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सलाम दिल्ली

सामान्य

चाहता हूं कि आपकी याददाश्त को थोड़ा पीछे ले चलूं. याद करें, रामलीला मैदान की रैली में प्रधानमंत्री मोदी का जादूगर की तरह लहराता हुआ हाथ. चेहरे पर दर्प—‘भाइयो और बहनो! हमें यहां विकास चाहिए, अराजकता नहीं. उनकी मास्टरी धरना करने में है. उन्हें वह काम करने दीजिए. हमारी मास्टरी सरकार चलाने में है. हमें वो काम दीजिए.’ केजरीवाल को अराजक कहने वाले प्रधानमंत्री भूल गए थे कि धरना, प्रदर्शन, आंदोलन, बायकाट आदि लोकतंत्र के मुख्य औजार हैं. इन्हीं औजारों की मदद से गांधी जी ने पूरे स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया था. इन्हीं के भरोसे अंततः यह देश आजाद भी हुआ था. जिस राज्य में जनता को ये अधिकार प्राप्त न हों, वहां लोकतंत्र असंभव है. ऐसा राज्य निरंकुश कहलाएगा. प्रधानमंत्री जी को कदाचित यह भी स्मरण नहीं हुआ था कि अ-राजकता प्रबुद्ध समाज का विधान है, जिसमें सरकार का आकार सिकुड़कर न्यूनतम रह जाता है. उसका प्रबंधन पूरी तरह से जन-संगठनों के अधीन होता है. दूसरे शब्दों में वह लोकतंत्र की समुन्नत अवस्था, उसका परिष्कृत रूप है, जिसमें बाहरी शासन औचित्यहीन हो जाता है. इसके बावजूद केजरीवाल को नक्सली कहकर उन्हें जंगल में जाने की सलाह देना, सस्ती राजनीति ही माना जाएगा, जिसकी प्रधानमंत्री जैसे गरिमामय पद को संभालने वाले व्यक्ति से अपेक्षा नहीं की जा सकती.

प्रबुद्ध नागरिक आत्म-नियंत्रित होता है; या होना चाहिए. ऐसे व्यक्ति को सरकार या बाहरी अनुशासन की आवश्यकता ही नहीं पड़ती. इसलिए अच्छी सरकार वह मानी जाती है, जो न्यूनतम शासन करे. इसलिए लोकतंत्र में जो भी नेता या दल, सरकार चलाने में अपनी मास्टरी का दावा करता है, उसके बारे में कहा जाना चाहिए कि वह लोकतंत्र की भावना को आत्मसात करने में असफल रहा है. लोकतंत्र में सरकार चलाना कला नहीं है. बल्कि बहुजन की सपनों और आकांक्षाओं को, सर्वजन के सपनों एवं आकांक्षाओं में बदल देना कला है. लोकतांत्रिक सरकारें जनता की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं. जागरूक जनता कभी यह नहीं चाहती कि सरकार चलाने के नाम पर कोई उसके सिर पर सवार हो जाए. समय आने पर इस तरह का विचार रखनेवाले नेताओं को वह सबक भी सिखा देती है. दिल्ली में कदाचित यही हुआ है. मोदी जी कैसी सरकार देना चाहते थे यह द्वारका रैली दिए गए उनके भाषण से स्पष्ट हो जाता है. चुनावी रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था—‘दिल्ली में ऐसी सरकार चाहिए, जो मोदी से डरे. भारत सरकार से डरे. जिसको केंद्र की परवाह नहीं, वह क्या सरकार चलाएगा.’ रैली में मोदीजी ने जो कहा वह लोकतंत्र और भारतीय संघीय राज्य की गरिमा के विरुद्ध जाता है. दिल्ली की जनता इतनी नासमझ नहीं कि इसके निहितार्थ समझ न सके. इसलिए उसने सरकार चलाने में एक्सपर्ट लोगों को सत्ता सौंपने के बजाय उस दल का चयन किया, जो अपनी कामयाबी को लगातार जनता की कामयाबी घोषित करता आया है. जो जनता की जीत में अपनी जीत का दावा करता है. लोगों ने सरकार चुनने के बजाय अपने प्रतिनिधि चुनने को प्राथमिकता दी है.

कसूर मोदी जी का भी नहीं है. वस्तुतः जिस राजनीतिक दल का वे प्रतिनिधित्व करते हैं, वह स्वयं लोकतंत्र में विश्वास नहीं रखता. ऐसे संगठन की वैचारिकी को आदर्श मानते हुए, मोदी जी ने अपने जीवन के चालीस बहुमूल्य उसके प्रचार-प्रसार को समर्पित किए हैं. उस वैचारिकी का प्रभाव उनके सोच और आचरण दोनों पर है. यही कारण है कि एक लोकतांत्रिक देश का प्रधानमंत्री होने के बावजूद वे कई बार लोकतंत्र की भावना के विरुद्ध जाकर काम करने लगते हैं. कोई व्यक्ति किस प्रकार के वस्त्र पहने यह उसका अपना चयन है. लोकतंत्र व्यक्ति स्वातंत्र्य का सम्मान करता है. उसे ऐसा करना भी चाहिए. लेकिन सार्वजनिक पद पर आसीन व्यक्ति को अपने समाज और संस्कृति को ध्यान में रखते हुए कुछ मर्यादाओं का पालन करना पड़ता है. जिस गुजरात से मोदी जी आते हैं, वहीं के गांधी जी ने देश की जनता को अधनंगा देख अपने वस्त्र त्याग दिए थे. उसके बाद एक लंगोटी आजीवन उनका अंग-वस्त्र बनी रही. मोदी जी नौ लाख का सूट पहनते हैं. अपने कपड़े विदेश से मंगवाते हैं. 125 करोड़ जनसंख्या यह घर-परिवार के प्रति अनासक्त मोदी की वैभव लिप्सा है या कोई कुंठा!

‘दिल्ली में ऐसी सरकार चाहिए, जो मोदी से डरे. भारत सरकार से डरे.’—मोदीजी का यह वक्तव्य न केवल उनके अहं का परिचायक है, बल्कि लोकतंत्र की मूल भावना से खिलबाड़ भी है. मोदी जी यह बात किसी राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में कहते तो भी गनीमत थी. उन्होंने सब कुछ देश के प्रधानमंत्री के रूप में, भरी सभा में कहा. एक तानाशाह की भाषा बोल रहे मोदी जी भूल गए थे कि लोकतंत्र में नेता की समस्त शक्तियां जनता की ओर से प्राप्त होती हैं. संसदीय लोकतंत्र में प्रधानमंत्री की हैसियत प्रधान सलाहकार की है, शासक की नहीं. एक ‘चायवाले’ का प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचना इस देश में लोकतंत्र के कारण ही संभव हो पाया है. वे यह सोचकर भूल करते हैं कि भाजपा और संघ ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर, उनकी चालीस वर्ष की अनथक सेवा का पारितोषिक दिया था. यह बात किसी से भी छिपी नहीं है कि संघ, गुजरात दंगों के द्वारा मोदी की जो छवि वहां बनी थी, उसके माध्यम से हिंदुत्व के संदेश को पूरे देश तक ले जाना चाहता था. हालांकि प्रधानमंत्री का उम्मीदवार मनोनीत किए जाने के पीछे यही एक कारण नहीं था. क्योंकि संघ को समर्पित व्यक्तित्वों की तो लंबी कतार है. अनेक नेता ऐसे हैं जिन्होंने उनसे भी ज्यादा सेवा की है. मोदी को आगे लाने की असली वजह थी, उनकी जाति. उनका पिछड़े वर्ग से होना. आजादी के अड़सठवें वर्ष में भी इस देश की जनता अपने राजनीतिक निर्णय जाति और धर्म को केंद्र में रखकर लेती है. मोदी को ताज इसलिए पहनाया गया ताकि पिछड़ों के वोट-बैंक में सेंध लगाई जा सके, जो देश की कुल जनसंख्या के लगभग 50 प्रतिशत हैं. अपने उद्देश्य में संघ को कामयाबी भी मिली. मायावती से नाराज दलित, मुलायम सिंह के यादव प्रेम से उकताए अतिपिछड़े और हिंदुत्व का नारा लगाने वाले जुनूनी, मोदी के पीछे होते गए. इसलिए मोदी जी सत्ता को यदि केवल अपने पुरुषार्थ का फल मानते हैं, यदि वे सोचते हैं कि प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने के लिए उन्होंने संघ को अपनी सीढ़ी बनाया है, तब वे गलत हैं. असल में चारों ओर से निराश हो चुके संघ ने मोदी का केवल उपयोग किया है. उन्हें अपना मुखौटा बनाया है.

मोदी जी इस हकीकत से अपरिचित हों, यह असंभव है. भाजपा के नेताओं को वे चाहे जितने अनुशासन में रख लें, संघ के नेताओं या उनकी भावनाओं को आगे बढ़ानेवाले भाजपा नेताओं पर उनका कोई जोर नहीं चलता. इसलिए चाहे धर्मांतरण का मुद्दा हो, साधु-साध्वियों द्वारा हिंदुओं को अधिक से अधिक बच्चे पैदा करने की सलाह, किसी पर भी मोदी जी का जोर नहीं चलता. सरकार के निर्णय कहीं और ले लिए जाते हैं और उनपर अमल भी अलग तरीके से किया जाता है. यही कारण है कि विकास के नाम पर बनी सरकार की असल उपलब्धियां नौ महीने बाद भी शून्य हैं. जिस ‘जन-धन-योजना’ की शुरुआत के लिए भाजपा सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है, वह भी पिछली यूपीए सरकार की देन है और ‘जीरो बैलेंस खाता’ के नाम से लगभग 25 करोड़ बैंक खाते पिछली सरकार के कार्यकाल में ही खुल चुके थे. तमाम नारेबाजी के बीच यह सरकार अभी तक केवल साढ़े बारह करोड़ बैंक खाते ही खोल पाई है. सरकार के समर्थक दावा करते हैं कि आमूल परिवर्तन के लिए, थोड़े समय तो लगता ही है. वे गलत भी नहीं हैं. लेकिन विकास के माडल और उसके लक्ष्य समूह के बारे में सरकार के पास जो स्पष्टता होनी चाहिए, वह भी मोदी सरकार में नजर नहीं आ रही है.

हाल के दिल्ली चुनावों में आआप के हाथों मोदी सरकार को मिली करारी शिकस्त इसी का नतीजा है. मेरा मानना है कि इन चुनावों में न तो भाजपा पराजित हुई है, न ही उसके नेता. इन चुनावों में मोदी जी का अहंकार पराजित हुआ है. मीडिया और भाजपा नेताओं की वह चाटुकारिता भी पराजित हुई है, जो मोदी को एक मिथक के रूप में जनता के बीच पेश कर रही थी. इन चुनावों ने यह भी दिखा दिया है कि देश में सांप्रदायिक सौहार्द्र की जड़ें आज भी बहुत गहरी हैं. उन्हें कोई शाखाधारी या मुल्ला-मौलवी आसानी से नहीं उखाड़ सकता. इन चुनावों में भाजपा को मिलने वाले कुल मतों में बहुत थोड़ी गिरावट आई है, लेकिन उसे केवल तीन सीटों से संतोष करना पड़ा है. इतनी बड़ी हार भाजपा विरोधी मतों के विभाजन न होने के कारण भी संभव हुई है. पहले लोग भाजपा की काट आआप और कांग्रेस में अलग-अलग करके देखते थे. इस बार भाजपा विरोधी मतदाताओं के बड़े वर्ग ने बंटने के बजाय एकजुट रहने का निर्णय लिया. नतीजा आम आदमी की सफलता.

इसलिए आआप को मिले भारी बहुमत की घड़ी में मैं दिल्ली की जनता को सलाम करता हूं जिसने कारपोरेट मीडिया के षड्यंत्र को समझा और उसको पूरी तरह फेल कर दिखाया. मैं उसे इसलिए भी सलाम करता हूं कि देश के डेढ़ सौ सांसदों, दर्जनों केंद्रीय मंत्रियों और स्वयं प्रधानमंत्री के दिल्ली में होते हुए, चुनाव के दिन उसने केवल अपने विवेक पर भरोसा किया. मैं केजरीवाल, उनके साथियों तथा आम आदमी पार्टी कार्यकत्ताओं के संघर्ष को भी नमन करता हूं, जिन्होंने पूंजी और मीडिया के बड़े सिंडीकेट को अपने आत्मविश्वास, संगठन और अनथक संघर्ष के बल पर विफल कर दिया. इन चुनावों में केवल भाजपा को लगभग पांच प्रतिशत सीटें प्राप्त हुई हैं. देश में इतनी ही संख्या इलीट वर्ग की है. यदि आम आदमी के उम्मीदवारों को कुछ देर के लिए सचमुच आम आदमी का प्रतिनिधि मान लिया जाए तो भाजपा के तीन सदस्य, इस देश की जनसंख्या के कुल 5 प्रतिशत अभिजन समाज का आनुपातिक प्रतिनिधित्व करते हैं. इस तरह से देखा जाए तो आप के रूप में बड़ी सामाजिक क्रांति का भी आगाज हुआ है. जनता इस तथ्य को समझे, अपनी एकता और सूझबूझ को आगे भी बनाए रखे, इसी में उसकी असली जीत है. वरना आम आदमी के ये प्रतिनिधि कब खास आदमी का प्रतिनिधित्व करने लगेंगे, पता भी नहीं चलेगा.

© ओमप्रकाश कश्यप

समय : पारंपरिक दृष्टिकोण

सामान्य

समय का दर्शन : एक

समय सबसे बड़ा छलिया होता है. मेहरबान हो तो दुनियाभर की सल्तनत बख्श दे. रूठ जाए तो चौहद्दी के राजपाट समेत डुबा दे. इस जैसा न तो कोई दयालु, न बेहरम. न इससे असरदार कोई मरहम. न इससे धारदार कोई हथियार….

समयसा कोई महाज्ञानी नहीं!

समय से बड़ा बहरूपिया भी नहीं!

समय से कभी मत लड़ना!

समय को चुनौती मत देना!

समय पर कभी भरोसा न करना!

हर आदमी यही कहता है. चाहता है कि समय से बचकर रहे. उसे कभी अनदेखा न करे. बूढ़ी होती पीढ़ी कामना करती है कि उसका समय ज्यों का त्यों बना रहे….आने वाली पीढि़यों पर समय की सदा मेहरबानी रहे. समय पर सब काम पूरे हों. समय का सब लाभ उठाएं.

आने वाला समझता है कि जाने वाली पीढ़ी अपने हिस्से का समय इस्तेमाल कर चुकी. अब उसकी बारी है. जाने वाला सोचता है कि उसकी यादें और समय ज्यों का त्यों उसके बाद भी बना रहे.

समय को लेकर अनगिनत मुहावरे, अनगिनत किवदंतियां हैं. समय बदलता है…. समय खराब होता है, समय भला निकलता है. समय मेहरबानी दिखाता है. समय आंखें तरेरता है. समय करीब होता है. समय उड़नछू हो जाता है. समय का हर खेल निराला है. समय बादशाहों का बादशाह, सूरमाओं का सूरमा है. वह अपनी चाल चलता है. बहुत तेज भागता है. कभी वापस लौटकर नहीं आता. फिर भी दिन बहुरेंगे, यह सोचकर मन को तसल्ली दी जाती है. समय अबूझ पहेली बना रहता है.

बड़ेबड़े मनीषी कह गए हैं—समय को समझना आसान नहीं! भर्तृहरि जैसे ज्ञानी न समझ सके, हमारी तो बिसात क्या?

भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः।

तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः ।।

कालो न यातं वयमेव याताः।

तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः।।

यानी सब कुछ नश्वर है. हम समय को नहीं जीते, समय हमें जीता है. कविता में नैराश्य झलकता है. लेकिन यह कोई नई बात नहीं है. संसार को मोहमाया से ग्रस्त और नश्वर दिखाने की प्रवृत्ति धार्मिक ग्रंथों का प्रमुख स्वर रही है. डर धर्म की धंधागिरी का प्रमुख आधार है. भविष्य के प्रति अनिश्चितता इसके लिए जिम्मेदार है. हालांकि हमेशा ऐसा नहीं होता. अनिश्चितता का गुण समय को मानवोपयोगी भी बनाता है. विशेषकर दुख और निराशा भरे दिनों में, यह विश्वास कि आनेवाला समय अपने साथ कुछ अच्छा ला सकता है, मनुष्य को भविष्य के प्रति आशावान बनाए रखता है.

समय के अनिश्चित स्वभाव के कारण ही मनुष्य उससे डरता, समय के साथ बढ़ता है. समय क्या है, कोई नहीं जानता. समय है यह सब मानते हैं. आदमी भगवान पर भरोसा भले कर ले, समय पर कभी विश्वास नहीं लाता. डरता है, वह जाने कब, किस ओर पलटनिया खा जाए. आदमी समय को अपना मानता है, मगर समय के लिए कोई खास नहीं होता. इस कारण आदमी तो क्या देवता तक समय के आगे झुकते आए हैं. समय सबका है, पर समय पर अधिकार किसी का नहीं….इसीलिए ज्ञानी लोग कहते आए हैं—समय को मनाओ, उससे टकराओ मत. वैज्ञानिक और वुद्धिजीवी कुछ भी दावा करें. समय को तीसराचौथा आयाम चाहे जो मानें, आम आदमी का उससे संबंध भावनात्मक ही होता है. उसमें उसका डर भी समाया होता है. उम्मीदें होती हैं, मगर डरीसहमी. इस तरह समय के कई रूप हो सकते हैं. वैज्ञानिकों के लिए समय एक विज्ञान है, ज्योतिषी के लिए भूतभविष्य और वर्तमान का लेखा, पुजारी के लिए धर्म और जनसाधारण के लिए वह कुछ भाग्यरेख जैसा है. दूसरे शब्दों में समय ऐसी झील है, जिसमें स्वच्छ, स्फटिकजैसी विपुल नील जलराशि भरी होती है. उसमें झांको तो अपनी ही छवि दिखाई पड़ती है.

समय को लेकर कुछ ऐसी ही अवधारणा, ऐसे ही विचार जनमानस में व्याप्त हैं. कुछ लोग समय को इतिहास मानकर संतुष्ट हो जाते हैं, कुछ के लिए वह निस्सीम विस्तार है. ग्रह, नक्षत्र, चांदसितारे, धरतीअंबर और न जाने कितने ब्रह्मांड उसमें समाए हुए हैं. कुछ ऐसे भी हैं जो समय को बहती धारा मानते हैं. भूतवर्तमान और भविष्य की चिरतरंगिणी. अदृश्य प्रवाह जो ब्रह्मांड की समस्त हलचलों, ग्रहनक्षत्र, नीहारिकाओं, नदियों, महासागरों के साथसाथ गतिमान है. समय की प्रतीतियां अनंत हैं. किसी के लिए वह ब्रह्मांड के भीतर है. किसी के लिए बाहर. कोई समय को जलधार की भांति सतत प्रवाहमान मानता है, कोई ब्रह्मांड की भांति विस्तीर्ण. समय को परमात्मा स्वरूप भी माना गया है. ईश्वर का एक नाम ‘काल’ भी है. ‘काल’ यानी मौत का देवता. जब वह आता है तो माना जाता है कि प्राणी का समय पूरा हो गया. ‘काल’ के संबंध में समय का व्यक्ति सापेक्ष अर्थ है—मनुष्य का अपना समय. धार्मिक आधार पर यह माना जाता है कि प्रत्येक मनुष्य एक सुनिश्चित समय लेकर इस संसार में आता है. जैसे ही वह समय पूरा होता है, काल उसे लेने के लिए पुनः धरती पर अवतरित हो जाता है. समय को लेकर ये मान्यताएं बहुत पुरानी हैं और लगभग सभी समाजों में मिलतीजुलती हैं. विज्ञान भी उन्हें बदल नहीं पाया है. यदि ध्यानपूर्वक देखा जाए तो समय के रूप में हम केवल घटनाओं की स्थिति बयान कर रहे होते हैं. उनके घटने की दर, उनका स्वरूप, या उनके बारे में कोई नया आकलन. इसके बावजूद समय का प्रभाव इतना गहरा होता है कि घटनाओं के होने को ही उसकी प्रतीति मानने का साहस नहीं कर पाते. अथवा समय को जानने की कोशिश में हम दरअसल कुछ और जान रहे होते हैं. जैसेजैसे हम समय के बारे में आगे विचार करेंगे, ये रहस्य स्वतः अनावृत होते जाएंगे.

समय की अवधारणा कब जन्मी, यह ठीकठीक बता पाना संभव नहीं. सिर्फ कल्पना की जा सकती है कि आदमी ने जब सूरज को समय पर उगते और डूबते देखा. तारामंडल की उदयअस्त होती कलाबाजियां देखीं. बालक को जन्मते, बड़ा होते, फिर बूढ़ा होकर मौत के गाल में समाते हुए पाया—तब उसने माना कि कुछ है जो कभी उसके साथ चलता है, तो कभी उसको पीछे ढकेल आगे निकल जाता है. जो अंतरिक्ष की तरह सर्वव्यापी, नदी की तरह पलपल प्रवाहमान है. जिसका कोई ओर है न छोर. जो घटनाओं को क्रम देता है. उन्हें एकदूसरे से संबद्ध करता है. कल, आज और कल की इस चिरतरंगिणी को मनुष्य ने ‘समय’ नाम दिया. यह संज्ञा इतनी मनोहारी थी कि आगे जो भी दार्शनिक और विचारक आए, सभी ने उसकी पुष्टि की. वैज्ञानिकों तक की हिम्मत न हुई कि समय की परिकल्पना तथा उससे जुड़े लोकविश्वासों को चुनौती दे सकें. मान्यता चाहे जैसी हो, समय भी उनके विचारों के विकास में सहायक बना रहा.

दार्शनिकों ने समय के बारे में तरहतरह की परिकल्पनाएं प्रस्तुत कीं. कुछ ने समय को घटनाओं और परिवर्तन के आधार पर परिभाषित किया तो कुछ घटनाओं को समय के परिप्रेक्ष्य में, उसके भीतर घटते हुए माना. कुछ विचारक समय को अनंत का प्रतिरूप, ब्रह्मांड के समानांतर मगर उससे स्वतंत्र सत्ता मानते रहे, तो कुछ ने उसको भूतवर्तमान और भविष्य के रूप में देखा. ‘टाइमस’ में प्लेटो ने समय को अनंत की संज्ञा दी है. उसके अनुसार, ‘समय अनंत की गत्यात्मकता को दर्शानेवाली अपरिमेय सत्ता है.’ घटअघट सबकुछ उसमें समाया रहता है. कुछ मामलों में समय ब्रह्मांड से भी विस्तीर्ण है. चूंकि ब्रह्मांड की प्रत्येक घटना किसी न किसी अंतराल में घटित होती है; और स्वयं ब्रह्मांड भी घटनाओं की अपरिमित शृंखला में है—अतः कहा जा सकता है कि समय ब्रह्मांड से भी विस्तीर्ण है. दूसरे शब्दों में ब्रह्मांड का भी समय होता है. उसकी आयु है, उसके गर्भ में घटनेवाली तरहतरह की घटनाएं और गतियां हैं. इसलिए वह भी समय की पकड़ से दूर नहीं है. कुल मिलाकर प्लेटो के अनुसार समय ऐसी अपरिमेय रचना है, जिसमें सृष्टि की समस्त घटनाएं घटित होती हैं.

मनुष्य समय की सत्ता पर लगभग पिछले 2500 वर्ष से निरंतर विचार करता आया है. बौद्ध दर्शन से लेकर सुकरात, प्लेटो, अरस्तु आदि ने अपनीअपनी तरह से समय की विवेचना की है. इसके बावजूद समय की सत्ता को लेकर विद्वानों के बीच आज भी सहमति नहीं बन पाई है. अनेक प्रश्न आज भी उलझे हुए हैं. मसलन समय क्या है? यदि ब्रह्मांड न हो क्या तब भी समय रहेगा? क्या मानवमस्तिष्क का समय से कोई प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष संबंध है? भूत, वर्तमान और भविष्य क्या सचमुच घटनाओं से स्वतंत्र हैं, अथवा ये केवल भ्रांति और मानव मस्तिष्क की उपज हैं? कल, आज और कल क्या केवल समयबोध का प्रतीक हैं और समय वास्तव में कालरहित है? क्या कालरहित समय और समयरहित ब्रह्मांड की कल्पना की जा सकती है? ब्रह्मांड और समय दोनों की उत्पत्ति क्या एक साथ हुई? क्या ब्रह्मांड की भांति समय भी भौतिक नियमों से पूरी तरह अनुशासित होता है? ऐसे ही अनेक प्रश्न हैं, जो मानवमस्तिष्क को हजारों वर्षों से मथते आए हैं. मानवीय मेधा आज तक उनका सर्वसम्मत निदान नहीं खोज पाई है. न्यूटन, अरस्तु जैसे कई दार्शनिकों, वैज्ञानिकों ने समय की सत्ता को स्वीकारा है. समय के प्रत्यय का विज्ञान में भी भरपूर उपयोग होता है. प्लेटो समय को अनंत का पर्याय मानता है. उसके अनुसार—

प्राणीमात्र की प्राकृतिक क्षमताएं अपरिमेय थीं. यह संभव नहीं था वह उन क्षमताओं को ब्रह्मांड पर पूरी तरह न्योछावर कर दे, बजाय इसके उसने अपरिमेय की चलतीफिरती छवि बनाने का फैसला किया. उसने स्वर्ग से ऐसी अपरिमेय छवि बनाने का आदेश दिया तब स्वर्ग ने वह बनाया, जिसे आज हम समय कहते हैं. स्वर्ग यानी अनंत की अकेली अपरिमेय छवि, जो अनंत तक बनी रहेगी.’2

समय के बारे में प्लेटो के आदर्शवादी दृष्टिकोण की अपेक्षा अरस्तु व्यावहारिकता पर जोर देता है. मानव मस्तिष्क एवं समय की अंतर्निभरता पर टिप्पणी करते हुए वह लिखता है—

यदि मस्तिष्क अनुपस्थित है तब समय अनुपस्थित होगा या नहीं, ऐसा सवाल किया जा सकता है. मगर उसके बारे में जानना चाहिए कि यदि किसी के पास किसी के पास गिनने लायक कुछ नहीं है, वहां ऐसा कुछ नहीं होगा, जिसको गिना जा सके.’3

जाहिर है, अरस्तु की समयसंबंधी अवधारणा व्यावहारिक और जनसाधारण के सोच के करीब है. वह मानता है कि समय स्वतंत्र है, उसकी अपनी सत्ता है, गति है. सृष्टि की प्रत्येक घटना, परिवर्तन समय का आभास कराता है. तदनुसार जहां परिवर्तन है, वहां समय अथवा उसकी प्रतीति है. ‘समय भूत और भविष्य के संदर्भ में घटनाओं की आवृत्ति है.’ लेकिन समय केवल कल आज और कल नहीं हैं. भूत, वर्तमान और भविष्य केवल मनुष्य के समयबोध को दर्शाते हैं. वास्तविक समय इनसे अलग और स्वतंत्र है. अरस्तु का यह संबोधन समय को लेकर गहरे निहितार्थ रखता है. यदि ध्यानपूर्वक देखा जाए तो इस परिभाषा में अरस्तु ने जहां समयसंबंधी प्लेटो की मान्यताओं का सम्मान किया है, वहीं समय को गतिशीलता का लक्षण मानकर, मतवैभिन्नय भी बनाए रखा है. हालांकि समय को लेकर प्लेटो को योगदान भी संदेह से परे नहीं है. आगे चलकर समय के बारे में जो दो प्रमुख दृष्टिकोण बने, उनमें से एक के बीजतत्व प्लेटो के दर्शन में तथा दूसरे के अरस्तु के विचारों में दिखाई पड़ते हैं.

आधुनिक वैज्ञानिक ब्रह्मांड की कुल आयु को लेकर स्वयं कोई दावा नहीं करते, ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत जिसके अनुसार पदार्थ कभी नष्ट नहीं होता, केवल रूपांतरित होता रहता है, कदाचित इसके आड़े आता है. लेकिन उनका मानना है कि एक न एक दिन, भले वह समय करोड़ों, अरबों वर्ष बाद हो—वर्तमान ब्रह्मांड और उसके साथ समय भी नए रूप को प्राप्त हो सकता है. वैज्ञानिक मानते हैं कि समय का भी जन्म हुआ है. वे समय और ब्रह्मांड की उत्पत्ति एक साथ, एक ही घटना से मानते हैं. हाकिंग ब्रह्मांड के निर्माण के रहस्य की गुत्थी सुलझाने के लिए ‘समय का इतिहास’ को माध्यम बनाते हैं. एक वैज्ञानिक के लिए ब्रह्मांड एवं समय के उद्भवकाल को एक मानना सैद्धांतिक रूप से सही हो सकता है. मगर इससे ‘समय का संक्षिप्त इतिहास’ केवल ब्रह्मांड की उत्पत्ति तक सीमित रह जाता है. समय की आयु भले न हो, परंतु ब्रह्मांड की आयु है, इसे निरंतर फैलता हुआ ब्रह्मांड भी सिद्ध करता है. वह दिखाता है कि ब्रह्मांड सतत परिवर्तनशील है. कल्पना कीजिए निरंतर फैलता हुआ ब्रह्मांड कुछ लाख या करोड़ वर्षों के बाद, किसी नई संरचना में ढल जाता है. अथवा अपने आंतरिक परिवर्तनों के चलते पुनः परमबिंदू में सिमट जाता है—तब समय का नया रूप क्या होगा. क्या समय या उसकी प्रतीति दुबारा नष्ट हो जाएगी. स्टीफन हाकिंग के विचार हमें इसी निष्कर्ष तक ले जाते हैं. मगर इसमें दृष्टि को ही सृष्टि मान लेने जैसा दोष है. इससे यह विचार कि सबकुछ समय के साथ घटता है, संदेह के दायरे में आ जाता है.

