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बालसाहित्य का विकासयुग : साहित्य में बचपन की दस्तक

सामान्य

हिंदी बालसाहित्य : अतीत से आज तक—3

विश्व इतिहास में अठारवीं शताब्दी को विभिन्न वैचारिक आंदोलनों की जन्मदाता होने का श्रेय प्राप्त है. मगर भारत के संदर्भ में यह शताब्दी करीबकरीब ठहरा हुआ समय था. मुगल समाज पतनोन्मुखी था. रजबाड़ों में विलासिता का दौर जारी जारी था. भक्त कवियों ने जिस सामाजिक क्रांति का शुभारंभ किया था, वह कर्मकांडों और बौद्धिक हताशा के दौर में पड़कर दम तोड़ चुकी थी. यही कारण है कि इस कालखंड में जो विदेशी व्यापार कंपनियां भारत में आईं, स्थानीय राजाओं की आपसी फूट और राजसी लिप्साओं के कारण वे यहां बड़ी आसानी से राजनीतिक शक्ति बटोरती चली गईं. निहित स्वार्थ के लिए उन्होंने भारतीय साहित्य का अध्ययनशोधन करना आरंभ किया. कालांतर में उसका लाभ देशवासियों को भी हुआ. यूरोपीय ज्ञानविज्ञान और संस्कृतियों के लेनदेन के बीच नए विचारों ने देश में दस्तक दी. इससे साहित्यसंस्कृति में नया युग आरंभ हुआ. यूरोप के संदर्भ में यह पंद्रहवीं शताब्दी से शुरू होता है. उस संधिकाल का एक पक्ष वैज्ञानिक प्रबोधन की घटना से जुड़ा है, जब एक ओर मार्टिन लूथर, जान काल्विन जैसे सुधारवादी विचारक धर्म के नाम पर फैलाई जा रही जड़ता और पुरोहितवर्ग की लूटखसोट की ओर ध्यानाकर्षित करा रहे थे. दूसरी ओर वैज्ञानिकों और मौलिक विचारकों का वर्ग था जो लोगों को अज्ञानता के दलदल से निकालने की कोशिश कर रहे थे. वैज्ञानिकों में न्यूटन और कापरनिकस सबसे अग्रणी थे. उन्होंने अपने मौलिक खोजों द्वारा उन्होंने अर्से से चली आ रही अवैज्ञानिक मान्यताओं, रूढ़ियों तथा अज्ञानता के प्रतीकों पर जोरदार प्रहार किया था. प्रौद्योगिकीय क्रांति ने अनेक सामाजिक समस्याएं भी पैदा की थीं. जिसने दार्शनिकों, समाजविज्ञानियों को नए सिरे से सोचने को विवश कर दिया था. कालांतर में मानवाधिकार एवं स्वाधीनतावादी आंदोलनों ने समाज में एक नई चेतना प्रवाहित की. इसी दौर में स्त्रीस्वातंत्रय की बयार चली. प्रकारांतर में उसने बालकों के अधिकारों की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया.

साहित्य भूमि पर बचपन की दस्तक शब्दों में मासूमियत की दस्तक है. यह उस क्षण की खोज है जब से बालक की स्वतंत्र अस्मिता को पहचानने का चलन शुरू हुआ. उस अवसर की खोज है जब यह माना जाने लगा कि बालक स्वतंत्र नागरिक है तथा बच्चों की सक्रिय मौजूदगी के अभाव में कोई रचना उनपर थोपी हुई रचना कही जानी चाहिए. प्राचीन भारतीय वाङमय यथा स्मृतियों, ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों आदि में इसपर विस्तार से चर्चा है. उपनिषद का तो मतलब ही गुरु के आगे बैठकर ज्ञानार्जन करना है. वेदउपनिषदादि में एकलव्य, नचिकेता, उपमन्यु, ध्रुव, अभिमन्यु, आरुणि उद्दालक आदि उदात्त बालचरित्रों का वर्णन हैं. उनमें दर्शन है, गुरुभक्ति है, त्याग है, समर्पण है, प्रेम और श्रद्धा भी है. सूरदास ने कृष्ण की बाललीलाओं का ऐसा मनोरम वर्णन किया है जिसका उदाहरण अन्यत्र दुर्लभ है. लेकिन सब बड़ांे द्वारा, बड़ों के बड़े उद्देश्य साधने के निमित्त किया गया साहित्यिक आयोजन था. बचपन का मुक्त उल्लास वहां अनुपस्थित है. लेकिन यह भी स्मरण रखने योग्य है कि बच्चों की शिक्षा को लेकर तो मनुष्य सभ्यता के आरंभ से ही सजग था, परंतु बचपन पर वास्तविक विमर्श काफी विलंब से आरंभ हो सकता. यह वस्तुतः बीसवीं शताब्दी के मध्याह्न की घटना है. वह दूसरे विश्वयुद्ध के बाद शुरू हुई द्वितीय औद्योगिक क्रांति की सफलता का चमचमाता हुआ दौर था. दूसरा विश्वयुद्ध ही अपने आप में चुनौतीर्पूण समय था.

पश्चिम में स्वतंत्र बालसाहित्य की आवश्यकता पंद्रहवी शताब्दी में ही अनुभव की जाने लगी थी. यूनानी साहित्य में बचपन को महत्त्व दिए जाने का प्रथम प्रयास हमें प्लेटो के लेखन से दिखाई पड़ता है. सुकरात का अपना लिखा तो कुछ नहीं मिलता, लेकिन प्लेटो ने सुकरात के विचारों को अपनी संवाद पुस्तकों ‘सीता,’ पर जो लिखा लेकर जो लिखा है, उससे स्पष्ट है कि गुरुशिष्य दोनों ही बच्चों की शिक्षा को पर्याप्त महत्त्व देते थे. किंचित विरोधाभास के बावजूद प्लेटो का शिक्षादर्शन पर्याप्त आधुनिक और अभिनव संभावनाओं से युक्त है. वह पहला विचारक था जिसने स्त्रियों की शिक्षा पर बराबर जोर दिया, खासकर ऐसे समय में जब उसके समकालीन विचारकों में से अधिकांश स्त्रियों को घर की चारदीवारी से बाहर कोई जिम्मेदारी देने को तैयार न थे. उसने सुझाव दिया था कि पूरा शिक्षातंत्र किसी कुशल पर्यवेक्षक की देखरेख में संचालित होना चाहिए. ऐसा व्यक्ति जो शिक्षा से जुड़े समस्त मामलों की विशद जानकारी रखता हो तथा जो समाज के सभी वर्गों, स्त्री, पुरुष आदि के बीच बिना किसी भेदभाव के शिक्षा का प्रसार कर सके. उल्लेखनीय है लोकतांत्रिक पद्धति के आलोचक रहे प्लेटो ने राज्य की बागडोर दार्शनिक मंडल के हाथों में सौंपने का सुझाव दिया था. यह पूछे जाने पर शिक्षा का लाभ क्या है, प्लेटो संवाद पुस्तक ‘लाज’ में एक एथेंसवासी के माध्यम से स्पष्ट करता है—‘यदि तुम यह जानना चाहते हो कि शिक्षा का सामान्य लाभ क्या है, तो इसका उत्तर बहुत आसान है—शिक्षा मनुष्य को सद्गुणसंपन्न करती है; और सद्गुणसंपन्न व्यक्ति विनम्रतापूर्ण व्यवहार करता है. अपनी विनम्रता के बल पर वह युद्ध में अपने शत्रुओं का दिल भी जीत लेता है.’

शिक्षा के लिए विद्यार्थी की उम्र कितनी हो? इस बारे में वह लिखता है कि बालक की शिक्षा का शुभारंभ यथासंभव न्यूनतम उम्र से कर देना चाहिए. यदि संभव हो तो उसके जन्म से अथवा उसके पहले से ही. उसके अनुसार शिक्षा का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हिस्सा ही वह है, जो बचपन में सिखाया जाता है—इसलिए अभिभावक वर्ग का दायित्व है कि वह शिशु की शिक्षा का अनुकूल प्रबंध करे. ताकि बड़ा होने पर वह अपने कार्य में पूरी दक्षता प्राप्त कर सके. प्लेटो के अनुसार शिक्षा कभी समाप्त न होने वाला कर्म है. उसके लिए उम्र की कोई सीमा नहीं है. इसलिए बालक को जहां तक संभव हो, जन्म से ही शिक्षा के लिए तैयार किया जाना चाहिए. वह बच्चों को जन्म से ही राज्य के संरक्षण में रखने और पूर्व निर्धारित मापदंडों के अनुसार उनका पालनपोषण करने का सुझाव देता है. वह मानता है कि शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर तथा हृष्टपुष्ट बच्चों का लालनपालन अलगअलग समूहों में होना चाहिए. कठोर निर्णय लेते हुए वह अःशक्त एवं अपंग बच्चों को अज्ञात स्थान पर रखने का सुझाव देता है. वह मातापिता को अपने बच्चों के साथ संतुलित व्यवहार करने का परामर्श देता है. उपेक्षा एवं असंतुलित व्यवहार से बालक मानसिक रूप से कमजोर रह सकता है. वह लिखता है—

बच्चों की उपेक्षा उन्हें मानसिक रूप से चिड़चिड़ा, कमजोर तथा अधैर्यवान बना सकती है, उनके साथ दोषपूर्ण व्यवहार तथा अज्ञानतापूर्ण जोरजबरदस्ती, मारपीट उन्हें कठोर, चापलूस, संकोची एवं एकांतजीवी बनाएगी. प्रकारांतर में वे सामान्य पारिवारिक और नागरिक जीवन जीने के अयोग्य हो सकते हैं.’

प्लेटो के बाद अरस्तु ने भी बच्चों की शिक्षा पर जोर दिया. उसका कहना था कि शिक्षा मनुष्य लिए शिक्षा मनुष्य को नैतिक बनाए रखने के लिए अनिवार्य है. प्लेटो के अनुसार राजनीति प्रकटतः शिक्षा कार्यक्रम का हिस्सा थी. इसलिए उसने अकादमिक ज्ञान के बजाय व्यावहारिक ज्ञान पर ज्यादा जोर दिया, ‘पढ़नालिखना बच्चों को इसलिए नहीं सिखाया जाना चाहिए कि वह उपयोगी है, प्रत्युत इसलिए भी सिखाएं जाने चाहिए कि उसके द्वारा ज्ञान की अन्य बहुतसी शाखाएं प्राप्त करना संभव है….बच्चों को पढ़ाने के लिए विवेक से पहले अभ्यास का उपयोग करना चाहिए तथा बुद्धि से पहले शरीर को शिक्षित करना चाहिए.’3 अरस्तु के अनुसार शिक्षा का काम नागरिकों के मन में आवश्यक सद्गुणों का संचार करना है, ताकि वे समाज हित में आवश्यक कर्तव्यों को बेहतर ढंग से अंजाम दे सकें. प्लेटो और अरस्तु के शिक्षासंबंधी विचार शताब्दियों तक पश्चिमी समाज का नेतृत्व करते रहे. अरस्तु के करीब तेरह सौ वर्ष बाद उसके ज्ञानसिद्धांत को पहली चुनौती मिली पीटर अबेलार्ड के शब्दों में. उसने ज्ञान के आरंभिक लोकप्रचलित सिद्धांत कि ‘जो दिखता है, वह विश्वसनीय है’ सूत्रवाक्य को बदलते हुए उसने कहा कि ‘जो दिखता है, वह संद्धिग्ध है.’ उसका संकेत एकदम स्पष्ट था. अब तक चले आ रहे ज्ञान और उसपर विश्वास को एक झटके में धराशायी करते हुए ज्ञान की उपलब्ध विरासत पर संदेह करना और फिर पूरी तरह जांचपड़ताल के बाद सत्य का अवगाहन करना. वह अनूठा कविदार्शनिक था. संदेह से आगे बढ़ते ससंदेह को सम्मान देना. पीटर अबेलार्ड ने लिखा था—

संदेह होने पर हम जांचपड़ताल आरंभ करते हैं तथा जांचपड़ताल हमें सत्य तक पहंुचा देती है.’

पीटर अबलार्ड की इस उक्ति में जहां मानवीय जिज्ञासा को महत्त्व दिया गया था, वहीं मस्तिष्क की संभावनाओं और ज्ञान की शक्ति की ओर इशारा भी निहित था. इसमें एक आशावाद था. अबेलार्ड स्वयं आस्थावादी था. सत्य से उसका अभिप्राय ‘परमात्मा’ से ही था. तो भी परमात्मा की खोज के लिए संदेह को महत्त्व देकर उसने मानवीय जिज्ञासा की महत्ता को रेखांकित किया था. इसका परिणाम सोलहवीं और सतरहवीं शताब्दी में दो प्रमुख पुस्तकों के रूप में सामने आया, जो एक तरह से अबेलार्ड की संदेहवादी खोज का विस्तार थीं. ये पुस्तकें थीं ‘दि रिबोल्युनिबस आरबियम(1543)’ तथा ‘फिलास्फी नेचुरलिस प्रिंसिपिया मेथमैटिका(1687)’. लेखक थे क्रमशः निकोलस कापरनिकस और इसाक न्यूटन. महान खगोलविज्ञानी निकोलस कापरनिकस ने स्थापित किया था कि ब्रह्मांड का केंद्र पृथ्वी न होकर सूर्य है. उसने यह खोज अपने जीवन के आरंभिक दिनों में ही कर ली थी, लेकिन इस डर से कि उसकी खोज धार्मिक जगत में तहलका मचा सकती है, वह उसको वर्षों तक दबाए रखा था. अंततः जीवन के अंतिम दिनों में एक मित्र के आग्रह पर उसने पुस्तक की पांडुलिपि छपने को दे दी. पुस्तक जब बाजार में आई तब समाज में उसकी वही प्रतिक्रिया हुई, जैसा काॅपरनिकस ने कल्पना की थी. आखिरकार चर्च से क्षमाचायना करने के बाद ही बूढ़े काॅपरनिकस को जीवन के चंद दिन उधार मिल सके. न्यूटन ने काॅपरनिकस के निष्कर्षों से आगे बढ़ते हुए गुरुत्वबल की खोज की थी. उसके निष्कर्ष भी तत्कालीन धार्मिक मान्यताओं का विरुद्ध जाते थे, लेकिन उस समय तक यूरोपीय समाज काफी आगे आ चुका था. उसकी पुस्तक ‘प्रिंसिपिया मेथमैटिका’ को विज्ञान के क्षेत्र में अभी तक लिखी मौलिक पुस्तकों में श्रेष्ठतम का दर्जा दिया जाता है.

इन पुस्तकों का साहित्य से सीधा संबंध नहीं था. मनुष्य की शाश्वत ज्ञानपिपासा को रेखांकित करने वाली ये पुस्तकें मानवीय मेधा की अनूठी देन थीं. दर्शाती थीं कि केवल आध्यात्मिक जिज्ञासाएं नहीं, बल्कि भौतिक जगत को जाननेसमझने की ललक भी मनुष्य को अज्ञान के अंधेरे से बाहर ला सकती हैं. इन पुस्तकों के प्रकाशन के साथ ही समाज में नए ज्ञान की ललक पैदा हुई. जिससे वैज्ञानिक शोध को विस्तार मिला, जो कालांतर में औद्योगिक क्रांति का वाहक बना. वैज्ञानिक ज्ञान एवं औद्योगिकीकरण की ताकत को समय रहते पहचाना—फ्रांसिस बेकन ने. उसने लिखा कि आनेवाले दिनों में मनुष्यता का इतिहास मनुष्य की ज्ञान के प्रति ललक के आधार पर लिखा जाएगा. ‘ज्ञान ही शक्ति है’—बेकन का यह वाक्य वैज्ञानिक प्रबोधन की आधारशिला बन गया. हालांकि जड़ता में आकंठ डूबे समाज में उस समय भी ऐसे बहुत से लोग थे, जो नए ज्ञान के विरोध में जुटे थे. वे ज्ञान को अलौकिक और दिव्य मानते आए थे. उनका विचार था कि आध्यामिक जिज्ञासाएं ही मानवीय ज्ञान का मूल हैं. इसलिए बच्चों और बड़ों को दी जाने वाली शिक्षा केवल धर्म सीमित होती थी. इसी बोध के साथ बच्चों को धार्मिक प्रतीकों, कर्मकांडों, अवतारवाद, पूजापाठ और तंत्रमंत्र के बारे में अच्छी तरह रटा दिया जाता था. ज्ञान के नाम पर यह पोंगापंथी आचरण पीढ़ीदरपीढ़ी अंतरित होता था. उस व्यवस्था के साथ बालक का इस प्रकार अनुकूलन कर दिया जाता था कि वह उनपर शायद ही संदेह कर सके. सांस्कृतिकसामाजिक दबावों के बीच यही बोध पीढ़ीदरपीढ़ी अंतरित होता था. नए बोध के फलस्वरूप समाज के उपेक्षित वर्गों के बारे में नए सिरे से सोचा जाने लगा. अवसर का लाभ उठाते हुए स्त्रीस्वातंत्रयवादी आंदोलनों ने जोर पकड़ा, इसकी पहल का श्रेय फ्रांस को जाता है.

बच्चों के लिए विशेष रूप से लिखी गई पहली सचित्र पुस्तक जाॅन अमोस कामिनियस(1592—1670) की ‘आरिबस सेन्युलियम पिक्चस्(1657)’ थी, जिसका अभिप्राय है—‘चित्रों की दुनिया’. इस पुस्तक में बच्चों की रोजमर्रा की दुनिया की वस्तुओं को चित्रों के माध्यम से समझाने का प्रयास किया गया था. कामिनियस का मानना था कि मानवीय मस्तिष्क की सीमाएं अनंत होती हैं. उसने अरस्तु की इस बात से तो सहमति व्यक्त की थी कि मानवमस्तिष्क कोरी सलेट के समान होता है, जिसपर कुछ भी लिखा जा सकता है. मगर मस्तिष्क की सीमा को जड़ सलेट तक सीमित कर देने पर उसकी असहमति थी. मानवीय मस्तिष्क के विपुल सामर्थ्य का उल्लेख करते हुए अपनी पुस्तक ‘शिक्षण की संपूर्ण कला’ में उसने लिखा था—

यह ठीक है कि बच्चे का मस्तिष्क कोरी सलेट होता है, जिसपर हम मनचाही इबारत लिख सकते हैं. लेकिन एक अर्थ में यह उससे भी बढ़कर है. सलेट की सीमा होती है. हम उसपर उसके आकार से अधिक कोई इबारत लिख ही नहीं सकते. जबकि मानवमस्तिष्क अनंत क्षमतावान होता है. उसपर जितना चाहे लिखा जा सकता है, क्योंकि वह निस्सीम विस्तार है.’

कामिनयस का कहना था कि बच्चे स्वभावतः अच्छे होते हैं. इतने अच्छे कि उन्हें सद्गुणों की खान कहा जा सकता है. किंतु उनके व्यक्तित्व को निखारने के लिए शिक्षा अनिवार्य है. कामिनियस ने ये विचार उस समय और समाज में व्यक्त किए थे, जहां एक सर्वमान्य मान्यता थी कि पाप मनुष्य के साथ उसके जन्म से जुड़ा है. अतः पतित मनुष्य के त्राण हेतु शिक्षा (धार्मिक) अनिवार्य है. इस मान्यता के चलते तत्कालीन समाज में शिक्षा के नाम पर बलप्रयोग सामान्य बात थी. शिक्षाकर्म के जुड़े अधिकांश विचारक परंपरावादियों की ‘कर्मआचार संहिता’ से प्रभावित थे, जिसका संदेश था—‘कठिन परिश्रम, बुराई के विरुद्ध युद्ध में हथियार की तरह डटे रहना.’ इस खतरनाक और स्वार्थी अवधारणा के चलते अबोध बच्चों को तांबे और कोयला की खदानों, कारखानों, खेतों और कपड़ा मिलों में जोत दिया जाता था. उनसे ऐसे काम लिए जाते जिन्हें बड़े आदमी करने से कतराते थे. आर्थर वालेस काल्हों(1885—1979) ने अपनी पुस्तक ‘ए सोशल हिस्ट्री आफ अमेरिकन फेमिलीज’ में एक रोंगटे खड़े कर देने वाले तथ्य का खुलासा किया है. उसने लिखा है कि यूरोप से लेकर अमेरिका तक बालश्रम इतना आम था कि यूरोप से अपहृत बच्चों को कृषिमजदूर तथा उद्योग मजदूर के रूप में अमेरिका ले जाकर बेच दिया जाता था. वहां खतरनाक परिस्थितियों में बच्चों से अमानवीय परिस्थितियों में सोलहसतरह घंटे प्रतिदिन बिना किसी विश्राम के काम लिया जाता था. बदले में उन्हें मामूली मजदूरी दी जाती थी. बीमार होने पर उनके इलाज का भी कोई इंतजाम न था. भारत के हालात भी भिन्न न थे. यहां भी लोहे, तांबे और कोयले की खदानों में छोटेछोटे बच्चों से अमानवीय परिस्थितियों में काम लिया जाता था. बीमार होने पर उपचार की कोई व्यवस्था न थी. दम घुटने से होने वाली दुर्घटनाएं आम थीं.

कामिनियस ने जोर देकर कहा था कि न केवल अमीर और ताकतवर वर्ग के बच्चों, बल्कि गांवों, कस्बों, शहरों में रहने वाले अभिजात्य और सामान्य, गरीब और अमीर, झोपड़ियों और अट्टालिकाओं में रहने वाले सभी लड़केलड़कियों को शिक्षा के लिए अनिवार्यतः स्कूल जाना चाहिए. ये विचार तत्कालीन यूरोपीय समाज में क्रांतिकारी थे. ‘डाइडेक्टि मेग्ना’ को चतुर्दिक सराहना मिली और प्रायः सभी यूरोपीय भाषाओं में उसका अनुवाद किया गया. यह पुस्तक वर्षों तक कई यूरोपीय भाषाओं में सर्वाधिक बिकने वाली बनी रही. बच्चों के बीच शिक्षा को सरल एवं ग्राह्यः बनाने के लिए उसने सचित्र पुस्तक, आरबिस सेंसुलियम पिक्चस् (1658), जिसका अर्थ है—चित्रों की दुनिया, भी तैयार भी की थी. वह पुस्तक वास्तव में एक लघु ज्ञानकोश थी, जिसमें बच्चों के काम की जानकारी चित्रों के साथ प्रकाशित की गई थी. ‘आरबिस सेंसुलियम पिक्चस्’ को विश्व की पहली सचित्र पुस्तक होने का गौरव प्राप्त है. काॅमिनियस द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में दिए गए योगदान के लिए यूरोपवासी उसको सम्मान के साथ ‘आधुनिक शिक्षा का पितामह’ कहकर बुलाते हैं. उसने जोर देकर कहा था कि शिक्षा पर हर बच्चे का अधिकार है, इसलिए यह राज्य का धर्म है कि वह प्रत्येक बच्चे के लिए शिक्षण की समुचित व्यवस्था करे—

न केवल संपन्न और शक्तिशाली वर्ग के बच्चों के लिए, बल्कि हर वर्ग के बच्चों को जैसे की लड़का और लड़की, गरीब और अमीर, सभ्रांत और असभ्रांत, शहर और कस्बे, गांव और बस्ती प्रत्येक बच्चे को शिक्षार्जन के लिए अनिवार्य रूप से स्कूल भेजा जाना चाहिए.’

बचपन के मनोविज्ञान को समझने की वास्तविक शुरुआत हुई सतरहवीं शताब्दी में. इसका श्रेय अनुभववादी दार्शनिक जान लाक(1632—1704) तथा स्वतंत्रतावादी विचारक रूसो को जाता है. अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘एन ऐस्से आन ह्युमैन अंडरस्टेंडिंग’ में लाक ने प्लेटो की उस धारणा को चुनौती दी, जिसमें उसने कहा था कि पढ़ना असल में दिमाग में पहले से ही विद्यमान ज्ञानसंपदा को तरोताजा करने की प्रक्रिया है. इस बारे में अरस्तु का समर्थन करते हुए लाक ने बच्चों के मस्तिष्क को ‘कोरा कागज’ बताया और माना कि मनुष्य का ज्ञान उसके अनुभव की देन है. उसने बच्चों में पुस्तकपाठन की रुचि बढ़ाने के लिए सुझाव देते हुए कहा था कि बच्चों के लिए ऐसी पुस्तकें प्रकाशित की जाएं जो उनकी बौद्धिक क्षमता और वयस् के अनुकूल हों. जिनमें उनका बचपन झलकता हो. जो उनके मनोविज्ञान और रुचि को प्राथमिकता दें. जिनमें भरपूर कल्पनाशीलता हो, साथ में रोचकता भी. अरस्तु परीकथाओं को बच्चों के लिए गैरजरूरी मानता था, जबकि लोककथाओं और नीतिकथाओं का यह मानते हुए पक्ष लिया था कि उनमें यदाकदा नैतिकता से भरपूर सामग्री होती है, जो कि बच्चों में सामाजिक बोध जगाने के लिए आवश्यक है. यही नहीं लाॅक ने रेनार्ड दि फाक्स(1481) ईसप की बोधकथाओं(1484) की प्रशंसा की थी. साथ में यह भी कहा था कि ‘यदि ईसप अपनी अपनी कहानियों में चित्रों का संयोजन भी करते तो वह और भी अधिक उपयोगी हो सकती थीं.’

बच्चों की पुस्तकें कैसी हों, इस बारे में सुझाव देते हुए लाॅक ने कहा था कि बच्चों की पुस्तकें उनके लिए—‘‘उपयोगी और आनंददायक हों, जिन्हें पढ़ाते समय शिक्षक को और पढ़ते समय विद्यार्थी को आनंद आए.’ यह बचपन को समझने की पहली गंभीर कोशिश थी. लाॅक के विचारों का प्रभाव आगे आने पीढ़ियों पर भी पड़ा. उसकी मृत्यु के लगभग मात्र आठ वर्ष बाद जन्मे रूसो ने बचपन को लघु अभ्यारण्य की अवधि माना. अपनी पुस्तक ‘एमाइल’ में वह प्रश्न करता है—‘आखिर वह कौनसी अवस्था है जिसकी सामान्य गतिविधियां करुणा और परोपकार से भी बढ़कर हैं?’ उत्तर वह स्वयं देता है—‘बचपन!’ अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए वह लिखता है—‘बचपन को प्यार करो. उसके साथ खेल खेलो. उसके सुखामोद में शामिल होकर उसकी मनोरम प्रकृति में डूब जाओ.कृबचपन के आनंदमय दिनों को छीनो मत, ये बहुत जल्दी गुजर जाने वाले हैं.’ इसी पुस्तक में संत पियरे की बात को आगे बढ़ाता हुआ वह लिखता है—‘संत पियरे ने व्यक्ति को बड़ा बालक कहा है. हम चाहें तो बालक को छोटा व्यक्ति भी कह सकते हैं.’ ‘एमाइल’ पहली बार फ्रांसिसी भाषा में 1762 में प्रकाशित हुई थी, उसका तत्काल अंग्रेजी में अनुवाद हुआ. पुस्तक में रूसो ने शुद्धतावादियों की ‘मूल अपराध’ की विचारधारा का खंडन किया था, जो सृष्टि के उद्भव को आदम और हव्वा के ‘प्रथम अपराध’ से जोड़ती थी. उल्लेखनीय है कि उस समय तक शुद्धतावादियों के दबाव में बच्चों को उपदेशक साहित्य ही पढ़ने को दिया जाता था. उसमें बच्चों को पढ़ाया जाता थाआदम के पाप मेंहम सब अपराधी.’

जान लाक के तर्क को विस्तार देते हुए रूसो ने ‘एमाइल’ में लिखा—‘बच्चे निर्दोष जन्मते हैं, बाद में समाज उन्हें बिगाड़ देता है.’ रूसो की एक और मान्यता थी कि बच्चे पढ़ने के बजाय अनुभवों से गुजरते हुए सीखते हैं. उसका मानना था कि बच्चों की शिक्षा की शुरुआत बारह वर्ष की उम्र से होनी चाहिए. आरंभ के लिए डेनियल डिफोई की राबिन्सन क्रूसो(1719) की पुस्तक पर्याप्त है. हालांकि आगे चलकर रूसो के विचारों को अपरिपक्व मानते हुए करीबकरीब छोड़ दिया गया, तो भी उस समय रूसो के विचारों को मौलिक और क्रांतिकारी माना गया. बालसाहित्य के क्षेत्र में उसके विचार नए लेखन और प्रयोगों का माध्यम बने. उसकी प्रेरणा पर थाॅमस डे ने ‘हिस्ट्री आॅफ स्टेंडफोर्डेंड मार्टन(1783-1789) की रचना की. तीन खंडों में लिखी गई इस पुस्तक में गरीब किसान के सद्गुण संपन्न बेटे हेरी सेंडफोर्ड तथा एक धनी सौदागर के बिगडैल बेटे टामी मार्टन की कहानी थी.

स्टेंडफोर्ड अपने किसान पिता के साथ खेतों पर खेलतेकूदते बड़ा होता है. उसका गरीब पिता उसकी शिक्षा की व्यवस्था भी ढंग से नहीं कर पाता. दूसरी ओर मार्टिन का पिता अपने बेटे के लिए बेहतरीन शिक्षण की व्यवस्था करता है. वह उसको अच्छी पाठशाला में भेजता है, जहां उसको नियमित नैतिक शिक्षा दी जाती है. बावजूद इसके मार्टन बिगड़ जाता है. इस कहानी का शिक्षा थी कि केवल महंगी शिक्षा की पर्याप्त नहीं है, बल्कि बालक के संपूर्ण चारित्रिक विकास के लिए अनुकूल वातावरण भी जरूरी है. यह बालसाहित्य के क्षेत्र में यथार्थवादी लेखन का शुभारंभ था. निस्संदेह उसका श्रेय रूसो को ही जाता है. उसके पश्चात तो यूरोपीय साहित्य में ऐसे कथानकों की बाढ़सी आ गई. बालकों की मनोरचना को समझकर उनके अनुरूप मनोरंजक और उद्देश्यपूर्ण बालसाहित्य की रचना की मांग जोर पकड़ने लगी. 1744 में जान लाक और रूसो से प्रभावित एक समर्पित प्रकाशक जान न्यूबेरी आगे आया. ‘एक छोटीसुंदर पाकेट बुक’ के नारे के अंतर्गत प्रकाशित न्यूबेरी की चित्रात्मक पुस्तकें असल में बालोपयोगी सूचनाओं का कोष थीं. उनमें अक्षरों, कहावतों, लोकोक्तियों को ईसप की कहानियों के साथ चित्रों के साथ प्रकाशित किया जाता था. उसको आधुनिक रचनात्मक बालसाहित्य की प्रारंभिक पुस्तक कहा जाता है. अपनी पुस्तकों को लोकप्रिय बनाने के लिए न्यूबेरी ने कुशल विपणन तकनीक अपनाई थी. ग्राहक यदि लड़का हो तो प्रत्येक पुस्तक के साथ एक गेंद और लड़की हो तो उसे एक पिनकुशन भेंट में दिया जाता था. न्यूबेरी द्वारा प्रकाशित पुस्तकमाला को इंग्लेंड में व्यापक लोकप्रियता मिली.

