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संस्कृति और सामाजिक न्याय

सामान्य

प्रत्येक समाज अपनी संस्कृति से पहचाना जाता है. उसका प्रमुख कार्य समाज में एकता की अनुभूति जगाना पैदा करना है. इसके लिए जरूरी है कि वह सामाजिक संबंधों, नागरिकों के सामान्य व्यवहारों, सार्वकालिक जीवन-मूल्यों और भविष्य के सपनों से अनुप्रेत हो. प्रायः धर्म एवं संस्कृति को एक मान लिया जाता है. जबकि आस्था और विश्वास को अपनी पीठ पर ढोने वाला धर्म विराट संस्कृति का अंग तो हो सकता है, उसका पर्याय नहीं. किसी समाज द्वारा धर्म की केंचुल से बाहर आने की छटपटाहट विवेकीकरण के प्रति उसकी उत्सुकता को दर्शाती है. जहां तक भारतीय संस्कृति का प्रश्न है, अधिकांश विद्वान इसे ‘विविधता की संस्कृति’ मानते तथा ‘सनातन संस्कृति’ कहकर इसका महिमा-मंडन करते हैं. इनमें से एक भी धारणा मूल्यबोधक नहीं हैं. सांस्कृतिक वैविध्य तभी सार्थक है जब वह मानवीय चेतना का स्वयं-स्फूर्त विस्तार हो. साथ ही लोकतांत्रिक सोच को बढ़ावा देता हो. प्राचीनता काल-सापेक्ष स्थिति है. वह केवल घटना-विशेष की ऐतिहासिकता को दर्शाती है. संस्कृति का असल बड़प्पन इसमें है कि अपने अनुयायियों के बीच न्याय, समानता और समरसता के वितरण को लेकर वह कितनी उदार है! कितने प्रयास उसने अपने अंतर्विरोधों के समाहार हेतु किए हैं. और इन सब के लिए वह लोकतंत्र के कितने करीब है. इस कसौटी पर भारतीय संस्कृति उतनी सफल सिद्ध नहीं होती, जितनी बताई जाती है.

सच तो यह है कि स्मृति-ग्रंथों, पुराणों, महाकाव्यों आदि के माध्यम से जो संस्कृति हमारे जीवन में दाखिल होती है, या एक अल्पसंख्यक अभिजन वर्ग द्वारा बहुसख्यक जनसमुदाय पर बरबस थोप दी जाती है, वह सामाजिक न्याय की अवरोधक तथा सामूहिक विवेक का क्षरण करने वाली है. सामान्य नैतिकता एवं लोकादर्शों को अमल में लाने के बजाय वह धर्म के हाथों में खेलती है; और खुद को बड़ी आसानी से उसकी सामंती वृत्तियों के अनुसार ढाल लेती है. वह लोगों से अपेक्षा रखती है कि वे क्या करें, क्या खाएं, क्या पियें, क्या पढ़े-लिखें, और किन लोगों से कैसे संबध बनाएं? न तो उसे मानवीय विवेक की परवाह रहती है, न उसकी रुचियों का परिष्कार. बावजूद इसके जीवन में अनावश्यक दखल देकर, वह समानता और स्वतंत्रता की भावना का हनन करती है. कभी धर्म, कभी समाज और कभी परंपरा-वैविध्य के बहाने, असमानता को मानवीय नियति घोषित करना उसकी मूल प्रवृत्ति रही है. वह असल में शासक संस्कृति है, जो व्यक्ति को जन्म के साथ ही बता देती कि उसका जन्म शासन करने के वास्ते हुआ है या शासित होने के लिए. जो लोग शासक वर्ग में जन्म लेते हैं, अभिजनोन्मुखी संस्कृति का रेशा-रेशा उनकी मदद में जुटा होता है. शासितों की कोटि में जन्मे व्यक्ति, यदि दुर्दशा से उबरना चाहें या इस तरह का सपना भी देखें तो वह लगातार अवरोध उत्पन्न कर, परिवर्तन की चाहत को ही मिटाने पर तुल जाती है. लोगों के सवाल करने की आदत को छुड़ाकर वह उनके निर्मानवीकरण को गति देती है. इससे सामूहिकताबोध, जो संस्कृति का प्रमुख उद्देश्य है, का हृास होता है. सांप्रदायिकता पनपती है; और जनशक्ति छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटकर निष्प्रभावी हो जाती है. इससे परिवर्तन का लक्ष्य निरंतर दूर खिसकता रहता है.

हम भारतीयों, विशेषकर जो लोग स्वयं को हिंदू मानते हैं, का जीवन जन्म से लेकर मृत्यु तक तरह-तरह के कर्मकांडों से बंधा होता है. वे अनेक प्रकार के हो सकते हैं. एक समाज से दूसरे समाज, यहां तक कि एक जाति समूह से दूसरे जाति-समूह के बीच उनका रूप बदलता रहता है. कर्मकांडों का उद्देश्य होता है, किसी महाशक्ति को प्रसन्न करना. उनमें एक पक्ष दाता(जाहिर है काल्पनिक), दूसरा याचक की भूमिका में होता है. याचक अपने श्रेष्ठतम को समर्पित करने की भावना के साथ दाता के आगे नतशिर होता है. तत्क्षण खुद को दाता का प्रतिनिधि घोषित करते हुए पुरोहित बीच में आ टपकता है. याचक द्वारा दाता के नाम पर समर्पित सामग्री के अलावा वह दक्षिणा की भी दावेदारी करता है. कर्मकांडों को लोक की सामान्य स्वीकृति प्राप्त होने के कारण उनसे पैदा स्तरीकरण समाज में गहरी पैठ बना लेता है. तदनुसार जो दाता या उसके स्वयं-घोषित प्रतिनिधि की इच्छा है, उसे उसी रूप में, बगैर किसी ना-नुकर के, स्वीकार कर लेना याचक की विवशता होती है. इसका लाभ शिखर पर बैठे लोग उठाते हैं. राज्य की कुल उत्पादकता में नगण्य योगदान के बावजूद वे किसी न किसी बहाने लाभ के नब्बे प्रतिशत को हड़पे रहते हैं. उसी के दम पर वे दाता की भूमिका निभाए जाते हैं. उनके नेतृत्व में पूरी संस्कृति कर्मकांडों में सिमटकर रह जाती है.

कर्मकांडों की व्याख्या जिन ग्रंथों में है, सब ब्राह्मणों द्वारा रचे गए हैं. उनकी समीक्षा अथवा संशोधन-विस्तार का अधिकार ब्राह्मणेत्तर वर्गों को नहीं है. उनसे बस इतनी अपेक्षा होती है कि ब्राह्मणों द्वारा गढ़े गए लिखित-अलिखित विधान का बगैर ना-नुकुर अनुसरण करें. उनपर किसी भी प्रकार का संदेह, आलोचना, समीक्षा पाप की कोटि में आती है. सांस्कृतिक-सामाजिक असमानता का पोषण करने वाली इस संस्कृति के प्रति विरोध के स्वर आरंभ से ही उठते रहे हैं. उनके दस्तावेजीकरण का काम हमें अपेक्षाकृत उदार एवं समावेशी संस्कृति के करीब ला सकता है. उसे हम जनसंस्कृति अथवा मूल भारतवंशियों की संस्कृति भी कह सकते हंै.

सत्य यह भी है कि कोई भी संस्कृति स्वयं लक्ष्य नहीं होती. वह केवल मार्ग चुनने में मदद करती है. उसका काम मानवीय वृत्तियों को सुसंस्कृत करना है, किसी व्यक्ति या व्यक्तियों की रोजमर्रा की आदतों पर नियंत्रण करना नहीं. विडंबना है कि भारतीय संस्कृति की अधिकांश ऊर्जा नकारात्मक कार्यों में खपती आई है. वह बड़ी आसानी से उन लोगों के हाथों में खेलने लगती है, जिनका काम दूसरों के मूल-भूत अधिकारों का हनन करना है. शिखरस्थ ब्राह्मण उसके विधान का निर्माता, व्याख्याता, पालक-अनुपालक सब होता है. विशेष मामलों में, या यूं कहिए कि अपवाद-स्वरूप संस्कृति के विशिष्ट प्रवत्र्तकों को, जन्मना ब्राह्मण न हों तो भी उन्हें कर्मणा ब्राह्मण मान लिया जाता है. व्यास, वाल्मीकि, महीदास आदि शास्त्रीय परंपरा के ब्राह्मण नहीं हैं. फिर भी उन्हें ब्राह्मण माना गया है. क्योंकि वे उस संस्कृति के सिद्ध संहिताकार हैं, जो वर्ण-व्यवस्था को आदर्श तथा ब्राह्मणों को समाज का सर्वेसर्वा मानकर उन्हें अंतहीन अधिकार सौंप देती है. कुछ लोग इसे भारतीय संस्कृति की उदारता या उसका लचीलापन मानते हैं. असल में यह दूसरे वर्गों के बुद्धिजीवी, उनकी उपलब्धियों का श्रेय हड़प लेने की स्वार्थ-पूर्ण व्यवस्था है. इससे निम्न वर्गों की उच्च स्तरीय मेधा, उच्चस्थ वर्गों की स्वार्थ-सिद्धि में लगी रहती है.

इस प्रवृत्ति के दर्शन ऋग्वेद से लेकर आधुनिक साहित्य तक मौजूद हैं. गुरु उद्दालक के पास सत्यकाम जाबाल जब यह कहता है कि वह घरों में काम करने वाली दासी के गर्भ से जन्मा है और पिता का नाम पता नहीं है, तो महर्षि उसे यह कहकर कि ‘तूने सत्य कहा, ऐसा सत्यभाषी ब्राह्मण पुत्र ही हो सकता है.’-दीक्षा देने को तैयार हो जाते हैं. भारतीय संस्कृति के अध्येता इस उद्धरण को उसके उदात्त लक्षण के रूप में प्रस्तुत करते आए हैं. वस्तुतः यह बौद्धिक धूर्तता है, जिससे ब्राह्मणेत्तर वर्गों को एक ही झटके में ‘मिथ्याभाषी’ घोषित दिया जाता है. सत्यकाम जाबालि की भांति महीदास भी दासी पुत्र था. जन्म से शूद्र किंतु मन-बुद्धि से ब्राह्मण संस्कृति का प्रतिभाशाली संहिताकार. ऋग्वेद शाखा के ‘ऐतरेय ब्राह्मण’, ‘ऐतरेय उपनिषद’ और ‘ऐतरेय आरण्यक’ का रचियता. इस संस्कृति ने महीदास को भी शूद्रों से झटक लिया. अपवादस्वरूप ही सही, ब्राह्मणेत्तर वर्ग के कुछ अतिप्रतिभाशाली बुद्धिजीवियों को अनुलोम परंपरा के अनुसार ब्राह्मण मान लिए जाने की नीति, प्रतिभाहीन ब्राह्मण पुत्रों के लिए शिखर का स्थान सुरक्षित रखती है. स्तर से ऊपर उठने के लिए ब्राह्मणेत्तर वर्ग के बुद्धिजीवियों को जहां विरलतम प्रतिभा, सर्जनात्मक मेधा एवं विभेदकारी ब्राह्मण-संस्कृति के प्रति अटूट निष्ठा का प्रदर्शन करना पड़ता है, वहीं ब्राह्मण-संतति को उसका स्वाभाविक उत्तराधिकारी मान लिया जाता है. प्रमुख प्रतिभाओं के पलायन के बाद निचले वर्ग आवश्यक बौद्धिक नेतृत्व से वंचित रह जाते हैं. दूसरे षब्दों में भारतीय संस्कृति, उसके नामित देवता, कर्मकांड, धर्म-दर्शन आदि केवल ब्राह्मणों का सृजन नहीं हंै. उसमें ब्राह्मणेत्तर वर्गों का भी भरपूर योगदान रहा है. हालांकि लाभ सर्वाधिक ब्राह्मणों ने उठाया है.

ब्राह्मण संस्कृति के व्याख्याकारों की प्रशंसा करनी होगी कि वर्गीय श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए उन्होंने अपनी रचना का श्रेय स्वयं लेने के बजाय वर्गीय श्रेय को प्राथमिकता दी. ब्राह्मण होने के नाते व्यक्तिगत श्रेय-सम्मान तो उन्हें आसानी से मिल ही जाता है. व्यास, याज्ञवल्क्य, वशिष्ट आदि किसी मनीषी के नहीं, गौत्र या परंपरा के नाम हैं. उनका उल्लेख स्मृतिग्रंथों से लेकर रामायण, महाभारत, पुराण यहां तक कि उत्तरवर्ती ग्रंथों में भी, मुख्य सिद्धांतकार के रूप में होता आया है. व्यक्तिगत श्रेय के आगे वर्गीय श्रेय को वरीयता दिए जाने का अच्छा उदाहरण ‘योग वशिष्ट’ है. लगभग एक हजार वर्ष पुराने, 29000 से अधिक पदों वाले तथा शताब्दियों के अंतराल में अनाम लेखकों द्वारा रचित, परिवर्धित इस विशद् ग्रंथ का रचनाकार होने का श्रेय आदि कवि वाल्मीकि को प्राप्त है, जबकि वाल्मीकि का नाम लगभग दो हजार वर्ष पुरानी कृति ‘पुलत्स्य वध’ जो निरंतर प्रक्षेपण के उपरांत ‘रामायण’ महाकाव्य के रूप में ख्यात हुआ-से भी जुड़ा है. ज्ञान को परंपरा में ढाल देने का लाभ तो केवल ब्राह्मणों को जबकि नुकसान पूरे बहुजन समाज को उठाना पड़ा है. वर्ण-व्यवस्था के चलते पोंगा पंडितों को भी बौद्धिक नेतृत्व का अवसर मिलता रहा. पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही धारा के लेखन से मौलिकता का हृास हुआ. चूंकि धर्म-ग्रंथों में प्रक्षेपण अलग-अलग समय में हुआ था, इसलिए उनमें परस्पर विरोधी बातें भी शामिल होती गईं. जिस महाभारत(शांतिपर्व) कहा गया था, ‘वर्ण-विभाजन जैसी कोई चीज असलियत में नहीं है. यह पूरी सृष्टि ब्रह्म है, क्योंकि इसे ब्रह्मा ने बनाया है.’ उसी में द्रोणाचार्य द्वारा एकलव्य का अंगूठा मांग लेने के धत्तकर्म को भी ‘धर्म’ मान लिया गया.

उधर व्यवस्था से अनुकूलित गरीब-विपन्न लोग निरंतर यह आस बांधे रहे कि जो पंडित लोग चैंसठ लाख योनियों का हिसाब रखते हैं, आदमी के ‘भाग्य’ का अगला-पिछला सब बांच लेने का दावा करते हैं, वे उनका भी ‘हिसाब’ रखेंगे! यदि परमात्मा छोटे-बड़े, गरीब-अमीर, ब्राह्मण और शूद्र में भेद नहीं रखता तो वे भी नहीं रखेंगे. इस भरोसे के साथ वे अपने अधिकारों की ओर से, इतिहास की ओर से मुंह फेरे रहे. समय के दस्तावेजीकरण के प्रति निचले वर्गों की उदासीनता का लाभ ऊपर वालों ने खूब उठाया. उन्होंने कर्मफल का सिद्धांत पेश किया. उसके जरिये शोषित वर्गों को समझाया जाने लगा कि उनकी दुर्दशा के लिए कोई दूसरा नहीं, वे स्वयं जिम्मेदार हैं. संस्कृति के आवरण में उन्होंने पहले अवसर छीने, फिर मान-सम्मान. अपने से नीचे के लोगों को बर्बर, असभ्य, गंवार, गलीच घोषित करके खुद इतिहास में तोड़-मरोड़ करते रहे. उनके द्वारा रचे गए इतिहास में ‘भेड़ों’ और ‘मेमनों’ को जंगल में अव्यवस्था का दोषी बताया जाता रहा तथा ‘भेड़ियों’ और ‘लक्कड़बघ्घों’ को प्रत्येक अपराध से बरी रहने की व्यवस्था की गई. पंडित, देवता, करुणानिधान, अन्नदाता, रक्षक, सेठ, साहूकार जैसे सुशोभन विशेषण उन्होंने अपने लिए सुरक्षित कर लिए. पिछले दो हजार साल का सांस्कृतिक खेल उनकी चालों और समझौतापरस्ती से बना है. ऐसी संस्कृति में जनसाधारण के लिए न्याय की उम्मीद करना खुद को धोखा देना है.

‘सांस्कृतिक वर्चस्व’ बनाए रखने की कोशिश के समानांतर उससे उबरने की छटपटाहट भी मानव-इतिहास का हिस्सा रही है. भारत में उसका पहला उदाहरण मक्खलि गोशाल के चिंतन-कर्म में दिखाई पड़ता है. वह पहला विद्वान था जिसने श्रम-शोषक, परजीवी ब्राह्मण संस्कृति के बरक्स समाज में मेहनतकशों, शिल्पकारों तथा उसके श्रम-कौशल के सहारे आजीविका जुटाने वाले लोगों को संगठित कर आजीवक संप्रदाय की स्थापना की थी. मक्खलि की लोकप्रियता का अनुमान इससे भी लगाया जाता है कि उसके जीवनकाल में आजीवक संप्रदाय के अनुयायियों की संख्या बौद्ध अनुयायियों से अधिक थी. विद्वता के मामले में भी वह अद्वितीय था. सम्राट प्रसेनजित ने बुद्ध से कहा था कि वह गोशाल को उन(बुद्ध)से अधिक प्रतिभाशाली मानते हैं. बुद्ध की हिंसा तथा कर्मकांड विरोधी भौतिकवादी विचारधारा पर आजीवक संप्रदाय का ही प्रभाव था. मक्खलि तथा बुद्ध के अलावा निगंठ नागपुत्त, संजय वेठलिपुत्त, पूर्ण कस्सप, अजित केशकंबलि, कौत्स आदि विद्वान भी यज्ञों में दी जाने वाली बलि तथा कर्मकांड का विरोध कर रहे थे. निगंठ नागपुत्त आगे चलकर महावीर स्वामी के नाम से जैन दर्शन के प्रवर्त्तक माने गए. इनमें सर्वाधिक ख्याति मध्यमार्गी गौतम बुद्ध को मिली, जो उस समय की चर्चित दार्शनिक समस्याओं ‘आत्मा’, ‘परमात्मा’ आदि पर विमर्श करने के बजाय उन्हें टालने के पक्ष में थे. क्षत्रिय कुल में जन्म लेने के कारण बुद्ध और उनके विचारों को उन राजदरबारों में आसानी से प्रवेश मिलता गया, जो ब्राह्मण पुरोहितों के बढ़ते दबाव से तंग आ चुके थे. ‘आजीवक’ और ‘लोकायत’ धारा का प्रतिनिधि साहित्य आज अप्राप्य है. उनका छिटपुट उल्लेख ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन ग्रंथों में ही प्राप्त होता है. सभी में उनकी पड़ताल नकारात्मक दृष्टिकोण के साथ की गई है. संकेत साफ हैं कि विजेता संस्कृतियों ने, पराजित संस्कृति के ग्रंथों को मिटाने का काम पूर्णतः योजनाबद्ध ढंग से किया.

धर्म और संस्कृति का आधार कहे जाने वाले ग्रंथों में, लंबे प्रक्षेपण के बावजूद ऐसे अनेक तत्व हैं, जो वैकल्पिक जनसंस्कृति के प्रवत्र्तक और संवाहक रहे हैं. महिषासुर, बालि, पौराणिक सम्राट वेन के अलावा गणेश, शिव जैसे अनेक नाम मिथक भी हो सकते हैं और यथार्थ भी. लेकिन यदि इन्हें मिथक मान लिया जाए तो ब्राह्मण संस्कृति के प्रमुख संवाहक ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र, हनुमान तथा अन्य देवी-देवताओं को भी मिथक मानना पड़ेगा. क्योंकि उसका पूरा का पूरा भवन इन्हीं के कंधों पर टिका है. शिव भारत की आदिम जातियों के मुखिया रहे होंगे. उनके सहयोगी के रूप में भूत, पिशाच, प्रेत आदि हमें भारत के आदिम कबीलों की याद दिलाते हैं. आर्यों ने शिव को तो अपनाया. मगर उनके सहयोगी कबीलों की पूरी तरह उपेक्षा की. अप्रत्यक्ष रूप से बख्शा शिव को भी नहीं गया. उन्हें आक, धतूरा खाने और भभूत लगाकर रमने वाले अवधूत की तरह दर्शाते हुए सृष्टि चलाने(शासन करने) का अधिकार ‘ब्राह्मण ब्रह्मा’ तथा ‘क्षत्रिय विष्णु’ की बपौती मान लिया गया. गणेश का मिथक भी प्राचीन भारतीय गणतंत्रों के मुखिया की याद दिलाता है. गणतांत्रिक व्यवस्थाओं में मुखिया को प्रथम सम्मानेय माना जाता था. कालांतर में बड़े राज्यों का गठन होने लगा तो सभा का नेतृत्व करने वाले गण-प्रमुख के चरित्र का भी विरूपण किया जाने लगा. बैठे-बैठे सूंड लटक आना और लंबोदर जैसे प्रतीक गण-प्रमुख पर कटाक्ष तथा उसे अपमानित करने के लिए रचे गए.

‘सामाजिक न्याय’ का सपना देखने वाले बुद्धिजीवियों की असली लड़ाई धार्मिक वर्चस्ववाद, विपन्नता और जड़ हो चुकी वर्ण-व्यवस्था से है. इस लक्ष्य की सिद्धि वर्चस्वकारी संस्कृति से मुक्ति के बिना असंभव है. ब्राह्मण संस्कृति ईश्वरीय न्याय में विश्वास करती है. न्याय का स्वरूप क्या हो? वंचित तबकों की उन्नति में वह किस भांति सहायक हो सकता है-यह नहीं बताती. ‘सामाजिक न्याय’ के पैरोकारों का प्रथम लक्ष्य ऐसी संस्कृति का पुनरुद्धार करना है, जिसमें संगठित धर्म का हस्तक्षेप न्यूनतम हो. जो पूरी तरह उदार एवं लोकतांत्रिक हो. इसके लिए आवश्यक है कि प्राचीन संस्कृति के उन प्रतीकों को रेखांकित किया जाए जो कभी ब्राह्मण संस्कृति के विरोध में या उसके समानांतर खड़े थे. क्या यह धर्म के भीतर एक और धर्म की खोज सिद्ध नहीं होगी? यह आशंका पूर्णतः निर्मूल नहीं है. ध्यान यह रखना होगा कि समानांतर संस्कृति के इन प्रतीकों, नायकों, मिथकों का योगदान दमित-शोषित वर्गों के आत्मविश्वास को लौटाने तक सीमित हो. यह एहसास दिलाने के लिए हो कि वे हमेशा से ही ‘ऐसे’ नहीं थे. वे न केवल ‘वैसे’ बल्कि कई मायनों में उनसे भी बढ़कर थे-रावण की लंका में विभीषण को अपनी आस्था और विश्वास के साथ ससम्मान जीने की स्वतंत्रता प्राप्त थी. रामराज्य में शंबूक से यह स्वतंत्रता छीन ली जाती है. इसी तरह राक्षस-सम्राट जलंधर अपनी विष्णु-भक्त पत्नी वृंदा के साथ सुखी जीवन जीता है और उनके दांपत्य के बीच अविश्वास की किरच तक मौजूद नहीं है, जबकि सीता को रावण की अशोकवाटिका में रहने के लिए भी अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ता है. यह गरीबी तथा जाति-भेद द्वारा पैदा की गई अन्यान्य विषमताओं के विरुद्ध जंग भी है. सदियों से जाति के आधार पर सुख-सुविधा और सम्मान भोगते आए समूह, परिवर्तनकामी समूहों पर जातिभेद को बढ़ावा देने का आरोप लगा रहे हैं. दूसरी ओर जातीय उत्पीड़न का शिकार रहे वर्गों को लगता है कि लोकतांत्रिक माहौल का लाभ उठाकर वे अपने संघर्ष को आगे बढ़ा सकते हैं. इसलिए वे जाति को संगठनकारी ‘टूल’ की तरह इस्तेमाल कर रहे है. लेकिन जाति-आधारित संगठनों की अपनी परेशानियां हैं. इस देश में हजारों जातियां हैं. अपनें दम पर कोई भी जाति परिवर्तनकारी ताकत बनने में अक्षम है. अतः लोग समझने लगे हैं कि सामाजिक न्याय के संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए समानांतर लड़ाई संस्कृति के मोर्चे पर भी लड़नी होगी. जीत उन्हीं की होगी जो संगठित रहने के साथ-साथ सामूहिक विवेक से काम लेंगे.