लोकव्यवहार में समय के दो रूप देखने को मिलते हैं. पहला दिनरात, वर्ष, ऋतु काल जिसमें जीवन की दैनंदिन घटनाएं संचालित होती हैं. दूसरा समय को सर्वव्यापी, अनंत, ब्रह्मांडनुमा रचना मानना जिसमें सृष्टि की प्रत्येक घटना घटित होती है. आस्थावान लोगों के लिए संभव नहीं होता कि वे समयसंबंधी किसी भी प्रतीति की उपेक्षा कर सकें. समय उनके लिए अनंत प्रवाह, देवता तुल्य और आराधनयोग्य है. सामान्यतः वे समय से डरते, उसका उपकार मानते हैं तथा उसे धर्म की भांति नियामक सत्ता मानकर, जीवन को उसके अनुसार ढालने के लिए प्रयत्नरत रहते हैं. लेखकों और कवियों ने समय को परमतत्व का विस्तार मानकर, उसका भांतिभांति से महिमा मंडन किया है. दार्शनिकों ने समय को केंद्र में रखकर जीवनरहस्यों की व्याख्या की. दूसरी ओर ऐसे भी कई भौतिकवादी विचारक हैं जिन्होंने समय की सत्ता पर खरेखरे सवाल उठाए हैं. मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि व्यक्ति पर समय का प्रभाव उसकी मनःस्थिति और परिवेश के अनुसार पड़ता है. तदनुसार समय व्यक्तियों पर अलगअलग प्रभाव डालता है. इन परस्पर विरोधी विचारधाराओं के बीच कुछ प्रश्न लगातार सिर उठाए रहे.कृ

समय: दार्शनिक पहेली

माना कि समय है, उसकी प्रतीति है. पर वह है क्या? कब उसका जन्म हुआ? ब्रह्मांड के साथ अथवा उससे पहले? यदि पहले तो कितना? समय क्या घड़ी की टिकटिक, नदी की कलकल की भांति आगे बढ़ने वाला प्रवाह है? अथवा ऐसी निस्सीम सत्ता जिसमें घड़ी की टिकटिक, नदी की कलकल, चांद, सितारे, सूरज, ग्रहउपग्रह जैसे ब्रह्मांड के कोटिक कोटि पिंड समाए हुए हैं? समय की प्रतीति घटनाओं के माध्यम से होती है, तो क्या वह घटनाओं की अन्वति मात्र है? घटनाएं समय में बीतती हैं या घटनाओं के साथ समय की उलटबांसी चलती है? अगर वह घटना नहीं है तो उसकी प्रतीति का आधार क्या है? क्या घटनाओं से बाहर समय की अनुभूति संभव है? समय और समयबोध में अंतर क्या है? क्या समय और समयबोध दोनों साथसाथ जन्मे? यदि नहीं तो उनके बीच अंतराल कितना है? दोनों में पहले कौन जन्मा? मानवमन में हजारों वर्ष पहले कौंधे ये प्रश्न आज भी उसी तरह बने हुए हैं. समय को लेकर जो चुनौतियां ईसा से चारपांच सौ वर्ष पहले थीं, वे किसी न किसी रूप में आज भी मुंह बाए खड़ी हैं. समय को लेकर महत्त्वपूर्ण चिंतन बौद्ध, न्याय, वैशेषिक आदि दर्शनों में हुआ है. मगर आधुनिक भारतीय विचारकों ने इस क्षेत्र को उपेक्षित ही रखा है. जबकि समय की दार्शनिक विवेचना एक प्रकार से इस विश्वसमाज की वस्तुनिष्ट विवेचना जैसी होगी. वह हमें धर्म के नाम पर चल रहे अनेकानेक पाखंडों और अज्ञानताओं से मुक्ति दिला सकती है. संतोष है तो बस इतना है कि प्रश्न का होना भी कम नहीं होता. समस्या हो तो मानवीय जिजीविषा उसका समाधान कभीकभी खोज ही लेती है.

समय की व्युत्पत्ति को लेकर वैज्ञानिकों के अलगअलग विचार हैं. स्टीफन हाकिंग समय की उत्पत्ति को ब्रह्मांड के जन्म से जोड़ते हैं. ‘समय का संक्षिप्त इतिहास’ में उन्होंने समय की व्युत्पत्ति महाविस्फोट की घटना से मानी है. हाकिंग के अनुसार, महाविस्फोट से पहले पूरा ब्रह्मांड अनंत संपीडित ‘परम बिंदू’;ैपदहनसंतपजलद्ध अथवा ‘परमएैक्य’ की अवस्था में था. लगभग 15 अरब वर्ष पहले निंरतर बढ़ता आंतरिक दाब ही ‘परम बिंदू’ के महाविस्फोट तथा ब्रह्मांड के जन्म का निमित्त बना था. हाॅकिंग के अनुसार ब्रह्मांड के जन्म से पहले समय अथवा किसी वस्तु की कोई कल्पना संभव नहीं है. यहां हाकिंग अरस्तु और न्यूटन के विचारों से सहमत दिखाई पड़ते हैं, मगर एक उलझन है. न्यूटन और अरस्तु समय को ‘परमतत्व’ के तुल्य मानते हैं. उनके अनुसार समय की अपनी सत्ता है और वह भौतिक घटनाओं से स्वतंत्र है. समय घटनाओं पर नजर रखता तथा उनके होने के प्रभाव को दर्शाता है. स्टीफन हाकिंग सहित ये दोनों वैज्ञानिक भी समय की उत्पत्ति को ब्रह्मांड के जन्म से जोड़ते हैं. यह उनकी विवशता है. विज्ञान तर्क के सहारे चलता है. चूंकि ब्रह्मांड के जन्म से पहले समय की सत्ता का प्रमाणन असंभव है. इसलिए उनकी वैज्ञानिक बुद्धि समय की उत्पत्ति को ब्रह्मांड की उत्पत्ति से पीछे नहीं ले जा पाती. दार्शनिक के लिए ऐसी कोई बाध्यता नहीं होती. उसके लिए विचार का तर्क सम्मत होना पर्याप्त है. जाहिर है, समय की व्युत्पत्ति की वैज्ञानिक व्याख्या एक दार्शनिक के लिए अनेक सवाल छोड़ जाती है. सबसे पहला और महत्त्वपूर्ण प्रश्न तो यही है कि ब्रह्मांड और समय को एकदूसरे से संबद्ध करने का आधार क्या है? यदि दोनों को परस्पर जोड़ा जाता है तो माना जाएगा कि कि वे परस्पर अन्योन्याश्रित हैं, ऐसे में समय को ‘परम’ अथवा ‘स्वतंत्र’ मानना अनुचित होगा, जबकि प्लेटो, अरस्तु, न्यूटन से लेकर अनेक आधुनिक वैज्ञानिक समय को परिवर्तन निरपेक्ष और स्वतंत्र मानते आए हैं.

अरस्तु से लेकर हाकिंग तक इन समस्याओं पर कोई विचार नहीं करते. न ही किसी प्रकार का सवाल उठाते हैं. उनका यह अभीष्ट भी नहीं है. इसलिए कि हाकिंग हो या न्यूटन अथवा अरस्तु सभी का ध्येय सृष्टि के जन्म से जुड़ी जिज्ञासाओं के प्रति वैज्ञानिक नजरिया पेश करना था. उससे जुड़े दार्शनिक प्रश्नों का समाधान करना नहीं. अब यदि हाकिंग की स्थापना को सत्य मान लिया जाए, मान लिया जाए कि सृष्टि का जन्म महाविस्फोट से ही हुआ था, तब भी समय को लेकर कुछ सवाल हमेशा बने रहते हैं. जैसे कि पदार्थ को निरंतर संपीडित होतेहोते ‘परमबिंदू’ की अवस्था तक आने में कितना समय लगा था? वह परमबिंदू की अवस्था में कब तक रहा? यदि समय घटनाओं की अन्वति अथवा उनके परिवर्तन को दर्शाता है तो ‘परमशून्य बनने तथा उसके विखंडित होने के बीच की अवधि को भी समय क्यों न मान लिया जाए? क्या परम बिंदू बनने तथा ‘महाविस्फोट’ का क्षण दोनों एक हैं? क्या परमबिंदू से पहले भी सृष्टि का कोई स्वरूप था? यदि परमबिंदू बनना एक घटना है तो उसके बनने में लगने वाले समय की उपेक्षा हम कैसे कर सकते हैं? परम शून्य की अवस्था में आने से पहले ब्रह्मांड और समय का क्या संबंध था? हाकिंग इन सवालों को छोड़ आगे बढ़ जाते हैं. उनके अनुसार ब्रह्मांड से पहले समय की परिकल्पना का वैज्ञानिक आधार उन्हें नजर नहीं आता. हाकिंग का कहना सही हो सकता है, लेकिन दार्शनिक की दृष्टि से यह जल्दबाजी का निष्कर्ष है. विषय ही सीमा को सत्य की सीमा मान लेने के कारण प्रायः ऐसा होता रहता है. ध्यातव्य है कि हाकिंग का ध्येय ब्रह्मांड की उत्पत्ति जुड़ी वैज्ञानिक गुत्थियों को सुलझाना था. ऐसा नहीं है कि समय पर वैज्ञानिक दृष्टि से विचार नहीं किया जा सकता. न्यूटन के गति के नियमों से लेकर हाइंजवर्ग के अनिश्चितता के सिद्धांत तक सभी में समय का प्रयोग किया जाता है. आइंस्टाइन के विचार के अनुसार समय चौथा आयाम है. हाइंजवर्ग भी परमाणु के भीतर मूलकणों की वास्तविक उपस्थिति को जानने के लिए समय को चौथे आयाम के रूप में स्वीकार करते हैं. लेकिन प्रकारांतर में वे दोनों ही किसी पिंड अथवा मूलकण की स्थिति को समझने के लिए चौथे आयाम के रूप में मानव मस्तिष्क द्वारा कल्पना के अतिरिक्त विस्तार, अधिक बौद्धिक श्रम की अपेक्षा कर रहे होते हैं.

दर्शन के विद्यार्थी के लिए समय की विवेचना से जुड़े प्रश्न बड़े प्रासंगिक हैं. एक वैज्ञानिक ब्रह्मांड के जन्म से समय की उत्पत्ति को मानकर संतुष्ट हो जाता है. क्योंकि उससे पहले किसी भी सत्ता की कल्पना उसके लिए असंभव है. असंभव कल्पना करना विज्ञान का क्षेत्र भी नहीं है. दर्शन तर्क की विचारभूमि पर विकसित होता है. दार्शनिक के लिए समय को लेकर सामान्यतः दो विकल्प होते हैं. समय को अनंत प्रवाह मानते हुए गहन सृष्टि के जन्म से पहले ‘परम बिंदू’ बनने से लेकर महाविस्फोट तथा उसके बाद की समस्त घटनाओं का,े उसके विभिन्न अंतरालों में घटी हुई घटनाएं माने. दूसरे समय और महाविस्फोट दोनों का जन्म एक साथ मानते हुए समय को घटनापरिवर्तन के साक्षी के रूप में देखे. लेकिन ब्रह्मांड एवं समय की व्युत्पत्ति को परस्पर असंबद्ध करना, दर्शन की दृष्टि से भी इतनी समस्याएं उत्पन्न करता है, जिनका समाधान असंभव है. यदि समय की व्युत्पत्ति को ब्रह्मांड से पहले मान लिया जाए, तब एक और ब्रह्मांड अथवा ऐसी रचना की परिकल्पना करनी होगी, जिसमें समय रह सके; अथवा जिसके साथ वह अपने ‘होने’ को दर्शा सके. उसके बाद सिलसिला अनंत तक चलता जाएगा. चूंकि समय की सत्ता की सिद्धि बगैर परिवर्तन के असंभव है और दृश्यमान जगत में परिवर्तन के लिए वस्तु जगत की मौजूदगी अपरिहार्य है, इसलिए समय के इतिहास के बहाने वैज्ञानिक दरअसल ब्रह्मांड अथवा ब्रह्मांडीय हलचलों का इतिहास ही बता रहे होते हैं; और किसी ठोस तर्क के अभाव में दार्शनिक भी समझौते की ओर बढ़ते नजर आते हैं. अधिकांश यह मान लेते हैं कि समय और ब्रह्मांड एक ही है. अथवा दोनों एक ही सत्ता की भिन्न प्रतीतियां हैं. यदि यह सही है तब समस्या होती है कि ब्रह्मांड की व्याख्या के लिए समय की अवधारणा क्यों जरूरी है?

दूसरे शब्दों में समय को घटनाओं की प्रतीति मानते हुए हम केवल समयबोध अथवा उसकी व्यावहारिक उपस्थिति को महत्त्व दें. जैसा अरस्तु और न्यूटन जैसे वैज्ञानिक भी मानते आए हैं, मान लें कि प्रत्येक परिवर्तन समय सापेक्ष होता है. इससे स्टीफन हाकिंग, न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों, जिनके लिए ब्रह्मांड के जन्म से पहले समय की उपस्थिति असंभव है, की मान्यता अवधारणा को स्वीकृति मिलेगी. हालांकि उस अवस्था में समय की निरपेक्षता का प्रश्न आइंस्टाइन के सापेक्षता के सिद्धांत से संघर्ष करता हुआ नजर आएगा. विकल्प यह भी है कि समय को अनंत एवं निरपेक्ष सत्ता के रूप में पहचाना जाए, जिसमें समस्त घटनाएं, परिवर्तन आदि बनतेमिटते रहते हैं. मानें कि समय सभी का साक्षी, केवल दृष्टामात्र है. प्लेटो ने भी उसे अनंत के साथी और सहधर्मी के रूप में देखा है, यह भी हो सकता है कि समय के व्यावहारिक बोध जिसे हमारी स्मृति तय करती है, जो परिवर्तन को समझने के लिए जरूरी है, को मान्यता देते हुए समय की स्वतंत्रता जैसे सवालों से मुक्ति पा लें. आइंस्टाइन, स्टीफन हाकिंग आदि मानते हैं कि विशिष्ट परिस्थितियों में समय का आचरण वह नहीं रह जाता, जैसा सामान्य अवस्था में होता है. उनके अनुसार समय स्थिति सापेक्ष है. और यदि वह स्थिति सापेक्ष है, तब उसके संदर्भ में स्वतंत्रता, स्वायत्तता जैसे विशेषण बेमानी हो जाते हैं. क्योंकि समय को यदि परिवर्तन की दर अथवा घटनाओं की प्रतीति मात्र माना जाए तो प्रत्येक वस्तु अथवा घटना के लिए स्वतंत्र समय की परिकल्पना करनी होगी. अनंत घटनाओं के लिए समय के अनंत प्रारूपों की कल्पना करने से उचित होगा कि समय को वस्तुजगत से निरपेक्ष मान लिया जाए. मान लिया जाए कि ब्रह्मांड की भांति समय भी अनंत और अपरिमेय है, जो उसके समस्त परिवर्तनों का साक्षी है. तीसरी धारणा के समर्थक विचारक वे हैं जो समय की सत्ता को घटनाओं से परे मानने के लिए तैयार ही नहीं हैं, जो समय की किसी भी प्रकार की उपस्थिति को नकारते हैं. जिनके अनुसार समय मनुष्य की कल्पना या भ्रांति जैसा कुछ है, जिसे वह घटनाओं के अनुक्रम की व्याख्या के लिए अपनाता है.

समय की सत्ता के नकार अनेक लोगों को चैंका सकता है. हजारों वर्षों से चली आ रही इस मान्यता का प्रतिकार उन्हें अनोखा लगेगा ही. लेकिन हमें जानना चाहिए कि समय की सामान्य प्रतीति घटनाओं से जुड़ी है. मनुष्य परिवर्तन की रफ्तार को समझने के लिए समयबोध का सहारा लेता है. घटनाशून्य ब्रह्मांड समय शून्य होगा, इसमें भी संदेह नहीं है. हाकिंग इसी आधार पर महाविस्फोट से पहले समयशून्यता की स्थिति स्वीकार करते हैं. तो समय क्या केवल अंतराल है? घटनाओं के बीच का शून्य? निरंतर परिवर्तनकारी जगत में मनुष्य होश संभालते ही स्वयं को घटनाओं के प्रवाह में स्वयं को पाता है. उन्हीं का अवलोकन करते, हिसाबकिताब रखते हुए समय का प्रत्यय उसके अवचेतन में अनायास पैठ जाता है. चूंकि मनुष्य घटनाओं का दृष्टा ही नहीं भोक्ता भी है. इसलिए उनका प्रभाव इतना गहरा और स्थायी होता है कि उसके प्रभावक्षेत्र से बाहर आ पाना जनसाधारण तो क्या अच्छेअच्छों के लिए संभव नहीं होता. हालांकि यह आवश्यक नहीं कि मनुष्य के आसपास घटनेवाली सभी घटनाएं उसे समानरूप से प्रभावित करती हों. प्रायः दो प्रकार की घटनाएं मनुष्य के आसपास में अंतरिक्ष में घट सकती हैं. पहली वे जिनका मनुष्य से सीधा संबंध हो. दूसरी वे जिनका उससे कोई प्रत्यक्ष संबंध न हो. हालांकि यह आवश्यक नहीं कि केवल वही घटनाएं मनुष्य को प्रभावित करें, जिनका उससे प्रत्यक्ष संपर्क हो. अनेक ऐसी घटनाएं हो सकती हैं, जिनका मनुष्य से तात्कालिक रूप से कोई संबंध नहीं है, बावजूद इसके वे तात्कालिक रूप से, अथवा कुछ अंतराल के पश्चात मनुष्य को प्रभावित करती हैं. कह सकते हैं कि समय की प्रतीति प्राणी चेतना के आरंभिक बिंदू से जुड़कर अंत तक बनी रहती है. उल्लेखनीय है कि मानवमस्तिष्क घटनाओं के ही माध्यम से समय का आकलन करता है. रातदिन, ऋतुकाल, धूप, आकाश में चांदतारों की बदलती स्थितियां मस्तिक पर प्रभाव डालती हैं. उनमें से अनेक स्थितियां ऐसी होती हैं, जिनकी एक निश्चित अंतराल के बाद पुनरावृत्ति होती है. धीरेधीरे मानवमस्तिष्क उनकी तारतम्यता से अनुकूलित होने लगता है. यही अनुकूलन समयबोध के रूप मंे जाना जाता है.

