अस्मिताओं का मूर्तिकरण

नदी तभी तक पवित्र रहती है, जब तक वह प्रवाह में रहती है. प्रवाह जितना तेज, नदी उतनी महान. यही स्थिति ज्ञान की है. ज्ञान तभी तक ज्ञान रहता है, जब तक वह विमर्श का हिस्सा है. ज्ञान का ठहराव रूढ़ि को, नदी का दलदल को जन्म देता है.

 

खबर है कि लखनऊ स्थित आंबेडकर पार्क में अभिजन नायकों की मूर्तियां स्थापित की जाएंगी. महापुरुषों के संघर्ष और विचारों को मूर्तियों तक सीमित कर देना, विवेकशील समाज का लक्षण नहीं है. यह ठीक ऐसा है जैसे ‘दि कैपीटल’ की पूंजीवादी गवेषणा को समझने के बजाय मार्क्स के स्टेच्यू पर फूलमालाएं चढ़ाकर खुद को साम्यवादी घोषित कर देना. ज्ञान का कर्मकांडीकरण सामाजिक गतिशीलता में विक्षोभ उत्पन्न करता है. परिणामस्वरूप नागरिक समूहों का आचरण भीड़ के व्यवहार में ढल जाता है. भारत इसका अकेला उदाहरण नहीं है. पूरी दुनिया में यही होता आया है. प्रगतिकामी विचारों की प्रखरता को कम करने का सबसे आसान तरीका उसे मूर्तिर्यों में कैद कर, पवित्र घोषित कर देना है. इसीलिए चालबाज सत्ताएं, क्रांति-धर्मा नायकों को देवता घोषित करती आई हैं. वे जनसाधारण को लगातार यह विश्वास दिलाती रहती हैं कि पृथ्वी पर कुछ लोग जन्मजात शासक होते हैं. जो वैसे नहीं हैं, उन्हें दूसरों के भरोसे, उनकी अनुकंपा पर जीना पड़ता है. शासित से अपेक्षा की जाती है कि वह महापुरुषों के नाम पर बनी मूर्तियों तथा मठों का सम्मान करे. धर्म, संस्कृति और राजनीति के चौतरफा दबाव में जनसाधारण भी यह मान लेता है कि समस्याओं के समाधान हेतु कुछ लोगों का देवताकरण अपरिहार्य है. विचारों और संघर्षों का मूर्तिकरण सामाजिक असमानता और दमनात्मक स्थितियों को स्थायी बनाता है. लोग हालात से अनुकूलित हो, सवाल करना भूलने लगते हैं. इससे उत्पीड़क वर्ग के लिए शोषण की राह आसान हो जाती है.

भारत में मूर्ति-पूजा की परंपरा शताब्दियों से है. इसकी जड़ें इतनी गहरी हैं कि समाज का बड़ा वर्ग मूर्ति को ही आराध्य माने रहता है. अपनी आस्था और विश्वास को दूसरों से विशिष्ट समझने की जिद बड़े-बड़े संघर्षों को जन्म देती आई है. मूर्ति को सबकुछ मानने वाला व्यक्ति अपने सहज विवेक से भी वंचित जाता है. वह अपने हित-अहित का निर्णय स्वयं नहीं ले पाता. वह दूसरों की इच्छा का दास होता है. मूर्तिपूजा उसे न केवल ज्ञान की प्राचीन, बल्कि अधुनातन परंपरा से भी काट देती है. इसलिए परिवर्तन की वांछा रखने वाले समूहों और बुद्धिजीवियों द्वारा उनका विरोध लाजिमी हो जाता है. ये स्थितियां सामाजिक अंतर्द्वंद्व को बढ़ावा देती हैं. विकासशील समाजों में ऐसे अंतर्द्वंद्वों को साफ-साफ देखा जा सकता है. अंतर्द्वंद्व हमेशा नकारात्मक नहीं होते. कई बार वे समाज को सकारात्मक परिवर्तनों की ओर भी ले जाते हैं. भारत में आधुनिक शिक्षा के फलस्वरूप दमित वर्गों में नई चेतना जगी है. वे शोषण के विभिन्न रूपों, उसके कारण तथा संगठन की ताकत को समझने लगे हैं. इससे शताब्दियों से दूसरों के श्रम-कौशल पर जीता आया वर्ग अपने भविष्य को लेकर आंदोलित है. मूर्ति-स्थापना की घोषणा परिवर्तन की चाल को अवमंदित करने और येन-केन-प्रकारेण यथास्थिति बनाए रखने का षड्यंत्र है.

उत्तरप्रदेश के पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा को दलितों के काफी संख्या में; तथा अतिपिछड़ों के लगभग एकमुश्त वोट मिले थे. उसकी बंपर कही जा रही जीत दलितों-पिछड़ों की आपसी फूट का परिणाम थी. 2019 में जीत को आसान बनाने के लिए भाजपा की कोशिश मत-समीकरणों को पूर्वतः बनाए रखने की है. राजभर समुदाय को फुसलाए रखने के लिए राजा सुहेलदेव की मूर्ति लगवाने की भूमिका पिछले महीने उस समय बन चुकी थी, जब 14 मई 2017 को विश्व हिंदू परिषद के एक कार्यक्रम में बोलते हुए मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने सुहेलदेव को पासी राजा कह दिया था. राजभर समुदाय ने इसे अपनी अस्मिता पर हमला माना. तीन दिन बाद ही वह सड़क पर आ गया. जैसे सब कुछ पूर्वनियोजित हो. उसके कुछ दिन बाद मुख्यमंत्री ने आंबेडकर पार्क का निरीक्षण कर, वहां सुहेलदेव की प्रतिमा स्थापित करने का ऐलान कर कर दिया. उत्तर प्रदेश सरकार में पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री ओमप्रकाश राजभर को भी लगा कि पार्टी हाईकमान को खुश करने का यह अच्छा अवसर है. सो बिना कोई पल गंवाए उन्होंने पार्क में राजा सुहेलदेव के अलावा महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी जैसे संघ के चहेते महापुरुषों की प्रतिमाएं लगवाने की घोषणा कर दी. वैसे भी पूर्वी उत्तरप्रदेश में 18 प्रतिशत की मत-संख्या वाले इस समुदाय को नाराज करना, राजनीतिक दृष्टि से आत्मघाती कदम होता. गौरतलब है कि अपनी चूक के लिए मुख्यमंत्री ने खेद व्यक्त नहीं किया. उससे पासी समाज नाराज हो सकता था. आजादी के बाद राजभर जाति का वोट विभिन्न राजनीतिक दलों में बंटता आया है. विगत उत्तर प्रदेश चुनावों में उन्होंने भाजपा के समर्थन में एकमुश्त मतदान किया था. यदि मूर्ति लगाने मात्र से प्रदेश के बड़े वोट बैंक को साधा जा सकता है तो राजनीतिक दृष्टि से यह बुरा सौदा नहीं था. आर्थिक दृष्टि से राजभर समुदाय समाज के सर्वाधिक विपन्न वर्गों में से है. उचित होता कि केंद्र और प्रदेश दोनों की सरकारें राजभरों की मूलभत समस्याओं के समाधान हेतु आवश्यक कदम उठातीं. लोकतांत्रिक विश्वास को इसी तरह कायम रखा जाता है. लेकिन जिस विचारधारा का भाजपा प्रतिनिधित्व करती है, उसमें लोकतांत्रिक शक्तिकरण से कहीं अधिक महत्त्व मनुष्य को बौद्धिक विपन्न बनाने वाले कर्मकांडों का है. इस बार भी उसने बिना किसी हिचक, वही किया.

सवाल है, राजा सुहेलदेव(995—1060 ईस्वी) ही क्यों? ग्यारहवीं शताब्दी के इस राजा के बारे भारतीय लेखकों ने बहुत कम लिखा है. उनकी उपेक्षा स्वतः प्रमाण है कि राजा सुहेलदेव शूद्र कुलोत्पन्न था. कदाचित इसीलिए वह 900 वर्षों तक भारतीय लेखकों की स्मृति से गायब रहा. जबकि पार्शियन लेखक अब्दुर्र रहमान चिश्ती 17वीं शताब्दी में ही, ‘मिरात-ए-मसूदी’ में राजा सुहेलदेव और सालार मसूद के बीच हुए युद्ध का वर्णन कर चुका था. सालार मसूद गजनी के सुलतान का भतीजा था. उसने 16 वर्ष की उम्र में भारत में हमलावर के रूप में प्रवेश किया था. यहां उसने इस्लाम की स्थापना के लिए कई युद्ध लड़े, जिससे उसे गाजी की उपाधि प्राप्त हुई. सालार मसूद को सोमनाथ मंदिर की प्रसिद्ध मूर्तियों को तोड़ने का दोषी भी माना जाता है. दिल्ली, मेरठ आदि ठिकानों को जीतता हुआ, वह बहराइच की ओर प्रस्थान कर गया. हमलावर को अपनी ओर बढ़ते देख श्रावस्ती के राजा सुहेलदेव ने दूरदर्शिता का परिचय दिया. उन्होंने पड़ोसी राजाओं के साथ संघ तैयार किया. एक महीने तक राजा सुहेलदेव के नेतृत्व में लड़ाई चली. जिसमें दोनों पक्षों का भारी नुकसान हुआ. अंततः सालार मसूद युद्ध में घायल हुआ. वहीं उसकी मृत्यु हो गई. उसका मजार बहराइच में है, जहां उसको ‘गाजी मसूद’ के नाम से जाना जाता है. मुगल बादशाह जहांगीर के समकालीन चिश्ती के अनुसार, ‘सालार मसूद की ऐतिहासिकता, उसका भारत आना और यहां शहीद होना प्रामाणिक है. इस कहानी को अनेक तरह से कहा गया है, परंतु इतिहास की किसी भी प्रामाणिक पुस्तक में इसका उल्लेख नहीं है.’(हिस्ट्री ऑफ इंडिया एज टोल्ड बाय इट्स ओन हिस्टोरियन : मोहम्मदियन पीरियड). बताया गया है कि पुस्तक की रचना से पहले लेखक ने सालार मसूद के बारे में काफी शोध किया था. आखिर उसे मुल्ला मुहम्मद गजनवी द्वारा लिखित पुस्तक मिली. मुल्ला मुहम्मद सुल्तान मुहम्मद सुबुक्तगीन का सेवादार था. उसने कुछ समय तक सालार साहू तथा सालार मसूद के बेटे के यहां भी नौकरी की थी.

एक तरह से यह भारत पर मुस्लिमों के आरंभिक आक्रमणों का किस्सा है. बावजूद इसके उस वर्ग में जिसका विद्वता के नाते शिखर पर बने रहने का दावा था, और जिसके उत्तराधिकारी आज हिंदुत्व के पैरोकार बने हैं—यह हिम्मत नहीं थी कि गाजी सालार मसूद को युद्ध में धूल चटाने वाले राजा सुहेलदेव के इतिहास को सहेज सके. भारतीय लेखकों को सुहेलदेव की याद बीसवीं शताब्दी में उस समय आई, जब स्वाधीनता करीब दिखने लगी थी. विभिन्न दलों में आजाद भारत की सत्ता पर काबिज होने की होड़ मची थी. उन्हीं दिनों कहानी को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की गई. सुहेलदेव को ‘गौ-रक्षक’ बताया गया. कहानी को सांप्रदायिक रंग देने के लिए कुछ प्रसंग गढ़े गए. उनमें से एक के अनुसार, यह सोचते हुए कि हिंदू सैनिक गायों पर हमला नहीं करेंगे, सालार मसूद ने अपनी छावनी के आगे गाएं बांध दीं. सुहेलदेव को पता चला तो परेशान हुए. दूरदर्शिता दिखाते हुए उन्होंने युद्ध आरंभ होने से पहले ही सालार मसूद के छावनी-स्थल पर धावा बोलकर गायों के रस्से काट डाले. उसके बाद जो युद्ध हुआ, उसमें सुहेलदेव ने सालार मसूद को करारी शिकस्त दी. इस कहानी का सिवाय लोक-साहित्य के कोई संदर्भ नहीं है. लेकिन कहानी का यही हिस्सा सुहेलदेव को आज के संदर्भों में प्रासंगिक बनाता है. आज हिंदुत्ववादी लोग सालार मसूद को सोमनाथ के सूर्यमंदिर की मूर्ति को ध्वस्त करने का दोषी मानते हैं. जबकि मुस्लिम संप्रदायवादी उसे गाजी और शहीद का दर्जा देते हैं. इन सबसे अलग एक वर्ग उन लोगों का है, जो आस्था और विश्वास से परे कुछ सोच ही नहीं पाते. ऐसे लोग सालार मसूद को पीर का दर्जा देकर उसकी मजार पर सदके करते हैं.

हम मिश्रित अस्मिताओं वाले समाज में रहते हैं. यदि किसी को महाराणा प्रताप में अपना आदर्श नजर आता है और वह चाहता है कि उनकी मूर्ति स्थापित हो तो ऐसी इच्छा करने और उसकी मांग करने का उसे पूरा अधिकार है. देश में महाराणा प्रताप की मूर्तियों की कमी नहीं है. कुछ दशकों से गांवों में प्रवेशद्वार बनवाने का चलन बढ़ा है. ठाकुर बहुल गांवों के प्रवेश-द्वार पर चेतक पर सवार महाराणा प्रताप की मूर्तियां प्रायः दिख जाती हैं. उनसे गांव के शक्ति-संतुलन का अनुमान लगाया जा सकता है. राजस्थान में महाराणा प्रताप का शौर्य गढ़ने के नाम पर इतिहास को नए सिरे से लिखे जाने की कवायद शुरू हो चुकी है. किसी-किसी गांव में दलित बस्ती में, उभरती अस्मिताओं की प्रतीक, आंबेडकर की प्रतिमा भी दिख जाती है. जिसके रूपाकार को देख वहां पसरी विपन्नता का अनुमान लगाया जा सकता है.

राजा सुहेलदेव की मूर्ति लगाने के लिए आंबेडकर पार्क ही क्यों? प्रशंसकों की निगाह में राणा प्रताप तथा राजा सुहेलदेव का संघर्ष उतना ही महान हो सकता है, जितना दलितों के लिए महात्मा फुले, पेरियार और डॉ. आंबेडकर का. परंतु दोनों के संघर्ष में मूल-भूत अंतर है. यह अंतर परंपरा और आधुनिकता का भी है. फुले दंपति, डॉ. आंबेडकर, रामास्वामी पेरियार, कांशीराम आदि का जीवन-संघर्ष सामाजिक न्याय को समर्पित, लोकतंत्र की भावना से ओतप्रोत था. उसके फलस्वरूप आधुनिक समाज गढ़ने में मदद मिली. जबकि महाराणा प्रताप, राजा सुहेलदेव, यहां तक कि शिवाजी भी राजशाही और सामंतवाद के पोषक-पालक हैं. उनकी महानता इतिहास के संदर्भ में आंकी जानी चाहिए. तदनुसार उनकी जीवनगाथाएं बच्चों को इतिहास की तरह पढ़ाई जा सकती हैं. मनुष्य उनसे प्रेरणा ले सकता है. न्याय और लोकतंत्र की समृद्धि हेतु आवश्यक है कि आगामी पीढ़ियां लोकतांत्रिक संघर्षों के विविध रूपों से परिचित हो. इसके लिए ज्योतिबा फुले और डॉ. आंबेडकर के पार्श्व में महाराणा प्रताप की मूर्ति स्थापित करने का कोई औचित्य नहीं है.

अपने फैसले के समर्थन में मुख्यमंत्री उत्तरप्रदेश तर्क दे सकते हैं कि आंबेडकर पार्क में बहुजन नायकों के अगल-बगल राजा सुहेलदेव, महाराणा प्रताप आदि की मूर्तियां लगाने से समाज में बराबरी और एकता का संदेश जाएगा. फलस्वरूप देश में विभिन्न स्तरों पर जो अलगाव दिखाई पड़ता है, उसमें कमी आएगी. मुख्यमंत्री की घोषणा में नई मूर्तियों की धातु तथा उनके आकार का उल्लेख नहीं था. जबकि ओमप्रकाश राजभर का कहना है कि सुहेलदेव की प्रतिमा मायावती की प्रतिमा से कम से कम पांच फुट ऊंची होगी. आप इस गणित में उलझे रहिए. सोचते रहिए कि मायावती(दलित) से राजा सुहेलदेव(शूद्र) की प्रतिमा पांच फुट बड़ी होगी तो क्षत्रिय महाराणा प्रताप की प्रतिमा को राजा सुहेलदेव की प्रतिमा से कितना ऊंचा रखा जाएगा? मंत्री महोदय इसका समाधान भले न खोज पाएं हों, सुहेलदेव के बहाने अपनी राजनीतिक गोटियां फेंटने सवर्ण इसे भली-भांति समझते हैं. यह कोई आज का किस्सा भी नहीं है. धर्मांतरण के दबावों से उबरने के लिए अतिपिछड़ी जातियों के संस्कृतिकरण की कोशिश आर्यसमाज के षुरुआती दिनों में ही आरंभ हो चुकी थी. भाजपा उस जकड़बंदी को मजबूत करना चाहती है.

वस्तुतः अभिजन वर्ग के नेतृत्व में बनी सरकारें परिवर्तन की मांग को उस समय तक उपेक्षित रखती हैं, जब तक संबंधित समूहों में परिवर्तन के प्रति अनिवार्य चेतना न हो. परिवर्तन की दिशा-दशा तय करने में विचारधाराओं की भूमिका महत्त्वपूर्ण रहती है. इसलिए शिखर पर मौजूद लोग परिवर्तन तथा परिवर्तन को हवा देने वाले विचार, दोनों से घबराते हैं. परिवर्तन की आंधी को रोकने, उसकी दिशा बदलने के लिए ऐसे मिथक गढ़े जाते हैं जो लोगों के परंपराबोध को जड़ और पश्चगामी बनाते हों. मूर्तिकरण जैसी प्रवृत्तियां उसमें सहायक बनती हैं. अकस्मात चर्चा में आए सुहेलदेव प्रसंग को इसी संदर्भ में देखना चाहिए. यह उन सपनों और संकल्पों से परे है जो आजादी के साक्षी बने थे. उनमें एक संकल्प यह भी था कि देश लोकतांत्रिक आदर्शों के साथ आगे बढ़ेगा. लेकिन आजादी के बाद से ही गांधी राजघाट में और संविधान की भावना संसद के शोरगुल में दबती आई है.

वैसे भी भाजपा शासित राज्यों में इन दिनों ऊंची से ऊंची प्रतिमा स्थापित करने की होड़ मची है. गुजरात सरकार सरदार पटेल की 182 मीटर फुट ऊंची प्रतिमा लगाने जा रही है, वहीं महाराष्ट्र सरकार द्वारा 190 मीटर ऊंची शिवाजी की प्रतिमा लगाने का ऐलान किया गया है. इसके पीछे इतिहास को सहेजने से अधिक कोशिश राष्ट्रवाद को थोपने की है. एक तरह से सांस्कृतिक हमला. जिससे समाज में विक्षोभ उत्पन्न होने की संभावना है. मूर्तिकरण के खतरे और भी हैं. आंबेडकर पार्कों में मूर्तियों के सामान्य आकार से बड़ी मूर्तियां लगवाने की कोशिश शुरू हुई तो बहुजन समाज उसे अपनी संस्कृति पर हमले की तरह लेगा. वह उसे अपने महानायकों का अपमान समझेगा. उससे जातीय संघर्ष में वृद्धि होगी. बात केवल यहीं तक सीमित नहीं है. सुश्री मायावती के शासनकाल में बने आंबेडकर पार्कों में उन बहुजन नायकों की मूर्तियां लगी हैं, जिन्होंने देश में व्याप्त धार्मिक-सामाजिक पाखंड के विरोध में लंबा संघर्ष किया था. जिन्होंने दलितों में आत्मचेतना जाग्रत की. भाग्य को ही सबकुछ मानते आए बहुजनों को अपने ऊपर विश्वास करने और अपने भरोसे जीना सिखाया. वर्तमान सरकार की कोशिश उन्हें फिर से मनुवाद के हवाले कर देने की है. वैसे इसके लिए न केवल सरकार दोषी है, न वे लोग जो देष और समाज को खास दिषा में ले जाना चाहते हैं. दोष जनता का भी है, जो रूढ़ियों और परंपराओं से चिपके रहने में ही जीवन की परमसिद्धि माने रहती है. जो नए ज्ञान का उस समय तक विरोध करती है, जब तक कि वह उसपर थोप न दिया जाए. ऐसी जनता को फुसलाना आसान होता है. मूल्यों और विचारों को मूर्तिकरण में सीमित कर देना भी इसी रणनीति का हिस्सा है.

ओमप्रकाश कश्यप

 

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धर्मनिरपेक्षता और जाति

  • कोई भी व्यक्ति इतना न्यायप्रिय नहीं होता, जितना पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति.—गिल्बर्ट कीथ चेटरसन

  • ‘‘मेरे विचार में भारत न हिंदू देश बन सकता है ना हिंदू धर्म भारत सरकार का धर्म बन सकता है. हमें याद रखना चाहिए कि हमारे देश में अल्पसंख्यक भी रहते हैं और हमारा यह कर्तव्य है कि उनकी सुरक्षा का प्रबंध करें. यह देश सबका देश है. चाहे कोई धर्म, कोई जाति हो. हम उस रास्ते पर नहीं चल सकते़ जिसपर पाकिस्तान चल रहा है. हमें यह ध्यान रखना होगा कि हमारे धर्मनिरपेक्ष उद्देश्य सुरक्षित रहें. यहां हर मुसलमान, हर ईसाई और अन्य अल्पसंख्यक वर्गों को यह विश्वास होना चाहिए कि वह सुरक्षित है और उसे भारतीय नागरिक की हैसियत से बराबर के अधिकार प्राप्त हैं. अगर हम उसे यह विश्वासदिलाने में नाकाम रहे तो यह हमारी विरासत और इस देश का घोर अपमान होगा.’’—सरदार वल्लभभाई पट

धर्मनिरपेक्षता का मामला आधुनिक राष्ट्रराज्य की न्यायचेतना से जुड़ा है. जबकि जाति इस देश के लिए कम से कम तीन हजार वर्ष पुरानी संस्था है. जाति का भारतीय, विशेषकर हिंदू समाज पर इतना गहरा प्रभाव है कि बिना इसके हिंदुओं को अपनी पहचान अधूरी लगती है. जबकि इसी की वजह से समाज के बड़े वर्ग को कदमकदम पर अपमानितलांछित होना पड़ता है. विभिन्न सभ्यताओं में कार्यविभाजन के लिए समाज को अलगअलग बांटने की संस्कृति रही है. वर्तमान में दुनियाभर में केवल भारत ऐसा देश है जहां आज भी जाति का बोलबाला है. जिसके चलते बच्चे के जन्म के साथ ही तय कर दिया जाता है कि वह समाज में कौनसा काम करने के लिए जन्मा है. इन दिनों परिस्थितियां बदली हैं. विशेषरूप से शहरों में. वहां जाति के विरुद्ध आवाजें उठने लगी हैं. मगर यह सुगबुगाहट मुख्य रूप से जातिवादी अन्याय एवं शोषण का शिकार रहे वर्गों में देखने को मिलती है. जिन वर्गों को जातीय स्तरीकरण का लाभ मिलता आया है, वे मौका मिलते ही आज भी उसके समर्थन में खड़े हो जाते हैं. उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के सत्ता संभालने के बाद ऐसा स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है. हाल ही में भाजपा के एक वरिष्ठ नेता का बयान देखा. उनके अनुसार जाति ठीक, जातिवाद बुरा है. उनके कहने का आशय है कि जाति भले बनी रहे, परंतु जातिवाद जाना चाहिए. यह ठीक ऐसा ही कामना है कि धर्म और धार्मिक दुराग्रह बने रहें और सांप्रदायिकता समाप्त हो जाए. लोकप्रिय राजनीति के दबाव भी जातिवाद को संरक्षित करने का काम करते हैं. हिंदुओं में जाति, सभ्यता और संस्कृति परस्पर अंतर्गुंफित हैं. इसलिए वे एकदूसरे के गुणदोष से भी प्रभावित होते हैं.

जातिवाद की तुलना में धर्मनिरपेक्षता आधुनिक अवधारणा है. कुछ विद्वान इसे मध्यकाल तक ले जाते हैं. अकबर आदि आरंभिक मुगल सम्राटों की यह कहकर प्रशंसा की जाती है कि वे सभी धर्मों का सम्मान करते थे. उनके राज्य में धर्म के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं था. वे किसी सीमा तक सही भी हैं. लेकिन अकबर आदि की राजनीति धार्मिक उदारता अर्थात सर्वधर्म समभाव तक सीमित थी. वह स्वयं धार्मिक था और राज्य में अनेक पद धार्मिक आधार पर सुनिश्चित थे. उसे धार्मिक रूप से उदार सम्राट तो कहा जा सकता है, धर्मनिरपेक्ष नहीं. धर्मनिरपेक्षता के लिए राज्य का लोकतांत्रिक होना आवश्यक है. एक सिद्धांत के रूप में धर्मनिरपेक्षता यूरोपीय चिंतन की देन है. इस बारे में विचित्र बात यह है कि बहुधर्मिता जो कई बार सांप्रदायिकता के रंग में रंगकर भारत के लिए विकट स्थितियां पैदा कर देती है, जैसी कोई समस्या यूरोप में न थी. वहां धर्म का एकमात्र केंद्र चर्च था. उसके दो धड़े थे—कैथोलिक और प्रोस्टेंट. दोनों के बीच संघर्ष होता रहता था. वही दौर था जब वाल्तेयर, रूसो, हीगेल, फायरबाख, बूनो बायर, मार्क्स, मिखाइल बकुनिन आदि ने धार्मिक पाखंड और उसके सहारे फलतेफूलते सामंतवाद का विश्लेषण करते हुए, तज्जनित बौद्धिक जड़ता, शोषण आदि की ओर इशारा किया था. वहीं जॉन लाक, हॉब्स, बैंथम, जॉन स्टुअर्ट मिल, जेफरसन, थॉमस पेन जैसे विचारकों ने व्यक्ति स्वाधीनता और समानता की मांग को आगे बढ़ाते हुए विधिसम्मत राज्य की स्थापना पर जोर दिया था. उस समय तक औद्योगिक क्रांति की शुरुआत हो चुकी थी. उसे सफल बनाने का एकमात्र उपाय था, मानवमात्र की सामंतवाद से शारीरिकमानसिक मुक्ति.

धर्मनिरपेक्षता के विचार का जन्मदाता जार्ज जैकोब हॉलीयोक(1817—1906) को माना जाता है. विचारों से नास्तिक हॉलीयोक सहकारिता के पितामह कहे जाने वाले राबर्ट ओवेन से प्रभावित था. ओवेन ने इंग्लेंड एवं अमेरिका में सहजीवन पर आधारित बस्तियों की स्थापना की थी. धर्मनिरपेक्षकता उसके उद्देश्य में व्यावहारिक जरूरत थी. सहकारिता और सहजीवन पर आधारित बस्तियों की सफलता के लिए आवश्यक था कि लोगों में धर्म आदि को लेकर मतभेद न्यूनतम हों. हॉलीयोक धर्मकेंद्रित समाज के स्थान पर ऐसे समाज का सपना देखता था, जिसमें लोग आपसी सहयोग और मैत्री द्वारा बंधे हों. ज्ञानविज्ञान और तर्क के आधार पर निर्णय लेते हों. मानते हों कि मानवतावादी लक्ष्यों की प्राप्ति में मनुष्य का अपना विवेक किसी भी देवता या पैगंबर से अधिक मददगार होता है. 1851 में धर्मनिरपेक्षता का विचार प्रस्तुत करते हुए हॉलीयोक ने ऐसे आदर्शोन्मुखी समाज की परिकल्पना पेश की थी, जिसमें लोग शारीरिक, मानसिक, नैतिक और बौद्धिक उठान के उच्चतम स्तर पर हों. जीवन अदृश्य शक्तियों की कृपा के बजाय ठोस, यथार्थ, सकारात्मक जीवनबोध और मानवविकास के उद्देश्य को समर्पित हो. जिनमें नैसर्गिक शुभता, सदगुण, चारित्रिक उदात्तता तथा वैचारिक गहनता हो; तथा लोग आस्था और वायवी विश्वासों के बजाय ठोस, दृश्यमान, चराचर जगत से प्रेरणाएं ग्रहण करते हों; और विशुद्ध मानवतावादी लक्ष्यों के लिए निःस्वार्थ भाव से समर्पित हों. उसका मानना था कि मानवव्यवहार तथा उसके नैतिक प्रतिमानों का एकमात्र आधार लोककल्याण होना चाहिए. उसके लिए धर्म, आस्था, लोकपरलोक जैसी प्रगतिविरोधी मान्यताओं का बहिष्कार अत्यावश्यक है.

भारत में शासन के स्तर पर धर्मनिरपेक्षता के अनुसरण की पहली विधिवत घोषणा 1857 में प्रथम स्वाधीनता संग्राम की विफलता के बाद हुई थी. उस समय दिल्ली सहित अनेक बड़े राज्यों पर मुस्लिमों का शासक था. दूसरी ओर देश की बहुसंख्यक जनता हिंदू थी. दोनों ही समुदाय धार्मिक भावनाओं से गहराई से जुड़े थे. प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के मूल में भी धार्मिक भावनाओं के आहत होने से जन्मा आक्रोश था. इसलिए ईस्ट इंडिया कंपनी से शासन की बागडोर अपने हाथों में लेते हुए महारानी विक्टोरिया ने घोषणा की थी कि भारत धर्मनिरपेक्ष राज्य होगा. उसके तुरंत बाद देश में कानूनी सुधार के दौर की शुरुआत हुई. उसके फलस्वरूप धर्मनिरपेक्ष राज्य का स्वरूप सामने आने लगा. भारतीय संविधान भी धर्मनिरपेक्षता की भावना से ओतप्रोत है. 1951 में हिंदू कोड बिल पर भाषण देते हुए डॉ. आंबेडकर ने जो कहा, उससे धर्मनिरपेक्षता को भलीभांति समझा जा सकता है. आंबेडकर के अनुसार—

धर्मनिरपेक्ष राज्य का अर्थ यह नहीं है कि वह लोगों की धार्मिक भावनाओं का ध्यान नहीं रखेगा. धर्मनिरपेक्ष राज्य का अर्थ केवल यह है कि यह संसद सारी जनता पर कोई एक विशेष धर्म नहीं थोप पाएगी.’

भारतीय संविधान में धमनिरपेक्षता को सिद्धांततः 42वें संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया. तो क्या धर्मनिरपेक्षता का अर्थ राज्य का धर्म की ओर से महज तटस्थ हो जाना है? क्या यह केवल जनता के धार्मिक विश्वास एवं राज्य से जुड़ा विषय है? डॉ. आंबेडकर के उपर्युक्त कथन और संविधान संशोधन के समय सदस्यों की बहस पर विचार करें तो यही प्रतीत होता है. गांधी, नेहरू, पटेल, के. एम. मुंशी, लक्ष्मीकांत मेघ, के. एम. पणिक्कर, के. संथाराम, एच. आर. खन्ना, पी. वी. गजेंद्रड़कर आदि विद्वानों ने धर्मनिरपेक्षता को धर्म के संदर्भ में ही परिभाषित करने की कोशिश की है. कुछ ऐसे नेता भी थे जिन्हें धर्मनिरपेक्षता का विचार ही अस्वीकार था. उनमें प्रमुख नाम डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का है. डॉ. राधाकृष्णन की ख्याति दार्शनिकविचारक के रूप में है. परंतु व्यक्ति के रूप में उन्हें उदार आस्थावादी ही कहा जा सकता है. वे धर्म को नैतिकता के आलंबन के रूप में देखते थे. उन्हें क्षोभ था कि ‘आधुनिक मनुष्य की मानस रचना रूसो के ‘सोशल कांट्रेक्ट, मार्क्स की ‘दि कैपीटल’, डार्विन की ‘ऑन दि ओरीजिन्स ऑफ सोसाइटीज’ तथा स्पिंग्लर की ‘डिक्लाइन ऑफ वेस्ट’ के प्रभाव से हुई है.’ उनके अनुसार भारतीय राज्य की निष्पक्षता को धर्मनिरपेक्षता अथवा नास्तिकता के भ्रामक अर्थ में नहीं समझा जाना चाहिए. वे बिना धर्म के नैतिकता को असंभव मानते थे. इसलिए धर्मनिरेक्षता को उन्होंने अपने समय की सबसे बड़ी कमजोरी माना था(रिलीजन एंड सोसाइटी, पृष्ठ 20). इस तरह स्वयं डॉ. राधाकृष्ण भी धर्मनिरपेक्षता को धर्म के संबंध में ही देखसमझ रहे थे. वे इस तथ्य को जानबूझकर नजरंदाज करते रहे कि समाज में अपनी प्रतिष्ठा, अपना स्थान सुरक्षित के लिए धर्म स्वयं नैतिकता का सहारा लेता है. हमारे युग की त्रासदी ही यही है कि यहां धर्म ने नैतिकता को हड़प लिया है.

बहुलतावादी भारतीय समाज में अनेक संस्कृतियां और उपसंस्कृतियां हैं. एक ही राष्ट्र की सीमा में यहां हिंदू, जैन, पारसी, मुस्लिम, ईसाई, सिख आदि विभिन्न धर्मावलंबी रहते हैं. ऐसी स्थिति में धर्मनिरपेक्षता स्वयं एक मूल्य बन जाती है. ऐसा मूल्य जिसे समाज ने स्वयं हासिल किया है. सम्राट अकबर द्वारा सभी धर्मों के प्रति उदारता पूर्ण व्यवहार, महारानी विक्टोरिया द्वारा धर्मनिरपेक्षता की नीति लागू करना तथा संविधान में उसे एक मूल्य के रूप में शामिल करना इसलिए संभव हुआ क्योंकि भारतीय जनता ऐसा चाहती थी. धर्म उसके लिए निजी आस्था और व्यवहार का विषय रहा है, राजनीति का नहीं. इसलिए यहां धर्म को लेकर कभी सीमारेखाएं नहीं बनीं. स्वाधीनता संग्राम की स्थितियों का सूक्ष्म अवलोकन किया जाए तो तत्कालीन भारतीय समाज को सामान्यतः दो हिस्सों में बंटा पाते हैं. एक ओर संभ्रात तबका, जिसमें जमींदार, नबाव, राजेमहाराजे, पुरोहितकाजी, सेठसाहूकार आदि सम्मिलित थे. उन्हें सत्तासंरक्षण प्राप्त था. बदले में वे सरकारी अमले को भेटसौगात आदि देकर प्रसन्न रखते थे. उनकी निगाह में शासन का अभिप्राय जनता से कर वसूली तक सीमित था. लगभग छह सौ रियासतें उस समय देश में थीं. जिनके कर्ताधर्ता अंग्रेजियत में ढले हुए थे.

