नहीं है. परंतु कृतज्ञता की भी सीमाएं होती हैं. जैसा कि आयरिश देशभक्त पैट्रिक डैनियल ओ’कोनेल ने कहा है कि सम्मान, प्रतिष्ठा और स्वतंत्रता की कीमत पर कृतज्ञ नहीं हुआ जा सकता. जान स्टूअर्ट मिल.

हम एक राष्ट्र हैं’ ऐसा मानकर हम एक बड़े भ्रम को बढ़ावा दे रहे हैं. हजारों जातियों में बंटे लोग भला एक राष्ट्र कैसे हो सकते हैं? जितनी जल्दी यह बात हम समझ लें कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अभी हम एक राष्ट्र नहीं हैं, उतना ही हमारे लिए बेहतर होगा. तभी हम राष्ट्र बनने कि जरूरत को बेहतर समझ पाएंगे तथा इस उद्देश्य को हासिल करने के तरीकों और साधनों के बारे में ढंग से सोच पाएंगे. इस उद्देश्य की प्राप्ति कठिन है…. जातियाँ राष्ट्रविरोधी हैं. पहला कारण तो ये कि वे सामाजिक जीवन में अलगाव को बढ़ावा देती हैं. दूसरे वे एक जाति और दूसरी जाति के बीच ईर्ष्या और असहिष्णुता को बढाती हैं. अगर हम सच में राष्ट्र बनना चाहते हैं तो हमें इन सब मुश्किलों से पर पाना होगा. क्योंकि बंधुत्व यथार्थ तभी हो सकता है जब राष्ट्र मौजूद हो. और बगैर बंधुत्व के समानता और स्वाधीनता महज दिखावा होंगी.डा.भीमराव आंबेडकर.

बुद्धिजीवियों और लेखकों ने गत शताब्दी के दो बड़े आंदोलनों की भारी उपेक्षा की है. यदि उन्हें समर्थन मिलता तो बात दूसरी होती. कदाचित वे समस्याएं न देखनी पड़तीं, जिनसे हम आज गुजर रहे हैं. उनमें पहले का नाम है—‘त्रिवेणी संघ’. दूसरा ‘अर्जक संघ’. दोनों ही संगठन सामाजिक न्याय की भावना से अनुप्रेत थे. ‘त्रिवेणी संघ’ का गठन शाहाबाद, बिहार तथा ‘अर्जक संघ’ का गठन इलाहाबाद, उत्तरप्रदेश में हुआ था. दोनों का उद्देश्य था, दबी-पिछड़ी जातियों में आत्मसम्मान का भाव जाग्रत करना. उन्हें तथाकथित उच्च जाति के भू-सामंतों, जमींदारों, धर्म के नाम पर ठगी करने वाले पंडा-पुरोहितों से बचाना. ‘त्रिवेणी संघ’ पिछड़ी जातियों को राजनीतिक स्तर पर गोलबंद कर कांग्रेस के वर्चस्व को तोड़ना चाहता था, जो उन दिनों मुख्यतः सर्वर्णों का संगठन था. ‘अर्जक संघ’ का उद्देश्य तंत्र-मंत्र, जादू-टोने, पूजा-पाखंड में धंसे समाज में मानवतावादी, राष्ट्रीयतावादी एवं वैज्ञानिक सोच का विकास करना था.

‘त्रिवेणी संघ’ का विचार सबसे पहले सरदार जगदेव सिंह के मन में उपजा था. उसे आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने कई नेताओं से बात की. उस समय तक बिहार में सामाजिक न्याय की मांग उठने लगी थी. लेकिन बराबरी और समानता की बात करना भू-सामंतों और पुरोहितों की निगाह में पाप था. पिछड़ी जातियां मान चुकी थीं कि सवर्ण वर्चस्व के विरुद्ध लड़ाई केवल संगठन के बल पर लड़ी जा सकती है. यदुनंदनप्रसाद मेहता और शिवपूजन सिंह ‘जनेऊ आंदोलन’ सहित अनेक समतावादी आंदोलनों में शिरकत कर चुके थे. उनका लोगों पर प्रभाव था. इसलिए सरदार जगदेव सिंह द्वारा संगठन के प्रस्ताव पर दोनों ने अपनी तत्क्षण सहमति दे दी. गंगा, यमुना, सरस्वती की त्रिवेणी के आधार पर उसे नाम दिया गया—‘त्रिवेणी संघ.’ उसके लिए आदर्श वाक्य चुना गया—‘संघे शक्ति कलयुगे.’ इस तरह 30 मई 1933 को बिहार के शाहाबाद जिले की तीन प्रमुख पिछड़ी जातियों यादव, कोयरी और कुर्मी के नेताओं क्रमशः सरदार जगदेव सिंह, यदुनंदन प्रसाद मेहता और शिवपूजन सिंह ने ‘त्रिवेणी संघ’ की नींव रखी. कुछ इतिहासकार उसका गठन 1920 से मानते हैं.

आगे की लड़ाई और भी चुनौतियों से भरी थी. ‘त्रिवेणी संघ’ के गठन से पहले तीनों नेता कांग्रेस में सक्रिय थे. उस समय कांग्रेस भारत की समस्त जनता की प्रतिनिधि होने का दावा करती थी, परंतु प्रांत-भर में लगभग सभी राजनीतिक पदों पर सवर्णों का कब्जा था. पिछड़ों को राजनीति से दूर रखने के लिए उन्हें तरह-तरह से हतोत्साहित किया जाता था. उनके लिए चुनावों में हिस्सा लेना आसान भी नहीं था. पूरा समाज सामंतवाद और कुलीनतावाद की जकड़ में था. जिला बोर्ड का चुनाव वही लड़ सकता था जो न्यूनतम 64 रुपये सालाना मालगुजारी का भुगतान करता हो. जबकि बिहार की कुल आबादी के मात्र 0.06 प्रतिशत लोगों की आमदनी ही कर-योग्य थी. इस तरह ब्राह्मण, बनिया, ठाकुर और कायस्थ का आर्थिक साम्राज्यवाद, राजनीतिक साम्राज्यवाद का पूरक और परिवर्धक बना हुआ था. पिछड़ी जाति के नेता कांग्रेस के पास टिकट मांगने जाते तो उनकी खिल्ली उड़ाई जाती थी.

‘त्रिवेणी संघ’ के गठन में हालांकि तीन प्रमुख पिछड़ी जातियों का हाथ था, मगर योजना सभी पिछड़ी जातियों को साथ लेकर चलने की थी. दबंग जातियों द्वारा गरीब दलित और पिछड़ी जाति की महिलाओं का यौन शोषण उन दिनों सामान्य बात थी. त्रिवेणी संघ ने बेगार और महिलाओं के यौन शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई. 1937 में विधान सभा चुनावों से पहले टिकट की कामना के साथ संघ के प्रतिनिधि कांग्रेसी नेताओं से मिले. कुछ दिनों बाद उन्होंने डा. राजेंद्र प्रसाद से भी संपर्क किया. सभी ने उन्हें टिकट का आश्वासन दिया. लेकिन हुआ वह जो पहले से तय था, कांग्रेस ने एक न सुनी और सब उम्मीदवार उच्च जातियों के रखे गए.’ (त्रिसबि) कांग्रेसी नेताओं की चालाकी का खुलासा यदुनंदनप्रसाद मेहता ने अपनी पुस्तिका ‘त्रिवेणी संघ का बिगुल’ में किया है—‘पहले ऐलान किया गया कि योग्य व्यक्तियों को लिया जाएगा. जब इन बेचारों ने योग्य व्यक्तियों को ढूंढना शुरू किया तो कहा गया कि खद्दरधारी होना चाहिए. जब खद्दरधारी सामने लाए गए तो कहा गया कि जेल यात्रा कर चुका हो. जब ऐसे भी आने लगे तो कहा गया कि वहां क्या सागभंटा बोना है….किसी को कहा जाता कि वहां क्या भैंस दुहनी हैं? तो किसी को व्यंग्य मारा जाता कि वहां क्या भेड़ें चरानी हैं?….किसी को यह कहकर फटकार दिया जाता कि वहां क्या नमकतेल तौलना है!’(त्रिसबि) निराश होकर त्रिवेणी संघ ने अपने प्रतिनिधि खड़े करने का निश्चय किया. किंतु संसाधनों और अनुभव की कमी तथा अपने ही लोगों की कांग्रेसी नेताओं के साथ मिली-भगत के उसके प्रतिनिधि चुनावों में अपेक्षित सफलता अर्जित न कर सके.

‘त्रिवेणी संघ’ के नेता परंपरागत धर्म के विरोध में नहीं थे. तथापि उसकी आचारसंहिता पर सोवियत क्रांति के प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता. संघ मानता था कि उसकी असली लड़ाई साम्राज्यवाद से है और उसका लक्ष्य है साम्यवाद—‘त्रिवेणी संघ’ चाहता है, धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक साम्राज्यवादों का अंत तथा उनके स्थान पर धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक साम्यवाद का प्रचार, औद्योगिक क्रांति जिससे सभी फलफूल सकें.’(त्रिसबि) धार्मिक साम्यवाद से उनका आशय था, धर्म के नाम पर चल रहे सर्वाधिकारवाद और आडंबरों का विरोध. संघ का विश्वास था कि—‘धर्म के ठेकेदार अपनी तोंद फुलाने के लिए धर्मअधर्म, पापपुण्य, नरकस्वर्ग तथा मोक्ष आदि के अड़ंगे लगालगा, जनता को कूपमंडूक बनाबना उसकी आंखों में धूल झोंक दिनदोपहर लूट रहे हैं.’ (त्रिसबि)

त्रिवेणी संघ की स्थापना के मूल में जातीय चेतना थी. उसके सिद्धांतकारों का मानना था जातिगत भेदभाव से मुक्ति ही सामाजिक साम्राज्यवाद से मुक्ति है. सिद्धांततः संघ के नेता जातीय समानता और समरसता के समर्थक थे, जन्म से कोई ऊंच है न नीच. लोग अपनेअपने कर्तव्य से ऊंचनीच हुआ करते हैं.’(त्रिसबि) जाति असमानताकारी व्यवस्था है. यह कुछ लोगों को अत्यधिक अधिकार संपन्न करती है, तो समाज के बड़े हिस्से के निर्णय-सामर्थ्य का हनन कर उसे प्रभुता संपन्न जातियों का दास बना देती है. इतिहास साक्षी है कि जातीय भेदभाव ने भारतीय समाज को हमेशा पीछे की ओर ढकेला है—”ऊंचनीच और छूतअछूत की भेदभावना ने बड़ेबड़े महात्माओं को भी नहीं छोड़ा है. यही कारण है कि हमारे देश में एकता नहीं हो पाती…..त्रिवेणी संघ ऐसे अन्यायों को मिटा देना चाहता है. और इस अछूत शब्द को दुनिया से विदा कर देना चाहता है.’(त्रिसबि) यह त्रिवेणी संघ का प्रभाव ही था जो कांग्रेस को पिछड़ी जातियों को लुभाने के लिए 1937 में अपने भीतर ‘बैकवर्ड कास्ट फेडरेशन’ स्थापना करनी पड़ी थी.

इसके बावजूद त्रिवेणी संघ का प्रयोग ज्यादा दिन न चल सका. 1937 के चुनावों की असफलता के पश्चात नेताओं का उत्साह मद्धिम पड़ने लगा. उसके कई कारण था. पहला यह कि संघ के कुछ नेताओं के कांग्रेसी नेताओं से गहरे संबंध थे. कांग्रेस ने ‘पिछड़ा जाति संघ’ का गठन किया तो उसके कई कद्दावर नेता उसकी शरण में चले गए. दूसरी और महत्त्वपूर्ण बात यह कि साम्राज्यवाद से लड़ाई के लिए संघ के नेता लोकतंत्र को हथियार बनाना चाहते थे. परंतु लोकतंत्र की मूल भावना से तालमेल बनाए रखने का उन्हें अभ्यास न था. लंबे समय तक सामंतवादी संस्कारों तथा जातिवादी परिवेश में जीने के कारण उनका स्वभाव उसी के अनुकूल ढल चुका था. आपसी संवाद द्वारा विरोधों का समाहार करने, असहमतियों के बीच से सामान्य सहमति की राह निकालने की कला से वे अनभिज्ञ थे. एक उदाहरण इसे समझने के लिए पर्याप्त है. चुनावों में त्रिवेणी संघ के उम्मीदवारों की भारी संख्या में पराजय के बाद एक पत्रकार प्रतिक्रिया जानने के लिए उसके यादव नेता से मिला. वह चारपाई पर बैठा हुक्का गुड़गुड़ा रहा था. लाठी बराबर में रखी थी. उस समय बजाय हार के कारणों की समीक्षा करने के नेता ने लाठी पर नजर टिकाते हुए कहा था—‘चुनाव हार गए तो क्या हुआ. हमारी लाठी तो हमारे पास है.’

त्रिवेणी संघ के पराभव का चौथा और महत्त्वपूर्ण कारण यह था कि संघ के गठन से पहले यादव, कुर्मी और कोयरी जातियों के अपने-अपने महासंघ थे. सब अपनी-अपनी ऐंठ में रहते थे. यादव कृष्ण का वंशज होने का दावा करते थे तो कुर्मियों का मानना था कि वे राम के वंशज क्षत्रिय हैं. जातीय क्षत्रपों का निजी अहंकार अंततः ‘त्रिवेणी संघ’ को भारी पड़ा. उसकी एकता बिखरने लगी. हालांकि ‘अखिल भारतीय कुर्मी क्षत्रिय सभा’ के तीसवें सत्र में कुछ नेताओं ने सभा से ‘क्षत्रिय’ शब्द हटाकर कोयरियों के साथ जातीय गठबंधन को मजबूत करने की बात उठाई थी. मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी. संघ अपनी चमक खो चुका था. आज की बहुजन राजनीति त्रिवेणी संघ के उस बिखराब से सबक ले सकती है.

ओमप्रकाश कश्यप

(त्रिसबि: त्रिवेणी संघ का बिगुल, स्रोत—भारत में सामाजिक परिवर्तन के कुछ आयाम, लेखक प्रसन्न कुमार चैधरी/श्रीकांत)

 

स्वतंत्र देश में स्वाधीन मनस्

विशेष रुप से प्रदर्शित

  • सच्ची स्वाधीनता का अभिप्राय है, दूसरों की समान स्वाधीनता का सम्मान करते हुए कार्य करने की संपूर्ण आजादी. मेरा मतलब कानून सम्मत अधिकारों से नहीं है. क्योंकि कभीकभी कानून भी तानाशाह की मनमर्जी का शिकार हो जाता है. उस समय वह दूसरों की स्वाधीनता का हनन करने लगता है.—थॉमस जेफरसन.

  • क्या स्वतंत्रता सिवाय इसके कि जैसा जीवन हम अपने लिए चाहते हैं, वैसा ही जीवन जीने की क्षमता के अलावा कुछ और है? कुछ भी नहीं.1एपिक्टीटस, दि डिस्कोर्स.

शुरुआत एक पहेली से करते हैं. देश स्वतंत्र है. लोग स्वतंत्र हैं. पर क्या वे स्वाधीन भी हैं? सामान्यतः हम ‘स्वतंत्रता’ और ‘स्वाधीनता’ दोनों को एक माने रहते हैं. मान लेते हैं कि इनके बीच महज शब्दों का ऐरफेर है. दोनों में से किसी भी शब्द का प्रयोग करो, मंतव्य वही रहता है. अर्थात यदि हम स्वतंत्र हैं, तो स्वाधीन भी हैं. या स्वाधीन हैं, इसलिए स्वतंत्र भी है. ‘स्वतंत्रता’ एवं ‘स्वाधीनता’ के अर्थों में घालमेल का एक कारण यह भी है कि स्वतंत्र भारत में हमने लोकतंत्र को तो अपनाया, मगर शताब्दियों तक सामंती संस्कारों में पलेढले समाज के लोकतांत्रिकरण हेतु अपेक्षित प्रयासों की ओर से मुंह मोड़े रहे. स्वतंत्रता आंदोलन के हमारे कई महानायक तो, जो कदाचित सबसे भरोसेमंद दिखाई पड़ते थे—समानता और स्वाधीनता के अधिकार तथा लोकतंत्र की आलोचना ही करते रहे. गांधी के सर्वाधिक प्रिय शिष्य विनोबा को समान मताधिकार का विचार ही विचित्र लगता था. उन्हें यह स्वीकार नहीं था कि नेहरू और उनके खानसामा दोनों का वोट एक हो. ‘गणतंत्र’ को एक स्थान पर उन्होंने ‘अवगुणतंत्र’ कहा है(गणतंत्र नहीं गुणतंत्र, लोकनीति). कथित इसलिए कि उनमें से कई गांधी के कहने पर ‘हरिजनोद्धार’ के कार्यक्रमों में हिस्सा ले चुके थे, परंतु जिस मनुस्मृति को दलित अपने गले की फांस मानते आए थे—ऋषि के राज के बहाने वे उसी का महिमामंडन करते थे(ऋषि अनुशासन, विनोबा, लोकनीति). लोकतंत्र के प्रति चलताऊ निष्ठा का नुकसान यह हुआ कि हम राज्य और नागरिक के अंतःसंबंधों को पहचानने तथा उनकी मजबूती के लिए उपयुक्त तंत्र खड़ा करने में असफल रहे. हमने लोकतंत्र को आधेअधूरे बोध के साथ, केवल इतने बोध के साथ अपनाया कि उसके माध्यम से हमारा संविधान हमें सरकार चुनने का अधिकार देता है. संविधान हमें अपनी स्वाधीनता को परिपक्व बनाने, उसके दायरे को विस्तृत करते जॉने तथा स्वतंत्रता का सहीसार्थक उपयोग करने के जो अवसर हमें देता है, उस ओर से हम प्रायः अनभिज्ञ बने रहे. भूल गए कि अच्छी नागरिक सरकार अपनी स्वतंत्रता की व्याप्ति नागरिकों में देखती है. चूंकि हम स्वयं अपनी स्वाधीनता की ओर से उदासीन रहे, इसलिए सरकार और अन्य संस्थाएं कब अपनी स्वतंत्रता का दायरा लांघकर हमारी स्वाधीनता और अधिकारों को अवरुद्ध करने लगीं, हम समझ ही नहीं पाए. इस बीच शासनप्रशासन की निरंकुशता ने जबजब हमें आहत किया, उसे लोकतंत्र की स्वाभाविक दुर्बलता मानकर हम प्रायः मौन साधे रहे.

स्वतंत्रता’ के अंग्रेजी पर्याय Freedom से किसी भी प्रकार के दासत्व से संपूर्ण मुक्ति का भाव जुड़ा है. तदनुसार स्वतंत्र वह है जो बाहरी बंधनों से सर्वथा मुक्त हो. जिसके सोच पर, कर्म पर किसी भी प्रकार का बाहरी प्रतिबंध न हो. स्वतंत्रता मनुष्य को उसके मनुष्यत्व का एहसास कराती है, इसलिए लोग उससे प्यार करते हैं. आरनेल्डो पेटरसन के अनुसार—स्वतंत्रता ऐसा मूल्य है, जिसके लिए लोग खुशीखुशी जान देने को तैयार रहते हैं….यह नेताओं का चहेता नारा, मुक्त अर्थतंत्र का धर्मनिरपेक्ष अवतार तथा हमारी समस्त सांस्कृतिक गतिविधियों का आधार है.” किसी देश के संदर्भ में स्वतंत्रता बाहरी प्रतिबंधों से पूरी तरह मुक्ति तथा संपूर्ण निर्णयाधिकार की क्षमता एवं उसकी स्वयंप्रभुता को दर्शाती है. स्वतंत्रता का इतिहास राज्य की उत्पत्ति से जुड़ा है. उसकी मांग लगभग 2600 वर्ष पहले तब शुरू हुई जब यह महसूस किया गया कि विवेकशील प्राणी होने के नाते मनुष्य अपने बारे में निर्णय करने में स्वयं सक्षम है. इस योग्यता का सम्मान करना राज्य के हित में है. इस सोच में कल्याण राज्य की अवधारणा के बीज छिपे थे, हालांकि उसे भलीभांति विकसित होने में अनेक शताब्दियां गुजर गईं. इस बीच सर्वसत्तावादी निरंतर दावा करते रहे कि सभ्यता के लंबे दौर से गुजरने के बावजूद मानव स्वभाव में जंगली जीवन की प्रवृत्तियां शेष हैं. उसके समुचित मार्गदर्शन तथा समाज में शांति एवं अनुशासन बनाए रखने के लिए शक्तिशाली राज्य की उपस्थिति अपरिहार्य है. दूसरी ओर उदारचेता विद्वान लगातार मानवमात्र की स्वाधीनता पर जोर देते रहे. इससे कल्याणकारी राज्य के विचार ने जोर पकड़ा. यह विचार भी आगे बढ़ा कि स्वाधीन व्यक्ति न केवल अपना विकास बेहतर कर सकता है, बल्कि समाज को भी अपना श्रेष्ठतम प्रदान करने में सक्षम होता है. कुछ विद्वानों के अनुसार Freedom शब्द की उत्पत्ति दासों के मुक्ति संघर्ष से जुड़ी है. लगभग ढाई हजार वर्ष पहले एथेंस में सम्राट सोलोन ने नागरिकों को अधिकार दिए जाने के लिए अपेक्षाकृत उदार नियम बनाए थे. बाद की शताब्दियों में एथेंस की प्रगति में सोलोन द्वारा लागू संविधान की बड़ी भूमिका थी. तदनंतर स्वतंत्रता की अवधारणा में अनेक बदलाव हुए हैं. नई मान्यताओं के अनुसार बिना नागरिकों की स्वाधीनता के राज्य की स्वतंत्रता अपर्याप्त मानी जाती है. इसलिए मानवाधिकार, समानता, सामाजिक न्याय आदि के माध्यम से स्वतंत्रता का लाभ जनजन तक पहुंचाने के लिए जनसमर्थन और सहभागिता पर जोर दिया जाने लगा है.

स्वतंत्रता और स्वाधीनता परस्पर पूरक हैं. स्वतंत्रता तभी पूर्ण मानी जाती है, जब शिखर पर बैठे लोग उसके अच्छेखासे हिस्से को, बगैर किसी पक्षपात के नागरिकों तक अंतरित करने लगते हैं. लोकतंत्र में निर्णयाधिकार जनता के पास होते हैं. तथापि नागरिक उसका वास्तविक लाभ तभी उठा सकते हैं, जब वे अपनी स्वाधीनता का सदुपयोग करने में सक्षम हों. दूसरों के हितों पर आंच आए बिना अपने हितों के अनुरूप उपयुक्त निर्णय लेने का नागरिक अधिकार स्वाधीनता की कोटि में आता है. इसके अंग्रेजी पर्याय के रूप में Liberty का प्रयोग किया जाता है. स्वतंत्रता राज्य से संबंधित, उसपर किसी भी प्रकार के बाहरी नियंत्रण से मुक्ति का नाम है. जबकि स्वाधीनता समाज और शासन की ओर से प्रदान की जाती है, जिसमें सत्ता की आलोचना का अधिकार भी सम्मिलित है. इतिहासकार, राजनीति विज्ञानी जॉन अक्टन के लिए वह सत्ता के वाजिब विरोध का माध्यम है. स्वाधीनता की कदाचित सबसे अच्छी परिभाषा जे. आर. ल्यूकस ने अपने ग्रंथ ‘दि प्रिंसिपल आफ दि पॉलिटिक्स’ में दी है, उसके अनुसार—‘‘स्वाधीनता का तात्विक अर्थ यह है कि विवेकशील कर्ता को जो भी सर्वोत्तम प्रतीत हो, वह वही कुछ करने में समर्थ हो तथा उसके कार्यकलाप बाहर से प्रतिबंधित न हों.’’ राष्ट्र विशेष के संबंध में स्वतंत्रता से भी यही उद्दिष्ट है. कुल मिलाकर ‘स्वतंत्रता’ विशेषत: राष्ट्र का मसला है. वही स्वतंत्रता जब आंतरिक स्तर पर विस्तरित होकर नागरिकों के सोच और व्यवहार का हिस्सा बन जाती है, तो स्वाधीनता कहलाने लगती है. इस तरह स्वाधीनता नागरिकों का अधिकार, विवेक सम्मत आचरण की संपूर्ण आजादी है. वह राज्य की उदारता एवं न्याय भावना की संकेतक है. स्वतंत्रता एवं स्वाधीनता परस्पर पूरक, सहायक और अन्योन्याश्रित पद हैं. दोनों में इतना सूक्ष्म अंतर है कि समझने में प्रायः गड़बड़ हो ही जाती है.

यह मान लेना कि स्वतंत्रता केवल राष्ट्र का विषय है, सामान्य नागरिक का उससे कोई सरोकार नहीं है, अनुचित होगा. कोई भी राष्ट्र अपने नागरिकों के सपनों तथा उनकी कर्तव्यनिष्ठा से बनता है. अरस्तु के शब्दों में कहें तो अच्छी जनता ही अच्छे शासन की जनक होती है. ऐसी जनता को बाहरी नियंत्रण में लंबे समय तक नहीं रखा जा सकता. अपने अधिकारों के प्रति चैतन्य, सतत जागरूक जनता अपने लिए स्वतंत्रता का रास्ता खोज ही लेती है. स्वाधीनता, स्वतंत्रता की अगली सीढ़ी है. उसे तभी प्राप्त किया जा सकता है, जब राज्य स्वतंत्र तथा अपने नागरिकों के प्रति उदार हो. शिखर पर आसीन लोग मानते हों कि शासन चलाने का अधिकार उन्हें जनता की ओर से प्राप्त है. वास्तविक स्वाधीनता मनुष्य को, दूसरे के स्वाधीनता क्षेत्र में अतिक्रमण को छोड़ वह सब करने की आजादी देती है, जिसे वह अपने लिए आवश्यक मानता है. भले ही उससे समाज, सत्ता, विचारधारा या स्थापित रीतिरिवाजों को चुनौती मिलती हो. स्वाधीनता की सीमा शासन की प्रवृत्ति से भी तय होती है. यह कतई आवश्यक नहीं है कि दो स्वतंत्र राज्यों की जनता को समान स्वाधीनता भी उपलब्ध हो. यह भी हो सकता है कि राज्य स्वतंत्र हो, परंतु लोग पूरी तरह स्वाधीन न हों. उदाहरण के लिए हिटलर के समय जर्मनी एक स्वतंत्र और शक्तिशाली देश था. मगर वहां की जनता नागरिक अधिकारों से वंचित थी. यहां तक कि मनुष्य के मौलिक अधिकारों पर भी डाका पड़ चुका था. चीन का उदाहरण भी हम ले सकते हैं. वह स्वतंत्र देश है. लेकिन वहां के नागरिकों को उतने निर्णयाधिकार उपलब्ध नहीं हैं, जितने भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों में प्राप्त होते हैं. इस उदहारण को आगे और भी बढ़ाया जा सकता है.

