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विमुद्रीकरण के बहाने

सामान्य

जनता जब तक निजी क्षेत्र की बढ़ती अर्थशक्ति की ओर से आंखे मूंदे रहेगी, उस समय तक मूंदे रहेगी जब तक कि वे गणतांत्रिक राज्य से अधिक शक्तिशाली नहीं हो जाते, तब तक गणतंत्र असुरक्षित बना रहेगा. कुल मिलाकर फासिस्ज्म का अर्थ सरकार पर किसी व्यक्ति, दल अथवा निजी संस्थान का सर्वाधिकार है.रूजवेल्ट, अमेरिकी राष्ट्रपति.

बाजार केंद्रित अर्थव्यवस्था में मुद्रा के महत्त्व से इन्कार नहीं किया जा सकता. 8 नवंबर के बाद ‘नोटबंदी’ या ‘विमुद्रीकरण’ की घोषणा के पश्चात देशभर में मचे हाहाकार से उसे समझा जा सकता है. सरकार ने आतंकवाद और कालेधन पर रोकथाम के लिए विमुद्रीकरण की घोषणा की थी. उसका मानना है कि प्रचलित मुद्रा का बड़ा हिस्सा गैरकानूनी रूप से जमाखोरों तथा कालाबाजारियों के पास जमा है, पड़ोसी देश नकली करेंसी भारत में झोंककर आतंकवाद को बढ़ावा देता है. इसलिए एक साहसिक निर्णय के अंतर्गत प्रधानमंत्री ने प्रचलित मुद्रा को निश्चित अवधि के भीतर वापस लेने का ऐलान किया है. वर्तमान सरकार के लगभग ढाई वर्ष के कार्यकाल में यह पहला निर्णय है, जिसपर पिछली यूपीए सरकार की छाप नहीं है. इसके अलावा वर्तमान सरकार की ‘जनधन’ तथा ‘मनरेगा’ जैसी जितनी भी योजनाएं हैं, सब विरासत में मिली हैं. वर्तमान सरकार ने उन्हें ज्यों की त्यों अथवा नाम बदलकर अपनाया है. योजना आयोग के स्थान पर सरकार ने नीति आयोग का गठन जरूर किया है, परंतु नए संस्थान की ओर से अभी तक ऐसा ठोस कार्यक्रम सामने नहीं आया है, जिससे इस बदलाव का औचित्य सिद्ध हो. जिन मामलों में सरकार ने तत्परता से काम किया है, उनमें उच्च पदों पर प्रतिबद्ध संघियों को नियुक्त करना, उनके संगठनों को प्रोत्साहित करना तथा यथासंभव मदद पहुंचाना शामिल हैं. इसके अलावा जिन कार्यों को इस सरकार ने प्राथमिकता दी है, उनके नाम हैंदूरदर्शन पर तंत्रमंत्र, पूजापाखंड वाले धारावाहिकों को बढ़ावा देना, पाठ्यक्रम में अपनी विचारधारा के अनुरूप फेरबदल करना और हिंदू मतों के ध्रुवीकरण हेतु हिंदूमुस्लिम सांप्रदायिकता को हवा देना. इन सबका विकास से कोई संबंध नहीं है. बल्कि ये समाज को पीछे ढकेलकर लोगों के बीच अविश्वास और अव्यवस्था फैलाने वाले हैं. वर्तमान सरकार ने यदि इनका चयन किया है तो इसलिए कि उसके सबसे बड़े घटक की राजनीति सांप्रदायिक अविश्वास और धार्मिक पाखंड के सहारे चलती है.

प्रचलित करेंसी नोटों को तयशुदा अवधि में वापस लेने की योजना को प्रधानमंत्री ने ‘डीमोनीटाइजेशन’ का नाम दिया है. जिसे मीडिया ने ‘नोटबंदी’ या ‘विमुद्रीकरण’ कहकर प्रचारित करना शुरू कर दिया. इसका आशय प्रचलित मुद्रा जिसका एक हिस्सा, सरकार के अनुसार टैक्स चोरों की गिरफ्त में हैको सरकारी खजाने में खींच लेने या छिपाए रखने की स्थिति में उसे कागज के टुकड़ों में बदल देने की नीति से है. यह अर्थशास्त्र सम्मत प्रक्रिया है, जिसकी अनुशंसा डॉ. आंबेडकर जैसे विद्वान अर्थशास्त्री ने भी की है. ‘नोटबंदी’ या ‘विमुद्रीकरण’ इस योजना के लिए उपयुक्त शब्द नहीं हैं. लेकिन व्यक्ति की भांति भाषा की भी सीमा होती है. कभीकभी ऐसा होता है जब सटीक शब्द की खोज के लिए शब्दकोश अपर्याप्त दिखने लगते हैं. हड़बड़ी में हम उन शब्दों का उपयोग करने लगते हैं, जो हमारे मंतव्य से मेल न खाते हों. यह मुख्यतः मुद्रा के स्वरूप में परिवर्तन से जुड़ा मसला है. उपयुक्त शब्द के अभाव में हम फिलहाल ‘विमुद्रीकरण’ का उपयोग करेंगे. ‘विमुद्रीकरण’ को लेकर असमंजस सरकार के स्तर पर भी था. इसलिए आरंभ में केवल करेंसी नोटों में बदलाव का संकेत देते हुए, बड़े नोटों को बैंकों में जमा करने का आदेश दिया गया. बाद में नकदी की कमी से समाज में अफरातफरी मची तो कागजी मुद्रा के स्थान पर डिजिटल लेनदेन पर जोर दिया जाने लगा.

इस लेख का उद्देश्य विमुद्रीकरण या उसके प्रभावों की समीक्षा करना नहीं है, केवल यह देखना है कि योजना लागू होने के पश्चात समाज में जो उथलपुथल मची है, क्या उसे स्वाभाविक माना जाएगा! क्या यह स्वस्थ समाज का लक्षण है! लाभकेंद्रित अर्थव्यवस्था में ‘विमुद्रीकरण’ पूंजीवादी कामना है. इससे लोगों के मुद्राअधिकार बाजारहित में बदला जा सकता है. भारत जैसे भीषण समाजार्थिक असमानताओं वाले देश में यह विषमताओं और अधिक बढ़ाएगा. शायद इसीलिए पिछली सरकारें उसे लागू करने से बचती आई थीं. यदि लागू किया भी तो पर्याप्त लचीलापन अपनाते हुए, ताकि जनसाधारण को किसी प्रकार की परेशानी न झेलनी पड़े. कदाचित वर्तमान सरकार को इस कार्य की जटिलता का आभास नहीं था. इतनी बड़ी योजना को तरीके से निपटाने के लिए जैसी तैयारी चाहिए, सरकार उससे बहुत पीछे थी. केवल राजनीतिक हित साधने हेतु किए गए निर्णय के दुष्परिणाम बैंकों तथा एटीएम के आगे लंबीलंबी लाइनों के रूप में सामने आए. लगभग 135 व्यक्तियों की बैंक और एटीएम की लाइनों में लगेलगे जानें चली गईं. यह इस साल भारतपाकिस्तान बार्डर पर मारे गए सैनिकों की संख्या से सवा गुनी है. बाजार से मुद्रा गायब होने से उपभोक्ता और व्यापारी सबका हालबेहाल हैं. उद्योगधंधे ठप्प पड़ चुके हैं. दिहाड़ी मजदूर, रिक्शाचालक, ऑटोवाले, रेहड़ीखोमचे वाले जिनका चूल्हा रोज की कमाई से चलता हैसब परेशान हैं. रोजगार की तलाश में गांव छोड़ चुके लोग आहत हैं. गांव की राजनीति और बेरोजगारी से बचने के लिए शहर चुना था. अब यहां से कहां जाएं! किसी के पास ग्राहक नहीं है तो किसी के नियोक्ता के पास उसे देने के लिए नकदी का अभाव है. शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन, आयातनिर्यात उत्पादन, सर्विस सेक्टर, खेतीबाड़ी आदि अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्र आर्थिक मंदी के शिकार हैं. विडंबना यह कि सरकार के कदम से जितना कालाधन उजागर होने की उम्मीद है, उससे कहीं अधिक धनराशि का नुकसान व्यापार तथा उद्योगधंधों की मंदी के चलते पूरा देश उठा चुका है. घोषणा में तीस दिसंबर के बाद हालात सामान्य होने की बात कही गई थी, मगर इसके छह महीने बाद भी सब कुछ पटरी पर आ पाएगा, इसकी बहुत क्षीण संभावना है.

क्या यह मुद्रा की ताकत है? समाजार्थिक विषमताओं से घिरे देश में जो कल्याणराज्य होने का दावा करता हो, क्या मुद्रा को इतना ही शक्तिशाली होना चाहिए? क्या मुद्रा का शक्तिशाली होना देश और समाज के शक्तिशाली होने जैसा ही है? लोकतंत्र में समस्त निर्णायक शक्तियां जनता के पास होती हैं. परंतु लोकहित के नाम पर लिए गए इस निर्णय में लोक ही सर्वाधिक आहत हुआ है. अधिकांश जन निर्णय से नाखुशी जता चुके हैं. बैंक और एटीएम की लाइनों में लोग दम तोड़ रहे हैं. कामधंधे तबाह हो चुके हैं. फिर भी सरकारी निर्णय के विरोध में कोई विशेष आक्रोश नजर नहीं आता. क्यों? बिना सार्थक आक्रोश और विरोध की अभिव्यक्ति के क्या लोकतंत्र सुरक्षित रह सकता है? आप कह सकते हैंजीवन में अर्थ की उपयोगिता है. ‘रुपया’ को ‘बाप और भइया से बड़ा’ भी हमारे यहां कहा गया है. कितने ही मुहावरे जीवन में अर्थ की उपयोगिता को लेकर लोकप्रचलित हैं. हिंदू धर्म में उसे जीवन के चार पुरुषार्थों में से एक माना गया है. ठीक है, लेकिन हम एक बात प्रायः भूल जाते हैं. जिन दिनों यह ‘अर्थ’ को पुरुषार्थ माना गया था, उन दिनों मुद्रा का मूल्य वास्तविक होता था. सौ मुद्राएं चुकाने का मतलब था, सौ स्वर्णभार का भुगतान. आज मुद्रा का मूल्य प्रतीकात्मक है. बिना सरकार की गारंटी के नोट महज कागज का टुकड़ा है. वह बाजार में मनुष्य के क्रय सामर्थ्य को दर्शाता है, परंतु स्वयं ‘समृद्धि’ का मानक नहीं है. यद्यपि उसके उपयोग द्वारा वास्तविक ‘समृद्धि’ खरीदी जा सकती है.

यदि बिना सरकारी गारंटी के मुद्रा का वास्तविक मूल्य शून्य है तो नागरिक जीवन में मुद्रा के वास्तविक महत्त्व की समीक्षा आवश्यक हो जाती है. खासकर समृद्धि में उसके योगदान को लेकर. क्योंकि कोई भी सरकार समाज से बड़ी नहीं होती. खुद को व्यवस्थित रखने के लिए समाज ही सरकार का गठन करता है. समाज राज्य की आत्मा है तो सरकार महज उसका एक संस्कार. यदि सरकार अथवा उसकी कोई संविदा सामाजिक संबंधों के लिए ही संकट का विषय बन जाए तो मान लेना चाहिए कि उस संविदा और समाज के अंतःसंबंधों की समीक्षा का समय आ चुका है. उस ओर से समाज की उदासीनता उसके पतन की संकेतक हैं. यह स्वस्थ समाज का लक्षण नहीं कि बैंक की कतार में खड़ेखड़े नागरिक की मृत्यु हो जाए और लाश को किनारे कर, दोचार हजार रुपये की उम्मीद में लोग कतार में बने रहने के लिए धक्कामुक्की करते रहें. इस घटना ने मानवीय संबंधों को तारतार कर दिया है. उधर सरकार है कि उसके कर्ताधर्ताओं को हर वह व्यक्ति जो बैंक या एटीएम की कतार में है, कहीं न कहीं चालू, बेईमान और भ्रष्टाचारी नजर आता है.

करेंसी राज्य की ओर से आपसी लेनदेन को सुगम बनाने के लिए की जाने वाली व्यवस्था है. उसका अपना कोई मूल्य नहीं होता. राज्य की गारंटी उसे मूल्यवान बनाती है. चूंकि करेंसी का अपने आप में कोई मूल्य नहीं होता, इसलिए वह अर्थव्यवस्था की मजबूती का पर्याय भी नहीं होती. वह केवल उसके प्रवाह को दर्शाती है. जैसे थर्मामीटर का तापांक स्वयं उष्मा न होकर मात्र उसके स्तर को दर्शाता है, वैसे ही मुद्रा की मात्रा केवल मनुष्य के क्रयसामर्थ्य की संकेतक होती है, समृद्धि की नहीं. बाजारकेंद्रित मुद्राप्रवाह में समृद्धि का आवागमन बराबर नहीं होता, बल्कि वह मुनाफे के रूप में निरंतर ऊपर की ओर अग्रसर रहता है. मुद्रा की उपयोगिता आपसी लेनदेन को सहज बनाने में है. उससे बाजार को गति मिलती है. लोग अपने अधीन मुद्रा का अधिकाधिक उपयोग खरीदफरोख्त में करें, इसके लिए बाजार मुद्रा की मौजूदगी को सराहता है. उसे आर्थिक शक्ति के रूप में पेश करता है. किंतु उसकी मूल्यवत्ता तभी तक है, जब तक उसके पीछे सरकार की गारंटी हो. मुद्रा का उपयोग सभी वर्गों में समान नहीं होता. उसकी मुख्य उपयोगिता मध्य तथा निम्न वर्गों तक सीमित होती है, जिन्हें अपनी तात्कालिक जरूरतों के लिए खरीदफरोख्त करनी होती है. बड़े व्यापारियों, उद्योगपतियों तथा पेशेवरों के लेनदेन में, जहां भुगतान राशि अत्यधिक हो, मुद्रा का उपयोग अव्यावहारिक मान लिया जाता है. उनके यहां समृद्धि का आकलन संसाधनों पर अधिकार से किया जाता है, न कि लेनदेन से. उदाहरण के लिए जमींदार की समृद्धि का आकलन भूसंपदा के आधार किया जाता है. व्यापारी और उद्योगपति की समृद्धि, उसके अधीन बाजार, कलकारखानों आदि पर एकाधिकार से आंकी जाती है. मुद्रा का महत्त्व केवल व्यापारिक हिसाबकिताब तक सीमित होता है.

व्यक्ति करेंसी के उपयोग द्वारा भूमि तथा समृद्धि के दूसरे स्थायी उपादानों का अर्जन कर सकता है. उस समय वह वास्तव में ‘अर्थ’ बन जाती है. लेकिन जनसाधारण द्वारा अर्जित करेंसी का अधिकांश जीवन की भोजन, वस्त्र, स्वास्थ्य जैसी बेहद सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति में ही खप जाता है. वास्तविक समृद्धि में अंतरित करने का अवसर उसे कम ही प्राप्त होता है. उसे भुलावे में रखने के लिए बाजारवादी ताकतें तथा उसके पोषित अर्थविज्ञानी समृद्धि को दैनिक जरूरतों के संदर्भ में, क्रयसामर्थ्य द्वारा परिभाषित करते हैं. सामान्यतः यह मान भी लिया जाता है. मुद्रा को वास्तविक संपदा अथवा समृद्धि का प्रतीक मानना मूर्ति को देवता मानने की स्थिति है. चालाक पुरोहित जैसे पत्थर की मूर्ति में देवता की प्रतिष्ठा करते रहते हैं, वैसे ही पूंजीवादी शक्तियां अर्थव्यवस्था की सारी ताकत मुद्रा में केंद्रित होने का भ्रम फैलाए रखती हैं. बाजारकेंद्रित अर्थव्यवस्था में ऊपर के स्तर पर मुनाफे की स्पर्धा होती है, जबकि निचले वर्ग रोजीरोटी के संघर्ष में उलझे रहते हैं. स्पर्धा उनके आत्मविश्वास, आपसी विश्वास और सहअस्तित्व की भावना का हनन करती है. आपसी विश्वासहीनता तथा निचले स्तर की स्पर्धा उनके जीवन में मुद्राआधारित लेनदेन को अपरिहार्य बना देती है. इस तरह मुद्रा की आभासी शक्ति सामान्यतः जनसाधारण तथा मध्यवर्ग को प्रभावित करती है, उच्च वर्गों को नहीं. मुद्रा उनके लिए महज संख्या जितना महत्त्व रखती है, जिसका उपयोग व्यापारिक हिसाबकिताब तक सीमित होता है.

बाजार में करेंसी की किल्लत तथा शीघ्र ही उसके समाधान की क्षीण संभावनाओं को देखते हुए सरकार रोजमर्रा के लेनदेन में डिजिटल करेंसी को अपनाने पर जोर दे रही है. उपभोक्ताओं को डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, पेटीएम, आधारकार्ड आदि के माध्यम से खरीदफरोख्त करने की सलाह दी जा रही है. डिजिटल पेमेंट गेटवे को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने कई उपहार योजनाएं लागू की हैं. सेवाकर की छूट, लॉटरी द्वारा पुरस्कार आदि योजनाओं से सरकार की नीयत और नीति दोनों को समझा जा सकता है. इससे सरकार का क्या लाभ है? यह समझने के लिए ज्यादा माथापच्ची की आवश्यकता नहीं है. ऐसे दुकानदारों की संख्या लाखों में है जो कर चोरी को अपना अधिकार मान बैठे हैं. बिना रसीद के लेनदेन बाजार में बहुत आम है. करयोग्य आमदनी वाले दुकानदारों में से बामुश्किल दो या तीन प्रतिशत आयकर देते हैं. सरकार का मानना है कि लेनदेन डिजिटल गेटवे से होगा तो भ्रष्ट दुकानदारों, व्यापारियों तथा कालेधन के बूते खरीदारी करने वालों पर नजर रखना आसान हो जाएगा. उसकी आमदनी बढ़ेगी. भ्रष्टाचार पर काबू कर पाना संभव होगा. सवाल है कि इससे उपभोक्ता को क्या लाभ होगा? दुकानदार उसे ‘अधिकतम खुदरा मूल्य’ पर बेचता है, जिसमें सामान्यतः स्थानीय कर भी सम्मिलित होता है. इस तरह व्यक्ति जो भी वस्तु खरीदता है, उसपर दुकानदार के लाभ तथा कर आदि का भुगतान वह कमोबेश करता ही है. क्या नई व्यवस्था उसके लिए हितकर सिद्ध होगी? पेमेंट सीधे बैंक में जाने से धनराशि की सुरक्षा, लानेले जाने में बचत, रकम पर मिलने वाला तात्कालिक ब्याज अपरोक्ष रूप में बड़े दुकानदारों को लाभ पहुंचाएगा. ग्राहक को भी इसका लाभ पहुंचे, सरकार इसपर विचार करने के लिए फिलहाल तैयार नहीं है. इतना तय है कि इस व्यवस्था से डिजिटल पेमेंट के लिए जिस माध्यम को ग्राहक अपनाएगा, उसके सेवामूल्य के साथ सेवाकर के रूप में अतिरिक्त धनराशि भी उसे वहन करनी पड़ेगी.

बाजार की नीयत और नीति को समझने वालों के लिए यह कोई अबूझ पहेली नहीं है. परंपरागत पद्धतियों में उत्पादक एवं उपभोक्ता का सीधा संबंध होता था. उत्पादक अपने उपभोक्ता की आवश्यकता के अनुसार उत्पादन करता था. मुनाफे के लालच में उत्पाद का निर्माण करना तब की अर्थव्यवस्था में प्रचलित नहीं था. कुछ कारीगर और कलाकार ऐसे अवश्य होते थे जो अपने हुनर का प्रदर्शन राजाओं और सामंतों को प्रसन्न करने के लिए करते थे. उनके उत्पाद को कई बार कला तो कई बार विलासिता की वस्तु तक मान लिया जाता था. परंतु वह संख्या की दृष्टि से समाज का मामूली हिस्सा था. वे अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने की हैसियत नहीं रखते थे. दूसरे उनका ध्येय महज अपने आश्रयदाता को खुश करना होता था. बाजार केंद्रित अर्थव्यवस्था में उत्पाद और उपभोक्ता के बीच दुकानदार के रूप में तीसरा पक्ष उपस्थित हो जाता है. उसके तहत उत्पादक लाभ की कामना के साथ माल बनाता है. उपभोक्ता तक पहुंचतेपहुंचते वस्तु के मूल्य में उत्पादक के मुनाफे तथा उत्पादनकर के साथसाथ, दुकानदार का मुनाफा भी जुड़ जाता है. यदि उत्पादक के अलावा उपउत्पादक भी हैं, तथा अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचने के वस्तु कई दुकानदारों के हाथों से होकर गुजरती है तो उसमें उपउत्पादकों तथा बिचौलिए दुकानदारों का मुनाफा भी जुड़ता चला जाता है. उपभोक्ता न केवल उन सबके मुनाफे का हिस्सा वहन करता है, अपितु अपरोक्ष रूप में विभिन्न स्तरों पर देय कराधान, यातायात, सर्विस चार्ज, विज्ञापन आदि का बोझ भी वही उठाता है. परिणामस्वरूप वास्तविक उपभोक्ता तक पहुंचतेपहुंचते वस्तु की कीमत कई गुना बढ़ जाती है. कई बार तो वास्तविक मूल्य तथा सभी बिचौलिये दुकानदारों के सकल मुनाफे का अनुपात एक और चार का हो जाता है. उत्पादक एवं उपभोक्ता के बीच सीधा संबंध न होने के कारण चालू अर्थव्यवस्था को मुनाफे की अर्थव्यवस्था माना जाता है. जिसमें उपभोक्ता एवं उत्पादक के बीच किसी भी प्रकार की आत्मीयता नहीं पनप पाती. वस्तुविनिमय जरूरत और मुनाफे का लेनदेन बन जाता है. इसमें उपभोक्ता जो अपनी जरूरत के चलते खरीदारी को विवश है, हमेशा घाटे में रहता है.

सरकार को लगता है कि व्यापारी और दुकानदार अपने मुनाफे पर देय आयकर तथा अन्य करों का भुगतान करने में बेईमानी करते हैं. हालांकि इसकी रोकथाम के लिए सरकार के अधीन भारीभरकम निगरानी तंत्र रहता है. उसका कार्य दुकानदारों के आयव्यय पर नजर रखना तथा उनसे निर्धारित कर वसूली करना है. डिजिटल पेमेंट गेटवे को बढ़ावा देने का अर्थ यह भी है कि सरकार अपने निगरानी तंत्र की विफलता को स्वीकार चुकी है. उसे लगता है कि लेनदेन के डिजिटलाइजेशन द्वारा कराधान का हिसाबकिताब और संग्रह सुगम हो जाएगा. चूंकि धनराशि का लेनदेन बैंकों या उपबैंकीय संस्थानों तथा संविदाओं यथा पेटीएम, आधारकार्ड, डेबिटक्रेडिट कार्ड आदि के माध्यम से होगा, तब उसकी वसूली भी आसान होगी. फलस्वरूप सरकार की अपने ही तंत्र पर निर्भरता घटेगी. इस निर्णय द्वारा सरकार को दुहरा लाभ होने की उम्मीद है. सरकार को लगता है कि इससे वह अधिकतम कराधान में सफल होगी. दूसरे बैंकिंग सेवाओं के जरिये उसे मोटी रकम सेवाकर के रूप में भी प्राप्त होगी. कुल मिलाकर सरकार अपने निगरानी तंत्र और उपभोक्ताओं से अधिक भरोसा उपबैंकीय एजेंसियों पर कर रही है. यह तब है जबकि उपभोक्ता वस्तुओं तथा अधिकांश औद्योगिक उत्पादों के मूल्य पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है. कराधान से बढ़े खर्च की भरपाई पूंजीपति और उद्यमी बड़ी आसानी से मूल्य बढ़ाकर कर सकते हैं. उसका असर सीधे उपभोक्ता की जेब पर पड़ेगा. उसके लिए चीजें और भी महंगी होंगी. सेवा प्रदाता बैंकिंग और उपबैंकिंग एजेंसियों का खर्च तथा उसपर लगने वाला सेवा कर भी अंततः उपभोक्ता की जेब से ही जाएगा. उसे न केवल बैंकिंग सेवा के बदले भुगतान करना पड़ेगा, बल्कि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में दुकानदार पर लगने वाले करों का हिस्सा भी उसे ही वहन करना पड़ेगा. चूंकि नकदी जेब में नहीं रहेगी, इसलिए उसका लाभ बैंक उठाएगा. ये बातें आम उपभोक्ता से छिपी नहीं हैं. बावजूद इसके सामाजिक स्तर पर कोई बड़ी हलचल या आक्रोश नजर नहीं आता. आमजन की इस चुप्पी या अपार सहनशीलता को सरकार अपने निर्णय के प्रति समर्थन के रूप में पेश कर रही है. क्या हालात पूर्णतः विकल्पहीन हैं?

लोकतंत्र में मतसंख्या महत्त्वपूर्ण होती है. लेकिन मतदान में समाज के सभी वर्ग समान रूप से हिस्सा नहीं लेते. मतदाताओं की आय के आधार पर हम उन्हें तीन वर्गों में बांट सकते हैं. पहला अतिसंपन्न वर्ग. प्रत्यक्ष या परोक्ष उसका संबंध पक्षविपक्ष के सभी नेताओं से होता है. असल में यह वर्ग राजनीति का उपयोग अपने हक में करता है. चाहे जिस दल की जीत हो यह वर्ग सत्ता के हमेशा करीब रहता है. उसे निर्वाचन प्रक्रिया की परवाह नहीं होती. चुनावों में इसकी आनुपतिक भागीदारी सबसे कम होती है. दूसरा मध्य वर्ग. इस वर्ग में पढ़ालिखा रोजगारपरस्त वर्ग, छोटेव्यापारी, पेशेवर, बुद्धिजीवी आदि आते हैं. यह किसी भी समाज की प्राणशक्ति होता है. इसका एक हिस्सा समाज के शीर्षस्थ वर्ग से समझौता कर अपनी स्वार्थसिद्धि में लगा रहता है, जबकि दूसरा हिस्सा व्यवस्था से असंतुष्टों का होता है. जनता का साथ मिले तो यह सामाजिक क्रांति का वाहक बन जाता है. इसकी दुर्बलता है कि यह राजनीतिक रूप से बेहद बंटा हुआ होता है. संख्या में यह अतिसंपन्न वर्ग से अधिक तथा राजनीतिक दृष्टि से सबसे चलायमान वर्ग माना जाता है. चुनावों में आगापीछा सोचकर मतदान करता है. बंटा होने के कारण यह वर्ग खुद तो राजनीतिक ताकत नहीं बन पाता, लेकिन लोकमानस को बनानेबिगाड़ने, दलविशेष के संबंध में हवा बनाने में इस वर्ग का बहुत योगदान होता है. इसके मामूली प्रतिशत का किसी दल या विचार की ओर झुकाव, मतदाताओं के बड़े वर्ग को प्रभावित करता है. तीसरा वर्ग जनसाधारण का होता है, जिसमें किसान, मजदूर, छोटे पेशेवर आदि आते हैं. इस वर्ग के लिए रोजीरोटी के मसले जीवन के बाकी मामलों से बड़े होते हैं. वर्तमान चुनौतीपूर्ण होता है, जिससे भविष्य के सपनों की ओर उनका ध्यान ही नहीं जा पाता. इस वर्ग के पास देशदुनिया के बारे में ज्यादा सोचने का अवसर नहीं होता. इसलिए मतदान के समय धर्म, जाति, क्षेत्रीयता जैसे मुद्दों के आधार पर अपनी राय बनाता है, जिनका इसके विकास से कोई संबंध नहीं होता. लोकतांत्रिक विवेक की कमी भी इसका कारण बनती है. इस वर्ग का मानस धर्म, संस्कृति परंपरा के मौखिक पाठों द्वारा तैयार होता है. समस्याओं के निदान के लिए इसे सदैव किसी तारणहार की प्रतीक्षा रहती है. इस कारण इसे फुसलाना आसान होता है. अतएव नेतागण चुनावी नारे इसी वर्ग को ध्यान में रखकर बनाते हैं. रातदिन इसी के कल्याण का राग अलापते हैं. परंतु चुनाव जीतते ही वे इससे पूरी तरह कटकर उस वर्ग के रहनुमा बन जाते हैं जिसे हमने पहले स्थान पर रखा है.

जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि यदि जनता के नहीं रहते, जनकल्याण के नाम पर बनी सरकारें यदि पूंजीपतियों और सरमायेदारों की हितैषी बन जाती हैं, तो जनता क्या करे? समस्या का कारण जनता की दुर्बलता नहीं, आत्मविश्वास और अपनी शक्ति के प्रति अनभिज्ञता है. लोग जानते हैं कि संसद में पहुंचे नेताओं को सर्वाधिक वोट उन्हीं के प्राप्त होते हैं. जो अमीर हैं, जिनकी सत्ता और संस्थानों तक पहुंच है, वे मतदान के दिन घर से नहीं निकलते. इसके बावजूद नेता हैं कि संसद तथा विधायिकाओं में जाते ही उस वर्ग को भुला देते हैं, जिसका उनकी जीत में सर्वाधिक योगदान है. वे उस वर्ग के पिछलग्गू बन जाते हैं, जो सामान्यतः उनकी परवाह नहीं करता. जनसाधारण जो मतदान में उत्साहपूर्वक हिस्सा लेता है, जनप्रतिनिधियों के माध्यम से सरकार के गठन को संभव बनाता है, अपनी समस्याओं के समाधान के लिए पुनः किसी तारणहार की प्रतीक्षा में लगा रह जाता है.