ओमप्रकाश कश्यप

प्राचीन भारत में दास प्रथा : एक सामाजिक-सांस्कृतिक कलंक

सामान्य

अरस्तु ने कहा था, कुछ व्यक्तियों का जन्म दास बनने के लिए ही हुआ है। मैं इससे इन्कार करता हूं। क्योंकि मैं नहीं मानता कि कुछ लोग जन्मजात मालिक होते हैं—डेनियल वी. चेप्पल

कहा जाता है कि सभ्यता को दासों की जरूरत पड़ती है। मैं कहता हूं, गुलामों की मदद से कोई भी सभ्य और सुसंस्कृत समाज नहीं बनाया जा सकता—विल्हेम रीश

संस्कृति के बारे में जितनी अच्छी-अच्छी बातें संभव हैं, सब भारतीय संस्कृति में भी कही जाती हैं। जैसे कि भारतीय संस्कृति उदार है। समरस है। पुरानी है। नए विचारों का स्वागत करने वाली है। दास प्रथा के बारे में पूछा जाए तो अधिकांश का उत्तर होगा—‘नहीं, यह तो पश्चिम की विशेषता है। खासकर रोम की। भारत का इससे दूर-दूर तक नाता नहीं है।’ जवाब में कोई देवदासी का जिक्र छेड़ दे तो आस्था का मामला कहकर तुरंत दबा दिया जाएगा। बड़े-बड़े विद्वानों का भी यही हाल रहा है। ‘हिंदू सभ्यता’ में राधाकुमुद मुखर्जी इस कुप्रथा पर लगभग मौन साधे रहते हैं। रामविलास शर्मा कुछ ईमानदार हैं। उनके अनुसार यह प्रथा भारत में थी, मगर बहुत बड़े स्तर पर नहीं।1 हालांकि इससे हमारी समस्या कम नहीं होती। महाभारत(सभापर्व-52/45, विराटपर्व-18/21) में युधिष्ठिर द्वारा 88,000 स्नातकों में से प्रत्येक को 30, कुल 26,40,000 दासियां दान में देने का उल्लेख है। यह एक राजा द्वारा अवसर-विशेष पर दिए गए दान का उदाहरण है। धर्मशास्त्रों में एक बार में हजारों दासियां दान करने के उल्लेख कई जगह हैं। रामविलासजी दास-प्रथा के और कितने बड़े स्तर की कल्पना करते थे, कहना मुश्किल है। काणे थोड़ा संतुलित करने का प्रयास करते हैं—‘ऐसा प्रतीत होता है कि यहां दास का अर्थ गुलाम या अर्धदास है।’2 यहां ‘गुलाम’ और ‘दास’ में पारिभाषिक दृष्टि से क्या अंतर है, यह तो काणे साहब ही बता सकते हैं। रोम में अर्धदास को ‘शेरिफ’ अथवा ‘हेलोट’ कहा जाता था। वे कृषि-भूमि के साथ जुड़े होते थे। भूमि के खरीद-बिक्री में उनकी खरीद-फरोख्त भी शामिल होती थी। उपर्युक्त ऋचा में कृषि-भूमि अथवा खेती का कोई उल्लेख नहीं है। कौटिल्य या नारद के विभाजन में कृषिदास का अलग से कोई उल्लेख नहीं है। ए. एल. बाशम ने ‘दास’ शब्द का प्रयोग आक्रमणकारी आर्यों द्वारा पराजित प्राग्वैदिक अनार्यों के लिए किया है।

सिंधु सभ्यता में दास

भारत सहित प्राचीन सभ्यताओं में दास प्रथा के कम से कम 5200 पहले तक के प्रमाण उपलब्ध हैं। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो आदि सिंधु सभ्यता(3300—1750 ईस्वीपूर्व) के प्रमुख नगरों में बड़े-बड़े भवनों के साथ एक कमरे के मकान भी मिले हैं। उससे तत्कालीन समाज के आर्थिक-सामाजिक विभाजन का अनुमान लगाया जाता है। पुरातत्ववेत्ता जॉन मार्शल के अनुसार एक कमरे के मकान नौकरों अथवा दासों के हो सकते हैं। हालांकि यह केवल अनुमान है। व्हीलर ने हड़प्पा और सुमेरियन सभ्यता के बीच हाथीदांत, कपास के साथ-साथ दासों के व्यापार की संभावना भी व्यक्त की है। उसके अनुसार लागेश के बाउ के मंदिर परिसर में एक फैक्ट्री थी। उसमें 21 डबलरोटी बनाने वाले, 27 दासियां, 25 शराब खींचने वाले और छह दास, बुनकर और कताई करने वाले, लुहार तथा अन्य शिल्पकर्मी काम करते थे। व्हीलर के अनुसार कारखाने की संरचना हड़प्पा शैली के अनुरूप थी।3 अब यदि मान लिया जाए कि हड़प्पा और सुमेरियन सभ्यता के बीच दासों का व्यापार भी होता था, तो सिंधु सभ्यता में दासों के मौजूगी स्वतः प्रमाणित हो जाती है। दास प्रथा की उत्पत्ति का संबंध, खेती के विकास से भी बताया जाता है। उसके लिए अतिरिक्त श्रम की आवश्यकता थी। इसलिए आरंभ में ताकत के बल पर लोगों को खेतों में काम करने के लिए बाध्य किया जाने लगा। कुछ लोग जो प्रकृति-आधारित खेती की अनिश्चितता के स्थान पर निश्चित आजीविका को पसंद करते थे, वे दूसरों को अपना श्रम बेचने लगे होंगे। कालांतर में उसी से दास प्रथा का जन्म हुआ, फिर धीरे-धीरे इस प्रथा को समाज की स्वीकृति मिलने लगी। खेती के अलावा घरों, उद्यमों में भी दासों की मदद ली जाने लगी। ऐसा विकास के आरंभिक चरणों में सभी समाजों में हुआ था। फिर जैसे-जैसे राज्य नामक संस्था मजबूत हुई, दासप्रथा के अन्यान्य रूपों का विस्तार होता गया। गौरतलब है कि भारतीय और रोम तथा सुमेरियन समाज में दासों की स्थिति में बड़ा अंतर है। रोम और सुमेर में दास तत्कालीन अर्थव्यवस्था के उपकरण मात्र थे। वे खरीदे-बेचे जाते थे। उस दासप्रथा का जन्म सामंतशाही की चरम अवस्था में हुआ था। सिंधु सभ्यता में दासों की उपस्थिति के जो संकेत मिले हैं, वे रोम और सुमेर की तरह आर्थिक दास ही हैं। जिनका उस समय की अर्थव्यवस्था के संचालन में बड़ा योगदान था। लेकिन जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं, भारतीय दासप्रथा वर्णव्यवस्था के अनुरूप ढलने लगती है।

ऋग्वेदकालीन दासप्रथा

प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में ऐसे शताधिक विवरण मौजूद जिनसे तत्कालीन भारतीय समाज में दास प्रथा की बड़े स्तर पर उपस्थिति का पता चलता है। ऋग्वेद में ‘दास’ शब्द अनेक स्थानों पर आया है। उसमें दासों के खरीदने-बेचने, भेंट करने, उपहार अथवा दान में देने, यहां तक कि दान लेने के भी, अनेकानेक प्रसंग हैं। ऋग्वेद(8/56/3) के बालखिल्य सूक्तों में पृषध्र मुनि की उक्ति है—‘शतं मे गर्दभानां, शतमूर्णावतीनाम्। शतं दासाः अति स्रजः।।

‘मुझे एक सौ गधे, एक सौ भेड़ें और एक सौ दास दो।’—यहां दास को गधे और भेड़ के समकक्ष रखकर उसे मनुष्य की संपदा माना गया है।

ऋग्वेद में मोटे तौर पर दो प्रकार के दासों का उल्लेख है। पहले वे जो अपने स्वामी की संपत्ति कहे जाते थे। जिनके शरीर पर उनके मालिक का अधिकार होता था। यानी ऐसे दास जिनका जिक्र होते ही श्रीविहीन, दीन-हीन, अपने मालिक के इशारों पर नाचने वाले व्यक्ति की छवि मन में उभर आती है। इस श्रेणी में आर्य और अनार्य दोनों प्रजातियों के दास शामिल थे। दूसरी श्रेणी उन अनार्य दासों की थी, जो अपेक्षाकृत साधन-संपन्न थे। जिनके पूर्वजों ने सिंधु सभ्यता की नींव रखी थी। उस समय वह सभ्यता अपने पराभवकाल में थी, मगर उसका वैभव पूरी तरह क्षीण नहीं हुआ था। 8 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक में फैली उस सभ्यता के मूल बाशिंदों से आर्य कहीं जूझ रहे थे, तो कहीं मैत्री का हाथ बढ़ा रहे थे। ऋग्वेद(7/99/4) में वृषशिप्र नामक दास का उल्लेख है, जिसमें विष्णु और इंद्र की स्तुति करते हुए कहा गया है—‘तुमने वृषशिप्र नामक दास की माया को संग्राम में विनष्ट किया है।’ एक मंत्र(ऋग्वेद-10/22/8) से आर्यों एवं अनार्यों के बीच भीषण संघर्ष का पता चलता है। युद्धरत आर्य इंद्र की स्तुति कर, उससे अनार्यों के विनाश के लिए प्रार्थना करते हैं—‘हम सब चारों ओर से दस्युओं से घिर चुके हैं। वे यज्ञ कर्म नहीं करते(अकर्मन)। न वे किसी वस्तु को मानते हैं(अमंतु)। उनके व्रत हमसे भिन्न हैं(अन्यव्रत)। वे मनुष्यों जैसा व्यवहार नहीं करते(अमांतुष)। हे शत्रुनाशक इंद्र! तू उन दासों का विनाश कर।’ जाहिर है, इस श्रेणी के ‘दास’ केवल नाम के दास थे—‘दासों और दस्युओं, दोनों ही के कब्जे में अनेक किलाबंद बस्तियां थीं….माना जाता है कि घुमक्कड़ आर्यों की आंखें दुश्मनों की बस्तियों पर संचित संपत्ति पर लगी हुई थीं। उसके लिए दोनों में सतत संघर्ष होता रहता था….ऐसे दो दास प्रमुखों का उल्लेख किया गया है कि जो धनलोलुप माने गए हैं। कामना की गई है कि इंद्र दासों की शक्ति को क्षीण करें तथा उनके द्वारा जमा की गई संपत्ति को लोगों में बांट दें।’4 

‘निरुक्त’ में ‘दास’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘दश्’ धातु से हुई है। इसका तात्पर्य संपन्न करना है। तदनुसार जो व्यक्ति अपने स्वामी के विविध कार्य संपन्न करता है, वह दास कहलाता है। इसका अर्थ ‘देना’ भी है। सवाल है कि दास का देने से क्या संबंध है? जिसकी देह पर भी उसके स्वामी का कब्ज़ा है, जिसे संपत्ति रखने का कोई भी अधिकार नहीं है, वह दूसरों को क्या देगा. ऋग्वैदिक काल के  ‘तरुक्ष’ और ‘बल्बूथ’ नामक अनार्य दास इस कसौटी पर खरे नजर आते हैं। श्रेणी में आते थे। ऋग्वेद में दोनों का उल्लेख दास-प्रमुख के रूप में हुआ है। ऋग्वेद(8/46/32) में लिखा गया है—‘मैंने बल्बूथ नामक दास से सौ गौ और अश्व प्राप्त किए थे।’ बल्बूथ की भांति तरुक्ष नामक दासप्रमुख का उल्लेख भी दानदाता के रूप में आया है। इन दोनों की ओर से पुरोहितों को जो उपहार दिए गए थे उससे उनकी बड़ी सराहना हुई थी।5 ऋग्वेद(8/19/36) में त्रसदस्यु को पचास युवतियां दान करते हुए बताया गया है। निश्चय ही वे युवतियां दासकर्म के निमित्त दान की गई होंगी। ऋग्वेद(10/33/4) में त्रसदस्यु के पुत्र कुरुश्रवण राजा को भी श्रेष्ठ दाता बताया गया है—‘मैं कवष ऋषि हूं। मैं त्रसदस्यु के पुत्र कुरुश्रवण राजा के पास याचना करने गया था; क्योंकि वे श्रेष्ठ दाता हैं।’ अथर्ववेद के आरंभिक अंशों में भी दासप्रथा का विवरण दिया है। उसमें दासियों के संबंध में प्रमाण मिले हैं। उसमें एक दासी का उल्लेख है जिसके हाथ भीगे होते थे। वह ओखल-मूसल कूटती थी; तथा गाय के गोबर पर पानी छिड़कती थी।6 

केवल संपदा नहीं, ज्ञान के क्षेत्र में भी दासों का हस्तक्षेप था। ऋग्वेद के उद्गाता ऋषियों में एक महत्त्वपूर्ण नाम कक्षीवान का है। उनका जन्म दीर्घतमस और उशिज नामक स्त्री जो दास कन्या थी, के संसर्ग से हुआ था। उशिज अंगदेश की महारानी की दासी थी। ऋग्वेद में एक बड़ा ही महत्त्वपूर्ण और लोकोपयोगी प्रसंग है, जुआरी का। उसके उद्गाता ऋषि कवष ऐलूष भी एक दासी की संतान थे। सूर्यकांत बाली ने ‘भारत गाथा’ में कवष ऐलूष को ‘वैदिक कविता को जमीन से जोड़ने वाला कवि’ कहा है। कवष के ऋग्वेद के दशम मंडल में कुल पांच(10/30-34) मंत्र हैं। जिनमें वह जुआरी की मनःस्थिति का वर्णन करता है। अंतः में उसे महत्त्वपूर्ण लौकिक संदेश तक ले जाता है—‘ओ जुआरी। जुआ मत खेल। मत खेल जुआ। जा अपने खेतों को देख। भार्या को देख। खेती करेगा तो धन आएगा। उसी से तुझे इज्जत मिलेगी। उसी से गौएं आएंगी। तेरी भार्या प्रसन्न होगी….घर जा। जुआ मत खेल।’ इस प्रसंग को महाभारतकार ने युधिष्ठिर के प्रसंग में ज्यों का त्यों अपना लिया गया है। बौद्ध धर्म के उभार से पहले भारत में भौतिकवादी दर्शन अपने शिखर पर था। उस समय के पांच प्रमुख आजीवक चिंतकों में से एक पूर्ण कस्सप को दास बताया गया है। बाकी दो आजीवक विद्वानों अजीत केशकंबलि और मक्खलि गोसाल की समाजार्थिक स्थिति भी दास की तरह ही थी।

ऋग्वेद(1/24) में शुनःशेप का कथासूत्र आता है। उस कथा का विस्तार ऐतरेय ब्राह्मण, भागवत पुराण, ब्रह्मपुराण आदि में भी देखने को मिलता है। कहानी के अनुसार राजा हरिश्चंद्र संतान की आकांक्षा के साथ वरुण की प्रार्थना करता है। वरुण प्रसन्न होते हैं। परंतु उनका वरदान सशर्त है—‘तुम्हारे संतान तो अवश्य होगी। लेकिन उसके लिए तुम्हें बलि देनी होगी।’ वरदान के फलस्वरूप हरिश्चंद्र के रोहित नामक पुत्र का जन्म होता है। लेकिन राजा बलि देना भूल जाता है। आखिरकार उसे याद दिलाया जाता है। रोग से पीडि़ता, दारुण अवस्था में हरिश्चंद्र 100 गायों के बदले अजीगर्त के पुत्र शुनःशेप को बलि के लिए खरीद लेता है। बाद में विश्वामित्र उसकी रक्षा करते हैं।

ऋग्वेद(2/12/4) तथा अथर्ववेद(20/34/4) में कहा गया है कि इंद्र ने दासों को गुफाओं में रहने को बाध्य कर दिया था। अनार्य दासों को आर्य ‘असुर’ मानते थे(ऋग्वेद, 9/71/2)। उन्हें पराधीन बनाने की जिम्मेदारी इंद्र पर डाली गई है। इंद्र से दासों को पराधीन करने के लिए जिस तरह बार-बार प्रार्थना की गई है, उससे लगता है, कि यह संबोधन उस समय के पूरे आर्येत्तर समुदाय के लिए रहा होगा, जो आर्यों के आगमन के पहले से ही इस भूभाग पर रहते आ रहे थे। ऋग्वेद में ‘दास’ के अलावा ‘दस्यु’ शब्द का भी कई बार प्रयोग हुआ है। सामान्यत दासों एवं दस्युओं को एक मान लिया जाता है। लेकिन ऋग्वेद में दस्युहत्या के उल्लेख हैं, जबकि दासहत्या का कोई उल्लेख नहीं है। दासों की अपेक्षा दस्युओं के विनाश तथा उन्हें पराधीन बनाने की चर्चा अधिक की गई है। इंद्र से अनुरोध किया गया है कि वे दस्युओं से युद्ध कर उन्हें परास्त करें, ताकि आर्यों की शक्ति बढ़ सके। ऋग्वेद(4/30/21) के एक प्रसंग में 30 सहस्र दासों को माया द्वारा मूर्छित करने का उल्लेख है। इससे पता चलता है कि दस्यु भारत आर्यों के आने से पूर्व शासक कबीले थे। ऋग्वेद में दस्युओं की हत्या की चर्चा कम से कम 12 स्थानों पर हुई है। अधिकांश हत्याएं इंद्र द्वारा ही कराई गई है।7 अंतर्जातीय युद्धों में दासों को भी सहायक सेना के रूप भर्ती किया जाता था। बावजूद इसके ‘कृष्णवर्ण अनार्यों को पराजित करना हंसी-खेल न था। अनार्य अपनी बढ़ी-चढ़ी सभ्यता के साथ अपने दुर्गों में सुरक्षित थे। ऋग्वेद(1/4/1/3) में उनके सैकड़ों पुरों और दुर्गों का उल्लेख है। उनमें लोहे(आयसी, 2/58/8), पत्थर(अश्ममयी, 4/30/20), लंबे-चौड़े(पृथ्वी), विस्तृत(उर्वी), गउओं से भरे हुए(गोमती, अथर्व 8/6/23), सौ खंबों वाले(शतभुजी) तथा शरतकालीन जलौघ से बचाने वाले दुर्ग शामिल थे.

अनार्य दास काले रंग(कृष्ण-योनि) के और अनास या चपटी नाक वाले थे। इसके अलावा कुछ सामाजिक-सांस्कृतिक भिन्नताएं भी थीं; यथा—

1. उनकी भाषा वैदिक-संस्कृति से भिन्न थी जो स्पष्ट नहीं थी(मृध-वाक्)।

2. वे वैदिक कर्मकांड से शून्य थे।(अकर्मन)

3. वे वैदिक देवों को नहीं पूजते थे(अदेवयु)।

4. वे देवों के लिए भक्ति से रहित थे(अब्रह्मन्)।

5. वे यज्ञ से विरहित थे(अयज्वन्)।

6. वे वैदिक व्रतों का पालन नहीं करते थे।(अव्रत)।

7. उनके स्थान पर भिन्न प्रकार व्रतों या धार्मिक नियमों को मानते थे(अन्यव्रत)।

8. वे वैदिक देवों के निंदक थे(देवपीयु)।

9. वे लिंग की पूजा करते थे(शिश्नदेव)।

ऋग्वेद में इंद्र को पुरंदर और शत्रु हंता कहा गया है। इसलिए कि उसने अनार्यों के सैकड़ों दुर्गों को नष्ट किया था। हजारों हत्याएं की थीं। इंद्र ने ये हत्याएं क्यों कीं? इन्हें समझना कठिन नहीं है। आर्य अपने लिए बेहतर देश की खोज में भारत तक पहुंचे थे। भारत पहुंचने पर उनका सिंधुवासियों से सामना हुआ। जो अपनी नागरी सभ्यता पर गर्व करने वाले, भले और शांतिप्रिय लोग थे। आर्यों ने कहीं बलपूर्वक, तो कहीं सहयोग-समझौते से सिंधु सभ्यता के मूल निवासियों को अपने प्रभाव में लेना आरंभ किया। इस कार्य में उन्हें जैसे-जैसे सफलता मिली, उनका लक्ष्य भी बदलता गया। राजनीतिक विजय के बाद उनका लक्ष्य था, देव-संस्कृति की श्रेष्ठता को स्थापित करना; तथा अनार्यों की श्रम संस्कृति, जिसका विकास कृषि के विकास के साथ-साथ हुआ था, को हेय सिद्ध कर, धीरे-धीरे नष्ट कर देना।

गौरतलब है कि अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक श्रेष्ठता को श्रेष्ठतम मानकर, पराजित समूहों को अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक परिधि में लाने का काम लगभग सभी ब्राह्मणेत्तर धर्मों और संस्कृतियों में हुआ था। ईसाई और इस्लाम के अनुयायियों ने तो उसके लिए बल-बुद्धि दोनों का प्रयोग किया था। मगर ब्राह्मणों ने एकदम उलटा तरीका अपनाया था। वर्ण-व्यवस्था की मदद से उन्होंने न केवल आर्येत्तर समूहों को, अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सेदारी से दूर रखा, अपितु अपने ही एक हिस्से पर जिसे उन्होंने शूद्र की संज्ञा दी थी, ऐसे अनेक प्रतिबंध लागू कर दिए जिससे उनका सामाजिक जीवन, अत्यंत कष्टकारी होता गया। इसके पीछे आर्यों की कुंठा का योगदान भी रहा होगा। सिंधुवासी समृद्ध नागरी सभ्यता के उत्तराधिकारी थे, जो समकालीन संस्कृतियों से श्रेष्ठतम थी। 1500 ईस्वीपूर्व में आर्यों के आगमन तक, उसका प्राचीन वैभव यद्यपि क्षीण होने लगा था, तथापि घुमक्कड़ आर्यों की संस्कृति की अपेक्षा वे कहीं अधिक विकसित थे। यह जानते हुए कि भौतिक प्रगति के मामले में वे सिंधुवासियों से होड़ कर पाना असंभव है, आर्यों ने यज्ञ केंद्रित वायवी संस्कृति की नींव रखी। उन्होंने प्राकृतिक शक्तियों का मानवीकरण किया। दावा करने लगे कि यज्ञादि के माध्यम से वे देवताओं से सीधे संवाद कर सकते हैं। आवश्यकता पड़ने पर उन्हें बुला भी सकते हैं। चूंकि उन दिनों सिंधु सभ्यता अपने अवसानकाल में थी, इसलिए एक समृद्ध सभ्यता के पराभव से निराश हुए सिंधुवासी धीरे-धीरे ब्राह्मणों की वायवी संस्कृति के प्रलोभन में फंसने लगे। ब्राह्मणों ने उन्हें आर्य संस्कृति में जगह दी, मगर इसके लिए उन्हें अपना आत्मसम्मान गंवाना पड़ा। ब्राह्मणों ने उन्हें शूद्र और दास के रूप में स्वीकार किया। दासों की कोई जाति नहीं थी। मगर कई शूद्र जातियों का सामाजिक स्तर शूद्र से भी बदतर था।

ऋग्वेद की कई ऋचाएं इसकी साक्षी हैं कि आरंभिक विजयों के साथ ही आर्यों को अपनी सांस्कृतिक विजय की चिंता होने लगी थी। वे अनार्यों के संसाधनों को कब्जाने के साथ-साथ उनकी संस्कृति को भी तहस-नहस कर देना चाहते थे। कभी छल तो कभी बल-पूर्वक वे लड़ाई को जीतते भी रहे। यह लड़ाई आसान नहीं थी। लोग ईसाइयों पर आरोप लगाते हैं कि मिशनरियों ने जनता के बीच जाकर लोगों को धर्मांतरण के लिए उकसाने, प्रलोभन देकर अपनी ओर मिलाने की कोशिशें कीं। वे इस्लाम के प्रसार हेतु जेहाद छेड़ने वाले मुस्लिमों को भी दोषी ठहराते हैं। जबकि भारत में सबसे पहला ‘जेहाद’ तो आर्यों ने अनार्यों के साथ किया था। बाद में वैसा ही जेहाद पुष्यमित्र शुंग ने वौद्धों का कत्लेआम करके किया था।

उपनिषदों में दासप्रथा

उपनिषदों को आमतौर पर दार्शनिक विमर्श के लिए जाना जाता है। कहा जाता है कि वेदों में जो दार्शनिक विचार सूत्र रूप में दिए हैं, उपनिषदों में आकर वे स्वतंत्र धारा का रूप ले लेते हैं। उपनिषदों में भी सबसे बड़ा है—छांदोग्योपनिषद। उसके चौथे अध्याय में राजा जानश्रुति और वायु को सृष्टि का मूल तत्व मानने वाले ऋषि रैक्व का संदर्भ आता है। रैक्व की ख्याति से प्रभावित जानश्रुति धर्मोपदेश की कामना के साथ अपनी पुत्री और धन-धान्य उन्हें भेंट कर देता है। उपनिषदों में ऐसे और प्रसंग भी हैं, जिनमें स्त्री के साथ दास जैसा व्यवहार किया गया है। कुछ विद्वान ऋग्वेद के दिवोदास को जो स्वयं कई ऋचाओं के उद्गाता थे, दासी-पुत्र मानते हैं।9