निरंकुश शासक ताकत के बल पर शासन करता है. अपनी सर्वोच्चता के प्रदर्शन के लिए वह नागरिकों के सामान्य अधिकारों का भी हरण कर लेता है. ऐसे में स्वाधीनता का आकार सिकुड़ जाता है. नागरिक अधिकार की दृष्टि से ऐसी स्वतंत्रता जिसमें नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन हो, नकारात्मक स्वतंत्रता कही जाएगी. उसमें अधिकांश अधिकार केंद्रीय शक्तियों में सिमट जाते हैं. परिणामस्वरूप नागरिकों के मूलभूत अधिकारों पर भी कटौती के बादल मंडराने लगते है. सकारात्मक या वास्तविक स्वतंत्रता वहां संभव है, जहां जनता के विवेकाधिकार बाधित न हों. लोग अपने हितों के अनुसार निर्णय लेने को स्वतंत्र हों. वहां शासन की बागडोर जनता के हाथों में होती है. अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से वह ऐसी सरकार का गठन करती है, जो न्यूनतम शासन करे. इस तरह स्वस्थ नागरिक समाजों में सरकार और नागरिक अपनीअपनी मर्यादा से आबद्ध रहकर स्वाधीनता का आनंद लेते हैं. सरकार की स्वतंत्रता वहां तक मर्यादित होती है जहां तक वह नागरिकजीवन में अनावश्यक दखलंदाजी प्रतीत न हो. वहीं नागरिक के लिए स्वाधीनता की मर्यादा, दूसरों की स्वाधीनता को अक्षुण्ण रखने तक सीमित रहती है. नागरिकगण केवल दूसरे नागरिकों की स्वाधीनता का सम्मान करके अपनी स्वाधीनता की रक्षा कर सकते हैं. दूसरे की स्वाधीनता में हस्तक्षेप करने वाला व्यक्ति अपनी स्वाधीनता के अधिकार को खो बैठता है. उस अवस्था में शांतिव्यवस्था बनाए रखने के लिए शासन को उसकी स्वाधीनता की परिसीमा में हस्तक्षेप का अधिकार मिल जाता है. कह सकते हैं कि स्वतंत्रता और स्वाधीनता परस्पर पूरक और सहायक हैं. नागरिकों की स्वाधीनता का स्तर बढ़ाने के लिए चुनी हुई सरकारें जहां न्यूनतम शासन करती हैं. वहीं एकदूसरे की स्वाधीनता का सम्मान करते हुए नागरिक सरकार और शासन को यह भरोसा दिलाते रहते हैं कि वे अपने कर्तव्य के प्रति सचेत हैं. फलस्वरूप राज्य की स्वतंत्रता नागरिकों की स्वाधीनता से अनुप्रेत होने लगती है; या यूं कहें कि स्वतंत्रता और स्वाधीनता का अंतर लुप्त होने लगता है.

स्वाधीनता और मानवाधिकार परस्पर पूरक हैं. उन्हें बिना किसी भेदभाव के नागरिकों को उपलब्ध कराने का संकल्प राज्य की उदारता को दर्शाता है. कल्याण राज्य में हर अवधारणा के केंद्र में नागरिक होता है. इसलिए वहां स्वाधीनता भी नागरिक दृष्टि से परखी जानी चाहिए, जैसे—लोग यदि स्वाधीन हैं तो कितने? परिपक्व लोकतंत्र के लिए जितनी स्वाधीनता चाहिए, क्या उतनी स्वाधीनता नागरिकों को प्राप्त है? स्वाधीनता को समझना, उसे पाने जितना ही महत्त्वपूर्ण होता है. स्वाधीनता को समझा कैसे जाए? इसपर बड़ी अच्छी बात एपिक्टीटस(55 ईस्वी—135ईस्वी) ने कही है. वह एक दास था. उसका धनवान मालिक एप्फ्रिोडिटो भी किसी जमाने में दास हुआ करता था. बाद में उसने अपने दासत्व से मुक्ति प्राप्त की और बादशाह नीरो का मंत्री बन गया. एपिक्टीटस की पढ़ने की बड़ी ललक थी. वह सुकरात और प्लेटो का प्रशंसक था; और खुद भी दार्शनिक बनना चाहता था. एपिक्टीटस की ललक देखकर उसके स्वामी ने उसे मुक्त कर दिया. बाद में उसने दास बच्चों को पढ़ाने के लिए स्कूल की स्थापना की. एपिक्टीटस का मानना था कि दासत्व का कारण संसाधन छीन लेना नहीं है, बल्कि लोगों को ज्ञान के अवसरों से वंचित कर देना है. उसका विश्वास था कि केवल शिक्षा ही व्यक्ति को भय, भ्रांति और उद्धिग्नता से मुक्ति दिला सकती है. अपने शिष्यों को संबोधित करते हुए उसने कहा था—

हमें उन अनेक लोगों की बात पर भरोसा नहीं करना चाहिए जो कहते हैं कि केवल मुक्त लोगों को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है. बजाय इसके हमें यह मानना चाहिए कि केवल शिक्षा ही हमें मुक्ति दिला सकती है.’2

स्वतंत्रता की भांति स्वाधीनता भी निःशर्त नहीं होती. प्रकटतः वह बंधनमुक्ति का पक्ष लेती है, परंतु व्यक्ति को कुछ भी करने की आजादी नहीं देती. स्वाधीनता का संपूर्ण आनंद बिना नैतिक बने असंभव है. जो नैतिक है, आत्मानुशासित है, समाज और राज्य के विधान के प्रति जिसकी निष्ठा विवेकसम्मत है, जो दूसरे के मूलभूत अधिकारों का सम्मान करता है, वही व्यक्ति स्वाधीनता का सच्चा लाभ उठा सकता है. सरकार नागरिकों की संरक्षक होती है. अतः जब तक वह अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदार है, उसकी स्वतंत्रता और अधिकारिता का सम्मान करना नागरिकों का कर्तव्य है. कहा यूं भी जा सकता है कि अच्छी सरकार और नागरिक स्वाधीनता को एकदूसरे से अलग नहीं किया जा सकता. क्योंकि जो लक्ष्य अच्छी सरकार का होता है, वही लक्ष्य स्वाधीनता का भी होता है. जैसे अच्छी सरकार स्वयं एक उपलब्धि है, वैसे ही स्वाधीनता अपने आप में परम लक्ष्य है. वह समाजीकरण की उच्चतम अवस्था है, जिसमें व्यक्ति के निजत्व को भी उतना ही सम्मान प्राप्त होता है, जितना समाज को. वह नागरिकों को उनकी पसंदों के साथ बने रहने का अधिकार ही नहीं देती. बल्कि वे सभी अवसर प्रदान करती है, जिनसे वे उस सभी कार्यों को कर सकें जिन्हें अपने लिए आवश्यक मानते हैं. वह मनुष्य को अपने, समाज और देश; फिर दुनिया के हित में अपना अधिकतम योगदान देने के लिए आवश्यक अवसर उपलब्ध कराती है. स्वाधीनता को दैविक कहकर किसी भी हालत में टाला नहीं जा सकता. ना ही उसमें कटौती की जा सकती है. वह मनुष्य का जीवनसिद्ध अधिकार है. इसलिए वह नैतिक लक्ष्य न होकर समाजीकरण की उच्चतम अवस्था है.

रूसो ने कहा था कि सभी मनुष्य आजाद जन्मते हैं. बेड़ियां समाज उन्हें पहनाता है. स्वाधीनता इस विकृति का निस्तार है. वह मनुष्य को निर्बंधता का एहसास कराती है. पराधीनता मानव समाज के लिए कलंक है. वह महज राजनीतिकसामाजिक अवस्था है, जो व्यक्ति और समाज के बीच किसी न किसी प्रकार की सत्ता को ले आती है. स्वाधीनता प्राकृतिक जीवन के निकट होती है. इसलिए वह मनुष्य को अधिकतम आज़ादी का एहसास करने में सक्षम होती है. वह मनुष्यों को परस्पर निकट लाकर, मनुष्यता में विश्वास करना सिखाती है. बताती है कि सभी मनुष्य श्रेष्ठ हैं. अपने सर्वोत्तम की अभिव्यक्ति, उसको अपने तथा शेष समाज के लाभ के लिए प्रयुक्त करने का अधिकार प्रत्येक को है. अधिकांश लोग अपनी ऊर्जा दूसरों को अनुशासित करने में खपाते रहते हैं. जबकि वह दुष्कर कार्य है. स्वाधीन समाज में सच्चा नागरिक धर्म स्वयं को अनुशासित रखना है. खुद पर अनुशासन दूसरों को अनुशासित करने से आसान होता है. शासन का कार्य नागरिकों को अनुशासित करना नहीं, ऐसे वातावरण का निर्माण करना है, जिसमें नागरिकगण आत्मानुशासन हेतु स्वत: अनुप्रेत हों. उसके लिए सार्वजनिक जीवन में राज्य की न्यूनतम भूमिका अपरिहार्य है. किसी ने कहा है कि कोई भी प्रजाति, समूह या मनुष्य अनुशासन की दृष्टि से अयोग्य नहीं होता. जबकि शासन करने के लिए सभी अनफिट होते हैं. अक्टन के शब्दों में—

‘‘बीजगणित की कोई भी प्रमेय इससे ज्यादा स्वयंसिद्ध नहीं है कि जिन लोगों के हाथों में जितनी ताकत होती है, वे उतने ही अधिक अपराध करते हैं.’’ उसके अनुसार—‘‘शक्ति का अतिरेक आदमी को पत्थर दिल बनाता है, विवेक का हरण करता है और विचारधारा को कलुषित करता है.’’3

स्वाधीनता का इतिहास स्वंतंत्रता के इतिहास से बहुत पुराना है. स्वतंत्रता का इतिहास सामान्यतः राज्यों की स्थापना के बाद आरंभ होता है. जब राज्य नहीं था, तब भी मनुष्य स्वाधीन था. लेकिन तब उसके चर्या में स्थायित्व नहीं था. यायावर जीवन में हर दिन नई चुनौती से जूझना पड़ता था. जिसके लिए वह हर रोज नई योजना बनाता था. दूसरी ओर स्वाधीनता का इतिहास मनुष्य की विकास की चाहत से जुड़ा है. अपनी पुस्तक ‘ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ लिबर्टी’ में डेविड शेमिड्ज और जेसन ब्रेनन स्वाधीनता के इतिहास को 40000 वर्ष पहले तक ले जाते हैं. उस समय मनुष्य को हिम युग से बाहर आए कुछ ही समय हुआ था. जीवन संघर्षभरा था. उसे न केवल विषम प्राकृतिक हालातों से चुनौती थी, बल्कि अपने भीतर पैठे भय और दूसरे मानवसमूहों से भी जूझना पड़ता था. उसके पीछे कहीं न कहीं स्वयं को स्वाधीन बनाने की चाहत थी. लेखकद्वय के अनुसार स्वाधीनता प्रत्येक युग में द्वंद्वात्मकता का शिकार रही है. जनतांत्रिक समझ के अभाव में लोगों के लिए उसके मायने भी अलगअलग रहे हैं. ताकतवर ज्यादा आजादी इसलिए चाहता है, ताकि वह और ताकत जुटा सके. इसके लिए वह अपनी शक्ति और संसाधनों का दुरुपयोग करता है. गरीब सोचता है कि आजाद होने पर वह अपने श्रम का उपयोग अपने लिए कर, दरिद्रता से मुक्ति पा सकेगा. मगर उसकी सीमाएं हैं. न्यूनतम स्वाधीनता प्राप्त करने के लिए उसके पास सिवाय देह के कुछ नहीं होता. उसका उपयोग वह जीविकोपार्जन से इतर कर ही नहीं पाता. अपनी स्वाधीनता के लिए उसे शक्तिशाली वर्गों तथा सरकार पर आश्रित रहना पड़ता है. सरकार का दायित्व है कि न्याय भावना का पालन करे हुए नागरिक स्वाधीनता के उच्चतम स्तर को बनाए रखे. सामाजिक शांति और समरसता के लिए यह आवश्यक है. मनुष्य सामाजिक प्राणी है. मगर समाज के साथ वह आत्मनिर्भर होकर रहना चाहता है. दूसरों पर बोझ बनकर नहीं. प्रत्येक युग में कभी समूह की मदद से तो कभी अकेले ही, आत्मनिर्भर बनने की चाहत मनुष्य के लिए देरसवेर मुक्तिप्रदाता बनी है. आत्मनिर्भरता का आशय यह नहीं है कि मनुष्य अपनी जरूरत की हर वस्तु का उत्पादन स्वयं करे. जरूरतों का आदानप्रदान भी आत्मनिर्भरता के स्तर को दर्शाता है. प्रस्तरकालीन मानव प्रजातियां अपनी पूर्वज प्रजातियों के मुकाबले इसलिए जीवित रह सकीं, क्योंकि उन्होंने दूसरे मानवसमूहों से तालमेल तथा वस्तुओं के आदानप्रदान की योग्यता प्राप्त कर ली थी. एकदूसरे की जरूरतों का सम्मान करते हुए उन्होंने प्रकृति के अनेक झंझावात पार किए थे. इससे जीवन में स्वाधीनता की उपयोगिता को समझा जा सकता है.

स्वतंत्रता आमतौर पर राजनीतिक और विधिमान्य होती है. वह जब नागरिकों के व्यवहार में रचबस जाती है और राष्ट्र मान लेता है कि उसके नागरिक स्वतंत्रता को आत्मसात् कर चुके हैं, तो वह अपने विशेषाधिकारों में धीरेधीरे कटौती करने लगता है. नागरिक उसका उपयोग दूसरों की स्वाधीनता का सम्मान करते हुए करते हैं. इस तरह स्वाधीनता केवल स्वतंत्र राष्ट्र में संभव होती है. उस समय संभव होती है जब राज्य नागरिकों के जीवन में अपनी भूमिका को सीमित कर लेता है. जब यही भाव नागरिकों के मन में समा जाता है तो वे दूसरों के निणर्याधिकार का सम्मान करते हुए खुद को सामाजिक की मर्यादा में बांध लेते हैं. इससे समाज को अनुशासित करने में लगने वाली ऊर्जा बचने लगती है. यानी स्वाधीनता का अभिप्राय दूसरों की इच्छा और अधिकारों का मान रखते हुए अपने विकास का मार्ग सुनिश्चित करने में है. जबकि स्वतंत्रता का अभिप्राय राज्य द्वारा बिना किसी प्रतिबंध के निर्णय लेने के अधिकार से है.

स्वाधीनता और स्वतंत्रता के अलावा एक प्यारासा शब्द और भी है—स्वच्छंदता! मुक्त नीलांचल में पक्षियों को उड़ान भरते या जंगल में हिरनों को कुलांचे मारते देख कई बार हम उनसे इर्ष्या करने लगते हैं. काश! हम भी वैसी ही स्वछंद उड़ान भर पाते. न आज की चिंता न आने वाले कल का भय—जंगल के मुक्त प्राणियों जैसा निर्बंध जीवन, काश! हमारा भी होता. यथार्थ में यह संभव नहीं है. पूर्ण स्वच्छंदता केवल कल्पना की वस्तु है. समाज का गठन ही कुछ मर्यादाओं के साथ होता है. जबकि स्वच्छंदता मर्यादाविहीन होती है. इसलिए जहां सभ्यता है, वहां स्वच्छंदता ज्यादा देर नहीं टिक सकती. दूसरे स्वच्छंदता प्रायः अल्पजीवी होती है. उसका जीवन लंबा नहीं होता. क्योंकि प्रत्येक की स्वच्छंदता, प्रकारांतर में प्रत्येक की निरंकुशता को न्योंता देती है. हरिण को लगता है कि उसे जंगल में मुक्त कुलांच भरने की स्वच्छंदता है, तो भेड़िया कहेगा कि मेरी स्वच्छंदता किसी का भी भक्षण कर, अपनी भूख मिटाने की है. यदि चिड़िया आसमान में मुक्त उड़ान को अपनी स्वच्छंदता मानती है, तो बाज अपनी स्वच्छंदता के नाम पर कहीं भी, किसी भी निरीह पक्षी पर झपट्टा मारने को अपनी स्वच्छंदता मानेगा. दोनों अपनेअपने सामर्थ्य और इच्छाशक्ति से अनुशासित हैं. इसके अलावा कोई नियम उनके बीच काम नहीं करता. जैसे ही सामर्थ्य की टकराहट होती है, भेड़िया के सामने मेमना और बाज के आगे चिड़िया को पस्त होना ही पड़ता है. इस अत्याचार के लिए न तो भेड़िया को दोषी माना जा सकता है, न ही बाज को. स्वच्छंद वातावरण में नियम जरूरतों और महत्त्वाकांक्षाओं से बनते हैं. सामर्थ्य के दुरुपयोग को रोकने का वहां कोई नियम नहीं होता. ऐसी स्वच्छंदता सभ्य समाज के लिए वरेण्य नहीं है. स्वाधीनता जहां बहुमान्य नियमों से अनुशासित होती है, वहीं स्वच्छंदता में सभी अपनेअपने नियम के अनुसार जीते हैं. स्वच्छंद समाज में यदि कोई नियम होता है तो यही कि वहां कोई नियम नहीं होता. सभ्य समाज नागरिकों की सहमति से स्वच्छंदता के अतिरिक्त हिस्से पर कैंची चलाकर उसे स्वाधीनता तक सीमित कर देता है. तय कर देता है कि उनमें से हरेक की स्वाधीनता, दूसरे की स्वाधीनता की हद पर समाप्त होगी.

स्वाधीनता चूंकि नागरिक का विषय है, अतएव उसका आनंद उठाने के लिए नागरिकों को स्वयं पहल करनी पड़ती है. राज्य खुद को अधिकतम उदार उनकी मदद कर सकता है. ऐसे वातावरण का निर्माण कर सकता है, जिसमें लोग अपनी स्वाधीनता का अधिकतम लाभ उठा सकें. स्वाधीनता की एक कसौटी विकास में सभी की समान सहभागिता है. लेकिन विकास को पूरी तरह समझना आसान नहीं. वह जटिल प्रक्रिया है, जिसकी व्याप्ति अनेकायामी होती है. नागरिक विशेष के संबंध में वह भ्रामक अवधारणा है. शरीर में कूबड़ भी निकल आए और वह लगातार बढ़ता जाए तब उसका भी विकास होता है, ऐसा हमारे डाक्टर और समाजविज्ञानी दोनों मानते हैं. लेकिन जब हम किसी देश के संदर्भ में इस शब्द को लेते हैं तो उसका अर्थ सामान्यतः प्रगति के पर्याय के रूप में होता है. प्रगति सामान्यत: एकदैशिक होती है. विकास की चर्चा करते समय उसके साथ जुड़े नकारात्मक एवं अनैच्छिक पहलुओं को कुछ देर के लिए नजरंदाज कर दिया जाता है. किसी स्वतंत्र देश के लिए विकास उसकी स्वतंत्रता का विस्तार होता है. इसलिए उसे आंकने का पैमाना यह होना चाहिए कि विकास ने लोगों की स्वाधीनता की अनुभूति का गाढ़ा करने में कितनी तरक्की है. या उस देश के नागरिकों के बीच न्याय के समविभाजन में वह कितना सफल सिद्ध हुआ है. समाज में नागरिकों की रुचियों, जरूरतों और कार्यक्षमताओं में अंतर होता है. इसलिए सभी नागरिक विकास योजनाओं का समान लाभ नहीं उठा सकते. हालांकि उचित यही है कि वह सभी के लिए सामान रूप से लाभदायक हो. व्यवहार में यह संभव नहीं है. अच्छी से अच्छी योजना कुछ लोंगों के लिए हानिप्रद हो सकती है. उन हालात में सरकार से अपेक्षा की जाती है कि वह ऐसे लोगों के नुकसान की भरपाई के लिए वैकल्पिक कार्यक्रम बनाए, ताकि कल्याण के विभाजन में समानता बनी रहे. नागरिकों द्वारा अपनी और दूसरों की स्वाधीनता का सम्मान करने के लिए ऐसे विश्वास का होना आवश्यक है.

स्वाधीनता का रास्ता हमेशा सरल नहीं होता. बावजूद इसके कि कल्याण राज्य की अवधारणा मानवमात्र के लिए अधिकतम स्वाधीनता के विचार पर टिकी है, सभ्यताकरण की कोशिश में मानवीय स्वाधीनता पर निरंतर हमले होते रहे हैं. मनुष्य ने खेती करना सीखा. एक जगह टिककर खेती करतेकरते एक समय ऐसा आया जब समाज के संसाधन मुट्ठीभर आदमियों के हाथों में सिमट गए और बाकी लोक उनकी इच्छा के अनुसार कार्य करने को विवश हो गए. धीरेधीरे भूमि और अन्य संसाधनों पर कब्जा जमाकर एक वर्ग दूसरे वर्ग का मालिक बन बैठा. खुद को सर्वेसर्वा बताकर वह लोगों से मन चाहा काम लेने लगा. जनसाधारण का जीवन संघर्ष और त्रासदियों से भरा था. सो सबसे पहले धर्माचार्य मदद के लिए आगे आया. संघर्ष से थकेहारे लोगों का आवाह्न करते हुए उसने कहा—‘तुम मुझे दान दो. मैं तुम्हें संघर्ष से सदा के लिए मुक्ति दिलाऊंगा.’ लोग दान देने लगे. हालात ज्यों की त्यों रहे. परेशान लोग धर्माचार्य से मुक्ति के बारे में पूछते तो उसका एक ही जवाब होता—‘मसीहा का इंतजार करो. अपनी संतान को संकट में देखकर वह मदद के जरूर आगे आएगा.’ लोगों ने इंतजार किया. कुछ दिनों बाद लोगों की निराशा बढ़ने लगी. तब तलवार लिए एक व्यक्ति आगे आया, बोला—‘मैं तुम्हारा राजा हूं. तुम मुझे कर दो. मैं तुम्हें दुश्मनों से बचाऊंगा.’ लोगों ने उसे कर देना शुरू कर दिया. थोड़े दिन बाद सैनिक ने पुरोहित से दोस्ती कर ली. प्रजा वैसी की वैसी ही रही. फिर एक दिन एक और व्यक्ति आया, ‘मैं व्यापारी हूं. तुम मेरे लिए काम करो. मैं तुम्हें सारे कष्टों से मुक्ति दिलाऊंगा.’ हताश लोगों ने दिल और दिमाग दोनों व्यापारी के यहां गिरवी रख दिए. बाद में पुरोहित, राजा और व्यापारी एक साथ मिल गए. पुरोहित राजा और व्यापारी के भले के लिए पूजा करने लगा. राजा व्यापारी के धन की देखभाली में जुट गया. और व्यापारी उसका व्यापार दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा था. राजा उसके धन की रखवाली करता, पुरोहित उसके लिए हवा बनाने का काम करता. जनता उन तीनों की गुलाम बनकर रह गई.

कहानी से पता चलता है कि दिमाग की गुलामी देह की गुलामी से चार कदम आगे चलकर आती है. मनुष्य पहले मानसिक रूप में दास बनता है, बाद में दैहिक रूप में. ऊपर के उदाहरण में मनुष्य के समक्ष एक के बाद एक स्थितियां जन्म लेती हैं. हर बार उसके विवेक पर कोई और कब्ज़ा करता चला जाता है. सभ्यता का इतिहास साक्षी है कि लोगों ने पहले अपनी निर्णयप्रक्रिया दूसरों को समर्पित की. दूसरों के फैसलों पर पूरी तरह आश्रित होने के बाद शरीर को उससे आजाद रख पाना असंभव था. परिणाम यह हुआ कि समाज स्वामी और दास में बदल गया. एक व्यक्ति अनेक व्यक्तियों के दिलोदिमाग पर कब्जा, लोगों को अपना दास बना, उनसे काम लेने लगा. फिर उसी को व्यवस्था मान लिया गया. मुट्ठी भर लोगों द्वारा बहुसंख्यक की चेतना पर सवार हो जाने की नीति थी. आगे चलकर दास वर्ग में चेतना का प्रवाह हुआ. वह समझने लगा कि कोई मसीहा उसकी मदद को नहीं आने वाला. न कोई व्यापारी उसका कल्याण करेगा. उसे अपनी सुरक्षा, अपना कल्याण, अपनी मदद स्वयं करनी होगी. तदनंतर वह वर्ग अपनी मुक्ति के लिए एकजुट होने लगा. सतत संघर्ष से उसे सफलता भी मिली. स्वतंत्रता की मूल अवधारणा यही है. स्वतंत्रता का मूलभूत अर्थ इसी चेतना के सुफल है. उसका आशय राज्य की स्वायत्तता से है. ऐसा राज्य जो अपनी इच्छाओं के आधार पर संचालित हो. लेकिन ऐसी स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है जो केवल राज्य के स्तर पर सीमित हो. जब तक नागरिक जीवन में स्वतंत्रता की संपूर्ण व्याप्ति नहीं है, तब तक उसकी कोई उपयोगिता नहीं है.

स्वतंत्रता लोकचेतना का विस्तार है. कह सकते हैं कि स्वतंत्रता एवं स्वाधीनता दोनों सापेक्षिक अवस्थाएं हैं. संदर्भ बदलते ही उनके अर्थ भी बदल जाते हैं. हिटलर का जर्मनी तथा मुसोलिनी का इटली दोनों स्वतंत्र देश थे. उनकी किसी बाहरी शक्ति का दबाव नहीं था. परंतु उन देशों की प्रजा स्वाधीन नहीं थी. आशय है कि नागरिकों की स्वाधीनता राज्य की मर्जी पर टिकी होती है. राज्य यदि अपने नागरिकों के प्रति संवेदनशील है. उनकी भावनाओं का सम्मान करता है, तो वह उनके सतत प्रबोधीकरण पर भी जोर देता है. लेकिन राज्य यदि कट्टर हो तो नागरिकों के सामान्य अधिकार भी संकट में पड़ जाते हैं. केवल राज्य व्यक्ति की स्वाधीनता को बाधित नहीं करता. अपनीअपनी तरह से बाज़ार और धर्म भी इस काम को करते हैं. चूँकि वैधानिक अधिकार राज्य के पास होते हैं. धर्म और बाज़ार को नागरिकों की स्वाधीनता में सीधे हस्तक्षेप का अधिकार नहीं होता, इसलिए वे चतुराई से काम लेते हैं. वे तरहतरह के प्रलोभनों द्वारा लोगों का ध्यान इस तरह से भटकाने में लगे रहते हैं. जिससे वे स्वाधीनता के भ्रम और वास्तविकता स्वाधीनता में अंतर नहीं कर पाते. जैसे कुछ लोग फैशन को ही आधुनिकता माने रहते हैं, वैसे ही वे नकली स्वाधीनता को वास्तविक मान कर भ्रम में जीते चले जाते हैं. जिन लोगों का विवेक दूसरों के पास गिरबी हो उनके लिए स्वाधीन होना, न होना बेमानी हो जाता है.