दरअसल हमने लोकतंत्र को तो अपनाया, मगर आधेअधूरे मन से. संविधान की भावना के अनुरूप लोगों की चेतना का लोकतांत्रिकरण कर ओर हमने ध्यान ही नहीं दिया. बताया गया कि लोकतंत्र की परिभाषा जनता द्वारा सरकार चुनना है. जनता इसके लिए निर्वाचन प्रक्रिया में हिस्सा लेती रही. बिना यह जाने कि उसके द्वारा चुने गए प्रतिनिधि संसद और विधायिकाओं में जाते ही शासक बन जाते हैं. निहित स्वार्थ के लिए वे जनसाधारण से उसकी स्वतंत्रता, समानता तथा विकास के अवसर छीन लेते हैं, जिनपर नागरिक होने के नाते उनका अधिकार है. लोकतांत्रिक सरकार को चाहिए कि वह न्यूनतम शासन करे. उसके लिए लोगों का जागरूक रहना जरूरी है. लोग स्वयं जागरूक होंगे तो अनुशासित भी होंगे. अनुशासित होंगे तो सरकार का लावलश्कर कम होगा. लाव लश्कर कम होगा तो नागरिकों की जेब पर पड़ने वाला खर्च स्वतः घट जाएगा. वर्तमान व्यवस्था में सरकार मानती है कि लोगों में जागरूकता की कमी है. अनुशासन बनाए रखने के लिए वह नागरिकों के खर्च पर पुलिस को ले आती है. पुलिस से झगड़ा नहीं सुलझता तो अदालतें आ जाती हैं. हर संस्था नागरिक आजादी को थोड़ी कम करती है और उसकी जेब पर बोझ बढ़ा देती है. यानी लोकतंत्र में जनता की जिम्मेदारी केवल प्रतिनिधि चुनने से पूरी नहीं हो जाती. वे प्रतिनिधि ही बने रहें, शासक और सर्वेसर्वा न बनें इसका ध्यान रखना भी जनता की जिम्मेदारी है. इस तरह जनता का जनताकरण राजनीति के लोकतांत्रिकरण की बुनियादी शर्त है.

इस अवांतर से वार्तालाप का लेख की विषयवस्तु से क्या संबंध है? विमुद्रीकरण अर्थशास्त्र की समस्या है, राजनीति की नहीं. फिर भी यह हमें आवश्यक लगा, क्योंकि विमुद्रीकरण का वर्तमान निर्णय विशुद्ध अर्थशास्त्रीय नहीं है. उसके पीछे राजनीति छिपी है. यदि सरकार इसे अर्थशास्त्रीय मुद्दा समझती तो रिजर्ब बैंक या ज्यादा से ज्यादा वित्तमंत्री के स्तर पर इसकी घोषणा होनी चाहिए थी. आधीअधूरी तैयारी के साथ स्वयं प्रधानमंत्री को पहल करने की आवश्यकता नहीं थी. विमुद्रीकरण की घोषणा चार राज्यों में विधानसभा चुनावों से पहले की गई है. सो इसके राजनीतिक निहितार्थ होंगे ही. नेताओं की हर निर्णय को राजनीतिक नफानुकसान सोचकर करने की प्रवृत्ति की ओर ध्यान आकृष्ट कराना हमें इसलिए भी आवश्यक लगा क्योंकि यह न केवल समस्या की जड़ है, बल्कि समाधान भी इसी में अंतर्निहित है. लोकतांत्रिक व्यवस्था में यदि जनप्रतिनिधि कर्तव्यपथ से विचलित होते हैं, तो उसके लिए केवल वही दोषी नहीं होते. प्रकारांतर में जनता भी उसके लिए जिम्मेदार होती है. यदि निर्वाचित प्रतिनिधि या चुनी हुई सरकार जनता के कष्टों की ओर से लापरवाह हैं तो जनता के लिए सबसे अच्छा रास्ता यही है कि वह अपनी संगठित शक्ति का उपयोग हालात को सुधारने के लिए करे. इस कार्य को जनप्रतिनिधियों पर दबाव डालकर किया सकता है, यदि फिर भी सरकार के स्तर पर निरंकुशता बनी रहती है तो जनता के पास एकमात्र रास्ता बचता है कि वह सरकार पर अपनी निर्भरता को कम करते हुए न्यूनतम स्तर पर ले आए. हमारी यह सलाह अव्यावहारिक लग सकती है. लेकिन लोकतंत्र को उत्सव की तरह जीने का रास्ता इसी ओर से जाता है. प्रूधों के शब्दों मेंᅳ‘मुक्त समाज में कानून बनाने, नई संस्थाएं गठित करने, उनका संविधान रचने, स्थापना एवं प्रशासनिक ढांचा खड़ा करने से लेकर कार्यारंभ तक सरकार की भूमिका न्यूनतम, इतनी कम जितनी कि संभव होहोनी चाहिए. राज्य (सरकार का लाभकारी) उद्यम नहीं है. इसलिए उद्यमों एवं संस्थाओं की स्थापना/संचालन के उपरांत सरकार को उनसे स्वयं अलग होकर, उन्हें स्थानीय प्राधिकरणों और जनसंस्थाओं के सुपुर्द कर देना चाहिए.’

राज्य पर निर्भरता को कम करने के अनेक रास्ते हैं. करेंसी के मुद्दे को ही लें. किसी भी राज्य की राज्य की वास्तविक शक्ति उसकी जनता में अंतर्निहित होती है. जबकि राज्य करेंसी को प्रत्याभूत करता है. इस तरह करेंसी के प्रत्याभूतिकरण के पीछे अंतिम शक्ति जनता की ही होती है. जनता यदि करेंसी को प्रत्याभूत कर सकती है तो उसके विकल्प भी तलाश सकती है. ऐसे विकल्प जो उसे अधिक स्वतंत्रता तथा आत्मनिर्भरता का एहसास दिलाते हुए उसके आत्मविश्वास बनाए रखने में मददगार हों. इस दिशा में प्रचलित विकल्पों को समाजवाद के आधुनिक अपररूप की संज्ञा दी जा सकती है. हालांकि इनकी कार्यशैली उससे भिन्न है. ये पूंजीवाद के जूझने के बजाए संगठन और सामूहिक विवेक के बल पर उससे मुक्ति का भरोसा दिलाते हैं. कुछ दशक पहले तक भारत के गांवों में जो प्राचीन सहयोगाधारित व्यवस्था रही है, जिसे हमारी ही पीढ़ी ने दम तोड़ते देखा है, इन्हें उसका संशोधित संस्करण भी कहा जा सकता है. आजकल शहरों में मिश्रित बस्तियों का चलन है. एक ही मुहल्ले में विभिन्न पेशों और कलाओं में दक्ष लोग रहते हैं. उनमें प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, बढ़ई, लुहार, एकाउंटेंट, राजमिस्त्री, पेंटर, ऑटो चालक वगैरह अनेक प्रकार के पेशेवर और तकनीकी कौशल वाले लोग रहते हैं. यदि ये ठान लें कि आपसी व्यवहार के दौरान मुद्रा का प्रयोग न्यूनतम करेंगे, तो थोड़ीसी आरंभिक हिचक के बावजूद, वे आसानी से ऐसा कर सकते हैं. इस व्यवस्था के अंतर्गत श्रम का आकलन एवं भुगतान बजाय मुद्रा के श्रमघंटों में किया जाएगा. मान लीजिए ‘क’ कंप्यूटर पेशेवर है. उसे अपने घर के लिए प्लंबर की आवश्यकता है. वह बस्ती के प्लंबर ‘ख’ को आमंत्रित करेगा. ‘ख’ को काम पूरा करने में यदि दो घंटे लगते हैं, तो उसके दो श्रमघंटे ‘क’ पर उधार माने जाएंगे. मुद्रा रहित भुगतान प्रणाली में ‘क’ को कुछ ऐसा करना होगा, जिससे वह ‘ख’ के श्रमघंटों का भुगतान श्रमघंटों में ही कर सके. इसके लिए वह ‘ख’ की आवश्यकतानुसार कुछ डिजायन कर सकता है. यदि ऐसा होता है तो वह श्रमघंटों का सीधा आदानप्रदान मान लिया जाएगा. यह भी हो सकता है कि ‘ख’ को ‘क’ की सेवाओं की तत्काल कोई जरूरत न हो. उस अवस्था में उनके बीच का लेनदेन सुरक्षित माना जाएगा. मान लीजिए कुछ दिनों के बाद ‘ख’ को बिजली मिस्त्री ‘ग’ की आवश्यकता पड़ती है. जिसपर ‘क’ के किसी काम के दो श्रमघंटे बकाया हैं. तो ‘ग’ उस उधार के बदले ‘ख’ को अपनी सेवाएं देकर ‘क’ से उऋण हो सकता है. यह उदाहरण है. इस प्रणाली को थोड़े प्रबंधन के साथ आसानी से अपनाया जा सकता है. मुहल्ला सभाएं इस काम को बड़े आराम से कर सकती हैं. हो सकता है कंप्यूटर पेशेवर दावा करे कि उसके काम के लिए आनुपातिक रूप से अधिक योग्यता की आवश्यकता पड़ती है. और वह अपने श्रमघंटों के मूल्य की तुलना बिजली मैकेनिक या पलंबर से करने को तैयार न हो. इस समस्या के समाधान के दो रास्ते हैं. पहला और श्रेष्ठतर उपाय है कि कंप्यूटर पेशेवर से अनुरोध किया जाए कि वृहद सामूहिक हितों के लिए उदारता दिखाते हुए इस प्रकार की तुलना को रहने दे. दूसरा यह कि आपसी सहमति से ऐसे नियम बनाए जाएं जिससे इस प्रकार के विवाद उत्पन्न ही न हों. इससे मौद्रिक लाभ सामाजिक लाभ के अपेक्षा श्रेष्ठतर रूप में प्राप्त होंगे. यह रास्ता अव्यावहारिक लग सकता है, मुश्किल बिलकुल नहीं है. अधिकांश कारखाने अपने कामगारों को वेतन देने के लिए उनके कार्य का मूल्यांकन श्रमघंटों के आधार पर करते ही हैं. एक बार चलन में आ जाने के बाद व्यवस्था सहज लगने लगेगी. इससे सरकार और उसके तंत्र पर निर्भरता घटेगी और मुद्राकेंद्रित क्रयविक्रय में जनता को जो भारीभरकम कर सरकार को चलाने के लिए देना पड़ता है, उसकी बचत हो जाएगी. सरकार का काम सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय संबंधों तक सिमट जाएगा. क्लेरेंस ली स्वार्ज ने अपनी पुस्तक ‘व्हॉट इज म्युच्युलिज्म’(1927) में इसकी प्रशंसा करते हुए लिखा है

यह एक ऐसा सामाजिक दर्शन है जो सभी नागरिकों के लिए समान स्वाधीनता, पारस्परिक समानताधारित लेनदेन तथा व्यक्तिविशेष की अपने जीवन, श्रम एवं श्रमोत्पाद पर पूर्ण संप्रभुता को दर्शाता है.’

सच यह है कि सरकार का विवेक, जनता के विवेक पर टिका होता है.

© ओमप्रकाश कश्यप

बेलगाम पूंजीवाद को लगाम

सामान्य

आलेख 

एक

 

बीसवीं शताब्दी का पूर्वार्ध पूंजीवाद के विकास का था. उस कालखंड में पूंजी का वर्चस्व पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ा; और मुनाफा जिसे कभी व्यावसायिक नैतिकता के अनुपालन में मर्यादित रखने की सलाह दी जाती थी, उसे आर्थिक विकास के नजरिये से देखा जाने लगा था. पूंजीवाद का अभीष्ट थाबाजार पर एकाधिकार और अधिकतम मुनाफा. यह कहीं न कहीं श्रम शोषण से जुड़ा मसला भी था. इतिहास की तह में जाकर देखें तो पता चलेगा कि श्रमशोषण की समस्या पूंजीवाद की पूर्ववर्ती अर्थव्यवस्थाओं में भी थी. सहयोगाधारित संगठनों को छोड़कर, जिनके बारे में 3000 वर्ष पहले तक की जानकारी उपलब्ध है—श्रमशोषण प्रायः हर युग की समस्या रही है. बल्कि लंबे युग तक इसे नियतिबद्ध मानते हुए गंभीरता से लिया ही नहीं गया. सहयोगाधिारित संगठनों ने इस समस्या का सार्थक समाधान खोजने की कोशिश की थी. उस समय तेली, रंगरेज, बुनकर, राजमिस्त्री, काष्ठकार जैसे दस्तकारों के प्रभावशाली संगठन थे. समाज में उनका खासा मानसम्मान था. हालांकि उसी युग में जिसे सहयोगाधारित संगठनों का स्वर्णकाल माना जाता है, समानांतर रूप में दासप्रथा भी कायम थी.े दास की निजी इच्छाओं का कोई महत्त्व न था. वह एकमात्र अपने स्वामी की इच्छा से नियंत्रित होता था. प्रकारांतर में उससे अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने के अधिकार छीन लिए जाते थे. कालांतर में जैसेजैसे छोटे राज्यों का विकास हुआ, श्रमिक संगठनों के लिए स्वतंत्र रूप में काम करना कठिन होता गया. अद्वितीय शिल्पी जो अपने कौशल के लिए दूरदूर तक जाने जाते थे, वे पूरी तरह राज्याश्रित होने लगे. स्वामी प्रसन्न तो इनामइकराम की भरमार, स्वामी अप्रसन्न तो मृत्युदंड तक की नौबत आ जाती थी. उसके विरुद्ध सुनवाई किसी अदालत में संभव न थी. संभव है सहयोगाधारित संगठन भी दासों की सेवाएं लेते हों. लेकिन शिल्पकार और पेशेवरों द्वारा गठित वे संगठन निजी लाभ के साथसाथ सामाजिक लाभ की वांछा से चलाए जाते थे. उनमें स्वामीश्रमिक संबंधों नहीं होते थे. समूह के अंदर कार्यों का सामान्य सहमति के आधार पर विभाजन और अन्योन्याश्रितता होती थी. श्रेणियों का यह गुण उन्हें समकालीन उत्पादक समूहों से श्रेष्ठतर और मानवीय सिद्ध करता है.

मशीनी क्रांति के आरंभ में श्रमिकों को उम्मीद थी कि पूंजीवाद का आगमन सामंती शक्तियों के पतन में सहायक होगा, फलस्वरूप श्रमिक को श्रम और शिल्पकार को उसके शिल्पकौशल का भरपूर प्रतिदेय प्राप्त होगा. वे अपने श्रमकौशल का मूल्यांकन करने को पूर्ण स्वतंत्र होंगे. इसमें कोई संदेह नहीं कि पूंजीवाद ने सामंतवाद की अनेक ज्यादतियों पर प्रहार किया. कठिन श्रम से मुक्ति दिलाने में भी नई प्रौद्योगिकी मनुष्य की मददगार बनी. औद्योगिक अर्थव्यवस्था ने बेगार जैसी कुप्रथाओं पर नियंत्रण लगाया था. श्रमिक को उसके श्रम के बदले नकद भुगतान किया जाने लगा. किंतु श्रम पर पूर्ण स्वत्वाधिकार; यानी श्रममूल्य के निर्धारण का अधिकार जो श्रमिक की पुरानी नीतिसम्मत मांग थी—पर पूंजीपतियों और सरमायेदारों का अधिकार यथावत था. वैज्ञानिक क्रांति ने उत्पादन वृद्धि के जो नए रास्ते ईजाद किए थे, उनका अधिकांश लाभ पूंजीपति के हिस्से आया था. कामगारों को तुलनात्मक रूप से बहुत कम, बल्कि नगण्य लाभ पहुंचा था. नई प्रौद्योगिकी समाज में आर्थिक असमानता की खाई को और गहरा करने में सहायक बनी, जिसके परिणामस्वरूप पूंजीवादी शोषण का दायरा लगातार बढ़ता गया.

नई अर्थव्यवस्था में व्यावसायिक और उत्पादक इकाइयों को प्रतिस्पर्धी बनने/बनाने की अपेक्षाओं के चलते मुनाफे को तय करने का अधिकार समाज एवं सरकार के हाथों से खिसककर, पूर्णतः पूंजीपति के हाथों में चला गया. कुछ अपवादों को छोड़कर पूंजीपतियों को मिला अधिकार असीमित था. विशेषकर श्रमिकसंबंधी विषयों को लेकर. श्रमअधिकारों के संरक्षण हेतु कुछ कानून अवश्य बनाए गए. लेकिन उनका रास्ता इतना लंबा, दुरूह और जटिलताओंभरा था कि साधारण श्रमिक द्वारा उनका लाभ उठाना तो दूर, समझना तक कठिन था. इस तरह प्रतिस्पर्धा का पहला शिकार बना था—श्रमिक. दूसरा वह शिल्पकर्मी जिसके पास सिवाय अपने शिल्पकर्म के उपार्जन का कोई और माध्यम नहीं था. नतीजा यह हुआ कि जो शिल्पकर्मी प्राचीन समाजों में अपने हुनर के लिए सराहे जाते थे, जिनका विशेष मानसम्मान था, वे बेरोजगारी का शिकार होने लगे. इससे उनका कलाकौशल भी दम तोड़ने लगा, जो उन्होंने पीढि़यों के संघर्ष के बूते प्राप्त किया था. उचित यही था कि जिस प्रकार उद्यमी अपने उत्पाद के मूल्यनिर्धारण को स्वतंत्र होता है, श्रमकौशल के मूल्यांकन की वैसी ही स्वतंत्रता श्रमिक और शिल्पकार को भी प्राप्त होती. व्यावसायिक और सामाजिक नैतिकता की दृष्टि से भी यही अपेक्षित था. परंतु प्रौद्योगिकीकरण ने श्रम और शिल्प दोनों के सक्षम और सस्ते विकल्प पेश किए थे. परिणामस्वरूप श्रमिक और कामगार वर्गाें के ऊपर बेरोजगारी की तलवार लटकने लगी थी. मशीनों ने मानवश्रम का विकल्प बनना शुरू किया तो बेरोजगारी संकट से घिरे, हतोत्साहित शिल्पकार और मजदूर पूंजीपतियों पर निर्भर होते चले गए. उनके शिल्प और श्रम के मूल्यांकन का अधिकार उन लोगों के हाथों में चला गया जो केवल और केवल अपने मुनाफे के लिए काम करते थे.यह पूंजी की सुदृढ़ता का पहला चरण था. दूसरे चरण की शुरुआत उपभोक्तावाद से होनी थी. जिसमें उत्पादन व्यक्ति की जरूरत के बजाय पूंजीवादी अर्थतंत्र की लाभकामना के निमित्त होता था. उसकी शुरुआत तो मशीनीकरण के साथ ही हो चुकी थी, मगर वास्तविक सफलता मध्य वर्ग के मजबूत आर्थिक शक्ति बनने के बाद संभव हो सकी.

स्वाधीन भारत में कल्याण राज्य की नींव रखी गई और आजादी का लाभ सभी वर्गों तक पहुंचाने के लिए मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया गया. सोचा गया कि राष्ट्रीय महत्त्व के जितने भी भारी उद्यम हैं, उनपर सरकार का अधिपत्य हो. इसके फलस्वरूप सार्वजनिक उद्यमों की स्थापना की गई थी. मगर कमजोर नेतृत्व, इच्छाशक्ति का अभाव, पूंजीपति और भ्रष्ट नौकरशाही के अनुचित गठजोड़ में फंसकर, वे लगातार घाटे का शिकार होने लगे. भारीभरकम पूंजी के आधार पर लगे सार्वजनिक उद्यमों पर पूंजीपतियों की कुदृष्टि थी. येनकेनप्रकारेण वे उनपर एकाधिकार चाहते थे. आजादी के तीसरे दशक बाद से राजनीति पर पूंजीपतियों का प्रभाव बढ़ने लगा था. इसलिए हुआ वही जो पूंजीपति तथा उनके चहेते भ्रष्ट नेता चाहते थे. बीसवीं शताब्दी के समाप्त होतेहोते यह मान लिया गया कि मिश्रित अर्थव्यवस्था के बूते दुनिया के साथ स्पर्धा कर पाना असंभव है. इसलिए उदारीकरण के बहाने भारतीय बाजारों को दुनियाभर के उद्यमों के लिए खोल दिया गया. इसी के साथ देशभर में प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित दोहन और शोषण की शुरुआत हो गई. पूंजीपतियों और वैश्विक कारपोरेट घरानों की गिद्धदृष्टि अर्से से इस देश के प्राकृतिक संसाधनों पर टिकी थी. उदारीकरण के साथ वे उन संसाधनों को औनेपौने दामों में खरीदने या जोड़तोड़ द्वारा हड़पने का स्वप्न देखने लगे. मिश्रित अर्थव्यवस्था के दौरान पिछले पचास वर्षों में जो बड़ेबड़े सार्वजनिक उद्यम खड़े किए गए थे, उनसे पीछा छुड़ाने के लिए विनिवेश पर खास जोर दिया गया. सरकार किसी भी दल की रही हो, अपनीअपनी तरह से सभी ने, कभी प्रकट रूप में तो कभी पिछले दरवाजे से, उदारवाद और विनिवेशीकरण को बढ़ावा दिया. यह अवधारणा बनी कि कारखाने चलाना सरकार का काम नहीं है. उसका काम केवल शासन और व्यवस्था संभालना है. नतीजा यह हुआ कि कुछ वोटबटोरू, लोकप्रिय योजनाओं को छोड़कर बाकी योजनाएं निजी हाथों की ओर खिसकने लगीं. यह काम पश्चिम की तर्ज पर किया गया, जिनकी पहचान विकसित देश के रूप में थी. जहां शिक्षा, भोजन, आवास और बेरोजगारी जैसी समस्याएं उतनी भयावह नहीं थीं, जितनी वे भारत सहित दूसरे विकासशील एवं अल्पविकसित देशों में. पिछली ढाई दशाब्दियों से तो पूरी अर्थव्यवस्था ही पूंजीवाद के नाम लिख जा चुकी है.

घोषित रूप से समाजवादी भारत में पूंजीवाद ने बड़े नाजुक अंदाज में, उदारवाद के नाम से प्रवेश किया था. चूंकि अर्थव्यवस्था के पूंजीकरण को लेकर समाज में अनेकानेक अंतर्विरोध थे पहला अंतर्विरोध यहां की जाति व्यवस्था के रूप में था, जिसमें व्यक्ति को अरुचि और अनिच्छा के बावजूद पैत्रिक पेशे की ओर ढकेल दिया जाता था. अंततः वह उसको अपनी नियति मानकर, परंपरा की लकीर पीटते हुए काम करता था. चूंकि उसके पास भविष्य को लेकर कोई बड़ा सपना नहीं होता था, इसलिए साधारणतः उसके काम में रचनात्मक कौशल और मौलिकता का अभाव रहता था. यह कमी कथित ऊंची जातियों में भी थी. ‘पंडिज्जी’ संबोधन सुन, फूलकर कुप्पा हो जानेवाले ब्राह्मणपुरोहित कथावाचन को ज्ञान, रटंत को शिक्षा और कर्मकांडों को सभ्यता एवं संस्कृति मानकर, एक पोथीपत्रा पढ़ते हुए ‘अंधों में काना सरदार’ वाली कहावत को चरितार्थ करते रहते थे. वास्तव में ज्ञान से उनका नाता केवल रटे हुए को रटाने तक सीमित था. उन अंतर्विरोधों को दूर करने, देश को बड़े परिवर्तन के लिए तैयार करने के बजाए आननफानन में उदारीकृत अर्थनीतियों को लागू किया था. उसका दुष्परिणाम यह हुआ कि भारत विश्वउत्पादकों के लिए मंडी बन गया. छोटेमोटे लाखों उद्यम, जिनसे देश के करोड़ों लोगों को रोजगार मिलता था, धीरेधीरे बंद होने लगे. सरकार किसी भी दल की रही हो, उसकी व्यापार नीति करीबकरीब एक समान और पूंजीपतियों की हितरक्षक रही है. आज ‘मेक इन इंडिया’ की हवा में भी लघु, कुटीर उद्यमों तथा छोटे व्यवसायों की सुध लेने वाला कोई नहीं है. अब तो इसे देखकर ऐसा लगता है कि वह खुद पर सवारी गांठ रहे सहसवार के नियंत्रण से भी बाहर जा चुका है.

पूंजीवाद को मिली इस अप्रत्याशित सफलता का राज? कौनसा विचार है जिसने नईपुरानी सभी पीढि़यों को अपने मोहपाश में जकड़ लिया है? जवाब है, कोई नहीं. पूंजीवाद की सफलता का एकमात्र रहस्य है कि वह अपने उपभोक्ताओं को विचारधाराओं के दबाव से मुक्त करता है. परंपरागत सामाजिक मूल्यों के के स्थान पर वह उत्पादकउपभोक्ता के संबंधों को ले आता हौ. ‘जिन चीजों से मनुष्य को सुख प्राप्त हो, उन्हें प्राप्त करने का उसे अधिकार है.’—यह धारणा पूंजीवाद का आदर्श है. यह धारणा मनुष्य और पशु के अंतर को मिटाती है. समाज को उत्पादक और उपभोक्ता में बांट देती है. उत्पादक का सुख अधिकतम मुनाफे में निहित होता है. इसलिए अपने सुख की तलाश में बाजार में पहुंचे उपभोक्ता, बहुसंख्यक होने के बावजूद, उत्पादक की अधिकतम लाभ में अपना सुख खोजने की मानसिकता के विरुद्ध कोई नैतिक दबाव नहीं बना पाते. 1751 में फ्रांस के अर्थशास्त्री फ्रांसिस केने ने पहली बार ‘लेजेज फेयर’ पद का उपयोग कर, उद्योगों को नियंत्रण मुक्त करने की सलाह दी थी. आगे चलकर एडम स्मिथ ने केने की इस मान्यता को तर्कसम्मत ढंग से आगे बढ़ाया. वे उद्योगों को नियंत्रण मुक्त करने की मांग कर रहे थे, क्योंकि उन्हें उद्यमों की स्वतंत्रता में ही राष्ट्र हित नजर आता था. वे भूल गए थे कि उत्पादकों को नियंत्रण मुक्त करने के पीछे एडम स्मिथ का ध्येय राष्ट्रीय उत्पादन में वृद्धि करना था, न कि अर्थव्यवस्था को कुछ पूंजीपतियों के हाथों में सौंप देना. इसलिए उसने ‘वैल्थ आ॓फ नेशन’ लिखा था, न कि ‘वैल्थ आ॓फ कैपीटलिस्ट’. नीतिनिर्माण की दृष्टि से तत्कालीन राजनीतिज्ञों की भूमिका किसी भी पूंजीपति की अपेक्षा अधिक सामथ्र्यशाली थी. वे राष्ट्रहित के अनुसार आवश्यक निर्णय लेने के लिए पूर्ण स्वतंत्र थे. मगर कुछ ही दिनों में औद्योगिक संस्थानों को दी गई स्वतंत्रता सरकार की सीमा बनने लगी. देशहित के निर्णय पूंजीवादी संस्थानों के निर्देश पर, उनके हितों को देखकर लिए जाने गले. भारत में यह आपाधापी के साथ, कतिपय भौंडे तरीके से हुआ.

