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संस्कृति और सामाजिक न्याय

सामान्य

प्रत्येक समाज अपनी संस्कृति से पहचाना जाता है. उसका प्रमुख कार्य समाज में एकता की अनुभूति जगाना पैदा करना है. इसके लिए जरूरी है कि वह सामाजिक संबंधों, नागरिकों के सामान्य व्यवहारों, सार्वकालिक जीवनमूल्यों और भविष्य के सपनों से अनुप्रेत हो. प्रायः धर्म एवं संस्कृति को एक मान लिया जाता है. जबकि आस्था और विश्वास को अपनी पीठ पर ढोने वाला धर्म विराट संस्कृति का अंग तो हो सकता है, उसका पर्याय नहीं. किसी समाज द्वारा धर्म की केंचुल से बाहर आने की छटपटाहट विवेकीकरण के प्रति उसकी उत्सुकता को दर्शाती है. जहां तक भारतीय संस्कृति का प्रश्न है, अधिकांश विद्वान इसे ‘विविधता की संस्कृति’ मानते तथा ‘सनातन संस्कृति’ कहकर इसका महिमामंडन करते हैं. इनमें से एक भी धारणा मूल्यबोधक नहीं हैं. सांस्कृतिक वैविध्य तभी सार्थक है जब वह मानवीय चेतना का स्वयंस्फूर्त विस्तार हो. साथ ही लोकतांत्रिक सोच को बढ़ावा देता हो. प्राचीनता कालसापेक्ष स्थिति है. वह केवल घटनाविशेष की ऐतिहासिकता को दर्शाती है. संस्कृति का असल बड़प्पन इसमें है कि अपने अनुयायियों के बीच न्याय, समानता और समरसता के वितरण को लेकर वह कितनी उदार है! कितने प्रयास उसने अपने अंतर्विरोधों के समाहार हेतु किए हैं. और इन सब के लिए वह लोकतंत्र के कितने करीब है. इस कसौटी पर भारतीय संस्कृति उतनी सफल सिद्ध नहीं होती, जितनी बताई जाती है.

सच तो यह है कि स्मृतिग्रंथों, पुराणों, महाकाव्यों आदि के माध्यम से जो संस्कृति हमारे जीवन में दाखिल होती हैय या एक अल्पसंख्यक अभिजन वर्ग द्वारा बहुसख्यक जनसमुदाय पर बरबस थोप दी जाती है, वह सामाजिक न्याय की अवरोधक तथा सामूहिक विवेक का क्षरण करने वाली है. सामान्य नैतिकता एवं लोकादर्शों को अमल में लाने के बजाय वह धर्म के हाथों में खेलती है; और खुद को बड़ी आसानी से उसकी सामंती वृत्तियों के अनुसार ढाल लेती है. वह लोगों से अपेक्षा रखती है कि वे क्या करें, क्या खाएं, क्या पियें, क्या पढ़ेलिखें, और किन लोगों से कैसे संबध बनाएं? न तो उसे मानवीय विवेक की परवाह रहती है, न उसकी रुचियों का परिष्कार. बावजूद इसके जीवन में अनावश्यक दखल देकर, वह समानता और स्वतंत्रता की भावना का हनन करती है. कभी धर्म, कभी समाज और कभी परंपरावैविध्य के बहाने, असमानता को मानवीय नियति घोषित करना उसकी मूल प्रवृत्ति रही है. वह असल में शासक संस्कृति है, जो व्यक्ति को जन्म के साथ ही बता देती कि उसका जन्म शासन करने के वास्ते हुआ है या शासित होने के लिए. जो लोग शासक वर्ग में जन्म लेते हैं, अभिजनोन्मुखी संस्कृति का रेशारेशा उनकी मदद में जुटा होता है. शासितों की कोटि में जन्मे व्यक्ति, यदि दुर्दशा से उबरना चाहें या इस तरह का सपना भी देखें तो वह लगातार अवरोध उत्पन्न कर, परिवर्तन की चाहत को ही मिटाने पर तुल जाती है. लोगों के सवाल करने की आदत को छुड़ाकर वह उनके निर्मानवीकरण को गति देती है. इससे सामूहिकताबोध, जो संस्कृति का प्रमुख उद्देश्य है, का हृास होता है. सांप्रदायिकता पनपती है; और जनशक्ति छोटेछोटे टुकड़ों में बंटकर निष्प्रभावी हो जाती है. इससे परिवर्तन का लक्ष्य निरंतर दूर खिसकता रहता है.

हम भारतीयों, विशेषकर जो लोग स्वयं को हिंदू मानते हैं, का जीवन जन्म से लेकर मृत्यु तक तरहतरह के कर्मकांडों से बंधा होता है. वे अनेक प्रकार के हो सकते हैं. एक समाज से दूसरे समाज, यहां तक कि एक जाति समूह से दूसरे जातिसमूह के बीच उनका रूप बदलता रहता है. कर्मकांडों का उद्देश्य होता है, किसी महाशक्ति को प्रसन्न करना. उनमें एक पक्ष दाता(जाहिर है काल्पनिक), दूसरा याचक की भूमिका में होता है. याचक अपने श्रेष्ठतम को समर्पित करने की भावना के साथ दाता के आगे नतशिर होता है. तत्क्षण खुद को दाता का प्रतिनिधि घोषित करते हुए पुरोहित बीच में आ टपकता है. याचक द्वारा दाता के नाम पर समर्पित सामग्री के अलावा वह दक्षिणा की भी दावेदारी करता है. कर्मकांडों को लोक की सामान्य स्वीकृति प्राप्त होने के कारण उनसे पैदा स्तरीकरण समाज में गहरी पैठ बना लेता है. तदनुसार जो दाता या उसके स्वयंघोषित प्रतिनिधि की इच्छा है, उसे उसी रूप में, बगैर किसी नानुकर के, स्वीकार कर लेना याचक की विवशता होती है. इसका लाभ शिखर पर बैठे लोग उठाते हैं. राज्य की कुल उत्पादकता में नगण्य योगदान के बावजूद वे किसी न किसी बहाने लाभ के नब्बे प्रतिशत को हड़पे रहते हैं. उसी के दम पर वे दाता की भूमिका निभाए जाते हैं. उनके नेतृत्व में पूरी संस्कृति कर्मकांडों में सिमटकर रह जाती है.

कर्मकांडों की व्याख्या जिन ग्रंथों में है, सब ब्राह्मणों द्वारा रचे गए हैं. उनकी समीक्षा अथवा संशोधनविस्तार का अधिकार ब्राह्मणेत्तर वर्गों को नहीं है. उनसे बस इतनी अपेक्षा होती है कि ब्राह्मणों द्वारा गढ़े गए लिखितअलिखित विधान का बगैर नानुकुर अनुसरण करें. उनपर किसी भी प्रकार का संदेह, आलोचना, समीक्षा पाप की कोटि में आती है. सांस्कृतिकसामाजिक असमानता का पोषण करने वाली इस संस्कृति के प्रति विरोध के स्वर आरंभ से ही उठते रहे हैं. उनके दस्तावेजीकरण का काम हमें अपेक्षाकृत उदार एवं समावेशी संस्कृति के करीब ला सकता है. उसे हम जनसंस्कृति अथवा मूल भारतवंशियों की संस्कृति भी कह सकते हंै.

सत्य यह भी है कि कोई भी संस्कृति स्वयं लक्ष्य नहीं होती. वह केवल मार्ग चुनने में मदद करती है. उसका काम मानवीय वृत्तियों को सुसंस्कृत करना है, किसी व्यक्ति या व्यक्तियों की रोजमर्रा की आदतों पर नियंत्रण करना नहीं. विडंबना है कि भारतीय संस्कृति की अधिकांश ऊर्जा नकारात्मक कार्यों में खपती आई है. वह बड़ी आसानी से उन लोगों के हाथों में खेलने लगती है, जिनका काम दूसरों के मूलभूत अधिकारों का हनन करना है. शिखरस्थ ब्राह्मण उसके विधान का निर्माता, व्याख्याता, पालकअनुपालक सब होता है. विशेष मामलों में, या यूं कहिए कि अपवादस्वरूप संस्कृति के विशिष्ट प्रवत्र्तकों को, जन्मना ब्राह्मण न हों तो भी उन्हें कर्मणा ब्राह्मण मान लिया जाता है. व्यास, वाल्मीकि, महीदास आदि शास्त्रीय परंपरा के ब्राह्मण नहीं हैं. फिर भी उन्हें ब्राह्मण माना गया है. क्योंकि वे उस संस्कृति के सिद्ध संहिताकार हैं, जो वर्णव्यवस्था को आदर्श तथा ब्राह्मणों को समाज का सर्वेसर्वा मानकर उन्हें अंतहीन अधिकार सौंप देती है. कुछ लोग इसे भारतीय संस्कृति की उदारता या उसका लचीलापन मानते हैं. असल में यह दूसरे वर्गों के बुद्धिजीवी, उनकी उपलब्धियों का श्रेय हड़प लेने की स्वार्थपूर्ण व्यवस्था है. इससे निम्न वर्गों की उच्च स्तरीय मेधा, उच्चस्थ वर्गों की स्वार्थसिद्धि में लगी रहती है.

इस प्रवृत्ति के दर्शन ऋग्वेद से लेकर आधुनिक साहित्य तक मौजूद हैं. गुरु उद्दालक के पास सत्यकाम जाबाल जब यह कहता है कि वह घरों में काम करने वाली दासी के गर्भ से जन्मा है और पिता का नाम पता नहीं है, तो महर्षि उसे यह कहकर कि ‘तूने सत्य कहा, ऐसा सत्यभाषी ब्राह्मण पुत्र ही हो सकता है.’-दीक्षा देने को तैयार हो जाते हैं. भारतीय संस्कृति के अध्येता इस उद्धरण को उसके उदात्त लक्षण के रूप में प्रस्तुत करते आए हैं. वस्तुतः यह बौद्धिक धूर्तता है, जिससे ब्राह्मणेत्तर वर्गों को एक ही झटके में ‘मिथ्याभाषी’ घोषित दिया जाता है. सत्यकाम जाबालि की भांति महीदास भी दासी पुत्र था. जन्म से शूद्र किंतु मनबुद्धि से ब्राह्मण संस्कृति का प्रतिभाशाली संहिताकार. ऋग्वेद शाखा के ‘ऐतरेय ब्राह्मण’, ‘ऐतरेय उपनिषद’ और ‘ऐतरेय आरण्यक’ का रचियता. इस संस्कृति ने महीदास को भी शूद्रों से झटक लिया. अपवादस्वरूप ही सही, ब्राह्मणेत्तर वर्ग के कुछ अतिप्रतिभाशाली बुद्धिजीवियों को अनुलोम परंपरा के अनुसार ब्राह्मण मान लिए जाने की नीति, प्रतिभाहीन ब्राह्मण पुत्रों के लिए शिखर का स्थान सुरक्षित रखती है. स्तर से ऊपर उठने के लिए ब्राह्मणेत्तर वर्ग के बुद्धिजीवियों को जहां विरलतम प्रतिभा, सर्जनात्मक मेधा एवं विभेदकारी ब्राह्मणसंस्कृति के प्रति अटूट निष्ठा का प्रदर्शन करना पड़ता है, वहीं ब्राह्मणसंतति को उसका स्वाभाविक उत्तराधिकारी मान लिया जाता है. प्रमुख प्रतिभाओं के पलायन के बाद निचले वर्ग आवश्यक बौद्धिक नेतृत्व से वंचित रह जाते हैं. दूसरे षब्दों में भारतीय संस्कृति, उसके नामित देवता, कर्मकांड, धर्मदर्शन आदि केवल ब्राह्मणों का सृजन नहीं हंै. उसमें ब्राह्मणेत्तर वर्गों का भी भरपूर योगदान रहा है. हालांकि लाभ सर्वाधिक ब्राह्मणों ने उठाया है.

ब्राह्मण संस्कृति के व्याख्याकारों की प्रशंसा करनी होगी कि वर्गीय श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए उन्होंने अपनी रचना का श्रेय स्वयं लेने के बजाय वर्गीय श्रेय को प्राथमिकता दी. ब्राह्मण होने के नाते व्यक्तिगत श्रेयसम्मान तो उन्हें आसानी से मिल ही जाता है. व्यास, याज्ञवल्क्य, वशिष्ट आदि किसी मनीषी के नहीं, गौत्र या परंपरा के नाम हैं. उनका उल्लेख स्मृतिग्रंथों से लेकर रामायण, महाभारत, पुराण यहां तक कि उत्तरवर्ती ग्रंथों में भी, मुख्य सिद्धांतकार के रूप में होता आया है. व्यक्तिगत श्रेय के आगे वर्गीय श्रेय को वरीयता दिए जाने का अच्छा उदाहरण ‘योग वशिष्ट’ है. लगभग एक हजार वर्ष पुराने, 29000 से अधिक पदों वाले तथा शताब्दियों के अंतराल में अनाम लेखकों द्वारा रचित, परिवर्धित इस विशद् ग्रंथ का रचनाकार होने का श्रेय आदि कवि वाल्मीकि को प्राप्त है, जबकि वाल्मीकि का नाम लगभग दो हजार वर्ष पुरानी कृति ‘पुलत्स्य वध’ जो निरंतर प्रक्षेपण के उपरांत ‘रामायण’ महाकाव्य के रूप में ख्यात हुआसे भी जुड़ा है. ज्ञान को परंपरा में ढाल देने का लाभ तो केवल ब्राह्मणों को जबकि नुकसान पूरे बहुजन समाज को उठाना पड़ा है. वर्णव्यवस्था के चलते पोंगा पंडितों को भी बौद्धिक नेतृत्व का अवसर मिलता रहा. पीढ़ीदरपीढ़ी एक ही धारा के लेखन से मौलिकता का हृास हुआ. चूंकि धर्मग्रंथों में प्रक्षेपण अलगअलग समय में हुआ था, इसलिए उनमें परस्पर विरोधी बातें भी शामिल होती गईं. जिस महाभारत(शांतिपर्व) कहा गया था, ‘वर्णविभाजन जैसी कोई चीज असलियत में नहीं है. यह पूरी सृष्टि ब्रह्म है, क्योंकि इसे ब्रह्मा ने बनाया है.’ उसी में द्रोणाचार्य द्वारा एकलव्य का अंगूठा मांग लेने के धत्तकर्म को भी ‘धर्म’ मान लिया गया.

उधर व्यवस्था से अनुकूलित गरीबविपन्न लोग निरंतर यह आस बांधे रहे कि जो पंडित लोग चैंसठ लाख योनियों का हिसाब रखते हैं, आदमी के ‘भाग्य’ का अगलापिछला सब बांच लेने का दावा करते हैं, वे उनका भी ‘हिसाब’ रखेंगे! यदि परमात्मा छोटेबड़े, गरीबअमीर, ब्राह्मण और शूद्र में भेद नहीं रखता तो वे भी नहीं रखेंगे. इस भरोसे के साथ वे अपने अधिकारों की ओर से, इतिहास की ओर से मुंह फेरे रहे. समय के दस्तावेजीकरण के प्रति निचले वर्गों की उदासीनता का लाभ ऊपर वालों ने खूब उठाया. उन्होंने कर्मफल का सिद्धांत पेश किया. उसके जरिये शोषित वर्गों को समझाया जाने लगा कि उनकी दुर्दशा के लिए कोई दूसरा नहीं, वे स्वयं जिम्मेदार हैं. संस्कृति के आवरण में उन्होंने पहले अवसर छीने, फिर मानसम्मान. अपने से नीचे के लोगों को बर्बर, असभ्य, गंवार, गलीच घोषित करके खुद इतिहास में तोड़मरोड़ करते रहे. उनके द्वारा रचे गए इतिहास में ‘भेड़ों’ और ‘मेमनों’ को जंगल में अव्यवस्था का दोषी बताया जाता रहा तथा ‘भेड़ियों’ और ‘लक्कड़बघ्घों’ को प्रत्येक अपराध से बरी रहने की व्यवस्था की गई. पंडित, देवता, करुणानिधान, अन्नदाता, रक्षक, सेठ, साहूकार जैसे सुशोभन विशेषण उन्होंने अपने लिए सुरक्षित कर लिए. पिछले दो हजार साल का सांस्कृतिक खेल उनकी चालों और समझौतापरस्ती से बना है. ऐसी संस्कृति में जनसाधारण के लिए न्याय की उम्मीद करना खुद को धोखा देना है.

सांस्कृतिक वर्चस्व’ बनाए रखने की कोशिश के समानांतर उससे उबरने की छटपटाहट भी मानवइतिहास का हिस्सा रही है. भारत में उसका पहला उदाहरण मक्खलि गोशाल के चिंतनकर्म में दिखाई पड़ता है. वह पहला विद्वान था जिसने श्रमशोषक, परजीवी ब्राह्मण संस्कृति के बरक्स समाज में मेहनतकशों, शिल्पकारों तथा उसके श्रमकौशल के सहारे आजीविका जुटाने वाले लोगों को संगठित कर आजीवक संप्रदाय की स्थापना की थी. मक्खलि की लोकप्रियता का अनुमान इससे भी लगाया जाता है कि उसके जीवनकाल में आजीवक संप्रदाय के अनुयायियों की संख्या बौद्ध अनुयायियों से अधिक थी. विद्वता के मामले में भी वह अद्वितीय था. सम्राट प्रसेनजित ने बुद्ध से कहा था कि वह गोशाल को उन(बुद्ध)से अधिक प्रतिभाशाली मानते हैं. बुद्ध की हिंसा तथा कर्मकांड विरोधी भौतिकवादी विचारधारा पर आजीवक संप्रदाय का ही प्रभाव था. मक्खलि तथा बुद्ध के अलावा निगंठ नागपुत्त, संजय वेठलिपुत्त, पूर्ण कस्सप, अजित केशकंबलि, कौत्स आदि विद्वान भी यज्ञों में दी जाने वाली बलि तथा कर्मकांड का विरोध कर रहे थे. निगंठ नागपुत्त आगे चलकर महावीर स्वामी के नाम से जैन दर्शन के प्रवर्त्तक माने गए. इनमें सर्वाधिक ख्याति मध्यमार्गी गौतम बुद्ध को मिली, जो उस समय की चर्चित दार्शनिक समस्याओं ‘आत्मा’, ‘परमात्मा’ आदि पर विमर्श करने के बजाय उन्हें टालने के पक्ष में थे. क्षत्रिय कुल में जन्म लेने के कारण बुद्ध और उनके विचारों को उन राजदरबारों में आसानी से प्रवेश मिलता गया, जो ब्राह्मण पुरोहितों के बढ़ते दबाव से तंग आ चुके थे. ‘आजीवक’ और ‘लोकायत’ धारा का प्रतिनिधि साहित्य आज अप्राप्य है. उनका छिटपुट उल्लेख ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन ग्रंथों में ही प्राप्त होता है. सभी में उनकी पड़ताल नकारात्मक दृष्टिकोण के साथ की गई है. संकेत साफ हैं कि विजेता संस्कृतियों ने, पराजित संस्कृति के ग्रंथों को मिटाने का काम पूर्णतः योजनाबद्ध ढंग से किया.

धर्म और संस्कृति का आधार कहे जाने वाले ग्रंथों में, लंबे प्रक्षेपण के बावजूद ऐसे अनेक तत्व हैं, जो वैकल्पिक जनसंस्कृति के प्रवत्र्तक और संवाहक रहे हैं. महिषासुर, बालि, पौराणिक सम्राट वेन के अलावा गणेश, शिव जैसे अनेक नाम मिथक भी हो सकते हैं और यथार्थ भी. लेकिन यदि इन्हें मिथक मान लिया जाए तो ब्राह्मण संस्कृति के प्रमुख संवाहक ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र, हनुमान तथा अन्य देवीदेवताओं को भी मिथक मानना पड़ेगा. क्योंकि उसका पूरा का पूरा भवन इन्हीं के कंधों पर टिका है. शिव भारत की आदिम जातियों के मुखिया रहे होंगे. उनके सहयोगी के रूप में भूत, पिशाच, प्रेत आदि हमें भारत के आदिम कबीलों की याद दिलाते हैं. आर्यों ने शिव को तो अपनाया. मगर उनके सहयोगी कबीलों की पूरी तरह उपेक्षा की. अप्रत्यक्ष रूप से बख्शा शिव को भी नहीं गया. उन्हें आक, धतूरा खाने और भभूत लगाकर रमने वाले अवधूत की तरह दर्शाते हुए सृष्टि चलाने(शासन करने) का अधिकार ‘ब्राह्मण ब्रह्मा’ तथा ‘क्षत्रिय विष्णु’ की बपौती मान लिया गया. गणेश का मिथक भी प्राचीन भारतीय गणतंत्रों के मुखिया की याद दिलाता है. गणतांत्रिक व्यवस्थाओं में मुखिया को प्रथम सम्मानेय माना जाता था. कालांतर में बड़े राज्यों का गठन होने लगा तो सभा का नेतृत्व करने वाले गणप्रमुख के चरित्र का भी विरूपण किया जाने लगा. बैठेबैठे सूंड लटक आना और लंबोदर जैसे प्रतीक गणप्रमुख पर कटाक्ष तथा उसे अपमानित करने के लिए रचे गए.

सामाजिक न्याय’ का सपना देखने वाले बुद्धिजीवियों की असली लड़ाई धार्मिक वर्चस्ववाद, विपन्नता और जड़ हो चुकी वर्णव्यवस्था से है. इस लक्ष्य की सिद्धि वर्चस्वकारी संस्कृति से मुक्ति के बिना असंभव है. ब्राह्मण संस्कृति ईश्वरीय न्याय में विश्वास करती है. न्याय का स्वरूप क्या हो? वंचित तबकों की उन्नति में वह किस भांति सहायक हो सकता हैयह नहीं बताती. ‘सामाजिक न्याय’ के पैरोकारों का प्रथम लक्ष्य ऐसी संस्कृति का पुनरुद्धार करना है, जिसमें संगठित धर्म का हस्तक्षेप न्यूनतम हो. जो पूरी तरह उदार एवं लोकतांत्रिक हो. इसके लिए आवश्यक है कि प्राचीन संस्कृति के उन प्रतीकों को रेखांकित किया जाए जो कभी ब्राह्मण संस्कृति के विरोध में या उसके समानांतर खड़े थे. क्या यह धर्म के भीतर एक और धर्म की खोज सिद्ध नहीं होगी? यह आशंका पूर्णतः निर्मूल नहीं है. ध्यान यह रखना होगा कि समानांतर संस्कृति के इन प्रतीकों, नायकों, मिथकों का योगदान दमितशोषित वर्गों के आत्मविश्वास को लौटाने तक सीमित हो. यह एहसास दिलाने के लिए हो कि वे हमेशा से ही ‘ऐसे’ नहीं थे. वे न केवल ‘वैसे’ बल्कि कई मायनों में उनसे भी बढ़कर थेरावण की लंका में विभीषण को अपनी आस्था और विश्वास के साथ ससम्मान जीने की स्वतंत्रता प्राप्त थी. रामराज्य में शंबूक से यह स्वतंत्रता छीन ली जाती है. इसी तरह राक्षससम्राट जलंधर अपनी विष्णुभक्त पत्नी वृंदा के साथ सुखी जीवन जीता है और उनके दांपत्य के बीच अविश्वास की किरच तक मौजूद नहीं है, जबकि सीता को रावण की अशोकवाटिका में रहने के लिए भी अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ता है. यह गरीबी तथा जातिभेद द्वारा पैदा की गई अन्यान्य विषमताओं के विरुद्ध जंग भी है. सदियों से जाति के आधार पर सुखसुविधा और सम्मान भोगते आए समूह, परिवर्तनकामी समूहों पर जातिभेद को बढ़ावा देने का आरोप लगा रहे हैं. दूसरी ओर जातीय उत्पीड़न का शिकार रहे वर्गों को लगता है कि लोकतांत्रिक माहौल का लाभ उठाकर वे अपने संघर्ष को आगे बढ़ा सकते हैं. इसलिए वे जाति को संगठनकारी ‘टूल’ की तरह इस्तेमाल कर रहे है. लेकिन जातिआधारित संगठनों की अपनी परेशानियां हैं. इस देश में हजारों जातियां हैं. अपनें दम पर कोई भी जाति परिवर्तनकारी ताकत बनने में अक्षम है. अतः लोग समझने लगे हैं कि सामाजिक न्याय के संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए समानांतर लड़ाई संस्कृति के मोर्चे पर भी लड़नी होगी. जीत उन्हीं की होगी जो संगठित रहने के साथसाथ सामूहिक विवेक से काम लेंगे.

ओमप्रकाश कश्यप

सामाजिक न्याय की कसौटी पर ‘स्वामीभक्ति’ और ‘राष्ट्रवाद’ का आकलन

सामान्य

लेख

हिंदी में एक बड़ा ही निर्लज्ज शब्द है—स्वामीभक्ति। निर्लज्ज मैं आज कह रहा हूं। एक जमाने में यह बड़ा ही पुण्यवान शब्द माना जाता था। स्वामीभक्त व्यक्ति का समाज में बड़ा मान-सम्मान और प्रतिष्ठा थी। उसकी गिनती मालिक के सर्वाधिक विश्वसनीय लोगों में होती थी। स्वामीभक्ति सिखाने के लिए न तो कोई स्कूल था, न इसके लिए कोई अलग से धर्मशास्त्र रचा गया था। फिर भी स्वामीभक्त होना, कुछ लोगों के लिए अत्यंत गौरवशाली होता था। ‘स्वामीभक्ति’ कदाचित जन्मजात गुण था। समाज में कहीं से, कोई भी, ऐसा ‘स्वामीभक्त’ निकल आता, जो अपना सर्वस्व किसी सत्ता अथवा सत्ता-शिखर पर विराजमान व्यक्ति या दरबारियों में से किसी एक को सौंप देता था। उसके बाद स्वामी का मित्र उसका मित्र; तथा स्वामी का दुश्मन उसका दुश्मन बन जाता था। उसका समर्पण इतना प्रबल होता था कि ‘स्वामी’ के हित में यदि निर्दोष व्यक्ति की जान लेनी पड़े; अथवा किसी अपने की बलि देनी पड़े तो भी वह खुशी-खुशी कर्तव्य-पूर्ति का आनंद लेता था। मालिक का विश्वासपात्र होना ही उसकी उपलब्धि थी। यही उसका श्रेय था और यही उसका प्रेय—जिसके लिए वह बड़े से बड़ा बलिदान करने को तत्पर होता था। इस कारण अपने आश्रयदाता की कीर्ति-गाथा रचने वाले कवि, इतिहासकार भी उसके विश्वासपात्रों को नजरंदाज नहीं कर पाते थे। कभी-कभी स्वामीभक्ति का सिलसिला पीढ़ियों तक चलता रहता था। हर ‘स्वामीभक्त’ गर्व से दोहराता था कि उसकी इतनी पीढ़ियां अमुक व्यक्ति तथा उसके परिवार की विश्वासपात्र रही हैं।  

स्वामीभक्त के लिए उसकी ‘स्वामीभक्ति’ ही सब कुछ थी। ईश्वरभक्ति और स्वामीभक्ति में उसके लिए कोई अंतर न था। यद्यपि राजा के आदेशानुसार काम करने वाले सैंकड़ों-हजारों लोग हो सकते थे। ऐसे लोग जो दावा करते हों कि वे ठीक वही करते हैं, जो उनका मालिक कहता है। लेकिन इतने भर से वे स्वामीभक्त नहीं हो जाते थे। इसलिए कि स्वामीभक्ति, स्वामीभक्त व्यक्ति द्वारा संपन्न कार्य के बजाय, उस समर्पण एवं विश्वास में होती है, जिसमें एकमात्र स्वामी की इच्छा सर्वोपरि हो। बदले में स्वामीभक्त को क्या मिलता था—यह वर्णनातीत है। गूंगे के गुण के समान—सच्चा स्वामीभक्त ही उसे महसूस कर सकता था। ‘अमुक व्यक्ति मेरा भरोसेमंद है’—ये चंद शब्द स्वामीभक्त द्वारा आत्ममुग्ध जीवन जीने के लिए पर्याप्त होते थे। अपने ‘मैं’ को मारकर, पूरी तरह स्वामी का हो जाना, अपना अच्छा-बुरा कुछ भी न सोचना, स्वामी के हित को अपना हित मान लेना, उसके प्रत्येक आदेश को सिर-माथे लेना, अच्छाई-बुराई, नीति-अनीति पर कतई विचार न करना, विवेक और तर्कबुद्धि को मालिक के नाम पर गिरवी रख देना, स्वामी दिन कहे तो दिन, रात कहे तो रात बताना—ये स्वामीभक्ति के विशिष्ट लक्षण माने जाते थे। समाज में इन गुणों की इज्जत चाहे हो या न हो, स्वामीभक्त के लिए यही सबकुछ होते थे। वह केवल अपने ‘स्वामी’ के लिए जीता था। जीवन देकर भी स्वामी के हित की रक्षा करने को अपना सौभाग्य मानता था। बदले में जो भी मिलता, उसी को पुण्यफल मानकर ग्रहण कर लेता था। अपने मालिक या राज्य के प्रति सब कुछ बलिदान कर देने की भावना अवश्य ही उदात्त एवं सराहनीय मानी जा सकती है। इसीलिए इतिहास उसे महिमामंडित करता आया है। कमी यह थी कि मालिक के प्रति समर्पण और बलिदान के समय स्वामिभक्त मनुष्य अपने विवेक तथा कार्य के औचित्य को एकदम भुला देता था। स्वामीभक्त व्यक्ति की तत्कालीन समाज में क्या इज्जत थी? जनसाधारण उसे किस प्रकार देखता था? इसका कोई लिखित साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। तथापि लगता तो यही है कि स्वामीभक्त की सारी मान-मर्यादा और सम्मान स्वामी के पद-गौरव में विलीन होकर रह जाते थे। इस बात को स्वामीभक्त भी समझता था, मगर इससे उसकी स्वामीभक्ति पर कोई अंतर नहीं पड़ता था। 

स्वामीभक्ति का एक चलताऊ नाम है—नमकहलाली। लेकिन उसमें स्वयंस्फूर्त्त स्वामीभक्ति की भावना नहीं है। ‘तुमने उनका नमक खाया है, इसलिए उनके साथ दगा करने की सोचना भी मत’ या ‘मैंने उसका नमक खाया है, मैं भला उसको धोखा कैसे दे सकता हूं’ कहकर नमकहलाल, व्यक्ति-विशेष के साथ कभी छल न करने को प्रतिबद्ध हो जाता था। लेकिन नमकहलाली का प्रत्यय सामान्यतः आमजन के लिए ही था। शिखरस्थ वर्गों में ‘हम पियाला—हम निवाला’ बनने के बावजूद वर्चस्व का संघर्ष चलता रहता था। तब वह कूटनीति माना जाता था। सीधे तौर पर कहें तो जनसाधारण पर नमकहलाली के नाम पर स्वामीभक्ति सायास थोप दी जाती है। सवाल है कि नमक ही क्यों? बड़े से बड़ा व्यक्ति हमेशा खैरात तो बांटता नहीं था। बल्कि भिखारियों और फकीरों से तो, जिनका जीवन पूरी तरह खैरात पर पलता था, नमकहलाली की अपेक्षा की ही नहीं जाती थी। नमकहलाली की अपेक्षा आमतौर पर ऐसे लोगों से की जाती थी, जो सेवा में रहते थे। जिन्हें उनका मालिक नौकरी के बदले मात्र नमक जितना देता था। उस ‘नमक’ जितनी पगार के लिए नमकहलाल ने अपनी देह का कितना नमक बहाया है, इस बात को वह न तो खुद समझ पाता था, न उसके आसपास रहने वालों को समझ आती थी। नमक की कीमत चुकाने में अकसर पीढ़ियां गुजर जाती थीं। बावजूद इसके, मजबूरी में ही सही स्वामीभक्ति दर्शाने वाले लोग कम न थे। इनमें अधिकांश समाज की पिछड़ी और अतिपिछड़ी जातियों के लोग होते थे, जो अपनी आजीविका के लिए ‘स्वामी’ पर निर्भर थे। स्वामीभक्ति दर्शाना एक तरह से आजीविका को सुरक्षित रखने का माध्यम भी था। एक बात और, जिन दिनों यह शब्द बना या यूं कहो कि जब से स्वामीभक्ति को आदर्श माना गया—उन दिनों सत्ता और संसाधनों में जनसाधारण की हिस्सेदारी नमक जितनी भी नहीं थी। जनसाधारण के पास कुल पूंजी के नाम पर, केवल उसकी देह होती थी। अपने स्वामी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन के लिए सिवाय देह के वह कुछ और दांव पर लगा ही नहीं सकता था। इसलिए स्वामीभक्त बने रहना कुछ लोगों के लिए उनकी मजबूरी भी थी।

उन दिनों पृथ्वी की समस्त निधियों और संपदाओं का स्वामी ब्राह्मण को माना जाता था। उसका कोई स्वामी न था। वह अपना स्वामी स्वयं होता था। दूसरे पायदान पर राजा यानी क्षत्रिय था। उसका दायित्व था, ब्राह्मण के नाम पर, उसके मार्गदर्शन में उसकी संपदाओं की सुरक्षा और संवर्धन करना। तीसरे में व्यापारी-वर्ग आता था। उसके कराधान से राज्य का खर्च चलता था। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन तीनों के पास ‘नमक’ की अफरात थी। बावजूद इसके स्वामीभक्त शब्द उन तीनों के लिए नहीं बना था। ये तीनों खुद ‘स्वामीवर्ग’ से थे। उनमें वर्चस्व के लिए स्पर्धा चलती रहती थी। एक-दूसरे को नीचा दिखाकर आगे निकलने के लिए षड्यंत्र भी होते रहते थे। स्पर्धा ऊपर के तीन वर्गों में हो तो प्रत्येक वर्ग स्वयं को श्रेष्ठतम मानकर एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश में लगा रहता था। लेकिन किसी कारणवश, हालांकि इसकी संभावना बहुत कम थी, यदि चौथा वर्ग मुकाबले में आ जाए तो  ऊपर के तीनों वर्ग अपने सारे वैर-भाव बिसराकर एक हो जाते थे। इस चौथे वर्ग के साथ मुकाबले जैसी स्थिति न बने, लोग सहज भाव के साथ अपने शूद्रत्व को धारण करें—‘स्वामीभक्ति’ शब्द ऐसे अवसर के लिए ही बना था। 

‘शूद्र’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द ‘क्षुद्र’ से हुई थी। ‘क्षुद्र’ यानी ओछा, यानी नाकुछ। समाज के एक हिस्से को, जो संख्या में कुल जनसंख्या के तीन-चौथाई से भी अधिक था, ‘शूद्र’ कहकर पायदान में सबसे नीचे ढकेल दिया गया था। उसके कुछ लोग वर्ण-व्यवस्था के भीतर थे, कुछ बाहर। उन्हें पक्के घर बनाने का अधिकार नहीं था। शरीर वे केवल आधा ढक सकते थे। रहने के लिए उन्हें बस्ती से बाहर स्थान दिया जाता था। नए वस्त्र पहनना निषिद्ध था। स्वामी जो उतार दे, वही पहनना उनके लिए गौरव की बात थी। नाम वे ऐसे रखते थे जिनसे दरिद्रता झलकती हो। सार्वजनिक मार्गों पर चलते हुए जिन्हें सिर झुकाकर निकलना पड़ता था। अपनी ही बस्ती में यदि चारपाई या चौपाल पर बैठे हों और रास्ते से सवर्ण गुजरे तो उसके सम्मान में खड़ा न होना धृष्टता मानी जाती थी। धन जुटाने के अवसर नहीं थे। फिर भी अपने पुरुषार्थ और परिश्रम से यदि शूद्र कुछ धन जुटा ले तो ब्राह्मण को अधिकार था कि उसे हड़प लें। शिक्षा प्राप्त करने की हसरत के साथ शूद्र यदि गुरुकुल पहुंच जाए तो उसे एकलव्य की भांति अपमानित करके बाहर निकाल दिया जाता था। या फिर कर्ण की तरह आजीवन शाप ढोना पड़ता था। धर्मशास्त्रों को पढ़ने की चाहत करें तो शंबूक की भांति गर्दन उड़ा दी जाती थी। सुनने की कोशिश करें तो कान में सीसा उंडेल दिया जाता। सामाजिक ऊंच-नीच को दैवीय माना जाता था। धर्म मनुष्य की पूरी जीवनचर्या, उसके समस्त कार्यकलापों को नियंत्रित करता था। सांस्कृतिक अधिपत्य के औजार के रूप में ‘सीसा’ का इस्तेमाल भारत की अकेली और मौलिक खोज थी। उसका इस्तेमाल उन कानों को बंद करने के लिए किया जाता था, जिनमें वेदादि धर्मग्रंथों के शब्द जा घुसे हैं। यह इसलिए आवश्यक था ताकि ब्राह्मण धर्मशास्त्रों की मनमानी व्याख्या कर जनसाधारण को छलते रहें। उनका गुरुत्व बना रहे और बौद्धिक वर्चस्व को किसी भी प्रकार की चुनौती पेश न हो। अमानवीय और असमानताकारी होने के बावजूद यह व्यवस्था लंबे समय तक टिकी रही तो इसलिए कि सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों से अनुकूलन के चलते पीड़ित वर्ग ने स्वयं इसे स्वेच्छापूर्वक अपना लिया था। 

जब सब कुछ ऊपर से तय होता हो, समस्त लाभ-कामनाएं शीर्षस्थ वर्ग के लिए की जाती हों—ऐसे में जनसाधारण द्वारा जीवन को ‘आभार’ की तरह लेना स्वाभाविक ही था। इसलिए लोग स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को भुला बैठे थे। अधिकांश ने मान लिया था कि उनका जन्म ही सेवाकर्म के लिए हुआ है। उसी में वे अपने जीवन की छोटी-मोटी खुशियां तलाशते रहते थे। और वह खुशी थी, खाना-पीना, समाज के प्रभुवर्ग के लिए कामकाजी हाथ पैदा करना और मर जाना। कई बार समाज की जातीय संरचना उनकी मामूली खुशियों पर भी भारी पड़ जाती थी। अछूत कही जाने वाली जाति का व्यक्ति यदि गलती से भी किसी सछूत को छू ले तो उसके लिए कड़े दंड की व्यवस्था थी। उसे चुनौती देने के लिए कोई अदालत न थी। जाहिर है, स्वामीभक्ति केवल व्यक्ति विशेष का मसला नहीं था—अपितु जातीय शोषण को महिमा-मंडित करने की सोची-समझी चाल थी। जाति-केंद्रित व्यवस्था में उसे सर्वसम्मति से स्वीकार लिया गया था। निचली जाति के सदस्यों से उम्मीद की जाती थी कि वे अपने अधिकार एवं खुशियों को भुलाकर, उच्च जाति के सदस्यों के प्रति सम्मान, सदाशयता, सत्यनिष्ठा एवं स्वामीभक्ति का प्रदर्शन करें। इस व्यवस्था के अनुसार यदि बेगार भी करनी पड़े तो खुशी-खुशी करता था।  

असल में वह परिवेश ही ऐसा था जो लोगों के दिलो-दिमाग को निष्क्रिय कर देता था। उनके सोचने-समझने की शक्ति को छीन लेता था। स्वामीभक्ति को समर्पित व्यक्ति जहर को अमृत समझने लगता था। इसे समझने के लिए पन्ना धाय के जीवन को देखा जाता है। पन्ना राणा सांगा के पुत्र उदय सिंह की दाई थी। उसका अपना बेटा भी था—चंदन। पन्ना ने दोनों का दूध पिलाकर बड़ा किया था। राणा सांगा के बाद बनवीर ने राज-परंपरा से विद्रोह कर दिया। बनवीर राणा सांगा के भाई का पुत्र था। उसकी मां एक दासी थी। उस समय की परंपरा के अनुसार राजा अपनी वासना पूर्ति के लिए राजमहल में मौजूद दासियों के साथ सो तो सकते थे, परंतु उनका उत्तराधिकारी विवाहिता पत्नी द्वारा उत्पन्न संतान में से ही होता था। राजा के महल में ऐसी स्त्रियां भी होती थीं, जिन्हें राजा हरण करके ले आते थे, या पसंद आने पर रंगमहल की शोभा मान ली जाती थीं। उन्हें विवाहिता स्त्री के अधिकार प्राप्त नहीं थे। महत्त्वाकांक्षी बनवीर ने राणा के वंशजों को एक-एक कर मौत के घाट उतार दिया। रह गया बस उदय सिंह जो पन्ना धाय के संरक्षण में था। एक दिन नंगी तलवार लिए वह पन्ना के महल में भी आ धमका। पन्ना को उसकी पूर्वसूचना मिल चुकी थी। उसने उदय सिंह को बांस की टोकरी में सुलाकर, झूठी पत्तलों से ढककर बाहर भेज दिया और अपने बेटे चंदन को उसके पलंग पर सुला दिया। बनवीर ने एक ही झटके में चंदन की हत्या कर दी। पन्ना खड़ी, चुपचाप देखती रही। 

इसी ‘त्याग’ के लिए इतिहास पन्ना को महिमा-मंडित करता आया है। उसके बलिदान को लेकर न जाने कितने ग्रंथ और लोककाव्य रचे गए हैं। वर्षों तक पन्ना धाय को स्वामीभक्ति और त्याग की प्रतिमूर्ति के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा। राजस्थान में आज भी यही स्थिति है। पन्ना दासी थी। परिस्थितिवश उसे उदय सिंह को अपना दूध पिलाना पड़ा था। बनवीर भी दासी-पुत्र था। पन्ना यह भी सोच सकती थी कि बनवीर की मां और उसकी त्रासदी एक समान है। कि राज-पुरुष की संतान होने के बावजूद बनवीर जिन अधिकारों से वंचित है, स्वयं उसके पुत्र को भी उन अधिकारों से वंचित रहना पड़ेगा। कि बनवीर का आक्रोश स्वाभाविक है, अतएव उसका साथ देकर वह व्यवस्था को चुनौती दे सकती है। वह सोच सकती थी कि राज्य यदि समाजीकरण की प्रक्रिया में लोगों द्वारा गढ़ी गई संस्था है तो उसका अधिकार किसी परिवार या वंश परपंरा के अनुसार क्यों तय होना चाहिए! अनपढ़ और सामंती संस्कारों के बीच पली-बढ़ी पन्ना यह नहीं सोच पाती। वह वही करती है जो वर्चस्वकारी संस्कृति ने उसे सिखाया था। कि राज करना केवल राजा और उसके उत्तराधिकारियों का अधिकार है। कि राज करने वाले लोग दैवी कृपा से संपन्न होते हैं। बाकी लोगों का कर्तव्य है कि इस अधिकार का सम्मान करें। खुद को केवल सेवा-भाव द्वारा संतुष्ट रखें। वर्चस्वकारी संस्कृति की रक्षा के लिए अपने मन-प्राण समर्पित कर दें।

पन्ना ने जो किया वह उस समय का युग-संस्कार था, जिसे वर्चस्वकारी संस्कृति के निर्माता और संरक्षकों ने बनाया हुआ था और जिसे वे युगों से बचाते आए थे। पन्ना ने किया वह अनोखा भले लगे, स्वामीभक्ति का  अकेला कृत्य नहीं था। समाज के निचले वर्ग उच्च वर्गों की समृद्धि एवं सुरक्षा हेतु शताब्दियों से समर्पित होते आए हैं। वैसी मानसिकता से अनुकूलित लोग ही पन्ना धाय के कृत्य को ‘बलिदान’ कहकर महिमामंडित करते आए हैं। आधुनिक चेतना से संपन्न व्यक्ति पन्ना के निर्णय को लेकर सवाल कर सकता है। क्या मां होने के नाते पन्ना का चंदन के प्राणों पर भी अधिकार था? क्या एक राजकुमार के प्राण तथा सामान्य व्यक्ति के प्राण के मूल्य में कोई अंतर हो सकता है? क्या बनवीर का आक्रोश एकदम वृथा था? लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी जन्मदात्री मां को वाल्सल्य और त्याग की प्रतिमूर्ति माना जाता है। लेकिन इससे किसी मां को उसकी संतान के प्राणों पर अधिकार नहीं मिल जाता। बावजूद इसके शताब्दियों से पन्ना धाय को गौरवान्वित किया जाता रहा है। पन्ना का आचरण तत्कालीन गैरबराबरी वाले समाज और संस्कृति में स्वामीभक्ति की पराकाष्ठा है, जो कुछ वर्गों के सत्ता एवं संसाधनों पर एकाधिकार के दावे को पुष्ट करता है।

जब तक राजशाही रही, स्वामीभक्ति को खूब फलने-फूलने का अवसर मिला। मगर लोकतंत्र के उदय के साथ उसपर संकट मंडराने लगा। बदले समय में राजा-रानी और उनकी गाथाओं की चमक फीकी पड़ी तो ‘स्वामीभक्ति’ की अवधारणा भी अप्रासंगिक होने लगी। बड़े अर्थों में उसे नए चलन में ‘स्वामीभक्त’ के स्थान पर ‘चापलूस’ और ‘चमचा’ जैसे  शब्दों का प्रचलन बढ़ता गया। ये शब्द पहले भी थे, मगर सार्वजनिक जीवन में इनका उपयोग परिहासजनक स्थिति में—प्रायः कमजोर के लिए किया जाता था। शक्तिशाली के संदर्भ में ‘स्वामीभक्त’ का ही प्रचलन था। शायद इसलिए कि ‘स्वामीभक्ति की अपेक्षा ‘चमचागिरी’ बहुत हल्का शब्द था। उसमें स्वामीभक्ति का विकल्प बनने की योग्यता नहीं थी। 

उस दौर में सत्ता राजा तथा उसके गिने-चुने दरबारियों के अधीन होती थी। जनता राजनीतिक शक्ति से विहीन होती थी। इसलिए उस समय ऐसे स्वामीभक्तों की आवश्यकता पड़ती थी, जिनके माध्यम से राजसत्ता अपने वैभव और मेहरबानियों का प्रदर्शन कर सके। जो राजसत्ता का गुणगान करते हुए उसके पक्ष में माहौल बनाने का काम करें। लोकतंत्र में सरकार बनाने की ताकत जनता को हस्तांतरित हो चुकी थी। उसके फलस्वरूप नागरिकों में अधिकार चेतना में भी विस्तार हुआ था। अतएव सर्वसत्तावादियों को, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी अपने अधिपत्य को सुरक्षित रखना चाहते थे—स्वामीभक्ति की परंपरा को अक्षुण्ण रखने के लिए, नए युगबोध के अनुकूल ऐसे शब्द की आवश्यकता थी, जो देखने-सुनने में थोड़ा आधुनिक प्रतीत हो, जिसमें स्वामीभक्ति जैसा ही आभासी आदर्श और गौरव की प्रतीति हो, इसके साथ-साथ जिसमें ठीक वैसा ही नशा हो जैसा स्वामीभक्ति में है; या जिसे ‘सम्मानित’ नशे के रूप में पेश किया जा सके। मुखर अभिव्यक्तियों के दौर में हालांकि ऐसा कोई सर्वमान्य शब्द मिलना आसान भले न हो, मगर मुश्किल भी नहीं था। बदले समय के अनुरूप स्वामीभक्ति के मुकाबले जिस शब्द को प्राथमिकता दी वह था—‘राष्ट्रवाद’। राष्ट्रवाद चूंकि राजनीतिक संकल्पना है, और जाति-भेद से ग्रस्त भारतीय समाज में विशुद्ध राजनीतिक संकल्पनाएं सर्वसत्तावादियों के मंसूबों को पूरा करने की दिशा में अपर्याप्त मान ली जाती हैं, इसलिए ‘राष्ट्रवाद’ को हमारे यहां ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में थोपा जा रहा है।