न्यूबेरी द्वारा बच्चों के लिए पुस्तकों का प्रकाशन किसी भी पुस्तक विक्रेता द्वारा मौलिक एवं सुरुचिपूर्ण बालसाहित्य के प्रकाशन के क्षेत्र में किया गया पहला गंभीर प्रयास था. न्यूबेरी से पहले बच्चों के लिए उपलब्ध पुस्तकों के कथानक किसी लोकनायक अथवा मिथकीय पात्र पर निर्भर करते थे. इसी क्रम में विलियम के केक्सटन ने ‘रेनार्ड दि फाक्स’(1481) तथा फ्रांसिसी से अनूदित ‘ईसप की बोधकथाओं’(1484), थामस मलोरी की ‘मोर्ट डार्थर’(1485) के कई संस्करण प्रकाशित किए थे. उसके बाद वाइकिन दि वार्ड ने ‘राबिन हुड के कारनामे’(गेस्ट आफ राबिनहुड, 1510) का प्रकाशन किया. साहसी और बहादुर नायकों की कथा के रूप में किंग आर्थर तथा लोकगाथाओं के नायक डिक व्हीटिंग्टन की कहानियों लोगों के बीच पहुंचने लगीं. सोलहवीं शताब्दी में ये पुस्तकें छोटे दुकानदारों और फेरी वालों के माध्यम से गांवगांव पहुंचाई जातीं, जहां वे कुछ पेंस में बेची जाती थीं. सोलह से चैबीस पृष्ठ संख्या वाली पुस्तकों को आकर्षक बनाने के लिए उनमें लकड़ी के ब्लाॅक की सहायता से चित्र बनाए जाते थे. ये पुस्तकें हालांकि ‘विशेषरूप से बच्चों के लिए’ जैसी श्रेणी में प्रकाशित नहीं हुई थी, उनपर धार्मिक शिक्षा का गहरा प्रभाव था. तो भी ये बच्चों में पुस्तकपाठन संस्कृति की आधारशिला रखने में सहायक बनीं. बच्चों के बीच इन्हें खूब पसंद किया जाता था.

न्यूबेरी ने अंग्रेजी बालसाहित्य को जो दिशा दी, वही कालांतर में बच्चों के लिए मौलिक साहित्यलेखन का प्रस्थान बिंदु बन गई. तदनंतर बालसाहित्य के नाम पर नीति, धर्म, अध्यात्म आदि के नाम पर छापे जा रहे ‘उपदेशक साहित्य’ का प्रकाशन घटने लगा. उसके स्थान पर बच्चों की रुचि, मनोरंजन एवं उपयोगिता को केंद्र में रखकर लिखी गई पुस्तकें बाजार में छाने लगीं. उन पुस्तकों का लक्ष्य बच्चों को केवल कहानियोंं सुनाना या उनका मनोरंजन मात्र न था, उनके माध्यम से लेखक की कोशिश होती थी कि बालक अपने व्यक्तित्व का संपूर्ण विकास करे, ताकि भविष्य की चुनौतियों से आसानी से निपट सके. बच्चों के मनोविज्ञान को नए सिरे समझने का गंभीर प्रयास भी किया गया, जो अंततोगत्वा मौलिक बालसाहित्य की आवश्यकता को स्थापित करने में सहायक बना. उस समय पुस्तकों की उपलब्धता धनी और उच्च मध्यमवर्गीय परिवारों तक ही सीमित थी. गरीब परिवारों में व्यक्तिगत संबंधों और आपसी अनुराग, शिक्षा आदि का महत्त्व आर्थिक भरणपोषण के बाद था. गरीब परिवारों में जन्मे बच्चे अपने मातापिता के साथ श्रम करते थे. पठनपाठन की सुविधा उनमें से गिनेचुने बच्चों को ही मिल पाती थी. हां, माताएं घर लौटने पर अपने बच्चों के मनोरंजन के लिए किस्सेकहानियोंं अवश्य सुनाती थीं. निर्धन बच्चों के लिए, विशुद्ध बालसाहित्य की कोटि में रखे जाने योग्य पुस्तकों की संख्या नगण्य थी. इसके स्थान पर उपदेशक और प्रचारात्मक पुस्तकों की भरमार थी. इस स्थिति ने अपने समय के कई महान लेखकों जैसे डेनियल डेफो(राबिन्सन क्रूसो, 1719), जोनाथन स्फिट(गुलीवर की यात्राएं, 1726), लेविस केरौल(ऐलिस इन वंडरलें, 1865 लुकिंग ग्लास, 1871), मेरी शेरवुड(हिस्ट्री आॅफ दि फेयरचाइल्ड फैमिली, 1818), मार्क ट्वेन(दि एडवेंचर आफ दि टाम सायर), चाल्र्स डिकेन्स जैसे महान बालसाहित्यकारों को जन्म दिया. सतरहवींअठारवीं शताब्दी के यूरोपीय पुनर्जागरण का असर देर से ही सही, भारत पर भी पड़ा. स्वाभाविक रूप से इसमें ईस्ट इंडिया कंपनी तथा अन्य यूरोपवासियों की भी भूमिका रही, जो मुगल शासन के अवसान के दिनों में भारत आए और यहां की राजनीतिक अस्थिरता देख अपने पांव जमाने की कोशिश करने में लगे थे.

अंग्रेज भारत में व्यापार के सिलसिले में आए थे. सतरहवीं शताब्दी में वहां आरंभ हुई औद्योगिक क्रांति ने उत्पादन में तीव्र बढ़ोत्तरी की थी. उत्पादित माल की बिक्री के लिए अब उन्हें नए बाजारों की तलाश थी. उनके लिए भारत आदर्श बाजार हो सकता था. पराधीनता के बावजूद यहां की जनता अपने प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों के दम पर पूरी दुनिया में अपनी ललचाती थीं. अंग्रेजों ने अपने ठिकाने समुद्र के किनारे बसाए थे. जहां से उन्हें माल लानेले जाने में आसानी रहे. शासन व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए लिए उन्हें अंग्रेजी पढ़ेलिखे लोगों की आवश्यकता थी. इसके लिए लार्ड मैकाले ने औपनिवेशिक भारत की शिक्षानीति में कंपनी के स्वार्थानुरूप बदलाव किया, जिसका भारतीय बुद्धिजीवियों द्वारा व्यापक विरोध भी हुआ. उस समय तक भारत में लोकचेतना की लहर व्याप चुकी थी. राष्ट्रीय अस्मिता का संघर्ष दो स्तरों पर जारी था. एक ओर तो धार्मिकसामाजिक सुधारवादी के रूप में स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, महर्षि अरविंद, राजा राममोहनराय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, दयानंद सरस्वती जैसे विचारक थे, जो देश को रूढ़ियों और परतंत्रता से मुक्ति दिलाकर उसका पुराना गौरव लौटाने को प्रतिबद्ध थे. दूसरी ओर देश की राजनीतिकसामाजिक अस्मिता की लड़ाई भी जोर पकड़ने लगी थी. इसके उत्प्रेरकों में राष्ट्रवादी लेखक, पत्रकार, साहित्यकर्मी आदि थे.

भारत में छापाखाना 1694 में स्थापित हुआ. लेकिन देश को भारतीय अस्मिता से परचानेवाला एक और महान व्यक्ति इसी दौर में अवतरित हुआ था, जो भारतीय नहीं था. मगर उसने भारतीयता का अनुसंधान इतनी लगन, गहन निष्ठा और परिश्रम के साथ किया था कि उसके द्वारा भारत के बारे में, अपने बारे में जानकार भारतीय विद्वान भी चौंक पड़े थे. उन्हें पहली बार अनुभव हुआ था कि शताब्दियों लंबी दासता के दौरान वे अपने आपको, अपनी पहचान को कितना पीछे छोड़ आए हैं. वह विद्वान था—मैक्समूलर. जर्मन के इस भारतअनुरागी विद्वान ने विलुप्तप्रायः संस्कृत वाङमय से न केवल पूरी दुनिया, बल्कि भारत का भी परिचय कराया था. मैक्समूलर के अध्ययन का प्रभाव यूरोपीय देशों पर भी पड़ा. इसके फलस्वरूप भारतीय दर्शन और साहित्य को लेकर बड़े पैमाने पर शोधकार्य आरंभ हुआ. पश्चिम में उन दिनों सुधारवादी आंदोलनों की बाढ़ आई हुई थी. फ्रांसिसी क्रांति सफल हो चुकी थी. उसका असर भारतीय जनमानस पर पड़ना स्वाभाविक ही था. वे सभी कारण भारतीय अस्मिता के उभार के दिन थे, जो आगे चलकर राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन की प्रेरणा बने.

सतरहवीं शताब्दी में जब पश्चिम में वैचारिक आंदोलन जोर पकड़ रहा था, भारत में मुगल साम्राज्य का सूरज अस्ताचलगामी था. अपनी रूढ़ धार्मिक परंपराओं और विरल शैक्षिक रुझान के कारण मुगलों में धर्मेत्तर पुस्तकों को पढ़ने की परंपरा क्षीण थी. लंबी दासता से हिंदी मनीषा का आत्मविश्वास डिगा हुआ था. विद्वान देश पर छाए राजनीतिक संकट को धार्मिक संकट के रूप में देखते थे. अंग्रेज सरकार धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप छोड़कर राजनीतिक निर्णय चाहे जो ले, भारत के शिखरस्थ वर्ग की यह सामान्य नीति थी. इसलिए उनका अधिकांश लेखन प्रतिक्रियावादी था. सामंतवादी सोच एवं जातीय पूर्वाग्रहों के बीच विद्वानों से क्रांतिकारी सोच की अपेक्षा कम ही थी. लार्ड मैकाले ने तत्कालीन शिक्षा प्रणाली पर धर्म के वर्चस्व को लेकर बेहतर टिप्पणी की है. हिंदू एवं मुस्लिम शिक्षा प्रणाली पर आलोचनात्मक टिप्पणी करते हुए उसने लिखा था—

हिंदुओं और मुसलमानों की शिक्षापद्धति में काफी समानता थी. वे उस भाषा में शिक्षा देते थे जो जनता की भाषा नहीं थी. उनकी शिक्षा का मूलस्रोत धर्म था और उसकी आप्तता अपरिवर्तनीय थी. वे नए अभिनिवेश और परिवर्तन के विरुद्ध थे….’

दरअसल उनीसवीं शताब्दी में हिंदू और मुस्लिम दोनों को मानने वाले कट्टरता में डूबे हुए थे. मुस्लिमों की अपेक्षा हिंदू धर्म अपेक्षाकृत अधिक सहिष्णु रहा है, लेकिन निरंतर बाहरी आक्रमणों के बीच इस प्रकार की शिक्षा पद्धति धर्म के प्रति कट्टरता की भावना ही पैदा कर सकती थी. इसके द्वारा स्वतंत्र व्यक्तित्व और विवेक सम्मत(रेशनल) वैज्ञानिक दृष्टिकोण का निर्माण संभव नहीं था. इकीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ईस्ट इंडिया कंपनी के अंग्रेज अधिकारियों ने भारतीय संस्कृति और साहित्य को समझने के गंभीर प्रयास आरंभ कर दिए. कंपनी की ओर से जार्ज प्रिंसेप, विलियम जोन्स, गियर्सन जैसे विद्वानों को नियुक्त किया था. उन्होंने भारतीय साहित्य का दस्तवेजीकरण कर उसका यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद किया, इससे भारत की परंपरागत छवि जो जेम्स मिल जैसे दार्शनिकइतिहासकारों की अधूरी और एकांगी समझ द्वारा बनी थी, में बदलाव होने लगा. इससे विदेशी विद्वानों का ध्यान भारतीय संस्कृति और साहित्य की ओर गया.

ईस्ट इंडिया कंपनी ने सुखवादी विचारक जेम्स मिल को भारतीय इतिहास के अध्ययन के लिए नियुक्त किया था. मिल भारत आने से पहले ही उपयोगितावादी दार्शनिक के रूप में पर्याप्त ख्याति अर्जित कर चुका था. ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारी की हैसियत से उसने ‘हिस्ट्री आॅफ ब्रिटिश इंडिया’ नामक ग्रंथ की रचना की. पुस्तक में भारतीय समाज के जातीय विभाजन, धर्म और परंपरा के नाम पर फैली घोर रूढ़िवादिता तथा आडंबर, राजनीति की जगह घोर अवसरवाद, छोटेछोटे रजबाड़ों के आपसी वैमनस्य, अकारण युद्ध और मारकाट जैसी बुराइयों का, जो भारत की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक दुर्दशा का कारण बन चुकी थीं, प्रामाणिक और तथ्यपरक चित्रण किया था. छह खंडों की इस पुस्तक को पूरा करने में मिल को बारह वर्ष लगे थे. इस पुस्तक को भारी सफलता प्राप्त हुई. हालांकि इसके कारण उसकी आलोचना भी खूब हुई. अपने महत्त्वपूर्ण उपयोगितावादी दर्शन के कारण मिल की जैसी प्रतिष्ठा इंग्लेंड तथा अन्य यूरोपीय देशों पर सवार थी. भारत में वह प्रतिष्ठा कभी हासिल न हो सकी. अपने एकतरफा आकलन में साम्राज्यवादी दृष्टिकोण अपनाते हुए मिल ने भारत के बारे कटु टिप्पणियां की थीं, साथ ही भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का समर्थन किया था. ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा किए गए कार्यों की सराहना करते हुए उसने लिखा था—

‘‘ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत को सभ्य बनाने, उसका नागरीकरण करने में मदद की थी. अंग्रेजों के आने से पहले भारत एक बर्बर युग से बाहर आने के लिए छटपटा रहा था.’ हालांकि बाद में मिल ने अपने ही कथन का उलट करते हुए भारत में ब्रिटिश राज को ‘समाज के संपन्न तबके के लिए बाहरी मदद उपलब्ध कराने वाला व्यापक तंत्र’’ कहकर ब्रिटिश राज्य की वास्तविक खामियों की ओर इशारा भी किया था.’’

पुस्तक में मिल ने एक तरह से तत्कालीन ब्रिटिश सरकार का बचाव ही किया था.उसकी पुस्तक ब्रिटिश सरकार उपनिवेशवादी सोच को मान्यता प्रदान करती थी. वह अंग्रेजों के इस दुष्प्रचार का समर्थन करती थी कि भारतीय समाज के नागरीकरण तथा उनमें एकराष्ट्र की भावना पैदा करने के लिए अंगे्रजों का इस देश में टिके रहना आवश्यक है. मिल को उसका लाभ भी मिला. पुस्तक लिखने के साथ ही मिल को इंडिया हाउस में नियुक्ति मिल गई. उसके बाद तो उसने विभिन्न राजनीतिक पदों पर रहते हुए खूब प्रतिष्ठा एवं मानसम्मान अर्जित किया. इसमें कोई संदेह नहीं कि मिल का विश्लेषण औपनिवेशिक दृष्टि से परिपूर्ण था. बावजूद इसके पुस्तक में उसने कई स्थानों पर भारतीय समाज की कटु सचाइयों को बेनकाब भी किया था, जो उसकी राजनीतिकआर्थिक और सामाजिक दुरवस्था का कारण थीं. इसलिए भारत में उस पुस्तक की आलोचना होना स्वाभाविक ही था. मिल के कई निष्कर्ष भारतीय विद्वानों, खासकर ब्राह्मणों की स्वार्थपरता और उनकी शोषणवादी प्रवृत्तियों पर सीधे चोट करते थे. पुस्तक के दूसरे खंड में उसने लिखा था—

हिंदू शासनव्यवस्था का अध्ययन करते समय हम पहले ही देख चुके हैं कि राजशाही के रूप में एक चालू किस्म की शासकीय निरंकुशता, नितांत अकलात्मक यानी बड़े ही रूढ़ तरीके से भारत में स्थापित हुई, जिसको (निहित स्वार्थों के लिए) दैवीसत्ता के रूप में मान्यता दी जाती रही. भारतीय समाज का जातीय आधार पर विभाजन, हयुक्त तथा घृणास्पद विचारों का कुफल था, जिसने हिंदूसमाज का बेहद ओछा और हानिकारक स्तरीकरण किया था. यही नहीं, स्वार्थी तत्वों द्वारा इस जातीय विभाजन को दुनिया के किसी भी अन्य समाज की अपेक्षा कहीं अधिक विध्वंसात्मक महत्ता प्रदान की गई; और हम देखते हैं कि अत्यंत हानिकारक अंधविश्वासों पर टिकी उस उत्पीड़क और ताकतवर धर्मसत्ता ने मनुष्यता की ऐसी अवमानना की जिसकी मिसाल किसी भी अन्य राष्ट्रसमाज में मिलनी मुश्किल है. उनके दिमाग उनके शरीरों से कहीं अधिक असहिष्णु थे. संक्षेप में निरंकुश राजशाही तथा धर्मसत्ता की सम्मिलित शक्ति ने हिंदुओ के दिलोदिमाग पर कब्जा कर उन्हें मानवसमाज के सबसे दाससमूह में बदल दिया था.’

इससे आगे वह सर विलियम जोन्स द्वारा मनुस्मृति के अनुवाद की भूमिका से उद्धरण देते हुए लिखता है—

वैधानिक रूप से मान्य राजनीतिक निरंकुशता तथा धर्मसत्ता का वह मिलाजुला तंत्र आपसी सहमति के सिद्धांत के आधार पर समाज में अपनी जगह बनाए था. वह अज्ञात दिव्य सत्ता के नियम द्वारा संचालित तथा उसी के द्वारा नियंत्रित होता था. हमने देखा कि समाज के जातीय बंटवारे तथा ब्राह्मणों के पूर्वाग्रहयुक्त, विभेदनकारी सोच ने हिंदुओं में ऊंचनीच की घोर हानिकारक प्रथा को जन्म दिया. इस प्रकार का जाति आधारित विध्वंसकारी विभाजन जैसा भारत में देखने को मिला, वैसा अन्यत्र कहीं न था. हमने देखा कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था के घृणित, पीड़ादायी और अमानवीय विभाजन ने समाज के बड़े वर्ग का निरंतर उत्पीड़न किया है. इतनी बुरी तरह से कि लोगों के दिमाग उनके शरीर से बड़े गुलाम बन चुके हैं. संक्षेप में धार्मिकराजनीतिक निरंकुशता एवं पुरोहितवाद ने मिलकर हिंदुओं के दिलोदिमाग को मानवीय सभ्यता का सबसे बड़ा दास बनाने का काम किया है.’

एक ओर व्यक्तिस्वातंत्रय और जनवादी विचारधारा का पक्ष लेना तथा दूसरी ओर एक औपनिवेशिक सत्ता के समर्थन में भारीभरकम तर्क गढ़ना, ये जेम्स मिल के जीवन के अंतर्विरोध हैं. ब्रिटिश कालीन भारत का इतिहास लिखते समय अपनी लेखकीय ईमानदारी का प्रदर्शन करते हुए वह यह तो लिखता है कि उसने भारत नहीं देखा और उसका समस्त ज्ञान भारत संबंधी पुस्तकों, संदर्भ ग्रंथों और छुटपुट आलेखों तक सीमित है, मगर अपनी पुस्तक को प्रामाणिक बनाने के लिए वह भारतीय सभ्यता और संस्कृति को लेकर वैसा शोध नहीं कर पाता, जो विलियम जोन्स, मैक्समूलर जैसे विद्वानों ने खुले मन से बिना किसी पूर्वाग्रह के किया, जिससे प्राचीन भारत की बौद्धिक संपदा को लेकर वे दरवाजे खुले जिनके बारे में अधिकांश भारतीय बुद्धिजीवी भी अनजान थे. इसके बावजूद हमें मानना पड़ेगा कि अपनी पुस्तक में जेम्स मिल ने भारतीय समाज के बारे में कटु वास्तविकताओं की ओर संकेत किया था, जो यहां जातीय विभाजन के रूप में शताब्दियों से चली आ रही थीं. उनकी जकड़ इतनी मजबूत थी कि जातिव्यवस्था के निचले पायदान पर मौजूद लोगों ने जातीय शोषण को अपनी नियति मान लिया था. उल्लेखनीय है कि सतरहवींअठारहवीं शताब्दी में यूरोपीय देशों में प्राचीनकाल से चली आ रही दासप्रथा के उन्मूलन के लिए आंदोलन जोरों पर थे; और जेम्स मिल उन विचारकों में से था जो घृणित दासप्रथा को तत्काल समाप्त किए जाने के पक्ष में थे. इसलिए भारतीय समाज के जातीय विभाजन तथा उसके आधार पर एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग की शारीरिकमानसिक गुलामी के बारे में सुनने के बाद उसका क्षुब्ध होना स्वाभाविक ही था.

बहरहाल, भारतीय इतिहास और संस्कृति को लेकर अंग्रेजों की कोशिश का परिणाम यह हुआ कि जिस देश का इतिहास एक हजार वर्ष पहले तक खोजे नहीं मिलता था, उसको ग्रियर्सन और विलियम जोन्स, जार्ज प्रिंसेप की टीम ने न केवल ढाई हजार वर्ष पहले तक पहुंचा दिया, बल्कि भारतीय संस्कृति की विविधता एवं विशालता को लेकर ऐसे तथ्य भी उजागर किए जो लंबी गुलामी और समाज में व्याप्त अशिक्षा, धार्मिकजातीय वैमनस्य के कारण लुप्तप्रायः थे. लगभग यही वह दौर था, जब मैक्समूलर ने वेदों का जर्मन अनुवाद किया और भारत का वह रूप दुनिया के सामने आया, जिसके आधार पर वह ढाई हजार वर्ष पहले विश्वगुरु का दर्जा हासिल कर चुका था. मैक्समूलर की प्रेरणा से यूरोपीय विद्वानों के बीच भारतीय साहित्य के अध्ययनविश्लेषण को लेकर मानो होड़सी व्याप गई. आर्थर एंथोनी मैक्डानल, मौरिस विंटरनिट्ज, जे. गोंडा, कीथ आदि विद्वानों ने भारतीय साहित्य का विशद् अध्ययन द्वारा उसे संयोजित, विश्लेषित करने का युगांतरकारी कार्य किया. इन प्रयासों द्वारा भारतीय जनता का खोया हुआ आत्मविश्वास वापस लाने में मदद मिली, जो शताब्दियों की दासता में लगभग गायब हो चुका था. जर्मनी के अलावा फ्रांस तथा इंग्लेंड के विद्वान भी आगे आए, जिसके फलस्वरूप भारत को समझने के लिए पाश्चात्य विद्वानों को साहित्यिक सामग्री उन्हीं की भाषा में उपलब्ध हो सकी.

अंग्रेज अपने साथ एक आर्थिक व्यवस्था भी लाए थे, जो मशीनों द्वारा उत्पादन पर टिकी थी. उन्होंने भारत का वैसा औद्योगिकीकरण नहीं किया, जैसा इंग्लेंड में हो चुका था. व्यापारी अंग्रेजों की इसके पीछे भी एक चाल थी. उनका इरादा अपने अन्य उपनिवेशों की भांति भारत को भी कच्चे माल के òोत के रूप में इस्तेमाल करने का था. उन्होंने भारत में सिर्फ वही कारखाने या उद्यम स्थापित किए जिनकी या तो यहां प्रशासनिक दृष्टि से अनिवार्यता थी अथवा वे जिन्हें पर्यावरण की दृष्टि से इंग्लेंड में लगाया जाना उचित न था. पहली श्रेणी में रेल यातायात और छापाखाना आते हैं, जबकि दूसरी में नील और अफीम की खेती जैसे विनाशकारी उद्यम, जो कालांतर भारत में अंग्रेजों के प्रति आक्रोश को बढ़ावा देने और उनकी शोषणकारी वृत्ति को सामने लाने में सहायक बने. ये चेताएं समाज को औपनिवेशिक शोषण के विरुद्ध एकजुट कर रही थीं. लगभग पूरी दुनिया में चल रहे सुधारवादी आंदोलनों का प्रभाव भारत पर भी पड़ रहा था. इससे वे प्रसुप्त अस्मिताएं भी सिर उठा रही थीं, जिन्हें अभी तक जाति, धर्म, सामंतवाद आदि के कारण उपेक्षा का शिकार होना पड़ा था. अंग्रेजी शिक्षा के बढ़ते चलन के कारण परंपरागत शिक्षा तक सीमित रहना अब जरूरी नहीं रह गया था. नई शिक्षा के लिए आधुनिक भावबोध से भरपूर पुस्तकों की आवश्यकता थी. इसलिए अन्य देशों की भांति भारत में भी बच्चों के लिए पुस्तक लेखन का सिलसिला पाठ्य पुस्तकें तैयार करने से आरंभ हुआ, फिर जैसे ही बच्चों में पढ़ने की ललक जन्मी, उनके लिए साहित्यकारों ने बहुउपयोगी पुस्तकें रचना आरंभ कर दिया.

हिंदी बालसाहित्य की मुख्य प्रेरणाएं

पहले भी कहा गया कि भारत में बालक कभी उपेक्षित नहीं रहा. धर्मग्रंथों में भी उदात्त बालचरित्रों का वर्णन जगहजगह हुआ है. हमारे यहां नचिकेताओं की परंपरा रही है, जो बचपन से ही मृत्यु जैसे गंभीर सवालों से दो चार होते रहे हैं. ध्रुव, प्रहृलाद, आरुणि उद्दालक, एकलव्य, सत्यकाम जाबालि जैसे बच्चों की कहानियोंं भले ही धार्मिकसामाजिक जरूरतों के आधार पर गढ़ी गई हों, मगर वे यह दर्शाती हैं कि भारतीय परिवारों में बालक चेतना के केंद्र में रहा है. उन्हें देश की आध्यात्मिक चेतना का उत्तराधिकारी और सूत्रधार भी बताया गया था. बावजूद इसके चाहे वह कठोपनिषद हो अथवा कोई और, बच्चों के माध्यम से जो विषय विमर्श के केंद्र में लाए गए हैं, उनका संबंध बड़ों से था, या कह सकते हैं कि वे बच्चों को बड़ीबड़ी बातें, बड़ों की भाषा और संस्कार के साथ पढ़ातेसुनाते थे. बालसाहित्य की आधुनिक अवधारणा से जो अभिप्रेत है, उसके उन दिनों तक विकास ही नहीं हो पाया था. प्राचीन ग्रीक, यूनानी, मिश्र, अरब देशों आदि की भांति भारत में भी साहित्य का प्रथम लक्ष्य धर्म का प्रसारप्रचार रहा है. अन्य सभ्यताओं की भांति भारत में भी अक्षर के आविष्कार को मनुष्य की आध्यात्मिक चेतना का विचार माना गया. हालांकि वह विस्तार संपूर्ण मानवीय चेतना का था, जिसका अध्यात्मिक चेतना केवल एक अंग है. संभव है कि समाज के कुछ वर्गों ने निहित स्वार्थों के लिए जानबूझकर ऐसा किया हो. तो भी लेखनपाठन लंबे समय तक धर्मदर्शन और अध्यात्म तक सिमटा रहा. इसके अलावा जो पढ़ना पड़ता था, वह वर्गीय शिक्षा थी. जैसे क्षत्रिय बालक को गुरु से हथियार चलाने की शिक्षा लेना अनिवार्य था. वैश्य बालक को गणित के बारे में सिखाना जरूरी माना जाता था, ताकि वह अपने पैत्रिक व्यवसाय को आगे बढ़ा सके. इसका अभिप्राय यह नहीं है कि भारतीय परंपरा में बालक को सर्वथा उपेक्षित माना जाता था. वैदिक साहित्य की वाचिक परंपरा में गुरु बच्चे को अपने समक्ष बिठाकर पाठ सिखाता था. उस समय लेखनवाचन को समान महत्त्व दिया जाता था. वेदों में ऐसी कई रचनाएं हैं जिन्हें बच्चों के नैतिक विकास के लिए अनिवार्य माना जाता है. भारतीय वाङमय में बच्चों के लिए उपयोगी साहित्य के रूप मे वड्डकथा, कथासरित्सागर, जातक कथाएं, पंचतंत्र, हितोपदेश आदि पुस्तकों की चर्चा समयसमय पर होती रहती है. इनमें कथासरित्सागर और हितोपदेश मौलिक न होकर क्रमशः वड्डकथा(बृहत्कथा) और पंचतंत्र का पुनर्लेखन हैं. वड्डकथा की रचनाकाल 495 ईस्वीपूर्व माना जाता है. उसके रचनाकार गुणादय सातवाहन के राज्य में मंत्री थे. कहा जाता है कि प्राकृत भाषा में लिखी गई ‘वड्डकथा’ में सात लाख सूक्त थे, लेकिन उसका कोई भी हिस्सा आज उपलब्ध नहीं है. कश्मीरी पंडित सोमदेव ने ‘वड्डकथा’ को संस्कृत में लिखा और नाम दिया ‘कथासरित्सागर’. सोमदेव कश्मीर सम्राट अनंत के आश्रित थे. कथासरित्सागर की रचना उन्होंने रानी सूर्यमती के मनोरंजन के निमित्त की थी.