स्वधीनता नागरिक का विवेकाधिकार है. कानून जनता के भले के लिए बनाए जाते हैं. उसके लिए जरूरी है कि सबका भला हो. उनसे यदि एक भी व्यक्ति को नुकसान पहुंचता है, तो वह अधूरा माना जाएगा. अत: अधिकतम लोगों को अधिकतम सुख को ध्यान में रखकर कानून बनाने के साथसाथ आवश्यक है कि जो नागरिक अधिकतम की सीमा में नहीं आ पाए हैं, उनकी भी उपेक्षा न हो. इसके अभाव में स्वतंत्रता और स्वाधीनता दोनों ही का दुरुपयोग माना जाएगा. स्वाधीनता के विस्तार के लिए ऐसे अनेक काम हैं जिन्हें सरकार कर सकती है. करना चाहिए. इसी के लिए जनता उसे जिम्मेदारी सौंपती है. मगर यह कार्य जनता और नागरिकों के मध्य संवाद द्वारा होना चाहिए. यदि सरकार यह दावा करती है कि वह जनता की शिक्षक है, इस कारण लोगों की राय को बदलने का उसे अधिकार है तो समझ लीजिए कि उसकी निष्ठा लोकतंत्र में न होकर, निरंकुश शासन में है. इसलिए लोकतंत्र का पहरुआ बनने के लिए सरकार को जनता का शिक्षक बनने का भ्रम छोड़ देना चाहिए.

लोकतंत्र पर यह आरोप लगाया जाता है कि वह अनेक लोगों की निरंकुशता है. यह आरोप प्राय: वही लोग लगाते हैं जो लोकतंत्र पर भरोसा नहीं करते या उसको ढंग से समझ ही नहीं पाते. ऐसे लोगों से आप कोई उदाहरण पेश करने को कहिए. फिर ध्यानपूर्वक उस उदाहरण का विश्लेषण करने की कोशिश कीजिए. कुछ ही देर में सच सामने आ जाएगा. जिसे वे लोग बहुसंख्यक की तानाशाही कहते हैं, असल में वहां बहुसंख्यक के नाम पर कुछ लोगों की मनमानी वाली सरकार होगी. निर्वाचन प्रक्रिया में उलटफेर कर धोखा देकर आए लोग. जो लोग लोकतंत्र को समझते हैं; और वह जनता जो लोकतंत्र का महत्त्व जानती है, वह न तो तानाशाह हो सकती है, न ही तानाशाही को पाल सकती है. इसलिए कि अल्पसंख्यक समूह द्वारा बहुसंख्यक समूह का दमन लज्जाजनक है. लेकिन बहुसंख्यक द्वारा अल्पसंख्यक का दमन घृणित कार्य है.

स्वतंत्रता और स्वाधीनता के सूक्ष्म अंतर को यदि स्वीकार लिया जाए तो 1857 के जनविद्रोह को क्या कहना उचित रहेगा—‘स्वाधीनता संग्राम’ या ‘स्वतंत्रता संग्राम’? फैसला एकदम साफ है. जिन आंदोलनों में जनता की प्रत्यक्ष या परोक्ष भागीदारी हो, वहां स्वतंत्रता और स्वाधीनता को एकदूसरे से अलग नहीं किया जा सकता. अधिकतम स्वाधीनता के लिए अपना शासनतंत्र जिसपर जनता का नियंत्रण हो, होना आवश्यक है. 1857 की क्रांति के मूल में मुख्यतः सैनिक विद्रोह की भूमिका को रेखांकित किया जाता है, जिसे क्रांति में ढालने की जमीन किसानों, मजदूरों और शिल्पकार वर्ग के असंतोष ने तैयार की थी. उसकी तात्कालिक परिणति के पीछे सैनिकों की धार्मिक भावनाओं का प्रस्फुटन था. कारतूसों में गाय और चर्बी प्रयुक्त किए जाने की अपवाह से भारतीय सैनिक नाराज थे. मेरठ की बैरक से निकलकर जैसे ही विद्रोह की सूचना देश के बाकी हिस्सों तक पहुंची, उसमें आम नागरिकों की सहभागिता भी बढ़ती गई. लोग अंग्रेजों को खदेड़ कर अपनों का शासन चाहते थे. बाद में अंग्रेजों के हाथों सत्ता गंवा चुके चंद राजा और नबाव भी उनके साथ मिल गए. उनका असली मकसद अपनी खोई सत्ता हासिल करना था. दूसरी ओर आम जनता अपना मानसम्मान वापस पाने तथा स्वाधीनता की चाहत के साथ, स्वतंत्रता सेनानियों की मदद के लिए उतरी थी.

लंबे संघर्ष के उपरांत देश को 15 अगस्त 1947 को बाहरी शासन से मुक्ति मिली. तय किया गया कि देश में जनता का अपना शासन होगा. एक तरह से जनता के संघर्ष का समापन सुखद एवं फलदायी था. तब से आज तक, लगभग सात दशक लंबी विकास यात्रा पर गर्व करने के लिए पर्याप्त कारण हमारे पास हैं. स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार से भारतीय मनुष्य की औसत आयु आजादी के समय के औसत 32 वर्ष से बढ़कर 66 वर्ष हो चुकी है. अनाज, दुग्ध, सीमेंट, लोहा आदि के उत्पादन में यह देश आत्मनिर्भर है. देश की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा युवा है. इन सब उपलब्धियों पर हम अपनी पीठ थपथपा सकते हैं. मगर केवल भौतिक उपलब्धियां स्वतंत्रता की जरूरत का मापदंड नहीं होतीं. मानवमन का स्वाभाविक उल्लास भी उसकी पहचान होता है. समानताधारित समाजों में वह नागरिकों के व्यक्तित्व का हिस्सा होता है. स्वतंत्रता की वीं वर्षगांठ पर विचारणीय यह है कि स्वाधीनता के जो लक्षण हमने ऊपर गिनाए हैं, क्या उनका लाभ सभी नागरिकों को समान रूप से पहुंचा है? क्या लोग स्वाधीनता और स्वतंत्रता के अंतर तथा उसके मूल्य को समझते हैं? समानता, समरसता, न्याय और समानाधिकार का जो सपना संविधान निर्माताओं ने देखा था, क्या वह पूरा हुआ है? यदि नहीं तो उसके कारण क्या है?

15 अगस्त का दिन यह याद रखने का भी है कि सत्ता का चरित्र मूलतः एक जैसा होता है. स्वयंभू बनने की चाहत प्रत्येक सत्तासीन के भीतर छिपी होती है. उसपर केवल जागरूक जनता नियंत्रण रख सकती है. जाति, धर्म, सांप्रदायिकता आदि के अनेकानेक खानों में बंटी जनता क्या इस स्थिति में है कि स्वाधीनता पर आसन्न खतरों को समझ सके? इन दिनों आतंकवाद को देश की शांति, एकता और अखंडता के बड़े खतरे के रूप में पेश किया जाता है. कदाचित वह है भी. लेकिन इस खतरे का शोर मचाकर आर्थिक वैषम्य और जातीय भेदभाव की उत्तरोत्तर चौड़ी होती खाई की ओर से हमारा ध्यान हटा दिया जाता है. चूंकि सरकार ने शासन के स्तर पर जातिआधारित भेदभाव को हटाने के लिए कुछ नहीं किया, इसलिए जातीय दंश का शिकार रही जातियां मजबूरी में जाति को अपना तारणहार समझने लगती हैं. गत दो दशकों से मतदाताओं का जितना जातिआधारित ध्रुवीकरण हुआ, उतना पहले कभी नहीं हुआ. क्या जनता इस प्रपंच को समझती है? कोई भी देश अपने नागरिकों से बनता है. यदि नागरिक अपनी स्वाधीनता पर मंडराते संकट की ओर से बेखबर हों तो समझ लेना चाहिए कि उतना ही बड़ा खतरा देश की स्वतंत्रता और अखंडता पर भी मंडरा रहा है. 2021 में भारत आजादी की 75वीं वर्षगांठ मनाएगा. तब तक इन समस्याओं का समाधान न सही, असली कारण भी हम पहचान पाए तो बड़ी उपलब्धि होगी.

© ओमप्रकाश कश्यप

शब्दानुक्रमणिका

1. in these matters we must not believe the many, who say that free persons only ought to be educated, but we should rather believe the philosophers, who say that the educated only are free. – Epictetus, The Discourses.

2. (Freedom) is the one value that many people seem prepared to die for….It is the catchword of every politician, the secular gospel of our economic, ‘free enterprise’ system, and the foundation of all our cultural activities.”-Orlando Patterson, Freedom : Freedom in the Making of Western Culture.

3. Those who have more power are liable to sin more; no theorem in geometry is more certain than this….the possession of unlimited power…corrodes the conscience, hardens the heart, and confounds the understanding…

 

नास्तिक दर्शन : पुरोहितवाद विरुद्ध सार्थक मोर्चा (दो)

विशेष रुप से प्रदर्शित

यदि ईश्वर सचमुच कही है, तो उसे मिटा देने में ही भलाई है.—मिखाइल बेकुनिन.

पाठकों के लिए यह जिज्ञासा का विषय हो सकता है कि ‘सामन्नल सुत्त’ का अंतिम संदेश क्या है? अजातशत्रु पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है? छह समकालीन दार्शनिकों से असंतुष्ट होकर बुद्ध तक पहुंचा अजातशत्रु क्या उनसे संतुष्ट हो पाता है? धर्म के मनोविज्ञान को समझने के लिए भी अजातशत्रु के निर्णय को जानना आवश्यक है. शांति की खोज में आए अजातशत्रु को बुद्ध शील(आरंभिक शील, मध्यम शील, महाशील), संयम, स्मृति संप्रजन्य, संतोष, समाधि, प्रज्ञा, करुणा आदि का उपदेश देते हैं. उनके उपदेश में दर्शन का गांभीर्य और नैतिकता का परमोत्कर्ष दोनों हैं. उपदेश के समापन पर वे कहते हैं—‘महाराज! इस श्रामण्यफल से बढ़कर दूसरा कोई श्रामण्यफल नहीं है.’ अजातशत्रु की प्रतिक्रिया अनुकूल है. वह बुद्ध के दर्शन से प्रभावित नजर आता है—

अद्भुत भंते! अद्भुत!! जैसे कोई उल्टे को सीधा कर दे, भटके हुए को उचित मार्ग दिखा दे, छिपे हुए को उजागर कर दे, अंधियारे में भटकते हुओं को प्रकाश में ले आए, ऐसे ही भंते! भगवान ने अनेक प्रकार से धर्म को प्रकाशित किया है. भंते! मैं भगवान की शरण में जाता हूं. धर्म और संघ की शरणागत होता हूं. आज से जीवनपर्यंत आप मुझे अपनी शरण में आया उपासक स्वीकार करने की अनुकंपा करें.’ उसके बाद वह अपने मन के उद्वेग को प्रकट करता है. उस वेदना को सामने रखता है जो उसे भटकाए रखती है. अजातशत्रु का ग्लानिबोध पुराना है. उससे मुक्ति की छटपटाहट उसे बुद्ध की शरण में ले आती है—‘भंते! मैंने जघन्य अपराध किया है. अपनी मूर्खता और पाप के वशीभूत होकर मैंने अपने पिता की हत्या की है. मुझे क्षमा करें. आशीर्वाद दें कि भविष्य में मेरे कदम कभी डगमगाएं नहीं.’

बुद्ध उसे क्षमादान देते हैं—‘अपनी मूढ़ता, अज्ञानता और कुविचारों के बशीभूत होकर तुमने अपने महान पिता की हत्या कर बहुत भारी अपराध किया है. किंतु तुम अपने पाप को स्वीकार करके भविष्य में संभलकर रहने की प्रतिज्ञा करते हो. इस कारण तुम क्षमा के पात्र हो. मनुष्य अपने अपराध को स्वीकार कर, भविष्य में वैसा न करने की प्रतिज्ञा कर ले, इसी में उसकी बुद्धिमानी है.’ बुद्ध का कथन परोक्ष रूप में अजातशत्रु को संघ में सम्मिलित होने का आमंत्रण है. किंतु अजातशत्रु अभी तक ‘सहेजे रखने’ और ‘मुक्त होने’ के द्वंद्व में उलझा है. उसका बुद्ध तक पहुंचना असल में प्रायश्चितबोध से उपजी अंतर्वेदना की परिणति है. वह केवल अपने पिता की ही हत्या नहीं करता, बुद्ध के फुफेरे भाई देवदत्त के उकसावे में आकर स्वयं बुद्ध के लिए भी परेशानी खड़ी करता है. बुद्ध उसके सभी अपराधों को क्षमा करते जाते हैं. अजातशत्रु की प्रतिक्रिया तत्कालीन भावोद्रेक से युक्त है. लेकिन उसे अपने राजन्य तथा राजनीतिकसामाजिक पदप्रतिष्ठा का भी बोध है, जिसे वह एकाएक छोड़ना नहीं चाहता. बहरहाल, ग्लानिबोध और लोकानुराग के बीच जीत अंततः लोकानुराग की होती है. अजातशत्रु के भीतर पैठे ‘सम्राट’ की होती है. वह शास्ता से वापस लौटने की अनुमति चाहता है—‘भंते! अब मैं चलता हूं. अनेक अत्यावश्यक कार्य निपटाने हैं.’ उसके बाद शास्ता की प्रदक्षिणा कर वहां से प्रस्थान कर जाता है. अजातशत्रु के लौटने के पश्चात बुद्ध भिक्षुओं को संबोधित करते हैं—

इस राजा का संस्कार अच्छा नहीं रहा. यह अभागा है. यदि यह अपने धर्मशील पिता की हत्या न करता तो आज इसी स्थान पर बैठेबैठे निर्मल, निश्चल, निष्कलुष ज्ञान को प्राप्त कर लेता.’ क्या यह बुद्धमार्ग की असफलता थी; या अथवा शिष्यों को समझाने के बहाने वे स्वयं को दिलासा दे रहे थे? यदि अजातशत्रु सबकुछ छोड़कर संघ में रहने का निर्णय ले लेता, क्या तब भी बुद्ध की यही प्रतिक्रिया होती? क्या श्रामण्य जीवन सभी प्रकार के पापों के समाधान, प्रायश्चित की सर्वोत्तम जीवनशैली है. बुद्ध के शिष्यों में अंगुलिमाल का उदाहरण भी है. अनेक लोगों को लूटकर हत्या कर देने वाला अंगुलिमाल बुद्ध की शरण में जाने के बाद भिक्षु संघ का होकर रह जाता है. बुद्ध उसे अभागा नहीं कहते. क्या अपने पिता के हत्यारे तथा निर्दोष लोगों की हत्या करनेवाले डाकू के पाप में कोई अंतर है? ‘सामाफल सुत्त’ इन प्रश्नों पर विचार किए बिना ही संपन्न मान लिया जाता है.

इसी प्रसंग की चर्चा ‘संयुत्त निकाय’(3.1.1) तथा थोड़े बदले स्वरूप में ‘मिलिंद प्रश्न’ में भी है. अंतर केवल इतना है कि ‘संयुत्त निकाय’ में अजातशत्रु का स्थान कोसल सम्राट प्रसेनदि ले लेता है. स्थान राजग्रह स्थित जीवक की आम्रवाटिका के बजाय सावित्थी नदी से सटे जेतवन में अनाथपिंडक का उपवन हो जाता है. ‘संयुत्त निकाय’ के अनुसार बुद्ध उन दिनों अनाथपिंडक के आश्रम में विहार कर रहे थे. कोशल सम्राट प्रसेनदि ने सुना तो तत्वज्ञान की इच्छा के साथ उनसे मिलने पहुंचा. बुद्ध को अभिवादन कर, कुशलक्षेम जानने के पश्चात उसने आसन ग्रहण किया. तदनंतर मन की जिज्ञासा को बुद्ध के समक्ष रखते हुए कहा—‘हे गौतम! आप तो खुद को सर्वोत्तम, सम्यक संबुद्ध, परमज्ञानी तथा श्रेष्ठतम मानते हैं. इस तरह का दावा भी करते हैं.’ बुद्ध हमेशा की भांति आत्मविश्वास से भरपूर हैं. देखा जाए तो बुद्ध का अटूट आत्मविश्वास ही है जो उन्हें अपने समकालीन दार्शनिकों में विशिष्ट बनाता है. उस समय ब्राह्मणवादी परंपरा के विचारक जहां आत्मा और परमात्मा की व्याख्याओं में उलझे हुए थे. दार्शनिक विचारों को लेकर उनकी मान्यताएं इतनी डांवाडोल थीं कि उनकी विपुल शास्त्रसंपदा के बीच से किसी स्पष्ट विचारधारा को खोजना आज भी असंभवप्रायः है. वहां सैद्धांतिक रूप से एकेश्वरवाद का पक्ष लेने वाले भी व्यावहारिक रूप में बहुदेववाद का समर्थन करते हुए नजर आते हैं. किसी न किसी रूप में सभी परंपरापोषी. उन दिनों भी ब्राह्मणवादी दार्शनिकों के बीच सृष्टि के अस्तित्व को नकारना मानो फैशन का रूप ले चुका था, आत्मविश्वास की कमी के चलते सृष्टि को माया था अथवा मिट्टी समान नश्वर बताया जा रहा था. सिर्फ इसलिए कि पुरोहितों की दुकानदारी चलती रहे. महावीर ‘स्याद्वाद’ के सिद्धांत को बढ़ाते हुए अनेकांतवाद का समर्थन करने लगते थे. एकमात्र बुद्ध ऐसे थे जो अपने स्थिरमति होने के साथ, अपनी विचारधारा और संघ को लेकर गौरवान्वित भी थे. प्रसेनदि को उत्तर देते हुए बुद्ध कहते हैं—

सर्वोत्तम, सर्वश्रेष्ठ, सम्यक संबुद्ध, परमज्ञानी अर्थात जो भलीभांति जान चुका है, ऐसा जिसके बारे में ठीकठीक कहा जा सकता है, उसका आशय मुझसे ही समझना चाहिए.’

प्रसेनदि इससे आश्वस्त नहीं है. यह यूं कहो कि विश्वास करने से पहले भलीभांति परीक्षा कर लेना चाहता है. अगले चरण में अजातशत्रु की भांति वह भी नास्तिक दार्शनिकों का नाम लेता है. लेकिन अजातशत्रु जहां नास्तिक विचारकों की ओर से निराश है, वहीं एक प्रसंग में प्रसेनदि उनसे प्रभावित नजर आता है—‘पूर्ण कस्सप, मक्खलिपुत्र गोशालक, निग्र्रंथ नागपुत्त, संजय वेलत्थिपुत्त, अजित केशकंबलि तथा पुकुद कात्यायन—ये सब गणाचार्य, संघाधिपति, स्वयंसंबुद्ध, यशस्वी तीर्थंकर, परमज्ञानी आदि कहे जाते हैं. सभी आपसे उम्र में छोटे हैं, पूर्ण कस्सप तथा गोसाल तो आपसे पहले ही जिनत्व को प्राप्त कर चुके हैं. लेकिन यह पूछने पर कि क्या आप स्वयंसंबुद्ध हैं, उनमें से कोई भी स्वयं को परमज्ञानी, सम्यक संबुद्ध, सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्तम होने का दावा नहीं करता. ऐसे में आप स्वयं के सर्वश्रेष्ठ, सर्वज्ञानी, सर्वोत्तम, सम्यक संबुद्ध तथा परमतत्व का ज्ञाता होने का दावा कैसे कर सकते हैं?’

प्रसेनदि का कथन तर्कसम्मत है. मगर बुद्ध सीधे उत्तर देने के बजाय उदाहरण थमाने लगते हैं—‘महाराज! तीन चीजें हैं जिन्हें कभी हल्का करके नहीं लेना चाहिए. वे तीन हैं—क्षत्रीय, सर्प, अग्नि एवं भिक्षु. क्षत्रीय का काम युद्ध करना है. आप उसका अवमूल्यन करेंगे तो वह अपमानित होगा. उस अवस्था में उसके मन में गांठ भी पड़ सकती है. वह जीवन में कभी भी आपसे बदला ले सकता है. यही सर्प के साथ है. सर्प के छोटा या बड़ा होने से उसके विष का अनुमान नहीं लगाया जा सकता. अग्नि का भी यही स्वभाव है. स्फुर्लिंग मामूली ही क्यों न हों, उसकी कभी उपेक्षा या निरादर नहीं करना चाहिए. मामूली स्फुर्लिंग भी पलक झपकते पूरी बस्ती को खाक में मिला सकता है. चैथे यानी सदाचारी भिक्षु का तो कतई निरादर नहीं करना चाहिए. भिक्षु निष्पृह, पशुधन विहीन होता है. इसलिए विद्वान पुरुष कभी भिक्षु का निरादर नहीं कहते.’ संवाद के समापन पर प्रसेनदि वही कहता है, जो ‘दीघनिकाय’ में अजातशत्रु ने कहा था. और प्रकारांतर में वही जो बौद्ध लेखक उनसे कहलवाना चाहता है—‘आश्चर्य भंते आश्चर्य. जैसे कोई उल्टे को सीधा कर दे, भटकते हुए को प्रकाश में ले आए, वैसे ही आपने मेरा मार्गदर्शन किया है. कृपया, मुझे अपना उपासक स्वीकार करें.’(संयुत्त निकाय, कोसल सुत्त).

अपने मत के प्रचारप्रसार के लिए बौद्ध दर्शन को न केवल ब्राह्मणवादी परंपरा से जूझना पड़ रहा था, बल्कि उन नास्तिक दार्शनिकों से भी उसका विरोध था, जो जीवन के कारोबार में किसी भी दैवी शक्ति के हस्तक्षेप को नकारते थे. जिनका विश्वास था कि मनुष्य प्रकृति का सहजस्वाभाविक अंग है. प्राणिमात्र का जीवन भौतिकी के उन्हीं नियमों से अनुशासित होता है, जिनसे प्रकृति. इसलिए वे जीवन और प्रकृति के सामन्जस्य को ही मनुष्यता की श्रेष्ठतम उपलब्धि मानते थे. प्रकृति और जीवन से उनका सहज जुड़ाव था. देखा जाए तो वह जीवन के प्रति पूरी तरह वैज्ञानिक दृष्टिकोण था. वे सत्तावादी प्रलोभनों, छलप्रपंच, लालच आदि से दूर, यायावर चिंतनपरंपरा से निकले विद्वान थे. दूसरी ओर ब्राह्मण दर्शनों का पोषणपल्लवन राज्य के संरक्षणसमर्थन के साथ हुआ था. धर्म और राजसत्ता के उस गठजोड़ ने केंद्रोन्मुखी संस्कृति और सभ्यता को जन्म दिया था. एकदूसरे के प्रकटतः विरोधी और आलोचक दिखने के बावजूद उसके विभिन्न घटक पारस्परिक हितों को लेकर संगठित थे. उनकी रक्षा एवं विस्तार के लिए वे सम्मिलित शक्तियों का उपयोग करते थे. इस कारण जनसाधारण के लिए सत्तासमर्थित पुरोहितसंस्कृति, कर्मकांड एवं बलि प्रथा का विरोध न केवल अनेक प्रकार के खतरों से भरा, बल्कि असंभवजैसा था. इस शक्तिशाली गठजोड़ के बावजूद देश में भौतिकवादी दर्शन शताब्दियों तक समाज में अस्तित्व बनाए रहा तो इसलिए कि अपने श्रमकौशल के आधार पर जीवन जीने वाले श्रमजीवी तथा शिल्पकार वर्ग आर्थिक स्वावलंबन हेतु परस्पर संगठित थे. ईसापूर्व पांचवीछठी शताब्दी तक उन्होंने सामान्य हितों के लिए खुद को इतना एकजुट कर लिया था कि विशेष परिस्थिति को छोड़कर संगठन की गतिविधियों में राज्य का हस्तक्षेप भी संभव न था. आजीवक दार्शनिक उन्हीं की मेधा की उड़ान का प्रतिनिधित्व करते थे. किंतु अपने इतिहास, शिक्षा, संस्कृति तथा ज्ञान के दस्तावेजीकरण के मामले में पिछड़ा होने के कारण वे लोग मेहनती, प्रतिभाशाली एवं कलासंपन्न होने के बावजूद, लंबे समय तक अपनी उपलब्धियों को सुरक्षित रखने में असमर्थ रहे. इस कमी के कारण उनके ज्ञान और अनुभवों को न केवल बिसरा दिया गया, बल्कि मनमानी व्याख्याओं द्वारा उन्हें विकृत भी किया गया.

ब्राह्मणदर्शनों की भांति बौद्ध दर्शन भी राज्य की शक्ति और संसाधनों का उपयोग करता था, इसलिए बौद्ध लेखक ब्राह्मणवादी परंपरा के लेखकों के साथ वैसा व्यवहार नहीं करते, जैसा भौतिकवादी परंपरा के महान विचारकों के साथ करते हैं. इसे उनकी व्यावहारिक समझ कह सकते हैं और चाहें तो आंतरिक समझौता भी. उन्होंने वैदिक कर्मकांडों और पुरोहितवाद पर तो प्रहार किया, किंतु वर्णाश्रम व्यवस्था को, उस व्यवस्था पर जो ब्राह्मणों को शिखर का दर्जा देती थी, कभी चुनौती नहीं दी. तो भी भारतीय संस्कृति में बौद्ध धर्म के योगदान को नकारा नहीं जा सकता. बुद्ध ने धर्मदर्शन के क्षेत्र में कर्मकांड की भूमिका को कम करते हुए उसकी जगह नैतिक मूल्यों को महत्त्व दिया. सामूहिक जीवन में विश्वास जगाया तथा बलि प्रथा का निषेध किया. संभव है ये प्रेरणाएं उन्हें नास्तिक दर्शनों से मिली हों. क्योंकि जो दर्शन जीवन में पराभौतिक शक्तियों की भूमिका को नकारते हों, मनुष्य को केंद्र में रखकर गढ़े गए हों, उनकी प्रतिष्ठा जीवन में मानवीय मूल्यों को उच्च स्थान दिए बिना संभव न थी. तो भी निश्चित प्रमाणों के अभाव में इस बारे में दावे के साथ कुछ भी कहना असंभव है.