अब हम इस नई अवधारणा की पृष्ठभूमि पर विचार करेंगे। दरअसल, नए विचारों के उदय के साथ इस स्थापना को स्वीकृति मिली थी कि राज्य नागरिकों की रचना है। मनुष्य ने उसे अपने सुख और सुरक्षा के लिए गढ़ा है, इसलिए उसको नागरिकों के प्रति कल्याणकारी होना चाहिए। लेकिन जहां राज्य के नागरिकों के प्रति कुछ दायित्व हैं, वहीं नागरिकों के भी राज्य के प्रति कर्तव्य हैं। राज्य और नागरिकों के सहसंबंधों को समझने की पहल अरस्तु बहुत पहले कर चुका था, तथापि उसपर सही मायने में विचार सोलहवीं शताब्दी के बाद ही संभव हो पाया। थॉमस हॉब्स, ग्रीन, जॉन लॉक, रेने देकार्त्त, रूसो, मिल, बैंथम, इमानुअल कांट, टॉमस पेन, थॉमस जेफरसन आदि चिंतकों ने राज्य और मनुष्य के संबंधों को परिभाषित किया था। कालांतर में उसी के आधार पर आधुनिक राज्य की नींव पड़ी। उसके मूल में जहां राज्य की गरिमा को प्राथमिकता दी गई थी, वहीं नागरिकों के कर्तव्यों एवं अधिकारों को भी सम्मानजनक स्थान प्राप्त था। 

यह ठीक है कि परंपरागत राजनीतिक दर्शनों में भी प्रजा-कल्याण पर जोर दिया जाता था। उन दिनों उसी राजा को श्रेष्ठ माना जाता था जो राज्य की सुरक्षा के साथ-साथ प्रजा के कल्याण पर भी ध्यान दे। प्रजा के सुख में अपना सुख देखे। श्रेष्ठ राजा में क्या गुण होने चाहिए, इस बारे में ‘अर्थशास्त्र’ कहता है—‘राजा का सुख प्रजा के सुख में निहित है। राजा के सुख में प्रजा का सुख निहित नहीं होता। जो स्वयं को प्रिय हो, उसमें राजा का हित नहीं है, बल्कि जो प्रजा को प्रिय लगे उसी में रजा का हित है’(अर्थशास्त्र 1/19)। अर्थशास्त्र के अलावा ‘महाभारत’ और ‘शुक्रनीति’ में भी राजनीतिक दर्शन पर विचार हुआ है। उस व्यवस्था की कमजोरी थी कि उसमें प्रजा और राजा के बीच संवाद का कोई मजबूत तंत्र न था। कुछ कहानियों में राजा या उसके मंत्रियों को भेष-बदलकर राज्य की स्थिति का जायजा लेते हुए पाते हैं। प्रजा चाहती क्या है? राजा द्वारा चलाए गए कार्यक्रमों से वह संतुष्ट है अथवा असंतुष्ट? इसे जानने-समझने के लिए कोई मजबूत तंत्र न था। चाणक्य हालांकि प्रजा की मनोस्थिति को समझने के लिए राजा को गुप्तचर रखने की सलाह देते हैं। लेकिन उसके पीछे प्रजाकल्याण की भावना कम, राजा को षड्यंत्रों से बचाए रखने की वांछा ही प्रबल थी। दूसरे राजपद के साथ अनेक महत्त्वाकांक्षाएं जुड़ी होती थीं। उनमें से एक राज्य की सीमाओं का विस्तार भी था। राजाओं का बड़ा समय सीमाओं के विस्तार हेतु पराक्रम दिखाने अथवा विद्रोहों को दबाने में गुजर जाता था। आमतौर पर राजा के बदलने के साथ राज्य की प्राथमिकताएं भी बदल जाया करती थीं। चापलूस दरबारियों से घिरे राजा लोककल्याण के कार्यक्रमों को प्रजा पर अपनी कृपा मानने लगते थे। 

बदले परिवेश में लोक-कल्याण को वरीयता देना, राज्य के गठन का प्राथमिक उद्देश्य था। पहले राज्य को राजा की निर्मिति माना जाता था। बदली मान्यता में उसे नागरिकों का सृजन मान लिया गया। आज राज्याध्यक्ष निर्वाचित प्रतिनिधि होता है। यदि वह नागरिक अपेक्षाओं पर खरा न उतरे तो उसे बदल देने का अधिकार भी जनता को प्राप्त है। ऐसे में ‘स्वामीभक्ति’ का अप्रासंगिक हो जाना स्वाभाविक है। यद्यपि किस्से-कहानियों में वह आज भी जिंदा है, तथा उसके महत्त्व को पुनर्स्थापित करने के प्रयत्न भी जारी हैं। प्राचीन कथानकों को लेकर ऐसे ग्रंथ रचे जा रहे हैं, जिनसे स्वामीभक्ति का महिमा-मंडन होता हो। सच तो यह है कि समाज के एक हिस्से का अतीतमोह उसे बार-बार प्राचीन इतिहास और संस्कृति की ओर खींच ले जाता है। हर स्थिति में अपने स्वार्थ को आगे रखने वाले उस वर्ग की धारणा है कि आजादी के बाद भारतीय समाज और राजनीति में आए परिवर्तन अस्थायी हैं। धर्म और संस्कृति की मदद से आमजन को फुसलाकर, परिवर्तन-चक्र को वापस किया जा सकता है। लोकतंत्र की आड़ में ऐसी कोशिशें लगातार होती रही हैं। संविधान की सौगंध उठाने वाले राजनीतिक दल भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में इसमें सहयोगी बन जाते हैं।

संवैधानिक व्यवस्थाओं में जहां अधिकारों एवं कर्तव्यों की लिखित व्यवस्था हो, परंपरागत ‘स्वामीभक्ति’ को हेय मान लिया जाता है। लोकतंत्र व्यक्ति-स्वातंत्र्य का समर्थन करता है। परिणामस्वरूप ‘स्वामीभक्ति’ जिसने कुछ खास वर्गों को शिखर पर बनाए रखा है—का दौर औपचारिक तौर पर लगभग खत्म हो चुका है। मगर शासक वर्ग का काम बिना उसके नहीं चलता। वह अपने वर्चस्व को लगातार कायम रखना चाहता है। इसके लिए उसे भरोसेमंद लोगों की जरूरत पड़ती है। ऐसे नागरिकों की आवश्यकता पड़ती है जो अपनी निजी महत्त्वाकांक्षाओं को सत्तावर्ग की महत्त्वाकांक्षाओं में विलीन कर दें। कुछ सीमा तक यह काम नौकरशाही भी करती आई है। उसे सत्ताधारी वर्ग, वह चाहे जिस रास्ते से सत्तासीन हुआ हो—के प्रति ईमानदार रहने की शिक्षा दी जाती है। किंतु लोकतंत्र में जहां निश्चित अवधि के बाद जनता के समर्थन की आवश्यकता पड़ती है—सत्ता में बने रहने के लिए केवल नौकरशाही का समर्पण पर्याप्त नहीं होता, अपितु ‘राष्ट्रवाद’ जैसी लोकलुभावन संकल्पनाओं की भी जरूरत पड़ती है। उसमें राष्ट्रीय अस्मिता को व्यक्तिगत अस्मिताओं पर वरीयता दी जाती है। नागरिकों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी पहचान को राष्ट्र की पहचान में विलीन कर दें। राष्ट्रीय गौरव और मान-सम्मान के लिए यथासंभव बलिदान देने को तत्पर हों। उन्हें लगातार यह विश्वास दिलाया जाता है कि वर्तमान व्यवस्था तथा उसको चला रहे लोग ही सर्वाधिक श्रेष्ठ, ईमानदार और विश्वसनीय हैं। प्रकारांतर में राष्ट्रवाद समाज को दो वर्गों में बांट देता है। पहले वर्ग में सत्ता-लाभान्वित, विशेषाधिकार प्राप्त लोग होते हैं, जो येन-केन-प्रकारेण सत्ता से चिपटे रहना चाहते हैं। दूसरी ओर जनसाधारण, जिनसे उनकी राष्ट्रीय पहचान के बदले, यथासामर्थ्य त्याग और समर्पण की अपेक्षा की जाती है।

‘राष्ट्रवाद’ की अवधारणा पुरानी है। इस पद का सर्वप्रथम प्रयोग, 18वीं शताब्दी में जर्मन दार्शनिक जॉन गाटफ्रेड हर्डर ने किया था। हर्डर ने राष्ट्रवाद को समूची मानवता के संदर्भ में देखा था। उसका कहना था कि राष्ट्र केवल साझे इतिहास, भाषा, संस्कृति, नस्ल, धर्म और भौगोलिक क्षेत्र से बनता है। वह नागरिकों के गर्व करने की चीज है। विश्व अनेक राष्ट्रीयताओं का समुच्चय है। क्षेत्रीय विशेषता होने के बावजूद राष्ट्रवाद में ऐसा कुछ नहीं है जो दूसरी राष्ट्रीयताओं से श्रेष्ठतर दर्शाता हो—‘किसी देश द्वारा अपनी ही बढ़ाई करना, घमंड का मूर्खतापूर्ण प्रदर्शन है।’ ‘राष्ट्र क्या है?’ इस प्रश्न का उत्तर देते हुए उसने कहा था कि राष्ट्र, ‘एक घना जंगल है जिसमें अच्छे और बुरे दोनों तरह के पौधे होते हैं।’ हर्डर की परिभाषा के अनुसार भारतीय राष्ट्रवाद की क्या स्थिति है? इसे समझना आसान नहीं है। क्योंकि भारत में इतिहास, भाषा एवं संस्कृति के क्षेत्र में अनेक विविधताएं हैं। विद्वान भारत में राष्ट्रवादी भावनाओं का उभार उनीसवीं शताब्दी के आरंभ से मानते आए हैं। यदि गहराई से सोचें तो वह कालखंड दो समानांतर घटनाओं का साक्षी था। पहला, भारत के निचले वर्गों में शिक्षा के प्रति चेतना का उभार। दूसरा, औपनिवेशिक शासन से मुक्ति की छटपटाहट। 

यदि आप सोचें कि ये दोनों घटनाएं भारतीय राष्ट्रवाद के विस्तार में समानरूप से सहायक थीं, तो आप पूरी तरह गलत होंगे। दरअसल भारतीय समाज का एक बड़ा हिस्सा ऐसा था जिसे हजारों वर्षों से दबाकर रखा गया था। जो पीढ़ियों से शिक्षा, स्वतंत्रता, मान-सम्मान सहित सामान्य प्राकृतिक अधिकारों से भी वंचित था। चूंकि ईस्ट इंडिया कंपनी ने उनके मनुष्य होने के अहसास को पुनर्जीवित किया था, उनके लिए समानता और शिक्षा की राह प्रशस्त की थी। अतएव भारतीय समाज का वह बहुसंख्यक हिस्सा, औपनिवेशिक शासन को अपने लिए अवसर के रूप में देखता था। ऐसे में राष्ट्रवाद बहुजन चेतना का हिस्सा बन ही नहीं सकता था। उनके लिए सामाजिक न्याय, राष्ट्रवाद से कहीं बड़ा मुद्दा था। दूसरे स्वाधीनता आंदोलन में भी सामाजिक यथास्थितिवादी, बुर्जुआ ताकतों का वर्चस्व था। नए भारत को वे अपने वर्गीय सोच, जो प्रकृति से सांप्रदायिक और जातिवादी था—के अनुसार ढालना चाहती थीं। यही कारण है कि बहुजन समुदाय राष्ट्रवादी भावनाओं के उभार को अपने हितों के लिए घातक मानता रहा। कुछ सीमा तक आज भी मानता है, क्योंकि आजादी से उसकी जो अपेक्षाएं थीं, वे आज भी स्वप्न तक सीमित हैं। 

दूसरी घटना; यानी औपनिवेशिक शासन से मुक्ति की छटपटाहट की परिणति 1857 के स्वाधीनता संग्राम के रूप में हुई थी। उस समय उत्तर भारत का बड़ा हिस्सा अंग्रेजों के विरुद्ध लामबंद था। बड़ी बात यह थी कि हिंदू और मुसलमान भारत के दो बड़े धार्मिक समूह, उस समय अंग्रेजों के विरुद्ध कंधे से कंधा मिलाकर, साथ-साथ खड़े थे। इसी आधार पर अधिकांश विद्वान 1857 के स्वाधीनता संग्राम को भारत में राष्ट्रवादी चेतना के उभार के रूप में देखते हैं। लेकिन हर्डर ने राष्ट्रवाद की जो कसौटी तय की है, उसपर 1857 की घटना खरी नहीं उतरती। 1857 के विद्रोह की शुरुआत सैनिक विद्रोह से हुई थी। उसके मूल में धर्मिक भावनाएं थीं। सैनिकों को कारतूसों में गाय और सुअर की चर्बी के प्रयोग के बहाने उकसाया गया था। विद्रोही सैनिकों का लक्ष्य, धर्मभ्रष्ट करने वाले अंग्रेजों को देश से बाहर खदेड़ देना तो था, परंतु उसके बाद क्या होगा, इसकी उनके मस्तिष्क में कोई योजना नहीं थी। यह विश्वास तक नहीं था कि केवल अपने दम पर, बिना किसी बड़े नेतृत्व के, वे अंग्रेजों से जंग जीत सकते हैं। नेतृत्व के लिए पहले वे झांसी की रानी सहित कई रजबाड़ों के पास गए थे। वहां से निराश होने के बाद उन्होंने बूढ़े बहादुरशाह जफर को अपना नेता चुना था। उस युद्ध में जिन राजे-रजबाड़ों ने विद्रोही सैनिकों का साथ दिया, सबकी अपनी-अपनी मांगें थीं। इसलिए युद्ध के दौरान, 1858 में जैसे ही ब्रिटेन ने उनकी मांगों के प्रति सहमति दर्शायी, अधिकांश ने खुद को विद्रोह से अलग कर लिया। कल्पना कीजिए, उस युद्ध के बाद यदि झांसी पर रानी लक्ष्मी बाई और दिल्ली पर बहादुरशाह का परचम लहराने लगता तो उनकी देखा-देखी बाकी राजे-महाराजे भी खुद को आजाद घोषित कर देते। उससे देश में सीधे राजशाही की वापसी होती। तब हम 1857 की घटना को राष्ट्रवादी चेतना के उभार से कभी नहीं जोड़ पाते। हमें ध्यान रखना चाहिए कि राष्ट्रवादी चेतना का मूल सामाजिक-सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रीय अखंडता की प्रतीति में निहित है। जबकि भारतीय समाज आज भी जाति, धर्म, भाषा, संस्कृति, संप्रदाय एवं क्षेत्रीयता के आधार पर अनेक हिस्सों में बंटा हुआ है। यही कारण है कि भारतीय राष्ट्रवाद आज भी एक संद्धिग्ध अवधारणा है।

इसका आशय यह नहीं है कि भारतीय नागरिक अपने देश को प्यार नहीं करते? बिलकुल करते हैं। सामान्य स्थिति में  ‘राष्ट्रवाद’ और ‘देशभक्ति’ में खास अंतर नहीं होता। अपनी भाषा, अपनी मिट्टी और अपनी संस्कृति से लगाव नैसर्गिक चेतना है। हम जिस देश में रहते हैं, उससे प्यार करना, जरूरत पड़ने पर मदद के लिए आगे आना, न केवल स्वाभाविक है, अपितु आवश्यक भी है। यही देशभक्ति है। जिस तरह देशभक्ति अपने साझा इतिहास, संस्कृति, भौगोलिकता, धर्म आदि के प्रति जनसाधारण की स्वयंस्फूर्त्त  भावना और उद्गार है, उसी तरह राष्ट्रवाद भी है। देश पर संकट के समय जैसे समर्पण की अपेक्षा किसी ‘देशभक्त’ से की जाती है, ठीक ऐसे ही राष्ट्रवाद में भी जाती है। बावजूद इसके देशभक्ति और राष्ट्रवाद में अंतर है। देशभक्ति स्वयंस्फूर्त्त भावना है। अपनी मिट्टी के प्रति सहजानुराग है। कर्तव्यपरायण होना भी देशभक्ति का लक्षण है। एक मजदूर जो ईमानदारी से अपना काम निपटाता है, वह भी सीमा पर डटे सैनिक जितना ही देशभक्त है। देशभक्ति सत्ता निरपेक्ष होती है तथा नागरिकों में देश के प्रति स्वयंस्फूर्त्त समर्पण एवं बलिदान की प्रेरणा जगाती है। 

इसके उलट राष्ट्रवाद कृत्रिम और सत्ता-सापेक्ष संकल्पना है। देशभक्ति में सहज नागरिक-सामाजिक संबंध तथा स्थानीयता का भाव होता है। उनमें पर्याप्त लचीलापन होता है। नागरिक अपने देश, वहां के समाज, संस्कृति और देशवासियों से बराबर प्यार करते हैं। यह मानते हैं कि जिस तरह वे अपने देश से प्यार करते हैं, बाकी लोग भी अपने देश से उतना ही प्यार करते होंगे। इसमें किसी देश या उसके नागरिकों के देशप्रेम को छोटा या कमतर नहीं आंका जाता। अपने प्रचलित रूप में ‘राष्ट्रवाद’, राष्ट्र को गौरवशाली स्तंभ की भांति प्रस्तुत करता है। नागरिकों से अपेक्षा की जाती है कि वे राष्ट्र के हित में बलिदान हेतु तत्पर रहें। इसके लिए आवश्यकतानुसार कानून भी बनाया जा सकता है। प्रसंगवश बता दें कि पश्चिमी के कई देशों में अनिवार्य सैन्य सेवा का कानून है। भारत में ऐसा नहीं है। राष्ट्रवाद को प्रासंगिक ठहराने के लिए यहां प्रायः संस्कृति की मदद ली जाती है, जो अपने आप में जातीय भेदभाव से ग्रस्त रही है। 

संवैधानिक राज्य होने के बावजूद भारत में आज भी जाति मानवीय पहचान का महत्त्वपूर्ण पहलू है; और वह नीचे से ऊपर तक असरकारी है। यहां तक कि यह सरकार और उसके फैसलों को भी प्रभावित करता है। ऐसे में जो लोग जाति के आधार पर पिछड़े हुए हैं, सरकार की नजर में भी उनका अस्तित्व गौण हो जाता है; या वे ज्यादा से ज्यादा वोट-बैंक तक सीमित होकर रह जाते हैं। नतीजा यह होता है कि छोटी और अल्पसंख्यक अस्मिताएं, बहुसंख्यक अस्मिताओं के दबाव में खुद को उपेक्षित समझने लगती हैं। शासक वर्ग की निरंतर उपेक्षा कभी-कभी उन्हें हताशा की ओर ढकेल देती है। दूसरी ओर राष्ट्रवाद के चलते शासक वर्ग के हाथों में अतिरिक्त अधिकार आ जाते हैं, जिनसे उनके निरंकुश आचरण की संभावना बढ़ जाती है। मूर्तियों पर अनाप-शनाप पैसा खर्च करना, मंदिर निर्माण को राष्ट्रीय पहचान से जोड़ देना—सरकार की वैचारिक निरंकुशता को दर्शाता है। निरंकुशता का दूसरा रूप दलितों एवं अल्पसंख्यकों पर हमलों के रूप में नजर आता है।

राष्ट्रवाद जब तक नागरिक-मन की स्वयंस्फूर्त्त भावना है, तब तक उसमें और देशभक्ति में कोई अंतर नहीं होता। ऐसा राष्ट्रवाद(या देशभक्ति) देश तथा उसके नागरिक, सभी के लिए श्रेयस्कर होता है। लेकिन जब भी कोई शासकवर्ग राष्ट्रवाद को अपनी महत्त्वाकांक्षाओं का औजार बनाकर, दूसरी राष्ट्रीयताओं के संदर्भ में उसका उपयोग करने लगता है, जब वह दावा करता है कि उसकी राष्ट्रीयता दूसरी राष्ट्रीयताओं से श्रेष्ठतर है, तथा उसे श्रेष्ठतम बनाने की आवश्यकता है, अर्थात जब राष्ट्रवाद शासकवर्ग की साम्राज्यवादी लिप्साओं का हथियार बन जाता है—तब वह सामाजिक-राजनीतिक स्तरीकरण का प्रस्तावक एवं पोषक भी बन जाता है। राष्ट्रीयताओं के स्तरीकरण की साम्राज्यवादी प्रवृत्ति पहले सत्ता का चरित्र बनती है, कालांतर में नागरिक भी, कभी दबाव तो कभी प्रलोभनों के चलते उससे अनुकूलित होने लगते हैं। 

कह सकते हैं कि राष्ट्रवाद खासकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, देशप्रेम से इतर थोपी गई अवधारणा है। भारत जैसे विविधताओं वाले देश में होता प्रायः यह है कि जो वर्ग शक्तिशाली और सत्ता के केंद्र में है उन्हें स्वयं को दूसरों से अच्छा और योग्य सिद्ध करने का अवसर मिलता रहता है। जो हाशिये पर हैं, उन्हें उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है। अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए यदि वे संघर्ष करना चाहें तो, सत्ताकेंद्र पर विराजमान लोग अपनी पहुंच और अधिकारों का उपयोग कर, उन्हें समाज का शांति-भंजक, यहां तक कि राष्ट्रद्रोही तक कह जाते हैं। दूसरे शब्दों में राष्ट्रवाद की अभिकल्पना के समय हर्डर की चाहे जितनी सदेच्छा रही हो, कालांतर में इसका उदय अंध-राष्ट्रवाद के रूप में देखने में आया, जिसमें बड़ी अस्मिताएं छोटी अस्मिताओं को कुचलने में लगी होती हैं। स्वयं जर्मनी इसका उदाहरण है। वहां जर्मन राष्ट्रवाद के नाम पर हिटलर ने पूरी दुनिया को दूसरे विश्वयुद्ध की भट्टी में ढकेल दिया था। सामूहिक फांसीघर बनवाकर हजारों अल्पसंख्यक यहूदियों को सामूहिक मृत्युदंड की सजा दी थी। 

आवश्यक नहीं कि कथित बड़ी संस्कृतियां अपने समर्थकों के संख्याबल के अनुसार भी बड़ी हों। बावजूद इसके सत्ताकेंद्र पर विराजमान लोग अपनी संस्कृति और धार्मिक विश्वासों को ही मुख्य संस्कृति की तरह पेश करते हैं। ग्राम्शी ने इसे ‘सांस्कृतिक अधिपत्यवाद’ कहा था, जिसमें अल्पसंख्यक वर्ग, सांस्कृतिक श्रेष्ठता के दावे के साथ, बहुसंख्यकों के दिलो-दिमाग पर कब्जा कर लेता है। जनसाधारण के विवेकीकरण तथा मनुष्य को उसके अधिकारों से परचाकर इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया जा सकता है। इसके लिए सामाजिक न्याय को समर्पित राज्य तथा ऐसे नागरिक संगठनों की जरुरत पड़ती है जो नागरिक प्रबोधीकरण के लिए आवश्यक कार्यक्रमों का संचालन कर सकें। 

ओमप्रका कश्यप

1.  प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां तु हिते हितम् ।

न आत्मप्रियम् हितम् राज्ञः प्रजानाम् तु प्रियम् हितम्॥ अर्थशास्त्र 1/19

महिषासुर मूवमेंट : ‘डिब्रह्मनाइजिंग अ कल्चर’

सामान्य

परि​चर्चा

(कुछ महीने पहले एक पत्रिका की ओर से परि​चर्चा की गई थी. उसमें उठाए गए मुद्दों पर कुछ बातें)

 

  • फरवरी, 2016 में संसद के बजट सत्र में भारतीय जनता पार्टी की राजनेता व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्‍मृति ईरानी ने महिषासुर शहादत दिवस पर सवाल उठाकर इसे देशद्रोह से जोड़ दिया था. क्‍या ऐसा किया जाना उचित है? आपकी क्‍या राय है?

‘महिषासुर दिवस’ हमारे समय की महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक परिघटना है. शताब्दियों से जो वर्ग दूसरों की निगाह से खुद को देखता आया था, अर्से तक जो आरोपित विचारधारा पर ही अपना ईमान कायम रखे था—‘महिषासुर दिवस’ के बहाने वह खुद को अपनी दृष्टि से देखने-समझने की कोशिश में लगा है. यह देर से हुई अच्छी शुरुआत है. महिषासुर की ऐतिहासिकता पर बहस करना बेकार है. मिथ को इतिहास-सिद्ध करने की दावेदारी कोई कर भी नहीं सकता. राम और रावण भी मिथकीय पात्र हैं. संभव है सभ्यता के किसी दौर में उनसे मिलते-जुलते व्यक्ति सचमुच इस धरती पर रहे हों, लेकिन वे वैसे ही रहे होंगे जैसे महाकाव्यों तथा अन्य ग्रंथों में दर्शाए गए हैं—यह सप्रमाण नहीं कहा जा सकता. मूल कृति ‘पुलत्स्य वध’ से लेकर ‘रामायण’ और फिर ‘रामचरितमानस’ तक उसमें अनगिनत बदलाव हुए हैं. हर प्रस्तोता ने उसमें कुछ न कुछ जोड़ा-घटाया है. इसलिए उसके अनेकानेक पाठ तथा अनगिनत अंतर्विरोध हैं, जिन्हें वे आस्था और विश्वास की झीनी चादर से ढांपते आए हैं. यदि मान लें कि राम नामक राजा कभी इस धरती पर था, तो भी हम उसे अपना नायक क्यों मानें, जिसने शंबूक का वध केवल इसलिए किया था कि वह किसी खास पुस्तक को पढ़कर ज्ञान में हिस्सेदारी करना चाहता था. असमानता और भेदभाव को बढ़ावा देने वाला ‘रामराज’ हमारा सपना भला कैसे बन सकता है! विवेकवान समाज अपने नायक स्वयं चुनता है. यदि उन्हें अपनी सुविधानुसार नायक चुनने की आजादी है तो वही आजादी बाकी समाज को भी है. ‘महिषासुर’ मिथ होकर भी हमारे लिए सम्मानेय है, क्योंकि वह उस संस्कृति का प्रतिकार करता था जो अनेकानेक असमानताओं, आडंबरों और भेदभाव से भरी थी. दूसरों के श्रम पर अधिकार जताने वाली बेईमान संस्कृति. उसके सर्वेसर्वा रहे देवता सागर-मंथन में बराबरी का हिस्सा देने के वायदे के साथ असुरों से सहयोग मांगते हैं, परंतु बेईमानी करते हुए ‘अमृत’ तथा बहुमूल्य रत्न खुद हड़प लेते हैं. ‘महिषासुर’ श्रम-संस्कृति में भरोसा रखने वाली, पशु-चारण अर्थव्यवस्था से नागर सभ्यता की ओर बढ़ती, तेजी से विकासमान भारत की प्राचीनतम सभ्यता का प्रतीक नायक है.

सरकार और सरकार में बैठे जो लोग इसे देशद्रोह बता रहे हैं. उनके सोच पर तरस आता है. वे या तो देश और देशद्रोह की परिभाषा से अनभिज्ञ हैं, अथवा हमें शब्दों के जाल में फंसाए रखना रखना चाहते हैं. जैसा वे हजारों वर्षों से करते आए हैं. देश कोई भूखंड नहीं होता. वह अपने नागरिकों के सपनों और स्वातंत्र्य-चेतना में बसता है. लाखों-करोड़ों लोग जहां एकजुट हो जाएं, वहीं अपना देश बना लेते हैं. जिन लोगों में स्वातंत्रय चेतना नहीं होती, उनका कोई देश भी नहीं होता. ऐसे लोग देश में रहकर भी उपनिवेश की जिंदगी जीते हैं. भारत अर्से से ब्राह्मणवाद का उपनिवेश रहा है. आगे भी रहे, यह न तो आवश्यक है, न ही हमें स्वीकार्य. यहां वही संस्कृति चलेगी जो इस देश के 1.3 अरब लोगों की साझा संस्कृति होगी. जो सामाजिक-सांस्कृतिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता तथा संसाधनों में सभी की निष्पक्ष और समान सहभागिता सुनिश्चित करती हो. वैसे भी मनुष्य की स्वतंत्रता किसी व्यक्ति समाज या संस्कृति का देय नहीं होती. यह मनुष्य होने की पहली और अनिवार्य शर्त है. यह प्रकृति का ऐसा अनमोल उपहार है जो मनुष्य को उसके जन्म से ही, वह चाहे जिस जाति, धर्म, वर्ग, देश या समाज में जन्मा हो—जीवन की पहली सांस के साथ स्वतः प्राप्त हो जाता है. जिस देश की संस्कृति अपने तीन-चौथाई नागरिकों को समाजार्थिक एवं बौद्धिक रूप से गुलाम बनाती हो, वह ‘राष्ट्र’ तो क्या भूखंड कहलाने लायक भी नहीं होता. इसे देशद्रोह कहने वाले असल में वे लोग हैं जिनका देश कुर्सियों में बसा होता है. जो जनता से प्राप्त शक्तियों का उपयोग उसे छलने और मूर्ख बनाने के लिए करते हैं. इसके लिए वे कभी राष्ट्रवाद, कभी धर्म तो कभी जाति को माध्यम बनाते हैं. यह सरकार को ही राष्ट्र घोषित करने की साजिश है, जिसके सर्वोत्तम रूप को भी टॉमस पेन ने आवश्यक बुराई माना है.

  • भाजपा द्वारा संसद में इस बात को उठाये जाने के पहले से ही आरएसएस के अन्‍य अनुषांगिक संगठन जैसे विश्‍व हिंदू परिषद व अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद इसका विरोध करते रहे हैं। क्‍या आपको लगता है कि महिषासुर शहादत स्‍मृति दिवस जैसे सांस्‍कृतिक आंदोलन का विरोध ब्राह्मणवादी वर्चस्‍व को मजबूत करने के लिए किया जा रहा है?

भाजपा, आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद ऐसे संगठन हैं जिन्हें धर्म से कोई लेना-देना नहीं है. वे केवल राजनीति करते हैं, जिसमें लोकतंत्र के लिए कोई जगह नहीं है. उनके मन में 1000—1500 वर्ष पुराना भारत बसता है, जब ऊंची जातियां अपने से निचली जातियों के साथ मनमाना व्यवहार करने को स्वतंत्र थीं. वे प्राचीन भारत की संपन्नता का बखान करते हुए नहीं थकते. बार-बार याद दिलाते हैं कि भारत कभी ‘सोने की चिड़िया’ कहलाता था. इतिहास बताता है कि भारत का सबसे समृद्धिशाली दौर ईसा के चार-पांच सौ वर्ष पहले से लेकर इतनी ही अवधि बाद तक का रहा है. उस दौर के बड़े सम्राट या तो बौद्ध थे, अथवा जैन. कह सकते हैं कि ब्राह्मणवाद के सबसे बुरे दिन देश की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे अच्छे दिन थे. डॉ. रमेश मजूमदार के अनुसार उस दौर में आजीवक, जैन एवं बौद्ध दर्शनों के प्रभामंडल में जातीय स्तरीकरण घटा था. सामाजिक भेदभाव तथा यज्ञ-बलियों में कमी आई थी. उसके फलस्वरूप परस्पर सहयोगाधारित व्यापारिक संगठन तेजी से पनपे. बौद्ध दर्शन ने भारतीय मेधा को विश्व-स्तर पर स्थापित किया था, इसलिए हर कोई भारतीय व्यापारियों के साथ व्यापार करने को उत्सुक था. उसके फलस्वरूप व्यापार बढ़ा और देश आर्थिक समृद्धि के शिखर की ओर बढ़ता गया.

हिंदू राज्य के रूप में भाजपा तथा उसके सहयोगी दलों की निगाह में पुष्यमित्र शुंग के बाद का भारत बसता है, जो भौतिक और अधिभौतिक दोनों ही दृष्टियों से देश के पराभव का दौर था. विदेशी व्यापार सिमटने लगा था. उपनिषदों की जगह पुराण लिखे जा रहे थे. वैदिक धर्म छोटे-छोटे संपद्रायों में सिमट चुका था. महाकाव्यों को उनका वर्तमान स्वरूप इन्हीं दिनों प्राप्त हुआ, जिसने चातुर्वण्र्य समाज की अवधारणा को मजबूती से स्थापित किया था. इसके लिए तत्कालीन लेखकों ने वैदिक चरित्रों को मनमाने ढंग से प्रस्तुत किया. ऋग्वेद में कृष्ण यदु कबीले का वीर और बुद्धिमान नेता है, वह आर्य-संस्कृति का विरोधी है तथा आर्यों के विरुद्ध संग्राम में अपने कबीले का नेतृत्व कर युद्ध में इंद्र को परास्त करता है. ‘महाभारत’ के परिवर्धित संस्करण में उसे ब्राह्मणी व्यवस्था के समर्थक के रूप में पेश किया गया. इसके ऐवज में यदुओं को वर्ण-क्रम में ‘क्षत्रिय’ का दर्जा प्राप्त हुआ. इस दौर में दर्शन की मुक्त-धारा, धर्म की ताल-तलैयों में सिमटने लगी थी. बहुदेववाद जो वैदिक साहित्य की विशेषता था, जिसे बुद्ध के समकालीन आचार्यों ने उपनिषदों में एकेश्वरवाद में समेटने की कोशिश की थी—वह पुनः छोटे-छोटे संप्रदायों यथा शैव, कापालिक, तांत्रिक, वैष्णव, नाथपंथी, शाक्त आदि में बंट चुका था. उनके बीच बहुत गहरे मतभेद थे. भाजपा तथा उसके आनुषंगिक संगठन ब्राह्मण धर्म में उभरे उन मतभेदों को याद नहीं करते. वे जानते हैं कि लोकतंत्र के दौर में पुराना समय लौटकर नहीं आने वाला. इसलिए वे धर्म के नाम पर केवल राजनीति करते हैं. उनकी राजनीति भी पूरी तरह प्रतिक्रियावादी, मुस्लिम-विरोध से अनुप्रेत है. उनके लिए राष्ट्रवाद और फासीवाद में बहुत अधिक अंतर नहीं है. जबकि लोकतंत्र को सम्मानजनक स्थान न तो फासीवाद दे पाता है, न ही वह कट्टर राष्ट्रवाद के बीच सुरक्षित रह पाता है.

ब्राह्मणवादी अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए धर्म और संस्कृति को औजार बनाता है. उनके माध्यम से वह लोगों के दिलो-दिमाग पर कब्जा जमाता है, फिर निरंतर उनका भावनात्मक और शारीरिक शोषण करता है. फासीवाद लोगों के दिलो-दिमाग में भय का संचार करता है. इतना भयभीत कर देता है कि जनसाधारण अपने विवेक से काम लेना छोड़ केवल आदेश को ही कर्तव्य समझने लगता है. ताकत का भय दिखाकर वह लोगों को उसकी मनमानियां सहने के लिए मजबूर कर देता है. लेकिन फासीवाद की उम्र कम होती है. वह व्यक्ति के दिलो-दिमाग पर कब्जा तो करता है, लेकिन ऐसा कोई माध्यम उसके पास नहीं होता, जो देर तक प्रभावशाली हो. सत्ता बदलते ही उसका स्वरूप बदल जाता है. नहीं तो जनता स्वयं खड़ी होकर राजनीति के उस खर-पतवार को समाप्त कर देती है.

ब्राह्मणवाद तभी तक जीवित है, जब तक लोग धर्म, जाति, और आडंबरों के मोहजाल में फंसे हैं. इसलिए वह किसी भी प्रकार के प्रबोधन से घबराता है. ‘महिषासुर शहादत दिवस’ का आयोजन भारतीय संस्कृति के इतिहास में न तो कोई नया पन्ना जोड़ता है, न ही कुछ गायब करता है. असल में वह ब्राह्मणवाद द्वारा थोपी गई स्थापनाओं से बाहर आने की छटपटाहट है. और यही डर इस सभ्यता के धार्मिक अभिजन ब्राह्मण को सता रहा है. वे जानते हैं कि बहुजन हितों के अनुसार मिथकों की पुनर्व्याख्या का सिलसिला एक बार आरंभ हुआ तो आगे रुकेगा नहीं. ऐसा नहीं है कि ब्राह्मणवाद को इतिहास में इससे पहले कोई चुनौती नहीं मिली थी. उसे कई बार चुनौतियों से गुजरना पड़ा है. लेकिन तब से आज तक धरती न जाने कितनी  परिक्रमाएं कर चुकी है. ज्ञान पर तो किसी का कब्जा न तब संभव था, न आज. लेकिन तब ब्राह्मणेत्तर वर्गों की प्रतिभाओं को उपेक्षित किया जाता था. आज यह संभव नहीं है. लोकतांत्रिक परिवेश में उनके विरोध को दबाया जाना आसान नहीं है. भाजपा, विश्व हिंदू परिषद जैसे ब्राह्मणवादी संगठनों को यही डर खाए जा रहा है. यह सच भी है कि सिलसिला केवल ‘महिषासुर’ के मिथ की पुनर्व्याख्या पर रुकने वाला नहीं है. रुकना भी नहीं चाहिए. उम्मीद है बहुत जल्दी दूसरे मिथ भी पुनर्व्याख्या के दायरे में आएंगे. इससे ब्राह्मणीय सर्वोच्चता का वह मिथ भी भरभरा कर गिर पड़ेगा, जिसे बनाने में उन्हें सहस्राब्दियाँ लगी हैं.

  • पिछले कुछ सालों में वर्चस्‍ववादी संस्‍कृति के बरक्‍स समतामूलक बहुजन पंरपरा बहुजन संस्‍कृति की बात उच्‍च शिक्षण संस्थानों में पहुंचे ओबीसी, आदिवासी और दलित विद्यार्थी करने लगे हैं. क्‍या आप मानते हैं कि इस तरह के आंदोलनों से समाज में जागृति आएगी? इस तरह के आंदोलनों का क्‍या लाभ आप देखते हैं?  

वर्चस्वकारी संस्कृति दो तरह से समाज को अपनी जकड़ में लेती है. पहले बल-प्रयोग द्वारा, जिसमें शक्ति का उपयोग कर समाज के अधिकतम संसाधनों पर अधिकार कर लिया जाता है. दूसरे अपनी बौद्धिक प्रखरता के बल पर. वर्चस्वकारी संस्कृति बुद्धिजीवियों से लैस होती है. उसके पोषित बुद्धिजीवी प्रत्येक परिस्थिति को अपने स्वार्थ के अनुकूल परिभाषित करने में प्रवीण होते हैं. अपने बुद्धि-चातुर्य के बल पर वे शेष जनसमाज को यह विश्वास दिला देते हैं कि केवल वही उनके सबसे बड़े शुभेच्छु हैं और जो व्यवस्था उन्होंने चुनी है वह दुनिया की श्रेष्ठतम सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था है. ऐसा नहीं है कि जनसाधारण में बुद्धि-विवेक की कमी होती है. ग्राम्शी की माने तो प्रत्येक व्यक्ति दार्शनिक होता है. लेकिन प्रत्येक व्यक्ति परिस्थितियों को अपने पक्ष में परिभाषित करने में दक्ष नहीं होता. इस कारण वर्चस्वकारी संस्कृति के समर्थक बुद्धिजीवियों पर विश्वास करना, जनसाधारण की विवशता बन जाता है. वह अपने शोषकों को ही अपना सर्वाधिक हितैषी और शुभेच्छु मानने लगता है. ऐसे में यदि परिवर्तन होता भी है तो केवल सतही, दिखावे के लिए, जिसका लाभ पूंजीपति और दूसरे एकाधिकारवादी संस्थानों को जाता है. जनाक्रोश को शांत करने के लिए वर्चस्वकारी संस्कृति प्रायः अपने आवरण में ऐर-फेर कर परिवर्तन का नाटक करती है. स्थितियों में आमूल परिवर्तन तभी संभव है, जब गैर अभिजन समाज के अपने बुद्धिजीवी हों, जो उसकी समस्याओं और हितों की उसके पक्ष में सही-सही पड़ताल कर, प्रतिबद्धता के साथ उसका नेतृत्व कर सकें.

वर्चस्ववादी ब्राह्मण संस्कृति के विरोध शुरुआत हालांकि मध्यकाल में कबीर, रैदास जैसे संत-कवियों द्वारा हो चुकी थी. लेकिन उनकी चिंता के केंद्र में केवल धार्मिक आडंबरवाद, छुआछूत तथा अन्यान्य सामाजिक रूढ़ियां थीं. आर्थिक असमानता जो बाकी सभी बुराइयों की जड़ है, को वे कदाचित मनुष्य की नियति मान बैठे थे. कबीर जैसे विद्रोही कवि ने भी संतोष को परम-धन कहकर रूखी-सूखी खाने, दूसरे की चुपड़ी रोटी देखकर जी न ललचाने की सलाह दी थी. रैदास ने जरूर ‘बेगमपुर’ के बहाने समानता पर आधारित समाज की परिकल्पना की थी. वह क्रांतिकारी सपना था, अपने समय से बहुत आगे का सपना—जिसके लिए उनका समाज ही तैयार नहीं था. जिन लोगों के लिए वह सपना था वह इतना शोषित, उत्पीड़ित था कि शीर्षस्थ वर्गों की कृपा में ही अपनी मुक्ति समझता था. उस समय तक पश्चिम में भी यही हालात थे. वहां रैदास से दो शताब्दी बाद थामस मूर ने ‘बेगमपुर’ से मेल खाती ‘यूटोपियाई’ परिकल्पना की थी, जिसपर उसे स्वयं ही विश्वास नहीं था. इसलिए अपनी कृति ‘यूटोपिया’ में उसने समानता-आधारित समाज की परिकल्पना पर ही कटाक्ष किया गया था. आगे चलकर, यूरोपीय पुनर्जागरण के दौर में यही शब्द आमूल परिवर्तन का सपना देख रहे लेखकों, बुद्धिजीवियों, आंदोलनकारियों और जनसाधारण का लक्ष्य और प्रेरणास्रोत बन गया.

सामाजिक अशिक्षा और आत्मविश्वास की कमी के कारण रैदास के ‘बेगमपुर’ की परिकल्पना सूनी आंखों के सपने से आगे न बढ़ सकी थी. शताब्दियों बाद उस परिकल्पना को आगे बढ़ाने का काम फुले और डॉ. अंबेडकर ने किया. ग्राम्शी ने बुद्धिजीवी की जो परिभाषा उद्धृत की है, उस पर ये दोनों महामानव एकदम खरे उतरते हैं. उनकी प्रेरणा तथा लोकतांत्रिक अवसरों का लाभ उठाते हुए दलित बुद्धिजीवियों का एक वर्ग उभरा, जिसने ब्राह्मणवाद के विरुद्ध आवाज बुलंद की. इसी के साथ-साथ पिछड़े वर्गों में भी राजनीतिक चेतना का संचार हुए. आबादी के हिसाब से पिछड़े पचास प्रतिशत से अधिक थे. कदाचित उनके नेताओं को लगता था कि उन्हें किसी बौद्धिक नेतृत्व की आवश्यकता नहीं है. अपनी-अपनी कमजोरियों के कारण दलित और पिछड़े नेता-बुद्धिजीवी वास्तविक सहयोगियों की पहचान करने में चूकते रहे. इसी का लाभ उठाकर वर्चस्वकारी संस्कृति के पैरोकार, दलितों और पिछड़ों को उनकी जाति की याद दिलाकर अलग-अलग समूहों में बांटते रहे. पर्याप्त संख्याबल का अभाव दलितों के स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति बनने की बाधा था. नतीजा यह हुआ कि वर्चस्वकारी संस्कृति के विरुद्ध शोषित-उत्पीड़ित वर्गों का कोई सशक्त मोर्चा न बन सका.

आज स्थिति बदली हुई है. शिक्षा और लोकतांत्रिक अवसरों का लाभ उठाकर दलितों और पिछड़ों में नया बुद्धिजीवी वर्ग उभरा है, जो न केवल अपने शोषकों की सही-सही पहचान कर रहा है, बल्कि अपने बुद्धि-विवेक के बल पर उन्हें उन्हीं के मैदान में चुनौती देने में सक्षम है. वह जानता है कि जाति, धर्म, संस्कृति, राष्ट्रवाद आदि वर्चस्वकारी संस्कृति के वे हथियार हैं जिनका उपयोग अभिजन संस्कृति के पैरोकार अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए करते आए हैं. वह यह भी समझ चुका है कि कोरा राजनीतिक परिवर्तन केवल सत्ता-परिवर्तन को संभव बना सकता है. आमूल परिवर्तन के लिए संस्कृति के क्षेत्र में भी बदलाव आवश्यक है. वह यह भी जानता है कि दलित और पिछड़ों के सपने, दोनों की समस्याएं यहां तक कि चुनौतियां भी एक जैसी हैं. उनके समाधान के लिए संगठित विरोध अपरिहार्य है. इस बात को शिखरस्थ वर्ग भी भली-भांति जानता है कि दलित और पिछड़े वर्गों की सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक एकता उसे सत्ता से हमेशा-हमेशा के लिए बेदखल कर सकती है. उच्च-शिक्षण संस्थानों से निकले ओबीसी, आदिवासी एवं दलित युवाओं का यही युगबोध वर्चस्वकारी संस्कृति के पैरोकारों को चिंता में डाले हुए है.

  • क्‍या इतिहास में हुए ऐसे किसी और आंदोलन के बारे आप कुछ बताना चाहेंगे, जिसमें बहुजनों के संस्‍कृति पक्ष पर बल दिया गया हो, और उसके सकारात्‍मक परिणाम सामने आएं हों?

