न्याय की पाश्चात्य अवधारणा—दो

‘न्याय क्या है’ पर सबसे पहली प्रतिक्रिया केफलस की ओर से ही आती है. केफलस मैटिक(विदेशी) है. उसके विचार कुछ-कुछ परंपरागत किस्म के हैं. उसके अनुसार न्याय का अर्थ है—‘अपने कथन और कर्म में सच्चा रहना तथा मनुष्यों एवं देवताओं के प्रति ऋण चुकाना.’ सुकरात इस परिभाषा से संतुष्ट नहीं होता. उसके अनुसार सत्य सापेक्षिक होता है. यानी एक व्यक्ति के लिए जो सत्य है, आवश्यक नहीं कि दूसरे व्यक्ति की परिस्थितियों में भी ठीक वैसा ही सत्य स्वीकार्य हो. इसलिए केफलस के विचारों की आलोचना वह यह कहकर करता है कि विशेष परिस्थितियों में सत्य और समुचित व्यवहार को न्याय माना जा सकता है. परंतु उसे सार्वभौमिक सत्य के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. उधार को समय पर चुकाना अच्छी बात है. उसे मानव-चरित्र के विशिष्ट गुण के रूप में लिया जा सकता है. परंतु इस नियम की भी सीमा है. यह प्रत्येक परिस्थिति में निरापद नहीं है. केफलस के मत के विरोध में अपना तर्क प्रस्तुत करते समय सुकरात उदाहरण देता है—‘मान लीजिए आपके दोस्त ने अपना घातक हथियार आपके पास सुरक्षित रख छोड़ा है. उसे वह उस समय वापस मांगता है, जब वह अत्यंत क्रोधावस्था में है; तथा हथियार द्वारा किसी तीसरे व्यक्ति की हत्या करना चाहता है. उस क्षण हथियार लौटाकर ऋण-मुक्त होना क्या न्याय की परिसीमा में आएगा?’ इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर केफलस के पास नहीं है. परिस्थिति चाहे जो हो, शुभ यदि अशुभ का जन्मदाता अथवा उसे प्रोत्साहित करता है—तो वह न्याय नहीं माना जा सकता. न्याय की कसौटी उसकी सार्वभौमिकता में है. वही न्याय है जो अधिकतम व्यक्तियों को न्याय जंचे और अधिकतम परिस्थितियों में न्याय-संगत सिद्ध हो. समय पर उधार लौटाने का गुण व्यक्ति को जिम्मेदार तो दर्शाता है, परंतु वह न्याय की कसौटी नहीं बन सकता.

केफलस वयोवृद्ध है. उस पीढ़ी का प्रतीक जो सुकरात के समय बूढ़ी हो चली थी. उसका ज्ञान सुदीर्घ अनुभव पर आधारित है. उसकी पीढ़ी के लिए न्याय और नैतिकता के अर्थ बहुत सीमित थे. सत्य-भाषण एवं समय पर उधार चुकाने का मामला भी व्यावहारिक नैतिकता से जुड़ा था. लोगों में उधार लेन-देन चलता रहता था. उसके कारण झगड़े भी होते थे. प्रकारांतर में केफलस उस न्याय की ओर इशारा करता है, जिसके लिए न्यायालय या किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की आवश्यकता पड़ती है. जबकि सुकरात न्याय को उसके वृहद संदर्भों में देख रहा था. सबकुछ जानते-समझते हुए भी सुकरात केफलस के विचारों को पुराना मानकर उसका उपहास नहीं करता. अच्छे विमर्शकार की भांति वह धैर्यपूर्वक सुनता और बाद में विनयपूर्वक उसका प्रतिवाद करता है. इसके लिए सिसरो ने सुकरात की प्रशंसा की है—‘सुकरात का आचरण एक उदाहरण है, जिसे अरस्तु ने दर्शन के अध्येता के लिए अनुकरणीय बताया है.’ न्याय की दृष्टि से सुकरात ने केफलस को भले ही निरुत्तर कर दिया हो, परंतु उसके अनुभवों से हमें व्यावहारिक नैतिकता की झलक मिलती है. जिनका दर्शन की दृष्टि से भले ही बहुत ज्यादा महत्त्व न हो, परंतु समाज का समूचा कार्य-भार सामान्यतः उसी पर केंद्रित होता है. प्रकारांतर में वह सुकरात को चरित्र की महत्ता से परचाना चाहता है. वह बताना चाहता है कि गरीबी निश्चित रूप से मनुष्य के सुख में बाधक बनती है. जीवन में अनेक परेशानियां और दुश्वारियां धनाभाव के कारण पैदा होती हैं. बावजूद इसके यह मान लेना कि जो अमीर हैं, जिन्हें कोई अभाव नहीं है, वे पूरी तरह प्रसन्न हैं अनुचित होगा. मनुष्य के लिए उसका चरित्र ही सच्ची दौलत है—इस तरह का सोच लंबे अनुभव और समाज के साथ सतत संवाद के बाद ही पनप सकता है. इसलिए व्यावहारिक न्याय और नैतिकता को देखते हुए केफलस के विचार मायने रखते हैं, हालांकि न्याय की परिभाषा की दृष्टि से उनका खास महत्त्व नहीं है.

केफलस को निरुत्तर देख उसका बेटा पोलीमार्क बहस में कूद पड़ता है. पोलीमार्क की न्याय संबंधी अवधारणा सीधी-सरल है. वह सोफिस्ट विचारकों से प्रभावित है. एक तरह से वह अपने पिता के न्याय संबंधी सहज बोध को ही आगे बढाता है. उसके अनुसार, ‘न्याय का अभिप्राय है—मित्रों को लाभ पहुंचाना और दुश्मनों को हानि.’ इस प्रकार का भेदभाव न्याय की आधारभूत मान्यता के विपरीत है. उसके आधार पर न्याय की कसौटी का निर्माण असंभव है. गौरतलब है कि उन दिनों यूनान के छोटे-छोटे राज्य परस्पर युद्ध करते रहते थे. युद्धक संस्कृति पूरे यूनान पर बढ़त बनाए थी. मित्र राज्यों की मदद तथा दुश्मन राज्यों का विरोध करना उस संस्कृति का सामान्य लोकाचार था. मित्रों के प्रति अनुराग और शत्रु से राग-विराग प्राचीन यूनानी समाज की सामान्य नैतिकता का हिस्सा था. सोलन की कविताओं में मिलता है—‘मुझे अपने मित्रों के प्रति सुखद तथा शत्रुओं के प्रति उदार बना दो.’ इसी तरह ईसा पूर्व आठवीं शताब्दी के कवि हेसियाद ने एक जगह लिखा था—‘वे हमें देंगे तो हम भी देंगे. वे यदि नहीं देंगे तो हम भी नहीं देंगे.’ प्राचीन भारत में न्याय की यही स्थिति थी. देवताओं से कुछ प्राप्त करने के लिए उन्हें अर्घ्य, भेंट-पूजा चढ़ाना. एक चढ़ाकर दस लाख की उम्मीद न करना. नहीं तो देवता के कोप-भाजन बनने से भयभीत रहना. यही व्यवस्था तत्कालीन राजनीति के न्याय-सिद्धांत की मुख्य प्रेरणा थी. राजा प्रसन्न हो तो भेंट-सौगात से मालामाल कर देता था. राजा के अप्रसन्न होने पर दंड सुनिश्चित था. दंड की मात्रा भी राजा के कोप और उसकी मर्जी पर निर्भर करती थी. कोई लिखित विधान न था. बाद में धर्मसूत्रों में हालांकि दंड संबंधी व्यवस्था देखने को मिलती है. परंतु उसका अनुसरण आवश्यक न था. राजा की मर्जी ही दंड विधान था. उसके विरोध में कहीं, कोई सुनवाई न थी.

पोलीमार्क का तर्क भी उससे प्रभावित है. परम जिज्ञासु सुकरात उसके तर्कां से आश्वस्त नहीं है. वह बताता है कि निष्पक्षता न्याय की कसौटी है. यदि नैतिकता की दृष्टि से सभी मनुष्य बराबर हैं, तो समान परिस्थितियों में उनके साथ एक जैसा व्यवहार करना ही न्यायिक उत्कृष्टता की कसौटी है. यदि दो व्यक्ति समान अपराध में लिप्त हों तथा उनमें से एक शासक का मित्र तथा दूसरा उसका शत्रु हो तो दोनों के अपराध का दंड क्या अलग-अलग होना चाहिए? व्यक्ति मित्रों के प्रति सामान्यतः उदार होता है, जबकि अमित्रों तथा दुश्मनों के प्रति अनुदार. ऐसे में उसका निर्णय निजी धारणाओं से प्रभावित होगा, जो न्याय-भावना के विपरीत है. पूर्वाग्रहवश वह मित्रों का पक्ष लेगा. जो मित्र नहीं हैं, उनके प्रति उसके निर्णय उपेक्षा से भरे, पक्षपातपूर्ण होंगे. पक्षपात जहां किसी अपात्र को लाभ पहुंचाता है, वहीं किसी अन्य व्यक्ति से जो उसका न्यायपूर्ण अधिकारी है, उचित अवसर छीन लेता है. सुकरात के अनुसार किसी को नुकसान पहुंचाना अथवा उसका बुरा करना न्याय की मूल अवधारणा के विपरीत है. फिर मित्रता कोई स्थायी संबंध नहीं है. दो व्यक्तियों के बीच संबंधों में उतार-चढ़ाव आते ही रहते हैं. आज जो मित्र हैं, कल वही दुश्मन भी बन सकते हैं. तदनुसार एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्तियों के प्रति व्यवहार भिन्न परिस्थितियों में अलग-अलग हो सकता है. अपने मत के समर्थन में प्लेटो सुकरात के माध्यम से कई तर्क प्रस्तुत करता है.

न्याय को यदि अच्छाई और बुराई से अभिव्यक्त होने वाला गुण मान लिया जाए तो कोई भी व्यक्ति उसका मनमाना उपयोग करने को स्वतंत्र हो जाएगा. एक डॉक्टर जो अपने उपचार द्वारा किसी रोगी को सही कर सकता है, उपचार न करके या जानबूझकर गलत उपचार द्वारा उसे नुकसान भी पहुंचा सकता है. प्रत्येक अवस्था में वह अपेने ज्ञान का उपयोग कर रहा होगा, हालांकि उसके परिणाम भिन्न-भिन्न होंगे. मगर जानबूझकर नुकसान पहुंचाने अथवा उपचार में लापरवाही बरतने की अवस्था में रोगी के प्रति उसके व्यवहार को न्यायपूर्ण नहीं माना जाएगा. न्याय कला भी नहीं है. कोई भी कलाकार अपनी कृति को रूपाकार देने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होता है. जबकि न्याय का न तो मनचाहा उपयोग संभव है, न ही मनमाने ढंग से उसे तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है. कलाएं अनुभव के साथ-साथ निरंतर परिष्कृत होती जाती हैं. जबकि न्याय के साथ ऐसा नहीं है. किसी भी समाज में न्याय उसकी आदर्शोन्मुखता का प्रतिरूप होता है. उसे अनुभव के आधार पर परिष्कृत नहीं किया जा सकता. सुकरात के अनुसार न्याय का सीमित अर्थों एवं संदर्भों में प्रयोग निषिद्ध है. वह बृहत्तर ज्ञान का विषय है. पोलीमार्क्स के तर्क के विरोध में सुकरात की अनेक शंकाएं हैं. उसके अनुसार मित्र को लाभ पहुंचाने और शत्रु का अहित करने की बात करना जितना आसान है, वास्तविक मित्र और शत्रु की पहचान करना उतना ही कठिन है. मनुष्य का व्यवहार बदलता रहता है. कुछ मनुष्य इतने तेज-तर्रार होते हैं कि उनके व्यवहार से पता ही नहीं चलता कि वे मित्र हैं या शत्रु? ऐसे लोग सामने हितैषी होने का दावा करते हैं, परंतु पीठ पीछे वे नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं. ऐसे मनुष्य के प्रति कैसा व्यवहार न्यायोचित होगा—यह समझ पाना आसान नहीं होता. ऐसे व्यक्तियों के लिए जिनकी मैत्री केवल दिखावा है, हमेशा लाभ की बात करना उन लोगों के प्रति प्रति सरासर अन्याय होगा जिनका व्यवहार आपको पसंद नहीं है, परंतु उन्होंने आपको या किसी अन्य को कभी भी नुकसान पहुंचाने की कोशिश नहीं की है. ऐसे व्यक्ति के साथ जो मन से बुरा नहीं है, या परिस्थितिवश बुराई अपनाने को विवश हुआ है—यदि दुर्व्यवहार किया जाए तो समाज के प्रति उसके विश्वास में कमी आएगी. दूसरी ओर जो व्यक्ति सचमुच बुरा है, यदि उसके अहित को न्याय मान लिया जाए तो वह अपने पक्ष को ही न्यायपूर्ण मान लेगा. इस प्रकार उसके सुधार की समस्त संभावनाओं का अंत हो जाएगा. न्याय की पहली शर्त करने वाले और जिसके साथ न्याय किया जा रहा है, स्पष्टता है. उसमें समिष्ठि की भावना अंतनिर्हित होती है. न्याय परिस्थिति-निरपेक्ष, व्यक्ति निरपेक्ष और देश-काल निरपेक्ष होता है. सार्वदैशिकता उसका गुण होता है. देश-काल के अनुसार अपराध की प्रवृत्ति, परिभाषाएं और उनके अनुरूप दंड विधान बदल सकता है, न्याय नहीं. उसे तो पक्षपात रहित और इन सभी से ऊपर, सर्वकल्याणकारी होना चाहिए. इसलिए न्यायशील व्यक्ति मित्र या शत्रु का भेद किए बगैर सर्वकल्याण की भावना के साथ न्याय को अपनाएगा. अतएव मित्र को लाभान्वित करने तथा अमित्र को नुकसान पहुंचाने की भावना न्यायसंगत नहीं कही जा सकती. किसी भी प्रकार का भेदभाव न्याय की मूल-भावना के पूरी तरह विपरीत है. सुकरात के तर्कों के बाद पॉलीमार्क्स तर्क छोड़कर बहस से बाहर आ जाता है. उस तर्क-शृंखला का समापन प्लेटो यह कहकर करता है कि ‘मित्रों के भलाई और दुश्मन के साथ बुराई जैसी धारणा पेरियांडर जैसे निरंकुश सम्राट ने बनाई होगी. प्रसंगवश बता दें कि पेरियांडर की गिनती यूनान के सात प्रसिद्ध संतों में की जाती है. यह उन दिनों की बात है जब वहां दार्शनिक का राजा होना श्रेष्ठतर माना जाता था. पेरियांडर ने कोरिंथ पर ईसापूर्व 625 से 585 ईस्वीपूर्व तक शासन किया था. आरंभ में उसका शासन बहुत दयालुतापूर्ण था. लेकिन बाद में वह दमन का रास्ता अपनाने लगा था.

‘रिपब्लिक’ को पढ़ते हुए कभी-कभी यह लगता है कि उसके पात्र प्लेटो की कल्पना की उपज हैं. उनकी भूमिका किसी न किसी विचार के पक्ष-विपक्ष को आगे बढ़ाने तक सीमित है. सुकरात का योगदान कहीं सूत्रधार का है, कहीं महत्त्वपूर्ण वक्ता के रूप में तो कहीं विभिन्न विचारधाराओं में समन्वयक का. संवाद के बीच अनेक व्यक्तियों की सहभागिता का उद्देश्य है कि उनके माध्यम से प्लेटो, अंतिम निष्कर्ष से पहले किसी एक विचार या अवधारणा के यथासंभव सभी पक्षों पर खुलकर विचार कर लेना चाहता है. वह लगातार यह सिद्ध करने की कोशिश करता है कि न्याय को लेकर परंपरागत किस्म की धारणाएं व्यावहारिक दृष्टि के लिए उपयोगी कही जा सकती हैं. परंतु विशिष्ट परिस्थितियों में उनकी उपयोगिता सीमित तथा अलाभकारी हो जाती है. व्यापक परिदृश्य में उनके अंतर्विरोध और सीमाएं सामने आने लगती हैं. न्याय पर चर्चा करते हुए सुकरात केवल अपने साथियों की न्याय-संबंधी अवधारणा में खोट नहीं निकालता. परिचर्चा के दौरान वह खुद का भी अविकल परिमार्जन करता जाता है. ‘रिपब्लिक’ में हम प्लेटो न्याय-संबंधी प्रारंभिक संकल्पना में एक के बाद एक सुधार हुआ पाते हैं. न्याय की अवधारणा पर शुरू हुई बहस में तीसरे पात्र के रूप में थ्रेचाइमच्स का आगमन होता है. प्लेटो ने उसे वाग्मिता में निपुण ऐसा व्यक्ति बताया है तो श्रोताओं की वासनाओं को उत्तेजित करने में दक्ष था. शिक्षा का प्राथमिक ध्येय ज्ञानार्जन है. जबकि सोफिस्टों के लिए वह केवल वाक्-कौशल अथवा वाक्-चातुर्य तक सीमित था. तो भी सोफिस्टों की ग्रीक संस्कृति में महत्ता से इन्कार नहीं किया जा सकता. सुकरात और प्लेटो के आगमन से पहले सोफिस्ट ही थे, जिनसे ग्रीक संस्कृति का बोध होता था. वे अपनी विचारधारा और तर्क-सामर्थ्य के आधार पर जाने जाते थे. तर्क-नैपुण्य उनके लिए इतना महत्त्वपूर्ण था कि आगे चलकर उन्होंने उसी को अपना व्यवसाय बना लिया था. यूनानी समाज में उनकी हैसियत ठीक ऐसी ही थी जैसी भारत में पुरोहित वर्ग की. थ्रेचाइमच्स के विचार ‘सत्ता-सर्वेसर्वा’ का प्रतिनिधित्व करते हैं. बहस में उतरने के पश्चात वह दावा करता है कि शक्तिशाली की हित-सिद्धि ही न्याय है. उसके अनुसार—‘सबल सर्वदा सही होता है.’ ‘राजा जो करे वही न्याय’—ऐसी मान्यता भारत में भी रही है. तुलसी ने लिखा है, ‘समरथ को नहिं दोष गुसाईं.’ इसी से शायद यह कहावत भी बनी है—‘जिसकी लाठी उसकी भैंस.’ अपने मंतव्य को स्पष्ट करता हुआ थ्रेचाइमच्स कहता है—

‘विभिन्न प्रकार के राजदर्शनों यथा जनतंत्रात्मक, निरंकुश, कुलीनतंत्री आदि के आधार पर गठित सरकारें इस प्रकार के कानून बनाती हैं, जिनके द्वारा उनकी अपनी स्वार्थ-सिद्धि होती है. निहित स्वार्थ के लिए बनाए गए कानूनों को ही वे न्याय की संज्ञा देती हैं और चाहती हैं कि लोग बिना कोई प्रश्न उठाए उनका पालन करें. जो व्यक्ति उनके आदेश की अवहेलना करता है उसे वे कानून के उल्लंघन का तर्क देते हुए दंडित करती हैं. सभी राज्यों में न्याय का एकमात्र उद्देश्य है शासकीय वर्गों का हित. चूंकि राज्य अपने आप में शक्तिशाली तंत्र होता है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि न्याय सर्वत्र एक ही है, वह है—शासक वर्ग का हित और शक्तिशाली का स्वार्थ.’

थ्रेचाइमच्स के अनुसार न्याय शक्तिशाली का अधिकार है. जो शक्तिसंपन्न है, वह न्याय को अपने पक्ष में कर लेता है. शक्तिशाली हमेशा अपने पक्ष में कानून बनाता है. सवाल है शक्ति कैसी? देह की, मन की या किसी और प्रकार की? सुकरात प्रश्न करता है. थ्रेचाइमच्स इस बारे में स्पष्ट है. वह शारीरिक शक्ति से इन्कार करता है. भूल जाता है कि शारीरिक शक्तियों, जिनमें बौद्धिक सामर्थ्य भी सम्मिलित है, से इतर जितनी भी शक्तियां हैं, वे सभी व्यक्ति को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में समाज की ओर से प्राप्त होती हैं, भले ही समाज अपनी इस देन को गंभीरता से न लेता हो. उसमें व्यक्ति की अपनी प्रतिभा एवं परिश्रम का भी योगदान होता है, परंतु इतना नहीं कि समाज के योगदान की बराबरी कर सके. अध्ययन-अध्यापन, अनुभव आदि के माध्यम से मनुष्य जो ज्ञान अर्जित करता है, वह उसकी पूर्ववर्त्ती पीढ़ियों के अनुभवों का निचोड़ होता है. परंतु अहंभाव के चलते व्यक्ति समाज की देन को अपनी मान बैठता है. यह उसका अहंभाव है. अपने ज्ञान पर गर्व करने का अधिकार उसे है. लेकिन पूर्ववर्त्ती पीढ़ियों के योगदान को बिसरा देना भी अनैतिक कर्म है. थ्रेचाइमच्स नेतृत्व के अधिकार को शक्ति मानता है. उसके अनुसार जिसके पास कानून बनाने की शक्ति है, उसे दूसरों पर नियंत्रण का अधिकार और अवसर स्वतः प्राप्त हो जाते हैं. थ्रेचाइमच्स की कसौटी है कि जो शक्ति-संपन्न है, वह न्याय-संपन्न भी है. कानून-निर्माता होने के कारण शक्तिशाली सदैव लाभ की अवस्था में रहता है. उस गड़हरिया की भांति जो अपनी भेड़ों को इसलिए पालता है ताकि समय आने पर वह उनसे काम ले सके. जिसमें जरूरत पड़ने पर उसकी बलि भी शामिल है. थ्रेचाइमच्स का विचार प्राचीन राजनीति के बेहद करीब है. प्राचीन सम्राट अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के लिए प्रजा को कभी भी युद्ध में उतार सकते थे, लोगों से मनचाहा काम या बेगार ले सकते थे. थ्रेचाइमच्स के अनुसार जो लोग शासन से दूर हैं, जिन्हें कानून बनाने या बदलने का कोई अधिकार नहीं है, वे सामान्यतः नुकसान में रहते हैं. शिखर पर मौजूद व्यक्ति यदि जनता की भलाई के लिए काम भी करता है तो इसलिए कि उसके पीछे उसका कहीं बड़ा स्वार्थ निहित है. सुकरात को यह तर्क मंजूर नहीं है. उसके अनुसार ऐसा करना राज्य की नीयत को कठघरे में लाना तथा उसके औचित्य के आगे प्रश्न-चिह्न लगाना है, शिखर पर मौजूद लोग अपना स्वार्थ देखते हैं. परंतु वे ऐसा हमेशा करें, यह आवश्यक नहीं है. डॉक्टर अपनी प्रक्टिश केवल धन जुटाने के लिए नहीं करता. लोग सेवाभाव से भी चिकित्सक के पेशे को अपनाते आए हैं. यही बात शिक्षक पर भी लागू होती है. कलाकार भी लोक-कल्याण का भाव लेकर कला-साधना करता है.

सुकरात को विपरीत-कथन या व्याजोक्ति के लिए भी जाना जाता है. बहस के दौरान ऐसा ही विपरीत-कथन जैसा थ्रेचाइमच्स भी करता है. हालांकि वह अपने विचारों पर दृढ़ है और उसका यह कथन ‘शक्तिशाली सदा सही’ का ही विस्तार है. वह कहता है—‘अन्याय करना न्याय करने से बेहतर है.’ अपने तर्क को नई दिशा में बढ़ाता हुआ थ्रेचाइमच्स कहता है कि न्याय को शक्तिशाली की इच्छा या उसके लाभ तक सीमित कर देने से प्रत्येक व्यक्ति को उसका लाभ नहीं मिल पाएगा. बल्कि जो अन्यायी है वह अधिक प्रसन्न और संतुष्ट दिखाई पड़ेगा. इन परिस्थितियों में अन्याय अधिक सुखदायी और आश्वस्तिकारक हो सकता है. इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति केवल अपने स्वार्थानुरूप कार्य करेगा, जिसके लिए उसे अन्यायी मान लिया जाएगा. जबकि वह वही कर रहा है, जिसे करने में वह सक्षम है और जिसके द्वारा उसकी स्वार्थ-सिद्धि संभव है. कुल मिलाकर व्यक्ति का हित अन्यायी बनने में है. अपने तर्क की पुष्टि के लिए थ्रेचाइमच्स के पास अपने तर्क हैं. आप उन्हें कुतर्क सकते हैं; और चाहें तो वाग्जाल भी. लेकिन अन्य सोफिस्टों की भांति थ्रेचाइमच्स को भी अपनी इस कला पर गर्व था. अपने तर्क को आगे बढ़ाता हुआ वह कहता है—‘यदि न्यायी और अन्यायी दो व्यक्ति साथ-साथ व्यापार करें तो लाभ की गणना के समय यह कहना बहुत कठिन होगा कि न्यायी को अधिक लाभ हुआ हो. संभावना इसी की है जो अन्यायी है, उसने अधिक लाभ कमाया हो. व्यवहार में प्रायः देखा जाता है कि न्यायी व्यक्ति हमेशा घाटे में रहता है, जबकि अन्यायी ज्यादा ऐंठ ले जाता है. कराधान के समय भी अन्यायी कर-चोरी कर लाभ की अवस्था में रहता है. दूसरी ओर न्यायी व्यक्ति ईमानदारी बरतते हुए अधिक कराधान कर अपेक्षाकृत घाटे में रहता है. राज्य की ओर कोई सुविधा प्राप्त करनी हो तो अन्यायी आगे बढ़कर ज्यादा हाथ मार ले जाता है, जबकि न्यायी वहां भी पिछड़ जाता है. इन तर्कों से वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि न्यायी व्यक्ति से अन्यायी होना अच्छा है. थ्रेचाइमच्स के अनुसार, ‘न्याय बलवान का स्वार्थ’ अथवा ‘सबल की स्वार्थ दृष्टि है.’ जनसाधारण को न्याय सिवाय आत्मतुष्टि के, कुछ नहीं दे पाता. थ्रेचाइमच्स का तर्क यहीं समाप्त नहीं होता. वह आगे बढ़कर शासकीय पदों पर विराजमान व्यक्तियों की तुलना करते हुए कहता है कि अन्यायी व्यक्ति, न्यायी की अपेक्षा सदैव अधिक लाभ कमाते हैं. अन्यायी व्यक्ति न केवल अपने परिजनों को अधिक सुख दे पाता है, बल्कि न्यायी की अपेक्षा अधिक यश-लाभ का भी भागी बनता है. अन्याय जितना बड़ा हो, लाभ में रहने की संभावना भी उतनी ही बढ़ जाती है. छोटी-मोटी चोरी या लूट करने वाले चोर-डकैत कहे जाते हैं और समाज में अपमान और दंड के भागी बनते हैं. जबकि अपनी सेना और शक्ति के भरोसे यदि कोई नरेश दूसरे राज्य को लूटकर ले जाता है तो वह यश का भागी बनता है. चारणवृंद उसकी गौरव-गाथाएं लिखते हैं. इसलिए थ्रेचाइमच्स कहता है कि—‘हे सुकरात! पर्याप्त रूप से बड़े स्तर पर किया गया अन्याय, न्याय की अपेक्षा अधिक गौरवशाली, स्वच्छंद एवं यश-लाभ देने वाला कार्य है.’ उस समय थ्रेचाइमच्स न्याय के साथ-साथ लाभ को भी बहुत सीमित संदर्भों में ले रहा होता है. या यह कहें कि न्याय और लाभ को लेकर शक्तिशाली की जो दृष्टि है, वह उसी को आगे बढ़ाता है. आदर्श राज्य में लाभ का अभिप्रायः केवल मौद्रिक लाभ तक सीमित नहीं रहता. बल्कि उसके सारे कारोबार और संकल्प सामाजिक लाभ की दृष्टि के साथ रचे जाते हैं. राज्य व्यक्तियों से इतर संस्था नहीं है. वह अपने नागरिकों की सामूहिक इच्छा और संकल्पशक्ति का ही रूप है. राज्य की समस्त शक्तियां, संसाधन तथा लक्ष्य उसके नागरिकों के सामूहिक श्रम तथा इच्छा का सुफल होते हैं. इसलिए जो व्यक्ति ईमानदारी से अपना अपना काम करते हुए यथानिर्दिष्ट कराधान देता है, वह परोक्ष रूप में उन कार्यों को पूरा करने में भी सहभागी बनता है, जिनके लिए राज्य का गठन किया गया है. ऐसा व्यक्ति मौद्रिक अवदान के बदला सामाजिक लाभ के अपेक्षाकृत वृहत्तर संदर्भों में प्राप्त करता है.

थ्रेचाइमच्स का कथन सर्वथा गलत भी नहीं है. सामान्य धारणा यही है कि न्याय सदैव सबल का पक्ष लेता है. शक्तिशाली के आगे अदालतें भी झुक जाया करती हैं. रोजमर्रा के सामान्य अनुभवों से न्याय को लेकर एक दृष्टिकोण यह भी बनता है कि न्याय का जन्म दुर्बलों को शक्तिशाली वर्ग की लोभ, लालच और स्वार्थपरता से बचाने के लिए हुआ है. समाज में यदि सभी सबल हों अथवा सभी दुर्बल हो तो न्याय की कदाचित आवश्यकता ही न पड़े. इसलिए न्याय एक कृत्रिम व्यवस्था है, जो असमानताओं के अन्याय को पाटने के लिए जरूरी मानी गई है. उसे ‘भय की संतान’ या कमजोर का ‘रक्षाकवच’ भी कहा जा सकता है. प्रकृति में भी हम देखते हैं कि वहां जो शक्तिशाली है, वह सदैव लाभ की अवस्था में रहता है. इसलिए न्याय और कानून जैसी कृत्रिम व्यवस्थाएं कमजोर वर्ग की सुरक्षा और बेहतरी के लिए की गई हैं. वे शक्तिशाली वर्ग की मनमानी पर रोक लगाने तथा दुर्बल वर्ग को संरक्षण देने का काम करती हैं. ‘रिपब्लिक’ के अगले ‘संवाद’ में प्लेटो गलाकॉन के मुंह से कहलवाता है—‘जनसाधारण की मान्यता है कि न्याय को वास्तविक अच्छाई और शुभता का पर्याय कभी नहीं माना जा सकता. असल में वह ऐसी चीज है जिसको अन्याय न कर पाने की क्षमता के कारण स्वीकार्य माना जाता है.’ ग्लाकॉन के अनुसार न्याय की जरूरत कमजोर व्यक्ति की अन्याय न कर पाने की क्षमता तथा अन्यायी का सामना न करने की अक्षमता के कारण पड़ती है. दूसरे शब्दों में न्याय कमजोर की बैशाखी है, और शक्तिशाली की राह की बाधा. थ्रेचाइमच्स जहां न्याय को शक्तिशाली व्यक्तियों का हित स्वीकारता है, ग्लाकॉन उसे भय की भावना के कारण दुर्बल वर्ग के हित में बनाई कई अनिवार्यता की संज्ञा देता है. दोनों ही न्याय को बनावटी और दुर्बल वर्ग की रक्षा के लिए बनाई गई व्यवस्था स्वीकारते हैं. दोनों का मानना है कि न्याय को अपने आप में नैतिक या शाश्वत सिद्धांत नहीं माना जा सकता. अपने पक्ष को प्रस्तुत करते हुए थ्रेचाइमच्स कुतर्क की सीमा तक चला जाता है. उसके कहने का आशय है कि मनुष्य अपनी शक्ति के बल पर जितना समेट सकता है, उतना समेट लेने का उसे अधिकार है और यह काम उसे करते रहना चाहिए. इसी में उसका सुख है. वह संतोष को दुर्बल व्यक्ति द्वारा किया गया समझौता मानता है. लोकतंत्र में भी जनता यदि शासन की ओर से मुंह मोड़ ले, पूरी तरह निर्वाचित प्रतिनिधियों पर छोड़कर शासन की ओर से उदासीन हो जाए तो लोकतंत्र के अल्पतंत्र में बदलने में देर नहीं लगती. ऐसे राज्यों के कानून केवल अल्पतंत्र के हितों का ही रक्षण करते हैं. लोकतांत्रिक सरकारें निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा संचालित होती हैं. उनमें निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथों में जो संख्या में अत्यल्प होते हैं—कानून बनाने के अधिकार होते हैं. संयोग से अल्पतंत्र में भी कानून बनाने का अधिकार सीमित वर्ग के अधीन होता है. इसलिए जनता की उदासीनता अथवा जनमत के बंटा होने पर शासन-शिखर पर मौजूद लोगों को मनमानी का अधिकार मिल जाता है. परिणामतः जनतंत्र के अल्पतंत्र में बदलते देर नहीं लगती.