हमारे नेतागण ‘मेक इन इंडिया’ का नारा लगाते हैं. 56 इंची सीने का दावा करते हैं, मगर इस तथ्य को नजरंदाज कर देते हैं कि भारतीय बाजार चीनी और दूसरे विदेशी उत्पादों से भरे पड़े हैं. इनमें चीन का तो इतना दबदबा है कि सस्ते खिलौने, इलेक्ट्रोनिक्स, मोबाइल, कंप्यूटर, टेलीविजन से लेकर छोटीछोटी चीजें जैसे दर्पण और बच्चों की काॅपी, कलम, पेंसिल, वर्कबुक तक चीन से आयात की जा रही हैं. मंडी में जाओ तो फल और सब्जियां तक आयातित मिल जाएंगी. उन्हें कौन बताए कि देशभक्ति हवा में नहीं तैरती, लोगों के व्यवहार में बसती है. वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं के इस दौर में जो देश बाजार में नहीं होता, उसकी हैसियत समाज में भी घट जाती है. ऐसा देश नागरिकों के आत्मसम्मान का सबब नहीं बन पाता. वैसे भी पुरानी कहावत है कि लोग जिसका खाते हैं, गुण भी उसी के गाते हैं. एक समय था जब देश में बाजार में जापान के उत्पाद छाये होते थे. उच्चगुणवत्ता युक्त वे उत्पाद भारतीयों के मन में जापानी प्रौद्योगिकी के बारे में एक सकारात्मक छवि का निर्माण करते थे. इसलिए जापानियों की कमर्ठता और अनुशासनप्रियता के किस्से उन दिनों आम हुआ करते थे. आजकल बाजार पर चीन का कब्जा है. इसलिए हम व्यवहार में देख सकते हैं कि जापान हमारे लिए एक भूला हुआ देश बनता जा रहा है. जनसाधारण तक चीन के जो उत्पाद पहुंचते हैं, वे घटिया गुणवत्ता के होते हैं. चीन के बारे में नागरिकों की राय भी एक गैर भरोसेमंद देश की है. दरअसल हम ऐसे राष्ट्रवादियों की सरकार के इकबाल में रह रहे हैं जहां बाजार में राष्ट्रीय उत्पादों का टोटा है. इसका नकारात्मक प्रभाव हमारे राष्ट्रीयताबोध पर पड़ा है. पिछले 14 वर्षों में देश से 61000 करोड़पतियों के पलायन की घटना भी इसी प्रवृत्ति की संकेतक है. ऐसी घटनाएं यदि सरकार की नींद खराब नहीं करतीं तो समझ लेना चाहिए कि वे सरकारें देश की होकर भी देश के लिए काम नहीं कर रही हैं. वे या तो अपने नेताओं के स्वार्थ के लिए काम कर रही हैं, अथवा उन पूंजीपतियों के लिए जो उन्हे सत्ताकेंद्र तक पहुंचाने में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं. इसके लिए वे अकेले जिम्मेदार भले न हों, लेकिन सुधार की कोशिश करने के बजाए इसे और आयातनिर्भर बना देना चाहते हैं. हमारी प्रथम दर्जे की प्रतिभाएं परराष्ट्रों के अर्थतंत्र को मजबूत करने के लिए नईनई योजनाएं बनाती हैं. और औसत दर्जे की प्रतिभाएं हैं, वे उनके लिए बाजार का काम देखती हैं. पिछले कुछ दशकों में भारतीय शिक्षा ने जितने सेल्समेन इस देश को दिए हैं, वह अपने आपमें विश्वरिकार्ड है.

वे दिन गए जब युद्ध सीमाओं पर लड़े जाते थे. दुनिया बदल चुकी है. इन दिनों राष्ट्र की भूमिकाएं अब राष्ट्राध्यक्ष तय नहीं करते. उन्हें मनमाफिक भूमिका निभाने के लिए पूंजीवादी कंपनियों की ओर से बाध्य किया जाता है. आदमी का मोल समाप्त हो चुका है. मोल संसाधनों का है. इसलिए नई युद्धनीतियां कूटनीतिपरक होती हैं. वे संसाधनों पर अधिकार को हड़पने के लिए बनाई जाती हैं. इस लड़ाई में चीन भारत से बहुत आगे है. हम भले ही सीमा पर चीन को उसकी गीदड़भभकियों से बाज आने की सलाह दे रहे हों, अर्थव्यवस्था के मैदान में वह हमारे घर में घुसकर हमें मात दे रहा है और हमारे नेता रेत में गर्दन दबाए शुतुरमुर्ग की भांति खुद को धोखा दिए जा रहे हैं. सतरहवीं शताब्दी में मानवमुक्ति के जितने भी शब्द, मुहावरे, उपकरण और औजार चुने गए थे, इस दैत्य के आगे, एकएक कर वे सभी बेअसर सिद्ध हो रहे हैं. कमी उन विचारों की नहीं, विचारहीनता को अपनी जीवनशैली बना चुके समाजों की थी. वे तार्किकता और उन निष्ठाओं से निरंतर परे हटते गए, जो उनके विकास की आधारशिला बनी थीं. इस संबंध में भारतीय विरोधाभास छिपे नहीं हैं. हमारे यहां पश्चिम से मशीनीकरण तो उधार लिया गया. लेकिन उन विचारों से पूरी तरह कन्नी काट ली, जो वहां मशीनीकरण की समस्याओं से जूझते हुए, उनके समाधान की चाहत में विकसित हुए थे. परिणामस्वरूप समाज तथा हमारे व्यवहार में विचारशून्यता पसरती गई, जो आगे चलकर उपभोक्तावाद के समाज में पैठ बनाने में मददगार बनी. मसलन जेरेमी बैंथम का उपयोगितावादी सिद्धांत निरे भोग का, कोरा उपभोक्तावादी दर्शन नहीं था. वह खुशियों पर खास वर्गों के एकाधिकार का विरोधी था. वह शताब्दियों से वंचित रहे समाज के अधिकारों का समर्थन करते हुए उसे मुख्य धारा में शामिल करने का पक्षधर था. उससे पहले राज्य धार्मिक आचारसंहिताओं से अनुशासित होते थे. बैंथम ने पहली बार विधि के न्याय का पक्ष लिया था. इसके लिए आधुनिक न्याय प्रणाली बैंथम की ऋणी है. सामाजिक न्याय की आधुनिक संकल्पना को हम बैंथम के उपयोगितावाद और विधि के दर्शन की अवधारणा के विकास के रूप में देख सकते हैं. उसका आदर्श कथन था—‘अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख.’ उपयोगितावादी विचारकों के अनुसार दुनिया में कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जिसका मानव कल्याण के हित में उपयोग वर्जित हो. जो है, जिसकी उपयोगिता है, उसपर समूची मनुष्यता का अधिकार है. न तो कोई व्यक्ति विशेष है, न ही तिरष्कृत. बाजार ने उपयोगितावाद को उपभोक्तावाद में बदल दिया, जिसमें ऐसा जताया जाता है कि जीवन का अभीष्ट केवल सर्वोत्तम का भोग करना है, उसके कोई और सरोकार नहीं हैं. विचार शून्यता के परिवेश में यह पूर्ण स्वाभाविक था.

बैंथम ने जनसाधारण तक सुख की समान उपलब्धता सुनिश्चित करने को राज्य का कर्तव्य बताया था. इसके लिए उसने कानून के राज्य का समर्थन किया. जिन दिनों पूरा यूरोप चर्च से अनुशासित होता था, कानून के राज्य की बात करना बहुत बड़ी बात थी. इसकी शुरुआत पूर्ववत्र्ती विचारकों द्वारा हो चुकी थी. बैंथम ने उसको विधिक आधार दिया, साथ ही लागू भी कराया. पूंजीवाद की मान्यता रही कि सुखसुविधाएं उसकी जिसकी जेब में पैसा है. जो उनके मूल्य का भुगतान कर सकता है. बैंथम के आदर्श था, ‘अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख.’ सिक्का शक्तिशाली पूंजीवाद का चला. बैंथम का सिद्धांत केवल अकादमिक क्षेत्रों तक सिमटकर रह गया. देखते ही देखते, ‘अधिकतम लोगों को अधिकतम सुख’ का विचार ‘संपन्नतम व्यक्तियों को अधिकतम वैभवविलास’ में बदल गया. पूंजी या धन को सुविधाओं के साथसाथ सुख को अर्जित करने का पैमाना मान लिया गया. सामाजिक लाभ की संकल्पना मौद्रिक लाभ तक सीमित होकर रह गई. इससे मानवसंबंधों पर पूंजी को वरीयता मिलने लगी. खुद की स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए पूंजीवाद ने समाज में जो भी, जब भी मिला, सभी का अपने स्वार्थानुकूल इस्तेमाल किया. कानून, न्याय, अदालत, व्यक्ति स्वातंत्रय, मानवाधिकार, उपभोक्ता अधिकार, लोकतंत्र सब पूंजीवाद के हितों के अनुकूल ढलते गए. उपयोगितावाद, सुखवाद और मानवतावाद जैसी विचारधाराएं उच्चमानवीय आदर्शों को केंद्र में रखकर गढ़ी गई थी. उनमें किसी भी प्रकार के वर्चस्ववाद को नकारने की सर्वसाधारणीय वांछा शुरू से ही स्पष्ट थी. पूंजीवाद एक और तो उपभोक्ता वस्तुओं की आधुनिकतम रेंज बाजार में उतारता रहा, संस्कृति के क्षेत्र में वह ‘प्राचीनतम को महानतम’ सिद्ध करने में सहायक बना. पोंगापंथी पुरोहित इस काम को लगातार अंजाम देते रहे. यंत्रों पर निर्भर समाज में भावुक और संवेदनशील होना अविवेकपूर्ण तथा दुर्बलता की निशानी कहा जाने लगा. मानवाधिकार, स्वतंत्रता, व्यक्तिस्वातंत्रय जैसी जितनी भी चेतनाप्रधान अभिव्यक्तियां थीं, उन सभी को पूंजीवाद ने अपनाया अवश्य, मगर पूरी तरह से निस्तेज कर, स्वार्थानुसार अनुकूलन करते हुए. ताकि वे अंधानुकरण और स्तुतिगान के अलावा कहीं और सहायक न हो सकें. मानवीकरण के इन माध्यमों का अपने पक्ष में अनुकूलन करते हुए पूंजीवादी अर्थतंत्र के लक्ष्य को मौद्रिक लाभ तक सीमित कर, केवल और केवल एक शब्द को स्थापित करता गया. उदारवादी अर्थतंत्र की दृष्टि में वह पवित्रतम, मार्गदर्शक, परमकल्याणकारी शब्द है—मुनाफा. आखिर ऐसा क्यों हुआ कि धर्मदर्शन, संस्कृति, परंपरा आदि मानवसभ्यता और जीवन को मर्यादित करने वाली जितनी भी संस्थाएं और संगठन थे, सब के सब पूंजी के आराधन में लग गए? यहां तक कि इसके लिए राष्ट्रीय हितों की बलि भी दी जाने लगी. इसके कारणों तक पहुंचने के लिए हमें भारतीय संस्कृति और सभ्यता की पड़ताल करनी पड़ेगी. विशेषकर डेढ़दो शताब्दी पहले के इतिहास में जाना होगा.

1857 के भारतीय स्वाधीनता संग्राम की बात करें. उस समय तक भारत लगभग 400 वर्ष पराधीनता में गुजार चुका था. प्रथम स्वाधीनता संग्राम के बाद भारत पर जब ब्रिटिश राज्य हुआ तथा मुस्लिमों के हाथ से सत्ता जाने पर भारतीय अभिजात वर्ग ने प्रशंसा व्यक्त की थी, जबकि शासक बदल जाने से भारतीयों की राजनीतिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था. वे पहले की तरह ही परतंत्र थे. वह परतंत्रता पहले से कहीं अधिक परेशान करने वाली इसलिए भी थी कि 1857 में लगभग 25 करोड़ भारतीयों पर मात्र कुछ हजार अंग्रेज शासन चला रहे थे. मुस्लिम शासकों के जमाने में यह बात नहीं थी. इसलिए कि इस्लामिक जिहादियों के भारत आक्रमण से पहले यहां सूफी संतों, औलियाओं के रूप में इस्लाम दस्तक दे चुका था. उसने जाति के आधार पर बुरी तरह से बंटे समाज के निचले वर्गों में काफी पैठ पैदा कर ली थी. उसके फलस्वरूप लोग इस्लाम के प्रति आकर्षित हो रहे थे. बाद में भी इस्लाम के शासकों ने भारतीय जनजीवन को प्रभावित करने की कोशिश नहीं की. चारपांच शताब्दी के इस्लामिक शासन में भारत का इलीट वर्ग राजनीतिक और आर्थिक लाभों के लिए मुस्लिम शासकों से जुड़ा था, जबकि जनसाधारण, विशेषकर समाज के निचले जातिवर्गों के लिए के लिए वह उनकी लुप्त अस्मिता की पहचान का मसला था, जिसे वे इस देश में जातीय विभाजन के कारण शताब्दियों से सहते आए थे. ब्राह्मण एवं पुरोहित वर्ग को केवल अपने धर्म एवं संस्कृति की चिंता थी. शासक का धर्म और चरित्र क्या है, इससे उन्हें कोई संबंध न था. मुगल शासकों के पराभव तथा उनके स्थान पर अंग्रेज शासकों के आने से इलीट वर्ग प्रसन्न था. इसलिए कि मुगल सभ्यता भारतीय सभ्यता के सापेक्ष पिछड़ी हुई थी, जबकि औद्योगिकीकरण के कारण यूरोपियन सभ्यता तीव्र गति से विकासमान थी. अंग्रेज इस देश में व्यापार के लिए आए थे. मगर उनके भारत आगमन से पहले ही यूरोपियन औद्योगिक क्रांति की खबरें शेष दुनिया को चमत्कृत कर रही थीं. भारत का अभिजात वर्ग उसके प्रति आकर्षित था और एक तरह से उस सभ्यता को अपनाने के लिए उतावला भी.

गौरतलब है कि भारत का प्राचीन गौरव कम न था. प्राचीन भारतीय सभ्यता अपनी समकालीन सभी सभ्यताओं के मुकाबले बहुत अधिक विकसित भले न हो, मगर उसे पिछड़ा हरगिज नहीं माना जा सकता. ढाईतीन हजार वर्ष पहले भारतीय मेधा ने विश्वमेधा को चमत्कृत करते हुए उसपर अपना प्रभाव छोड़ा था. लेकिन परतंत्रता के लंबे दौर में वह निरंतर क्षरणशील होकर अपना तेज खो चुकी थी. दूसरों को तो दूर उसे खुद अपनी वास्तविकता की पहचान तक न थी. अतः 1874 के आसपास जब यूरोपियनों ने अपनी सत्ता के स्थायित्व के लिए भारतीय सभ्यता और इतिहास को समझना आरंभ किया, तो सबसे ज्यादा चमत्कृत होने वालों में वे लोग थे, जिनपर इस सभ्यता के बौद्धिक नेतृत्व की जिम्मेदारी थी. इसलिए कि वे अपना कर्तव्य भुलाकर केवल चाटुकारिता को अपने आचरण में ढाल चुके थे; और सत्ता के इर्दगिर्द रहकर उसका लाभ उठाने में प्रवीण थे. उस समय तक दर्शन की जगह कर्मकांड छा चुका था. जातिवाद का बोलवाला था और रूढि़यों में जकड़ी सभ्यता अपने अतीत को पूरी तरह बिसराए हुए थी. पढ़ालिखा वर्ग अंग्रेजों की कृपा प्राप्त करने के लिए अपने ही देशवासियों पर जुल्म ढा रहा था. वह एक प्राचीन जाति और वर्ग में बंटी संस्कृति का अपेक्षाकृत विकसित संस्कृति के आगे समर्पण था. भारतीय समाज चूंकि छोटेछोटे जाति, वर्गों में बुरी तरह बंटा हुआ था. जाति व्यवस्था की जकड़ बहुत गहरी थी. इसलिए अंग्रेजों के आगमन पर खुश होने के विभिन्न वर्गों के अलगअलग कारण थे. अभिजात वर्ग अंग्रेजों की कृपा शासन के निकट रहने, उनके जैसी जीवनशैली प्राप्त करने के लिए चाहता था. औद्योगिकीकरण के बाद यूरोप की अर्थव्यवस्था का जादुई तेजी से विकास हुआ था. उच्च वर्गों की संपन्नता बहुत तेजी से बढ़ी थी. भारतीय सामंतवर्ग में उसके प्रति विशेष आकर्षण था. यूरोपीय उद्यमियों की भांति वे भी आननफानन में संपन्नता बटोर लेना चाहते थे; और इसके लिए कुछ भी करने को तैयार थे. समाज के पढ़ेलिखे वर्गों के एक तबके की श्रद्धा यूरोप में चले बौद्धिक आंदोलनों के कारण थी, जिसमें वे अपने मानसम्मान और अस्मिता की सुरक्षा का सपना देखते थे. नए विचारों की रोशनी में उत्पीडि़त वर्ग भी अपनी अस्मिता के संघर्ष को खड़ा करना चाहते थे. उसकी शुरुआत ज्योतिबा फुले महाराष्ट्र से कर ही चुके थे. उसके लिए अंग्रेजी शिक्षा नए विचारों के साथ मुक्तिसंदेश की वाहक बनी हुई थी.

लगभग दो शताब्दियों के ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय समाज को अपने भीतर झांकने का अवसर मिला था. हालांकि उस समय भी समाज का एक वर्ग परिवर्तनों के विरोध में अड़ा था. जबकि पढ़ालिखा वर्ग अंग्रेजों से प्रभावित था. ज्ञानविज्ञान की यूरोपियन शैली उसको आकर्षित करती थी. यह प्रभाव इतना गहरा था कि औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के लिए भारत में वही रास्ते अपनाए गए जो अंग्रेजों के थे. यह स्वाभाविक भी था. ब्रिटिश साम्राज्यवाद के मूल में आर्थिक साम्राज्यवाद की लालसा थी. वह एक ऐसा राजनीतिक तंत्र था जो जनता की विकास की आकांक्षा तथा पंूजीपतियों की अतिमहत्त्वाकांक्षाओं के योग से बना था. अलगअलग दिखने के बावजूद उसमें अन्योन्याश्रितता का भाव था. उसकी कमी थी कि उसमें उत्पादन में भागीदारी सभी वर्गों की थी, मगर लाभानुपात शीर्ष की ओर तेजी से बढ़ता जाता था. इससे मध्यक्रम और निचले वर्गों में भारी असंतोष था. उस असंतोष के फलस्वरूप उपजे विद्रोह ने ही पश्चिम में प्रतिरोध के नए हथियारों को जन्म दिया था. देशी सभ्यता और संस्कृतिसमर्थक गांधी ने भी अंग्रेजों से काफी ग्रहण किया. उन्होंने समय रहते ही समझ लिया था कि इस नए किस्म के साम्राज्यवाद को गैरपरंपरागत हथियारों से ही चुनौती दी जा सकती है. ‘सत्याग्रह’ नामक उनका औजार थोरो के ‘सिविल डिसओविडियंस’ का भारतीयकरण था. उसने लोगों को अपनी शक्ति का आकलन करने तथा आजादी के लिए एकजुट होने के लिए प्रेरित किया. फलस्वरूप देशभर की जनता स्वाधीनता की मांग लेकर घरों से निकल पड़ी.

अच्छा नेता जनता का मार्गदर्शन करता है. लेकिन सबसे अच्छा नेता वह होता है जो लोगों को उनके भीतर छिपी शक्तियों से परचाता है. उन शक्तियों को बाहर लाकर उपयुक्त प्रेरणा जगाता हे. गांधी ने यही जादू इस देश की जनता के साथ किया था. ज्ञात हो कि धर्म, जातपात में बंटा भारतीय समाज कोई जड़ समाज नहीं था. कभी रहा भी नहीं है. परिवर्तन की कामना विशेषकर उत्पीडि़त वर्ग में हमेशा से विद्यमान रही है. उसके लिए शीर्ष नेतृत्व आवश्यक नहीं था. बल्कि जनता के भीतर से ही नेतृत्वकारी शक्तियां स्वयंस्फूर्त्त भाव से निकल आती थीं. वैदिक कर्मकांड के विरोध में जैन और बौद्ध दर्शन के उदय से बहुत पहले ही पूर्ण कस्सप, निगंठ नागपुत्त, अजित केशकंबली, संजय वेल्ट्ठिपुत्त, कौत्स, मक्खलि घोषाल आदि के बौद्धिक अवदान स्वरूप भौतिकवादी परंपरा इस देश में पनप चुकी थी. उनसे प्रेरणाओं के आधार पर ही जैन और बौद्ध दर्शन का विकास हुआ. जैन दर्शन का प्रसिद्ध ‘स्याद्वाद’ का सिद्धांत जिसे आज कुछ विद्वान क्वांटम थ्योरी के निष्कर्ष ‘अनिश्चितता का सिद्धांत’(थ्योरी आ॓फ अनसर्टेनिटी) से जोड़ते हैं, की मूल अवधारणा संजय वेल्ट्ठिपुत्त से प्राप्त हुई थी. साधना के आरंभिक दौर में महावीर स्वामी और मक्खलि घोषाल साथसाथ थे. कालांतर में दोनों अलगअलग हुए तो मक्खलि ने आजीवक संप्रदाय और महावीर स्वामी ने जैन धर्म की नींव डाली थी. मक्खलि घोषाल और बाकी विचारकों के बारे में भारतीय साहित्य में अधिक प्रसंग प्राप्त नहीं होते. लेकिन इतना महत्त्वपूर्ण उल्लेख हमें प्राप्त होता है कि बौद्ध धर्म के आरंभिक दिनों में आजीवक संप्रदाय को चाहनेवालों की संख्या बौद्ध धर्म से कहीं अधिक थी. मक्खलि के बारे में प्रसेनजित ने बुद्ध से एक बार कहा था कि वह उसे(मक्खलि को) उनसे अधिक बुद्धिमान मानता है. क्या इसके पीछे कोई सामाजिक कारण थे? इसे प्रमाणसहित कह पाना तो कठिन है. भारतीय समाज में व्याप्त जातीय भेदभाव को देखते हुए कुछ आकलन अवश्य लगाए जा सकते हैं. महावीर स्वामी और बुद्ध दोनों ही क्षत्रिय कुलों से आए थे. उन दिनों बलि, धार्मिक भेदभाव, अनावश्यक निषेधों की वजह से क्षत्रिय और ब्राह्मणों के बीच मनमुटाव बढ़ने लगे थे. इसलिए जब महावीर स्वामी और बुद्ध ने धर्मदर्शन में रुचि खोजने की कोशिश की तो तत्कालीन क्षत्रिय सम्राट उनकी ओर आकर्षित होते गए. आशय है कि न केवल आज बल्कि सहस्राब्दियों से भारतीय जनसमाज में परिवर्तन की वांछा रही है. उसके लिए उसे जब भी, जो भी अवसर मिला, उसका उपयोग किया है. चाहे वह निराकार की भक्ति हो अथवा सूफी परंपरा, कबीर हों या गांधी, जयप्रकाश नारायण हों या कांशीराम अथवा विश्वनाथ प्रताप सिंह समाज की परिवर्तन की चाहत, अलगअलग स्वरों से गूंजती रही है. इतिहास जनविद्रोहों से भरा पड़ा है. लेकिन यह भी सच है कि भारतीय दमित वर्गों का वास्तविक संघर्ष बाहरी लोगों से कम, अपने लोगों से अधिक रहा है. भारतीय समाज की परिवर्तन की उत्कट अभिलाषा का सबसे सार्थक उपयोग गांधी ने सत्याग्रह के दौरान किया था. जबकि डा॓. अंबेडकर जनमानस के मुक्तिस्वरों को आवाज दे रहे थे.

परंपरा और संस्कृति का गुणगान करनेवाला भारतीय समाज का अभिजात तबका अंग्रेजी शिक्षा और नई प्रौद्योगिकी से के प्रति भी आकर्षित था. इसलिए 1947 तक आतेआते भारत में अंग्रेजी राज और अंग्रेजी शिक्षा के समर्थकों की बड़ी फौज खड़ी हो चुकी थी. जिसे अपने अंग्रेजी ज्ञान पर गर्व था, वह अंग्रेजी ज्ञान एवं आधुनिक सभ्यता से वंचित अपने ही भाईबहनों को वह हेय दृष्टि से देखता था. उनीसवीं शताब्दी के अंतिम अंतिम दशकों में मध्यम मार्गी कांगेस की स्थापना मुख्यतः पढ़ेलिखे वर्ग को अंग्रेजी शासन से जोड़ने और जनाक्रोश पर नियंत्रण रखने के लिए की गई थी. एक प्रकार से वह अंग्रेजी शैली का ही संगठन था. धीरेधीरे वक्त बदला और जनता के दबावों में कांग्रेस को स्वराज की मांग पर उतरना पड़ा. उल्लेखनीय है कि ‘स्वराज्य’ और ‘स्वराज’ के आधार पर कांग्रेस में भी दो दल बन चुके थे. स्वराज्य की मांग करनेवाले कम संख्या में थे. उनमें से बड़ी संख्या उन नेताओं की थी, जो किसी न किसी प्रकार से ग्रामीण क्षेत्रों से आए थे और जिनकी प्रतिबद्धता अपने लोगों के साथ थी. कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में से एक दादा भाई नौरोजी हालांकि कांग्रेस की नर्म राजनीति की धारा का प्रतिनिधित्व करते थे. किंतु उनकी लिखी पुस्तक ‘पावर्टी एंड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया’ ब्रिटिश भारत की त्रासदी को बयान करती थी. पुस्तक में उन्होंने ‘ड्रैन थ्योरी’ को स्थापित किया था, जिसके अनुसार अंग्रेजों द्वारा विभिन्न रास्तों से भारतीय संपदा के दोहन तथा उसको इंग्लेंड ले जाने की बात कही थी. इस पुस्तक ने ब्रिटिश शासन के विरोध को तार्किक आधार प्रदान किया था. वे देश की अंग्रेजों से पूर्ण आजादी चाहते थे. ‘स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है.’ कहनेवाले तिलक इस वर्ग के अग्रणी नेताओं में से थे. उनके सापेक्ष गांधी चतुर बनिये की तरह अपनी और भारतीय समाज की स्वाधीनता की वांछा को तौल रहे थे. 1942 से पहले तक उनकी मांग ‘स्वराज’ तक सीमित थी. संभवतः पूरी तैयारी के बिना अंग्रेजों से कोई टकराव मोल लेना नहीं चाहते थे. वे मानते थे कि अंग्रेज इस देश का समाजार्थिक शोषण कर रहे हैं. ‘हिंद स्वराज’ का पहला संस्करण गुजराती में ‘हिंद स्वराज्य’ के नाम पर लिखा गया था. परंतु जब अंग्रेजों ने उस उस संस्करण को प्रतिबंधित कर दिया तो गांधी ने तुरंत पुस्तक का शीर्षक बदलकर उसका अंग्रेजी अनुवाद ‘इंडियन होमरूल’ नाम से प्रकाशित कराया, ‘हिंद स्वराज’ के नाम से प्रकाशित किया, जो कांग्रेस की मांग से मिलतीजुलती थी.

बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशक विश्वराजनीति में हलचल भरे थे. सोवियत संघ, जर्मनी, इटली, फ्रांस, चीन आदि देशों में राजनीतिक परिवर्तन जारी थे. इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण था, सोवियत संघ का कम्युनिज्म के घेरे में चले जाना. चीन में भी साम्यवादी शक्तियां प्रभावी थीं. वहां माओ के नेतृत्व में साम्राज्यवादी शक्तियों से संघर्ष जारी था. उसकी लाल सेना चीन के बड़े हिस्से को अपने अधिकार में चुकी थी. भारतीय बुद्धिजीवियों खासकर पढ़ेलिखे वर्ग पर साम्यवादी आंदोलन का गहरा प्रभाव था. उन्हें उसमें ब्रिटिश साम्राज्यवाद का तोड़ नजर आता था. बंगाल, केरल, पंजाब आदि प्रांतों के युवक सोवियत संघ जाकर वहां की राजनीतिक जमीन को समझने में लगे थे. रूस के साम्यवादियों का भी भारतीयों को भरपूर समर्थन था. वे इसे साम्यवादी आंदोलन की पूर्णता के रूप में देखते थे. इससे पूंजीवादी ताकतों में इस बात की चिंता स्वाभाविक थी कि यदि भारत भी साम्यवादी झंडे के नीचे आ जाता है तो एशिया के छोटेछोटे देशों को भी उसके प्रभाव में आते देर न लगेगी. वह यूरोप के बाकी देशों के लिए बड़ा खतरा हो सकता है, जिसके उस समय पूरे आसार थे. भारतीय स्वाधीनता आंदोलनकारियों की पहली खेप साम्यवादी रूस से काफी प्रेरित थी. उस समय के सभी प्रमुख नेता और बुद्धिजीवी उससे प्रभावित थे. महान समाज सुधारक राजा राममोहन राय स्वयं कार्ल मार्क्स से प्रेरित थे. वे मार्क्स से मिलने इंग्लेंड भी गए थे. लेकिन उनकी मार्क्स से मुलाकात न हो सकी थी. उस समय के प्रमुख नेता डा॓. हरदयाल, करतार सिंह सराबा आदि क्रांतिकारी नेताविचारकों पर रूस के साम्यवादी आंदोलन का असर था. भारत के सैकड़ों युवा रूसी जमीन पर रहकर क्रांति की शिक्षा ले रहे थे. यहां तक कि पूरी तरह भारतीयता के रंग में रंगे विवेकानंद पर भी साम्यवादी विचारधारा का प्रभाव था.