कई आंदोलनों के नाम लिए जा सकते हैं. एकदम हाल की बात करें तो साठ के दशक में बिहार से आरंभ हुए ‘अर्जक संघ’ को ले सकते हैं. जिसने मेहनतकश लोगों ने जीवन में किसी भी धर्म की भूमिका को मानने से इन्कार कर दिया था. मध्यकालीन भारत में रैदास, कबीर, फुले आदि ने ब्राह्मणवाद का विरोध करते हुए जनसंस्कृति के उभार पर जोर दिया था. यदि बौद्धकालीन भारत तक जाएं तो आजीवक संप्रदाय भी श्रम-संस्कृति के उन्नयन को समर्पित था, जिसे आज बहुजन संस्कृति कहा जा रहा है. उसके केंद्र में धर्म के नाम पर आडंबरवाद से मुक्ति और आर्थिक स्वावलंबन था. आजीवक श्रमजीवियों के अपने संगठन थे. उनके माध्यम से वे देश-विदेश के व्यापारियों के साथ कारोबार करते थे. जातक कथाओं के हवाले से डॉ. रमेश मजूमदार ने बौद्धकालीन भारत में 31 प्रकार के सहयोगाधारित संगठनों का उल्लेख किया है. उनमें लुहार, बढ़ई, चर्मकार, पत्थर-तराश, सुनार, तेली, बुनकर, रंगरेज, किसान, मत्स्य पालन करने वाले, आटा पीसने वाले, नाई, धोबी, माली, कुम्हार यहां तक कि चोरों के संगठन का भी जिक्र है. वे अपने आप में स्वायत्त थे. अपने फैसलों के लिए पूरी तरह स्वतंत्र. उनके अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप का अधिकार राज्य को भी नहीं था. सम्राट विशेष अवसरों पर उनसे परामर्श करना आवश्यक समझता था. खास बात यह है कि उन समूहों में श्रम-कौशल और सहभागिता को महत्त्व दिया जाता था. केवल बुद्धि के नाम पर, जैसा ब्राह्मणवादी व्यवस्था में था, विशेषाधिकार का कोई प्रावधान उनमें नहीं था. ‘कूटवणिज जातक’ में बनारस के दो व्यापारियों की कहानी दी है. उनमें एक ‘बुद्धिमान’ था ‘दूसरा अतिबुद्धिमान’. एक बार दोनों ने मिल-जुलकर व्यापार करने का निर्णय लिया. उन्होंने बराबर-बराबर निवेश कर पांच सौ छकड़े माल खरीदा. दोनों व्यापार के लिए साथ निकले और सारा माल बेचकर वापस लौट आए. उसके बाद दोनों मुनाफे के बंटवारे के लिए जमा हुए. ‘बुद्धिमान’ व्यक्ति ने पहल करते हुए लाभ को दो समान हिस्सों में बांट दिया. यह देख ‘अतिबुद्धिमान’ बोला—

‘मैं तुमसे दुगुना हिस्सा लूंगा.’ उसकी बात सुनकर बुद्धिमान चौंका. उसने पूछा—

‘दो गुना क्यों?’

‘इसलिए कि मैं अतिबुद्धिमान हूं.’

‘हमने व्यापार में बराबर धन लगाया है. मेहनत भी बराबर-बराबर की है.’ ‘बुद्धिमान’ बोला.

‘तो क्या! सभी जानते हैं कि मैं तुमसे अधिक बुद्धिमान हूं. इसलिए मुझे लाभ में दुगुना हिस्सा मिलना चाहिए.’ कहते हुए दोनों व्यापारी आपस में झगड़ने लगे. न्याय के लिए अंततः वे बुद्ध की शरण में पहुंचे. बुद्ध दोनों को बराबर-बराबर हिस्सा देने का फैसला करते हैं. लाभ के दुगने हिस्से पर अधिकार जताने वाले ‘अतिबुद्धिमान’ को उन्होंने ‘बेईमान व्यापारी’ कहा है. वर्चस्वकारी व्यवस्था ऐसी बेईमानी कदम-कदम पर करती है. वह श्रम के सापेक्ष बुद्धि को वरीयता देती है. ब्राह्मण जो शिखर पर रहता है, उसका शारीरिक श्रम से कोई संबंध नहीं होता. वह दूसरों के श्रम पर परजीवी की भांति जीवन-यापन करता है. कमोबेश यही हालत बाकी दो वर्गों की भी है. वर्ण-व्यवस्था में निचले पायदान पर मौजूद शूद्र को अधिकाधिक श्रम करना पड़ता है. फिर भी उसे समग्र आय का मामूली हिस्सा प्राप्त होता है. बड़ा हिस्सा शीर्षस्थ वर्ग हड़प लेते हैं. कहानी के माध्यम से बुद्ध ने इस व्यवस्था का प्रतिकार किया है. इससे उस बौद्धकालीन समाज में अपने श्रम-कौशल के आधार पर जीवन जीने वालों की महत्ता का अनुमान लगाया जा सकता है. यह आदर्श व्यवस्था थी, जिसे समय रहते रेखांकित करने की आवश्यकता थी. लेकिन इतिहास लेखन का काम ब्राह्मणों या ब्राह्मणवादी मानसिकता से ग्रस्त लेखकों के अधीन रहने के कारण वह सदैव पूर्वाग्रह-ग्रस्त रहा है. उन्होंने उस संस्कृति के दस्तावेजीकरण में पूरी तरह उपेक्षा बरती जिसे समानांतर संस्कृति, जनसंस्कृति या सर्बाल्टन संस्कृति कहा जाता है. उसका खामियाजा विराट बहुजन समाज आज तक भुगत रहा है.

  • महिषासुर आंदोलन के बारे में आपके निजी विचार क्‍या हैं? पिछले दिनों विभिन्‍न समाचारपत्रों, टीवी चैनलों पर इसकी चर्चा रही. इनसे प्राप्‍त सूचनाओं के आधार पर आपका इस आंदोलन के प्रति क्‍या विचार बना? या फिर, इस संबंध में आप किसी अनछुए पहलू पर प्रकाश डालना चाहेंगे?

मन से इस आंदोलन से जुड़े सभी मित्रों को बधाई देते हुए मैं थोड़ा मतांतर रखता हूं. ‘राम’, ‘कृष्ण’, ‘दुर्गा’ आदि की भांति ‘महिषासुर’ भी एक मिथ है और मिथ की सीमा है कि वह अकेला किसी काम का नहीं होता है. वह समाज और सांस्कृतिक परंपरा के साथ जुड़कर कारगर होता है. इसके लिए उसको अनगिनत मिथों की आवश्यकता पड़ती है, जिनका समर्थन या विरोध करते हुए वह समाज में अपनी पहचान बनाए रखता है. मिथ प्रायः दीर्घजीवी होते हैं. मगर कोई भी मिथ जीवन में हर समय मार्गदर्शक नहीं रह सकता. अमावस्या की रात में दिये या एक स्फुर्लिंग की भांति वह केवल अवसर-विशेष पर हमें राह दिखा सकता है. किंतु अनेक मिथों के साथ मिलकर वह मनुष्य की संपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक यात्रा का सहभागी बन जाता है. मिथों के उपयोग के लिए बहुत सावधानी की आवश्यकता होती है. किसी मिथ का उपयोग करने के लिए उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की जानकारी होना आवश्यक है. इसके अभाव में वह दोधारी तलवार की तरह काम करने लगता है. सही समय पर सटीक उपयोग न हो तो उसके मायने एकदम बदल जाते हैं. पिछले कुछ महीनों में ‘महिषासुर’ की पुनर्व्याख्या ने दलित, पिछड़ों एवं आदिवासियों को एक-दूसरे के निकट लाने का काम किया है. लेकिन सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से लड़ाई में कोई एक मिथ कारगर नहीं हो सकता. उसके लिए अनेक मिथ चाहिए. लेकिन नए मिथ गढ़ना आसान नहीं होता. हां, पहले से ही प्रचलित मिथों को युगानुकूल संदर्भों के साथ पुनपर्रिभाषित अवश्य किया जाता है. अतः जो मिथ की ताकत को जानते हैं, जिन्हें अपने विवेक पर भरोसा है, और जो सचमुच बहुजन संस्कृति के विस्तार का सपना देखते हैं, उन्हें चाहिए कि वे महिषासुर जैसे दूसरे मिथकों की भी खोज करें. नए मिथकों की खोज करना जितना आसान है, उतना ही कठिन है, उन मिथकों को युगानुकूल संदर्भों में नए सिरे से परिभाषित करना. सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से मुक्ति के लिए बहुजन को अपने लक्ष्य को समर्पित बुद्धिजीवियों की पूरी खेप तैयार करनी होगी.

महिषासुर मिथ की दूसरी कमजोरी यह है कि वह एक सम्राट है. उस दौर का है जब यह दुनिया लोकतंत्र के बारे में जानती न थी. जबकि आज जमाना लोकतंत्र का है. ‘महिषासुर’ के प्रतीक के सहारे वर्चस्वकारी संस्कृति पर हमला तो बोला जा सकता है. या ऐसे ही हमलों के बीच वह हमारे लिए कारगर हथियार बन सकता है. लेकिन केवल उसके सहारे वर्चस्वकारी संस्कृति को रचनात्मक विकल्प संभव नहीं है. अतएव आवश्यकता अनुकूल मिथकों के चयन के साथ-साथ उन्हें लोकतांत्रिक परिवेश के अनुकूल ढालने की है. ताकि वे मिथक जो अभी तक वर्चस्वकारी संस्कृति के सुरक्षा-कवच बने थे, प्रकारांतर में लोकतंत्र और सहजीवन का समर्थन करते नजर आएं.

  • क्या आप मानते हैं कि संघ परिवार का महिषासुर शहादत दिवस का कटु हिंसक विरोध और आरक्षण की व्यवस्था को समाप्त करने की उनकी मांग से दलित-बहुजनों को यह अहसास हो सकेगा कि हिंदुत्व एजेंडा ब्राह्मणवाद से अधिक कुछ नहीं है? क्या आप उनके असली चेहरे और एजेंडे का पर्दाफाश करने में सहयोग करना चाहेंगें?

हिंदुत्व को न्यायालय ने जीवन-पद्धति माना है. परंतु विचार करके देखिए, क्या यह केवल जीवन-पद्धति ही है. मनुष्य को जो आजादी जीवन-पद्धति को चुनने की होनी चाहिए, वैसी आजादी क्या यह धर्म देता है? कथित सनातनी हो या गैर-सनातनी, एक हिंदू परिवार की सामान्य जीवन-चर्या मिली-जुली होती है. हर परिवार में कोई आला या कोना ‘मंदिर’ के नाम पर आरक्षित होता है. हर घर में मूर्तियों को नहलाया जाता है. सुबह-शाम की आरती, पूजा-बंदन बिना नागा चलता है. जब तक पत्थर की मूर्ति से छुआ न लें, स्त्रियां अन्न-जल ग्रहण नहीं करतीं. मंदिर में कागज, पत्थर, कांच, मिट्टी, लकड़ी या प्लास्टिक के आड़े-तिरछे, भांति-भांति के देवता आसन जमाए रखते हैं. हर घर में साल में एक-दो बार ‘सत्यनारायण कथा’ कही जाती है. पंडित सारे कर्मकांड रचता है. परंतु कभी नहीं बताता कि ‘सत्यनाराण की कथा’ क्या है? किस हिंदू धर्म-शास्त्र में उनका उल्लेख है? फिर भी डरी-सहमी कुल-ललनाएं इस कथा के श्रवण से खुद को धन्य मानती रहती हैं. अब यह मत कहिए कि संकट के समय जरूरतमंद की मदद करना, सादा जीवन जीना, जीवमात्र पर दया करना, चोरी-चकारी से परहेज रखना, सत्य वाचन, माता-पिता का सम्मान करना और बुराइयों से दूर रहना हिंदुत्व हमें सिखाता है. ये सब बातें तो नैतिकता के हिस्से आती हैं और समाजीकरण का मुख्य आधार हैं. समाज के बीच जगह बनाने के लिए प्रत्येक धर्म चाहे वह मूर्ति-पूजकों का हो या मूर्ति-भंजकों का, इन सदाचारों को अपनाता है. इन्हें अपनाए बिना उसकी गति नहीं है. इसलिए अभिव्यक्ति का तरीका चाहे जो हो, हर धर्म में यही सदाचार सिखाए जाते हैं. इसे धर्म की धूत्र्तता कहें या बेईमानी, वह नैतिकता से उधार लिए इन सदाचारों को अपना बनाकर पेश करता है. इस तरह पेश करता है मानो धर्म है तो वे सदाचार हैं. असल में होता इसका उलटा है. मनुष्य धर्म को इसीलिए अपनाता है ताकि उसकी आने वाली पीढ़ियां धर्म के साथ जुड़े शील और सदाचारों को अपनाएं. समाजीकरण की अनिवार्यता धर्म नहीं, शील और सदाचरण हैं. यदि कहीं समाज है तो वहां धर्म भले ही न हो, समाजीकरण की प्रमुख शर्त के रूप में शील और सदाचरण रहेंगे ही. बिना धर्म के समाज गढ़ा जा सकता है, लेकिन बिना शील और सदाचार के उसका एक क्षण भी अस्तित्व में रहना मुश्किल है. आम हिंदू के लिए ‘हिंदुत्व’ या ‘जीवनपद्धति’ का आशय मूर्तियों पर जल चढ़ाने, किसी न किसी देवता पर भरोसा करने, गाय को रोटी देने, व्रत-उपवास रखने, पर्व-त्योहार पर विधि-सम्मत पूजन-अर्चन करने जैसे कर्मकांडों तक सीमित है. ये सब ऐसे आयोजन हैं जिनमें ब्राह्मणों की प्रत्यक्ष या परोक्ष भूमिका बनी रहती है. दूसरे शब्दों में जिसे हिंदुत्व कहा जाता है, वह ब्राह्मणवाद का ही लौकिक विस्तार है. इसलिए हिंदुत्व का बने रहना, प्रकारांतर में ब्राह्मणवादी व्यवस्था का अस्तित्व में रहना है.

‘हिंदुत्व’ को बनाए रखने के लिए उन्होंने अनेक षड्यंत्र रचे हैं. उनमें जनता द्वारा प्रथम निर्वाचित सम्राट वेन तथा महिषासुर की छल-हत्या, एकलव्य का अंगूठा काट लेना, शंबूक की हत्या के बहाने उसके उत्तराधिकारियों को ज्ञान से वंचित कर देना जैसे उनके अनेकानेक धत्त्कर्म सम्मिलित हैं. चूंकि आरक्षण ने दलित एवं समाजार्थिक आधार पर पिछड़े वर्गों को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर दिया है, इसलिए वे उनके सबसे बड़े आलोचक हैं. जातिवाद को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पोषते, उसके आधार पर अपने विशेषाधिकार गिनाते आए लोग आज उन वर्गों पर जातिवादी होने का आरोप लगा रहे हैं, जो शताब्दियों से जातीय उत्पीड़न के शिकार होते आए हैं. हिंदुत्व का उनका एजेंडा केवल धर्म तक सीमित नहीं है. इसे केवल धर्म से जोड़कर रखना परिवर्तनकामी शक्तियों की भारी भूल रही है. हिंदुत्व का एजेंडा कहीं न कहीं संसाधनों पर मुट्ठी-भर लोगों की इजारेदारी को भी मजबूत करता है. जाति के आधार पर तीन-चौथाई जनसंख्या को शूद्र या दलित बताकर जमीन तथा उत्पादन के अन्य साधनों से वंचित कर देने का अर्थ है—पंद्रह-बीस प्रतिशत लोगों द्वारा समाज के कुल संसाधनों पर कब्जा. अभी तक ऐसा ही होता आया है.

महिषासुर जैसे प्रतीकों की बहुजन व्याख्याएं हिंदुत्व की नींव पर प्रहार करती हैं. उस पतित संस्कृति का विरोध करती हैं जो बलात्कारी को ‘देवराज’ का दर्जा देती है. दलित-बहुजन की नई बौद्धिक खेप का आदर्श राम नहीं है जो अपनी निर्दोष भार्या की शील-परीक्षा लेता है, शंबूक को दंडित करता है. ‘महिषासुर शहादत दिवस’ जैसे आयोजन प्रकारांतर में एक सलाह भी है कि बहुजन, ब्राह्मणवादी नायकों को अपना नायक मान लेने की भूल न करें. यह चूक उन्होंने शताब्दियों पहले उनके पूर्वजों की ओर से हुई थी. जिसका दंड वे आज तक भुगत रहे हैं. आरक्षण दमित वर्गों को शिक्षा और स्वतंत्र सोच का अवसर प्रदान करता है. इसलिए वह उनके लिए असह् हैं. चाहे जिस आधार पर हो, हिंदुत्व को न्यायालय की स्वीकृति मिल चुकी है, इसलिए वर्चस्वकारी शक्तियां उनके बहाने दलित-बहुजन को फुसलाए रखने का सदियों पुराना खेल खेल रही हैं.

 

  • निस्संदेह आज जो बहुजन सवाल उठा रहा है, सांस्कृतिक प्रतीकों की पुनर्व्याख्या की जा रही है, उसका सीधा-सा आशय है कि समाज के निचले वर्गों में शिक्षास्तर में वृद्धि हुई है. उससे लोगों का आत्मविश्वास बढ़ा है. इसके पीछे आरक्षण का योगदान भी है. इसलिए वे चाहते हैं कि आरक्षण खत्म हो ताकि उन्हें चुनौती देने वाला कोई न हो और जैसे वे पिछले हजारों वर्ष से याद करते आए हैं, आगे भी इसी प्रकार चलता रहे.

ब्राह्मणवाद सांस्कृतिक ‘दैत्य’ है. यहां ‘दैत्य’ का अभिप्राय उसके परंपरागत अर्थ में ही लेना चाहिए. परंपरा में जो धत्तकर्म दैत्य के बताए जाते हैं, असलियत में वही कार्य ब्राह्मणवादियों के देवता भी करते हैं. उनके देवता कदम-कदम पर छल करते हैं, दूसरों की स्त्रियों को बलत्कृत करते हैं. भेंट-पूजा पाकर प्रसन्न होते हैं. यदि मन-माफिक चढ़ावा न मिले तो कुपित हो जाते हैं. तुलना करें तो उनके देवता और नकचढ़े सामंत में कोई अंतर ही नहीं है. यह अनायास नहीं है कि बृहश्पति जो देवताओं के गुरु हैं, वही चार्वाक दर्शन के प्रणेता भी हैं. देव-सभाओं में अप्सराओं का नृत्य-गायन, देवताओं की मौज-मस्ती तथा सोम-पान, चार्वाकों की ‘खाओ-पीओ मौज करो’ की विचारधारा को ही प्रतिबिंबित करता है. यानी ‘देवगुरु’ का दर्शन देवताओं की दिनचर्या से ही प्रेरित है. या फिर यह हो सकता है कि देवता अपने गुरु के दर्शन के अनुगामी हों. दूसरी ओर असुर गुरु शुक्राचार्य हैं, जिन्हें इतिहास, दंडनीति, नीति-शास्त्र का आदि व्याख्याकार बताया गया है. ‘महाभारत’ की चर्चा प्राचीन भारतीय राजनीतिक दर्शन के लिए होती है. हस्तिनापुर का राज्य संभालने से पहले युधिष्ठिर भीष्म के पास राजनीति का ज्ञान लेने जाता है. शुक्राचार्य के ज्ञान की महिमा इससे भी जानी जा सकती है कि युधिष्ठिर को राजनीति का पाठ पढ़ाने वाले भीष्म शुक्राचार्य के ही शिष्य हैं. उनके शिष्यों में दूसरा नाम पृथु का भी आता है, जिसे प्रथम निर्वाचित सम्राट वेन का पुत्र तथा पृथ्वी का प्रथम मनोनीत सम्राट कहा गया है. दूसरे किस्से कहानियों की भांति शुक्राचार्य से जुड़ी कहानियां भी मिथ हो सकती हैं. कदाचित वे मिथ हैं भी. फिर भी उनकी अपनी महत्ता है. क्योंकि भारत जैसे समाजों में जहां तर्कबोध, विज्ञानबोध की कमी हो, जनजीवन मिथों से ही प्रेरणा लेता है. बहरहाल आचार्य बृहश्पति तथा शुक्राचार्य के क्रमशः चार्वाक पंथ और दंडनीति का व्याख्याकार होने से क्या यह नहीं लगता कि ब्राह्मणवादी लेखकों ने अपने ग्रंथों में सुरों और असुरों की चारित्रिक विशेषताओं को पूरी तरह उल्टा-पल्टा है. कई बार तो ठीक 180 डिग्री का मोड़ देकर पेश किया है.

ब्राह्मणवाद को सामान्यतः धर्म और संस्कृति से जोड़ा जाता है. यह उसकी सीमित व्याख्या है. असल में वह ‘सर्वसत्तावादी’ और ‘सर्वाधिकारवादी’ किले का पर्याय है, जहां से समस्त संसाधनों और विचारकेंद्रों को नियंत्रित किया जाता है. क्षत्रिय इस किले की रक्षा करते रहे हैं तो वैश्य उसके खजाने को समृद्ध करने का काम करते आए हैं. बदले में ब्राह्मणवाद कुछ सुविधाएं, मान-सम्मान और संसाधनों के उपयोग का अवसर देकर उन्हें कृतार्थ करता आया है. इसे ब्राह्मणवादी वर्चस्व ही कहा जाएगा कि मामूली सुविधा, संसाधनों में सीमित हिस्सेदारी के बावजूद वे वर्ग लंबे समय से स्वयं को उस व्यवस्था का हिस्सा मानते आए हैं. इसलिए एक सीमा से अधिक विरोध के लिए वे कभी आगे नहीं आए. स्वतंत्र भारत के संविधान में मिले अधिकारों के फलस्वरूप पहली बार दलितों और पिछड़ों को अवसर मिला कि वे ब्राह्मणवाद के किले में सैंध लगा सकें. आरक्षण ने इस प्रक्रिया को संभव बनाया, इसलिए वे वर्ग आरक्षण को अपने लिए खतरे के रूप में देखते हैं. पिछले कुछ वर्षों में हालात और भी बदले हैं. शिक्षा के क्षेत्र में मिले आरक्षण ने दलितों और पिछड़ों को अवसर दिया कि वे ब्राह्मणवाद की चतुराइयों को समझ सकें तथा जिन प्रतीकों एवं मिथों के माध्यम से वह अपने सर्वसत्तावादी स्वरूप को बनाए हुए है, उनकी अपने हितों के अनुरूप व्याख्या कर सकें. ‘महिषासुर शहादत दिवस’ जैसे आयोजन दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों में उभरी इसी सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा हैं. इसलिए ब्राह्मणवाद के पैरोकारों की ओर से उनका विरोध स्वाभाविक है. अब वे चाहते हैं कि ‘कल्याण राज्य’ की अपेक्षाओं के चलते स्वाधीन भारत के संविधान में दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को जो अधिकार दिए हैं, वे समाप्त हों, ताकि पुरानी व्यवस्था लौट सके. पूंजीवाद और राजनीतिक सत्ता आज भी उसके मददगार हैं.

परिवर्तनकामी शक्तियों के लिए जितना आवश्यक ब्राह्मणवाद की कमजोरियों को समझना है, उतना ही आवश्यक समानांतर संस्कृति खड़ी करना भी है. ब्राह्मणवादी तंत्र में आमने-सामने की चुनौती नहीं होती, उसका एक कोना अपने घर-परिवार में भी मौजूद होता है. व्यवस्था से अनुकूलित लोग परिवर्तन की हर संभावना को निष्फल करने की कोशिश करते हैं. कुछ समय पहले तक धर्म और जाति उसके सुरक्षा कवच थे. बदली परिस्थितियों में उसने राष्ट्रवाद को अपनी आड़ बनाया हुआ है. ‘महिषासुर’ जैसे मिथों की नवव्याख्या ने ब्राह्मणवाद के मर्मस्थल पर चोट की है. यह ज्ञान और तर्क की लड़ाई है. इतिहास में शताब्दियों बाद ऐसा हुआ है जब दलित और पिछड़े वर्ग के बुद्धिजीवी ब्राह्मणवाद को उसी के क्षेत्र में चुनौती दे रहे हैं. इससे ब्राह्मण बुद्धिजीवी खुद को असहज पा रहे हैं. आरक्षण का विरोध इसी विषम मनःस्थिति की उपज है. चलते-चलते एक बात मैं अवश्य जोड़ना चाहूंगा. आरक्षण एक व्यवस्था है. यह सामाजिक न्याय के दायरे में भी आता है. लेकिन यह प्राकृतिक न्याय का पर्याय नहीं है. इसलिए संविधान-सम्मत होने के बावजूद इसे हमेशा-हमेशा के लिए लागू नहीं रखा सकता. इसलिए बहुजन अस्मिता की चिंता करने वाले बुद्धिजीवियों, लेखकों और कलाकारों को अभी से खुद को तैयार रखना होगा. उसका एकमात्र उपाय है, वर्चस्वकारी संस्कृति के मुकाबले सामाजिक न्याय, तर्क, विवेक और आधुनिक जीवनमूल्यों से संपन्न जनसंस्कृति को खड़ा करना. विवेकवान बनना और समानधर्मा लोगों के विवेकीकरण में सहायता करना. जनसंस्कृतिकरण की यात्रा दुर्गम भले हो, असंभव नहीं है.

 ओमप्रकाश कश्यप

 

शरद यादव और वैकल्पिक राजनीति की चुनौतियां

सामान्य
सांझी संस्कृति’ अथवा ‘सांझी विरासत’ असल में मिथ है. उसका वास्तविक प्रतीति यदि समाज में ही नहीं है, तब वह राजनीतिक दलों की एकता का आधार भला कैसे बन सकती है? क्या भारत जैसे विविधताओं वाले बड़े समाज को ‘सांझी संस्कृति’ के कोरे मिथ के सहारे एक किया जा सकता है? क्या केवल मिथ के भरोसे परिवर्तन की निर्णायक लड़ाई संभव है? इन सबसे महत्त्वपूर्ण एक प्रश्न यह है कि जो दल या नेता सांझी संस्कृति को बचाने के नाम पर एकजुट होना चाहते हैं, क्या उनका अपना जीवन या राजनीति सांझी संस्कृति की भावना पर खरी उतरती है?

रद यादव सांझी विरासत बचाने के लिए प्रयत्नरत हैं. वे जगहजगह सभाएं कर रहे हैं. वरिष्ठ नेता होने के साथसाथ उनकी प्रतिबद्धताएं भी स्पष्ट हैं. संसद में बोलते समय वे अपने सरोकारों के साथ ईमानदार नजर आते थे. पिछले महीने उन्होंने पटना में एक सम्मेलन में हिस्सा लिया था. 27 अगस्त 2017 को लालू यादव द्वारा बुलाई गई रैली में वे उनके साथ, गले मिलते नजर आए. घनी बारिष तथा राज्य के 18 से अधिक जिले बाढ़ग्रस्त होने के बावजूद जितने लोग उत्साह और उम्मीद के साथ गांधी मैदान पहुंचे, उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि जनता भय और सांपद्रायिकता की राजनीति से तंग आ चुकी है. सार्थक विकल्प की तलाश करीबकरीब सभी को है. शरद यादव की अब तक की प्रतिबद्धताएं उनसे थोड़ी उम्मीद जगाती हैं. परंतु रास्ता क्या इतना ही आसान है? जिस तरह की राजनीति का आजकल चलन है, बाजार ने जिस तरह लोगों के दिलोदिमाग को कब्जाया हुआ है, ऐसे में क्या मूल्यों और प्रतिबद्धता की सफल राजनीति संभव है? जो लोग शरद यादव को सुनने, उनके सम्मेलनों में उमड़ रहे हैं, क्या वे चुनाव के दिन भी उनके साथ खड़े होकर ‘सांझी विरासत’ बचाने के लिए सहभागी बनेंगे? और भारत में जहां व्यक्ति की पहचान उसके धर्म और जाति से की जाती है, वहां लोग क्या ‘सांझी विरासत’ को समझते हैं. यदि यह केवल आकादमिक अवधारणा है तो उसे लोकअवधारणा बनाने के लिए शरद यादव और उनके सहयोगियों की क्या कोई योजना है? ये प्रश्न प्रासंगिक हैं. इन्हीं में शरद यादव तथा परिवर्तन की राजनीति का सपना देखने वाले किसी भी नेता की मुश्किलें और चुनौतियां भी छिपी हैं.

आजादी के आसपास मूल्यविहीन राजनीति की कोई कल्पना ही नहीं कर सकता था. देश पूंजीवाद के चंगुल से बाहर था. स्कूलों में गर्व से पढ़ाया जाता था कि भारत कृषिप्रधान देश है. पूंजीपति राजनीति के पिछलग्गू थे. मनमाफिक नीति बनवाने के लिए उन्हें नेताओं और अधिकारियों के चक्कर काटने पड़ते थे. उत्पादन में प्रत्यक्ष श्रम की उपयोगिता थी, इसलिए श्रमिकों के साथ बेहतर संबंध रखना उद्योगपतियों की मजबूरी थी. इसके बावजूद बड़े से बड़े नेता में यह साहस नहीं था कि पूंजीपति के साथ गले मिलते हुए फोटो खिंचवा सके. अस्सी के बाद हालात बदले. राजनीतिक मूल्यों का त्वरित क्षरण होने लगा. स्वाधीनता संग्राम ने कुछ नेताओ को महानायकत्व प्रदान किया था. उसके दबाव में तत्कालीन नेता अपनी छवि, जिसे गढ़ने में उनके परिश्रम एवं त्याग के अतिरिक्त परिस्थितियों का भी योगदान था—से बाहर आने का साहस कम ही जुटा पाते थे. बाद में आई पीढ़ी पर ऐसा कोई दबाव न था. इसलिए जनता, जो पुराने नेताओं के साथ खुशीखुशी और उत्साहपूर्वक जुड़ी थी, को अपनी ओर आकर्पित करने तथा उसका विश्वास जीतने के लिए उन्हें अतिरिक्त प्रयत्न करने पड़ते थे. उत्पादन प्रौद्योगिकी में भी बदलाव आया था. जटिल प्रौद्योगिकी विशेषज्ञता की मांग करती थी. तीव्र मशीनीकरण से मालिक और मजदूर का सीधा संपर्क टूटने लगा था. पूंजीपति का लालच उत्तरोत्तर बढ़ रहा था. संचारक्रांति की मदद लेकर पूंजीपतियों ने लोकसंचार के जितने भी साधन थे, धीरेधीरे सब कब्जा लिए. उनके माध्यम से वह जनता के दिलोदिमाग को अपने स्वार्थ के अनुरूप ढालने में लगा था. पहले मतदाता के मानसनिर्माण का काम नेता करता था. इसके लिए उसे जनता के बीच जाना ही पड़ता था. पूंजीपतियों ने मीडिया का उपयोग पहले लोगों के उपभोक्ताकरण के लिए किया. समाज में उपभोग की संस्कृति विकसित हुई. परिणामस्वरूप व्यक्ति और विचारधारा के बीच जो अंतरंग संबंध था, जो व्यक्ति के आत्मविश्वास को बढ़ाकर, उसके प्रति समाज के विश्वास को सुदृढ़ करता था, जिसके बल पर आंबेडकर, गांधी, नेहरू, लोहिया, पटेल जैसे नेताओं को जनता का प्यार, दुलार और समर्थन प्राप्त होता आया था—वह कमजोर पड़ने लगा था. हालांकि इस दौर में भी जयप्रकाश नारायण, विश्वनाथ प्रताप सिंह, कर्पूरी ठाकुर जैसे प्रभावशाली नेता आए. परंतु उनका प्रभामंडल ऐसा न था कि राजनीति पर पूंजी की निरंतर सुदृढ़ होती पकड़ को कमजोर कर सकें. इसका कारण भी था. उस समय के बड़े उद्योगपति जो दूर की नजर रखते थे, जिन्हें अंदाज था कि भारत में अंग्रेजी राज के दिन गिनेचुने हैं, स्वाधीनता आंदोलन के दौरान बड़ेबड़े नेताओं, जिनमें गांधी भी थे—से करीबी रिश्ता बनाने में कामयाब रहे थे. उनके लिए यह भी एक प्रकार का निवेश था. आजाद भारत में उन्हें संबंधों का लाभ उठाना आरंभ कर दिया. आजादी के तुरंत बाद पूंजीपतियों के बीच संसाधनों पर कब्जा करने की होड़ शुरू हो चुकी थी. नेतागण कहीं उनके साझीदार बने, कहीं सहयोगी और कहीं हितसंरक्षक. एकदूसरे के साथ स्पर्धा करते हुए पूंजीपतियों ने बड़ेबड़े सरकारी कांट्रेक्ट हासिल किए. कलकारखानां के नाम पर ओनेपोने भाव जमीन खरीदी. प्राकृतिक संसाधनों को जैसे भी संभव हुआ, कब्जाया. नएनए आजाद हुए देश में जनता भी ढेर सारी उम्मीदें पाले थी. उसके लिए कुछ कार्यक्रम पंचवर्षीय योजनाओं के नाम पर चलाए गए. लेकिन भ्रष्टाचार और लचर नौकरशाही के कारण वे अपेक्षित परिणाम न दे सके. ठोस अर्थनीति, राजनीतिक दिशाहीनता और बढ़ते भ्रष्टाचार के दबाव में अधिकांश नेता मानने लगे कि बिना पूंजीपतियों के सहयोग के विकास को अपेक्षित गति दे पाना असंभव है. कुल मिलाकर पूंजीवाद के प्रति समर्पण का वातावरण देश स्वतंत्र होने के साथ ही बनने लगा था. निश्चय ही उसके पीछे पूंजीपतियों की सोचीसमझी रणनीति थी. दूसरे विश्वयुद्ध में औपनिवेशिक सरकार का साथ देने वाले, युद्ध के जरिये खूब मुनाफा कमाने वाले भारतीय उद्योगपति युद्धोपरांत ब्रिटेन की खस्ता आर्थिक स्थिति देख ‘राष्ट्रवाद’ का चोला ओढने लगे थे.

अगले चरण में मीडियाक्रांति का लाभ उठाकर, पूंजीपतियों ने मतदाताओं के मानसनिर्माण का काम भी अपने अधीन कर लिया. पूंजीवाद का ‘अप्रत्यक्ष हाथ’ देश की राजनीति, अर्थनीति और सामाजिकसांस्कृतिक गतिविधियों को नियंत्रित करने लगा. युद्ध, आतंकवाद, भय, जातिवाद, तंत्रमंत्र, सांप्रदायिकता, धर्म तथा उसके आडंबरों जिनसे वह लोकमानस को प्रभावित करता था—सब उसके द्वारा नियंत्रित होने लगे. पूंजीवाद की अतिसक्रियता के बीच, जनमानस पर नेताओं की पकड़ ढीली पड़ने लगी. मानसनिर्माण का सारा काम मीडिया और ‘अप्रत्यक्ष हाथ’ ने संभाल लिया. विवश होकर नेता को भी पूंजीपति का शरणागत होना पड़ा. विचार की राजनीति, जिसके भरोसे आजादी की लंबी जंग लड़ी गई थी, दम तोड़ने लगी. पश्चिम की नकल पर पूंजीवाद का जादू ऐसा चला कि चाहेअनचाहे नेता भी उसका सहारा लेने लगे. सड़क, बिजली, पानी जैसे नगरपालिका स्तर के मुद्दों को आधार बनाकर प्रधानमंत्री कद के नेता चुनाव लड़ने लगे. क्या दक्षिणपंथ और क्या वामपंथ सब लोकप्रियता और तात्कालिक लाभ की राजनीति का शिकार होते गए. मीडिया की मदद से देशभक्ति का मनोभाव क्रिकेटर, गायक, अभिनेता जैसे नकली नायकों के हवाले कर दिया कर गया. आजादी से पहले भी ‘महामना’, ‘महात्मा’, ‘लोकमान्य’, ‘नेताजी’ जैसी उपाधियां बांटी जाती थीं. उन दिनों वे जनसंघर्ष में तपकर निकले नेताओं को अलंकृत करती थीं. इससे जनता में उनके प्रति विश्वसनीयता भी थी. बाजार को विज्ञापन के लिए नकली नायकों की आवश्यकता थी. इसलिए उसके इशारे पर फिल्मी अभिनेताओं, क्रिकेटरों तथा सस्ता मनोरंजन करने वाले कलाकारों को ‘सदी के महानायक’, ‘क्रिकेट का भगवान’ जैसे अलंकरण दिए जाने लगे. तात्कालिक लोकप्रियता की दिशाविहीन राजनीति का लाभ उठाकर साधुसंतों भी सत्ता की राजनीति की ओर आकर्षित हुए. उन्हें धर्म के नाम पर वाग्जाल तथा शब्दाडंबर खड़ा करने का खासा अभ्यास था, इसलिए बड़ी आसानी से वे राजनीति में स्थान बनाते चले गए. परिणामस्वरूप दूसरे और तीसरे स्तर के अभिनेता, क्रिकेटर, धंधेबाज धर्माचार्य आदि चाटुकार संसद और विधायिकाओं की शोभा बढ़ाने लगे. समाज उस रास्ते चल पड़ा जहां विघटन ही विघटन, बिखराव ही बिखराव था. उसका सबसे विकृत रूप आज हमारे सामने है.

पूंजीवाद के पीछे केवल लाभ की विचारधारा काम करती है. यही उसकी ताकत और सही मायने में उसकी कमजोरी भी है. लाभ की विचारधारा के प्रभाव में वह केवल अपना हित देखता है. उपभोक्तासंस्कृति जो और कुछ नहीं, पूंजीवाद की महत्त्वाकांक्षाओं और स्वार्थलिप्सा की उपज होती है—उसे आगे बढ़ाने में सहायक होती है. उसके दबाव में जनसंस्कृति सुविधासंस्कृति का रूप लेने लगती है. परिणामस्वरूप सब केवल अपने सुखसुविधा की चिंता करने लगते हैं. विचारधारा के अभाव में समाज लक्ष्यविहीन हो जाता है. ऐसे समाज को मर्जीमुताबिक हांकना आसान होता है. मीडिया आज यही कर रहा है. प्राचीन वाङ्मय की पड़ताल से यह भलीभांति जाना जा सकता है कि ज्ञान तथा उसकी परंपरा पर कभी किसी का विषेषाधिकार नहीं रहा. एक साधारण किसान और मजदूर भी समाज के हित में मौलिक चिंतन कर सकता है. बावजूद इसके सामाजिक ऊंचनीच को नैसर्गिक सिद्ध करने, कुछ खास वर्गों को दूसरों से सक्षम दर्षाने के लिए ज्ञान को विषिष्ट कर्म घोषित करने की परंपरा भारत में हजारों वर्षों से रही है. आधुनिक भारतीय मीडिया का संस्कार ऐसे ही लोगों ने गढ़ा है. इसलिए वह भी ज्ञान को कुछ लोगों के विषेषाधिकार के रूप में पेष करता आया है. हम किसी विचार से सहमत हों या असहमत, प्रत्येक अवस्था में वह हमारा और समाज का मार्गदर्शन करता है. यदि हम किसी विचार से असहमत हैं तो वह हमें बताता है कि विचारगत स्थितियां हमें क्यों पसंद नहीं हैं. इसी तरह विचारविशेष से सहमति उस विचार से संबंध रखने वाली स्थितियों के प्रति हमारी पसंद तथा उसके स्तर को दर्शाती है. वह लोगों को धैर्यवान बनाकर, उनकी उम्मीद बनाए रखने में मददगार बनता है. इसे दरकिनार करते हुए गत शताब्दी के उत्तरार्ध में ‘विचारधारा के अंत’ का नारा खूब उछाला गया था. स्वाधीनता आंदोलन के दौरान और उसके बाद के दोतीन दशकों में समाजवादी विचारधारा का प्रभाव नेताओं और समाज के बुद्धिजीवी तबके पर था. कोई सोच भी नहीं सकता था कि आजादी के कुछ ही दशक बाद के नेता और सरकारें, जनसाधारण के प्रति अपने संकल्प को भुलाकर दक्षिणपंथी ताकतों के हाथ का खिलौना बन जाएंगी. लेकिन हुआ वही जो अनपेक्षित था. धर्म, पूंजी और राजनीति के गठजोड़ के परिणामस्वरूप देश में दक्षिणपंथ उत्तरोत्तर मजबूत होता चला गया.

ऐसा नहीं है कि इसका विरोध नहीं हुआ. परिवर्तनकामी शक्तियों की ओर से उन्हें चुनौती भी खूब मिली. आजादी आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के बाद दलित और पिछड़ी जातियों में राजनीतिक चेतना का विकास हुआ था. लोकतांत्रिक परिवेश में वे अपने लिए समानता और स्वतंत्रता की मांग करने लगी थीं. बहुमत में होने के कारण उनकी उपेक्षा करना ठेठ दक्षिणपंथी ताकतों के लिए भी आसान न था. इसलिए जातिवाद को बचाए रखने के लिए उन्होंने धर्म का सहारा लिया. सांप्रदायिकता को उभारा. उनकी कोशिश जाति और धर्म के सहारे बहुसंख्यक वर्ग को छोटेछोटे समूहों में बांटने की रही. कभी प्रलोभन तो कहीं फूट डालकर वे जनचेतना को अवरुद्ध करने में लगी रहीं, ताकि संगठित शक्ति का रूप लेकर वह उनके लिए कभी चुनौती न बन सकें. पूंजीवाद के उभार के साथ सार्वजनिक स्थलों पर जातीय भेदभाव में तो कमी आई, किंतु उत्तरोत्तर सिकुड़ती सामाजिकता के कारण, परिवार और समूह के भीतर लोग घोर जातिवादी होते चले गए. इस विकृति के बावजूद वंचित समूहों में उभरती लोकतांत्रिक चेतना ने दक्षिणपंथ को जबरदस्त टक्कर दी; और आज तक दे रहे हैं. इन दिनों देश में पूंजीवाद चरम पर है. चूंकि इस देश की पूंजी और संसाधनों का बड़ा हिस्सा दक्षिणपंथी समूहों के अधिकार में है, इसलिए गैरदक्षिणपंथी धाराओं के दमन और उपेक्षा की नीति आज भी जारी है.

दक्षिणपंथ का उभार शेष दुनिया में भी बड़ी तेजी से हुआ, किंतु भारतीय दक्षिणपंथ कई मायनों में उससे भिन्न था. वहां सामाजिक स्तरीकरण का एकमात्र आधार या तो नस्ल थी अथवा पूंजी. नस्ल के प्रभाव को अमेरिकी क्रांति काफी हद तक बेअसर कर चुकी थी. फ्रांसिसी क्रांति के बाद तो व्यक्तिस्वातंत्र्य और मानवाधिकार की हवाएं पूरी दुनिया में बहने लगीं. भारत भी उनसे अछूता नहीं था. हालांकि यहां हालात पश्चिम से भिन्न थे. आर्थिक असमानता के अतिरिक्त यहां जाति और धर्म के आधार पर भी सामाजिक ऊंचनीच और विषमताएं थीं. इसलिए दक्षिणपंथ की विकृतियों को सहेजे रखना यहां बहुत आसान था. इसलिए जिस लोकतंत्र से उम्मीद की जाती थी कि वह दक्षिणपंथी ताकतों को किनारे होने के लिए विवश कर देगा, अंततः वही उनका पालनहार बन गया. कुछ ऐसी ही उम्मीद तकनीक और प्रौद्योगिकी से भी थे. पश्चिम में ‘विज्ञान के पितामह’ कहे जाने कहे जाने वाले फ्रांसिस बेकन ने मशीनीकरण का स्वागत करते हुए कहा था कि मशीनें मनुष्य को जानलेवा उनकी मुक्ति में सहायक बनेंगीं. किंतु एक शताब्दी से भी कम समय में अनियोजित मशीनीकरण की विकृतियां सामने आने लगी थीं. दोष मशीनों और मशीनीकरण का नहीं था. दोष विपुल उत्पादन में सहायक प्रौद्योगिकी के कुछ हाथों तक सीमित होकर रह जाना था.

हाल के दशकों में भारतीय पूंजीवाद अपने उग्रतम रूप में सामने आया है. किंतु वैश्विक स्तर पर यह नया नहीं हैं. अठारवीं शताब्दी से पहले तक लौकिक संस्कार और धार्मिक विश्वास वहां भी मनुष्य का स्वैच्छिक वरण नहीं थे. सामाजिकता की अनिवार्य शर्त के रूप में वे जन्म के साथ जनसाधारण पर थोप दिए जाते थे. अपनी सामाजिक हैसियत को सुरक्षित रखने के लिए चालाक अभिजन शक्तियां सामाजिक प्रतीकों, मिथों में मनमाना हस्तक्षेप करती थीं. इस तरह संस्कृति की आड़ में अल्पसंख्यक समूहों की बहुसंख्यक पर इजारेदारी पीढ़ीदरपीढ़ी चलती रहती थी. जनसाधारण यह माने रहता था कि अभिजन शक्तियां अपने जन्मजात गुणों के कारण उससे श्रेष्ठ हैं. इसलिए शिखर पर बने रहने का उनका दावा भी स्वाभाविक है. चूंकि पश्चिमी समाज में जातीय विभाजन जैसी कोई परिकल्पना नहीं थी, इसलिए सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के विरुद्ध जंग जीतना वहां अपेक्षाकृत आसान था. इसके प्रयास वहां पंद्रहवीं शताब्दी के आरंभ से ही होने लगे थे. मैकियावेली ने राजतंत्र की अपेक्षा नागरिक समूहों द्वारा गठित सरकार को श्रेष्ठ माना था. उसका प्रभाव आने वाली शताब्दियों में पड़ा. इससे राज्य की अवधारणा पुष्ट हुई. उससे पहले राजतंत्र में केवल केंद्र हुआ करता था. किसी भी राजा द्वारा शासित क्षेत्रों की उसके नाम के साथ गिनती की जाती थी. नागरिक की पहचान, जो पहले सामान्यतः राजाविशेष की प्रजा के रूप में होती थी, राज्य की अवधारणा विकसित होने के बाद, स्वतंत्र रूप से स्पष्ट होने लगी. अठारहवीं शताब्दी तक वहां मानवमात्र की समानता और स्वतंत्रता का समर्थन करने वाली अनेक विचारधाराएं अस्तित्व में आ चुकी थीं. उनके बीच अनेक मतांतर थे. कुछ मुद्दों को लेकर आपसी टकराव भी था. लेकिन मानवमात्र की आजादी और सुख में सबकी सहभागिता को लेकर वे प्रायः एकमत थीं.

सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के विरुद्ध बौद्धिक चेतना का प्रादुर्भाव इटली में हुआ था. भारत की इटलीवासी भी अपनी प्राचीन संस्कृति को श्रेष्ठतादंभ का शिकार थे. उसमें भी समाज के बहुत छोटे हिस्से को अतिरिक्त अधिकार प्राप्त थे. विल्फ्रेड परेतो, गेइतानो मोस्का, अंतोनियों ग्राम्शी आदि ने संस्कृतिक विभाजन की पड़ताल की. परेतो पेशे से इंजीनियर था. अपने अध्ययन से उसने यह निष्कर्ष निकाला कि इटली की कुल अस्सी प्रतिशत संपदा पर वहां के 20 प्रतिशत अभिजन समूहों का अधिकार है. अगले चरण में उसने अपने अध्ययन का दूसरे यूरोपीय देशों तक विस्तार किया. वह यह देखकर हैरान रह गया कि दूसरे देशों भी समाज का बहुत छोटा हिस्सा बाकी समूहों पर अपनी सांस्कृतिकसामाजिक और आर्थिक श्रेष्ठता का दम भरते हुए, शासन करता है. मोस्का का अध्ययन अभिजन समूहों की पहचान तथा उनकी प्रवृत्तियों को लेकर था. उसका कहना था कि शासकवर्ग अपनी बौद्धिक चतुराइयों के बल पर दूसरों पर शासन गांठने में कामयाब होता है. मार्क्स ने पूंजीवाद की चुनौतियों से निपटने के लिए श्रमिकों का संगठित विरोध के लिए आवाह्न किया था. श्रमिक समूहों को उसका सुझाव था कि उन्हें आगे बढ़कर सत्ता और संसाधनों पर अपना अधिकार सुनिश्चित कर लेना चाहिए. ग्राम्शी मार्क्सवाद के नाम पर हुई क्रांतियों की असफलता से परिचित था. अपने चिंतन से वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि सफल सर्वहारा राज्य की परिकल्पना तभी संभव है, जब सर्वहारा समूहों में राज्य करने की पर्याप्त योग्यता हो. वे अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक हों. गैरअभिजन समूहों के अपने बुद्धिजीवी हों जो अभिजन वर्ग की बौद्धिक चतुराइयों को समझकर समय रहते उसका समाधान खोजकर, गैरअभिजन समूहों की स्वतंत्रता बनाए रख सकें. इसे राजनीतिक पराधीनता कहें या नए ज्ञान के प्रति उदासीनता का स्वभाव, भारतीय बुद्धिजीवी विश्वस्तर पर हो रही बौद्धिक क्रांतियों से अनजान बने रहे. यह स्वाभाविक भी था. भारतीय समाज जातियों में बंटा था और जाति के आधार पर जिस वर्ग का बौद्धिक कार्यों में दखल था, और जो उसका स्वयंनिर्धारित कर्तव्य था, उसके हित समाज में बौद्धिक जड़ता बनाए रखने से जुड़े थे. उसके लिए उसकी कल्पना में गढ़ा गया ‘सतयुग’ ही सबकुछ था, जिसमें वह निरंकुशता की परिसीमा तक अधिकारसंपन्न था. राज्य उसकी जिदों और महत्त्वाकांक्षाओं के आगे बौना दिखाई पड़ता था. उनीसवीं शताब्दी के आरंभ में, अंग्रेजी शिक्षा के साथ, देश के बौद्धिक वातावरण में हलचल दिखाई पड़ी. आरंभ में अंग्रेजी पढ़ना सरकार के करीब पहुंचने का जरिया था. धीरेधीरे अंग्रेजी के ज्ञानविज्ञान ने दूसरे क्षेत्रों में भी दखल देना शुरू किर दिया. नई व्यवस्था में शिक्षा के दरवाजे सभी के लिए खुल चुके थे. इससे गैरब्राह्मणों का भी बौद्धिक क्षेत्र में दखल बढ़ा. उसके फलस्वरूप आधुनिक प्रगतिगामी विचारधाराएं भारत में प्रवेश करने लगीं.

आधुनिक विद्वानों में जॉन देरिदा, मिशेल फूको जैसे विचारकों के नाम शामिल हैं. वे मानवीय सरोकारों से प्रतिबद्ध थे. दोनों ने उत्तरआधुनिकता को अपने अध्ययन का विषय बनाया. उत्तरआधुनिकता उपभोक्तावादी संस्कृति की देन, व्यक्तिवाद और पूंजीवाद का बेमेल संस्करण है. उसमें ज्ञान को भी आकादमिक उत्पाद मान लिया जाता है. पूंजी के वर्चस्व के आगे विचारधाराएं मौन और असहाय नजर आती हैं. बाजारकेंद्रित अर्थव्यवस्था में व्यक्तिस्वातंत्र्य और समानता का बोध, उपभोग की स्वतंत्रता तक सीमित हो जाते हैं. आधुनिक सभ्यता की इस विसंगति की सहीसही पहचान फूको ने की थी. उसका विचार था कि पूंजीपति वर्ग को इन दिनों केवल आर्थिक सत्ता से संतोष नहीं है. वह अपनी सामाजिक सत्ता भी बनाए रखना चाहता है. इसके लिए वह हिंसा के उपकरणों सेना, पुलिस आदि का भी मनमाना उपयोग करने में दक्ष होता है. समाज को नियंत्रित करने के लिए वह अपने स्वार्थ को ध्यान में रखकर कुछ कसौटियां बना लेता है. जो भी व्यक्ति उन कसौटियों पर खरा नहीं उतरता, वह उसे अक्षम मानकर डराता है. इस तरह लोगों को अक्षमता का भय दिखाकर उनपर नियंत्रण बनाए रखता है. डरा हुआ व्यक्ति दूसरों को भयभीत करता है. परिणामस्वरूप लोग एकदूसरे पर संदेह करने लगते हैं. समाज में उत्तरोत्तर बढ़ती विश्वासहीनता के बीच पूंजीपति का काम आसान हो जाता है. मानवीय संबंधों में आई दरार को पाटने के लिए वह कृत्रिम संबंधों का निर्माण करता है. मनुष्य को वास्तविकता से काटकर आभासी दुनिया में ले जाता है. लोगों को लगता है कि तकनीक के आधार पर निर्मित दुनिया में वह अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्र और सुरक्षित है. केवल नई दुनिया उसकी बौद्धिक एवं भावनात्मक उपलब्धियों की सहीसही पहचान करती है. इस भ्रम में वह आभासी दुनिया को असली दुनिया से अधिक वास्तविक और भरोसेमंद मानने लगता है. जबकि आभासी दुनिया में व्यक्ति या व्यक्तिसमूहों की स्वतंत्रता उपभोक्ताबाजार तक सीमित होती है. लोकतंत्र और मानवाधिकार उपभोक्ताअधिकारों की जकड़बंदी से बाहर नहीं निकल पाते.

देरिदा ने गिनती पिछली शताब्दी के सर्वाधिक प्रतिभाशाली और मौलिक चिंतक के रूप में की जाती है. वे ‘विखंडनवाद’ के सिद्धांतकार हैं. देरिदा के विचारों को ग्राम्शी के सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के सिद्धांत के समानांतर रखकर आसानी से समझा जाता है. यथास्थिति बनाए रखने के लिए अल्पसंख्यक अभिजन केवल समाज के संसाधनों का स्वार्थ हेतु उपयोग नहीं करता. अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के विस्तार एवं भविष्य की चुनौतियों को कम करने के लिए वह बहुसंख्यक वर्ग के दिलोदिमाग पर भी अधिकार जमाए रखता है. अपने स्वार्थ को वह बहुजन समूह के हित के रूप में पेश करता है. इस चालाकी से बेखबर अपने बौद्धिक नेतृत्व हेतु अभिजन समूहों पर निर्भर बहुजन, अल्पसंख्यक अभिजनों द्वारा विनिर्मित तंत्र और सामाजिकसांस्कृतिक विश्लेषण को ही असल माने रहते हैं. प्रकारांतर में वे अभिजन समूह की स्वार्थपूर्ति में ही अपना कल्याण समझने लगते हैं. यह उसी तरह है जैसे कारखाने के मुनाफे और विस्तार को किसी मजदूर या कारीगर द्वारा अपनी तरक्की मान लेना. अल्पसंख्यक अभिजन द्वारा थोपी गई भ्रांतियां बहुसंख्यक वर्ग को ऐसा सोचने को बाध्य करती हैं. इसलिए ग्राम्शी ने अभिजन वर्चस्व से बौद्धिकशारीरिक मुक्ति के लिए सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक मुक्ति को आवश्यक माना. यह मुक्ति एकदम आसान नहीं है. इसलिए कि वैचारिकता के आकलन के जितने भी ज्ञात मापदंड हैं, सब पर अभिजन वर्ग की स्वार्थदृष्टि का प्रभाव है. उदाहरण के लिए लेखकों और कलाकारों के बड़े वर्ग में प्रचलित ‘कला कला के लिए’—जैसी अवधारणा. या फिर यह विचार कि ‘साहित्य का प्रथम उद्देश्य मनोरंजन है.’ ये मान्यताएं समाज के शीर्षस्थ अभिजनों द्वारा जो समस्त कलाओं को उपयोग अपने सुखसुविधा के लिए करना चाहते हैं—द्वारा थोपी गई हैं. प्राचीन आलोचनाशास्त्र इन्हीं कसौटियों के आसपास घूमता है. वर्णव्यवस्था और सामंती वृत्तियों के घोर समर्थक तुलसी उसकी दृष्टि में हिंदी के श्रेष्ठतम कवि हैं. आलोचना के ऐसे मापदंडों से साहित्य की लोकोपकारी समालोचना असंभव है. इस लिए देरिदा साहित्य के नए पाठ हेतु नवीन आलोचनादृष्टि को अपरिहार्य मानता है.

देरिदा का विचार था कि इतिहास, संस्कृति और ज्ञान के उपलब्ध स्रोतों में अत्यधिक दोहराव है. जैसे मशीन अपनी पूर्ववर्ती अवस्था में निरंतर लौटती रहती है, इसी प्रकार इतिहास भी बारबार अपनी उन्हीं प्रतिज्ञाओं को दोहराता है, जिनसे येनकेनप्रकारेण अभिजन हितों की पुष्टि होती हो. जिससे ऐतिहासिक निष्कर्षों पर जड़ता हावी होने लगती है. इतिहास के प्रभामंडल से बाहर आने के लिए आवश्यक है कि सभ्यता और संस्कृति के रूप में उपलब्ध ज्ञानसामग्री तथा आलोचना के उपकरणों को संदेह के दायरे में लाया जाए. उन्हें अपर्याप्त तथा ‘ना कुछ’ मानकर किनारे करते हुए नवोन्वेषण हेतु कमर कस ली जाए. चुनौती यहीं समाप्त नहीं होती. वृहद सामाजिक हितों के अनुरूप नई व्याख्याएं पेश करने कैसे संभव हो? कैसे मनुष्य को उसकी प्रतिगामी सोच से बाहर लाया जाए? इसके लिए देरिदा ने ‘विखंडनवाद’ का विचार दिया. उनका आशय था किसी भी कृति, शब्द या विचार के ज्ञात अर्थों तथा प्रज्ञप्तियों पर अविश्वास करते हुए, स्थापित अर्थो को पूरी तरह किनारे कर, उसके नवीनतम पाठों की ओर बढ़ना. बौद्धिक वर्चस्व से मुक्ति के लिए इस तरह का विखंडन अपरिहार्य है.

लोकहित का दावा करने वाली प्राचीन विचारधाराओं का संज्ञान न लेते हुए, यदि केवल विगत दोतीन शताब्दियों के बौद्धिक आंदोलनों पर ही विचार किया जाए तो इस अवधि में मानवकल्याण का दावा करने वाले अनेक दर्शन सामने आए हैं. उनपर किसी को भी गर्व हो सकता है. उनके प्रवर्त्तकों की ईमानदारी पर भी संदेह नहीं किया जा सकता. मगर समाज में उत्तरोत्तर बढ़ती विचारहीनता, अविश्वास, हताशा, भय और तनाव की स्थिति दर्शाती है कि समग्र लोकहित का दावा करने वाली उन विचारधाराओं में कोई न कोई कमी अवश्य रही है. कुछ है, जिससे समाज उससे अपेक्षित रूप में लाभान्वित न हो सका. या तो वे विचारधाराएं कमजोर थीं. अथवा समाज को उनके अनुरूप ढालने में कोताही बरती गई. सच यह भी है कि सामाजिक जटिलताओं की व्याख्या के लिए कोई भी एकल विचार, वह चाहे जितना परिपक्व दिखाई पड़े, अपर्याप्त होता है. एक सीमा के बाद प्रत्येक विचारधारा कमजोर दिखने लगती है. उचित यह है कि विचारों के कार्यान्वन, समाज निर्माण में लगी शक्तियां अपनी संक्रियता को निरंतर बना यह भी संभव है कि विचारधाराओं में कोई कमी न हो, उनके प्रवर्त्तकों की सदाशता भी संदेह से परे हो, लेकिन वृहद जनसमाज में उन विचारधाराओं को लेकर अविश्वास का भाव रहा हो? विचारबहुलता के दौर में समाज का विचारहीनता की ओर बढ़ना दर्शाता है कि विचार चाहे जिस वर्ग की देन रहे हों, प्रत्येक युग में समाज को उनसे परचाने तथा उनके कार्यान्वन हेतु सक्षम योजनाएं बनाने के प्रमुख सूत्रधार शीर्षस्थ अभिजन ही रहे हैं. भारत में मार्क्सवाद और वामपंथ की असफलता का बड़ा कारण भी यही है. चूंकि बहुजन तथा अभिजन वर्ग के हितों में सदैव टकराव रहा है, इसलिए विचारधाराओं के कार्यान्वन के लिए आधीअधूरी योजनाएं बनाने, तथा जनता में उन कार्यक्रमों के प्रति उदासीनता के कारण समाज उनसे अपेक्षित लाभ उठाने में अक्षम रहा है. बहुजन वर्ग भी ऐसी विचारधाराओं को संदेह की दृष्टि से देखता है. वह उन्हें थोपी हुई विचारधारा मानता है. यही कारण है कि उद्देश्यों की पवित्रता के बावजूद ऐसे विचार समाज का प्रबोधीकरण करने में नाकाम होते आए हैं.

असफलता का बड़ा कारण जीवन में पूंजी का अवांछित हस्तक्षेप है. ठोस विचारधारा के अभाव में सामूहिक हितों की पड़ताल कठिन हो जाती है. छोटेछोटे सामाजिक समूहों को ललचाने के लिए राजनीतिक दल ऐसे मुद्दे लाते हैं, जो विशेष प्रलोभनकारी और किसी न किसी प्रकार उपभोग से जुड़े होते हैं. पूंजीवादी मीडिया इस काम में उनकी मदद करता है. चूंकि उपभोक्ता के मानसनिर्माण का कार्य मुख्यतः मीडिया के अधीन होता है, जिसपर पूंजीपतियों का अधिकार है. चर्चा में बने रहने के लिए राजनीतिक दल मीडिया की शरण में जाते हैं किसी न किसी रूप में पूंजीपति संस्थानों के लिए कठपुतली की तरह काम करते हैं. उससे शासन पूंजीवाद के हितसंरक्षण में जुड़ जाता है. विचारधारा से अलगाव उनके भीतर अपने ही राजनीतिक कार्यक्रमों के प्रति अविश्वासहीनता को जन्म देता है. प्रकारांतर में वे पूंजीवादी संगठनों के हाथ की कठपुतली की तरह काम करने लगते हैं. पक्षविपक्ष दोनों की राजनीतिक गतिविधियां पूंजीपतियों के हितसंरक्षण में लगी होती हैं. पूंजीवाद का अप्रत्यक्ष हाथ उन्हें अपने स्वार्थ के हिसाब से अनुकूलित करता रहता है. दुष्परिणाम यह होता है कि सरकार और संगठन जनता से कटकर पूंजीपतियों के हितसाधन में लगे रहते हैं. चूंकि पूंजीपति वर्ग ये सारे काम पर्दे के पीछे रहकर, बड़ी चतुराई के साथ करता है, इसलिए शासन की असफलताओं, जनता की कसौटियों पर खरा न उतरने का दोष सरकार और उसके नेताओं पर आता है. हकीकत से अनजान जनता चुनावों के जरिये बारबार सरकार बदलती है. लेकिन हालात वही के वही रहते हैं. इसलिए कि लोग जो उम्मीद अपनी सरकार से पालते हैं, वह कदाचित उसके बस से बाहर होता है.

इसका आषय यह नहीं है कि जितने नेता हैं, सभी पाकसाफ और दूध के धुले हैं. उद्देष्य केवल यह बताना है कि लोकतांत्रिक दायित्वों को निभाने के लिए यदि कोई उत्साही नेता आगे बढ़ना चाहे तो उसके लिए नई चुनौतियों से गुजरना बेहद कठिन होता है. इसलिए पढ़ेलिखे विचारवान नेता भी मूल्यकेंद्रित राजनीति से कतराने लगते हैं. योगेंद्र यादव इसका सटीक उदाहरण हैं. वे विचार की दुनिया से राजनीति में आए हैं. समाजविज्ञान के ज्ञाता हैं. राजनीति में लोकभागीदारी सुनिश्चित करना चाहते हैं. यही लक्ष्य गणतांत्रिक समाजवाद का भी है, जो एक आधुनिक और लोकप्रिय विचारधारा है. योगेंद्र जी की निष्ठा और कार्यशैली पर संदेह नहीं किया जा सकता. गणतांत्रिक लोकतंत्र की सफलता तभी संभव है जब नागरिक उससे भलीभांति परिचित हों. देशभर में घूमघूमकर अपनी सभाओं के माध्यम से वे भी लोकजागरण के काम में जुटे हैं. जाति, धर्म और सामंतवाद के साये में रही जनता के लोकतांत्रिक प्रबोधीकरण के लिए ऐसे कार्यक्रमों की आवश्यकता आजादी के बाद से ही थी. मगर कभी कोई गंभीर कोशिश इस दिशा में नहीं की गई. यहां ‘रोशडेल पायनियर्स’ का उल्लेख प्रासंगिक होगा. उसे विश्व की पहली सफल सहकारी संस्था होने का गौरव प्राप्त है. यह समझते हुए कि कामयाब सहकारिता के लिए सदस्यों को उसकी सैद्धांतिकी के बारे में समझाना आवश्यक है, संस्था की ओर से सीमित संसाधनों के बावजूद उसकी नियमित व्यवस्था की गई थी. ‘रोशडेल पार्यनियर्स’ की सफलता दूसरों के लिए मार्गदर्शक बनी. फलस्वरूप सहकारिता आंदोलन दुनियाभर में फैला. बहरहाल बात योगेंद्र यादव की हो रही है. उनसे जब भी वैचारिक प्रतिबद्धता के बारे में चर्चा हुई, वे सीधे व्यवहार पर उतर आते हैं. यह कुछ ऐसा ही है जैसे तेज आंधीतूफान के बीच बिना छत के घर के नीचे षरण लेने की सलाह देना. दुनिया को नए चिचारों की नहीं, उसे बदलने वालों की जरूरत है—यह कार्ल मार्क्स ने भी कहा था. वह आज की तरह विचारशून्यता का समय नहीं, बौद्धिक क्रांति का दौर था. समाज में नए राजनीतिक दर्षनों के बीच बहस छिड़ी थी. विभिन्न विचारधाराओं के बीच सीधी प्रतिद्विंद्वता थी. स्वयं मार्क्स भी अपने ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’ के साथ चर्चा में थे. दिनोंदिन पांव पसारते पूंजीवाद पर अंकुश लगाने के लिए सीधा टकराव आवश्यक था. इसलिए उन दिनों पूंजीवाद और शेष विचारधाराएं आमनेसामने थीं. उनकी पहचान करना सरल था. आज वैसा नहीं है. समय के साथ पूंजीवाद ने खुद को बदला है. राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में उसकी गहरी घुसपैठ है. वामपंथी नेता भी इससे अछूते नहीं हैं. वामपंथ की मूलभूत प्रतिबद्धताओं को वे व्यावहारिकता का तकाजा कहकर किनारे करते आए हैं. इसलिए समाज में पूंजीवाद के प्रति सामान्य सहमति दिखाई पड़ती है.

2012 में अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में चले जनांदोलन ने समाज में परिवर्तन के प्रति उत्सुकता चलाई थी. चूंकि उसके पीछे कोई ठोस विचारधारा नहीं थी, इसलिए कुछ ही महीनों में वह आंदोलन बिखरसा गया. उसके नेता लोकप्रिय राजनीति का हिस्सा बनते चले गए. इस बीच कई जनांदोलन पनपे. पूंजीवादी मीडिया की नीति उन्हें उपेक्षित करने की रही. जनांदोलनों की उपेक्षा अथवा उनके नेताओं की चरित्रहत्या द्वारा वह लोकसशक्तिकरण के कार्यों में बाधक रहा है. पूंजीवादी चालों को समझने वालों के लिए यह अनपेक्षित नहीं है. उसके अभाव में संसदीय बहसें सड़कें, बिजली, पानी और आरक्षण जैसे मामूली मुद्दों के आसपास घूमती रहती हैं. कहने की आवश्यकता नहीं कि कारपोरेट सेक्टर भी यही चाहता है. इससे उपभोक्ताकरण में मदद मिलती है. लोग अमर्यादित उपभोग और उपयोग का अंतर भूलने लगते हैं. समस्या इतनी भयावह है कि गंभीर और स्वचेता किस्म के लोग भी उम्मीद छोड़ने लगे हैं. जबतब ‘विचारधारा के अंत’ की बात भी सुनाई पड़ जाती है. ऐसे दौर में जब क्रिकेट और फिल्में देशभक्ति का पर्याय बन चुकी हों, मोबाइल उत्तरोत्तर ‘स्मार्ट’ मगर आदमी का दिलोदिमाग कुंद होता जा रहा हो, लोग आभासी और वास्तविक दुनिया का भेद भूल चुके हों, क्या प्रतिबद्धता की सफल राजनीति संभव है? सवाल यह भी है कि षरद यादव, लालू यादव, अखिलेश यादव सहित 17 दलों के प्रमुख नेता अथवा उनके प्रतिनिधि जो उस रैली में उपस्थित थे, क्या सार्थक विकल्प देने के लिए कृतसंकल्प हैं?

उस रैली में बसपा की ओर से सतीष चंद्र मिश्र मौजूद थे. सामाजिक न्याय को लेकर उनकी क्या प्रतिबद्धता है, यह स्पष्ट नहीं है. बसपा के साथ वे केवल राजनीतिक स्वार्थ के लिए जुड़े हैं. फिर सुश्री मायावती द्वारा रैली में बतौर बसपा प्रतिनिधि सतीश मिश्रा को ही क्यों चुना? ठीक है, बात जब ‘सांझी विरासत’ की हो तो उसमें ब्राह्मणों को भी सम्मानजनक हिस्सा मिलना चाहिए. पर बात केवल इतनी नहीं है. उन्हीं दिनों ‘सोषल मीडिया’ पर एक तस्वीर वायरल हुई थी. तस्वीर क्या बसपा की ओर से या उसके नाम पर बनाया गया पोस्टर था. उसमें बसपा प्रमुख की आदमकद तस्वीर थी. बाकी दलों के नेताओं के, जिन्हें गठबंधन के सदस्य के रूप में देखा जा रहा है, के केवल मुखौटे थे. पोस्टर को किसने बनाया? किसने और क्यों सोषल मीडिया पर वायरल किया? संभव है वह किसी विरोधी नेता की साजिश अथवा जानबूझकर की गई सांकेतिक कार्रवाही रही हो. बताया यह भी गया कि वह बसपा का अधिकारिक पोस्टर नहीं था. लेकिन वह जिस तरह बनाया गया था, बसपा की ओर से उसका खंडन न होना, गठबंधन बनाने में जुटे नेताओं की मनोदषा को दर्षाता है.

उत्तर प्रदेश विधान सभा के पिछले चुनावों के बाद प्रत्येक दल भलीभांति समझ चुका है कि वर्तमान परिस्थितियों में भाजपा का सामना उनमें से किसी एक दल द्वारा संभव नहीं है. सब जानते हैं कि 70 प्रतिषत मत विपक्षी दलों के बीच थोड़ेथोड़े बंट जाते हैं और बाकी बचे वैध मतों में से 28-29 प्रतिषत मत पाकर भाजपा पूरी ठसक के साथ सरकार बना ले जाती है. भाजपा को हराने के लिए विरोधी मतों को एकजुट करना न केवल उनके लिए बल्कि देष की एकता, अखंडता, सामाजिक सद्भाव और देश की सुखसमृद्धि के लिए अत्यावश्यक है. बावजूद इसके प्रत्येक दल संभावित गठबंधन में अपने लिए अधिकाधिक सीटें सुनिष्चित कर लेना चाहता है. वर्तमान भारतीय राजनीति, विषेषकर विपक्ष की सबसे बड़ी त्रासदी उसका विचारषूण्य हो जाना है. बिना किसी ठोस नीति और वैचारिक संकल्प के वे ऐसा गठबंधन बनाना चाहते हैं जो भाजपा को जो इस समय अपनी विचारधारा को लेकर सर्वाधिक उग्र और आत्मविश्वास से भरपूर है—चुनौती देना चाहते हैं. भाजपा जैसे शुद्ध सांप्रदायिक और घोर जातिवादी दल को हराने के लिए गठबंधन अपरिहार्य है. किंतु दूरदृष्टि और ठोस नीति के अभाव में कोई भी संभावित गठबंधन विषुद्ध अवसरवादी समझौता होगा.

चलतेचलते कुछ चर्चा ‘सांझी विरासत’ पर भी. शरद यादव जाति के बजाय जमात की बात करते हैं. धर्म और छोटेछोटे जाति समूहों के रूप में बुरी तरह विभाजित समाज में इन शब्दों के गहरे निहितार्थ हैं. सवाल है कि ‘सांझी संस्कृति’ अथवा ‘सांझी विरासत’ जैसी कोई चीज क्या सचमुच भारतीय समाज में रही है? भारत के संदर्भ में कहीं वह सामाजिक यथास्थितिवाद का पर्याय तो नहीं? देश में सांस्कृतिक एकता की बात करने वाले विद्वान प्रायः ‘विविधता में एकता’ की बात कहकर भारतीय संस्कृति का महिमामंडन करते हैं. प्रथम दृष्टया वे गलत भी नहीं हैं. इस देश में उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक ऐसी अनेक समानताएं हैं, जिनसे विविधता में एकता का आभास होता है. उदाहरण के लिए होली, दीवाली, रक्षाबंधन, दशहरा जैसे त्योहार, पूरे देश में एक साथ और लगभग एक तरह से मनाए जाते हैं. स्थानीय रीतिरिवाज और आदिवासी समाजों को छोड़कर पूरे देश में विवाह संस्कार भी एक समान होता है. लोग समान रूप से आस्थावान हैं. जातिव्यवस्था को लेकर सभी के लगभग एक जैसे विचार हैं. स्थानीय देवीदेवताओं के अलावा राम, कृष्ण जैसे सामंती संस्कारों वाले देवता भी हैं, जिनकी पूजा किसी न किसी रूप में पूरे देश में की जाती है. प्रायः सभी प्रांतों में अर्थव्यवस्था का मुख्य स्रोत खेती है. ‘सांझी संस्कृति’ अथवा ‘सांझी विरासत’ का दावा करने के लिए क्या इतना पर्याप्त है?

यदि संस्कृति पीढ़ीदरपीढ़ी आगे बढ़ने वाला सामान्य लोकाचार है तो ‘सांझी संस्कृति’ उसे कहा जा सकता है, जिसे बनाने में सभी का बराबर का योगदान हो. जिसमें अवसरों की समानता हो. भारतीय संस्कृति इस दृष्टि से बहुत विपन्न है. प्रकटतः उसमें ऐसा कुछ नहीं है जो सामूहिकता, सहभागिता और मानवमात्र की स्वतंत्रता की प्रतीति कराता हो. भारतीय समाज जाति और धर्म के नाम पर अनेक छोटेछोटे समूहों में बंटा है. देशभर में तीस हजार से ऊपर जातियां, उपजातियां, गोत्र, उपगोत्र आदि हैं. उनके बीच ऊंचनीच की चौड़ी खाई है. वैवाहिक संबंध, खानपान और रहनसहन को लेकर भांतिभांति के प्रतिबंध हैं, जिन्हें वह अतीत की धरोहर के रूप में सौंपता है. धर्म पर संप्रदायवाद हावी है. प्रत्येक मतावलंबी अपने पंथ को दूसरों से श्रेष्ठ मानता है. जबकि तत्संबंधी उसका ज्ञान रूढ़ियों, आडंबरों और जड़विश्वासों का घालमेल होता है. कुल मिलाकर जिसे हम सांझा संस्कृति कहते हैं, उसमें कहीं न कहीं अपनेअपने विश्वासों, रीतिरिवाजों, धार्मिकसामाजिक आडंबरों यहां तक कि रूढ़ियों और पाखंडों के साथ जीने की बाध्यता बनी रहती है. यदि कोई उससे अलग चलना चाहे, तो संस्कृति उसे इजाजत नहीं देती. उल्टे तरहतरह की बाधाएं उत्पन्न कर, जीवन को दुष्कर बना देती है.

सांझी संस्कृति’ अथवा ‘सांझी विरासत’ असल में मिथ है. उसका वास्तविक प्रतीति यदि समाज में ही नहीं है, तब वह राजनीतिक दलों की एकता का आधार भला कैसे बन सकती है? क्या भारत जैसे विविधताओं वाले बड़े समाज को ‘सांझी संस्कृति’ के कोरे मिथ के सहारे एक किया जा सकता है? क्या केवल मिथ के भरोसे परिवर्तन की निर्णायक लड़ाई संभव है? इन सबसे महत्त्वपूर्ण एक प्रश्न यह है कि जो दल या नेता सांझी संस्कृति को बचाने के नाम पर एकजुट होना चाहते हैं, क्या उनका अपना जीवन या राजनीति सांझी संस्कृति की भावना पर खरी उतरती है? कुछ दशक पहले तक राजनीति पर सवर्णों का अधिकार था. कोई चुनौती उनके आगे नहीं थी. राजनीति में पिछड़ों और दलितों की संख्या नगण्य थी. आजादी के बाद दलितों और पिछड़ों के भीतर आत्मसम्मान की भावना जाग्रत हुई. लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव, मायावती, नितीश कुमार जैसे नेता अस्मितावादी आंदोलनों की ही देन हैं. जातिआधारित भेदभाव और उत्पीड़न को उन्होंने या उनके पूर्वजों ने स्वयं झेला है. बावजूद इसके उनकी लड़ाई जाति के विरोध में न होकर, कहीं न कहीं अपने जातीय हितों की अधिकतम सुरक्षा तक सीमित रही है. पाब्लो फ्रेरा का मानना था कि उत्पीड़न के कारणों का सही बोध न होने के कारण उत्पीड़ित जनों की लड़ाई आमूल परिवर्तन के लिए न होकर तात्कालिक लाभों तक सिमट जाती है. परिवर्तन के आरंभिक दौर में उत्पीड़ित उत्पीड़क की नकल करता हुआ, उसके जैसा बनना चाहता है. स्वातंत्र्योत्तर भारत में दलितोंपिछड़ों की राजनीति के साथ यही हुआ है. लोकतांत्रिक अवसरों का लाभ उठाकर जो दलितपिछड़े नेता सत्ताकेंद्रों तक पहुंचे, उन्होंने आमूल परिवर्तन के लिए संघर्ष जारी रखने के बजाय क्षुद्र हितों से समझौता करना उचित समझा. इसलिए उनकी उपलब्धियां प्रदेशविशेष तक सीमित रहीं. जाहिर है जिस सांझी संस्कृति की बात शरद यादव कर रहे हैं, उसपर महागठबंधन के संभावित घटक दलों का न तो विश्वास है, न वह पूरी तरह से उनकी जीवनशैली का हिस्सा ही रहा है.

जातिवाद भाजपा और कांग्रेस के चरित्र का भी हिस्सा है. जातिवादी होने के साथसाथ वे यथास्थितिवादी भी हैं. एकदूसरे का विरोधी दल होने का दावा करने वाले ये दल असल में अभिजन संस्कृति के प्रमुख संरक्षक, पालक और प्रवर्त्तक रहे हैं. भाजपा अधिक उग्र है. वह जातिवाद को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के साये में सुरक्षित रखना चाहती है. उसके लिए समयसमय पर अनेक चालें चलती रहती है. कांग्रेस चुपचाप काम करने में विश्वास रखती है. दोनों पर समाज के अभिजन तबकों का कब्जा है. दलितों और शूद्रों की उपस्थिति केवल मतदाताओं को लुभाने अथवा संवैधानिक औपचारिकताओं को पूरा करने तक सीमित है. व्यवस्था में आमूल परिवर्तन न तो भाजपा का अभीष्ट है, न कांग्रेस का. दोनों उन्हीं जातियों की हितसंरक्षक रही हैं, जो आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक स्तर पर हमेशा से शक्तिशाली रही हैं. इस आधार पर उनके पास सचमुच ‘सांझी विरासत’ है. ऐसी विरासत जिसमें वे मिलबांटकर सुखसाधनों का भोग करती आई हैं. अपनी सामाजिकसांस्कृतिक श्रेष्ठता का दावा करते हुए वे बाकी जनसमूहों पर शताब्दियों से शासन करती आई हैं. उसे पूंजीपतियों और सरमायेदारों का समाजवाद कह सकते हैं. ठीक सतयुग की तरह जिसमें समस्त सुखसंसाधन देवताओं की थाती मान लिए गए थे. जो देवता नहीं थे, वे या तो असुर थे या दास, जिन्हें धरती के बोझ की भांति देखा जाता था. सवर्ण जानते हैं कि यदि वे बिखरे तो लोकतंत्र का लाभ उठाकर संख्याबल में चार गुना बहुजन उन्हें सत्ता से हमेशाहमेशा के लिए बेदखल कर सकते हैं. यही स्वार्थपरता उन्हें एक रखती है. इसलिए वे बहुजन समूह में फूट डालकर, समयसमय पर जातिसमूहों को फुसलाकर अपनी राजनीतिक हैसियत को बचाने का षड्यंत्र रचते रहते हैं. धर्मकेद्रित संस्कृति उनका वर्चस्व कायम रखने में मददगार होती हैं. संगठित अल्पसंख्यक अभिजन असंगठित बहुजन समूहों पर शताब्दियों से राज करती आए हैं; और आज भी कर रहे हैं. इस बात को भाजपा के नेता भलीभांति जानते हैं.

यह कहना तो अनुचित होगा कि शरद यादव जैसा अनुभवी और मंजा हुआ राजनीतिज्ञ इन तथ्यों से अनजान हो. लेकिन शीर्ष जातियों के सांस्कृतिक वर्चस्व से जूझने और अभिजन संस्कृति के मुकाबले जनसंस्कृति को खड़ा करने के लिए जो सोच, साहस, राजनीतिक दूरदृष्टि और संकल्पसामर्थ्य चाहिए, वह उनके पास नहीं है. इसलिए कि वे स्वयं भी जातिवादी राजनीति का उपज हैं. दूसरा बड़ा कारण है—‘थिंक टेंक’ का अभाव. भाजपा आज यदि सफल है तो उसके पीछे ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ का मजबूत वैचारिक स्रोत है, जो अपने ठेठ जातिवादी सोच को धर्म और राष्ट्रीयता के पर्दे में छिपाए रखता है. लेकिन संघ तो पहले भी था. अटलविहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे नेता संघ के प्रति उतने ही आस्थावान और समर्पित थे, जितने आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. लेकिन उस समय तक समाजवादी पार्टी पर राममनोहर लोहिया और बसपा पर ज्योतिराव फुले, डॉ. आंबेडकर, पेरियार और कांशीराम के आंदोलन का असर था. उनका विरोध कांग्रेस का था जो जातिवादी राजनीति करते हुए भी अपने सोच को बहुजन हितकारी दिखाती थी. गांधी की वैचारिकी से बंधी होने का दावा करने वाली कांग्रेस दलितों और पिछड़ों के सीधे विरोध में जा ही नहीं सकती थी. सत्ता की राजनीति करतेकरते ये दल अपनी वैचारिकी से दूर हटते गए. संघ उस समय तक नेपथ्य में रहकर कार्य करने को विवश था. कांग्रेस के कमजोर पड़ते ही संघ खुलकर सामने आ गया. बड़ी चतुराई से वह दलितों और पिछड़ों के बीच दरार बनाने में कामयाब रहा. सोचीसमझी रणनीति के तहत संघ ने भाजपा की राजनीति में हस्तक्षेप करना आरंभ किया. चुनावों को सांप्रदायिकता का रंग देने के लिए पिछले चुनावों में उसने मुस्लिम उम्मीदवारों से किनारा किया. पिछड़ी जातियों में सैंध डालने के लिए मोदी जैसे घोर संघी मानसिकता के नेता को पिछड़ी जाति का बताकर भाजपा का मुखौटा बनाया. उत्तर प्रदेश के चुनावों में भाजपा की जीत के बाद वह खुलकर मैदान में आ गया. समाज का सांप्रदायिक और जातीय विभाजन करने में इतना सफल हुआ कि प्रदेश की राजनीति में आगे मुखौटा लगाने की आवश्यकता ही नहीं समझी; और केशव प्रसाद मौर्य को किनारे कर, योगी आदित्यनाथ को सूबे की सत्ता का कर्णधार बना दिया गया. आरएसएस जैसे ‘थिंक टेंक’ के बल पर भाजपा का संघर्ष आरंभ से ही उर्ध्वगामी बना रहा. जाति केंद्रित राजनीति तक सीमित मुलायम सिंह यादव, मायावती, लालू यादव आदि ने कभी भी ‘थिंक टेंक’ की आवश्यकता को नहीं समझा. इसलिए उनकी सत्ता उनके अपने प्रदेशों में कैद रहने के साथसाथ बिखराव का शिकार होती रही.

ऐसे में शरद यादव से क्या उम्मीद रखी जाए? उल्लेखनीय है कि राजनीतिक वर्चस्व की अपेक्षा सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के विरुद्ध लड़ाई हमेशा कठिन होती है. उसमें प्रतिद्विंद्वी के अलावा अपने लोग भी प्रतिपक्ष की भूमिका में रहते हैं. शताब्दियों से बौद्धिक दमन के शिकार रहे लोग धीरेधीरे उस व्यवस्था से अनुकूलित होकर, शोषणकारी व्यवस्था को साथ देने में ही अपना त्राण समझने लगते हैं. जिससे उनकी प्रतिरोधक क्षमता, इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास कमजोर पड़ जाते हैं. आर्थिक वंचना का शिकार, धनवान को देखकर सोच सकता है कि उसके पास अतिरिक्त धन क्यों है? मेरे पास क्यों नहीं है? इसी तरह राजनीतिक अधिपत्य के बीच जीता आया व्यक्ति राजीतिक रूप से शक्तिशाली व्यक्ति को देखकर सोच सकता है कि जो अधिकार उसके पास हैं, उतने ही अधिकार मेरे पास क्यों नहीं हैं? किंतु वर्चस्वकारी संस्कृति के जाल में फंसा नागरिक स्वेच्छा से उसमें फंसा रहता है. यह जानते हुए भी कि संस्कृति के नियम उसके बनाए नहीं हैं और उनका झुकाव पूरी तरह से शक्तिशाली वर्गों की ओर है; लोग उससे समझौता किए रहते हैं. शक्तिशाली वर्गों द्वारा गढ़ी गई संस्कृति, उत्पीड़ित वर्गों के विरुद्ध हथियार का काम करती है. उसके आगे समाज का बहुसंख्यक वर्ग बेबस बना रहता है. संस्कृति का नशा हमेशा उसपर सवार रहता है. वह भूल जाता है कि संस्कृति के नियम उसपर थोपे हुए हैं और बहुसंख्यक वर्गों को बौद्धिक दास बनाए रखने के लिए अभिजन समाज सदियों से उनका प्रयोग करता आया है. उसमें जनसाधारण की भूमिका केवल अनुगमन तक सीमित कर दी जाती है. परिणामस्वप व्यक्ति जिस हाल में है, उसी को श्रेष्ठतर माने रहता है. लोकप्रिय राजनीति आंदोलन नहीं, उसका केवल मिथ पैदा करती है. उसके बुद्धिजीवी उन प्रतीकों की सत्तोन्मुखी व्याख्या करने में जुटे रहते हैं. कतार में लगा उपासक कभी नहीं सोचता कि उसकी थाली खाली और दूसरे की जरूरत से ज्यादा भरी क्यों है. वह केवल अपनी श्रद्धा को सबकुछ माने रहता है. अभावों को सहना और उनके बीच जीना उसकी आदत बनने लगता है. वह मान लेता है कि समाज जो ऊंचनीच, अनाचारअत्याचार हैं उनके कारण समाज के बीच न होकर उससे बाहर हैं, इसलिए नियंत्रण से परे हैं.

इसका आशय यह नहीं कि शरद यादव जिस ‘सांझी संस्कृति’ को आधार बनाकर आंदोलनरत हैं, उसकी उपेक्षा की जानी चाहिए. संघ और भाजपा जिस विघटनकारी सोच को लेकर काम कर रहे हैं, उसे देखते हुए सांझी संस्कृति और सहअस्तित्व की बात करना भी जीवनमूल्यों को बचाए रखने जैसा है. लेकिन परिवर्तनोन्मुखी राजनीति का संकल्प उठाने वाले किसी भी नेता को समझ लेना चाहिए कि उनका सामना केवल राजनीतिक शक्तियों से नहीं है. न ही केवल सत्ता परिवर्तन द्वारा सामाजिक व्यवस्था में आमूल परिवर्तन संभव है. इसलिए उन्हें राजनीतिकसामाजिक सघर्ष के साथसाथ जनता को धर्मसत्ता और अर्थसत्ता से टकराव के लिए भी तैयार करना चाहिए. आर्थिक असमानता से जूझ रहे समाजों में यह संघर्ष और भी कठिन हो जाता है. क्योंकि शक्तिशाली आर्थिक शक्तियां समाज के विपन्न वर्गों को आश्रित बनाए रखने के लिए सारे निर्णयाधिकार अपने पास रखती हैं. जनसाधारण जो समाज की मुख्य कार्यकारी शक्ति है, अपनी ताकत से अनजान किंतु अपनी जरूरतों के लिए आर्थिक शक्तियों पर निर्भर रहता है. उसे सदैव यह डर सताता रहता है कि आर्थिक शक्तियों की नाराजगी उसकी आजीविका के मामूली साधनों के लिए भी संकट का कारण बन सकती है. अतएव आमजन के आत्मविश्वास को बनाए रखना और उन्हें परिवर्तन की बड़ी लड़ाई के लिए तैयार करना, प्रत्येक राजनीतिकसामाजिक आंदोलन का उद्देश्य होना चाहिए. ‘सांझी संस्कृति’ का नारा यदि बहुसंख्यक वर्गों के आत्मविश्वास को बचाए रखने में सहायक होता है, तब भी वह आज की राजनीति में बड़ी उपलब्धि माना जाएगा.

©ओमप्रकाश कश्यप

न्याय की पाश्चात्य अवधारणा—चार

सामान्य

सुकरात, पेरामेनीडिस, हेराक्लाट्स, प्रोटेगोरस आदि

 

न्याय मानव—समाज का सदगुण है. (ऐसा बादल) जो जहां जितना सूखा है, वहां उतना ही ज्यादा बरसता है.—अरस्तु

आदर्श समाज की खोज मनुष्य का आरंभिक सपना है. यह सपना अकेले प्लेटो का नहीं था. किसी देवता, महामानव या अतिविलक्षण प्रतिभाशाली को भी इसका श्रेय नहीं दिया जा सकता. साधारण से साधारण मनुष्य यह कामना करता आया है कि जिस समाज में वह रहता है, उसे जितना कि वह आज है, उससे बेहतर होना चाहिए. भले ही वह यह न जानता हो कि परिवेश को किस प्रकार बेहतर बनाया जाए? या वे कौन से कारण हैं जो समाज की बेहतरी की राह के अवरोधक हैं? जिन्हें दूर किया जाना व्यक्ति और समाज दोनों के लिए जरूरी है. भारत में ऐसा सपना बुद्ध ने देखा था. मक्खलि गोशाल, पूर्ण कस्सप और महावीर स्वामी का सपना भी कुछ ऐसा ही था. यूनान में सुकरात, प्लेटो, अरस्तु, जेनोफीन, चीन में कन्फ्यूशियस, लाओ जू, चुआंग जू, बाओ जिंग्यान आदि का सपना भी कुछ इसी प्रकार का था. इनमें प्लेटो अतिरिक्त श्रेय का हकदार है. उसने न केवल आदर्श समाज का सपना देखा, बल्कि उस सपने के समर्थन में तर्क देते हुए, समाज को बेहतरी की ओर ले जाने के रास्ते भी बताए. भले ही उसके विचारों को अव्यावहारिक मानकर उसके शिष्य और अगली पीढ़ी के विचारक अरस्तु ने नजरंदाज कर दिया हो, उससे प्लेटो का महत्त्व कम नहीं हो जाता. वह अपने समय का विलक्षण प्रतिभासंपन्न, कविमना दार्शनिक था. अपनी पूरी जिंदगी वह इसी दिशा में प्रयत्न करता रहा. विपुल लेखन उसने किया. ‘रिपब्लिक’ और ‘दि लॉज’ जैसे बहुखंडी ग्रंथ जिन्हें ग्रंथमाला कहना उचित होगा—उसकी विलक्षण मेधा प्रमाण हैं. उससे पहले के समाज के मुकाबले व्यक्ति की हैसियत बहुत कम थी. माना जाता था कि अच्छे और बुरे दो किस्म के लोग होते हैं. अच्छे समाज के मित्र तथा बुरे सामाजिकता के द्रोही हैं. अतः केवल और केवल बुरों को दंडित करके समाज को बेहतर बनाया जा सकता है. एक तरह से यह मान लिया गया था कि दुष्टता दुष्ट व्यक्ति के स्वभाव का अभिन्न हिस्सा है. और जो अच्छे हैं, वे बुराई से सर्वथा मुक्त ‘देवतुल्य’ हैं. अतएव बुरों को दंड देकर अथवा शासन का डर दिखाकर बुराई से बचा जा सकता है. बुराई को मिटाने के नाम पर तुनकमिजाजी देवता शाप देते थे, राजा दंड. उस व्यवस्था में बुराई को मिटाने के नाम पर तथाकथित बुरे को ही मिटा दिया जाता था.

