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सच्ची रामायण का विरोध धार्मिक से कहीं ज्यादा राजनीतिक है

सामान्य

मैं मानव समाज का सुधारक हूँ. मैं देश, धर्म, ईश्वर, भाषा अथवा राज्य की परवाह नहीं करता. मुझे केवल मनुष्यता के विकास और उसके कल्याण की चिंता है—पेरियार

बाइबिल का परमात्मा पक्के तौर पर सर्वाधिक ईर्ष्यालु, सर्वाधिक नाकारा, सर्वाधिक क्रूर, सर्वाधिक अन्यायी, सर्वाधिक रक्त पिपासु, सबसे ज्यादा निरंकुश तथा मानवीय गरिमा एवं स्वतंत्रता का सबसे बड़ा शत्रु था. जबकि शैतान शाश्वत विद्रोही और पहला मुक्त चिंतक था—मिखाइल बकुनिन, ईश्वर और राज्य.

‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी.’ प्रथम दृष्टया लोकतांत्रिक लगने वाली ये पंक्तियां तुलसी की हैं. पढ़कर लगता है कि लिखने वाले का लोकतंत्र में अटूट विश्वास है. वह साधक को अपनी भावना के अनुसार साध्य गढ़ने की छूट देता है. मगर इनमें लोकतंत्र की व्याप्ति मान लेना वैसा ही संभ्रम है, जैसे यह कहना कि कण-कण में भगवान हैं, इसलिए चराचर जगत में सभी बराबर हैं, दुनिया में आदर्श समानता है. ऊंच-नीच, जात-पात, छोटा-बड़ा, छूत-अछूत जैसा कुछ भी नहीं है. असल में, धर्म का यह उदार चेहरा उतना ही बनावटी है, जितना किसी पुरोहित का दक्षिणा मिलते ही ‘कल्याणम् भव’ कह, निस्पृह भाव से आगे बढ़ जाना. भारतीय समाज छोटे-छोटे समुदायों, धार्मिक और सांप्रदायिक समूहों, गोत्रों-उपगोत्रों तथा जातियों-उपजातियों में हमेशा बंटा रहा. उनके बीच वर्चस्व को लेकर संघर्ष भी लगातार चलते रहे.

हालांकि एक सीमा तक तुलसी गलत भी नहीं थे. जिस दौर में वे रामचरितमानस लिख रहे थे, समाज में रामकथा के अलग-अलग रूप प्रचलित थे. प्रत्येक समूह अपनी रामकथा को असली मानता था. बावजूद इसके रामायण के भिन्न कथारूपों पर विश्वास करने वाले समूहों में परस्पर कोई द्वेष नहीं था. अकेले राम सभी के ‘भगवान’ नहीं थे, लेकिन कोई राम को सबसे बड़ा देवता और भगवान माने, इसपर उन्हें कोई आपत्ति न थी. आदिवासियों, जनजातियों, शूद्रों, अतिशूद्रों के अपने-अपने देवता थे, जो राम जैसे अवतारी, उतने ही पराक्रमी और चमत्कारी; कहीं-कहीं तो उनसे भी आगे थे. राम के देवत्व पर भरोसा कर अपना आराध्य मानने वालों ने भी, उन्हें अपनी परंपरा और संस्कृति के अनुसार ढालने के बाद ही स्वीकार किया था. यही कारण है कि उस जमाने में सीता को राम की बहन बताने वाली जैन रामायण ‘पउमचरिय’ उतनी ही लोकप्रिय और सम्मानीय मानी जाती रही, जितनी राम-सीता को पति-पत्नी बताने वाली वाल्मीकि रामायण.

विभिन्न रामायणों के मुख्य पात्र भले ही एक हों, किंतु उनके चरित्र में आधारभूत अंतर है. जैन रामायण में ब्राह्मणों पर रावण को बदनाम करने का आरोप लगाया गया है. जैन मान्यता के अनुसार रावण उनके 63 शलाकापुरुषों में से एक था. उसके अनुसार राम और रावण दोनों जैन थे. मृत्यु के बाद राम को कैवल्य; तथा लक्ष्मण को नर्क प्राप्त हुआ था. वाल्मीकि, तुलसी, विमलसूरि(पउमचरिय) द्वारा रचित रामायणों के अलावा भी रामकथा के सैंकड़ों रूप दुनिया-भर में प्रचलित हैं. फादर कामिल बुल्के ने देश-विदेश में प्रचलित रामकथाओं की गणना कर, उनकी संख्या को 300 माना था. अपने लेख ‘थ्री हंड्रेड रामायण’ में ए. के. रामानुजन रामकथा की विविधता को दर्शाने के लिए जिस लोकश्रुति का सहारा लेते हैं, उसके अनुसार रामकथा अनंत रूपों में, अनादिकालीन कथा है. फिर पेरियार ने ऐसा क्या लिखा था, जिससे उनकी लिखी ‘सच्ची रामायण’ का नाम सुनकर ब्राह्मणवादी लाल-पीले होने लगते हैं?

मुख्य कारण था, पेरियार का रामकथा के प्रति दृष्टिकोण. पेरियार स्वयं नास्तिक थे. जहां रामायण के अन्य प्रारूपों के साथ कोई न कोई धार्मिक दृष्टिकोण जुड़ा था, पेरियार उसे धार्मिक पुस्तक मानने से ही इन्कार करते थे. उनका कहना था कि रामायण एक राजनीतिक ग्रंथ है. उसकी रचना ब्राह्मणों ने द्रविड़ों पर अपना प्रभुत्व दर्शाने के लिए की गई है. वह द्रविड़ों के आत्मसम्मान की विरोधी, उनकी अस्मिता का हनन करने वाली है. ‘दि रामायण: एक ट्रू रीडिंग’ की भूमिका में वे लिखते हैं—

‘रामायण और बरधाम(महाभारत) काल्पनिक ग्रंथ हैं….इन्हें आर्यों ने द्रविड़ों को अपने जाल में फंसाने, उनके आत्मसम्मान को नष्ट करने, निर्णय सामथ्र्य को कुंद करने तथा उनकी इंसानियत को पथभ्रष्ट करने के लिए रचा है. इन दोनों कथाओं के नायक क्रमशः राम और कृष्ण हैं. जो कि आर्य हैं और बेहद साधारण व्यक्ति हैं. ये कथाएं इसलिए थोपी गईं हैं, ताकि इनके कथानायकों, उनके परिजनों एवं सहायकों को अलौकिक एवं अतिमानवीय मान लिया जाए; तथा उन्हें पूजनीय मानकर, जनसाधारण द्वारा उनकी पूजा-अभ्यर्थना की जाए.’ बावजूद इसके रामासामी पेरियार की पुस्तक ‘दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ जब तक तमिल और अंग्रेजी में थी, तब तक हिंदी पट्टी के ब्राह्मणवादियों को उससे कोई आपत्ति नहीं थी. इसलिए करीब 40 वर्षों तक उसके तमिल और अंग्रेजी में संस्करण पर संस्करण निकलते रहे.

पुस्तक को लेकर तूफान तब उठा जब कानपुर देहात के रहने वाले पेरियार ललई सिंह ने ‘सच्ची रामायण’ शीर्षक से उसका हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया. हिंदी अनुवाद दुलालपुर निवासी, राम आधार द्वारा किया गया था. उसे छापने के लिए उस समय कोई प्रकाशक तैयार नहीं था. इसलिए ललई सिंह ने उसे अपने प्रकाशन, ‘अशोक पुस्तकालय’ कानपुर से 1 अक्टूबर, 1968 को प्रकाशित किया था. मूल कृति ‘रामायण पादिरंगल’(रामायण के कथापात्र) शीर्षक से 1930 में प्रकाशित हुई थी. 1972 तक उसके दस संस्करण प्रकाशित हो चुके थे. पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद 1959 में आया था. उसके बाद दो और संस्करण क्रमशः 1972 और 1980 में प्रकाशित हुए. पुस्तक के हिंदी में आने की संभावना उसके अंग्रेजी अनुवाद के बाद ही बनी थी. ‘रामायण पादिरंगल’ की रचना से पहले पेरियार ने लगभग सभी उपलब्ध रामकथाओं यथा जैन, बौद्ध, कंब आदि का गहन अध्ययन किया था. विषय से संबंधित विद्वानों से बातचीत की थी.

रामकथा संबंधी उनके अध्ययन-चिंतन की सफल परिणति एक साथ दो पुस्तकों के रूप में हुई थी. दूसरी पुस्तक का नाम था—रामायण कुरीप्पुकल(रामायण के बारे में कुछ बातें). वह पहली की अपेक्षा अधिक गंभीर तथा कथानक की दृष्टि से मूल रामकथा के करीब थी. उनमें प्रसिद्धि मिली पहली पुस्तक को. अंग्रेजी में उसे मूल शीर्षक से थोड़ा हटकर, ‘दि रामायण: एक ट्रू रीडिंग’ शीर्षक से छापा गया. उसका हिंदी अनुवाद ‘सच्ची रामायण’ के रूप में सामने आया. हम सोच सकते हैं कि तमिल कृति ‘रामायण पादिरंगल’ यानी ‘रामायण के कथापात्र’ के हिंदी में ‘सच्ची रामायण’ के रूप में अनूदित होते-होते, शीर्षक के स्तर पर भी काफी अर्थ-परिवर्तन हो चुका था.

‘सच्ची रामायण’(रामायण पादिरंगल) की रचना विखंडनात्मक शैली में हुई है. वह रामकथा की स्थापित छवियों का खंडन करती थी. उसका उद्देश्य रामायण के कथापात्रों के चरित्र का वस्तुनिष्ट विवेचन है. जिस राम को तुलसी मर्यादापुरुषोत्तम कहकर ईश्वरतुल्य बना देते हैं, उसके बारे में पेरियार आरंभ में ही साफ कर देते हैं कि—‘राम कोई आदर्श व्यक्ति नहीं है.’ आगे वे विस्तार से राम के चरित्र को लेकर अपने विचार पेश करते हैं. शंबूक प्रसंग का उल्लेख करते हुए वे आगे लिखते हैं—

‘राम जिसने तपस्या कर रहे शंबूक की बगैर किसी गलती के, निर्दयतापूर्वक हत्या कर दी थी, उस राम को विष्णु का अवतार माना जाता है. अगर आज राम की तरह का कोई राजा होता तो उन लोगों की क्या दशा होती, जिन्हें शूद्र(जो गालीनुमा संबोधन है) कहा जाता है!’

ऐसी वैचारिक प्रखरता, प्रतिबद्धता और साफगोई के कारण वह उसकी लोकप्रियता उत्तरोत्तर बढ़ती गई.

पेरियार ललई सिंह ने न केवल ‘दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ का हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया था, अपितु ‘सच्ची रामायण’ में पेरियार के तर्कों की पुष्टि के लिए, विभिन्न रामकथाओं से कुछ संदर्भ भी दिए थे. जिसे उन्होंने ‘सच्ची रामायण की चाबी’ कहा था. पाठकों की सुविधा के लिए दोनों पुस्तकों को एक ही जिल्द में छापा गया था. उदाहरण के लिए पेरियार ने सीता का वर्णन करते हुए उसके चरित्र की दुर्बलताओं को उजागर किया था तो पेरियार ललई सिंह ने उसकी पुष्टि के लिए रामचंद्र शुक्ल की पुस्तक ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ से, ‘श्रीरामावतार भजन तरंगिनी’ से एक पद उद्धृत किया था. पद में यूं तो पति-पत्नी का सहज रति प्रसंग है. लेकिन एक ‘वनवासी मर्यादा पुरुषोत्तम’ के संदर्भ से जुड़कर वह अशालीन लगने लगता है. पद में सीता का कथन देखिए—

‘हमारे प्रिय ठाड़े सरजू तीर।।टेक।।

छोड़ लाजि मैं जाय मिली, जहां खड़े लखन के वीर

मृदु मुसुकाय पकरि कर मेरी खेच लियो तब चीर

झाऊ वृक्ष की झाड़ी भीतर करन लगे रति धीर.1

कह सकते हैं कि पेरियार द्वारा, ‘दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग’, के रूप में रामायण की विखंडनवादी अन्वीक्षा, ‘सच्ची रामायण’ में थोड़ी और मुखर, और अधिक व्यंजनात्मक हो चुकी थी. इसलिए ब्राह्मणवादियों के कान खड़े होना स्वाभाविक था. हिंदी में प्रकाशित होने के साथ पूरे हिंदी जगत में तूफान सा उठ गया. ललई सिंह पर मुकदमा ठोक दिया गया. यह कहकर कि पुस्तक हिंदुओं की भावनाओं को आहत कर, सामाजिक विद्वेष फैलाने वाली है, उसकी सभी प्रतियों को जब्त करने के आदेश सुना दिए गए. गौरतलब है कि प्रतिबंध और जब्ती के आदेश पुस्तक के केवल अंग्रेजी और हिंदी संस्करण के थे. तमिल तथा दूसरी दक्षिणी भारतीय भाषाओं में प्रकाशित पुस्तक की बिक्री पर कोई पाबंदी नहीं लगाई गई थी. गोया तमिलनाडु या दक्षिण भारत के दूसरे हिस्सों में हिंदू रहते ही नहीं थे. इससे पेरियार के कथन कि रामायण एक राजनीतिक ग्रंथ है—की पुष्टि होती है. सच तो यह है कि ‘सच्ची रामायण’ के माध्यम से ब्राह्मणवादी राजनीतिक ताकतें, अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक एवं राजनीतिक सत्ता की पुनर्वापसी को अंजाम देने में लगी थीं.

पुस्तक को प्रतिबंध मुक्त कराने के लिए ललई सिंह यादव को लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी. उसका समापन 16 सितंबर, 1976 के उच्चतम न्यायालय के फैसले से हुआ. शीर्षतम अदालत ने प्रतिबंध को गलत बताकर, पुस्तक की जब्त की गई प्रतियां लौटाने का आदेश दिया था. उच्चतम न्यायालय के आदेश के बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार औपचारिक आदेश जारी करने से बचती रही. 1995 में मायावती सरकार के दौरान पुस्तक प्रतिबंध-मुक्त हो सकी. उसके बाद से हिंदी पट्टी में ‘सच्ची रामायण’ की लोकप्रियता बढ़ती गई, मगर पोंगापंथी भी शांत न थे. वे विरोध के लिए नए सिरे से एकजुट होने लगे थे. नया दौर हिंदुओं का न होकर, हिंदुत्ववादियों का था. उनके भीतर पेरियार के प्रति नफरत कूट-कूट कर भरी थी. इसलिए नहीं कि पेरियार ने रामायण के पात्रों के चरित्र पर उंगलियां उठाई थीं. बल्कि इसलिए कि उन्होंने इन धर्मग्रंथों के पीछे छिपे ब्राह्मणवादियों के राजनीतिक मंसूबों को उजागर कर दिया था. पेरियार के प्रति उनके भीतर कितनी नफरत भरी थी, इस समझने के लिए एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा.

2002 में लखनऊ स्थित आंबेडकर पार्क जब बन रहा था तो उसमें योजनानुसार ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, शाहूजी महाराज, डॉ. आंबेडकर, बिरसा मुंडा, कांशीराम जैसी बहुजन शख्सियतों की मूर्तियां स्थापित की गईं. मायावती उसमें पेरियार की मूर्ति भी लगवाना चाहती थीं. कलाकार को मूर्ति-निर्माण का आदेश जारी हो चुका था. उस समय प्रदेश में भाजपा के सहयोग से बनी बहुजन समाज पार्टी की सरकार थी. पेरियार का नाम सुनते ही विश्वहिंदू परिषद, बजरंग दल, हिंदू महासभा जैसे उग्रपंथी संगठन भड़क उठे. विनय कटियार ने ऐलान किया कि पेरियार की मूर्ति लगाई गई तो वे उसे ढहा देंगे. भाजपा ने समर्थन वापस लेने की धमकी दे डाली. बसपा पेरियार को अपना ‘आइकन’ मानती थी. उसके हर कार्यक्रम में ज्योतिबा फुले, डॉ. आंबेडकर, शाहूजी महाराज के साथ-साथ पेरियार के चित्र भी लगे होते थे. उस समय मायावती चाहतीं तो सामाजिक न्याय समर्थित वैचारिकी को महत्व देकर, सरकार को दाव पर लगाने का खतरा उठा सकती थीं. लेकिन उन्होंने राजनीतिक सत्ता को बचाने का अवसरवादी विकल्प चुना. बयान दिया कि सरकार का पेरियार की मूर्ति लगाने का कोई इरादा नहीं है. जबकि मूर्ति तैयार होकर शिल्पकार के स्टूडियो में प्रतीक्षारत थी.

मंदिर आंदोलन की आड़ में प्रदेश में दक्षिणपंथी ताकतें दुबारा मजबूत हुई तो उच्चतम न्यायालय के फैसले के बावजूद पुस्तक पर नए सिरे से प्रतिबंध लगाने की मांग की जाने लगी. 2007 में प्रदेश में सुश्री मायावती की सरकार थी. उस समय भाजपा की प्रादेशिक इकाई ने आरोप लगाया कि ‘बहुजन समाज पार्टी’ सच्ची रामायण का प्रचार-प्रसार कर रही है. उसके संरक्षण में प्रदेश में बड़े पैमाने पर पुस्तक की बिक्री की जा रही है. भाजपा की प्रदेश इकाई ने, पुस्तक को हिंदुओं की भावनाओं को आहत करने वाली बताकर, उसपर तत्काल प्रतिबंध लगाने की मांग की थी. भाजपा विधान मंडल के तत्कालीन नेता ओमप्रकाश सिंह ने सरकार से मांग की थी कि—‘हिंदू देवी-देवताओं के विरोधी तथा द्रविड़िस्तान की मांग करने वाले, अलगाववादी पेरियार रामासामी की सरकार निंदा करे तथा उन्हें महापुरुषों की श्रेणी में स्थान न दे.’ भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी ने दावा किया था कि 9 अक्टूबर को बसपा की रैली में ‘सच्ची रामायण’ की 4000 प्रतियां बेची गई थीं. हैरानी की बात यह है कि सामाजिक न्याय की बात करने वाली समाजवादी पार्टी भी, ‘सच्ची रामायण’ के विरोध में भाजपा का साथ दे रही थी. विधानसभा में विपक्ष के नेता और समाजवादी पार्टी के सदस्य अहमद हसन ने ‘सच्ची रामायण’ के जरिये सरकार पर निशाना साधते हुए कहा था कि—

‘भगवान राम के प्रति अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना अच्छी बात नहीं है. पूरी दुनिया के मुसलमान स्वीडिश कार्टूनिस्ट द्वारा बनाए गए पैगंबर मोहम्मद के कार्टून की भर्त्सना कर रहे हैं. विवादित पुस्तक पर तत्काल प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए.2

इससे अनुमान लगाया जाता है कि मामला जब धर्म की आलोचना का हो तो समय-समय पर एक-दूसरे के प्रतिद्विंद्वी की भूमिका में उतरने वाले धर्मावलंबी भी एक-दूसरे के समर्थन पर उतर आते हैं.

देखा जाए तो भाजपा का आरोप सरकार पर न होकर, ‘बहुजन समाज पार्टी’ पर था. उस पार्टी पर जो पेरियार को अपना आदर्श मानती थी. अपनी वैचारिकी पर दृढ़ रहने के बजाए, मुख्यमंत्री मायावती ने एक बार फिर पीछे हटने का फैसला किया. उनकी ओर से वक्तव्य जारी हुआ—‘बसपा तथा सरकार का सच्ची रामायण की बिक्री से कोई लेना—देना नहीं है.’ मामले पर राजनीति करने के बजाय, पुस्तक पर प्रतिबंध की मांग कर रहे नेताओं को केंद्र सरकार से संपर्क करना चाहिए, जहां उनकी अपनी पार्टी की सरकार है.3

इस प्रसंग का सबसे रोचक पहलू यह है कि जिस ‘सच्ची रामायण’ के विरोध को लेकर भाजपा सरकार पर लगातार आरोप लगा रही थी, तथा बिना आगा-पीछा सोचे कांग्रेस और समाजवादी पार्टी उसका साथ दे रही थीं, उसकी प्रति न तो भाजपा के पास थी, न सपा, न कांग्रेस और न ही बसपा के पास. यहां तक कि बसपा के साहित्य के प्रकाशक ‘बहुजन चेतना मंडप’ के पास भी उस पुस्तक की प्रतियां उपलब्ध नहीं थी. जबकि लखनऊ के सबसे बड़े पुस्तक विक्रेता ‘यूनीवर्सल बुक सेलर’ का दावा था, ‘हमने वह पुस्तक कभी नहीं बेची, न ही वह पुस्तक फिलहाल हमारे पास है.’ उल्लेखनीय है कि भाजपा के लखनऊ मुख्यालय में ‘सच्ची रामायण’ को लेकर 27—28 अक्टूबर 2007 को एक बैठक हुई थी. उसमें पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह और नेता लालकृष्ण आडवाणी भी मौजूद थे. उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से प्रदेश भर में ‘सच्ची रामायण’ की बिक्री का विरोध करने को कहा था. जबकि जिस पुस्तक का बहिष्कार किया जाना था, उसकी एक भी प्रति उस बैठक में उपलब्ध नहीं थी.

भाजपा नेताओं द्वारा विधानसभा परिसर के आगे स्थित, अपने पार्टी मुख्यालय में ‘सच्ची रामायण’ की प्रतियों का दहन(का नाटक) किया था.4 भाजपा का ‘सच्ची रामायण’ के दहन का दावा कितना खरा था, इसे इंडियन एक्सप्रेस में अलका एस. पांडे की 7 नबंवर की रिपोर्ट से समझा जा सकता है. उसके अनुसार पार्टी ने जैसे-तैसे ‘सच्ची रामायण’ के कुछ पन्ने जुटाए थे. उन्हीं को जलाकर, पुस्तक के दहन का नाटक किया गया था. वे भूल गए कि किसी व्यक्ति को महापुरुष मानना या न मानना, सत्ता प्रतिष्ठानों द्वारा तय नहीं होता. थोपे गए महापुरुषों की कलई अल्पावधि में ही खुलने लगती है. उसके बाद जनता की निगाह में वे खलनायक सरीखे बन जाते हैं.

एक महत्वपूर्ण बात और भी है. रामायण को धार्मिक ग्रंथ न मानकर पेरियार ने उसे विशुद्ध राजनीतिक ग्रंथ माना है. पेरियार के आलोचक भी उनपर कुछ ऐसा ही आरोप लगाते हैं. उनके अनुसार पेरियार द्वारा हिंदू धर्म तथा उसके मिथकों की आलोचना पूर्णतः राजनीति से प्रेरित थी. पेरियार इससे इन्कार नहीं करते थे. अंतर सिर्फ इतना है कि ब्राह्मण कभी यह मानने को तैयार नहीं होते कि रामायण तथा रामकथा को हिंदू संस्कृति के केंद्र में रखने के पीछे उनकी राजनीति है. खुद को सबसे ऊपर, शिखर पर बनाए रखने की राजनीति. जबकि पेरियार अपनी मंशा को छिपाते नहीं हैं—

‘मैं अपने समाज के कुछ ऐसे पहलुओं पर प्रहार करता हूं, जो हमें नीचा दिखाते हैं. मेरा जोर इस बात पर है कि जब तक हिंदू धर्म, हिंदू देवताओं, हिंदू शास्त्रों, पुराणों, वेदों और इसके इतिहास पर हमारा विश्वास रहेगा, और जब तक हम इनका अनुसरण करते जाएंगे, तब तक हमारा दमन और शोषण जारी रहेगा. हम समाज की असमानताकारी स्थितियों से कभी उबर ही नहीं पाएंगे. इन सड़ी हुई स्थितियों से उबरने की कोशिश के बजाए, जो केवल इनका पालन करने में लगा रहेगा—वह चाहे जितनी बेहतर स्थिति में आ जाए, खुद को अपनी अवनति और अपमानजनक स्थितियों से कभी उबार नहीं पाएगा.’5

एक अन्य भाषण में उन्होंने कहा था—

‘मैं किसी को चाहे प्यार करूं अथवा घृणा; दोनों स्थितियों में मेरा सिद्धांत एक ही रहता है. वह सिद्धांत यह है कि मैं यह शिक्षा देता हूं कि धनी लोगों और प्रशासनिक अधिकारियों को गरीब लोगों का खून नहीं चूसना चाहिए.’6

पेरियार का मानना था कि बगैर हिंदू धर्म को मिटाए, जाति-भेद को मिटाना संभव नहीं है. वे धर्मांतरण के विरोधी थे. जाति-आधारित उत्पीड़न और अवमानना से बचने के लिए जिन लोगों ने धर्मांतरण का सहारा लिया था, उनकी सामाजिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया था. हिंदू धर्म में जो अछूत था, धर्मांतरण के बाद भी उसकी हैसियत अछूत जैसी ही रहती थी. इसलिए शूद्रों और अतिशूद्रों की राजनीतिक, सामाजिक भागीदारी को आवश्यक मानते थे. राजनीति में प्रवेश के साथ ही उन्होंने सभी वर्गों को उनकी संख्या के अनुपात में संरक्षण की मांग शुरू कर दी थी. उन दिनों अस्पृश्यों को मंदिरों में प्रवेश की स्वतंत्रता नहीं थी. पेरियार स्वयं नास्तिक थे. मगर मंदिर प्रवेश का मसला सामाजिक स्वतंत्रता से भी जुड़ा था. इसलिए तमिलनाडु कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बनने के तुरंत बाद उसके तिरुपुर सम्मेलन में उन्होंने एक प्रस्ताव पेश किया, जिसमें सभी अस्पृश्यों को मंदिरों में प्रवेश की इजाजत की मांग की गई थी. लेकिन कांग्रेस कमेटी के ब्राह्मण सदस्यों ने उस प्रस्ताव का जोरदार विरोध विरोध किया. नाराज पेरियार ने तत्काल घोषणा की कि वे मनुस्मृति, रामायण आदि पुस्तकों, जिनका उपयोग कुटिल ब्राह्मणों द्वारा धार्मिक हथियारों के रूप में किया जाता है—दहन करेंगे.

वह अवसर 1956 में आया. पेरियार ने ऐलान किया कि 1 अगस्त 1956 को वे मद्रास के समुद्री तट पर राम की तस्वीरों की होली जलाएंगे. उत्तर भारत में दशहरे के अवसर पर हर वर्ष रावण के पुतले को आग लगाई जाती है. पेरियार रावण को आदर्श द्रविड़ राजा मानते थे. इसलिए उत्तर भारतीयों द्वारा रावण के पुतले को आग लगाने के विरोध में उन्होंने राम की तस्वीरों का दहन करने का ऐलान किया था. एक तरह से वह ब्राह्मणवादी संस्कृति का प्रतीकात्मक विरोध था. पेरियार की घोषणा के बाद तमिलनाडु के सभी नेताओं ने उनसे संपर्क कर, कार्यक्रम को टाल देने का अनुरोध किया. तमिलनाडु कांग्रेस के अध्यक्ष पी. काक्कन ने कहा कि राम की तस्वीरें जलाना ईश्वर के प्रति उस विश्वास की अवमानना होगी, जिसके भरोसे गांधी ने आजादी प्राप्त की है. उन्हें पेरियार के प्रस्तावित कदम को ‘असामाजिक कृत्य’ घोषित किया था. इसपर पेरियार ने अपने निश्चय पर दृढ़ रहते हुए जवाब दिया कि उनका यह कदम सामाजिक परिवर्तन के लिए अपरिहार्य है.

अगले ही दिन सुबह, घर से निकलने के साथ ही पुलिस उपायुक्त ने पेरियार को गिरफ्तार कर लिया. पेरियार इस स्थिति के लिए पहले से ही तैयार थे. घर से निकलते समय उनके पास माचिस की डिब्बियों, राम की तस्वीरों के अलावा एक बिस्तर भी था, जिसे वे जेलयात्रा की संभावना के कारण अपने साथ लेकर निकले थे. पेरियार के गिरफ्तार होते ही उनकी पत्नी समुद्र तट पर पहुंची जहां उनके समर्थक इकट्ठा थे. उन्होंने पेरियार की गिरफ्तारी की सूचना दी. इससे उनके समर्थक उग्र हो गए और साथ लाई राम की तस्वीरों को आग के हवाले करने लगे. उस समय तक पुलिस भी वहां पहुंच चुकी थी. करीब आधा घंटे तक पुलिस से बचने और गिरफ्तार होने का नाटक चलता रहा. लोग पिटते रहे, खुद को बचाने के लिए भागते भी रहे. भागते-भागते एक व्यक्ति रेत पर फिसल गया. पुलिस उसे गिरफ्तार करने को दौड़ी. लेकिन तब तक वह राम की तस्वीर को आग लगा चुका था. बाद में पेरियार सहित सभी को रिहा कर दिया गया. पेरियार का उद्देश्य पूरा हो चुका था.

पेरियार के जीवन से जाना जा सकता है कि उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था. वे जनता के बीच में खड़े होकर खुलेआम देवी-देवताओं का मखौल उड़ाते थे. धर्म और उसके प्रतीकों में आस्था और विश्वास को जनसाधारण की गरीबी और दैन्य के लिए जिम्मेदार मानते थे. कहते थे कि धर्म का मूल उद्देश्य, ईश्वर के गौरवगान की खातिर मनुष्यता का तिरष्कार करना है. इसपर धर्म भीरू लोग कहते कि पेरियार मूर्ख है. एक न एक दिन ईश्वर का कोप उनपर कहर टूटेगा. उस समय वह संभल नहीं पाएंगे. मगर पेरियार ने 94 वर्ष लंबा संघर्षमय जीवन जिया. अपनी मृत्यु से एक दिन पहले भी वे अपने मिशन को लेकर सतर्क थे. वे अंत तक कहते रहे कि यदि ईश्वर में जरा-भी शक्ति तो वह उन्हें दंड क्यों नहीं देता! उनसे उनका जीवन छीन क्यों नहीं लेता! खुद को ‘पंडित’ और धर्माधिकारी कहने वाले लोगों के पास पेरियार के इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं था. आस्था और धर्म के नाम पर दूसरों को मूर्ख बनाते आए लोगों के पास पेरियार के तार्किक प्रश्नों का उत्तर हो भी नहीं सकता था.

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ :

  1. सच्ची रामायण और सच्ची रामायण की चाबी, अंबेडकर प्रचार समिति, मोती कटरा आगरा, पृष्ठ 76
  2. वेब दुनियाhttps://news.webindia123.com/news/ar_showdetails.asp?id=711050918&cat=&n_date=20071105
  3. वेब दुनियाhttps://news.webindia123.com/news/articles/India/20071027/805535.html.
  4. वन इंडियाhttps://www.oneindia.com/2007/10/30/bjp—workers—burnt—copies—of—sacchi—ramayan—1193744742.html
  5. रिपब्लिक 19 जनवरी, 1945
  6. दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग के प्रथम संस्करण के प्रकाशकीय से उद्धृत, 1959

प्राचीन भारत में दास प्रथा : एक सामाजिक-सांस्कृतिक कलंक

सामान्य

अरस्तु ने कहा था, कुछ व्यक्तियों का जन्म दास बनने के लिए ही हुआ है। मैं इससे इन्कार करता हूं। क्योंकि मैं नहीं मानता कि कुछ लोग जन्मजात मालिक होते हैं—डेनियल वी. चेप्पल

कहा जाता है कि सभ्यता को दासों की जरूरत पड़ती है। मैं कहता हूं, गुलामों की मदद से कोई भी सभ्य और सुसंस्कृत समाज नहीं बनाया जा सकता—विल्हेम रीश

संस्कृति के बारे में जितनी अच्छी-अच्छी बातें संभव हैं, सब भारतीय संस्कृति में भी कही जाती हैं। जैसे कि भारतीय संस्कृति उदार है। समरस है। पुरानी है। नए विचारों का स्वागत करने वाली है। दास प्रथा के बारे में पूछा जाए तो अधिकांश का उत्तर होगा—‘नहीं, यह तो पश्चिम की विशेषता है। खासकर रोम की। भारत का इससे दूर-दूर तक नाता नहीं है।’ जवाब में कोई देवदासी का जिक्र छेड़ दे तो आस्था का मामला कहकर तुरंत दबा दिया जाएगा। बड़े-बड़े विद्वानों का भी यही हाल रहा है। ‘हिंदू सभ्यता’ में राधाकुमुद मुखर्जी इस कुप्रथा पर लगभग मौन साधे रहते हैं। रामविलास शर्मा कुछ ईमानदार हैं। उनके अनुसार यह प्रथा भारत में थी, मगर बहुत बड़े स्तर पर नहीं।1 हालांकि इससे हमारी समस्या कम नहीं होती। महाभारत(सभापर्व-52/45, विराटपर्व-18/21) में युधिष्ठिर द्वारा 88,000 स्नातकों में से प्रत्येक को 30, कुल 26,40,000 दासियां दान में देने का उल्लेख है। यह एक राजा द्वारा अवसर-विशेष पर दिए गए दान का उदाहरण है। धर्मशास्त्रों में एक बार में हजारों दासियां दान करने के उल्लेख कई जगह हैं। रामविलासजी दास-प्रथा के और कितने बड़े स्तर की कल्पना करते थे, कहना मुश्किल है। काणे थोड़ा संतुलित करने का प्रयास करते हैं—‘ऐसा प्रतीत होता है कि यहां दास का अर्थ गुलाम या अर्धदास है।’2 यहां ‘गुलाम’ और ‘दास’ में पारिभाषिक दृष्टि से क्या अंतर है, यह तो काणे साहब ही बता सकते हैं। रोम में अर्धदास को ‘शेरिफ’ अथवा ‘हेलोट’ कहा जाता था। वे कृषि-भूमि के साथ जुड़े होते थे। भूमि के खरीद-बिक्री में उनकी खरीद-फरोख्त भी शामिल होती थी। उपर्युक्त ऋचा में कृषि-भूमि अथवा खेती का कोई उल्लेख नहीं है। कौटिल्य या नारद के विभाजन में कृषिदास का अलग से कोई उल्लेख नहीं है। ए. एल. बाशम ने ‘दास’ शब्द का प्रयोग आक्रमणकारी आर्यों द्वारा पराजित प्राग्वैदिक अनार्यों के लिए किया है।

सिंधु सभ्यता में दास

भारत सहित प्राचीन सभ्यताओं में दास प्रथा के कम से कम 5200 पहले तक के प्रमाण उपलब्ध हैं। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो आदि सिंधु सभ्यता(3300—1750 ईस्वीपूर्व) के प्रमुख नगरों में बड़े-बड़े भवनों के साथ एक कमरे के मकान भी मिले हैं। उससे तत्कालीन समाज के आर्थिक-सामाजिक विभाजन का अनुमान लगाया जाता है। पुरातत्ववेत्ता जॉन मार्शल के अनुसार एक कमरे के मकान नौकरों अथवा दासों के हो सकते हैं। हालांकि यह केवल अनुमान है। व्हीलर ने हड़प्पा और सुमेरियन सभ्यता के बीच हाथीदांत, कपास के साथ-साथ दासों के व्यापार की संभावना भी व्यक्त की है। उसके अनुसार लागेश के बाउ के मंदिर परिसर में एक फैक्ट्री थी। उसमें 21 डबलरोटी बनाने वाले, 27 दासियां, 25 शराब खींचने वाले और छह दास, बुनकर और कताई करने वाले, लुहार तथा अन्य शिल्पकर्मी काम करते थे। व्हीलर के अनुसार कारखाने की संरचना हड़प्पा शैली के अनुरूप थी।3 अब यदि मान लिया जाए कि हड़प्पा और सुमेरियन सभ्यता के बीच दासों का व्यापार भी होता था, तो सिंधु सभ्यता में दासों के मौजूगी स्वतः प्रमाणित हो जाती है। दास प्रथा की उत्पत्ति का संबंध, खेती के विकास से भी बताया जाता है। उसके लिए अतिरिक्त श्रम की आवश्यकता थी। इसलिए आरंभ में ताकत के बल पर लोगों को खेतों में काम करने के लिए बाध्य किया जाने लगा। कुछ लोग जो प्रकृति-आधारित खेती की अनिश्चितता के स्थान पर निश्चित आजीविका को पसंद करते थे, वे दूसरों को अपना श्रम बेचने लगे होंगे। कालांतर में उसी से दास प्रथा का जन्म हुआ, फिर धीरे-धीरे इस प्रथा को समाज की स्वीकृति मिलने लगी। खेती के अलावा घरों, उद्यमों में भी दासों की मदद ली जाने लगी। ऐसा विकास के आरंभिक चरणों में सभी समाजों में हुआ था। फिर जैसे-जैसे राज्य नामक संस्था मजबूत हुई, दासप्रथा के अन्यान्य रूपों का विस्तार होता गया। गौरतलब है कि भारतीय और रोम तथा सुमेरियन समाज में दासों की स्थिति में बड़ा अंतर है। रोम और सुमेर में दास तत्कालीन अर्थव्यवस्था के उपकरण मात्र थे। वे खरीदे-बेचे जाते थे। उस दासप्रथा का जन्म सामंतशाही की चरम अवस्था में हुआ था। सिंधु सभ्यता में दासों की उपस्थिति के जो संकेत मिले हैं, वे रोम और सुमेर की तरह आर्थिक दास ही हैं। जिनका उस समय की अर्थव्यवस्था के संचालन में बड़ा योगदान था। लेकिन जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं, भारतीय दासप्रथा वर्णव्यवस्था के अनुरूप ढलने लगती है।

ऋग्वेदकालीन दासप्रथा

प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में ऐसे शताधिक विवरण मौजूद जिनसे तत्कालीन भारतीय समाज में दास प्रथा की बड़े स्तर पर उपस्थिति का पता चलता है। ऋग्वेद में ‘दास’ शब्द अनेक स्थानों पर आया है। उसमें दासों के खरीदने-बेचने, भेंट करने, उपहार अथवा दान में देने, यहां तक कि दान लेने के भी, अनेकानेक प्रसंग हैं। ऋग्वेद(8/56/3) के बालखिल्य सूक्तों में पृषध्र मुनि की उक्ति है—‘शतं मे गर्दभानां, शतमूर्णावतीनाम्। शतं दासाः अति स्रजः।।

‘मुझे एक सौ गधे, एक सौ भेड़ें और एक सौ दास दो।’—यहां दास को गधे और भेड़ के समकक्ष रखकर उसे मनुष्य की संपदा माना गया है।

ऋग्वेद में मोटे तौर पर दो प्रकार के दासों का उल्लेख है। पहले वे जो अपने स्वामी की संपत्ति कहे जाते थे। जिनके शरीर पर उनके मालिक का अधिकार होता था। यानी ऐसे दास जिनका जिक्र होते ही श्रीविहीन, दीन-हीन, अपने मालिक के इशारों पर नाचने वाले व्यक्ति की छवि मन में उभर आती है। इस श्रेणी में आर्य और अनार्य दोनों प्रजातियों के दास शामिल थे। दूसरी श्रेणी उन अनार्य दासों की थी, जो अपेक्षाकृत साधन-संपन्न थे। जिनके पूर्वजों ने सिंधु सभ्यता की नींव रखी थी। उस समय वह सभ्यता अपने पराभवकाल में थी, मगर उसका वैभव पूरी तरह क्षीण नहीं हुआ था। 8 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक में फैली उस सभ्यता के मूल बाशिंदों से आर्य कहीं जूझ रहे थे, तो कहीं मैत्री का हाथ बढ़ा रहे थे। ऋग्वेद(7/99/4) में वृषशिप्र नामक दास का उल्लेख है, जिसमें विष्णु और इंद्र की स्तुति करते हुए कहा गया है—‘तुमने वृषशिप्र नामक दास की माया को संग्राम में विनष्ट किया है।’ एक मंत्र(ऋग्वेद-10/22/8) से आर्यों एवं अनार्यों के बीच भीषण संघर्ष का पता चलता है। युद्धरत आर्य इंद्र की स्तुति कर, उससे अनार्यों के विनाश के लिए प्रार्थना करते हैं—‘हम सब चारों ओर से दस्युओं से घिर चुके हैं। वे यज्ञ कर्म नहीं करते(अकर्मन)। न वे किसी वस्तु को मानते हैं(अमंतु)। उनके व्रत हमसे भिन्न हैं(अन्यव्रत)। वे मनुष्यों जैसा व्यवहार नहीं करते(अमांतुष)। हे शत्रुनाशक इंद्र! तू उन दासों का विनाश कर।’ जाहिर है, इस श्रेणी के ‘दास’ केवल नाम के दास थे—‘दासों और दस्युओं, दोनों ही के कब्जे में अनेक किलाबंद बस्तियां थीं….माना जाता है कि घुमक्कड़ आर्यों की आंखें दुश्मनों की बस्तियों पर संचित संपत्ति पर लगी हुई थीं। उसके लिए दोनों में सतत संघर्ष होता रहता था….ऐसे दो दास प्रमुखों का उल्लेख किया गया है कि जो धनलोलुप माने गए हैं। कामना की गई है कि इंद्र दासों की शक्ति को क्षीण करें तथा उनके द्वारा जमा की गई संपत्ति को लोगों में बांट दें।’4 

‘निरुक्त’ में ‘दास’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘दश्’ धातु से हुई है। इसका तात्पर्य संपन्न करना है। तदनुसार जो व्यक्ति अपने स्वामी के विविध कार्य संपन्न करता है, वह दास कहलाता है। इसका अर्थ ‘देना’ भी है। सवाल है कि दास का देने से क्या संबंध है? जिसकी देह पर भी उसके स्वामी का कब्ज़ा है, जिसे संपत्ति रखने का कोई भी अधिकार नहीं है, वह दूसरों को क्या देगा. ऋग्वैदिक काल के  ‘तरुक्ष’ और ‘बल्बूथ’ नामक अनार्य दास इस कसौटी पर खरे नजर आते हैं। श्रेणी में आते थे। ऋग्वेद में दोनों का उल्लेख दास-प्रमुख के रूप में हुआ है। ऋग्वेद(8/46/32) में लिखा गया है—‘मैंने बल्बूथ नामक दास से सौ गौ और अश्व प्राप्त किए थे।’ बल्बूथ की भांति तरुक्ष नामक दासप्रमुख का उल्लेख भी दानदाता के रूप में आया है। इन दोनों की ओर से पुरोहितों को जो उपहार दिए गए थे उससे उनकी बड़ी सराहना हुई थी।5 ऋग्वेद(8/19/36) में त्रसदस्यु को पचास युवतियां दान करते हुए बताया गया है। निश्चय ही वे युवतियां दासकर्म के निमित्त दान की गई होंगी। ऋग्वेद(10/33/4) में त्रसदस्यु के पुत्र कुरुश्रवण राजा को भी श्रेष्ठ दाता बताया गया है—‘मैं कवष ऋषि हूं। मैं त्रसदस्यु के पुत्र कुरुश्रवण राजा के पास याचना करने गया था; क्योंकि वे श्रेष्ठ दाता हैं।’ अथर्ववेद के आरंभिक अंशों में भी दासप्रथा का विवरण दिया है। उसमें दासियों के संबंध में प्रमाण मिले हैं। उसमें एक दासी का उल्लेख है जिसके हाथ भीगे होते थे। वह ओखल-मूसल कूटती थी; तथा गाय के गोबर पर पानी छिड़कती थी।6 

केवल संपदा नहीं, ज्ञान के क्षेत्र में भी दासों का हस्तक्षेप था। ऋग्वेद के उद्गाता ऋषियों में एक महत्त्वपूर्ण नाम कक्षीवान का है। उनका जन्म दीर्घतमस और उशिज नामक स्त्री जो दास कन्या थी, के संसर्ग से हुआ था। उशिज अंगदेश की महारानी की दासी थी। ऋग्वेद में एक बड़ा ही महत्त्वपूर्ण और लोकोपयोगी प्रसंग है, जुआरी का। उसके उद्गाता ऋषि कवष ऐलूष भी एक दासी की संतान थे। सूर्यकांत बाली ने ‘भारत गाथा’ में कवष ऐलूष को ‘वैदिक कविता को जमीन से जोड़ने वाला कवि’ कहा है। कवष के ऋग्वेद के दशम मंडल में कुल पांच(10/30-34) मंत्र हैं। जिनमें वह जुआरी की मनःस्थिति का वर्णन करता है। अंतः में उसे महत्त्वपूर्ण लौकिक संदेश तक ले जाता है—‘ओ जुआरी। जुआ मत खेल। मत खेल जुआ। जा अपने खेतों को देख। भार्या को देख। खेती करेगा तो धन आएगा। उसी से तुझे इज्जत मिलेगी। उसी से गौएं आएंगी। तेरी भार्या प्रसन्न होगी….घर जा। जुआ मत खेल।’ इस प्रसंग को महाभारतकार ने युधिष्ठिर के प्रसंग में ज्यों का त्यों अपना लिया गया है। बौद्ध धर्म के उभार से पहले भारत में भौतिकवादी दर्शन अपने शिखर पर था। उस समय के पांच प्रमुख आजीवक चिंतकों में से एक पूर्ण कस्सप को दास बताया गया है। बाकी दो आजीवक विद्वानों अजीत केशकंबलि और मक्खलि गोसाल की समाजार्थिक स्थिति भी दास की तरह ही थी।

ऋग्वेद(1/24) में शुनःशेप का कथासूत्र आता है। उस कथा का विस्तार ऐतरेय ब्राह्मण, भागवत पुराण, ब्रह्मपुराण आदि में भी देखने को मिलता है। कहानी के अनुसार राजा हरिश्चंद्र संतान की आकांक्षा के साथ वरुण की प्रार्थना करता है। वरुण प्रसन्न होते हैं। परंतु उनका वरदान सशर्त है—‘तुम्हारे संतान तो अवश्य होगी। लेकिन उसके लिए तुम्हें बलि देनी होगी।’ वरदान के फलस्वरूप हरिश्चंद्र के रोहित नामक पुत्र का जन्म होता है। लेकिन राजा बलि देना भूल जाता है। आखिरकार उसे याद दिलाया जाता है। रोग से पीडि़ता, दारुण अवस्था में हरिश्चंद्र 100 गायों के बदले अजीगर्त के पुत्र शुनःशेप को बलि के लिए खरीद लेता है। बाद में विश्वामित्र उसकी रक्षा करते हैं।

ऋग्वेद(2/12/4) तथा अथर्ववेद(20/34/4) में कहा गया है कि इंद्र ने दासों को गुफाओं में रहने को बाध्य कर दिया था। अनार्य दासों को आर्य ‘असुर’ मानते थे(ऋग्वेद, 9/71/2)। उन्हें पराधीन बनाने की जिम्मेदारी इंद्र पर डाली गई है। इंद्र से दासों को पराधीन करने के लिए जिस तरह बार-बार प्रार्थना की गई है, उससे लगता है, कि यह संबोधन उस समय के पूरे आर्येत्तर समुदाय के लिए रहा होगा, जो आर्यों के आगमन के पहले से ही इस भूभाग पर रहते आ रहे थे। ऋग्वेद में ‘दास’ के अलावा ‘दस्यु’ शब्द का भी कई बार प्रयोग हुआ है। सामान्यत दासों एवं दस्युओं को एक मान लिया जाता है। लेकिन ऋग्वेद में दस्युहत्या के उल्लेख हैं, जबकि दासहत्या का कोई उल्लेख नहीं है। दासों की अपेक्षा दस्युओं के विनाश तथा उन्हें पराधीन बनाने की चर्चा अधिक की गई है। इंद्र से अनुरोध किया गया है कि वे दस्युओं से युद्ध कर उन्हें परास्त करें, ताकि आर्यों की शक्ति बढ़ सके। ऋग्वेद(4/30/21) के एक प्रसंग में 30 सहस्र दासों को माया द्वारा मूर्छित करने का उल्लेख है। इससे पता चलता है कि दस्यु भारत आर्यों के आने से पूर्व शासक कबीले थे। ऋग्वेद में दस्युओं की हत्या की चर्चा कम से कम 12 स्थानों पर हुई है। अधिकांश हत्याएं इंद्र द्वारा ही कराई गई है।7 अंतर्जातीय युद्धों में दासों को भी सहायक सेना के रूप भर्ती किया जाता था। बावजूद इसके ‘कृष्णवर्ण अनार्यों को पराजित करना हंसी-खेल न था। अनार्य अपनी बढ़ी-चढ़ी सभ्यता के साथ अपने दुर्गों में सुरक्षित थे। ऋग्वेद(1/4/1/3) में उनके सैकड़ों पुरों और दुर्गों का उल्लेख है। उनमें लोहे(आयसी, 2/58/8), पत्थर(अश्ममयी, 4/30/20), लंबे-चौड़े(पृथ्वी), विस्तृत(उर्वी), गउओं से भरे हुए(गोमती, अथर्व 8/6/23), सौ खंबों वाले(शतभुजी) तथा शरतकालीन जलौघ से बचाने वाले दुर्ग शामिल थे.

