कबीर और तुलसी : कौन ज्यादा प्रासंगिक

विशेष रुप से प्रदर्शित

डॉ. रामचंद्र शुक्ल का पूर्वाग्रह ही है जो उन्होंने ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में कबीर और तुलसी को एक ही समूह में रखा है। जबकि कबीर तुलसी, सूर, मीरा और रसखान जैसे व्यक्तिपरक भक्ति-भाव वाले कवि हरगिज नहीं हैं। उनकी अध्यात्म चेतना प्रखर है। वह सदैव नए सत्य की तलाश में रहती है। वे कहीं रहस्यवादी हैं, तो कहीं उच्छेदवादी। लोकहित की खातिर बड़ी से बड़ी सत्ता से टकरा जाने का साहस कबीर को अपने समय का विलक्षण कवि बनाता है। यही उन्हें अंतिम समय में काशी से मगहर प्रस्थान की हिम्मत देता है। शुक्लजी चाहते तो कबीर, तुलसी, पल्टूदास जैसे लोकवादी कवियों की अलग श्रेणी बना सकते थे। किंतु अव्वल तो लोकसत्ता को महत्व देना उनके संस्कार का हिस्सा नहीं है। दूसरे इससे उनके आदर्श कवि तुलसी की महिमा फीकी पड़ सकती थी। साहित्य का गुण मनोरंजन, संवेदनशीलता और सर्वकल्याण की भावना के अनुरूप पाठक के व्यक्तित्व का परिष्कार करना है। इसके अनुसार कबीर तुलसी की अपेक्षा बड़े सरोकारों वाले कवि हैं।  

अच्छी बात है कि अधिकांश विद्वान कबीर को तुलसी जैसा भक्त कवि न मानकर निर्गुण धारा का संत कवि मानते हैं। आखिर दोनों में अंतर क्या है? क्या इसी कसौटी पर दोनों के व्यक्तित्व की पड़ताल संभव है? भक्त हों या संत, दोनों ही अलौकिक शक्ति में भरोसा रखते हैं। दोनों मानते हैं कि सृष्टि का संचालन और नियंत्रण किसी परासत्ता के हाथों में हैं। संत कवि आमतौर पर उस शक्ति को निराकार मानते हैं, जबकि तुलसी सूर जैसे सगुण कवि साकार। अगर ऐसा है तो भी क्या फर्क पड़ता है? तुलसी ने तो उदारतापूर्वक कह भी दिया है, जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखि तिन तैसी। निर्गुण हो या सगुण, व्यक्ति का मन, जो पसंद को उसे पूजे! अपनाए!! साधना करे!!! पर क्या इतनी-सी ही बात है?

आगे बढ़ने से पहले उचित होगा कि ‘संत’ और ‘भक्त’ शब्दों के बारे में जान लिया जाए। दोनों ही शब्द संस्कृत साहित्य में आए हैं। प्रायः दोनों को समानधर्मा मान लिया जाता है। ‘भक्ति’ और ‘भजन’ दोनों शब्द ‘भज्’ धातु से बने हैं। इसका अर्थ है—‘सेवा करना’, ‘प्रेम के वशीभूत होकर अपने आराध्य के आगे समर्पित हो जाना’। उसके प्रति अटूट आस्था और विश्वास रखना। नारद भक्ति-सूत्र के अनुसार, ‘सा त्वस्मिन परमप्रेमरूपा’—‘भक्ति ईश्वर के प्रति प्रेमानुराग का प्रदर्शन करना’ है। श्रीमद्भागवद में नवधा भक्ति द्वारा उसके विभिन्न रूप या चरणों के बारे में बताया गया है, उसके अनुसार—

श्रवणं, कीर्तन, विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।

अर्चनं वंदनं, दास्यं, सख्यात्मानिवेदनम्।।

अर्थात श्रवण, कीर्तन, पूजा, नाम-स्मरण, पादसेवन, वंदन, अर्चन, दास्य-सख्य भाव से आत्मनिवेदन—इसी से भक्ति भाव सामने आ जाता है। भक्ति की पराकाष्ठा में भक्त अपने आराध्य को समर्पित हो जाता है। उसकी तलाश पूर्ण हो चुकी होती है। सिर्फ आराध्य को पाना शेष रह जाता है। भक्ति की पराकाष्टा में घर-परिवार, रिश्ते-नाते सब पीछे छूट जाते हैं। आस्था और विश्वास पर जोर दिया जाता है। तर्क अथवा संदेह के लिए उसमें कोई स्थान नहीं होता। इस तरह भक्ति ठेठ व्यक्तिपरक आयोजन है, जिसमें आत्मरति की भावना प्रधान होती है। जैसे-जैसे मनुष्य उसमें आगे बढ़ता है—सांसारिक रिश्ते-नाते, यहां तक कि लोक और लोककल्याण की भावना भी पीछे छूटती जाती है। जहां धर्म और उसके प्रति रूढ़ आस्था है, वहां भक्ति है। केवल हिंदू धर्म इसका अपवाद नहीं है। ईसाई धर्म में यीशु कहते हैं कि सभी को अपने पूरे दिल और दिमाग के साथ ईश्वर से प्यार करना चाहिए। यह सवाल करने पर पर कि हे स्वामी, धर्म में सबसे बड़ा विधान कौन-सा है? यीशु उत्तर देते हैं—‘अपने परमेश्वर यहोवा से, अपने सारे मन, प्राण और बुद्धि से प्रेम करना, यही सबसे बड़ी आज्ञा है।’(मत्ती 22/36/40)।

‘संत’ और ‘संतई’ में लोकोन्मुखता प्रधान होती है। ‘संत’ शब्द का प्रयोग सामान्यतः पवित्रात्मा, बुद्धिमान, परोपकारी, सज्जन और सदाचारी व्यक्ति के लिए किया जाता है। ऐसे व्यक्ति के लिए किया जाता है जो सांसारिक मोह-माया से परे, लोककल्याण में लीन रहता है। जो प्राणिमात्र का भला चाहता है। उसकी सारी साधना, तप परोपकार को ही समर्पित होते हैं। संत आत्ममुक्ति की साध तो रखता है, किंतु शेष दुनिया से संबंध तोड़कर नहीं। न ही उससे निर्लिप्त होकर रहता है। बल्कि संतई का स्तर के बढ़ने के साथ-साथ वह और अधिक उदार, और ज्यादा मानवीय तथा करुणामूलक होता जाता है। ‘संत’ का अंग्रेजी पर्याय, इसी से मिलता-जुलता शब्द Saint है, जिसका अर्थ है—पवित्र कर देना। संत के लिए आचरण पवित्र होता है। एक तरह से आदर्श की पराकाष्ठा पर स्थित माना जाता है, जिससे यह माना जाता कि उसमें वे  गुण और शक्तियां भी समा जाती हैं, जो ईश्वर में अभिकल्पित की जाती हैं। उसके पास आते ही मनुष्य का मन पवित्रताबोध से भर जाता है। पश्चिम में चमत्कार करने की शक्ति को संत का विशेष लक्षण माना गया है, तथापि यह आवश्यक नहीं है। कबीर के अनुसार जो निर्वैर और निष्कामी हो, विषय-वासनाओं से विरक्त रहता हो, वही संत है—‘निबैरी, निहकामता साईं सेती नेह। विशया सूं न्यारा रहे संतन का अंग सह।’

साफ है कि भक्ति में व्यक्तिपरक्ता है। प्रहलाद की भक्ति की प्रशंसा होती है। दृष्टांत के अनुसार रात-दिन की भक्ति के बाद वह अपने आराध्य को प्रसन्न करने में सफल होता है और ‘स्वर्ग में सबसे ऊंचा स्थान प्राप्त कर लेता है।’ ऐसी भक्ति से दुनिया को क्या मिला, इसकी न तो भक्त को चिंता होती है, न ही उसके आराध्य को है। भक्त आमतौर पर संसार को मोह-माया मानकर उसे अपने लक्ष्य में बाधक मानता है, इसलिए वह इसे सुधारने पर कोई ध्यान नहीं देता। वह अपना सारा ध्यान कथित ‘परमपद’ को प्राप्त करने पर लगाए रहता है, ताकि बाद में उसे दुनिया में आना ही न पड़े। इस अंधी-दौड़ से उसे सचमुच कुछ हासिल होता है या नहीं, इस सवाल को छोड़ देते हैं। दूसरी ओर संत का पूरा ध्यान लोककल्याण पर निहित होता है। इसके लिए उपदेश से ज्यादा वह अपने आचरण से प्रेरणा जगाता है। वह परोपकार, दया, करुणा, समानता, बंधुता का प्रचार करता है, ताकि यह दुनिया बेहतर हो सके। संत कवि की कल्पना में उसके आराध्य, लोक यहां तक कि मुक्ति की कामना भी निहित हो सकती है। लेकिन भक्त-कवि की तरह उसकी यात्रा अकेली नहीं होती। बल्कि शेष समाज को साथ लेकर चलने की होती है।

अब सवाल है कि इनमें साहित्य किसके करीब है? या इनमें से कौन साहित्य को उसकी संपूर्ण मूल्यवत्ता के साथ अभिव्यक्ति दे सकता है? ‘भक्त’ और ‘संत’ के अंतर को समझ लेने के बाद इस प्रश्न का उत्तर दे पाना मुश्किल नहीं रह जाता। चूंकि भक्त कवि के लिए उसका आराध्य ही सब कुछ होता है, इसलिए वह जो लिखेगा उसकी प्रशंसा में ही लिखेगा। उसकी कविता बहुत कुछ चारणगीत की तरह होगी, जिसमें दोहराव और अतिश्योक्तियां स्वाभाविक है। जैसे चारण और भाट अपने आश्रयदाताओं की प्रशस्ति में लिखते-गाते थे, भक्त कवि अपने अलौकिक आराध्य की प्रशस्ति में लेखन करेगा। तुलसी का संपूर्ण साहित्य, रामचरितमानस से लेकर, कवितावली और विनयपत्रिका तक इसके अलावा क्या है? चूंकि इन कृतियों का संबंध धर्म-विशेष से है इसलिए हम इन्हें ज्यादा से ज्यादा  प्रचार-साहित्य कह सकते हैं।

तुलसी और मानस के प्रशंसक उनकी प्रशंसा में अकसर कहते हैं कि तुलसी ने रामचरित मानस में सामाजिक आदर्श को सामने रखा है। कुछ इससे भी आगे बढ़कर राम को आदर्श राजा दर्जा देकर रामराज्य का गुणगान करने लगते हैं। रामायण के आदर्श क्या हैं? पूछो तो तत्काल कह दिया जाता है कि रामायण हमारे सामने लक्ष्मण जैसे आज्ञाकारी भाई, भरत जैसे त्यागी, राम जैसे पुत्र, कौशल्या जैसी मां और सीता जैसी पत्नी का आदर्श सामने रखती है। थोड़ा आगे बढ़ें तो हनुमान जैसे भक्त और विभीषण जैसे मित्र इस सूची को और आगे बढ़ा देते हैं। यहां हम इन पात्रों के चरित्र का स्वतंत्र विश्लेषण न भी करें, तो भी यह मानना ही पड़ेगा कि जिन्हें रामचरितमानस में ‘आदर्श’ के रूप में दर्शाया गया है, असल में वे पारिवारिक या दरबारी आदर्श हैं। समाज में मनुष्य की क्या भूमिका होनी चाहिए? और समाज का अपनी इकाइयों के प्रति कैसा व्यवहार होना चाहिए? यहां तक कि एक पड़ोसी का दूसरे पड़ोसी के प्रति कैसा व्यवहार होना चाहिए—इस बारे में ‘मानस’ हमें कुछ नहीं बताता। वह ‘रामराज’ को आदर्श कहकर महिमामंडित करता है। मगर प्रजा के अधिकारों, उसकी इच्छा को लेकर उसमें कोई टिप्पणी नहीं है। रामराज्य को कल्याणकारी मान भी लिया जाए, तो भी इतना साफ है कि उसमें कल्याण(यदि वह कहीं है तो) तो ऊपर से थोपा हुआ प्रतीत होता है। प्रजा क्या चाहती है, राजा की इच्छा, महत्वाकांक्षा या जिद के आगे आगे उसका कोई मूल्य नहीं होता। एक शंबूक अपनी मर्जी से पढ़ना चाहता है तो राजा राम की तलवार उसकी गर्दन तराश देती है। तुलसी की वर्गदृष्टि, शूद्रों और स्त्रियों के प्रति उनके हेय विचारों पर तो चर्चा होती ही रहती है।  

समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व जैसे आधुनिक मूल्यों की बात तो जाने ही दीजिए। आस्था और भक्ति में इन मूल्यों को गैर-जरूरी और अप्रासंगिक मान लिया जाता है। निःशर्त समर्पण की शर्त के कारण, आत्मसम्मान और स्वाभिमान जैसे उदात्त मानवीय मूल्य भी भक्ति-मार्ग में बाधक मान लिए जाते हैं। कह सकते हैं कि भक्ति की पराकाष्ठा व्यक्ति को नितांत आत्मपरक बना देती है। इतना कि अपनी समूची प्रतिभा के बावजूद ‘भक्त’ अपने दैन्य और दास्यबोध से मुक्त नहीं हो पाता। इसे हम तुलसी की कविता में जगह-जगह रेखांकित कर सकते हैं। उनके जीवन का दैन्य(विडंबना) ही  उनकी कविता में समाया हुआ है। राम के प्रति अनन्य आस्था भी इसे कम नहीं कर पाती—

अगुण-अलायक-आलसी जानि अधम अनेरो

स्वारथ के साथिन्ह तज्यो तिजराको-सो टोटक, औचट उलटि न हेरो।। विनयपत्रिका, 272

(‘मुझे गुणहीन, नालायक, आलसी, नीच अथवा निकम्मा समझकर, स्वार्थी लोगों ने तिजारी के टोटके की तरह त्याग दिया है और भूलकर भी मेरी ओर नहीं देखा’); अथवा

तनु जन्यो कुटिल कीट ज्यों तज्यो मातु-पिताहूं।

काहे को रोष-दोष काहि धौं मेरे ही अभाग मोसां सकुचत छुई सब छाहूं। विनयपत्रिका, 275

(जैसे कुटिल कीड़ा(सांप) अपनी देह से उत्पन्न हुई केंचुली को छोड़ देता है; वैसे ही मेरे मातापिता ने मुझे जन्मते ही त्याग दिया था। मैं किस पर क्रोध करूं, और किसे दोष दूं? मेरे ही अभाग से सब मेरी छाया छूने से भी  सकुचाते हैं।’)

रामचरितमानस को पारिवारिक आदर्श(!) तक सीमित कर देना, कदाचित तुलसी की निजी कुंठा की ही देन था। उनके माता-पिता अत्यंत गरीब थे। भीख मांगकर गुजारा करते थे। ऊपर से, प्रतिकूल(!) नक्षत्र में जन्म लेने के कारण उन्होंने तुलसी को बचपन में त्याग दिया था। सो उनका बचपन घोर विपन्नता के बीच, ही बीता था—

जायो कुल मंगन बधावो न बजायो सुनि, भयो परिताप पाप जननी-जनक को।

बारे तें ललात बिललात द्वार-द्वार दीन जानत हौं चारि फल चारि ही चनक को।(कवितावली, उत्तर कांड, 73)

(मैंने भिखमंगों के कुल में जन्म लिया। मेरा जन्म सुनकर बधावा नहीं बजाया गया, मेरे मातापिता को अपने पाप पा परिताप हुआ। मैं बचपन से ही भूख से व्याकुल होकर दरिद्रता के कारण अन्न के लिए द्वारद्वार बिललाता फिरता था।)

‘जाति के, सुजाति के, कुजाति के पेटागि-बस,

खाए टूक सबके विदित बात दुनी सो।कवितावली, 72  

(पेट की आग बुझाने के लिए मैंने जाति, सुजाति और कुजाति सबके टुकड़े खाए हैं। यह बात समूचा संसार जानता है।)

तुलसी के इस दैन्य का मुख्य कारण है श्रम से विलगाव। माता-पिता की ओर से मिला परजीविता का संस्कार, जिसे जाति-व्यवस्था में अपने अटूट विश्वास के चलते वे लांघ ही नहीं पाते। कवि होने के कारण बस इतना कर पाते हैं कि जो भौतिक जीवन में जो याचनाभाव लोक के प्रति है, कविता में वह आराध्य के प्रति मुखर होने लगता है। जिसे उन्हीं जैसा परजीवी समाज भक्ति का आदर्श बताने लगता है।

दूसरी ओर कबीर हैं। जन्म उनका भी अज्ञात कुल में हुआ था। माता-पिता हिंदू थे या मुसलमान, कभी इसे लेकर चिंता में नहीं पड़े।  पालन-पोषण एक श्रम-शील आजीवक परिवार में हुआ था। सो अपने ही श्रम के भरोसे जीना, मेहनत करके खाना, उन्हें संस्कार में मिला। एक मेहनतकश किसान, मजदूर या शिल्पकार की तरह कबीर का हृदय भी साफ है। आत्मविश्वास से भरा हुआ। वे करघा चलाते-चलाते कविता रचते थे। उनके चारों ओर अपना समाज था, जिसका वे भला चाहते थे। इसलिए उनकी कविता में न तो किसी प्रकार का दैन्य झलकता है न ही परिताप की भावना। भावना के वशीभूत होकर कभी-कभार खुद को राम की बहुरिया भी कह जाते हैं। लेकिन जब उनका स्वाभिमान हुंकारता है तो उसे भी आड़े हाथ लेने लगते हैं—

हम बहनोई राम मोर सारा, हमहिं बाप हरि पुत्र हमारा

कहै कबीर हरी के बूता, राम रमैतैं कुकरि के पूता—बीजक, 100

कबीर की कविता तुलसी की कविता जैसी  चारणगीत नहीं है। न ही वे भक्ति के नाम पर खुद को और समाज को पंगु बनाने का संदेश देते हैं। कबीर को खुद पर भरोसा है। इसलिए ईश्वर से कुछ अपेक्षा ही नहीं रखते। अपनी संतई में इतने निरपेक्ष हैं कि ईश्वर का नाम भी बिसर जाए तो खुशी मनाने लगाते हैं—भला हुआ हरि बिसरे मोरे सिर से टली बला।

सवाल यह है कि इतना कुछ होते हुए भी भक्ति को आदर्श क्यों मान लिया गया? कारण है—धर्मसत्ता और राजसत्ता का स्वार्थपूर्ण गठजोड़ और जातिप्रथा। स्वार्थ के कारण ये दोनों ही वर्ग नहीं चाहते थे कि निचले वर्ग के लोग सवाल करना सीखें। इसलिए भक्ति को महिमा-मंडित किया। इससे उन्हें तो लाभ हुआ, लेकिन उनके कहने पर भक्ति की राह पर चल पड़ा जनसमुदाय कब पत्थर की मूर्ति को अपना ईश्वर, ब्राह्मण को अपना देवता और नाम-पाठ को ही ज्ञान समझने लगा, यह वह समझ ही नहीं पाया। आस्था और विश्वास को ही सबकुछ मान लेने से वह जान ही नहीं पाया कि भक्ति का जन्म अज्ञानता और ज्ञान के टोटमीकरण की प्रक्रिया के दौरान हुआ है। नाम रटते-रटते भक्त नाम को ही सब-कुछ मानने लगता है, ठीक ऐसे ही जैसे मूर्ति को पूजते-पूजते व्यक्ति पत्थर को ही देवता मान बैठता है। खुद तुलसी इसी मानसिकता के शिकार नजर आते हैं—

राम नाम को कल्पतरु कलि कल्यान निवास

जो सुमिरत भयो भाग ते तुलसी तुलसीदास

कबीर नाम जप को सिवाय प्रदर्शन के कुछ नहीं मानते। ऐसे दिखावा करने वालों को वे आड़े हाथों लेते हैं—

राम कहे जो जगत गति पावै, खांड कहे मुख मीठा

पावक कहे पांव जो डाहै, जल कहे त्रिषा बुझाई

बिनु देखु बिनु अरस-परस बिनु नाम लिए का होई

धन के कहे धनिक जो होवै, निरधन रहै न कोई

कुल मिलाकर भक्ति के आवरण जहां तुलसी नाम रटने तक सीमित हो जाते हैं, वहीं, कबीर की संतई उन्हें ज्ञान के स्वागत को सदैव तत्पर रहती है—‘संतो भई आई ग्यांन की आंधी… ’

यह अनायास नहीं है कि बीती कुछ शताब्दियों में  ‘भगत’ और ‘भगतजी’ जैसे संबोधन दलित और पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित कर दिए गए हैं। जबकि ब्राह्मण ने अपने लिए ‘पंडिज्जी’ संबोधन को सुरक्षित रखा हुआ है। कबीर इस षड़यंत्र का जगह-जगह पर्दाफाश करते हैं। उनकी कविता का यही गुण उसे युगप्रवर्त्तक और कालातीत बताता है, जबकि राम-राम रटते-रटते तुलसी(और उनके भक्त) कब जड़ हो जाते हैं, इसे वे स्वयं भी नहीं जान पाते।

ओमप्रकाश कश्यप

महुआ डाबर : एक  गुमशुदा गांव, जहां चिराग नहीं जलते

विशेष रुप से प्रदर्शित

आदमी कहीं चला जाए, कितना ही कमा ले, खुशियों की चाहे जितनी बरसात हो, यदि वह अपनी जड़ों से अनजान है तो चैन नहीं मिलता. कसक बनी ही रहती है. जड़ों की खोज का सिलसिला कभी-कभी ऐसी स्थिति में ला खड़ा करता है जो उम्मीद से एकदम परे हो. कभी-कभी तो चमत्कार की तरह महुआ डाबर जैसा पूरा गांव धरती की छाती पर उभरने लगता है.  

आजादी के इतिहास की इस महत्वपूर्ण मगर गुमशुदा कहानी की शुरुआत 1994 में 65 वर्षीय अब्दुल लतीफ अंसारी नामक व्यापारी से होती है. करीब डेढ़ सौ साल पहले उनके पूर्वजों को अपना जमा-जमाया धंधा छोड़कर पलायन करना पड़ा था. अहमदाबाद, पुणे जैसे नगरों-उपनगरों में भटकते हुए वे मुंबई पहुंचे थे. वहां उन्होंने अपना धंधा जमाया. धीरे-धीरे खाते-पीते व्यापारी बन गए. अब्दुल लतीफ को विरासत में जहां पूर्वजों का जमा-जमाया व्यापार मिला, धन-दौलत मिली—साथ में वे कहानियां भी मिलीं, जिन्हें उनके पूर्वज अकथ पीड़ा के साथ सुनाया करते थे. उन्हें सुनते-सुनते महुआ डाबर नाम का वह गांव कैसा था? कहां था? देश की आजादी के पहले संग्राम में उनके पुरखों की हिस्सेदारी की बात कितनी सच है? यह जानने की उनकी उत्कंठा लगातार बढ़ती गई. आखिरकार वे उस गांव की तलाश में जुट गए जो सरकारी रिकार्ड और नक्शों से भी कभी का गायब हो चुका था—

‘मैं अपने पूर्वजों के गांव को खोजने की जिद ठाने हुए था. मुझे पुरखों के इस दावे की हकीकत का पता लगाना था, जिसमें उनका कहना था कि 1857 के सैन्य विद्रोह के बाद, आरंभ हुए अंग्रेजी दमन के कारण उन्हें अपना गांव छोड़ना पड़ा था.’1 

वे आगे कहते हैं, ‘मुझे अपनी शुरुआत शून्य से करनी थी. बस्ती जिले के नक्शे पर उस गांव का कहीं अता-पता न था.’2 आखिरकार 8 फरवरी, 1994 को, पूर्वजों के ठिकाने को खोजने का जुनून उन्हें जिले के बहादुरपुर विकास खंड तक ले गया. आगे वे जिस स्थान पर पहुंचे वहां गैहूं, मटर और अरहर की फसल लहलहा रही थीं. महुआ डाबर के बारे में किसी को कोई पता नहीं था. खोज के दौरान गैहूं की लहलाती फसल के बीच दो जली हुई मस्जिदों के अवशेष दिखाई पड़े. फिर उन्होंने बहादुरपुर से दो किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित उस टीले को भी खोज निकाला, जो जले हुए घरों के मलबे के साथ, अतीत की किसी आबाद बस्ती की ओर संकेत करता था. मगर प्रशासन को खुदाई के लिए तैयार करने के लिए कुछ और सुबूतों की आवश्यकता थी. वे बस्ती जिले के अधिकारियों से मिले. स्थानीय पुस्तकालयों की खाक छानी. थानों में जाकर मौजूद रिकार्ड को खंगाला. उन सुबूतों के साथ वे बस्ती के जिला अधिकारियों से मिले. उनके बार-बार आग्रह और साक्ष्यों को देखकर जिला अधिकारी एक समिति के गठन को तैयार हो गए. खोज का सिलसिला कमजोर न पड़े, इसके लिए अब्दुल लतीफ ने व्यापार को अपने बेटों के हवाले कर, बस्ती को दूसरा ठिकाना बना लिया. धीरे-धीरे बात आगे बढ़ी. साक्ष्य जुटने लगे.

पता चला कि 1865 तक बस्ती जिले का इलाका गोरखपुर जिले में आता था. इसलिए तत्संबंधी सभी दस्तावेज गोरखपुर जिले के कलेक्टर के कार्यालय से प्राप्त होंगे. खोज के दौरान उन्हें कलावरी थाने में एक उल्लेख मिला, जिसमें उस महुआ डाबर के उजाड़ने और दुबारा न बसने देने के निर्देश थे. अंग्रेज अफ़सर सार्जेन्ट बुशर का वह पत्र प्राप्त हुआ जिसमें महुआ डाबर गांव का उल्लेख मनोरमा नदी(घाघरा नदी की उपशाखा) के किनारे किया गया था। ईस्ट इंडिया कंपनी के एक दस्तावेज से पता चला कि फ्रांसिस बुकनेन ने 1800-1801 की यात्रा में महुआ डाबर का उल्लेख करते हुए बताया था कि वह छोटा-सा कस्बा था, जिसमें खपरैल की छत वाले लगभग 200 घर थे. उनमें से कुछ पक्के घर भी थे.3 जिलाधिकारी द्वारा गठित समिति आखिरकार बस्ती जिले का 1813 का नक्शा खोजने में कामयाब हो गई, जिसमें महुआ डाबर को दर्शाया गया था. उसके बाद सब कुछ अनुकूल होता चला गया.

राज्य और केंद्र सरकार की मंजूरी आने के बाद 14 जून 2010 से खुदाई का काम आरंभ हुआ. देखते ही देखते एक जमींदोज गांव इतिहास के पन्नों पर उबरने लगा. अगले पंद्रह दिनों तक दर्जनों मजदूर और पुरातत्वविद खुदाई के काम में जुटे रहे. सफलता करीब आने लगी. कुआं, लाखौरी ईंटों से बनी दीवारें, छज्जे, नालियां, लकड़ी के जले टुकड़े, राख, मिट्टी के बर्तन, ईस्ट इंडिया कंपनी के 1835 के सिक्के, कुछ पुराने सिक्के, मिट्टी के खिलौने और हड्डियां प्राप्त हुई हैं. जो बताती हैं कि कुछ वर्ष पहले वहां एक भरा-पूरा संपन्न गांव रहा होगा.

क्या हुआ था वहां?

कहानी अठारहवीं शताब्दी के साथ शुरू होती है. भारत में पांव जमा लेने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी जमकर मुनाफा कमाना चाहती थी. वस्त्र उद्योग उस समय का सबसे लाभदायक उद्योग था. इसलिए उसका तेजी से मशीनीकरण किया गया था. इस काम में बाधक बने थे गांव-गांव बसे बुनकर, रंगरेज जैसे कारीगर. वे स्थानीय निवासियों से जरूरी कपास या सूत खरीदकर गांव के लोगों वस्त्र-संबंधी जरूरत की पूर्ति करते थे. कंपनी ने कारीगरों का दमन करना आरंभ दिया. मुर्शिदाबाद, ढाका जैसे शहरों में बुनकरों के हाथ काट डाले गए. जिन कारीगरों की वस्त्र-कला की दुनिया-भर में पहचान थी, जिनके हाथों की बुनी मलमल दुनिया-भर में नाम कमाती थी—वे कारीगर आए दिन के अत्याचार और दमन के कारण वे स्थान छोड़ने को मजबूर हो गए. उनीसवीं शताब्दी की शुरुआत के आसपास, पलायन के लिए मजबूर बुनकरों के बीस सदस्यों का ऐसा ही एक कारवां, मुर्शिदाबाद और नादिया जैसे शहरों से चलकर भटकता हुआ अवध की धरती पर पहुंचा. वहां के जमींदार ने उन्हें महुआ डाबर में शरण दी. मेहनती और कारीगर लोग थे. हुनर बोलता था. कुछ ही अर्से में उन्होंने अपने दैन्य को पीछे छोड़ दिया. उनकी कला के बल पर महुआ डाबर कस्बे के रूप में उभरने लगा. उनके बनाए वस्त्र न केवल बस्ती और गोरखपुर के बाजारों में, बल्कि नेपाल तक भी धड़ल्ले से बेचे जाते थे.

महुआ डाबर पहुंचे बुनकरों में कुछ ऐसे भी थे जिनके पूर्वजों के हाथ अंग्रेजों ने काट डाले थे. उनके मन में अंग्रेजों के प्रति आक्रोश था. इसलिए 1857 में विद्रोह की चिंगारी जब महुआ डाबर पहुंची तो उनका खून भी उबलने लगा. बुनकरों ने छापामार दल का गठन किया, जिसमें पिरई खां और जाकिर अली जैसे बहादुर बुनकर शामिल थे.

सैन्य-विद्रोह की चिंगारी

सैन्य विद्रोह की शुरुआत 10 मई 1857 को मेरठ से हुई थी. जल्दी ही दिल्ली से लेकर कानपुर, लखनऊ, झांसी आदि क्षेत्र उसके प्रभाव में आने लगे. उनकी देखा-देखी फैजाबाद में 22वीं नैटिव इन्फैंट्री ने 8 जून 1957 को विद्रोह का बिगुल फूंक दिया. फैजाबाद पर कब्जा करने के बाद उन्होंने वहां मौजूद अंग्रेज सैन्य अधिकारियों को अपने अधिकार में ले लिया. किंतु एक रात कैद रखने के बाद उन्होंने अंग्रेजों को वहां से चले जाने को कहा. यही नहीं उन्होंने अंग्रेज सिपाहियों की यात्रा का इंतजाम करने के साथ-साथ उन्हें अपने हथियार भी साथ ले जाने की अनुमति दे दी.

अगले दिन यानी 9 जून की सुबह 22 अंग्रेज सैन्य अधिकारी घाघरा नदी के रास्ते दीनापुर(पटना) छावनी जाने के लिए चार नावों पर सवार होकर निकल पड़े. जब वे बेगमगंज के करीब से गुजर रहे थे, तब उनका सामना आजमगढ़ की 17वीं नेटिव इन्फेंट्री के विद्रोही सैनिकों से हुआ. उस लड़ाई में जान बचाकर भाग रहे अंग्रेजों की दो नावें डुबा दी गईं. फैजाबाद के सुपरिटेंडेंट कमीश्नर कर्नल गोल्डने, सार्जेंट मेजर मैथ्यू और ब्राइट उस संघर्ष में मारे गए. जबकि मिल, करी और पारसन ने खुद को बचाने के लिए नदी में छलांग लगा दी. और डूब गए.

बाकी बचे अंग्रेज बचते-बचाते 10 जून को वे कप्तानगंज(बस्ती) पहुंचे. वहां के तहसीलदार ने उनका स्वागत किया. बताया कि बस्ती में विद्रोही सैनिकों ने डेरा डाला हुआ है. इसलिए उनका वहां जाना सुरक्षित नहीं है. उन्होंने सैनिकों को गोरखपुर जाने की सलाह दी. तहसीलदार ने रास्ता दिखाने के लिए एक जमादार के अलावा पांच खच्चर, सुरक्षा के लिए तीन बंदूकची और रास्ते के खर्च के लिए 50 रुपये भी दिए.    

तहसीलदार के कहे अनुसार अंग्रेज अधिकारियों का कारवां आगे बढ़ गया. करीब 13 किलोमीटर की यात्रा के बाद वे महुआ डाबर पहुंचे. वहां साथ चल रहे बंदूकचियों में से एक ने कहा कि वे उस गांव में कुछ देर के लिए आराम कर सकते हैं. इतना कहकर वह सुरक्षित ठिकाने और खाने-पीने की चीजों का प्रबंध करने के लिए आगे बढ़ गया. उसके बाद की घटना का वर्णन प्रत्यक्षदर्शी सार्जेंट बुशर ने अपने बयान में किया था, उसके अनुसार—

‘हम आगे बढ़ गए. कुछ भी संदेहास्पद नहीं था. हमें अपनी सुरक्षा का भरोसा हो चला था. जैसे ही हम गांव के पास पहुंचे, वह बंदूकची हमें फिर दिखाई दिया. वह दो अन्य व्यक्तियों से बात कर रहा था. उसके पास पहुंचते ही हम भय से थर्रा उठे. पूरा गांव हथियारों के साथ तैयार था. बिना कोई टिप्पणी किए हम तीन सिपाहियों के पीछे-पीछे चुपचाप आगे बढ़ते गए. गांव के पार होते ही हमें एक नाला दिखाई पड़ा. नाला बहुत गहरा नहीं था. हम उसमें पार जाने के लिए उतर पड़े. अचानक गांववालों ने बंदूक और तलवार साथ हमपर हमला बोल दिया. यह देख हमने जल्दी से जल्दी नाला पार करने की कोशिश की. लेफ्टीनेंट लिंडसे हमलावरों की पकड़ में आ गए. उन्होंने उन्हें वहीं टुकड़े-टुकड़े कर दिया.

जैसे ही हम नाले के दूसरे सिरे पर पहुंचे, गुस्साए गांव वाले हम पर टूट पड़े. उन्होंने हमला करके हमारे दल के पांच सदस्यों को मौत के घाट उतार दिया. मैं और लेफ्टीनेंट कॉटली वहां से भागने में कामयाब हो गए. लेकिन भीड़ हमारे पीछे थी. लगभग 300 मीटर तक दौड़ने के बाद कॉटली की हिम्मत जवाब दे गई. वे जमीन पर गिर पड़. हमलावरों ने उन्हें भी टुकड़े-टुकड़े कर दिया.’5

सार्जेंट बुशर किसी तरह खुद को बचाने में कामयाब हो गया. उसने एक गांव में शरण ली. जहां से उसे विलियम पेपे, डिप्टी मजिस्ट्रेट ने सुरक्षित बाहर निकाल लिया. अंग्रेजी दस्तावेजों में महुआ डाबर के क्रांतिकारियों के मुखिया के रूप में जाफ़िर अली का नाम दिया गया है, जबकि दैनिक जागरण सहित दूसरे अखबारों के में पिरई खान को महुआ डाबर की गुरिल्ला टुकड़ी का मुखिया बताया गया है. अखबार के अनुसार—

‘10 जून 1857 को अंग्रेजी सेना के लेफ्टिनेंट लिंडसे, लेफ्टिनेंट थामस, लेफ्टिनेंट इंग्लिश, लेफ्टिनेंट रिची, सार्जेन्ट एडवर्ड, लेफ्टिनेंट काकल व सार्जेंट बुशर फैजाबाद से बिहार के दानापुर(पटना) जा रहे थे. इधर पिरई खां के नेतृत्व में उनके गुरिल्ला क्रांतिकारी साथियों ने अंग्रेजी सेना के कुख्‍यात अफसरों की घेराबंदी करके तब तक मारा, जब तक उनकी मौत नहीं हो गई. अंग्रेजी सेना के छह अफसरों के मौत के बाद सार्जेंट बुशर घायल अवस्था में किसी तरह से अपनी जान बचाकर भाग निकला और अंग्रेजी हुकूमत के उच्च अधिकारियों को सारी घटना की जानकारी दी.’6

महुआ डाबर : नरसंहार का शिकार दूसरा जलियांवाला बाग

महुआ डाबर के निवासियों छह अंग्रेज सैन्य अधिकारियों की हत्या का आरोप था. अनियोजित होने के कारण अंग्रेजों ने शीघ्र ही उस घटनाक्रम पर काबू पर लिया. उसके बाद डिप्टी मजिस्ट्रेट विलियम पेपे के नेतृत्व में ग्रामीणों के दमन की शुरुआत हुई. महुआ डाबर को पूरी तरह से मिटा देने के आदेश उसे गोरखपुर के कार्यकारी कमिश्नर डब्ल्यू. विनयार्डे की ओर से प्राप्त हुए थे. 15 जून 1857 को लिखे गए पत्र में पेपे को ‘मजिस्ट्रेट’ की शक्तियां और अधिकार देते हुए विनयार्ड ने लिखा था कि वह 12वीं अनियमित घुड़सवार सेना की एक टुकड़ी के साथ तुरंत बस्ती के उन क्षेत्रों में जाए जहां विद्रोही सिर उठाए हुए हुए हैं. बस्ती थाने से पुलिसबल, मुशिंफ तथा कुछ मजदूरों को लेकर महुआ डाबर के लिए प्रस्थान करे, जहां पांच अंग्रेजों की बेरहमी से हत्या की गई है. पत्र में गांव को ‘पूरी तरह जलाने और नष्ट कर देने के लिए आवश्यक बारूद ले जाने’ का भी निर्देश था. आगे हर संभव मदद का भरोसा दिलाते हुए लिखा था कि महुआ डाबर पूरी तरह जला देने का भरोसा हो जाने के बाद ही उस गतिविधि को अंजाम दे. पत्र में पूरे गांव की संपत्ति, जिसमें जानवरों और फसल को कुर्क कर लेने की भी सूचना थी. विनयार्ड ने लिखा था कि उसे यह सुनकर खुशी होगी कि महुआ डाबर को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया गया है, और किसी भी मकान का एक भी पत्थर सही-सलामत नहीं बचा है.7

विलियम पेपे को जैसा आदेश मिला था, उसने वैसा ही किया. यह बात पेपे द्वारा 22 जून 1859 को लॉर्ड केनिंग, गवर्नर जनरल और उच्च अधिकारियों को भेजे गए पत्र द्वारा प्रमाणित होती है. पत्र में उसने लिखा था—

‘3 जुलाई(1957) को मैंने महुआ डाबर नाम के बड़े गांव को पूरी तरह नष्ट कर दिया है, जहां 22वीं देशी पैदल सेना के अधिकारियों की हत्या की गई थी.’ यही नहीं पत्र में पेपे ने 26 जून को इलाके के ही सौसीपुर(संसारपुर) गांव को भी आग लगा देने का उल्लेख था, जहां के किसान विद्रोही सैनिकों को मदद पहुंचा रहे थे.

उस समय महुआ डाबर की आबादी 5000से ऊपर थी. वह भरा-पूरा संपन्न गांव था. आग लगाने से पहले वहां भीषण कत्लेआम मचाया गया था. लोगों की गिरफ्तारियां की गई थीं. विद्रोह में हिस्सा लेने वाले गुलजार खान, निहाल खान, घीसा खान, बदलू खान को 18 फरवरी 1858 को फांसी पर लटका दिया गया. ये सभी महुआ डाबर के पठान थे. इनके अलावा भैंरोंपुर के गुलाम खान, बखीरा के बाबू को भी फांसी की सजा दी गई. जाफिर अली, जिसे महुआ डाबर विद्रोह का प्रमुख सूत्रधार बताया है, उपर्युक्त घटनाक्रम के बाद मक्का चला गया था. यात्रा से लौटते ही उसे भी गिरफ्तार कर लिया, जिसे बाद में फांसी लगा दी गई. गौरतलब है कि 1857 के विद्रोह में देशी सैनिकों का साथ देने वालों में अकेले महुआ डाबर के लोग शामिल नहीं थे. अपितु अमोधा की रानी ताहोरी कुमारी, नागर के राजा उदयप्रताप सिंह, अथ्दमा के राजा शिवगुलाम सिंह, तिल्जा के शेख वली मोहम्मद आदि अनेक सेनानी शामिल थे. शेख गुलाम मोहम्मद को उनके साथियों शेख सुल्तान, शेख तालिब, अब्दुल बहाव और बुझारत के साथ वलीबाग में इसलिए फांसी दे दी गई थी कि उन्होंने बस्ती के तहसीलदार को उस समय मार डाला जब वह स्वाधीनता सेनानियों की संपत्ति को कुर्क करने की धमकी दे रहा था.8 समाचार के अनुसार अंग्रेजों ने तिल्जा गांव का भी वही हश्र किया था, जो महुआ डाबर का किया था.

अब्दुल लतीफ अंसारी को जिन्हें महुआ डाबर के इतिहास के दबे सच को दुनिया के सामने लाने का श्रेय हासिल है, पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम द्वारा सम्मानित किया गया. हाल ही में कर्नल तिलक राज ने महुआ डाबर के बहादुर बुनकरों को याद करते हुए ओज-भरा गीत रचा है—

महुआ डाबर! महुआ डाबर!!                        

इतिहास का है काला दिन!!

शहीदों के त्याग का है अदभुत दिन

आज़ादी संग्राम के हिम्मत के दिन

शहीदों के लहू की इज्ज़त के दिन

इन्क़िलाब! ज़िन्दाबाद! इन्क़िलाब! ज़िन्दाबाद!

—ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

  1. दि टेलीग्राफ, 8 दिसंबर, 2008.
  2. वही
  3. ए गजेटियर ऑफ टेरीटरीज अंडर दि गवर्नमेंट ऑफ ईस्ट इंडिया कंपनी, खंड 3, एडवर्ड थॉरंटन, 1854, पृष्ठ 877.
  4. मॉर्निंग क्रोनीकल, लंदन, 30 सितंबर, 1857http://www.pastpresented.ukart.com/mahuadabar/index.htm
  5. वही
  6. दैनिक जागरण, आजादी की समरगाथा में हो गई महुआ डाबर की शहादत, 13 अगस्त 2021.
  7. विनयार्ड का विलियम पेपे को संबोधित पत्र दिनांक 15 जून, 1857, http://www.pastpresented.ukart.com/mahuadabar/mahuadabar-peppe-mutiny.htm
  8. याद करो कुर्बानी, लाइव हिंदुस्तान, दिनांक 26 जनवरी 2018,  https://www.livehindustan.com/uttar-pradesh/gorakhpur/story-the-british-had-wiped-out-the-first-freedom-struggle-the-existence-of-tilja-1767740.htm

बौद्ध-धर्म धर्म न होकर बुद्धि का मार्ग है

विशेष रुप से प्रदर्शित

पेरियार ई.वी. रामासामी

एक तिब्बती पेंटिंग

हम बुद्ध जयंती क्यों मनाते हैं? गौतम बुद्ध का जन्मोत्सव मनाने का आशय कपूर, नारियल, कुमकुम और खाद्य-पदार्थों से बुद्ध के चित्र अथवा मूर्ति की प्रार्थना करना नहीं है. इसका आशय है कि हमने अपने जीवन में बुद्ध के जीवन और उपदेशों से कुछ सीखने तथा उनके बताए मार्ग पर चलने का निश्चय कर लिया है. मुझे नास्तिक कहा जाता है. यदि नास्तिक का आशय वेद, पुराणों एवं धर्मशास्त्रों में को प्रमाण मानने से इन्कार करना है, उनमें आस्था न रखना है तो निस्संदेह मैं नास्तिक ही हूं. मुझे लगता है कि बुद्ध पर बोलने के लिए यह अभीष्ट एवं पर्याप्त योग्यता है.

ऐसा व्यक्ति जो वेदों, धर्मशास्त्रों और पुराणों में विश्वास रखता हो, उसे इस प्रकार के अवसरों पर बोलने के लिए काफी चालाक होना चाहिए. उसे ऐसे लोगों में से एक होना चाहिए जो जनता को मूर्ख बनाने में भली-भांति दक्ष होते हैं. उन्हें पाखंडी और आडंबरप्रिय होना चाहिए. ऐसे व्यक्ति द्वारा बुद्ध को प्राचीन ऋषि, साधु, या महात्मा, जिनका वह वास्तव में सम्मान करता है—के समकक्ष ठहरा देना असामान्य नहीं है.

ऋषि और ही महात्मा

बुद्ध न तो साधु थे, न ऋषि और न ही महात्मा. वे उन लोगों में से थे जिन्होंने पुराने जमाने के हिंदू साधुओं, ऋषियों का वास्तविक विरोध किया था. यही वह कारण है कि उनका जन्मदिवस मनाने के लिए आज हम सब यहां एकत्र हुए हैं. जिस प्रकार बुद्ध ऋषि या महात्मा नहीं हैं, वैसे ही धर्म की स्वीकार्य परिभाषा के अनुसार बौद्ध धर्म भी कोई धर्म नहीं है. बहुत से लोग बौद्ध मार्ग को धर्म की श्रेणी में रखते हैं. वे गलत हैं. धर्म होने के लिए आवश्यक है कि उसके केंद्र में एक ईश्वर हो. दूसरी चीजें जो धर्म होने के लिए अपरिहार्य हैं वे है स्वर्ग, नर्क, मोक्ष, पाप-पुण्य, आत्मा और परमात्मा जैसी अवधारणाएं. बड़ा धर्म बनने के लिए कोई एक ईश्वर भी पर्याप्त नहीं होता. उसके अनेक ईश्वर हो सकते हैं. उन ईश्वरों की पत्नियां, रखैलें, तथा स्वीकार्य मानव-संबंध भी होने चाहिए. भारतीय सिर्फ ऐसे ही धर्म के बारे में जानते और उसे पसंद करते हैं.

 तर्कशीलता : बौद्ध धर्म का महानतम लक्षण

बुद्ध ने आरंभ में बता दिया था कि मनुष्य के लिए खुद को किसी ईश्वर से जोड़ना, उसकी चाहत रखना कतई आवश्यक नहीं है. वे चाहते थे कि मनुष्य सिर्फ मनुष्य की ही चिंता करे. उन्होंने मोक्ष, स्वर्ग, नर्क जैसी ख्याली बातों पर कुछ नहीं कहा. उनका आग्रह मनुष्य के चरित्र, आचरण और सद-व्यवहार के प्रति था. बुद्धिवादी सोच और ज्ञान, उनके अनुसार मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है. वही उसके श्रेष्ठत्व का आधार है. किसी बात पर सिर्फ इसलिए भरोसा नहीं करना चाहिए कि एक ऋषि ने ऐसा कहा था, अथवा किसी महात्मा ने वैसा लिखा है. किसी भी प्रज्ञावान मनुष्य के लिए अत्यंत आवश्यक है कि वह स्थितियों की अपने विवेक के अनुसार समीक्षा करने के बाद, स्वयं किसी स्वतंत्र निष्कर्ष तक पहुंचे.

इस कसौटी पर आंका जाए तो बौद्ध धर्म वास्तव में कोई धर्म ही नहीं है. इसी कारण हमें बौद्ध जयंती पर आयोजित इस कार्यक्रम में हिस्सा लेते हुए विशेष प्रसन्नता हो रही है. गौतम बुद्ध के बुद्धिवादी दृष्टिकोण की प्रतिक्रियावादियों द्वारा घोर आलोचना हुई थी. वे 2500 वर्ष पहले जन्मे थे. उन दिनों इस देश में धर्म के नाम पर आदिम कर्मकांड प्रचलित थे. उन्होंने साहस और दृढ़ता के साथ उन आदिम धार्मिक कर्मकांडों और रूढ़ियों के विरुद्ध आवाज उठाई. प्रतिक्रियावादियों द्वारा उनका तीव्र विरोध ही बुद्ध की महानता तथा उनके शब्दों की ताकत को दर्शाता है. बुद्ध के बाद उनके बुद्धिवादी दर्शन और संप्रदाय को नष्ट करने के लिए जिन लोगों ने लिखा और बोला, उन्होंने असभ्य हिंदू धर्म की जंजीरों को दुबारा मजबूत करने के लिए मूर्खतापूर्ण आख्यान गढ़े और सुनाए.

रामायण में बुद्ध का संदर्भ

रामायण में बौद्ध धर्म की बुराई की गई है. रामायण का बड़ा हिस्सा बाद में बुद्ध की शिक्षाओं का सामना करने, उन्हें बेअसर करने के लिए लिखा गया. गौतम बुद्ध से पहले की रामायण एक छोटी कहानी मात्र थी. वैष्णव ग्रंथ ‘नलायिरा प्रबंधम’(तमिल में 4000 की संख्या को नलायिरा कहा जाता है. ‘नलायिरा प्रबंधम’ में भी 4000 पद हैं, जिनकी रचना 12 अलवार संतों ने मिलकर, पांचवी से दसवीं शताब्दी के बीच, की थी. ‘नलायिरा प्रबंधम’ का उपलब्ध  संस्करण नौवीं और दसवीं शताब्दी के बीच का है, जो श्री रंगनाथ मुनि द्वारा रचित है) तथा शैव ग्रंथ ‘थीवरम’(शैव ग्रंथ थीवरम सातवीं-आठवीं शताब्दी की रचना है. उसकी रचना भी कई तमिल शैव संतों ने मिलकर की थी. रचनाकारों में तीन प्रमुख संत हैं—संबंदर, अप्पार और सुंदरार) जैसी विशालकाय कृतियाँ बौद्ध धर्म-दर्शन के प्रभाव को कम करने के लिए ही रची गई थीं. उनमें बौद्ध एवं जैन मतावलंबियों को नास्तिक, डाकू, हत्यारा यहां तक कि वैदिक बलि प्रथा का दुश्मन बताया गया. शैव मतावलंबी अपने आराध्य की प्रार्थना कर, उनसे बौद्ध मतावलंबियों की पत्नियों के साथ बलात्कार करने की ताकत मांगते हैं.