महावीर स्वामी और बुद्ध दोनों ही क्षत्रिय कुलों से आए थे. सो उनकी अन्य उपलब्धि यह भी रही कि ज्ञानसाधना का क्षेत्र जो पहले केवल ब्राह्मणों के लिए आरक्षित था, क्षत्रियों को भी स्थान मिलने लगा. पहले यदि जन्मना ब्राह्मण हों तो अच्छा, न हो तो उस परंपरा में व्यक्तिविशेष के विशिष्ट योगदान हेतु उसे किसी न किसी बहाने ब्राह्मणत्व से जोड़ दिया जाता था. मिथ गढ़ने की कला में प्रवीण वह वर्ग ऐसी हर घटना के लिए कोई नया किस्सा या मिथ गढ़ ही लेता था, जिसपर बाकी जनसमुदाय को देरसवेर विश्वास करना ही पड़ता था. इसके अनेक उदाहरण है, किंतु हम जो कहने जा रहे हैं, उसके लिए विश्वामित्र का उदाहरण अधिक प्रासंगिक है. विश्वामित्र का जन्म क्षत्रिय कुल में हुआ था, लेकिन तत्संबंधी मिथों के अनुसार अपने स्वाध्याय के बल उन्होंने शस्त्र के साथसाथ शास्त्रों में भी प्रवीणता हासिल कर ली थी. इसलिए वे चाहते थे कि लोग उन्हें ब्राह्मण के रूप में मान्यता प्रदान करें. जबकि वशिष्ट उन्हें ब्रह्मर्षि घोषित करने को तैयार नही थे. विश्वामित्र के राजर्षि से ब्रह्मर्षि बनने का लंबा संघर्ष है, जिससे स्पष्ट होता है कि पर्याप्त बौद्धिक तेजस्विता के बावजूद एक क्षत्रिय के तत्वज्ञान को ब्राह्मणों के बीच अपेक्षित मान्यता प्राप्त नहीं थी. ‘जातक कथा’ के अनुसार बुद्ध के समय तक यह मान लिया गया था कि बोधिसत्व ‘वैश्य या शूद्र कुल में उत्पन्न नहीं होते. लोकमान्य क्षत्रिय या ब्राह्मण इन्हीं दो कुलों में उत्पन्न होते हैं.’ यही देखते हुए महापुरुष(गौतम बुद्ध) निर्णय लेते हैं—‘आजकल क्षत्रिय कुल ही लोकमान्य है, इसीलिए इसी में जन्म लूंगा’(बुद्धचर्या, राहुल सांकृत्यायन, पृष्ठ-1). यह एक बड़ा बदलाव था. हो सकता है, तत्कालीन ब्राह्मणों को बौद्ध लेखकों की यह स्थापना अस्वीकार्य रही हो. किंतु बुद्ध की व्यापक लोकप्रियता के चलते इस बदलाव को स्वीकारना उनकी बाध्यता थी. राजसत्ताओं से समानरूप से लाभान्वित होने के कारण बौद्ध लेखक ब्राह्मणवादी परंपरा के आचार्यों पर वैसा चारित्रिक हमला नहीं करते, जैसा वे नास्तिक परंपरा के दार्शनिकों पर करते हैं. ठीक ऐसे ही जैसे दो बड़े पूंजीपति बाजार पर पकड़ बनाए रखने के लिए उत्पाद की ऊपरी विशेषताओं को गिनाते हुए विज्ञापनजगत में घमासान मचाए रखते हैं. उत्पाद की वास्तविक गुणवत्ता, मूल्य निर्धारण एवं उत्पादन की प्रक्रिया, उत्पादक तथा उसके मुनाफे पर कोई चर्चा नहीं की जाती. इसके विपरीत नास्तिक दार्शनिकों का बौद्ध ग्रंथों में न केवल मनमाना उल्लेखउपयोग किया गया है, बल्कि जबतब उनका उपहास भी किया गया है. यह तब है जबकि बौद्ध दार्शनिकों ने ब्राह्मणवादी धारा के सार्थक विरोध हेतु आवश्यक बौद्धिक सामग्री, तर्क आदि कदाचित नास्तिक परंपरा से ही ग्रहण किए थे. बावजूद इसके उन्होंने नास्तिक विचारकों के ससम्मान उल्लेख में कोताही बरती थी—

संयुत्त निकाय’ दलमें कोसलाधिपति प्रसेनदि द्वारा छह नास्तिक विचारकों से संपर्क करने का उल्लेख किया गया है. उसका विवरण उपहास की भाषा में है. प्रसंग इस प्रकार है—‘छह भौतिकवादी विचारकों से प्रभावित, उनकी शिष्यमंडली के सदस्य यहां से वहां विचरण करते हुए, एक बार श्रावस्ती पहुंचे. वहां उन्होंने नगरवासियों के बीच यह प्रचार करना आरंभ कर दिया कि उनके गुरु पूर्ण कस्सप, अजित केशकंबलि संपूर्ण, सम्यक संबुद्ध एवं सर्वज्ञ हैं.’ राजा के अनुचरों ने यह बात राजा प्रसेनदि तक पहुंचा दी. कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करने से पहले राजा ने उनकी परीक्षा लेने का निर्णय लिया. उसने सैनिकों को आदेश दिया—‘उन्हें दरबार में आमंत्रित किया जाए.’ सम्राट प्रसेनदि के आमंत्रण पर छह नास्तिक दार्शनिक उसके दरबार में पहुंचे. राजा ने उनका स्वागत करते हुए कहा—‘आसन ग्रहण कीजिए.’

यह सोचते हुए कि ऊंचे आसन पर बैठने से उनके भीतर भी राजमद आ सकता है, वे बहुमूल्य आसन का मोह त्याग धरती पर ही बैठ गए. यह देख राजा को अजीब लगा. वह तत्काल इस निर्णय पर पहुंचा कि जो श्रमण मेरे समक्ष आसन ग्रहण करने से ही घबरा रहे हैं, ‘उनके भीतर धर्म का तेज नहीं है.’ इसके साथ ही राजा उखड़ गया. बिना किसी सम्मानभाव के उसने रूक्ष स्वर में पूछा, ‘क्या तुम बुद्ध हो? राजा का व्यवहार देखकर वे सोच में पड़ गए. सोचने लगे—‘यदि हम कहें कि बुद्ध हैं’ तो राजा अवश्य ही हमसे हमारे ‘बुद्धत्व’ को लेकर प्रश्न करेगा. सही उत्तर न मिलने पर वह हमारी जिव्हा भी कटवा सकता है.’ इसी भय के कारण उन्होंने कहा, ‘हम बुद्ध नहीं है.’ यह सुनते ही राजा ने उन्हें दरबार से निकलवा दिया.’

दूसरा उदाहरण ‘संयुत्त निकाय’ के चैथे अध्याय से लिया जा सकता है. उसमें श्रमण वच्चागोत्त का प्रसंग आया है. वच्चागोत्त ‘निर्वाण’ को समझना चाहता है. उसे लेकर वच्चागोत्त की कुछ जिज्ञासाएं हैं, कुछ प्रश्न. वह जानना चाहता है कि क्या यह ‘संसार चिरंतन है….’ ‘मृत्यु के बाद क्या होता है?’ ‘क्या पुनर्जन्म है.’ ‘क्या तथागतों को भी पुनर्जन्म की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है?’ अपनी जिज्ञासा को लेकर वह अनेक लोगों से मिलता है. उनमें बुद्ध के शिष्य भी सम्मिलित हैं. सबसे पहले वह बुद्ध के पास जाता है. उसके बाद उनके शिष्य मोग्गलायन तथा अन्य मताब्लंबियों से. बुद्ध उसका प्रश्न सुनकर मौन पड़ जाते हैं. संयुत्त निकाय(4/44) में दिया है. उसके अनुसार वच्चागोत्त मोग्गलायन से कहता है—‘मैंने यही प्रश्न दूसरी मताब्लंबियों से किया तो वे अपने विचारों को लेकर पूरी तरह अनिश्चित थे. उनका मानना था कि ‘संसार चिरंतन हो सकता है’ और ‘संसार चिरंतन नहीं भी हो सकता.’ आगे एक शास्त्रार्थ का उल्लेख है. जिसमें बुद्ध के अलावा पूर्ण कस्सप, मक्खलिपुत्र गोशालक, पुकुद कात्यायन, संजय वेल्लठिपुत्त, अजित केशकंबलि, निंगठ नागपुत्त भी सम्मिलित होते हैं. वच्चागोत्त उनसे भी वही प्रश्न करता है—‘संसार चिरंतन है. क्या तथागत मृत्यु बाद भी होते हैं? या तथागत मत्यु के बाद नहीं होते हैं? इस बारे में पूर्ण कस्सप का कहना था—‘संसार चिरंतन है. तथागत न तो हैं, न ही मृत्यु के बाद होते हैं.’ समापन से पहले मामला बुद्ध के पास जाता है. बुद्ध उसे आत्मज्ञान देते हैं. वे निर्वाण की महत्ता तथा उसकी अवधारणा को स्पष्ट करते हैं.

नास्तिक परंपरा के विचारकों का उल्लेख बुद्ध से लगभग पांच सौ वर्ष बाद के ग्रंथ ‘मिलिंद प्रश्न’ में भी आता है. ‘दीघ निकाय’ में अजातशत्रु और बुद्ध के बीच संवाद दिखाया गया है. ‘मिलिंद प्रश्न’ में संवाद सम्राट मिलिंद और बौद्ध विद्वान नागसेन के बीच है तथा स्थान ‘सागल’(स्यालकोट, पाकिस्तान) हो जाता है. अजातशत्रु गौतम बुद्ध से मिलने के लिए अपनी पांच सौ पत्नियों तथा सैनिकों के साथ जीवक की आम्रवाटिका में जाता है, जहां गौतम बुद्ध 1250 भिक्षुओं की मंडली के साथ मौजूद हैं. ‘मिलिंद प्रश्न’ में सम्राट मिलिंद द्वारा 500 यवन सैनिकों के साथ नागसेन से भंेट करने का उल्लेख किया गया है, जिसके साथ अस्सी हजार भिक्षुओं का जत्था है. यह संख्या अतिश्योक्तिपूर्ण हो सकती है. संभव है, लेखक का मंतव्य नगर के कुल बौद्ध अनुयायियों से हो. इससे बौद्ध धर्म के प्रसार का भी अनुमान लगाया जा सकता है. बहरहाल, अजातशत्रु के साथ गई 500 रानियों और सैनिकों, तथा मिलिंद के साथ गए 500 यवनों पर बुद्ध के दर्शन का क्या प्रभाव पड़ा, इसका कोई उल्लेख संबंधित ग्रंथ में नहीं है. कदाचित उल्लेख की आवश्यकता ही नहीं समझी गई. शायद इसलिए कि लेखक का मंतव्य भौतिकवादी दर्शनों के सापेक्ष अपने दर्शन की श्रेष्ठता को सिद्ध करना था. सोचता था कि यदि अजातशत्रु बौद्ध दर्शन के प्रभाव में आ जाता है तो प्रजा स्वतः उसकी ओर चली आएगी—‘यतो राजा, ततो प्रजा.’ उपर्युक्त उद्धरणों में से एक में श्रमण परंपरा से निकले नास्तिक विचारक हैं, जो राजदरबार में राजमद के भय से उच्च आसन पर बैठने के बजाय सीधे जमीन को आसन बना लेते हैं. दूसरी और बौद्ध विचारक हैं, जो सम्राटों और श्रेष्ठि जन द्वारा विशेष रूप से बनाए गए विहारों में ठहरते रहते थे और उस अवसर का प्रयोग अपने धर्म को संगठित करने में करते थे. उल्लेखनीय है कि ब्राह्मण धर्म स्वतः सत्ता केंद्रित रहा तथा राज्याश्रय में फलाफूला है. ‘संयुत्त निकाय’ के अनुसार महाराज प्रसेनदि या ‘मिलिंद प्रश्न’ के अनुसार सम्राट मिलिंद का भिक्षु नागसेन से मिलना तथा दोनों अवसरों पर, यानी बुद्ध और नागसेन के पास भिक्षुओं की अपेक्षाकृत बड़ी संख्या दिखाया जाना, दर्शाता है कि बौद्ध लेखकों के लिए संख्याबल भी महत्त्वपूर्ण था; और इसके द्वारा वे राजसत्ता के समानांतर धर्मसत्ता की पैठ को दर्शाते थे.

दीघ निकाय’, ‘संयुत्त निकाय’ तथा ‘मिलिंद प्रश्न’ में एक ही घटना को तीन अलगअलग रूपों में देखकर उनकी प्रामाणिकता पर संदेह हो सकता है. जबकि तीनों घटनाओं की विषयवस्तु एक है. उनमें केवल पात्र और स्थान रहते हैं. इससे यह संभावना भी बलवती होती है कि अजातशत्रु तथा प्रसेनदि की बुद्ध से तथा ‘मिलिंद प्रश्न’ के अनुसार सम्राट मिलिंद की नागसेन से भेंट बौद्ध लेखकों की कल्पना की उपज थी. चूंकि प्रत्येक विवरण में नास्तिक विचारकों के नाम अपरिवर्तित रहते हैं, और वही नाम जैन साहित्य में भी उसी रूप में मौजूद हैं. इससे उनकी ऐतिहासिकता संदेह से परे है. वह दर्शाती है कि बौद्ध लेखकों द्वारा इन प्रसंगों की कल्पना भौतिकवादी विचारधारा के बरक्स अपने दर्शन की श्रेष्ठता दर्शाने के लिए की गई थी. ध्यान देनेवाली बात है कि ‘दीघ निकाय’ एवं ‘संयुत्त निकाय’ दोनों ही ग्रंथों में संबंधित प्रसंग की शुरूआत ‘ऐसा मैंने सुना….’ से की गई है. यानी लेखकगण संबंधित घटना के न तो स्वयं साक्षी हैं, न ही उसका उल्लेख बुद्ध के हवाले से कर रहे हैं. इसे हम उनके लेखकों की लेखकीय ईमानदारी भी कह सकते हैं कि वे उन प्रसंगों को प्रामाणिक घटनाओं के रूप में प्रस्तुत करने के बजाए ‘कथन’ या ‘उपकथन’ के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं. श्रुति आधारित घटनाओं में पात्रों का बदल जाना अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता. ‘मिलिंद प्रश्न’ में उसी प्रसंग को पांच शताब्दियों के बाद तत्कालीन सम्राट के नाम के साथ पेश करने एक संभावना यह भी हो सकती है कि आजीवक विचारधारा बुद्ध के पांच सौ साल बाद भी, न केवल लोकप्रचलित थी बल्कि उस समय की अन्य दर्शनपरंपराओं को चुनौती देने की स्थिति में थी. कदाचित यही स्थिति आगे भी बनी रही. यही नहीं दसवीं शताब्दी के तमिल काव्य ‘नीलकेशी’ में भी पूर्ण कस्सप, मक्खलिपुत्र गोशालक का नामोल्लेख है. उसमें नीलकेशी को अर्धदेवी या मायावी के रूप में दर्शाया गया है, जो कालांतर में जैन धर्म स्वीकार लेती है. ज्ञान और आत्मशांति की खोज में नास्तिक विचारकों से भी मिलती है.

अजातशत्रु एवं प्रसेनदि और सम्राट मिलिंद द्वारा बौद्ध धर्म स्वीकार लेने का उल्लेख संबंधित ग्रंथों में है. एक ही प्रसंग को अलगअलग ग्रंथों में अलगअलग नाम के साथ प्रस्तुत करने से पता चलता है कि अपने समय के किसी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति को बीच में लाकर अपने मंतव्य के अनुरूप नए प्रसंग गढ़ लेना बौद्ध विद्वानों की शैली रही है. वैसे भी श्रमण जीवन की श्रेष्ठता का ‘मिथ’ तभी स्थापित हो सकता था, जब समाज का प्रभुसत्तासंपन्न वर्ग, जिसके पास आमोदप्रमोद, वैभवविलास के संसाधनों का प्राचुर्य हो, सांसारिक सुखों को निस्सार मानते हुए—उनके आगे नतमस्तक हो. उस समय की परंपरा के अनुसार अपने दार्शनिक विचारों को आमजन तक पहुंचाने के लिए तत्कालीन बौद्ध विद्वान भी किस्सेकहानियों का सहारा ले रहे थे. आवश्यकता के अनुसार वे नए किस्सेकहानियां गढ़ भी रहे थे. नास्तिक विचारक कदाचित तर्क को ज्यादा महत्त्व देते थे, इसलिए वे अपने विचारों को दीर्घकालिक संस्कृति में ढालने में असमर्थ रहे. बावजूद इसके उनका असर लंबे समय तक समाज पर बना रहा. ‘श्रामण्य जीवनशैली’ पर जोर देने के बावजूद बौद्ध और जैन श्रमणों को अपने समय के सम्राटों के दरबार में जाने, तत्कालीन श्रेष्ठि वर्ग का आतिथ्य स्वीकार करने में हिचक नहीं थी. इसे उनका वर्गीय संस्कार भी कह सकते हैं. दोनों ही राजकुलों में जन्मे थे. ऐसे परिवेश में पलेबढ़े थे, जिसमें बड़े साम्राज्य का सपना आरंभ से ही मानस में रोप दिया जाता है. ‘धम्मविजय’ का सपना तथा अपने साथ सैकड़ों, हजारों भिक्षुओं को लेकर निकलना, उन्हीं महत्त्वाकांक्षाओं की सात्विक परिणति था. श्रमण जीवन की महत्ता समझाने के लिए वे जहां अपने समय के प्रमुख सम्राटों को बीच में ले आते हंै, वहीं अहिंसा के दर्शन को ऊंचा दिखाने के लिए अंगुलिमाल की सहायता ली जाती है. विचारों के प्रचारप्रसार के लिए कहानियों तथा अन्य लोककलाओं का उपयोग न तो अस्वाभाविक था, न ही नया. पुरोहितवर्ग स्वयं कहानियां गढ़ने में माहिर था. इसका उन्हें लाभ भी मिला. जबकि केवल तर्क के आधार पर अपने दर्शन को दुनिया के सामने लाने वाले और तत्कालीन सत्ताशिखरों से किसी भी प्रकार कर समझौता न करने वाले लोकायत और आजीवक धर्मानुयायी बड़ी आसानी से भुलाए जाते रहे. जबकि किस्सेकहानियां गढ़ने में माहिर बौद्ध, जैन और ब्राह्मण धर्मानुयायियों ने कालांतर में उन्हें बदनाम करने के लिए भी किस्सेकहानियों का सहारा लेना आरंभ कर दिया. जो वास्तव में मानवमात्र की मुक्ति चाहते थे, मानवीय विवेक को महत्त्व देते थे, बौद्ध, जैन और ब्राह्मण लेखको के जरिये वे मनुष्यता के दुश्मन, राक्षस, दैत्य आदि कहे जाने लगे.

दीघ निकाय’ में यह पूरी तरह तय नहीं हो पाता कि अजातशत्रु ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया था या नहीं? जैन और बौद्ध दोनों धर्म उसपर अपना अनुयायी होने की दावेदारी करते हैं. बुद्ध के निर्वाण प्राप्ति के एक वर्ष बाद आयोजित होने वाली पहली बौद्ध परिषद का आयोजन भी अजातशत्रु की पहल पर किया गया था. इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अजातशत्रु ने बौद्ध धर्म अपना लिया था. मगर अजातशत्रु के जीवन से जुड़ी घटनाएं बताती हैं कि उसने बौद्ध धर्म को उसने अपनाया भी होगा तो केवल नाममात्र के लिए. यहां इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना पर विचार करना आवश्यक है. उससे ‘धर्मसत्ता’ एवं ‘राजसत्ता’ के गठबंधन तथा एकदूसरे के हितों के लिए काम करने की नीयत को समझा जा सकता है. भारतीय इतिहास में वैशाली की चर्चा उसकी अकूत समृद्धि, वैभव के साथसाथ गणतंत्र के लिए भी होती है. जब हम गणतंत्र के इतिहास की खोज करते हैं तो नजर सीधे बौद्ध कालीन भारत में वैशाली पर जाती है. जहां नागरिक तंत्र पर्याप्त रूप में मौजूद था. लोग अपने निर्णय मिलजुलकर लेते थे. अपना शासक स्वयं सुनते थे. हालांकि आधुनिक लोकतंत्र के सापेक्ष उनका गणतंत्र बहुत पिछड़ा हुआ था. उनमें निर्णय प्रक्रिया में हिस्सा लेने का अधिकार समाज के सीमित लोगों को प्राप्त था. स्त्री और गरीब मताधिकार से वंचित थे. एक तरह से वह कुलीनतंत्र ही था, बावजूद इसके समकालीन निरंकुश राज्यों की तुलना में वैशाली को बेहतर राज्य माना जा सकता है.

अपनी अकूत संपत्ति और वैभव के कारण वैशाली अजातशत्रु की आंख की किरकिरी बनी थी. उसकी निगाह वैशाली की पर टिकी थीं. महावीर स्वामी का जन्म वैशाली में ही हुआ था, इसलिए वहां की प्रजा(उसे नागरिक या जनता कहने में मुझे संकोच है) पर जैनमत का प्रभाव था. इस कारण वैशाली गणतंत्र अजातशत्रु के साथसाथ बुद्ध के लिए भी चुनौती बना हुआ था. बुद्ध उसे अपनी ‘धम्म’ के प्रभावक्षेत्र में लाना चाहते थे. इस कोशिश में बुद्ध वैशाली में कई सभाएं कर चुके थे. लेकिन वैशाली के प्रजाजन उनके प्रभाव से बाहर थे. बुद्ध के लिए ‘मगध’ एवं ‘कोसल’ जैसे राज्यों में जहां राजा निरंकुश होता था, ‘धम्म’ का प्रचारप्रसार करना आसान था. वहां सम्राट को अपने प्रभाव में लाकर उसकी प्रजा के सोच को प्रभावित किया जा सकता था. राज्य का मुख्य अधिपति समर्थन में हो तो उसके संसाधनों के उपयोग का रास्ता भी साफ हो जाता है. जैसे मगध में हुआ. मगर वैशाली के मामले में ऐसा न था. उसमें प्रत्येक नागरिक अपने आपको राजा समझता था. और अपनी वैचारिक चेतना को लेकर स्वतंत्र था. बौद्ध ग्रंथों के अनुसार उस समय वैशाली में 7707 प्रासाद, 7707 कुटागार, 7707 उद्यान, 7707 पुष्करणियां तथा इतने ही राजा थे. यानी जितने प्रासाद थे, उतने ही राजा थे. मान सकते हैं कि जो अपेक्षाकृत बड़े भवनों में रहते थे, जिनका एक सीमा से ऊपर आर्थिक हैसियत थी, केवल उन्हीं को ‘राजा’ बनने का अधिकार था. दूसरे राजा की पदवी के लिए जन्मना क्षत्रिय होना आवश्यक था. इससे यह भी संकेत मिलता है कि 7707 प्रासादों में रहनेवाले 7707 क्षत्रिय परिवार के मुखियाओं को ही ‘राजा’ होने का गौरव प्राप्त था. उनकी नियमित सभा होती थी. जिसमें प्रत्येक ‘राजा’ को अपना मत प्रस्तुत करने का अधिकार था. जहां बौद्धिक स्वातंत्रय हो, वहां किसी एक व्यक्ति, कथित रूप से वह कितना ही पहुंचा हुआ क्यों न हो, को प्रभावित करने से काम बनने वाला नहीं था. जो भी हो बुद्ध द्वारा वैशाली में बौद्ध धर्म के प्रसार के कई प्रयास विफल सिद्ध हुए थे. दूसरी ओर अजातशत्रु भी वैशाली को अपराजेय मानता था. बुद्ध उन दिनों राजग्रह में गृधकूट पर्वत पर विहार कर रहे थे. वैशाली पर ‘धम्म’ की पकड़ न बन पाने के कारण वे खिन्न थे. उधर मगध सम्राट अजातशत्रु भी वैशाली को अपने अधीन करने के लिए ललचा रहा था.

वैशाली उन दिनों वज्जि संघों की महानगरी थी. वज्जि संघ तथा अजातशत्रु दोनों के राज्य की सीमाएं गंगा से मिलती थीं. उन दिनों नदियां दूरदराज के व्यापार का प्रमुख माध्यम थीं. मगध एवं वैशाली के वैभव से आकर्षित हो दूरदूर से व्यापारिक काफिले वहां आया करते थे. नदीतट से जुड़े आधा योजन(लगभग 7.5 किलोमीटर लगभग) तक मगध का अधिकार था और इतने ही क्षेत्र पर वैशाली का. दूरदराज से आए व्यापारियों से माल खरीदने के लिए वैशाली तथा मगध मंे होड़ लगी रहती थी. लेकिन बाजी वज्जि संघ के हाथ लगती थी. इस बात से आहत एक दिन उसने वज्जि संघ को तबाह करने का प्रण किया. लेकिन वह जानता था कि वज्जियों को तबाह कर पाना आसान नहीं है. वज्जि संघ को अपने अधिकार में किस तरह लिया जाए, इस बारे में चर्चा के लिए अजातशत्रु ने अपने महामात्य ‘वस्सकार’ को बुद्ध के पास भेजा. बुद्ध उन दिनों राजग्रह में गिद्धकूट पर्वत पर विहार कर रहे थे. वे जीवन की अंतिम बेला में थे. वैशाली को अपने प्रभावक्षेत्र में न ला पाने का उन्हें किंचित अफसोस भी था. वस्सकार ने सम्राट का यथायोग्य अभिवादन कर सम्राट अजातशत्रु का सारा संदेश कह सुनाया. तब बुद्ध ने अपने शिष्य आनंद से चर्चा के माध्यम से अजातशत्रु को संकेत दिया कि जब तक वैशाली के नागरिक मिलजुलकर फैसले करते हैं, स्त्रियों, बच्चों और बूढ़ों का सम्मान करते हैं, अपने विवादों का निपटारा शांतिपूर्वक कर लेते हैं उस समय तक वे अजेय बने रहेंगे. यह एक संकेत था. जिसे सुनकर चतुर ‘वस्सकार’ की आंखों में चमक आ गई. वापस लौटने के बाद वह अजातशत्रु से मिला. उसके बाद दोनों ने एक गुप्त योजना पर काम करने लगे. योजना के अनुसार सम्राट के निर्णय में अनुचित हस्तक्षेप का आरोप लगाकर वस्सकार को राज्य से निकाल दिया गया. नाराज वस्सकार सीधे वैशाली पहुंचा. अजातशत्रु से अपने मतभेदों को बढ़ाचढ़ाकर पेश करके उसने वैशाली के नगरवासियों की सहानुभूति अर्जित कर ली. उसके बाद कूटनीतिक चालें चलते हुए उसने वैशाली के नागरिकों में फूट पैदा कर दी. गणराज्य का तानाबाना छिन्नभिन्न होने लगा. वैशाली को कमजोर होते देख अजातशत्रु ने एकाएक उसपर हमला कर दिया. वैशाली में रहते हुए वह वहां के नागरिकों में फूट पैदा कर देता है. उसके बाद अजातशत्रु हमला करता है तो विजय उसी के हाथ लगती है. अजातशत्रु न केवल वैशाली के गणतंत्र को छिन्नभिन्न कर देता है, बल्कि उस समय के 36 अन्य गणतांत्रिक राज्यों को तबाह कर वहां अपना शासन स्थापित कर लेता है. बुद्ध इसके लिए उसका विरोध नहीं करते.