पंचतंत्र’ को न केवल भारत बल्कि दुनियाभर के बालसाहित्य का स्रोत कहा सकता है. इस कृति का मूल रचनाकार विष्णु शर्मा को माना गया है, जो महिलारोप्य नामक नगर के सम्राट अमरशक्ति के आश्रित थे. राजा के तीन उद्दंड बेटों बहुशक्ति, उग्रशक्ति और मंदशक्ति को सही रास्ते पर लाने के लिए विष्णु शर्मा ने उन्हें एकएक कर कई कहानियों सुनाई थीं, वही पंचतंत्र के रूप में संकलित हैं. कुछ विद्वानों के अनुसार विष्णुशर्मा और कोई नहीं चंद्रगुप्त मौर्य के मंत्री विष्णुगुप्त चाणक्य हैं. उन्होंने ही छद्म नाम से इस पुस्तक की रचना की है. उल्लेखनीय है कि प्राचीन भारतीय वाङमय में महिलारोप्य नाम के किसी राज्य का उल्लेख नहीं है. इससे लगता है कि यह पंचतंत्रकार की एक कल्पना थी. दूसरी बात यह कि जिस कूटनीति की शिक्षा पंचतंत्र की कहानियों देती हैं, वे चाणक्य की नीति से बहुत मेल खाती है. जो हो इतना तो साफ है कि व्यावहारिक राजनीति के बारे में पंचतंत्रकार और चाणक्य की नीति एकदूसरे से बहुत मेल खाती थी. इस आधार पर पंचतंत्र ईसा से करीब 350 वर्ष पुरानी रचना है. जबकि हटेल ‘पंचतंत्र’ को 200 ईस्वीपूर्व की रचना मानता है. कहते हैं कि पुस्तक के लेखक ने उसकी रचना 80 वर्ष की परिपक्व अवस्था में की थी. इसलिए ‘पंचतंत्र’ में उस समय की कूटनीति और व्यवहारशास्त्र का निचोड़ है. यह उस समय की रचना है जब भारत में गणतांत्रिक राज्य अपनी प्रासंगिकता खो चुके थे तथा साम्राज्यवाद की धारणा जोर पकड़ने लगी थी. ‘पंचतंत्र’ का अनुवाद और पुनर्लेखन भारतीय और विदेशी भाषाओं में लगातार होता रहा है. भारतीय दर्शन के विशेषज्ञ, गीता, पंचतंत्र जैसी पुस्तकों का सीधे संस्कृत से अंग्रेजी में अनुवाद, संस्कृत व्याकरण तथा उसका शब्दकोश तैयार करने वाले फ्रैंकलिन एडगर्टन(1885—1963) ने पंचतंत्र के अनुवादों की विशद्ता का उल्लेख करते हुए लिखा है कि उसके—

पचास से अधिक भाषाओं में दो सौ से अधिक अलगअलग अनुवाद हुए है. इनमें से तीनचैथाई भाषाएं भारत से बाहर की हैं. यह ग्रंथ अनुवाद के माध्यम से ग्यारहवीं शताब्दी के आरंभ में ही यूरोप में दस्तक दे चुका था. सोलवीं शती में उसकी गूंज यूनान, लैटिन, स्पेन, इटली, जर्मनी, अंग्रेजी, स्लोवाकिया, चेक गणराज्य सहित स्लोवाकिया की अन्यान्य भाषाओं में सुनाई पड़ने लगी थी. उसकी पहुंच जावा से लेकर दक्षिणी ध्रुव तक बनी थी. (भारत में भी)…पंचतंत्र का निरंतर लेखनपुनर्लेखन चलता रहा. इसका विस्तार, संक्षेपीकरण, टीकाकरण जैसे कार्य लगातार होते रहे. भारतीय में भी पंचतंत्र की रचनाओं के पद्यानुवाद तथा गद्य लेखनरूपातंरण होते रहे. संस्कृत में पुनर्लेखन सहित इसका मध्यकालीन लोकभाषाओं में भी अनुवाद किया गया. किस्साकहानी के दीवाने भारतीयों ने पंचतंत्र की अनेक कहानियों को लोककथाओं के रूप में पिरोया और शताब्दियों तक लगातार सुनतेसुनाते रहे. फिर आधुनिक लेखकों ने लोककथाओं में अनेक रूप में सुनीसुनाई जाने वाली पंत्रतंत्र की कथाओं का अनेक बार पुनर्प्रस्तुतिकरण भी किया.’

भारत में पंचतंत्र के विभिन्न भाषाओं में 25 से अधिक रूप मिलते हैं. जिनमें एक संस्कृत में लिखी तंत्रआख्यायिका भी है. पारसी भाषाओं में इसका अनुवाद 570 ईस्वी में बोर्जुया द्वारा किया गया. वहां से वह सीरियाई भाषाओं में ‘कलिलग तथा दमनग’ के शीर्षक के अंतर्गत अनूदित किया गया. अरबी में इसका अनुवाद पारसी विद्वान अब्दुल्ला इब्न अलमुकाफा द्वारा ‘कलिला वा दिमनाह’ शीर्षक से किया गया. अरबी अनुवाद के आधार पर पंचतंत्र पारसी भाषा में ‘अनवारेसोहेली’ के रूप में सामने आया. यूरोप में पंचतंत्र के आरंभिक अनुवाद अरबी भाषा से हुए, जहां पंचतंत्र की कहानियों ‘बिदपई(कुछ यूरोपीय देशों में पिलपई) की परीकथाओं’ के रूप में प्रसिद्ध हैं. बिदपई का उल्लेख कुछ स्थानों पर सूफी संत के रूप में हुआ है. संभव है यह पंचतंत्रकार विष्णु शर्मा के नाम का अरबी संस्करण हो, जो बोलीभाषा की सहजता के कारण बदलकर ‘बिदपई’ हो गया हो. जबकि कुछ विद्वान इसे मध्यकाल के लेखक विद्यापति का अपभ्रंश बताते हैं. डोरिस लेसिंग ने अपने एक निबंध में बिदपई को एक सूफी संत के रूप में दर्शाया है. लेकिन सभी में बिदपई का कार्यकाल पंचतंत्रकार के मुकाबले बहुत बाद का है. यहां डोरिस लेसिंग ने एक निबंध में बिदपई को लेकर एक कहानी का उल्लेख किया है. कहानी में बिदपई एक सूफी संत के रूप में दर्शित है. वह लोककथाओं का जादूगर तथा अनूठा किस्सागो है. कहानी कुछ इस प्रकार है—

बात उन दिनों की है जब सम्राट सिकंदर भारत छोड़कर जा रहा था. भारत में विजित राज्यों की देखभाल के लिए उसने अपने प्रतिनिधि नियुक्त किए थे. उनमें एक राजा बहुत ही उदंड एवं आततायी था. प्रजा के सुखदुख से उसे कोई मतलब ही न था. उस समय एक साधु आगे आया, नाम था बिदपई. उसने अपनी पत्नी से कहा कि मैं राजा को डपटने समझाने जा रहा हूं. इसपर पत्नी रोनेझींकने लगी तो बिदपई ने उसको समझाया और प्रस्थान कर गया. जब वह सम्राट के दरबार में पहुंचा तो उस समय रात हो चुकी थी. इसपर पत्नी रोनेझींकने लगी. उसको समझाकर बिदपई प्रस्थान कर गया. जिस समय वह सम्राट की नगरी में पहुंचा अंधेरा हो चुका था. राजभवन की छत पर बैठा सम्राट खुले आसमान में तारे देख रहा था. विस्तीर्ण अनंताकाश में टिमटिमाते अनगिनत तारों को देख अचानक राजा को अपने अस्तित्व की लघुता का बोध होने लगा. उसका लगा कि अनंताकाश के समक्ष वह कितना तुच्छ है. ये तारे हजारोंलाखों वर्षों से इसी प्रकार टिमटिमाते आ रहे हैं. इन्हें देखते हुए उसका जीवन कितना लघु है. देखते ही देखते सम्राट का नगण्यताबोध अवसाद में ढल गया. उसे अपना जीवन तुच्छ लगने लगा.

उसी क्षण सम्राट ने एक भव्य आकृति को अपने समक्ष पाया. वह हरे वस्त्रों पहने थी, जिनपर अनेक कहानियों छपी हुई थीं. सम्राट की मनःस्थिति को पहचानते हुए भव्य आकृति बोली—‘चूंकि तुमने पहली बार अपने वैभव और महत्त्वाकांक्षाओं से परे हटकर जीवन के सत्य के बारे में सोचा है, इसलिए मैं तुम्हें एक वरदान देना चाह रहा हूं. यदि तुम कल प्रातःकाल मेरी बताई गई दिशा में प्रस्थान करोगे तो वहां तुम्हें अनमोल खजाना प्राप्त होगा.’

राजा वैभव से उकता चुका था. साधु की बात मान अगले दिन उसने राज्य छोड़ दिया और साधु द्वारा बताई दिशा में प्रस्थान कर गया. चलतेचलते अचानक उसकी निगाह एक फटेहाल व्यक्ति पर पड़ी. राजा उसके पास पहुंचा. पूछने पर थकान से चूर राजा ने कहा—‘मित्र कल रात मुझसे कहा गया था कि यहां पहुंचने पर मुझे खजाना मिलेगा, मैं उसी की तलाश में हूं.’

क्या तुम सम्राट देवशलीन हो!’

हां, मैं सम्राट देवशलीन ही हूं.’

तब तो उस गुफा में खजाना तुम्हारी प्रतीक्षा में है. चलकर देखो.’ मंत्रमुग्धसा सम्राट उसके पीछे चल दिया. गुफा के भीतर पहुंचते ही सम्राट की आंखें चौंधियां गईं. वहां सोने और हीरेजवाहरात का ढेर लगा था. सम्राट उसको फटीफटी आंखों से मग्न मन कुछ देर तो देखता रहा, थोड़ी देर बाद बोला—‘अरे, यह सब तो मेरे पास पहले ही बहुत सारा है. और मुझे भला क्यों चाहिए?’

तभी उसकी निगाह एक पुस्तक पर पड़ी. उसने जतन से उसको उठाया और खोलकर देखा. लेकिन उसकी कुछ समझ में न आया. हीरेजवाहरात के ढेर को वहीं छोड़ सम्राट उस पुस्तक को ले राजमहल लौट आया. लेकिन पुस्तक में कही गई पहेलीनुमा बातें उसकी समझ में न आ सकीं. उसने उकताकर पुस्तक को नाली में फेंक दिया. अचानक वह हरे वस्त्रधारी साधु वहां उपस्थित हुआ. उसने पुस्तक को निकाला. साफ किया. राजा उसको हैरानी से देखता रहा—

क्या तुम इस पुस्तक के बारे में बता सकते हो?’ उसने साधु से फरियाद की.

अवश्य.’ साधु ने कहा. वह साधु बिदपई था.’

पंचतंत्र की कहानियों की अरब यात्रा के साथ अनेकानेक कहानियों के साथ यह कहानी भी जन्मी और उनके साथसाथ अरब देशों के लोकसमाज का हिस्सा बन गई.

भारत में हितोपदेश के रूप में पंचतंत्र का पुनर्लेखन नारायण पंडित ने संवत 1393(12वीं शताब्दी) में किया था. नारायण पंडित बंगाल के राजा धवलचंद के आश्रित थे. हितोपदेश की कहानियों के संकलन के पीछे उनका उद्देश्य था युवाओं को व्यावहारिक जीवनदर्शन से परचाना, ताकि बड़े होकर वे जिम्मेदार नागरिक बन सकें. पंचतंत्र और हितोपदेश की कई कहानियोंं जातक कथाओं से भी मिलती हैं. ऐतिहासिक दृष्टि से जातक कथाएं इन सबमें पुरानी हैं. जातक कथाओं के रूप में लगभग तीनहजार रचनाएं प्राप्त होती हैं. उनका लेखनकाल ईसापूर्व तीसरीचैथी शताब्दी है. इस वर्ग में धर्म, नीति और आचारशास्त्र पर अलगअलग कहानियोंं प्राप्त होती हैं. प्रत्येक कहानी में नैतिक संदेश छिपा हुआ है. इन कहानियों को बुद्ध के पूर्वजन्म की कथाएं कहकर प्रचलित किया गया है. लगभग इसी दौर में रचे गए महाकाव्यों, शताधिक पुराणों, स्मृतियों और आरण्यकों में भी ऐसी कई कहानियों और दृष्टांत आए हैं, जिन्हें बच्चों के लिए उपयोगी माना जा सकता है. हालांकि उस समय के अधिक साहित्य की भांति इन सबकी रचना भी बड़ों की जरूरत और पसंद को केंद्र में रखकर की गई थी.

मध्यकाल में भी ऐसी कई कृतियों की रचना इस देश में हुई जिन्हें बच्चे चाव से पढ़ते हैं. इनमें अकबरबीरबल के चुटुकले, तेनाली राम के किस्से, देवन मिसर, गोनू झा की कहानियों, वैताल पचीसी, सिंहासन बतीसी आदि सम्मिलित हैं. कुछ रचनाएं मुगलों और इस्लाम के अनुयाइयों के सौजन्य से भी इस देश में पहुंची थीं, जिनमें ‘हजार रातें उर्फ आलिफ लैला’, हातिम ताई, मुल्ला नसीरुद्दीन, गुलबकाबली आदि किस्से सम्मिलित हैं. बीरबल सम्राट अकबर का समकालीन और उसका दरबारी था. जबकि तेनाली राम विजयनगर सम्राट महाराज कृष्णदेव के दरबार में रहता था. गोनू झा मिथिलांचल में चैदहवीं शताब्दी में जन्मे थे. उनके वुद्धि चातुर्य और सूझबूझ का परिचय देते छोटेछोटे किस्से हैं, उनमें गजब की पठनीयता है. ‘वैताल पचीसी’ और ‘सिंहासन बतीसी’ वस्तुतः कथासरित्सागर की कुछ कहानियों का ही पुनर्लेखन है. लेकिन कथासरित्सागर की कहानियों में जहां नैतिकताबोध प्रबल है, वहीं ‘वैताल पचीसी’ और ‘सिहांसन बतीसी’ की कहानियों में कर्मकांड की प्रचुरता है. ‘वैताल पचीसी’ के रचनाकार या प्रस्तोता वैताल भट्ट बताए जाते हैं, जो न्याय और वीरता के लिए प्रसिद्ध सम्राट विक्रमादित्य के दरबार में मंत्री थी. ‘वैताल पचीसी’ की भांति ‘सिंहासन बतीसी’ भी सम्राट विक्रमादित्य की न्यायप्रियता और बहादुरी का बखान करती है. ‘सिंहासन बत्तीसी’ का प्रस्तोता मुनि क्षेमेंद्र हैं. इन कहानियों का प्रस्तुतीकरण दक्षिण भारत और बंगाल में भी अलगअलग समय हुआ. दक्षिण में ये कहानियों ‘विक्रमचरित’ के नाम से विख्यात हुईं. बंगाल में इनके प्रस्तोता वररुचि थे. वर्षों तक यह कहानियों जनसमाज के बीच किस्सेकहानियों के रूप में सुनीसुनाई जाती रहीं. घरों में पंचतंत्र और हितापदेश की कहानियों के लौकिक संस्करण भी परिजनों द्वारा बच्चों को सुनाए जाते रहे. इनमें पंचतंत्र को छोड़कर जिसके बारे में सभी जानते हैं कि उसकी रचना उदंड राजकुमारों को व्यावहारिक ज्ञान की शिक्षा देने के ध्येय से की गई था. जबकि वैताल पचीसी, कथासरितसागर और सिंहासन बतीसी आदि की रचनाओं का मुख्य ध्येय बड़ों का मनोरंजन करना, उन्हें कुछ नैतिकव्यावहारिक सीख देना था. उनकी रचना भी बड़ों को केंद्र में रखकर की गई थी. मध्ययुग के कथाचरित्र पर लोक और सामंतवाद की छाया है. अधिकांश जनजीवन चूंकि ग्राम्याश्रित था, जहां मनोरंजन के कम साधन थे, इसलिए कहानीकिस्से सुननासुनाना लोगों के मनोरंजन का प्रमुख साधन था. गोनू झा, बीरबल, तेनाली राम आदि सभी किसी न किसी सम्राट के आश्रित थे. इसलिए उनकी कहानियों पर सामंतवाद की छाया है. यह भारतीय इतिहास का वह कालखंड है जब राजनीति तेजविहीन हो चुकी थी. वर्णव्यवस्था, जातिवाद और कर्मकांडों से ग्रस्त भारतीय मनीषा की धार कुंद थी. उम्मीद थी तो बस लोक से. उन लेखकों, कवियों से जो स्वयं को राजसत्ता के बजाय लोक के अधिक निकट पाते थे. गोनू झा उन्हीं में से थे. वे लोक को बिसराते नहीं है. समयसमय पर हंसीमजाक के जरिये ही सही, जहां सम्राट को उसके कर्तव्य की याद दिलाते हैं, वहीं लोक के विचलन पर उसको भी आवश्यक चेतावनी दे जाते हैं. गोनू झा की कहानियों लोक के अधिक करीब, सीधे लोकसाहित्य का हिस्सा जान पड़ती हैं. मध्ययुग के कथासाहित्य की बानगी के तौर पर उनकी एक कहानी का आनंद लेते हैं—

गोनू झा की मां बीमार थी. मरणासन्न अवस्था. बचने की कोई उम्मीद न थी. कुदरत का कमाल. उस बरस गोनू झा के खेतों में गन्ने की फसल खूब लहलहाई थी. जो भी देखता उसकी प्रशंसा किए बिना न रहता. गोनू झा ने मां का काफी उपचार कराया, पर जराजर्जर काया प्राणों को अधिक दिन संभाल न सकी. वृद्धा के देहांत का समाचार इलाके के पंडितों और गांववालों को मिला तो जोरदार भोज की उम्मीद में सबने गोनू झा को घेर लिया—

गरीब आदमी हूं, पांच ब्राह्मणों से अधिक नहीं जिमा सकता.’ गोनू झा ने कहा.

आप और गरीब, इस पर कौन विश्वास करेगा? कम से कम पचीस गांवों का भोज जमना चाहिए.’

पचीस गांव! यह तो ज्यादती है. इतने लोगों को जिमाने के लिए धन कहां से लाऊंगा!’

वह केवल आपकी नहीं, हमारी भी मां थी. इसलिए हम सब इसमें सहयोग करने को तैयार हैं. आपको जितने धन की आवश्यकता हो मांग लीजिए. उधार रहेगा, धीरेधीरे चुकाते रहना.’

कर्ज लेकर भोज कराना क्या की समझदारी है!’

इसमें गलत क्या है. मां आखिर रोजरोज तो मरती नहीं. और हां, भोज में शुद्ध मिष्ठान चलना चाहिए.’ गोनू झा ने गांववालों को काफी समझाने की कोशिश की. परंतु वे जिद ठाने रहे. निर्णय के लिए एक दिन का समय लेकर गोनू झा घर लौट गए. बेहद चिंतित. समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें! गांव में जो घटा, उसकी खबर पत्नी को भी मिल चुकी थी. गांववालों के व्यवहार से वह गुस्से में थी. गोनू झा घर पहुंचे तो बोली—

उन्हें भोज ही चाहिए तो पत्तल पर एकएक ढेली गुड़ की रख दीजिए.’

त्वरित बुद्धि गोनू झा ने झट से निर्णय ले लिया. अगले दिन गांव में लोग जुटे तो उन्होंने पचीस गांवों को भोज देने की स्वीकृति दे दी.

भोज में शुद्ध मिष्ठान्न होना चाहिए.’

अवश्य!’ गोनू झा ने कहा.

आपने गांव वालों की बात रखी तो हम भी पीछे नहीं रहेंगे. पचीस गांवों की दावत है. बड़ा खर्च होगा. आप चिंता छोड़कर बता दीजिए….जितना उधार चाहेंगे मिल जाएगा.’ गांव के महाजन आगे आए. पर गोनू झा ने मना कर दिया—

रहने दीजिए, यदि आवश्यकता पड़ी तो मांग लूंगा.’

देखा हम कहते थे न, यह गोनू झा हैं. मालमत्ते की कोई कमी थोड़े ही है इन पर. वो तो बस दावत से बचना चाहते थे.’ एक बार फिर शुद्ध मिष्ठान्न की याद दिलाकर गांववाले अपनेअपने घर लौट गए. आखिर दावत का दिन करीब आया. एक दिन पहले ही गोनू झा ने अपनी ईख कटवा दी. गन्नों को साफ कर उसके छोटेछोटे टुकड़े कराकर रख लिए. अगले दिन दावत थी. सुबह से ही भोज के लिए गांववालों का आना शुरू हो गया.

मिष्ठान्न की महक नहीं आ रही.’ एक पंडित ने बोला.

आप बैठिए तो सही, मिठाई बस आने ही वाली है.’

भीतर हवेली में हलवाई जुटे होंगे. आखिर गोनू झा ठहरे. कोई ऐसेवैसे आदमी थोड़े ही हैं.’

पंडित कतारबद्ध होकर बैठने लगे. उनके बैठते ही गोनू झा सिर पर टोकरा रखकर मिष्ठान्न परोसने निकले. सब ललचाई निगाहों से टोकरे की ओर देखने लगे. गोनू झा ने परोसना आरंभ किया. पर यह क्या! पत्तल पर मिठाई के स्थान पर गन्ने का टुकड़ा देख पंडित लोग चैंक पड़े.

क्या यही खिलाने लिए आपने हमें यहां बुलवाया है?’

क्यों इसमें क्या बुराई है. मिठाई है. शुद्ध है. यही तो मैंने कहा था.’

पर क्या गन्ना भी दावत में परोसा जाता है.’

क्यों नहीं. दावत तो गृहस्थ की मर्जी से होती है. और मेरे पास जो था, वह तो मैंने आपके हवाले कर दिए.’

भोज में आए ब्राह्मणों के पास इसका कोई जवाब न था. गन्ने के टुकड़े को बगल में दबाए वे घर लौटने लगे.

ये लोक से जुड़ी कहानियों हैं. हास्य मिश्रित, मगर कुरीतियों पर कटाक्ष करती हुई. देवन मिसर, गोपाल भांड, गोनू झा, तेनालीराम, मुल्ला नसीरुद्दीन के किस्से इस कसौटी पर खरे उतरते हैं. यही आगे चलकर हिंदी बालसाहित्य की मुख्य प्रेरणा बने और किसी न किसी रूप में उसको लगभग एक शताब्दी तक प्रभावित करते रहे. बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जब दूसरी औद्योगिक क्रांति ने लोगों के सोच और जीवनमूल्यों पर प्रभाव डालना आरंभ किया तो बालसाहित्य भी परिवर्तन से अछूता न रहा. लेकिन संस्कृति के नाम पर, परंपरा के नाम पर लोक में घुलमिल गए इन किस्सेकहानियों का प्रभाव उसपर आज तक बना है.

हिंदी बालसाहित्य का उद्भव

अंग्रेजी शिक्षा के प्रभाव और परिवर्तनशील समय की आवश्यकताओं को देखते हुए बच्चों के लिए उपयुक्त साहित्यिक पुस्तकों की आवश्यकता अनुभव की गई तो श्रेष्ठ और मौलिक बालसाहित्य के विकल्प के अभाव में वैताल पचीसी, सिंहासन बतीसी, कथासरितसागर, जातक कथा, आलिफ लैला की रचनाओं को भी बालोपयोगी साहित्य में शुमार लिया. उनकी कहानियों का संक्षिप्त रूप लिखित और वाचिक परंपरा के माध्यम से बच्चों को पढ़ायासुनाया जाता रहा. यह स्थिति हिंदी में मौलिक बालसाहित्य की दस्तक तक चलती रही. कालांतर में हिंदी में मौलिक लेखन का शुभारंभ हुआ. उसका श्रेय जाता है, भाखामुंशी लल्लूलाल(1763—1835) तथा सदल मिश्र(1767/68—1847/48) आदि को. वे फोर्ट विलियम कालेज में हिंदी की पुस्तकों को बढ़ावा देने के लिए नियुक्त किए गए थे. दोनों में विशेष साहित्यिक प्रतिभा तो न थी, लेकिन संस्कृत, ब्रजभाषा आदि का अच्छा ज्ञान था. उपलब्ध साहित्य के खड़ी बोली में रूपांतरण के साथ नए भाषाई क्षेत्र में आत्मविश्वास के साथ कदम बढ़ाने का उन्होंने जो साहस दिखाया वह उनकी ऐतिहासिक भूमिका को रेखांकित करने के लिए पर्याप्त है. उस समय के साहित्यकारों की प्रमुख समस्या थी कि भाषा का रूप तत्सम हो या आम बोलचाल वाला? उर्दू और हिंदवी में साहित्य की भाषा क्या हो, यह भी मसला था. इस बीच बच्चों की शिक्षा के लिए पुस्तकों की आवश्यकता आन पड़ी. इसके लिए हिंदी लेखकों की आवश्यकता थी, जो बच्चों की युगीन आवश्यकता को पहचानकर पुस्तकें लिख सकें. फोर्ड विलियम कालेज के प्रोफेसर गिलक्राइस्ट उस योजना के प्रभारी थे. उन्होंने लल्लूलाल और सदल मिश्र को यह जिम्मेदारी सौंपी—

लल्लूलाल ने ब्रजभाषा में लिखी कहानियों को उर्दूहिंदी गद्य में लिखा. इन्होंने ‘सिंहासन बत्तीसी’, ‘वैताल पचीसी’, ‘शकुंतला नाटक’, ‘माधोनल’ आदि पुस्तकें लिखीं. सके अतिरिक सन 1812 में इन्होंने ‘राजनीति’ नाम से हितोपदेश की कहानियों को भी गद्य में लिखा. वास्तव में इस समय जो पुस्तकें लिखवाई जा रही थीं, उनके दो उद्देश्य थे—एक यह कि ‘भाखा’ की समस्या सुलझाई जा सके और दूसरा यह कि वे पुस्तकें स्कूलों में भी पढ़ाई जाएं, जिनसे ‘भाखा’ का भविष्य निर्मित हो सके और वह अधिक लोकप्रिय हो सके….इन पुस्तकों की भाषा सरल और आसानी से समझ में आने वाली होती थी. जिन स्थानों पर अंग्रेजी पढ़ाने के लिए स्कूल और कालेज खुल चुके थे, वहां भी अंग्रेजी के साथसाथ हिंदी पढ़ाई जाने लगी.’(हिंदी बालसाहित्य: एक अध्ययन—डा. हरिकृष्ण देवसरे)

बालसाहित्य के शुभचिंतकों के लिए यह सुखदायक है कि हिंदी के इन प्रारंभिक गद्यकारों ने शेष साहित्य के साथ बालोपयोगी साहित्य को भी पर्याप्त महत्त्व दिया था. वस्तुतः यह उनके काम का ही हिस्सा था. ईस्ट इंडिया कंपनी भारत पर अपने प्रभुत्व को स्थायी बनाने के लिए यहां के जनसमाज को अपने प्रभाव में लेना चाहती थी. कंपनी के विरोध में आए दिन होने वाले विरोधों को देखते हुए उसके संचालकों यह लगने लगा था कि भारत में स्थायी प्रभुत्व के लिए यहां के साहित्य, संस्कृति और इतिहास को समझना अनिवार्य है. इसके लिए उन्होंने खड़ी बोली को महत्त्व दिया. सन 1800 में फोर्ट विलियम कालेज की स्थापना का उद्देश्य भी भारत में अंग्रेजों को प्रशासिक मामलों में मदद के लिए आवश्यक संसाधन तैयार करना था. उस समय तक संस्कृत, फारसी और अरबी प्रमुख साहित्यिक भाषाएं थीं. अंग्रेजों को लोकभाषा को महत्त्व दिए जाने का परिणाम यह हुआ कि कालांतर में बांग्ला, तमिल, हिंदुस्तानी, भाखा, मराठी आदि भाषाओं में भी साहित्यिक लेखन होने लगा. हिंदुस्तानी के प्राध्यापक के रूप में फोर्ट विलियम काॅलेज की ओर से गिलक्राइस्ट को नियुक्त किया गया. गिलक्राइस्ट के लिए हिंदुस्तानी का अभिप्राय था, अरबीफारसी शब्दों से भरपूर भाषा. उनके नेतृत्व में अरबीफारसी मिश्रित हिंदवी भाखा को बढ़ावा मिला. लगभग 25 वर्षों तक फोर्ट विलियम कालेज में अरबीफारसी भाखा का दबदबा बना रहा. इसलिए उसके समय में जो अनुवाद या लेखन कार्य हुआ, उसपर अरबीफारसी का असर बना रहा. स्थिति 1824 में उस समय बदली जब कैप्टन विलियम प्राइस को हिंदुस्तानी भाषा का प्रभारी बनाया गया. प्राइस ने गिलक्राइस्ट की भाखानीति में बदलाव लाते हुए उर्दू के बजाय हिंदवी को प्रमुखता दी. इससे खड़ी बोली का रास्ता साफ हुआ. ईसाई मिशनरियों ने भी नई भाषा नीति का समर्थन किया.

नई भाखानीति के अनुरूप विद्यार्थियों को पुस्तकें प्राप्त हो सकें, इसलिए कालेज की ओर से उर्दू और भाखा यानी हिंदी में पुस्तकें लिखने के लिए अलगअलग विभागों की स्थापना की गई. भाखा के लिए पुस्तकें तैयार करने का दायित्व सौंपा गया लल्लू लाल और सदल मिश्र को. यह एक युगप्रर्वत्तनकारी पहल थी, मगर इसका आशय यह नहीं है कि खड़ी बोली में साहित्यिक लेखन की पहल फोर्ट विलियम कालेज की ओर से की गई थी तथा उससे बाहर उसे कोई पूछने वाला ही नहीं था. वस्तुतः कालेज से बाहर भी खड़ी बोली के प्रशंसक भारी मात्रा में थे. फोर्ट विलियम कालेज से बाहर के प्रमुख लेखकों में इंशाअल्ला खां और सदासुख राय निसार(1746—1824) प्रमुख थे. सदासुखराय हिंदी में ‘सुखसागर’ तथा उर्दू में ‘निसार’ उपनाम से रचनाएं लिखते थे. वे लल्लूलाल और सदल मिश्र से वरिष्ठ थे, जबकि इंशाअल्ला खां उनके समकालीन. इंशाअल्ला खां की लिखी ‘रानी केतकी की कहानी’ को हिंदी की पहली कहानी माना जाता है. स्पष्ट है कि हिंदी लेखन का शुभारंभ फोर्ड विलियम कालेज में भाखा के लिए अलग विभाग खोले जाने से पहले ही हो चुका था. लेकिन बालोपयोगी पुस्तकों के लेखन और अनुवाद का श्रेय फोर्ट विलियम कार्य के भाखा अध्यापक लल्लूलाल को ही जाता है. उन्होंने छोटीबड़ी लगभग 14 पुस्तकें लिखीं. अनेक बालोपयोगी पुस्तकों के अनुवाद भी उन्होंने किए. खड़ी बोली में अनूदित उनकी बालोपयोगी पुस्तकों में ‘राजनीति’(1802, हिस्ट्री आफ हिंदी लिटरेचर के लेखक फ्रेंक अर्नेस्ट ने इसे 1809 उद्धृत किया है) अथवा ‘वार्तिक’ भी आती है, जो ब्रजभाषा में ‘हितोपदेश’ यानी ‘पंचतंत्र’ का गद्यानुवाद थी. पंचतंत्र के अनुवाद के अलावा लल्लूलाल ने ‘वैताल पचीसी’ और ‘सिंहासन बतीसी’ का भी अनुवाद किया. उनकी भाषा उर्दू के निकट थी. हिंदी साहित्य के इतिहासकार फ्रांसिसी विद्वान गार्सा दा तासी का मानना है कि लल्लूलाल के अनुवाद कार्य केवल उनके अपने नहीं थे. इसके लिए उन्होंने दूसरे विद्वानों की भी मदद ली थी. लल्लूलाल द्वारा अनूदित वैताल पचीसी की भाषा का एक नमूना देखिए—

ये बातें करते थे कि इतने में सांझ हुई. उसे अच्छा भोजन दिया और उसने अच्छा व्यालू किया. मसल मशहूर है कि भोग आठ प्रकार का है. एक सुगंध है, दूसरे वनिता, तीसरे वस्त, चैथे गीत, पांचवे पान, छठे भोजन, सातवें सेज, आठवें आभूषण—ये सब वहां मौजूद थे. गरज जब पहररात आई, उसने रंगमहल में जा उसके साथ सारी रात आनंद से काटी. जब भोर हुई, वह अपने घर गया और वह उठके अपनी सहेलियों के पास आई.’