अनार्य दास काले रंग(कृष्ण-योनि) के और अनास या चपटी नाक वाले थे। इसके अलावा कुछ सामाजिक-सांस्कृतिक भिन्नताएं भी थीं; यथा—

1. उनकी भाषा वैदिक-संस्कृति से भिन्न थी जो स्पष्ट नहीं थी(मृध-वाक्)।

2. वे वैदिक कर्मकांड से शून्य थे।(अकर्मन)

3. वे वैदिक देवों को नहीं पूजते थे(अदेवयु)।

4. वे देवों के लिए भक्ति से रहित थे(अब्रह्मन्)।

5. वे यज्ञ से विरहित थे(अयज्वन्)।

6. वे वैदिक व्रतों का पालन नहीं करते थे।(अव्रत)।

7. उनके स्थान पर भिन्न प्रकार व्रतों या धार्मिक नियमों को मानते थे(अन्यव्रत)।

8. वे वैदिक देवों के निंदक थे(देवपीयु)।

9. वे लिंग की पूजा करते थे(शिश्नदेव)।

ऋग्वेद में इंद्र को पुरंदर और शत्रु हंता कहा गया है। इसलिए कि उसने अनार्यों के सैकड़ों दुर्गों को नष्ट किया था। हजारों हत्याएं की थीं। इंद्र ने ये हत्याएं क्यों कीं? इन्हें समझना कठिन नहीं है। आर्य अपने लिए बेहतर देश की खोज में भारत तक पहुंचे थे। भारत पहुंचने पर उनका सिंधुवासियों से सामना हुआ। जो अपनी नागरी सभ्यता पर गर्व करने वाले, भले और शांतिप्रिय लोग थे। आर्यों ने कहीं बलपूर्वक, तो कहीं सहयोग-समझौते से सिंधु सभ्यता के मूल निवासियों को अपने प्रभाव में लेना आरंभ किया। इस कार्य में उन्हें जैसे-जैसे सफलता मिली, उनका लक्ष्य भी बदलता गया। राजनीतिक विजय के बाद उनका लक्ष्य था, देव-संस्कृति की श्रेष्ठता को स्थापित करना; तथा अनार्यों की श्रम संस्कृति, जिसका विकास कृषि के विकास के साथ-साथ हुआ था, को हेय सिद्ध कर, धीरे-धीरे नष्ट कर देना।

गौरतलब है कि अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक श्रेष्ठता को श्रेष्ठतम मानकर, पराजित समूहों को अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक परिधि में लाने का काम लगभग सभी ब्राह्मणेत्तर धर्मों और संस्कृतियों में हुआ था। ईसाई और इस्लाम के अनुयायियों ने तो उसके लिए बल-बुद्धि दोनों का प्रयोग किया था। मगर ब्राह्मणों ने एकदम उलटा तरीका अपनाया था। वर्ण-व्यवस्था की मदद से उन्होंने न केवल आर्येत्तर समूहों को, अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सेदारी से दूर रखा, अपितु अपने ही एक हिस्से पर जिसे उन्होंने शूद्र की संज्ञा दी थी, ऐसे अनेक प्रतिबंध लागू कर दिए जिससे उनका सामाजिक जीवन, अत्यंत कष्टकारी होता गया। इसके पीछे आर्यों की कुंठा का योगदान भी रहा होगा। सिंधुवासी समृद्ध नागरी सभ्यता के उत्तराधिकारी थे, जो समकालीन संस्कृतियों से श्रेष्ठतम थी। 1500 ईस्वीपूर्व में आर्यों के आगमन तक, उसका प्राचीन वैभव यद्यपि क्षीण होने लगा था, तथापि घुमक्कड़ आर्यों की संस्कृति की अपेक्षा वे कहीं अधिक विकसित थे। यह जानते हुए कि भौतिक प्रगति के मामले में वे सिंधुवासियों से होड़ कर पाना असंभव है, आर्यों ने यज्ञ केंद्रित वायवी संस्कृति की नींव रखी। उन्होंने प्राकृतिक शक्तियों का मानवीकरण किया। दावा करने लगे कि यज्ञादि के माध्यम से वे देवताओं से सीधे संवाद कर सकते हैं। आवश्यकता पड़ने पर उन्हें बुला भी सकते हैं। चूंकि उन दिनों सिंधु सभ्यता अपने अवसानकाल में थी, इसलिए एक समृद्ध सभ्यता के पराभव से निराश हुए सिंधुवासी धीरे-धीरे ब्राह्मणों की वायवी संस्कृति के प्रलोभन में फंसने लगे। ब्राह्मणों ने उन्हें आर्य संस्कृति में जगह दी, मगर इसके लिए उन्हें अपना आत्मसम्मान गंवाना पड़ा। ब्राह्मणों ने उन्हें शूद्र और दास के रूप में स्वीकार किया। दासों की कोई जाति नहीं थी। मगर कई शूद्र जातियों का सामाजिक स्तर शूद्र से भी बदतर था।

ऋग्वेद की कई ऋचाएं इसकी साक्षी हैं कि आरंभिक विजयों के साथ ही आर्यों को अपनी सांस्कृतिक विजय की चिंता होने लगी थी। वे अनार्यों के संसाधनों को कब्जाने के साथ-साथ उनकी संस्कृति को भी तहस-नहस कर देना चाहते थे। कभी छल तो कभी बल-पूर्वक वे लड़ाई को जीतते भी रहे। यह लड़ाई आसान नहीं थी। लोग ईसाइयों पर आरोप लगाते हैं कि मिशनरियों ने जनता के बीच जाकर लोगों को धर्मांतरण के लिए उकसाने, प्रलोभन देकर अपनी ओर मिलाने की कोशिशें कीं। वे इस्लाम के प्रसार हेतु जेहाद छेड़ने वाले मुस्लिमों को भी दोषी ठहराते हैं। जबकि भारत में सबसे पहला ‘जेहाद’ तो आर्यों ने अनार्यों के साथ किया था। बाद में वैसा ही जेहाद पुष्यमित्र शुंग ने वौद्धों का कत्लेआम करके किया था।

उपनिषदों में दासप्रथा

उपनिषदों को आमतौर पर दार्शनिक विमर्श के लिए जाना जाता है। कहा जाता है कि वेदों में जो दार्शनिक विचार सूत्र रूप में दिए हैं, उपनिषदों में आकर वे स्वतंत्र धारा का रूप ले लेते हैं। उपनिषदों में भी सबसे बड़ा है—छांदोग्योपनिषद। उसके चौथे अध्याय में राजा जानश्रुति और वायु को सृष्टि का मूल तत्व मानने वाले ऋषि रैक्व का संदर्भ आता है। रैक्व की ख्याति से प्रभावित जानश्रुति धर्मोपदेश की कामना के साथ अपनी पुत्री और धन-धान्य उन्हें भेंट कर देता है। उपनिषदों में ऐसे और प्रसंग भी हैं, जिनमें स्त्री के साथ दास जैसा व्यवहार किया गया है। कुछ विद्वान ऋग्वेद के दिवोदास को जो स्वयं कई ऋचाओं के उद्गाता थे, दासी-पुत्र मानते हैं।9

दासियों से मनोरंजन का काम लेने का भी उल्लेख है। तैत्तिरीय संहिता में सिर पर कलश रखकर नाचती-गाती हुई दासियों का वर्णन आया है। इसी ग्रंथ में दास के दान का भी उल्लेख है(2/2/6/3)। कठोपनिषद में दासियां नचिकेता को अपनी ओर लुभाने का यत्न करती हैं।11 ऐतरेय ब्राह्मण(39.8) में जिक्र आता है कि राजा ने राज्याभिषेक वाले पुरोहित को दस हजार दासियां और दस हजार हाथी दिए। वृहदारण्यकोपनिषद्(4.4.23) में आया है कि याज्ञवल्क्य से बृह्मविद्या की शिक्षा लेने के पश्चात जनक ने उनसे कहा, ‘विदेहों के साथ मैं स्वयं को दास बनने की कामना के साथ, आपको दान-स्वरूप प्रदान करता हूं।’ छांदोग्योपनिषद(7.24.2) में लिखा है, ‘इस संसार में लोग गायों, घोड़ों, हाथियों, सोने, खेतों, घरों एवं दासियों के साथ अपने घरों को समृद्ध करते हैं।’ इसी उपनिषद के एक प्रसंग में राजा अश्वपति ने सत्ययज्ञ से कहा था—‘खच्चरों से जुता हुआ यह रथ, दासियों तथा हार सहित प्रस्तुत है।12 इससे पता चलता है कि ऋग्वेदयुगीन दास प्रथा का वेदोत्तरकाल में खूब विकास हुआ था। यह प्रथा तत्कालीन अभिजन समाज के लिए गर्व की बात थी। यहां तक कि स्वयं को तापस और साधक कहने वाले तथाकथित वेदज्ञ ब्राह्मण भी उससे बचे न थे। आरुणि जब अपने पुत्र श्वेतकेतु के साथ ज्ञान-प्राप्ति की आकांक्षा में पांचाल नरेश प्रवाहण जाबालि के निकट पहुंचे तो वहां गाय, अश्व, परिवार और परिधानों के अतिरिक्त ‘दासी’ भी मौजूद थी।13 

स्मृतिकालीन दासप्रथा

हिंदू धर्म में स्मृतियों का स्थान वेद-वेदांगों के बाद आता है। उन्हें हिंदू धर्म का आधारभूत ढांचा माना गया है। सभी धर्मशास्त्र, पुराण, महाकाव्य, सूत्र आदि स्मृतियों का अंग माने गए हैं। जहां तक दासप्रथा का सवाल है, मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, नारद, बृहस्पति, कात्यायन स्मृति सहित दोनों महाकाव्यों तथा अन्य धर्मशास्त्रों में उसका उल्लेख हुआ है। स्मृतियों का रचनाकाल बौद्ध धर्म के बाद से, चौथी शताब्दी तक फैला हुआ है। इस बीच दासों के कार्यक्षेत्र में भी वृद्धि हुई थी। गृह्मसूत्रों में सम्मानित अतिथियों के चरण धोने के लिए दासों की नियुक्ति का उल्लेख है। मनु(1.91, 8.413-414) के अनुसार शूद्रों का प्रमुख कर्तव्य है, उच्च वर्णों की सेवा करना। उसके बाद उसने जो व्यवस्थाएं की हैं, उनमें अधिकांश वही हैं, जो दासों के लिए थीं। धन-संचय का अधिकार न शूद्रों को था, न ही दासों को। यदि कोई शूद्र अथवा दास संपत्ति संचय में सफल हो जाए तो उसकी संपत्ति को छीनकर ब्राह्मणों को देने का नियम था। जैसे कुम्हार की संतान कुम्हार, जुलाहे की जुलाहा कही जाती थी, ठीक उसी प्रकार दास की संतान भी दास कहलाती थी। अंतर बस एक था। विशिष्ट परिस्थितियों में दास को स्वतंत्र किया जा सकता था। वह सामान्य जीवन जी सकता था। परंतु शूद्र को अपने जातिगत पेशे से हटकर काम करने की अनुमति नहीं थी। यहां तक कि आजाद होने के बाद भी दास पर उसकी जाति चिपकी रहती थी।

स्मृतिकाल तक दास प्रथा सांस्थानिक रूप ले चुकी थी। दास-दासियों को लेकर कानून बनाए जाने लगे थे। याज्ञवल्क्य किसी दास के साथ विवाद न करने की सलाह देते हैं। वहीं जैमिनी(6.7.6) ने शूद्रों के दान को निषिद्ध माना है, जबकि मनु ने शारीरिक दंड की व्यवस्था में दास एवं पुत्र को एक ही श्रेणी में रखा है(8.299-300)। आपस्तंबधर्मसूत्र(2.4.9.11) में आया है कि अतिथि के अकस्मात पहुंच जाने पर, खुद को, स्त्री या पुत्र को भूखा रखा जा सकता है, किंतु उस दास को नहीं, जो रात-दिन सेवा में लिप्त रहता है। नारद के अनुसार गृहस्वामी चाहे तो दास को पुत्र की भांति अपनी संपत्ति का एक हिस्सा प्रदान कर सकता है। वर्ण-व्यवस्था के बंधन दासों पर भी उसी प्रकार लागू होते थे। याज्ञवल्क्य (2.183) तथा नारद (39) के अनुसार ब्राह्मण के अतिरिक्त बाकी तीनों वर्ण ब्राह्मण के दास बन सकते थे। क्षत्रिय के दास केवल वैश्य अथवा शूद्र बन सकते थे। क्षत्रिय किसी वैश्य या शूद्र का तथा वैश्य शूद्र का दास नहीं सकता था। कात्यायन ब्राह्मण के दासत्व ग्रहण करने पर थोड़ी छूट प्रदान करते हैं। उनके अनुसार ब्राह्मण किसी ब्राह्मण का भी दास नहीं बन सकता। यदि बनना ही चाहता है तो उसे किसी चरित्रवान, एवं वैदिक ब्राह्मण का दास बनने की अनुमति है। वह भी केवल पवित्र कार्यों के लिए।14 कात्यायन(7.33) ने व्यवस्था थी कि संन्यास से भटके हुए ब्राह्मण को राज्य से बाहर निकाल देना चाहिए। लेकिन संन्यास भ्रष्ट क्षत्रिय एवं वैश्य राजा के दास होते हैं। कौटिल्य(3.13) एवं कात्यायन(7.23) के अनुसार यदि स्वामी दासी से संसर्ग करे और संतानोत्पत्ति हो तो दासी एवं पुत्र दोनों को दासत्व से मुक्ति मिल जाती है। दास की गवाही अमान्य थी। परंतु विशिष्ट परिस्थिति में जब कोई अन्य साक्ष्य अनुपलब्ध हो तो मनु(8.70) ने नाबालिग, स्त्री, नौकर आदि के साथ दास की गवाही को भी मान्य ठहराया है।

स्मृतिकाल तक दासों की कई कोटियां बन चुकी थीं। मनुस्मृति(8.415) में 7 प्रकार के दासों का उल्लेख है। कौटिल्य का मत भी मिलता-जुलता है, जबकि नारदस्मृति दासों की 15 कोटियों की लंबी सूची प्रस्तुत करता है—‘1. घर में पैदा हुआ, 2. खरीदा हुआ।, 3. दान अथवा किसी अन्य प्रकार से प्राप्त, 4. वसीयत से प्राप्त, 5. अकाल में रक्षित, 6. किसी अन्य स्वामी द्वारा प्रतिश्रुत, 7. बड़े ऋण से युक्त, 8. युद्धबंदी, 9. बाजी में जीता हुआ, 10. ‘मैं आपका हूं’ कहकर दासत्व ग्रहण करने वाला, 11. संन्यास से च्युत, 12. जो कुछ दिनों के लिए स्वेच्छापूर्वक दास बना हो, 13. भोजन के लिए दास बना हुआ, 14. दासी के प्रेम से आकृष्ट(बड़वाहृत) तथा 15. स्वयं को बेच देने वाला।15  

‘अर्थशास्त्र’ के अनुसार स्मृतिकाल में दासों की खरीद-फरोख्त, उन्हें दान में लेने-देने, गिरवी रखने का प्रचलन बढ़ चुका था। कौटिल्य ने लिखा था कि प्रत्येक स्वतंत्र परिवार उदरदास(दास के पेट से उत्पन्न संतान) अवश्य रखता है। दास अपने स्वामी की संपदा कहे जाते थे। उन्हें गिरवी रखा जा सकता था। यहां तक कि उनकी हत्या भी की जा सकती थी। दासों को न्यूनतम न्याय देने के लिए स्मृतियों में कुछ अनुशंषाएं की गई थीं। परंतु व्यवहार में उनका उपयोग बहुत कम हो पाता था। इसलिए स्वामी द्वारा दास पर दंडात्मक कार्यवाही के विरुद्ध किसी अदालत में सुनवाई नहीं थी।16 

उन दिनों दासों का जीवन अत्यंत कष्टकारी होता था। बीमार पड़ जाने पर उनके लिए इलाज की कोई व्यवस्था न थी। नियमानुसार दास अपना मूल्य चुकाकर अपनी आजादी खरीद सकता था। परंतु व्यवहार में ऐसा संभव ही नहीं था। इसलिए दास और उसका परिवार मालिक के लिए जो भी परिश्रम और धनार्जन करता था, उससे उत्पन्न आय उसके स्वामी की मानी जाती थी। दास का अपनी आय का कोई स्रोत नहीं था। इसलिए उसकी आजादी, सिवाय किसी चमत्कार के, असंभव जैसी थी। मुक्ति की चाहत में कई बार कुछ दास अपने स्वामी का घर छोड़कर भाग भी जाते थे। दास पर अत्याचार के समय मौन रहने वाला, उसके विरुद्ध मनमानी दंडात्मक कार्यवाही को दास-स्वामी का विशेषाधिकार मानने वाला राज्य, उस समय एकाएक बीच में कूद पड़ता था। राज्य के कर्मचारी भगोड़े दास को पकड़कर पुनः उसके स्वामी के सुपुर्द कर देते थे। खुद को गिरवी रखने वाला व्यक्ति यदि घबराकर भाग जाता तो उसे जीवन-भर के लिए दास बना लिया जाता था। मालिकों द्वारा दासियों का मान-भंग करने तथा उन्हें दूसरों के आगे पेश करना तो शान की बात मानी जाती थी।

स्मृतिकाल के दौरान दास-प्रथा पर काफी लिखा गया है। विशेषकर नारद और कात्यायन स्मृति में। नारद ने दूसरों की सेवा करने वाले(शुश्रूषक) को पांच भागों में बांटा है—1. वैदिक छात्र, 2. अंतःवासी, 3. पर्यवेक्षक(अधिकर्मकृत), 4. भृतक, तथा 5. दास। इनमें प्रथम चार को कर्मकार कहा जाता था। पवित्र कार्यों के समय उन्हें आवश्यकतानुसार बुलाया जा सकता था। दासों के लिए काम की कोई तय सूची नहीं थी। उनसे कोई भी काम लिया जा सकता था। नारद स्मृति(6.7) के अनुसार दासों के कुछ सामान्य कार्य थे—‘साज-सफाई करना, यथा झाड़ू लगाना, गंदे गड्ढों, मार्ग, गोबर, कूड़ा, तालाब आदि की सफाई करना गुप्तांगों को खुजलाना, मल-मूत्र फेंकना आदि। गौतम धर्मसूत्र(2.1.59) में भी ‘पुरुष दासादयः वंशोवंध्या’ कहकर समाज के उच्च वर्गों की सेवा को उनका कर्तव्य कहा गया है।

दासों के छूटने के नियम तथा उसके मुक्त होने की पूरी पद्धति थी। याज्ञवल्क्य(2.182) के अनुसार यदि दास किसी हमले या दुर्घटना के कारण स्वामी के संकट में पड़े जीवन की रक्षा कर ले, तो उसे मुक्त किया जा सकता है। नारद ने भी इसकी पुष्टि की है। दासत्व से मुक्ति का प्रावधान भी धर्मशास्त्रों में दिया गया है। नारद स्मृति के अनुसार स्वामी जल से भरे मिट्टी के एक घड़े को दास के कंधे से उतारकर उसे तोड़ डालता था। तदनंतर अन्न एवं पुष्पमिश्रित जल को दास के सिर पर छिड़कते हुए तीन बार उसके स्वतंत्र होने की घोषणा करता था।17 ध्यातव्य है कि यूनानी लेखक  मेगस्थनीज, जो चंद्रगुप्त मौर्य की सभा में सेल्यूकस निकेटर का राजदूत था—ने अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में भारत में दासप्रथा की मौजूदगी से इन्कार किया है। जबकि उस दौरान लिखे जा रहे सभी धर्मग्रंथ दास प्रथा की मौजूदगी का समर्थन करते हैं।

महाकाव्यों में दास प्रथा

भारतीय जनमानस में रामायण और महाभारत की बड़ी प्रतिष्ठा है। इनमें रामायण को महाभारत से पहला माना जाता है। परंतु जिस तरह उसमें ब्राह्मणवाद मुखर होकर आया है, वह बौद्ध धर्म से पहले की रचना नहीं हो सकती। अपने वर्तमान स्वरूप में दोनों ही ग्रंथ पुष्यमित्र शुंग के बाद की रचना है। हालांकि उनके कुछ कथासूत्र प्राचीन हो सकते हैं। ईसा पूर्व पांचवी-छठी शताब्दी में आजीवकों और बौद्धों की ओर से मिल रही चुनौतियों के कारण आभाहीन हो चुका ब्राह्मण-धर्म, अनुकूल माहौल में अपने राजनीतिक एवं सांस्कृतिक वर्चस्व को पुनःस्थापित करने में लगा था। इसके लिए समर्थन और विरोध दोनों नीतियों पर काम जारी था। एक ओर बुद्ध को दसवें अवतार के रूप में प्रतिष्ठित करके उनके विचारों को भारतीय धर्म-दर्शन की शाखा के रूप में मान्यता दी जा रही थी, दूसरी ओर ब्राह्मण धर्म को मजबूत करने के लिए वर्ण-व्यवस्था को दैवीय घोषित करने वाले ग्रंथ रचे जा रहे थे। उन सबका एकमात्र उद्देश्य था, जनसाधारण को यह विश्वास दिलाना कि ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ है और वर्ण-व्यवस्था उसका आदर्श विधान है।

जो लोग रामायण और महाभारत की अतिप्राचीनता का दावा करते हैं, उन्हें समझ लेना चाहिए कि रामायण का मूल संस्करण, जिसे वाल्मीकि ने ‘पुलत्स्य वध’ शीर्षक से लिखा था, वह अनुपलब्ध है। महाभारत के पूर्व संस्करणों ‘जय’, ‘विजय’ और ‘भारत’ के बारे में भी हमारी जानकारी शून्य है। यहां तक कि हम उनकी शैली और कथा-वस्तु के बारे में कुछ भी दावे के साथ नहीं कह सकते। लेकिन इतना अवश्य कह सकते हैं कि इनके मूल कथानक अपने समय की साहित्यिक संपदा रहे होंगे। बाद की कृतियों में राम का अतिमानवीकरण, गौतम बुद्ध की श्रीलंका तथा पड़ोसी देशों में ‘धम्म विजय’ के बाद, ब्राह्मणों के मन में जन्मी कुंठा की सृजनात्मक परिणति थे। यह काम बौद्ध धर्म के कमजोर होने के बाद ही संभव था।

महाभारत में जिस प्रकार गणसंघों का प्रमुखत: उल्लेख हुआ है, वह रामायण में मौजूद समाज से करीब 200-300 वर्ष पुराने समाज की प्रतीति कराता है। उन दिनों भारत में गणराज्य काफी मजबूत अवस्था में थे। महाभारत छोटे राज्यों की अप्रासंगिकता को भी दर्शाता है। भारतीय समाज में यह बोध सिकंदर के आक्रमण के बाद बना था। उल्लेखनीय है कि सिंकदर के आक्रमण से पहले भी भारत पर यूनान की तरफ से दो बड़े हमले हो चुके थे। उनमें पहला हमला असीरिया की साम्राज्ञी सेमिरामिस की ओर से था। दूसरा आक्रमण ईरान के प्रसिद्ध विजेता कुरु की ओर से। कुरु को अंग्रेजी में साइरस लिखा जाता है। कुरु ने काबुल से लेकर इराक, शाम, टर्की, बेबिलोन, मिस्र तथा यूनान के कुछ हिस्से पर अपनी विजय पताका लहराई थी। भारत पर आक्रमण के बाद उसे सेमिरामिस की तरह ही शर्मनाक पराजय का रूप देखना पड़ा था। कुरु की मृत्यु भारतीय योद्धा के हाथों ही हुई थी। सिंकदर का आक्रमण इन सबमें बड़ा था। मगर उसका सामना चंद्रगुप्त मौर्य जैसे राजा से था, जिसके पास विश्व की सबसे विशाल सेना थी। उसमें छह लाख से ज्यादा पैदल सिपाही थे। चंद्रगुप्त ने उसमें से पांच लाख सैनिक सिंकदर से लड़ने के लिए उतारे थे। भारतीय कवियों, लेखकों ने पहली बार बड़ी सेना को दुश्मन से लोहा लेते हुए देखा था। उसी से बड़े राज्यों की अवधारणा ने जन्म लिया। कदाचित वही महाभारत की  18 अक्षौहिणी सेना के मिथ की प्रेरणा बना। उसका परिणाम रामायण और महाभारत के उपलब्ध आख्यानों के पुनर्लेखन के रूप में सामने आया। उसके बाद भी इन दोनों ग्रंथों में शताब्दियों तक प्रक्षेपण होते रहे हैं। दो हजार वर्ष पहले तक भारत में दास प्रथा, सामाजिक व्यवस्था का आवश्यक अंग बन चुकी थी। इसलिए रामायण और महाभारत में उनका खूब उल्लेख हुआ है। तत्कालीन परिस्थितियों में इतनी बड़ी सेना का खर्च उठाने के लिए भारी-भरकम अर्थव्यवस्था; तथा उसके लिए दासप्रथा का होना अपरिहार्य जैसा था। इसके प्रमाण इन दोनों महाकाव्यों में उपलब्ध हैं।  

रामायण में राम के चरित्र को उदात्त बताया गया है। तुलसी उसे ‘मर्यादापुरुषोत्तम’ तक कह जाते हैं। तुलसी के लिए ‘मर्यादापुरुषोत्तम’ का मतलब ब्राह्मणवादी संस्कृति और वर्णव्यवस्था के प्रति अंध-समर्पण है। दास-दासियों के मामले में भी वह ठेठ परंपरावादी हैं। इसलिए विवाह में खुशी-खुशी दहेज लेते हैं। बकौल तुलसीदास—‘दहेज इतना अधिक था कि उसका वर्णन संभव ही नहीं है। स्वर्ण आभूषणों तथा मणियों से मंडप भर गया था। वहां हाथी, स्वर्णाभूषण, माणिक-मणियां, घोड़े, दास और दासियां तथा अलंकारों से सजी कामधेनु सरीखी बहुत-सी गौएं थीं।’

‘कहि न जाय कछु दायज भूरी, रहा कनक मणि मंडप पूरी

गज रथ तुरग, दास अरु दासी, धेनु अलंकृत काम दुहासी।

इस बात से वाल्मीकि भी इत्तफाक रखते हैं। राम के विवाह में दिए गए दहेज का वर्णन करते हुए वे भी गदगद हो जाते हैं—‘कन्या के पिता जनक ने दास-दासियों सहित, सोने, मोती-माणिकों और मुद्राएं दहेज में अर्पित की थीं।’18 यह तो राजा जनक द्वारा वरपक्ष यानी राम और उसके परिवार को दिए गए दहेज का वर्णन है। इसके अलावा उन्होंने सीता और अपनी बाकी पुत्रियों को भी सौ-सौ कन्याएं तथा उत्तम दास-दासियां दहेज के रूप में प्रदान की थीं। उत्तरकांड में अयोध्या के सामंत और छोटे राजाओं ने दासियां प्रदान की थीं।19 उन दिनों गुरु लोग आश्रमवासी हुआ करते थे। परंतु दासियों का दान लेने से उन्हें भी इन्कार न था। सो मर्यादापुरुषोत्तम गुरु, ब्राह्मणों और आचार्यों को कैसे भूल जाते। खुशी का अवसर नहीं था। वनवास के लिए निकलना था। राजमहल में क्लेश व्याप्त था। फिर भी गुरु को प्रसन्न करने के लिए राम ने उन्हें अपने दास-दासियों को भेंट कर दिया था—‘दासी-दास बोलाइ बहोरी, गुरहि सौंपि बोले कर जोरि’ (रामचरितमानस, अयोध्याकांड)। दशरथ का महल दास-दासियों से भरा हुआ था। राम का भवन हो या लक्ष्मण का; या फिर भरत की आरामगाह हो। सभी जगह दास-दासियों की भरमार थी। कैकई तो मंथरा नामक दासी को मैके से अपने साथ लेकर आई थी। चूंकि मंथरा के लिए कैकई ही उसकी स्वामिनी और सबकुछ थी। इसलिए वह चाहती थी कि भरत ही अयोध्या का भावी सम्राट बने। हनुमान का अपना आचरण दासत्व को पूरी तरह स्वीकार लेने वाला प्राणी जैसा है। उसकी अष्ठ सिद्धियां और नवनिधियां राम के चरणों में पड़े-पड़े गारत हो जाती हैं। शुनःशेप की कहानी रामायण में कुछ और विस्तार से प्रस्तुत है।

रामायण में हमारा तीन समाजों और संस्कृतियों से वास्ता पड़ता है। पहला अयोध्या और उसकी संस्कृति है। दूसरी किश्किंधा और तीसरी लंका की। किश्किंधा में बालि, सुग्रीव अंगद जैसे नेता हैं। वे आखेटक समुदाय से हैं जो प्रकृति से अपना भोजन जुटाते थे। बालि के राज्य में अथवा सुग्रीव के ठिकाने पर किसी दास के दर्शन नहीं होते। आवश्यकता पड़ने पर सभी वानर स्वेच्छा से राम की सेना में भागीदारी करते हैं। उनमें पदानुक्रम तो है परंतु दास और अदास का विभाजन नहीं है। लंकाकांड के दौरान हनुमान राम का संदेश लेकर लंका जाता है। वहां का वैभव देखकर वह हतप्रभ रह जाता है। लंका के सभी घर बराबर थे। धन-धान्य और वैभव से भरपूर। रामायण में लंका की अर्थव्यवस्था के बारे में कोई उल्लेख नहीं है। मगर जिस तरह की समृद्धि का वर्णन हनुमान करता है, उससे पता चलता है कि वहां अवश्य ही व्यापार केंद्रित अर्थव्यवस्था रही होगी, जबकि अयोध्या का समाज कृषि-केंद्रित था। जहां तक दास-दासियों का सवाल है, उनका उल्लेख न तो किश्किंधा के वानर समाज में था, न ही लंका के राक्षसों के बीच। यहां तक कि रावण के दरबार में भी किसी दास या दासी का उल्लेख नहीं है। अशोकवाटिका में राक्षसियां पहरा देती थीं। मगर वे सभी अनुचरी थीं। यह भी संभव है कि दास प्रथा को शान और समृद्धि का प्रतीक माना जाता था, इस कारण वाल्मीकि और तुलसी दोनों ने वहां दासों की कल्पना न की हो। यह बात पात्रों के चरित्र-चित्रण में भी नजर आती है। रावण के दरबारी जरूरत पड़ने पर अपने राजा से बहस करते, उसे समझाते हैं। राम के दरबारियों को यह सुविधा प्राप्त नहीं थी। वहां सिर्फ ‘हां’ में ‘हां’ मिलाने और जय-जयकार करने का अवसर था। कह सकते हैं कि समाज का दासभाव दरबारियों के चरित्र की भी विशेषता था, इसलिए वहां दास-प्रथा के मजबूत होने के सभी अवसर थे। रामायण का आदर्श भी ऐसा ही समाज है, जहां कुछ लोग मालिक हों और बाकी लोग दास जैसा आचरण करते हों।

महाभारत के नायक कृष्ण हैं। वे अंधक गणराज्य के मुखिया है। गणतंत्र में भरोसा रखते हैं। इसलिए दासत्व के लिए उनके यहां वैसी जगह नहीं है, जैसी राम के यहां हैं। कृष्ण स्वयं अपने साथियों-सहयोगियों के साथ मैत्री-भाव रखते हैं। मगर कृष्ण के देवत्व को मान्यता देने वाले ब्राह्मण उन्हें खुली छूट देने को तैयार नहीं थे। इतिहासचक्र के अचानक घूम जाने की बात है जिससे ब्राह्मणों को एक ग्वाले के देवत्व को स्वीकारना पड़ा। फिर भी इतना ध्यान उन्होंने रखा कि वे ब्राह्मण विरोधी न दिखें। ऋग्वेद में इंद्र को चुनौती देने वाले कृष्ण का नया रूपाकार ब्राह्मणवाद का आराधक हो, इस कारण उन्हें सुदामा के पैर धोते हुए दिखाया गया है। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में अतिथियों के पांव धोने की जिम्मेदारी भी उन्हीं को ओटनी पड़ी। महाभारतकार उसी का महिमा मंडन करता है। यदि अतिथियों के पांव-प्रक्षालन करना इतना ही पुनीत कार्य था तो यह काम किसी ब्राह्मण को क्यों नहीं सौंपा गया? अथवा वह जिम्मेदारी युधिष्ठिर या उसके किसी भाई न स्वयं क्यों न संभाल ली? महाभारत में इस सवालों के लिए कोई जगह नहीं है। वैसे भी, जहां धर्म होता है, वहां सवाल या शंकाएं नहीं होतीं। केवल आस्था होती है। आंख मूंदकर विश्वास करना पड़ता है। अगर सवाल होते तो महाभारत धर्मयुद्ध कभी न बन पाता।

महाभारत में दास प्रथा का उल्लेख अनेक अवसरों पर हुआ है। हमने आरंभ में ही बता दिया है कि राजसूय यज्ञ कराने के उपलक्ष्य में युधिष्ठिर ने 88,000 ब्राह्मण पुरोहितों में से प्रत्येक को तीस दासियां उपहार स्वरूप दी थीं। वनपर्व में दिया है कि वैन्य ने अत्रि को एक हजार सुंदर दासियां प्रदान कीं।20 विराटपर्व(18.21) में 30 दासियां दान करने का एक और उल्लेख आया है। दासों का वर्णन जितना खुलकर दिया गया है, उससे लगता है कि समाज में शूद्र और दास में बहुत अंतर नहीं था। सभापर्व में युधिष्ठिर के महल में एक लाख दासियां होने का वर्णन हुआ है। यह वर्णन अतिश्योक्तिपूर्ण हो सकता है। संभव है हस्तिनापुर की कुल शूद्र स्त्रियों को ही युधिष्ठिर की दासी मान लिया हो। क्योंकि आगे उसमें लिखा है कि युधिष्ठिर अपनी दासियों का अनुरोध सुनने के लिए सदैव तत्पर रहता था। विराटपर्व(7.17) के अनुसार पांडवों के निजी कक्ष भी दास-दासियों से समृद्ध थे।। दास-दासियों की संख्या को लेकर यह अतिरंजना अन्य स्थानों पर भी पाई जाती है। उदाहरण के लिए देवयानी और शर्मिष्ठा के विवरण को ही लें। उन दोनों की एक-एक हजार दासियां बताई गई हैं। उन दिनों दहेज में दास-दासियां देने का चलन था। द्रोपदी के विवाह में भी द्रुपद की ओर से पांडवों को बड़ी संख्या में दासियां दी गई थीं।21 महाभारत काल में दास-दासियों की उपस्थिति के प्रचुर प्रसंग हैं। दुर्योधन के साथ जुआ खेलते समय युधिष्ठिर ने दावा किया था कि उसके पास एक लाख तरुण दासियां हैं। वे सुंदर हैं। सुवर्णमय मांगलिक आभूषण तथा मनोहारी वस्त्र धारण करती हैं। मणि और स्वर्णाभूषणों से लदीं, चौसठ कलाओं में निपुण उन दासियों को युधिष्ठिर अपना धन मानते थे।22 

महाभारत एक वृहद ग्रंथ है। उसके भीतर अनेक उपकथाएं समाहित हैं। कद्रु-वनिता, नल-दमयंती, देवयानी, शर्मिष्ठा जैसे उपाख्यानों में भी दास प्रथा का उल्लेख है। इसमें भी नल-दमयंती का प्रकरण इतना रोचक है कि वह स्वतंत्र लोककथा के रूप में भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में ख्यात रहा है। इस उपकथा में भी जुए की बुराई को दर्शाया गया है। नल-दमयंती आख्यान के अंतिम हिस्से में पुष्कर जुए में खुद को हार जाता है। परिणामस्वरूप उसे अपनी स्वतंत्रता लुटाकर दास बनना पड़ता है। कालांतर में वह पुनः मुक्त हो जाता है। उन दिनों एक नियम यह भी था कि युद्ध में पराजित को, विजेता का दासत्व स्वीकारना  वह आमतौर पर तब तक रहता था, जब तक फिरौती या बदले में कुछ हासिल न हो जाए।23 प्राय:  विजेता को प्रसन्न करने के लिए बाकी भेंटों के अलावा दासियां भी भेंट की जाति थीं, इस कारण उन दिनों दास-दासियां प्रचुर संख्या में होती थीं।  महाभारत(3.76.77)। लोपामुद्रा की सेवा में 1000 दासियां रहती थीं। एक प्रसंग में च्यवन ऋषि मछुआरे के जाल में फंसकर उसकी संपत्ति बन जाते हैं। आखिरकार एक राजा उन्हें खरीदकर उनकी स्वतंत्रता वापस दिलाता है। भरत दक्षिणा स्वरूप दासों की भेंट करते हैं। असल में वह शक्तिशालियों का समाज था। स्त्री, पुरुष, धन-धान्य, पशु, भूमि कुछ भी हो, इन सभी को ताकत के बल पर जीता जा सकता था। जीतने के बाद वे विजेता की संपत्ति मान लिए जाते थे। ताकत का बोलबाला था। जो ताकतवर था, वह लोगों गरीबों, विपन्नों और कमजोरों को कैद करने, उन्हें दास बनाने यहां तक कि हत्या करने की धमकी भी देते रहते थे। दास का कर्तव्य था, अपने प्राणों पर खेलकर भी अपने स्वामी के आदेश का पालन करना। कुरुक्षेत्र में युद्ध के दौरान एक अवसर ऐसा आता है जब भीष्म(भीष्मपर्व 4.15.534) कृष्ण को अपना स्वामी मानकर अपने हथियार डाल देते हैं—‘हे प्रभो! तुम मुझ पर चाहे जैसे आक्रमण करो, मैं तुम्हारा दास हूं।’ युधिष्ठिर द्वारा खुद को तथा अपने भाइयों को दाव पर लगा देने के बाद, पांडवों की स्थिति भी दास जैसी बन चुकी थी। दास बनने के साथ ही वे अपनी इच्छाएं, अपनी स्वतंत्रता और विरोध की क्षमता भी गंवा चुके थे। उनके शरीर, इच्छाएं सभी कुछ दुर्योधन के अधीन हो चुके थे, जिसने उन्हें जुए में जीता था। एक स्थान पर आता है कि पुत्र, पत्नी और दास का संपत्ति में कोई अधिकार नहीं होता, क्योंकि उनपर क्रमशः पिता, पति और स्वामी का अधिकार होता है।

दास प्रथा में स्त्रियों की और भी अधिक दुर्दशा होती थी। प्राचीन मनीषी मानते थे कि कन्या गिरवी रखे आभूषण की तरह है, जिसे मांगे जाने पर उसके वास्तविक स्वामी को वापस लौटाना ही धर्म है। इस धारणा का विकृत विस्तार मंदिरों में देवदासी प्रथा के रूप में मिलता है जिसमें ईश्वर को समर्पित करने के नाम पर नन्ही बालिकाएं मंदिर के पुजारियों को सौंप दी जाती थीं। महाभारत में एक और प्रसंग आया है जो उस समाज में स्त्री की दुर्दशा को दर्शाता है, जिसके अनुसार स्त्री की हैसियत उस समाज में दास और कहीं-कहीं तो उससे भी बदतर थी। विश्वामित्र ने ऋषि गालव से गुरु दक्षिणा के रूप में 800 श्यामकर्णी घोड़ों की मांग की। 800 श्यामकर्णी घोड़ों का प्रबंध करना हंसी-खेल नहीं था। अगर इससे दस गुनी दासियां मांगी होतीं तो कोई भी राजा पलक झपकते इंतजाम कर देता। लेकिन 800 श्यामकर्णी घोड़े! परेशान गालव अपने मित्र गरुड़ से मिला। गरुड़ ने उसे सम्राट ययाति के पास जाने की सलाह दी। ययाति के पास श्यामकर्णी घोड़े तो थे नहीं। परंतु द्वार पर आए याचक को लौटाए कैसे? अंतत: उसने माधवी नामक अपनी सुंदर पुत्री गालव ऋषि को सौंपते हुए कहा—

‘हे महर्षि! यह मेरी कन्या है। यह अपूर्व सुंदरी, लावण्यमयी एवं सर्वगुणसंपन्न है। तीनों लोकों में ऐसा कोई भी नहीं जो इसे वरण करने की इच्छा न रखता हो। इसमें सुर, नर, किन्नर, आर्यों, अनार्यों सभी को सम्मोहित करने की अभूतपूर्व शक्ति है। मैं इस कन्या को आपको अर्पित करता हूं। इसे किसी भी राजा के पास बेचकर आप आसानी से गुरु दक्षिणा का इंतजाम कर सकते हैं।’24

मानो लड़की न होकर कोई ‘हुंडी’ हो। अपने मित्र गरुण के साथ गालव माधवी को लेकर अयोध्या नरेश हर्यश्व के दरबार में पहुंचा। हर्यश्व के कोई पुत्र नहीं था। ऋषि ने दो सौ श्यामकर्णी अश्वों के बदले माधवी को उसके हवाले कर दिया—‘आप इससे एक पुत्र उत्पन्न कर लें।’(उद्योगपर्व 116.15)। हर्यश्व के माधवी से वसुमना नामक पुत्र पैदा हुआ। कुछ समय बाद गालव ने हर्यश्व से मालती को वापस ले लिया। तदनंतर उस ‘हुंडी’ को लेकर वह राजा दिवोदास के पास पहुंचा। वहां भी दो सौ घोड़ों के बदले उसने लड़की राजा को सौंप दिया(उद्योगपर्व 117.7)। दिवोदास के यहां माधवी से प्रतर्दन नामक पुत्र का जन्म हुआ। निश्चित अवधि के बाद गालव पुन: राजा दिवोदास के दरबार में जा धमका तथा उससे माधवी को वापस ले लिया। तदनंतर वह राजा उशीनर से मिला। राजा उशीनर से भी 200 घोड़े लेकर उसने माधवी को सौंप दिया। उशीनर और माधवी के संयोग से शिवि नामक पुत्र का जन्म हुआ। अब तक गुरु दक्षिणा के 600 घोड़ों का प्रबंध हो चुका था। बाकी दो सौ का प्रबंध कहां से किया जाए? आखिरकार गालव माधवी को लेकर विश्वामित्र के पास पहुंचा और पूरी कहानी सुनाने के बाद, उसने 200 घोड़ों के बदले माधवी को रखने को कहा। मेनका को देखकर आपा खो देने वाला विश्वामित्र भला क्यों इन्कार करता! उसने माधवी को रख लिया। दोनों के संयोग से अष्टक नामक पुत्र का जन्म हुआ(उद्योगपर्व 118.3-8)। बाद में गालव माधवी को उसके पिता के पास वापस लौटाने पहुंचता है। ययाति ने माधवी का स्वयंवर करने की इच्छा प्रकट की। अनिच्छा से चार अलग-अलग पुरुषों की संतान को जन्म देने के बाद बुरी तरह टूट चुकी माधवी ने विवाह से इन्कार कर, संन्यास धारण कर लिया।

इस घटना में माधवी की स्थिति दासी से भी बदतर है। सामान्य दासी का अपनी संतान पर अधिकार होता था। परंतु इस कहानी में माधवी पशुवत एक राजा से दूसरे राजा तक ले जाई जाती है। ले जाने वाला एक ऋषि है और उसका भोग करने वाले उस समय के प्रतिष्ठित राजा हैं, जिनपर न्याय की रक्षा का भार होता है।   

बौद्धकालीन दासप्रथा

बौद्ध धर्म में अष्ठधम्म पद गृहस्थ जनों के लिए आचारसंहिता है। इसका पांचवा ‘धम्म’ ‘सम्यक आजीव’ है। बौद्ध धर्म गृहस्थ जनों के लिए धनार्जन का निषेध नहीं करता। किंतु चोरी, डकैती, हिंसा, लूटमार जैसे दूसरों के लिए कष्टकारी कार्यों द्वारा अर्जित धन को उसमें वर्ज्य माना गया है। ‘अपण्णकसुत्त’ में कहा गया है—‘वही व्यक्ति न्यायपथ पर है, जिसका मस्तिष्क शुद्ध एवं सात्विक है। जो अपने मन को प्रसन्न रखता है, तथा दास अथवा दासी रखने से बचता है।’ दीघनिकाय, ‘सामञ्ञफलसुत्त’ में ‘संतोष’ की स्थितियों का वर्णन करते समय कहा गया है—‘जैसे महाराज कोई पुरुष दास हो। जो पराधीन हो। जिसे अपनी इच्छा से कहीं भी आने-जाने का अधिकार न हो। समय आने पर जब वह दासता से मुक्त हो जाए। स्वतंत्र, अपराधीन, यथेच्छगामी हो जाए। तब उसके मन में ऐसे भाव होने के साथ प्रसन्न एवं आनंदित होना चाहिए—‘मैं पहले दास था, अब स्वतंत्र हूं। जहां जी चाहे वहां जा सकता हूं।’ भिक्षु संघ के नियमों के अनुसार समाज का कोई भी व्यक्ति उसकी दीक्षा ग्रहण कर सकता था। परंतु सैनिक,कर्जदार, दास आदि को भिक्षु संघ में शामिल होने के लिए संबंधित व्यक्ति की अनुमति लेनी पड़ती थी। 

अंगुत्तर निकाय(5.177) के अनुसार बुद्ध ने पांच प्रकार की आजीविकाओं, जो दूसरों के लिए कष्टकारी हो सकती हैं, को अपनाने से मना किया है। जैसे हथियारों, विष, दास-दासी, वेश्यावृति, मांस तथा उसके उत्पादों की खरीद-बिक्री द्वारा अर्जित धन। इसका आशय यह नहीं है कि बौद्ध काल में दास प्रथा का अभाव था; अथवा बौद्ध धर्म की उपस्थिति से दास-प्रथा में परिमाणात्मक कमी आई थी। अन्य सभ्यताओं और संस्कृतियों की भांति बौद्धकाल में भी दासप्रथा अपने निकृष्टतम रूप में मौजूद थी। सस्ता श्रम, विकास की चाहत और स्वामी के लिए सामाजिक प्रतिष्ठा—दासप्रथा की ऐसी देन थीं, जिसके कारण सुकरात से लेकर अरस्तु तक सभी ने उसे आवश्यक माना था। भारत में भी बुद्ध जैसे कुछेक अपवादों को छोड़कर लगभग सभी बुद्धिजीवी, दास प्रथा का या तो समर्थन कर रहे थे, अथवा उसकी ओर से मौन साधे हुए थे। ध्यातव्य है कि बौद्ध धर्म के प्रभाव में चलते यज्ञ-बलियों में कमी आई थी। बची हुई पशु-शक्ति का उपयोग उत्पादक कार्यों में होने लगा था। उसका सकारात्मक प्रभाव विकास पर भी पड़ा था। व्यक्तिगत संपत्ति की लालसा में निरंतर वृद्धि हो रही थी। उसके लिए सस्ता, लगभग मुफ्त श्रम उपलब्ध कराने वाली दासप्रथा का महत्त्व बढ़ता ही जा रहा था। यह भी कह सकते हैं कि अधिकाधिक लाभ की वांछा के कारण तत्कालीन व्यापारी वर्ग उसे छोड़ने को तैयार नहीं था।

बौद्धकाल तक बड़े राज्यों का बनना आरंभ नहीं हुआ था। उन दिनों भारत में मगध और उज्जैनी जैसे राजतंत्र थे। उनके साथ-साथ लिच्छिवी, वाहीक, शाक्य, मल्ल, वृष्णि जैसे गणों की भी प्रतिष्ठा थी। दासों की उपस्थिति राजतंत्र और गणतंत्र दोनों में थी। राजतंत्र में सेना के दरवाजे समाज के सभी वर्गों के लिए खुले थे।25 आवश्यकता पड़ने पर दासों को सेना में भी भर्ती किया जा सकता था। हालांकि उनका स्तर, बाकी सैनिकों से कमतर होता था। कई बार राजा युद्धकाल में मृत्युदंड पाए अपराधियों को दास के रूप में सेना में शामिल कर लेता था। वे सैनिकों और जानवरों की देखभाल के काम आते थे। सेना में भर्ती दासों को ‘दासकपुत्त’ कहा जाता था। उन्हें गृह-दास योद्धा का नाम भी दिया गया था। कई बार राजा किसी अपराधी का मृत्युदंड माफ करने के बाद, उसे अपनी सेना में शामिल कर लेता था।

कृषिकर्म के लिए भी दासों की मदद ली जाती थी। समाज के संपन्न वर्गों के पास हजारों एकड़ जमीन पर अधिकार होता था। इतनी बड़ी जमीन पर खेती करने के लिए दासों की मदद लेना तत्कालीन समाज का सामान्य चलन था। उस समय रोम की तरह भारत में दासों की दो श्रेणियां थीं। पहली श्रेणी में वे दास थे, जिनका दासत्व कृषि-भूमि से जुड़ा था। भूमि की बिक्री के साथ वे भी नए स्वामी के अधिकार में चले जाते थे। दूसरे स्वतंत्र दास थे। वे घरों और संस्थानों में काम करते थे। थेरीगाथा एक की कहानी के अनुसार, बौद्धकाल में बनारस के पास ‘दासग्राम’ था, जिसमें संपूर्ण आबादी दासों की थी। यह उन 14 गांवों में से एक था, जिनपर बुद्ध के शिष्य ‘पिप्पली मानव’ यानी महाकाश्यप का नियंत्रण था। विशाखा को दहेज में कृषि औजारों से भरी 500 गाडि़यां तथा सैकड़ों दास भेंट किए गए थे। उन दिनों दासों को अंतःवासी, अहेटक, केटक, दता, मानुस्स, सेवक, उपत्थका जैसे नाम दिए जाते थे, जबकि स्त्री दासों को अंतःपुरिका, अट्ठककारिका, इत्थी, पसेन दारिका आदि नामों से पुकारा जाता था। उनसे दासत्व की प्रवृत्ति तथा उसके कार्यक्षेत्र का बोध भी होता था।  

बुद्ध के समकालीन दार्शनिकों में भौतिकवादी चिंतक पूर्ण कस्सप की बड़ी प्रतिष्ठा थी। वे अपने समय के महान आजीवक चिंतक थे। उनके जीवन के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं है। उनके नामकरण के साथ एक कहानी जुड़ी है। हालांकि उसपर विश्वास करना कठिन है। बौद्धग्रंथों के अनुसार वे एक दास थे। जो स्वामी उन्हें दास बनाने के लिए लाया था, उसके 99 दास पहले से ही थे। पूर्ण कस्सप के आने के बाद सौ होने पर, स्वामी को लगा कि उसके दासों की संख्या पूरी हो चुकी है, इसलिए स्वामी ने ही उसका नामकरण पूर्ण या पूरण कस्सप नाम दिया था। उस समय के दूसरे आजीवक एवं लोकायत चिंतकों मक्खलि गोसाल और अजित केशकंबलि की सामाजिक स्थिति भी एक दास की तरह थी। डॉ. धर्मबीर ने ‘महान आजीवक : कबीर, रैदास और गोसाल’(पृष्ठ-227) नामक पुस्तक में कबीर के ‘बीजक’ के शीर्षक की मुख्य प्रेरणा ‘महानारद कश्यप जातक’ के कथासूत्र को बताया है। उक्त जातक में बीजक आजीवक विद्वान है। उसका जन्म पानी लाने वाली दासी के गर्भ से हुआ था। दासता को उन्होंने करीब से देखा था। धर्मवीर के अनुसार बीजक, ‘अपने धर्म और दर्शन में आजीवक थे और दासता के विरोध में लड़ रहे थे।’

मेगस्थनीज चंद्रगुप्त के शासनकाल में भारत आया था। वह चंद्रगुप्त के दरबार में सेल्यूकस की ओर से राजदूत था। अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में मेगस्थनीज ने भारत में दासप्रथा की उपस्थिति से इन्कार किया है। जबकि उन्हीं दिनों रचे जा रहे बौद्ध साहित्य में दासों का खुला उल्लेख है। क्या मेगस्थनीज भारतीय दासप्रथा से सचमुच अनभिज्ञ था? अथवा उसने जानबूझकर उसे छिपाया था? जबकि वह स्वयं ऐसे देश से आया था, जहां जनसंख्या का करीब एक-तिहाई हिस्सा दास की श्रेणी में आता था। असल में मेगस्थनीज की जानकारी का स्रोत केवल ब्राह्मण थे। अतएव एक कारण तो यह हो सकता है कि ब्राह्मणों ने भारत में मौजूद दासप्रथा को जानबूझकर छिपाया हो। दूसरा कारण यह कि भारत में शूद्र एवं दास की स्थिति में बहुत अंतर नहीं था। इसलिए संभव है मेगस्थनीज स्वयं उस समय के शूद्रों एवं दासों के जीवन में अंतर करने में असमर्थ रहा हो।

उन दिनों दास प्रथा अपने चरम पर था। दासों के शरीर पर उसके स्वामी का अधिकार होता था। नाराज होने पर स्वामी उसे दंडित कर सकता था। एक जातक में एक दासी का उल्लेख हुआ है जिसे उसके स्वामी ने दूसरे व्यक्ति के पास काम के लिए भेजा था। जब वह काम करने में असमर्थ रही तो बेंतों से उसकी पिटाई की थी। दूसरी ओर दास द्वारा आत्म-उत्थान के भी उदाहरण है। कटहक का एक दास तीव्र बुद्धि था। वह स्वामी के पुत्रों के साथ पढ़ना-लिखना सीख गया। अन्य कर्मों के साथ-साथ वह भाषण कला में भी पारंगत था। मालिक ने प्रसन्न होकर उसे भंडारगृह के रक्षक के रूप में नियुक्त कर दिया था। लेकिन उसे सदैव यह भय रहता था कि उसे कभी भी किसी अपराध के कारण काम से हटाया अथवा प्रताडि़त किया जा सकता है।26

बौद्धकाल में दासों की उपस्थिति प्रायः सभी पेशों और उद्यमों में थी। विनयपिटक, दीघनिकाय, जातक कथाओं आदि में दासों की उपस्थिति बनी हुई है। बौद्ध साहित्य में आठ प्रकार के दासों का उल्लेख मिलता है—ध्वजाहृत(युद्ध में जीता गया), उदरदास(भरण-पोषण), आमाय दास(जीवकोपार्जन हेतु दासता स्वीकारना), भयाक्रांत दास(भय के कारण), स्वैच्छिक दास(स्वेच्छापूर्वक दासता को अपनाने वाला), क्रीतदास(धन देकर खरीदा गया), पादमूलिक(राजा और राजपरिवार का विश्वसनीय एवं अंतरंग दास), कम्मंतदास(खेत एवं कार्यशाला में काम करने वाला) तथा दौवारिक(द्वार पर नियुक्त रहकर स्वामी की रक्षा करने वाला)। ‘थेरवादी अट्ठकथा’ के अनुसार सेट्ठि सुदंत अनाथिपिंडक ने विहार की रक्षा के लिए एक दास दिया था। बौद्ध ग्रंथों में दासियों के भी भेद मिलते हैं। दासियां घर के प्रत्येक काम में सहयोग करती थीं। दासी की बेटी भी दासी ही कहलाती थी। ‘विदुर जातक’(जातक संख्या 545) के अनुसार कुछ लोग केवल दासी के पेट से जन्म लेने के कारण दास होते हैं। कुछ लोग धन से खरीदे जाने के बाद दास बनते हैं। कुछ भय से दास बनते हैं तो कुछ स्वयं दास बन जाते हैं। 

दास को योनि मान लिया था। उससे पता चलता था की दासप्रथा को कुछ लोग दैवी विधान घोषित करने  में लगे थे तदनुसार जो व्यक्ति एक बार दास बन जाता वह हमेशा दास ही बना रहता है। इसी जातक में एक जगह माणवक कहता है—’निश्चित रूप से मैं दास योनि में पैदा हुआ हूं। चाहे राजा की वृद्धि हो, चाहे अवृद्धि हो, दूर जाकर भी मैं देव का दास ही रहूंगा।’ ‘निमी जातक’ की बिरानी दासी को दासत्व उत्तराधिकार में मिला था। एक जातक में लापरवाह और आलसी ब्राह्मण स्त्री अपने पति को यह कहकर भिक्षा लेने के लिए भेजती है कि वह उसके लिए दासी खरीदकर लाए। पत्नी की इच्छा पूरी करने के लिए ब्राह्मण 700 कार्षापण मांग कर लाता है। उतने मूल्य में एक दासी खरीदी जा सकती थी। दासियां दहेज में भी दी जाती थीं। ‘सुप्पारक जातक’ के अनुसार विशारक को दहेज में दासियां प्रदान की गई थीं। गणिकाओं के यहां 500 दासियों के होने का उल्लेख है। ‘खंडहाल जातक’ में चंद्रकुमार स्वयं को दास बनाने के लिए समर्पित करता है—

‘देव! हमारा वध न करें। हमें दास बनाकर ‘खंडहाल’ को दे दें। पैरों में बेड़ी पड़ी रहने पर भी हम हाथी-घोड़ों का पालन करेंगे। देव हमारा वध न करें….हम हाथियों की लीद बटोरेंगे….हम घोड़ों की लीद बटोरेंगे….हमें चाहे जिसे दास बनाकर दे दें।’27

ऐसे ही वास्संत्र जातक में एक राजकुमार स्वयं को 1000 पण में बेच देता है। ‘कुस्सजातक’ से पता चलता है कि विधुर के घर में 700 दासियां थीं। दास-दासियों का प्रमुख कार्य परिवार के सदस्यों की सेवा करना था। अतिथियों के आने पर उनके पैर धोना, आवष्यकता पड़ने पर उनके पैर दबाना जैसे कार्य दासों के जिम्मे थे। ‘मझिम्मनिकाय’ के अनुसार ‘काली’ नामक एक दासी चावल पकाने, बिस्तर लगाने, गाय दुहने से लेकर दीपक जलाने जैसे काम करती थी। दासियां धाय का काम भी करती थीं। वे खासतौर पर लड़कियों को पालती-पोसतीं, उन्हें बड़ा करतीं और लड़की के विवाह के बाद, उसकी ससुराल वालों को दान दे जाती थीं। एक जातक कथा के अनुसार एक राजकुमार के 64 दासियां थीं। दासों का रोजमर्रा का जीवन आमतौर पर बड़ा ही कठिन था। वे अपनी नियति को जानते थे, इसलिए उनके सपने बहुत छोटे होते थे। एक जातक कथा में राजा ने प्रसन्न होकर अपने कुलपुरोहित से वरदान मांगने को कहा। इसपर पुरोहित ने अपने परिजनों के साथ-साथ घर में काम करने वाली दासी पुण्णा से उसकी आवष्यकता के बारे में भी पूछा। जवाब में पुण्णा अपने लिए मूसल, सूप तथा गारा मांगती है। दासियों को अपने स्वामी की काम-वासना का षिकार भी होना पड़ता था। जो दासियां सुंदर होतीं, वे अपने स्वामी की रखैल बनकर रहने से खुद को कृतार्थ समझने लगती थीं। उद्दालक जातक के अनुसार एक ब्राह्मण राजपुरोहित अपनी दासी पर आसक्त हो गया। आगे चलकर दासी के गर्भ से उद्दालक का जन्म हुआ। आगे चलकर वह बड़ा ऋषि बना। इस तरह हम देखते हैं कि बुद्ध ने हालांकि दासप्रथा को हेय माना, तथा दास अथवा दासी न रखने की सलाह दी थी। तथापि इस बात के प्रबल प्रमाण हैं कि बौद्ध काल में दासप्रथा पूरे जोरों पर थी।

प्राकृत भाषा में ‘दास’ का उल्लेख अन्य अर्थों में देखने को मिलता है। वह उसकी अब तक स्थापित सामाजिकी से बिलकुल अलग है. प्राकृत में दास का अर्थ है, देखना। ‘दर्शन’ का अर्थ भी यही है। ऐसे लोग जो संसार के आंतरिक और बाहरी रहस्यों को समझते थे, जितनी अंतर्चेतना प्रबल थी, उन्हें दास कहा जाता था। वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा, बिहार में प्राचीन भारतीय इतिहास के गंभीर अध्येता डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह के अनुसार, दास मूल रूप से बौद्ध थे. उनके अनुसार साँची और भरहुत के स्तूपों पर अनेक दास तथा दासी उपाधिधारक बौद्धों के शिलालेख हैं, जिन्होंने स्तूप-निर्माण में मदद की थी।’ वे लिखते हैं—

”अरहत दास थे, अरहत दासी थीं, यमी दास थे, जख दासी थीं….अनेक, सभी के नाम लिखे हुए हैं। एक बौद्धकालीन शिलालेख पर प्राकृत में ‘थूप दास’ का वर्णन मिलता है। उसपर लिखा है-‘मोरगिरिह्मा थूपदासस दान थंभे।’ थूप दास मोरगिरि(महाराष्ट्र) के निवासी थे। उन्होंने भरहुत के एक स्तंभ-निर्माण में मदद की थी। वैदिक साहित्य में वर्णित आर्यों का सांस्कृतिक संघर्ष इन्हीं बौद्ध दास-दासियों से हुआ था। वैदिक साहित्य इन दास-दासियों के बारे में बताता है कि ये लोग यज्ञ नहीं करते और न ये इंद्र-वरुण की पूजा करते हैं…स्पष्ट है कि ये बौद्ध हैं। प्राकृत भाषा में ‘दास'(दसन) का अर्थ द्रष्टा है। मगर आर्यों ने सांस्कृतिक दुश्मनी के कारण अपनी पुस्तकों में ‘दास’ का अर्थ ‘गुलाम/नौकर’ कर लिया है। दास और आर्यों का यह सांस्कृतिक संघर्ष 1500 ई.पू. में नहीं बल्कि मौर्य काल के बाद हुआ था।”

इस संबंध में अभी और शोध की अपेक्षा है. यह सच है कि समय और परिस्थितियों में आए बदलाव के कारण शब्द अपनी अर्थ-छवियां बदलती रही हैं। अठारहवीं-उनीसवीं शताब्दी में ‘अराजकतावाद’ शब्द ‘जनतंत्र’ की उच्चतम अवस्था का प्रतीक था। उसका अर्थ ऐसे राज्य से था, जहां के प्रबुद्ध नागरिक अपने आप में ही इतने अनुशासित और समर्पित हों कि राज्य की आवश्यकता और उसका औचित्य ही जाता रहे। आज यह शब्द एकदम भिन्न अर्थों में अव्यवस्था और कानून विरोध के संदर्भ में प्रयुक्त किया जाने लगा है। अराजक शब्द का उपयोग कई बार गाली की तरह भी किया जाता है.