यूनान में इस सोच में बदलाव सुकरात के बाद नजर आता है. सुकरात ने सत्य को शुभ माना और समाज को शुभत्व की कर्मस्थली. प्लेटो को जितना विश्वास समाज पर था, उतना सामाजिक इकाई के रूप में मनुष्य पर भी था. उसका मानना था कि आदर्श समाज में दोनों में से किसी एक की उपेक्षा भी असंभव है. इसी विश्वास के साथ उसने आदर्श समाज का खाका तैयार किया था. अपने समय के उस विलक्षणतम दार्शनिक ने कालांतर में दार्शनिकों की ऐसी पीढ़ी विकसित की, जिसने आगामी शताब्दियों में राजनीतिक दर्शन की नई परिभाषाएं गढ़ीं. प्लेटो ने तो ‘रिपब्लिक’ तथा दूसरे ग्रंथों में आदर्श समाज सपने को इतना विस्तार दिया था कि दोनों एकदूसरे के पर्याय जैसे बन गए. आज भी आदर्श समाज का जिक्र हो तो प्लेटो की याद आना स्वाभाविक है. सतत चिंतनविमर्श के उपरांत वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि समाज के गठन का उद्देश्य अयाचित अथवा किसी कल्याणभाव से प्रेरित नहीं है. यह सीधेसीधे मानवकल्याण से जुड़ा मसला है. चूंकि अकेले मनुष्य के लिए जीवन की अनेक दुश्वारियां थीं, इसलिए उसने समूह में रहना सीखा. उसके लिए कुछ नियम बनाए. मानवसमूहों के बीच कुछ स्वीकृतियां हुईं. कालांतर में वही नियम तथा उनसे जुड़े रीतिरिवाज संस्कृति का हिस्सा बनते गए. कुल मिलाकर समाज मनुष्य की रचना है. जिसे उसने अपने सुख, सुरक्षा, एवं समृद्धि हेतु गढ़ा है. इसलिए समाज यदि मनमानी करता है, पात्रता के बावजूद किसी व्यक्ति को उसके अधिकारों से वंचित कर देता है तो दोष समाज है. दूसरी ओर यदि मनुष्य अपने कर्तव्य में कोताई बरतता है, या अपने किसी कार्य से दूसरे के सुख, सुरक्षा और समानता के अधिकार को बाधित करता है तो वह उस अनुबंध के साथ विश्वासघात करता है, जो उसके और समाज के बीच की महत्त्वपूर्ण कड़ी है.

आखिर ऐसे हालात क्यों बनते हैं. यदि कोई मनुष्य समाज के साथ किए गए अपने अनुबंध को तोड़ता है तो उसके लिए क्या केवल वही दोषी है? क्या दोषमुक्त होना केवल समाज का गुण है? और यदि कोई मनुष्य समाज के साथ अपने अनुबंध को तोड़ते हुए पाया जाता है तो उसका समाधान क्या केवल दंड है? इन प्रश्नों के उत्तर की खोज तथा सामाजिक विक्षोभ के कारणों को समझना आसान नहीं है. उसके लिए करीब पांच हजार वर्ष पहले सामाजिकसांस्कृतिक विकास के उस दौर में लौटना पड़ेगा जब मनुष्य यायावर जीवन छोड़ स्थायी प्रवास को अपनाने में लगा था. नागरीय सभ्यता अंगड़ाई लेने लगी थी. खेती के साथसाथ छोटेछोटे उद्योग और लोकशिल्प विकासमान अवस्था में थे. नौकाओं और भारी जलयानों की मदद से मनुष्य लंबी समुद्री यात्रओं पर निकलने लगा था. दुर्गम स्थानों की यात्र के लिए वह पशुओं की मदद लेता था. रास्ते में हिंस्र पशुओं और दस्युओं का खतरा था. इसलिए कुछ व्यापारी दस्युओं का सामना करने के लिए भाड़े के सैनिक रखने लगे. सैन्यबल और धनसंपदा दोनों ही ताकत का प्रतीक थे. व्यक्ति के पास जब इनका प्राचुर्य हुआ तो उसकी महत्त्वाकांक्षाएं अंगड़ाई लेने लगीं. पशु आधारित अर्थव्यवस्था में व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा अविकसित अवस्था में थी. अधिकृत पशुओं की संख्या से जनजातीय समूह की समृद्धि का आकलन किया जाता था. कृषि का विकास हुआ तो समृद्धि का मापदंड अधिकृत पशुओं की संख्या के बजाए अधिकृत भूक्षेत्र को मान लिया गया. फिर भी व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा के विकास में कई शताब्दियां गुजर गईं. जिन स्थानों से उसको वाणिज्यिक लाभ पहुंचता था, उन स्थानों पर सीधे अथवा सहयोगियों की सहायता से मनुष्य अपने उपनिवेश कायम करने लगा. फिर भी आरंभ में जो राज्य बने उनका क्षेत्रफल बहुत कम, नगरविशेष की सीमा तक होता था. निश्चितरूप से तत्कालीन नगरराज्य की स्थापना एक स्वतंत्र एवं आत्मनिर्भर आर्थिकराजनीतिक इकाई के रूप में की गई होगी. शीघ्र ही मनुष्य को लगने लगा था कि विकास की निरंतरता के लिए ऐसी कार्यकारी संस्थाओं की आवश्यकता है जिनके द्वारा संबंधों को मर्यादित और नियंत्रित किया जा सके. आदिम मानवीय जिज्ञासा केवल जीवन और प्रकृति के रहस्यों के अन्वेषण तक सीमित थी. समाज को व्यवस्थित करने की चाहत में नए राजनीतिक दर्शनों की खोज का सिलसिला आरंभ हुआ. बहुत शीघ्र मनुष्य को वे भी अपर्याप्त लगने लगे. कुछ लोगों ने महसूस किया कि केवल पराजागतिक कल्पनाओं से काम चलने वाला नहीं है. जीवन को अधिक सुविधासंपन्न बनाने तथा प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए प्रकृति को समझना भी अनिवार्य है. इसलिए बुद्धिजीवियों का ध्यान इहलौकिक सत्यों के अन्वेषण की ओर गया. उससे ज्ञानविज्ञान की खोज के नए रास्तों का विकास हुआ. आरंभिक विज्ञान प्रयोगों के बजाए मनुष्य सहजानुभवों पर आधारित था. उसमें एकरूपता का अभाव था. स्वाभाविक रूप से उसके कुछ अंतर्विरोध भी थे. जैसे खेती के विकास के लिए एक ओर तो औजारों का निर्माण करना, तटबंध बनाना तथा दूसरी ओर कभी वर्षा तो कभी अतिवृष्टिअनावृष्टि की मार से बचने के लिए कल्पनाधारित पराभौतिक शक्तियों को प्रसन्न रखने की कोशिश करना.

इस क्रांतिक परिवर्तन का श्रेय सुकरात को दिया जाता है. लेकिन विचारधारा को तर्कसम्मत बनाने में उससे पहले के विचारकों यथा पेरामेनडिस, एनेक्सीमेंडर, हेराक्लाइटस, डेमोक्रिटस का भी योगदान है. डेमोक्रिट्स की ईसा से 460(कुछ विद्वानों के अनुसार 490) वर्ष पहले जन्मे यूनानी दार्शनिक वैज्ञानिक डेमोक्रिटस ने लोकभ्रांतियों का खंडन करते हुए घोषणा की कि चंद्रमा पर दिखने वाली छाया वस्तुतः उसकी सतह पर बने ऊबड़खाबड़ पठार हैं. उसने नीहारिकाओं का रहस्योद्घाटन करते हुए बताया कि रात में आसमान में नजर आने वाली दूधिया नदी, वास्तव में तारों का प्रकाश है, जो अरबों की संख्या में विराट अंतरिक्ष में फैले हुए हैं. हालांकि लोकमानस सूर्य, चंद्र आदि ग्रहनक्षत्रों की भावनात्मक कहानियां आगे भी गढ़ता रहा, तो भी डेमोक्रिट्स के लेखन से आने वाले विचारकों को एक नई दिशा मिली. लोगों को लगा कि विश्वसमाज और उसकी उत्पत्ति की तह में जाने का एक तरीका यह भी हो सकता है, जो दूसरे की अपेक्षा कहीं अधिक वस्तुनिष्ठ और तर्कसम्मत है. इससे आगे चलकर विज्ञान के विकास को नई दिशा मिली. उस दौर में संवाद के साधन बेहद सीमित थे. ज्ञानविज्ञान का प्रचारप्रसार मुख्यतः मौखिक संवादन पर आधारित था. कमी यह रही कि डेमोक्रिट्स जैसे वैज्ञानिक सोच वाले दार्शनिक बहुत कम थे. वह दौर था जब आपसी झगड़ों के अतिरेक के कारण नगरराज्य की व्यवस्था असफल होने लगी थी; और व्यापारिक सफलता हेतु अपेक्षाकृत बड़े राज्यों की आवश्यकता महसूस की जाने लगी थी. चूंकि राज्य के विकास से जनसाधारण की उम्मीदें भी जुड़ी थीं, इसलिए बड़े राज्यों की सफलता किसी बड़े विभ्रम के बिना संभव न थी. विभ्रम तैयार करने का काम धर्म ने किया. जिसे तहत एक ‘ईश्वर’ की कल्पना की गई. लोगों को विश्वास दिलाया गया कि ‘सर्वशक्तिमान ईश्वर’ राजाओं का राजा है. और जो उपेक्षा या अनाचार लौकिक व्यवस्था के कारण सहना पड़ता है, ईश्वर के राज्य में उसकी संभावना दूरदूर तक नहीं है. वह सच्चा न्यायकर्ता है. जनजातीय समाजों में जहां गणतांत्रिक व्यवस्था थी, परिवार का वरिष्ठ सदस्य प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में राजनीति में हिस्सा लेता था. कृषि के उभार के साथ ऐसा वर्ग पनपा था जो अपेक्षाकृत आत्मनिर्भर था. जिसका राजनीति से सीधा संपर्क नहीं था. व्यवस्था से असंतोष अथवा अत्याचार के समय यह वर्ग शासन से अपनी दूरी के कारण स्वयं को असहाय एवं उपेक्षित महसूस करता था. ऐसे लोगों के लिए धर्म के नाम पर बनाया गया यह विभ्रम कि ‘सर्वशक्तिमान’ के राज्य में प्रत्येक मनुष्य की समान भागीदारी है, कोई भी सदस्य उपेक्षित नहीं हे, सर्वत्र खुशहाली और सुखों का प्राचुर्य है, वह सबके करीब और सच्चा न्यायकर्ता है—बड़ा कारगर सिद्ध हुआ. इस विभ्रम को लोकप्रतिष्ठित करने में पुरोहित वर्ग का विशेष योगदान था, सही मायनों में यह उसी के द्वारा निहित स्वार्थ हित रचा गया विभ्रम था. इसलिए जनाक्रोश से बचने तथा प्रशासनिक नाकामियों को छिपाने के लिए पुरोहितों को ऊंचे शासकीय पदों पर रखा जाने लगा. राज्य के कार्यों के निपटान के लिए उसकी राय का महत्त्व बढ़ता ही गया. चूंकि वह सिर्फ और विभ्रम था, इसलिए उसके प्रभावस्वरूप शिक्षा पर कम, आडंबरों पर ज्यादा जोर दिया जाने लगा. विभ्रम का प्रभाव इतना गहरा रहा कि शताब्दियों तक राजामहाराजाओं ने धर्मालय बनवाने पर प्रजा का बेशुमार धन खर्च किया10, परंतु शिक्षा की तरक्की की ओर से वे प्रायः आंख मूंदे रहे. इसके परिणामों को समझे बगैर बहुसंख्यक जनमानस उसी के आधार पर राजामहाराजाओं का महिमामंडन करता रहा. हालात में परिवर्तन उनीसवीं शताब्दी में अंग्रेजों के आगमन के बाद ही संभव हो सका.

धर्म और राजनीति के गठजोड़ के विरुद्ध विश्वव्यापी प्रतिक्रिया पूरी दुनिया में हुई, जिसने बौद्धिक क्रांति को जन्म दिया. यूनान में सोफिस्ट विचारकों की राज्यसंबंधी अवधारणा बहुत कुछ ब्राह्मणवादी विचारकों से मिलती थी. वैदिक परंपरा के आचार्यों की भांति वे भी राज्य को कृत्रिम व्यवस्था मानते थे. उनका मानना था कि राज्य की उत्पत्ति उन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हुई है, जिन्हें प्राकृतिक व्यवस्था में आसानी से प्राप्त नहीं किया जा सकता था. वैज्ञानिक के रूप में डेमोक्रिट्स का उल्लेख हमने पीछे किया. एक मानवतावादी विचारक के रूप में भी उसका योगदान कम नहीं है. सुकरात पूर्व दार्शनिकों के प्रतिनिधि के तौर पर उसने सोफिस्टों की सर्वसत्तावादी दृष्टि की आलोचना की, जो राजा को अपने स्वार्थ के अनुरूप सभी निर्णय लेने का अधिकार देती थी. उसने राज्य के नैतिक स्वरूप की आवश्यकता पर बल दिया था. डेमोक्रिट्स का विचार था कि गणतांत्रिक राज्य की गरीबी तानाशाही की अमीरी से बेहतर है. यह बात अलग है कि गणतांत्रिक राज्य के स्वरूप की ठोस परिकल्पना करने में वह असमर्थ रहा था. उसने कहा था—‘यह सहीसही तय कर पाना बड़ा ही कठिन है कि राज्य का कौनसा स्वरूप पूर्णतः गणतांत्रिक है.’ उसका मानना था कि राज्य का प्रबंधन किसी भी अन्य कार्य से अधिक महत्त्वपूर्ण और श्लाघनीय कर्म है. दासता को वह अपराधतुल्य मानता था. ‘समानता प्रत्येक अवस्था में सम्मानीय है’ कहकर उसने अपने उदार सोच का प्रदर्शन किया था. डेमोक्रिट्स के अनुसार राज्य की सफलता उसके नागरिकों की स्वेच्छिक सहभागिता पर निर्भर करती है—

जनता से जुड़ने का सर्वोत्तम रास्ता है कि सबकुछ इसी(राज्य)पर निर्भर हो. यदि राज्य की सुरक्षा हुई तो बाकी सब सुरक्षित रहेगा; और यदि राज्य को नष्ट किया गया तो शेष सभी नष्ट हो जाएगा.’11

समाज में राज्य की उत्तरोत्तर बढ़ती महत्ता को पहचानकर डेमोक्रिट्स ने सपना देखा था कि कोई तो होगा जो राज्य को अन्य सभी मामलों पर तजरीह देगा. कुछ इस तरह कि सबकुछ संतुलितसा लगे; तथा राजनीति समाज के प्रमुख विधेयात्मक कदम के रूप में स्थापित हो सके. ऐसा राज्य जो न तो वास्तविकता से बहुत परे, विवादपूर्ण हो, न ही किसी सार्वजनिक शुभ से इतर विषय पर जोर देता हो. डेमोक्रिट्सि का यह सोच कालांतर में प्लेटो, अरस्तु जैसे दार्शनिकों के राजनीतिक चिंतन की प्रेरणा बना. सुकरात ने डेमोक्रिट्स के नैतिकतावादी सूत्र को पकड़ा और राजनीतिकसामाजिक परमादर्श को समर्पित जीवन जीने पर जोर दिया. डेमोक्रिट्स को भी अंदाजा कदाचित नहीं था कि उससे मात्र पचास वर्ष बाद जन्मा प्लेटो आजीवन राजनीतिक दर्शन को समर्पित रहेगा. प्लेटो के बाद अरस्तु ने व्यवाहारिक नैतिकता को केंद्र मानकर राजनीतिक दर्शन के क्षेत्र में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया. प्लेटो की दृष्टि अपेक्षाकृत विशद थी. इसलिए अपने विश्लेषण में उसने प्रायः सभी उपलब्ध राजनीतिक दर्शनों की विवेचना की है. हालांकि सेबाइन आदि कुछ विद्वानों का विचार है कि प्लेटो ने जो भी लिखा, वे सभी विचार यूनानी समाज में पहले से ही मौजूद थे. उनके अनुसार प्लेटो का लेखन तत्कालीन समाज में प्रचलित राजनीतिक चिंतन का बेहतरीन संकलन है. उदाहरण के लिए स्त्रियों को आदर्श समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान दिए जाने का तर्क तथा विवाह संस्था का निषेध. सेबाइन ने संभावना व्यक्त की है कि प्लेटो ने यह विचार अरिस्टोफेंस के प्रहसन ‘एक्लेसियाजूसाइ’(महिलासंसद) से लिया था. उस नाटक में महिलाएं राजनीति के लिए आगे आती हैं. वे पुरुषों को राजनीति से बाहर कर देती हैं. विवाह संस्था का तिरष्कार किया जाता है. संतान को यह नहीं बताया जाता कि उसके मातापिता कौन हैं. बच्चे अपने से बड़ों को मातापिता का दर्जा देते हैं. बड़े भी उन्हें अपनी संतानतुल्य मानते हैं. श्रम केवल दासवर्ग के लिए सुरक्षित है. नाटक के अनुसार इस व्यवस्था के अच्छे परिणाम आते हैं. पुरुषों की नशे और जुआ की लत छूट जाती है. निरर्थक मुकदमेबाजी की घटनाएं कम होने लगती है. इस नाटक का ‘रिपब्लिक’ पर कितना प्रभाव पड़ा इस बारे में सेबाइन पूरी तरह आश्वस्त नहीं है, परंतु हमें जानना चाहिए कि ऐरिस्टोफेंस को प्राचीन यूनानी साहित्य में ‘कामेडी का पितामह’ माना गया है. ईसा से 390 वर्ष पूर्व जब यह नाटक लिखा गया, प्लेटो 37 वर्ष का मननशील युवा था. सुकरात के मृत्युदंड को लगभग एक दशक बीत चुका था. जिससे उसके मन में लोकतंत्र तथा एथेंस की राजनीति के प्रति गहरा क्षोभ था. इसलिए यह अरिस्टोफेंस के प्रहसन के प्रति आकर्षित होना स्वाभाविक था. प्लेटो राज्य की सफलता के लिए अनुशासन को अत्यावश्यक मानता था. उसका विचार था कि राज्य यदि बहुत अधिक उदार होगा तो उसके नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाह हो जाएंगे. जिससे उसको बिखरने में देर न लगेगी. यदि वह अत्यधिक मजबूत होगा तो देरसवेर सत्तामद में चूर उसके शासकगण तानाशाह बन जाएंगे. दोनों ही स्थितियों में वह उन उद्देश्यों से दूर चला जाएगा जिनके लिए उसका गठन किया गया है.

सुकरात से करीब 30 वर्ष छोटे प्लेटो ने एथेंस और स्पार्टा के बीच तीस वर्ष तक चलने वाले युद्ध को अपनी आंखों से देखा था. वह 429 ईस्वी पूर्व की एथेंस की प्लेग का भी साक्षी रहा था, जिसमें उसके महान योद्धा और राजनीतिज्ञ पेरीक्लीस समेत अनेक बहादुर सैनिकों को जान गंवानी पड़ी थी. 401 ईस्वी पूर्व में एथेंस की हार के बाद वहां के सम्राट को अपदस्थ कर विजयी स्पार्टा ने तीस सदस्यीय परिषद की स्थापना की थी. उसके बाद कुछ समय तक सबकुछ ठीकठाक चलता रहा. धीरेधीरे वहां भ्रष्टाचार और तानाशाही का बोलबाला हो गया. परिषद के सदस्य निजी अहं के शिकार होकर मनमानी करने लगे. गणतंत्र के नाम पर गठित व्यवस्था कुलीनतंत्र में ढल गई. इन सभी परिवर्तनों को प्लेटो ने बहुत करीब से देखा था. लोकतांत्रिक संस्थाओं की विफलता ने उसे दार्शनिक सम्राट की परिकल्पना को प्रेरित किया था. वह स्वयं अभिजात परिवार से था. एथेंस के राजपरिवार से उसका संबंध था, इस कारण वह स्वयं को एथेंस की राजनीति का उत्तराधिकारी भी मानता था. इसके बावजूद उसे सक्रिय राजनीति में योगदान देने का अवसर कभी न मिल सका, मगर राजनीति उसके दिलोदिमाग पर सदैव हावी रही. उसके जीवन में कई ऐसे अवसर आए जब उसे राजनीति या कहो कि विकृत राजनीति का शिकार होना पड़ा. ‘रिपब्लिक’ में जिस आदर्शलोक का सपना वह देखता है और उसके लिए जिस राजनीतिक दर्शन की परिकल्पना करता है, उसे कुछ विद्वान सक्रिय राजनीति में हिस्सा न ले पाने से उत्पन्न कुंठा की देन मानते हैं. मेरे विचार में प्लेटो के अपने जीवनानुभव ही ऐसे थे, जिससे प्रचलित राजनीतिक दर्शनों के प्रति निराशा का भाव पैदा होना स्वाभाविक था. उसका अपना जीवन राजतंत्रें की तानाशाही का शिकार रहा था. उन राजतंत्रें में उसे उत्पीड़न भोगना पड़ा था जो दार्शनिकों का सम्मान करने का दावा करते हुए दूसरों से श्रेष्ठ होने का दावा करते थे. जबकि उस समय के सर्वाधिक गर्वीले एथेंस के लोकतंत्र को प्लेटो अपने गुरु और मनीषी सुकरात की हत्या का दोषी मानता था.

प्लेटो की कल्पना ऐसे शक्तिशाली, पूर्णतः आत्मनिर्भर राज्य की थी, जिसके नागरिक राज्य के प्रति अपने कर्तव्यों से पूरी तरह सचेत हों. यह प्रेरणा उसे स्पार्टा के नागरिक जीवन से मिली थी. वहां के नागरिक वीरता, अनुशासन और सादा जीवनशैली के मामले में अद्वितीय थे. युद्ध उनके लिए खेल के समान था. दूसरी ओर एथेंसवासी प्रायः मननशील, साहित्यकला के अनुरागी, उदार एवं संवेदनशील थे. उन्हें अपने गणतंत्र पर गर्व था, परंतु शिखर पर बैठे लोग वहां भी आत्मश्लाघा तथा स्वार्थ भाव से आपूरित थे. उनमें राजनीतिक मतैक्य का अभाव था. एथेंस को स्पार्टा के हाथों मिली शर्मनाक पराजय के कारण भी वही थे. प्लेटो सुकरात को मृत्युदंड के लिए एथेंस की दोषपूर्ण राजनीति को जिम्मेदार मानता था. आदर्श राज्य में उसने स्पार्टा के अनुशासित नागरिक जीवन से प्रेरणा लेते हुए ऐसे समाज की कल्पना की थी, जिसके नागरिक वीर, जुझारू, निष्ठावान तथा सादा रहनसहन के आदी हों. प्लेटो स्पार्टा की कमजोरी भी समझता था. वहां राज्य के आगे नागरिक जीवन का महत्त्व गौण था. इसलिए आदर्श राज्य में उसने ऐसे समाज की कल्पना की है जहां राज्य और नागरिक दोनों के हित परस्पर जुड़े हों. व्यक्ति को वह सब मिले जो उसका अधिकार है. इस प्रेरणा के पीछे सुकरात के नैतिकतावादी दर्शन का बड़ा योगदान था. वह मानता था कि आदर्श राज्य एवं न्यायसिद्धांत एकदूसरे से जुड़े हैं. न्याय नागरिक और समाज दोनों की शुभत्व की यात्र को संभव बनाता है. एक के अभाव में दूसरे की उपस्थिति संभव ही नहीं है. नगरराज्यों में प्रचलित बुराइयों के निदान हेतु न्याय महत्त्वपूर्ण साधन है. इसलिए राज्य को न्यायआधारित राज्य में बदलना न केवल शासक, बल्कि जागरूक नागरिकों की भी जिम्मेदारी है.

यह सर्वविदित है कि बुद्ध की भांति सुकरात ने भी स्वयं कुछ नहीं लिखा. दोनों वाचिक परंपरा के विचारक थे. तथापि जैसे बुद्ध भारत में युगप्रवर्त्तक विचारक के रूप में प्रतिष्ठित हैं, यूनानी दर्शन में सुकरात की महत्ता भी युगप्रवर्त्तक विचारक की है. उसका जन्म शिल्पी परिवार में हुआ था. उसका यौवन पेरीक्लीज के महान युग में बीता था. एक नागरिक के रूप में उसने सभी विहित कर्तव्यों का पालन किया था. एथेंस के लिए उसने कई युद्धों में भाग लिया. डेलियम के सुप्रसिद्ध युद्ध में उसके धैर्य की काफी प्रशंसा हुई थी. राज्य के कानून में उसकी पूरी निष्ठा थी, जिसपर वह आजीवन अडिग बना रहा. उसने एथेंस के शासकवर्ग की आलोचना की. खुली आलोचना की. जिसके लिए उसपर नास्तिक होने के आरोप भी लगे. परंतु नगरराज्य के कानून के प्रति उसके सम्मान में कभी कमी नहीं आई. जब भी शासकवर्ग के स्वार्थ और कानून में द्वंद्व की स्थिति बनी, उसने सदैव कानून और संविधान का साथ दिया. इस कारण उसे नास्तिक तक कहा गया. एथेंस की संसद के कई सदस्य उससे हमेशाहमेशा के लिए नाराज हो गए. तमाम विरोधों के बावजूद वह अपने विचारों पर डटा रहा. उसे अपने देश के कानून से कितना प्यार था, इसके समर्थन में एक उदाहरण अकसर दिया जाता है. एथेंस की संसद द्वारा मृत्युदंड सुनाए जाने पर प्लेटो तथा उसके साथियों ने सुकरात को जेल से बाहर निकालने की योजना बनाई थी. गोपनीय तरीके से प्रस्ताव सुकरात तक पहुंचाया गया. लेकिन जान दाव पर लगी होने के बावजूद सुकरात ने कैद से भागने से यह कहकर इन्कार कर दिया था कि ऐसा करना कानून का उल्लंघन होगा. कानून के प्रति सुकरात की अनन्य निष्ठा को दर्शाने वाला यह अकेला उदाहरण नहीं है. जिन दिनों वह नागरिक परिषद का सदस्य था, उसके सामने नौसेनापतियों का मामला आया. उनपर आरोप था कि अरगिनुगाए के समुद्री युद्ध(405 ईस्वी) के दौरान उन्होंने डूबते हुए नागरिकों को बचाने के लिए कोई प्रयत्न नहीं किया था. कुछ विवरणों में बताया गया है कि परिषद की अध्यक्षता समिति का सदस्य होने के साथसाथ सुकरात उस दिन उसका सभापतित्व भी कर रहा था. इसलिए अपराधी सेनापतियों के दंडनिर्धारण के लिए परिषद में मतदान कराने की जिम्मेदारी उसी की थी. निचली अदालत सेनापतियों को एक मत के अंतर से दोषी घोषित कर चुकी थी. इसलिए यदि वह सचमुच आदेश सुना देता तो वह परिषद की सामान्य कार्रवाही मानी जाती. मगर सुकरात ने यह कहकर कि सामूहिक रूप से दंड निर्धारित करना एथेंस के संविधान के विरुद्ध है—फैसले के लिए मतदान कराने से इन्कार कर दिया था. परिषद में केवल सुकरात ऐसा था जिसने दंडनिर्धारण प्रक्रिया को दोषी माना और बाकी सदस्यों के दबाव डालने के बावजूद सुनवाई को टाल गया. उसके सालभर बाद की एक और घटना है. सुकरात तथा चार अन्य नागरिकों को 30 सदस्यों की संसद की ओर से एक अपराधी को गिरफ्तार करके लाने का आदेश दिया गया. उस व्यक्ति को एक मामले में मृत्युदंड सुनाया गया था. सुकरात ने आदेश को संविधान विरुद्ध मानते हुए उसके पालन से इन्कार कर दिया था. नागरिक कर्तव्यों के प्रति संपूर्ण निष्ठा, उनपर अटल रहते हुए उनका पालन तथा कानून की सीमाएं लांघने की दृढ़तापूर्वक अस्वीकृति—दो ऐसी विशेषताएं हैं, जो सुकरात को सामान्य से हटकर उसकी वैचारिक दृढ़ता को दर्शाती हैं.

महान व्यक्तित्व बहुप्रतिभाशाली होते हैं. कई बार परिस्थितियां भी उनके जीवन को नया मोड़ दे देती हैं. पिता मोरोपंत तांबे ने बेटी ‘मनु’ का विवाह अधेड़ गंगाधर राव से यह सोचकर किया था कि बेटी रानियों की तरह सुख भोगेगी. परंतु वीरांगना लक्ष्मी बाई ने अंग्रेजों को बगावती तेवर दिखाए और 1857 के स्वाधीनता संग्राम की नायिका सिद्ध हुईं. गांधी जी नाकाम वकील से कामयाब नेता बने. डॉ. आंबेडकर की रुचि अर्थशास्त्र में थी. वे कामयाब अर्थशास्त्री थे और उसी क्षेत्र में आगे काम करना चाहते थे. अगर वही करते तो सामाजिक न्याय के लिए उन्होंने जो संघर्ष किया, जिससे आगे चलकर दलितों के लिए कल्याण और अधिकारिता का मार्ग प्रशस्त हुआ, उसके लिए उन्हें किसी और मसीहा की प्रतीक्षा करनी पड़ती. अपने सामाजिक दायित्व को समझते हुए डॉ. आंबेडकर ने संघर्षमय राजनीति का रास्ता चुना. जीवन के आरंभ में सुकरात की रुचि भौतिक विज्ञान में थी. उसने अपने समय के लगभग सभी भौतिकवादी सिद्धांतों का अध्ययन किया था. परंतु उनसे उसे संतुष्टि न मिली थी. उसका मानना था कि भौतिक विज्ञान यह तो बताता है कि ‘चींजें कैसे बनीं?’ परंतु उनके बनने का औचित्य क्या है? कौनसी सत्ता उनके निर्माण के पीछे है? जैसे प्रश्नों का उत्तर वे नहीं दे पातीं. घिसेपिटे प्रश्नों और उत्तरों से उकताए सुकरात के लिए यही प्रश्न सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण थे. धीरेधीरे वह प्रकृतिविज्ञान और तत्वमीमांसा से जुड़े यांत्रिक प्रश्नों से उकताने लगा. अंततः क्रांतिक छलांग मारते हुए, उसने एनेक्सीमेंडर और हेराक्लाइटस की दुनिया छोड़, ज्ञानमीमांसा की ऐसी दुनिया में प्रवेश किया, जहां ज्ञान के साथसाथ, ज्ञान के निर्माण की विभिन्न पद्धतियों तथा उनकी विशेषताओं पर भी विचार किया जाता था. आगे चलकर उसे प्लेटो, जेनोफीन, इसोक्राइट्स जैसे विद्वान शिष्य और सहयोगी प्राप्त हुए. अपनी प्रतिभा और सूझबूझ के बल पर सुकरात ने अनूठी चिंतनशैली विकसित की, जिसमें प्रश्नोत्तर शैली में ज्ञानमीमांसा को आगे बढ़ाया जाता है. सुकरात राजनीति को श्रेष्ठ कला मानता था. उसने कहा था—

यदि श्रेय(शुभत्व) कला नहीं, बल्कि उससे ऊंची और उदार चीज है तो कम से कम राजनीति को तो कला मानना ही चाहिए. और राजनीतिज्ञ से भी यह अपेक्षा होनी चाहिए कि वह प्रशिक्षण प्राप्त करे और एक शिल्पी की भांति किसी उस्ताद की देखरेख में रहे. परंतु हमें राजनीतिज्ञ को तुरंत या एकदम शिल्पी से अभिन्न नहीं मान लेना चाहिए. जिन चीजों का संबंध न्याय एवं संयम से है, यदि उनका संरक्षण उसके जिम्मे है तो सबसे पहले आवश्यक है कि श्रेय के बारे में उसकी सच्ची और दार्शनिक धारणा हो….यह विषय ऐसा है जिसका संबंध कला के बजाय किसी उच्चतर वस्तु से है.’12

एक समय सुकरात की इच्छा नैतिक शिक्षक बनने की थी. प्लेटो के अनुसार सुकरात ने कई परिभाषाओं में समसामयिक नैतिकता के संदर्भों में संशोधन किया था. अतः उसके अनुसार वह नैतिक शिक्षक ही था. हमें उसे कामयाब शिक्षक मानना चाहिए. इसलिए भी कि अपनी कलम से एक भी शब्द लिखे बिना सुकरात की गिनती विश्व के सिरमौर दार्शनिकों में की जाती है. प्लेटो के विपुल लेखन में ऐसी एक भी पंक्ति नहीं है, जिसमें लेखक ने सुकरात का प्रभाव महसूस न किया हो. एक परमजिज्ञासु व्यक्तित्व के रूप में उसने अपने समय की दर्शनचिंतन परंपरा को प्रभावित किया. इसमें प्लेटो के योगदान की उपेक्षा असंभव है. आज हम सुकरात के बारे में जो भी जानते हैं, उसमें प्लेटो तथा उसके अन्य शिष्यों, समकालीनों का बहुत बड़ा योगदान है. यह सुकरात के सोच का अनूठापन ही था कि उसको प्लेटो जैसे विचारकों ने अपना गुरु माना. जिस समय सोफिस्ट विचारक कोरे तर्क के आधार पर वितंडा रच रहे थे—सुकरात ने जीवन और समाज में नैतिकता को सम्मान देने पर जोर दिया. उसके लिए ज्ञान और सद्गुण में कोई अंतर न था. न ही वह बौद्धिक चिंतन को भावना से सर्वथा निरपेक्ष मानता था. सुकरात के अनुसार बौद्धिक चिंतन कुछ ऐसी चीज है जो ‘भावना से अनुप्राणित’ है. जो न केवल ज्ञान को दिशादशा देता है, बल्कि मानवी ऐषणाओं को भी प्रभावितप्रेरित करताकराता है. उसका असर मनुष्य के व्यवहार और कार्यकलापों पर देखने पर मिलता है. इसपर बार्कर ने मेयर को उद्धृत किया है—

यदि हम ज्ञान तथा आचरण को एक ही मान सकें तो वह आचरण का स्थायी मापदंड बन जाता है. जिस ज्ञान का आचरण से कोई संबंध न हो, और जो ज्ञान केवल ज्ञान के लिए ही अर्जित किया जाए, तो ऐसे ज्ञान का इस यूनानी दार्शनिक की दृष्टि में कोई विशेष अर्थ नहीं था. ज्ञान केवल कुछ सूचनाओं का संकलनमात्र नहीं है. व्यक्ति के चरित्रनिर्माण के साथ उसका गहरा संबंध है. ज्ञान बुद्धि के माध्यम से ही समूचे व्यक्तित्व को प्रभावित करता है. यह इच्छाशक्ति और भावनाओं का निर्माण है. साहस, संयम, न्याय आदि सभी सद्गुणों की उत्पत्ति ज्ञान से ही होती है. साहसी वही व्यक्ति बन सकता है जो भय तथा निर्भीकता का ज्ञान रखता हो.’13

सुकरात के दर्शन में एक शब्द बारबार पढ़ने को मिलता है. वह शब्द है—सद्गुण. इसके पर्याय के रूप में प्लेटो ने ‘अरैती’ शब्द का उपयोग किया है, जिसका भाषिक अर्थ है—‘उत्कृष्टता.’ इस तरह सद्गुण का अभिप्राय है—सभी कर्मक्षेत्रों में उत्कृष्टता. उस गुण में प्रवीणता जिसके लिए उस वस्तु का आविष्कार हुआ है. जैसे कलम का गुण लिखना है, चाकू का गुण काटना. तो कलम की उत्कृष्टता का मापदंड होगा कि उससे कितना अच्छा या बुरा लिखा जा सकता है. ठीक इसी प्रकार चाकू की उत्कृष्टता भी उसके द्वारा किए गए कार्य की गुणवत्ता पर निर्भर होगी. मनुष्य के संदर्भ में उत्कृष्टता का आकलन उसमें मानवीय गुणों की उपस्थिति से आंकी जा सकती है. सुकरात के अनुसार मनुष्य की अच्छाई या बुराई दो प्रकार की होती है. पहली उसकी प्रवृत्ति को लेकर. जिसके आधार पर उसका दूसरे मनुष्यों के साथ व्यवहार का आकलन किया जा सकता है. दूसरी व्यवसाय या कौशल को लेकर. जो उसके उत्पादकता संबंधी गुणों का मापदंड है. समाज के लिए मनुष्य के दोनों ही गुण अभीष्ट हैं. इनमें एक का भी अभाव मनुष्य को समाज के लिए अनुपयोगी बना सकता है. कोई व्यक्ति अच्छा या बुरा चित्रकार, इंजीनियर, वकील, नेता, डॉक्टर, लेखक आदि हो सकता है. परंतु अच्छा वही मनुष्य हो सकता है, जिसमें मनुष्य की अच्छाई को दर्शाने वाले गुण प्रचुर मात्र में उपलब्ध हों. अच्छाई का मापदंड क्या है? सुकरात के अनुसार संयम, न्याय, साहस और विवेक, मनुष्य के श्रेष्ठत्व के स्तर को दर्शाते हैं. संयुक्त रूप से चारों गुण मानवीय उत्कृष्टता का मापदंड कहे जा सकते हैं. इनके अभाव में मनुष्यत्व पर संकट आ सकता है, जो प्रकारांतर में समाज के लिए भी हानिकारक है. सुकरात के आचरण की उत्कृष्टता के विचार की तुलना बुद्ध के ‘अष्टांग मार्ग’ से की जा सकती है. सुकरात से लगभग आधी शताब्दी पहले जन्मे बुद्ध ने भी आचरण की शुद्धता एवं उत्कृष्टता पर बल दिया था. उनका अष्टांगिक मार्ग—सम्यक दृष्टि, सम्यक कर्म, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक्, सम्यक स्मृति, सम्यक जीविका, सम्यक व्यायाम तथा सम्यक समाधि का समर्थन करता है. इन कर्तव्यों में पूर्णता व्यक्ति को निर्वाण की ओर ले जाती है. यह कहना तो अनुचित होगा कि सुकरात ने अपने विचार बुद्ध से लिए थे, परंतु दोनों के कर्मसिद्धांत में अनूठा साम्य मनुष्यता के इन दो हितचिंतकों के समान वैचारिक धरातल को दर्शाता है. सुकरात का विचार था कि डॉक्टरी, नौकासंचालन अथवा दूसरे उद्यमों की भांति राजनीति भी एक कला है. व्यक्ति राजनीति का ज्ञान अर्जित कर, शासनकार्य में निपुणता प्राप्त कर सकता है. परंतु श्रेष्ठ शासन के लिए व्यक्ति का उच्च नैतिक मूल्यों में विश्वास और कर्तव्यपरायणता आवश्यक है. सुकरात के जीवनदर्शन की ये विशेषताएं उसे सोफिस्टों से अलग कर, मनुष्यता के आदिचिंतक के रूप में स्थापित करती हैं.

सुकरात ने जिस आदर्शवाद को केंद्र में रखते हुए उसने अपने दर्शन सिद्धांत गढ़े थे, प्लेटो ने उसी को आधार बनाकर आदर्श समाज की रूपरेखा तैयार की थी. यही कारण है कि प्लेटो का राजनीतिक दर्शन नैतिकता से आबद्ध है. सुकरात का उल्लेख उसने ऐसे तेजस्वी विद्वान के रूप में किया है, जो ‘शुभ’ को पहचानने तथा उसका अनुसरण करने की आवश्यकता पर जोर देता है. वह ईश्वर की परंपरागत अवधारणा से भिन्न, यद्यपि उसकी कुछ समानताएं लिए हुए है. प्लेटो को लगता था कि राजनीतिक पदों पर जिम्मेदारी का निर्वहन चुनौतीभरा काम होता है. महत्त्वपूर्ण कर्तव्यों के निष्पादन के लिए उपयुक्त व्यक्ति पर्याप्त संख्या में सर्वदा उपलब्ध हों, यह संभव भी नहीं होता. इसलिए किसी भी राज्य के सामने, जो नागरिक हितों को सर्वोपरि समझता है, बड़ी समस्या ईमानदार, दूरदृष्टा, साहसी और नीतिवान राजनीतिज्ञों के चयन की होती है. प्लेटो को विश्वास था कि शिक्षा के माध्यम से अच्छे राजनीतिज्ञ तैयार किए जा सकते हैं. ‘अकादमी’ की स्थापना उसने इसी उद्देश्य के निमित्त की गई थी. पलभर के लिए एकदम हाल के युग में लौटकर याद करने की कोशिश करें. कुशलनीतिवान राजनीतिज्ञों की उपलब्धता की समस्या को लेकर ब्रिटिश की तत्कालीन प्रधानमंत्री मारर्गेट थैचर ने भी अपने एक बयान में कहा था कि उन्हें राजकर्म के कुशल संपादन के लिए केवल छह व्यक्तियों की आवश्यकता है, जो निपुण एवं नीतिवान हों. पर ऐसे लोग इतनी संख्या में कभी एक साथ नहीं मिल पाते. हालांकि ऐसा सोच सर्वथा निरापद नहीं है. समाज में प्रतिभाशाली लोग हमेशा होते हैं. लेकिन प्रायः लोग विरोधी विचारधाराओं के प्रति लचीलेपन के अभाव में उनकी उपेक्षा कर जाते हैं. समन्वयसामर्थ्य की कमी भी इसका कारण होती है. शिखर पर बैठे लोग प्रायः यह सोचते हैं कि उनके सहयोगी या मातहत ठीक वैसा और उतना ही सोचेंकरें, जैसा वे स्वयं सोचतेचाहते हैं. मार्गेट थैचर जैसे नेता जब कुशल और समर्पित लोगों की कमी की बात करते हैं तो इसका आशय यह नहीं है कि समाज में उस तरह के लोगों की सचमुच कमी होती है. असलियत यह है कि प्रतिभा के साथसाथ जिस अंधसमर्पण की अपेक्षा सत्ताशीन वर्ग दूसरों से करते हैं, वैसा प्रायः नहीं हो पाता. जिसको ऐसे लोग मिल जाते हैं, वह हिटलर की भांति तानाशाह बन जाता है.

यही समस्या प्लेटो के सामने भी थी. इसलिए उसने शिक्षा के माध्यम से भावी राजनीतिज्ञों की पीढ़ी तैयार करने पर जोर दिया था. ‘रिपब्लिक’ की रचना में प्लेटो के गुरु सुकरात के अलावा उसके और कई समकालीन एवं पूर्ववर्त्ती दार्शनिकों का योगदान था. उनमें पाइथागोरेस के अनुयायी, पेरामेनीडिस, डेमोक्रिटिस, हेराक्लाटस आदि प्रमुख थे. प्लेटो पर सर्वाधिक प्रभाव, ईसा से पांच शताब्दी पहले जन्मे यूनानी दार्शनिक पेरामेनीडिस का पड़ा था. उसका विचार था कि ‘सत्य को सदैव अनतिंम तथा अपरिवर्तनीय होना चाहिए.’ पेरामेनीडिस शब्दों की ताकत पर भरोसा करता था. उसका विचार था कि यदि भाषा में अभिव्यक्तिसामर्थ्य है तो उसके द्वारा हम जिस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं, यानी लगातार विमर्श के माध्यम से जो ज्ञान हमें प्राप्त होता है, वह भी सच होना चाहिए. पेरामेनीडिस के दर्शन का स्रोत ‘दि नेचर’ शीर्षक से लिखी गई एक कविता है. कहा जाता है कि उस कविता में लगभग 3000 पद थे. उनमें से अधिकांश पद अब गायब हो चुके हैं. मूल कविता भी अनुपलब्ध है. उसका सिर्फ संदर्भ प्राप्त होता है. अपनी कविता में पेरामेनीडिस ने कहा था कि आप उस वस्तु के बारे में नहीं जान सकते जिसका कोई अस्तित्व ही न हो. इसका अभिप्राय है कि मनुष्य का ज्ञान केवल अस्तित्वमान प्रत्ययों की व्याख्याविश्लेषण तक संभव है. शुभत्व इस आधार पर अस्तित्ववान है क्योंकि वह मानवजीवन को नैतिकता की ओर अग्रसर करता है. दूसरी ओर नैतिकता इसलिए अस्तित्ववान है, क्योंकि वह मनुष्य की शुभत्व की यात्रा को सफल बनाती है. इस कसौटी के अनुसार पेरामेनीडिस को पहला तत्वविज्ञानी भी कहा जाता है. कालांतर में वही भौतिकवादी दर्शन की प्रेरणा बना.