दासियों से मनोरंजन का काम लेने का भी उल्लेख है। तैत्तिरीय संहिता में सिर पर कलश रखकर नाचती-गाती हुई दासियों का वर्णन आया है। इसी ग्रंथ में दास के दान का भी उल्लेख है(2/2/6/3)। कठोपनिषद में दासियां नचिकेता को अपनी ओर लुभाने का यत्न करती हैं।11 ऐतरेय ब्राह्मण(39.8) में जिक्र आता है कि राजा ने राज्याभिषेक वाले पुरोहित को दस हजार दासियां और दस हजार हाथी दिए। वृहदारण्यकोपनिषद्(4.4.23) में आया है कि याज्ञवल्क्य से बृह्मविद्या की शिक्षा लेने के पश्चात जनक ने उनसे कहा, ‘विदेहों के साथ मैं स्वयं को दास बनने की कामना के साथ, आपको दान-स्वरूप प्रदान करता हूं।’ छांदोग्योपनिषद(7.24.2) में लिखा है, ‘इस संसार में लोग गायों, घोड़ों, हाथियों, सोने, खेतों, घरों एवं दासियों के साथ अपने घरों को समृद्ध करते हैं।’ इसी उपनिषद के एक प्रसंग में राजा अश्वपति ने सत्ययज्ञ से कहा था—‘खच्चरों से जुता हुआ यह रथ, दासियों तथा हार सहित प्रस्तुत है।12 इससे पता चलता है कि ऋग्वेदयुगीन दास प्रथा का वेदोत्तरकाल में खूब विकास हुआ था। यह प्रथा तत्कालीन अभिजन समाज के लिए गर्व की बात थी। यहां तक कि स्वयं को तापस और साधक कहने वाले तथाकथित वेदज्ञ ब्राह्मण भी उससे बचे न थे। आरुणि जब अपने पुत्र श्वेतकेतु के साथ ज्ञान-प्राप्ति की आकांक्षा में पांचाल नरेश प्रवाहण जाबालि के निकट पहुंचे तो वहां गाय, अश्व, परिवार और परिधानों के अतिरिक्त ‘दासी’ भी मौजूद थी।13 

स्मृतिकालीन दासप्रथा

हिंदू धर्म में स्मृतियों का स्थान वेद-वेदांगों के बाद आता है। उन्हें हिंदू धर्म का आधारभूत ढांचा माना गया है। सभी धर्मशास्त्र, पुराण, महाकाव्य, सूत्र आदि स्मृतियों का अंग माने गए हैं। जहां तक दासप्रथा का सवाल है, मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, नारद, बृहस्पति, कात्यायन स्मृति सहित दोनों महाकाव्यों तथा अन्य धर्मशास्त्रों में उसका उल्लेख हुआ है। स्मृतियों का रचनाकाल बौद्ध धर्म के बाद से, चौथी शताब्दी तक फैला हुआ है। इस बीच दासों के कार्यक्षेत्र में भी वृद्धि हुई थी। गृह्मसूत्रों में सम्मानित अतिथियों के चरण धोने के लिए दासों की नियुक्ति का उल्लेख है। मनु(1.91, 8.413-414) के अनुसार शूद्रों का प्रमुख कर्तव्य है, उच्च वर्णों की सेवा करना। उसके बाद उसने जो व्यवस्थाएं की हैं, उनमें अधिकांश वही हैं, जो दासों के लिए थीं। धन-संचय का अधिकार न शूद्रों को था, न ही दासों को। यदि कोई शूद्र अथवा दास संपत्ति संचय में सफल हो जाए तो उसकी संपत्ति को छीनकर ब्राह्मणों को देने का नियम था। जैसे कुम्हार की संतान कुम्हार, जुलाहे की जुलाहा कही जाती थी, ठीक उसी प्रकार दास की संतान भी दास कहलाती थी। अंतर बस एक था। विशिष्ट परिस्थितियों में दास को स्वतंत्र किया जा सकता था। वह सामान्य जीवन जी सकता था। परंतु शूद्र को अपने जातिगत पेशे से हटकर काम करने की अनुमति नहीं थी। यहां तक कि आजाद होने के बाद भी दास पर उसकी जाति चिपकी रहती थी।

स्मृतिकाल तक दास प्रथा सांस्थानिक रूप ले चुकी थी। दास-दासियों को लेकर कानून बनाए जाने लगे थे। याज्ञवल्क्य किसी दास के साथ विवाद न करने की सलाह देते हैं। वहीं जैमिनी(6.7.6) ने शूद्रों के दान को निषिद्ध माना है, जबकि मनु ने शारीरिक दंड की व्यवस्था में दास एवं पुत्र को एक ही श्रेणी में रखा है(8.299-300)। आपस्तंबधर्मसूत्र(2.4.9.11) में आया है कि अतिथि के अकस्मात पहुंच जाने पर, खुद को, स्त्री या पुत्र को भूखा रखा जा सकता है, किंतु उस दास को नहीं, जो रात-दिन सेवा में लिप्त रहता है। नारद के अनुसार गृहस्वामी चाहे तो दास को पुत्र की भांति अपनी संपत्ति का एक हिस्सा प्रदान कर सकता है। वर्ण-व्यवस्था के बंधन दासों पर भी उसी प्रकार लागू होते थे। याज्ञवल्क्य (2.183) तथा नारद (39) के अनुसार ब्राह्मण के अतिरिक्त बाकी तीनों वर्ण ब्राह्मण के दास बन सकते थे। क्षत्रिय के दास केवल वैश्य अथवा शूद्र बन सकते थे। क्षत्रिय किसी वैश्य या शूद्र का तथा वैश्य शूद्र का दास नहीं सकता था। कात्यायन ब्राह्मण के दासत्व ग्रहण करने पर थोड़ी छूट प्रदान करते हैं। उनके अनुसार ब्राह्मण किसी ब्राह्मण का भी दास नहीं बन सकता। यदि बनना ही चाहता है तो उसे किसी चरित्रवान, एवं वैदिक ब्राह्मण का दास बनने की अनुमति है। वह भी केवल पवित्र कार्यों के लिए।14 कात्यायन(7.33) ने व्यवस्था थी कि संन्यास से भटके हुए ब्राह्मण को राज्य से बाहर निकाल देना चाहिए। लेकिन संन्यास भ्रष्ट क्षत्रिय एवं वैश्य राजा के दास होते हैं। कौटिल्य(3.13) एवं कात्यायन(7.23) के अनुसार यदि स्वामी दासी से संसर्ग करे और संतानोत्पत्ति हो तो दासी एवं पुत्र दोनों को दासत्व से मुक्ति मिल जाती है। दास की गवाही अमान्य थी। परंतु विशिष्ट परिस्थिति में जब कोई अन्य साक्ष्य अनुपलब्ध हो तो मनु(8.70) ने नाबालिग, स्त्री, नौकर आदि के साथ दास की गवाही को भी मान्य ठहराया है।

स्मृतिकाल तक दासों की कई कोटियां बन चुकी थीं। मनुस्मृति(8.415) में 7 प्रकार के दासों का उल्लेख है। कौटिल्य का मत भी मिलता-जुलता है, जबकि नारदस्मृति दासों की 15 कोटियों की लंबी सूची प्रस्तुत करता है—‘1. घर में पैदा हुआ, 2. खरीदा हुआ।, 3. दान अथवा किसी अन्य प्रकार से प्राप्त, 4. वसीयत से प्राप्त, 5. अकाल में रक्षित, 6. किसी अन्य स्वामी द्वारा प्रतिश्रुत, 7. बड़े ऋण से युक्त, 8. युद्धबंदी, 9. बाजी में जीता हुआ, 10. ‘मैं आपका हूं’ कहकर दासत्व ग्रहण करने वाला, 11. संन्यास से च्युत, 12. जो कुछ दिनों के लिए स्वेच्छापूर्वक दास बना हो, 13. भोजन के लिए दास बना हुआ, 14. दासी के प्रेम से आकृष्ट(बड़वाहृत) तथा 15. स्वयं को बेच देने वाला।15  

‘अर्थशास्त्र’ के अनुसार स्मृतिकाल में दासों की खरीद-फरोख्त, उन्हें दान में लेने-देने, गिरवी रखने का प्रचलन बढ़ चुका था। कौटिल्य ने लिखा था कि प्रत्येक स्वतंत्र परिवार उदरदास(दास के पेट से उत्पन्न संतान) अवश्य रखता है। दास अपने स्वामी की संपदा कहे जाते थे। उन्हें गिरवी रखा जा सकता था। यहां तक कि उनकी हत्या भी की जा सकती थी। दासों को न्यूनतम न्याय देने के लिए स्मृतियों में कुछ अनुशंषाएं की गई थीं। परंतु व्यवहार में उनका उपयोग बहुत कम हो पाता था। इसलिए स्वामी द्वारा दास पर दंडात्मक कार्यवाही के विरुद्ध किसी अदालत में सुनवाई नहीं थी।16 

उन दिनों दासों का जीवन अत्यंत कष्टकारी होता था। बीमार पड़ जाने पर उनके लिए इलाज की कोई व्यवस्था न थी। नियमानुसार दास अपना मूल्य चुकाकर अपनी आजादी खरीद सकता था। परंतु व्यवहार में ऐसा संभव ही नहीं था। इसलिए दास और उसका परिवार मालिक के लिए जो भी परिश्रम और धनार्जन करता था, उससे उत्पन्न आय उसके स्वामी की मानी जाती थी। दास का अपनी आय का कोई स्रोत नहीं था। इसलिए उसकी आजादी, सिवाय किसी चमत्कार के, असंभव जैसी थी। मुक्ति की चाहत में कई बार कुछ दास अपने स्वामी का घर छोड़कर भाग भी जाते थे। दास पर अत्याचार के समय मौन रहने वाला, उसके विरुद्ध मनमानी दंडात्मक कार्यवाही को दास-स्वामी का विशेषाधिकार मानने वाला राज्य, उस समय एकाएक बीच में कूद पड़ता था। राज्य के कर्मचारी भगोड़े दास को पकड़कर पुनः उसके स्वामी के सुपुर्द कर देते थे। खुद को गिरवी रखने वाला व्यक्ति यदि घबराकर भाग जाता तो उसे जीवन-भर के लिए दास बना लिया जाता था। मालिकों द्वारा दासियों का मान-भंग करने तथा उन्हें दूसरों के आगे पेश करना तो शान की बात मानी जाती थी।

स्मृतिकाल के दौरान दास-प्रथा पर काफी लिखा गया है। विशेषकर नारद और कात्यायन स्मृति में। नारद ने दूसरों की सेवा करने वाले(शुश्रूषक) को पांच भागों में बांटा है—1. वैदिक छात्र, 2. अंतःवासी, 3. पर्यवेक्षक(अधिकर्मकृत), 4. भृतक, तथा 5. दास। इनमें प्रथम चार को कर्मकार कहा जाता था। पवित्र कार्यों के समय उन्हें आवश्यकतानुसार बुलाया जा सकता था। दासों के लिए काम की कोई तय सूची नहीं थी। उनसे कोई भी काम लिया जा सकता था। नारद स्मृति(6.7) के अनुसार दासों के कुछ सामान्य कार्य थे—‘साज-सफाई करना, यथा झाड़ू लगाना, गंदे गड्ढों, मार्ग, गोबर, कूड़ा, तालाब आदि की सफाई करना गुप्तांगों को खुजलाना, मल-मूत्र फेंकना आदि। गौतम धर्मसूत्र(2.1.59) में भी ‘पुरुष दासादयः वंशोवंध्या’ कहकर समाज के उच्च वर्गों की सेवा को उनका कर्तव्य कहा गया है।

दासों के छूटने के नियम तथा उसके मुक्त होने की पूरी पद्धति थी। याज्ञवल्क्य(2.182) के अनुसार यदि दास किसी हमले या दुर्घटना के कारण स्वामी के संकट में पड़े जीवन की रक्षा कर ले, तो उसे मुक्त किया जा सकता है। नारद ने भी इसकी पुष्टि की है। दासत्व से मुक्ति का प्रावधान भी धर्मशास्त्रों में दिया गया है। नारद स्मृति के अनुसार स्वामी जल से भरे मिट्टी के एक घड़े को दास के कंधे से उतारकर उसे तोड़ डालता था। तदनंतर अन्न एवं पुष्पमिश्रित जल को दास के सिर पर छिड़कते हुए तीन बार उसके स्वतंत्र होने की घोषणा करता था।17 ध्यातव्य है कि यूनानी लेखक  मेगस्थनीज, जो चंद्रगुप्त मौर्य की सभा में सेल्यूकस निकेटर का राजदूत था—ने अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में भारत में दासप्रथा की मौजूदगी से इन्कार किया है। जबकि उस दौरान लिखे जा रहे सभी धर्मग्रंथ दास प्रथा की मौजूदगी का समर्थन करते हैं।

महाकाव्यों में दास प्रथा

भारतीय जनमानस में रामायण और महाभारत की बड़ी प्रतिष्ठा है। इनमें रामायण को महाभारत से पहला माना जाता है। परंतु जिस तरह उसमें ब्राह्मणवाद मुखर होकर आया है, वह बौद्ध धर्म से पहले की रचना नहीं हो सकती। अपने वर्तमान स्वरूप में दोनों ही ग्रंथ पुष्यमित्र शुंग के बाद की रचना है। हालांकि उनके कुछ कथासूत्र प्राचीन हो सकते हैं। ईसा पूर्व पांचवी-छठी शताब्दी में आजीवकों और बौद्धों की ओर से मिल रही चुनौतियों के कारण आभाहीन हो चुका ब्राह्मण-धर्म, अनुकूल माहौल में अपने राजनीतिक एवं सांस्कृतिक वर्चस्व को पुनःस्थापित करने में लगा था। इसके लिए समर्थन और विरोध दोनों नीतियों पर काम जारी था। एक ओर बुद्ध को दसवें अवतार के रूप में प्रतिष्ठित करके उनके विचारों को भारतीय धर्म-दर्शन की शाखा के रूप में मान्यता दी जा रही थी, दूसरी ओर ब्राह्मण धर्म को मजबूत करने के लिए वर्ण-व्यवस्था को दैवीय घोषित करने वाले ग्रंथ रचे जा रहे थे। उन सबका एकमात्र उद्देश्य था, जनसाधारण को यह विश्वास दिलाना कि ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ है और वर्ण-व्यवस्था उसका आदर्श विधान है।

जो लोग रामायण और महाभारत की अतिप्राचीनता का दावा करते हैं, उन्हें समझ लेना चाहिए कि रामायण का मूल संस्करण, जिसे वाल्मीकि ने ‘पुलत्स्य वध’ शीर्षक से लिखा था, वह अनुपलब्ध है। महाभारत के पूर्व संस्करणों ‘जय’, ‘विजय’ और ‘भारत’ के बारे में भी हमारी जानकारी शून्य है। यहां तक कि हम उनकी शैली और कथा-वस्तु के बारे में कुछ भी दावे के साथ नहीं कह सकते। लेकिन इतना अवश्य कह सकते हैं कि इनके मूल कथानक अपने समय की साहित्यिक संपदा रहे होंगे। बाद की कृतियों में राम का अतिमानवीकरण, गौतम बुद्ध की श्रीलंका तथा पड़ोसी देशों में ‘धम्म विजय’ के बाद, ब्राह्मणों के मन में जन्मी कुंठा की सृजनात्मक परिणति थे। यह काम बौद्ध धर्म के कमजोर होने के बाद ही संभव था।

महाभारत में जिस प्रकार गणसंघों का प्रमुखत: उल्लेख हुआ है, वह रामायण में मौजूद समाज से करीब 200-300 वर्ष पुराने समाज की प्रतीति कराता है। उन दिनों भारत में गणराज्य काफी मजबूत अवस्था में थे। महाभारत छोटे राज्यों की अप्रासंगिकता को भी दर्शाता है। भारतीय समाज में यह बोध सिकंदर के आक्रमण के बाद बना था। उल्लेखनीय है कि सिंकदर के आक्रमण से पहले भी भारत पर यूनान की तरफ से दो बड़े हमले हो चुके थे। उनमें पहला हमला असीरिया की साम्राज्ञी सेमिरामिस की ओर से था। दूसरा आक्रमण ईरान के प्रसिद्ध विजेता कुरु की ओर से। कुरु को अंग्रेजी में साइरस लिखा जाता है। कुरु ने काबुल से लेकर इराक, शाम, टर्की, बेबिलोन, मिस्र तथा यूनान के कुछ हिस्से पर अपनी विजय पताका लहराई थी। भारत पर आक्रमण के बाद उसे सेमिरामिस की तरह ही शर्मनाक पराजय का रूप देखना पड़ा था। कुरु की मृत्यु भारतीय योद्धा के हाथों ही हुई थी। सिंकदर का आक्रमण इन सबमें बड़ा था। मगर उसका सामना चंद्रगुप्त मौर्य जैसे राजा से था, जिसके पास विश्व की सबसे विशाल सेना थी। उसमें छह लाख से ज्यादा पैदल सिपाही थे। चंद्रगुप्त ने उसमें से पांच लाख सैनिक सिंकदर से लड़ने के लिए उतारे थे। भारतीय कवियों, लेखकों ने पहली बार बड़ी सेना को दुश्मन से लोहा लेते हुए देखा था। उसी से बड़े राज्यों की अवधारणा ने जन्म लिया। कदाचित वही महाभारत की  18 अक्षौहिणी सेना के मिथ की प्रेरणा बना। उसका परिणाम रामायण और महाभारत के उपलब्ध आख्यानों के पुनर्लेखन के रूप में सामने आया। उसके बाद भी इन दोनों ग्रंथों में शताब्दियों तक प्रक्षेपण होते रहे हैं। दो हजार वर्ष पहले तक भारत में दास प्रथा, सामाजिक व्यवस्था का आवश्यक अंग बन चुकी थी। इसलिए रामायण और महाभारत में उनका खूब उल्लेख हुआ है। तत्कालीन परिस्थितियों में इतनी बड़ी सेना का खर्च उठाने के लिए भारी-भरकम अर्थव्यवस्था; तथा उसके लिए दासप्रथा का होना अपरिहार्य जैसा था। इसके प्रमाण इन दोनों महाकाव्यों में उपलब्ध हैं।  

रामायण में राम के चरित्र को उदात्त बताया गया है। तुलसी उसे ‘मर्यादापुरुषोत्तम’ तक कह जाते हैं। तुलसी के लिए ‘मर्यादापुरुषोत्तम’ का मतलब ब्राह्मणवादी संस्कृति और वर्णव्यवस्था के प्रति अंध-समर्पण है। दास-दासियों के मामले में भी वह ठेठ परंपरावादी हैं। इसलिए विवाह में खुशी-खुशी दहेज लेते हैं। बकौल तुलसीदास—‘दहेज इतना अधिक था कि उसका वर्णन संभव ही नहीं है। स्वर्ण आभूषणों तथा मणियों से मंडप भर गया था। वहां हाथी, स्वर्णाभूषण, माणिक-मणियां, घोड़े, दास और दासियां तथा अलंकारों से सजी कामधेनु सरीखी बहुत-सी गौएं थीं।’

‘कहि न जाय कछु दायज भूरी, रहा कनक मणि मंडप पूरी

गज रथ तुरग, दास अरु दासी, धेनु अलंकृत काम दुहासी।

इस बात से वाल्मीकि भी इत्तफाक रखते हैं। राम के विवाह में दिए गए दहेज का वर्णन करते हुए वे भी गदगद हो जाते हैं—‘कन्या के पिता जनक ने दास-दासियों सहित, सोने, मोती-माणिकों और मुद्राएं दहेज में अर्पित की थीं।’18 यह तो राजा जनक द्वारा वरपक्ष यानी राम और उसके परिवार को दिए गए दहेज का वर्णन है। इसके अलावा उन्होंने सीता और अपनी बाकी पुत्रियों को भी सौ-सौ कन्याएं तथा उत्तम दास-दासियां दहेज के रूप में प्रदान की थीं। उत्तरकांड में अयोध्या के सामंत और छोटे राजाओं ने दासियां प्रदान की थीं।19 उन दिनों गुरु लोग आश्रमवासी हुआ करते थे। परंतु दासियों का दान लेने से उन्हें भी इन्कार न था। सो मर्यादापुरुषोत्तम गुरु, ब्राह्मणों और आचार्यों को कैसे भूल जाते। खुशी का अवसर नहीं था। वनवास के लिए निकलना था। राजमहल में क्लेश व्याप्त था। फिर भी गुरु को प्रसन्न करने के लिए राम ने उन्हें अपने दास-दासियों को भेंट कर दिया था—‘दासी-दास बोलाइ बहोरी, गुरहि सौंपि बोले कर जोरि’ (रामचरितमानस, अयोध्याकांड)। दशरथ का महल दास-दासियों से भरा हुआ था। राम का भवन हो या लक्ष्मण का; या फिर भरत की आरामगाह हो। सभी जगह दास-दासियों की भरमार थी। कैकई तो मंथरा नामक दासी को मैके से अपने साथ लेकर आई थी। चूंकि मंथरा के लिए कैकई ही उसकी स्वामिनी और सबकुछ थी। इसलिए वह चाहती थी कि भरत ही अयोध्या का भावी सम्राट बने। हनुमान का अपना आचरण दासत्व को पूरी तरह स्वीकार लेने वाला प्राणी जैसा है। उसकी अष्ठ सिद्धियां और नवनिधियां राम के चरणों में पड़े-पड़े गारत हो जाती हैं। शुनःशेप की कहानी रामायण में कुछ और विस्तार से प्रस्तुत है।

रामायण में हमारा तीन समाजों और संस्कृतियों से वास्ता पड़ता है। पहला अयोध्या और उसकी संस्कृति है। दूसरी किश्किंधा और तीसरी लंका की। किश्किंधा में बालि, सुग्रीव अंगद जैसे नेता हैं। वे आखेटक समुदाय से हैं जो प्रकृति से अपना भोजन जुटाते थे। बालि के राज्य में अथवा सुग्रीव के ठिकाने पर किसी दास के दर्शन नहीं होते। आवश्यकता पड़ने पर सभी वानर स्वेच्छा से राम की सेना में भागीदारी करते हैं। उनमें पदानुक्रम तो है परंतु दास और अदास का विभाजन नहीं है। लंकाकांड के दौरान हनुमान राम का संदेश लेकर लंका जाता है। वहां का वैभव देखकर वह हतप्रभ रह जाता है। लंका के सभी घर बराबर थे। धन-धान्य और वैभव से भरपूर। रामायण में लंका की अर्थव्यवस्था के बारे में कोई उल्लेख नहीं है। मगर जिस तरह की समृद्धि का वर्णन हनुमान करता है, उससे पता चलता है कि वहां अवश्य ही व्यापार केंद्रित अर्थव्यवस्था रही होगी, जबकि अयोध्या का समाज कृषि-केंद्रित था। जहां तक दास-दासियों का सवाल है, उनका उल्लेख न तो किश्किंधा के वानर समाज में था, न ही लंका के राक्षसों के बीच। यहां तक कि रावण के दरबार में भी किसी दास या दासी का उल्लेख नहीं है। अशोकवाटिका में राक्षसियां पहरा देती थीं। मगर वे सभी अनुचरी थीं। यह भी संभव है कि दास प्रथा को शान और समृद्धि का प्रतीक माना जाता था, इस कारण वाल्मीकि और तुलसी दोनों ने वहां दासों की कल्पना न की हो। यह बात पात्रों के चरित्र-चित्रण में भी नजर आती है। रावण के दरबारी जरूरत पड़ने पर अपने राजा से बहस करते, उसे समझाते हैं। राम के दरबारियों को यह सुविधा प्राप्त नहीं थी। वहां सिर्फ ‘हां’ में ‘हां’ मिलाने और जय-जयकार करने का अवसर था। कह सकते हैं कि समाज का दासभाव दरबारियों के चरित्र की भी विशेषता था, इसलिए वहां दास-प्रथा के मजबूत होने के सभी अवसर थे। रामायण का आदर्श भी ऐसा ही समाज है, जहां कुछ लोग मालिक हों और बाकी लोग दास जैसा आचरण करते हों।

महाभारत के नायक कृष्ण हैं। वे अंधक गणराज्य के मुखिया है। गणतंत्र में भरोसा रखते हैं। इसलिए दासत्व के लिए उनके यहां वैसी जगह नहीं है, जैसी राम के यहां हैं। कृष्ण स्वयं अपने साथियों-सहयोगियों के साथ मैत्री-भाव रखते हैं। मगर कृष्ण के देवत्व को मान्यता देने वाले ब्राह्मण उन्हें खुली छूट देने को तैयार नहीं थे। इतिहासचक्र के अचानक घूम जाने की बात है जिससे ब्राह्मणों को एक ग्वाले के देवत्व को स्वीकारना पड़ा। फिर भी इतना ध्यान उन्होंने रखा कि वे ब्राह्मण विरोधी न दिखें। ऋग्वेद में इंद्र को चुनौती देने वाले कृष्ण का नया रूपाकार ब्राह्मणवाद का आराधक हो, इस कारण उन्हें सुदामा के पैर धोते हुए दिखाया गया है। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में अतिथियों के पांव धोने की जिम्मेदारी भी उन्हीं को ओटनी पड़ी। महाभारतकार उसी का महिमा मंडन करता है। यदि अतिथियों के पांव-प्रक्षालन करना इतना ही पुनीत कार्य था तो यह काम किसी ब्राह्मण को क्यों नहीं सौंपा गया? अथवा वह जिम्मेदारी युधिष्ठिर या उसके किसी भाई न स्वयं क्यों न संभाल ली? महाभारत में इस सवालों के लिए कोई जगह नहीं है। वैसे भी, जहां धर्म होता है, वहां सवाल या शंकाएं नहीं होतीं। केवल आस्था होती है। आंख मूंदकर विश्वास करना पड़ता है। अगर सवाल होते तो महाभारत धर्मयुद्ध कभी न बन पाता।