जैन दर्शन भी बौद्ध दर्शन का समकालीन है। जैन धर्म में अहिंसा पर अत्यधिक जोर दिया गया है। वहां अहिंसा की परिभाषा बहुत व्यापक है। उसमें मनसा-वाचा-कर्मणा किसी भी प्रकार की हिंसा का निषेध है। चूंकि दास प्रथा में स्वामी दास के विवेक को पनपने नहीं देता। उसपर हमेशा अपना निर्णय लादे रहता है। दास से जीवन के कई मौलिक अधिकार जैसे संपत्ति संचय, छीन लिए जाते हैं। इसलिए कह सकते हैं कि प्रत्यक्ष न सही, परोक्ष में ही—जैन धर्म दास प्रथा का विरोध करता है। हालांकि उसमें सीधे तौर पर कहीं भी दास प्रथा का विरोध नहीं है। जैन दर्शन में महावीर स्वामी के आरंभिक अनुयायियों में चंदनबाला का उल्लेख मिलता है। वह महावीर स्वामी की प्रथम महिला शिष्या थी। कहानी के अनुसार चंदनबाला चंपानगरी के राजा दधिवाहन की बेटी थी। उसका मूल नाम वसुमती था। एक बार चंपानगरी पर पड़ोसी राजा शतानीक ने हमला कर दिया। आकस्मिक हमले से आक्रांत दधिवाहन जंगलों की ओर भाग गए। उनकी पत्नी और बेटी वसुमती को शत्रु सेना ने कैद कर लिया। बाद में उन्होंने वसुमती को बेचने के लिए कोशांबी के चौराहे पर खड़ा कर दिया। वहां उसे धन्नासेठ नाम के व्यापारी ने खरीद लिया। यह देखते हुए कि वसुमती किसी संभ्रांत घर की लड़की है, धन्ना ने उससे दासी का काम लेने के बजाए, चंदनबाला नाम देकर अपनी पुत्री की तरह उसका लालन-पालन किया। बदलते घटनाचक्र के दौरान चंदनबाला महावीर स्वामी के संपर्क में आई और उनकी शिष्या बन गई।

बुद्धेत्तर भारत में दास प्रथा

बाद के कालखंड में भी दास प्रथा की मौजूदगी के पर्याप्त प्रमाण हैं। संस्कृत नाटक ‘मृच्छकटिकम’ में दासों की मंडी का उल्लेख किया गया। एक व्यक्ति उधार चुकाने में असमर्थ रहता है। इसपर साहूकार के आदमी उसे पीटते हुए मंडी में ले जाते हैं। जहां उसको नीलाम करके अपना कर्ज वसूल लिया जाता है। भारतीय दास प्रथा की चर्चा मध्य एशिया की ओर से आए योद्धाओं की चर्चा के बिना पूरी नहीं हो सकती। अपने लिए स्थायी राज्य की चाहत में उन्होंने हजारों किलोमीटर लंबी कठिन यात्राएं की थीं। बीच-बीच में उन्हें अस्थायी सफलताएं भी मिलती रहीं। कारण है कि एक अंतराल के पश्चात उनके सहयोगी सैनिकों, जिनमें उनके अपने परिजन भी होते थे—की अपनी महत्त्वाकांक्षाएं अंगड़ाई लेने लगती थीं। जिससे विजित क्षेत्र के शासन-प्रशासन के अधिकार को लेकर उनके बीच सत्ता-संघर्ष शुरू हो जाता था। उससे बचने के लिए कुछ लड़ाकों ने दास प्रथा का सहारा लिया था। दास के पास सिवाय ‘स्वामीभक्ति’ के अपना और गर्व करने लायक कुछ नहीं होता था। यह प्रत्यय भी दास प्रथा को दैवीय उठान देने के मंशा के साथ मालिक ही दासों के मनस् में रोपते आए थे। समय के साथ दास उस अमानवीय प्रथा से अनुकूलित होने लगे। एक समय ऐसा आया, जब दास उन असमानताकारी पृथा को अपना चुके थे। परिणामस्वरूप स्वामीभक्ति उनके लिए बड़ा जीवनमूल्य, बन गई। इसकी पराकाष्ठा हमें पन्ना धाय के चरित्र में दिखाई पड़ती है। सोलहवीं शताब्दी की वह स्त्री जिसका स्तर समाज में दास जैसा ही था, महाराणा संग्राम सिंह के बेटे और मेवाड़ के भावी सम्राट उदय सिंह को बचाने के लिए, अपने बेटे चंदन को हत्यारे बनवीर के आगे कर देती है। बनवीर बिना कोई दया दिखाए एक झटके में उस मासूम की हत्या कर देता है। ऐसा उदात्त दासत्व सत्तानशीनों के बड़े काम का था, इसलिए राजस्थान के इतिहास में पन्ना धाय के त्याग का खूब महिमामंडन किया गया। पन्ना धाय जैसे स्वामीभक्त हर शासक की जरूरत थे। बगैर उनके बड़े और स्थायी राज्य स्थापित कर पाना असंभव था।  

दास के लिए अपने मालिक के सुख-वैभव के अलावा कुछ भी महत्त्वपूर्ण नहीं था। वे मानापमान की भावना से कोसों परे थे। इसे समझने के लिए एक खलीफा की यह स्वीकारोक्ति काफी होगी—

‘जब मैं दरबार में बैठता हूं तो एक गुलाम को बुलाकर अपने बगल में बिठा सकता हूं। इस तरह कि उसके और मेरे घुटने एक-दूसरे को जकड़ें। जैसे ही दरबार समाप्त हो जाए तो मैं उसे अपने घोड़े की मालिश को कह सकता हूं। उसे इसमें तनिक भी बुरा नहीं लगेगा। अगर में यही काम किसी और से करने को कहूं तो वह कहता, ‘मैं आखिर तुम्हारे पक्षधर का बेटा हूं।’ या ‘तुम्हारा खास साथी हूं।’ और मैं उसे राजी नहीं करवा पाता।’28 

तो बात मध्य एशिया, ईरान और अफगानिस्तान के जुझारू लड़ाकों की हो रही थी। दसवीं शताब्दी में वे अपनी-अपनी सैन्य टुकडि़यों के साथ संघर्षरत थे। उन्हें जहां भी कमजोर राज्य दिखता, फौरन हमला कर देते थे। मगर वह जीत स्थायी न होती थी। कुछ दिनों बाद उनके अपने बीच भी सत्ता संघर्ष पनपने लगता था। उसे शांत रखने के लिए उन्हें या तो राज्य का बंटवारा करना पड़ता; अथवा अपने अधिकारों में कटौती करनी पड़ती थी। उससे मुक्ति के लिए कुछ महत्त्वाकांक्षी लड़ाकों ने प्रशिक्षित और ख्यातिनाम सैनिकों के बजाए, अपनी सेना में दासों को भर्ती करना शुरू कर दिया। उन्हें सैन्य-प्रशिक्षण देकर लड़ने लायक बनाया। प्रयोग कामयाब रहा। उदाहरण के लिए कुतबुद्दीन ऐबक शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी का गुलाम था। गौरी के साथ उसने कई युद्धों में हिस्सा लिया था। मुहम्मद गौरी ने भारत में गौरी-साम्राज्य की नींव डाली थी। परंतु उसका शासन ज्यादा लंबा न खिंच सका। अवसर मिलते ही कुतबुद्दीन ऐबक ने मुहम्मद गौरी के उत्तराधिकारियों से सत्ता छीन ली। कुतबुद्दीन ऐबक के बाद दिल्ली सल्तनत उसके भाई आरामशाह के हाथों में चली गई। वह अपने नामानुरूप ऐशोआरामपरस्त था। उसे मारकर इल्तुतमिश ने दिल्ली सल्तनत पर कब्जा कर लिया। इल्तुततमिश कुतबुद्दीन ऐबक का दास, यानी गुलाम का भी गुलाम था। विद्रोहियों के दमन के लिए उसने 40 भरोसेमंद गुलामों को लेकर ‘तुर्कान-ए-चिहालगानी’ नामक संगठन बनाया था, जो साये की तरह उसकी सुरक्षा में रहता था। इल्तुतमिश दास-योद्धाओं से अपने बेटों से भी अधिक प्यार करता था। भारत में गुलाम वंश का शासन 84 वर्षों(1206—1290 ईस्वी) तक रहा। लेकिन वह गुलाम वंश का शासन था, गुलामों का नहीं। क्योंकि न तो उससे समाज के गुलामों के प्रति नजरिये में बदलाव आया, न बाकी गुलामों में उससे आत्मविश्वास का संचार हुआ था और न ही उन शासकों का गुलामों के प्रति नजरिया बाकी लोगों से बहुत ज्यादा अलग था।

दासों का जीवन बहुत चुनौतीपूर्ण और कष्टकारी होता था। इस मामले में शूद्रों की स्थिति भी उनसे खास अच्छी नहीं थी। अछूतों का तो और भी बुरा हाल था। डॉ. आंबेडकर ने छूआछूत को दास प्रथा से भी घृणित एवं निदंनीय माना है—

‘अस्पृश्यता, दासत्व से कहीं अधिक निकृष्ट है, क्योंकि यह अछूतों को उनके हाल पर ऐसे स्थान पर पटक देती है, जहां उनकी आजीविका का कोई साधन ही न हो….दास अपने स्वामी की संपत्ति होता था। इसलिए स्वामी द्वारा उसे मुक्त व्यक्ति के सापेक्ष वरीयता दी जाती थी। मूल्यवान होने के कारण उससे स्वामी के स्वार्थ भी जुड़े होते थे, वह दास के स्वास्थ की देखभाल करता था। रोम में दासों को दलदल  और मलेरिया से ग्रस्त स्थान पर कभी नहीं ठहराया जाता था। वहां केवल मुक्त व्यक्तियों को ही नियुक्त किया जाता था।’29

बावजूद इसके भारतीय छूआछूत को हजारों वर्षों तक गले लगाए रहे। अंग्रेजों ने दास प्रथा को निंदनीय मानते हुए, 1843 में ही समाप्त कर दिया था। मगर छुआछूत को पूरी तरह खत्म करने के लिए संविधान के लागू होने तक प्रतीक्षा करनी पड़ी।

ओमप्रकाश कश्यप

9013 254 232 

संदर्भ

1. डॉ. रामविलास शर्मा, मानव सभ्यता का विकास, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ-74

2. डॉ. रामविलास शर्मा द्वारा उद्धृत, उपर्युक्त, पृष्ठ-74

3. मोर्टीमर व्हीलर, दि इंडस सिविलाइजेशन, कैंब्रिज यूनीवर्सिटी प्रेस, लंदन, 1968, पृष्ठ-34 & 135

4. रामशरण शर्मा, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, राजकमल प्रकाशन, 1992, पृष्ठ- 17

5.  उपर्युक्त, 25

6. यद्वा दास्र्याद्रहस्ता समत उलूखल मुसलम् शुम्भताप-अथर्ववेद, 12/3/13)

7. रामशरण शर्मा, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, राजकमल प्रकाशन, 1992, पृष्ठ-16

8. राधाकुमुद मुखर्जी, हिंदू सभ्यता, पृष्ठ 89

9. रामशरण शर्मा, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, 25

10. उदकुंभानधिनिधाम दास्यौ मार्जालीयं परिनृत्यंति पदों

      निध्नतीरिदं मधुगायन्त्यों मधु वै दैवानां परममन्नाधाम—तैत्तिरीय संहिता, 7/5/101

  1. डॉ. रामविलास शर्मा, मानव सभ्यता का विकास, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ-74

12. प्रवृत्तोऽश्वतरीरथो दासीनिष्कोऽत्स्यन्नं पश्यसि—छांदोग्योपनिषद, 5.13.2

13. स होवाच विज्ञायते हस्ति, हिरण्यस्पापस्तं गौ, अश्वानां दासीनां—बृहदारण्यक उपनिषद(6.2.7)।

14. ओमप्रकाश प्रसाद, प्राचीन भारत का सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास, राजकमल प्रकाशन, 2006

15. गृह जातस्था, क्रीतो लब्धो, दायादुपागतः

अनाकाल भृतो, लोके अहितः स्वामिना च यः। 24

मोक्षितो महतश्चार्णात्प्राप्तो, युद्धात्पणार्जितः

तवाह मित्युपगतः प्रवज्यावसितः कृतः। 25

भक्तदासश्चविज्ञेयस्तथैव वडवाहतः

विक्रेता चात्मनः शास्त्रै दासाः पंचदशस्मृताः। 26

  1. श्रीपाद अमृत डांगे, आदिम साम्यवाद, हिंदी अनुवाद आदित्य मिश्र, राजकमल प्रकाशन, 1978,  पृष्ठ 195

17. डॉ. सुरेद्र कुमार शर्मा अज्ञात, क्या बालू की भीत पर खड़ा है हिंदू धर्म, विश्व बुक्स प्रा. लिमिटेड,

18. ददौ कन्यापिता तासां दासीदासमनुत्तमम्।

हिरण्यस्य सुवर्णस्य मुक्तानां विद्रुमस्य च। रामायण, बालकांड, 1.74.5

19. रूपाजीवाश्म वादिन्यो वणिजश्य महाधनाः

शोभयंतु कुमारस्य वाहिनी सुप्रसारिताः।। उत्तरकांड-6.74.2

20. तस्माततेऽहं प्रदास्यामि विविधं वसु भूरि च

      दासी सहस्राश्यामानं सुवस्त्राणामलंकृतम्।। वनपर्व, 185.34

21. ‘दासाश्च दास्याश्च सुमृष्ठवेषाः। संभोजकाश्चाप्युपजहृनुरत्नम्।। आदिपर्व-193।

22. शतं दासीसहस्राणि तरूण्यो हेमभद्रिकाः

कंबूकेयूर धारिष्यो निष्ककंठयः स्वलंकृता-महाभारत, 2.61.8

23.  दासॊऽसमीति तवया वाच्यं संसत्सु च सभासु च।
       एवं ते जीवितं दद्याम एष युद्धजितॊ विधिः।। महा.3.256.11

24.  इयं सुरसुतप्रख्या सर्वधर्मोपचायिनी

सदा देवमनुष्याणामसुराणां च गालव।।

कांछिता रूपतो बाला सुता मे प्रतिगृह्यताम्

अस्याः शुल्कं प्रदास्यंति नृपा राज्यमपि ध्रुवम्।। उद्योगपर्व, 115.2-3

25. देवराज चानना, सलेवरी इन एन्शीएंट इंडिया, पिपुल्स पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, 1960, पृष्ठ-40

26. डांगे, आदिम समाज, पृष्ठ 195

27. खंडहाल जातक, भदंत आनंद कौसल्यायन, जातक संख्या 542, हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग।

28. सी.एन.सुब्रह्मण्यम, जब गुलाम सुल्तान बने, शैक्षिक संदर्भ, मार्च-अप्रैल 1996

29. कौन ज्यादा बुरा है—गुलामी या अस्पृश्यता?, डॉ. भीमराव आंबेडकर।

दक्षिण भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के जन्मदाता : सिंगारवेलु चेट्टियार

सामान्य
जब भी कोई नया महापुरुष जन्मता है, मनुष्यता का भी पुनर्जन्म होता है। प्रत्येक महापुरुष अपने विचारों से, कर्मों से नई इबारत लिखता है। ऐसे कि लोग सम्मोहित होकर उसका उसका अनुसरण करने लगते हैं। फलस्वरूप जड़ और अप्रासंगिक हो चुकी विचारधाराएं पीछे छूटने लगती हैं। कुल मिलाकर बात इतनी-सी है कि जब भी किसी महापुरुष का जन्म होता है, इस दुनिया का भी पुनर्जन्म होता है।

आजकल लोग सवाल नहीं गूगल करते हैं। तो चलिए गूगल कर लेते हैं—‘भारत में मई दिवस मनाने की शुरुआत किसने की थी? वर्ग-क्रांति का प्रतीक लाल झंडा भारत में पहली बार किसने फहराया था? कौन था वह भारतीय जिसने खचाखच भरे सभागार में पहली बार ‘कामरेड’ शब्द का संबोधन किया था। जिसे सुनकर पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजने लगा था? भारत में मजदूर आंदोलनों का पितामह कौन था? कौन था, दक्षिण भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन का जन्मदाता? गूगल बाबा इन प्रश्नों का थोड़ा घुमा-फिराकर एक ही जवाब देंगे—‘सिंगारवेलु चेट्टियार। लोग उन्हें सम्मान से सिंगारवेलार कहते थे।

अब आप सिंगारवेलु को गूगल करना चाहेंगे। पर थोड़ा धीरज रखिए। पहले कुछ बातें ‘मई दिवस’ पर कर ली जाएं। मशीनीकरण के आरंभ में आदमी को भी मशीन मान लिया गया था। ‘कार्य-दिवस’ का अर्थ था, सूरज निकलने से दिन ढलने तक काम करना। मौसम के अनुसार दिन घटता-बढ़ता तो काम के घंटे भी बदल जाते। कामगार को प्रतिदिन 14 से 16 घंटे काम करना पड़ता था। कभी-कभी तो एक कार्यदिवस 18 घंटे तक पहुंच जाता था। अगस्त 1866 में ‘नेशनल लेबर यूनियन’ 8 घंटे की मांग का समर्थन किया।1 आंदोलन होने लगे। परंतु न सरकारें चेतीं न कारखाना मालिकों ने ही कोई ध्यान दिया। आखिरकार अमेरिकी मजदूरों ने 1 मई 1886 से देशव्यापी हड़ताल की घोषणा कर दी। तीन और चार मई, को प्रदर्शन के दौरान पुलिस और मजदूर संगठनों की भिड़ंत हुई। 4 मई को शिकागो के हेमार्किट चौक पर हुई घटना तो नरसंहार जैसी थी। उसी की याद में मई दिवस मनाया जाता है। मई की पहली तारीख का संबंध 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग तथा उसके लिए श्रमिकों द्वारा दी गई कुर्बानियों से है।

भारत में पहला मई उत्सव, 1 मई, 1923 को मद्रास में मनाया गया था। उसी दिन देश में पहले मजदूर संगठन का जन्म हुआ था, नाम था—‘हिंदुस्तान लेबर एंड किसान पार्टी’।2 उसी दिन लाल झंडा पहली बार फहराया गया था।3 आगे चलकर यह झंडा मजदूर आंदोलनों की पहचान बन गया। इन सबका श्रेय जाता है—सिंगारवेलु चेट्टियार को। भारत में ‘कामरेड’ शब्द का पहली बार इस्तेमाल उन्होंने ही, दिसंबर 1922 में कांग्रेस के गया अधिवेशन में किया था।4 यह जादुई शब्द आगे चलकर साम्यवादी चेतना की पहचान बन गया। गया सम्मेलन में सिंगारवेलु ने ही पहली बार भारत के लिए ‘संपूर्ण स्वराज’ की मांग रखी थी।5

जीवन परिचय

सिंगारवेलु  का जन्म 18 फरवरी, 1860 को एक मछुआरा परिवार में हुआ था। समुद्र किनारे जिस बस्ती में वे रहते थे, उसे वे ‘कप्पम’ कहते थे। बस्ती के प्रायः सभी पुरुष मछली पकड़ने का काम करते। बांस और तख्तों से बनी डोंगी से समुद्र की लहरों को चीरते हुए वे आगे बढ़ जाते। कभी समुद्र की बन आती। उसकी उन्मत्त लहरें, किनारे बसीं झुग्गियों को अपने साथ बहा ले जातीं। मगर कुछ दिनों बाद वे फिर उसी जगह उभर आती थीं। प्रकृति और पुरुष की डांडा-मेंडी….झुग्गियों का बनना-मिटना भी मानो लहरों जैसा हो। सिंगारवेलु के पिता का नाम था—वेंकटचलम चेट्टियार। मां थीं—वाल्लमई। बताया जाता है कि उनके दादा मामूली डोंगी के सहारे बर्मा के तटवर्ती क्षेत्रों तक चले जाते। वहां से चावल और इमारती लकड़ी मद्रास तक ले आते थे।6 कह सकते हैं कि धैर्य और दुस्साहस सिंगारवेलु को विरासत में प्राप्त हुए थे।

जिस जाति में सिंगारवेलु का जन्म हुआ था, उसमें पढ़ने-पढ़ाने की कोई परंपरा न थी। परंतु वेंकटचलम थोड़ा आधुनिक मिजाज थे। उन्होंने सिंगारवेलु को पढ़ाने का फैसला किया। खुद को प्रखर बुद्धि सिद्ध करते हुए सिंगारवेलु ने 1881 में मेट्रिक की परीक्षा पास की। 1884 में क्रिश्चन कॉलेज से एफए पास करने के पष्चात उन्होंने बीए के लिए प्रेसीडेंसी कॉलेज मद्रास में दाखिला ले लिया। आगे की पढ़ाई के लिए मद्रास लॉ कॉलेज से जुड़े। 1902 में कानून की डिग्री मिली। उसके बाद वे मद्रास उच्च न्यायालय में प्रक्टिश करने लगे। प्रतिभाषाली थे ही। सो वकालत के जमने में देर न लगी।7

1889 में उनका विवाह आंगम्मल से हुआ। वह अंतररजातीय विवाह था। दोनों के एकमात्र संतान, बेटी का जन्म हुआ। जिसका नाम उन्होंने कमला रखा था। 1932 में उन्होंने अपने धेवते, कमला के पुत्र सत्यकुमार को उन्होंने कानूनी तरीके से गोद ले लिया।

आरंभ में सिंगारवेलु व्यापार में हाथ आजमाना चाहते थे। इसलिए 1902 में वे चावल के व्यापार की संभावना तलाशने के लिए ब्रिटेन चले गए। सिंगारवेलु के लिए वह यात्रा बहुत परिवर्तनकारी सिद्ध हुई। वहां उन्हें नई-नई पुस्तकें पढ़ने का अवसर मिला। लंदन में उन्होंने बौद्ध अधिवेशन में हिस्सा लिया। उससे बौद्ध धर्म-दर्शन के प्रति ऐसा अनुराग बना कि मद्रास लौटने पर अपने घर पर ही ‘महाबोधि सोसाइटी’ की बैठकें आयोजित करने लगे।8 इससे प्रसन्न होकर उन्हें मद्रास महाबोधि सोसाइटी का अध्यक्ष भी मनोनीत कर दिया गया। उन्हीं दिनों समाज सेवा से लगाव हुआ। वे चाहते थे कि बस्ती के बच्चे पढ़-लिखकर आगे बढ़ें। इसके लिए वे बच्चों तथा उनके माता-पिता को प्रोत्साहित करने लगे। आवश्यकता पड़ने पर गरीब बच्चों को पुस्तक, स्टेशनरी, भोजन वगैरह देकर मदद भी करते। पढ़ने का शौक था। सो धर्म, दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्र आदि विषयों की नई से नई पुस्तकें अपने लिए जुटाते, पढ़ते। अपने पढ़े हुए पर दूसरों से बातचीत करते। सुब्रह्मयम भारती, वी. चक्करई चेट्टियार जैसे नेताओं के संपर्क में आने के बाद वे राजनीति की ओर मुड़ गए।

प्लेग के दौरान

1905 में रूसी क्रांति की खबरें मिलीं, जिससे पहली बार उनका कम्युनिस्म की ओर वे रुझान बढ़ा। इस बीच उनके कांग्रेस से अच्छे संबंध बन चुके थे। पार्टी में वे तिलक जैसे उग्रपंथी नेता माने जाते थे। वे मानते थे कि देश को आजाद कराने के लिए बल प्रयोग अपरिहार्य है। बिना उसके साम्राज्यवादी अंग्रेजों से मुक्ति असंभव होगी। 1914 में पहला विश्वयुद्ध छिड़ा तो सिंगारवेलु का ध्यान युद्ध की खबरों से ज्यादा जनसाधारण की बढ़ती समस्याओं की ओर गया। खासकर उन समस्याओं की ओर जो युद्ध की, पूंजीवादी लिप्साओं की देन थीं। उन्हीं दिनों एक बड़ी चुनौती सामने आ गई। मुंबई सहित पूरे महाराष्ट्र में तबाही मचाने वाली प्लेग 1898 में मद्रास तक आ पहुंची। वहां उसने ‘कुप्पम’ को भी अपनी चपेट में लिया। सब कुछ छोड़कर सिंगारवेलु जनसेवा में जुट गए। लोगों को भुखमरी से बचाने के लिए उन्होंने ‘सामुदायिक रसोई’ का संचालन किया। 1910 के बाद प्लेग से छुटकारा मिला तो मलेरिया ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। सिंगारवेलु जूझते रहे। इससे उन्हें गरीबी तथा उसके कारणों को समझने की दृष्टि मिली। वही उन्हें साम्यवाद की ओर ले गई।

राजनीति में दस्तक

13 अप्रैल 1919 भारतीय इतिहास का रक्त-रंजित दिन था। उस दिन जलियांवाला हत्याकांड 379 लोग मारे गए थे। लगभग 1500 हताहत हुए थे। क्षुब्ध जनता अंग्रेजों के विरुद्ध प्रदर्शन करने लगी। उत्तर से दक्षिण तक सब अंग्रेजों के खिलाफ थे। फिर सिंगारवेलु कैसे पीछे रह सकते थे! उन्होंने युवाओं को संगठित कर, कई शांतिपूर्ण प्रदर्शन किए। गांधी ने असहयोग आंदोलन का आह्वान किया। उससे प्रेरित होकर सिंगारवेलु ने भी एक जनसभा में अपने गाउन को अग्नि-समर्पित कर अदालत से नाता तोड़ने की घोषणा कर दी। मई 1921 में उन्होंने गांधी को लिखा—‘मैंने आज अपने वकालत के पेशे से मुक्ति पा ली है। देश-सेवा के लिए मैं भी आपका अनुसरण करूंगा।’9 इसी दौरान वे कांग्रेस के संपर्क में आए। जनमानस में अपनी पैठ, प्रतिभा और सरोकारों के चलते बहुत जल्दी प्रदेश कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में उनकी गिनती होने लगी।

हैलो कामरेड्स

दिसंबर 1922 में उन्हें कांग्रेस के गया अधिवेशन में शामिल होने का अवसर मिला। उस समय वे अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य भी थे। अधिवेशन में दिए गए भाषण में सिंगारवेलु का रंग एकदम निराला था। गए वे प्रदेश कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में थे, मगर भाषण में वे खुद को कुछ और ही बता रहे थे—‘अध्यक्ष, हाल में मौजूद कामरेड्स, साथी मजदूरो, प्रजाजनो, हिंदुस्तान के किसानो और हलवाहो….मैं आपके बीच आपके मजदूर साथी के रूप में बोलने आया हूं। मैं यहां पूरी दुनिया के लिए महा-कल्याणकारी, कम्युनिस्टों की दुनिया के प्रतिनिधि के रूप में पहुंचा हूं। मैं यहां उस महान संदेश को दोहराऊंगा, जिसे साम्यवाद दुनिया-भर के मजदूरों को देता आया है।’10 उन दिनों अंग्रेज ‘कम्युनिज्म’ शब्द से ही खार खाते थे। ऐसे में किसी प्रतिनिधि के मुंह से ‘कामरेड्स’ संबोधन सुनना, खुद को साम्यवादी जगत का प्रतिनिधि बताना, कामगारों, मजदूरों और किसानों की बात करना, वहां मौजूद सदस्यों के लिए यह एकदम अप्रत्याशित था। सो सिंगारवेलु की पहली पंक्ति के साथ ही सभागार तालियों से गूंजने लगा।

भाषण में सिंगारवेलु ने कहा था—‘हम स्वराज के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह लड़ाई हम अहिंसा और असहयोग जैसे हथियारों की मदद से लड़ रहे हैं। मेरा उनमें विश्वास है। मगर इन हथियारों से वर्गहीन समाज की रचना संभव नहीं है।’ उन्होंने कहा था—‘धनाढ्य संभल जाएं। ताकतवर ध्यान दें….दुनिया में जितनी भी अच्छी चीजें हैं, सब मेहनतकश लोगों ने ही तुम्हें दी हैं। तुमने उन्हीं को हाशिये पर ढकेल दिया। वे हमेशा तुम्हारी इच्छाओं के खटते रहते हैं। फिर भी तुम उनकी उपेक्षा करते हो….याद रखो, भारतीय मजदूर अब जाग चुके हैं। वे अपने अधिकारों को धीरे-धीरे समझने लगे हैं।’11 कांग्रेस के इतिहास में वह पहला अवसर था, जब उसके सम्मेलन में किसान और मजदूर वर्ग पर चर्चा हो रही थी। लोग कांग्रेस के कायाकल्प का श्रेय गांधी को देते हैं। लेकिन उस समय की परिस्थितियां ऐसी थीं कि उनसे समझौता किए बगैर कांग्रेस की राष्ट्रव्यापी स्वीकार्यता संभव ही नहीं थी। डॉ. आंबेडकर, रामासामी पेरियार और सिंगारवेलु जैसे नेताओं का दबाव कांग्रेस और गांधी दोनों को बदलने को विवश कर रहा था।

कांग्रेस का गया सम्मेलन सिंगारवेलु की राजनीति की दिशा तय कर चुका था। उनके भाषण ने देश-विदेश के लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था। देश-भर से पहुंचे प्रतिनिधियों ने मांग की कि सिंगारवेलु को कांग्रेस की श्रमिक मामलों की प्रस्तावित उपसमिति में स्थान दिया जाए। मानवेंद्रनाथ राय ने मजदूरों तथा आम जनता की समस्या की ओर कांग्रेस तथा सरकार का ध्यान आकर्षित कराने के लिए सिंगारवेलु की प्रशंसा की थी। अपनी उग्र कार्यशैली और साम्यवादी रुझान के कारण वे पहले ही अंग्रेजों की नजर में आ चुके थे। 1921 में पुलिस ने उनके घर पर दबिश दी थी। वह कथित रूप से ‘चुनौती’ शीर्षक से प्रकाशित पंपलेट्स की तलाशी लेने गई थी। लेकिन पुलिस को वहां से खाली हाथ लौटना पड़ा था।12

सिंगारवेलु और गांधी

अपने आरंभिक राजनीतिक जीवन में सिंगारवेलु गांधी से प्रभावित थे। परंतु उनकी कार्यशैली गांधी से अलग थी। प्रिंस ऑफ़ वाल्स भारत दौरे पर आए। शेष भारत की तरह दक्षिण में भी उनकी यात्रा का बहिष्कार किया गया। मद्रास में सिंगारवेलु के नेतृत्व में हड़ताल का आह्वान किया गया था। हड़ताल पूरी तरह कामयाब थी। बाद में पता चला कि हड़ताल में शामिल होने के लिए कुछ दुकानदारों पर दबाव बनाया गया था। कुछ कार्यकर्ताओं की शिकायत पर गांधी ने 9 फरवरी, 1922 के ‘यंग इंडिया’ में ‘सत्याग्रह की मूल भावना का पालन न करने पर’ सिंगारवेलु की आलोचना की थी।13

कम्युनिज्म की ओर

गया सम्मेलन में ही उनकी भेंट श्रीपाद अमृत डांगे से हुई। मानवेंद्रनाथ राय से उनका संपर्क पहले से ही था। अबनीनाथ मुखर्जी, जो अपने साथियों में अबनि मुखर्जी के नाम से पहचाने जाते थे, सिंगारवेलु से मिलने दो बार मद्रास पहुंचे थे। इस तरह सिंगारवेलु कांग्रेस में रहकर भी अपनी स्वतंत्र राजनीति कर रहे थे। पेरियार की तरह वे भी कांग्रेसी नेताओं की कथनी और करनी के अंतर को समझते थे। जानते थे कि कांग्रेस कभी भी मजदूरों और किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए सरकार से सीधे टकराव का खतरा मोल नहीं लेगी। इसलिए मद्रास लौटते ही उन्होंने अपने विचारों को कार्यरूप देने के लिए काम शुरू कर दिया था। उसके फलस्वरूप ‘हिंदुस्तान लेबर किसान पार्टी’ का गठन हुआ। वह कम्युनिस्ट विचारधारा पर आधारित पहला संगठन था। ध्यातव्य है कि मानवेंद्रनाथ राय, अबानी मुखर्जी, इवेलिना राय आदि नेता मिलकर 17 अक्टूबर, 1920 को ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया’(ताशकंद पार्टी) के गठन की घोषणा कर चुके थे, परंतु 25 दिसंबर 1925 को विधिवत गठन से पहले उसका अस्तित्व केवल अनौपचारिक था।

सिंगारवेलु  के नेतृत्व में पहली बार, 1 मई 1923 को भारत में मई दिवस का आयोजन किया गया। उसी दिन ‘हिंदुस्तान लेबर किसान पार्टी’ तथा उसके गठन के उद्देश्यों के बारे में लोगों को बताया गया था। मई दिवस का आयोजन सिंगारवेलु ने मद्रास में दो स्थानों पर किया था। पहला उच्च न्यायालय के आगे समुद्र तट पर। दूसरा ट्रिप्लीकेंस तट पर। पहली बैठक की अध्यक्षता स्वयं सिंगारवेलु ने की थी। दूसरे कार्यक्रम की अध्यक्षता एस. कृष्णास्वामी सरमा ने। उस अवसर पर सिंगारवेलु ने कहा था कि मई दिवस का आयोजन स्वयं मजदूरों द्वारा किया गया है। उन्होंने उम्मीद जाहिर की थी कि देश में शीघ्र ही मजदूरों की सत्ता स्थापित होगी, जो लोगों के विकास को गति देगी। ‘मद्रास मेल’ नामक अखबार ने ‘लेबर किसान पार्टी’ द्वारा मई दिवस की आलोचना का जवाब देते हुए कहा था कि केवल वास्तविक मजदूर ही इस उत्सव को मना रहे थे, इसलिए चिंता की कोई बात नहीं है। उस अवसर पर लाल-क्रांति का प्रतीक ‘लाल-झंडा’ भी फहराया गया था। सार्वजनिक कार्यक्रम में लाल झंडा फहराने की वह घटना, न केवल भारत, अपितु एशिया में भी पहली घटना थी। उस अवसर पर 2 मई 1923 के ‘दि हिंदू’ में छपा था—

‘लेबर किसान पार्टी ने मद्रास में मई दिवस उत्सव आरंभ किया है। कामरेड सिंगारवेलु ने उस बैठक की अध्यक्षता की थी। प्रदर्शन कामयाब था। मीटिंग में मई दिवस को सार्वजनिक अवकाश घोषित करने की मांग भी की गई। पार्टी अध्यक्ष ने पार्टी के अहिंसक सिद्धांतों के बारे में लोगों को बताया था। उसमें लोगों से आर्थिक मदद की अपील भी की गई। इस बात पर जोर दिया गया था कि भारतीय मजदूरों को दुनिया-भर के मजदूरों के साथ एकजुट हो जाना चाहिए।’14

दिसंबर 1923 में उन्होंने ‘दि लेबर किसान गजट’ शीर्षक से पाक्षिक की शुरुआत की। इसके साथ-साथ तमिल भाषा में ‘तोझीलालान’(कामगार) शीर्षक से साप्ताहिक भी निकाला था। ‘कामगार’ के एक अंक का मूल्य ‘आधा आना’ था। अंग्रेजों की सिंगारवेलु पर नजर थी। उनकी दृष्टि में ‘हिंदुस्तान लेबर किसान पार्टी’, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से कहीं अधिक खतरनाक थी। 1924 में ‘कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र’ मामले में सिंगारवेलु को उनके घर पर नजरबंद कर लिया गया। उन दिनों उनकी उम्र 64 वर्ष थी। बाद में उन्हें जमानत मिल गई।

1925 में कानपुर में पहले कम्युनिस्ट सम्मेलन का आयोजन किया गया था। उसकी अध्यक्षता सिंगारवेलु ने की। उस बैठक में ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया’ के गठन को स्वीकृति मिली थी। अपने अध्यक्षीय भाषण में सिंगारवेलु ने छूआछूत की समस्या की चर्चा भी की थी। उनका दृष्टिकोण साम्यवादी दृष्टिकोण से मेल खाता था,

‘हमें साफ तौर पर समझ लेना चाहिए कि साम्यवाद की नजर में छूआछूत पूरी तरह आर्थिक समस्या है। अछूतों को मंदिर प्रवेश, सार्वजनिक तालाबों और मार्गों पर चलने का अधिकार प्राप्त है अथवा नहीं, इन प्रश्नों का ‘स्वराज’ के संघर्ष से कोई संबंध नहीं है….कम्युनिस्टों की न तो कोई जाति होती है, न धर्म। व्यक्ति का हिंदू, मुसलमान या ईसाई होना उसका निजी मामला है….जैसे ही उन(अस्पृश्यों) की आर्थिक पराश्रितता खत्म होगी, छूआछूत की समस्या भी अपने आप समाप्त हो जाएगी।’15

उन दिनों पेरियार राजनीति में, गैर-ब्राह्मण जातियों को समुचित प्रतिनिधित्व न दिए जाने के कारण कांग्रेस से नाराज चल रहे थे। उन्होंने ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की स्थापना की थी। सिंगारवेलु की ख्याति उन दिनों शिखर पर थी। उसी दौरान दोनों नेता एक-दूसरे के करीब आए। सिंगारवेलु ने ही पेरियार को कांग्रेस छोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया था। पेरियार के मनस् में साम्यवाद का बीजारोपण करने वाले भी वही थे। सिंगारवेलु की सलाह पर ही पेरियार ने सोवियत संघ की यात्रा पर गए थे। लौटने के बाद पेरियार ने सोवियत संघ के अनुभवों के आधार पर ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की कार्यनीति में बदलाव करने का निर्णय लिया। पेरियार के आग्रह पर सिंगारवेलु ने ‘इरोद कार्यक्रम’ का ड्राफ्ट तैयार किया। ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ का एक सम्मेलन 4 मार्च 1934 को मन्नारगुडी, तमिलनाडु में हुआ था। सिंगारवेलु ने उसकी अध्यक्षता की थी। अपने भाषण में सिंगारवेलु ने भारतीय समाज के आर्थिक वैषम्य पर चिंता व्यक्त की थी—

‘देश की 40 प्रतिशत जनता को भरपेट भोजन भी नहीं मिलता। मृत्यदर दूसरे देशों से कहीं ज्यादा है। यह 1000 में 30 है। 100 में से 30 बच्चे एक साल का होते-होते मर जाते हैं। भारत में औसत आयु मात्र 20 है, जबकि इंग्लेंड में 53 साल है….लोग घोर दारिद्रय में जीते हैं, बावजूद इसके मंदिरों की घंटियां टनटनाती रहती हैं। मस्जिदों में नमाज और चर्च में प्रार्थनाएं चलती रहती रहती हैं। लोग जिसे ईश्वर समझकर पूजते हैं, उसके बारे में वे कुछ नहीं जानते। ईश्वर महज मनुष्य की रचना है।’16

उस भाषण में सिंगारवेलु ने अपने पूर्वजों को भी नहीं छोड़ा था—

‘मेरे अपने पूर्वजों ने ब्राह्मणों को भोजन कराने के लिए 1 लाख रुपये अलग रख दिए थे। लेकिन जब उनकी बस्ती के मछुआरे बीमार पड़े, वे केवल देवता को पूजा-अर्चना, प्रार्थना और बलि तक सीमित रहे। मेरी जाति की तरह और भी जातियां हैं। वे भी धर्मादे के लिए रकम एक ओर रख देती हैं और मुष्किल समय में प्रार्थनाओं और बलि देकर मन को तसल्ली देती रहती हैं।’17

पेरियार के मन में सिंगारवेलु के प्रति गहरा सम्मान था। खासकर उनकी वैज्ञानिक सोच पर। पेरियार के आग्रह पर ही सिंगारवेलु ने ‘कुदी अरासु’ में लिखना शुरू किया था। मगर उन दोनों के साथ आने से न तो कांग्रेस खुश थी, न ही अंग्रेज सरकार। अंग्रेजों का मानना था कि यह सिंगारवेलु ने ही पेरियार को ‘बिगाड़ा’ है। ब्रिटिश सरकार नहीं चाहती थी कि देश में कम्युनिस्ट आंदोलन को बढ़ावा मिले। उसे देखते हुए सिंगारवेलु ने ‘मजदूर एवं किसान’ जैसे शब्दों को अपनाया। मगर अपनी उग्र कार्यषैली के कारण वे सरकार और विरोधियों की आंखों में हमेशा ही खटकते रहे।

मजदूर नेता के रूप में  

बकिंघम एंड कार्नेटिक मिल, मद्रास की सबसे बड़ी कपड़ा मिल थी। उसका महत्त्व इसलिए भी है क्योंकि भारत की पहली लेबर यूनियन18, ‘मद्रास लेबर यूनियन’ का गठन अप्रैल 1918 में वहीं के मजदूरों ने मिलकर किया था। ब्रिटिश अधिकारी यूनियन के गठन का विरोध कर रहे थे। घटना की नींव 1920 में पड़ी थी। ब्रिटिश अधिकारी रिवाल्वर लिए मजदूरों को धमकाता फिर रहा था। एक मजदूर ने उसकी रिवाल्वर छीनकर पुलिस को सौंप दी। इसपर पुलिस ने गोलीबारी शुरू कर दी। बाबूराव और मुरुगन नामक दो युवा मजदूर उस गोलीबारी में मारे गए। मद्रास में श्रम आंदोलन में मरने वाले ये दोनों पहले थे। घटना से नाराज 13000 मजदूर हड़ताल पर उतर आए। बाद में पुलिस और कामगारों के बीच कई भिड़ंत हुईं, जिनमें दर्जनों मजदूरों को प्राण गंवाने पड़े। सिंगारवेलु ने न केवल हड़ताल के नेतृत्व में हिस्सा लिया, बल्कि लगातार लेख लिखकर मजदूरों के उत्पीड़़न के विरुद्ध आवाज उठाते रहे।

उन्हीं दिनों उत्तरी मद्रास में मैसी कंपनी के कामगार भी हड़ताल पर चले गए। वी. चक्करई और ओदीकेसवेलु नायकर जैसे मजदूर नेताओं के साथ सिंगारवेलु एक बार फिर मजदूरों के समर्थन में उतर गए। अपने आग उगलते भाषणों से इन तीनों नेताओं ने सरकार को हिला दिया था। 1927-28 उत्तरी-पश्चिमी रेलवे, बंगाल-नागपुर रेलवे तथा ईस्ट इंडियन रेलवे के कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर हड़ताल पर चले गए। रेलवे कर्मचारियों को समर्थन देने, उनका हौसला बढ़ाने के लिए सिंगारवेलु ने भोपाल, हावड़ा और बंगाल की यात्राएं कीं। हावड़ा और बंगाल में 30,000 मजदूर-कामगार हड़ताल पर थे। सिंगारवेलु ने अपने साथियों के साथ हड़ताल में हिस्सा लिया था। उत्तरी भारत की यात्रा से लौटे ही थे कि दूसरी हड़ताल की सूचना मिली। 1928 में दक्षिण भारतीय रेलवे के मजदूरों ने भी हड़ताल का ऐलान कर दिया। मजदूर उनकी योग्यता के नए सिरे से छंटनी का विरोध कर रहे थे। छंटनी के लिए प्रबंधकों ने कर्मचारियों की योग्यता के नए मानदंड तैयार किए थे, जो मजदूरों को स्वीकार्य नहीं थे। दूसरे रेलवे ने मजदूरों को अलग-अलग ठिकानों पर भेजने का निर्णय लिया था। मजदूर इनका विरोध कर रहे थे। मांगे न मानने पर मजदूर 19 जुलाई 1928 से हड़ताल पर चले गए। उनके समर्थन में बाकी मजदूरों और कामगारों ने भी हड़ताल की घोषणा कर दी। परिणामस्वरूप 21 जुलाई से रेलवे का चक्का जाम हो गया। वह हड़ताल आखिरकार नाकाम सिद्ध हुई। सिंगारवेलु को दस वर्षों की सजा हुई। लेकिन बाद में अपील पर, उनकी बीमारी और उम्र को देखते हुए सजा की अवधि 18 महीने कर दी गई।

1927 में ही जब हड़ताली मजदूर चाको और विंसेंट पुलिस की गोली से मारे गए। मद्रास तक जब वह समाचार पहुंचा तो सिंगारवेलु ने बिना कोई पल गंवाए उनकी स्मृति में शोक सभा का आयोजन किया। जिसमें पुलिस के दमन की निंदा की गई। मजदूर और कामगारों की समस्याओं के समाधान को लेकर वे इतने समर्पित थे कि जब भी, जहां से भी बुलावा मिलता, तुरंत पहुंच जाते थे।

सिंगारवेलु का निधन 11 फरवरी 1946 को हुआ। जब तक जिये तब तक उन्हें मजदूरों के हितों की चिंता सताती रही। जीवन के आखिरी दिनों में जब बढ़ी उम्र के कारण सक्रियता घट गई तो उन्होंने पेरियार की पत्रिकाओं, ‘कुदी अरासु’, ‘रिवोल्ट’ तथा अंग्रेजी दैनिक हिंदू में लेख आदि लिखकर संघर्ष की लौ को जलाए रखा। उनकी आंखों में समानता पर आधारित, वर्गहीन समाज का सपना बसता था। इस कसौटी पर कांग्रेस की ‘स्वराज’ की अवधारणा भी उन्हें अधूरी दिखाई पड़ती थी। उनका गांधी के नाम लिखा गया एक पत्र 24 मई 1922 को ‘नवशक्ति’ में प्रकाशित हुआ था। पत्र में उन्होंने लिखा था कि कि प्रत्येक परिवार को उतनी जमीन मिलनी चाहिए, जिससे वह अपनी जरूरत के लायक अन्न उपजा सके। अपना घर होना चाहिए, ताकि किसी को भी किराया न चुकाना पड़े। इसके अलावा मुफ्त शिक्षा, स्वास्थ्य की व्यवस्था भी सरकार की ओर से करनी चाहिए। जिस स्वराज में यह गारंटी न हो, उसका कोई मूल्य नहीं है। असली स्वराज केवल जनता द्वारा, और केवल जनता के लिए आएगा। वे बेहद पढ़ाकू थे। उनका पुस्तकालय मद्रास के सबसे बड़े निजी पुस्तकालयों में से था।

ओमप्रकाश कश्यप

 संदर्भ

  1.  अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग,दि हिस्ट्री ऑफ़ मे डे, इंटरनेशनल पंपलेट, 14,799 ब्रोडवे न्यू यार्क, पृष्ठ 3
  2.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम- सिंगारवेलु : फर्स्ट कम्युनिस्ट इन साउथ इंडिया, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, पृष्ठ-1
  3.  पी.मनोहरन, जेनेसिस एंड ग्रोथ ऑफ़ कम्युनिस्ट पार्टी इन इंडिया, पृष्ठ 191।
  4.  पी. मनोहरन, पृष्ठ-189
  5.  पी. मनोहरन, पृष्ठ-190
  6.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम, पृष्ठ-1
  7.  पी.वसंतकुमारन, गॉडफादर ऑफ़ इंडियन लेबर, एम. सिंगारवेलु, पूर्णिमा प्रकाशन, चैन्नई।
  8.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम, पृष्ठ-2
  9.  वसंतकुमारन, पूर्णिमा प्रकाशन, चैन्नई।
  10.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम, पृष्ठ 164-165
  11.  उपर्युक्त 165
  12.  पी. मनोहरन, पृष्ठ 183
  13.  दि कलैक्टिड वर्क्स ऑफ़महात्मा गांधी, खंड-26, पृष्ठ 132-134।
  14.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम, पृष्ठ-169
  15. उपर्युक्त पृष्ठ 203
  16.  उपर्युक्त पृष्ठ 221-22
  17.   उपर्युक्त पृष्ठ 222
  18.  पी. मनोहरन, पृष्ठ-11

संस्कृति और सामाजिक न्याय

सामान्य

प्रत्येक समाज अपनी संस्कृति से पहचाना जाता है. उसका प्रमुख कार्य समाज में एकता की अनुभूति जगाना पैदा करना है. इसके लिए जरूरी है कि वह सामाजिक संबंधों, नागरिकों के सामान्य व्यवहारों, सार्वकालिक जीवनमूल्यों और भविष्य के सपनों से अनुप्रेत हो. प्रायः धर्म एवं संस्कृति को एक मान लिया जाता है. जबकि आस्था और विश्वास को अपनी पीठ पर ढोने वाला धर्म विराट संस्कृति का अंग तो हो सकता है, उसका पर्याय नहीं. किसी समाज द्वारा धर्म की केंचुल से बाहर आने की छटपटाहट विवेकीकरण के प्रति उसकी उत्सुकता को दर्शाती है. जहां तक भारतीय संस्कृति का प्रश्न है, अधिकांश विद्वान इसे ‘विविधता की संस्कृति’ मानते तथा ‘सनातन संस्कृति’ कहकर इसका महिमामंडन करते हैं. इनमें से एक भी धारणा मूल्यबोधक नहीं हैं. सांस्कृतिक वैविध्य तभी सार्थक है जब वह मानवीय चेतना का स्वयंस्फूर्त विस्तार हो. साथ ही लोकतांत्रिक सोच को बढ़ावा देता हो. प्राचीनता कालसापेक्ष स्थिति है. वह केवल घटनाविशेष की ऐतिहासिकता को दर्शाती है. संस्कृति का असल बड़प्पन इसमें है कि अपने अनुयायियों के बीच न्याय, समानता और समरसता के वितरण को लेकर वह कितनी उदार है! कितने प्रयास उसने अपने अंतर्विरोधों के समाहार हेतु किए हैं. और इन सब के लिए वह लोकतंत्र के कितने करीब है. इस कसौटी पर भारतीय संस्कृति उतनी सफल सिद्ध नहीं होती, जितनी बताई जाती है.

सच तो यह है कि स्मृतिग्रंथों, पुराणों, महाकाव्यों आदि के माध्यम से जो संस्कृति हमारे जीवन में दाखिल होती हैय या एक अल्पसंख्यक अभिजन वर्ग द्वारा बहुसख्यक जनसमुदाय पर बरबस थोप दी जाती है, वह सामाजिक न्याय की अवरोधक तथा सामूहिक विवेक का क्षरण करने वाली है. सामान्य नैतिकता एवं लोकादर्शों को अमल में लाने के बजाय वह धर्म के हाथों में खेलती है; और खुद को बड़ी आसानी से उसकी सामंती वृत्तियों के अनुसार ढाल लेती है. वह लोगों से अपेक्षा रखती है कि वे क्या करें, क्या खाएं, क्या पियें, क्या पढ़ेलिखें, और किन लोगों से कैसे संबध बनाएं? न तो उसे मानवीय विवेक की परवाह रहती है, न उसकी रुचियों का परिष्कार. बावजूद इसके जीवन में अनावश्यक दखल देकर, वह समानता और स्वतंत्रता की भावना का हनन करती है. कभी धर्म, कभी समाज और कभी परंपरावैविध्य के बहाने, असमानता को मानवीय नियति घोषित करना उसकी मूल प्रवृत्ति रही है. वह असल में शासक संस्कृति है, जो व्यक्ति को जन्म के साथ ही बता देती कि उसका जन्म शासन करने के वास्ते हुआ है या शासित होने के लिए. जो लोग शासक वर्ग में जन्म लेते हैं, अभिजनोन्मुखी संस्कृति का रेशारेशा उनकी मदद में जुटा होता है. शासितों की कोटि में जन्मे व्यक्ति, यदि दुर्दशा से उबरना चाहें या इस तरह का सपना भी देखें तो वह लगातार अवरोध उत्पन्न कर, परिवर्तन की चाहत को ही मिटाने पर तुल जाती है. लोगों के सवाल करने की आदत को छुड़ाकर वह उनके निर्मानवीकरण को गति देती है. इससे सामूहिकताबोध, जो संस्कृति का प्रमुख उद्देश्य है, का हृास होता है. सांप्रदायिकता पनपती है; और जनशक्ति छोटेछोटे टुकड़ों में बंटकर निष्प्रभावी हो जाती है. इससे परिवर्तन का लक्ष्य निरंतर दूर खिसकता रहता है.