पेरामेनीडिस के अलावा प्लेटो पर सर्वाधिक प्रभाव उससे कुछ ही वर्ष पहले जन्मे हेराक्लाट्स का पड़ा था. यूनानी दर्शन के पितामह थेल्स से प्रभावित हेराक्लाट्स जल को ही सृष्टि का मूलाधार मानता था. उसका मानना था कि सबकुछ गतिमान है. दो व्यक्ति यदि आगे पीछे जा रहे हैं तो पीछे मौजूद व्यक्ति कभी पहले को नहीं पकड़ पाएगा. इसलिए कि उनकी यात्र का भौतिक जगत के अलावा एक आयाम और भी है—वह है समय, जो सदैव गतिमान रहता है. जब तक पीछे चल रहा व्यक्ति आगे वाले के बराबर पहुंचेगा, तब तक आगे चल रहा व्यक्ति समय के प्रवाह में कुछ और आगे निकल चुका होगा. ग्रहनक्षत्र भी इसी नियम का पालन करते हैं. हेराक्लाइट्स के अनुसार रातदिन सूर्य चक्र के अनुसार बदलते हैं. हालांकि हर रोज एक ही सूरज दिखाई पड़ता है, किंतु हम एक ही समय में कभी नहीं लौटते. हर बार का सूरज कुछ नया होता है. हम उस अंतर को नहीं समझ पाते; क्योंकि हमारी दृष्टि अरबों वर्ष के अंतराल को परखने में समर्थ नहीं है. हेराक्लाइट्स का यह विचार आधुनिक वैज्ञानिक शोधों के निकट है. इसे पढ़ते हुए आइंस्टाइन की याद आना स्वाभाविक है. आइंस्टाइन ने भी समय को चौथा आयाम माना है. परंतु हमें याद रखना चाहिए कि हेराक्लाटस के शब्द आइंस्टाइन से लगभग 2400 वर्ष पहले के हैं. हेराक्लाइटस की प्रसिद्ध उक्ति है—‘सबकुछ प्रवाहमान है.’ किवदंति है कि यह वाक्य उसने नदी में खड़े होकर, उसके प्रवाह को देखते हुए कहा था. हेराक्लाइट्स के अनुसार—

यह विश्व, जो सभी के लिए एक समान है, इसमें जो कुछ है सभी सनातन है—वह न तो ईश्वरनिर्मित है, न ही मानवनिर्मित. जो कुछ आज है वह अखंड ज्योति के समान, परिवर्तनशीलता के बीच, हमेशाहमेशा के लिए रहने वाला है.’14

हेराक्लाइट्स के चिंतन में भौतिकवादी विचारधारा के बीजतत्व मौजूद हैं, जिन्होंने प्लेटो, अरस्तु समेत आने वाली पीढ़ी के अनेक दार्शनिकों को प्रभावित किया था. उसके बारे में यह बात भी चौंका सकती है कि वह युद्ध का समर्थक था. यहां तक कि न्याय की स्थापना के लिए भी वह युद्ध को अनिवार्य मानता था. युद्ध का जैसा दुराग्रही समर्थन हेराक्लाइट्स ने किया, वैसा शायद ही किसी और विचारक ने किया हो—

युद्ध आमखास, राजाओं तथा राजाओं के राजा का जनक है. युद्ध ने ही कुछ को भगवान, कुछ को इंसान, कुछ को दास तथा कुछ को स्वामी बनाया है. हमें मालूम होना चाहिए कि युद्ध से हम सभी का नाता है. विरोध न्याय का जन्मदाता है, प्रत्येक वस्तु संघर्ष से ही जन्मती तथा उसी से अंत को प्राप्त होती है.15

हेराक्लाइट्स तथा पारमेनीडिस के अलावा सुकरात पूर्व के दार्शनिकों में प्रोटेगोरस का नाम भी बड़े सम्मान के साथ के साथ लिया जाता है. उसके विचारों में हम आर्थिक उदारवाद की झलक देख सकते हैं. वह सोफिस्ट था और गर्व के साथ खुद को पुराने सोफिस्टों की भांति ‘मानवता का शिक्षक’ कहता था. यह बात अलग है कि उसके जीवनकाल में ही सोफिस्टों का सम्मान घटने लगा था. उसके पीछे सोफिस्टों की अपनी चूकों, जैसे कि ज्ञान को वितंडा का पर्याय मानना तथा शिक्षा का अभिप्रायः दूसरों को प्रभावित करने की कला बताना तथा सुकरात की बढ़ती ख्याति का बड़ा योगदान था. सुकरात के प्रभाव में ही प्लेटो भी सोफिस्टों से दूरी बनाए रहा. अपने मौलिक विचारों के कारण प्रोटेगोरस जैसे प्रतिभाशाली चिंतकों का महत्त्व बाद में भी बना रहा. वह प्राचीन क्लासिक किस्म के सोफिस्टों में से था जो प्रकृति और मनुष्य के संबंधों के बीच नएपन की खोज को समर्पित थे. उनीसवीं शताब्दी के उदारवादी विचारकों की भांति उसके दर्शन का केंद्र भी मनुष्य है. इस संबंध में प्रोटेगोरस का पहेलीनुमा कथन है—‘केवल मनुष्य सृष्टि की समस्त वस्तुओं का मापदंड है. ऐसी वस्तुओं का जो जैसी हैं, वैसा है. ऐसी वस्तुओं का जो जैसी नहीं हैं, वैसा नहीं है.’ इस कथन की अनेक व्याख्याएं हुई हैं. प्रकारांतर में वह बताता है कि न्याय अथवा कोई और ऐसी चीज जो समाज की भलाई की दावेदारी करती है, व्यक्तिनिरपेक्ष नहीं हो सकती. ऐसी वस्तुओं की उपयोगिता लोकहित साधते रहने में है. विवेचना को आगे बढ़ाते हुए उसने लिखा है कि, ‘प्रत्येक राज्य के लिए जो भी उचित एवं कल्याणकारी प्रतीत होता है, वह उसके लिए उस समय तक उचित एवं कल्याणकारी बना रहेगा, जब तक उसके विचारों में आमूल परिवर्तन नहीं होता.’ विचारों में परिवर्तन से प्लेटो का आशय समाज में वस्तु या व्यक्ति के प्रति धारणा है. उदाहरण के लिए ऐसे समाजों में जहां बहुपत्नीत्व अथवा बहुपतित्व जैसी प्रथाएं हैं, वहां क्रमशः एकाधिक पत्नी अथवा पति रखना अनुचित नहीं है. प्रथाएं समाज में उस समय तक सम्मानेय अथवा असम्मानेय बनी रहती हैं, जब तक कोई समाज उन्हें सम्मानेय अथवा असम्मानेय मानता है. प्रत्येक बदलाव मनुष्य की इच्छाशक्ति और बदलाव की उत्कंठा को दर्शाता है. अकसर यह कहा जाता है कि मनुष्य परिस्थितियों का दास होता है. घटनाएं उसके जीवन और विचारों को मनचाहा मोड़ देने में सक्षम होती हैं. परंतु इस सोच की सीमाएं हैं. कोई भी घटना मानवव्यवहार को तभी तक प्रभावित कर सकती हैं, जब उनमें व्यक्ति के आचरण से कुछ सीख लेने का गुण हो. कुल मिलाकर मनुष्य और उसके चारों और घट रही घटनाओं के बीच लेनदेन चलता रहता है. प्लेटो के अनुसार—

नगरराज्य से संबंधित मामलों में प्रत्येक नगर अच्छे और बुरे, उचित और अनुचित, न्यायसंगत और न्यायविरुद्ध, अनुकूल और प्रतिकूल निर्णय कर लेने के बाद उस निर्णय के अनुसार व्यवस्थाओं का गठन करता है, जो समान रूप से मान्य होती हैं. लेकिन इसका आशय यह नहीं कि कोई व्यक्ति अथवा नगर दूसरों के मुकाबले कम अथवा अधिक बुद्धिमान है. किसी नगरराज्य के लिए क्या उपयोगी और सुलभ होगा, इस बारे में मतभेद संभव हैं. परंतु नैतिकता से संबंधित मामलों में राज्य ही एकमात्र सत्ता है. राज्य का निर्णय सामूहिकता की देन होता है.’16

प्रोटेगोरस के अनुसार राज्य नैतिकता और कानून दोनों का आधार है. आदर्श राज्य प्रत्येक नागरिक को अपने मत पर बने रहने, अपने विचारों के साथ जीने की स्वतंत्रता देता है. साथ ही नागरिक इसके लिए भी बाध्य होता है कि वह राज्य द्वारा अनुमन्य सभी नियमों और कानूनों का पालन करेगा, ताकि उसके विचारों के कारण बाकी नागरिकों को जो उससे भिन्न राय रखते हैं किसी प्रकार की परेशानी न हो. स्मरणीय है कि प्रोटेगोरस के जीवनकाल में राज्य छोटेछोटे थे. समाज समुदायों में बंटा हुआ था. कुल जनसंख्या दास और गैर दास में बंटी थी. इसलिए उस समय तक समुदाय और समाज में बड़ा अंतर नहीं था. प्रायः समुदाय की इच्छा को ही समाज की इच्छा के रूप में अभिव्यक्त किया जाता था, हालांकि उसका प्रभाव क्षेत्र समुदाय विशेष तक ही सीमित रहता था. इसलिए प्रोटेगोरस ‘सामुदयिक इच्छा’ पर, जिससे समुदाय के अधिसंख्यक लोगों का भला हो, जोर देता है. समुदाय को बड़े समाज में बदलने की चाहत अरस्तु के बाद आरंभ होती है. अरस्तु सामाजिक नैतिकता का प्रश्न उठाता है और प्लेटो से हटकर सोचते हुए किसी खास राजनीति दर्शन के बजाय व्यक्ति और समाज की सामूहिक चेतना के विस्तार की मांग प्रस्तुत करता है. रूसो उसका उदात्तीकरण करते हुए उसे ‘सामान्य इच्छा’ में बदल देता है. यह अंतर दिखने में भले मामूली लगे, है अत्यंत महत्त्वपूर्ण. ‘सामुदायिक इच्छा’ का आशय ऐसी इच्छा से था, जिससे समाज में अधिसंख्यक लोगों का भला होता हो. ‘सामान्य इच्छा’ में भी बहुसंख्यक वर्ग का हित सुरक्षित है. लेकिन पहली में बहुसंख्यक वर्ग के हितों पर जोर देते हुए अल्पसंख्यक वर्ग के हितों की या तो उपेक्षा कर दी जाती है, अथवा उनके अहित को बहुसंख्यक के हित की अनिवार्यता मानकर उपेक्षित कर दिया जाता है. रूसो की ‘सामान्य इच्छा’ इस मायने में उदार है कि वह अल्पसंख्यक वर्ग की पसंदों को नजरंदाज करने के बजाय उन्हें राज्य की नैतिकता का प्रश्न बना देता है. तदनुसार उन इच्छाओं पर भी जोर दिया जाया जाता है, जिन्हें अल्प समूह की इच्छाएं मानकर प्रायः नजरंदाज किया जाता है. श्रेष्ठ समाज में ही श्रेष्ठ मनुष्य का वास होता है—कहते हुए अरस्तु बहुसंख्यक वर्ग से उम्मीद करता है कि वह अल्पसंख्यक वर्ग की पसंदों का भी ध्यान रखेगा; और राज्य जो प्रायः बहुसंख्यक वर्ग की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करता है, वह अल्पसंख्यक वर्ग के हितों, समानता और स्वतंत्रता को निर्बंध रखने के लिए समुचित कदम उठाएगा.

प्लेटो का विचार था कि आदर्श राज्य की स्थापना केवल समर्थन, सहयोग और परिवर्तनशील बने रहने से संभव नहीं है. इसे दृढ़, स्थायी, अपरिवर्तनीय राजनीतिक तंत्र के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है, जो सामाजिक परिवर्तनों को निरंतर नियंत्रितनिर्देशित करने में सक्षम हो. ‘रिपब्लिक’ और ‘लॉज’ में आदर्श समाज के लिए जिन विचारों को वह स्थान देता है, वे यूनानी समाज में छिटपुट रूप से उससे पहले भी मौजूद थीं. लेकिन प्लेटो का दर्शन इस मायने में विशिष्ट है कि राजनीति पर उस समय तक इतने व्यवस्थित उपयोग के बारे में किसी ने नहीं सोचा था. अतः राजनीतिक दर्शन के लिहाज से यह एक अद्भुत और विकासगामी सोच था. ‘आदर्श समाज’ की परिकल्पना के पीछे उसके कविहृदय का भी उतना ही योगदान था, जितना कि दार्शनिक मस्तिष्क का. इसलिए अपने आदर्श राज्य में उसने कानून के हस्तक्षेप को न्यूनतम रखते हुए आत्मानुशासन पर ज्यादा जोर दिया है. इस ग्रंथ को कुछ विद्वान प्लेटो की कुंठा की उपज भी मानते हैं, जो उनके अनुसार एथेंस की राजनीति में सक्रिय भूमिका न निभा पाने के कारण जनमी थी. प्लेटो स्वयं दार्शनिक था. सुकरात, डेमोक्रिटिस, हेराक्लाइट्स, पेरामेनीडिस समेत पाइथागोरस के अन्य अनुयायी आदि जिनसे वह प्रभावित था, वे सब भी दार्शनिक थे. उसने एथेंस में गणतंत्रीय शासन को कुलीनतंत्र की मनमानी में ढलते हुए देखा था. सायराकस के सम्राट डायोनिसियस प्रथम और द्वितीय की तानाशाही भी देखी थी. डायोनिसियस प्रथम अपने राज्य में विद्वानों और दार्शनिकों को रखता था. लेकिन उसकी मनमानी, सनकों और महत्त्वाकांक्षाओं पर रोक लगाने में वे सभी अक्षम थे. इसी कारण प्लेटो का राजतंत्र से विश्वास उठ चुका था. राजतंत्र को वह राजा तथा उसके आसपास जुटे अधिकारियों की तानाशाही कहता था. राज्य के मुखिया के रूप में वह ऐसे शासकों की कल्पना करता था, जो दूरदर्शी, वीर, साहसी, दृढ़निश्चयी, बुद्धिमान और किसी भी प्रकार से प्रलोभन से मुक्त हों. उसका मानना था कि ये गुण एकमात्र दार्शनिक में ही संभव हैं. इसलिए वह राज्य की बागडोर दार्शनिक के हाथों में सौंपने की अनुशंसा करता है. ‘रिपब्लिक’ में उसकी यही परिकल्पना विस्तार लेती दिखाई पड़ती है.

ध्यातव्य है कि ‘रिपब्लिक’ प्लेटो के प्रौढ जीवन की रचना है, हालांकि उसका लेखन वर्षां तक चलता रहा. कुछ खंड उसने अपने उत्तरवर्ती जीवन में पूरे किए थे. वे कदाचित उसके जीवन के हताशा भरे दिन थे. उसे लगने लगा था कि ‘रिपब्लिक’ के सपने को यथार्थ में साकार कर पाना सहज नहीं है. तो भी उसका ‘शुभ’ की अनिवार्यता तथा आदर्शों से मोह भंग नहीं हुआ था. अतएव अपने अंतिम दिनों की कृति ‘लॉज’ में वह उन व्यवस्थाओं की परिकल्पना करता है, जिनके द्वारा उस सपने को साकार किया जा सकता है. ‘रिपब्लिक’ की मुख्य स्थापना थी कि राज्य का मुखिया किसी दार्शनिक को होना चाहिए. वही चुनौतीपूर्ण स्थितियों में दृढ़ निश्चय लेकर राज्य का कल्याण कर सकता है. दार्शनिक सम्राट का प्रयोग प्लेटो से पहले भी यूनान के नगरराज्यों में हो चुका था. नगरराज्यों में विकास हेतु योजनाएं बनाने तथा शासन हेतु आचारसंहिता तैयार करने का दायित्व प्रायः दार्शनिकविचारक ही संभालते थे. लंबे अनुभव के आधार पर वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि दुर्बलताओं से बाहर निकालने के लिए व्यक्ति के स्वभाव में आमूल परिवर्तन अनिवार्य है. जाहिर है, मार्क्स की भांति प्लेटो भी दुनिया को समझने नहीं, बदलने में विश्वास करता था. यही कारण है कि वह सहस्राब्दियों से दार्शनिक विचारकों को प्रभावित करने में सक्षम रहा है.

राजनीतिक दर्शन को समर्पित प्लेटो की महान रचना ‘रिपब्लिक’ न तो किसी विशिष्ट राजनीतिक दर्शन की स्थापना करती है, न ही किसी खास राजनीतिक विचारधारा का पक्ष लेती है. उसकी स्थापनाएं यूनान के किसी भी नगरराज्य के बारे में सच हो सकती थीं. इसलिए कि वह किसी विशेष राजनीतिक प्रणाली पर जोर देने के बजाय समाज में आदर्शों की स्थापना पर जोर देता था. चूंकि आदर्श की स्थापना परोक्षतः न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना ही है, इसलिए इस ग्रंथ में वह न्याय को विभिन्न कोणों से परिभाषित करने का प्रयास करता है. न्याय की उसकी अवधारणा भी तत्संबंधी आधुनिक विचारधाराओं से भिन्न है. ‘जस्टिस’ के माध्यम से एक भयमुक्त, अपराधमुक्त, न्यायाधारित समाज की स्थापना का पक्ष लेने के बजाय वह नागरिकों में कर्तव्यबोध पैदा करने पर ज्यादा जोर देता है. उसकी निगाह में न्याय का अभिप्राय व्यक्ति और समाज के आचरण की स्वयंस्फूर्त पवित्रता से है. ‘न्याय’ हालांकि अपने आप में एक जटिल अवधारणा है. इसका संबंध व्यक्ति मात्र के सदाचरण तथा समाज में अनुशासन बनाए रखने से होता है. ‘रिपब्लिक’ के पहले खंड में प्लेटो ने सुकरात को अपने साथियों के साथ ‘न्याय’ की अवधारणा पर विस्तार से चर्चा करते हुए दर्शाया है. उस चर्चा के माध्यम से ‘न्याय’ की मुख्यतः चार परिभाषाएं हमें प्राप्त होती हैं. मगर उनमें से एक भी परिभाषा ऐसी नहीं है, जिसे सर्वमान्य और सर्वकालिक माना जा सके.

प्लेटो के अनुसार न्याय का उद्देश्य सार्वकालिकसार्वत्रिक शुभ और सर्वश्रेष्ठ न्यायिकराजनीतिक शासन की स्थापना करना है. वह न्याय के दो स्वरूप मानता है. पहला राज्य की कार्यप्रणाली के माध्यम से सामने आता है. जिसके द्वारा निहित स्वार्थ तथा कर्तव्यों के निष्पादन के लिए राज्य विभिन्न संस्थाओं का गठन करता है. न्याय का दूसरा चेहरा उसके नागरिकों के आचरण में दिखाई पड़ता है. उसे लोगों के साहस, कर्तव्यों के प्रति उत्साहभाव, नैतिक व्यवहार आदि के माध्यम से जाना जा सकता है. प्लेटो की मान्यता थी कि व्यक्ति की अपेक्षा बड़े तंत्र, जैसे राज्य के व्यवहार में न्याय की पहचान अपेक्षाकृत आसानी से की जा सकती है. लेकिन यदि प्रत्येक नागरिक न्याय की ओर से उदासीन हो जाए तो न्याय के राज्य का कोई अर्थ नहीं रह जाता. ऐसे में प्रत्येक व्यक्ति को मनमानी करने का अवसर मिल जाता है. इसलिए व्यक्तिमात्र का कर्तव्य है कि वह समाज को उस रूप में व्यवस्थित करने के बारे में सोचे और सहयोग करे जिस प्रकार वह स्वयं को व्यवस्थित करना चाहता है. किसी प्रकार के संदेह की गुंजाइश न रहे, इसके लिए वह न्याय को ऐसे चरित्रिक लक्षण के रूप में देखना चाहता है जिसकी व्याप्ति व्यक्ति और समाज दोनों जगह समानरूप से हो. चूंकि समाज सदैव दो से बड़ा होता है. अतः बड़ा होने के कारण समाज में न्याय की मौजूदगी उसी अनुपात में अधिक होनी चाहिए. सहजीवन और कठोर अनुशासित जीवनशैली के समर्थक प्लेटो का यह तर्क अजीब लग सकता है. परंतु इस बात में कोई संदेह नहीं कि वह राजनीतिक सत्ता को अधिक न्यायोन्मुखी, उदार, कर्तव्यपरायण और दायित्वभावना से युक्त देखना चाहता था. वह चाहता था कि प्रत्येक व्यक्ति यह सोचे कि—‘अपने समाज और राज्य की बेहतरी के लिए मैं क्या कर सकता हूं?’ ‘उसके प्रति मेरा कर्तव्य और जिम्मेदारियां क्या हैं?’ इसे कर्तव्यबोध कहें अथवा नागरिकबोध, प्लेटो के मन में ऐसा विचार यूनानवासियों, विशेषकर वहां के अभिजात्यवर्ग के चारित्रिक पतन की प्रतिक्रियास्वरूप उपजा था. परोक्ष रूप में समाज को बेहतर बनाने की चिंता ही ‘रिपब्लिक’ का प्रतिपाद्य विषय है, जो कभी ‘न्याय’ की लोकोन्मुखी अवधारणा और कभी ‘आदर्श राज्य’ की परिकल्पना के रूप में सामने आती है. उसकी निगाह में आदर्श राज्य की स्थापना तब तक असंभव है, जब तक वहां के नागरिक और शीर्षस्थ वर्ग के लोग ‘शुभत्व’ से भलीभांति परिचित न हों. ‘शुभत्व’ की संकल्पना सुकरात की देन थी, जिसको पाने की अभिलाषा प्लेटो के पूरे साहित्य में व्याप्त है. यही उसका आकर्षण है.

प्लेटो को पढ़ते हुए मार्क्स की याद आना स्वाभाविक है. दोनों ही भौतिकवादी थे. दोनों का ही मानना था कि कोई मनुष्य अपने आप में पूर्ण नहीं है. मानवमात्र की यही अपूर्णता सामाजिक गठन को अपरिहार्य बनाती है. परंतु एक सीमा के बाद मनुष्य और समाज के रिश्ते जटिल होने लगते हैं. उन्हें नियंत्रित करना अकेले समाज के लिए संभव नहीं होता. ऐसे में राज्य की अहमियत बढ़ जाती है. राज्य न केवल मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आवश्यक संसाधन जुटाने के लिए नीतियां बनाता है, अपति कल्याण के बंटवारे के लिए भी उसकी भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है. मनुष्य की भोजन, वस्त्र, आवास आदि ऐसी अनेक आवश्यकताएं हैं, जिन्हें उसकी मूलभूत आवश्यकताएं माना जाता है. इनके बगैर जीवन असंभव है. कुछ आवश्यकताएं विकास की देन होती हैं—जैसे सड़क, औजार, मशीनें, बिजली के उपकरण, यातायात के साधन इत्यादि. मनुष्य की सामान्य इच्छा होती है कि उसके जीवन में दूसरों का हस्तक्षेप न हो. सुरक्षा का पक्का भरोसा हो. यह काम मनुष्य आपस में एकदूसरे के साथ सहयोग करते हुए भी कर सकता है. अक्सर करता भी है. यह कार्य वह दूसरों के हितों को देखते हुए, राज्य और समाज के प्रति अपने कर्तव्य मानकर करे, यही सच्चा न्यायबोध है. यही वह ज्ञान है जिसके भरोसे राज्य के हस्तक्षेप अथवा उसकी नीतियों से स्वतंत्र रहकर भी मनुष्य अपना विकास कर सकता है.

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

10. जिस समाज में धार्मिक आग्रह प्रबल हों, वहां तानाशाही भी मूल्य मान ली जाती है. धर्म स्वयं तानाशाही प्रवृत्ति रखता है. ऐसे समाजों में या तो पुरोहित की मर्जी चलती है, अथवा उसके देवता की. उनपर सवाल उठाना उदंडता समझा जाता है. यहां तक कि यदि कोई शंबूक ज्ञान की चाहत में पढ़नालिखना भी चाहे तो उसे मृत्युदंड देना धर्मरक्षा मान लिया जाता है. धार्मिक संस्थाएं कितनी पूर्वाग्रह ग्रस्त होती हैं, इसके अनेक उदाहरण हैं. उनकी खूबी है कि वे लोगों के दिलोदिमाग में ज्ञानपिपासा जगाने के बजाय उसे अनुकूलित करने का काम करती हैं. विज्ञान हो या साहित्य अथवा कोई ऐतिहासिक प्रसंग हो, वे उन सभी की व्याख्या अपने स्वार्थ के अनुसार करती हैं. ऐसा ही एक उदाहरण मध्यकाल में रहीम को लेकर है. रहीम अकबर के सेनापति, बड़े कवि थे. उनकी दानशीलता के भी बड़े किस्से प्रचलित हैं. एक किस्सा गंग कवि को लेकर है, जो स्वयं अकबर के दरबारी कवि थे. कहते हैं कि गंग कवि ने रहीम की विनत दानशीलता से प्रभावित होकर एक दोहा लिखकर भेजा—

सीखे कहाँ नवाब जू, ऐसी दैनी दैन.

ज्योंज्यों कर ऊँचौं कियौं, त्योंत्यों नीचे नैन.

खानखाना ने उसका प्रत्युत्तर वैसी ही विनम्रता और कविकौशल के साथ दिया—

देनहार कोउ और है, देत रहत दिनरैन.

लोग भरम हम पै करें, तासों नीचे नैन.’

हम रहीम के दोहे में आए ‘देनहार’ शब्द पर चर्चा करेंगे. हालांकि यह कोई नया शब्द नहीं है. ‘दाता’ शब्द का उपयोग इसके पर्याय के रूप में हमेशा होता आया है. चूंकि दानकर्म को धर्म से जोड़ा जाता रहा है, इसलिए बिना एक पल गंवाए इसका अर्थ ‘ईश्वर’ या अल्लाह’ मान लिया जाता है. हमारे आस्थावादी दिमाग को यह न तो असंगत लगता है, न ही अनुचित. इसी के साथ रहीम और हर्ष जैसे दानदाताओं की उदारता का विराट आभामंडल हमारे मस्तिष्क में बनने लगता है. अब दान दो प्रकार से दिया जाता है. अपनी कमाई से देना. जैसे कोई गरीब धर्म के नाम पर मंदिरमस्जिद या पीरऔलिया की दरगाह पर देता है. दूसरा राजामहाराजा, जो जनता से खुशीखुशी, जबरन उगाए गए या लूटे हुए धन को दान के नाम बांटकर समाज के शीर्षस्थ वर्गों की ‘वाहवाह’ लूटते रहते थे. दोनों हालात में असल देनदार जनता है. किसान खेत में हल चलता है, मजदूर कारखानों में पसीना बहता है, उन्हीं की कमाई राजा से राजा का खजाना भरता है. राजा उसके एक हिस्से को दान के रूप में लौटाकर यशप्रतिष्ठा अर्जित करता है—यह हकीकत भूले से भी हमारे दिमाग में नहीं आती. अंधआस्था हमारे विवेक को हर लेती है. नतीजा यह होता है कि हम धर्म और ईश्वर के नाम पर सत्ताओं के प्रत्येक धत्त्कर्म को पचाते चले जाते हैं. तो क्यों न यह मान लिया जाए कि रहीम जैसे संवेदनशील कवि की गर्दन यह जानने के कारण नीची थी कि जिस धन को वे दान में लुटा रहे हैं, वह उनका नहीं उनकी प्रजा के गाढ़े पसीने की कमाई का है.

11. ‘One should think it of greater importance than anything else that the affairs of polis are conducted well is the best means to success: everything depends on this, and if this is preserved, everything is preserved and if this is destroyed everything is destroyed’.-Democritus.

12. अर्नेस्ट बार्कर, यूनानी राजनीतिकसिद्धांत, पृष्ठ—140, अनुवाद विश्वप्रकाश गुप्त.

13. पाश्चात्य राजनीतिक विचारों का इतिहास, डॉ. प्रभुदत्त शर्मा से उद्धृत.

14. This world, which is the same for all, no one of gods or men has made; but it was ever, is now,and ever shall be an ever-living Fire, with measures kindling and measures going out.from BERTRAND RUSSELL, A HISTORY OF WESTERN PHILOSOPHY And Its Connection with Political and Social Circumstances from the Earliest Times to the Present Day.

15. ‘War….is the father of all and the king of all; and some he has made gods and some men, some bond and some free…We must know that war is common to all and strife is justice, and that all things come into being and pass away through strife.’-Heraclitus, quoted by BERTRAND RUSSELL, A HISTORY OF WESTERN PHILOSOPHY.

16. यूनानी राजनीतिक विचारधारा, टी. . सिनक्लेयर, अनुवाद विष्णुदत्त मिश्र.

राजनीतिक के साथ सांस्कृतिक समर भी है उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव

सामान्य

[यह पत्र एक खास संदर्भ में लिखा गया है. जिन्हें संबोधित है, वे भाजपा से जुड़े हैं. संघ जिसकी आत्मा है. इसके अलावा वे वर्षों से कश्यप, कहार, महार, बिंद, मल्लाह आदि जातियों को अनुसूचित जातियों की परिभाषा में लाने के लिए आंदोलन करते हैं. उनका आंदोलन लंबा है, और इस कारण वे सम्मानीय हैं. लोकसभा के चुनावों में और हाल के चुनावों में भी, उपुर्यक्त जातियों का बड़ा हिस्सा भाजपा के पक्ष में गया था. विधानसभा चुनावों में भी यही दिशादशा दिखती है. मगर इन जातियों का भाजपा समर्थन के मायने केवल राजनीति तक सीमित नहीं हैं. उनका बड़ा संदर्भ सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से भी है. इधर संघ नेता मनमोहन वैद्य ने चुनाव से ऐन पहले आरक्षण खत्म करने की मांग दोहराई है. उनका मानना है कि आरक्षण अलगाव बढ़ाता है.(गोया मनु की संहिता समाज को जोड़ती थी) उनके अनुसार आरक्षण अनुसूचित जातियों और जनजातियों के कारण लाया गया है. जिन्हें लंबे समय से सुविधाओं से वंचित रखा गया है. संघ के नेताओं की यह मांग नई नहीं है. न ही इसमें कुछ अलग से जोड़ा गया है. संघ की चलती तो आरक्षण को एक दशक से भी आगे चलाना कठिन हो जाता. इसके बावजूद कुछ जातियां हैं जो भाजपा से आरक्षण बढ़ाने या उसमें फेरबदल करने का सपना पाले हुए हैं. जबकि सामाजिक न्याय को केंद्रीय मुद्दा बनाकर आई बिहार सरकार ने न्यायपालिकाओं को आरक्षण के दायरे में लाकर क्रांतिकारी कदम उठाया है…..

पत्र की भाषा निजी है. संदर्भ समसामयिक. अतः जिन सज्जन को संबोधित है उन्हें सीधे न लिखकर सार्वजनिक कर रहा हूं, ताकि सनद रहे. लेख में कुछ जातियों का नामोल्लेख जरूर है, प्रकारांतर में वे समाज के उस समूह का हिस्सा हैं, जिसे आज बहुजन कहा जाता है. यह सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के मकड़जाल को समझने की कोशिश भर है. इसलिए कि उत्तरप्रदेश के चुनावों के परिणाम केवल राजनीतिक परिवर्तन तक सीमित नहीं रहने वाले. उनका महत्त्व सांस्कृतिक क्षेत्र में कहीं ज्यादा होगा. पत्र है इसलिए इसकी भाषा में काफी कुछ व्यक्तिगत भी है. लेख को उसी भाव के साथ पढ़ा जाना चाहिए.]

आदरणीय…..!

आपका पत्र प्राप्त हुआ. साथ में चैक भी. आभार व्यक्त नहीं कर सकता. क्योंकि जिस उद्देश्य के लिए यह तुच्छ सहभागिता थी, वहीं इसका उपयोग सार्थक था. कारण जो बताया गया है, वह उचित ही है. सूबे में भाजपा या कांग्रेस की सरकार होती तथा सपा, बसपा जैसे दल ऐसा आयोजन करना चाहते, जिसमें किसी राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष की सहभागिता होतब भी यही हालात होते. असल में जिस जातिसमूह की ओर से यह आयोजन प्रस्तावित था, वह राजनीतिक दलों के लिए महज वोट बैंक रहा है. 2014 के चुनावों में इनका बड़ा हिस्सा भाजपा के समर्थन में उतरा था, जिससे उसे सूबे में 73 सीटें मिलीं. उससे पहले ये जातियां कभी सपा तो कभी बसपा की झोली में जाती रही हैं.

इस सम्मेलन के रद्द होने की मुझे न तो खुशी है न ही दुख. जिस सम्मेलन के विशिष्ट अतिथि ‘शाह’ और ‘मौर्य’ जैसे व्यक्ति होंवह कश्यप, महार, धींवर, तुरैहा, कहार, मल्लाह, निषाद आदि का सम्मेलन हो ही नहीं सकता था. यह सीधासीधा राजनीतिक सम्मेलन था. जिसे सूबे की सरकार ने अपना राजनीतिक स्वार्थ देते हुए मंजूरी देने से इंकार कर दिया. हम लोग जैसे अभी तक विभिन्न दलों की राजनीति में पिसते आए थे, इस बार भी ऐसा ही हुआ. इसमें आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं है. वैसे भी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा प्रदेश अध्यक्ष के सान्निध्य में हुआ यह सम्मेलन भाजपा का सम्मेलन ही कहलाता. जातिबंधु जैसे अब तक दूसरे दलों को कंधों पर साधते आए हैं, इस बार वे भाजपा को उठा रहे होते. मुझे तो यह भी लगता है कि अमित शाह और उनके प्रदेश अध्यक्ष स्वयं इस सम्मेलन को लेकर गंभीर नहीं थे. अगर चाहते तो वे प्रदेश सरकार पर दबाव डाल सकते हैं. अनुमति के लिए कलेक्ट्रेट के आगे प्रदर्शन कर सकते थे. धरने के माध्यम से भी आवाज उठाई जा सकती थी. परंतु उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया. कदाचित उन्हें विश्वास रहा कि सम्मेलन हो या नहीं, बंटे हुए जातिसमूह के जितने वोट उन्हें अपेक्षित हैं, वे कहीं नहीं जाने वाले. यह भाजपा की नीति है, जो गत चुनावों में पूरी तरह कारगर रही थी. कारण जो भी हों, सम्मेलन के टलने पर व्यक्तिगत रूप से मुझे खुशी है. सच तो यह है कि मैं इस देश के उन 69 प्रतिशत सक्रिय मतदाताओं में से हूं जिन्होंने 2014 में भाजपा के विरोध में मतदान किया था. जो अलगअलग दलों में बंटने के कारण निष्फल सिद्ध हुआ था.

मैं अपनी सपाटबयानी के लिए क्षमा चाहता हूं. आप जैसे वयोवृद्ध, सक्रिय, सतत चेतनशील व्यक्ति के समक्ष ऐसी साफगोई धृष्टता भी मानी जा सकती है. परंतु आप जैसे व्यक्तित्व के आगे जो समाज में निरंतर सक्रिय और लंबे समय तक बहुतसे जातिबंधुओं का पथप्रदर्शक रहा हो, अपने विचारों को झूठ के आवरण में पेश करना अवमानना जैसा ही होगा. आपके प्रति मेरे मन में भरपूर सम्मानभाव है, जिसपर झूठ का लांछन लगाना मैं नहीं चाहता. रामस्वरूप वर्मा तथा अन्य लोगों से कश्यपबंधुओं को एकसूत्र में बांधने के लिए आपके अनथक योगदान का परिचय मुझे बहुत पहले मिल चुका था. ……..को दिल्ली विधानसभा में पहुंचाने तथा उनकी राजनीतिक पहचान बनाने का श्रेय भी आप को जाता है. सीमित संसाधनों से साधारण नौकरीपेशा आदमी जितना कर सकता है, उससे कई गुना संघर्ष आपने किया है. इसलिए मैं आपके समक्ष न केवल विनीत हूं, बल्कि सम्मानभाव से भरा हुआ हूं.

आप कहेंगे, कश्यप, तुरैहा, बाथम, मल्लाह, कहार, धींवर आदि जातियां तो हमेशा से ही राजनीतिक दलों के हाथों में झूलती आई हैं. सपा, बसपा आदि सभी दलों के लिए भी तो हम महज वोट बैंक हैं. भाजपा भी उन्हें वोट बैंक की भांति इस्तेमाल करती है, तो इसमें बुरा क्या है? कभी कांग्रेस भी यही करती थी. उस समय तक इस समाज में राजनीतिक चेतना का वैसा उभार नहीं था, जैसा आज दिखाई पड़ता है. हालांकि मतों का बिखराब और दिशाहीनता जैसी तब थी, वैसी आज भी है. दिशाहीनता का शिकार हमारे नेतागण भी हैं. एक सामान्य सोच सभी के भीतर पनपा हुआ हैᅳ‘जब सभी के लिए हम वोट बैंक हैं प्रत्येक दल हमारी ओर बाहें फैलाए खड़ा है तो जहां अवसर मिले, वहां ‘शरण लेने’ में बुराई क्या है. इस ‘समझदारी’ के चलते हम अपने ही प्रतिद्विंद्वी बने हैं. लोकतंत्र में जितना बुरा किसी नागरिक समूह को वोटबैंक मानना है, उतना ही बुरा उसका मूक/अमूक प्रतिनिधि बनकर, बिना किसी भविष्य योजना के किसी दल की शरण में जाना और फिर दलीय विचारधारा का प्रतिनिधि बनकर समाज में वोट मांगने आना है. संभव है इससे कुछ व्यक्ति नेता के रूप में प्रसिद्ध हो जाएं. यह भी संभव है कि वे निर्वाचित होकर संसद और विधान मंडलों की शोभा बढ़ाने लगें. वे जानते हैं की उनके पीछे समाज की वास्तविक ताकत नहीं है. राजनीतिक दल की बैशाखी थामकर वे सत्ता में पहुंचे हैं, इस कारण वे हमेशा अविश्वास से भरे रहते हैं. उन्हें अपने ऊपर भरोसा ही नहीं होता. इसलिए समाज को उनका कोई लाभ नहीं मिल पाता. इससे लोगों का आत्मविश्वास भी घटता है और समाज अपने लक्ष्य के प्रति एकमत नहीं रह पाता. बंटा हुआ जनमत बड़ा नेतृत्व उभरने की राह में भी बाधक होता है.

यहां प्रतिवाद का अवसर उपलब्ध है. कहा जा सकता है कि विभिन्न दलों को हमारे नेताओं की आवश्यकता है तो उसका लाभ उठाने में क्या बुराई है. इसी के बूते संसद और विधायिकाओं में ‘कश्यप’, ‘मांझी’ और ‘निषाद’ जैसे टाइटिल दिखने लगे हैं. बात बिलकुल सही है. मगर मैं जानना चाहूंगा कि संसद और विधानमंडलों में समाज के जो नेता विभिन्न दलों में उनकी जरूरत बनकर जाते हैं. क्या वे वहां वास्तव में अपनी उपस्थिति दर्शा पाते हैं? अभी तक तो यही देखा गया है कि हमारे प्रतिनिधि समाज से ज्यादा दलीय जरूरतों को पूरा करने का काम करते हैं. ‘पार्टीलाइन’ पर बने रहना उनकी बाध्यता होती है. जिस प्रकार चुनावों में हमारा समाज वोट बैंक बना रहता है, उसी तरह हमारे ‘प्रतिनिधि’ संसद और विधायिकाओं में ‘संख्या’ बनकर रह जाते हैं. समाज की आवाज बनते हुए उन्हें कम ही देखा गया है.

ठीक है, अपने लोग जिस विपन्नता, सामाजिक अवरोधों को पार करके आते हैं, उनका उभरकर आना तथा चुनौतीपूर्ण चुनावी प्रक्रिया से गुजरकर संसद और विधायिकाओं में जाना ही बड़ी बात है. मैं इससे इन्कार नहीं करूंगा. लेकिन फिर भी कहूंगा कि हमारे प्रतिनिधि उतना नहीं कर पाते, जितना वे कर सकते हैं. या उन्हें करना चाहिए. एक उदाहरण मैं देना चाहूंगा, गाजियाबाद के ही एक पूर्व सांसद हैं. कभी वे बसपा प्रमुख के करीबियों में जाने जाते थे. ताजा खबर के अनुसार वे भाजपा के हो चुके हैं. यह उनका चयन है. इस लिहाज से इसमें कोई बुराई नहीं है. मेरा बस इतना कहना है कि वे जब तक बसपा में थे, अपनी जातियों को अनुसूचित जातियों में शामिल कराने के लिए कुछ नहीं किया. परिस्थितिवश बसपा से बाहर आना पड़ा. जिस आरक्षण के लिए बसपा में रहकर कुछ न कर सके, उसके लिए बाहर आकर आंदोलन किया और अब आरक्षण की सिद्धांतत: विरोधी, केवल राजनीतिक मज़बूरी के तहत उसका समर्थन करने वाली, भाजपा में शामिल होकर उसके लिए वोट मांग रहे हैं. उनकी हालत देख मुझे उदितराज(रामराज) की याद आती है, जिन्होंने कभी रामसे पीछा छुड़ाने के लिए नया नाम(उदितराज) अपनाया था और अब भाजपा के टिकट पर सांसद बनकर अपनी संपूर्ण क्रांतिधर्मिता को स्वयं अंगूठा दिखा चुके हैं. समाज ऐसे नेताओं पर भरोसा करे भी तो कैसे!

पीछे मैंने ‘सांस्कृतिक अधिपत्यवाद’ का नाम लिया है. इसके लिए मुझे कोई आसान शब्द याद नहीं आ रहा. इसका आशय है, ‘समाज में बिना सोचेविचारे, किसी को अपने से बड़ा मानकर उसका अंधानुकरण करना. विवेक को ताक पर रख थोपी गई परंपरा को आदर्श मान लेना. यह मान लेकिन कि वह शासक है, और हमारी नियति शासित बने रहना है. फिर थोपे गए दासत्व को गर्व का विषय मान उसे जीवन की सिद्धि के रूप में अपनाए रहना. सांस्कृतिक अधिपत्य राजनीतिक अधिपत्य से ज्यादा खतरनाक होता है. राजनीतिक अधिपत्य में दासता केवल राजनीतिक हारजीत तक सीमित होती है. वह कुछ वर्ष या दशक में समाप्त हो जाती है. यदि न भी हो तो परिस्थितियां एकसी नहीं रहतीं. सांस्कृतिक अधिपत्य में थोपी गई संस्कृति; यानी सामाजिक दासता को गौरव का विषय मान लिया जाता है. संस्कृति की विशेषता है कि वह परिवर्तन को आसानी से आत्मसात नहीं करती. बल्कि उन चीजों को अधिक महत्त्व देती है जो समय की पकड़ से बाहर होती हैं. चाहे वे अमरत्व का तमगा प्राप्त देवता हों या महामानव. चूंकि शाश्वतता और अमरत्व की मांग मनुष्य की सार्वकालिक चाहत रही है, इसलिए परिवर्तन की मांगों को आसानी से परंपराविरुद्ध, समाजविरुद्ध यहां तक कि संस्कृतिद्रोह तक मान लिया जाता है. रूढ़िग्रस्त मानव परिवर्तन से घबराता है. इच्छा के विरुद्ध परिवर्तन हों भी तो वह उन्हें वह आधेअधूरे मन से आत्मसात् करता है. जैसे वैष्णो देवी की यात्रा में हेलीकॉप्टर का उपयोग एक यात्री को विज्ञान और प्रौद्योगिकी की शक्ति का एहसास तो कराता है, लेकिन वह उसकी आस्था का परिमार्जन नहीं करता. मिथों के प्रति ठीकठाक पढ़ेलिखे व्यक्ति का भी वही श्रद्धाभाव रहता है, जो साधारण यात्री का. पूर्वाग्रहग्रस्त मन नएपन को अनमन्यस्क भाव से अपनाता है. उसके अनमनेपन का लाभ उठाकर पुरोहित और तंत्राचार्य धर्म को विज्ञानसम्मत बताने लगते हैं. लोगों की अनमन्यस्कता का लाभ उठाकर वे विज्ञान को भी धर्मसम्मत सिद्ध करने में सफल हो जाते हैं. नतीजा यह होता है कि उनके शिखरत्व को कभी कोई चुनौती नहीं मिलती और युवावर्ग जो आधुनिक तकनीक को फैशन और अस्मिता से जोड़ता है, वह वैचारिक आधुनिकता से दूर बना रहता है.

रामायण में इसका सबसे बड़ा उदाहरण हनुमान है. वह बलशाली है. कहने को बुद्धिमान भी है. परंतु सिवाय अपने आराध्य की चाटुकारिता के उसकी बुद्धिमत्ता का दूसरा प्रमाण नहीं मिलता. अनार्य हनुमान वर्चस्वकारी आर्य संस्कृति के आगे इतना नतमस्तक है कि महाशक्तिशाली होने के बावजूद अपने दीनताबोध से बाहर नहीं आ पाता. राम के आगे हनुमान का दैन्य उस सर्वहारा का दैन्य है, जो सांस्कृतिक अधिपत्य से अनुकूलित हो, बात और लात में फर्क करना भूल चुका था. वह बड़ी चालाकी से, धूर्त्ततापूर्वक गढ़ा गया चरित्र है. पहले किसी को महाबलशाली, परम प्रज्ञावान घोषित करना, फिर उसे अपना अनुचर बना लेना. ताकि लोगों को यह संदेश जाए कि बड़े से बड़ा व्यक्ति भी उनका दास है. उसकी उपलब्धियां उसके द्वारा अर्जित न होकर उसके आश्रयदाता या आराध्य की देन हैं. ‘हनुमान राम के बिना कुछ नहीं हैं’यह धारणा भावविभोर करने वाली है. अपने लोग भी सरयू तट पर निषादराज द्वारा राम के पदप्रक्षालन के ‘मिथ’ को गौरव का विषय मानते आए हैं. पीढ़ियां बस इसी सोच के सहारे मरखप गईं कि हम भी उस ‘महान संस्कृति’ का हिस्सा थे. जबकि इस तथाकथित ‘महान संस्कृति’ ने हमारे पूर्वजों के अनथक श्रम, संपूर्ण निष्ठा एवं सेवाभाव के बावजूद शोषण, उत्पीड़न और बेगार से ज्यादा कुछ नहीं दिया. आजीविका के लिए दूसरों पर निर्भर समाज बौद्धिक रूप से भी पराश्रित होता चला गया.

जहां कानून का शासन न हो, वहां न्याय और संसाधनों पर अधिकार को दैवीय मान लिया जाता है. परिणामस्वरूप स्वतंत्रता और समानता जैसे मूल्य जिनपर आधुनिक समाजों की नींव टिकी है, वहां बेमानी हो जाते हैं. इस तरह आस्था और परंपरा का केवल सांस्कृतिक पक्ष नहीं होता, उसकी व्याप्ति लौकिक विषयों तक भी होती है. उनके प्रभाव में संसाधनों पर एकाधिकार को दैवीय मानकर विपन्नता को प्रभावित लोगों की नियति घोषित कर दिया जाता है. सांस्कृतिक वर्चस्व से दबासहमा हमारा मन यह सोच ही नहीं पाता कि ऐसे हालात बने क्यों? उसके लिए जिम्मेदार शक्तियां कौनसी हैं? खुद को राम का मित्र कहने वाले, उसके लिए सेना लेकर अयोध्या पर चढ़ाई करने को उद्यत गुहराज भला इतने दीन कैसे हो सकते हैं कि नाव में राम के पांव पड़ते ही उसके उड़नछू हो जाने का भय सताने लगे और संदेहनिवारण के कठौते में पानी लेकर बैठ जाएं. ‘जो व्यक्ति श्रम करता है, वह उसके प्रतिफल का भी अधिकारी है.’यह कहानी इस सामान्य नियम का उल्लंघन करने के साथसाथ बेगार का महिमामंडन करती है. अभी कुछ अर्सा पहले तक ऐसे प्रसंगों पर लोग भावविभोर होते आए हैं. उनमें अपने लोग भी होते होंगे. वे यह समझ ही नहीं पाते कि अपने श्रम पर जीवनयापन करने वाले व्यक्ति का, नदी पार उतारने वाले मांझी का पारिश्रमिक क्या पैरों की धोबन होना चाहिए? यदि कोई व्यक्ति ऐसा करता है, तो क्या उसे ईश्वर कहा जाना चाहिए? मेरी निगाह में यह सांस्कृतिक दुष्टता है.