थ्रेचाइमच्स के अनुसार द्वारा ‘शक्तिशाली सदा सही’ कहना अनुभव-सिद्ध निर्णय था. जिस दौर में सोफिस्ट विचारधारा पनपी थी, उस दौर के शासकों के लिए शक्ति की सबकुछ थी. यूनान ही क्यों, प्राचीन सभी सभ्यताओं में लगभग वही स्थिति थी. भारत में इसे धर्म कहा गया है; और धर्म के नाम पर सत्ता के प्रत्येक धत्तकर्म को श्रेय की कोटि में रख दिया जाता था. राम जब शंबूक को मृत्युदंड देता है, निर्दोष पत्नी को वनवास की सजा सुनाता है अथवा बालि की छिपकर हत्या करता है, तो तत्कालीन विधान उसे दोष नहीं देता. उल्टे उसका महिमा-मंडन करता है. चूंकि राम वर्चस्वकारी संस्कृति का महानायक है, इसलिए उसके दोष पर पर्दा डालने के लिए समर्थन में तर्क गढ़ लिए जाते हैं. धर्म-विजय कहकर शक्तिशाली के वर्चस्व को अधिमान्य ठहराया जाता है. महाभारत युद्ध को जीतने के लिए कृष्ण कदम-कदम पर छल करता है. उसकी हर चतुराई और छल का भी धर्म बताकर महिमामंडन कर दिया जाता है. अपने स्तर पर यही काम संस्कृति भी करती है. इसे विजेता संस्कृति का दर्प भी कह सकते हैं, जो इतिहास और सांस्कृतिक प्रतीकों की व्याख्या अपने स्वार्थ के अनुरूप करती रहती है. प्लेटो का ध्येय न्याय संबंधी प्रचलित अवधारणाओं पर विचार करते हुए उसके वास्तविक रूप की पहचान करना है. थ्रेचाइमच्स का तर्क तत्कालीन यूनानी प्रभुवर्ग की सामान्य मानसिकता को दर्शाता है. चर्चा के दौरान सवाल करने पर वह कहता है—‘न्याय असल में दूसरों के कल्याण से ही संबंधित है. शासकवर्ग नियम बनाता है, इसलिए वह सदैव लाभ की अवस्था में रहता है.’ किसी न किसी रूप में वह उन्हीं नियमों को मान्यता देता है जो उसके लिए हितकारी हैं. जो व्यक्ति उन नियमों को एकतरफा मानकर उसका विरोध करता है, उन्हें वह दंडित करता है; अथवा उपेक्षित कर हाशिये पर ढकेल देता है.’ उस समय वह बड़ी चतुराई से संस्कृति, समाज तथा कानूनी प्रावधानों की अपने पक्ष में व्याख्या करता है. न्याय की यह अवधारणा सुकरात की निगाह में उचित नहीं है. यदि शक्तिशाली द्वारा मनमाने ढंग से, केवल अपने हितों में काम करने को न्याय मान लिया जाए तो उसकी मूल अवधारणा ही खतरे में पड़ जाएगी. न्याय को परखने के लिए वह तीन कसौटियां बनाता है—‘कौन-सा कार्य बुद्धिमत्तापूर्ण है?’ ‘सबसे सुरक्षित रास्ता क्या है?’ तथा ‘जीवन में शुभत्व की स्थापना किस प्रकार संभव है?’ सुकरात के लिए इनमें तीसरा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है.

‘रिपब्लिक’ की शैली में दार्शनिक गांभीर्य है. प्लेटो न तो व्यंजना का सहारा लेता है, न ही अनपेक्षित संवेदना को बीच में हालात है. ध्रेचाइमच्स के माध्यम से वह सोफिस्टों की न्याय-संबंधी अवधारणा को हमारे सामने लाता है. सोफिस्ट शक्ति का आराधन करने वाले थे. लेकिन उनके राज्य बड़े नहीं थे. जब चारों और शक्ति का बोलबाला हो और लोग समाज की समन्वित शक्ति के बजाय अपनी-अपनी शक्ति पर नाज करते हों तो संघर्ष की स्थितियां बनेंगी ही. सो उस समय तक राज्य नगरीय सीमाओं में सिमटे हुए थे. थ्रेचाइमच्स शक्ति के सर्वसत्तावादी दृष्टिकोण को हमारे सामने रखता है. सुकरात को माध्यम बनाकर प्लेटो उसका प्रतिवाद करता है. बताता है कि केवल शक्ति-आराधन से राज्य नहीं बनते. प्रत्येक समाज में ऐसे लोग होते हैं जो दूसरों के लिए समर्पण-भाव से जीना जानते हैं. डॉक्टर अपना पेशा दूसरों के भले के लिए चलाता है. अध्यापक ज्ञान बांटता है. दर्जी दूसरों के लिए वस्त्र सिलता है, कलाकर लोककल्याण की भावना के साथ चित्र बनाता है. ठीक है ये सब अपने-अपने कार्य के बदले में समाज से कुछ वसूलते हैं. डॉक्टर रोगी से फीस लेता है. अध्यापक को पढ़ाई के बदले वेतन मिलता है. इसी तरह दर्जी, कलाकार आदि भी अपने-अपने श्रम-कौशल के बदले समाज से कुछ न कुछ प्राप्त करते हैं. परंतु यह सब तो इसलिए आवश्यक है ताकि वे समाज को अपनी अनवरत सेवाएं प्रदान कर सकें. इससे उनके योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता. ‘रिपब्लिक’ में थ्रेचाइमच्स सुकरात के तर्कों के आगे शांत हो जाता है. परंतु जिस प्रकार वह शक्ति का पक्ष लेता है, उसके सर्वसत्तावादी दृष्टिकोण का समर्थन करता है, उसका प्रभाव पीढ़ियों तक बना रहता है. थ्रेचाइमच्स के दृष्टिकोण का विस्तार उनीसवीं शताब्दी में, नीत्शे के दर्शन में नजर आता है. प्लेटो ने जहां दार्शनिक सम्राट की परिकल्पन की थी, नीत्शे ने महामानव की परिकल्पना की, जो प्लेटो के दार्शनिक सम्राट जैसा ही सर्वगुणसंपन्न, विराट व्यक्त्वि का स्वामी है. अपनी पुस्तक The genealogy of morals में वह  ‘दास नैतिकता’ और ‘स्वामी नैतिकता’ की बात करता है. उसके अनुसार स्वामी के नैतिक मूल्य शक्ति, सदाचरण, सज्जनता, अच्छे और बुरे को परखने की दृष्टि से देखे जा सकते हैं, जो दास की नैतिकता ‘समर्पण’, दयालुता, मानवता, करुणा और संवेदना से परखी जा सकती है.

प्लेटो मानता है कि सृष्टि में पूर्ण समानता असंभव है. जितने भी प्राणी हैं उनमें परस्पर अनेक भिन्नताएं हैं. प्रकृति में देखा जाता है कि शक्तिशाली कमजोर पर राज्य करता है. उसपर अधिकार जमाकर किसी न किसी रूप में उसके अधिकारों का हनन करता है. ऐसे में राज्य की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है. राज्य प्राकृतिक असमानताओं की खाई को पाटते हुए लोगों को समान धरातल पर लाने का प्रयास करता है. यही उसके गठन का उद्देश्य भी है. साधारण सोच यही है कि शक्तिशाली को दुर्बल पर राज्य करना चाहिए. वृहद सामाजिक हितों के लिए यह अत्यावश्यक है. सोफिस्ट चिंतक यही मानते थे. ‘जार्जियस’ नामक संवाद में प्लेटो स्वयं यूनानी विचारक केलीक्लिस के विचारों से सहमत नजर आता है. वह स्वीकारता है कि प्राकृतिक आधार पर असमानताओं की भरपाई के लिए शक्तिशाली को समाज के कमजोर पक्षों का समर्थन, प्रोत्साहन करते हुए शासन करना चाहिए. इसी से प्राकृतिक स्तर पर गैरबराबरी को कम किया जा सकता है. सुकरात वहां भी प्रतिवादी के रूप में उपस्थित हो जाता है. वह उसी प्रश्न को दोहराता है, जो उसने थ्रेचाइमच्स से किया था कि श्रेष्ठतम के चयन की कसौटी क्या हो? शक्ति या फिर बुद्धिमत्ता? केवल ताकत के भरोसे शासन करना संभव नहीं है. जनता की सामूहिक शक्ति किसी भी शक्तिशाली शासक के कुल सैन्य-सामर्थ्य से अधिक होती है. प्रजा ही कभी समर्थन तो कभी निष्क्रिय रहकर राज्य के सर्वसत्तासंपन्न होने का भ्रम पैदा करती है. युद्ध तक में शारीरिक बल से अधिक बुद्धिबल की आवश्यकता पड़ती है. दूसरे शारीरिक बल को श्रेष्ठता का पर्याय मान लेना प्रकारांतर में प्राकृतिक न्याय को सामाजिक न्याय मान लेने जैसा ही है. यदि मान लिया जाए कि शक्ति ही सबकुछ है तो उसके आधार पर प्रतिफल की अपेक्षा से कौन रोक सकता है. सुकरात के अनुसार केलीकिल्स न्याय की मूल-भावना को पकड़ने में असमर्थ है. केवल शक्ति को न्याय का पर्याय बताकर वह अन्याय का पक्ष लेने की गलती कर जाता है. पहले चरण की बहस बेनतीजा समाप्त होती है. उससे हम यह तो जान लेते हैं कि ‘न्याय क्या नहीं है’, परंतु यह नहीं जान पाते कि ‘न्याय वास्तव में क्या है?’

© ओमप्रकाश कश्यप

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न्याय की पाश्चात्य अवधारणा

न्यायमूलक भावना ही मनुष्यता के साथ प्रेम संबंधों का नैरन्तर्य है.1जॉन रॉल्स

न्याय बड़ा खूबसूरत शब्द है. साथ में सम्मानित भी. परंपरा में वह शब्दों का ‘अभिजन’ है. इसीलिए जो व्यक्ति ईमानदार और न्यायकर्ता है, जिसके पास न्याय करने का अधिकार है. किसी भी दबाव, विशेषकर सत्ता के दबावों से जो मुक्त है, ‘दूध को दूध और पानी को पानी’ सिद्ध करने की कला जिसे आती है—जनसाधारण उसकी ओर उम्मीद-भरी निगाह से देखता है. आवश्यकता पड़ने पर वह अपने जीवन में ऐसे ही न्याय की कामना करता है. किसी भी समाज में न्याय का स्तर उस समाज में मानवीय अधिकारों की पहुंच का भी संकेतक होता है. समृद्ध न्याय-बोध हेतु परिपक्व अधिकारबोध आवश्यक है. परंपरागत समाजों में मनुष्य का अधिकारबोध, सामूहिकताबोध के दबावों से मुक्त नहीं हो पाता था. सामूहिकता का दायरा परिवार, बस्ती, जाति-समूह, पंचायत वगैरह कुछ भी हो सकता था. साधारणजन उन्हीं के बीच रहते हुए प्रचलित सांस्कृतिक प्रतीकों, लोकगाथाओं, रूपकों और मिथों से अपने न्यायबोध का संस्कार करता था. हालात आज भी वही हैं. आज भी किस्से-कहानियां जनसाधारण के न्यायबोध को बनाते हैं. बचपन से ऐसे अनेकानेक किस्सों, मिथों, धार्मिक प्रतीकों और गाथाओं से उसका वास्ता पड़ता है, जो उसे न्याय की प्रतीति कराते हैं. या जिन्हें उसके समक्ष न्याय के मानक के रूप में पेश किया जाता है. ‘जहांगीर का न्याय’, ‘अकबर-बीरबल’, ‘खोजा-बादशाह’, ‘मुल्ला नसरुद्दीन’, उपनिषदों और महाकाव्यों की कहानियों के अलावा समाज में लोक-किस्सों की भरमार हैं. उलझनों के बीच वही हमारी प्रेरणा बनते हैं. वही हमारे लोकमानस को बनाते हैं. उन्हीं से हमारे भीतर न्याय का संस्कार बनता है. भारतीय धर्मग्रंथों में यमराज को भी न्याय-प्रिय बताया गया है. उसे लेकर अनेक कहानियां और मिथ समाज में विद्यमान हैं. चूंकि उनके मूल में मिथकीय अंश ज्यादा हैं, इसलिए वे न्यायबोध को निखारने के बजाय तयशुदा निष्पत्तियों को थोपने का ही काम करते हैं. अपने समग्र प्रभाव में वे व्यक्ति को न्याय की मूल अवधारणा से दूर ले जाते हैं. जिस न्याय पर हम फिलहाल विचार करने जा रहे हैं, उसका दायरा विस्तृत है. वह बादशाह, काजी, अदालत, यमराज या किसी दयालु सम्राट के परंपरागत न्याय-बोध से परे है. न्याय के विविध रूपों पर विचार करने से पहले दो किस्से, बतौर उद्धरण यहां प्रस्तुत हैं—

‘महमूद गजनबी का पिता सुबुक्तगीन गजनी के बादशाह का गुलाम था. कहते हैं कि प्रतिभा किसी की चेरी नहीं होती. गरीब के घर विद्वान जन्म ले सकता है, और तमाम इंतजामात के बावजूद बादशाह का बेटा निकम्मा, आलसी, दुर्व्यसनी और मंदबुद्धि हो सकता है. तुर्की मूल के गुलाम सुबुक्तगीन की प्रतिभा को देखते हुए गजनी के बादशाह ने उसे अपना दामाद बना लिया था. अवसर मिला तो सुबुक्तगीन की साम्राज्यवादी लालसाएं जोर मारने लगीं. उसने भारत पर आक्रमण कर कांधार पर कब्जा कर लिया और वहां अपनी छावनी बना दीं. सुबुक्तगीन भारतीय इतिहास में खुद तो ज्यादा हस्तक्षेप न कर सका. लेकिन उसके बेटे महमूद गजनवी ने भारत के बड़े हिस्से पर कब्जा कर अपनी सलनत कायम कर ली. महमूद गजनवी भले ही सुलतान हो, हजारों सैनिकों की फौज का बेड़ा रखता हो. परंतु यह बात वह भी भली-भांति जानता था कि राजा-महाराजाओं को तलवार के दम पर दबाया जा सकता है. परंतु प्रजा को तलवार के बल पर लंबे समय तक दबा पाना असंभव होता है. निहत्थी जनता यदि अपनी पर आ जाए तो बड़े-बड़े साम्राज्य भू-लुंठित होने लगते हैं. हां, उसे भुलावे में जरूर रखा जा सकता है. धर्म, परंपरा, संस्कृति, राष्ट्रवाद जनता को भुलावे में रखने के ही उद्यम हैं. निजी मंसूबों को साधने के लिए चालबाज लोग इन्हीं का सहारा लेते आए हैं. भारतीय राजाओं का इतिहास रहा है कि वे आपसी फूट द्वारा प्रतिपक्षी की विजय को खुद आसान बना देते थे. सुबुक्तगीन को इसी का लाभ मिला था. अपनी छोटी-सी सेना की मदद से उसने युद्ध में स्थानीय राजा जयपाल को बुरी तरह पराजित किया था. उस युद्ध में जयपाल ने एक लाख सैनिक उतारे थे. परंतु युद्ध कौशल का अभाव और आपस की फूट ने उसे हथियार डालने को विवश कर दिया था.

बड़ी सलतनत खड़ी करने और लंबे समय तक बनाए रखने के लिए प्रजा का भरोसा जीतना भी आवश्यक है. सो मोहम्मद गजनवी ने प्रजा को न्याय का भरोसा दिलाया. विश्वास दिलाया कि न्याय के आगे बादशाह हो या फकीर सब बराबर हैं. ‘मनुस्मृति’ के विधान के जरिये ऊंच-नीय और गैरबराबरी में जीने वाले भारतीय जनसमाज के लिए ‘इस्लाम का बराबरी का सिद्धांत’ बड़ा ही आकर्षक सिद्ध हुआ. वर्ण-व्यवस्था के सताए लोग इस्लाम में दीक्षित होने लगे. नए धर्म में शामिल होने के बाद उनके हालात में क्या सुधार हुआ, यह कहना कठिन है. परंतु यह बात सही है कि इस्लाम अपने साथ कई आकर्षक परंपराएं भी लेकर आया था. प्राचीन फारस में न्याय के लिए काजी नियुक्त करने की व्यवस्था थी. काजी उसे बनाया जाता था जो अनुभवी हो. निडर हो. राजा-प्रजा के भेद से जिसका न्याय प्रभावित न होता हो. महमूद का काजी था—मोहतसिब. वह सुलतान के किसी भी आदेश से बरी था. न्याय के लिए उसे किसी खास समय की दरकार न थी. इसलिए लोग उसे चलता-फिरता न्यायालय मानते थे. उसका देखा-सुना ही प्रमाण था. घटना का यदि वह स्वयं साक्षी हो तो बिना किसी औपचारिकता के घटना-स्थल पर अदालत लगा, मामले को वहीं निपटा देता था. राज्य में सामाजिक स्थलों पर शराब पीने या शराब पीकर बाहर निकलने पर पूरी पाबंदी थी. एक दिन सुलतान और उसके सरदार ने शराब पी. नशे से दोनों झूमने लगे. शराब पीने के बाद सरदार ने घर जाने की इच्छा जाहिर की. इस पर सुलतान ने उसे रोका. समझाया कि नशा उतरने के बाद बाहर निकलना. लेकिन सरदार न केवल शराब का बल्कि रुतबे का नशा भी सवार था. सो सुलतान की सलाह की परवाह किए बिना वहां से चल दिया. संयोग ऐसा कि उसी समय काजी मोहतसिब खाना खाने के बाद घूमने के लिए निकला था. उसने सरदार को डगमगाते कदमों से गुजरते देखा तो गुस्सा आ गया. तत्क्षण सरदार को गिरफ्तार कर कोड़े लगाने का दंड सुनाया गया. न्याय हुआ, स्वयं बादशाह अपने चहेते सरदार को बचा न सका.’

ऐसे किस्सों में कितना सच होता है कितना झूठ, यह ठीक-ठीक बता पाना आसान नहीं है. सभी राजा-महाराजा, बादशाह-सुलतान दरबार में भाटों को नियुक्त रखते थे. उनका काम ही था, राजा की महिमा का बखान करते रहना. ताकि जनता को अपने राजा पर भरोसा बना रहे. उस समय तक ‘राजा’ और ‘राज्य’ में बड़ा अंतर नहीं था. राजा एक व्यक्ति के साथ-साथ संस्था भी होता था. उसकी इच्छा ही न्याय होती थी. जाहिराना तौर पर उसका झुकाव राजा के करीबियों की ओर अधिक होता था. न्याय के दूसरे स्वरूप को जानने के लिए दूसरा किस्सा प्रस्तुत है. यह न्याय से जुड़े नैतिक पक्ष की ओर संकेत करता है. महाभारत के वनपर्व में राजा उशीनर के न्याय की कहानी आई हैं. कुछ पुराणों इस कहानी को महान असुरराज बलि की दानवीरता से भी जोड़ा गया है—

‘एक दिन उशीनर दरबार में बैठे हुए थे कि एक घबराया हुआ कबूतर उनकी गोद में आकर गिरा. पीछे-पीछे एक बाज भी वहां आ पहुंचा. शरणागत की रक्षा के लिए उशीनर ने तलवार उठा ली. इस पर बाज बोला—‘महाराज! यह मेरा भोजन है. इसपर मेरा अधिकार है.’ उशीनर ने कबूतर की आंखों में झांककर देखा, वहां भय ही भय था. उसे देख राजा ने कहा—‘यह मेरी शरण में आया है और शरणागत की रक्षा करना मेरा धर्म है.’ बाज इस प्रश्न के उत्तर के लिए तैयार था. बोला—‘आपकी दया और दानवीरता के अनेक किस्से मैं सुन चुका हूं. इस समय मैं भूख से व्याकुल हूं. अगर जल्द कुछ इंतजाम न हुआ तो मैं यहीं दरबार में सबके सामने अपने प्राण त्याग दूंगा. राज्य में भूख के कारण मेरी अकाल मृत्यु के जिम्मेदार एकमात्र आप होंगे.’

उशीनर पेशोपेश में पड़ गया. कबूतर भयभीत था. राज्य-धर्म कहता था, शरण में आए की रक्षा करना. दूसरी ओर बाज भी अपनी जगह सही है. सृष्टि में ऐसे अनेक प्राणी है जिनका आहार दूसरे जीव हैं. प्रकृति की इस व्यवस्था को भी नहीं बदला जा सकता. सहसा राजा ने निर्णय लिया. उसका दायां हाथ उठा. कटार चली. राजा ने जांघ पर प्रहार कर मांस का एक हिस्सा शरीर से अलग कर दिया—‘कबूतर के मांस के बराबर मेरा मांस लेकर तुम अपनी क्षुधा शांत कर सकते हो.’

पहले किस्से में न्याय का लोक-प्रचलित रूप है. न्याय को लेकर सामान्य धारणा इसी प्रकार की होती है. राज्य का कर्तव्य है कि वह प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की रक्षा करे. प्राणरक्षा करना कबूतर का भी अधिकार है. बाज के सामने जब वह खुद को बचा नहीं पाता तो राजा की शरण लेता है. तभी बाज अपने दावे के साथ उपस्थित हो जाता है. एक तरह से दोनों का जीवन दाव पर लगा है. बाज सोचता है कि भोजन नहीं मिला तो उसके प्राण चले जाएंगे. दूसरी ओर कबूतर भी जानता है कि यदि वह बाज के प्राकृतिक अधिकार के आगे झुका तो वह स्वयं अपने जीवन से हाथ धो बैठेगा. उशीनर कबूतर और बाज दोनों के जीवन के अधिकार का सम्मान करता हुआ, तीसरा जो अपेक्षाकृत निरापद रास्ता है, अपनाता है. कबूतर के भार के बराबर अपना मांस देकर वह बाज के जीवन की रक्षा करता है. यह न्याय की पराकाष्ठा है, जिसमें राज्य(उशीनर) किसी भी पक्ष को हानि पहुंचाए बिना उन्हें संतुष्ट कर देता है. यह अपेक्षाकृत दुर्बल प्राणियों के प्रति राज्य के कर्तव्य को दर्शाता है. ऐसी अवस्था में वकील, अदालत आदि की भूमिका अप्रासंगिक हो जाती है. पहले किस्म के न्याय का परिष्कृत रूप हम अदालतों में देखते हैं. न्याय के प्रति जनसाधारण का दृष्टिकोण न्यायालयों में होने वाले न्याय तक सीमित होता है. कई बार क्षोभ और हताशा में डूबा व्यक्ति पुकार उठता है—‘दुनिया से न्याय मानो उठ-सा गया है.’ उस समय उसकी शिकायत पूरे समाज, देश और व्यवस्था से होती है. दूसरी कहानी में न्याय का स्वरूप परिष्कृत है. वहां भौतिक संसाधनों की अपेक्षा अधिकार और कर्तव्य पर चर्चा होती है. न्याय करते हुए उशीनर सामान्य दंडाधिकारी से बहुत ऊपर उठ जाता है. वादी और प्रतिवादी में से किसी को कष्ट न हो, इसलिए वह स्वयं कष्ट-पीड़ा सहकर न्याय का संकल्प उठाता है. हालांकि न्याय की आधुनिक सैद्धांतिकी पर ऐसे उद्धरण पूरी तरह खरे नहीं उतरते.

धर्म-केंद्रित समाजों की सामान्य धारणा होती है कि केवल परमात्मा की कृपा और उसका डर मनुष्य को धर्म की ओर प्रवृत्त कर सकता है. इसलिए हर धर्म के साथ कुछ न कुछ सिद्ध-निषिद्ध जुड़े होते हैं. मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि जो सामाजिक रूप से अनुमन्य है, उसका पालन करे तथा जिन कार्यों को निषिद्ध घोषित किया गया है—उनसे अपेक्षित दूरी बनाए रखे. ये शिक्षाएं विभिन्न सांस्कृतिक कार्यकलापों, किस्से-कहानियों, गाथाओं और मिथकों के माध्यम से जनता तक पहुंचती हैं. उपर्युक्त दोनों कहानियां धर्म के न्यायशील पक्ष को दर्शाती हैं. दोनों राजशाही के दौर की हैं. जिस दौर की ये कहानियां हैं वहां असहमतियों के लिए बहुत कम गुंजाइश थी. इसलिए वर्षों-वर्ष राज्य की मर्जी को ही धर्म और न्याय कहकर महिमा-मंडित किया जाता रहा. प्रकारांतर में ये कहानियां न्याय के दो भिन्न रूपों की ओर हमारा ध्यानाकर्षित करती हैं. जैसा कि अध्याय के आरंभ में ही कहा गया है, इस तरह की कहानियां ही जनसाधारण की चेतना का निर्माण करती हैं. यदि यह सच है तो न्याय को धर्म का विस्तार अथवा उसका प्रतिफल मानने में संकोच कैसा? वैसे भी धर्म जनसाधारण के बीच न्याय की अपेक्षा कहीं लोकप्रिय शब्द है. धर्म का इतिहास भले ही खून-खराबे का रहा हो, पुरोहितों ने उसके सहारे अपना धंधा खूब चमकाया हो, परंतु उसे सामाजिकता का आधार बनाने वाले आरंभिक मनीषियों की नीयत पर संदेह नहीं किया जा सकता. यदि उन्होंने समाज की सुख-शांति के लिए डर को आवश्यक माना तथा समाज उसके कारण शताब्दियों तक अनुशासित रहा तो आगे भी उसका अनुसरण करने में बुराई क्या है! प्रश्न जितना आसान दीखता है, उत्तर उतना सरलीकृत नहीं है. धर्म-प्रधान राज्यों की न्याय व्यवस्था को देखकर इस वास्तविकता को समझा जा सकता है. अपना औचित्य सिद्ध करने के लिए प्रत्येक धर्म नैतिकता का समर्थन करता है. यह बात अलग है कि धर्म-प्रेरित नैतिकता स्वयं स्फूर्त्त नहीं होती. वहां ईश्वर या परमात्मा के रूप में तीसरी सत्ता अवश्य होती है. ऐसी सत्ता जो सर्वोपरि है. सर्वशक्तिमान भी है. जिसका स्वरूप अनिश्चित और अदृश्य है. सर्वोपरि और सर्वशक्तिमान बताकर उसका हर निर्णय अंतिम मान लिया जाता है. वहीं स्वरूप निश्चित न होने के कारण व्यक्ति को यह अवसर मिलता है, कि वह ईश्वर के नाम पर अपनी इच्छाएं थोप सके. धर्मप्राण मनुष्य के सद्कर्म और इच्छाएं बिना ईश्वर को बीच में लाए पूरी नहीं होतीं. परिणामस्वरूप उसके लिए जीवन और व्यक्ति दोनों का महत्त्व घट जाता है. वह अपने फैसले व्यक्ति और समाज की जरूरत के बजाय तीसरी शक्ति को प्रसन्न करने की चाहत के साथ लेने लगता है. ‘रिपब्लिक’ में सुकरात के साथ चर्चा करते हुए ग्लाकॉन नामक पात्र धर्माधारित न्याय की इसी कमजोरी की ओर इशारा करता है. इससे विकास के मायने और लक्ष्य दोनों बदल जाते हैं. प्राचीन सम्राट धर्मालयों के निर्माण पर जितना खर्च करते थे, लोकमहत्त्व के निर्माण यथा सड़क, चिकित्सालय, नहर, स्कूल आदि पर बहुत कम खर्च होता था. भारतीय राजाओं ने देश में जितनी बड़ी संख्या में मंदिर बनवाए, उसका दसवां हिस्सा भी यदि विद्यालय बनवाए होते तो समाज की हालत दूसरी होती. उन्होंने शिक्षा की जिम्मेदारी उस वर्ग को सौंपी हुई थी, जिसके वर्गीय स्वार्थ प्रबल थे. यही कारण है कि शिक्षा भारत में सदा ही धर्म का पूरक संस्कार बनी रही, उसके प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण कभी नहीं पनप सका. बावजूद इसके प्राचीन समाजों में जनविद्रोह की घटनाएं विरल हैं. यह भी संभव है कि जानबूझकर उनका उल्लेख करने से बचा गया हो. इतिहासकारों, लेखकों और कवियों ने उनके दस्तावेजीकरण में उपेक्षा बरती हो. क्योंकि उस दौर में सामाजिक-राजनीतिक घटनाओं को धर्म और सत्ता की दृष्टि से देखने का चलन था. धर्म का जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हस्तक्षेप था. यह जानते हुए भी कि जिसे धर्मानुशासन कहा जाता है, वह स्वयं-स्फूर्त्त नहीं होता. मनुष्य को उसकी कीमत अपने विवेक के रूप में चुकानी पड़ती है, जिससे अपने बुद्धि-विवेक से निर्णय लेने का अभ्यास निरंतर कम होता जाता है.

उपर्युक्त के बावजूद लंबे समय तक न्याय का धर्म-केंद्रित होना ही ‘श्रेष्ठतम न्याय’ माना जाता रहा. वैदिक युग से लेकर दो-ढाई सौ वर्ष पहले तक भारत में यही व्यवस्था काम करती रही. हालांकि ईश्वर को किसी ने देखा नहीं था, धर्म की परिभाषाएं आपस में गड्ड-मड्ड थी, फिर भी लोग एक-दूसरे को समझाते—‘दुनिया धर्म पर टिकी है. ईश्वर सच्चा न्यायकर्ता है.’ यह सोचते हुए वे अपने जीवन के महत्त्वपूर्ण निर्णय भी दूसरों के हवाले कर देते. बिना यह सोचे-विचारे कि ईश्वर के नाम पर स्वार्थ का सारा कारोबार उसके चेले-चपाटों ने कब्जाया हुआ है. चूंकि तीसरी शक्ति का कल्पना से बाहर कोई अस्तित्व नहीं है, इसलिए जनसाधारण ईश्वरेच्छा के नाम पर चंद लोगों की मनमानी का दास होकर रह जाता है, जिन्हें वह अपना गुरु अथवा अधीश्वर मानता है. उनके प्रभाव में न्याय व्यक्ति का अधिकार न रहकर शीर्ष पर बैठे लोगों की अनुकंपा मान लिया जाता है. इसी के साथ व्यक्ति से निर्णय की आलोचना का अधिकार छिन जाता है. कई बार तो न्याय की आलोचना या विरोध को दैवीय इच्छा का अपमान मान लिया जाता है. इस कोशिश में मानवीय अस्मिता को पीछे ढकेल दिया जाता है. मनुष्य के मान-सम्मान, आत्मगौरव, सहज विश्वास यहां तक कि स्वतंत्र पहचान को भी धर्म की राह में बाधक मान लिया जाता है. यह नजरंदाज कर दिया जाता है कि न्याय व्यक्ति का अधिकार, राज्य का अपने नागरिकों के प्रति पवित्रतम दायित्व है. उसे राज्य की अनुकंपा मानना समाजीकरण के उद्देश्यों पर पानी फेरने जैसा है. न्यायशीलता राज्य और राजा दोनों का अभीष्ट गुण है. यदि किसी धर्म में यह गुण मौजूद है तो निश्चित रूप से वह प्रशंसनीय है. फिर भी न्याय को धर्म का प्रतिफल मानना सर्वथा अनुचित होगा. उसे लोकचेतना का विस्तार अवश्य कहा जा सकता है. अरस्तु के शब्दों में न्याय, ‘समाज का शुभत्व है, वही राज्य को शुभत्व प्रदान करता है.’

अभी तक के विश्लेषण से न्याय की दो प्रवृत्तियां उभरती हैं. अदालतों में वकील, जज आदि के माध्यम से होने वाला न्याय. दूसरे अपने नागरिकों के प्रति राज्य के कर्तव्य के रूप में निरूपायित न्याय. भारतीय धर्मग्रंथों में न्याय के प्रथम रूप पर पर्याप्त चर्चा है. ब्राह्मण ग्रंथों, स्मृतियां और धर्मसूत्रों में इसपर खुलकर विचार किया गया है. उसे राज्य का कर्तव्य बताया गया है. परंतु न्याय के दूसरे पक्ष जो नागरिक-समाज के प्रति राज्य के दायित्व को दर्शाता है, को लेकर भारतीय वाङ्मय में गहरी चुप्पी पसरी है. अर्थशास्त्र में राजा के सामने हालांकि लोकहित का बड़ा आदर्श रखा गया है. जोर देकर कहा गया है—‘प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है. प्रजाहित में राजा का हित सन्निहित है.’2 ‘विष्णु धर्मसूत्र’ में भी इस भावना को विस्तार दिया गया है. तदनुसार—‘जो राजा प्रजा के सुख में सुखी, उसके दुख में दुखी हो जाता है. उसे संसार में अपनी कीर्ति बनाए रखने के लिए यज्ञ और तपादि की आवश्यकता नहीं है.’3 लेकिन यही ग्रंथ जब राजा को पृथ्वी का ईश्वर या देवता घोषित करते हैं, और उसके हाथ में सारे अधिकार सौंप देते हैं, और उत्तराधिकार में अंतरित राजन्य जब अयोग्य हाथों में पहुंचकर मनमानी का अवसर देता है, तब वह एक ऐसी निरंकुश शक्ति का प्रतीक बन जाता है, जिसका निर्णय समीक्षा और आलोचना से परे है. इन ग्रंथों के अनुसार राजा अकेला ही रक्षक, प्रजापालक, अन्नदाता, दंडाधिकारी वगैरह सबकुछ होता था. फैसले पर कोई सवाल न उठे, इसलिए उसके निर्णय को देववाणी घोषित कर दिया जाता था.