महाभारत में दास प्रथा का उल्लेख अनेक अवसरों पर हुआ है। हमने आरंभ में ही बता दिया है कि राजसूय यज्ञ कराने के उपलक्ष्य में युधिष्ठिर ने 88,000 ब्राह्मण पुरोहितों में से प्रत्येक को तीस दासियां उपहार स्वरूप दी थीं। वनपर्व में दिया है कि वैन्य ने अत्रि को एक हजार सुंदर दासियां प्रदान कीं।20 विराटपर्व(18.21) में 30 दासियां दान करने का एक और उल्लेख आया है। दासों का वर्णन जितना खुलकर दिया गया है, उससे लगता है कि समाज में शूद्र और दास में बहुत अंतर नहीं था। सभापर्व में युधिष्ठिर के महल में एक लाख दासियां होने का वर्णन हुआ है। यह वर्णन अतिश्योक्तिपूर्ण हो सकता है। संभव है हस्तिनापुर की कुल शूद्र स्त्रियों को ही युधिष्ठिर की दासी मान लिया हो। क्योंकि आगे उसमें लिखा है कि युधिष्ठिर अपनी दासियों का अनुरोध सुनने के लिए सदैव तत्पर रहता था। विराटपर्व(7.17) के अनुसार पांडवों के निजी कक्ष भी दास-दासियों से समृद्ध थे।। दास-दासियों की संख्या को लेकर यह अतिरंजना अन्य स्थानों पर भी पाई जाती है। उदाहरण के लिए देवयानी और शर्मिष्ठा के विवरण को ही लें। उन दोनों की एक-एक हजार दासियां बताई गई हैं। उन दिनों दहेज में दास-दासियां देने का चलन था। द्रोपदी के विवाह में भी द्रुपद की ओर से पांडवों को बड़ी संख्या में दासियां दी गई थीं।21 महाभारत काल में दास-दासियों की उपस्थिति के प्रचुर प्रसंग हैं। दुर्योधन के साथ जुआ खेलते समय युधिष्ठिर ने दावा किया था कि उसके पास एक लाख तरुण दासियां हैं। वे सुंदर हैं। सुवर्णमय मांगलिक आभूषण तथा मनोहारी वस्त्र धारण करती हैं। मणि और स्वर्णाभूषणों से लदीं, चौसठ कलाओं में निपुण उन दासियों को युधिष्ठिर अपना धन मानते थे।22 

महाभारत एक वृहद ग्रंथ है। उसके भीतर अनेक उपकथाएं समाहित हैं। कद्रु-वनिता, नल-दमयंती, देवयानी, शर्मिष्ठा जैसे उपाख्यानों में भी दास प्रथा का उल्लेख है। इसमें भी नल-दमयंती का प्रकरण इतना रोचक है कि वह स्वतंत्र लोककथा के रूप में भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में ख्यात रहा है। इस उपकथा में भी जुए की बुराई को दर्शाया गया है। नल-दमयंती आख्यान के अंतिम हिस्से में पुष्कर जुए में खुद को हार जाता है। परिणामस्वरूप उसे अपनी स्वतंत्रता लुटाकर दास बनना पड़ता है। कालांतर में वह पुनः मुक्त हो जाता है। उन दिनों एक नियम यह भी था कि युद्ध में पराजित को, विजेता का दासत्व स्वीकारना  वह आमतौर पर तब तक रहता था, जब तक फिरौती या बदले में कुछ हासिल न हो जाए।23 प्राय:  विजेता को प्रसन्न करने के लिए बाकी भेंटों के अलावा दासियां भी भेंट की जाति थीं, इस कारण उन दिनों दास-दासियां प्रचुर संख्या में होती थीं।  महाभारत(3.76.77)। लोपामुद्रा की सेवा में 1000 दासियां रहती थीं। एक प्रसंग में च्यवन ऋषि मछुआरे के जाल में फंसकर उसकी संपत्ति बन जाते हैं। आखिरकार एक राजा उन्हें खरीदकर उनकी स्वतंत्रता वापस दिलाता है। भरत दक्षिणा स्वरूप दासों की भेंट करते हैं। असल में वह शक्तिशालियों का समाज था। स्त्री, पुरुष, धन-धान्य, पशु, भूमि कुछ भी हो, इन सभी को ताकत के बल पर जीता जा सकता था। जीतने के बाद वे विजेता की संपत्ति मान लिए जाते थे। ताकत का बोलबाला था। जो ताकतवर था, वह लोगों गरीबों, विपन्नों और कमजोरों को कैद करने, उन्हें दास बनाने यहां तक कि हत्या करने की धमकी भी देते रहते थे। दास का कर्तव्य था, अपने प्राणों पर खेलकर भी अपने स्वामी के आदेश का पालन करना। कुरुक्षेत्र में युद्ध के दौरान एक अवसर ऐसा आता है जब भीष्म(भीष्मपर्व 4.15.534) कृष्ण को अपना स्वामी मानकर अपने हथियार डाल देते हैं—‘हे प्रभो! तुम मुझ पर चाहे जैसे आक्रमण करो, मैं तुम्हारा दास हूं।’ युधिष्ठिर द्वारा खुद को तथा अपने भाइयों को दाव पर लगा देने के बाद, पांडवों की स्थिति भी दास जैसी बन चुकी थी। दास बनने के साथ ही वे अपनी इच्छाएं, अपनी स्वतंत्रता और विरोध की क्षमता भी गंवा चुके थे। उनके शरीर, इच्छाएं सभी कुछ दुर्योधन के अधीन हो चुके थे, जिसने उन्हें जुए में जीता था। एक स्थान पर आता है कि पुत्र, पत्नी और दास का संपत्ति में कोई अधिकार नहीं होता, क्योंकि उनपर क्रमशः पिता, पति और स्वामी का अधिकार होता है।

दास प्रथा में स्त्रियों की और भी अधिक दुर्दशा होती थी। प्राचीन मनीषी मानते थे कि कन्या गिरवी रखे आभूषण की तरह है, जिसे मांगे जाने पर उसके वास्तविक स्वामी को वापस लौटाना ही धर्म है। इस धारणा का विकृत विस्तार मंदिरों में देवदासी प्रथा के रूप में मिलता है जिसमें ईश्वर को समर्पित करने के नाम पर नन्ही बालिकाएं मंदिर के पुजारियों को सौंप दी जाती थीं। महाभारत में एक और प्रसंग आया है जो उस समाज में स्त्री की दुर्दशा को दर्शाता है, जिसके अनुसार स्त्री की हैसियत उस समाज में दास और कहीं-कहीं तो उससे भी बदतर थी। विश्वामित्र ने ऋषि गालव से गुरु दक्षिणा के रूप में 800 श्यामकर्णी घोड़ों की मांग की। 800 श्यामकर्णी घोड़ों का प्रबंध करना हंसी-खेल नहीं था। अगर इससे दस गुनी दासियां मांगी होतीं तो कोई भी राजा पलक झपकते इंतजाम कर देता। लेकिन 800 श्यामकर्णी घोड़े! परेशान गालव अपने मित्र गरुड़ से मिला। गरुड़ ने उसे सम्राट ययाति के पास जाने की सलाह दी। ययाति के पास श्यामकर्णी घोड़े तो थे नहीं। परंतु द्वार पर आए याचक को लौटाए कैसे? अंतत: उसने माधवी नामक अपनी सुंदर पुत्री गालव ऋषि को सौंपते हुए कहा—

‘हे महर्षि! यह मेरी कन्या है। यह अपूर्व सुंदरी, लावण्यमयी एवं सर्वगुणसंपन्न है। तीनों लोकों में ऐसा कोई भी नहीं जो इसे वरण करने की इच्छा न रखता हो। इसमें सुर, नर, किन्नर, आर्यों, अनार्यों सभी को सम्मोहित करने की अभूतपूर्व शक्ति है। मैं इस कन्या को आपको अर्पित करता हूं। इसे किसी भी राजा के पास बेचकर आप आसानी से गुरु दक्षिणा का इंतजाम कर सकते हैं।’24

मानो लड़की न होकर कोई ‘हुंडी’ हो। अपने मित्र गरुण के साथ गालव माधवी को लेकर अयोध्या नरेश हर्यश्व के दरबार में पहुंचा। हर्यश्व के कोई पुत्र नहीं था। ऋषि ने दो सौ श्यामकर्णी अश्वों के बदले माधवी को उसके हवाले कर दिया—‘आप इससे एक पुत्र उत्पन्न कर लें।’(उद्योगपर्व 116.15)। हर्यश्व के माधवी से वसुमना नामक पुत्र पैदा हुआ। कुछ समय बाद गालव ने हर्यश्व से मालती को वापस ले लिया। तदनंतर उस ‘हुंडी’ को लेकर वह राजा दिवोदास के पास पहुंचा। वहां भी दो सौ घोड़ों के बदले उसने लड़की राजा को सौंप दिया(उद्योगपर्व 117.7)। दिवोदास के यहां माधवी से प्रतर्दन नामक पुत्र का जन्म हुआ। निश्चित अवधि के बाद गालव पुन: राजा दिवोदास के दरबार में जा धमका तथा उससे माधवी को वापस ले लिया। तदनंतर वह राजा उशीनर से मिला। राजा उशीनर से भी 200 घोड़े लेकर उसने माधवी को सौंप दिया। उशीनर और माधवी के संयोग से शिवि नामक पुत्र का जन्म हुआ। अब तक गुरु दक्षिणा के 600 घोड़ों का प्रबंध हो चुका था। बाकी दो सौ का प्रबंध कहां से किया जाए? आखिरकार गालव माधवी को लेकर विश्वामित्र के पास पहुंचा और पूरी कहानी सुनाने के बाद, उसने 200 घोड़ों के बदले माधवी को रखने को कहा। मेनका को देखकर आपा खो देने वाला विश्वामित्र भला क्यों इन्कार करता! उसने माधवी को रख लिया। दोनों के संयोग से अष्टक नामक पुत्र का जन्म हुआ(उद्योगपर्व 118.3-8)। बाद में गालव माधवी को उसके पिता के पास वापस लौटाने पहुंचता है। ययाति ने माधवी का स्वयंवर करने की इच्छा प्रकट की। अनिच्छा से चार अलग-अलग पुरुषों की संतान को जन्म देने के बाद बुरी तरह टूट चुकी माधवी ने विवाह से इन्कार कर, संन्यास धारण कर लिया।

इस घटना में माधवी की स्थिति दासी से भी बदतर है। सामान्य दासी का अपनी संतान पर अधिकार होता था। परंतु इस कहानी में माधवी पशुवत एक राजा से दूसरे राजा तक ले जाई जाती है। ले जाने वाला एक ऋषि है और उसका भोग करने वाले उस समय के प्रतिष्ठित राजा हैं, जिनपर न्याय की रक्षा का भार होता है।   

बौद्धकालीन दासप्रथा

बौद्ध धर्म में अष्ठधम्म पद गृहस्थ जनों के लिए आचारसंहिता है। इसका पांचवा ‘धम्म’ ‘सम्यक आजीव’ है। बौद्ध धर्म गृहस्थ जनों के लिए धनार्जन का निषेध नहीं करता। किंतु चोरी, डकैती, हिंसा, लूटमार जैसे दूसरों के लिए कष्टकारी कार्यों द्वारा अर्जित धन को उसमें वर्ज्य माना गया है। ‘अपण्णकसुत्त’ में कहा गया है—‘वही व्यक्ति न्यायपथ पर है, जिसका मस्तिष्क शुद्ध एवं सात्विक है। जो अपने मन को प्रसन्न रखता है, तथा दास अथवा दासी रखने से बचता है।’ दीघनिकाय, ‘सामञ्ञफलसुत्त’ में ‘संतोष’ की स्थितियों का वर्णन करते समय कहा गया है—‘जैसे महाराज कोई पुरुष दास हो। जो पराधीन हो। जिसे अपनी इच्छा से कहीं भी आने-जाने का अधिकार न हो। समय आने पर जब वह दासता से मुक्त हो जाए। स्वतंत्र, अपराधीन, यथेच्छगामी हो जाए। तब उसके मन में ऐसे भाव होने के साथ प्रसन्न एवं आनंदित होना चाहिए—‘मैं पहले दास था, अब स्वतंत्र हूं। जहां जी चाहे वहां जा सकता हूं।’ भिक्षु संघ के नियमों के अनुसार समाज का कोई भी व्यक्ति उसकी दीक्षा ग्रहण कर सकता था। परंतु सैनिक,कर्जदार, दास आदि को भिक्षु संघ में शामिल होने के लिए संबंधित व्यक्ति की अनुमति लेनी पड़ती थी। 

अंगुत्तर निकाय(5.177) के अनुसार बुद्ध ने पांच प्रकार की आजीविकाओं, जो दूसरों के लिए कष्टकारी हो सकती हैं, को अपनाने से मना किया है। जैसे हथियारों, विष, दास-दासी, वेश्यावृति, मांस तथा उसके उत्पादों की खरीद-बिक्री द्वारा अर्जित धन। इसका आशय यह नहीं है कि बौद्ध काल में दास प्रथा का अभाव था; अथवा बौद्ध धर्म की उपस्थिति से दास-प्रथा में परिमाणात्मक कमी आई थी। अन्य सभ्यताओं और संस्कृतियों की भांति बौद्धकाल में भी दासप्रथा अपने निकृष्टतम रूप में मौजूद थी। सस्ता श्रम, विकास की चाहत और स्वामी के लिए सामाजिक प्रतिष्ठा—दासप्रथा की ऐसी देन थीं, जिसके कारण सुकरात से लेकर अरस्तु तक सभी ने उसे आवश्यक माना था। भारत में भी बुद्ध जैसे कुछेक अपवादों को छोड़कर लगभग सभी बुद्धिजीवी, दास प्रथा का या तो समर्थन कर रहे थे, अथवा उसकी ओर से मौन साधे हुए थे। ध्यातव्य है कि बौद्ध धर्म के प्रभाव में चलते यज्ञ-बलियों में कमी आई थी। बची हुई पशु-शक्ति का उपयोग उत्पादक कार्यों में होने लगा था। उसका सकारात्मक प्रभाव विकास पर भी पड़ा था। व्यक्तिगत संपत्ति की लालसा में निरंतर वृद्धि हो रही थी। उसके लिए सस्ता, लगभग मुफ्त श्रम उपलब्ध कराने वाली दासप्रथा का महत्त्व बढ़ता ही जा रहा था। यह भी कह सकते हैं कि अधिकाधिक लाभ की वांछा के कारण तत्कालीन व्यापारी वर्ग उसे छोड़ने को तैयार नहीं था।

बौद्धकाल तक बड़े राज्यों का बनना आरंभ नहीं हुआ था। उन दिनों भारत में मगध और उज्जैनी जैसे राजतंत्र थे। उनके साथ-साथ लिच्छिवी, वाहीक, शाक्य, मल्ल, वृष्णि जैसे गणों की भी प्रतिष्ठा थी। दासों की उपस्थिति राजतंत्र और गणतंत्र दोनों में थी। राजतंत्र में सेना के दरवाजे समाज के सभी वर्गों के लिए खुले थे।25 आवश्यकता पड़ने पर दासों को सेना में भी भर्ती किया जा सकता था। हालांकि उनका स्तर, बाकी सैनिकों से कमतर होता था। कई बार राजा युद्धकाल में मृत्युदंड पाए अपराधियों को दास के रूप में सेना में शामिल कर लेता था। वे सैनिकों और जानवरों की देखभाल के काम आते थे। सेना में भर्ती दासों को ‘दासकपुत्त’ कहा जाता था। उन्हें गृह-दास योद्धा का नाम भी दिया गया था। कई बार राजा किसी अपराधी का मृत्युदंड माफ करने के बाद, उसे अपनी सेना में शामिल कर लेता था।

कृषिकर्म के लिए भी दासों की मदद ली जाती थी। समाज के संपन्न वर्गों के पास हजारों एकड़ जमीन पर अधिकार होता था। इतनी बड़ी जमीन पर खेती करने के लिए दासों की मदद लेना तत्कालीन समाज का सामान्य चलन था। उस समय रोम की तरह भारत में दासों की दो श्रेणियां थीं। पहली श्रेणी में वे दास थे, जिनका दासत्व कृषि-भूमि से जुड़ा था। भूमि की बिक्री के साथ वे भी नए स्वामी के अधिकार में चले जाते थे। दूसरे स्वतंत्र दास थे। वे घरों और संस्थानों में काम करते थे। थेरीगाथा एक की कहानी के अनुसार, बौद्धकाल में बनारस के पास ‘दासग्राम’ था, जिसमें संपूर्ण आबादी दासों की थी। यह उन 14 गांवों में से एक था, जिनपर बुद्ध के शिष्य ‘पिप्पली मानव’ यानी महाकाश्यप का नियंत्रण था। विशाखा को दहेज में कृषि औजारों से भरी 500 गाडि़यां तथा सैकड़ों दास भेंट किए गए थे। उन दिनों दासों को अंतःवासी, अहेटक, केटक, दता, मानुस्स, सेवक, उपत्थका जैसे नाम दिए जाते थे, जबकि स्त्री दासों को अंतःपुरिका, अट्ठककारिका, इत्थी, पसेन दारिका आदि नामों से पुकारा जाता था। उनसे दासत्व की प्रवृत्ति तथा उसके कार्यक्षेत्र का बोध भी होता था।  

बुद्ध के समकालीन दार्शनिकों में भौतिकवादी चिंतक पूर्ण कस्सप की बड़ी प्रतिष्ठा थी। वे अपने समय के महान आजीवक चिंतक थे। उनके जीवन के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं है। उनके नामकरण के साथ एक कहानी जुड़ी है। हालांकि उसपर विश्वास करना कठिन है। बौद्धग्रंथों के अनुसार वे एक दास थे। जो स्वामी उन्हें दास बनाने के लिए लाया था, उसके 99 दास पहले से ही थे। पूर्ण कस्सप के आने के बाद सौ होने पर, स्वामी को लगा कि उसके दासों की संख्या पूरी हो चुकी है, इसलिए स्वामी ने ही उसका नामकरण पूर्ण या पूरण कस्सप नाम दिया था। उस समय के दूसरे आजीवक एवं लोकायत चिंतकों मक्खलि गोसाल और अजित केशकंबलि की सामाजिक स्थिति भी एक दास की तरह थी। डॉ. धर्मबीर ने ‘महान आजीवक : कबीर, रैदास और गोसाल’(पृष्ठ-227) नामक पुस्तक में कबीर के ‘बीजक’ के शीर्षक की मुख्य प्रेरणा ‘महानारद कश्यप जातक’ के कथासूत्र को बताया है। उक्त जातक में बीजक आजीवक विद्वान है। उसका जन्म पानी लाने वाली दासी के गर्भ से हुआ था। दासता को उन्होंने करीब से देखा था। धर्मवीर के अनुसार बीजक, ‘अपने धर्म और दर्शन में आजीवक थे और दासता के विरोध में लड़ रहे थे।’

मेगस्थनीज चंद्रगुप्त के शासनकाल में भारत आया था। वह चंद्रगुप्त के दरबार में सेल्यूकस की ओर से राजदूत था। अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में मेगस्थनीज ने भारत में दासप्रथा की उपस्थिति से इन्कार किया है। जबकि उन्हीं दिनों रचे जा रहे बौद्ध साहित्य में दासों का खुला उल्लेख है। क्या मेगस्थनीज भारतीय दासप्रथा से सचमुच अनभिज्ञ था? अथवा उसने जानबूझकर उसे छिपाया था? जबकि वह स्वयं ऐसे देश से आया था, जहां जनसंख्या का करीब एक-तिहाई हिस्सा दास की श्रेणी में आता था। असल में मेगस्थनीज की जानकारी का स्रोत केवल ब्राह्मण थे। अतएव एक कारण तो यह हो सकता है कि ब्राह्मणों ने भारत में मौजूद दासप्रथा को जानबूझकर छिपाया हो। दूसरा कारण यह कि भारत में शूद्र एवं दास की स्थिति में बहुत अंतर नहीं था। इसलिए संभव है मेगस्थनीज स्वयं उस समय के शूद्रों एवं दासों के जीवन में अंतर करने में असमर्थ रहा हो।

उन दिनों दास प्रथा अपने चरम पर था। दासों के शरीर पर उसके स्वामी का अधिकार होता था। नाराज होने पर स्वामी उसे दंडित कर सकता था। एक जातक में एक दासी का उल्लेख हुआ है जिसे उसके स्वामी ने दूसरे व्यक्ति के पास काम के लिए भेजा था। जब वह काम करने में असमर्थ रही तो बेंतों से उसकी पिटाई की थी। दूसरी ओर दास द्वारा आत्म-उत्थान के भी उदाहरण है। कटहक का एक दास तीव्र बुद्धि था। वह स्वामी के पुत्रों के साथ पढ़ना-लिखना सीख गया। अन्य कर्मों के साथ-साथ वह भाषण कला में भी पारंगत था। मालिक ने प्रसन्न होकर उसे भंडारगृह के रक्षक के रूप में नियुक्त कर दिया था। लेकिन उसे सदैव यह भय रहता था कि उसे कभी भी किसी अपराध के कारण काम से हटाया अथवा प्रताडि़त किया जा सकता है।26

बौद्धकाल में दासों की उपस्थिति प्रायः सभी पेशों और उद्यमों में थी। विनयपिटक, दीघनिकाय, जातक कथाओं आदि में दासों की उपस्थिति बनी हुई है। बौद्ध साहित्य में आठ प्रकार के दासों का उल्लेख मिलता है—ध्वजाहृत(युद्ध में जीता गया), उदरदास(भरण-पोषण), आमाय दास(जीवकोपार्जन हेतु दासता स्वीकारना), भयाक्रांत दास(भय के कारण), स्वैच्छिक दास(स्वेच्छापूर्वक दासता को अपनाने वाला), क्रीतदास(धन देकर खरीदा गया), पादमूलिक(राजा और राजपरिवार का विश्वसनीय एवं अंतरंग दास), कम्मंतदास(खेत एवं कार्यशाला में काम करने वाला) तथा दौवारिक(द्वार पर नियुक्त रहकर स्वामी की रक्षा करने वाला)। ‘थेरवादी अट्ठकथा’ के अनुसार सेट्ठि सुदंत अनाथिपिंडक ने विहार की रक्षा के लिए एक दास दिया था। बौद्ध ग्रंथों में दासियों के भी भेद मिलते हैं। दासियां घर के प्रत्येक काम में सहयोग करती थीं। दासी की बेटी भी दासी ही कहलाती थी। ‘विदुर जातक’(जातक संख्या 545) के अनुसार कुछ लोग केवल दासी के पेट से जन्म लेने के कारण दास होते हैं। कुछ लोग धन से खरीदे जाने के बाद दास बनते हैं। कुछ भय से दास बनते हैं तो कुछ स्वयं दास बन जाते हैं। 

दास को योनि मान लिया था। उससे पता चलता था की दासप्रथा को कुछ लोग दैवी विधान घोषित करने  में लगे थे तदनुसार जो व्यक्ति एक बार दास बन जाता वह हमेशा दास ही बना रहता है। इसी जातक में एक जगह माणवक कहता है—’निश्चित रूप से मैं दास योनि में पैदा हुआ हूं। चाहे राजा की वृद्धि हो, चाहे अवृद्धि हो, दूर जाकर भी मैं देव का दास ही रहूंगा।’ ‘निमी जातक’ की बिरानी दासी को दासत्व उत्तराधिकार में मिला था। एक जातक में लापरवाह और आलसी ब्राह्मण स्त्री अपने पति को यह कहकर भिक्षा लेने के लिए भेजती है कि वह उसके लिए दासी खरीदकर लाए। पत्नी की इच्छा पूरी करने के लिए ब्राह्मण 700 कार्षापण मांग कर लाता है। उतने मूल्य में एक दासी खरीदी जा सकती थी। दासियां दहेज में भी दी जाती थीं। ‘सुप्पारक जातक’ के अनुसार विशारक को दहेज में दासियां प्रदान की गई थीं। गणिकाओं के यहां 500 दासियों के होने का उल्लेख है। ‘खंडहाल जातक’ में चंद्रकुमार स्वयं को दास बनाने के लिए समर्पित करता है—

‘देव! हमारा वध न करें। हमें दास बनाकर ‘खंडहाल’ को दे दें। पैरों में बेड़ी पड़ी रहने पर भी हम हाथी-घोड़ों का पालन करेंगे। देव हमारा वध न करें….हम हाथियों की लीद बटोरेंगे….हम घोड़ों की लीद बटोरेंगे….हमें चाहे जिसे दास बनाकर दे दें।’27