दूसरा वर्ग किसानों, मजदूरों, शिल्पकारों तथा उन छोटेछोटे व्यापारियों का था, जो अंग्रेजों तथा उनके मुंह लगे सामंतों के अत्याचारअनाचार का शिकार थे. अपने श्रमकौशल के भरोसे आजीविका कमाने वाला वह वर्ग अंग्रेजी सत्ता से मुक्ति चाहता था. संभ्रांत तथा गैर संभ्रांत दोनों ही वर्गों में धर्म के आधार पर कोई विभाजन न था. दोनों में सभी प्रकार के धर्मावलंबी शामिल थे. आपसी लेनदेन था. हो सकता है शुद्धतावादियों का एक छोटासा तबका इधरउधर दोनों तरफ रहा हो. लेकिन उसकी जनसमाज में कोई पैठ न थी. आजादी के संघर्ष में यह वर्ग और भी करीब आया था. स्वाधीनता संग्राम के दौरान ही यह तय हो चुका था कि स्वतंत्र भारत में सामंतों और पंडापुरोहितों के अधिकारों में भारी कटौती की दरकार होगी. नई व्यवस्था में धर्म का हस्तक्षेप न्यूनतम होगा. जनता मुख्य निर्णायक की भूमिका में रहेगी. स्वाधीनता संग्राम के दौरान गर्मदल, नरम दल, क्रांतिकारी, अहिंसावादी आदि जितने भी समूह बने, उनमें धर्मनिरपेक्षता को लेकर लगभग आमसहमति थी. कह सकते हैं कि जातिविहीन समाज और धर्मनिरपेक्षता, स्वतंत्रता से जुड़े महत्त्वपूर्ण सर्वसम्मत संकल्प थे. जनमत के दबाव के चलते गांधी जैसे वर्णव्यवस्था समर्थक नेता को भी धर्मनिरपेक्षता के समर्थन में आना पड़ा था. 1946 में ईसाई मिशनरी से संवाद करते हुए उन्होंने लिखा था—

यदि तानाशाह होता तो राज्य और धर्म को एकदूसरे से अलग कर देता. मैं अपने धर्म से बंधा हूं. उसके लिए अपनी जान भी दे सकता हूं. परंतु वह मेरा निजी मामला है. राज्य के साथ उसका कोई लेनादेना नहीं है. राज्य को स्वास्थ्य, लोककल्याण, संचार, विदेशनीति, मुद्रा जैसे धर्मनिरपेक्ष मामलों में फैसले लेने का पूरा अधिकार है; धर्मिक मामलों नहीं. धर्म प्रत्येक व्यक्ति का निजी मसला है.’2

क्या धर्मनिरपेक्षता और शासन की प्रकृति में कोई अंतःसंबंध है? राजतंत्र हो या गणतंत्र धर्मनिरपेक्षता की कसौटी पर क्या दोनों ही खरे हैं? असल में ऐसा नहीं है. राजतंत्रात्मक शासन प्रणालियां किसी न किसी रूप में धर्म से अनुशासित और प्रेरित रही हैं. धर्म की भांति उनका ढांचा भी सर्वसत्तावादी होता है. इसलिए उनके लिए पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष होना, न केवल कठिन बल्कि असंभव होता है. उदार सम्राट अपने राज्य में विभिन्न धर्मावलंबियों के बीच समानता का नियम लागू कर सकता है. वह धार्मिक भेदभाव से भी मुक्त हो सकता है. लेकिन धर्मनिरपेक्ष राज्य के लिए केवल इतना अपेक्षित नहीं होता. न ही उसका आशय सर्वधर्म समभाव तक सीमित होता है. राजतंत्र में सम्राट की हैसियत एकल संस्था की होती है. वह उदार हो या कठोर, सारे निर्णय उसकी के विवेककुविवेक से चलते हैं. राजा के कुछ सलाहकार भी होते हैं, परंतु दरबारियों की सलाह पर अमल करना सम्राट के लिए बाध्यकारी नहीं होता. सत्ताअंतरण में अनुवांशिक उत्तराधिकार का नियम राजा को और भी शक्तिशाली बनाता है. इस प्रकार उसकी हर इच्छा वैध मान ली जाती है. ऐसे राज्यों में धर्मनिरपेक्षता व्यक्तिगत निर्णय तक सिमटकर, प्रकारांतर में राजा या सम्राट की अनुकंपा के रूप में सामने आती है. राजा अपने निर्णय को इच्छानुसार कभी भी बदल सकता है. राजा के बाद, अथवा उसके विचारों में आए परिवर्तन के साथ ही धर्मनिरपेक्षता के आगे भी प्रश्नचिह्न लगने लगता है. उधर जो लोग राजा का गुणगान सभी धर्मों के प्रति उसकी उदारता और न्यायभावना के लिए करते आए थे, तत्काल उसे धर्मरक्षक, देवानामप्रिय, धर्मोद्धारक जैसी उपाधियों और अलंकारों से महिमामंडित करने लगते हैं. चूंकि राजतंत्र में राजा स्वयं एक संस्था होता है. इसलिए उसकी मर्जी राज्य की मर्जी भी मान ली जाती है. ऐसे में राजा की आस्था, राज्य की आस्था के रूप में प्रदर्शित होती रहती है. ऐसे राज्य में धर्मनिरपेक्षता न तो पूरी तरह फलित होती है, न ही लंबे समय तक टिकाऊ रह पाती है. आधुनिक राष्ट्रराज्य के लिए जो न्याय, समानता एवं स्वतंत्रता जैसे मानवमूल्यों के आधार पर गठित होते हैं, वहां धर्मनिरपेक्षता राज्य की ‘कृपा’ के बजाय उसके संवैधानिक कर्तव्य के रूप में निरूपायित होती है. वह राज्य की विभिन्न धर्मावलंबी नागरिकों के प्रति निष्पक्षता एवं न्यायभावना को दर्शाती है.

श्रेष्ठ राज्य की नैतिकता उसके नागरिकों के आचरण में झलकनी चाहिए. धर्मनिरपेक्ष राज्य की अपेक्षा होती है कि नागरिकगण अपने धार्मिक विश्वासों के साथसाथ दूसरों के विश्वासों का भी समादर करें. धर्मनिरपेक्ष आचरण के लिए नागरिकों का धर्मविशेष के प्रति आस्थावान रहना आवश्यक नहीं है. मनुष्य धार्मिक आस्था के बिना भी धर्मनिरपेक्ष रह सकता है. राज्य की ओर से धर्मनिरपेक्ष आचरण दर्शाता है कि वह नागरिकभावनाओं के प्रति कितना उदार और संवेदनशील है. ऐसा राज्य सभी धर्मों का सम्मान करता है. यदि कहीं विवाद हों तो उनका समाधान विधिमान्य कसौटियों के अनुरूप खोजा जाता है. जाहिर है, धर्मनिरपेक्ष राज्य धर्म की उपेक्षा नहीं करता. न ही वह विभिन्न धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन कर उनकी कोटियां बनाता है. न ही यह निर्धारित करता है कि प्रचलित धर्मों में से कौनसा धर्म संवैधानिक मान्यताओं के अधिक करीब है. वह केवल धर्म को व्यक्तिगत आस्था का विषय मानकर खुद को उसकी ओर से तटस्थ बना लेता है. चूंकि विभिन्न धर्मों के नैतिक सिद्धांतों में एक किस्म की एकता का भाव रहता है. इसलिए सुधी नागरिकगण धर्मनिरपेक्षता को गणतंत्र की अनिवार्यता के रूप में स्वीकारने लगते हैं. उन्हें यह विश्वास रहता है कि उनमें से कोई भी, धर्म को बीच में लाकर न तो किसी विशेष छूट का अधिकारी है न ही धर्म के आधार पर उसे उन अधिकारों और अवसरों से वंचित किया जा सकता है, जो नागरिक होने के नाते उसे सहज प्राप्त हैं.

जाति मुख्यतः हिंदू धर्म से जुड़ा मसला है. चूंकि जाति को हिंदुओं में धर्मसम्मत बताया जाता रहा है, इसलिए इसे हिंदू धर्म की मान्य संस्था भी कहा जा सकता है. कुछ विद्वान इसपर आपत्ति कर सकते हैं. कह सकते हैं कि धर्मग्रंथों में केवल वर्ण का उल्लेख है, जाति का नहीं. वे यह भी कह सकते हैं कि वर्णविभाजन की मिलीजुली परंपरा भारत के अलावा यूनान, अफ्रीका, यूरोप, मिस्र, पूर्वी एशिया, चीन, जापान आदि देशों में भी प्रचलित थी. इससे इन्कार नहीं किया जा सकता. लेकिन कहीं भी वह उतनी रूढ़ नहीं रही, जैसी कि भारत में. प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ में व्यक्तियों को उनके गुणों के आधार पर काम सांपने की अनुशंसा की है. उसने लोगों को उनकी प्रकृति के अनुसार बांटकर, स्वर्ण, रजत, कांस्य और लौह नामक श्रेणियां बनाई थीं. उसके पीछे प्लेटो की आदर्शवादी राज्य की संकल्पना थी. कार्यविभाजन को वंशानुगत न मान लिया जाए, इसके लिए सावधानी बरतते हुए उसने बच्चों का लालनपालन राज्य के संरक्षण में, उनकी पैत्रिक पहचान को छिपाकर करने का सुझाव दिया था. भारत में हालात भिन्न थे. यहां मान लिया गया कि ज्ञान और अज्ञान दोनों उत्तराधिकार में अंतरित किए जा सकते हैं. इसलिए पंडित के बेटे को पंडित और शूद्र की संतान को शूद्र का दर्जा दिया जाता रहा. समय के साथ जैसेजैसे नए पेशे बढ़े, जातियों की संख्या में भी वृद्धि होती गई. पेशागत जरूरत को रक्तसंकरण का नाम दिया गया.

यदि सब एक विराट पुरुष की संतान हैं तो रक्तशुद्धता का विचार क्यों? ऐसा तो हो नहीं सकता कि मस्तिष्क में एक प्रकार का खून बहता हो, और पैरों में दूसरा? सवाल जायज है. सवाल उठा भी होगा. परंतु नियम साधारण लोगों के लिए होते हैं. शिखर पर विराजमान लोग स्वार्थसिद्धि हेतु कोई न कोई चोर दरवाजा निकाल ही लेते हैं. ब्राह्मणों ने चोरदरवाजा निकाला था, द्विजीकरण का. एक संस्कार, जिसे ‘दूसरा जन्म’ कहा गया. जातियों और वर्णों के कथित रक्तसंकरण से जो बच्चे जन्मे उन्हें नई जातियों के रूप में समायोजित किया गया. प्राचीन धर्मग्रंथों में जातियां बनने का विस्तारसहित विवरण है. उसका विरोध या आलोचना कहीं भी नहीं है. न ही शूद्रत्व के आधार पर समाज के बड़े वर्ग के शोषण और उत्पीड़न की कहीं आलोचना है. अभिजात हिंदुओं की निगाह में वह आदर्श व्यवस्था रही है. इसलिए दैविक बताकर उसका जगहजगह महिमामंडन किया गया है. रक्तसंकरण के बहाने से मनु, याज्ञवल्क्य, गौतम आदि ने जातियों के बनने का जो विधान रचा है उसका विस्तृत वर्णन पांडुरंग वामन काणे की पुस्तक ‘धर्मसूत्रों का इतिहास’ में दर्ज है. इसलिए यह कहना पूरी तरह गलत है कि हिंदू धर्म केवल वर्णव्यवस्था को समर्थन देता है, जाति को नहीं. पौरोहित्य जातिवाद का संरक्षक रहा है. समाज में जैसेजैसे पुरोहितवाद का असर बढ़ा—न केवल जातियों की संख्या में वृद्धि हुई, बल्कि उनके बीच ऊेचनीच की भावना भी गहराती चली गई.

जातिव्यवस्था के कारण हिंदुओं को देशविदेश में इतनी बदनामी झेलनी पड़ी है कि सीधेसीधे उसके समर्थन में आने का कोई साहस कोई नहीं करता. प्रत्येक जाति के अपनेअपने मंच और संस्थाएं हैं. जिनके जरिये जातीय पहचान को बनाए रखने तथा संगठित शक्ति में बदलकर लोकतंत्र में दबावसमूह की तरह काम करने के प्रयास चलते ही रहते हैं. उच्चतम न्यायालय ‘हिंदुत्व को जीवनपद्धति’ बताना, प्रकारांतर में जातिआधारित समाज का समर्थन करना है. जातिव्यवस्था के समर्थक तर्क देते आए हैं कि मातापिता को काम करते देख संतान भी पैत्रिक व्यवसाय में दक्षता प्राप्त कर लेती है. इससे उनके आगे बेरोजगारी का संकट नहीं रहता. परंतु आजीविका की पहली शर्त उसका सम्मानजनक होना है. दूसरी मनुष्य को उससे इतनी आय होनी चाहिए कि वह अपने परिजनों की जरूरतों को पूरा करने के साथसाथ उन्हें बेहतर भविष्य दे सके. यदि व्यक्ति को लगता है कि उसकी वर्तमान आजीविका इन लक्ष्यों को पूरा करने में अक्षम है तो उसे अपने लिए उपयुक्त रोजगार चुनने का अधिकार होना चाहिए. जाति की अवधारणा इस मूलभूत सिद्धांत की उपेक्षा करती है. वह मनुष्य को अपने श्रम या सेवा के मूल्यांकन का अधिकार नहीं देती. धर्मसूत्रों और स्मृतियों में तो हर वह व्यवस्था की गई है जिससे शूद्र अपने दैन्य से कभी न उभर पाएं. ‘मनुस्मृति’ में शूद्र के पास संपत्ति जमा नहीं होने देने के स्पष्ट निर्देश हैं. यदि किसी कारण वह धन जमा करने में सफल हो जाए तो ब्राह्मण को यह अधिकार दिया गया है कि वह उसे बलात् छीन ले. गौतम धर्मसूत्र के अनुसार, ‘कन्या के विवाह का खर्च वहन करने के लिए और शास्त्रविहित किसी धार्मिक अनुष्ठान के लिए कोई व्यक्ति शूद्र से छल या बल का उपयोग करके धन ले सकता है.’(द्रव्यदान विवाहसिध्यर्थम धर्मतत्रसयोगे—गौतम धर्मसूत्र, 27/24, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, रामशरण शर्मा से उद्धृत). कह सकते हैं अपने आरंभ से ही यह व्यवस्था सामाजिक न्याय की भावना के विरुद्ध काम करती आई है.

समाज में लोग अपनेअपने धार्मिक विश्वास के आधार पर और उसके बिना भी रह सकते हैं. इसपर न तो समाज को आपत्ति होती है, न ही राज्य को. बल्कि राज्य का तो ध्येय ही व्यक्ति की स्वतंत्रता और निजी विश्वासों की सुरक्षा के लिए किया जाता है. ऐसा वह तभी कर सकता है, जब वह स्वयं किसी आस्था, विश्वास आदि से बंधा न हो. उसकी प्रतिबद्धता केवल और केवल अपने संविधान के प्रति हो. यदि वह स्वयं धर्म, जाति या वर्ग के प्रति आग्रहशील होगा तो उसके लिए तटस्थ भाव से काम करना कठिन हो जाएगा. समाज पूरी तरह समावेशी न हो तो भी उसके सदस्यों के बीच इतना समझौता अवश्य होता है जिससे वह न्यूनतम शांतिव्यवस्था को बनाए रख सके. जाहिर है संवैधानिक प्रतिबद्धताओं पर खरा उतरने हेतु राज्य का धर्मनिरपेक्ष आचरण समय की मांग बन जाता है. बहुधार्मिकता वाले समाजों में राज्य का धर्मनिरपेक्ष आचरण मात्र इसलिए अपेक्षित नहीं होता कि क्योंकि वहां अनेक धर्मावलंबी रहते हैं. वह इसलिए भी अपेक्षित होता है कि समानता, न्याय, स्वतंत्राता और निष्पक्षता के लिए राज्य को उन सभी विचारों और प्रतीकों से दूर रहना चाहिए, जिनके चयन में मानवीय विवेक की कोई भागीदारी न हो. जो व्यवस्था की मनमानी को दर्शाते हों. राज्य से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने नागरिकों के पक्ष में अधिकतम स्वतंत्रता सुनिश्चित करेगा. ऐसा वातावरण विनिर्मित करेगा, जिसमें लोग अपने विवेक और स्वतंत्रता का अधिकतम लाभ उठा सकें. उसके लिए थोपी गई किसी भी पहचान के आधार पर पक्षपात नहीं करेगा. धर्म के चयन में, जाति के चयन में मनुष्य की इच्छा या विवेक का कोई योगदान नहीं होता. ये जन्म के साथ ही उसपर थोप दी जाती हैं. धर्म के मामले में आध्यात्मिक विश्वास के अनुसार धर्मांतरण की छूट तो होती है, परंतु वह काम भी सर्वथा आसान नहीं होता. वहां धर्मकेंद्रित सामाजिकता आड़े आ जाती है.

वस्तुतः धर्म, जाति, वर्ण जैसी प्रतिगामी संस्थाएं परस्पर इतनी अंतर्गुंफित हैं कि इनमें से कौनसी, किसे और कब संबल प्रदान करती हैं, इस पर निर्णय लेना प्रायः कठिन होता है. धर्मसम्मत विधान विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच व्याप्त असमानता, ऊंचनीच आदि को दैविक सिद्ध करने की कोशिश में जुटे रहते है. इससे उनकी दुर्दशा के वास्तविक कारणों की पड़ताल कठिन हो जाती है. प्रकारांतर में सामाजिक न्याय की प्रक्रिया अवरुद्ध होती है; और राज्य अपने उद्देश्य में विफल सिद्ध होता है. अतः उचित यही है कि राज्य का संचालन सर्वसम्मत या बहुसम्मत विधान के माध्यम से हो, ताकि असमानता, अन्याय और अनाचार की हालत में जिम्मेदारी तय की जा सके. इस तरह धर्मनिरपेक्षता जहां लोकतंत्र का उदात्त लक्षण है, वहीं जाति सामंतवाद का ऐसा रूप है जिसमें अल्पसंख्यक वर्ग को बहुसंख्यक वर्गों पर शासन का अधिकार केवल इसलिए मिल जाता है कि उनका जन्म किसी जातिविशेष में हुआ है. परिस्थितिवश यदि सुधार की मांग उठे तो उसे वर्णव्यवस्था के ढांचे के भीतर रखने की पुरजोर कोशिश की जाती है. ऐसे में शासन का यह कर्तव्य है कि नागरिकों को अधिकतम स्वतंत्रता और समानता के अवसर उपलब्ध कराने के लिए प्रतिक्रियावादी शक्तियों को आगे न आने दे.

वर्णाश्रम व्यवस्था विकास विरोधी भी है. शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण के अनुक्रम में जो पहले स्थान पर है, उसे सर्वाधिक शारीरिक श्रम करना पड़ता है. जैसेजैसे आगे बढ़ते हैं, श्रम की मात्रा घटती चली जाती है. अंत में वह लगभग शून्य हो जाती है. ब्राह्मण का श्रम पूरी तरह अनुत्पादक है. जब वह भौतिक जगत एवं सुखसंसाधनों को मोहमाया, क्षणभंगुर आदि कहकर परंपरानुसार नकारता है, तो उत्पादकता का विरोधी बन जाता है. यह विधान ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के लिए तो विशेष सहायक सिद्ध होता है, परंतु शूद्रों के हितों के, जो मुख्य उत्पादक हैं—प्रतिकूल असरकारी होता है. अतः जब भी धर्मनिरपेक्षता की बात चलती है, समाज के वे वर्ग जिन्हें वर्णक्रम में ऊपर रखा गया है, कम या ज्यादा उसके विरोध में उठ खड़े होते हैं.

हम लेख के केंद्रीय विषय तक आ चुके हैं. भारत हिंदू बहुल देश है. जाति उसकी शास्त्रसम्मत संस्था. सवाल है कि धर्मनिरपेक्षता और जाति के संबंधों को कैसे परिभाषित किया जाए? सामाजिक न्याय के लिए धर्मनिरपेक्षता के साथ क्या जातिनिरपेक्षता भी आवश्यक है? चूंकि जाति के आधार पर समाज का बड़ा वर्ग शोषण का शिकार रहा है, इसलिए उत्तर तो ‘हां’ में ही आएगा. प्रथम दृष्टया यह अनुचित भी नहीं लगता. यह सच है कि धर्मनिरपेक्षता के साथ जातिनिरपेक्ष होना भी कामयाब लोकतंत्र की जरूरत है. परंतु मामला इतना आसान नहीं है, क्योंकि इस तरह हम ‘धर्म’ और ‘जाति’ को एक समान मान रहे होते हैं. जबकि जाति धर्म की अपेक्षा कहीं अधिक रूढ़ है. धर्म में जाति से ज्यादा खुलापन रहता है. हिंदुओं में व्यक्ति कथित तैंतीस करोड़ देवताओं में से किसी को भी अपना आराध्य मान सकता है. या फिर उसकी मर्जी है कि समस्त देवताओं तथा उनसे जुड़े कर्मकांडों को पूरी तरह नकारकर नास्तिक होने की घोषणा कर दे. उस समय लोग थोड़ीबहुत आलोचना करेंगे. लेकिन पूजापाठ एवं देवताओं को अंगूठा दिखाने से हिंदू धर्म से उसके संबंधों पर असर नहीं पड़ेगा. धर्म के नाम पर हिंदुओं में जितना खुलापन है, उतना शायद ही किसी दूसरे धर्म में हो. इसे उसकी विशेषता कहा जा सकता है. परंतु यह उसकी कमजोरी भी है. हिंदू धर्म अनेकास्थावादी धर्म है. इसमें साधक को इतनी छूट है कि वह अपने स्वतंत्र विश्वास के साथ हिंदू रह सकता है. जाति के साथ ऐसा नहीं है. वह जीवन के साथ जन्मती और जान के साथ जाती है. गांधी सहित इस देश के ऐसे असंख्य लोग हैं, जो धर्म के खुलेपन का समर्थन करते हैं, किंतु जाति और वर्ण के नाम पर कट्टर या परंपरापोषी देखे गए हैं. हिंदू समाज में जाति के आधार पर शोषण की शताब्दियों पुरानी रवायत है, जिसने समाज के बड़े वर्ग के जीवन को नर्क में बदल दिया था.

जाति के दो सामान्य पक्ष हैं. पहला व्यैक्तिक, दूसरा सामाजिक. समाज ने किसी जमाने में, सभ्यता के आदिचरण में तय किया कि व्यक्ति अपने पैत्रिक व्यवसाय को ही अपनाएगा. शुरूशुरू में लोगों ने भी मान लिया. उनके पास इसके अलावा दूसरा कोई रास्ता भी नहीं था. रक्षा और पाठपूजन के अलावा बाकी सारे काम शूद्रों के हिस्से आते थे. उन्हें पढ़नेलिखने या शस्त्र विद्या की जानकारी लेने की मनाही थी. प्राचीन भारत में ब्राह्मण के लिए पाठशालाएं और विद्यालय थे. क्षत्रियों के शिक्षणप्रशिक्षण के व्यापक प्रबंध थे. लेकिन शिल्पकारों के लिए पढ़नेलिखने या शिल्प के निखार के लिए कोई व्यवस्था न थी. श्रमिकों और कारीगरों का विधिवत विकास हो, इसकी आवश्यकता ही नहीं समझी जाती थी. लेकिन श्रम और शिल्पकर्म की मांग हर जगह थी. समाज में उनकी अबाध आपूर्ति रहे, इसके लिए नियम बनाया कि बेटा बाप के व्यवसाय को आगे बढ़ाएगा.

जब तक राज्य संस्था शक्तिशाली नहीं हुई थी, समाज में आवश्यक खुलापन था, शिल्पकारों ने भी उस व्यवस्था को सहज भाव से लिया होगा. आगे चलकर ब्राह्मणवाद ने लोगों के मनमस्तिष्क को जकड़ना शुरू किया. राजसत्ता के साथ मिलकर उन्होंने शिल्पकर्म और श्रम के मूल्यनिर्धारण का काम अपने हाथों में ले लिया. इस बीच बौद्धिक स्वातंत्रय का परिचय देते हुए, मेहनतकश वर्गों ने नए दार्शनिक सिद्धांतों की नींव भी रखी. फलस्वरूप आजीवक, चार्वाक, लोकायत, श्रमण, अक्रियावादी, वैनायिक3 जैसे अनीश्वरवादी दर्शन अस्तित्व में आए. शिल्पकर्म की मांग बढ़ी तो वे संगठन बनाकर दूरदराज के देशों तक व्यापार करने लगे. एक समय ऐसा आया जब उन्होंने धर्मसत्ता और राजसत्ता के समानांतर आर्थिक आत्मनिर्भरता प्राप्त कर ली. बौद्ध धर्म के उदय तक लगभग ठीकठाक चलता रहा. कदाचित बुद्ध पहले ऐसे विचारक हुए जिन्होंने धार्मिक आधार पर सांगठनीकरण का रास्ता दिखाया. उसके पहले ब्राह्मण पुरोहित आश्रमों में रहकर वहीं से अपना प्रभुत्व जमाए रहते थे; उनकी पहुंच केवल सत्ताकेंद्रों तक थी. शूद्रों को वे कुछ समझते ही नहीं थे. उन्होंने शूद्रों की उपेक्षा, उन्हें अपने धर्मदर्शन से दूर रखने का हरसंभव प्रयत्न किया था. आर्थिक आत्मनिर्भरता का अवसर मिला तो शूद्र पूरे आत्मविश्वास के साथ नए दर्शनों की ओर मुखातिब होने लगे. ईसा से पांच सौ वर्ष पहले तक यही स्थिति बनी रही.

बौद्ध दर्शन का उभार ब्राह्मणों के लिए अप्रत्याशित था. उससे पहले भी विश्वामित्र जैसे क्षत्रिय तथा शूद्र विद्वानों ने ब्राह्मणों को बौद्धिक क्षेत्र में चुनौती दी थी. लेकिन वे सब वर्णव्यवस्था के समर्थक थे. अवसर मिलते ही ब्राह्मणों ने उन्हें उच्च वर्ण देकर वर्णव्यवस्था को बचाए रखा था. बौद्ध दर्शन को मिली व्यापक लोकप्रियता ने ब्राह्मणों के आगे अस्तित्व का संकट उत्पन्न कर दिया था. बुद्ध ने न केवल जाति और वर्णव्यवस्था को चुनौती दी थी, बल्कि क्षत्रियों को ब्राह्मणों से श्रेष्ठतर भी माना था. इसलिए बुद्ध के रहते उनका ब्राह्मणीकरण आसान न था. असुरक्षाबोध के बीच पुरोहितों का एक वर्ग पनपा जिसने स्वयं को प्राचीन धर्मदर्शन का अनुयायी बताते हुए आमजन में भी अपनी पैठ बनाना आरंभ कर दिया. परंतु आजीवक संप्रदाय की लोकप्रियता तथा बौद्ध एवं जैन जैसे श्रमण परंपरा पर आधारित धर्मों की लोकप्रियता के चलते आरंभिक शताब्दियों में सफलता उनके लिए दूभर बनी रही. बुद्ध के बाद राजसत्ता और धर्मसत्ता में फैलाव के लिए मानो होड़सी मच गई. चूंकि राज्य को संगठित करने के लिए काफी धन की आवश्यकता थी, इसलिए नए शासकों ने शिल्पकारों से उनके शिल्प के मूल्य निर्धारण का काम छीन लिया. चाणक्य आर्थिक रूप से स्वावलंबी शिल्पकार संगठनों को संदेह की दृष्टि से देखता था. इसलिए उसने सहयोगाधारित व्यापारिक संगठनों को नियंत्रित करना आरंभ कर दिया. इस बीच पुरोहितवर्ग तेजी से पनपा. उसने तेजी से कर्मकांड आधारित धर्मों को फैलाना शुरू कर दिया. जातिव्यवस्था को रूढ़ बनाने तथा तत्संबंधी भेदभाव और ऊंचनीच की नींव रखी जाने लगी. यह भेदभाव आर्थिक स्तर पर कितना गहरा था, इसका अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में मुख्य पुरोहित को प्रतिमाह 48000 पण वेतन मिलता था, जबकि प्रमुख शिल्पकार के लिए मात्रा 120 पण वृत्तिका ही निर्धारित थी.

उपर्युक्त से स्पष्ट है कि जातीय विभाजन के नाम पर समाज के बड़े वर्ग को उसके मूलभूत अधिकारों से अलग कर देने में समाज के साथसाथ शासन का भी हाथ रहा है. यूं भी कह सकते हैं कि धर्मसत्ता और राजसत्ता के गठजोड़ ने समाज के बहुसंख्यक वर्गों के साथ अनाचार किया है. इसलिए राज्य की जिम्मेदारी केवल खुद को धर्म की ओर से तटस्थ बना लेने से पूरी नहीं होती. विशेषकर ऐसे राज्य के लिए जो लोकतांत्रिक और लोककल्याण को समर्पित होने का दावा करता है, उसका यह दायित्व है कि विकास की दौड़ में किसी भी कारण पिछड़ चुके अथवा पीछे ढकेल दिए गए लोगों के कल्याण के लिए विशिष्ट प्रबंध करे. भारतीय धर्मशास्त्रों में राज्य के लिए इस नैतिक दायित्व के बारे में अधिक नहीं मिलता. यहां धर्म को नैतिकता का पर्याय माना गया है. जबकि पश्चिम में नीतिशास्त्र सुकरात के जमाने से ही अध्ययन का विषय रहा है. ‘पॉलिटिक्स’ में अरस्तु ने न्यायस्थापना को राजनीति का प्रमुख उद्देश्य माना है—‘राजनीति का प्रमुख उद्देश्य है न्याय और न्याय का मूल ध्येय है—सर्वसाधारण का हित.’ इस काम के लिए निष्पक्षता अनिवार्य है. अरस्तु ने इसके लिए संवितरणात्मक न्याय का सिद्धांत प्रस्तुत किया है. उसके अनुसार राजनीति का प्रमुख लक्ष्य न्याय की स्थापना है. यह सभी को समान अवसर देने से पूरा नहीं हो जाता.

अरस्तु ने न्याय को वस्तु पक्ष और व्यक्ति पक्ष में बांटा है. राज्य की ओर से सभी को समान वस्तुएं और अवसर दिए जाने चाहिए. लेकिन इस बारे में कोई एक नियम हमेशा कारगर नहीं हो सकता. मान लीजिए दो व्यक्ति दौड़ में हैं. दोनों का लक्ष्य समान है. किंतु उनमें से एक व्यक्ति लक्ष्य से बेहद दूर, एकदम अंतिम छोर पर है, जबकि दूसरा उसके एकदम पास खड़ा है. ऐसे में उन्हें यदि एक साथ दौड़ने के लिए कहा जाए तो जीत जो लक्ष्य के एकदम पास खड़ा है, उसकी ही सुनिश्चित मानी जाएगी. वह दौड़ में आगे बना रहेगा. दूसरा व्यक्ति कभी उसके बराबर पहुंच ही नहीं पाएगा. यदि दोनों में से एक ताकतवर और दूसरा अत्यधिक कमजोर है, तब भी यही परिणाम होंगे. अतएव राज्य का कर्तव्य है कि जो लक्ष्य से बहुत दूर, विकास के अंतिम छोर पर है अथवा किसी कारणवश कमजोर है, उसे विशेष प्रोत्साहन देकर स्पर्धा हेतु सक्षम बनाए. आधुनिक विचारक इसे संवितरणात्मक न्याय कहकर राज्य के कर्तव्य के रूप में निरूपायित किया है. इसलिए धर्मनिरपेक्षता की तर्ज पर जातिनिरपेक्ष होना राज्य का आदर्श हो सकता है. परंतु जाति के आधार पर पिछड़ चुके वर्गों की दृष्टि में वह न्याय नहीं कहा जा सकता. धर्मनिरपेक्षता को फलनेफूलने के लिए आधुनिक संवैधानिक कसौटी पर खरे राज्य की आवश्यकता पड़ती है. साथ ही सैद्धांतिक स्तर पर जातिनिरपेक्ष रहते हुए, तज्जनित भेदभाव और अन्याय की भरपाई हेतु सामाजिक स्तर पर पिछड़ गए वर्गों को विशेष प्रोत्साहन द्वारा मुख्यधारा से जोड़ना—राज्य का विशिष्ट कर्तव्य माना गया है. दूसरे शब्दों में समानता और स्वतंत्रता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दमन का शिकार रही जातियों के लिए विशेष प्रोत्साहन देना उसका संवैधानिक कर्तव्य बन जाता है. इस दृष्टि से भारतीय संविधान को आदर्श कहा जा सकता है. यह बात अलग है कि भारतीय समाज स्वयं को संवैधानिक आदर्शों के अनुरूप ढालने में अभी तक नाकाम सिद्ध हुआ है. लोकप्रियता की राजनीति इस लक्ष्य की सबसे बड़ी बाधा है. उससे बचने के लिए समाज तथा उसकी अन्यान्य संस्थाओं का लोकतांत्रिकरण हमारे समय की सबसे बड़ी जरूरत है.

अंत में कबीर को याद करते/कराते हुए—

सबही भूमि बनारसी, सब निर गंगा होय

ज्ञानी आतम राम है, जो निर्मल घट होय

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भानुक्रम

1. द्रव्यदान विवाहसिध्यर्थम धर्मतत्रसयोगे—गौतम धर्मसूत्र, 27/24, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, रामशरण शर्मा से उद्धृत.

2. If I were a , religion and state would 1be separate. I swear by my religion. I will die for it. But it is my personal affair. The state has nothing to do with it. The state would look after your secular welfare, health, communications, foreign relations, currency and so on, but not your or my religion. That is everybody’s personal concern!” ―Gandhi MK, Harijan, 22 September 1946.

3. विनायक गणेश का उपनाम है. गणेश शिवपुत्र जिन्हें आदि यानी अनार्यो का देवता माना जाता है. वे उस दौर के देवता हैं हैं जब देश कबीलों में बंटा था और उनका मुखिया ही सबकुछ होता था. वही सारे निर्णय लेता था. गणेश का वैनायिक को अनीश्वरवादी आजीवकों का ही एक संप्रदाय माना जाता है. इस तरह गणेश और शिव दोनों ही अनार्य अनीश्वरवादी देवता सिद्ध होते हैं. बाद में उन्हें अपने भीतर मिलाने के लिए जहां आर्यों ने अपनी बेटी का विवाह शिव से किया, वहीं गणेश को शामिल करने के लिए उन्हें प्रथम देवता का नाम देना पड़ा. लेकिन गणेश को देवता मानते ही उनके पद गणवेश के साथ खूब खिलबाड़ किया गया. गणेश की सूंड सभापति के स्थान पर बैठकर सबकी बात ध्यानपूर्वक सुनते व्यक्ति का विकृतीकरण है.


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अरस्तु का न्याय-दर्शन

समानता का आशय यह नहीं है कि व्यक्ति की पसंदों का ध्यान न रखा जाए. न्याय इसमें है कि प्रत्येक नागरिक को विकास के समान अवसर प्राप्त हों. इसके लिए अवसरों की समानता तथा किसी कारणवश विकास में पिछड़ चुके हैं नागरिकों को विशेष प्रोत्साहन देकर मुख्यधारा में लाने की कोशिश करते रहनान्याय और समाजीकरण दोनों की प्रथम कसौटी है.