सिंहासन बतीसी’ की भाषा भी अरबी, हिंदवी, हिंदुस्तानी और संस्कृत का मिश्रण थी. इसके बावजूद उसकी नजदीकी आधुनिक हिंदी भाषा से है. इस अनुवाद का उदाहरण देखिए—

तीनों लोक में हंगामा मचा कि राजा वीर विक्रमाजीत का काल हुआ उस वक्त आगिया कोयला दोनों वीर भी साथ राजा ही के लोप हो गए न वह स्वामी रहा न वे दास रहे—संसार में से धर्म की धजा उखड़ गई सब रएयत राजा के राज की रोने लगी—विराहमन भाट भिखारी रांड दुखी सब धाय मारमार रोरो कहने लगे कि हमारा आदर करने वाला और मान रखने वाला आज जग से उठ गया रानियां राजा के साथ सती हुईं, और जितने दासदासी थे सब अनाथ हो गए….’

जैसा कि कहा जा चुका है ऊपर दी हुई रचना अथवा उनका अनुवाद करने वाले लेखक राजाओं के आश्रित थे और ब्राह्मण थे. इसलिए इन ‘सिंहासन बत्तीसी’ और ‘वैताल पचीसी’ की कहानियों में समाज में व्याप्त वर्णाश्रम व्यवस्था को तरहतरह से सराहा गया है. उनमें वर्णित मूल्य किसी न किसी रूप में सामंतवाद को बढ़ावा देने वाले हैं, जिनका उनीसवीं शताब्दी में बदलते जीवनमूल्यों और सुधारवादी आंदोलनों के बीच कोई महत्त्व न था. इसलिए अंग्रेजी शासन में जो सुधारवादी आंदोलन भारत में चले उनमें अंग्रेजों के सर्वसत्तावादी दृष्टिकोण का तो विरोध किया गया था, अंग्रेजी शासन के शासन के विरुद्ध जगहजगह आंदोलन भी चलते रहे, मगर उनके पश्चिम से आ रहे प्रगतिशील विचारों को अपनाने पर भी जोर दिया जाने लगा था. इसका प्रभाव हिंदी के बहुआयामी विकास पर पड़ा. प्रारंभिक दौर में जो साहित्यकार खड़ी बोली को साहित्यिक समृद्धि प्रदान करने के लिए आगे आए उनके समक्ष एक और समस्या थी कि भाषा का रूप तत्सम हो या आम बोलचाल वाला. उर्दू और हिंदवी का भी मसला था. इस बीच बच्चों की शिक्षा के लिए अपनाई जाने वाली भाषा की भी समस्या थी. कुछ लोग उन्हें उर्दू से संपन्न रखना चाहते थे, क्योंकि वह लंबे समय तक राजदरबार की भाषा थी और उस समय भी अदालतों और सरकारी विभागों में संवाद का प्रमुख माध्यम बनी हुई थी. परंतु हिंदू जागरण का सपना आंखों में बसाए एक वर्ग उर्दू को अध्ययन की भाषा बनाने का सख्त विरोधी था. भारत में अपने पांव जमाने के प्रयास में जुटे अंग्रेजों के लिए किसी भी वर्ग को नाराज करना संभव न था. इसलिए फोर्ड विलियम कालेज से लेकर सरकार के कामकाज तक, अंग्रेज मिलीजुली भाषा की ही सिफारिश करते रहे. यही कारण है कि अंग्रेज नौकरशाहों के नेतृत्व में जो हिंदी पनपी उसमें अरबी, फारसी के अलाबा ब्रजभाषा, अवधी आदि स्थानीय भाषाओं का भी पुट था. इसका लाभ यह हुआ कि हिंदी का शब्द भंडार तेजी से बढ़ता गया और कालांतर में अनेक भाषाबोली से संबंधित क्षेत्रों के विद्वान साहित्यकार हिंदी की ओर मुड़े, जिससे अंततः हिंदी साहित्य को लाभ ही हुआ.

हिंदी बालसाहित्य की नींव: आदि युग

किसी भी भाषा में साहित्य का जन्म उस भाषा के विकास का आदि चरण होता है. इसलिए कि अपने जन्म के साथ ही भाषा अपने समाज के विभिन्न वर्गों की भावनाओं, इच्छाआकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करने लगती है. साहित्य का प्रारंभिक रूप लोकाश्रयी रहा है. वह वाचिक परंपरा के माध्यम से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति, एक स्थान से दूसरे स्थान और एक कालखंड से दूसरे कालखंड के बीच यात्रा करता रहा है. हिंदी में भी साहित्य की वाचिक परंपरा की शुरुआत इस भाषा जितनी ही पुरानी है, जो कुछ विद्वानों के अनुसार पंद्रहवीं शताब्दी तक जाती है. उस समय साहित्य का बालक और बड़ों के बीच विभाजन नहीं हुआ था. हिंदी ही क्यों दुनिया की किसी भी भाषा में यही स्थिति थी. बड़ों के लिए लिखीगढ़ी जाने वाली रचनाओं में से सहजसरल बोलीबानी और रोचक कथानक वाली रचनाएं ही बच्चों के मनोरंजन का काम भी करती थीं. लिखित साहित्य की विधिवत शुरुआत के बाद भी दशकों तक यही होता रहा. साहित्यकार की निगाह में केवल उसका पाठक होता था. बालक के लिए अलग साहित्य लिखा जा सकता है या लिखा जाना चाहिए, यह उस समय तक परिकल्पित ही नहीं था. इसलिए आधुनिक समय में विश्वसाहित्य में बालसाहित्य की जो भी धरोहर कृतियां कही जाती हैं, हिंदीसंस्कृत के संदर्भ में कहें तो पंचतंत्र, कथासरितसागर, हितोपदेश, जातक कहानियों आदि सभी की रचना बड़ों द्वारा बड़ों के मनोरंजन अथवा कल्याणभावना के साथ लिखी गई थीं. इनमें पंचतंत्र की रचना अवश्य महिलारोप्य नामक नगर के राजकुमारों को व्यावहारिक शिक्षा देने के लिए की गई थी, तथापि उसका उद्देश्य बड़ों के बड़े उद्देश्य साधना ही था. साहित्य से जो अपेक्षा आज की जाती है, वह इस पुस्तक से जुड़ी हुई नहीं थी. तो भी इन पुस्तकों का लोक और संस्कृति पर गहरा प्रभाव था. यही कारण है कि उनीसवीं शताब्दी के आरंभ में फोर्ट विलियम कालेज में जब बच्चों की शिक्षा के लिए पुस्तक तैयार करने का समय आया तो प्रारंभ में बालोपयोगी पुस्तकों के नाम पर पंचतंत्र, सिंहासन बतीसी, हितोपदेश जैसी पुस्तकों के अनुवाद से ही काम चलाया गया. मौलिक बालसाहित्य की परंपरा देर से जन्म ले सकी.

कुछ विद्वान यद्धपि हिंदी बालसाहित्य का शुभारंभ सूरदास से मानते हैं. लेकिन यह उचित नहीं लगता. सूरदास ने कृष्ण की बाल्यावस्था का वर्णन अवश्य किया, उनके वर्णन में प्रामाणिकता है तथा भाषा में लालित्य. इसके बावजूद सूरदास ने जो लिखा उसको बालसाहित्य नहीं कहा सकता. कई दशकों तक नंदन जैसी लोकप्रिय बालपत्रिका के संपादन का दायित्व संभाल चुके जयप्रकाश भारती हिंदी बालसाहित्य के उद्भवकाल को 1623 तक खींच लाते हैं. वे जटमल द्वारा लिखित ‘गोरा बादल की कथा’ पर हिंदी बालसाहित्य की पहली पुस्तक का विशेषण चस्पां कर देते हैं. बालसाहित्य के कतिपय आधुनिक समीक्षकविचारक भी मिश्र बंधुओं के हवाले से ‘गोरा बादल की कथा’ को हिंदी बालसाहित्य की पहली पुस्तक मानते हैं. लेकिन यह धारणा अतार्किक और पूर्वाग्रह प्रेरित लगती है. इस पुस्तक के बारे में जो विवरण हमें डा. रामकुमार वर्मा की पुस्तक ‘हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास’(पृष्ठ 593—594) से प्राप्त होते हैं, वे हैं—

‘‘इधर राजस्थान में हस्तलिखित पुस्तकों की जो खोज की गई है, उसमें जटमलकृत ‘गोराबादल की कथा’ की जितनी हस्तलिखित प्रतियां उपलब्ध हुई हैं, वे सब पद्य में हैं. राजपूताने के चारणों और ऐतिहासिक ग्रंथों का जो विवरण बंगाल की ऐशियाटिक सोसायटी की ओर से, डा. एल. पी. टेसीटरी ने सन 1918 में प्रकाशित कराया है, उसके प्रथम भाग के द्वितीय खंड में 52वें पृष्ठ पर ‘गोराबादल की कथा’ के संबंध में कुछ ज्ञातव्य बातें मालूम होती हैं. डा. टेसीटरी को गद्य का एक हस्तलिखित ग्रंथ प्राप्त हुआ है जिसका नाम है—‘फुटकर वातां रो संग्रह’. इसे उन्होंने हस्तलिखित ग्रंथ नंबर 15 माना है. इस ग्रंथ में 425 पन्ने हैं, जिनका आकार 12 गुणा 8 है. यह ग्रंथ बड़ी बुरी दशा में है. इसके कई पन्ने फट गए हैं. अंत के कुछ पन्ने गायब भी हो गए हैं. प्रत्येक पृष्ठ में 26 या 27 पंक्तियां हैं और प्रत्येक पंक्ति में 20 से 24 अक्षर हैं. इसका कुछ भाग तो संवत 1845 में देशणोक में और कुछ भाग दासोढ़ी में रतन मन रूप के द्वारा लिखा गया है. इस वृहत ग्रंथ में भिन्नभिन्न 39 फुटकर वार्ताओं का संग्रह है. इन्हीं वार्ताओं में तीसवीं वार्ता गोराबादल के संबंध में है. इस ग्रंथ में टेसीटरी उसका वर्णन इस प्रकार करते हैं—

गोराबादल री कथा—(पृष्ठ 288 . से 295 . तक) जटमल द्वारा लिखित चित्तौड़ की सुंदरी पद्यिमिनी और उसके सगेसंबंधी गोराबादल की पद्यबद्ध प्रसिद्ध कहानी, उसका प्रारंभ इस प्रकार है—

चरण कमल चीत लायक। स्मरू श्री सारदा। मुझ अष्यर दे माय। कहो सकथा चीत लायक।।1।। जम्बू द्वीप मंझार। भरतषंड षंडा सिर। नगर भलो इ संसार। गढ़ चित्तौड़ है विषम अत।। 2।। आदि

इसी खंड के 73 वें पृष्ठ पर गोराबादल के संबंध में एक दूसरी प्रति मिलती है. यह प्रति हस्तलिखित ग्रंथ नंबर 22 ‘फुटकर बातां रो संग्रह’ में है. इस संग्रह में 436 पन्ने हैं जिनका आकार 11.5 गुणा 7.25 है. प्रत्येक पृष्ठ में 30 पंक्तियां हैं और प्रत्येक पंक्ति में 24 से 30 अक्षर हैं. इस संग्रह में कई पन्ने कोरे हैं. इससे ज्ञात होता है कि यह किसी दूसरे ग्रंथ की प्रतिलिपि है, जिसके कुछ पन्ने या तो खो गए हैं या पढ़े नहीं जा सके. ‘ड’ और ‘ड़’ में कोई अंतर नहीं रखा गया. यह संग्रह महाराजा राजसिंह बीकानेर वालों ने संवत 1820 में लिखाया था. इसी से 15(1845 संवत), 18, 20, 21 नंबर के संग्रहों की बहुतसी वार्ताएं नकल की गई हैं. पांचवीं वार्ता में गोराबादल की कथा का विवरण निम्नवत है—

गोंरेबादल री कथा—(पृष्ठ 87 . से 93 . तक) यह लगभग वही वार्ता है जो हस्तलिखित ग्रंथ नंबर 15 में है. पर पाठांतर बहुत है, उदाहरण के लिए इस प्रति का प्रारंभिक भाग देखिए—

चरण कमल चित लाय के समरूं सरसति माय

कहिस कथा बनाय के प्रणमू सदगुरु पाय।।1।।

जंबू दीप मझारि भरथ क्षेत्र सोभित अधिक।

नगर भलो चित्रोड़ है ता परि दूठ दुरंग।

रतनसेन राणो निपुण अमली माण अभंग।।2।। आदि

इस प्रति के अंत में एक दोहा है, जो संग्रह 15 में नहीं है. इसमें कवि का नाम (जटमल) और कथा का लेखनकाल(संवत 1680) दिया है.

सोलै सो असी थै समै फागुण पूनिम मास

बीरारस सिणगाररस कही जटमल सुपरकास(1)49

इस प्रकार गोराबादल की ये दोनों प्रतियां क्रमशः संवत 1820 और 1845(अथवा 1892) में लिखी गईं थीं, पद्य ही में हैं, हां, दोनों के पाठ में भेद बहुत है भाव तो अधिकतर वही हैं.’’

उपर्युक्त 22वें हस्तलिखित ग्रंथ का अंतिम दोहा जो ग्रंथ संख्या 15 में नहीं है, से स्पष्ट है कि कवि जटमल की यह रचना वीर एवं शृंगार रस की कृति है. ऐसी कृतियों का मूल उद्देश्य अपने आश्रयदाता सम्राट को प्रसन्न करना था. ‘गोराबादल की कथा’ के मूल में भी जो कथा है वह भी, राजशाही के प्रंपचों और सनकों से भरी पड़ी है. ऐसी कथा को बालसाहित्य की आधारकृति मान लेना सरासर अनुचित है. इसके मूल में कहानी चित्तौड़ की रानी पद्यमिनी की है, जिसके सौंदर्य के वशीभूत बादशाह अलाउद्दीन खिलजी उसपर हमला कर देता है. उसकी विशाल सेना के आगे चित्तौड़ के बांकुरे कुछ नहीं कर पाते. पराजय सन्निकट देख पद्यमिनी चतुराई का सहारा लेती है. वह अपने काका गोरा और भाई बादल के साथ मिलकर सात सौ पालकी तैयार कराती है. प्रत्येक पालकी में एक सैनिक को छिपाकर अलाउद्दीन के शिविर में पहुंचती है. वहां जो घमासान होता है, ‘गोराबादल की कथा’ उसी की रोमांचक गाथा है. युद्ध में दोनों रणबांकुरे वीरगति को प्राप्त होते हैं.

इस कहानी में गोराबादल की वीरता है. परंतु उसका जो संदर्भ है, वह उसको कहीं से भी बालसाहित्य की रचना सिद्ध नहीं करता. ‘गोराबादल’ की कहानी सामंती मूल्यों के समक्ष बलिदान की गाथा है, जिसका लोकतांत्रिक समाज में कोई महत्त्व नहीं है. यदि ‘गोराबादल की कथा’ को हिंदी की पहली बालसाहित्य की रचना कहा जा सकता है तो सूरदास की बालसुलभ चेष्ठाओं का वर्णन तो उससे भी कहीं अधिक मौलिक और बालमनोविज्ञान के निकट है. उस अवस्था में तो हिंदी या ब्रजभाषा के प्रथम बालसाहित्य सर्जक का श्रेय सूरदास को ही मिलना चाहिए. फिर सूरदास ही क्यों, पहेलियां भी तो बालसाहित्य की एक मान्य विधा है. इस दृष्टि से देखें तो अमीर खुसरो से भी बालसाहित्य की शुरुआत मानी जा सकती है. उल्लेखनीय है कि अमीर खुसरो का हिंदी गद्य भी ‘गोराबादल की कथा’ के गद्य की अपेक्षा कहीं सहज और आधुनिक हिंदी के करीब है. वह इस उदाहरण से भी स्पष्ट हो जाता है. अपनी रचना ‘आशिका’ में अमीर खुसरो हिंदी की प्रशंसा जी खोलकर करते हैं—

किंतु मेरी यह भूल थी, क्योंकि यदि आप इस विषय पर अच्छी तरह से विचार करें तो आप हिंदी भाषा को फारसी से किसी प्रकार भी हीन न पावेंगे. वह भाषाओं की स्वामिनी अरबी से कुछ हीन अवश्य है पर राय और रूम(परशिया के शहर) में जो भाषा प्रचलित है, वह हिंदी से हीन है. यह मैंने बहुत विचारपूर्वक निर्धारित किया है.

हिंदी अरबी के समान है, क्योंकि इन दोनों में से कोई भी मिश्रित नहीं है. यदि अरबी में व्याकरण और शब्दविन्यास है तो हिंदी में भी वह एक अक्षर कम नहीं है. यदि आप पूछें कि उसमें काव्यशास्त्र है तो हिंदी किसी प्रकार भी इस क्षेत्र में हीन नहीं है. जो व्यक्ति तीनों भाषाओं का ज्ञाता है, वह समझ लेगा कि मैं न तो भूल कर रहा हूं और न अतिश्योक्ति ही.’1 .

खुसरो की मुकरियां और पहेलियां भी आमफहम हिंदी में लिखी हुई हैं. इसके बावजूद यदि सूरदास और खुसरों की रचनाओं को बालसाहित्य का आदिस्रोत मानने में आपत्ति है तो जटमल को भी यह श्रेय दे पाना कदापि संभव नहीं है. अधिकांश विद्वान हिंदी बालसाहित्य के शुभारंभ का श्रेय भारतेंदु हरिश्चंद्र को देते हैं. और यह तार्किक भी है. स्वयं डा. देवसरे भी इससे सहमत हैं. उनके अनुसार बालसाहित्य की शुरुआत 1 जनवरी 1874 से, पत्रिका ‘बालाबोधिनी’ के प्रकाशन की तिथि से मानना उचित होगा. लेकिन ’बालाबोधिनी’ के प्रकाशन की तिथि से नारीवादी साहित्य की दस्तक तो मानी जा सकती है, बालसाहित्य की नहीं. केवल अपनी सुविधा के लिए तथ्यों से छेड़छाड़ अनुचित है. फिर बालाबोधिनी के संपादक ने तो पत्रिका के मुखपृष्ठ पर—‘स्त्री जनों की प्यारी हिंदी भाषा में सुधारी’ लिखकर अपनी मंशा साफ कर दी थी कि वे महिलाओं के लिए पत्रिका निकाल रहे हैं. पत्रिका के मुखपृष्ठ पर उपर्युक्त वाक्य के नीचे ये पंक्तियां भी छपा करती थीं—

सीता अनुसूया सती अरुंधती अनुहारि

शील लाजि विद्यादि गुण लहौ सकल जग नारि

स्पष्ट है कि ‘बालाबोधिनी’ के प्रकाशन तिथि को हिंदी बालसाहित्य की पहली दस्तक नहीं माना जाता. परंतु इसी कारण डा. देवसरे को पूरी तरह गलत भी नहीं ठहराया जा सकता. हिंदी बालसाहित्य के आदिउन्नायक का श्रेय भारतेंदु जी को ही जाता है. इसलिए कि उन्होंने बालसाहित्य के उन्नयन हेतु अनेक जहां बालोपयोगी नाटक, जिनमें ‘सत्य हरिश्चंद्र’ एवं ‘अंधेर नगरी’ प्रमुख हंै, हिंदी में नाट्य विधा का श्रेय भी उन्हीं को जाता है. इसके साथ उन्होंने कुछ मौलिक बालोपयोगी कहानियों भी लिखीं हैं. उनकी दो बालोपयोगी कहानियों हम पाठकों के लिए बानगी के तौर पर प्रस्तुत कर रहे हैं. इनमें पहली कहानी का शीर्षक ‘एक से दो’ है—

एक काने ने किसी आदमी से यह शर्त बदी कि, ‘जो मैं तुमसे ज्यादा देखता हूं तो पचास रुपया जीतूं.’

और जब शर्त पक्की हो चुकी तो काना बोला कि, ‘लो, मैं जीता.’

दूसरे ने पूछा, ‘क्यों?’

इसने जवाब दिया कि, ‘मैं तुम्हारी दोनों आंखें देखता हूँ और तुम मेरी एक ही.’

ऐसी ही अनेक मजेदार कहानियों भारतेंदु जी ने बच्चों के लिए लिखी हैं, जिनमें आधुनिक हिंदी बालकथा के बीजतत्व सुरक्षित हैं. उनके द्वारा लिखी गई एक और मजेदार कहानी ‘सच्चा घोड़ा’ शीर्षक से है—

एक सौदागर किसी रईस के पास एक घोड़ा बेचने को लाया और बारबार उसकी तारीफ में कहता, ‘हुजूर, यह जानवर गजब का सच्चा है.’

रईस साहब ने घोड़े को खरीद कर सौदागर से पूछा कि, ‘घोड़े के सच्चे होने से तुम्हारा मतलब क्या है?’

सौदागर ने जवाब दिया, ‘हुजूर, जब कभी मैं इस घोड़े पर सवार हुआ, इसने हमेशा गिराने का खौफ दिलाया, और सचमुच, इसने आज तक कभी झूठी धमकी न दी.’

कहा जा सकता है कि नाट्य विधा की भांति ही भारतेंदु ने हिंदी बालसाहित्य को भी पहली दस्तक दी. बालसाहित्य की पहली रचना कौनसी है, यह आज भी शोध का विषय है, लेकिन बालसाहित्य की ओर हिंदी लेखकों का पहली बार ध्यान भारतेंदु युग में ही गया. भारतेंदु ने स्वयं रोचक बालकहानियों भी लिखीं. संभव है वे बालसाहित्य को स्वतंत्र रूप से भी आगे बढ़ाते यदि नियति ने उन्हें कुछ लंबा जीवन दिया होता. लेकिन अल्पायु में ही उन्होंने बच्चों और बड़ों सभी के लिए साहित्यकारों की एक समर्थ पीढ़ी तैयार की. भारतेंदु की प्रेरणा से ही 1882 ईस्वी में इलाहाबाद से ‘बाल दर्पण’ नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हुआ. इसके छह वर्ष बाद लखनऊ से ‘बालहितकर’ प्रकाशित हुई. इसका परिणाम यह हुआ कि बड़ों के लिए लिख रहे साहित्यकारों का ध्यान बालसाहित्य की ओर गया. उल्लेखनीय है कि संस्कृत में बालपत्रकारिता का आरंभ बहुत पहले, 1876 में ही हो चुका था. संस्कृत की प्रथम बालपत्रिका थी—‘विद्यार्थी’. पहले चरण में इसके मात्र दो अंक ही निकल पाए थे. पत्रिका का पुनःप्रकाशन 1878 में हुआ. उसके बाद भी पत्रिका थोड़े समय ही निकल पाई थी.

रचनात्मक बालसाहित्य लेखन के क्षेत्र में भी भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रेरणा से युगांतरकारी कार्य हुआ. उनके उत्साहवर्धन के फलस्वरूप बद्री नारायण ‘प्रेमघन’ ने सुंदर बालोपयोगी कविताएं लिखीं. उनके अलावा श्रीनिवास दास, प्रतापनारायण मिश्र, रायकृष्णदास, काशीनाथ खत्री, बालकृष्ण भट्ट आदि ने भी बालोपयोगी साहित्य की रचना की. प्रेमघन कवि थे. उन्होंने मुख्यतः बालोपयोगी कविताओं की रचना की. जबकि प्रताप नारायण मिश्र, रायकृष्ण दास, बालकृष्ण भट्ट, काशीनाथ खत्री ने बच्चों के लिए कहानियों और नाटकादि लिखकर बालसाहित्य की धारा को आगे बढ़ाने का काम किया. इनके अलावा फ्रेडरिक पिन्काट(1836—1896) जैसे विदेशी भी थे, जिन्हें हिंदी का लालित्य अपनी ओर खींच लाया था. गौरतलब है कि साधारण परिवार में जन्मे पिन्काट का कभी भारत आना नहीं हुआ था. वे ब्रिटेन में एक छापाखाने में शब्द संयोजक थे, जो आगे चलकर प्रसिद्ध एलन कंपनी में अधिकारी बने. छापाखाने में कार्य करते हुए उनकी हिंदी तथा भारतीय भाषाओं में रुचि जन्मी. संस्कृत, ब्रजभाषा, अवधी आदि उस समय की भारतीय भाषाओं का ज्ञान उन्होंने अपने स्वाध्याय के बल पर अर्जित किया. यह ज्ञान इतना गहरा और प्रामाणिक था कि पिन्काट की हिंदी में लिखी गई पुस्तकें उन दिनों ‘ब्रिटिश सिविल सर्विस’ के पाठ्यक्रम में सम्मिलित थीं. पिन्काट स्वयं हिंदी एवं संस्कृत के विद्वान थे. ब्रिटेन से भारत आने वाले अधिकारियों को हिंदी का ज्ञान अनिवार्य हो—इसके लिए भी पिन्काट का योगदान सराहनीय था. खड़ी बोली के आरंभिक कवियों में प्रमुख श्रीधर पाठक को लिखे गए पत्र में उन्होंने लिखा है—

बीस साल पहले मैं एकमात्र यूरोपीयन था, जिसने सरकार पर हिंदी के बारे में दबाव डाला और दस साल बाद इस नियम को बनवाने में सफल रहा कि भारत आने वाले अंग्रेजों को हिंदी की परीक्षा पास करना अनिवार्य किया जाए.’

पिन्काट आस्थावान व्यक्ति थे. तत्कालीन साहित्यिक परंपरा के अनुसार उन्होंने भी बच्चों के लिए नीतिप्रधान रचनाएं ही लिखीं. उनकी पुस्तक ‘एक थी बालदीपक’ को उन दिनों बिहार के स्कूलों में पढ़ाया जाता था. इस कालखंड की कविताएं और कहानियों साहित्यिक दृष्टि से चाहे जो हों, उनमें मौलिकता का अभाव है. अधिकांश रचनाएं बच्चों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने के लिए लिखी गई हैं. उनमें उपदेशात्मकता का भाव है. मौलिक बालसाहित्य के अभाव के बावजूद इस युग का महत्त्व इसलिए है क्योंकि पहली बार बच्चों को लेकर विमर्श की शुरुआत हुई तथा उनके लिए स्वतंत्र शैक्षणिकसाहित्यिक सामग्री की आवश्यकता के बारे में सोचा गया.

हिंदी साहित्य के इतिहास में भारतेंदु युग का महत्त्व लगभग सभी विधाओं के दिशानिर्धारण के लिए जाना जाता है. विशेषकर नाटक, कविता, कहानी आदि के क्षेत्र में इस युग में जो शुरुआत हुई, उसने कालांतर में महान साहित्यकारों की कई पीढ़ियों को जन्म दिया. उनीसवीं शताब्दी के समापन तक पहुंचतेपहुंचते हिंदी साहित्य की धाराओं के निर्धारण का काम लगभग पूरा हो चुका था. खड़ी बोली स्वयं को उस समय राजकाज में उपयोग हो रहीं भाषाओं के विकल्प के रूप में स्थापित कर चुकी थी. स्वयं पिन्काट ने माना था कि इस भाषा में राजभाषा बनने के समस्त गुण उपलब्ध हैं. आगे चुनौती भाषा के परिमार्जन तथा मौलिकता के समावेश को लेकर थी. भाषा को लेकर अब भी दो वर्ग थे, जो भारतेंदु युग के आरंभ से चले आ रहे थे. उनमें से एक संस्कृतनिष्ठ हिंदी का समर्थक था, तो दूसरा उर्दू मिश्रित हिंदी का. भाषासंबंधी इस मतभेद के पीछे उस समय कुछ लेखकों की सांप्रदायिक दृष्टि भी थी. कुछ हिंदी साहित्यकार संस्कृतनिष्ठ हिंदी के प्रयोग को जातीय पुनरुत्थान के रूप में देख रहे थे. उनके अलावा कुछ साहित्यकार थे जो समावेशी चेतना पर जोर देते थे और लेखक की भाषा को आमजन की भाषा बनाए रखने के समर्थक थे. बालसाहित्य को लेकर भी चुनौतियां कम नहीं थीं. वह अब भी उपदेशात्मक बना हुआ था. इस क्षेत्र में युगांतरकारी काम हुआ, महावीर प्रसाद द्विवेदी के तत्वावधान में. 1903 में ‘सरस्वती’ के संपादन के साथ ही द्विवेदी जी ने हिंदी साहित्य को रचनात्मक और तत्वात्मक सुधार के प्रति समर्पित कर दिया. बालसाहित्य की दृष्टि से भी द्विवेदीयुग में उल्लेखनीय कार्य हुआ. इस युग के आरंभ में बच्चों के मनोरंजन के लिए पाठ्येत्तर पुस्तकों के प्रकाशन पर जोर दिया गया. कई लेखकों ने बच्चों के लिए स्वयंस्फूर्त भाव से मौलिक पुस्तकें लिखीं. आवश्यकतानुसार कुछ पुस्तकें लिखवाई भी गईं. यद्यपि आरंभ में जो पुस्तकें प्रकाशित हुईं, उनपर धार्मिक पुस्तकों का दबाव था. रामायण और महाभारत के बालोपयोगी संस्करणों ने बच्चों को भारतीय साहित्य की परंपरा से जोड़ने में मुख्य भूमिका अदा की. बालमनोरंजन को केंद्र में रखकर लोककथाओं और पौराणिक कथाओं को संकलित किया जाने लगा. लगभग इसी दौर में श्रीसीतारामशरण भगवानप्रसाद रूपकलाजी द्वारा रचित ‘पीपाजी की कथा’ नामक लघु पुस्तक का प्रकाशन हुआ. यह गन्नौर के विलासी सम्राट पीपा के भोग विलास से उकताकर वैराग्य धारण कर, ‘संत पीपाजी’ बनने की कथा थी. पुस्तक बड़ों के साथसाथ बच्चों में भी लोकप्रिय हुई. इस पुस्तक के उस दौर में कई संस्करण प्रकाशित हुए.