चूंकि बुद्ध के विचारों का संग्रहण उनके निर्वाण प्राप्ति के बाद किया गया था, इसलिए उनके शिष्यों के पास इस तरह के प्रयोगों की भरपूर स्वतंत्रता थी. अपने मत के प्रचारप्रसार के लिए उन्होंने जो भी, जैसा भी आवश्यक समझा, उसका भरपूर उपयोग किया. यहां तक कि ईश्वर और अवतारवाद से भी गुरेज नहीं किया. नागसेन को बुद्ध का अवतार सिद्ध करने के लिए स्वयं बुद्ध के मुंह से कहलवाया गया कि 500 वर्ष बाद वे नागसेन के रूप में जन्म लेंगे. ‘मिलिंद प्रश्न’ जो स्पष्टतः बुद्ध से 500 वर्ष बाद की रचना है—जिससे बौद्ध धर्म की ब्राह्मण धर्म के बीच घटती दूरी का पता चलता है. उस समय तक बुद्ध को ‘भगवान’ मान लिया गया था. अवतारवाद, जादूटोना जैसे विकार, जिनका बुद्ध ने अपने उपदेशों में विरोध किया था, समय के साथ बौद्ध दर्शन में भी आने लगे थे. यह कदाचित जनसाधारण के बीच अपनी लोकप्रियता बनाए रखने की लालसा का भी परिणाम था. दरअसल ईसा से पहलीदूसरी शताब्दी के आसपास बौद्ध धर्म दो प्रकार की समानांतर चुनौतियों के बीच से गुजर रहा था. पहली चुनौती उसे ब्राह्मण धर्म की ओर से मिल रही थी. पुरोहितवादी शक्तियां जो बौद्ध धर्म के प्रभाव में कुछ शताब्दियों के लिए आभाहीन हो गई थीं, वे स्वयं को नए सिरे से संगठित करने लगी थीं. तीसरी संभवत आजीवक विचारधारा थी, जो उस समय तक हालांकि क्षीण पड़ चुकी थी, किंतु निरंतर आभाहीन होते बौद्ध विद्वानों को उसका भय सताता रहता था. यह भी हो सकता है कि आजीवकों और ब्राह्मण धर्माबलंबियों की ओर से बढ़ती चुनौती के बीच अपनी श्रेष्ठता के प्रदर्शन के लिए बौद्ध विद्वान नास्तिक विचारकों पर अपनी जीत को बदले समय और चुनौतियों के बीच पात्र बदलबदलकर दोहराते रहते हों. उल्लेखनीय है कि भौतिकवादी विचारकों के प्रभाव से केवल बौद्ध दार्शनिक चिंतित नहीं थे, जैन दर्शन के लिए भी वह चुनौती बना था.

यह ऐतिहासिक सचाई है कि ब्राह्मण धर्म की ओर से निरंतर मिलती चुनौतियों तथा बौद्ध दर्शन के विस्तार के बीच में भौतिकवादी दर्शन धीरेधीरे सिमटने लगे थे. उसके विचारक सामाजिकसांस्कृतिक मूल्यों की तर्क और ज्ञान पर समीक्षा करते थे और कमजोर होने पर जमकर उनकी खिल्ली उड़ाते थे. जबकि आस्था और विश्वास पर आधारित धर्म होने के कारण ब्राह्मण धर्म तर्क से दूर था. बौद्ध धर्म ने भौतिकवादी दर्शनों से उनकी तर्कपद्धति सीखी थी. चूंकि जनसाधारण के आगे जीवन की चुनौतियां बढ़ती जा रही थीं. समाज के गठन का उद्देश्य कि सभी को समान अधिकार मिलेगा, शासक सभी के प्रति न्यायपूर्ण आचरण करेगा—धूमिल पड़ने लगा था. जिस ‘राजा’ नामक संस्था को संसाधनों की सुरक्षा और न्यायपूर्ण विभाजन के अधिकार के साथ गठित किया गया था, वह सभी संसाधनों और निर्णय प्रक्रिया पर एकाधिकार कर स्वयं को सर्वेसर्वा घोषित कर चुकी थी. ऐसे में लोगों का विश्वास तथाकथित ईश्वरीय न्याय के प्रति बढ़ना स्वाभाविक ही था. उसके लिए तर्क में उलझने के बजाय आस्था और विश्वास के सहारे जीवन बिताना कहीं आसान था. वैसे भी सत्ता के संसाधनों के साथ ज्ञान का भी केंद्रीकरण हुआ था. यह मान लिया गया था कि जो शिखर पद पर या उसका कृपापात्र होकर उसके आसपास भी है, वह शिखर से दूर लोगों की अपेक्षा अधिक बुद्धिमान एवं योग्य है. इस धारणा के चलते समाज अपनी ही प्रखर मेधाओं के लाभ से वंचित रहने लगा था. राजाओं को, वे चाहे जितने शक्तिशाली हों, शांति एवं जनसमर्थन की आवश्यकता पड़ती थी. जिनमें पुरोहितवर्ग भी सम्मिलित था. इसलिए वह लोगों के विश्वास(चाहे वह अंधविश्वास) ही क्यों न हो, बाधक बनने के बजाए उसमें सहायक की भूमिका निभाता था. यही कारण है कि प्राचीन भारतीय इतिहास में सम्राटों द्वारा स्कूल एवं पाठशालाएं खुलवाने के उदाहरण नगण्य हैं. जबकि अपने नाम और यश के अनुरूप छोटे से छोटा राजा भी मंदिर और धर्मशालाएं बनवाने का कार्य प्राथमिकता के आधार पर कराता था. अध्ययनअध्यापन का कार्य ब्राह्मणों के सुपुर्द था. राज्य उनकी पाठशालाओं और आश्रमों को दानादि देकर प्रसन्न रखता था. अतः उन पाठशालाओं में वही पढ़ाया जाता था जिनसे सम्राट और शिक्षक ब्राह्मण का हित सधता हो. इसका दुष्परिणाम सत्ता का केंद्रीकरण तथा समाज में भारी असमानताओं के रूप में सामने आया. उपेक्षित वर्गों में असंतोष न पनपे, उसके लिए धर्म की शरण ली. जाति और धर्म के चंगुल में फंसा समाज समाजार्थिक असमानताओं को अपनी नियति मानकर जीने लगा. कुल मिलाकर धर्मदर्शन का पिछले दो हजार वर्षों का इतिहास, समाज के अनेकानेक टुकड़ों में बंटने और निरंतर प्रतिक्रियावादी होते जाने का सिलसिला भी है. इस बीच समयसमय पर बदलाव की कोशिशें भी हुईं. कई महामानव उभरे. लेकिन किसी न किसी रूप में उन सभी के प्रयास धर्मकेंद्रित रहे. धर्म के सामंती संस्कारों के दबाव में समानताआधारित स्वावलंबी समाज का गठन, कुछ भले लोगों के स्वप्न से आगे न बढ़ सका.

© ओमप्रकाश कश्यप

सभ्यता का विकास और कहानी

विशेष रुप से प्रदर्शित

मनुष्य और किस्सागोई के नजदीकी संबंध के तीसचालीस हजार वर्ष पुराने पुख्ता प्रमाण आज मौजूद हैं. बावजूद इसके कहानी कला के उद्गम की खोज के लिए यह अवधि बहुत नई है. हिमयुग की दहलीज पर ही मनुष्य समय बिताने, अनुभव साझा करने तथा संघर्षपूर्ण जीवन में मनोरंजन की भरपाई के लिए किस्सेकहानियों का सहारा लेने लगा था. तब तक वह अक्षरज्ञान से अनभिज्ञ था. बाकी कलाएं भी अल्पविकास की अवस्था में थीं. खेती करना तक उसे नहीं आता था. पूरी तरह प्रकृतिआधारित जीवन में भोजन जुटाने का एकमात्र रास्ता थाशिकार करना. किसी कारण उसमें सफलता न मिले तो प्राकृतिक रूप से उपलब्ध भोजन यथा कंदमूलफल आदि पर निर्भर रहना. प्राकृतिक आपदाओं, वनैले जीवों से भरपूर घने जंगलों में जैसे भी संभव हो, अपनी सांगठनिक एकता एवं संघर्ष के बल पर खुद की रक्षा करना. अपने संगठनसामथ्र्य एवं परिस्थितिकीय सामंजस्य के हुनर के दम पर प्राचीन मनुष्य उन चुनौतियों से जूझता था. कभी सफल होता था, कभी असफल. प्राचीन वनाधारित यायावरी जीवन की वे सामान्य विशेषताएं थीं. उसमें जीतहार लगी ही रहती थी. जीवन का हर नया अनुभव उसे रोमांचित करता. यदाकदा हताशा के क्षण भी आते, किंतु मानवीय जिजीविषा के आगे उनका लंबे समय तक ठहर पाना संभव न था. या यूं कहो कि बुरे सपने की तरह उन्हें भुलाकर वह यायावर कर्मयोगी तुरंत आगे बढ़ जाता था. कठोर संघर्षमय जीवन तथा अनूठेपन से भरपूर अनिश्चितसी स्थितियां मानवीय कल्पनाओं के नित नए वितान तैयार करती थीं. उन्हें सहेजकर दूसरों तक पहुंचाने, उनके माध्यम से समूह का मनोरंजन करने की चाहत ने किस्सेकहानियों को जन्म दिया.

उस समय तक मनुष्य का स्थिर ठिकाना तो बना नहीं था. धरती का खुला अंचल और प्रकृति की हरियाली गोद उसे शरण देने को पर्याप्त थी. जंगल में शिकार का पीछा करते हुए आखेटी दल का यदाकदा दूर निकल जाना; अथवा लौटते समय रास्ता भटककर जंगलों में खो जाना बहुत सामान्य बात रही होगी. फिर भी आखेट के लिए गए लोगों के वापस लौटने तक उनके वे परिजन जो बीमारी, वृद्धावस्था अथवा किसी अन्य कारण से आखेट पर न जा पाए हों, उनकी प्रतीक्षा में परेशान रहते होंगे. आकुल मनस्थितियों में समय बिताने के लिए समूह के सदस्यों के साथ अनुभव बांटना, धीरेधीरे एक लोकप्रिय चलन बनता गया. मनोरंजन की उत्कट चाहत, जो उस संघर्षशील जीवन की अनिवार्यता थी, उत्पे्ररक का काम करती थी. आखेटी दल के लौटने पर समूह के बीच हर बार नए अनुभवों के साथ कुछ नए किस्से भी जुड़ जाते थे. अभियान सफल हो या असफल, आखेट से लौटे सदस्यों के पास अपने परिजनों को सुनाने के लिए भरपूर मसाला होता था. उनमें से कुछ वर्णन निश्चय ही दुख और हताशा से भरे होते होंगे, जिन्हें सुनकर समूह के सदस्यों की आंखें नम हो आती होंगी. फिर भी वे उनके यायावर जीवन का जरूरी हिस्सा थे और परिवार नामक संस्था के अभाव में, उन्हें एक होने की प्रतीति कराते थे. इसलिए शाम को भोजन के बाद अथवा फुर्सत के समय दिनभर के रोमांचक अनुभवों का पिटारा समूह के सदस्यों के आगे खोल दिया जाता. उन्हें सुनने के लिए बूढ़ोंबच्चों सभी में होड़ मच जाती होगी.

सुनाने के लिए शुरूशुरू में सीधेसपाट वर्णन का सहारा लिया जाता होगा. जैसेजैसे अनुभव बढ़ा, घटना को रोमांचक एवं मनोरंजनपूर्ण बनाने के लिए कल्पना का सहारा लिया जाने लगा. जो व्यक्ति घटनाओं को लुभावने अंदाज में सुनाने में सिद्ध होता, समूह उसकी बातें सुनने को उत्सुक रहता. उसको विशिष्ट सम्मान देता था. लंबे संघर्षपूर्ण जीवन के पश्चात, वृद्धावस्था को प्राप्त लोगों के लिए भी अपने पिछले जीवन के शौर्यपूर्ण किस्से सुनाना समय बिताने का एकमात्र जरिया रहा होगा. किस्सागोई की नींव ऐसे ही अनुभवसिद्ध लोगों द्वारा रखी गई. मनोरंजन की जरूरत के चलते लोग उनके पास आते. चूंकि उनके पास अनुभवों का विशाल खजाना होता था, इसलिए वे उनके साथ ससम्मान पेश आते थे. उस समय तक मनुष्य का जीवन स्वेच्छाचारी था. समाज का विधिवत गठन अभी नहीं हो पाया था. लेकिन किस्सेकहानी तथा दूसरी विकासमान कलाओं के प्रभाव में रागात्मक संबंध स्थायी रूप लेने लगे थे. इससे समूह की, बाद में जब समूह के सदस्यों की संख्या बढ़ने लगी तो परिवार की संकल्पना ने जन्म लिया. स्पष्ट है कि किस्सेकहानियां मनुष्य के समाजीकरण के न केवल साक्षी, बल्कि उत्पे्ररक और सहायक भी बने थे. फिर जैसेजैसे समाज बढ़ा, वैसेवैसे किस्सेकहानियों के रूपकलेवर में भी बदलाव आता गया. आरंभिक कहानियां व्यक्ति के रोजमर्रा के अनुभवों से उपजी सत्यकथाएं अथवा थोड़ीबहुत बढ़ाचढ़ाकर पेश की गईं कल्पकथाएं ही थीं. उनमें रहस्यरोमांच, हर्षविषाद, सुखदुख, करुणामैत्री, मिलनबिछोह, साहसउत्साह के साथसाथ मनुष्य की आदिम जिज्ञासाओं, प्रवृत्तियों, भावनाओं और कल्पनाशीलता की सहज और युगानुकूल अन्विति थी. कह सकते हैं कि कहानी कला दुनियाभर की उन आरंभिक कलाओं में से है जो सभ्यता के एकदम आदिम छोर पर, जीवन की धड़कनों के बीच स्वाभाविक तौर पर विकसी थीं. उसकी उत्पत्ति के मूल में यद्यपि मनोरंजन प्रमुख तत्व था, तथापि कहानी सहित विभिन्न कलाभिव्यक्तियों के विकास का एकमात्र वही अभिप्रेत नहीं था. उन कलारूपों के विकास के पीछे मनुष्य की ज्ञान की ललक, अपनी मौलिक कल्पना द्वारा उन्हें नए कलेवर में ढालकर अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की दृढ़ इच्छाशक्ति तथा उनसे कुछ सीखने, सिखाने एवं स्वयं को दैनंदिन के समर हेतु तैयार रखने की कामना सन्निहित थी

उनका नृत्य, जिसमें संभवतः कुछ लोग टोटम पशु की नकल उतारते थे, कुछ शिकारियों की, एक धर्मानुष्ठान के साथसाथ, आखेट का अभ्यास भी था. वह एक प्रकार से आखेट विधि की कवायद ही थी. इसी से कई हजार वर्ष पश्चात नृत्यनाट्य(वले) और नाटक का विकास होने वाला था. हिमयुग में जंगली पशुओं के जो हुबहू चित्र तैयार किए गए थे(फ्रांस एवं स्पेन की गुफाओं में) उन्हें अब अनुपम कलाकृतियां समझा जाता है. परंतु मूलतः ये चित्रकला की विशेष भावना से तैयार नहीं किए गए थे. जहां दिन का उजाला नहीं पहुंच सकता, ऐसी अंधेरी गुफाओं में ये चित्र चरबी से जलने वाले मंद दीपों या मशालों की रोशनी में तैयार किए गए थे. उत्कृष्ट पशु प्रतिमाओं का इस्तेमाल, जैसा कि इनपर भालों और तीरों से बने हुए छेदों से पता चलता है, लक्ष्यभेद के आनुष्ठानिक अभ्यास के लिए होता था.’

प्राकृतिक घटनाओं में एक नैरंतर्य एवं तारतम्यता रहती है. आरंभिक कहानियां उसी से अनुप्रेत थीं. प्रकृति की भांति कहानी के भी कई रंग थे. सुख हो या दुख, कहानी जीवन में प्रत्येक क्षण मनुष्य के साथ थी. उथलपुथल भरे उसके जीवन में नए किस्सेकहानी का बानक बन ही जाता था. घने जंगल तथा मौसम की विकट परिस्थतियों में, लंबे आखेट के उपरांत ठिकाने पर सकुशल लौट आना भी कम उत्सवधर्मी घटना न थी. हर्ष अथवा शोक के ऐसे समविषम क्षणों में आखेटकुशल पूर्वजों की वीरता, साहस, विपत्ति एवं त्रासदियों के किस्से खासे लोकप्रिय होते होंगे. स्वाभाविक रूप से ऐसे किस्सों को बारबार सुनासुनाया जाता होगा. सुनाते समय प्रत्येक व्यक्ति उन्हें अपनी तरह से प्रस्तुत करता. प्रस्तुतीकरण के दौरान वह श्रौत कथानक में अपनी रुचि के अनुसार कुछ न कुछ जोड़ताघटाता रहता था. फलस्वरूप समय के साथ उनमें कल्पना का पुट बढ़ता गया. कल्पना को गति देने में वातावरण एवं प्रकृति का योगदान कम न था. खुले, तारों से भरे आसमान, तरहतरह की वनवनस्पतियों, जंगली जानवरों, नदियों, पहाड़ों, झरनों आदि से भरे भूमांचल में बहुतसी बातें मनुष्य को प्रभावित करती थीं. आरंभिक कहानियां सत्यकथाओं के करीब थीं. रोजमर्रा के अनुभवों में मनुष्य को जो भी विचित्र लगता, उसे सहेजने के लिए वह कहानीकिस्सों में ढाल लेता था. उसको धीरेधीरे एहसास हुआ होगा कि सीधेसपाट ढंग से कहने की अपेक्षा प्रतीकों के रूप में बयान की गई घटना अधिक संप्रेषणीय होती है. उसका प्रभाव दीर्घकालिक होता है. उसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक, एक समाज से दूसरे भिन्न परिस्थितियों में रह रहे समाज तक, पहुचाने में आसानी रहती है. पात्रों एवं घटनाओं का प्रतीकीकरण इसलिए भी आवश्यक था, क्योंकि सुनिश्चित ठिकाने के अभाव, मौसम की मार और भोजन की जरूरत के चलते उसके यायावरी जीवन में प्रायः परिवर्तन होता रहता था. अतएव ऐसे पात्रों और घटनाओं का समावेश जरूरी था, जिनकी विभिन्न परिस्थितियों तथा कबीलाई समूहों के बीच अधिकतम स्वीकार्यता हो. इसके लिए नए कल्पनालोक गढ़े गए, ताकि मनुष्य के भौतिक आवत्र्तनप्रत्यावर्तन का उसके द्वारा गढ़े गए किस्सेकहानियों, जो तब तक उसकी जीवनसंस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन चुके थे, की विश्वसनीयता पर कोई संकट न पड़े. समाजीकरण के आरंभिक दौर में मनुष्य यह भी समझ चुका था कि समूह की एकता को बनाए रखने हेतु जीवनमूल्यों में स्थायित्व होना चाहिए. इसके लिए भी किस्सेकहानी मददगार बने. बढ़ते अनुभवों एवं कल्पनाशक्ति के फलस्वरूप मानवअभिव्यक्ति में प्रतीकात्मकता एवं गुणवत्ता में निखार आता गया. संघर्षपूर्ण जीवन में कल्पना और प्रतीकात्मकता से भरे किस्सों की अपनी उपयोगिता थी. प्रतीकों ने वर्णन को रोचक बनाया. उनके माध्यम से बात समझाना आसान था. एक कहानी के माध्यम से इसको आसानी से समझा जा सकता है

एक लकड़हारा था. बहुत ही चतुर और बुद्धिमान. उसके साथी उसकी अक्लमंदी का लोहा मानते थे. एक बार की बात लकड़हारा जंगल में लकड़ी काटने निकला. वहां एक सूखे पेड़ को देख उनकी बांछें खिल गईं. पेड़ बड़ा था. उसकी लकड़ी को अकेले घर ले जाना संभव न था. कुछ सोचकर उसने जंगल से ही कुछ मजदूर दिहाड़ी पर ले लिए. काम को जल्दी निपटाने के फेर में वह पेड़ पर चढ़ा और जल्दीजल्दी कुल्हाड़ी चलाने लगा. हड़बड़ी में कुल्हाड़ी का बेंट तने से टकराया और ‘खटाक्!’ कुल्हाड़ी हत्थे से अलग हो दूर जा गिरी.

उफ्!’ उसके मुंह से निकला, ‘काश! एक कुल्हाड़ी और ले आता.’ वह बड़बड़ाया. चेहरे पर परेशानी झलकने लगी

अब क्या करें उस्ताद?’ एक मजदूर ने इशारे में पूछा. लकड़हारा सोच में पड़ा था. वह खाली हाथ घर नहीं लौटना चाहता था. उपाय एक ही था, घर से नई कुल्हाड़ी मंगवाई जाए. कटी हुई लकड़ी को छोड़ वह खुद जाना न चाहता था. तब लकड़हारे ने निर्णय लिया कि किसी मजदूर को घर भेजकर कुल्हाड़ी मंगवा ली जाए. पर भेजा किसे जाए? नौकरों को उसकी भाषा आती न थी. और पत्नी थी अनपढ़. चैकाचूल्हे में रमी रहने वाली.

खूब सोचविचार के बाद उसने एक पत्थर मंगवाया. उसपर खडि़या मिट्टी से कुछ रेखाएं खींचीं और मजदूर को थमा दिया. मजदूर गया. लौटा तो उसके हाथ में नई कुल्हाड़ी थी. लकड़हारा तो काम में जुट गया. मगर साथ काम कर रहे मजदूरों की समझ में कुछ न आया. यह कैसे संभव हुआ कि लकड़हारे की पत्नी ने बिना कुछ पूछे नई कुल्हाड़ी उसके हाथ में थमा दी. जरूर वह कोई जादू जानता है. जबकि जादू जैसी कोई बात संभव ही नही है. लकड़हारे ने पत्थर पर कुल्हाड़ी का चित्र बनाकर मजदूर को दिया था. उस संकेत को समझकर उसकी पत्नी ने उसको कुल्हाड़ी थमा दी थी.

जाहिर है कि कहानीकला के विकास के साथ उसके स्थूल कथानक का महत्त्व घट रहा था. धीरेधीरे लोग यह समझने लगे थे कि कहानी के पात्रों और घटनाओं की महत्ता सामान्यतः मनोरंजन तत्व को विस्तार देने तक सीमित है, असली चीज वह संदेश है, जिसे लोककल्याण के वास्ते सहेजना जरूरी है. कालांतर में समाज में ऐसी कहानियों तथा प्रतीकों का महत्त्व बढ़ता ही गया. नएनए प्रतीकों को जोड़ने के लिए मनुष्य ने अपनी कहन की कला का विस्तार किया. मनुष्य की आदिम सहयोगी बनीं वे कहानियां इतनी उपयोगी और महत्त्वपूर्ण मानी गईं कि मनुष्य उन्हें न केवल सुनतासुनाता था, बल्कि उन्हें सहेजने का भी प्रयत्न करता था. फ्रांस और स्पेन की सीमा पर मौजूद लेस्काक्स की रहस्यमयी कंदराओं में बनीं अनूठी चित्रमालाओं से सिद्ध होता है कि अपने अनुभवों और कल्पनाओं को स्थायी बनाने के लिए प्राचीन मनुष्य कितना सजग था. उन चित्रमालाओं के अध्ययन से यह भी सामने आया है कि उन कलाभिव्यक्तियों का उद्देश्य केवल मनःरंजन तक सीमित नहीं था, बल्कि उनका उपयोग नवांतुक पीढ़ी को जंगल की परिस्थितियों का बोध कराने तथा किशोर शिकारियों को आखेटकला में प्रवीण बनाने के लिए भी किया जाता था. जिन दीवारों पर ये चित्रमालाएं हैं, वहां कुछ निशान भी पाए गए हैं, जो तीर, भाले अथवा किसी नुकीले हथियार के हो सकते हैं. उनसे प्रतीत होता है कि आदिमानव समूह के सदस्य उनका उपयोग निशाना साधने के लिए भी करते थे. आदिमानव द्वारा वे चित्र गुफाओं में, चट्टानों तथा ऐसे सुरक्षित एवं बहुगंतव्य ठिकानों पर बनाए गए, जिधर आदिमसमूहों का निरंतर आनाजाना था. उद्देश्य यही था कि कबीले के सदस्य तथा नवांतुक कबीले वहां ठहरकर मनःरंजन के साथसाथ आखेटकला की भी एकांतसाधना कर सकें. वन्य जीवों से भरे जंगल में, जहां कदमकदम पर खतरनाक स्थितियां और जीवन की चुनौतियां हों, आखेट हेतु निर्विघ्न अभ्यास के लिए ऐसे सुरक्षा प्रबंध अपरिहार्य थे. लेस्काॅक्स और आसपास की पहाडि़यों में बने पांच सौ से अधिक चित्रों से पता चलता है कि कभी वहां पर अलगअलग कालखंड के दौरान प्राचीन मनुष्य की अनेक टुकडि़यों ने बसेरा किया था. आखेट के अभ्यास के अलावा वे भित्तिचित्र उनके मनोरंजन की कमी को भी पूरा करते होंगे. शोध के अनुसार इन चित्रावलियों की रचना अलगअलग समय में की गई. इसी प्रकार की चित्रावलियां मध्यप्रदेश के विंध्यांचल और सतपुड़ा की पहाडि़यों में भी मिलती हैं. इनमें सबसे उल्लेखनीय नाम भीमबैठका का है. भोपाल से 40 किलोमीटर दक्षिण में स्थित भइयापुर गांव के आसपास मौजूद पहाडि़यां कभी आदिवासियों का ठिकाना थीं. यहां पहाडि़यों पर मनुष्य की प्राचीनतम कलाभिव्यक्तियों के निशान मौजूद हैं. इस विश्वधरोहर को दुनिया के सामने लाने का श्रेय विक्रम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विष्णु श्रीधर वाकणकर को जाता है. शोध बताते हैं कि प्रस्तर काल में यहां बड़ी संख्या में आदिम मनुष्यों का बसेरा था. एक पूरी बस्ती. लगभग 750 शैलआश्रयों में से 500 शैलआश्रयों में गेरुए, लाल, सफेद हरे, कहींकहीं पीले और हरे रंग में चिंत्रों की लंबी शृंखला है. जिनमें बाघ, शेर, घडि़याल, कुत्ते, हाथी, नीलगाय आदि जानवरों को चित्रित किया गया है. इन चित्रावलियों की सटीक उम्र का आकलन तो अभी बाकी है, किंतु अभी तक जो शोध हुए हैं, उनके अनुसार प्राचीन मनुष्य की अभिव्यक्ति कला के वे अवशेष 15000 से 35000 वर्ष तक पुराने हैं. भारत के अलावा फ्रांस, स्पेन, आस्ट्रेलिया आदि में भी इसी प्रकार के चित्र प्राप्त हुए हैं. ये सभ्यता के उभार के एकदम आरंभिक दौर को सामने लाते हैं, जब मनुष्य ने अपनी स्मृति और कलाओं को सहेजने के प्रयास संभवतः शुरू ही किए थे.