नास्तिक का अभिप्राय

बुद्ध व्यक्तिवाचक संज्ञा है. व्यक्ति के संबंध में ही आमतौर पर उसका उपयोग किया जाता है. बुद्ध का अभिप्राय बुद्धि अथवा मेधा से है. कोई भी व्यक्ति जो स्थितियों की विवेचना के लिए अपनी तर्कबुद्धि का उपयोग करता है—वही बुद्ध है. यूं तो सभी मनुष्यों के पास कुछ न कुछ तर्कबुद्धि अवश्य होती है. लेकिन सिर्फ वही लोग जो अपने विवेक का समझदारी से, सकारात्मक संदर्भों में उपयोग करते हैं—‘बुद्ध’ कहे जा सकते हैं. सिद्ध शब्द का भी वही अर्थ है. सिद्ध ऐसे व्यक्ति को माना गया है, जिसका अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण हो.

वैष्णव संप्रदाय के केंद्र में विष्णु है, जिसे अवतार और ईश्वर का दर्जा प्राप्त है. दूसरी ओर बौद्ध धर्म के केंद्र में सिर्फ मानवीय बुद्धि या विवेक है. इन दिनों किसी भी व्यक्ति को जो ईश्वरीय सत्ता में अविश्वास रखता है, नास्तिक घोषित कर दिया जाता है. मगर सचाई यह है कि ऐसा व्यक्ति जो ईश्वर के अस्तित्व को नकारने के साथ-साथ अपने विवेक का तर्कसंगत ढंग से उपयोग करता है, वही नास्तिक कहलाने का अधिकारी है. ब्राह्मणवाद का विरोध करने वालों को भी उनके विरोधी नास्तिक मान लेते हैं.

बौद्ध धर्म के संदेशों के साथ बुरी तरह छेड़छाड़

कुछ समय पहले, इरोड(तमिलनाडु का एक शहर) में बौद्ध सम्मेलन हुआ था. उसमें ‘विश्व बौद्ध सभा’ के मुखिया भंते मल्लाल शेखर ने, अपने बीज भाषण में स्पष्ट रूप से कहा था कि जितने भी लोग वहां एकत्र हुए थे, वे सभी बुद्ध थे. इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका में बौद्ध को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है, जो अंधविश्वास का खंडन करते हुए, सिर्फ अपने बुद्धि-विवेक का प्रयोग करता है.

इन दिनों सार्वजनिक जीवन में बुद्धि-विवेक के उपयोग को शायद ही महत्व दिया जाता है. स्कूल और कॉलेजों में विद्यार्थियों को अपनी बुद्धि और तर्कशक्ति का प्रयोग करने की शिक्षा नहीं दी जाती. न ही उन्हें परंपरा, रूढ़ियों और अंधविश्वासों पर सवाल उठाना सिखाया जाता है. यदि थोड़े-बहुत लोग अपने तर्क-सामर्थ्य का स्वतंत्र उपयोग करते भी हैं तो तत्काल उनपर नास्तिक होने का ठप्पा लगा दिया जाता है, जो असल में ऐसी पदवी है जिसका कोई अर्थ ही नहीं है. तर्कवादी यदि नास्तिक होने से इन्कार करे, खुद को बुद्धिवादी कहलवाना पसंद करे तो उसे ऐसा सिद्ध करने के लिए भारी परेशानी उठानी पड़ती है. कारण है कि नास्तिक के शब्द के अर्थ को बुरी तरह बदल दिया गया है.

बुद्ध ने भी अपने समर्थकों से यह कभी नहीं कहा था कि वे जो उपदेश देते हैं, उसपर ज्यों का त्यों विश्वास कर लेना चाहिए. उन्होंने कहा था कि उनके शब्दों को जांचे-परखें और अपने बुद्धि-विवेक के अनुसार ही उन पर फैसला करें. बुद्धिसंगत होने के बाद ही उन्हें स्वीकार करें.

नंगी आंखों से स्वर्ग को देखा

गौतम बुद्ध ने अपने विचार 2500 वर्ष पहले अभिव्यक्त किए थे. वे तात्कालिक समाज की शिक्षा और ज्ञान के अनुरूप थे. मनुष्य के ज्ञान की सीमा है. अपने समय और समाज की परिस्थितियों में उन्होंने जो भी कहा था, वह आज की परिस्थितियों में न तो पूरी तरह सही है, न ही शत-प्रतिशत लागू हो सकता है. बुद्ध के विचारों को शब्दशः ग्रहण करना, मेरी दृष्टि में अलग किस्म की आस्तिकता है. उस समय के लोग नंगी आँखों से आसमान में झांकते थे. प्रकृति और समाज के बारे में बहुत मोटी जानकारी उनके पास थी. आजकल शक्तिशाली दूरदर्शी से आसमान की पड़ताल की जाती है. फलस्वरूप सूरज पर बने काले धब्बों का परीक्षण भी संभव है. हमारे पूर्वज जितना जानते थे, उसी को सबकुछ समझकर विश्वास करना—मनुष्य की रचनात्मक मेधा तथा उसके सृजन-सामर्थ्य को सीमित कर देने जैसा है.

आर्यवाद ने देश को असभ्य बनाया है

बौद्ध धर्म के बारे में हमें यही कहना सही होगा कि समय के साथ मनुष्य के ज्ञान-सामर्थ्य में वृद्धि होती है; अतएव हमें भी अपने विचारों को प्रगति और समसामयिक परिवर्तनों के अनुरूप समायोजित करते रहना चाहिए. पुराने कथनों को ही अंतिम मानकर, उनपर अड़े रहना समाज के प्रति बौद्धिक विश्वासघात और पिछड़ापन है. यह मानवीय मेधा के विकास को अवरुद्ध कर देने जैसा है.

बुद्ध ऐसे समय में उभरकर आए जब आर्यवाद ने इस देश को आदिम, बर्बर, तर्कहीनों और जड़ बुद्धिजीवियों की भूमि बना दिया था. जिन लोगों ने धर्मशास्त्रों और पुराणों की रचना की वे अपनी तरह से बुद्धिमान रहे होंगे. उन्होंने वही लिखा था जो उनकी साम्राज्यवादी और औपनिवेशिक प्रवृतियों के अनुकूल था. सभी लोगों का कल्याण हो, पूरा समाज फले-फूले—यह उनकी चिंता का विषय कभी नहीं था. उनके द्वारा रचे गए धर्मशास्त्र और पुराण निर्विवाद रूप से इसकी पुष्टि करते हैं.

थिरुवेल्लुवर और उनकी सीमाएं

थिरुवेल्लुवर(श्री वेल्लुवर, प्राचीन तमिल संत कवि) के प्रति मेरे हृदय में गहरा सम्मान है, किंतु उनकी भी सीमाएं थीं. यहां तक कि प्राचीन काल का सबसे महानतम ग्रंथ, अपने समय में उपलब्ध मेधा या उस समय तक मनुष्यता के बौद्धिक विकास से परे नहीं जा पाया है.(पेरियार यहां ‘थिरुक्कुरल’ की चर्चा कर रहे हैं. थिरुक्कुरल तमिल भाषा के  प्राचीनतम ग्रंथों में से एक है. उसकी रचना थिरुवेल्लुवर ने की थी. पेरियार ने कई जगह इस ग्रंथ की प्रशंसा की है. साथ ही उसकी कमजोरियों या असामयिक हो चुकी अनुशंसाओं की ओर इशारा भी किया है. उनका यह भी मानना है कि मूल ‘थिरुक्कुरल’ ऐसी कमजोरियों से मुक्त था. ब्राह्मणों के दक्षिण आगमन के बाद उन्होंने निहित स्वार्थ के अनुसार वहां के प्राचीन ग्रंथों को प्रदूषित किया था). इसलिए प्राचीन ऋषि-मुनियों, बुद्ध या थिरुवेल्लुवर ने जो कहा, वही अंतिम है, या उसी को एकमात्र सत्य या मानवीय मेधा की सीमा मान लेना—पूर्णत: अनुचित है.

बावजूद इसके गौतम बुद्ध और थिरुवेल्लुवर का हम इसलिए सम्मान करते हैं कि ऐसे दौर में जब हिंदू धर्म और समाज पूरी तरह असभ्य था, लोग बर्बर थे—समाज का बहुसंख्यक हिस्सा बाकि बचे मामूली हिस्से के सुखोपभोग, वैभव और विलासिता की खातिर गुलामों की तरह काम करता था—उस दौर में बुद्धिवाद को स्थापित करना, तर्क और ज्ञान के महत्व से लोगों को परचाना—केवल उन्हीं के लिए संभव था. अपने साहस के भरोसे यह उन्होंने कर दिखाया था.

धार्मिक प्रवृति के लोग पुराणों में कही गई मनगढंत और ऊल-जुलूल बातों पर विश्वास करेंगे. उनका गुणगान भी करते रहेंगे, किंतु यदि उन्हें असली इतिहास के बारे में बताया जाए तो प्रतिक्रिया में बस इतना कहेंगे, ‘गोरे अंग्रेजों ने भारत के बारे में जो कहा है, उसपर विश्वास मत करो.’ ये ऐसे लोग हैं जो अपने विवेक और अपनी अंतश्चेतना के विरुद्ध मिथ्या भाषण करते हैं. वे हमेशा ऐसे लोगों से घिरे रहते हैं जो अपनी मुक्त चिंतन शक्ति को गंवा चुके हैं. धर्म और ईश्वर के नाम पर धार्मिक लोगों ने जो भी मन में आए, बकवास करना और डींगे हांकना सीख लिया है. भले ही उनके शब्दों का इतिहास या तत्कालीन सामाजिक यथार्थ से कोई संबंध हो या न हो. उनके लिए यह महत्वहीन है. स्पष्ट है कि धर्म ने खुद को अंधविश्वास तक सीमित कर दिया है. 

पुराण गौतम बुद्ध के बाद की रचना हैं 

जिन दिनों यह कहा जा रहा था कि ब्रिटिश इतिहासकारों ने भारत के बारे में जो लिखा है, उसपर विश्वास नहीं करना चाहिए, उन दिनों उत्तर भारत स्थित भारतीय विद्या भवन नामक संस्था के तत्वावधान में, मूर्खतापूर्ण धार्मिक आख्यानों तथा अलोकतांत्रिक शास्त्रों पर केंद्रित पुस्तकें लगातार छापी जा रही थीं. मि. मुंशी(कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी) उस संस्था के अध्यक्ष; तथा अरबपति बिरला(घनश्यामदास बिरला) और डॉक्टर राधाकृष्णन(सर्वपल्ली) उसके  विशिष्ट सदस्य थे. उन्होंने ‘वैदिक युग’(प्राचीन इतिहास और संस्कृति पर प्रकाशित पुस्तकमाला थी. प्राच्यविद रमेशचंद मजुमदार उसके संपादक थे.)  नामक पुस्तक प्रकाशित की थी. उस पुस्तक की रचना में मिस्टर मुंशी की बड़ी भूमिका थी. उस पुस्तक की प्रस्तावना में भी लिखा गया था, ‘पुराण और महाकाव्य इतिहास नहीं हैं. उनमें समकालीन घटनाओं का वर्णन नहीं है. ‘व्यास’ शब्द का अर्थ कहानी लेखक(किस्सागो) है.’ वही  पुराण लोगों के दिलो-दिमाग में पैठ गए. लोगों की सहज बुद्धि पर कब्जा जमाकर वे उनका मार्गदर्शन करने लगे. यही हमारी परेशानियों का सबसे बड़ा कारण है.

तीन-चौथाई से अधिक पुराणों का लेखनकाल बुद्ध के बाद का बताया गया है. बुद्ध द्वारा प्रचारित तर्कवादी शिक्षा के विरोध में, उसकी ओर से लोगों का ध्यान हटाने तथा उन्हें ब्राह्मणवाद की ओर आकृष्ट करने के लिए—पौराणिक ऋषियों ने अवतारों की मनगढंत कहानियां रचीं. कृष्ण को उनका मुखिया बनाया गया. हिंदू देवी-देवताओं के चमत्कारपूर्ण कारनामे हमेशा ही लोगों के विशिष्ट आकर्षण और उत्तेजन का कारण रहे हैं. कृष्ण महाकाव्य तो पूरी तरह कामुकता और फूहड़पन से भरपूर है. इतना कुछ होने के बाद, उसे दैवीय भी घोषित कर दिया गया. भगवदगीता को तो महाभारत में बहुत बाद में, आगे चलकर जोड़ा गया था.

जाति से मेरा अभिप्राय अलग है

ऐसे अश्लील और कामुक परिवेश में कृष्ण जैसा देवता गढ़ने तथा उसकी प्रशस्ति में भजन गाने, नाटक और नृत्यों के आयोजन का भला क्या औचित्य है! कृष्णलीलाएं तो सिनेमा के पर्दे पर भी आ चुकी हैं. जो भक्त कृष्णलीला स्थल पर हाथ जोड़े या तालियां बजाते, तन्मयता से गाते-झूमते हुए नजर आते हैं, वे उसी भगवान को अपने घर में, अपनी पत्नी के पास जाने की अनुमति देने का साहस नहीं कर पाएंगे. लोगों का अंतःकरण जिस बात को करने से रोकता है, आम व्यवहार में उसका खंडन न करने का आखिर क्या कारण है? भगवान की अश्लीलता, संकीर्णता और व्यभिचार को जश्न की तरह दर्शाने वाले त्योहारों को समाज में जगह क्यों मिलनी चाहिए?

आज कोई भी व्यक्ति जाति प्रथा का समर्थन करने का साहस नहीं जुटा पाता. सी. राजगोपालाचारी कदाचित इसके अपवाद हैं. वे जातिवाद को बनाए रखना चाहते हैं. यदि उनसे सीधे मिलकर, आमने-सामने सवाल किया जाता तो वे कदाचित यही कहते, ‘जाति से मेरा अभिप्राय कुछ अलग है.’ वेदों, धर्मशास्त्रों और पुराणों के समर्थन के अभाव में जाति क्या टिक सकती थी? वेदों, धर्मशास्त्रों और पुराणों के बहिष्कार के बगैर जाति का उच्छेद कभी भी, भला कैसे संभव है? धर्मशास्त्रों का एकमात्र उद्देश्य है गैर-ब्राह्मणों जैसे कि शूद्रों और पारिया जैसे अछूतों का  सदा-सर्वदा तिरस्कार तथा पुरोहित वर्ग को संरक्षण प्रदान करना.

कंधे पर देवता और बुद्ध की स्तुति

बुद्ध जयंती या बुद्ध दिवस को मनाना हमारे लिए जरूरी क्यों है? यदि बुद्ध को अलवार और नयनमार संतों की श्रेणी में रखना है तो उन्हें भुला देना ही बेहतर होगा. बुद्ध जयंती वस्तुत: वैदिक धर्मावलंबियों के लिए शत्रु-दिवस है. ब्राह्मण वर्चस्व वाला मीडिया इस तरह के सम्मेलनों की कार्रवाही के बारे में ईमानदारी से रिपोर्टिंग नहीं करेगा. बजाय इसके उनके अखबारों में एक या अधिक पौराणिक सभाओं की घोषणाओं की भरमार मिलेगी. बाद में उन सभाओं से संबंधित समाचारों से अखबार के पन्ने भर दिए जाएंगे. ऐसे परिवेश में जाति को विनष्ट कर, बुद्धिवाद के वर्चस्व को पुनर्स्थापित कर पाना कितना  कठिन है. उस स्थिति का बयान संभव नहीं, अच्छा है  उसकी कल्पना से तसल्ली कर ली जाए.

दुनिया के भला किस देश में इतने सारे भगवान हैं जितने हमारे देश में हैं? इतने सारे चरित्रहीन ईश्वरों की मौजूदगी का औचित्य ही क्या है? ऐसे भगवानों में आस्था और विश्वास रखते हुए, उन्हें अपने कंधों पर लादकर, बुद्ध को ससम्मान याद करने तथा उनकी स्तुति करने से कोई भला नही होने वाला. इन ईश्वरों का बहिष्कार करने के लोग स्वयं बुद्ध बन जाएंगे. मनुष्य की आकृति में, मनुष्य को दुःख और सुख देने वाला, मानवीय अपराधों और सद्गुणों लिप्त रहने वाला ईश्वर हो ही नहीं सकता. विष्णु, शिव और ब्रह्मा, इन हिंदू त्रिदेवों की कहानियों में अश्लीलता, हिंसा, फूहड़पन, हत्या आदि की भरमार है. 

गंदे पुजारी के चरण पखारना

आश्चर्य की बात यह है कि पुराणों में विश्वास रखने वाले लोग भी यहाँ आने, और बौद्ध जयंती के उत्सव में हिस्सा लेने का साहस जुटा लेते हैं. ये वही लोग हैं  जो मंदिर बनवाने वाले को ही दयावान और परोपकारी मानते हैं. सोचते हैं कि भक्ति सिर्फ पत्थर के स्तंभ से माथा रगड़ने पर व्यक्त की जा सकती है, यही लोग गंदे पुजारियों के पैर धोने को भी भक्तिकर्म मानते हैं. गौतम जैसे विश्व के महान बुद्धिवादी चिंतक के व्यापक प्रभाव को बेअसर करने के लिए ही इन पौराणिकों ने उनके बारे में सत्य को तोड़-मरोड़कर, उसे प्रदूषित करते हुए पेश किया है.

जाति को नष्ट करने की हिम्मत ही नहीं है 

रामायण और महाभारत के बारे पुस्तकें आज भी हजारों की संख्या में लिखी और बेची जाती हैं. इनका क्या उद्देश्य है? क्या इसका सीधा और साफ उद्देश्य जातिवाद, अंधविश्वासों और लोगों की दास मानसिकता को बनाए रखना नहीं है? यदि भारत में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे जीवनमूल्यों से भरपूर वास्तविक लोकतंत्र की जड़ें जमानी हैं तो जातिवाद को जड़ से उखाड़ना पड़ेगा. सरकार ऐसी होनी चाहिए जिसमें यह सब करने का साहस हो. जो जातिवाद जैसी विकृति से समाज को मुक्त कर सके. आज हमारे पास ऐसी सरकार है जो जातिवाद की बुराइयों पर बात तो करती है, लेकिन उसमें इसे उखाड़ फेंकने का साहस नहीं है.

डॉ. राधाकृष्णन ने यह कहने का साहस दिखाया है, ‘हमने राजाओं और जमींदारों को उखाड़ फैंकने का साहस  कर दिखाया है. स्थायी और दूरगामी लाभों के लिए हमें जातिवाद को नष्ट कर देना चाहिए. यह करने के लिए हमारे पास लोहे के दिल वाले इंसान होने चाहिए.’ सरकार के पास ऐसा विचार तो है किंतु जातिवाद पर हमला करने की इच्छा नहीं है. हमारा लक्ष्य ईश्वरविहीन समाज की स्थापना करना नहीं है. हम ऐसा समाज चाहते हैं जिसमें सत्य और विवेक देवताओं के रूप में मौजूद हों.

बुद्ध : क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए  अपरिहार्य  

23 जनवरी  1954 को हमने इरोड में एक बौद्ध सम्मेलन का आयोजन किया था. उसके आयोजन के पीछे हमारा उद्देश्य क्या था? क्या उससे हमारा इरादा खुद को बौद्ध धर्म का अनुयायी घोषित करना था? उसके माध्यम से क्या हम हिंदू धर्म को उजाड़ कर बौद्ध धर्म को लाना चाहते थे? नहीं. फिर बुद्ध के नाम पर सम्मलेन आयोजित करने का क्या कारण था? वह इसलिए कि हम मानते हैं कि हम जो बदलाव लाना चाहते हैं, हिंदुओं की जिन बुराइयों को हम नष्ट करना चाहते हैं—गौतम बुद्ध की शिक्षाएं उसका संपूर्ण समर्थन करती हैं. गौतम बुद्ध का दर्शन, उनके सिद्धांत और उपदेश हमारे स्व:सम्मान एवं बुद्धिवादी आंदोलन के साथ—उसके समर्थन में खड़े हैं. ईश्वर, जाति, गौत्र, धर्मशास्त्र, पुराण और महाकाव्य हमारी पराधीनता का कारण हैं. ऐसी चीजें हैं जिनसे हम मुक्त होना चाहते हैं. जबकि जीवनमूल्यों से भरपूर गौतम बुद्ध की शिक्षाएं और उनका दर्शन हमारे क्रांतिधर्मा लक्ष्यों के लिए बेहद मूल्यवान हैं.

हमारे आदर्शों के प्रतीकपुरुष

कुछ चीजें जिनका हम आज प्रचार-प्रसार करते हैं, वे गौतम बुद्ध की ढाई हजार वर्ष पुरानी शिक्षाओं में पहले से ही शामिल हैं. बौद्ध धर्म हमारे आदर्शों के लिए आधार स्रोत, मानक संस्था की तरह है. जिन दिनों इस रामासामी(पेरियार) द्वारा स्व:सम्मान आंदोलन के आदर्शों का प्रचार आरंभ किया गया था, तब कुछ ऐसे भी लोग थे, जिनका मानना था उसमें कोई बड़ी, अनोखी या महत्वपूर्ण बात नहीं है. वे सोचते थे कि मैं गीता से बड़ा नहीं हो सकता. ऐसे लोगों के लिए कम से कम बौद्ध धर्म का होना बड़ा ही प्रोत्साहनपरक और उत्साहवर्धक है. हमारे आदर्शों को किनारे करना, उन्हें मिटा पाना परंपरावादियों के लिए आसान नहीं होगा. उन्हें यह बताने की जरूरत है कि बुद्धिवाद उतना ही पुराना है जितना कि बौद्ध धर्म; और हम जो आज प्रचार कर रहे हैं—उसमें कुछ भी नया नहीं हैं.

बुद्ध हिंदुओं के लिए भी मान्य और पूजनीय

ऐतिहासिक जरूरतों की खातिर हिंदुओं ने बुद्ध के धर्म-दर्शन को स्वीकार किया था. यहां तक कि उनकी पूजा भी की जाती रही है. हालांकि इतिहास हमें यह भी बताता है कि बौद्ध धर्मालंबियों को सताया जाता था. उनकी हत्या भी कर दी जाती थी. उनके मठों को जला दिया गया था. यहाँ तक कि उनके धर्म-दर्शन को भी हिंदू कट्टरपंथियों ने बहुत पहले ही उखाड़ दिया था. कुछ बौद्ध मतावलंबियों को गहरे समुद्र की तलहटियों में डुबा दिया गया था. इतने सारे षड्यंत्रों और दमन के बावजूद हिंदुओं के लिए कभी संभव नहीं हो पाया कि वे हिंदू मानस में बसी गौतम बुद्ध की यादों को मिटा सकें.

ब्राह्मणों ने उन्हें विष्णु का अवतार घोषित किया

आखिरकार ब्राह्मणों को, गौतम बुद्ध को विष्णु के दसवें अवतार के रूप में मान्यता देनी ही पड़ी. इस तरह सब कुछ को पचा लेने वाले हिंदू धर्म ने शैव और वैष्णव संप्रदाय की भांति, बौद्ध धर्म को भी हिंदू धर्म की उपशाखा मान लिया. संभव है प्राचीनकाल में उन्होंने अच्छा व्यवहार किया हो, संभव है न भी किया हो—लेकिन यह सचाई है कि भारत भूमि से बौद्ध धर्म कभी भी पूरी तरह गायब नहीं हो सका. यहाँ तक कि स्वतंत्र भारत की सरकार को भी मानना पड़ा कि इस देश में बुद्ध को भुला पाना आसान नहीं है. इसलिए शैव और वैष्णव संपद्राय, जो हिंदू धर्म का दायां और बायां हाथ थे, को छोड़ते हुए बुद्ध की शिक्षाओं को बौद्ध धर्म-दर्शन की शिक्षाओं को सरकारी पहचान के रूप में सहेजा गया.

राष्ट्रीय झंडे में धम्मचक्क

बौद्ध धर्म के प्रतीक धम्मचक्क को हमारे राष्ट्रीय झंडे में सम्मानित स्थान प्राप्त हुआ. सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ के शिखर पर बनी चार शेरों की मूर्ति को राष्ट्रीय प्रतीक की मान्यता मिली, वही हमारे सैन्य अधिकारियों ने कंधों पर, मंत्रियों की गाड़ियों के बोनेट्स पर, सरकारी वाहनों, आम आदमी के काम आने वाले पोस्टकार्ड जिनका सुदूर गांवों में बहुतायत से प्रयोग होता है—शोभायमान है. आजादी के बाद से ही गौतम बुद्ध के जन्मदिवस को सरकारी अवकाश घोषित किया जा चुका है.

क्या हमारे आंदोलन को कमजोर किया जा सकता है  

इन शब्दों का अभिप्राय क्या है. इसका अभिप्राय है कि आजाद भारत की सरकार ने गौतम बुद्ध और उनकी शिक्षाओं को मान्यता दी है. उन्हें राष्ट्रीय महत्व का माना है. सरकार के लिए यह संभव नहीं था कि किसी हिंदू, शैव या वैष्णव प्रतीक को राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में स्वीकार कर सके. इसका आशय यह है कि भारत के राष्ट्रीय हितों की दृष्टि से हिंदू प्रतीक सर्वथा अनुपयुक्त हैं. अपनी जनता के इतिहास में मैं इसे एक क्रांतिकारी पड़ाव के रूप में चिह्नित करता हूं.

इसलिए,  यदि हम यह कहते हैं कि हमारे द्वारा शुरू किया स्व:सम्मान आंदोलन बुद्ध की 2500 वर्षों पुरानी शिक्षाओं पर आधारित, उसी का विस्तार था, तो लोग आसानी से समझ सकते हैं कि हम जो करते हैं—वह सरकार द्वारा अनुमन्य, उसके द्वारा अनुशंसित कार्यक्रम से परे कुछ भी नहीं है. इसलिए ब्राह्मणों, कांग्रेसियों, धर्माधीशों, शंकराचार्यों और मठाधिपतियों के लिए हमारे आंदोलन को, जो असल में सुधारवादी आंदोलन है—रोकना/ सीमित कर पाना असंभव है.

कुरल में ब्राह्मणवादी शिक्षाओं के अनुरूप प्रक्षेपण  

ब्राह्मणों की एक कुटिलनीति बुद्धिवादी चिंतकों को अपना बताकर, उनकी शिक्षाओं को तोड़-मरोड़कर पेश करने की रही है, जिससे वे उन्हें अलोकतांत्रिक और वर्चस्ववादी ब्राह्मणवादी शिक्षाओं के अनुरूप ढल सकें. पहले यह काम उन्होंने बुद्ध के लिए किया, उसके बाद थिरुवेल्लुवर के साथ. स्व:सम्मान आंदोलन द्वारा कुरल को अपना नीति-ग्रंथ मानने से पहले ब्राह्मण, साथ में उनके शूद्र अनुचर भी, कुरल के बारे में बढ़-चढ़कर दावे करते थे. उनका असली उद्देश्य कुरल की शिक्षाओं को, ब्राह्मणवाद के अनकूल ढालने की नीयत से—तोड़ना-मरोड़ना तथा उसके अर्थ का अनर्थ करना था.

ब्राह्मण टीकाकार पेरीमेलाझगर ने अपनी टीका में आर्यों की बहुत-सी शिक्षाओं को शामिल किया है. इस प्रकार वे थिरुवेल्लुवर की शिक्षाओं को पूरी तरह तोड़ने-मरोड़ने, उनमें अंतर्निहित मूल सत्य पर पर्दा डालने में लगभग कामयाब रहे हैं. (पेरीमेलाझगर 13वीं के टीकाकार थे. कुरल पर उनकी टीका के कारण जहाँ अनेक विद्वान उनकी सराहना करते हैं, वहीं अनेक विद्वान उन पर कुरल में प्रक्षेपण का आरोप भी लगाते हैं.) हमारे आंदोलन द्वारा कुरल तथा उसमें निहित सत्य को दुबारा दुनिया के सामने लाने के बाद ही, उसके प्राचीन गौरव और दीप्ति की वापसी संभव हो सकी है. आज पूरी तमिल-भूमि कुरल संगठनों और समूहों से भरी है. स्कूलों और कॉलेजों में कुरल के अध्ययन में लगातार वृद्धि हो रही है. जैसे-जैसे कुरल के अध्ययन को बढ़ावा दिया जा रहा है, वैसे वैसे रामायण एवं महाभारत जैसे जातिवादी और अंधविश्वासों से भरपूर आर्य ग्रंथों का प्रभाव कमजोर पड़ता जा रहा. 

यही कार्य अब हम बौद्ध धर्म के साथ कर रहे हैं. रूढ़िवादी और परंपरापोषी हिंदुओं को हतोत्साहित करने के लिए बौद्ध धर्म के आदर्शों, उसमें अंतर्निहित वास्तविक मूल्यों का प्रचार किया जा रहा है. उनकी ईर्ष्या और क्रोध हमें परेशान नहीं करते.

ऋषिमुनियों के उपदेश वृथा हैं

गौतम बुद्ध ने तर्क और बुद्धिवाद को प्रथम स्थान पर रखा था. उन्होंने प्राचीन ऋषियों अथवा कथित दिव्य मनीषियों के लिखे को बुद्धिसंगत(ज्ञान) मानने से इन्कार कर दिया था. वे चाहते थे लोग अपने विवेक से काम लें और उसकी मदद से खुद सत्य का साक्षात करें. तथाकथित ईश्वर के अस्तित्व अथवा उसकी सत्ता पर कोई टिप्पणी करने से इन्कार के साथ-साथ उन्होंने आत्मा के अस्तित्व को स्वीकारने से भी मना कर दिया था. दावा किया जाता है कि कथित आत्मा स्वयं तथाकथित परमात्मा के तेज से अस्तित्ववान होती है. इस कारण वह ईश्वर के विचार को ही परोक्ष रूप में स्थापित करती है. चूंकि ईश्वर को प्रत्येक दृष्टि से संपूर्ण एवं विकाररहित बताया गया है, अतएव ईश्वर की अनुभूति को पाप, पुण्य, अवगुण या सद्गुण, अच्छे अथवा बुरे कर्मों से नहीं जोड़ा जा सकता. इस तरह से आत्मा और परमात्मा के बीच अनुचित और अप्रमाणिक तादात्मय के कारण, गौतम बुद्ध की कसौटी पर उन्हें भारी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था.

बुद्ध ने सभी प्रकार की मूर्तिपूजा, मानवरूपी देवताओं की अभ्यर्थना, रूढ़िवाद, परंपरावाद और अंधविश्वास की निंदा करते हुए उनका बहिष्कार करने का उपदेश दिया था. लगभग वे सभी बातें जिन्हें आर्यमत के अनुसार पवित्र एवं दिव्य माना जाता था, उन्हें गौतम बुद्ध की तीखी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था.

विध्वसंक हथियारों वाले देवता

पुरातत्वविद भली-भांति सिद्ध कर चुके हैं कि हिंदुओं के जितने भी प्राचीन मंदिर हैं, वे पहले कभी बौद्ध विहार थे. यहां तक बताया गया है कि श्रीरंगम, कांचीपुरम, पालनी, तिरुपति आदि मंदिर भी मूल रूप से बौद्ध विहार ही थे. ऐसे मंदिर जो कभी गौतम बुद्ध की आभा से पूरी तरह देदीप्यमान थे—जहां प्यार, अनुराग,  समर्पण, सहानुभूति सब कुछ सहज प्राप्य थे, उन मंदिरों को युद्धोन्मादी देवताओं की रम्यस्थली बना दिया. उनके हाथों में जानलेवा हथियार थमा दिए गए. ऐसा कोई हिंदू देवता नहीं है जो जानलेवा, विध्वंसक हथियारों से न खेलता हो. ये दिखाते हैं कि भगवान बनने के लिए उस सत्ता के खाते में कुछ हत्याओं का होना जरूरी है.

शैव और वैष्णव उपदेशों के दौरान बढ़-चढ़ कर दावे करते हैं कि उनका देवता प्यार करने वाला है. यह  सब मनगढ़ंत तानाशाही और पाखंड पूर्ण है. उनके ये लंबे-चौड़े दावे देवताओं की हथियार बंद छबि को देखते ही हवा हो जाते हैं. प्रेम और हिंसा के बीच भला क्या संबंध हो सकता है? सबसे आश्चर्यजनक और दिलचस्प बात यह है कि युद्धोन्मादी देवताओं की भीड़ के बावजूद—दूसरे राष्ट्र के नागरिकों की अपेक्षा हिंदू कुल मिलाकर—तुलनात्मक रूप से सर्वाधिक कायर हैं.

(स्रोत : कलेक्टेड वर्क ऑफ़ पेरियार, संपादक के. वीरामणि, सेल्फ रेस्पेक्ट प्रोपेगेंडा फाउंडेशन चेन्नई. पेरियार ने यह संबोधन 15 मई, 1957 को चेन्नई के एगमोरे स्थित महाबोधि संगठम् परिसर में बुद्ध की 2501वीं जयंती के मौके पर आयोजित समारोह में किया था। (स्रोत : Velivada.com)]

अंग्रेजी से अनुवाद

ओमप्रकाश कश्यप

दक्षिण भारतीय संस्कृति में ब्राह्मणवाद विरोधी चेतना और पेरियार

विशेष रुप से प्रदर्शित

[बताया गया है कि छूआछूत को बनाने वाला ईश्वर है। यदि यह बात  सही है तो हमें सबसे उस ईश्वर को ही नष्ट कर देना चाहिए। यदि ईश्वर इस परंपरा से अनजान है तो उसका और भी जल्दी उच्छेद होना चाहिए। यदि वह इस अन्याय को रोकने या इससे रक्षा करने में असमर्थ है तो इस दुनिया में उसका कोई कोई काम नहीं है—पेरियार, कुदी अरासू 17 फरवरी, 1929] 

चीजें किस प्रकार दिमाग में बैठतीं या बैठा दी जाती हैं—इस बारे में प्रायः हमें पता नहीं चलता। जैसे कि लोककथाओं का एक सबक जिसे जाने-अनजाने उनके आरंभ में ही जोड़ दिया जाता था। शिकार, नौकरी अथवा किसी और काम से ‘परदेस’ जाने वाले कथानायक को घर-परिवार के बुजुर्ग समझाते—‘बेटा पूरब जाना, पश्चिम जाना, उत्तर दिशा तो खुशी-खुशी जाना, मगर दक्षिण में हरगिज न जाना।’ कहानियों के अनुसार दक्षिण में या तो कोई राक्षस रहता था अथवा डायन। कोई ऐसी खूबसूरत राजकुमारी भी हो सकती थी, जिसे प्राप्त करना आग के दरिया को पार करने जैसा हो। कहानियों में जो डर जाते या असफल रहते वे सफर से वापस नहीं लौटते थे। या यूं कहो कि उनकी कहानियां ही नहीं बनती थीं। जो व्यक्ति तमाम हिदायतों और बंदिशों को लांघकर साहस के साथ निषिद्ध लक्ष्य की ओर प्रस्थान कर; वहां से सकुशल लौट आता—वह कथानायक कहलाता था। दक्षिण की यात्रा आपदाओं को चुनौती देने की यात्रा थी। नायक बनने या यूं कहो कि नायक गढ़ने की यात्रा थी।

आखिर कौन-से दबाव थे कि ऐसी कहानियों में प्रायः दक्षिण दिशा को ही निषिद्ध बताया जाता था? कुछ लोग कह सकते हैं कि इसके पीछे लेखक-किस्सागो का उद्देश्य कहानी को रहस्यपूर्ण और रोचक बनाना होता था। मना करने के बावजूद नायक का दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान, उसके साहसी होने का प्रमाण था। लेकिन यदि यही उद्देश्य होता तो किस्सागो—कथानायक के नाम, स्थान की तरह, दिशा में भी मनचाहा परिवर्तन कर सकता था। दक्षिण के अलावा वह पूरब, पश्चिम या उत्तर को भी निषिद्ध बता सकता था। हमेशा एक ही दिशा क्यों? कुछ चतुर-सुजान कहेंगे कि वास्तुशास्त्र के अनुसार दक्षिण में यमराज का अधिष्ठान है। अगर ऐसा है तब भी हमारा मूल प्रश्न कायम रहता है कि यमराज ने अपने लिए; अथवा वास्तुशास्त्रियों ने यमराज के लिए दक्षिण दिशा को ही क्यों चुना था?

इसके लिए हमें मिथ-निर्माण की प्रक्रिया को समझना पड़ेगा। मिथों के निर्माण में पूरे समाज की भूमिका होती है। मगर उसे विशिष्ट चरित्र प्रदान करने, खास अवसरों से जोड़ने और मनमाना इस्तेमाल करने का काम समाज का अभिजन समुदाय करता है। यह भी सच है कि मिथ में आमजन का भरोसा ही उसे अभिजन समुदाय की निगाह में महत्वपूर्ण बनाता है। इसके पीछे उसकी नीयत खुद को दूसरों से अलग और खास दिखाने के लिए होती है। वह चाहता है कि उसके द्वारा छलपूर्वक कब्जाए गए अभिजात्यपन तथा विशेषाधिकारों को, लोग दैवीय अनुकंपा मान लें। मान लें कि समाज में उसकी हैसियत किसी षड्यंत्र अथवा दुरभिसंधि का परिणाम न होकर, विशिष्ट ईश्वरीय अनुकंपा है। दक्षिण को यमराज का अधिष्ठान घोषित करना, इसी सांस्कृतिक कूटनीति का हिस्सा है। इसी से जुड़ा एक सच गांव-बस्तियों में अछूतों और शूद्रों को दक्षिण में बसाया जाना भी है।

सवाल है कि दक्षिण दिशा ही क्यों? आखिर क्यों दक्षिण को राक्षस-राक्षसियों की दिशा बताया गया? क्यों यमराज को टिकने के लिए वही दिशा दी गई थी? क्यों शूद्रों और दलितों को दक्षिण दिशा तक सीमित कर दिया जाता है?

पेरियार के संघर्ष को समझने; या यूं कहो कि भारतीय समाज की जिस मानसिकता के विरुद्ध उन्हें संघर्ष करना पड़ा था; और जो इसकी अनेकानेक व्याधियों की वजह है—की पृष्ठभूमि को समझने के लिए—इन सबको जानना आवश्यक है। इसके लिए कुछ हजार वर्ष पहले के इतिहास में लौटना होगा। यह स्थापित तथ्य है कि करीब 12 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक में फैली सिंधु सभ्यता(3300-1750 ईस्वीपूर्व) अपनी समकालीन सभ्यताओं में सर्वाधिक उन्नत और समृद्ध नागरी सभ्यता थी। जलवायु परिवर्तन के कारण उस फली-फूली सभ्यता का अवसान काल आया तो उसके निवासी सुरक्षित ठिकानों की ओर पलायन करने लगे। 1500 ईस्वी पूर्व आर्य हमलावरों ने भारत में प्रवेश किया तो उसमें और भी तेजी आई। पलायन के दो प्रमुख रास्ते थे। पहला पंजाब के रास्ते मैदानी इलाकों में गंगा-यमुना के तराई क्षेत्र की ओर। इस ओर जो दल गए, उन्होंने तराई क्षेत्र में समृद्ध सभ्यता की नींव रखी जिसे गंगा-यमुनी सभ्यता कहते हैं। दूसरे दल राजस्थान, गुजरात, कोंकण प्रदेश से होते हुए दक्षिण दिशा में गए। और दक्षिण भारत में पहले से रह रहे आदिवासी कबीलों में घुल-मिल गए। कलाभ्र शासकों के सिक्कों पर प्राप्त लिपि संकेतों और सिंधु घाटी से प्राप्त लिपि संकेतों में गहरी समानता, दोनों को आपस में जोड़ती है।

कालांतर में गंगा-यमुना के तराई क्षेत्र की ओर गए सिंधुवासी कबीलों और आर्य कबीलों में समन्वय हुआ। वहां के अनार्य कबीलों ने आर्य संस्कृति के आगे करीब-करीब समर्पण कर दिया। जबकि दक्षिण जाकर बसे कबीलों ने अपनी पारंपरिक संस्कृति और उसके मूल्यों को बनाए रखा। उसके बाद लगभग एक सहस्राब्दी तक दक्षिण भारतीय सभ्यता, जो अपनी प्रकृति में अनार्य सभ्यता थी, और उत्तर-पश्चिमी सभ्यता एक-दूसरे से अनजान बनी रहीं। ईसा से छह-सात सौ वर्ष पहले, आर्यों को उस सभ्यता के बारे में पता तो उनकी पुरानी स्मृतियां ताजा होने लगीं। आर्यों की दृष्टि में वे वही अनार्य कबीले थे, जिन्होंने सिंधु उपत्यका में उनका मार्ग रोकने की कोशिश की थी। जो आर्य संस्कृति की श्रेष्ठता के मिथ को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं थे। इसी कुंठा और ईर्ष्या के चलते उन्होंने अपने गीतों में, अनार्य कबीलों को राक्षस, दैत्य, दानव आदि घोषित करना शुरू कर दिया। बाद में रचे संस्कृत ग्रंथों में भी यही प्रवृत्ति बनी रही।

ईसा-पूर्व चौथी-पांचवी शताब्दी में बौद्ध और जैन श्रमणों ने दक्षिण पहुंचना शुरू किया। व्यावहारिक नैतिकता पर आधारित इन दर्शनों का दक्षिण में खूब स्वागत किया गया। प्राचीन तमिल, बौद्ध एवं जैन दर्शन के समन्वय से वहां संगम साहित्य की नींव रखी गई। करीब दो सौ वर्ष बाद, बौद्ध धर्म-दर्शन के पराभव के दौर में ब्राह्मण भी वहां पहुंचे। अपने साथ वे जातीय भेदभाव से लबरेज अपनी संस्कृति को भी ले गए। वहां उन्होंने राजाओं और प्रभावशाली वर्गों को फुसलाना आरंभ कर दिया। नए-नए मिथकीय आख्यान गढ़कर उनका अवतारीकरण किया जाने लगा। अवतारीकरण की प्रक्रिया उन्हें राजसत्ता का नैसर्गिक उत्तराधिकारी बनाती थी। उसकी आड़ में मनमाने फैसले भी थोपे जा सकते थे। इस कारण लोग धीरे-धीरे उनके प्रभाव में आने लगे। ब्राह्मणों को खुश करने के लिए गांव के गांव दान किए जाने लगे। इससे उन लोगों के आगे आजीविका का संकट पैदा होने लगा, जो उन जमीनों पर खेती करते थे।

ब्राह्मणों का बढ़ता वर्चस्व, कभी मंदिर, यज्ञ तो कभी ब्राह्मणों को बसाने के लिए गांव के गांव दान देने से उपजा आक्रोश, महान कलाभ्र विद्रोह के रूप में सामने आया। कलाभ्र शूद्र-किसान और आदिवासी कबीले थे। तीसरी शताब्दी के आरंभ में उन्होंने पांड्य, चेर, पल्लव आदि ब्राह्मणवाद के रंग में रंग चुके शासकों पर हमला किया और उन्हें परास्त कर, कलाभ्र साम्राज्य की नींव डाली। पूरा तमिल प्रदेश, जिसमें आधुनिक केरल, तमिलनाडु के अलावा कर्नाटक और आंध्र प्रदेश का भी बड़ा हिस्सा शामिल था, कलाभ्र साम्राज्य की परिसीमा में आते थे। मंदिर, धर्मस्थान आदि के बहाने ब्राह्मणों को जो जमीनें दान में दी गई थीं, कलाभ्र शासकों ने उन्हें छीन लिया। राज्य के संरक्षण में होने वाले यज्ञ और बलिप्रथाएं समाप्त हो गईं। बौद्ध धर्म को पुनर्स्थापित किया गया।

कलाभ्र शासकों ने तीसरी शताब्दी से लेकर पांचवी शताब्दी तक दक्षिण पर राज्य किया। उतनी अवधि के बीच ब्राह्मणवाद वहां निस्तेज बना रहा। देखा जाए तो यही वह दौर था जब ब्राह्मण रामायण, महाभारत, गीता तथा पुराणादि ग्रंथों के लेखन-पुनर्लेखन में लगे थे। वेदों सहित सभी संस्कृत ग्रंथों में जमकर प्रक्षेपण किया जा रहा था। उत्तर भारत में राज्य के संरक्षण में ब्राह्मण धर्म खूब फलफूल रहा था। मनुस्मृति के विधान लागू होने के बाद शूद्रों-अतिशूद्रों से पढ़ने-लिखने सहित अन्यान्य का अधिकार छीन लिए गए थे। इससे ब्राह्मणों के वर्चस्व को चुनौती देने वाला कोई नहीं था। कलाभ्र शासकों के शासनकाल दक्षिण से ब्राह्मण धर्म के उखड़ने की प्रतिक्रिया, रामायण-महाभारत आदि के बहाने दक्षिण पर नकली विजयगीतों के रूप में हुई थी। चूंकि ब्राह्मण धर्म के दक्षिण प्रवेश से बहुत पहले बौद्ध और जैन धर्म वहां अपनी पैठ बना चुके थे, इसलिए रामायण जैसा काव्य जो उत्तर भारतीय संस्कृति की दक्षिण पर विजय दिखाता था, ब्राह्मणवादियों को मानसिक संतुष्टि देता था। रामायण और अन्यान्य पुराणों के माध्यम से, उन परिश्रमी और स्वाभिमानी लोगों को असुर, राक्षस आदि घोषित किया जा रहा था, जो दक्षिण में रहकर खुद को आर्य संस्कृति के प्रभाव से न केवल बचाए हुए थे, अपितु अच्छी-खासी, समृद्ध सभ्यता के निर्माता भी थे।

अनार्यों के प्रति आर्यों की नफरत के रामायण आदि ग्रंथों में कई आयाम हैं। जरा उस प्रसंग को याद कीजिए जब राम लंका जाने के लिए समुद्र से रास्ता मांगते हैं। समुद्र द्वारा अनसुनी करने पर अपना वाण तान लेते हैं। समुद्र हाजिर होकर वाण तूणीर में डालने की प्रार्थना करता है। राम के यह कहने पर कि संधान किया हुआ वाण वापस तूणीर में नहीं जा सकता, समुद्र वाण को उत्तर दिशा में द्रुमकुल्य की ओर छोड़ने का आग्रह करता है—

उत्तरेणावकाशोऽस्ति कश्चित् पुण्यतरो मम।

द्रुमकुल्य इति ख्यातो लोके ख्यातो यथा भवान्।।32।।

उग्रदर्शनं कर्माणो बहवस्तत्र दस्यवः।

आभीर प्रमुखाः पापाः पिवंति सलिलम् मम।।33।।

तैर्न तत्स्पर्शनं पापं सहेयं पाप कर्मभिः।

अमोघ क्रियतां रामोऽयं तत्र शरोत्तमः ।।34।।

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सागरस्य महात्मनः।

मुमोच तं शरं दीप्तं परं सागर दर्शनात्।।35।। वाल्मीकि रामायण, युद्धकांड, 22वां सर्ग।

गौर करने की बात यह है कि दक्षिण में रावण का ठिकाना है। हरण के बाद रावण सीता को वहीं लेकर गया है। वहां राक्षसों का वास है, समुद्र उनसे लंका की ओर शर-संधान करने का आग्रह नहीं करता, बल्कि उत्तर दिशा की ओर शर-संधान करने को कहता है, जहां आभीर, किरात, यवन आदि लोग रहते थे। बताता है कि ऐसे ‘पापी’ प्राणियों के स्पर्श से उसका जल अपवित्र हो जाता है। राम जैसे ब्राह्मण के कहने पर शंबूक की गर्दन तराश देते हैं, ठीक ऐसे ही बिना कुछ सोचे-समझे, समुद्र के कहने पर तीर को उसी की बताई दिशा में छोड़ देते हैं। ये अभीर, किरात वही लोग थे, जिन्होंने सिंधु घाटी में आर्यों को जोरदार टक्कर दी थी। ऋग्वेद में इस युद्ध को दासराज्ञ युद्ध; अर्थात दस राजाओं का युद्ध के रूप में दिखाया गया है। रामायण आदि ग्रंथों के माध्यम से, आर्यों-अनार्यों की राजनीतिक राजनीतिक प्रतिद्विंद्वता को, धार्मिक-सांस्कृतिक घृणा में बदल दिया जाता है। उपर्युक्त प्रसंग से यह भी पता चलता है कि छुआछूत की भावना, जिसके शूद्रों और अछूतों को सार्वजनिक तालाबों का जल पीने से रोक दिया जाता था, रामायण काल में ही पनप चुकी थी।

ईसापूर्व पहली-दूसरी शताब्दी में दक्षिण जाने वाले वैदिक संस्कृति के प्रचारक वहां के राजाओं और कुछ शीर्ष वर्गों को तो अपने प्रभाव में लेने में कामयाब रहे थे, लेकिन वहां की आम जनता, विशेष रूप से स्थानीय कबीले ब्राह्मण-संस्कृति के प्रभाव से मुक्त थे। उन्हें अपनी संस्कृति पर गर्व था। दोनों संस्कृतियों के संधि-स्थल, विंध्य के पठारों और जंगलों में, जब वे लोग मिलते तो टकराव की संभावनाएं बन ही जाती थीं। इस कारण दक्षिण को लेकर एक अजाना भय, ईर्ष्या उत्तर भारतीय संस्कृति के संरक्षक ब्राह्मणों के हृदय में समाया हुआ था। उत्तर भारत श्रेष्ठ है, दक्षिण भारत निकृष्ट, यह सोच तथा इससे उपजा डर लोककथाओं में दक्षिण-यात्रा के प्रति निषेधाज्ञा के रूप में सामने आया। चूंकि ब्राह्मणों के लिए असुरों, राक्षसों की तरह शूद्र और पंचम भी बाहरी थे, इसलिए गांव में उनके रहने के लिए दक्षिण दिशा सुनिश्चित की गई।

एक हजार ईस्वी के आसपास उत्तर भारत बाहरी हमलों का शिकार होने लगा। जबकि शंकराचार्य के नेतृत्व में दक्षिण, आठवीं शताब्दी में ही ब्राह्मण धर्म की केंद्र-स्थली बन चुका था। सो उत्तर भारत में भारी राजनीतिक उथल-पुथल के चलते, आने वाली शताब्दियों में दक्षिण, ब्राह्मण धर्म के लिए सुरक्षित ठिकाना बन गया। उस दौर में ब्राह्मणों को विशेषाधिकार दिए गए। वर्णाश्रम धर्म की पुनर्स्थापना की गई। राज्य की मदद से जाति-व्यवस्था को इतना मजबूत किया गया कि शूद्रातिशूद्र जातियां सांस तक न ले सकें। इसकी प्रतिक्रिया संत साहित्य के रूप में हुई। लेकिन कई कारणों से संत ब्राह्मण धर्म को वैसी चुनौती नहीं दे सके, जैसी उनसे अपेक्षित थी। उनके सारे सुधार कार्यक्रम धर्म के दायरे में थे, जो ब्राह्मणवादियों के सबसे सुरक्षित दायरा है।

ब्राह्मण धर्म को चुनौती उनीसवीं शताब्दी में उस समय मिलनी शुरू हुई जब औपनिवेशिक सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों के अंतर्गत शूद्रातिशूद्रों को पढ़ने-लिखने का अवसर मिला। तभी उन्हें अपनी सामाजिक परतंत्रता का अहसास हुआ। पता चला कि वे अंग्रेजों के अलावा ब्राह्मणों के भी गुलाम हैं। धर्म और जाति उन्हें परतंत्र रखने वाले ब्राह्मणी औजार हैं। वे छुआछूत के सुरक्षा-कवच भी हैं। आरंभ में सामाजिक मुक्ति की पहल के रूप में धर्मांतरण का सहारा लिया गया। लेकिन कुछ ही दशकों में यह साफ हो गया कि धर्म अपने आप में एक सत्ता है और किसी भी प्रकार की सत्ता के रहते, न तो मानवीय गरिमा की रक्षा हो सकती है। न मानव-मुक्ति के लक्ष्य को पाया जा सकता है। इस सोच के साथ दक्षिण की राजनीति में उभरे पेरियार ने सीधे ईश्वर की सत्ता को चुनौती दी। कहा कि सामाजिक आजादी प्राप्त करने के लिए द्रविड़ों को सबसे पहले ब्राह्मणों द्वारा गढ़े गए, ईश्वर और धर्म से मुक्त होना होगा। द्रविड़ों की समानता, स्वतंत्रता और आत्मसम्मान के लिए ऐसा करना जरूरी है।

1932 में वे श्रीलंका में बसे तमिलों के आमंत्रण पर वहां गए थे। वहां कोलंबो में दिए गए भाषण में उन्होंने कहा था कि आत्मसम्मान और मनुष्यता की स्थापना के लिए तमिलों को ईश्वर, धर्म और राष्ट्रवाद के मोह से बाहर निकल आना चाहिए(कुदी आरसु, 30 अक्टूबर, 1932)। उनका मानना था कि धर्म और ईश्वर मानव-प्रगति के सबसे बडे़ दुश्मन हैं। गौरतलब है कि ईश्वर और धर्म के औचित्य पर सवाल उठाने वाले, उन्हें मानव-मात्र की गरिमा, आत्मसम्मान, स्वतंत्रता और समानता के लिए हानिकारक मानने वाले पेरियार अकेले नहीं थे। पश्चिम में दो शताब्दी पहले ही ऐसे सवाल उठने लगे थे। धर्म की सत्ता शोषक की सत्ता है। वह शोषण को बढ़ावा देने वाली है, इस तथ्य को वहां बार-बार रेखांकित किया जा रहा था। मिखाइल बकुनिन का कहना था कि बाईबिल का ईश्वर—‘पक्के तौर पर सर्वाधिक ईर्ष्यालु, सबसे बकवास, सबसे ज्यादा क्रूर, सबसे अन्यायी, सबसे निरंकुश, सर्वाधिक खून का प्यासा, सबसे ईर्ष्यालु तथा मानवीय गरिमा एवं स्वतंत्रता के लिए सबसे डरावना और वैरभाव रखने वाला है। जबकि शैतान शाश्वत विद्रोही और पहला स्वतंत्र विचारक था।’(ईश्वर और राज्य, मिखाइल बकुनिन) 

हिंदू धर्म की आलोचना करते समय पेरियार रामायण, गीता और मनुस्मृति को निशाना बनाते हैं। राम, लक्ष्मण, सीता, दशरथ जैसे चरित्र जिन्हें हिंदू धर्म में ‘आदर्श’ के तौर पर पेश किया जाता रहा है, की चारित्रिक दुर्बलताओं को गिनाते हुए वे रावण को आदर्श चरित्र वाला और द्रविड़ों के महानायक के रूप में पेश करते हैं। वे एक-एक कर उन सभी हिंदू मिथों को निशाना बनाते हैं, जिनके माध्यम से ब्राह्मण हिंदू धर्म और उनकी आड़ में अपनी शताब्दियों से अपनी अधिसत्ता को बनाए हुए हैं। पेरियार की धर्म और जाति-संबंधी स्थापनाओं को पढ़ना, हिंदू धर्मशास्त्रों की विखंडनात्मक व्याख्या करने जैसा है। इसलिए वे धर्म की आड़ में राजनीति करने वालों को सबसे ज्यादा अखरते हैं।

2002 में उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री सुश्री मायावती आंबेडकर पार्क में पेरियार की मूर्ति की स्थापना कराना चाहती थीं। लेकिन भारतीय जनता पार्टी को यह कतई स्वीकार नहीं था। भाजपा के भारी विरोध के कारण उन्हें अपना इरादा बदलना पड़ा था। यही क्यों, 1980 में पेरियार के अपने राज्य तमिलनाडु के कांचीपुरम में पेरियार की मूर्ति की स्थापना की अनुमति देने से तत्कालीन मुख्यमंत्री एमजी रामाचंद्रन ने मना कर दिया था। उन्हें लगता था कि इससे कांची के शंकराचार्य नाराज हो सकते हैं। यह बात अलग है कि सरकार के फैसले के बाद विपक्षी दल द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने मद्रास उच्च न्यायालय में अपील की और अदालत की अनुमति के बाद, मूर्ति को स्थापित कर दिया गया। 

अच्छी बात यह है कि इन दिनों पेरियार के प्रति उत्तर भारतीयों का दृष्टिकोण बदल रहा है। उनकी स्वीकार्यता लगातार बढ़ती जा रही है। जो आने वाले वर्षों में बढ़ती ही जाएगी. विचारों को पकने, फैलने और और उन्हें क्रांति में ढलने में इतना समय तो लगता ही है.