ऐसे ही वास्संत्र जातक में एक राजकुमार स्वयं को 1000 पण में बेच देता है। ‘कुस्सजातक’ से पता चलता है कि विधुर के घर में 700 दासियां थीं। दास-दासियों का प्रमुख कार्य परिवार के सदस्यों की सेवा करना था। अतिथियों के आने पर उनके पैर धोना, आवष्यकता पड़ने पर उनके पैर दबाना जैसे कार्य दासों के जिम्मे थे। ‘मझिम्मनिकाय’ के अनुसार ‘काली’ नामक एक दासी चावल पकाने, बिस्तर लगाने, गाय दुहने से लेकर दीपक जलाने जैसे काम करती थी। दासियां धाय का काम भी करती थीं। वे खासतौर पर लड़कियों को पालती-पोसतीं, उन्हें बड़ा करतीं और लड़की के विवाह के बाद, उसकी ससुराल वालों को दान दे जाती थीं। एक जातक कथा के अनुसार एक राजकुमार के 64 दासियां थीं। दासों का रोजमर्रा का जीवन आमतौर पर बड़ा ही कठिन था। वे अपनी नियति को जानते थे, इसलिए उनके सपने बहुत छोटे होते थे। एक जातक कथा में राजा ने प्रसन्न होकर अपने कुलपुरोहित से वरदान मांगने को कहा। इसपर पुरोहित ने अपने परिजनों के साथ-साथ घर में काम करने वाली दासी पुण्णा से उसकी आवष्यकता के बारे में भी पूछा। जवाब में पुण्णा अपने लिए मूसल, सूप तथा गारा मांगती है। दासियों को अपने स्वामी की काम-वासना का षिकार भी होना पड़ता था। जो दासियां सुंदर होतीं, वे अपने स्वामी की रखैल बनकर रहने से खुद को कृतार्थ समझने लगती थीं। उद्दालक जातक के अनुसार एक ब्राह्मण राजपुरोहित अपनी दासी पर आसक्त हो गया। आगे चलकर दासी के गर्भ से उद्दालक का जन्म हुआ। आगे चलकर वह बड़ा ऋषि बना। इस तरह हम देखते हैं कि बुद्ध ने हालांकि दासप्रथा को हेय माना, तथा दास अथवा दासी न रखने की सलाह दी थी। तथापि इस बात के प्रबल प्रमाण हैं कि बौद्ध काल में दासप्रथा पूरे जोरों पर थी।

प्राकृत भाषा में ‘दास’ का उल्लेख अन्य अर्थों में देखने को मिलता है। वह उसकी अब तक स्थापित सामाजिकी से बिलकुल अलग है. प्राकृत में दास का अर्थ है, देखना। ‘दर्शन’ का अर्थ भी यही है। ऐसे लोग जो संसार के आंतरिक और बाहरी रहस्यों को समझते थे, जितनी अंतर्चेतना प्रबल थी, उन्हें दास कहा जाता था। वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा, बिहार में प्राचीन भारतीय इतिहास के गंभीर अध्येता डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह के अनुसार, दास मूल रूप से बौद्ध थे. उनके अनुसार साँची और भरहुत के स्तूपों पर अनेक दास तथा दासी उपाधिधारक बौद्धों के शिलालेख हैं, जिन्होंने स्तूप-निर्माण में मदद की थी।’ वे लिखते हैं—

”अरहत दास थे, अरहत दासी थीं, यमी दास थे, जख दासी थीं….अनेक, सभी के नाम लिखे हुए हैं। एक बौद्धकालीन शिलालेख पर प्राकृत में ‘थूप दास’ का वर्णन मिलता है। उसपर लिखा है-‘मोरगिरिह्मा थूपदासस दान थंभे।’ थूप दास मोरगिरि(महाराष्ट्र) के निवासी थे। उन्होंने भरहुत के एक स्तंभ-निर्माण में मदद की थी। वैदिक साहित्य में वर्णित आर्यों का सांस्कृतिक संघर्ष इन्हीं बौद्ध दास-दासियों से हुआ था। वैदिक साहित्य इन दास-दासियों के बारे में बताता है कि ये लोग यज्ञ नहीं करते और न ये इंद्र-वरुण की पूजा करते हैं…स्पष्ट है कि ये बौद्ध हैं। प्राकृत भाषा में ‘दास'(दसन) का अर्थ द्रष्टा है। मगर आर्यों ने सांस्कृतिक दुश्मनी के कारण अपनी पुस्तकों में ‘दास’ का अर्थ ‘गुलाम/नौकर’ कर लिया है। दास और आर्यों का यह सांस्कृतिक संघर्ष 1500 ई.पू. में नहीं बल्कि मौर्य काल के बाद हुआ था।”

इस संबंध में अभी और शोध की अपेक्षा है. यह सच है कि समय और परिस्थितियों में आए बदलाव के कारण शब्द अपनी अर्थ-छवियां बदलती रही हैं। अठारहवीं-उनीसवीं शताब्दी में ‘अराजकतावाद’ शब्द ‘जनतंत्र’ की उच्चतम अवस्था का प्रतीक था। उसका अर्थ ऐसे राज्य से था, जहां के प्रबुद्ध नागरिक अपने आप में ही इतने अनुशासित और समर्पित हों कि राज्य की आवश्यकता और उसका औचित्य ही जाता रहे। आज यह शब्द एकदम भिन्न अर्थों में अव्यवस्था और कानून विरोध के संदर्भ में प्रयुक्त किया जाने लगा है। अराजक शब्द का उपयोग कई बार गाली की तरह भी किया जाता है.

जैन दर्शन भी बौद्ध दर्शन का समकालीन है। जैन धर्म में अहिंसा पर अत्यधिक जोर दिया गया है। वहां अहिंसा की परिभाषा बहुत व्यापक है। उसमें मनसा-वाचा-कर्मणा किसी भी प्रकार की हिंसा का निषेध है। चूंकि दास प्रथा में स्वामी दास के विवेक को पनपने नहीं देता। उसपर हमेशा अपना निर्णय लादे रहता है। दास से जीवन के कई मौलिक अधिकार जैसे संपत्ति संचय, छीन लिए जाते हैं। इसलिए कह सकते हैं कि प्रत्यक्ष न सही, परोक्ष में ही—जैन धर्म दास प्रथा का विरोध करता है। हालांकि उसमें सीधे तौर पर कहीं भी दास प्रथा का विरोध नहीं है। जैन दर्शन में महावीर स्वामी के आरंभिक अनुयायियों में चंदनबाला का उल्लेख मिलता है। वह महावीर स्वामी की प्रथम महिला शिष्या थी। कहानी के अनुसार चंदनबाला चंपानगरी के राजा दधिवाहन की बेटी थी। उसका मूल नाम वसुमती था। एक बार चंपानगरी पर पड़ोसी राजा शतानीक ने हमला कर दिया। आकस्मिक हमले से आक्रांत दधिवाहन जंगलों की ओर भाग गए। उनकी पत्नी और बेटी वसुमती को शत्रु सेना ने कैद कर लिया। बाद में उन्होंने वसुमती को बेचने के लिए कोशांबी के चौराहे पर खड़ा कर दिया। वहां उसे धन्नासेठ नाम के व्यापारी ने खरीद लिया। यह देखते हुए कि वसुमती किसी संभ्रांत घर की लड़की है, धन्ना ने उससे दासी का काम लेने के बजाए, चंदनबाला नाम देकर अपनी पुत्री की तरह उसका लालन-पालन किया। बदलते घटनाचक्र के दौरान चंदनबाला महावीर स्वामी के संपर्क में आई और उनकी शिष्या बन गई।

बुद्धेत्तर भारत में दास प्रथा

बाद के कालखंड में भी दास प्रथा की मौजूदगी के पर्याप्त प्रमाण हैं। संस्कृत नाटक ‘मृच्छकटिकम’ में दासों की मंडी का उल्लेख किया गया। एक व्यक्ति उधार चुकाने में असमर्थ रहता है। इसपर साहूकार के आदमी उसे पीटते हुए मंडी में ले जाते हैं। जहां उसको नीलाम करके अपना कर्ज वसूल लिया जाता है। भारतीय दास प्रथा की चर्चा मध्य एशिया की ओर से आए योद्धाओं की चर्चा के बिना पूरी नहीं हो सकती। अपने लिए स्थायी राज्य की चाहत में उन्होंने हजारों किलोमीटर लंबी कठिन यात्राएं की थीं। बीच-बीच में उन्हें अस्थायी सफलताएं भी मिलती रहीं। कारण है कि एक अंतराल के पश्चात उनके सहयोगी सैनिकों, जिनमें उनके अपने परिजन भी होते थे—की अपनी महत्त्वाकांक्षाएं अंगड़ाई लेने लगती थीं। जिससे विजित क्षेत्र के शासन-प्रशासन के अधिकार को लेकर उनके बीच सत्ता-संघर्ष शुरू हो जाता था। उससे बचने के लिए कुछ लड़ाकों ने दास प्रथा का सहारा लिया था। दास के पास सिवाय ‘स्वामीभक्ति’ के अपना और गर्व करने लायक कुछ नहीं होता था। यह प्रत्यय भी दास प्रथा को दैवीय उठान देने के मंशा के साथ मालिक ही दासों के मनस् में रोपते आए थे। समय के साथ दास उस अमानवीय प्रथा से अनुकूलित होने लगे। एक समय ऐसा आया, जब दास उन असमानताकारी पृथा को अपना चुके थे। परिणामस्वरूप स्वामीभक्ति उनके लिए बड़ा जीवनमूल्य, बन गई। इसकी पराकाष्ठा हमें पन्ना धाय के चरित्र में दिखाई पड़ती है। सोलहवीं शताब्दी की वह स्त्री जिसका स्तर समाज में दास जैसा ही था, महाराणा संग्राम सिंह के बेटे और मेवाड़ के भावी सम्राट उदय सिंह को बचाने के लिए, अपने बेटे चंदन को हत्यारे बनवीर के आगे कर देती है। बनवीर बिना कोई दया दिखाए एक झटके में उस मासूम की हत्या कर देता है। ऐसा उदात्त दासत्व सत्तानशीनों के बड़े काम का था, इसलिए राजस्थान के इतिहास में पन्ना धाय के त्याग का खूब महिमामंडन किया गया। पन्ना धाय जैसे स्वामीभक्त हर शासक की जरूरत थे। बगैर उनके बड़े और स्थायी राज्य स्थापित कर पाना असंभव था।  

दास के लिए अपने मालिक के सुख-वैभव के अलावा कुछ भी महत्त्वपूर्ण नहीं था। वे मानापमान की भावना से कोसों परे थे। इसे समझने के लिए एक खलीफा की यह स्वीकारोक्ति काफी होगी—

‘जब मैं दरबार में बैठता हूं तो एक गुलाम को बुलाकर अपने बगल में बिठा सकता हूं। इस तरह कि उसके और मेरे घुटने एक-दूसरे को जकड़ें। जैसे ही दरबार समाप्त हो जाए तो मैं उसे अपने घोड़े की मालिश को कह सकता हूं। उसे इसमें तनिक भी बुरा नहीं लगेगा। अगर में यही काम किसी और से करने को कहूं तो वह कहता, ‘मैं आखिर तुम्हारे पक्षधर का बेटा हूं।’ या ‘तुम्हारा खास साथी हूं।’ और मैं उसे राजी नहीं करवा पाता।’28 

तो बात मध्य एशिया, ईरान और अफगानिस्तान के जुझारू लड़ाकों की हो रही थी। दसवीं शताब्दी में वे अपनी-अपनी सैन्य टुकडि़यों के साथ संघर्षरत थे। उन्हें जहां भी कमजोर राज्य दिखता, फौरन हमला कर देते थे। मगर वह जीत स्थायी न होती थी। कुछ दिनों बाद उनके अपने बीच भी सत्ता संघर्ष पनपने लगता था। उसे शांत रखने के लिए उन्हें या तो राज्य का बंटवारा करना पड़ता; अथवा अपने अधिकारों में कटौती करनी पड़ती थी। उससे मुक्ति के लिए कुछ महत्त्वाकांक्षी लड़ाकों ने प्रशिक्षित और ख्यातिनाम सैनिकों के बजाए, अपनी सेना में दासों को भर्ती करना शुरू कर दिया। उन्हें सैन्य-प्रशिक्षण देकर लड़ने लायक बनाया। प्रयोग कामयाब रहा। उदाहरण के लिए कुतबुद्दीन ऐबक शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी का गुलाम था। गौरी के साथ उसने कई युद्धों में हिस्सा लिया था। मुहम्मद गौरी ने भारत में गौरी-साम्राज्य की नींव डाली थी। परंतु उसका शासन ज्यादा लंबा न खिंच सका। अवसर मिलते ही कुतबुद्दीन ऐबक ने मुहम्मद गौरी के उत्तराधिकारियों से सत्ता छीन ली। कुतबुद्दीन ऐबक के बाद दिल्ली सल्तनत उसके भाई आरामशाह के हाथों में चली गई। वह अपने नामानुरूप ऐशोआरामपरस्त था। उसे मारकर इल्तुतमिश ने दिल्ली सल्तनत पर कब्जा कर लिया। इल्तुततमिश कुतबुद्दीन ऐबक का दास, यानी गुलाम का भी गुलाम था। विद्रोहियों के दमन के लिए उसने 40 भरोसेमंद गुलामों को लेकर ‘तुर्कान-ए-चिहालगानी’ नामक संगठन बनाया था, जो साये की तरह उसकी सुरक्षा में रहता था। इल्तुतमिश दास-योद्धाओं से अपने बेटों से भी अधिक प्यार करता था। भारत में गुलाम वंश का शासन 84 वर्षों(1206—1290 ईस्वी) तक रहा। लेकिन वह गुलाम वंश का शासन था, गुलामों का नहीं। क्योंकि न तो उससे समाज के गुलामों के प्रति नजरिये में बदलाव आया, न बाकी गुलामों में उससे आत्मविश्वास का संचार हुआ था और न ही उन शासकों का गुलामों के प्रति नजरिया बाकी लोगों से बहुत ज्यादा अलग था।

दासों का जीवन बहुत चुनौतीपूर्ण और कष्टकारी होता था। इस मामले में शूद्रों की स्थिति भी उनसे खास अच्छी नहीं थी। अछूतों का तो और भी बुरा हाल था। डॉ. आंबेडकर ने छूआछूत को दास प्रथा से भी घृणित एवं निदंनीय माना है—

‘अस्पृश्यता, दासत्व से कहीं अधिक निकृष्ट है, क्योंकि यह अछूतों को उनके हाल पर ऐसे स्थान पर पटक देती है, जहां उनकी आजीविका का कोई साधन ही न हो….दास अपने स्वामी की संपत्ति होता था। इसलिए स्वामी द्वारा उसे मुक्त व्यक्ति के सापेक्ष वरीयता दी जाती थी। मूल्यवान होने के कारण उससे स्वामी के स्वार्थ भी जुड़े होते थे, वह दास के स्वास्थ की देखभाल करता था। रोम में दासों को दलदल  और मलेरिया से ग्रस्त स्थान पर कभी नहीं ठहराया जाता था। वहां केवल मुक्त व्यक्तियों को ही नियुक्त किया जाता था।’29

बावजूद इसके भारतीय छूआछूत को हजारों वर्षों तक गले लगाए रहे। अंग्रेजों ने दास प्रथा को निंदनीय मानते हुए, 1843 में ही समाप्त कर दिया था। मगर छुआछूत को पूरी तरह खत्म करने के लिए संविधान के लागू होने तक प्रतीक्षा करनी पड़ी।

ओमप्रकाश कश्यप

9013 254 232 

संदर्भ

1. डॉ. रामविलास शर्मा, मानव सभ्यता का विकास, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ-74

2. डॉ. रामविलास शर्मा द्वारा उद्धृत, उपर्युक्त, पृष्ठ-74

3. मोर्टीमर व्हीलर, दि इंडस सिविलाइजेशन, कैंब्रिज यूनीवर्सिटी प्रेस, लंदन, 1968, पृष्ठ-34 & 135

4. रामशरण शर्मा, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, राजकमल प्रकाशन, 1992, पृष्ठ- 17

5.  उपर्युक्त, 25

6. यद्वा दास्र्याद्रहस्ता समत उलूखल मुसलम् शुम्भताप-अथर्ववेद, 12/3/13)

7. रामशरण शर्मा, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, राजकमल प्रकाशन, 1992, पृष्ठ-16

8. राधाकुमुद मुखर्जी, हिंदू सभ्यता, पृष्ठ 89

9. रामशरण शर्मा, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, 25

10. उदकुंभानधिनिधाम दास्यौ मार्जालीयं परिनृत्यंति पदों

      निध्नतीरिदं मधुगायन्त्यों मधु वै दैवानां परममन्नाधाम—तैत्तिरीय संहिता, 7/5/101

  1. डॉ. रामविलास शर्मा, मानव सभ्यता का विकास, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ-74

12. प्रवृत्तोऽश्वतरीरथो दासीनिष्कोऽत्स्यन्नं पश्यसि—छांदोग्योपनिषद, 5.13.2

13. स होवाच विज्ञायते हस्ति, हिरण्यस्पापस्तं गौ, अश्वानां दासीनां—बृहदारण्यक उपनिषद(6.2.7)।

14. ओमप्रकाश प्रसाद, प्राचीन भारत का सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास, राजकमल प्रकाशन, 2006

15. गृह जातस्था, क्रीतो लब्धो, दायादुपागतः

अनाकाल भृतो, लोके अहितः स्वामिना च यः। 24

मोक्षितो महतश्चार्णात्प्राप्तो, युद्धात्पणार्जितः

तवाह मित्युपगतः प्रवज्यावसितः कृतः। 25

भक्तदासश्चविज्ञेयस्तथैव वडवाहतः

विक्रेता चात्मनः शास्त्रै दासाः पंचदशस्मृताः। 26

  1. श्रीपाद अमृत डांगे, आदिम साम्यवाद, हिंदी अनुवाद आदित्य मिश्र, राजकमल प्रकाशन, 1978,  पृष्ठ 195

17. डॉ. सुरेद्र कुमार शर्मा अज्ञात, क्या बालू की भीत पर खड़ा है हिंदू धर्म, विश्व बुक्स प्रा. लिमिटेड,

18. ददौ कन्यापिता तासां दासीदासमनुत्तमम्।

हिरण्यस्य सुवर्णस्य मुक्तानां विद्रुमस्य च। रामायण, बालकांड, 1.74.5

19. रूपाजीवाश्म वादिन्यो वणिजश्य महाधनाः

शोभयंतु कुमारस्य वाहिनी सुप्रसारिताः।। उत्तरकांड-6.74.2

20. तस्माततेऽहं प्रदास्यामि विविधं वसु भूरि च

      दासी सहस्राश्यामानं सुवस्त्राणामलंकृतम्।। वनपर्व, 185.34

21. ‘दासाश्च दास्याश्च सुमृष्ठवेषाः। संभोजकाश्चाप्युपजहृनुरत्नम्।। आदिपर्व-193।

22. शतं दासीसहस्राणि तरूण्यो हेमभद्रिकाः

कंबूकेयूर धारिष्यो निष्ककंठयः स्वलंकृता-महाभारत, 2.61.8

23.  दासॊऽसमीति तवया वाच्यं संसत्सु च सभासु च।
       एवं ते जीवितं दद्याम एष युद्धजितॊ विधिः।। महा.3.256.11

24.  इयं सुरसुतप्रख्या सर्वधर्मोपचायिनी

सदा देवमनुष्याणामसुराणां च गालव।।

कांछिता रूपतो बाला सुता मे प्रतिगृह्यताम्

अस्याः शुल्कं प्रदास्यंति नृपा राज्यमपि ध्रुवम्।। उद्योगपर्व, 115.2-3

25. देवराज चानना, सलेवरी इन एन्शीएंट इंडिया, पिपुल्स पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, 1960, पृष्ठ-40

26. डांगे, आदिम समाज, पृष्ठ 195

27. खंडहाल जातक, भदंत आनंद कौसल्यायन, जातक संख्या 542, हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग।

28. सी.एन.सुब्रह्मण्यम, जब गुलाम सुल्तान बने, शैक्षिक संदर्भ, मार्च-अप्रैल 1996

29. कौन ज्यादा बुरा है—गुलामी या अस्पृश्यता?, डॉ. भीमराव आंबेडकर।

मई दिवस : संघर्ष की याद और संकल्पों का दिन

सामान्य

मई दिवस पर विशेष

यदि तुम सोचते हो कि हमें फांसी पर लटकाकर तुम मजदूर आंदोलन को, गरीबी, बदहाली और विपन्नता में कमरतोड़ परिश्रम करने वाले लाखों लोगों के आंदोलन कोकुचल डालोगे….अगर तुम्हारी यही राय है तो हमें खुशीखुशी फांसी के तख्ते पर चढ़ा दो। किंतु याद रहे, आज तुम एक चिंगारी को कुचल रहे हो, कल यहांवहां, तुम्हारे आगेपीछे, प्रत्येक दिशा से लपटें उठेंगीं। यह जंगल की आग है। तुम इसे कभी भी बुझा नहीं पाओगे। एक दिन आएगा, जब हमारी खामोशी उन आवाजों से कहीं ज्यादा ताकतवर होगी, जिनका तुम आज गला घोंट रहे हो ऑगस्ट स्पाइस।

मई दिवस’ के साथ कोई खुशनुमा प्रसंग नहीं जुड़ा है। न यह मजदूरों के लिए उत्सव मनाने का दिन है। फिर भी हर मेहनतकश के लिए इस दिन का महत्त्व है। यह उन्हें संगठन की ताकत का एहसास दिलाता है। उस हौसले की याद दिलाता है जिसके बल पर उनके लाखों मजदूर भाई अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर आए थे। चार्ल्स. रथेनबर्ग के शब्दों में, ‘मई दिवस वह दिन है जो मजदूरों के दिलों में उम्मीद तथा पूंजीपतियों के मन में खौफ पैदा करता है।’ यह अकेला दिन है जिसे मजदूरों के नाम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाता है। मजदूरों के लिए यह याद रखने का दिन है। ठीक ऐसे ही जैसे कोई जीवंत समाज अपनी आजादी के महानायकों के किस्सों को सहेजकर रखता है।

मशीनीकरण के बाद का दौर पूंजी के केंद्रीकरण का था। उसमें आदमी को भी मशीन मान लिया गया था। फैक्ट्रियों में काम के घंटे निर्धारित नहीं थे। उनीसवीं शताब्दी के आरंभ तक ‘कार्यदिवस’ का अर्थ था, सूरज निकलने से सूरज छिपने तक काम करना।1 मौसम के अनुसार दिन घटताबढ़ता तो काम के घंटे भी घटबढ़ जाते। हर कामगार को प्रतिदिन 14 से 16 घंटे काम करना पड़ता था। कभीकभी तो एक कार्यदिवस 18 घंटे तक पहुंच जाता था।2 कार्यघंटों को लेकर महिलाओं और पुरुषों, बच्चों और बड़ों में कोई भेद नहीं थाइसके आलावा मजदूरी बहुत कम थी। 16 से 18 घंटों तक काम करने के बावजूद मजदूरों को इतनी मजदूरी नहीं मिलती थी, जिससे वे सामान्य जीवन भी जी सकें। ऊपर से बार-बार आने वाली मंदी के कारण मजदूरों को बेरोजगारी का सामना करना पड़ता था। आड़े वक्त में सरकार भी उद्यमियों और पूंजीपतियों का ही पक्ष लेती थी। 1834 में ‘वर्किंगमेन्स एडवोकेट’ नामक अखबार ने छापा था, ‘डबलरोटी के पैकेटों को लानेले जाने के काम में लगे मजदूरों की हालत मिस्र के बंधुआ मजदूरों से भी बुरी थी। उन्हें दिन के 24 घंटों में 18 से 20 घंटे काम करना पड़ता था।’ मजदूर उसे 10 घंटों तक सीमित करने की मांग करते आ रहे थे। 1791 में फिलाडेफिया के बढ़इयों ने 10 घंटे के कार्यदिवस के लिए हड़ताल की थी। उसके बाद 1827 में ‘मेकेनिक्स यूनियन ऑफ़ फिलाडेफिया’, जिसे विश्व का पहला मजदूर संगठन कहा जा सकता है, के नेतृत्व में निर्माण कार्य के मजदूरों ने, 10 घंटों के कार्यदिवस की मांग को लेकर हड़ताल की थी।3 उनके बैनरों पर लिखा होता था—‘छह से छह तक, दस घंटे काम के, दो घंटे आराम के।’ 1830-40 के बीच उनकी मांग में और भी तेजी आ गई। उसके फलस्वरूप 1860 तक लगभग सभी देशों ने कार्यदिवस के औसत घंटों को 12 से घटाकर, 11 कर दिया था