हम भारतीयों, विशेषकर जो लोग स्वयं को हिंदू मानते हैं, का जीवन जन्म से लेकर मृत्यु तक तरहतरह के कर्मकांडों से बंधा होता है. वे अनेक प्रकार के हो सकते हैं. एक समाज से दूसरे समाज, यहां तक कि एक जाति समूह से दूसरे जातिसमूह के बीच उनका रूप बदलता रहता है. कर्मकांडों का उद्देश्य होता है, किसी महाशक्ति को प्रसन्न करना. उनमें एक पक्ष दाता(जाहिर है काल्पनिक), दूसरा याचक की भूमिका में होता है. याचक अपने श्रेष्ठतम को समर्पित करने की भावना के साथ दाता के आगे नतशिर होता है. तत्क्षण खुद को दाता का प्रतिनिधि घोषित करते हुए पुरोहित बीच में आ टपकता है. याचक द्वारा दाता के नाम पर समर्पित सामग्री के अलावा वह दक्षिणा की भी दावेदारी करता है. कर्मकांडों को लोक की सामान्य स्वीकृति प्राप्त होने के कारण उनसे पैदा स्तरीकरण समाज में गहरी पैठ बना लेता है. तदनुसार जो दाता या उसके स्वयंघोषित प्रतिनिधि की इच्छा है, उसे उसी रूप में, बगैर किसी नानुकर के, स्वीकार कर लेना याचक की विवशता होती है. इसका लाभ शिखर पर बैठे लोग उठाते हैं. राज्य की कुल उत्पादकता में नगण्य योगदान के बावजूद वे किसी न किसी बहाने लाभ के नब्बे प्रतिशत को हड़पे रहते हैं. उसी के दम पर वे दाता की भूमिका निभाए जाते हैं. उनके नेतृत्व में पूरी संस्कृति कर्मकांडों में सिमटकर रह जाती है.

कर्मकांडों की व्याख्या जिन ग्रंथों में है, सब ब्राह्मणों द्वारा रचे गए हैं. उनकी समीक्षा अथवा संशोधनविस्तार का अधिकार ब्राह्मणेत्तर वर्गों को नहीं है. उनसे बस इतनी अपेक्षा होती है कि ब्राह्मणों द्वारा गढ़े गए लिखितअलिखित विधान का बगैर नानुकुर अनुसरण करें. उनपर किसी भी प्रकार का संदेह, आलोचना, समीक्षा पाप की कोटि में आती है. सांस्कृतिकसामाजिक असमानता का पोषण करने वाली इस संस्कृति के प्रति विरोध के स्वर आरंभ से ही उठते रहे हैं. उनके दस्तावेजीकरण का काम हमें अपेक्षाकृत उदार एवं समावेशी संस्कृति के करीब ला सकता है. उसे हम जनसंस्कृति अथवा मूल भारतवंशियों की संस्कृति भी कह सकते हंै.

सत्य यह भी है कि कोई भी संस्कृति स्वयं लक्ष्य नहीं होती. वह केवल मार्ग चुनने में मदद करती है. उसका काम मानवीय वृत्तियों को सुसंस्कृत करना है, किसी व्यक्ति या व्यक्तियों की रोजमर्रा की आदतों पर नियंत्रण करना नहीं. विडंबना है कि भारतीय संस्कृति की अधिकांश ऊर्जा नकारात्मक कार्यों में खपती आई है. वह बड़ी आसानी से उन लोगों के हाथों में खेलने लगती है, जिनका काम दूसरों के मूलभूत अधिकारों का हनन करना है. शिखरस्थ ब्राह्मण उसके विधान का निर्माता, व्याख्याता, पालकअनुपालक सब होता है. विशेष मामलों में, या यूं कहिए कि अपवादस्वरूप संस्कृति के विशिष्ट प्रवत्र्तकों को, जन्मना ब्राह्मण न हों तो भी उन्हें कर्मणा ब्राह्मण मान लिया जाता है. व्यास, वाल्मीकि, महीदास आदि शास्त्रीय परंपरा के ब्राह्मण नहीं हैं. फिर भी उन्हें ब्राह्मण माना गया है. क्योंकि वे उस संस्कृति के सिद्ध संहिताकार हैं, जो वर्णव्यवस्था को आदर्श तथा ब्राह्मणों को समाज का सर्वेसर्वा मानकर उन्हें अंतहीन अधिकार सौंप देती है. कुछ लोग इसे भारतीय संस्कृति की उदारता या उसका लचीलापन मानते हैं. असल में यह दूसरे वर्गों के बुद्धिजीवी, उनकी उपलब्धियों का श्रेय हड़प लेने की स्वार्थपूर्ण व्यवस्था है. इससे निम्न वर्गों की उच्च स्तरीय मेधा, उच्चस्थ वर्गों की स्वार्थसिद्धि में लगी रहती है.

इस प्रवृत्ति के दर्शन ऋग्वेद से लेकर आधुनिक साहित्य तक मौजूद हैं. गुरु उद्दालक के पास सत्यकाम जाबाल जब यह कहता है कि वह घरों में काम करने वाली दासी के गर्भ से जन्मा है और पिता का नाम पता नहीं है, तो महर्षि उसे यह कहकर कि ‘तूने सत्य कहा, ऐसा सत्यभाषी ब्राह्मण पुत्र ही हो सकता है.’-दीक्षा देने को तैयार हो जाते हैं. भारतीय संस्कृति के अध्येता इस उद्धरण को उसके उदात्त लक्षण के रूप में प्रस्तुत करते आए हैं. वस्तुतः यह बौद्धिक धूर्तता है, जिससे ब्राह्मणेत्तर वर्गों को एक ही झटके में ‘मिथ्याभाषी’ घोषित दिया जाता है. सत्यकाम जाबालि की भांति महीदास भी दासी पुत्र था. जन्म से शूद्र किंतु मनबुद्धि से ब्राह्मण संस्कृति का प्रतिभाशाली संहिताकार. ऋग्वेद शाखा के ‘ऐतरेय ब्राह्मण’, ‘ऐतरेय उपनिषद’ और ‘ऐतरेय आरण्यक’ का रचियता. इस संस्कृति ने महीदास को भी शूद्रों से झटक लिया. अपवादस्वरूप ही सही, ब्राह्मणेत्तर वर्ग के कुछ अतिप्रतिभाशाली बुद्धिजीवियों को अनुलोम परंपरा के अनुसार ब्राह्मण मान लिए जाने की नीति, प्रतिभाहीन ब्राह्मण पुत्रों के लिए शिखर का स्थान सुरक्षित रखती है. स्तर से ऊपर उठने के लिए ब्राह्मणेत्तर वर्ग के बुद्धिजीवियों को जहां विरलतम प्रतिभा, सर्जनात्मक मेधा एवं विभेदकारी ब्राह्मणसंस्कृति के प्रति अटूट निष्ठा का प्रदर्शन करना पड़ता है, वहीं ब्राह्मणसंतति को उसका स्वाभाविक उत्तराधिकारी मान लिया जाता है. प्रमुख प्रतिभाओं के पलायन के बाद निचले वर्ग आवश्यक बौद्धिक नेतृत्व से वंचित रह जाते हैं. दूसरे षब्दों में भारतीय संस्कृति, उसके नामित देवता, कर्मकांड, धर्मदर्शन आदि केवल ब्राह्मणों का सृजन नहीं हंै. उसमें ब्राह्मणेत्तर वर्गों का भी भरपूर योगदान रहा है. हालांकि लाभ सर्वाधिक ब्राह्मणों ने उठाया है.

ब्राह्मण संस्कृति के व्याख्याकारों की प्रशंसा करनी होगी कि वर्गीय श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए उन्होंने अपनी रचना का श्रेय स्वयं लेने के बजाय वर्गीय श्रेय को प्राथमिकता दी. ब्राह्मण होने के नाते व्यक्तिगत श्रेयसम्मान तो उन्हें आसानी से मिल ही जाता है. व्यास, याज्ञवल्क्य, वशिष्ट आदि किसी मनीषी के नहीं, गौत्र या परंपरा के नाम हैं. उनका उल्लेख स्मृतिग्रंथों से लेकर रामायण, महाभारत, पुराण यहां तक कि उत्तरवर्ती ग्रंथों में भी, मुख्य सिद्धांतकार के रूप में होता आया है. व्यक्तिगत श्रेय के आगे वर्गीय श्रेय को वरीयता दिए जाने का अच्छा उदाहरण ‘योग वशिष्ट’ है. लगभग एक हजार वर्ष पुराने, 29000 से अधिक पदों वाले तथा शताब्दियों के अंतराल में अनाम लेखकों द्वारा रचित, परिवर्धित इस विशद् ग्रंथ का रचनाकार होने का श्रेय आदि कवि वाल्मीकि को प्राप्त है, जबकि वाल्मीकि का नाम लगभग दो हजार वर्ष पुरानी कृति ‘पुलत्स्य वध’ जो निरंतर प्रक्षेपण के उपरांत ‘रामायण’ महाकाव्य के रूप में ख्यात हुआसे भी जुड़ा है. ज्ञान को परंपरा में ढाल देने का लाभ तो केवल ब्राह्मणों को जबकि नुकसान पूरे बहुजन समाज को उठाना पड़ा है. वर्णव्यवस्था के चलते पोंगा पंडितों को भी बौद्धिक नेतृत्व का अवसर मिलता रहा. पीढ़ीदरपीढ़ी एक ही धारा के लेखन से मौलिकता का हृास हुआ. चूंकि धर्मग्रंथों में प्रक्षेपण अलगअलग समय में हुआ था, इसलिए उनमें परस्पर विरोधी बातें भी शामिल होती गईं. जिस महाभारत(शांतिपर्व) कहा गया था, ‘वर्णविभाजन जैसी कोई चीज असलियत में नहीं है. यह पूरी सृष्टि ब्रह्म है, क्योंकि इसे ब्रह्मा ने बनाया है.’ उसी में द्रोणाचार्य द्वारा एकलव्य का अंगूठा मांग लेने के धत्तकर्म को भी ‘धर्म’ मान लिया गया.

उधर व्यवस्था से अनुकूलित गरीबविपन्न लोग निरंतर यह आस बांधे रहे कि जो पंडित लोग चैंसठ लाख योनियों का हिसाब रखते हैं, आदमी के ‘भाग्य’ का अगलापिछला सब बांच लेने का दावा करते हैं, वे उनका भी ‘हिसाब’ रखेंगे! यदि परमात्मा छोटेबड़े, गरीबअमीर, ब्राह्मण और शूद्र में भेद नहीं रखता तो वे भी नहीं रखेंगे. इस भरोसे के साथ वे अपने अधिकारों की ओर से, इतिहास की ओर से मुंह फेरे रहे. समय के दस्तावेजीकरण के प्रति निचले वर्गों की उदासीनता का लाभ ऊपर वालों ने खूब उठाया. उन्होंने कर्मफल का सिद्धांत पेश किया. उसके जरिये शोषित वर्गों को समझाया जाने लगा कि उनकी दुर्दशा के लिए कोई दूसरा नहीं, वे स्वयं जिम्मेदार हैं. संस्कृति के आवरण में उन्होंने पहले अवसर छीने, फिर मानसम्मान. अपने से नीचे के लोगों को बर्बर, असभ्य, गंवार, गलीच घोषित करके खुद इतिहास में तोड़मरोड़ करते रहे. उनके द्वारा रचे गए इतिहास में ‘भेड़ों’ और ‘मेमनों’ को जंगल में अव्यवस्था का दोषी बताया जाता रहा तथा ‘भेड़ियों’ और ‘लक्कड़बघ्घों’ को प्रत्येक अपराध से बरी रहने की व्यवस्था की गई. पंडित, देवता, करुणानिधान, अन्नदाता, रक्षक, सेठ, साहूकार जैसे सुशोभन विशेषण उन्होंने अपने लिए सुरक्षित कर लिए. पिछले दो हजार साल का सांस्कृतिक खेल उनकी चालों और समझौतापरस्ती से बना है. ऐसी संस्कृति में जनसाधारण के लिए न्याय की उम्मीद करना खुद को धोखा देना है.

सांस्कृतिक वर्चस्व’ बनाए रखने की कोशिश के समानांतर उससे उबरने की छटपटाहट भी मानवइतिहास का हिस्सा रही है. भारत में उसका पहला उदाहरण मक्खलि गोशाल के चिंतनकर्म में दिखाई पड़ता है. वह पहला विद्वान था जिसने श्रमशोषक, परजीवी ब्राह्मण संस्कृति के बरक्स समाज में मेहनतकशों, शिल्पकारों तथा उसके श्रमकौशल के सहारे आजीविका जुटाने वाले लोगों को संगठित कर आजीवक संप्रदाय की स्थापना की थी. मक्खलि की लोकप्रियता का अनुमान इससे भी लगाया जाता है कि उसके जीवनकाल में आजीवक संप्रदाय के अनुयायियों की संख्या बौद्ध अनुयायियों से अधिक थी. विद्वता के मामले में भी वह अद्वितीय था. सम्राट प्रसेनजित ने बुद्ध से कहा था कि वह गोशाल को उन(बुद्ध)से अधिक प्रतिभाशाली मानते हैं. बुद्ध की हिंसा तथा कर्मकांड विरोधी भौतिकवादी विचारधारा पर आजीवक संप्रदाय का ही प्रभाव था. मक्खलि तथा बुद्ध के अलावा निगंठ नागपुत्त, संजय वेठलिपुत्त, पूर्ण कस्सप, अजित केशकंबलि, कौत्स आदि विद्वान भी यज्ञों में दी जाने वाली बलि तथा कर्मकांड का विरोध कर रहे थे. निगंठ नागपुत्त आगे चलकर महावीर स्वामी के नाम से जैन दर्शन के प्रवर्त्तक माने गए. इनमें सर्वाधिक ख्याति मध्यमार्गी गौतम बुद्ध को मिली, जो उस समय की चर्चित दार्शनिक समस्याओं ‘आत्मा’, ‘परमात्मा’ आदि पर विमर्श करने के बजाय उन्हें टालने के पक्ष में थे. क्षत्रिय कुल में जन्म लेने के कारण बुद्ध और उनके विचारों को उन राजदरबारों में आसानी से प्रवेश मिलता गया, जो ब्राह्मण पुरोहितों के बढ़ते दबाव से तंग आ चुके थे. ‘आजीवक’ और ‘लोकायत’ धारा का प्रतिनिधि साहित्य आज अप्राप्य है. उनका छिटपुट उल्लेख ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन ग्रंथों में ही प्राप्त होता है. सभी में उनकी पड़ताल नकारात्मक दृष्टिकोण के साथ की गई है. संकेत साफ हैं कि विजेता संस्कृतियों ने, पराजित संस्कृति के ग्रंथों को मिटाने का काम पूर्णतः योजनाबद्ध ढंग से किया.

धर्म और संस्कृति का आधार कहे जाने वाले ग्रंथों में, लंबे प्रक्षेपण के बावजूद ऐसे अनेक तत्व हैं, जो वैकल्पिक जनसंस्कृति के प्रवत्र्तक और संवाहक रहे हैं. महिषासुर, बालि, पौराणिक सम्राट वेन के अलावा गणेश, शिव जैसे अनेक नाम मिथक भी हो सकते हैं और यथार्थ भी. लेकिन यदि इन्हें मिथक मान लिया जाए तो ब्राह्मण संस्कृति के प्रमुख संवाहक ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र, हनुमान तथा अन्य देवीदेवताओं को भी मिथक मानना पड़ेगा. क्योंकि उसका पूरा का पूरा भवन इन्हीं के कंधों पर टिका है. शिव भारत की आदिम जातियों के मुखिया रहे होंगे. उनके सहयोगी के रूप में भूत, पिशाच, प्रेत आदि हमें भारत के आदिम कबीलों की याद दिलाते हैं. आर्यों ने शिव को तो अपनाया. मगर उनके सहयोगी कबीलों की पूरी तरह उपेक्षा की. अप्रत्यक्ष रूप से बख्शा शिव को भी नहीं गया. उन्हें आक, धतूरा खाने और भभूत लगाकर रमने वाले अवधूत की तरह दर्शाते हुए सृष्टि चलाने(शासन करने) का अधिकार ‘ब्राह्मण ब्रह्मा’ तथा ‘क्षत्रिय विष्णु’ की बपौती मान लिया गया. गणेश का मिथक भी प्राचीन भारतीय गणतंत्रों के मुखिया की याद दिलाता है. गणतांत्रिक व्यवस्थाओं में मुखिया को प्रथम सम्मानेय माना जाता था. कालांतर में बड़े राज्यों का गठन होने लगा तो सभा का नेतृत्व करने वाले गणप्रमुख के चरित्र का भी विरूपण किया जाने लगा. बैठेबैठे सूंड लटक आना और लंबोदर जैसे प्रतीक गणप्रमुख पर कटाक्ष तथा उसे अपमानित करने के लिए रचे गए.

सामाजिक न्याय’ का सपना देखने वाले बुद्धिजीवियों की असली लड़ाई धार्मिक वर्चस्ववाद, विपन्नता और जड़ हो चुकी वर्णव्यवस्था से है. इस लक्ष्य की सिद्धि वर्चस्वकारी संस्कृति से मुक्ति के बिना असंभव है. ब्राह्मण संस्कृति ईश्वरीय न्याय में विश्वास करती है. न्याय का स्वरूप क्या हो? वंचित तबकों की उन्नति में वह किस भांति सहायक हो सकता हैयह नहीं बताती. ‘सामाजिक न्याय’ के पैरोकारों का प्रथम लक्ष्य ऐसी संस्कृति का पुनरुद्धार करना है, जिसमें संगठित धर्म का हस्तक्षेप न्यूनतम हो. जो पूरी तरह उदार एवं लोकतांत्रिक हो. इसके लिए आवश्यक है कि प्राचीन संस्कृति के उन प्रतीकों को रेखांकित किया जाए जो कभी ब्राह्मण संस्कृति के विरोध में या उसके समानांतर खड़े थे. क्या यह धर्म के भीतर एक और धर्म की खोज सिद्ध नहीं होगी? यह आशंका पूर्णतः निर्मूल नहीं है. ध्यान यह रखना होगा कि समानांतर संस्कृति के इन प्रतीकों, नायकों, मिथकों का योगदान दमितशोषित वर्गों के आत्मविश्वास को लौटाने तक सीमित हो. यह एहसास दिलाने के लिए हो कि वे हमेशा से ही ‘ऐसे’ नहीं थे. वे न केवल ‘वैसे’ बल्कि कई मायनों में उनसे भी बढ़कर थेरावण की लंका में विभीषण को अपनी आस्था और विश्वास के साथ ससम्मान जीने की स्वतंत्रता प्राप्त थी. रामराज्य में शंबूक से यह स्वतंत्रता छीन ली जाती है. इसी तरह राक्षससम्राट जलंधर अपनी विष्णुभक्त पत्नी वृंदा के साथ सुखी जीवन जीता है और उनके दांपत्य के बीच अविश्वास की किरच तक मौजूद नहीं है, जबकि सीता को रावण की अशोकवाटिका में रहने के लिए भी अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ता है. यह गरीबी तथा जातिभेद द्वारा पैदा की गई अन्यान्य विषमताओं के विरुद्ध जंग भी है. सदियों से जाति के आधार पर सुखसुविधा और सम्मान भोगते आए समूह, परिवर्तनकामी समूहों पर जातिभेद को बढ़ावा देने का आरोप लगा रहे हैं. दूसरी ओर जातीय उत्पीड़न का शिकार रहे वर्गों को लगता है कि लोकतांत्रिक माहौल का लाभ उठाकर वे अपने संघर्ष को आगे बढ़ा सकते हैं. इसलिए वे जाति को संगठनकारी ‘टूल’ की तरह इस्तेमाल कर रहे है. लेकिन जातिआधारित संगठनों की अपनी परेशानियां हैं. इस देश में हजारों जातियां हैं. अपनें दम पर कोई भी जाति परिवर्तनकारी ताकत बनने में अक्षम है. अतः लोग समझने लगे हैं कि सामाजिक न्याय के संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए समानांतर लड़ाई संस्कृति के मोर्चे पर भी लड़नी होगी. जीत उन्हीं की होगी जो संगठित रहने के साथसाथ सामूहिक विवेक से काम लेंगे.

ओमप्रकाश कश्यप

नुपी लेन : मणिपुर के महिला-संघर्ष की अनूठी दास्तान

सामान्य

आज की राज बीत चुकी है

एक दिन और गुजर गया

स्त्रियो! अपने बाल बांध लो

वे अराजक होकर उड़ रहे हैं

क्या तुम भूल गईं….

एक 12 दिसंबर गुजर चुका है

दूसरा 12 दिसंबर आने को है

भूल जाओ कि बालों को बांधना जरूरी है

भूल जाओ कि यह दिन दुबारा लौटकर आएगा

स्त्रियो! अपने बाल बांध लो….

—हाजिम इराबोट, मणिपुरी जननेता और लोककवि

भारत विविध संस्कृतियों और मान्यताओं वाला विशाल देश है।  अपने आप में लंबा इतिहास समेटे हुए।  मगर जब भी देश के इतिहास और संस्कृति की बात होती है, आमतौर पर सारा विमर्श उत्तर, उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत तक सिमटकर रह जाता है।  ज्यादा से ज्यादा सुदूर दक्षिण को शामिल कर लिया जाता है। पूर्वोत्तर के प्रदेशों जो भारतीय भू-भाग के वैसे ही हिस्से हैं, जैसे बाकी प्रदेश—के योगदान को आमतौर पर बिसरा दिया जाता है।  इसका एक कारण तो उनकी विशिष्ट जनजातीय संस्कृति है।  हम प्रायः मान लेते हैं कि जनजातीय प्रभाव के कारण पूर्वोत्तर के समाज आधुनिकताबोध से कटे हुए हैं।  जबकि सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक हलचलों से यह क्षेत्र वैसा ही प्रभावित रहा है, जैसा बाकी देश।  कुछ मामलों में तो यह दूसरों से विशिष्ट है।  जैसे 1904 और 1939 में मणिपुर में हुए दो ‘नुपी-लेन’(महिला-युद्ध) की मिसाल पूरे देश में अन्यत्र नहीं मिलती।  वे महिलाओं द्वारा अपने बल पर चलाए गए एकदम कामयाब जनांदोलन थे, जिन्होंने औपनिवेशिक भारतीय सरकार के संरक्षण में पल रही भ्रष्ट  राजसत्ता को झुकने के लिए विवश कर दिया था।  उनके फलस्वरूप सामाजिक सुधारों का सिलसिला आरंभ हुआ।  संवैधानिक सुधारों की राह प्रशस्त हुई।

मणिपुर विरल जनसंख्या वाला प्रांत है।  लगभग 22300 वर्ग किलोमीटर में फैले इस प्रांत की जनसंख्या करीब तीस लाख है।  प्रदेश का 91 प्रतिशत हिस्सा पहाड़ी क्षेत्र है। पर जो बात उसे खास बनाती है, वह है—समाजार्थिक-सांस्कृतिक जीवन में महिलाओं की पुरुषों के मुकाबले ज्यादा भागीदारी।  इस दृष्टि से वह देश का इकलौता प्रांत है।  मणिपुर का इतिहास 2000 वर्ष पहले, 33वें ईस्वी सन से आरंभ होता है, जब वहां मैतेई प्रजाति के नोंग्दा लैरन पाखनग्बा ने शासन संभाला।  मैतेई प्रजाति के कारण ही उस क्षेत्र का नाम मणिपुर हुआ।  इस बीच वहां अनेक सामंती समूह पनपे। परंतु शासन-प्रशासन में मैतेई लोगों की प्रधान भूमिका बनी रही।  15वीं-16वीं शताब्दी के बीच मणिपुर में ब्राह्मणों ने प्रवेश किया। देखते ही देखते वे राजसत्ता के करीबी और उसके सबसे बड़े लाभार्थी बन गए।  पूजा-पाठ और कर्मकांडों के माध्यम से उन्होंने वहां के जनजीवन पर कब्जा कर लिया।  सामाजिक सरंचना में सबसे ऊपर मैतेई थे, दूसरे स्थान पर ब्राह्मण, तीसरा वर्ग आम प्रजा, मेहनतकश लोगों का था।  जिनकी अहमियत वहां दासों के समान थी।  उन्हें बाकी दोनों वर्गों की गुलामी करनी पड़ती थी।

मणिपुर की स्वतंत्रता को झटका 1819 में उस समय लगा, जब वहां बर्मा का आक्रमण हुआ।  स्वतंत्रता प्रेमी मणिपुर वासी अगले 7 वर्षों तक हमलावरों से लगातार जूझते रहे।  उन्होंने अपनी स्वतंत्रता की रक्षा तो कर ली, परंतु प्रदेश का लैंगिक अनुपात गड़बड़ा गया।  युद्ध में भारी संख्या में पुरुष हताहत हुए थे।  इसलिए गृहस्थी चलाने की जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर आ गई।  स्त्रियां कढ़ाई, बुनाई जैसे हस्तशिल्पों में जुट गईं।  हाट-बाजार में सामान ले जाकर बेचने लगीं।  महिलाओं की सक्रियता के फलस्वरूप ‘इमा’ जैसे बाजार बने।  अपने आप में अद्वितीय।  ऐसे बाजार जिन्हें केवल महिलाएं चलाती हैं।  मणिपुर के हस्तशिल्प ने अंग्रेज व्यापारियों को आकर्षित किया था।  मारवाड़ी भी वहां पहुंचे।  अंग्रेज व्यापारियों के साथ मिलकर वे स्थानीय बाजार पर छा गए।

1891 में मणिपुर अंग्रेजों के अधिकार में आ गया।  राजा से सेना और हथियार रखने के अधिकार छीन लिए गए।  अंग्रेजों की ओर से राजनीतिक प्रतिनिधि, जिसे राज्याध्यक्ष का दर्जा प्राप्त था, शासनकार्य संभालने लगा।  अंग्रेज राजा को शक्तिविहीन-श्रीविहीन कर चुके थे, परंतु मणिपुर के नागरिकों की स्वातंत्र्य-चेतना मरी नहीं थी।  इस कारण वहां अंग्रेज प्रशासकों को अनेक प्रतिरोध का सामना करना पड़ता था।  स्थानीय नागरिकों का प्रतिरोध भिन्न-भिन्न रूपों में सामने आता था।  जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में महिलाओं का वर्चस्व हो तो प्रतिरोध के मामले में वे भला कैसे पीछे रह सकती थीं।  पहले नुपी लेन(Nupi-Lan) को वहां ‘महिला-युद्ध’ के रूप में देखा जाता है।  लेकिन उसके मूल में दास प्रथा और नाकारा शासन-व्यवस्था थी।  धर्मसत्ता और राजसत्ता ने मिलकर तरह-तरह के टैक्स जनता पर थोपे हुए थे।  कर-वसूली के लिए अमानवीय बल-प्रयोग आम बात थी।  उनसे वहां का सामान्य जनजीवन त्रस्त था।

पहले महिला-विद्रोह(नुपी लेन) की कहानी 15 मार्च 1904 से आरंभ हुई।  कुछ विद्रोहियों ने औपनिवेशिक सरकार के राजनीतिक प्रतिनिधि तथा सुपरिटेंडेंट जे.  जे.  डनलप के बंगले को आग लगा दी।  उस घटना के बारे में जांच-पड़ताल चल ही रही थी कि छह महीनों के भीतर 4 अगस्त को डनलप और सहायक राजनीतिक प्रतिनिधि एवं राज्याध्यक्ष आई। आर.  नटाल के बंगले दुबारा आग के हवाले कर दिए गए। उससे पहले 6 जुलाई 1904 को विद्रोहियों ने राजधानी इंफाल के सबसे बड़े व्यापारिक स्थल, ख्वारमबंद बाजार में भी आग लगा दी थी। विद्रोहियों के सुराग के लिए अंग्रेज शासकों ने काफी जतन किए। आगजनी को षड्यंत्र मानते हुए डनलप ने सुराग देने के वाले को 500 रुपये का ईनाम भी घोषित किया। लेकिन कोई भी आगे नहीं आया। तिलमिलाए डनलप ने वर्षों पहले समाप्त कर दी गई बेगार पृथा लालअप(Lalup) को इंफाल में दुबारा शुरू करने का ऐलान कर दिया। पाखनग्बा राजाओं के शासनकाल में आरंभ हुई ‘लालअप’ पृथा असल में कराधान प्रणाली थी।  जिसमें जनता को प्रत्येक 40 दिनों में से 10 दिन बेगार ली जाती थी।  इस तरह स्थानीय जनता से उसके 25 प्रतिशत श्रम-दिवस कराधान के बहाने झटक लिए जाते थे। डनलप ने घोषणा की थी कि क्षतिग्रस्त भवनों का पुनर्निर्माण के लिए स्थानीय जनता को बेगार करनी होगी।

 

मनुष्य प्रकृति से आजाद होता है। जब भी उसे अपनी स्वाधीनता पर खतरा दिखाई देता है, विद्रोह की स्वाभाविक चेतना उसके भीतर उमगने लगती है। चूंकि मनुष्य का व्यवहार उसके विवेक के साथ-साथ परिस्थितियों भी प्रभावित होता है। इससे संभव है, उसकी कोई तात्कालिक प्रतिक्रिया न हो। कई बार तात्कालिक प्रतिक्रिया न होना भी अच्छा होता है। विशेषकर सामाजिक परिवर्तन की दृष्टि से।  स्थायी परिवर्तन के लिए वही बदलाव कामयाब होते हैं, जो लंबे समय तक सुलगती सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना का परिणाम हों।  क्योंकि इस बीच उत्पीड़ित जन, उत्पीड़क सत्ता के मनोविज्ञान को पहचानकर उसका सामना करने की रणनीति तैयार कर लेते हैं।  भारतीय स्वाधीनता संग्राम ऐसे ही सत्ता विरोध का परिणाम था। जबकि 1857 का प्रथम स्वाधीनता संग्राम सैनिकों के तात्कालिक आक्रोश की परिणति होने के कारण अपेक्षित सफलता प्राप्त न कर सका था।  दक्षिण में पेरियार द्वारा शुरू किए गए ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की सफलता के मूल में भी लोगों के मन में वर्ण-व्यवस्था के प्रति शताब्दियों पुराने आक्रोश की भूमिका थी।  लंबे समय की परतंत्रता के कारण मनुष्य की स्वातंत्र्य-चेतना कमजोर पड़ सकती है। कई बार वह परिस्थितियों से समझौता कर लेता है।  परिणामस्वरूप पराधीनता उसे समाज और संस्कृति का सहज-स्वाभाविक हिस्सा लगने लगती है। ऐसे में यदि कोई उसे स्वतंत्रता का बोध करा दे, अथवा उसे पराधीनता के कारणों का पता चल जाए तो वह दुबारा दासता के लिए आसानी से तैयार नहीं होता।

डनलप के ऐलान के साथ के साथ ही लोगों को ‘लालअप’ पृथा की वापसी का डर सताने लगा था। जनमानस में बढ़ता आक्रोश देख पंचायत और स्थानीय मुखियाओं के एक दल ने डनलप से भेंट कर फैसला वापस लेने की अपील की। डनलप का कहना था कि स्थानीय पुलिस और चौकीदार अपनी जिम्मेदारी निभाने में नाकाम रहे हैं। उसने धमकी दी कि आदेश के विरोध को ‘राजद्रोह’ माना जाएगा।  भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए पुलिस चौकियां बनाई जाएंगी। उनका खर्च भी स्थानीय जनता से वसूला जाएगा।  इन सूचनाओं ने आग में घी डालने का काम किया।

5 अक्टूबर की सुबह को महिलाएं निकल पड़ीं। लगभग 3000 निहत्थी महिलाओं ने डनलप के आवास को घेर लिया।  वे लालअप के आदेश को वापस लेने की मांग पर अड़ी थीं।  आंदोलनकारियों के बढ़ते दबाव को देखते हुए डलनप को आदेश पर पुनर्विचार करने का निर्णय लेना पड़ा। स्थानीय अधिकारियों के आश्वासन पर महिलाएं वापस लौट आईं। मगर उसी दिन शाम को ख्वारमबंद बाजार में 5000 से अधिक महिलाओं की भीड़ जुट गई। वे अंग्रेज प्रशासक द्वारा दिए गए आदेश पर अमल चाहती थीं। आखिर आंदोलनकारियों की जीत हुई। लालअप आदेश को वापस ले लिया गया।  यह अशिक्षित, गंवई, गरीब और साधनविहीन महिलाओं की बड़ी कामयाबी थी।  इतिहास में अपने किस्म की अनूठी घटना।

 

दूसरा नुपी लेन

दूसरे ‘नुपी लेन’ की परिस्थितियां भिन्न थीं। मगर पहले नुपी लेन की भांति वह भी महिलाओं का स्वयं-स्फूर्त आंदोलन था।  उसका दायरा पहले नुपी-लेन की अपेक्षा काफी विस्तृत था। आरंभ में आंदोलनकारी महिलाएं चावलों के बढ़ते मूल्य तथा उनके निर्यात पर पाबंदी के लिए एकजुट हुई थीं। बाद में उनका लक्ष्य बढ़ता गया।  उसमें वाखई सेल, मेगा सेखई तथा मांग्बा-सेंग्बा जैसी कुरीतियों से मुक्ति की मांगें भी शामिल होती गईं। अंग्रेजों के आने के बाद ‘लालअप’ नामक बेगारी की प्रथा समाप्त हो चुकी थी।  उसके स्थान पर सरकार ने नई कराधान प्रणाली लागू की थी, जिसके अनुसार खाड़ी क्षेत्र में 2 रुपये प्रति आवास तथा पहाड़ी क्षेत्र में तीन रुपये प्रति आवास का नया कर लगाया गया था।  कृषि-योग्य भूमि भी कराधान के दायरे में आती थी। कर-वसूली के लिए जबरदस्ती करना आम बात थी। उसके कारण जनता में आक्रोश था।  शासन प्रणाली में शिखर पर महाराजा और ब्रिटिश सरकार का प्रतिनिधि था, जो ‘दरबार’ की मदद से शासन करते थे। दरबार में अधिकांश प्रतिनिधि राजा की ओर से नियुक्त किए जाते थे। आमतौर पर वे उसके सगे-संबंधी होते थे।  बड़े व्यापार पर मारवाड़ियों का कब्जा था।  सबने मिलकर आम जनता पर तरह-तरह के कर लादे हुए थे।

1939 में चारुचंद मणिपुर का महाराजा था, लेकिन नाममात्र का।  अधिकांश अधिकार औपनिवेशिक सरकार के प्रतिनिधि के अधीन थे।  बड़े फैसलों में उसी की मनमानी चलती थी।  राजसत्ता और धर्मसत्ता की ओर से थोपे गए करों का बोझ आमजन को उठाना पड़ता था।  वाखई सेल(Wakhei sel), मांग्बा-सेंग्बा(Mangba-Sengba), पंडित लोइशंग(Pandit Loishang), चंदन सेंखाई(Chandan Senkhai) तथा कुंजा सेन(Kunja Sen) असल में जनता से वसूले जाने वाले तरह-तरह के टैक्स थे।  इनमें से कुछ तो बड़े ही विचित्र थे।  उनके पीछे राजसत्ता और धर्मसत्ता का स्वार्थमय गठजोड़ था। कई कर मनुष्य के जनजीवन से जुड़ी सामान्य गतिविधियों के नाम पर लगाए गए थे।  वे मनुष्य की मौलिक स्वतंत्रता का हनन करते थे। ‘वाखई सेल’ भूमि के बंदोबस्त, चकबंदी से जुड़ा था, जबकि ‘पंडित लोइशंग’ ब्राह्मण मंडल के नाम पर थोपा हुआ कर था। ‘चंदन सेंखाई’ माथे पर तिलक लगाने के नाम पर वसूला जाता था।  उसके अनुसार प्रत्येक हिंदू परिवार को ‘चार आना’ केवल माथे पर तिलक लगाने के लिए चुकाना पड़ता था। ‘कुंजा सेन’ वेशभूषा कर था।  इनके अतिरिक्त गायकों के नाम पर भी टैक्स का प्रावधान था।

‘मांग्बा-सेंग्बा’ सबसे निकृष्ट और अमानवीय कराधान व्यवस्था थी।  यदि कोई व्यक्ति सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन करता हुआ पाया जाता अथवा ब्रह्म-सभा की सत्ता को चुनौती देता या किसी कारणवश ब्रह्म-सभा उससे रुष्ट हो जाती थी, तो ऐसे व्यक्ति को अशुद्ध(मांग्बा) घोषित कर दिया था।  ‘मांग्बा’ घोषित व्यक्ति अपने समाज और जाति के लिए अछूत हो जाता था।  शुद्धीकरण(सेंग्बा) यानी समाज में पुनर्वापसी के लिए उसे भारी जुर्माना भरना पड़ता था।  जुर्माने की दर अलग-अलग थी।  यदि निचली सभा व्यक्ति को अशुद्ध घोषित करती, तो मात्र 50 रुपये की क्षतिपूर्ति देकर शुद्धीकरण किया जा सकता था।  लेकिन यदि ब्रह्म सभा के अशुद्ध घोषित करने पर 85 रुपये 23 पैसे। ‘ब्रह्म सभा’ के अध्यक्ष के रूप में राजा भी किसी व्यक्ति को अशुद्ध घोषित कर सकता था। महाराजा द्वारा ‘मांग्बा’ घोषित व्यक्ति को अपने शुद्धीकरण के लिए, 500 रुपये की मोटी धनराशि भेंट करनी पड़ती थी।

महाराजा चारुचंद्र सिंह के शासनकाल में ‘मांग्बा-सेंग्बा’ की समस्या प्लेग की तरह भयावह हो चुकी थी। उसका सामना गरीब, विपन्न और कमजोर तबके को करना पड़ता था। ‘लालअप’ से मिलती-जुलती ‘पोथांग’ जैसी बेगार पृथा भी थी। उसके अनुसार राजा, शाही परिवार का और कोई सदस्य अथवा अंग्रेज अधिकारी जब भी यात्रा या शिकार पर निकलते तो मैदानी और पहाड़ी दोनों इलाकों में उन्हें तथा उनके सामान को ढोने की जिम्मेदारी स्थानीय प्रजा की होती  थी। भोजन और मनोरंजन आदि का प्रबंध भी गरीब जनता को करना पड़ता था। लोगों का विश्वास था कि महाराजा ने ‘ब्रह्म सभा’ के प्रभाव में आकर इन करों को थोपा हुआ है। संवैधानिक सुधारों के बिना उनसे मुक्ति असंभव है।  यह आधुनिक चेतना थी जो लगभग सभी पूर्वोत्तर के सभी प्रदेशों में एक साथ पनप रही थी।  लोग राजा की शक्तियों पर नियंत्रण चाहते थे।  यही वे कारण थे जिन्होंने दूसरे ‘महिला युद्ध’ की जमीन तैयार की थी।  दूसरे ‘महिला युद्ध’ को निखिल मणिपुरी महासभा का समर्थन प्राप्त था।

 

1938-39 में मणिपुर को भारी बाढ़ का सामना करना पड़ा था।  बाढ़ से तबाह हुई संपत्ति की मरम्मत हेतु दरबार की ओर से 16000 रुपये की धनराशि स्वीकृत की गई।  लेकिन फसल से हुए नुकसान की भरपाई होना मुश्किल था।  फसल मारे जाने से खाद्य-सामग्री के दाम तेजी से बढ़ने लगे।  राज्य में अकाल जैसे हालात पैदा हो गए। हालात को काबू करने के लिए दरबार ने चावल, चिवड़ा के निर्यात को अपने नियंत्रण में ले लिया। आदेश दिया गया कि यदि निर्यात आवश्यक हुआ तो वह केवल राज्य के अन्न-भंडारों के माध्यम से किया जा सकेगा। चावल तथा उसके उत्पादों के निर्यात को हालांकि राजा की मंजूरी प्राप्त नहीं थी। लेकिन ब्रिटिश सरकार के राजनीतिक प्रतिनिधि ने उसके पीछे राजा का हाथ मानते हुए, तत्काल प्रतिबंध उठा लेने का निर्देश दिया। दबाव में आकर राजा वैसा ही आदेश देना पड़ा। अंततः चावल तथा चावल उत्पादों के निर्यात से प्रतिबंध हटा लिया गया। जनता पर इसका उल्टा असर पड़ा।  उन्हें अकाल का डर सताने लगा।  अफवाहों ने काम किया।  लोग गुस्से से उबलने लगे।

चावल और धान के निर्यात की अनुमति का असर स्थानीय बाजारों में आपूर्ति पर पड़ा।  परिणामस्वरूप उनके दाम तेजी से बढ़ने लगे।  अफवाहों का बाजार पुनः गर्म हो गया।  स्त्रियों के अहिंसक आंदोलन का पहला निशाना बनीं खुमुककेम(Khumukcham Tclchcu vhc) चावल मिल, जो चावल के निर्यात में अग्रणी थी।  आंदोलनकारी महिलाओं ने मिल बंद करने को विवश कर दिया। उसके बाद वे साहसी महिलाएं सीधे राजनीतिक प्रतिनिधि क्रिस्टोफर जिमसन के सहायक टी।  ए.  शार्पे के पास पहुंचीं तथा उससे चावल निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की मांग की। उनका आक्रोश देख शार्पे ने अगले दिन तक संबंधित आदेश जारी करने का आश्वासन दिया।  उसके बाद आंदोलनकारी महिलाएं वापस लौट आईं। मगर आंदोलन का यही समापन नहीं था।  अगले दिन बाजार में काम करने वाली महिलाओं ने बिक्री के लिए आए धान की गाड़ियों को अपने कब्जे में ले लिया।  कब्जे में लिए गए धान को इकट्ठा कर वे दरबार की इमारत के आगे पहुंचीं तथा किसी भी सूरत में धान और चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की मांग करने लगीं।

महिलाओं का आक्रोश देख दरबार के सदस्य एक-एक कर बाहर निकल गए। केवल राजनीतिक प्रतिनिधि वहां रह गया। महिलाएं घेरा डाले पड़ी थीं।  वे उससे निर्यात पर तत्काल प्रतिबंध की मांग कर रही थीं। फंसे हुए राजनीतिक प्रतिनिधि ने महाराज की अनुपस्थिति में प्रतिबंध के आदेश देने में असमर्थता प्रकट की।  इसपर औरतों ने कहा कि वे महाराज को टेलीग्राम कर, तत्काल आने को कहें।  उग्र महिलाओं ने राजनीतिक प्रतिनिधि को अपने साथ तार-घर तक चलने को विवश कर दिया। आंदोलनकारियों का व्यवहार देखकर राजनीतिक प्रतिनिधि ने असम रायफल्स के कमांडर बुलफिल्ड को संदेश भेजकर स्थिति से परचाया।  हालात की गंभीरता समझते हुए बुलफिल्ड फौज की टुकड़ी के साथ वहां पहुंच गया। पुलिस बल को वहां देख आंदोलनरत महिलाओं का गुस्सा और भी बढ़ गया।  उसकी परिणति महिलाओं और सिपाहियों के बीच झड़प के रूप में हुई। घायल महिलाओं को इंफाल के अस्पताल में भर्ती कराया गया।  अगले दिन महाराज की ओर से चावल के निर्यात पर प्रतिबंध के आदेश आ गए।  उसके अनुसार असम रायफल्स की कोहिमा और इंफाल छावनियों को छोड़कर बाकी निर्यात को प्रतिबंधित कर दिया गया था।

उसी दिन आदेश पर अमल के लिए महिलाएं दुबारा राजनीतिक प्रतिनिधि और इंजीनियर के आफिस पहुंचीं।  उन्होंने दोनों को अपने साथ चलने के लिए विवश कर दिया।  दोनों अधिकारियों को साथ लेकर आंदोलनकारी महिलाएं चावल मिलों तक पहुंची।  वहां उन्होंने मिलों के विद्युत कनेक्शन काटने के लिए विवश कर दिया। ख्वारेमबंद बाजार में पूरे सात दिनों तक हड़ताल रही।  आंदोलनकारी महिलाओं ने बाजार पहुंचकर माल बेचने बैठे दुकानदारों का सारा सामान उलट-पुलट दिया।  इतने प्रयासों के बावजूद बाजार में चावल का भाव गिर नहीं रहा था। महिलाओं ने पाया कि प्रतिबंध के बाद भी दुकानदार माल को मुनाफे के लिए यहां से वहां ले जा रहे हैं।  उसे रोकने के लिए 28 दिसंबर को महिलाओं का एक जत्था इंफाल के निकट केसमपेट नाम स्थान पर पहुंचा।  वहां उन्होंने चावल से लदी नौ गाड़ियों को गुजरते हुए देखा।  महिलाओं ने उन गाड़ियों को अपने अधिकार में ले लिया।  उन्होंने गाड़ीवान पर दबाव डाला कि वह चावलों को एक रुपया बारह आना प्रति मन(चालीस सेर) के हिसाब से बेचे।  चावलों का व्यापारी उस माल को सीधे दुकानदारों को, ऊंचे दाम पर बेचना चाहता था।  उसके कहने पर गाड़ीवान ने चावल को सस्ता बेचने से इन्कार कर दिया।  इसपर आंदोलनकारी महिलाएं भड़क गईं।  कुपित महिलाओं ने सारा चावल बिखेर दिया और गाड़ीवान को मारने के लिए चढ़ गईं।  अभी तक महिलाओं का आंदोलन अहिंसक चल रहा था।  लेकिन ख्वारेमबंद बाजार और केसमपेट की घटनाओं में महिलाओं का उग्र रूप सामने आया था।  इसके बाद शासन को आंदोलनकारियों पर बल प्रयोग का बहाना मिल गया।  पुलिस बल ने हस्तक्षेप करते हुए आंदोलनकारी महिलाओं को गिरफ्तार कर लिया।

दूसरा ‘नुपी-लेन’ लगभग 14 महीनों तक चला था।  इतने दिनों तक महिला बाजार भी अस्त-व्यस्त रहा।  महिलाएं वहां माल बेचने पहुंचतीं तो पुलिस बल निगरानी के लिए पहुंच जाता।  इससे आंदोलनकारियों में फूट पड़ने लगी। बावजूद इसके उस ‘नुपी-लेन’ की सफलताएं कम नहीं थीं। असम रायफल्स की दो छावनियों को छोड़कर चावल बाहर भेजने प्रतिबंध लग चुका था। आंदोलन का असर वाखई सेल, मांग्बा-सेंग्बा, चंदन शेखई जैसे कानूनों पर भी पड़ा था। उसने पूरे मणिपुरी समाज को जाग्रत करने का काम किया था।  फलस्वरूप मणिपुर में कानून के राज्य और संवैधानिक सुधारों का मार्ग प्रशस्त हुआ। आंदोलन के दौरान महिलाएं बजाय किसी नेता के ‘मणिपुर माता की जय’ के साथ आगे बढ़ती थीं। मणिपुर में ‘वंदेमातरम’ गीत सबसे पहले दूसरे नुपी-लेन के दौरान गूंजा था।

दूसरे नुपी-लेन की एक विशेषता यह भी थी कि अपनी एकता, संगठन सामर्थ्य और सूझबूझ के कारण महिलाओं ने शासन-प्रशासन को अपने पीछे चलने के लिए विवश कर दिया था।  बावजूद इसके उस आंदोलन के लिए किसी भी महिला को सजा नहीं हुई। पिछले 12 दिसंबर 2018 को राज्य सरकार द्वारा राजधानी इंफाल में ‘नुपी लेन दिवस’ के रूप में, राजकीय स्तर पर बड़ी धूमधाम से मनाया गया।  उसमें राज्य सरकार ने निर्णय लिया कि आंदोलन के साक्षी रहे, कासिमपेठ से संजेनथोंग(इंफाल) मार्ग का नामकरण दूसरे नुपी लेन की आंदोलनकारी ‘इमास’(माओं) और इच्स(बहनों) की याद में ‘नुपी लेन रोड़’ के रूप में किया जाएगा।

ओमप्रकाश कश्यप

बहुजन चेतना का निर्माण और अर्जक संघ

सामान्य

धार्मिक यंत्रणाएं, एक साथ और एक ही समय में वास्तविक यंत्रणाओं की अभिव्यक्ति तथा उनके विरुद्ध संघर्ष हैं।  धर्म उत्पीड़ित प्राणी की आह, निष्ठुर, हृदयहीन संसार का हृदय, आत्माहीन परिस्थितियों की आत्मा है।  यह लोगों के लिए अफीम है। । । । मनुष्य ने धर्म की रचना की है, न कि धर्म ने मनुष्य को बनाया है। ’                             

                                                                    कार्ल मार्क्स 

दुनिया में अनेक धर्म है, लेकिन अपने ही भीतर जितनी आलोचना हिंदू धर्म को झेलनी पड़ती है, शायद ही किसी और धर्म के साथ ऐसा हो।  इसका कारण है हिंदुओं की जाति-व्यवस्था, जो मनुष्य को जन्म के आधार पर अनगिनत खानों में बांट देती है।  ऊंच-नीच को बढ़ावा देती है।  मुट्ठी-भर लोगों को केंद्र में रखकर बाकी को हाशिये पर ढकेल देती है।  ऐसा नहीं है कि इसकी आलोचना नहीं हुई।  गौतम बुद्ध से लेकर आज तक, जब से जन्म हुआ है, तभी से उसके ऊपर उंगलियां उठती रही है।  जाति और जाति-भेद मिटाने के लिए आंदोलन भी चले हैं, बावजूद इसके उसे मिटाना चुनौतीपूर्ण रहा है।  इसलिए कि हिंदू धर्म का प्रमुख लाभकर्ता ब्राह्मण, धर्म के साथ-साथ जाति के भी शिखर पर है, समाज में अतिरिक्त रूप से प्रभावशाली है।  वही किसी न किसी रूप में जाति को बचाए रखता है।  लोगों का विश्वास जीतने के लिए कभी-कभार कुछ समझौते या सुधारवाद का दिखावा करना पड़े तो बेझिझक करता है।  मध्यकाल में संत रविदास, कबीर, नानक आदि ने जाति के नाम पर समाज के बंटवारे को चुनौती दी थी।  उनीसवीं शताब्दी में केशवचंद सेन, स्वामी दयानंद, विवेकानंद आदि ने जाति उन्मूलन की दिशा में गंभीरता से काम किया।  लेकिन उनका प्रभाव सीमित और अल्पकालिक रहा।  उनीसवीं शताब्दी के बौद्धिक जागरण के दौरान, यह मानते हुए कि बिना धर्म को चुनौती दिए जातीय भेदभाव से मुक्ति असंभव हैᅳफुले ने हिंदू धर्म तथा उसको संरक्षण देने वाले ब्राह्मणवाद पर सीधा प्रहार किया।  उसके बाद उसे बहुआयामी चुनौती डॉ।  आंबेडकर, ई।  वी।  रामास्वामी पेरियार, स्वामी अछूतानंद, श्रीनारायण गुरु आदि की ओर से मिली।  इस बीच बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में ‘त्रिवेणी संघ’ ने पिछड़ी जातियों और अछूतों को संगठित करना शुरू किया।  1970 के आसपास ‘अर्जक संघ’ ने जातीय शोषण और धार्मिक आडंबरवाद के विरुद्ध आवाज बुलंद की।  आरंभ में उसका प्रभाव कानपुर और आसपास के क्षेत्रों तक सीमित था।  पिछले कुछ वर्षों से उसकी लोकप्रियता में तेजी आई है।  संचार-क्रांति के इस दौर में सैकड़ों युवा उससे जुड़ चुके हैं।  इसके फलस्वरूप वह उत्तर प्रदेश की सीमाओं से निकलकर बिहार, उड़ीसा जैसे प्रांतों में भी जगह बना रहा है।

‘अर्जक संघ’ की स्थापना रामस्वरूप वर्मा ने 1 जून 1968 को की थी।  उसके पीछे ‘बिहार का लेनिन’ कहे जाने वाले बाबू जगदेवप्रसाद सिंह की प्रेरणा थी।  आंदोलन को आगे बढ़ाने का काम महाराज सिंह भारती, मंगलदेव विशारद जैसे बुद्धिवादी चेतना से लैस नेताओं ने किया।  स्थापना के लगभग दो महीने बाद बाबू जगदेवप्रसाद सिंह भी ‘अर्जक संघ’ से जुड़ गए।  उन सभी का एकमात्र उद्देश्य था, सामाजिक न्याय की लड़ाई को विस्तार देना।  ऊंच-नीच, छूआछूत, जात-पांत, तंत्र-मंत्र, भाग्यवाद, जन्म-पुनर्जन्म आदि के मकड़जाल में फंसे दबे-कुचले लोगों को, उनके चंगुल से बाहर लाना।  फुले हिंदू धर्म की विकृतियों की ओर बहुत पहले इशारा कर चुके थे।  उसके बाद से ही उसमें सुधार के दावे किए जा रहे थे।  स्वाधीनता संग्राम के दौरान एक समय ऐसा भी आया जब दलितों और पिछड़ों का नेता कहलाने की होड़-सी मची थी।  उससे लगता था कि लोकतंत्र जातीय वैषम्य को मिलाने में सहायक होगा।  लेकिन हो एकदम उलटा रहा था।  जिन नेताओं पर संविधान की रक्षा की जिम्मेदारी थी, वे चुनावों में जाति और धर्म के नाम पर वोट मांगते थे।  पुरोहितों के दिखावे और आडंबर में कोई कमी नहीं आई थी।  ऊपर से समाज के निचले वर्गों पर होने वाले जाति-आधारित हमले।  उन्होंने साफ कर दिया था कि हिंदू धर्म के नेता अपनी केंचुल से बाहर निकलने को तैयार नहीं हैं।  वे जाति और धर्मांधता को स्वयं नहीं छोड़ने वाले।  लोगों को स्वयं उसके चंगुल से बाहर आना पड़ेगा।  पिछले आंदोलनों से यह सीख भी मिली थी कि जाति-मुक्त समाज के लिए धर्म से मुक्ति आवश्यक है।  मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म मनुष्यता है।  जियो और जीने दो उसका आदर्श है।  मामला धार्मिक हो या सामाजिक, मनुष्य यदि अपने विवेक से काम न ले तो उसके मनुष्य होने का कोई अर्थ नहीं है।  

 रामस्वरूप वर्मा का जन्म कानपुर(वर्तमान कानपुर देहात) जिले के गौरीकरन गांव में पिछड़ी जाति के किसान परिवार में दिनांक 22 अगस्त 1923 को हुआ था।  उनके पिता का नाम वंशगोपाल और मां का नाम सुखिया देवी था।  चार भाइयों में सबसे छोटे रामस्वरूप वर्मा की प्राथमिक शिक्षा कालपी और पुखरायां में हुई।  हाईस्कूल और इंटरमीडिएट परीक्षा पास करने के पश्चात उन्होंने  इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया।  वहां से 1949 में हिंदी में परास्नातक की डिग्री हासिल की।  उसके बाद उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री प्राप्त की।  वे शुरू से ही मेधावी थे।  हाईस्कूल और उससे ऊपर की सभी परीक्षाएं उन्होंने प्रथम श्रेणी में पास की थीं।  