ओमप्रकाश कश्यप

इंटरनेट लर्निंग : भारतीय परिदृश्य और नई शिक्षा नीति

विशेष रुप से प्रदर्शित

ओमप्रकाश कश्यप

‘दूर-शिक्षण’ यानी ‘ऑनलाइन शिक्षा’ अथवा ‘ई’लर्निंग’ प्रौद्योगिकीय विकास की देन है। एक लोकोपयोगी प्रौद्योगिकी में जितने गुण होने चाहिए, वे लगभग सभी इसमें मौजूद हैं। यह स्कूली शिक्षा से सस्ती हो सकती है। प्रयोगात्मक अवस्था में है, इसलिए हम इसके निरंतर बेहतर होने की उम्मीद कर सकते हैं। तकनीकी सुधार द्वारा इसे अधिकाधिक रचनात्मक, आकर्षक, संप्रेषणीय एवं प्रभावशाली बनाया जा सकता है। आज देश के विभिन्न हिस्सों में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रम में भारी अंतर है। यहां तक कि एक ही शहर में प्राइवेट तथा सरकारी स्कूलों में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रम का स्तर एक जैसा नहीं होता। शिक्षा  स्तर में यह अंतर प्रकारांतर में सामाजिक असमानता को बढ़ावा देता है। इसलिए शिक्षा-नीति-2020 में इस अंतर को पाटने का संकल्प लिया गया है. दूर-शिक्षण पद्धति पाठ्यक्रम के मानकीकरण में सरकार की मददगार सिद्ध हो सकती है। सरकार चाहे तो एनसीईआरटी तथा उसकी अनुषंगी संस्थाओं की मदद से दूर-शिक्षण सामग्री के वाक्-चित्रण(आडियो विजुलाइजेशन) का मानकीकरण भी कर सकती है। ऑनलाइन शिक्षा के सामुदायिकरण द्वारा हम वहां भी आसानी से पहुंच सकते हैं, जहां अभी तक स्कूली शिक्षा नहीं पहुंच पाई है। कुल मिलाकर, तात्कालिक मजबूरी में ही सही, ऑनलाइन शिक्षा को अपनाना घाटे का सौदा नहीं है। देखना यह है कि समाजार्थिक विषमता से भरपूर भारतीय परिदृश्य में वह कितनी और किस प्रकार उपयोगी हो सकती है!

भारत में ‘ऑनलाइन क्लासिस’ की दशा-दिशा पर बातचीत करने से पहले इसके इतिहास पर सरसरी नजर डाल लेना उचित होगा।

ऐतिहासिक विहंगावलोकन

‘ऑनलाइन क्लासिस’, दूर-शिक्षण(डिस्टेंस एजुकेशन) का आधुनिक संस्करण है। दूर-शिक्षण की संकल्पना उनीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में जन्मी थी। उद्देश्य था, जो लोग किसी कारणवश स्कूली शिक्षा से वंचित हैं—उनके लिए शिक्षा के वैकल्पिक माध्यम विकसित किए जाएं। 1833 में एक स्वीडिश अखबार में प्रकाशित एक विज्ञापन ने लोगों को चौंकाने का काम किया था। विज्ञापन में डाक के माध्यम से शिक्षा देने की सूचना थी। उस समय तक पत्राचार द्वारा शिक्षा की एकदम अवधारणा नई थी। इसलिए लोगों का ध्यान उसकी ओर कम ही गया। फिर भी विचार की नींव तो पड़ ही चुकी थी। सो उत्साही लोग ‘दूर-शिक्षण’ को कामयाब बनाने में जुट गए। इस बीच इंग्लेंड सरकार की ओर से पूरे देश के लिए एक समान डाक-नीति लागू करने की घोषणा की गई। उसका लाभ उठाते हुए 1840 में सर ईसाक पिटमेन(1813-1897) ने पोस्टकार्ड को पत्राचार की शिक्षा का माध्यम बनाया। प्रति पत्राचार एक पेनी की शुल्क पर वे दूरदराज के क्षेत्रों में रह रहे विद्यार्थियों को आशुलिपि सिखाने लगे। ये वही पिटमेन थे, जिन्हें ‘शार्टहेंड’ का जनक माना जाता है। उनके सम्मान में शार्टहेंड को ‘पिटमेन शार्टहेंड’ का नाम भी दिया गया है। पिटमेन साहब पोस्टकार्ड के माध्यम से अपने विद्यार्थियों को शार्टहेंड के बारे समझाते। लगे हाथ उन्हें ‘एक्सरसाइज’ के बारे में बता देते थे। विद्यार्थी भी पोस्टकार्ड के जरिए उनका हल भेजते और अपनी समस्याएं सामने रखते थे। प्रयोग इतना ज्यादा कामयाब हुआ कि मात्र 3 वर्ष के भीतर पिटमेन के नेतृत्व में ‘फोनोग्राफिक कोरसपोंडेंस सोसाइटी’ का गठन हुआ। उसके तत्वावधान में पत्राचार  कॉलेज की स्थापना हुई, जिसे दुनिया का पहला पत्राचार कॉलेज कह सकते हैं। 

एक कामयाब प्रयोग की देर थी। उसके बाद तो ‘दूर-शिक्षा’ का सिलसिला जोर पकड़ने लगा। 1891 तक अमेरिका में पत्राचार द्वारा डिग्री कोर्स कराने की सुविधा आरंभ हो चुकी थी। ग्रेट ब्रिटेन के बाद अमेरिका, जर्मनी आदि देशों में पत्राचार द्वारा शिक्षा के स्कूल खोले जाने लगे। सबसे बड़ी सफलता मिली, शिकागो विश्वविद्यालय को। वहां प्रतिवर्ष 125 अनुदेशक, 3000 विद्यार्थियों को पत्राचार द्वारा शिक्षा प्रदान करते थे। विश्वविद्यालय में पत्राचार शिक्षा के लिए 350 पाठ्यक्रम निर्धारित थे। कह सकते हैं कि वह शिक्षा-जगत की पहली क्रांति थी। रेडियो का प्रचलन हुआ तो विश्वविद्यालयों ने उसे भी दूर-शिक्षा का माध्यम बना लिया। 1920 के दशक में, अकेले अमेरिकी विश्वविद्यालयों ने दूर-शिक्षण के लिए 176 रेडियो स्टेशन स्थापित किए थे। फिर आया दूरदर्शन। आने के साथ ही उसने मनोरंजन उद्योग के साथ-साथ शिक्षा क्षेत्र को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया। गौरतलब है कि 1891 में ‘चलचित्र कैमरा’ का आविष्कार करते समय थॉमस अल्वा एडीसन ने कहा था कि चलती-फिरती तस्वीरें शिक्षाजगत में क्रांति का आगाज करेंगी। वे शिक्षा को और अधिक मनोरंजक, आकर्षक एवं रचनात्मक बनाएंगी। एड़ीसन के बाद जन्मे मार्शल मेक्लुहान ने ‘मीडिया ही संदेशवाहक’ कहते हुए उसे ‘मनुष्य के विस्तार’ के रूप देखा। आगे सबकुछ  एडिसन की भविष्यवाणी के अनुरूप हुआ। 1950 के दशक तक दुनिया के कई देश, दूरदर्शन को दूर-शिक्षा के उपयोगी माध्यम के रूप में अपना चुके थे। खासतौर पर दूरस्थ गांवों में शिक्षा देने के लिए दूरदर्शन विशेष मददगार सिद्ध हुआ। अमेरिका के अलास्का में, दूर-शिक्षण प्रविधि द्वारा गांव-गांव शिक्षा पहुंचाने के लिए 1980 में ‘लर्न अलास्का’ परियोजना आरंभ की गई। उसकी ओर से प्रतिदिन छह घंटे का शैक्षिक कार्यक्रम प्रसारित किया जाता था, जिसकी पहुंच कई सौ गांवों तक थी।

भारत में दूर शिक्षा की नींव 1962 में रखी गई। उसी वर्ष दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा ‘स्कूल ऑफ़ कॉरसपोडेंस कोर्सिस एंड कंटीन्युइंग एजुकेशन’ की शुरुआत की गई। उसका भरपूर स्वागत किया गया। मात्र एक दशक में कई और भी संस्थान दूर-शिक्षण प्रणाली को अपना चुके थे। 1982 में हैदराबाद में डॉ. भीमराव आंबेडकर मुक्त विश्वविद्यालय की स्थापना दूर शिक्षण की दिशा में क्रांतिकारी कदम थी। आज देश में 242 विश्वविद्यालय/संस्थान ऐसे हैं जो सामान्य कक्षाओं के साथ-साथ दूर शिक्षण के माध्यम से भी शिक्षा प्रदान करते हैं। 2009-10 में देश में उच्चतर शिक्षा के क्षेत्र में दूर शिक्षा संस्थानों का योगदान 23.38 प्रतिशत था। उसी वर्ष दूर-शिक्षा संस्थानों में पंजीकरण कराने वाले विद्यार्थियों की संख्या लगभग 40,00,000 थी।

जिसे आज हम ई’लर्निंग(इलेक्ट्रानिक्स लर्निंग) कहते हैं, उसकी शुरुआत 1980 के दशक से ही हो चुकी थी। आज लाखों की संख्या में बेवसाइटें किसी न किसी रूप में शिक्षा प्रदान करने या उसके प्रचार-प्रसार में जुटी हैं। इंटरनेट द्वारा शिक्षण के क्षेत्र में नई क्रांति का आगाज हुआ, ‘वेब-2’(वर्ल्ड वाईड वेब-2) के आविष्कार के बाद। वेब-1 का दौर 1980 से 2004 तक चला था। उसमें प्रयोक्ता की हैसियत महज उपभोक्ता जैसी थी। उस एकल-मार्गी माध्यम का उद्देश्य उपभोक्ता तक सूचनाएं पहुंचाना मात्र था। उपभोक्ता वेबसाइट पर मौजूद सामग्री को केवल देख सकता था। इंटरनेट की पहुंच सीमित थी। गति कम। इंटरनेट सामग्री निर्माता भी कम थे। उपभोक्ता की प्रतिक्रिया जानने के लिए ‘गेस्टबुक’ हुआ करती थी। जिसपर दी गई प्रतिक्रियाएं मुख्य सामग्री से अन्यत्र जमा होती थी। वेब-2 के आविष्कार इस क्षेत्र में क्रांति ने उपभोक्ता को भी ‘सामग्री उत्पादक’ की श्रेणी में ला दिया। उपभोक्ता को यह छूट दी जाने लगी कि वह उपलब्ध सामग्री में विषयगत संशोधन कर सके। फिर ऐसी बेवसाइटें भी बनने लगीं जिनमें सामग्री उत्पादक और उपभोक्ता के बीच कोई अंतर न था। प्रयोक्ता अपनी ओर से नई सामग्री जोड़ने तथा उसके मनचाहे प्रस्तुतीकरण के लिए स्वतंत्र था। आज लाखों बेवसाइट केवल उपभोक्ताओं द्वारा सृजित सामग्री के भरोसे चलती हैं। सामग्री उसकी अपनी या किसी और व्यक्ति/संस्था की हो सकती है। वेबसाइट निर्माताओं का काम केवल ‘सामग्री सर्जकों’ और ‘सामग्री प्रयोक्ताओं’ के बीच पुल बनाना है। उन्हें ‘सूचनाप्रदेश के वासी’ अथवा ‘डिजिटल नेटिव्स’ का नाम दिया। आज जिसे सोशल मीडिया कहते हैं, वह असल में इंटरनेट पर फैला ‘वैश्विक सूचनाप्रदेश’ है, जिसमें आमोखास सभी को दखलंदाजी करने का अधिकार प्राप्त है। ई’लर्निंग सूचना-प्रदेश की विस्मयकारी सफलताओं तथा उसके महाविस्तार का ही हिस्सा है।   

सवाल है कि इन सब खूबियों के बावजूद क्या ऑनलाइन शिक्षा, स्कूली शिक्षा का समानोपयोगी अथवा बेहतर विकल्प बन सकती है? प्रश्न यह भी हो सकता है कि क्या शिक्षा का माध्यम, उसकी गुणवत्ता को प्रभावित करता है। इस संबंध में दो अमेरिकी प्रोफेसरों, रिचर्ड एडवर्ड क्लार्क तथा राबर्ट बी। कोझमा के बीच लंबी बहस चली थी। 1983 में बहस की शुरुआत करते हुए क्लार्क ने कहा था—‘संज्ञानात्मक प्रक्रियाएं एवं रणनीतियां जो सीखने के लिए आवश्यक हैं, उनका उपयोग विद्यार्थी अपने लिए नहीं कर सकते। वे करेंगे भी नहीं।’1 क्लार्क के अनुसार मीडिया सूचनाओं एवं अनुदेशों को विद्यार्थी तक पहुंचाने का महज एक माध्यम है। इससे इतर उसकी और कोई भूमिका नहीं है। जैसे खाने-पीने की चीजों की पौष्टिकता, उन्हें ढोने वाले ट्रक के प्रभाव से बेअसर रहती है, इसी तरह शिक्षा भी मीडिया के प्रभाव से अछूती रहती है। एक तरह से क्लार्क ने मीडिया को महज सूचना-प्रदाता तथा विद्यार्थियों को सूचना-संग्राहक मात्र मान लिया था।

करीब एक दशक बाद, 1994 में कोझ़मा ने क्लार्क की आलोचना करते हुए कहा कि शिक्षा पर मीडिया के असर को समझने के लिए उन दोनों के संबंधों को समझना जरूरी है। कोझ़मा के अनुसार, क्लार्क की धारणा इन दोनों के अंतःसंबंध को सही-सही न समझ पाने के कारण बनी थी। उसका कहना था कि यदि माध्यम को तकनीक; तथा शिक्षा-अनुदेशों को अध्यापन प्रविधि मान लिया जाए तो मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए बाध्य हूं कि शिक्षण माध्यम से अधिक प्रविधि से प्रभावित होता है।2 कोझ़मा का तर्क एक तरह से क्लार्क के निष्कर्ष की ही पुष्टि करता था। बावजूद इसके कोझ़मा को नकार पाना संभव नहीं है। निरंतर शक्तिशाली होते इंटरनेट-मीडिया, खासकर तब जब उपभोक्ता को वेबसाइटों पर उपलब्ध सामग्री को संपादित करने की छूट प्राप्त हो, उससे निरपेक्ष सूचना-प्रदाता बने रहने की उम्मीद करना ही व्यर्थ है।

तकनीकी का मूल स्वभाव गतिशीलता है। प्रत्येक प्रौद्योगिकी अपने से बेहतर प्रौद्योगिकी की संभावनाएं लिए रहती है। वह न केवल स्वयं गतिशील रहती है, अपितु अपने प्रयोक्ता को भी गतिमान बनने के लिए उकसाती है। इसलिए वह शिक्षण की समग्र प्रक्रिया के साथ-साथ विद्यार्थी क्या सीखता है, कब सीखता है, कैसे सीखता है—को प्रभावित करती है। ई’लर्निंग की प्रक्रिया में विद्यार्थी केवल अपने अनुदेशक या शिक्षण संस्थान से जुड़ा नहीं होता। बल्कि इंटरनेट के जरिए लाखों जालपट्टों, इलेक्ट्रॉनिक सामग्री के प्रयोक्ताओं, सर्जकों, उत्पादकों तथा उनका व्यापार करने वालों से भी जुड़ा होता है। यदि यह मान लिया जाए कि प्रयोक्ता(विद्यार्थी) इंटरनेट पर उपलब्ध पाठेत्तर सामग्री के आकर्षण से खुद को बचाए रखता है, तब भी वहां मौजूद दर्जनों शब्दकोश, अनुवाद सुविधाएं, तरह-तरह के संदर्भ ग्रंथ, विश्वकोश, पूरक पाठ्य-सामग्री, अखबार, शोध पत्रिकाएं आदि से उसका निरपेक्ष रह पाना संभव नहीं है। इसलिए क्लार्क का कथन कि माध्यम का संबंध केवल सूचना के आवागमन तक सीमित रहता है, उचित नहीं है। गौरतलब है कि क्लार्क और कोझ़मा के बीच बहस उन दिनों हुई थी, जब तक वेब-2 का आविष्कार नहीं हो पाया था। अधिकतर वेब-सामग्री एकतरफा सूचना-प्रदाता माध्यमों पर सुरक्षित थी। यदि क्लार्क आधुनिक वेबसाइटों को देखते, ऐसी वेबसाइटों को देख पाते जिनपर वेबसाइट मालिकों की हैसियत महज सूचना प्रबंधक जैसी है—तब उनका निष्कर्ष अवश्य ही कुछ और होता।

     

इंटरनेट लर्निंग : भारतीय परिदृश्य और नई शिक्षा नीति

भारतीय संविधान में 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा को मौलिक अधिकार माना गया है। भारत में इस आयु-वर्ग में करीब 30 करोड़ विद्यार्थी हैं। 300 विश्वविद्यालय स्तरीय शिक्षण संस्थान हैं, जिनसे जुड़े कॉलेजों की संख्या 12,600 से अधिक है। उनमें 80 लाख विद्यार्थी हैं। देश में स्कूल अध्यापकों की संख्या लगभग 95 लाख है। इनमें से 4,00,000 कॉलेज स्तर की संस्थाओं में अध्यापन करते हैं। बावजूद इसके देश में साक्षरता अनुपात मात्र 56 प्रतिशत है। अनेक ऐसे ठिकाने हैं जहां औपचारिक शिक्षण संस्थाओं का बेहद अभाव है। कुछ, खासकर उच्चशिक्षण संस्थान, अत्यंत महंगे होने के कारण गरीब आदमी की पहुंच से बाहर हैं। इसे देखते हुए ऑनलाइन शिक्षा देश के लिए वरदान सिद्ध हो सकती है।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में शिक्षा को प्रतिस्पर्धी एवं सर्वसुलभ बनाने पर जोर दिया गया है। इसके लिए उसमें ‘ऑनलाइन शिक्षा’ को बढ़ावा देने तथा उसके लिए नवीनतम प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल का भी संकल्प है। कहा गया है कि ऐसे क्षेत्रों में जहां बालक को सीधे शिक्षा देना संभव नहीं है—वहां ऑनलाइन शिक्षा बेहतर विकल्प बन सकती है। इसके लिए मानव संसाधन मंत्रालय के तहत, एक सशक्त ढांचा खड़ा करने की योजना बनाई गई है। ऐसा ढांचा जो स्कूली स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक, ऑनलाइन अध्ययन-अध्यापन हेतु प्रभावशाली डिजीटल सामग्री और कारगर सिस्टम का निर्माण करेगा; तथा सरकार और शिक्षण संस्थानों के लिए मार्गदर्शक का काम करेगा।

नई शिक्षा नीति में शिक्षा-क्षेत्र में सुधार तथा उसके बहुआयामी विस्तार हेतु, नवीनतम प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल पर जोर दिया गया है। एक ‘राष्ट्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी फोरम’ बनाने का संकल्प लिया है। यह फोरम गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के विस्तार हेतु डिजीटल सामग्री के निर्माण, मूल्यांकन, योजना, प्रशासन, प्रबंधन आदि क्षेत्रों में नवीनतम प्रौद्योगिकी के प्रयोग के बारे में सलाह देगा। फोरम की सभी सेवाएं, स्कूल स्तर से लेकर उच्च शिक्षण संस्थानों तक, निःशुल्क उपलब्ध होंगी। फोरम क्लासरूम शिक्षा के क्षेत्र में नई तकनीकी के उपयोग के साथ-साथ, ऑनलाइन शिक्षा हेतु ई-सामग्री के निर्माण तथा अध्यापकों के प्रशिक्षण के क्षेत्र में नवीनतम तकनीक के उपयोग की संभावनाओं पर विचार कर, उनके कार्यान्वन हेतु भरोसेमंद मार्गदर्शक तंत्र का काम करेगा।

ऑनलाइन शिक्षा की समस्याएं

एक ओर जहां ऑनलाइन शिक्षा की उपयोगिता स्वयं-सिद्ध है, वहीं दूसरी ओर यह भी सच है कि भारत जैसे बड़े देश के भारी-भरकम और विविधतापूर्ण शिक्षातंत्र का संपूर्ण डिजिटलाइजेशन एकाएक संभव नहीं है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में प्राइमरी तथा प्री-प्राइमरी स्तर पर कुछ ऐसे स्कूल, शृंखलाबद्ध तरीके से खोले गए हैं, जिनमें अध्यापक की भूमिका कक्षा में अनुशासन बनाए रखने; अथवा विद्यार्थी की तात्कालिक जिज्ञासाओं के समाधान तक सीमित होती है। ऐसे स्कूलों में जोर केवल शिक्षण-सामग्री का डिजिटलाइजेशन पर होता है। बच्चे सामान्य तौर पर स्कूल आते हैं। कक्षा लगती हैं, किंतु दीवार पर ब्लैक बोर्ड के स्थान पर सिल्वर स्क्रीन या टेलीविजन सेट होता है। उसके द्वारा पूर्वनिर्धारित पाठ-सामग्री, स्रोत केंद्र से सीधे विद्यार्थियों तक पहुंचाई जाती है। अभी तक ऐसे स्कूल, नर्सरी और प्राईमरी स्तर तक हैं। अलग-अलग स्थान पर कक्षाएं चलाने के लिए बड़े कोचिंग संस्थान भी इस प्रौद्योगिकी का सहारा लेने लगे हैं।

कुछ महीनों से कोविड-19 की महामारी के दौरान शिक्षण को लेकर आ रही मुश्किलों के लिए परंपरागत स्कूलों ने भी ऑनलाइन कक्षाएं चलाना आरंभ किया है। यह मजबूरी में अपनाया गया रास्ता है। क्योंकि ऐसे स्कूलों द्वारा चलाई जा रही ऑनलाइन कक्षाओं में उपलब्ध प्रौद्योगिकी के दसवें हिस्से का भी उपयोग नहीं हो पा रहा है। लगभग सभी अध्यापक परंपरागत शिक्षा के माहौल से आए हैं। उनका समूचा अनुभव और ज्ञान, क्लासरूम शिक्षा तक सीमित है। सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी उनकी जानकारी बहुत सामान्य स्तर की है। ऑनलाइन शिक्षा के लिए जो आवश्यक उपकरण, लैब, डिजिटलीकृत पाठ-सामग्री आदि चाहिए, स्कूलों में उसका भी अभाव है। ऑनलाइन शिक्षा के नाम पर वे केवल भरपाई कर रहे हैं, ताकि स्कूलों के नाम पर चल रही उनकी दुकानें बंद न हों। विद्यार्थियों, खासकर प्राथमिक स्तर के बच्चों की हालत और भी बुरी है। उनमें से अधिकांश बच्चों की जानकारी कंप्यूटर खोलने और बंद करने तक सीमित है। इस हकीकत को उनके अभिभावक भी जानते हैं। लेकिन फिलहाल इसके अलावा उनके सामने कोई विकल्प भी नहीं है। विडंबना यह है कि यह आधी-अधूरी ऑनलाइन शिक्षा भी केवल एक-चौथाई बच्चों के लिए उपलब्ध है। देश में करीब 76 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं जो अन्यान्य कारणों से ऑनलाइन शिक्षा का लाभ उठाने से वंचित हैं। आंकड़े बताते हैं कि भारत के लगभग 22 फीसदी ग्रामीण घरों में आज भी बिजली की सप्लाई नहीं है। कुछ राज्यों में तो हालत और भी खराब है। ऑनलाइन शिक्षा का सारा दारोमदार इंटरनेट पर टिका है। देश में अभी कुल 31 प्रतिशत, लगभग 40 लोगों के पास इंटरनेट की आधी-अधूरी सुविधा उपलब्ध है। आंकड़े बताते हैं कि अगले कुछ वर्षों में इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या दो गुनी हो जाएगी। इसी आधार पर सरकार का इरादा 2025 तक, शिक्षा को ऑनलाइन मोड में लाने का है। संकल्प बुरा नहीं है, मगर चुनौतियां भी कम नहीं हैं।

डिजिटल माध्यम द्वारा पाठ को विद्यार्थी तक पहुंचाने के लिए चाहिए एक कंप्यूटिंग मशीन, निर्बाध इंटरनेट कनेक्शन, जरूरी साफ्टवेयर। इसके अलावा उसे चाहिए एकांत। ऐसी जगह जहां विद्यार्थी बगैर किसी व्यवधान के दूर-शिक्षण का लाभ उठा सके। मुश्किल यह है कि भारत जैसे विविधताओं वाले देश में जहां आमदनी के हिसाब से लोगों के बीच जमीन-आसमान का अंतर है। गांवों और शहरों में बड़ी संख्या उन लोगों की है जिनके पास एक कमरे के घर हैं। जहां एक ही छत के नीचे छह-सात लोग रहते हैं। उनमें से काफी लोगों के लिए ये संसाधन जुटाना मुश्किल काम है। करीब चार महीने के घोषित-अघोषित लॉकडाउन और उस दौरान कीर्तिमान रच चुकी बेरोजगारी के कारण, विद्यार्थियों के माता-पिता की हालत ऐसी नहीं है कि वे बच्चों के लिए कंप्यूटिंग मशीन, इंटरनेट आदि का इंतजाम कर सकें। एक समाचार के अनुसार बच्चे की ऑनलाइन शिक्षा के लिए असम के एक परिवार को गाय बेचना पड़ी.  इस तरह के समाचार पूरे देश से प्राप्त हो रहे हैं।

‘इंडियन एक्सप्रेस’ में 27 जुलाई 2020 को प्रकाशित, हरियाणा की बडेशर तहसील के मोरनी गांव से जुड़े समाचार से ऑनलाइन शिक्षा की जमीनी हकीकत को समझा जा सकता है।3 उसके अनुसार गांव में गिने-चुने लोगों के पास स्मार्ट फोन हैं। जिनके पास हैं, वे ठीक-ठाक इंटरनेट सिग्नल न मिलने से परेशान रहते हैं। ऐसे में जिन विद्यार्थियों के पास स्मार्ट फोन नहीं है, उन्हें उन बच्चों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिनके पास फोन की सुविधा है। यह सुविधा उन्हें स्कूल समय में उपलब्ध नहीं हो पाती। उस समय जिसका फोन है, वह खुद ऑनलाइन क्लास से जुड़ा होता है। इसलिए बच्चे स्कूल समय के बाद उनके पास जाते हैं। ऐसे परिवार भी हैं, जिनके माता-पिता बच्चों को तत्काल मोबाइल फोन खरीदकर देने में असमर्थ हैं। गांव के एक किसान के ये शब्द पूरे भारत के मजदूर-किसानों की त्रासदी बयान करते हैं—‘मैंने कुछ रुपये बचाए थे। मगर लॉकडाउन के कारण सब घर-गृहस्थी की जरूरतों पर खर्च हो गए। अब सोच रहा हूं कि एक महीने में टमाटरों की फसल बिक जाएगी। उसके बाद मैं अपने बच्चों के लिए स्मार्ट फोन खरीद दूंगा।’ उस किसान की दो बेटियां हैं। छोटी पांचवी कक्षा में पढ़ती है, बड़ी सातवीं में। स्मार्टफोन न होने के कारण वे गांव के एक लड़के के घर जाती हैं। किसान के अनुसार—

‘मेरे पास साधारण फोन है, लेकिन यह बच्चों के किसी काम नहीं आ सकता। इसलिए जब तक टमाटरों की फसल उठ नहीं जाती, मैं अपनी बेटियों को उस लड़के के पास भेजने को विवश हूं, जिसके पास स्मार्ट फोन है। हमने कभी नहीं सोचा था कि पढ़ाई केवल टच फोन के सहारे ही संभव हो पाएगी।’

अखबार में स्थानीय पॉलिटेक्निक की छात्रा, देवी नामक लड़की का बयान भी छपा है। देवी के अनुसार, मोबाइल पर अपना काम निपटाने के बाद वह बच्चों को कापी-कलम के साथ अपने घर बुला लेती है—

‘शाम के समय उन सभी को अपने खेतों में काम करना पड़ता है। इसलिए वे दोपहर के बाद आते हैं और अध्यापक द्वारा भेजे गए नोट्स और वीडियो के पाठ को अपनी कापी में उतार लेते हैं।’

गौरतलब है कि पंचकुला जिले में शिवालिक की पहाड़ियों पर बसा मोरनी एक ऐतिहासिक गांव है। वह हरियाणा का टूरिस्ट स्थल भी है। यदि वहां के बच्चों की यह हालत है तो आप पूर्वी उत्तरप्रदेश, बिहार और उड़ीसा के गांवों के बच्चों के हालात का सहज अनुमान लगा सकते हैं।

ऑनलाइन शिक्षा की सफलता में भाषा की समस्या भी है। अभी तक जितने सॉफ्टवेयर बने हैं, वे सभी अंग्रेजी में है। यह ठीक है कि यूनीकोड ने कंप्यूटर पर भाषायी लेखन को आसान बनाया है। मगर उन बच्चों से जिन्होंने आपात-सुविधा के रूप में दूर-शिक्षण को अपनाया है, जो अंग्रेजी के की’बोर्ड को देखकर भी टाइप करना नहीं जानते, यह उम्मीद करना कि वे हिंदी अथवा अपनी मातृभाषा को यूनीकोड में टाइप करना सीखकर, कक्षा में सक्रिय भागीदार बन पाएंगे—एक दुष्कर कल्पना है। न केवल विद्यार्थी, अपितु अधिकांश अध्यापकों के आगे भी यह समस्या है। इस कमी को पेशेवर प्रोग्रामरों द्वारा तैयार ‘पाठ’ के माध्यम से काफी हद तक दूर किया जा सकता है। लेकिन वह खर्चीला उद्यम है, जिसे खानापूर्ति के नाम पर ऑनलाइन कक्षाएं चला रहे स्कूल शायद ही स्वीकार करें।

ऑनलाइन कक्षाओं के लिए जो साफ्टवेयर और पोर्टल, खासतौर पर भारत में इस्तेमाल किए जा रहे हैं, वे स्वयं विकास की प्रारंभिक अवस्था में हैं। ऐसे में लिखित उत्तर की अपेक्षा वाले प्रश्नों का उत्तर दे पाना विद्यार्थी के लिए, खासतौर पर छठी-सातवीं तक के बच्चों के लिए असंभव होगा। इस कमी को नजरंदाज करने के लिए स्कूल वस्तुनिष्ठ प्रश्नमालाओं के विकल्प को आजमा रहे हैं। उनके उत्तर कंप्यूटर या मोबाइल पर महज क्लिक के जरिए दिए जाते हैं। इससे विद्यार्थी की तात्कालिक समस्या का समाधान हो सकता है, परंतु लिखने का अभ्यास, खुद को अभिव्यक्त करने की कला, जो शिक्षा का अनिवार्यता है, वह ढंग से विकसित नहीं हो पाएगी।    

क्या ऑनलाइन शिक्षा स्कूली शिक्षा का विकल्प बन सकती है

क्या ऑनलाइन शिक्षा स्कूली शिक्षा का विकल्प बन सकती है? ऑनलाइन शिक्षा से समय अपना समय घर पर, अपने परिजनों के बीच अपेक्षाकृत आत्मीय माहौल में बिताने का अवसर मिलेगा। आने-जाने की थकान, रास्ते के प्रदूषण से उसका बचाव होगा। बावजूद इसके घर-बैठे ऑनलाइन शिक्षा, विशेषकर वर्तमान परिस्थितियों में, स्कूली शिक्षा का सार्थक विकल्प बन सकेगी—इसमें संदेह है। बालक जब स्कूल जाता था तो घर से निकलने के बाद उसका वास्ता तरह-तरह के लोगों से पड़ता था। अपने साथियों से मिलता-मिलाता था। अध्यापकों और स्कूल के बाकी स्टाफ से संपर्क में आता था। इससे स्कूली शिक्षा के साथ-साथ बालक के समाजीकरण का सिलसिला, जो पुस्तकीय शिक्षा से भी अधिक महत्वपूर्ण है—चलता रहता था। बालक को प्रबुद्ध नागरिक में ढालने के लिए उन अनुभवों की महत्ता से इन्कार नहीं किया जा सकता। ऑनलाइन क्लासिस के दौरान बालक का जीवन केवल परिवार के दायरे में सिमटकर रह गया है। एक बात और….सहपाठियों के साथ पढ़ते हुए बालक के मन में अनायास एक स्पर्धा जन्म ले लेती थी। उसमें थोड़ी-बहुत नकारात्मकता से इन्कार नहीं किया जा सकता। मगर उसका बड़ा हिस्सा सकारात्मक ही होता था। वह बालक को और अधिक परिश्रम करने, आगे बढ़ने की प्रेरणा देती थी। सहपाठियों के बीच रहकर बालक के बीच स्वतः मूल्यांकन की प्रक्रिया सतत चलती रहती थी। दूर-शिक्षण ने इन अवसरों को उनसे छीन लिया है।

बंद कमरे में दूर-शिक्षण के लिए कंप्यूटर स्क्रीन पर नजर गढ़ाए बैठा बालक पाठ सामग्री के रूप में केवल सूचनाएं समेट सकता है। सूचनाओं को ज्ञान में बदलने के लिए जो आपसी संवाद, परिचर्चाएं और अनुभव चाहिए, वे ऑनलाइन शिक्षा द्वारा संभव नहीं हैं। दूसरे शब्दों में ऑनलाइन शिक्षा ने सूचनाओं को ज्ञान में परिवर्तित करने, उसे अनुभवों के रूप में दोहराने का अवसर बच्चों से छीन लिया गया है। यदि महामारी के कारण, आधे-अधूरे संसाधनों पर टिकी वर्तमान दूर-शिक्षण प्रणाली लंबे समय तक अपनायी जाती है तो उससे बालक को शिक्षा के क्षेत्र में जो हानि होगी, उसकी अभी हम केवल कल्पना ही कर सकते हैं।

इन कमियों के बावजूद मानना पड़ेगा कि भविष्य आनलाइन शिक्षा के साथ है। जैसे-जैसे इंटरनेट और संचार प्रौद्योगिकी का विस्तार होगा, ऑनलाइन शिक्षा के क्षेत्र में आ रही मुश्किलें भी कम होती जाएंगीं। पहले चरण में कक्षाओं का डिजिटलीकरण होगा। वह दिन दूर नहीं जब आने वाले दशकों में ब्लैक बोर्ड बिलकुल गायब हो जाएंगे। उनकी जगह टेलीविजन स्क्रीन सेट ले लेंगे। अध्यापकों का काम स्कूलों में पढ़ाने के बजाए, पाठ्यसामग्री तैयार करने तथा उसे प्रयोगशाला से, इंटरनेट के माध्यम से छात्रों तक पहुंचाना भर रह जाएगा। राष्टीय शिक्षा नीति—2020 में सरकार ने, पाठ-सामग्री के निर्माण हेतु ‘स्वयं’, ‘दीक्षा’, ‘स्वयंप्रभा’ नाम से डिजिटलीकृत प्रयोगशालाएं बनाने पर जोर दिया है। ऑनलाइन परीक्षा के लिए भी ‘परख’ नाम से पोर्टल बनाने का सुझाव है। यदि इस दिशा में प्रभावशाली ढंग से आगे बढ़ा गया तो संभव है आने वाले चंद दशकों में ही औपचारिक कक्षाओं की जगह, वर्चुअल कक्षाएं छा जाएं और बड़े-बड़े स्कूल उसी तरह बेमानी लगने लगें जैसे आज सिनेमाघर दिखते हैं। तब हम ‘अपना देश, अपनी भाषा, सबको समान शिक्षा’ के लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ सकेंगे; और विद्यार्थियों को उनकी पसंद की शिक्षा उंनकी सुविधा अनुकूल समय पर उपलब्ध हो सकेगी।

ओमप्रकाश कश्यप

 संदर्भ : 

  1. Clark, R. E. (1994). Media will never influence learning. Educational, Technology Research and Development,  Page 5.
  2. Kozma, R. B. (1994). Will media influence learning? Reframing the debate. Educational Technology Research & Development,42(2), 7-19. Retrieved February 15, 2006, fromhttp://mmtserver.mmt.duq.edu/mm416-01/gedit704/articles/kozmaArticle.html
  3. इंडियन एक्सप्रेस, 27 जुलाई 2020,https://indianexpress.com/article/cities/chandigarh/haryana-struggling-to-study-at-remote-morni-village-students-travel-miles-to-access-a-smartphone-6524856/  

ईश्वर और धर्म से मुक्ति : पेरियार और धर्म 

विशेष रुप से प्रदर्शित

धर्म और राज्य में व्यावहारिक रूप में चाहे जितना अंतर नजर आता हो, उनकी उत्पत्ति का कारण समान है। वह कारण है—व्यक्ति का अहंबोध। यह मान लेना कि वही श्रेष्ठतम है….दूसरों को उसका आदेश मानना ही चाहिए। इन दोनों की अवधारणा उस क्षण जन्मी थी, जिस क्षण किसी व्यक्ति के मन में श्रेष्ठतम होने का एहसास जन्मा था।( यहाँ  धर्म और अध्यात्म को एक-दूसरे से अलग ही रखें तो अच्छा। अध्यात्म का संबंध मनुष्य की आंतरिक और बाह्य: जगत को लेकर उपजी जिज्ञासा और कौतूहल से है। उसमें नवीनता और वैभिन्न्य के लिए भरपूर गुंजाइश होती है। एक ही समूह के अलग-अलग व्यक्ति अपने स्वतंत्र अध्यात्मबोध के साथ जी सकते हैं। उनमें किसी एक का अध्यात्मबोध दूसरे के अध्यात्मबोध की राह में बाधक नहीं बनता। धर्म के साथ ऐसा नहीं है।) धर्म वर्चस्व की भावना एवं स्पर्धा को जन्म देता है। चूंकि राज्य और धर्म की उत्पत्ति का क्षण एक; तथा प्रवृत्ति लगभग समान है, इसलिए उनका इतिहास भी एक-दूसरे से मेल खाता है। अपने-अपने विस्तार के लिए दोनों ने खूब खून-खराबा किया है। चूंकि दोनों के स्वार्थ एक-दूसरे से जुड़े हैं, इसलिए जरूरत पड़ने पर राज्य यह कहकर कि उसने जो किया, धर्म के लिए किया….तथा धर्म यह दावा करते हुए कि उसने जो किया, वही देवेच्छा थी, इसी में सबका कल्याण है—दोनों एक-दूसरे का सुरक्षा-कवच बनते आए हैं। इस कोशिश में दोनों न केवल एक दूसरे की कमजोरियों पर पर्दा डालते हैं, अपितु मनमानी करने का अवसर भी देते हैं।  

समाज और संस्थाओं का स्तरीकरण धर्म की प्रवृत्ति है। वह खुद भी एक बहुस्तरीकृत संस्था है। अपने स्थायित्व के लिए वह पूरी सृष्टि को ‘देवता’ और ‘देवता नहीं हैं’ में बांट देता है। फिर ‘देवता नहीं हैं’ का एक छोटा-सा हिस्सा खुद को उससे अलग कर लेता है। वह स्वयं को ‘देवता’ का विशेषज्ञ और उसका जानकार होने का दावा करने लगता है। अपनी जानकारी के दावे के समर्थन में वह ‘देवता’ को लेकर कुछ चमत्कारयुक्त मिथ गढ़ लेता है। उन मिथों के सहारे ‘देवता’ से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष संबंध स्थापित कर, बचे हुए ‘देवता नहीं हैं’ वर्ग के आगे श्रेष्ठतर होने का दावा पेश कर देता है। चूंकि चमत्कार और मिथों से जुड़ी कहानियां सभी को लुभाती हैं, इसलिए आरंभ में केवल मनोरंजन और कौतूहल की वांछा से, ‘देवता नहीं है’ समूह के बाकी लोग उन्हें सहज भाव से अपना लेते हैं। धीरे-धीरे जब वे मिथ और चमत्कार, प्रतीकों, कलाओं, लिखित सामग्री, श्रुति आदि के रूप में अगली पीढ़ी तक, उत्तराधिकार के रूप में पहुँचते हैं, तो आगंतुक पीढ़ी उनके प्रति ठीक वैसी ही निरपेक्ष नहीं रह जाती, जैसी उससे पिछली पीढ़ी थी। नई पीढ़ी उन्हें पिछली पीढ़ी के ‘पवित्र’ अवदान के रूप में सहेजकर रखती है। उसके बाद तो हर नई पीढ़ी के साथ ‘पवित्रताबोध’ का अनुपात बढ़ता ही जाता है। किसी सामान्य घटना, विचार अथवा वस्तु के ‘धर्म’ अथवा ‘टोटम’ बनने के पीछे यही प्रवृत्ति काम करती है। इस बात को शासकवर्ग भी भली-भांति जानता था। वह धर्म की शक्ति का उपयोग अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए करता है। इसलिए यह अन्यथा नहीं है कि भारत में धर्मसत्ता के मजबूत होने का जो समय है, वही समय राजसत्ता के मजबूत होने का भी है। पहली बार गौतम बुद्ध ने दुनिया को संगठित धर्म की ताकत का अहसास कराया था। अशोक ने उसका उपयोग कलिंग युद्ध के बाद बिगड़ चुकी अपनी छवि के सुधार के लिए किया। इससे लोगों को पहली बार धर्म की सांगठनिक क्षमता के बारे पता चला। उसके बाद तो हर राजा अपने मंसूबे साधने के लिए धर्म की मदद लेने लगा। ईसा मसीह और मोहम्मद साहब दोनों को अपने क्रांतिधर्मा विचारों के कारण समाज में विरोध का सामना करना पड़ा था। लेकिन कुछ अरसे बाद जब जनता में उनके विचारों का प्रभाव बढ़ा और लोग उनके प्रति सम्मोहित नजर आने लगी तो राजाओं और राजसत्ता का सपना देखने वाले लोगों ने भी जनता को अपने प्रभाव में लेने के लिए उनके विचारों का इस्तेमाल करना आरंभ कर दिया। धर्म और राजनीति के गठजोड़ ने ही साम्राज्यवाद को संभव बनाया है। यही कारण है कि समानता और स्वतंत्रता को मनुष्य का मौलिक अधिकार मानने वाले, लगभग सभी आधुनिक विचारकों ने धर्म और उसके सहारे पलने वाले सांस्कृतिक वर्चस्व की आलोचना की है।