मजदूर कार्यदिवस को 10 घंटों तक सीमित करने की मांग पर अड़े थे। 1837 में अमेरिका में उसे लेकर चक्काजाम जैसी स्थिति बन गई। आखिरकार संयुक्त राष्ट्र के राष्ट्रपति वेन बुरान ने सरकारी दफ्तरों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए प्रतिदिन 10 घंटे करने का आदेश जारी कर दिया। उसकी देखादेखी कारखाना मजूदरों ने यह कहते हुए कि उनसे भी सरकारी कर्मचारियों के बराबर काम लिया जाए, आंदोलन को और तेज कर दिया4 1853 में नएनए बने कैलीफोर्निया राज्य ने कार्यघंटों को सीमित करने से संबंधित पहला, मगर आधाअधूरा कानून बनाया था। मूल प्रस्ताव में दस घंटे के वैध कार्यदिवस के साथ, उससे अधिक काम लेने वाले नियोक्ताओं को दंडित किए जाने का प्रावधान था। उसकी काफी चर्चा भी हुई थी। प्रस्ताव कानून की शक्ल ले, उससे पहले ही उद्यमियों ने सरकार पर जोर डालकर, उसे कमजोर करने का षड्यंत्र रच दिया। जो कानून बना उसमें कहा गया था कि ‘राज्य की किसी भी अदालत में 10 घंटों के श्रम को, एक कार्यदिवस का श्रम माना जाएगा।’5 इस तरह दस घंटों के कार्यदिवस की घोषणा महज कानूनी अवधारणा तक सीमित थी। वह नियोक्ताओं को न तो कोई निर्देश देता था, न उसमें क़ानून के उल्लंघन पर किसी तरह के दंड काप्रावधान था। कानून की कमजोरी का लाभ उठाकर नियोक्ता मजदूरों के साथ खूब सौदेबाजी करते थे। मजदूर संगठन उस कानून में आवश्यक संशोधन की मांग कर रहे थे।

10 घंटे के कार्यदिवस की मांग अभी चल ही रही थी कि श्रमिकों ने 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग तेज कर दी। इस बार वह मांग सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं थी। बल्कि जहां-जहां भी श्रमिक उत्पीड़न का शिकार थे, वहांवहां वे अपनी मांग के समर्थन में सरकार और उद्योगों पर दबाव बनाने में लगे थे। 1856 में आस्ट्रेलिया के निर्माण मजदूरों ने, 8 घंटे की मांग को लेकर नारा गढ़ा था—‘8 घंटे काम, 8 घंटे मनोरंजन और 8 घंटे आराम।’ इस मांग को तब बल मिला जब अगस्त 1866 में ‘नेशनल लेबर यूनियन’ ने 8 घंटे की मांग का समर्थन किया। वह अमेरिका का पहला मजदूर संगठन था। अपने स्थापना समारोह में ही 8 घंटे के कार्यदिवस की मांग के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाते हुए संगठन की ओर कहा गया था कि पूंजीवादी दासता से श्रमिकों की मुक्ति हेतु वर्तमान समय की सबसे पहली और बड़ी जरूरत है, अमेरिका के सभी राज्यों में 8 घंटे के कार्यदिवस को वैध माना जाए। सितंबर 1866 में फर्स्ट इंटरनेशनल द्वारा अपने जिनेवा सम्मेलन में 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग, घोषणा के साथ ही अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गईफर्स्ट इंटरनेशनल का निष्कर्ष था—

काम के घंटों की वैध सीमा तय होना आवश्यक है। इसके अभाव में कामगार वर्गों की स्थिति में सुधार तथा शोषण से मुक्ति का कोई भी प्रयास सफल नहीं हो सकता…..एक वैध कार्यदिवस के लिए यह सभा 8 घंटों की सीमा के प्रस्ताव को मंजूर करती है।’6

1867 में ‘पूंजी’ का प्रथम खंड प्रकाशित हो चुका था। उससे पहले माना जाता था कि उत्पादकता सांस्कृतिक उपादानों पर निर्भर करती है। मार्क्स ने शताब्दियों से चली आ रही इस धारणा का खंडन किया था। कहा था कि संस्कृति स्वयं उत्पादकता के साधनों द्वारा तय होती है। उस पुस्तक में मार्क्स ने श्रमिक शोषण की विशद विवेचना की थी। पूंजीवादी शोषण के लगभग सभी पक्ष उसमें शामिल थे। उसका विश्लेषण इतना गहन था कि श्रमिक शोषण से जुड़ी छोटी-सेछोटी बात भी उसकी पैनी नजर से बच नहीं पाई थीमार्क्स ने ‘नेशनल लेबर यूनियन’ के 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग का समर्थन किया था। कहा था कि श्रमिकों को रंग-भेद की भावना से ऊपर उठकर, अपने अधिकारों के पक्ष में आवाज उठानी चाहिए। उन दिनों अमेरिका में मजदूर को प्रति सप्ताह 63 घंटे काम करना पड़ता थामार्क्स चाहता था कि संयुक्त राष्ट्र अमेरिका श्रमिक अधिकारों के समर्थन में 8 घंटों के वैध कार्यदिवस की घोषणा करेपूंजीपतिवर्ग दूसरों को दास बनाकर रखने की मानसिकता से बाहर आए। उसने लिखा था—

जब तक दासता उसके गणतंत्र को विरुपित करती रहेगी, तब तक श्रमिक मुक्ति की दिशा में उठाया गया कोई भी कदम नाकाम सिद्ध होगा। जब तक काले श्रमिकों की पहचान उनके रंग के आधार पर होगी, तब तक श्वेत मजदूरों के लिए भी शोषणमुक्ति संभव नहीं है….24 घंटे के सामान्य दिन में मनुष्य अपनी कार्यशक्ति का भरपूर इस्तेमाल सीमित घंटों तक ही कर सकता है। यहां तक कि एक घोड़ा भी, प्रतिदिन अधिकतम 8 घंटे काम कर सकता है। दिन के बाकी घंटों में 8 घंटे कार्यशक्ति को आराम करना चाहिए, बाकी घंटे उन्हें अपने भौतिक आवश्यकताओं स्नान, भोजन आदि के लिए मिलने चाहिए।’7

8 घंटे के कार्यदिवस की मांग असामयिक नहीं थी। उसके पीछे भरा-पूरा वैचारिक दर्शन था। उसे जमीन दी थी, पीयरे जोसेफ प्रूधों, मार्क्स, मिखाइल बकुनिन, एंगेल्स जैसे विचारकों ने। वे अर्थव्यवस्था के समाजीकरण की मांग कर रहे थे। उसके पीछे समानता और स्वतंत्रता का दर्शन था। मान्यता थी कि यदि सब बराबर हैं, तो सभी को अपनी जरूरत के अनुसार भोग करने का भी अधिकार है। इसलिए मार्क्स का कहना था—‘प्रत्येक से उसकी योग्यता के अनुसार। प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुरूप।’ समाजवाद की दिशा में सबसे क्रांतिकारी पहल प्रूधों ने की थी। वह अराजकतावादी चिंतक था। मानता था कि व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा गुलामी जितनी ही घातक है। उसका कहना था—‘व्यक्तिगत संपत्ति चोरी है। संपत्तिधारक व्यक्ति चोर है।’ वह संपत्ति को सामाजिक दासता का कारक मानता था—

यदि मुझसे कोई यह पूछे कि गुलामी क्या है? तो मैं उसका एक ही शब्द में उत्तर दूंगा—‘गुलामी, हत्या है!’ मेरा मंतव्य पूरी तरह सरल और स्पष्ट है। उसके लिए किसी अतिरिक्त प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य की चेतना, उसके मस्तिष्क तथा व्यक्तित्व को छीन लेने की शक्ति—उसके जीवनमृत्यु का फैसला करने की शक्ति के समान हैं। यह मनुष्य को गुलाम बनाती है। यह उसकी हत्या है, क्यों? अब यदि कोई मुझसे पूछे—‘संपत्ति क्या है?’ क्या मुझे इसका वैसा ही उत्तर नहीं देना चाहिए! कहना चाहिए कि यह डकैती है!’ इसमें गलत समझे जाने की कतई गुंजाइश नहीं है। दूसरा निष्कर्ष निश्चित रूप से पहले का ही रूपांतरण है?8

प्रूधों की धारा का ही दूसरा विचारक था, मिखाइल बकुनिन। उसका राजनीतिक दर्शन नागरिक स्वतंत्रता, समाजवाद, संघवाद, नास्तिकता और भौतिकवाद से मिलकर बना था। बकुनिन का मानना था कि किसी समाज में व्यक्ति अथवा व्यक्ति समूह को दिए गए विशेषाधिकार उसके बुद्धि-विवेक एवं संवेदनशीलता को मार देते हैं। विशेषाधिकार चाहे राजनीतिक हों अथवा आर्थिक, वे मनुष्य के समाजीकरण की धारा को अवरुद्ध करते हैं। उसे स्वार्थी और आत्मपरक बनाते हैं। मनुष्य की अधिकतम स्वतंत्रता का समर्थक बकुनिन लोकतंत्र का भी आलोचक था। उसका कहना था कि जब जनता पर लाठियां बरसाई जा रही हों तो लोगों को यह जानकर कोई प्रसन्नता नहीं होगी कि वे लोकतंत्र की लाठियां हैं। बुद्धिजीवियों और दार्शनिकों से उसकी अपील थी—

हमें अपने सिद्धांतों का प्रचार शब्दों के माध्यम से नहीं, कार्यों के माध्यम से करना चाहिए। यही प्रचार का सबसे लोकप्रिय, शक्तिशाली और अनूठा तरीका है….दुनिया में क्रांतिकारी गतिविधियों को बढ़ावा देने में सत्तावादी क्रांतिकारियों का बहुत कम योगदान रहा है। इसलिए कि वे जनमानस को आड़ोलित कर, क्रांति की ओर उन्मुख करने के बजाय, मात्र अपने दम पर, अपनी योग्यता, सत्ता और विचारों के माध्यम से क्रांति लाना चाहते थे….उन्हें क्रांति के समर्थन में फरमान जारी करके नहीं, अपितु जनता को अपने लक्ष्यप्राप्ति की दिशा में प्रोत्साहित करके, क्रांति को बढ़ावा देना चाहिए।’9

मई दिवस के आंदोलन का चरित्र मूलतः ‘अराजकतावादी’ था। बता दें कि अराजकतावाद का आशय, जैसा प्रचार किया जाता है, राज्य तथा उसकी शक्तियों का लोप हो जाना नहीं है। उसके मूल में यह विचार है कि राज्य जनता का चयन है। उसका गठन जनता द्वारा अपने सुख एवं सुरक्षा के लिए किया जाता है। वह जनता के तभी हितकारी हो सकता है, जब उसपर जनता का अधिकाधिक नियंत्रण हो। अराजकतावाद में राज्य की अधिकतम शक्तियां जनता की ओर अंतरित हो जाती हैं। परिणामस्वरूप राज्य की शक्तियां प्रतीकात्मक होकर रह जाती हैं। सरकार की आवश्यकता नहीं रह जाती, यदि हो भी तो वह न्यूनतम अधिकारों के साथ न्यूनतम शासन करती है।

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प्रूधों और बकुनिन का उल्लेख यहां इसलिए प्रासंगिक समझा गया क्योंकि मई दिवस आंदोलन की बागडोर मुख्यतः अराजकतावादियों के हाथों में थी, जो किसी भी प्रकार के सत्तावाद का विरोध करते थे। ‘अंतरराष्ट्रीय वर्किंग मेन्स ऐसोशिएसन’ जिसे ‘प्रथम इंटरनेशनल’ के नाम से भी जाना जाता है, समाजवादी संगठन था। उसके पीछे सोच था कि मजदूर चाहे किसी देश का हो, उसकी मूलभूत समस्याएं और चुनौतियां एक जैसी होती हैं, इसलिए उसके विरोध में लड़ाई भी संगठित होकर लड़ी जानी चाहिए। वे समाजवाद के समर्थक थे, किंतु उसके लिए रास्ता क्या हो, इसे लेकर उनमें मतभेद थे। उसमें से कुछ राबर्ट ओवन के अनुयायी थे, कुछ लुइस ब्लेंक के। कुछ का भरोसा संघवाद में था, तो कुछ अपना तारणहार गणतंत्र को मानते थे। यह विभाजन ऊपर की श्रेणी के बुद्धिजीवियों में भी था। हीगेल से प्रभावित कार्ल मार्क्स द्वंद्ववादी विचारधारा का समर्थक था। उसका मानना था कि सत्ता प्रतिष्ठानों और उत्पादन केंद्रों पर श्रमिक वर्गों का नियंत्रण होना चाहिए। बकुनिन किसी भी प्रकार के सत्तावाद का विरोधी था। उसे वह मनुष्य की स्वतंत्रता में बाधक मानता था। दोनों गुटों के मतभेद इतने बढ़े कि इंटरनेशनल की छठी कांग्रेस के बाद, दोनों के बीच विभाजन हो गया। अराजकतावादी बकुनिन के नेतृत्व में अलग हुए टुकड़े को ‘एंटी-आथरटेरियन इंटरनेशनल’ का नाम दिया गया था। ‘एंटी-आथरटेरियन इंटरनेशनल’ के नेता मानते थे कि ‘हड़ताल का संघर्ष का बेशकीमती हथियार’ है। इसलिए श्रमिकों को ‘महान एवं अंतिम चुनौती’ के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए। अराजकतावादी नेताओं के मनस् में नई वर्गहीन, समाजवादी आदर्शों से युक्त और सभी प्रकार यहां तक राज्य के वर्चस्व से भी मुक्त नए समाज का सपना कौंधता रहता था। 8 घंटे के कार्यदिवस से जुड़ी हड़ताल में इसी गुट के नेता थे, जो ‘बेहतर समाजवादी दुनिया’ के सपने के साथ जूझ रहे थे

1872 में ‘प्रथम इंटरनेशनल’ का कार्यालय, लंदन से न्यू यार्क शिफ्ट कर दिया गया था। इससे उसकी गतिविधियों में व्यवधान आया था। प्रभाव भी घटने लगा था। लेकिन मजदूर 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग पर अडिग थे। उसके लिए धरना, प्रदर्शन, हड़ताल चलते ही रहते थे। 1877 में मार्टिंग्स वर्ग, पश्चिमी वर्जिनिया में रेलवे कर्मचारियों ने हड़ताल का ऐलान कर दिया। मामला इतना बढ़ा कि उसपर काबू करने के लिए सेना बुलानी पड़ी। बलप्रयोग के कारण हड़ताल तो दब गई, परंतु उससे जो चिंगारियां फूटीं उसने बहुत जल्दी वाल्टीमोर, ओहियो, पेनसिल्वेनिया जैसे शहरों की रेलवे कंपनियों को अपनी गिरफ्त में ले लिया। धीरे-धीरे दूसरे उद्यमों से जुड़े मजदूर भी हड़ताल पर उतर आए। पहली बार मजदूरों ने सरकार और पूंजीपतियों को अपनी विराट शक्ति का एहसास कराया था। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा था। वह ऐसा जनउभार था, जिसका असर राष्ट्रव्यापी था

1884 का वर्ष अंतरराष्ट्रीय मजदूर आंदोलनों के इतिहास में बड़ा परिवर्तनकारी सिद्ध हुआ। उसी वर्ष फेडरेशन ऑफ़ आर्गनाइज्ड ट्रेड एंड लेबर यूनियंस, जिसे बाद में ‘अमेरिकन फेडरेशन ऑफ़ लेबर’ के कूटनाम से भी जाना गया—का शिकागो में चौथा राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ। 7 अक्टूबर, 1884 को आयोजित उस सम्मेलन में निम्नलिखित प्रस्ताव को स्वीकृति मिली थी—

‘‘फेडरेशन ऑफ़ आर्गनाइज्ड ट्रेड एंड लेबर यूनियंस ऑफ़ दि यूनाइटिड स्टेट्स एंड कनाडा’ तय करती है कि पहली मई तथा उसके बाद से 8 कार्यघंटों का एक कार्यदिवस, वैध कार्यदिवस के रूप में जाना जाएगा। हम सभी श्रमिक संगठनों से अपील करते हैं कि वे अपने-अपने नियमों को इस प्रकार निर्धारित करें कि वे इस प्रस्ताव के अनुकूल हों10

अमेरिकन फेडरेशन ऑफ़ लेबर’ स्वैच्छिक और संघीय आधार पर बना था। फेडरेशन के राष्ट्रीय सम्मेलन के निर्णय सिर्फ उससे जुड़े श्रमिक संगठनों पर लागू होते थे; वह भी तब जब श्रमिक संगठन उन निर्णयों का विधिवत समर्थन करें। 8 घंटे के प्रस्तावित कार्यदिवस की घोषणा में हड़ताल का संकल्प भी छिपा था। चूंकि हड़ताल के दौरान श्रमिकों के पास अपनी आजीविका का कोई साधन नहीं होता, इसलिए हड़ताल लंबी खिंचने पर मजदूरों को संगठन की आर्थिक मदद की जरूरत पड़ सकती थी। परोक्ष रूप में फेडरेशन का संकेत बड़ी हड़ताल की ओर था। उसके लिए सदस्य श्रमिक संगठनों का समर्थन और सहभागिता आवश्यक थी। उस समय फेडरेशन के सदस्यों की संख्या लगभग 50000 थी। राष्ट्रीय स्तर पर यह बहुत ज्यादा भी नहीं थी। सरकारों पर दबाव बनाने की स्थिति में तो वह संगठन बिलकुल भी नहीं था

उस दिनों अमेरिका का श्रमिक आंदोलन तीन प्रमुख धाराओं में बंटा हुआ था। उसके सबसे बड़े मजदूर संगठन का नाम था—‘आर्डर ऑफ़ दि नाइट्स ऑफ़ लेबर’ यानी योद्धाओं का संगठन।’ 1886 में सदस्य संख्या की दृष्टि से वह सबसे बड़ा मजदूर संगठन था। उसके लगभग 7 लाख से अधिक सदस्य थे। उसमें कई महिलाएं भी शामिल थीं। टेरेंस वी. पोव्देर्ली उसका नेता था। यह संगठन 1878 में ही 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग करता हुआ आ रहा था। उसकी ख्याति एक जुझारू संगठन की थी। 1886 में उसकी लोकप्रियता शिखर पर थी। इस कारण उसके सदस्यों की संख्या भी बढ़ती जा रही थी। उसके प्रमुख नेता हड़ताल के बजाए सरकार के साथ सहयोग और बातचीत करते हुए, उसका हल निकालना चाहते थे। हालांकि उसका एक हिस्सा हड़ताल के लिए तैयार था। नाइट ऑफ़ लेबरने 1886 की 8 घंटों के कार्यदिवस हेतु ऐतिहासिक हड़ताल में हिस्सा न लेने का निर्णय लिया था।. नतीजा यह हुआ कि उसका प्रभाव कम पड़ने लगा।। उसके बाद जितनी तेजी से उसकी सदस्य संख्या बढ़ी थी, उतनी ही तेजी से उसकी सदस्य संख्या और प्रतिष्ठा कम होने लगी थी। दूसरी धारा अराजकतावादियों की थी। उन्होंने 1883 में ‘इंटरनेशनल वर्किंग पिपुल्स एसोशिएसन’ का गठन किया था। वे लोग न केवल कानून अपितु राज्य की सत्ता को ही श्रमिक हितों में बाधक मानते थे। इसलिए वे सहयोग या बातचीत के बजाए, मांग को लेकर जोरदार संघर्ष छेड़ने के पक्ष में थे। उसके लिए मारक हथियारों के प्रयोग से भी उन्हें आपत्ति नहीं थी।

तीसरा संगठन ‘अमेरिकन फेडरेशन ऑफ़ लेबर’ था। इस संगठन के कई सदस्य मार्क्सवादी विचारधारा के थे। यह संगठन शुरू से ही आठ घंटों के कार्यदिवस की मांग करता आया था। आरंभ में इसका तरीका भी संवाद और सहयोग पर आधारित था। उसमें एक गुट ऐसा भी था जिसे बातचीत के तरीके पर शुरू से ही विश्वास न था। यह गुट आगे चलकर न केवल फेडरेशन के बाकी सदस्यों को हड़ताल के लिए तैयार करने में सफल रहा, अपितु अपने अनुषंगी संगठनों के कुछ गुटों को हड़ताल के लिए अपने साथ लाने में सफल रहा था

यह दिखाने के लिए कि 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग केवल घोषणा नहीं है, श्रमिक संगठन उसके बारे में पूरी तरह से गंभीर हैं, ‘फेडरेशन ऑफ़ लेबर’ ने अपरोक्ष तैयारियां आरंभ कर दी थीं। आने वाले वर्ष में श्रमिक नेताओं की जगह-जगह सभाएं आयोजित की गईं। हर जगह 8 घंटों के कार्यदिवस के संकल्प को दोहराया गया। उसे सबसे सुधारवादी कदम बताया जा रहा था। कहा जा रहा था कि उससे ‘पूंजीवाद’ की जड़ पर प्रहार होगा। हालांकि कुछ अराजकतावादी अब भी यह मानकर चल रहे थे कि 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग से श्रमिकों की हालत में सुधार होने की संभावना बहुत कम है। श्रमिक नेताओं में ऑगस्ट स्पाइस जैसे उग्र अराजकतावादी भी थे, जो 8 कार्यघंटों की मांग से सहमत थे, मगर श्रमिकों के कल्याण के लिए उन्हें अपर्याप्त मानते थे। स्पाइस का विचार था कि—‘हमारी समस्याओं का वास्तविक समाधान बुराई की जड़ पर सीधा प्रहार किए बगैर संभव नहीं है।’11 एक और अराजकतावादी सेमुअल फील्डेन ने हेमार्किट नरसंहार से एक वर्ष पहले अराजकतावादी अखबार ‘दि अलार्म’ में लिखा था—‘‘कोई आदमी चाहे दिन में आठ घंटे काम करे या दस घंटे, वह गुलाम है, गुलाम रहेगा।’12 फील्डेन ने कहा था कि मजदूरों की समस्या का एकमात्र समाधान है, ‘निजी संपत्ति का खात्मा और प्रतिस्पर्धा का अंत।’

8 कार्यघंटों की मांग को श्रमिकों का चौतरफा समर्थन मिल रहा था। मजूदर संगठन भी अपनी-अपनी तरह से सक्रिय थे। ‘कारपेंटरर्स एंड सिगार मेकर्स’, ‘नाइट्स ऑफ़ लेबर’ की सदस्य संख्या में दिन दूनी, रात चौगुनी वृद्धि हो रही थी। इसका अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है, कि फेडरेशन की घोषणा के बाद, श्रमिक संगठन ‘नाइट्स ऑफ़ लेबर’(मजदूरों के शूरवीर) की सदस्य संख्या 1884 में 70000 से 1885 तक 200000 और फिर 1886 तक 700000 हो चुकी थी13 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग नाइट आफ लेबर के कार्यक्रम का हिस्सा थी। आरंभ में वह उस मुद्दे पर हड़ताल के लिए बाकी सदस्यों का साथ देने को तत्पर था. मगर बाद में, कदाचित मजदूर संगठनों पर अराजकतावादियों के प्रभाव के चलते, नाइट ऑफ़ लेबरके नेता हड़ताल से कटने लगे थे. स्वयं पोव्देर्ली, फेडरेशन से जुड़ी यूनियनों से हड़ताल में भाग लेने को कहने लगा था।

दूसरे कई संगठनों में भी बढ़ती सदस्य संख्या को देखकर उत्साह था। उसका असर किसी एक शहर तक सीमित नहीं था, बल्कि अमेरिका के विभिन्न शहरों के श्रमिक इस मांग को लेकर जोश से भरे हुए थे। मजदूरों को अंदाजा था कि 8 कार्यघंटों की मांग के लिए होने वाली हड़ताल लंबी खिंच सकती है। इसलिए कुछ सरकार पर दबाव बनाने के लिए निर्धारित तिथि से पहले अल्पावधिक हड़तालों का सिलसिला शुरू हो चुका था। उन हड़तालों में ‘कुशल और अकुशल, काले और गोरे, स्त्री और पुरुष, नेटिव और प्रवासी सभी शामिल होते थे

3

मजूदर संघर्ष का केंद्र शिकागो बना था। क्या इसके पीछे कोई खास कारण था? बिलकुल। अमेरिकी गृहयुद्ध(1861-1865) के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था को जोरदार झटका लगा था। वह भयानक मंदी के दौर से गुजर रही थी। 1873 से 1879 के बीच 18000 कंपनियां दिवालिया घोषित हो चुकी थीं। 8 राज्य और सैकड़ों बैंक तबाह हो चुके थे14 मगर जैसे ही मंदी का दौर समाप्त हुआ, अमेरिका खासकर उसके शिकागो शहर में जो उन दिनों बड़ा औद्योगिक केंद्र था—बाहर से आने वाले मजदूरों की संख्या अचानक बढ़ चुकी गई। इससे शहर की समस्याएं भी बढ़ी थीं। उन दिनों अमेरिका में प्रति सप्ताह औसत 63 घंटे काम का प्रावधान था15 मंदी से उबरने की छटपटाहट में जहां उद्योगपति अधिक से अधिक मुनाफा कमाना चाहते थे। वहीं श्रमिक संगठन अपने लिए बेहतर मजदूरी की मांग कर रहे थे। कारण यह था कि मंदी के बाद जिस अनुपात में मंहगाई में वृद्धि हो रही थी, उस अनुपात में वेतनवृद्धि नहीं हो पा रही थीतनाव तब और बढ़ गया था जब बाल्टिमोर एंड ऑहियो रेलरोड ने मंदी के बहाने मजदूरों की पगार में 10 की कटौती की घोषणा की नतीजा यह हुआ की जुलाई 25, 1877 से मजदूरों ने हड़ताल कर दी देखते ही देखते उसने पूरे अमेरिका को अपनी चपेट में ले लिया स्थानीय पुलिस और सुरक्षा बल हड़ताल पर काबू पाने में नाकाम रहे तो सेना बुलानी पड़ी दो सप्ताह चलने वाली उस हड़ताल ने सैकड़ों की जान ली थी करोड़ों डॉलर की संपत्ति को नुकसान पहुंचा था जार्ज शिलिंग नाम के एक मजदूर नेता ने उसे ‘सामाजिक और औद्योगिक ग़दर’ की संज्ञा की थी