स्पष्ट है कि कहानीकला मनुष्य की प्राचीनतम खोज है. वह तब से मनुष्य के साथ है, जब तक मनुष्य किसी ज्ञात सभ्यता के प्रभाव से दूर था. वह मनुष्य के सभ्यताकरण की साक्षी, उसकी प्रेरक और अनुगामिनी रही है. कहानीकला को विस्तार देने, कहानियों को और अधिक रोचक एवं कल्पनाप्रधान बनाने की कोशिश में मनुष्य अपनी रचना के साथ नित नए प्रयोग करता गया. आरंभिक किस्सेकहानियों के पात्र मनुष्य के अनुभव जगत से सीधे जुड़े पशुपक्षी तथा वन्यप्राणी होते होंगे. उनमें भी ऐसे पशुपक्षियोंवन्य प्राणियों की संख्या अधिक रहती होगी, जो किसी न किसी प्रकार उनके सहयोगी थे अथवा जिनसे खतरे की संभावना होने के कारण बचाव की जरूरत थी. उस समय तक लिपि का आविष्कार नहीं हुआ था. अतएव तत्कालीन भावाभिव्यक्तियों के स्वरूप का सटीक अनुमान लगा पाना तो असंभव है, तथापि भित्तिचित्रों तथा उस समय की अन्य कलाभिव्यक्तियों द्वारा हम आसानी से इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि वे सब विपरीत परिस्थितियों में हिम्मत न हारने, चुनौतियों में साहस और धैर्य बनाए रखने, खुद पर भरोसा करने तथा सतत संघर्ष की प्रेरणा देने वाली रही होंगी. कुछ विद्वानों का मानना है कि अभिव्यक्ति के क्षेत्र में पद्य का आगमन गद्य की अपेक्षा पहले हुआ था. इसमें पूरी सचाई भले न हो, मगर एक बात पद्य के पक्ष में अवश्य जाती थी. जब तक लिपि का आविष्कार नहीं हुआ था, भाषाभिव्यक्तियों को सहेजने के लिए स्मृति ही एकमात्र माध्यम थी. भारत में वेदादि ग्रंथों को श्रुति ग्रंथ इसीलिए कहा जाता है. चूंकि पद्य को गद्य की अपेक्षा आसानी से याद किया जा सकता था, वह सुननेसुनाने में भी प्रिय लगता था और उसमें दूसरों को प्रभावित करने की क्षमता अधिक थी, अतएव कहानी का प्रथम सहेजा गया रूप पद्यात्मक हो सकता है. प्रख्यात अमेरिकी लेखिका रुथ साॅवयर इस बारे में सुनिश्चित हैं

कहानी गढ़ने का सर्वप्रथम प्रयास, आदिम समूहों द्वारा चक्की चलाते, किश्ती खेते, शिकार अथवा युद्ध के लिए हथियारों की धार चढ़ाते या पर्वउत्सव के बहाने समयसमय पर सामूहिक रूप से गएगुनगुनाए जा सकनेवाले गीतों के माध्यम से हुआ होगा. आदिगायक या किस्सागो अपनी अद्वितीय वीरता पर इतरानेवाला, आत्माभिमानी तथा विजयोल्लास में डूबकर स्वच्छंद आनंद मनानेवाला पहला इंसान रहा होगा. अपनी पुस्तक ‘दि वे आफ स्टोरीटेलिंग’ में सावयर ने कनाडा के तटीय क्षेत्र में बसने वाले आदिवासियों के एक प्राचीनतम गीत को उद्धृत किया है

मैं, कोको, मैने एक भालू का शिकार किया

होहोहो…..

बड़ा भालू….डरावना भालू

हेहेहे…..

उसको मैंने अपने बल से परास्त किया

हेहेहे….

मेरी बाजुओं में अपार शक्ति है

वे भाला फेंकने के लिए काफी मजबूत हैं

वे नाव खेने के लिए मजबूत हैं….मैं कोको

हे….हे….हे….हो….हो….हो.

यह कविता दर्शाती है कि प्रारंभिक अभिव्यक्तियां जीवन से जुड़ी थीं. उनमें कल्पना का योग कम से कम था. लेकिन इससे यह मान लेना कि आरंभिक अभिव्यक्तियां केवल पद्यात्मक रही होंगी, उचित न होगा. दिनभर जंगल की परिस्थितियों से जूझने के बाद शाम को घर लौटने वाले आदिम मनुष्य के लिए समूह के सदस्यों के साथ अपने अनुभव साझा करने के लिए यह संभव न था कि वह उन्हें पद्य में तत्काल अभिव्यक्त कर सके. क्योंकि अनुभवों के पद्य रूपांतरण के लिए ज्यादा समय और काव्यात्मक प्रतिभा की आवश्यक थी. दूसरे सीधेसरल गद्य का आनंद बच्चे भी ले सकते थे. इसलिए अधिकांश सदस्यों के लिए अनुभवों की सीधी गद्यात्मक प्रस्तुति आसान रहती होगी. उनमें वह आवश्यकतानुसार कल्पना का प्रयोग भी करता होगा. पद्य का विकास कदाचित फुर्सत और एकांत के क्षणों में, आगत की कल्पना, अनुभवों को सहेजने की लालसा अथवा समूह के सदस्यों का मनोरंजन करने की कामना के साथ हुआ होगा. आज इस बात के पुरातात्विक प्रमाण मौजूद हैं कि मानवसभ्यता का विकास पृथ्वी के अलगअलग हिस्सों में हुआ. सिंधु घाटी, मेसोपोटामिया(इराक), मिस्र, चीन, बेबीलोन, आदि क्षेत्रों में लगभग एक ही समय में अलगअलग संस्कृतियां पनपीं. समय के साथसाथ वे एकदूसरे के संपर्क में आईं. उनमें आर्थिकसामाजिक लेनदेन बढ़ा. आपसी व्यापार में तेजी के फलस्वरूप उनमें सांस्कृतिक आदानप्रदान की भी शुरुआत हुई. फलस्वरूप कला और संस्कृति के दूसरे उपकरणों के आदानप्रदान में तेजी आई. इसलिए यह भी संभव है कि अपनी भावाभियक्तियों को सहेजने के लिए अलगअलग सभ्यताओं ने अलगअलग पद्धतियों को खोजकर उन्हें अपनाया हो. लिपि के आविष्कार का श्रेय बेबीलोनवासियों का जाता है. उससे पहले कलाभिव्यक्तियों को सहेजने का एकमात्र आधार स्मृति थी. यद्यपि चित्रलिपि और प्रस्तर कला का आविष्कार बहुत पहले, हिम युग में ही हो चुका था, लेकिन उसको दूसरे स्थान पर ले जाना संभव न था. इसलिए आरंभिक चित्र गुफाओं में, ऐसे सुरक्षित ठिकानों पर बनाए गए, जहां जीवन अधिक सुरक्षित था और जिधर से मानवसमूहों का आनाजाना लगा रहता था. लिपि का आविष्कार होने के पश्चात कलाभिव्यक्तियों को नए प्रारूप में सहेजना संभव हुआ. आरंभिक यायावरी जीवन में मनुष्य एक स्थान से दूसरे स्थान तक विचरता रहता था. एकदूसरे से संपर्क के समय जहां संघर्ष की संभावना थी, वहीं व्यक्तिगत अनुभवों और कलारूपों को साझा करने के अवसर भी मिलते होंगे. इसलिए आरंभिक कलारूपों में वैविध्य के साथसाथ एक किस्म की एकरूपता भी नजर आती है.

भारतीय उपमहाद्वीप में कहानी लेखन की परंपरा बहुत पुरानी है. ऋग्वेद, जिसे संसार के सबसे पुराना ग्रंथ होने का गौरव प्राप्त है, में अनेक कहानियां आई हैं. प्रत्येक कहानी का कोई न कोई उद्देश्य है. उसके माध्यम से उद्गाता ऋषि पाठकोंश्रोताओं तक एक नैतिक संदेश पहुंचाना चाहता है. इससे उस समय कहानी कला के विकास का अनुमान लगाया जा सकता है. महाभारत में तो छोटीछोटी हजारों कहानियां मिलकर बड़े ग्रंथ का रूप ले लेती हैं. उन्हीं कहानियों के बल पर वह जीवन और समाज का समग्र दस्तावेज बन जाता है. वे उसकी ‘जय’ से ‘विजय’ फिर ‘भारत’ और अंततः ‘महाभारत’ तक की यात्रा का बानक बनी हैं. वेदों के अलावा उपनिषद्, रामायण, कथासरित्सागर, जातक कथाओं आदि में भी सैकड़ों कहानियां संकलित हैं. उन सभी में गजब की एकरूपता है. इससे अनुमान लगा सकते हंै, कि उन ग्रंथों में पंक्तिबद्ध होने से पूर्व वे कहानियां लोकसाहित्य के रूप में समाज में बहुत पहले से विद्यमान रही होंगी. लोकसाहित्य के रूप में ही वे धरती के एक छोर से दूसरे छोर तक की यात्रा करती रही हैं. विश्वसभ्यताओं में नागरीकरण की शुरुआत ईसा से सातआठ वर्ष हजार पहले हो चुकी थी. ईसापूर्व 3000 वर्ष पहले तक धरती के अलगअलग कोनों में विकसित संस्कृतियों के बीच व्यापारिक संबंध विकसित हो चुके थे. उनके बीच आर्थिक के साथसाथ सामाजिकसांस्कृतिक आदानप्रदान भी बढ़ा था. उनके आपसी संपर्क को प्रगाढ़ बनाने, संबंधों में आत्मीयता का विस्तार करने में इन कहानियों का बड़ा योगदान था. एक क्षेत्र की लोकप्रिय कहानियां दूसरे हिस्से में जाकर न केवल लोकप्रिय हुईं, बल्कि उनमें वहां के क्षेत्रवासियों ने अपनी रुचि एवं परिस्थितियांे के अनुसार आवश्यक परिवर्तन भी किया.

सभ्यताकरण की साक्षी रही कहानियों ने हर समाज, हर परिवेश में अपनी उपस्थिति बनाए रखी है. इसके बावजूद दुनिया के पहले किस्सागो और प्रथम कथालेखक का पता लगाना असंभव है. केवल यह कहा जा सकता है कि मनुष्य को जिन दिनों पहली बार भाषाज्ञान हुआ, जब उसे अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने की कला आई, तभी से वह अपनी कहानियां भी एकदूसरे के साथ साझा करने लगा था. कहानियों के माध्यम से वह मनोरंजन और शिक्षा दोनों उद्देश्यों को साधता था. कहानी द्वारा मनोरंजन का पहला लिखित प्रमाण 2560 ईस्वीपूर्व का है. मिस्र की पहाडि़यों से प्राप्त दस्तावेज के अनुसार प्रसिद्ध पिरामिड निर्माता यूनानी सम्राट खुपु के तीन पुत्र अपने यशस्वी पिता के मनोरंजन के लिए बारीबारी से रोमांचभरी कहानियां सुनाते हैं. लेखनकला का आविष्कार बेवीलोनवासियों ने किया. प्रथम महाकाव्य के लेखन का श्रेय भी उन्हीं को दिया जाता है. विश्व का पहला महाकाव्य होने का गौरव ‘गिलगमेश’ को प्राप्त है. विद्वानों के अनुसार गिलगमेश उरुक का राजा था, जिसने 3000 ईस्वीपूर्व दक्षिणी बाबुल पर राज किया था. उसी गिलगमेश की र्कीतिकथा इस महाकाव्य का आधार है. उसमें भरपूर कल्पना तत्व है. कथानायक गिलगमेश बहादुर सम्राट है. कहानी में मिट्टी और लार से बना अर्धमानव पशु एनकिडु है, जो कालांतर में गिलगमेश का दोस्त बन जाता है. इस कथा को लगभग 2000 वर्ष पहले कीलाक्षरों में लिपिबद्ध किया गया था. यह भी संभावना है कि लिपिबद्ध होने से पूर्व गिलगमेश की र्कीतिकथा भी शताब्दियों तक लोकसाहित्य में श्रुति रूप में प्रचलित रही हो. गिलगमेश की कहानी इतनी लोकप्रिय हुई कि बेबीलोन की कीलाक्षर लिपि जहांजहां भी गई, वहां यह कथा भी पहुंची. गिलगमेश वीररस से भरपूर कृति है, उसमें इतिहास और कल्पना दोनों का सम्मिश्रण हैं. यह कहानी दर्शाती है कि 5000 वर्ष पहले तक मनुष्य कल्पना के आधार पर पात्र गढ़ने लगा था. विशिष्ट वीरता का प्रदर्शन करने वाला व्यक्ति समूह के बीच सम्मान का पात्र माना जाता था.

आशय है कि ईसा पूर्व दूसरी सहस्राब्दी तक कहानीकला काफी विकसित हो चुकी थी. उससे पहले तक कहानी या तो ठेठ अनुभवाधारित होती थी, अथवा अनुभव और कल्पना का सम्मिश्रण. आगे की कुछ शताब्दियों में इसमें परिवर्तन आया, फलस्वरूप कल्पना के आधार पर नएनए कथानक गढ़े जाने लगे. कहानी की बढ़ती लोकप्रियता को देखकर प्रतिभाशाली किस्सागो इस क्षेत्र से जुड़े थे, जो श्रोताओं की रुचि को समझते हुए कहानियां गढ़ने में माहिर थे. उन्हीं के फलस्वरूप कहानी में कल्पना का अनुपात बढ़ता गया. विशुद्ध कल्पना पर केंद्रित कथानक और कहानी कला की कसौटी पर सही पाए जानेवाली मिस्र की पुरानी ‘राजकुमार और उसके तीन नसीब’ (दि प्रिंस एंड दि थ्री फेट) का उल्लेख प्रायः होता है. इस कहानी में जहां लोककथा के भरपूर तत्व हैं, वहीं इसमें कल्पना का भी भरपूर इस्तेमाल किया गया है. इस कहानी का 1500 वर्ष पुराना लिखित प्रारूप उपलब्ध है. इस बात की भी प्रबल संभावना है कि लिखित रूप में आने से पहले यह कहानी लोकसाहित्य का हिस्सा रही होगी. अनूठी परिकल्पना और कथातत्व के आधार पर हम इसे विश्व की आदि परीकथा भी कह सकते हैं. इसमें कांचघर, बड़ी समुद्र जैसी नाव की अनूठी कल्पना है. कुछ विद्वान इसे कल्पना पर आधारित पहली कहानी मानते हैं. जो अस्वीकार्य है, क्योंकि वेदों, उपनिषदों तथा यूनानी ग्रंथों के अनुसार कल्पनाआधारित कहानियों के सृजन की शुरुआत 3000 वर्ष पहले ही हो चुकी थी.

भारतीय परंपरा में ऋग्वेद में, जो विश्व की पहली कृति है, अनेक उपकथाएं भी आई हैं. वे कल्पना के द्रष्टिकोण से भी अत्यंत विलक्षण हैं. निरे मनोरंजन के बजाय वे विशेष उद्देश्य को लेकर गढ़ी गई हैं, इसलिए कथारस के साथसाथ उनमें लक्ष्य की प्रधानता है. वस्तुतः ऋग्वेद के मनस्वी विद्वानों का ध्येय कहानी लिखना न होकर जीवनमूल्यों से भरपूर धार्मिकआध्यामिक संदेश को आनेवाली पीढि़यों के लिए सहेजना था. केवल मनोरंजन के लिए लेखन उनकी वृत्ति नहीं थी. इसलिए वेदों में आई प्रत्येक उपकथा का विशिष्ट उद्देश्य है. वहां कथातत्व मुखर न होकर प्रच्छन्न रूप में आया है. यहां ऋग्वेद से दो उदाहरण देना प्रासंगिक होगा. दो इसलिए क्योंकि आगे चलकर कहानी की जो यात्रा चलती है, दोनों कथासूत्र उसके आदिप्रतिनिधि अथवा दिशावाहक कहे जा सकते हैं. इनमें पहली कहानी जुआरी की है. उल्लेखनीय है कि जुआ वैदिक काल में ही एक बुराई के रूप में पनप चुका था. जुए की बुराई और उसके जुआरी के परिवार पर पड़नेवाले दुष्प्रभाव को दर्शाता हुआ एक अत्यंत मार्मिक कथासंकेत ऋग्वेद में आया है. उसके दशम मंडल का 34वां सूक्त जुआरी की मनोदशा का वर्णन करता है. स्थितियां यथार्थपरक और दिल को छू लेनेवाली हैं. कहानी के अनुसार एक जुआरी है. वह बारबार जुआ न खेलने की शपथ लेता है. लेकिन पासों की ध्वनि उसकी व्याकुलता को बढ़ा देती हैं. वह उसकी ओर खिंचा चला जाता है. निकट संबंधी उसकी आलोचना करते हैं. जुआरी के पिता, माता और भाई उससे दूरी बनाए रखते हैं, ‘हम उसको नहीं जानते, जुआरियो इसे पकड़कर ले जाओकहकर अपना पीछा छुड़ा लेते हैं.’ एकमात्र जुआरी की पत्नी उसको प्यार करती है. जुआरी भी उसको भरपूर प्रेम करता है. लेकिन जुए के अपने शौक के कारण एक दिन वह पत्नी को ही दांव पर लगा देता है. अपनी भार्या को दूसरों की बांहों में देखकर वह विगलित हो जाता है. इस दुर्दशा पर उसके अपने उसको दुत्कारते हैं. संपत्तिविहीन होते ही उसके साथी जुआरी भी उसको त्याग देते हैं. अपनी प्रिय भार्या को जीते हुए जुआरियों के अधीन देखकर वह बिलख उठता है. इसके बावजूद जुए का चस्का अपनी जगह है. सबकुछ गंवा देने के बावजूद जो बाकी है, वह है जीत की संभावना. सबकुछ खोकर पुनः सबकुछ पा लेने की भ्रांति. यह उम्मीद कि अगला दांव शायद सबकुछ वापस दिला दे उसको बारबार जुआघर ले जाती है. वहां पहुंचते ही हार की संभावना उसको डराने लगती है. वह लौट आना चाहता है. परंतु पासों की आवाज सुनकर उसका हृदय मचलने लगता है. वह रुक नहीं पाता और ‘जारिणी की भांति’ द्यूतस्थल की ओर दौड़ पड़ता है. उद्गाता ऋषि द्वारा जुआरी की मनोदशा का वर्णन देखिए

जुआरी द्यूतस्थल पर पहुंचता है. सबकुछ गंवा देने के बाद मन शंकाकुल है. तन में आग लगी है. पूछता हैᅳ‘क्या मैं जीतूंगा?’ पासे उसकी कामनाओं को भड़काते हैं. खुद पर उसका बस नहीं चलता. अपना बचाकुचा धन वह दांव पर लगा देता है. लेकिन ‘अक्ष, धन आदि से संयुक्त पासे उसको धोखा देते हैं. तपाते हैं, संताप जनते हैं. जुआरी को पहले थोड़ी जीत से लुभाकर अंततः उसका सबकुछ हर लेते हैं. वे जुआरी के श्रेष्ठतम धन द्वारा स्वयं अभिसिक्त होते हैं….जादू के अंगारों की भांति ढाले जाते हुए वे स्वयं तो शीतल हैं, पर दर्शकों के हृदय को जलाकर क्षार कर जाते हैं.’

कहानी के समापन पर उद्गाता ऋषि उसके आगे समर्पण कर, अपना सबकुछ गंवा चुके जुआरी को समझाता है, छोड़ दे जुआ, न खेल जुआ. धरती की ओर देख, खेतों को जोत. परिश्रम से जो प्राप्त होता है, उसी को पर्याप्त समझकर संतोष कर. उसी में खुश रहना सीख. अपने पसीने से कमा….वे तेरी गौए हैं, वह तेरी भार्या है….’’

उपर्युक्त कहानी या दृष्टांत के माध्यम से वैदिक ऋषि जुए की बुराइयों को सामने लाकर उसको व्यक्ति के लिए एक अभिशाप सिद्ध करना चाहता था. इसमें वह कामयाब भी हुआ है. वेदों को मुख्यतः आध्यात्मिक ग्रंथ के रूप में देखा जाता है. इसलिए उनमें सामाजिक संदेश युक्त कहानियों को अपेक्षित लोकप्रियता नहीं मिल पाई. कहानी में जुए के दुष्प्रभाव पर जोर दिया गया है. ऋग्वेद का जुआरी अपनी पत्नी को जुए में दांव पर लगाकर खिन्न है. इस कथानक का वास्तविक प्रस्फुटन महाभारत में देखने को मिलता है. वहां जुआरी स्वयं युधिष्ठर हैं, ज्येष्ठ पांडव पुत्र धर्मराज, जो जुआ खेलने की अपनी लत के कारण अपना राजपाटपत्नी सबकुछ गंवा देता है. वहां कहानी कला और नाटकीयता के संयोग से जो कथा निखरकर आती है, उसका प्रभाव शताब्दियों तक पाठकोंश्रोताओं के दिलोदिमाग पर बना बना रहता है. कहानियों की यह धारा आचारविचार, आचरण की शुद्धता और सामाजिक नैतिकता का पाठ पढ़ाती थी. इस धारा का विस्तार रामायण, महाभारत, कथासरित्सागर की कहानियों में खुलकर सामने आया. ऋग्वेदकाल में ही कहानियों की दूसरी धारा, जो कदाचित पहली से भी पुरानी थी, जन्म ले चुकी थी. इस धारा में पात्रों की उपस्थिति प्रतीकात्मक होती थी. इस धारा का प्रमुख उद्देश्य था, पशुपक्षी अथवा काल्पनिक पात्रों के माध्यम से पाठकों तक नैतिक संदेश पहुंचाना. पात्रों की प्रतीकात्मक उपस्थिति होने के कारण कहानी के समापन पर मनोमस्तिष्क पर उनका प्रभाव गौण हो जाता था. रह जाता केवल वह नीतिसंदेश, जिसे रचनाकार अपने पाठकों तक पहुंचाना चाहता है. ऋग्वेद में ऐसे भी प्रसंग हैं जहां मानवेतर जीवों को मनुष्यता के लिए कल्याणकारी कर्म करते हुए दिखाया गया है. अवसर आने पर वे रूढि़यों पर कटाक्ष करने से भी नहीं चूकते. सातवें अध्याय के 103वें सूक्त में तालाब में टर्राते हुए मेंढकों की तुलना वेदपाठ करते ब्राह्मणों से की गई है. दशम मंडल(108) में इंद्र की सरमा नामक कुतिया कृपण पणियों को उपदेश देती है. यह भी अपने आप में बहुत रोचक प्रसंग है

इंद्रगण, मैं इंद्र की दूत बनकर आई हूं. तुमने जो गौधन एकत्र किया है, उसको ग्रहण करने की मेरी बड़ी इच्छा है.’ पणि प्रत्युत्तर में सरमा को फुसलाते हैं

सरमा, जिस इंद्र की दूत बनकर तुम आई हो, वे कैसे हैं? उनका पराक्रम कितना है? उनकी सेना कैसी है? वे इंद्र आएं, हम उन्हें मित्र बनाने को तत्पर हैं….तुम स्वर्ग से चलकर आ रही हो. इतनी कठिन यात्रा के लिए तुम्हें जितनी गायें चाहिए, उतनी ले जा सकती हो. वरना बिना युद्ध के भला कौन गाय देता है!’

इसपर सरमा इंद्र के आयुधों की भीषण मारक क्षमता का बखान करती है. पणि सरमा से युद्ध का भय न दिखाने को कहते हैं

हमें डराओ मत, हमारे पास भी पर्याप्त सैन्यबल एवं तीक्ष्ण आयुध हैं.’ सरमा पुनः उन्हें इंद्र के बल से परचाने की कोशिश करती है

ये शरीर कहीं इंद्र के वाणों का लक्ष्य न हो जाएं. तुम्हारे यहां आने का जो मार्ग है, कहीं उसपर देवता लोग आक्रमण न कर बैंठंे! यदि तुम गाय नहीं दोगे तो आपदाएं सन्निकट हैं.’

सरमा, हमारी संपत्ति पर्वतों द्वारा रक्षित है. गायों, अश्वों तथा अन्यान्य धनों से परिपूर्ण है. रक्षाकार्य में समर्थ पणिसैनिक उसकी रखवाली करते हैं. गायों के शब्दों से अनुगूंजित इस स्थान पर तुम व्यर्थ ही चली आईं.’

सरमा पणियों को बारबार इंद्र के बल से परचाती है. उन्हें धमकी देती है. पणिगण सरमा को बहन मानकर उसका हिस्सा सौंपने का आश्वासन देते हैं. लेकिन सरमा इन्कार कर देती है. अंत में सरमा के साथ और भी आवाजें सम्मिलित हो जाती हैं. संदेश यह है कि गायें, अश्वादि पशु जिनपर पूरे समूह का जीवन निर्भर है, व्यापार की वस्तु नहीं है. देवगण पणियों से स्थान छोड़ जाने को कहते हैं.