न्याय की व्याख्या करते हुए अरस्तु उसके दोनों रूपों पर विचार करता है. पहला वह जिसके बारे में सामान्यजन सोचता है कि न्याय कानून के तत्वावधान में अदालतों के जरिये प्राप्त होता है. इसके साथसाथ वह मनुष्य के आचरण एवं व्यवहार की व्याख्या करता है. न्याय का यह रूप नागरिक और राष्ट्रराज्य के कानून के अंतर्संबंध को दर्शाता है. उन अनुबंधों की ओर इशारा करता है, जिनसे कोई नागरिक सभ्य समाज का नागरिक होने के नाते जन्म के साथ ही जुड़ जाता है. प्रकारांतर में वह बताता हे कि आदर्शोंन्मुखी समाज में मनुष्य का आचरण एवं कर्तव्य किस प्रकार के होने चाहिए, ताकि समाज में शांति, सुशासन और आदर्शोन्मुखता बनी रहे. प्रायः सभी समाजों में कानून को नकारात्मक ढंग से लिया जाता है. बातबात पर कानून का हवाला देने वालीं, उसके अनुपालन में लगी शक्तियां प्रायः यह मान लेती हैं कि बुराई मानवस्वभाव का स्थायी लक्षण है. जो बुरा है, उसे केवल दंड के माध्यम से बस में रखा जा सकता है. कि मानवव्यक्तित्व पर आज भी अपने उन पूर्वजों के लक्षण शेष हैं जो कभी जंगलों में जानवरों के बीच रहा करते थे. कुछ व्यक्तियों में पाशविक वृत्ति ज्यादा प्रभावी होती है. ऐसे लोगों पर बलप्रयोग उन्हें अनुशासित रखने का एकमात्र उपाय है. इसलिए सभ्यताकरण के आरंभ से ही दंडविधान की व्यवस्था प्रत्येक समाज और संस्कृति में रही है. इसे पुष्ट करने के लिए धर्म और संस्कृति से जुड़े ऐसे अनेक किस्से हैं, जिनसे हमारा संस्कार बनता है. स्वर्गनर्क की कल्पना भी इसी का हिस्सा है. उनमें से अधिकांश पर विजेता संस्कृति का प्रभाव है. आधुनिक संदर्भों में वह भले ही लोकतंत्र और मानवस्वातंत्र्य का विरोधी हो, प्राचीन इतिहास, धर्म और संस्कृति का हिस्सा होने के कारण उसे धरोहर के रूप में सहेजा जाता है.

प्राचीनकाल में जब अदालतें नहीं थीं, तब न्याय करने की जिम्मेदारी बस्ती के मुखिया या समूह के वरिष्ठ सदस्य जिसकी निष्पक्षता असंद्धिग्ध होकी होती थी. इस्लामी शासन के दौरान यह जिम्मेदारी काजी के कंधों पर आ पड़ी. राजशाही में राजा को सर्वेसर्वा माना जाता था. दरबार में आए मामलों की सुनवाई के लिए न्यायाधिकारी और दंडाधिकारी दोनों की जिम्मेदारियां वही संभालता था. दंडविधान का आधार परंपरागत अथवा लिखितअलिखित विधिसंहिताओं को बनाया जाता था. किसी न किसी रूप में वे सभी धार्मिक उपादानों द्वारा शासितअनुशासित होती थीं. उसका लाभ धार्मिक कार्यकलापों में लिप्त ‘धंधेबाज’ उठाते थे. उदाहरण के लिए भारत में एक जैसे अपराध के लिए ब्राह्मणों तथा शूद्रों के लिए अलगअलग दंडविधान था. ब्राह्मणों को मृत्युदंड निषिद्ध था, जबकि ब्राह्मणेत्तर वर्गों के लिए इस तरह की कोई पाबंदी न थी. चूंकि दिए गए दंड के विरुद्ध अपील के बहुत कम अवसर थे, इसलिए जनसाधारण मजबूरी में दैवीय न्याय की उम्मीद करने लगता था. आज भी ऐसे लोग कम नहीं हैं. उनका मानना है कि एकमात्र ईश्वर सच्चा न्यायकर्ता है. जिन्हें अपराधी होने के बावजूद इस जन्म में दंड नहीं मिला, वे ईश्वर के दरबार में अवश्य ही दंडित किए जाएंगेइस विश्वास के साथ साधारणजन बड़े से बड़े अनाचार को पचाते चले जाते थे. आधुनिक समाजों में न्याय की जिम्मेदारी अदालतों पर होती है. उनका आचरण संवैधानिक मर्यादाओं से आबद्ध रहता है. इसलिए यह व्यवस्था न्याय के अपेक्षाकृत अनुकूल है. इसके अनुसार राज्य अपने नागरिकों से अपेक्षा करता है कि वे कानून सम्मत व्यवहार करें, ताकि राज्य को उनके जीवन में हस्तक्षेप की आवश्यकता ही न पड़े. जो व्यक्ति अपने आचरण द्वारा दूसरे व्यक्ति के जीवन में अमर्यादित हस्तक्षेप करता है, वह राज्य को अपने जीवन में हस्तक्षेप करने का अधिकार दे देता है. दूसरों के जीवन में अवांछित और अमर्यादित हस्तक्षेप को राज्य अपराध मानता है. दूसरों के जीवन में अवांछित हस्तक्षेप करने वाला व्यक्ति अपनी निजता का अधिकार भी गंवा देता है. तदनुसार राज्य को समाज द्वारा प्राप्त शक्तियों के बल पर उस व्यक्ति के जीवन में हस्तक्षेप करने का अधिकार स्वतः हासिल हो जाता है. चूंकि राज्य पर समाज में शांति और अनुशासन बनाए रखने की जिम्मेदारी भी होती है, इसलिए वह अपराधी के विरुद्ध दंडनीति के तयशुदा प्रावधानों के अनुसार कार्रवाही करता है. न्याय का यह लोकप्रचलित रूप व्यक्ति के कर्तव्य पालन से जुड़ा है, जिसमें विचलन होते ही दंडनीति प्रभावी हो जाती है. प्रायः इसे सभ्यताकरण की अनिवार्यता के रूप में अपनाया जाता है. जनसाधारण न्याय के इसी रूप से सर्वाधिक प्रभावित होता है.

न्याय का दूसरा रूप कानून और अदालतों से प्राप्त होने वाले न्याय से अलग है. पहला जहां राज्य के अधिकारपक्ष के निकट है, दूसरा उसके कर्तव्य पक्ष की महत्ता एवं कार्यक्षेत्र को व्यापकता दर्शाता है. सिसरो के अनुसार राज्य जनता का सर्वाधिकार है. चूंकि राज्य का गठन लोगों द्वारा सामान्य हितों की पूर्ति हेतु किया जाता है, अतएव उसका वही कृत्य न्यायपूर्ण कहा जाएगा, जो उसके द्वारा संपूर्ण विवेक, निष्पक्षता, समानता और सर्वजन के विकास की चाहत के साथ उठाया जाता है. वह राज्य की नैतिकता तथा उसके गठन के औचित्य को दर्शाता है. अरस्तु इसे और भी स्पष्ट कर देता है. उसके अनुसार अन्याय केवल दूसरों के जीवन में अवांछित हस्तक्षेप, उसका प्रताड़न; अथवा मान्य कानूनों का उल्लंघन करने तक सीमित नहीं है. बल्कि दूसरों के अधिकारों का हनन करना, उन्हें उनके अधिकारों से वंचित कर देना, जो नागरिकों के प्रति राज्य का कर्तव्य भी हैंअन्याय की सीमा में आता है. आखिर मनुष्य के अधिकारों की पहचान कैसे हो? इस बात में कैसे अंतर किया जाए कि जो अधिकार किसी एक व्यक्ति का है, वह दूसरे का भी है अथवा नहीं है? तथा उनके आकलन की कसौटी क्या है?

सवाल और भी हैं. जब हम कहते हैं कि भरपेट भोजन प्राप्त करना मनुष्य का अधिकार है? सभ्य समाज में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं प्रत्येक व्यक्ति को आसानी से प्राप्त होनी चाहिए, तो इस तर्क का आधार क्या होता है? क्यों न मान लिया जाए कि जो व्यक्ति जीवन में अतिरिक्त रूप से सफल होते हैं, उसके पीछे उनकी अपनी मेहनत और प्रतिभा का भी कमाल होता है. लोकहित में आवश्यक है कि समाज के सभी सदस्य एकदूसरे के हितों का ध्यान रखें. लेकिन यह भी जरूरी है कि योग्य व्यक्ति को उसकी योग्यता का लाभ खुद भी प्राप्त हो. परंतु इतनेभर से समस्या का समाधान नहीं हो जाता. मान लीजिए, दो मजूदर किसी कारखाने में काम करते हैं. उनमें एक की क्षमता दस नग प्रतिदिन तैयार करने की है. दूसरा उतने ही समय में बीस नग बना देता है. तो जो कारीगर बीस नग प्रतिदिन बनाता है, उसके उत्पादन क्षमता का लाभ दस नग प्रतिदिन बनाने वाले के साथ बांट देना क्या उसके प्रति अन्याय नहीं होगा? यदि किसी व्यक्ति को लगे कि उसके उत्पादन का लाभ उसे नहीं मिल रहा है, तो क्या वह अपनी पूर्ण क्षमता के साथ लगातार काम कर पाएगा? अपने लाभ को दूसरों में बंटते देख क्या वह हतोत्साहित नहीं होगा? चलताऊ ढंग से सोचें तो बात एकदम सच जान पड़ेगी. पूंजीवादी अर्थतंत्र कहता है, श्रमिक को उसके श्रम का पूरा लाभ मिले. दावा करता है कि केवल वही है जो श्रमिक को उसके श्रम का पूरा लाभ दिला सकता है. लाभ का आकलन केवल भौतिक मुद्रा के आधार पर करने वाले पूंजीवाद की निगाह में यही न्याय है. ऐसे ही तर्क देकर वह श्रमिकों को बांटे रखता है. वहां इसे स्पर्धा का नाम दिया जाता है. परिणाम यह होता है कि जो मजदूर बीस नग प्रतिदिन बनाता है, वह निरंतर आगे निकलता जाता है. जबकि दस नग बनाने वाला कारीगर स्पर्धा में पिछड़ता चला जाता है. वृहद संदर्भों में यह स्पर्धा दो कारखानों के बीच भी देखी जा सकती है. चूंकि समाज में विशिष्ट लोगों की संख्या बहुत कम होती है, अधिकांश दस नग प्रतिदिन बनाने वाले कामगार जितने ही कार्यक्षम होते हैं. इसलिए अपने उत्पाद का सारा लाभ खुद रखने वाला कामगार स्पर्धा में निरंतर आगे निकलता चला जाता है. इससे समाज में आर्थिक विभाजन बढ़ता चला जाता है. इसका समाधान क्या है? अरस्तु इतना उदार नहीं है कि वह बीस नग बनाने वाले के श्रमलाभों वाले कामगार के लाभ को दस नग प्रतिदिन बनाने वाले श्रमिकों के बीच बांटने पर सहमत हो जाए. इस असमानता को वह प्राकृतिक मानता है. अरस्तु के समय में मौद्रिक लाभ की अवधारणा इतनी पुष्ट नहीं थी, जैसी वह आज है. इसलिए उसका समाधान भी आज के संदर्भों में ही खोजना पड़ेगा.

ऊपर के उदाहरण में मान लिया गया है कि बीस नग प्रतिदिन बनाने वाले कारीगर की उत्पादन क्षमता केवल उसकी अपनी उपलब्धि है. यहां व्यक्ति के कौशलनिर्माण में उसके परिवेश के प्रभाव जो एक तरह से उसका योगदान ही है, बिसरा दिया गया है. मनुष्य और उसके समाज के बीच का संबंध आपसी लेनदेन का होता है. जो समाज को अधिक लौटाते हैं, या जिनसे समाज को अधिकाधिक लौटाने की अपेक्षा की जाती है, वे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में समाज से अधिक ग्रहण भी करते हैं. यदि किसी विद्वान की बात करें तो पहले वह पीढ़ियों से अर्जित ज्ञान का अध्ययनमनन करता है, तदनंतर अपने विचारों को सामने लाता है. इस तरह से वह अपने पूर्ववर्ती विद्वानों का कर्जदार होता है. अतएव जो व्यक्ति समाज से जितना अधिक ग्रहण करता है, समाज को उसी अनुपात में वापस लौटाना उसका कर्तव्य भी है. इसमें मौद्रिक लेनदेन आवश्यक नहीं है. इसलिए इसका समाधान भी अकेले मौद्रिक लेनदेन द्वारा संभव नहीं है. उचित यही है कि मौद्रिक लाभ के स्थान पर सामाजिक लाभ की अवधारणा को स्थापित किया जाए. शांति और खुशहाली के लिए आवश्यक है कि समाज में आर्थिक विभाजन न्यूनतम हो. कुशल कामगार को यह समझाया जाए कि उसकी उपलब्धियां केवल उस अकेले की नहीं हैं. उनमें उसके परिवेश जिसमें उसके मित्र, संबंधी, पड़ोसी यहां तक कि दुश्मन भी सम्मिलित हैं, सभी का साझा है. इसी तरह धनपति को मालूम होना चाहिए कि उसके लाभ पर सिर्फ उसका अधिकार नहीं है, उन श्रमिकों और कारीगरों का भी योगदान है, जो रातदिन मेहनत करने अपने मालिक की समृद्धि को संभव बनाते हैं. अरस्तु राज्य से अपेक्षा रखता है कि दस नग बनाने वाले को निरंतर प्रोत्साहित करता रहे. और बीस नग प्रतिदिन बनाने वाले कामगार को इस बात के लिए राजी करे कि वह मौद्रिक लाभों के बजाए सामाजिक लाभों पर भी ध्यान दे, ताकि दो भिन्न उत्पादनक्षमता वाले कामगारों के बीच अधिकतम समानता संभव हो सके.

समाजीकरण मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है. यदि केवल किसी एक व्यक्ति के सुखदुख, गुणदोष का मामला हो तो समाजीकरण की आवश्यकता ही न पड़े. समाज न तो विशिष्ट व्यक्ति की चयन है, न ही व्यक्तियों की विशिष्ट पसंद. मनुष्यों की सामूहिक सृष्टि है. उसका सृजन सामूहिक रूप से सर्वकल्याण के उद्देश्य से किया जाता है. समाज की जरूरत उस व्यक्ति को भी पड़ती है, जिसकी आवश्यकता व्यक्ति के अस्तित्व से जुड़ी है. इसकी इच्छा वह व्यक्ति भी करता है, जो अतिरिक्त रूप से गुणी और संपन्न है. इसके कारणों में मामूली अंतर हो सकते हैं. जो व्यक्ति जीवन में अतिरिक्त रूप से कामयाब होते हैं, वे अपनी सफलता से दूसरों को प्रभावित करना चाहते हैं. प्रजा न हो तो राजा का होना अर्थहीन हो जाए. इसी तरह अमीर को अपनी अमीरी का प्रदर्शन करने के लिए गरीब की जरूरत पड़ती है. कह सकते हैं कि मनुष्य की किसी भी उपलब्धि का महत्त्व दूसरों के साथ, उन सबके सापेक्ष है. असफलता सफलता की पहली और निर्णायक कसौटी है. असफल व्यक्ति जितने अधिक संख्या में होंगे, सफलता का मूल्य उतना ही अधिक आंका जाएगा. यही प्रवृत्ति न्याय की जरूरत पर बल देती है.

ऊपर संकेत किया गया है कि किसी व्यक्ति की सफलता केवल उसके गुणों पर निर्भर नहीं करती. इस बात पर भी निर्भर करती है कि उस व्यक्ति को जीवन में कामयाबी दर्ज कराने के लिए कितने अवसर और संसाधन प्राप्त थे. तुलना यदि प्राकृतिक स्तर पर हो तो सफल और असफल व्यक्तियों में बहुत अंतर नहीं होता. युद्ध में किसी राजा की जीत केवल इसपर निर्भर नहीं करती कि वह स्वयं कितना बहादुर है, बल्कि उसकी ओर से लड़ रहे सैनिकों की संख्या तथा राजा के प्रति उनकी निष्ठा पर भी निर्भर करती है. इसलिए अपनी सत्ता की सुरक्षा और स्थायित्व के लिए शासक वर्ग स्वामीभक्ति को महिमामंडित करता रहता है. युद्ध में सैनिक और उनके अस्त्रशस्त्र राजा के लिए संसाधन होते हैं. वे राजा को केवल उसकी निजी योग्यता के आधार पर प्राप्त नहीं होते. उनमें से अधिकांश उत्तराधिकार में प्राप्त होते हैं. यदि राजा केवल अपने दम पर, आमनेसामने की लड़ाई करे तो उसकी सफलता की संभावना बहुत सीमित स्तर की होगी. कारखानेदार के मामले में सैनिकों का स्थान पूंजी ले लेती है. संभव है उसमें से पूंजी का बड़ा हिस्सा उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त हुआ हो. यदि यह न भी हो और किसी उद्यमी ने अपने जीवन में ही बेशुमार प्रगति की है तो इसका कारण केवल यह है कि व्यवस्था के चलते उसके कारखानों में कार्यरत श्रमिकों ने अपना श्रमोत्पाद, मामूली वृत्तिका के बदले कारखानेदार को समर्पित किया है. जैसे सैनिकों द्वारा जान की बाजी लगा देना किसी राजा के साम्राज्यवादी मनसूबों को साकार बनाता है. वैसे ही न्यूनतम मजदूरी के बदले अधिकतम श्रमोत्पाद पर कारखानेदार का अधिकार मान लेना और स्वयं मामूली वृत्तिका से संतुष्ट होकर रातदिन काम में जुटे रहना, पूंजीपति को कामयाबी दिलाता है. उद्यमी की सफलता का स्तर बताता है कि श्रमिकों ने उसके उत्पादनस्तर को शिखर तक पहुंचाने के लिए जीजान से काम किया है. यहां त्याग का अर्थ न्यूनतम वृत्तिका के बदले मालिक को अधिकतम मुनाफा कमाकर संतुष्टि प्राप्त कर लेना है. जाहिर है सफलता चाहे राजा की हो या व्यापारी की, उसमें क्रमशः प्रजा अथवा श्रमिकों का योगदान होता है. यहां पूंजी और राष्ट्रवाद दोनों ही वर्चस्वकारी शक्तियों के स्वार्थ से जुड़ै होते हैं. दोनों की प्रवृत्ति मानवविवेक पर कब्जा कर लेने की होती है. अंतर केवल इतना है कि पूंजीवाद अपनी चमकदमक और भौतिक सुखों का प्रलोभन देकर लोगों को आकर्षित करता है. राष्ट्रवाद के पास उग्र राष्ट्रप्रेम के सिवाय नागरिकों को देने के लिए कुछ नहीं होता. इसलिए वह भावुक प्रतीकों के माध्यम से लोगों को लुभाने का प्रयास करता है.

अमीरगरीब, राजाप्रजा के इस कृत्रिम विभाजन से बाहर निकलकर देखें तो प्राकृतिक स्तर पर उनके बीच कोई मौलिक अंतर नजर नहीं आता. राजाप्रजा, अमीरगरीब सभी को एकसमान जीवनचक्र से गुजरना पड़ता है. धूपवर्षाशीत सभी को लुभाते हैं. सभी को भूखप्यास लगती है. यह ठीक है कि मनुष्य में प्राकृतिक स्तर पर अंतर होता है. एक मनुष्य शक्तिशाली हो सकता है और दूसरा शक्तिविपन्न. परंतु प्राकृतिक स्तर पर शक्तिशाली और शक्तिविपन्न व्यक्ति में अंतर का अनुपात उतना नहीं होता, जितना सामाजिक स्तर पर अमीरगरीब, शक्तिशाली एवं शक्तिविपन्न के बीच होता है. न प्रकृति अपने स्तर पर किसी प्रकार का भेदभाव करती है. चूंकि समाजीकरण की मूलभूत अवधारणा समानता के सिद्धांत पर गढ़ी होती है, राज्य भी इसी दावेदारी के साथ जनसमर्थन प्राप्त करता है कि वह धनीनिर्धन, शक्तिसंपन्न एवं शक्तिविपन्न के बीच बहुत अंधिक अंतर नहीं करेगाइसलिए यदि किसी राज्य में ऐसा है तो समझ लेना चाहिए कि वह अपने गठन के मूलभूत उद्देश्यों से भटका हुआ है. दूसरे शब्दों मे समानता का आशय किसी व्यक्ति से राजा या पूंजीपति बनने के अवसर छीन लेना नहीं है. बल्कि जनसाधारण को इस आधार पर होने वाले भेदभाव से मुक्ति दिलाना है. सफलता सदैव सापेक्षिक होती है, परंतु न्याय निरपेक्ष. इस आधार पर अरस्तु न्याय पर विमर्श के आरंभ में ही उसकी दो कसौटियां बना लेता है. पहली के अनुसार तयशुदा कानून की मर्यादा में रहना न्याय है. जिन कार्यों को राज्य की विधिसंहिता स्वीकारे उनका अनुपालन न्याय है. जिनसे राज्यसमाज में शांतिसुव्यवस्था स्थापित होती हो, वह न्याय है. न्याय का दूसरा रूप अपने साथ बाकी लोगों की स्वतंत्रता और समानता का सम्मान करना है. जबकि अन्याय वह है जो कानून के विरुद्ध है. जिससे दूसरों के अधिकारों का हनन होता है. जिससे किसी व्यक्ति को उसके विधिसम्मत देय से वंचित कर दिया जाता है.

समानता का आशय यह नहीं है कि व्यक्ति की पसंदों का ध्यान न रखा जाए. न्याय इसमें है कि प्रत्येक नागरिक को विकास के समान अवसर प्राप्त हों. इसके लिए अवसरों की समानता तथा किसी कारणवश विकास में पिछड़ चुके हैं नागरिकों को विशेष प्रोत्साहन देकर मुख्यधारा में लाने की कोशिश करते रहनान्याय और समाजीकरण दोनों की प्रथम कसौटी है. अरस्तु ने न्याय को सर्वसाधारण के सामान्य हित की संज्ञा दी है. उसके अनुसार न्याय के दो पक्ष होते हैं. पहला व्यक्ति पक्ष और दूसरा वस्तु पक्ष. व्यक्ति का संबंध भी प्रकारांतर में वस्तुओं से होता है. उसके अनुसार न्याय का तकादा है कि सभी मनुष्यों को समान वस्तुएं निर्दिष्ट की जानी चाहिए. पर कैसे? यहां एक पेंच है जिससे समानता की हमारी सार्वत्रिक अवधारणा संकट में पड़ जाती है. समानता का विचार न तो रूढ़ है न ही व्यक्तिनिरपेक्ष. सभी व्यक्तियों को सभी अवसर दिए जाने का अभिप्राय यह नहीं है कि कोई व्यक्ति अपनी रुचि या अन्यान्य कारण से किसी पद के अयोग्य है तो समानता के सिद्धांत के अनुसार उसे उस पद की जिम्मेदारी सौंप देनी चाहिए. समानता की सीधीसी अवधारणा है कि सभी व्यक्तियों को सभी अवसर प्राप्त हों. तदनुसार प्रत्येक नागरिक को यह अवसर मिलना चाहिए कि यदि वह स्वयं को राजपद के योग्य बना सके, तो वह पद उसकी पहुंच से दूर नहीं है. राज्य का हित भी इसमें है कि नागरिकों को यथायोग्य पद प्राप्त हों. राजा उसी को चुना जाए जो राजा बनने के योग्य है. अरस्तु के अनुसार व्यक्ति के अधिकार उसकी योग्यता पर निर्भर करते हैं. तदनुसार राजा बनने का अधिकार उसी को मिलना चाहिए जो राजपद के योग्य है. श्रेष्ठ राज्य अपने लिए कसौटियां स्वयं तय करता है, जिनके माध्यम से वह स्वयं को नियंत्रित एवं विकासरत रख सकता है. वीरता, व्यक्तित्व, व्यवहार कुशलता, दूरदर्शिता, बुद्धिमानी जैसे उदात्त चारित्रिक गुण यदि राजा बनने के लिए अपरिहार्य हैंतो समानता के सिद्धांत के अनुसार जिस व्यक्ति में ये सभी गुण पर्याप्त मात्रा में मौजूद हों, उसे राजा बनने का अधिकार मिलना चाहिए. इसपर उसके परिवार अथवा उन गुणों को जिनका राजा के लिए अपेक्षित गुणों से कोई संबंध नहीं है, कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए. ‘पॉलिटिक्स’ के तीसरे खंड के 12वें अध्याय में अरस्तु बासुंरीवादक का उदाहरण देता है

यदि बहुत से व्यक्ति बासुंरी वादन की कला में निपुण हों तो उनमें से किसी व्यक्ति को सिर्फ इस कारण अच्छी या अधिक बांसुरियां नहीं दी जानी चाहिए, कि उसका संबंध किसी उच्च कुल से है.’

आगे वह स्पष्ट करता है

बासुंरीवादन एक कला है, जिसका व्यक्ति के कुल से कोई संबंध नहीं है. इसी तरह यदि कोई व्यक्ति बासुंरी वादन की कला में पीछे है, मगर कुल और सुंदरता के मामले में बाकी प्रतिस्पर्धियों से आगे तो भी अच्छी अथवा सर्वाधिक बासुंरिया किसी वाद्यकला में निपुण व्यक्तियों को ही दी जानी चाहिए….कुलपरिवार की सदस्यता के आधार पर भी व्यक्ति अच्छी बांसुरियों की दावेदारी कर सकता है, परंतु उसमें उन गुणों की प्रधानता अपरिहार्य है, जो बांसुरी वादन की कला के लिए अत्यावश्यक हैं.’

आशय है कि श्रेष्ठ वस्तुएं यथायोग्य व्यक्तियों को प्राप्त हों. उन्हें प्राप्त हों, जिन्हें उनकी आवश्यकता है और जो उनका श्रेष्ठतम उपयोग करने में सक्षम हैं. परंतु योग्यता का मापदंड क्या हो? प्रत्येक व्यक्ति अपनी दृष्टि में योग्यतम होता है. फिर जो अधिकतम की दृष्टि में श्रेष्ठतम है, उसके भी आलोचक हो सकते हैं. इसे ‘एथिक्स’ में समझाया गया है. अरस्तु की यह पुस्तक नीतिशास्त्र की श्रेष्ठतम कृतियों में से है. सर्वथा मौलिक. इसके माध्यम से अरस्तु ने नैतिकता को उस दौर में परिभाषित किया, जब राज्य पर धर्म का नियंत्रण था. उत्तराधिकार में जो भी प्राप्त हो, उसे बचाए रखने और उसके माध्यम से अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को शिखर तक ले जाने के लिए सारे उद्यम किए जाते थे; फिर उन्हें धर्म का नाम दे दिया जाता था. अरस्तु के अनुसार न्याय ज्ञानविज्ञान की विभिन्न शाखाओं का अंतिम और वास्तविक लक्ष्य है. मनुष्य जो ज्ञानार्जन करता है, वह तब तक अनुयोगी या अल्पउपयोगी माना जाएगा, जब तक उससे किसी न किसी रूप में न्याय की पुष्टि न होती है. ताकि प्रत्येक नागरिक को यह विश्वास हो जाए कि जो उसका प्राप्य है, वह उसको यथासमय प्राप्त होता रहेगा. आखिर यह कैसे सुनिश्चित हो कि व्यक्ति को जो अधिकार है, वह उसे प्राप्त हैं. यहां राज्य की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है. राज्य का कर्तव्य है कि वह यह सुनिश्चित करे कि उसके राज्य में किसी भी नागरिक के अधिकार बाधित न हों. न ही किसी के साथ कोई पक्षपात हो. यह ध्यान रखते हुए कि समानता न्याय का उद्देश्य है, लेकिन एकमात्र समानता को भी न्याय का पर्याय मान लेना अनुचित होगा. उदाहरण के लिए दो भिन्न व्यक्तियों की कल्पना कीजिए, जिन्हें खराद मशीन पर कोई पुर्जा बनाने को दिया जाता है. मान लीजिए उनमें से पहला दस नगों का उत्पादन करता है और दूसरा उतनी ही अवधि में बीस नगों का. चूंकि व्यक्ति का अपने श्रम पर अधिकार होता है, इसलिए कानून और नैतिकता दोनों दृष्टि में यह उचित माना जाएगा कि जिस व्यक्ति ने अधिक उत्पादन किया है, उसकी अतिरिक्त लाभ में आनुपातिक साझेदारी हो. पूंजीवादी व्यवस्था इसी को न्याय मानती है. उसके अनुसार इससे समाज में स्पर्धा बढ़ती है. चीजें सस्ती होती जाती हैं. उसकी भरपाई के लिए उत्पादक उत्पादनवृद्धि का सहारा लेता है. उससे रोजाकर के अवसर बढ़ते हैं. उसके फलस्वरूप हुई उत्पादन वृद्धि का लाभ पूरे समाज को पहुंचता है. पूंजीवादी राज्यों की सरकारें भी कमोबेश वही सोचती हैं. परंतु राज्य की मजबूरी है कि उसे समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संतुलन बनाकर रखना पड़ता है. उसके लिए वे अधिक आय वाले व्यक्तियों पर कराधान की सीमा बढ़ाकर बाकी लोगों को संतुष्ट करने का प्रयास करती हैं. यह केवल दिखावा ही होता है, क्योंकि एक ओर जहां अधिक करउगाही का का नाटक किया जाता है, वहीं दूसरी ओर पूंजीपतियों को विभिन्न प्रकार की छूट देकर, ओनेपौने दाम में राज्य के संसाधन लुटाकर प्रसन्न रखा जाता है.

यदि शतप्रतिशत ऐसा हो जाए कि व्यक्ति को ठीक उतना ही प्राप्त हो, जितनी उसकी क्षमता है, तो सोचिए क्या यह जंगल के न्याय जैसी व्यवस्था न होगी? जंगल में भी प्राणी अपने सामर्थ्य के अनुसार शिकार करते हैं. चिड़िया मामूली कीड़ेमकोड़ों का शिकार करके पेट भरती है. शेर और चीता भारीभरकम सांड को भी अपना शिकार बन सकते हैं. जानवर के लिए उसका शिकार एक तरह से उसका उत्पाद ही है. अतः न्याय दृष्टि से समानता व्यक्ति और समाजनिरपेक्ष नहीं होती. उसमें परिस्थिति अनुसार बदलाव होते रहते हैं. लेकिन समानता ऐसी पहेली भी नहीं है, जिसे समझा न जा सके. आखिर समानता किसकी और कैसे? सामान्य सिद्धांत के अनुसार असमान व्यक्तियों का हिस्सा समान नहीं हो सकता. समानता की न्यूनतम शर्त नागरिकों को न्याय की अबाध प्रतीति है. यह ठीक है जन्म के आधार पर, स्थितियों के आधार पर लोगों की कार्यक्षमता में अंतर होता है. राज्य और समाज का गठन का उद्देश्य भी यही है कि व्यक्तिमात्र की इन दुर्बलताओं का असर उसकी खुशियों पर न पड़े. जहां कोई नियम या व्यवस्था न हो. दूसरों के सुखदुख की परवाह किए बिना सभी मनमानी पर उतारू रहते हों. वहां राज्य की भूमिका नगण्य मानी जाएगी. यह नियम कि व्यक्ति को ठीक उतना ही प्राप्त हो, जितना उसका सामर्थ्य हैप्रकारांतर में समाज को इस स्वार्थी सोच की प्रेरणा बन सकता है. इससे समाजीकरण का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा. अतः राज्य का कर्तव्य है कि वह उस नागरिकों को जो किसी कारण पिछड़े हुए हैं, विशेष प्रोत्साहन देकर दूसरों के बराबर लाने का प्रयास करे. साथ में यह विश्वास भी बनाए रखे की समाज की एकता, किसी भी व्यक्तिगत उपलब्धि से बड़ी है.

अरस्तु न्याय के पर्याय के रूप में सद्गुण को स्थापित करता है. राज्य के संदर्भ में ‘न्याय राज्य का सद्गुण’ है. उसकी व्याप्ति राज्य और उसके नागरिकों के आचरण से आंकी जानी चाहिए. न्याय वह है जिसे सभी नागरिक सही मानें. जिसकी श्रेष्ठतम के रूप में प्रत्येक नागरिक अपने जीवन में कामना करे. ठीक इसी तरह अन्याय वह है जो अधिकतम नागरिकों को नियमविरुद्ध और अनुचित प्रतीत होता हो. किंतु न्याय और अन्याय, उचित और अनुचित की यह बहुत सरलीकृत व्याख्या है. यह दोनों को एक दूसरे का विरोधी दर्शाती है. सामान्यतः यह सही भी दिखता है. न्यायालय का कोई फैसला यदि बहुसंख्यक वर्ग को अनुचित और अन्यायपूर्ण लगता है तो वह उचित और न्यायपूर्ण हो ही नहीं सकता. लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि न्याय और अन्याय, उचित और अनुचित को लेकर सभी नागरिकों की एकसमान राय हो. लोगों का न्यायबोध उनकी संस्कृति और मानसिक प्रशिक्षण पर भी निर्भर करता है. राजशाही में राजा और उसके परिवार की सुरक्षा शेष जनसमाज की सुरक्षा से महत्त्वपूर्ण मानी जाती थी. उसके लिए अनेकानेक सैनिक की बलि दे देना राजधर्म माना जाता था. अधिकांश युद्ध राजाओं के व्यक्तिगत अहं और राजलिप्सा का परिणाम होते थे. अपने समग्र परिणाम में वे प्रजा के लिए अहितकारी होते थे. बावजूद इसके प्रजा अपने राजा और उसकी व्यवस्था को सराहती थी. क्योंकि उसका मानसिक प्रशिक्षण इसी तरह का होता था. जनतांत्रिक समाजों में नागरिकों का सोच स्वतंत्र होता है. निर्णयविशेष को कुछ लोग उचित मान सकते हैं और कुछ अनुचित. कुछ ऐसे नागरिक भी हो सकते हैं जिन्हें वह निर्णय आंशिक अनुचित और अन्यायपूर्ण अथवा आंशिक उचित और न्यायपूर्ण लगता हो. इस तरह लोगों की दृष्टि के अनुसार न्याय और अन्याय के अनेक रूप संभव हैं. लेकिन राज्य की दृष्टि में न्याय का केवल एक रूप होता है. सभी नागरिकों के साथ समान वर्ताब और समाज में कल्याण विस्तार. ऐसे समाजों में कर्तव्यपरायण मनुष्य, न्यायसंगत बने रहने के लिए वही करता है जो समाज की निगाह में उचित है. वैसा ही सोचता है, जिसे न्यायसंगत माना जा सके.