सरस्वती का प्रकाशन साहित्यिक पत्रकारिता के दौर में नए युग की शुरुआत थी. यह युग पत्रकारिता के नए क्षेत्रों में विस्तार का भी था. महिलापत्रकारिता की नींव तो भारतेंदु ही रख चुके थे. ‘बाला बोधिनी’ में समयसमय पर बालोपयोगी सामग्री प्रकाशित होती थी. बालसाहित्य की स्वतंत्र पत्रकारिता के शुभारंभ का श्रेय द्विवेदी युग को जाता है, जिसमें पहली दस्तक 1882 में निकली पत्रिका ‘बालसखा’ की रही. 1906 में अलीगढ़ से ‘छात्र हितैषी’ का प्रकाशन आरंभ हुआ तो बनारस से इसी वर्ष ‘बाल प्रभाकर’ ने दस्तक दी, इसके संपादक थे, किशोरीलाल गोस्वामी. फिर तो एक के बाद बालपत्रिकाओं के प्रकाशन का सिलसिला आरंभ हो गया. 1910 में इलाहाबाद से ‘विद्यार्थी’ का प्रकाशन हुआ. इसमें किशोर और बालक दोनों के लिए उपयोगी सामग्री का प्रकाशन होता था. इसके मात्र दो वर्ष बाद 1912 में नरसिंहपुर से एक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ हुआ, नाम था—‘मानीटर’. देश में जैसेजैसे स्वाधीनता संग्राम जोर पकड़ रहा था, हिंदी पत्रकारिता भी उतनी ही तेजी से विस्तार ले रही थी. बालपत्रकारिता पर उसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही था. इसके फलस्वरूप एक के बाद एक नई और उपयोगी बालोपयोगी पत्रिकाओं के प्रकाशन का सिलसिला बन रहा था. बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में प्रकाशित होने वाली प्रमुख बालपत्रिका थी, सुदर्शनाचार्य के संपादन में निकली—‘शिशु’. सुदर्शनाचार्य के पास बालसाहित्य को लेकर मौलिक दृष्टि थी. इसके फलस्वरूप बालसाहित्य के नए युग की शुरूआत हुई. पहली बार बालक को परंपरा और उपदेशात्मक साहित्य की कैद से बाहर निकालकर मौलिक लेखन के बारे में विचार किया गया. उसके बाद तो ‘बालसखा(1917)’ संपादक बद्रीनाथ भट्ट, ‘छात्र सहोदर(1920)’ संपादक मातादीन शुक्ल बाद में नरसिंह दास, ‘वीर बालक’(1924), ‘बालक’(1926), इलाहाबाद से संपादक रामजीलाल शर्मा के संपादन में ‘खिलौना’(1927) जैसी बालसाहित्य की श्रेष्ठ एवं मौलिक पत्रिकाओं की कतार लग गई. इनमें सबसे अधिक प्रतिष्ठा मिली ‘बालसखा’ को. 53 वर्षों तक निरंतर प्रकाशित होते वाली यह पत्रिका बालसाहित्य में नवीनता की स्थापक सिद्ध हुई. महान बालसाहित्यकारों की बड़ी पीढ़ी तैयार करने का श्रेय भी इस पत्रिका को जाता है. इससे बालसाहित्य को महत्त्व मिलना आरंभ हुआ. फलस्वरूप बड़े साहित्यकारों का ध्यान भी बालसाहित्य की ओर गया. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की प्रथम कविता जो 1924 में छपी थी, के प्रकाशन का श्रेय ‘छात्र सहोदर’ को जाता है.

द्विवेदी युग में साहित्य में भाषा के परिमार्जन के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम हुआ. स्वयं द्विवेदी जी ने ‘सरस्वती’ जैसी स्तरीय पत्रिका का संपादनदायित्व संभाला जिसने हिंदी साहित्य को भाषा और वर्तनी की एकरूपता में बांधने में बड़ी भूमिका अदा की. इससे हिंदी की प्रतिष्ठा में इजाफा हुआ. फलस्वरूप हिंदी और उर्दू के बीच की वह दूरी मिटने लगी, जो खड़ी बोली के मूल में जन्मी थी. स्मरणीय है कि खड़ी बोली को महत्त्व दिए जाने के पीछे हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच वर्चस्व की लड़ाई थी. 1837 में स्थानीय प्रशासन को चुस्त एवं जिम्मेदार बनाने तथा जनसाधारण में कंपनी के प्रति विश्वास पैदा करने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने घोषणा की थी कि स्थानीय प्रशासन तथा अदालतों की कार्रवाही के लिए स्थानीय भाषा का प्रयोग होगा. उस समय तक हिंदी और उर्दू का भेद नहीं बन पाया था. न हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच कोई सांप्रदायिक दुराव था. लेकिन भाषाई नीति लागू होने के बाद संबंधों में खटास पड़ने लगी थी. हिंदुओं को लगता था कि यदि सरकारी कामकाज की भाषा उर्दू बनती है तो भाषा के जानकार होने के कारण मुस्लिमों को सरकारी नौकरियों में अधिक अवसर प्राप्त होंगे, इससे उनका विकास बाधित होगा. इसलिए हिंदुओं का एक वर्ग सरकारी कामकाज के लिए वैकल्पिक भाषा की खोज में था. हालांकि ब्रज, अवधी और भोजपुरी उस समय की स्थापित भाषाएं थीं. ब्रज और अवधी की तो समृद्ध साहित्यिक परंपरा भी थी. इन भाषाओं का साहित्य लोकतत्वों से समृद्ध था. संस्कृत देवभाषा थी. उसपर अपना विशेषाधिकार कायम रखते हुए हिंदू पुनरुत्थानवादी लेखक ऐसी भाषा चाहते थे, जो अपेक्षाकृत कम लोकप्रिय हो. इसके लिए दिल्ली और मेरठ के आसपास के क्षेत्रों में बोली जाने वाली भाषा को साहित्यिक भाषा के रूप में चुना गया. उसको नाम दिया गया ‘खड़ी बोली’ का. भाषाई राजनीति के चलते तत्कालीन बुद्धिजीवी वर्ग दो हिस्सों में बंट गया. भारतेंदु युग का आरंभ उर्दू के समानांतर वैकल्पिक भाषा खड़ी करने के संघर्ष के फलस्वरूप हुआ था. इसलिए उस युग की चुनौतियां बड़ी थीं. द्विवेदी युग में हिंदी अपना संस्कार ग्रहण कर चुकी थी, अतएव नए लेखकों तेजी से उसकी ओर आकर्षित हुए थे.

सरस्वती’ ने न केवल हिंदी को भाषाई कलेवर में ढाला, वर्तनी को एकरूपता प्रदान की, बल्कि लेखकों की कई पीढ़ियां भी तैयार कीं. इसके बावजूद बालसाहित्य के क्षेत्र में यथास्थिति बनी रही. यह बात अलग है कि बच्चों के लिए कई उल्लेखनीय पत्रिकाएं इस युग में आरंभ हुईं. बालसाहित्य को बढ़ावा देने के कारण ‘विद्यार्थी’, ‘बालसखा’, ‘वानर’ आदि पत्रिकाएं इस युग की विशिष्ट पहचान बनीं. लेखन की दृष्टि से भी इस युग में बदलाव देखा गया. भारतेंदु हरिश्चंद्र के समय में बालसाहित्य रामायण, महाभारत आदि के बालोपयोगी संस्करणों….उपनिषदों, पुराणों की कहानियों के पुनर्लेखन तथा ‘हितोपदेश’ आदि के अनुवाद तक सीमित था. द्विवेदी युग में बालसाहित्य के क्षेत्र में मौलिक विषयों का समावेश हुआ. इस युग में महाकाव्यों, पुराणों, वैताल पचीसी, सिंहासन बतीसी आदि रचनाओं के अनुवाद, पुनर्लेखन के अलावा लोकसाहित्य ने भी बालसाहित्य में दस्तक दी. यूं तो लोकसाहित्य को साहित्य की मुख्यधारा में लाने की शुरुआत भारतेंदु हरिश्चंद्र कर चुके थे. उन्होंने ‘भारत दुर्दशा’ तथा ‘अंधेर नगरी’ में लोकतत्वों का जमकर उपयोग किया था. इन दोनों नाटकों की सफलता का मुख्य कारण भी व्यंजना के साथ लोकतत्व की उपस्थिति थी, जो दर्शाती थी कि भारतीय लोकमानस अंग्रेजी शासन से त्रस्त होकर उसको नकार चुका है. लेकिन मौलिक कथासाहित्य का अभाव था. द्विवेदी युग में राजारानी, पशुपक्षी के अलावा चोरठग आदि भी बालसाहित्य में पात्र के रूप में समाने लगे. हालांकि उसपर अब भी उपदेशात्मकता का कब्जा था. लेकिन रचनाओं में नए पात्रों की दस्तक से संकेत मिलता है कि बालसाहित्य में गुणात्मक परिवर्तनों का दौर जारी था.

नई बालपत्रिकाओं ने इस युग में बड़ी संख्या में साहित्यकारों को बालसाहित्य से जोड़ा. इस युग के प्रमुख बालसाहित्यकारों में महावीर प्रसाद द्विवेदी के अलावा श्रीधर पाठक, बालमुकुंद गुप्त, अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, मैथिलीशरण गुप्त, ललन द्विवेदी गजपुरी, कामताप्रसाद गुरु, रामजीलाल शर्मा, सुखराम चौबे ‘गुणाकर’, लज्जाशंकर, ठाकुर श्रीनाथ सिंह, रामनरेश त्रिपाठी, रामचंद रघुनाथ सर्वटे, विद्याभूषण ‘विभु’, गिरिजादत्त ‘गिरीश’, सुदर्शन, सुदर्शनाचार्य, डा. रामकुमार वर्मा, शंभुदयाल सक्सेना, रघुनंदन प्रसाद त्रिपाठी, गोपालशरण सिंह आदि सम्मिलित थे. इस युग में बालसाहित्य की नई पुस्तकों के साथसाथ बच्चों के लिए नया पाठ्यक्रम बनाने की पहल भी की गई. ‘उपन्यास सम्राट’ कहे जाने वाले प्रेमचंद ने भी इसी युग में दस्तक दी. उनका अधिकांश साहित्य बड़ों के लिए है. लेकिन भाषाशैली और कथ्य के स्तर पर सहजाभिव्यक्ति के कारण उनकी अनेक कहानियों आधुनिक बालसाहित्य की धरोहर मानी जाती हैं. उनके द्वारा रचित कहानियों में कई के पात्र बालक और किशोर थे. ‘ईदगाह’, ‘गिल्लीडंडा’, ‘आत्माराम’, ‘पंच परमेश्वर’, ‘पुरस्कार’, ‘बड़े भाई साहब’, ‘जुलूस’, ‘सवा सेर गेंहूं’, ‘नशा’, ‘जुलूस’ जैसी कहानियों मौलिक बालसाहित्य की प्रेरक और पहचान बन गईं. बालपाठकों के लिए प्रेमचंद ने ‘कुत्ते की कहानी’ शीर्षक से एक उपन्यास भी लिखा. इसे हिंदी का पहला बाल उपन्यास माना जाता है. प्रेमचंद के अलावा सुदर्शन ने भी कुछ बालोपयोगी कहानियों लिखीं, जिनमें ‘हार की जीत’, ‘साइकिल की सवारी’ हिंदी की उत्कृष्टतम कहानियों में से हैं. कविताओं के क्षेत्र में विद्याभूषण ‘विभू’, रामनरेश त्रिपाठी, श्रीधर पाठक आदि कवियों का उल्लेखनीय योगदान रहा. उस समय तक भी हालांकि बालसाहित्य को गंभीरता से लेने का चलन कम ही था. न बालक के स्वतंत्र व्यक्तित्व को महत्त्व देने वाली अवधारणा का ही जन्म हुआ था. इसके बावजूद इस युग के कई साहित्यकारों ने स्तरीय बालसाहित्य की रचना की. लेकिन इस युग की श्रेष्ठतम बालोपयोगी कहानियोंं वे हैं, जिनका लेखन सामान्य पाठकों को ध्यान में रखकर किया गया था. इसके अलावा कुछ नई बालोपयोगी पत्रिकाओं का प्रकाशन भी इस दौर में आरंभ हुआ. प्रेमचंद, सुदर्शन आदि की बालोपयोगी कहानियोंं परंपरा से हटकर थीं, इससे बालसाहित्य में मौलिक लेखन को बढ़ावा मिला, जो उससे पहले दूर की कौड़ी लगती थी. बच्चों के लिए नई पाठ्यपुस्तकों के लेखन की जिम्मेदारी भी विद्वान साहित्यकारों और मनीषियों ने संभाली. हालांकि उनका महत्त्व केवल पाठ्य पुस्तकें उपलब्ध कराने जैसा था, लेकिन यह पहला अवसर था जब पाठ्यपुस्तकों में कविता, कहानी के अलावा पहेलियों, निबंध, बुझौवल आदि को भी स्थान दिया गया था. फलस्वरूप हिंदी पाठकों का नया वर्ग पैदा हुआ.

द्विवेदी युग के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षरों में बालमुकुंद गुप्त, अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, सुखराम चैबे ‘गुणाकर’, मनन द्विवेदी गजपुरी, मैथिलीशरण गुप्त आदि प्रमुख हैं. इस युग में ‘बालहितकर’, ‘बालप्रभाकर’, ‘विद्याथीं’, ‘बालमनोरंजन’, ‘शिशु’ आदि पत्रिकाओं का आरंभ हुआ. बालकों के भाषाज्ञान को समृद्ध करने के लिए व्याकरण पर आधारित पुस्तकों का लेखन भी हुआ. इससे बालसाहित्य की ओर समीक्षकों का ध्यान गया. स्वयं महावीरप्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ में बालोपयोगी रचनाओं को मुक्तमन से स्थान दिया. इसी युग में बच्चों के लिए स्वतंत्र समाचारपत्रों का श्रीगणेश हुआ. ‘बालहितकर’(लखनऊ), ‘छात्र हितैषी’(अलीगढ़, 1906), ‘बालप्रभाकर’, ‘मानीटर’, ‘विद्यार्थी’, ‘बालमनोरंजन’, ‘शिशु’ आदि अनेक बालोपयोगी पत्र आरंभ किए गए. इन सभी ने अपनीअपनी तरह से बालसाहित्य को आगे ले जाने, उसको स्थायित्व देने में मदद की. यह बात अलग है कि संसाधनों के अभाव में ये पत्र लंबे समय तक मौजूदगी बनाए रखने में नाकाम रहे. इसी समय में ‘बालसखा’ निकालने की घोषणा हुई. द्विवेदी जी के प्रोत्साहन पर इस समाचारपत्र को निकालने का दायित्व वहन किया था—‘इंडियन प्रेस’ ने. यह पत्रिका न केवल चली बल्कि उस समय बालसाहित्य के स्वरूप का निर्धारण करने में भी बहुत सहायक सिद्ध हुई. ‘बालसखा’ ने बच्चों के लिए मौलिक साहित्य रचना को आंदोलन के रूप में लिया, जिसके परिणामस्वरूप हिंदी बालसाहित्य तंत्रमंत्र, जादूटोने, पुराकथाओं और परीकथाओं के दायरे से बाहर निकलने को छटपटाने लगा. इसी युग में साहित्यकारों का एक वर्ग ऐसा भी उभरा, जो बच्चों के लिए रोजमर्रा के जीवन से उठाई गई, कदाचित नए आविष्कार और विज्ञान के रोमांच भरपूर, मौलिक एवं समसामयिक रचनाएं लिख रहा था. रेल का आगमन भारत में हो चुका था. भारतीय रेल पर इसी समय में लिखी गई, एक अख्यातनाम् कवि माधव या माधो कवि की हस्तलिखित पाण्डुलिपि से प्राप्त एक कविता का उद्धरण देखिए—

घन सो घहराति औ उड़ति हाहाकार करि

खात पाठ पानी धुवा छायो आसमान है.

वौक बाहार देश देशन सो भेंट हो

ऐसी फहरात मानो अर्जुन को बान है.

माधो कवि कहै नेक पाइके बखान करौ

लाखान मन लादि लेत जानत जहान है.

धाम है सुजान बात दूसरी न आन मारौ

रेल मेरी जान तो कुबेर को विमान है.

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और की सवारी असवारी सबै न्यारीन्यारी

रेल की सवारी से सवारी सबै रद्द है.

हिंदी बालसाहित्य को द्विवेदी युग का महत्त्वपूर्ण योगदान यह रहा कि बच्चों के मनोरंजन को ध्यान में रखकर रचनाएं लिखी जाने लगीं. हालांकि एक वर्ग अब भी बच्चों को पौराणिक साहित्य से भरपूर सामग्री लिख रहा था. राजारानी, भूतप्रेत, तंत्रमंत्र और जादूगरी से भरपूर कहानियों की रचना भी धड़ल्ले से जारी थी. बच्चों की रुचि एवं उनके मनोरंजन के नाम पर बालसाहित्यकारों का बड़ा वर्ग इस प्रकार की रचनाएं दे रहा था. निश्चित रूप से ये कहानियोंं लोकपरंपरा से साहित्य में आई थीं; तथा पर्याप्त साहित्यिक चेतना एवं स्पष्ट दृष्टिकोण के अभाव में लेखकों द्वारा बच्चों के लिए अपना भी ली गई थीं. तथापि ऐसे भी अनेक लेखक थे, जो इस प्रकार के साहित्य को अनुपयोगी मानते हुए बच्चों के लिए रोचक, मनोरंजक, मौलिक तथा प्रेरणास्पद रचनाएं दे रहे थे. यही उस युग की वास्तविक देन कही जानी चाहिए. बालसाहित्य को द्विवेदी युग की एक और बड़ी देन थी, जिसपर पर्याप्त चर्चा अभी तक अपेक्षित है, वह है विज्ञान बालसाहित्य का आर्विभाव. अठारहवीं शताब्दी की औद्योगिक क्रांति विज्ञानशोधों के आधार पर संभव हो पाई थी. बालसाहित्य में नई चेतना के स्थायित्व के लिए उसको विज्ञान साहित्य से जोड़ना अनिवार्य था. पश्चिम में चूंकि तकनीकी क्रांति भी पहले आई थी, इसके फलस्वरूप वहां विज्ञान साहित्य उनीसवीं शताब्दी के आरंभ में ही दस्तक दे चुका था. वहां बच्चों के लिए एक से बढ़कर एक विज्ञान पुस्तकें लिखी जा रही थीं. बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में सापेक्षिकता के सिद्धांत की खोज हो चुकी थी और मानवप्रज्ञा मुक्त ब्रह्मांड के नएनए छोरों की तलाश में जुटी हुई थी. ऐसे में जूलियस बर्न तथा एच. जी. वेल्स ने बच्चों के लिए विज्ञानपरक बालसाहित्य को रचकर नए युग का सूत्रपात किया. जूलियस बर्न द्वारा लिखित ‘जर्नी टू सेंटर आफ दि अर्थ’ गुरुत्वाकर्षण के बारे जानकारी देने वाला रोमांचक उपन्यास था. एच. जी. वेल्स ने ‘टाइम मशीन’ तथा ‘दि इन्वीजिबिल मेन’ जैसे उपन्यास लिखकर विज्ञान साहित्य में क्रांति लाने का काम किया था. इन पुस्तकों की लोकप्रियता का प्रभाव भारतीय लेखकों और पाठकों पर भी पड़ा, जो प्रकारांतर में हिंदी विज्ञान साहित्य की नींव बना. इससे प्रेरित होकर हिंदी के कई साहित्यकार आगे आए. इस प्रकार हिंदी विज्ञान साहित्य नींव पड़ी. यद्यपि विज्ञान साहित्य संबंधी स्पष्ट सोच के अभाव में उनका लेखन अनुवाद और अनुसरण की परंपरा से आगे न बढ़ सका. तो भी उनके योगदान को नकार पाना संभव नहीं है.

हिंदी में विज्ञान साहित्य की शुरुआत करने का श्रेय अंबिकादत्त व्यास को जाता है. उन्होंने ‘आश्चर्य वृतांत’ नामक उपन्यास लिखा था. यह उपन्यास स्वयं लेखक द्वारा संपादित पत्र ‘पीयूष प्रवाह’ में चार वर्षों 1884 से 1888 तक प्रकाशित होता रहा. इस आधार पर अंबिकादत्त व्यास को हिंदी का प्रथम विज्ञान लेखक होने का श्रेय दिया जाता है. हालांकि उनकी इस दावेदारी पर सवाल भी लगातार उठते रहे हैं. इसका कारण है कि ‘आश्चर्य वृतांत’ मौलिक कृति न होकर, जूलियस बर्न के सुप्रसिद्ध उपन्यास ‘ए जर्नी टू दि सेंटर आफ दि अर्थ’ से प्रभावित था. इसके वर्षों बाद केशव प्रसाद सिंह ने ‘चंद्र लोक की यात्रा’ शीर्षक से एक उपन्यास लिखा. उसका प्रकाशन 1900 में सरस्वती में हुआ. यह कृति भी विदेशी प्रभाव से मुक्त नहीं थी. अंबिकादत्त व्यास के उपन्यास की भांति केशवप्रसाद सिंह की पुस्तक पर भी बन्र्स के उपन्यास ‘फाइव वीक्स इन बैलून’ की छाया थी. इनके अलावा भी हिंदी में कई विज्ञानपरक बालोपयोगी पुस्तकों की रचना की गई, लेकिन द्विवेदी युग तक हिंदी विज्ञान साहित्य अनुवाद और विदेशी प्रभाव से मुक्त न हो सका. हिंदी विज्ञान साहित्य में वास्तविक हलचल स्वतंत्रता के बाद ही संभव हो सकी. इसके बावजूद विज्ञान साहित्य के क्षेत्र में द्विवेदी युग के योगदान को नकार पाना संभव नहीं है. इसलिए कि अनुवाद के बहाने से ही सही, इस युग में हिंदी साहित्यकारों का ध्यान विज्ञान साहित्य की ओर गया. इसके फलस्वरूप सरस्वती जैसी पत्रिका ने भी वैज्ञानिक कथानकों पर आधारित कहानियों को प्रमुखता से प्रकाशित किया.

©  ओमप्रकाश कश्यप

जातक कथाएं, बड्डकहा (कथासरित्सागर) तथा पंचतंत्र

सामान्य

हिंदी बालसाहित्य : अतीत से आज तक—2

यूं तो भारत में पशु-पक्षियों को लेकर कहानी लिखे जाने का चलन वैदिक काल में ही शुरू हो चुका था. उत्तर वैदिककाल तक वे कहानियों लोकसाहित्य में घुलमिलकर जनसमाज में अपनी जगह बना चुकी थीं. लोग उनके संदेश को जीवन में ढालने का प्रयत्न करने लगे थे. इस बीच उनमें गुणात्मक परिवर्तन भी आया था. किंतु लोकमानस में उनकी पैठ का, सोची-समझी कल्याणकारी नीति के अंतर्गत उपयोग जैन और वौद्ध आचार्यों द्वारा किया गया. उस समय वैदिक धर्म कर्मकांड और निरर्थक वितंडा में डूबकर अपनी प्रासंगिकता खोने लगा था. जनमानस धर्म के नाम पर थोपे जा रहे आडंबरों से त्रस्त था. कहने की आवश्यकता नहीं कि जब समाज का नेतृत्व दिशाहीन हो, निरर्थक वितंडा में खोकर अपना तेज बिसरा चुका हो, तब शताब्दियों से चली आ रही कहानियों, दंतकथाएं और किवदंतियां घने असमंजस में लोगों का मार्गदर्शन करती होंगी. जैन और बौद्ध आचार्यों ने समाज की जीवनी शक्ति और चेतना का प्रतीक बन चुकी कहानियों और दंतकथाओं को समाज से उठाया और अपने प्रवर्त्तक के नाम से जोड़कर उन्हें नए सिरे से प्रासंगिक बनाने में अपना योगदान दिया. यह काम इतनी बुद्धिमत्तापूर्वक किया गया कि उन कहानियों में अंतनिर्हित नीति-संदेश उनके धर्म-प्रवर्त्तक और मार्गदर्शक का जान पड़े. इसका लाभ भी उन्हें मिला. नए-नए उभरे बौद्ध और जैन धर्म की जनमानस में पैठ बनती गई. कहानियों के रूप में मौजूद लोकसंपदा और लोकविश्वासों का लाभ उठाने की यह अकेली कोशिश न थी. उससे पहले वैदिक धर्म के आचार्य भी यह करते आए थे. प्रकृति आधारित जीवन में वर्षा, धूप जल, अग्नि, वायू मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताएं थीं. प्राचीन देवताओं का जखीरा जीवन की इन्हीं मूलभूत आवश्यकताओं के अधिष्ठाता के रूप में खड़ा किया गया था, जिसमें इंद्र(वर्षा), धूप(सूर्य) जल(वरुण), वायू(मरुत्), अग्नि(अग्नि) जैसे देवताओं की परिकल्पना की गई. इसी के फलस्वरूप जातक कथा, पंचतंत्र, बड्डकहा अथवा बृहत्कथा जैसे ग्रंथ अस्तित्व में आए. बुद्ध के पूर्वजन्मों को लेकर ईसा पूर्व चौथी-पांचवी शताब्दी में लिखी गई जातक कथाओं का बड़ा हिस्सा श्रीलंका में रचा गया था. कालांतर में विश्व की पचास से अधिक भाषाओं में अनूदित होकर ये कहानियां देश-देशांतर के साहित्य का हिस्सा बनीं और सर्वत्र सराही गईं.

जातक कथा अथवा किसी अन्य रूपाकार में जिन दिनों ये कहानियां लिखी जा रही थीं, वह समय पूरे विश्व में बौद्धिक जागरण का था. प्राचीनतम धर्मों में आ चुकी विकृतियों से मुक्ति के प्रयास हर जगह शुरू हो चुके थे. भारत में बुद्ध और महावीर, चीन में कन्फ्यूशियस, यूनान में सुकरात, प्लेटो तथा जापान में ताओ के माध्यम से धर्म-दर्शनों में नवीकरण का अध्याय लिखा जाने लगा था. पुराने धर्म अपनी विकृतियों के कारण उत्तरोत्तर ठहराव का शिकार हो रहे थे, नए धर्मों ने उनके द्वारा छोड़ी गई खाली जमीन पर अपने आदर्शों की नींव रखी और अपेक्षाकृत व्यावहारिक दृष्टिकोण के सहारे लोगों का विश्वास जीतने में कामयाब हुए. इसके लिए उन्होंने हर उस संसाधन का प्रयोग किया, जिनके आधार पर पुराने धर्मों ने अपनी जमीन बनाई थी, किंतु बाद में पूरी तरह अभिजातोन्मुखी हो जाने के कारण वे जनसाधारण के गले की हड्डी बनने लगे थे. बहरहाल, जातक कथाओं के बाद अगली महत्त्वपूर्ण कृति गुणाढ्य की ‘बड्डकहा’ थी. मूल ‘बड्डकहा’ अथवा ‘बृहत्कथा’ वररुचि(350 ईस्वी पूर्व) ने काणभूति से कही थी. गुणाढ्य ने उसे काणभूति ये सुना तथा उनका पैशाची में पुनर्लेखन किया. आगे चलकर यह कृति कथासरित्सागर, बृहत्कथामंजरी, हितोपदेश, बृहत्कथाश्लोक संग्रह, वैताल पचीसी, सिंहासन बतीसी जैसी महान कृतियों का आधार बनी. इन सभी में भारत की कहानीकला का उत्कृष्टतम रूप मौजूद है. बड्डकहा का मूल स्वरूप अनुपलब्ध है. मूल ग्रंथ सात खंडों में था. उनमें से अब एक भी प्राप्यः नहीं हैं. हिंदी कथा साहित्य में बड्डकथा का संस्कृत साहित्य के तीन मूर्धन्य कथाकार दंडी, सुबाहू और वाणभट्ट की रचनाओं पर उसका गहरा प्रभाव है. 850 ईस्वी में कंबोडिया की एक संस्कृत प्रशस्ति में गुणाढ्य और बृहत्कथा का उल्लेख हुआ है. इससे स्पष्ट है कि उस समय तक यह कृति न केवल प्राप्त थी, बल्कि इसकी ख्याति दूसरे देशों तक भी पहुंच चुकी थीं. ‘अरेबियन नाइट्स’ की कहानियां भी कथासरित्सागर के प्रभाव से अछूती नहीं हैं. ‘बड्डकहा’ के लिखे जाने की कहानी भी अपने आप में रोचक दृष्टांत हैं.

भारतीय इतिहास में सातवाहन वंश बहुत चर्चित रहा है. ईसा से पांच सौ वर्ष पहले लिखे गए ग्रंथ ऐतरेय ब्राह्मण में दक्षिण की एक पराक्रमी जनजाति ‘आंध्र’ को ‘दस्यु’ तथा अनार्य माना गया है. इसी वंश के सम्राट सिमुक(शासनकाल 235 ईसापूर्व—195 ईस्वी पूर्व) ने सातवाहन साम्राज्य की नींव डाली थी. सिमुक के वंश में हा॓ल का जन्म हुआ. बीसवीं शताब्दी में दक्षिण में पुरातात्विक खोज के दौरान उस कालखंड के कुछ सिक्के प्राप्त हुएं हैं, जिनपर ‘साड़’ अथवा ‘सात’ खुदा मिला है. विशेषज्ञों के अनुसार वह ‘हा॓ल’(शासनकाल 20 ईस्वीपूर्व से 24ईस्वी पूर्व) का ही प्राकृत नाम है. हा॓ल बहुत पराक्रमी सम्राट था. उसकी साहित्य में भी पर्याप्त रुचि थी. हा॓ल ने सतसई की रचना की है, जिसमें उसने गुणाढ्य द्वारा ‘बड्डकहा’ अथवा ‘बृहत्कथा’ के लेखन के दौरान उठाए गए कष्टों का उल्लेख किया गया है. अधिकांश विद्वानों का यह भी मानना है कि ‘बड्डकहा’ का लेखन हा॓ल के शासनकाल में ही हुआ था. वह संस्कृत का विद्वान था, जबकि बड्डकहा की रचना उस समय की लोकभाषा पैशाची में की गई थी. इसके पीछे स्वयं एक बृहत्कथा है. कहानी कुछ इस प्रकार है—

“सम्राट हा॓ल एक बार जलक्रीड़ा कर रहे थे. अचानक उन्हें संस्कृत का ज्ञान न होने का क्षोभ उपजा. उन्होंने तत्क्षण प्रतीज्ञा की कि जब तक धारावाहिक रूप से संस्कृत बोलने-लिखने नहीं लगेंगे, तब तक प्रजा को मुंह नहीं दिखाएंगे. जिन दिनों राजा के आदेश के बिना राज्य में पत्ता तक नहीं हिलता था. प्रजा अपने राजा को ईश्वर तुल्य मानती थी, उन दिनों राजा इस तरह की कठिन व्रत साध ले….बड़ी समस्या थी. पर राजा तो राजा. प्रतीज्ञा कर तो ली. लेकिन पूरी कैसे हो? राजा के प्रजा से कट जाने का असर राजकाज पर पड़ा. राज-काज बंद हो गया. राजा को संस्कृत सिखाने के लिए बड़े-बड़े पंडित बुलवाए गए. उनमें गुणाढ्य पंडित भी सम्मिलित थे. उन्होंने राजा को छह वर्ष में संस्कृत-निष्णात बना देने का आश्वासन दिया. राजा ने शर्त मान ली. राजा की पढ़ाई शुरू हो उससे पहले ही एक और पंडित ने दरबार में प्रवेश किया. उसने केवल छह महीने में ही संस्कृत सिखा देने का आश्वासन दिया.