दूसरी ओर भारत में लाल झंडा न फहरने पाए, इसके लिए देश और विदेश में बड़ेबड़े कूटनीतिज्ञ सक्रिय थे. लाला लाजपत राय, भगत सिंह, राजगुरु जैसे क्रांतिकारियों के देश के युवावर्ग पर प्रभावी होने से रोकने के लिए बड़ा खेल खेलने की तैयारी हो रही थी. 1857 का संग्राम हिंदुओं और मुस्लिमों ने मिलकर लड़ा था. उस समय तक देश में सांप्रदायिक विभाजन जैसी बात न थी. अंगेज चाहते थे कि भारतीय अंग्रेजी सीखें. कम से कम इतनी कि सरकारी कामकाज में उनकी मदद ली जा सके, लेकिन साम्यवाद जैसी विचारधाराओं से उन्हें चिढ़ थी. सामरिक दृष्टि से भी अंग्रेज भारत को रूसी साम्यवाद के प्रभाव से बचाए रखना चाहते थे. इसलिए अंग्रेजी के प्रति सम्मोहित, मगर प्राचीन भारतीय संस्कृति में गहरी आस्था रखने वाले गांधी और रवींद्रनाथ ठाकुर जैसे व्यक्तित्वों को अतिरिक्त रूप से बढ़ावा दिया गया. यही कारण है कि महात्मा गांधी ने जब सत्याग्रह की शुरुआत की तो उन्हें अपने समय के सभी प्रमुख उद्यमियों का साथ मिला था. जमनालाल बजाज, घनश्यामदास बिड़ला, खेतान जैसे उद्यमियों और व्यापारियों से गांधी जी के आत्मीय संबंध थे. उनकी समृद्धि का अधिकांश विश्वयुद्धों की देन था. दोनों विश्वयुद्धों के दौरान गांधी भी, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में साम्राज्यवादियों के साथ थे. उल्लेखनीय है कि रूस ने अपनी स्वतंत्रता हिंसक क्रांति के माध्यम से ग्रहण की थी. चीन भी उसी दिशा में बढ़ रहा था. ऐसे में गांधीजी का अहिंसा का विचार केवल जमीनी सचाइयों की देन न होकर भारत को रूसी एवं चीनी प्रभाव से बचाने की कोशिश भी था. दूसरे शब्दों में गांधी की अहिंसा केवल साम्राज्यवादी अंग्रेजों का रक्षाकवच नहीं थी. वह भारतीय नवपूंजीपतियों एवं जमींदारों को उस भय से बचाने में सहायक थी, जो रूस तथा दूसरे देशों के रास्ते आ रहा था. दूसरे शब्दों में गांधी जितना काम भारतीयों के लिए कर रहे थे, उतना ही काम अंग्रेजों के लिए भी कर रहे थे. और चाहेअनचाहे वैसा ही काम भारतीय नवपूंजीपति वर्ग की रक्षा के लिए भी कर रहे थे, जिनके लिए स्वतंत्रता के मायने पश्चिमी प्रौद्योगिकी से गठजोड़ तथा उसके माध्यम से भारत की अर्थसत्ता पर कब्जा करने तक सीमित था.

यहां एक प्रश्न स्वाभाविक है कि महात्मा गांधी जो बडे़ उद्यमों में कटौती के पक्ष में थे, हाथ के उद्यमों तथा दस्तकारों को आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे, आखिर क्यों बिड़ला और बजाज जैसे उद्यमी उनके पीछे लगे हुए थे. बड़ी पूंजी का निषेध करनेवाले गांधी को अपने कार्यक्रमों के लिए पूंजीपतियों की ओर से चंदा आता था. साध्य एवं साधन दोनों की पवित्रता के समर्थक गांधी को उससे कोई विरोध क्यों नहीं था? क्या वह पूंजीपतियों का राष्ट्रप्रेम था? गांधीजी द्वारा चलाए गए स्वदेशी अभियान का लाभ सीधे पूंजीपतियों को पहुंचा था. खादी का लाभ उठाने वालों में बिरला घराना सबसे आगे था. बदले में वह उनका लाभ भी उठा रहा था. उल्लेखनीय है कि गांधीजी ने खादी को बढ़ावा देने के लिए मिल से बुने कपड़े का बहिष्कार किया था. बाद में अपनी राय में संशोधित करते हुए भारतीय मिलों से बुने कपड़े को उपयोग में लाने की छूट दे दी थी. यह गांधी की नीति में बड़ा परिवर्तन था. वे यदि इसकी अनुमति न देते तो भी मशीनीकरण की ओर बढ़ते भारत के कदम रुकनेवाले नहीं थे. इसलिए पूंजीपति गांधी जी का उतना ही समर्थन चाहते थे, जो उनको व्यावसायिक दृष्टि से लाभकारी हो. दरअसल गत शताब्दी के दूसरे दशक में जब दक्षिण अफ्रीका में सफलता के झंडे गाढ़कर गांधीजी हिंदुस्तान पहुंचे उस समय दुनिया में माक्र्स के विचारों की धूम मची हुई थी. रूसी क्रांति सफल हो चुकी थी. चीन का बड़ा भूभाग माओत्से तुंग की लाल सेना के अधिकार में था. लेनिन के सिपहसालार ट्राटस्की भारत में भी साम्यवादी क्रांति को सफल देखना चाहते थे. भारत के सैकड़ों युवा उससे उत्साहित थे. अंग्रेज अब सर्वविजेता कौम नहीं नहीं रह गई थी. भगत सिंह, सुभाष, नेहरू आदि पर साम्यवादी विचारों की छाया थी. अमेरिका में बसे भारतीय समानता और व्यक्ति स्वातंत्रय का संदेश भारत तक पहुंचा रहे थे. अब्राह्म लिंकन के नेतृत्व में वहां जो स्वाधीनता संग्राम लड़ा गया था, उसका अगला सफलतापूर्ण चरण फ्रांस में पूरा हुआ था. टामस पेन, थामस जेफरसन आदि ने, ने व्यक्ति मात्र की समानता, समानता और अधिकारों को लेकर आवाज उठाई थी. भारत में वही काम ज्योतिबा फुले और बाद में चलकर उनके सशक्त उत्तराधिकारी डा॓. अंबेडकर द्वारा किया गया. यही कारण है कि घबराए हुए भारतीय पूंजीपतियों ने धर्म भीरू और परंपरावादी गांधी की लुकाटी को चमकाते रहने में ही अपनी भलाई समझी थी. चूंकि आर्थिक और सामाजिक समानता के सवालों को राजनीतिक स्वतंत्रता के उत्साह में दबाया जा सकता था, इसलिए कांग्रेस ने सामाजिकआर्थिक स्वतंत्रता के प्रश्न को कोई महत्त्व नहीं दिया गया था. गांधी की राजनेता और धार्मिक संत की तस्वीर साथसाथ गढ़ी गई. भारतीय हिंदूमन जो सात सौ वर्ष की दासता से गुजर चुका था, अपनी पहचान को सम्मान देना चाहता था. इसलिए राष्ट्रीय भावनाओं की धार्मिक आर्थिकसामाजिक समानता जैसे शाश्वत मूल्यों पर संप्रदायवाद की जीत हुई. इस बीच भारतीय जनमानस पर गांधी का प्रभाव उत्तरोत्तर बढ़ता गया. गांधी तथा अन्य परंपरापोषी नेताओं की छत्रछाया में भारतीय उद्योगपति अपना काम करते रहे. कुल मिलाकर भारतीयता की बात करनेवाले हमारे तत्कालीन बड़े नेता, पूंजीवाद के प्रवेश को रोकने के बजाय उसकी पैठ बनाने में सहायक सिद्ध हुए.

स्वातंत्रयोत्तर भारत में पूंजी का हस्तक्षेप आजादी के समय से ही रहा. महात्मा गांधी की सफलता में उन पूंजीवादी ताकतों का बड़ा योगदान था. गांधीजी के आयोजनों में खर्च सामंतों और पूंजीवादी ताकतों का ही लगता था. स्वाधीनता आंदोलन में उन्होंने खादी का समर्थन किया था. स्वदेशी का जोरदार समर्थन करते हुए वे आगे बढ़े. दरअसल खादी और स्वदेशी में अंतर है. खादी की अवधारणा गांधीजी की गांव के आर्थिक स्वावलंबन से जुड़ी थी, जबकि स्वदेशी की सीमा में भारतीय उद्योग भी आ जाते थे. ‘हिंद स्वराज’ में गांधी ने मशीनों की आलोचना की थी. खादी मानवीय श्रम का सम्मान करती है. वह मानवीय कौशल को हस्तशिल्प और यंत्रशिल्प की स्पर्धा में भी मरने नहीं देती. व्यक्ति को उसके श्रम का पूरापूरा मूल्य मिले, यह व्यवस्था गांधी दर्शन में कहीं नहीं है. गांधीजी ने जब खादी का दर्शन दुनिया को दिया, वे चरखे के बारे में जानते नहीं थे. हिंद स्वराज पर अपने साक्षात्कार के दौरान उन्होंने यह स्वयं स्वीकारा था. उस समय तक खादी को ग्रामीण अर्थव्यवस्था के आधार के रूप में प्रस्तुत करने में कोई बड़ी आर्थिक समझ नहीं हो सकती. स्वयं गांधी जी ने इसका कोई दावा नहीं किया था. लेकिन गांधी की व्यापक लोकप्रियता के चलते इसका बड़े उद्योगों पर इसका असर पड़ना स्वाभाविक था. कालांतर में पूंजीपतियों के आग्रह या दबाव में ‘हिंद स्वराज’ के मूल कथ्य में कोई परिवर्तन न करनेवाले, पुस्तक के प्रथम संस्करण में आदमी को अपने हाथ का कताबुना कपड़ा पहनने का आग्रह करने वाले गांधी, 1931 में ‘भारतीय मिलों का कताबुना’ पहनने की अनुशंसा कर चुके थे. यानी खादी का स्थान स्वदेशी ले चुकी थी. स्वदेशी का मतलब है देश में बना हुआ. यह अपने आप में भावुक अवधारणा है. उसे बनाने के, बनाने का कारखाना लगाने के लिए किसका पैसा लगा है, तकनीक कैसी है, उसपर जोर नहीं देती. यानी स्वदेशी का समर्थन करते समय गांधीजी मशीनों की आलोचना के बारे में अपने तर्क को बहुत पीछे छोड़ चुके थे. यदि लंकाशायर का कोई पूंजीपति सस्ते श्रम की चाहत में भारत में कोई कारखाना, अत्याधुनिक श्रमविरोधी मशीनों के साथ लगाए तो उसका बुना कपड़ा स्वदेशी है. तथा गांधीजी का उससे विरोध नहीं था. इसलिए वे खादी की अपनी अवधारणा में संशोधन कर, स्वदेश निर्मित वस्तुओं के पक्ष में तर्क देने लग जाते हैं. भले ही लंकाशायर का वह पूंजीपति अपने देश के मुकाबले यहां के श्रमिकों को बहुत कम वेतन पर रख रहा हो. गांधी जी जीवन को धार्मिक नजरिये से देखते हैं. आर्थिक दृष्टिकोण उनके लिए अधिक महत्त्व नहीं रखता. जो पूंजीपति गांधीजी के आगेपीछे लगे थे, उन्हें इससे मतलब भी नहीं था. बल्कि प्रकारांतर में धार्मिक जड़ता उनके लिए मददगार ही थी.

गांधी बारबार धार्मिक आजादी की बात करते रहे. आर्थिक स्वावलंबन के लिए उन्होंने ग्राम स्वराज, खादी एवं ग्रामोद्योग का नारा दिया. वैसे भी उन दिनों शिक्षा और शहरों से कटे भारतीय गांवों के मशीनीकरण की संभावना भी नहीं थी. भीषण गरीबी के कारण लोगों का क्रयसामथ्र्य अत्यधिक कम था. उनमें निवेश करने से पूंजीपतियों को कोई तात्कालिक लाभ होनेवाला नहीं था. इसलिए इस बात को खूब उछाला गया. गांधी ब्रिटेन के सम्राट के बुलाने पर गए तो एक लंगोटी में थे. इसके लिए उनकी प्रशंसा भी की जाती है. बात है भी प्रशंसा की. उन्होंने कहा था कि वे भारत की जनता के प्रतिनिधि हैं. एक नेता को ऐसा ही होना चाहिए. ऐसे सुनने में भी अच्छा लगता है. लेकिन क्या इससे यह जाहिर नहीं होता कि इससे गरीबी का महिमा मंडन होता है. क्या इससे यह नहीं लगता कि कि गांधीजी ने गरीब भारत की अभावग्रस्तता को चुनौती मानने के बजाय उसको उसी रूप में स्वीकार कर लिया था. वैसे भी उनके ऐजेंडा में राजनीतिक आजादी प्रमुख थी. समाजार्थिक आजादी के सवालों को वे स्वातंत्र्योत्तर भारत में सुलझाना चाहते थे. इसलिए गांधीजी की वह घटना एक गरीब देश के स्वाभिमान का प्रतीक तो बन सकती है, लेकिन उसके माध्यम से गरीबी के महिमा मंडन का जो संदेश जाता है, उससे आगे चलकर नुकसान ही हुआ. प्रकारांतर में यह नामक एक और हथियार मिल गया. आशय है कि गांधी और गांधीवाद, मशीनीकरण को रोकने और त्याज्य बताने के बावजूद पूंजीवाद पर नकेल कसने में नाकाम रहे हैं. पूंजीवाद को नाथने के लिए गांधी ने ट्रस्टीशिप का विचार रखा था. ऊपर से देखने पर यह आदर्श विचार प्रतीत होता है. मगर व्यवहार में यह आर्थिक विभाजन को न्यायसम्मत मान देती है. वह दान की व्याख्या को जन्म देता है. जिसके आधार पर समाज में परजीवी वर्ग को फलनेफूलने का अवसर मिलता है. जिस ग्रामस्वराज को वे ग्रामीण परिवेश में फलतेफूलते देखना चाहते हैं, उसकी परिणति सामंतवाद में होती रही है. पूंजीवाद चूंकि लोकतंत्र का पक्ष लेता है, जिसमें उसका अपना हित भी है. जबकि सामंतवाद में पूंजीपतियों पर नियंत्रण केवल मनमानी और बलप्रयोग द्वारा होता था. इसलिए पूंजीवाद की सफलता के लिए सामंतवाद को पुराना, दकियानूसी शासन पद्धति वाला और लोकतंत्र विरोधी कहकर बदनाम करने का काम किया गया. बहरहाल सामंतवाद जिन कमजोरियों का शिकार था, उसका पतन स्वाभाविक था.

पूंजीवाद को नाथने की कोशिश गत दो सौ वर्षों में होती रही है. निश्चय ही इसका केंद्र यूरोप था. मगर उसकी धमक दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों तक सुनाई पड़ी थी. पूंजीवाद को नाथने के लिए साहचर्य, अराजकतावाद, श्रमिक संघवाद, संगठनवाद, सहजीवितावाद जैसे विचार आए. उन सभी की विशेषता थी कि वे श्रम को महत्त्व दिए जाने पर जोर देते थे. सभी का आग्रह था कि पूंजीस्वामी को पूंजी के आधार पर अतिरिक्त लाभ का अधिकारी बनाने से रोका जाए और आपसी व्यवहार में मौद्रिक विनिमय को न्यूनतम किया जाए. संक्षेप में ये सभी धनबल के स्थान पर श्रमबल को खड़ा कर देना चाहते थे. संगठन में ताकत है. पूंजीवाद के सुरसई आतंक पर केवल संगठित जनशक्ति रोक लगा सकती है, ऐसा इस वर्ग का विश्वास था. इनके बीच एक समानता यह भी है कि वे लोकतंत्र और व्यक्तिमात्र की इच्छाओं का समर्थन करते हैं. व्यक्ति और समाज से उनकी अपेक्षा होती है कि वे एकदूसरे की इच्छाओं का सम्मान करते हुए उपलब्ध संसाधनों के न्यायपूर्ण बंटवारे से सभी वर्गों के लिए काम करें. वे मानते हैं कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति की राय महत्त्वपूर्ण है. इसलिए निर्णय में सभी की साझेदारी होनी चाहिए. व्यक्ति की अपनी आवश्यकता भी होती है. इसके लिए उसको अपने अलावा दूसरों के उत्पाद पर भी निर्भर रहना पड़ता है. विडंबना यह है कि सुख, व्यक्तिगत आकांक्षाओं और मानवाधिकार को लेकर, समाजवाद के आधुनिक प्रकल्पों तथा पूंजीवाद में बहुत अंतर नहीं है. व्यक्ति कल्याण के जिस लक्ष्य को लेकर समाजवाद आगे बढ़ता है, पूंजीवाद भी उन्हीं के आधार पर अपना औचित्य सिद्ध करने में लगा रहता है. समाजवाद की भांति पूंजीवाद भी व्यक्तिस्वातंत्र्य एवं मानवाधिकार का बढ़चढ़कर गुणगान करता है, किंतु उसकी कमजोरी है कि वह इसको सस्थाओं के माध्यम से लागू करना चाहता है. संस्थाओं की जटिलता और नियमादि उनकी कार्यप्रणाली को जटिल बनाते हैं जिससे जनसाधारण के लिए संस्थाओं का लाभ उठा पाना बहुत कठिन होता है. इससे विशेषज्ञ संस्कृति को बढ़ावा मिलता है. उसके फलस्वरूप समाज में बौद्धिक आधार पर विभाजन को स्वीकृति मिलने लगती है. यही समाज के आर्थिक आधार पर विभाजन का बुनियादी आधार है, जिसे पूंजीवाद निहित स्वार्थ के लिए पोषितपल्लवित करता है.

पूंजीवाद में मनुष्य की नैतिक प्रेरणाओं को जगाने के लिए कोई कोई तंत्र नहीं होता. न ही वह इस तरह का कोई प्रयास करता है. इसके उलट पूंजीवाद सुखसुविधाओं के नाम पर ऐसे उपकरण और संसाधन बाजार में उतार देता है जो मनुष्य के भीतर अकेलेपन को संपूर्णता के साथ जी लेने का भ्रम पैदा करते हैं. इससे समाज में संवाद के अवसर घटते जाते हैं. परिणामस्वरूप विभिन्न इकाइयों के बीच संदेह और अविश्वास को बढ़ावा मिलता है. व्यक्ति के अकेलेपन को बांटने, उसकी भरपाई के नाम पर पूंजीवाद बहुत चतुराई से बाह्यः संस्थाओं को ले आता है. जिससे समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संदेह और अविश्वास स्थायी रूप लेने लगता है. इससे सामाजिक विक्षोभ पैदा होते हैं. उस समय वह मध्यस्थता का नाटक करते हुए ऐसे रेफरी की भूमिका में होता जिसका टीमों की हारजीत से कोई नाता नहीं होता. उसकी नजर अपने मुनाफे और प्रोत्साहनलाभ पर टिकी होती है. इसके बावजूद पूंजीवाद के समर्थक शांत नहीं बैठते. वे मनुष्य के अकेलेपन को बढ़ाने, समाज में अविश्वास और संदेह पैदा करने के लिए चोरीचोरी हर समय, हर कालखंड में काम करते रहते हैं. इसलिए कि अकेलेपन की अनुभूति और समाज से डरे हुए व्यक्ति को पूंजीवाद के चंगुल में फंसाना बहुत आसान होता है. उसे पूंजीवाद द्वारा खड़ी की गई संस्थाओं के मोहपाश में आसानी से फंसाया जा सकता है. पूंजीवाद के लिए मुनाफा ही मोक्ष है. उसकी हर बहस लाभ पर आकर दम तोड़ लेती है. स्वयं को वैज्ञानिक सोच और नवीतम ज्ञान का समर्थक बताने वाला, नवीनतम शोध एवं प्रौद्योगिकी के आधार पर अहर्निंश काम करने वाला पूंजीवाद, मुनाफे के लिए बुरी नजर से बचाने वाले ‘नजर सुरक्षा कवच’ तथा ‘शनियंत्र’ आदि बेचता है. पाखंड के कारोबार को तरहतरह से बढ़ावा देता है. मुनाफे के लिए उसे मौत को प्रायोजित करने का अवसर मिले वह उसके लिए भी सहर्ष तैयार रहता है.

इसी स्वार्थपरता के कारण पूंजीवाद की आलोचना उसके उभार के दिनों में ही होने लगी थी. इसके बावजूद वह विकासमान रहा. इसका कारण है कि पूंजीवाद ने समाज में मध्यवर्ग पैदा किया था. उससे पहले समाज में अमीर और गरीब का विभाजन था. उसकी विडंबना थी कि जो अमीर था, उसके पास जरूरत से इतना अधिक था, उसको बनाए रखना ही उसके लिए बड़ी चुनौती थी. दूसरी ओर गरीब था जिसके पास इतने अभाव थे कि जीवन को बचाए रखना बड़ी चुनौती होती थी. एक को सपनों की जरूरत इसलिए नहीं थी क्योंकि उसकी हर ख्वाइश तत्काल पूरी हो जाती थी. दूसरे के पास कोई सपना नहीं था. इसलिए कि घोर अभावों के बीच सपना देखने की उसकी हिम्मत ही नहीं होती थी. मामला सीधेसीधे ‘होने’ या ‘न होने’ का था, इसलिए उसे आसानी से नियतिबद्ध किया जाता था. लोगों के दिलों में यह बात बिठाई जा चुकी थी कि जो विशिष्ट तथा सुखसुविधा संपन्न वर्ग है, उसपर ईश्वर की विशेष अनुकंपा है. मध्यवर्ग ने व्यक्ति की खुशहाली को नियतिबद्ध मानने वाली धारणा पर प्रहार किया था. उसके पास सपने थे और संकल्प भी. ऊपर से खूबी यह कि वह अपनी सीमाओं के अतिक्रमण के लिए निरंतर प्रयत्नरत रहता था. मशीनीकरण और पूंजीवाद की सफलता में इस वर्ग का योगदान किसी से छिपा नहीं था. इसका उसे लाभ भी मिला था. इस वर्ग का बड़ा हिस्सा पूंजीवाद को कामयाब बनाने के लिए सतत प्रयत्नशील रहता था. मगर एक हिस्सा असंतोष का शिकार भी था. उसे हमेशा यह लगता था कि मात्र पूंजी और अपने निष्क्रिय योगदान के बल पर पूंजीपति जितना लाभ कमाता है, उसका उसे कोई अधिकार नहीं है. यह वर्ग लाभ में अपनी सम्मानजनक हिस्सेदारी चाहता था. इस वर्ग के असंतोष के कारण पश्चिम में अनेक पूंजीवादी आंदोलनों और विचारधाराओं का जन्म हुआ था. उन आंदोलनों और विचारधाराओं को पूंजीवाद उत्पादन व्यवस्था से जुड़े अन्य वर्गों का समर्थन भी प्राप्त हुआ.

क्रमश:

ओमप्रकाश कश्यप

पूंजी का राज या राज की पूंजी

सामान्य

आलेख

सुरक्षा के बिना विकास का आनंद नहीं होगा. विकास के बिना सुरक्षा का आनंद नहीं होगा; और मानवाधिकारों का सम्मान किए बिना हम न तो सुरक्षा का सुख भोग सकते हैं, न ही विकास का.

कोफी अन्नान

सरकार समाज का सबसे अनुत्पादक और खर्चीला, मगर अनिवार्य कर्म है. मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता इसके कार्यक्षेत्र को सीमित कर, कम खर्चीला बना सकती है. इसलिए कि ऐसे अनेक क्षेत्र हैं, जहां एक सभ्य व्यक्ति को, यदि वह सभ्यता का मतलब कर्तव्यपरायणता से लेता है, यदि वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है तथा अपने कार्यों का निष्ठापूर्वक पालन करता है, तो उसको सरकार की आवश्यकता ही नहीं पड़ती. कहने की आवश्यकता नहीं कि समाज में अधिकांश व्यक्ति ऐसे ही होते हैं, जो बस अपने काम से काम रखते हैं. सरकार के होने या न होने से उन्हें कोई अंतर नहीं पड़ता. ऐसे लोग अपने जीवन को शांतिपूर्वक जीना चाहते हैं और वे जीने की भरसक कोशिश भी करते हैं. थोड़ेबहुत विक्षोभ को जो परिस्थितिगत प्रभावों के कारण उनके जीवन को प्रभावित करने आ धमकता है, नजरंदाज कर वे अपने जीवन में रमे रहना चाहते हैं. सरकार कैसी है, किस दल की है. उसकी मूल सैद्धांतिकी तथा विकास को लेकर नीतियां कौनसी हैं, आदि बातों का उनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. सही मायने में ऐसे लोग सरकार की जरूरत होते हैं. हर चौथे या पांचवे वर्ष मतदान के बहाने ऐसे लोगों की सहानुभूति अर्जित करने के लिए सरकार को उनके दरवाजे पर जाना ही पड़ता है. उनपर एक विद्वान की उक्ति सटीक बैठती है. उसने कहा था—‘दुनिया के सारे के सारे कानून व्यर्थ हैं. इसलिए कि एक भले आदमी को उनकी जरूरत नहीं पड़ती और जो बुरे हैं जिन्हें ऐसे कानूनों की जरूरत है, वे ऐसे कानूनों की परवाह नहीं करते. सरकार के साथ भी यही स्थिति है. ऐसे बहुत से लोग हैं जिनका काम उसके बिना भलीभांति चलता रहता है. किसी गांव के आदमी से पता कीजिए कि इस देश का प्रधानमंत्री कौन है? संभव है वह चुप्पी साध ले. उसे मालूम ही न हो. इसका उसे कोई मलाल भी नहीं होगा. हालांकि व्यक्तियों के संपर्क के मामले में वह किसी भी शहरी को पछाड़ सकता है. साफ है, आम आदमी सरकार के मुखिया का नाम भले न जाने, परंतु वह न केवल अपने गांव, बल्कि आसपास के अनेक गांवों के लोगों के नाम, मौसम, फसल, पशुपक्षी, व्रतत्योहार आदि के बारे में बता सकता है, जिसमें पढ़ेलिखे लोग पिछड़ सकते हैं. उनकी निगाह में उसके व्यावहारिक ज्ञान का, उस ज्ञान का उसके स्थानीय स्रोतों का परिचय दे, कोई महत्त्व नहीं होता. इसलिए वे उसे अज्ञानी कहकर मन को तसल्ली दे लेते हैं. कारण साफ है—हम सूचना को ज्ञान समझते हैं. और मनोरंजन के अवसरों को छोड़कर प्रायः उन्हीं सूचनाओं को महत्त्व देते हैं, जिनका बाजार या उत्पादकता से कोई संबंध हो, जो हमें किसी न किसी प्रकार लाभ पहुंचाने वाली हो. अगर कोई हमसे पूछे कि गेहूं की बुबाई कब की जाती है? ईख का बीज कैसा होता है? पशुओं की मुख्य बीमारियां क्या हैं, तो अधिकांश बगलें झांकने लगंेगी. पर किसी गांव वाले से पूछ लीजिए, खेती से कोई वास्ता न रखने वाला भी ऐसे सवालों को चलतेचलते बूझ देगा. पर हम उसके सवालों को महत्त्व नहीं देते. हम सूचनाओं को महत्त्व देते हैं. सरकार खुद सूचनाओं के दम पर चलती है. इसलिए सरकार सूचना को ज्ञान की अहमियत भी देती है. जबकि सूचना ज्ञान का उपकरण है. वह स्वयं ज्ञान नहीं है. ज्ञान अपने आप में जटिल संकल्पना है. जब हम किसी वस्तु के बारे में ज्ञान का दावा करते हैं तो हमारा आशय होता है कि हमें उस वस्तु के उस पक्ष की जानकारी है, जो केवल सूचनाओं तक सीमित नहीं है. सरकार के जितने भी नेता या अधिकारी हैं, सब सूचनाएं बटोरने में लगे रहते हैं. इनमें नेताओं को सूचना बनाने और अधिकारियों को सूचनाएं बटोरने वाली मशीन कह सकते हैं. दूसरे शब्दों में अधिकारीगण नेताओं और पूंजीपतियों द्वारा बोई गई सूचनाओं की फसल काटते रहते हैं.