न्याय की दृष्टि से पश्चिमी दर्शन अपेक्षाकृत उदार रहे हैं. विशेषकर सुकरात और उसके बाद के यूनानी विचारक. मानव-केद्रित होने के कारण वे नियतिवाद से उतने प्रभावित नजर नहीं आते, जितने भारतीय धर्म-दर्शन. ऐसा नहीं है कि यूनानी साहित्य मिथकीय प्रभावों से सर्वथा मुक्त रहा है. इस आधार पर यूनानी दर्शनों को सुकरात पूर्व और सुकरात के बाद के दर्शनों में बांटा जा सकता है. सुकरात पूर्व के यूनानी दर्शनों पर मिथकीय चरित्रों का वैसा ही प्रभाव है, जैसा भारतीय धर्म-दर्शनों पर. कुछ अंशों में यह प्लेटो के विचारों पर भी बना रहता है. लेकिन प्लेटो उससे सिर्फ प्रेरणा लेता है. अपने विचारों को परंपरा से बांधता नहीं है. अरस्तु सहित उत्तरवर्ती विचारक उसे और भी विस्तार देते हैं. वस्तुतः ईसा पूर्व छठी शताब्दी का समय पूरी दुनिया में बौद्धिक क्रांति का था, जिसमें विश्वास को तर्क की कसौटी कसा जाने लगा था. भारत में उसके सूत्रधार थे— गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी तथा यूनान में सुकरात, प्लेटो, जेनोफीन, डेमीक्रिटिस आदि. भारत में जैन एवं बौद्ध दर्शन के अलावा अनीश्वरवादी विचारक यथा आजीवक, लोकायत, वैनायिक भी वैदिक परंपरा के धर्म-दर्शनों का तार्किक विरोध कर रहे थे. फिलहाल उनके पक्ष में शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध न होने के कारण कुछ भी कहना अनुचित होगा. बुद्ध और सुकरात दोनों ने अपने-अपने देश में ठेठ परंपरावाद, आडंबर और दिखावे का जोरदार विरोध किया था. दोनों ने दर्शन के क्षेत्र में व्यावहारिकता को समर्थन दिया. यूनान में सुकरात आदि के नेतृत्व में उभरे बौद्धिक आंदोलनों ने मिथकीय विश्वासों को दर्शन के क्षेत्र से करीब-करीब अलग-थलग कर दिया था. इससे न्याय के क्षेत्र में स्वतंत्र चिंतन को बल मिला.

एक प्रसिद्ध ग्रीक कहावत है—‘मनुष्य अपने लिए न्याय का दरवाजा स्वयं खोलता है.’ इसका मंतव्य एकदम स्पष्ट है. जब भी कोई मनुष्य अपने मित्रों, सगे-संबंधियों, पड़ोसियों तथा परिजनों के प्रति न्याय-भाव से परिपूर्ण आचरण करता है, तो उसके अपने लिए न्याय के रास्ते प्रशस्त हो जाते हैं. उसे न्याय के लिए भटकना नहीं पड़ता. आवश्यकता पड़ने पर न्याय स्वयं उस तक चला आता है. दूसरे शब्दों में ‘न्याय ही न्याय को कमाता है.’ कदाचित इसीलिए सुकरात ने कहा था—‘न्याय समाज का सद्गुण है. वह समाज में शुभत्व की उपस्थिति को दर्शाता है.’ सुकरात की यह अवधारणा न्याय की आधुनिक परिभाषा के काफी निकट है. हालांकि यूनान में सुकरात के पहले से ही न्याय को समझने की कोशिश होती रही है. सोलोन की कविता में कहा गया है कि ‘बिना कानून के राज्य को कानून एवं व्यवस्था के राज्य में बदल देना चाहिए.’4 यूनानी धर्मशास्त्रों में ‘दाइक’ को न्याय की देवी बताया गया है. हेसियद की कविता में ‘दाइक’ को ‘क्रूरता को समाप्त करने के लिए जीयस की ओर से उपहार’ बताया गया है. प्लेटो ने ‘दाइक’ को दंड के निषेध के रूप में, उदारता एवं विवेक से न्याय करने वाली पराशक्ति के रूप में परिभाषित किया है. ‘दाइक’ की प्रतिपक्षी के रूप में ‘अदाइका’ का उल्लेख है, जिसे यूनानी धर्मशास्त्रों में ‘अन्याय’ की देवी माना गया है. मिथकीय गाथा के अनुसार ‘दाइका’ अन्याय की देवी ‘अदाइका’ को छड़ी से पीटकर भगा देती है. रोमन धर्मशास्त्रों में ‘दाइक’ की समकक्ष देवी ‘जस्टीटिया’ है. दोनों अपने हाथ में न्याय के प्रतीक के रूप में ‘तराजू’ को उठाए रहती हैं. स्पष्ट है कि भारतीय धर्मशास्त्रों की भांति प्राचीन यूनानी एवं रोमन धर्मशास्त्रों में भी न्याय की आरंभिक अवधारणा रूढ़ ही रही है. उसमें बदलाव ईसा पूर्व छठी शताब्दी के बाद से दिखाई पड़ता है. सुकरात उसका प्रमुख सूत्रधार है.

उन दिनों का यूनानी समाज युद्ध-प्रिय समाज था. यूनानी द्वीप समूह पर छोटे-छोटे राज्य थे. उनके बीच आपस में युद्ध होता रहता था. स्पार्टा और एथेंस के बीच तो शताब्दियां पुराना वैर-भाव था. वहां का पूरा समाज युद्धक मानसिकता में जीता था. वास्तविक नायकों की पूजा के दौर में मिथकों का अप्रासंगिक हो जाना स्वाभाविक भी था. उस समय के सभी प्रमुख विचारकों हिरोटोडस, एनेक्सिमेंडर, पेरामेनीडिस, प्लेटो, जेनोफीन, हेराक्लाट्स आदि के विचार युद्धक भावनाओं से भरे हैं. एनेक्सिमेंडर(610—546 ईस्वीपूर्व), हेराक्लाइट्स जैसे विद्वान युद्ध को सकारात्मक अर्थ में देखते थे. वह न्याय को ऐसे ही अंत:संघर्षों का परिणाम मानता था. उसका मानना था, ‘युद्ध सामान्य बात है. न्याय दो पक्षों में विक्षोभ की परिणति है. उसके परिणाम विवाद की प्रवृत्ति और आवश्यकता के अनुसार बदलते रहते हैं.’ एनेक्सिमेंडर भी न्याय को व्यवहार की श्रेष्ठता के रूप में देखता था. उसके अनुसार मनुष्य का कर्तव्य है—‘परस्पर न्याय-भावना के साथ पेश आना और एक-दूसरे के अन्याय को भूलते चले जाना.’ उसके अनुसार न्याय को उस रूप में देखना चाहिए जिसके अनुसार वस्तुएं अपने स्वाभाविक रूप में आकार ग्रहण करती हैं तथा किसी समय विशेष में दूसरी वस्तुओं पर प्रभाव डालती हैं. उल्लेखनीय है कि एनेक्सिमेंडर की न्याय-संबंधी अवधारणा में समानता और स्वतंत्रता के लिए कोई जगह नहीं थी. उसका महत्त्व न्याय को दार्शनिक विवेचना की विषय-वस्तु बनाने के कारण है.

उस समय पूरे यूनान में दास प्रथा थी. अर्थव्यवस्था में दासों की संख्या का बड़ा योगदान था. सुकरात के समय एथेंस की कुल जनसंख्या लगभग तीन लाख थी. उसमें से 125000 दास तथा लगभग 25000 कृषिदास अथवा अर्धदास थे. कृषिदास मुख्यतः कृष्ट भूमि से जुड़े किसान थे. भू-अधिकार में परिवर्तन के साथ ही उनका स्वामित्व भी नए भू-स्वामी के हाथों में अंतरित हो जाता था. अर्धदासों में छोटे शिल्पकार और कारीगर भी आते थे. एथेंस और रोम की संपन्नता का सारा दारोमदार उन्हीं के कंधों पर था. इसलिए दर्शन के क्षेत्र में शुभत्व और सदगुण की मांग करने वाले सुकरात, प्लेटो और अरस्तु जैसे विचारक भी दास प्रथा के समर्थक थे. वे उसे समाज की आवश्यकता के रूप में देखते थे. अभिजात वर्ग में जन्मे विचारकों के लिए उस व्यवस्था का विरोध एकाएक संभव भी न था. न्याय संबंधी उनकी अवधारणा जीवन में सामान्य नैतिकता के अनुपालन तक सीमित थी. एनेक्सिमेंडर के लिए न्याय का सामान्य अर्थ था—व्यक्ति के संपत्ति-अधिकारों की सुरक्षा. उन दिनों यूनानी देशों की परंपरा थी कि यदि किसी कुलीन परिवार की स्त्री का पति मर जाता था, तो उसकी संपत्ति राज्य के अधीन मान ली जाती थी. इस कानून के विरोध में स्त्रियां मोर्चा निकाल चुकी थीं. एनेक्सिमेंडर जैसे कुछ विचारक कुलीन परिवार की विधवाओं को संपत्ति अधिकार देने के पक्ष में थे. दूसरे की संपत्ति पर अधिकार को अनैतिक माना जाने लगा था. सुकरात के समकालीन थियोगनिस की काव्य-पंक्तियों में तत्कालीन समाज में न्याय एवं कानून-व्यवस्था के प्रति क्षोभ समाया हुआ है—

‘उन्होंने हिंसा द्वारा संपत्ति कब्जा ली है. यह पूरे विश्व के लिए संकट की स्थिति है. वास्तविक न्याय अब संभव नहीं दिखता.’5

हेराक्लाइट्स(535—475 ईस्वीपूर्व) न्याय को उसके सामान्य अर्थों से बढ़कर मानता था. उसका मानना था कि न्याय ब्रह्मांड का सर्वाधिक क्रियाशील तत्व है. हेराक्लाइट्स की न्याय संबंधी अवधारणा को एनेक्सिमेंडर के विचारों के तत्वावधान में समझा जा सकता है. एनेक्सिमेंडर विश्व को दो ध्रुवी मानता था. उसका मानना था कि समय विशेष में दोनों ध्रुवों से कोई एक सक्रिय रहता है. उस दौरान दूसरा शांत बना रहता है. कभी-कभी दोनों में एक जीत की ओर अग्रसर रहता है तो दूसरा पराजित होता दिखाई पड़ता है. द्वंद्व के बीच ऐसा अवसर भी आता है जब दूसरे पक्ष की सहनशक्ति समाप्त हो जाती है. वह पलटकर प्रहार करता है. इससे परिवर्तन की स्थिति उत्पन्न होती है. इस धारा का विस्तार हीगेल के ‘द्वंद्ववाद’ तथा मार्क्स के सुप्रसिद्ध दर्शन ‘ऐतिहासिक भौतिकवाद’ में देखा जा सकता है. एनेक्सिमेंडर द्वंद्व को न्याय की स्वाभाविक अवस्था मानता था. उसके अनुसार विपरीत विचारधाराओं का द्वंद्व समाज को न्याय की ओर ले जाता है. उन्हें सार्थक परिणाम तक पहुंचाने में समय की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है. अपने मंतव्य को स्पष्ट करने के लिए वह धनुष का उदाहरण देता है. उसके अनुसार धनुष में खिंचाव उत्पन्न होने पर उसके दोनों सिरे डोर को अपनी-अपनी ओर खींचते हैं. उनके खिंचाव की दिशा परस्पर विरोधी होती है. खिंचाव से धनुष असामान्य अवस्था में आ जाता है. फिर भी धनुष ठीक से काम करे उसके लिए खिंचाव आवश्यक है. बगैर तन्यता के धनुष काम नहीं कर पाएगा. लक्ष्य भेदने के लिए खिंचाव की मात्रा तथा उसकी दिशा महत्त्वपूर्ण होती है.

हेराक्लाट्स के अनुसार विपरीतधर्मियों का द्वंद्व सदैव बाहर की ओर नहीं होता. मनुष्य के भीतर भी अंतर्द्वंद्व प्रभावी रहते हैं. अच्छे और बुरे का बोध मानवीकरण की प्रक्रिया का प्रथम चरण होता है. वही उस प्रक्रिया को आसान बनाता है. हेराक्लाइट्स के लिए द्वंद्व ही सृष्टि की समस्त गतियों का उत्प्रेरक है. द्वंद्वात्मकता का सबसे बड़ा प्रमाण है, सृष्टि में नर और मादा जैसे विपरीतलिंगी जीवधारियों की मौजूदगी. यदि यह नहीं तो दुनिया में सब कुछ थम-सा जाए. हेराक्लाइट्स यह मानने को तैयार नहीं था कि दुनिया में अन्याय है. बल्कि उसका मानना था कि यह न्याय ही है जो दुनिया की हर चीज को संवारे हुए है. उसके अनुसार संसार में द्वंद्व से मुक्ति असंभव है. द्वंद्व सृष्टि को संवारता तथा उसके विकास को गति देता है. उसका समकालीन पेरामेनीडिस न्याय को समाज के लिए उत्प्रेरक शक्ति के रूप में देखता था. न्याय-केंद्रित समाजों में मनुष्य को यह विश्वास होता है कि समाज में रहते हुए उसके हित सुरक्षित है. आवश्यकता पड़ने पर पूरा समाज मदद के लिए उसके साथ होगा. उसने न्याय को समाज की प्रमुख मार्गदर्शक शक्ति माना है. तदनुसार न्याय मनुष्य का समाज में विश्वास बढ़ाता है. उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है. एक कविता में उसने देवी के मुंह से कहलवाया है—

‘सुनो! बुराई तुम्हें आगे नहीं ले जाएगी. इस रास्ते पर मनुष्य को आगे बढ़ने से रोकने के लिए बाधाएं अनेक हैं. केवल न्याय और कानून ही तुम्हें राह दिखा सकते हैं.’6

एनेक्सिमेंडर, हेराक्लाट्स, पेरामेनिडस आदि जितने भी सुकरात पूर्व तथा उसके समकालीन यूनानी चिंतक हैं, सभी ने न्याय को अपनी-अपनी तरह से परिभाषित करने की कोशिश की थी. परंतु लगभग सुकरात पूर्व के सभी विचारक न्याय को ईश्वर के संदर्भ में देख रहे थे. उनके लिए न्याय या तो ईश्वर का उपहार था अथवा दैवीय विधान, जिसमें किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप अवांछनीय है. कह सकते हैं कि जिस तरह भारतीय चिंतक न्याय को धर्म के उपांग या उपहार के रूप में देखते थे, वैसे ही पश्चिम में भी न्याय ईश्वरीय प्रेरणा या उपहार तक सीमित था. इसके लिए वहां ‘न्याय की देवी’ जैसी मिथकीय कल्पना भी मौजूद है. हालात में परिवर्तन सुकरात के आगमन से होता है. सुकरात ने सत्य को सद्गुण और सद्गुणों को शुभत्व की यात्रा का पाथेय मानकर उसे सामाजिक नैतिकता का विषय बना दिया. भारत में व्यावहारिक नैतिकता पर जोर देने का काम सुकरात से थोड़ा पहले बुद्ध ने किया था. बुद्ध की न्याय-संबंधी अवधारणा व्यैक्तिक एवं सामूहिक हितों से मिलकर बनी थी. उनके अनुसार व्यक्तिमात्र की खुशी आत्मलाभ में होती है. यानी हर कोई अपनी खुशी चाहता है. यह मनुष्य की सामान्य प्रवृत्ति है. दूसरी ओर समाज का हित सामूहिक लाभ में होता है. चूंकि समाज व्यक्ति-सापेक्ष रचना है. उसमें व्यक्ति स्वयं समाहित हैं, इसलिए समाज-हित तभी संभव है जब उसमें व्यक्तिमात्र के हितों की सुरक्षा होती हो. इसलिए न्याय का अभिप्रायः ‘सामूहिक आत्मलाभ’ है. ऐसी व्यवस्था जिसमें समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने तथा बाकी सदस्यों के सुख एवं सुरक्षा के प्रति आश्वस्त हो.

प्लेटो का न्याय-दर्शन

प्लेटो के विपुल लेखन को देखते हुए विद्वानों की यह धारणा रही है कि जो प्लेटो के दर्शन में नहीं है, वह कहीं भी नहीं है. न्याय के बारे में भी सबसे पहले और विशद् विवरण प्लेटो के दर्शन में प्राप्त होता है. न्याय के पर्यायवाची के रूप में उसने ग्रीक भाषा के शब्द ‘दिकायसने’(Dikaisyne) का प्रयोग किया है, जिसका अभिप्राय है—‘नैतिकता’ अथवा ‘न्याय-परायणता’ से है. ग्रीक साहित्य में ‘दाइक’ मिथकीय कल्पना है, जिसे ‘न्याय’ की देवी’ कहा जाता रहा है. परंतु प्लेटो का ‘दिकायसने’ मिथकीय न होकर न्याय को समर्पित राज्य की आदर्श व्यवस्था है. वह न्याय को मनुष्य की संपूर्ण कर्तव्यपरायणता के रूप में देखता है. कर्तव्यपरायणता से उसका आशय उन सभी कार्यों से है, जिनसे कोई व्यक्ति अपने साथ-साथ दूसरों को भी प्रभावित करता है; अथवा जिनके परिणाम किसी न किसी रूप में समाज पर असर डालते हैं. उसके अनुसार व्यक्ति का चयन ऐसा होना चाहिए जिससे समाज में शुभत्व का विस्तार हो. वह न्याय को ‘आत्मा का विशिष्ट गुण’ मानता था.’ उसका मानना था कि सभी मनुष्य अपने-अपने कर्तव्य को समर्पित होंगे तो समाज स्वतः ही अपने दायित्वों के प्रति सजग रहेगा. अतएव न्याय व्यक्ति-मात्र की ऐसी नैतिक साधना है जिसमें वह उन सभी वस्तुओं से दूरी बनाने लगता है, जो उसके निर्णय सामर्थ्य को नितांत व्यक्तिगत बनाती हैं. यहां तक कि वह अपनी उन सभी इच्छाओं भी से दूरी बना लेता है, जो वृहद सामाजिक हितों का अवरोधक है तथा जिनमें स्वार्थपरता की गंध बसी हो. समाज को शुभत्व की ओर अग्रसर करने के लिए उसकी प्रत्येक इकाई का सहयोग अत्यावश्यक है. इस अवधारणा में ‘सोशल कांट्रेक्ट’ के बीजतत्व देखे जा सकते हैं, जिन्हें आगे चलकर हॉब्स और रूसो के लेखन में विस्तार मिला.

प्लेटो का न्याय इकतरफा नहीं है. न ही, उसके अनुसार न्याय के स्वत्व को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी केवल मनुष्य की है. समाज की भी जिम्मेदारी है कि अपनी नागरिक इकादयों को वह सब प्राप्त करने में मदद करे जो उनका अधिकार है. समाज और व्यक्ति दोनों का भला इसी में है कि व्यक्तिमात्र को वही कार्य सौंपा जाना चाहिए जिसके वह सर्वाधिक योग्य है.7 न्याय को परिभाषित करते हुए वह लिखता है—‘व्यक्ति को समाज में वह सब कुछ प्राप्त होना चाहिए, जो उसका प्राप्य है.’ अब व्यक्ति का ‘प्राप्य’ क्या है. यदि सभी मनुष्य केवल अपने प्राप्य का ध्यान केंद्रित कर लें तो समाज का क्या होगा? जार्ज हॉलेंड सेबाइन के अनुसार, ‘प्राप्य’ में कर्तव्य और दायित्व दोनों सन्निहित हैं. ‘हिस्ट्री ऑफ पॉलिटिकल थ्योरी’ में ‘प्राप्य’ की विवेचना करता है—‘व्यक्ति के लिए उसका प्राप्य क्या है?’ इससे प्लेटो का अभिप्राय है कि व्यक्ति के साथ उसकी योग्यता, रुचि, शिक्षा-दीक्षा और कार्यकुशलता के अनुसार व्यवहार किया जाना चाहिए. सेबाइन के अनुसार इसमें यह भी अंतर्निहित है कि व्यक्ति को उसकी योग्यता के अनुसार समाज की ओर से जो भी कर्तव्य सौंपे जाएंगे, उनका पालन वह अपनी संपूर्ण कार्यनिष्ठा, संकल्प और क्षमता के साथ करेगा.’ प्लेटो स्पष्ट करता है कि राज्य का दायित्व नागरिकों की सुरक्षा, शांति-व्यवस्था एवं स्वतंत्रता की रक्षा करने तक सीमित नहीं है. राज्य का यह भी कर्तव्य है कि अपने नागरिकों के सामाजिक-आर्थिक जीवन में सुधार के लिए वह वे सभी प्रयत्न करे, जो आवश्यक हैं और जिन्हें वह अपने सामर्थ्य के अनुसार करने में सक्षम है. लेकिन राज्य तो अमूर्त्त है. नागरिकों से इतर उसका कोई वजूद नहीं है. इसलिए प्लेटो के अनुसार राज्य के जो अधिकार एवं दायित्व हैं, वे अप्रत्यक्ष रूप से उसके नागरिकों के अधिकार एवं दायित्वों के आधार पर ही जाने जाते हैं. राज्य अपने नागरिकों की योग्यता एवं कार्यकुशलता को देखते हुए उनके लिए कर्तव्य विहित करता है, जिनका अनुपालन नागरिकों की जिम्मेदारी है. बदले में राज्य अपने नागरिकों के सुख, सुविधा, स्वतंत्रता एवं सुरक्षा के लिए वह सभी करने के लिए वचनबद्ध होता है, जिसे करने में वह सक्षम है.

प्लेटो का न्याय-दर्शन सुकरात की शुभता की अवधारणा से प्रभावित था, जिसने ज्ञान को सद्गुण की संज्ञा दी थी. सुकरात ने स्वयं कोई ग्रंथ नहीं लिखा. परंतु प्लेटो के दर्शन में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में हर जगह उसकी उपस्थिति है. इसलिए यह तय करना बड़ा ही कठिन है कि ‘रिपब्लिक’ आदि ग्रंथों में जो विचार सुकरात के हवाले से आए हैं, क्या वे सचमुच सुकरात के विचार हैं; अथवा प्लेटो ने अपने विचार, गुरु सुकरात को अतिरिक्त सम्मान देने के लिए, उसके माध्यम से व्यक्त किए हैं? समानांतर प्रश्न यह भी हो सकता है कि यदि वे विचार सुकरात के ही हैं, तो क्या प्लेटो ने उन्हें उसी रूप में, वस्तुनिष्ठ भाव से अभिव्यक्त किया है, अथवा अपनी ओर से उनमें कुछ फेर-बदल किया है. इस बारे में विश्वास के साथ कुछ भी कहना कठिन है. इतना अवश्य है कि प्लेटो अपने गुरु से बेहद प्रभावित था. उन दिनों एथेंस में गणतंत्र को आदर्श राजदर्शन के रूप में मान्यता प्राप्त थी. प्लेटो ने गणतंत्र को भीड़तंत्र में बदलते हुए भी देखा था. सुकरात को गणतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा ही मृत्युदंड दिया गया था. यह प्लेटो के लिए व्यक्तिगत रूप से बहुत भारी क्षति थी. इन घटनाओं का उसके व्यक्तित्व पर इतना अधिक प्रभाव पड़ा था कि सक्रिय राजनीति से ही अरुचि हो चली थी. उसके लेखन का बड़ा हिस्सा आदर्श राजदर्शन की खोज को समर्पित है. इसी क्रम में वह न्याय को अलग-अलग दृष्टि से परिभाषित करता है. न्याय को लेकर ‘रिपब्लिक’ का पहला और चौथा खंड तथा ‘दि लॉज’ जैसा विशद् ग्रंथ विशेषरूप से दृष्टव्य है. ‘दि लॉज’ प्लेटो द्वारा वृद्धावस्था में रचा गया ग्रंथ है, जब उसपर किंचित निराशा हावी होने लगी थी. ‘रिपब्लिक’ की गिनती राजनीतिक दर्शन के प्रमुखतम ग्रंथों में ही जाती है. ग्रंथ में प्लेटो जिस गंभीरता के साथ ‘न्याय’ पर विचार करता है, उससे स्पष्ट हो जाता है कि उसका मुख्य विषय ‘राजनीतिक दर्शन’ अथवा ‘गणतंत्र’ न होकर ‘न्याय’ है.

न्याय की पर्त-दर-पर्त व्याख्या करता हुआ प्लेटो स्पष्ट करता है कि राज्य की सफलता तभी सुनिश्चित है, जब उसके नागरिक निर्दिष्ट कर्तव्यों का संपूर्ण निष्ठा के साथ पालन करें. व्यापारी निष्ठापूर्ण ढंग से व्यापार करें, सेनाएं युद्ध में वीरता का प्रदर्शन कर राज्य की गरिमा को सुरक्षित रखें तथा संरक्षक वर्ग अपने दायित्वों का कुशलतापूर्वक निर्वाह करे. समाज के ये सभी वर्ग बिना दूसरे के काम में बाधा उत्पन्न किए अपने कर्तव्य का पालन करें, तभी राज्य की समृद्धि और सुरक्षा संभव है. इसके साथ-साथ वह यह भी कहता है कि यदि सभी नागरिक अपने-अपने कर्तव्य-पालन के प्रति सचेत हों तो ‘कानून’ और ‘न्याय’ जैसे मुद्दों का कोई अर्थ ही न रहे. जीवन में राज्य की भूमिका सिमट जाए. राज्य और नागरिकों के संबंधों की व्याख्या प्लेटो के लगभग 2100 वर्ष बाद जॉन लॉक, थॉमस हॉब्स और रूसो के दर्शन में देखने को मिलती है. रूसो का ग्रंथ ‘सोशल कांट्रेक्ट’ प्लेटो के दर्शन-चिंतन का विस्तार है. प्लेटो मानता था कि अज्ञानता और स्वार्थपरता के चलते लोग कर्तव्य-पालन में चूक करते रहते हैं. मानवीय कमजोरियां उसके कर्तव्यपालन में विचलन का कारण बनती हैं. वही समाज में शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बाहरी शक्तियों की आवश्यकता को जन्म देती हैं. इससे राज्य को शक्तिशाली होने का अवसर मिलता है. शक्तिशाली राज्य खुद को और शक्तिमान बनाने के लिए नागरिक अधिकारों का हनन करता है. इस समस्या के समाधान हेतु प्लेटो प्रचलित राज्य प्रणालियों पर विचार करता है और अंततः दार्शनिक सम्राट के विचार पर जाकर ठहरता है. उसके अनुसार केवल दार्शनिक ही सत्ता-मोह ने निर्लिप्त, निष्पक्ष, दूरदृष्टा और ईमानदार हो सकता है.

‘न्याय’ को राज्य की नैतिकता से जोड़ने वाला प्लेटो अकेला यूनानी चिंतक नहीं है. बल्कि उसे जमीन देने और आगे बढ़ाने वाले विचारकों की लंबी परंपरा है. आरंभिक यूनानी दर्शन के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति तथा वस्तु का पूर्व निर्धारित स्थान और कर्तव्य होता है. व्यक्ति अपने कर्तव्य को पूरे मनोयोग तथा विवेक सम्मत ढंग से करे, इसके लिए उसकी किसी भी पराभौतिक शक्ति के बंधन और तत्संबंधी पूर्वाग्रहों से मुक्ति अनिवार्य है. प्लेटो परमसत्ता को कर्मशील मानता था, जो अपने कर्तव्य से उसी प्रकार आबद्ध है, जैसे सृष्टि की बाकी वस्तुएं तथा प्राणी. इसलिए अपने दायित्व का निर्वहन करना समाज के प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह किसी भी पद अथवा प्रतिष्ठा से जुड़ा क्यों न हो, की जिम्मेदारी है. यह पराभौतिक शक्तियों पर भी, यदि वे हैं तो, उतनी ही गंभीरता से लागू होता है. समस्या तब उत्पन्न होती है, जब व्यक्ति शक्ति के उन्माद में अपने कर्तव्य की उपेक्षा करने लगता है. शक्ति की अनुभूति अथवा शक्तिकेंद्रों पर अल्पतम लोगों का अधिकतम नियंत्रण सत्तासीन वर्ग में श्रेष्ठता का दर्प पैदा करता है. यही दर्प उसको नियमों की अवहेलना के लिए उकसाता है. यह भ्रम पैदा करता है कि वह दूसरों पर शासन करने, नियम बनाने के लिए जन्मा है, न कि बंधे-बंधाए नियमों के अनुपालन हेतु. इसलिए जो व्यक्ति उस जैसे या उतने शक्ति-संपन्न नहीं हैं, उनका कर्तव्य है कि उसका आदेश मानें. श्रेष्ठता-दंभ का प्रभाव आंतरिक भी होता है. सामान्यतः मनुष्य विवेक से अधिक अहं से निर्देशित होते हैं. कभी-कभी ऐसा अवसर भी आता है जब शक्ति के उन्माद तथा घमंड में डूबा व्यक्ति अपने कर्तव्य से विमुख हो, मनमानी पर उतारू हो जाता है. परिणामस्वरूप समाज में अंतर्द्वंद्व पैदा होते हैं. किसी भी सत्ता की संपूर्ण शक्तियां समाज की समेकित शक्ति के सापेक्ष नगण्य होती हैं. इस कारण प्रत्येक सत्ता वह चाहे जितनी शक्तिशाली हो, दूसरों पर शासन चलाने के लिए उसकी शक्तियां लंबे समय तक कारगर नहीं होतीं. शिखर पर बने रहने के लिए उसे जनता के सामान्य समर्थन की जरूरत पड़ती है. शासन के किसी भी निर्णय, वह चाहे जितना महत्त्वपूर्ण क्यों न हो, की सफलता तब तक संद्धिग्ध रहती है, जब तक समाज के सभी वर्गों का उसे खुला समर्थन प्राप्त न हो. अतः यह कहना कि कानून राज्य बनाता है, और केवल राज्य के भरोसे वे कारगर सिद्ध होते हैं, सर्वथा अनुचित है. राज्य कानून बनाता है. लेकिन कानून बनाने की शक्ति उसे जनसमाज की ओर से प्राप्त होती है. इसलिए कानून की सफलता व्यापक जनसहयोग पर निर्भर करती है. धर्म और सांस्कृतिक प्रतीक तथा उनसे जन्मे संस्कार अधिकतम जनता द्वारा समर्थित होने के कारण ही लोकप्रिय बने रहते हैं. अतएव शिखर पर मौजूद लोगों का दायित्व है कि वे जनता, जो उनकी शक्तियों का एकमात्र स्रोत एवं वास्तविक अधिमान्य सत्ता है, के प्रति ईमानदार तथा कर्तव्यनिष्ठ रहें. परंतु व्यक्ति या समूह का दर्प उसे कानून या अनुशासन में बंधने से रोकता है. इसलिए प्राचीन यूनानी विधिशास्त्र में दर्प को कुचल डालने की अनुशंसा की गई है. यह माना गया है कि दूसरों से श्रेष्ठता का दर्प मनुष्य को कर्तव्य से विमुख होने तथा उनके कार्य में बाधा खड़ी करने के लिए उकसाता है. प्लेटो की ‘न्याय’ संबंधी अवधारणा इसी यूनानी चेतना से बनी थी. उसके लिए ‘न्याय’ का मतलब था—‘सामाजिक आदर्श का बोध तथा कर्तव्यपरायणता. वह मानता था कि आदर्श राज्य की परिकल्पना को साकार करने के लिए आंतरिक शुभता अपरिहार्य है. व्यापक स्तर पर यह कैसे संभव हो इसके लिए वह प्रचलित राजदर्शनों की विवेचना करता है.