समय के विवेचन का सामाजिकसांस्कृतिक पक्ष भी है. दरअसल समय के प्रत्यय का जीवन में इतने प्रकार से प्रयोग होता है कि वह सामाजिकसांस्कृतिक संबंधों के निर्धारण में प्रमुख नियामक शक्ति के रूप में नजर आता है. जन्म के साथ मनुष्य का अपने मातापिता; तथा उनके माध्यम से शेष समाज के साथ संबंध बनता है. उसी से मनुष्य के व्यक्तिगत समय की शुरुआत होती है. मृत्यु के साथ मान लिया जाता है कि संबंधित व्यक्ति का समय पूरा हो चुका है. प्राणिमात्र के संबंध में जीवन और मृत्यु यद्यपि जैविक घटनाएं हैं, जैसेजैसे मनुष्य का जीवन आगे बढ़ता है, वैसेवैसे अनेक घटनाएं उनके जीवन में घटती हैं. उनसे उसके बदलते जीवन और समय की प्रतीति होती है. वृद्धावस्था में समय जितनी तेजी से बीतता हुआ महसूस होता है, वैसा युवावस्था में नहीं हो पाता. कारण स्पष्ट है. वृद्धावस्था में मनुष्य जीवन के सूक्ष्म अवलोकन से कट जाता है. एक युवा लिए दिन का आशय सुबह व्यायाम, काॅलेज, खेल, पढ़ाई, दोस्तों से साथ मटरगश्ती, टेलीविजन, सिनेमा, पुस्तकालय आदि हो सकता है. अपने दिनभर के समय को वह इन्हीं कार्यों में बांटकर उन्हें टुकड़ेटुकड़े जीता है. वृद्धावस्था में बाहरी कार्यकलाप सिमट जाते हैं. जीवन बच्चों के साथ बातचीत, भोजन, पुरानी यादों और निद्रा में सिमट जाता है. इसलिए समय भागता हुआ महसूस होता है. यदि बीमारी हो तो बात भिन्न है. तब भी देह के बाहर समय की प्रतीति घट जाती है.

आशय है कि मनुष्य का समयबोध जीवन के व्यावहारिक पहलुओं से जुड़ा होता है. इस बीच अव्यावहारिक और अनावश्यक है उसे प्रायः छोड़ दिया जाता है. उदाहरण के लिए किसी मनुष्य की जीवनावधि जन्म से मृत्यु के क्षण तक मानी जाती है. चूंकि जन्म और मृत्यु साक्षात घटनाएं हैं, इसलिए उन्हें जीवन यात्रा के पहले और अंतिम पड़ाव के रूप में देखने की परंपरा, लगभग सभी समाजों में मिलती है. जबकि हम सभी जानते हैं कि प्राणीमात्र का जीवन गर्भाधान की प्रक्रिया संपन्न होने के साथ ही आरंभ हो जाता है. अनेक महामानव अपने विचारों और कर्म से दुनिया को अपनी मृत्यु के बाद भी प्रभावित करते हैं और इस तरह समाज में उनकी अभौतिक उपस्थिति बनी रहती है. इसके बावजूद गर्भस्थ भ्रूण की अवधि को हम मनुष्य की जीवनावधि का हिस्सा नहीं मानते. अनिश्चितता अथवा सामाजिक शुचिता के लिहाज से भी उसे मनुष्य की कुल जीवनावधि में जोड़ना उचित नहीं माना जाता.

समय को लेकर मानवमात्र की अनुभूति दो प्रकार की होती है. पहली उसके व्यक्तिगत जीवन और अनुभवों को लेकर. जिसमें वह सूरज को उदयअस्त होते देखता है. व्यक्ति की दिनचर्या सुबह के साथ आरंभ हो जाती है. दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होकर काम पर जाना, समयानुसार भोजन और दूसरे दायित्वों को निपटाना, फिर शाम होतेहोते घर लौटकर रात्रिविश्राम करना. इस तरह उसके दिमाग पर समय का जो प्रत्यय बनता है. उसको भौतिक समय कह सकते हैं. दूसरे शब्दों में व्यक्ति की पूरी दिनचर्या भौतिक समय के साथ एक संवाद है. उसे मनुष्य का व्यक्तिगत समय भी कह सकते हैं. लेकिन जब कोई मनुष्य समय के साथ व्यवहार करने के बजाय उसके बारे में सोचने लगता है. जब वह सोचता है कि न केवल उसका अपना जीवन बल्कि उसके साथियों, जड़चेतन सभी, जो जीवित हैं और जो नहीं हैं, वे भी जो हजारोंलाखों वर्ष पहले मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं, साथ में धरती, ग्रहनक्षत्र, चरअचर, ब्रह्मांड सभी समय के भीतर आजा रहे हैं; यानी जब वह अपने अलावा दूसरों के समय के बारे में सोचता है तो उसे समय को लेकर कुछ और ही अनुभव होता है. तब उसके मन में अपरिमेय समय की छवि आकार लेने लगती है. समय की अपरिमेयता के बोध ने ही जीवन की नश्वरता के विचार को जन्म दिया है. उसी से आदमी ने माना कि कुछ है जिसमें सब कुछ बीत रहा है. यहां तक कि उसका जीवन भी. जो इतना शक्तिशाली है कि बड़े से बड़े पहलवान को एक ही झटके में धूल चटा दे. और इतना व्यापक भी कि ब्रह्मांड की एक भी घटना, एक भी प्राणी, चरअचर उससे बाहर नहीं.

समय की अनिश्चितता के बोध ने डर को जन्म दिया. डर ने अमरत्व की कल्पना को. जरामरण से घबराए इंसान ने समय को ताकतवर सत्ता मान लिया गया. समय की मेहरबानी बनी रहे इसके लिए मनौतियां मांगी जाने लगीं. भयभीत मनुष्य समय से दोस्ती गांठने, उसके साथ सातत्य बनाए रखने की कोशिश करने लगा. समय के साथ बने रहने की चाहत ने पुनर्जन्म की संकल्पना को जन्म दिया. मृत्यु के चंगुल से पार छिटक जाने की चाहत का नाम मोक्ष पड़ा. वह अमरत्व की ऐसी कल्पना थी, जिसपर समय की मार भी बेअसर थी. समय के साथ बने रहना. उसको दौड़ में मात दे देना पुरुषार्थ का लक्षण मान लिया गया. समय के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ने वाले निस्प्रह पुरुषार्थी को कर्मयोगी कहा गया. चूंकि समय के संग दौड़ में बने रहना, सभी के लिए सदैव संभव नहीं होता. समय अच्छेअच्छों को छका देता है, कथित देवता भी उसके प्रभाव से मुक्त नहीं हैं—अतएव स्वार्थी पंडाओं ने भाग्य, प्रारब्ध, कपालरेख, नियतिचक्र, कालचक्र, गति जैसी संज्ञाओं और विशेषणों की परिकल्पना की. फलित ज्योतिष का गूदा स्वयं खाकर गुठलियां वे जनसाधारण में बांटने लगे. निराशा से उबरने के आदमी जबतब उनकी शरण लेने लगा. भाग्य कर्महीनों की शरणस्थली बना, पुरुषार्थ कर्मयोगियों की पहचान.

मानव जीवन समय से अनुशासित है. तो क्या समय की संकल्पना मनुष्य की सामाजिकता का निकष् है? क्या अकेले व्यक्ति का भी कोई समय होता है? शायद नहीं; या शायद हां? अकेले व्यक्ति के लिए भी घटनाएं होंगी. उन्हें देखकर उसको अपने आसपास गतिशीलता का आभास होगा. इससे वह वर्तमान को अपने सामने से गुजरते हुए देखेगा. यानी जैसा हमने पीछे कहा, व्यक्तिगत रूप से मनुष्य भौतिक समय के संपर्क में रहता है. मगर नितांत अकेले, मानव समाज से कटे हुए मनुष्य का समयसंबंधी सोच ठीक वह नहीं होगा, जो समाज में रहनेवाले मनुष्य का है. उसे स्मृति की आवश्यकता शायद ही पड़ेगी. चूंकि अनुभवों को बांटने के लिए दूसरा कोई नहीं होगा, इसलिए मस्तिष्क और स्मृति का उपयोग भी धीरेधीरे घटता जाएगा. इस प्रकार अकेला, समाज से कट चुका मनुष्य, पशुपक्षियों की भांति घटनाओं की तारतम्यता, उनकी परिवर्तनशीलता का बारीक हिसाबकिताब शायद ही रख पाएगा. यदि रखेगा भी तो सबकुछ गड़बड़ा भी सकता है. इसलिए कि उसके निर्णय और बोध को चुनौती देने वाला कोई न होगा. दूसरे शब्दों में समाज से कटे व्यक्ति का समयबोध हुआ भी तो वह सामूहिक समयबोध से काफी भिन्न और सीमित होगा. वह कुछ ऐसा होगा जैसी पशुपक्षियों की अंतश्चेतना, जो अपनी जैविक आश्यकताओं के आधार पर सौर दिवस में प्रकृतिचक्र से तालमेल बनाए रखती है. प्रकृति के निरंतर साहचर्य में रहते हुए वे अपनी जैविक आवश्यकताओं और परिवेश के बीच सामंजस्य स्थापित कर लेते हैं. दिन की पहली झलक के साथ उन्हें भोजन की चिंता सताने लगती है. अंबर से उतरता उजाला देखते ही चिडि़याओं में उड़ान भरने का हौसला आ जाता है. पशु अपनेअपने काम की ओर निकल जाते हैं. इससे मनुष्य की समयसंबंधी अवधारणा पर सामाजिकता के प्रभाव को आंका जा सकता है. दूसरे शब्दों में मनुष्य के समयसंबंधी जो भी विचार आज हमें उपलब्ध हैं, वे समाजसापेक्ष भी हैं.

स्मृति मनुष्य के लिए प्रकृति का अनोखा वरदान है. वह घटनाओं की आवृत्ति तथा उनका क्रमानुक्रम सहेजने में सहायक सिद्ध होती है. उसके अभाव में सूरज का उगना और अस्त होना महज प्राकृतिक घटनाएं होतीं. स्मृति घटनाओं को सहेजने का दायित्व निभाती है. मनुष्य के आसपास जो घटनाएं घटती हैं, स्मृति उन्हें एकएक कर दर्ज करती जाती है. वे स्मृतियां मस्तिष्क में अपने स्वरूप एवं क्रमानुक्रम के साथ दर्ज होती जाती हैं. दो घटनाओं का अंतराल समय की प्रतीतियों को जन्म देता है. कह सकते हैं कि परिवर्तन शून्यता ही समयशून्यता है. लेकिन घड़ी की सुइयों को रोकने से समय नहीं रुकता. इसलिए परिवर्तन शून्यता का अभिप्राय प्रेक्षक और प्रेक्षित दोनों की आंतरिक और बाह्य ठहराव से है. लेकिन मानवमस्तिष्क की सीमा है कि वह अति उच्च गति और अत्यंत निम्न गति के परिवर्तनों को पकड़ नहीं पाती. खासतौर पर अकेलेपन की अवस्था में. वैज्ञानिक प्रयोग इस तथ्य को प्रमाणित करते हैं. यदि घटनाओं में बहुत तेजी से परिवर्तन हो तो वे मानवमस्तिष्क पकड़ से बाहर रह जाते हैं. सिनेमा और दूरदर्शन पर दिखनेवाले धारावाहिक, चलचित्र असल में अलगअलग चित्रों की शृंखला होते हैं. उन्हें आंखों के आगे इतनी तेजी से गुजारा जाता है कि वे उनमें सातत्य, एकदूसरे से परस्पर जुड़ाव नजर आने लगता है, जिसके कारण निर्जीव आकृतियां जीवंत दिखाई पड़ने लगती हैं. दूसरे शब्दों में जो दिखता है, और जो वास्तविक है, दोनों में मूलभूत अंतर होता है. अर्थात जो दृष्टि में है, आवश्यक नहीं कि वही सृष्टि में भी हो. कलकल बहती नदी एक धारा होने का आभास कराती है. इस कारण लोग उसको पूजते भी हैं. अगर हेराक्लाइट्स की माने तो नदी असल में नदी न होकर अनगिनत जलबिंदुओं से मिलकर बना एक प्रवाह है. अपरिमित जलबिंदू लघु धाराएं बनकर नदी होने का एहसास कराते हैं. इसलिए हेराक्लाइट्स कहना था—‘हम एक ही नदी में दो बार नहीं उतर सकते.’ जब हम नदी में दुबारा प्रवेश करते हैं, पहले वाला जल कहीं आगे बढ़ चुका होता है. इससे एक धारा संदेहवाद की ओर भी जाती है. फलस्वरूप समय की सत्ता पर सवाल उठाने वालों को ठोस तार्किक आधार प्राप्त होता है. संदेहवादियों के अनुसार समय असल में अंतहीन घटनाओं से उत्पन्न प्रवाह, एक मानसिक संरचना है. ठीक वैसा ही जैसे अनेक छोटीछोटी धाराएं एवं अनंत जलकण मिलकर नदी के प्रत्यय को जन्म देती हैं. (और हिग्स बोसोन मिलकर द्रव्यमान को!)

समय का प्रत्यय व्यक्तिसापेक्ष भी होता है. यदि दो ऐसे प्रेक्षकों की कल्पना की जाए जिनमें एक पृथ्वी पर है, दूसरा पृथ्वी से लाखों किलोमीटर दूर ऐसे ग्रह पर जिसका सौरचक्र पृथ्वी के सौरचक्र से पूरी तरह भिन्न है, तो दोनों के समयबोध में पर्याप्त अंतर होगा. आइंस्टाइन के अनुसार यदि दो प्रेक्षक एक दूसरे के सापेक्ष असंभव तीव्र गति से जा रहे हों तो दोनों के समयबोध में काफी अंतर होगा. उस अवस्था में यदि कोई अंतरिक्षयात्री पृथ्वी पर मौजूद प्रेक्षक से घड़ी मिलाकर अतितीव्र गति से यात्रा पर निकलता है तो, उसकी घड़ी, पृथ्वी पर मौजूद प्रेक्षक की घड़ी की अपेक्षा कम समय बताएगी. आइंस्टाइन इसे ‘समय का सिकुड़ना’ कहते हैं. आइंस्टाइन ने प्रकाश गति को व्यवहार में असंभव माना है. फिर भी यदि कल्पना की जाए कि दो प्रेक्षकों की सापेक्षिक गति प्रकाश वेग के बराबर हो तो उनका समयबोध शून्य होगा. कारण स्पष्ट है, प्रकाशवेग को सृष्टि का उच्चतम वेग माना गया है, कोई भी घटना उससे तेज गति से चल ही नहीं सकती. इसलिए प्रकाशगति से दौड़ रहे प्रेक्षक तक घटनासंबंधी सूचना पहुंच ही नहीं पाएगी. साफ है कि स्वतंत्र या स्वच्छंद समय जैसा कुछ नहीं होता. समय न केवल व्यक्तिसापेक्ष होता है, बल्कि परिस्थिति सापेक्ष भी होता है. चूंकि समय का आभास घटनाओं के माध्यम से होता है, उसकी सीधी अनुभूति का कोई माध्यम ही नहीं है, चूंकि प्रकाश गति से दौड़ने के कारण कोई घटना उस तक पहुंच ही नहीं पाएगी, इसलिए गतिमान प्रेक्षक के लिए शेष ब्रह्मांड की घटनाएं शून्य प्रतीत होंगी. तदनुसार समय उसको ठहरा हुआ नजर आएगा.