मिखाइल बकुनिन ने कहा था कि धर्म का खास गुण, ईश्वर के महिमामंडन द्वारा मनुष्यता का अनादर करना है। हिंदू धर्म की स्थिति थोड़ी अलग है। हिंदुओं में ब्राह्मण खुद को ईश्वर और धर्म का व्याख्याकार बताकर खुद को बाकी लोगों से अलग कर लेता है। बकौल ‘मनुस्मृति’ वह पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि बनकर रहता है। इसलिए हिंदू धर्म में मनुष्यता का अनादर मुख्यतः गैर-ब्राह्मणों तक, जो कुल आबादी का 90 प्रतिशत हैं, सीमित होकर रह जाता है। इसलिए धर्म और ईश्वर के प्रति चुनौती को ब्राह्मण, अपने अस्तित्व को चुनौती मान लेते हैं। ‘ईश्वर और राज्य’ में बकुनिन ने लिखा है कि ईश्वर, ‘मानवीय गरिमा तथा उसकी स्वतंत्रता के प्रति निश्चित रूप से सर्वाधिक ईर्ष्यालु, सर्वाधिक अहंकारी, सर्वाधिक क्रूर, सर्वाधिक अन्यायी, सर्वाधिक जालिम, सर्वाधिक निरंकुश और सबसे ज्यादा शत्रुतापूर्ण था।’ उसके बनिस्पत शैतान या राक्षस बकुनिन के शब्दों में—‘शाश्वत विद्रोही, प्रथम मुक्त चिंतक तथा मनुष्यता का मुक्तिदाता है। वह पहला प्राणी है जो मनुष्यता की समस्त बंधनों से मुक्ति का सपना देखता है।’ बकुनिन ने यह मुख्यतः बाईबिल के बारे में लिखा है। लेकिन हर धर्म के ‘ईश्वर’ की यही स्थिति है। हर ‘ईश्वर’ अपने पक्ष को अंतिम और सर्वोपरि मानता है। संवाद का अवसर दिए बिना, वह चाहता है कि लोग केवल उसका आदेश मानें। उल्लंघन करने पर दंड के लिए तैयार रहें। मनमानी करना सत्ता का लक्षण है। इसलिए दुनिया में जितने भी ‘ईश्वर’ हैं, वे सत्ता के समर्थन से ही ‘ईश्वर’ बने हैं। सत्ता ने उन्हें गढ़ा ही इसलिए कि ईश्वर के नाम पर वह अपनी मनमानियों को वैध बना सके। एक बार ‘ईश्वर’ स्थापित हो जाए तो सर्वसत्तावादियों का खेल आसान हो जाता है। अपने स्वार्थ को ईश्वरेच्छा बताकर वे अपनी इच्छाओं को अपने अनुयायियों पर थोपने लगते हैं। अनुयायी उनपर तथा उनके गढ़े हुए ईश्वर पर भरोसा करें, इसलिए उसके नाम पर चमत्कारों भरे आख्यान गढ़ लिए जाते हैं। जनता उन्हें धर्म, परंपरा और संस्कृति के नाम पर सहेजती जाती है। लोक-स्मृति से उन्हें मिटाना असंभव नहीं तो कठिन बहुत होता है। इसके लिए लंबा और सतत बुद्धिवादी संघर्ष अपेक्षित होता है।

2

जनता के बीच धर्म का सीधा अर्थ आध्यात्मिक शक्ति पर विश्वास से है। लोगों को यही बताया भी जाता है वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार इसका अर्थ उन आध्यात्मिक एवं सांसारिक गतिविधियों से भी है, जिन्हें कोई व्यक्ति जाति-विशेष से संबद्ध होने के नाते करता है; अथवा वर्ण-विधान के आधार पर उससे ऐसा करने की अपेक्षा की जाती है। धर्म पर टिके इस जाति-विधान में ब्राह्मण का दर्जा सर्वोपरि है। वही धर्म का मुख्य कर्ता-धर्ता है। इस कारण उसके कुछ विशेषाधिकार भी हैं। जाति चूंकि मानवीय विवेक, चयन के नैसर्गिक अधिकार का निषेध करती है, इसलिए जब से बनी है, तभी से उसकी आलोचना होती आई है। लेकिन कुछ लोगों के लिए वह पवित्र विधान है। अत: जब भी उसपर संकट आता है, या बड़ी चुनौती खड़ी होती है, धर्म उसका सुरक्षा-कवच बन जाता है। धर्म ऐसा क्यों करता है? जाति तो उसकी अनिवार्यता नहीं है। हिंदू धर्म को छोड़ और किसी धर्म में समाज के जातीय विभाजन की अवधारणा नहीं है। हिंदू धर्म में इसलिए है क्योंकि इसका मुख्य कर्ता-धर्ता ब्राह्मण जातिक्रम में भी शिखर पर हैं। शीर्षस्थ शक्ति होने के कारण इस व्यवस्था में वह हमेशा लाभ की स्थिति में रहता है। जब भी जाति को चुनौती मिलती है, वह धर्म और संस्कृति के अपसंस्करण का मुद्दा खड़ा कर देता है। उन्हीं की आड़ में वह जाति को बचा ले जाता है। चुनौतियों के बीच यदि कुछ समजौते करने पड़ें तो करता है, लेकिन अपनी सामाजिक प्रस्थिति और विशेषाधिकारों पर कोई आंच नहीं आने देता। 

जाति-व्यवस्था और उसके सर्वाधिक विकृत रूप छूआछूत को चुनौती देने के लिए धर्म को आलोचना की जद में लाना आवश्यक था। ऐसा किसी न किसी रूप में जाति और धर्म की उत्पत्ति के समय से ही होता आया है। बीसवीं शताब्दी में यदि किसी ने जाति, धर्म और धार्मिक आडंबरवाद,  यहाँ  तक कि धर्म की शीर्षतम परिकल्पना ईश्वर को भी खुली चुनौती दी, तथा अपने स्वार्थ के लिए उनका प्रचार-प्रसार करने वाले पुरोहित वर्ग ब्राह्मणवाद के विरोध में खुलकर संघर्ष किया तो वे थे—ई. वी. रामासामी पेरियार। यद्यपि ज्योतिबा फुले और डॉ. आंबेडकर ने भी हिंदू धर्म में व्याप्त रूढि़यों और आडंबरों के लिए ब्राह्मणवाद को जिम्मेदार माना था। फुले तो उसके जन्मदाता ही थे। फुले ने ‘तृत्तीय रतन’, ‘किसान का कोड़ा’ और ‘गुलामगिरी’ जैसी पुस्तकों में ब्राह्मण पुरोहितों द्वारा जनसाधारण के शोषण के बारे में बताया है।  ‘गुलामगिरी’ हिंदू धर्म और संस्कृति का विखंडनात्मक पाठ है। डॉ. आंबेडकर ने ‘हिंदू धर्म की पहेलियां’, ‘जाति का उच्छेद’ जैसी पुस्तकें लिखकर हिंदूधर्म की विकृतियों की बारीकी से पड़ताल की थी। पेरियार ने जनसंवाद का रास्ता अपनाया। ब्राह्मणवाद की कटु आलोचना की; और द्रविड़ संस्कृति को उसके समानांतर लाकर, आमने-सामने की लड़ाई बना दिया था। धर्म और जाति के मामले में वे सीधे उच्छेदवादी थे। देखा जाए तो डॉ. आंबेडकर और पेरियार के बीच यही मामूली अंतर भी है। आंबेडकर जाति को लेकर पूरी तरह उच्छेदवादी हैं। जबकि धर्म के प्रति उनका दृष्टिकोण सुधारवादी था। आरंभ में उन्हें उम्मीद थी कि हिंदू धर्म अपने भीतर सुधार करेगा। ‘जाति का उच्छेद’ पुस्तक लिखकर उन्होंने हिंदू समाज के उस नासूर को सामने लाने का काम किया था, जिससे छुटकारा पाए बगैर हिंदू धर्म का स्वस्थ, मानवीय धर्म बन पाना असंभव था। हिंदू धर्म के नेता, धर्माचार्य उस विकृति का उपचार करेंगे, इसकी वे 20 वर्ष तक प्रतीक्षा करते रहे। इस बीच दूसरे धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन भी करते रहे। अंत में हिंदू धर्म और धर्माचार्यों की ओर से जन्मी निराशा ने उन्हें बौद्ध धर्म की ओर प्रवृत्त कर दिया।  

1920 से 1927 तक पेरियार भी जाति-व्यवस्था और छूआछूत के कारण हिंदू धर्म पर हमलावर रहते हैं। वे जातीय असमानता और धर्म दोनों की आलोचना करते हैं, परंतु धर्म-सत्ता पर पूरी तरह हमलावर नहीं होते। बदलाव उनकी विदेश यात्रा के बाद आता है। यूरोप और सोवियत संघ की प्रगति देखकर वे अचंभित होते हैं। समानता, सहयोग और सहअस्तित्व के आधार पर बनीं वहाँ की नई सामाजिक संरचना उन्हें लुभाती है। वहाँ से ठेठ बुद्धिवादी बनकर लौटते हैं। यात्रा से पहले केवल हिंदू धर्म उनके निशाने पर था। इसलिए कि वह जातिवाद और छूआछूत को प्रश्रय देता; और उन्हें दैवीय बताता था। धीरे-धीरे समूची धर्मसत्ता उनकी आलोचना की जद में आ जाती है। एक नए पेरियार का जन्म होता है, जो बुद्धिवाद का समर्थक है। तर्क और ज्ञान-विज्ञान को महत्व देता है। समाजवादी राज्य का सपना देखता है। मिजाज से नास्तिक है। धर्मसत्ता पर बगैर हिचके प्रहार करता है। 

इस दृष्टि से उनकी तुलना मिखाइल बकुनिन से की जा सकती है। मार्क्स का विचार था कि ‘शक्तिशाली वर्ग राज्य की मदद से शासन करता है’। ‘राज्य और ईश्वर’ में बकुनिन ने लिखा है कि ‘राज्य शक्तिशाली वर्ग की मदद से राज करता है।’ राज्य कुछ और नहीं, शक्तिशाली वर्ग की इच्छा की परिणति होता है। वह इस तरह छाया रहता है कि शक्तिशाली वर्ग की इच्छा ही राज्य की इच्छा मान ली जाती है। जनसाधारण राजनीति और पूँजीवाद के गठजोड़ को न समझ पाए, इसके लिए वह धर्म की मदद लेता है। इसलिए मार्क्स ने धर्म को अफीम की संज्ञा दी थी। बकुनिन धर्म के अभिजन चरित्र को उजागर करता है। कहता है कि राज्य और धर्म का अपवित्र गठबंधन कमजोरों और गरीबों की स्वतंत्रता की सबसे बड़ी बाधा है, अपने स्वार्थ के लिए दोनों उसे विपन्न बनाए रखते हैं। पेरियार मिजाज से अराजकतावादी थे। फिर भी राज्य के प्रति उतने सख्त नहीं थे। कारण यह है कि जिस वर्ग की लड़ाई वे लड़ रहे थे, उसके अधिकारों पर धार्मिक-सांस्कृतिक शक्तियों ने डाका डाला हुआ था। उनके विरुद्ध संघर्ष में राज्य कभी-कभी मददगार की भूमिका निभाने लगता था। उनकी असल लड़ाई ब्राह्मणों तथा उनके धर्म से थी। राज्य के प्रति आलोचक थे तो इसलिए थे कि अपने स्वार्थ के लिए वह पुरोहितवाद को संरक्षण देने लगता है। उनका कहना था कि शूद्रों को ‘वेश्या की संतान’ बनाए रखने के राज्य और ब्राह्मण दोनों मिलकर काम करते हैं। 

अज्ञात का डर समाज में धर्म के लिए जगह बनाता है। इसलिए शूद्रातिशूद्र धर्म की ओर आकर्षित होते हैं। बिना यह जाने कि वे सब व्यवस्थाएं ब्राह्मणों ने अपने वर्गीय हितों को सुरक्षित रखने के लिए बनाई हैं। यह शूद्रातिशूद्रों की अज्ञानता ही है कि उन्होंने अपनी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा मंदिरों में प्रवेश के लिए खपाया है। पेरियार के इस विषय में क्या विचार थे, इसे वायक्कम आंदोलन से समझ सकते हैं। नारायण गुरु ने वायक्कम मंदिर में प्रवेश के अधिकार के लिए शूद्रों के आंदोलन का नेतृत्व किया था। उन दिनों शूद्रों को चुनींदा मार्गों पर ही चलने का अधिकार था। वायक्कम मंदिर के आसपास से गुजरती सड़कों पर भी उन्हें चलने का अधिकार नहीं था। वायक्कम सत्याग्रह की शुरुआत के बाद एक समय ऐसा आया जब पेरियार को उसमें सहभागी बनने के लिए आमंत्रित किया गया। उनके लिए मंदिर प्रवेश कोई मुद्दा नहीं था। वे सत्याग्रह में शामिल हुए। जीत भी मिली, परंतु उनकी प्राथमिकता, अस्पृश्यों की सार्वजनिक मार्गों पर चलने की आजादी को लेकर थी। 25-26 दिसंबर, 1958 को पेरियार ने अपने एक भाषण में उस घटना को याद किया था—

”महारानी(त्रावणकोर) निचली जाति के शूद्रों और अछूतों के लिए सभी मार्ग खोल देने को तैयार थीं। लेकिन, उन्होंने अपने डर के बारे में बताया। उन्हें लगता था कि मैं अछूतों के मंदिर प्रवेश के अधिकार की खातिर आंदोलन को उसके बाद भी जारी रख सकता हूं। गाँधी यात्री-भवन में पहुँचे, जहां मैं ठहरा हुआ था। उन्होंने मेरी राय जाननी चाही। मैंने कहा, ‘क्या अछूतों को सार्वजनिक मार्गों पर चलने का अधिकार प्राप्त होना बड़ी उपलब्धि नहीं है! यूं भी, क्या मंदिर प्रवेश कांग्रेस के आदर्शों में से एक नहीं है। जहां तक मेरी बात है, यह मेरे प्रमुख सरोकारों में से एक है। लेकिन, आप महारानी को खबर कर सकते हैं कि फिलहाल मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर आंदोलन खड़ा करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। मैं आगे क्या करूंगा, इसे तय करने से पहले माहौल शांत होने दीजिए।”18 

पेरियार नास्तिक कैसे बने? क्यों बने? नास्तिक बनने की प्रेरणा उन्हें कहां से मिली? इसकी खोज करते हुए जी. अलोसियस औपनिवेशिक शासन के दौरान प्रशासनिक बदलावों की शुरुआत तक चले जाते हैं।19 उन्हीं के कारण गैर-ब्राह्मणों को शिक्षा के अवसर मिले। औद्योगिकीकरण से वैकल्पिक रोजगार के अवसर बढ़े। इन दोनों ने जाति-प्रथा को कमजोर करने का काम किया। पहले हिंदुओं के प्रमुख ग्रंथ संस्कृत में थे। उसे पढ़ने-लिखने का अधिकार भी केवल ब्राह्मणों तक सीमित था। इसलिए धर्म की व्याख्या के लिए ब्राह्मणेत्तर जातियां ब्राह्मणों पर निर्भर थीं। जैसा वे कहते वैसा मानना ही पड़ता था। बदले परिवेश में वे सभी ग्रंथ अँग्रेजी और दूसरी यूरोपीय भाषाओं में उपलब्ध होने लगे। धर्म-ग्रंथों को पढ़ने-लिखने से लेकर उनकी आलोचना तक का अधिकार समाज के सभी वर्गों को प्राप्त हो गया। पूर्व-स्थापित मान्यताओं का विश्लेषण कर, उनके नए अर्थ निकाले जाने लगे। इस बीच धार्मिक अंतरण के नए रास्ते खुले। धर्मों के बीच स्पर्धा बढ़ने से उनके काम में लगी शक्तियों को सुरक्षात्मक मुद्रा में आना पड़ा। इससे मनुष्य का आत्मविश्वास बढ़ा और वह मुक्ति के नए आयाम खोजने लगा।

3

आधुनिक भारत में नास्तिकता को वापस लाने का श्रेय दक्षिण भारत को जाता है। 1878 में वहाँ ‘मद्रास सेकुलर सोसाइटी’ का गठन हुआ था। उसके सदस्य संख्या में कम, मगर सक्रियता के मामले में बहुत आगे थे। अगले दस वर्षों तक वे धर्मसत्ता और उसके विभिन्न अपररूपों पर लगातार प्रहार करते रहे। ‘असुर’, ‘राक्षस’ आदि जिन्हें हिंदू संस्कृति का खलपात्र माना गया है, की उन्होंने पुनर्व्याख्या की। आर्य-श्रेष्ठता के मिथ को चुनौती दी। धर्म के आलोचना पक्ष को मजबूत करने के लिए ‘दि थिंकर’ नाम का अखबार निकाला, जो नास्तिक विचारों का प्रचार करता था। उसके फलस्वरूप धर्म वैसी पवित्र गाय नहीं रह गया था, जैसा वह पहले था। धार्मिक सुधारों की मांग बढ़ रही थी। पेरियार के समय तक हिंदू धर्म के सुधारवादी और यथास्थितिवादी आमने-सामने आ चुके थे। एक वर्ग आधुनिक विचारों के तत्वावधान में उसका नवोन्मेषण चाहता था। दूसरे को उसकी स्वयं-घोषित महानता पर पूरा विश्वास था। इसलिए वह किसी भी प्रकार के बदलाव का विरोधी था। 

हिंदू धर्म की बढ़ती आलोचना और ब्राह्मणों के यथास्थितिवादी दृष्टिकोण ने असंतुष्टों को करीब एक हजार वर्ष पहले लुप्त हो चुके बौद्ध धर्म की खोज के लिए प्रेरित किया। उसकी शिक्षाओं को अपेक्षाकृत आधुनिक और लोकतांत्रिक मूल्यों के करीब माना गया। प्राचीन ‘संघम साहित्य’ एवं बौद्ध धर्म के अंतःसंबंधों की खोज से स्वतंत्र द्राविड़ अस्मिता की अवधारणा को बल मिला। इस क्षेत्र में पहल करने वाले थे—आयोथि थास। उन्हें दक्षिण भारतीय समाज में नवजागरण का अग्रदूत माना जाता है। दक्षिण भारत में प्रचलित जातिप्रथा तथा उसके प्रति लोगों के दुराग्रह पर टिप्पणी करते हुए, आयोथि थास ने कहा था कि द्रविडि़यन आर्यों की जाति-प्रथा को मानते हैं। इस तरह मानते हैं मानो वह उन्हीं का आविष्कार हो। जाति-प्रथा के चलते कृषि, उद्योग, व्यापार, शिक्षा आदि का विकास नहीं हो सकता। क्योंकि ब्राह्मण का उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन होता है। क्षत्रिय शासन करता है और व्यापारियों का काम लेन-देन तक सीमित होता है। केवल शूद्र वर्ग ऐसा है जो खेती और उत्पादन दोनों की जिम्मेदारी संभालता है। लेकिन उसे ज्ञानार्जन का अधिकार नहीं होता। उसके अभाव में वह परंपरागत तरीके से ही काम चलाता है। प्राचीन सभ्यताओं में यह निभ सकता था। क्योंकि उस समय मनुष्य की सीमित आवश्यकताओं की पूर्ति स्थानीय उत्पादक आसानी से कर सकते थे। परंतु वर्तमान में जब मनुष्य की जरूरतें बढ़ती जा रही हैं, परंपरागत ढंग की प्रणालियों से काम चलना आसान नहीं है। इसलिए शोषणकारी जातिप्रथा का उन्मूलन जितनी जल्दी संभव हो, हो जाना चाहिए।‘ थॉस ने अशिक्षित और गरीब जनता को लूटने वाले राजनेताओं को फटकार लगाई थीा उनका कहना था कि वे लोग जनता का हितैषी बनकर उसे लूटने का काम करते हैं। ब्राह्मण कहते हैं कि शूद्रों को वेदादि ग्रंथ पढ़ने का अधिकार नहीं है। इस तरह की भेदभावपूर्ण नीतियों को बनाने वाला ईश्वर हो ही नहीं सकता। वह कुटिल ब्राह्मण अथवा कोई निरंकुश ताकत हो सकता है. ऐसे ईश्वर के प्रति आस्था का प्रदर्शन करने से अच्छा है कि किसी महापुरुष की अभ्यर्थना कर ली  जाए।

आगे बढ़ने से पहले एक बात और। भारत में धार्मिक-सामाजिक सुधारवाद की शुरुआत का श्रेय बंगाल को देने की परंपरा रही है। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि राजाराममोहन राय, ईश्वरचंद विद्यासागर, केशवचंद सेन, देवेंद्रनाथ ठाकुर आदि भारत के आरंभिक सुधारवादियों का संबंध बंगाल से था। उनकी विशेषता, जिसे उनकी कमजोरी भी कहा जा सकता है, थी कि वे हिंदू धर्म की परिसीमा में रहते हुए, धार्मिक-सामाजिक सुधारों को अंजाम देना चाहते थे। धार्मिक-सामाजिक सुधारवाद की समानांतर लहर दक्षिण से भी चली थी, जो अपेक्षाकृत निर्णायक और अधिक परिवर्तनकामी थी। दक्षिण में जन्मे संत अय्यंकालि, आयोथि थास आदि ने वहाँ धार्मिक-सामाजिक सुधारवादी आंदोलनों का नेतृत्व किया था। उनमें और बंगाल के सुधारवादियों में मूल-भूत अंतर यह था कि बंगाल के सुधारवादी हिंदू धर्म के प्रति अधिक आशान्वित थे। मानते थे कि सुधारों के माध्यम से हिंदू धर्म को अधिक मानवीय बनाया जा सकता है। वहीं दक्षिण के सुधारवादी हिंदू धर्म को सुधार का अवसर देना चाहते थे। लेकिन यदि हिंदू धर्म अपेक्षित सुधारों के लिए तैयार नहीं होता है तो उन्हें उसे छोड़ देने से भी गुरेज नहीं था। एक और बड़ा अंतर जिसका संबंध पहले से ही है, वह यह है कि बंगाल और उत्तर भारत के सुधारवादियों का विश्वास था कि यदि हिंदू धर्म में ऊपर के वर्गों में सुधार होता है, तो सुधार की वह प्रक्रिया, प्रकारांतर में निचले वर्गों में भी अंतरित होगी। इसलिए धार्मिक सुधारवाद की पहल उन्होंने समाज के शीर्षस्थ वर्गों के साथ आरंभ की थी। जबकि संत अय्यंकालि, पेरियार जैसे दक्षिण भारतीयों ने अपना कार्यक्रम निचले वर्गों के बीच से शुरू किया था। ठीक ऐसे ही जैसे ज्योतिबा फुले ने महाराष्ट्र में किया था। वे निचले वर्गों को मजबूत करके, ऊपर के वर्गों को चुनौती देना चाहते थे कि धर्म, समाज और देश-हित में उन्हें आवश्यक सुधारों को स्वीकार लेना चाहिए। इसके बीजतत्व दक्षिण भारतीय साहित्य और संस्कृति में पहले से ही मौजूद थे। तमिल में तीसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व के संघम साहित्य से लेकर, संत तिरुवेलुवर तक साहित्य और संस्कृति की प्राचीनतम परंपरा थी, जो आर्य-संस्कृति की श्रेष्ठता के मिथ को नकारती थी। पेरियार के आत्मसम्मान आंदोलन की पृष्ठभूमि में वही विचारधारा थी। पांचवी शताब्दी का जैन काव्य ‘नीलकेसी’ तथा उसकी प्रतिक्रिया में रचा गया, बौद्ध काव्य ‘कुंडालकेसी’ वहाँ बौद्ध एवं जैन धर्म की न केवल उपस्थिति दर्शाता है। बल्कि जिस तरह ‘नीलकेसी’ की प्रतिक्रिया में बौद्ध आचार्य ‘कुडांलकेसी’ की रचना करते हैं, उससे लगता है कि उस समय भारतीय धर्म-दर्शन की ये दोनों शाखाएं दक्षिण में काफी जीवंत रूप में विद्यमान थीं। उनके बीच बहस होती रहती थी। इनके साथ-साथ मक्खलि गोशाल का ‘आजीवक’ संप्रदाय भी हर्षवर्धन के काल तक अपनी उपस्थिति बनाए हुए था। 

नास्तिकता, पेरियार के बचपन के अनुभवों का उपहार थी। उनके पिता की दुकान पर हिंदू साधु-संत आते थे। अधिकांश का मकसद होता था, दान-दक्षिणा के नाम पर कुछ न कुछ ऐंठ लेना। पेरियार ने इसे करीब से देखा था। ब्राह्मणों का लालच देखकर कभी-कभी वे उनका उपहास भी करने लगते थे। इसके अलावा, किशोरावस्था से ही पेरियार को जिन्होंने प्रभावित किया, उनमें से एक थे मुरुथैया पिल्लई। मरुथैया इरोड के ही रहने वाले थे। वे तमिल के प्रखर विद्वान, ओजस्वी वक्ता, जाति, परंपरावाद, धार्मिक आडंबरों और धर्म के कटु आलोचक थे। ब्राह्मण उनके सामने पड़ने से कतराते थे। पेरियार को आलोचना दृष्टि को समृद्ध करने वालों में दूसरा नाम था—कैवल्य सामियार का। मुरुथैया पिल्लई की भांति कैवल्य सामियार भी तर्कवादी और ब्राह्मणवाद के कट्टर आलोचकों में से थे। इन दोनों के जीवन के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। पेरियार के जीवनीकार और आत्मसम्मान आंदोलन के नेता चिदंबरानार के अनुसार, इन दोनों की पेरियार के चरित्र-निर्माण में बड़ी भूमिका थी। 

काशी यात्रा के दौरान उनका परिचय हिंदू धर्म की विकृतियों से हुआ था। 1933 में विदेश यात्रा के बाद तो उनका विश्वास धर्म नामक संस्था से बिलकुल उठ चुका था। मास्को पहुँचने पर उन्होंने ‘एंटी रिलीजियस प्रापेगेंडा ऑफिस में अपना पंजीकरण भी कराया था। उनका मानना था कि वर्गहीन समाज की रचना हेतु धर्म से मुक्ति आवश्यक है। सोवियत संघ की प्रगति, वहाँ की सामाजिक रचना से वे इतने प्रभावित थे कि वहाँ से लौटते ही उन्होंने आत्मसम्मान आंदोलन की वैचारिकी और संगठन में भारी फेरबदल करने का निर्णय किया था। बावजूद इसके सोवियत संघ की तरह सत्ता का सघन केंद्रीकरण, उसकी समस्त कार्यकारी शक्तियों का एक जगह जमा हो जाना—उन्हें स्वीकार न था। भारत के लिए वे उदार साम्यवाद की कल्पना करते थे। उनका मानना था कि ब्राह्मणों की धार्मिक-सामाजिक अधिसत्ता के रहते, भारत में सोवियत मॉडल को लागू कर पाना संभव नहीं है। 7 जून, 1931 के ‘कुदीआरसु’ में उन्होंने लिखा था कि गैर-ब्राह्मणों और अछूतों, गरीब और कामगार लोगों को यदि वे समानता और समाजवाद लाना चाहते हैं, तो सबसे पहले हिंदुत्व को खत्म करना होगा। सोवियत संघ से वे श्रीलंका के रास्ते भारत लौटे थे। वहाँ कोलंबों में दिए गए भाषण में उन्होंने एक बार फिर मनुष्यता, आत्मसम्मान और देश के लिए ईश्वर तथा धर्म का बहिष्कार करने का आग्रह किया था।20

4

विदेश यात्रा से लौटने के बाद ‘कुदीआरसु’ में समाजवाद और नास्तिकता विषयक लेखों की संख्या बढ़ी थी। भगतसिंह के लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ का तमिल अनुवाद, ‘नान नाथिकन येन’ शीर्षक से पी. जीवानंदम् ने किया था। पी. जीवानंदम् ‘मद्रास प्रांत नास्तिक संगठन’ के सचिव, विचारों से साम्यवादी और पेरियार के सहयोगी थे। ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ का प्रथम पुस्तिकाकार प्रकाशन पेरियार द्वारा स्थापित ‘पहुथारिवु पब्लिशिंग हाउस लिमिटेड’ ने 1934 में किया था। तमिल शब्द ‘पहुथारिवु’ का अर्थ ‘तर्कशील’ है। पुस्तक में पेरियार द्वारा 29 मार्च 1931 को ‘कुदीआरसु’ में भगतसिंह की शहादत पर लिखित संपादकीय को भी शामिल किया गया था। भूमिका में प्रकाशक की ओर से लिखा गया था कि वे भगतसिंह की राजनीतिक विचारधारा से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। पुस्तिका का मूल उद्देश्य आम जनता, विशेषकर नास्तिकों तथा कांग्रेसजनों को भगतसिंह के ईश्वर-संबंधी विचारों से परचाना है। 46 पृष्ठों की पुस्तिका के पहले 40 पृष्ठों पर मूल लेख छपा था। बाद के 6 पृष्ठों में ‘कुदीआरसु’ के संपादकीय को जगह मिली थी। संपादकीय में पेरियार ने भगतसिंह तथा उनके साथियों के साहस और बलिदान की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। उसमें भगतसिंह द्वारा पंजाब के गवर्नर को लिखे गए पत्र के एक अंश को भी उद्धृत किया गया—

‘हमारी लड़ाई निश्चित रूप से उस समय तक चलती रहेगी, जब तक कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता में नहीं आ जाती और लोगों के स्तर में जो अंतर है, वह समाप्त नहीं हो जाता। यह युद्ध हमें मार देने से समाप्त नहीं होगा। प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप यह संघर्ष हमेशा जारी रहेगा।’

संपादकीय में गाँधी के साथ-साथ लार्ड इरविन की भी आलोचना थी। विचित्र बात यह है कि भगतसिंह द्वारा मूल अँग्रेजी में लिखे गए उस लेख में औपनिवेशिक सरकार को कुछ भी ‘निषिद्ध’ या ‘आपत्तिजनक’ नहीं लगा था। हालाँकि धर्माचायों की आंखों की किरकिरी वह आरंभ से ही था। पेरियार द्वारा तमिल अनुवाद के साथ पंजाब के गवर्नर को लिखे पत्र का संदर्भ जोड़ देने से वह औपनिवेशिक शासकों की दृष्टि में भी ‘अपराध’ बन चुका था। इसलिए पुस्तिका के छपते ही उसका संज्ञान लिया गया। अगस्त 1934 में ‘आपराधिक जांच विभाग’ की स्थानीय शाखा ने उसके बारे में सरकार को लिखा। बिना समय गंवाए सीआईडी ने पुस्तिका की प्रतियां सरकार को भिजवा दीं। मद्रास सरकार के मुख्य सचिव जी.टी.एच. ब्राकेन ने मद्रास सरकार के कार्यालय में कार्यरत तमिल अनुवादक एन. सरवण मुदलियार, से पूरी पुस्तिका का अनुवाद करने को कहा। मुदलियार ने आपत्तिजनक अंशों को हाईलाइट करते हुए, 16 अक्टूबर 1934 को अनुवाद की प्रति ब्राकेन को भेज दी गई। ब्राकेन ने 22 अक्टूबर, 1934 को भारतीय प्रेस(आपातकालीन शक्तियां) अधिनियम—1931 के अनुच्छेद 19(1) के अंतर्गत पुस्तिका और उससे जुड़ी सामग्री को जब्त करने के आदेश जारी कर दिए। आदेश में पुस्तिका की सामग्री को अधिनियम की धारा 4(1) के अंतर्गत आपत्तिजनक माना गया था। नोटिफिकेशन जारी होते ही, पुस्तिका की प्रतियां जब्त कर ली गईं। तब तक भगतसिंह के विचारों की चिंगारी वडवानल बन चुकी थी। पुस्तिका से प्रेरणा लेकर तरह-तरह के पंपलेट, पुस्तिकाएं, चित्र, कार्टून वगैरह भारी मात्रा में प्रकाशित हो चुके थे। न केवल तमिल, अपितु क्षेत्रीय भाषाओं मलयालम, तेलुगू, कन्नड़ आदि में भी भगतसिंह और उनके साथियों के समर्थन में विपुल सामग्री का प्रकाशन हुआ था। नतीजा यह हुआ कि सरकार द्वारा पुस्तक तथा संबंधित सामग्री, की जब्ती की कार्रवाही, 1938 तक चलती रही। कह सकते हैं कि दक्षिण तक भगत सिंह के विचारों को ले जाने तथा उन्हें लोकप्रिय बनाने में पेरियार की बड़ी भूमिका थी। यह कहना भी अन्यथा न होगा कि जिस परिवेश और परिस्थिति में पेरियार ने वह काम किया, वैसा करने का साहस भी उन दिनों किसी में नहीं था। 

भगतसिंह की पुस्तक के अलावा बर्ट्रेंड रसेल की ‘व्हाई आम एम नाट ए क्रिश्चन’, लेनिन की जीवनी, राबर्ट इंगरसोल की समाजवाद विषयक पुस्तकों के तमिल अनुवाद भी पेरियार के प्रकाशन द्वारा छापे गए थे। उनका मानना था कि ईश्वर, धर्म और उनसे जुड़े अनगिनत कर्मकांड प्रगतिशील समाज के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा हैं। लेकिन समाज में सभी के लिए नास्तिक बन पाना आसान नहीं है। खासकर तब जब कुछ अपवादस्वरूप लोगों को छोड़, लगभग सभी धर्मविहीन जीवन को असंभव मानते हों। इसलिए उन लोगों के लिए पेरियार ने, महज रणनीति के तौर, यह सोचकर कि दबाव में आने पर हिंदू धर्म संभवतः अपने पुनरावलोकन के लिए तैयार हो—उन्होंने इस्लाम और बौद्ध धर्म का समर्थन किया था। हालाँकि व्यक्तिगत जीवन में वे पूरी तरह नास्तिक थे। 1969 में उन्होंने कहा था—

‘मैं मनुष्यता का सुधारक हूं। मैं किसी देश, ईश्वर, धर्म, भाषा अथवा राज्य की परवाह नहीं करता। मेरे सरोकार केवल और केवल मानव समाज की उन्नत्ति और विकास तक सीमित हैं।’

तमिल नाडु में कम्युनिस्ट आंदोलन की नींव रखने का श्रेय सिंगरावेलु चेट्टियार, जिन्हें लोग सम्मान के साथ ‘सिंगरावेलु’ कहते थे—को जाता है। उन्होंने ही मद्रास में 1 मई 1923 को ‘लेबर किसान पार्टी ऑफ़ हिंदुस्तान’ की स्थापना की थी। उसी दिन भारत में ‘मई दिवस’ को उत्सव की तरह मनाने की शुरुआत हुई थी। सिंगरावेलु, पेरियार से बीस वर्ष बड़े थे। दोनों के प्रगाढ़ संबंध थे। धर्म और जाति के प्रति दोनों के विचारों में एकरूपता थी। सिंगरावेलु का कहना था, ‘प्रत्येक धर्म समाज के शिखर पर बैठे लोगों का समर्थन करता है। वह ‘सर्वसंपन्न’ एवं ‘सर्वविपन्न’ के भेद को स्थायी भाव देता है, असमानता को नियतिसिद्ध कहकर मनुष्य को जन्म के आधार पर छोटा-बड़ा मान लेता है। सभी भाई हैं, सभी का एक ईश्वर है, यदि हम अपने आसपास की दुनिया को देखें तो ये बातें एकदम मिथ्या और प्रपंच सिद्ध होती हैं, मगर समाज में इन्हीं पर घमासान छिड़ा रहता है।’

5

सिंगरावेलु के संपर्क में आने के बाद पेरियार ने अपने साथियों को ‘कामरेड’ कहना आरंभ किया था। बावजूद इसके पेरियार का मार्क्सवाद, खासकर उसकी वर्ग-संघर्ष की वैचारिकी में ज्यादा विश्वास नहीं था। वे सिंगरावेलु के बुद्धिवादी सोच से प्रभावित थे। उनके आग्रह पर ही सिंगरावेलु ने ‘कुदीआरसु’ के लिए कई विज्ञान-केंद्रित लेख लिखे थे। ‘इरोड कार्यक्रम’ का ड्राफ्ट भी सिंगरावेलु ने ही तैयार किया था। उस समय सिंगरावेलु ने आत्मसम्मान आंदोलन के नाम को लेकर एक सवाल उठाया था। उनका कहना था कि इसे ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ कहना उचित होगा; अथवा ‘अवमानना आंदोलन’?21 इस प्रश्न के पीछे सिंगरावेलु के भीतर छिपा वर्ग-संघर्ष का योद्धा बोल रहा था। ‘अवमानना आंदोलन’ का आशय था, सामाजिक असमानता के लिए लिए जिम्मेदार ‘बुर्जुआ’ सोच वाली शक्तियों का तिरस्कार। उन्हें सीधी चुनौती, तथा उनकी सार्वजानिक भर्त्सना। पेरियार को सीधे टकराव से किसी प्रकार का संकोच नहीं था। भविष्य में ऐसे कई अवसर आए जब पेरियार तथा उनके विरोधी आमने-सामने थे; और पेरियार ने ‘न दैन्यम न पलायनम’ की भावना के साथ उनका सामना किया था। बावजूद इसके वे ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ का नाम बदलने को तैयार नहीं थे। सिंगारवेलार ने भले ही मजाक में नाम बदलने का सुझाव दिया हो, परंतु नाम न बदलकर पेरियार ने एक तरह से अच्छा ही किया था। क्योंकि आगे चलकर वे समाज को ‘ब्राह्मण बनाम गैर-ब्राह्मण’ और ‘आर्य बनाम द्रविड़’ में बांटने में सफल रहे थे। 

पेरियार का विश्वास साम्यवाद से ज्यादा समाजवाद में था। इसका एक कारण यह भी है कि नवगठित कम्युनिस्ट पार्टी में भी प्रमुख पदों पर ब्राह्मण छाने लगे थे। वर्ग-संघर्ष उनके लिए महज नारा था। एक तरह से कृत्रिम लड़ाई। जिन यूरोपीय देशों में जहां साम्यवाद को कामयाबी मिली थी, वहाँ मशीनीकरण काफी तरक्की कर चुका था। भारत में मशीनीकरण आरंभिक दौर में था। कहने को तो वर्ग-क्रांति के समय सोवियत संघ भी भारत की तरह औद्योगिक प्रगति में पिछड़ा हुआ था। परंतु वहाँ लेनिन और ट्रोट्स्की ने वर्ग-संघर्ष की वैचारिकी का स्थानीयकरण करते हुए, संयुक्त खेती का विचार रखा था। उसके फलस्वरूप वहाँ वोल्शैविक क्रांति की जमीन तैयार हुई। भारत में अधिकांश कृषि भूमि पर समाज की ऊंची जातियों का कब्जा था, उन्हीं से निकले नेता कम्युनिस्ट पार्टी तथा उसके सहायक संगठनों को कब्जाए हुए थे। सामूहिक खेती के विचार से उनके अपने हितों को नुकसान पहुँच सकता था। इसलिए उनकी राजनीति मजूदर आंदोलनों और हड़तालों से आगे न बढ़ सकी। दूसरे शब्दों में भारतीय कम्युनिस्ट संगठन ऐसे वर्ग के भरोसे वर्ग-संघर्ष का सपना देखते रहे, जो वास्तव में था ही नहीं। शताब्दियों पहले जो काम तुलसी, सूरदास, मीरा जैसे भक्त कवियों ने रैदास, कबीर, दादूदयाल आदि संत कवियों द्वारा शुरू की गई सामाजिक क्रांति को तेजहीन करके किया था, वही धत्त-कर्म भारत के साम्यवादी दलों ने कम्युनिस्ट विचारधारा के साथ किया था। 

6

दुनिया भर में प्रचलित धर्मों में पेरियार यदि किसी धर्म के प्रति नर्म नजर आते हैं तो वह है, बौद्ध धर्म। हिंदू धर्म के अलावा उन्होंने यदि किसी धर्म पर लगातार चर्चा की है, तो वह बौद्ध धर्म की। हिंदू धर्म के प्रति उनकी दृष्टि आलोचनात्मक है, वहीं बौद्ध धर्म के प्रति हम उन्हें सहानुभूतिपरक पाते हैं। दोनों के बीच वे बौद्ध धर्म श्रेष्ठतर मानते थे। हिंदू धर्म में बढ़ती धर्मांतरण की घटनाओं के लिए ब्राह्मण ईसाई मिशनरियों को जिम्मेदार मानते थे। पेरियार का विचार था कि हिंदू धर्म ने ही भारत में ईसाई धर्म और इस्लाम की राह आसान की है—

‘जो दुष्टता वे(ब्राह्मण) गैर-ब्राह्मणों के साथ बरतते हैं, वह उस दुष्टता से कम है जो वे मुस्लिमों और ईसाइयों के साथ बरतते हैं। मगर अछूतों के साथ वे जिस निर्दयता के साथ पेश आते हैं, वह किसी भी अन्य अत्याचार से बढ़कर है। अपरोक्ष रूप में हिंदू धर्म ने ही इस्लाम और ईसाई धर्म के फलने-फूलने के लिए रास्ता तैयार किया है। हिंदू धर्म बाकी दोनों धर्मों के लिए लाभकारी सिद्ध हुआ है। अतएव हिंदू धर्म को नष्ट करना, गैर-ब्राह्मणों और अछूतों की सबसे बड़ी प्राथमिकता है।’22 

गौरतलब है कि दक्षिण भारत में हिंदू धर्म से इस्लाम और ईसाई धर्म की ओर अंतरण की प्रक्रिया बहुत पहले आरंभ हो चुकी थी। उनीसवीं शताब्दी में ईसाई मिशनरियों को भारत में प्रवेश की अनुमति मिलने के बाद उसमें और भी तेजी आई थी। ब्राह्मणों का मानना था कि ईसाई मिशनरियां निचली जातियों को तरह-तरह के प्रलोभन देकर उन्हें धर्मांतरण के लिए उकसाती हैं। मुगलों के शासनकाल में जहां बलपूर्वक कुछ लोग मुस्लिम बनाए गए, वहीं स्वेच्छा से इस्लाम में शामिल होने वालों की संख्या भी काफी थी। पेरियार के लिए धर्मातंरण का मुद्दा आस्था से ज्यादा सामाजिक महत्व का था। उनका मानना था कि हिंदू धर्म की आंतरिक संरचना, उसमें गैर-ब्राह्मणों एवं अछूतों की निम्नतम स्थिति उन्हें धर्मांतरण के लिए विवश करती है—

‘हमारे देश के एक करोड़ ईसाई कौन हैं? हमारे राष्ट्र में 7 करोड़ मुस्लिम कौन हैं? ब्राह्मणों एवं धार्मिक नेताओं के अत्याचारों के कारण वे धर्मांतरण के लिए बाध्य हुए थे। वे हमारे ही भाई हैं। वे यरोशलम या अरब से नहीं आए हैं।

हम 24 करोड़ लोग खुद को सम्मानित कैसे मान सकते हैं? मुस्लिम हमें ‘काफिर’ कहते हैं। ईसाई हमें ‘धार्मिक रूप से भटके हुए लोग’ बताते हैं। अँग्रेज हमें ‘कुली’ कहते हैं। ब्रिटेन हमें ‘असभ्य’ बताता है; और ब्राह्मण हमें ‘शूद्र’ कहते हैं। हम इन संबोधनों से अपमानित महसूस नहीं करते। धर्म के नाम पर चुनींदा सार्वजनिक मार्गों पर चलने से हमें आज भी रोका जाता है। वेदों में केवल चार जातियां हैं, लेकिन अब  यहाँ  4000 से अधिक जातियां हैं। ये जातियां भी अपनी पहचान बनाए रखने के लिए जूझती रहती हैं।’23 

पेरियार ने हिंदू धर्मग्रंथों की खुली आलोचना की थी। इतने तीखे स्वरों में कि विरोधी तिलमिला उठते थे। उनके निष्कर्ष तर्क केंद्रित होते थे। तार्किक विश्लेषण करते समय प्रायः वे निर्मम भी हो जाते थे। ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की पत्रिकाओं विदुथलाई, कुदीआरसु और रिवोल्ट में हिंदू धर्म की आलोचना से जुड़े सैंकड़ों आलेख प्रकाशित हुए थे। लेखकों में पेरियार के अलावा एस. गुरुसामी और रामानाथन शामिल थे। प्रकाशित लेखों में कुछ की शैली विवेचनात्मक है तो कुछ की व्यंग्य प्रधान। कल्पना कर सकते हैं कि जिन दिनों ‘हिंदू महासभा’ जैसे संगठन हिंदू धर्म के पुनरुद्धार में जुटे थे। जिनका सपना स्वतंत्र भारत को ‘हिंदू राज्य’ के रूप में देखना था, उन्हीं दिनों पेरियार अपने सहयोगियों के साथ हिंदू देवी-देवताओं तथा उनसे जुड़े मिथों की निरंतर पड़ताल में लगे थे। यदि हिंदू कट्टरपंथी, पेरियार की तीखी, तेज-तर्रार भाषा को सहने के लिए विवश थे तो इसलिए कि लगभग पूरा का पूरा गैर-ब्राह्मण समाज पेरियार के समर्थन में था। उनका मानना था कि मनुस्मृति, गीता, रामायण, महाभारत, पुराणादि ग्रंथ ब्राह्मणवाद को थोपने के लिए रचे हैं। उनमें वर्णित आख्यान विशुद्ध काल्पनिक हैं। उन्होंने लोकप्रिय हिंदू देवताओं, ब्रह्मा, विष्णु, महेश की त्रयी के अलावा इंद्र, कार्तिकेय, गणेश, राम और कृष्ण के चरित्र की बिना किसी झिझक या भय के आलोचना की थी। हमें ध्यान रखना चाहिए कि जिस समय गाँधी गीता और रामायण को भारत की राष्ट्रीय एकता का आधारग्रंथ घोषित कर रहे थे, राम को आदर्श पुरुष बताते हुए रामराज्य का सपना पूरे देश को दिखा रहे थे, उन्हीं दिनों पेरियार उनकी अन्वीक्षा में लगे थे। उपलब्ध रामकथाओं का विश्लेषण करते हुए उन्होंने ‘रामायण’ का पुनर्पाठ किया था, जो आगे चलकर ‘सच्ची  रामायण’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ विवाद का कारण बना। रावण को वे द्रविण संस्कृति के आदि संरक्षक के रूप में देखते थे। रामायण के बारे में उनका विचार था—

‘रामायण एक षड्यंत्रकारी कथा है, उसे केवल ब्राह्मणों ने वर्णाश्रम धर्म की रक्षा हेतु रचा था। उसके माध्यम से वे अपनी वैचारिकी को स्थापित करना चाहते हैं, कहते हैं कि विष्णु ने राम के रूप में अवतार लिया था।’

सीता को रावण की कैद से छुड़ाने के बाद राम राजगद्दी पर थे। तभी एक किशोर ब्राह्मण बालक मर गया। उसका पिता राम के पास जाकर बोला—‘तुम और तुम्हारे लोग धर्म के विरुद्ध काम कर रहे हैं, इसलिए आज मेरा बेटा मृत्यु को प्राप्त हुआ। एक ब्राह्मण को सौ वर्ष तक जीना चाहिए। ब्राह्मण पुत्र के अकाल मौत मरने का मतलब है कि उस देश का राजा शास्त्र-विरुद्ध काम कर रहा है।’24 ‘रामायण का अंत कैसे होता है? यह बताते हुए कि शूद्र ऋषि शंबूक की प्रार्थना करने पर ब्राह्मण पुत्र की मृत्यु हुई थी। राम द्वारा शंबूक की हत्या करते ही ब्राह्मण का मृत पुत्र जीवित हो उठता है। इससे वे लोगों को क्या समझाना चाहते हैं? यह कि शूद्र को ईश्वर की सीधे पूजा नहीं करनी चाहिए। वह केवल ब्राह्मण के माध्यम से पूजा कर सकता है।’25 वर्णाश्रम व्यवस्था में मनुष्य के लिए सौ वर्ष की आयु निर्धारित की गई। लेकिन, वाल्मीकि या तुलसी यह नहीं बताते कि उस समय गैर-ब्राह्मणों की औसत आयु और सामाजिक स्थिति क्या थी। गौरतलब है कि धर्म और जाति के आधार पर समाज का विभाजन प्रकारांतर में आर्थिक विभाजन को भी न्योता देता है। जनसाधारण का उस ओर ध्यान न जाए, इसलिए कर्म-सिद्धांत गढ़ा गया है। धर्म किस प्रकार आर्थिक विषमता को जायज बनाता है। इस बारे में पेरियार का विचार था—

‘इन दिनों भिक्षा मांगने वाला ब्राह्मण भी दिन में दो बार कॉफ़ी पी लेता है, परंतु एक किसान जो कड़ी धूप में दिन-भर श्रम करता है, उसे नमक मिले मांड से काम चलाना पड़ता है। जबकि मंदिर या होटल में काम करने वाला ब्राह्मण अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देकर कलेक्टर, जज, मंत्री, प्रधानमंत्री तक बना सकता है। दूसरी ओर मेहनतकश लोगों को निचले पदों से संतोष करना पड़ता है।’26 

अपने लेखों में पेरियार बार-बार धर्म और जाति की बात उठाते हैं। हर बार मांग करते हैं, कि जाति को आमूल नष्ट होना चाहिए। इसलिए कि जाति की मदद से समाज के बड़े हिस्से को मूलभूत सुख-सुविधाओं तथा जीवन के मामूली अधिकारों से भी वंचित किया गया है। 

7

सवाल है कि ब्राह्मणवाद को मजबूत करने में धर्म की भूमिका बड़ी है या जाति की। पेरियार का निष्कर्ष है, जाति की। ब्राह्मण जाति और धर्म दोनों के शिखर पर मौजूद है। अकेले धर्म की मदद से वह समाज के शिखर पर नहीं रह सकता। जाति ब्राह्मण के अधिकारों का संरक्षण करती है। वह न हो तो किसी भी जाति-वर्ग का व्यक्ति धार्मिक कर्मकांडों का संचालन कर सकता है। जैसा विदेशों में है। वहाँ मोची का बेटा चर्च में पादरी या बड़ा धर्म-पुरुष बन सकता है। हिंदू धर्म में ये पद केवल ब्राह्मणों के लिए आरक्षित हैं। इसलिए जाति की सुरक्षा के लिए ब्राह्मण कोई भी धत्तकर्म करने को तैयार रहता है। गौतम बुद्ध, महर्षि दयानंद, स्वामी विवेकानंद से लेकर गाँधी तक, जिन्होंने भी जाति-संबंधी नियमों को शिथिल करने की कोशिश की थी, सभी को अपने प्राणों से हाथ धोने पड़े थे। गाँधी की ह्त्या भी एक ब्राह्मण ने की थी। पेरियार के अनुसार गाँधी स्वयं जातिवाद के समर्थक थे—

‘‘महात्माओं में सबसे बड़े महात्मा(गाँधी) कहते हैं, दुनिया सदगुण-संपन्न है। क्या उन्होंने कभी यह मांग की कि जाति का उच्छेद होना चाहिए? उन्होंने बस इतना कहा है कि छूआछूत नहीं रहनी चाहिए। क्या उन्होंने एक शब्द भी इस बारे में कहा है कि जाति का नाश होना चाहिए? उन्होंने बस यही कहा है, ‘मैंने हिंदू धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष किया है। मैं वर्णाश्रम धर्म समर्थित समाज से हूं। मेरा प्रथम उद्देश्य रामराज्य की स्थापना करना है।’ बावजूद इसके गाँधी को छूआछूत उन्मूलन के कार्यक्रमों की कीमत अपने प्राण देकर चुकानी पड़ी थी।(इसका आशय है कि लोग गाँधी जितना उदार बनने या उनसे कुछ सीखने को भी तैयार नहीं हैं)। वर्णाश्रम व्यवस्था कहती है कि शूद्रों को पढ़ने का अधिकार नहीं है। परंतु गाँधी अपने समय के दबावों के चलते यह मानने को विवश थे कि शूद्रों को भी पढ़ने का अधिकार है। आखिर क्या हुआ?—‘उन्हें तीन गोलियों का शिकार बनना पड़ा….उन्हें एक ब्राह्मण द्वारा गोली मारी गई थी। गाँधी ने कहा था कि हिंदू धर्म और इस्लाम एक ही हैं(अल्लाह, ईश्वर सब एक ही परमशक्ति के नाम हैं), इसलिए उनकी हत्या कर दी गई।”27  

साफ है कि ब्राह्मण के लिए धर्म से ज्यादा जाति प्रिय है। यदि कुल जनसंख्या के मात्र 3 प्रतिशत ब्राह्मण अपने स्वार्थ के लिए संगठित होकर, धर्म और जाति का इस्तेमाल करते हैं, तो बाकी लोगों का भी दायित्व बनता है कि स्वयं को अमानवीय जातीय विषमता से बचाने के लिए उसका इस्तेमाल अपने संगठन को मजबूत करने के लिए करें । इसके लिए जरूरी है—

‘द्रविड़ जनता उन मंदिरों में न जाए, केवल ब्राह्मण पुरोहित पूजा कराते हैं। खासतौर पर उन मंदिरों का बहिष्कार करे, जहां यह नियम है कि केवल ब्राह्मण ही पुरोहित बनकर पूजा-पाठ करा सकते हैं। यदि वे ऐसे मंदिरों में जाते भी हैं तो उन्हें चाहिए कि ब्राह्मणों द्वारा संपन्न कराई जाने वाले पूजा-पाठ अथवा दूसरे कर्मकांडों में हिस्सा न लें।’28 

पेरियार बहुत पढ़े-लिखे भले न हों, मगर सत्ता और धर्म के गठजोड़ को भली-भांति समझते थे। जानते थे कि धर्म को चुनौती देने के लिए उन मिथों को संद्धिग्ध बनाना होगा, जिनके माध्यम से कोई धर्म जनमानस में पैठ बनाता है। इसलिए बिना कोई नर्मी दिखाए उन्होंने हिंदू धर्मशात्रों तथा उनके द्वारा स्थापित मिथों की आलोचना की थी। जैसे गाय और हनुमान का मिथ। शंकराचार्य का वेदांत दर्शन ईश्वास्योपनिषद के इस कथन पर विश्वास करता है—’सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शांत उपासीत’—यानी जो दृष्टिगोचर है, वह ब्रह्म है। लेकिन व्यवहार में तो मनुष्यों की भांति पशुओं के बीच भी रंग और प्रजाति के आधार पर भेदभाव किया जाता है। पेरियार इस तरह के अंधविश्वासों पर मुखर थे—

‘प्रत्येक संस्कृति में अंधविश्वास नकारात्मक सोच की तरह पैठा है। वह मानव-मस्तिष्क में वैज्ञानिक सोच और तर्कशीलता को ग्रस लेता है। सांपों के प्रति डर उन्हें पूजनीय बनाता है। यह सरासर अंधविश्वास है कि सांप को पूजने के बाद वह मनुष्य को नुकसान नहीं पहुँचाएगा। विद्वानों के अनुसार आधुनिक भारत में अंधविश्वास इतना शक्तिशाली है कि  यहाँ  बंदरों की पूजा भी हनुमान के रूप में की जाती है। जिसकी छोटी-छोटी मूर्तियां देश-भर में जगह-जगह लगी हैं। उनके अलावा राजमार्गों पर विशालकाय मूर्तियां भी नजर आती हैं। इसकी न तो कोई वैज्ञानिक तुक है, न ही कारण। हमारे देश में 21वीं शताब्दी का सबसे बड़ा अंधविश्वास है, बंदर की पूजा। हनुमान की 60 फुट ऊंची प्रतिमा की पूजा तमिल नाडु में होती है। इस मूर्खता पर कोई सवाल क्यों नहीं उठाता!