‘रिपब्लिक’ के माध्यम से हमारा सामना प्लेटो की बड़ी समस्या से होता है. सुकरात को एथेंस की न्याय प्रणाली के आधार पर दंडित किया गया था. जूरी के सदस्यों के चयन हेतु कोई विधि-सम्मत प्रक्रिया न थी. उसमें व्यक्ति की आर्थिक समृद्धि का बड़ा योगदान था. वाक्-चातुर्य और दूसरों को प्रभावित करने की कला उसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थी. जिस जूरी ने सुकरात को मृत्युदंड सुनाया था, उसके सदस्यों अपने दुराग्रह प्रबल थे. उनमें से अधिकांश सुकरात की साफगोई के कारण उससे ईर्ष्या करते थे. सुकरात के विचार उनके लिए चुनौती बने थे. इसलिए सुकरात पर चलाए जा रहे मुकदमे का वास्तविक उद्देश्य उसकी अवमानना या उसे दंडित करने से अधिक उस वैचारिकी को परास्त होते देखना था, जो उनके वर्चस्व के लिए चुनौती बन चुकी थी. सारा तमाशा आधी-अधूरी गणतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से, न्याय के नाम पर हुआ था. यहीं से प्लेटो के मन में सवाल उठा था कि ‘न्याय क्या है?’ क्या जिसे बहुत से लोग मान लें वह न्याय है. अथवा जिसे राज्य अपनी शक्ति के बल पर लागू करे, वह न्याय है? इस समस्या को वह सुकरात के माध्यम से ‘रिपब्लिक’ में उठाता है. अपने स्वभाव के अनुरूप सुकरात अपनी शिष्य-मंडली के बीच प्रश्न उठाता है. चर्चा के पहले चरण में सुकरात के अलावा केफलस, पोलीमार्क, थ्रेचाइमच्स, लीसियस और केल्सीडॉन प्रमुख सहभागी बनते हैं. चर्चा-स्थल केफलस का आवास है. उन सबको केफलस की ओर से एक उत्सव में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित किया गया है. मित्रों के आगमन पर बूढ़ा केफलस स्वयं उनका स्वागत करता है. प्रकारांतर में चर्चा का मुख्य सूत्रधार भी वही बनता है. अपने लंबे जीवनानुभवों को याद करते हुए वह ग्रीक कवि पिंडोरयस को उद्धृत करता है, जिसका आशय है—‘जब कोई मनुष्य अपना जीवन न्याय एवं श्रद्धा के साथ व्यतीत करता है तो उसके जीवन को आह्लादित करने तथा वृद्धावस्था में उसको सहारा देने के लिए ‘आशा’ जीवन-संगिनी की भांति सदैव उसके साथ रहना चाहती है.’ इसपर परम जिज्ञासु सुकरात प्रश्न करता है—‘क्या यही न्याय है?’ सुकरात का यही कौतूहल ‘रिपब्लिक’ की चर्चा का केंद्रीय विषय बन जाता है. उससे पहले तक न्याय को व्यक्ति और राज्य के व्यवहार और अंतर्संबंधों के अनुसार देखने की प्रथा थी, जिसमें राज्य की इच्छा और उसका अधिकार पक्ष प्रबल रहता था. चर्चा बढ़ती है तो न्याय पर नए-नए विचार आते चले जाते हैं.

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

  1. The sense of justice is continuous with the love of mankind.-Rowls.
  2. प्रजासुखे सुख राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्। नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्।। — अर्थशास्त्र-1/19
  3. प्रजासुखे सुखी राजा. तद्दुःखे यश्च दुःखित। सः कीर्तियुक्तो लोकेस्मिन् प्रेत्य यस्य महीस्यते।।— विष्णुधर्मसूत्र 3,
  4. A-nomia, lawlessness, must be replaced by eunomia, law and order-The Greek Concept of Justice, Eric A. Havelock, page 298.
  5. they seize property by violence; kosmos has perished

Equitable distribution no longer obtains.-Theognis, as quoted by Andrew    Gregory    in  Anaximander: A Re-assessment, Page 77

  1. Welcome! for it is no evil fate [trzoira] that escorted you forth to travel along this way: for indeed it lies [estin] far outside of the treading of men.

No, it was the law [themis] and justice [dike].-Parmenides, from The Greek Concept      of Justice, page 269.

  1. every member of the community must be assigned to the class for which he finds himself best fitted. Plato, The Republic.

 

 

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राजनीतिक के साथ सांस्कृतिक समर भी है उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव

[यह पत्र एक खास संदर्भ में लिखा गया है. जिन्हें संबोधित है, वे भाजपा से जुड़े हैं. संघ जिसकी आत्मा है. इसके अलावा वे वर्षों से कश्यप, कहार, महार, बिंद, मल्लाह आदि जातियों को अनुसूचित जातियों की परिभाषा में लाने के लिए आंदोलन करते हैं. उनका आंदोलन लंबा है, और इस कारण वे सम्मानीय हैं. लोकसभा के चुनावों में और हाल के चुनावों में भी, उपुर्यक्त जातियों का बड़ा हिस्सा भाजपा के पक्ष में गया था. विधानसभा चुनावों में भी यही दिशादशा दिखती है. मगर इन जातियों का भाजपा समर्थन के मायने केवल राजनीति तक सीमित नहीं हैं. उनका बड़ा संदर्भ सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से भी है. इधर संघ नेता मनमोहन वैद्य ने चुनाव से ऐन पहले आरक्षण खत्म करने की मांग दोहराई है. उनका मानना है कि आरक्षण अलगाव बढ़ाता है.(गोया मनु की संहिता समाज को जोड़ती थी) उनके अनुसार आरक्षण अनुसूचित जातियों और जनजातियों के कारण लाया गया है. जिन्हें लंबे समय से सुविधाओं से वंचित रखा गया है. संघ के नेताओं की यह मांग नई नहीं है. न ही इसमें कुछ अलग से जोड़ा गया है. संघ की चलती तो आरक्षण को एक दशक से भी आगे चलाना कठिन हो जाता. इसके बावजूद कुछ जातियां हैं जो भाजपा से आरक्षण बढ़ाने या उसमें फेरबदल करने का सपना पाले हुए हैं. जबकि सामाजिक न्याय को केंद्रीय मुद्दा बनाकर आई बिहार सरकार ने न्यायपालिकाओं को आरक्षण के दायरे में लाकर क्रांतिकारी कदम उठाया है…..

पत्र की भाषा निजी है. संदर्भ समसामयिक. अतः जिन सज्जन को संबोधित है उन्हें सीधे न लिखकर सार्वजनिक कर रहा हूं, ताकि सनद रहे. लेख में कुछ जातियों का नामोल्लेख जरूर है, प्रकारांतर में वे समाज के उस समूह का हिस्सा हैं, जिसे आज बहुजन कहा जाता है. यह सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के मकड़जाल को समझने की कोशिश भर है. इसलिए कि उत्तरप्रदेश के चुनावों के परिणाम केवल राजनीतिक परिवर्तन तक सीमित नहीं रहने वाले. उनका महत्त्व सांस्कृतिक क्षेत्र में कहीं ज्यादा होगा. पत्र है इसलिए इसकी भाषा में काफी कुछ व्यक्तिगत भी है. लेख को उसी भाव के साथ पढ़ा जाना चाहिए.]

आदरणीय…..!

आपका पत्र प्राप्त हुआ. साथ में चैक भी. आभार व्यक्त नहीं कर सकता. क्योंकि जिस उद्देश्य के लिए यह तुच्छ सहभागिता थी, वहीं इसका उपयोग सार्थक था. कारण जो बताया गया है, वह उचित ही है. सूबे में भाजपा या कांग्रेस की सरकार होती तथा सपा, बसपा जैसे दल ऐसा आयोजन करना चाहते, जिसमें किसी राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष की सहभागिता होतब भी यही हालात होते. असल में जिस जातिसमूह की ओर से यह आयोजन प्रस्तावित था, वह राजनीतिक दलों के लिए महज वोट बैंक रहा है. 2014 के चुनावों में इनका बड़ा हिस्सा भाजपा के समर्थन में उतरा था, जिससे उसे सूबे में 73 सीटें मिलीं. उससे पहले ये जातियां कभी सपा तो कभी बसपा की झोली में जाती रही हैं.

इस सम्मेलन के रद्द होने की मुझे न तो खुशी है न ही दुख. जिस सम्मेलन के विशिष्ट अतिथि ‘शाह’ और ‘मौर्य’ जैसे व्यक्ति होंवह कश्यप, महार, धींवर, तुरैहा, कहार, मल्लाह, निषाद आदि का सम्मेलन हो ही नहीं सकता था. यह सीधासीधा राजनीतिक सम्मेलन था. जिसे सूबे की सरकार ने अपना राजनीतिक स्वार्थ देते हुए मंजूरी देने से इंकार कर दिया. हम लोग जैसे अभी तक विभिन्न दलों की राजनीति में पिसते आए थे, इस बार भी ऐसा ही हुआ. इसमें आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं है. वैसे भी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा प्रदेश अध्यक्ष के सान्निध्य में हुआ यह सम्मेलन भाजपा का सम्मेलन ही कहलाता. जातिबंधु जैसे अब तक दूसरे दलों को कंधों पर साधते आए हैं, इस बार वे भाजपा को उठा रहे होते. मुझे तो यह भी लगता है कि अमित शाह और उनके प्रदेश अध्यक्ष स्वयं इस सम्मेलन को लेकर गंभीर नहीं थे. अगर चाहते तो वे प्रदेश सरकार पर दबाव डाल सकते हैं. अनुमति के लिए कलेक्ट्रेट के आगे प्रदर्शन कर सकते थे. धरने के माध्यम से भी आवाज उठाई जा सकती थी. परंतु उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया. कदाचित उन्हें विश्वास रहा कि सम्मेलन हो या नहीं, बंटे हुए जातिसमूह के जितने वोट उन्हें अपेक्षित हैं, वे कहीं नहीं जाने वाले. यह भाजपा की नीति है, जो गत चुनावों में पूरी तरह कारगर रही थी. कारण जो भी हों, सम्मेलन के टलने पर व्यक्तिगत रूप से मुझे खुशी है. सच तो यह है कि मैं इस देश के उन 69 प्रतिशत सक्रिय मतदाताओं में से हूं जिन्होंने 2014 में भाजपा के विरोध में मतदान किया था. जो अलगअलग दलों में बंटने के कारण निष्फल सिद्ध हुआ था.

मैं अपनी सपाटबयानी के लिए क्षमा चाहता हूं. आप जैसे वयोवृद्ध, सक्रिय, सतत चेतनशील व्यक्ति के समक्ष ऐसी साफगोई धृष्टता भी मानी जा सकती है. परंतु आप जैसे व्यक्तित्व के आगे जो समाज में निरंतर सक्रिय और लंबे समय तक बहुतसे जातिबंधुओं का पथप्रदर्शक रहा हो, अपने विचारों को झूठ के आवरण में पेश करना अवमानना जैसा ही होगा. आपके प्रति मेरे मन में भरपूर सम्मानभाव है, जिसपर झूठ का लांछन लगाना मैं नहीं चाहता. रामस्वरूप वर्मा तथा अन्य लोगों से कश्यपबंधुओं को एकसूत्र में बांधने के लिए आपके अनथक योगदान का परिचय मुझे बहुत पहले मिल चुका था. ……..को दिल्ली विधानसभा में पहुंचाने तथा उनकी राजनीतिक पहचान बनाने का श्रेय भी आप को जाता है. सीमित संसाधनों से साधारण नौकरीपेशा आदमी जितना कर सकता है, उससे कई गुना संघर्ष आपने किया है. इसलिए मैं आपके समक्ष न केवल विनीत हूं, बल्कि सम्मानभाव से भरा हुआ हूं.

आप कहेंगे, कश्यप, तुरैहा, बाथम, मल्लाह, कहार, धींवर आदि जातियां तो हमेशा से ही राजनीतिक दलों के हाथों में झूलती आई हैं. सपा, बसपा आदि सभी दलों के लिए भी तो हम महज वोट बैंक हैं. भाजपा भी उन्हें वोट बैंक की भांति इस्तेमाल करती है, तो इसमें बुरा क्या है? कभी कांग्रेस भी यही करती थी. उस समय तक इस समाज में राजनीतिक चेतना का वैसा उभार नहीं था, जैसा आज दिखाई पड़ता है. हालांकि मतों का बिखराब और दिशाहीनता जैसी तब थी, वैसी आज भी है. दिशाहीनता का शिकार हमारे नेतागण भी हैं. एक सामान्य सोच सभी के भीतर पनपा हुआ हैᅳ‘जब सभी के लिए हम वोट बैंक हैं प्रत्येक दल हमारी ओर बाहें फैलाए खड़ा है तो जहां अवसर मिले, वहां ‘शरण लेने’ में बुराई क्या है. इस ‘समझदारी’ के चलते हम अपने ही प्रतिद्विंद्वी बने हैं. लोकतंत्र में जितना बुरा किसी नागरिक समूह को वोटबैंक मानना है, उतना ही बुरा उसका मूक/अमूक प्रतिनिधि बनकर, बिना किसी भविष्य योजना के किसी दल की शरण में जाना और फिर दलीय विचारधारा का प्रतिनिधि बनकर समाज में वोट मांगने आना है. संभव है इससे कुछ व्यक्ति नेता के रूप में प्रसिद्ध हो जाएं. यह भी संभव है कि वे निर्वाचित होकर संसद और विधान मंडलों की शोभा बढ़ाने लगें. वे जानते हैं की उनके पीछे समाज की वास्तविक ताकत नहीं है. राजनीतिक दल की बैशाखी थामकर वे सत्ता में पहुंचे हैं, इस कारण वे हमेशा अविश्वास से भरे रहते हैं. उन्हें अपने ऊपर भरोसा ही नहीं होता. इसलिए समाज को उनका कोई लाभ नहीं मिल पाता. इससे लोगों का आत्मविश्वास भी घटता है और समाज अपने लक्ष्य के प्रति एकमत नहीं रह पाता. बंटा हुआ जनमत बड़ा नेतृत्व उभरने की राह में भी बाधक होता है.

यहां प्रतिवाद का अवसर उपलब्ध है. कहा जा सकता है कि विभिन्न दलों को हमारे नेताओं की आवश्यकता है तो उसका लाभ उठाने में क्या बुराई है. इसी के बूते संसद और विधायिकाओं में ‘कश्यप’, ‘मांझी’ और ‘निषाद’ जैसे टाइटिल दिखने लगे हैं. बात बिलकुल सही है. मगर मैं जानना चाहूंगा कि संसद और विधानमंडलों में समाज के जो नेता विभिन्न दलों में उनकी जरूरत बनकर जाते हैं. क्या वे वहां वास्तव में अपनी उपस्थिति दर्शा पाते हैं? अभी तक तो यही देखा गया है कि हमारे प्रतिनिधि समाज से ज्यादा दलीय जरूरतों को पूरा करने का काम करते हैं. ‘पार्टीलाइन’ पर बने रहना उनकी बाध्यता होती है. जिस प्रकार चुनावों में हमारा समाज वोट बैंक बना रहता है, उसी तरह हमारे ‘प्रतिनिधि’ संसद और विधायिकाओं में ‘संख्या’ बनकर रह जाते हैं. समाज की आवाज बनते हुए उन्हें कम ही देखा गया है.

ठीक है, अपने लोग जिस विपन्नता, सामाजिक अवरोधों को पार करके आते हैं, उनका उभरकर आना तथा चुनौतीपूर्ण चुनावी प्रक्रिया से गुजरकर संसद और विधायिकाओं में जाना ही बड़ी बात है. मैं इससे इन्कार नहीं करूंगा. लेकिन फिर भी कहूंगा कि हमारे प्रतिनिधि उतना नहीं कर पाते, जितना वे कर सकते हैं. या उन्हें करना चाहिए. एक उदाहरण मैं देना चाहूंगा, गाजियाबाद के ही एक पूर्व सांसद हैं. कभी वे बसपा प्रमुख के करीबियों में जाने जाते थे. ताजा खबर के अनुसार वे भाजपा के हो चुके हैं. यह उनका चयन है. इस लिहाज से इसमें कोई बुराई नहीं है. मेरा बस इतना कहना है कि वे जब तक बसपा में थे, अपनी जातियों को अनुसूचित जातियों में शामिल कराने के लिए कुछ नहीं किया. परिस्थितिवश बसपा से बाहर आना पड़ा. जिस आरक्षण के लिए बसपा में रहकर कुछ न कर सके, उसके लिए बाहर आकर आंदोलन किया और अब आरक्षण की सिद्धांतत: विरोधी, केवल राजनीतिक मज़बूरी के तहत उसका समर्थन करने वाली, भाजपा में शामिल होकर उसके लिए वोट मांग रहे हैं. उनकी हालत देख मुझे उदितराज(रामराज) की याद आती है, जिन्होंने कभी रामसे पीछा छुड़ाने के लिए नया नाम(उदितराज) अपनाया था और अब भाजपा के टिकट पर सांसद बनकर अपनी संपूर्ण क्रांतिधर्मिता को स्वयं अंगूठा दिखा चुके हैं. समाज ऐसे नेताओं पर भरोसा करे भी तो कैसे!

पीछे मैंने ‘सांस्कृतिक अधिपत्यवाद’ का नाम लिया है. इसके लिए मुझे कोई आसान शब्द याद नहीं आ रहा. इसका आशय है, ‘समाज में बिना सोचेविचारे, किसी को अपने से बड़ा मानकर उसका अंधानुकरण करना. विवेक को ताक पर रख थोपी गई परंपरा को आदर्श मान लेना. यह मान लेकिन कि वह शासक है, और हमारी नियति शासित बने रहना है. फिर थोपे गए दासत्व को गर्व का विषय मान उसे जीवन की सिद्धि के रूप में अपनाए रहना. सांस्कृतिक अधिपत्य राजनीतिक अधिपत्य से ज्यादा खतरनाक होता है. राजनीतिक अधिपत्य में दासता केवल राजनीतिक हारजीत तक सीमित होती है. वह कुछ वर्ष या दशक में समाप्त हो जाती है. यदि न भी हो तो परिस्थितियां एकसी नहीं रहतीं. सांस्कृतिक अधिपत्य में थोपी गई संस्कृति; यानी सामाजिक दासता को गौरव का विषय मान लिया जाता है. संस्कृति की विशेषता है कि वह परिवर्तन को आसानी से आत्मसात नहीं करती. बल्कि उन चीजों को अधिक महत्त्व देती है जो समय की पकड़ से बाहर होती हैं. चाहे वे अमरत्व का तमगा प्राप्त देवता हों या महामानव. चूंकि शाश्वतता और अमरत्व की मांग मनुष्य की सार्वकालिक चाहत रही है, इसलिए परिवर्तन की मांगों को आसानी से परंपराविरुद्ध, समाजविरुद्ध यहां तक कि संस्कृतिद्रोह तक मान लिया जाता है. रूढ़िग्रस्त मानव परिवर्तन से घबराता है. इच्छा के विरुद्ध परिवर्तन हों भी तो वह उन्हें वह आधेअधूरे मन से आत्मसात् करता है. जैसे वैष्णो देवी की यात्रा में हेलीकॉप्टर का उपयोग एक यात्री को विज्ञान और प्रौद्योगिकी की शक्ति का एहसास तो कराता है, लेकिन वह उसकी आस्था का परिमार्जन नहीं करता. मिथों के प्रति ठीकठाक पढ़ेलिखे व्यक्ति का भी वही श्रद्धाभाव रहता है, जो साधारण यात्री का. पूर्वाग्रहग्रस्त मन नएपन को अनमन्यस्क भाव से अपनाता है. उसके अनमनेपन का लाभ उठाकर पुरोहित और तंत्राचार्य धर्म को विज्ञानसम्मत बताने लगते हैं. लोगों की अनमन्यस्कता का लाभ उठाकर वे विज्ञान को भी धर्मसम्मत सिद्ध करने में सफल हो जाते हैं. नतीजा यह होता है कि उनके शिखरत्व को कभी कोई चुनौती नहीं मिलती और युवावर्ग जो आधुनिक तकनीक को फैशन और अस्मिता से जोड़ता है, वह वैचारिक आधुनिकता से दूर बना रहता है.

रामायण में इसका सबसे बड़ा उदाहरण हनुमान है. वह बलशाली है. कहने को बुद्धिमान भी है. परंतु सिवाय अपने आराध्य की चाटुकारिता के उसकी बुद्धिमत्ता का दूसरा प्रमाण नहीं मिलता. अनार्य हनुमान वर्चस्वकारी आर्य संस्कृति के आगे इतना नतमस्तक है कि महाशक्तिशाली होने के बावजूद अपने दीनताबोध से बाहर नहीं आ पाता. राम के आगे हनुमान का दैन्य उस सर्वहारा का दैन्य है, जो सांस्कृतिक अधिपत्य से अनुकूलित हो, बात और लात में फर्क करना भूल चुका था. वह बड़ी चालाकी से, धूर्त्ततापूर्वक गढ़ा गया चरित्र है. पहले किसी को महाबलशाली, परम प्रज्ञावान घोषित करना, फिर उसे अपना अनुचर बना लेना. ताकि लोगों को यह संदेश जाए कि बड़े से बड़ा व्यक्ति भी उनका दास है. उसकी उपलब्धियां उसके द्वारा अर्जित न होकर उसके आश्रयदाता या आराध्य की देन हैं. ‘हनुमान राम के बिना कुछ नहीं हैं’यह धारणा भावविभोर करने वाली है. अपने लोग भी सरयू तट पर निषादराज द्वारा राम के पदप्रक्षालन के ‘मिथ’ को गौरव का विषय मानते आए हैं. पीढ़ियां बस इसी सोच के सहारे मरखप गईं कि हम भी उस ‘महान संस्कृति’ का हिस्सा थे. जबकि इस तथाकथित ‘महान संस्कृति’ ने हमारे पूर्वजों के अनथक श्रम, संपूर्ण निष्ठा एवं सेवाभाव के बावजूद शोषण, उत्पीड़न और बेगार से ज्यादा कुछ नहीं दिया. आजीविका के लिए दूसरों पर निर्भर समाज बौद्धिक रूप से भी पराश्रित होता चला गया.

जहां कानून का शासन न हो, वहां न्याय और संसाधनों पर अधिकार को दैवीय मान लिया जाता है. परिणामस्वरूप स्वतंत्रता और समानता जैसे मूल्य जिनपर आधुनिक समाजों की नींव टिकी है, वहां बेमानी हो जाते हैं. इस तरह आस्था और परंपरा का केवल सांस्कृतिक पक्ष नहीं होता, उसकी व्याप्ति लौकिक विषयों तक भी होती है. उनके प्रभाव में संसाधनों पर एकाधिकार को दैवीय मानकर विपन्नता को प्रभावित लोगों की नियति घोषित कर दिया जाता है. सांस्कृतिक वर्चस्व से दबासहमा हमारा मन यह सोच ही नहीं पाता कि ऐसे हालात बने क्यों? उसके लिए जिम्मेदार शक्तियां कौनसी हैं? खुद को राम का मित्र कहने वाले, उसके लिए सेना लेकर अयोध्या पर चढ़ाई करने को उद्यत गुहराज भला इतने दीन कैसे हो सकते हैं कि नाव में राम के पांव पड़ते ही उसके उड़नछू हो जाने का भय सताने लगे और संदेहनिवारण के कठौते में पानी लेकर बैठ जाएं. ‘जो व्यक्ति श्रम करता है, वह उसके प्रतिफल का भी अधिकारी है.’यह कहानी इस सामान्य नियम का उल्लंघन करने के साथसाथ बेगार का महिमामंडन करती है. अभी कुछ अर्सा पहले तक ऐसे प्रसंगों पर लोग भावविभोर होते आए हैं. उनमें अपने लोग भी होते होंगे. वे यह समझ ही नहीं पाते कि अपने श्रम पर जीवनयापन करने वाले व्यक्ति का, नदी पार उतारने वाले मांझी का पारिश्रमिक क्या पैरों की धोबन होना चाहिए? यदि कोई व्यक्ति ऐसा करता है, तो क्या उसे ईश्वर कहा जाना चाहिए? मेरी निगाह में यह सांस्कृतिक दुष्टता है.

मैंने ऊपर लिखा है कि ‘सांस्कृतिक अधिपत्य’ ’राजनीतिक अधिपत्य’ से कहीं ज्यादा खतरनाक और दीर्घजीवी होता है. भारत के 3000 वर्षों के इतिहास का आकलन किया जाए तो ऐसा कभी नहीं हुआ जब केवल ब्राह्मण शिखर पर रहे हों या सिर्फ क्षत्रियों के हाथों में राजसत्ताएं रही हों. बल्कि जब भी देश इस तरह की प्रवृत्ति की ओर कट्टरता से बढ़ा, हमेशा कमजोर पड़ा है. उसके बाद पूरे समाज को भयानक पतनशीलता से गुजरना पड़ा है. इसके बावजूद भारतीय धर्मग्रंथों मे ब्राह्मणों और क्षत्रियों का गुणगान है, तो इसलिए कि उनके लेखक ब्राह्मण या ब्राह्मणवादी मानसिकता के पालकपोषक रहे हैं. बात सिर्फ इतनी नहीं है कि ब्राह्मणों ने स्वयं का महिमामंडन करते हुए धर्मग्रंथ रचे हैं. यह वह संस्कृति है जो वेदों को पढने से ज्यादा पूजने का समर्थन करती है. ब्रह्मा तक को वेद पढ़ते हुए नहीं उनका प्रदर्शन करते हुए दिखाती है. ब्रह्मा के स्वयंभू उत्तराधिकारी, जनसाधारण के आगे त्याग, तपश्चर्य, संन्यास और वैराग्य को महिमामंडित करने वाले, ये तथाकथित ब्रह्मामुखोवतार असल में बेहद अवसरवादी रहे हैं. शूद्र वेदों की पूजा करें यह उनके लिए गर्व की बात थी, वे वेदों को पढ़ें यह उन्हें बर्दाश्त न था. अजीब लोग ठहरे, पूर्वजों के पढ़ेलिखे को अपना समझकर शताब्दियों तक कूपमंडूक बने रहे. चालाक इतने कि देश पर मुस्लिमों का आक्रमण हुआ तो संस्कृत को देवभाषा मानने वाले ब्राह्मणों ने फारसीअरबी सीखने में देर नहीं की. धर्म के साथ छेड़खानी न करने की शर्त पर वे मुस्लिम बादशाहों के दरबार में नौकरी करने लगे. अंग्रेज आए तो अंग्रेजी सीख उनके महिमामंडन में जुट गए. उन्हें राजनीतिक सत्ता से उतना मोह नहीं रहा, जितना सांस्कृतिक सत्ता से. जबजब दोनों के बीच संघर्ष की स्थिति बनी, उन्होंने सांस्कृतिक वर्चस्व को चुना है. वह बना रहे इसलिए ज्ञान के जिन उपकरणों से वे स्वयं लाभान्वित रहे, उनका लाभ समाज के दूसरे वर्ग न उठा पाएं इसका उन्होंने सर्वविध प्रपंच रचा. क्षत्रिय की शिक्षा को केवल हथियार चलाने तक सीमित रखा तो वैश्य को गुणाभाग तक. शूद्र पर कोई जिम्मेदारी नहीं, उसका काम बाकी समाज की जिम्मेदारी उठाना है, सो उसे शिक्षा से ही वंचित रखा. शूद्र पढ़ लिख जाए तो कान में पिघला सीसा डालने का नियम बनाया गया.

उन्होंने खुद वेद पढ़े और हमसे कहा ‘रामराम’ रटो. बेशर्मी ऐसी कि कह दियाकबीर जैसे तत्वज्ञानी के ज्ञान का मूल रामानंद का गुरुमंत्र ‘मरामरा’ है. असलियत से अनजान हम मैकाले पर आरोप लगाते हैं कि उसने हमें ज्ञान को रटंत विद्या में बदलने का महामंत्र दिया. इस विषय में मैकाले का निबंध ‘मिनिट्स ऑन एजुकेशन’ कुछ और ही बात कहता है. ठीक है वह चाहता था कि भारतीय अंग्रेजी पढ़ें. इसलिए भी चाहता था कि दुनिया का बेहतरीन ज्ञान उस भाषा में सुरक्षित है. वह गलत नहीं था. अंग्रेजी सचमुच समृद्ध भाषा है. अपने निबंध में मैकाले ने शिक्षा को तर्कमूलक बनाने पर जोर दिया है, उसने जोर देकर कहा है भारतीय लॉक के तर्कशास्त्र को पढ़ें. यहां यह उल्लेख प्रासंगिक है कि आधुनिक विधिशास्त्र की नींव जॉन लॉक, रूसो, बैंथम के दर्शन पर रखी है. उसका निबंध ही प्रकारांतर में ‘इंग्लिश एजुकेशन एक्ट’ की नींव बना. मैकाले की शिक्षा से कहीं बड़ी देन कानून के क्षेत्र में है. उसने इस देश में विधि आयोग की नींव रखी. उसके फलस्वरूप देश में समान अपराध के लिए समान दंड का कानून बना. उससे पहले मनुस्मृति का कानून चलता था. जिसमें ब्राह्मण को सभी प्रकार के दंडों से बरी रखा गया था. फिर भी लोकतंत्र के नाम पर वोट मांगने वाले किसी प्रतिबद्ध भाजपाई से पूछ लीजिए, वह मैकाले को गाली देगा, उसे भारतीय इतिहास का खलनायक घोषित करेगा.

भाजपा जिन विचारों का प्रतिनिधित्व करती है, वह चाहे हिंदुत्व हो या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, सब सांस्कृतिक अधिपत्य बनाए रखने के औजार हैं. ज्यादा दूर जाने की आवश्यकता नहीं है. पिछले दो वर्षों में आप देख लीजिए. भाजपा शासन के मोर्चे पर बुरी तरह फेल रही है. विकास के वायदे के साथ चुनाव जीतकर आए मोदी हताशा में ऐसे कदम उठा रहे हैं, जिनसे अर्थव्यवस्था को तात्कालिक रूप से कोई लाभ होने वाला नहीं है. और यदि इनका दूरगामी महत्त्व मान भी लिया जाए तो उसके लिए जितना समय चाहिए उसके लिए धैर्य और सामर्थ्य दोनों ही भारतीय जनता में नहीं हैं. राजनीतिक मोर्चे पर भी सरकार को असफलता का सामना करना पड़ा है. भाजपा के ही कई नेता उसके भविष्य को लेकर चिंता करने लगे हैं. लेकिन भाजपा के पितृ संगठन ‘आरएसएस’ को इसकी कतई चिंता नहीं है. राजनीतिक जीतहार को उसने कभी अर्थपूर्ण माना भी नहीं है. उसकी स्थिति यूरोप की चर्च जैसी रही है. जो लोगों के दिलोदिमाग को अपने अधिकार में लेकर उन्हें अपना अनुचर बनाए रखने में विश्वास रखती है. सरकार विकास के वायदे को पूरा करने के लिए कुछ करे या न करे, इन दोढाई वर्षों में संघ ने हर वैचारिक संस्थान में अपने आदमी बिठा दिए हैं. पाठ्यक्रमों में अपनी सांस्कृतिक नीति के अनुसार बदलाव किया गया है. दूरदर्शन पर तंत्रमंत्र, भूतप्रेत के पोंगापंथी सीरियलों की बाढ़सी आई हुई है. संघ जानता है, यदि पांचदस वर्ष के लिए भाजपा को सत्ता से बाहर रहना भी पड़ा तो महत्त्वपूर्ण स्थानों पर जमे उसके कार्यकर्ता भीतर ही भीतर अपना काम करते रहेंगे. मैं स्पष्ट कर दूं कि राजनीतिक दल के तौर पर भाजपा से मुझे कोई शिकायत नहीं है. उसे कांग्रेस, बसपा, सपा, जेडीयू, लोजपा जैसी परिवारवाद के अधीन होकर संविधान की मूल भावना से दूर जा चुकी पार्टियों से बेहतर मानता हूं. अपनी तमाम शिकायतों के बावजूद मैंने भाजपा के प्रतिनिधियों के पक्ष में एक या दो बार मतदान किया था. तब मुझे लगा था कि वे उम्मीदवार भाजपा के उग्र राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक अधिपत्यवाद में वैसा भरोसा नहीं करते, जैसा कि भाजपा के परंपरागत, संघी पृष्ठभूमि के नेता. लेकिन मोदी को मुखौटा बनाकर संघ इस बार जो उग्र राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक वर्चस्व की जमीन तैयार कर रहा है, वह अभूतपूर्व है. कहने की आवश्यकता नहीं कि यह अति पिछड़ी जातियों के मतों के भरोसे हो रहा है.

अंत में बस इतना कि सांप्रदायिकता धार्मिक प्रदूषण है; और धार्मिकता बौद्धिक प्रदूषण. पहली का अतिरेक मनुष्य को पशु बना देता है. जबकि दूसरी का अतिरेक उसे अंतहीन नशे की गिरफ्त में ले जाता है.

ओमप्रकाश कश्यप

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विमुद्रीकरण के बहाने

जनता जब तक निजी क्षेत्र की बढ़ती अर्थशक्ति की ओर से आंखे मूंदे रहेगी, उस समय तक मूंदे रहेगी जब तक कि वे गणतांत्रिक राज्य से अधिक शक्तिशाली नहीं हो जाते, तब तक गणतंत्र असुरक्षित बना रहेगा. कुल मिलाकर फासिस्ज्म का अर्थ सरकार पर किसी व्यक्ति, दल अथवा निजी संस्थान का सर्वाधिकार है.रूजवेल्ट, अमेरिकी राष्ट्रपति.