जिस प्रकार घनत्व, द्रव्यमान, आयतन आदि को पदार्थ से अलग करके देखना असंभव है, उसी प्रकार घटनाओं अथवा परिवर्तन को अवधि निरपेक्ष कर पाना असंभव है. एक सवाल यह भी किया जा सकता है कि क्या किसी मनुष्य को समयशून्य स्थिति में ले जाया जा सकता है. उत्तर ‘न’ में मिलेगा. चूंकि मनुष्य का परिवर्तनशून्य स्थिति में जाना संभव नहीं है, इसलिए समयशून्यता भी असंभव है. उदाहरण के लिए एक प्रेक्षक को अंधेरे बंद कमरे में कैद करके बाहरी जगत से उसका संपर्क बिलकुल काट दिया जाए. उस अवस्था में उसका व्यक्ति का व्यावहारिक समयबोध समाप्त हो जाएगा. किंतु शेष सृष्टि किसी न किसी रूप में उससे जुड़ी रहेगी. उसका शरीर उसकी क्रियाएं निंरतर चलती रहेंगी. व्यक्ति प्राकृतिक घटनाओं तथा उनसे जन्मे समयबोध की ओर से भले ही संवेदन शून्य हो जाए, विश्व के लिए वह समय का वैसा ही हिस्सा बना रहेगा. यह भी संभव है कि एक अवधि के बाद उसकी जैविक घड़ी रातदिन तथा भौतिक जगत की अन्य दृश्यमान घटनाओं से संचालित होने के बजाय, केवल भूखप्यास तथा अन्य शारीरिक प्रक्रियाओं से नियंत्रित होने लगे. क्योंकि प्रकृति को देखकर समय का अनुमान लगाने वाली उसकी जैविक घड़ी भौतिक घटनाओं से कटते ही गड़बड़ा सकती है. लंबे समय तक प्रकृति से कटे रहने पर उसमें स्थायी व्यवधान भी आ सकता है. इसके बावजूद व्यक्ति के लिए समयशून्य स्थिति असंभव होगी. क्योंकि जीवन के रहते परिवर्तनशून्यता से मुक्ति असंभव है. दो घटनाओं अथवा परिवर्तन के अंतराल के रूप में समय का बोध लगातार बना रहेगा. दूसरे शब्दों में घटनाओं की क्रमानुक्रमता ही समयबोध के रूप में विकसित होती है. बातचीत के दौरान सामने वाला व्यक्ति उन घटनाओं को उसी क्रमानुक्रम में ग्रहण करता है. इसलिए घटना के साथ उनके अंतराल के रूप में उनसे संबद्ध समयबोध भी बड़ी आसानी से दूसरे के मनमस्तिष्क पर छा जाता है. अकेलेपन की अवस्था में ऐसा समयबोध अस्थायी होगा. तब व्यक्ति घटनाओं का प्रेक्षकभर होता. क्योंकि उपयोग न होने के कारण उसकी स्मृति शायद ही विकसित हो. इस उदाहरण से समय की निरपेक्षता का सवाल खटाई में पड़ने लगते हैं और वह स्वतंत्र सत्ता न होकर परिवर्तनों का प्रभाव उसी प्रकार जैसे घनत्व, द्रव्यमान, आयतन आदि हैं—नजर आने लगता है.

अनेक विद्वान भौतिक समय अथवा समय की प्रवाहशीलता के विचार से सहमत नहीं हैं. समय को मिनट, सैकिंड, पलअनुपल में बांटने का विचार उन्हें स्वीकार नहीं है. उनके अनुसार समय से ऐसा भौतिक आचरण अनपेक्षित है. समय उनके लिए अनुभूति का विषय है. उनके अनुसार समय ब्रह्मांडीय विस्तार जैसा ही निस्सीम और शाश्वत है, जिसमें सबकुछ घटता है. ऐसा कुछ भी नहीं जो समय की व्याप्ति से परे हो. ब्रह्मांड की प्रत्येक हलचल उसमें समाई है. इस मान्यता के अनुसार समय का आकलन संभव नहीं. मनुष्य उसकी निस्सीमता का मात्र अनुभव कर सकता है. घटनाएं उसके अनंत महासागरीय विस्तार में आतीजाती क्षुद्र डांेगियों के समान हैं. भूत, वर्तमान और भविष्य का कालविभाजन यद्यपि इस मान्यता में भी है. इसलिए नहीं कि वह समय की विशेषता है. बल्कि इसलिए कि वह मनुष्य की व्यावहारिक जरूरत है. सांत मानवेंद्रियों द्वारा अनंत समय से तालमेल बनाए रखने की चेष्ठा! इसलिए भूतवर्तमानभविष्य आदि समय के स्वतंत्र प्रखंड न होकर उसकी निस्सीमता में समाहित हैं. समय के प्रत्यय की तार्किक विवेचना के लिए ये निष्कर्ष बहुत काम के हैं. जिसपर हम आगे विचार करेंगे.

जो भी हो, समय अपने आप में रोचक पहेली है. प्राचीन मनीषियों ने मतवैभिन्न्य को बौद्धिकता के लक्षण के रूप में स्वीकार किया है—‘न एको मुनिस्र्य मर्तिभिन्ना.’—यानी ‘एक भी विचारक ऐसा नहीं है, जो अपनी स्वतंत्र राय न रखता हो.’ समय को लेकर भी ऐसे ही विभिन्न मतमतांतर हैं. जिनमें तीन प्रमुख हैं. पहला है घटनाओं को आगे रखकर समय का आकलन करना. जैसे एक लेख की तैयारी के लिए कल मैं पुस्तकालय गया था. आज मैं यह लेख लिख रहा हूं. लेख के प्रकाशित होने के बाद यह पाठकों के हाथ तक पहुंचेगा. ये घटनाएं आगेपीछे की हैं. समय इनके होने के और बीच के अंतराल को तय करता है. तदनुसार उसका भौतिक अस्तित्व है. दूसरी प्रविधि समय को केंद्र में रखकर घटनाओं को परखने की है—जैसे प्राचीन समय में आदिमानव आग जलाने के लिए पत्थर के टुकड़ों को रगड़ता था. गौतम बुद्ध ने गणिका आम्रपाली को धर्मोपदेश दिया था. गुरु नानक ने सिख धर्म की नींव रखी. भारत द्वारा छोड़ा गया यान मंगल की कक्षा में, उसकी परिक्रमा कर रहा है. यदि विश्वयुद्ध हुआ तो करोड़ों लोग तबाह हो सकते हैं. रात्रि के दस बजे हैं और मैं अपने लेख को पूरा करने के लिए कलम घसीट रहा हूं, अमेरिका में सुबह दस्तक दे चुकी है. चांदनी रात का आनंद लेने के लिए कुछ लोग इंडिया गेट पर घूम रहे हैं. समय की निस्सीमता में घट रहीं, घट चुकीं या घटनेवाली ये घटनाएं ऐसी हैं, जिनका कोई न कोई साक्षी है या होगा. इनमंे आगेपीछे की अनुभूति मानवमस्तिष्क तय करता है. तदनुसार समय ब्रह्मांडतुल्य रचना है. सृश्टि की समस्त हलचल को अपने भीतर समेटे हुए. इसमें सभी घटनाएं जो समय के विभिन्न कालखंडों में घटीं, उनके अलावा कोटिक अन्यान्य घटनाएं भी रही होंगी,कृस्वतः समाहित हैं. दूरदर्शन पर प्रसारित लोकप्रिय धारावाहिक ‘महाभारत’ में उद्घोषक हरीश भिमाणी की गूंजती हुई आवाज ‘मैं समय हूं’ समय की इसी निस्सीमता का बखान करती थी. इस सैद्धांतिकी में कालविभाजन अमान्य है. यह समय की चिंरतनवादी अवधारणा है. पहली ने इतिहास को जन्म दिया. दूसरी ने दार्शनिक चिंतना को. तीसरा दृष्टिकोण उन विद्वानों का है जो समय के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगाते हैं. उनके अनुसार समय सिवाय मानसिक संरचना के कुछ नहीं है. वह केवल परिवर्तनशीलता का प्रभाव है. जैसे द्रव्यमान वस्तुओं का गुण है, वैसे ही समय परिवर्तनशीलता का लक्षण है. यह भौतिकवादी दृष्टिकोण है. इसके माननेवाले संख्या में कम हैं, लेकिन तार्किक आधार पर यह किसी भी जनोन्मुखी विचार से कम महत्त्वपूर्ण नहीं है. इन सबके बावजूद समय आज भी अबूझ पहेली बना हुआ है.

समय के बारे में पहला वस्तुनिष्ठ चिंतन बौद्ध दर्शन में मिलता है. न्याय दर्शन में उसी को विस्तार दिया गया है. पश्चिम विचारकों में प्लेटो, अरस्तु, यूडीपियस, न्यूटन, जीनो, ह्यूम, बर्कले, कांट, हीगेल, हाकिंग आदि ने भी समय को लेकर स्वतंत्र रूप से विचार किया है. कुछ संदेहवादी दार्शनिक भी हुए हैं, जिन्होंने समय के अस्तित्व पर ही सवाल उठाए है. लेकिन समय के बारे में पहली बार सुनिश्चित चिंतन बीसवीं शताब्दी में आरंभिक दशकों में आया. उसके पीछे आइंस्टाइन के सापेक्षिकतावाद की प्रेरणा थी. जैसा कि हम सभी जानते हैं आइंस्टाइन ने समय को चौथा आयाम मानते हुए उसकी शाश्वत सत्ता में विश्वास प्रकट किया था. समय की कुछ गांठों को पहचानने की कोशिश हम इस लेखमाला के अगले हिस्से के रूप में करेंगे.

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

1. वैराग्य शतक, 12/1045 भर्तृहरि

2. The nature of living being was eternal, and it was not possible to bestow this attribute fully on the created universe; but he determined to make a moving image of eternity, and so when he ordered the heavens he made in that which we call time an eternal moving image of the eternity which remains for ever at one. Plato in Timaeus. trans by Desmond Lee.

3. Whether, if soul (mind) did not exist, time would exist or not, is a question that may fairly be asked; for if there cannot be someone to count there cannot be anything that can be counted…”Aristole, Physics, chapter 14.

आम आदमी पार्टी और 2014 से उम्मीदें

सामान्य

2014 के स्वागत के पर्याप्त कारण हैं. इनमें से कुछ 2013 की कोख से जन्मे हैं. कुछ 2014 अपने साथ लाने वाला है. उन्हें लेकर उम्मीदें बंधी हैं. जो मुद्दे 2013 में जन्मे उनकी भूमिका 2010 में ही रची जा चुकी थी. 2013 महत्त्वपूर्ण इसलिए रहा कि उसमें हमने उन्हें साकार होते देखा. ‘आम आदमी पार्टी’ के संयोजक के रूप में अरविंद केजरीवाल का संकल्प इतनी जल्दी फलीभूत होगा, इसकी संभावना किसी को नहीं थी. उसी हर्षोल्लास और उम्मीदों के बीच 2014 को लेकर नए-नए सपने सजाए जा रहे हैं. ‘आम आदमी पार्टी’ की सफलता से उत्साहित-अचंभित हर कोई यह अनुमान लगाने पर तुला है कि प्रसुप्त जनाकाक्षांओं के उभार प्रतीक बन चुकी यह पार्टी, आसन्न चुनावों में क्या चमत्कार दिखाती है. हालांकि जिस पार्टी की उम्र बामुश्किल साल-भर हो. गांवों में जहां देश की 65 प्रतिशत आबादी रहती है, जिसे अभी पैठ बनानी हो, उससे सिर आ चढ़े चुनावों में बहुत बड़े चमत्कार की अपेक्षा रखना असंभव कामना होगी. फिर ‘आम आदमी पार्टी’ की अप्रत्याशित सफलता, जन-ज्वार का अकेला उदाहरण नहीं है. पूर्वोत्तर प्रदेशों से लेकर सुदूर दक्षिण तक ऐसे चमत्कार पहले भी हो चुके हैं. हर बार आरंभ में सबकुछ अनोखा-सा लगा था. युग-परिवर्तन की प्रतीति हुई थी. लेकिन सत्ता काजल की कोठरी ठहरी. उसमें जो गया, बेदाग नहीं निकल पाया. फिर भी ‘आम आदमी पार्टी’ को इस बात का श्रेय दिया ही जाना चाहिए कि उसने आगामी चुनावों को नितांत ‘व्यक्ति-केंद्रित’ होने से बचा लिया है. वरना राजनीतिक पार्टियों और मीडिया की पूरी-पूरी साजिश उन्हें ‘मोदी बनाम राहुल’ बना देने की थी. यदि दिल्ली विधानसभा चुनावों में भी बाकी तीन राज्यों की भांति ‘भारतीय जनता पार्टी’ को बहुमत मिला होता तो ‘नमो-नमो’ की दुंदभि पहले की अपेक्षा कहीं जोर की बज रही होती. व्यक्ति पूजा इसलिए ताकि महंगाई, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता, परिवारवाद, बेरोजगारी, मुद्रा-स्फीति जैसे मुद्दों की ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाए. अब हालात बदल चुके हैं. ‘भारतीय जनता पार्टी’ के रणनीतिकार ‘आम आदमी पार्टी’ की बढ़ती लोकप्रियता से चिंतित नजर आने लगे हैं. उनका असर पार्टी के विज्ञापनों तथा फेसबुकिया अभियान पर भी नजर आ रहा है.