उसके अलावा गाय है, जिसे हिंदू पवित्र मानते हैं और जिसे सभी हिंदुओं की मां कहा जाता है….कुल मिलाकर, पवित्रता और अपवित्रता की अवधारणाएं महज धार्मिक टोटम हैं।’29 

गाय को लेकर एक जगह वे लिखते हैं, ‘शंकराचार्य कहते हैं, गौहत्या पाप है। वे सभी जानवरों की प्राण-रक्षा की मांग नहीं करते, केवल गाय की करते हैं।30 

पेरियार का मानना था कि विशेषाधिकार प्राप्त अभिजन ब्राह्मण, भारत में वर्गहीन, समानता पर आधारित समाज की स्थापना की सबसे बड़ी बाधा हैं। उन्होंने गैर-ब्राह्मणों, दलितों और स्त्रियों की अवमानना, उनके लिए निराशाजनक स्थितियों का निर्माण करने, आजादी की राह में मुश्किल खड़ी करने के लिए ब्राह्मणों को जिम्मेदार माना था। स्त्री-समानता पर उनके विचार अपने समकालीन नेताओं की अपेक्षा कहीं ज्यादा आधुनिक थे। वैदिक रीति से विवाह, जिसमें पंडित मंत्रोच्चार करता है, वर-वधु अग्नि की सप्तपदी लेते हैं, के वे घोर विरोधी थे। मानते थे कि स्त्री-पुरुष का विवाह स्वर्ग में बनी जोड़ियां नहीं हैं। वह दांपत्य सुख के लिए किया गया समझौता मात्र है, जिसमें लड़का और लड़की दोनों बराबर के सहभागी होते हैं। मातृत्व स्त्री का चयन होना चाहिए। कर्तव्य नहीं। यदि कोई स्त्री संतान नहीं चाहती, तो उसे संतानोत्पत्ति के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए। 

पेरियार ने ब्राह्मणों को विदेशी मूल के आर्यों का उत्तराधिकारी बताते हुए, द्रविड़ अस्मिता का मामला उठाया। मैक्समूलर से लेकर तिलक तक, सभी ने इस विषय पर खूब लिखा है। ‘गुलामगिरी’ और दूसरी कई पुस्तकों में फुले ने ब्राह्मणों को भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास में गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार ठहराया था। सो पेरियार का द्रविड़ अस्मितावादी आंदोलन जनता के दिल की आवाज बन गया। सांस्कृतिक वर्चस्व बनाए रखने में धर्म की भूमिका सर्वोपरि होती है। फुले ने इसे समझा था। उन्होंने धर्म और संस्कृति के आधार पर थोपे गए सांस्कृतिक प्रतीकों, मिथों की तार्किक स्तर पर पड़ताल की थी, जिसका समाज पर सकारात्मक असर पड़ा। उन्होंने धार्मिक और सांस्कृतिक शोषण को द्रविड़ अस्मिता से जोड़ा । समाज में नैतिकता और सदाचरण का पर्याय मान लिए गए धार्मिक प्रतीकों और मिथों की तार्किक व्याख्या की । रामायण की प्रतियों का दहन किया । लोगों से अपील की थी कि धर्म को धंधा बना देने वाले पंडे पुरोहितों के चक्कर में आने के बजाय स्वयं उनकी समीक्षा करें । तर्क-बुद्धि से काम लें ।     

उन दिनों देश में स्वाधीनता आंदोलन तेजी पर था। दक्षिण भी उससे अछूता न था। पेरियार के नेतृत्व में एक और समानांतर आंदोलन उभरने लगा, जिसका उद्देश्य सामाजिक-सांस्कृतिक आजादी प्राप्त करना था। इसी सिलसिले में पेरियार 1926 में बंगलुरू आए गाँधी से मिले। उन्होंने कहा कि वर्ण-व्यवस्था के उन्मूलन के बगैर छूआछूत पर काबू कर पाना मुश्किल है। गाँधी के सामने उन्होंने उस समय की तीन प्रमुख बुराइयों का उल्लेख करते हुए, उन्हें तत्काल मिटाने का आवश्यकता पर जोर दिया। पहला ब्राह्मणों के नियंत्रण वाली कांग्रेस पार्टी, दूसरा हिंदू धर्म और उसकी जाति पृथा तथा तीसरा समाज में ब्राह्मणों का वर्चस्व।

‘वायक्कम सत्याग्रह’ की सफलता के बाद पिछड़ों और अतिपिछड़ों का हौसला बढ़ा था। स्वयं पेरियार कांग्रेस से त्यागपत्र देने के बाद ब्राह्मणवाद विरोधी कार्यक्रमों में उतर चुके थे। ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ दक्षिण भारत में द्रविड़ अस्मिता की पहचान बनकर उभर रहा था। पेरियार छूआछूत विरोधी आंदोलन के प्रमुख नेतृत्वकर्ता थे। 10 फरवरी 1929 को छूआछूत उन्मूलन के मुद्दे पर बुलाई गई सभा में भाषण देते हुए उन्होंने कहा था—

‘वे कहते हैं कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है। ऊंच-नीच का भेद नहीं मानता। दूसरी ओर वे कहते हैं कि अछूतों पर हो रहे अत्याचारों के लिए एकमात्र ईश्वर जिम्मेदार है। यह कितने शर्म की बात है। यह भी कहा जाता है कि छूआछूत की रचना स्वयं ईश्वर ने की है। यदि यह सही है तो सर्वप्रथम हमें उस ईश्वर का बहिष्कार करना चाहिए। उसके बाद ही किसी और कार्यक्रम पर विचार किया जा सकता है। यदि ईश्वर छुआछूत के बारे में अनजान है तो भी जितना जल्दी हो सके, उसका बहिष्कार कर देना चाहिए। यदि ईश्वर इस अन्याय को मिटाने में असमर्थ है, यदि वह ब्राह्मण पुरोहितों पर नियंत्रण करने में नाकाम रहता है तो उसे दुनिया के किसी भी स्थान पर बसने का अधिकार नहीं है। ऐसे में जितनी जल्दी हो सके, उसे उखाड़ फेंकना ही न्यायसंगत होगा। 

यदि ऐसा कोई आधार है, जो यह बताता है कि ईश्वर या धर्म छूआछूत के लिए जिम्मेदार नहीं हैं, तो उसे भी जलाकर खाक कर देना चाहिए। बजाय यह जाने कि वह क्या है अथवा किसने कहा है?’31 

पेरियार का मानना था कि भारत में ऊंची जातियां समानता की राह की सबसे बड़ी बाधा हैं। वे धर्म का उपयोग अपनी वर्गीय श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए करती हैं। राज्य के अधिकांश निर्णायक पदों पर उन्हीं का वर्चस्व होता है। इसलिए राज्य भी उनके हितों का ज्यादा ख्याल रखता है। धार्मिक जड़ता का एक कारण धर्म का उत्तराधिकार के रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंपा जाना है। इससे एक तो ब्राह्मण की सर्वोच्चता का विचार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को अंतरित होता रहता है। दूसरे व्यक्ति बगैर धर्म की खूबियों और खामियों की पड़ताल के, उसे अपनाने को विवश होता है। उसे अपने जीवन में धर्म की समीक्षा करने का अवसर कभी मिल ही नहीं पाता। धर्माचार्य या पुरोहित भी नहीं चाहते कि लोग धर्म के चयन में अपने विवेक और तर्क-शक्ति का इस्तेमाल करें। उपलब्ध धर्मों के गुणों-अवगुणों का परस्पर निष्पक्ष और तुलनात्मक अध्ययन करने के बाद ही किसी एक धर्म को अपनाएं। ऐसे में धर्माचार्य हो अथवा धर्मानुयायी, सभी को धर्म के बाहरी प्रतीकों से अपना काम चलाना पड़ता है। कुल मिलाकर धर्म मनुष्य के विवेकीकरण में कोई मदद नहीं करता। इस कारण मानव-जीवन के लिए उसकी कोई उपयोगिता नहीं है। अछूतों, गैर-ब्राह्मणों और स्त्रियों का सामाजिक अवमूल्यन करने, उनकी मुक्ति की राह में अनावश्यक अड़चन पैदा करने के लिए पेरियार ने ब्राह्मणों तथा उनके धर्म की आलोचना की थी। पेरियार के अनुसार धर्म विवेकशील मनुष्य की उसके जीवन में कोई मदद नहीं करता। इसलिए वह अनावश्यक है।  फिर भी यदि कोई व्यक्ति खूब सोच-विचार के बाद किसी धर्म का स्वेच्छापूर्वक चयन करे—तब उन्हें कोई आपत्ति न थी। उनके अनुसार केवल भली-भांति सोचने के बाद स्वेच्छापूर्वक ढंग से अपनाया गया धर्म लोगों को मुक्त कर सकता है वही उनकी धार्मिक दासता को समाप्त कर सकता है। धर्म और मानवीय विवेक को परस्पर विरोधी बताते हुए पेरियार का कहना था कि केवल तर्क-सम्मत आधार पर, स्वेच्छापूर्वक अपनाया गया धर्म ही, जाति और धर्म की मदद से दास बनाए गए लोगों का आत्मसम्मान वापस दिला सकता है। 

रूढ़ियों के शिकार धर्म-दर्शन

विशेष रुप से प्रदर्शित

आधुनिकता की ओर बढ़ती आज की दुनिया के आगे सर्वाधिक ज्वलंत प्रश्न है—क्या दुनिया को धर्म की सचमुच जरूरत है? क्या उसके बिना दुनिया का कारोबार एकदम थम जाएगा? धर्म के आलोचक आज भी कम नहीं हैं। धर्मानुयायी मानते हैं कि उनके आलोचक धर्म के मर्म को समझ ही नहीं पाते। यह बात अलग है कि स्वयं धर्म के अनुयायी भी उसे पूरी तरह समझने का दावा नहीं करते। धर्म की आलोचना, अन्वीक्षा से वे प्रायः यह कहकर पीछे हट जाते हैं कि उसे  समझना आसान नहीं है। इसके पीछे उनकी मंशा धर्म के नाम पर गुरुडम को थोपने तथा उसे ‘नेति-नेति’ कहते हुए इतना महान बना देने की होती है कि सामान्य आलोचना-समीक्षा को भी समाज और राष्ट्रीय भावना के विरुद्ध मान लिया जाता है। असल में वे तयशुदा सीमाओं से, उन सीमाओं से जो उन्होंने धर्म से बंधकर अपने लिए सहर्ष चुनी हैं, अथवा किसी न किसी बहाने उनपर थोप दी गई हैं, बाहर आना ही नहीं चाहते। न ही वे चाहते हैं कि उनका कोई अनुयायी उस सीमा रेखा को लांघने की हिमाकत करे। हम धर्म को ऐसी हवेली मान सकते हैं, जिसके अनेकानेक दावेदार हैं। कदाचित इसी कारण वह हजारों वर्षों से बंद है। ताजी हवा का प्रवेश उसमें निषिद्ध है। उसके भीतर झांकने की इजाजत तक किसी को नहीं है। यदि कोई उस हवेली के भीतर जाकर झाड़-पौंछ करना चाहे तो उसके दावेदार नाराज हो जाते हैं। डरते हैं कि हवेली साफ हुई तो उनकी सत्ता गई। बाहरी हस्तक्षेप को रोकने के लिए वे कई बार इतनी कुटिल चालें चलते हैं कि बड़े-बड़े प्रतिभाशाली उनके आगे घुटने टेक देते हैं। जनसाधारण को बस इतनी अनुमति होती है कि अपने विवेक को गिरवी रखकर उस हवेली के दूर से ही दर्शन कर सके।

ऐसा आज से नहीं, सैकड़ों वर्षों से है। मध्यकाल में इसका सटीक उदाहरण मीमांसक कुमारिल भट्ट हैं। अपने समय के विलक्षण प्रतिभाशाली कुमारिल भट्ट ने बौद्ध विद्वानों को शास्त्रार्थ में परास्त करने के लिए बौद्ध दर्शन का अध्ययन किया था। वे अपने मकसद में कामयाब भी हुए। बौद्ध पराजित हुए। लेकिन कुमारिल भट्ट अपनों से हार गए। प्रायश्चित स्वरूप उन्हें धीमी आंच में तपकर मृत्यु का वरण करना पड़ा। केवल इसलिए कि उन्होंने गुरु की अनुमति लिए बिना बौद्धमत का अध्ययन किया था। हिंदू धर्म में व्याप्त जड़ता, गुरुडम तथा नए और समकालीन ज्ञान-विज्ञान से जान-बूझकर बनाई गई दूरी को समझने के लिए यहाँ उनकी विशेष चर्चा प्रासंगिक है।

शंकराचार्य से एक पीढ़ी, लगभग 650 ईस्वी पूर्व जन्मे कुमारिल भट्ट वैदिक परंपरा में विश्वास रखते थे। तिब्बतीय बौद्ध ग्रंथों के हवाले से यह भी बताया गया है कि कुमारिल भट्ट के पास धान का विशाल खेत था, जिसमें 500 पुरुष और इतनी ही स्त्रियां दास के रूप में काम करते थे। उन दिनों भारत में बौद्ध दर्शन का बोलबाला था। कुमारिल भट्ट मानते थे कि बिना बौद्ध धर्म-दर्शन के पराभव के वैदिक परंपरा का पुनर्जीवन असंभव है। वैदिक धर्म को पुनःस्थापित करने की प्रेरणा उन्हें एक राजकुमारी से मिली थी। राजकुमारी बौद्ध दर्शन से घबराई हुई थी। बौद्ध दर्शन सनातन वर्ण-व्यवस्था और वंशगत अधिकारों का विरोध करता था। द्विज वर्ग की परंपरागत श्रेष्ठता के विचार को अस्वीकार करते हुए वह निर्वाण(मोक्ष) को सर्वसाधारण के लिए संभव बताता था। समानता आधारित दर्शन के कारण बौद्ध दर्शन का प्रभाव, भारत के अलावा आसपास के देशों पर भी था। राजकुमारी को डर था कि बौद्ध धर्म के प्रभाव के चलते उसके वंशगत अधिकार उससे छिन सकते हैं। अद्वितीय प्रतिभा के धनी कुमारिल भट्ट उन दिनों वैदिक परंपरा के ग्रंथों के अध्ययन-अनुशीलन में लगे थे। गुरुजन उनकी मेधा से अत्यंत प्रभावित थे। वंशानुगत अधिकारों के छिन जाने की आशंका से बुरी तरह घबराई राजकुमारी कुमारिल भट्ट से मिलते ही रो पड़ी। उसने रोते-रोते ही अपनी व्यथा प्रकट की—

‘क्या करूं, कहां जाऊं, वेदों का उद्धार कौन करेगा?’

‘हे सुकुमारे! रो मत!! वेदों का उद्धार कुमारिल भट्ट करेगा।’1 

राजकुमारी के आंसुओं से विगलित युवा कुमारिल भट्ट के मुख से सहसा निकला। कहते हैं कि कुमारिल भट्ट ने उसी दिन से बौद्ध धर्म-दर्शन की प्रतिष्ठा को कम करना अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। उन दिनों बिना गुरु की अनुमति के किसी और धर्म-दर्शन की शिक्षा लेना अपराध माना जाता था। लक्ष्य-सिद्धि हेतु कुमारिल भट्ट ने पहले तो बौद्ध धर्म का गहरा अध्ययन किया। तदनंतर, राजकुमारी को दिए गए वचन का निर्वहन करते हुए उन्होंने बौद्ध धर्म-दर्शन की जमकर आलोचना की। यहां तक कि नालंदा जाकर उस समय के प्रसिद्ध बौद्ध आचार्यों को शास्त्रार्थ में पराजित भी किया। लेकिन अपने गुरु से छिपकर बौद्ध दर्शन की शिक्षा लेने की ग्लानि उन्हें लगातार सालती रही। इसलिए प्रायश्चित स्वरूप उन्होंने खुद को धीमी अग्नि शिखाओं के समर्पित कर दिया। बौद्ध धर्म-दर्शन के पराभव के लिए उन्होंने जो जमीन तैयार की, उसी पर चलते हुए वेदांती शंकराचार्य ने अपनी कीर्ति-कथा लिखी। इस योगदान हेतु वैदिक परंपरा के अनुयायी कुमारिल भट्ट को पहला बलिदानी ब्राह्मण मानते हैं।

कहते हैं कि वेदांत की ध्वजा फहराने के लिए निकले शंकराचार्य काशी-मार्ग में कुमारिल भट्ट से भी मिले थे। अपने मत को स्थापित करने के लिए वे उनसे शास्त्रार्थ करना चाहते थे। जिस समय शंकराचार्य कुमारिल के पास पहुंचे, वे स्वयं को धीमी अग्नि युक्त चिता को समर्पित कर चुके थे। उनकी टांगें और शरीर का निचला हिस्सा जल चुका था। उस अवस्था में वे शंकराचार्य से शास्त्रार्थ नहीं कर सकते थे। अतः उन्होंने अपने शिष्य मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ करने का सुझाव दिया। कुमारिल भट्ट को अग्नि-शैय्या पर झुलसता हुआ छोड़, शंकराचार्य वहां से चल दिए। धार्मिक दृष्टिकोण से वह भले ही कुमारिल भट्ट का प्रायश्चित रहा हो, लेकिन व्यापक अर्थों में क्या वह अवसाद-जनित आत्महत्या नहीं थी? यदि ऐसा है तो शंकराचार्य का कुमारिल भट्ट को अग्नि-चिता पर छोड़कर जाना क्या उचित था? क्या उनका यह कर्तव्य नहीं था कि वे कुमारिल भट्ट से आत्महत्या का इरादा त्याग देने का निवेदन करते? उन्हें उस आत्म-ग्लानि से बाहर लाने की कोशिश करते, जिसने आत्महत्या जैसा घृणित कदम उठाने को विवश किया था? सामान्य नैतिकता कहती है कि आत्महत्या को उद्यत व्यक्ति को, वह चाहे जिस कारण से प्राणांत चाहता हो, किसी भी प्रकार से रोका जाए। लेकिन जिस दौर की यह घटना है, उसमें धार्मिक आग्रह हठधर्मी की सीमा तक प्रभावी होते थे। धार्मिक वाद-विवाद प्रायः जीवन-मरण का सवाल बन जाता था। ऐसे में व्यक्ति के साथ उसके विचार का अंत भी स्वाभाविक था। शंकराचार्य से हारकर मींमासक मंडन मिश्र, वेदांती सुरेश्वराचार्य बनकर उसके प्रचार-प्रसार में लग जाते हैं। उसके बाद मीमांसा दर्शन बौद्धिक विमर्श और जीवन दोनों से गायब हो जाता है।

इस प्रसंग के कुछ खास संकेत हैं। पहला प्राचीन गुरु नहीं चाहते थे कि उनका शिष्य ज्ञान और यश में उनसे आगे जाए। दूसरे प्राचीन ऋषियों के लिए बौद्धिक शास्त्रार्थ शारीरिक कुश्ती से भी गया-गुजरा था। कुश्ती में हारा हुआ पहलवान नई तैयारी और हौसले के साथ उसी पहलवान को दुबारा चुनौती दे सकता है। लेकिन शास्त्रार्थ में विजेता, पराजित व्यक्ति के तन और मन दोनों पर अधिकार जमा लेता था। व्यक्ति के साथ उसकी विचारधारा भी पराजित मान ली जाती थी। केवल विजेता का धर्म रह जाता है। कुल मिलाकर विचार को भी अखाड़े में उतर कर प्रतिद्विंद्वी विचारधारा को चुनौती देनी पड़ती थी।

2

जैन और बौद्ध धर्म-दर्शन इसके अपवाद थे। यहाँ जैन दर्शन की तो हमें खास तौर पर प्रशंसा करनी होगी। वैदिक हिंसा और गलाकाट बौद्धिक स्पर्धा के बीच उसने ‘स्याद्वाद’ का सिद्धांत सामने रखा था। वह विभिन्न विचारों को स्वतंत्र रूप से, एक-दूसरे के समानांतर बहने की अनुमति देने का उदारतापूर्ण विधान था। इसके अनुसार कोई भी विचार अंतिम सत्य नहीं है। प्रत्येक विचार अपने भीतर सत्य का कोई न कोई अंश छिपाए रखता है। वह पूरा सत्य हो ही नहीं सकता। चार अंधे एक ही बार में हाथी के पूर्ण रूप का बयान नहीं कर सकते। इसलिए उनमें से प्रत्येक द्वारा दिया गया विवरण, सत्य होने के बावजूद सत्य नहीं है। वह पूर्ण सत्य की एकांगी अथवा आंशिक अनुभूति है। ‘स्याद्वाद’ का दर्शन, वैदिक दर्शन की वैचारिक हिंसा के विरोध में उपजा था। लेकिन राजाओं के साम्राज्यवादी मनसूबे साधने के लिए युद्ध आवश्यक थे; और बगैर हिंसा के युद्ध लड़ना संभव ही नहीं था। ऐसे समाज में वैचारिक अहिंसा का कोई व्यावहारिक महत्व न था। अतः कालांतर में हिंसा को उसके स्थूल रूप; यानी केवल जैविक हिंसा तक सीमित मान लिया गया।

‘स्याद्वाद’ से पता चलता है कि जैन दर्शन में अहिंसा का अर्थ कहीं व्यापक था। उसकी कामना थी कि समाज में विभिन्न मतांतर वाले लोग, एक-दूसरे का सम्मान करते हुए जीवन जिएं। उनमें कोई द्वैष न हो। यदि वैचारिक लोकतंत्र होगा, तो लोग एक-दूसरे की भावनाओं का ख्याल रखेंगे, तभी समाज में वैचारिकता के प्रति अनुराग होगा। मगर केवल अपने विचारों को सर्वोपरि समझने, बताने की जिद के चलते, ‘स्याद्वाद’ का विचार समाज में गहरी जड़ें न जमा सका। यह बात भुला दी गई कि हिंसा प्रधान समाज में वैचारिक अहिंसा का टिके रहना असंभव है। वैचारिक लोकतंत्र के समर्थक, ‘स्याद्वाद’ जैसे दर्शन के कमजोर पड़ने का परिणाम यह हुआ कि ब्राह्मणों ने न केवल दूसरे विचारों की ओर से अपने आँख-नाक-कान बंद कर लिए, अपितु गैर-ब्राह्मण उनके धर्म-ग्रंथों के पढ़ न पाएँ, इसके लिए भी उनपर बड़े-बड़े प्रतिबंध थोप दिए।

हम पुनः कुमारिल भट्ट की कहानी पर लौटते हैं। हमने जाना कि कुमारिल भट्ट को अग्नि-शिखाओं पर आसीन देखकर भी शंकराचार्य का हृदय मोम न हुआ। शायद उनकी उत्कृष्ट मेधा का भय शंकराचार्य को रहा हो; यह आशंका कि कुमारिल भट्ट जैसे विद्वान को पराजित करना शायद उनके लिए संभव न हो! यह भी संभव है कि  वेदोक्त धर्म-दर्शन के शीर्ष-पुरुष बनने की महत्वाकांक्षा के साथ निकले शंकराचार्य, ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना चाहते हों, जिससे उनपर वैदिक परंपरा का दोषी होने का आरोप लगाया जा सके। इसलिए उन्होंने कुमारिल भट्ट को बचाने की कोई कोशिश न की। आज शंकराचार्य के समर्थक उस प्रसंग को गोल-मोल कर जाते हैं। हिंदू परंपराओं के जानकार के लिए इसमें कुछ भी अजूबा नहीं है। परंपरानुगामी भारतीय मेधा घटनाओं के निष्पक्ष विवेचन के बजाय श्रद्धा को महत्व देती है। उसकी कोशिश व्यक्तिगत श्रद्धा को सामूहिक श्रद्धा में बदल देने की रहती है। उस समय यदि शंकराचार्य कुमारिल भट्ट को चिता से उबार लेते तो वेदांत भले ही न जीतता, लेकिन इंसानियत अमर हो जाती।

3

यहां एक किस्सा याद आ रहा है। बताते हैं कि रामानुजाचार्य को उनके गुरु ने एक मंत्र दिया था। मंत्र देते समय उन्होंने शिष्य रामानुज के कान में कहा—

‘बहुत पवित्र मंत्र है। जिसे बताओगे वह तर जाएगा।’

‘जी….गुरु जी।’ रामानुज ने गुरु का धन्यबाद किया।

‘लेकिन एक शर्त है। इस मंत्र को किसी अपात्र के समक्ष कभी प्रकट मत करना।’

‘अपात्र कौन?’

‘शूद्र, अछूत, स्त्री….शास्त्रों में उनका उल्लेख है।’

‘यदि मैं ऐसा करूं तो….’

‘घोर पाप….घोर पाप। सीधे रौरव नर्क में जाओगे।’

गुरुजी को दंडवत कर रामानुज वहां से चल दिए। रास्ते में उन्हें जो भी पात्र व्यक्ति दिखाई दिया, सभी को मंत्र दिया। गुरु को जब पता चला कि रामानुजाचार्य पात्र-अपात्र का ध्यान रखे बिना ही दीक्षा दे रहे हैं तो उन्होंने उन्हें बुलवाया, बरजा। गुरु के आदेश का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। तब रामानुजाचार्य ने कहा—

‘आप ही ने कहा था कि जो भी व्यक्ति इस मंत्र का पाठ करेगा, उसका उद्धार होगा?’

‘मैंने यह भी कहा था कि अपात्र को इस मंत्र की दीक्षा दी तो तुम सीधे रौरव नर्क में जाओगे।’

‘यदि मुझ अकेले के नर्क में जाने से इतने सारे लोगों को मुक्ति मिलती है तो मुझे सौ-सौ जन्मों तक नर्क स्वीकार्य है।’ रामानुज का उत्तर था।

इसकी प्रतिक्रिया में रामानुज के गुरु ने क्या कहा होगा, मालूम नहीं। लेकिन उनके साथ अप्रत्यक्ष स्पर्धा में जीत शंकराचार्य की हुई थी। कैसे? रामानुज विशिष्टाद्वैत दर्शन के प्रवर्त्तक थे, और शंकराचार्य अद्वैत के। रामानुज मानते थे कि आत्मा और परमात्मा एक ही हैं, मगर संसार में आकर उनकी अलग-अलग प्रतीति होती है। शंकराचार्य आत्मा और परमात्मा को एक मानते थे। ब्राह्मणों ने घोषित रूप से शंकराचार्य के मत को स्वीकार किया। इस्लाम के सूफीवाद की और से मिल रही चुनौती से निपटने के लिए यह जरूरी था। किंतु आत्मा और परमात्मा एक हैं, इस आधार पर सभी मनुष्य बराबर हैं—इस सत्य को वे कभी गले से नहीं उतार पाए।  

हम यह नहीं कहते कि रामानुज का विशिष्टाद्वैत आदर्श दर्शन है। असल में न तो स्वर्ग होता है, न ही नर्क। मुक्ति स्वयं एक मिथ है। अतएव ऊपर दी गई कहानी को उसकी प्रतीकात्मकता, यानी सामाजिक संदर्भों में समझना चाहिए। कहानी बताती है कि किसी काम से यदि एक व्यक्ति को नुकसान, मगर अनेक को लाभ पहुंचता है तो वह कार्य करणीय हो सकता है, और व्यावहारिक नैतिकता के दायरे में आता है। पूर्ण नैतिकता तब होगी जब बाकी सब लोग, व्यक्ति विशेष को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई करने की ठान लें।

अपने मान-अपमान और आलोचनाओं की चिंता किए बिना शंकराचार्य कुमारिल भट्ट जैसे मनीषी की प्राण रक्षा को आगे आते; तो वे मनुष्यता के लिए आदर्श उदाहरण पेश करते। मगर परंपरा से भयभीत शंकराचार्य उस अवसर की जानबूझकर उपेक्षा कर जाते हैं। बहरहाल, बौद्ध दर्शन के अध्ययन हेतु प्रस्थान करते समय कुमारिल भट्ट की मनःस्थिति को लेखक और क्रांतिकारी यशपाल ने खूब समझा था। वे लिखते हैं—

‘कुमारिल भट्ट दो बातें खूब समझते थे। पहली बात यह कि बौद्ध दर्शन उनकी प्रतिपालक और रक्षक द्विज श्रेणी के हित और अधिकारों पर आघात कर रहा है; और दूसरी बात, द्विज श्रेणी के सामाजिक और आर्थिक शासन की वेदोक्त व्यवस्था….द्विज श्रेणी के शासन के अधिकारों का विरोध करने वाले बौद्ध दर्शन की सत्य, अहिंसा और न्याय की मांग—द्विज श्रेणी के अधिकारों की हिंसा करती है। अतः बौद्ध दर्शन से ‘फाइट’ करना आवश्यक है।’2 

कुमारिल भट्ट के प्रायश्चित की घटना द्वारा हम, न केवल उनकी मनोरचना, अपितु तत्कालीन समाज के मनोविज्ञान को  भी समझ सकते हैं। उन दिनों धर्म, दर्शन और विचार की प्रामाणिकता को परखने के उपाय कभी-कभी इतने विचित्र, अविचारी और अस्वाभाविक होते थे कि आज उनपर विश्वास करना कठिन जान पड़ता है। बताते हैं कि नालंदा में बौद्ध दर्शन के अध्ययन के लिए कुमारिल भट्ट ने छद्म नाम से प्रवेश लिया था। वहां के विद्यार्थियों को जब पता चला तो वे बहुत कुपित हुए। उन्होंने कुमारिल को सबक सिखाने की ठान ली। कुछ शरारती लड़कों ने उन्हें विश्वविद्यालय की छत से फैंकने का निश्चय किया।  बौद्ध विचारक वेदों को अप्रामाण्य और मानवकृत मानते थे। बौद्ध दर्शन को मिटाने के कुमारिल भट्ट के संकल्प के पीछे यही मुख्य वजह थी। जब वे लड़के उन्हें कुमारिल को ढकेलने जा रहे थे तब उन्होंने उन सभी को सुनाते हुए कहा था—‘यदि वेद प्रामाण्य हैं तो मुझे कोई भी चोट नहीं पहुंचेगी।’

संयोगवश वे सकुशल बच गए। उसी दिन से कुमारिल ने मान लिया कि वेद स्वतः प्रामाण्य हैं। वह विवेक पर  अंधश्रद्धा की जीत थी। आत्मदहन से पहले कुमारिल भट्ट ने विपुल वाङ्मय की रचना की थी। लेकिन विलक्षण मेधा के बावजूद वे मीमांसा दर्शन को वह सम्मान दिलाने में नाकाम रहे, जिसके वे आचार्य थे। जिसके लिए उन्होंने बौद्धों को पराजित करने की कामना के साथ गुरु-द्रोह किया था। मंडन मिश्र के पराजित होते ही मीमांसा दर्शन लगभग पूरी तरह उखड़ गया। बाद में ब्राह्मणों ने उनके प्रायश्चित का खूब महिमामंडन किया। उससे दर्शन में विचार को जो सम्मान मिलना चाहिए, वह लगातार कम होता गया। उसके स्थान पर कर्मकांड और रूढ़ियां अपनी पकड़ बनाते गए।

4

शब्द की कसौटी शब्द; और विचार की कसौटी केवल विचार बन सकता है। बावजूद इसके चमत्कारों और संयोगों के माध्यम से किसी विचार या वस्तु को प्रमाणित करने की प्रवृत्ति भारतीय समाज में बहुत पुरानी है। रूढ़ियों को विचारधारा का रूप देने तथा विरोधी विचारों से सीख लेने के बजाय उन्हें मिटा देने के उदाहरण भी कई हैं। कहीं पढ़ा था कि उज्जैन नगरी में एक ऐसा तालाब था, जिसका उपयोग शास्त्रीय ग्रंथों की जांच के लिए कहा जाता था। तरकीब निराली थी। यदि ग्रंथ तैर जाए तो उसको मौलिक और महत्वपूर्ण मानकर सम्मान मिलता था। अगर डूब जाए तो उसे स्थायी जल-समाधि के लिए छोड़ दिया जाता था। समझ सकते हैं कि वह गुणवत्ता जांच के नाम पर ग्रंथ को ही मिटा देने की बौद्धिक वर्ग की साजिश थी। लोकश्रुति के अनुसार उस तालाब में पांच हजार से अधिक ग्रंथों को इसी तरह डुबोया गया था। बाद में उस तालाब को पाट दिया गया। इस तरह न जाने कितनी बहुमूल्य पांडुलिपियां, केवल इसलिए कि उनमें व्यक्त विचार शासन और उसके चहेते बुद्धिजीवी वर्ग की विचारधारा से मेल नहीं खाते थे, हमेशा-हमेशा के लिए दफन कर दिए गए। बौद्ध काल में चार्वाक, लोकायत और आजीवक धर्म जैसी भौतिकवादी विचारधाराएं विमर्श में थीं। अजित केशकंबलि, मक्खलि घोषाल, पूर्ण कस्सप जैसे विचारक उनके पोषण में लगे थे। वैदिक परंपरा के पुरोहितों और आचार्यों से उनका शास्त्रार्थ चलता रहता था। इसके बावजूद इन विचारधाराओं से संबंधित स्वतंत्र ग्रंथ हमें प्राप्त नहीं होता। इसके पीछे तत्कालीन आचार्यों की विरोधी विचारधारा के प्रति असहिष्णुता रही है।

संवैधानिक व्यवस्थाओं और लोकतंत्र के इस दौर में होना तो यह चाहिए कि हम इतिहास से कुछ सबक लें, किंतु विचार के नाम पर जड़ता और धर्म-दर्शन के नाम पर असहिष्णुता निरंतर बढ़ती ही जा रही है। शायद ऐसी ही परिस्थितियां डॉ.  आंबेडकर की बहुचर्चित पुस्तक ‘हिंदू धर्म की पहेलियां’ लिखने की प्रेरणा बनी थीं।

ओमप्रकाश कश्यप 

1.   किं करोमि क्वगच्छामि को वेदानुधरिष्यति.

मा रुदसि बाले, कुमारिलभट्टोवेदानुद्धारिष्यति. —यशपाल द्वारा ‘अपने संपर्कों के प्रति मेरे देय’ से उद्धृत, यशपाल के निबंध, पृष्ठ 431.

2 .   यशपाल के निबंध, अपने संपर्कों के प्रति मेरे देय, 431।

सच्ची रामायण का विरोध धार्मिक से कहीं ज्यादा राजनीतिक है

विशेष रुप से प्रदर्शित

मैं मानव समाज का सुधारक हूँ. मैं देश, धर्म, ईश्वर, भाषा अथवा राज्य की परवाह नहीं करता. मुझे केवल मनुष्यता के विकास और उसके कल्याण की चिंता है—पेरियार

बाइबिल का परमात्मा पक्के तौर पर सर्वाधिक ईर्ष्यालु, सर्वाधिक नाकारा, सर्वाधिक क्रूर, सर्वाधिक अन्यायी, सर्वाधिक रक्त पिपासु, सबसे ज्यादा निरंकुश तथा मानवीय गरिमा एवं स्वतंत्रता का सबसे बड़ा शत्रु था. जबकि शैतान शाश्वत विद्रोही और पहला मुक्त चिंतक था—मिखाइल बकुनिन, ईश्वर और राज्य.

‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी.’ प्रथम दृष्टया लोकतांत्रिक लगने वाली ये पंक्तियां तुलसी की हैं. पढ़कर लगता है कि लिखने वाले का लोकतंत्र में अटूट विश्वास है. वह साधक को अपनी भावना के अनुसार साध्य गढ़ने की छूट देता है. मगर इनमें लोकतंत्र की व्याप्ति मान लेना वैसा ही संभ्रम है, जैसे यह कहना कि कण-कण में भगवान हैं, इसलिए चराचर जगत में सभी बराबर हैं, दुनिया में आदर्श समानता है. ऊंच-नीच, जात-पात, छोटा-बड़ा, छूत-अछूत जैसा कुछ भी नहीं है. असल में, धर्म का यह उदार चेहरा उतना ही बनावटी है, जितना किसी पुरोहित का दक्षिणा मिलते ही ‘कल्याणम् भव’ कह, निस्पृह भाव से आगे बढ़ जाना. भारतीय समाज छोटे-छोटे समुदायों, धार्मिक और सांप्रदायिक समूहों, गोत्रों-उपगोत्रों तथा जातियों-उपजातियों में हमेशा बंटा रहा. उनके बीच वर्चस्व को लेकर संघर्ष भी लगातार चलते रहे.

हालांकि एक सीमा तक तुलसी गलत भी नहीं थे. जिस दौर में वे रामचरितमानस लिख रहे थे, समाज में रामकथा के अलग-अलग रूप प्रचलित थे. प्रत्येक समूह अपनी रामकथा को असली मानता था. बावजूद इसके रामायण के भिन्न कथारूपों पर विश्वास करने वाले समूहों में परस्पर कोई द्वेष नहीं था. अकेले राम सभी के ‘भगवान’ नहीं थे, लेकिन कोई राम को सबसे बड़ा देवता और भगवान माने, इसपर उन्हें कोई आपत्ति न थी. आदिवासियों, जनजातियों, शूद्रों, अतिशूद्रों के अपने-अपने देवता थे, जो राम जैसे अवतारी, उतने ही पराक्रमी और चमत्कारी; कहीं-कहीं तो उनसे भी आगे थे. राम के देवत्व पर भरोसा कर अपना आराध्य मानने वालों ने भी, उन्हें अपनी परंपरा और संस्कृति के अनुसार ढालने के बाद ही स्वीकार किया था. यही कारण है कि उस जमाने में सीता को राम की बहन बताने वाली जैन रामायण ‘पउमचरिय’ उतनी ही लोकप्रिय और सम्मानीय मानी जाती रही, जितनी राम-सीता को पति-पत्नी बताने वाली वाल्मीकि रामायण.

विभिन्न रामायणों के मुख्य पात्र भले ही एक हों, किंतु उनके चरित्र में आधारभूत अंतर है. जैन रामायण में ब्राह्मणों पर रावण को बदनाम करने का आरोप लगाया गया है. जैन मान्यता के अनुसार रावण उनके 63 शलाकापुरुषों में से एक था. उसके अनुसार राम और रावण दोनों जैन थे. मृत्यु के बाद राम को कैवल्य; तथा लक्ष्मण को नर्क प्राप्त हुआ था. वाल्मीकि, तुलसी, विमलसूरि(पउमचरिय) द्वारा रचित रामायणों के अलावा भी रामकथा के सैंकड़ों रूप दुनिया-भर में प्रचलित हैं. फादर कामिल बुल्के ने देश-विदेश में प्रचलित रामकथाओं की गणना कर, उनकी संख्या को 300 माना था. अपने लेख ‘थ्री हंड्रेड रामायण’ में ए. के. रामानुजन रामकथा की विविधता को दर्शाने के लिए जिस लोकश्रुति का सहारा लेते हैं, उसके अनुसार रामकथा अनंत रूपों में, अनादिकालीन कथा है. फिर पेरियार ने ऐसा क्या लिखा था, जिससे उनकी लिखी ‘सच्ची रामायण’ का नाम सुनकर ब्राह्मणवादी लाल-पीले होने लगते हैं?

मुख्य कारण था, पेरियार का रामकथा के प्रति दृष्टिकोण. पेरियार स्वयं नास्तिक थे. जहां रामायण के अन्य प्रारूपों के साथ कोई न कोई धार्मिक दृष्टिकोण जुड़ा था, पेरियार उसे धार्मिक पुस्तक मानने से ही इन्कार करते थे. उनका कहना था कि रामायण एक राजनीतिक ग्रंथ है. उसकी रचना ब्राह्मणों ने द्रविड़ों पर अपना प्रभुत्व दर्शाने के लिए की गई है. वह द्रविड़ों के आत्मसम्मान की विरोधी, उनकी अस्मिता का हनन करने वाली है. ‘दि रामायण: एक ट्रू रीडिंग’ की भूमिका में वे लिखते हैं—

‘रामायण और बरधाम(महाभारत) काल्पनिक ग्रंथ हैं….इन्हें आर्यों ने द्रविड़ों को अपने जाल में फंसाने, उनके आत्मसम्मान को नष्ट करने, निर्णय सामथ्र्य को कुंद करने तथा उनकी इंसानियत को पथभ्रष्ट करने के लिए रचा है. इन दोनों कथाओं के नायक क्रमशः राम और कृष्ण हैं. जो कि आर्य हैं और बेहद साधारण व्यक्ति हैं. ये कथाएं इसलिए थोपी गईं हैं, ताकि इनके कथानायकों, उनके परिजनों एवं सहायकों को अलौकिक एवं अतिमानवीय मान लिया जाए; तथा उन्हें पूजनीय मानकर, जनसाधारण द्वारा उनकी पूजा-अभ्यर्थना की जाए.’ बावजूद इसके रामासामी पेरियार की पुस्तक ‘दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ जब तक तमिल और अंग्रेजी में थी, तब तक हिंदी पट्टी के ब्राह्मणवादियों को उससे कोई आपत्ति नहीं थी. इसलिए करीब 40 वर्षों तक उसके तमिल और अंग्रेजी में संस्करण पर संस्करण निकलते रहे.

पुस्तक को लेकर तूफान तब उठा जब कानपुर देहात के रहने वाले पेरियार ललई सिंह ने ‘सच्ची रामायण’ शीर्षक से उसका हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया. हिंदी अनुवाद दुलालपुर निवासी, राम आधार द्वारा किया गया था. उसे छापने के लिए उस समय कोई प्रकाशक तैयार नहीं था. इसलिए ललई सिंह ने उसे अपने प्रकाशन, ‘अशोक पुस्तकालय’ कानपुर से 1 अक्टूबर, 1968 को प्रकाशित किया था. मूल कृति ‘रामायण पादिरंगल’(रामायण के कथापात्र) शीर्षक से 1930 में प्रकाशित हुई थी. 1972 तक उसके दस संस्करण प्रकाशित हो चुके थे. पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद 1959 में आया था. उसके बाद दो और संस्करण क्रमशः 1972 और 1980 में प्रकाशित हुए. पुस्तक के हिंदी में आने की संभावना उसके अंग्रेजी अनुवाद के बाद ही बनी थी. ‘रामायण पादिरंगल’ की रचना से पहले पेरियार ने लगभग सभी उपलब्ध रामकथाओं यथा जैन, बौद्ध, कंब आदि का गहन अध्ययन किया था. विषय से संबंधित विद्वानों से बातचीत की थी.

रामकथा संबंधी उनके अध्ययन-चिंतन की सफल परिणति एक साथ दो पुस्तकों के रूप में हुई थी. दूसरी पुस्तक का नाम था—रामायण कुरीप्पुकल(रामायण के बारे में कुछ बातें). वह पहली की अपेक्षा अधिक गंभीर तथा कथानक की दृष्टि से मूल रामकथा के करीब थी. उनमें प्रसिद्धि मिली पहली पुस्तक को. अंग्रेजी में उसे मूल शीर्षक से थोड़ा हटकर, ‘दि रामायण: एक ट्रू रीडिंग’ शीर्षक से छापा गया. उसका हिंदी अनुवाद ‘सच्ची रामायण’ के रूप में सामने आया. हम सोच सकते हैं कि तमिल कृति ‘रामायण पादिरंगल’ यानी ‘रामायण के कथापात्र’ के हिंदी में ‘सच्ची रामायण’ के रूप में अनूदित होते-होते, शीर्षक के स्तर पर भी काफी अर्थ-परिवर्तन हो चुका था.

‘सच्ची रामायण’(रामायण पादिरंगल) की रचना विखंडनात्मक शैली में हुई है. वह रामकथा की स्थापित छवियों का खंडन करती थी. उसका उद्देश्य रामायण के कथापात्रों के चरित्र का वस्तुनिष्ट विवेचन है. जिस राम को तुलसी मर्यादापुरुषोत्तम कहकर ईश्वरतुल्य बना देते हैं, उसके बारे में पेरियार आरंभ में ही साफ कर देते हैं कि—‘राम कोई आदर्श व्यक्ति नहीं है.’ आगे वे विस्तार से राम के चरित्र को लेकर अपने विचार पेश करते हैं. शंबूक प्रसंग का उल्लेख करते हुए वे आगे लिखते हैं—

‘राम जिसने तपस्या कर रहे शंबूक की बगैर किसी गलती के, निर्दयतापूर्वक हत्या कर दी थी, उस राम को विष्णु का अवतार माना जाता है. अगर आज राम की तरह का कोई राजा होता तो उन लोगों की क्या दशा होती, जिन्हें शूद्र(जो गालीनुमा संबोधन है) कहा जाता है!’