वे कौनसी स्थितियां हैं, जब मनुष्य के कर्म को न्यायपूर्ण नहीं माना जा सकता? इसे समझना मुश्किल नहीं हैं. उपर्युक्त विवरण के आधार पर देखें तो दो मुख्य स्थितियां हैं जिनके आधार पर मनुष्य के कृत्य को अनुचित या अन्यायपूर्ण कहा जा सकता है. पहला जब वह कानून तोड़ता है. ऐसे काम करता है जो राज्य तथा समाज की निगाह में अनुचित हैं. दूसरी स्वार्थपरता. समाज में रहते हुए उससे अधिक ग्रहण करना जितना अधिकार है. अपने अलावा दूसरों की आवश्यकता पर विचार ही न करना. बल्कि जिसपर दूसरों का अधिकार है, उसे भी हड़प कर जाना. अरस्तु के अनुसार उचित होने के लिए कानून सम्मत और निस्वार्थ होना आवश्यक है. जो कानूनसम्मत नहीं है. जो अपने आचरण में निष्ठावान तथा दूसरों के प्रति ईमानदार नहीं है, इसलिए वह उचित भी नहीं है. उचित की बहुमान्य परिभाषा उपलब्ध संसाधनों, अवसरों और कर्तव्यों में न्यायपूर्ण हिस्सेदारी है. ऐसी सहभागिता जिससे दूसरों के अधिकार निर्बंध रहें. सच यह भी है कि समाज में रहते हुए अपने हिस्से से अधिक लेना हमेशा अन्यायपूर्ण नहीं होता. कई बार अपने हिस्से को छोड़ देना या दूसरों का हिस्सा भी हड़प जाना प्रशंसा का पात्र बना देता है. जब कोई भूखा व्यक्ति अपने आगे रखी थाली, ज्यों की त्यों दूसरे भूखे प्राणी को सौंप देता है तो उसकी नैतिकता हमें भावाकुल कर देती है. ठंड से ठिठुरते किसी व्यक्ति को अपने वस्त्र उतारकर दे देना मानवचरित्र की उदात्तता से परचाता है. इसी प्रकार सारे के सारे दुर्योग को, जिससे बहुतसे लोगों के अनिष्ट की संभावना हो, अपने हिस्से समेट लेना भी उचित और सराहनीय माना जाएगा. ऐसी कई कहानियां हैं, जिनमें अपनी दोषी संतान को बचाने के लिए पिता उनके सारे अपराध अपने सिर ले लेते हैं. समुद्रमंथन की मिथकथा के अनुसार शिव सबके हिस्से का विषपान करके ही नीलकंठ कहलाए थे. किसी व्यक्ति में कम बुराइयां हों, यह भी अच्छी बात है. अब सवाल है कि कानून क्या है? उससे व्यक्ति का हित सधता है या राज्य का. अथवा व्यक्ति और राज्य दोनों का?कुछ विद्वानों का मानना है कि श्रेष्ठ नागरिक आत्मानुशासित होता है. उसे अपने और दूसरों के सुखदुख की चिंता होती है. इसलिए वह किसी के जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करता. ऐसे व्यक्ति को कानून की आवश्यकता नहीं पड़ती. यह बात सही हो सकती है. परंतु हमेशा सही हो आवश्यक नहीं है. कानून अदालती प्रक्रिया मात्र नहीं है. कानून का पलड़ा हालांकि समाज के शीर्षस्थ वर्गों की ओर झुका होता है. फिर भी उसमें कई ऐसी खूबियां होती हैं, जिनकी अनुपस्थिति समाज की एकता और अखंडता के लिए खतरा बन सकती है. उनके अभाव में प्रत्येक नागरिक ‘श्रेष्ठ आचरण’ की परिभाषा अपने हिसाब से करेगा. प्रकारांतर में सब मनमानी उतर आएंगे. परिणामस्वरूप समाज के गठन का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाएगा. इसलिए कानून के रूप में सुनिश्चित आचारसंहिता का होना आवश्यक है.

अरस्तु के अनुसार कानून विधायी व्यवस्था है. राज्य यदि नागरिकों के प्रति उदार है तो कानून नागरिकअधिकारों के पक्ष में झुका पाएगा और मानवमात्र के अधिकारों का ध्यान रखेगा. यदि कानून का गठन कुछ लोगों की मर्जी से, स्वार्थभावना के साथ हुआ है तो उसका झुकाव शिखर पर मौजूद अल्पतंत्र अथवा कुलीनतंत्र के पक्ष में नजर आएगा. केवल उन्हीं लोगों के भले की सोचेगा है जो किसी न किसी रूप से सत्ता से जुड़े हों. निरंकुशता की भावना से गठित कानून केवल तानाशाह की मर्जी से संचालित होंगे. सही मायने में तो वे तानाशाह के स्वार्थ से इतर कुछ हो ही नहीं सकते. इससे हम राज्य में न्याय की मौजूदगी को परखने के लिए कुछ मापदंड बना सकते हैं. ऐसे कानून जिनसे राज्य की उदारता झलकती हो, जो समाज के अधिक से अधिक लोगों के कल्याण की भावना से बनाए गए हों, वे कानून न्यायसंगत माने जाएंगे. जबकि ऐसे कानून जिनसे अल्पसंख्यक वर्गों की स्वार्थसिद्धि होती हो, अथवा जिनका गठन तानाशाह की इच्छाओं को दूसरों पर लादने के लिए हुआ हो, उन्हें न्यायसंगत मानने में हमें संकोच होगा. जिस राज्य में पहली कसौटी का पालन होगा, वह कल्याणराज्य के मापदंडों के अनुरूप होगा. उसमें शुभ की व्याप्ति होगी. तदनुसार न्यायकारी शक्तियों का सत्ताप्रेम अथवा उनपर शासक वर्गों का नियंत्रण शासन की निरंकुशता का परिचायक होता है.

इस विवेचन से न्याय को समझा जा सकता है. न्याय हमेशा दूसरों के प्रति होता है. लेकिन मनुष्य दूसरों के प्रति तभी न्याय कर सकता है, जब उसे अपने प्रति न्याय की उम्मीद हो. इस तरह न्याय सद्गुण है. व्यक्ति का समाज और समाज का अपने नागरिकों के प्रति कल्याणभाव जिससे झलकता हो, वह सद्गुण है. समाज में सद्गुण से श्रेष्ठ कुछ नहीं होता. वह निर्मेल्य होता है. अरस्तु के अनुसार ‘न्याय कुल मिलाकर संपूर्ण सद्गुण या सद्गुणों का समुच्चय है. वह इसलिए सद्गुण है, क्योंकि वह व्यक्ति का अपने पड़ोसियों, अपने मित्र, हितैषी यहां तक कि आलोचकों के प्रति न्यायभाव को दर्शाता है. कुल मिलाकर सद्गुण किसी भी समाज की श्रेष्ठतम उपलब्धि हैं. यदि कोई व्यक्ति केवल अपने मित्रों और सगेसंबंधियों के प्रति न्यायपूर्ण आचरण करता है और बाकी समाज के प्रति वैसा करने से बचता है, तो उसका आचरण न्याय की कसौटी पर स्वार्थपूर्ण माना जाएगा. दूसरे शब्दों में न्याय सद्गुण है और सद्गुण वह है, जिसे कोई व्यक्ति दूसरों के प्रति कल्याणभाव के साथ करता है. न्यायपूर्ण व्यक्ति वह है जो दूसरों की हितसिद्धि के लिए बिना किसी स्वार्थभाव से प्रयासरत रहता है. और ऐसा व्यक्ति जो केवल स्वार्थसिद्धि में लीन रहता है, दूसरों को किसी प्रकार का कष्ट पहुंचाता है अथवा उन वस्तुओं पर कब्जा करता है, जो किसी दूसरे का अधिकार हैं, अन्यायी की श्रेणी में आएगा.

मनुष्य क्या है? कैसा है, इसकी पहचान सभा में की जाती है. अकेले मनुष्य की अच्छाई या बुराई किसी काम की नहीं होती. सामाजिक प्राणी होने के नाते, ‘सभा ही मनुष्य के चरित्र का दर्पण है.’ अच्छाई व्यक्तिमात्र का आंतरिक गुण है. मगर इसकी तब तक कोई उपयोगिता नहीं है जब तक उसका कोई सार्वजनिक प्रयोजन न हो. कह सकते हैं कि मानवचरित्र की कसौटी दूसरों के प्रति उसका व्यवहार है. तदनुसार जो केवल अपना हित चाहता है, दूसरों के लाभालाभ से जिसे कोई सरोकार नहीं है, जिसे दूसरों के कष्ट द्रवित नहीं करते, वह अश्रेष्ठ है. वह नागरिक धर्म का पालन नहीं कर पाता. इसलिए किसी न किसी रूप में वह कानून का उल्लंघन करता है. दूसरी ओर जो सभी के साथ समभाव से पेश आता है. उदारता जिसका स्वभाव है. जो अपने अधिकारों के साथसाथ दूसरों के अधिकारों का भी ध्यान रखता है. वह श्रेष्ठता का प्रतीक है. अश्रेष्ठ और श्रेष्ठ के व्यवहार में जो अंतर है, वह अन्याय और न्याय, गैरकानूनी और कानूनी में भी है. न्याय और सद्गुण के अंतर को स्पष्ट करने के लिए अरस्तु की व्याख्या बहुत सरल है. उसके अनुसार न्याय और सदगुण को व्यक्ति के आचरण द्वारा परखा जा सकता है. व्यक्ति दूसरे के संदर्भ में सदाचरण करे, उसकी अच्छाइयां जो लोककल्याण के निमित्त उद्घाटित हों, जो दूसरों के साथ कल्याणभाव से पेश आए वह न्याय प्रिय है. और उसका आचरण न्यायोचित कहा जाएगा. जिनसे मनुष्य के चरित्र आदर्श बने, वह सद्गुण हैं. इसी तरह जब कोई मनुष्य दूसरों पर बुरी नीयत के साथ हमला करता है, उसे नुकसान पहुंचाता है. दूसरे के साथ बदसलूकी करता है या उसके न्यायपूर्ण हिस्से को अपना कहकर छीन लेता है, तो उससे मनुष्य के चरित्र की बुराई लक्षित होती है. और उसका व्यवहार गैरकानूनी तथा अन्यायपूर्ण माना जाएगा. अन्याय और बुराई परस्पर जुड़े होते हैं. अरस्तु यहां व्यक्ति और समाज के अथवा व्यक्ति और शेष जनसमाज के संबंधों के आधार पर न्याय और अन्याय की तुलना करता है. राज्य को बीच में नहीं लाता. उसके अनुसार राज्य समाज का सत्कर्म है, जिसे वह नागरिकों के कल्याण के लिए अपनाता है. समाज की भांति राज्य भी मनुष्य की रचना है. राज्य मनुष्य के राजनीतिक बोध की निर्मिति है. इस कसौटी के अनुसार न्याय सद्गुण का कोई हिस्सा न होकर संपूर्ण सद्गुण है. बिना सद्गुणों के न्याय की अभिकल्पना संभव भी नहीं है.

प्रश्न है कि क्या न्याय और सद्गुण परस्पर पर्यायवाची हैं? यदि ‘हां’ तो उनकी अलगअलग पहचान कैसे संभव है? यदि नहीं तो क्या उन्हें एकदूसरे से जोड़कर, पारस्परिक संबंधों में परखा जा सकता है? अरस्तु के अनुसार न्याय संपूर्ण सद्गुण है. जहां न्याय है, वहां सद्गुण हैं. वह समाज में शुभत्व की मौजूदगी के लिए पूरी तरह जिम्मेदार हैं. शुभत्व माने जड़चेतन सभी के प्रति समान रूप से कल्याण का भाव. फिर उसी के अनुरूप कार्य करने की चेष्ठा. इसी तरह अन्याय या अनाचार विचारों, कर्तव्यों या भावनाओं का वह हिस्सा है जो व्यक्ति और समाज में दुर्गुणों की उपस्थिति और/या दुराचरण के स्तर को दर्शाता है. लेकिन जैसे सद्गुण की संकल्पना तय है, उसी प्रकार सदाचरण की संकल्पना भी सभी के लिए एक समान हो, आवश्यक नहीं है. कल्पना कीजिए दो व्यक्ति हैं. उनमें से एक बदचलनी या भ्रष्टाचरण करता है, और उससे धनार्जन करता है. दूसरा व्यक्ति बदचलनी के नाम पर अपना धन लुटाता है तो उनमें से दूसरे को भ्रष्टाचरण का दोषी माना जाएगा. चूंकि पहला व्यक्ति अपनी गांठ से धन लुटाकर भ्रष्टाचरण करता है, इसलिए उसे कंजूस शायद ही कोई मानेगा. हालांकि सामाजिक नैतिकता की दृष्टि से दोनों ही समान रूप से दोषी माने जाएंगे. परस्त्रीगमन विशिष्ट किस्म का दोष है. उसे मानवमन का विकार या व्यक्ति का समाज के प्रति अनाचार समझकर क्षमा भी किया जा सकता है. लेकिन यदि बदलचनी के दौरान वह अपने साथी को नुकसान करता है, उसको किसी प्रकार की चोट पहुंचाता है या उससे समाज को किसी प्रकार की हानि पहुंचती तो वह सीधे तौर पर उस व्यक्ति या समाज के प्रति अन्याय माना जाएगा.

बुद्ध ने मध्यम मार्ग की अनुशंसा की थी. अरस्तु ने भी मध्यम मार्ग को ही श्रेष्ठ माना है. ऐसा मार्ग जिसमें राज्य और नागरिक सब मिलकर अपनेअपने अधिकारों का भोग करते हों. जिसमें नागरिक समाज इतना शक्तिशाली हो कि सत्ताओं की मनमानी पर अंकुश लगा सके. इतना विवेक उसमें हो कि शासकवर्ग की नाकामियों को समझकर उनका समाधान खोज सके. क्या अकेला नागरिक ऐसा कर सकता है? इस प्रश्न का उत्तर इस तरह भी खोजा जा सकता है कि क्या कोई व्यक्ति केवल अपने हित को राज्य का हित मानता है? यदि वह ऐसा नहीं करता. यदि वह संपूर्ण समाज के या समाज के अधिसंख्यक वर्ग के हित में अपना हित देखता है, तो ऐसे नागरिक के सामने अकेले पड़ जाने की समस्या नहीं झेलनी पड़ती. समाज इतना अनुदार कभी नहीं होता कि अपना हित साधने वाले का अहित कर सके. हां, स्वार्थी शक्तियों के हाथों में झूल रहा राज्य यह कर सकता है. ऐसे राज्य का सामना जनता की सामूहिक शक्ति के साथ किया जाना चाहिए. ठीक हे कि राज्य के पास कानून की ताकत होती है. अकेले नागरिक के सापेक्ष राज्य बहुत बड़ी शक्ति है. लेकिन नागरिकों को यह समझना चाहिए कि राज्य को उसकी शक्तियां जनता की ओर से प्राप्त होती हैं. जनसमर्थन ही राज्य की ताकत को वैधता प्रदान करता है. अतः आवश्यक है कि राज्य जनता की इच्छा और हित को देखते हुए अपनी शक्तियों का प्रयोग करे. निरंकुश राज्य के हाथों में शक्तियां का केंद्रित हो जाना जनता के लिए हानिकारक होता है.

आशय है कि राज्य को अधिकारसंपन्न बनाने वाली ताकत का मूलस्रोत जनता होती है. परंतु जनता आमतौर पर यह माने रहती है कि राज करना उसका काम नहीं हैं. वह यह भी मान लेती है कि जो राज करते हैं वे विशिष्ट गुणों से संपन्न होते हैं. कि राज करना विलक्षण गुण है, जो जन्मजात या कुछ खास लोगों में ही होता है. कुछ मनोवैज्ञानिक भी इसका समर्थन करते हैं. परंतु हमें यह समझना चाहिए कि मनोवैज्ञानिक धरती से परे के जीव नहीं होते. वे समाज के बीच रहकर, समाज से ही अपने निष्कर्ष ग्रहण करते हैं. कल्पना के घोड़ों की बागडोर अनुभव के हाथों में होती है. मनुष्य अपने अनुभवों की परिधि से बाहर बहुत लंबा नहीं झांक सकता. यदि किसी मनोवैज्ञानिक को ऐसे राज्य में छोड़ दिया जाए जहां सभी बराबर हों, लोग शांतिपूर्ण जीवन जीते हों, उनके बीच किसी प्रकार की स्पर्धा न हो, तो उसका एकमात्र यही निष्कर्ष होगा कि मानव मन बहुत सरल और सहजगम्य है. कुल मिलाकर जनता की यह भ्रांति कि राज्य उससे स्वतंत्र सत्ता है, राज्य को निरंकुश बनने का अवसर देती है. शिखर पर मौजूद लोग स्वयं को सामान्य से हटकर मानने लगते हैं. चूंकि अकेले व्यक्ति के पास इतनी शक्ति नहीं होती कि शिखर पर बैठे लोगों को उनकी चूकों की ओर आगाह कर सके, इसलिए वह हालात से समझौता किए रहता हे. उसे केवल संगठन के बल पर चुनौती दी जा सकती है. परंतु उसके लिए आवश्यक है कि लोग सामान्य हितों को पहचानकर बड़ी संख्या में संगठित हां. उनमें पर्याप्त अधिकार चेतना हो, जिससे वह शासन की मनमानियों के विरोध में खड़े हो सकें. अरस्तु के अनुसार न्याय संपूर्ण सद्गुण है. इसलिए सीमित संदभो्र्रं में न्याय सद्गण का ही हिस्सा है. अरस्तु ने समानता को न्याय का पूरक बताया है. जहां असमानता है, वहां न्याय संभव नहीं है. परंतु समानता को परिभाषित करना भी सरल नहीं है. समानता कैसी और किसकी? अरस्तु के अनुसार व्यक्तियों तथा वस्तुओं के वितरण का अनुपात न्यायसंगत होना चाहिए. तदनुसार यदि व्यक्ति एकसमान नहीं हैं, तो उनको मिलने वस्तुएं भी असमान होंगी. लेकिन इसमें दो प्रकार की स्थितियां संभव हैं. पहली दो व्यक्ति जो समान हैं, उन्हें एक समान वस्तुओं की प्राप्ति न हो. दूसरी व्यक्ति असमान हों और उन्हें समान मात्रा में वस्तुएं प्राप्त हों. यह ऐसी उलझन है जिसका निपटारा आसान नहीं है. इसके समाधान के लिए प्रायः कह दिया जाता है कि लोगों में वस्तुओं का वितरण ‘प्राथमिकता के आधार’ पर हो. परंतु प्राथमिकता का भी सर्वमान्य मानक नहीं है. राज्यों की प्रकृति और परिस्थिति के अनुसार प्राथमिकता के मायने बदलते रहते हैं. लोकतांत्रिक समाजों में जन्म के आधार पर ही नवजात के नागरिक अधिकार सुरक्षित मान लिए जाते हैं. भले ही वह उनके बारे में कुछ भी जानता हो. जहां अल्पतंत्र अथवा कुलीनतंत्र है, वहां संसाधनों का बंटवारा कुलीनों की संख्या को आधार बनाकर किया जाता है. जनसाधारण की जरूरतों पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता. इसी प्रकार निरंकुश राज्य में संसाधनों के विभाजन का कोई नियम नहीं होता. सबकुछ तानाशाह की इच्छा से निर्धारित होता है. तो भी इससे यह नियम खारिज नहीं होता कि न्याय की कसौटी के अनुसार वस्तुओं का विभाजन आनुपातिक होना चाहिए. यानी व्यक्ति को यह लगना चाहिए कि समाज और राज्य उसकी रुचि एवं जरूरतों का ख्याल रखने में सक्षम हैं. और उनका प्रत्येक प्रयास इसी दिशा में जाता है.

अरस्तु को विज्ञान का संस्कार बचपन से प्राप्त था. न्यायसिद्धांत की व्याख्या करते हुए वह आवश्यकतानुसार गणित की मदद भी लेता है. असमानता समाज में स्तरीकरण करती है. दो व्यक्तियों के बीच की असमानता यदि उसी अनुपात में आगे बढ़े तो किन्हीं दो जोड़ों के बीच अधिकतम और न्यूनतम आय के बीच कम से कम चार गुने का अंतर होगा. उदाहरण के लिए ‘क’, ‘ख’, ‘ग’ और ‘घ’ के बीच यदि ‘क’ के पास ‘ख’ से दो गुनी संपदा है तथा ‘ग’ के पास ‘घ’ से दो गुनी, तो ‘क’ के पास ‘घ’ से न्यूनतम चार गुनी समृद्धि होगी. इस तरह समृद्धि अनुपात बढ़ने से आर्थिक असमानता, विशेषकर अधिकतम और न्यूनतम के बीच का अंतर बहुत तेजी से बढ़ता है. इसलिए सभी व्यक्तियों को समान आंकना, उन्हें समान अवसर देना और आय में किसी प्रकार का पक्षपात न बरतना ही न्याय है. इस उदाहरण में यदि ‘क’ और ‘ग’ को जोड़ दिया जाए तो उनकी संपत्ति लगभग ‘ख’ के बराबर हो जाएगी. अरस्तु ने इसे ‘वितरणात्मक न्याय’ कहा है. हालांकि उदार लोकतांत्रिक सरकारों में जहां सबको साथ लेकर चलने की प्रवृत्ति होती है, यह कार्य संभव नहीं है. हालांकि समानता की ओर प्रतिबद्धता के साथ आगे बढ़ना उनकी जरूरत होती है.

क्रमश:

© ओमप्रकाश कश्यप

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अरस्तु : विद्वानों का विद्वान

 

ज्ञान और अध्यात्म के क्षेत्र में गुरुशिष्य परंपरा का महत्त्व बताया गया है. आज भी है. भारत में सैकड़ों आश्रम और धर्मगुरु हैं. उनके लाखोंकरोड़ों भक्त हैं. प्रत्येक गुरु अपने शिष्यों के भौतिकअधिभौतिक उत्थान का दावा करता है. शिष्य भी मानते हैं कि उनके गुरु अनन्य हैं. वे अपने और गुरु के बीच मर्यादा की लकीर खींचे रहते हैं. जिसके अनुसार गुरु की आलोचना करना, सुनना यहां तक कि मन में गुरु के प्रति भूल से भी अविश्वास लाना पाप माना जाता है. इसी जड़श्रद्धा के भरोसे गुरुओं का कारोबार चलता है. उस कारोबार में कभी घाटा नहीं आता. जड़श्रद्धा के बल पर ही गुरु कमाते, भक्त गंवाते हैं. बुद्ध ने जड़श्रद्धा का निषेध किया था. दूसरी ओर मीमांसक कुमारिल भट्ट को मात्र इस कारण खुद को प्रायश्चिताग्नि के सुपुर्द करना पड़ा था, क्योंकि उन्होंने गुरु की पूर्वानुमति के बिना बौद्ध दर्शन का अध्ययन इसलिए किया था, ताकि शास्त्रार्थ में बौद्ध आचार्यों को पराजित कर वैदिक दर्शनों की श्रेष्ठता सिद्ध कर सकें. उद्देश्य सही था. ज्ञान का भी यही तकाजा था. परंतु तत्कालीन परंपरा को स्वीकार्य न था. कुमारिल अपने उद्देश्य में सफल हुए थे, किंतु गुरुद्रोह के अपराध के प्रायश्चितस्वरूप खुद को अग्निसमर्पित करना पड़ा था. सुकरात, प्लेटो और अरस्तु की गुरुशिष्य परंपरा में अंधश्रद्धा के लिए कोई स्थान न था. तीनों परंपरापोषण के बजाय उसके परिमार्जन पर जोर देते हैं. उसका आदिप्रस्तावक सुकरात खुले संवाद में विश्वास रखता था. यह सुनकर कि लोग उसे यूनान का सर्वाधिक बुद्धिमान प्राणी मानते हैं, सुकरात को अपने ही ऊपर संदेह होने लगा था. संदेह दूर करने के लिए वह एथेंस के वुद्धिमान कहे जाने वाले राजनयिकों, दार्शनिकों और तत्ववेत्ताओं से मिला. अंततः इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि वह सचमुच सबसे बुद्धिमान है. इसलिए नहीं कि उसे सर्वाधिक ज्ञान है. सुकरात ने माना कि वह केवल एक चीज दूसरों से अधिक जानता है, वह है—अपने ही अज्ञान का ज्ञान. ‘मुझे अपने अज्ञान का ज्ञान है’ कहकर उसने खुद को उन दार्शनिकों, विचारकों और तत्ववेत्ताआ से अलग कर लिया था, जिन्हें अपने ज्ञान का गुमान था. उसके लिए ज्ञान से ज्यादा ज्ञानार्जन की चाहत और उसकी कोशिश का महत्त्व था. ज्ञान की मौलिकता के लिए वह संदेह को आवश्यक मानता था. सुकरात की इसी प्रेरणा पर अरस्तु ने मनुष्य को विवेकशील प्राणी माना है. विवेकशीलता में स्वयं अपने ज्ञानानुभवों के पुनरावलोकन की, संदेह की भावना अंतर्निहित है. ज्ञानार्जन के लिए संदेह की अनिवार्यता को रेखांकित करते हुए ग्यारहवीं शताब्दी के फ्रांसिसी विचारक पीटर अबलार्ड ने लिखा था—‘संदेह हमें जांचपड़ताल के लिए प्रेरित करता है. जांचपड़ताल हमें सत्य का दर्शन कराती है.’ ‘सुकरातप्लेटो और अरस्तु’ की त्रयी के विचारों में अंधश्रद्धा के लिए कोई जगह न थी. हालांकि इस विद्वानत्रयी को अनुपम और अद्वितीय मानने पर कुछ लेखकों को ऐतराज है.

पॉलिटिक्स’ का अनुवाद करते समय भोलानाथ शर्मा ने ‘सुकरातप्लेटोअरस्तु’ की त्रयी के समकक्ष ‘पराशरव्यास और शुकदेव’ त्रयी का उदाहरण दिया है. इस निष्कर्ष के पीछे उनके पूर्वाग्रह साफ नजर आते हैं. यह ठीक है कि ‘पराशरव्यास और शुकदेव’ की पितापुत्रपौत्र त्रयी में भी तीनों लेखक थे. पराशर को भारतीय परंपरा में पुराणों के आदिरचियता होने का श्रेय दिया जाता है. बताया जाता है कि व्यास ने महाभारत के अलावा पिता के लिखे पुराणों का पुनर्लेखन कर, उन्हें वह कलेवर प्रदान किया जिसमें वे आज प्राप्त होते हैं. तीसरे शुकदेव ने ‘भागवत पुराण’ लिखकर पुराण साहित्य को समृद्धि प्रदान की थी. बावजूद इसके ये तीनों भारतीय लेखक उस कोटि के मौलिक लेखकविचारक नहीं हैं, जिस कोटि के ‘सुकरातप्लेटो और अरस्तु’ हैं. व्यास की कृति ‘महाभारत’ अवश्य अलग है. उसमें अपने समय का सामाजिकसांस्कृतिक एवं राजनीतिक विमर्श मौजूद है, परंतु जिस महाभारत से हम आज परिचित हैं, वह ईस्वी संवत्सर की शुरुआत के आसपास की कृति है, जब देश में एकराष्ट्र की भावना प्रबल थी. गणतांत्रिक पद्धति पर आधारित छोटेछोटे राज्यों को अनावश्यक मान लिया गया था. एकराष्ट्र अथवा साम्राज्यवादी सोच का उद्भव पूरी दुनिया में लगभग एक साथ हुआ था. भारत में इसका प्रवर्त्तक चाणक्य था, जबकि यूनान में अरस्तु ने सिकंदर की साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाओं का समर्थन करते हुए उसे एशिया पूर्व के छोटेछोटे देशों को अपने अधीन करने की सलाह दी थी. महाभारत मूलतः धार्मिक ग्रंथ है और उसकी रचना शताब्दियों के अंतराल में एकाधिक लेखकों द्वारा की गई है. दूसरे केवल लेखक होना ही शर्त होती तो एक ही धारा के तीन लेखकों के अनेक उदाहरण दुनियाभर में मिल जाएंगे. यहां कसौटी ज्ञान की विलक्षणता, मनुष्यता के प्रति अगाध निष्ठा तथा एकदूसरे से असहमति जताते हुए उसकी ज्ञानपरंपरा को विस्तृत तथा सतत परिमार्जित करने की है—जिसपर यह त्रयी विश्वपटल पर अनुपम है. प्लेटो के लेखन के हर हिस्से पर सुकरात की छाप है. इसी तरह अरस्तु के लेखन पर भी प्लेटो का प्रभाव छाया हुआ है. लेकिन प्लेटो सुकरात से तथा अरस्तु प्लेटो से कदमकदम पर असहमति दर्शाते हैं. प्लेटो से अरस्तु की असहमतियों का दायरा तो इतना बड़ा है कि उन्हें एक ही दर्शनपरंपरा से जोड़ना अनुचित जान पड़ता है. जैसे कि पारिवारिक जीवन का महत्त्व, सुखस्वास्थ्य प्राप्ति के संसाधन, लोकमत का सम्मान, जनसाधारण की रुचि एवं इच्छाओं का समादर जैसे विषयों पर अरस्तु पर्याप्त उदार था. जबकि प्लेटो ने अपने आदर्श राज्य में सामूहिक संस्कृति और सहजीवन पर जोर देते हुए परिवार संस्था को अनावश्यक मानते हुए कठोरअनुशासित जीवन जीने की अनुशंसा की है.

फिर प्रभाव किस बात का है? कौनसा सूत्र है जो इन तीनों को परस्पर जोड़ता है? इस तारतम्यता को इन्हें पढ़ते हुए आसानी से समझा जा सकता है. एकसूत्रात्मकता ‘पराशरव्यासशुकदेव’ की त्रयी के बीच भी है. अंतर केवल इतना है कि भारतीय परंपरा के लेखकों पर अध्यात्म प्रभावी रहा है, जो अतिरेकी आस्था और विश्वास के दबाव में अंधानुकरण में ढल जाता है. जबकि ‘सुकरातप्लेटोअरस्तु’ के बीच ज्ञान की लालसा तथा शुभत्व की खोज के लिए एकदूसरे पर संदेह का सिलसिला निरंतर बना रहता है. परंपरापोषी होने के कारण भारतीय लेखक एकदूसरे को दोहराते अथवा परंपरा का पिष्ठप्रेषण करते हुए नजर आते हैं. पश्चिम का लेखन विशेषकर वह लेखन जो सुकरात से आरंभ होकर अरस्तु और आगे थामस हॉब्स, जान लॉक, रूसो, वाल्तेयर, बैंथम आदि तक जाता है, उसमें संदेह का सिलसिला कभी टूटता नहीं है. वाल्तेयर और रूसो एकदूसरे के समकालीन लेखक थे. जीतेजी उनमें हमेशा विलगाव बना रहा. दोनों एकदूसरे के कट्टर आलोचक थे. परंतु वाल्तेयर और रूसो को पढ़ते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि उनमें से किसी एक के मन में ज्ञान की ललक, मनुष्यता को बेहतर बनाए जाने की उत्कंठा दूसरे से कम है. जिस तरह प्लेटो सुकरात के प्रति और अरस्तु प्लेटो के प्रति अगाध प्रेम और विश्वास रखते हुए, विनम्र असहमति क साथ विचारपरंपरा को आगे बढ़ाते हैं, वैसा भारतीय परंपरा में दुर्लभ है. प्लेटो के विपुल वाङ्मय में एक भी शब्द, एक भी पंक्ति ऐसी नहीं है, जिसपर सुकरात का असर न हो. बावजूद इसके जहां आवश्यक समझा उसने सुकरात की बात भी काटी है. अरस्तु तो प्लेटो से आगे निकल जाता है. उसके मन में गुरु प्लेटो के प्रति गहरा सम्मान था. बावजूद इसके उसके ग्रंथों में प्लेटो के विचारों के प्रति सहमति से अधिक असहमति नजर आती है. प्लेटो और अरस्तु अपनेअपने गुरु के ज्ञान को आत्मसात करते हैं, परंतु उनका विश्वास उस परंपरा को आगे बढ़ाने में है, न कि अनुसरण में. प्लेटो भावुक, कवि हृदय है, जबकि अरस्तु अपेक्षाकृत वैज्ञानिक प्रवृत्ति से युक्त. इसलिए अरस्तु के लेखन में असहमति अधिक मुखर है. इस कारण कुछ विद्वान तो अरस्तु को प्लेटो का शिष्य मानने को ही तैयार नहीं है. लेकिन अरस्तु के लेखन में प्लेटो के प्रति जैसा सम्मानभाव है उसे देखते हुए यह असंभव भी नहीं लगता. कथ्य के आधार पर उनमें अंतर न के बराबर मिलेगा. ऐसा महसूस होगा मानो सारे पुराण एक ही लेखक द्वारा रचित अलगअलग कालखंड की कृतियां हैं; अथवा उनके लेखक मंजे हुए किस्सागो थे. उन्होंने समाज में पहले से प्रचलित कहानियां को अतिरेकपूर्ण कल्पनाओं और रोचकता के साथ पौराणिक कलेवर प्रदान किया था.

अरस्तु(जन्म 384 ईस्वीपूर्व) और प्लेटो के जन्म के बीच लगभग चार दशक का अंतराल था. Aristole का अर्थ है—‘श्रेष्ठतम लक्ष्य’(The best purpose). कहने की आवश्यकता नहीं कि अपने नामानुरूप अरस्तु ने जीवन में महान उद्देश्य सिद्ध किए. अरस्तु का मुख्य कर्मक्षेत्र एथेंस रहा, परंतु सुकरात और प्लेटो की भांति वह मूल एथेंसवासी नहीं था. उसका जन्म एथेंस से लगभग 340 किलोमीटर दूर, थ्रेस नदी के किनारे स्थित स्तेगिरा नामक छोटे से शहर में हुआ था. उसके पिता का नाम निकोमाराक्स् था. उनके पूर्वज मैसेनिया से ईसापूर्व सातवींआठवीं शताब्दी में स्तेगिरा में आकर बसे थे. उसकी मां का नाम फैस्तिस था और उसके पूर्वज यूबोइया प्रदेश के खालिक्स नामक मामूली शहर के रहने वाले थे. मेसिडन के राजा एमींतस जिसकी प्रतिष्ठा सिंकदर का दादा होने के कारण भी है—का निजी चिकित्सक होने के कारण निकोमाराक्स् की समाज में प्रतिष्ठा थी. वे वैद्यों की पंचायत के सदस्य भी थे. उन दिनों यूनान के अनेक राज्यों में नगरराज्य की व्यवस्था थी, जहां शासन प्रक्रिया में अधिकांश नागरिकों की भागीदारी रहती थी. मेडिसन में राजतंत्र था. और जैसा कि इस प्रकार की राज्य प्रणालियों में होता है, मेडिसन में भी वंशानुक्रम के आधार पर राजा की घोषणा की जाती थी. अरस्तु के बचपन के बारे में अधिक जानकारी नहीं है. यत्रतत्र बिखरी सूचनाओं से पता चलता है कि उसकी प्राथमिक शिक्षा होमर की रचनाओं से आरंभ हुई था. उसपर अपने चिकित्सक पिता का विशेष प्रभाव पड़ा. उन दिनों चिकित्सक परिवार के बच्चों को बचपन से ही शल्यचिकित्सा का प्रशिक्षण दिया जाता था.सो अरस्तु को भी शरीर विज्ञान और वनस्पतियों की शिक्षा बचपन से ही मिलने लगी थी.शरीर विज्ञान और प्रकृतिविज्ञान के दूसरे क्षेत्रों में अरस्तु की रुचि को देखते हुए उस समय शायद ही कोई कल्पना कर सकता था कि आगे चलकर यूनानी दर्शन और तर्कशास्त्र का महापंडित कहलाएगा. बचपन के वही अनुभव कालांतर में विज्ञान, विशेषकर वनस्पति शास्त्र के क्षेत्र में उसकी रुचि का कारण बने. यह भी बताया जाता है कि बचपन के चिकित्सा क्षेत्र के अनुभवों के कारण ही अरस्तु को चिकित्सकों की स्थानीय संस्था का सदस्य बना लिया था.

अरस्तु का परिवार समृद्ध था. इसलिए बचपन में उसे सुखसुविधाओं की कमी न थी. उसका बचपन राजपरिवार के लोगों के सान्निध्य में, सुखपूर्वक बीता. संयोगवश अरस्तु के मातापिता की मृत्यु उसकी किशोरावस्था में ही हो चुकी थी. उसके बाद उसकी देखभाल का दायित्व उसके एक रिश्तेदार प्रॉक्सीनस ने संभाला. सुकरात की भांति अरस्तु की आरंभिक इच्छा भी विज्ञान के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने की थी. उसने अपने जीवन का लंबा समय वैज्ञानिक अनुभवों के लिए लगाया था. अनेक ग्रंथों की रचना की, बाद में वह प्रकृति विज्ञान से उकताने लगा. इसका कारण स्टेगिरा की राजनीति थी. सम्राट एमींतस महत्त्वाकांक्षी था. राज्य की सीमाओं के विस्तार के लिए उसने कई युद्ध लड़े थे. जिसमें उसे सफलता भी मिली थी. लेकिन राज्य की सीमाओं का विस्तार और प्रजा के सुखसंतोष में विस्तार के बीच कोई तालमेल न था. लगातार युद्ध के मैदान में रहने वाले राजा की प्रजा को जो कष्ट भोगने पड़ते हैं, वे कष्ट स्तेगिरा की प्रजा को भी भोगने पड़ते थे. इसी विसंगति से अरस्तु के मन में राजनीति को समझने की ललक पैदा हुई. उसने अनुभव किया था कि राज्य के उद्देश्यों तथा उसके कार्यों के बीच कोई तालमेल नहीं है. युवावस्था तक पहुंचतेपहुंचते वह ज्ञान के परंपरागत संसाधनों से उकताने लगा था. उसका झुकाव दर्शन और राजनीति की ओर गया. उस समय पूरे यूनान में प्लेटो द्वारा स्थापित ‘अकादेमी’ की प्रतिष्ठा थी. अरस्तु की प्रतिभा और उच्च शिक्षा के प्रति लगन को देखते हुए प्रॉक्सीनस ने उसका दाखिला प्लेटो की अकादेमी में करा दिया. ईस्वी पूर्व 367 में वह एथेंस पहुंचकर प्लेटो की अकादमी का सदस्य बन गया. उस समय उसकी वयस् मात्र 17 वर्ष थी. अकादमी में आने का उद्देश्य केवल राजनीति और दर्शन की शिक्षा के साथसाथ विश्व के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में रहकर अध्ययन करने की लालसा थी.