बाजार केंद्रित अर्थव्यवस्था में मुद्रा के महत्त्व से इन्कार नहीं किया जा सकता. 8 नवंबर के बाद ‘नोटबंदी’ या ‘विमुद्रीकरण’ की घोषणा के पश्चात देशभर में मचे हाहाकार से उसे समझा जा सकता है. सरकार ने आतंकवाद और कालेधन पर रोकथाम के लिए विमुद्रीकरण की घोषणा की थी. उसका मानना है कि प्रचलित मुद्रा का बड़ा हिस्सा गैरकानूनी रूप से जमाखोरों तथा कालाबाजारियों के पास जमा है, पड़ोसी देश नकली करेंसी भारत में झोंककर आतंकवाद को बढ़ावा देता है. इसलिए एक साहसिक निर्णय के अंतर्गत प्रधानमंत्री ने प्रचलित मुद्रा को निश्चित अवधि के भीतर वापस लेने का ऐलान किया है. वर्तमान सरकार के लगभग ढाई वर्ष के कार्यकाल में यह पहला निर्णय है, जिसपर पिछली यूपीए सरकार की छाप नहीं है. इसके अलावा वर्तमान सरकार की ‘जनधन’ तथा ‘मनरेगा’ जैसी जितनी भी योजनाएं हैं, सब विरासत में मिली हैं. वर्तमान सरकार ने उन्हें ज्यों की त्यों अथवा नाम बदलकर अपनाया है. योजना आयोग के स्थान पर सरकार ने नीति आयोग का गठन जरूर किया है, परंतु नए संस्थान की ओर से अभी तक ऐसा ठोस कार्यक्रम सामने नहीं आया है, जिससे इस बदलाव का औचित्य सिद्ध हो. जिन मामलों में सरकार ने तत्परता से काम किया है, उनमें उच्च पदों पर प्रतिबद्ध संघियों को नियुक्त करना, उनके संगठनों को प्रोत्साहित करना तथा यथासंभव मदद पहुंचाना शामिल हैं. इसके अलावा जिन कार्यों को इस सरकार ने प्राथमिकता दी है, उनके नाम हैंदूरदर्शन पर तंत्रमंत्र, पूजापाखंड वाले धारावाहिकों को बढ़ावा देना, पाठ्यक्रम में अपनी विचारधारा के अनुरूप फेरबदल करना और हिंदू मतों के ध्रुवीकरण हेतु हिंदूमुस्लिम सांप्रदायिकता को हवा देना. इन सबका विकास से कोई संबंध नहीं है. बल्कि ये समाज को पीछे ढकेलकर लोगों के बीच अविश्वास और अव्यवस्था फैलाने वाले हैं. वर्तमान सरकार ने यदि इनका चयन किया है तो इसलिए कि उसके सबसे बड़े घटक की राजनीति सांप्रदायिक अविश्वास और धार्मिक पाखंड के सहारे चलती है.

प्रचलित करेंसी नोटों को तयशुदा अवधि में वापस लेने की योजना को प्रधानमंत्री ने ‘डीमोनीटाइजेशन’ का नाम दिया है. जिसे मीडिया ने ‘नोटबंदी’ या ‘विमुद्रीकरण’ कहकर प्रचारित करना शुरू कर दिया. इसका आशय प्रचलित मुद्रा जिसका एक हिस्सा, सरकार के अनुसार टैक्स चोरों की गिरफ्त में हैको सरकारी खजाने में खींच लेने या छिपाए रखने की स्थिति में उसे कागज के टुकड़ों में बदल देने की नीति से है. यह अर्थशास्त्र सम्मत प्रक्रिया है, जिसकी अनुशंसा डॉ. आंबेडकर जैसे विद्वान अर्थशास्त्री ने भी की है. ‘नोटबंदी’ या ‘विमुद्रीकरण’ इस योजना के लिए उपयुक्त शब्द नहीं हैं. लेकिन व्यक्ति की भांति भाषा की भी सीमा होती है. कभीकभी ऐसा होता है जब सटीक शब्द की खोज के लिए शब्दकोश अपर्याप्त दिखने लगते हैं. हड़बड़ी में हम उन शब्दों का उपयोग करने लगते हैं, जो हमारे मंतव्य से मेल न खाते हों. यह मुख्यतः मुद्रा के स्वरूप में परिवर्तन से जुड़ा मसला है. उपयुक्त शब्द के अभाव में हम फिलहाल ‘विमुद्रीकरण’ का उपयोग करेंगे. ‘विमुद्रीकरण’ को लेकर असमंजस सरकार के स्तर पर भी था. इसलिए आरंभ में केवल करेंसी नोटों में बदलाव का संकेत देते हुए, बड़े नोटों को बैंकों में जमा करने का आदेश दिया गया. बाद में नकदी की कमी से समाज में अफरातफरी मची तो कागजी मुद्रा के स्थान पर डिजिटल लेनदेन पर जोर दिया जाने लगा.

इस लेख का उद्देश्य विमुद्रीकरण या उसके प्रभावों की समीक्षा करना नहीं है, केवल यह देखना है कि योजना लागू होने के पश्चात समाज में जो उथलपुथल मची है, क्या उसे स्वाभाविक माना जाएगा! क्या यह स्वस्थ समाज का लक्षण है! लाभकेंद्रित अर्थव्यवस्था में ‘विमुद्रीकरण’ पूंजीवादी कामना है. इससे लोगों के मुद्राअधिकार बाजारहित में बदला जा सकता है. भारत जैसे भीषण समाजार्थिक असमानताओं वाले देश में यह विषमताओं और अधिक बढ़ाएगा. शायद इसीलिए पिछली सरकारें उसे लागू करने से बचती आई थीं. यदि लागू किया भी तो पर्याप्त लचीलापन अपनाते हुए, ताकि जनसाधारण को किसी प्रकार की परेशानी न झेलनी पड़े. कदाचित वर्तमान सरकार को इस कार्य की जटिलता का आभास नहीं था. इतनी बड़ी योजना को तरीके से निपटाने के लिए जैसी तैयारी चाहिए, सरकार उससे बहुत पीछे थी. केवल राजनीतिक हित साधने हेतु किए गए निर्णय के दुष्परिणाम बैंकों तथा एटीएम के आगे लंबीलंबी लाइनों के रूप में सामने आए. लगभग 135 व्यक्तियों की बैंक और एटीएम की लाइनों में लगेलगे जानें चली गईं. यह इस साल भारतपाकिस्तान बार्डर पर मारे गए सैनिकों की संख्या से सवा गुनी है. बाजार से मुद्रा गायब होने से उपभोक्ता और व्यापारी सबका हालबेहाल हैं. उद्योगधंधे ठप्प पड़ चुके हैं. दिहाड़ी मजदूर, रिक्शाचालक, ऑटोवाले, रेहड़ीखोमचे वाले जिनका चूल्हा रोज की कमाई से चलता हैसब परेशान हैं. रोजगार की तलाश में गांव छोड़ चुके लोग आहत हैं. गांव की राजनीति और बेरोजगारी से बचने के लिए शहर चुना था. अब यहां से कहां जाएं! किसी के पास ग्राहक नहीं है तो किसी के नियोक्ता के पास उसे देने के लिए नकदी का अभाव है. शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन, आयातनिर्यात उत्पादन, सर्विस सेक्टर, खेतीबाड़ी आदि अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्र आर्थिक मंदी के शिकार हैं. विडंबना यह कि सरकार के कदम से जितना कालाधन उजागर होने की उम्मीद है, उससे कहीं अधिक धनराशि का नुकसान व्यापार तथा उद्योगधंधों की मंदी के चलते पूरा देश उठा चुका है. घोषणा में तीस दिसंबर के बाद हालात सामान्य होने की बात कही गई थी, मगर इसके छह महीने बाद भी सब कुछ पटरी पर आ पाएगा, इसकी बहुत क्षीण संभावना है.

क्या यह मुद्रा की ताकत है? समाजार्थिक विषमताओं से घिरे देश में जो कल्याणराज्य होने का दावा करता हो, क्या मुद्रा को इतना ही शक्तिशाली होना चाहिए? क्या मुद्रा का शक्तिशाली होना देश और समाज के शक्तिशाली होने जैसा ही है? लोकतंत्र में समस्त निर्णायक शक्तियां जनता के पास होती हैं. परंतु लोकहित के नाम पर लिए गए इस निर्णय में लोक ही सर्वाधिक आहत हुआ है. अधिकांश जन निर्णय से नाखुशी जता चुके हैं. बैंक और एटीएम की लाइनों में लोग दम तोड़ रहे हैं. कामधंधे तबाह हो चुके हैं. फिर भी सरकारी निर्णय के विरोध में कोई विशेष आक्रोश नजर नहीं आता. क्यों? बिना सार्थक आक्रोश और विरोध की अभिव्यक्ति के क्या लोकतंत्र सुरक्षित रह सकता है? आप कह सकते हैंजीवन में अर्थ की उपयोगिता है. ‘रुपया’ को ‘बाप और भइया से बड़ा’ भी हमारे यहां कहा गया है. कितने ही मुहावरे जीवन में अर्थ की उपयोगिता को लेकर लोकप्रचलित हैं. हिंदू धर्म में उसे जीवन के चार पुरुषार्थों में से एक माना गया है. ठीक है, लेकिन हम एक बात प्रायः भूल जाते हैं. जिन दिनों यह ‘अर्थ’ को पुरुषार्थ माना गया था, उन दिनों मुद्रा का मूल्य वास्तविक होता था. सौ मुद्राएं चुकाने का मतलब था, सौ स्वर्णभार का भुगतान. आज मुद्रा का मूल्य प्रतीकात्मक है. बिना सरकार की गारंटी के नोट महज कागज का टुकड़ा है. वह बाजार में मनुष्य के क्रय सामर्थ्य को दर्शाता है, परंतु स्वयं ‘समृद्धि’ का मानक नहीं है. यद्यपि उसके उपयोग द्वारा वास्तविक ‘समृद्धि’ खरीदी जा सकती है.

यदि बिना सरकारी गारंटी के मुद्रा का वास्तविक मूल्य शून्य है तो नागरिक जीवन में मुद्रा के वास्तविक महत्त्व की समीक्षा आवश्यक हो जाती है. खासकर समृद्धि में उसके योगदान को लेकर. क्योंकि कोई भी सरकार समाज से बड़ी नहीं होती. खुद को व्यवस्थित रखने के लिए समाज ही सरकार का गठन करता है. समाज राज्य की आत्मा है तो सरकार महज उसका एक संस्कार. यदि सरकार अथवा उसकी कोई संविदा सामाजिक संबंधों के लिए ही संकट का विषय बन जाए तो मान लेना चाहिए कि उस संविदा और समाज के अंतःसंबंधों की समीक्षा का समय आ चुका है. उस ओर से समाज की उदासीनता उसके पतन की संकेतक हैं. यह स्वस्थ समाज का लक्षण नहीं कि बैंक की कतार में खड़ेखड़े नागरिक की मृत्यु हो जाए और लाश को किनारे कर, दोचार हजार रुपये की उम्मीद में लोग कतार में बने रहने के लिए धक्कामुक्की करते रहें. इस घटना ने मानवीय संबंधों को तारतार कर दिया है. उधर सरकार है कि उसके कर्ताधर्ताओं को हर वह व्यक्ति जो बैंक या एटीएम की कतार में है, कहीं न कहीं चालू, बेईमान और भ्रष्टाचारी नजर आता है.

करेंसी राज्य की ओर से आपसी लेनदेन को सुगम बनाने के लिए की जाने वाली व्यवस्था है. उसका अपना कोई मूल्य नहीं होता. राज्य की गारंटी उसे मूल्यवान बनाती है. चूंकि करेंसी का अपने आप में कोई मूल्य नहीं होता, इसलिए वह अर्थव्यवस्था की मजबूती का पर्याय भी नहीं होती. वह केवल उसके प्रवाह को दर्शाती है. जैसे थर्मामीटर का तापांक स्वयं उष्मा न होकर मात्र उसके स्तर को दर्शाता है, वैसे ही मुद्रा की मात्रा केवल मनुष्य के क्रयसामर्थ्य की संकेतक होती है, समृद्धि की नहीं. बाजारकेंद्रित मुद्राप्रवाह में समृद्धि का आवागमन बराबर नहीं होता, बल्कि वह मुनाफे के रूप में निरंतर ऊपर की ओर अग्रसर रहता है. मुद्रा की उपयोगिता आपसी लेनदेन को सहज बनाने में है. उससे बाजार को गति मिलती है. लोग अपने अधीन मुद्रा का अधिकाधिक उपयोग खरीदफरोख्त में करें, इसके लिए बाजार मुद्रा की मौजूदगी को सराहता है. उसे आर्थिक शक्ति के रूप में पेश करता है. किंतु उसकी मूल्यवत्ता तभी तक है, जब तक उसके पीछे सरकार की गारंटी हो. मुद्रा का उपयोग सभी वर्गों में समान नहीं होता. उसकी मुख्य उपयोगिता मध्य तथा निम्न वर्गों तक सीमित होती है, जिन्हें अपनी तात्कालिक जरूरतों के लिए खरीदफरोख्त करनी होती है. बड़े व्यापारियों, उद्योगपतियों तथा पेशेवरों के लेनदेन में, जहां भुगतान राशि अत्यधिक हो, मुद्रा का उपयोग अव्यावहारिक मान लिया जाता है. उनके यहां समृद्धि का आकलन संसाधनों पर अधिकार से किया जाता है, न कि लेनदेन से. उदाहरण के लिए जमींदार की समृद्धि का आकलन भूसंपदा के आधार किया जाता है. व्यापारी और उद्योगपति की समृद्धि, उसके अधीन बाजार, कलकारखानों आदि पर एकाधिकार से आंकी जाती है. मुद्रा का महत्त्व केवल व्यापारिक हिसाबकिताब तक सीमित होता है.

व्यक्ति करेंसी के उपयोग द्वारा भूमि तथा समृद्धि के दूसरे स्थायी उपादानों का अर्जन कर सकता है. उस समय वह वास्तव में ‘अर्थ’ बन जाती है. लेकिन जनसाधारण द्वारा अर्जित करेंसी का अधिकांश जीवन की भोजन, वस्त्र, स्वास्थ्य जैसी बेहद सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति में ही खप जाता है. वास्तविक समृद्धि में अंतरित करने का अवसर उसे कम ही प्राप्त होता है. उसे भुलावे में रखने के लिए बाजारवादी ताकतें तथा उसके पोषित अर्थविज्ञानी समृद्धि को दैनिक जरूरतों के संदर्भ में, क्रयसामर्थ्य द्वारा परिभाषित करते हैं. सामान्यतः यह मान भी लिया जाता है. मुद्रा को वास्तविक संपदा अथवा समृद्धि का प्रतीक मानना मूर्ति को देवता मानने की स्थिति है. चालाक पुरोहित जैसे पत्थर की मूर्ति में देवता की प्रतिष्ठा करते रहते हैं, वैसे ही पूंजीवादी शक्तियां अर्थव्यवस्था की सारी ताकत मुद्रा में केंद्रित होने का भ्रम फैलाए रखती हैं. बाजारकेंद्रित अर्थव्यवस्था में ऊपर के स्तर पर मुनाफे की स्पर्धा होती है, जबकि निचले वर्ग रोजीरोटी के संघर्ष में उलझे रहते हैं. स्पर्धा उनके आत्मविश्वास, आपसी विश्वास और सहअस्तित्व की भावना का हनन करती है. आपसी विश्वासहीनता तथा निचले स्तर की स्पर्धा उनके जीवन में मुद्राआधारित लेनदेन को अपरिहार्य बना देती है. इस तरह मुद्रा की आभासी शक्ति सामान्यतः जनसाधारण तथा मध्यवर्ग को प्रभावित करती है, उच्च वर्गों को नहीं. मुद्रा उनके लिए महज संख्या जितना महत्त्व रखती है, जिसका उपयोग व्यापारिक हिसाबकिताब तक सीमित होता है.

बाजार में करेंसी की किल्लत तथा शीघ्र ही उसके समाधान की क्षीण संभावनाओं को देखते हुए सरकार रोजमर्रा के लेनदेन में डिजिटल करेंसी को अपनाने पर जोर दे रही है. उपभोक्ताओं को डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, पेटीएम, आधारकार्ड आदि के माध्यम से खरीदफरोख्त करने की सलाह दी जा रही है. डिजिटल पेमेंट गेटवे को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने कई उपहार योजनाएं लागू की हैं. सेवाकर की छूट, लॉटरी द्वारा पुरस्कार आदि योजनाओं से सरकार की नीयत और नीति दोनों को समझा जा सकता है. इससे सरकार का क्या लाभ है? यह समझने के लिए ज्यादा माथापच्ची की आवश्यकता नहीं है. ऐसे दुकानदारों की संख्या लाखों में है जो कर चोरी को अपना अधिकार मान बैठे हैं. बिना रसीद के लेनदेन बाजार में बहुत आम है. करयोग्य आमदनी वाले दुकानदारों में से बामुश्किल दो या तीन प्रतिशत आयकर देते हैं. सरकार का मानना है कि लेनदेन डिजिटल गेटवे से होगा तो भ्रष्ट दुकानदारों, व्यापारियों तथा कालेधन के बूते खरीदारी करने वालों पर नजर रखना आसान हो जाएगा. उसकी आमदनी बढ़ेगी. भ्रष्टाचार पर काबू कर पाना संभव होगा. सवाल है कि इससे उपभोक्ता को क्या लाभ होगा? दुकानदार उसे ‘अधिकतम खुदरा मूल्य’ पर बेचता है, जिसमें सामान्यतः स्थानीय कर भी सम्मिलित होता है. इस तरह व्यक्ति जो भी वस्तु खरीदता है, उसपर दुकानदार के लाभ तथा कर आदि का भुगतान वह कमोबेश करता ही है. क्या नई व्यवस्था उसके लिए हितकर सिद्ध होगी? पेमेंट सीधे बैंक में जाने से धनराशि की सुरक्षा, लानेले जाने में बचत, रकम पर मिलने वाला तात्कालिक ब्याज अपरोक्ष रूप में बड़े दुकानदारों को लाभ पहुंचाएगा. ग्राहक को भी इसका लाभ पहुंचे, सरकार इसपर विचार करने के लिए फिलहाल तैयार नहीं है. इतना तय है कि इस व्यवस्था से डिजिटल पेमेंट के लिए जिस माध्यम को ग्राहक अपनाएगा, उसके सेवामूल्य के साथ सेवाकर के रूप में अतिरिक्त धनराशि भी उसे वहन करनी पड़ेगी.

बाजार की नीयत और नीति को समझने वालों के लिए यह कोई अबूझ पहेली नहीं है. परंपरागत पद्धतियों में उत्पादक एवं उपभोक्ता का सीधा संबंध होता था. उत्पादक अपने उपभोक्ता की आवश्यकता के अनुसार उत्पादन करता था. मुनाफे के लालच में उत्पाद का निर्माण करना तब की अर्थव्यवस्था में प्रचलित नहीं था. कुछ कारीगर और कलाकार ऐसे अवश्य होते थे जो अपने हुनर का प्रदर्शन राजाओं और सामंतों को प्रसन्न करने के लिए करते थे. उनके उत्पाद को कई बार कला तो कई बार विलासिता की वस्तु तक मान लिया जाता था. परंतु वह संख्या की दृष्टि से समाज का मामूली हिस्सा था. वे अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने की हैसियत नहीं रखते थे. दूसरे उनका ध्येय महज अपने आश्रयदाता को खुश करना होता था. बाजार केंद्रित अर्थव्यवस्था में उत्पाद और उपभोक्ता के बीच दुकानदार के रूप में तीसरा पक्ष उपस्थित हो जाता है. उसके तहत उत्पादक लाभ की कामना के साथ माल बनाता है. उपभोक्ता तक पहुंचतेपहुंचते वस्तु के मूल्य में उत्पादक के मुनाफे तथा उत्पादनकर के साथसाथ, दुकानदार का मुनाफा भी जुड़ जाता है. यदि उत्पादक के अलावा उपउत्पादक भी हैं, तथा अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचने के वस्तु कई दुकानदारों के हाथों से होकर गुजरती है तो उसमें उपउत्पादकों तथा बिचौलिए दुकानदारों का मुनाफा भी जुड़ता चला जाता है. उपभोक्ता न केवल उन सबके मुनाफे का हिस्सा वहन करता है, अपितु अपरोक्ष रूप में विभिन्न स्तरों पर देय कराधान, यातायात, सर्विस चार्ज, विज्ञापन आदि का बोझ भी वही उठाता है. परिणामस्वरूप वास्तविक उपभोक्ता तक पहुंचतेपहुंचते वस्तु की कीमत कई गुना बढ़ जाती है. कई बार तो वास्तविक मूल्य तथा सभी बिचौलिये दुकानदारों के सकल मुनाफे का अनुपात एक और चार का हो जाता है. उत्पादक एवं उपभोक्ता के बीच सीधा संबंध न होने के कारण चालू अर्थव्यवस्था को मुनाफे की अर्थव्यवस्था माना जाता है. जिसमें उपभोक्ता एवं उत्पादक के बीच किसी भी प्रकार की आत्मीयता नहीं पनप पाती. वस्तुविनिमय जरूरत और मुनाफे का लेनदेन बन जाता है. इसमें उपभोक्ता जो अपनी जरूरत के चलते खरीदारी को विवश है, हमेशा घाटे में रहता है.

सरकार को लगता है कि व्यापारी और दुकानदार अपने मुनाफे पर देय आयकर तथा अन्य करों का भुगतान करने में बेईमानी करते हैं. हालांकि इसकी रोकथाम के लिए सरकार के अधीन भारीभरकम निगरानी तंत्र रहता है. उसका कार्य दुकानदारों के आयव्यय पर नजर रखना तथा उनसे निर्धारित कर वसूली करना है. डिजिटल पेमेंट गेटवे को बढ़ावा देने का अर्थ यह भी है कि सरकार अपने निगरानी तंत्र की विफलता को स्वीकार चुकी है. उसे लगता है कि लेनदेन के डिजिटलाइजेशन द्वारा कराधान का हिसाबकिताब और संग्रह सुगम हो जाएगा. चूंकि धनराशि का लेनदेन बैंकों या उपबैंकीय संस्थानों तथा संविदाओं यथा पेटीएम, आधारकार्ड, डेबिटक्रेडिट कार्ड आदि के माध्यम से होगा, तब उसकी वसूली भी आसान होगी. फलस्वरूप सरकार की अपने ही तंत्र पर निर्भरता घटेगी. इस निर्णय द्वारा सरकार को दुहरा लाभ होने की उम्मीद है. सरकार को लगता है कि इससे वह अधिकतम कराधान में सफल होगी. दूसरे बैंकिंग सेवाओं के जरिये उसे मोटी रकम सेवाकर के रूप में भी प्राप्त होगी. कुल मिलाकर सरकार अपने निगरानी तंत्र और उपभोक्ताओं से अधिक भरोसा उपबैंकीय एजेंसियों पर कर रही है. यह तब है जबकि उपभोक्ता वस्तुओं तथा अधिकांश औद्योगिक उत्पादों के मूल्य पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है. कराधान से बढ़े खर्च की भरपाई पूंजीपति और उद्यमी बड़ी आसानी से मूल्य बढ़ाकर कर सकते हैं. उसका असर सीधे उपभोक्ता की जेब पर पड़ेगा. उसके लिए चीजें और भी महंगी होंगी. सेवा प्रदाता बैंकिंग और उपबैंकिंग एजेंसियों का खर्च तथा उसपर लगने वाला सेवा कर भी अंततः उपभोक्ता की जेब से ही जाएगा. उसे न केवल बैंकिंग सेवा के बदले भुगतान करना पड़ेगा, बल्कि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में दुकानदार पर लगने वाले करों का हिस्सा भी उसे ही वहन करना पड़ेगा. चूंकि नकदी जेब में नहीं रहेगी, इसलिए उसका लाभ बैंक उठाएगा. ये बातें आम उपभोक्ता से छिपी नहीं हैं. बावजूद इसके सामाजिक स्तर पर कोई बड़ी हलचल या आक्रोश नजर नहीं आता. आमजन की इस चुप्पी या अपार सहनशीलता को सरकार अपने निर्णय के प्रति समर्थन के रूप में पेश कर रही है. क्या हालात पूर्णतः विकल्पहीन हैं?

लोकतंत्र में मतसंख्या महत्त्वपूर्ण होती है. लेकिन मतदान में समाज के सभी वर्ग समान रूप से हिस्सा नहीं लेते. मतदाताओं की आय के आधार पर हम उन्हें तीन वर्गों में बांट सकते हैं. पहला अतिसंपन्न वर्ग. प्रत्यक्ष या परोक्ष उसका संबंध पक्षविपक्ष के सभी नेताओं से होता है. असल में यह वर्ग राजनीति का उपयोग अपने हक में करता है. चाहे जिस दल की जीत हो यह वर्ग सत्ता के हमेशा करीब रहता है. उसे निर्वाचन प्रक्रिया की परवाह नहीं होती. चुनावों में इसकी आनुपतिक भागीदारी सबसे कम होती है. दूसरा मध्य वर्ग. इस वर्ग में पढ़ालिखा रोजगारपरस्त वर्ग, छोटेव्यापारी, पेशेवर, बुद्धिजीवी आदि आते हैं. यह किसी भी समाज की प्राणशक्ति होता है. इसका एक हिस्सा समाज के शीर्षस्थ वर्ग से समझौता कर अपनी स्वार्थसिद्धि में लगा रहता है, जबकि दूसरा हिस्सा व्यवस्था से असंतुष्टों का होता है. जनता का साथ मिले तो यह सामाजिक क्रांति का वाहक बन जाता है. इसकी दुर्बलता है कि यह राजनीतिक रूप से बेहद बंटा हुआ होता है. संख्या में यह अतिसंपन्न वर्ग से अधिक तथा राजनीतिक दृष्टि से सबसे चलायमान वर्ग माना जाता है. चुनावों में आगापीछा सोचकर मतदान करता है. बंटा होने के कारण यह वर्ग खुद तो राजनीतिक ताकत नहीं बन पाता, लेकिन लोकमानस को बनानेबिगाड़ने, दलविशेष के संबंध में हवा बनाने में इस वर्ग का बहुत योगदान होता है. इसके मामूली प्रतिशत का किसी दल या विचार की ओर झुकाव, मतदाताओं के बड़े वर्ग को प्रभावित करता है. तीसरा वर्ग जनसाधारण का होता है, जिसमें किसान, मजदूर, छोटे पेशेवर आदि आते हैं. इस वर्ग के लिए रोजीरोटी के मसले जीवन के बाकी मामलों से बड़े होते हैं. वर्तमान चुनौतीपूर्ण होता है, जिससे भविष्य के सपनों की ओर उनका ध्यान ही नहीं जा पाता. इस वर्ग के पास देशदुनिया के बारे में ज्यादा सोचने का अवसर नहीं होता. इसलिए मतदान के समय धर्म, जाति, क्षेत्रीयता जैसे मुद्दों के आधार पर अपनी राय बनाता है, जिनका इसके विकास से कोई संबंध नहीं होता. लोकतांत्रिक विवेक की कमी भी इसका कारण बनती है. इस वर्ग का मानस धर्म, संस्कृति परंपरा के मौखिक पाठों द्वारा तैयार होता है. समस्याओं के निदान के लिए इसे सदैव किसी तारणहार की प्रतीक्षा रहती है. इस कारण इसे फुसलाना आसान होता है. अतएव नेतागण चुनावी नारे इसी वर्ग को ध्यान में रखकर बनाते हैं. रातदिन इसी के कल्याण का राग अलापते हैं. परंतु चुनाव जीतते ही वे इससे पूरी तरह कटकर उस वर्ग के रहनुमा बन जाते हैं जिसे हमने पहले स्थान पर रखा है.

जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि यदि जनता के नहीं रहते, जनकल्याण के नाम पर बनी सरकारें यदि पूंजीपतियों और सरमायेदारों की हितैषी बन जाती हैं, तो जनता क्या करे? समस्या का कारण जनता की दुर्बलता नहीं, आत्मविश्वास और अपनी शक्ति के प्रति अनभिज्ञता है. लोग जानते हैं कि संसद में पहुंचे नेताओं को सर्वाधिक वोट उन्हीं के प्राप्त होते हैं. जो अमीर हैं, जिनकी सत्ता और संस्थानों तक पहुंच है, वे मतदान के दिन घर से नहीं निकलते. इसके बावजूद नेता हैं कि संसद तथा विधायिकाओं में जाते ही उस वर्ग को भुला देते हैं, जिसका उनकी जीत में सर्वाधिक योगदान है. वे उस वर्ग के पिछलग्गू बन जाते हैं, जो सामान्यतः उनकी परवाह नहीं करता. जनसाधारण जो मतदान में उत्साहपूर्वक हिस्सा लेता है, जनप्रतिनिधियों के माध्यम से सरकार के गठन को संभव बनाता है, अपनी समस्याओं के समाधान के लिए पुनः किसी तारणहार की प्रतीक्षा में लगा रह जाता है.

दरअसल हमने लोकतंत्र को तो अपनाया, मगर आधेअधूरे मन से. संविधान की भावना के अनुरूप लोगों की चेतना का लोकतांत्रिकरण कर ओर हमने ध्यान ही नहीं दिया. बताया गया कि लोकतंत्र की परिभाषा जनता द्वारा सरकार चुनना है. जनता इसके लिए निर्वाचन प्रक्रिया में हिस्सा लेती रही. बिना यह जाने कि उसके द्वारा चुने गए प्रतिनिधि संसद और विधायिकाओं में जाते ही शासक बन जाते हैं. निहित स्वार्थ के लिए वे जनसाधारण से उसकी स्वतंत्रता, समानता तथा विकास के अवसर छीन लेते हैं, जिनपर नागरिक होने के नाते उनका अधिकार है. लोकतांत्रिक सरकार को चाहिए कि वह न्यूनतम शासन करे. उसके लिए लोगों का जागरूक रहना जरूरी है. लोग स्वयं जागरूक होंगे तो अनुशासित भी होंगे. अनुशासित होंगे तो सरकार का लावलश्कर कम होगा. लाव लश्कर कम होगा तो नागरिकों की जेब पर पड़ने वाला खर्च स्वतः घट जाएगा. वर्तमान व्यवस्था में सरकार मानती है कि लोगों में जागरूकता की कमी है. अनुशासन बनाए रखने के लिए वह नागरिकों के खर्च पर पुलिस को ले आती है. पुलिस से झगड़ा नहीं सुलझता तो अदालतें आ जाती हैं. हर संस्था नागरिक आजादी को थोड़ी कम करती है और उसकी जेब पर बोझ बढ़ा देती है. यानी लोकतंत्र में जनता की जिम्मेदारी केवल प्रतिनिधि चुनने से पूरी नहीं हो जाती. वे प्रतिनिधि ही बने रहें, शासक और सर्वेसर्वा न बनें इसका ध्यान रखना भी जनता की जिम्मेदारी है. इस तरह जनता का जनताकरण राजनीति के लोकतांत्रिकरण की बुनियादी शर्त है.

इस अवांतर से वार्तालाप का लेख की विषयवस्तु से क्या संबंध है? विमुद्रीकरण अर्थशास्त्र की समस्या है, राजनीति की नहीं. फिर भी यह हमें आवश्यक लगा, क्योंकि विमुद्रीकरण का वर्तमान निर्णय विशुद्ध अर्थशास्त्रीय नहीं है. उसके पीछे राजनीति छिपी है. यदि सरकार इसे अर्थशास्त्रीय मुद्दा समझती तो रिजर्ब बैंक या ज्यादा से ज्यादा वित्तमंत्री के स्तर पर इसकी घोषणा होनी चाहिए थी. आधीअधूरी तैयारी के साथ स्वयं प्रधानमंत्री को पहल करने की आवश्यकता नहीं थी. विमुद्रीकरण की घोषणा चार राज्यों में विधानसभा चुनावों से पहले की गई है. सो इसके राजनीतिक निहितार्थ होंगे ही. नेताओं की हर निर्णय को राजनीतिक नफानुकसान सोचकर करने की प्रवृत्ति की ओर ध्यान आकृष्ट कराना हमें इसलिए भी आवश्यक लगा क्योंकि यह न केवल समस्या की जड़ है, बल्कि समाधान भी इसी में अंतर्निहित है. लोकतांत्रिक व्यवस्था में यदि जनप्रतिनिधि कर्तव्यपथ से विचलित होते हैं, तो उसके लिए केवल वही दोषी नहीं होते. प्रकारांतर में जनता भी उसके लिए जिम्मेदार होती है. यदि निर्वाचित प्रतिनिधि या चुनी हुई सरकार जनता के कष्टों की ओर से लापरवाह हैं तो जनता के लिए सबसे अच्छा रास्ता यही है कि वह अपनी संगठित शक्ति का उपयोग हालात को सुधारने के लिए करे. इस कार्य को जनप्रतिनिधियों पर दबाव डालकर किया सकता है, यदि फिर भी सरकार के स्तर पर निरंकुशता बनी रहती है तो जनता के पास एकमात्र रास्ता बचता है कि वह सरकार पर अपनी निर्भरता को कम करते हुए न्यूनतम स्तर पर ले आए. हमारी यह सलाह अव्यावहारिक लग सकती है. लेकिन लोकतंत्र को उत्सव की तरह जीने का रास्ता इसी ओर से जाता है. प्रूधों के शब्दों मेंᅳ‘मुक्त समाज में कानून बनाने, नई संस्थाएं गठित करने, उनका संविधान रचने, स्थापना एवं प्रशासनिक ढांचा खड़ा करने से लेकर कार्यारंभ तक सरकार की भूमिका न्यूनतम, इतनी कम जितनी कि संभव होहोनी चाहिए. राज्य (सरकार का लाभकारी) उद्यम नहीं है. इसलिए उद्यमों एवं संस्थाओं की स्थापना/संचालन के उपरांत सरकार को उनसे स्वयं अलग होकर, उन्हें स्थानीय प्राधिकरणों और जनसंस्थाओं के सुपुर्द कर देना चाहिए.’