महत्त्वपूर्ण बात यह कि ‘गृह युद्ध की समाप्ति के एक दशक के भीतर ही उद्योगपति शिकागो पुलिस को गैरभरोसेमंद बताने लगे थे। उनका मानना था कि सरकारी सुरक्षाबल मजदूरों के प्रति उदारता बरतते हैं। ऐसा न हो, इसके लिए सुरक्षा बलों की जगह अपने खर्च पर पेशेवर संगठन बनाने की कोशिश जारी थी। 1870 और 1880 के दशक में उन्होंने प्राइवेट सशस्त्र बलों की भर्ती शुरू कर दी थी। निजी तथा सरकारी सशस्त्र बलों की सुरक्षा के लिए मजबूत हथियार-घर और किले बनाए जा रहे थे16 इसके साथसाथ मजदूर संगठनों पर लगाम लगाने के प्रयत्न भी जारी थे। वे मजदूरों को डराने, धमकाने, उनके संगठनों को काली सूची में डालने जैसे काम कर रहे थे। श्रमिक संगठनों में फूट डालने के लिए जासूसों, ठगों, निजी सुरक्षा बलों, और भेदियों की भरती की जा रही थी। सीधे-साधे गरीब मजदूरों को अनार्किस्ट और कम्युनिस्ट जैसे नाम देकर नौकरी से हटाया जा रहा था। मंदी के नाम पर मजदूरों के वेतन की कटौती की जा रही थी।

इसके बावजूद मुख्य धारा के अखबार पूंजीपतियों का समर्थन कर रहे थे। शिकागो ट्रिबून, दि टाइम्स, जैसे बड़े अखबारों का किसी न किसी रूप में राजनीतिकरण हो चुका था। मजदूरों की ओर ‘सोशलिष्ट’ और ‘अनार्किस्ट’ जैसे कुछ जनवादी तेवर के अखबार थे। लेकिन तुलनात्मक रूप से उनकी पहुंच बहुत छोटे समूह तक थी। उदाहरण के लिए 1890 के दशक में शिकागो डेली न्यूज की पाठकसंख्या जहां 2,00,000 थी, वहीं सोशलिष्ट और अनार्किस्ट जैसे प्रतिबद्ध विचारधारा के अखबारों की संयुक्त पाठक संख्या महज 30,000 थी17 जैसेजैसे मई का महीना करीब आ रहा था, मजदूरों का जोश भी बढ़ता जा रहा था। 1886 के आरंभ में, जहां जाओ वहां, 8 घंटे के कार्यदिवस, मजदूर एकता और पूंजीपतियों के शोषण पर चर्चा होती सुनाई पड़ती थी। सड़कों पर, सेलूनों और बाजारों में जोशीले गीत सुनाई पड़ते थे —

लाखों मेहनतकश, जागे हुए है

आओ उन्हें मार्च करते हुए देखें

उधर देखो, तानाशाह कांप रहे हैं,

अरे! उनकी ताकत खत्म होने लगी है

ओ श्रमयोद्धाओं किलों को उड़ा दो

अपने उद्देश्य की खातिर लड़ो

लड़ो, ताकि तुम्हें और तुम्हारे

सभी पड़ोसियों को बराबर का हक मिल सके

उठो, इन निरंकुश कानूनों को दफन कर दो

ऐसे गीतों ने श्रमिकों की आंखों में सपने रोपने का काम किया था। सपने बराबरी और एकता के। समानता और स्वतंत्रता के। फेडरेशन ऑफ़ लेबर की 8 कार्यघंटों को कानूनी घोषित करने की मांग के साथ ही श्रमिक संगठन उसके लिए तैयारियों में जुटने लगे थे। कामगारों का जुझारूपन, लक्ष्यप्राप्ति के लिए बलप्रयोग से न हिचकने का संकल्प श्रम आंदोलनों को विस्तार दे रहा था। अराजकतावादी नेताओं में से अल्बर्ट पार्सन्स, जोहान्न मोस्ट, ऑगस्ट स्पाइस, लुईस लिंग्ग जैसे नाम घरघर के जानेपहचाने नाम बन चुके थे। 1885 में ही हड़तालों का सिलसिला आरंभ हो चुका था। अपनी एकजुटता दर्शाने के लिए मजदूर बेंड-बाजे के साथ परेड के निकलते थे। 1881-1884 के बीच अमेरिका में हड़ताल और तालाबंदी की घटनाओं का वार्षिक औसत लगभग 500 था। उनमें करीब 1,50,000 श्रमिकों ने हिस्सा लिया था। मगर 1885 में हड़ताल और तालाबंदी की घटनाओं की संख्या 700 तक पहुंच चुकी थी। उनमें 2,50,000 मजदूरों की भागीदारी थी। उससे अगले साल यानी 1886 में हड़तालों तथा तालाबंदी की संख्या पिछले साल, यानी 1885 के मुकाबले दुगुनी से भी ज्यादा, 1572 थी। उनमें 6,00,000 श्रमिकों की हिस्सेदारी थी। 1885 में जहां 2467 औद्योगिक संस्थान हड़ताल और तालाबंदी से प्रभावित थे, वहीं उससे अगले वर्ष में 11562 कारखाने प्रभावित हुए थे। ‘नाइट्स ऑफ़ लेबर’ के नेताओं ने हालांकि हड़ताल में भाग न लेने का खुला ऐलान कर दिया था बावजूद इसके उसके लगभग 7,00,000 सदस्यों में से 5,00,000 कामगार हड़ताल में सीधे तौर पर शामिल थे18

आसन्न संकट को सामने देख सावधान हो जाना मनुष्य का प्राकृतिक लक्षण है। संकट जितना अधिक बड़ा हो, वह उतनी ही अधिक शक्ति से उसका सामना करता है। 1870 और 1880 के बीच श्रमिक संगठनों की भी यही हालत थी। इसलिए एक और जहां पूंजीपति और राज्य मिलकर मजदूर एकता और उनके संगठनों को कमजोर करने में लगे थे, उनसे निपटने की तैयारियां की जा रहीं थीं, वहीं श्रमिक भी 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग को लेकर एकजुट हो रहे थे। इस बीच श्रमिक संगठनों में ही कुछ ऐसे नेता भी थे, जो मजदूर एकता में खलल डालकर, हड़ताल की संभावना का टालने या उसे कमजोर करने में लगे थेउनमें ऐसे लोग भी थे जिन्हें पूंजीपतियों ने इस काम के लिए नियुक्त किया था। लेकिन मजदूरों में जोश था। 1 मई से ठीक पहले एक गुमनाम प्रकाशक की ओर से छपा पर्चा मजूदरों में बांटा गया, जिसमें अपील थी—

    • मजदूर हथियारों के लिए!

    • महल के लिए युद्ध, झोपड़ी के लिए शांति, विलासितापूर्ण सुस्ती के लिए मौत

    • मजदूरी प्रथा दुनिया की बदहाली की एकमात्र वजह है। वह धनाढ्यों द्वारा समर्थित है। इसे नष्ट करने के लिए उन्हें या तो काम करना होगा, अथवा मरना होगा

    • एक पाउंड डायनामाइट, एक बुशेल मतदातापत्रों से बेहतर है!(बुशेल: 32 सेर या 25.4 किलोग्राम की माप)

    • पूंजीपति लकड़बघ्घों, पुलिस और लड़ाकुओं का समुचित सामना करने के लिए, अपने हाथों में हथियार लेकर, आठ घंटों की मांग उठाओ19

साफ है कि दोनों ओर से कमानें तन चुकी थीं। हड़ताल का केंद्र शिकागो था। लेकिन आंदोलन केवल वहीं तक सीमित नहीं था। न्यू यार्क, बाल्टीमोर, सिनसिनाटी, सेंट लुईस, वाशिंग्टन, डेट्रोइट, पिटसबर्ग, मिलवोकी, कैलीफोर्निया सहित दूसरे और भी कई शहरों में मजदूर भड़के हुए थे। अफवाहों का बाजार गर्म था। इतिहासकार और समाज-वैज्ञानिक एक और गृह युद्ध की संभावना जता रहे थे। पूंजीपतियों के प्रति घृणा चारों ओर पसरी हुई थी। मजदूर मान चुके थे कि कार्यघंटों को लेकर सरकार और कारखाना मालिकों ने उन्हें और रियायत मिलने वाली नहीं है। मैकार्मिक कंपनी ने अपने सैकड़ों कर्मचारियों को लॉकआउट के बहाने बाहर निकाल दिया था। बाहर किए गए कर्मचारी किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न न करें, इसके लिए 300 सुरक्षा कर्मियों को नियुक्त किया गया था। कंपनी के इस निर्णय को लेकर कर्मचारियों में खासी कड़वाहट थी। मैकार्मिक के लॉकआउट में ‘इंटरनेशनल कारपेंटरर्स यूनियन’ की बड़ी भूमिका था। उसके नेताओं में से एक लुइस लिंग्ग चरमपंथी था। वह निर्भीक और मुखर वक्ता था तथा जो डायनामाइट को ‘सच्चा औजार’ मानता था।

4

आखिर वह दिन भी आ पहुंचा जिसके लिए दोनों ही वर्गों ने भरपूर तैयारी की थी। सबसे ज्यादा क्रांतिधर्मा श्रमिक संगठन शिकागो में ही जमा हुए थे। विभिन्न संगठनों के बीच तालमेल बनाए रखने के लिए ‘8-घंटा समिति’ का गठन किया गया था। दूसरी ओर उग्र वामपंथी मजदूर संगठनों ने हड़ताल का मोर्चा संभालने के लिए ‘सेंट्रल लेबर यूनियन’ का गठन किया था। समन्वय की व्यवस्था ‘8-घंटा समिति’ और ‘सेंट्रल लेबर यूनियन’ के बीच भी थी। उन्होंने हड़ताल के संचालन के लिए एक संयुक्त मोर्चा बनाया हुआ था। ‘सेंट्रल लेबर यूनियन’ ने अभ्यास के लिए 1 मई से पहले रविवार के दिन लामबंदी प्रदर्शन किया था। उसमें कई श्रमिक संगठनों के लगभग 25000 मजदूरों ने हिस्सा लिया था। उसके साथ नाइट्स ऑफ़ लेबर, सोशलिष्ट लेबर पार्टी भी थीं। लेकिन नाइट्स ऑफ़ लेबर ने, शिकागो में एकदम अंतिम क्षण में खुद को प्रस्तावित हड़ताल से अलग कर लिया20 इससे नाराज उसका एक गुट, हड़ताल के सक्रिय समर्थन में उतर आया था। 1 मई का ‘दि आर्बीटर जाइटुंग’ हड़ताल के आवाह्न के साथ पाठकों तक पहुंचा था—

बहादुरो आगे बढ़ो! संघर्ष शुरू हो चुका है….साथियो! इन शब्दों पर ध्यान रखना—कोई समझौता नहीं। कापुरुष पीछे चले जाएं, बहादुर आगे आ जाएं। अब हम पीछे नहीं हट सकते। यह मई की पहली तारीख है….अपनी बंदूकों को साफ करो, कारतूसों को संभालकर रखो। पूंजीपतियों द्वारा किराये पर बुलाए गए हत्यारे, पुलिस और सैन्यबल, हत्या के लिए तैयार हैं। इन दिनों कोई भी मजदूर खाली जेब घर से बाहर कदम नहीं रखेगा।’21

उद्योगपतियों और व्यापारियों ने अपनी सुरक्षा के लिए निजी सुरक्षा बलों का गठन किया था। दूसरी ओर मजदूर संगठन भी 8 घंटे कार्यदिवस की मांग को अपने जीवन और मरण का सवाल बना चुके थे। पूंजीपतियों के सुरक्षाबलों का जवाब देने के लिए जर्मन तथा बोहेमियन समाजवादियों की ओर से शिकागो में ‘लेहर अंड वेहर वीरीन’(शैक्षिक एवं सुरक्षा समिति) का गठन किया गया था22 उद्देश्य था कि राज्य यदि श्रमआंदोलनों को रोकने के लिए बल का इस्तेमाल करे तो उसका उत्तर बलपूर्वक उसी अंदाज में दिया जा सके। साथी मजदूरों से संवाद करने के लिए श्रमिक संगठनों के पास ‘अलार्म’ और ‘आर्बीटर जाइटुंग’ जैसे समाचारपत्र थे। उनका सर्कुलेशन मुख्यधारा के अखबारों के मुकाबले बहुत कम था। मगर मजदूरों पर उनका प्रभाव दूसरे अखबारों की अपेक्षा कहीं ज्यादा था। उनकी भाषा आह्वानकारी होती थी। इसे एक उदाहरण के जरिये समझना उपयुक्त होगा। नवंबर-1884 में ‘इंटरनेशनल एसोशिएसन ऑफ़ वर्किंगमेन’ ने, स्थानीय श्रमिक संगठनों और संस्थाओं की मदद से समाजवाद को परिभाषित करने की कोशिश की थी23

1. निष्ठुर क्रांति तथा अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों की मदद से वर्तमान वर्गीय वर्चस्व को समाप्त करना

2. साम्यवादी संगठनों अथवा उत्पादन को लेकर मुक्त समाज की रचना

3. उत्पादक संगठनों के माध्यम से, बगैर लार्भाजन तथा लूट के बराबर श्रममूल्य के आधार पर वस्तुओं का विनिमय।

4. ऐसा शिक्षातंत्र खड़ा जिसमें स्त्रीपुरुष सभी धर्मरहित, वैज्ञानिक सूझबूझ तथा बराबरी के सिद्धांत के अनुरूप शिक्षा ग्रहण कर सकें।

5. लिंग अथवा जातीय भेदभाव से परे, सभी के लिए समान अधिकार

6. जनता के आपसी कार्यकलापों को संघों एवं कम्यूनों के बीच समझौतों के माध्यम से नियंत्रित करना

इस समाचार को 3 नवंबर 1884 के ‘अलार्म’ ने निम्नलिखित टिप्पणी के साथ प्रकाशित किया गया था—

दुनियाभर के मजदूर भाइयो! एक हो जाओ। साथियो! इस महान लक्ष्य तक पहुंचने के लिए जो सबसे आवश्यक है, वह है हमारा संगठन और हमारी एकता…..सो एकजुट होने का दिन आ पहुंचा है। हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो जाओ। ड्रम बजाकर बेखटके युद्ध की मुद्रा में आ जाओ—दुनिया के मजदूरो एक हो जाओ। तुम्हारे पास खोने के लिए जंजीरों के अलावा कुछ भी नहीं है, जीतने के लिए दुनिया पड़ी है।’24

जैसे ही पहली मई का दिन आया, मजदूरों ने अपने औजार रख दिए। उनके चेहरों पर विश्वास था। हर कोई अपने अधिकारों के लिए लड़ने का उद्धत था। श्रमिक आंदोलनों के इतिहास का वह सबसे अविस्मरणीय दिन था। शिकागो मजदूर क्रांति का केंद्र था। वहां मेकार्मिक हार्वेस्टर नामक कंपनी थी, जो खेती के औजार, मशीनें और ट्रक बनाने का काम करती थी। उसके आधे कामगार पहले ही दिन सड़क पर उतर आए। अकेले शिकागो में लगभग 40000 मजदूर हड़ताल पर थे25 उनके चेहरों पर जोश था। होठों पर गगनभेदी नारे थे—‘‘8 घंटे काम के। आठ घंटे आराम के। 8 घंटे हमारी मर्जी के।’ काम के घंटे घटाओ-मजदूरी बढ़ाओ।’ हड़ताल में 11562 कारखानों के मजदूर शामिल हुए थे26 शिकागो के अलावा केलीर्फोनिया जैसे दूसरे बड़े शहर भी हड़ताल में शामिल थे। पूरे अमेरिका में पांच लाख से अधिक मजदूर सड़कों पर थे। नेतागण अपने भाषण द्वारा मजदूरों को प्रोत्साहित कर रहे थे। अल्बर्ट पार्सन्स, ऑगस्ट स्पाइस, जोहन्न मोस्ट, लुईस लिंग्ग, सेमुअल फील्डेन जैसे अराजकतावादी नेताओं के भाषण आग उगल रहे थे। हड़ताल के बारे में एक अखबार ने लिखा था—‘फैक्ट्रियों और मिलों की ऊंची-ऊंची चिमनियों से उस दिन धुंआ नहीं निकला था। लगता था, जैसे छुट्टी के दिन, सब कुछ ठहरा हुआ हो।’27 उल्लेखनीय स्तर पर शांत रही पहले दिन की हड़ताल ने अमेरिका के श्रम आंदोलन के इतिहास में बड़ा अध्याय जोड़ दिया था

3 मई को हड़ताली फिर सड़क पर थे। इस बार मैकार्मिक हार्वेस्टर कंपनी के अलावा ‘लंबर शोवर’ के 6000 कर्मचारी भी सड़क पर थे। गौरतलब है कि मैकार्मिक कंपनी में 16 फरवरी, 1886 से लॉकआउट चल रहा था। उसके कर्मचारी पिछले तीन महीनों से काम न मिलने के कारण क्षुब्ध थे। सच तो यह है कि वे हताश हो चुके थे। इसलिए उनमें दो वर्ग बन चुके थे। हड़ताली मजदूर मैकार्मिक हार्वेस्टर से थोड़ा हटकर जमा हुए थे। कुछ और हड़ताली वहां पहले से ही जमा थे। कुल लगभग 15000 हडताली वहां जमा थे। हड़ताल का नेतृत्व कर रहे नेताओं में से एक ऑगस्ट स्पाइस ने जोरदार भाषण दिया था। अपने भाषण में उसने पूंजीवादी दमन, उसकी क्रूरताओं और कुटिलताओं पर चर्चा की थी। कहा था कि मजदूरों की हालत गुलामों से भी बदतर है। उसने मजदूरों से अपील की थी कि एकजुट होकर खड़े रहें। अपने मालिकों और हड़ताल तोड़ने वालों को बीच में न घुसने दें। मजदूर सावधान थे। हड़ताली मजदूर सड़क पर आकार मार्च करने लगे। इस बीच उनके बीच कुछ भेदिये भी आ मिले थे, जिन्हें मजदूरों ने वापस लौटने को विवश कर दिया था। मजदूरों का जुलूस शांतिपूर्वक आगे बढ़ रहा था। चारों तरफ से जत्थे निकलकर उसमें शामिल हो रहे थे। तभी हड़तालियों पर पत्थरों, ईंटों और लाठीडंडों से मार पड़ने लगी। मजदूर समझ पाएं, तभी 200 पुलिसकर्मियों का जत्था उनके सामने पहुंच गया। बिना किसी चेतावनी के लिए उसने मजदूरों पर लाठियों और बंदूकों से हमला कर दिया। उसमें चार मजदूरों की मृत्यु हो गई। अनेक घायल हो गए।28

3 मई की घटना के बारे में शिलिंग नामक मजदूर ने पीटर आल्टगोल्ड के सामने इस प्रकार बयान दिया था—‘‘मैकार्मिक कारखाने पर आयोजित प्रदर्शन सिर्फ लंबर शोवर्स यूनियन का ही प्रदर्शन नहीं था, वहां पर मैकार्मिक कारखाने के भी एक हजार से अधिक हड़ताली मजदूर थे। हालांकि ऑगस्ट स्पाइस वहां बोला था, पर उसने गड़बड़ी करने का नारा नहीं दिया था। उसने एकता का आह्वान किया था….गड़बड़ी तो तब शुरू हुई जब हड़तालभेदिये कारखाने से बाहर जाने लगे। हड़तालियों ने उन्हें देख लिया और भला-बुरा कहना, गालियां देना शुरू कर दिया जो यहां दोहराने लायक नहीं हैं। उस दृश्य की कल्पना करो। दो यूनियनों के छह हजार हड़ताली मजदूर बाहर सभा कर रहे हैं और उनकी नजरों के सामने से हड़ताल भेदिये चले जा रहे हैं। मैंने देखा वहां क्या हुआ। मैकार्मिक के हड़ताली कारखाने की ओर बढ़ने लगे। किसी ने उनसे कहा नहीं था। किसी ने उन्हें उकसाया नहीं था। उन्होंने सुनना बंद कर दिया था और वे फाटकों की ओर बढ़ रहे थे। हो सकता है उन्होंने कुछ पत्थर उठा रखे हों, हो सकता है उन्होंने भद्दी बातें कही हों। लेकिन उनके कुछ कहने से पहले की कारखाने की पुलिस ने गोलियां चलानी शुरू कर दीं। हे भगवान लगता है, जैसे कोई युद्ध हो। हड़ताली निहत्थे और पुलिस मानो चांदमारी कर रही हो, पिस्तौलें हाथभर की दूरी पर थीं। रायफलें भी तनी हुई थीं—धांय, धांय, धांय…..मजदूर ऐसे गिर रहे थे, जैसे लड़ाई का मैदान हो। जब उन्होंने टिककर खड़े होने की कोशिश की तो पुलिस वाले चढ़ दौड़े और लाठियों से पीटकर उन्हें अलग कर दिया। जब वे तितर-बितर होकर दौड़े तो पुलिसवालों ने उनका पीछा किया। पीछे से लाठियां बरसाईं। देखा नहीं जाता था। वह क्रूरता थी। बहशीपन था। भाग जाने का मन कर रहा था। लगता था कै हो जाएगी। और यही किया मैंने.’29

ऊपर के विवरण से स्पष्ट है कि हड़तालियों पर पुलिस का हमला न केवल आकस्मिक, अपितु पूर्वनिर्धारित षड्यंत्र जैसा था। क्रोधित ऑगस्ट स्पाइस अराजकतावादी दैनिक आर्बीटर जाइटुंग के कार्यालय में पहुंचा था। वहां उसने हड़तालियों के नाम एक पोस्टर जारी किया। उसका शीर्षक था—‘बदला।’ घटना के कुछ ही घंटों बाद सड़कें उन पोस्टरों से पटी हुई थीं—

‘‘तुम्हारे मालिकों ने अपने शिकारी कुत्ते, पुलिस भेज दी है। इस दोपहर उन्होंने मैकार्मिक के पास तुम्हारे छह साथियों को मार गिराया है। उन्होंने उन गरीब दुखियारों को मार गिराया है, क्योंकि तुम्हारी तरह उन्होंने भी अपने मालिकों के आगे झुकने से इन्कार कर दिया था….तुम वर्षों से अंतहीन असमानता को झेलते आ रहे हो। तुम उनके लिए मृत्युपर्यंत काम करते हो। उनके लिए तुम अपनी इच्छाओं के साथसाथ, अपनी और अपने बच्चों की भूख को अनंतकाल से दबाते आए हो। यहां तक कि अपने बच्चों को भी तुमने अपने मालिकों के लिए कुर्बान कर दिया है। तुम हमेशा से दुखियारे और आज्ञाकारी गुलाम रहे हो। क्यों? अपने सुस्त और चोर मालिकों के अंतहीन लालच और उनकी तिजोरियों को भर देने के लिए….