अरस्तु प्लेटो की अकादेमी में लगभग बीस वर्षों तक रहा. वहां रहते हुए उसने गणित, दर्शन, राजनीति आदि विषयों में ज्ञान प्राप्त किया. उसके बाद कुछ अर्से तक अकादेमी में अध्यापन कार्य भी किया. यहीं उसके और प्लेटो के बीच आत्मीयता का विस्तार हुआ. अरस्तु को पुस्तकें जमा करने का शौक था और अपने धन का बड़ा हिस्सा पुस्तकों और पांडुलिपियों को जुटाने पर करता था. प्लेटो ने उसके आवास को ‘श्रेष्ठ अध्येता का घर’ कहा था. कुछ लोग मजाक में कहा करते थे कि ईश्वर ने अरस्तु के मस्तिष्क में गहरा गड्ढा बना दिया है, जिसमें वह पुस्तकों को सहेज कर रखता है. अकादेमी में रहते हुए अरस्तु पर प्लेटो की विद्वता का प्रभाव उत्तरोत्तर बढ़ता गया. प्लेटो की लेखनशैली का अनुकरण करते हुए उसने अकादमी प्रवास के दौरान भौतिकी, जीवविज्ञान, वनस्पति विज्ञान, तर्कशास्त्र, तत्वदर्शन आदि पर अनेक पुस्तकों की रचना की. अरस्तु के मन में अपने गुरु के प्रति बेहद सम्मान था. वहीं प्लेटो भी अरस्तु की प्रतिभा का मुरीद था. वह उसे ‘अकादेमी का मस्तिष्क’ और ‘सर्वश्रेष्ठ अध्ययनशील’ विद्यार्थी मानता था. प्लेटो का निधन हुआ, उस समय अरस्तु की उम्र लगभग 37 वर्ष थी. वह प्लेटो के उत्तराधिकारियों में से एक था. प्रतिभा को देखते हुए अरस्तु की दावेदारी भी बनती थी. वह प्लेटो का वास्तविक उत्तराधिकारी है, यह उसने आगे चलकर सिद्ध भी कर दिया था. परंतु ‘अकादमी’ का अध्यक्ष प्लेटो के रिश्तेदार तथा गणित एवं जीवविज्ञान के पंडित स्पूसिपस को बनाया गया. इसका कारण प्लेटो से अरस्तु की वैचारिक असहमतियां भी थीं. अधिकारियों में इतना साहस न था कि अकादेमी का संचालन का दायित्व ऐसे व्यक्ति के हाथों में सौंप दें, जिसकी अकादेमी के संस्थापक और गुरु से घोर असहमतियां रही हों, हालांकि अरस्तु की प्रतिभा को लेकर उन्हें कोई संदेह न था. नतीजा यह हुआ कि अरस्तु का जी अकादेमी से उचट गया. निराश होकर उसने एथेंस छोड़ दिया. वहां से वह माइसिया में एटारनियस नामक स्थान पर पहुंचा. वहां अकादेमी के पूर्व छात्रों की मंडली का सदस्य बन गया. उनमें वहां का शासक हरमियॉस भी शामिल था. इससे अरस्तु को पुनः राजपरिवार के निकट आने का अवसर मिला. कुछ ही दिनों में हरमियॉस और अरस्तु गहरे दोस्त बन गए. इसका सुखद परिणाम अरस्तु और हरमियॉस की भतीजी(कुछ विद्वानों के अनुसार भानजी) पिथियास के विवाह के रूप में सामने आया. उसके फलस्वरूप उसके जीवन में स्थायित्व आया. अकादमी में प्राप्त गणित और विज्ञान की शिक्षा बहुत कारगर सिद्ध हुई. पिथियास से विवाह के उपरांत उसने खुद को प्रकृति विज्ञान की खोज में लगा दिया. समुद्र तटीय स्थानों पर जाकर वह वनस्पतियों और जीवजंतुओं का अध्ययन करने लगा. उन अनुभवों के आधार पर उसने आगे चलकर कई पुस्तकों की रचना की. एथेंस छोड़ने के बाद 12 वर्षों तक वह इसी तरह अनुभव और ज्ञान बंटोरता रहा. इस बीच राजतंत्र की निरंकुशता को करीब से देखने का अवसर मिला. कदाचित इसी बीच उसके मन में छोटेछोटे राज्यों की विकृतियां सामने आने लगी थीं. वही अनुभव कालांतर में आगे चलकर ‘पॉलिटिक्स’ एवं ‘एथिक्स’ जैसे गं्रथों की प्रेरणा बनी. अपने उत्तरवर्ती जीवन में अरस्तु ने एक अन्य युवती हरपिलिस से विवाह किया, जिससे उसे संतान हुई. पुत्र का नाम उसने अपने पिता के नाम पर निकोमाराक्स् रखा.

342 ईस्वीपूर्व के आसपास उसको मेसिडन के सम्राट की ओर से निमंत्रण प्राप्त हुआ. इस अवधि में वहां काफी कुछ बदल चुका था. एमींतस के बाद फिलिप मेसिडन का सम्राट था. उसे अपने बेटे सिकंदर के लिए योग्य शिक्षक की तलाश थी. अरस्तु की प्रतिभा के बारे में वह पहले से ही परिचित था. अकादेमी में अरस्तु द्वारा किए गए कार्य भी उसकी जानकारी में थे. ऐसे में सिकंदर की शिक्षा के लिए अरस्तु से बेहतर कोई हो ही नहीं सकता था. निमंत्रण मिलते ही अरस्तु मेसिडन लौट आया. सम्राट फिलिप की ओर से उसका जोरदार स्वागत किया गया. आते ही उसे ‘रॉयल अकादेमी ऑफ मेसिडन’ का अध्यक्ष बना दिया गया. अगले तीन वर्षों तक वह इसी पद पर बना रहा. शिक्षक के तौर पर उसने राजकुमार सिकंदर में साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाएं जगाने का काम किया. उसने सिंकदर को राज्य की सीमाओं के विस्तार के लिए एशियामाइनर तथा अन्य उत्तरपूर्वी राज्यों पर अधिकार करने की सलाह दी. इस बीच एटारनियस से दुखद समाचार आया कि एक ईरानी सेनापति ने उसके मित्र और वहां के शासक हरमियॉस को धोखे से पकड़कर उसकी हत्या कर दी है. इस सूचना ने अरस्तु को व्यथित कर दिया. 340 ईस्वी पूर्व में फिलिप की मृत्यु के बाद सिकंदर सम्राट बना. सिंकदर के मन में शुरू से ही साम्राज्यवादी भावनाएं जोर मारती थीं. सत्ता हाथ में आते ही वह युद्ध पर निकल पड़ा. अब मेसिडन में अरस्तु को कोई काम न था. इसी बीच उसे एथेंस जाने का अवसर मिला. उसी समय अकादेमी अध्यक्ष पद के रिक्त होने की सूचना मिली. अरस्तु के मन में अकादेमी से जुड़ने की लालसा अब भी शेष थी. परंतु अरस्तु की उपेक्षा करते हुए अकादेमी के अधिकारियों द्वारा खेनोक्रातेस को अकादेमी का मुख्यअधिष्ठाता मनोनीत किया गया. अरस्तु एक बार फिर निराश हो गया. परंतु उसके जैसे मननशील व्यक्ति के आगे निराशा बहुत टिकाऊ नहीं थी. उसने स्वयं को अध्ययन के प्रति समर्पित कर दिया.

335 ईस्वी पूर्व में उसे पुनः एथेंस लौटने का अवसर मिला. इस बार आमंत्रित करने वाला था, हर्मेडयस उस समय उसकी उम्र 51 वर्ष थी और एक विद्वान दार्शनिक के रूप में उसकी ख्याति आसपास के देशों में फैल चुकी थी. एथेंस की ज्ञानविज्ञान के क्षेत्र में धाक थी. अवसर गंवाए बिना अरस्तु एथेंस के लिए प्रस्थान कर गया. उन दिनों एथेंस और मेसीडन के संबंध अच्छे न थे. परंतु अरस्तु की विद्वता की धाक ऐसी थी कि एथेंस में उसका स्वागत हुआ. जाहिर है इसके पीछे एथेंसवासियों की ज्ञान के प्रति सम्मानभावना का असर था. एथेंस के उत्तरपूर्व स्थित उपनगर अपोलो में लीशियस देवी का मंदिर था. एथेंस के कानून के अनुसार वहां बाहरी व्यक्तियों को भूमि खरीदने की अनुमति नहीं थी. इसलिए अरस्तु ने मंदिर के आसपास के क्षेत्रों में कुछ मकान किराये पर लेकर अपने विश्वविद्यालय की स्थापना की. विश्वविद्यालय का नाम लीशियस देवी के नाम के आधार पर ‘लीशियम’ रखा गया. कुछ ही दिनों में एथेंस के अनेक प्रतिष्ठित लोग जिनमें अकादेमी से शिक्षित लोग भी थे, अरस्तु से जुड़ने लगे. इससे अरस्तु और उसके विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा बढ़ने लगी. उस विश्वविद्यालय की खूबी थी कि वहां टहलते हुए शिक्षार्जन पर जोर दिया जाता था. अरस्तु स्वयं टहलते हुए पढ़ाता था. इसलिए कुछ प्लेटो को ‘टहलतेटहलते पढ़ाने वाला अध्यापक’ तथा संस्था को ‘परिभ्रामी विद्यालय’;च्मतपचंजमजपब ैबीववसद्ध भी कहने लगे थे. लीशियम में रहते हुए अरस्तु ने अध्यापन के अलावा कई महत्त्वपूर्ण काम किए. पुस्तक संग्रह का शौक उसको अकादेमी प्रवास से ही था. लीशियम में उसे पुस्तकें जमा करने के भरपूर अवसर मिला. फलस्वरूप उसने सैकड़ों पुस्तकों एवं पांडुलियों का संग्रह किया. और उन्हें सुरक्षित रखने लिए लीशियम के भीतर एक विशाल पुस्तकालय का निर्माण किया. अरस्तु द्वारा निर्मित पुस्तकालय उसके समकालीन नाटककार यूरीपिडिस के पुस्तकालय को छोड़कर, पूरे यूनान में सबसे बड़ा था. यही नहीं उसने पुस्तकों को व्यवस्थित करने के लिए आवश्यक नियम भी बनाए थे. पुस्तकालय के अलावा उसने विश्वविद्यालय में विचित्र वस्तुओं, शैवालों तथा मानचित्रों का एक अजायबघर तैयार किया. हालांकि स्वयं अरस्तु के पास धन की कमी न थी. उसकी पत्नी धनाड्य परिवार से थीं. इसके साथसाथ पुस्तकालय, अजायबघर, वैज्ञानिक उपकरण आदि के लिए सिंकदर की ओर से भी समयसमय पर मदद प्राप्त होती रहती थी. गुरु अरस्तु के प्रति सिंकदर का सम्मान इससे भी जाहिर होता है कि उसने अपने सैनिकों, मछुआरों, बहेलियों और शिकारियों को आदेश दिया था कि काम के दौरान यदि कोई विचित्र वस्तु मिले तो उसे संग्रहित कर, लीशियम के संग्रहालय में जमा करा दें. इसके अतिरिक्त सिंकदर ने जीव विज्ञान एवं भौतिक विज्ञान संबंधी खोजों के वैज्ञानिक उपकरण भेजकर भी अरस्तु की मदद की थी.

अरस्तु ‘लीशियम’ में 12 वर्षों तक रहा. इस बीच उसका विद्यालय निरंतर प्रगति करता रहा. लगभग सभी विषय की शिक्षाओं का वहां प्रबंध था और शिक्षार्थी के रूप में दूरदूर के विद्यार्थी वहां पहुंचते थे. ‘लीशियम’ के प्रशासन हेतु अरस्तु ने विशेष प्रबंध किए थे. उस व्यवस्था को प्लेटो के ‘आदर्श राज्य’ तो नहीं कह सकते, परंतु शिक्षक और विद्यार्थी के बीच अनौपचारिक बातचीत को बढ़ाने, शिक्षा में सहजता लाने की भावनाएं उसके पीछे अवश्य थीं. तदनुसार विद्यार्थी अपने बीच से एक विद्यार्थी को चुनते थे. अगले दस दिनों तक वही विश्वविद्यालय के प्रशासक का काम करता था. इसके बावजूद ‘लीशियम’ में पर्याप्त अनुशासन था. भोजनव्यवस्था वहां सामूहिक थी. महीने में एक दिन विशेष परिचर्चा के लिए सुरक्षित था, जिसके नियम अरस्तु ने निर्धारित किए थे. अरस्तु का यह विश्वविद्यालय ‘अकादेमी’ जैसी प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं कर सका. एक तरह से यह उसकी शाखा जैसा ही था. दोनों में एक विशेष अंतर भी था. ‘अकादेमी’ में गणित पर ज्यादा जोर दिया जाता था, जबकि ‘लीशियम’ में जीवविज्ञान और वनस्पति विज्ञान की शिक्षा पर खास ध्यान दिया जाता था. प्रायोगिक शिक्षा का खास महत्त्व था. उन दिनों बाढ़ आम समस्या थी. बरसात के समय नील नदी उफनने लगती. अरस्तु ने नियमित आने वाली बाढ़ों की रोकथाम के लिए भी शोधकार्य किया था. ‘लीशियम’ को प्लेटो के ‘अकादेमी’ जैसी प्रतिष्ठा भले ही प्राप्त न कर सका, परंतु एक दार्शनिक के रूप में अरस्तु को वैसी प्रतिष्ठा प्राप्त हो चुकी थी, जैसी कभी सुकरात और प्लेटो को प्राप्त था. अरस्तु को नकारकर जिस व्यक्ति को अकादेमी का अध्यक्ष मनोनीत किया गया था, अरस्तु के प्रभामंडल के आगे उसकी प्रतिष्ठा नगण्य थी.

लीशियम में अध्यापन करते हुए अरस्तु ने अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की. उस समय सिकंदर विश्वविजय के लिए निकला हुआ था. यात्रा के विवरणों को दर्ज करने के लिए सिंकदर के साथ कल्लिस्थेसनस् नामक युवा भी उसके साथ अभियान पर था. वह अरस्तु का शिष्य था और अपने गुरु की भांति स्पष्टवक्ता भी. अभियान के दौरान किसी कार्य के लिए कल्लिस्थेसनस् ने सिंकदर की आलोचना कर दी. परिणामस्वरूप सिंकदर उससे रुष्ट हो गया. उस समय तक सिंकदर की विश्वविजय की कामनाएं उभार पर थीं. आलोचना उससे सहन न हुई. उसके आदेश पर कल्लिस्थेसनस् को मृत्युदंउ सुनाया गया. कल्लिस्थेसनस अरस्तु का करीबी शिष्य था. अरस्तु ने ही उसे सिकंदर के साथ भेजा था, इसलिए कल्लिस्थेसनस् के साथसाथ अरस्तु को भी दोषी माना गया. सिंकदर ने अरस्तु को दंडित करने का निर्णय कर लिया. लेकिन भारत अभियान में वह इतनी बुरी तरह से उलझा कि वापस लौट ही नहीं पाया. ईसा पूर्व 323वें वर्ष में उसकी मृत्यु हो गई.सिकंदर की मौत का समाचार जैसे ही मेसिडन पहुंचा वहां विद्रोह हो गया. अरस्तु सिंकदर का गुरु और करीबी रह चुका था, इसलिए विद्रोहियों ने उसे भी दंडित करने का निर्णय किया. लेकिन अरस्तु को दंडित करना आसान न था. उसकी पूरे यूनान में प्रतिष्ठा थी. विद्रोहियों ने उसे ‘नास्तिक’ घोषित कर दिया. आरोप का आधार अरस्तु द्वारा ईसापूर्व 340-341 में अपने दोस्त हरमियॉस पर लिखी कविता को बनाया गया. वह कविता अरस्तु ने हरमियॉस की हत्या के बाद लिखी थी, जिसमें उसके गुणों का बखान करते हुए उसे देवतुल्य घोषित किया गया था. बीस वर्ष पुरानी उस कविता के समय और परिस्थिति को देखते हुए इस प्रकार के आरोप बेमानी थे. विरोधी किसी भी प्रकार अरस्तु को दंडित करना चाहते थे, इसलिए अरस्तु को नास्तिक घोषित करना, जनता के बीच उसकी छवि को धूमिल करने की चाल थी. अपने विरुद्ध बढ़ता माहौल देख अरस्तु को एथेंस छोड़ना पड़ा. उसी वर्ष 62 वर्ष की अवस्था में उसकी मृत्यु हो गई.

एथेंस छोड़ते समय उसने घोषणा की थी कि एथेंसवासियों को दर्शनशास्त्र के विरुद्ध दूसरी बार अपराध नहीं करने देगा. दर्शनशास्त्र के विरुद्ध एथेंसवासियों का पहला अपराध उसकी संसद द्वारा सुकरात को दिया गया मृत्युदंड था. एथेंस से वह युबोइया के लिए प्रस्थान कर गया. वहां खॉल्किस नामक छोटे से नगर में जाकर रहने लगा. वहीं रहते हुए उसने अपनी वसीयत तैयार की, जिसमें उसने अपनी पत्नी हर्पीलियस के स्वभाव की प्रशंसा करते हुए उसके लिए धन की व्यवस्था की थी. पहली पत्नी पिथियास की यादें अब भी उसके दिल में बसी थीं. इसलिए उसने वसीयत में लिखा कि उसे पिथियास के अवशेषों के साथ दफनाया जाए. अपनी संपत्ति का कुछ हिस्सा दासों के नाम किया था और कुछ को उसने दासत्व से मुक्त कर, स्वतंत्र कर दिया था. ये घटनाएं उसकी संवेदनशीलता को दर्शाती हैं. कविहृदय प्लेटो ने भी पाया था, परंतु उसे कविता से अरुचि थी. मानता था कि कविता और नाटक जैसी विधाएं मनुष्य को यथार्थ से परे ले जाकर कमजोर बनाती हैं. अरस्तु मनोमस्तिष्क से वैज्ञानिक होने के साथसाथ संवेदनशील कवि भी था. एक कविता में उसने प्लेटो की विलक्षण मेधा की प्रशंसा करते हुए उसे विद्वानों के बीच अद्वितीय घोषित किया है. देहयष्टि को लेकर भी अरस्तु और प्लेटो के बीच उल्लेखनीय अंतर था. प्लेटो लंबेचौड़े डीलडोल, चौड़ी छाती और सुदर्शन चेहरे वाला व्यक्ति था. उसके नामकरण का कारण ही उसका लंबाचौड़ा डीलडौल था. दूसरी ओर अरस्तु की आंखें छोटीछोटी. पैर पतले. कदकाठी सामान्य थी. बोलते समय वह कभीकभी तुतलाने लगता था. यह भी कहा गया है कि उम्र के आखिरी पड़ाव पर उसके बाल झड़ चुके थे. रहनसहन और बोलचाल में वह असंयमी था. अरस्तु की वाक्पटुता की प्रशंसा की जाती है. दियोगेनस ने उसकी वाक्पटुता के उदाहरणों को पुस्तकाकार संग्रहित किया है. मगर उसकी प्रतिभा बेमिसाल थी. वह अपने समय के शीर्षतम दार्शनिकों और कुछ मामलों में तो अपने गुरु प्लेटो से भी आगे था. दांते ने उसे ‘सभी विद्वानों का गुरु’ घोषित किया है. अरस्तु ने विपुल साहित्य की रचना की. उसके ग्रंथों की संख्या लगभग चार सौ बताई जाती है. उनमें से अनेक ग्रंथ तो दर्शनशास्त्र और राजनीति की धरोहर हैं. लेकिन यह भी विडंबना है कि अरस्तु जैसे महामेधावी दार्शनिक की पुस्तकें भी उसके निधन के लगभग 250 वर्ष बाद ही सिसरो के प्रयासों के फलस्वरूप प्रकाशित हो सकीं. इस बीच उसकी अनेक पांडुलिपियां लुप्त हो चुकी थीं. अब सिवाय संदर्भों के उनका कहीं अतापता नहीं है. लेकिन ‘पॉलिटिक्स’ और ‘एथिक्स’ जैसे ग्रंथ मानवता के उपहार के रूप में आज भी सुरक्षित हैं.

प्लेटो और अरस्तु

अरस्तु की विलक्षणता उसके तार्किक विश्लेषण में है. सुकरात और प्लेटो की शैली मुख्यतः निगमनात्मक थी. अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले सुकरात अपने प्रतिपक्षी के आगे तर्क करता था. उत्तर प्राप्त होने पर वह प्रति तर्क अथवा प्रत्युत्तर के माध्यम से बातचीत को आगे बढ़ाता था. सुकरात को पढ़ते हुए सुधी पाठक समझ जाता है कि संबंधित विषय को लेकर उसका खास दृष्टिकोण है. परंतु निष्कर्ष को सामने रखने से पूर्व वह उसके सभी पक्षों को गंभीरतापूर्वक परख लेना चाहता है. प्रत्येक तर्क के साथ वह अपने मंतव्य को मजबूत करता जाता है. संवादात्मक शैली इसमें सहायक बनती है. यह तर्क की निगमनात्मक पद्धति है, जिसमें एक परिकल्पना को सिद्धांत में बदलने के लिए उसके समर्थन में तर्क जुटाए जाते हैं. पर्याप्त साक्ष्य हों तो ठीक वरना उस परिकल्पना को किनारे कर नए शोध की शुरुआत की जाती है. इसका मुख्य प्रयोग विज्ञान में होता है, जिसमें एक परिकल्पना के साथ परीक्षण, अनुरीक्षण करते हुए निष्कर्ष तक पहुंचने की कोशिश की जाती है. आगमनात्मक पद्धति में निष्कर्ष भविष्य में निहित होता है. उससे जुड़ी कुछ छोटीछोटी स्थितियां, विचार अथवा अनुभवादि होते हैं. फिर उनकी पड़ताल, पुराने निष्कर्षों के साथ मिलान, व्याख्या और परिणामों में आवश्यक संशोधनपरिवर्धन के बाद अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचा जाता है. अरस्तु को तर्क के क्षेत्र में आगमनात्मक पद्धति के प्रथम उपयोग का श्रेय भी प्राप्त है.

अरस्तु को इस बात का भी श्रेय दिया जाता है कि उसने राजनीति को फुटकर विचारों से ऊपर उठाकर स्वतंत्र विषय के रूप में मान्यता दिलाने का काम किया. उससे पूर्व वह धर्मदर्शन का हिस्सा थी. भारत में तो वह आगे भी बनी रही. अरस्तु का समकालीन चाणक्य ‘अर्थशास्त्र’ में अपने राजनीतिक विचारों को सामने रखता है और मजबूत केंद्र के समर्थन में तर्क देते हुए राज्य की सुरक्षा और मजबूती हेतु अनेक सुझाव भी देता है, परंतु ‘अर्थशास्त्र’ और ‘पॉलिटिक्स’ की विचारधारा में खास अंतर है. यह अंतर प्राचीन भारतीय और पश्चिम के राजनीतिक दर्शन का भी है. उनमें अरस्तु की विचारधारा आधुनिकताबोध से संपन्न और मानवमूल्यों के करीब है. ‘पॉलिटिक्स’ के केंद्र में भी मनुष्य और राज्य है. दोनों का लक्ष्य नैतिक एवं सामाजिक उद्देश्यों की प्राप्ति है. अरस्तु के अनुसार राजनीतिकसामाजिक आदर्शों की प्राप्ति के लिए आवश्यक है नागरिक और राज्य दोनों अपनीअपनी मर्यादा में रहें. सामान्य नैतिकता का अनुपालन करते हुए एकदूसरे के हितों की रक्षा करें. इस तरह मनुष्य एवं राज्य दोनों एकदूसरे के लिए साध्य भी साधन भी. ‘अर्थशास्त्र’ में राज्य अपेक्षाकृत शक्तिशाली संस्था है. उसमें राज्यहित के आगे मनुष्य की उपयोगिता महज संसाधन जितनी है. लोककल्याण के नाम पर चाणक्य यदि राज्य के कुछ कर्तव्य सुनिश्चित करता है तो उसका ध्येय मात्र राज्य के लिए योग्य मनुष्यों की आपूर्ति तक सीमित है. ‘पॉलिटिक्स’ के विचारों के केंद्र में नैतिकता है. वहां राज्य का महत्त्व उसके साथ पूरे समाज का हित जुड़े होने के कारण है. राज्य द्वारा अपने हितों के लिए नागरिक हितों की बलि चढ़ाना निषिद्ध बताया गया है. दूसरी ओर ‘अर्थशास्त्र’ के नियम नैतिकता के बजाए धर्म को केंद्र में रखकर बुने गए हैं, जहां ‘कल्याण’ व्यक्ति का अधिकार न होकर, दैवीय अनुकंपा के रूप में प्राप्त होता है. जिसका ध्येय राज्य की मजबूती और संपन्नता के लिए आवश्यक जनबल का समर्थन और सहयोग प्राप्त करना है. ठीक ऐसे ही जैसे कोई पूंजीपति श्रमिककामगार को मात्र उतना देता है, जिससे वह अपनी स्वामी के मुनाफे में उत्तरोत्तर संबृद्धि हेतु अपने उत्पादनसामर्थ्य को बनाए रख सके.

अरस्तु के जीवनकाल में यूनान भारी उथलपुथल के दौर से गुजर रहा था. लोग छोटैछोटे राज्यों से उकताने लगे थे. गणतांत्रिक प्रणाली को नाकाम होते देख साम्राज्यवादियों का हौसला बढ़ा था. वे नए सिरे से साम्राज्यवादी विस्तार की तैयारियों में लगे थे. छोटे राज्यों के असफल होने के दो कारण थे. पहला उनमें आपस में बहुत झगड़े होते थे. जरासी बात पर तलवारें खिंच जाया करती थीं. दूसरा और प्रमुख कारण था—व्यापारिक बाधाएं. ईसा पूर्व पांचवीछठी शताब्दी में अंतर्प्रायद्विपीय व्यापार ने काफी तरक्की की थी. व्यापारिक बेड़े दूरदराज के राज्यों के साथ व्यापार करते थे. दूसरे राज्य में व्यापार की अनुमति पारस्परिक राजनीतिक संबंधों पर निर्भर करती थी. संबंध अनुकूल हों तब भी शिल्पकार संगठनों को दूसरे राज्य में व्यापार हेतु भारीभरकम करों का भुगतान करना पड़ता था. बड़े राज्यों के गठन के पीछे मूल विचार था कि उनमें मुक्त व्यापार के लिए अधिक बाजार उपलब्ध हो सकेगा. कुल मिलाकर बड़े राज्यों के गठन के पीछे जहां सभ्यताकरण की प्रेरणाएं थीं, वहीं वर्तमान के प्रति असंतोष की भावना भी थी. अरस्तु जैसा प्रखर विद्वान परिवर्तनों का मूकनिष्पंद द्रष्टा बनकर नहीं रह सकता था. वह दार्शनिक था. विचारों का उसकी दुनिया में महत्त्व था. विचारों को वह किसी भी प्रकार के परिवर्तन की आधारशिला मानता था. उसका मानना था कि मनुष्य श्रेष्ठ का चयन तब कर सकता है, जब उसे श्रेष्ठत्व का बोध हो. उन खूबियों की जानकारी हो जो श्रेष्ठ को श्रेष्ठत्व प्रदान करती हैं. ऐसा नहीं है कि इसकी शुरुआत अरस्तु या प्लेटो से हुई हो. दर्शन के रूप में राजनीति के अध्ययन की शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी. प्राचीन यूनान में होमर, लायक्राग्स, सोलन, प्रोटेगोरस, एंडीफोन, पाइथागोरस, जेनोफीन जैसे अनेक नाम हैं, जिन्होंने राजनीति को सभ्यताकरण के उपकरण की भांति प्रयुक्त किया था. तथापि सुसंगत राजनीतिक चिंतन का अभाव था. राजा प्रजा की मांग तथा अपनी सुविधा के अनुसार कुछ नियम बना लिया करते थे. फिर लंबे समय तक उन्हीं को मार्गदर्शक मानकर काम चलाया जाता था. उनमें से कुछ पर अमल हो पाता था, कुछ पर नहीं. प्रजा कुछ समय तक प्रशासन की दुर्बलताओं को सहती. धीरेधीरे असंतोष उमड़ने लगता था. फलस्वरूप नए सिरे से व्यवस्थापरिवर्तन की मांग उठने लगती थी. नियमों में बड़ा परिवर्तन प्रायः बड़े सत्तापरिवर्तन के साथ ही हो पाता था.

प्लेटो ने न केवल विभिन्न राजनीतिक दर्शनों को एक साथ अध्ययनचिंतन का विषय बनाया, वहीं उनकी खूबियों और खामियों पर भी चर्चा की. उसका लक्ष्य सामाजिक आदर्श थे, जिनके लिए वे राजनीति को औजार के रूप में उपयोग करना चाहता था. अरस्तु ने उस अध्ययन को तर्कसम्मत ढंग से विस्तार दिया. उसके लिए कसौटी न्याय और नैतिकता को बनाया. अरस्तु की कामना ऐसे राज्य की थी, जो परमशुभ की प्राप्ति हेतु सतत अग्रसर हो. जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को अपनी अच्छाइयों के साथ जीने की आजादी हो. और वह अंतःस्फूर्त्त प्रेरणा के साथ लक्ष्यप्राप्ति हेतु संकल्परत हो. यह तभी संभव है जब व्यक्ति को कानून और समाज की मर्यादा में, वह सब कुछ करने की स्वतंत्रता हो जिसे वह अपने लिए उपयुक्त मानता है. इसके लिए आवश्यक है कि राज्य अपेक्षित रूप में उदार हो. निरंकुश, अल्पतंत्रात्मक राज्यों में जनसाधारण से उसके चयन का अधिकार छीन लिया जाता है. इस कारण प्लेटो ने निरंकुश राज्य को सबसे बुरा माना है. उसके अनुसार निरंकुश राज्य में नीचे से ऊपर तक सभी स्वार्थलिप्त होते हैं. संसाधनों पर कुछ लोगों का अधिकार होता है. बहुसंख्यक वर्ग से अपेक्षा की जाती है कि वह अल्पसंख्यक शासक वर्ग की मनमानियों को सहते हुए शासन में सहयोग करे तथा राज्य के हित को, जो वास्तव में उसपर शासक वर्ग द्वारा थोपा हुआ उसका स्वार्थ होता है—अपना हित समझकर वर्ताब करे. ऐसे राज्य में मनुष्य सज्जन की संगत को तरस जाता है. दुर्जन उसे चारों ओर से घेरे रहते हैं. परिणामस्वरूप वह अपनी ही अच्छाइयों से कट जाता है. दुष्प्रभाव केवल यहीं तक सीमिन नहीं रहता. अपने चारों और स्वार्थपरक माहौल देख भले नागरिकों का अपनी मूलभूत अच्छाई से भरोसा उठने लगता है. वे मान लेते हैं कि अस्तित्व को बचाए रखने के लिए दुर्जनों के बीच दुर्जन जैसा व्यवहार करना उसकी मजबूरी है. बुराई के लिए आपधापी में अच्छाई की बलि चढ़ा दी जाती है. परिणामस्वरूप लोगों के स्वार्थ प्रबल होने लगते हैं. केवल अपने लिए जीने की होड़ मच जाती है. कुल मिलाकर निरंकुश राज्य नागरिकों को स्वार्थ के लिए प्रेरित करता है. ऐसे समाजों में चूंकि प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए जीता है, इसलिए सामूहिक हितों के लिए संगठित प्रतिरोध की उसकी क्षमता निरंतर घटती जाती है. ऐसे समाजों में न्याय के अवसर विरल हो जाते हैं.

प्लेटो व्यक्ति एवं समाज की अंतःनिर्भरता पर जोर देता है. सामाजिकता की शर्त है कि अन्योन्याश्रितता केवल सुखसुविधाओं और संसाधनों की नहीं, आचारव्यवहार की भी बनी रहे. इस दृष्टि से मनुष्य तथा समाज के बीच बहुत अधिक अंतर नहीं होता. श्रेष्ठ मनुष्य श्रेष्ठ नागरिक भी होता है, किंतु अकेले मनुष्य की श्रेष्ठता क्षणभंगुर होती है. मनुष्य अपने आचारव्यवहार में श्रेष्ठतर बना रहे, उसके लिए समाज की श्रेष्ठता अपरिहार्य है. इस तरह जो मनुष्य के लिए आदर्श है, प्रकारांतर में वह राज्य के लिए भी आदर्श होना चाहिए. न्याय मानव जीवन का उद्देश्य तभी बन सकता है, जब वह समाज का उद्दिष्ट हो. यदि समाज में न्याय का अभाव है तो समझना चाहिए कि राज्य एवं नागरिकों के बीच विश्वास एवं तालमेल की कमी है. विचार को आगे बढ़ाता हुआ प्लेटो लिखता है कि मनुष्य के लिए क्या श्रेष्ठ है, इसे उस समय तक नहीं जाना जा सकता, जब तक हम यह न जान लें कि राज्य के लिए क्या श्रेष्ठ है. अथवा राज्य जो उसके नागरिकों के लिए श्रेष्ठ है, उसे अपने लिए भी श्रेष्ठ न मान ले. निरंकुश राज्य में ऐसा संभव नहीं होता. वहां नागरिकों से न केवल उनके चयन का अधिकार छीन लिया जाता है, बल्कि लोगों को विवश किया जाता है कि वे अपने विवेक से काम लेने के बजाय दूसरों के आदेश का अनुपालन करें. इससे मनुष्य अपने नागरिक धर्म को भूल जाता है. दूसरी ओर वे लोग जो दूसरों के श्रम और अधिकारों पर कब्जा जमाए होते हैं, विरोध की कोई संभावना न देख उनका दुस्साहस बढ़ता ही जाता है. परिणामस्वरूप स्तरीकरण स्थायी रूप ले लेता है. इससे समाज दो हिस्सों में बंट जाता है. एक ओर आज्ञाप्रदाता समूह होता है. दूसरी ओर आज्ञापालक लोग, जो संख्या में बहुसंख्यक होने के बावजूद अधिकारवंचित होने के कारण दबाव में रहने को विवश होते हैं. इससे मनुष्य की मूलभूत पहचान जो उसके मानवीकरण की शर्त के साथ जुड़ी है, धूमिल पड़ने लगती है. अरस्तु ने मनुष्य को सभी प्राणियों में श्रेष्ठ माना है. मनुष्य सबके साथ मिलकर जीने को उत्सुक होता है, इस कारण वह दूसरों से श्रेष्ठ है. परंतु सामूहिकरण की भावना जो पशुओं में भी होती है. यहां तक कि कीटपतंगे भी समूह में जीना जानते हैं. फिर मनुष्य की सामूहिकता और मानवेत्तर प्राणियों की सामूहिकता में क्या अंतर है? अरस्तु के अनुसार मनुष्य की सामूहिकता समाज के रूप में कुछ नियमों से बंधी होती है. या यह कहो कि अपनी सूझबूझ का परिचय देते हुए वह सामाजिक नियमों के रूप में कुछ मर्यादाएं चुनता है. फिर उनके अनुपालन हेतु संस्थाओं का गठन करता है. मानवेत्तर प्राणियों में ऐसा नहीं होता. वहां केवल बल का साम्राज्य होता है. इसलिए जब कोई बलशाली प्राणी अपने से कमजोर पर आक्रमण कर उसके लिए संकट उत्पन्न करता है, तो बाकी जानवरों में उसकी कोई स्थायी प्रतिक्रिया नहीं होती. मनुष्य के साथ ऐसा नहीं है. मानवसमाज में अधिकार एवं कर्तव्य साथसाथ चलते हैं. परंतु ऐसे समाजों में जहां स्तरीकरण बहुत अधिक हो, समाज शक्तिशाली और शक्तिविपन्न वर्गों में बंटा हो, वहां मिलजुलकर रहने की प्रवृत्ति भी कमजोर पड़ती जाती है. न्यायभावना किसी भी मनुष्य की श्रेष्ठता का मापदंड होती है. न्यायभावना से कटा मनुष्य नितांत जंगली हो सकता है.