आप कहेंगे कि यह कैसी उलटबांसी है! आदमी ने सभ्यता के क्रम में ही सरकार बनाना सीखा है. आज का जीवन कितना व्यवस्थित है….दोषी को सजा दिलाने के लिए कानून है. अपराध रोकने के लिए पुलिस. सरकार न हो तो अस्पताल, यातायात, बिजली और पानी की आपूर्ति आदि सब धराशायी हो जाएं. हो सकता है कुछ अर्थों में उनका यह कहना सही हो. हमने देखा है ऐसे मामलों में सरकार की भूमिका बड़ी महत्त्वपूर्ण होती है. आज किसी एक प्रांत में अनाज की कमी पड़े तो सरकार तत्काल देश के दूसरे रास्तों से विदेश से जरूरतमंदों के लिए भोजन की व्यवस्था करती है. बीमारों की देखभाल के लिए अस्पताल हैं. यातायात को सुगम बनाने के लिए सड़कें और शिक्षा के लिए बेहतर सुविधाएं हैं. सरकार न हो तो इनकी कौन देखभाल करे. लेकिन ऊपर दिए गई सुविधाओं, शिक्षा, यातायात, स्वास्थ्य आदि में से कुछ भी ऐसी नहीं है जिसके लिए केवल सरकार पर निर्भर रहा जाए. बल्कि सरकार स्वयं इनके लिए निजी संस्थाओं पर रहने की वकालत करने लगी है. बड़े शहरों में शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात तो पहले ही निजी संस्थानों के हवाले था, अब सफाई, बिजली सप्लाई जैसे कार्य भी जो रोजगार सृजन के बड़े आधार थे, निजी संस्थानों को सौंपे जाने लगे हैं. जहां तक कानून और पुलिस प्रशासन की बात है, सरकार द्वारा दी जाने वाली ये व्यवस्थाएं इतनी लचर हैं कि कुछ पूछो मत. पुलिस की हालत इतनी गई बीती है कि लोग सिपाही को ‘वर्दी वाला गुंडा’ तक कह देते हैं. ऐसे माहौल में काम करते हुए पुलिस कर्मचारी अपना आत्मबल इतना गंवा चुका होता है कि इसका विरोध तक नहीं कर पाता. अस्पतालों का यही हाल है. यही हाल शिक्षा का भी है. सरकार नौकरी होने का रौब भले हो, परंतु आम धारणा यही है कि जिन सेवाओं से सरकार के होने का औचित्य सिद्ध होता है, उन्हें प्रदान करने में सरकार पूरी तरह नाकाम सिद्ध होती है. आदमी ही क्यों, सरकार का भी अपने सुरक्षातंत्र से भरोसा उठ गया लगता है. नहीं तो रेलवेस्टेशन पर जाकर सरकार की उद्घोषणाएं सुन लीजिए. चौबीसों घंटे माइक पर यही सुनाई देगा—‘लावारिस वस्तुओं को न छुएं….अपने आसपास अच्छी तरह देखें. अनजान वस्तु बम हो सकती है.’ यानी सरकार सुरक्षा जैसा काम भी ढंग से नहीं कर पाती. फिर भी सरकार का होना हमें अपरिहार्य लगता है. सरकार के बगैर भी समाज चल सकता है, इस बारे में सोच भी नहीं पाते. कारण साफ है, हम अपना नागरिक धर्म भूल चूके हैं. सब कुछ सरकार भरोसे छोड़कर निश्चिंत हो जाना चाहते हैं. पड़ोसी भूखा रहे, हमारी नींद खराब नहीं होती. उसपर कोई संकट आन पड़े तो हम पुलिस को फोन कर अपने नागरिक कर्म की इतिश्री कर देते हैं. परंतु अब संबंध औपचारिक हो चुके हैं. पहले यह केवल शहरों तक सीमित था. अब कस्बों और गांवों में भी शहर की यह बीमारी प्रवेश कर चुकी है. आप कहेंगे कि इसमें सरकार क्या कर सकती है? मैं कहूंगा कि यदि नहीं कर सकती तो उसकी जरूरत ही क्या है? शिक्षा, बिजली, पानी, यातायात, स्वास्थ्य, सुरक्षा जिनके होने से कभी सरकार का होना सिद्ध होता था या जो कल्याण सरकार की प्रतिनिधि जनसेवाएं कही जाती थीं, उन सबसे तो सरकार एकएक कर पल्ला झाड़ चुकी है. जो शेष हैं उन्हें भी जिम्मेदारी से पीछे हटती जा रही है. सारे काम निजी सेवाएं निजी कंपनियों के हवाले करती जा रही है. फिर सरकार के बने रहने का औचित्य? ऐसा कौनसा कार्य शेष है जो सरकार के होने को सार्थक बनाए.

सरकार के पक्ष में आपसे कुछ तर्क दिलवाकर मैं उसको अपरिहार्य नहीं बनाना चाहता. मैं चाहता हूं कि आप स्वयं मान लें कि आपको सरकार की जरूरत नहीं है. जिन कार्यों के लिए आप अभी तक सरकार पर निर्भर रहते आए थे, वे दरअसल सरकार के थे ही नहीं. अपना औचित्य सिद्ध करने के लिए सरकार ने आपसे हथिया लिए थे. जब तक आपको शासित होने की आदत नहीं थी. अपनी जिम्मेदारियों को दूसरों पर डाल देना आपका स्वभाव नहीं था, उस समय तक सरकार आपकी अपनी होने का एहसास दिलाती थी. आपकी सहानुभूति अर्जित करना चाहती थी. परंतु जैसे ही सरकार आपकी जरूरत बनी, जिस दिन से आपने यह मानना आरंभ किया कि फलांफलां काम सरकार के हैं, उन्हें सरकार को ही करना चाहिए. नागरिक होने के नाते मैं भला क्या कर सकता हूं! उसी दिन से सरकार ने अपनी ताकत को पहचानना आरंभ कर दिया. यानी सरकार को जो ताकत मिलती है, उसका जो भारीभरकम लावलश्कर तैयार होता है, वह नागरिकों की कमजोरी या अपने कर्तव्य के प्रति उदासीनता से मिलता है. अधिकारों के प्रति चेतना के अभाव से, जंनतंत्र की कमजोरी से भी मिलता है. एक जागरूक समाज सरकार के बिना भी रह सकता है. समाज यदि आपसी तालमेल बनाने में कामयाब सिद्ध होता है. यदि वह अपने अधिकारों के साथसाथ कर्तव्यों के प्रति भी जागरूक है? तो उसको सरकार की जरूरत ही नहीं रह जाती. और सरकार का काम भी यही है कि वह लोगों के आत्मविश्वास को वापस लाए, उन्हें उनके अधिकारों से परचाए और कर्तव्यों के प्रति जागरूक करे. ताकि वे अपनी चुनौतियों से स्वयं निपट सकें. जो काम राजनीतिक संस्थाएं करती हैं, उनमें से अधिकांश को सामाजिक संस्थाओं से कराए, जो कम खर्चीली और ज्यादा जबावदेह होती हैं. यदि सरकार का काम यही सब है तो वह सामाजिकता को बनाए रखने के लिए जरूरी कदम क्यों नहीं उठाती. ऐसे सवालों पर सरकार अकसर यह कहकर पल्ला झाड़ लेती है कि यह करने से लोगों की जिंदगी में अनावश्यक हस्तक्षेप होगा. अगर सरकार परस्पर तालमेल बनाए रखना अपना कर्तव्य मानती है तो यह बुरी बात नहीं. पर सरकार का यह कार्य प्रायः अपनी जिम्मेदारी से पीछा छुड़ाने के लिए दिया करती है.

अब यह जान लिया जाए कि सरकार किसकी जरूरत है? सामान्यतः यही माना जाता है कि सरकार समाज की जरूरत है. चूंकि समाज अपने नागरिकों के योग से मिलकर बनता है इसलिए सरकार को नागरिकों की जरूरत कहकर प्रचारित किया जाता है. कम से कम जो लोग सरकार में हैं, वे तो यही कहकर अपना औचित्य सिद्ध करते हैं. हालांकि उनका यह दावा यथार्थ से एकदम परे है. सरकार चाहे कितनी ही उदार क्यों न हो, वह कुछ न कुछ तो शासन करती ही है. यह शासन कहीं न कहीं नागरिक स्वतंत्रता की कीमत पर होता है. तो क्या यह मान लिया जाए कि नागरिकगण स्वयं अपनी स्वतंत्रता का बोझ नहीं संभाल पाते, इसलिए वे सरकार के गठन को बाध्य हो जाते हैं? यदि इसे सच मान लिया जाए तो इसका अगला निष्कर्ष यह होगा कि मनुष्य अपनी स्वतंत्रता का सबसे बड़ा दुश्मन स्वयं होता है. अपनी स्वतंत्रता वह बड़ी आसानी से समाज के प्रभुवर्ग के हाथों में सौंपकर निश्चिंत हो जाता है और अपना जीवन ‘कोऊ नृप होय हमें का हानि’ कहते हुए बिताता है. ऐसी अवश्था में मानवाधिकार और व्यक्तिस्वातंत्र्य अर्थहीन होकर रह जाता है. एक सोये हुए समाज के लिए क्रांति के कोई मायने नहीं होते. बड़ीबड़ी क्रांतियां उसके आसपास से होकर गुजर जाती हैं और उसे पता तक नहीं चलता. भारतीय समाज के बारे में ऐसा हुआ है. पंद्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी में जब पश्चिमी जगत वैज्ञानिक क्रांति से गुजर रहा था, तब हमारे भक्तकवि प्रभुभक्ति में आत्मलीन नजर आ रहे थे. दलित और पिछड़े वर्ग से आए भक्त कवियों के लिए जातीय उत्पीड़न के सवाल तो थे, मगर आर्थिक असमानता जैसा कोई मुद्दा उनके आगे नहीं था. वे संतोष धन को ही सबसे बड़ा धन मानकर उसका गुणगान करने में लगे हुए थे. ‘सूखीसूखी खाय के ठंडा पानी पीव’ को ही सत्कर्म माने हुए थे. गरीबी उनकी ठसक थी. अगर कहीं से धन हासिल हो जाए उसे फेंक दिया करते थे. बस चले तो दानदाता को दुत्कार भी देते थे. दूसरी ओर शीर्षस्थ वर्ग ‘भूखे भजन न होय गोपाला’ कहकर कंगाली में भगवान को भी अंगूठा दिखाने को तत्पर रहता था. एक वर्ग दैन्य को अपना जीवन मान चुका था, दूसरे को उसका कोई अभ्यास नहीं था. धर्म एक के लिए अपने दैन्य से समझौते का नाम था, दूसरे के लिए अपनी सत्ता को बनाए रखने की रणनीति. उन्हें न तो मनुष्य के अधिकार याद थे, न ही संस्कृतिबोध था. उनका न तो बीता कल था, न ही आनेवाला कल. केवल गयागुजरा वर्तमान था, जिसे वे जैसेतैसे गुजार देना चाहते थे.

था॓मस पेन ने कहा है व्यक्ति समाज या राज्य में अपनी स्वतंत्रता को गंवाने के लिए सम्मिलित नहीं होता. बल्कि इसलिए सम्मिलित होता है कि वह अपनी स्वतंत्रता के साथसाथ उन सुखों का भी भोग कर सके, जिन्हें वह मानवीय सीमाओं के चलते स्वयं अर्जित करने में अक्षम है. बदले में वह जो स्वयं उत्पादन करता है, उसका एक हिस्सा दूसरों को देता है. समाज और व्यक्ति के संबंधों के गठन का मुख्याधार यही है. जबकि वह वर्ग समाज के बीच रहकर भी असुरक्षित और उत्पीडि़त था. उसका जीवन अपने लिए नहीं, दूसरों के सुखों में वृद्धि करने के लिए था. असमानताकारी व्यवस्था, सामंतवाद के लक्षणों को वह अपने जीवन में पूरी तरह आत्मसात् कर चुका था और उसी को अपना गौरव मानता था. इसी भावना के चलते पन्ना धाय हत्यारे के आगे राजा के बेटे की सुरक्षा करने के लिए अपने बेटे को आगे कर खुद को धन्य मान लेती है. प्रत्येक जीव में एक ही परमात्मा को मानने वाली, आत्माआत्मा को बराबर मानने वाली व्यवस्था पन्ना के कृत्य की आलोचना नहीं करती, बल्कि महिमामंडन करती है. जबकि सत्ताओं को बचाने के लिए जनसाधारण ऐसे ही बलि का बकरा बनते रहे. सामंतवाद की यह पराकाष्ठा कथित भगवान हाथों प्राप्त मौत के बाद मोक्ष मिलने के पाखंड में दिखाई पड़ती है. आततायी सत्ताओं के आतंक से मुक्ति, उनकी अनिवार्यता के एहसास से मुक्ति के लिए इन सांस्कृतिक अज्ञानताओं से बाहर आना जरूरी है.

लोग कहेंगे कि सरकार न होगी तो कानून कौन बनाएगा? न्यायालयों का संचालन कौन करेगा? सेना और पुलिस बल किसके अधीन रहेंगे? अपराधी तत्व सिर उठाने लगेंगे. कानून का डर ही तो अपराधियों की नाक में नकेल डाले रखता है. ऐसा करते समय हम यह तथ्य बिलकुल भुला देते हैं कि अपराध का अनुपात आज पिछले जमाने की अपेक्षा कहीं अधिक है. हमारी जेलें अपराधियों से भरी पड़ी हैं. अदालतों के पास इतने मुकदमे हैं कि सुनवाई का समय निकाल ही नहीं पातीं. एकएक मुकदमे की सुनवाई में वर्षों निकल जाते हैं. भारत सरकार के एक मंत्री की हत्या के एक मुकदमे का फैसला हाल ही में, चालीस वर्ष बाद आया है. इतने लबें अर्से तक टलने के बाद न्याय का कोई औचित्य रह ही नहीं जाता. यह काम लोकतंत्र के नाम पर, अभियुक्त पक्ष को बचाव का पूरा अवसर देने के नाम पर किया जाता है. अभियुक्त को सफाई का पूरा अवसर मिले, यह उसका अधिकार है. लेकिन इस बहाने न्याय केवल मजाक बनकर रह जाए, यह और भी बड़ी विडंबना होगी. ध्यान रहे यह स्थिति तब है जब पुलिस आधे से अधिक मुकदमे दायर ही नहीं करती. अगर पुलिस सारे के सारे केस दायर करने लगे तो आदमी को अपनी जिंदगी में, अदालतों की सुस्त रफ्तार के चलते, कभी न्याय मयस्सर न हो. यानी सरकार होने के एहसास, और इस बहाने अपराधियों थोड़ा भय होने के अलावा उसके रहने या न रहने से जनसाधारण को विशेष लाभ नहीं पहुंचा है.

कुछ लोग कहेंगे कि अपनी सरकार होने से सबको बोलने की समान आजादी है. अभिव्यक्ति का आनंद. जिसे यह सुविधा प्राप्त नहीं, उससे पूछिए. यह मनुष्यता की गरिमा का प्रमाण है. सच में मनुष्य को मनुष्य होने जैसा एहसास कराता है. सवाल है कि अभिव्यक्ति की आजादी जैसे सवाल जन्मे ही क्यों? क्यों यह स्थिति आन पड़ी कि लोगों की अभिव्यक्ति पर भी बंदिशें थोपी जाने लगीं. यदि सभी मनुष्य बराबर हैं, प्रकृति ने सभी को समान विशेषताएं दी हैं तो वे कौन लोग थे, जिन्होंने लोगों की अभिव्यक्ति पर बंदिश लगाने की शुरुआत की. जाहिर है वे सत्ताओं पर अनाधिकृत कब्जा जमाने वाले लोग रहे होंगे. उन्होंने पहले एक वर्ग के पढ़नेलिखने पर पाबंदी लगाई. जिन शास्त्रों के माध्यम से शासन चलाया जाता था, जिनको दैवी मानकर बातबात पर दुहाई दी जाती थी, उन्हें पढ़ना इतना बड़ा अपराध हो गया कि कान में पिघला सीसा डालने तक की सजाएं दी जाने लगीं. वह वर्ग जानता था कि जो सत्ता वह चला रहा है, वह दूसरे वर्ग की मूक सहमति पर ही टिकी है. यदि उसकी कमजोरियां सामने आने लगें तो लोग जो संख्या में कहीं अधिक हैं, जिनकी सम्मिलित शक्ति किसी भी राज्य की शक्ति से कहीं अधिक है, बल्कि राज्य को उसकी शक्तियां ही उसके समर्थन से प्राप्त हैं, वे अपनी शक्ति का एहसास कर अल्पसंख्यक सत्ताधारियों को एक झटके में उखाड़ फेंकेंगे. इसलिए उसने लोगों से बोलने का अधिकार ही छीन लिया. वेदों को विमर्श से बाहर निकालकर आप्तग्रंथ बना दिया गया. ताकि उनकी समीक्षा, उनमें दर्ज सामग्री पर संवाद ही न हो सके. वेदों से हुई शुरुआत दूसरे ग्रंथों तक भी पहुंची. अब यदि लोगों को अपने अतीत का स्मरण न हो, तो उससे संवाद करने का सलीका कहां से लाएंगे. और उसपर संदेह न करें तो सांस्कृतिक विकास कैसे होगा. इसलिए पहले सांस्कृतिक दासता की शुरुआत हुई. जिसे बहुत जल्दी राजनीतिक और सामाजिक दासता का रूप दे दिया गया. मानवाधिकार मनुष्य को उस दासता से उबारने की कोशिश हैं, जो सांस्कृतिक गुलामी के कारण जन्मी है. अभिव्यक्ति की आजादी, जो मनुष्य का मौलिक अधिकार है, बंद गुंबद में रोशनदान की तरह है. जिसके माध्यम से गुंबद में रह रहे लोग इंसान होने के एहसास को बचाए रख सकते हैं.

सरकार के होने से हम सब इतने अनुकूलित हैं कि असरकार होने के डर से ही लगता है सबकुछ बिखर जाएगा. इसलिए जब भी चर्चा होती है, सब असरदार सरकार की मांग करने लगते हैं. ‘सरकार’ समाज के बारे में सोचते हुए भी घबराते हैं. और सरकार है कि उसमें बैठे लोग केवल उतनी ही आजादी लोगों को देना चाहते हैं, जितनी से उनकी सत्ता बनी रहे. आखिर कुछ ऐसे लोग भी चाहिए जिनके माध्यम से अभिजातपन को दर्शाया जा सके. लोग इस बनावटी विभाजन को अकाट्य सच मान लेते हैं, इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे वरदान भी उसका भला नहीं कर पाते. यूं भी ऐसी आजादी का कोई अभिप्राय नहीं जिसका लोग लाभ न उठा सकें. क्योंकि जिन लोगों ने अभिव्यक्ति की आजादी का समर्थन किया, वे अभिव्यक्ति को कुंद करने का माध्यम भी ले आए. देखते ही देखते ज्ञान को सूचनाओं में बदल दिया गया. परीक्षाएं वस्तुनिष्ठ आधार पर ली जाने लगीं. स्मृति को कुंद करने के लिए मोबाइल आया. भाषा को कुंद करने के लिए एसएमएस, और सस्ते मनोरंजन को बढ़ावा देने के लिए वाटअप. विकास का अभिप्राय साफसुथरी सड़क और नागरिक सुविधाओं तक सिमट गया. घर के भीतर मनुष्य कैसा जीवन जीता है, उसकी रसोई में पक रहा भोजन पौष्टिक हैं भी या नहीं—इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता ही नहीं रही. जब अभिव्यक्ति कला का बोध ही न हो तो अभिव्यक्ति ही आजादी का मतलब क्या! अभिव्यक्ति की अधकचरी कला प्रदूषित अभिव्यक्ति के मायने ही बदल देती है.ऐसे लोगों को मतदान के बहाने आसानी से फुसला जा सकता है. धर्म, जाति और क्षेत्रीयता के प्रलोभन उसको मूल मुद्दों से भटकाए रहते हैं. लोगों का अभिव्यक्ति का अधिकार सुरक्षित रहे, जरूरी है. पर उतना ही जरूरी है अभिव्यक्ति कला का परिमार्जन. जिसकी समझ इतिहास, संस्कृति और ज्ञान के अधुनातन रूपों को समझे बिना असंभव है.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को आधुनिक कानून की विशेषता माना जाता है. नवसभ्यता का प्रतीक. यहां सरकार का आशय हर उस वर्ग से है जो शीर्ष पर विराजमान होकर दूसरों को निर्देश देता है. उसमें पक्ष और विपक्ष में मौजूद सभी नेता, अधिकारी आदि सम्मिलित हैं, जो उत्पादन में सीधे हिस्सा न लेकर समाज के दूसरे के श्रमकौशल पर निर्भर रहते हैं. समाज मुख्यतः शासक और शासित में बंटा होता है. सत्ता हमेशा शासकवर्ग के अधीन होती है, जो कभी पक्ष तो कभी विपक्ष में रहकर उसका लाभ उठाता है. अतएव अभिव्यक्ति की आजादी केवल सरकार के भरोसे संभव नहीं. सरकार अपने विरोध को विद्रोह की तरह लेती है. ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जब अभिव्यक्ति के लिए सरकार का कोपभाजन बनना पड़ा है. कुछ महीने पहले अरुंधति राय और बाद में प्रशांत भूषण ने सरकार की कश्मीरी नीति की आलोचना कर दी थी. सरकार तो चुप्पी साधे रही, लेकिन तथाकथित राष्ट्रवादियों को उनका बयान बेहद नागवार गुजरा था. जैसे अरुंधति और प्रशांत भूषण इतने शक्तिशाली हों कि उनके कहनेभर से कश्मीर पाकिस्तान के हाथों में चला जाएगा. इस पर वे लोग विशेष तौर पर नाराज थे, जो राष्ट्र को जड़ अवधारणा मानते हैं. यहां मामला अरुंधति राय या प्रशांत भूषण के अलगअलग बयानों के औचित्य का बिलकुल नहीं है. मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति ऐसे समाज के दृष्टिकोण का है, जो लोकतांत्रिक होने का दावा करता है और नियमित अंतराल के बाद अपने प्रतिनिधि चुनकर सरकार बनाता है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र प्राणवायु है. उसके न रहने से लोकतंत्र के निष्प्राण होने से कोई नहीं रोक सकता. लोकतांत्रिक समाजों से यह अपेक्षा तो की जाती ही है कि वे व्यक्ति के वाक् को नियंत्रण मुक्त रखें. मनुष्य यदि विवेकशील प्राणी है तो उसके विचारों का सम्मान होना चाहिए. किसी व्यक्ति की टिप्पणीमात्र से यदि किसी समाज की भावनाएं आहत होती हैं और वह उस व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ही सवाल खड़े करने लगता है तो मानना चाहिए कि उस समाज ने खुद को लोकतांत्रिक आदर्शों के अनुरूप ढालने में अभी देर है. ऐसे समाज में लोकतांत्रिक पद्धति पर चुनी गई सरकारें भी किसी न किसी दृष्टि से कमजोर होंगी ही.

सरकार सभ्य समाज की अनिवार्य बुराई, एक खर्चीला आयोजन है. लेकिन सच यह भी है कि बिना सरकार के आधुनिक समाज का काम सधने वाला नहीं है. इसलिए कि नहीं कि सरकार समाज की अपरिहार्यता है. बल्कि इसलिए कि समाजों में जिस तरह नागरिकताबोध का तेजी से पतन हुआ है, जिस तरह से लोग एकदूसरे की ओर संदेह से देखने लगे हैं, सार्वजनिक जीवन जिस तरह अविश्वास ने जगह घेर ली और विकास के नाम पर जो सैंकड़ों किस्म की संस्थाएं खड़ी की गई हैं, उन पर नियंत्रण और तालमेल बनाए रखने के लिए एक बड़ी संस्था की जरूरत है. सामंतवादी व्यवस्था में शीर्षस्थ वर्ग न केवल संसाधनों को कब्जाए रहता है, बल्कि लोगों के दिलों पर भी अधिकार कर लेता है. वे मन और विचारों से पंगु हो जाते हैं. दूसरों का हित तो दूर वे अपने हितानुकूल निर्णय कर पाने में भी असमर्थ होते हैं. ऐसे लोग केवल सिर झुकाकर आदेश मानने को बाध्य होते हैं. यानी लोगों की शासित होने की इच्छा ने सरकार को अपरिहार्य बनाया है. उन लोगों ने बनाया है जो छोटीछोटी बातों के लिए सरकार का मुंह देखते रखते हैं. जो अपने दरवाजे के ठीक सामने बने गड्ढे को भरने से इसलिए मुंह मोड़ लेते हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि वह जमीन नगर पालिका की है. जैसे नगरपालिका उनकी अपनी संस्था न होकर ऊपर से थोपी गई संस्था हो. ऐसे लोग जो मामूली कार्यों के लिए भी सरकार का मुंह ताकते रहते हैं, वही उसकी उपस्थिति को अनिवार्य बनाते हैं. वरना बाहरी दुश्मनों से सुरक्षा और विदेशनीति के अलावा ऐसा कोई कारण नहीं है, जो सरकार के औचित्य की अनिवार्यता सिद्ध करता हो. आपाधापी के बीच लोग अपना धर्म भूल जाते हैं, व्यक्तिस्वातंत्र्य के वास्तविक अर्थ को भूल जाते हैं, यह भूल जाते हैं कि उनकी स्वतंत्रता या सुख पड़ोसी की स्वतंत्रता और सुख से अलग नहीं है, इसलिए वे सरकार नामक संस्था का औचित्य गढ़ते हैं. एकदूसरे को संदेह की निगाह से देखने के स्वभाव ने ही सरकार की अनिवार्यता सिद्ध की है.

विज्ञान और आधुनिक तकनीक ने व्यक्ति को जितना शक्तिशाली बनाया है, उससे लगता है कि उसके आगे कोई सीमा और मर्यादा है ही नहीं. मानवीकरण के नाम पर विकसित अनेक आधुनिक सुविधाएं अमानवीकरण की कोशिश करती नजर आती हैं. ऐसा नहीं है कि ऐसी तकनीक का कोई समाजार्थिक महत्त्व न हो. तकनीक ने मानवजीवन को सुविधामय बनाने के लिए अनेक विलक्षण काम किए हैं. उसके मनुष्यता पर अनेकानेक अहसान हैं. उसमें विपुल संभावनाएं हैं. इसलिए तकनीक के लोकहितकारी उपयोग पर जोर दिया जाना चाहिए. नई तकनीक की खोज भी आवश्यक है. लेकिन लेकिन तकनीक के विशुद्ध व्यावसायिक रूप ने मनुष्यता को नुकसान भी बहुत पहुंचाया है. इसलिए समय आ पहुंचा है कि हम अपने जीवन में तकनीक की सीमा निर्धारित करें. उसके उपयोग की दिशा पर नियंत्रण रखें. अपने वैज्ञानिकों और उत्पादकों को बताएं कि वे हमारे लिए नवीन तकनीक के किस प्रकल्प पर काम करें? उनके शोध की दिशा क्या हो? यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो एक जागरूक नागरिक और समाज के रूप में हम क्या कर सकते हैं, वह उन्हें समझाएं. यह कार्य सरकार को करना चाहिए. वह नहीं करती. या कर नहीं पाती. दरअसल सभ्यताकरण के नाम पर जो भारीभरकम तामझाम सरकार का बन चुका है, उसे चलाने कके लिए पैसा चाहिए. हर पांचवे वर्ष नेताओं को चुनाव में उतरना पड़ता है, उसके लिए पैसा चाहिए. और पैसा कमाने का सरकार की निगाह में सबसे आसान तरीका कराधान का है. जिसका बड़ा हिस्सा उद्यमियों और पूंजीपतियों की ओर से आता है. सरकार को पैसा चाहिए. उद्योगपतियों को मुनाफा. ऐसे में पूंजीपति यह शर्त थोपने में कामयाब हो जाते हैं कि पैसा चाहिए तो हमें निर्बंध काम करने की अनुमति दी जाए. यही होता है. सरकार एडम स्मिथ के ‘लेजेज फेयर’ का अनुसरण करने लगती है. बदले में पूंजीपतियों की ओर से पैसा आता है. हालांकि यह बड़ा भ्रम है. अपनी स्थिति और पहुंच का लाभ उठाते हुए पूंजीपति केवल उसका श्रेय ले जाता है. सच तो यह है कि सरकार के साथसाथ पूंजीपति का खजाना भी जनता की खूनपसीने की कमाई से भरता है. बहरहाल, सरकार को अपने समर्थन में देख पूंजीपति और पैसा कमाना चाहते हैं. उनकी सहूलियत के लिए सरकार कुछ ऐसी नई संस्थाओं का गठन करती है, जिससे उनकी राह आसान हो सके. परिणामस्वरूप पूंजीपतियों का मुनाफा बढ़ता है और वे फिर नई शर्तें थोपने, कुछ और आजादी की मांग करने लग जाते हैं. धीरेधीरे जो संस्थाएं सरकार ने खड़ी की थीं, वे पूंजीपतियों का मुनाफा कमाने का माध्यम बन जाती है. जैसे कि शिक्षा मनुष्य का मौलिक अधिकार है. इसलिए वह सभी को बराबर, एक समान मिलनी चाहिए. लेकिन हालात ऐसे नहीं हैं. प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में ही एक ओर ऐसी पाठशालाएं हैं, जहां बिछाने के लिए टाट तक नहीं हैं. दूसरी ओर वातानुकूलित कमरों से बने, आलीशान कान्वेंट स्कूल हैं. यह विषमता सड़क, यातायात, मनोरंजन हर जगह देखी जा सकती है. यहां तक कि अदालतें भी पीछे नहीं हैं. पूंजीपतियों के समर्थन और पैसे बनी सरकार को उन्हें मनमर्जी करने की छूट देनी ही पड़ती है. अब पूंजीपति हैं तो किसी एक तकनीक से भला क्यों संतुष्ट होंगे. वे हर उस क्षेत्र पर छा जाना चाहते हैं, जहां से उन्हें मुनाफे की उम्मीद हो. उनका बस चले तो आदमी सांसों का व्यापार भी करने लगें. असल में तो वे ऐसा करते भी हैं. अत्याधुनिक पूंजी के दम पर बने अस्पतालों को देख लीजिए. वहां ऐसा ही होता है. जिसके पास खर्च करने को है. एक साथ कई डा॓क्टर उसकी सांसों की गिनते करने में जुटे रहते हैं. ऐसी जिंदगियां जो सांसों की कीमत का भुगतान करने में नाकाम हैं, वे अस्पताल के बाहर भीड़ भरे चौराहों पर दम तोड़ लेती हैं. बाजार में बढ़ रही सुविधाओं तथा उन्हें एक झटके में बटोर लेने की चाहत ने आदमी को संवेदनहीन बनाया है. मानवकल्याण से जुड़ा प्रत्येक क्षेत्र जो कहीं न कहीं मानवाधिकार का मसला भी है, कई खानों में बंटा हुआ है. यदि गौर देखा जाए तो वे सब पूंजीपतियों के मुनाफा कमाने के रास्ते हैं. सरकार की मजबूरी है कि लोकतंत्र के कारण उसे जनता पर निर्भर रहना पड़ता है. विकास का दिखावा करना पड़ता है. इसलिए वह जबतब लोककल्याण कार्यक्रमों का दिखावा करती रहती है. मगर हालात में वास्तविक परिवर्तन हो नहीं पाता. सरकार संवेदनहीनता को बनाए रखने का भी कोई प्रयास नहीं कर पाती. वह आदमी को निस्संवेद भीड़ में बदलने के लिए प्रयासरत होती है.