वेदों को 35004000 वर्ष पुरानी रचना माना जाता है. उन्हें हिंदुओं के धार्मिक ग्रंथ होने का सम्मान प्राप्त है. विद्वानों का यह भी मानना है कि वेदादि ग्रंथों में वर्णित छोटीछोटी कहानियां, द्रष्टांत उनके रचनाकाल से भी कई शताब्दी पुराने हैं. श्रुति के रूप में वे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक अंतरित होते रहे हैं. निरुक्त में यास्क ‘इत्यैतिहासकाः’ कहकर इंद्र और वृत्रासुर संग्राम को कथारूप में ढालते हैं. ऐतरेय ब्राह्मण(713) में कथा के साथ नीतिसंबंधी आख्यान भी समाहित हैं. उपनिषदों में तो न जाने कितने दृष्टांत हैं जिनकी कहानियां लोकजीवन में भी प्रचलित रही हैं. छांदोग्योपनिषद में एक अद्भुत कहानी आई है जो उस समय की परंपरा से हटकर है. इसलिए कि गंभीर मानी जानेवाली संस्कृत में व्यंग्य की छटा कम ही देखने को मिलती है. मगर वह कहानी व्यंग्य में लिखी गई है. उसमें कुत्ते भोजन के लिए अपना एक नेता चुन लेते हैं. कहानी को पढ़ते समय आधुनिक राजनीति में व्याप्त अवसरवाद सहसा याद आने लगता है. रैक्व, सत्यकाम पुत्र जाबाल की सुप्रसिद्ध कहानियां भी इसी उपनिषद में हैं. एक कथा में बैल, हंस और मद्गु(जलचर पक्षी) ब्रह्मविद्या का उपदेश देते हैं. वैदिक कहानियों की खूबी उनकी प्रतीकात्मकता है. उनमें पशुपक्षियों को पात्र बनाकर बड़ी गंभीर बातें कही गई हैं. उनमें शेर, चूहा, बिल्ली, कबूतर, बैल, कुछआ आदि को पात्र बनाकर नैतिकता, आचारविचार एवं व्यवहार संबंधी संदेह दिया गया है. फलस्वरूप वे प्रत्येक वयस् के पाठक को उपयोगी जान पड़ती हैं. उनमें कथातत्व की अमूमन सभी विशेषताओं यथा कौतूहल, विनोद, हासपरिहास, रहस्य, उल्लासशोक आदि का उपयोग किया गया है. धर्म, नीति, सदाचार, व्यवहार, कूटनीति के प्रसंग उन कहानियांे में भरे पड़े हैं. जिससे वे कोरी कहानी न होकर दृष्टांत जान पड़ती हैं. इसलिए आवश्यकता पड़ने पर उन्हें उद्धरण की भांति उपयोग किया जाता रहा है.

महाभारत तक आतेआते भारत में कहानीकला काफी विकसित रूप ले चुकी थी. विशेषकर पशुपक्षी और प्रतीकों को केंद्र बनाकर कहानियां गढ़ने की कला. महाभारत में सोने के अंडे देने वाले पक्षी की कहानी है. धार्मिक बिल्ली की कहानी है जो चूहों को विश्वास दिलाकर उन्हें अपने काबू में कर लेती है. एक कथा चतुर शृगाल की है जो अपने मित्रों को भी धोखा देने से बाज नहीं आता. आदि पर्व में हाथी और कछुए की कथा, कुत्ते की कथा तथा वनपर्व में मनु और मत्स्य की कहानी है. तत्कालीन राजनीतिकव्यावहारिक दर्शन को समझाने के लिए शांतिपर्व में अनेक नीतिकथाएं हैंजो आगे चलकर भारतीय कथा साहित्य की प्रेरणा बनीं. कतिपय स्थलों पर यक्ष, गंदर्भ, अप्सरा, किन्नर जैसे विचित्र पात्र भी कहानियों में आए हैं, जो उस समय अभिव्यक्ति के क्षेत्र में नएनए काल्पनिक प्रयोगों की ओर इशारा करते हैं. यक्ष मनुष्य और देवता का मिलाजुला रूप हैं. पृथ्वी पर उनकी उपस्थिति कदाचित शापित देवता के रूप में है. गंदर्भ नृत्यगायनवादन आदि विभिन्न लोककलाओं में इतने प्रवीण थे कि सांस्कृतिक इतिहास में उनकी उपस्थिति चमत्कार के रूप में दर्ज है. महाभारत में यक्ष की परिकल्पना एवं संवाद जिसके माध्यम से वह युधिष्श्ठिर को लोकनीति एवं व्यवहार की सीख देता है, अज्ञातवास के दौरान भीम का असुर हिडिंब से युद्ध तथा उसकी बहन हिडिंबा से विवाह; लाक्षागृह, खांडव वन जैसी अनेक घटनाएं तथा महाप्रयाण के समय कुत्ते द्वारा पांडवों के साथ हिमालयारोहण करना, परीकथाओं जैसा अजूबापन और रोमांच लिए हुए हैं. ये सभ कथाएं प्राचीन मनुष्य के कल्पनासामथ्र्य को दर्शाती हैं.

महाभारत जहां भारतीय समाज, राजनीति और जनजीवन का विस्तृत लेखा है, वहीं रामायण में कथानक मुख्यतः राम के इर्दगिर्द पसरा हुआ है. वहां आस्थाभाव प्रबल है. फिर भी उसमें नीतिकथाओं का यत्रतत्र समावेश है. कहानियों की लोकप्रियता इससे भी आंकी जाती है कि गौतम बुद्ध जैसा दार्शनिक विचारक अपने संदेशों को जनजन तक पहुंचाने के लिए कहानीकला की शरण लेता है. जातक कथाओं में गौतम बुद्ध के जीवनप्रसंगों के माध्यम से बौद्ध धर्म का नीतिसंबंधी चिंतन भी समाया हुआ है. जातक कथाओं का संकलन आरंभ ईसा से चार शताब्दी पहले हो चुका था. उनमें पशुपक्षी संबंधी पात्रों का विशेष स्थान मिला. उनका ध्येय था, पशुपक्षी जैसे लोकप्रिय कथापात्रों के माध्यम से बोधिसत्व की शिक्षाओं को जनजन तक पहुंचाना. इनमें हाथी, वानर, मृग, हंस आदि को पात्र बनाकर कथाएं रची गई हैं. पतंजलि(150 ईसा पूर्व) ने ‘कथासूचक लोकोक्तियों, अजाकृपाणीय, काकतालीय आदि तथा जन्म शत्रुता के उदाहरण रूप में अहिनकुलम्, काकोलूकीयम् जैसी नीति कथाओं का उल्लेख किया है.’ महाभाष्य, पणिनि के सूत्र 2/1/3/, 2/4/9 तथा 5/3/106 आदि, संस्कृत साहित्य का समीक्षात्मक इतिहास, डाॅ. कपिलदेव द्विवेदी, पृष्ठ 573. इन कथाओं की लोकप्रियता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि चीनी विश्वकोश(668) में 200 से अधिक बौद्धग्रंथों से चुनकर नीतिकथाएं प्रकाशित की गईं. भरहुत में ईसापूर्व तीसरी शताब्दी का बौद्धकालीन स्तूप प्राप्त हुआ है, उसपर उत्क्रीर्णित संदेश में पशुकथाओं का उल्लेख है. बौद्ध मतावलंबियों की देखादेखी जैन मतावलंबियों ने भी अपने संदेश को जनसाधारण तक पहुंचाने के लिए कहानीकला का सहारा लिया था. बौद्ध अनुयायियों की भांति उन्होंने भी पशुपक्षी को केंद्र बनाकर नीतिकथाएं रचीं. हरिषेण के बृहत्कथाकोश(992 ईस्वी) में जैन धर्मसंबंधी विचारों को नीतिकथाओं के माध्यम से समझाया गया है. गूढ़ विचारों की व्याख्या के लिए आवश्यकतानुसार एकाधिक नीतिकथाओं की भी सहायता ली गई है.

कहानी की ऐसी प्रतीकात्मकता, कथातत्व का ऐसा ही प्रस्फुटन परिवर्ती बौद्ध एवं जैन ग्रंथों, पंचतंत्र, कथासरित्सागर, जातक आदि में और भी निखरकर सामने आता है. उपनिषदों में भी गूढ़ विषयों को समझाने के लिए यत्रतत्र दृष्टांत रूप में कहानियों का सहारा लिया गया है. चूंकि वेदादि ग्रंथों, कथासरित्सागर, जातक, पंचतंत्र आदि में संग्रहीत कहानियां व्यक्तिविशेष की रचना न होकर लोकसमाज में पहले से ही प्रचलित कहानियां थीं. इसलिए कहानी के इतिहास को वेदों या उनके परिवर्ती ग्रंथों के लेखनकाल से जोड़ना अनुचित होगा. तत्कालीन मनस्वियों ने जीवनमूल्य को आधार देने के लिए समाज से ही कथानकों को चुना था. इसके माध्यम से उसका उद्देश्य रहा होगा, लोकविश्वासों को शास्त्रीयता में ढालना, शब्द को मानवीयकरण का हथियार बना देना. ऐसी कोशिशें प्रायः सभी संस्कृतियों में थोड़ेबहुत परिवेशगत अंतर के साथ जारी थीं. पृथ्वी पर अलगअलग समूहों में विचरने वाले कबीलों ने अलगअलग क्षेत्रों में भिन्न संस्कृतियों को जन्म दिया था. उनकी भौगोलिक परिस्थितियों में अंतर था, तथापि मनुष्य की सामान्य जिजीविषा, परिस्थितियों से जूझने की चाहत, विकास की लालसा कमोबेश एकसमान थी. इसलिए आरंभिक अभिव्यक्तियों में आंतरिक समानता है. तत्कालीन जीवन प्रकृति के नियंत्रण में था. मनुष्य खेती करना सीख चुका था. चूंकि कृषिकर्म पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर था, इसलिए प्रकृति और जीवन के बीच तालमेल बेहद आवश्यक था. चीन की एक लोककथा प्रकृति और मानवजीवन की अंतनिर्भरता और उनके संबंधों पर प्रकाश डालती है. कहानी शिकारी ‘ई’ की है

बहुत दिन पहले की बात है. चीन में एक नामीगिरामी शिकारी ‘ई’ रहता था. उसका निशाना अचूक था. भाला हो अथवा तीर, उसके हाथों से छूटकर सीधा निशाने पर जाकर लगता था. वह घोड़े पर सवार होकर शिकार करता. भाला फेंकने के साथ, बगैर कोई पल गंवाए वह तेजी से शिकार की ओर दौड़ पड़ता. उसको पक्का विश्वास होता कि उसकी कमान से छूटा हुआ तीर सीधे निशाने पर जाकर लगेगा. जब ऐसा विलक्षण तीरंदाज अपने पास हो तो लोगों को उससे उम्मीद भी होगी. एक बार की बात. चीन को एक विपत्ति ने आ घेरा. एक सुबह जब लोग जागे तो देखा कि आसमान में दसदस सूरज जगमगा रहे हैं. उनकी गर्मी से जनजीवन कुम्हलाने लगा. पेड़पौधे झुलसने लगे. जीवजंतु भूखप्यास से व्याकुल होकर इधरउधर भटकने लगे. इस उम्मीद में कि केवल शिकारी ‘ई’ उन्हें प्रकृति के कोप से बचा सकता है, लोग उसके पास फरियाद लेकर पहुंचने लगे.

हमारी मदद करो….आसमान यदि ऐसे ही आग उगलता रहा तो आदमी की जाति ही धरा से मिट जाएगी.’ शिकारी ‘ई’ चिंता में पड़ा था. वह समझता था कि यदि दसदस सूर्य आसमान में चमकते रहे तो प्राणी झुलस जाएंगे. वनवनस्पतियां स्वाह हो जाएंगी. लेकिन धरती को उन सूरजों से बचाया कैसे जाए? ‘ई’ सोचने लगा. इस बीच दसों सूरज सिर पर चढ़े आ रहे थे. उसने सूरजों को ललकारा. आवाज देकर उन्हें बाज आने की चेतावनी दी, लेकिन वे मनमानी पर उतारू थे. यह देख ‘ई’ का पारा चढ़ गया. गुस्से में उसने धनुषवाण उठाए. प्रत्यंचा चढ़ाई. एक साथ दस तीर कमान पर चढ़ाकर डोर को कान तक खींचा. निशाना साधकर तीर छोड़ दिए. दसों तीर तेजी से आसमान की ओर बढ़े. उनमें से नौ तीर अलगअलग दिशाओं में निकलकर नौ सूरजों से टकराए. जैसे सूरज न होकर हवा से भरे गुब्बारे हों. तीर लगने के साथ ही नौ सूरज देखते ही देखते धरती पर बिखर गए.

दसवां तीर निशाने से चूक गया. उधर नौ सूरजों को धराशायी होते देख दसवां सूरज बुरी तरह डर गया था. वह आसमान छोड़ भाग खड़ा हुआ. खुद को बचाने की जुगत में वह बैंसबाड़ी के पीछे जा छिपा. अब आसमान सूरजों से खाली था. इसी के साथ वहां अंधेरा छा गया. थोड़ी देर पहले जो जीवजंतु भीषण गर्मी से व्याकुल थे, अब उन्हें अंधेरा डराने लगा. सूरज न रहने से सर्दी बढ़ गई. जीवजंतु परेशान हो उठे. ‘ई’ को भी लगा कि उससे चूक हुई है. जीवजगत के लिए धूप और गरमी दोनों चाहिए. सूरज के बिना प्राणियों को ये चीजें कौन देगा! इसपर विचार किए बगैर ही उसने दस के दस सूरजों को निशाना बना लिया. एक सूरज बचा रहता तो चिंता की बात न होती. लेकिन अब? अब क्या होगा? ‘ई’ की चिंताओं का पारावार न था.

तभी उसे ध्यान आया कि उसने नौ सूरजों को तो गुब्बारे की तरह आसमान से गिरते देखा था. लेकिन दसवां सूरज! वह कहां गया? ‘ई’ ने इधरउधर नजर दौड़ाई. अचानक बैंसबाड़ी के पीछे छिपा दसवां सूरज उसको दिखाई पड़ गया. सूरज स्वयं बाहर आने को उत्सुक था. लेकिन जैसे ही वह ‘ई’ को देखता, भय से बैंसबाड़ी के पीछे दुबक जाता था. ‘ई’ सूरज की मनस्थिति को देख मुस्करा दिया. उसको खुशी थी कि एक सूरज बचा हुआ है. अपना धनुषवाण संभालकर वह अपने घर की ओर चल दिया. उसके जाते ही दसवां सूरज बैंसबाड़ी के पीछे से निकला और दुबारा आसमान पर छा गया. दुनिया फिर जगमगा उठी. लोग ‘ई’ की जयजयकार करने लगे. (सांस्कृतिक निबंध, भगवतशरण उपाध्याय से उद्धृत)

चीनी किवदंति है कि सूरज आज भी शिकारी ‘ई’ के भय से उबर नहीं पाया है. वह डरताडरता पूरब से उदय होता है. पहले केवल दिन ही दिन था. उस घटना के बाद से सूरज दिनभर पश्चिम की ओर भागते रहने के बाद शाम को पुनः बैंसबाड़ी के पीछे दुबक जाता है. इसी से दिनरात होते हैं. सूरज रात को छिप जाता है, इससे प्राणियों को सोने का अवसर मिल जाता है. इसके लिए चीनी लोग महान शिकारी ‘ई’ का आभार मानते हैं. यह कहानी जहां सृष्टि के विकास के बारे में एक चीनी मिथ को सामने रखती है, साथ में यह भी समझाती है कि गुस्सा महान व्यक्ति को भी चूक करने को बाध्य कर देता है. यह भी दर्शाती है कि उस समय तक विश्व के अनेक कोनों में कहानी कला का विस्तार हो चुका था. ग्रीक परंपरा में होमर प्रख्यात कथावाचक हैं. उसने महान ग्रंथ ‘इलियाड’ और ‘ओडिसी’ की रचना लोगों के बीच, उन्हें सुनाते हुए की थी. ईसा से आठ सौ वर्ष पहले जन्मा वह महाकवि लोकश्रुति के अनुसार जन्मांध था. वह लोगों को घूमघूम कर अपनी रची हुई कविताएं सुनाता था. जिसको होमर के प्रशंसक उसके शिष्य लिखते जाते थे. ईसा से ढाईतीन शताब्दी पहले जन्मे ईसप का नाम भी दुनिया के चर्चित किस्सागो में शामिल है. एक दास के रूप में जन्मा ईसप अपनी बोधकथाओं के माध्यम से चर्चित हुआ. उसके दृष्टांतों पर पंचतंत्र का प्रभाव साफ तौर पर नजर आता है. प्राचीन यूनान और भारत के बीच जिस प्रकार का अंतःसंबंध था, नियमित यात्राएं होती थीं, उसको देखते हुए लोककथाओं का सहजआदानप्रदान असंभव न था. यही कारण है कि यदि विश्व के अलगअलग देशों से वहां की बहुचर्चित लोककथाएं लेकर उनकी परस्पर तुलना की जाए तो पाएंगे कि उनके कथानक में असीमित समानता है. उनमें यदि कुछ अंतर है तो केवल परिवेश और भाषा का. लेकिन विचित्र पात्रों, काल्पनिक चरित्रों और कथानकों के आधार पर नीतिआख्यान गढ़ने में भारतीय मनीषियों का कोई सानी नहीं था. इस मामले में बाकी दुनिया के अपने समकालीन आचार्यों से वे बहुत आगे थे. भारत में कहन की कला की लोकप्रियता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि यहां बड़ेबड़े महाकाव्यों का प्रणयन किस्सागोई के माध्यम से हुआ है, जिनमें एक मिथ दूसरे मिथ का जन्मदाता है. इससे कहानी में तारतम्यता बनी रहती है. रामायण की कहानी के बारे में कहा जाता है कि इसको पहले शिव ने पार्वती को सुनाया था. फिर शिव के आदेश पर काकभुसुंडि उसको वाल्मीकि को सुनाते हैं. महाभारत भी कहन की परंपरा का एक ग्रंथ है, जिसको व्यास ने सूतजी के मुख से कहलवाया है. उपनिषद का तो अर्थ ही है, गुरु के आगे बैठकर बैठकर चिंतनमनन, श्रवणादि करना. लोकसाहित्य की तो पूरी की पूरी परंपरा कहन पर टिकी हुई है. आज भी किसी को कोई बात समझानी हो तो लोग किसी कहानी या दृष्टांत का उद्धरण देने लगते हैं.

भारतीय वाङमय में पशुपक्षियों को केंद्र बनाकर इतना ज्यादा साहित्य रचा गया है कि केवल इसी को आधार बनाकर उसका वर्गीकरण संभव है. पशुपक्षियों को केंद्र बनाकर रचे गए साहित्य में पंचतंत्र, हितोपदेश, शुकसप्तति आदि ग्रंथ हैं तो मनुष्य को पात्र बनाकर लिखे गए ग्रंथों में कथासरित्सागर, शिवदास कृत कथार्णव(1200 ईस्वी) जिसमें मूर्खों और चोरों की 35 कथाएं हैं, श्रीवीर कवि के ‘कथाकौतुक’(1451) तथा वल्लाल सेन के ‘भोजप्रबंध’(16वीं शती) का नाम लिया जा सकता है, जिनमें व्यवहार और नैतिकता के बीच अंतर को स्पष्ट करते हुए मनुष्य से नैतिक पथ पर बने रहने की अपेक्षा की गई है. इनके अतिरिक्त बड़ी संख्या ऐसे ग्रंथों की है जिनमें पशुओं और मनुष्यों को सम्मिलित पात्रों के रूप में प्रयुक्त किया गया था. ऐसे ग्रंथों में रामायण, महाभारत के अलावा जातक कथाएं, वैतालपचीसी, सिंहासन बतीसी आदि का नाम लिया जा सकता है. वैताल पचीसी और सिंहासन बतीसी में पुतलियों और वैताल को पात्र बनाकर कथानक में अद्भुत रस की सृष्टि की गई है. भारतीय समाज और परंपरा पर आधारित इन कहानियों की पठनीयता देखते ही बनती है. यह भी माना जाता रहा है कि विचित्र पात्रों की कल्पना का मुख्य ध्येय श्रोताओं का मनोरंजन करना था. लेकिन कहानियों की जैसी संरचना है, उससे स्पष्ट है कि उनका उद्देश्य मनोरंजन के साथसाथ समाज की तयशुदा व्यवस्था से अनुकूलित रखना भी था. इनमें सर्वाधिक लोकप्रियता पंचतंत्र, कथासरित्सागर और जातक कथाओं को मिली. शायद इसलिए कि उनकी रचनाओं के मूल कथासूत्र लोक से आए थे और रचनाकारों ने उनकी लोकप्रियता को देखते हुए ही, उन्हें अपनी विचारधारा के अनुरूप ग्रंथों में सम्मिलित किया था. इन कहानियों की एक अन्य खूबी उनकी किस्सागोई शैली है. शताब्दियों से सुनेसुनाए जाने के कारण इनके कथानक पाठक और श्रोता दोनों की जुबान पर चढ़े होते थे. ऐसे में किस्सागो द्वारा शैलीगत चमत्कार ही श्रोताओं के बीच उसकी लोकप्रियता और पैठ को बनाए रख सकता था. इसलिए प्रतिभाशाली किस्सागो प्रस्तुतीकरण के समय कथानक में आवश्यक फेरबदल करने के साथसाथ प्रस्तुति को आकर्षक बनाने का हरसंभव प्रयास करते थे. फलस्वरूप समाज में किस्सागो का महत्त्व बढ़ता गया. कालांतर में मनुष्य के आध्यात्मिक बोध में ठहराव आने लगा. जिज्ञासाएं विश्वास में ढलने लगीं. धर्म के प्रभाव के चलते ऐसे पात्रों और कथानकों की परिकल्पना की जाने लगी जो जीवन को सहजसरल बनाने में मददगार हों, या जिनके बारे में उसको भरोसा था कि आसन्न संकट की अवस्था में वे उसके मददगार सिद्ध हो सकते हैं. चूंकि साधारण पात्रों द्वारा असाधारण कार्य संभव न थे. अतएव असाधारण कार्यों के लिए असाधारण पात्रों और घटनाओं की परिकल्पना ने जोर पकड़ा. इस प्रवृत्ति का विस्तार हमें पौराणिक ग्रंथों में दिखाई पड़ता है.

परीकथाओं की संकल्पना तो बहुत बाद की उपज थी, किंतु जिस तरह के विचित्र पात्रों और चमत्कारी कथानकों के आधार पर परीकथाओं ने आगे चलकर लोकप्रियता के शिखर को छुआ, वैसी विचित्र परिकल्पनाएं इस दौर में होने लगी थीं. धार्मिक आस्था, विश्वास, कल्पना और मनोरंजन के दबाव में गढ़े गए ये अनूठे पात्र पहले लोककथाओं में स्थापित हुए, कालांतर में उन्हीं के एक हिस्से को जो कदाचित अधिक विचित्र, कल्पनाप्रधान और मनोरंजनपरक था, परीकथाओं के रूप में सहेजा जाने लगा. उस समय तक लेखन कला का विकास नहीं हुआ था. मानवीय बोध के आरंभ से लेकर उस समय तक जो रचा गया था, वह सब का सब श्रुति का हिस्सा था. इसलिए उस समय तक जो भी साहित्य रचा गया, सब लोक की धरोहर, लोकसाहित्य का हिस्सा था. उस समय तक परीकथाओं की श्रेणी तो नहीं बनी थी. जो साहित्य था, वह श्रुति के रूप में लोकसाहित्य का हिस्सा था. हम केवल इतना कह सकते हैं कि उस समय तक उस कालखंड तक कहानियों, रूपकों में वे पात्र कल्पित होने लगे थे, जो आगे चलकर परीकथाओं के रूप में पहचाने गए.

आधुनिक विद्वान पशुपक्षियों की कहानियों को भी परीकथाओं का हिस्सा मानते हैं. यह अन्यथा भी नहीं है. पशुपक्षी आदिकाल से ही मनुष्य के प्रथम सहयोगी रहे हैं. महाकाव्यों में ऐसे प्राणियों की परिकल्पना की गई है, जिनका शरीर ‘मनुष्य और पशु’ अथवा ‘मनुष्य एवं पक्षी’ का बना था. ये आदिम मनुष्य की प्रकृति से निकटता का प्रतीक है. प्राचीन मनुष्य ने जीवन में जो भी उसके आसपास था, उसे बिना किसी वरिष्ठताबोध, अपने अस्तित्व का हिस्सा बनाया था. उसकी वह छोटीसी दुनिया थी. उसमें न ज्यादा लंदफंद था, न जीवन की भागमभाग. प्रकृति से भोजन जुटाना और पशुपक्षियों की भांति उनके साथ, सभी को प्रकृति का हिस्सा मानकर रहना….रोज सुबह की किरण के साथ जागना तथा रात को भोजनोपरांत लंबी नींद लेनायही उसका जीवन था. लंबे अनुभव के उपरांत वह समझ चुका था कि पशुपक्षियों में कौनकौन उसके मित्र, सहयोगी हैं ; तथा किनसे उसके जीवन को खतरा हो सकता है. किस्सेकहानी पशुपक्षियों के स्वभाव, चारित्रिक विशेषताओं, खानपान तथा रहनसहन की आदतों से परचाने में सहायक थे. आने वाली पीढ़ी को जीवन की वास्तविकता से परिचित कराने में किस्सेकहानी सहायक थे. पीढ़ीदरपीढ़ी सुनेसुनाए जाने के कारण उनमें निरंतर निखार आता गया.