कविहृदय प्लेटो आदर्श राज्य के सपने को अपनी कल्पना के जरिये विस्तार देता है. उसका वैचारिक स्तर इतना ऊंचा है कि व्यावहारिक कठिनाइयों को कभी समझ ही नहीं पाता. अरस्तु को मानवव्यक्तित्व की जटिलताओं की समझ अपेक्षाकृत अधिक थी. वह जानता था कि मनुष्य के व्यवहार के बारे में कोई भी सटीक भविष्यवाणी कर पाना संभव नहीं है. यह भी नहीं कहा जा सकता कि किसी मनुष्य में जो गुण आज हैं, वे सदैव बने रहेंगे. इसलिए किसी व्यक्ति का दार्शनिक होना उसके चरित्र का स्थायी लक्षण नहीं है. अपने विचारों की व्याख्या के लिए अरस्तु ने ‘पॉलिटिक्स’ के तीसरे खंड के तेरहवें अध्याय में पेरियांडर का उदाहरण दिया है. पेरियांडर ने 627 ईस्वीपूर्व से 587 ईस्वीपूर्व तक कोरिंथ पर राज किया था. उसकी गिनती ग्रीक के सात प्राचीन संतपुरुषों में होती है. वह दार्शनिक, कवि, आविष्कारक, योद्धा और श्रेष्ठ प्रशासक था. यातायात साधनों की खोज तथा अनेक महत्त्वपूर्ण भवनों के निर्माण के कई आविष्कारों का श्रेय भी उसे दिया जाता है. किंतु उसका आचरण उसकी विद्वता के सर्वथा विपरीत था. अपने आचरण में वह पूरी तरह निरंकुश, क्रोधी, निर्मम, कठोर और कुटिल तानाशाह था. एक बार उसे अपनी पत्नी लिसिडा पर इतना क्रोध आया कि उसे सीढ़ियां पर ढकेल दिया था, जिसमें उसकी मृत्यु हो गई. पेरियांडर और मेनिटस के राजा थ्रेसीबुलस् के बीच गहरी मैत्री थी. पेरियांडर की भांति थ्रेसीबुलस् भी निरंकुश सम्राट था. मेलिटस और लीडिया के बीच लंबा संग्राम चला था. वर्षों तक चलने वाले युद्ध का कोई परिणाम न निकलता देख दोनों राज्य आपस में समझौते के लिए विवश हो गए. थ्रेसीबुलस ने युद्ध विराम की घोषणा तो कर दी, लेकिन वह अपने विरोधियों को मित्र का दर्जा देने को तैयार न था. इस कारण वह भीतर से बहुत आहत था. सो उसने पेरियांडर से सलाह लेने के लिए उसके पास अपना दूत भेजा. पेरियांडर ने दूत की बातें सुनीं. सलाह देने के बजाय वह दूत को बस्ती से बाहर खेत में ले गया. वहां गेहूं की फसल खड़ी थी. पेरियांडर ने साथ आए सैनिकों को सबसे ऊपर निकली बालियों को काटने का आदेश दिया. उसके इशारे पर सैनिकों ने सबसे ऊपर दिखने वाली बालियों को काटकर जमीन पर बिछा दिया. उसके बाद थ्रेसीबुलस् के दूत को वापस लौटा दिया. दूत की कुछ समझ न आया. उसने वापस लौटकर जो कुछ घटा था, सम्राट को बता दिया. सुनकर थ्रेसीबुलस् की आंखों में चमक आ गई. वह पेरियांडर का इशारा समझ गया. सबसे ऊंची बालियों को नष्ट कर देने का अर्थ जो उसने निकाला वह था, अपने सभी प्रमुख विरोधियों का निर्ममतापूर्ण सफाया. अरस्तु का निष्कर्ष था कि सत्ताएं अपना विरोध नहीं सह पातीं. गणतांत्रिक सरकारें तानाशाहों की भांति कठोर फैसले लेने से बचती हैं, लेकिन विरोधियों को वे भी अपवादस्वरूप ही पचा पाती हैं. विरोधियों के क्रूरतापूर्ण दमन से बचते हुए वे आरंभ में अपेक्षाकृत उदार दिखने वाले रास्ते अपनाती हैं. उनकी पहली कोशिश विरोधियों के संगठन को तोड़ने की होती है. फिर उनमें से एक पक्ष को बहलाफुसला या सत्ता में हिस्सेदार बनाकर अपने पक्ष में कर लिया जाता है. यदि उससे समाधान की संभावना कम हो अथवा कोई अड़ जाए राष्ट्रहित का हवाला देते हुए देशनिकाले जैसी सजा देकर उससे मुक्ति पा ली जाती है.

अरस्तु आदर्श और व्यवहार के अंतर को वह भलीभांति समझता था. प्लेटो आदर्श से तनिक पीछे हटने को तैयार न था, जबकि अरस्तु आदर्श और व्यवहार में संतुलन बनाए रखने का समर्थक था. व्यावहारिकता से जराभी पीछे हटे बिना वह समाज में नैतिकता और अनुशासन को बनाए रखने का समर्थन करता है. व्यावहारिक आदर्शोन्मुखता उसके दर्शन का मुख्य लक्षण है. उल्लेखनीय है कि ‘पॉलिटिक्स’ की रचना से पहले उसने 158 नगरराज्यों के संविधानों का अध्ययन किया था. अंततः वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि प्रत्येक राजनीतिक दर्शन स्वयं में अपूर्ण है. केवल चरित्र की ईमानदारी और निष्ठा से अपेक्षित लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है. किसी एक व्यक्ति अथवा समूह द्वारा भी उन आदर्शों को प्राप्त नहीं किया जा सकता. इसके लिए समाज के सभी वर्गों के बीच आपसी सहयोग और तालमेल आवश्यक है. समाजवाद की भाषा में कहें तो सब एक के लिए और एक सबके लिए जीने को तैयार हो, तभी अपेक्षित लक्ष्यों की प्राप्ति संभव है. राजनीति के आधुनिक पंडित राजतंत्र की आलोचना इस आधार पर करते हैं कि वहां राजा वंशानुगत आधार पर सत्ता ग्रहण करता है. एक ही वर्ग की मनमानी चलती रहती है. महत्त्वपूर्ण निर्णय लेते समय जनता से सलाहमशविरा करने अथवा लोगों की इच्छाओं का सम्मान करने की जरूरत ही नहीं समझी जाती. प्रायः सत्ता पक्ष की पसंदों को प्रजा की पसंद या उसके लिए सर्वथा हितकारी बनाकर लाद दिया जाता है. ऐसे समाजों में संपन्न लोगों की चलती है और न्याय की संभावना अत्यंत विरल हो जाती है. जबकि अरस्तु के अनुसार न्याय प्रत्येक व्यवस्था का अंतिम उद्देश्य होना चाहिए. तदनुसार न्याय की दृष्टि में जो श्रेष्ठ है, वही राज्य के गठन का उद्देश्य भी है. इसलिए राजतंत्र हो अथवा लोकतंत्र, यदि उसका शासन समाजीकरण की प्रक्रिया को मजबूत बनाते हुए राज्य के उद्देश्यों के प्रति समर्पित है, यदि वह राजकर्म को समाज द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारी मानता है तो उसे अनैतिक नहीं माना जा सकता. हालांकि अकेले व्यक्ति के हाथों में सत्ता आने पर उसकी मनमानी के आसार अधिक होते हैं. राजतंत्र में प्रायः यह सोचकर कि राजा के सुख में ही प्रजा का सुख निहित है—नीतियां बनाई जाती हैं. इसलिए प्रजा की पसंदों के बारे में पता ही नहीं चल पाता. प्रजा भी राज्य की ओर से उम्मीद खो बैठती है. उस अवस्था में राज्य के गठन का औचित्य ही समाप्त हो जाता है. यदि प्रजा की उदासीनता बहुत अधिक बढ़ जाए तो वह राज्य की प्रवृत्ति तथा उसके बदलाव में रुचि लेना छोड़ देती है. इससे शीर्ष पर बैठे लोगों की मनमानियां बढ़ती जाती हैं.

भारत में राजा नामक संस्था को असुरों की देन बताया गया है. ऐतरेय ब्राह्मण में रोचक प्रसंग आया है—‘‘देव और असुर परस्पर युद्धरत रहते थे. दोनों के बीच पूरब दिशा में युद्ध हुआ. उसमें देवता पराजित हुए. अगली लड़ाई दक्षिण में हुई. उसमें भी असुरों की जीत हुई. उसके बाद पश्चिम में युद्ध हुआ. असुरों ने एक बार पुनः देवताओं को पराजित किया. फिर उत्तर दिशा में युद्ध हुआ. देवता उस युद्ध में भी पराजित हुए. उसके बाद वे उत्तरपूर्व में युद्धरत हुए. इस बार देवताओं की विजय हुई. देवताओं ने माना, वह दिशा ‘अपराजेय’ है….केवल वही दिशा थी, जिसमें देवताओं को जीत मिली. अंततः देवताओं को समझ आया—‘हम इसलिए पराजित हुए, क्योंकि हमारा कोई राजा नहीं है.’ उसके बाद उन्होंने सोम को अपना राजा चुना.’’16 उसके बाद राजा नियुक्ति की जाने लगी. यजुर्वेद में राजा को उसके कर्तव्यों के बारे में चेताते हुए कहा गया है—‘तुम्हें यह राष्ट्र सौंपा जाना है—प्रजा के क्षेम तथा उसके सर्वविध पोषण, कृषि की उन्नति एवं बहुआयामी विकास के लिए.’17 अथर्ववेद में कहा गया है—‘प्रजा के सुख में ही राजा का सुख, प्रजा कल्याण में राजा का कल्याण निहित है.18 लेकिन कल्याण का स्वरूप क्या हो? प्रजा के सुख को तय करने वाले मापदंड कैसे हों? क्या यह संभव है कि कोई एक सुख प्रजा के सभी सदस्यों के लिए समानरूप से सुखकारी हो? राजतंत्र चूंकि किसी एक व्यक्ति या चुने हुए व्यक्तियों के समूह की इच्छा द्वारा नियंत्रित होता है, इसलिए राजतंत्र में इन प्रश्नों को प्रायः अनसुना कर दिया जाता है.

देवासुर संग्राम एक प्रतीक है. मिथकीय आख्यान. परंतु यह ऐतिहासिक सत्य है कि प्राचीन भारत में लंबे समय तक यही हाल रहा. छोटेछोटे राज्य आपस में लड़ते रहते थे. इसलिए प्रजा ‘कोऊ नृप होय हमें क्या हानि’—कहकर राज्य और राजा दोनों की ओर से उदासीन बनी रहती थी. यहां तक कि सत्ता केंद्र पूरी तरह बदल जाने पर भी परिवर्तनों पर उसका ध्यान नहीं जाता था. सामान्यतः इसे राजनीति की असफलता कहा जाएगा. क्योंकि वह उन लोगों के राज्य का नेतृत्व करने का दावा करती थी, जिन्हें पता ही नहीं होता कि उनका राज्य के प्रति और राज्य का उनके प्रति क्या कर्तव्य है? न ही यह मालूम होता है कि राज्य समाज से ऊपर नहीं, बल्कि समाज द्वारा खुद को व्यवस्थित रखने के लिए गढ़ी गई संस्था है, जिसपर एकमात्र जनता का सर्वाधिकार है. यदि उन्हें या उनमें से किसी एक को राज्य की ओर से कुछ समस्या है तो इसका कारण केवल राज्य की दुर्बलता नहीं, बल्कि उनका अपने ही अधिकारों के प्रति उपेक्षाभाव भी है. असल में वे जान ही नहीं पाते कि वास्तविक समस्या राज्य को उत्तराधिकार का विषय और केवल शक्तिकेंद्र समझकर उसपर काबिज होने, फिर उन कर्तव्यों से पलायन से जन्म लेती है, जो राजा नामक संस्था के लिए विहित हैं. इसलिए अरस्तु ने राजतंत्र की आलोचना करने के बजाए राजा के आदर्शों पर ज्यादा जोर दिया है. उसका विचार था कि जिस व्यक्ति में नेतृत्व का गुण हो, वही राजा है. स्टोइक विचारकों के अनुसार केवल वही व्यक्ति सम्राट बनने का अधिकारी था, जो आचरण में सर्वश्रेष्ठ तथा राजपद के लिए अपेक्षित योग्यताएं रखता हो. सुकरात का विचार था कि राजा उसे बनाना चाहिए जिसमें राजा के लिए अपेक्षित सभी गुणों का समावेश हो. इस तरह सिद्धांत के स्तर पर राजशाही में भी लोकहित को साधने पर जोर दिया जाता है. परंतु यदि समाज का बहुसंख्यक समुदाय ही राज्य, उसकी गतिविधियों और अपने अधिकारों की ओर से उदासीन हो जाए तो शिखर पर बैठे लोगों को मनमानी का अवसर सहज ही मिल जाता है. अरस्तु का विचार था कि यदि नागरिक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक तथा शासक वर्ग कर्तव्यों के प्रति पूर्णतः सचेत हो तो कोई भी राजनीतिक दर्शन राज्य के उद्देश्यों को प्राप्त कर सकता है. इसलिए दोष किसी विचार अथवा विचारधारा का न होकर उसका सही अनुपालन न करने तथा राजनीतिज्ञों के स्वार्थ से घिर जाने का है. इसलिए उसने कहा था—

कम से कम आधी राजनीति उपलब्ध संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण तथा परिस्थितियों का श्रेष्ठतम उपयोग करने में है.’

ऐसा नहीं है कि अरस्तु राजनीतिक परिवर्तन की संभावनाओं अथवा उसमें नए चिंतन और विचारों को अनावश्यक मानता था. उसका विचार था कि राजनीतिक दर्शनों में सुधार की भरपूर संभावना है. उसके लिए राज्य एवं नागरिकों का आपसी विश्वास एवं सहयोग आवश्यक है. यह तभी संभव है जब राज्य के सभी नागरिक श्रेष्ठतम आचरण का प्रदर्शन करें, तथा राज्य के केंद्र पर आसीन शक्तियां अपने कर्तव्यों के प्रति पूरी तरह सजग एवं समर्पित हों. आदर्श राज्य को लेकर कुछ ऐसा ही स्वप्न प्लेटो का भी था. क्या दोनों का परिकल्पनाएं समान हैं? यदि कुछ अंतर है तो क्या है? ‘दि लॉज’ प्लेटो की प्रौढ़ वयस् की रचना है. उसकी गिनती राजनीतिक दर्शन की श्रेष्ठतम कृतियों में की जाती है. प्लेटो ने उसमें आदर्श राज्य की संकल्पना को प्रस्तुत किया है. अरस्तु को वह परिकल्पना अव्यावहारिक लगती है. प्लेटो के विचारों को सर्वथा मौलिक और अनुपम बताकर वह उसकी प्रशंसा करता है, साथ में यह भी जोड़ देता है कि उसके विचार उत्कृष्ट वैचारिकता से भरपूर होने के साथसाथ, अत्यधिक क्रांतिकारी किंतु अतिकल्पनात्मक हैं. उसके शब्दों में छिपी व्यंग्यरेख को नजरंदाज नहीं किया जा सकता. अप्रत्यक्ष रूप से वह प्लेटो के विचारों को अव्यावहारिक करार देता देता है. इसका आशय यह नहीं है कि राज्य के लिए जिस उच्चतम आदर्शं की परिकल्पना प्लेटो करता है, उसके स्वरूप एवं संचालन को लेकर अरस्तु की उससे कुछ कम अपेक्षाएं हैं. देखा जाए तो दार्शनिक सम्राट के रूप में उसकी कामना ऐसे महामानव की है जो उच्च मानवादर्शों से युक्त हो. जो लोगों की समानता और स्वतंत्रता में विश्वास रखता हो. उनके सुख एवं सुरक्षा में संवृद्धि के प्रति पूरी तरह संकल्पबद्ध हो. ऐसा महामानव मिलना असंभव है. यदि चमत्कारस्वरूप मिल भी जाए तो उसके परिवर्त्ती सम्राट उसी की भांति गुणवंत होंगे इसकी संभावना अत्यंत विरल है. समय के साथ स्वयं व्यक्ति के आदर्श एवं प्राथमिकताओं में बदलाव आ सकता है. आदर्श राज्य के लिए ‘दार्शनिक सम्राट’ की अनुशंसा करते समय प्लेटो प्रकारांतर में राजतंत्र का ही पक्ष लेता है, जिसमें राजा की इच्छा सर्वोपरि होती है. जबकि व्यक्ति वह चाहे जितना उदार क्यों न हो, अपने ईमानदार सोच, संपूर्ण सदेच्छा और समर्पण के साथ काम भी करता हो, यह आवश्यक नहीं कि जिसे वह विस्तृत जनसमाज के लिए हितकारी मानता है, वह उसके लिए वास्तव में उतना ही हितकारी हो. पेरियांडर का उदाहरण पीछे दिया गया है. छब्बीस शताब्दी पहले ग्रीक में जन्मा पेरियांडर एक साथ वीर, दूरदृष्टा, आविष्कारक, कुशल प्रशासक, महत्त्वाकांक्षी सम्राट आदि सबकुछ था. उसके शासन के दौरान कोरिंथ ने खूब तरक्की की. कई नए आविष्कार उसने किए. महत्त्वपूर्ण इमारतों का निर्माण कराया, परंतु समय के साथ उसकी मान्यताओं में बदलाव आता गया. आज कुछ लोग उसे तानाशाह के रूप में पहचानते हैं, जबकि कुछ के लिए जो उसके आरंभिक जीवन के कार्यकलापों पर अटके रहते हैं, पेरियांडर संत की हैसियत रखता है. ठीक ऐसे ही जैसे राम के बारे में कहा जाता है. रामराज्य को आदर्श बताने वालों के लिए राम इतना आदर्श राजा है कि वे उसे ईश्वर का दर्जा देते है. परंतु जो लोग उसे शंबूक हत्या का दोषी मानते हैं, उनकी निगाह में वह निरंकुश सम्राट है.

वस्तुतः राजनीतिक आदर्श के रूप में अरस्तु राज्य के जिस स्वरूप की कल्पना करता है, उसमें और प्लेटो के दर्शन में विशेष अंतर नहीं है. ‘आदर्श राज्य’ के रूप में प्लेटो जो कल्पना करता है, अरस्तु उसी सपने को ‘राज्य के आदर्श’ के रूप में साकार करना चाहता है. इस तरह हम अरस्तु के विचारों पर प्लेटो की छाया को देख सकते हैं. बावजूद इसके अरस्तु के विचारों को प्लेटो के दर्शन की पुनरावृत्ति नहीं कहा जा सकता. ‘राज्य के आदर्श’ को परिपक्व दर्शन के रूप में विस्तार देने से पहले वह प्लेटो के ‘आदर्श राज्य’ से उतनी ही प्रेरणा लेता है, जितनी आवश्यक है. ‘लॉज’ में प्लेटो का यह विचार कि न्याय सभ्यताकरण की कसौटी है तथा न्याय से ही मानव ने सभ्यता का पाठ पढ़ा है—अरस्तु के दर्शन के लिए प्रस्थान बिंदू का काम करता है.

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

16. ऐतरेय ब्राह्मण, 1/1/14

17. इय ते राष्ट्र. कृप्ये त्वा क्षैमाय. त्वा रय्यै त्वा पोषाय, त्वा। यजुर्वेद-9/22।।

18. प्रजा सुखे सुख राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्!—अथर्ववेद.

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मुखौटे की त्रासदी

शासक वर्ग और शासित वर्ग में से प्रथम वर्ग में लोगों की संख्या कम होती है, परंतु समस्त राजनीतिक कामकाज को यही वर्ग अंजाम देता है. सारी सत्ता केवल उसी हाथों में केंद्रित होती है. वह सत्ता के लाभों को प्राप्त करने में रस लेता है. इसके विपरीत दूसरा वर्ग बहुसंख्यक है. यह पहले वर्ग द्वारा कभी कमोबेश वैधानिक तरीकों से, तो कभी कम या अधिक स्वेच्छाचारपूर्ण एवं हिंसक तरीकों से चालित-नियंत्रित होता है….अल्पसंख्यक वर्ग बहुसंख्यक समाज पर केवल इसलिए राज कर पाता है, कि वह संगठित है.गायतानो मोस्का, दि रूलिंग क्लॉस.

2014 में भाजपा की जीत के नायक मोदी जी थे. जीत इतनी शानदार थी कि लालकृष्ण आडवाणी, मुरलीमनोहर जोशी, जसवंत सिंह जैसे पार्टी के दिग्गज नेता नेपथ्य में खिसका दिए गए. इसे परिणाम कहें कि दुष्परिणाम, जो सरकार पूरे देश की मानी जाती है, उसे ‘मोदी सरकार’ कहा जाने लगा. कुछ नेता जीतकर भी पराजित नजर आए. राजनाथ सिंह ने उत्तर प्रदेश में अति-पिछड़ी जातियां को पार्टी से जोड़कर बड़ा काम साधा था. जिससे भाजपा की जीत की असली इबारत लिखी गई—‘हर-हर मोदी—घर-घर मोदी’ के नारों के बीच वह भी फीका पड़ गया. पूरी भाजपा मोदीमय थी. नतीजा यह हुआ कि चुनाव जीतने के तुरंत बाद जिन राजनाथ सिंह को प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी के बराबर का दावेदार माना जा रहा था, उन्हें दूसरे नंबर के पद से संतोष करना पड़ा. उसके बाद उपचुनाव हुए. भाजपा के लिए परिणाम आशा के विपरीत थे. बिहार, दिल्ली, केरल, पश्चिमी बंगाल जैसे प्रदेशों में वह कोई सफलता प्राप्त न कर सकी. सिवाय मीडिया के हर कोई मान चुका था कि मोदी का जादू उतार पर है. यहां तक कि पार्टी के भीतर से भी विरोधी स्वर उभरने लगे थे. कुछ नया करने की जरूरत थी. सो मीडिया को साधते हुए मोदीजी ने नोट-बंदी जैसा सबको हैरान-परेशान करने वाला कदम उठा लिया. चाहते तो फैसला लेकर रिजर्ब बैंक को आगे कर सकते थे. परंतु सारी जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली. नोटबंदी की सफलता से अधिक असफलताएं सामने आईं. नोट बदलने के लिए कतार में लगे 130 लोगों को जान गंवानी पड़ी. नकदी के अभाव में बाजार सूने पड़ गए. शहरों में काम करने वाले लाखों मजदूर, कारीगर बेरोजगार होकर अपने ‘देस’ लौट गए. सरकार की खूब आलोचना हुई. मीडिया बचाव करता रहा. सरकार कदम-कदम पर संवेदनहीन नजर आई. मोदी और पार्टी नेता चुप्पी साधे रहे.

फिर एक समय ऐसा आया जब मोदी और मीडिया एक ओर थे, पूरा विपक्ष दूसरी ओर. यहां तक कि भाजपा के अपने ही लोग दबे स्वर में नोटबंदी के कदम को आत्मघाती बताने लगे थे. मानो सब कुछ सोची-समझी नीति के अनुसार हो. मोदी न केवल नोटबंदी को राष्ट्रहित में बताकर उसके लाभ गिनाते रहे, बल्कि विधानसभा चुनावों से ऐन पहले बेनामी संपत्ति का मसला उठाकर उन्होंने एक और धमाका कर दिया था. हर बार की भांति इस बार भी पूरा विपक्ष दो-फाड़ नजर आया. एक ओर मीडिया और मोदी. दूसरी ओर अपने आप से हैरान-परेशान विपक्ष जो सिवाय मोदी की आलोचना के बाकी सब मुद्दों पर विभाजित था. राजनीति के बड़े-बड़े पंडित समझ ही नहीं पाए कि नोटबंदी जैसे आत्मघाती कदम के तुरंत बाद बेनामी संपत्ति का मुद्दा उठाना मोदी तथा उनके सहयोगियों की चाल हो सकती है. मोदी यदि भ्रष्टाचार से सचमुच लड़ना चाहते तो सरकार के पास स्विस बैंक के खाताधारों की सूची तैयार थी. उनपर कार्रवाही करते; या फिर जांच एजेंसियों के माध्यम से भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए विशेष अभियान चलाते; जैसा कभी विश्वनाथ प्रताप सिंह ने किया था. असल में वह आने वाले विधानसभा चुनावों में जनमत को ‘मोदी बनाम गैर-मोदी’ में बांट देने की कूटनीति थी, जिसमें वे कामयाब नजर आए. पूरा चुनाव मुद्दों के बजाय व्यक्तियों पर केंद्रित रहा. उसमें बाजी मोदी के हाथ लगनी थी, सो लगी.

लोकतंत्र में चुनावों का लोकहितकारी मुद्दों के बजाय कुछ चेहरों पर केंद्रित होकर रह जाना, अपने आपमें त्रासदी है. उसमें जनता के सवाल गौण हो जाते हैं. चूंकि चेहरों की स्पर्धा में मीडिया की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है, इसलिए मीडिया से गठजोड़ से वास्तविक चेहरों के स्थान पर कठपुतलियां चुनावी समर में कब उतार दी जाती हैं, जनसाधारण को पता ही नहीं चलता. हाल के विधानसभा चुनावों में तो पक्ष-विपक्ष दोनों ही मुद्दों के साथ चुनावों में उतरने की हिम्मत खो चुके थे. भाजपा के लिए यह सबसे सुरक्षित मोर्चा था. उसे पूरा विश्वास था कि चुनाव को ‘मोदी बनाम अन्य’ कर देने से हिंदुत्व की सोच रखने वाला मतदाता, घुटनों के बल चलकर भी भाजपा को वोट देने आएगा. विरोधी मत जहां अलग-अलग हिस्से में बंट जाएंगे, वहीं समर्थन में इतने मत निकल आएंगे कि जीत का जश्न मनाया जा सके. इसी फार्मूले के तहत लड़े गए पिछले लोकसभा चुनाव में केवल 31 प्रतिशत मत पाने वाली भाजपा की जीत को धमाकेदार माना गया था, क्योंकि शेष 69 प्रतिशत मत अलग-अलग दलों में बंटकर बेअसर हो चुके थे.

यह समझना मुश्किल नहीं है कि जो भाजपा 2014 में विकास के मुद्दे के साथ आई थी, वह विधानसभा चुनावों को व्यक्तित्वों की लड़ाई में बदल देने को क्यों उत्सुक थी. दरअसल अपने तीन वर्ष के कार्यकाल में सिवाय पुरानी योजनाओं को आधे-अधूरे मन से आगे बढ़ाने के सरकार कुछ खास नहीं कर पाई है. पार्टी नेता जानते थे कि बढ़ती बेरोजगारी, सकल उत्पादन और व्यापार में गिरावट, मुद्रा स्फीति जैसे कई विषय हैं, जिन्हें विपक्ष उठाने लगा तो जवाबदेही कठिन हो जाएगी. यही समस्या प्रांतीय सरकारों के साथ भी थी. इसलिए वही हुआ जो भाजपा चाहती थी. चुनाव अभियान के दौरान एक-दूसरे को खूब अपशब्द कहे गए. शालीनता की सीमाएं पक्ष-विपक्ष दोनों ओर से जमकर लांघी गईं. जुबानी लड़ाई में जीत प्रायः बड़बोले की होती है, वही इन चुनावों में हुआ.

उत्तरप्रदेश में भाजपा की जीत के कई कारण गिनाए जा सकते हैं. प्रबंधन की दृष्टि से देखें तो भी भाजपा ने ये चुनाव ज्यादा सूझबूझ, कूटनीति, प्रबंधकीय कौशल तथा कार्यकर्त्ताओं के साथ बेहतर तालमेल से लड़े थे. जीत के लिए उसने हर वह पैंतरा आजमाया जिसे वह आजमा सकती थी. संघ समझता है कि भारत का आम मतदाता किसी भी प्रकार के अतिवाद को पसंद नहीं करता. उग्र हिंदूवाद समाज के एक वर्ग को पार्टी के पक्ष में संगठित रख सकता है, अपने दम पर सरकार नहीं बनवा सकता. अगर ऐसा होता तो लालकृष्ण अडवाणी पार्टी के सबसे बड़े नेता माने जाते तथा अटलविहारी वाजपेयी को उनके पीछे कदम-से-कदम मिलाकर चलना पड़ता. उस समय संघ और पार्टी ने अटलविहारी वाजपेयी के नरमपंथी ‘मुखौटे’ के पीछे चुनाव लड़ा था. उस समय तक दलित और पिछड़ी जातियों के मन में भाजपा को लेकर अविश्वास था. इसलिए सरकार बनाने के लिए अटलजी को दूसरे दलों की मदद लेनी पड़ी थी. पिछले कुछ दशकों में दलितों और पिछड़े वर्गों में फूट डालने के लिए जमकर चालें चली गईं. राजनीति में स्थायी दोस्ती-दुश्मनी नहीं होती. परंतु मीडिया ने मुलायम और माया को उनके मतभेदों के आधार पर इतना भड़काया कि दोनों उसे अपनी व्यक्तिगत लड़ाई मान बैठे. अतिपिछड़ों को पिछड़ों तथा महादलितों को दलितों से अलग कर देने की रणनीति 2014 में कामयाब रही. पिछड़े वर्ग के मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए पार्टी को ऐसे नेता की आवश्यकता थी, जिसकी हिंदुत्व के प्रति निष्ठा असंद्धिग्ध हो. मोदी की उग्र हिंदुवादी छवि तथा उनका घोषित रूप से पिछड़े वर्ग का होना उनकी दावेदारी को पुष्ट करता था. ध्यातव्य है कि मोदी की अपनी जाति हमेशा से पिछड़े वर्गों में शुमार नहीं थी. गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद स्वयं मोदी ने उसे पिछड़ी जातियों में शामिल किया था. कदाचित सोची-समझी दूरगामी रणनीति के तहत. उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि मोदी जी का यह पिछड़ावाद दशकों से चली आ रही दलित एवं पिछड़ी जातियों की राजनीति में हलचल पैदा कर, जमे-जमाए दलित-पिछड़े नेताओं को किनारे कर देगा.

रणनीति के तहत बड़बोले भाजपाई नेता प्रायः उकसावे वाले बयान देकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश लगातार करते रहते हैं. परंतु इन चुनावों के दौरान पार्टी अपेक्षाकृत शांत थी. इसलिए भी कि पूरा विपक्ष, विशेषकर उत्तरप्रदेश में, उसका मददगार बना था. वहां जीत के दावेदार दो प्रमुख दलों के बीच मुस्लिम मतों के लिए अलग तरह का दंगल जारी था. समाजवादी पार्टी का मानना था कि प्रदेश में उसे छोड़कर मुस्लिम मतदाताओं के लिए दूसरा कोई विकल्प नहीं है. लगभग सौ मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देकर बसपा भी एकमुश्त मुस्लिम मतों की उम्मीद लगाए बैठी थी. मायावती अपनी सभाओं में शान से बताती थीं कि उनकी पार्टी ने सबसे अधिक मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव में उतारे हैं. ऐसे दल के लिए जिसका गठन ‘सामाजिक न्याय’ की अवधारणा को पुष्ट करने के पीठिका पर हुआ हो, क्या ऐसा करना उचित था? प्रदेश में मुस्लिम जनसंख्या लगभग 18 प्रतिशत है. टिकट दिए गए 24 प्रतिशत को. मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या में छह प्रतिशत की बढ़ोत्तरी अतिपिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व में कटौती के बाद ही संभव थी. कुछ ऐसा ही सपा ने भी किया था. जबकि समीकरण चाहे जो रहे हों, ये दोनों दल जब-जब सत्ता में आए हैं, जीत में अतिपिछड़ी कही जाने वाली जातियों का बड़ा योगदान रहा है. पहले यह वर्ग कांग्रेस का मतदाता था. आगे चलकर सपा और बसपा के बीच झूलने लगा. दोनों दलों की मूल वैचारिकी, जो केवल नारेबाजी तक शेष बची है—सामाजिक न्याय से जुड़ी है. एक बरास्ते फुले-अंबेडकरवाद तो दूसरी राममनोहर लोहिया के माध्यम से. इसलिए दोनों दल बहुजन हितों की नुमाइंदगी का दावा कर सकते हैं. इस बार दोनों अतिपिछड़ों की ओर से उदासीन थे. मायावती को अपनी जाति के एक-मुश्त वोटों का भरोसा क्या मिला, उन्होंने बाकी दलित एवं अतिपिछड़े वर्गों की उपेक्षा करनी शुरू कर दी. सोचती थीं कि मुसलमानों को साध लिया तो सब सधते चले जाएंगे. नतीजा यह हुआ कि गैर जाटव दलित और अतिपिछड़ी जातियां बसपा से छिटकने लगीं, जिसका लाभ सीधे भाजपा को मिला. इस तरह उत्तरप्रदेश में भाजपा को जीत सपा-बसपा ने थाली में सजाकर भेंट की है? जब ये तीनों पार्टियां प्रदेश के मुसलमानों को लुभाने के लिए एक किए थीं, भाजपा एक भी मुसलमान को टिकट न देकर, मतों के मौन धु्रवीकरण में लगी थी. जिन दिनों कांग्रेस के नेता प्रशांत किशोर के आगे दंडवत थे, संघ भाजपा के लिए प्रदेश में केसरिया कालीन बिछाने में लगा था. वैसे भी देश की सबसे बड़ी पार्टी का, उस पार्टी का जो स्वाधीनता समर से तपकर निकली हो, आंदोलन जिसका इतिहास रहा हो, वह अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं से विश्वास खोकर चुनाव-प्रबंधकों की शरण में चली जाए, सीधे-सीधे उसके नेताओं के अपरिपक्व सोच और आत्मविश्वास की कमी को दर्शाता है.