‘आम आदमी पार्टी’ की इस सफलता पर चौंकने जैसी बात कतई न होती, यदि हमारे राजनीतिक विश्लेषकों का व्यवहार, उनके सोचने-समझने का नजरिया लोकतांत्रिक होता. यदि वे सचमुच मान रहे होते कि लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है. देश लोगों से बनता है, किसी भू-भाग से लोग नहीं बना करते. राष्ट्र जनता की सामूहिक चेतना की परिणति होता है, उसका निर्माता नहीं. कहीं न कहीं सत्ता का प्रभाव हमारे विश्लेषकों के दिलो-दिमाग पर भी रहता है. इसलिए लोकतंत्र के प्रबुद्ध नागरिक की तरह व्यवहार करने के बजाय वे अपने आकाओं के पिछ-लग्गू नजर आते हैं. अपना अधिकांश समय सत्ताधीशों की विरुदावलि गाने और विपक्षी को गरियाने में बिताते हैं. जनमानस को गहराई से समझना उनके लिए असंभव होता है. इसलिए जनता के बीच उठने वाले स्वाभाविक ज्वार उसकी पहचान से छूट जाते हैं. उनका सामंती सोच एवं अलोकतांत्रिक संस्कार उन्हें भरमाए रखते हैं. वे वैचारिक प्रतिबद्धता को ताक पर रखकर, स्वार्थ के वशीभूत हो सत्ता के निकट आते हैं. भूल जाते हैं कि पीढ़ियों से सत्ता पर सवार लोग उनकी अपेक्षा कहीं ज्यादा चालाक और काइयां हैं. वे उनसे मनचाहा काम लेते हैं. अपनी कमजोरी और स्वार्थपरता को वे उनकी विचारधारा की आड़ में छिपा ले जाते हैं. भारतीय लोकतंत्र की असफलता का प्रमुख कारण भी यही है कि आजादी के बाद जिन लोगों पर समाज के लोकतांत्रिक प्रशिक्षण का दायित्व था, वे केवल स्वार्थ-सिद्धि तक सिमट गए. उन्होंने भुला दिया कि विकास एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. सत्ता उसको उत्प्रेरित अथवा अवमंदित कर सकती है, चाहे तो उसकी दिशा भी बदल सकती है. लेकिन उसे पूरी तरह रोक नहीं सकती. नादानी में वे ऐसे विकास का समर्थन करने लगते हैं, जिससे विषमता बढ़ती है. विकास के नाम पर कहीं भीषण रेगिस्तान तो कहीं फलते-फूलते नखलिस्तान नजर आते हैं.

कमी उनकी भी नहीं है. दरअसल शिखर की ओर देखते रहना हममें से अधिकांश का स्वभाव बन चुका है. हम प्रायः ऊंचाई पर मौजूद लोगों को पहचान पाते हैं. हमारे स्वार्थी मन में बराबर वालों के प्रति ईर्ष्या होती है, छोटों के प्रति तिरष्कार. जनमानस में मौजूद परिवर्तन के प्रति आकुलता, सुगबुगाहट, बेचैनी और असंतोष की ओर से हम प्रायः नजरें फेर लेते हैं. नजर पड़ भी जाए तो हमारी समझ वहां काम नहीं करती. इसका एकमात्र कारण है, अभ्यास की कमी. जनसमूह की हलचल को परखने के लिए जितना धैर्य और निष्पक्षता चाहिए, उसे हम जुटा नहीं पाते. बुद्धिजीवी होने का दावा करते हुए भी हम आसान रास्तों की खोज में लगे रहते हैं. हमारी असफलता और विकलता का कारण भी यही है. सरलीकरण के इसी स्वभाव के चलते हम 2013 में दिल्ली के सत्ता-परिवर्तन को केजरीवाल या ‘आम आदमी पार्टी’ की सफलता मान लेते हैं.

मेरी राय में दिल्ली में वह हुआ, जैसा यहां की जनता उनसे चाहती थी. केजरीवाल की अल्पमत सरकार का बनना भी उसी का निर्णय है. वरना बहुमत तो भाजपा के पास था. केजरीवाल और उनके साथियों की खूबी रही कि वे जनता की सोई आकांक्षाओं को जगाने में कामयाब रहे. इसमें अन्ना हजारे का योगदान भी रहा. जनलोकपाल आंदोलन के पीछे भले ही केजरीवाल की ‘इंजीनियरिंग’ ने काम किया हो, उसे नैतिक उठान अन्ना हजारे की अगुवाई से मिला था. चौतरफा मिलती चुनौतियों के बीच केजरीवाल ने राजनीतिक पार्टी बनाने का निर्णय लिया. लेकिन दूसरे दलों की भांति समझौते नहीं किए. उनकी खूबी रही कि एक जनांदोलन के नैतिक उठान और ऊर्जा को राजनीति में बनाए रखा. फलस्वरूप राजनीति की उस खोई प्रतिष्ठा को लौटाने का काम भी उन्होंने किया, जो पारंपरिक राजनीतिक दलों के बीच कभी की गायब हो चली थी. जनसाधारण के मुद्दे, जनसाधारण जैसी बोली-बानी और जनसाधारण जैसी वेशभूषा ने उन्हें जनाकांक्षा की राजनीति का प्रतिनिधि बना दिया. इसी के बूते वे लोगों को अपनी राजनीति का हिस्सा बनाने में कामयाब रहे. आज अन्ना भले ही राजनीति में न हों, भले ही वे केजरीवाल और ‘आम आदमी पार्टी’ ने दूरी का ऐलान कर चुके हैं. मगर जनता केजरीवाल को राजनीति में उनका नैतिक उत्तराधिकारी मान चुकी है. बड़े-बड़े नेताओं को अपनी सभाओं के लिए श्रोता ‘मैनेज’ करने पड़ते हैं, केजरीवाल के लिए उनकी कोई समस्या नहीं रहती. ‘आम आदमी पार्टी’ की छोटी से छोटी सभा में लोग स्वयं-स्फूर्त्त भाव से सहभागी बनते हैं. सहभागिता की राजनीति के पहले जादूगर गांधी थे. उनके बाद विनोबा, जयप्रकाश नारायण और कुछ सीमा तक विश्वनाथ प्रताप सिंह ने वही किया. आगे चलकर राजनीति व्यवसाय बनी तो नेता और जनता के बीच आत्मीयता घटना लगी. केजरीवाल ने अपनी सहजता और विश्वसनीयता के बल पर ‘आम आदमी पार्टी’ के माध्यम से राजनीति में खोई आत्मीयता को लौटाने का चमत्कार कर दिखाया है. इस बीच उनपर लांछन भी लगे, किंतु उन्होंने अपने चरित्र की पारदर्शिता को बनाए रखा. अंततः आमजन वाली छवि का जादू चला और बाजी ‘आम आदमी पार्टी’ के हाथ लगी.

अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व हुए हालिया चुनावों ने नैतिकता को सांस्थानिक दर्जा दिया. यही कारण है कि चुनावों में पहले नंबर पर रहकर भी भाजपा को सत्ता से पांव पीछे खींचने पड़े. वह जानती थी कि विपक्ष का नैतिक आधार कहीं ज्यादा मजबूत है. यह सच से जनता भी परिचित है. नैतिकता की कसौटी पर खरा विपक्ष सत्ता को असली चुनौती पेश करेगा. तब समर्थन की बैशाखियों पर टिकी सरकार उसके ताप को सह नहीं पाएगी. ऊपर से गर्दन पर लटकती आम चुनावों की तलवार. यदि वहां भी केजरीवाल की उच्च नैतिकता फलीभूत हुई तो ‘नमो-नमन’ की केसरियां कवायदें धरी-की-धरी रह जाएंगी. यह सोचते हुए भाजपा को सरकार बनाने से अपने पांव पीछे खींचने पड़े तो कांग्रेस अपने बचे-कुछे दमदमे को लेकर समर्थन में उतर आई. यह उनकी उदारता न होकर सोची-समझी चाल थी—किसी भी तरह आआप के नेताओं को सत्ता के रूपमहल का दरवाजा दिखाकर उनके ईमान को डिगा दिया जाए. यदि हम्माम में सब नंगे सिद्ध हुए तो फिर कोई चुनौती बाकी न रहेगी. रेबड़ियों का स्वाद मिल-बांटकर, बारी-बारी से मिलता रहेगा. लेकिन जनता इतनी भी नादान नहीं है कि वह ईमानदार इच्छा और वायवी प्रलोभनों का अंतर न समझ सके. इसलिए एक कूटनीतिक फैसले के तहत केजरीवाल सरकार बनाने के मुद्दे पर जनता की राय लेने निकले तो लोग उनकी सभाओं में हिस्सेदारी के लिए एक बार फिर सड़क पर उतर आए.

लोकसभा चुनावों में अब केवल पांच महीने बाकी हैं. इस अल्पावधि में यह नई-नई उभरी पार्टी देश की जनता से जुड़ने के लिए कितना विस्तार कर पाती है, इस बारे में उसकी सफलता इस बात पर ज्यादा निर्भर करेगी कि जनसाधारण देश की राजनीति में दखल देने के लिए स्वयं कितना उत्सुक है और ‘आम आदमी पार्टी’ राष्ट्रीय स्तर पर उसके विश्वास को कितना जीत पाती है. वैसे भी चेतनशील समाज को विकल्पों की दरकार नहीं होती. विकल्प स्वयं उस तक चलकर आते हैं. यदि लोग सचमुच बदलाव को उत्सुक हैं तो ‘आप’ के अनुपस्थित रहते भी वे रास्ते निकाल सकते हैं. उनकी सफलता की कसौटी जनतंत्र के प्रति उनकी निष्ठा और समझ से आंकी जाएगी. साथ में यह विश्वास भी कि लोकतंत्र में नेता की शक्ति प्रतीकात्मक होती है. वास्तविक शक्ति जनता के अधीन होती है. यदि लोग जनतंत्र के इस मूल मंत्र को आत्मसात कर लें तो स्वयं सरकार की उपस्थिति भी प्रतीकात्मक रह जाएगी.

यह भी जरूरी नहीं है कि प्रत्येक बदलाव के लिए राजनीति की ओर देखा जाए. समाज चेतना-संपन्न होगा तो कम से कम नागरिक जीवन में राजनीति अप्रासंगिक मान ली जाएगी. आजादी के समय देश में सामाजिक जागरूकता और राजनीतिक चेतना का स्तर कमोबेश समान था. दोनों ही समान रूप से परिवर्तनोन्मुखी थे. आजादी के बाद सामाजिक चेतना का हृास होने लगा. गांधी सामाजिक आंदोलनों का महत्त्व जानते थे, इसलिए उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को गांवों में सुधार कार्यक्रम चलाने की जिम्मेदारी सौंपी थी. ताकि समाज में आपसी सौहार्द और मेल-मिलाप बढ़े. उस समय के समाचार-पत्र पत्रिकाओं ने गांधीजी का साथ दिया था. आज स्थिति बदली हुई है. अखबारों की जगह मीडिया ने ले ली है. पहले पत्रकारिता मिशन हुआ करती थी. अब वह उद्यम बन चुकी है. मीडिया संस्थानों पर पूंजीपतियों का कब्जा है. उनके दबाव में मीडिया वही करता है, जिससे कारपोरेट घरानों का हित-साधन होता हो.

आजादी के बाद राजनीतिक गतिविधियों पर तो जोर रहा, मगर सुधारवादी कार्यक्रमों से करीब-करीब किनारा कर दिया गया. इससे समाज सुधार से जुड़े आंदोलनों का ताप घटता गया. इस बीच प्रतिक्रियावादी ताकतें निरंतर अपनी जकड़ बढ़ाती गईं. इस बीच सामाजिक संस्थाओं का जितनी तेजी से हृास हुआ है, उससे राजनीति का दखल उन क्षेत्रों में भी बढ़ा, जो सामाजिकता के दायरे में आते थे. यह राजनीति की किसी खूबी के कारण नहीं, बल्कि सामाजिक संस्थानों के शिखर पर जातिवादी, वर्चस्वादी, सांप्रदायिक ताकतों के सवार हो जाने से हुआ है. निहित स्वार्थ की खातिर उन्होंने परिवर्तन के दरवाजे उन लोगों के लिए बिलकुल बंद कर दिए थे, जिन्हें उनकी दरकार थी. जो यह सपना पाले बैठे थे कि आजादी के बाद उनकी मुक्ति के रास्ते प्रशस्त होंगे. अवमूल्यन राजनीति का भी हुआ. संविधान में धर्मभेद, जातिभेद, मुक्त भारत बनाने का आग्रह संविधान निर्माताओं का था. लेकिन उल्टे वे राजनीति का ही शिकार होते गए.

इसमें कोई दो राय नहीं कि भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, सांप्रदायिकता, परिवारवाद और काहिली में डूबी सरकारों ने आम आदमी पार्टी या प्रतिबद्धता और ईमानदारी की राजनीति करने वाले किसी भी दूसरे दल के लिए खुला मैदान छोड़ दिया है. जिस डगर पर आज केजरीवाल हैं, उसे केवल वामपंथी दलों की ओर से टककर मिल सकती थी. परंतु भारतीय वामपंथ की विडंबना है कि उसकी बागडोर आरंभ से ही बुर्जुआ सोच वाले नेताओं के हाथों में रही. जो स्वयं वर्गभेद की उपज थे और निहित स्वार्थ के लिए उसे बनाए रखने में ही अपना भला समझते थे. उन्होंने वामपंथ की राजनीति करने के बजाय, उसका अपने स्वार्थ के अनुसार अनुकूलन करने के लिए ज्यादा उपयोग किया. परिणाम यह हुआ कि वामपंथ देश में अपनी प्रासंगिकता लगातार खोता गया. भारतीय मतदाता के हृदय में वामपंथी राजनीति को लेकर संदेह हमेशा बना रहा. पश्चिमी बंगाल और दक्षिण के कुछ राज्यों में वामपंथ को पांव टिकाने लायक जगह मिली तो इसलिए कि भारतीय वामपंथी चेतना के उभार के दिनों में वहां ईमानदारी से काम किया गया था. पश्चिमी बंगाल में मानवेंद्रनाथ राय और दक्षिण में सिंगारवेलु चेट्टियार, अमृत डांगे जैसे कुछ समर्पित विचारकों, नेताओं ने वामपंथ को निष्ठापूर्वक जिया था. इसलिए उन राज्यों में वामपंथी राजनीति आज भी एक बड़ी ताकत मानी जाती है.

बहरहाल, आम आदमी पार्टी की जीत के जश्न और 2014 की उम्मीदों के बीच अरविंद केजरीवाल को यह श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने गांधी की ‘अंतिमजन’ की अवधारणा को राजनीति में प्रासंगिक बना दिया है. हालांकि उत्तरी भारत के दो अन्य दल भी खुद को अंतिमजन की अवधारणा से जोड़ने का दावा करते हैं. उनमें पहला नंबर मायावती का है. दूसरा मुलायम सिंह यादव का. मायावती जननायक डाॅ. अंबेडकर को अपना प्रेरणास्रोत मानती हैं. वहीं मुलायम सिंह खुद को लोहिया का उत्तराधिकारी बताते हैं. मगर दोनों की राजनीति स्वार्थपूर्ण विचलनों से भरी है. खुद को सत्ता में बनाए रखने के लिए दोनों ने कदम-कदम पर समझौते किए हैं. प्रतिबद्धता को ताक पर रखकर सत्ता की गोटियां खेलीं हैं. मायावती ने देश की सत्ता में बने रहने के लिए ऐसे दलों के साथ अनाप-शनाप समझौते किए, जिनकी राजनीति में सामाजिक न्याय के लिए सिवाय राजनीतिक मजबूरी के कोई स्थान न था. वहीं मुलायम सिंह का समाजवाद जातिवाद और परिवारवाद की देहरी को कभी लांघ ही नहीं पाया. इन दोनों को यदि अपनी राजनीतिक शाख को बचानी है तो निजी महत्त्वाकांक्षाओं को लांघकर समाज के बड़े वर्ग के हितों पर अपनी राजनीति को केंद्रित करना होगा. जिसकी फिलहाल कोई उम्मीद नहीं दिखती. इसलिए निकट भविष्य में उनसे किसी भी प्रकार की उम्मीद करना फिजूल होगा.