राज्य पर निर्भरता को कम करने के अनेक रास्ते हैं. करेंसी के मुद्दे को ही लें. किसी भी राज्य की राज्य की वास्तविक शक्ति उसकी जनता में अंतर्निहित होती है. जबकि राज्य करेंसी को प्रत्याभूत करता है. इस तरह करेंसी के प्रत्याभूतिकरण के पीछे अंतिम शक्ति जनता की ही होती है. जनता यदि करेंसी को प्रत्याभूत कर सकती है तो उसके विकल्प भी तलाश सकती है. ऐसे विकल्प जो उसे अधिक स्वतंत्रता तथा आत्मनिर्भरता का एहसास दिलाते हुए उसके आत्मविश्वास बनाए रखने में मददगार हों. इस दिशा में प्रचलित विकल्पों को समाजवाद के आधुनिक अपररूप की संज्ञा दी जा सकती है. हालांकि इनकी कार्यशैली उससे भिन्न है. ये पूंजीवाद के जूझने के बजाए संगठन और सामूहिक विवेक के बल पर उससे मुक्ति का भरोसा दिलाते हैं. कुछ दशक पहले तक भारत के गांवों में जो प्राचीन सहयोगाधारित व्यवस्था रही है, जिसे हमारी ही पीढ़ी ने दम तोड़ते देखा है, इन्हें उसका संशोधित संस्करण भी कहा जा सकता है. आजकल शहरों में मिश्रित बस्तियों का चलन है. एक ही मुहल्ले में विभिन्न पेशों और कलाओं में दक्ष लोग रहते हैं. उनमें प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, बढ़ई, लुहार, एकाउंटेंट, राजमिस्त्री, पेंटर, ऑटो चालक वगैरह अनेक प्रकार के पेशेवर और तकनीकी कौशल वाले लोग रहते हैं. यदि ये ठान लें कि आपसी व्यवहार के दौरान मुद्रा का प्रयोग न्यूनतम करेंगे, तो थोड़ीसी आरंभिक हिचक के बावजूद, वे आसानी से ऐसा कर सकते हैं. इस व्यवस्था के अंतर्गत श्रम का आकलन एवं भुगतान बजाय मुद्रा के श्रमघंटों में किया जाएगा. मान लीजिए ‘क’ कंप्यूटर पेशेवर है. उसे अपने घर के लिए प्लंबर की आवश्यकता है. वह बस्ती के प्लंबर ‘ख’ को आमंत्रित करेगा. ‘ख’ को काम पूरा करने में यदि दो घंटे लगते हैं, तो उसके दो श्रमघंटे ‘क’ पर उधार माने जाएंगे. मुद्रा रहित भुगतान प्रणाली में ‘क’ को कुछ ऐसा करना होगा, जिससे वह ‘ख’ के श्रमघंटों का भुगतान श्रमघंटों में ही कर सके. इसके लिए वह ‘ख’ की आवश्यकतानुसार कुछ डिजायन कर सकता है. यदि ऐसा होता है तो वह श्रमघंटों का सीधा आदानप्रदान मान लिया जाएगा. यह भी हो सकता है कि ‘ख’ को ‘क’ की सेवाओं की तत्काल कोई जरूरत न हो. उस अवस्था में उनके बीच का लेनदेन सुरक्षित माना जाएगा. मान लीजिए कुछ दिनों के बाद ‘ख’ को बिजली मिस्त्री ‘ग’ की आवश्यकता पड़ती है. जिसपर ‘क’ के किसी काम के दो श्रमघंटे बकाया हैं. तो ‘ग’ उस उधार के बदले ‘ख’ को अपनी सेवाएं देकर ‘क’ से उऋण हो सकता है. यह उदाहरण है. इस प्रणाली को थोड़े प्रबंधन के साथ आसानी से अपनाया जा सकता है. मुहल्ला सभाएं इस काम को बड़े आराम से कर सकती हैं. हो सकता है कंप्यूटर पेशेवर दावा करे कि उसके काम के लिए आनुपातिक रूप से अधिक योग्यता की आवश्यकता पड़ती है. और वह अपने श्रमघंटों के मूल्य की तुलना बिजली मैकेनिक या पलंबर से करने को तैयार न हो. इस समस्या के समाधान के दो रास्ते हैं. पहला और श्रेष्ठतर उपाय है कि कंप्यूटर पेशेवर से अनुरोध किया जाए कि वृहद सामूहिक हितों के लिए उदारता दिखाते हुए इस प्रकार की तुलना को रहने दे. दूसरा यह कि आपसी सहमति से ऐसे नियम बनाए जाएं जिससे इस प्रकार के विवाद उत्पन्न ही न हों. इससे मौद्रिक लाभ सामाजिक लाभ के अपेक्षा श्रेष्ठतर रूप में प्राप्त होंगे. यह रास्ता अव्यावहारिक लग सकता है, मुश्किल बिलकुल नहीं है. अधिकांश कारखाने अपने कामगारों को वेतन देने के लिए उनके कार्य का मूल्यांकन श्रमघंटों के आधार पर करते ही हैं. एक बार चलन में आ जाने के बाद व्यवस्था सहज लगने लगेगी. इससे सरकार और उसके तंत्र पर निर्भरता घटेगी और मुद्राकेंद्रित क्रयविक्रय में जनता को जो भारीभरकम कर सरकार को चलाने के लिए देना पड़ता है, उसकी बचत हो जाएगी. सरकार का काम सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय संबंधों तक सिमट जाएगा. क्लेरेंस ली स्वार्ज ने अपनी पुस्तक ‘व्हॉट इज म्युच्युलिज्म’(1927) में इसकी प्रशंसा करते हुए लिखा है

यह एक ऐसा सामाजिक दर्शन है जो सभी नागरिकों के लिए समान स्वाधीनता, पारस्परिक समानताधारित लेनदेन तथा व्यक्तिविशेष की अपने जीवन, श्रम एवं श्रमोत्पाद पर पूर्ण संप्रभुता को दर्शाता है.’

सच यह है कि सरकार का विवेक, जनता के विवेक पर टिका होता है.

© ओमप्रकाश कश्यप

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एक ‘राष्ट्रवादी’ फैसला

  • राष्ट्रवाद महज धारणा है. उससे हम यह मान लेते हैं कि कोई एक देश दुनिया के  बाकी देशों से मात्र इस कारण श्रेष्ठतर है, क्योंकि हमारा  जन्म उसमें हुआ है.                                                               जार्ज बनार्ड शा.

  • कल्पना कीजिए कि (आपका)कोई देश नहीं है, जिसके लिए मारा या मरा जाए. यह सोच पाना बहुत कठिन भी नहीं है. सोचिए कि कोई धर्म भी नहीं है. सब शांतिपूर्वक जीवनयापन कर रहे हैं. आप कह सकते हैं कि मैं कोरा स्वप्नजीवी हूं. लेकिन ऐसा केवल मैं ही नहीं हूं. मुझे उम्मीद है  कि एक दिन तुम भी मेरे साथ खड़े नजर आओगे. उस दिन यह दुनिया एक हो जाएगी.                                    जॉन लिनन.

पिछले दिनों उच्चतम न्यायालय ने सिनेमाघरों में राष्ट्रीय गान को अनिवार्य कर दिया. पता चला कि मामला 13 वर्षों से लटकता आ रहा था. न्यायालय को लगा कि अब और टालना अनुचित होगा. क्यों लगा? क्या इसलिए कि केंद्र में भाजपा की सरकार है? किसी और दल की सरकार होती तो फैसला कुछ और आता! या फिर कुछ वर्ष और लटका रहता! संभवतः कोर्ट ने सोचा हो कि राष्ट्रप्रेम का पाठ स्वयंभू राष्ट्रवादियों की सरकार के अनुशासन में आसानी से पढ़ाया जा सकता है. सचाई चाहे जो हो, महत्त्वपूर्ण यह जानना है कि अदालत को अचानक क्यों लगा कि लोगों में राष्ट्रीयता की भावना घट रही है. वह भी स्वयंभू राष्ट्रवादियों की सरकार तथा वाग्वीर प्रधानमंत्री के रहते. बात-बात पर भारत-माता का जयकारा लगाने वाले ‘आर्यपुत्र’ लोगों में राष्ट्रप्रेम की प्रेरणा जगाने में असमर्थ क्यों हुए, जो न्यायालय को हस्तक्षेप के लिए आगे आना पड़ा?

फैसला देश की सबसे बड़ी अदालत का है तब कुछ हकीकत तो होगी. पेंच यह है कि राष्ट्रप्रेम की क्लास लगाने के लिए सिनेमाघरों को चुना गया है, जहां जाने वाले दर्शकों में बड़ी संख्या बेरोजगारों, रिक्शाचालकों और प्रवासी मजदूरों की होती है. घर-परिवार से दूर, कभी मनोरंजन की चाहत में तो कभी यूं ही, परिजनों की याद से छुटकारा पाने के लिए अधिकांश वही सिनेमाघर जाते हैं. कुछ इसलिए भी जाते हैं क्योंकि उनके पास रात बिताने का ठिकाना नहीं होता. देर रात का शो देखकर लौटने तक सड़कें सुनसान होने लगती हैं. आवारा कुत्ते थककर सड़कों के किनारे, दुकान के थड़ों के आसपास ठिकाना तलाशने लगते हैं. मौका देखकर वे भी जहां सिर समाए, अगली सुबह जिंदगी से जूझने का संकल्प लेकर लुढ़क जाते हैं. कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो बड़े लोग सिनेमाघर जाते नहीं, सिनेमा खुद उनके बीच चला जाता है. जब भी मन करता है, वे सिने कलाकारों को जन्मदिवस या किसी और बहाने आंगन में नंचवा लेते हैं. जो और बड़े हैं उनके घर ही में सिनेमाघर बने हैं. फैसले से यह साफ नहीं हुआ कि यह कानून क्या ‘एंटीला’ और उस जैसे प्रासादों में बने सिनेमाघरों पर भी लागू होगा? शायद नहीं. इसलिए कि हमारे यहां खुद को राष्ट्रभक्त सिद्ध करने की जिम्मेदारी प्रायः जनसाधारण की होती है. अमीर और वीवीआईपी की नहीं. उनकी राष्ट्रभक्ति तो स्वयंसिद्ध होती है. एहसान तले दबा मीडिया दिन-रात उनके महिमा-मंडन में जुटा रहता है. राष्ट्रप्रेम बलिदान मांगता है. सो बेघर, अकेलेपन के शिकार, बेरोजगार लोगों को राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाते रहना जरूरी है. कदाचित इसीलिए अदालत ने दखल दिया है.

आप कह सकते हैं कि अदालत का फैसला सभी के लिए है. मैं कहूंगा गलत. यदि सभी के लिए होता तो शुरुआत संसद और विधान-सभाओं से होती. हर उस कल-कारखाने से होती जिसे राष्ट्र-निर्माण का मंदिर बताया जाता है. साथ ही स्कूल, कॉलेज, क्रिकेट और खेल के मैदानों तथा हर उस सभा से भी होती, जहां सार्वजनिक उपस्थिति हो. सिनेमाघर तो व्यक्ति हल्के-फुलके मूड के साथ जाता है. कभी खुद को भुलाने, तो कभी भूले हुए को याद करने के लिए. अगंभीर मनस्थिति में राष्ट्रगान में हिस्सा लेने का औचित्य? क्या इससे राष्ट्रप्रेम जगाने में सचमुच सफलता मिलेगी? कल्पना कीजिए पर्दे पर राष्ट्रगान के तुरंत बाद हेलन के डांस या सनी लियोनी के रोमांस का सीन आएगा तो उनमें से कौन-सा दिमाग पर देर तक प्रभावी  रहेगा. या फिर राष्ट्रगान समाप्त होते ही पर्दे पर सोडे के बहाने शराब का विज्ञापन आया तो राष्ट्रगान का असर कितनी देर टिक पाएगा? कुल मिलाकर हाल का निर्णय राष्ट्रीय भावनाओं को धर्म में ढाल देने जैसा है, जिसमें पुजारी दुनिया के सभी कारोबार आरती, पूजा-अर्चन के बीच तथा आगे-पीछे चतुर सौदागर की तरह निपटाता है. राष्ट्रप्रेम धर्म न होकर, नागरिक मात्र का अपने राष्ट्र के प्रति नैतिक एवं संवैधानिक कर्तव्य है. इसमें राज्य की भूमिका उत्प्रेरक की होनी चाहिए. कहने की आवश्यकता नहीं कि राज्य के स्वनामधन्य कर्ता-धर्ता अपने स्वार्थपूर्ण आचरण द्वारा इस काम में चूकते रहे हैं. ऐसे में केवल सिनेमाघरों में राष्ट्रीयगान की अनिवार्यता राष्ट्रप्रेम के वास्ते निर्धारित कानूनी कर्मकांड जैसी ही है. राष्ट्रगान की गरिमा तभी है जब परिवेश अनुकूल हो. व्यक्ति उदात्त मन से उसके साथ जुड़ा हो. साथ ही राज्य अपने प्रत्येक नागरिक के साथ ईमानदार एवं निष्पक्ष अभिभावक जैसा व्यवहार करता हो. हमारी संस्कृति कर्मकांड प्रधान सही, परंतु कोरे कर्मकांडों से राष्ट्रप्रेम नहीं जगाया जा सकता. राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान आवश्यक है. प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य कि अपने देश और देशवासियों पर गर्व करे. मगर इसके लिए सिनेमाघर उपयुक्त स्थान नहीं हैं. यदि न्यायालय उन्हें उपयुक्त मानता है, तो क्रिकेट मैच की शुरुआत भी राष्ट्रगान से होनी चाहिए. क्योंकि दोनों ही मनोरंजन का माध्यम हैं; तथा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में दोनों ही बाजारवादी अर्थव्यवस्था का हित साधते हैं.

सिनेमा हाल में राष्ट्रगान को जरूरी बताकर उच्चतम न्यायालय में अप्रत्यक्ष रूप से यह मान लिया है कि जो लोग सिनेमाघर जाते हैं, वे राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति उदासीन होते हैं. जबकि ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जब किसी गरीब ने लालच में पड़कर देशद्रोह जैसा धत्तकर्म किया हो. सच तो यह है कि जो लोग घर ही में सिनेमाघर बनवाने का सामर्थ्य रखते हैं, वे प्रतीक की बात दो दूर, खुद को राष्ट्र का पर्याय माने रहते हैं. सीना तान कर प्रधानमंत्री के फोटो का उपयोग अपने प्रॉडक्ट के विज्ञापन के लिए करते हैं. एहसानमंद मीडिया उसे बार-बार दिखाता है. यहां सिनेमा की उपयोगिता से इंकार नहीं है. वह सशक्त माध्यम है. उसका उपयोग राष्ट्रप्रेम जगाने के लिए किया जा सकता है. अच्छा सिनेमा अनेक राष्ट्रहित साध सकता है. उसके लिए सिनेमाघर में राष्ट्रगान आवश्यक नहीं है. विशेषकर भारत में जहां अधिकांश फिल्में फार्मूलाबद्ध होती हैं. सस्ते मनोरंजन के अतिरिक्त उनकी कोई सार्थकता नहीं होती, गाहे-बगाहे जो सामाजिक असमानता तथा उसकी बाजारवादी प्रवृत्तियों का समर्थन करती हैं—वहां थर्ड ग्रेड सिनेमा राष्ट्रीयताबोध जगाने के किसी भी प्रयास को मजाक में बदल सकता है. समस्या यह है कि सरकार हो या अदालत, ऐसे मामलों में पूर्वाग्रहों से सर्वथा मुक्ति असंभव होती है. यह मान लिया गया है कि राष्ट्रधर्म और राष्ट्रीयताबोध, दोनों की रक्षा करना केवल जनसाधारण की जिम्मेदारी है. इन परिस्थितियों में राज्य की भूमिका पेशेवर प्रबंधक जैसी होती है, जो कराधान के बदले नागरिकों को सुरक्षा और सुविधा उपलब्ध कराता है.

जनसाधारण काम की बातें प्रायः बड़े लोगों के आचरण से सीखता आया है. ‘महाजने येन गतः सः पंथा.’—जिस रास्ते पर महान लोग जाएं उसी का अनुसरण उत्तम है. यही उसे सिखाया जाता है. यही सीख उसके गीत-संगीत, किस्से-कहानियों, कहावतों और बड़े-बूढ़ों के अनुभवों के रूप में सामने आती है. उसे राष्ट्रगान का महत्त्व समझाने के लिए सिनेमाघर में पर्दे के सामने खड़ा करने की आवश्यकता नहीं है. शिखर पर मौजूद नेतागण, बड़े अधिकारी, पूंजीपति, व्यवसायी यदि अपने आचरण को राष्ट्रीयता की भावनाओं के अनुकूल ढाल लें तो जनसाधारण को अलग से राष्ट्रीयता का पाठ पढ़ाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. वर्षों पहले इसी देश के एक नेता ने सिर पर टोपी और लंगोटी पहननी शुरू की थी, तब अच्छे-खासे घरों के उच्च शिक्षा प्राप्त युवा सूट-बूट छोड़ टोपी और लंगोटी में आ गए थे. और उस समय तक न तो देश स्वतंत्र हुआ था, न ही राष्ट्रगान बना था. लेकिन राष्ट्रीय भावनाओं से पूरा देश ओतप्रोत था. पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण गूंजते नारे  स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़े सभी में यह एहसास जगा देते थे कि हम सब एक हैं. आजादी के बाद संकट की घड़ी में एक ठिगने कद के प्रधानमंत्री ने देशवासियों से सप्ताह में एक दिन व्रत रखने आवाह्न किया. उस समय न तो टेलीविजन था, न इंटरनेट, न ही बड़े-बड़े सुरसामुखी मीडिया घराने. साउंड ट्रैक का जमाना भी नहीं था. फिर भी उस नेता के कंठ से निकली आवाज को देश के नागरिकों ने दूर-दराज तक सुना था. फिर जैसे-जैसे जहां तक भी संदेश पहुंचा, लोगों ने सप्ताह में एक दिन व्रत रखने का नियम बना लिया था. आखिर क्यों? इसलिए कि वह जैसा था, वैसा ही दिखता था. किसी को उसकी ईमानदारी पर संदेह नहीं था. उसके पास केवल तीन-चार जोड़ी वस्त्र होते थे. पूरे वर्ष वह उन्हीं से काम चलाता था. रोज पांच-पांच बार वस्त्र बदलकर ‘फकीरी’ का दावा नहीं करता था. आज के नेता आत्ममोह को आत्मविश्वास मानते हैं. बड़बोले भाषणों से जनता के दिलों पर छाने का भ्रम पाले रहते हैं. पूंजी, प्रचार और पाखंड के भरोसे राजनीति करते हैं. ऐसे नेता जनता पर भरोसा करने का साहस नहीं जुटा पाते. न ही जनता उनपर विश्वास करती है. इसलिए राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाने के लिए न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा है.

क्या किसी को राष्ट्रभक्ति का पाठ सचमुच पढ़ाया जा सकता है? कुछ भाव मन में स्वतः उमड़ते हैं. लोगों को सिखाए नहीं जा सकते. जैसे कि प्रेम करना. हम किसी को इस बात के लिए विवश नहीं कर सकते कि वह हमारी बताई वस्तु या प्राणी से प्रेम करे. प्रेम करने के लिए जरूरी है कि व्यक्ति जिससे प्रेम करे, वह उसके किसी अभाव की पूर्णता का एहसास कराती हो. जमीन किसान का पेट भरती है. इसलिए किसान उससे प्रेम करता है. मां का दर्जा देता है. 1857 में राष्ट्रीय भावनाओं के प्रस्फुटन के मूल में कोई नेता नहीं था. उस समय तो देश में एक-राष्ट्र की भावना का उदय भी नहीं हुआ था. केवल सामूहिक अस्मिताबोध था. जिसमें प्रत्येक सैनिक खुद को नेता मान बैठा था. अपने उत्साह के बूते उन्होंने पूरे उत्तर भारत को अंग्रेजों के विरुद्ध जंग के लिए खड़ा कर दिया था. वह संघर्ष नाकाम हुआ, इसलिए कि इतने बड़े आंदोलन को संभालने के लिए जैसी मानसिक तैयारी चाहिए, वह उनके पास नहीं थी. लेकिन वह नाकाम संघर्ष भी देश में राष्ट्रीयताबोध जगाने में सफल सिद्ध हुआ.

ऐसा नहीं कि न्यायालय का निर्णय एकदम हवा से पैदा हुआ है. आजादी के बाद से ही यह देश भीतरी और बाहरी चुनौतियों से जूझ रहा है. पिछले कुछ दशकों से चुनौतियां तेजी से बढ़ी हैं. इस फैसले के मूल में ऐसी कई बातें हैं जो देश की आंतरिक उथल-पुथल को सामने लाती हैं. उत्तर में कश्मीर, पूर्वोत्तर के आतंकवाद पीड़ित राज्यों को छोड़ दें तो भी बिहार, झारखंड, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश, पश्चिमी बंगाल, मध्य प्रदेश जैसे राज्य हैं, जहां भारत नामक राज्य के विरुद्ध आवाजें उठ रही हैं. आप उन्हें ‘नक्सलाइट’ कहें, ‘चरमपंथी’ कहें या कुछ और—वे निर्विवाद रूप से भारतीय गणराज्य के लिए चुनौती बने हैं. इसका प्रमुख कारण लोकतांत्रिक समाधान के प्रति अविश्वास को जन्म लेना है. विडंबना यह है कि समस्या के कारणों को समझे बिना मीडिया उन्हें केंद्र के विरुद्ध चुनौती के रूप में पेश करता आया है. जबकि राज्य के विरुद्ध हथियार उठाने का अभिप्राय हमेशा यह नहीं होता कि विद्रोहियों को अपनी राष्ट्रीय पहचान से शिकायत है. प्रायः वह राज्य और नागरिक समूहों के बीच बढ़ते अविश्वास को दर्शाता है. इसलिए इस प्रकार की समस्याओं का समाधान राष्ट्रीयता की सीमा में, लोकतांत्रिक सूझबूझ के साथ किया जाना चाहिए. विडंबना है कि भारतीय राज्य की ओर से ऐसी कोई रचनात्मक कोशिश नजर नहीं आती. विकास का मतलब अर्थव्यवस्था को पूंजीपतियों, जिनकी गिद्ध-दृष्टि देश के संसाधनों पर है—के हवाले कर देने तक सीमित रह गया है. मुनाफे की बंदरबांट, लूट और उसके कारण बढ़ती आर्थिक विषमता सामाजिक असंतोष का मूल कारण है. 1857 के संग्राम में जितने लोग अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार लेकर निकले थे, उनसे कहीं बड़ी संख्या आज उन लोगों की है जो ‘नक्सलाइट’ या ‘चरमपंथी’ के रूप में राज्य के विरुद्ध संघर्ष छेड़े हुए हैं. अपनी असफलता को राज्य कई बार राष्ट्रभक्ति के नाम पर दबाने की कोशिश करता है. उस समय वह खुद को राष्ट्र के पर्याय के रूप में पेश करता है. परिणामस्वरूप राजतंत्र के विरुद्ध उठी आवाजें, राष्ट्र-राज्य के विरुद्ध जंग मान ली जाती हैं. जेएनयू मामले में कन्हैया कुमार के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ था.

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की एक बेहतरीन कविता, देश कागज पर बना नक्शा नहीं होता.’ बहुत कुछ कह देती है—‘इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ा/कुछ भी नहीं है/न ईश्वर/न ज्ञान/न चुनाव….जो विवेक/खड़ा हो लाशों को टेक/वह अंधा है/जो शासन/चल रहा हो बंदूक की नली से/हत्यारों का धंधा है.’ राष्ट्रभक्ति के नाम पर नारेबाजी करने वाले लोगों को भी समझना चाहिए कि राष्ट्र का अभिप्राय नदी-नाले, सागर, पहाड़, विशाल भूक्षेत्र या कल-कारखाने तक सीमित नहीं है. न ही वह केवल इतिहास, संस्कृति और सीमाओं के बोध का नाम है. यह बोध तो हम भारतवासियों को हजारों वर्षों से रहा है—उत्तरम् यत् समुद्रस्य हिमाद्रेः चैव दक्षिणम्/वर्षम् तद् भारतम् नाम भारती यत्र संततिः‘(विष्णुपुराण). धर्मशास्त्रों की दृष्टि से हम अलबेले हैं. यदि इन्हीं से सच्ची राष्ट्रभक्ति उत्पन्न होती तो हम संभवतः कभी गुलाम न होते. कोई भी देश अपने नागरिकों से बनता है. उनके सामूहिक सामाजिक-राजनीतिक और सांस्कृतिक बोध से बनता है. देश से प्रेम करने के लिए एक-दूसरे से प्रेम और परस्पर भरोसा करना आवश्यक है. सच्ची देशभक्ति सामाजिक एकता और विश्वास में बसती है. उसके लिए आवश्यक है कि लोगों के मन एक हों. सब एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करते हों; तथा सुख-दुख में साझा करने को सदैव तत्पर रहते हों.बावजूद इसके राष्ट्रीयबोध की मूल-भूत अनिवार्यता के रूप में जिस चीज को हम आरंभ से ही उपेक्षित करते आए हैं, वह है सामाजिक एकता और समानता. सत्ता-शिखर पर बैठे मुट्ठी-भर लोग अपने ही समाज के बहुसंख्यक लोगों का, उन्हें उनके न्यूनतम मानवीय अधिकारों से भी वंचित कर, कभी धर्म तो कभी जाति के नाम पर, शोषण करते आए हैं. नतीजा यह हुआ कि भारतीय समाज आरंभ से ही छोटे-छोटे वर्गां में बंटा रहा. जिनके पास शक्ति थी, साधन थे, उनके अपने स्वार्थ प्रबल थे. उसके लिए वे हर आक्रमणकारी से समझौता करते रहे. और जो समाज के लिए कुछ कर सकते थे, जिनके पास संख्याबल था. जो ईमानदार और मेहनती थे, उन्हें लगातार दुत्कार कर, उनके मनोबल को खंडित किया जाता रहा. परिणामस्वरूप इतना बड़ा देश इतिहास के कुछ हिस्सों को छोड़कर शायद ही कभी बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरा हो. छोटे-छोटे राज्यों के बीच वर्चस्व का संघर्ष हमेशा रहा है. बाहर के मुल्कों में देश की छवि यदि बनी तो बौद्ध धर्म के कारण, जो विभिन्न समुदायों के बीच एकता और समानता का संदेश लेकर दुनिया-जहान तक पहुंचा था. उसका संदेश था कि व्यक्ति का चरित्र और सदाचरण उसे लोक-प्रतिष्ठित बनाता है.

कोरा राष्ट्रवाद वर्चस्वकारी सत्ताओं का सबसे बड़ा पाखंड है. नागरिकों को भुलावे में रखने के लिए स्वार्थी सत्ताएं सदैव यह चाहती हैं कि लोग राज्य को, जो महज राजनीतिक संस्था है, राष्ट्र का पूरक और पर्याय माने रहें. ताकि वे अपने प्रत्येक फैसले को राष्ट्र का निर्णय बताकर, उसे बहस और आलोचना के दायरे से बाहर रख सकें. वे हमेशा यह समझाने में लगी रहती हैं कि लोगों के हित केवल और केवल उन्हीं के मार्गदर्शन में सुरक्षित हैं. उनकी कोशिश राष्ट्रभक्ति को धर्म बना देने की होती है. कदाचित इसीलिए सैमुअल जानसन ने देशभक्ति को ‘बदमाशों का अंतिम आश्रय’(Patriotism is the last refuge of a scoundrel) माना है. थोड़े परिवर्तन के साथ ऑस्कर वाइल्ड ने भी दुहराया था, ‘देशभक्ति शातिरों का गुण है’(Patriotism is the virtue of the vicious). राष्ट्रीयताबोध स्वतंत्र नागरिक चेतना में बसता है. परिपक्व राष्ट्रीयताबोध के लिए आवश्यक है कि लोग अपने अधिकारों तथा दूसरे के अधिकारां का भी सम्मान करें. इसके लिए राज्य का स्वयंप्रभुता संपन्न होना आवश्यक नहीं है. परतंत्र राज्य में भी मुखर राष्ट्रीयताएं पनपती रही हैं. भारतीय स्वाधीनता आंदोलन इसका श्रेष्ठ उदाहरण है. सोवियत संघ में अनेक राज्य प्रभुतासंपन्न राज्य नहीं थे. परंतु उनके नागरिकों के हृदय मैं तीव्र राष्ट्रीयताबोध हिलोर मारता था. सोवियत राज्य ने उसे उपेक्षित रखा, जिसका दुष्परिणाम उसके विघटन के रूप में सामने आया. राष्ट्रीयताबोध के मूल में सांस्कृतिक चेतना और एैक्य-भाव अनिवार्य है. क्या भारतीय समाज के बारे में ऐसा कहा जा सकता है?

विद्वान भारत की सांस्कृतिक-सामाजिक एकता की निरंतर दुहाई देते रहे हैं. इसके लिए वे महाकाव्यों और होली, दीपावली जैसे त्योहारों का नाम लेते हैं. तर्क देते हैं कि महाकाव्य देश के सभी भागों में पढ़े-पढ़ाए जाते हैं, होली, दीपावली जैसे त्योहार सभी जगह प्रचलित हैं, इसलिए यह देश भू-सांस्कृतिक इकाई यानी एकराष्ट्र है. जबकि महाकाव्यों में, होली, दिवाली जैसे त्योहारों के मूल में जो विश्वास है, वह स्वयं विरोधाभासी है. लोकतंत्र की कसौटी पर न तो महाकाव्य खरे हैं, न ही इन त्योहारों की अंतर्कथाएं. किसी न किसी रूप में वे सभी धर्म-केंद्रित राजतंत्र का समर्थन करते हैं. जिसमें निर्णय ऊपर से थोपे जाते हैं. लोकतांत्रिक विमर्श के लिए वहां कोई गुंजाइश नहीं होती. इसलिए उसके सहारे विकसित संस्कृति प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में सामाजिक-सांस्कृतिक असमानता का समर्थन करने लगती है. धर्म और राष्ट्रवाद की कई विशेषताएं एक-दूसरे से मेल खाती हैं. दोनों में एक अपेक्षाकृत आधुनिक अवधारणा है. दूसरी लगभग तीन सहस्राब्दी पुरानी. दोनों की ही खूबी है कि वे व्यक्ति-स्वातंत्र्य की दुश्मन हैं. उनके चयन में मनुष्य का अपना कोई योगदान नहीं होता. अधिसंख्यक मामलों में दोनों जन्म के साथ थोप दी जाती हैं.

राष्ट्रवाद का नकार राष्ट्रप्रेम का नकार नही है. वह राष्ट्रभक्ति के नाम पर मनमानी, उग्रता, पक्षपात तथा एकाधिकार की भावना का नकार है. राज्य की असफलता है कि वह अपने नागरिकों को यह विश्वास दिलाने में नाकाम रहा है कि वह संकट में उसके साथ है. इससे सामाजिक अंतर्द्वंद्वों में वृद्धि हुई. हताश राज्य शांति-व्यवस्था के नाम पर कानून की ताकत का तरह-तरह से इस्तेमाल करता है. हाल का अदालती निर्णय भी इसी दिशा में जाता है. इन दिनों भारत में झंडा उठाऊ राष्ट्रवाद का बोलबाला है. उसके नाम पर शोर-शराबा वे लोग कर रहे हैं जिनके पास ताकत है. साथ में सत्ता का समर्थन. सांस्कृतिक श्रेष्ठता का दावा करते हुए जो समाज को अर्से से अपनी तरह हांकते आए हैं. ऐसे लोगों का ‘राष्ट्रवाद’ आवश्यक नहीं कि लोकतंत्र और नागरिकता के मानकों के अनुरूप हो. छदम् राष्ट्रवाद का झंडा उठाए वे दिखाना चाहते हैं कि वे बाकी लोगों से बेहतर हैं. उसमें समानता और स्वतंत्रता से अधिक बल और आक्रामकता प्रभावी होते हैं. यदि राज्य ऐसे ही राष्ट्रवाद को प्रोत्साहित करता है तो स्थिति उन लोगों के प्रति अन्यायकारी हो जाती है, जिनका राष्ट्रीयताबोध समानता, नैतिकता, स्वतंत्रता एवं लोकतंत्र जैसे मूल्यों से बना है. यही कसौटी देशप्रेम पर भी लागू होती है. देशभक्ति का अभ्रिप्राय राज्य की प्रत्येक गतिविधि को गर्व की निगाह से देखना नहीं है. इसके लिए आलोचनात्मक विवेक अनिवार्य है. राष्ट्र के प्रति अनुराग तभी तक उचित है, जब तक नागरिकों को यह भरोसा हो कि उनका राष्ट्र समानता, स्वतंत्रता और मानवीय आदर्शों का सम्मान करते हुए उन्हें पाने के लिए सतत प्रयत्नशील है. यदि उन्हें लगता है कि उनका राष्ट्र मानवीय आदर्शां को भुला चुका है, तो नागरिकों को ऐसे राष्ट्र से शिकायत करने, यहां तक कि उससे घृणा करने अधिकार भी प्राप्त होता है. यह जिम्मेदारी राज्य की है कि वह ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न न होने दे, जिससे नागरिकों को अपने ही राष्ट्र-राज्य के विरोध हेतु मुखर होना पड़े.