छात्र जीवन से ही रामस्वरूप वर्मा की रुचि राजनीति में थी।  बौद्धिक स्तर पर वे समाजवादी विचारधारा के निरंतर करीब आ रहे थे।  उनका संवेदनशील मन सामाजिक ऊंच-नीच और भेदभाव को देखकर आहत होता था।  लोहिया उनके आदर्श थे।  फिर भी छात्र जीवन में वे राजनीति से दूरी बनाए रहे।  माता-पिता चाहते थे कि उनका बेटा उच्चाधिकारी बने।  उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए रामस्वरूप वर्मा ने भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षाएं दीं और उत्तीर्ण हुए।  उनकी मेधा और अध्ययनशीलता का अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि प्रशासनिक सेवा के लिए उन्होंने इतिहास को चुना था और सर्वाधिक अंक उसी में प्राप्त किए थे, जबकि परास्नातक स्तर पर इतिहास उनका विषय नहीं था।  एक अच्छी नौकरी और भविष्य की रूपरेखा बन चुकी थी, लेकिन नौकरी के साथ बंध जाने का मन न हुआ।  वे स्वभाव से विनम्र, मृदुभाषी तथा आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी थे।  आत्मविश्वास उनमें कूट-कूट कर भरा था।  इसलिए प्रशासनिक सेवा के लिए साक्षात्कार का बुलावा आया तो उन्होंने शामिल होने से इन्कार कर दिया।  

परिचितों को उनका फैसला अजीब लगा।  कुछ ने टोका भी।  लेकिन परिवार को उनपर भरोसा था।  इस बीच उनकी डॉ।  राममनोहर लोहिया और सोशलिष्ट पार्टी से नजदीकियां बढ़ी थीं।  सार्वजनिक जीवन की शुरुआत के लिए उन्होंने अपने प्रेरणा पुरुष को ही चुना।  वे सोशलिष्ट पार्टी के सदस्य बनकर उनके आंदोलन में शामिल हो गए।  1957 में उन्होंने ‘सोशलिस्ट पार्टी’ के उम्मीदवार के रूप में कानपुर जिले के भोगनीपुर से, विधान सभा का चुनाव लड़ाय और मात्र 34 वर्ष की अवस्था में वे उत्तरप्रदेश विधानसभा के सदस्य बन गए।  यह उनके लंबे सार्वजनिक जीवन का शुभारंभ था।  उससे अगला चुनाव वे 1967 में ‘संयुक्त सोशलिष्ट पार्टी’ के टिकट पर जीते।  गिने-चुने नेता ही ऐसे होते हैं, जो पहली ही बार में जनता के मनस् पर अपनी ईमानदारी की छाप छोड़ जाते हैं।  रामस्वरूप वर्मा ऐसे ही नेता थे।  जनमानस पर उनकी पकड़ थी।  लोहिया के निधन के बाद पार्टी नेताओं से उनके मतभेद उभरने लगे।  1969 का विधान सभा चुनाव उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लड़ा और जीते।  स्वतंत्र राह पकड़ने की चाहत में उन्होंने 1968 में ‘समाज दल’ नामक राजनीतिक पार्टी की स्थापना की थी।  उद्देश्य था, समाजवाद और मानवतावाद को राजनीति में स्थापित करना।  लोगों के बीच समाजवादी विचारधारा का प्रचार करना।  उनका दूसरा लक्ष्य था, ब्राह्मणवाद के खात्मे के लिए अर्जक संघ की वैचारिकी को घर-घर पहुंचाना।  गौरतलब है कि ‘समाज दल’ की स्थापना से कुछ महीने पहले बाबू जगदेवप्रसाद सिंह ने 25 अगस्त 1967 को ‘शोषित दल’ का गठन किया था।  दोनों राजनीतिक संगठन समानधर्मा थे।  क्रांतिकारी विचारधारा से लैस।  ‘शोषित दल’ के गठन पर बावू जगदेवप्रसाद सिंह ने ऐतिहासिक महत्त्व का, क्रांतिकारी और लंबा भाषण दिया था।  उन्होंने कहा था—

‘जिस लड़ाई की बुनियाद आज मैं डालने जा रहा हूँ, वह लम्बी और कठिन होगी।  चूंकि मै एक क्रांतिकारी पार्टी का निर्माण कर रहा हूँ इसलिए इसमें आने-जाने वालों की कमी नहीं रहेगी।  परन्तु इसकी धारा रुकेगी नहीं।  इसमें पहली पीढ़ी के लोग मारे जायेंगे, दूसरी पीढ़ी के लोग जेल जायेंगे तथा तीसरी पीढ़ी के लोग राज करेंगे।  जीत अंततोगत्वा हमारी ही होगी। ’

बाबू जगदेवप्रसाद सिंह और रामस्वरूप वर्मा के विचार काफी हद तक मिलते थे।  दोनों व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं से मुक्त थे।  आखिकार दोनों नेताओं ने राजनीतिक एकजुटता दिखाने का निर्णय लिया।  7 अगस्त 1972 को ‘शोषित दल’ और ‘समाजदल’ के विलय के बाद ‘शोषित समाज दल’ का जन्म हुआ।  1980 तथा 1989 के विधानसभा चुनावों में वर्मा जी ने ‘शोषित समाज दल’ के सदस्य के रूप में हिस्सा लिया।  दोनों बार उन्होंने शानदार जीतें हासिल कीं।  1991 में उन्होंने ‘शोषित समाज दल’ के उम्मीदवार के रूप में छठी बार विधान सभा चुनावों में जीत हासिल की।  रामस्वरूप वर्मा पर क्षेत्र की जनता का पूरा भरोसा था।  वे एक के बाद एक चुनाव जीतते जा रहे थे।  राजनीतिक क्षेत्र में उनकी प्रतिष्ठा और मान-सम्मान था।  लेकिन सिर्फ संसदीय राजनीति से उन्हें संतोष न था।  इसलिए सक्रिय राजनीति के साथ जनांदोलनों में भी नियमित सक्रियता बनी हुई थी।  

भारतीय समाज के बड़े हिस्से के पिछड़ेपन का मूल कारण है—धर्म के नाम पर आडंबर।  तरह-तरह के कर्मकांड और रूढ़ियां।  शताब्दियों से दबे-कुचले समाज को पंडित और पुजारी तरह-तरह के बहाने बनाकर लूटते रहते थे।  ‘अर्जक संघ’ के गठन का प्रमुख उद्देश्य लोगों को धर्म के नाम किए जा रहे छल-प्रपंच और पाखंड से मुक्ति दिलाना था।  रामस्वरूप वर्मा पर फुले, पेरियार और आंबेडकर का प्रभाव था।  बाबू जगदेवप्रसाद सिंह तो उनके सहयोगी और प्रेरणा-पुरुष थे ही।  उन दिनों डॉ।  आंबेडकर के प्रभाव से उत्तर प्रदेश और बिहार के दलितों में भी चेतना का संचार हुआ था।  स्वामी अछूतानंद के आंदोलन का भी लोगों पर प्रभाव था।  जाति मुक्ति की मांग तेज हो चुकी थी।  दलित अपने परंपरागत पेशों, जिनके आधार पर उन्हें नीच और गुलाम बनाया हुआ था, को छोड़कर नए धंधे अपनाने को संकल्पबद्ध थे।  

जाति मुक्ति के लिए पेशा-मुक्ति आंदोलन की शुरुआत 1930 से हो चुकी थी।  आगे चलकर अलीगढ़, आगरा, कानपुर, उन्नाव, एटा, मेरठ जैसे जिले, जहां चमारों की संख्या काफी थी─उस आंदोलन का केंद्र बन गए।  आंदोलन का नारा था─‘मानव-मानव एक समान’।  उन दिनों गांवों में मृत पशु को उठाकर उनकी खाल निकालने का काम चमार जाति के लोग करते थे।  जबकि चमार स्त्रियां नवजात के घर जाकर नारा(नाल) काटने का काम करती थीं।  समाज के लिए दोनों ही काम बेहद आवश्यक थे।  मगर उन्हें करने वालों को हेय दृष्टि से देखा जाता था।  अछूत मानकर उनसे नफरत की जाती थी।  डॉ।  आंबेडकर की प्रेरणा से 1950-60 के दशक में उत्तर प्रदेश से ‘नारा-मवेशी आंदोलन’ का सूत्रपात हुआ था।  उसकी शुरुआत बनारस के पास, एक दलित अध्यापक ने की थी।  चमारों ने एकजुटता दिखाते हुए इन तिरष्कृत धंधों को हाथ न लगाने का फैसला किया था।  इससे दबंग जातियों में बेचैनी फैलना स्वाभाविक था।  आंदोलन को रोकने के लिए उनकी ओर से दलितों पर हमले भी किए गए।  बावजूद इसके आंदोलन जोर पकड़ता गया।

रामस्वरूप वर्मा अपने संगठन और सहयोगियों के साथ ‘नारा मवेशी आंदोलन’ के साथ थे।  जहां भी नारा-मवेशी आंदोलन के कार्यक्रम होते अपने समर्थकों के साथ उसमें सहभागिता करने पहुंच जाते थे।  अछूतों के प्रति अपमानजनक स्थितियों के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए उन्होंने ‘अछूतों की समस्याएं और समाधान’ तथा ‘निरादर कैसे मिटे’ जैसी पुस्तिकाओं की रचना भी की।  उनमें जातीय आधार पर होने वाले शोषण और अछूतों की दयनीय हालत के कारणों पर विचार किया गया था।  चमारों द्वारा थोपे गए पेशे के बायकाट की सवर्ण हिंदुओं में प्रतिक्रिया होना अवश्यंभावी था।  उनकी ओर से चमारों पर हमले किए गए।  रामस्वरूप वर्मा ने प्रभावित स्थानों पर जाकर न केवल पीड़ितों को ढाढस बंधाने का काम किया, अपितु आंदोलन में डटे रहने का आवाह्न भी किया।  ‘अर्जक संघ’ के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए उन्होंने ‘अर्जक साप्ताहिक’ अखबार भी निकाला।  उसका मुख्य उद्देश्य ‘अर्जक संघ’ के विचारों को जन-जन तक पहुंचाना था।  

1967—68 में उत्तर प्रदेश में ‘संयुक्त विधायक दल’ की सरकार बनी तो रामस्वरूप वर्मा को वित्तमंत्री का पद सौंपा गया।  उस पद पर रहते हुए उन्होंने जो बजट पेश किया, उसने सभी को हैरत में डाल दिया था।  बजट में 20 करोड़ लाभ दर्शाया गया था।  उससे पहले मान्यता थी कि सरकार के बजट को लाभकारी दिखाना असंभव है।  केवल बजट घाटे को नियंत्रित किया जा सकता है।  जहां घाटे को नियंत्रित रखना ही वित्तमंत्री का कौशल हो, वहां लाभ का बजट पेश करना बड़ी उपलब्धि जैसा था।  केवल ईमानदार और विशेष प्रतिभाशाली मंत्री से, जिसकी बजट निर्माण में सीधी सहभागिता हो─ऐसी उम्मीद की जा सकती थी।  बजट में सिंचाई, शिक्षा, चिकित्सा, सार्वजनिक निर्माण जैसे लोकोपकारी कार्यों हेतु, उससे पिछले वर्ष की तुलना में लगभग डेढ़ गुनी धनराशि आवंटित की गई थी।  कर्मचारियों के महंगाई भत्ते में वृद्धि का प्रस्ताव भी था।  इस सब के बावजूद बजट को लाभकारी बना देना चमत्कार जैसा था।  उस बजट की व्यापक सराहना हुई।  रामस्वरूप वर्मा की गिनती एक विचारशील नेता के रूप में होने लगी।  पत्रकारों के साथ बातचीत के दौरान उनका कहना था कि उद्योगपति और व्यापारी लाभ-हानि को देखकर चुनते हैं।  घाटा बढ़े तो तुरंत अपना धंधा बदल लेते है।  लेकिन किसान नफा हो या नुकसान, किसानी करना नहीं छोड़ता।  बाढ़-सूखा झेलते हुए भी वह खेती में लगा रहता है।  वह उन्हीं मदों में खर्च करता है, जो बेहद जरूरी हों।  जो उसकी उत्पादकता को बनाए रख सकें।  इसलिए किसान से अच्छा अर्थशास्त्री कोई नहीं हो सकता।  जाहिर है, बजट तैयार करते समय सरकार के अनुत्पादक खर्चों में कटौती की गई थी।  कोई जमीन से जुड़ा नेता ही ऐसा कठोर और दूरगामी निर्णय ले सकता था।  

देश में आर्थिक आत्मनिर्भरता की चर्चा अकसर होती है।  मगर बौद्धिक आत्मनिर्भरता को एकदम बिसरा दिया जाता है।  यह प्रवृत्ति आमजन के समाजार्थिक शोषण को स्थायी बनाती है।  समाज का पिछड़ा वर्ग जिसमें  शिल्पकार और मेहनतकश वर्ग शामिल हैं, अपने श्रम-कौशल से अर्जन करते हैं।  जब उसको खर्च करने, लाभ उठाने की बारी आती है तो पंडा, पुरोहित, व्यापारी, दुकानदार सब सक्रिय हो जाते हैं।  धर्म के नाम पर, ईश्वर के नाम पर, तरह-तरह के कर्मकांडों, आडंबरों, ब्याज और दान-दक्षिणा के नाम पर─वे उसकी मामूली आय का बड़ा हिस्सा हड़पकर ले जाते हैं।  धर्म मनुष्य की बौद्धिक आत्मनिर्भरता, उसके वास्तविक प्रबोधीकरण में सबसे बाधक है।  लेकिन जब भी कोई उसकी ओर उंगली उठाता है, विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग तुरंत परंपरा की दुहाई देने लगता है।  इस मामले में हिंदू विश्व-भर में इकलौते धर्मावलंबी हैं, जो पूर्वजों के ज्ञान पर अपनी पीठ ठोकते हैं।  कुछ न होकर भी सबकुछ होने का भ्रम पाले रहते हैं।  तर्क और बुद्धि-विवेक की उपेक्षा करने के कारण कूपमंडूकता की स्थिति में जीते हैं।  ‘अर्जक संघ’ कमेरे वर्गों का संगठन है।  धर्म या संप्रदाय न होकर वह मुख्यतः जीवन-शैली है, जिसमें आस्था से अधिक महत्त्व मानवीय विवेक को दिया जाता है।  उसका आधार सिद्धांत है कि श्रम का सम्मान और पारस्परिक सहयोग।  लोग पुरोहितों, पंडितों के बहकावे में आकर आडंबरपूर्ण जीवन जीने के बजाय ज्ञान-विज्ञान और तर्कबुद्धि को महत्त्व दें।  गौतम बुद्ध ने कहा था─‘अप्पदीपो भव। ’ अपना दीपक आप बनो।  अर्जक संघ भी ऐसी ही कामना करता है।

रामस्वरूप वर्मा विचारों से पूरी तरह समाजवादी थे।  अपने छात्र जीवन के दौरान ही वे डॉ।  नरेंद्र देव और लोहिया के विचारों से प्रभावित थे।  स्वयं लोहिया उनके व्यक्तित्व से प्रभावित थे।  उन्हें पार्टी के लिए ऐसे ही ईमानदार, विचारशील और प्रतिभाशाली युवाओं की दरकार थी।  इसलिए उनके राजनीति में प्रवेश के निर्णय का लोहिया ने खुले दिल से स्वागत किया था।  रामस्वरूप वर्मा ने भी उन्हें निराश नहीं किया।  राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों में हिस्सेदारी करते हुए उन्होंने महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के कई राज्यों की यात्राएं कीं।  इस काम में उन्हें मंगलदेव विशारद और महाराज सिंह भारती जैसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले सहयोगी प्राप्त हुए, जिनकी समाजवाद के प्रति निष्ठा असंद्धिग्ध थी।  जिनका सपना रूढ़िमुक्त समाज का था।  जो ब्राह्मणवाद को भारतीय समाज की अनेकानेक समस्याओं के लिए जिम्मेदार मानते थे।  वे जानते थे कि शताब्दियों से जड़ जमाए धर्म और जातिवाद से एकाएक मुक्ति संभव नहीं है।  परंतु लोकतंत्र और वैज्ञानिक सोच की मदद से उन्हें चुनौती दी सकती है।  

‘शोषित दल’ के संस्थापक बाबू जगदेवप्रसाद सिंह ‘अर्जक संघ’ के माध्यम से किए जा रहे कार्यों से बेहद प्रभावित थे।  उनका मानना था का ब्राह्मणवाद के अनाचारों से मुक्ति केवल ‘अर्जक संघ’ द्वारा संभव है।  बाबू जगदेवप्रसाद सिंह और रामस्वरूप वर्मा दोनों का विश्वास था कि श्रम-केंद्रित संस्कृति मानववाद को बढ़ावा देगी।  उसके माध्यम से ब्राह्मणवाद से मुक्ति सहज संभव हो सकेगी।  लेकिन यह काम आसान नहीं है।  क्योंकि शताब्दियों से सत्ता और संसाधनों पर कुंडली मारकर बैठे लोग इतनी आसानी से जगह खाली करने को तैयार न होंगे।  उनके द्वारा फैलाए जा रहे अंधविश्वासों और धार्मिक पाखंडों से मुक्ति के लिए शिक्षा आवश्यक है।  इसलिए उनकी मांग थी कि देश में सभी को शिक्षा के समान अवसर प्राप्त हों।  विद्यालयों का पाठ्यक्रम ऐसा बनाया जाए जो वैज्ञानिक सोच और तर्कबुद्धि को बढ़ावा दे।  नैतिक शिक्षा का आधार मानवीय संबंधों को बनाया जाए।  सरकार को चाहिए कि गरीबों और समाज के पिछड़े वर्गों को प्रोत्साहन देकर आगे लाए।  रामस्वरूप वर्मा, बाबू जगदेवप्रसाद सिंह, महाराज सिंह भारती, बामसेफ के सहसंस्थापक डी।  के।  खापर्डे, पेरियार ललई सिंह यादव जैसे नेताओं के कारण देश में मानो नई सामाजिक-राजनीतिक चेतना अंगड़ाई ले रही थी।  ‘शोषित समाज दल’ का यह नारा उन दिनों गली-गली गूंजता था—

दस का शासन नब्बे पर

नहीं चलेगा, नहीं चलेगा।

सौ में नब्बे शोषित है,

नब्बे भाग हमारा है।

धन-धरती और राजपाट में,

नब्बे भाग हमारा है।

अपने विचारों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए रामस्वरूप वर्मा ने ‘क्रांति क्यों और कैसे’, ‘ब्राह्मणवाद की शव-परीक्षा’, ‘अछूत समस्या और समाधान’, ‘ब्राह्मण महिमा क्यों और कैसे?’, ‘मानवतावादी प्रश्नोत्तरी’, ‘मनुस्मृति राष्ट्र का कलंक’, ‘निरादर कैसे मिटे’, ‘सृष्टि और प्रलय’, ‘अम्बेडकर साहित्य की जब्ती और बहाली’,  जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकों की रचना की।  उनकी लेखन शैली सीधी-सहज और प्रहारक थी।  ऐसी पुस्तकों के लिए प्रकाशक मिलना आसान न था।  सो उन्होंने उन्हें अपने ही खर्च पर प्रकाशित किया।  जहां जरूरी समझा, पुस्तक  को मुफ्त वितरित किया गया।  उत्तर प्रदेश की प्रमुख भाषा हिंदी है।  रामस्वरूप वर्मा स्वयं हिंदी के विद्यार्थी रह चुके थे।  सरकार का कामकाज जनता की भाषा में हो, इस तरह सहज-सरल ढंग से हो कि साधारण से साधारण व्यक्ति भी उसे समझ सके, यह सोचते हुए उन्होंने वित्तमंत्री रहते हुए, सचिवालय से अंग्रेजी टाइपराइटर हटवाकर, हिंदी टाइपराटर लगवा दिए थे।  उस वर्ष का बजट भी उन्होंने हिंदी में तैयार किया था।  जनता को यह परचाने के लिए कि प्रशासन में कौन कहां पर है, उसके धन का कितना हिस्सा प्रशासनिक कार्यों पर खर्च होता है—बजट में छठा अध्याय विशेषरूप से जोड़ा गया था।  उसमें प्रदेश के कर्मचारियों और अधिकारियों का विवरण था।  उस पहल की सभी ने खूब सराहना की थी।  

1970 में उत्तर प्रदेश सरकार ने ललई सिंह की पुस्तक ‘सम्मान के लिए धर्म परिवर्तन करें’ पर रोक लगा दी।  यह पुस्तक डॉ।  आंबेडकर द्वारा जाति-प्रथा के विरुद्ध दिए गए भाषणों संकलन थी।  सरकार के निर्णय के विरुद्ध ललई सिंह यादव ने उच्च न्यायालय में अपील की।  मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट में था।  रामस्वरूप वर्मा कानून के विद्यार्थी रह चुके थे।  उन्होंने मुकदमे में ललई सिंह यादव की मदद की।  उसके फलस्वरूप 14 मई 1971 को उच्च न्यायालय ने पुस्तक से प्रतिबंध हटा लेने का फैसला सुनाया।

रामस्वरूप वर्मा ने लंबा, सक्रिय और सारगर्भित जीवन जिया था।  उन्होंने कभी नहीं माना कि वे कोई नई क्रांति कर रहे हैं।  विशेषकर अर्जक संघ को लेकर, उनका कहना था कि वे केवल पहले से स्थापित विचारों को  लोकहित में नए सिरे से सामने ला रहे हैं।  उनके अनुसार पूर्व स्थापित विचारधाराओं को, लोकहित को ध्यान में रखकर, नए समय और संदर्भों के अनुरूप प्रस्तुत करना ही क्रांति है।  एक तरह से उनका यह विश्वास सही भी था।  क्योंकि महावीर और बुद्ध के पहले से ही आजीवकों का एक बड़ा संप्रदाय था।  उसके अधिकांश सदस्य अपने श्रम-कौशल द्वारा आजीविका कमाते थे।  जीवन से भागने के बजाय उसका सम्मान करते थे।  मध्यकाल में कबीर और संत रविदास ने भी अपना काम-धंधा करते हुए उपदेश दिए थे।  प्रसिद्ध कहावत है कि ‘आदमी जैसा खाता है, वैसा ही सोचता है’।  तुलसी ने मंदिर में बैठकर, दूसरों के श्रमोत्पाद पर ‘रामचरितमानस’ की रचना की थी।  इसलिए महाकाव्य रचने के बावजूद वे रचनाकार का आत्मविश्वास कभी अर्जित नहीं कर पाए।  अपनी रचनाओं में तुलसी, दुनिया के कदाचित सबसे दीन कवि हैं।  दूसरी ओर अपने श्रम के भरोसे जीवनयापन करने वाले कबीर और रविदास साहित्य में बेहद मुखर हैं।  जहां भी अनैतिकता और अनाचार दिखे, उनकी ललकार दूर तक सुनाई पड़ती है।  

विचारों से कबीर, जीवन में बुद्धिवाद, तर्क और मानववाद को महत्त्व देने वाला, भारतीय राजनीति वह फकीर,  19 अगस्त 1998 को हमसे विदा ले गया।

अर्जक संघ 

भारतीय समाज के संदर्भ में जाति महज सामाजिक समस्या नहीं है।  उसका प्रभाव राजनीतिक और आर्थिक पक्षों पर भी प्रभाव पड़ता है।  इसमें जो जाति के शिखर पर है, वह शुरू से आर्थिक और राजनीतिक सत्ता का लाभ उठाता आया है।  उसका परिणाम भीषण आर्थिक विषमता के रूप में हमारे सामने है।  ऊपर के तीनों वर्ग जो प्रत्यक्ष श्रम से दूर हैं, वे आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक सुख-सुविधाओं, पद-प्रतिष्ठा का भरपूर लाभ उठाते हैं।  उनके पास विपुल अधिकार हैं।  दूसरी ओर शूद्र और अतिशूद्र जो समाज के प्रमुख उत्पादक वर्ग हैं, उन्हें उनके श्रम-लाभों से वंचित कर दिया गया है।  उनकी संख्या देश की कुल आबादी की तीन-चौथाई है।  देश और समाज के विकास की जिम्मेदारी उनके कंधों पर है।  लेकिन जब लाभ के बंटवारे का समय आता है, देश की तीन-चौथाई से ज्यादा कमाई ऊपर के 25 प्रतिशत लोगों में बंट जाती है।  भारतीय समाज में व्याप्त भीषण आर्थिक असमानता की यही वजह है।  धर्म और जाति का विधान लोगों को भुलावे में रखने और यथास्थिति बनाए रखने के लिए है।  इस तरह धर्म और जाति से मुक्ति का मसला, केवल सामाजिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है, उसमें आर्थिक स्वतंत्रता और राजनीतिक समानाधिकार एवं सहभागिता की चाहत भी सम्मिलित हैं।   

रामस्वरूप वर्मा ने स्वयं कहते थे कि ‘अर्जक संघ’ के पीछे कोई नई वैचारिकी नहीं थी।  जैन ग्रंथ ‘भगवती सूत्र’ और बौद्ध त्रिपिटक में आजीवक चिंतकों के बारे में आया है।  हालांकि वहां उनकी उपस्थिति केवल उनके मत के खंडन के लिए है।  जैन और बौद्ध दोनों आजीवक चिंतकों के प्रति आलोचनात्मक हैं।  कभी-कभी लगता है मानो उनपर कटाक्ष कर रहे हों।  यह स्वाभाविक था।  समाज में पहले से जमे-जमाए आजीवक और लोकायत विचारधाराओं को चुनौती दिए बिना, किसी नए धर्म-संप्रदाय की स्थापना संभव भी न थी।  बौद्ध साहित्य के अनुसार आरंभ में आजीवक मक्खलि गोशाल के समर्थकों की संख्या गौतम बुद्ध के अनुयायियों से अधिक थी।  ‘दीघनिकाय’ में मक्खलि गोशाल और पूरण कस्सप को पूर्ण ज्ञानी, मत संस्थापक, अनेक लोगों का शास्ता, धर्म-गुरु, मत-संस्थापक आदि माना है।  

बुद्धकालीन अर्थव्यवस्था, जिसे आजीवक या लोकायतकालीन अर्थव्यवस्था भी कहा जा सकता है—के बारे में विचार करें तो उन दिनों भारत का विदेशी व्यापार शिखर पर था।  जो उत्पादक वर्ग था, उसके अपने संगठन थे।  उन संगठनों का इतना प्रभाव था कि राजा को भी उनके कामकाज में हस्तक्षेप करने का अधिकार न था।  ब्राह्मण उन दिनों भी समाज के शिखर पर थे।  वे मानव-बस्तियों से दूर, यज्ञादि में लिप्त रहते थे।  बलि हेतु पशु तथा अन्य समिधा जुटाने के लिए ही वे राजाओं और श्रेष्ठियों के संपर्क में आते थे।  बदले में वे धार्मिक कर्मकांडों का नेतृत्व करते तथा उनके बच्चों को शिक्षा दिया करते थे।  उनके अलावा एक वर्ग कारीगरों, किसानों और शिल्पकारों का था।  जो अपने काम में लीन रहता था।  उनमे से अधिकांश आजीवक संप्रदाय के मानने वाले थे।  आजीवक संप्रदाय अब भले ही लुप्त प्राय हो, परंतु तमिल भाषा में लिखित जैनग्रंथ ‘नीलकेसी’ के अनुसार जिसका लेखनकाल 10वीं शताब्दी है, काशी में एक धनाढ्य सेठ रहता था, जो आजीवक संप्रदाय में विश्वास रखता था।  आजीवक मूलतः प्रकृतिवादी विचारधारा में विश्वास रखते थे।  श्रम-कौशल उनके लिए सब कुछ था।  यज्ञादि कर्मकांड तथा देवताओं के नाम पर होने वाले आडंबर उन्हें स्वीकार्य न थे।  ‘अर्जक संघ’ को हम भारत की उसी आजीवक परंपरा का आधुनिक संस्करण मान सकते हैं।  

‘अर्जक संघ’ मानवीय विवेक को महत्त्व देकर, तर्क और बुद्धिवाद में यकीन रखता है।  धर्म या दैवी शक्ति के नाम पर थोपा गया, कुछ भी उसे स्वीकार नहीं है।  धर्म और उसके समर्थन से पनपा जातिवाद, आदमी-आदमी के बीच भेद करना सिखाता है।  अर्जक संघ का विश्वास है कि प्रकृति सभी के साथ समान व्यवहार करती है।  इसलिए जन्म के आधार पर किसी को छोटा-बड़ा नहीं माना जा सकता।  वह जाति, वर्ण, क्षेत्रीयता आदि किसी भी प्रकार के कृत्रिम विभाजन को नकारता है।  सभी मनुष्य बराबर हैं।  इसलिए सबके अधिकार भी बराबर हैं।  जन्म के आधार पर किसी को छोटा, बड़ा अथवा विशेषाधिकार संपन्न नहीं बताया जा सकता।  जातियां मनुष्य द्वारा निर्मित हैं।  उन्हें प्राकृतिक संरचना के रूप में महिमा-मंडित करना, मनुष्य और मनुष्यता दोनों का अपमान करना है।  उसका मानना है कि ब्राह्मणवाद की विकृतियों और अनाचारों का समाधान केवल मानवतावाद द्वारा संभव है।  ‘अर्जक संघ’ जाति, धर्म, वर्ण, संप्रदाय के भेदभाव से रहित ऐसे समाज की परिकल्पना करता है, जिसमें सभी बराबर हों।  सभी को समान आजादी, सुख, शांति एवं समृद्धि के अवसर प्राप्त हों।  उसका एक बहुप्रचलित नारा है—

‘मानववाद की क्या पहचान,

ब्राह्मण, भंगी एक समान।  

अर्जक संघ के सिद्धांत

अर्जक संघ के सिद्धांत केवल सिद्धांत नहीं, वे उसके कार्यक्रम भी हैं।  इस तरह वह कोई नया संप्रदाय न होकर मानवीयता, बुद्धिपरकता और सौहार्द्र के साथ जीवन जीने की एक शैली है।  फिर भी उसके मुख्य सिद्धांतों /कार्यक्रमों को निम्नलिखित वर्गों में बांटा जा सकता है—

ब्राह्मणवाद का खंडन 

ब्राह्मणवाद जन्म के आधार पर दूसरों पर अपना आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक वर्चस्व बनाए रखने की राजनीति है।  उसकी आधार मान्यता है कि कुछ लोग जन्म से ही विशेष होते हैं।  इसके समर्थक, जो इसका लाभकारी वर्ग भी हैं, ईश्वर को सर्वोपरि मानकर दावा करते हैं कि ईश्वर ने उन्हें विशेष अनुकंपा और अधिकारों के साथ धरती पर भेजा है।  चूंकि शिक्षा का समस्त कारोबार उन्हीं के हाथों में रहता है, इसलिए उनमें  नेतृत्व की योग्यता होती है, जिसे वे अपना जन्मजात गुण बताते है।  हालांकि हर युग में उनके विरोधी हुए हैं, जिससे कई बार उन्हें नेपथ्य में जाना पड़ा है।  ऐसे अवसरों पर विरोधियों के साथ समझौता करके जैसे-तैसे खुद को बचाए रखना उनका चारित्रिक गुण रहा है।  द्वि-जन्म के सिद्धांत पर विश्वास रखना, जनेऊ धारण करना, भाग्यवाद आदि ब्राह्मणवाद के शतरंजी मोहरे हैं, जिनके आधार पर वह शताब्दियों से लोगों को भरमाता आया है।  ‘अर्जक संघ’ ब्राह्मणवाद के सभी प्रतीकों यथा पुजारी, यज्ञादि कर्मकांड, भाग्य, द्विजीकरण की परंपरा आदि का खंडन करते हैं।  वह मानता है कि मनुष्य को उन सभी रीति-रिवाजों और मान्यताओं को हतोत्साहित करना चाहिए, जो समाजार्थिक असमानता और शोषण को बढ़ावा देती हैं।  उन्हें नियतिबद्ध बताती हैं।  ‘अर्जक संघ’ के अनुयायी विवाह, सगाई आदि अवसरों पर ब्राह्मण पुरोहित की उपस्थिति को अनावश्यक और गैर-वाजिब मानते हैं।  उनके लिए विवाह धार्मिक बंधन न होकर एक समझौता मात्र है, जिसे पति-पत्नी एक-दूसरे के सुख, संतोष, संतान और समृद्धि के लिए अपनाते हैं।  ‘अर्जक संघ’ मूर्ति-पूजा, दहेज, जनेऊ संस्कार, विवाह में फिजूलखर्ची के साथ-साथ मृत्युभोज, श्राद्ध आदि का भी विरोध करता है।  वह इनको ब्राह्मणवाद का षड्यंत्र मानता है।  सभी मनुष्य समान हैं।  ब्राह्मण को पायलागन कहकर चरण-वंदना करना एक तरह से उसकी सामाजिक सर्वोच्चता को स्वीकार करता है।  अर्जक संघ इसका विरोध करता है।  

जाति-व्यवस्था को स्थायी रूप देने के लिए ब्राह्मणी विधान में शूद्रों और अछूतों को बराबर में बैठने की आजादी नहीं थी।  उसे जमीन पर बैठने को कहा जाता था।  ‘अर्जक संघ’ इसका विरोध करता है।  धर्म की रचना सामाजिक स्तरीकरण को मान्य ठहराती है।  इसलिए ऐसे किसी भी धार्मिक रीति-रिवाज जो समाज में भेदभाव फैलाता हो, आदमी को छोटे-बड़े, ऊंच-नीच में बांटता हो—का ‘अर्जक संघ’ विरोध करता है।  धर्म मनुष्य की आध्यात्मिक चेतना से जुड़ा मसला है।  हर व्यक्ति जीवन और सृष्टि की उत्पत्ति के कारण की खोज या उसमें विश्वास रखने को स्वतंत्र है।  ‘अर्जक संघ’ के अनुसार माता-पिता के धर्म को उसकी संतान पर लाद देने की परंपरा, उसके स्वविवेक और चयन के अधिकार का विरोध करती है।  इसलिए वह जन्म के आधार पर धर्म निर्धारित करने की परंपरा का भी विरोध करता है।  

आमतौर पर मान लिया जाता है कि धर्म नैतिकता को संबल देता है।  वही उसका आधार है।  वास्तव में है बिलकुल उलटा।  मनुष्यता के आदर्श सर्वोपरि हैं।  क्योंकि मनुष्य ने समाजीकरण के लंबे अनुभव के बाद उनका चयन किया है।  इसलिए प्रत्येक धर्म अपनी स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार उन्हें अपनी आचार-संहिता से जोड़ता है।  दुनिया में धर्मों और संप्रदायों की संख्या दर्जनों में है।  परंतु उनकी आचार-संहिता लगभग एक समान है।  वही आदर्श समाज के स्थायित्व, विकास तथा एकीकरण के लिए आवश्यक हैं।  मानव-मूल्यों को बनाए रखने के लिए किसी भी धर्म की बैशाखी की आवश्यकता नहीं है।  नैतिकता को सर्वोपरि मानते हुए ‘अर्जक संघ’ मानवधर्म का समर्थन करता है, जो और कुछ नहीं बल्कि मानव समाज द्वारा सबकी बेहतरी के लिए चुने गए आदर्शों का लेखा है।

मनुष्य के विवेकीकरण के लिए शिक्षा अनिवार्य है।  ब्राह्मणवादी शिक्षा का स्वरूप सामाजिक भेदभाव को बढ़ाने वाला रहा है।  संघ की मान्यता है कि भारतीय संविधान सर्वसमानता और स्वतंत्रता का समर्थक है, इसलिए परोक्ष रूप में वह धर्म का विरोध करता है।  इसलिए उसकी मांग थी कि ब्राह्मणवाद को आश्रय देने वाले सभी विचार और परंपराएं यथा पुनर्जन्म, भाग्यवाद, जाति-प्रथा, जाति और वर्णाधारित भेदभाव, चमत्कारपूर्ण कहानियों को बच्चों के पाठ्यक्रम से दूर रखना चाहिए।  उसके स्थान पर वैज्ञानिक चेतना से युक्त ऐसी शिक्षा को बढ़ावा देना चाहिए जो मनुष्य को अंधविश्वास, पाखंड, भाग्यवाद, तंत्रमंत्र आदि से मुक्ति दिला सके।  चूंकि सभी मनुष्य एक समान हैं।  स्वतंत्रता और समानता पर सभी का समानाधिकार है, इस आधार पर वह छूआछूत का विरोध करता है।  वह सभी के लिए समान शिक्षा और अवसरों का समर्थक है।  

अर्जक संघ का मानना है कि दांपत्य जीवन की नींव पति-पत्नी की परस्पर सहमति पर रखी जानी चाहिए।  उसके लिए दहेज, फिजूलखर्ची, दिखावे और तड़क-भड़क के लिए कोई स्थान नहीं है।  विवाह के समय पति-पत्नी लिखित सहमति और शर्तें यदि आवश्यक हों, तो तय की जा सकती हैं।  विवाह समारोह साधारण, कम से कम लोगों की उपस्थिति में संपन्न होने चाहिए, ताकि अमीर-गरीब का अंतर जाता रहे।  समाज में कोई भी उसके आधार पर स्वयं को हीन न समझे।  ब्राह्मणवादी संस्कार मनुष्य के जीवन से लेकर मृत्यु तक पीछा नहीं छोड़ते।  और उनके माध्यम से मनुष्य ब्राह्मणों के चंगुल में फंसा रहता है।  ‘अर्जक संघ’ जन्म से लेकर मृत्यु तक सभी ऐसे संस्कारों का विरोध करता है जिसमें ब्राह्मण या वर्ग-विशेष को सामान्य से अधिक अहमियत दी जाती हो।  हिंदुओं के अधिकांश त्योहारों जैसे दीपावली, दशहरा, होली आदि के साथ कोई न कोई मिथ जुड़ा हुआ है।  पर्व-त्योहारों की अपनी प्रासंगिकता है, वे समाज की एकरसता और मेल-जोल बनाए रखने के लिए आवश्यक माने जाते हैं।  ‘अर्जक संघ’ को पर्व-उत्सव आदि से आपत्ति नहीं है।  परंतु वह उन सभी को मिथों को अनावश्यक मानता है जिनसे किसी भी प्रकार की अधिभौतिक सत्ता का नाम जुड़ा है।  वह त्योहारों के रूप में ऐसे मानवीय चलन की कामना करता है, जिससे लोग आपस में मिलें और बराबरी का संदेश जाए।  होली, दीवाली, दशहरा जैसे त्योहार समाज में गैर-बराबरी को पोसते हैं, इसलिए अर्जक संघ इनका बहिष्कार करता है।  वह मुस्लिमों की ईद ओर ईसाइयों के क्रिसमस को भी ऐसा ही त्योहार मानता है।  इनके बजाए वह जिन 14 मानवतावादी त्योहारों को महत्त्व देता है, उनमें गणतंत्र दिवस, आंबेडकर जयंती, बुद्ध जयंती, स्वतंत्रता दिवस, बिरसा मुंडा और पेरियार रामास्वामी की पुण्यतिथियां शामिल हैं।  

‘अर्जक संघ’ मानववाद में विश्वास रखता है।  उसके अनुसार मानववाद या मानवतावाद वह विचारधारा है जो मनुष्य मात्र के लिए समानता, स्वतंत्रता, सुख, समृद्धि और विकास के समान अवसर उपलब्ध कराती हो।  समानता से उसका आशय उठने-बैठने, बोलने, खान-पान, पहनावे, अभिव्यक्ति के अधिकार आदि में किसी भी प्रकार के भेदभाव के निषेध से है।  इसका आदर्श है कि मनुष्य को दूसरों के साथ वही व्यवहार करना चाहिए, जैसा वह अपने प्रति चाहता है।  प्रत्येक मनुष्य का अहं-बोध प्रबल होता है।  भोजन, वस्त्र, आवास आदि की पूर्ति के साथ-साथ प्रत्येक मनुष्य समाज में अपने लिए मान-सम्मान की कामना करता है।  लेकिन सम्मान का स्तर जन्म के आधार पर तय नहीं किया जा सकता।  उसका आधार मनुष्य की योग्यता, बुद्धि-विवेक, साहस, सहृदयता, सद्भाव आदि होना चाहिए।  इसके लिए आवश्यक है कि प्रत्येक मनुष्य जाति-धर्म की मर्यादाओं से निकलकर एक-दूसरे का सम्मान करें तथा उनके जीवन-लक्ष्यों में प्राप्ति के प्रति सहायक हों।  

शिक्षा मनुष्य का न केवल प्रबोधीकरण करती है, अपतिु उसे समाज में जीने के योग्य भी बनाती है।  इसलिए आवश्यक है कि सभी नागरिकों को शिक्षा के समान अवसर प्राप्त हों-उसमें किसी भी प्रकार का भेदभाव न हो।  अर्जक संघ का प्रचलित नारा है—‘चपरासी हो या राष्ट्रपति की संतान, सबको शिक्षा एक सामान’।  शिक्षा हेतु ऐसे पाठ्यक्रम का निर्धारण करना चाहिए जो मनुष्य के विवेकीकरण में सहायक हो।  उसे अंधविश्वासों से बाहर निकालकर रूढ़ि मुक्त करे।  मनुष्य की उत्पादन क्षमता को बढ़ाए तथा तर्क-सामर्थ्य का विस्तार करे।  पुनर्जन्म और भाग्य जैसी धारणाएं मनुष्य की उत्पादकता को प्रभावित करती हैं।  उसके सोच को विकृत करती हैं।  ‘अर्जक संघ’ उनका बहिष्कार करता है।  एक समय था जब उसका नारा—‘पुनर्जन्म और भाग्यवाद, इनसे जन्मा ब्राह्मणवाद’ गली-गली गूंजा करता था।  

‘अर्जक संघ’ का अभिप्राय है, मेहनतकश लोगों का संगठन।  इसमें किसान, मजूदर, शिल्पकार, तकनीशियन आदि वे सभी लोग सम्मिलित हैं जो अपने श्रम-कौशल के आधार पर जीविकोपार्जन करते हैं।  वह बौद्धिक श्रम और शारीरिक श्रम में भेद नहीं करता।  अपितु वह शारीरिक श्रम को बौद्धिक श्रम से ऊंचा मानता है।  उसका मानना है कि बौद्धिक श्रम उत्पादन में सहायक तो हो सकता है, लेकिन वह स्वयं उत्पादन नहीं कर सकता।  दूसरी ओर शारीरिक श्रम द्वारा मनुष्य अपनी जरूरत के लायक कुछ भी उत्पादित कर सकता है।  इसलिए वह बौद्धिक श्रम की अपेक्षा श्रेष्ठतर है।  बौद्धिक श्रम करने वाले प्रायः अपनी स्थिति का लाभ उठाकर समाज में अनुकूल स्थितियों का सृजन कर लेते हैं।  इससे वह वर्ग जो शारीरिक श्रम में लिप्तय और समाज का प्रमुख उत्पादक वर्ग भी है-के साथ अन्याय बढ़ता जाता है।  भारतीय वर्ण-व्यवस्था का स्वरूप कुछ ऐसा है कि इसमें शारीरिक श्रम करने वाले को न केवल सबसे नीचे माना गया है, अपितु उसे मानवोचित मान-सम्मान और सुख से भी वंचित रखा जाता है।  ‘अर्जक संघ’ के अनुसार दूसरों के श्रम पर जीना भिक्षावृत्ति जैसा है।  ब्राह्मण आरंभ से ही दूसरों के श्रम पर जीता आया है।  दूसरी ओर सफाई करने वाला सबसे निकृष्ट काम करता है।  उसे ऐसे काम का उचित मेहनताना तो दूर अपेक्षित मान-सम्मान भी नहीं मिल पाता।  खुद को श्रम से बचाए रखने के लिए ही ब्राह्मणों ने जातिप्रथा की रचना की है।  इसलिए किसी भी रूप में ब्राह्मणवाद का बहिष्कार, व्यक्ति और समाज दोनों के हित में है।  ‘अर्जक संघ’ श्रम को उसका वास्तविक सम्मान दिए जाने का समर्थक है।  इसके लिए वह जाति-प्रथा को गैरजरूरी, भेद-भाव को जन्म देनी वाली अमानवीय प्रथा मानता है।  ‘अर्जक संघ’ संपूर्ण सामाजिक समानता, जिसमें लैंगिक समानता भी सम्मिलित है, का समर्थन करता है।  

दार्शनिक समस्याएं और मानववादी प्रश्नोत्तरी

जब भी कोई व्यक्ति नई राह चलना चाहता है, उसके रास्ते को लेकर तरह-तरह के प्रश्न उठने लगते हैं।  कभी-कभी केवल दिखावे के लिए।  कभी-कभी नई राह की खामियों को पकड़ने का श्रेय लेने की कोशिश में।  ऐसे प्रश्न या जिज्ञासाएं सदैव बेकार नहीं होतीं।  स्थापित विचारधाराओं के बीच नए विचार, धर्म या संप्रदाय की महत्ता दर्शाने के लिए भी कई बार उन प्रश्नों का उत्तर देना आवश्यक हो जाता है।  हालांकि कई बार ऐसे सवाल भी सामने आ जाते हैं जिनका उस संगठन के मुख्य उद्देश्यों से कोई करीबी संबंध नहीं होता।  ‘अर्जक संघ’ के संस्थापक रामस्वरूप वर्मा के आगे भी कुछ ऐसे ही प्रश्न थे।  जैसे ‘अर्जक संघ’ की जीवन, सृष्टि और समाज को लेकर क्या दृष्टि है? जीवन की उत्पत्ति कैसे हुई? ‘अर्जक संघ’ का मूल उद्देश्य रचनात्मक कार्यक्रमों के जरिए समाज में व्याप्त कुरीतियों से संघर्ष करना था।  दर्शन की जटिल समस्याओं का समाधान उसका उद्देश्य नहीं था।  समस्या थी कि इन प्रश्नों को टालने पर संघ के प्रति लोगों की गंभीरता में कमी आ सकती है।  ऐसे आध्यात्मिक किस्म के प्रश्नों के कुछ ‘मानववादी प्रश्नोत्तरी’ में दिए गए हैं।  

यह पूछने पर कि मानव शरीर की क्या आवश्यकताएं हैं, उत्तर मिलता है—‘शुद्ध वायु, जल, पौष्ठिक भोजन और स्वास्थ्य। ’ अगला प्रश्न था, ‘क्या मन भी शरीर की तरह ही पदार्थ है? उत्तर मिला, ‘प्रत्येक पदार्थ दृश्यमान है।  उसका कोई कोई रूप, स्पष्ट देहाकृति होती है।  सृष्टि का प्रत्येक पदार्थ किसी न किसी रूप में गतिमान है।  गति के लिए पदार्थ का होना आवश्यक है।  इसी तरह मन के लिए भी शरीर की उपस्थिति अनिवार्य है। ’ आशय था कि देह मन का आधार है।  बिना पहले के दूसरा असंभव है।  आगे वे कहते हैं कि मन की यदि कोई गति है तो उसे देह की ऊर्जा ही संभव बनाती है।  गति पदार्थ का गुण है।  इस आधार पर पदार्थ स्वयं चैतन्य है।  इसे हम वेदांत का प्रतिचिंतन कह सकते हैं।  वेदांतियों के अनुसार सृष्टि की समस्त गतिशीलता का स्रोत परमात्मा है।  जबकि भौतिकवादियों के लिए चेतना सृष्टि का विशिष्ट गुण है।  वही उसके कण-कण में समायी होती है।  सभी पदार्थ चैतन्य हैं।  दूसरी ओर विज्ञान कहता है, प्रकृति की प्रत्येक वस्तु छोटे-छोटे कणों से मिलकर बनी है।  वे सदैव गतिमान रहते हैं।  नई खोजें बताती हैं कि परमाणु के भीतर भी अत्यंत छोटे-छोटे कण रहते हैं।  नन्हे-नन्हे ऊर्जा पिंड, वे कहीं ठहरते नहीं।  सदैव गतिमान रहते हैं।  सो चेतना सृष्टि के हर पदार्थ में है।  यही चेतना जब जीवन में ढल जाती है तो पदार्थ जीव बन जाता है।  जिनमें जीवन नहीं है, वह केवल पदार्थ रहता है।  

फिर निर्जीव पदार्थ और जैविक पदार्थ में कैसे अंतर किया जाए? ‘अर्जक संघ’ की दार्शनिकी के अनुसार, ‘निर्जीव पदार्थ वह होता है जिसकी गतिशीलता बाहरी कारणों द्वारा नियंत्रित होती है।  उसपर स्वयं पदार्थ का कोई नियंत्रण नहीं होता।  प्रकृति ने जैसा उसे बनाया है, वैसा बने रहना, उसकी नियति है।  इसलिए गतिमान रहकर भी वह अपनी प्रकृति में स्थिर होता है।  इसलिए उसे निर्जीव पदार्थ कहा जाता है।  जीव पदार्थ वे हैं जो कम या ज्यादा अपनी गतियों पर नियंत्रण रखने का गुण रखते हैं।  समय के साथ इस गुण में बदलाव होता रहता है।  निर्जीव पदार्थ में अपेक्षाकृत जड़ता बनी रहती है।  ‘अर्जक संघ’ के अनुसार जीव वह है जो अपने अंदर ऊर्जा का उत्पादन, उत्पादित ऊर्जा की मदद से आवश्यक अणुओं का उत्पादन और प्रजनन कर सके।  ये गुण मनुष्य में भी हैं, इसलिए मनुष्य स्वयं एक जीव है।  लेकिन प्रकृति का हिस्सा होने के कारण है वह पदार्थ ही है।  हम उसे जैविक पदार्थ भी कह सकते हैं, जो विवेक से काम लेना, अपने अनुभवों और ज्ञान को स्मृति के माध्यम से सहेजना जानता है।

सृष्टि की रचना और विनाश जितना विज्ञान का विषय है उतना ही दर्शनशास्त्र का भी विषय है।  अर्से से दार्शनिक और वैज्ञानिक इसपर चर्चा करते आए हैं।  आस्थावादियों के अनुसार सृष्टि की रचना का एकमात्र  स्रोत और कर्ता ईश्वर है।  वही सृष्टि को बनाता मिटाता रहता है।  परमात्मा या ईश्वर क्या है, इसके बारे में हर धर्म ने अपनी-अपनी धारणाएं गढ़ रखी हैं।  वे धर्म इसलिए हैं क्योंकि उनकी धारणाओं में आसानी से बदलाव नहीं होता।  पीढ़ी दर पीढ़ी लोग उनपर विश्वास करते रहते हैं।  भौतिकवादी या विज्ञानवादी की दृष्टि में परमात्मा जैसे मिथ के लिए कोई जगह नहीं है।  प्रकृति स्वयं ही अपना परमात्मा है।  वही खुद को बनाती और मिटाती है।  प्रकृति सनातन है।  उसकी आंतरिक और बाहरी हलचलों से जीवन बनता और मिटता रहता है।  यह सृष्टि के प्रति भौतिकवादी दृष्टिकोण है।  जिसकी विशेषता है कि वह जड़ नहीं है।  कल को यदि विज्ञान जीवन की उत्पत्ति के बारे में नए निष्कर्ष तक पहुंचता है तो प्रकृतिवादी को अपना निर्णय में संशोधन करते में देर न लगेगी।  

अर्जक संघ तर्क और विवेक बुद्धि पर जोर देता है।  विवेकबुद्धि और कुछ नहीं, तर्कसंगत सोचने की कला और सामथ्र्य है।  जिस तरह चेतना पदार्थ का गुण है, वैसे ही विवेक बुद्धि मनुष्य का गुण है।  तो क्या जानवरों में भी बुद्धि होती है? इसका उत्तर नकारात्मक है।  यह स्थापित तथ्य है कि धरती पर मनुष्य अकेला विवेकशील प्राणी है।  लेकिन भूख लगने पर भोजन तो पशु भी मांगते हैं।  प्यास लगने पर वे पानी की ओर चल पड़ते हैं।  फिर मनुष्य और शेष प्राणियों की बुद्धि में क्या अंतर है।  ‘अर्जक संघ’ ने बुद्धि को सहज बुद्धि और विवेक बुद्धि में बांटा है।  सहज बुद्धि वह है तो शरीर की मूल-भूत आवश्यकताओं द्वारा संचालित होती है।  भूख लगने पर नन्हा शिशु रोने लगता है।  वह भूख के बारे में नहीं जानता।  रोने का अर्थ भी नहीं जानता।  लेकिन अपने अनुभव से वह इतना समझ चुका होता है कि उसका रोना सुनकर ‘मां’ उसे भोजन देने चली आएगी।  यह उसकी सहज बुद्धि है।  मनुष्य को छोड़कर सभी रेंगने वाले प्राणी जो उड़ने में असमर्थ होते हैं, तैरने का हुनर उन्हें सहज-बुद्धि से प्राप्त होता है।  धीरे-धीरे बिना बताए भी मनुष्य यह समझ लेता है कि नदी में हाथ-पांव मारने से शरीर गतिमान होने लगता है।  इसी को तैरना कहा जाता है।  

सहज बुद्धि के लिए बाहरी मदद आवश्यक नहीं है।  प्राणी अकेला ही उसमें निपुण हो जाता है।  जबकि अच्छे-बुरे पर विचार करते हुए समुचित निर्णय लेना विवेक बुद्धि है।  मनुष्य जानवर से इसलिए श्रेष्ठ है क्योंकि उसके पास विवेक होता है।  अपने अच्छे-बुरे का निर्णय कर उसके अनुसार कदम आगे बढ़ा सकता है।  जानवरों में इसका अभाव होता है।  ऐसा मनुष्य जिसके पास कुदरती विवेक बुद्धि है, अगर उसका प्रयोग न करे तो वह जानवरों से बदतर ही माना जाएगा।  बावजूद इसके किसी भी स्थिति में मनुष्य जानवर नहीं बन सकता।  क्योंकि मनुष्य होने के कारण विवेक बुद्धि उसको बाकी जानवरों से, जिनके पास केवल सहज बुद्धि है, अलग करती है।  फिर ऐसा क्या है? जिससे मनुष्य की रक्षा और उन्नति हो? कोई भी व्यक्ति अपनी रक्षा के साथ अपने वांछित जीवन लक्ष्यों भी प्राप्त कर सके? इसका उत्तर है, मनुष्य विवेक वुद्धि के प्रयोग द्वारा अपनी ओर दूसरों की रक्षा एवं उन्नति कर सकता है।  मनुष्य का यही गुण बाकी प्राणियों से उसे अलग कर देता है।  