गुणाढ्य के लिए यह असंभव बात थी. अपने रोष को दबाए बिना उन्होंने प्रतीज्ञा की, ‘यदि कोई व्यक्ति छह महीने में संस्कृत सिखा देगा तो मैं इस भाषा में लिखना ही छोड़ दूंगा.’ अब राजा बस इतना चाहता था कि संस्कृत में बोल-समझ सके. उसे उस भाषा में ग्रंथ तो रचने नहीं थे. तो हुआ यह कि छह महीने में राजा संस्कृत पढ़ने-लिखने और बोलने में प्रवीण हो गया. दरबारियों ने भी मान लिया कि राजा संस्कृत-ज्ञान से संपन्न है. अब गुणाढ्य के लिए बड़ी मुश्किल हुई. जिन दिनों पंडित की योग्यता भाषाज्ञान से आंकी जाती हो, केवल भाषा-ज्ञान के आधार पर किसी को पंडित की उपाधि से अलंकृत कर दिया जाता हो, ऐसे में बगैर किसी अभिजन भाषा के जीना बड़ा कठिन था. सम्राट गुणाढ्य जैसे विद्वान को खोना नहीं चाहता था. मगर बाजी हारने के बाद गुणाढ्य भी दरबार में नहीं रहना चाहते थे. अतएव वचन के अनुसार गुणाढ्य ने राजधानी छोड़ दी. वहां एक नया अवसर उनकी प्रतीक्षा में था. गुणाढ्य मौन होकर पिशाचों की बस्ती में रहने लगे. वहां एक गंदर्भ रहता था. उसे सैंकड़ों कहानियां याद थीं. गंदर्भ के मुंह से सुनी कहानियों को गुणाढ्य ने पैशाची भाषा में लिखना आरंभ किया. पिशाचों की बस्ती में लेखन सामग्री तो थी नहीं, इसलिए कागज के स्थान पर पशु-चर्म और स्याही की जगह पशु-रक्त प्रयोग किया गया. वर्षों बाद पुस्तक पूरी हुई. पिशाचों की बस्ती में तो लिखित पुस्तक का कोई उपयोग था नहीं. सो गुणाढ्य ने उसको राजा तक पहुंचाने का निर्णय लिया. अपने दो शिष्यों के साथ जो आरंभ से ही उनके साथ लगे थे, गुणाढ्य ने राजधानी की ओर कूंच कर दिया. राजधानी पहुंचकर ग्रंथ को शिष्यों के हाथ राजा के पास भिजवा दिया और स्वयं नगर के उपकंठ में विश्राम करने लगे.

ग्रंथ को देखकर राजा को घिन आने लगी. उसने शिष्यों से ग्रंथ के रचनाकार के बारे में जानना चाहा. शिष्यों ने बताया कि उनके गुरु मौन और अपने आप में मग्न रहने वाले हैं. वे किसी से नहीं मिलते. ऐसे ग्रंथ जो सूखे चमड़े पर पशु-रक्त से लिखा गया हो, जिसका लेखक मौन और मत्त रहनेवाला हो—उसमें भला क्या विचारणीय हो सकता है.1 यह कहते हुए राजा ने ग्रंथ वापस लौटा दिया. वह भाषा के आधार पर, वर्ण के आधार पर कृति का मूल्यांकन करने की प्राचीन परिपाटी थी, जो किसी कृति की श्रेष्ठता का आकलन उसकी भाषा अथवा रचनाकार के वर्ण से किया जाता था. बहरहाल, गुणाढ्य को शिष्यों ने जब सारी बात बताई तो वह अत्यंत मर्माहत हुए. उन्होंने हताश होकर पुस्तक को जला देने का निर्णय लिया. शुभचिंतकों ने सलाह दी कि वे एक बार राजा के समक्ष स्वयं उपस्थित होकर उसे पुस्तक में वर्णित कथाओं का श्रवण कराएं. मगर गुणाढ्य राजा के समक्ष अपना मौन तोड़ने तैयार न थे.

अंततः गुरु के आदेश पर अग्नि प्रज्वलित की गई. कोई उपाय न देख शिष्यों ने ग्रंथ को अग्नि-समर्पित करने से पूर्व उसकी कहानियां अंतिम बार सुनाने का आग्रह किया. गुणाढ्य ने अनुरोध स्वीकार कर लिया. शिष्य आसन जमाकर बैठ गए. गुणाढ्य पुस्तक के एक-एक पृष्ठ को पढ़कर अग्नि को समर्पित करने लगे. पुस्तक की कहानियां इतनी मधुर थीं कि पशु-पक्षी मग्न होकर सुनने लगे. जंगल में जो जहां था वहीं ठहर गया. मृग और बाघ अपने आपे को बिसरा, पांव पसारकर कथा सुनने लगे. सुबह से शाम हुई, शाम से सुबह. गुणाढ्य पुस्तक को जलाए बिना उठने को तैयार न थे. कहानी सुन रहे जीव-जंतुओं के पांव भी अकड़ने लगे. एक ही स्थान पर पड़े रहने से उनकी देह का मांस सूखने लगा. पाकशाला में सूखे मांस से बना भोजन सम्राट के पास पहुंचा. उसे खाते ही राजा के पेट में दर्द हो गया. तत्काल राजवैद्य को बुलाया गया. नाड़ी देखकर उन्होंने रोग का कारण बताया. तदनंतर वधिकों और शिकारियों को बुलवाया गया. इस पड़ताल के दौरान जंगल में कथा कह रहे अघोरी के बारे में राजा को बताया गया. राजा ने सबकुछ छोड़कर जंगल की ओर प्रस्थान कर दिया. जंगल में पशु-पक्षियों को दत्तचित्त कथा सुनते और अघोरी को एक-एक पृष्ठ पढ़कर जलाते देख राजा दंग रह गया. राजा ने आगे बढ़कर अघोरी से पुस्तक न जलाने का आग्रह किया. अघोरी रुक गया. मगर उस समय तक गुणाढ्य पुस्तक के छह खंड जला चुके थे. सातवें खंड की कहानियां ही क्षेमेंद्रकृत ‘बृहत्कथामंजरी’, सोमदेव कृत ‘कथासरित्सागर’ आदि रूपों में हमारे बीच उपलब्ध हैं.”

‘बृहत्कथामंजरी’ में दी गई इस कहानी में कितनी सचाई है, कहना कठिन है. इससे यह निष्कर्ष अवश्य निकलता है कि प्राचीन ग्रंथों, विशेषरूप से जिनमें कहानी अथवा लोक-मनोरंजन से जुड़ी सामग्री हो, को लिखने के कारण स्वरूप एक कहानी जुड़ी होती थी. कहानी की कहानी के रूप में. यह परिपाटी तत्कालीन कहानी को लेकर उस समय की शास्त्रीय परंपरा के अनुरूप थी. रुद्रट ने कथा अथवा महाकथा के लक्षण बताते हुए लिखा है कि कथा के आरंभ में देवता या गुरु की वंदना होनी चाहिए. फिर ग्रंथकार का अपना और कुल का परिचय दिया जाना चाहिए. और उसके बाद कथा लिखने का उद्देश्य वर्णित होना चाहिए. गुरु में एक कथानक होना चाहिए जो प्रधान कहानी का प्रस्ताव रख सके.’2 कथाग्रंथों को लिखने की कहानी, यानी कहानी की कहानी क्यों जरूरी है, इसका कारण स्पष्ट नहीं है. संभव है यह केवल व्यवस्था रही हो. चूंकि प्राचीन लेखन धर्मोन्मुखी था, धर्म-दर्शन की व्याख्या-विश्लेषण में लिखे हुए को महत्त्वपूर्ण माना जाता था और केवल मनोरंजन के लिए किस्से-कहानियां लिखने की कोई परिपाटी न थी—संभवतः ऐसे लेखन को मर्यादित करने तथा जब पर्याप्त कारण हों तभी लिखने की व्यवस्था प्राचीन आचार्यों ने की थी. जो भी हो गुणाढ्य ने ‘बृहत्कथा’ द्वारा प्रचलित परिपाटी में एक नया अध्याय जोड़ा था.

पंचतंत्र

प्राचीन भारतीय कथा-साहित्य में सर्वाधिक ख्याति ‘पंचतंत्र को मिली. छोटी-छोटी कहानियों को समेटे हुए यह कृति जहां-जहां गई, वहीं अपना प्रभाव छोड़ा. न केवल लिखित वाङ्मय पर, बल्कि देश-विदेश के लोकसाहित्य को भी इसने गहराई से प्रभावित किया. कह सकते हैं कि न केवल भारतीय बल्कि विश्व-साहित्य के इतिहास में पंचतंत्र मील का वह पत्थर है, जहां से उसकी मौलिकता और सोद्देश्यपरकता की यात्रा आरंभ होती है. बौद्ध दर्शन के बाद यही एकमात्र ऐसी भारतीय कृति है जिसने विश्व-भर की संस्कृतियों को प्रभावित किया है. कथा और उपकथा के रूप में छोटी-छोटी कुल 75 रचनाओं को अपने भीतर समेटे इस लघुकाय कृति की महत्ता इससे भी जाहिर होती है कि आर्थर एंथनी मेक्डोनल(1854—1930) ने ‘संस्कृत साहित्य का इतिहास’ लिखा तो उसके चैदहवें अध्याय ‘परीकथाएं और नीतिकथाएं’ की शुरुआत पंचतंत्र से की. कीथ और विंटरनिट्ज ने भी पंचतंत्र को विश्व-साहित्य को भारतीय मनीषा का प्रमुखतम अवदान माना है. यही नहीं बलदेव उपाध्याय ने ‘संस्कृत साहित्य का इतिहास’ तथा डा॓. कपिलदेव द्विवेदी ने ‘संस्कृत साहित्य का समीक्षात्मक इतिहास’ में भी ‘पंचतंत्र’ को प्रमुख स्थान दिया है.

उल्लेखनीय है कि जिन दिनों पंचतंत्र की रचना हुई, उन्हीं दिनों बौद्ध और जैन विद्वान भी पशु-पक्षियों को पात्र बनाकर नीति कथाएं लिख रहे थे, किंतु येन-केन-प्रकारेण उनका ध्येय लोगों में अपने-अपने धर्म-दर्शन को लोकप्रिय बनाना था. इसके लिए वे धर्म को नीति और नैतिकता का आधार बनाकर प्रस्तुत कर रहे थे. उससे पहले महाभारत में भी नीति कथाएं आ चुकी थीं. महाभारत को धर्मग्रंथ और धर्मयुद्ध मानते हुए परोक्षरूप में धर्म को नीति कथाओं के आलंबन या मुख्य प्रेरणा के रूप में इस्तेमाल किया गया था. तुलनात्मक रूप से विष्णु शर्मा की दृष्टि कहीं अधिक मौलिक और यथार्थवादी थी. पंचतंत्र की रचना उन्होंने अस्सी वर्ष की परिपक्व अवस्था में की थी. तत्कालीन परंपरा के अनुसार निश्चय ही उनकी भी कुछ धार्मिक मान्यताएं रही होंगी, किंतु अपने रचनाकर्म को धार्मिक आस्था से निरपेक्ष रखते हुए उन्होंने पंचतंत्र को नीति-ग्रंथ के रूप में प्रस्तुत किया था, जिसमें मनुष्य को नीति-विषयक बोध केवल मनुष्य होने के नाते जरूरी माना गया था, न कि किसी धर्म-विशेष में आस्था के कारण.

‘पंचतंत्र’ की नीतिकथाओं की विशेषता है कि उनके मुख्य पात्र मानवेत्तर प्राणी पशु-पक्षी आदि हैं. महाभारत और उससे पहले की पुराकथाओं में आई नीतिकथाओं का मुख्य ध्येय सामान्यतः मोक्ष अथवा मत्यु-पर्यंत कल्याण की कामना को लेकर होता था. जबकि पंचतंत्र की रचनाओं का संबंध जीवन के व्यावहारिक पक्ष से था. राष्ट्र से था और उस राजनीति से था, जो प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों ही विधियों से राज्य पर असर डालती है. वे मनुष्य को दैनिक जीवन के सामान्य व्यवहार, कर्तव्य-अकर्तव्य, अच्छाई-बुराई आदि से परचाती हैं. वह भी बिना किसी धार्मिक शक्ति या विश्वास को बीच में लाए. पंचतंत्र की कहानियों के मुख्य विषय आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक हैं. यदि कहानियों के भावबोध, राजनीतिक दर्शन और नीति-विषयक सूझबूझ की दृष्टि से परखा जाए तो पंचतंत्र की कहानियों तथा चाणक्य प्रणीत ‘अर्थशास्त्र’ में समानता दिखेगी. इसलिए कुछ विद्वान आचार्य चाणक्य और पंचतंत्रकार विष्णु शर्मा को एक मानते हैं. यदि ऐसा न भी हो तो भी पंचतंत्रकार और ‘अर्थशास्त्र’ के रचियता चाणक्य में वैचारिक साम्य अवश्य रहा होगा. पंचतंत्र की रचना महिलारोप्य के राजा अमरशक्ति के तीन उदंड पुत्रों को राजनीति की व्यावहारिक शिक्षा देने के लिए की गई थी. वह भी मात्र छह महीने में. उन राजकुमारों ने ‘पंचतंत्र’ से क्या सीखा, यह तो ज्ञात नहीं है. पूरा इतिहास इसपर मौन नजर आता है, लेकिन पंचतंत्र के लिखे जाने के बाद से ही साहित्यिक कृति के रूप में इसे जो वैश्विक प्रतिष्ठा मिली, उससे न जाने कितने ‘राजकुमारों’ को इसने अपने नीति-विषयक ज्ञान से दीक्षित किया है; और आगे भी करता रहेगा.

उल्लेखनीय है कि पशु-पक्षियों की कहानियां तो समस्त दुनिया में कही-सुनी जाती थीं. वे मनुष्य के अर्वाचीन साथी रहे हैं. मनुष्य ने जब से अभिव्यक्ति की कला सीखी तभी से वह पशु-पक्षियों के साथ अपने संबंध को कलात्मक अभिव्यक्ति देता आया है. यह बात फ्रांस में खोजे गए हिम युग के गुफा चित्रों से होती है. फिर पंचतंत्र में ऐसा क्या था, जिसने इसे बाइबिल के बाद दुनिया की सर्वाधिक प्रचार पानेवाली पुस्तक बना दिया? दरअसल इससे पहले पशु-पक्षियों की कहानियां अक्रमबद्ध रूप में प्राप्त होती थीं. उनमें से प्रत्येक कहानी अपनी जगह महत्त्वपूर्ण होती थी, लेकिन सभी कहानियां अपनी-अपनी जगह महत्त्वपूर्ण हों तथा अलग-अलग होकर भी एक वृहद उद्देश्य को समर्पित हों, ऐसा नहीं हो पाता था. यूं जातक कथाएं ‘पंचतंत्र’ से पहले ही लिखी जा चुकी थीं. उनमें जो कहानियां थीं, वे अपने अनगढ़ रूप में लोक में विद्यमान थीं. जिसे भी अपने विचार के समर्थन में नीति-विषयक तर्क देना हो वह नीति-कथाओं को बीच में ले आता था. एक ही ग्रंथ में अलग-अलग संदर्भ के साथ अलग-अलग मिजाज की कहानियां हो सकती थीं. पंचतंत्रकार ने पहली बार नीति-कथाओं की ताकत को पहचाना था और अपेक्षाकृत बड़े उद्देश्य, उदंड राजकुमारों को शिक्षित करने के ध्येय से उन्हें क्रमबद्ध रूप में पुस्तकाकार पेश किया था.

चूंकि दुनिया में कोई भी सत्य अंतिम नहीं होता. प्रत्येक नीति विशिष्ट परिवेश में ही अनुकूल सिद्ध होती है. परिस्थितियों के अनुसार केवल संदर्भ बदलते रहते हैं. मनुष्य की स्वतंत्र प्रवृत्ति तथा व्यक्तित्व की जटिलता के कारण सभी को किसी एक नियम या विचार-दृष्टि से नहीं देखा जा सकता. जैसे किसी भले व्यक्ति से अच्छी बात कही जाए तो वह उससे सीख लेगा, लेकिन दुर्जन को यदि उपदेश दिया जाए तो वह उसको हमेशा उल्टा लेगा. इस बात को पंचतंत्रकार ने चिड़िया और कौए की कहानी के माध्यम से समझाया था. चिड़िया कौए को घौंसला बनाने को कहती है. उसको समझाने की कोशिश करती है. कौआ इसमें अपनी तौहीन समझता है और गुस्से में आकर चिड़िया के घौंसले को तहस-नहस कर देता है.

तो क्या दुर्जन को सुधारने की कोशिश ही न की जाए? पंचतंत्रकार का ऐसा उद्देश्य नहीं है. पंचतंत्र की रचना ही उदंड राजकुमारों को सही रास्ते पर लाने के लिए की गई है. उपर्युक्त कहानी में यदि चिड़िया को पता होता कि दुष्ट कौआ नाराज होकर नुकसान भी पहुंचा सकता है, तो वह दूसरा रास्ता अपना शक्ति थी; अथवा कौए की संभावित प्रतिक्रिया का अनुमान लगाकर उससे अपनी सुरक्षा की व्यवस्था कर सकती थी. इसलिए क्रिया की प्रतिक्रिया क्या हो सकती है, कोई भी कदम बढ़ाने से पहले इसका आकलन करना जरूरी है. इसलिए पंचतंत्र की कहानियां अपने संदेश में एक-दूसरे का विरोध करती, परस्पर काटती हुई लग सकती हैं. मगर असल में वे एक-दूसरे की विरोधी न होकर पूरक हैं. यही पंचतंत्र की विशेषता है. इसके लिए पंचतंत्रकार ने कहानियों का पैटर्न ऐसा रखा कि वे नीति और व्यवहार का पूरा ब्रह्मांड रच देती हैं. एक कहानी से दूसरी कहानी उसकी पूरक होकर निकलती चली जाती है. यही पंचतंत्र की महत्ता है. इसी से प्रभावित होकर ईरान के शाह नौशेरवां ने पंचतंत्र को ‘ज्ञान का महासागर’ था, जबकि बुर्ज़ोई पंचतंत्र को अमृत तुल्य मानता था. पंचतंत्र को लेकर एक किस्सा यह भी है कि संस्कृत साहित्य के पारखी विद्वान मौरिज विंटरनिट्ज से किसी ने प्रश्न किया—‘आपकी सम्मिति में भारत की विश्व को मौलिक देन क्या है?’ उत्तर में विंटरनिट्ज का कहना था—

‘एक वस्तु, जिसका नाम मैं तुरंत और बेखटके ले सकता हूं, वह पशु-पक्षियों को केंद्र बनाकर रचा हुआ कथा-साहित्य है, जो भारत ने संसार को दी है.’

पंचतंत्र का लेखनकाल तीसरी शताब्दी पूर्व का है. लेकिन विडंबना है कि शताब्दियों तक अपनी इस कृति से अनजान थे. यह कृति या तो ग्रंथालयों में पड़ी धूल चाट रही थी, अथवा लाल कपड़े में लिपटी किसी अलमारी में मुंह छिपाए होगी. भला हो जर्मन विद्वान जोहंस हर्टल(1872—1955) और अमेरिकी भाषाविज्ञानी फ्रेंकलिन एडगर्टन(1885—1963) का जिन्होंने उस कैद से पंचतंत्र का उद्धार किया. हालांकि पंचतंत्र की ख्याति पर दुनिया की पहले से ही नजर थी. उसका पहला अनुवाद पहेलवी में ईरान के राजा नौशेरवां के आग्रह पर उसके मंत्री हकीम बुर्ज़ोई ने किया था.

ईरान के शाही हकीम बुर्जोई ने किसी पुस्तक में पढ़ा था कि भारत में किसी पहाड़ पर संजीवनी बूटी प्राप्त होती है, जिसे मसलकर यदि उसकी कुछ बूंदें मृत व्यक्ति के मुंह में डाल दी जाएं तो वह जीवित हो उठता है. मरणासन्न व्यक्ति के प्राण लौट आते हैं. उसने यह बात बादशाह से कही, लेकिन नौशेरवां को इसका विश्वास नहीं हुआ. लेकिन यह कहते हुए कि किसी भी बात को बगैर जांचे-परखे नकार देना उचित नहीं, उसने बुर्जोई को भारत जाने की अनुमति दे दी. नौशेरवां के कार्यकाल में ही शतरंज का खेल भी भारत से ईरान पहुंचा था. वह इस खेल को गढ़नेवाले भारतीयों की मेधा से प्रभावित था. सम्राट की आज्ञा ले, तीन सौ ऊंटों के भारी-भरकम काफिले, रसद-पानी, माल-असबाव के साथ बुर्जोई भारत के लिए रवाना हुआ. लंबी यात्रा के पश्चात वह लगभग 550 ईस्वी के आसपास कन्नौज के राजा के दरबार में पहुंचा.

राजा ने दरबारियों की बैठक बुलाई. जिसके सेवन से मृतक के प्राण लौट आएं ऐसी वनस्पति की जानकारी किसी को न थी. वनस्पति की खोज में यथासंभव मदद का आश्वासन देते हुए राजा ने अपने कुछ आदमियों को भी उसके साथ लगा दिया. बुर्जोई राजा के सहायकों के साथ संजीवनी की खोज में जुट गया. उसने जंगलों की खाक छान मारी. वहां मिलनेवाली जड़ी-बूटियों को आजमाया. हर नई और अनोखी दिखनेवाली वनस्पति का परीक्षण किया गया. उसका अर्क निकालकर मृत व्यक्ति के मुंह में डाला गया. लेप बनाकर मृत शरीर पर मला गया. लेकिन सब व्यर्थ. हर बार उसको निराशा ही हाथ लगी. धीरे-धीरे उसकी हिम्मत जवाब देने लगी. उसे उस व्यक्ति पर गुस्सा आने लगा जिसने पुस्तक में संजीवनी बूटी का उल्लेख किया था. सबसे ज्यादा गुस्सा अपने ऊपर था. आखिर क्यों उसने मूर्खतापूर्ण बात पर विश्वास किया. और अपने साथ सैकड़ों मनुष्यों की परेशानी का कारण बना. अब वापस लौटकर शाह को क्या मुंह दिखाएगा!

‘वह व्यक्ति निश्चय ही मूर्ख और लापरवाह रहा होगा, जिसने पुस्तक में संजीवनी जैसी निराधार और काल्पनिक बूटी का जिक्र किया. जिसके कारण मुझे हजारों मील की यात्रा करनी पड़ी.’ बुर्जोई ने कोसा. वह हताश होकर वापस लौटने का निर्णय कर ही रहा था कि एक विद्वान व्यक्ति के बारे में जानकारी मिली. लोगों ने उसे बताया, ‘यहां एक विद्वान व्यक्ति रहता है, जो वर्षों से हमारा मार्गदर्शन करता आया है. उसके ज्ञान का आकलन करना, समुद्र की थाह लेने जैसा दुष्कर कार्य है. सहायक बुर्जोई को उस व्यक्ति के पास तक ले गए. बुर्जोई ने उसे देखा तो देखता ही रह गया. वृद्ध के चेहरे पर तेज था. होठ लगता थे कि मानो तत्काल कुछ अनोखा कहनेवाले हैं. ऊंचा माथा दर्शाता था कि उसने अपना जीवन ज्ञान की साधना में लगाया है. संजीवनी के बारे में पूछने पर वृद्ध ने बताया, ‘कभी मैंने भी संजीवनी के बारे में पढ़ा था. फिर जीवन का लंबा समय उसकी खोज में बिताया. लेकिन जब कुछ भी हाथ नहीं लगा तो हमने पुस्तक में लिखी बातों को दुबारा समझने की कोशिश की. तब हमने पाया—

‘विज्ञान पर्वत है. वन-वनस्पतियां वैज्ञानिक. उनका प्रभाव कभी कम नहीं होता. बल्कि गुणात्मक आधार पर बढ़ता ही चला जाता है. बिना ज्ञान के जीता-जागता मनुष्य भी मृत समान है. अशिक्षित होना निर्जीव होने के समान है. ज्ञान मनुष्य को पुनर्जीवन देता है. वही मनुष्य प्रसन्न है जो स्वयं को ज्ञान की साधना में लीन रखता है.’ बुर्जोई सम्मोहित होकर वृद्ध व्यक्ति को सुन रहा था. उसने आगे बताया, ‘राजा के खजाने में एक पुस्तक है, जिसे विद्वान ‘कलीला’(पंचतंत्र के पहेलवी अनुवाद का शीर्षक) कहते हैं. लोग जब बौद्धिक शिथिलता और लापरवाही का शिकार होने लगें तो उनके लिए एकमात्र औषध ‘कलीला’ है. संजीवनी ज्ञान का पर्वत है और अमरत्व ज्ञानार्जन की यात्रा.’ वृद्ध व्यक्ति की बातें सुनकर बुर्जोई की खुशी का ठिकाना न रहा. उसकी सारी थकान एकाएक गायब हो गई. साधु का आभार व्यक्त कर वह राजदरबार की ओर लौट पड़ा. दरबार में पहुंचकर उसने सम्राट की अभ्यर्थना की, कहने लगा—

‘हे सम्राट! जहां तक सूर्य का प्रकाश है आपकी कीर्ति वहां तक फैले. आपका प्रताप युगों तक बना रहे. आपके खजाने में एक पुस्तक है, जिसका शीर्षक ‘कलीला’ है. उसे बहुमूल्य वस्तु के समान सुरक्षित रखा गया है. ज्ञान की अमोल निधियां उसमें विद्यमान हैं. असल में वही पुस्तक मनुष्यता की संजीवनी है. यदि आपके लिए बहुत कष्टकारी न हो तो वह पुस्तक मुझे भेंट करने की कृपा करें.’

बुर्जोई की बात सुनकर राजा तमतमा उठा. गुस्से से उसकी देह थरथराने लगी. उसने बुर्जोई से कहा—‘वह पुस्तक मेरी आत्मा और प्राण दोनों हैं. उसको लेकर मैं न तुमपर भरोसा कर सकता हूं, न ही अपने दरबारियों पर. यहां तक कि स्वयं सम्राट नौशेरवां आकर कहें तो भी मैं उसे सौंपनेवाला नहीं हूं. हां, तुम अगर चाहो तो मेरी आंखों के सामने उसे पढ़ सकते हो.’

‘जैसा सम्राट चाहते हैं, वैसा ही होगा.’ बुर्जोई ने आश्वासन दिया.

राजा के आदेश पर खजाने से पुस्तक बाहर लाई गई. अपने साथी सलाहकारों के साथ बुर्जोई उसे पढ़ने लगा. वह पुस्तक को उतना ही पढ़ता था, जितना भली-भांति हृदयंगम कर सके. उससे आगे हरगिज नहीं पढ़ता था. रात को सोने से पहले वह उसको अपनी भाषा में उतार लेता था. बीच में उसने नौशेरवां को पत्र लिखा तो पुस्तक का एक अध्याय भी उसके साथ जोड़ दिया था. इस आशंका से दूर कि वह संजीवनी खोजने निकला था, और भेज रहा है एक पुस्तक का अनुवाद, ऐसे में बादशाह पर क्या प्रतिक्रिया होती है—वह पंचतंत्र रूपी ज्ञान के महासागर में अपनी आत्मा को नहलाता रहा. शाह को उसने जो अंश भेजे थे, उन्हें पढ़कर कुछ दिनों बाद एक पत्र आया, उसमें लिखा था—

‘ज्ञान का महासागर हम तक पहुंच चुका है.’

वापस लौटने के बाद बुर्जोई शाह के दरबार में पहुंचा. शाह की अभ्यर्थना के उपरांत उसने पूछा—‘संजीवनी के स्थान पर पुस्तक को पाकर कैसा लगा?’

बादशाह ने जवाब दिया—‘पुस्तक के बारे में तुमने जैसा सुना था, ठीक ऐसा ही है. उसका ज्ञान मेरी आत्मा को पवित्र कर चुका है.’ इतना कहकर शाह ने अपने खजाने की चाबी बुर्जोई के आगे डाल दी और कहा—‘ईरान का खजाना तुम्हारे आगे खुला है. उसमें से जितना चाहो निकाल सकते हो.’

बुर्जोई ने उत्तर दिया—‘मुझे शाहों के शाह नौशेरवां के दरबार में जगह मिली है. जिसे अच्छे और बुरे की पहचान है. जो विद्वता को सम्मान देता है. मुझे सोना, चांदी अथवा रत्नाभूषण कुछ नहीं चाहिए. फिर भी यदि देना ही है तो….’

‘कहो….हमारे लिए कुछ भी असंभव नहीं है.’

‘शाह मेरी प्रार्थना है कि जब मंत्री बोजोर्गमिर उसकी शाही प्रति तैयार करें, तो मैं चाहता हूं कि उसमें मेरे नाम का भी उल्लेख हो.’

‘अपनी कीर्ति को बनाए रखने के लिए विद्वान पुरुष की इससे महान इच्छा हो ही नहीं सकती.’ शाह ने उत्तर दिया. बुर्जोई के श्रम को देखते हुए उसकी इच्छा मान ली गई. बोजोर्गमिर ने जब पंचतंत्र का शाही संस्करण तैयार किया तो उसमें पहले अध्याय में बुर्जोई का नाम लिखा गया.3

उस समय तक पंचतंत्र को लिखे 800 से अधिक वर्ष बीत चुके थे. हैरानी की बात यह भी है कि भारत के ‘अमृत’ के बारे में दुनिया आठ शताब्दी के बाद जान रही थी. पंचतंत्र की महत्ता असंद्धिग्ध है. मगर भारतीयों की अपने ज्ञान और उपलब्धियों को छिपाकर रखने के स्वभाव के चलते हुआ था. हालांकि इस बीच पंचतंत्र के भारतीय भाषाओं में अनुवाद टीकाकरण आदि हो चुके थे. संस्कृत में तंत्राख्यायिका, दक्षिण भारतीय पंचतंत्र, नेपाली पंचतंत्र, हितोपदेश, सोमदेवकृत कथासरित्सागर, क्षेमेंद्र लिखित बृहत्कथा मंजरी, पश्चिम भारतीय पंचतंत्र, पूर्णभद्र कृत पंचाख्यान आदि ग्रंथों की रचना में पंचतंत्र की सामग्री का आंशिक या पूर्ण रूप से उपयोग किया गया था. लेकिन पंचतंत्र जैसी पुस्तक के आठ सौ वर्षों में मात्र आठ-दस अनुवादों या टीकाओं में सिमटकर रह जाना, उन दिनों भारतीयों की अपने ज्ञान के विस्तार के प्रति उदासीनता को दर्शाता है. हालांकि यह भी हो सकता है कि पंचतंत्र को जो प्रतिष्ठा बाद में, विशेषकर विदेशी भाषाओं में अनुवाद के पश्चात मिली, वैसी उस समय न रही हो. अध्यात्म और दर्शन जैसे गूढ़ विषयों के अध्ययन-अध्यापन में लीन रहनेवाले भारतीय मनीषियों को पशु-पक्षियों की कहानियां बहुत साधारण जान पड़ी हों. श्रेष्ठताबोध के साथ-साथ अपने ज्ञान को छिपाकर रखने, उसको दुनिया की नजरों से बचाए रखने का डर भी संभवतः भारतीयों के मन में था.