—ओमप्रकाश कश्यप

 

  1. Imagine there’s no countries/It isn’t hard to do/Nothing to kill or die /And no religion too/Imagine all the people/Living life in peace You may say that I’m a dreamer/But I’m not the only one/I hope someday you’ll join us/And the world will be as one.―John Lennon, Imagine.
  2. उत्तरम् यत् समुद्रस्य हिमाद्रेः चैव दक्षिणम्।

वर्षम् तद् भारतम् नाम भारती यत्र संततिः।।

गायंति देवाः किल गीतिकानि, धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।

स्वर्गापवर्गास्पद—मार्गभूते, भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्।।

समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले।

विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्वमे।।

   (वह देश जो महासागर के उत्तर में बसा है, जिसके दक्षिण में हिमगिरि विद्यमान है. उसी का नाम भारतवर्ष है, वहां बसनेवाले भरत के वंशज हैं/देवता गीत गाते हैं कि स्वर्ग और अपवर्ग की मार्गभूत भारत भूमि के भाग में जन्मे लोग देवताओं की अपेक्षा भी अधिक धन्य हैं।/हे देवी पृथ्वी! आप समुद्र रूपी वस्त्रों को धारण करने वाली हैं, पर्वतरूपी स्तनों से सुशोभित हैं तथा भगवान विष्णु कि आप पत्नी हैं, आपको पैरों से स्पर्श करने के लिए मैं क्षमा चाहता हूं. विष्णुपुराण.)

 

 

 

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ओबीसी साहित्य : सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के विरुद्ध मोर्चा

मिलावट बुरी बात है. ज्ञान की खूबी है कि वह हर मिलावट का पर्दाफाश कर देता है. इसलिए इस देश में ज्ञानी को हमेशा सिर-माथे लिया गया है. सैंकड़ों ग्रंथ उनके अवदान और प्रशस्तियों से भरे पड़े हैं. बावजूद इसके ज्ञान ही है, जिसमें सर्वाधिक मिलावट पाई जाती है. धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर, क्षेत्रीयता और राष्ट्रवाद के नाम पर कुछ ज्ञानियों ने इस क्षेत्र में इतना घोटाला किया है कि झूठ और सच का पता लगाना चुनौती बन जाता है. खासकर उसके लिए जो ज्ञान पर मानव-मात्र के अधिकार का समर्थक है; तथा उसे मनुष्यता के हक में इस्तेमाल करना चाहता है.

लेख का शीर्षक सैकड़ों सवाल उठाने वाला है. प्रतिक्रियावादियों के लिए एक और मौकाᅳ‘अरे! दलित साहित्य तो था ही, अब ओबीसी साहित्य भी! आखिर क्यों? कौन हैं ये लोग जो देश और समाज को बांटने पर तुले हैं! उन्हें पता होना चाहिए कि साहित्य और साहित्यकार की कोई जाति नहीं होती! संपूर्ण मनुष्यता उनकी जद में होती है! उसपर ये सिरफिरे हैं कि साहित्य को बांटने की जिद ठाने हैं. जातिवाद फैला रहे हैं! छिः!! ये प्रतिक्रियाएं उनकी होंगी जो वर्षों से जाति की मलाई मारते आए हैं. जिन्हें सुधार के नाम से ही चिढ़ है. जातिवाद जिनकी रग-रग में भरा है. उसपर पर्दा डालने के लिए कभी धर्म का सहारा लेते हैं, कभी राष्ट्रवाद का. जो खुद को दूसरों से बहुत-बहुत ऊपर मानते हैं. जिनके मन में समाज को हजार-दो हजार वर्ष पीछे ले जाने का षड्यंत्र हमेशा चलता रहता है. उसके लिए उन्हें चाहे जो करना पड़े. संयोग से इन दिनों माहौल उनके अनुकूल है. इसलिए इस बार उनके तेवर कुछ अलग हो सकते हैं.

आलोचना पूरी तरह हवा में हो यह बात भी नहीं है. ठीक है, ओबीसी में समाजार्थिक रूप से पिछड़ी जातियां आती हैं. यह भी कि देश में उनका कोई एक स्वरूप नहीं है. उनकी सूची प्रदेशानुसार बदलती रहती है. सरकारी योजनाओं की बात अलग है, परंतु साहित्य में जिसका रूप ही समावेशी होता हैᅳयह कैसे माना जा सकता है कि किसी एक प्रदेश में जाति-विशेष के साहित्यकार को ओबीसी की श्रेणी में लिया जाए और दूसरे प्रदेश में उसी जाति के साहित्यकार को छोड़ दिया जाए? अगर ऐसा हुआ तो जाति का प्रश्न और गहराएगा. उस समय साहित्य के नाम पर जातिवाद फैलाने के आरोप से कैसे बच पाएंगे? विशेषकर तब जब जातिवाद के विरुद्ध जंग, साहित्य और साहित्यकार दोनों का पहला संकल्प हो. लेकिन प्रदेशवार जातियों के बदलने की समस्या तो दलित साहित्य के साथ भी है. वहां इस तरह के सवाल नहीं उठते. क्यों? इसलिए कि ‘दलित साहित्य’ जाति के बजाय उपेक्षा और उत्पीड़न का शिकार रहे वर्गों की बात करता है. वर्ग के रूप में ही वह करोड़ों लोगों की अस्मिता और अधिकारों के संघर्ष को विमर्श के केंद्र में ले लाता है. ‘ओबीसी’ स्वयं एक वर्ग है. लेकिन इस वर्ग में आने वाले लोगों के जातीय पूर्वाग्रह इतने प्रबल रहे हैं कि खुद को वर्ग के रूप में देखने की प्रवृत्ति बन ही नहीं पाई. जबकि वर्ग-भेद का दंश पिछड़ों ने उतना ही झेला है, जितना दलितों ने. ब्राह्मण ग्रंथों में जो प्रतिबंध अंतज्यों पर लगाए गए हैं, लगभग वही शूद्र के लिए भी हैं. केवल पेशे के कारण दोनों में वर्ग-भेद पैदा किया गया है.

ओबीसी सरकार द्वारा घोषित श्रेणी है. इस शब्द में वैसी कशिश नहीं है, जैसी इसके समानधर्मा ‘दलित’ में है. ‘दलित’ संबोधन के साथ-साथ दमित तथा दमनकारी जातियों, वर्गों की याद बरबस आ जाती है. तब क्या ओबीसी साहित्य का विचार छोड़ देना चाहिए? परंतु यह तो देश की आधी से अधिक जनता के हितों को लेकर विमर्श की जो संभावना बन रही है, उसपर पानी फेर देने जैसा काम होगा. काम इतना आसान भी नहीं है. चुनौती शून्य को सागर का विस्तार देने की है. सिर्फ साहित्यकारों द्वारा यह संभव नहीं. ‘ओबीसी साहित्य’ के विचार को सफल बनाना है तो उसके अंदर सम्मिलित जातियों में वैसी चेतना भी पैदा करनी होगी जिससे वे स्वयं को वर्ग के रूप में देख और महसूस कर सकें. यानी कुछ ऐसा हो कि ‘ओबीसी साहित्य’ का नाम आते ही वर्गीय शोषण, उत्पीड़न, दैन्य के साथ-साथ उनके कारणों तथा उन संघर्षों की तस्वीर भी आंखों में तैर जाए जो उन्होंने खुद को दैन्य और दुर्दशा से बाहर लाने हेतु किए हैं. न केवल उन लोगों की आंखों में जो जाने-अनजाने उनके पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार रहे हैं, बल्कि उन लोगों की आंखों में भी जो ‘पिछड़ेपन’ को अपना भूत-भविष्य-वर्तमान मानकर हिम्मत हार चुके हैं. अपनी तरह से साहित्य भी यह काम कर सकता है. करेगा ही. यही इस विमर्श का उद्देश्य है. परंतु इसके लिए उसे आंतरिक और बाह्यः चुनौतियों से साथ-साथ गुजरना पड़ेगा.

भारत में दलित आंदोलन की लंबी परंपरा है. पूरी संत-परंपरा एक तरह से उनका समर्थन करती है. उन आंदोलनों का संबंध सामाजिक आधार पर पिछड़े वर्गों में से भी था. लेकिन अशिक्षा और वर्गीय चेतना के अभाव में पिछड़े उनसे कम ही प्रभावित हुए. दोष पिछड़ी जातियों का भी है. उन्होंने स्वयं यह भुला दिया कि जिन्हें आज पिछड़ा माना जाता है, उन्होंने प्राचीनकाल में अनेकानेक अगड़े चिंतक इस देश और समाज को दिए हैं. रैक्व, पूर्ण कस्सप, मक्खलि गोशाल, सति, कौत्स, अजित केशकंबलि, महीदास, उपालि, महामोग्गलायन जैसे पिछड़े वर्ग के चिंतकों की लंबी शृंखला है. कमी ज्ञान को सहेजने तथा उनकी परंपरा को आगे बढ़ाने वालों की रही. नतीजा यह हुआ है कि हम पुरावैदिक काल से बुद्धकाल तक के अनेक विचारकों के अवदान, यहां तक कि उनके नाम से भी अपरिचित हैं. सत्ता और धर्म के गठजोड़ ने उस ज्ञान को जो उनकी परंपरा और संस्कृति के प्रति विरोध दर्ज कराता था, हर तरह से मिटाने की कोशिश की है. उनका छिटपुट उल्लेख बौद्ध एवं जैन ग्रंथों में है; जो स्वयं ब्राह्मण धर्म के विरोध में जन्मे थे. चूंकि उनके प्रवर्त्तक क्षत्रिय कुलोद्भव थे, इसलिए स्वयं ब्राह्मणों ने उनके दर्शन को सहेजने के लिए समर्पित कर दिया. इसके पीछे उनके वर्गीय स्वार्थ भी थे. ब्राह्मणों लेखकों ने बौद्ध धर्म के तेज को कम करने, उसका ब्राह्मणीकरण करने का षड्यंत्र किया. ‘दीघनिकाय’ में बुद्ध जादू-टोने, सम्मोहन आदि का विरोध करते हैं. परंतु उत्तरवर्ती बौद्ध-ग्रंथों में वे स्वयं जादू-टोना करते दिखाई पड़ते हैं. षड्यंत्र के चलते ही बुद्ध को विष्णु के अवतारों में जगह दी गई.

वर्गीय चेतना के अभाव में पिछड़ों ने दलितों के साथ ठीक वही व्यवहार किया जैसा सवर्ण उनके साथ करते आए थे. इसका नुकसान दलितों को कम, पिछड़ों को अधिक हुआ. परिवर्तन के दौर में दलित बहुत जल्दी यह समझ गए कि उनके उद्धार के लिए कोई मसीहा आसमान से उतरने वाला नहीं है. ‘अप्प दीपो भव’ᅳकी भावना के अनुरूप उन्होंने ठान लिया कि जो करना है, स्वयं करना होगा. दासता ग्रंथि से ग्रसित पिछड़े देर तक अगड़ों से उम्मीद पाले रहे. बहुसंख्यक होने के बावजूद उन्होंने अपनी शक्तियां जातीय मतभेदों में फंसकर गंवा दीं. ओबीसी साहित्य को विमर्श का विषय बनाते समय सबसे पहली चुनौती लेखकों, साहित्यकारों और पाठकों के मन में यह विश्वास जगाने की होगी कि ‘ओबीसी’ केवल जातीय समूह न होकर एक वर्ग है. उन शिल्पकारों, कर्मकारों और मेहनतकशों का वर्ग जिसने अपने श्रम-कौशल द्वारा शुरू से आजतक मानवीय सभ्यता को संवारने का काम किया है. इसके लिए उन्हें अपने  सुख और सम्मान दोनों की बलि चढ़ानी पड़ी है. ब्राह्मणवाद के जितने शिकार वे हैं, उनसे कहीं अधिक दुख-दर्द दलितों को झेलना पड़ा है, इसलिए जाति और वर्चस्ववाद के विरुद्ध संघर्ष में दलित उनके वास्तविक सहयोगी हैं.

 पूंजीवाद की आलोचना में प्रायः कहा जाता है कि वह श्रमिक से उसके श्रम और शिल्पकार से शिल्पकर्म के मूल्य-निर्धारण का काम छीन लेता है. अपनी ओर से उसकी न्यूनतम कीमत तय कर, मजदूरों और शिल्पकर्मियों का शोषण करता है. उस समय मान लिया जाता है कि शिल्पकारों और श्रमिकों का शोषण आधुनिक या उदार अर्थव्यवस्था की देन है. जबकि प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था में अल्प ही सही, इन वर्गों को अपने श्रम के मूल्य को लेकर मोल-भाव करने के अधिकार रहता है. देर-सवेर विकल्प भी मौजूद होते हैं. अन्याय के विरोध में न्यायालयों और अदालतों का दरवाजा खटखटाया जा सकता है. भारतीय संदर्भ में श्रमिक से उसके श्रम के मूल्यांकन का अधिकार छीन लेना केवल, पूंजीवाद की करतूत नहीं है. यहां यह काम बहुत पहले श्रम-विभाजन के नाम पर जातिप्रथा के माध्यम से शुरू हो चुका था. विराट पुरुष का रूपक अपने आप में इसका गवाह है. वह शारीरिक श्रम की तुलना में बौद्धिक श्रम को वरीयता देता है. रूपक के माध्यम से बताया यह जाता है कि शिखर पर मौजूद लोग अपने ज्ञानानुभव का उपयोग लोक-कल्याण के लिए करेंगे. लगभग ऐसी ही कामना है, जैसी प्लेटो ने दार्शनिक राज्य के रूप में ‘रिपब्लिक’ में की थी. वहां अरस्तु जैसा जागरूक विद्धान था. वह नैतिकता को श्रेष्ठ शासन की अनिवार्य शर्त मानता था. इसलिए अपने गुरु के प्रति संपूर्ण मान-सम्मान के बावजूद उसने दार्शनिक राज्य के सुझाव को अव्यावहारिक मानकर नकार दिया था. भारतीय मनीषियों को अपनी दर्शन-परंपरा पर गर्व रहा है. परंतु यहां दर्शन को या तो पुस्तकों तक सीमित रखा गया, अथवा वानप्रस्थी आश्रम के लिए छोड़ दिया. बाकी सब जगह धर्म ही हावी रहा है. यहां जो बौद्धिक सत्ता थी, असल में वह धर्मसत्ता ही थी. निहित स्वार्थ के लिए यहां आस्था पर जोर दिया गया. परिणामस्वरूप धर्म की आलोचना करना, उसके ऊपर सवाल खड़े करना असंभव-सा हो गया. जिन लोगों ने ऐसा करने की कोशिश की, उन्हें शूद्र और धर्म-विरोधी कहकर नकार दिया गया. चुनौती के अभाव में शिखरस्थ ब्राह्मण अपने बुद्धि-विवेक का उपयोग केवल स्वार्थ-सिद्धि हेतु करने लगे. इसके लिए उन्होंने हर कानून, हर सिद्धांत की मनमानी व्याख्याएं कीं; यहां तक कि अपने ही रचे शास्त्रों को खूब तोड़ा-मरोड़ा. पुरोहितों का जनता पर प्रभाव था. वे जनता को कभी भी राज्य के विरुद्ध उकसा सकते थे. इसलिए राजाओं की हिम्मत न थी कि उनका विरोध कर सकें.

जनता पर पकड़ के चलते पुरोहित वर्ग को प्रसन्न रखना राजा के लिए जरूरी हो गया. इसका अंदाज उसे मिलने वाले वेतन और दूसरी सुविधाओं से लगाया जा सकता है. पुरोहितों और ब्राह्मणों को गांव के गांव दान में देने की परंपरा थी. मौर्य शासन के दौरान उसे राज्य के खजाने से सेनापति और अमात्य के बराबर 48000 पण मासिक वेतन मिलता था. जबकि कुशल शिल्पकार का मासिक वेतन मात्र 120 पण था. इससे उस कालखंड में शिल्पकारों जिन्हें वर्ण-व्यवस्था के अनुसार शूद्रों में स्थान मिला हैᅳकी दुर्दशा का अनुमान लगाया जाता है. यह तब है जब राज्य की आर्थिक समृद्धि का भार पूरी तरह से श्रमिकों और शिल्पकारों के कंधों पर था. जाहिर है शारीरिक श्रम की अनदेखी करना या उसे बौद्धिक श्रम से कमतर आंकना प्राचीनकाल से ही आरंभ हो चुका था. चाणक्य के अर्थशास्त्र और मनुस्मृति में इस बात की व्यवस्था की गई थी कि वर्ण-व्यवस्था में सबसे निचले स्तर पर रखे गए लोग कभी आर्थिक रूप से स्वावलंबी न होने पाएं. यदि वे आर्थिक स्तर पर आत्मनिर्भर हो जाएंगे तो ब्राह्मणों और क्षत्रियों के लिए भोजन या नाम मात्र की वृत्तिका पर रात-दिन मेहनत करने वाले लगभग मुफ्त के सेवक कहां से आएंगे! मनुस्मृति तो ब्राह्मणों को यहां तक अधिकार देती है कि वे शूद्र के पास धन इकट्ठा न होने दे. यदि किसी तरह से शूद्र धन अर्जित कर ले तो ब्राह्मण को यह अधिकार दिया गया था कि उसपर बलात् कब्जा कर ले. इसके लिए अर्थशास्त्र में ब्राह्मणों और क्षत्रियों को परस्पर मिलकर काम करने की सलाह दी गई. कहा गया कि दोनों के हित परस्पर जुड़े हैंᅳ‘ब्राह्मण की सहायता के बिना क्षत्रिय आगे नहीं बढ़ता और क्षत्रिय की मदद के बगैर ब्राह्मण की उन्नति असंभव है. दोनों मिल-जुलकर रहें तभी लोक-परलोक में सुख प्राप्त कर सकते हैं’(नाऽब्रह्म क्षत्रमृध्नोति नाऽक्षत्रं ब्रह्मवर्धते. ब्रह्मक्षत्रं च संप्रक्तंमिह चामुत्र वर्धतेमनुस्मृति 9/322). शिखर पर बने रहने के लिए एक दूसरे को समर्थन देने, पारस्परिक हितों की रक्षा करने की नीति आगे चलकर मिथ का रूप ले लेती है. जिसमें तीन प्रमुख देवता इस तरह एक-दूसरे महिमा-मंडन करते रहते हैं कि व्यक्ति भ्रम से बाहर आ ही नहीं पाता. इसी तरह स्वार्थ के आधार पर संगठित तीन शीर्षस्थ वर्ग असंगठित जनसमाज को परस्पर उलझाए रखते हैं.

ब्राह्मण ग्रंथों में शूद्र को विपन्न बनाने, उन्हें आर्थिक-सामाजिक रूप से पराश्रित बनाए रखने की अचूक प्रावधान किए गए हैं. लेकिन आवश्यकतानुसार इस नियम में संशोधन भी होता रहा है. कौटिल्य पूर्व भारत में ब्राह्मण ग्रंथ शूद्रों को शस्त्र उठाने की अनुमति नहीं देते. माना जाता था कि ब्राह्मण सर्वाधिक तेजवंत होता है. तेज की प्रधानता के अनुसार सेना में शूद्र के बजाय वैश्य को, वैश्य के बजाय क्षत्रिय को और क्षत्रिय के बजाय ब्राह्मण को भर्ती किया जाना चाहिए(अर्थशास्त्र, 9/2/21). चाणक्य का यह सोच अपने पूर्ववर्ती ब्राह्मण आचार्यों जैसा ही था. परंतु परिस्थितियां उसके साथ नहीं थीं. मौर्यकाल में देश पर यवनों के आक्रमण होने लगे थे. अकेले क्षत्रियों से जिनकी अधिकांश ऊर्जा और शक्ति आपस के युद्धों में क्षीण होती रहती थी, देश की सुरक्षा असंभव थी. पुरोहिताई करते-करते ब्राह्मण सत्ता-सुख के अभ्यस्त होने लगे थे. चुनौतियों के बीच शूद्र के युद्ध में भाग लेने संबंधी नियम में संशोधन आवश्यक हो जाता है. ब्राह्मण को युद्ध क्षेत्र से दूर रखने के लिए कौटिल्य अजीब-सा तर्क देता है, जिसे पढ़कर हंसी आने लगती है. उसके अनुसार ब्राह्मण स्वाभावतः उदार होता है, इसलिए ‘शत्रु दंडवत कर युद्धभूमि में उसे पटा लेगा.’(प्राणिप्रातेन ब्राह्मणबलं पराऽभिहारयेत, अर्थशास्त्र 9/2/23). परंपरा अनुमति देती तो कौटिल्य कदाचित कहता कि युद्ध करना ब्राह्मण का धर्म ही नहीं है. चूंकि वह पुरोहिताई में रम चुके ब्राह्मणों की कमजोरी से भली-भांति परिचित था, इसलिए बजाए ‘तेजवंत’ ब्राह्मणों के आपत्काल के नाम पर शूद्रों को सेना में भर्ती करने की छूट देता है. इसके लिए उसके तर्क चतुराई-भरे हैंᅳ‘विनयशील ब्राह्मणों की अपेक्षा क्षत्रियों की सेना श्रेयस्कर है. संख्याबल में अधिक होने के कारण वैश्य-शूद्रों को सेना में भर्ती किया जाना चाहिए’(प्रहरण विद्याविनीतं तु क्षत्रियबलं श्रेयः बहुलसारं वा वैश्यशूद्रबलंमिति, अर्थशास्त्र 9/2/24). वेदादि ग्रंथ ब्राह्मणों के युद्ध-प्रेम तथा युद्ध के दौरान उनके द्वारा बरती गई क्रूरता के उदाहरणों से भरे पड़े हैं. परशुराम जैसे ब्राह्मण का भी महिमामंडन है जिसके बारे में बताया गया है कि वह पृथ्वी को कही बार क्षत्रीय-विहीन कर चुका था. इन सब शौर्यगाथाओं(!) के बावजूद वह ब्राह्मणों को युद्ध क्षेत्र से दूर रखना चाहता है तो इसकी दो संभावनाएं हो सकती हैं. पहली, सत्ता-सुख में लिप्त, पुरोहिताई में रमे ब्राह्मण अपना युद्ध-कौशल गंवा चुके थे. दूसरी, उसे लगता था कि प्रशीक्षित यवन-सेना के मुकाबले ब्राह्मणों को खतरे में डालने से उचित था, शूद्रों को उनके आगे झोंक दिया जाए. कौटिल्य की ब्राह्मणों को युद्धक्षेत्र से दूर रखने की सलाह को ‘अर्थशास्त्र’ के पांचवे अध्याय की एक व्यवस्था से जोड़कर देखा जाए तो उसकी नीयत साफ नजर आने लगती है. उसमें वह राजा को सलाह देता हैᅳ‘कोष की कमी होने पर पाषंडसंघों(संभवतः बौद्ध संघों) के द्रव्य को, श्रोत्रिय के उपयोग में न आने वाले देवमंदिर के धन को एक जगह बटोरकर राजकोष में हथिया लेना चाहिए’(अर्थशास्त्र 5/2/38, मार्क्स और पिछड़े हुए समाज, डॉ. रामविलास शर्मा, पृष्ठ-195). आगे वह कहता है, ‘देवताध्यक्ष दुर्ग और राष्ट्र के धन के देवमंदिरों का धन एकत्रित करेगा फिर उनका अपहरण करेगा’(वही). वह जानता था कि ब्राह्मण देवमंदिरों और बौद्ध संघों में जमा धन के अपहरण हेतु एकाएक तैयार न होंगे. अतः ऐसे अलोकप्रिय कार्य के लिए वह शूद्रों और वैश्यों की सेना बनाने की सलाह देता है. ताकि ब्राह्मणों को क्षमा, धृतिशील और विनम्रता की प्रतिमूर्ति सिद्ध किया जा सके. कहने की आवश्यकता नहीं कि कौटिल्य द्वारा गढ़ी गई ब्राह्मणों की यह छवि आगे चलकर सत्ता से निकटता बनाए रखने में बहुत सहायक सिद्ध हुई.

कौटिल्य मजबूत केंद्र का समर्थक था. राज्य की मजबूती के लिए वह शूद्रों को सेना में भर्ती करने की छूट तक देता है. राजकोष में किसी प्रकार की कमी न हो, इसलिए धर्मालयों में आए चढ़ावे को राज-कल्याण के नाम पर उपयोग करने का नियम बनाता है. मनु वर्णाश्रम धर्म को लेकर इतना उदार नहीं था. शूद्रों और वैश्यों को लेकर जो डर कौटिल्य को था, मनु का डर उससे कहीं ज्यादा बड़ा था. डर यह कि यदि शूद्रों को युद्ध में जाने का अवसर मिला, तो युद्ध-कौशल में प्रवीण शूद्र अपने संख्याबल के आधार पर, क्षत्रियों और ब्राह्मणों के मुकाबले बड़ी आसानी से युद्ध जीत सकते हैं. इसलिए वह वर्णाश्रम व्यवस्था के कड़े नियम बनाकर समस्त संभावनाओं का पटाक्षेप कर देता है. इसका असर शताब्दियों तक रहता है.

उपर्युक्त विवेचन से यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि शूद्रों ने मनु की व्यवस्था को ज्यों का त्यों मान लिया था और वर्णाश्रम व्यवस्था का कोई विरोध था ही नहीं. ब्राह्मण ग्रंथों में विरोध का कोई उल्लेख नहीं है. उन्हें पढ़कर लगता है कि शूद्रों उस व्यवस्था के प्रति पूर्णतः समर्पित थे और उनकी ओर से विरोध जैसी कोई बात न थी. वास्तविकता यह है कि उस समय भी समाज का बड़ा वर्ग ब्राह्मणवाद के प्रतिकार में खड़ा था. बल्कि यह कहना अथिक सार्थक होगा कि ब्राह्मण धर्म का प्रभाव सीमित लोगों तक था. ‘ब्रह्मजालसुत्त’ में बुद्ध ने अपने समकालीन 62 दार्शनिक सिद्धांतों के बारे में बताया है. उनमें कम से कम चार नास्तिक परंपरा के दर्शन हैं. दूसरी ओर जैन प्राकृत ग्रंथ ‘सूत्रकृतांगसुत्त’ के आधार पर बनाई गई सूची में 363 विभिन्न प्रकार के दार्शनिक संप्रदायों का उल्लेख है. उनमें 183 नास्तिक परंपरा के, 84 अक्रियावादी, 67 संशयवादी तथा 32 वैनायिकः(आजीवक) सम्मिलित हैं. बाकी 180 को क्रियावादी कहा गया है(अर्ली बुद्धिस्ट थ्योरी ऑफ नॉलिज, कुलित्स नंद जयतिलके, पृष्ठ 116). इससे सिद्ध होता है कि लोगों में श्रमण-परंपरा के दर्शनों पर ज्यादा विश्वास था. समाज का बड़ा वर्ग ब्राह्मणवादी विचारधारा की पकड़ से बाहर था. आगे चलकर लोकायत, चार्वाक, आजीवक, श्रमण, बौद्ध और जैन दर्शनों को मिली ख्याति इसी का परिणाम थी. ‘शांतिपर्व’(59/97) में पर्वतों और वनों में रहनेवाले निषादों और मलेच्छों का वर्णन है, जो तत्कालीन वर्णाश्रम व्यवस्था के समर्थकों के लिए चुनौती बने हुए थे. बेशम के अनुसार गंगातट के सभी प्रमुख नगरों में आजीवकों की बस्तियां थीं. आजीवक धर्म का प्रभाव समाज के सभी वर्गों, विशेषरूप से उन्नतिशील व्यापारी समुदाय के बीच था.’(बेशम, हिस्ट्री एंड डॉक्ट्रीन ऑफ आजीवक्स, पृष्ठ 133-134). पोलसपुरवासी सदलपुत्त नाम के एक कुम्हार का उल्लेख जैन ग्रंथों में मिलता है. वह 500 कुम्हार परिवारों का मुखिया था. उसके अधीन नावों का बेड़ा था, जो पूरी गंगा तट पर फैला हुआ था. जैन और बौद्ध ग्रंथों में कांपिल्यपुरवासी करोड़पति महाश्रेष्ठि कुंदकोल्यि का भी उल्लेख है. उसके पास अकूत स्वर्ण-संपदा और पशुधन था. वह आजीवकों का समर्थक था. इस तरह के और भी कई प्रमाण है जो दिखाते हैं कि ब्राह्मणधर्म के विकास के आरंभिक चरण में अधिकांश शूद्र अनीश्वरवाद में भरोसा रखते थे. कालांतर में उन्हीं का एक हिस्सा बौद्ध और जैन धर्मों की ओर आकृष्ट हुआ था.

‘पंचविश ब्राह्मण’ पूर्ववर्ती ब्राह्मण ग्रंथों में से है. उसके अनुसार शूद्र का जन्म उस समाज में हुआ जहां ईश्वर का अस्तित्व नहीं माना जाता था. वहां यज्ञ का आयोजन भी नहीं होता था. परंतु उनके पास बहुत-से मवेशी रहते थे.’(पंचविश ब्राह्मण 6,1,2). बेशम ने ऐसे कुंभकार परिवार का उल्लेख किया, जो मालिक की ज्यादतियों के विरोध में उठ खड़ा होता है. उन दिनों शूद्र कामगारों के विरोध का सबसे प्रचलित तरीका था, काम छोड़कर चले जाना. एक जातक के अनुसार लकड़कारों की एक बस्ती को काम करने के लिए पहले ही भुगतान कर दिया गया था. किसी कारणवश वह समय पर काम पूरा नहीं कर सका. जब उसपर बहुत ज्यादा दबाव डाला गया तो लकड़हारे ने अपने परिवार के साथ मिलकर चुपचाप एक नाव बनाई और पूरा परिवार रातों-रात बस्ती खाली कर वहां से कूंच कर गया. वे लोग गंगा नदी के साथ-साथ चलते हुए समुद्र तक पहुंचे. समुद्र के भीतर भी उस समय तक चलते रहे जब तक उन्हें उपजाऊ द्वीप नहीं मिल गया.(शूद्रों का प्राचीन इतिहास, रामशरण शर्मा, पृष्ठ 130). मनु ने बौद्धों तथा वर्णाश्रम व्यवस्था का विरोध करने वाले आजीवकों को वृषल (शूद्र) की संज्ञा दी है. बेशम के अनुसार वायुपुराण जो गुप्तकाल का ग्रंथ है, के आसपास आजीवकों को शूद्र मान लिया गया था. ग्रंथ इस बात की भी गवाही देते हैं कि ब्राह्मणों ने हर उस व्यक्ति या समुदाय के सदस्य को शूद्र मान लिया था, जो उनके धर्म तथा श्रेष्ठत्व को चुनौती देता था.

मनुष्य की स्वाभाविक कमजोरी कि वह केवल उन्हीं बातों को गंभीरता से लेता है जिनका सत्ता से निकट-संबंध हो. ब्राह्मणों को इसी का लाभ मिला. बुद्ध और महावीर भी भली-भांति समझते थे कि प्रजा अपने राजा का अनुसरण करती है. इसलिए अपने धर्म-दर्शन को लोकप्रिय बनाने के लिए उन्होंने सत्ता का भली-भांति इस्तेमाल किया. बुद्ध ने जाति-आधारित असमानता का विरोध किया था. लेकिन जाति और वर्ग संबंधी ऊंच-नीच, दासप्रथा से उन्हें बहुत अधिक शिकायत न थी. उनके सारे प्रवचन या तो किसी सम्राट की पहल पर होते थे अथवा श्रेष्ठि के उपवन में. अपने विशेषाधिकारों के साथ ब्राह्मण भी सदैव सत्ता के निकट बने रहे. जितना उनसे बन पड़ा, उन्होंने ब्राह्मणेत्तर वर्गों को सत्ता से दूर रखने की भरपूर कोशिश की. सीता की ‘अग्निपरीक्षा’ का उल्लेख रामायण में है. वर्षों पूर्व मध्यभारत के किसी ऐसे तालाब के बारे में कहीं पढ़ा था, जिसे नए ग्रंथों की परख के लिए इस्तेमाल किया जाता था. उसके लिए पांडुलिपि को बजाय उसके अध्ययन के ‘पवित्र तालाब’ के सुपुर्द कर दिया जाता था. जो पोथी डूब जाती, उसे व्यर्थ मान लिया जाता था. लेख में बताया गया था तैर न पाने के कारण लगभग पांच हजार पांडुलिपियां उस तालाब में समाई हुई थीं. बाद में तालाब को मिट्टी से पाटकर उन्हें हमेशा के लिए दफना दिया गया. यह पुरोहित वर्ग की मौलिक ज्ञान के प्रति असहिष्णुता का उदाहरण है. पुराणों और महाकाव्यों में उसने बातों का जो बबंडर खड़ा किया है, उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए हीगेल ने कहा थाᅳ

‘भारतीयों के पास राजाओं की कतार है, असंख्य देवी-देवता हैं, लेकिन उनमें से कोई भी संदेह से परे नहीं है.’