फिर मन और बुद्धि में क्या अंतर है? कहीं ऐसा तो नहीं जिसे विवेक-बुद्धि कहा गया है, वह मन की गतिशीलता का ही परिचायक हो।  अर्जक संघ की दार्शनिकी के अनुसार मन की प्रत्येक स्थिति विवेक को जन्म देती है।  अगर विवेक कुंठित हो, आदमी जानबूझकर उससे काम लेना बंद कर दे, या बहकावे में आकर विवेक के विपरीत जाने लगे तो दुर्बुद्धि पैदा होती है, जो व्यक्ति को कु-मार्ग की ओर ले जाती है।  विवेकशीलता की क्षमता सभी मनुष्यों में बराबर होती है।  व्यक्ति अपने विवेक सामथ्र्य का उपयोग कर दार्शनिक, वैज्ञानिक, भारवाहक, डाॅक्टर, वकील आदि कुछ भी बन सकता है।  इसलिए वह बाकी प्राणियों से श्रेष्ठ है।  जानवर जिनके पास केवल सहज-बुद्धि है, वे अपना स्वाभाविक जीवन तो जी सकते हैं, विवेक के अभाव में प्रगति नहीं कर सकते।

आवश्यक नहीं कि प्रत्येक दर्शन के पास हर उत्तर का जवाब हो।  ऐसी कामना भी नहीं करनी चाहिए।  यह भी संभव नहीं कि किसी दार्शनिक संप्रदाय की प्रत्येक मान्यता हमें आश्वस्त करे।  इस मायने में बुद्ध सचमुच समझदार थे।  उन्होंने शताब्दियों से उलझे हुए सवालों को टाल दिया था।  ईश्वर है या नहीं? आत्मा का अस्तित्व क्या है? सृष्टि का जन्म कैसे हुआ? प्रलय कैसे और क्या होती है? बुद्ध ने इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं दिया।  जब जीवन की समस्याएं ही इतनी अधिक हैं तो जो दृश्यमान नहीं है, जो मनुष्य के बस से बाहर है, उसके बारे में चिंता क्यों की जाए? लेकिन जिज्ञासा तो जिज्ञासा है।  सृष्टि कैसे जन्मी? प्रलय कैसे होती है? ये सब सवाल कभी न कभी तो मनुष्य के दिमाग में आते ही हैं।  रामस्वरूप वर्मा का दृष्टिकोण विज्ञानवादी था।  वे विज्ञान की छांह में ही इन प्रश्नों का समाधान खोजते हैं।  उनके अनुसार पदार्थ अपनी अंतश्चेतना के कारण, गति के कारण जब अंतरिक्ष में फैलने लगता है तो सृष्टि होती है।  और अपने ही आंतरिक बल के कारण, गुरुत्वाकर्षण के कारण जब सिकुड़ने लगता है तो प्रलय आ जाती है।  

आवश्यक नहीं कि जीवन और सृष्टि की उत्पत्ति से जुड़ा ये प्रश्न और उनके व्यावहारिक उत्तर आपको आश्वस्त ही करंे।  रामस्वरूप वर्मा का उद्देश्य कोई धार्मिक या दार्शनिक मत या संप्रदाय चलाना नहीं था।  जिन लोगों ने इन सवालों की खोज में सहòाब्दियां लगा दीं, उनके मत का क्या हुआ।  खुद को सबसे पुराना, सनातन कहने वाला हिंदू धर्म ही सबसे ज्यादा कुरीतियों का वाहक बना हुआ है।  इसलिए आवश्यक नहीं कि हर नए मत संप्रदाय के पास जीवन और सृष्टि से जुड़े सभी प्रश्नों का उत्तर हो।  हमने पहले भी कहा है कि ‘अर्जक संघ’ को धार्मिक संप्रदाय न होकर महज जीवन शैली है।  मनुष्य पर मनुष्य के भरोसे को, आपसी सहयोग को बढ़ावा देने वाली जीवन-शैली।  यही मानवधर्म है।  जो मनुष्य और उसके कर्तव्यों के बीच आत्मा, परमात्मा, पाप, पुण्य, धर्म-अधर्म को ले आते हैं, वे दरअसल आदमी को भरमाए रखकर अपना उल्लू सीधा करने का काम करते हैं।  असली मजहब इंसानियत है।  इसका उद्देश्य है विकास के रास्ते में सभी को बराबरी पर लाना।  ‘अर्जक संघ’ में जातीयता का बंधन नहीं है।  अर्जक यानी कमेरी (श्रमशील) कौम, जो पसीना बहाकर आजीविका कमाता है—वह अर्जक है।  जो दूसरे के श्रम पर जीता है, वह ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद का पोषक है।  सनातन विचारधारा के उलट अर्जक केवल दो संस्कारों को मानते हैं—विवाह और मृत्यु संस्कार।  शादी के लिए लड़का-लड़की संघ की पहले से तय प्रतिज्ञा को दोहराते हैं और एक-दूसरे को वरमाला पहनाकर शादी के बंधन में बंध जाते हैं।  मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार मुखाग्नि या दफनाना तो होता है।  इसके 5 या 7 दिन बाद दिवंगत की याद में एक शोकसभा होती है, जो सामाजीकरण की आवश्यकता है।  बाकी कर्मकांडों के लिए उनके यहां कोई स्थान नहीं है।  

बहुजन चेतना का निर्माण और अर्जक संघ

मनुष्य को धर्म क्यों चाहिए? किसलिए चाहिए? धर्म है तो क्या ईश्वर भी आवश्यक है? क्या बगैर ईश्वर के धर्म चल नहीं सकता? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं, जो आरंभ से ही मानवीय सरोकारों का हिस्सा रहे हैं।  इसी के साथ एक और भी सवाल है? क्या दलित और बहुजन के लिए भी धर्म उतना ही अपरिहार्य है, जितना वह ब्राह्मण के लिए है? इस प्रश्न का तुरंता जवाब यह हो सकता है कि ईश्वर जात-पात का भेद नहीं करता।  उसकी निगाह में सभी बराबर हैं।  हालांकि व्यवहार में यह बात सच नहीं बैठती।  धार्मिक व्यवस्थाएं ब्राह्मण और अछूत के लिए अलग-अलग हैं।  ब्राह्मण धर्म का प्रमुख कर्ता है।  जबकि अछूत को ईश्वर का सान्निध्य तो दूर, मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने तक का अधिकार प्राप्त नहीं है।  इसलिए धर्म और ईश्वर का चरित्र वैसा नहीं है, जैसा उसके बारे में दावा किया जाता है।  दोनों सीधे-सीधे अलोकतांत्रिक सत्ताएं हैं।  वहां ब्राह्मण जो धर्मसत्ता के केंद्र में है, सबसे शक्तिशाली है।  उसके अधिकार भी उतने ही अधिक हैं।  सत्ता से दूरी के साथ अधिकार और शक्तियां कमजोर पड़ती जाती हैं।  अछूत और आदिवासी वहां हाशिये के लोग हैं जो शक्ति और अधिकार दोनों से विपन्न हैं।  

अर्जक संघ समानता, स्वतंत्रता और लोकतंत्र का समर्थक है।  वह जन्माधारित भेदभाव को नहीं मानता।  बहुजन कमेरे वर्गों का समूह है, जो समाज के प्रमुख उत्पादक और जीवनी शक्ति हैं।  अर्जक संघ बौद्धिक श्रम और शारीरिक श्रम को बराबर मानता है।  वह श्रम के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव के विरुद्ध है।  वह शिक्षा, रोजगार तथा संसाधनों में सभी की समान भागीदारी का समर्थक है।  वह मानवीय विवेक का समर्थक है।  ऐसे धर्म जिसकी नींव कोरे विश्वास पर टिकी होती है का वह बहिष्कार करता है।  इसके स्थान पर वह मानवधर्म की बात करता है, जिसके अनुसार जन्म के आधार पर न कोई छोटा होता है, न बड़ा। कुल मिलाकर  ‘अर्जक संघ’ ठीक वैसे ही समाज की कामना करता है, जो बहुजन समाज का सपना है।  इसलिए बहुजन समाज उससे आवश्यकतानुसार प्रेरणा ले सकता है।

ओमप्रकाश कश्यप

नुपी लेन : मणिपुर के महिला-संघर्ष की अनूठी दास्तान

सामान्य

आज की राज बीत चुकी है

एक दिन और गुजर गया

स्त्रियो! अपने बाल बांध लो

वे अराजक होकर उड़ रहे हैं

क्या तुम भूल गईं….

एक 12 दिसंबर गुजर चुका है

दूसरा 12 दिसंबर आने को है

भूल जाओ कि बालों को बांधना जरूरी है

भूल जाओ कि यह दिन दुबारा लौटकर आएगा

स्त्रियो! अपने बाल बांध लो….

—हाजिम इराबोट, मणिपुरी जननेता और लोककवि

भारत विविध संस्कृतियों और मान्यताओं वाला विशाल देश है। अपने आप में लंबा इतिहास समेटे हुए। मगर जब भी देश के इतिहास और संस्कृति की बात होती है, आमतौर पर सारा विमर्श उत्तर, उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत तक सिमटकर रह जाता है। ज्यादा से ज्यादा सुदूर दक्षिण को शामिल कर लिया जाता है। पूर्वाेत्तर के प्रदेशों जो भारतीय भू-भाग के वैसे ही हिस्से हैं, जैसे बाकी प्रदेश—के योगदान को आमतौर पर बिसरा दिया जाता है। इसका एक कारण तो उनकी विशिष्ट जनजातीय संस्कृति है। हम प्रायः मान लेते हैं कि जनजातीय प्रभाव के कारण पूर्वाेत्तर के समाज आधुनिकताबोध से कटे हुए हैं। जबकि सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक हलचलों से यह क्षेत्र वैसा ही प्रभावित रहा है, जैसा बाकी देश। कुछ मामलों में तो यह दूसरों से विशिष्ट है। जैसे 1904 और 1939 में मणिपुर में हुए दो ‘नुपी-लेन’(महिला-युद्ध) की मिसाल पूरे देश में अन्यत्र नहीं मिलती। वे महिलाओं द्वारा अपने बल पर चलाए गए एकदम कामयाब जनांदोलन थे, जिन्होंने औपनिवेशिक भारतीय सरकार के संरक्षण में पल रही भ्रष्ट राजसत्ता को झुकने के लिए विवश कर दिया था। उनके फलस्वरूप सामाजिक सुधारों का सिलसिला आरंभ हुआ। संवैधानिक सुधारों की राह प्रशस्त हुई।

मणिपुर विरल जनसंख्या वाला प्रांत है। लगभग 22300 वर्ग किलोमीटर में फैले इस प्रांत की जनसंख्या करीब तीस लाख है। प्रदेश का 91 प्रतिशत हिस्सा पहाड़ी क्षेत्र है। पर जो बात उसे खास बनाती है, वह है—समाजार्थिक-सांस्कृतिक जीवन में महिलाओं की पुरुषों के मुकाबले ज्यादा भागीदारी। इस दृष्टि से वह देश का इकलौता प्रांत है। मणिपुर का इतिहास 2000 वर्ष पहले, 33वें ईस्वी सन से आरंभ होता है, जब वहां मैतेई प्रजाति के नोंग्दा लैरन पाखनग्बा ने शासन संभाला। मैतेई प्रजाति के कारण ही उस क्षेत्र का नाम मणिपुर हुआ। इस बीच वहां अनेक सामंती समूह पनपे। परंतु शासन-प्रशासन में मैतेई लोगों की प्रधान भूमिका बनी रही। 15वीं-16वीं शताब्दी के बीच मणिपुर में ब्राह्मणों ने प्रवेश किया। देखते ही देखते वे राजसत्ता के करीबी और उसके सबसे बड़े लाभार्थी बन गए। पूजा-पाठ और कर्मकांडों के माध्यम से उन्होंने वहां के जनजीवन पर कब्जा कर लिया। सामाजिक सरंचना में सबसे ऊपर मैतेई थे, दूसरे स्थान पर ब्राह्मण, तीसरा वर्ग आम प्रजा, मेहनतकश लोगों का था। जिनकी अहमियत वहां दासों के समान थी। उन्हें बाकी दोनों वर्गों की गुलामी करनी पड़ती थी।

मणिपुर की स्वतंत्रता को झटका 1819 में उस समय लगा, जब वहां बर्मा का आक्रमण हुआ। स्वतंत्रता प्रेमी मणिपुर वासी अगले 7 वर्षों तक हमलावरों से लगातार जूझते रहे। उन्होंने अपनी स्वतंत्रता की रक्षा तो कर ली, परंतु प्रदेश का लैंगिक अनुपात गड़बड़ा गया। युद्ध में भारी संख्या में पुरुष हताहत हुए थे। इसलिए गृहस्थी चलाने की जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर आ गई। स्त्रियां कढ़ाई, बुनाई जैसे हस्तशिल्पों में जुट गईं। हाट-बाजार में सामान ले जाकर बेचने लगीं। महिलाओं की सक्रियता के फलस्वरूप ‘इमा’ जैसे बाजार बने। अपने आप में अद्वितीय। ऐसे बाजार जिन्हें केवल महिलाएं चलाती हैं। मणिपुर के हस्तशिल्प ने अंग्रेज व्यापारियों को आकर्षित किया था। मारवाड़ी भी वहां पहुंचे। अंग्रेज व्यापारियों के साथ मिलकर वे स्थानीय बाजार पर छा गए।

1891 में मणिपुर अंग्रेजों के अधिकार में आ गया। राजा से सेना और हथियार रखने के अधिकार छीन लिए गए। अंग्रेजों की ओर से राजनीतिक प्रतिनिधि, जिसे राज्याध्यक्ष का दर्जा प्राप्त था, शासनकार्य संभालने लगा। अंग्रेज राजा को शक्तिविहीन-श्रीविहीन कर चुके थे, परंतु मणिपुर के नागरिकों की स्वातंत्र्य-चेतना मरी नहीं थी। इस कारण वहां अंग्रेज प्रशासकों को अनेक प्रतिरोध का सामना करना पड़ता था। स्थानीय नागरिकों का प्रतिरोध भिन्न-भिन्न रूपों में सामने आता था। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में महिलाओं का वर्चस्व हो तो प्रतिरोध के मामले में वे भला कैसे पीछे रह सकती थीं। पहले नुपी लेन(Nupi-Lan) को वहां ‘महिला-युद्ध’ के रूप में देखा जाता है। लेकिन उसके मूल में दास प्रथा और नाकारा शासन-व्यवस्था थी। धर्मसत्ता और राजसत्ता ने मिलकर तरह-तरह के टैक्स जनता पर थोपे हुए थे। कर-वसूली के लिए अमानवीय बल-प्रयोग आम बात थी। उनसे वहां का सामान्य जनजीवन त्रस्त था।

पहले महिला-विद्रोह(नुपी लेन) की कहानी 15 मार्च 1904 से आरंभ हुई। कुछ विद्रोहियों ने औपनिवेशिक सरकार के राजनीतिक प्रतिनिधि तथा सुपरिटेंडेंट जे। जे। डनलप के बंगले को आग लगा दी। उस घटना के बारे में जांच-पड़ताल चल ही रही थी कि छह महीनों के भीतर 4 अगस्त को डनलप और सहायक राजनीतिक प्रतिनिधि एवं राज्याध्यक्ष आई। आर। नटाल के बंगले दुबारा आग के हवाले कर दिए गए। उससे पहले 6 जुलाई 1904 को विद्रोहियों ने राजधानी इंफाल के सबसे बड़े व्यापारिक स्थल, ख्वारमबंद बाजार में भी आग लगा दी थी। विद्रोहियों के सुराग के लिए अंग्रेज शासकों ने काफी जतन किए। आगजनी को षड्यंत्र मानते हुए डनलप ने सुराग देने के वाले को 500 रुपये का ईनाम भी घोषित किया। लेकिन कोई भी आगे नहीं आया। तिलमिलाए डनलप ने वर्षों पहले समाप्त कर दी गई बेगार पृथा लालअप(Lalup) को इंफाल में दुबारा शुरू करने का ऐलान कर दिया। पाखनग्बा राजाओं के शासनकाल में आरंभ हुई ‘लालअप’ पृथा असल में कराधान प्रणाली थी। जिसमें जनता को प्रत्येक 40 दिनों में से 10 दिन बेगार ली जाती थी। इस तरह स्थानीय जनता से उसके 25 प्रतिशत श्रम-दिवस कराधान के बहाने झटक लिए जाते थे। डनलप ने घोषणा की थी कि क्षतिग्रस्त भवनों का पुनर्निर्माण के लिए स्थानीय जनता को बेगार करनी होगी।

मनुष्य प्रकृति से आजाद होता है। जब भी उसे अपनी स्वाधीनता पर खतरा दिखाई देता है, विद्रोह की स्वाभाविक चेतना उसके भीतर उमगने लगती है। चूंकि मनुष्य का व्यवहार उसके विवेक के साथ-साथ परिस्थितियों भी प्रभावित होता है। इससे संभव है, उसकी कोई तात्कालिक प्रतिक्रिया न हो। कई बार तात्कालिक प्रतिक्रिया न होना भी अच्छा होता है। विशेषकर सामाजिक परिवर्तन की दृष्टि से। स्थायी परिवर्तन के लिए वही बदलाव कामयाब होते हैं, जो लंबे समय तक सुलगती सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना का परिणाम हों। क्योंकि इस बीच उत्पीड़ित जन, उत्पीड़क सत्ता के मनोविज्ञान को पहचानकर उसका सामना करने की रणनीति तैयार कर लेते हैं। भारतीय स्वाधीनता संग्राम ऐसे ही सत्ता विरोध का परिणाम था। जबकि 1857 का प्रथम स्वाधीनता संग्राम सैनिकों के तात्कालिक आक्रोश की परिणति होने के कारण अपेक्षित सफलता प्राप्त न कर सका था। दक्षिण में पेरियार द्वारा शुरू किए गए ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की सफलता के मूल में भी लोगों के मन में वर्ण-व्यवस्था के प्रति शताब्दियों पुराने आक्रोश की भूमिका थी। लंबे समय की परतंत्रता के कारण मनुष्य की स्वातंत्र्य-चेतना कमजोर पड़ सकती है। कई बार वह परिस्थितियों से समझौता कर लेता है। परिणामस्वरूप पराधीनता उसे समाज और संस्कृति का सहज-स्वाभाविक हिस्सा लगने लगती है। ऐसे में यदि कोई उसे स्वतंत्रता का बोध करा दे, अथवा उसे पराधीनता के कारणों का पता चल जाए तो वह दुबारा दासता के लिए आसानी से तैयार नहीं होता।

डनलप के ऐलान के साथ के साथ ही लोगों को ‘लालअप’ पृथा की वापसी का डर सताने लगा था। जनमानस में बढ़ता आक्रोश देख पंचायत और स्थानीय मुखियाओं के एक दल ने डनलप से भेंट कर फैसला वापस लेने की अपील की। डनलप का कहना था कि स्थानीय पुलिस और चौकीदार अपनी जिम्मेदारी निभाने में नाकाम रहे हैं। उसने धमकी दी कि आदेश के विरोध को ‘राजद्रोह’ माना जाएगा। भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए पुलिस चौकियां बनाई जाएंगी। उनका खर्च भी स्थानीय जनता से वसूला जाएगा। इन सूचनाओं ने आग में घी डालने का काम किया।

5 अक्टूबर की सुबह को महिलाएं निकल पड़ीं। लगभग 3000 निहत्थी महिलाओं ने डनलप के आवास को घेर लिया। वे लालअप के आदेश को वापस लेने की मांग पर अड़ी थीं। आंदोलनकारियों के बढ़ते दबाव को देखते हुए डलनप को आदेश पर पुनर्विचार करने का निर्णय लेना पड़ा। स्थानीय अधिकारियों के आश्वासन पर महिलाएं वापस लौट आईं। मगर उसी दिन शाम को ख्वारमबंद बाजार में 5000 से अधिक महिलाओं की भीड़ जुट गई। वे अंग्रेज प्रशासक द्वारा दिए गए आदेश पर अमल चाहती थीं। आखिर आंदोलनकारियों की जीत हुई। लालअप आदेश को वापस ले लिया गया। यह अशिक्षित, गंवई, गरीब और साधनविहीन महिलाओं की बड़ी कामयाबी थी। इतिहास में अपने किस्म की अनूठी घटना।

दूसरा नुपी लेन

दूसरे ‘नुपी लेन’ की परिस्थितियां भिन्न थीं। मगर पहले नुपी लेन की भांति वह भी महिलाओं का स्वयं-स्फूर्त आंदोलन था। उसका दायरा पहले नुपी-लेन की अपेक्षा काफी विस्तृत था। आरंभ में आंदोलनकारी महिलाएं चावलों के बढ़ते मूल्य तथा उनके निर्यात पर पाबंदी के लिए एकजुट हुई थीं। बाद में उनका लक्ष्य बढ़ता गया। उसमें वाखई सेल, मेगा सेखई तथा मांग्बा-सेंग्बा जैसी कुरीतियों से मुक्ति की मांगें भी शामिल होती गईं। अंग्रेजों के आने के बाद ‘लालअप’ नामक बेगारी की प्रथा समाप्त हो चुकी थी। उसके स्थान पर सरकार ने नई कराधान प्रणाली लागू की थी, जिसके अनुसार खाड़ी क्षेत्र में 2 रुपये प्रति आवास तथा पहाड़ी क्षेत्र में तीन रुपये प्रति आवास का नया कर लगाया गया था। कृषि-योग्य भूमि भी कराधान के दायरे में आती थी। कर-वसूली के लिए जबरदस्ती करना आम बात थी। उसके कारण जनता में आक्रोश था। शासन प्रणाली में शिखर पर महाराजा और ब्रिटिश सरकार का प्रतिनिधि था, जो ‘दरबार’ की मदद से शासन करते थे। दरबार में अधिकांश प्रतिनिधि राजा की ओर से नियुक्त किए जाते थे। आमतौर पर वे उसके सगे-संबंधी होते थे। बड़े व्यापार पर मारवाड़ियों का कब्जा था। सबने मिलकर आम जनता पर तरह-तरह के कर लादे हुए थे।

1939 में चारुचंद मणिपुर का महाराजा था, लेकिन नाममात्र का। अधिकांश अधिकार औपनिवेशिक सरकार के प्रतिनिधि के अधीन थे। बड़े फैसलों में उसी की मनमानी चलती थी। राजसत्ता और धर्मसत्ता की ओर से थोपे गए करों का बोझ आमजन को उठाना पड़ता था। वाखई सेल(Wakhei sel), मांग्बा-सेंग्बा(Mangba-Sengba), पंडित लोइशंग(Pandit Loishang), चंदन सेंखाई(Chandan Senkhai) तथा कुंजा सेन(Kunja Sen) असल में जनता से वसूले जाने वाले तरह-तरह के टैक्स थे। इनमें से कुछ तो बड़े ही विचित्र थे। उनके पीछे राजसत्ता और धर्मसत्ता का स्वार्थमय गठजोड़ था। कई कर मनुष्य के जनजीवन से जुड़ी सामान्य गतिविधियों के नाम पर लगाए गए थे। वे मनुष्य की मौलिक स्वतंत्रता का हनन करते थे। ‘वाखई सेल’ भूमि के बंदोबस्त, चकबंदी से जुड़ा था, जबकि ‘पंडित लोइशंग’ ब्राह्मण मंडल के नाम पर थोपा हुआ कर था। ‘चंदन सेंखाई’ माथे पर तिलक लगाने के नाम पर वसूला जाता था। उसके अनुसार प्रत्येक हिंदू परिवार को ‘चार आना’ केवल माथे पर तिलक लगाने के लिए चुकाना पड़ता था। ‘कुंजा सेन’ वेशभूषा कर था। इनके अतिरिक्त गायकों के नाम पर भी टैक्स का प्रावधान था।

‘मांग्बा-सेंग्बा’ सबसे निकृष्ट और अमानवीय कराधान व्यवस्था थी। यदि कोई व्यक्ति सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन करता हुआ पाया जाता अथवा ब्रह्म-सभा की सत्ता को चुनौती देता या किसी कारणवश ब्रह्म-सभा उससे रुष्ट हो जाती थी, तो ऐसे व्यक्ति को अशुद्ध(मांग्बा) घोषित कर दिया था। ‘मांग्बा’ घोषित व्यक्ति अपने समाज और जाति के लिए अछूत हो जाता था। शुद्धीकरण(सेंग्बा) यानी समाज में पुनर्वापसी के लिए उसे भारी जुर्माना भरना पड़ता था। जुर्माने की दर अलग-अलग थी। यदि निचली सभा व्यक्ति को अशुद्ध घोषित करती, तो मात्र 50 रुपये की क्षतिपूर्ति देकर शुद्धीकरण किया जा सकता था। लेकिन यदि ब्रह्म सभा के अशुद्ध घोषित करने पर 85 रुपये 23 पैसे। ‘ब्रह्म सभा’ के अध्यक्ष के रूप में राजा भी किसी व्यक्ति को अशुद्ध घोषित कर सकता था। महाराजा द्वारा ‘मांग्बा’ घोषित व्यक्ति को अपने शुद्धीकरण के लिए, 500 रुपये की मोटी धनराशि भेंट करनी पड़ती थी।

महाराजा चारुचंद्र सिंह के शासनकाल में ‘मांग्बा-सेंग्बा’ की समस्या प्लेग की तरह भयावह हो चुकी थी। उसका सामना गरीब, विपन्न और कमजोर तबके को करना पड़ता था। ‘लालअप’ से मिलती-जुलती ‘पोथांग’ जैसी बेगार पृथा भी थी। उसके अनुसार राजा, शाही परिवार का और कोई सदस्य अथवा अंग्रेज अधिकारी जब भी यात्रा या शिकार पर निकलते तो मैदानी और पहाड़ी दोनों इलाकों में उन्हें तथा उनके सामान को ढोने की जिम्मेदारी स्थानीय प्रजा की होती थी। भोजन और मनोरंजन आदि का प्रबंध भी गरीब जनता को करना पड़ता था। लोगों का विश्वास था कि महाराजा ने ‘ब्रह्म सभा’ के प्रभाव में आकर इन करों को थोपा हुआ है। संवैधानिक सुधारों के बिना उनसे मुक्ति असंभव है। यह आधुनिक चेतना थी जो लगभग सभी पूर्वोत्तर के सभी प्रदेशों में एक साथ पनप रही थी। लोग राजा की शक्तियों पर नियंत्रण चाहते थे। यही वे कारण थे जिन्होंने दूसरे ‘महिला युद्ध’ की जमीन तैयार की थी। दूसरे ‘महिला युद्ध’ को निखिल मणिपुरी महासभा का समर्थन प्राप्त था।

1938-39 में मणिपुर को भारी बाढ़ का सामना करना पड़ा था। बाढ़ से तबाह हुई संपत्ति की मरम्मत हेतु दरबार की ओर से 16000 रुपये की धनराशि स्वीकृत की गई। लेकिन फसल से हुए नुकसान की भरपाई होना मुश्किल था। फसल मारे जाने से खाद्य-सामग्री के दाम तेजी से बढ़ने लगे। राज्य में अकाल जैसे हालात पैदा हो गए। हालात को काबू करने के लिए दरबार ने चावल, चिवड़ा के निर्यात को अपने नियंत्रण में ले लिया। आदेश दिया गया कि यदि निर्यात आवश्यक हुआ तो वह केवल राज्य के अन्न-भंडारों के माध्यम से किया जा सकेगा। चावल तथा उसके उत्पादों के निर्यात को हालांकि राजा की मंजूरी प्राप्त नहीं थी। लेकिन ब्रिटिश सरकार के राजनीतिक प्रतिनिधि ने उसके पीछे राजा का हाथ मानते हुए, तत्काल प्रतिबंध उठा लेने का निर्देश दिया। दबाव में आकर राजा वैसा ही आदेश देना पड़ा। अंततः चावल तथा चावल उत्पादों के निर्यात से प्रतिबंध हटा लिया गया। जनता पर इसका उल्टा असर पड़ा। उन्हें अकाल का डर सताने लगा। अफवाहों ने काम किया। लोग गुस्से से उबलने लगे।

चावल और धान के निर्यात की अनुमति का असर स्थानीय बाजारों में आपूर्ति पर पड़ा। परिणामस्वरूप उनके दाम तेजी से बढ़ने लगे। अफवाहों का बाजार पुनः गर्म हो गया। स्त्रियों के अहिंसक आंदोलन का पहला निशाना बनीं खुमुककेम(Khumukcham Tclchcu vhc) चावल मिल, जो चावल के निर्यात में अग्रणी थी। आंदोलनकारी महिलाओं ने मिल बंद करने को विवश कर दिया। उसके बाद वे साहसी महिलाएं सीधे राजनीतिक प्रतिनिधि क्रिस्टोफर जिमसन के सहायक टी। ए। शार्पे के पास पहुंचीं तथा उससे चावल निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की मांग की। उनका आक्रोश देख शार्पे ने अगले दिन तक संबंधित आदेश जारी करने का आश्वासन दिया। उसके बाद आंदोलनकारी महिलाएं वापस लौट आईं। मगर आंदोलन का यही समापन नहीं था। अगले दिन बाजार में काम करने वाली महिलाओं ने बिक्री के लिए आए धान की गाड़ियों को अपने कब्जे में ले लिया। कब्जे में लिए गए धान को इकट्ठा कर वे दरबार की इमारत के आगे पहुंचीं तथा किसी भी सूरत में धान और चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की मांग करने लगीं।

महिलाओं का आक्रोश देख दरबार के सदस्य एक-एक कर बाहर निकल गए। केवल राजनीतिक प्रतिनिधि वहां रह गया। महिलाएं घेरा डाले पड़ी थीं। वे उससे निर्यात पर तत्काल प्रतिबंध की मांग कर रही थीं। फंसे हुए राजनीतिक प्रतिनिधि ने महाराज की अनुपस्थिति में प्रतिबंध के आदेश देने में असमर्थता प्रकट की। इसपर औरतों ने कहा कि वे महाराज को टेलीग्राम कर, तत्काल आने को कहें। उग्र महिलाओं ने राजनीतिक प्रतिनिधि को अपने साथ तार-घर तक चलने को विवश कर दिया। आंदोलनकारियों का व्यवहार देखकर राजनीतिक प्रतिनिधि ने असम रायफल्स के कमांडर बुलफिल्ड को संदेश भेजकर स्थिति से परचाया। हालात की गंभीरता समझते हुए बुलफिल्ड फौज की टुकड़ी के साथ वहां पहुंच गया। पुलिस बल को वहां देख आंदोलनरत महिलाओं का गुस्सा और भी बढ़ गया। उसकी परिणति महिलाओं और सिपाहियों के बीच झड़प के रूप में हुई। घायल महिलाओं को इंफाल के अस्पताल में भर्ती कराया गया। अगले दिन महाराज की ओर से चावल के निर्यात पर प्रतिबंध के आदेश आ गए। उसके अनुसार असम रायफल्स की कोहिमा और इंफाल छावनियों को छोड़कर बाकी निर्यात को प्रतिबंधित कर दिया गया था।

उसी दिन आदेश पर अमल के लिए महिलाएं दुबारा राजनीतिक प्रतिनिधि और इंजीनियर के आफिस पहुंचीं। उन्होंने दोनों को अपने साथ चलने के लिए विवश कर दिया। दोनों अधिकारियों को साथ लेकर आंदोलनकारी महिलाएं चावल मिलों तक पहुंची। वहां उन्होंने मिलों के विद्युत कनेक्शन काटने के लिए विवश कर दिया। ख्वारेमबंद बाजार में पूरे सात दिनों तक हड़ताल रही। आंदोलनकारी महिलाओं ने बाजार पहुंचकर माल बेचने बैठे दुकानदारों का सारा सामान उलट-पुलट दिया। इतने प्रयासों के बावजूद बाजार में चावल का भाव गिर नहीं रहा था। महिलाओं ने पाया कि प्रतिबंध के बाद भी दुकानदार माल को मुनाफे के लिए यहां से वहां ले जा रहे हैं। उसे रोकने के लिए 28 दिसंबर को महिलाओं का एक जत्था इंफाल के निकट केसमपेट नाम स्थान पर पहुंचा। वहां उन्होंने चावल से लदी नौ गाड़ियों को गुजरते हुए देखा। महिलाओं ने उन गाड़ियों को अपने अधिकार में ले लिया। उन्होंने गाड़ीवान पर दबाव डाला कि वह चावलों को एक रुपया बारह आना प्रति मन(चालीस सेर) के हिसाब से बेचे। चावलों का व्यापारी उस माल को सीधे दुकानदारों को, ऊंचे दाम पर बेचना चाहता था। उसके कहने पर गाड़ीवान ने चावल को सस्ता बेचने से इन्कार कर दिया। इसपर आंदोलनकारी महिलाएं भड़क गईं। कुपित महिलाओं ने सारा चावल बिखेर दिया और गाड़ीवान को मारने के लिए चढ़ गईं। अभी तक महिलाओं का आंदोलन अहिंसक चल रहा था। लेकिन ख्वारेमबंद बाजार और केसमपेट की घटनाओं में महिलाओं का उग्र रूप सामने आया था। इसके बाद शासन को आंदोलनकारियों पर बल प्रयोग का बहाना मिल गया। पुलिस बल ने हस्तक्षेप करते हुए आंदोलनकारी महिलाओं को गिरफ्तार कर लिया।

दूसरा ‘नुपी-लेन’ लगभग 14 महीनों तक चला था। इतने दिनों तक महिला बाजार भी अस्त-व्यस्त रहा। महिलाएं वहां माल बेचने पहुंचतीं तो पुलिस बल निगरानी के लिए पहुंच जाता। इससे आंदोलनकारियों में फूट पड़ने लगी। बावजूद इसके उस ‘नुपी-लेन’ की सफलताएं कम नहीं थीं। असम रायफल्स की दो छावनियों को छोड़कर चावल बाहर भेजने प्रतिबंध लग चुका था। आंदोलन का असर वाखई सेल, मांग्बा-सेंग्बा, चंदन शेखई जैसे कानूनों पर भी पड़ा था। उसने पूरे मणिपुरी समाज को जाग्रत करने का काम किया था। फलस्वरूप मणिपुर में कानून के राज्य और संवैधानिक सुधारों का मार्ग प्रशस्त हुआ। आंदोलन के दौरान महिलाएं बजाय किसी नेता के ‘मणिपुर माता की जय’ के साथ आगे बढ़ती थीं। मणिपुर में ‘वंदेमातरम’ गीत सबसे पहले दूसरे नुपी-लेन के दौरान गूंजा था।

दूसरे नुपी-लेन की एक विशेषता यह भी थी कि अपनी एकता, संगठन सामर्थ्य और सूझबूझ के कारण महिलाओं ने शासन-प्रशासन को अपने पीछे चलने के लिए विवश कर दिया था। बावजूद इसके उस आंदोलन के लिए किसी भी महिला को सजा नहीं हुई। पिछले 12 दिसंबर 2018 को राज्य सरकार द्वारा राजधानी इंफाल में ‘नुपी लेन दिवस’ के रूप में, राजकीय स्तर पर बड़ी धूमधाम से मनाया गया। उसमें राज्य सरकार ने निर्णय लिया कि आंदोलन के साक्षी रहे, कासिमपेठ से संजेनथोंग(इंफाल) मार्ग का नामकरण दूसरे नुपी लेन की आंदोलनकारी ‘इमास’(माओं) और इच्स(बहनों) की याद में ‘नुपी लेन रोड़’ के रूप में किया जाएगा।

ओमप्रकाश कश्यप

समाजवाद और सामाजिक न्याय

सामान्य

स्वाधीनता आंदोलन के दौरान तय था कि स्वतंत्र भारत का मूल चरित्र समाजवादी राज्य का होगा. गांधी घोषित रूप में समाजवादी नहीं थे, मगर अंत्योदय का उनका विचार समाजवाद और सामाजिक न्याय की आवश्यकता एवं उनके महत्त्व को रेखांकित करता है. आधुनिक भारत के निर्माताओं में अग्रणी डॉ. आंबेडकर मूलतः अर्थशास्त्री थे. उनके विचार और संविधान का स्वरूप कल्याण राज्य की अवधारणा का समर्थन करते हैं. आगे चलकर उन्होंने स्वयं को समाजवादी नेताओं तथा संगठनों से अलग रखा तो उसके इतर कारण थे. यूरोपीय जीवनशैली में पले-बढ़े जवाहरलाल नेहरू रूसी क्रांति से प्रभावित थे. उनके नेतृत्व में भारत मिश्रित अर्थव्यवस्था वाला देश बना.

समाजवादी चेतना और इंदिरा गांधी

इंदिरा गांधी द्वारा संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवाद’ शब्द जोड़ने को कुछ लोग राजनीति मानते हैं. राजे-रजबाड़ों के प्रिवी पर्स की समाप्ति, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, भूमि सुधार, महिलाओं के लिए समान वेतन जैसे कानून, देश को समाजवादी राज्य में ढालने की नीति का ही हिस्सा था. उन्हीं के कारण इंदिरा को सामंतों, राजे-रजबाड़ों और जमींदारों के आक्रोश का सामना करना पड़ा था. वे जनसंघ के बैनर तले उनके विरोध में संगठित होने लगे. बिहार सर्वाधिक भू-असमानता वाले प्रांतों में से था. वहां जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में शुरू हुआ ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन, ठेठ प्रतिक्रियावादी आंदोलन था. परिणामस्वरूप जनता पार्टी की सरकार बनी. जगजीवन राम के बजाय मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री मनोनीत किया गया, जो तत्कालीन नेताओं की दलित और पिछड़ा विरोधी मानसिकता को दर्शाता था.

‘जनता पार्टी’ का प्रयोग भले असफल रहा हो, ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन पूर्णतः निष्फल नहीं था. उससे पिछड़ी तथा निचले क्रम की जातियों में राजनीतिक चेतना का संचार हुआ था. भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल उसी के गर्भ से निकली हुई पार्टियां हैं. इनमें ‘भारतीय जनता पार्टी’ समाज के प्रभुवर्ग के हितों की रक्षा को समर्पित है. यह उसने पिछले पांच वर्षों के दौरान सिद्ध भी किया है.

त्रिवेणी संघ’ और लालू प्रसाद यादव

लालू यादव ने ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था. मीसा कानून के अंतर्गत जेल भी गए थे. परंतु जिस राजनीति के आधार पर कालांतर में उन्होंने सफलता प्राप्त की, आज भी बिहार की राजनीति में उनकी प्रतिष्ठा हैーउसकी जमीन ‘त्रिवेणी संघ’ द्वारा तैयार की गई थी. निचली-मंझोली जातियों को संगठन का महत्त्व समझाने के साथ-साथ पहली बार, त्रिवेणी संघ ने ही ब्राह्मणवाद से मुक्ति का नारा दिया था. उसने सामाजिक न्याय के पक्ष में भी आवाज उठाई थी. मगर राजनीतिक पटल पर ‘सामाजिक न्याय’ का प्रतिनिधित्व हुआ ‘बहुजन समाज पार्टी’ के उभार से, जिसका गठन मान्यवर कांशीराम द्वारा फुले और आंबेडकर के सपनों को साकार करने के लिए किया गया था.

साम्यवादी नेताओं की सवर्ण मानसिकता

भारत में अस्सी के दशक तक समाजवाद देश के सर्वाधिक लोकप्रिय शब्दों में से था, जबकि ‘सामाजिक न्याय’ का कोई नामलेवा न था. क्योंकि जिस वर्ग के लिए ‘सामाजिक न्याय’ अपेक्षित है, वह राजनीतिक समझ और अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की ओर से बेखबर था. समाजवाद के नाम पर जो भी नेता सत्ता में आए, किसी न किसी रूप में वे सभी पूंजीवाद और सामंतवाद का पोषण करते रहे. साम्यवादियों के आदर्श श्रीपाद अमृत डांगे(आदिम साम्यवाद) और करपात्री(मार्क्सवाद और रामराज्य) जैसे लेखक बने. डांगे यज्ञ को ‘आर्य साम्य-संघ की सामूहिक उत्पादन पद्धति’ मानते थे तो करपात्री के लिए रामराज्य, मार्क्सवाद से कहीं अधिक उन्नत राजनीतिक व्यवस्था थी. भारतीय साम्यवादी दलों पर आज भी इसी मानसिकता के नेताओं का कब्जा है.

समाजवाद की कमजोरी

संविधान की प्रस्तावना का हिस्सा बनने तथा लोहिया जैसे नेताओं के बावजूद भारत में यदि समाजवादी आंदोलन असफल रहा है तो उसके पर्याप्त कारण हैं. समाजवादी व्यवस्था में समस्त संसाधन राज्य के अधिकार में होते हैं. अपेक्षा की जाती है कि राज्य संसाधनों का प्रबंधन इस प्रकार करेगा कि उनका लाभ ऊपर से नीचे तक सभी नागरिकों को समानरूप से मिल सकेगा. विशेषकर उन्हें जो किसी न किसी कारण से वंचना का शिकार रहे हैं. समाजवाद की कमजोरी है कि वह संसाधनों को राज्य के अधिकार में पहुंचाने के बाद मौन हो जाता है. राज्य पर नियंत्रण करने वाली शक्तियां कौन-सी हैं? उनका मिजाज कैसा है? उनका आचरण निष्पक्ष है अथवा पक्षपातपूर्णーइसपर वह ध्यान नहीं देता. यदि उन संस्थाओं पर खास वर्गों का कब्जा हो, उनका जो सत्ता को अपना विशेषाधिकार मानते हैं, तो समाजवाद के सारे लाभ धरे के धरे रह जाते हैं. समाजवाद की ढुलमुल परिभाषा का लाभ उठाकर हिटलर जैसा तानाशाह भी समाजवादी होने का दावा करता था. चीनी राष्ट्रपति झी जिनपिंग अपनी साम्राज्यवादी नीतियों को ‘चीनी मिजाज का समाजवाद’ कहकर आगे बढ़ा रहे हैं.

समाजवाद और सामाजिक न्याय

समाजवादी राज्य के मायने क्या हैं, उसका कर्तव्य क्या होना चाहिए, संसाधनों के हाथ में आने के बाद कैसे उनका उपयोग न्यायसंगत और कल्याणकारी राज्य की मान्यताओं के अनुरूप होーयह दृष्टि सामाजिक न्याय समाजवाद को देता है. भारत जैसे देश में जहां समाज जाति और वर्ग के नाम पर बुरी तरह बंटा हो, वहां समाजवाद की सफलता सामाजिक न्याय संबंधी नीतियों के कार्यान्वन पर निर्भर करती है. सामाजिक न्याय अपेक्षाकृत आधुनिक विचार है. वह राज्य के कर्तव्य, उसकी न्यायभावना का संकेतक है और कसौटी भी. सामाजिक न्याय समाजवाद की दुर्बलताओं, उलझनों और असमंजसों के बीच अपनी जगह बनाता है. साथ ही राज्य को कल्याणोन्मुखीफैसले लेने में मदद करता है.

चाहें तो लोकतंत्र को भी इनमें जोड़ सकते हैं. अधिनायकवादी राज्य में संसाधनों का प्रयोग शासक वर्ग और उसके चहेतों के वैभव-विलास तक सिमट जाता है. ऐसे राज्य में न तो समाजवाद फल-फूल सकता है, न ही सामाजिक न्याय के लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है. फासीवादी तथा पूंजीवादी राज्यों में सामाजिक न्याय संभव ही नहीं है. कुल मिलाकर सामाजिक न्याय, समाजवाद और लोकतंत्र तीनों एक-दूसरे के पूरक और अस्तित्व की कसौटी हैं.

भारत में आर्थिक असमानता के अलावा जातीय असमानता जैसी विकृत और अमानवीय व्यवस्था भी है. समानता-आधारित समाज के लिए, जाति पर प्रहार करना आवश्यक है. ‘जाति का उच्छेद’ शीर्षक से तैयार किए गए ऐतिहासिक व्याख्यान में डॉ. आंबेडकर की हिंदुवादियों से यही अपेक्षा थी. उस समय उन्हें भाषण देने से रोक दिया गया था. आज भी जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त छद्म समाजवादी और साम्यवादी भारतीय राजनीति में भरे पड़े है. उनपर तथा ‘भारतीय जनता पार्टी’ जैसे दक्षिणपंथी दलों पर अंकुश रखने के समाजवादी तथा सामाजिक न्याय को समर्पित दलों की एकजुटता आवश्यक है. इसमें लोकतंत्र और संविधान का आदर करने वाले दल भी शामिल हो जाएं तो सोने पर सुहागा.

हाल के आम चुनावों में इस दिशा में कुछ कदम आगे बढ़े हैं. इसकी सफलता भारतीय राजनीति की अगली दिशा तय करेगी.

ओमप्रकाश कश्यप

आधुनिक भारत के निर्माता : महात्मा ज्योतिराव फुले और डा. भीमराव आंबेडकर

सामान्य


मैं मानव-मात्र की समानता में विश्वास करता हूं. मेरे हिसाब से धर्म का अभिप्रायः ऐसे कर्तव्यों का अनुपालन करना है, जिनसे न्याय की स्थापना हो. दिलों में एक-दूसरे के प्रति दया, ममता, करुणा तथा प्रेम का उजियारा हो, ऐसे कर्तव्य करना जिनसे हमारे आसपास के प्राणी अधिकाधिक सुखी रह सके—थॉमस पेन.      

तुम उस समय तक अच्छा समाज नहीं गढ़ सकते जब तक तुम्हें पर्याप्त राजनीतिक अधिकार न हों. न ही तुम उस समय तक अपने राजनीतिक संकल्पों तथा विशेषाधिकारों पर अमल कर सकते हो, जब तक तुम्हारा सामाजिक  तंत्र तर्क और न्याय-भावना पर केंद्रित न हो. तुम उस समय तक अच्छा आर्थिक ढांचा खड़ा नहीं कर सकते जब  तक सामाजिक ढांचा बेहतर न हो. यदि तुम्हारा धर्म नैतिक आधार पर कमजोर और भटकाव-युक्त है तो तुम स्त्री तथा अन्य वर्गों के लिए समानतायुक्त वातावरण नहीं बना सकते. अन्योन्याश्रितता महज दुर्घटना नहीं, कुदरत  का नियम है.—महादेव  गोविंद  रानाडे.

आज देश में लोकतंत्र है. चुनावों के दौरान करीब एक अरब नागरिक अलग-अलग और एक साथ अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं. उसके आधार पर हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश होने का दावा कर सकते हैं. हालांकि कुछ कमजोरियां भी हैं. हमारे यहां भूख है, गरीबी है, भीषण समाजार्थिक असमानता तथा बेरोजगारी है. नेता सब्जबाग दिखाते हैं. सरकारें बनती हैं. जनाकांक्षाओं को पूरा किए बगैर चली भी जाती हैं. उनका शिकार समाज के निम्न-मध्यम, गरीब और विपन्न लोगों को होना पड़ता है. फिर भी चुनावों के दौरान सर्वाधिक भागीदारी इन्हीं लोगों की रहती है. लोकतंत्र से सर्वाधिक उम्मीद भी इसी वर्ग को है. यह उम्मीद नहीं होती, सपने नहीं होते. सपनों को पहचानने, उन्हें पूरा करने की हसरत तथा संघर्ष करने का जज्बा नहीं होता—यदि महात्मा ज्योतिराव फुले और डॉ. आंबेडकर नहीं होते. भारत को आधुनिक राज्य बनाने में इन दो महापुरुषों का सर्वाधिक योगदान रहा है. दोनों अलग-अलग समय में जन्मे. जो फुले का समय है वह डॉ. आंबेडकर का नहीं है. जिस वर्ष आंबेडकर का जन्म हुआ, उससे कुछ महीने पहले फुले दुनिया छोड़ चुके थे. फिर भी लगता है जैसे सबकुछ योजनाबद्ध हो. ओलंपिक के उन खिलाड़ियों की भांति जिनमें एक पूरे संकल्प और इरादे के साथ मशाल लेकर दौड़ता है, फिर उसे आगे वाले खिलाड़ी के हाथों में सौंपकर अंर्तध्यान हो जाता है. दोनों का संघर्ष अपने समाज के अलावा समय के साथ भी है. अतएव बिना उनके इतिहास को जाने, बगैर उस समय की पड़ताल किए—उनके योगदान को समझ पाना असंभव है.

ज्योतिबा फुले द्वारा स्थापित पाठशाला में पढ़ने वाली एक लड़की ने प्रदेश में महार और मांग जातियों की दुर्दशा पर एक निबंध लिखा था. निबंध इतना मार्मिक था कि मराठी समाचारपत्र ‘ज्ञानोदय’ ने 15 फरवरी 1855 के अंक में उसपर एक समाचार प्रकाशित किया. इस घटना का उल्लेख धनंजय कीर ने ‘महात्मा ज्योतिबा फुले’ में किया है. उसमें पेशवाई के अन्याय के विरोध में आक्रोश है, तो अंग्रेजी शासन के प्रति सहानुभूति की झलक भी है. निबंध उस समय के शूद्र एवं अतिशूद्रों की मनोस्थिति का दस्तावेज है—

‘‘ब्राह्मण कहते हैं, वेदों पर उनका विशेषाधिकार है. केवल वही उनका अध्ययन कर सकते हैं. इससे पता चलता है कि हमारा कोई धर्मग्रंथ नहीं है. यदि वेद ब्राह्मणों की रचना है तो उनके अनुसार आचरण करना भी उन्हीं की जिम्मेदारी है. हमें धर्मग्रंथों को पढ़ने की स्वतंत्रता नहीं है. कहना पड़ेगा कि हमारा कोई धर्म नहीं है. हम बिना धर्म के हैं. हे ईश्वर! तू ही बता, तूने हमारे लिए कौन-सा धर्म बनाया है, जिससे ब्राह्मणों की तरह हम भी उसका पालन कर सकें

पहले हम इमारतों की नींव तले दफना दिए जाते थे. शिक्षा सदनों में जाने की हमें अनुमति नहीं थी. यदि कोई ऐसा करे तो उसकी गर्दन नाप दी जाती थी. आज बाजीराव द्वितीय आकर देखे कि अछूत और शूद्र लड़के-लड़कियां स्कूल जा रहे हैं तो ईर्ष्या और क्रोध से उसका दिमाग फट जाएगा—‘अरे! यदि महार और मांग पढ़-लिख जाएंगे तो क्या ब्राह्मण उनकी सेवा करेगा? क्या ब्राह्मण बच्चे उसके लिए बोझा ढोकर लाएंगे? परमात्मा ने हमें ब्रिटिश राज्य की सौगात दी है. आज हमारे कष्टों में कमी आई है. अब कोई हमें परेशान नहीं कर सकता. कोई हमें फांसी नहीं चढ़ा सकता. कोई हमें जिंदा नहीं जला सकता. हमारी संतान सुरक्षित है. हम अपना शरीर ढक सकते हैं. चादर ओढ़ सकते हैं. आज हर किसी को अपने ढंग से जीने की आजादी है. कोई बंधन नहीं, किसी प्रकार का अंकुश नहीं है. कोई प्रतिबंध भी नहीं हैं. यहां तक कि हमें बाजार जाने की भी आजादी है.’’

उसी अखबार ने आगे लिखा था—‘‘वे(अछूत) किसी न्यायालय के भीतर नहीं जा सकते. रोगी का इलाज कराने के लिए उन्हें अस्पताल में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है. किसी सराय में नहीं ठहर सकते. न ही प्रदेश की सार्वजनिक सड़कों पर आने-जाने की अनुमति उनको है. किसान-शिल्पकार की हैसियत से उन्हें सदैव घाटा उठाना पड़ता है, क्योंकि बाजार में दुकान की सीढ़ियां चढ़ने की अनुमति उन्हें नहीं है. मजबूरी में उन्हें अपना माल दलालों के हाथों ओने-पौने भाव बेचना पड़ता है. कुछ तो इतने पतित मान लिए गए हैं कि उनसे कुछ काम नहीं लिया जा सकता….वे केवल भिक्षा के सहारे जीते हैं. भीख मांगने के लिए भी वे सड़क का प्रयोग नहीं कर सकते. उन्हें सड़क से दूर, ऐसी जगह जहां से कोई देख न ले, खड़ा होना पड़ता है. लोगों को आते-जाते देख दूर खड़े-खड़े गुहार लगाते हैं. दया करके यदि कोई दूर से ही भीख उछाल देता है, तो वे उसपर झपट नहीं पड़ते. बल्कि वे वहीं खड़े-खड़े उस समय तक प्रतीक्षा करते हैं, जब तक भीख देने वाला आंखों से ओझल न हो जाए. उसके जाते ही भीख को उठाकर वहां से भाग जाते हैं.’’1

कदाचित वह पहला अवसर था जब कोई अछूत बालिका अपने कष्टों को शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्त कर रही थी; और समाचारपत्र उसकी पीड़ा को सार्वजनिक कर रहा था. उससे पहले शूद्र और अतिशूद्र अपने कष्टों के बारे में बताना तो दूर सोचना तक नहीं जानते थे. उनके लिए सबकुछ नियतिबद्ध, दैवी आदेश जैसा था. शोषण एवं दमन से मुक्ति के लिए ईश्वर की विशेष अनुकंपा की कामना की जाती थी. कहा जाता था कि ईश्वरीय अनुकंपा तभी संभव है जब वे उन कर्मों का निर्वाह पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ करें, जो उनके लिए वर्ण-व्यवस्था द्वारा निर्धारित किए गए हैं. इस तरह दमन और शोषण का सोचा-समझा विधान था. खासकर अश्पृश्यता को लेकर. देवेंद्र कुमार बेसंतरी ने केरल का उदाहरण दिया है—‘नंबूदरी ब्राह्मण नायर जैसे सवर्णों से 32 फुट की दूरी से, नायर इढ़वा लोगों से जो अगम्य थे, परंतु जिनका सामाजिक ढांचे में बहुत ऊंचा स्थान था, 64 फुट कर दूरी से और इढ़वा जाति के लोग अछूतों पुलवा, परेया से सौ फुट की दूरी पर ही अपवित्र हो जाते थे.’(संदर्भ-भारत के सामाजिक क्रांतिकारी, देवेंद्र कुमार बेसंतरी, पेज, 136). ऐसे परिवेश में शूद्र अपने लिए भला कैसे मान-सम्मान की उम्मीद करता! नाउम्मीदी के बीच वे अपना जीवन जीने को विवश थे. पुरोहित वर्ग इसे भाग्यदोष अथवा पूर्व कर्मों का फल कहकर भरमाए रखता था. उत्पीड़न से मुक्ति का एक रास्ता धर्म-परिवर्तन भी था. लेकिन वह भी निरापद न था. जाति प्रथा के विषाणु बाकी धर्मों में भी प्रवेश कर चुके थे. धर्मांतरित व्यक्ति को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता था. यह दुर्दशा क्यों हुई? इसपर फुले ने विचार किया है. शूद्रों-अतिशूद्रों की अशिक्षा का मामला उनके लिए कितना महत्त्वपूर्ण था, वह इससे भी पता चलता है कि ‘किसान का कोड़ा’ पुस्तिका की भूमिका की शुरुआत ही उन्होंने इन शब्दों से की है—‘विद्या न होने से बुद्धि न रही, बुद्धि के न रहने से नैतिकता का हृास हुआ, नैतिकता न रहने से गतिशीलता का लोप हुआ, गतिशीलता के अभाव में धन-दौलत दूर होते गए, धन-दौलत के न रहने से शूद्रों का पतन हुआ. इतना अनर्थ एक अविद्या के कारण हुआ.’ डॉ. आंबेडकर ने बुद्ध और कबीर के अलावा फुले को भी अपना गुरु माना. दलितों की दुर्दशा का मूल कारण अशिक्षा है. दलित युवाओं को शिक्षा का महत्त्व समझाते हुए उन्होंने लिखा—‘शिक्षा शेरनी का दूध है. जो भी पीता है, दहाड़ने लगता है.’ डॉ. आंबेडकर आजीवन दलितों को शिक्षित होने, संगठित रहने तथा अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने का आवाह्न करते रहे.