‘आम आदमी पार्टी’ ने परिवर्तनकारी राजनीति की उम्मीद जताई है. उसकी शुरुआत है. क्या दिल्ली की सफलता को पूरे देश में दोहराया जा सकता है? इसे लेकर हम आशंका से परे नहीं हैं. लेकिन ऐसा सोचते-लिखते समय हम उन्हीं बुद्धिजीवियों की कतार में सम्मिलित हो रहे हैं, जिनपर यह लांछन लगाया जाता है कि वे सत्ता के नजरिये से सोचते-करते हैं. राजनीतिक पार्टी भी एक सत्ता है. और इस देश में ऐसी अनेक मिसालें हैं जब राजनीतिक पार्टियों ने लोकतंत्र को अंगूठा दिखाया है. देश की कुल राजनीतिक पार्टियों में कुछ निजी उद्यम, कुछ प्राइवेट लिमिटेड कंपनी तो कुछ कारपोरेट घरानों की तरह काम कर रही हैं. ऐसे में उनमें आंतरिक लोकतंत्र की खोज करना, भूसे से सुई तलाशने जैसा है. रही केजरीवाल और आम आदमी पार्टी की सरकार की कार्यशैली की बात. यहां केजरीवाल अपने प्रतिद्विंद्वयों पर भारी ही दिखते हैं. सरकार बनने के साथ ही उन्होंने बीमारी की हालत में भी जिस त्वरा से निर्णय लिए हैं, उससे लगता यही है कि वे पारंपरिक राजनीति को बड़ी चुनौती देने वाले हैं. किंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि देश-भर में पार्टी ने जो बदलाव की आहट सुनाई दी है, उसके प्रति देश-भर में बहुत उत्सुकता है.

ओमप्रकाश कश्यप

हमारा नायक फिसड्डी क्यों

सामान्य

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत । क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ।।*   –     कठोपनिषद्, अध्याय 1, वल्ली 3, मंत्र 14.

हालांकि केजरीवाल प्रकट में कभी यह स्वीकार नहीं करेंगे कि वे अन्ना के प्रतिद्वंद्वी या उनके विरुद्ध हैं. सीधेसीधे अन्ना भी शायद ही मानेंगे कि केजरीवाल के प्रति उनके दिल में जो स्नेहानुराग था, उसमें कमी आई है. मगर हाल का घटनाक्रम बताता है कि दोनों के रास्ते अलगअलग हो चुके हैं. एक साल पहले तक दोनों साथसाथ थे. सूचना अधिकार अधिनियम से लेकर जनलोकपाल के मुद्दे तक, दोनों ने कंधे से कंधा मिलाकर आंदोलन को आगे बढ़ाया था. बाद में अरविंद केजरीवाल सिस्टम के भीतर घुसकर भ्रष्टाचार पर प्रहार करने का संकल्प लेकर सक्रिय राजनीति में चले आए. जनलोकपाल आंदोलन से जुड़े साथियों के साथ ‘आम आदमी पार्टी’ बनाई. दिल्ली विधानसभा चुनावों में उतरकर भारतीय जनता पार्टी के विजय अभियान में रोड़ा बने और 15 वर्षों से जमीजमाई कांग्रेस पार्टी की सरकार को उखाड़कर लोगों में नई राजनीति की उम्मीद जगाई. अरविंद केजरीवाल को मिल रही चैतरफा वाहवाही के बीच अन्ना ने लोकपाल विधेयक को अविलंब लागू करने के लिए आमरण अनशन रखा. अब उनकी ओर से बयान आया है कि वे लोकपाल बिल के सरकारी मसौदे से संतुष्ट हैं, जबकि ‘आम आदमी पार्टी’ के नेता जनलोकपाल के पुराने प्रारूप पर अटल हैं. वे अन्ना के गलत सहयोगियों द्वारा घिर जाने पर क्षोभ जता रहे हैं. दिल्ली विधानसभा के चुनावों से बाकी देश का कोई लेनादेना भले न हो, मगर उनकी गूंज न केवल देश, बल्कि पड़ोसी देशों तक भी पहुंची है. पाकिस्तान से इमरान खान का केजरीवाल की प्रशंसा से भरा बयान आया है. केजरीवाल और ‘आम आदमी पार्टी’ की बढ़ती प्रतिष्ठा से कांग्रेस और भाजपा बुरी तरह घबराई हुई हैं. इसलिए कांग्रेस के जो नेता लोकपाल बिल को बरसाती मच्छर बता रहे थे, आज उसे देश के लिए जरूरी मानकर उसकी तरफदारी में जुटे हैं. राहुल गांधी आम आदमी पार्टी से सीख लेने की घोषणा कर चुके हैं. नानुकर की राजनीति के साथ भाजपा भी चाहती है कि लोकपाल बिल पास हो, ताकि केजरीवाल तथा ‘आम आदमी पार्टी’ को जो देशव्यापी प्रशंसा मिल रही है, उसपर लगाम लगे तथा आगामी लोकसभा चुनावों में ‘आम आदमी पार्टी’ लोकपाल बिल के नाम पर किसी प्रकार का राजनीतिक लाभ न उठा सके. अनशन पर बैठे अन्ना का लोकपाल बिल के समर्थन में आ जाना, कांग्रेस और भाजपा की बड़ी जीत कही जा रही है. अभी तक किसी न किसी बहाने लोकपाल बिल को टालती आईं, राजनीतिक पार्टियां यदि लोकपाल बिल के मसले पर अन्ना हजारे को अपने पक्ष में कर लेने को यदि अपनी जीत बता रही हैं, तो दूसरे अर्थों में यह अन्ना हजारे की हार है, क्योंकि सिवाय ‘आम आदमी पार्टी’ की ओर से मिली चुनौती के इन पार्टियों ने ऐसा कुछ नहीं किया है, जिससे देश में स्वच्छ राजनीति करने की इनकी इच्छाशक्ति जाहिर होती हो. और संसदीय समिति की जिन सिफारिशों के साथ लोकपाल बिल के प्रति अन्ना हजारे सहमति दर्शा रहे हैं, वे सालभर पहले ही आ चुकी हैं. बहरहाल, देश की सत्ता की बड़ी साझेदार दोनों पार्टियां लोकपाल बिल को इसी सत्र में पास करवा कर किसी भी तरह ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के ‘गुब्बारे’ की हवा निकाल देना चाहती हैं. उनकी दूसरी कोशिश है कि केजरीवाल दबाव में आकर अपनी पार्टी की सरकार बना लें. ताकि राजनीति के तपे, घाघ नेता ‘आप’ के अपेक्षाकृत युवा और अनुभवहीन नेताओं से बनी पार्टी को किसी न किसी तरह बदनाम कर, उनकी पैठ को दिल्ली तक सीमित कर सकें. विधानसभा चुनावों में भाजपा का सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद सरकार बनाने से पीछे हटना, इसी कूटनीति का हिस्सा है. अभिजन राजनीति का प्रतीक रही कांग्रेस और भाजपा इस मुद्दे पर एक हैं.


निस्संदेह अन्ना केजरीवाल के मुकाबले अनुभव तपे नेता हैं. सेना की नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने अपने गांव को प्रयोगशाला बनाया और वहां रहकर ग्राम्यः सुधार के कार्यक्रम चलाए. खुद को गांधी का अनुयायी और अंहिसा में विश्वास करने वाला बताया, लेकिन लोगों को सुधारने के लिए पेड़ से बांधकर पिटाई करने का रास्ता अपनाने से गुरेज नहीं किया. गांधी ‘साध्य’ और ‘साधन’ की पवित्रता पर जोर देने वाले आदर्शवादी नेता थे. अन्ना का गांधीवाद ‘अंत भला सो सब भला’ की उपयोगितावादी चाल तक सिमट जाता है. इसके बावजूद ग्रामस्तर पर किए गए अन्ना के प्रयोगों को सर्वत्र सराहना मिली, जिससे अन्ना की ख्याति रालेगण सिद्धि से बाहर निकलकर देशव्यापी बनी. उन्होंने महाराष्ट्र सरकार के मंत्रियों के भ्रष्टाचार के प्रति भी आंदोलन किए. बावजूद इसके 2010 तक, विचार और कर्म की दृष्टि से अन्ना हजारे रालेगण सिद्धि तक सिमटे सर्वोदयी नेता ही थे. हालांकि उनकी ख्याति देशविदेश तक थी. उन्हें महाराष्ट्र से बाहर भ्रष्टाचार मुक्ति, सूचना अधिकार तथा जनलोकपाल आंदोलन के बहाने, दूसरे नायक ही लाए, जिनमें अरुणा राय, अरविंद केजरीवाल आदि प्रमुख हैं. कालांतर में राजनीतिक क्षेत्र में व्याप्त गंदगी को ‘अंदर से साफ’ करने के संकल्प के साथ केजरीवाल सक्रिय राजनीति में हिस्सा लेने के लिए अन्ना से अलग हुए तो चर्चांओं का बड़ा हिस्सा उनपर केंद्रित होता चला गया. उस समय तक अन्ना तो क्या स्वयं अरविंद को भी विश्वास नहीं था कि ‘आम आदमी पार्टी’ को इतनी बड़ी सफलता मिल सकती है. इसीलिए सत्ता से दूर रहने की गांधीजी की परंपरा के निर्वाह तथा जनांदोलनों की अपनी कमाई को सहेजे रखने के लिए अन्ना केजरीवाल से अलग ही रहे. उसके बाद सालभर तक जब केजरीवाल ‘आम आदमी पार्टी’ के लिए नई जमीन तलाश रहे थे, वे अपने गांव रालेगण सिद्धि में जो उनकी प्रयोगशाला रही है, खुश थे. परंतु दिल्ली विधानसभा के चुनावों में ‘आप’ को मिली भारी सफलता के बाद जनता उसमें कांग्रेस और भाजपा का साफसुथरा विकल्प देखने लगी है. इससे उन लोगों के कान भी खड़े हो गए, जो केजरीवाल को अभी तक हल्के में ले रहे थे. फिलहाल एक ओर तो कांग्रेस और भाजपा लोकपाल बिल को आननफानन में पास कराने पर तुली हैं, दूसरी ओर अन्ना और केजरीवाल के बीच की दूरी को बढ़ाकर ‘आम आदमी पार्टी’ के प्रभाव को हल्का करने की कोशिश की जा रही है.

आम आदमी पार्टी’ को देश की राजनीति में सैद्धांतिक प्रयोग कहा जाएगा, जो अभी कच्ची अवस्था में है. इसके सहीसही परिणाम अभी सामने आने बाकी हैं, जो अरविंद केजरीवाल तथा उनके साथियों के सत्साहस और विवेक पर निर्भर करेगा. इसके बावजूद इसमें कोई संदेह नहीं है कि ‘आम आदमी पार्टी’ के माध्यम से केजरीवाल ने लोगों के दिलों में साफसुथरी राजनीति की एक उम्मीद जगाई है. लोकपाल बिल का श्रेय चाहे राहुल लें या अन्ना, सचाई यही है कि ‘आम आदमी पार्टी’ का राजनीति के क्षेत्र में उभार, साठ से ऊपर वर्षों से अदलबदल कर सरकार बनाते आए, यथास्थति के पोषकसमर्थक दलों को रास नहीं आ रहा है. चूंकि जनलोकपाल आंदोलन और भ्रष्टाचार ‘आम आदमी पार्टी’ के उभार का प्रमुख बिंदू रहा है, इसलिए लोकपाल बिल लाकर वे उस कारण को ही समाप्त कर देना चाहते हैं, जिससे ‘आम आदमी पार्टी’ तपकर निकली है. मगर यहीं वे भूल भी कर रहे हैं. दरअसल केजरीवाल की राजनीति केवल भ्रष्टाचार विरोध तक सीमित नहीं है. कुछ महीनों के अंतराल में ही उन्होंने बड़ी बुद्धिमत्ता पूर्वक आम आदमी को सत्ता की राजनीति से जोड़ा है. उनके भीतर सत्ता का आकर्षण पैदा किया है. फलस्वरूप वह वर्ग जो अभी तक दूसरों के अधीन राजनीति करता आया था और जिसे धर्म, जाति, क्षेत्रीयता के नाम पर लोग एकदूसरे से उलझा दिया करते थे, पहली बार उसके मन में विश्वास जागा है कि वह खुद भी सत्ता में आ सकता है. ‘अभिजन’ के बरक्स ‘जन’ को खड़ा करने का जैसा सत्साहस केजरीवाल ने दिखाया है, उसका उदाहरण भारत के स्वातंत्रयोत्तर इतिहास में दुर्लभ है. उसमें जाति, धर्म, सांप्रदायिकता, तुष्टिकरण जैसे विभेदकारी राजनीति के पुराने औजार कारगर हो ही नहीं सकते थे. इसलिए यदि वे धैर्य और बुद्धिमत्तापूर्वक आगे बढ़ें तो यहां से भारतीय राजनीति की नई राहें निकल सकती हैं.

अन्ना और केजरीवाल भले साथ रहे हों, और केजरीवाल ने स्वयं को अन्ना का विनम्र अनुयायी ही माना हो, इसके बावजूद सचाई यही है कि दिल्ली विधान सभा के हालिया चुनावों में लोगों ने अन्ना के नाम पर नहीं, केजरीवाल और उसके साथियों की मेहनत और आश्वासन से प्रभावित होकर एक उम्मीद के साथ ‘आम आदमी पार्टी’ को वोट दिया है. इसलिए इस समय केजरीवाल उनकी आंखों के तारे हैं, और उन्हें लेकर भावी राजनीति का आदर्शवादी मुहावरा गढ़ने में लगे हैं. कह सकते हैं कि ‘आम आदमी पार्टी’ राजनीति के जंगल में उपजा उम्मीद का खुशनुमा पौधा है. उस बिरवे को असमय ही कुचल देने की जमीजमाई पार्टियों की ओर से की जा रही है. यही कारण है कि दिल्ली विधानसभा में सबसे बड़ा दल होने के बावजूद भाजपा सरकार बनाने से पीछे हट जाती है और कांग्रेस ‘आप’ को बिना मांगे समर्थन देने का ऐलान कर देती है. ताकि उस पार्टी के कंधों पर जो अभी चलना सीख ही रही है, अपेक्षाओं का भारी बोझ लाद दिया जाए. उन्हें भारतीयों का स्वभाव की बहुत अच्छी समझ है. जानते हैं कि लोग लोग यहां दिमाग से ज्यादा दिल से काम लेते हैं. नेताओं की बातों में आकर उन्हें बहुत जल्दी कंधों पर बिठा लेते हैं. फिर जरासी बात बिगड़ने पर तुनकमिजाजी के साथ उतार भी देते हैं. इसलिए वे उस कारण को समाप्त कर देना चाहते हैं, जो नई उम्मीद और संभावनाओं की राजनीति का जन्मदाता है.