भाजपा की जीत में सपा का योगदान भी कम नहीं हैं. मुलायम सिंह ने उसे अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं के कारण गढ़ा था. लोहिया और समाजवाद का नाम पार्टी ठीक ऐसे ही इस्तेमाल करती है, जैसे कांग्रेस गांधी और गांधीवाद का. मुलायम सिंह के नेतृत्व में पार्टी में खूब परिवारवाद पनपा. आंतरिक कलह से जूझ रही समाजवादी पार्टी अपने परंपरागत वोटों के अलावा ब्राह्मणों और ठाकुरों को साधने में जुटी थी. यह कुछ ऐसा ही था जैसे अपने घर की रखवाली छोड़ दूसरे के घर में ताकझांक करना. उधर मीडिया प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में यह प्रचारित करने में जुटा था कि समाजवादी पार्टी के राज में केवल यादवों तथा बसपा के राज्य में सिर्फ जाटवों को लाभ पहुंचा है. अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए मीडिया के पास कोई ठोस प्रमाण नहीं था. सपा और बसपा दोनों इसका खंडन सकती थीं. परंतु एक ने भी प्रतिवाद नहीं किया. कदाचित एकमुश्त जातीय मतों के लालच में वे इस भ्रम(!) को बनाए रखना चाहते थे. इससे अतिपिछड़े वर्गों का भरोसा इन दलों से टूटा और लगभग बिना किसी शर्त के वे भाजपा से जुड़ते चले गए. यह जानते हुए भीकि भाजपा के पास उनके लिए न तो कोई नया विचार है, न ही योजना. जिस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का समर्थन वह करती है, उसमें शूद्रों के लिए कोई सम्मानजनक स्थान नहीं है. बल्कि लोकतंत्र के बल पर जो अधिकार और अवसर उन्होंने प्राप्त किए हैं, उनके भी छिन जाने की संभावना है.

संघ के लिए राजनीतिक परिवर्तन उतना आवश्यक नहीं है, जितना कि सांस्कृतिक परिवर्तन. राजनीति उसके लिए सिर्फ औजार है, जिससे वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और प्रकारांतर में हिंदू राष्ट्र के सपने को साकार करना चाहता है. उसकी सारी प्रेरणाएं और विमर्श वर्ण-व्यवस्था समर्थक वेदादि ग्रंथों, स्मृतियां और महाकाव्यों से आते हैं. उस व्यवस्था में खुद को पिछड़ी जाति का बताने वाले मोदी को प्रधानमंत्री पद देना ‘आपद्धर्म’ हैं; जबकि आदित्यनाथ के हाथों में सत्ता आना उनका स्वाभाविक कर्म. यह अनायास नहीं है कि विगत चार-पांच वर्षों से राष्ट्रीय राजनीति में सर्वाधिक स्पेस घेरने वाले मोदी इन दिनों मीडिया के फोकस से बाहर हैं. आदित्यनाथ उनसे कहीं अधिक स्पेस घेर रहे हैं. 2019 के चुनावों की तैयारी पर आदित्यनाथ का बयान दर्शाता है कि आने वाले समय में बहुत कुछ बदलने वाला है. लगता है, संघ मान चुका है कि ‘मोदी मैजिक’ से जितना काम लेना था, लिया जा चुका है? कि यह इशारों या प्रतीकों के माध्यम से बात करने का नहीं, सीधी कार्रवाही का समय है. उसके लिए योगी आदित्यनाथ ज्यादा उपयोगी सिद्ध होंगे. हो सकता है, अमेरिका में टं्रप का उभार इसकी तात्कालिक प्रेरणा हो. तो क्या मोदी पार्टी के लिए महज मुखौटे थे? ठीक ऐसे ही जैसे कभी अटल पार्टी के मुखौटे कहे जाते थे? सच तो यही है कि हिंदुत्व के जिस सांस्कृतिक परिक्षेत्र के रूप में संघ और भाजपा भारत की परिकल्पना करते हैं, उसमें एक शूद्र की नियति इससे अधिक हो ही नहीं सकती. अगर माहौल अनुकूल रहा तो संघ की अगली कोशिश संविधान का हिंदूकरण करने की होगी. एक तरह से मनुवाद की वापसी. यह कार्य आसान नहीं है. किंतु पिछड़ों और दलितों का बिखराव तथा उनके नेताओं के अहं का टकराव इसी तरह रहा तो दूर-भविष्य में यह असंभव भी नहीं हैं.

ओमप्रकाश कश्यप

 

 

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डॉ. आंबेडकर : आधुनिक भारत के असली वास्तुकार

भारत में भक्ति या नायकपूजा ने, दुनिया के किसी और हिस्से के बरअक्स, राजनीति में कहीं ज्यादा बड़ी भूमिका निभाई है. धर्म के हिस्से के रूप में भक्ति आत्मा की मुक्ति की राह भले हो सकती है. परंतु राजनीति में, भक्ति अथवा नायकपूजा देश में लोकतंत्र के अवसान और तानाशाही की ओर ही ले जाएगी.’—डॉ. भीमराव आंबेडकर, संविधान सभा में दिए गए भाषण का अंश. 

आंबेडकर और गांधी

बीसवीं शताब्दी भारत के इतिहास में बेहद महत्त्वपूर्ण है. उसमें भारत न केवल आजाद हुआ, बल्कि विश्व-पटल पर स्वतंत्र-स्वयंभू गण-राज्य के रूप में भी उभरा. उस शताब्दी ने भारत को दो महानायक दिए. पहले डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर जिन्हें लोग प्यार और सम्मान से ‘बाबा आंबेडकर’ कहते हैं. उन्होंने सामाजिक उत्पीड़न और वंचना के शिकार लोगों के लिए आजीवन संघर्ष किया. वे अपने समय के सर्वाधिक विद्वान और सुविज्ञ नेताओं में से थे. जीवन में तरह-तरह के अपमान, उपेक्षा और उलाहने सहते हुए वे आगे बढ़े. उन लोगों को आवाज दी जिन्हें दमन सहते-सहते चुप्पी साधने की आदत पड़ चुकी थी. वे सही मायने में ‘मूकनायक’ बने. वंचितों के हित में सतत संघर्ष कर जननायक कहलाए. वे अपने जीवन में ही किंवदंति बन चुके थे. नेहरू उन्हें ‘विद्रोह का प्रतीक’ मानते थे. जबकि उनके समकालीन नेता उन्हें ‘पथ-प्रदर्शक’ का सम्मान देते थे. उन्होंने भारतीय समाज को समानता, सद्भाव. न्याय एवं बंधुता के रास्ते पर लाने के लिए सतत संघर्ष किया. दूसरे गांधी, जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम का लंबे समय तक सफल नेतृत्व किया. अहिंसा और सत्याग्रह जिनके बारे में पहले केवल आकादमिक जगत में चर्चा होती थी—को वे राजनीति में लाए तथा सचाई, शुचिता और सेवाभाव के कारण लंबे समय तक भारतीय राजनीति की धुरी बने रहे. कांग्रेस को उसके अभिजात चरित्र से छुटकारा दिलाकर उसे जनसाधारण तक लेकर गए. नतीजा यह हुआ कि आजादी की मांग जो पहले उच्चवर्गीय नेताओं की नरम-गरम राजनीति का हिस्सा थी, जनसाधारण की अस्मिता के संघर्ष में ढलने लगी. अंततः देश आजाद हुआ. गांधी अपने प्रशंसकों के बीच महात्मा कहलाए. आंबेडकर और गांधी, अपने समय में दोनों ही लोकप्रियता की सीमाओं को पार कर देने वाले नेता थे. गांधी यदि ‘राष्ट्र पिता’ थे, तो डॉ. आंबेडकर ‘राष्ट्र निर्माता’, युग-प्रवर्त्तक, ‘आधुनिक भारत का वास्तुकार’ कहलाने के सर्वथा योग्य हैं. यहां आंबेडकर को पहले स्थान पर रखा गया है. उन्हें यह सम्मान देने का पर्याप्त आधार है. स्वतंत्रता संग्राम भले ही गांधी के नेतृत्व में लड़ा गया हो, भारत को आधुनिक राष्ट्र-राज्य के रूप में ढालने में आंबेडकर का योगदान गांधी से कहीं ज्यादा है. जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे, जान जाएंगे.

डॉ. आंबेडकर उन लोगों के नेता थे जो एक साथ दो गुलामियां झेल रहे थे. राजनीतिक गुलामी के अलावा सामाजिक दासता, जिनके शिकार वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी होते आए थे. ऐसे लोगों के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अर्थहीन थी, जब तक सामाजिक दासता से मुक्ति न हो. ऐसे ही सामाजिक-सांस्कृतिक दलन का शिकार रहे लोगों के मान-सम्मान और आजादी के निमित्त उन्होंने अपना जीवन समर्पित किया. इसके लिए उन्हें दो मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ा. पहला मोर्चा देश की आजादी का था. दूसरा अपने लोगों के सामाजिक मान-सम्मान, सुरक्षा और स्वतंत्रता का. उनके लिए सामाजिक आजादी राजनीतिक स्वतंत्रता से ज्यादा महत्त्वपूर्ण थी. उनका पूरा आंदोलन सामाजिक स्वतंत्रता एवं समानता पर केंद्रित था. कोरी राजनीतिक स्वतंत्रता को वे वास्तविक स्वतंत्रता मानने को तैयार ही नहीं थे. इस मुद्दे पर गांधी सहित समकालीन नेताओं से उनका मतभेद हमेशा बना रहा. यह आंबेडकर से छिपा भी न था. अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के लिए उन्होंने तरह-तरह की लांछनाएं सहीं. यहां तक कि अंग्रेजों के पिठ्ठू भी कहलाए. अंततः संविधान के माध्यम से उनके लिए ऐसी राह तैयार की जिससे वे सम्मानजनक जीवन का सपना देख सकें. इतिहास को प्रभावित करने करने वाले नेता से इतिहास बदल देने वाला नेता हमेशा बड़ा होता है. उस समय के पूंजीपति, सामंत और बड़े-बड़े सरमायेदार गांधी के समर्थन में थे. गाँधी उन्हें कई डरों से बचाते थे. मगर गांधी के जाते ही उन्हें बिसरा दिया गया. जैसे टूटी हुई ढाल कबाड़घर में शरण पाती है, गांधी भी संग्रहालयों की शोभा बढ़ाने लगे. इन दिनों केवल उनकी ऐनक बाकी है. उसका उपयोग सफाई अभियान के पोस्टरों को सजाने के लिए किया जाता है.

 

आंबेडकर इतिहास बदल देने वाले नेता थे. सामंती सोच में ढले हिंदू समाज को उन्होंने आधुनिक मूल्यों से समृद्ध करने की भरपूर कोशिश की. उनीसवीं शताब्दी की बौद्धिक क्रांति में जिन मानवतावादी विचारों ने पूरे यूरोप में उथल-पुथल मचाई थी, उनका जिस शिद्दत, शालीनता और ईमानदारी के साथ डॉ. आंबेडकर ने भारतीय राजनीति में उपयोग किया, वैसा उनके समकालीन किसी नेता ने नहीं किया. स्वतंत्रता संघर्ष में अहिंसा, सत्याग्रह जैसे मौलिक प्रयोगों का श्रेय यदि गांधी को दिया जा सकता है तो लोकतंत्र, समानता, बंधुता, सामाजिक न्याय, व्यक्ति-स्वातंत्र्य जैसे बुनियादी विचारों को आजादी के दौरान और बाद में संविधान के माध्यम से, भारतीय राष्ट्र-राज्य का हिस्सा बनाने का श्रेय डॉ. आंबेडकर को जाता है. यदि यह माना जाए कि बिना अंहिंसा और सत्याग्रह जैसे गांधीवादी औजारों के भारत की आज़ादी असंभव थी, तो यह बात भी स्वत; सिद्ध है कि बिना आंबेडकर के भारत को आधुनिक राज्य बनाना कतई संभव न था. अवश्य ही कुछ दूसरे नेता भी थे. देश को स्वतंत्र कराने में उनका योगदान भी कम नहीं रहा. तथापि देश को वास्तविक स्वतंत्रता दिलाने, विशेषकर सामाजिक न्याय के क्षेत्र में आंबेडकर का योगदान उन सबसे अधिक है. भारत में यदि लोकतंत्र है, समानता और बंधुत्व को उच्च जीवन-मूल्यों के रूप में मान्यता प्राप्त है, यदि दमितों और उत्पीड़ितों की आंखों में सुंदर भविष्य का सपना हिलोर मारता है तो इसका एकमात्र श्रेय आंबेडकर को जाता है. वे हमारे सभ्यताकरण के अप्रतिम महानायक हैं. इस कारण उनकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है. बल्कि बढ़ती ही जा रही है.

 

गांधी भारतीय होने से पहले ‘हिंदू’ थे—आंबेडकर हिंदू होने से पहले भारतीय. आधुनिक जीवन-मूल्यों के सच्चे पोषक. सभी धर्मों का आदर करने वाले गांधी आजीवन सर्व-धर्म-समभाव को समर्पित रहे. ‘ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम’ कहकर देश में सांप्रदायिक एकता की अलख जगाते रहे. परंतु उनका सर्वधर्म समभाव हिंदू धर्म की चौहद्दी तक सीमित था. उनके असली आराध्य ‘रघु(कुल) पति’, ‘राघव’, ‘राजा राम’ थे. ‘ईश्वर-अल्लाह’ उनके लिए ‘राजा राम’ के ही उपनाम थे. जीवन के अंतिम क्षण तक वे ‘राम’ की शरणागत बने रहे. उन्होंने वर्ण-व्यवस्था को आदर्श भले न माना, मगर उसे कभी चुनौती भी नहीं दी. धर्म की आड़ में वे उसे लगातार संरक्षण देते रहे. आंबेडकर के लिए जाति की समस्या सामाजिक थी. मानते थे कि समस्या का निदान केवल समाजार्थिक बराबरी द्वारा संभव है. यह केवल कानून के रास्ते संभव है. गांधी के लिए जाति की समस्या ईश्वरीय विधान थी. समाज को छुआछूत से मुक्ति दिलाने के लिए उन्होंने हालांकि कई टोटके किए. निजी स्तर पर और कांग्रेस की मदद से अनेक कार्यक्रम भी चलाए. दिखावे के लिए सवर्णों को दलितों के प्रति अत्याचार के लिए डांटा भी था. परंतु जैसा कि आंबेडकर भली-भांति समझते थे, गांधी के सारे प्रयत्न एक राजनीतिक कार्यक्रम से अधिक न थे. दलितों को ‘हरिजन’ घोषित करने के पीछे भी परंपरावादी मन ईश्वरीय विधान और अस्पृश्यों के प्रति हेय-भाव से ग्रस्त था.

उपनिषदों में कहा गया है—‘सर्व खाल्विदं ब्रह्म.’ यह सारा जगत ही ब्रह्म है….कण-कण में परमात्मा है….प्रत्येक आत्मा परमात्मा का रूप है. फिर दलितों और अतिशूद्रों के लिए ही ‘हरिजन’ संबोधन क्यों? ब्राह्मणों और क्षत्रियों के लिए क्यों नहीं? क्या यह दलितों और अतिशूद्रों के प्रति उपकार-भाव की परिणति था? जैसे पुराने जमाने के राजा-महाराजा अपने यहां बेगार करने वाले नौकरों और सेवादारों को उनकी हाड़तोड़ मेहनत के बदले कभी-कभार रुपया-अठन्नी देकर बहला दिया करते थे, ऐसा ही कुछ? गांधी ने यह संबोधन केवल उछाल दिया था. जातीय दलन के शिकार लोग ‘हरिजन’ क्यों हैं? इसका कभी खुलासा नहीं किया. विरोध हुआ तो कह दिया, जो इसे अपनाना चाहते हैं, अपनाएं. दलितों ने कभी इस संबोधन को मन से नहीं लिया. परंतु दिखावे की उदारता के नाम पर कुछ सवर्ण जरूर ‘हरिजन’ प्रेमी हो गए, ताकि उनकी सहानुभूति जीतकर लोकतंत्र का दरिया पार कर सकें. इतना तो सब मानते हैं कि गांधी बिना सोचे-समझे कुछ भी करने वाले न थे. सवाल है कि ‘हरिजन’ की गांधीवादी व्याख्या क्या हो सकती है? और दलित जब इस संबोधन पर आपत्ति कर रहे थे तो गांधी के पास क्या इसका कोई भी विकल्प नहीं था? उत्तर है—बिलकुल था; और बहुत पहले से था. याद कीजिए—‘वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीर पराई जाने रे…’ गांधी-सभा में नियमित गाया जाने वाला भजन. इसमें एक शब्द आता है, ‘वैष्णव जन’. ‘हरि’ को विष्णु का उपनाम माना जाता है. ‘हरिजन’ और ‘वैष्णव जन’ का भावार्थ भी एक है. दोनों ही नरसी मेहता के पदों से लिए गए हैं. उनमें से एक का उल्लेख ऊपर किया जा चुका है. फिर गांधी ने जातीय दलन का शिकार रहे लोगों को ‘वैष्णव जन’ संबोधन क्यों नहीं दिया? क्यों वे केवल ‘हरिजन’ पर अड़े रहे? यदि गांधी सचमुच वर्ण एवं जाति के विरोधी होते तो और वही कहना चाहते जो उन्होंने ‘हरिजन’ के बारे में बताया है तो ‘वैष्णव जन’ से बेहतर और सम्मानजनक शब्द दूसरा हो ही नहीं सकता था. जरूरी नहीं है कि दलन का शिकार लोगों को ‘वैष्णव जन’ जैसा संबोधन भी स्वीकार होता. परंतु तब वे पक्षपात से बच सकते थे. गांधी ने ऐसा नहीं किया. इसके दो कारण हो सकते हैं. पहला वे बहुत जिद्दी थे. एक बार मुंह से जो निकला उसपर पुनर्विचार करना उनके महात्मापन को स्वीकार न था. उनकी मंशा नहीं थी कि दलितों को ‘वैष्णवजन’ जैसा ‘पवित्र’ नाम या उपाधि दी जाए. ब्राह्मण-ग्रंथों में दलितों के नामकरण को लेकर भी निर्देश हैं. उनके अनुसार दैन्य दलित के नाम से झलकना चाहिए. ‘हरिजन’ में जैसा दैन्य-भाव है, वैसा दैन्य-भाव ‘वैष्णवजन’ में नहीं है. यानी गांधी की सवर्ण-मानसिकता दलितों को ऐसा कोई नाम देना नहीं चाहती थी, जो समाज में सम्मानित हो. जबकि इन्हीं हरिजनों के एक संतपुरुष रैदास ने, ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’—कहकर अपने समय के पुरोहितों और पाखंडी पंडितों की बोलती बंद कर दी थी. कह सकते हैं कि गांधी को सामाजिक परिवर्तन वहीं तक स्वीकार्य था, जहां तक वह हिंदू वर्णव्यवस्था को चोट न पहुंचाता हो. एक सीमा के बाद उनकी उदारता जिद में ढल जाती थी. उस समय वे या तो ‘राम-राज्य’ की प्रशंसा करने लगते; या फिर ‘पंचायती राज्य’ के नक्श में भारत का भविष्य तलाशने लगते थे. यह जानते हुए भी कि ‘राम-राज्य’ के माथे ‘शंबूक-हत्या’ तथा स्त्री-विरोधी होने का कलंक लगा है; और पंचायती राज्य का चेहरा जाति-व्यवस्था के कलंक के चलते बेदाग नहीं रह सकता—वे उन्हें आदर्श लगते थे. आंबेडकर गांवों को जाति और सामंती संस्कारों का सबसे सुरक्षित ठिकाना मानते थे. गांधी गांव को आत्मनिर्भर इकाई बनाने का सपना देखते थे. जानते थे कि नई प्रौद्योगिकी नए विचार भी लाएगी, मशीनें प्राचीनतम वर्णव्यवस्था को चुनौती देंगी. इसलिए वे मशीनों को पूरे भारत के लिए खतरा मानते थे. आंबेडकर को नई तकनीक से परहेज नहीं था. वे उन्हें विकास के लिए आवश्यक मानते थे. लेकिन चाहते थे कि बड़े कारखाने सरकार के सीधे नियंत्रण में हों. इस मामले में वे तथाकथित समाजवादियों से भी बड़े समाजवादी थे.

‘हिंद स्वराज’ में गांधी ने वकीलों और जजों के पेशे को निकृष्ट बताया है. वह भी तब जब वे स्वयं विलायत से वकालत करके आए थे. वही क्यों, कांग्रेस के कई बड़े नेताओं ने भी वकालत के रास्ते राजनीति में कदम रखा था. अजीब-सी स्थापना थी उनकी—‘सत्ता की मुख्य कुंजी उनकी अदालतें हैं और अदालतों की कुंजी वकील हैं. अगर वकील वकालत करना छोड़ दें और वह पेशा वेश्या के पेशे जैसा नीच माना जाए तो अंग्रेजी राज एक दिन में टूट जाए’(हिंदुस्तान की दशा—4, हिंद स्वराज). आखिर अदालतों से क्या रोष था उनका? क्यों उन्होंने वकील के पेशे की तुलना वेश्या से की है? आखिर क्यों? कारण जानने के लिए गांधी की मनोरचना को समझना होगा. वे वर्ण-व्यवस्था के समर्थक थे. उनके हिसाब से वह आदर्श व्यवस्था थी. उसके पोषकों की निगाह में ‘मनुस्मृति’ भारत का आदर्श विधिग्रंथ था, जिसके अनुसार ब्राह्मण का बड़े से बड़ा अपराध क्षम्य था. दूसरी ओर शूद्रों को छोटे-से-छोटे अपराध के लिए दंड करने का अधिकार उसके स्वामी को प्राप्त था. उसकी सुनवाई किसी भी अदालत में नहीं थी. इसे देखते हुए 1834 में ईस्ट इंडिया कंपनी के मुलाजिम लार्ड मैकाले ने ‘बेहतर प्रशासन’ के लिए ‘विधि आयोग’ की स्थापना की थी. उसके बाद मैकाले भारतीय लेखकों की निगाहों में खलनायक बन गया. ठीक वैसा ही खलनायक जैसा ‘ब्रिटिश भारत का इतिहास’ के लेखक जेम्स मिल को माना गया था. मिल ने अपनी बृहद् ग्रंथमाला में जहां भी आवश्यक समझा हिंदू धर्म और समाज में व्याप्त रूढ़ियों की जमकर आलोचना की है. 1853 में दूसरा विधि आयोग बनाया गया, जिसने 1861 में आपराधिक मामलों की सुनवाई के लिए कानून बनाए. उसकी 25वीं धारा में लिखा था कि आपराधिक कानून सभी पर समान रूप से लागू होगा. उसने ‘मनुस्मृति’ की विधि-संहिता को किनारे कर दिया. शताब्दियों से चले आ रहे ब्राह्मणों के विशेषाधिकार एक झटके में समाप्त हो गए. अदालतें, वकील और अधिकारी विधि-संहिता के अनुसार काम करने लगे. दलितों और अस्पृश्यों के बीच जो वर्षों से दबा-ढका था, वह एकाएक बाहर आने लगा. सवर्णों के विशेषाधिकारों को चुनौती मिलने लगी. ज्योतिबा फुले, आंबेडकर, रामास्वामी पेरियार जैसे क्रांतिधर्मा नेताओं और विचारकों का जन्म इसी के फलस्वरूप हुआ. यह बदलाव ब्राह्मणवादी मानसिकता के लोगों के लिए असह् था. गांधी भी अपवाद न थे. जिन दिनों उन्होंने वकालत की थी, संभव है तब तक उन्हें भारतीय समाज की हकीकत का पूरा अंदाजा न रहा हो. परंतु राजनिति में आने के बाद आधुनिक विधि संहिता उन्हें वर्णव्यवस्था के प्रतिकूल दिखने लगी थी. इसलिए वे वकीलों के पेशे को वेश्या के पेशे से नीच मानने की सलाह दे जाते हैं. गांधी आधुनिक शिक्षा के भी विरोधी थे जिसने वर्णव्यस्था की पीठ पर प्रहार किया था. कानून के विद्यार्थी होने के बावजूद वे व्यवस्था को धर्म की सहायता से चलाना चाहते थे. पूरी दुनिया जब धर्म को नकार रही थी, गांधी ने अपने लिए उसकी मर्यादा को आदर्श माना तथा आजीवन भारत को धर्मोन्मुखी राज्य बनाने की सलाह देते रहे. उनके लिए हर समस्या का समाधान धर्म में अंतर्निहित था. धर्म और राजनीति को अलग-अलग देखने वाली पश्चिमी सभ्यता उन्हें शैतान-सभ्यता लगती थी. जबकि स्वयं गांधी और उस समय के प्रमुख नेता इंग्लेंड से पढ़-लिखकर आए थे. दक्षिणी अफ्रीका में तथा वहां से लौटने के बाद भारत में, अंग्रेज सरकार को चुनौती देने के लिए बार-बार अंग्रेजी कानून ही उनके मददगार सिद्ध होते थे.

भक्ति-भाव में गांधी इस बात को नजरंदाज कर जाते थे कि धर्म शक्तिशाली के वर्चस्व को औचित्यपूर्ण ठहराने का सुविचारित तंत्र है. विजेता संस्कृतियों की यह सामान्य खूबी होती है कि वे लंबे और स्थायी शासन हेतु, अपने नायकों को ईश्वर या उसके प्रतिनिधि और उनके फैसलों को ईश्वरीय-न्याय के रूप में पेश करती हैं. उनके निरंतर दबाव के बीच जनसामान्य निर्णय-प्रक्रिया से कटने लगता है. परिणामस्वरूप बहुसंख्यक के विवेक का लोकहित में उपयोग हो ही नहीं पाता. यहीं से उसके संकटों की वास्तविक शुरुआत होती है. दूसरों के आसरे अपने फैसले लेने का अभ्यस्त समाज प्रकारांतर में अपनी खुशी, अपनी स्वतंत्रता, यहां तक कि समानता की चाहत को भी उनके आगे गिरवी रख देता है. पीटर ऑल्टजिल्ड के शब्दों में—

‘शक्तिशाली सदैव सही होता है—इस विचार ने दुनिया को अथाह दुख दिए हैं. यह विचार न केवल कमजोर को कुचलता है, बल्कि ताकतवर को भी नष्ट कर देता है. क्योंकि प्रत्येक झूठ, प्रत्येक छल-कपट और प्रत्येक चूक आगे-पीछे उसके स्वामी को ही नुकसान पहुंचाती है. न्याय समाज के नैतिक स्वास्थ्य को दर्शाता है, खुशियां लाता है, जबकि अन्याय नैतिकता का लोप है, मनुष्य को जीते-जी मार देता है.’

एक दृष्टांत के माध्यम से महाभारत में बताया गया है, ‘जो सबका होता है, वह किसी का नहीं होता.’ गांधी ने सबका बनने की कोशिश की, आजादी के बाद लोगों के मोहभंग की शुरुआत हुई तो सबसे पहले गांधी को किनारे किया गया. उन लोगों ने किनारे किया जिनके लिए वे आजीवन काम करते आए थे. जबकि समय के साथ आंबेडकर की प्रासंगिकता लगातार बढ़ती गई. वे दलितों और वंचितों के मसीहा मान लिए गए. आजादी से पहले देश-भर में गांधी का नाम गूंजता था. धीरे-धीरे उनकी लोकप्रियता का ग्राफ गिरने लगा. गांधी दर्शन हवा में बिला गया. दूसरी ओर आंबेडकर-दर्शन में विश्वास रखने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही है. लोग उनके विचारों के आधार पर संगठित हो रहे हैं. कह सकते हैं कि गांधी नेता बने थे. आंबेडकर को लोगों ने अपना नेता, अपना मार्गदर्शक और उद्धारक स्वत: स्वीकार किया. आजादी के बाद जितनी मूर्तियां आंबेडकर की लगीं, शायद ही किसी और नेता की लगी होंगी. गांधी को प्यार करने वालों के मन में उनके प्रति भावुकता भरा लगाव है. गांधीवाद को बिना भावुकता और अतीतमोह के लागू ही नहीं किया जा सकता. आंबेडकर के अनुयायी उन्हें अधिकार चेतना जगाने तथा ‘अप्पदीपो भव’ की भावना जगाने के लिए याद करते हैं. इसीलिए याद करते हैं क्योंकि उनकी बातों में तार्किकता का समावेश रहता था. गांधी तर्क की कसौटी पर कमजोर पड़ते ही अनशन पर उतर आते थे. उन्हें राष्ट्रपिता की पदवी ओढ़ाई गई थी. आंबेडकर को उनके श्रद्धावनत अनुयायियों ने खुशी-खुशी अपना ‘बाबा’ मान लिया. इन स्थापनाओं पर कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है. परंतु थोड़ी देर के लिए यदि वे अपने पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर सोचें, आधुनिकता का मंतव्य समझ लेने के बाद आंबेडकर के कार्यों की महत्ता का आकलन करना आसान हो जाएगा.

 

आधुनिकता को सामान्यतः फैशन से लिया जाता है. दूर-दराज के गांवों में धोती-कुर्ता के स्थान पर सूट-बूटेड लड़के को तुरंत ‘मार्डन’ मान लिया जाता है. कोई उसका प्रतिवाद नहीं करता. विद्वान आधुनिकता को प्रौद्योगिकीय विकास से जोड़ते हैं. उनकी निगाह में बुलेट ट्रेन, सुपरसोनिक हवाई जहाज, संचार-क्रांति के क्षेत्र में हुए तीव्र बदलाव—सब आधुनिकता की निशानियां हैं. इस आधार पर देखा जाए तो कलम-दवात छोड़कर फाउंटेन पेन पर आना, फिर फाउंटेन पेन छोड़ कंप्यूटर और लेपटाप की शरणागत होता—आधुनिकीकरण की ही मिसाल है. पर क्या यही आधुनिकता है? असल में ये आधुनिकता के आवरण हैं. ज्यादा से ज्यादा उसका समुत्पाद. मगर कई बार वे मानवीय गरिमा के प्रतिकूल आचरण करते दिखाई पड़ते हैं. उदाहरण के लिए ‘स्मार्टफोन’ को लें. उसमें तकनीक के स्तर पर जो स्मार्टनेस है, वह उसके उपभोक्ता में नहीं आ पाती. बल्कि उपभोक्ता अपनी स्मार्टनेस का इस्तेमाल न करे, जितना करता है उसका अभ्यास भी जाता रहे, इसलिए भी तकनीक को स्मार्ट बनाया जाता है. सुविधा के नाम पर ये फोन मानव-स्मृति और उसकी सामाजिकता पर जैसा हमला करते हैं, उसकी भरपाई किसी अन्य आधुनिक उपकरण द्वारा असंभव है. वे व्यक्ति के अकेलेपन का लाभ उठाते हैं तथा उसे और अधिक बढ़ावा देते हैं. जिससे उसका आत्मविश्वास घटता है. परिणामस्वरूप उनके निर्णय विवेक के बजाय भीड़ की मानसिकता से संचालित होने लगते हैं.

आधुनिकता का अभिप्राय वर्तमान और भूतकाल अथवा निकट-भूतकाल के बीच आए बदलाव से है. वह समाजेतिहासिक घटना है, जिसपर अपने समय के वैचारिक और प्रौद्योगिकीय आंदोलनों का प्रभाव पड़ता है. वह समय-सापेक्ष होने के साथ-साथ व्यक्ति-सापेक्ष भी होती है. यानी आधुनिकता के मायने सभी के लिए अलग-अलग हो सकते हैं. किसी फैशनपरस्त युवक के लिए जिसका वैचारिक आंदोलनों से कोई नजदीकी संबंध नहीं है, आधुनिकता का अभिप्रायः महज फैशन की दुनिया में आए बदलावों और उपभोक्ता वस्तुओं की नवीनतम खेप तक सीमित होगा. लेकिन जिसकी विचारों की दुनिया में रुचि है उसके लिए आधुनिकता के मायने कहीं व्यापक होंगे. वह उपभोक्ता बाजार, सभ्यता और संस्कृति के हालिया बदलावों के साथ-साथ उन कारकों पर भी विचार करेगा, जो उन बदलावों के मूल में हैं. ऐसे व्यक्ति के लिए आधुनिकता आंशिक नहीं हो सकती. वह ऐसी आधुनिकता को नकार देगा जिसमें व्यक्ति अत्याधुनिक डिजायन के कपड़े पहने, आधुनिकतम उपकरणों से लैस रहे, परंतु विचारों में पूरी तरह दकियानूसी हो जाएं. यह आवश्यक नहीं है कि केवल नए और मौलिक विचार ही आधुनिकता की श्रेणी में आएं. पुराने विचारों का नवीकरण अथवा नव-प्रस्तुतीकरण भी आधुनिकता की परिसीमा में आता है. आधुनिकता समग्रता में कैसे फलीभूत होती है. इसे जानने के लिए आधुनिक शब्द की उत्पत्ति पर विचार किया जाना आवश्यक है—

आधुनिक शब्द संस्कृत के अद्यः का विस्तार है. जिसका अर्थ है—आज, आजतक. अद्य से ही अद्यतन, अधुनातन शब्द बने हैं, जो आधुनिकता से ही संबंधित हैं. इस तरह आधुनिकता में वे सभी परिवर्तन, विकास-प्रक्रियाएं सम्मिलित हैं, जिन्हें कोई समाज अपने अधिकतम सदस्यों की शुभता हेतु अपनाता है. आधुनिकता का अंग्रेजी पर्यायवाची modern प्राचीन लेटिन के शब्द modo से बना है. उसका अर्थ है—आज, आजतक, वर्तमानकालीन या समकालीन आदि. modo से ही उत्तरवर्ती लैटिन के शब्द modernus शब्द की उत्पत्ति हुई. जिससे modern  शब्द बना है. इसका भावार्थ है, नएपन का सम्मान. कुछ विद्वान आधुनिकता को अठारहवीं शताब्दी के यूरोपीय पुनर्जागरण से जोड़ते हैं. यह वह समय था पश्चिम में नित-नए विचार आ रहे थे. लोकतंत्र, मानवाधिकार, व्यक्ति-स्वातंत्र्य, बराबरी, सामाजिक न्याय जैसे विचारों ने सामंतवाद, पौरोहित्यवाद आदि को अप्रासंगिक बना दिया था. नए विचारों ने मानव-मेधा को समृद्ध किया, वहीं लोगों में यह विश्वास पैदा किया कि दूसरों की आस्था का सम्मान करके ही अपने विश्वासों की रक्षा संभव है. कुल मिलाकर समानता और सहिष्णुता आधुनिकता की मान्य कसौटियां हैं. सभी के लिए न्याय और सामाजिक-आर्थिक राजनीतिक बराबरी. यदि समाज इन्हें मानने से इन्कार करता है, तो राज्य का कर्तव्य है कि इन मूल्यों की स्थापना के लिए आवश्यक विधान बनाए, ताकि असमानता और वर्ग भेद को मिटाया जा सके.