ऐसी वैचारिक प्रखरता, प्रतिबद्धता और साफगोई के कारण वह उसकी लोकप्रियता उत्तरोत्तर बढ़ती गई.

पेरियार ललई सिंह ने न केवल ‘दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ का हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया था, अपितु ‘सच्ची रामायण’ में पेरियार के तर्कों की पुष्टि के लिए, विभिन्न रामकथाओं से कुछ संदर्भ भी दिए थे. जिसे उन्होंने ‘सच्ची रामायण की चाबी’ कहा था. पाठकों की सुविधा के लिए दोनों पुस्तकों को एक ही जिल्द में छापा गया था. उदाहरण के लिए पेरियार ने सीता का वर्णन करते हुए उसके चरित्र की दुर्बलताओं को उजागर किया था तो पेरियार ललई सिंह ने उसकी पुष्टि के लिए रामचंद्र शुक्ल की पुस्तक ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ से, ‘श्रीरामावतार भजन तरंगिनी’ से एक पद उद्धृत किया था. पद में यूं तो पति-पत्नी का सहज रति प्रसंग है. लेकिन एक ‘वनवासी मर्यादा पुरुषोत्तम’ के संदर्भ से जुड़कर वह अशालीन लगने लगता है. पद में सीता का कथन देखिए—

‘हमारे प्रिय ठाड़े सरजू तीर।।टेक।।

छोड़ लाजि मैं जाय मिली, जहां खड़े लखन के वीर

मृदु मुसुकाय पकरि कर मेरी खेच लियो तब चीर

झाऊ वृक्ष की झाड़ी भीतर करन लगे रति धीर.1

कह सकते हैं कि पेरियार द्वारा, ‘दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग’, के रूप में रामायण की विखंडनवादी अन्वीक्षा, ‘सच्ची रामायण’ में थोड़ी और मुखर, और अधिक व्यंजनात्मक हो चुकी थी. इसलिए ब्राह्मणवादियों के कान खड़े होना स्वाभाविक था. हिंदी में प्रकाशित होने के साथ पूरे हिंदी जगत में तूफान सा उठ गया. ललई सिंह पर मुकदमा ठोक दिया गया. यह कहकर कि पुस्तक हिंदुओं की भावनाओं को आहत कर, सामाजिक विद्वेष फैलाने वाली है, उसकी सभी प्रतियों को जब्त करने के आदेश सुना दिए गए. गौरतलब है कि प्रतिबंध और जब्ती के आदेश पुस्तक के केवल अंग्रेजी और हिंदी संस्करण के थे. तमिल तथा दूसरी दक्षिणी भारतीय भाषाओं में प्रकाशित पुस्तक की बिक्री पर कोई पाबंदी नहीं लगाई गई थी. गोया तमिलनाडु या दक्षिण भारत के दूसरे हिस्सों में हिंदू रहते ही नहीं थे. इससे पेरियार के कथन कि रामायण एक राजनीतिक ग्रंथ है—की पुष्टि होती है. सच तो यह है कि ‘सच्ची रामायण’ के माध्यम से ब्राह्मणवादी राजनीतिक ताकतें, अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक एवं राजनीतिक सत्ता की पुनर्वापसी को अंजाम देने में लगी थीं.

पुस्तक को प्रतिबंध मुक्त कराने के लिए ललई सिंह यादव को लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी. उसका समापन 16 सितंबर, 1976 के उच्चतम न्यायालय के फैसले से हुआ. शीर्षतम अदालत ने प्रतिबंध को गलत बताकर, पुस्तक की जब्त की गई प्रतियां लौटाने का आदेश दिया था. उच्चतम न्यायालय के आदेश के बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार औपचारिक आदेश जारी करने से बचती रही. 1995 में मायावती सरकार के दौरान पुस्तक प्रतिबंध-मुक्त हो सकी. उसके बाद से हिंदी पट्टी में ‘सच्ची रामायण’ की लोकप्रियता बढ़ती गई, मगर पोंगापंथी भी शांत न थे. वे विरोध के लिए नए सिरे से एकजुट होने लगे थे. नया दौर हिंदुओं का न होकर, हिंदुत्ववादियों का था. उनके भीतर पेरियार के प्रति नफरत कूट-कूट कर भरी थी. इसलिए नहीं कि पेरियार ने रामायण के पात्रों के चरित्र पर उंगलियां उठाई थीं. बल्कि इसलिए कि उन्होंने इन धर्मग्रंथों के पीछे छिपे ब्राह्मणवादियों के राजनीतिक मंसूबों को उजागर कर दिया था. पेरियार के प्रति उनके भीतर कितनी नफरत भरी थी, इस समझने के लिए एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा.

2002 में लखनऊ स्थित आंबेडकर पार्क जब बन रहा था तो उसमें योजनानुसार ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, शाहूजी महाराज, डॉ. आंबेडकर, बिरसा मुंडा, कांशीराम जैसी बहुजन शख्सियतों की मूर्तियां स्थापित की गईं. मायावती उसमें पेरियार की मूर्ति भी लगवाना चाहती थीं. कलाकार को मूर्ति-निर्माण का आदेश जारी हो चुका था. उस समय प्रदेश में भाजपा के सहयोग से बनी बहुजन समाज पार्टी की सरकार थी. पेरियार का नाम सुनते ही विश्वहिंदू परिषद, बजरंग दल, हिंदू महासभा जैसे उग्रपंथी संगठन भड़क उठे. विनय कटियार ने ऐलान किया कि पेरियार की मूर्ति लगाई गई तो वे उसे ढहा देंगे. भाजपा ने समर्थन वापस लेने की धमकी दे डाली. बसपा पेरियार को अपना ‘आइकन’ मानती थी. उसके हर कार्यक्रम में ज्योतिबा फुले, डॉ. आंबेडकर, शाहूजी महाराज के साथ-साथ पेरियार के चित्र भी लगे होते थे. उस समय मायावती चाहतीं तो सामाजिक न्याय समर्थित वैचारिकी को महत्व देकर, सरकार को दाव पर लगाने का खतरा उठा सकती थीं. लेकिन उन्होंने राजनीतिक सत्ता को बचाने का अवसरवादी विकल्प चुना. बयान दिया कि सरकार का पेरियार की मूर्ति लगाने का कोई इरादा नहीं है. जबकि मूर्ति तैयार होकर शिल्पकार के स्टूडियो में प्रतीक्षारत थी.

मंदिर आंदोलन की आड़ में प्रदेश में दक्षिणपंथी ताकतें दुबारा मजबूत हुई तो उच्चतम न्यायालय के फैसले के बावजूद पुस्तक पर नए सिरे से प्रतिबंध लगाने की मांग की जाने लगी. 2007 में प्रदेश में सुश्री मायावती की सरकार थी. उस समय भाजपा की प्रादेशिक इकाई ने आरोप लगाया कि ‘बहुजन समाज पार्टी’ सच्ची रामायण का प्रचार-प्रसार कर रही है. उसके संरक्षण में प्रदेश में बड़े पैमाने पर पुस्तक की बिक्री की जा रही है. भाजपा की प्रदेश इकाई ने, पुस्तक को हिंदुओं की भावनाओं को आहत करने वाली बताकर, उसपर तत्काल प्रतिबंध लगाने की मांग की थी. भाजपा विधान मंडल के तत्कालीन नेता ओमप्रकाश सिंह ने सरकार से मांग की थी कि—‘हिंदू देवी-देवताओं के विरोधी तथा द्रविड़िस्तान की मांग करने वाले, अलगाववादी पेरियार रामासामी की सरकार निंदा करे तथा उन्हें महापुरुषों की श्रेणी में स्थान न दे.’ भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी ने दावा किया था कि 9 अक्टूबर को बसपा की रैली में ‘सच्ची रामायण’ की 4000 प्रतियां बेची गई थीं. हैरानी की बात यह है कि सामाजिक न्याय की बात करने वाली समाजवादी पार्टी भी, ‘सच्ची रामायण’ के विरोध में भाजपा का साथ दे रही थी. विधानसभा में विपक्ष के नेता और समाजवादी पार्टी के सदस्य अहमद हसन ने ‘सच्ची रामायण’ के जरिये सरकार पर निशाना साधते हुए कहा था कि—

‘भगवान राम के प्रति अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना अच्छी बात नहीं है. पूरी दुनिया के मुसलमान स्वीडिश कार्टूनिस्ट द्वारा बनाए गए पैगंबर मोहम्मद के कार्टून की भर्त्सना कर रहे हैं. विवादित पुस्तक पर तत्काल प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए.2

इससे अनुमान लगाया जाता है कि मामला जब धर्म की आलोचना का हो तो समय-समय पर एक-दूसरे के प्रतिद्विंद्वी की भूमिका में उतरने वाले धर्मावलंबी भी एक-दूसरे के समर्थन पर उतर आते हैं.

देखा जाए तो भाजपा का आरोप सरकार पर न होकर, ‘बहुजन समाज पार्टी’ पर था. उस पार्टी पर जो पेरियार को अपना आदर्श मानती थी. अपनी वैचारिकी पर दृढ़ रहने के बजाए, मुख्यमंत्री मायावती ने एक बार फिर पीछे हटने का फैसला किया. उनकी ओर से वक्तव्य जारी हुआ—‘बसपा तथा सरकार का सच्ची रामायण की बिक्री से कोई लेना—देना नहीं है.’ मामले पर राजनीति करने के बजाय, पुस्तक पर प्रतिबंध की मांग कर रहे नेताओं को केंद्र सरकार से संपर्क करना चाहिए, जहां उनकी अपनी पार्टी की सरकार है.3

इस प्रसंग का सबसे रोचक पहलू यह है कि जिस ‘सच्ची रामायण’ के विरोध को लेकर भाजपा सरकार पर लगातार आरोप लगा रही थी, तथा बिना आगा-पीछा सोचे कांग्रेस और समाजवादी पार्टी उसका साथ दे रही थीं, उसकी प्रति न तो भाजपा के पास थी, न सपा, न कांग्रेस और न ही बसपा के पास. यहां तक कि बसपा के साहित्य के प्रकाशक ‘बहुजन चेतना मंडप’ के पास भी उस पुस्तक की प्रतियां उपलब्ध नहीं थी. जबकि लखनऊ के सबसे बड़े पुस्तक विक्रेता ‘यूनीवर्सल बुक सेलर’ का दावा था, ‘हमने वह पुस्तक कभी नहीं बेची, न ही वह पुस्तक फिलहाल हमारे पास है.’ उल्लेखनीय है कि भाजपा के लखनऊ मुख्यालय में ‘सच्ची रामायण’ को लेकर 27—28 अक्टूबर 2007 को एक बैठक हुई थी. उसमें पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह और नेता लालकृष्ण आडवाणी भी मौजूद थे. उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से प्रदेश भर में ‘सच्ची रामायण’ की बिक्री का विरोध करने को कहा था. जबकि जिस पुस्तक का बहिष्कार किया जाना था, उसकी एक भी प्रति उस बैठक में उपलब्ध नहीं थी.

भाजपा नेताओं द्वारा विधानसभा परिसर के आगे स्थित, अपने पार्टी मुख्यालय में ‘सच्ची रामायण’ की प्रतियों का दहन(का नाटक) किया था.4 भाजपा का ‘सच्ची रामायण’ के दहन का दावा कितना खरा था, इसे इंडियन एक्सप्रेस में अलका एस. पांडे की 7 नबंवर की रिपोर्ट से समझा जा सकता है. उसके अनुसार पार्टी ने जैसे-तैसे ‘सच्ची रामायण’ के कुछ पन्ने जुटाए थे. उन्हीं को जलाकर, पुस्तक के दहन का नाटक किया गया था. वे भूल गए कि किसी व्यक्ति को महापुरुष मानना या न मानना, सत्ता प्रतिष्ठानों द्वारा तय नहीं होता. थोपे गए महापुरुषों की कलई अल्पावधि में ही खुलने लगती है. उसके बाद जनता की निगाह में वे खलनायक सरीखे बन जाते हैं.

एक महत्वपूर्ण बात और भी है. रामायण को धार्मिक ग्रंथ न मानकर पेरियार ने उसे विशुद्ध राजनीतिक ग्रंथ माना है. पेरियार के आलोचक भी उनपर कुछ ऐसा ही आरोप लगाते हैं. उनके अनुसार पेरियार द्वारा हिंदू धर्म तथा उसके मिथकों की आलोचना पूर्णतः राजनीति से प्रेरित थी. पेरियार इससे इन्कार नहीं करते थे. अंतर सिर्फ इतना है कि ब्राह्मण कभी यह मानने को तैयार नहीं होते कि रामायण तथा रामकथा को हिंदू संस्कृति के केंद्र में रखने के पीछे उनकी राजनीति है. खुद को सबसे ऊपर, शिखर पर बनाए रखने की राजनीति. जबकि पेरियार अपनी मंशा को छिपाते नहीं हैं—

‘मैं अपने समाज के कुछ ऐसे पहलुओं पर प्रहार करता हूं, जो हमें नीचा दिखाते हैं. मेरा जोर इस बात पर है कि जब तक हिंदू धर्म, हिंदू देवताओं, हिंदू शास्त्रों, पुराणों, वेदों और इसके इतिहास पर हमारा विश्वास रहेगा, और जब तक हम इनका अनुसरण करते जाएंगे, तब तक हमारा दमन और शोषण जारी रहेगा. हम समाज की असमानताकारी स्थितियों से कभी उबर ही नहीं पाएंगे. इन सड़ी हुई स्थितियों से उबरने की कोशिश के बजाए, जो केवल इनका पालन करने में लगा रहेगा—वह चाहे जितनी बेहतर स्थिति में आ जाए, खुद को अपनी अवनति और अपमानजनक स्थितियों से कभी उबार नहीं पाएगा.’5

एक अन्य भाषण में उन्होंने कहा था—

‘मैं किसी को चाहे प्यार करूं अथवा घृणा; दोनों स्थितियों में मेरा सिद्धांत एक ही रहता है. वह सिद्धांत यह है कि मैं यह शिक्षा देता हूं कि धनी लोगों और प्रशासनिक अधिकारियों को गरीब लोगों का खून नहीं चूसना चाहिए.’6

पेरियार का मानना था कि बगैर हिंदू धर्म को मिटाए, जाति-भेद को मिटाना संभव नहीं है. वे धर्मांतरण के विरोधी थे. जाति-आधारित उत्पीड़न और अवमानना से बचने के लिए जिन लोगों ने धर्मांतरण का सहारा लिया था, उनकी सामाजिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया था. हिंदू धर्म में जो अछूत था, धर्मांतरण के बाद भी उसकी हैसियत अछूत जैसी ही रहती थी. इसलिए शूद्रों और अतिशूद्रों की राजनीतिक, सामाजिक भागीदारी को आवश्यक मानते थे. राजनीति में प्रवेश के साथ ही उन्होंने सभी वर्गों को उनकी संख्या के अनुपात में संरक्षण की मांग शुरू कर दी थी. उन दिनों अस्पृश्यों को मंदिरों में प्रवेश की स्वतंत्रता नहीं थी. पेरियार स्वयं नास्तिक थे. मगर मंदिर प्रवेश का मसला सामाजिक स्वतंत्रता से भी जुड़ा था. इसलिए तमिलनाडु कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बनने के तुरंत बाद उसके तिरुपुर सम्मेलन में उन्होंने एक प्रस्ताव पेश किया, जिसमें सभी अस्पृश्यों को मंदिरों में प्रवेश की इजाजत की मांग की गई थी. लेकिन कांग्रेस कमेटी के ब्राह्मण सदस्यों ने उस प्रस्ताव का जोरदार विरोध विरोध किया. नाराज पेरियार ने तत्काल घोषणा की कि वे मनुस्मृति, रामायण आदि पुस्तकों, जिनका उपयोग कुटिल ब्राह्मणों द्वारा धार्मिक हथियारों के रूप में किया जाता है—दहन करेंगे.

वह अवसर 1956 में आया. पेरियार ने ऐलान किया कि 1 अगस्त 1956 को वे मद्रास के समुद्री तट पर राम की तस्वीरों की होली जलाएंगे. उत्तर भारत में दशहरे के अवसर पर हर वर्ष रावण के पुतले को आग लगाई जाती है. पेरियार रावण को आदर्श द्रविड़ राजा मानते थे. इसलिए उत्तर भारतीयों द्वारा रावण के पुतले को आग लगाने के विरोध में उन्होंने राम की तस्वीरों का दहन करने का ऐलान किया था. एक तरह से वह ब्राह्मणवादी संस्कृति का प्रतीकात्मक विरोध था. पेरियार की घोषणा के बाद तमिलनाडु के सभी नेताओं ने उनसे संपर्क कर, कार्यक्रम को टाल देने का अनुरोध किया. तमिलनाडु कांग्रेस के अध्यक्ष पी. काक्कन ने कहा कि राम की तस्वीरें जलाना ईश्वर के प्रति उस विश्वास की अवमानना होगी, जिसके भरोसे गांधी ने आजादी प्राप्त की है. उन्हें पेरियार के प्रस्तावित कदम को ‘असामाजिक कृत्य’ घोषित किया था. इसपर पेरियार ने अपने निश्चय पर दृढ़ रहते हुए जवाब दिया कि उनका यह कदम सामाजिक परिवर्तन के लिए अपरिहार्य है.

अगले ही दिन सुबह, घर से निकलने के साथ ही पुलिस उपायुक्त ने पेरियार को गिरफ्तार कर लिया. पेरियार इस स्थिति के लिए पहले से ही तैयार थे. घर से निकलते समय उनके पास माचिस की डिब्बियों, राम की तस्वीरों के अलावा एक बिस्तर भी था, जिसे वे जेलयात्रा की संभावना के कारण अपने साथ लेकर निकले थे. पेरियार के गिरफ्तार होते ही उनकी पत्नी समुद्र तट पर पहुंची जहां उनके समर्थक इकट्ठा थे. उन्होंने पेरियार की गिरफ्तारी की सूचना दी. इससे उनके समर्थक उग्र हो गए और साथ लाई राम की तस्वीरों को आग के हवाले करने लगे. उस समय तक पुलिस भी वहां पहुंच चुकी थी. करीब आधा घंटे तक पुलिस से बचने और गिरफ्तार होने का नाटक चलता रहा. लोग पिटते रहे, खुद को बचाने के लिए भागते भी रहे. भागते-भागते एक व्यक्ति रेत पर फिसल गया. पुलिस उसे गिरफ्तार करने को दौड़ी. लेकिन तब तक वह राम की तस्वीर को आग लगा चुका था. बाद में पेरियार सहित सभी को रिहा कर दिया गया. पेरियार का उद्देश्य पूरा हो चुका था.

पेरियार के जीवन से जाना जा सकता है कि उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था. वे जनता के बीच में खड़े होकर खुलेआम देवी-देवताओं का मखौल उड़ाते थे. धर्म और उसके प्रतीकों में आस्था और विश्वास को जनसाधारण की गरीबी और दैन्य के लिए जिम्मेदार मानते थे. कहते थे कि धर्म का मूल उद्देश्य, ईश्वर के गौरवगान की खातिर मनुष्यता का तिरष्कार करना है. इसपर धर्म भीरू लोग कहते कि पेरियार मूर्ख है. एक न एक दिन ईश्वर का कोप उनपर कहर टूटेगा. उस समय वह संभल नहीं पाएंगे. मगर पेरियार ने 94 वर्ष लंबा संघर्षमय जीवन जिया. अपनी मृत्यु से एक दिन पहले भी वे अपने मिशन को लेकर सतर्क थे. वे अंत तक कहते रहे कि यदि ईश्वर में जरा-भी शक्ति तो वह उन्हें दंड क्यों नहीं देता! उनसे उनका जीवन छीन क्यों नहीं लेता! खुद को ‘पंडित’ और धर्माधिकारी कहने वाले लोगों के पास पेरियार के इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं था. आस्था और धर्म के नाम पर दूसरों को मूर्ख बनाते आए लोगों के पास पेरियार के तार्किक प्रश्नों का उत्तर हो भी नहीं सकता था.

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ :

  1. सच्ची रामायण और सच्ची रामायण की चाबी, अंबेडकर प्रचार समिति, मोती कटरा आगरा, पृष्ठ 76
  2. वेब दुनियाhttps://news.webindia123.com/news/ar_showdetails.asp?id=711050918&cat=&n_date=20071105
  3. वेब दुनियाhttps://news.webindia123.com/news/articles/India/20071027/805535.html.
  4. वन इंडियाhttps://www.oneindia.com/2007/10/30/bjp—workers—burnt—copies—of—sacchi—ramayan—1193744742.html
  5. रिपब्लिक 19 जनवरी, 1945
  6. दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग के प्रथम संस्करण के प्रकाशकीय से उद्धृत, 1959

प्राचीन भारत में दास प्रथा : एक सामाजिक-सांस्कृतिक कलंक

विशेष रुप से प्रदर्शित

अरस्तु ने कहा था, कुछ व्यक्तियों का जन्म दास बनने के लिए ही हुआ है। मैं इससे इन्कार करता हूं। क्योंकि मैं नहीं मानता कि कुछ लोग जन्मजात मालिक होते हैं—डेनियल वी. चेप्पल

कहा जाता है कि सभ्यता को दासों की जरूरत पड़ती है। मैं कहता हूं, गुलामों की मदद से कोई भी सभ्य और सुसंस्कृत समाज नहीं बनाया जा सकता—विल्हेम रीश

संस्कृति के बारे में जितनी अच्छी-अच्छी बातें संभव हैं, सब भारतीय संस्कृति में भी कही जाती हैं। जैसे कि भारतीय संस्कृति उदार है। समरस है। पुरानी है। नए विचारों का स्वागत करने वाली है। दास प्रथा के बारे में पूछा जाए तो अधिकांश का उत्तर होगा—‘नहीं, यह तो पश्चिम की विशेषता है। खासकर रोम की। भारत का इससे दूर-दूर तक नाता नहीं है।’ जवाब में कोई देवदासी का जिक्र छेड़ दे तो आस्था का मामला कहकर तुरंत दबा दिया जाएगा। बड़े-बड़े विद्वानों का भी यही हाल रहा है। ‘हिंदू सभ्यता’ में राधाकुमुद मुखर्जी इस कुप्रथा पर लगभग मौन साधे रहते हैं। रामविलास शर्मा कुछ ईमानदार हैं। उनके अनुसार यह प्रथा भारत में थी, मगर बहुत बड़े स्तर पर नहीं।1 हालांकि इससे हमारी समस्या कम नहीं होती। महाभारत(सभापर्व-52/45, विराटपर्व-18/21) में युधिष्ठिर द्वारा 88,000 स्नातकों में से प्रत्येक को 30, कुल 26,40,000 दासियां दान में देने का उल्लेख है। यह एक राजा द्वारा अवसर-विशेष पर दिए गए दान का उदाहरण है। धर्मशास्त्रों में एक बार में हजारों दासियां दान करने के उल्लेख कई जगह हैं। रामविलासजी दास-प्रथा के और कितने बड़े स्तर की कल्पना करते थे, कहना मुश्किल है। काणे थोड़ा संतुलित करने का प्रयास करते हैं—‘ऐसा प्रतीत होता है कि यहां दास का अर्थ गुलाम या अर्धदास है।’2 यहां ‘गुलाम’ और ‘दास’ में पारिभाषिक दृष्टि से क्या अंतर है, यह तो काणे साहब ही बता सकते हैं। रोम में अर्धदास को ‘शेरिफ’ अथवा ‘हेलोट’ कहा जाता था। वे कृषि-भूमि के साथ जुड़े होते थे। भूमि के खरीद-बिक्री में उनकी खरीद-फरोख्त भी शामिल होती थी। उपर्युक्त ऋचा में कृषि-भूमि अथवा खेती का कोई उल्लेख नहीं है। कौटिल्य या नारद के विभाजन में कृषिदास का अलग से कोई उल्लेख नहीं है। ए. एल. बाशम ने ‘दास’ शब्द का प्रयोग आक्रमणकारी आर्यों द्वारा पराजित प्राग्वैदिक अनार्यों के लिए किया है।

सिंधु सभ्यता में दास

भारत सहित प्राचीन सभ्यताओं में दास प्रथा के कम से कम 5200 पहले तक के प्रमाण उपलब्ध हैं। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो आदि सिंधु सभ्यता(3300—1750 ईस्वीपूर्व) के प्रमुख नगरों में बड़े-बड़े भवनों के साथ एक कमरे के मकान भी मिले हैं। उससे तत्कालीन समाज के आर्थिक-सामाजिक विभाजन का अनुमान लगाया जाता है। पुरातत्ववेत्ता जॉन मार्शल के अनुसार एक कमरे के मकान नौकरों अथवा दासों के हो सकते हैं। हालांकि यह केवल अनुमान है। व्हीलर ने हड़प्पा और सुमेरियन सभ्यता के बीच हाथीदांत, कपास के साथ-साथ दासों के व्यापार की संभावना भी व्यक्त की है। उसके अनुसार लागेश के बाउ के मंदिर परिसर में एक फैक्ट्री थी। उसमें 21 डबलरोटी बनाने वाले, 27 दासियां, 25 शराब खींचने वाले और छह दास, बुनकर और कताई करने वाले, लुहार तथा अन्य शिल्पकर्मी काम करते थे। व्हीलर के अनुसार कारखाने की संरचना हड़प्पा शैली के अनुरूप थी।3 अब यदि मान लिया जाए कि हड़प्पा और सुमेरियन सभ्यता के बीच दासों का व्यापार भी होता था, तो सिंधु सभ्यता में दासों के मौजूगी स्वतः प्रमाणित हो जाती है। दास प्रथा की उत्पत्ति का संबंध, खेती के विकास से भी बताया जाता है। उसके लिए अतिरिक्त श्रम की आवश्यकता थी। इसलिए आरंभ में ताकत के बल पर लोगों को खेतों में काम करने के लिए बाध्य किया जाने लगा। कुछ लोग जो प्रकृति-आधारित खेती की अनिश्चितता के स्थान पर निश्चित आजीविका को पसंद करते थे, वे दूसरों को अपना श्रम बेचने लगे होंगे। कालांतर में उसी से दास प्रथा का जन्म हुआ, फिर धीरे-धीरे इस प्रथा को समाज की स्वीकृति मिलने लगी। खेती के अलावा घरों, उद्यमों में भी दासों की मदद ली जाने लगी। ऐसा विकास के आरंभिक चरणों में सभी समाजों में हुआ था। फिर जैसे-जैसे राज्य नामक संस्था मजबूत हुई, दासप्रथा के अन्यान्य रूपों का विस्तार होता गया। गौरतलब है कि भारतीय और रोम तथा सुमेरियन समाज में दासों की स्थिति में बड़ा अंतर है। रोम और सुमेर में दास तत्कालीन अर्थव्यवस्था के उपकरण मात्र थे। वे खरीदे-बेचे जाते थे। उस दासप्रथा का जन्म सामंतशाही की चरम अवस्था में हुआ था। सिंधु सभ्यता में दासों की उपस्थिति के जो संकेत मिले हैं, वे रोम और सुमेर की तरह आर्थिक दास ही हैं। जिनका उस समय की अर्थव्यवस्था के संचालन में बड़ा योगदान था। लेकिन जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं, भारतीय दासप्रथा वर्णव्यवस्था के अनुरूप ढलने लगती है।

ऋग्वेदकालीन दासप्रथा

प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में ऐसे शताधिक विवरण मौजूद जिनसे तत्कालीन भारतीय समाज में दास प्रथा की बड़े स्तर पर उपस्थिति का पता चलता है। ऋग्वेद में ‘दास’ शब्द अनेक स्थानों पर आया है। उसमें दासों के खरीदने-बेचने, भेंट करने, उपहार अथवा दान में देने, यहां तक कि दान लेने के भी, अनेकानेक प्रसंग हैं। ऋग्वेद(8/56/3) के बालखिल्य सूक्तों में पृषध्र मुनि की उक्ति है—‘शतं मे गर्दभानां, शतमूर्णावतीनाम्। शतं दासाः अति स्रजः।।

‘मुझे एक सौ गधे, एक सौ भेड़ें और एक सौ दास दो।’—यहां दास को गधे और भेड़ के समकक्ष रखकर उसे मनुष्य की संपदा माना गया है।

ऋग्वेद में मोटे तौर पर दो प्रकार के दासों का उल्लेख है। पहले वे जो अपने स्वामी की संपत्ति कहे जाते थे। जिनके शरीर पर उनके मालिक का अधिकार होता था। यानी ऐसे दास जिनका जिक्र होते ही श्रीविहीन, दीन-हीन, अपने मालिक के इशारों पर नाचने वाले व्यक्ति की छवि मन में उभर आती है। इस श्रेणी में आर्य और अनार्य दोनों प्रजातियों के दास शामिल थे। दूसरी श्रेणी उन अनार्य दासों की थी, जो अपेक्षाकृत साधन-संपन्न थे। जिनके पूर्वजों ने सिंधु सभ्यता की नींव रखी थी। उस समय वह सभ्यता अपने पराभवकाल में थी, मगर उसका वैभव पूरी तरह क्षीण नहीं हुआ था। 8 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक में फैली उस सभ्यता के मूल बाशिंदों से आर्य कहीं जूझ रहे थे, तो कहीं मैत्री का हाथ बढ़ा रहे थे। ऋग्वेद(7/99/4) में वृषशिप्र नामक दास का उल्लेख है, जिसमें विष्णु और इंद्र की स्तुति करते हुए कहा गया है—‘तुमने वृषशिप्र नामक दास की माया को संग्राम में विनष्ट किया है।’ एक मंत्र(ऋग्वेद-10/22/8) से आर्यों एवं अनार्यों के बीच भीषण संघर्ष का पता चलता है। युद्धरत आर्य इंद्र की स्तुति कर, उससे अनार्यों के विनाश के लिए प्रार्थना करते हैं—‘हम सब चारों ओर से दस्युओं से घिर चुके हैं। वे यज्ञ कर्म नहीं करते(अकर्मन)। न वे किसी वस्तु को मानते हैं(अमंतु)। उनके व्रत हमसे भिन्न हैं(अन्यव्रत)। वे मनुष्यों जैसा व्यवहार नहीं करते(अमांतुष)। हे शत्रुनाशक इंद्र! तू उन दासों का विनाश कर।’ जाहिर है, इस श्रेणी के ‘दास’ केवल नाम के दास थे—‘दासों और दस्युओं, दोनों ही के कब्जे में अनेक किलाबंद बस्तियां थीं….माना जाता है कि घुमक्कड़ आर्यों की आंखें दुश्मनों की बस्तियों पर संचित संपत्ति पर लगी हुई थीं। उसके लिए दोनों में सतत संघर्ष होता रहता था….ऐसे दो दास प्रमुखों का उल्लेख किया गया है कि जो धनलोलुप माने गए हैं। कामना की गई है कि इंद्र दासों की शक्ति को क्षीण करें तथा उनके द्वारा जमा की गई संपत्ति को लोगों में बांट दें।’4 

‘निरुक्त’ में ‘दास’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘दश्’ धातु से हुई है। इसका तात्पर्य संपन्न करना है। तदनुसार जो व्यक्ति अपने स्वामी के विविध कार्य संपन्न करता है, वह दास कहलाता है। इसका अर्थ ‘देना’ भी है। सवाल है कि दास का देने से क्या संबंध है? जिसकी देह पर भी उसके स्वामी का कब्ज़ा है, जिसे संपत्ति रखने का कोई भी अधिकार नहीं है, वह दूसरों को क्या देगा. ऋग्वैदिक काल के  ‘तरुक्ष’ और ‘बल्बूथ’ नामक अनार्य दास इस कसौटी पर खरे नजर आते हैं। श्रेणी में आते थे। ऋग्वेद में दोनों का उल्लेख दास-प्रमुख के रूप में हुआ है। ऋग्वेद(8/46/32) में लिखा गया है—‘मैंने बल्बूथ नामक दास से सौ गौ और अश्व प्राप्त किए थे।’ बल्बूथ की भांति तरुक्ष नामक दासप्रमुख का उल्लेख भी दानदाता के रूप में आया है। इन दोनों की ओर से पुरोहितों को जो उपहार दिए गए थे उससे उनकी बड़ी सराहना हुई थी।5 ऋग्वेद(8/19/36) में त्रसदस्यु को पचास युवतियां दान करते हुए बताया गया है। निश्चय ही वे युवतियां दासकर्म के निमित्त दान की गई होंगी। ऋग्वेद(10/33/4) में त्रसदस्यु के पुत्र कुरुश्रवण राजा को भी श्रेष्ठ दाता बताया गया है—‘मैं कवष ऋषि हूं। मैं त्रसदस्यु के पुत्र कुरुश्रवण राजा के पास याचना करने गया था; क्योंकि वे श्रेष्ठ दाता हैं।’ अथर्ववेद के आरंभिक अंशों में भी दासप्रथा का विवरण दिया है। उसमें दासियों के संबंध में प्रमाण मिले हैं। उसमें एक दासी का उल्लेख है जिसके हाथ भीगे होते थे। वह ओखल-मूसल कूटती थी; तथा गाय के गोबर पर पानी छिड़कती थी।6 

केवल संपदा नहीं, ज्ञान के क्षेत्र में भी दासों का हस्तक्षेप था। ऋग्वेद के उद्गाता ऋषियों में एक महत्त्वपूर्ण नाम कक्षीवान का है। उनका जन्म दीर्घतमस और उशिज नामक स्त्री जो दास कन्या थी, के संसर्ग से हुआ था। उशिज अंगदेश की महारानी की दासी थी। ऋग्वेद में एक बड़ा ही महत्त्वपूर्ण और लोकोपयोगी प्रसंग है, जुआरी का। उसके उद्गाता ऋषि कवष ऐलूष भी एक दासी की संतान थे। सूर्यकांत बाली ने ‘भारत गाथा’ में कवष ऐलूष को ‘वैदिक कविता को जमीन से जोड़ने वाला कवि’ कहा है। कवष के ऋग्वेद के दशम मंडल में कुल पांच(10/30-34) मंत्र हैं। जिनमें वह जुआरी की मनःस्थिति का वर्णन करता है। अंतः में उसे महत्त्वपूर्ण लौकिक संदेश तक ले जाता है—‘ओ जुआरी। जुआ मत खेल। मत खेल जुआ। जा अपने खेतों को देख। भार्या को देख। खेती करेगा तो धन आएगा। उसी से तुझे इज्जत मिलेगी। उसी से गौएं आएंगी। तेरी भार्या प्रसन्न होगी….घर जा। जुआ मत खेल।’ इस प्रसंग को महाभारतकार ने युधिष्ठिर के प्रसंग में ज्यों का त्यों अपना लिया गया है। बौद्ध धर्म के उभार से पहले भारत में भौतिकवादी दर्शन अपने शिखर पर था। उस समय के पांच प्रमुख आजीवक चिंतकों में से एक पूर्ण कस्सप को दास बताया गया है। बाकी दो आजीवक विद्वानों अजीत केशकंबलि और मक्खलि गोसाल की समाजार्थिक स्थिति भी दास की तरह ही थी।

ऋग्वेद(1/24) में शुनःशेप का कथासूत्र आता है। उस कथा का विस्तार ऐतरेय ब्राह्मण, भागवत पुराण, ब्रह्मपुराण आदि में भी देखने को मिलता है। कहानी के अनुसार राजा हरिश्चंद्र संतान की आकांक्षा के साथ वरुण की प्रार्थना करता है। वरुण प्रसन्न होते हैं। परंतु उनका वरदान सशर्त है—‘तुम्हारे संतान तो अवश्य होगी। लेकिन उसके लिए तुम्हें बलि देनी होगी।’ वरदान के फलस्वरूप हरिश्चंद्र के रोहित नामक पुत्र का जन्म होता है। लेकिन राजा बलि देना भूल जाता है। आखिरकार उसे याद दिलाया जाता है। रोग से पीडि़ता, दारुण अवस्था में हरिश्चंद्र 100 गायों के बदले अजीगर्त के पुत्र शुनःशेप को बलि के लिए खरीद लेता है। बाद में विश्वामित्र उसकी रक्षा करते हैं।

ऋग्वेद(2/12/4) तथा अथर्ववेद(20/34/4) में कहा गया है कि इंद्र ने दासों को गुफाओं में रहने को बाध्य कर दिया था। अनार्य दासों को आर्य ‘असुर’ मानते थे(ऋग्वेद, 9/71/2)। उन्हें पराधीन बनाने की जिम्मेदारी इंद्र पर डाली गई है। इंद्र से दासों को पराधीन करने के लिए जिस तरह बार-बार प्रार्थना की गई है, उससे लगता है, कि यह संबोधन उस समय के पूरे आर्येत्तर समुदाय के लिए रहा होगा, जो आर्यों के आगमन के पहले से ही इस भूभाग पर रहते आ रहे थे। ऋग्वेद में ‘दास’ के अलावा ‘दस्यु’ शब्द का भी कई बार प्रयोग हुआ है। सामान्यत दासों एवं दस्युओं को एक मान लिया जाता है। लेकिन ऋग्वेद में दस्युहत्या के उल्लेख हैं, जबकि दासहत्या का कोई उल्लेख नहीं है। दासों की अपेक्षा दस्युओं के विनाश तथा उन्हें पराधीन बनाने की चर्चा अधिक की गई है। इंद्र से अनुरोध किया गया है कि वे दस्युओं से युद्ध कर उन्हें परास्त करें, ताकि आर्यों की शक्ति बढ़ सके। ऋग्वेद(4/30/21) के एक प्रसंग में 30 सहस्र दासों को माया द्वारा मूर्छित करने का उल्लेख है। इससे पता चलता है कि दस्यु भारत आर्यों के आने से पूर्व शासक कबीले थे। ऋग्वेद में दस्युओं की हत्या की चर्चा कम से कम 12 स्थानों पर हुई है। अधिकांश हत्याएं इंद्र द्वारा ही कराई गई है।7 अंतर्जातीय युद्धों में दासों को भी सहायक सेना के रूप भर्ती किया जाता था। बावजूद इसके ‘कृष्णवर्ण अनार्यों को पराजित करना हंसी-खेल न था। अनार्य अपनी बढ़ी-चढ़ी सभ्यता के साथ अपने दुर्गों में सुरक्षित थे। ऋग्वेद(1/4/1/3) में उनके सैकड़ों पुरों और दुर्गों का उल्लेख है। उनमें लोहे(आयसी, 2/58/8), पत्थर(अश्ममयी, 4/30/20), लंबे-चौड़े(पृथ्वी), विस्तृत(उर्वी), गउओं से भरे हुए(गोमती, अथर्व 8/6/23), सौ खंबों वाले(शतभुजी) तथा शरतकालीन जलौघ से बचाने वाले दुर्ग शामिल थे.

अनार्य दास काले रंग(कृष्ण-योनि) के और अनास या चपटी नाक वाले थे। इसके अलावा कुछ सामाजिक-सांस्कृतिक भिन्नताएं भी थीं; यथा—

1. उनकी भाषा वैदिक-संस्कृति से भिन्न थी जो स्पष्ट नहीं थी(मृध-वाक्)।

2. वे वैदिक कर्मकांड से शून्य थे।(अकर्मन)

3. वे वैदिक देवों को नहीं पूजते थे(अदेवयु)।

4. वे देवों के लिए भक्ति से रहित थे(अब्रह्मन्)।

5. वे यज्ञ से विरहित थे(अयज्वन्)।

6. वे वैदिक व्रतों का पालन नहीं करते थे।(अव्रत)।

7. उनके स्थान पर भिन्न प्रकार व्रतों या धार्मिक नियमों को मानते थे(अन्यव्रत)।

8. वे वैदिक देवों के निंदक थे(देवपीयु)।

9. वे लिंग की पूजा करते थे(शिश्नदेव)।

ऋग्वेद में इंद्र को पुरंदर और शत्रु हंता कहा गया है। इसलिए कि उसने अनार्यों के सैकड़ों दुर्गों को नष्ट किया था। हजारों हत्याएं की थीं। इंद्र ने ये हत्याएं क्यों कीं? इन्हें समझना कठिन नहीं है। आर्य अपने लिए बेहतर देश की खोज में भारत तक पहुंचे थे। भारत पहुंचने पर उनका सिंधुवासियों से सामना हुआ। जो अपनी नागरी सभ्यता पर गर्व करने वाले, भले और शांतिप्रिय लोग थे। आर्यों ने कहीं बलपूर्वक, तो कहीं सहयोग-समझौते से सिंधु सभ्यता के मूल निवासियों को अपने प्रभाव में लेना आरंभ किया। इस कार्य में उन्हें जैसे-जैसे सफलता मिली, उनका लक्ष्य भी बदलता गया। राजनीतिक विजय के बाद उनका लक्ष्य था, देव-संस्कृति की श्रेष्ठता को स्थापित करना; तथा अनार्यों की श्रम संस्कृति, जिसका विकास कृषि के विकास के साथ-साथ हुआ था, को हेय सिद्ध कर, धीरे-धीरे नष्ट कर देना।

गौरतलब है कि अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक श्रेष्ठता को श्रेष्ठतम मानकर, पराजित समूहों को अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक परिधि में लाने का काम लगभग सभी ब्राह्मणेत्तर धर्मों और संस्कृतियों में हुआ था। ईसाई और इस्लाम के अनुयायियों ने तो उसके लिए बल-बुद्धि दोनों का प्रयोग किया था। मगर ब्राह्मणों ने एकदम उलटा तरीका अपनाया था। वर्ण-व्यवस्था की मदद से उन्होंने न केवल आर्येत्तर समूहों को, अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सेदारी से दूर रखा, अपितु अपने ही एक हिस्से पर जिसे उन्होंने शूद्र की संज्ञा दी थी, ऐसे अनेक प्रतिबंध लागू कर दिए जिससे उनका सामाजिक जीवन, अत्यंत कष्टकारी होता गया। इसके पीछे आर्यों की कुंठा का योगदान भी रहा होगा। सिंधुवासी समृद्ध नागरी सभ्यता के उत्तराधिकारी थे, जो समकालीन संस्कृतियों से श्रेष्ठतम थी। 1500 ईस्वीपूर्व में आर्यों के आगमन तक, उसका प्राचीन वैभव यद्यपि क्षीण होने लगा था, तथापि घुमक्कड़ आर्यों की संस्कृति की अपेक्षा वे कहीं अधिक विकसित थे। यह जानते हुए कि भौतिक प्रगति के मामले में वे सिंधुवासियों से होड़ कर पाना असंभव है, आर्यों ने यज्ञ केंद्रित वायवी संस्कृति की नींव रखी। उन्होंने प्राकृतिक शक्तियों का मानवीकरण किया। दावा करने लगे कि यज्ञादि के माध्यम से वे देवताओं से सीधे संवाद कर सकते हैं। आवश्यकता पड़ने पर उन्हें बुला भी सकते हैं। चूंकि उन दिनों सिंधु सभ्यता अपने अवसानकाल में थी, इसलिए एक समृद्ध सभ्यता के पराभव से निराश हुए सिंधुवासी धीरे-धीरे ब्राह्मणों की वायवी संस्कृति के प्रलोभन में फंसने लगे। ब्राह्मणों ने उन्हें आर्य संस्कृति में जगह दी, मगर इसके लिए उन्हें अपना आत्मसम्मान गंवाना पड़ा। ब्राह्मणों ने उन्हें शूद्र और दास के रूप में स्वीकार किया। दासों की कोई जाति नहीं थी। मगर कई शूद्र जातियों का सामाजिक स्तर शूद्र से भी बदतर था।

ऋग्वेद की कई ऋचाएं इसकी साक्षी हैं कि आरंभिक विजयों के साथ ही आर्यों को अपनी सांस्कृतिक विजय की चिंता होने लगी थी। वे अनार्यों के संसाधनों को कब्जाने के साथ-साथ उनकी संस्कृति को भी तहस-नहस कर देना चाहते थे। कभी छल तो कभी बल-पूर्वक वे लड़ाई को जीतते भी रहे। यह लड़ाई आसान नहीं थी। लोग ईसाइयों पर आरोप लगाते हैं कि मिशनरियों ने जनता के बीच जाकर लोगों को धर्मांतरण के लिए उकसाने, प्रलोभन देकर अपनी ओर मिलाने की कोशिशें कीं। वे इस्लाम के प्रसार हेतु जेहाद छेड़ने वाले मुस्लिमों को भी दोषी ठहराते हैं। जबकि भारत में सबसे पहला ‘जेहाद’ तो आर्यों ने अनार्यों के साथ किया था। बाद में वैसा ही जेहाद पुष्यमित्र शुंग ने वौद्धों का कत्लेआम करके किया था।

उपनिषदों में दासप्रथा

उपनिषदों को आमतौर पर दार्शनिक विमर्श के लिए जाना जाता है। कहा जाता है कि वेदों में जो दार्शनिक विचार सूत्र रूप में दिए हैं, उपनिषदों में आकर वे स्वतंत्र धारा का रूप ले लेते हैं। उपनिषदों में भी सबसे बड़ा है—छांदोग्योपनिषद। उसके चौथे अध्याय में राजा जानश्रुति और वायु को सृष्टि का मूल तत्व मानने वाले ऋषि रैक्व का संदर्भ आता है। रैक्व की ख्याति से प्रभावित जानश्रुति धर्मोपदेश की कामना के साथ अपनी पुत्री और धन-धान्य उन्हें भेंट कर देता है। उपनिषदों में ऐसे और प्रसंग भी हैं, जिनमें स्त्री के साथ दास जैसा व्यवहार किया गया है। कुछ विद्वान ऋग्वेद के दिवोदास को जो स्वयं कई ऋचाओं के उद्गाता थे, दासी-पुत्र मानते हैं।9

दासियों से मनोरंजन का काम लेने का भी उल्लेख है। तैत्तिरीय संहिता में सिर पर कलश रखकर नाचती-गाती हुई दासियों का वर्णन आया है। इसी ग्रंथ में दास के दान का भी उल्लेख है(2/2/6/3)। कठोपनिषद में दासियां नचिकेता को अपनी ओर लुभाने का यत्न करती हैं।11 ऐतरेय ब्राह्मण(39.8) में जिक्र आता है कि राजा ने राज्याभिषेक वाले पुरोहित को दस हजार दासियां और दस हजार हाथी दिए। वृहदारण्यकोपनिषद्(4.4.23) में आया है कि याज्ञवल्क्य से बृह्मविद्या की शिक्षा लेने के पश्चात जनक ने उनसे कहा, ‘विदेहों के साथ मैं स्वयं को दास बनने की कामना के साथ, आपको दान-स्वरूप प्रदान करता हूं।’ छांदोग्योपनिषद(7.24.2) में लिखा है, ‘इस संसार में लोग गायों, घोड़ों, हाथियों, सोने, खेतों, घरों एवं दासियों के साथ अपने घरों को समृद्ध करते हैं।’ इसी उपनिषद के एक प्रसंग में राजा अश्वपति ने सत्ययज्ञ से कहा था—‘खच्चरों से जुता हुआ यह रथ, दासियों तथा हार सहित प्रस्तुत है।12 इससे पता चलता है कि ऋग्वेदयुगीन दास प्रथा का वेदोत्तरकाल में खूब विकास हुआ था। यह प्रथा तत्कालीन अभिजन समाज के लिए गर्व की बात थी। यहां तक कि स्वयं को तापस और साधक कहने वाले तथाकथित वेदज्ञ ब्राह्मण भी उससे बचे न थे। आरुणि जब अपने पुत्र श्वेतकेतु के साथ ज्ञान-प्राप्ति की आकांक्षा में पांचाल नरेश प्रवाहण जाबालि के निकट पहुंचे तो वहां गाय, अश्व, परिवार और परिधानों के अतिरिक्त ‘दासी’ भी मौजूद थी।13 

स्मृतिकालीन दासप्रथा

हिंदू धर्म में स्मृतियों का स्थान वेद-वेदांगों के बाद आता है। उन्हें हिंदू धर्म का आधारभूत ढांचा माना गया है। सभी धर्मशास्त्र, पुराण, महाकाव्य, सूत्र आदि स्मृतियों का अंग माने गए हैं। जहां तक दासप्रथा का सवाल है, मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, नारद, बृहस्पति, कात्यायन स्मृति सहित दोनों महाकाव्यों तथा अन्य धर्मशास्त्रों में उसका उल्लेख हुआ है। स्मृतियों का रचनाकाल बौद्ध धर्म के बाद से, चौथी शताब्दी तक फैला हुआ है। इस बीच दासों के कार्यक्षेत्र में भी वृद्धि हुई थी। गृह्मसूत्रों में सम्मानित अतिथियों के चरण धोने के लिए दासों की नियुक्ति का उल्लेख है। मनु(1.91, 8.413-414) के अनुसार शूद्रों का प्रमुख कर्तव्य है, उच्च वर्णों की सेवा करना। उसके बाद उसने जो व्यवस्थाएं की हैं, उनमें अधिकांश वही हैं, जो दासों के लिए थीं। धन-संचय का अधिकार न शूद्रों को था, न ही दासों को। यदि कोई शूद्र अथवा दास संपत्ति संचय में सफल हो जाए तो उसकी संपत्ति को छीनकर ब्राह्मणों को देने का नियम था। जैसे कुम्हार की संतान कुम्हार, जुलाहे की जुलाहा कही जाती थी, ठीक उसी प्रकार दास की संतान भी दास कहलाती थी। अंतर बस एक था। विशिष्ट परिस्थितियों में दास को स्वतंत्र किया जा सकता था। वह सामान्य जीवन जी सकता था। परंतु शूद्र को अपने जातिगत पेशे से हटकर काम करने की अनुमति नहीं थी। यहां तक कि आजाद होने के बाद भी दास पर उसकी जाति चिपकी रहती थी।