आम आदमी पार्टी’ को मिली अप्रत्याशित सफलता केवल भाजपा और कांग्रेस का सिरदर्द नहीं है, वह केजरीवाल के उन साथियों के भी गले नहीं उतर रही है, जो अन्ना के आंदोलन से उनके साथ थे और खुद को परिवर्तन के बड़े पुरोधाओं में शुमार करने लगे थे. ऐसे लोग अरविंद को धोखेबाज, अतिमहत्त्वाकांक्षी, स्वार्थी आदि और न जाने क्याक्या कहे जा रहे हैं. जहां तक धोखा देने की बात है, अरविंद पर ऐसा इल्जाम नाइंसाफी होगी. ‘आम आदमी पार्टी’ के गठन के समय उन्होंने अपने सभी साथियों को उसमें सम्मिलित होने का नियंत्रण दिया था. किरन बेदी को तो ‘आप’ की ओर से मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनने का न्योता था. यदि वे केजरीवाल के साथ नहीं जा सकीं तो यह उनका अपना निर्णय था. इसके पीछे पहला कारण तो यही था कि किसी को उम्मीद नहीं थी कि दिल्ली में ‘आम आदमी पार्टी’ सरकार बनाने की स्थिति में आ सकती है. दूसरे किरन बेदी का भाजपा से लगाव आरंभ से ही रहा है. इसलिए जब उनके दिल के करीब की पार्टी ‘नमोनमो’ भज रही हो, और देशभर का मीडिया उसके सुर में सुर मिला रहा हो, तो वे उसके लिए किसी प्रकार की समस्या खड़ी नहीं करना चाहती थीं. कुल मिलाकर अरविंद केजरीवाल को इसके लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

अरविंद केजरीवाल के आलोचक उन्हें अत्यंत महत्त्वाकांक्षी बताते हैं. लेकिन महत्त्वाकांक्षी या अतिमहत्त्वाकांक्षी होना बुरा नहीं है. बल्कि एक सद्गुण है, जिसको विकास के लिए जरूरी माना जाता है. महत्त्वाकांक्षा के अंग्रेजी पर्याय ‘एंबीशन’ को लें. रोमन ambition शब्द ambitio से निकला है, जिसके मूल में ‘चारों दिशाओं पर कब्जा जमा लेने’ का भाव है. इस शब्द का अपना ऐसा ही कुछ अतीत भी है. प्राचीन यूनान में उस नेता को जो चारों दिशाओं में अपना प्रभाव जमाने की साध रखता हो और उसके लिए सभी तरह से निरंतर सतत प्रयत्नशील हो, ambitio कहा जाता था. चूंकि धर्म की निगाह में सांसारिक उपलब्धियों का कोई महत्त्व न था, इसलिए धर्माचार्यों की निगाह में ‘एबिशियो’ होना, पापलिप्त होना था. लेकिन समय के साथ शब्दों के अर्थ भी बदलते रहते हैं. कभीकभी शब्द के मायने और निहितार्थ बिलकुल बदल जाते हैं. एक समय में ‘नास्तिक’ होना वेदों में अविश्वास रखने वाले व्यक्ति या विचार से था. कालांतर में नास्तिक को ईश्वर में अविश्वास रखने वाले व्यक्ति तक सीमित कर दिया. दूसरा ऐसा ही महत्त्वपूर्ण शब्द ‘अराजकता’ है. अब अराजकता को अव्यवस्था, अशांति, उच्छ्रंखलता और राजनीतिक उथलपुथल का पर्याय माना जाता है. जबकि ‘अराजकता’ का मूल अर्थ जनसमाज का एकता, सामंजस्य, विवेक और आत्मनिर्भरता के स्तर पर इतना ऊपर उठ जाना है कि वह इतना आत्मानुशासित और लोकसमर्पित हो जाए, जिससे बाहरी शासन या सरकार की आवश्यकता ही न पड़े. दूसरे शब्दों में प्रबुद्ध और स्वतंत्रचेता समाज के लिए ‘अराजक’ होना सम्मानजनक स्थिति है, जहां मनुष्य अपनी संपूर्ण स्वतंत्रता के साथ निर्विघ्न रह सकता है. आज बदले अर्थ के साथ ‘अराजकता’ को लोकतांत्रिक समाजों में भी हेय दृष्टि से देखा जाता है.

इसी तरह महत्त्वाकांक्षी होना भी आजकल उदात्त गुण है. विद्वानों ने महत्त्वाकांक्षाओं को सकारात्मक और नकारात्मक श्रेणियों में बांटा है. सकारात्मक महत्त्वाकांक्षा एक सद्गुण है, जो मनुष्य में विकास की प्रथम प्रेरणाएं जगाती हैं, साथ ही उसे कर्तव्य की दिशा में उत्प्रेरित करती रहती हैं. महत्त्वाकांक्षा की सामान्यतः दो कोटियां होती हैं—निजी और सार्वजनिक. एक विद्यार्थी यदि पढ़लिखकर आइएस, उच्चाधिकारी बनने का सपना देखता है; या कारखानेदार बड़ा उद्योगपति बनना चाहता है तो ये उनकी निजी महत्त्वाकांक्षाएं हैं. इनमें उनका स्वार्थ छिपा है. जीवन में व्यक्तिगत उपलब्धियां भी महत्त्व रखती हैं, उनसे कहीं न कहीं समाज का हित भी सधता है, लेकिन उनका प्रथम ध्येय व्यक्ति की निजी इच्छाओं का पोषण करना होता है, इसलिए ऐसी महत्त्वाकांक्षाओं को ‘प्रेय’ की जनक कहा जा सकता है. दूसरी किस्म की महत्त्वाकांक्षाएं सार्वजनिक महत्त्व की होती हैं. ये महत्त्वाकांक्षाएं लोकोपकार की राह पर चलते हुए सार्वजनिक जीवन की कामयाबी को लेकर बनती हैं. उनमें परिवर्तन की आस छिपी होती है. ऐसा व्यक्ति व्यवस्था से असंतुष्ट होता है. बदलाव की कामना उसका जुनून होता है. चूंकि उसकी अपनी सफलता शेष समाज से मिले समर्थन और सहयोग पर निर्भर होती है, जिसपर यथास्थितिवादियों का कब्जा होता है, इसलिए उसकी राह कंटकभरी होती है. हर पल उसे सफलताअसफलता के झूले में झूलना पड़ता है. ऐसे में उनकी अपनी उत्कंठा, आत्मविश्वास और बदलाव की चाहत आगे बढ़ने का संबल बनती हैं. कई बार तो सब कुछ कुहरे और अनिश्चितता में लिपटा होता है. इसके बावजूद अपने जुनून के बल पर व्यक्ति आगे बढ़ता जाता है. ऐसे व्यक्ति देरसबेर अप्रत्याशित सफलता का वरण कर ही लेते हैं, नहीं तो समाज को ऐसे पड़ाव तक ले जाते हैं, जहां एक बड़ा कारवां उनकी संकल्पयात्रा को आगे बढ़ाने के लिए तैयार होता है. पहली किस्म के महत्त्वाकांक्षी लोगों की समाज में कोई कमी नहीं होती. ज्यादातर इसी प्रकार के होते हैं. वे प्रेय के लिए महत्त्वाकांक्षाओं की खेती करते हैं. समाज में मानप्रतिष्ठा और सुखसंपदा बटोरते हैं. आर्थिक उदारीकरण के दौर में ऐसी ही महत्त्वाकांक्षाओं को बढ़ावा देने के लिए अनेक पुस्तकें रची गई हैं. दूसरी किस्म यानी परिवर्तनकामी महत्त्वाकांक्षी होना बहुत कम लोगों के बस की बात होती है. इसलिए धर्म, जाति, संप्रदाय, राजनीति के क्षेत्र में जमे बहुत से यथास्थितिवादी ऐसे हैं जो ऐसी महत्त्वाकांक्षाओं को सराहना करना तो दूर, उन्हें अपराध तक मानने लगते हैं.

अरविंद केजरीवाल को मैं दूसरी कोटि का महत्त्वाकांक्षी मानता हूं. जो ‘प्रेय’ की अपेक्षा ‘श्रेय’ को महत्त्व देते हैं. कहने की आवश्यकता नहीं कि ऐसे महत्त्वाकांक्षी समाज में विरले ही होते हैं. इस तरह की महत्त्वाकांक्षाओं की खूबी होती है कि उनका कोई एक स्वरूप नहीं होता. व्यक्ति महत्त्वाकांक्षाओं के एक चरण को पार करता है, तो उसकी महत्त्वाकांक्षाएं मनुष्यता के हित में नया उठान ले लेती हैं. उनमें व्यक्ति की प्रतिभा और समर्पण के नएनए रूप सामने आते हैं. उदाहरण के लिए यदि कोई विद्यार्थी आईएएस बनना चाहता है तो उस लक्ष्य को पाते ही उसकी महत्त्वाकांक्षा समाप्त हो सकती है. हो सकता है उसके बाद वह घरगृहस्थी में रमकर रह जाए. यह भी हो सकता है कि उच्च पद पर पदासीन हो, भ्रष्टाचार के चालू तरीकों को अपनाकर अंधाधुंध कालाधन जमा करे, ऐसे ही एक महत्त्वाकांक्षी कारखानेदार बड़ा उद्यमी बनकर कई कंपनियों का स्वामी बन सकता है. लेकिन कुल मिलाकर वे अपने ‘प्रेय’ का ही विस्तार करते हैं, जिसमें व्यक्तित्व का केवल क्षैतिज विस्तार संभव होता है. दूसरी किस्म के महत्त्वाकांक्षी यानी श्रेय को महत्त्व देने वाले देरसवेर लोगों का समर्थन पाकर ‘उर्ध्व’ एवं ‘क्षैतिज’ दोनों तरह से विस्तार पाते हैं. हालांकि धारा के विपरीत बहने के कारण उन्हें अनेक परीक्षाओं और संघर्ष के कठिन दौर से गुजरना पड़ता है. ऐसे महत्त्वाकांक्षी समाज में विरले ही होते हैं.

अरविंद केजरीवाल ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग से आईआईटी की. देश के बड़े औद्योगिक घराने टाटा स्टील में काम किया. लेकिन उनके भीतर रहा महत्त्वाकांक्षी प्राणी उन्हें कुछ नया करने की निरंतर प्रेरणा दे रहा था. अगर वे इंजीनियर ही रहते तो सरकार और सार्वजनिक जीवन में पैठे अनाचार के किसी एक रूप से ही परिचित हो सकते थे. एक इंजीनियर का वास्ता मशीनों से होता है. सरकारी निकाय से जुड़े तो भी सीमित अनुभव प्राप्त कर सकते थे. मगर राजस्व विभाग की नौकरी ने उन्हें सार्वजनिक जीवन में पैठे पर्तदरपर्त पैठे भ्रष्टाचार से रूरू कराया. सूचना अधिकार के आंदोलन के दौरान बहुत से समाजकर्मियों की भांति उन्हें भी लगा कि सूचना का अधिकार मिलते ही लोग भ्रष्टाचार के विरुद्ध उठ खड़े होंगे. सरकारी कर्मचारी को पता हो कि लोग अपनी फाइल और उसमें की गई कार्रवाही को जानने का अधिकार रखते हैं तो उनकी रिश्वत मांगने की हिम्मत ही नहीं पड़ेगी. इस तरह सूचना का अधिकार का हथियार बनकर एक दिन भ्रष्टाचार को धराशायी कर देगा. मगर उस दौर के आतेआते पूंजीवाद बेलगाम होकर दौड़ने लगा था. संचारक्रांति के लुभावने नारे के साथ बहुत शातिराना ढंग से उसने लोगों के दिलोदिमाग को कब्जाना आरंभ कर दिया. धर्म नाम की अफीम तथा विकास के नाम पर उन्मुक्त व्यापती उपभोक्ता क्रांति ने लोगों के दिलोदिमाग पर अपना कब्जा जमा लिया. धर्म ने लोगों को ‘स्वर्ग’ और ‘मुक्ति’ के नाम पर स्वार्थी बनाया तो पूंजीवाद प्रेरित उपभोक्तावाद ने स्वार्थ को विस्तार देते हुए लोगों से लिखनेपढ़ने का संस्कार ही छीन लिया. अब कोई हथियार चाहे जितना कारगर हो, यदि व्यक्ति को उसे चलाने का हुनर नहीं आता तो उसका होना व्यर्थ है. कुछ ऐसा ही सूचना अधिकार अधिनियम के साथ हुआ. बड़े जोश के साथ, संसद के अधिकार से लागू सूचना अधिकार अधिनियम की धार भी धीरेधीरे भौंथरी पड़ने लगी थी. वैसे भी सूचना अधिकार अधिकार फाइल में लिखी इबारत को पढ़ने की इजाजत तो देता था, लेकिन उसे लिखते समय यदि किसी कर्मचारी ने गलत मंशा से काम लिया है, तो उसपर कार्रवाही करने की इजाजत कानून के अंदर नहीं थी. जनलोकपाल के समर्थक मान रहे थे कि भ्रष्टाचारी को दंडित करने का कार्य ऐसी संस्था द्वारा लिया जा सकता था जो अधिकारसंपन्न होने के साथसाथ स्वायत्त भी हो. इससे जनलोकपाल आंदोलन का जन्म हुआ.

सूचना अधिकार को हवा देने के लिए अरविंद ने परिवर्तन नाम की संस्था खोली थी. मगर सूचना अधिकार के शिथिल पड़ते दिनों में ही जनलोकपाल आंदोलन चला तो अरविंद उसमें कूद पड़े. अन्ना उस आंदोलन के मुखिया बने, लेकिन जनलोकपाल बिल के नाम पर राज्य सभा में जो राजनीतिक नाटक हुआ, उससे पूरा देश यह जान गया कि देश के घाघ नेता ऐसा कोई काम नहीं करना चाहते, जिससे उनकी सत्ता पर खतरा नजर आए. मगर अन्ना और केजरीवाल के आंदोलन का इतना असर तो हुआ था कि जनता राजनेताओं के नकली मुखौटों को पहचानने लगी थी. विशेषकर युवावर्ग जो आर्थिक उदारीकरण के बावजूद देश के दिवालियेपन जैसी स्थिति देख, स्वयं को छला हुआ महसूस कर रहा था. विशेषकर 2007 में पूंजीवाद का गुब्बारा फूटने के बाद आई मंदी के बाद से. मोहभंग का शिकार वही युवावर्ग अरविंद केजरीवाल से जुड़ता चला गया. ‘आम आदमी पार्टी’ की सफलता में उसका बड़ा योगदान है.

सवाल है कि रास्ता किसका अच्छा है. अन्ना का कि अरविंद का? जैसा अन्ना हजारे और किरन बेदी मानना है, सत्ता से दूर रहकर एक दबाव गु्रप की भांति काम करना अच्छा रहेगा; या फिर दलदल में घुसकर उसकी सफाई करने का—जैसाकि अरविंद केजरीवाल करना चाहते हैं. इसका जवाब ढूंढने के लिए हमें बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है. गीता(5/2) में बहुत पहले कह दिया गया है—संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ/तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते.

हो सकता है दलदल में पांव रखने से कुछ छींटे दामन पर आएं. लेकिन जो अपने लिए नया रास्ता चुनते हैं, उनके लिए यह स्वाभाविक ही है. अब यह अरविंद पर है कि वे छींटों की परवाह किए बिना आगे बढ़ते हैं या किनारेकिनारे रहकर केवल राजनीति करना चाहते हैं. वैसे अब तक उन्होंने जो किया है उससे लगता है कि वे चुनौतियों से बचकर चलनेवाले नेता नहीं हैं. यही बात उन्हें दूसरों से अलग बनाती है. यही उनकी दिनोंदिन बढ़ती ख्याति का प्रतीक है. वे भारतीय राजनीति के नए मिथक हैं, जिसमें आदर्श भी है और भरपूर लोकप्रियता भी. दोनों को साधना बड़ी तपस्या का काम है. पर जो साध ले जाते हैं, वे इतिहास नया गढ़ ही लेते हैं. विधानसभा चुनावों के प्रचार के दौरान अरविंद केजरीवाल के साथी अपने हाथों में फिल्म ‘नायक’ का पोस्टर लेकर चलते थे. उस फिल्म में दिखाया गया था कि यदि सचमुच कुछ करने का संकल्प हो तो 24 घंटे का समय भी पर्याप्त होता है. लोग नहीं चाहते कि आम आदमी का नायक फिल्मी नायक से ‘फिसड्डी’ साबित हो. सच्चे कर्मयोगी पलछिन नहीं गिनते, केवल अवसर देखते हैं, तभी तो वे छोटेसे सफर को भी यादगार बना जाते हैं. और अंत में दिनकर की प्रेरणादायी कविता की पंक्तियां जो उन्होंने जयप्रकाश नारायण के लिए लिखी थी—

सेनानी करो प्रयाण अभय, भावी इतिहास तुम्हारा है

ये नखत अमा के बुझते हैं, सारा आकाश तुम्हारा है.

© ओमप्रकाश कश्यप

* उठो, जागो, और जानकार श्रेष्ठ पुरुषों के सान्निध्य में ज्ञान प्राप्त करो । विद्वान् मनीषी जनों का कहना है कि लक्ष्य प्राप्ति का मार्ग उसी प्रकार दुर्गम है जिस प्रकार छुरे के पैना किये गये धार पर चलना.