इन कमजोरियों के बावजूद सरकार यदि जरूरी है तो सोचना होगा कि कौनसी सरकारें ज्यादा हितकारी है. वे कौनसी सरकार हैं, जिनके रहते मनुष्य अधिकतम स्वतंत्रता, सुख और सुरक्षा की प्राप्ति कर सकता है? सभ्यता के आरंभ से लेकर आज तक सरकार के अनेक रूप अपनाए जा चुके हैं. ऐसा दौर भी देखा गया है कि जब एक ही युग में विभिन्न देशों में सरकार के अलगअलग रूप रहे हैं. कुछ देशों में मिश्रित सरकार के प्रयोग हुए. लेकिन वह नाकाम सिद्ध हुए. सरकार की यानी अच्छी सरकार के बारे में कहा गया है कि सरकार जो कम से कम शासन करे. इसका एक अर्थ यह भी है कि सर्वोत्तम सरकार न्यूनतम शासन करती है. वह शासन करने जैसी स्थिति बनने नहीं देती. अपने आचरण की नैतिकता का उदाहरण पेश कर वह अपने नागरिकों का नैतिक स्तर इतना ऊपर उठा देती है कि उन्हें किसी बाहरी शासन की आवश्यकता ही नहीं पड़ती. पर न्यूनतम शासन कह देना आसान है, उस स्थिति को प्राप्त करना बहुत ही कठिन. आखिर सत्ता और संपत्ति को नापसंद कौन करता है. समाज में होड़ मची हो तो आगे निकलकर दूसरों से विशिष्ट दिखने के लिए सत्ता और संपत्ति दोनों की प्रमुख भूमिका होती है. दरअसल हमारी यह मानसिकता दर्शाती है कि हम अच्छी सरकार चाहते ही नहीं हैं. हमारा खुद से मनुष्यता से विश्वास उठ चुका है. हम सुधार की उम्मीद छोड़ चुके हैं. और अब हालात यह हैं कि हमारा आलस्य और लापरवाही हम पर भारी पड़ने लगी है. इसलिए चुनावों के बाद हमारे यहां चेहरे बदलते हैं. कभीकभी पुराने चेहरे ही मुखौटा लगाकर हाजिर हो जाते हैं. वास्तविक सत्ता परिवर्तन कभी हो नहीं पाता. फिर भी यदि इस सत्य को हम समझने लगे हैं, यदि हम जानने लगे हैं कि लोकतंत्र को भीड़तंत्र या कुलीनतंत्र में बदलत़े हुए देखने के लिए हम भी उतने ही जिम्मेदार हैं, तो भूलसुधार जैसी कोशिश की जा सकती है. की जानी चाहिए.

यदि हम इस सत्य को जानने लगे हैं कि अच्छी सरकार वह है जो कम से कम शासन करती है, तो इसका सीधासा अभिप्राय है कि अच्छी सरकार वह है जो अपने नागरिकों को स्वयं शासित बनाने, आत्मानुशासन में ढालने का संकल्प धारण कर चुप नहीं बैठ जाती. बल्कि निरंतर प्रयासरत रहती है. वह जानती है कि यदि नागरिक आत्मानुशासित होंगे तो उन्हें किसी प्रकार के बाह्यानुशासन की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी. लेकिन यह अनुशासन पीटी के अध्यापक द्वारा अनुशासन शब्द बोलना और भागीदारों का एक खास मुद्रा में आ जाना नहीं है. अनुशासन शब्द व्यापक है. वह मर्यादित भोग और संतुलित वितरण में सहयोग तक जाता है. यह आत्मसम्मान के साथ दूसरे के मान को सुरक्षित बनाए रखने का मामला भी है. यह जियो और जीने दो की भावना है. यह कोई नई समस्या नहीं है. मनुष्य इस समस्या से शताब्दियों से जूझता आया है. सफलता भी मिली है. परंतु तभी तक जब तक इंसान खुद जागरूक रहा है, जब तक उसने अपना नियंता स्वयं को माना है. जैसे ही वह लापरवाह हुआ, मानसिक और शारीरिक आलस्य ने उसे घेरा है—सत्ताओं पर स्वार्थी वर्गों के सवार होते देर नहीं लगी है. जब सरकार का वर्तमान स्वरूप नहीं था, सोचा गया था कि धर्म की सहायता से लोगों को पारलौकिक सत्ता का डर दिखाकर अनुशासन में रखा जाए. अतिरिक्त धनसंपदा मनुष्य के मन में लालच बढ़ाती है, इसलिए अपरिग्रह, अस्तेय, संतोष आदि को प्रत्येक धर्म ने अपना ध्येय माना. धर्म के साथ दूसरे नैतिक मूल्य भी जोड़े गए. फलस्वरूप धर्म शताब्दियों तक मनुष्य का नैतिक और सामाजिक मार्गदर्शक बना रहा. आदमी थोड़ा निश्चिंत हुआ तो धर्म के नाम पर धड़े बनने लगे. मंदिरों में सोने की मूर्तियां आकर सजने लगीं. और जिस व्यक्ति को मानव समाज ने अपना राजा बनाया था, वह स्वयं को ईश्वरीय प्रतिनिधि बताकर अपने लिए विशिष्ट अधिकारों की मांग करने लगा. ऐसे में व्यवस्था का लंबे समय तक टिके रहना और निर्णायक प्रेरणा शक्ति बने रहना असंभव था. लेकिन मनुष्य के चेतने में देर हो चुकी थी. समाज तब तक आर्थिकसामाजिक आधार पर बंट चुका था. शासक और शासित संस्कृति का अंतर साफ नजर आने लगा था. चूंकि शासक वर्ग दूसरों से अधिक साधनसंपन्न था, तथा बाकी लोग आर्थिकराजनीतिक रूप से उसपर निर्भर थे, इसलिए उनसे प्रेरित होना, उनके आदेश को मानना उनकी विवशता थी. यानी धर्म जो स्वयं नैतिकता का प्रवत्र्तन करने निकला था, जिसने स्वयं को आचार संहिता गढ़ी थी, वह भ्रष्ट, स्वार्थी धर्माचारियों के कारण विचलन का शिकार होने लगा. धर्म की बढ़ती ताकत देख कालांतर में राजसत्ता को स्वयं उसके करीब आना पड़ा. राजनीतिकधार्मिक सत्ता के गठजोड़ ने आम आदमी की स्वाधीनता को धीरेधीरे छीनना आरंभ किया. अब वह धर्म और राजनीति के नाम पर नाटक करने लगा. इससे निपटने के प्रयास भी हुए. दरअसल धर्मसत्ता के प्रवत्र्तकों की नीति संकट के समय कछुए की भांति अपने शरीर को समेट लेने और अवसर मिलते ही बिच्छु की तरह झपटकर डंक मार देने की रही है. कहा जा सकता है कि धर्म की प्रवृत्ति जहां आत्म को मजबूत, सक्षम और सहृदय बनाने की होनी चाहिए, बजाय इसके उसने लोकपरलोक, पापपुण्य, स्वर्गनर्क जैसी निराधार संकल्पनाओं द्वारा मनुष्य को निरंतर कमजोर बनाया है.

सरकार जो कम से कम शासन कर सकती है, वही हो सकती है जो नागरिकों को विवेकवान बनने, उन्हें आपसी तालमेल और विश्वास द्वारा आगे बढ़ने का पूरापूरा अवसर देती हो. इसके लिए समाज में स्पर्धा का लोप आवश्यक है. यह तभी संभव है जब उत्पादन राज्य की जरूरत के आधार पर तय किया जाए और प्रत्येक व्यक्ति को आगे बढ़ने के समान अवसर प्राप्त हों. इसके लिए समानता आधारित व्यवस्था चाहिए. यह सही है कि प्रत्येक मनुष्य की कुछ चारित्रिक भिन्नताएं होती हैं. यह संभव नहीं है कि प्रत्येक मनुष्य को एक ही ढांचे में ढाला जाए. विविधवर्णी समाज के लिए भी यह उचित भी नहीं है. लेकिन मनुष्य को यह तोष होना चाहिए कि उसने जो काम किया है, उसका प्रतिफल उसको प्राप्त हो चुका है. साथसाथ यह विश्वास भी जरूरी है कि आगे जो भी कामना करता है, उसको न्यायपूर्ण रास्ते पर चलकर पाया जा सकता है. इस कार्य में समाज उसका प्रतिद्विंद्वी न होकर सहयोगी है. दूसरे शब्दों में मनुष्य का अपनी समाजव्यवस्था पर भरोसा होना अनिवार्य है. यदि ऐसा न हो वह उन रास्तों का अनुसरण करने की सोचेगा, जो समाज के वृहद हितों को नुकसान पहुंचाने वाले हों.

अब जरा आधुनिक लोकतांत्रिक प्रणाली पर भी विचार करके देखा जाए. यह माना जाने लगा है कि लोकतांत्रिक समाजवाद शासन की सर्वोत्तम प्रणाली है. फुकोयामा जैसे चिंतक मानते है कि यह मानवीय मेधा का चरम है. इसके बाद इतिहास का अंत स्वाभाविक है. इसलिए वे विचारधारा के अंत की घोषणा भी करने लगे हैं. यह बुद्धिजीवी हताशा की घोषणा है. एक तरह से ये उस बाजारवादी मानसिकता को संतुष्ट करते हैं, जो निद्र्वंद्व उपभोग के लिए मनुष्य को विचार से एकदम काट देना चाहते हैं. करीब डेढ़ शताब्दी पहले नीत्शे ने भी ईश्वर के अंत की घोषणा की थी—‘ईश्वर मर चुका है, हमने उसकी हत्या की है.’—नीत्शे ने जिन दिनों यह कहा, वह विकृत पूंजीवाद का युग था. जिसके विरोध में दुनियाभर में बौद्धिक आंदोलन खड़े हो रहे थे. नीत्शे ने शायद सोचा था कि उत्पादन व्यवस्था की क्रांति मनुष्य के चिंतनस्तर में वास्तविक सुधार करेगी. फलस्वरूप वह धर्म, संप्रदाय जैसे प्रलोभनों तथा तज्जनित भीरूताओं के चंगुल से बाहर आने में सक्षम होगा. मगर हुआ बिलकुल उल्टा. जिस धर्म से पूंजीवाद को खतरा महसूस होता था, जिसे वह अपने अबाध विस्तार में सबसे बड़ा रोड़ा मानता था, पूंजीवाद के विरुद्ध विचारकों की लड़ाई में वही सबसे ज्यादा सहायक सिद्ध हुआ. लेकिन भारत में तथा अन्य देशों में लोकतंत्र के नाम पर जो क्षेत्रीयतावाद, जातिवाद, भाषासंस्कृति, धर्म आदि का विभेदकारी खेल खेला जाता है, क्या वह उचित है? जो लोकतंत्र अपने विरोध को आत्मसात करने सामथ्र्य खो बैठा हो, जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संसद के गलियारों से बाहर जाते ही दम तोड़ देता हो, क्या वह देश सही अर्थ में लोकतंत्र कहा जा सकता है? जिस देश का मीडिया पूंजीपतियों के हितों का संरक्षक हो, उन्हीं की भाषा बोलता हो. उन्हीं के समर्थन में दिनरात काम करता हो, वहां निष्पक्ष प्रेस से क्या कोई उम्मीद की जा सकती है? दरअसल लोकतंत्र एक चेतन समाज की अभिव्यक्ति है. यदि समाज में पर्याप्त लोकतांत्रिक चेतना हो, तो राजनीति हो या प्रेस, सचाई से विचलन आसान नहीं रह जाता. लोकतंत्र की कमजोरी यह है कि वह व्यक्ति को राजनीतिक अधिकार तो देता है, किंतु उन्हें समानता के स्तर पर लाने का कार्य नागरिकों के भरोसे छोड़ देता है. पर्याप्त नागरिक चेतना के अभाव में लोकतंत्र में नेता अपने नागरिकों को आकर्षित करने के लिए ऐसे मुद्दे उछालने तथा उनका राजनीतिक लाभ उठाने में सफल हो जाते हैं, जिनका उनके विकास से कोई लेनादेना नहीं होता. इसे वे लोकप्रिय राजनीति की मजबूरियां बताकर मीडिया भी कमोबेश मान्य ठहरा देता है.

लोकतंत्र एक चेतन समाज का दर्शन है. यदि समाज में पर्याप्त लोकतांत्रिक चेतना न हो तो उसका कोई अर्थ ही नहीं रह जाता. लोकतंत्र की कमजोरी यह है कि वह व्यक्ति को समान अधिकार तो देता है, परंतु उसको समानता के स्तर पर लाने की जरूरत को बिसरा देता है. अथवा उसकी ओर ध्यान ही नहीं देता. या फिर उस काम को समय के भरोसे छोड़कर निश्चिंत हो जाता है. पर्याप्त नागरिक चेतना के अभाव में लोकतंत्र में नेता अपने नागरिकों को आकर्षित करने के लिए ऐसे मुद्दे उछालने आरंभ कर देते हैं, जिनका उनके जीवन और उसकी समस्याओं से कोई सीधा संबंध नहीं होता. लोकतंत्र में इस प्रकार के मुद्दे राजनीतिक लाभ के लिए, प्रायः धर्म और मीडिया के क्षेत्र में कार्यरत शक्तियों की सहायता से तैयार किए जाते हैं. इसका दुष्परिणाम यह होता है कि जनता अपने नेता के नैतिक आभामंडल तथा अन्य सद्गुणों के अभाव में जाति, धर्म, क्षेत्रीयता आदि को देखकर निर्णय लेने लगती है. चूंकि लोकलुभावन राजनीति के चालू तरीके खर्चीले भी होते हैं, इसलिए चुनावों में अधिक धन खर्च करने वाले व्यक्ति को उसका लाभ भी मिलता है. लोकतंत्र को लेकर यह डर आज का नहीं है. बल्कि उस समय से है जब इस व्यवस्था का जन्म ही हुआ था. करीब ढाई हजार वर्ष पहले सुकरात ने लोकतंत्र को बहुसंख्यक वर्ग की मनमानी का तंत्र कहकर उसकी आलोचना की थी. प्लेटो ने तो अपनी महान कृति ‘रिपब्लिक’ में अनेक पन्ने लोकतंत्र की आलोचना में काले किए थे. उसके अनुसार लोकतंत्र कालांतर में निरंकुश तंत्र में बदल जाता है. यह उसकी स्वाभाविक परिणति है.

प्लेटो ने विकल्प के रूप में दार्शनिक सम्राट का सुझाव दिया था. दार्शनिक सम्राट के रूप में प्लेटो की कल्पना अपने आप में खोए रखने, शासन और दुनियादारी की ओर से बेफिक्र रहने वाले आत्मलीन मुनि जैसी नहीं थी. दार्शनिक सम्राट से उसका आशय सद्गुणों से संपन्न साहसी, वीर, निडर, शांतिप्रिय, बुद्धिमान, ईमानदार, न्यायपरक, सहिष्णु, निष्पक्ष, मनुष्यता के उदात्त गुणों से संपन्न तेजोमय शासक से था. ऐसा व्यक्ति जो न केवल शांतिकाल में राज्य को विकास के शिखर पर पहुंचा सके, बल्कि युद्धकाल में सीधे समर में उतर कर दुश्मन को नाकों चने चबवा सके. प्लेटो की ऐसी ही परिकल्पना थी. प्लेटो का दार्शनिक सम्राट ऐसा उदात्त व्यक्तित्व था, जो प्रत्येक क्षेत्र में सर्वोत्तम हो. मोह, माया, लालच और स्वार्थ से दूर, ऐसा व्यक्ति जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में श्रेष्ठतम हो. दार्शनिक सम्राट की गरिमा भी उसको एकाएक नहीं मिल जाती. उसके लिए प्लेटो ने पूरा विधान तैयार किया था, जिसमें उच्चतम शिक्षा, देशसेवा से लेकर अनिवार्य सैन्य सेवा भी सम्मिलित हैं. कठिन परिश्रम, स्वाध्याय, उम्र के लंबे अनुभव के बाद ही व्यक्ति इन कसौटियों पर खरा उतर सकता है. आयु की मर्यादा विलक्षण प्रतिभाशाली पर लागू नहीं होती. भारत में प्राचीन यायावर मुनियों के रूप में हमें ऐसी ही प्रतिभाओं के बारे में सुनने को मिलता है. लेकिन भारतीय मुनियों और आश्रम व्यवस्था तथा प्लेटो के दार्शनिक की संकल्पना में मूल अंतर है. यह कि प्लेटो के आदर्श समाज में वंश परंपरा के लिए कोई स्थान नहीं है. बल्कि वहां व्यक्ति के निजी संबंध और भावनाओं को भी उपेक्षित रखा जाता है. प्लेटो सामूहिक जीवन की वकालत करता था. इसके लिए दार्शनिक समेत सभी नागरिकों को साझा छत के नीचे सोना, एक जैसा भोजन करना, एक समान जीवनस्तर अपनाना अनिवार्य था. उसने सोनेचांदी के उपयोग को वज्र्य माना है. निजी संपत्ति को वह एक सीमा के बाद नकार देता है. साझा जीवन की प्लेटो की संकल्पना आगे चलकर पत्नियों में साझेदारी तक विस्तार ले जाती है. समानता के विचार के लिए कभीकभी वह अति की सीमा को पार करता नजर आता है. विशेषकर उस समय वह जब वह काम संबंधों को मर्यादित करने की सोचता है. उसके आदर्श राज्य में मनुष्य के भावनात्मक संवेगों के लिए कोई स्थान नहीं था. उसने व्यवस्था की थी कि बच्चों का लालनपालन इस प्रकार किया जाना चाहिए कि मातापिता और उनकी संतान एकदूसरे को पहचान न सकें. बच्चे समाज की जिम्मेदारी हैं और उसी का भविष्य. इसलिए बच्चों के लालनपालन की जिम्मेदारी अभिभावक होने के नाते हमारी भी है. संतानोत्पत्ति राजकीय धर्म है. योग्य संतान जन्म ले सके, इसके लिए प्लेटो ने विशेष अवसर पर स्वस्थ्य एवं बुद्धिमान स्त्रीपुरुष के जोड़ों को परस्पर मिलने, संतानोत्पत्ति के लिए समागम करने की अनुशंसा की है. प्लेटो की सहजीवन के प्रति सिफारिशें इतनी अधिक हैं कि वर्तमान समय में वे हमें अवास्तविक लगने लगती हैं. इसी के साथ उसका आदर्श राज्य का सपना भी वायवी बन जाता है. प्लेटो को अपने देश एथेंस से प्यार था, मगर वह स्पार्टा की योद्धा संस्कृति से बेहद प्रभावित था. स्पार्टा के हाथों एथेंस की पराजय की स्मृतियां उनके दिलोदिमाग पर थी. अत्यंत प्रतिभाशाली होने के साथ वह स्वयं बेहद सुंदर और शरीर सौष्ठव में दूसरों से आगे था. उसके व्यक्तित्व की यही खूबियां दार्शनिक सम्राट की परिकल्पना पर प्रभावी हैं. जीवन में शुभत्व की प्रतिष्ठा हेतु, प्लेटो की निष्ठा संदेह से परे है. इस बात को संभवतः प्लेटो भी समझता था. इसलिए अपनी आरंभिक कृतियों में दार्शनिक सम्राट का समर्थन करनेवाला प्लेटो अपने जीवन के उत्तरकाल में दार्शनिक मंडल को राज्य की बागडोर सौंपे जाने की सिफारिश करने लगता है.

दार्शनिक मंडल से प्लेटो का अभिप्राय समाज के निर्वाचित व्यक्तियों को सौंपे जाने से था. प्लेटो की दार्शनिक की परिभाषा, व्यापक संदर्भ लिए हुए है. उसके अनुसार दार्शनिक वह है जो विलक्षण मेधावी, प्रतिभासंपन्न अपरिग्रही, उदार, सत्यनिष्ठ, उच्च शिक्षित, अध्येता, तर्क शास्त्री, तर्कशास्त्री, उदारचेता है. अपनेअपने क्षेत्रों मंे निपुण और परंगत हैं. लोकतंत्र में भी जनप्रतिनिधि से अपेक्षा पर सकती है कि वह उदार, परमविद्वान, सत्यनिष्ठ, वीर, साहसी और नेतृत्वकला में निपुण हो. व्यवहार शास्त्र में उसके प्रवीणता हासिल हो. लोकतंत्र में भी जनप्रतिनिधि से यह अपेक्षा की जाती है कि वह उपर्युक्त कसौटियों पर खरा उतरता हो. चूंकि एकल व्यक्ति कभी भी निरंकुश हो सकता है, इसलिए राज्य के भले के लिए आवश्यक है कि एकाधिक व्यक्तियों को शासनाधिकार सौंपे जाएं. तथा सम्मिलित राय से शासन चलाया जाए. उनका एक मुखिया जरूर हो, मगर वह दूसरों की राय का प्रतिनिधित्व करे. मनमानी करने से बचे. उसको मनमानी से रोकने के लिए जनता के पास पर्याप्त अधिकार हों. प्लेटो के दार्शनिक मंडल की परिणति एक आधुनिक संसदीय लोकतंत्र के रूप में देख सकते हैं. संसद के लिए निर्वाचित लोक प्रतिनिधियों से अपेक्षा की जाती है कि गुणी, बुद्धिमान, तथा ईमानदार हों. उन्हें अपने राष्ट्र एवं क्षेत्र की समस्याओं की समझ हो. वे कुशल वक्ता तथा विवेकवान हों. ताकि जनप्रतिनिधियों के बीच अपनी बात को सलीके और सिलसिलेवार ढंग से प्रस्तुत कर सकें. शब्दों के थोड़े ऐरफेर के साथ यही गुण दार्शनिक के भी हैं. प्लेटो का मानना था कि दार्शनिक सम्राट लोकेच्छा को समझने वाला होगा. इसलिए वह अपनी राय जनमानस पर थोपने के बजाय लोगों की इच्छाओं को अधिक महत्त्व देगा. और जैसे जैसे लोग उसे अपनाएंगे, दार्शनिक की इच्छा व्यापक लोकेच्छा का प्रतिनिधित्व करती हुई नजर आएगी. इसलिए कि दार्शनिक के स्तर को प्राप्त करने के बाद वह लौकिक सुखों, मानसम्मान की छिछली आकांक्षाओं, लोभमोह आदि से मुक्त हो चुका होगा. ऐसे व्यक्ति का प्रत्येक निर्णय लोकोन्मुखी होगा.

भारतीय और यूरोप के समाजों में पद्रहवीं शताब्दी बौद्धिक चेतना के विस्तार की थी. धार्मिक पाखंड और रूढि़यों के प्रति जागरूकता की शुरुआत भी इसी दौर में हुई. भारत में कबीर, रैदास, संत ज्ञानेश्वर, आदि भक्त कवियों ने धार्मिक पाखंड का विरोध करते हुए मनुुष्य की आध्यात्मिक जिज्ञासाओं को उर्ध्वगामी बनाने पर जोर दिया. उन्होंने धर्म और शास्त्रीयता के नाम पर पनपे कर्मकांड की भत्र्सना की तथा धार्मिक कुरीतियों के लिए पंडोंमौलवियों को ललकारा. यूरोप में यह काम मार्टिन लूथर ने किया था. दरअसल पंद्रहवींसोलहवीं शताब्दी के जिस दौर की ये घटनाएं हैं, भारतीय संदर्भ में तब की सामाजिक चेतना धार्मिक और सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से मुक्ति की लहर के रूप में पनपी थी. उन संतों, महात्माओं के धर्म के केंद्रीय सत्तावाले चरित्र से कोई शिकायत न थी. बल्कि दीनता के चरम पर जाकर भक्त कवि ईश्वर की अधिसत्ता को और भी पुख्ता रूप दे देते थे. यही दौर था जब पश्चिम में मशीनीकरण की प्रक्रिया के साथसाथ वैचारिक क्रांति ने दस्तक दी. भारत उस समय मुगल साम्राज्य का हिस्सा था. उसकी अर्थव्यवस्था के साधन पुराने थे. इसलिए भारत भक्तिकाल की चेतना को वास्तविक परिवर्तन की दिशा देने में नाकाम सिद्ध हुआ था. जिससे भक्ति आंदोलन की समस्त क्रांतिकारिता गुरुडम, मूर्तिपूजा, कर्मकांड को बढ़ाने वाली सिद्ध हुई. इसके विपरीत पश्चिम में उत्पादन के नवविकसित साधन मध्यवर्ग के उदय के साथ परिवर्तनकारी सिद्ध हुए. उभरती मध्यवर्गीय चेतना ने वहां वयस्क मताधिकार, लोकतंत्र एवं समाजवाद जैसे नए विचारों और आंदोलनों को जन्म दिया. फलस्वरूप वहां नई सभ्यता एवं संस्कृति का विकास संभव हुआ. जिनपर परंपरागत मूल्यों, जो उससे पहले तक समाज का नेतृत्व करते आए थे, का प्रभाव निरंतर क्षीण होता गया.

नई व्यवस्था समाज एवं राजनीति के प्रति नई आलोचना दृष्टि पैदा कर रही थी. खासकर तेजी से उभरते मध्यवर्ग में जो निस्संदेह औद्योगिक क्रांति का सुफल था, वर्गीय चेतना का उदय होता जा रहा था. दरअसल मध्यवर्ग अपने ही भीतर बुरी तरह विभाजित था. भौतिक सुखों के प्रति बढ़ती उसकी लालसाएं एक ओर तो पूंजीपति वर्ग का भरोसेमंद बने रहने को प्रेरित करती थीं, दूसरी ओर श्रमिकों के शोषण, उत्पीड़न में पूंजीपतियों का साथ देने के लिए मजबूर कर देती थीं. इसके पीछे उनके मन में छिपा क्षोभ था, जो सपनों के अनुरूप अपेक्षित आय न होने के कारण जन्मा था. प्रारंभ में गणतांत्रिक अधिकार देश के अभिजात वर्ग को प्राप्त थे. प्लेटों के समय में भी अभिजात उसी को माना जाता था, जो कुलीन हो तथा जिसे न्यूनतम निर्धारित भूमि का स्वामित्व प्राप्त हो. प्लेटो ने हालांकि गणतंत्र की आलोचना की थी, लेकिन मध्यवर्ग को यह विश्वास था कि गणतांत्रिक अधिकार मिलने से उसकी राजनीतिक ताकत में वृद्धि होगी. जो उसके विकास के रास्ते प्रशस्त करेगी. दूसरे शब्दों में वर्गीय शोषण का शिकार रहा मध्यवर्ग अपनी मुक्ति के लिए उसी रास्ते को अपनाना चाहता था, जो वर्गविभाजन के जिम्मेदार था. प्रकारांतर में वही उसके शोषण का कारण भी था. इसलिए आर्थिक समानता से पहले राजनीतिक समानाधिकारिता की मांग जोर पकड़ती गई. उसके लिए पहल चार्टिस्ट आंदोलनकारियों की ओर से की गई. जिनकी मुख्य मांग संसद में सदस्यता हेतु श्रमिकप्रतिनिधियों के लिए न्यूनतम स्थान आरक्षित करने तथा वयस्क मताधिकार को लागू करने की थी.

चार्टिस्ट आंदोलन को व्यापक लोकप्रियता मिली. इसका आकलन करने के लिए मात्र यह उदाहरण पर्याप्त होगा कि अपनी मांग के समर्थन में चार्टिस्ट आंदोलनकारियों द्वारा वर्षों लंबा हस्ताक्षर अभियान चलाया गया, जिसमें वे अपनी मांगों के समर्थन में 60 लाख हस्ताक्षर लेने में कामयाब हुए थे. हालांकि आंदोलनकारियों के इस दावे को आलोचकों ने नकार दिया था. लेकिन चार्टिस्ट आंदोलनकारियों की इस मांग में दम था. हस्ताक्षरों की गिनती के लिए 13 व्यक्ति लगाए गए थे. लगातार 17 घंटे गिनती करने के बाद वे केवल 19 लाख हस्ताक्षर ही गिन पाए थे. आज से लगभग 175 वर्ष पहले यह बहुत बड़ी बात थी. व्यापक जनसमर्थन पाकर चार्टिस्ट आंदोलन बढ़ता गया. इससे ब्रिटिश सरकार का घबरा जाना स्वाभाविक था. आंदोलन को कुचलने के लिए बल प्रयोग का सहारा लिया गया. जिसमें हजारों चार्टिस्टों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया तथा सैकड़ों को स्वैच्छिक मृत्युदंड की सजा मिली. चार्टिस्ट आंदोलन हालांकि नाकाम सिद्ध हुआ, फिर भी चार्टिस्ट आंदोलनकारी को ब्रिटिश संसद में श्रमिक प्रतिनिधियों के लिए स्थान आरक्षित कराने, निर्वाचन प्रणाली में ढील दिए जाने में सफलता मिली थी. विज्ञान और औद्योगिकीकरण से बढ़ती सुविधाएं जहां लोगों के जीवन को अधिक सुखसुविधामय बना रहे थे, वहीं उनके मन में शोषण से मुक्ति की चाह भी जगा रहे थे.