उस समय के सभी सुधारवादी अंग्रेजी शिक्षा से प्रेरित थे. नई ज्ञान-चेतना, जिसके मूल में जॉन लाक, वाल्तेयर, रूसो, बैंथम, मार्क्स, थॉमस पेन जैसे महान दार्शनिकों की प्रेरणाएं थीं—से लबरेज होकर उन्होंने भारतीय समाज की कुरीतियों को समझा तथा उनसे संघर्ष किया था. बदले में यथास्थितिवादियों का विरोध और उत्पीड़न सहा. अपने-अपने क्षेत्र में वे सब कमोबेश सफल भी रहे. लेकिन उनके कार्यक्षेत्र का दायरा सीमित था. डॉ. आंबेडकर के मतानुसार उनके प्रयास केवल परिवार-सुधार तक सीमित थे.2 

समाज सुधार की दिशा में बहुत आगे बढ़ने की इच्छाशक्ति उनमें नहीं थी. राजा राममोहनराय, ईश्वरचंद विद्यासागर, स्वामी दयानंद जैसे महापुरुषों द्वारा चलाए जा रहे सुधारवादी आंदोलनों का प्रभाव जनता पर पड़ा था. लेकिन सीमित अर्थों में. हेनरी वर्नर हंपटन ने ‘ब्रह्मसमाज’ के संस्थापक राजा राममोहनराय को भारत में सुधारवादी आंदोलन का शिखर पुरुष घोषित करने के साथ-साथ, उन सीमाओं का उल्लेख भी किया है, जिनके पीछे उनके जन्मगत संस्कार थे. हंपटन के अनुसार राजा राममोहनराय, ‘अपने समय से बहुत आगे थे. लेकिन जहां तक शूद्रों की शिक्षा का सवाल है उनका मानना था कि शिक्षा ऊपर से शुरू होकर नीचे तक जानी चाहिए. इस प्रकार आरंभ में धीरे-धीरे, आगे चलकर तेजी से वह जनसाधारण तक पहुंच जाएगी. इस मामले में वे अपने समय की प्रचलित मान्यताओं के समर्थक थे. प्रकारांतर में वे उन लोगों में से थे जो बहुत आशावादी थे.’3 हंपटन ने इसे फिल्ट्रेशन का सिद्धांत कहा है.

‘ब्रह्म समाज’ प्रकट में समाज के जाति-आधारित विभाजन की आलोचना करता था. वर्ण-विभाजन को लेकर उसे कोई शिकायत न थी. उसके द्वारा निर्धारित पूजा-विधानों में पुरोहित की भूमिका केवल ब्राह्मण निभा सकता था. जिसे ऊपर ‘फिल्ट्रेशन का सिद्धांत’ कहा गया है, अर्थशास्त्र की भाषा में उसे ‘ट्रिकिल डाउन थियरी’(रिसाव का सिद्धांत) कहा जाता है. उसके अनुसार समृद्धि ऊपर से नीचे की ओर निस्सरित होती है. गोया समाज को अपने स्वार्थ के अनुसार चलाते आए लोग सुधार को भी अपने स्वार्थानुसार नियंत्रित कर लेते हैं. इसकी सबसे अच्छी व्याख्या डॉ. आंबेडकर ने 1936 में ‘जात-पांत तोड़क मंडल’ के महाधिवेशन के लिए अपने दिए न जा सकने वाले अध्यक्षीय भाषण में की थी. विधवा विवाह, सती प्रथा उन्मूलन, बाल-विवाह की रोकथाम आदि भारतीय समाज की प्रमुख समस्याओं जिनसे भारतीय समाज उन दिनों जूझ रहा था, को उन्होंने ‘हिंदू परिवार का सुधार’ कार्यक्रमों तक सीमित माना था. उनका विश्वास था कि वास्तविक सुधार किसी मसीही कृपा द्वारा संभव नहीं है. उसकी पुनर्रचना केवल समाज के पुनर्गठन द्वारा संभव है(जातिप्रथा का उन्मूलन). वे जानते थे कि शिखर पर मौजूद लोग अपने विशेषाधिकारों को एकाएक छोड़ने को तैयार न होंगे. केवल संगठित शक्ति द्वारा उन्हें काबू में लाया जा सकता है. यह तभी संभव है जब लोग अपने कष्ट, शोक, विपन्नता के प्रति संवेदनशील हों. उनके पीछे निहित कारणों को समझते हों. ऐसे प्रश्नों की ओर लोगों का ध्यान न जाए, इसके लिए धर्म को बीच में लाया जाता है. इस साजिश को फुले ने सबसे पहले समझा था. यह मानते हुए कि दूसरों के भरोसे आदमी अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता, उन्होंने निचली जातियों के युवक-युवतियों की पढ़ाई के लिए स्कूल खोले. सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिए आंदोलन चलाए. धर्म के नाम पर आडंबर फैला रहे ब्राह्मण पुरोहितों को चुनौती दी.

फुले ने जो कहा और जितना लिखा, बहुत बड़ा हिस्सा केवल दो मुद्दों पर केंद्रित है. पहला धर्म के नाम पर ब्राह्मणों द्वारा फैलाए जा रहे आडंबरों का विरोध, दूसरा शूद्र-अतिशूद्र के लिए शिक्षा पर जोर. दोनों मुद्दे बेहद चुनौतीपूर्ण थे. व्यवस्था के शिखर पर कुंडली मारे बैठी शक्तियां खुद को बदलने के लिए तैयार न थीं. जिस ‘फिल्ट्रेशन थियरी’ पर राजा राममोहनराय तथा उनके सहयोगियों की उम्मीदें टिकी थीं, वह नाकाम सिद्ध हुई थी. भारतीय समाज में शिक्षा की स्थिति का आकलन करने के लिए 1882 में ‘इंडियन एजुकेशन मिशन’ की स्थापना की गई थी. अपने अध्ययन के दौरान मिशन ने पाया कि कस्बों और शहरों में शिक्षा में सुधार हुआ था. लेकिन गांवों में वैसे ही हालात थे. शहरों में भी शिक्षा का जितना लाभ ऊंची जातियों ने उठाया था, शूद्रों, अतिशूद्रों तक उतना लाभ नहीं पहुंच पाया था. शिक्षा  विभाग में अधिकांश अध्यापक ब्राह्मण थे. वे निचली जातियों के विद्यार्थियों के साथ भेदभाव बरतते थे. यह बात कमोबेश उस समय के प्रमुख सुधारवादियों पर भी लागू थी. उच्च वर्गों से आए सुधारवादी सुधार तो चाहते थे, लेकिन हिंदू धर्म की मूल संरचना में छेड़छाड़ का न तो उनमें साहस था, न वैसी इच्छाशक्ति. इसीलिए थोड़े अंतराल के पश्चात हिंदू समाज में वही विकृतियां दुबारा पनपने लगती थीं. सती प्रथा पर कानूनी रोक 1829 में ही लग चुकी थी, मगर समाज उस विकृति से पूर्णतः मुक्त नहीं हो पाया था. मुंबई के समाचारपत्र ‘टेलीग्राफ एंड कुरियर’ में नवंबर 1852 में भुज की एक घटना छपी थी—

‘एक स्त्री को बलात् सती के लिए ले जाया जा रहा था. वह बचने के लिए चीख-चिल्ला रही थी. अंग्रेज अधिकारियों ने उसे बचाने का प्रयत्न किया. लेकिन साथ जा रहे ब्राह्मणों ने उसे जबरदस्ती खींचकर पुनः चिता पर बिठा दिया. युवती आगे चीखे-चिल्लाए नहीं इसके लिए उन्होंने उसके सिर पर प्रहार कर उसे बेहोश कर दिया फिर उसी अवस्था में चिता पर लिटाकर आग जला दी गई.’4

विकृति केवल सती प्रथा तक सीमित नहीं थी. प्रसिद्ध उपयोगितावादी दार्शनिक जेम्स मिल ने ‘ब्रिटिश भारत का इतिहास’ तथा अमेरिकी लेखिका कैथरीन मेयो ने ‘मदर इंडिया’ में भारतीय समाज की दुर्दशा का वर्णन किया है. उसके अनुसार पूरा भारतीय समाज घोर जातिवाद और आडंबरों में फंसा था. अनगिनत अंधविश्वास थे. एक अंधविश्वास यह भी था कि गंगा किनारे मृत्यु होने पर मोक्ष प्राप्त होता है. इसलिए बीमार परिजनों को मरणासन्न अवस्था में गंगा किनारे छोड़ देना धार्मिक कर्तव्य माना जाता था. बंगाल में तो यह मान्य प्रथा बन चुकी थी. माना जाता था कि गंगा किनारे मृत्यु होने पर आत्मा सीधे स्वर्ग की ओर प्रयाण कर जाती है. उस समय ‘कलकत्ता रिव्यू’ में ऐसे अनेक समाचार प्रकाशित हुए थे, जिसमें रोगी से छुटकारा प्राप्त करने के लिए उसे मरने के लिए गंगाघाट भेज दिया जाता था. कुछ धर्म-भीरू वृद्धाएं गैहूं या चावल के दाने रात-दिन गिनती रहती थीं. एक लाख की गिनती पूरी होने पर उन्हें दान कर दिया जाता था. तरह-तरह बत्तियां बंटकर दान करने की भी प्रथा थी. कई बार यह मानते हुए कि गाय की सेवा ही मुक्ति दिला सकती है, गाय को अनाज खिलाया जाता. फिर उसके गोबर और मूत्र को श्रद्धापूर्वक ग्रहण किया जाता था. पुजारी वर्ग ऐसे पाखंडों को बढ़ावा देता था. सरकार उनकी अनेक कुरीतियों पर प्रतिबंध लगा चुकी थी. तथापि अशिक्षा  और रूढ़ियों में फंसा धर्मभीरू भारतीय समाज उनसे बाहर निकल ही नहीं पा रहा था.

महाराष्ट्र में 1827 तक एक प्रथा थी कि शंकराचार्य आगमन पर दक्षिणा के रूप जो भी मांग लें उसे देना यजमान का कर्तव्य बन जाता था. इस कुरीति के बारे में किसी ने पूना के कलेक्टर से शिकायत कर दी तो उसने तत्काल उसपर प्रतिबंध लगा दिया. दान का निर्णय शंकराचार्य की मर्जी के बजाय दानदाता की इच्छा पर छोड़ दिया गया. विधवाओं का मुंडन करना, उन्हें शुभ घोषित  कर घर के किसी अंधेरे कोने में रहने के लिए विवश कर देना. अच्छा खाने, पहनने और रहने पर प्रतिबंध लगा देना—उन दिनों के स्त्री जीवन की त्रासदी थी. अगर कोई विधवा गलती से परपुरुषगमन करते हुए पकड़ी जाए तो दोष जानलेवा हो जाता था. 1854 में ऐसे ही एक मामले का शंकराचार्य द्वारा फैसला करने का एक उदाहरण है. घटना के अनुसार मुंहमांगी दक्षिणा का भरोसा होने के पश्चात शंकराचार्य ने विधवा के शुद्धीकरण का आश्वासन दिया. शंकराचार्य के पैर का अंगूठा विधवा स्त्री के सिर पर रखकर उसे पंच-गव्य से स्नान कराया गया. इस बीच लड़की के पिता ने बताया कि उसकी बेटी गर्भवती है, शुद्धीकरण के दौरान इसका भी ध्यान रखा जाए. इसपर शंकराचार्य क्रोधित हो गए. पुरुष हजार बदचलनी करे. इंद्र और विष्णु जैसे देवता दूसरों की पत्नियों के साथ बलात्कार करते फिरें. उससे धर्म की हानि नहीं होती. यदि स्त्री भूलवश भी कुछ कर दे तो ‘वैकुंठलोक’ संकट में पड़ जाता है. अंतत मनोवांछित दक्षिणा की शर्त पर शंकराचार्य ने विधवा के ‘उद्धार’ की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली. उन्होंने युवती को खोखले पेड़ के तने में रखकर आग लगाने का विधान किया. लड़की के पिता से कहा कि ‘अग्निपरीक्षा’ के बाद भी यदि उसकी बेटी बच रहती है तो उसका सिर मुंडवाने तथा एक सहस्र  ब्राह्मणों को भोज कराने के उपरांत उसका शुद्धीकरण संभव है.

ऐसा नहीं कि इन घटनाओं का हिंदू समाज के भीतर कोई विरोध नहीं था. यहां तक कि सवर्णों में भी ऐसे लोग मौजूद थे जो सामाजिक विकृतियों का विरोध करते थे. लेकिन उन लोगों की संख्या बहुत कम थी. 94 प्रतिशत जनता अशिक्षित थी. बाकी 6 प्रतिशत किसी न किसी रूप में उस व्यवस्था से लाभान्वित थे. वे सरकार और समाज के शीर्षस्थ पदों पर थे. बेहद जटिल सामाजिक ताने-बाने में फंसा आम आदमी केवल कराह सकता था. आडंबरों का बोलबाला था. तरह-तरह के भय दिखाकर पंडे-पुरोहित उसे लूटते रहते थे—

‘प्रत्येक नागरिक राज्य को कर देने से ज्यादा ब्राह्मणों को दान करता है. जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत, वह भू-देवता ब्राह्मणों का पोषण करने में लगा रहता है. जातक के जन्म के समय ब्राह्मण को भोजन कराना जरूरी माना जाता है, नहीं तो बच्चे के आजीवन कंगाल बने रहने की संभावना रहती है. जन्म के सोलहवें दिन घर के शुद्धीकरण की रस्म मनाई जाती है, उसमें भी ब्राह्मण को दक्षिणा दी जाती है. कुछ दिन बाद बच्चे के नामकरण के नाम पर फिर ब्राह्मण को दक्षिणा. तीसरे महीने मुंडन की रस्म होती है, ब्राह्मण पुनः दक्षिणा लेने पहुंच जाता है. उसके बाद अन्नप्राशन संस्कार. शिशु जब पहली बार अन्न चखता है, तब भी ब्राह्मण को भुगतान किया जाता है. बालक चलने लगता है तो एक बार फिर ब्राह्मण को दक्षिणा दी जाती है. साल-भर बाद बालक का जन्मदिवस आ जाता है. ब्राह्मण को फिर भोग के लिए आमंत्रित किया जाता है. वह आता है और दक्षिणा के साथ वापस लौटता है. सात वर्ष का होने पर बालक का शिक्षा  संस्कार होता है. उस समय भी ब्राह्मण को  भोज और दक्षिणा के लिए आमंत्रित किया जाता है.’5

उपनयन के बाद भी अनेक संस्कार थे, जिनसे हिंदुओं को गुजरना पड़ता था. सामाजिक संबंध और मर्यादाओं के निर्वहन के लिए बहुत जरूरी था. ‘किसान का कोड़ा’ में फुले ऐसी कई स्थितियों का वर्णन करते हैं, जिनमें पुरोहित द्वारा यजमान को डराकर, प्रलोभन देकर तरह-तरह से धन ऐंठते रहते थे. अधिकांश के लिए वही जीवन है. धर्म, संस्कृति और परंपरा के नाम पर वे अत्याचार को चुपचाप सह लेते हैं. लोगों को धर्म और ईश्वर का भय दिखाना पंडित का पुश्तैनी धंधा है. उस को जमाए रखने के लिए वह नए-नए देवता गढ़ता है. कर्मकांड की अमर-बेलि चढ़ाता है. परंपराओं का मनमाना विश्लेषण तो आम बात है. हालात जो भी हों, धर्म लोगों के विवेक पर पर्दा डालता है. लोगों की अज्ञानता तथा धर्म के बहाने भीतर पैठाए गए डर की मदद से पंडित पूरे समाज पर राज करता आया है. जनसंख्या की दृष्टि से वह अल्पसंख्यक है. मगर संगठन के आधार पर सबसे ताकतवर. अनगिनत जातियों, उपजातियों में विभाजित शूद्र-अतिशूद्र संख्या-बहुल होकर भी शक्ति-विपन्न बने रहते थे. दूसरी ओर ब्राह्मण के मुंह से निकले प्रत्येक शब्द को ज्ञान मान लिया जाता था. लोकश्रुति के अनुसार रामानंद नहीं चाहते थे कि कबीर को दीक्षा दें. मगर धुन के पक्के कबीर बनारस के गंगा घाट की सीढ़ियों पर जाकर लेट गए. रामानंद का वहां से रोज आना-जाना था. उस दिन घाट की सीढ़ियों से गुजरते रामानंद का पैर कबीर से टकराया. मुंह से निकला—‘राम-राम.’ अनायास निकले उन शब्दों को ही कबीर ने गुरुमंत्र मान लिया. यह कहानी समाज की मानसिकता को दर्शाती है. भला कबीर जैसे औघड़ ज्ञानी को ब्राह्मण गुरु की क्या आवश्यकता थी! इसकी आवश्यकता तो उन चेले-चपाटों को थी, जिन्होंने कबीर को गुरु बनाकर मठ स्थापित किए थे. लोग मठों को पूजें, उनके शिष्यत्व को स्वीकारें इसके लिए कबीर को गुरु परंपरा के प्रति समर्पित दिखाना जरूरी था.

परिवर्तन की आहट उनीसवीं सदी के आरंभ में ही मिलने लगी थी. जून 1818 में पेशवा बाजीराव द्वितीय द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी के आगे आत्मसमर्पण के साथ पेशवाई का अंत हो चुका था. उस लड़ाई में अछूत सैनिकों की बड़ी भूमिका थी. उनके लिए वह अस्मिता और आत्मसम्मान की लड़ाई थी. इसलिए ईस्ट इंडिया कंपनी के मात्र आठ सौ सैनिक बाजीराव द्वितीय के लगभग 28000 सैनिकों पर भारी पड़े थे. उसके साथ ही देश का अधिकांश हिस्सा ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन हो चुका था. तीस करोड़ भारतीयों का कुछ हजार अंग्रेजों के अधीन हो जाना शर्म की बात थी. परंतु धर्म, जाति, क्षेत्रीयता के आधार पर बंटे समाज के लिए तो यह नियतिबद्ध जैसा था. उससे पहले भी कई बार ऐसा हो चुका था. सत्तापक्ष से असंतुष्ट लोग स्वार्थ के वशीभूत हो, विदेशी आक्रामकों का साथ देते आए थे. कुछ ऐसे लोग भी अंग्रेजों के समर्थन में थे, जो योरोप की औद्योगिक क्रांति से प्रभावित थे. उनमें से अधिकांश के वाणिज्यिक हित अंग्रेजों से जुड़े थे. उस समय तक भारतीय उद्योग असंगठित था. व्यापारी वर्ग उत्पादों को देश-देशांतर तक पहुंचाने का काम करता था. अंग्रेजों के आने से इस वर्ग की महत्त्वाकांक्षाएं बढ़ी थीं. व्यापारियों के कंपनी के समर्थन में आने का सीधा असर रजबाड़ों की अर्थव्यवस्था पर पड़ा था. वे विरोध का सामर्थ्य गंवा चुके थे. शूद्रों-अतिशूद्रों के लिए पेशवाई का पराभव मुक्ति-संदेश जैसा था. उधर ‘चार्टर अधिनियम-1813’ के अनुसार देश की बागडोर अप्रत्यक्ष रूप से इंग्लेंड के हाथों में जा चुकी थी. कंपनी के अधिकार घटे थे. चीन को चाय और अफीम आदि के निर्यात के अलावा बाकी मामलों में उसे ब्रिटिश संसद की मंजूरी लेनी पड़ती थी.

जन-सहानुभूति हासिल करने के लिए कंपनी ने चार्टर अधिनियम द्वारा जो व्यवस्था लागू की थी, वह भारतीय सभ्यता के तब तक के इतिहास में सबसे मौलिक एवं क्रांतिकारी थी. उसके दो प्रावधान शूद्रों तथा अतिशूद्रों के लिए विशेष महत्त्वपूर्ण थे. उनमें पहला था—सभी के लिए समान कानून, जिसने स्मृतियों की ब्राह्मणवादी व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया था. दूसरा था—सभी वर्गों के लिए समान शिक्षा. उसके लिए भारत से होने वाली आय में से न्यूनतम एक लाख रुपये आधुनिक शिक्षा पर खर्च करना. शूद्रों-अतिशूद्रों ने उनका जोरदार स्वागत किया था. उनके लिए वह परीकथाओं में दिखने वाले चमत्कार जैसा था. चेटरसन ने उसके बारे में लिखा है—‘महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि परीकथाओं में राक्षस होते हैं. महत्त्वपूर्ण यह जान लेना है कि राक्षस को पराजित किया जा सकता है.’ पेशवाओं की पराजय से उनका आत्मविश्वास बढ़ा था. लगने लगा था कि ब्राह्मणवाद अपराजेय नहीं है. उसे पराजित किया जा सकता है. आने वाला समय तो अवसरों के लाभ उठाने का था. समान शिक्षा और एक जैसा कानून भारतीय सभ्यता के ज्ञात इतिहास में अद्वितीय थे. युगांतरकारी बदलाव की नींव रखने वाले. अंग्रेजों से पहले इस देश में बड़े-बड़े सम्राट हुए. किसी ने भव्य मंदिर बनवाए, किसी ने किले. नाम चलाने के लिए किसी-किसी ने कुएं, बावड़ियां भी बनवाईं. यहां तक कि धर्मशाला और गौशाला के नाम पर भी खर्च किया जाता था. लेकिन शिक्षा  की जरूरत किसी ने भी नहीं समझी. नालंदा और तक्षशिला जैसे विद्यालयों के बारे में पढ़ना-सुनना किसी को भी रोमांचित कर सकता है. लेकिन वे उस कालखंड की निर्मितियां हैं, जब ब्राह्मण धर्म सबसे कमजोर था. ब्राह्मण वर्चस्व के दौर में शिक्षा  आश्रम-भरोसे बनी रही. आश्रमों में केवल उच्च वर्ग के विद्यार्थी प्रवेश पा सकते थे. क्षत्रियों और वैश्यों को भी उतना पढ़ाया जाता था जितना उनके काम के लिए आवश्यक हो. शूद्रातिशूद्रों के लिए शिक्षा  पर पूरा प्रतिबंध था. अगर वे पढ़ना चाहें तो उसके लिए दंड का घोषित विधान था. एकलव्य, कर्ण, शंबूक के किस्से आज भले ही ब्राह्मणवाद की आलोचना के काम आते हों, उन दिनों इनका उपयोग उसके महिमामंडन के लिए किया जाता था. अशिक्षित लोग मनमानी व्याख्याओं पर विश्वास भी कर लेते थे.

फुले कदम-कदम पर शिक्षा  की जरूरत पर बल देते हैं. बल्कि ऐसा कोई अवसर ही नहीं है जब शूद्र-अतिशूद्रों की अशिक्षा उनकी चिंता का विषय न रही हो. शूद्रों की अशिक्षा के लिए ब्राह्मण को ही जिम्मेदार माना है—

‘ऐसे दुष्ट लोगों को अध्यापक बनाते

बच्चे वे गैरों(सवर्णों) के ही पढ़ाते

स्वजाति के बच्चे(को) गलती करने पर बार-बार समझाते

शिक्षा  यत्नपूर्वक देते

परजाति के बच्चे गलती करते, थप्पड़-मुक्का मारते

जोर से कान ऐंठते

शूद्र बालक के मन को घायल करके भगा देते.’(पांवड़ा, शिक्षा  विभाग के ब्राह्मण अध्यापक)

नए कानून यथास्थितिवादियों की ओर से उसका भी विरोध भी हुआ. आरोप लगाया गया कि आधुनिक शिक्षा के नाम पर सरकार निचली जातियों का ईसाईकरण करना चाहती है. मगर सरकार को समाज के बहुसंख्यक वर्ग का समर्थन हासिल था. अंग्रेजी शासन को औचित्यपूर्ण सिद्ध करने के लिए उसे भारत के परंपरागत शासकों से अलग दिखना था. इसलिए सुधारवाद का सिलसिला आगे बढ़ता गया.

इन्हीं परिस्थितियों में फुले का जन्म हुआ. तारीख थी, 11 अप्रैल 1827. पिता फूलों के व्यवसायी थे. सुखी-समृद्ध परिवार था. मगर शूद्र के लिए आर्थिक समृद्धि सामाजिक मान-सम्मान का आधार नहीं बनती. फुले के पिता पारंपरिक विचारों के थे. अपने बुद्धि-विवेक से उन्होंने व्यापार को ऊंचाई तक पहुंचाया था. जो सहज प्राप्य था, वे उसी से खुश थे. किंतु बचपन से ही स्वाभिमानी फुले को उससे संतुष्टि न थी. फिर परिस्थितियां ऐसी बनती गईं कि उन्हें युग-निर्माण के ऐसे रास्तों पर उतरना पड़ा जहां पोंगापंथी ब्राह्मणों से सीधा टकराव था. एक घटना से फुले के सामने समाज में व्याप्त जाति-व्यवस्था का घिनौना रूप एकाएक सामने आ गया. पिता गोविंदराव की दुकान पर ब्राह्मण युवक मुंशीगिरी करता था. उसके साथ फुले की गहरी मित्रता थी. उसने फुले को अपने विवाह पर आमंत्रित किया. दूल्हे का मित्र होने के नाते विवाह के दौरान फुले हर आयोजन में उसके साथ थे. एक आयोजन में केवल ब्राह्मण हिस्सा ले सकते थे. यह बात न तो फुले को मालूम थी, न उनके मित्र ने बताया था. फुले सहज भाव से अपने मित्र का साथ दे रहे थे. इस बीच कोई देखते ही चिल्लाया—‘अरे! वह तो शूद्र है. उसे यहां किसने आने दिया?’ इसी के साथ चीख-पुकार मच गई. समाज का क्रूर जातिवादी चेहरा एकाएक सामने आ गया. किशोर ज्योतिबा को अपमानित होकर लौटना पड़ा. उस दिन उन्हें पता चला कि मनुष्य अपने बुद्धि-विवेक और परिश्रम से आर्थिक दैन्य को मिटा सकता है. लेकिन जाति का कलंक एक बार लग जाए तो उससे मुक्ति पाना असंभव है. जातिभेद का सामना डॉ. आंबेडकर को भी करना पड़ा था. उनके पिता सेना में सूबेदार थे. अछूत होने के कारण बालक आंबेडकर के साथ स्कूल में भेदभाव किया जाता था. यहां तक कि जब वे विदेश से खूब पढ़-लिखकर वापस लौटे तब भी मुंबई में उन्हें कोई कमरा देने वाला न था. एक पारसी महिला ने उन्हें कमरा दिया था. लेकिन जब उसे उनकी जाति के बारे में पता चला तो उसने तत्काल घर खाली करने का हुक्म सुना दिया. कार्यालय में चपरासी उन्हें पानी लाने में संकोच करता था. इन प्रसंगों के बारे में दलित साहित्य का विद्यार्थी भली-भांति जानता है. महसूस करता है. क्योंकि वे स्वयं ऐसे ही उत्पीड़न को झेलकर बड़े हुए हैं. जातीय भेदभाव की वह न तो पहली घटना थी, न ही आखिरी. लेकिन स्वाभिमानी फुले को जो उससे चोट पहुंची वह बड़ी थी. पेशवाई शासन की क्रूरता के बारे में सुनते आए थे. अब वह नहीं था. कानून की निगाह में अब सभी बराबर थे. लेकिन लोगों की मानसिकता ज्यों की त्यों थी. आखिर क्यों? फुले ने न केवल इसे समझा, बल्कि उसके समाधान के लिए आगे बढ़कर पहल भी की.

इसके अतर्निहित कारण को समझना बहुत मुश्किल भी नहीं था. अंग्रेज इस देश के शासक बन चुके थे. शासन कैसे चलाया जाएगा, मागदर्षक सिद्धांत कौन-से होंगे—इसकी लिखित व्यवस्था थी. अशिक्षित शूद्रों के लिए उन्हें समझना भी कठिन था. इसलिए वे उनके किसी काम के न थे, जब तक उसे समझ न सकें. ब्राह्मण पढ़-लिख सकते थे, इसलिए जोड़-तोड़ द्वारा स्वार्थ-सिद्धि का कोई न कोई उपाय वे खोज ही लेते थे. न हो तो शास्त्रों का हवाला देकर अपना उल्लू सीधा करते रहते थे. फुले समझ चुके थे कि दलितों की दुर्दशा का कारण गरीबी न होकर अशिक्षा  है. नए प्रावधानों का लाभ उठाते हुए उन्होंने स्कूल-कॉलेज खोले. मुश्किलें वहां भी थीं. स्कूल चलाने के लिए अध्यापकों की आवश्यकता थी. उस समय के अधिकांश अध्यापक ब्राह्मण थे. उनके लिए शूद्रों की शिक्षा-दीक्षा निषिद्ध और धर्म-विरुद्ध कर्म था. फुले द्वारा स्थापित स्कूलों में अध्यापन के लिए वे भला क्यों तैयार होते! कहते हैं, जहां चाह वहां राह. दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे बाधाएं सिर झुकाए मौन समर्पण कर देती हैं. फुले ने अपनी पत्नी को तैयार किया. सावित्री बाई फुले की देखा-देखी दूसरी महिलाओं में भी उत्साह जगा. दबंगों के भय से फुले के परिजनों ने उन्हें घर से निष्कासित कर दिया था. उस मुश्किल घड़ी में फातिमा शेख और उसके पति उस्मान शेख सामने आए. उन्होंने फुले दंपति को रहने के लिए आश्रय दिया. फातिमा शेख ने घर-घर जाकर माता-पिताओं को प्रोत्साहित किया कि वे अपनी लड़कियों को स्कूल भेजें. उसके लिए यथास्थितिवादियों का विरोध सहा. वैसे भी राष्ट्र निर्माण की राह आसान नहीं होती. समाज सुधार की दिशा में फुले द्वारा किए जा रहे कार्यों से यथास्थितिवादी बेहद नाराज थे. पेशवाई के पराभव से वे हताश  अवश्य थे, लेकिन पीठ पीछे हमला करने, नए-नए षड्यंत्र रचने में उनका कोई सानी न था. ऐसे ही षड्यंत्रकारियों ने एक बार फुले पर जानलेवा हमले की योजना बनाई थी. फुले सावधान थे. उस समय तक महार और मांग फुले के साथ आ चुके थे. विरोधियों के सामने पीछे हटने के अलावा दूसरा कोई रास्ता ही नहीं था.

धीरे-धीरे शिक्षा  के क्षेत्र में सफलता मिलने लगी. मगर दूसरी समस्याएं सिर उठाए थीं. सती-प्रथा दबे-छिपे रूप में जारी थी. बिना दांपत्य संबंधों के जन्मी संतान की देखभाल का भी मसला था. लोकलाज से बचने के लिए स्त्रियां ऐसे बच्चों को जन्म लेते ही मार देती थीं. आड़े वक्त में परिजन मदद से हाथ खींच लेते थे. समस्या को देखते हुए फुले ने प्रसूतिग्रहों की स्थापना की. सामाजिक दृष्टि से अवैध कहे जाने बच्चों की देखभाल के लिए शिशु सदन खोले. उनमें किसी भी धर्म, जाति की महिलाएं जा सकती थीं. लोकलाज के भय से नवजात शिशु को अपने साथ न ले जाना चाहे तो शिशु-सदन उसकी देखभाल करता था. अंतरजातीय विवाहों को बढ़ावा देना भी क्रांतिकारी कदम था. सबसे बड़ी समस्या रूढ़ियों की थीं. समाज धर्म के नाम पर तंत्र-मंत्र और कर्मकांडों में फंसा हुआ था. पुजारी लोगों को तरह-तरह से भरमाकर, लूटने में लगा रहता था. फुले ने अपने समाज को जाग्रत करना शुरू किया. धार्मिक कर्मकांडों की निस्सारता पर खुलकर लिखा. सभाएं कीं. इश्तहार निकाले. इससे ब्राह्मण समाज उनसे नाराज रहने लगा. यहां तक कि जानलेवा हमला भी उनपर किया गया. उस समय तक महार और मांग युवकों का संगठन फुले के समर्थन में आ चुका था. इससे षड्यंत्रकारियों के मनसूबे धरे के धरे रह गए.

समाज सुधार के क्षेत्र में फुले द्वारा किए जा रहे अनथक उपायों से प्रभावित होकर उच्च जातियों के उदारमना लोग भी उनके साथ समाज सुधार के क्षेत्र में आए थे. उनमें से कुछ को फुले ने अपनी स्कूल समितियों का सदस्य बनने का अवसर दिया था. इसे इरादों की कमजोरी कहिए या सामाजिक बहिष्कार की धमकी का डर, सवर्ण सदस्य बीच में ही अपनी राह बदल लेते थे. अक्टूबर 1853 के अंतिम सप्ताह में मुंबई में एक सभा का आयोजन किया था. उद्देश्य था हिंदू समाज की विकृतियों को दूर करना और उसके लिए आवश्यक सुधारवादी कार्यक्रम लागू करना. उसमें प्रगतिशील ब्राह्मणों को आमंत्रित किया गया था. सम्मेलन की अध्यक्षता के लिए पंडित गंगाधर आप्टे को चुना गया. जो उस समय सुधारवादियों में गिने जाते थे. आप्टे को ब्राह्मण समाज के विरोध का अनुमान था. इसलिए सभा में उपस्थित होने का आश्वासन देने के बावजूद वे नियत दिन गायब रहे. सम्मेलन की अध्यक्षता भवानी विश्वनाथ ने की. बैठक में परंपरावादी ब्राह्मणों ने सुधारवादी कार्यक्रमों का इतना जबरदस्त विरोध किया कि बैठक को बेनतीजा समाप्त करना पड़ा. यह अकेला उदाहरण नहीं है. ‘इन्हीलेशन आफ कास्ट’ में डॉ. आंबेडकर ने सवर्ण नेताओं की मानसिकता पर विस्तार से लिखा है. जाति-व्यवस्था के विरोध में फुले जहां सीधी बात कहते या संकेत-भर करते हैं, वहीं आंबेडकर अपनी मान्यताओं के समर्थन में अकाट्य तर्क जुटाते हैं. उन्हीं ग्रंथों से जिनके बल पर ब्राह्मण जनसाधारण को भरमाते आए थे. बावजूद इसके रचनात्मक कार्यों को देखा जाए तो फुले आंबेडकर के गुरु सिद्ध होते हैं.

सामाजिक न्याय के पक्ष में बढ़ते दबाव को देख कांग्रेस ने ‘सोशल कांफ्रेंस’ नामक संगठन का गठन किया था. वह संगठन केवल दिखावे के लिए था. सवर्ण नेता राजनीति में तो रुचि लेते थे, लेकिन सामाजिक परिवर्तन की ओर से मुंह मोड़े रहते थे. इसलिए कांग्रेस के अधिवेशनों में जहां नेताओं की भीड़ उमड़ पड़ती थी, वहीं ‘सोशल कांफ्रेस’ के पंडाल खाली रह जाते थे—‘जनता की उदासीनता देख नेताओं ने ‘सामाजिक सम्मेलन’ का विरोध करना आरंभ कर दिया. ‘सामाजिक सम्मेलन’ के अधिवेशन कांग्रेस के पंडाल में हुआ करते थे. मगर तिलक के विरोध के पश्चात कांग्रेस ने अपना पंडाल देना बंद कर दिया. दोनों के बीच नफरत इस कदर बढ़ी कि ‘सोशल कांफ्रेस’ ने जब अपना अलग पंडाल लगाना चाहा तो दूसरे पक्ष के नेताओं ने उसे जलाने की धमकी दे डाली. धीरे-धीरे ‘सोशल कांफ्रेस’ कमजोर पड़कर समाप्त हो गई.’(इन्हीलेशन आफ कास्ट : डॉ. आंबेडकर). 1892 में हुए ‘सोशल कांफ्रेस’ के अंतिम सम्मेलन में अध्यक्ष पद से बोलते हुए डब्ल्यू. सी. बनर्जी ने जो कहा, उससे कांग्रेसी नेताओं की मानसिकता को समझने में मदद मिल सकती है. कांग्रेस की भविष्य की राजनीति की झलक भी उसमें है, जिसे गांधी सहित उस समय के सभी बड़े नेता अपने आचरण और भाषणों में दोहराते रहते थे. बनर्जी ने कहा था—‘मैं उन लोगों से सहमत नहीं हूं जो कहते हैं कि जब तक हम सामाजिक पद्धति में सुधार नहीं कर लेते, तब तक हम राजनीतिक सुधार के योग्य नहीं हो सकते. मुझे इन दोनों के बीच कोई संबंध नहीं दीखता. क्या हम राजनीतिक सुधार के योग्य इसलिए नहीं हैं क्योंकि हमारी विधवाओं का पुनर्विवाह नहीं होता. और दूसरे देशों के सापेक्ष हमारी लड़कियां कम उम्र में ब्याह दी जाती हैं. या हमारी पत्नियां और पुत्रियां हमारे साथ मोटरगाड़ी में बैठकर हमारे मित्रों से मिलने नहीं जातीं? या इसलिए कि हम अपनी बेटियों को आक्सफोर्ड और कैंब्रिज नहीं भेजते.’(इन्हीलेशन आफ कास्ट : डॉ. आंबेडकर). वह परिवर्तन विरोधी वक्तव्य था, जो तत्कालीन कांग्रेसी नेताओं की मानसिकता को दर्षाता है. प्रकारांतर में वह सामाजिक न्याय की मांग को दबाए रखने का प्रयास था. अंग्रेजों द्वारा सामाजिक सुधार के लिए उठाए गए कदमों से भारतीय समाज का सवर्ण तबका खासा आहत था. उसके लिए देश की स्वयंप्रभुता इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं थी, जितनी सामाजिक यथास्थिति बनाए रखने की चाहत. इस संबंध में हमें 1942 में गांधी द्वारा ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ आंदोलन के समय दिए गए ऐतिहासिक भाषण को याद करना चाहिए. उस समय तक कांग्रेस यह मान चुकी थी कि अंग्रेज भारत छोड़ने वाले हैं. सुरक्षित खेल खेलने के अभ्यस्त गांधी ने अपने ‘करेंगे या मरेंगे’ भाषण में अंग्रेजों से भारत को जैसा है उसी हालत में छोड़कर चले जाने का आवाह्न किया था. ताकि शूद्रों और अतिशूद्रों की समाज-सुधार की मांग को, जिसे आरंभ से ही अंग्रेजों की सहानुभूति प्राप्त थी, किसी न किसी बहाने हमेशा-हमेशा के लिए टाला जा सके. जबकि फुले, आंबेडकर, पेरियार जैसे नेता आरंभ से ही जानते थे कि एक न एक दिन अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना पड़ेगा. इसलिए जब तक वे देश में हैं, तब तक सामाजिक परिवर्तन के लिए सबसे अनुकूल समय है. दलितों और शूद्रों को उसका लाभ उठाना चाहिए. उस समय तक भारत आधुनिकीकरण की ओर बढ़ चुका था. जनता सांप्रदायिक द्वेष को बिसराकर राष्ट्रीय हितों के लिए एक हो चुकी थी. ‘तृतीय रत्न’ नाटक का सूत्रधार फुले की इन्हीं भावनाओं को अभिव्यक्त करता है—

‘ब्राह्मणों ने शूद्र-अतिशूद्रों पर जो शिक्षा बंदी लगाई थी, उसको समाप्त करके, उनको शिक्षा का मौका प्रदान करके होशियार बनाने के लिए भगवान ने इस देश में अंग्रेजों को भेजा है. शूद्र-अतिशूद्र पढ़-लिखकर होशियार होने पर वे लोग अंग्रेजों का अहसान नहीं भूलेंगे. फिर वे लोग पेशबाई से भी सौ गुना ज्यादा अंग्रेजों को पसंद करेंगे. आगे यदि मुगलों की भांति अंग्रेज लोग भी इस देश की प्रजा का उत्पीड़न करेंगे तो शिक्षा प्राप्त  बुद्धिमान शूद्र-अतिशूद्र पहले जमाने में हुए जवांमर्द शिवाजी की भांति अपने शूद्र-अतिशूद्र राज्य की स्थापना करेंगे और अमेरिकी लोगों की तरह अपनी सत्ता खुद चलाएंगे. लेकिन ब्राह्मण-पंडों की दुष्ट और भ्रष्ट पेशवाई को आगे कभी आने नहीं देंगे. यह बात जोशी-पंडों को भली-भांति समझ लेनी चाहिए.’6 

नई शिक्षा ने अनेक सुधारवादी आंदोलनों को जन्म दिया था. फुले को धर्म से गुरेज न था. यहां तक कि कर्मकांड में भी हिस्सा ले सकते थे. बशर्ते उसमें पुरोहित की भूमिका कोई गैर-ब्राह्मण निभा रहा हो. सत्यशोधक की नियमावलि में इस बात पर जोर दिया गया था कि शूद्र-अतिशूद्र रूढ़ियों और कर्मकांडों का बहिष्कार करें. जिन कर्मकांडों को वे परंपरासम्मत और आवश्यक मानते हैं, उनमें ब्राह्मण पुरोहित की अनिवार्यता न हो. धर्म के नाम पर आंबेडकर की भी यही नीति थी. फुले को उम्मीद थी कि नई ज्ञान-चेतना से सराबोर हो शूद्र-अतिशूद्र पुरोहितों की चालबाजियों को समझेंगे और धर्म को किनारे कर देंगे. इसलिए उन्होंने हिंदू धर्म की आलोचना तो की लेकिन उससे बाहर आने का आवाह्न नहीं किया. बल्कि उस समय के सभी बड़े हिंदू नेताओं जिनमें तिलक भी थे, के साथ मिलकर काम करते रहे. आंबेडकर मान चुके थे कि हिंदू धर्म का बदलना नामुमकिन है. क्योंकि जैसे-जैसे स्वतंत्रता निकट आ रही थी, सांप्रदायिक शक्तियां निरंतर उग्र हो रही थीं. धार्मिक कूपमंडूकता में भी वृद्धि हो रही थी. फिर भी हिंदू धर्म में सुधार के लिए उन्होंने लंबी प्रतीक्षा की थी. पूरी तरह निराश होने के बाद ही बौद्ध धर्म स्वीकार किया था. उस समय तक राजा राममोहन राय और केशवचंद सेन के आंदोलन को 130 वर्ष गुजर चुके थे. इसके बावजूद सवर्ण नेताओं की मानसिकता में बहुत अधिक बदलाव नहीं आया था. उनका चिंतन अतीतोन्मुखी था. भारत के प्राचीन गौरव के नाम पर वे उन दिनों की बार-बार याद दिलाते थे, जो उनके हिसाब से ब्राह्मणवाद के चरमोत्कर्ष के दिन थे. ताकि उनके माध्यम से निरंतर कमजोर पड़ती जा रही वर्ण-व्यवस्था को पुनर्स्थापित किया जा सके. जबकि फुले और आंबेडकर के प्रयासों से शूद्रों एवं अतिशूद्रों के बड़े वर्ग में जागरूकता आ चुकी थी. डॉ. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म स्वीकार करके एक तरह से हिंदू धर्म का ही भला किया था. उस समय तक धर्मांतरण के माध्यम से समाजार्थिक स्वतंत्रता की चाहत रखने वालों के लिए इस्लाम और ईसाई धर्म सबसे लोकप्रिय हुआ करते थे. डॉ. आंबेडकर के धर्मांतरण के पश्चात इस्लाम और ईसाई धर्म की ओर अंतरण लगभग रुक-सा गया. हिंदू धर्म से उत्पीड़ित-हताश लोग बौद्ध धर्म को अपनाने लगे. फलस्वरूप भारतीय बौद्ध धर्म जो मूल का था, चलन में आ गया.

फुले का जिक्र हो तथा उनकी पुस्तकों ‘गुलामगिरी’ तथा ‘किसान का कोड़ा’ उल्लेख से वंचित रह जाए—यह नामुमकिन है. यूं तो उनकी सभी पुस्तकें बेमिसाल हैं. वे उनके चिंतन और रचनात्मक कार्यों की एकता को दर्शाती हैं. इनमें वे अपने विचारों को एकीकृत रूप में प्रस्तुत करते हैं. लेकिन ये दोनों पुस्तकें उनके चिंतन और कर्म का प्रतिनिधि संग्रह कही जा सकती हैं. पांच छोटे-छोटे अध्यायों में फैली ‘किसान का कोड़ा’ में उन्होंने व्यापारियों द्वारा किसान और शिल्पकार वर्ग के बहुविध शोषण का खुलासा किया है. उनमें धर्म और संस्कृति के नाम पर ब्राह्मणों द्वारा शोषण तो शामिल है ही, मंडी में बिचैलियों द्वारा किसानों की ठगी पर भी उनकी नजर गई है. इस पुस्तक में फुले ने अंग्रेजी राज्य की खुलकर प्रशंसा की है. उसे पेशवाई शासन से श्रेेष्ठ बताया है. इसके साथ-साथ ही उन अंग्रेज अधिकारियों की आलोचना भी की है जो अपनी काहिली या ब्राह्मणों के प्रभाव में आकर अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़े रहते हैं. योरोप की औद्योगिक क्रांति की प्रशंसा करते हुए उन्होंने अंग्रेजों की यह कहकर आलोचना की है कि वे भारतीय प्रजा से धन ऐंठकर अपने मुल्क पहुंचाने में लगे रहते हैं. इस विषय पर दादा भाई नौरोजी ने भी लिखा है. उनका प्रसिद्ध भाषण ‘पावर्टी इन इंडिया’ 1876 का है, जबकि ‘किसान का कोड़ा’ 1882 में लिखी गई. फुले पर नौरोजी का कितना प्रभाव था, यह बता पाना तो कठिन है, लेकिन इससे इतना साफ हो जाता है कि उस समय तक अंग्रेजों की व्यापार नीति की आलोचना होने लगी थी. ‘किसान का कोड़ा’ में फुले उसे अपनी शैली में प्रस्तुत करते हैं. नौरोजी की पुस्तक जहां अर्थशास्त्रीय महत्त्व रखती है, वहीं फुले अंग्रेजों द्वारा देश के आर्थिक शोषण के साथ-साथ वर्गीय शोषण को भी उठाते हैं. इसलिए ‘किसान का कोड़ा’ का अर्थशास्त्र के साथ-साथ समाज-वैज्ञानिक महत्त्व भी है. पुस्तक से फुले की व्यापक दृष्टि का भी पता चलता है. खेती के विकास के लिए वे बांध बनाने, नए बीज अपनाने, बिचौलिए दुकानदारों पर पाबंदी लगाने, यहां तक कि किसानों के प्रशिक्षण की मांग भी सरकार से करते हैं. वे बौद्ध धर्म तथा उसके अनुयायियों की प्रशंसा करते हैं.

व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता की मांग करते हुए मार्टिन लूथर किंग ने कहा था—‘मैं मानता हूं कि सभी मनुष्य एक समान हैं. मेरा एकमात्र सपना है कि मेरे छोटे-छोटे बच्चे एक दिन ऐसे राष्ट्र के नागरिक होंगे जहां उनकी पहचान चमड़ी के रंग के बजाय उनके चारित्रिक गुणों के आधार पर तय की जाएगी.’ कुछ ऐसा ही सपना फुले का भी था. ‘गुलामगिरी’ और ‘किसान का कोड़ा’ दोनों में उन्होंने गणतंत्र की प्रशंसा की है. जूलिस सीजर की वे यह कहकर आलोचना करते हैं कि उसने अपने देश में गणतंत्र को कुचलकर सत्ता हासिल की थी. थाॅमस पेन का प्रभाव भी उनपर था. आगे चलकर आंबेडकर ने भी हिंदू प्रतीकों और मिथों की आलोचना की. काफी सोचने-समझने के बाद उन्होंने बौद्ध धर्म को स्वीकार किया. संविधान के माध्यम से वे भारत में गणतंत्र के प्रस्तोता बने. ‘किसान का कोड़ा’ में फुले ने बौद्ध धर्म तथा गणतंत्र की जैसी प्रशंसा की है, उससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि अपने-अपने समय के इन दोनों महामानवों के बीच विचार और कर्म की दृष्टि से कितना ज्यादा साम्य था.

‘किसान का कोड़ा’ को पढ़ते हुए यह बात भी सामने आती है कि शूद्रों-अतिशूद्रों की मुख्य समस्या गरीबी नहीं है. असली समस्या गरीबी के कारण को न समझ पाने की है. समाज के प्रमुख उत्पादक शिल्पकार और किसान हैं. लेकिन अपनी आय को अपनी मर्जी से खर्च करने का सत्साहस उनमें नहीं है. उनकी आय का बड़ा हिस्सा धार्मिक-सामाजिक कर्मकांडों पर खर्च होता है. आड़े समय पर किसानों को कर्ज लेना पड़ता है. फसल के समय महाजन और बिचैलिए उनकी फसल का बड़ा हिस्सा हड़प लेते हैं. जो बचता है, उसे भी अपनी मर्जी से, अपने विकास के लिए खर्च करना, उनके लिए संभव नहीं होता. शादी-विवाह, श्राद्ध, मुंडन, उपनयन जैसे अनेक संस्कार हैं, जो बेहद खर्चीले, मगर पूरी तरह अनुत्पादक हैं. वे लोगों की आर्थिक विपन्नता और बौद्धिक विकलांगता दोनों को बढ़ाते हैं. सामाजिक व्यवस्था ऐसी है कि व्यक्ति इनके चंगुल से निकल ही नहीं पाता. शिक्षा के अभाव में आम आदमी वही करता है, जो पुरोहित उन्हें बताता है. उसकी मानसिक संरचना पष्चगामी है. ‘तृतीय रतन’ नाटक में ब्राह्मण पुरोहित द्वारा अशिक्षित जनता के बहुआयामी शोषण को दर्शाया गया है. यह नाटक बताता है कि ब्राह्मण पुरोहित अशिक्षित जनता को कदम-कदम पर किस तरह भरमाते हैं. धर्म और अनीति का भय दिखाकर उनका धन लूटने में लगे रहते हैं. कोई ऐसा सामाजिक अनुष्ठान नहीं है जिसमें ब्राह्मण की मौजूदगी और उसके द्वारा दान-दक्षिणा के नाम पर गरीब जनता से धन न ऐंठा जाता हो. धर्म के नाम पर उन्हें इतना डराया जाता है कि कर्ज लेकर भी कर्मकांडों में लिप्त रहते हैं. इस उम्मीद से कि अंततः देवता उनपर कृपा करेगा. फिर उनके सारे दलिद्दर नष्ट हो जाएंगे. होता इसका उलटा है. दुख-दलिद्दर तो मिटना तो दूर, महाजन का कर्ज सिर पर चढ़ जाता है. उसे चुकाने के लिए वे जमींदार के घर बेगार करते रहते हैं. संक्षेप में ‘किसान का कोड़ा’ भारतीय किसान और मजदूर के जीवन का सबसे प्रामाणिक दस्तावेज है.

फुले की दूसरी महत्त्वपूर्ण पुस्तक का पूरा शीर्षक है—‘गुलामगिरी’ (ब्राह्मणधर्म की आड़ में होने वाली). छोटी-सी पुस्तिका को उन्होंने ‘संयुक्तराष्ट्र के सदाचारी जनों को जिन्होंने गुलामों को दासता से मुक्त करने के कार्य में उदारता, निष्पक्षता और परोपकार वृत्ति का प्रदर्शन किया था, के लिए सम्मानार्थ समर्पित’ किया गया है. भारत में इसे अपने विषय की इकलौती पुस्तक; जिसे आधार पुस्तक भी कहा जा सकता है. ‘सांस्कृतिक वर्चस्ववाद’ के विरुद्ध संघर्ष के इतिहास में इस पुस्तक का ठीक वही स्थान है, जो दुनिया-भर के मजदूर आंदोलनों के इतिहास में ‘कम्यूनिस्ट मेनीफेस्टो’ का है. धर्म के नाम पर फैलाए गए आडंबरों तथा निरर्थक कर्मकांडों का विरोध संत रविदास और कबीर ने भी किया था. उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए फुले ‘गुलामगिरी’ के माध्यम से उन मिथों पर सीधे प्रहार करते हैं, जो शताब्दियों से जनसमाज की बौद्धिक विकलांगता का कारण बने थे. जो छोटी-छोटी बात पर शूद्रों, अतिशूद्रों को ब्राह्मणों पर निर्भर बनाते थे. उनकी मदद से ब्राह्मण शिखर की दावेदारी करते हुए शेष तीनों वर्गों को अपना दासानुदास बनाए रखता था. वर्ण-व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण इस पृथ्वी के समस्त सुख-साधनों का एकमात्र स्वामी-संरक्षक है. क्षत्रिय का कर्तव्य उसकी रक्षा करना, वैश्य का धर्म कमा कर देना है. शूद्र-अतिशूद्रों के लिए मात्र ‘निष्काम सेवा’ निर्धारित है. पूजा-पाठ जैसे अनुत्पादक कार्यों के लिए मुंह-मांगी दक्षिणा लेना ब्राह्मण का एकाधिकार मान लिया जाता है. मजदूर अपने श्रम का मूल्यांकन स्वयं करना चाहे तो शास्त्र-विरुद्ध कहकर उसकी मांग को दबा दिया जाता है. क्षत्रिय और वैश्य ब्राह्मण के शीर्षत्व को स्वीकार करके संपत्ति के संरक्षक-संग्राहक बन सकते हैं. परंतु चौथे वर्ण को संपत्ति रखने का भी अधिकार नहीं है. इस वर्ग को जिसमें किसान, शिल्पकार, मजदूर आदि आते हैं, जिन्हें मार्क्स ने प्रमुख उत्पादक शक्ति माना है. बुद्धकालीन भारत में उनका यह स्थान और अपेक्षित मान-सम्मान सुरक्षित था. ब्राह्मण प्रभुत्व वाला तंत्र उन्हें न केवल वर्ण-विशेष के दायरे में कैद कर देता है, अपितु आजीविका के चयन के अधिकार के साथ-साथ उनसे श्रम और श्रमोत्पाद संबंधी समस्त अधिकार छीन लेता है. उत्पादक वर्ग विरोध न करे, उसके लिए जन्म-पुनर्जन्म, कर्मफल और पाप-पुण्य जैसी पश्चगामी व्यवस्थाएं हैं. ‘अवतारवाद’ की सैद्धांतिकी इन्हें पुष्ट करने के लिए ही गढ़ी गई है. ‘गुलामगिरी’ के माध्यम से फुले इसी पर प्रहार करते हैं.