ब्राह्मणों ने अपने धर्म को सदैव ही राष्ट्र से बढ़कर माना है. कोई भी सम्राट जो प्रजा की दृष्टि में भले ही अनर्थकारी हो, यदि वह ब्राह्मणों के अधिकारों और हिंदुओं के बीच उनके शिखरत्व का समर्थन करता था, तो उन्हें उसकी सत्ता से कोई आपत्ति न थी. हिंदू समाज का मस्तिष्क कहे जाने वाले ब्राह्मणों की इस दुर्बलता का लाभ प्रायः सभी विदेशी आक्रांताओं ने उठाया. मुस्लिम आक्रामक केवल इस्लाम का परचम लहराने भारत आए थे. यह देश उन्हें इतना अधिक पसंद आया कि उन्होंने यहीं बसने का मन बना लिया. उस समय समाज का मस्तिष्क होने का दावा करने वाले ब्राह्मणों ने आक्रमणकारियों का मुकाबला करने के लिए देश को तैयार करने के बजाय अपने शीर्ष स्थान की सुरक्षा करना उचित समझा. औरंगजेब ने जब सख्ती बरती तो वे भड़क गए और पुनः देश की आत्मा को जगाने के बजाय ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों द्वारा बंगाल के राजा पर विजय का स्वागत किया. इसी अवसरवादी दृष्टिकोण के चलते वे लंबे समय तक भारतीय समाज के शिखर पर बने रहे. उनकी सत्ता को पहली चुनौती मैकाले की ओर से मिली. 1861 में सभी भारतीयों के लिए एक समान दंड संहिता बनाकर उसने ब्राह्मणों के शताब्दियों से चले आए रहे वर्चस्व का अंत कर दिया. इसीलिए मैकाले उनकी निगाहों में सबसे बड़ा खलनायक है.

अप्रासंगिक से लगने वाले इस विवेचन का उद्देश्य मात्र यह दर्शाना है कि ओबीसी साहित्य का मुख्य संघर्ष सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से बाहर आने का है. संस्कृति की लड़ाई राजनीतिक लड़ाई से बड़ी और महत्त्वपूर्ण है. आज देश में लोकतंत्र है. संख्याबल के आधार पर पिछड़े राजनीति में अगड़ों के लिए चुनौती बने हुए हैं. इसलिए वे तरह-तरह के प्रपंच रचकर लोगों को भरमाने में लगे रहते हैं. इसलिए यह समझना और समझाना बेहद जरूरी है कि बगैर सांस्कृतिक वर्चस्व से बाहर निकले सामाजिक परिवर्तन का लक्ष्य असंभव है. इन दिनों समाज में जातिबंधन शिथिल पड़े हैं. बावजूद इसके समाज में ऐसे लोगों की अच्छी-खासी संख्या है जो आज भी दो हजार वर्ष पुरानी मानसिकता में जीते हैं. जिन्हें मनु का वर्ण-विधान आदर्श लगता है. कुछ दबावों के चलते वे प्रकट में भले ही कुछ न कह पाएं, परंतु उनका सोच और हर प्रयास इस देश और समाज को हजार-दो-हजार वर्ष पीछे ले जाने के लिए होता है. चूंकि ऐसे लोग अपने मनसूबों को छिपाए रखने में माहिर हैं, इस कारण उनकी पहचान करना और निपटना आसान नहीं हैं. इसलिए ओबीसी साहित्यकारों की चुनौतियां बड़ी और लंबे समय तक चलने वाली होंगी. उन्हें एक ओर तो अपने ही साथियों को साहित्य की इस नई धारा से जुड़ने के लिए तैयार करना होगा. साथ ही साहित्य के मानवतावादी स्वरूप को बनाए रखने के लिए उन्हें उन स्थितियों से भी जूझना पड़ेगा जो उनके पिछड़ेपन का कारण बनती आई हैं. इनमें जाति के अलावा धर्म भी सम्मिलित है.

उन्हें समझना होगा कि हिंदू धर्म और जाति का नाभि-नाल का संबंध है. दोनों एक दूसरे का पोषण करते हैं. जानना होगा कि धर्म ब्राह्मण के लिए ठीक ऐसे ही धंधा है जैसे मोची के लिए जूते गांठना, ग्वाला के लिए दूध दुहना, गड़हरिया के लिए पशु चराना. उन सबका ज्ञान अनुभव के साथ निखरता जाता है. पुरोहिताई के साथ ऐसा नहीं है. यह कहते हुए कि जो पुराना है, वही सत्य-सनातन है, उसमें फेरबदल की सोचना भी पाप हैᅳब्राह्मण बार-बार अतीत की ओर लौटता रहा है. धर्म में सिवाय डर के कुछ भी मौलिक नहीं है. इस डर को स्थायी बनाने, पुरातन को सनातन सिद्ध करने के लिए ब्राह्मण अपने धंधे के साथ चतुराईपूर्वक पवित्रता का मिथ जोड़ देता है. अतः इस धारणा ने कि ज्ञान पर केवल ब्राह्मणों का एकाधिकार है. एकमात्र वही वास्तविक चिंतक और पथ-प्रदर्शक हैᅳइंसानियत का काफी नुकसान किया है. इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ, जब केवल और केवल ब्राह्मण ज्ञान-संपदा के इकलौते स्वामी और संवर्धक रहे हों. हालांकि ब्राह्मणों की ओर से यह दावा हमेशा बना रहा.

आज जिसे हिंदी साहित्य के नाम से जाना जाता है, वह मुख्यतः ब्राह्मणों द्वारा, ब्राह्मणों के हितों की सुरक्षा के लिए रचा गया साहित्य है. अपवाद रूप में कुछ भले लोगों को छोड़ दिया जाए तो वे पक्के जातिवादी हैं. कदम-कदम पर जातिवाद परोसते आए हैं. अगर ओबीसी साहित्यकार ऐसे लोगों से अपनी जातीय पहचान के साथ संवाद करेगा तो वे कभी उसे गंभीरता से नहीं लेंगे, क्योंकि ब्राह्मणवादी नजरिया उसके बारे में शूद्र से बढ़कर सोचने को तैयार न होगा. लेकिन यदि वह देश की आधी से अधिक जनता के प्रतिनिधि के रूप में संवाद करेगा तथा उसके सपनों और संघर्षों को साहित्य में लेकर आएगा तो देर-सवेर उन्हें साहित्य की इस नई धारा को गंभीरता से लेना ही पड़ेगा. परंतु यह कह देना जितना आसान है, करना उतना ही कठिन है. समस्या यह नहीं है कि शताब्दियों से हिंदी साहित्य पर कुछ खास जातियों का कब्जा रहा है; और तीन-चौथाई लोग उसी को वास्तविक साहित्य मानते आए हैं. समस्या यह है कि शोषण सहते-सहते तीन-चौथाई लोगों मे से अधिकांश को शोषक की भूमिका में आने में ही अपनी मुक्ति नजर आती है. इससे बचाव का एकमात्र रास्ता यही है कि ओबीसी साहित्यकार अपने लेखन में, व्यवहार में लोकतांत्रिक हो.

‘ओबीसी साहित्य’ की मांग फिलहाल भले ही अवधारणा तक सीमित हो, इसकी संकल्पना नई नहीं है. न ही वह शून्य से उपजेगा. सभ्यता और संस्कृति के विकासकाल से ही उसका अस्तित्व रहा है. इसलिए ओबीसी साहित्य को रचने से बड़ी चुनौती परंपरा से अर्जित साहित्य को सहेजने तथा ओबीसी हितों के अनुरूप उसकी पुनर्व्याख्या की होगी. कुछ सवाल इस बीच उठेंगे ही. मसलन ओबीसी साहित्य का आधार क्या है? उसके सौंदर्यबोध की परख की कसौटी क्या होगी? क्या दलित साहित्य की तरह ओबीसी साहित्य का दायरा भी गैर ओबीसी के लिए बंद होगा? भारतीय संस्कृति की सुदीर्घ परंपरा में से अनुकूल को चुनने तथा तथा अप्रासंगिक को छांट देने की उसकी कसौटी क्या होगी? ओबीसी साहित्यकार को इन सब सवालों का हल खोजना होगा. जिन कुरीतियों से साहित्य संघर्ष करता आया है उनमें से एक जातिवाद भी है. इसलिए अच्छा तो यही है कि साहित्य का जातिवाद के नाम पर विभाजन न हो? इन सबसे ज्यादा यह महत्त्वपूर्ण है कि समाज का जाति के आधार पर विभाजन न हो? यह नहीं हो सकता कि समाज में जाति रहे और साहित्य से जाति का जनाजा पूरी तरह उठ जाए. ओबीसी साहित्य पर जातिवादी होने का आरोप लगाने वालों के लिए एक उत्तर यह भी हो सकता है कि जातियों का विधान ओबीसी(शूद्र) ने नहीं रचा. उसकी कोशिश तो इस जंजाल से हमेशा पीछा छुड़ाने की रही है. ओबीसी साहित्य के साथ वही चल सकता है जो इस जंजाल से मुक्ति की सौगंध उठा चुका हो, जिसका भरोसा जाति और धर्म से ज्यादा इंसानियत में हो.

आप चाहें तो इसे सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के विरुद्ध एक और मोर्चे का नाम भी दे सकते हैं.

© ओमप्रकाश कश्यप

 

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डॉ. आंबेडकर का आर्थिक चिंतन

अर्थशास्त्री के रूप में डॉ. आंबेडकर के योगदान की ओर बहुत कम विद्वानों का ध्यान गया है. प्रायः लोग उन्हें संविधान निर्माता के रूप में जानते हैं. यह भी जानते हैं कि दलितों के उद्धार के लिए उन्होंने अनथक संघर्ष किया. उसके लिए अनेक समकालीन नेताओं की आलोचनाएं सहीं. वे अपने समय के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मगर विवादित नेताओं में रहे. उनकी विद्वता विरोधियों को पस्त करने वाली थी. वस्तुतः राजनीति और समाज सुधार के क्षेत्र में उनका योगदान इतना महान एवं युगांतरकारी है कि उनके जीवन के बाकी पहलुओं तक लोगों की नजर जा ही नहीं पाती. यहां तक कि दलित विद्वानों का लेखन भी उनके सामाजिकराजनीतिक क्षेत्रों में योगदान तक सिमटा रहा है. अर्थशास्त्री के रूप में आंबेडकर के योगदान को केवल एक लेख या लेखांश से आंकना असंभव है. अपने एक व्याख्यान में प्रख्यात अर्थशास्त्री श्रीनिवास अंबीराजन ने अर्थशास्त्र के क्षेत्र से राजनीति और कानून के क्षेत्र में अंतरण को अर्थशास्त्र की भारी क्षति बताया था. उनके अनुसार अगर वे राजनीति और समाज सुधार के क्षेत्र में नहीं आते तो दुनियाभर में दिग्गज अर्थशास्त्री के रूप में स्थान पाते. इस बात में काफी सचाई भी है. 1947 आतेआते राजनीतिक क्षेत्र में उनकी व्यस्तता काफी बढ़ चुकी थी. लेकिन उन दिनों भी उनका मन अर्थशास्त्र के क्षेत्र में छूटे हुए काम को आगे बढ़ाने का था. उसी वर्ष ‘प्रॉब्लम ऑफ रुपी’ के संशोधित संस्करण की भूमिका में उन्होंने अर्थशास्त्र के क्षेत्र में 1923 के बाद हुए बदलावों को लेकर पुस्तक का दूसरा खंड यथाशीघ्र तैयार करने का आश्वासन दिया था. मगर आजादी के बाद राजनीतिक जिम्मेदारियां बढ़ने की वजह से वे छूटे हुए कार्य को पूरा नहीं कर सके.

अर्थशास्त्र आंबेडकर का सर्वाधिक प्रिय विषय था. कोलंबिया विश्वविद्यालय में अध्ययन करते समय उनके पास कुल 29 विषय ऐसे थे, जिनका सीधा संबंध अर्थशास्त्र से था. वहां से उन्होंने ‘इवोल्यूशन ऑफ पब्लिक फाइनेंस इन ब्रिटिश इंडिया’ विषय में पीएचडी की डिग्री प्राप्त की थी. आगे चलकर लंदन स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स से उन्होंने ‘प्राब्लम ऑफ रुपया : इट्स ओरिजिन एंड इट्स सोल्यूशन’ विषय पर डीएससी की डिग्री हेतु शोध प्रबंध लिखा. उस ग्रंथ की भूमिका महान अर्थशास्त्री एडविन केनन ने लिखी थी. अर्थशास्त्र के क्षेत्र में उनकी विद्वता का अनुमान लगाने के लिए अमर्त्यसेन की टिप्पणी भी मददगार सिद्ध हो सकती है. 2007 में दिए गए एक व्याख्यान में अर्थशास्त्र के क्षेत्र में आंबेडकर की गुरुता को स्वीकारते हुए हमारे समय के इस महान अर्थशास्त्री ने कहा था—

आंबेडकर अर्थशास्त्र के क्षेत्र में मेरे जनक हैं. वे दलितोंशोषितों के सच्चे और जानेमाने महानायक हैं. उन्हें आजतक जो भी मानसम्मान मिला है वे उससे कहीं ज्यादा के अधिकारी हैं. भारत में वे अत्यधिक विवादित हैं. हालांकि उनके जीवन और व्यक्तित्व में विवाद योग्य कुछ भी नहीं है. जो उनकी आलोचना में कहा जाता है, वह वास्तविकता के एकदम परे है. अर्थशास्त्र के क्षेत्र में उनका योगदान बेहद शानदार है. उसके लिए उन्हें सदैव याद रखा जाएगा.’1

अर्थशास्त्र के क्षेत्र में आंबेडकर के योगदान की चर्चा करने से पहले इस विषय में उनकी प्रतिष्ठा को दर्शाने वाली एक और घटना का उल्लेख प्रासंगिक होगा. 1930 का दशक पूरे विश्व बाजार में भीषण मंदी लेकर आया था. ब्रिटिश सरकार के सामने भी गंभीर चुनौतियां थीं, खासकर उपनिवेशों में जहां आजादी की मांग जोड़ पकड़ती जा रही थी, वहां औपनिवेशिक सरकार की पकड़ को बनाए रखने के लिए स्थानीय समस्याओं का समाधान आवश्यक था. समस्याओं के मूल में कुछ वैश्विक मंदी का हाथ था और कुछ स्थानीय रोजगारों के उजड़ जाने से उत्पन्न मंदी का. इसलिए अगस्त 1925 में ब्रिटिश सरकार ने भारत की मुद्रा प्रणाली का अध्ययन करने के लिए ‘रॉयल कमीशन ऑन इंडियन करेंसी एंड फाइनेंस’ का गठन किया था. इस आयोग की बैठक में हिस्सा लेने के लिए जिन 40 विद्वानों को आमंत्रित किया गया था, उनमें आंबेडकर भी थे. वे जब आयोग के समक्ष उपस्थित हुए तो वहां मौजूद प्रत्येक सदस्य के हाथों में उनकी लिखी पुस्तक ‘इवोल्यूशन ऑफ पब्लिक फाइनेंस इन ब्रिटिश इंडिया’ की प्रतियां थीं. बात यहीं खत्म नहीं होती. उस आयोग ने अपनी रिपोर्ट 1926 में प्रकाशित की थी. उसकी अनुशंसाओं के आधार पर कुछ वर्षों बाद ‘भारतीय रिजर्व बैंक’ की स्थापना हुई. इस बैंक की अभिकल्पना नियमानुदेश, कार्यशैली और रूपरेखा आंबेडकर की शोध पुस्तक ‘प्राब्लम ऑफ रुपया’ पर आधारित है. उस समय तक उनका मुख्य लेखन अर्थशास्त्र जैसे गंभीर विषय को लेकर ही था. मात्र 27 वर्ष की उम्र में उन्हें मुंबई के एक कॉलिज में राजनीतिक अर्थशास्त्र के प्रोफेसर की नौकरी मिल चुकी थी. अध्यापन के अलावा वे विषय से संबंधित सैकड़ों लेख और व्याख्यान दे चुके थे. एक सभा में विद्यार्थियों के बीच पढ़े गए उनके लेख ‘रेस्पांसिबिल्टी ऑफ रेसपांसिबिल गवर्नमेंट’ की प्रशंसा उस समय के महान राजनीतिक विज्ञानी, चिंतक हेराल्ड लॉस्की ने भी की थी. लॉस्की का कहना था कि ‘लेख में आए आंबेडकर के विचार क्रांतिकारी स्वरूप’ के हैं.

अर्थशास्त्र के क्षेत्र में आंबेडकर के योगदान को और गहराई से समझने के लिए प्राचीन भारत की मुद्रा विनिमय प्रणाली के बारे में जानना आवश्यक है. 1893 तक भारत में केवल चांदी के सिक्कों का प्रयोग किया जाता था. 1841 में स्वर्ण मुद्रा का उपयोग भी होने लगा था. चांदी के सिक्के का मूल्य उसमें उपलब्ध चांदी के द्रव्यमान से आंका जाता था. इस तरह एक स्वर्णमुद्रा का मूल्य 15 चांदी के सिक्कों के बराबर था. 1853 में आस्ट्रेलिया और अमेरिका में स्वर्णभंडार मिलने से सोने की आमद बढ़ी. उसके बाद स्वर्णमुद्राओं में विनिमय का प्रचलन बढ़ने लगा. हालांकि उसका विधिवत चलन 1873 के बाद की संभव हो पाया. लगभग उसी समय चांदी के नए भंडार मिलने से उसकी आमद भी बढ़ने लगी, परंतु भारत में स्वर्ण उत्पादन में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पाई थी. परिणामस्वरूप स्वर्णमुद्रा के मुकाबले भारतीय रजतमुद्रा का निरंतर अवमूल्यन होने लगा. उस खाई को पाटने के लिए अधिक मात्रा में रजतमुद्राएं ढाली जाने लगीं. लेकिन वह समस्या का अस्थायी समाधान था. दूसरे उससे उन व्यक्तियों के लेनदेन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला था जो केवल रजत मुद्रा का इस्तेमाल करते थे. जनसामान्य के लिए वह प्रतिकूल स्थिति थी. मुद्रा का अवमूल्यन होने से महंगाई में वृद्धि हुई थी. जबकि आय ज्यों की त्यों बनी हुई थी. आंतरिक स्तर पर उससे प्रत्येक वर्ग को घाटा हो रहा था. 1872 से लेकर 1893 तक यही हालात बने रहे. आखिर 1893 में सरकार ने रजतमुद्रा ढालने का काम अपने नियंत्रण में ले लिया.

उस समय तक मुद्राओं का मूल्यांकन उनमें उपलब्ध धातु की मात्रा से आंका जाता था. 1899 में सरकार ने एक समिति का गठन किया, जिसने स्वर्णस्टेंडर्ड के स्थान पर स्वर्णमुद्रा के उपयोग की सलाह दी थी. तदनुसार मुद्रा का मूल्यांकन उसमें उपलब्ध धातुमूल्य के बजाए सरकार द्वारा अधिकृत मूल्य जितना आंका जाने लगा. सरकार ने रजतमुद्रा का मूल्य 1 शिलिंग, 4 पेंस के बराबर कर दिया. नए नियम के अनुसार स्वर्णमुद्रा का मूल्य लगभग स्थिर था. उसके मूल्यांकन का अधिकार सीधे ब्रिटिश सरकार के अधीन था, जबकि रजतमुद्रा के मूल्यनियंत्रण के लिए उस समय तक कोई व्यवस्था न थी. मुद्राओं के मूल्यांकन को लेकर आंबेडकर का दृष्टिकोण मानवीय था. कल्याणकारी अर्थशास्त्रियों से मिलता हुआ. उनका कहना था लोगों के लिए मुद्रा का वास्तविक मूल्य उसके बदले मिलने वाली आवश्यक वस्तुओं से तय होता है. सोना बेशकीमती हो सकता है. लेकिन वह आदमी की सामान्य जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता. वह न तो किसी भूखे का पेट भर सकता है, न ही उससे किसी नंगे तन को ढका जा सकता है. यदि एक रजत मुद्रा से उन्हें जरूरत की सभी चीजें प्राप्त हो जाती हैं, तो उन्हें स्वर्णमुद्रा की दरकार न होगी. इसके लिए मुद्रा का भरोसेमंद होने के साथसाथ विनिमय प्रणाली में स्थायित्व भी जरूरी है. मुद्रा के प्रति जनता का अविश्वास तथा उसकी मूल्यअस्थिरता आर्थिक संकट को जन्म देती है. रजतमुद्रा के उतारचढ़ाव को देखते हुए आंबेडकर ने स्वर्णमुद्रा को अपनाने का सुझाव दिया; तथा एक रजतमुद्रा का मूल्य एक शिलिंग तथा छह पैंस रखने की सलाह दी. उनकी अधिकांश अनुशंसाओं को सरकार ने ज्यों की त्यों अपना लिया था. उन्हीं के आधार पर आगे चलकर भारतीय रिजर्व बैंक की मूलभूत सैद्धांतिकी का विकास हुआ.

अपने अर्थशास्त्र संबंधी ज्ञान के आधार पर आंबेडकर एडम स्मिथ और डेविड रिकार्डो जैसे क्लासिकल अर्थशास्त्रियों की कतार में खड़े नजर आते हैं. आगे चलकर राजनीति और समाज सुधार के क्षेत्र में उन्होंने जो काम किया, उसके आधार पर हम उनके अर्थशास्त्र संबंधी सिद्धांतों की तुलना इटली के विचारक विलफर्ड परेतो से कर हैं. परेतो ने यूरोपीय समाज में व्याप्त असमानताओं का गहरा अध्ययन किया था. उसका मानना था कि शीर्ष पर मौजूद अल्पसंख्यक अभिजन समूह अपने बुद्धिचातुर्य द्वारा बहुसंख्यक समूह को छोटेछोटे समूहों में बांटे रखता है. इस तरह संगठित अल्पसंख्यक अभिजन के आगे असंगठित बहुजन की शक्ति नगण्य हो जाती है. ‘कल्याणकारी अर्थशास्त्र’ के क्षेत्र में ‘परेतो दक्षता तुल्यांक’ की चर्चा लगभग सभी आधुनिक अर्थशास्त्री करते आए हैं. परेतो को स्पर्धात्मक उत्पादन प्रणाली से कोई शिकायत न थी. लेकिन वह चाहता था कि सरकार समाजार्थिक समानता की स्थापना के दायित्व को समझे तथा उसके लिए समयानुसार आवश्यक कदम उठाती रहे. उसके अनुसार स्पर्धात्मक अर्थव्यवस्था में लाभार्जन की दर संतोषजनक बनी रहती है. न्यायभावना के साथ काम करने वाली सरकार उस लाभ का एक हिस्सा जरूरतमंदों तक पहुंचाकर असमानता की खाई को पाटते रहने का काम कर सकती है. परेतो के शब्दों में—‘समाज में किसी एक नागरिक के साथ निकृष्टतम किए बिना, कम से कम किसी एक नागरिक के साथ श्रेष्ठतम किया जा सकता है.’ आंबेडकर को भी मशीनों और स्पर्धात्मक उत्पादन व्यवस्था से कोई शिकायत न थे. लेकिन वे चाहते थे कि सभी प्रमुख और आधारभूत उद्योग सरकार के अधीन हों. वे मानते थे कि आर्थिक सुधार की कोई भी योजना बिना भूमि सुधार के असंभव है. इसके लिए उन्होंने बड़े भूस्वामियों की आय को आयकर के दायरे में लाने का सुझाव दिया था. 1946 में अखिल भारतीय स्तर पर भूमि सुधार की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि भूमि वितरण में असमानता के कारण समाज के बड़े हिस्से को बहुत छोटी जोतों से काम चलाना पड़ता है. परिणामस्वरूप एक ओर जहां श्रमशक्ति का दुरुपयोग होता है, वहीं बहुतसी श्रमशक्ति निष्क्रिय पड़ी रहती है. आवश्यकता से कई गुना भूमि के स्वामी बने जमींदार अपनी श्रमशक्ति का उपयोग इसलिए नहीं करते, क्योंकि उन्हें जरूरत से कई गुना श्रमशक्ति बेगार या मामूली मजदूरी पर उपलब्ध हो जाती है. यानी समाज का एक वर्ग संसाधनों के अभाव में अपनी श्रमशक्ति के लाभों से वंचित रह जाता है; जबकि दूसरा आवश्यकता से कहीं अधिक संसाधनों पर काबिज होने के कारण दूसरे के श्रम को कम मूल्य पर खरीदने में सफल हो जाता है. इस तरह न केवल श्रम का अवमूल्यन होता है, बल्कि समाज की बहुतसी श्रमशक्ति व्यर्थ चली जाती है. इसके लिए आंबेडकर कृषि, उद्योग, बीमा, बैंकादि का संपूर्ण राष्ट्रीयकरण चाहते थे. वे व्यापक भूमिसुधार के समर्थक थे. चाहते थे कि सरकार समस्त कृषियोग्य भूमि का अधिग्रहण कर उसे उचित आकार के फार्मों में विभाजित करे और उत्पाद का समुचित अनुपात में समाज के सभी सदस्यों के बीच संवितरण हो. समाजार्थिक समानता की स्थापना के लिए आंबेडकर का यह क्रांतिकारी सोच था.

आंबेडकर की विचारों पर हम समाजवादी चिंतन की छाया देख सकते हैं. लेकिन भारत में समाजवादी आंदोलन का जो स्वरूप रहा है, उस अर्थ में वे कतई समाजवादी न थे. हम उन्हें आमूल परिवर्तनवादी कह सकते हैं. चूंकि वे सामाजिक समानता के लक्ष्य को दलितों की वर्गीय चेतना, शैक्षणिकसामाजिक उन्नयन तथा लोकतांत्रिक परिवर्तन द्वारा प्राप्त करना चाहते थे, इसलिए उन्हें गणतांत्रिक समाजवादी कहना भी उपयुक्त होगा. वस्तुतः जिस समाज के लिए वे काम कर रहे थे, उसके कल्याण हेतु आर्थिक समरसता का विचार पर्याप्त न था. लाहौर में ‘जातपात तोड़क मंडल’ के वार्षिक अधिवेशन के लिए लिखे गए अपने लंबे भाषण ‘जाति का उन्मूलन’ में उन्होंने कई उदाहरण देकर बताया था कि आर्थिक समाधान कभी भी सामाजिक समाधान का विकल्प नहीं बन सकते. एक उदाहरण उन्होंने गुजरात के गांव का दिया था. वहां अछूत स्त्रियां घाट से पानी लाने के लिए मिट्टी के घड़ों का उपयोग करती थीं. जानूं गांव की खातेपीते दलित परिवारों की कुछ स्त्रियों ने पानी लाने के लिए पीतल के घड़ों का उपयोग करना चाहा तो सवर्ण लोगों की त्योरियां चढ़ गईं. उन्होंने विरोध किया. पूरे भारत में यही हालात थे. जयपुर रियासत के चकवारा की घटना के बारे में उन्होंने बताया कि एक रईस अछूत तीर्थ यात्रा पर गया. लौटा तो परंपरानुसार उसने मित्रोंरिश्तेदारों को भोज देने का फैसला किया. तय किया कि भोज के लिए सभी व्यंजन देशी घी में बनाए जाएंगे. सवर्णों को पता चला तो उबलने लगे. अछूत देशी घी से बने व्यंजनों का भोज दे, यह उन्हें सहन न हुआ. सो ऐन भोज के समय दर्जनों दबंग समारोह स्थल पर जा धमके. पलभर में सारा भोजन तहसनहस कर दिया. समाजवाद मुख्यतः आर्थिक समानता को अपना लक्ष्य मानता है. यही कारण है कि भारत में समाजवादी राजनीति कभी भी दलितों की मददगार नहीं बनी. न ही संसाधनों के संवितरण की न्यायपूर्ण मांग रखने वाले आंबेडकर को किसी ने समाजवादी विचारक के रूप में मान्यता दी.

आंबेडकर मार्क्स की आलोचना करते हुए बुद्ध को अपनाया था. अपने विचारों के कारण लगभग आधी दुनिया पर छाए रहने वाली विश्वइतिहास की इन महानतम हस्तियों में आपस में कोई स्पर्धा नहीं है. तो भी आंबेडकर के लिए बुद्ध इसलिए महत्त्वपूर्ण थे कि उन्होंने जाति पर सवालिया निशान लगाते हुए समानता आधारित समाज का सपना देखा था. साम्यवाद के रूप में समानता आधारित समाज का सपना मार्क्स का भी था. लेकिन मार्क्स की सीमा थी कि वे समानता को जीवन के आर्थिक पक्ष से आगे बढ़कर नहीं देख पाए थे. भारत के बारे में उन्होंने काफी लिखा था, तथापि वह जानकारी राजनीतिक और अखबारी सूचनाओं पर केंद्रित थी. जाति की भयावहता जिससे आंबेडकर का सीधा परिचय था और जिसकी विकृति को ढाई हजार वर्ष पहले जन्मे बुद्ध भी समझते थे, मार्क्स उतनी गहराई से नहीं समझ पाए थे. आंबेडकर मार्क्स की वर्गभेद की अवधारणा से सहमत थे. परंतु इस संशोधन के साथ कि भारतीय समाज में वर्गभेद मुख्यतः सामाजिकसांस्कृतिक रहा है. उनका मानना था कि जाति की समस्या के समाधान के बिना भारत में किसी भी सुधारवादी आंदोलन की सफलता संद्धिग्ध होगी. समाजार्थिक परिवर्तन के लक्ष्य को वे दलितों के प्रबोधीकरण द्वारा प्राप्त करना चाहते थे. इस रूप में वे अपने समय के किसी भी समाजवादी से बड़े और प्रतिबद्ध समाजवादी थे. भारतीय समाजवादी आंदोलन और राजनीति की यह विडंबना रही उसने आंबेडकर को मात्र दलितों का नेता मानकर उपेक्षित रखा. इसके लिए आंबेडकर को तो कोई नुकसान नहीं हुआ. परंतु जाति के सवालों की ओर से मुंह मोड़े रहने के कारण भारत का समाजवादी आंदोलन लगातार अपनी प्रासंगिकता खोता रहा.

आंबेडकर का पूरा जीवन एक महागाथा है. एक लेख या पुस्तक में उनके जीवनकर्म को नहीं समेटा जा सकता. वे अपने मानक आप हैं. इसलिए लेख का समापन हम उन्हीं की बात से करना चाहेंगे. यह दरअसल में एक चेतावनी है जो भारतीय संविधान को लोकार्पित करते हुए उन्होंने हम सबको दी थी. संविधान की प्रस्तावना की शुरुआत उन्होंने ‘हम भारत के लोग’ से की है. इसकी व्याख्या उनके भाषण में भी मिलती है —

‘‘मुझे याद है जब राजनीतिक रूप से सक्रिय हिंदुस्तानी ‘भारत के लोग’ कहने की अपेक्षा ‘भारतीय राष्ट्र’ कहना अधिक पसंद करते थे. मेरा विचार है कि ‘हम एक राष्ट्र हैं’ ऐसा मानकर हम एक बड़े भ्रम को बढ़ावा दे रहे हैं. हजारों जातियों में बंटे लोग भला एक राष्ट्र कैसे हो सकते हैं? सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक दृष्टि से हम अभी तक एक राष्ट्र नहीं हैं, इस बात को हम जितनी जल्दी समझ लें उतना ही हमारे लिए बेहतर होगा. तभी हम राष्ट्र बनने कि जरूरत को बेहतर समझ पाएंगे तथा इस लक्ष्य को हासिल करने के तरीकों और साधनों के बारे में बेहतर पाएंगे. (जातिप्रथा के रहते) इस उद्देश्य की प्राप्ति कठिन है….जातियां राष्ट्रविरोधी हैं. पहला कारण तो ये कि वे सामाजिक जीवन में अलगाव को बढ़ावा देती हैं. दूसरे वे एक जाति और दूसरी जाति के बीच ईर्ष्या और असहिष्णुता को ले आती हैं. अगर हम सच में राष्ट्र बनना चाहते हैं तो हमें इन सब मुश्किलों से मुक्ति पानी होगी. असली भाईचारा तभी कायम हो सकता है, जब राष्ट्र मौजूद हो—लेकिन बगैर बंधुत्व के समानता, स्वाधीनता और राष्ट्रीयता महज दिखावा ही होंगी.’’

ओमप्रकाश कश्यप

1. Ambedkar is my Father in Economics. He is true celebrated champion of the underprivileged. He deserves more than what he has achieved today. However he was highly controversial figure in his home country, though it was not the reality. His contribution in the field of economics is marvelous and will be remembered forever..!”

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