स्मृतिकाल तक दास प्रथा सांस्थानिक रूप ले चुकी थी। दास-दासियों को लेकर कानून बनाए जाने लगे थे। याज्ञवल्क्य किसी दास के साथ विवाद न करने की सलाह देते हैं। वहीं जैमिनी(6.7.6) ने शूद्रों के दान को निषिद्ध माना है, जबकि मनु ने शारीरिक दंड की व्यवस्था में दास एवं पुत्र को एक ही श्रेणी में रखा है(8.299-300)। आपस्तंबधर्मसूत्र(2.4.9.11) में आया है कि अतिथि के अकस्मात पहुंच जाने पर, खुद को, स्त्री या पुत्र को भूखा रखा जा सकता है, किंतु उस दास को नहीं, जो रात-दिन सेवा में लिप्त रहता है। नारद के अनुसार गृहस्वामी चाहे तो दास को पुत्र की भांति अपनी संपत्ति का एक हिस्सा प्रदान कर सकता है। वर्ण-व्यवस्था के बंधन दासों पर भी उसी प्रकार लागू होते थे। याज्ञवल्क्य (2.183) तथा नारद (39) के अनुसार ब्राह्मण के अतिरिक्त बाकी तीनों वर्ण ब्राह्मण के दास बन सकते थे। क्षत्रिय के दास केवल वैश्य अथवा शूद्र बन सकते थे। क्षत्रिय किसी वैश्य या शूद्र का तथा वैश्य शूद्र का दास नहीं सकता था। कात्यायन ब्राह्मण के दासत्व ग्रहण करने पर थोड़ी छूट प्रदान करते हैं। उनके अनुसार ब्राह्मण किसी ब्राह्मण का भी दास नहीं बन सकता। यदि बनना ही चाहता है तो उसे किसी चरित्रवान, एवं वैदिक ब्राह्मण का दास बनने की अनुमति है। वह भी केवल पवित्र कार्यों के लिए।14 कात्यायन(7.33) ने व्यवस्था थी कि संन्यास से भटके हुए ब्राह्मण को राज्य से बाहर निकाल देना चाहिए। लेकिन संन्यास भ्रष्ट क्षत्रिय एवं वैश्य राजा के दास होते हैं। कौटिल्य(3.13) एवं कात्यायन(7.23) के अनुसार यदि स्वामी दासी से संसर्ग करे और संतानोत्पत्ति हो तो दासी एवं पुत्र दोनों को दासत्व से मुक्ति मिल जाती है। दास की गवाही अमान्य थी। परंतु विशिष्ट परिस्थिति में जब कोई अन्य साक्ष्य अनुपलब्ध हो तो मनु(8.70) ने नाबालिग, स्त्री, नौकर आदि के साथ दास की गवाही को भी मान्य ठहराया है।

स्मृतिकाल तक दासों की कई कोटियां बन चुकी थीं। मनुस्मृति(8.415) में 7 प्रकार के दासों का उल्लेख है। कौटिल्य का मत भी मिलता-जुलता है, जबकि नारदस्मृति दासों की 15 कोटियों की लंबी सूची प्रस्तुत करता है—‘1. घर में पैदा हुआ, 2. खरीदा हुआ।, 3. दान अथवा किसी अन्य प्रकार से प्राप्त, 4. वसीयत से प्राप्त, 5. अकाल में रक्षित, 6. किसी अन्य स्वामी द्वारा प्रतिश्रुत, 7. बड़े ऋण से युक्त, 8. युद्धबंदी, 9. बाजी में जीता हुआ, 10. ‘मैं आपका हूं’ कहकर दासत्व ग्रहण करने वाला, 11. संन्यास से च्युत, 12. जो कुछ दिनों के लिए स्वेच्छापूर्वक दास बना हो, 13. भोजन के लिए दास बना हुआ, 14. दासी के प्रेम से आकृष्ट(बड़वाहृत) तथा 15. स्वयं को बेच देने वाला।15  

‘अर्थशास्त्र’ के अनुसार स्मृतिकाल में दासों की खरीद-फरोख्त, उन्हें दान में लेने-देने, गिरवी रखने का प्रचलन बढ़ चुका था। कौटिल्य ने लिखा था कि प्रत्येक स्वतंत्र परिवार उदरदास(दास के पेट से उत्पन्न संतान) अवश्य रखता है। दास अपने स्वामी की संपदा कहे जाते थे। उन्हें गिरवी रखा जा सकता था। यहां तक कि उनकी हत्या भी की जा सकती थी। दासों को न्यूनतम न्याय देने के लिए स्मृतियों में कुछ अनुशंषाएं की गई थीं। परंतु व्यवहार में उनका उपयोग बहुत कम हो पाता था। इसलिए स्वामी द्वारा दास पर दंडात्मक कार्यवाही के विरुद्ध किसी अदालत में सुनवाई नहीं थी।16 

उन दिनों दासों का जीवन अत्यंत कष्टकारी होता था। बीमार पड़ जाने पर उनके लिए इलाज की कोई व्यवस्था न थी। नियमानुसार दास अपना मूल्य चुकाकर अपनी आजादी खरीद सकता था। परंतु व्यवहार में ऐसा संभव ही नहीं था। इसलिए दास और उसका परिवार मालिक के लिए जो भी परिश्रम और धनार्जन करता था, उससे उत्पन्न आय उसके स्वामी की मानी जाती थी। दास का अपनी आय का कोई स्रोत नहीं था। इसलिए उसकी आजादी, सिवाय किसी चमत्कार के, असंभव जैसी थी। मुक्ति की चाहत में कई बार कुछ दास अपने स्वामी का घर छोड़कर भाग भी जाते थे। दास पर अत्याचार के समय मौन रहने वाला, उसके विरुद्ध मनमानी दंडात्मक कार्यवाही को दास-स्वामी का विशेषाधिकार मानने वाला राज्य, उस समय एकाएक बीच में कूद पड़ता था। राज्य के कर्मचारी भगोड़े दास को पकड़कर पुनः उसके स्वामी के सुपुर्द कर देते थे। खुद को गिरवी रखने वाला व्यक्ति यदि घबराकर भाग जाता तो उसे जीवन-भर के लिए दास बना लिया जाता था। मालिकों द्वारा दासियों का मान-भंग करने तथा उन्हें दूसरों के आगे पेश करना तो शान की बात मानी जाती थी।

स्मृतिकाल के दौरान दास-प्रथा पर काफी लिखा गया है। विशेषकर नारद और कात्यायन स्मृति में। नारद ने दूसरों की सेवा करने वाले(शुश्रूषक) को पांच भागों में बांटा है—1. वैदिक छात्र, 2. अंतःवासी, 3. पर्यवेक्षक(अधिकर्मकृत), 4. भृतक, तथा 5. दास। इनमें प्रथम चार को कर्मकार कहा जाता था। पवित्र कार्यों के समय उन्हें आवश्यकतानुसार बुलाया जा सकता था। दासों के लिए काम की कोई तय सूची नहीं थी। उनसे कोई भी काम लिया जा सकता था। नारद स्मृति(6.7) के अनुसार दासों के कुछ सामान्य कार्य थे—‘साज-सफाई करना, यथा झाड़ू लगाना, गंदे गड्ढों, मार्ग, गोबर, कूड़ा, तालाब आदि की सफाई करना गुप्तांगों को खुजलाना, मल-मूत्र फेंकना आदि। गौतम धर्मसूत्र(2.1.59) में भी ‘पुरुष दासादयः वंशोवंध्या’ कहकर समाज के उच्च वर्गों की सेवा को उनका कर्तव्य कहा गया है।

दासों के छूटने के नियम तथा उसके मुक्त होने की पूरी पद्धति थी। याज्ञवल्क्य(2.182) के अनुसार यदि दास किसी हमले या दुर्घटना के कारण स्वामी के संकट में पड़े जीवन की रक्षा कर ले, तो उसे मुक्त किया जा सकता है। नारद ने भी इसकी पुष्टि की है। दासत्व से मुक्ति का प्रावधान भी धर्मशास्त्रों में दिया गया है। नारद स्मृति के अनुसार स्वामी जल से भरे मिट्टी के एक घड़े को दास के कंधे से उतारकर उसे तोड़ डालता था। तदनंतर अन्न एवं पुष्पमिश्रित जल को दास के सिर पर छिड़कते हुए तीन बार उसके स्वतंत्र होने की घोषणा करता था।17 ध्यातव्य है कि यूनानी लेखक  मेगस्थनीज, जो चंद्रगुप्त मौर्य की सभा में सेल्यूकस निकेटर का राजदूत था—ने अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में भारत में दासप्रथा की मौजूदगी से इन्कार किया है। जबकि उस दौरान लिखे जा रहे सभी धर्मग्रंथ दास प्रथा की मौजूदगी का समर्थन करते हैं।

महाकाव्यों में दास प्रथा

भारतीय जनमानस में रामायण और महाभारत की बड़ी प्रतिष्ठा है। इनमें रामायण को महाभारत से पहला माना जाता है। परंतु जिस तरह उसमें ब्राह्मणवाद मुखर होकर आया है, वह बौद्ध धर्म से पहले की रचना नहीं हो सकती। अपने वर्तमान स्वरूप में दोनों ही ग्रंथ पुष्यमित्र शुंग के बाद की रचना है। हालांकि उनके कुछ कथासूत्र प्राचीन हो सकते हैं। ईसा पूर्व पांचवी-छठी शताब्दी में आजीवकों और बौद्धों की ओर से मिल रही चुनौतियों के कारण आभाहीन हो चुका ब्राह्मण-धर्म, अनुकूल माहौल में अपने राजनीतिक एवं सांस्कृतिक वर्चस्व को पुनःस्थापित करने में लगा था। इसके लिए समर्थन और विरोध दोनों नीतियों पर काम जारी था। एक ओर बुद्ध को दसवें अवतार के रूप में प्रतिष्ठित करके उनके विचारों को भारतीय धर्म-दर्शन की शाखा के रूप में मान्यता दी जा रही थी, दूसरी ओर ब्राह्मण धर्म को मजबूत करने के लिए वर्ण-व्यवस्था को दैवीय घोषित करने वाले ग्रंथ रचे जा रहे थे। उन सबका एकमात्र उद्देश्य था, जनसाधारण को यह विश्वास दिलाना कि ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ है और वर्ण-व्यवस्था उसका आदर्श विधान है।

जो लोग रामायण और महाभारत की अतिप्राचीनता का दावा करते हैं, उन्हें समझ लेना चाहिए कि रामायण का मूल संस्करण, जिसे वाल्मीकि ने ‘पुलत्स्य वध’ शीर्षक से लिखा था, वह अनुपलब्ध है। महाभारत के पूर्व संस्करणों ‘जय’, ‘विजय’ और ‘भारत’ के बारे में भी हमारी जानकारी शून्य है। यहां तक कि हम उनकी शैली और कथा-वस्तु के बारे में कुछ भी दावे के साथ नहीं कह सकते। लेकिन इतना अवश्य कह सकते हैं कि इनके मूल कथानक अपने समय की साहित्यिक संपदा रहे होंगे। बाद की कृतियों में राम का अतिमानवीकरण, गौतम बुद्ध की श्रीलंका तथा पड़ोसी देशों में ‘धम्म विजय’ के बाद, ब्राह्मणों के मन में जन्मी कुंठा की सृजनात्मक परिणति थे। यह काम बौद्ध धर्म के कमजोर होने के बाद ही संभव था।

महाभारत में जिस प्रकार गणसंघों का प्रमुखत: उल्लेख हुआ है, वह रामायण में मौजूद समाज से करीब 200-300 वर्ष पुराने समाज की प्रतीति कराता है। उन दिनों भारत में गणराज्य काफी मजबूत अवस्था में थे। महाभारत छोटे राज्यों की अप्रासंगिकता को भी दर्शाता है। भारतीय समाज में यह बोध सिकंदर के आक्रमण के बाद बना था। उल्लेखनीय है कि सिंकदर के आक्रमण से पहले भी भारत पर यूनान की तरफ से दो बड़े हमले हो चुके थे। उनमें पहला हमला असीरिया की साम्राज्ञी सेमिरामिस की ओर से था। दूसरा आक्रमण ईरान के प्रसिद्ध विजेता कुरु की ओर से। कुरु को अंग्रेजी में साइरस लिखा जाता है। कुरु ने काबुल से लेकर इराक, शाम, टर्की, बेबिलोन, मिस्र तथा यूनान के कुछ हिस्से पर अपनी विजय पताका लहराई थी। भारत पर आक्रमण के बाद उसे सेमिरामिस की तरह ही शर्मनाक पराजय का रूप देखना पड़ा था। कुरु की मृत्यु भारतीय योद्धा के हाथों ही हुई थी। सिंकदर का आक्रमण इन सबमें बड़ा था। मगर उसका सामना चंद्रगुप्त मौर्य जैसे राजा से था, जिसके पास विश्व की सबसे विशाल सेना थी। उसमें छह लाख से ज्यादा पैदल सिपाही थे। चंद्रगुप्त ने उसमें से पांच लाख सैनिक सिंकदर से लड़ने के लिए उतारे थे। भारतीय कवियों, लेखकों ने पहली बार बड़ी सेना को दुश्मन से लोहा लेते हुए देखा था। उसी से बड़े राज्यों की अवधारणा ने जन्म लिया। कदाचित वही महाभारत की  18 अक्षौहिणी सेना के मिथ की प्रेरणा बना। उसका परिणाम रामायण और महाभारत के उपलब्ध आख्यानों के पुनर्लेखन के रूप में सामने आया। उसके बाद भी इन दोनों ग्रंथों में शताब्दियों तक प्रक्षेपण होते रहे हैं। दो हजार वर्ष पहले तक भारत में दास प्रथा, सामाजिक व्यवस्था का आवश्यक अंग बन चुकी थी। इसलिए रामायण और महाभारत में उनका खूब उल्लेख हुआ है। तत्कालीन परिस्थितियों में इतनी बड़ी सेना का खर्च उठाने के लिए भारी-भरकम अर्थव्यवस्था; तथा उसके लिए दासप्रथा का होना अपरिहार्य जैसा था। इसके प्रमाण इन दोनों महाकाव्यों में उपलब्ध हैं।  

रामायण में राम के चरित्र को उदात्त बताया गया है। तुलसी उसे ‘मर्यादापुरुषोत्तम’ तक कह जाते हैं। तुलसी के लिए ‘मर्यादापुरुषोत्तम’ का मतलब ब्राह्मणवादी संस्कृति और वर्णव्यवस्था के प्रति अंध-समर्पण है। दास-दासियों के मामले में भी वह ठेठ परंपरावादी हैं। इसलिए विवाह में खुशी-खुशी दहेज लेते हैं। बकौल तुलसीदास—‘दहेज इतना अधिक था कि उसका वर्णन संभव ही नहीं है। स्वर्ण आभूषणों तथा मणियों से मंडप भर गया था। वहां हाथी, स्वर्णाभूषण, माणिक-मणियां, घोड़े, दास और दासियां तथा अलंकारों से सजी कामधेनु सरीखी बहुत-सी गौएं थीं।’

‘कहि न जाय कछु दायज भूरी, रहा कनक मणि मंडप पूरी

गज रथ तुरग, दास अरु दासी, धेनु अलंकृत काम दुहासी।

इस बात से वाल्मीकि भी इत्तफाक रखते हैं। राम के विवाह में दिए गए दहेज का वर्णन करते हुए वे भी गदगद हो जाते हैं—‘कन्या के पिता जनक ने दास-दासियों सहित, सोने, मोती-माणिकों और मुद्राएं दहेज में अर्पित की थीं।’18 यह तो राजा जनक द्वारा वरपक्ष यानी राम और उसके परिवार को दिए गए दहेज का वर्णन है। इसके अलावा उन्होंने सीता और अपनी बाकी पुत्रियों को भी सौ-सौ कन्याएं तथा उत्तम दास-दासियां दहेज के रूप में प्रदान की थीं। उत्तरकांड में अयोध्या के सामंत और छोटे राजाओं ने दासियां प्रदान की थीं।19 उन दिनों गुरु लोग आश्रमवासी हुआ करते थे। परंतु दासियों का दान लेने से उन्हें भी इन्कार न था। सो मर्यादापुरुषोत्तम गुरु, ब्राह्मणों और आचार्यों को कैसे भूल जाते। खुशी का अवसर नहीं था। वनवास के लिए निकलना था। राजमहल में क्लेश व्याप्त था। फिर भी गुरु को प्रसन्न करने के लिए राम ने उन्हें अपने दास-दासियों को भेंट कर दिया था—‘दासी-दास बोलाइ बहोरी, गुरहि सौंपि बोले कर जोरि’ (रामचरितमानस, अयोध्याकांड)। दशरथ का महल दास-दासियों से भरा हुआ था। राम का भवन हो या लक्ष्मण का; या फिर भरत की आरामगाह हो। सभी जगह दास-दासियों की भरमार थी। कैकई तो मंथरा नामक दासी को मैके से अपने साथ लेकर आई थी। चूंकि मंथरा के लिए कैकई ही उसकी स्वामिनी और सबकुछ थी। इसलिए वह चाहती थी कि भरत ही अयोध्या का भावी सम्राट बने। हनुमान का अपना आचरण दासत्व को पूरी तरह स्वीकार लेने वाला प्राणी जैसा है। उसकी अष्ठ सिद्धियां और नवनिधियां राम के चरणों में पड़े-पड़े गारत हो जाती हैं। शुनःशेप की कहानी रामायण में कुछ और विस्तार से प्रस्तुत है।

रामायण में हमारा तीन समाजों और संस्कृतियों से वास्ता पड़ता है। पहला अयोध्या और उसकी संस्कृति है। दूसरी किश्किंधा और तीसरी लंका की। किश्किंधा में बालि, सुग्रीव अंगद जैसे नेता हैं। वे आखेटक समुदाय से हैं जो प्रकृति से अपना भोजन जुटाते थे। बालि के राज्य में अथवा सुग्रीव के ठिकाने पर किसी दास के दर्शन नहीं होते। आवश्यकता पड़ने पर सभी वानर स्वेच्छा से राम की सेना में भागीदारी करते हैं। उनमें पदानुक्रम तो है परंतु दास और अदास का विभाजन नहीं है। लंकाकांड के दौरान हनुमान राम का संदेश लेकर लंका जाता है। वहां का वैभव देखकर वह हतप्रभ रह जाता है। लंका के सभी घर बराबर थे। धन-धान्य और वैभव से भरपूर। रामायण में लंका की अर्थव्यवस्था के बारे में कोई उल्लेख नहीं है। मगर जिस तरह की समृद्धि का वर्णन हनुमान करता है, उससे पता चलता है कि वहां अवश्य ही व्यापार केंद्रित अर्थव्यवस्था रही होगी, जबकि अयोध्या का समाज कृषि-केंद्रित था। जहां तक दास-दासियों का सवाल है, उनका उल्लेख न तो किश्किंधा के वानर समाज में था, न ही लंका के राक्षसों के बीच। यहां तक कि रावण के दरबार में भी किसी दास या दासी का उल्लेख नहीं है। अशोकवाटिका में राक्षसियां पहरा देती थीं। मगर वे सभी अनुचरी थीं। यह भी संभव है कि दास प्रथा को शान और समृद्धि का प्रतीक माना जाता था, इस कारण वाल्मीकि और तुलसी दोनों ने वहां दासों की कल्पना न की हो। यह बात पात्रों के चरित्र-चित्रण में भी नजर आती है। रावण के दरबारी जरूरत पड़ने पर अपने राजा से बहस करते, उसे समझाते हैं। राम के दरबारियों को यह सुविधा प्राप्त नहीं थी। वहां सिर्फ ‘हां’ में ‘हां’ मिलाने और जय-जयकार करने का अवसर था। कह सकते हैं कि समाज का दासभाव दरबारियों के चरित्र की भी विशेषता था, इसलिए वहां दास-प्रथा के मजबूत होने के सभी अवसर थे। रामायण का आदर्श भी ऐसा ही समाज है, जहां कुछ लोग मालिक हों और बाकी लोग दास जैसा आचरण करते हों।

महाभारत के नायक कृष्ण हैं। वे अंधक गणराज्य के मुखिया है। गणतंत्र में भरोसा रखते हैं। इसलिए दासत्व के लिए उनके यहां वैसी जगह नहीं है, जैसी राम के यहां हैं। कृष्ण स्वयं अपने साथियों-सहयोगियों के साथ मैत्री-भाव रखते हैं। मगर कृष्ण के देवत्व को मान्यता देने वाले ब्राह्मण उन्हें खुली छूट देने को तैयार नहीं थे। इतिहासचक्र के अचानक घूम जाने की बात है जिससे ब्राह्मणों को एक ग्वाले के देवत्व को स्वीकारना पड़ा। फिर भी इतना ध्यान उन्होंने रखा कि वे ब्राह्मण विरोधी न दिखें। ऋग्वेद में इंद्र को चुनौती देने वाले कृष्ण का नया रूपाकार ब्राह्मणवाद का आराधक हो, इस कारण उन्हें सुदामा के पैर धोते हुए दिखाया गया है। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में अतिथियों के पांव धोने की जिम्मेदारी भी उन्हीं को ओटनी पड़ी। महाभारतकार उसी का महिमा मंडन करता है। यदि अतिथियों के पांव-प्रक्षालन करना इतना ही पुनीत कार्य था तो यह काम किसी ब्राह्मण को क्यों नहीं सौंपा गया? अथवा वह जिम्मेदारी युधिष्ठिर या उसके किसी भाई न स्वयं क्यों न संभाल ली? महाभारत में इस सवालों के लिए कोई जगह नहीं है। वैसे भी, जहां धर्म होता है, वहां सवाल या शंकाएं नहीं होतीं। केवल आस्था होती है। आंख मूंदकर विश्वास करना पड़ता है। अगर सवाल होते तो महाभारत धर्मयुद्ध कभी न बन पाता।

महाभारत में दास प्रथा का उल्लेख अनेक अवसरों पर हुआ है। हमने आरंभ में ही बता दिया है कि राजसूय यज्ञ कराने के उपलक्ष्य में युधिष्ठिर ने 88,000 ब्राह्मण पुरोहितों में से प्रत्येक को तीस दासियां उपहार स्वरूप दी थीं। वनपर्व में दिया है कि वैन्य ने अत्रि को एक हजार सुंदर दासियां प्रदान कीं।20 विराटपर्व(18.21) में 30 दासियां दान करने का एक और उल्लेख आया है। दासों का वर्णन जितना खुलकर दिया गया है, उससे लगता है कि समाज में शूद्र और दास में बहुत अंतर नहीं था। सभापर्व में युधिष्ठिर के महल में एक लाख दासियां होने का वर्णन हुआ है। यह वर्णन अतिश्योक्तिपूर्ण हो सकता है। संभव है हस्तिनापुर की कुल शूद्र स्त्रियों को ही युधिष्ठिर की दासी मान लिया हो। क्योंकि आगे उसमें लिखा है कि युधिष्ठिर अपनी दासियों का अनुरोध सुनने के लिए सदैव तत्पर रहता था। विराटपर्व(7.17) के अनुसार पांडवों के निजी कक्ष भी दास-दासियों से समृद्ध थे।। दास-दासियों की संख्या को लेकर यह अतिरंजना अन्य स्थानों पर भी पाई जाती है। उदाहरण के लिए देवयानी और शर्मिष्ठा के विवरण को ही लें। उन दोनों की एक-एक हजार दासियां बताई गई हैं। उन दिनों दहेज में दास-दासियां देने का चलन था। द्रोपदी के विवाह में भी द्रुपद की ओर से पांडवों को बड़ी संख्या में दासियां दी गई थीं।21 महाभारत काल में दास-दासियों की उपस्थिति के प्रचुर प्रसंग हैं। दुर्योधन के साथ जुआ खेलते समय युधिष्ठिर ने दावा किया था कि उसके पास एक लाख तरुण दासियां हैं। वे सुंदर हैं। सुवर्णमय मांगलिक आभूषण तथा मनोहारी वस्त्र धारण करती हैं। मणि और स्वर्णाभूषणों से लदीं, चौसठ कलाओं में निपुण उन दासियों को युधिष्ठिर अपना धन मानते थे।22 

महाभारत एक वृहद ग्रंथ है। उसके भीतर अनेक उपकथाएं समाहित हैं। कद्रु-वनिता, नल-दमयंती, देवयानी, शर्मिष्ठा जैसे उपाख्यानों में भी दास प्रथा का उल्लेख है। इसमें भी नल-दमयंती का प्रकरण इतना रोचक है कि वह स्वतंत्र लोककथा के रूप में भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में ख्यात रहा है। इस उपकथा में भी जुए की बुराई को दर्शाया गया है। नल-दमयंती आख्यान के अंतिम हिस्से में पुष्कर जुए में खुद को हार जाता है। परिणामस्वरूप उसे अपनी स्वतंत्रता लुटाकर दास बनना पड़ता है। कालांतर में वह पुनः मुक्त हो जाता है। उन दिनों एक नियम यह भी था कि युद्ध में पराजित को, विजेता का दासत्व स्वीकारना  वह आमतौर पर तब तक रहता था, जब तक फिरौती या बदले में कुछ हासिल न हो जाए।23 प्राय:  विजेता को प्रसन्न करने के लिए बाकी भेंटों के अलावा दासियां भी भेंट की जाति थीं, इस कारण उन दिनों दास-दासियां प्रचुर संख्या में होती थीं।  महाभारत(3.76.77)। लोपामुद्रा की सेवा में 1000 दासियां रहती थीं। एक प्रसंग में च्यवन ऋषि मछुआरे के जाल में फंसकर उसकी संपत्ति बन जाते हैं। आखिरकार एक राजा उन्हें खरीदकर उनकी स्वतंत्रता वापस दिलाता है। भरत दक्षिणा स्वरूप दासों की भेंट करते हैं। असल में वह शक्तिशालियों का समाज था। स्त्री, पुरुष, धन-धान्य, पशु, भूमि कुछ भी हो, इन सभी को ताकत के बल पर जीता जा सकता था। जीतने के बाद वे विजेता की संपत्ति मान लिए जाते थे। ताकत का बोलबाला था। जो ताकतवर था, वह लोगों गरीबों, विपन्नों और कमजोरों को कैद करने, उन्हें दास बनाने यहां तक कि हत्या करने की धमकी भी देते रहते थे। दास का कर्तव्य था, अपने प्राणों पर खेलकर भी अपने स्वामी के आदेश का पालन करना। कुरुक्षेत्र में युद्ध के दौरान एक अवसर ऐसा आता है जब भीष्म(भीष्मपर्व 4.15.534) कृष्ण को अपना स्वामी मानकर अपने हथियार डाल देते हैं—‘हे प्रभो! तुम मुझ पर चाहे जैसे आक्रमण करो, मैं तुम्हारा दास हूं।’ युधिष्ठिर द्वारा खुद को तथा अपने भाइयों को दाव पर लगा देने के बाद, पांडवों की स्थिति भी दास जैसी बन चुकी थी। दास बनने के साथ ही वे अपनी इच्छाएं, अपनी स्वतंत्रता और विरोध की क्षमता भी गंवा चुके थे। उनके शरीर, इच्छाएं सभी कुछ दुर्योधन के अधीन हो चुके थे, जिसने उन्हें जुए में जीता था। एक स्थान पर आता है कि पुत्र, पत्नी और दास का संपत्ति में कोई अधिकार नहीं होता, क्योंकि उनपर क्रमशः पिता, पति और स्वामी का अधिकार होता है।

दास प्रथा में स्त्रियों की और भी अधिक दुर्दशा होती थी। प्राचीन मनीषी मानते थे कि कन्या गिरवी रखे आभूषण की तरह है, जिसे मांगे जाने पर उसके वास्तविक स्वामी को वापस लौटाना ही धर्म है। इस धारणा का विकृत विस्तार मंदिरों में देवदासी प्रथा के रूप में मिलता है जिसमें ईश्वर को समर्पित करने के नाम पर नन्ही बालिकाएं मंदिर के पुजारियों को सौंप दी जाती थीं। महाभारत में एक और प्रसंग आया है जो उस समाज में स्त्री की दुर्दशा को दर्शाता है, जिसके अनुसार स्त्री की हैसियत उस समाज में दास और कहीं-कहीं तो उससे भी बदतर थी। विश्वामित्र ने ऋषि गालव से गुरु दक्षिणा के रूप में 800 श्यामकर्णी घोड़ों की मांग की। 800 श्यामकर्णी घोड़ों का प्रबंध करना हंसी-खेल नहीं था। अगर इससे दस गुनी दासियां मांगी होतीं तो कोई भी राजा पलक झपकते इंतजाम कर देता। लेकिन 800 श्यामकर्णी घोड़े! परेशान गालव अपने मित्र गरुड़ से मिला। गरुड़ ने उसे सम्राट ययाति के पास जाने की सलाह दी। ययाति के पास श्यामकर्णी घोड़े तो थे नहीं। परंतु द्वार पर आए याचक को लौटाए कैसे? अंतत: उसने माधवी नामक अपनी सुंदर पुत्री गालव ऋषि को सौंपते हुए कहा—

‘हे महर्षि! यह मेरी कन्या है। यह अपूर्व सुंदरी, लावण्यमयी एवं सर्वगुणसंपन्न है। तीनों लोकों में ऐसा कोई भी नहीं जो इसे वरण करने की इच्छा न रखता हो। इसमें सुर, नर, किन्नर, आर्यों, अनार्यों सभी को सम्मोहित करने की अभूतपूर्व शक्ति है। मैं इस कन्या को आपको अर्पित करता हूं। इसे किसी भी राजा के पास बेचकर आप आसानी से गुरु दक्षिणा का इंतजाम कर सकते हैं।’24

मानो लड़की न होकर कोई ‘हुंडी’ हो। अपने मित्र गरुण के साथ गालव माधवी को लेकर अयोध्या नरेश हर्यश्व के दरबार में पहुंचा। हर्यश्व के कोई पुत्र नहीं था। ऋषि ने दो सौ श्यामकर्णी अश्वों के बदले माधवी को उसके हवाले कर दिया—‘आप इससे एक पुत्र उत्पन्न कर लें।’(उद्योगपर्व 116.15)। हर्यश्व के माधवी से वसुमना नामक पुत्र पैदा हुआ। कुछ समय बाद गालव ने हर्यश्व से मालती को वापस ले लिया। तदनंतर उस ‘हुंडी’ को लेकर वह राजा दिवोदास के पास पहुंचा। वहां भी दो सौ घोड़ों के बदले उसने लड़की राजा को सौंप दिया(उद्योगपर्व 117.7)। दिवोदास के यहां माधवी से प्रतर्दन नामक पुत्र का जन्म हुआ। निश्चित अवधि के बाद गालव पुन: राजा दिवोदास के दरबार में जा धमका तथा उससे माधवी को वापस ले लिया। तदनंतर वह राजा उशीनर से मिला। राजा उशीनर से भी 200 घोड़े लेकर उसने माधवी को सौंप दिया। उशीनर और माधवी के संयोग से शिवि नामक पुत्र का जन्म हुआ। अब तक गुरु दक्षिणा के 600 घोड़ों का प्रबंध हो चुका था। बाकी दो सौ का प्रबंध कहां से किया जाए? आखिरकार गालव माधवी को लेकर विश्वामित्र के पास पहुंचा और पूरी कहानी सुनाने के बाद, उसने 200 घोड़ों के बदले माधवी को रखने को कहा। मेनका को देखकर आपा खो देने वाला विश्वामित्र भला क्यों इन्कार करता! उसने माधवी को रख लिया। दोनों के संयोग से अष्टक नामक पुत्र का जन्म हुआ(उद्योगपर्व 118.3-8)। बाद में गालव माधवी को उसके पिता के पास वापस लौटाने पहुंचता है। ययाति ने माधवी का स्वयंवर करने की इच्छा प्रकट की। अनिच्छा से चार अलग-अलग पुरुषों की संतान को जन्म देने के बाद बुरी तरह टूट चुकी माधवी ने विवाह से इन्कार कर, संन्यास धारण कर लिया।

इस घटना में माधवी की स्थिति दासी से भी बदतर है। सामान्य दासी का अपनी संतान पर अधिकार होता था। परंतु इस कहानी में माधवी पशुवत एक राजा से दूसरे राजा तक ले जाई जाती है। ले जाने वाला एक ऋषि है और उसका भोग करने वाले उस समय के प्रतिष्ठित राजा हैं, जिनपर न्याय की रक्षा का भार होता है।   

बौद्धकालीन दासप्रथा

बौद्ध धर्म में अष्ठधम्म पद गृहस्थ जनों के लिए आचारसंहिता है। इसका पांचवा ‘धम्म’ ‘सम्यक आजीव’ है। बौद्ध धर्म गृहस्थ जनों के लिए धनार्जन का निषेध नहीं करता। किंतु चोरी, डकैती, हिंसा, लूटमार जैसे दूसरों के लिए कष्टकारी कार्यों द्वारा अर्जित धन को उसमें वर्ज्य माना गया है। ‘अपण्णकसुत्त’ में कहा गया है—‘वही व्यक्ति न्यायपथ पर है, जिसका मस्तिष्क शुद्ध एवं सात्विक है। जो अपने मन को प्रसन्न रखता है, तथा दास अथवा दासी रखने से बचता है।’ दीघनिकाय, ‘सामञ्ञफलसुत्त’ में ‘संतोष’ की स्थितियों का वर्णन करते समय कहा गया है—‘जैसे महाराज कोई पुरुष दास हो। जो पराधीन हो। जिसे अपनी इच्छा से कहीं भी आने-जाने का अधिकार न हो। समय आने पर जब वह दासता से मुक्त हो जाए। स्वतंत्र, अपराधीन, यथेच्छगामी हो जाए। तब उसके मन में ऐसे भाव होने के साथ प्रसन्न एवं आनंदित होना चाहिए—‘मैं पहले दास था, अब स्वतंत्र हूं। जहां जी चाहे वहां जा सकता हूं।’ भिक्षु संघ के नियमों के अनुसार समाज का कोई भी व्यक्ति उसकी दीक्षा ग्रहण कर सकता था। परंतु सैनिक,कर्जदार, दास आदि को भिक्षु संघ में शामिल होने के लिए संबंधित व्यक्ति की अनुमति लेनी पड़ती थी। 

अंगुत्तर निकाय(5.177) के अनुसार बुद्ध ने पांच प्रकार की आजीविकाओं, जो दूसरों के लिए कष्टकारी हो सकती हैं, को अपनाने से मना किया है। जैसे हथियारों, विष, दास-दासी, वेश्यावृति, मांस तथा उसके उत्पादों की खरीद-बिक्री द्वारा अर्जित धन। इसका आशय यह नहीं है कि बौद्ध काल में दास प्रथा का अभाव था; अथवा बौद्ध धर्म की उपस्थिति से दास-प्रथा में परिमाणात्मक कमी आई थी। अन्य सभ्यताओं और संस्कृतियों की भांति बौद्धकाल में भी दासप्रथा अपने निकृष्टतम रूप में मौजूद थी। सस्ता श्रम, विकास की चाहत और स्वामी के लिए सामाजिक प्रतिष्ठा—दासप्रथा की ऐसी देन थीं, जिसके कारण सुकरात से लेकर अरस्तु तक सभी ने उसे आवश्यक माना था। भारत में भी बुद्ध जैसे कुछेक अपवादों को छोड़कर लगभग सभी बुद्धिजीवी, दास प्रथा का या तो समर्थन कर रहे थे, अथवा उसकी ओर से मौन साधे हुए थे। ध्यातव्य है कि बौद्ध धर्म के प्रभाव में चलते यज्ञ-बलियों में कमी आई थी। बची हुई पशु-शक्ति का उपयोग उत्पादक कार्यों में होने लगा था। उसका सकारात्मक प्रभाव विकास पर भी पड़ा था। व्यक्तिगत संपत्ति की लालसा में निरंतर वृद्धि हो रही थी। उसके लिए सस्ता, लगभग मुफ्त श्रम उपलब्ध कराने वाली दासप्रथा का महत्त्व बढ़ता ही जा रहा था। यह भी कह सकते हैं कि अधिकाधिक लाभ की वांछा के कारण तत्कालीन व्यापारी वर्ग उसे छोड़ने को तैयार नहीं था।

बौद्धकाल तक बड़े राज्यों का बनना आरंभ नहीं हुआ था। उन दिनों भारत में मगध और उज्जैनी जैसे राजतंत्र थे। उनके साथ-साथ लिच्छिवी, वाहीक, शाक्य, मल्ल, वृष्णि जैसे गणों की भी प्रतिष्ठा थी। दासों की उपस्थिति राजतंत्र और गणतंत्र दोनों में थी। राजतंत्र में सेना के दरवाजे समाज के सभी वर्गों के लिए खुले थे।25 आवश्यकता पड़ने पर दासों को सेना में भी भर्ती किया जा सकता था। हालांकि उनका स्तर, बाकी सैनिकों से कमतर होता था। कई बार राजा युद्धकाल में मृत्युदंड पाए अपराधियों को दास के रूप में सेना में शामिल कर लेता था। वे सैनिकों और जानवरों की देखभाल के काम आते थे। सेना में भर्ती दासों को ‘दासकपुत्त’ कहा जाता था। उन्हें गृह-दास योद्धा का नाम भी दिया गया था। कई बार राजा किसी अपराधी का मृत्युदंड माफ करने के बाद, उसे अपनी सेना में शामिल कर लेता था।

कृषिकर्म के लिए भी दासों की मदद ली जाती थी। समाज के संपन्न वर्गों के पास हजारों एकड़ जमीन पर अधिकार होता था। इतनी बड़ी जमीन पर खेती करने के लिए दासों की मदद लेना तत्कालीन समाज का सामान्य चलन था। उस समय रोम की तरह भारत में दासों की दो श्रेणियां थीं। पहली श्रेणी में वे दास थे, जिनका दासत्व कृषि-भूमि से जुड़ा था। भूमि की बिक्री के साथ वे भी नए स्वामी के अधिकार में चले जाते थे। दूसरे स्वतंत्र दास थे। वे घरों और संस्थानों में काम करते थे। थेरीगाथा एक की कहानी के अनुसार, बौद्धकाल में बनारस के पास ‘दासग्राम’ था, जिसमें संपूर्ण आबादी दासों की थी। यह उन 14 गांवों में से एक था, जिनपर बुद्ध के शिष्य ‘पिप्पली मानव’ यानी महाकाश्यप का नियंत्रण था। विशाखा को दहेज में कृषि औजारों से भरी 500 गाडि़यां तथा सैकड़ों दास भेंट किए गए थे। उन दिनों दासों को अंतःवासी, अहेटक, केटक, दता, मानुस्स, सेवक, उपत्थका जैसे नाम दिए जाते थे, जबकि स्त्री दासों को अंतःपुरिका, अट्ठककारिका, इत्थी, पसेन दारिका आदि नामों से पुकारा जाता था। उनसे दासत्व की प्रवृत्ति तथा उसके कार्यक्षेत्र का बोध भी होता था।  

बुद्ध के समकालीन दार्शनिकों में भौतिकवादी चिंतक पूर्ण कस्सप की बड़ी प्रतिष्ठा थी। वे अपने समय के महान आजीवक चिंतक थे। उनके जीवन के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं है। उनके नामकरण के साथ एक कहानी जुड़ी है। हालांकि उसपर विश्वास करना कठिन है। बौद्धग्रंथों के अनुसार वे एक दास थे। जो स्वामी उन्हें दास बनाने के लिए लाया था, उसके 99 दास पहले से ही थे। पूर्ण कस्सप के आने के बाद सौ होने पर, स्वामी को लगा कि उसके दासों की संख्या पूरी हो चुकी है, इसलिए स्वामी ने ही उसका नामकरण पूर्ण या पूरण कस्सप नाम दिया था। उस समय के दूसरे आजीवक एवं लोकायत चिंतकों मक्खलि गोसाल और अजित केशकंबलि की सामाजिक स्थिति भी एक दास की तरह थी। डॉ. धर्मबीर ने ‘महान आजीवक : कबीर, रैदास और गोसाल’(पृष्ठ-227) नामक पुस्तक में कबीर के ‘बीजक’ के शीर्षक की मुख्य प्रेरणा ‘महानारद कश्यप जातक’ के कथासूत्र को बताया है। उक्त जातक में बीजक आजीवक विद्वान है। उसका जन्म पानी लाने वाली दासी के गर्भ से हुआ था। दासता को उन्होंने करीब से देखा था। धर्मवीर के अनुसार बीजक, ‘अपने धर्म और दर्शन में आजीवक थे और दासता के विरोध में लड़ रहे थे।’

मेगस्थनीज चंद्रगुप्त के शासनकाल में भारत आया था। वह चंद्रगुप्त के दरबार में सेल्यूकस की ओर से राजदूत था। अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में मेगस्थनीज ने भारत में दासप्रथा की उपस्थिति से इन्कार किया है। जबकि उन्हीं दिनों रचे जा रहे बौद्ध साहित्य में दासों का खुला उल्लेख है। क्या मेगस्थनीज भारतीय दासप्रथा से सचमुच अनभिज्ञ था? अथवा उसने जानबूझकर उसे छिपाया था? जबकि वह स्वयं ऐसे देश से आया था, जहां जनसंख्या का करीब एक-तिहाई हिस्सा दास की श्रेणी में आता था। असल में मेगस्थनीज की जानकारी का स्रोत केवल ब्राह्मण थे। अतएव एक कारण तो यह हो सकता है कि ब्राह्मणों ने भारत में मौजूद दासप्रथा को जानबूझकर छिपाया हो। दूसरा कारण यह कि भारत में शूद्र एवं दास की स्थिति में बहुत अंतर नहीं था। इसलिए संभव है मेगस्थनीज स्वयं उस समय के शूद्रों एवं दासों के जीवन में अंतर करने में असमर्थ रहा हो।

उन दिनों दास प्रथा अपने चरम पर था। दासों के शरीर पर उसके स्वामी का अधिकार होता था। नाराज होने पर स्वामी उसे दंडित कर सकता था। एक जातक में एक दासी का उल्लेख हुआ है जिसे उसके स्वामी ने दूसरे व्यक्ति के पास काम के लिए भेजा था। जब वह काम करने में असमर्थ रही तो बेंतों से उसकी पिटाई की थी। दूसरी ओर दास द्वारा आत्म-उत्थान के भी उदाहरण है। कटहक का एक दास तीव्र बुद्धि था। वह स्वामी के पुत्रों के साथ पढ़ना-लिखना सीख गया। अन्य कर्मों के साथ-साथ वह भाषण कला में भी पारंगत था। मालिक ने प्रसन्न होकर उसे भंडारगृह के रक्षक के रूप में नियुक्त कर दिया था। लेकिन उसे सदैव यह भय रहता था कि उसे कभी भी किसी अपराध के कारण काम से हटाया अथवा प्रताडि़त किया जा सकता है।26

बौद्धकाल में दासों की उपस्थिति प्रायः सभी पेशों और उद्यमों में थी। विनयपिटक, दीघनिकाय, जातक कथाओं आदि में दासों की उपस्थिति बनी हुई है। बौद्ध साहित्य में आठ प्रकार के दासों का उल्लेख मिलता है—ध्वजाहृत(युद्ध में जीता गया), उदरदास(भरण-पोषण), आमाय दास(जीवकोपार्जन हेतु दासता स्वीकारना), भयाक्रांत दास(भय के कारण), स्वैच्छिक दास(स्वेच्छापूर्वक दासता को अपनाने वाला), क्रीतदास(धन देकर खरीदा गया), पादमूलिक(राजा और राजपरिवार का विश्वसनीय एवं अंतरंग दास), कम्मंतदास(खेत एवं कार्यशाला में काम करने वाला) तथा दौवारिक(द्वार पर नियुक्त रहकर स्वामी की रक्षा करने वाला)। ‘थेरवादी अट्ठकथा’ के अनुसार सेट्ठि सुदंत अनाथिपिंडक ने विहार की रक्षा के लिए एक दास दिया था। बौद्ध ग्रंथों में दासियों के भी भेद मिलते हैं। दासियां घर के प्रत्येक काम में सहयोग करती थीं। दासी की बेटी भी दासी ही कहलाती थी। ‘विदुर जातक’(जातक संख्या 545) के अनुसार कुछ लोग केवल दासी के पेट से जन्म लेने के कारण दास होते हैं। कुछ लोग धन से खरीदे जाने के बाद दास बनते हैं। कुछ भय से दास बनते हैं तो कुछ स्वयं दास बन जाते हैं। 

दास को योनि मान लिया था। उससे पता चलता था की दासप्रथा को कुछ लोग दैवी विधान घोषित करने  में लगे थे तदनुसार जो व्यक्ति एक बार दास बन जाता वह हमेशा दास ही बना रहता है। इसी जातक में एक जगह माणवक कहता है—’निश्चित रूप से मैं दास योनि में पैदा हुआ हूं। चाहे राजा की वृद्धि हो, चाहे अवृद्धि हो, दूर जाकर भी मैं देव का दास ही रहूंगा।’ ‘निमी जातक’ की बिरानी दासी को दासत्व उत्तराधिकार में मिला था। एक जातक में लापरवाह और आलसी ब्राह्मण स्त्री अपने पति को यह कहकर भिक्षा लेने के लिए भेजती है कि वह उसके लिए दासी खरीदकर लाए। पत्नी की इच्छा पूरी करने के लिए ब्राह्मण 700 कार्षापण मांग कर लाता है। उतने मूल्य में एक दासी खरीदी जा सकती थी। दासियां दहेज में भी दी जाती थीं। ‘सुप्पारक जातक’ के अनुसार विशारक को दहेज में दासियां प्रदान की गई थीं। गणिकाओं के यहां 500 दासियों के होने का उल्लेख है। ‘खंडहाल जातक’ में चंद्रकुमार स्वयं को दास बनाने के लिए समर्पित करता है—

‘देव! हमारा वध न करें। हमें दास बनाकर ‘खंडहाल’ को दे दें। पैरों में बेड़ी पड़ी रहने पर भी हम हाथी-घोड़ों का पालन करेंगे। देव हमारा वध न करें….हम हाथियों की लीद बटोरेंगे….हम घोड़ों की लीद बटोरेंगे….हमें चाहे जिसे दास बनाकर दे दें।’27

ऐसे ही वास्संत्र जातक में एक राजकुमार स्वयं को 1000 पण में बेच देता है। ‘कुस्सजातक’ से पता चलता है कि विधुर के घर में 700 दासियां थीं। दास-दासियों का प्रमुख कार्य परिवार के सदस्यों की सेवा करना था। अतिथियों के आने पर उनके पैर धोना, आवष्यकता पड़ने पर उनके पैर दबाना जैसे कार्य दासों के जिम्मे थे। ‘मझिम्मनिकाय’ के अनुसार ‘काली’ नामक एक दासी चावल पकाने, बिस्तर लगाने, गाय दुहने से लेकर दीपक जलाने जैसे काम करती थी। दासियां धाय का काम भी करती थीं। वे खासतौर पर लड़कियों को पालती-पोसतीं, उन्हें बड़ा करतीं और लड़की के विवाह के बाद, उसकी ससुराल वालों को दान दे जाती थीं। एक जातक कथा के अनुसार एक राजकुमार के 64 दासियां थीं। दासों का रोजमर्रा का जीवन आमतौर पर बड़ा ही कठिन था। वे अपनी नियति को जानते थे, इसलिए उनके सपने बहुत छोटे होते थे। एक जातक कथा में राजा ने प्रसन्न होकर अपने कुलपुरोहित से वरदान मांगने को कहा। इसपर पुरोहित ने अपने परिजनों के साथ-साथ घर में काम करने वाली दासी पुण्णा से उसकी आवष्यकता के बारे में भी पूछा। जवाब में पुण्णा अपने लिए मूसल, सूप तथा गारा मांगती है। दासियों को अपने स्वामी की काम-वासना का षिकार भी होना पड़ता था। जो दासियां सुंदर होतीं, वे अपने स्वामी की रखैल बनकर रहने से खुद को कृतार्थ समझने लगती थीं। उद्दालक जातक के अनुसार एक ब्राह्मण राजपुरोहित अपनी दासी पर आसक्त हो गया। आगे चलकर दासी के गर्भ से उद्दालक का जन्म हुआ। आगे चलकर वह बड़ा ऋषि बना। इस तरह हम देखते हैं कि बुद्ध ने हालांकि दासप्रथा को हेय माना, तथा दास अथवा दासी न रखने की सलाह दी थी। तथापि इस बात के प्रबल प्रमाण हैं कि बौद्ध काल में दासप्रथा पूरे जोरों पर थी।

प्राकृत भाषा में ‘दास’ का उल्लेख अन्य अर्थों में देखने को मिलता है। वह उसकी अब तक स्थापित सामाजिकी से बिलकुल अलग है. प्राकृत में दास का अर्थ है, देखना। ‘दर्शन’ का अर्थ भी यही है। ऐसे लोग जो संसार के आंतरिक और बाहरी रहस्यों को समझते थे, जितनी अंतर्चेतना प्रबल थी, उन्हें दास कहा जाता था। वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा, बिहार में प्राचीन भारतीय इतिहास के गंभीर अध्येता डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह के अनुसार, दास मूल रूप से बौद्ध थे. उनके अनुसार साँची और भरहुत के स्तूपों पर अनेक दास तथा दासी उपाधिधारक बौद्धों के शिलालेख हैं, जिन्होंने स्तूप-निर्माण में मदद की थी।’ वे लिखते हैं—

”अरहत दास थे, अरहत दासी थीं, यमी दास थे, जख दासी थीं….अनेक, सभी के नाम लिखे हुए हैं। एक बौद्धकालीन शिलालेख पर प्राकृत में ‘थूप दास’ का वर्णन मिलता है। उसपर लिखा है-‘मोरगिरिह्मा थूपदासस दान थंभे।’ थूप दास मोरगिरि(महाराष्ट्र) के निवासी थे। उन्होंने भरहुत के एक स्तंभ-निर्माण में मदद की थी। वैदिक साहित्य में वर्णित आर्यों का सांस्कृतिक संघर्ष इन्हीं बौद्ध दास-दासियों से हुआ था। वैदिक साहित्य इन दास-दासियों के बारे में बताता है कि ये लोग यज्ञ नहीं करते और न ये इंद्र-वरुण की पूजा करते हैं…स्पष्ट है कि ये बौद्ध हैं। प्राकृत भाषा में ‘दास'(दसन) का अर्थ द्रष्टा है। मगर आर्यों ने सांस्कृतिक दुश्मनी के कारण अपनी पुस्तकों में ‘दास’ का अर्थ ‘गुलाम/नौकर’ कर लिया है। दास और आर्यों का यह सांस्कृतिक संघर्ष 1500 ई.पू. में नहीं बल्कि मौर्य काल के बाद हुआ था।”

इस संबंध में अभी और शोध की अपेक्षा है. यह सच है कि समय और परिस्थितियों में आए बदलाव के कारण शब्द अपनी अर्थ-छवियां बदलती रही हैं। अठारहवीं-उनीसवीं शताब्दी में ‘अराजकतावाद’ शब्द ‘जनतंत्र’ की उच्चतम अवस्था का प्रतीक था। उसका अर्थ ऐसे राज्य से था, जहां के प्रबुद्ध नागरिक अपने आप में ही इतने अनुशासित और समर्पित हों कि राज्य की आवश्यकता और उसका औचित्य ही जाता रहे। आज यह शब्द एकदम भिन्न अर्थों में अव्यवस्था और कानून विरोध के संदर्भ में प्रयुक्त किया जाने लगा है। अराजक शब्द का उपयोग कई बार गाली की तरह भी किया जाता है.