‘गुलामगिरी’ संवाद की शैली में लिखी गई पुस्तक है. यह उन दिनों की प्रचलित शैली थी. यह जानते हुए कि अनपढ़ जनता प्रतीकों और मिथों से ही प्रेरणा लेती है, उन्हीं का हवाला देकर ब्राह्मणादि सवर्ण खुद को देव-सभ्यता का उत्तराधिकारी मानते आए हैं; तथा कुछ गिने-चुने मिथ शूद्रों-अतिशूद्रों की शारीरिक-मानसिक दासता का कारण हैं—फुले उनकी जड़ पर प्रहार करते हैं. आर्य बाहर से आए थे. यह उन दिनों स्थापित सत्य था. मैक्समूलर, विंसेंट स्मिथ, रिस डेविस, जॉन मार्शल जैसे विद्वानों का यही विचार था. इस दृष्टि से ब्राह्मणों को विदेशी मूल का बताना फुले की मौलिक स्थापना नहीं थी. मौलिक था, वाराह, कच्छप, नरसिंह जैसे कथित अवतारों के विवेचन से उस ऐतिहासिकता की खोज करना जिसके पीछे आर्य-अनार्य संघर्ष की अनेक कहानियां छिपी हैं. मिथों में उलझकर उनका वास्तविक इतिहास कहीं लुप्त चुका है. अनेकानेक मिथों पर टिकी प्राचीन भारतीय संस्कृति की आलोचना करते हुए फुले उस इतिहास की झलक दिखाते हैं, जिसकी कालावधि के बारे में ठोस जानकारी भले ही न हो, मगर वह सत्य के अपेक्षाकृत करीब है. यह असल में कांटे से कांटा निकालने की कोशिश है. जो सच हो न हो, मगर अपने सरोकारों के आधार पर सच के बहुत करीब दिखता है. देरिदा को ‘विखंडनवाद’ का आदि व्याख्याता माना जाता है. फुले उसका प्रयोग ‘गुलामगिरी’ में देरिदा से लगभग एक शताब्दी पहले करते हैं. उसी को अपना प्रस्थान-बिंदू बनाकर डॉ. आंबेडकर हिंदू धर्म की जटिल पहेलियों की विवेचना करते हैं. दोनों के निष्कर्ष आधुनिक दलित-बहुजन विमर्श की आधार सामग्री हैं. भारतीय संदर्भ में ‘गुलामगिरी’ ‘सांस्कृतिक विखंडनवाद’ की पहली पुस्तक है; तथा फुले ब्राह्मणों के ‘सांस्कृतिक आधिपत्य’ को चुनौती देने वाले पहले बहुजन नेता. दक्षिण भारत में उनकी प्रेरणा द्रविड़ आंदोलन के रूप में फलीभूत होती है. पेरियार उनके संघर्ष को नई ऊर्जा और वैचारिक चेतना के साथ आगे बढ़ाते हैं. ‘गुलामगिरी’ में फुले ने हिंदुओं की अवतारवादी धारणा का जोरदार खंडन किया है. पुस्तक का महत्त्व इससे भी आंका जा सकता है कि ब्राह्मणवाद के विरोध में जिन सांस्कृतिक प्रतीकों तत्वों का हवाला दिया जाता है, लगभग वे सभी इसमें मौजूद हैं. कुल मिलाकर बहुजन दृष्टि से फुले भारत के पहले और मौलिक इतिहासकार हैं. इस पुस्तक के प्रथम संस्करण का मूल्य 12 आना था. निर्धन तथा शूद्रातिशूद्रों के लिए उसकी कीमत मात्र छह आना रखी गई थी. इसके पीछे भी फुले की दूरदृष्टि थी. उद्देश्य यही था कि जो गरीब तथा शूद्र-अतिशूद्र ‘गुलामगिरी’ को पढ़ना चाहते हैं, पैसे की कमी उसमें बाधा न बने.

फुले के समय तक सिंधु सभ्यता के बारे में जानकारी उजागर नहीं हुई थी. संस्कृत ग्रंथों से केवल यही तथ्य सामने आता है कि बाहर से आने वाली प्रजाति, जिसने स्वयं को ‘आर्य’ घोषित किया था, का स्थानीय प्रजातियों से जोरदार संघर्ष हुआ था. समुद्र और पहाड़ियों द्वारा सुरक्षित अनार्य अपेक्षाकृत सुख और शांतिपूर्ण जीवन जीने के अभ्यस्त थे. इसके प्रमाण सिंधू सभ्यता से प्राप्त हो चुके हैं. लाखों वर्ग किलोमीटर में फैली सिंधू सभ्यता के उत्खनन से पुरात्वविदों को भंडारगृह, बर्तन, सौंदर्य प्रसाधन सामग्री, मूर्तियां, मुद्राएं, अनाज, मापन यंत्र आदि प्राप्त हुए हैं, लेकिन हथियार के बारे में कोई प्रमाण नहीं मिला है. उस सभ्यता का पराभव 1750 ईस्वी पूर्व के आसपास प्राकृतिक कारणों से हुआ था. आर्यों के भारत पहुंचने(1500 ईस्वी पूर्व) तक वह नष्टप्रायः अवस्था में थी. बचे-कुुचे सिंधुवासी हतोत्साहित होकर जंगलों में बिखर चुके थे. असंगठित और  शांतिप्रिय अनार्यों को पराजित करना आसान था. अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए आर्यों ने स्थानीय निवासियों के दिमाग को कब्जाना शुरू कर दिया था. उन्होंने काल्पनिक नायक इंद्र को केंद्र बनाकर मंत्र रचे. उसे उन पुरों का विनाशक घोषित किया, जो उनके आगमन से शताब्दियों पहले खंडहरों में बदलने लगे थे. सिंधू सभ्यता के आरंभिक अध्येता सुप्रसिद्ध पुरातत्वविद् जॉन मार्शल ने अपनी पुस्तक ‘मोहनजोदड़ो एंड इंड्स सिविलाइजेशन’(1931) में एक अध्याय सिंधुवासियों की धार्मिक मान्यताओं पर शामिल किया है. मार्शल का शोध उस सभ्यता को भारत की जनसंस्कृति के करीब रखता है, जो निश्चय ही ब्राह्मणेत्तर संस्कृति थी. ये तथ्य यदि फुले के सामने होते तो वे उनका उपयोग निश्चित रूप से वर्चस्वकारी ब्राह्मण संस्कृति के विखंडन हेतु करते. जातीय श्रेष्ठता का दंभ आर्यों से तीन हजार वर्ष बाद आने वाले अंग्रेजों में भी था, लेकिन उसके मूल में योरोपीय पुनर्जागरण की बेमिसाल उपलब्धियां थीं. जिसमें मानवीय गरिमा और मान-सम्मान पर जोर दिया गया था. मशीन-केंद्रित उत्पादन प्रणाली सामंतवाद के अत्याचारों से मुक्ति का भरोसा दिलाती थी. इसलिए शताब्दियों से आर्थिक-सामाजिक विषमता का दंश झेल रही जातियों ने उनका स्वागत किया था. फुले अंग्रेजी शासन की प्रशंसा करते हैं. वहीं, आर्थिक-सामाजिक शोषण के शिकार वर्गों की स्वतंत्रता के लिए पर्याप्त कदम न उठाने के कारण वे उसकी आलोचना भी करते हैं.

फुले की रचनाएं सीधे संवाद करती हैं. उनकी भाषा किसान-मजदूर की खरखरी भाषा है. मराठी में प्रशस्ति काव्य को पावड़ा कहा गया है. फुले ने कई पावड़े लिखे हैं. लेकिन वे निरे प्रशस्ति काव्य नहीं है. उनके सरोकार मानवीय हैं और सामाजिक न्याय की भावना पर खरे उतरते हैं. शिवाजी की गौरवगाथा को याद दिलाता एक पावड़ा है. एक अन्य पावड़े में वे निर्माण विभाग के अधिकारी की रिश्वत के बारे में बात करते हैं. ब्राह्मण अध्यापक अछूत विद्यार्थियों के साथ पक्षपात करते हैं. उन्हें पढ़ाने से बचते हैं. फुले इसकी पोल खोलते हुए शिक्षा अधिकारी से निवेदन करते हैं कि वह शिक्षा विभाग में शूद्र और अतिशूद्र विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए इसी वर्ग के अध्यापकों की नियुक्ति करे. किसान की उपज का बड़ा हिस्सा मंडी में दलाल खा जाते हैं. इसलिए एक पावड़ा उसकी दुर्दशा की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए भी है. ‘गुलामगिरी’ में परिशिष्ट के रूप में ‘ब्राह्मण कर्मचारी इंजीनियरिंग विभाग में किस प्रकार धांधली मचाते हैं’—इस विषय पर एक पांवड़ा दिया गया है, जिसमें उन्होंने ब्राह्मण कर्मचारियों की स्वार्थपरता और काहिली के साथ-साथ अंग्रेज अधिकारियों पर भी तंज कसा है—

‘ब्राह्मण बड़ी चतुराई करते. लिखने में कौशल दिखलाते. कुनबी को दिन-दहाड़े लूटते. हाजिरी-बही ले फैल(कार्यस्थल) पर जाते….फैल में जो हों शूद्र औरतें उनसे बरतन मंजवाते. बेगारी मजदूरों से फिर अपना बिस्तर हैं लगवाते. पागल से कुन्बी को पाकर उससे अपने पैर दबवाते. खूब मजे से खुर्राटे भरते. अपनी जात के बाम्हन को फैल पर काम को हैं ले जाते….किसान का लहू चूस-चूसकर मोटे-ताजे हैं बन जाते. जितना ये घी-शक्कर हैं उड़ाते, सब किसान के ऊपर.’

भाषा और अध्ययन की दृष्टि से डॉ. आंबेडकर फुले की अपेक्षा समृद्ध हैं. उनकी भाषा एक दार्शनिक और वैज्ञानिक की भाषा है. जो तर्क करती है; तथा उनके समर्थन में जरूरी प्रमाण भी देती है. फुले की भाषा की भांति उनके तर्क भी सीधे-सपाट हैं. डॉ. आंबेडकर का लेखन उनके विशद् अध्ययन का स्वतः प्रमाण है. ब्राह्मणवाद के विरुद्ध पिछड़े और दलित वर्गों में चेतना जगाने में फुले के लेखन का बड़ा योगदान है. उससे प्रेरणा लेकर दलित और पिछड़े समुदायों के सैकड़ों बुद्धिजीवी आगे आए. उन्होंने अनेकानेक आंदोलनों को जन्म दिया. सांस्कृतिक वर्चस्व से मुक्ति हेतु ग्राम्शी ने सर्वहारावर्ग से अपने बुद्धिजीवी पैदा करने का आवाह्न किया है. ऐसे चिंतक जिनकी मेधा स्वतंत्र हो, जो अभिजन बुद्धिजीवियों के मानसिक दास न हों. अपने विचार-कर्म से फुले, ग्राम्शी से आधी शती पहले ही इसे चरितार्थ करते नजर आते हैं. एक किसान की तरह वे भविष्य के दलित आंदोलन के लिए जमीन तैयार करते हैं.

फुले के समय भारतीयों, विशेषकर शूद्रों के लिए राजनीति में आने के अवसर कम थे. स्वयं फुले ने भी उस दिशा में कभी प्रयास नहीं किया. वे राजनीतिज्ञों यहां तक कि अंग्रेजों से भी दूरी बनाए रहे. निष्पक्ष बुद्धिजीवी की तरह जब आवश्यक समझा, तब अंग्रेजी शासन की प्रशंसा की और जहां कुछ आपत्तिजनक नजर आया, तत्काल आलोचना से भी बाज नहीं आए. राजनीति से प्रत्यक्ष संबंध न रखने के बावजूद शूद्रातिशूद्रों में संगठन और संघर्ष की प्रेरणा जगाने में फुले का योगदान अपने समकालीन किसी भी नेता से कहीं अधिक है. अच्छा शिष्य गुरु की शिक्षा  को ज्यों का त्यों नहीं अपनाता, बल्कि उसको निरंतर परिवर्धित-परिमार्जित करता जाता है. जिस आंदोलन को फुले खड़ा करते हैं, डॉ. आंबेडकर उसे और अधिक मजबूती, साहस, ईमानदारी और संकल्प के साथ आगे बढ़ाते हैं. अंततः अपनी अप्रतिम मेधा, अनथक संघर्ष तथा प्रतिबद्धता के बल पर उसे एक अंजाम तक पहुंचाने में सफल सिद्ध होते हैं. डॉ. आंबेडकर राजनीति की महत्ता को समझते थे. उन्होंने दलितों का आवाह्न किया कि अपने अधिकारों के लिए राजनीति में खुलकर हिस्सा लें. फुले के समय तक अस्मितावादी राजनीति का वातावरण नहीं बना था. वक्त की नजर और समाज की जरूरतों को पहचानते हुए उन्होंने खुद को सामाजिक सुधार तक सीमित रखा था. पहले पंद्रह वर्ष वे मुख्यतः शिक्षा-सुधार को समर्पित रहे. शूद्रातिशूद्र विद्यार्थियों के लिए स्कूल खोले. लेकिन राजनीति से दूरी बनाए रखी. डॉ. आंबेडकर राजनीति की ताकत तथा जरूरत को समझते थे. उनकी सक्रियता समाज और राजनीति, दोनों क्षेत्रों बराबर बनी रही.

अच्छा नागरिक के लिए अच्छे समाज का होना आवश्यक है; और एक अच्छा समाज ही अच्छे राज्य का गठन कर सकता है.  इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य का विवेक स्वतंत्र हो. प्रत्येक मनुष्य को अपने निर्णय खुद लेने की स्वतंत्रता हो. उसके लिए शिक्षा भी चाहिए और सहयोगपूर्ण वातावरण भी. इसी सपने के साथ फुले अपने आंदोलन की शुरुआत करते हैं. जिसे डॉ. आंबेडकर उसी निष्ठा एवं समर्पण के साथ आगे बढ़ाते हैं. आधुनिक भारत के निर्माण में दोनों की भूमिका अद्वितीय है. प्रतिक्रियावाद के इस दौर में जो लोग इन दोनों के योगदान को नकारने की कोशिश में हैं, उन्हें फ्रैड्रिक डगलस की यह चेतावनी याद रखनी चाहिए—‘जहां न्याय की अवमानना होती है, जहां जहालत और गरीबी है, जहां कोई भी समुदाय यह महसूस करे कि समाज सिवाय उसके दमन, लूट तथा अवमानना के संगठित षड्यंत्र के सिवाय कुछ नहीं है—वहां न तो मनुष्य सुरक्षित रह सकते हैं, न ही संपत्ति.’

ओमप्रकाश कश्यप

 संदर्भ:

1. Dhanajay Keer in Mahatama Jyotiba Phule

2.   इनहिलेशन आॅफ कास्ट, संतराम बीए द्वारा अनूदित, पृष्ठ 8.

3. Henry Verner Hampton in Biographical Studies of Education in India.

4. Dhanajay Keer in Mahatama Jyotiba Phule

5. Katherine Mayo, Mother India(1937), page 64.

6. तृतीय रत्न, नाटक, फुले, ज्योतिराव फुले रचनावली, अनुवाद डॉ. एल. जी. मेश्राम ‘विमलकीर्ति’ पेज—47

भविष्यलोक : एक नास्तिक का स्वप्न

सामान्य

(आज रामास्वामी पेरियार का जन्मदिवस है, भारत को आधुनिक राज्य बनाने में जितनी भूमिका डॉ. आंबेडकर की है, उतनी ही पेरियार की भी है. अपनी—अपनी भूमिका में दोनों महान हैं. डॉ. आंबेडकर साधारण परिवार से आए थे, अपने श्रम, स्वाध्याय, विद्वता, त्याग और विवेक के बल पर वे इस देश के निर्माता बने. समाज के बड़े वर्ग को जगाने का काम किया. पेरियार के पिता धनी व्यापारी थे. जीवन के आरंभिक वर्षों में धन उन्होंने भी खूब कमाया. धीरे—धीरे उसकी ओर से निस्पृह होते चले गए. आगे चलकर कांग्रेस से जुड़े. बहुत जल्दी समझ में आ गया कि कांग्रेस के सुधार की एक सीमा है. वह समाज के निचले हिस्सों के भले के लिए उतना की कर सकती है, जितना उपकार—भाव के साथ संभव है. पेरियार ने राजनीति को छोड़ा और केवल जनता पर भरोसा किया. खुद को जनांदोलनों के लिए समर्पित कर दिया. राजनीति से दूर रहते हुए बड़े आंदोलन चलाना, जिनसे आगे चलकर पूरे देश की राजनीति प्रभावित हुई, पेरियार जैसी हस्ती के लिए ही संभव था.

आदर्श समाज को लेकर हर महापुरुष का एक सपना रहा है. पश्चिम में प्लेटो से लेकर थॉमस मूर और आल्डोस हक्सले तक. भारत में संत रविदास ने भी समानता, सहयोग और स्वतंत्रता पर आधारित सपना देखा था, जिसे हम बेगमपुराके नाम से जानते हैं. आने वाली दुनियामें रामास्वामी पेरियार भी इसी प्रकार का सपना देखते हैं. यह आलेख उनके भाषण के अंग्रेजी अनुवाद(प्रो. ए. एस. वेणु)  का अनुवाद है, जो उन्होंने आत्मसम्मान आंदोलनके एक कार्यक्रम दिया था. वैज्ञानिक सोच के प्रसारक ईवी रामास्वामी इसमें ऐसे अनेक आष्विकारों की कल्पना करते हैं, जो आज हमारे सामने हैं. इससे उनकी दूरंदेशी का अनुमान लगाया जा सकता है. ओजस्वी विचारकों के कारण पेरियार को यूनेस्को ने दक्षिण एशिया का सुकरातकहा तो कुछ विद्वानों ने उन्हें भारत का वाल्तेयरमाना है. कुछ विद्वान उनकी तुलना रूसो से करते हैं. यह भाषण पुस्तकाकार भी प्रकाशित हुआ, जिसकी समीक्षा सुप्रसिद्ध अंग्रेजी दैनिक दि हिंदूमें छपी थी, जहां उनकी तुलना बीसवीं ताब्दी का एच.जी.वेल्स कहा गया था. लेख में गांधी का नाम नहीं है. उनकी ओर संकेत-भर है. परंतु इससे गांधी और पेरियार के सोच का अंतर पूरी तरह सामने आ जाता है.

यह लेख एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित हुआ था. पेरियार की भूमिका के साथ, जो लेख जितनी ही महत्त्वपूर्ण है.  परियार के जन्मदिन पर उन्हें याद करते हुए उन्हीं के लेख का अनुवाद प्रस्तुत कर रहे हैंओमप्रका कश्यप)

 

प्राक्कथन

कल की दुनिया कैसी थी? आज की दुनिया कैसी है? आने वाले कल की दुनिया कैसी होगी? समय के साथ-साथ, शताब्दियों के अंतराल में कौन-कौन से परिवर्तन होंगे? केवल तर्कवादी इन बातों को सही-सही समझ सकता है. धर्माचार्य के लिए इन्हें समझना अत्यंत कठिन है. यह बात मैं किस आधार पर कह रहा हूं?

धर्माचार्य मात्र उतना जानते हैं, जितना उन्होंने धर्मशास्त्रों और ऊटपटांग पौराणिक साहित्य को रट्टा लगाते हुए समझा है. उन सब चीजों से जाना है, जो ज्ञान और तर्क की कसौटी पर कहीं नहीं ठहरतीं. उनमें से कुछ केवल भावनाओं में बहकर सीखते-समझते हैं. दिमाग के बजाए दिल से सोचते हैं. अंध-श्रद्धालु की तरह मान लेते हैं कि उन्होंने जो सीखा है, वही एकमात्र सत्य है. बुद्धिवादियों का यह तरीका नहीं है. वे ज्ञानार्जन को महत्त्व देते हैं. अनुभवों से काम लेते हैं. उन सब वस्तुओं से सीखते हैं, जो उनकी नजर से गुजर चुकी हैं. प्रकृति में निरंतर हो रहे परिवर्तनों, जीव-जगत की विकास-प्रक्रिया से भी वे ज्ञान अर्जित करते हें. इसके साथ-साथ वैज्ञानिक शोधों, महापुरुषों के ज्ञान, व्यक्तिगत खोजबीन, उपलब्ध शोधकर्म को भी वे आवश्यकतानुसार और विना किसी पूर्वाग्रह के ग्रहण करते हैं.

धर्माचार्य सोचता है कि परंपरा-प्रदत्त ज्ञान ही एकमात्र ज्ञान है. उसमें कोई भी सुधार संभव नहीं है. अतीत को लेकर जो पूर्वाग्रह और धारणाएं प्रचलित हैं, वे उसमें किसी भी प्रकार के बदलाव के लिए तैयार नहीं होते. दूसरी ओर तर्कवादी मानता है कि यह संसार प्रतिक्षण आगे की ओर गतिमान है. सबकुछ तेजी से बदल रहा है. इसलिए वह अधुनातन और श्रेष्ठतर के स्वागत को सदैव तत्पर रहता है. मेरा आशय यह नहीं है कि दुनिया-भर के सभी धर्माचार्य एक जैसे हैं. लेकिन जहां तक ब्राह्मणों का सवाल है, वे सब के सब  बुद्धिवाद का विरोध करते हैं. परंपरा नएपन की उपेक्षा करती है. वह लोगों को तर्क और मुक्त चिंतन की अनुमति नहीं देती. न ही शिक्षा-तंत्र और परीक्षा-विधि को उन्नत करने में उन्हें कोई मदद पहुंचाती है. उलटे वह लोगों के पूर्वाग्रह रहित चिंतन में बाधा उत्पन्न करती है. यह जानते हुए भी परंपरा-पोषक धर्माचार्य अज्ञानता के दलदल में बुरी तरह धंसे हैं, पुराणों के दुर्गंधयुक्त कीचड़ में वे आकंठ लिप्त हैं. अंधविश्वाश और अवैज्ञानिक विचारों ने उन्हें खतरनाक विषधर बना दिया है.

हमारे धार्मिक नेता, विशेषकर हिंदू धर्म के अनुयायी धर्माचार्यों से भी गए-गुजरे हैं. यदि धर्माचार्य लोगों को 1000 वर्ष पीछे लौटने की सलाह देता है, तो नेता उन्हें हजारों वर्ष पीछे ढकेलने की कोशिश में लगे रहते हैं. ये जनता को सदियों पीछे ढकेल भी चुके हैं. बुद्धिवाद न तो धर्माचार्यों को रास आता है, न ही हमारे हिंदू नेताओं को. उन्हें केवल अवैज्ञानिक, मूर्खतापूर्ण और बुद्धिहीन वस्तुओं से लगाव है.

अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं, ये लोग नई दुनिया में भी उम्मीद लगाए रहते हैं कि आने वाला समय उन जैसे असभ्य और गंवारों का होगा. ‘स्वर्णिम अतीत’(ओल्ड इज गोल्ड) की परिकल्पना पर वही व्यक्ति विश्वास कर सकता है, जिसने नए परिवर्तन को न तो समझा हो, न उसकी कभी सराहना की हो. केवल अकल के अंधे लोग उनका अनुसरण कर सकते हैं.

हम जैसे तर्कवादी लोग पुरातन को पूर्णतः खारिज नहीं करते. उसमें जो अच्छा है, हम उसका स्वागत करते हैं. उसे अपनाने के लिए भी अच्छाई और नएपन में विश्वास करना अत्यावश्यक है. तभी हम नए और अधुनातन सत्य की खोज कर सकते हैं. समाज तभी प्रगति कर सकता है, जब हम नए और बेहतर समाज की रचना के लिए नवीनतम परिवर्तनों के स्वागत को तत्पर हों.

लोग चाहे वे किसी भी देश  अथवा संस्कृति के क्यों न हों, पुरातन से संतुष्ट कभी नहीं थे. उनकी दृष्टि सदैव अधुनातन ज्ञान एवं प्रगति पर केंद्रित रही हैं. वे जिज्ञासु और निष्पक्ष थे. इसी कारण वे विस्मयकारी वस्तुओं की खोज कर पाए. आज दुनिया के हर कोने के लोग मानवोपयोगी आविष्कारों का लाभ उठा रहे हैं. इसलिए यह आलेख केवल उन लोगों के लिए है जो सत्य को अनुभव करना जानते हैं. उसे आत्मसात् करने को तत्पर हैं. ऐसे ही लोग शताब्दियों आगे के परिवर्तनों की कल्पना कर सकते हैं.  

 

भविष्यलोक : एक नास्तिक का स्वप्न

अतीत के विहंगावलोकन और महान इतिहासकारों की राय से पता चलता है कि आने वाले समय में राजशाही का अंत हो जाएगा. बहुमूल्य सोना-चांदी, हीरे-जवाहरात प्रभु वर्ग का विशेषाधिकार नहीं रह पाएंगे. उस दुनिया में न तो शासक की आवश्यकता होगी, न शासन की. न राजा होगा, न ही राज्य. लोगों की आजीविका और सुख-शान्ति पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं होगा, जैसा आजकल का चलन है. आज रोजी-रोटी के लिए किया जाने वाला श्रम अत्यधिक है, अपनी ही मेहनत का सुख प्राप्त करने के अवसर अपेक्षाकृत अत्यंत सीमित. जबकि हमारे पास खेती-किसानी और सुखामोद, यहां तक कि वैभव-सामग्री जुटाने के विपुल संसाधन हैं. दूसरी ओर भूख, गरीबी और दैन्य के सताए लोग बड़ी संख्या में हैं. ऐसे लोगों के पास सामान्य सुविधाओं का अभाव हमेशा बना रहता है. उनके पास न तो भरपेट भोजन है, न ही जीवन का कोई सुख. हालांकि दुनिया में अवसरों की भरमार है. उनसे कोई भी व्यक्ति अपनी रुचि के अनुसार जीवन के लक्ष्य निर्धारित कर सकता है, अपने आप को ऊंचा उठा सकता है. फिर भी ऐसे लोग बहुत कम हैं जो उन सबका आनंद उठा पाते हैं. कच्चे माल और उत्पादन के क्षेत्र तेजी से विकास की ओर अग्रसर हैं. दूसरी ओर ऐसे लोग भी अनगिनत हैं जो मामूली संसाधनों के साथ गुजारा करने को विवश हैं. समाज में जीवन की मूलभूत अनिवार्यताएं होती हैं. उनके अभाव में जीवन बहुत कठिन हो जाता है. बहुत-से लोग न्यूनतम सुविधाओं के लिए तरसते हैं. बड़ी कठिनाई में वे जीवनयापन कर पाते हैं. हमारे पास कृषि भूमि की कमी नहीं. बाकी संसाधन भी पर्याप्त मात्रा में है. मगर ऐसे लोग भी हैं जिनके पास जमीन का एक टुकड़ा तक नहीं है. ऐसी दुनिया में एक ओर सुख-पूर्वक जीवनयापन के भरपूर संसाधन मौजूद हैं, दूसरी ओर भुखमरी गरीबी, और दुश्चिंताओं की भरमार है. उनके कारण समाज में चुनौतियां ही चुनौतियां हैं.

क्या इन सबके और ईश्वर के बीच कोई संबंध है?

क्या इन सबके और मनुष्य के बीच कोई तालमेल है?

ऐसे लोग भी हैं जो सांसारिक कार्यकलापों को ईश्वर से जोड़ते हैं. परंतु हमें ऐसा कोई नहीं मिलता जो दुनिया की बुराइयों के लिए ईश्वर को जिम्मेदार ठहराता हो. तो क्या यह मान लिया जाए कि आदमी नासमझ है, उसमें इन बुराइयों से निपटने का सामर्थ्य ही नहीं है?

प्राणीमात्र के बीच मनुष्य सर्वाधिक बुद्धिमान है. यह आदमी ही है, जिसने ईश्वर, धर्म, दर्शन, अध्यात्म को गढ़ा है. कहा यह भी जाता है कि असाधारण मनुष्य ईश्वर का साक्षात्कार करने में सफल हुए थे. कुछ लोगों के बारे में तो यह दावा भी किया जाता है कि वे ईश्वर में इतने आत्मलीन थे कि स्वयं भगवान बन चुके थे. मैं बड़ी हिम्मत के साथ पूछता हूं—आखिर क्यों ऐसे महान व्यक्तित्व भी दुनिया में व्याप्त तमाम मूर्खताओं को उखाड़ फेंकने में नाकाम रहे? क्या इससे स्पष्ट नहीं होता कि लोग अपने सामान्य बोध से यह नहीं समझ पाए कि सांसारिक चीजों का ईश्वर, धर्म, आध्यात्मिक निर्देश, न्याय, मर्यादा, शासन आदि से कोई संबंध नहीं है. ये सिर्फ इसलिए हैं क्योंकि अधिकांश लोग स्वतंत्र रूप से सोचने तथा निर्णय लेने में अक्षम हैं?

पश्चिमी देशों में अनेक विद्वानों ने बुद्धि को महत्त्व देते हुए तर्कसंगत ढंग से सोचना आरंभ किया. उन विचारों की मदद से उन्होंने विलक्षण ज्ञान के साथ-साथ चामत्कारिक आविष्कार किए हैं. उसके फलस्वरूप वे अपनी आध्यात्मिकता के परिष्कार के साथ-साथ, अंधविश्वासों और आत्म-वंचनाओं का समाधान खोजने में भी कामयाब रहे. अंततः वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि प्राचीन ढकोसले ज्यादा दिन टिकने वाले नहीं हैं. यही कारण है कि उन्होंने नए युग पर ध्यान-केंद्रित करना आरंभ कर दिया है.

हम क्यों जन्मे हैं? आम आदमी को आज भी रोजी-रोटी के लिए संघर्ष क्यों करना पड़ता है? क्यों लोग भूख और गरीबी के कारण अकाल मौत मरते हैं? जबकि दुनिया में संसाधनों का प्राचुर्य है. ये मानव-मस्तिष्क को स्तब्ध कर देने वाले प्रश्न हैं. आज हालात बदल रहे हैं. आजकल बुद्धिवादी तरीके से अनेक चीजों का वास्तविक रूप हमारे सामने है. कालांतर में यही तरीका न केवल परिवर्तन का वाहक बनेगा, बल्कि सामाजिक क्रांति को भी जन्म देगा. एक समय ऐसा आएगा जब धन-संपदा को सिक्कों में नहीं आंका जाएगा. न सरकार की जरूरत रहेगी. किसी भी मनुष्य को जीने के लिए कठोर परिश्रम नहीं करना पड़ेगा. ऐसा कोई काम नहीं होगा जिसे ओछा माना जाए; या जिसके कारण व्यक्ति को हेय दृष्टि से देखा जाए. आज सरकार के पास असीमित अधिकार हैं. किंतु भविष्य में ऐसी कोई सरकार नहीं होगी, जिसके पास अंतहीन अधिकार हों. दास प्रथा का नामोनिशान नहीं बचेगा. जीवनयापन हेतु कोई दूसरों पर आश्रित नहीं रहेगा. महिलाएं आत्मनिर्भर होंगी. उन्हें विशेष संरक्षण, सुरक्षा और सहयोग की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी.

आने वाली दुनिया में मनुष्य को सुख-पूर्वक जीवन-यापन करने के लिए एक अथवा दो घंटे का समय पर्याप्त होगा. उससे वह उतना ही वैभवशाली जीवन जी सकेगा, जैसा संत-महात्मा, जमींदार, शोषण करने वाले धर्मगुरु और तत्वज्ञानी जीते आए हैं. सामान्य सुख-सुविधाओं तथा समस्त आनंदोपभोग के लिए मात्र दो घंटे का श्रम पर्याप्त होगा. मनुष्य के सामान्य रोग जैसे पैरों का दर्द, कान, नाक, पेट, हड्डी आदि के विकार तथा अन्यान्य रोग सहन नहीं किए जाएंगे. आने वाली नई दुनिया में अकेले मनुष्य की दुश्चिंताएं और कठिनाइयाँ समाज द्वारा सही नहीं जाएंगीं. उस दुनिया में समाज एकता और सहयोग के आधार पर गठित होगा.

युद्ध जो इन दिनों आम हैं, भविष्य में उनके लिए कोई जगह नहीं होगी. लोगों को युद्ध में जान देने के लिए मजूबर नहीं किया जा सकेगा. हत्या और लूटमार की घटनाओं में उल्लेखनीय गिरावट होगी. कोई बेरोजगार नहीं रहेगा. न कहीं भोजन और आजीविका के लिए मारामारी होगी. लोग काम की तलाश अपने आप को सुखी और स्वस्थ रखने के लिए करेंगे. बहुमूल्य वस्तुएं, मनोरम स्थल, मनभावन दृश्य और दमदार प्रदर्शनियां, जहां लोग मिल-जुलकर जीवन का आनंद ले सकें—सभी को समान रूप से सदैव उपलब्ध होंगी. आने वाली दुनिया में साहूकार, निजी व्यापारी, उद्योगपति और पूंजीपतियों के अधीन चल रही संस्थाओं के लिए कोई जगह नहीं होगी. केवल लाभ की कामना के साथ करने वाला कोई एजेंट, ब्रोकर या दलाल आने वाली दुनिया में नजर नहीं आएगा.

सहयोगाधारित विश्व-राज्य में जल, थल और वायुसेना बीते जमाने की चीजें बन जाएंगी. बस्तियों को तबाह कर देने वाले युद्धक जहाज और हथियार खुद नष्ट कर दिए जाएंगे. आजीविका के लिए रोजगार की तलाश आसान और मानव-मात्र की पहुंच में होगी. सुखामोद में चौतरफा वृद्धि होगी. ज्ञान-विज्ञान की मदद से मनुष्य की औसत आयु में बढ़ोत्तरी होगी. जनसंख्या बृद्धि की चाहे जो रफ्तार हो, आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता तथा उन्हें जुटाने में लगने वाला श्रम मूल्य न्यूनतम स्तर पर होगा. मशीनी-क्रांति उसे सहज-संभव कर दिखाएगी.

मिसाल के तौर पर, कभी वे दिन थे जब एक कारीगर एक मिनट में औसतन 150 धागे बुन पाता था. आज ऐसी मशीनें हैं जो किस्म-किस्म के कपड़े 45,000 धागे प्रति मिनट की रफ्तार से आसानी से बुन लेती हैं. इसी तरह पहले कारीगर के लिए प्रति मिनट 2-3 सिगरेट बनाना भी मुश्किल हो जाता था. आज एक मशीन प्रति मिनट में ढाई हजार सिगरेट बना देती है. आज मशीन के डेशबोर्ड पर केवल तंबाकू की पत्तियां, कागज आदि रखने की जरूरत होती है. सिगरेट बनाने से लेकर उनके पैकेट बनाने, फिर पैक करने तक का काम मशीनें करती हैं. वहां से उन्हें आसानी से बाहर भेजा जा सकता है. इसके अलावा खराब सिगरेटों को अलग करने से लेकर नष्ट करने तक का काम मशीनें स्वत: कर लेती हैं. आज जीवन के सभी क्षेत्रों में मशीनों के जरिये आसानी से काम हो रहा है. प्रौद्योगिकी विषयक ज्ञान में तीव्र वृद्धि हो रही है. तकनीक की मदद से आने वाली दुनिया में ऐसा संभव होगा जब कोई आदमी सप्ताह में मात्र दो श्रम करके साल-भर के लिए जरूरी वस्तुओं का उपार्जन कर सकेगा.

इस बात से डरने की जरूरत नहीं है कि लोग इससे सुस्त और आराम पसंद हो जाएंगे. इस तरह की चिंता किसी को भी नहीं करनी चाहिए. यही नहीं जैसे-जैसे जीवनोपयोगी वस्तुएं के उपार्जन के तरीकों और संसाधनों का विकास होगा, और जैसे-जैसे सुख-सुविधाओं की मांग बढ़ेगी, स्वाभाविक रूप से मनुष्य के श्रम और क्षमताओं का लोकहित में पूरे वर्ष उपयोग करने के लिए आवश्यक कदम भी उठते रहेंगे. ऐसी योजनाएं बनाई जाएंगी जिससे मनुष्य के खाली समय का सार्थक सदुपयोग संभव हो सके. आधुनिकतम मानवोपयोगी आविष्कारों की कोई सीमा नहीं होगी. सभी लोगों को काम मिलेगा, विशेषरूप से गुणी, प्रतिभाशाली और मनुष्यता के हित में आधुनिक सोच से काम लेने वालों के लिए काम की कोई कमी नहीं होगी. मजदूर केवल मजदूरी के लिए काम नहीं करेगा, बल्कि वह अपने मानसिक विकास के लिए भी काम को समर्पित होगा. उससे प्रत्येक व्यक्ति व्यस्त रहेगा. केवल लार्भाजन के लिए कोई उत्पादन नहीं किया जाएगा.

अपने से बड़ों को काम करते देख छोटे भी समाज हित में बहुउपयोगी योगदान देने को आश्चर्यजनक रूप से तत्पर होंगे. ठीक है, कुछ लोग सोच सकते हैं कि उनके कुछ उत्तराधिकारी सुस्त और आराम-पसंद होंगे. मैं ऐसा नहीं मानता. यह सोचते हुए कि कुछ लोग आलसी और निकम्मे हो सकते हैं, वे समाज के लिए बोझ नहीं रहेंगे. समाज की प्रगति पर उनसे न्यूनतम प्रभाव पड़ेगा. यदि कोई जानबूझकर सुस्त रहने की जिद ठाने रहता है, तो वह उसके लिए नुकसानदेह होगा, न कि पूरे समाज के लिए. सच तो यह है कि आने वाले समय में कोई भी खुद को आलसी और सुस्त कहलवाने में लज्जित महसूस करेगा. लोगों में समाज के लिए कुछ न कुछ उपयोगी करने की स्पर्धा बनी रहेगी. उनके लिए अपेक्षाकृत अधिक काम होगा. और किसी काम को करने वाले हाथों की कमी नहीं रहेगी. कोई किसी काम को पूरा न करने का दोष अपने सिर नहीं लेना चाहेगा.

आप पूछ सकते हैं कि क्या कुछ आदमी ऐसे भी होंगे जिन्हें ओछे और गंदे कार्यों पर लगाया जाएगा? अभी तक गंदे और खराब कार्यों से हमारा जो मतलब रहा है, आने वाली दुनिया में उन्हें ऐसा नहीं माना जाएगा. न उनके कारण किसी को हेय दृष्टि से देखा जा सकेगा. आनी वाले समय में झाडू़ लगाना, मैला उठाना, झूठे बर्तन धोने, कप-प्लेट धोने जैसे कार्यों के लिए मशीनों की मदद ली जाएगी. आदमी से उम्मीद की जाएगी कि तकनीकी कौशल प्राप्त कर, मषीनों का उपयोग करना सीखे. सिर पर भारी बोझा ढोने, खींचने या गड्ढा खोदने के लिए मानव-श्रम की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. किसी भी कार्य को असम्मानजनक नहीं माना जाएगा. कवियों, कलाकारों, कलमकारों और मूर्तिकारों के बीच नई दुनिया गढ़ने के लिए स्पर्धा रहेगी. अच्छे आदमियों को अच्छे काम सौंपे जाएंगे, ताकि वे नाम और नामा दोनों कमा सकें.

कोई भी व्यक्ति आत्मगौरव, चरित्र और मान-मर्यादा से शून्य नहीं होगा. चूंकि व्यक्तिगत लाभ के सभी रास्ते बंद कर दिए जाएंगे, इसलिए कोई भी आदमी गलत चाल-चलन में नहीं पड़ेगा. ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होगा जिसका झुकाव अनुचित और अनैतिक कार्य की ओर हो. ये शर्तें प्रत्येक व्यक्ति को उच्च नैतिक मापदंडों के अनुसरण की प्रेरणा देंगीं. उसे अधिक सुसभ्य और संवेदनशील बनाएंगी. यदि कहीं ऊंच-नीच, विशेषाधिकार और अधिकारविहीनता दिखेगी, वहां घृणा, जुगुप्सा, और विरक्ति के कारण भी मौजूद होंगे—और जहां ये चीजें अनुपस्थित होंगी, वहां अनैतिकता के लिए कोई स्थान न होगा. नए विश्व में किसी को कुछ भी चुराने या हड़पने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी. पवित्र नदियों जैसे कि गंगा के किनारे रहने वाले लोग उसके पानी की चोरी नहीं करेंगे. वे केवल उतना ही पानी लेंगे, जितना उनके लिए आवश्यक है. भविष्य के उपयोग के लिए वे पानी को दूसरों से छिपाकर नहीं रखेंगे. यदि किसी के पास उसकी आवश्यकता की वस्तुएं प्रचुर मात्रा में होंगी, वह चोरी की सोचेगा तक नहीं. इसी प्रकार किसी को झूठ बोलने, धोखा देने या मक्कारी करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, क्योंकि उससे उसे कोई प्राप्ति नहीं हो सकेगी. नशीले पेय किसी को नुकसान नहीं पहुंचाएंगे. न कोई किसी की हत्या करने का ख्याल दिल में लाएगा. बक्त बिताने के नाम पर जुआ खेलने, शर्त लगाने जैसे दुर्व्यसन समाप्त हो जाएंगे. उनके कारण किसी को आर्थिक बरबादी नहीं झेलनी पड़ेगी.

पैसे की खातिर अथवा मजबूरी में किसी को वेष्यावृत्ति के लिए विवश नहीं होना पड़ेगा. स्वाभिमानी समाज में कोई भी दूसरे पर शासन नहीं कर पाएगा. कोई किसी से पक्षपात की उम्मीद नहीं करेगा. ऐसे समाज में जीवन और काम-संबंधों को लेकर लोगों का दृष्टिकोण उदार एवं मानवीय होगा. वे अपने स्वास्थ्य की देखभाल करेंगे. प्रत्येक व्यक्ति में आत्मसम्मान की भावना होगी. स्त्री-पुरुष दोनों एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करेंगे और किसी का प्रेम बलात् हासिल करने की कोशिश नहीं की जाएगी. स्त्री-दासता के लिए कोई जगह नहीं होगी. पुरुष सत्तात्मकता मिटेगी. दोनों में कोई भी एक-दूसरे पर बल-प्रयोग नहीं करेगा. आने वाले समाज में कहीं कोई वेष्यावृत्ति नहीं रहेगी.

मानसिक अपंगता के शिकार लोगों को विशेषरूप से देखभाल की जरूरत पड़ सकती है. बावजूद इसके ऐसे व्यक्तियों को तभी बंद किया जा सकेगा, जब वे दूसरे लोगों के लिए परेशानियां खड़ी कर रहे हों. स्त्री-पुरुष दोनों पर किसी प्रकार के प्रतिबंध लागू करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. क्योंकि वे दोनों ही संबंधों की अच्छाई-बुराई की ओर से सावधान रहेंगे.

यातायात के साधन मुख्यतः हवाई होंगे और वे तीव्र से काम करेंगे. संप्रेषण प्रणाली बिना तार की होगी. सबके लिए उपलब्ध होगी और लोग उसे अपनी जेब में उठाए फिरेंगे. रेडियो प्रत्येक के हेट में लगा हो सकता है. छवियां संप्रेषित करने वाले उपकरण व्यापक रूप से प्रचलन में होंगे. दूर-संवाद अत्यंत सरल हो जाएगा और लोग ऐसे बातचीत कर सकेंगे मानो आमने-सामने बैठे हों. आदमी किसी से भी कहीं भी और कभी भी तुरंत संवाद कर सकेगा. शिक्षा का तेजी से और दूर-दूर तक प्रसार करना संभव होगा. एक सप्ताह तक की जरूरत का स्वास्थ्यकर भोजन संभवतः एक केप्सूल में समा जाएगा जो सभी को सहज उपलब्ध होंगे

मनुष्य की आयु सौ वर्ष अथवा उससे भी दो गुनी हो चुकी होगी.

नपुंसक स्त्री या पुरुष को संतान के लिए संभोग करने की जरूरत नहीं पड़ेगी. यही नहीं पषुओं की उन्नत नस्ल के लिए ताकतवर और सुदृढ़ सांड विशेषरूप से लाए जाएंगे, स्वस्थ्य और बुद्धिमान पुरुषों को वीर्य-दान के लिए तैयार किया जाएगा, तथा उसे वैज्ञानिक ढंग से स्त्री के गर्भाशय में स्थापित किया जाएगा. वह ऐसा रास्ता होगा जिससे आने वाली संतान शारीरिक एवं मानसिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ एवं तेजवंत होगी. बच्चे के जन्म की प्रक्रिया सरल होगी, जिसके लिए दंपति को संभोग की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. जनता के इच्छा और सहयोग से जनसंख्या-नियंत्रण का काम आसान हो जाएगा.

दैनिक उपभोग की वस्तुएं जैसी वे आज हैं, भविष्य में उससे अलग हांगीं. उदाहरण के लिए वाहनों का भार उल्लेखनीय रूप से कम हो जाएगा. उससे पैट्रोल की खपत में कमी आएगी. भविष्य की कारें बिजली अथवा दुबारा चार्ज होने वाली बैटरियों से चल सकेंगी. बिजली का उपयोग इस प्रकार किया जाएगा ताकि प्रत्येक व्यक्ति उसका लाभ उठा सके. वह मनुष्यता के लिए बहुउपयोगी होगी. इस तरह के अनेक वैज्ञानिक सुधार देखने में आएंगे. विज्ञान का बड़ी तेजी से विकास होगा, उसके माध्यम से नए-नए और उपयोगी आविष्कार सामने आएंगे.

उस दुनिया में आविष्कारों के दुरुपयोग के लिए कोई गुंजाइष नहीं होगी. आजकल संपत्ति, कानून और व्यवस्था की देखभाल, न्याय, प्रशासन, शिक्षा आदि के सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार संभालती है. इसके लिए सरकार के अलग-अलग विभाग हैं. आगे चलकर ये सब माध्यम अनावश्यक और अप्रचलित हो जाएंगे. इन कार्यों के लिए आजकल प्रचलित प्रणालियां कालांतर में अर्थहीन लगने लगेंगी.

संभव है आने वाली दुनिया में भी कोई व्यक्ति ईश्वर को समझने की चाहत रखे.

ईश्वर की संकल्पना स्वतः और स्वाभाविक रूप से नहीं जन्मी है. यह विश्वास की प्रक्रिया है, जो बड़ों द्वारा छोटों में अंतरित और उपदेशित की जाती है. आने वाली दुनिया में ईश्वर की चर्चा तथा कर्मकांड करने वाले लोग नगण्य होंगे. यही नहीं ईश्वर के नाम पर जितने चमत्कारों का दावा किया जाता है, कालांतर में वे लुप्त हो जाएंगे. मनुष्य ईश्वर की चर्चा करेगा किंतु बिना किसी अलौकिताबोध के. आज आदमी यह सोचकर ईश्वर को याद करता है, क्योंकि उसे उसकी आवश्यकता बताई जाती है. यदि हम काम करते समय अचानक बीच में आ जाने वाली बाधाओं के रहस्य को समझ लें, यदि मनुष्य की सामान्य जरूरतें उसकी आवश्यकता के अनुसार समय रहते आसानी से पूरी हो जाएं, तब उसे ईश्वर और सृष्टि की परिकल्पना की आवश्यकता ही न पड़े. स्वर्ग की परिकल्पना अवैज्ञानिक और अप्रामाणिक है. यदि मानव-मात्र के लिए धरती पर ही स्वर्ग जैसा वातावरण उपलब्ध हो जाए, तब उसे स्वर्ग जैसी आधारहीन कल्पना की आवश्यकता ही नहीं पड़े. न ही स्वर्ग मिलने की चाहत उसे परेशान करे. यही मानवीय बोध की चरमसीमा है. ज्ञान-विज्ञान और विकास के क्षेत्र में ईश्वर के लिए कोई स्थान नहीं है.

यदि व्यक्ति में खुद को जानने की योग्यता हो तो उसे ईश्वर की जरूरत ही नहीं है. यदि मनुष्य इस दुनिया को ही अपने लिए स्वर्ग मान ले तो वह स्वर्ग के आकाश में; तथा नर्क के पाताल में स्थित होने की जैसी भ्रामक बातों पर विश्वास ही नहीं करेगा. जागरूक और विवेकवान व्यक्ति इत तरह के अतार्किक सोच को तत्क्षण नकार देगा. जहां व्यक्तिगत इच्छाओं का लोप हो जाता है, वहां ईश्वर भी मर जाता है. जहां विज्ञान जिंदा हो, वहां ईश्वर को दफना दिया जाता है.

सामान्य धारणा में अपरिवर्तनीयता या अनश्वरता के बारे ठोस परिकल्पनाएं संभव हैं. इसका आशय क्या है? इसमें भ्रम पैदा करने वाले कारक कौन से हैं? अनश्वरता को लोग ईश्वर के पर्याय और गुण के रूप में देखते आए हैं. वैज्ञानिकों की दृष्टि में इस तरह का अर्थ निकालना मूर्खता है. हम अपने निजी अनुभवों को दूसरों को बताने में प्रायः संकोची रहे हैं. इसलिए दूसरों के अनुभव और विचार हमारे मस्तिष्क पर प्रभावी हो जाते हैं. हम अपनी अज्ञानता का प्रदर्शन करते हैं, जो प्रायः हमारी नहीं होती. जबकि वे दुनिया के जन्म और उसकी ऐतिहासिक सहनशीलता को समझने का आदर्श माध्यम हो सकती है. इन हालात में जबकि दुनिया के अनेक रहस्य हमें अभी तक अज्ञात हैं, आभार ज्ञापन के बहाने ही सही, कोई भी बुद्धिवादी ईष्वर की पूजा नहीं करेगा.

कोई भी व्यक्ति ज्ञानार्जन द्वारा अपने जीवन में सुधार ला सकता है. यही दुनिया का नियम है. जब कोई तर्कबुद्धि से घटनाओं की सही व्याख्या नहीं कर पाता, तब वह चुपचाप अज्ञानता के वृक्ष के नीचे शरण लेकर ईश्वर को पुकारने लगता है. इस तरह के अबौद्धिक कार्यकलाप आने वाले समय में सर्वथा अनुपयुक्त माने जाएंगे.

 आने वाले समय में न तो स्वर्ग होगा, न नर्क. क्योंकि उसमें सनातन पाप या पुण्य के लिए के लिए कोई स्थान नहीं होगा. किसी को किसी की मदद की जरूरत नहीं पड़ेगी. सिवाय पागल के कोई दूसरों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहेगा. इसलिए स्वर्ग और नर्क की परिकल्पना भविष्य में मनुष्यता के लिए अर्थहीन मान ली जाएगी.

इस तरह की आदर्श दुनिया अचानक नहीं गढ़ी जा सकती. धीर-धीरे, कदम-दर कदम आगे बढ़ते हुए मेहनती लोगों द्वारा, क्रमिक परिवर्तन के बाद, लंबे अंतराल में इस तरह की दुनिया अवश्य बनाई जा सकती है. समाज की विभिन्न समस्याओं के समाधान तथा मानवमात्र के बेहतर जीवन के लिए, नई दुनिया की संरचना के लिए यह रास्ता आदर्श होगा.

उस समाज में कोई यह नहीं पूछेगा, ‘हम क्या करें? जब सबकुछ ईश्वर की मर्जी से संचालित है.’ मनुष्यता की जो भी कमियां सामने आएंगी, लोग उनपर शांत नहीं बैठेंगे. लक्ष्य तक पहुंचने के लिए वे उनका समाधान अवश्य करेंगे. नियति और दुर्भाग्य की कोई बात नहीं होगी. प्रत्येक कार्य संपूर्ण आत्मविश्वास के साथ किया जाएगा. समाज में जो भी बुराइयां सामने आएंगी, बेहतर समाज की रचना के लिए उनका निदान तत्क्षण और निपुणता के साथ किया जाएगा.

प्राचीन रीति-रिवाजों और पंरपराओं में अंध-आस्था ने लोगों के सोचने समझने, तर्क-बुद्धि से काम लेने की प्रवृत्ति का लोप कर दिया है. ये चीजें दुनिया की प्रगति में बाधक बनी हुई हैं. कुछ लोगों के स्वार्थ इनसे जुड़े हैं. निहित स्वार्थ के लिए वही लोग, जो इन पुरानी और बकवास चीजों से ही कमाई करते रहते हैं. ऐसे लोग ही नई दुनिया की संरचना का विरोध करते हैं. उस दुनिया का विरोध करते हैं जिसमें खुशियों की, सुख-शांति की भरमार होगी. लोगों के विकास की प्रचुर संभावनाएं भी रहेंगी. बावजूद इसके जो मनुष्य के अज्ञान तथा कुछ लोगों के स्वार्थ के विरुद्ध खुलकर खड़े होंगे, वही नई दुनिया की रचना करने में समर्थ होंगे. नई दुनिया के निर्माताओं को मजबूत करते के लिए हमें उनके साथ, उनकी कतार में शामिल हो जाना चाहिए. युवाओं और बुद्धिवादियों के लिए उचित अवसर है कि वे नए विश्व की रचना हेतु अपने प्रयासों को अपने विचार, ऊर्जा और सपनों को समर्पित कर दें.

ई वी रामास्वामी पेरियार(1944)