यह इस बात से भी स्पष्ट हो जाती है कि भारतीयों को पंचतंत्र के दूसरे अनुवाद, जो सीरियाई भाषा में बुद द्वारा 570 ईस्वी में किया गया था—का पता उनीसवीं शताब्दी में जर्मनी विद्वानों द्वारा चला. कुछ लोगों का कहना है कि बुद द्वारा सीरियाई भाषा में किया गया अनुवाद मूल संस्कृत के पंचतंत्र के सर्वाधिक निकट है. मूल ग्रंथ अप्राप्य होने के कारण यह बात दावे के साथ नहीं कही जा सकती. लेकिन मूल ग्रंथ अप्राप्य होने के कारण ही उसके अनुवादों का महत्त्व और भी बढ़ जाता है. पंचतंत्र के अनुवादों को लेकर थियोडोर बेन्फी का अध्ययन बहुत महत्त्वपूर्ण है. विभिन्न अनुवादों का तुलनात्मक अध्ययन कर उसने मूल पंचतंत्र के निकट पहुंचने का सार्थक प्रयास किया है. पंचतंत्र का अगला अनुवाद 750 ईस्वी में सीरियाई भाषा से अरबी में हुआ, अनुवादक थे—अब्दुल्ला इब्नल मोकफ्फा. अरबी अनुवाद को उन्होंने नाम दिया—कलिलह-दिमनह, जो पंचतंत्र के मुख्य पात्र ‘करटक’ और ‘दमनक’ के अरबी रूपांतरण थे. ‘पंचतंत्र’ के यूरोपीय भाषाओं में अनुवादों का सिलसिला अरबी अनुवाद के माध्यम से ही बना.

अरबी अनुवाद से ग्यारहवीं शताब्दी के अंत में सिमियन ने यूनानी भाषा में पंचतंत्र को अनूदित किया. तदनंतर रब्बी जोयल कृत अरबी अनुवाद से 11वीं शताब्दी में ही हिबू्र अनुवाद. 1142 में अबुल मआली नसरल्ला द्वारा अरबी में एक और अनुवाद सामने आया. इसी वर्ष हिब्रू अनुवाद से जा॓न आफ केपुआ ने 1263—1278 लैटिन अनुवाद किया. 1470—1505 के बीच अबुल मआली नरसल्ला के अरबी अनुवाद से पंचतंत्र को फारसी अनूदित किया गया. आगे चलकर इससे तुर्की, फ्रेंच, डच, मलय, चेक, स्पेनिश, जर्मन और हंगारियन भाषाओं में कई अनुवाद हुए. 1483 ईस्वी में एंथानियस वा॓न फर द्वारा जर्मन अनुवाद, 1493 में स्पेनिश, 1546 में इटालियन, 1556 में फ्रेंच, 1570 में टामस नार्थ द्वारा अंग्रेजी तथा 1583 ईस्वी में गियुलियो नुति द्वारा इतालवी अनुवाद संपन्न हुए. 1644 में पंचतंत्र का एक और अनुवाद फ्रांसिसी भाषा में हुआ. आश्चर्यजनक रूप से वह अनुवाद ‘पिलपिली साहब की कहानियों’ के नाम से चर्चित हो गया. फ्रांसिसी लेखक ला॓ फोंतेन ने अपनी पुस्तक ‘फेबल्स’ लिखी थी. 12 खंडों में प्रकाशित उस पुस्तक में कुल 239 जीव-जंतु कथाएं थीं. अपनी कृति के बारे में फोंतेन की आत्मस्वीकृति थी कि उसने अपनी पुस्तक के लिए पशु-पक्षी की कथाओं का अधिकांश हिस्सा महात्मा पिल्पे की कहानियों से लिया है. महात्मा पिल्पे भारतीय लेखक विद्यापति का स्थानीय अपभ्रंश था. 1724 में फारसी के अनवार सुहेली के तुर्की अनुवाद से एक और फ्रांसिसी संस्करण तैयार किया गया, जिसका शीर्षक ‘विदपई की भारतीय कहानियां’ रखा गया. विदपई भी विद्यापति का ही अपभ्रंश था. उसके बाद तो पंचतंत्र के इतने अनुवाद हुए कि उनकी सूची बना पाना कठिन है.

आखिर पंचतंत्र की विश्वव्यापी लोकप्रियता का कारण क्या है? पशु-पक्षियों की कहानियां तो उससे पहले भी लिखी जा चुकी थीं. बल्कि उनका चलन दुनिया-भर के लोकसाहित्य में था. स्वयं भारत में ‘जातक कथाएं’ शीर्षक के अंतर्गत पशु-पक्षियों की कहानियों की भरमार है. पंचतंत्र को मिली अप्रत्याशित लोकप्रियता का कारण एक तो यह है कि ये एक उद्देश्य को समर्पित थीं. जातक कथा या दूसरे ग्रंथों जैसा बिखराब इनमें नहीं था. विष्णु शर्मा एक विचार या नीति की स्थापना के लिए कुछ कहानियां चुनते हैं. और उन्हें एक-दूसरे में इस तरह गूंथते हैं कि हर कहानी विचार को मजबूती प्रदान करती है. किसी विचार के पक्ष में नए-नए तर्क जुटाना भारतीयों के लिए नया नहीं था. वैदिक संस्कृत ने शास्त्रार्थ की परंपरा स्थापित की थी, जिसमें ऐसी बहसें चलती थीं. किंतु उसके लिए कहानियों का सहारा लेना, फिर पिटारे से एक के बाद एक कहानियां निकालते जाना और अंत में वृहद उद्देश्य से जोड़ देना पहली बार पंचतंत्र के रूप में सामने आया था. कहानी की शक्ति का यह पहला, अनूठा और सबसे सार्थक प्रयोग था. पंचतंत्र की रचना उदंड राजकुमारों को रास्ते पर लाने के लिए की गई थी. उसके लिए लेखक ने उस समय के उपलब्ध नीति और व्यवहार ज्ञान के अनुसार कहानियों को एक क्रम में सजाया था. चूंकि जीवन में कुछ भी एकरैखिक या सीधा-सादा नहीं होता, प्रत्येक घटना के तार दूसरी घटनाओं से जुड़े होते हैं. दूसरे शब्दों में प्रत्येक घटना एक भी होती है और अनेक भी. इसी प्रकार पंचतंत्र की कहानियों अलग-अलग होकर भी एक-दूसरे से संबद्ध थीं. जैसे एक घटना का संबंध दूसरी घटना से होता है, वही ‘कार्य-कारण’ संबंध पंचतंत्र की कहानियों में था. यह पंचतंत्रकार की शैली का अनूठापन था, जिसमें मनोरंजन भी था और दर्शन भी. पंचतंत्र की शैली का जादू ही था कि कालांतर में इसे कई बड़े आख्यानों में उपयोग किया गया, जिसका सबसे अच्छा उदाहरण ‘आलिफ लैला’ है.

पंचतंत्र की दूसरी विशेषता इसकी भाषाई सहजता है. पंचतंत्रकार ने जानवरों को कहानी का पात्र बनाया था. इसलिए उन्होंने अनावश्यक पांडित्य से भाषा को मुक्त रखा. पंचतंत्र में व्यावहारिक ज्ञान के लिए एक नीति-संदेश है. लेकिन वह इकहरा नहीं है. बल्कि परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है. जो दिखाता है कि परिस्थितियां भिन्न हों तो नीति का स्वरूप भी बदल सकता है. ऊपर से खूबी यह कि पाठक उसे कहानी के रूप में आत्मसात् करता है. चूंकि पात्र नाकुछ से पशु-पक्षी हैं, इसलिए कहानी के समापन के साथ ही उनका असर फीका पड़ जाता है, रह जाता है वह संदेश जिसको पाठक तक पहुंचाने के उद्देश्य से कहानी को गढ़ा गया है. पंचतंत्र के समय ही एक और महत्त्वपूर्ण कृति की रचना हुई थी, रचनाकार थे, गुणाढ्य और कृति का नाम था—बड्डकहा अथवा बृहत्कथा(350—200ईस्वीपूर्व). पंचतंत्र की भांति मूल ‘बड्डकहा’ भी अनुपलब्ध है. कथासरित्सागर से पता चलता है कि मूल ‘बड्डकहा’ लगभग 350 ईस्वी पूर्व वररुचि ने काणभूति से कही थी और काणभूति ने गुणाढ्य से. गुणाढ्य ने इसका पैशाची में पुनर्लेखन किया. आगे चलकर यह कृति कथासरित्सागर, बृहत्कथामंजरी, हितोपदेश, बृहत्कथाश्लोक संग्रह, वैताल पचीसी, सिंहासन बतीसी जैसी महान कृतियों का आधार बनी. इन सभी पुस्तकों में भारत में सहस्राब्दियों से कही जाने वाली पशु-पक्षियों की कहानियां हैं. इन्हीं के आधार पर विद्वान भारत को परीकथाओं का आदिदेश होने का दावा करते हैं.

© ओमप्रकाश कश्यप

1. पैशाची वाग् मषी रक्तं मौनोन्मत्तश्च लेखकः।
इति राजाऽब्रवीतृ का वा वस्तुसारविचारणां।। बृहत्कथामंजरी—1/87
2. हजारीप्रसाद द्विवेदी, हिंदी साहित्य का आदिकाल, पृष्ठ 61.
3. फिरदौसी कृत ‘शाहनामा’ से

हिंदी बालसाहित्य : अतीत से आज तक

सामान्य

कोई भी भाषा तभी समृद्ध मानी जा सकती है, जब उसमें समाज के प्रत्येक वर्ग जिनमें स्त्रीपुरुष, बालवृद्ध, धनवाननिर्धन, उच्च और अल्प शिक्षित आदि सभी के लिए भरपूर पाठ्यः सामग्री उपलब्ध हो. भरपूर पाठ्यसामग्री से हमारा अभिप्राय शिक्षा, संस्कृति, कला, दर्शन, साहित्य एवं साहित्येत्तर विषयों पर आवश्यक समस्त शब्दसंपदा से है, जो किसी भी समाज के प्रबोधीकरण के लिए अनिवार्य हो सकती है. पाठ्य सामग्री की बहुलता के साथ आवश्यक है कि उसको पढ़ने, समझने और पसंद करने वाले भी बहुसंख्यक हों. हालांकि किसी भाषा का पूरी दुनिया के लिए एकसमान उपयोगी होना, विभिन्न मान्यताओं, संस्कृतियों और सभ्यता वाले समाजों के प्रत्येक वर्ग से, एक ही स्तर पर संवाद करना पूर्णतः आदर्श एवं अव्यावहारिक अवस्था है, लेकिन किसी भी भाषा के लिए जो स्वयं को जीवंत और सचेतक होने का दम भरती हो, जिसका दुनिया के विभिन्न समाजों के बीच संपर्क सेतु बनाने का दावा हो, यह पवित्र लक्ष्य भी है. चूंकि देश की भांति प्रत्येक भाषाभाषी समाज की भी सीमाएं, विशिष्ट सामाजिकसांस्कृतिक आग्रह एवं परिस्थितियां होती हैं. इसलिए प्रत्येक वर्गविषय के अनुरूप पर्याप्त सामग्री उपलब्ध करा पाना, अभी तक किसी भी भाषा के लिए संभव नहीं हो पाया है. वैसी स्थिति में व्यावहारिक रूप में भाषा की समृद्धता का स्तर समाज में उसकी पैठ तथा उसके लिए साहित्य एवं ज्ञानविज्ञान से भरपूर पाठ्यसामग्री की उपलब्धता से लिया जाता है.

जब कोई भाषा लोक संपर्क से आगे बढ़ती है, तो वह सबसे पहले अपने समाज की मूलभूत जिज्ञासाओं को पंख देना चाहती है. उसके बाद उसका अगला काम उन जिज्ञासाओं, जीवनानुभवों, सामाजिकसांस्कृतिक प्रतीकों, पुराख्यानों तथा ज्ञान के अन्यान्य उपादानों को सहेजते हुए, जिन्हें वह समाज के प्रबोधीकरण के लिए आवश्यक मानती है—विमर्श के बीच निरंतर बनाए रखना रह जाता है. इन जिज्ञासाओं में जीवनजगत की उपस्थिति, व्यक्ति और समाज की समस्याएं, परिस्थतिकीय ससंबंध, प्रकृति और बृह्मांड से उपजी जिज्ञासाएं होती हैं. स्वाभाविक रूप से हर भाषा पहले इन्हीं चुनौतियों से दोचार होती है. वह न केवल उनसे प्रभाव ग्रहण करती है, बल्कि अनिवार्यरूप से उनको प्रभावित भी करती है. शायद इसीलिए इतिहास में प्रत्येक भाषा पहले आध्यात्मिक जिज्ञासाओं की शोधक बनी है. कालांतर में उसमें समाज, संस्कृति, उत्पादन के साधनों के आधार पर विकसित अर्थनीति, राजनीति एवं विज्ञान सहित अन्य लोकोपयोगी धाराएं भी समाविष्ठ होती जाती हैं. देखा जाए तो यही मनुष्य की बौद्धिक चेतना का विस्तारक्रम भी है. जिसे हम साहित्य कहते हैं अथवा साहित्य का जो रूप आजकल प्रचलित है, वह विभिन्न विचारधाराओं के समन्वय एवं संघर्ष, विज्ञान तथा प्रौद्योगिकीकरण के परिणामों, उसकी उपलब्धियों, विसंगतियों एवं तज्जनित आंदोलनों का संवेदनात्मक विस्तार है.

किसी भी समाज में साहित्य की प्रथम दस्तक लोककथाओं एवं लोकपरंपराओं के रूप में सामने आती है. ये साहित्य की वे मूल धाराएं हैं, जिनके लिए औपचारिक शिक्षा आवश्यक नहीं होती. वाचिक परंपरा में समाज के सभी वर्ग इनसे न केवल लाभान्वित होते हैं, बल्कि अपनीअपनी तरह से इनके विस्तार में योगदान भी देते हैं. साहित्य का आदिस्वरूप वाचिक परंपरा से समृद्ध रहा है. सहस्राब्दियों तक वही सभ्यता और संस्कृति के आदानप्रदान, लोकानुभवों को सहेजने, अंतरित करने, नए प्रतीक तथा जीवनमूल्य गढ़ने का माध्यम बना रहा. साहित्य का जो रूप आज प्रचलन में है तथा उसकी परिभाषा से जो सामान्यबोध अभिव्यक्त होता है—कुछ शताब्दियों के पहले तक साहित्य के वह मायने नहीं थे. साहित्य का आरंभिक रूप मनुष्य की नैसर्गिक आवश्यकता की भांति स्वतः जन्मा. वह मनुष्य को उपयोगी जान पड़ा इसलिए उसको अपनाया जाने लगा. अपने आदिरूप में साहित्य लोक संस्कार का हिस्सा था. मनोरंजन के अलावा लोग उसका उपयोग अपने मंतव्य को स्पष्ट करने, बात को धार देने, तार्किकता प्रदान करने हेतु भी करते थे. जीवन में स्थायित्व आने पर समाज की एकता एवं विकासदर को बनाए रखने के दबाव ने साहित्य की सप्रयोजन रचना की मांग को जन्म दिया. हालांकि लेखनकला के विकास तथा उसकी सर्वोपलब्धता तक साहित्य का मौखिक रूप ही बहुस्वीकार्य बना रहा. कालांतर में लिपि का विकास हुआ तो साहित्य को जैसे ठोस आधार मिला. जनसाधारण तक उसकी पहुंच बढ़ी, साथ में जिम्मेदारियां तथा अपेक्षाएं भी. लिपिबद्ध साहित्य पर बहस करना आसान था. उससे एकाएक मुकर पाना संभव नहीं था. इससे विचारधाराओं के जन्म का मार्ग प्रशस्त हुआ. लोकसाहित्य में रचनाकार की पहचान स्थायी रखने का कोई कारगर उपाय न था. लिपिबद्ध साहित्य ने यह समस्या दूर कर दी थी. अब रचनाकार आसानी से अपना नाम रचना के साथ चला सकता था. इससे रचनाओं पर परिश्रम कर, सोचसमझकर उद्देश्यपूर्ण ढंग से लिखने की परंपरा ने जोर पकड़ा. धीरेधीरे विचारधारा की अभिव्यक्ति के लिए भी साहित्य का उपयोग होने लगा. सवाल उठता है कि वे कौनसी आवश्यकताएं थीं, जिन्होंने साहित्य को जन्म दिया. उसको मनुष्य के लिए अपरिहार्य बनाया. इसके लिए हमें मानवइतिहास के वे पन्ने पलटने होंगे जब वह आखेट युग से कृषि युग में प्रवेश कर चुका था और जीवन में आए स्थायित्व ने मनुष्य को सोचने के लिए न केवल नए क्षेत्र बल्कि अवसर भी दिए थे.

कृषिकला के विकास ने मानवीय सभ्यता के विकास को नए पंख दिए थे. आखेट युग में मनुष्य का प्रमुख भोजन मांस था. उसकी सुलभता थी, परंतु जुटा पाना आसान न था. शिकार करने के लिए मनुष्य को कठिन परिश्रम भी करना पड़ता था. इस कार्य में जान का भी खतरा था. स्वयं शिकार हो जाने का खतरा शिकारी के सिर पर मंडराता ही रहता था. पशु उत्पादों को भोज्य पदार्थ के रूप में उपयोग करने की दूसरी कमजोरी थी कि उन्हें लंबे समय तक संरक्षित कर पाना संभव न था. जबकि कृषि उत्पादों को न केवल लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता था, बल्कि कृष्ठ भूमि की प्रचुरता के कारण अकेला व्यक्ति अनेक परिवारों के लिए भोजन उगा सकता था. इससे बची हुई श्रमशक्ति का उपयोग शिल्पकर्मों में होने लगा, जो कृषिकर्म के विकास के साथ समाज की अनिवार्य आवश्यकता बन चुके थे. कृषिऔजार तथा जीवन की बढ़ती जरूरतों के लिए अन्यान्य वस्तुओं की आपूर्ति के लिए मृदाकारी, लौहकारी, काष्ठकर्म, बुनकर, चर्मकारी जैसे शिल्पकर्मों का विकास हुआ. अतिरिक्त अनाज को संरक्षित करने के लिए मिट्टी के बर्तन बनाए जाने लगे. भोजन की निश्चिंतता बढ़ने से सभ्यता के विकास को गति मिली. उपजाऊ भूस्थलों पर, जहां सिंचाई के लिए पानी का उपयुक्त प्रबंध था, मानव बस्तियां आकार गढ़ने लगीं. समूह की सदस्य संख्या बढ़ने के साथसाथ समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए भी मनुष्य की जिम्मेदारी बढ़ती जा रही थी. समाज को व्यवस्थित रखने के लिए ग्रामणी, गण, गणप्रमुख आदि पदों का सृजन किया गया. इन पदों पर समाज के वरिष्ठ एवं योग्यतम व्यक्तियों को बिठाया जाता. यही वर्ग अतिरिक्त अनाज के सरंक्षण एवं जरूरतमंद लोगों के बीच विपणन का दायित्व वहन करता था.

एक ओर समाज भौतिक जीवन में प्रगति की डगर पर था तो दूसरी ओर उसकी बौद्धिक उपलब्धियां नितनए आसमान छू रही थीं. उसकी बुद्धि विराट प्रकृति के जितने रहस्यों का अनावरण करती, उतनी ही उलझती जाती थी. वह उसकी विलक्षणता के प्रति नतमस्तक था. जिज्ञासा के आयाम अनंत थे. उन सबका एकाएक समाधान उसके लिए संभव न था. मनुष्य की बौद्धिक सीमाओं ने प्रकारांतर में प्रकृति के प्रति दैवीय भाव को जन्म दिया. वैसे भी खेती हो अथवा नदीसागर तट पर बनी बस्ती, सभी तो प्रकृति की कृपा पर निर्भर थे. बारिश न पड़े तो खेती बंजर बन जाए, अतिवृष्टि हो तो खड़ी फसल बह जाए. जीवन से कदमकदम पर जूझता मनुष्य इन प्राकृतिक आपदाओं का सामना भी करता था. आपदाओं के डर तथा प्रकृति के प्रति मन में उमड़ी अतिश्रद्धा ने स्तुतियों को जन्म दिया. जीवनसंघर्ष से गुजरते मनुष्य ने अपनी भावनाओं को कविता में ढालना, कहानी में पिरोना आरंभ कर दिया. इसके मूल में आदि मानव की मनोरंजन की भूख तथा दूसरों के साथ अपने अनुभव बांटने की ललक थी.

दिनभर की घटनाएं सुननासुनाना भी कम मनोरंजक न था. सांझ को काम से निवृत्त हुए लोग अलाव के सहारे, गांवबस्ती के सार्वजनिक स्थलों पर जुटते तो अनुभवोंआख्यानों के आदानप्रदान का सिलसिला आरंभ हो जाता. उन्हीं में एकाध व्यक्ति ऐसा भी मिल जाता, जिसको कहन की कला में दूसरों की अपेक्षा महारत हासिल होती. लोगों का सूचना के साथ मनोरंजन भी हो जाता. प्रकृति के सीधे साहचर्य में रहने वाले, कदमकदम पर संघर्ष करने वाले मनुष्य के लिए यह सौगात कम न थी. इसलिए लोगों के बीच वह व्यक्ति गुणी, अतिरिक्त सम्मान और सराहना का पात्र समझा जाता. चतुर किस्सागो अपनी रचना में जीवनजगत से जुडे़ उदाहरण पेश करता, साथ में कुछ न कुछ काम की बातें भी जोड़ देता था. इससे वे न केवल मनोरंजन की कसौटी पर सौ टका खरी उतरतीं, बल्कि बालकोंबड़ों को बौद्धिकरूप में समृद्ध भी बनाती थीं. इस तरह साहित्य का वाचिक रूप समाज में विकसित होने लगा था. लेखनकला का विकास हुआ तो रोजमर्रा के अनुभवों तथा संपर्क में आने वाले व्यक्तियों, पशुपक्षियों, वस्तु जगत आदि को लोकाख्यानों में ढालने, सुगठित रचना का रूप देने की परंपरा बनी. इससे साहित्य और अन्यान्य कलाओं के विकास को गति मिली. अनुभव सहेजे जाने से मनुष्य के बौद्धिक विकास को पुनः गति मिली.

सभ्यता के विकास केव्व दौरान अक्षर की खोज मनुष्य के लिए सर्वाधिक चौंकाने और आत्ममुग्ध कर देने वाली है. यह उसको रचयिता की अनुभूति से भर देती है. इसलिए मनुष्य ने ज्यों ही अक्षरों को जोड़ना सीखा, इस कला का उपयोग उसने अपने सोच और संकल्पनाओं को शब्दबद्ध करने के लिए किया. इसमें उसको अभूतपूर्व आनंद मिला. मनुष्य अथवा समाज विशेष की धार्मिकआध्यात्मिक जिज्ञासाओं के उस समय तक पूर्णतः निजी, सीमित और उथला रह जाने का अंदेशा था, जब तक कि उनमें समाज के वृहद हिस्से के लिए उपयोगी तत्व न हो. इसलिए उसके लेखन में धार्मिकआध्यात्मिक जिज्ञासाओं के साथ उन सामान्य नैतिकताओं को भी स्थान मिलने लगा, जिन्हें मनुष्य ने विकासक्रम के अंतर्गत अपने अनुभव से जानासमझा था. जिनके बिना उसे लगता था कि समाज का चल पाना असंभव होगा. रचे गए धर्मग्रंथ तथा उनमें वर्णित विचार सर्वमान्य तथा बहुउपयोगी हों, इसके लिए उनमें लोककल्याण की भावना को स्थान मिला. चूंकि सृजन का काम कहीं न कहीं बड़ेपन की अनुभूति से भी भर देता था, अतएव रचनाकार तथा उसकी कृति को दैवीय मानने का चलन हुआ. मानवमात्र के लिए कल्याणकारी कृतियों को लोकेत्तर माने जाने का चलन आरंभ हुआ. वे आसानी से सर्वग्राह्यः हों, इसके लिए उनके साथ दैवीय सहमति जैसा कुछ जोड़ा जाने लगा. भारतीय मनीषियों ने नाम के बजाय लेखन के उद्देश्य को प्राथमिकता दी है. विशेषकर प्राचीन समाजों में, जहां विद्वानों की लंबी कतार है जो अपनी बड़ी से बड़ी रचना से अपना जोड़ने के बजाय उसको स्थापित गोत्र या ऋषिकुल के नाम करते रहे हैं. उनके द्वारा प्रणीत ग्रंथों का उद्देश्य ही लोककल्याण की उदात्त भावना थी. समाज की ओर से मानव जीवन के लिए अनिवार्य मान लिए गए आचारविचारों के प्रतिपादन हेतु रचित ग्रंथों को कालांतर में दैवीय मानने का चलन हुआ. इस प्रवृत्ति के पीछे आरंभ में भले ही मनुष्य की सदेच्छाएं, सद्भावनाएं रही हों, मगर यह सर्वथा निःस्वार्थ नहीं रह सका. कुछ अरसे बाद ही उनके समर्थन का हवाला देते हुए समाज में एक परजीवी वर्ग पनपने लगा. उसने स्वयं को धर्मग्रंथों का व्याख्याकार, लेखक बताते हुए उनमें मनमाना प्रक्षेपण करना आरंभ कर दिया. प्राचीन ग्रंथों के प्रणयन से एक संकेत भी मिलता है कि वैचारिक द्वंद्व और मतवैभिन्न्य उस उस समय भी थे. ऐसे में वही लेखक या लेखक समूह, जो अपने विचारों के संग्रंथन में सफल रहा, जिसने समावेशी दृष्टि का परिचय दिया, अपने विचारों को बचाने तथा दूरदूर तक फैलाने में भी कामयाब हो सका.

साहित्य का आधुनिक रूप औद्योगिकीकरण और विज्ञान के विस्तार की देन है. जैसा कि ऊपर संकेत किया गया है, उससे पहले या तो सामंतों और राजाओं की प्रशस्ति में किया जाने वाला लेखन था, अथवा आत्मश्लाघा से भरा इतिहास, जिसे राजा और बादशाह अपने आश्रित विद्वानों से लिखवाया करते थे. गौरवशाली अतीत से आगामी पीढ़ियों को परचाने के लिए प्रत्येक भाषा और समाज में महाकाव्य भी लिखे गए. उनमें इतिहास, अर्थशास्त्र, दर्शन तथा राजनीतिकसामाजिक गठन का विवरण मिलता है. इन सब ग्रंथों का आज साहित्येतिहासिक महत्त्व है, मगर उन्हें आधुनिक चेतनाबोध का उत्स मान लेना, एक प्रकार का अतीत व्यामोह, नास्टेल्जिया या अधिक से अधिक स्मृति को सहेजने का परिणाम है. साहित्य में समकालीन मूल्यबोध ही सर्वाधिक प्रेरणाशील एवं उपयोगी होता है. लेकिन परंपरागत रूप में सहेजे गए आचारविचार, नियम, संकल्प आदि भी अपनी भूमिका निभाते हैं.

भारतीय संदर्भों में मनुष्य के सामाजिकसांस्कृतिक विकास के आगे के इतिहास को हम चार वर्गों में बांट सकते हैं—

. वैदिक युग:यह युग मानवेतिहास में लगभग तीन हजार ईसा पूर्व से लेकर लगभग एक हजार वर्ष ईसापूर्व तक विस्तृत है.

. महाकाव्य युग:एक हजार ईसा पूर्व से लगभग छह सौ ईस्वी पूर्व तक.

. बौद्धकाल:ईसा पूर्व छठी शताब्दी से लेकर हर्षवर्धन तक. इस कालखंड का बड़ा हिस्सा इतिहास में भारत के स्वर्णकाल के नाम से भी जाना जाता है. हम इसको प्रबोधनकाल भी कह सकते हैं.

. मध्यकाल से लेकर ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन तक:इसमें भक्ति आंदोलन का परिवर्तनकारी दौर भी शामिल है.

. आधुनिक काल:सुविधा की दृष्टि से इस कालखंड को चाहें तो स्वतंत्रता पूर्व और स्वातंत्रयोत्तर भारत में पिछली शताब्दी के दौरान रचे गए बालसाहित्य में भी बांट सकते हैं.

बालसाहित्य की स्वतंत्र अवधारणा का विकास तो बीसवीं शताब्दी में हुआ. उससे पहले बच्चे बड़ों के लिए गए साहित्य से काम चलाते थे. बड़ों के लिए लिखी गई जो रचना बच्चों को रुचिकर लगती, वही उनकी हो जाती थी. यह बात विद्वानों के काफी देर से समझ आई कि बच्चों की रुचि और मनोविज्ञान को पहचानते हुए उनके लिए अलग साहित्य रचा जाए. यह सिर्फ भारत में नहीं हुआ, बल्कि दुनिया के प्रायः सभी देशों, भाषाओं की यही स्थिति रही. वहां भी जिसको श्रेष्ठतम बालसाहित्य कहा जाता है, वह मूलतः बड़ों के लिए रचा गया है. दूसरे शब्दों में बालोपयोगी साहित्य से बालसाहित्य तक की यात्रा अपने भीतर लंबा इतिहास समेटे हुए है. बालसाहित्य की पीठिका को समझने के लिए उसपर संक्षिप्त चर्चा आवश्यक है.