मुक्ति की छटपटाहट पहले धार्मिक सुधारवादी आंदोलन के रूप में हुई थी. धर्म और राजनीति के गठजोड़ ने जहां धर्मसत्ता को मजबूत बनाया था. वहीं सामंती उत्पीड़न को भी बढ़ावा दिया था. अपनी स्थिति को स्पष्ट करने के लिए धार्मिक सत्ताएं लगातार शक्ति बटोर रही थीं. इसके लिए उन्हें सामंतों की शोषणकारी वृत्ति से भी परहेज न था. ये लोग धर्म और शास्त्रों की मनमानी व्याख्या करते थे. वे जनसामान्य को त्याग, संयम तथा भोगविलास से दूर रहने की सीख देने वाले उन मठाधीशों का अपना जीवन विलासिता का प्रतीक था. धर्म के नाम पर संघवाद, पूजा के स्थान पर कर्मकांड समाज में परोसा जाता था. धर्म के नाम पर फैले आडंबर का सबसे पहला विरोध मार्टिन लूथर ने शुरू किया. बाद में जाॅन काॅल्विन ने यह कहते हुए कि सृष्टि में प्रत्येक वस्तु का अस्तित्व मनुष्य की खुशी के लिए है, पहली बार सुख को जीवन के लक्ष्य के रूप में स्वीकारा. उससे पहले सुख की वांछा को हेय मानकर उसकी उपेक्षा का चलन था. सांसारिक सुखों को दुख का कारण, मोहमाया में संलिप्तता की जड़ और मोक्ष की राह में बाधक कहकर नकारा जाता था. जबकि धर्म और राजनीति से प्राप्त ताकत का लाभ उठाकर दूसरा वर्ग विलासितापूर्ण जीवन जीता था. लूथर ने धर्म के आडंबरवाद को ललकारा और उसको लोकोन्मुखी चेहरे को उभारने का काम किया. का॓ल्विन ने उससे भी एक कदम आगे बढ़ते हुए सुख के साथ जुड़ी हीनताग्रंथि को चुनौती दी. उसने जोर देकर कहा कि दुनिया में कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जिसका लक्ष्य आदमी को सुख पहुंचाना न हो.

ये सभी कोशिशें, जनसाधारण को राजनीति और विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए थीं. जो सहòाब्दियों से उपेक्षा और वर्जनाओं का शिकार होता आया था. आम आदमी को वर्जनाओं और निषेधों से बाहर निकालने का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य वाल्तेयर ने किया. मानवीय अस्मिता को विमर्श के केंद्र में लाने का श्रेय उसी को प्राप्त है. वाल्तेयर ने तार्किक शिक्षा पर जोर दिया. असमानताओं के लिए धर्म और संस्कृति को दोषी ठहराया तथा हर उस चुनौती को करारा जवाब दिया, जो उन जड़ताओं का, यथास्थिति का समर्थन करती थी. इसके बावजूद समाज में दास प्रथा कायम रही. सामाजिकआर्थिक असंतुलन बना रहा तो इसलिए कि उस समय तक प्रौद्योगिकीय क्रांति अपने आरंभिक दौर में थी. संसाधनों पर यथास्थितिवादी सामंतवाद वर्ग का कब्जा था. इसके लिए दुनिया को उन्नीसवीं शताब्दी तक प्रतीक्षा करनी पड़ी, जब प्रौद्योगिकीय क्रांति के लाभों के साथसाथ उसके नुकसान भी दुनिया के सामने आने लगे थे. अस्मितावादी आंदोलनों का दूसरा दौर कहा जाए कि निर्णायक दौर सतरहवीं शताब्दी में औद्योगिकीकरण के उभार के दिनों में हुआ. दरअसल उत्पादन बढ़ने से बाजार की समस्याओं में वृद्धि हुई थी. नए बाजारों की खोज में पहले वाणिज्यिक कंपनियों ने बाहर निकलकर अपने आर्थिक उपनिवेश स्थापित किए. फिर उन उपनिवेशों को राजनीति के अधिकार क्षेत्र में लाकर वहां साम्राज्यवादी खेल खेला जाने लगा. मशीनीकरण ने मध्यवर्ग की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि की थी. कालांतर में यही वर्ग सामाजिक बदलाव के लिए नेतृत्वकारी शक्ति बना. हालांकि मध्यवर्गी चेतना प्रायः अपने स्वार्थी मनसूबों के इर्दगिर्द घूमती थी. एक ही समय में इसका एक धड़ा, बल्कि कहना चाहिए कि मजबूत धड़ा, पूंजीवाद के समर्थन में जुटा था; और उसको मजबूती प्रदान करता था. पूंजी के अलावा दूसरी बड़ी ताकत उस वर्ग को मध्यवर्ग से ही मिलती थी. निहित स्वार्थ के लिए दोनों एकदूसरे को बचाए रखना चाहते थे. जबकि मध्यवर्ग का दूसरा धड़ा पूंजीवाद से जूझने के लिए सर्वहारा समाज को एकजुट होने का आह्वान करता था. शोषित वर्ग के भीतर पैठे स्वाभाविक आक्रोश का लाभ उठाकर वह उसके माध्यम से पूंजीवाद को उखाड़ फेंकने के लिए प्रोत्साहित करता था. इस वर्ग का प्रेरणास्रोत वैज्ञानिक क्रांति और नई विचारधारा से प्रभावित बुद्धिजीवी वर्ग था.

चूंकि मशीनीकरण के कारण मध्यवर्ग की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही थी. और अकूत पूंजी और शक्ति संपन्न होते हुए भी शीर्षस्थ वर्ग अपने अनेकानेक कर्तव्यों के पालन के लिए इस वर्ग पर निर्भर था, इसलिए मध्यवर्गी विचारकों की मांग को स्वीकार किए जाने पर जोर दिया जाने लगा. इससे पहले इसी वर्ग के विचारकों ने सुखवाद, उपयोगितावाद, विज्ञानवाद जैसे दार्शनिक विचारों को जन्म दिया था. ये विचारधाराएं इतनी लोकप्रिय हुईं कि उन्नीसवीं शताब्दी को इन्हीं की शती कहा जा सकता है. इस तरह लोकतंत्र की मांग एक प्रकार से समय की की मांग थी. सुखवाद और उपयोगितावाद के बहाने भौतिकवाद का समर्थन करती ये विचारधाराएं प्राचीन विचारधाराओं से कई मायने में भिन्न थीं. सुखवाद सुख को मानवजीवन का लक्ष्य स्वीकारता था. इसका दूसरा संकेत था कि सुख पर सभी मनुष्यों का समानाधिकार है. प्राचीन धर्मकेंद्रित विचारधाराएं सांसारिक सुख को हेय मानकर काल्पनिक सुखों का भरोसा दिलाती थीं. उल्लेखनीय है कि धर्मकेंद्रित विचारधाराएं अपने आप में ही विरोधाभास का शिकार थीं. जिस भोगविलास को वे पारलौकिक सुखों की खातिर हेय बताती थीं, स्वर्ग में उन्हीं का आधिक्य बताया जाता था. वही सुख देवों को अंतहीन मात्रा में उपलब्ध बताकर उन्हें श्रेष्ठ और वरेण्य माना जाता था. इस आधार पर समाज का पुरोहित वर्ग जनसाधारण को बरगलाता था. यह किसी एक देश या धर्म की बात नहीं थी, बल्कि सभी धर्मों का यही हाल था. इस प्रश्न का कि जब अभिजन समाज सांसारिक सुखों के अंतहीन भोग करने पर भी स्वर्ग के अधिकारी बन जाते हैं तो जनसाधारण के लिए वह हेय कैसे हो सकता है—वह जन्मपुनर्जन्म, पापपुण्य और भाग्य की अंतहीन गल्प सुनाने बैठ जाता था. इसी आधार पर चर्च की आलोचना करते हुए का॓ल्विन ने कहा था कि दुनिया की कोई वस्तु ऐसी नहीं है, जो मनुष्य को सुख पहुंचाने के लिए न बनी हो. उससे सुख को हेय मानने वाली प्रवृत्ति कमजोर पड़ने लगी.

भारत में चार्वाक और लोकायत दार्शनिक यही तर्क शताब्दियों से देते आए थे. गौतम बुद्ध के समय में भी आजीवक अजित केशकंबली नाम का संप्रदाय सुख को जीवन का मुख्य लक्ष्य मानता था. लेकिन भारतीय लोकमानस पर पुरोहितवाद इतनी तेजी से हावी रहा कि इस सत्य को स्वीकारने की उसकी कभी हिम्मत न पड़ी. आर्थिक रूप से दूसरों पर आश्रित होने के कारण भी जनसाधारण के लिए यह संभव नहीं था कि वह अपने जीवन को अपने ढंग से निर्धारित कर सके. जबकि पश्चिम में मार्टिन लूथर और काॅल्विन के विचारों का व्यापक प्रभाव पड़ा. अमेरिका में उनके विचारों के आधार पर बस्तियों का निर्माण किया जाने लगा. कालांतर में सुखवाद के आधार पर जिस परिपक्व विचारधारा की नींव रखी गई वह मानवता के करीब थी. सुखवादी विचारधारा के प्रखर चिंतक जा॓न स्टुअर्ट मिल ने सुख की कामना को मानव जीवन का लक्ष्य माना, लेकिन उसका सुख केवल भौतिकता की सीमा से बंधा नहीं था. उसने सुख का मानवीकरण किया था. मिल के अनुसार स्वतंत्रता भी सुख की अनिवार्यता है. क्योंकि वह मानवमन को तोष प्रदान करती है, तभी वह सुख के संसाधनों का आनंदमय भोग कर सकता है. दूसरे शब्दों में सुखवाद और उपयोगितावाद के माध्यम से ये विचारक मनुष्य की शताब्दियों पुरानी मानसिकशारीरिक परतंत्रता से मुक्ति दिलाने के लिए प्रयासरत थे. जनसाधारण को शताब्दियों से कभी धर्म, कभी राष्ट्र तो कभी राज्यभक्ति के नाम पर बांधा जाता रहा है. सुखवाद और उपयोगितावादी विचारधाराएं मनुष्य को उसके मनुष्यत्व से परचाने की कोशिश करती थीं. व्यक्तिस्वातंत्र्य के उभार को आगे चलकर जेफरसन और पेन ने मजबूत आधार दिया. अमेरिकी स्वाधीनता की उद्घोषणा के साथ तो इस विचार को मानो वैश्विक स्वीकृति ही प्राप्त हो चुकी थी.

मिल ने सुखवाद को नैतिकता की उच्चतम अवस्था माना था. सुख की उसकी परिकल्पना केवल भौतिक सुखों तक सीमित न थी. मिल के अनुसार कर्तव्यपालन, नैतिक आचरण, परदुखकातरता भी सुख के पर्याय हैं. क्योंकि इनमें समूचे समाज के सुख की कामना निहित है. उसने कहा था कि अकेले व्यक्ति का सुख, सुख न होकर स्वार्थ है. जिसे समाज की कीमत पर ही स्वीकार किया जा सकता है. यही बात माक्र्स और माओ ने भी कही. माक्र्स ने सुख की समानता को अवसरों की समानता का नाम दिया और साम्यवादी क्रांति का आह्वान यह कहकर किया कि शताब्दियों के शोषण के उपरांत अपना सबकुछ गंवा चुके सर्वहारा वर्ग के पास खोने के लिए कुछ नहीं है. जबकि जीतने के लिए पूरी दुनिया पड़ी है. उसने सर्वहारा क्रांति के माध्यम से मजदूरों का संगठित होकर सत्ता अपने हाथ में ले लेने को कहा. ‘साम्राज्यवाद कागजी बाघ है.’ और ‘जनता ही असली लोहे का दुर्ग.’ जैसी राजनीतिक ललकार देते हुए माओ ने जनता को संगठित विद्रोह के लिए पुकारा. उसने सभी राष्ट्रीय मुक्तियुद्धों को समर्थन दिया. अन्य देशों के क्रान्तिकारी संघर्षों को अपनी सफल क्रांति द्वारा प्रेरित किया और बताया कि भड़क उठने पर ‘एक चिंगारी सारे जंगल में आग लगा सकती है.’ चीनी जनता से आगे बढ़कर सत्तासंविधान को अपने अधिकार में ले लेने के आह्वान के बाद उसने कहा कि आगे बढ़ो और ‘मेहनत तथा किफायत से अपने देश का निर्माण करो.’ उसके कहने पर चीन के मजदूर, किसान और शिल्पकार एकजुट हुए और वहां सफल क्रांति संभव हो सकी. माओ का कहना था कि ‘राज्यसत्ता का जन्म बन्दूक की नाल से होता है.’ माओ के लिए संस्कृति भी उत्पादन की अन्य प्रेरणाओं जैसी थी. सांस्कृतिक क्रांति का आवाह्न करते हुए माओ ने कहा था—‘क्रांति पर पकड़ कायम रखो और उत्पादन को आगे बढ़ाओ.’ वर्गसंघर्ष, उत्पादनसंघर्ष और वैज्ञानिक प्रयोग—इन तीन आंदोलनों द्वारा उसने चीनी जनता में सृजनात्मक उत्साह का विस्फोट किया और सभी मोर्चों पर जबरदस्त उपलब्धियां हासिल कीं. फलस्वरूप वहां उत्पादन में रिकार्डतोड़ वृद्धि हुई, उत्पादनसंबंधों में आशातीत क्रांतिकारी परिवर्तन. क्रांति के बाद विशेषज्ञों और नौकरशाहों के व्यक्तिवादी प्रबंधन का स्थान क्रांतिधर्मा श्रमिक संगठनों के हाथों में पहुंच गया. समाजवादी उत्पादन के उपक्रमों के मा॓डलों— कृषिक्षेत्र में ‘ता चाई’ और उद्योग में ‘ता चिङ’ का जन्म हुआ. क्रांति के स्थायित्व एवं जनचेतना के फैलाव के लिए माक्र्स ने सर्वहारा वर्ग को द्वंद्ववाद की दार्शनिक शिक्षा से लैस किया गया, और यह मौलिक विचार दुनिया के सामने रखा कि मनुष्य के विचार, राजनीति और सामाजिक संस्थाएं उसके उत्पादन के संसाधनों से निर्धारित होते हैं. यह विचार अपने आपमें इतना शक्तिशाली था कि दुनियाभर में उसके आधार पर लोग संगठित होने लगे और एक समय ऐसा आया जब आधी दुनिया की राजनीति मार्क्स के विचारों से निर्धारित होती थी. किसी विचारक की इससे बड़ी उपलब्धि भला और क्या हो सकती है.

मिल ने व्यक्ति को समाज के लिए समर्पित होने की कामना की थी. उसने समाज में उम्मीद व्यक्त की थी कि वह व्यक्तिमात्र की अस्मिता एवं स्वतंत्रता का ध्यान रखेगा. स्त्रीमुक्ति का विचार हालांकि रूसो के समय में ही जोर पकड़ने लगा था. बाद में चाल्र्स फ्यूरियर तथा मिल ने भी उसको शिद्दत के साथ आगे बढ़ाया. लेकिन मिल की असली देन थी, व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता पर जोर देना. देखा जाए तो मिल का व्यक्तिस्वातंत्र्य का विचार रूसो की ‘व्यक्तिमुक्ति’ की भावना का ही विस्तार था. रूसो ने कहा था कि मनुष्य आजाद जन्मा है. लेकिन वह हर जगह बेडि़यों में है. ये बडि़यां धर्म, कानून, समाज आदि किसी की भी हो सकती हैं. व्यक्तिस्वातंत्र्य का विचार हालांकि मानवतावादी अभिकल्पना थी, लेकिन हम आगे देखेंगे कि उसका उपयोग पूंजीवाद द्वारा नितांत स्वार्थी ढंग से, उपभोक्तावाद को विस्तार देने के लिए किया गया. दूसरी ओर व्यक्तिस्वातंत्र्य के विचार के आधार पर ही अत्याधुनिक लोकतंत्र की नींव विकसित हुई. व्यक्तिस्वातंत्र्य ने ही कालांतर में मानवाधिकार और वयस्क मताधिकार जैसे आंदोलनों को जन्म दिया. दूसरे विश्व के बाद आहत मानवता के जख्मों को सहलाने के लिए ब्रिटिश उपनिवेश से बाहर आने वाले देशों ने लोकतंत्र को अपनाया. लेकिन बाजारवाद और पूंजी के दबाव में कुछ ही अर्से में लोकतंत्र ऐसा रूप धारण कर चुका है, जिससे उसके औचित्य पर सवाल उठने लगे हैं.

विचलन का कारण किसी से छिपा नहीं है. लोकतंत्र के अंतर्गत जो निर्वाचन पद्धति अपनाई जाती है, वह अत्यंत महंगी है. जीत के लिए अधिकतम मत प्राप्त करना जरूरी होता है. इसलिए मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए प्रत्याशी ऐसे आयोजन करते रहते हैं, जिनका विकास और राष्ट्र कल्याण से कोई वास्ता नहीं होता. जाति, धर्म, क्षेत्रीयता जैसे संवेगात्मक मुद्दे उठाकर मतदाता को फुसलाया जाता है. ये मतदान प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले सर्वाधिक लोकप्रिय मुद्दे हैं, जिनका वास्तविक विकास और लोककल्याण से कोई वास्ता नहीं होता. अत्यधिक धनराशि लुटाकर राजनीति में वही लोग आते हैं, जिन्हें वहां से और अधिक मिलने की उम्मीद होती है. ऐसे लोगों के लिए राजनीति एक व्यापार होती है, देशसेवा एक बिकाऊ मसाला. जिससे वे अपने व्यापार को चमकाते हैं. ऐसे जनप्रतिनिधियों को पूंजीपति, स्वार्थी धर्माचार्यों के चंगुल में फंसना आसान होता है. इसलिए वे अपने विवेक और लोकहित को ध्यान में रखकर केवल अपनी स्वार्थसिद्धि में जुटे रहते हैं. यह सच है कि सरकार में सभी जनप्रतिनिधि एकसमान नहीं होते. कुछ ऐसे होते हैं, जो वास्तव पद की गरिमा को बढ़ाते हैं, जिनका राजनीति में आना एक सामाजिकराजनीतिक लक्ष्य रखता है. किंतु ऐसे नेता संख्याबल में बहुत कम होते हैं और लोकतंत्र जो संख्याबल के आधार पर चलता है, वहां से अपनी कारगर भूमिका नहीं रच पाते. हताश होकर या तो लोकप्रिय राजनीति के रंगढंग अपना लेते हैं; अथवा राजनीति से ही किनारा कर लेते हैं. राजनीति को जनसाधारण अच्छा नहीं समझता. निष्पक्ष बुद्धिजीवियों के पास वर्तमान राजनीति के पक्ष में कहने के लिए बहुत कम होता हैं. और उनके द्वारा राजनीति और राजनीतिज्ञों की निरंतर आलोचना से समाज में उनकी हो छवि बनती है, वह समाज में सरकार की विश्वसनीयता को कम करती जाती है. जनता का सरकार में विश्वास न हो तो वह असहयोग की मुद्रा में आ जाती है. नागरिक धर्म भुलाकर लोग केवल अपनी स्वार्थसिद्धि में लग जाते हैं. इससे समाज में शांतिव्यवस्था बनाए रखने के लिए सरकार को अतिरिक्त बलप्रयोग करना पड़ता है. परिणामस्वरूप जनता में उसकी छवि और बिगड़ती है. ऐसी अवस्था में अच्छे, प्रतिभाशाली और नीतिसंपन्न व्यक्ति राजनीति में आना छोड़ देते हैं और निर्धारित अवधि के बाद होने वाली निर्वाचन प्रक्रिया सरकारी कर्मकांड बनकर रह जाती है. महंगी निर्वाचन प्रक्रिया में उतरनेवाले नेता एक लगाकर दस कमाने की नीयत रखते हैं. राजनीति से जुड़े लोग समाज में अच्छे नहीं समझे जाते. पर निहित स्वार्थ के लिए अच्छेभले लोगों को भी उन्हीं की कृपादृष्टि के लिए तरसना पड़ता है. जनता के बीच भ्रम बनाए रखने के लिए वे प्रबुद्ध होते लोकतंत्र का बारबार दावा करते हैं, लेकिन जिन नारों के साथ वे लोगों के बीच आते हैं उनका विकास और लोकहित से कोई वास्ता नहीं होता. उनके दांवपेंच से अनभिज्ञ यदि कोई व्यक्ति चुनाव में उतरे तो उसके लिए जीत आसान नहीं होती.

लोकतंत्र की आवश्यकता है कि सरकार जनता की वोटों से बनी सरकार जनता के लिए काम करे. जनता के लिए काम करे. लेकिन पूंजी, धर्मसत्ता तथा क्षेत्रीय विशेषताओं के आधार पर जो सरकार चुनी जाती है, वह ऊपर से भले ही लोकतांत्रिक दिखे, उसका स्वरूप अल्पसंख्यक सरकार का ही होता है. वह जनता के वोटों से चुनी हुई कुछ लोगों की सरकार होती है, जो अपने वर्गीय हितों और कुछ लोगों को लिए काम करती है. जनता के बीच भ्रम बनाए रखने के लिए वे लोकतंत्र की प्रबुद्धता का बारबार हवाला देते हैं. उनका मुंहलगा मीडिया और प्रचारसारथी जनता के बीच बारबार यही दोहराते हैं कि ‘लोकतंत्र जीत रहा है’. असलियत में ‘जनता की जीत’ और लोकतंत्र के नाम पर केवल अल्पतंत्र फलताफूलता रहता है. जनता की उदासीनता से शिखर पर बैठे लोग मनमानी पर उतारू हो आते हैं. ये लोकतंत्र की सामान्य कमजोरियां हैं, जिन्हें ढाई हजार वर्ष पहले ही समझा जा चुका था.

मनुष्य की अधिकतम आजादी और मानवाधिकारों की प्रतिष्ठा हेतु जरूरी है कि हम एक फैसला कर लें—आखिर हमें चाहिए क्या? पूंजी का राज या राज की पूंजी. आप कहेंगे इसमें क्या है? राज होगा तो पूंजी भी रहेगी ही. बिना पूंजी के क्या राज चल सकता है! सो पूंजी को राज में रहना चाहिए. फिर चाहे राज पूंजी का हो या राज की पूंजी. पूंजी होगी तो समाज में सुखसुविधाएं बढ़ेंगी. उस गरीबी और बेकारी से मुक्ति मिलेगी, जिसमें हमारे पूर्वजों ने पूरी जिंदगी काट दी और जिसके कारण वे वक्तबेवक्त रामनाम रटकर दुनिया से कटे होने का दावा करते थे. कोई इशारा न समझ पाए तो आप बताएंगे कि वे लोग यानी आपके पूर्वज दुनिया से कटे होने का दावा इसलिए करते थे कि उनके आसपास भीषण गरीबी, अकाल और बेबसी के सिवाय कुछ था ही. आंखें खोलते ही उन्हें अपनी दुनिया की कंगाली सामने आ जाती थी. इसलिए पूंजी चाहिए और राज इसलिए कि सुरक्षा का एहसास बना रहे. जो हमारे लिए सुखसुविधाओं का इंतजाम कर सके. जिसके सेनानी पहरेदार का काम करें. जो हमारी जरूरत की चीजों की आवाजाही बनाए रखे. राज इसलिए भी चाहिए ताकि हमारे आसपास शांति हो. कोई हमारे सुख की ओर आंख उठाकर देखने न पाए. अगर आप सरकार से इतना कुछ चाहते हैं तो कुछ भी बुरा नहीं है. और इतना काम तो हर सरकार करती ही है. यदि कर न सके तो आश्वासन अवश्य दे देती है. परंतु कुछ काम ऐसे हैं जिनसे आपका सुख सचमुच जुड़ा होता है. किंतु उस ओर न तो सरकार की ओर से कोई हाथ उठता है, न आप ही उठा पाते हैं.

यह ठीक है सरकार का काम नागरिक हितों की देखभाल करना है. उन्हें सुरक्षा और आवश्यक सुविधाएं प्रदान करना है. यह काम ऐसा तो नहीं कि हमें डर लगे. जिसे हम कभी कर भी न सकें. फिर हमें डर क्यों है कि कोई हमारे सुख की ओर टकटकी लगाए बैठा है. जरा नजर चूकी नहीं कि झपट्टा मारकर गिरा देगा. यह तो तभी हो सकता है कि हमारे पास जो है, वह दूसरों से ज्यादा हो. उस अवस्था में हमें राज भी चाहिए तो इसलिए कि वह हमारे धन की, जो दूसरों से अधिक है, जिसे हमने औरों का हक मारकर जुटाया हुआ है, की सुरक्षा कर सके. हम पेटभर खाकर, डकार लेकर मजे की नींद लें और कोई हमारी नींद में खलल डालने न आए. हमारा पड़ोसी किस हाल में है इस हम कोई ध्यान न दें. वह यदि भूखा है, लाचार है, किसी का सताया हुआ है तो उसकी रक्षा करने के लिए भी हमें राज चाहिए. सरकार से हम यह उम्मीद रखें कि वह हमारा कोई अहित न होने दे. इसके लिए वह हमसे चाहे तो कुछ कर भी ले. यदि हम ऐसा ही राज चाहते हैं तो सही मायने में हम राज की पूंजी नहीं, पूंजी का राज चाहते हैं. जो सरकार आपके धन की रक्षा करेगी, आपको आपके भूखे, जरूरतमंद पड़ोसी की कुदृष्टि से बचाएगी.

उस समय हम मान लेते हैं कि सरकार में जो हैं वे निरे भलेमानुष हैं. कि सरकार लोगों की सदेच्छा से चलती है. वह इतना ही सोचती है, जितना हम जानते हैं. यदि वे भले मानुष न हों तो? तब वह सीधे आपसे पूछेंगे कि हमें पहरेदारी ही बनना है तो दूसरे के धन की क्यों करेंगे. पहरेदारी करनी है तो अपने धन की करेंगे. जो धन अपना नहीं है उसको किसी न किसी तरह अपना बनाने की सोचेंगे. सच तो यह है कि सरकार का पूरा तामझाम इसी रणनीति के तहत चलता है. सरकार के पास ताकत है, पैसा है, पहुंच है. वह पहरेदारी कर सकती है. पहरेदारी करती है. परंतु उसमें मौजूद लोग तथा उन्हें अपनी पूंजी के बल पर संसद और विधायिकाओं तक पहुंचानेवाले पूंजीपति और सरमायेदार कहीं न कहीं यह इच्छा भी पाले रहते हैं जिस धन की रखवाली सरकार कर रही है, एक न एक दिन वह धन उन्हीं के खाते में आना है. यह सरकार चलाने का पूंजीवादी रवैया है. पूंजीवादी मुनाफे के लिए उद्योग चलाता है. नेता मुनाफे के लिए राजनीति में आता है. सीधासादा गणित. सीधसादा विचार. इसलिए पूंजीवादी समाज में धन की केवल एक ही गति होती है. वह निचले स्तर से ऊपर की ओर जाता है. पैसा पैसे को खींचता है—यह मुहावरा यूं ही नहीं बना है. पूंजी की सरकार मुनाफे के लिए बनती, मुनाफा देखकर चलती है. उसके नेता मानते हैं कि धन उसका जो पहरेदारी करे. इसलिए धन वापस लौटता जाता है. वहीं जहां से वह चला था. आप सोचते हैं, समाज में कुछ लोगों के पास अकूत धन होगा और दूसरे कंगाल रहेंगे तो उसमें असंतोष की लहर उठेगी. लोग आक्रोश से बलबलाने लगेंगे. परंतु ऐसा कुछ नहीं होता. आपके देखते ही देखते पहरेदार खुद को धन का मालिक मानने लगता है. सरकार के मालिक में बदल जाने का यही दुष्परिणाम होता है. आप इसको कुफल कहें तो भी चलेगा. पर उनका यही अभीष्ट है, जिसमें हर कोई पूंजी के इशारे पर नाचता हुआ नजर आएगा.