जैन दर्शन भी बौद्ध दर्शन का समकालीन है। जैन धर्म में अहिंसा पर अत्यधिक जोर दिया गया है। वहां अहिंसा की परिभाषा बहुत व्यापक है। उसमें मनसा-वाचा-कर्मणा किसी भी प्रकार की हिंसा का निषेध है। चूंकि दास प्रथा में स्वामी दास के विवेक को पनपने नहीं देता। उसपर हमेशा अपना निर्णय लादे रहता है। दास से जीवन के कई मौलिक अधिकार जैसे संपत्ति संचय, छीन लिए जाते हैं। इसलिए कह सकते हैं कि प्रत्यक्ष न सही, परोक्ष में ही—जैन धर्म दास प्रथा का विरोध करता है। हालांकि उसमें सीधे तौर पर कहीं भी दास प्रथा का विरोध नहीं है। जैन दर्शन में महावीर स्वामी के आरंभिक अनुयायियों में चंदनबाला का उल्लेख मिलता है। वह महावीर स्वामी की प्रथम महिला शिष्या थी। कहानी के अनुसार चंदनबाला चंपानगरी के राजा दधिवाहन की बेटी थी। उसका मूल नाम वसुमती था। एक बार चंपानगरी पर पड़ोसी राजा शतानीक ने हमला कर दिया। आकस्मिक हमले से आक्रांत दधिवाहन जंगलों की ओर भाग गए। उनकी पत्नी और बेटी वसुमती को शत्रु सेना ने कैद कर लिया। बाद में उन्होंने वसुमती को बेचने के लिए कोशांबी के चौराहे पर खड़ा कर दिया। वहां उसे धन्नासेठ नाम के व्यापारी ने खरीद लिया। यह देखते हुए कि वसुमती किसी संभ्रांत घर की लड़की है, धन्ना ने उससे दासी का काम लेने के बजाए, चंदनबाला नाम देकर अपनी पुत्री की तरह उसका लालन-पालन किया। बदलते घटनाचक्र के दौरान चंदनबाला महावीर स्वामी के संपर्क में आई और उनकी शिष्या बन गई।

बुद्धेत्तर भारत में दास प्रथा

बाद के कालखंड में भी दास प्रथा की मौजूदगी के पर्याप्त प्रमाण हैं। संस्कृत नाटक ‘मृच्छकटिकम’ में दासों की मंडी का उल्लेख किया गया। एक व्यक्ति उधार चुकाने में असमर्थ रहता है। इसपर साहूकार के आदमी उसे पीटते हुए मंडी में ले जाते हैं। जहां उसको नीलाम करके अपना कर्ज वसूल लिया जाता है। भारतीय दास प्रथा की चर्चा मध्य एशिया की ओर से आए योद्धाओं की चर्चा के बिना पूरी नहीं हो सकती। अपने लिए स्थायी राज्य की चाहत में उन्होंने हजारों किलोमीटर लंबी कठिन यात्राएं की थीं। बीच-बीच में उन्हें अस्थायी सफलताएं भी मिलती रहीं। कारण है कि एक अंतराल के पश्चात उनके सहयोगी सैनिकों, जिनमें उनके अपने परिजन भी होते थे—की अपनी महत्त्वाकांक्षाएं अंगड़ाई लेने लगती थीं। जिससे विजित क्षेत्र के शासन-प्रशासन के अधिकार को लेकर उनके बीच सत्ता-संघर्ष शुरू हो जाता था। उससे बचने के लिए कुछ लड़ाकों ने दास प्रथा का सहारा लिया था। दास के पास सिवाय ‘स्वामीभक्ति’ के अपना और गर्व करने लायक कुछ नहीं होता था। यह प्रत्यय भी दास प्रथा को दैवीय उठान देने के मंशा के साथ मालिक ही दासों के मनस् में रोपते आए थे। समय के साथ दास उस अमानवीय प्रथा से अनुकूलित होने लगे। एक समय ऐसा आया, जब दास उन असमानताकारी पृथा को अपना चुके थे। परिणामस्वरूप स्वामीभक्ति उनके लिए बड़ा जीवनमूल्य, बन गई। इसकी पराकाष्ठा हमें पन्ना धाय के चरित्र में दिखाई पड़ती है। सोलहवीं शताब्दी की वह स्त्री जिसका स्तर समाज में दास जैसा ही था, महाराणा संग्राम सिंह के बेटे और मेवाड़ के भावी सम्राट उदय सिंह को बचाने के लिए, अपने बेटे चंदन को हत्यारे बनवीर के आगे कर देती है। बनवीर बिना कोई दया दिखाए एक झटके में उस मासूम की हत्या कर देता है। ऐसा उदात्त दासत्व सत्तानशीनों के बड़े काम का था, इसलिए राजस्थान के इतिहास में पन्ना धाय के त्याग का खूब महिमामंडन किया गया। पन्ना धाय जैसे स्वामीभक्त हर शासक की जरूरत थे। बगैर उनके बड़े और स्थायी राज्य स्थापित कर पाना असंभव था।  

दास के लिए अपने मालिक के सुख-वैभव के अलावा कुछ भी महत्त्वपूर्ण नहीं था। वे मानापमान की भावना से कोसों परे थे। इसे समझने के लिए एक खलीफा की यह स्वीकारोक्ति काफी होगी—

‘जब मैं दरबार में बैठता हूं तो एक गुलाम को बुलाकर अपने बगल में बिठा सकता हूं। इस तरह कि उसके और मेरे घुटने एक-दूसरे को जकड़ें। जैसे ही दरबार समाप्त हो जाए तो मैं उसे अपने घोड़े की मालिश को कह सकता हूं। उसे इसमें तनिक भी बुरा नहीं लगेगा। अगर में यही काम किसी और से करने को कहूं तो वह कहता, ‘मैं आखिर तुम्हारे पक्षधर का बेटा हूं।’ या ‘तुम्हारा खास साथी हूं।’ और मैं उसे राजी नहीं करवा पाता।’28 

तो बात मध्य एशिया, ईरान और अफगानिस्तान के जुझारू लड़ाकों की हो रही थी। दसवीं शताब्दी में वे अपनी-अपनी सैन्य टुकडि़यों के साथ संघर्षरत थे। उन्हें जहां भी कमजोर राज्य दिखता, फौरन हमला कर देते थे। मगर वह जीत स्थायी न होती थी। कुछ दिनों बाद उनके अपने बीच भी सत्ता संघर्ष पनपने लगता था। उसे शांत रखने के लिए उन्हें या तो राज्य का बंटवारा करना पड़ता; अथवा अपने अधिकारों में कटौती करनी पड़ती थी। उससे मुक्ति के लिए कुछ महत्त्वाकांक्षी लड़ाकों ने प्रशिक्षित और ख्यातिनाम सैनिकों के बजाए, अपनी सेना में दासों को भर्ती करना शुरू कर दिया। उन्हें सैन्य-प्रशिक्षण देकर लड़ने लायक बनाया। प्रयोग कामयाब रहा। उदाहरण के लिए कुतबुद्दीन ऐबक शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी का गुलाम था। गौरी के साथ उसने कई युद्धों में हिस्सा लिया था। मुहम्मद गौरी ने भारत में गौरी-साम्राज्य की नींव डाली थी। परंतु उसका शासन ज्यादा लंबा न खिंच सका। अवसर मिलते ही कुतबुद्दीन ऐबक ने मुहम्मद गौरी के उत्तराधिकारियों से सत्ता छीन ली। कुतबुद्दीन ऐबक के बाद दिल्ली सल्तनत उसके भाई आरामशाह के हाथों में चली गई। वह अपने नामानुरूप ऐशोआरामपरस्त था। उसे मारकर इल्तुतमिश ने दिल्ली सल्तनत पर कब्जा कर लिया। इल्तुततमिश कुतबुद्दीन ऐबक का दास, यानी गुलाम का भी गुलाम था। विद्रोहियों के दमन के लिए उसने 40 भरोसेमंद गुलामों को लेकर ‘तुर्कान-ए-चिहालगानी’ नामक संगठन बनाया था, जो साये की तरह उसकी सुरक्षा में रहता था। इल्तुतमिश दास-योद्धाओं से अपने बेटों से भी अधिक प्यार करता था। भारत में गुलाम वंश का शासन 84 वर्षों(1206—1290 ईस्वी) तक रहा। लेकिन वह गुलाम वंश का शासन था, गुलामों का नहीं। क्योंकि न तो उससे समाज के गुलामों के प्रति नजरिये में बदलाव आया, न बाकी गुलामों में उससे आत्मविश्वास का संचार हुआ था और न ही उन शासकों का गुलामों के प्रति नजरिया बाकी लोगों से बहुत ज्यादा अलग था।

दासों का जीवन बहुत चुनौतीपूर्ण और कष्टकारी होता था। इस मामले में शूद्रों की स्थिति भी उनसे खास अच्छी नहीं थी। अछूतों का तो और भी बुरा हाल था। डॉ. आंबेडकर ने छूआछूत को दास प्रथा से भी घृणित एवं निदंनीय माना है—

‘अस्पृश्यता, दासत्व से कहीं अधिक निकृष्ट है, क्योंकि यह अछूतों को उनके हाल पर ऐसे स्थान पर पटक देती है, जहां उनकी आजीविका का कोई साधन ही न हो….दास अपने स्वामी की संपत्ति होता था। इसलिए स्वामी द्वारा उसे मुक्त व्यक्ति के सापेक्ष वरीयता दी जाती थी। मूल्यवान होने के कारण उससे स्वामी के स्वार्थ भी जुड़े होते थे, वह दास के स्वास्थ की देखभाल करता था। रोम में दासों को दलदल  और मलेरिया से ग्रस्त स्थान पर कभी नहीं ठहराया जाता था। वहां केवल मुक्त व्यक्तियों को ही नियुक्त किया जाता था।’29

बावजूद इसके भारतीय छूआछूत को हजारों वर्षों तक गले लगाए रहे। अंग्रेजों ने दास प्रथा को निंदनीय मानते हुए, 1843 में ही समाप्त कर दिया था। मगर छुआछूत को पूरी तरह खत्म करने के लिए संविधान के लागू होने तक प्रतीक्षा करनी पड़ी।

ओमप्रकाश कश्यप

9013 254 232 

संदर्भ

1. डॉ. रामविलास शर्मा, मानव सभ्यता का विकास, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ-74

2. डॉ. रामविलास शर्मा द्वारा उद्धृत, उपर्युक्त, पृष्ठ-74

3. मोर्टीमर व्हीलर, दि इंडस सिविलाइजेशन, कैंब्रिज यूनीवर्सिटी प्रेस, लंदन, 1968, पृष्ठ-34 & 135

4. रामशरण शर्मा, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, राजकमल प्रकाशन, 1992, पृष्ठ- 17

5.  उपर्युक्त, 25

6. यद्वा दास्र्याद्रहस्ता समत उलूखल मुसलम् शुम्भताप-अथर्ववेद, 12/3/13)

7. रामशरण शर्मा, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, राजकमल प्रकाशन, 1992, पृष्ठ-16

8. राधाकुमुद मुखर्जी, हिंदू सभ्यता, पृष्ठ 89

9. रामशरण शर्मा, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, 25

10. उदकुंभानधिनिधाम दास्यौ मार्जालीयं परिनृत्यंति पदों

      निध्नतीरिदं मधुगायन्त्यों मधु वै दैवानां परममन्नाधाम—तैत्तिरीय संहिता, 7/5/101

  1. डॉ. रामविलास शर्मा, मानव सभ्यता का विकास, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ-74

12. प्रवृत्तोऽश्वतरीरथो दासीनिष्कोऽत्स्यन्नं पश्यसि—छांदोग्योपनिषद, 5.13.2

13. स होवाच विज्ञायते हस्ति, हिरण्यस्पापस्तं गौ, अश्वानां दासीनां—बृहदारण्यक उपनिषद(6.2.7)।

14. ओमप्रकाश प्रसाद, प्राचीन भारत का सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास, राजकमल प्रकाशन, 2006

15. गृह जातस्था, क्रीतो लब्धो, दायादुपागतः

अनाकाल भृतो, लोके अहितः स्वामिना च यः। 24

मोक्षितो महतश्चार्णात्प्राप्तो, युद्धात्पणार्जितः

तवाह मित्युपगतः प्रवज्यावसितः कृतः। 25

भक्तदासश्चविज्ञेयस्तथैव वडवाहतः

विक्रेता चात्मनः शास्त्रै दासाः पंचदशस्मृताः। 26

  1. श्रीपाद अमृत डांगे, आदिम साम्यवाद, हिंदी अनुवाद आदित्य मिश्र, राजकमल प्रकाशन, 1978,  पृष्ठ 195

17. डॉ. सुरेद्र कुमार शर्मा अज्ञात, क्या बालू की भीत पर खड़ा है हिंदू धर्म, विश्व बुक्स प्रा. लिमिटेड,

18. ददौ कन्यापिता तासां दासीदासमनुत्तमम्।

हिरण्यस्य सुवर्णस्य मुक्तानां विद्रुमस्य च। रामायण, बालकांड, 1.74.5

19. रूपाजीवाश्म वादिन्यो वणिजश्य महाधनाः

शोभयंतु कुमारस्य वाहिनी सुप्रसारिताः।। उत्तरकांड-6.74.2

20. तस्माततेऽहं प्रदास्यामि विविधं वसु भूरि च

      दासी सहस्राश्यामानं सुवस्त्राणामलंकृतम्।। वनपर्व, 185.34

21. ‘दासाश्च दास्याश्च सुमृष्ठवेषाः। संभोजकाश्चाप्युपजहृनुरत्नम्।। आदिपर्व-193।

22. शतं दासीसहस्राणि तरूण्यो हेमभद्रिकाः

कंबूकेयूर धारिष्यो निष्ककंठयः स्वलंकृता-महाभारत, 2.61.8

23.  दासॊऽसमीति तवया वाच्यं संसत्सु च सभासु च।
       एवं ते जीवितं दद्याम एष युद्धजितॊ विधिः।। महा.3.256.11

24.  इयं सुरसुतप्रख्या सर्वधर्मोपचायिनी

सदा देवमनुष्याणामसुराणां च गालव।।

कांछिता रूपतो बाला सुता मे प्रतिगृह्यताम्

अस्याः शुल्कं प्रदास्यंति नृपा राज्यमपि ध्रुवम्।। उद्योगपर्व, 115.2-3

25. देवराज चानना, सलेवरी इन एन्शीएंट इंडिया, पिपुल्स पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, 1960, पृष्ठ-40

26. डांगे, आदिम समाज, पृष्ठ 195

27. खंडहाल जातक, भदंत आनंद कौसल्यायन, जातक संख्या 542, हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग।

28. सी.एन.सुब्रह्मण्यम, जब गुलाम सुल्तान बने, शैक्षिक संदर्भ, मार्च-अप्रैल 1996

29. कौन ज्यादा बुरा है—गुलामी या अस्पृश्यता?, डॉ. भीमराव आंबेडकर।

दक्षिण भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के जन्मदाता : सिंगारवेलु चेट्टियार

विशेष रुप से प्रदर्शित

जब भी कोई नया महापुरुष जन्मता है, मनुष्यता का भी पुनर्जन्म होता है। प्रत्येक महापुरुष अपने विचारों से, कर्मों से नई इबारत लिखता है। ऐसे कि लोग सम्मोहित होकर उसका उसका अनुसरण करने लगते हैं। फलस्वरूप जड़ और अप्रासंगिक हो चुकी विचारधाराएं पीछे छूटने लगती हैं। कुल मिलाकर बात इतनी-सी है कि जब भी किसी महापुरुष का जन्म होता है, इस दुनिया का भी पुनर्जन्म होता है।

आजकल लोग सवाल नहीं गूगल करते हैं। तो चलिए गूगल कर लेते हैं—‘भारत में मई दिवस मनाने की शुरुआत किसने की थी? वर्ग-क्रांति का प्रतीक लाल झंडा भारत में पहली बार किसने फहराया था? कौन था वह भारतीय जिसने खचाखच भरे सभागार में पहली बार ‘कामरेड’ शब्द का संबोधन किया था। जिसे सुनकर पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजने लगा था? भारत में मजदूर आंदोलनों का पितामह कौन था? कौन था, दक्षिण भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन का जन्मदाता? गूगल बाबा इन प्रश्नों का थोड़ा घुमा-फिराकर एक ही जवाब देंगे—‘सिंगारवेलु चेट्टियार। लोग उन्हें सम्मान से सिंगारवेलार कहते थे।

अब आप सिंगारवेलु को गूगल करना चाहेंगे। पर थोड़ा धीरज रखिए। पहले कुछ बातें ‘मई दिवस’ पर कर ली जाएं। मशीनीकरण के आरंभ में आदमी को भी मशीन मान लिया गया था। ‘कार्य-दिवस’ का अर्थ था, सूरज निकलने से दिन ढलने तक काम करना। मौसम के अनुसार दिन घटता-बढ़ता तो काम के घंटे भी बदल जाते। कामगार को प्रतिदिन 14 से 16 घंटे काम करना पड़ता था। कभी-कभी तो एक कार्यदिवस 18 घंटे तक पहुंच जाता था। अगस्त 1866 में ‘नेशनल लेबर यूनियन’ 8 घंटे की मांग का समर्थन किया।1 आंदोलन होने लगे। परंतु न सरकारें चेतीं न कारखाना मालिकों ने ही कोई ध्यान दिया। आखिरकार अमेरिकी मजदूरों ने 1 मई 1886 से देशव्यापी हड़ताल की घोषणा कर दी। तीन और चार मई, को प्रदर्शन के दौरान पुलिस और मजदूर संगठनों की भिड़ंत हुई। 4 मई को शिकागो के हेमार्किट चौक पर हुई घटना तो नरसंहार जैसी थी। उसी की याद में मई दिवस मनाया जाता है। मई की पहली तारीख का संबंध 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग तथा उसके लिए श्रमिकों द्वारा दी गई कुर्बानियों से है।

भारत में पहला मई उत्सव, 1 मई, 1923 को मद्रास में मनाया गया था। उसी दिन देश में पहले मजदूर संगठन का जन्म हुआ था, नाम था—‘हिंदुस्तान लेबर एंड किसान पार्टी’।2 उसी दिन लाल झंडा पहली बार फहराया गया था।3 आगे चलकर यह झंडा मजदूर आंदोलनों की पहचान बन गया। इन सबका श्रेय जाता है—सिंगारवेलु चेट्टियार को। भारत में ‘कामरेड’ शब्द का पहली बार इस्तेमाल उन्होंने ही, दिसंबर 1922 में कांग्रेस के गया अधिवेशन में किया था।4 यह जादुई शब्द आगे चलकर साम्यवादी चेतना की पहचान बन गया। गया सम्मेलन में सिंगारवेलु ने ही पहली बार भारत के लिए ‘संपूर्ण स्वराज’ की मांग रखी थी।5

जीवन परिचय

सिंगारवेलु  का जन्म 18 फरवरी, 1860 को एक मछुआरा परिवार में हुआ था। समुद्र किनारे जिस बस्ती में वे रहते थे, उसे वे ‘कप्पम’ कहते थे। बस्ती के प्रायः सभी पुरुष मछली पकड़ने का काम करते। बांस और तख्तों से बनी डोंगी से समुद्र की लहरों को चीरते हुए वे आगे बढ़ जाते। कभी समुद्र की बन आती। उसकी उन्मत्त लहरें, किनारे बसीं झुग्गियों को अपने साथ बहा ले जातीं। मगर कुछ दिनों बाद वे फिर उसी जगह उभर आती थीं। प्रकृति और पुरुष की डांडा-मेंडी….झुग्गियों का बनना-मिटना भी मानो लहरों जैसा हो। सिंगारवेलु के पिता का नाम था—वेंकटचलम चेट्टियार। मां थीं—वाल्लमई। बताया जाता है कि उनके दादा मामूली डोंगी के सहारे बर्मा के तटवर्ती क्षेत्रों तक चले जाते। वहां से चावल और इमारती लकड़ी मद्रास तक ले आते थे।6 कह सकते हैं कि धैर्य और दुस्साहस सिंगारवेलु को विरासत में प्राप्त हुए थे।

जिस जाति में सिंगारवेलु का जन्म हुआ था, उसमें पढ़ने-पढ़ाने की कोई परंपरा न थी। परंतु वेंकटचलम थोड़ा आधुनिक मिजाज थे। उन्होंने सिंगारवेलु को पढ़ाने का फैसला किया। खुद को प्रखर बुद्धि सिद्ध करते हुए सिंगारवेलु ने 1881 में मेट्रिक की परीक्षा पास की। 1884 में क्रिश्चन कॉलेज से एफए पास करने के पष्चात उन्होंने बीए के लिए प्रेसीडेंसी कॉलेज मद्रास में दाखिला ले लिया। आगे की पढ़ाई के लिए मद्रास लॉ कॉलेज से जुड़े। 1902 में कानून की डिग्री मिली। उसके बाद वे मद्रास उच्च न्यायालय में प्रक्टिश करने लगे। प्रतिभाषाली थे ही। सो वकालत के जमने में देर न लगी।7

1889 में उनका विवाह आंगम्मल से हुआ। वह अंतररजातीय विवाह था। दोनों के एकमात्र संतान, बेटी का जन्म हुआ। जिसका नाम उन्होंने कमला रखा था। 1932 में उन्होंने अपने धेवते, कमला के पुत्र सत्यकुमार को उन्होंने कानूनी तरीके से गोद ले लिया।

आरंभ में सिंगारवेलु व्यापार में हाथ आजमाना चाहते थे। इसलिए 1902 में वे चावल के व्यापार की संभावना तलाशने के लिए ब्रिटेन चले गए। सिंगारवेलु के लिए वह यात्रा बहुत परिवर्तनकारी सिद्ध हुई। वहां उन्हें नई-नई पुस्तकें पढ़ने का अवसर मिला। लंदन में उन्होंने बौद्ध अधिवेशन में हिस्सा लिया। उससे बौद्ध धर्म-दर्शन के प्रति ऐसा अनुराग बना कि मद्रास लौटने पर अपने घर पर ही ‘महाबोधि सोसाइटी’ की बैठकें आयोजित करने लगे।8 इससे प्रसन्न होकर उन्हें मद्रास महाबोधि सोसाइटी का अध्यक्ष भी मनोनीत कर दिया गया। उन्हीं दिनों समाज सेवा से लगाव हुआ। वे चाहते थे कि बस्ती के बच्चे पढ़-लिखकर आगे बढ़ें। इसके लिए वे बच्चों तथा उनके माता-पिता को प्रोत्साहित करने लगे। आवश्यकता पड़ने पर गरीब बच्चों को पुस्तक, स्टेशनरी, भोजन वगैरह देकर मदद भी करते। पढ़ने का शौक था। सो धर्म, दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्र आदि विषयों की नई से नई पुस्तकें अपने लिए जुटाते, पढ़ते। अपने पढ़े हुए पर दूसरों से बातचीत करते। सुब्रह्मयम भारती, वी. चक्करई चेट्टियार जैसे नेताओं के संपर्क में आने के बाद वे राजनीति की ओर मुड़ गए।

प्लेग के दौरान

1905 में रूसी क्रांति की खबरें मिलीं, जिससे पहली बार उनका कम्युनिस्म की ओर वे रुझान बढ़ा। इस बीच उनके कांग्रेस से अच्छे संबंध बन चुके थे। पार्टी में वे तिलक जैसे उग्रपंथी नेता माने जाते थे। वे मानते थे कि देश को आजाद कराने के लिए बल प्रयोग अपरिहार्य है। बिना उसके साम्राज्यवादी अंग्रेजों से मुक्ति असंभव होगी। 1914 में पहला विश्वयुद्ध छिड़ा तो सिंगारवेलु का ध्यान युद्ध की खबरों से ज्यादा जनसाधारण की बढ़ती समस्याओं की ओर गया। खासकर उन समस्याओं की ओर जो युद्ध की, पूंजीवादी लिप्साओं की देन थीं। उन्हीं दिनों एक बड़ी चुनौती सामने आ गई। मुंबई सहित पूरे महाराष्ट्र में तबाही मचाने वाली प्लेग 1898 में मद्रास तक आ पहुंची। वहां उसने ‘कुप्पम’ को भी अपनी चपेट में लिया। सब कुछ छोड़कर सिंगारवेलु जनसेवा में जुट गए। लोगों को भुखमरी से बचाने के लिए उन्होंने ‘सामुदायिक रसोई’ का संचालन किया। 1910 के बाद प्लेग से छुटकारा मिला तो मलेरिया ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। सिंगारवेलु जूझते रहे। इससे उन्हें गरीबी तथा उसके कारणों को समझने की दृष्टि मिली। वही उन्हें साम्यवाद की ओर ले गई।

राजनीति में दस्तक

13 अप्रैल 1919 भारतीय इतिहास का रक्त-रंजित दिन था। उस दिन जलियांवाला हत्याकांड 379 लोग मारे गए थे। लगभग 1500 हताहत हुए थे। क्षुब्ध जनता अंग्रेजों के विरुद्ध प्रदर्शन करने लगी। उत्तर से दक्षिण तक सब अंग्रेजों के खिलाफ थे। फिर सिंगारवेलु कैसे पीछे रह सकते थे! उन्होंने युवाओं को संगठित कर, कई शांतिपूर्ण प्रदर्शन किए। गांधी ने असहयोग आंदोलन का आह्वान किया। उससे प्रेरित होकर सिंगारवेलु ने भी एक जनसभा में अपने गाउन को अग्नि-समर्पित कर अदालत से नाता तोड़ने की घोषणा कर दी। मई 1921 में उन्होंने गांधी को लिखा—‘मैंने आज अपने वकालत के पेशे से मुक्ति पा ली है। देश-सेवा के लिए मैं भी आपका अनुसरण करूंगा।’9 इसी दौरान वे कांग्रेस के संपर्क में आए। जनमानस में अपनी पैठ, प्रतिभा और सरोकारों के चलते बहुत जल्दी प्रदेश कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में उनकी गिनती होने लगी।

हैलो कामरेड्स

दिसंबर 1922 में उन्हें कांग्रेस के गया अधिवेशन में शामिल होने का अवसर मिला। उस समय वे अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य भी थे। अधिवेशन में दिए गए भाषण में सिंगारवेलु का रंग एकदम निराला था। गए वे प्रदेश कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में थे, मगर भाषण में वे खुद को कुछ और ही बता रहे थे—‘अध्यक्ष, हाल में मौजूद कामरेड्स, साथी मजदूरो, प्रजाजनो, हिंदुस्तान के किसानो और हलवाहो….मैं आपके बीच आपके मजदूर साथी के रूप में बोलने आया हूं। मैं यहां पूरी दुनिया के लिए महा-कल्याणकारी, कम्युनिस्टों की दुनिया के प्रतिनिधि के रूप में पहुंचा हूं। मैं यहां उस महान संदेश को दोहराऊंगा, जिसे साम्यवाद दुनिया-भर के मजदूरों को देता आया है।’10 उन दिनों अंग्रेज ‘कम्युनिज्म’ शब्द से ही खार खाते थे। ऐसे में किसी प्रतिनिधि के मुंह से ‘कामरेड्स’ संबोधन सुनना, खुद को साम्यवादी जगत का प्रतिनिधि बताना, कामगारों, मजदूरों और किसानों की बात करना, वहां मौजूद सदस्यों के लिए यह एकदम अप्रत्याशित था। सो सिंगारवेलु की पहली पंक्ति के साथ ही सभागार तालियों से गूंजने लगा।

भाषण में सिंगारवेलु ने कहा था—‘हम स्वराज के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह लड़ाई हम अहिंसा और असहयोग जैसे हथियारों की मदद से लड़ रहे हैं। मेरा उनमें विश्वास है। मगर इन हथियारों से वर्गहीन समाज की रचना संभव नहीं है।’ उन्होंने कहा था—‘धनाढ्य संभल जाएं। ताकतवर ध्यान दें….दुनिया में जितनी भी अच्छी चीजें हैं, सब मेहनतकश लोगों ने ही तुम्हें दी हैं। तुमने उन्हीं को हाशिये पर ढकेल दिया। वे हमेशा तुम्हारी इच्छाओं के खटते रहते हैं। फिर भी तुम उनकी उपेक्षा करते हो….याद रखो, भारतीय मजदूर अब जाग चुके हैं। वे अपने अधिकारों को धीरे-धीरे समझने लगे हैं।’11 कांग्रेस के इतिहास में वह पहला अवसर था, जब उसके सम्मेलन में किसान और मजदूर वर्ग पर चर्चा हो रही थी। लोग कांग्रेस के कायाकल्प का श्रेय गांधी को देते हैं। लेकिन उस समय की परिस्थितियां ऐसी थीं कि उनसे समझौता किए बगैर कांग्रेस की राष्ट्रव्यापी स्वीकार्यता संभव ही नहीं थी। डॉ. आंबेडकर, रामासामी पेरियार और सिंगारवेलु जैसे नेताओं का दबाव कांग्रेस और गांधी दोनों को बदलने को विवश कर रहा था।

कांग्रेस का गया सम्मेलन सिंगारवेलु की राजनीति की दिशा तय कर चुका था। उनके भाषण ने देश-विदेश के लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था। देश-भर से पहुंचे प्रतिनिधियों ने मांग की कि सिंगारवेलु को कांग्रेस की श्रमिक मामलों की प्रस्तावित उपसमिति में स्थान दिया जाए। मानवेंद्रनाथ राय ने मजदूरों तथा आम जनता की समस्या की ओर कांग्रेस तथा सरकार का ध्यान आकर्षित कराने के लिए सिंगारवेलु की प्रशंसा की थी। अपनी उग्र कार्यशैली और साम्यवादी रुझान के कारण वे पहले ही अंग्रेजों की नजर में आ चुके थे। 1921 में पुलिस ने उनके घर पर दबिश दी थी। वह कथित रूप से ‘चुनौती’ शीर्षक से प्रकाशित पंपलेट्स की तलाशी लेने गई थी। लेकिन पुलिस को वहां से खाली हाथ लौटना पड़ा था।12

सिंगारवेलु और गांधी

अपने आरंभिक राजनीतिक जीवन में सिंगारवेलु गांधी से प्रभावित थे। परंतु उनकी कार्यशैली गांधी से अलग थी। प्रिंस ऑफ़ वाल्स भारत दौरे पर आए। शेष भारत की तरह दक्षिण में भी उनकी यात्रा का बहिष्कार किया गया। मद्रास में सिंगारवेलु के नेतृत्व में हड़ताल का आह्वान किया गया था। हड़ताल पूरी तरह कामयाब थी। बाद में पता चला कि हड़ताल में शामिल होने के लिए कुछ दुकानदारों पर दबाव बनाया गया था। कुछ कार्यकर्ताओं की शिकायत पर गांधी ने 9 फरवरी, 1922 के ‘यंग इंडिया’ में ‘सत्याग्रह की मूल भावना का पालन न करने पर’ सिंगारवेलु की आलोचना की थी।13

कम्युनिज्म की ओर

गया सम्मेलन में ही उनकी भेंट श्रीपाद अमृत डांगे से हुई। मानवेंद्रनाथ राय से उनका संपर्क पहले से ही था। अबनीनाथ मुखर्जी, जो अपने साथियों में अबनि मुखर्जी के नाम से पहचाने जाते थे, सिंगारवेलु से मिलने दो बार मद्रास पहुंचे थे। इस तरह सिंगारवेलु कांग्रेस में रहकर भी अपनी स्वतंत्र राजनीति कर रहे थे। पेरियार की तरह वे भी कांग्रेसी नेताओं की कथनी और करनी के अंतर को समझते थे। जानते थे कि कांग्रेस कभी भी मजदूरों और किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए सरकार से सीधे टकराव का खतरा मोल नहीं लेगी। इसलिए मद्रास लौटते ही उन्होंने अपने विचारों को कार्यरूप देने के लिए काम शुरू कर दिया था। उसके फलस्वरूप ‘हिंदुस्तान लेबर किसान पार्टी’ का गठन हुआ। वह कम्युनिस्ट विचारधारा पर आधारित पहला संगठन था। ध्यातव्य है कि मानवेंद्रनाथ राय, अबानी मुखर्जी, इवेलिना राय आदि नेता मिलकर 17 अक्टूबर, 1920 को ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया’(ताशकंद पार्टी) के गठन की घोषणा कर चुके थे, परंतु 25 दिसंबर 1925 को विधिवत गठन से पहले उसका अस्तित्व केवल अनौपचारिक था।

सिंगारवेलु  के नेतृत्व में पहली बार, 1 मई 1923 को भारत में मई दिवस का आयोजन किया गया। उसी दिन ‘हिंदुस्तान लेबर किसान पार्टी’ तथा उसके गठन के उद्देश्यों के बारे में लोगों को बताया गया था। मई दिवस का आयोजन सिंगारवेलु ने मद्रास में दो स्थानों पर किया था। पहला उच्च न्यायालय के आगे समुद्र तट पर। दूसरा ट्रिप्लीकेंस तट पर। पहली बैठक की अध्यक्षता स्वयं सिंगारवेलु ने की थी। दूसरे कार्यक्रम की अध्यक्षता एस. कृष्णास्वामी सरमा ने। उस अवसर पर सिंगारवेलु ने कहा था कि मई दिवस का आयोजन स्वयं मजदूरों द्वारा किया गया है। उन्होंने उम्मीद जाहिर की थी कि देश में शीघ्र ही मजदूरों की सत्ता स्थापित होगी, जो लोगों के विकास को गति देगी। ‘मद्रास मेल’ नामक अखबार ने ‘लेबर किसान पार्टी’ द्वारा मई दिवस की आलोचना का जवाब देते हुए कहा था कि केवल वास्तविक मजदूर ही इस उत्सव को मना रहे थे, इसलिए चिंता की कोई बात नहीं है। उस अवसर पर लाल-क्रांति का प्रतीक ‘लाल-झंडा’ भी फहराया गया था। सार्वजनिक कार्यक्रम में लाल झंडा फहराने की वह घटना, न केवल भारत, अपितु एशिया में भी पहली घटना थी। उस अवसर पर 2 मई 1923 के ‘दि हिंदू’ में छपा था—

‘लेबर किसान पार्टी ने मद्रास में मई दिवस उत्सव आरंभ किया है। कामरेड सिंगारवेलु ने उस बैठक की अध्यक्षता की थी। प्रदर्शन कामयाब था। मीटिंग में मई दिवस को सार्वजनिक अवकाश घोषित करने की मांग भी की गई। पार्टी अध्यक्ष ने पार्टी के अहिंसक सिद्धांतों के बारे में लोगों को बताया था। उसमें लोगों से आर्थिक मदद की अपील भी की गई। इस बात पर जोर दिया गया था कि भारतीय मजदूरों को दुनिया-भर के मजदूरों के साथ एकजुट हो जाना चाहिए।’14

दिसंबर 1923 में उन्होंने ‘दि लेबर किसान गजट’ शीर्षक से पाक्षिक की शुरुआत की। इसके साथ-साथ तमिल भाषा में ‘तोझीलालान’(कामगार) शीर्षक से साप्ताहिक भी निकाला था। ‘कामगार’ के एक अंक का मूल्य ‘आधा आना’ था। अंग्रेजों की सिंगारवेलु पर नजर थी। उनकी दृष्टि में ‘हिंदुस्तान लेबर किसान पार्टी’, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से कहीं अधिक खतरनाक थी। 1924 में ‘कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र’ मामले में सिंगारवेलु को उनके घर पर नजरबंद कर लिया गया। उन दिनों उनकी उम्र 64 वर्ष थी। बाद में उन्हें जमानत मिल गई।

1925 में कानपुर में पहले कम्युनिस्ट सम्मेलन का आयोजन किया गया था। उसकी अध्यक्षता सिंगारवेलु ने की। उस बैठक में ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया’ के गठन को स्वीकृति मिली थी। अपने अध्यक्षीय भाषण में सिंगारवेलु ने छूआछूत की समस्या की चर्चा भी की थी। उनका दृष्टिकोण साम्यवादी दृष्टिकोण से मेल खाता था,

‘हमें साफ तौर पर समझ लेना चाहिए कि साम्यवाद की नजर में छूआछूत पूरी तरह आर्थिक समस्या है। अछूतों को मंदिर प्रवेश, सार्वजनिक तालाबों और मार्गों पर चलने का अधिकार प्राप्त है अथवा नहीं, इन प्रश्नों का ‘स्वराज’ के संघर्ष से कोई संबंध नहीं है….कम्युनिस्टों की न तो कोई जाति होती है, न धर्म। व्यक्ति का हिंदू, मुसलमान या ईसाई होना उसका निजी मामला है….जैसे ही उन(अस्पृश्यों) की आर्थिक पराश्रितता खत्म होगी, छूआछूत की समस्या भी अपने आप समाप्त हो जाएगी।’15

उन दिनों पेरियार राजनीति में, गैर-ब्राह्मण जातियों को समुचित प्रतिनिधित्व न दिए जाने के कारण कांग्रेस से नाराज चल रहे थे। उन्होंने ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की स्थापना की थी। सिंगारवेलु की ख्याति उन दिनों शिखर पर थी। उसी दौरान दोनों नेता एक-दूसरे के करीब आए। सिंगारवेलु ने ही पेरियार को कांग्रेस छोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया था। पेरियार के मनस् में साम्यवाद का बीजारोपण करने वाले भी वही थे। सिंगारवेलु की सलाह पर ही पेरियार ने सोवियत संघ की यात्रा पर गए थे। लौटने के बाद पेरियार ने सोवियत संघ के अनुभवों के आधार पर ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की कार्यनीति में बदलाव करने का निर्णय लिया। पेरियार के आग्रह पर सिंगारवेलु ने ‘इरोद कार्यक्रम’ का ड्राफ्ट तैयार किया। ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ का एक सम्मेलन 4 मार्च 1934 को मन्नारगुडी, तमिलनाडु में हुआ था। सिंगारवेलु ने उसकी अध्यक्षता की थी। अपने भाषण में सिंगारवेलु ने भारतीय समाज के आर्थिक वैषम्य पर चिंता व्यक्त की थी—

‘देश की 40 प्रतिशत जनता को भरपेट भोजन भी नहीं मिलता। मृत्यदर दूसरे देशों से कहीं ज्यादा है। यह 1000 में 30 है। 100 में से 30 बच्चे एक साल का होते-होते मर जाते हैं। भारत में औसत आयु मात्र 20 है, जबकि इंग्लेंड में 53 साल है….लोग घोर दारिद्रय में जीते हैं, बावजूद इसके मंदिरों की घंटियां टनटनाती रहती हैं। मस्जिदों में नमाज और चर्च में प्रार्थनाएं चलती रहती रहती हैं। लोग जिसे ईश्वर समझकर पूजते हैं, उसके बारे में वे कुछ नहीं जानते। ईश्वर महज मनुष्य की रचना है।’16

उस भाषण में सिंगारवेलु ने अपने पूर्वजों को भी नहीं छोड़ा था—

‘मेरे अपने पूर्वजों ने ब्राह्मणों को भोजन कराने के लिए 1 लाख रुपये अलग रख दिए थे। लेकिन जब उनकी बस्ती के मछुआरे बीमार पड़े, वे केवल देवता को पूजा-अर्चना, प्रार्थना और बलि तक सीमित रहे। मेरी जाति की तरह और भी जातियां हैं। वे भी धर्मादे के लिए रकम एक ओर रख देती हैं और मुष्किल समय में प्रार्थनाओं और बलि देकर मन को तसल्ली देती रहती हैं।’17

पेरियार के मन में सिंगारवेलु के प्रति गहरा सम्मान था। खासकर उनकी वैज्ञानिक सोच पर। पेरियार के आग्रह पर ही सिंगारवेलु ने ‘कुदी अरासु’ में लिखना शुरू किया था। मगर उन दोनों के साथ आने से न तो कांग्रेस खुश थी, न ही अंग्रेज सरकार। अंग्रेजों का मानना था कि यह सिंगारवेलु ने ही पेरियार को ‘बिगाड़ा’ है। ब्रिटिश सरकार नहीं चाहती थी कि देश में कम्युनिस्ट आंदोलन को बढ़ावा मिले। उसे देखते हुए सिंगारवेलु ने ‘मजदूर एवं किसान’ जैसे शब्दों को अपनाया। मगर अपनी उग्र कार्यषैली के कारण वे सरकार और विरोधियों की आंखों में हमेशा ही खटकते रहे।

मजदूर नेता के रूप में  

बकिंघम एंड कार्नेटिक मिल, मद्रास की सबसे बड़ी कपड़ा मिल थी। उसका महत्त्व इसलिए भी है क्योंकि भारत की पहली लेबर यूनियन18, ‘मद्रास लेबर यूनियन’ का गठन अप्रैल 1918 में वहीं के मजदूरों ने मिलकर किया था। ब्रिटिश अधिकारी यूनियन के गठन का विरोध कर रहे थे। घटना की नींव 1920 में पड़ी थी। ब्रिटिश अधिकारी रिवाल्वर लिए मजदूरों को धमकाता फिर रहा था। एक मजदूर ने उसकी रिवाल्वर छीनकर पुलिस को सौंप दी। इसपर पुलिस ने गोलीबारी शुरू कर दी। बाबूराव और मुरुगन नामक दो युवा मजदूर उस गोलीबारी में मारे गए। मद्रास में श्रम आंदोलन में मरने वाले ये दोनों पहले थे। घटना से नाराज 13000 मजदूर हड़ताल पर उतर आए। बाद में पुलिस और कामगारों के बीच कई भिड़ंत हुईं, जिनमें दर्जनों मजदूरों को प्राण गंवाने पड़े। सिंगारवेलु ने न केवल हड़ताल के नेतृत्व में हिस्सा लिया, बल्कि लगातार लेख लिखकर मजदूरों के उत्पीड़़न के विरुद्ध आवाज उठाते रहे।

उन्हीं दिनों उत्तरी मद्रास में मैसी कंपनी के कामगार भी हड़ताल पर चले गए। वी. चक्करई और ओदीकेसवेलु नायकर जैसे मजदूर नेताओं के साथ सिंगारवेलु एक बार फिर मजदूरों के समर्थन में उतर गए। अपने आग उगलते भाषणों से इन तीनों नेताओं ने सरकार को हिला दिया था। 1927-28 उत्तरी-पश्चिमी रेलवे, बंगाल-नागपुर रेलवे तथा ईस्ट इंडियन रेलवे के कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर हड़ताल पर चले गए। रेलवे कर्मचारियों को समर्थन देने, उनका हौसला बढ़ाने के लिए सिंगारवेलु ने भोपाल, हावड़ा और बंगाल की यात्राएं कीं। हावड़ा और बंगाल में 30,000 मजदूर-कामगार हड़ताल पर थे। सिंगारवेलु ने अपने साथियों के साथ हड़ताल में हिस्सा लिया था। उत्तरी भारत की यात्रा से लौटे ही थे कि दूसरी हड़ताल की सूचना मिली। 1928 में दक्षिण भारतीय रेलवे के मजदूरों ने भी हड़ताल का ऐलान कर दिया। मजदूर उनकी योग्यता के नए सिरे से छंटनी का विरोध कर रहे थे। छंटनी के लिए प्रबंधकों ने कर्मचारियों की योग्यता के नए मानदंड तैयार किए थे, जो मजदूरों को स्वीकार्य नहीं थे। दूसरे रेलवे ने मजदूरों को अलग-अलग ठिकानों पर भेजने का निर्णय लिया था। मजदूर इनका विरोध कर रहे थे। मांगे न मानने पर मजदूर 19 जुलाई 1928 से हड़ताल पर चले गए। उनके समर्थन में बाकी मजदूरों और कामगारों ने भी हड़ताल की घोषणा कर दी। परिणामस्वरूप 21 जुलाई से रेलवे का चक्का जाम हो गया। वह हड़ताल आखिरकार नाकाम सिद्ध हुई। सिंगारवेलु को दस वर्षों की सजा हुई। लेकिन बाद में अपील पर, उनकी बीमारी और उम्र को देखते हुए सजा की अवधि 18 महीने कर दी गई।

1927 में ही जब हड़ताली मजदूर चाको और विंसेंट पुलिस की गोली से मारे गए। मद्रास तक जब वह समाचार पहुंचा तो सिंगारवेलु ने बिना कोई पल गंवाए उनकी स्मृति में शोक सभा का आयोजन किया। जिसमें पुलिस के दमन की निंदा की गई। मजदूर और कामगारों की समस्याओं के समाधान को लेकर वे इतने समर्पित थे कि जब भी, जहां से भी बुलावा मिलता, तुरंत पहुंच जाते थे।

सिंगारवेलु का निधन 11 फरवरी 1946 को हुआ। जब तक जिये तब तक उन्हें मजदूरों के हितों की चिंता सताती रही। जीवन के आखिरी दिनों में जब बढ़ी उम्र के कारण सक्रियता घट गई तो उन्होंने पेरियार की पत्रिकाओं, ‘कुदी अरासु’, ‘रिवोल्ट’ तथा अंग्रेजी दैनिक हिंदू में लेख आदि लिखकर संघर्ष की लौ को जलाए रखा। उनकी आंखों में समानता पर आधारित, वर्गहीन समाज का सपना बसता था। इस कसौटी पर कांग्रेस की ‘स्वराज’ की अवधारणा भी उन्हें अधूरी दिखाई पड़ती थी। उनका गांधी के नाम लिखा गया एक पत्र 24 मई 1922 को ‘नवशक्ति’ में प्रकाशित हुआ था। पत्र में उन्होंने लिखा था कि कि प्रत्येक परिवार को उतनी जमीन मिलनी चाहिए, जिससे वह अपनी जरूरत के लायक अन्न उपजा सके। अपना घर होना चाहिए, ताकि किसी को भी किराया न चुकाना पड़े। इसके अलावा मुफ्त शिक्षा, स्वास्थ्य की व्यवस्था भी सरकार की ओर से करनी चाहिए। जिस स्वराज में यह गारंटी न हो, उसका कोई मूल्य नहीं है। असली स्वराज केवल जनता द्वारा, और केवल जनता के लिए आएगा। वे बेहद पढ़ाकू थे। उनका पुस्तकालय मद्रास के सबसे बड़े निजी पुस्तकालयों में से था।

ओमप्रकाश कश्यप

 संदर्भ

  1.  अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग,दि हिस्ट्री ऑफ़ मे डे, इंटरनेशनल पंपलेट, 14,799 ब्रोडवे न्यू यार्क, पृष्ठ 3
  2.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम- सिंगारवेलु : फर्स्ट कम्युनिस्ट इन साउथ इंडिया, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, पृष्ठ-1
  3.  पी.मनोहरन, जेनेसिस एंड ग्रोथ ऑफ़ कम्युनिस्ट पार्टी इन इंडिया, पृष्ठ 191।
  4.  पी. मनोहरन, पृष्ठ-189
  5.  पी. मनोहरन, पृष्ठ-190
  6.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम, पृष्ठ-1
  7.  पी.वसंतकुमारन, गॉडफादर ऑफ़ इंडियन लेबर, एम. सिंगारवेलु, पूर्णिमा प्रकाशन, चैन्नई।
  8.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम, पृष्ठ-2
  9.  वसंतकुमारन, पूर्णिमा प्रकाशन, चैन्नई।
  10.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम, पृष्ठ 164-165
  11.  उपर्युक्त 165
  12.  पी. मनोहरन, पृष्ठ 183
  13.  दि कलैक्टिड वर्क्स ऑफ़महात्मा गांधी, खंड-26, पृष्ठ 132-134।
  14.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम, पृष्ठ-169
  15. उपर्युक्त पृष्ठ 203
  16.  उपर्युक्त पृष्ठ 221-22
  17.   उपर्युक्त पृष्ठ 222
  18.  पी. मनोहरन, पृष्ठ-11