मैंने ऊपर लिखा है कि ‘सांस्कृतिक अधिपत्य’ ’राजनीतिक अधिपत्य’ से कहीं ज्यादा खतरनाक और दीर्घजीवी होता है. भारत के 3000 वर्षों के इतिहास का आकलन किया जाए तो ऐसा कभी नहीं हुआ जब केवल ब्राह्मण शिखर पर रहे हों या सिर्फ क्षत्रियों के हाथों में राजसत्ताएं रही हों. बल्कि जब भी देश इस तरह की प्रवृत्ति की ओर कट्टरता से बढ़ा, हमेशा कमजोर पड़ा है. उसके बाद पूरे समाज को भयानक पतनशीलता से गुजरना पड़ा है. इसके बावजूद भारतीय धर्मग्रंथों मे ब्राह्मणों और क्षत्रियों का गुणगान है, तो इसलिए कि उनके लेखक ब्राह्मण या ब्राह्मणवादी मानसिकता के पालकपोषक रहे हैं. बात सिर्फ इतनी नहीं है कि ब्राह्मणों ने स्वयं का महिमामंडन करते हुए धर्मग्रंथ रचे हैं. यह वह संस्कृति है जो वेदों को पढने से ज्यादा पूजने का समर्थन करती है. ब्रह्मा तक को वेद पढ़ते हुए नहीं उनका प्रदर्शन करते हुए दिखाती है. ब्रह्मा के स्वयंभू उत्तराधिकारी, जनसाधारण के आगे त्याग, तपश्चर्य, संन्यास और वैराग्य को महिमामंडित करने वाले, ये तथाकथित ब्रह्मामुखोवतार असल में बेहद अवसरवादी रहे हैं. शूद्र वेदों की पूजा करें यह उनके लिए गर्व की बात थी, वे वेदों को पढ़ें यह उन्हें बर्दाश्त न था. अजीब लोग ठहरे, पूर्वजों के पढ़ेलिखे को अपना समझकर शताब्दियों तक कूपमंडूक बने रहे. चालाक इतने कि देश पर मुस्लिमों का आक्रमण हुआ तो संस्कृत को देवभाषा मानने वाले ब्राह्मणों ने फारसीअरबी सीखने में देर नहीं की. धर्म के साथ छेड़खानी न करने की शर्त पर वे मुस्लिम बादशाहों के दरबार में नौकरी करने लगे. अंग्रेज आए तो अंग्रेजी सीख उनके महिमामंडन में जुट गए. उन्हें राजनीतिक सत्ता से उतना मोह नहीं रहा, जितना सांस्कृतिक सत्ता से. जबजब दोनों के बीच संघर्ष की स्थिति बनी, उन्होंने सांस्कृतिक वर्चस्व को चुना है. वह बना रहे इसलिए ज्ञान के जिन उपकरणों से वे स्वयं लाभान्वित रहे, उनका लाभ समाज के दूसरे वर्ग न उठा पाएं इसका उन्होंने सर्वविध प्रपंच रचा. क्षत्रिय की शिक्षा को केवल हथियार चलाने तक सीमित रखा तो वैश्य को गुणाभाग तक. शूद्र पर कोई जिम्मेदारी नहीं, उसका काम बाकी समाज की जिम्मेदारी उठाना है, सो उसे शिक्षा से ही वंचित रखा. शूद्र पढ़ लिख जाए तो कान में पिघला सीसा डालने का नियम बनाया गया.

उन्होंने खुद वेद पढ़े और हमसे कहा ‘रामराम’ रटो. बेशर्मी ऐसी कि कह दियाकबीर जैसे तत्वज्ञानी के ज्ञान का मूल रामानंद का गुरुमंत्र ‘मरामरा’ है. असलियत से अनजान हम मैकाले पर आरोप लगाते हैं कि उसने हमें ज्ञान को रटंत विद्या में बदलने का महामंत्र दिया. इस विषय में मैकाले का निबंध ‘मिनिट्स ऑन एजुकेशन’ कुछ और ही बात कहता है. ठीक है वह चाहता था कि भारतीय अंग्रेजी पढ़ें. इसलिए भी चाहता था कि दुनिया का बेहतरीन ज्ञान उस भाषा में सुरक्षित है. वह गलत नहीं था. अंग्रेजी सचमुच समृद्ध भाषा है. अपने निबंध में मैकाले ने शिक्षा को तर्कमूलक बनाने पर जोर दिया है, उसने जोर देकर कहा है भारतीय लॉक के तर्कशास्त्र को पढ़ें. यहां यह उल्लेख प्रासंगिक है कि आधुनिक विधिशास्त्र की नींव जॉन लॉक, रूसो, बैंथम के दर्शन पर रखी है. उसका निबंध ही प्रकारांतर में ‘इंग्लिश एजुकेशन एक्ट’ की नींव बना. मैकाले की शिक्षा से कहीं बड़ी देन कानून के क्षेत्र में है. उसने इस देश में विधि आयोग की नींव रखी. उसके फलस्वरूप देश में समान अपराध के लिए समान दंड का कानून बना. उससे पहले मनुस्मृति का कानून चलता था. जिसमें ब्राह्मण को सभी प्रकार के दंडों से बरी रखा गया था. फिर भी लोकतंत्र के नाम पर वोट मांगने वाले किसी प्रतिबद्ध भाजपाई से पूछ लीजिए, वह मैकाले को गाली देगा, उसे भारतीय इतिहास का खलनायक घोषित करेगा.

भाजपा जिन विचारों का प्रतिनिधित्व करती है, वह चाहे हिंदुत्व हो या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, सब सांस्कृतिक अधिपत्य बनाए रखने के औजार हैं. ज्यादा दूर जाने की आवश्यकता नहीं है. पिछले दो वर्षों में आप देख लीजिए. भाजपा शासन के मोर्चे पर बुरी तरह फेल रही है. विकास के वायदे के साथ चुनाव जीतकर आए मोदी हताशा में ऐसे कदम उठा रहे हैं, जिनसे अर्थव्यवस्था को तात्कालिक रूप से कोई लाभ होने वाला नहीं है. और यदि इनका दूरगामी महत्त्व मान भी लिया जाए तो उसके लिए जितना समय चाहिए उसके लिए धैर्य और सामर्थ्य दोनों ही भारतीय जनता में नहीं हैं. राजनीतिक मोर्चे पर भी सरकार को असफलता का सामना करना पड़ा है. भाजपा के ही कई नेता उसके भविष्य को लेकर चिंता करने लगे हैं. लेकिन भाजपा के पितृ संगठन ‘आरएसएस’ को इसकी कतई चिंता नहीं है. राजनीतिक जीतहार को उसने कभी अर्थपूर्ण माना भी नहीं है. उसकी स्थिति यूरोप की चर्च जैसी रही है. जो लोगों के दिलोदिमाग को अपने अधिकार में लेकर उन्हें अपना अनुचर बनाए रखने में विश्वास रखती है. सरकार विकास के वायदे को पूरा करने के लिए कुछ करे या न करे, इन दोढाई वर्षों में संघ ने हर वैचारिक संस्थान में अपने आदमी बिठा दिए हैं. पाठ्यक्रमों में अपनी सांस्कृतिक नीति के अनुसार बदलाव किया गया है. दूरदर्शन पर तंत्रमंत्र, भूतप्रेत के पोंगापंथी सीरियलों की बाढ़सी आई हुई है. संघ जानता है, यदि पांचदस वर्ष के लिए भाजपा को सत्ता से बाहर रहना भी पड़ा तो महत्त्वपूर्ण स्थानों पर जमे उसके कार्यकर्ता भीतर ही भीतर अपना काम करते रहेंगे. मैं स्पष्ट कर दूं कि राजनीतिक दल के तौर पर भाजपा से मुझे कोई शिकायत नहीं है. उसे कांग्रेस, बसपा, सपा, जेडीयू, लोजपा जैसी परिवारवाद के अधीन होकर संविधान की मूल भावना से दूर जा चुकी पार्टियों से बेहतर मानता हूं. अपनी तमाम शिकायतों के बावजूद मैंने भाजपा के प्रतिनिधियों के पक्ष में एक या दो बार मतदान किया था. तब मुझे लगा था कि वे उम्मीदवार भाजपा के उग्र राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक अधिपत्यवाद में वैसा भरोसा नहीं करते, जैसा कि भाजपा के परंपरागत, संघी पृष्ठभूमि के नेता. लेकिन मोदी को मुखौटा बनाकर संघ इस बार जो उग्र राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक वर्चस्व की जमीन तैयार कर रहा है, वह अभूतपूर्व है. कहने की आवश्यकता नहीं कि यह अति पिछड़ी जातियों के मतों के भरोसे हो रहा है.

अंत में बस इतना कि सांप्रदायिकता धार्मिक प्रदूषण है; और धार्मिकता बौद्धिक प्रदूषण. पहली का अतिरेक मनुष्य को पशु बना देता है. जबकि दूसरी का अतिरेक उसे अंतहीन नशे की गिरफ्त में ले जाता है.

ओमप्रकाश कश्यप

परिताप की मिठास : अतीत से भयभीत चार हस्तियां

सामान्य

अशोक, आइंस्टाइन और अब्दुल कलाम! चाहें तो एक और नाम इनमें जोड़ सकते हैंᅳअल्फ्रेड नोबेल. चारों अलग-अलग समय में जन्मे. अलग-अलग क्षेत्रों में उनका योगदान रहा. क्या इनमें कुछ समानता नजर आती है? उत्तर अलग-अलग व्यक्ति अलग-अलग तरह से देंगे. फलित ज्योतिष में विश्वास रखने वाला तत्क्षण कहेगाᅳ‘चारों नाम ‘अकार’ से आरंभ होते हैं; यानी सब एक ही नाम-राशि के हैं.’ जिसकी इतिहास में पैठ है वह जोर देकर कहेगाᅳ‘उन सबका प्रत्यक्ष या परोक्ष संबंध युद्ध से था.’ इतिहास और संस्कृति दोनों में पैठ रखने वाला बताएगाᅳ‘अशोक(304 ईस्वी पूर्वᅳ232 ईस्वी पूर्व) महान सम्राट था. हमेशा प्रजा कल्याण को समर्पित. लोककल्याण के निमित्त उसने बौद्ध धर्म अपनाया. उसके प्रचार-प्रसार के लिए जगह-जगह स्तंभ गढ़वाए. उसके फलस्वरूप बौद्ध धर्म देश की सीमाएं लांघ, देश-देशांतर तक फैला. भारत आर्थिक प्रगति की ओर बढ़ा.’ अपने तर्क को पक्का करने के लिए वह सुप्रसिद्ध उपन्यास लेखक एच. जी. वेल्स की पुस्तक ‘दि आउटलाइन ऑफ हिस्ट्री’ के हवाले से कहेगाᅳ

‘हजारों-लाखों सम्राटों के बीच, जिनसे इतिहास के लाखों-करोड़ों पन्ने भरे पड़े हैं. तेजस्विता, करुणा, शांति, औदार्य और कुलीनता के वैभव मंडल में अशोक एकमात्र ऐसा तारा है जो चमक रहा है, चमकता ही जा रहा है, अकेला….लगातार.’1

बाकी महापुरुषों के बारे में भी विद्वानों के अलग-अलग मत और जानकारियां हो सकती हैं. अल्फ्रेड नोबेल(1833ᅳ1896) ख्यातिनाम शख्सियत था. वह अपने काम से ज्यादा अपने नाम से दिए जाने वाले पुरस्कारों के लिए जाना जाता है. हर साल नोबेल पुरस्कारों की घोषणा होती है. जिसे पुरस्कार मिलता है, उसकी प्रतिभा को तत्क्षण वैश्विक मान्यता मिल जाती है. दुनिया-भर के लेखक, साहित्यकार, बुद्धिजीवी उसे सम्मान सहित याद करते हैं. कम लोग जानते होंगे कि वह अपने समय का प्रतिष्ठित रसायनशास्त्री, इंजीनियर, आविष्कारक, हथियार उत्पादक और सफल उद्यमी था. 355 के आसपास पेटेंट उसके नाम थे. ‘डायनामाइट’ के उसके आविष्कार ने साम्राज्यवादियों के हाथों में ऐसा हथियार थमा दिया था, जिससे वे युद्ध-स्थल पर लाशों के अंबार बिठा सकते थे.

आइंस्टाइन(1879ᅳ1955) तो बस आइंस्टाइन थे. उनके बारे में भला कौन नहीं जानता. वैज्ञानिक बहुत हुए. अनेक ने मनुष्यता के हित में कल्याणकारी आविष्कार किए. उनकी मेधा से विश्व-सभ्यता समृद्ध हुई. परंतु सर्वाधिक विलक्षण, मेधावी और प्रखर प्रतिभावान होने का जो श्रेय, प्रसिद्धि और मान-सम्मान अल्बर्ट आइंस्टाइन को प्राप्त है, वैसा शायद ही किसी दूसरे वैज्ञानिक को प्राप्त हो. वे मानवीय मेधा के ‘मिथ’ के रूप में स्थापित हैं. आज भी यदि कोई बालक अपनी प्रतिभा से समाज को एकाएक चौंका दे तो लोग उसकी तुलना आइंस्टाइन से करने लगते हैं. उनके बारे में कुछ और बताने को कहा जाए तो लोग कहेंगे कि उन्हें संगीत से भी प्यार था. वे गांधी के प्रशंसक तथा विश्वशांति के अग्रदूतों में से एक थे. नए-नए देश बने इजरायल ने उन्हें अपना राष्ट्रपति बनने का न्योता दिया था, मगर उन्होंने विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया था. लोग उन्हें संवेदनशील वैज्ञानिक मानते हैं. आइंस्टाइन का यह कथन, ‘मनुष्य के लिए मनुष्य से ज्यादा उपयोगी कुछ भी नहीं है’ᅳमहाभारत के कथन ‘न कि मानुषात् श्रेष्ठतरं हि किंचितः’ की याद दिलाता है. सापेक्षिकता का उनका सिद्धांत विशुद्ध वैज्ञानिकीय उपलब्धि था. आइंस्टाइन ने तो सहज भाव से बताया था कि पदार्थ और ऊर्जा अंतपर्रिवर्तनीय हैं. उस समय शायद ही किसी ने सोचा था कि उसके आधार पर बना परमाणु बम अच्छे-खासे देश की तबाही का कारण बनेगा. आगे चलकर उसी शोध के आधार पर परमाणु बम बना, जिसके कारण दूसरे विश्वयुद्ध में लाखों जापानियों की जानें गईं. कई लाख  हमेशा-हमेशा के लिए अपाहिज हो गए.

‘मिसाइल मैन’ अब्दुल कलाम की मृत्यु पिछले वर्ष हुई. भारत का बच्चा-बच्चा उनके नाम से परिचित है. बल्कि बड़ों से अधिक बच्चे कलाम साहब के बारे में जानते हैं. हिंदी में ‘बेस्टसेलर’ किताबें कम होती हैं. कलाम साहब की पुस्तक ‘अग्नि की उड़ान’ को उन्होंने भी पढ़ा जो सामान्यतः पढ़ने-लिखने से कतराते हैं. वे गांधी के देश के राष्ट्रपति थे. अजीब युति थी. राष्ट्रपिताᅳ‘अहिंसा का पुजारी’, ‘राष्ट्रपतिᅳ‘मिसाइल मैन!’ बुद्ध और महावीर के देश का एक ‘भारत रत्न’ जो ‘मिसाइल मैन’ भी है. देश में राष्ट्रपति का संबंध जनता से सीधे नहीं होता. बावजूद इसके दिवंगत कलाम साहब को जो ख्याति मिली, वह अनूठी थी. स्वयं उन्होंने भी खुद को जनता से दूर नहीं रखा. बल्कि लगातार लोगों से जुड़े रहे. खासकर शिक्षा के क्षेत्र में. अपने लिए कुछ जोड़ा नहीं. यहां तक की शादी तक नहीं की. उनके निधन के बाद पता चला कि वे कितने मितव्ययी थे. उनके निजी सामान में थे, कुछ कपड़े और ढेर सारी किताबें. घर वे दान में दे चुके थे. उनके भाई अब भी नुक्कड़ पर पान की दुकान चलाते हैं. उनके हजारों प्रशंसकों के प्रयास से ये बातें फेसबुक, इंटरनेट और पत्र-पत्रिकाओं में बिखरी पड़ी हैं. विद्यार्थी कलाम जैसा बनने के सपने देखते हैं. उनका सूक्ति-वाक्य कि ‘सपना वह नहीं है जो आप नींद में देखते हैं, सपने वे हैं जो आपको नींद ही नहीं आने देते.’ आज भी हजारों युवजनों की आंखों में बसता है.

ये चारों अपने समय की महानतम हस्तियां हैं. न जाने कितने ग्रंथ इन पर रचे गए हैं. सैंकड़ों-हजारों बार इनका उल्लेख हुआ है. ऐसे में इनके बारे में जानने योग्य रह क्या जाता है? यदि हम इन चारों की उपलब्धियों और बाद के फैसलों की तुलना करें तो समानता-सूत्र साफ दिखने लगते हैं. कुछ है जो इन्हें मन के धरातल पर एक करता है. उसकी पड़ताल द्वारा हम जान सकते हैं कि अपने-अपने क्षेत्र में विरलतम उपलब्धियों को प्राप्त करने वाले ये चारों जीवन के उत्तरकाल में लगभग एक समान मनस्थिति को जी रहे थे. वह अंतर्सूत्र क्या है? कौन-सी बात है जो अलग-अलग कालखंड की इन विभूतियों को एक साथ, एक मानसिक धरातल पर ले आती है?

संकेत हम ऊपर भी कर चुके हैं. चारों में अशोक सबसे पहले का है. इतिहास में सवार्धिक स्पेस भी वही घेरता है. राजा-महाराजाओं के लिए खून-खराबा बड़ी बात नहीं. साम्राज्यवादी लिप्साओं को साधने के लिए उन्होंने मनुष्यता का खूब लहू बहाया है. उनमें से शायद ही किसी को अपने किए पर मलाल हुआ हो. आरंभ में अशोक भी बाकी राजाओं जैसा था. साम्राज्यवादी लालसाओं से भरा महत्त्वाकांक्षी, क्रूर और अहंकारी सम्राट. उसकी युद्ध-लिप्सा ने कलिंग युद्ध में लाखों निर्दोष सैनिकों ने प्राणों की आहूति दी. कई लाख घायल हुए. समृद्ध राज्य तबाह हो गया. अपनी तलवार से जीवन-भर दूसरों को डराने वाला अशोक अंत में खुद इतना डरा कि अहिंसा का प्रचारक बन गया. जीव-जंतुओं की मौत पर पाबंदी लगा दी. जब तक जिया धर्म और नैतिकता का प्रचार करता रहा. देर से ही सही, पर समझा कि अपने भीतर के दानव को जीतने से बड़ा कोई विजेता नहीं होता.

अल्फ्रेड नोबेल ने डायनामाइट का आविष्कार खनन उद्योग को मदद पहुंचाने के लिए किया था. लेकिन विज्ञान की विवशता कि हर नई खोज अच्छे और बुरे परिणाम साथ-साथ लाती है. तीव्र विस्फोटक क्षमता के कारण डायनामाइट का उपयोग भी युद्ध सामग्री के रूप में किया जाने लगा. नोबेल के कारखाने युद्ध सामग्री निर्माण में आगे थे. डायनामाइट उनमें लगातार मांग वाला उत्पाद बन गया. दूसरी ओर डायनामाइट की मारक क्षमता के कारण लोग नोबेल को ‘हत्याओं का सौदागर’ कहने लगे. आरंभ में नोबेल अपने आलोचकों की ओर से निश्चिंत था. उसे केवल अपने मुनाफे की चिंता थी. उसके कारखाने सोना उगलते थे. उनमें बना बारूद न दोस्त देखता था, न दुश्मन, सिर्फ तबाही लाता था. युद्ध इंसानियत के लिए भले बरबादी का सबब हों, नोबेल के लिए वे समृद्धि का आधार थे. छोटी-मोटी घटनाओं के अलावा सब-कुछ ठीक-ठाक चल रहा था कि अचानक कुछ ऐसा घटा जिसने उसके सोच को बदलकर रख दिया.

1888 की बात. अल्फ्रेड नोबेल का बड़ा भाई लुडबिग नोबेल केन्स की यात्रा पर था. एक शाम वह पार्क में अकेला घूमने निकला था. अकस्मात वहीं उसकी मृत्यु हो गई. सुबह उसका शव पार्क से मिला. अखबारों में उसकी मृत्यु पर शोक संदेश प्रकाशित हुए. लेकिन एक अखबार ने गलती से लुडबिग की मृत्यु को अल्फ्रेड की मृत्यु समझकर हेडलाइन के रूप में छापाᅳ‘हत्यारों के सौदागर नोबेल की मौत.’ आगे शोक संदेश के रूप में उसने लिखाᅳ‘डा. अल्फ्रेड नोबेल जिसने ऐसे आविष्कारों से अकूत दौलत समेटी थी जिनसे लोगों को पहले की अपेक्षा अधिकाधिक तत्परता से मौत के घाट उतारा जा सकेᅳका कल निधन हो गया.’2 अखबार अल्फ्रेड नोबेल के हाथों में पहुंचा तो उसका माथा घूम गया. वह आजीवन अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के लिए जिया था. विज्ञान और इंजीनियरी उसका जुनून थे. उसके लिए उसने विवाह तक नहीं किया था. एकाएक उसे अपनी समस्त उपलब्धियां गौण दिखने लगीं. वह नहीं चाहता था कि लोग उसे ‘हत्याओं के सौदागर’ के रूप में याद रखें. प्रायश्चित की डगर पर कदम बढ़ाते हुए उसने अपनी कुल संपत्ति का 94 प्रतिशत हिस्सा ट्रस्ट के नाम कर दिया. वह बड़ा काम था. प्रायश्चितबोध अथवा अपकीर्ति से बचने के लिए नोबेल ने जो किया, उसका सुफल उसके नाम से दिए जाने वाले पुरस्कारों के रूप में हमारे सामने है. आज वह संस्था विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, विश्व-शांति, साहित्य आदि क्षेत्रों में विशेष योगदान देने वाली प्रतिभाओं को पुरस्कृत करती है; और दुनिया को उन स्थितियों से उबारने हेतु कृत-संकल्प है, जिनके माध्यम से नोबेल ने अकूत संपदा अर्जित की थी. अपने नाम से पुरस्कारों की स्थापना नोबेल को कुशल व्यापारी सिद्ध करती है, जो मानता था कि दौलत से सब कुछ खरीदा जा सकता है. अपकीर्ति को ढकने लायक यश-प्रतिष्ठा भी.

आइंस्टाइन ने परमाणु बम का आविष्कार नहीं किया था. 1905 में ‘सापेक्षिकता का विशिष्ट सिद्धांत’ प्रस्तुत करते समय उन्होंने स्वयं को शांतिवादी घोषित किया था. 1929 तक वे स्वयं को अमन-पसंद कहते रहे. उस समय देश पर पूरे विश्व पर युद्ध के बादल मंडरा रहे थे. उनका दावा था कि यदि युद्ध घोषित होता है तो उसके कारण चाहे जो भी, वे हमेशा उसके विरोध में रहेंगे. हालात तब बदले जब 1933 में हिटलर ने जर्मनी में सत्ता संभाली और उसके नेतृत्व में जर्मनी युद्ध की राह पर चल पड़ा. देखते ही देखते पूरे विश्व का ध्रुवीकरण होने लगा. प्रकट रूप में आइंस्टाइन तब भी स्वयं को युद्ध-विरोधी घोषित करते रहे. उन्हीं दिनों एक सूचना अफवाह की तेजी से फैलने लगी कि जर्मनी परमाणु बम पर काम कर रहा है. इस डर को हवा देने में पूंजीपतियों की हथियार उत्पादक लाबी का भी योगदान था.

आइंस्टाइन के निष्कर्ष-सूत्र E=MC2 को आधार मानकर अमेरिकी वैज्ञानिक लियो सिज्लार्ड और यूजीन बिग्नर यूरेनियम के परमाणु के विखंडन पर काम कर रहे थे. वे चाहते थे कि अमेरिकी सरकार परियोजना को आगे बढ़ाने में उनका सहयोग करे. लेकिन उनकी हैसियत ऐसी नहीं थी कि सरकार को प्रभावित कर सकें. आइंस्टाइन इस काम को कर सकते थे, मगर वे शांति-समर्थकों में से थे. वे परमाणु बम के समर्थन में सरकार के आगे सिफारिश करने को तैयार होंगे, इसकी संभावना कम ही थी. अंततः किसी तीसरे आदमी की मदद से आइंस्टाइन को विश्वास दिलाया गया कि जर्मनी बम बनाने की कगार पर है. उसके वैज्ञानिक परमाणु विखंडन की तकनीक खोज चुके हैं. एक तानाशाह के हाथों में परमाणु शक्ति जाए, यह आइंस्टाइन भी नहीं चाहते थे. अनमने भाव से उन्होंने राष्ट्रपति रूजवेल्ट को पत्र लिखने की सहमति दे दी. पत्र का मसौदा सिज्लार्ड ने तैयार किया था.

पत्र मिलते ही रूजवेल्ट ने ‘ब्रिग्स समिति’ का गठन कर दिया. 1940 तक समिति सुस्त चाल से काम करती रही. बम निर्माण के लिए यूरेनियम के परमाणु के विखंडन में सफल होना पर्याप्त नहीं था. विपुल ऊर्जा के निमित्त उस प्रक्रिया को ‘चेन रिएक्शन’ में बदलने की चुनौती वैज्ञानिकों के सामने थी. आइंस्टाइन उस रहस्य को समझते थे. मगर वे तटस्थ थे. अचानक ‘ब्रिग्स समिति’ को आइंस्टाइन के हस्ताक्षर युक्त पत्र प्राप्त हुआ. उसमें जर्मनी का डर दिखाते हुए बम निर्माण के काम में तेजी लाने का आग्रह था. पत्र सिज्लार्ड द्वारा आइंस्टाइन के फर्जी हस्ताक्षर से लिखा गया था. उस समय तक ‘चेन  रिएक्शन’ का सिद्धांत वैज्ञानिकों की समझ में आ चुका था. राह आसान होते ही वैज्ञानिकों के दल का नेतृत्व कर रहे वेनेवर बुश ने आइंस्टाइन से सूचनाओं को छिपाना शुरू कर दिया. उसका मानना था कि आइंस्टाइन बम परियोजना को ‘उस तरह से गोपनीय नहीं रख पाएंगे, जिस तरह से उसे रखना चाहिए.’ अंततः परमाणु बम बना. उसकी विभीषिका हिरोशिमा और नागासाकी पर देखने को मिली, उसने पूरे विश्व को हिला दिया. आइंस्टाइन युद्ध की विभीषिका का अनुमान लगा चुके थे. इसलिए 1944 में ही सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक नील बोह्र को पत्र लिखकर उन्होंने कहा था कि युद्ध समाप्ति के उपरांत दुनिया के सभी देशों को विश्वशांति के लिए मिलकर काम करना चाहिए. नबंवर 1954 में अपनी मृत्यु से कुछ ही महीने पहले परमाणु बम के निर्माण को लेकर अपनी गलती स्वीकारते हुए उन्होंने कहा थाᅳ‘मैंने जीवन में एक बड़ी गलती की है….परमाणु बम के निर्माण को लेकर राष्ट्रपति रूजवेल्ट को पत्र लिखना. अपनी सफाई में मैं कह सकता हूं कि अमेरिका देर करता तो जर्मनी उसे पहले ही बना लेता.’ बम निर्माण में सीधा योगदान न होने के बावजूद आइंस्टाइन आजीवन ग्लानिबोध में डूबे रहे. कदाचित वही बतौर प्रायश्चित शांति-प्रयासों के रूप में सामने आया. विश्वशांति की स्थापना हेतु उन्होंने रवींद्रनाथ ठाकुर, बट्रेंड रसेल, महात्मा गांधी आदि के साथ मिलकर अथक प्रयत्न किए.

अब्दुल कलाम सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक, सफल इंजीनियर और भारतीय गणराज्य के 11वें राष्ट्रपति थे. उनके नेतृत्व में भारत में परमाणु शक्ति का दूसरा परीक्षण किया. वे श्रेष्ठ अभियंता और समर्पित वैज्ञानिक थे. वैज्ञानिक और विज्ञान व्यवस्थापक के रूप में  उन्होंने ‘रक्षा अनुसंधान एवं विकास परिषद’ तथा ‘भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन’ के साथ चार दशकों तक सफलतापूर्वक काम किया. आइंस्टाइन विज्ञान का उपयोग शांति और समृद्धि के लिए करने के समर्थक थे. कलाम साहब का मानना था कि विकास के लिए शांति और शांति के लिए शक्ति का होना आवश्यक है. आधुनिक विज्ञान के पितामह कहे जाने वाले फ्रांसिस बेकन के कथन ‘ज्ञान ही शक्ति है’ पर उन्हें विश्वास था. हालांकि शक्ति-कामना से उनका मंतव्य संसाधनों की उपलब्धता और सुरक्षा से था. उनके कार्यकाल में भारत प्रक्षेपास्त्र प्रणाली तथा आग्नेयास्त्रों के उत्पादन में स्वावलंबी बना. ‘अग्नि’ और ‘पृथ्वी’ जैसे आग्नेयास्त्रों का निर्माण हुआ, जो परमाणु बम जैसे विध्वंसक अस्त्रों को ढोकर ले जा सकते हैं. जाहिर है तबाही में सहायक हैं.

तीव्र राष्ट्रीयताबोध छोटे-मोटे मनोभावों को आसानी से ढक लेता है. कलाम साहब के व्यवहार से ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता जिससे लगे कि मारक आग्नेयास्त्रों के निर्माण को लेकर उन्हें किसी तरह की आत्मग्लानि थी. सार्वजनिक जीवन की भारी-भरकम जिम्मेदारियों के रहते व्यक्तिगत मनोभावों का प्रकटीकरण संभव भी नहीं था. मगर कहीं न कहीं उन्हें विश्वास था कि युद्ध शासकों की विवेकहीनता की उपज होता है. सत्ता से जुड़े लोग निजी महत्त्वाकांक्षाओं को राष्ट्रभक्ति का दर्जा देकर जनसाधारण का भावनात्मक दोहन करते रहते हैं. विवेकवान समाज युद्धों को यथासंभव टालता है. उसके लिए आवश्यक है कि लोग दिलो-दिमाग से स्वतंत्र हों. महत्त्वपूर्ण निर्णय अपने विवेक से लेना पसंद करते हों. वे बेहतर सरकार के लिए बेहतर समाज की रचना में यकीन रखते थे. इसलिए राजनीतिक जिम्मेदारियों से मुक्त होने के साथ ही उन्होंने खुद को युवाओं और किशोरों में ज्ञार्नाजन की ललक जगाने के लिए समर्पित कर दिया था. 1999 में सलाहकार वैज्ञानिक के पद से मुक्ति के बाद उन्होंने दो वर्ष के भीतर एक लाख विद्यार्थियों से मिलकर उनमें ज्ञान-चेतना जगाने का संकल्प लिया था. उनका कहना था कि उन्हें बड़ी कक्षा के विद्यार्थियों की अपेक्षा हाईस्कूल स्तर के विद्यार्थियों को संबोधित करने में अधिक खुशी मिलती है. मृत्यु के दिन भी वे ‘इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ मेनेजमेंट’ में ‘पृथ्वी को रहने लायक ग्रह’ बनाने जैसे विषय पर वक्तव्य देने के लिए के लिए शिलांग पहुंचे हुए थे. यह सब उनके वर्तमान के प्रति असंतोष को दर्शाता है, जिनमें उनकी अपनी उपलब्धियां भी शामिल थीं.

जाहिर है चारों महान हस्तियां जिनका हमने ऊपर उल्लेख किया, अपनी उपलब्धियों से घबराई हुई थीं. ध्वंस या उसकी तैयारी में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष भागीदारी का एहसास तथा उससे उत्पन्न ग्लानिबोध आजन्म उनके दिलो-दिमाग पर छाया रहा. उनके जीवन को समझना मानव-व्यक्तित्व की जटिल गुत्थियों से दो-चार होना है. वस्तुतः कोई भी मनुष्य नितांत अच्छा या बुरा नहीं होता. व्यक्ति का परिवेश उसके निर्णय को प्रभावित कर, उसे अच्छा या बुरा बनाता है. कार्य चाहे जैसा हो कर्ता के पास उसके समर्थन में कोई न कोई तर्क होता है. यानी मनुष्य की कोशिश मूलतः खुद को ‘अच्छा’ सिद्ध करने की होती है. उस समय कर्ता यदि ऊंचे पद पर हो तो उसके अच्छे या बुरे निर्णय से इतिहास करवट लेने लगता है.

भारतीय मनीषा ने मति को चंचल माना है. उसपर विवेक का अंकुश अनिवार्य है. आत्मा के बारे में कहा गया है कि वह मनुष्य की सच्ची मार्गदर्शक होती है. भटकाव के समय मनुष्य को सावधान करती है. इसलिए आस्थावादी उसे ईश्वर का अंश मानते आए हैं. फ्रायड ने मानव-वृत्तियों को ‘इद’(Id), ‘ईगो’(Igo) तथा ‘सुपर ईगो’ में बांटा है. इन्हें क्रमशः ‘इदम्’, ‘अहम्’ और ‘अतिअहं’ भी कहा जा सकता है. ‘इदम्’ मनुष्य की विशेष मनोवृत्ति है. इसके प्रभाव से सुखासक्ति और वासना जैसी मूलभूत ऐषणाओं की उत्पत्ति होती है. ये मनुष्य को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं. ‘ईगो’ अथवा ‘अहम्’ मानव-व्यवहार को समाज द्वारा निर्धारित मर्यादाओं में रखने की कोशिश करता है. यह वैध इच्छाओं, जिन्हें समाज की स्वीकृति प्राप्त हैᅳकी उत्पत्ति के लिए भी जिम्मेदार होता है. ‘सुपर ईगो’, ‘इदम्’ (मनुष्य की तमाम सुखेच्छाओं) तथा ‘ईगो’ (समाज द्वारा मान्य सुखेच्छाओं) के बीच समन्वय और नियंत्रण की भूमिका निभाता है, इसलिए इसको ‘विवेक बुद्धि’ भी कहा गया है. इनके अलावा मानव-व्यक्तित्व के कुछ अन्य लक्षण भी होते हैं, जो जन्मजात, कदाचित प्रकृति की ओर से उपहार में प्राप्त होते हैं. यह कि प्रत्येक मनुष्य स्वतंत्र रहना चाहता है. इसके साथ-साथ हरेक मनुष्य न्याय और अच्छाई को सद्गुण मानता है. अपने प्रत्येक निर्णय को न्यायोचित ठहराने की वांछा इसी से अभिप्रेत होती है. लेकिन अपने आपको ‘अच्छा’ सिद्ध करना, यानी अपने पक्ष को तर्कसम्मत ढंग से पेश करना तथा प्रत्येक कृत्य को न्याय-संगत सिद्ध करना अलग-अलग बाते हैं. खुद को ‘अच्छा’ सिद्ध करते समय मनुष्य अपने दृष्टिकोण से बंधा होता है. उस समय वह हालात का अपने विवेकानुसार विवेचन और इस्तेमाल करता है. जबकि खुद को न्यायसंगत सिद्ध करते समय उसे समाज द्वारा निर्धारित कसौटियों पर खरा उतरना पड़ता है. सामान्य मनुष्यों के लिए इसमें बहुत अंतर नहीं पड़ता. वे प्रायः रोजी-रोटी के संघर्ष में उलझे होते हैं. उनके जीवन-संघर्ष और भटकावों में सामान्य एकरूपता होती है. जैसे झूठ बोलना, नशा करना, यह मानते हुए भी कि जीव-हत्या पाप हैᅳमांस का सेवन करना. इस सूची को मिलावट और छोटी-मोटी बेईमानी तक बढ़ाया जा सकता है. चूंकि सामान्य लोगों के लक्ष्य भी सामान्य होते हैं, अतएव दूसरे उनके बारे में क्या सोचते हैं, इसकी उन्हें परवाह नहीं होती. समाज ऐसे विचलनों को प्रायः नजरंदाज कर देता है. उनसे ऊपर के लोगों की सामान्य इच्छा होती है कि समाज उनकी विशिष्टताओं का सम्मान करे. जबकि अतिविशिष्ट किस्म के लोग जिन्हें लगता है कि वे आने वाले इतिहास का हिस्सा हैं, अपनी छवि-निर्माण के प्रति खासे सतर्क होते हैं. अपवादों से खुद को दूर रखना उनकी प्रवृत्ति होती है. अपवाद का भय एकाएक भी उत्पन्न हो सकता है. जैसा अल्फ्रेड नोबेल के साथ हुआ था. और किसी महान हस्ती या विचार के संपर्क में आने के बाद भी. जैसे अशोक के मामले में. व्यक्ति बहुत संवेदनशील हो तो अपवाद की संभावना ही उसे विचलित किए रहती है. सृजनशील मानस उसका तोड़ अपनी सर्जना से ही निकालता है.वह पुनः नवनिर्माण की राह पर निकल पड़ता है. जैसे आइंस्टाइन ने किया. युद्ध की विभीषिका को टालने के लिए वे निरंतर युद्ध विरोधी अभियान का हिस्सा बने रहे. कलाम साहब भी बेहतर समाज की संरचना के लिए हमेशा समर्पित रहे.

आत्मग्लानि से गांधी जैसा परंपरावादी भी बच नहीं पाया था. पिता की मरणासन्न अवस्था में पत्नी के साथ सहवासरत रहने का अपराधबोध उनके मन में ऐसा पैठा था उसके समाहार हेतु ब्रह्मचर्य प्रयोगों में लगे रहकर अपनी ही बनाई कसौटी पर खुद को कसते रहे. अपराधबोध और आत्मग्लानि बहुत अधिक बढ़ जाए और उसके समाहार का कोई रास्ता न दिखे तो बात जान पर भी बन आती है. छायाकार केविन कार्टर का उदाहरण सामने है. यथार्थवादी छायाकार बनने की कोशिश में वह कब यथार्थ से कट गया, उसे पता ही नहीं चला था. तीन दशक पहले दक्षिणी अफ्रीका में जघन्य अपराधियों को मृत्युदंड देने के लिए बेहद नृशंस तरीका अपनाया जाता था. उसमें अपराधी की छाती और बांहों को पैट्रोल भरे टायर से कसकर बांध दिया जाता, फिर उसमें आग लगा दी जाती. अपराधी तड़फते हुए जान देता. दिल दहला देने वाली उन घटनाओं को कैमरे में कैद करने वाला कार्टर पहला छायाकार बना. शुरू में उसे वे घटनाएं स्तंभित करती थीं. बाद में जब लगा कि लोग उनमें रुचि लेते हैं, तो उसे वह अपने कार्य सामान्य हिस्सा मानकर करने लगा. उसकी पराकाष्ठा सूडान के अकाल में सामने आई. भीषण अकाल की मार झेल रहे इलाकों का निरीक्षण करते हुए कार्टर ने एक चित्र खींचा, जिसमें भूख से बिलबिलाती अबोध बच्ची दाने की तलाश में जमीन पर झुकी है. उसके पीछे घात लगाए एक गिद्ध बैठा है. गिद्ध को उड़ाए बिना केविन ने उस बच्ची के कई चित्र लिए. उनमें से एक चित्र ‘न्यूयार्क टाइम्स’ के 26 मार्च 1993 के अंक में प्रकाशित हुआ. उसके लिए केविन को ‘पुल्तिजर पुरस्कार’ प्रदान किया गया. सूडान के अकाल की विभीषिका से पूरी दुनिया को परचाने के लिए उसे सर्वत्र सराहना मिली. लेकिन कुछ ही दिन बाद चित्र पर सवाल उठने लगे. लोग उस बच्ची के बारे में जानना चाहते थे. केविन ने सफाई देने की कोशिश की कि संक्रामक रोगों की आशंका के चलते पत्रकारों और फोटोग्राफरों को भुखमरी के शिकार लोगों को छूने की मनाही थी. मगर आलोचनाएं बदस्तूर जारी रहीं. केविन की तुलना उस बच्ची के पीछे घात लगाकर बैठे गिद्ध से की जाने लगी. इससे वह प्रतिभाशाली छायाकार अवसाद में रहने लगा. अवसाद इतना बढ़ा कि उसे जीवन से मौत आसान दिखने लगी. आत्महत्या के लिए भी उसने बड़े ही दर्दनाक तरीके को अपनाया.

इन कहानियों से पता चलता है कि मनुष्य के लिए केवल अच्छा होना पर्याप्त नहीं है. अपने अच्छेपन को दूसरों के अच्छेपन को उबारने के लिए प्रयुक्त करना, ताकि अधिक से अधिक लोगों का कल्याण हो, ही सच्ची मानवता है.

ओमप्रकाश कश्यप

 

1. Amidst the tens of thousands of names of monarchs that crowd the columns of history, their majesties and graciousnesses and serenities and royal highnesses and the like, the name of Ashoka shines, and shines, almost alone, a star.’ H. G. Wells, The Outline of History.
2. Le marchand de la mort est mort (“The merchant of death is dead”)….”Dr. Alfred Nobel, who became rich by finding ways to kill more people faster than ever before, died yesterday.”Golden, Frederic (16 October 2000). in The Worst and The Brightest , Time.

 

बहुजन साहित्य की रूपरेखा

सामान्य

एफपीबुक ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’ के बहाने

वेब संस्करण की घोषणा हो चुकी थी. वह समयानुसार काम भी करने लगा था. बावजूद इसके ‘फारवर्ड प्रेस’ द्वारा जून—2016 के बाद ‘प्रिंट संस्करण’ के बंद होने की घोषणा मन में आशंका पैदा करने वाली थी. ऐसे में ‘एफपी बुक्स’ की पहली खेप का आगमन बड़ा ही आह्लादकारी है. अपनी प्रतिबद्धता और वायदे पर खरा उतरने के लिए फारवर्ड प्रेस(अब एफपी बुक्स) के संपादक-द्वय आयवन कोस्का और प्रमोद रंजन चिर प्रशंसा के पात्र हैं. पत्रिका अपनी रीति-नीति में आरंभ से ही स्पष्ट रही है. हिंदी में बहुजन साहित्य की अवधारणा को बीच-बहस उतारने तथा तत्संबंधी प्रश्नों को लेकर उत्तेजक एवं महत्त्वपूर्ण बहसों की शुरुआत का श्रेय इसी पत्रिका को जाता है. तीन पुस्तकों की शृंखला में एक का शीर्षक ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’ है. पुस्तक-सामग्री का अधिकांश हिस्सा इसी पत्रिका के विभिन्न अंकों में प्रकाशित हो चुका है. बावजूद इसके विषयगत आलेखों को एक स्थान पर ले आना समीचीन था. यह कार्य समय रहते हुआ, इसके लिए भी संपादक द्वय प्रशंसा के पात्र हैं. पुस्तकाकार रचना पत्रिकायी कलेवर से कहीं अधिक प्रभावी, आकर्षक तथा दूरगामी महत्त्व रखती है. यदि ‘एफपी बुक्स’ की शृंखला पांच वर्ष भी सफलतापूर्वक चली; और प्रकाशकगण इन पुस्तकाकार संस्करणों की, पत्रिका-संस्करण की अपेक्षा आधी प्रतियां भी बेचने में सफल रहे तो यह न केवल बहुजन साहित्य की सैद्धांतिकी विकसित करने में मददगार होगी, बल्कि तब तक ब्राह्मणवाद को चुनौती देने में सक्षम समानांतर जनसंस्कृति के पक्ष में पुख्ता सोच तैयार हो चुकी होगी.

पुस्तक में लेखों को तीन खंडों में संयोजित किया गया है—ओबीसी साहित्य विमर्श, आदिवासी साहित्य विमर्श तथा बहुजन साहित्य विमर्श. उनके माध्यम से हम ‘ओबीसी साहित्य विमर्श’ से ‘बहुजन साहित्य विमर्श’ तक की यात्रा को भी समझ सकते हैं. हालांकि वह अभी अपने आरंभिक पड़ाव पर ही है. पुस्तक की सामग्री विचारोत्तेजक है. विशेषकर कंवल भारती, प्रेम शंकर मणि के लेख, जो सोचने को विवश करते हैं. यहां दो आलेखों का संदर्भ प्रासंगिक है. पहला सुप्रिसिद्ध भाषाविद् डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह का आलेख. ‘ओबीसी’ साहित्यकारों के बारे में उनका अध्ययन विशद् है. वे इस धारा के प्रथम प्रस्तावक माने जाते हैं. ब्राह्मणवादियों के लिए जाति का मुद्दा ईश्वर और धर्म से कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण रहा है. इसलिए ईश्वर और धर्म के नाम पर अलग-अलग मत रखने वाले ब्राह्मणवादियों में जाति के नाम पर अटूट एकता दिखती है. पिछले ढाई-तीन हजार वर्षों में धर्म ने तरह-तरह के बदलाव देखे हैं. इस कारण इसे जीवन-शैली भी माना जाता है. लेकिन इस बीच जाति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है. लोगों की अशिक्षा का लाभ उठा, संस्कृति की मनमानी व्याख्या करते आए ब्राह्मण पहले भी शिखर पर थे, आज भी शिखर पर हैं. इस मनुवादी षड्यंत्र को डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह गंभीरता से सामने लाते हैं. अपने लेख के माध्यम से वे बहुजन साहित्य की आवश्यकता को भी रेखांकित करते हैं.  दूसरा आलेख वरिष्ठ लेखक-समालोचक  डॉ. चौथीराम यादव का है, जिसमें वे पिछड़े वर्ग के लेखकों के अवदान की याद दिलाते हैं. दोनों विद्वान दलित साहित्य के विकास में पिछड़ी जातियों के साहित्यकारों की भूमिका को चिह्नित करते हैं. यह चिह्नन तथाकथित मुख्यधारा के साहित्य के समानांतर अपनी पहचान बना चुके दलित साहित्यकारों को यथारूप स्वीकार नहीं है. स्वीकार हो भी क्यों! जिस समय जातीय असमानता का सर्वाधिक शिकार रहे दलित-लेखक साहित्य की समानांतर धारा को स्थापित करने के लिए सतत संघर्ष कर रहे थे, पिछड़े वर्ग के लेखक विचित्र-से ऊहापोह में थे. द्विज लेखक उन्हें ईमानदारी से स्वीकारने को तैयार नहीं थे; और दलितों के साथ जाना उन्हें स्वयं अस्वीकार था. अपनी प्रतिभा, लगन और निरंतर संघर्ष द्वारा दलित लेखकों ने तथाकथित मुख्यधारा के साहित्य के समानांतर परिवर्तनकामी साहित्य को खड़ा करने में सफलता प्राप्त की है. अपनी उपलब्धि पर गर्व करने का अधिकार उन्हें है. इसीलिए कबीर, फुले, पेरियार आदि जो दलित साहित्य में पहले से ही सम्मानित स्थान रखते हैं, को ‘ओबीसी’ के नाम पर झटक लेना उन्हें स्वीकार नहीं है. कमोबेश यही मानसिकता आदिवासी पृष्ठभूमि के साहित्यकारों की भी है. बात सही है. दलित साहित्य दमन के विरुद्ध चेतना का साहित्य है. इसमें उन वर्गों की चेतना अभिव्यक्त होती है, जिन्हें इतिहास के दौर में सर्वाधिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी है. पुस्तक के कुछ लेखों में बहुजन साहित्य को लेकर स्वागत का भाव है, तो कुछ को पढ़कर लगता है कि दलित साहित्यकार बहुजन साहित्य की धारा में पूरी तरह समाहित होने के बजाए उसमें बड़े भाई की भूमिका को बनाए रखना चाहते हैं. साहित्य में बहुजन विमर्श की नवागंतुक धारा जो अभी केवल प्रस्तावना तक सीमित है, जिसकी रूपरेखा तक अस्पष्ट है—को लेकर स्थापित साहित्यकारों का दुराव अस्वाभाविक नहीं है.