देखते ही देखते एक सरकार हमारी मालिक बन जाती है. इसलिए कि हम अपने लालच को मरने नहीं देते. हमने अपने स्वार्थ से समझौता किया; और ऐसे नेताओं को राष्ट्र की निगहबानी सौंपी, जो देश के बजाय अपने और हमारे स्वार्थ की रक्षा कर सकें. पर क्या सचमुच ऐसा हो सका. हममें इतना सामर्थ्य नहीं कि अपने फैसले खुद कर सकें. स्वार्थी पहरेदारों ने वह किया जो हर काइयां, स्वार्थी पहरेदार करता है. नेताओं ने हमारा वोट लिया. और फिर सत्ता में पहुंचकर ऐसे कानून बनाए जो संपत्ति के निचले वर्गों से ऊपर के वर्गों को वैध सिद्ध करते हों. हमारी संपत्ति धीरेधीरे उनके अधिकार में जाने लगी. सरकार के पास कानून की बड़ीबड़ी पुस्तकें होती हैं. उनमें बड़ीबड़ी बारीकियां होती हैं. उनकी व्याख्या के लिए विशेषज्ञों की पूरी टीम होती है. उनका पैसा जाता जनता की जेब से है, लेकिन वे साथ सरकार का निभाते हैं. इसी में उनकी और सरकार की शान है. इसलिए सरकार जो कुछ करती है, वह कानून की मदद से करती है. उन कानूनों की मदद से करती है, जिन्हें वह लोकहित के नाम पर बनाती है. सरकार के लिए लोक एक अमूर्त्तन धारणा है. उसमें यदि कोई ‘मूर्त्त’ फंस जाता है तो गलती उस व्यक्ति की. लोकसमर्थन पाकर सरकार कराधान के लिए बारीक नियम बनाती है. इतने बारीक कि सुनकर बुद्धि चकरा जाए. सीधे आमदनी पर टैक्स तो समझ में आता है. पर आप जो चीज खरीदें उसपर टैक्स, उत्पादक जो माल बनाए उसपर टैक्स, माल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने में जो भाड़ा लगे उसपर टैक्स. वस्तु को पैकेट बंद करने में जो लागत आती है, उसपर टैक्स. सामग्री और उपसामग्री पर भी टैक्स. फिर विज्ञापन जो आपको वस्तु के बारे में बताता है, उसपर भी टैक्स. दुकानदार का टैक्स, सर्विस टैक्स. आप गिनते जाइए. आपकी याददाश्त धोखा देने लगेगी, टैक्स की कतार कम नहीं पड़ेगी. और ये सब कहां से आता है. वही जो हम और आप रातदिन परिश्रम से कमाते हैं. वही तरहतरह से, अलगअलग नामों से सरकार की जेब में जाने लगा. पर सरकार में जो बैठे हैं. उन्हें हमी ने ताकत सौंपी है. परंतु निखालिस ताकत से काम चलता नहीं. बली को तो सुखसुविधा, मानवैभव सभी कुछ चाहिए.

सरकार से जुड़े लोगों को सुखी बनाने की जिम्मेदारी ली पूंजीपतियों ने. अपने कारखाने उन्होंने विलासिता की वस्तुओं को बनाने के लिए सौंप दिए. सरकार और सत्ता केंद्र पर विराजमान लोगों के पास संसाधनों की अफरात ही अफरात. विलासिता की वस्तुओं की बिक्री बढ़ी तो उसपर भी टैक्स लगा दिया. जनता को थोड़ा और दुहा जाने लगा. उत्पीडि़त अपनी सफलता उत्पीड़क की नकल करने में देखता है. वह उसी को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानता है. इसलिए हममें से जो थोड़ाबहुत बचा लेते थे, वे भी अपनी बचत को विलासिता की वस्तुओं पर खर्च करते रहते हैं. उत्पीड़क के लिए यह सबसे मुफीद है. पूंजी गरीब के बटुए से बाहर आएगी, तभी तो ऊपर तक जाएगी. परंतु ऐसा करतेकरते निचला वर्ग खोखला पड़ने लगता है. लेकिन महत्त्वाकांक्षाएं, चाहतें और सपने तो उस वर्ग के भी होते हैं. खाली जेब और बाजार के आकर्षण, मन में अंतद्र्वंद्वों को जन्म देते हैं. उससे समाज में असंतुलन बढ़ता है. आपसी अविश्वास में वृद्धि होती है. तनाव और अंतर्कलह पनपने लगते हैं. ये सब बढें तो असहिष्णुता और असंवेदनशीलता भी बढ़ने लगती है. इससे आपसी झगड़े, मुकदमेबाजी, कोर्टकचहरी को बढ़ावा मिलता है. इस बहाने हमारा धन फिर हमारे हाथों से खिसकने लगा. कुल मिलाकर सरकार जो हमने अपने निगहवानी और जरूरतों की देखभाल के लिए बनाई थी, उसमें ऐसे लोग शामिल होते जाते हैं, जो सिर्फ राजनीति करते हैं. सत्ता की राजनीति, मुनाफे की राजनीति, अवसर और पदलाभ की राजनीति. इस तरह राजनीति जो सेवाकर्म हो सकती थी, शीर्षस्थ लोगों के व्यवसाय में बदल जाती है. ऐसे लोग उसमें चले आते हैं जिनका एकमात्र ध्येय अपनी स्वार्थसिद्धि करना रहता है. वे जानते हैं कि छोटेछोटे अनेक खानों में बंटी जनता उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती. लेकिन डर फिर भी सिर पर सवार होता है. डर इस बात का कि जिस ‘शार्टकट’ के जरिये वे उस स्थान तक पहुंचे हैं, उन्हीं के समान महत्त्वाकांक्षी कोई व्यक्ति उस स्थान पर पहुंचकर कभी भी उन्हें अपदस्थ कर सकता है. जनता ऊपर के वर्ग पर होने वाले ऐसे तमाशे को रोज देखती है. इससे लोगों को रोजमर्रा की ‘गपशप’ का मसाला मिलता है. उसी के जरिये वह अपनी कुंठाओं का विसर्जन करती है. उस समय वह भूल जाती है कि लोकतंत्र में उसकी सत्ता सर्वोपरि है. उसे यह अधिकार है कि स्वार्थी नेताओं को धूल चटा सके. परंतु वह ऐसा नहीं कर पाती. इसलिए कि शीर्ष पर बैठे हुए लोग उसको इतने छोटेछोटे खानों में बांट देते हैं कि वह कोई कारगर फैसला लेने की स्थिति में आ ही नहीं पाती. उसकी शक्तियां कारगर हो ही नहीं पातीं.

1947 में जब देश आजाद हुआ था कि उस समय हमारे पास एक ही नारा था—राष्ट्र के नवनिर्माण का. चूंकि राष्ट्र पहले था, इसलिए नेता और जनता सब उसी को समर्पित थे. लेकिन धीरेधीरे राजा और प्रजा सब स्वार्थसमर्पित होते चले गए. जनता इस सोच में अपने निगहबानों चुनने लगी कि वे सरकार बनाकर उसके सुख की रक्षा करेंगे. मगर निगहबानी की कसम खाकर सत्ताकेंद्र में पहुंचे नेता खुद को मालिक समझने लगे. लोग उनकी चालाकी को समझें, इसलिए धर्म, जाति, क्षेत्रीयता, वर्ण जैसे मुद्दे बहस और पहचान का प्रतीक बना दिए गए. आज हालात यह हैं कि राज है, पर राज कहीं नहीं हैं. नेता के लिए वोटर महज उत्पाद है. चुनाव लड़ना महज मतप्रबंधन बनकर रह गया है. मतदाता ऐसे नेता को वोट देने जाते हैं, जिसपर उन्हें जरा भी विश्वास न हो. और जब चुनाव में खड़ा उम्मीदवार भ्रष्ट, और दागी हो, तो चर्चा का आधार भी धर्म, जाति, क्षेत्रीयता जैसे अनुत्पादक मुद्दे रह जाते हैं. नेता भी मतदाता की इस कमजोरी को जानता है. इसलिए वह चुनावों में ऐसे मुद्दे उछालते ही नहीं जिनका विकास से सीधा संबंध हो. ‘सब चलता है’ सोचकर मतदाता वोट देता है और मुखौटायुक्त नेता संसद पहुंच जाते हैं. इन चेहरों में यदाकदा जो बदलाव आते भी हैं, तो इन्हीं गैर उत्पादक मुद्दों द्वारा.

आजादी के बाद देश ने लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को चुना था. इसलिए कि देश को सामंतवाद के चंगुल से बाहर लाना था. तब देश में करीब सात सौ रियासतें थें. जिनके वजीर, जमींदार, राजा, सामंत सब अपना स्वार्थ देखते थे. उनके लिए तरक्की का मतलब था, राजपरिवार में विलासिता की वस्तुओं का बढ़ते जाना. किसी साम्राज्यवादी मनसूबे का साकार हो जाना. प्रजा उन सामंतों, जागीरदारों के भोगविलास को हसरतभरी निगाह से देखती, जिंदगी किसी तरह गुजर जाने तथा अगले जन्म में इस जन्म के अभावों की पूर्ति के लिए प्रार्थना करती थी. स्वर्ग उसके लिए बड़ा प्रलोभन था. दुख और अभावों, जीवनसंघर्ष की असफलताओं ने उसे भाग्यवादी बनाया था. इसलिए राजा कौन है, इस बारे में अधिक नहीं सोचती थी. वह नासमझ भी नहीं थी. न ही मूर्ख थी. अनुभव पगी थी. अनुभव ने ही उसे चुप रहना, संतोष करना सिखाया था. लेकिन गांधीजी ने जब उसका आवाह्न किया, तो पहली बार उसे अपने नेताओं पर भरोसा जमा. इसी के साथ वह हुंकार पड़ी थी, स्वतंत्रता के लिए.

आजादी सिर्फ राजामहाराजाओं, सामंतों के संघर्ष के फलस्वरूप आती तो देश में राजशाही ही पनपती. अठारह सौ सतावन में जितने भी रजबाड़े अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध में सम्मिलित हुए थे, सभी के अपने स्वार्थ थे. उनकी लड़ाई केवल अपनी सत्ता के लिए थी. एक तरह से अच्छा ही हुआ जो आजादी से पहले देश के राजेरजबाडे़ अंग्रेज सरकार के पिछलग्गू बने हुए थे. जनता ने उनकी हकीकत को पहचाना और संगठित होकर अपने कंधे से गुलामी का जुआ उतार फेंका. देश उसका जो आजादी को अपने प्राणप्रण से सींचे. जनता के प्राणप्रण से बलिदान के फलस्वरूप स्वाधीनता ने दस्तक दी थी. इसलिए रजबाड़ों की हिम्मत ही न पड़ी थी, मनमानी करने दी. इसलिए जब भारत या पाकिस्तान में बंटने को कहा गया तो चुपचाप बंटते चले गए. जो इक्कादुक्का रहे उन्हें भी अपनी प्रजा और परिस्थितियों के आगे घुटने टेकने पड़े. निहत्थे गांधी से सब डरते थे. जानते थे कि उस अधनंगे फकीर को तो कभी भी मार सकते हैं. पर वह अकेला कहां हैं! जनताजनार्दन का हाथ उनकी पीठ पर था. यह ठीक है कि गांधी उन नेताओं में से थे जिन्होंने भारतीय जनता को राजनीति का पाठ पढ़ाया था. मगर यह भारतीय जनता ही थी जिसके कंधों पर सवार होकर स्वाधीनता आंदोलन अपनी सफलता को पहुंचा. जिस देश की जनता जाग जाए उसको दुनिया की कोई शक्ति गुलाम नहीं बना सकती. सो जनता के कंधों पर सवार होेकर ही गांधी महात्मा बने, राष्ट्रपिता कहलाए. लेकिन गांधीजी यदि देश के एकक्षत्र नेता होते तो क्या देश में लोकतंत्र का आगमन संभव होता? क्या लोकतंत्र को गांधीवादी राजनीति का समापन बिंदू कहा सकता है? एक शब्द में इसका उत्तर है—‘नहीं.’

निस्संदेह गांधी भारतीय जनमानस में सर्वाधिक लोकप्रिय नेता थे. किंतु गांधी की मनोरचना में लोकतंत्र कहीं नहीं था. वे अपने निर्णय जिद पूर्वक लागू कराते थे. दबाव बनाने के लिए सत्याग्रह सबसे कारगर हथियार था. दरअसल गांधी का आदर्शराज्य ‘रामराज्य’ की परिकल्पना से बुना था. उनका हिंदू मानस उस दायरे से बाहर सोच ही नहीं पाता था. बाद में लोकतंत्र के समर्थक बने तो इसलिए कि उस समय तक दलित और पिछड़ों में एक पढ़ालिखा बुद्धिजीवी वर्ग पनप चुका था. उसके नेता थे, ज्योतिबा फुले और डाॅ. भीमराव आंबेडकर. संविधान निर्माण के क्षेत्र में डा॓. अंबेडकर ने वही किया जो अमेरिका में था॓मस जेफरसन ने किया था. दोनों के जीवन में कुछ समानताएं भी हैं. दोनों बेहद पढ़ाकु थे. दोनों को गरीबी से संघर्ष करना पड़ा था. दोनों का ही जीवन अभावों में बीता था. कुछ अर्थों में अंबेडकर का काम जेफरसन से भी बड़ा था. अंबेडकर को डा॓. अंबेडकर बनने तक सामाजिक परिस्थितियों, जातिवाद और छुआछूत के विरुद्ध भी युद्ध करना पड़ा था. जेफरसन का देश और वहां के लोग इस मामले में उदार थे. इसलिए उन्होंने अमेरिकी गणतंत्र के प्रमुख सूत्रधार को राष्ट्रपति के पद से नवाजा. भारत में एक दलित को ऐसे अवसर कम से कम उस समय न थे. जेफरसन ने अमेरिका के लिए ‘स्वाधीनता का घोषणापत्र’ तैयार किया था, डाॅ. अंबेडकर ने भारतीय संविधान. बाद में संविधान का जो प्रारूप स्वीकृत हुआ उसके कई प्रावधानों से डा॓. अंबेडकर की असहमति थी. तथापि लोकतंत्र का सम्मान करते हुए वे संविधान के प्रचारप्रसार में जुटे रहे.

बहरहाल, लोकतांत्रिक शासन प्रणाली लागू करने के बाद असली काम लोगों को अपने पैरों पर खड़ा करने का था. उनमें ऐसा विवेक पैदा करना जरूरी था, ताकि वे लोकतंत्र का लाभ उठा सकें. पढ़े और अनपढ़ दोनों वोट से बंदूक का काम कैसे लें, यह समझाने की जरूरत थी. लंबे समय तक सामंतवादी समाज में रह रहे लोगों में नागरिकताबोध पैदा करना था. सामान्य राय के पक्ष में निजी हितों को कुछ समय के लिए बलिदान करना क्यों जरूरी है—यह बात भी लोगों को समझानी थी. इसके लिए अंबेडकर सामाजिक क्रांति की आवश्यकता महसूस करते थे. उनके लिए सामाजिक आजादी का मसला राजनीतिक आजादी से बढ़कर था. अंबेडकर साहब की नहीं चली. राष्ट्र पिता कहलाए जाने के बावजूद गांधी की भी नहीं चली. गांधी की हत्या के बाद तो देश को उस दशा में सोचने का अवसर ही कहां मिला? आजादी की घोषणा के तुरंत बाद देश में दंगे होने लगे थे. उसके बाद पाकिस्तान तथा चीन का हमला. 1971 में फिर पाकिस्तान से युद्ध. ये कुछ कारण ऐसे रहे जिससे देश में मतदाता के विवेकीकरण का अभियान चल ही नहीं पाया. 1950 में देश में मानवाधिकारों को स्वीकृति देकर मनुष्य की मूलभूत स्वतंत्रता की घोषणा कर दी गई. मगर जाति, धर्म, वर्ग, क्षेत्रीयता में फंसे समाज में राजनीति का इतना स्खलन हुआ कि जनविवेकीकरण का अभियान सिरे ही नहीं चढ़ सका. विवेकीकरण की प्रक्रिया को अवरुद्ध करने के कुछ और भी कारण थे. उनमें एक था, हिंदू समाज की पराजित मनोग्रंथि. देशवासियों को पराजित दासता में जीवनयापन करते हुए पांच सौ से अधिक वर्ष पूरे हो चुके थे. आक्रामकों ने इस देश का आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक यानी सभी तरह से शोषण किया था. लेकिन धर्मप्राण जनता को धर्माधारित शोषण का सर्वाधिक क्षोभ था. इसलिए 1947 में जैसे ही विदेशी शासन से मुक्ति मिली, सबसे पहले जनता का ध्यान अपने धर्म और परंपराओं को सहेजने पर गया. आजादी के तुरंत बाद बंटवारे की घटना देश में सांप्रदायिक धु्रवीकरण की ही देन थी, जो स्वाधीनता संग्राम के दौरान ही पनपने लगा था. आजादी के तुरंत बाद बंटवारे की घटना, धर्माधारित राष्ट्रों का निर्माण, बाद में पाकिस्तान के हमलों ने देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की पृष्ठभूमि तैयार की थी. कालांतर में वोट की राजनीति ने उसको और हवा दी.

उस समय यदि देश के नेता चाहते तो समन्वयात्मक राजनीति की शुरुआत कर सकते थे. पाकिस्तान से अधिक मुसलमान हिंदुस्तान में थे. तथा समाज में आपसी तालमेल बनाए रखना समय की आवश्यकता भी थी. ऐसे कुछ नेता अवश्य हुए जिन्होंने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बजाय समन्वयीकरण को अपनी राजनीति का लक्ष्य बनाया. किंतु वे अपने संप्रदाय से उभरकर ही नेता बने थे. उनके प्रशंसकों, समर्थकों में अधिक संख्या उनके अपने धर्मावलंबियों की थी. अतएव अपने संप्रदाय की एकाएक उपेक्षा उनके लिए संभव न थी. दूसरे समन्वयीकरण की राजनीति को अपने जीवन का लक्ष्य बनाने वाले वास्तविक नेता संख्या में बहुत कम थे. उनके पास संसाधनों का भी अभाव था. जो साधनसंपन्न थे, उनके वैसे सरोकार न थे. परिणाम यह हुआ कि आजादी के बाद सभी सरकारें तुष्टीकरण की नीति को अपनाने लगीं. इससे राष्ट्र निर्माण का लक्ष्य निरंतर दूर होता गया. 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध ने पुराने जख्मों को और भी हरा कर दिया. उस युद्ध में पाकिस्तान को मिली पराजय ने जहां पाकिस्तानी मुसलमानों की हीनताग्रंथि को मजबूत किया, बल्कि हिंदुमुसलमानों के बीच नई दरार बनाने का काम किया. आर्थिक उदारीकरण के समय लगा था कि बाजार और प्रतिस्पर्धा के दबाव सांप्रदायिकता को भी चुनौती देंगे. विकास की चाहत लोगों को एकदूसरे के साथ लाएगी. फलस्वरूप जाति, संप्रदाय, धर्म और क्षेत्रीयता जैसे अनुत्पादक मुद्दे राजनीति से एकएक कर हटते चले जाएंगे. मगर वह केवल खामाख्याली थी. जो अपेक्षाएं की जा रही थीं, उनके लिए एक विवेकीकृत जनसमाज का गठन जरूरी था. लगा था कि विकास के साथ नई शिक्षा, ज्ञान, विज्ञान और प्रौद्योगिकी ऐसा वातावरण बनाएगी. लेकिन बाजार और पूंजी की अपनी ठसक होती है. वह सबसे पहले उपभोक्ता के दिलोदिमाग पर कब्जा करती है. उसके सोचने और फैसले लेने की ताकत को चुनौती देती है. फिर उसको ऐसे मोड़ती है कि व्यक्ति वस्तुओं की खरीद अपनी जरूरत के बजाय प्रतिष्ठा को ध्यान में रखकर करने लगता है. धीरेधीरे वह ऐसा उपभोक्ता बन जाता है, जिसे बाजार कठपुतली की भांति अपनी उंगलियों पर नचाता है.

हाल की बात करें तो बाजार केंद्रित अर्थव्यवस्था ने मनुष्य के सारे सोच, सारी हरकतों को सुविधाभोगी बना दिया है. बाजार हालांकि हाल की अवधारणा नहीं है. पांच हजार वर्ष पहले भी बाजार था. व्यापारियों के काफिले दूरदूर तक यात्रा करते थे. बाधाओं का सीना चीरते हुए वे सैकड़ों, हजारों मील दूर निकल जाते थे. इसके साथ वे अपने देश की वस्तुओं के साथसाथ संस्कृति भी ले जाते थे. लेकिन वे व्यापार जरूरत की वस्तुओं का करते थे. विलासिता की वस्तुएं उस समय भी बनती थीं. मगर लोगों की जरूरतों या इच्छाओं पर बाजार का नियंत्रण न था. न बाजार लोगों की पसंदों को नियंत्रित करने की धृष्टता करता था. इसलिए जरूरतें व्यक्ति की अपनी थीं. वे व्यापारी की मनमर्जी से तय नहीं होती थीं. आज पंूजीवादी व्यवस्था ने सारे मायने बदल दिए हैं. स्थिति यहीं तक सीमित होकर रह जाने वाली नहीं है. बाजार न केवल मनुष्य के लिए नई जरूरतें रच रहा है, बल्कि सांस्कृतिक तत्वों को भी बाजार की दृष्टि से परिभाषित कर रहा है. कहीं पर संस्कृति को महत्त्वहीन बनाने के लिए उसको पूंजीपति घरानों के हवाले कर रहा है. उल्लेखनीय है कि बाजार अपने आप में बुरा नहीं है. हजारों, लाखों लोगों की जरूरत को पूरा करने वाली, लाखों को रोजगार देने वाली संस्था समाज की जरूरत ही कही जाएगी. किंतु उसपर मुट्ठीभर लोगों का नियंत्रण, उसका मुनाफाखोरों के हाथों में चला जाना बुरा है. बाजार का मनुष्य के निर्णयसामथ्र्य पर छा जाना बुरा है.

इससे मुक्ति संभव कैसे हो. कैसे बाजार को उसके मूल उद्देश्य तक वापस लाया जाए. यह कैसे हो कि बाजार भी रहे, पूंजी भी रहे और पूंजी अपना स्वभाव छोड़ दे. मनुष्य कठपुतली उपभोक्ता के बजाय विवेकवान ग्राहक की भांति व्यवहार करे. यहां पूंजी के स्वभाव को समझना पड़ेगा. उसका आशय है धनसंपदा का अपना मकसद भूलकर केवल लार्भाजन के काम में जुट जाना. समाज की संपदा जब धर्म भूलकर कुछ लोगों के मुनाफे के लिए काम करने लगती है, तो वह पूंजी बन जाती है. संपदा समाज की रहे, समाज के काम साधे. तभी वह सम्मानेय है. इसलिए पूंजी से अपना स्वभाव छोड़ने की अपेक्षा करना ही समाजवाद है. इसके लिए आवश्यक है कि पूंजी पर उन लोगों का अधिकार हो, जो उसका उपयोग करते हैं. उपयोग के तरीके और प्रविधियां कुछ भी हो सकती हैं, बस वे मानव की गरिमा बढ़ाने वाली हों. गिरानेवाली नहीं. उनसे समाज में उत्पादकता बढ़े, विलासिता नहीं. वस्तुओं का उत्पादन लोगों की जरूरतें पूरा करने के लिए हो, उद्योगों और बाजार पर एकाधिकार सिद्ध करने के लिए नहीं. पर क्या यह संभव है? यदि संभव है तो कैसे? कैसे यह संभव है कि व्यक्ति पूरे समाज के कल्याण के बारे में सोचे तथा उसकी उत्पादकता भी बाधित न हो. यह तभी संभव है जब प्रत्येक व्यक्ति अपने साथ अपने समूह और समाज के बारे में सोचे. जब समाज में सामाजिक लाभों को आर्थिक लाभों जितनी ही महत्ता दी जाए. बल्कि उत्पादकता का ध्येय सामाजिक लाभ की प्राप्ति हो. आर्थिक लाभ गौण हों.

दरअसल समाजवाद और उसके समानधर्मा अर्थदर्शनों की सबसे बड़ी कमजोरी है कि वे धन के राष्ट्र अथवा श्रमिक संगठनों के अधीन जाने की व्यवस्था तो करते हैं, किंतु नागरिकों को अधिकतम उत्पादन में सहयोग देने की कोई स्पष्ट आचारसंहिता उनके पास नहीं है. साम्यवाद में यह मान लिया जाता है कि उद्योगों पर स्वामित्वबोध की अनुभूति श्रमिकों को अधिकतम उत्पादन के लिए प्रेरित करेगी. जबकि समाजवाद यह मानकर चलता है कि जो समाज अपने प्रतिनिधियों को चुनने में सामथ्र्यवान है, उसके नागरिक अवश्य ही इतने योग्य हैं कि वे अपनी अंतःप्रेरणा के अनुसार राष्ट्रनिर्माण में भी अपना अधिकतम योगदान देंगे. समाजवाद की यह अपेक्षा अनुचित नहीं है. व्यक्ति यदि समाज से कुछ अपेक्षाए रखता है तो उसके समाज के प्रति कुछ कर्तव्य भी हैं. आशय है कि समाजवाद और साम्यवाद दोनों व्यवस्थाएं नागरिकों को अधिकतम उत्पादन में सहयोग देने के लिए स्पष्ट आचारसंहिता के बजाय स्वतः प्रेरणाओं का सहारा लेते हैं. जबकि व्यवहार में यह देखा गया है कि समाजवाद और साम्यवाद दोनों में निजी संपत्ति की अधिकारिता का निषेध, नागरिकों को उत्पादन कर्म के प्रति लापरवाह बनाता है. वह नागरिकों के मन में आलस्य की भावना का विकास करता है. जिससे उत्पादकता में घटाव शुरू हो जाता है. परिणामस्वरूप विकासदर शिथिल पड़ने लगती है.

विकासदर को बनाए रखने के लिए कुछ देश बलप्रयोग का सहारा लेते हैं. वहां लोगों से उनके लोकतांत्रिक अधिकार छीन लिए जाते हैं. श्रमिक कामगारों से मनमाना काम लिया जाता है. उनकी मजदूरी उनकी न्यूनतम आवश्यकता के अनुसार तय की जाती है. यह एकदलीय अथवा निरंकुश शासन में ही संभव है. जैसा इन दिनों चीन में हो रहा है. पर इससे आजादी का आधा लक्ष्य ही हासिल हो पाता है. समाज के मानवीकरण की कोशिशें अधूरी रह जाती हैं. वैसे समाजवाद और साम्यवाद की लोगों से यह अपेक्षा अनुचित नहीं है कि लोग स्वतःप्रेरणा के आधार पर उत्पादन में हिस्सा लें और अपना यथासंभव योगदान दें. परंतु दोनों के साथ विडंबना यह है कि उन्हें ऐसे समाजों में काम करना पड़ा है, जहां ही जनता की कई पीढि़यां विकृत सामंतवाद का उत्पीड़न झेलतेझेलते अपना धैर्य, स्वाभिमान और कदाचित स्वतंत्र निर्णय लेने की ताकत भी खो चुकी हैं. इसलिए समानता और बराबरी के समाजवादी सपने लंबे समय तक उसका विश्वास नहीं जीत पाते. दूसरे अपने ही समाज में व्याप्त असमानता के कारण उन्हें ऐसे लोगों से स्पर्धा करनी पड़ती है, जो कई मायने में उनसे बहुत आगे हैं. इसलिए समाजवादी और साम्यवादी सपने उन्हें मायाजाल लगते हैं. जैसे कोई बच्चा बाजार में रंगबिरंगी वस्तुएं देख मचलने लगता है और उन्हें पाने के लिए कभीकभी मातापिता की गोद से उतर जाता है, वैसे ही वे भी छिटकने लगते हैं. आधुनिक समाज के लिए सबसे बड़ी चुनौती, व्यक्तिगत लाभ और सामाजिक लाभों के बीच तालमेल बनाए रखने की है. साम्यवाद, पूंजीवाद और समाजवाद जैसी व्यवस्थाएं इसी तालमेल के लिए अलगअलग रास्ते सुझाती हैं. इनमें से प्रत्येक की अपनी विशेषताएं हैं. कमजोरी यह है कि वे व्यक्ति और समाज के संबंधों पर विशेष ध्यान नहीं देते. इसलिए एक को संभालो तो दूसरा साथ छोड़ने लगता है. व्यक्ति समाज के साथ भी रहना चाहता है और स्वतंत्र भी. किन परिस्थितियों में वह इनमें से किसे वरीयता देता है, यह पूरी तरह उसी पर निर्भर है. लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्यक है कि नागरिक हितों के सामान्यीकरण को अपनाएं. मगर हितों के सामान्यीकरण की आवश्यकता पहले भी थी, आज भी है. समाजवाद और साम्यवाद दोनों इस बात पर एकमत हैं कि राज की पूंजी हो न कि पूंजी का राज्य. आधुनिक समाज के सामने बड़ी समस्या है. वह समस्या है कि व्यक्ति और समूह के हितों में तालमेल बिठाना. बाजार को तो दोनों ही चाहिए. व्यक्ति भी समूह भी.

बात हमने सरकार से आरंभ की थी और समाजवाद तक आ गई. विचारों की यह यात्रा अन्यथा नहीं थी