 

आधुनिकता की कसौटी पर आंबेडकर गांधी से आगे हैं. हालांकि थोरो, ऑस्कर वाइल्ड, एडबर्ड कारपेंटर के विचारों के प्रभाव में गांधी ने भारतीय राजनीति में अनेक प्रयोग किए. परंतु उनका परंपरावादी मन बार-बार उन्हें पीछे लौटने को बाध्य करता रहा. विशेषकर जाति और धर्म के सवालों को लेकर. उनके सापेक्ष आंबेडकर लोकतंत्र, समानता मानवाधिकार आदि का समर्थन करते हुए आधुनिकता की दौड़ में गांधी से आगे निकल जाते हैं. दोनों की चुनौतियां भी अलग-अलग थीं. गांधी को बस एक मोर्चे पर जूझना था. वह मोर्चा था, आजादी का. उनके लिए सुधारवादी आंदोलन राजनीतिक गतिविधियों हेतु समर्थन जुटाने के औजार थे. आंबेडकर के लिए सामाजिक आजादी का लक्ष्य स्वाधीनता के लक्ष्य से बड़ा था. गांधी भारतीय राजनीति में  दृढ़ता और शालीनता के प्रतीक थे. आंबेडकर जिस वर्ग से आते थे, वह भारत में सहस्राब्दियों से उत्पीड़न का शिकार होता आया था. इस कारण उनके विचारों में स्वाभाविक उग्रता थी. धर्म  और संस्कृति को लेकर तीखा विरोध भी था. लेकिन उसका स्तर कहीं पर भी अशालीन नहीं था. भारतीय राजनीति में डॉ. भीमराव आंबेडकर का उदय युगांतरकारी घटना है. इसलिए उस युग को हम भारतीय राजनीति का प्रबोधनकाल भी कह सकते हैं. उस समय के जितने भी बड़े नेता थे, उनमें कदाचित आंबेडकर ही ऐसे थे, जो नए राजनीतिक दर्शनों से इत्तफाक रखते थे और बिना किसी हिचक के उन्हें स्वतंत्र भारत में अपनाना चाहते थे. उनका अध्ययन विशद् था. हालांकि उन्हें आरंभिक प्रसिद्धि सामाजिक न्याय के हित में किए गए आंदोलनों के कारण मिली. उन कार्यक्रमों की वजह से मिली, जो उन्होंने दलितों और अस्पृश्यों को समाज की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए चलाए थे. वही उनकी  प्राथमिकता भी थी. उसके पीछे उनके जीवन के कटु अनुभव भी थे. उच्च-शिक्षित होने के बावजूद उन्हें जाति के कारण अनेक दुर्व्यवहारों का सामना करना पड़ा था. वे समझ चुके थे कि यदि उन जैसे पढ़े-लिखे व्यक्ति को जातिवाद का कलंक इतना त्रास दे सकता है तो गरीब, विपन्न दलितों के साथ सवर्णों के दुर्व्यवहार की तो केवल कल्पना ही की जा सकती है. इसलिए पढ़ाई पूरी कर, भारत लौटते ही उन्होंने दलितों में सामाजिक चेतना जगाने को अपना लक्ष्य मान लिया था.

आंबेडकर पर विदेशी विचारकों के साथ-साथ भारतीय चिंतकों का भी प्रभाव था. कबीर, रैदास, ज्योतिबा फुले की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने धर्म की पुनरीक्षा के काम को संभाला और हिंदू धर्म की दुर्बलताओं को तरह-तरह से सामने लाए. इस तरह उन्होंने वह काम किया जो फ्रांस में वाल्तेयर ने किया था. उन्होंने लोगों को समझाया कि हिंदू धर्म और जातिवाद का नाभिनाल का संबंध है. दोनों एक-दूसरे को पूजते-पोषते हैं. इसलिए जातिवाद की समस्या से मुक्ति प्राप्त करनी है तो हिंदूधर्म से मुक्ति अत्यावश्यक है. राजनीतिज्ञ धर्म और जाति दोनों को पोषते हैं. ताकि वे अपनी नीयत और शासन की असफलताओं को ईश्वरीय विधान की आड़ में छिपा सकें. धर्म और जाति के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण के कारण वे सवर्णों के निशाने पर भी रहे. परंतु आंबेडकर के पांडित्य को देखते हुए किसी की हिम्मत उनपर सीधा प्रहार करने की न थी. वे जान चुके थे कि आंबेडकर को केवल समझौते से ही रोका जा सकता है. ब्राह्मणों-पुरोहितों के लिए यह कोई नया काम न था. वे अवसरानुकूल अपनी नीतियों में फेरबदल करने के माहिर रहे हैं. स्थितियां प्रतिकूल हों तो अपने अंग-प्रत्यंगों को कछुए की भांति समेटकर शांत पड़े रहना फिर अनुकूल हालात देखते ही भेड़िये की भांति आक्रामक दिखना उनकी पुरानी चाल रही है. लेकिन जिस समय वे शांत दिखते हैं, उस समय भी पूरी तरह शांत नहीं होते. बल्कि शांत रहकर हालात को अपनी ओर मोड़ने की कोशिश कर रहे होते हैं. आंबेडकर की प्रतिष्ठा और सम्मान को देखते हुए उन्होंने समझौते के प्रयास शुरू कर दिए थे. ‘जाति-पांत तोड़क मंडल की सभा की अध्यक्षता के लिए डॉ. आंबेडकर को आमंत्रित करने के पीछे उनकी यही चाल थी. वह सम्मेलन कभी हो न सका. आयोजकों ने उसे हमेशा के लिए स्थगित कर दिया था. वे चाहते थे कि आंबेडकर अध्यक्ष पद से जाति प्रथा पर भले ही सवाल उठाएं परंतु वेदों के आगे कोई प्रश्न-चिह्न न लगाएं. आंबेडकर का मानना था कि यदि ऋग्वेद को वर्ण-व्यवस्था का प्राचीनतम स्रोत माना जाता रहेगा, तो उसपर सवाल उठाए जाने लाजिमी हैं. उस अवसर पर आंबेडकर ने जो भाषण तैयार किया था, वह संशोधित रूप में प्रकाशित हुआ. अपने लेख में डॉ. आंबेडकर में जातिप्रथा के संपूर्ण उन्मूलन का समर्थन किया था. वह लेख ‘जातिप्रथा का उच्छेद’ नाम से ख्यात है. भारतीय जाति-व्यवस्था के अध्ययन हेतु वस्तुनिष्ट प्रयत्न तो अनेक हुए हैं, परंतु उसकी विकृति को समझाने वाली आंबेडकर की पुस्तक इकलौती और सबसे प्रामाणिक है.

पुस्तक में उन्होंने माना है कि जाति-व्यवस्था का मूल हिंदू धर्म में पसरा हुआ है. इसलिए यदि जाति-व्यवस्था का उच्छेद करना है तो धर्म का उच्छेद भी लाजिमी है. आंबेडकर चाहते थे कि दलित राजनीति में अधिक से अधिक हिस्सा लें, ताकि उनमें अधिकार चेतना और संघर्ष की भावना उत्पन्न हो सके. गांधी और समकालीन नेताओं तथा आंबेडकर के कार्यों में मूलभूत अंतर भी यही है. गांधी, नेहरू, पटेल सहित उस समय के सभी प्रमुख नेताओं के लिए राजनीति प्रमुख थी. वे शासक जातियों से आए थे. और अंग्रेजों द्वारा सत्ता हस्तांतरण की स्थिति में स्वयं को उसका स्वाभाविक दावेदार मानते थे. गांधी अवश्य सामाजिक सरोकारों की बात करते थे. इसलिए उन्होंने कांग्रेसी नेताओं को चुनाव के उपरांत कांग्रेस को भंग करने की सलाह दी थी. उस समय गांधी या तो खुद भुलावे में थे, अथवा दूसरों को भुलावे में रखना चाहते थे. जबकि आंबेडकर ने 1936 में ही कह दिया था—

‘भारत में समाज सुधार का मार्ग स्वर्ग के समान दुरूह है. इस कार्य में अनेक कठिनाइयां हैं. भारत में समाज सुधार के कार्य में सहायक मित्र कम और आलोचक अधिक हैं. आलोचकों के दो स्पष्ट वर्ग हैं. एक वर्ग राजनीतिक सुधारकों का है. दूसरे में समाज सुधारक शामिल हैं.’

 

आंबेडकर ने विपुल साहित्य लेखन किया. उनकी पुस्तकें ‘जाति का उन्मूलन’ तथा ‘शूद्र कौन थे’ भारतीय सभ्यता और संस्कृति पर सवाल खड़े करती हैं. इन पुस्तकों के माध्यम से वे हिंदू समाज की विकृतियों को सामने लाते हैं. दर्शाते हैं कि वर्ण-श्रेष्ठता का दावा करते हुए शिखर पर मौजूद आठ-दस प्रतिशत लोग किस प्रकार बाकी लोगों के मूल-भूत अधिकारों का हनन करते आए हैं. कैसे शोषण को शौर्य की संज्ञा देकर उन्होंने बाकी जनसमाज का लगातार उत्पीड़न किया है. इसके पीछे हिंदू समाज का अलोकतांत्रिक रवैया है. उसकी बुराइयों से सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक लोकतंत्र के माध्यम से निपटा जा सकता है. आंबेडकर उन लोगों में से थे जो गणतंत्र की तमाम कमजोरियों के बावजूद उसे दुनिया-भर की ज्ञात राजनीतिक प्रणालियों में सर्वोत्तम मानते आए हैं. इसलिए संविधान बनाते समय उन्होंने गणतंत्र को ही स्वतंत्र भारत के राजदर्शन के रूप में चुना. गांधी तथा गांधीवाद के प्रमुख सिद्धांतकारों को बहुमत का विचार ही अटपटा लगता था. विनोबा को यह जानकर विचित्र लगता था कि संविधान में नेहरू और उनके खानसामा दोनों के लिए एक ही वोट का प्रावधान है. ‘हिंद स्वराज’ जिसे प्रभाष जोशी पूर्वाग्रहवश रूसो के ‘सोशल कांट्रेक्ट’ तथा मार्क्स के ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ जैसी क्रांतिकारी पुस्तक बताते थे, असल में प्रतिगामी दर्शन का दस्तावेज है, जिसे गांधी के समकालीनों ने ही नकार दिया था. इस पुस्तक में गांधी इंग्लेंड की संसद को ‘बांझ और बेसवा’ कहकर संसदीय लोकतंत्र पर सवाल उठाते हैं. बहुमत का निर्णय उन्हें ‘अनीश्वरी बात’ लगता है—‘ज्यादा लोग जो कहें उसे थोड़े लोगों को मान लेना चाहिए यह तो अनीश्वरी बात है. एक वहम है.’ ‘हिंद स्वराज’ को पढ़कर कोई भी यह समझ सकता है कि गांधी के लिए ‘न्याय’ और ‘समानता’ कोई मूल्य न थे. वे बीसवीं शताब्दी में भारत का नेतृत्व कर रहे थे, परंतु उनका सोच अठारवीं शताब्दी के सुधारवादियों से अलग न था. वे समाज को शासक और शासित के रूप में बांटकर देखने के अभ्यस्त थे. इसलिए उन्हें सदैव किसी उद्धारक की तलाश रहती थी—‘जितना समय और पैसा पार्लियामेंट खर्च करती है, उतना समय और पैसा अच्छे लोगों को मिले तो प्रजा का उद्धार हो जाए.’ गांधी के अनुसार निगाह में ‘अच्छे लोग’ वही हैं, जिनका पीढ़ी-दर-पीढ़ी सत्ता और संसाधनों पर कब्जा रहा है. जो कभी धर्म तो कभी जाति के नाम पर जनसाधारण को बरगलाते आए हैं. यह एक प्रकार का कुलीनतावाद है जो कुछ लोगों को जन्म के आधार पर, धर्म के आधार पर विशेषाधिकार संपन्न बनाता है. आंबेडकर इसी से दलितों और पिछड़ों की मुक्ति चाहते थे, जबकि गांधी वर्ग-भेद और वर्ण-भेद दोनों के समर्थक थे. उन्हें ईश्वरीय मानकर किसी न किसी रूप में बचाए रखना थे. आंबेडकर का लोकतंत्र में विश्वास था. वे मानते थे कि समाज में जैसे-जैसे लोकतांत्रिक चेतना का विकास होगा, शताब्दियों से धर्म और सामंती संस्कारों में बंधे लोग उसके चंगुल से बाहर आने लगेंगे. उन्होंने जोर देकर कहा था—

‘लोकतंत्र ऐसी शासन पद्धति है, जिसमें लोगों के सामाजिक-आर्थिक जीवन में खून की एक बूंद बहाए बिना भी क्रांतिकारी परिवर्तन लाया जा सकता है.’1

लोकतंत्र की खूबी उसके बहुआयामी होने में है. राजनीति के क्षेत्र में वह तभी कामयाब हो सकता है, जब उनकी समान उपस्थिति आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में भी हो. इस बारे में आंबेडकर हेराल्ड लॉस्की के प्रशंसक थे. उसका कहना था कि बिना नैतिकता के आश्रय के लोकतंत्र अधूरा है. लॉस्की न्याय और नैतिकता को परस्पर पर्यायवाची मानता था. उसके अनुसार सत्ता से दूर रहने वाले या उसके महत्त्व को किसी भी रूप में नजरंदाज करने वाले लोग, स्वभावतः दूसरों के अनुगामी बन जाते हैं. इससे निर्णय लेने की उनकी योग्यता का हृस होता है. नतीजन वे दूसरों के अनुसरण को ही अपना कर्तव्य मान बैठते हैं. आगे चलकर वे न केवल अपनी क्षमताओं का आकलन करने में गलती करने लगते हैं, बल्कि उन्हें अपनी शक्ति और अच्छाइयों को लेकर भी संदेह होने लगता है. जनसाधारण की सत्ता-विमुखता का परिणाम यह होता है कि शिखर पर विराजमान लोग सत्ता-भोग को अपना अधिकार मान, वहीं बने रहने के लिए ऊल-जुलूल तर्कों का सहारा लेने लगते हैं. समाज में न्याय की उपस्थिति के लिए आवश्यक है कि सरकार उन लोगों को जो समाज में किसी भी प्रकार की उपेक्षा या वंचना का शिकार हैं, विशेष प्रोत्साहन देकर आगे लाए. ऐसा वातावरण उत्पन्न करे जिसमें उनकी अधिकतम उत्पादकता और मान-रक्षा संभव हो सके. राज्य की स्थापना का उद्देश्य भी यही है—

‘साधारण मनुष्य के व्यक्तित्व को रचनात्मक बनाने के लिए आवश्यक है कि ऐसी परिस्थितियां पैदा की जाएं जिनमें नागरिकों की रचनात्मकता का अधिकतम उपयोग हो सके. यह तभी संभव है जब साधारण से साधारण व्यक्ति यह अनुभव करे कि समाज में उसकी कुछ सार्थकता है. इसे स्वतंत्रता और समानता की अनुपस्थिति में प्राप्त करने की आशा हम नहीं कर सकते.’ (राजनीति के मूल तत्व—हेरॉल्ड लॉस्की)

सामाजिक न्याय एवं समानता के लक्ष्य की सिद्धि केवल सहभागी लोकतंत्र द्वारा संभव है. आंबेडकर के अनुसार लोकतंत्र कोरी राजनीतिक प्रणाली नहीं है. वह जीवन-पद्धति है. वह तभी सफल हो सकता है, जब लोग उसे अपने आचरण का हिस्सा बना लें. तभी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक शुचिता के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है. आंबेडकर का मानवतावादी सोच उन्हें बेहतर इंसान और बड़ा नेता बनाता है. वे मुख्यतः जिन लोगों के नेता थे, उनमें लगभग सभी अशिक्षित थे. गरीबी और बदहाली के शिकार. इतने बदहाल कि उनके लिए अवसरों की समानता का विचार भी महत्त्वहीन था. आंबेडकर जानते थे कि चमत्कारवश यदि भारत में सभी को बराबर मान लिया गया तो भी समाजार्थिक आधार पर पिछड़ चुके लोग, पिछड़े ही रहेंगे. इसलिए सामाजिक न्याय की भावना के अनुसार उन्होंने दलितों और पिछड़ों के लिए विशेष अवसरों की मांग रखी. सदियों से दमन का शिकार लोगों को उन्होंने समझाया—‘शिक्षा शेरनी का दूध है. जो भी पीता है, दहाड़ने लगता है’—इसलिए शिक्षित बनो. लोकतंत्र में संख्याबल महत्त्वपूर्ण होता है. सरकारें जनता की इच्छानुसार बनती-बिगड़ती हैं. उसके लिए लोगों का संगठित रहना आवश्यक है. शताब्दियों से दूसरों के अधिकारों पर कुंडली मारे शीर्षस्थ अभिजन, संसाधनों में हिस्सेदारी के लिए आसानी से तैयार नहीं होंगे. अपना दैन्य दूसरों के टाले नहीं टलता. मुक्ति के लिए खुद प्रयत्न करना पड़ता है. अतएव अपने अधिकारों के लिए, मान-सम्मान और अस्मिता के लिए, अपनी और आने वाली पीढ़ियों की खुशहाली के लिए—संघर्ष करो. उनके अनुयायियों ने भी ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो.’ को अपना जीवन-मंत्र मान लिया. गांधी-दर्शन में व्यक्ति-स्वातंत्र्य और समानता के लिए कोई स्थान नहीं है. समाज को ऊंच-नीच में बांटने वाला वर्ण-विधान ही उनके लिए सर्वोच्च है. असमानता से गांधी को तब तक कोई शिकायत न थी, जब तक शिखर पर बैठे लोग अनुदार न हों. इसलिए वे सवर्णों से कथित ‘हरिजनों’ के प्रति सदय होने की अपेक्षा रखते हैं. प्रकारांतर में वे दीन को भी बनाए रखना चाहते थे और दीनानाथ को भी. उससे अल्पावधि सुधार के अलावा हालात में बहुत अंतर पड़ने वाला नहीं था. कदाचित इसीलिए 26 जनवरी 1929 को ‘संघ और स्वाधीनता’ विषय पर दिए गए भाषण में आंबेडकर ने गांधी युग को भारतीय इतिहास का ‘काला अध्याय’ घोषित किया था—

‘मुझे इस बात में कतई संदेह नहीं है कि गांधीयुग भारत के इतिहास का काला अध्याय है. यह वह समय है जब भारत की जनता अपने आदर्श, अपने भविष्य की ओर देखने के बजाए बार-बार पीछे मुड़कर अतीत में झांकने लगती है.’2

आंबेडकर का कहा आज सच दिख रहा है. गांधी के नेतृत्व और परिस्थितियों के चलते देश को राजनीतिक स्वतंत्रता मिली. किंतु जिस सामाजिक स्वतंत्रता की मांग आंबेडकर आजीवन करते रहे, वह आज भी स्वप्न है. भारतीय समाज का वह हिस्सा जो वर्ण-व्यवस्था से लाभान्वित होता आया है, येन-केन-प्रकारेण उसे बनाए रखना चाहता है. यूं तो गांधी ने भी सामाजिक एकता और समरसता के लिए कार्यक्रम चलाए. सांप्रदायिक एकता के क्षेत्र में तो उन्हें पर्याप्त सफलता भी मिली. लेकिन आंबेडकर की प्राथमिकताएं और सोचने का ढंग उनसे अलग था. इस अंतर को धर्म की कसौटी पर भी परखा जा सकता है. गांधी के लिए धर्म पहले था. मनुष्य बाद में. उनके लिए इंसानियत धर्म से परे कुछ न थी. व्यक्त तौर पर वे सभी धर्मों का सम्मान करते थे. लेकिन कुछ भी होने से पहले वे एक हिंदू थे. हिंदू धर्म और जाति-व्यवस्था दोनों अस्थि-मज्जा की तरह एक-दूसरे पर निर्भर है, संकट के समय दोनों एक-दूसरे को साधते हैं—इस तथ्य को जानकर भी वे अनजान बने रहते थे. जबकि जाति आंबेडकर के लिए हिंदू धर्म की विकृति थी. ऐसी विकृति जो उसके उद्भव से ही उससे चिपकी हुई है. इस कारण वे उसकी खुली आलोचना करते थे. उनके लिए मनुष्य पहले था. धर्म का नंबर इंसानियत के बाद आता था. धर्म का ध्येय इंसानियत का पोषण करना है. इसलिए जो धर्म समानता, स्वतंत्रता और सौहार्द का समर्थन न करे, उसे वे मानने से इन्कार करते थे. वे चाहते थे कि दमित वर्ग किसी भी प्रकार के अंधानुकरण से बचे. धर्म और सांस्कृतिक प्रतिमानों के प्रति आलोचनात्मक रवैया अपनाए. चालबाज पंडितों के बहकावे में आने के बजाय अपने निर्णय स्वयं लेना सीखे. धर्म और आडंबर में फर्क को समझे. दलितों का आवाह्न करते हुए उन्होंने कहा था—

‘तुम्हारी मुक्ति का मार्ग न तो धर्मशास्त्र हैं, न ही मंदिर. तुम्हारा वास्तविक उद्धार उच्च शिक्षा, ऐसे रोजगार जो तुम्हें उद्यमशील बनाएं, श्रेष्ठ आचरण एवं नैतिकता में निहित है. इसलिए तीर्थयात्रा, व्रत-पूजा, ध्यान-आराधन, आडंबरों और कर्मकांडों में अपना बहुमूल्य समय व्यर्थ मत जाने दो. धर्मग्रंथों का अखंड पाठ करने, यज्ञाहुति देने तथा मंदिरों में माथा टेकने से तुम्हारी दासता दूर नही होगी. न गले में पड़ी तुलसी-माल तुम्हारे लिए विपन्नता से मुक्ति का सुख-संदेश लेकर आएगी. और काल्पनिक देवी-देवताओं की मूर्तियों के आगे नाक रगड़ने से भुखमरी, दुख-दैन्य एवं दासता से भी तुम्हारा पीछा छूटने वाला नहीं है. इसलिए अपने पुरखों की देखा-देखी चिथड़े मत लपेटो. दड़बे जैसे घरों में मत रहो. मत इलाज के अभाव में तड़फ-तड़फ कर जान गंवाओ. भाग्य और दैव-भरोसे रहने की आदत से बाज आओ. तुम्हारे अलावा कोई तुम्हारा उद्धारक नहीं है. खुद तुम्हें अपना उद्धारक बनना है. धर्म मनुष्य के लिए है. मनुष्य धर्म के लिए नही है. जो धर्म तुम्हें मनुष्य मानने से इन्कार करता है, वह अधर्म है. धर्म के नाम पर कलंक है. जो ऊंच-नीच की व्यवस्था का समर्थन करे, आदमी-आदमी के बीच भेदभाव को बढ़ावा दे, वह धर्म हो ही नहीं सकता. असल में वह तुम्हें गुलाम बनाए रखने का षड्यंत्र है.’

हिंदू धर्म से पूरी तरह निराश आंबेडकर ने बौद्ध धर्म को विकल्प के रूप में चुना था. कदाचित यह उनकी मजबूरी थी. रूसो, वाल्तेयर, बैंथम, थामस पेन, जॉन स्टुअर्ट मिल, लॉस्की आदि जिन विचारकों से वे प्रभावित थे, वे या तो धर्म को अनावश्यक मानते थे, अथवा धर्म उनके लिए केवल व्यक्तिगत आस्था का विषय था! आंबेडकर के लिए धर्म किसी आध्यात्मिक जिज्ञासा की पूर्ति तक सीमित नहीं था. वे धर्म के संगठन-सामर्थ्य को समझते थे तथा उसे नागरिक समाज की नींव मानते थे. बर्क को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा था—‘सच्चा धर्म समाज की नींव है, जिसपर सब नागरिक सरकारें टिकी हुई हैं’(जाति का उन्मूलन, डॉ. भीमराव आंबेडकर). वस्तुतः जिन लोगों का वे नेतृत्व करते थे उनके जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धर्म का किसी न किसी प्रकार का हस्तक्षेप था. धर्म-विहीन जीवन की कल्पना भी उनके लिए असंभव थी. आंबेडकर के सामने बड़ा सवाल था कि हिंदू धर्म नहीं तो क्या? बौद्ध धर्म को अपनाने से पहले उन्होंने लगभग सभी लोकप्रिय धर्मों पर विचार किया था. वे समझते थे कि कोई भी धर्म विकृतियों से अछूता नहीं है. प्रत्येक की शुरुआत सामान्य शुभता से होती है. समाज की भलाई के लिए कुछ नियम बनाए जाते हैं. यह मानते हुए कि उन नियमों के अनुपालन में ही सबका कल्याण है, सदस्यों की सामान्य सहमति के बाद उन्हें सामाजिक आचार-संहिता का हिस्सा बना दिया जाता है. लोकभाषा में वही धर्म कहलाता है. कालांतर में उसके साथ दूसरे मिथ, प्रतीकादि जुड़ते चले जाते हैं. सामाजिक आचार-संहिता का पालन सभी लोग समान निष्ठा के साथ करें, यह आवश्यक होने पर भी संभव नहीं हो पाता. इसलिए समय के साथ प्रत्येक धर्म में क्षरण का दौर आता है. उसके लिए सामाजिक असमानता का तरह-तरह से पोषण करने वाले शीर्षस्थ प्रवर्त्तक ज्यादा जिम्मेदार होते हैं. वे धर्म के नाम पर अपने लिए विशेषाधिकारों की मांग रखते हैं. परिणामस्वरूप जिन समतावादी मूल्यों के निमित्त धर्म का जन्म होता है, वह धूमिल पड़ने लगता है. प्रकारांतर में वह दिखावे की वस्तु बनकर रह जाता है.

बावजूद इसके यह मान लिया गया है कि धर्म मानव जीवन के लिए अपरिहार्य है. बिना उसके जीवन संभव ही नहीं है. मनुष्य को सामान्य नैतिकता के रास्ते पर बनाए रखने के लिए धर्म आवश्यक है. लेकिन धर्म यदि मनुष्य के लिए परिस्थितिजन्य अनिवार्यता है तो उसे ऐसा धर्म चुनना चाहिए जिसमें अधिकतम गत्यात्मकता हो. जो परंपरा और रूढ़ियों के जाल में कम से कम फंसा हो. जिसमें नएपन को अपनाने की अधिकतम छूट हो. जो मनुष्य को अपने निर्णय-सामर्थ्य का स्वागत करता हो. जो दूसरे धर्मों के प्रति उदार हो. इस कसौटी पर हिंदू धर्म आंबेडकर को पूरी तरह निराश करता था. इसलिए 1935 में ही उन्होंने हिंदू धर्म के त्याग की घोषणा कर दी थी. उस घोषणा के पीछे उनका व्यक्तिगत दर्द भी छिपा था. पंढरपुर स्थित ‘विठोबा’ के मंदिर की पूरे महाराष्ट्र में मान्यता थी. आंबेडकर की पहली पत्नी रमाबाई अकसर बीमार रहती थीं. वे पंढरपुर जाकर विठोबा के दर्शन करना चाहती थीं. लेकिन पवित्रता के ढकोसले के चलते मंदिर में अछूतों का प्रवेश वर्जित था. आंबेडकर अपनी पत्नी की यह इच्छा पूरी न कर सके. पत्नी की मृत्यु के पश्चात नासिक जिले के यावला नामक कस्बे में दिए गए अपने ऐतिहासिक भाषण में उन्होंने कहा था—‘मेरा जन्म हिंदू के रूप में हुआ है. परंतु मैं हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं.’ परोक्ष रूप में वह एक संकल्प था—एक ऐसा पंढरपुर बसाने का जहां झूठी आस्था और पाखंड के स्थान पर ज्ञान, तर्क और मनुष्यता का साम्राज्य हो.

 

आंबेडकर और बौद्ध धर्म

हिंदू धर्म से बौद्ध धर्म की यात्रा में आंबेडकर ने पूरे 21 वर्ष का समय लिया. इस बीच उन्होंने विभिन्न धर्मों का अध्ययन किया. उस दौरान विभिन्न धर्मों के आचार्यो की ओर से अनेक प्रलोभन भी आए. लगभग सभी लोकप्रिय धर्मों की विवेचना के उपरांत उन्होंने अंततः बौद्ध धर्म का चयन किया. मृत्यु से मात्र दो महीने पहले. क्या यह धर्मांतरण आवश्यक था? क्या एक धर्म से दूसरे धर्म के बीच की यात्रा तथा नए धर्म को ठोक-बजाकर देखने-परखने के लिए यह अवधि स्वाभाविक मानी जाएगी? ठीक है, धर्मांतरण या धर्म का चयन मनुष्य का निजी मसला है. परंतु आंबेडकर के संदर्भ में वह महज आस्था का विषय नहीं था. हम जानते हैं—वे जीवन-भर एक मिशनरी की तरह काम करते रहे. सरकार में रहकर और बाहर, स्वास्थ्य की परवाह न करते हुए उन्होंने रात-दिन अनथक मेहनत की, ताकि दलितों और पिछड़ों को उनकी दुर्दशा से मुक्ति दिला सकें. ऐसे में अपने बारे में निर्णय लेने का उन्हें समय कहां था? तो क्या धर्मांतरण उनके लिए बाकी कार्यों की अपेक्षा कम महत्त्वपूर्ण मसला था? इतना कि उसे 21 वर्षों तक टाला जा सके. या फिर वे हिंदू धर्म को सुधार के लिए पर्याप्त समय देना चाहते थे? जब उन्हें लगा कि संविधान लागू होने के छह वर्ष बाद भी हिंदू धर्म की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है, न ही उसमें सुधार की कोई संभावना है तो निराश होकर 1956 में नागपुर में उन्होंने लाखों समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली. वे धर्म के संगठन-सामर्थ्य का उपयोग दलितों को संगठित करने के लिए करना चाहते थे. इस तरह धर्मांतरण का निर्णय उनके लिए निजी आस्था और विश्वास का मामला कम, हिंदू धर्म पर निर्णायक चोट करने तथा अपने समाज को, उस समाज को जो बिना धर्म के सांस लेना भी असंभव मानता था, एक बेहतर विकल्प की ओर ले जाने की छटपटाहट का नतीजा था.

आंबेडकर के विचारों पर हम कबीर और फुले के अलावा थॉमस पेन, मिल, वाल्तेयर, रूसो, बर्ट्रेंड रसेल, लॉस्की, बैंथम जैसे विचारकों का प्रभाव देखते हैं. इन विचारकों में से अधिकांश परंपरागत धर्म के चंगुल से बाहर थे. मानते थे कि धर्म अल्पज्ञों की बैशाखी है. जिन्हें खुद पर भरोसा नहीं होता वही धर्म की शरणागत होते हैं. धर्म उनकी बौद्धिक पंगुता को कम करने के बजाय उसका लाभ उठाता है. उसका नशा इतना गहरा होता है कि मनुष्य को अपनी निरंतर पांव पसारती पंगुता का एहसास तक नहीं होता. आंबेडकर विद्वता के उच्चतम स्तर को प्राप्त कर चुके नेता, विचारक और समाज सुधारक थे. व्यक्तिगत स्तर पर उन्हें धर्मनुमा बैशाखी की आवश्यकता ही नहीं थी. लेकिन जिस समाज के लिए वे काम कर रहे थे, वह बहुत पिछड़ा हुआ था. शताब्दियों से धर्म के आश्रय में रहते हुए वह उसका अभ्यस्त हो चुका था. धर्म और जीवन को एक-दूसरे का पर्याय मानता था. उन्हीं की खातिर आंबेडकर को एक धर्म से दूसरे धर्म तक की यात्रा करनी पड़ी थी.

सवाल है बौद्ध धर्म ही क्यों? क्या इसलिए कि वह मध्यमार्गी था. उसकी नींव निरीश्वरवाद पर टिकी हुई थी? लेकिन बुद्ध के समय में निरीश्वरवादी विचारक तो और भी कई थे. अजित केशकंबलि, मक्खलि गोशाल, पूर्ण कस्सप, पुकुद कात्यायन, संजय वेलट्ठिपुत्त और कौत्स. वे सब अपने-अपने मत के आचार्य, विद्वान और विचारक थे. बुद्ध से पहले ही वे ब्राह्मण धर्म पर हमला कर समानांतर दर्शनों की स्थापना कर चुके थे. ईश्वर, आत्मा, परमात्मा जैसे विषयों पर उन्हें भरोसा नहीं था. वैदिक कर्मकांडों का वे मजाक उड़ाते थे. पाणिनी शिष्य व्याकरणाचार्य कौत्स ने वेदों को ‘अर्थहीन और निस्सार’ माना था. बौद्ध ग्रंथ इस बात की भी गवाही देते हैं कि अपने समय में मक्खलि गोशाल के आजीवक संप्रदाय के अनुयायियों की संख्या बौद्ध मतावलंबियों से अधिक थी. हालांकि उनके बारे में अधिक जानकारी नहीं मिलती. वे प्रकृति के साहचर्य में रहने वाले सीधे-सादे लोग थे. जैसा देखते-सोचते, वही लोगों को समझाते थे. उन्होंने कभी सोचा नहीं कि धर्म जो व्यक्तिगत आस्था का विषय है, कभी राजनीति का दायां हाथ बन जाएगा. वस्तुतः बुद्ध के जीवनकाल तक विचारों का आदान-प्रदान मौखिक किया जाता था. धर्म-दर्शन के संहिताकरण की कोई व्यवस्था नहीं थी. स्वयं बुद्ध ने अपने सारे उपदेश मौखिक ही दिए थे. उनके निर्वाण के नब्बे दिन बाद पहली धर्म-संसद हुई. उसमें बुद्ध के जीवन तथा दर्शन के संहिताकरण का संकल्प लिया गया. धर्म-संसद को मगध सम्राट अजातशत्रु का पूरा समर्थन प्राप्त था. निरीश्वरवादी विचारकों तथा उनके विचारों को कलमबद्ध करने के लिए न तो उस समय के बुद्धिजीवी उनके साथ थे न ही अजातशत्रु जैसे सम्राट का उन्हें समर्थन था. इस कारण वह परंपरा लंबे समय तक मौखिक ही बनी रही.

उस समय तक राजाओं की साम्राज्यवादी लालसाएं उमड़ने लगी थीं. धर्म इस कार्य में सहायक था. इस बीच ब्राह्मणों और क्षत्रियों के बीच शताब्दियों तक चले संघर्ष में कमी आने लगी थी. बुद्ध और महावीर ने धर्म-दर्शन के क्षेत्र में ब्राह्मणों के एकाधिकार को तोड़ा था. लोगों तक यह संदेश गया था कि ब्राह्मणों को उन्हीं के क्षेत्र में चुनौती देना संभव है. इसलिए वे समझौतावादी रवैया अपनाने को बाध्य हुए थे. मनुस्मृति इन दोनों वर्गों के बीच हुए समझौते का भी दस्तावेजीकरण है, जिसके माध्यम से शीर्ष के दोनों पद ब्राह्मण और क्षत्रियों ने कब्जा लिए थे. बौद्ध धर्म-दर्शन के संहिताकरण का काम उन्हीं लोगों को सौंपा गया जो या तो शीर्षस्थ वर्णां यानी ब्राह्मण और क्षत्रिय से थे अथवा उनके वर्चस्व का बिना शर्त समर्थन करते थे. राजाओं और श्रेष्ठि वर्ग का समर्थन होने से भी बुद्ध और महावीर को अपने धर्म-दर्शन के प्रसार में मदद मिली. शूद्र होने के कारण निरीश्वरवादी विचारकों—मक्खलि गोशाल, अजित केशकंबलि, पूर्ण कस्सप आदि को ऐसा कोई समर्थन प्राप्त नहीं था. इसलिए उनके विचार मौखिक परंपरा से बाहर न आ सके. उनके बारे में छिटपुट जानकारी हमें बौद्ध एवं जैन ग्रंथों से ही प्राप्त होती है. तदनुसार वे तर्क और ज्ञान पर आधारित भौतिकवादी विचारधाराएं थीं. इन सबको पढ़ते-समझते हुए आंबेडकर ने बौद्ध धर्म को वरीयता दी. कदाचित उन्हें लगता था कि ठेठ निरीश्वरवादी विचारधारा को उनका अशिक्षित समाज एकाएक स्वीकार नहीं कर पाएगा. समाज को संगठित रखने के लिए वे कोई भी समझौता करने को तैयार थे. बौद्ध धर्म की खूबी है कि वह धुर भौतिकवादी और ठेठ ब्राह्मणवादी दर्शनों के बीच जगह बनाता है. चार्वाकों, लोकायतों और आजीवकों की भांति वह ईश्वर, आत्मा आदि को नकारता नहीं, बस उन