अच्छी बात यह है कि ‘ओबीसी साहित्य’ को लेकर दलित और आदिवासी साहित्यकारों के जितने भी किंतु-परंतु हैं, ‘बहुजन साहित्य’ के अपेक्षाकृत बड़े कैनवास में उनका समाधान दिखने लगता है. उम्मीद की जानी चाहिए कि जैसे-जैसे बहुजन साहित्य की रूपरेखा स्पष्ट होगी, एक-दूसरे के प्रति समझ में इजाफा होगा—अंतर्विरोधों का समाहार स्वतः होता जाएगा. हालांकि बहुजन साहित्यकारों के कुछ घटकों के समक्ष पहचान का जो संकट अभी है, वह आगे भी बना रह सकता है. दरअसल बहुजन साहित्यकारों में जिन घटकों के सम्मिलन की परिकल्पना हम करते हैं, उनमें दलित, स्त्री-अस्मितावादी, आदिवासी साहित्य-धारा काफी परिपक्व हो चुकी है. जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग के साहित्य को लेकर इन्हीं जातियों के साहित्यकार किंतु-परंतु में उलझे हुए हैं. बहुजन साहित्य के एक अन्य घटक आदिमजाति साहित्य के समक्ष भी यही दुविधा बनी हुई है.

यह सच है कि दलित साहित्यकार जिन्हें अपना मूल प्रेरणास्रोत मानते हैं, उनमें से कई पिछड़ी जातियों से आए हैं. यह भी सच है कि दलितों पर अतीत में जो अत्याचार हुए, उनमें चाहे-अनचाहे पिछड़ी जातियों का भी हाथ रहा है. मगर अतीत की अप्रिय घटनाओं के आधार पर मन में गांठ पाल लेने से अच्छा है, भविष्य पर ध्यान दिया जाए. जातिवाद की पृष्ठभूमि की समझ इस संकल्प को आसान बना सकती है. ‘मनुस्मृति’ को मुख्यतः धर्म-ग्रंथ माना जाता है. इस ग्रंथ को लेकर यह अधूरी समझ है. वह केवल सामाजिक ऊंच-नीच को बढ़ावा देने वाली कृति ग्रंथ नहीं है, असल में वह समस्त संसाधनों पर मुट्ठी-भर लोगों के एकाधिकार की जन्मदाता है. वह ब्राह्मणों को पृथ्वी के समस्त संसाधनों का स्वामी घोषित करती है(सर्वं स्वं ब्राह्मणस्येदं यत्किझ्ज्जिगतीगतम्—मनु. 1/100). उस दौर में जब अर्थव्यवस्था खेती और पशु-संपदा पर आधारित थी. एक ओर संसार को माया कहना, उसे प्रपंचमय बताना, उससे दूर भागने का उपदेश देना और दूसरी तरफ समस्त संसाधन ब्राह्मणों के नाम घोषित करना—उस व्यवस्था के विरोधाभासों को दर्शाता है. जिसके कारण समाज सहस्राब्दियों तक कमजोर और देश बरसों-बरस गुलाम बना रहा. यह काम सोची-समझी नीति के तहत हुआ. इस तरह किया गया कि ब्राह्मण संपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श तथा जीवन की समस्त गतिविधियों का केंद्र बना रहे. आखिर ऐसा क्यों हुआ? मनुस्मृति की आलोचना आर्थिक वैषम्य को बढ़ावा देने वाले ग्रंथ के रूप में क्यों नहीं की गई? दरअसल ‘मनुस्मृति’ आलोचना की शुरूआत उन वर्गो की ओर से हुई जो कम से कम में गुजारा करने, संतोष को परम धन मानते आए थे. जिनके लिए सामाजिक समानता आर्थिक समानता से अधिक मूल्यवान थी. उन्हें लगता था कि सामाजिक समानता का लक्ष्य प्राप्त होने के उपरांत आर्थिक समानता का मार्ग स्वत: प्रशस्त: हो जाएगा.

बहरहाल, मनु का नाम लेकर किसी अनाम-धूर्त्त ब्राह्मण द्वारा लिखी गई उस पुस्तक के माध्यम से  न्याय भावना का गला घोंटते हुए समस्त संसाधनों को ब्राह्मणों के नाम कर दिया गया. उस स्थिति में बाकी वर्गों को उनका आश्रित होना ही था. ‘मनुवादी व्यवस्था’ क्षत्रियों को दूसरे स्थान पर रख उन्हें संसाधनों की रखवाली का काम सौंपती है. क्षत्रियों का काम शक्ति-प्रबंधन से जुड़ा है. जिसके पास शक्ति है उसे निर्णय लेने का सलीका न हो तो भी समाज उसकी बातों को आदेश की तरह लेता है. क्षत्रियों ने भी अपने हित को देखते हुए मनुस्मृति के विधान कि ब्राह्मण समस्त संपदा का स्वामी और वे संरक्षक हैं, का अतिक्रमण करना आरंभ कर दिया था. यह विरोध आमने-सामने का नहीं था. मनुस्मृति से कमोबेश दोनों के स्वार्थ जुड़े थे. इसलिए प्रकट में दोनों ही उसका गुणगान करते थे. किंतु आंतरिक स्तर पर संघर्ष हमेशा बना रहता था. कुछ ऐसी घटनाएं भी रहीं जो उस संघर्ष को एकदम धरातल पर ले आती हैं. परशुराम-सहस्रार्जुन युद्ध, विश्वामित्र-वशिष्ठ जैसे संघर्षों की लंबी गाथा है. महाभारत से लेकर देवासुर संग्रामों तक, जिन्हें ब्राह्मण धर्मयुद्ध कहकर प्रचारित करते रहे हैं, वास्तव में संपत्ति और संसाधनों के बंटवारे की खातिर हुए युद्ध थे. महाभारत के कौरव-पांडव परस्पर चचेरे भाई थे, जबकि देवता, दानव, दैत्य आदि तो एक ही पिता की संतान थे. उनकी माएं जरूर अलग-अलग थीं. इतिहास लेखन से बचने वाले ब्राह्मणों ने, निहित स्वार्थ के लिए संपत्ति के बंटवारे की खातिर हुए संघर्षों का जानबूझकर मिथकीकरण किया है. परिणामस्वरूप इतिहास का सच समय की गहरी पर्तों में विलीन होता चला गया. यहां समुद्र मंथन की प्रतीक कथा का भी संज्ञान ले सकते हैं. उसमें असुरों को वासुकि नाग के फन की ओर खड़ा किया जाता है. देवता पूंछ संभालते हैं. नाग का फन न केवल भारी होता है. बल्कि सारा विष उसी ओर रहता है. इस तरह असुरों को आरंभ से ही कठिन चुनौती के लिए तैयार किया जाता रहा है. वे गाय की पूंछ पकड़कर वैतरणी पार करते आए हैं. समय के साथ आवश्यकताएं बढ़ीं तो हर नई जरूरत के नाम पर एक नई जाति समाज से जुड़ती चली गई. उन जातियों का न तो अपने श्रम पर अधिकार था, न ही श्रमोत्पाद पर. नतीजा यह हुआ कि अपने श्रम-कौशल पर पूरे समाज का भरण-पोषण करने वाले बहुजन, अल्पसंख्यक अभिजनों के बंधुआ बनकर रह गए. दासत्वबोध उनके स्वभाव का अभिन्न हिस्सा बन गया. गिरबी दिमाग या तो नियति को कोसता; अथवा ‘स्वामी-सर्वेसर्वा’(बॉस इज आलवेज राइट) की भावना के साथ गर्दन झुकाए काम करता रहता था. मार्क्स ने यही बातें द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के माध्यम से कही हैं. इसलिए ब्राह्मणवादियों को वामपंथ और मार्क्स फूटी आंख नहीं सुहाते.

आगे चलकर कर्मकांडों में वृद्धि हुई. यायावर ऋषियों के स्थान पर परंपराबद्ध पुरोहित वर्ग छाने लगा. जब तक कर्मकांड आश्रम-केंद्रित रहे, वर्ण-व्यवस्था में कम ही सही, अंतरण की संभावना बनी रही. सत्यकाम जाबाल, मतंग, कर्दम, महीदास, रैक्व, विश्वामित्र आदि ने अपनी प्रतिभा के आधार पर उच्च वर्गों में अंतरण किया. यहां गिनाए गए नामों में पहले पांच ऋषि शूद्र वर्ग से आए थे. ब्राह्मण-ग्रंथों में उनके नाम इसलिए बचे रहे क्योंकि वे मानसिक रूप से ब्राह्मणवादी व्यवस्था को अपनाकर उसके प्रवक्ता बन चुके थे. अजित केशकंबलि, कौत्स, पूर्ण कस्सप, मक्खलि गोसाल भी शूद्र और अपने समय के प्रखरतम दार्शनिक थे. वे ब्राह्मणों के बौद्धिक वर्चस्व को चुनौती देते थे. वेदों को ‘धूर्त्त-भांड और निशाचरों’ की कृति बताकर उनका मखौल उड़ाते थे. इसलिए उनके नाम ब्राह्मण-ग्रंथों से पूरी तरह गायब हैं. सिवाय कौत्स के. कौत्स को वे नहीं मिटा पाए. क्योंकि स्वयं यास्क ने ‘निरुक्त’ के पंद्रहवें अध्याय में उसका उल्लेख किया है. पाणिनी शिष्य, अपने समय का महान वैयाकरणाचार्य कौत्स वैदिक ऋचाओं को ‘निरर्थक’ मानता था, ‘यदि तर्कपूर्ण ढंग से विश्लेषण किया जाए, तो वैदिक ऋचाएं अर्थविहीन काव्य हैं’(निरुक्त पंद्रहवां अध्याय). कालांतर में यज्ञादि कर्मकांड आश्रमों से निकलकर गृहस्थों की जीवनचर्या का हिस्सा बनने लगे तब स्वार्थी और कूपमंडूक पुरोहित वर्ग ने जन्म लिया. उससे पहले यज्ञादि कर्मकांड मुख्यतः ब्राह्मणों एवं क्षत्रियों तक सीमित थे. पुरोहित वर्ग द्वारा उनका विस्तार समाज के दूसरे वर्गों तक होने लगा. अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए उसने निकृष्ट समझे जाने वाले कार्यों में लगी जातियों को अस्पृश्य घोषित कर दिया. खुद को ऊंचा दिखाने के लिए ब्राह्मण पुरोहितों ने अस्पृश्यों से दूरी बनानी शुरू कर दी. अस्पृश्य होने के कारण ब्राह्मण उनके घरों में प्रवेश नहीं कर सकता था. परिणामस्वरूप अस्पृश्य कही जाने वाली जातियों से काम कराने की जिम्मेदारी निम्न और मंझोली जातियों पर आ गई. वे स्वयं ब्राह्मणवाद की शिकार थीं. परंतु परिवर्तनकारी चेतना के अभाव में वे अपने शोषकों को ही अपना पालक और मुक्तिदाता मान बैठी थीं. धीरे-धीरे यही उनका संस्कार बनता गया. जब यह व्यवस्था जम गई और ब्राह्मणों का काम आसानी से होने लगा, तब उन्होंने खुद को अस्पृश्यों की छाया से भी दूर रखना शुरू कर दिया. लेकिन यह लोक चलन, यानी महज दिखावे के लिए था. पर्दे के पीछे जारकर्म चलता ही रहता था. आगे चलकर इसी ने सैकड़ों मिश्रित वर्णों और जातियों को जन्म दिया. जातीय उत्पीड़न का निरंतर शिकार रहे अछूतों ने भी कालांतर में अस्पृश्यता को अपनी नियति मान लिया. समय-समय पर जन्मे महापुरुषों ने उनकी चेतना को जगाने की कोशिश भी. परंतु आमूल परिवर्तनकारी दौर सभ्यता के इतिहास में कभी नहीं आ सका.

व्यवस्था के प्रति नासमझी उसकी मनमानियों को बढ़ावा देकर उन्हें चिर-जीवी बनाती है. निरंकुशता लंबी चले तो लोग हालात से समझौता कर उनके आगे समर्पण कर देते हैं. मुक्ति की चाहत जगे भी तो व्यवस्था से अनुकूलित मानस पहले उन्हीं हथियारों को आजमाता है, जो उसकी दुर्दशा का कारण रहे हैं. पाब्लो फ्रेरा के अनुसार उत्पीड़न के कारणों की अपर्याप्त समझ की वजह से, ‘उत्पीड़ित अपनी मुक्ति उत्पीड़क की भूमिका में आने देखता है’(उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र). जाहिर है, दुर्दशा के कारणों के प्रति आधी-अधूरी समझ परिवर्तनकामी आंदोलनों को उनके लक्ष्यों से दूर रखती है. लोग अपनी दुरावस्था के कारणों को समझ न सकें, इसमें धर्म की बड़ी भूमिका होती है. जैसे विकट विपन्नता के लिए आर्थिक असमानता और संसाधनों पर कुछ लोगों के एकाधिकार के बजाय पूर्व जन्म के कर्मों को दोषी ठहराना, स्वर्ग-नर्क की अभिकल्पना, पूजा-पाखंड को संस्कार और माला फेरने, नाम रटने को ज्ञान-साधना की संज्ञा देना आदि. ये सब ब्राह्मणों के वर्चस्ववादी षड्यंत्र का हथियार बने हैं. दुरावस्था के कारणों की आधी-अधूरी समझ ने कई जनांदोलनों को भटकाया है. उदाहरण के लिए वर्ण-व्यवस्था से त्रस्त लोगों ने मुक्ति की चाहत में मनु को गालियां दीं, मनुस्मृति को जलाया, असमानता थोपने के लिए हिंदू धर्म को कोसा, परंतु उन लोगों से दूरी बनाए रहे, जो भिन्न जातीय स्तर पर होने के बावजूद उसके उतने ही शिकार थे, जितने वे. न ही संसाधनों पर एकाधिकार के तथाकथित धर्म-विधान को उन्होंने सीधी चुनौती दी. जबकि क्षत्रियों ने, जैसा कि हमने पहले भी संकेत किया है, इस व्यवस्था को वहीं तक स्वीकारा जहां तक उनके वर्गीय हित सधते हों. कभी बातचीत तो कभी संघर्ष के माध्यम से वे ब्राह्मणों के एकाधिकार को निरंतर चुनौती देते रहे. अपने बौद्धिक चातुर्य के भरोसे शूद्रों का ही एक वर्ग संसाधनों में हिस्सेदारी कर, तथाकथित सवर्ण समूहों का हिस्सा बन गया. जाति-व्यवस्था के रहस्य को समझने के लिए उसकी चर्चा यहां प्रासंगिक है.

समय के साथ समाज की जरूरतें बढ़ती गईं. लगातार चुनौतियों से गुजरते हुए उनके शिल्प में सुधार हुआ. अपने उत्पाद को अधिक दाम पर बेचने की समझ भी पैदा हुई. आजीवक कर्मकांडों का निषेध करते थे. बुद्ध ने भी उसी नीति को आगे बढ़ाया था. उसके फलस्वरूप जाति-संबंधी बंधन शिथिल पड़ने लगे. यज्ञ-बलियों में कमी से पशुधन की बचत हुई तो समृद्धि रफ्तार पकड़ने लगी. आजीवकों और बुद्ध के प्रभाव से जाति-प्रथा कमजोर पड़ रही थी. सामाजिक आचार-विचार और शुचिता संबंधी नियम भी ढीले पड़े थे. फलस्वरूप विभिन्न जाति-समुदायों के लोग एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करने लगे. शिल्पकारों ने भी संगठन की ताकत को समझा और सामूहिक पद्धति को अपनाया. अपने श्रम-कौशल द्वारा आजीविका चलाने के कारण वे आजीवक कहलाते थे. वही उनका धर्म था. मक्खलि गोसाल, पूर्ण कस्सप, अजित केशकंबलि उनके मार्गदर्शक और आचार्य थे. बौद्ध धर्म के उदय के बाद आजीवकों का एक हिस्सा उसकी ओर आकर्षित हुआ था, लेकिन संगठन और व्यापार के प्रति उनकी निष्ठा ज्यों की त्यों बनी रही. अपने श्रम-कौशल के बल पर शिल्पकार समूहों ने सफलता की ऐसी कहानी लिखी कि कुछ ही अर्से में उसका व्यापार दूर-दराज के देशों तक फैल गया. उनकी प्रगति को ग्रहण चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में लगा.

ऐसा कोई उदाहरण नहीं है कि अपनी शिल्पकला और व्यापार-कौशल से समस्त विश्व को चकित कर देने वाले उन शिल्पकार संगठनों ने राज्य की सत्ता को कभी चुनौती दी हो. अथवा अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के कारण राज्य के लिए खतरा बने हों. बावजूद इसके चाणक्य को शिल्पकार संगठनों से आपत्ति थी. वह मजबूत केंद्र का समर्थक था. नहीं चाहता था कि राज्य के समानांतर यहां तक कि उसके आसपास भी दूसरी कोई सत्ता हो. राजभवनों में पलने वाले षड्यंत्रों के बारे में उसे पूरी जानकारी थी. लेकिन राज्य की अर्थव्यवस्था में शिल्पकार संगठनों का योगदान इतना अधिक था कि उनके विरुद्ध सीधी कार्रवाही का साहस चाणक्य में भी नहीं था. उसने शिल्पकार समूहों की निगरानी करना शुरू कर दिया था. नतीजा यह हुआ कि आजीवक समुदाय जिसकी संख्या कभी बुद्ध के शिष्यों से भी अधिक थी; तथा जिसके स्थापक मक्खलि गोशाल तथा पूर्ण कस्सप को महावीर स्वामी और गौतम बुद्ध से पहले ही बुद्धत्व प्राप्त हो चुका था—धीरे-धीरे बिखरने लगा. इससे उस वर्ग को लाभ पहुंचा जिसका उत्पादन में सीधा योगदान न था, जो केवल लाभार्जन की कामना के साथ व्यापार करता था. अवसर अनुकूल देख उसने भेंट-पूजा, दानादि देकर पुरोहितों और अधिकारियों को खुश करना शुरू कर दिया. फलस्वरूप वे राज्य के कृपापात्र कहलाने लगे. बुद्ध के समय व्यापारिक संगठनों में काम मिल-जुलकर किया जाता था. धीरे-धीरे वैश्य ‘श्रेष्ठि’ संगठन का पर्याय बनने लगे. विशेष अवसरों पर उन्हें राज्य की ओर से आमंत्रित किया जाने लगा. भेंट-सौगात के बदले राज्य की ओर से निर्बाध व्यापार की सुविधा मिलने लगी. परिणाम अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में  दलाल-तंत्र के रूप में सामने आया. जिससे व्यापार के नाम पर उन वस्तुओं के मूल्य-निर्धारण का अधिकार मिल गया, जिसके निर्माण में किसी दूसरे के श्रम-कौशल का योगदान था. धर्म के क्षेत्र में यह काम बहुत पहले शुरू हो चुका था. वहां ‘भक्त’ और ‘भगवान’ के बीच ‘मध्यस्थ’ की भूमिका पुरोहित निभाता था. श्रेष्ठि वर्ग को बढ़ावा मिलने से शिल्पकार समूह अर्थव्यवस्था के केंद्र से हटने लगे. उत्पादों की बिक्री के लिए श्रेष्ठि-वर्ग पर उनकी निर्भरता बढ़ती चली गई. यह काम मनुस्मृति लिखे जाने के आसपास या उससे कुछ ही समय पहले हुआ. दूसरे शब्दों में जब तक देश की राजनीतिक शक्ति विकेंद्रित थी, अर्थसत्ता भी विकेंद्रित रही. सत्ता के उस केंद्रीकरण के दौर में ही महाभारत को उसका वर्तमान रूप मिला. गीता की रचना हुई. चातुर्वर्ण्य व्यवस्था  को समर्थन देते हुए ब्राह्मणों ने पुरुष सूक्त की रचना की. स्मृति-ग्रंथ, गीता, पुराणादि वर्ण व्यवस्था समर्थित ग्रंथों की रचना इसी दौर में संपन्न हुई. याद दिला दें कि वर्ण-विभाजन का विचार आर्य अपने पैत्रिक देश पर्शिया से साथ लाए थे. वहां समाज को चार वर्णों(Pishtras) में बांटा गया था. उनके नाम थेᅳ‘अथर्वा’ या पुजारी(Athravas or Priest), रथेस्थस्स या योद्धा(Rathaesthas or Warrior) वास्त्रय श्युआंत्स(Vastrya Fshuyants) अथवा उपार्जक तथा हाउटिस(Huitis or Manual Workers) यानी मेहनतकश मजदूर. भारत में आकर ये क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बन कहलाने लगे.

शिल्पकार संगठन स्वयं को राजनीतिक गतिविधियों से दूर रखते थे. बावजूद इसके राज्य के समानांतर हैसियत वाले शिल्पकार वर्गों के आर्थिक संगठनों का भय ब्राह्मणों के दिमाग में इतना था कि उन्होंने ‘मनुस्मृति’ के सहारे शूद्र शिल्पकर्मियों से उनके सारे संसाधन, उनके आर्थिक अधिकार छीन लिए. शूद्रों के लिए निर्धारित किया गया कि उनका काम केवल सेवा करना है. अपने लिए कुछ अपेक्षा करना नहीं. वे अपने अवदान के बदले कोई अपेक्षा न रखें. इसके लिए गीता के माध्यम से निष्काम कर्म की अवधारणा को प्रचारित किया.  उन्हें बताया गया कि केवल कर्म पर उनका अधिकार है. फल पर नहीं. शूद्रों से यहां तक कहा गया कि यदि उनमें धन-संचय का सामर्थ्य है, तो भी वैसी धृष्टता न करें. इसके बावजूद यदि कोई शूद्र धनार्जन में सफल हो जाए तो ब्राह्मण को अधिकार दिया गया कि वह शूद्र द्वारा अर्जित धन को उसके मालिक (जमींदार/सामंत/सम्राट आदि) की मदद से छीन ले. चैतरफा दबाव का नतीजा यह हुआ कि शूद्रों की सेवाएं मुफ्त हो गईं. बेगार लेने के लिए शूद्र को जीवित रखना था, इसलिए विशेष अवसरों यानी शादी-विवाह, पर्व-उत्सवों तथा नई फसल के अवसर पर उनको भेंट-सौगात दी जाने लगी, जिसका स्वरूप भीखनुमा होता था. शूद्र इस छलनीति को समझ न पाए इसके लिए उसके पढ़ने-लिखने पर पाबंदी लगा दी गई. लेकिन यह पाबंदी केवल वैदिक साहित्य को तर्कसम्मत ढंग से पढ़ने, अपने विवेक के अनुसार उसका अर्थ निकालने की थी. ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण से अध्ययन-अध्यापन करने पर नहीं. महीदास, सत्यकाम जाबाल शूद्र होकर भी वेदपाठी कहलाए गए, क्योंकि वे ब्राह्मणवाद के श्रेष्ठत्व को स्वीकार कर, उसके आगे समर्पित हो चुके थे.

इस विस्तृत वर्णन का एक ही उद्देश्य है, बहुजन वर्ग की आंतरिक एकता के सूत्रों की खोज करना. ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’ से बहुजन साहित्य की सैद्धांतिकी का आधार स्पष्ट नहीं होता. यह कार्य भविष्य पर छोड़ दिया गया है. यदि यह मान लिया जाए कि बहुजन समूह मेहनतकश जातियों और शिल्पकार समूहों का बेहद सक्रिय और कर्मशील समूह रहा है तो उससे न केवल बहुजन साहित्य की अवधारणा स्पष्ट करने में मदद मिल सकती है, बल्कि उसके सहारे हम इतिहास के कई बिखरे सूत्रों को भी सहेज सकते हैं. इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि वर्ण-व्यवस्था द्वारा संसाधनों से वंचित कर दिए जाने के बावजूद शिल्पकार समूह पूरी तरह हताश नहीं हुए थे. बल्कि अपने श्रम, शिल्प-कौशल तथा संगठन सामर्थ्य के दम उन्होंने खुद को इतना सुदृढ़ और व्यापक बना लिया था कि राज्य के लिए उनकी उपेक्षा कर पाना पूर्णतः असंभव था. समानकर्मा शिल्पकारों द्वारा संगठन बनाना उन दिनों सामान्य प्रक्रिया थी. लोग अलग-अलग काम करने के बजाए संगठित व्यापार ज्यादा पसंद करते थे. काष्ठकार, धातुकर्मी, स्वर्णकार, चर्मकार, पत्थर-तराश, हाथी-दांत के आभूषण-निर्माता, जलयंत्र निर्माता, बांसकर्मी, कास्सकार(पीतलकर्मी), बुनकर, कुंभकार, स्वर्णकार, तैलिक, रंगरेज, टोकरी बनाने वाले, अनाज व्यापारी, मत्स्यपालक, किसान, छापाकार, मालाकार, कसाई, नाई, पशुपालक, व्यापारी और व्यापारिक काफिले, दुरुह मार्गों पर व्यापारिक काफिलों की रक्षा करने वाले सैनिक, चोर-लुटेरे, महाजन—बुद्धकालीन भारत में 27 प्रकार के सहयोगी संगठनों का उल्लेख जातक कथाओं के जरिये प्राप्त होता है. इसका उल्लेख डॉ. रमेश मजूमदार ने ‘कोआॅपरेटिव्स लाइफ इन एन्शियंट इंडिया’ में विस्तार से किया है. उन दिनों वे आजीवक कहलाते थे. ब्राह्मण धर्म में उनकी कोई आस्था न थी. बाद के दिनों में उन्हें शूद्र घोषित कर दिया गया. चाणक्य ने तो क्षत्रियों के संघ का भी उल्लेख किया है. ये संगठन अपने आप में पूर्णतः स्वायत्त थे. उनके आंतरिक मामलों में दखल देने का अधिकार राज्य को भी नहीं था. चूंकि वे राज्य की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार थे, इसलिए राजा भी उनके साथ सहयोगात्मक रवैया अपनाते थे. वे अपनी आजीविका को ही अपना धर्म, अपना ईश्वर मानने वाले थे. जिस दौर के भारत को ‘सोने की चिड़िया’ के रूप में याद किया जाता है, वह इन संगठनों का सबसे सक्रिय कार्यकाल था. इससे हम राज्य की अर्थव्यवस्था में उनके महती योगदान का अनुमान लगा सकते हैं.

उपर्युक्त वर्णन से कुछ बातें साफ हो जाती हैं. पहली संगठन, एकता की ताकत. दूसरी समान-धर्मा संगठनों के साथ एकता की जरूरत, तीसरी धार्मिक मिथ्याडंबरों के बजाय तर्कसम्मत ढंग से निर्णय लेने की कला और चौथी चुनौतियों से भागने के बजाय परिस्थितियों के साथ संघर्ष करते हुए रास्ता निकालने की कोशिश करना. जाति-आधारित विषमता आज की समस्या नहीं है. सहस्राब्दियों से वह अस्तित्व में है. उसके विरोध में समय-समय पर आंदोलन छेड़े गए हैं. परंतु समस्या उत्तरोत्तर बढ़ती गई है. इसका पहला कारण तो यही है कि ज्योतिबा फुले से पहले जाति-विरोधी आंदोलनों की बागडोर मुख्यतः सवर्णों के हाथों में रही है. हालांकि मध्यकाल में कबीर, रैदास जैसे संत कवि शूद्र या अतिशूद्र जातियों से आए थे. जाति के विरोध में संत कवियों ने लगातार लिखा भी. परंतु वे संतोष को परमधन मानने वाले, दैन्य का महिमामंडन करने वाले संत थे. हालांकि रैदास ने ‘बेगमपुरा’ तथा कबीर ने ‘अमरपुरी’ के रूप में समानता पर आधारित समाज की कल्पना की थी. तो भी आर्थिक असमानता और संसाधनों पर द्विज वर्गों के एकाधिकार को लेकर उन्हें बहुत ज्यादा शिकायत न थी. उसे लेकर उनका दृष्टिकोण नियतिवादी था. बावजूद इसके संतकवियों का अपने समाज पर प्रभाव था. अपनी सीमाओं के भीतर उन्होंने ब्राह्मणवाद पर जोरदार प्रहार किया था. संतकवियों की समाज में बढ़ती प्रतिष्ठा को देख द्विज वर्गों के कवि भी उनकी ओर आकर्पित हुए. वे अपने साथ वर्गीय संस्कार भी लाए थे. उन्होंने संत-कवियों की मौलिक अध्यात्म चेतना का धार्मिकीकरण किया. परिणामस्वरूप संतकाव्य की क्रांतिधर्मिता भक्तिकाव्य में सिमटने लगी. तुलसी के आते-आते तो सबकुछ परंपरावादी हो गया. जाति और वर्ण पुनः प्रधान हो गए. उन्नीसवीं शताब्दी तक राजनीति पर धर्म का प्रभाव बना रहा. चूंकि धर्म की नींव जाति-व्यवस्था पर टिकी थी, इसलिए जाति के बहिष्कार को लेकर कोई बड़ा आंदोलन उनीसवीं शती से पहले के इतिहास से नदारद है.

जाति और हिंदू धर्म के गठजोड़ को इससे भी समझा जा सकता है कि बौद्ध धर्म से लेकर संत कवियों, सुधारवादी आंदोलनों, ज्योतिराव फुले और डॉ. अंबेडकर सहित जिसने भी जाति के पर कतरने की कोशिश की—प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में उसने धर्म पर भी प्रहार किया. यह आवश्यक था. क्योंकि हिंदू धर्म और जाति-व्यवसथा में नाभि-नाल का संबंध है. दोनों एक-दूसरे को बल प्रदान करते हैं. जाति पर सवाल उठाया जाता है तो धर्म आड़े आ जाता है और धर्म पर सवाल उठाते ही जाति बीच में अड़ जाती है. बुद्ध ने जाति का बहिष्कार किया था, लेकिन उनके बाद बौद्ध धर्म की बागडोर उन लोगों के हाथ में आ गई जो जन्मना सवर्ण थे. उन्हें बुद्ध के धर्म से कोई परेशानी न थी. परेशानी  उनके जाति-विरोध से थी. सो उन्होंने धर्म को सहारा लिया. अपना जीवन और समय उन्हें दिया. परंतु जाति के सवाल पर वे सब ठेठ परंपरावादी निकले. अवसर मिलते ही उन्होंने बौद्ध दर्शन के क्रांतिकारी विचारों को धीरे-धीरे जाति-धर्म की ब्राह्मणवादी व्यवस्था से जोड़ने का काम शुरू कर दिया. बुद्ध को अवतार घोषित कहना, यह कहना कि ‘बुद्ध या तो ब्राह्मण के घर जन्म लेते हैं, अथवा क्षत्रिय के’, ब्राह्मणवादियों की तर्कसम्मत निष्कर्षों से पलायन की मानसिकता को दर्शाता है. बौद्ध लेखकों ने प्रथम  शास्ता के निर्वाण प्राप्ति के तुरंत बाद अपनी जातिवादी मानसिकता को थोपना आरंभ कर दिया था. इसके लिए उन्होंने बुद्ध को भी नहीं बख्शा, जो आजीवन संघ और समानता का उपदेश देते रहते थे. असल में वह बुद्ध के जीवन-दर्शन की पश्चगामी व्याख्या थी. उन संगठनों की एक कमी खुद को केवल और केवल व्यवसाय तक सीमित रहना था. ज्ञान की शक्ति से अनभिज्ञ रहना तथा ज्ञानार्जन को ब्राह्मणों का विशेषाधिकार मानकर उसकी ओर से उदासीन बन जाना भी, उनकी कमजोरी थी. महात्मा ज्योतिबा फुले और डॉ. अंबेडकर सफल रहे तो इसलिए कि उन्होंने ब्राह्मणवादी व्यवस्था को बौद्धिक क्षेत्र में चुनौती दी थी. दोनों ने जीवन के आर्थिक पक्ष पर जोर दिया. उसके फलस्वरूप सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्तर पर समानता की मांग होने लगी.

बहुजन साहित्य की अवधारणा विकसित करने में समाज के पुराने अनुभव बहुत काम के सिद्ध हो सकते हैं. क्योंकि जो जो बंधु बहुजन साहित्य को तथाकथित मुख्य धारा के साहित्य के समानांतर देखना चाहते हैं, उनसे सबसे पहले यही सवाल होगा इसकी मूल अवधारणा या सैद्धांतिकी को लेकर उनका अपना सोच क्या है. उसमें जाति की क्या भूमिका होगी? क्या जाति का सहारा लेकर शुरू हुआ आंदोलन उसके बिना चार कदम भी चल पाएगा? यदि ऐसा नहीं हो सकता तो बाकी साहित्य और बहुजन साहित्य में क्या अंतर होगा? इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि जाति भारतीय समाज की एक कटु सचाई है. मजबूरी में ही सही, बहुजन साहित्यकारों को इस आंदोलन से जोड़ने का तुरंतिया आधार जाति ही है. बावजूद इसके वैकल्पिक साहित्य और संस्कृति की आधारशिला रखने के लिए जाति जैसी विष-बेलि पर भरोसा नहीं किया जा सकता. उससे व्यक्ति की बड़ी और स्थायी पहचान नहीं बनती. मार्क्स के दर्शन में जब ‘सर्वहारा’ का नाम लेते हैं तो बेमेलकारी औद्योगिक अर्थव्यवस्था में उपेक्षित, तिरष्कृत, चारों तरफ से छले गए, शोषित व्यक्ति की तस्वीर हमारे मनस् में उभरने लगती है. जाति की मार उससे कहीं ज्यादा घातक है. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था भी सर्वहारा को यह अधिकार देती है कि वह पूंजी के दम पर अपनी स्थिति बदलकर पूंजीवादी तबके में शामिल हो सके. जाति न केवल व्यक्ति, बल्कि उसकी आने वाली पीढ़ियों को भी इस अधिकार से वंचित रखती है. इसलिए जाति की बैशाखी के सहारे बड़ा और परिवर्तनकारी आंदोलन नहीं चलाया जा सकता. इस मामले में ‘बहुजन’ सार्थक शब्द है. इससे लोकतंत्र की ध्वनि निकलती है. इसलिए बहुजन साहित्य के नाम पर ऐसा साहित्य स्वीकार्य हो सकता है, जो लोगों में लोकतांत्रिक आदर्शों के प्रति चेतना जगाए.

वैसे भी साहित्यपन की कसौटी रचना में अंतर्निहित सर्वहित का भाव है. यह मनुष्य की सीमा है कि सिक्के के दूसरे पक्ष को देखने के लिए पहले को आंखों से ओझल करना ही पड़ता है. ऐसे में उदारमना लेखक केवल इतना कर सकता है कि लिखते समय अपने सोच का दायरा यथासंभव व्यापक रख सके. इस दृष्टि से देखें तो हिंदी का अधिकांश साहित्य ब्राह्मणवादियों द्वारा ब्राह्मणवाद के समर्थन में लिखा गया साहित्य है. वह एक प्रकार का स्तुति-लेखन है, जो येन-केन-प्रकारेण द्विज-हितों का पोषण करता है. संख्याबल के आधार पर ब्राह्मणवाद से लाभान्वित लोगों की संख्या कुल जनसंख्या के पांचवे हिस्से भी कम हैं. जाहिर है, जिसे साहित्य की मुख्यधारा कहा जाता है, वह अल्पसंख्यकों सत्तानशीनों द्वारा अल्पसंख्यक अभिजनों की स्वार्थ-सिद्धि के निमित्त किया गया लेखन है. सामाजिक स्तरीकरण को शास्त्रीय स्वरूप प्रदान करने में उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है. तुलसी, सूर, वाल्मीकि, कालीदास आदि इस धारा के प्रतिनिधि रचनाकार कहे जा सकते हैं. कहने को उनके साहित्य में स्त्री, अल्पसंख्यक, दलित, गरीब-अमीर सब आते हैं. परंतु उनका उपयोग द्विज चरित्रों के महिमा-मंडन के लिए किया जाता है, ताकि सामाजिक भेदभाव वाली व्यवस्था के प्रति लोगों का मूक समर्थन बना रहे. इस प्रकार वे आसमानताकारी व्यवस्था को खाद-पानी देने का काम करते हैं, ताकि वह निर्बंध फल-फूल सके. ब्राह्मणवादी कह सकते हैं कि जब उनके साहित्य में स्त्री, अल्पसंख्यक, दलित, गरीब-अमीर सब हैं, तब साहित्य की नई धारा की जरूरत और उसका औचित्य क्या है? वे यह भी कह सकते हैं भारत में उसके समानांतर क्या उसके दूर-दूर तक कोई ऐसी साहित्य धारा नजर नहीं आती जो उसको चुनौती देने में सक्षम हो, तो उससे मुख्यधारा का साहित्य मानने में गुरेज क्यों हो? उन्हें समझाने के लिए, बशर्ते वे समझना चाहें तो कहा जा सकता है कि किसी रचना के साहित्य होने की पहली शर्त यह है कि वह हाशिया नहीं छोड़ती. यदि कुछ हाशिये पर  है तो उसे प्राथमिकता के साथ केंद्र में लाकर विमर्श में सम्मिलित करने की कोशिश करती है. यदि वे अपने साहित्य को मुख्यधारा का साहित्य मानते हैं तो इसका यह अर्थ भी है कि साहित्य में उनके चाहे-अनचाहे ऐसी धाराएं भी मौजूद हैं, जो उपेक्षित या हाशिये की हैं. और ऐसा होने से उन्हें कोई शिकायत भी नहीं है. यदि कभी बराबर में लाने की कोशिश हुई भी तो उपकार भाव से. मानो वही उनके तारणहार हों. यह सोच ही ब्राह्मणवादी ग्रंथों को साहित्य के गौरव से बेदखल करने के लिए पर्याप्त है. बीती दो सहस्राब्दियों के बीच. ब्राह्मणवादी साहित्य द्वारा विरोधी विचारधाराओं से समन्वय या संवाद की संभावना तो दूर, उसकी कोशिश तो उन्हें नकारने और मिटाने की रही है.

दलित, पिछड़े, आदिवासी, आदिम जनजातियां आदि जिन जाति-समूहों को केंद्र में रखकर बहुजन साहित्य की अभिकल्पना की गई है, वे सभी किसी न किसी श्रम-प्रधान जीविका से जुड़े हैं. उनकी पहचान उनके श्रम-कौशल से होती आई है. मगर जाति-वर्ण संबंधी असमानता और संसाधनों के अभाव में उन्हें उत्पीड़न एवं अनेकानेक वंचनाओं के शिकार होना पड़ा है. बहुजन साहित्य यदि जातियों की सीमा में खुद को कैद रखता है तो उसके स्वयं भी छोटे-छोटे गुटों में बंट जाने की संभावना निरंतर बनी रहेगी. इसलिए वह स्वाभाविक रूप से श्रम-संस्कृति का सम्मान करेगा. फलस्वरूप विभिन्न जातियों के बीच स्तरीकरण में कमी आएगी. उसकी यात्रा सर्वजनोन्मुखी साहित्य में ढलने की होगी. कुल मिलाकर बहुजन साहित्य का वास्तविक ध्येय जाति उच्छेद ही होगा. इस तरह बहुजन साहित्य का संघर्ष सभी प्रकार की असमानता, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक से होना चाहिए. तथाकथित सवर्ण जो भारतीय समाज के अभिजन चरित्र का प्रतिनिधित्व करते हैं, बहुजन साहित्य में दखल देते हैं तो उनका स्वागत किया जाएगा. बशर्ते वे समानता और श्रम-संस्कृति के विचार का समर्थन करते हों. श्रम-संस्कृति को महत्त्व देने का आशय ज्ञान की मौलिक धाराओं से कट जाना नहीं है. बहुजन साहित्य ज्ञान के लोकतंत्र में विश्वास रखते हुए उसकी विभिन्न धाराओं का खुले मन से स्वागत करेगा. परंतु ज्ञान और श्रम को लेकर जिस प्रकार की दूरी ब्राह्मणवादी परंपरा रही है, बहुजन साहित्य में उसके लिए कोई स्थान न होगा, न होना चाहिए.

परिशिष्ट

‘दलित साहित्य’ हो या ‘ओबीसी साहित्य’ अथवा उसका नया नामरूप ‘बहुजन साहित्य’ हो, ये सब समाज और संस्कृति के बजाय चाहे-अनचाहे राजनीति से ज्यादा अनुप्रेत हैं. इसके दो कारण हैं. पहला यह कि भागम-भाग के इस दौर में हर कोई त्वरित परिवर्तन की चाहत रखता है. यह काम उसको राजनीति के माध्यम से आसान लगता है. लेकिन राजनीति की विशेषता है कि उसका कोई न कोई सत्ताकेंद्र होता है. जो भी उसके नजदीक या प्रभाव में आता है, दूरस्थ वर्गों को वह खुद से हीन समझने लगता है. यदि उसपर समाज और संस्कृति का अनुशासन न हो तो वह बहुत जल्दी शक्तिशाली समूहों के वर्चस्व में ढल जाता है. दलित और पिछड़े दोनों ही वर्ग इसके शिकार रहे हैं. 1930 में बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश की तीन प्रमुख पिछड़ी जातियों ने मिलकर ‘त्रिवेणी संघ’ की स्थापना की थी. उसके सदस्यगण बरास्ते राजनीति द्विज वर्गों के बराबर में आना चाहते थे. उन्हें आरंभिक सफलता भी मिली. परंतु पर्याप्त सामाजिक चेतना के अभाव में वह प्रयोग, महत्त्वपूर्ण होने के बावजूद अंततः असफल सिद्ध हुआ. कारण लोगों के दिमाग में मौजूद जाति की विषबेलि. इसके बावजूद परिवर्तनकामी समाजों में राजनीति का अलग महत्त्च होता है. प्राचीनकाल से लेकर आज तक समाज, संस्कृति और राजनीति सभी पर द्विज वर्गों का अधिपत्य रहा है. दलित और बहुजन दोनों ने ही समाज में जो हैसियत प्राप्त की है, या जिसका वे सपना देखते हैं, उसके लिए उन्हें समाज और संस्कृति दोनों से संघर्ष करना पड़ा है. दोनों ही दलित और पिछड़ों के शोषण का माध्यम बनते आए हैं. उनके दैन्य का कारण भी समाज और संस्कृति के निर्माण में उनकी भूमिका की निरंतर उपेक्षा, उसे कमतर आंका जाना है. इस मामले में स्वतंत्र भारत की राजनीति उनके लिए अधिक मददगार रही है. इसलिए साहित्य में राजनीति को महत्त्व देना या राजनीति के माध्यम से अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक हैसियत ऊपर उठाना अभी तक के उनके संघर्ष की मूल प्रेरणा रहा है.

दलित साहित्य भी इसी त्रासदी से गुजर रहा है. समाज और संस्कृति को राजनीति की अपेक्षा कम महत्त्व देने के कारण दलितों में भी शासक वर्ग का उदय होने लगा है. ‘बीसवीं शती अंबेडकर की होगी’ जैसे नारे इसी मानसिकता की देन है. नारेबाज प्रायः ऐसे राज्य का सपना देखते हैं, जिसमें वर्तमान मनुवादी शक्तियांे का पराभव हो चुका होगा. लेकिन मनुवादी शक्तियों का पराभव ‘मनुवाद’ या ‘ब्राह्मणवाद’ का पराभव नहीं नहीं है. ‘मनुवाद’ विचार से अधिक आज एक मानसिकता है. मनुवादी शक्तियों का पराभव हो परंतु मनुवाद नए चेहरे-मोहरों के रूप में बना रहे यह न तो अंबेडकर का सपना था, न ही आज के लिए सुधी समाजचेता का सपना हो सकता है. मनुवाद का पराभव बिना जाति के पराभव के असंभव है. फुले और अंबेडकर दोनों यह जानते थे. इसलिए अपनी-अपनी तरह से दोनों ने ही जाति का विरोध किया था. डॉ. अंबेडकर की पुस्तक ‘जाति का उच्छेद’ इस सवाल को बार-बार उठाती है. दलित साहित्य ने लोगों को इतना आत्मविश्वास तो दिया है कि जो दलित दो-तीन दशक पहले तक जाति को छिपाने में ही अपनी भलाई समझता थे, अब अपने नाम के साथ खुलकर ‘बाल्मीकि’, ‘जाटव’ आदि जाति-सूचक शब्द लगाने लगे हैं. ‘जाति के उच्छेद’ की दिशा में ऐसा आत्मविश्वास आवश्यक है. यहां मुझे पाब्लो फ्रेरा याद आते हैं. उन्होंने कहा था कि उत्पीड़ित वर्ग अपनी सफलता अनुत्पीड़क वर्ग की अवस्था में आने में देखता है. इसलिए जो शिखर पर है, उसपर ढेर सारे लोगों की निगाहें होती हैं. इसलिए शिखर पर अस्थिरता का मामला बना रहता है. जो लोग शिखर पर पहुंचने का हौसला नहीं रखते, वे शिखर के आसपास मंडराते रहते हैं. प्रेमचंद ने साहित्य को राजनीति के आगे चलने वाली मशाल कहा है. इसके लिए आवश्यक है कि साहित्य और राजनीति के बीच न्यूनतम दूरी हो. बहुजन साहित्य राजनीति से प्रेरणाएं, राजनीति की प्रेरणा बनने की कोशिश करेगा, परंतु सीधे राजनीतिक हस्तक्षेप या सहयोग से खुद को दूर रखेगा.

साहित्य की एक शर्त मानवीय अस्मिताओं के बीच समानता और समरसता का वातावरण उत्पन्न करना है. इसके लिए उसकी दृष्टि हमेशा उपेक्षित एवं निचले वर्गों की ओर होती है. ब्राह्मणवादी साहित्य प्रायः सत्ताकेंद्रित रहा है. यह बात अलग है कि उसके द्वारा मनोनीत सत्ताकेंद्र कभी राजनीति तो कभी धर्म की ओर झुकते रहे हैं. इसलिए ब्राह्मणवादी रचनाकारों के लेखन को मुख्यधारा का साहित्य नहीं कहा जा सकता. बजाय इसके उसे इस देश के अभिजन समूहों का वर्चस्वकारी साहित्य कहना उपयुक्त होगा. यह मान लेना चाहिए कि अस्मितावादी आंदोलन चाहे वे दलित आंदोलन हों या पिछड़े वर्गों का संघर्ष या कोई और, कोई भी जाति के दुर्ग को भेदने में असफल रहा है. याद करें भारत में जितनी जातियां हैं उससे कहीं अधिक उपजातियां भी हैं. सवर्ण में जहां गोत्रों की व्यवस्था है, वहीं तरह-तरह के भेद भी हैं. कुछ समय पहले तक ब्राह्मणों में ही दर्जनों उपजातियां थीं. उनके बीच इतना अंतर था कि तथाकथित उच्च श्रेणी का ब्राह्मण निचली श्रेणी के ब्राह्मणों के साथ रोटी-बेटी का संबंध तो दूर, बराबर में बैठकर भोजन करना पसंद नहीं करता था. इसलिए यह कहना कि जातिवाद देश में आज भी उतना ही है जितना पहले था, बड़ी भूल है. इसका श्रेय देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और निचले वर्गों द्वारा शिक्षा प्राप्त कर, द्विजों के लिए चुनौती देने की अवस्था में आना रहा है.

ओमप्रकाश कश्यप