© ओमप्रकाश कश्यप

गांधी और आइंस्टाइन

अहिंसा और इंसानियत के दो दावेदार

उन दोनों के देश अलग थे, धर्म अलग थे, भाषाएं और कार्यक्षेत्र अलगअलग थे. दोनों आमनेसामने कभी मिल भी न पाए थे. आपसी पत्रव्यवहार भी न के बराबर था. इसके बावजूद उनके मन में एकदूसरे के प्रति अगाध श्रद्धा थी. उनमें से एक विज्ञान के क्षेत्र की शिखरतम प्रतिभा था. नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर वह विश्व का विलक्षण मेधासंपन्न वैज्ञानिक माना गया. विज्ञान जगत उसकी अकूत मेधा और अद्वतीय कल्पनाशीलता से इतना अभिभूत था कि उसकी बौद्धिक विलक्षणता को समझने के लिए मरणोपरांत उसके मस्तिष्क को संरक्षित रखा गया. दूसरा पुरस्कारसम्मान से बहुत ऊपर था. इतना ऊपर कि हर सम्मान, पुरस्कार उसके नाम से जुड़कर सम्मानित होता था. वह लोगों के दिलों पर आजीवन राज करता रहा. दोनों ही विश्वशांति के समर्थक थे. एक के शोध को आधार बनाकर कुछ सिरफिरे वैज्ञानिकों ने परमाणु बम का निर्माण किया, जो दूसरे विश्वयुद्ध में तबाही का कारण बना. दूसरे की कथनीकरनी में एकता थी. वह आजीवन सत्य और अहिंसा की बात करता और उस पथ पर चलता रहा. फिर भी उसकी मृत्यु एक सिरफिरे राष्ट्रवादी की गोली से हुई. एक को नवगठित देश का राष्ट्रपति बनने का न्योता मिला. तब उसने यह कहकर कि वह राजनीति के लिए नहीं बना है, प्रस्ताव विनम्रतापूर्वक लौटा दिया. दूसरा बना ही राजनीति के लिए था. उसके लिए राजनीति समाजसेवा थी और समाजसेवा राजनीति. अतः आजादी के बाद जब उसके देश में अपनी सरकार बनी तो जनसेवा के प्रति अपनी संकल्पबद्धता दोहराकर वह सत्ता के प्रलोभन से हमेशा के लिए मुक्त हो गया. वह हर समय अपने समर्थकों, कार्यकर्ताओं से घिरा रहता था. उसके समर्थकों में हर वर्ग के आदमी थे. वह उनके सुखदुख और संघर्षों को समझता था. इस कारण लोगों का उससे गहरा जुड़ाव था. दूसरे को ‘एकांतसेवी’ कहा जाता है. गणित और भौतिक विज्ञान की जटिलतम गुत्थियों को सुलझाने में संलिप्त रहने हेतु उसका आमजन से कटाव स्वाभाविक ही था. पहला जिस ओर कदम बढ़ाता सैकड़ों लोग कतार बांधे उसका अनुसरण करने लगते. दूसरे की कल्पनाशक्ति जब मुक्ताकाश में डोलती तो उसमें हजारों ग्रहनक्षत्र और ब्रह्मांडीय स्फुर्लिंग ज्योतिवान हो उठते थे. दोनों में अनेक समानताएं थीं और अंतर भी. उनमें से प्रत्येक ने अपने समय और समाज को गहराई से प्रभावित किया. बेशुमार ख्याति, मानसम्मान पाया. अपने जीवनआचरण में दोनों मनुष्यता के पक्षधर, पवित्रता, सादगी, नैतिकता की मिसाल और इंसानियत के दावेदार बने रहे.

इतने विवरण के बाद अपने समय की इन विरलतम प्रतिभाओं का नामोल्लेख आवश्यक नहीं है. पाठकगण जान चुके होंगे कि उनमें से एक का नाम थामोहनदास करमचंद गांधी, दूसरे का—अल्बर्ट आइंस्टाइन. आइंस्टाइन का जन्म 1879 में हुआ था. गांधी के जन्म के दस वर्ष बाद. बचपन में दोनों ही संकोची थे. विद्यार्थी भी साधारण ही माने गए. आइंस्टाइन को स्कूल में साथियों का उपहास सहना पड़ता था. गांधी पोरबंदर के दीवान के बेटे थे. इसलिए उनका वैसा उपहास तो नहीं होता था, मगर विद्यार्थी वे औसत ही थे. दोनों की शुरुआत साधारण ही थी. पढ़ाई पूरी करने के बाद आइंस्टाइन ने पेटेंट कार्यालय में नौकरी कर ली. लंदन से बैरिस्टर बनकर लौटे अवश्य, किंतु वकालत के लिए जरूरी लंदफंद से दूर रहने के कारण आरंभ में असफलता ही उनके हिस्से आई. दोनों ने अपनी दुर्बलताओं को हथियार बनाया. आइंस्टाइन कल्पनाजगत में डूबे रहने वाले विद्यार्थी थे. औपचारिक पढ़ाईलिखाई पर कम ध्यान दे पाते थे. सापेक्षिकता के सिद्धांत की खोज उनकी अद्वितीय कल्पनाशक्ति के बल पर संभव हो सकी थी. प्रकाशवेग की अपरिवर्तनीयता, पदार्थ और ऊर्जा की अंतःपरिर्वतनीयता(E=MC2) प्रारंभ में परिकल्पना के रूप में ही जन्मे थे. गांधी ने अपनी सहनशक्ति को ताकत बनाया था. अपने आचरण से उन्होंने सिद्ध किया कि अहिंसा, सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा जैसे विचार केवल कागजी नहीं हैं. पर्याप्त नैतिक सामथ्र्य हो तो उन्हें आचरण में भी उतारा जा सकता है. दोनों को अपने ऊपर अटूट विश्वास था. आइंस्टाइन ने सापेक्षिकता के सिद्धांत की परिकल्पना दुनिया के सामने रखी तो उनका खूब मजाक उड़ाया गया. अधिकांश वैज्ञानिकों का मानना था कि डॉप्लर प्रभाव जैसे ध्वनि पर असरकारक होता है, वैसे ही प्रकाश पर भी उसका असर पड़ता है. लेकिन आइंस्टाइन अपनी धारणा पर अडिग रहे. खिल्ली उड़ाने वालों को उनका एक ही जवाब था—‘गलत सिद्ध करके दिखाओ?’ गांधी की अहिंसा को आलोचकों ने भीरूपन कहा था. मगर वे स्थिरमना अपने काम में लगे रहे. आखिर खुद को दुनिया की महाशक्ति समझने वाला ब्रिटिश साम्राज्य एक अधनंगे फकीर के आगे घुटने टेकने को मजबूर हो गया. आइंस्टाइन विलक्षण की सीमा तक अंतर्मुखी थे. वे खुद से घंटों संवाद कर सकते थे. मस्तिष्क गणित की पहेलियों को हल करने में उलझा रहता था. अकेलापन उन्हें पसंद था मगर उनका काम, अनूठी उपलब्धियां उन्हें बारबार लोगों के बीच ले आती थीं. गांधी अपने अनूठे प्रयोगों, कथनीकरनी की एकता तथा आचरण की पवित्रता के दम पर, लोगों के चहेते थे. इसलिए भीड़ में सबसे अलग नजर आते थे.

गांधी और आइंस्टाइन के बीच सीधी मुलाकात तो कभी संभव न हो सकी. पत्रव्यवहार भी अत्यल्प था. उनके अहिंसावादी दृष्टिकोण, जीवन की सादगी, सत्य के प्रति अटूट निष्ठा, जनांदोलनों की गहरी समझ तथा लोगों के दिलों में पैठ बनाने के अकूत सामथ्र्य ने आइंस्टाइन को प्रभावित किया था. संभवतः ऊर्जा के अजस्र, विराट स्रोत की खोज के रूप में दुनिया को परमाणु बम का आधारसिद्धांत देने वाला भावुक, संवेदनशील, मनुष्यता का हितचिंतक, नैतिकबोध से संपन्न सरलमना वैज्ञानिक अपने आविष्कार के दुरुपयोग की संभावनाओं की कल्पनामात्र से खुद को दोषी मान बैठा था. स्मरणीय है कि सापेक्षिकता के सिद्धांत की व्याख्या करते समय आइंस्टाइन ने सिद्ध किया था कि ऊर्जा और पदार्थ परस्पर अंतपर्रिवर्तनीय हैं. पदार्थ को ऊर्जा में बदला जा सकता है. इस प्रक्रिया में विपुल ऊर्जा उत्पन्न होती है. इसके बाद से ही परमाणु विखंडन द्वारा ऊर्जा के चिरंतन स्रोत को प्राप्त करने की कोशिशें तेज हो चली थीं. प्रथम विश्वयुद्ध में चोट खाए देश गुपचुप अपनी ताकत का विस्तार करने में लगे थे. 1933 में हिटलर द्वारा जर्मनी की सत्ता संभालते ही उनमें और भी तेजी आई. राष्ट्रों के बीच हथियारों की अंधस्पर्धा तथा भीतर ही भीतर उमड़ता असंतोष, नए विश्वयुद्ध की भविष्यवाणी कर रहा था. अपनी दूरद्रष्टि से आइंस्टाइन ने शायद यह भांप लिया था कि कोई सिरफिरा वैज्ञानिक परमाणु ऊर्जा संबंधी उनके शोध का दुरुपयोग कर, मनुष्यता के समक्ष भयावह संकट प्रस्तुत कर सकता है. इसीलिए गांधी, जो दक्षिणी अफ्रीका में सत्याग्रह का सफल प्रयोग कर चुके थे और भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का नेतृत्व करते समय भी अहिंसा पर पूर्णतः अडिग थे, का मानवतावादी द्रष्टिकोण उन्हें आकर्षित करता था. विश्वशांति की चाहत रखनेवाले आइंस्टाइन निरस्त्रीकरण के सबसे मुखर समर्थकों में थे. उसके पीछे बर्ट्रेंड रसेल, रवींद्रनाथ ठाकुर के अलावा गांधी की प्रेरणा भी प्रमुख थी. विश्वशांति के प्रति आइंस्टाइन की प्रतिबद्धता का एक और प्रमाण था—अनिवार्य सैन्यसेवा एवं युद्ध प्रशिक्षण के विरोध में जारी घोषणापत्र, जिसपर उनके और महात्मा गांधी के अलावा रवींद्रनाथ ठाकुर, सिगमंड फ्रायड, रोमन रोलेंड, एच. जी. वेल्स आदि के हस्ताक्षर थे.

आइंस्टाइन का विज्ञान पर भरोसा था. वह मानते थे कि विज्ञान की मदद से विश्व की भीषण समस्याओं यथा गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा आदि का उपचार संभव है. इसके लिए पर्याप्त जनसहभागिता और नियोजित कार्यक्रम जरूरी हैं. अनियोजित मशीनीकरण की आलोचना करते हुए आइंस्टाइन ने कहा था कि पूंजीवादी तंत्र के नेतृत्व में होने वाली प्रौद्योगिकीय क्रांति ने लोगों की गरीबी और अन्यान्य समस्याओं का समाधान करने के बजाय उन्हें बेरोजगारी की ओर ढकेला है. ऐसे तंत्र में उत्पादक का ध्यान केवल अपने मुनाफे पर होता है. इससे समाज में पूंजी का निचले वर्ग से ऊपर के वर्ग की ओर अंतरण लगातार बढ़ता जाता है. फलस्वरूप शीर्षस्थ वर्ग की खुशहाली बढ़ती जाती है, जो पूरी तरह से निम्नस्थ वर्गों के श्रम और कौशल की देन होती है. उच्च स्तर पर बढ़ती स्पर्धा निचले वर्गों के लिए और बड़ी चुनौतियां पेश करती है, जिससे बेरोजगारी की समस्या विकराल रूप धारण कर लेती है. उच्च प्रौद्योगिकीकरण की सबसे बड़ी बुराई है कि वह अपनी कीमत मनुष्य की कार्यक्षमता एवं कौशल से वसूलता है. जिससे श्रम के मूल्यांकन का अधिकार श्रमिक के हाथों से खिसककर पूंजीपति के अधीन चला जाता है. वे उस अधिकार का मनमाना दुरुपयोग करते हैं. अपने ही जैसे शोषितों, उत्पीड़ितों के साथ स्पर्धा और शोषणकारी स्थितियों से घिरा श्रमिक खुद को उनके आगे पंगु और लाचार अनुभव करता है. आपसी अविश्वास, कुंठा, हताशा, दैन्य और अवसाद जैसे अवगुण उसे घेर लेते हैं. पूंजीवादी समाज की ऐसी अनेकानेक नकारात्मक स्थितियों और संभावनाओं के बीच सर्वोदय, अहिंसा, आर्थिक आत्मनिर्भरता तथा विश्वबंधुत्व को समर्पित गांधी के विचार, उनका समाज के प्रति सकारात्मक और नीतिसम्मत सोच आइंस्टाइन को उम्मीद के ताजे झोंके की तरह लगता था.

आइंस्टाइन के मन में गांधी के प्रति सम्मान भाव पहली बार जुलाई-1929 में ‘क्रिश्चन सेंच्युरी’ को दिए गए साक्षात्कार में प्रकट हुआ, जिसमें उन्होंने गांधी द्वारा अहिंसापूर्ण ढंग से चलाए जा रहे आंदोलन की सराहना की थी. हालांकि उस समय तक दोनों के बीच कोई संवाद नहीं था. उनके बीच इकलौते पत्रव्यवहार की शुरुआत आइंस्टाइन की ओर से होती है. घटना 1931 की है. गांधी उस दिनों लंदन की यात्र पर थे. वहां भारत में संवैधानिक सुधारों को लेकर गोलमेज सम्मेलन की तैयारियां चल रही थीं. गांधी भारतीयों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. आइंस्टाइन उन दिनों बर्लिन में थे. वहीं, उनके आवास पर गांधी का शिष्य सुंदरम उनसे मिला. उसके माध्यम से आइंस्टाइन ने एक पत्र गांधी को भेजा था. 27 सितंबर, 1931 को लिखे उस पत्र में उन्होंने गांधी के प्रति अपनी श्रद्धा को बिना लागलपेट प्रस्तुत किया था—

परम आदरणीय गांधी जी,

इस पत्र को आप तक पहुंचाने के लिए मैंने आपके मित्र का सहारा लिया है, जो इस समय मेरे घर मेरे मेहमान हैं. अपने कार्यकलापों द्वारा आपने दिखा दिया कि उन सभी आदर्शों को जिनकी हम केवल कल्पना कर सकते हैं, हिंसा का सहारा लिए बिना भी प्राप्त किया जा सकता है और उन्हें जिनको हिंसा पर भरोसा है, अहिंसा के माध्यम से आसानी से जीता जा सकता है. हमें उम्मीद करनी चाहिए कि आपका संदेश आपके देश की सीमाओं के पार भी फैलेगा. उसके माध्यम से अंतरराष्ट्रीय मतभेदों का स्थायी समाधान संभव होगा. यही एकमात्र रास्ता है जो वैश्विक शांति एवं खुशहाली की ओर जाता है, जिससे हम अपने मतभेदों को आसानी से सुलझा सकते हैं.

पुनश्चः आपके प्रति अपनी हार्दिक श्रद्धा और सम्मानभाव के साथ मैं उम्मीद करता हूं कि बहुत जल्दी हम आमनेसामने होंगे.’(गांधी सेवा फाउंडेशन).1

पत्र में गांधी के अहिंसावादी द्रष्टिकोण के प्रति एक उदारमना वैज्ञानिक के उद्गार थे. गांधी विश्वशांति हेतु आइंस्टाइन के कार्यकलापों से परिचित थे. उनके प्रति मन में अगाध श्रद्धा भी थी. इसलिए पत्र का त्वरित प्रत्युत्तर देते हुए उन्होंने 18 अक्टूबर को आइंस्टाइन को लिखा—

सुंदरम के हाथों आपका खूबसूरत पत्र मुझे मिला. मुझे यह जानकर अत्यधिक संतोष है कि आप मेरे कार्यों का समर्थन करते हैं. मेरी उत्कट अभिलाषा है कि हमारी आमनेसामने की भेंट हो और आप भारत में मेरे आश्रम का आतिथ्य ग्रहण करें.’(गांधी सेवा फाउंडेशन).2

आइंस्टाइन गांधी के आमंत्रण पर भारत भले न आ सके, मगर गांधीजी द्वारा भारत में किए जा रहे सत्य एवं अहिंसा के प्रयोगों से निरंतर प्रेरणा लेते रहे. वे मूलतः वैज्ञानिक थे. विज्ञान के उपयोग को लेकर उनका मत ‘पश्चिमी विज्ञान का पितामह’ कहे जाने वाले दार्शनिक फ्रांसिस बेकन(1561—1626) से मेल खाता था. पंद्रहवीं शताब्दी की वैज्ञानिक क्रांति से उत्साहित बेकन का कहना था कि मशीनें मनुष्य को जानलेवा श्रम से मुक्ति दिलाकर उसके कल्याण की राह प्रशस्त करेंगी. ‘ज्ञान ही शक्ति है’ कहकर उसने विज्ञान और प्रौद्योगिकीय सुधारों का स्वागत किया था. आगे चलकर विज्ञान ने खूब तरक्की की. लेकिन उसके लोकोपकारी उपयोग को लेकर बेकन की भविष्यवाणी पूर्ण सच न हो सकी. खर्चीला उद्यम होने के नाते वैज्ञानिक शोधों की धारा उस दिशा में अग्रसर रही, जो केवल समाज के प्रभुवर्ग की स्वार्थानुरूप थी, या जैसा पूंजीपति और सरमायेदार वर्ग चाहता था. इससे श्रमविरोधी मशीनों के विकास को बढ़ावा मिला. कालांतर में उससे समाजार्थिक स्तरीकरण और बेरोजगारी में वृद्धि हुई. पूंजी की मनमानी के फलस्वरूप हुए मशीनीकरण ने उन कारीगरों और शिल्पकर्मियों के समक्ष अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया था, जो परंपरागत अर्थव्यवस्था में, सामंतवादी दबावों के बावजूद अपने श्रम एवं कौशल के दम पर सम्मानित जीवन जीते आए थे. यह बेकन की उस मनोवांछा के विपरीत था, जो वैज्ञानिक क्रांति का स्वागत करते हुए प्रकट हुई थी. वस्तुतः वैज्ञानिक शोधों का लाभ देश के आमजन तक कैसे पहुंचाया जाए, यह चिंता अठारहवीं शताब्दी से ही समाजविज्ञानियों और दार्शनिकों को परेशान करने लगी थी. कालांतर में यह चुनौती और भी कठिन, कठिनतर होती गई. आगे चलकर इसी ने यूरोप के वैचारिक आंदोलनों के लिए नई जमीनें तैयार कीं.

उल्लेखनीय है कि पश्चिम में अनियंत्रित मशीनीकरण के विरुद्ध आवाजें सतरहवीं शताब्दी से ही उठने लगी थीं. उनीसवीं शताब्दी आतेआते उसमें और भी तेजी आ चुकी थी. पूंजीवाद के प्रति विरोधी वातावरण और चौतरफा आलोचनाओं के बावजूद पश्चिम को अपनी प्रगति पर गर्व था. वह इसको आधुनिकता की निशानी मानता था. इसका कारण भी था. अठारहवीं शताब्दी में नए बाजारों की तलाश में निकले व्यापारी काफिलों ने ब्रिटेन के लिए नए उपनिवेश निर्मित किए थे. ब्रिटेन की आर्थिक समृद्धि में उसके उपनिवेशों का बड़ा योगदान था. औपनिवेशिक शोषण के लिए जिम्मेदार और विज्ञान के इकतरफा लाभों पर इतराने वाली कथित पश्चिमी सभ्यता को गांधी ने ‘शैतानी सभ्यता’ कहा था. यह बात अलग है कि पूरब में जाति, धर्म, परंपरा और संस्कृति के नाम पर फैला हुआ मकड़जाल, मानवमात्र की स्वाधीनता और खुशहाली की राह में, कथित ‘शैतानी सभ्यता’ से कहीं अधिक नुकसानदेह था. और गांधी जिसे शैतानी सभ्यता कहते थे, उसमें मानवाधिकारवादी आंदोलनों के विस्तार की भारत की दैवी सभ्यता से अधिक संभावनाएं थीं. गांधी की प्रमुख राजनीतिक, आर्थिक प्रेरणाएं धर्मदर्शन से निकली थीं. वैज्ञानिक बोध के बजाय उनमें भावबोध प्रबल था. पूंजी की मनमानी और तज्जनित बेलगाम मशीनीकरण को वे धार्मिक और सांस्कृतिक संकट के रूप में देखते और उसके निदान के लिए रहरहकर परंपरा की शरण में लौट जाते थे. यही कारण है कि आर्थिक विषमताओं तथा उसके कारणों को लेकर उनकी आलोचना वैसी तथ्यात्मक, तर्कसंगत और तेजवंत न थी जैसी बर्ट्रेंड रसेल, मार्क्स, बकुनिन, पीटर क्रोप्टोकिन, मानवेंद्रनाथ राय आदि विचारकों की. धर्म, विज्ञान एवं समाजवाद के बारे में आइंस्टाइन का विश्लेषण तुलनात्मक रूप से अधिक सुसंगत, वैज्ञानिक, तथ्यपरक एवं पारदर्शी है. लेकिन अपने विचारों, मान्यताओं को जिस गंभीरता और सत्यनिष्ठ भाव से गांधी अपने रोजमर्रा के आचरण का हिस्सा बना लेते हैं, यह आइंस्टाइन से संभव नहीं हो पाता.

गांधी के सत्य और अहिंसा के आदर्श के प्रति आइंस्टाइन की अटूट श्रद्धा थी. उत्तरोत्तर बढ़ते वैश्विक तनाव तथा वैमनस्यकारी स्थितियों के बीच गांधी का रास्ता उनकी एकमात्र उम्मीद थी. बावजूद इस श्रद्धाभाव के कुछ मुद्दों को लेकर गांधी से उनका मतभेद था. ऐसा ही मुद्दा उत्पादन क्षेत्र में मशीनों के प्रयोग को लेकर है, जिनका पश्चिमी देशों की आर्थिक प्रगति के पीछे बड़ा योगदान था. गांधी मशीनीकरण का विरोध करते हैं. उसे समाज में व्याप्त अनेकानेक बीमारियों की जड़ बताते हैं. ‘हिंद स्वराज’ में वे लिखते हैं—‘मशीनें यूरोप को उजाड़ने में लगी हैं. वहां की हवा अब हिंदुस्तान में चल रही है.’ मशीनों की आलोचना से उन्हें यहीं तोष नहीं. आगे वे चेतावनी वाले अंदाज में लिखते हैं, ‘मशीन की हवा अगर ज्यादा चली तो हिंदुस्तान की बुरी दिशा होगी….यंत्र तो सांप का ऐसा बिल है जिसमें एक नहीं बल्कि सैकड़ों सांप होते हैं.’ गांधी द्वारा मशीनों का विरोध केवल उत्पादकता जुड़े यंत्रों तक सीमित नहीं रहता. आगे बढ़कर रेलों, डॉक्टरों और वकीलों को भी अपने दायरे में समेट लेता है. ट्राम को वे स्वास्थ्य रक्षा से जोड़कर देखते हैं. उनकी दृष्टि में जहां मशीनें हैं, वहां अव्यवस्था है, दुख और सांस्कृतिक संकट हैं. मशीनें बीमारी और कमजोर स्वास्थ्य का कारण हैं—‘जहां रेलगाड़ी, ट्राम गाड़ी वगैरह साधन बढ़े हैं, वहां लोगों की सेहत गिरी होती है….यूरोप के एक शहर में जब पूंजी की तंगी हो गई थी तब ट्रामों, वकीलों और डॉक्टरों की आमदनी घट गई थी.’ इसके तुरंत बाद वे फैसलाकुन अंदाज में लिखते हैं, ‘यंत्र का गुण तो मुझे एक भी याद नहीं आता, मगर उसके अवगुणों पर मैं पूरी किताब लिख सकता हूं.’ यहां साफ कर दें कि मशीनों की आलोचना करने वाले गांधी पहले व्यक्ति न थे. उनसे पहले रूसो, थोरो, एडवर्ड कारपेंटर, इमर्सन आदि प्रख्यात विचारकों ने जीवन में मशीनों के बढ़ते दखल को गैरजरूरी माना था.

मानवीय स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक, ‘मनुष्य आजाद जन्मा है, लेकिन हर जगह वह बेड़ियों में है’ कहनेवाले रूसो ने भी कला एवं विज्ञान के विकास को मनुष्य के नैसर्गिक विकास में बाधक बताया था. यूरोप की वैज्ञानिक उपलब्धियों पर कटाक्ष करने हुए अपने सुप्रसिद्ध निबंध ‘डिस्कार्स आन दि आर्ट एंड साइंसिज’ में उसने कहा था कि विज्ञान एवं आधुनिक कलाओं के विकास ने मनुष्य और समाज के आगे नैतिक संकट खड़े किए हैं. मानवीय गरिमा और शुभत्व की स्थापना के लिए उनके पास न तो कोई कार्यक्रम है, न ही तैयारी. विकास के नाम पर मची आपाधापी ने मनुष्य और समाज के बीच दीवार खड़ी कर दी है. ऐसे संद्धिग्ध, विश्वासशून्यता से भरे समाज में, ‘हमारे पास भौतिक विज्ञानी हैं, गणितज्ञ हैं, रसायनज्ञ, कवि, संगीतकार यहां तक कि पेंटर भी भारी संख्या में हैं. ये सब हैं बस मनुष्य’ की कमी है. यदि वह हैं भी तो वे देश के विभिन्न समाजों में यहांवहां छिपे हुए हैं. इस व्यवस्था ने उन्हें उपेक्षित, बेचारा और अकेला बनाकर रख दिया है.’3 दरअसल रूसो जब सवाल करता है तो उसके जहन में मनुष्यमात्र की स्वतंत्रता और अस्मिता की सुरक्षा जैसे बड़े सवाल होते हैं. अपनी शीर्ष स्थिति का लाभ उठाते हुए पूंजीपति वर्ग विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हुए शोध एवं आविष्कार का उपयोग अपनी स्वार्थसिद्धि हेतु करना चाहता था. रूसो के अनुसार ज्ञान के नाम पर रचे गए आयोजन प्रकारांतर में केवल समाज के शीर्षस्थ वर्ग लिए लाभकारी सिद्ध होते हैं. इसमें कोई दो राय नहीं कि वैज्ञानिक आविष्कारों का जितना लाभ समाज के शीर्षस्थ वर्गों को मिला, उतना जनसाधारण के हिस्से में नहीं आ पाया था. इसके बावजूद यातायात, चिकित्सा, शिक्षा, आवास आदि क्षेत्रों में विज्ञान के माध्यम से जो तरक्की हुई थी, उसका कम ही सही, जनसाधारण को भी लाभ पहुंचा था. गांधी विज्ञान की सभी उपलब्धियों की उपेक्षा कर उच्च प्रौद्योगिकी को परंपरा और संस्कृति पर संकट के रूप में देखते थे. मानते थे कि किसी कारीगर से उसका रोजगार छीन लेना भी हिंसा है. इसलिए उन्होंने रोजगार के लिए नुकसानदेह सिद्ध हो चुकी मशीनों को चलनबाह्यः कर उनकी जगह ग्रामोद्योगों लाने का समर्थन किया था.

गांधी का निजी संपत्ति से दुराव न था. वे मात्र इतना चाहते थे कि ‘वे(जमींदार और राजामहाराजा) अपने लोभ और संपत्ति के बावजूद उन लोगों के समकक्ष बन जाएं जो मेहनत करके रोटी कमाते हैं. मजदूरों को भी यह समझना होगा कि मजदूरों का काम करने की शक्ति पर जितना अधिकार है, मालदार आदमी का अपनी संपत्ति पर उससे भी कम है.’ (हरिजन स