पुरा वैदिक युग से वैदिक युग तक

कहानी कहनेसुनने का इतिहास मानवीय सभ्यता के इतिहास से भी बहुत अधिक पुराना है. सितंबर 1940 को में भ्रमण पर निकले चार फ्रांसिसी किशोरों—मार्सल रेवीडट, जेकुइस मार्शल, साइमन कोइनकस तथा जार्ज एंगेल ने पाइरेनीस पर्वतमालाओं के बीच लेसकाक्स नामक गुफाओं की ऐसी शृंखला की खोज की, जिनकी दीवारों पर जानवरों और कीड़ेमकोड़ों की रंगीन चित्राकृतियां बनी हैं. उससे पहले 1880 स्पेन की अल्टामाइरा नामक गुफाओं में भी इसी प्रकार की शैलचित्र शृंखलाएं पाई गई थीं. ये चित्र महज दीवारों पर उकेरी गई आकृतियां नहीं हैं. बल्कि उनमें अद्भुत कलात्मक तारतम्यता है, जिसमें कथात्मकता का आभास होता है. उससे लगता है कि प्राचीन मनुष्य अपनी अभिव्यक्ति और मनोरंजन के माध्यमों की खोज कर चुका था. अल्टामाइरा की गुफाओं की जब खोज की गई तो अनेक विद्वानों ने इस बात पर संदेह व्यक्त किया था कि पूर्व पाषाण युग का मनुष्य इस प्रकार कलात्मक अभिव्यक्ति की क्षमता क्षमता शायद ही रखता था. उसकी अगली कड़ी के रूप में लेसकाॅक्स गुफाओं की खोज ने उनके संदेह को निर्मूल सिद्ध कर दिया है. कार्बन जांच से पता चला है कि इनमें से कुछ गुफाएं 35,000 वर्ष पुरानी हैं. 1940 के बाद लेसकाक्स में दर्जनों गुफाओं की खोज की जा चुकी है. उनकी दीवारों पर विभिन्न पशुओं की आकृतियां इस प्रकार चित्रित की गई हैं, मानो उनके माध्यम से कहानी कहने का प्रयास किया गया हो. स्पष्ट है कि आखेट युग में मनुष्य कहानी कहने की कला में प्रवीणता प्राप्त कर चुका था. यह स्वाभाविक भी था. समूह में रहकर शिकार करने वाला मनुष्य शाम को जब अपने परिजनों के साथ आराम करने के लिए जुटता होगा, तो दिनभर की घटनाओं को सुननेसुनाने की रुचि स्वाभाविक रूप से लोगों को रहती होगी. इसी से कहानी कला का विकास हुआ. आदि मानव के लिए कहानी सुननासुनाना भी चमत्कारी कला रही होगी. समूह के उन सदस्यों को जो किसी कारण उस दिन शिकार पर जाने में असमर्थ रहे हों, अथवा वृद्ध परिजनों जो शिकार करने में अक्षम हो चुके हों, को दिनभर की संघर्षपूर्ण घटनाओं का रोमांचक बयान देना एक नैमत्तिक कर्म रहा होगा. यदि शिकार करते समय कोई बड़ी घटना घटी है अथवा कोई बड़ा शिकार करने में कामयाबी मिली है तो उसको समूह के सदस्यों के बीच बांटना बड़ा मनोरंजक रहा होगा. कहानी सुनाने के उत्साह में अवश्य ही कुछ अतिश्योक्तिपूर्ण, कुछ अतिरेकी होता होगा, जिसे श्रोता ज्यादा पंसद करते हों. इससे सचाई से परे केवल कल्पनाधारित किस्सेकहानी गढ़ने की शुरुआत हुई, जिनका ध्येय केवल मनोरंजन था. धीरेधीरे जंगल तथा वहां के जानवरों के बारे में कहानियों गढ़ना, शिकार के बनावटी किस्से सुनाने का प्रचलन भी बढ़ता गया.

आदिमानव के लिए यह भी संभव नहीं था कि वह प्रतिदिन शिकार पर जा सके. इसलिए विश्राम के दिनों में शिकार की रूपरेखा बनाना, बच्चों एवं वृद्धों को वन्य जीवों एवं शिकार के बारे में बताना, अपनी स्मृति को बनाए रखने के लिए विशिष्ट अवसरों पर घटनाओं को पत्थर पर उकेरना आदिमानव के पसंदीदा काम रहे होंगे. यह कार्य विभिन्न स्थानों पर वन्य जीवों तथा जंगल की परिस्थितियों के अनुसार भिन्नभिन्न प्रकार से किया जाता है. इससे अलगअलग संस्कृतियों की नींव पड़ी. सिंधु घाटी की सभ्यता में भी बड़ी संख्या में प्रस्तर चित्रावलियां प्राप्त हुई हैं, जिससे लगता है कि वहां भी कहानी कहने की परंपरा मौजूद थी. कह सकते हैं कि कहानियों गढ़ने का प्रचलन एक युगीन घटना है.

शिकार कर्म में निपुण, समूह का नेतृत्व करने वाले नायक, अथवा शिकार के दौरान विपरीत परिस्थितियों में विशिष्ट साहस का प्रदर्शन करने वाले व्यक्ति को अतिरिक्त सम्मान का पात्र समझा जाता होगा. इसलिए उसके किस्से समूहों के बाकी सदस्यों और बच्चों को सुनाने की परंपरा बनी होगी. इसने कालांतर में समूह के नायकों, बहादुर व्यक्तियों को अतिरिक्त महत्त्व मिलना शुरू हुआ. प्रकारांतर में सर्वगुणसंपन्न व्यक्तित्व के रूप में देवताओं की कल्पना की गई. सबसे पहले यह कल्पना कहानियों के माध्यम से सामने आई होगी. इस आधार पर कहा जा सकता है कि कहन की परंपरा मानवसंस्कृति की न केवल साक्षी बनी, बल्कि उसमें सहायक भी रही है. आगे चलकर जब मनुष्य ने पशुपालन व्यवस्था से कृषि व्यवस्था में प्रवेश किया, गांवों और कस्बों का विकास हुआ तो ऐसे व्यक्तियों जो घटनाओं को आकर्षक ढंग से सुना सकें को अतिरिक्त महत्त्व दिया जाने लगा. इसी से पेशेवर किस्सागो का जन्म हुआ. दुनिया का पहला लिखित किस्सा यूनान में गिलगमेश के महाकाव्य के रूप में उपलब्ध है. वह लगभग 4000 वर्ष पुराना है. यूनान के अलावा चीन और भारत भी कहानी सुननेसुनाने की परंपरा आदिकाल से रही है.

प्रायः सभी प्रमुख सभ्यताओं का विकास नदियों के किनारे हुआ. पानी की उपलब्धता के कारण वहां पर खेती करना, पशुओं के लिए भोजन जुटाना आसान था. परंतु नदी के तटवर्ती जीवनबसर की अपनी अलग समस्याएं थीं. बरसात के दिनों में उमड़ती नदियां पूरी बस्ती को तबाह कर जाती थी. तबाही का मंजर वर्षों तक लोगों की यादों में बना रहता और धीरेधीरे किस्से कहानी का रूप ले लेता. प्रायः सभी सभ्यताओं में जलप्लावन को युगांतरकारी घटना के रूप में दर्ज किया है. भारतीय प्रायद्वीप में भी जलप्लावन की घटना शतपथ ब्राह्मण में नई सृष्टि के जन्म के रूप में दर्ज है. इस बात के भी पर्याप्त प्रमाण है कि ईसा से तीन हजार वर्ष तक पहले गांवों में स्थानीय प्रशासन व्यवस्था विकसित हो चुकी थी. ग्राम्यस्तर के पदाधिकारियों में ग्रामणी के अलावा किस्सागो का भी पद हुआ करता था. विशिष्ट अवसरों पर वह कहानी सुनाकर गांववालों का मनोरंजन करता था. लेखनकला का विकास उस समय तक नहीं हो पाया था. समूह की अनुभव संपदा और रोमांचक स्मृतियों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने का दायित्व किस्सागो का था. इसलिए उसे हम उस दौर का संस्कृतिकर्मी भी कह सकते हैं. इस तरह कहानी के कहन की परंपरा का इतिहास सभ्यता के इतिहास जितना ही पुराना है. विभिन्न संस्कृतियों में गढ़ी गई प्राचीन कहानियोंं में आश्चर्यजनक एकरूपता है. बाढ़ की स्मृतियां लगभग सभी में सुरक्षित हैं. इसके अलावा नैतिकता के प्रति तीव्र आग्रह, भोजन के बंटवारे को लेकर संघर्ष की लगभग एक समान स्थितियां हैं.

ऋग्वेद को भारतीय मेधा का पहला लिखित दस्तावेज माना जाता है. विद्वानों के अनुसार इसका संहिताकरण ईसा से करीब 1500 वर्ष पहले किया गया. हालांकि श्रुति परंपरा के रूप में यह ग्रंथ उससे बहुत पहले से भारतीय जनजीवन को प्रभावित करता रहा है. विद्वानों के अनुसार ऋग्वेद की कुछ ऋचाएं ईसा से पांच से छह हजार वर्ष पुरानी हैं. ऋग्वेद तक आतेआते भारत में नागरी सभ्यता विकसित हो चुकी थी. बालक के महत्त्व को समझा जाने लगा था. यद्यपि उसके स्वतंत्र व्यक्तित्व को मान्यता नहीं मिल पाई थी, तथापि उसके चारित्रिक विकास में शिक्षा के योगदान को स्वीकारा जाने लगा था. वेद, उपनिषद, स्मृतिगं्रथ और आरण्यकों में ऐसी अनेक कहानियों उपलब्ध हैं, जिनको आज भी हिंदी बालसाहित्य की महत्त्वपूर्ण निधि के रूप में स्वीकार किया जाता है. वेदों में ऐसी अनेक कथाएं हैं, जिनके पात्र बच्चे हैं. उनसे यह साफ जाहिर होता है कि उनकी रचना बच्चों को संस्कारित करने अथवा उनकी संस्कारशीलता को दर्शाने हेतु की गई थी. इनमें सत्यकाम जाबालि, नचिकेता, आरुणि उद्दालक, उपमन्यु की कहानियों उदात्त बालचरित्रों को दर्शाती हैं—

‘‘जाबाला का पुत्र सत्यकाम अपनी माता के पास जाकर बोला, ‘हे माता, मैं ब्रह्मचारी बनना चाहता हूं. मैं किस वंश का हूं?’

माता ने उसे उत्तर दिया, ‘हे मेरे पुत्र! मैं नहीं जानती कि तू किस वंश का है. अपनी युवावस्था में जब मुझे दासी के रूप में बहुत अधिक बाहर आनाजाना होता था, तभी तू मेरे गर्भ में आया था. इसलिए मैं नहीं जानती कि तू किस वंश का है. मेरा नाम जाबाला है. तू सत्यकाम है. तू कह सकता है कि मैं सत्यकाम जाबाला हूं.

हरिद्रमुत के पुत्र गौतम के पास जाकर उसने कहा, ‘भगवन्! मैं आपका ब्रह्मचारी बनना चाहता हूं. क्या मैं आपके यहां आ सकता हूं?’

उसने सत्यकाम से कहा, ‘हे मेरे बंधु, तू किस वंश का है?’

उसने कहा, ‘भगवन्, मैं नहीं जानता कि मैं किस वंश का हूं. मैंने अपनी माता से पूछा था और उसने यह उत्तर दिया—‘अपनी युवावस्था में जब दासी का काम करते समय मुझे बहुत बाहर आनाजाना होता था, तब तू मेरे गर्भ में आया. मैं नहीं जानती कि तू किस वंश का है. मेरा नाम जाबाला है और तू सत्यकाम है’—इसलिए हे भगवन्! मैं सत्यकाम जाबाला हूं.’

गौतम ने सत्यकाम से कहा कि, ‘एक सच्चे ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य कोई इतना स्पष्टवादी नहीं हो सकता. जा और समिधा ले आ. मैं तुझे दीक्षा दूंगा. तू सत्य के मार्ग से च्युत नहीं हुआ है.’’ (छांदोग्योपनिषद 4.4,1,4).

भले ही विधिवत बालसाहित्य का हिस्सा न हों, पर ये कहानियोंं कहन की उस परंपरा का विस्तार हैं, जो उससे हजारों वर्ष पहले आरंभ हो चुकी थी. चूकि वेदउपनिषद आदि दार्शनिक विवेचना के लिए लिखे गए ग्रंथ हैं, अतएव उनमें बालकों को भी दर्शन के गूढ़ प्रश्नों से साक्षात करते हुए दिखाया गया है. आरुणि उद्दालक, उपमन्यु की कहानियोंं तो सर्वख्यात हैं. दोनों में ही गुरुभक्ति और समाज के प्रति अनन्य निष्ठा का प्रदर्शन हैं. आरुणि गुरु के आदेश पर बांध का निरीक्षण करने जाता है. बरसात का मौसम है. बांध पर जाकर वह देखता है कि वहां से पानी रिस रहा है. आरुणि पानी को रोकने का प्रयास करता है. मगर नाकाम रहता है. इसी कोशिश में शाम हो जाती है. बांध का छेद बढ़ता ही जा रहा है. आश्रम और खेतों को बचाने के लिए आरुणि को जब कोई और उपाय नहीं सूझता तो वह बांध के टूटे हुए भाग से पीठ सटाकर बैठ जाता है. पूरी रात वह बांध से पीठ सटाए बैठा रहता है. सुबह ऋषि धौम्य अपने शिष्यों के साथ आरुणि को खोजते हुए वहां पहुंचते हैं, तब उन्हें आरुणि की गुरुभक्ति एवं आश्रम के प्रति निष्ठा का पता चलता है.

छांदोग्योपनिषद के एक प्रसंग में श्वेतकेतु को अपने पिता से संवाद करते हुए दर्शाया गया है. पिता उससे कहता है—

वहां से मेरे लिए न्यग्रोध वृक्ष का फल लाकर दो.’

यह लीजिए, भगवन, यह है.’

इसे फोड़ो.’

लीजिए तात्, यह फूट गया.’

तुम्हें इसमें क्या दिखाई देता है.’

यह बीज है, जो अत्यंत सूक्ष्म है.’

इसमें किसी एक को फोड़ो.’

लीजिए भगवन, यह फूट गया.’

तुम्हें इसमें क्या दिखाई देता है?’

कुछ नहीं भगवन्!’

पिता ने कहा, ‘हे मेरे पुत्र, वह सूक्ष्म तत्व जो तुम्हें उसमें प्रत्यक्ष नहीं होता, वस्तुतः उसी तत्व से इस महान नयग्रोध वृक्ष की सत्ता है. हे मेरे पुत्र! विश्वास करो इस सत्य पर कि यह सूक्ष्म तत्व ही है, और इसी के अंदर सब कुछ वर्तमान है. वही आत्मा को धारण करता है. यही सत्य है. यही आत्मा है. और तू, हे श्वेतकेतु, तू यही है.’’

(छांदोग्योपनिषद: 6: 10 और आगे).

नचिकेता और उपमन्यु की कथाओं के बीजतत्व ऋग्वेद में मौजूद हैं. सम्राट वाजश्रवा का पुत्र नचिकेता पिता द्वारा बीमार और अशक्त गायों को दान दिए जाने पर खिन्न होकर पिता से पूछता है—‘पिताजी मुझे किसको दान देंगे?’ पिता के यह कहने पर कि यमराज को, तब वह उससे मिलने की उत्कंठा में राज्य छोड़ देता है. लंबी साधना के उपरांत उसकी भेंट यमराज से होती है. यमराज उसको मृत्यु के बारे में बताते हैं. यह प्रसंग कठोपनिषद् में विस्तार आया है. बल्कि पूरी उपनिषद ही यमराज और नचिकेता के संवाद पर केंद्रित है. कुछ लोग यह कह सकते हैं कि आठनौ वर्ष के बालक से जीवनमृत्यु जैसे गंभीर प्रश्नों पर संवाद कराना उसके साथ खिलवाड़ करना है. भले ही यह संवाद सर्वथा काल्पनिक हो. तो भी यह कहा जा सकता है कि उस समय तक जीवनमूल्यों, विचारों, दार्शनिकसामाजिक मान्यताओं को लेकर साहित्य सृजन की शुरुआत हो चुकी थी. दूसरे यह उस कालखंड की रचना है जब आश्रमों में दार्शनिक प्रश्नों पर विमर्श करना सामान्य चर्या थी. शिष्य गुरु के सान्न्ध्यि में रहता था. मातापिता भी अपने बच्चों को गुरु के आश्रम में कठोर दिनचर्या के लिए छोड़ देते थे, ताकि उसका नवोन्मेष हो सके. बच्चों के प्रसंग में एक संस्कार का उल्लेख ऋग्वेद में कई स्थानों पर हुआ है. वह था—उपनयन संस्कार. जब बालक मातापिता के आंगन से निकलकर गुरु के आश्रम में चला जाता था. शिक्षार्जन करने. जितनी अवधि वह पाठशाला में रहता, उसपर केवल उसके गुरु का आदेश चलता था. शिष्य की निष्ठा को परखने के लिए गुरु उसकी तरहतरह से परीक्षा भी लेते थे. एक और बालक उपमन्यु की गुरुभक्ति का किस्सा ऋग्वेद में मिलता है—

‘‘महर्षि आयोदधौम्य का शिष्य उपमन्यु दूसरे शिष्यों के साथ भिक्षाटन करने जाता है. एक दिन गुरु प्रश्न करते हैं—

वत्स उपमन्यु, तुम भोजन क्या करते हो.’

गुरुदेव भिक्षाटन से जो मिलता है, उसी से कुछ अपने लिए रख लेता हूं.’

पर भिक्षाटन पर तो गुरु और आश्रम का अधिकार होता है.’

अगले दिन उपमन्यु को जो भिक्षान्न प्राप्त हुआ वह उसने गुरु के समक्ष लाकर रख दिया. गुरु ने उसको आश्रम के सुपुर्द कर दिया. उपमन्यु को भूखा रह जाना पड़ा. दूसरे दिन भी यही हुआ तो उपमन्यु भूख मिटाने के लिए दुबारा भिक्षाटन के लिए निकल गया. अगले दिन गुरुदेव ने पुनः वही प्रश्न किया—

वत्स उपमन्यु, आजकल भोजन क्या करते हो?’ उपमन्यु ने सच कह दिया. इसपर गुरु विचलित होकर बोले—‘दुबारा भिक्षाटन करना तो धर्म विरुद्ध है. इससे गृहस्थों पर अतिरिक्त भार पड़ता है.’

गुरु की आज्ञा मानकर उपमन्यु ने वह भी छोड़ दिया. एक दिन गुरु ने फिर पूछा—

वत्स उपमन्यु, आजकल भोजन क्या करते हो?’

गुरुदेव, गायों का दूध पी लेता हूं.’

परंतु आश्रम की गायों पर तो मेरा अधिकार है? मुझसे बिना अनुमति के गायों का दूध पी लेना तो चोरी हुई.’ उसके बाद उपमन्यु केवल दूध दुहने के बाद गायों के फेन से काम चलाने लगा. गुरु को पता चला तो वह भी बंद करा दिया. उपमन्यु निराहार रहने लगा. भूख असह् होने पर एक दिन उसने आक के पत्ते खा लिए. इससे उसकी नेत्रों की ज्योति चली गई…’’

कहानी का अंत दुःखद होता है. गुरुशिष्य के संबंधों में बंटी उस शिक्षाव्यवस्था में गुरु के गुरुत्व को दर्शाने के लिए चामत्कारिक कहानियोंं लिखना सामान्य बात थी. यहां इन कहानियों की नैतिकता खंगालने का उद्दिष्ट हमारा नहीं. हमारा उद्देश्य मात्र यह दिखाना है कि बच्चों के लिए साहित्य लेखन का आरंभ वैदिक युग में ही हो चुका था. उसका आरंभिक उद्देश्य समाज को तात्कालिक मान्यताओं, विश्वासों के अनुकूल ठालना था. यह भी कह सकते हैं कि कहन की कला लिपि के आविष्कार के साथ ही शब्दों में ढलने लगी थी. उपनिषदों, ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों और स्मृतियों में आकर इसको और भी गति मिली. कहानी सुननासुनाना लोगों में इतना लोकप्रिय हुआ कि हर ‘पुर’ में एक दक्ष किस्सागो की मौजूदगी अनिवार्य मान ली गई. उसको लगभग उतना ही सम्मान मिलता था, जितना गांव प्रमुख को.

महाकाव्य युग

महाकाव्य युग(1500 ईस्वी पूर्व—800 ईस्वी पूर्व तक) तक आतेआते भारतीय समाज व्यवस्थित हो चुका था. आपस में युद्धरत रहने वाले छोटेछोटे कबीलों ने बड़े राज्यों में संगठित होना आरंभ कर दिया था. राजाओं में स्पर्धा और साम्राज्यवादी ललक बढ़ी थी. अर्थव्यवस्था के स्रोतों में भी बदलाव आया था. कृषि की उपयोगिता बढ़ती जा रही थी. हालांकि समाज के कुछ वर्ग उस समय भी पशुपालन अर्थव्यवस्था को अपनाए हुए थे.अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार करता, अधिक से अधिक कृष्ठ भूमि को अपनी सीमाओं में सम्मिलित करना, वीरता और राजकीय कौशल की पहचान बन चुका था. जिस सम्राट का अधिक भूभाग पर अधिकार हो, वह अधिक सम्मान का पात्र माना जाने लगा था. कृषि के विकास ने सहायक उद्योगंधों को जन्म दिया था. लोगों की आवश्यकताएं निरंतर बढ़ रही थीं. इसके फलस्वरूप समाज में शिल्पकार वर्ग का सम्मान बढ़ा था. आय बढ़ने से व्यापार में तेजी आई थी. समृद्धि और वैभव के प्रतीक बड़ेबड़े प्रासाद, अट्टालिकाएं, दुर्ग समाज में आकर्षण का केंद्र बनते जा रहे थे. वर्गविभाजन एवं आर्थिक स्तरीकरण की शुरुआत हो चुकी थी. शीर्षस्थ वर्ग की निकटता का लाभ उठाने के लिए पुरोहितों एवं धर्माचार्यों ने लोगों को अपने प्रभाव में लेना आरंभ कर दिया था. वे धर्म के नाम पर लोगों का सत्ता के साथ अनुकूलन करना सिखा रहे थे. राजा का पद महत्त्वपूर्ण था. उसको पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था. उससे अपेक्षा की जाती थी कि वह ब्राह्मण को यथोचित महत्त्व दे. इस तरह पूरे समाज पर धर्मसत्ता और राजसत्ता का समवेत अधिकार था.

उस दौर में बच्चों के लिए अथवा उनके नाम पर जो साहित्य रचा गया, वह किसी न किसी प्रकार इन्हीं दो सत्ताओं से संबद्ध था. उसका एक ही उद्देश्य था शिखरसत्ताओं से तालमेल बनाकर चलना. उससे अनुकूलन करते रहने की शिक्षा देना. कर्मकांड और दैवीय ताकतों के भरोसे पूरा समाज स्वयं को वर्णव्यवस्था के अनुरूप ढाल चुका था. वर्चस्ववादी सत्ता का विरोध उस समय भी होता था. उसके प्रमाण वैदिक और उत्तरवैदिक साहित्य में भरे पड़े हैं. रामायणमहाभारतकाल तक वैदिक सभ्यता के समानांतर उसी के समान तेजवंत और प्रतापी सभ्यता मौजूद थी. उसको रक्षक(राक्षसी) सभ्यता कहा गया है. इस सभ्यता का कोई ग्रंथ उपलब्ध नहीं है. दोनों महाकाव्य असल में पुरातन रक्षक सभ्यता पर वैदिक सभ्यता की जीत का बयान है. आर्यों को युद्धप्रिय जाति बताया गया है. अतः यह संभव है कि आर्यद्रविड़ युद्ध में युद्ध जीतने के उपरांत आर्यों ने रक्षक सभ्यता के सभी संदर्भग्रंथ, साहित्यिक प्रमाण जला दिए हों. वैदिक साहित्य में इंद्र की महिमा तथा उस समय के देवदानव युद्धों का वर्णन तो है, लेकिन उस समय के रक्षक सभ्यता के साहित्य का नामोल्लेख तक नहीं है. जिसको प्राचीन भारतीय साहित्यिक संपदा कहा जा सकता है, वह असल में व्यवस्था से अनुकूलितमर्यादित साहित्यरचना है. उसमें विद्रोह की छवि सर्वथा अलभ्य है. अपने से बड़ों के प्रति विद्रोह तो दूर मतभेद की अनुमति तक नहीं थी. बालक को घर में मातापिता और पाठशाला में गुरु के अनुशासन में रहना पड़ता था. इस युग के बालकों में राम और कृष्ण के अलावा एकलव्य, श्रवण कुमार, कौषिक, ध्रुव, प्रहलाद, लवकुश आदि ऐसे बालचरित्र हैं, जिनका उल्लेख रामायण और महाभारत दोनों में मिलता है. इनमें ध्रुव और प्रहलाद की कहानियोंं आर्य संस्कृति के विस्तार को दर्शाती हैं. जबकि एकलव्य की कहानी एक बालक के आत्मविश्वास और अंततः उस व्यवस्था से छले जाने की गाथा है.

एकलव्य सम्राट हिरण्यधेनु का बेटा है. द्रोणाचार्य जो केवल राजपुत्रों को शस्त्रसंधान करना सिखाते हैं, की ख्याति से प्रभावित होकर वह उनके पास जाता है. ठुकराए जाने पर वह उन्हीं को गुरु मानकर अपनी एकांत साधना आरंभ कर देता है. कठिन परिश्रम और अनवरत अभ्यास द्वारा वह अल्प समय में ही इतनी निपुणता प्राप्त कर लेता है कि उसके धनुसंधान कौशल की धूम मच जाती है. एक दिन द्रोणाचार्य स्वयं शरसंधान का उसका कौशल देख चमत्कृत रह जाते हैं. एकलव्य का शस्त्रकौशल देखकर उन्हें अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने के लिए दिया गया वचन खटाई में जान पड़ता है. उसमें जीत ब्राह्मणवाद की होती है. द्रोण कुटिलतापूर्वक एकलव्य का अंगूठा मांग लेते हैं. उल्लेखनीय है कि बालक एकलव्य स्वयं राजपुत्र है. द्रोण द्वारा केवल राजपुत्रों को शस्त्रसंधान सिखाने की शर्त को वह पूरा करता है. यही विश्वास उसको उनके पास खींच ले जाता है. हालांकि उसके अग्रज जानते हैं कि द्रोण उसको शिक्षा देने को हरगिज तैयार न होंगे. वही होता भी है. द्रोण इन्कार कर देते हैं. एकलव्य का संबंध उस अनार्य संस्कृति से था, जिसपर विजय की कामना रामायण और महाभारत युद्ध की प्रमुख प्रेरणाएं हैं. सांस्कृतिक प्रेरणा के दबाव में ही द्रोण गुरुदक्षिणा में एकलव्य का अंगूठा मांग लेता है. एक विलक्षण अनार्य योद्धा आर्य संस्कृति के मनमाने आचरण और सम्मोहन का शिकार हो जाता है. विलक्षण प्रतिभा की इस बलात् हत्या को ‘गुरुभक्ति’ का नाम दिया जाता है. एकलव्य की कहानी यदि देखा जाए तो सांस्कृतिक वर्चस्ववाद की कहानी है. दिखाती है कि एक ताकतवर संस्कृति किस प्रकार कमजोर संस्कृति को मिटने पर बाध्य कर देती है. यह बात बिलकुल भिन्न है कि कटे हुए अंगूठे के बावजूद एकलव्य केवल उंगलियों की मदद से तीरसंधान के अपने अभ्यास को जारी रखता है और जरासंध की सेना में सम्मिलित होकर कृष्ण के आगे चुनौती पेश करता है. उस युद्ध में वह वीरगति को प्राप्त होता है. उसकी वीरता देखकर स्वयं कृष्ण सम्मोहित हैं. महाभारत युद्ध में पराक्रमी एकलव्य के रणकौशल की प्रशंसा करते हुए वे अर्जुन से कहते हैं—‘हे पार्थ! आज यदि एकलव्य जीवित होता तो देव, दानव और नाग ये सब मिलकर भी उसे युद्ध में जीत नहीं सकते थे.’ एकलव्य के साथ हुए अन्याय का बोध विजेता संस्कृति के आचार्यों को भी रहा. संभवतः इसी घटना से जन्मे पापबोध पर पछतावा करते हुए बाद के एक उपनिषदकार ने कहा है—

वत्स, तू केवल हमारे अच्छे कर्मों से प्रेरणा लेना. उससे इतर कर्मों से: अर्थात जो अश्रेष्ठ और हेय हैं, तू कोई शिक्षा ग्रहण मत करना.’1

तत्कालीन साहित्य द्वारा यह भ्रम भी लगातार बनाया जाता है कि केवल क्षत्रिय ही राज करते थे या विद्याध्ययन का कार्य केवल तथा केवल ब्राह्मण शिक्षित एवं विद्धान. इतिहास में कोई समय ऐसा नहीं हुआ जब केवल इन्हीं दो वर्गों का वर्चस्व रहा हो, लेकिन इस व्यवस्था से अनुकूलन की कोशिश हर समय होती रही. लेकिन समाज पर धर्म का बढ़ता अनुशासन सदैव प्रतिगामी रहा हो, ऐसा नहीं है. अच्छे जीवनमूल्यों से परचाने के लिए भी धर्म को माध्यम बनाया जाता था.

महाभारत में कौषिक नाम के ब्राह्मण की एक बालोपयोगी कहानी आती है—

‘‘वेदाध्ययन को उत्सुक कौषिक जब गुरु की खोज में जाने को उद्धत हुआ तो उसके वृद्ध मातापिता को चिंता हुई. मां ने कहा—

वत्स! हम दोनों जराशक्त हैं. तुम चले गए तो हमारी देखभाल कौन करेगा?’

कौषिक पर तो वेदाध्यन का भूत सवार था. वृद्ध मातापिता को निराश्रित छोड़कर वह जंगल की ओर प्रस्थान कर गया. कुछ वर्षों की साधना के पश्चात उसने अनेक सिद्धियां प्राप्त कर लीं. एक दिन वह एक वृक्ष के नीचे बैठा आराम कर रहा था. उसी समय एक सारस ऊपर डाल पर आकर बैठ गया. उसने कौषिक के सिर पर बीट कर दी. कुपित कौषिक ने पक्षी को घूरा. कहानी बताती है कि तापस की कोप दृष्टि के आगे पक्षी कहां टिक पाता. वह भस्म होकर भूमि पर आ गिरा. पक्षी को जमीन पर तड़फते देख कौषिक को बड़ा अपराधबोध हुआ—

यदि मैं अपने गुस्से पर नियंत्रण नहीं रख पाता तो मुझे मान लेना चाहिए कि मेरी साधना में दोष है.’ उसने स्वयं से कहा. समस्या थी कि गुस्से पर नियंत्रण कैसे प्राप्त हो? अगले दिन वह भिक्षाटन के लिए निकला. एक गृहणी के द्वार जाकर उसने टेर लगाई. गृहणी बाहर आई और शीघ्र लौटने का आश्वासन देकर भीतर चली गई. उसी समय स्त्री का पति वहां पहुंच गया. स्त्री सबकुछ छोड़कर अपने पति की सेवा में जुट गई. कौषिक को यह बहुत अपमानजनक लगा. कुछ देर बाद स्त्री भिक्षान्न का कटोरा लिए बाहर आई तो उससे रहा न गया. उसने कुपित दृष्टि स्त्री पर डाली—

एक साधु को दरवाजे पर छोड़कर तुम अपने पति की सेवा में जुट गईं. यह ब्राह्मण का अपमान है….’

मैंने तो केवल अपने कर्तव्य का पालन किया है.’ स्त्री ने उत्तर दिया.

ब्राह्मण के अपमान के लिए मैं तुम्हें शाप भी दे सकता हूं.’

मुझे धमकी देने की आवश्यकता नहीं है, भिक्षुक. मैं कोई सारस नहीं हूं जो तुम्हारी कोपदृष्टि से भस्म हो जाऊंगी.’ कौषिक हैरान. आखिर उस घटना के बारे में स्त्री कैसे जानती हे. अवश्य यह सिद्ध स्त्री है. वह क्षमायाचना करने लगा—

क्षमा करें देवि