यदि तुम इंसान हो, यदि तुम अपने उन पूर्वजों की संतान हो, जिन्होंने तुम्हें आजाद करने के लिए अपनी कुबार्नियां दी हैं, तो महाशक्तिशाली हरकुलिस की तरह उठो। और उन छिपे हुए राक्षसों का अंत कर दो, जो तुम्हें मिटा देना चाहते हैं। हथियार उठाओ….हम तुमसे कहते हैं….हथियार उठा लो।’’30

5

4 मई की सुबह ‘दि आर्बीटर जाइटुंग’ के मुख्य पृष्ठ पर मोटे अक्षरों में छपा था—

खून! असंतुष्ट मजदूरों की सेवा के लिए सिर्फ गोली और बारूद….यह है कानून और पुलिस! वे महलों में महंगी शराब से अपने जाम भरकर कानून और पुलिस के खूनी दरिंदों के स्वास्थ्य की कसमें उठा रहे हैं। गरीब और दुखियारो, अपने आंसू पोंछ डालो। अपनी ताकत को पहचानकर उठे खड़े हो और इस बेईमान शासन को धूल में मिला दो।’31

रातभर में पोस्टरों और पर्चों की एक और खेप सड़कों पर आ चुकी थी। लिखा था—‘मजदूरो, हथियार बांध लो। पूरी ताकत के साथ मोर्चे पर डट जाओ।’ पूरा शहर अफवाहों से भरा हुआ था। दोपहर होते-होते हेमार्किट चौक पर भीड़ जुटने लगी। उपस्थित श्रमिकों में बहुत से बेरोजगार थे। भूख से व्याकुल थे। अनेक लोग ऐसे भी थे, जिनके पास सिर छिपाने के लिए कोई ठिकाना तक नहीं था। सैकड़ों ऐसे थे जिनके सिर पर महीनों से मंदी की तलवार लटकी हुई थी। ऐसा लग रहा था कि जो वे कर रहे या करने जा रहे हैं, खुद को और अपने परिवार को बचाए रखने के लिए, उसके अलावा उनके पास दूसरा कोई रास्ता ही नहीं है। उनके पूंजीपति मालिक उन्हें रोजगार देते हैं। लेकिन उनके सपने देखने के अधिकार को छीन लेना चाहते है। यदि कोई सपना बचता-बचाता कहीं से चला आए तो वे उसे नोंचने पर उतारू हो जाते हैं। उनके नेताओं ने उन्हें सपना देखना सिखाया है। अपने ऊपर विश्वास करना सिखाया है। बताया है कि अपनी तमाम लाचारी, बेकारी, हताशा, विपन्नता और दैन्य के बावजूद वे इन्सान हैं। सपने देखने का हक उन्हें भी है। संगठन उनके सपनों के पूरा होने का भरोसा दिलाता है। सपने पूरे हों न हों, लेकिन वे सपनों को छोड़ना नहीं चाहते। 8 घंटे का कार्यदिवस तो असल में बहाना है। हड़ताल तो सपनों को बचाने के लिए है। जीवन रहे या जाए, बस सपने बचे रहें

पूरा शहर दो हिस्सों में बंट चुका था। एक ओर मजदूर थे। भूख और बेरोजगारी के मारे हुए, ठंडे, गरीब और बदहाल। उन्हीं के सामने, उनकी ओर बंदूकें थामें, पुलिस के सिपाही और सुरक्षाबल थे। उनमें और मजदूरों में ज्यादा अंतर नहीं था। बल्कि उन्हीं के बीच से निकलकर आए थे। उन्हीं के भाई-बंधुपड़ोसीरिश्तेदार थे। मालिकों ने उन्हें बंदूकें और लाठियां थमायी थीं। उन हथियारों का असर था कि अब वे अपने ही भाई-बंधुपड़ोसी या रिश्तेदारों को पहचानने को भी तैयार न थे। मालिकों के इशारे पर वे कुछ भी कर सकते थे। दूसरी ओर बड़े-बड़े उद्योगपति, व्यापारी, पूंजीपति, राजनेता और व्यापारी थे। उनके पास धन था। ताकत थी। अखबार थे, जिनके मदद से वे अपने झूठ को भी सच बनाते आए थे। अपने वर्चस्व को बचाने के लिए वे कुछ भी करने को तैयार थे।

अचानक आसमान घिर आया। तेज हवाएं चलने लगीं। ऊपर काले बादलों की मोटी परत छा गई। फिर बूंदाबांदी होने लगी। मानो मौसम उन्हें सावधान कर देना चाहता हो। मैदान पर उस समय मात्र तीन हजार लोग थे। जिनमें स्त्री-पुरुष, बच्चेबड़े सभी शामिल थे। मजदूर नेता भाषण दे रहे थे। उनके भाषण में हिंसा की कोई बात नहीं थी। पार्संस ने अर्थव्यवस्था पर बात रखी थी। समानांतर से रूप से उसी समय कारखाना मालिकों की भी गुप्त बैठक चल रही थी। गोपनीय ढंग से आदेश आ-जा रहे थे। घटना स्थल से थोड़ी दूर पर पुलिस स्टेशन था। वहां पुलिस कप्तान पूरे दल-बल के साथ मौजूद था। इस बीच मौसम कुछ और खराब हुआ था। झील की ओर से आती तेज-ठंडी हवाएं चल रही थीं। उससे पहले कि तूफान आए लोग घर लौट जाना चाहते थे।

उस समय शिकागो के मेयर कार्टर एच. हरीसन थे। अपनी लोकप्रियता के दम पर चौथी बार मेयर चुना गया था। हरीसन झुकाव मजदूरों की ओर था। शिकागो को वह अपनी ‘दुल्हन’ मानता था। वह चाहता था कि मजदूर उसपर भरोसा करें—‘मैं चाहता हूं कि लोग यह जान लें कि उनका मेयर यहीं पर है।’32 कार्यघंटों के लिए चल रहे आंदोलन के दौरान उसने अपनी ओर से तनाव को कम करने की पूरी कोशिश की थी। उसने यह कहते हुए कि मजदूर भी शिकागो के नागरिक हैं, सुरक्षा बलों को बुलाने से इन्कार कर दिया था। लेकिन मेयर होने के बावजूद सब कुछ उसके नियंत्रण में नहीं था। अनजाना भय उसे खाए जा रहा था। घबराया मेयर कभी निकट के पुलिस स्टेशन पर जाता तो कभी हेमार्किट चौक पर लौट आता था। थाने में कुछ सिपाही तैयार बैठे थे। कुछ काली पोशाक पहले लोग भी वहां थे।33 बावजूद इसके मेयर के लिए मजदूरों की सभा ‘अनुशासित’ थी। उसके नेताओं के भाषण अहिंसक थे।

10 बजे, मेयर हरीसन अपने बुझे हुए सिगार को चबाता हुआ पुलिस स्टेशन पहुंचा। और वहां मौजूद पुलिस अधिकारी से बोला—‘ऐसा कुछ भी होने की संभावना नहीं है, जिससे हस्तक्षेप की जरूरत पड़े।’ इसके बाद वह घर चला गया। मानो सब मेयर के वहां से चले जाने की प्रतीक्षा में हों। उसके जाने के 15 मिनट के भीतर ही पुलिस इंस्पेक्टर ने अपने सहायक से सारी पुलिस को आगे बढ़ने को कहा। उसमें 176 अधिकारी थे। आदेश मिलने पर वे घटनास्थल की ओर बढ़ने लगे। पुलिस इंस्पेक्टर बोनाफाइड को संभवतः उसे किसी बड़े अधिकारी, कदाचित मेयर से भी ऊंचे अधिकारी, का आदेश मिला था, जो निस्संदेह दंगा कराना चाहता था34

उस समय फील्डेन का भाषण चल रहा था। हड़ताली घर वापसी की तैयारी कर रहे थे। बारिश के कारण अधिकांश जा भी चुके थे। मैदान पर अब केवल 500 लोग जमा थे। फील्डेन आखिरी वक्ता था। वह अपने भाषण को समेटना चाहता था। पुलिस इंस्पेक्टर को करीब आते देख उसने कहा—‘यहां सब कुछ शांतिपूर्वक है। बस कुछ मिनट दीजिए, हम सब जाने ही वाले हैं।’ उसके बाद वह वहां उपस्थित लोगों की ओर मुड़ा और अपने भाषण का समापन करते हुए कहने लगा, ‘और अंत में….तभी उसने पुलिस के दस्ते को आंदोलनकारियों की ओर बढ़ते हुए देखा। मंच से कुछ फुट दूर रहने पर इंस्पेक्टर ने सिपाहियों को रुकने का आदेश दिया ओर स्वयं मंच की ओर बढ़ा। फील्डेन के पास पहुंचकर उसने जोर से कहा—‘मैं तुम्हें गिरफ्तार करता हूं।’

मैं लोगों की ओर से तुम्हें अभी इसी क्षण यहां से शांतिपूर्वक हट जाने का आदेश देता हूं।’ उसकी बात सुनते ही वहां शांति पसर गई। अब केवल हवाओं का शोर था जो झील से होकर आ रही थीं। आसमान में बादल मंडरा रहे थे।

किसलिए कैप्टन, यहां सब शांतिपूर्वक चल रहा है।’ फील्डेन ने कहा। फील्डेन ने गलत नहीं कहा था। बैठक पिछले सात-आठ घंटों से शांतिपूर्वक जारी थी। किसी भी पक्ष ने शिकायत का अवसर नहीं दिया था। एक सफल बैठक के शांतिपूर्वक समापन के अवसर पर फील्डेन इसके अलावा कुछ और कह ही नहीं सकता था। बावजूद इसके पुलिस की ओर से जो फील्डेन का जो बयान अदालत के सामने पेश किया गया, वह उपर्युक्त बयान से पूर्णतः भिन्न था। पुलिस रिकार्ड के अनुसार फील्डेन के शब्द थे, ‘यहां कुछ शिकारी कुत्ते हैं! जाओ, अपना काम करो और मैं अपना काम करूंगा।’ फील्डेन के बयान के बाद वहां पुनः शांति छा गई। हालांकि भविष्य में क्या होने वाला है, कुछ लोग यह अवश्य जानते थे

और तब अचानक, एक भयानक विस्फोट हुआ। तेज रोशनी में कुछ चेहरे दमके, और वातावरण दुर्गंध से भर गया। पुलिस की टुकड़ी की दायीं ओर से फैंका गया, हवा में लहराता हुआ बम स्पीकर स्टेंड से कुछ फुट दूरी पर फटा था। इसी के साथ वहां अव्यवस्था फैल गई। क्या हुआ किसी की कुछ समझ में नहीं आया। बम किसी अराजकतावादी ने फैंका था अथवा किसी उपद्रवी ने, अथवा पूंजीपतियों ने मिलकर हड़ताली नेताओं के विरोध में साजिश रची थी। या किसी सिरफिरे का काम था—इस बारे में अंत तक कुछ पता नहीं चला। हड़बड़ी में पुलिस ने भी फायरिंग शुरू कर दी। उधर मजदूर भी गोलियां बरसाने लगे। बम का धुंआ फैलने से कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था। पुलिस मजदूरों के साथ अपने साथियों पर भी गोली चला रही थी। बदहवासी का वह आलम 2-3 मिनट में समाप्त हो गया। उसके बाद किसी की लाश जमीन पर पड़ी थी। कोई घायलों में अपने मित्र, परिचित या रिश्तेदार को खोज रहा था। कोई खुद घायल पड़ा कराह रहा था। कानून की तरफ से 7 पुलिसकर्मियों की मृत्यु हुई थी। 67 घायल हुए थे35 मजदूरों की ओर से मरने वालों तथा हताहतों की संख्या उससे कई गुना था। परंतु सचमुच कितनी थी, यह कभी पता नहीं चल सका। अगले दिन के अखबारों ने मुख्यपृष्ठ पर उस घटना को जगह दी थी। सभी ने अराजकतावाद को अमेरिकी लोकतंत्र के लिए खतरा बताया था।

आठ अराजकतावादी नेता, अल्बर्ट पार्संस, ऑगस्ट स्पाइस, सेमुअल फील्डेन, ऑस्कर नीबे, माइकल श्वाब, जार्ज एंजिल, एडोल्फ फिशर तथा लुईस लिंग्ग को गिरफ्तार कर दिया गया। आठों मामूली मजदूर और कारीगर थे। अल्बर्ट पार्संस, प्रिंटिंग प्रेस का मजदूर था; और ‘अलार्म’ नाम का अख़बार निकलता गस्ट स्पाइस फर्नीचर तैयार करने वाला बढ़ई। फिशर भी प्रिंटिंग प्रेस में काम करता था। जार्ज एंजिल खिलौने बेचता था। ऑस्कर नीबे के अनुसार, एंजिल मजदूर वर्ग के संघर्ष का एक बहादुर सिपाही था। वह मेहनतकशों की मुक्ति के लिए जीजान लड़ा देने वाला बागी था।’ सेमुअल फील्डेन कारखाने में सामान की ढुलाई करने वाला साधारण मजदूर था। वह कहा करता था, ‘लिखनेपढ़ने वालों के बीच से अगर कोई क्रांतिकारी बन जाए तो आमतौर पर उसे गुनाह नहीं माना जाता। लेकिन अगर कोई गरीब क्रांतिकारी बन जाए तो वह भयंकर गुनाह हो जाता है।’ लुईस लिंग्ग बढ़ई था। विचारों से अराजकतावादी लिंग्ग के क्रांति रग-रग में बसी थी। वह कहा करता था, ‘मजदूरों को दबाने के लिए ताकत का इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए उसका जवाब भी ताकत से ही दिया जाना चाहिए।’ माइकल श्वाब बुकबाइंडर था। ऑस्कर नीबे साधारण मजदूर संगठनकर्ता था। दिल का साफ और सरल। उसकी खमीर बेचने वाली एक दुकान में भागीदारी थी।

आठों पर हत्याओं का आरोप था। लेकिन एक को भी बम फैंकने का आरोपी नहीं बताया गया था। बम वास्तव में किसने फैंका था, यह कभी पता नहीं चल सका। साफ था कि अदालत को उन नेताओं के कारनामे से ज्यादा उनकी विचारधारा से चिढ़ थी। हालांकि केवल ऊपर दिए गए नामों में से मात्र 3 नेता ही घटनास्थल पर मौजूद थे। बावजूद इसके जज जोसेफ ई. गैरी की अध्यक्षता में जूरी का गठन किया गया था, जो एक प्रतिक्रियावादी राजनेता था। अदालत ने उन सभी को फांसी की सजा सुनाई। यह वही अमेरिका था जिसने अपने संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ससम्मान अपने संविधान में जगह दी थी, और उसके लिए अपनी पीठ थपथपाता था। उसी अमेरिका में 8 लोगों को फांसी की सजा इसलिए सुनाई गई थी, क्योंकि वे खास विचारधारा में विश्वास रखते थे। लोकतांत्रिक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सबसे बड़े दावेदार अमेरिका के लिए तो वह कलंक जैसा था यह हुआ क्योंकि वहां का लोकतंत्र पूंजीपतियों के कब्जे में जा चुका था। जूलिस ग्रिनेल्ल जिसकी राजनीतिक संपर्क किसी से छिपे न थे, को मुदकमे का एटोर्नी बनाया गया था। जूरी के सामने अपने तर्क का समापन उसने इन शब्दों में किया था—

यह कानून की परीक्षा है, अराजकता की परीक्षा है। इन लोगों को जिन्हें सामने लाया गया है, जिन्हें इस महान जूरी द्वारा अभियुक्त ठहराया गया है, और चिन्हित किया गया है, क्योंकि वही नेता थे। ये उन हजारों लोगों से बड़े अपराधी नहीं हैं जो इनका अनुसरण करते हैं। जूरी के माननीय सदस्यो, इन लोगों को दंडित करो। फांसी पर लटकाकर इन्हें दूसरों के लिए नजीर बनाओ, और हमारी संस्थाओं और हमारे समाज की रक्षा करो36

11 नवंबर 1887 को पार्सन्स, स्पाइस, जार्ज एंगेल्स और एडोल्फ फिशर को मृत्युदंड दे दिया गया। लुईस लिंग्ग ने जल्लाद को फांसी लगाने का मौका तक नहीं दिया। उसने अपने मुंह में विस्फोटक दबाकर खुद को उड़ा दिया था। विस्फोटक सिगार की आकृति में लाया गया था। लाने वाला लिंग्ग का करीबी दोस्त था। जिस दिन उन्हें दफनाया गया, उस दिन उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए 600000 लोग शिकागो की सड़कों पर थे। फील्डेन, नीबे और श्वाब की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया। पूंजीवादी मीडिया ने, जिसे बुद्धिजीवियों ने मुख्यधारा का मीडिया कहना आरंभ कर दिया था, अराजकतावाद, समाजवाद आदि की इतनी आलोचना की कि इन्हें अमेरिका के लिए निषिद्ध मान लिया गया। मुदकमें के दौरान आठों अभियुक्तों को अदालत को संबोधित करने का अवसर मिला था। फील्डेन ने तीन घंटे समाजवाद सहित मजदूरों की समस्या पर भाषण दिया था। उसने कहा था—

‘‘आज, ठंडी मनभावन हवाओं के साथ शरत्काल की रुपहली किरणें हर आजाद ख्याल इंसान के चेहरे को स्पर्श कर रही हैं। लेकिन मैं यहां अपने चेहरे को फिर कभी सूर्य-रश्मियों में स्नान न कराने के लिए खड़ा हूं। मैं अपने साथियों से प्यार करता हूं। मैं अपने आप से प्यार करता हूं। मैं धोखेबाजी, बेईमानी और अन्याय से नफरत करता हूं। यदि इससे कुछ भला होगा, तो मैं मुक्त भाव से इन्हें अपना लूंगा।’

स्पाइस का भाषण जोशीला था—

यदि तुम सोचते हो कि हमें फांसी पर चढ़ा देने से तुम मजदूर आंदोलन को दबा दोगे, तब बुलाओ अपने जल्लाद को….तुम इसे नहीं समझ सकते।’

नीबे;

ठीक है, यह सब अपराध था मैं मान लेता हूं: मैंने मजदूर आंदोलनों को संगठित किया था। मैं कार्यघंटों को सीमित कराने को, मजदूरों की शिक्षा को, श्रमिकों के अखबार दाई आर्बीटर जाइटुंग को नए सिरे से आरंभ करने को समर्पित था। इसका कोई प्रमाण नहीं है कि बम फेंकने से मेरा कोई संबंध है, या मैं उसके पास था, या मैंने कुछ वैसा किया था।’

फिशर;

इन मांगों के लिए जितने ज्यादा लोग फांसी पर चढ़ाए जाएंगे, विचार उतनी ही जल्दी हकीकत बन जाएंगे

पार्संस;

मैं उनमें से एक हूं, यद्यपि मैं वृत्तिकदास हूं, जो मानता है कि यह मेरे लिए अपराध है, मेरे पड़ोसी के लिए गलत है….मेरे लिए यह….गुलामी से पीछा छुड़ाने अपना स्वामी आप बनने के लिए था….अनंत आकाश के नीचे यह मेरा इकलौता अपराध है।

एंजिल;

मैं भी ऐसे बहुत कुछ ऐसे व्यक्ति की तरह हूं, वर्तमान से टकराने से बचने की सोचता है। प्रत्येक विचारशील व्यक्ति को ऐसी सत्ता से जूझना चाहिए तो एक आदमी को कुछ ही वर्षों में विलासी और जमाखोर बना देती है, दूसरी ओर हजारों बेरोजगार आवारा और भिखमंगे बना दिए जाते हैं।’

श्वाब ने अराजकतावाद को परिभाषित करते हुए कहा था—

ऐसे समाज में जिसमें केवल सरकार को नीतिसंगत कहा जाता हो, ऐसे समाज में(बदल देना) जिसमें सभी मनुष्य सामान्य हितों के लिए नीतिसंगत कार्य करें और ऐसी चीजों से घृणा करें जो सचमुच घृणा के योग्य हैं

लिंग्ग पूरी अदालती कार्रवाही के दौरान सबसे निर्भीक सबसे विद्रोही बनकर उभरा था। अपने दिलेर और तिरस्कारपूर्ण भाषण में उसने कहा था—

मैं फिर याद दिलाता हूं कि मैं आज के ‘कानून’ का दुश्मन हूं। और मैं फिर से यह दोहराता हूं कि जब तक भी मेरे शरीर में सांस रहेगी, अपनी पूरी शक्तियों के साथ में इससे जूझता रहूंगा। मैं साफ तौर पर, सबके सामने कहता हूं कि मैं बलप्रयोग का हिमायती था। मैंने कैप्टन स्काक से कहा था(जिसने उसे गिरफ्तार किया था) और मैं आज भी उसपर कायम हूं, ‘यदि तुम हम पर गोली चलाओगे, हम तुम्हें बम से उड़ा देंगे। ओह! तुम्हें हंसी आ रही है! शायद तुम सोचते हो, ‘तुम और ज्यादा बम नहीं फेंक सकते।’ परंतु मुझे यह विश्वास है कि मैं फांसी के फंदे पर पर भी इसी तरह खुशी-खुशी चढ़ जाऊंगा और मुझे आपको आश्वस्त करना चाहिए कि सैकड़ों, हजारों लोग ऐसे होंगे जो मेरे इन शब्दों को याद रखेंगे, वे बम फैंकना जारी रखेंगे। इस उम्मीद के साथ मैं आपको कहना चाहूंगा कि मैं आपसे घृणा करता हूं! आपके ‘आदेश’ आपके कानून, बलप्रयोग पर टिकी आपकी सत्ता से नफरत करता हूं। इसके लिए मुझे फांसी पर लटका दिया जाए।’

उन आठों ने अदालत के सामने जो कहा था, वह मुख्यधारा के अखबारों में ठीक उसी भावना के साथ भले ही न आया हो, लेकिन बाद में इश्तहारों, पर्चों और पोस्टरों के रूप में लोगों के बीच फैल गया आज भी उनके विचार लोगों को प्रभावित करते हैं दुख की बात यह नहीं है कि लाखों मजदूरों के समर में उतरने के बावजूद अमेरिका में 1 मई, 1886 की क्रांति की नाकाम क्यों रही थी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जिस अमेरिका ने अब्राह्मम लिंकन के नेतृत्व में दासता को शिकस्त दी थी जिसके पास थॉमस जेफरसन और मानव थॉमस पेन ने द्वारा तैयार किया गया आधुनिकतम संविधान था ऐसा संविधान जो नागरिक अधिकारों को राज्य के अधिकारों जितना ही महत्त्व देता था—वह सातआठ दशक के भीतर ही वह अप्रासंगिक क्यों होने लगा था क्यों उनके विरुद्ध मजदूरों को कामगारों को खड़ा होना पड़ा जो लोकतंत्र से सर्वाधिक उम्मीद पाले रहते हैं, और जिन्हें उसकी सर्वाधिक आवश्यकता पड़ती है—वहां अराजकतावाद को जमीन कैसे मिली इस प्रश्न का उत्तर कुछ जटिल हो सकता है लेकिन यदि हम इसका उत्तर खोज लें तो भारतीय समाज में उभर रहे असंतोष, जिसे कुछ लोग भीड़तंत्र भी कह रहे हैं, का जवाब मिल सकता है

इस बारे में हम अभी सिर्फ इतना कहना आवश्यक समझते हैं कि अराजकतावाद लोकतंत्र का पुरोगामी दर्शन हैं। लोकतंत्र को न संभाल सकने वाली जनता, अराजकतावादी समाज गढ़ ही नहीं सकती। उसे संभालने के लिए लोकतंत्र से कहीं अधिक प्रबुद्ध जनता चाहिए। उस अवस्था में सत्ता परिवर्तन के लिए हिंसा गैर जरूरी हो जाती है। दूसरे शब्दों में अराजकतावाद का रास्ता लोकतंत्र की बहुविध सफलता से निकल सकता है। ऐसे लोकतंत्र से जो अपने नागरिकों के प्रबोधीकरण को भी आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक विकास जितना ही महत्त्व देता है। अमेरिकी क्रांति की असफलता के पीछे भी उसमें हिस्सेदारी कर रहे नेताओं तथा उनके अनुयायियों की अधूरी समझ थी। वे राज्य की आवश्यकता को समाप्त करने के बजाय, राज्य को ही समाप्त कर देना चाहते हैं। जबकि अराजकतावाद में राज्य समाप्त नहीं होता, अपनी खूबियों के साथ वह नागरिकों के रोजमर्रा के व्यवहार का हिस्सा बन जाता है। वह नागरिकीकरण की उच्चतम अवस्था है। इस बात को शिकागो के भोले-भाले मजदूर समझ ही नहीं पाए थे। इसलिए पूंजीवाद के शिकंजे में जकड़े हुए अमेरिकी राज्य की शक्ति द्वारा कुचल किए गए। अच्छा जनतंत्र चलाने की जिम्मेदारी नेताओं से ज्यादा जनता की होती है। जो जनता नेताओं पर जितनी कम निर्भर होगी, वह उतनी ही लोकतांत्रिक बन सकेगी
अमेरिका में 8 घंटे के कार्यदिवस की मांग 1836 से आरंभ हुई थी। 1864 में वह अमेरिकी मजदूरों की प्रमुख मांग बन चुकी थी। आखिरकार 1916 एडमसन एक्ट के माध्यम से अमेरिका रेलरोड वर्कर्स के लिए पहली बार 8 घंटे का कार्यदिवस लागू किया गया। फैक्ट्री मजदूरों को यह अधिकार मिला, फेयर लेबर स्टेंडर्डस् एक्ट—1938 के लागू होने के बाद। इस तरह से देखा जाए तो 8 घंटे के कार्यदिवस के लिए मजदूरों को एक शताब्दी से भी लंबा संघर्ष करना पड़ा था। चलतेचलते एक अवांतरसी चर्चा अमेरिका में धर्मसंसद का आयोजन 1893 में किया गया था कहा यह गया था कि धर्मसंसद का आयोजन क्रिस्ठोफर कोलंबस के अमेरिकी महाद्वीप पर पहुंचने की 400वीं सालगिरह के तौर पर मनाया गया था लेकिन क्या यही एकमात्र कारण था? ध्यान रहे कि हेमार्केट नरसंहार के दौरान ज्यादा नुकसान मजदूर पक्ष को उठाना पड़ा था लेकिन उससे न तो मजदूर अपनी मांगों को लेकर पीछे हटे थे न वहां समाजवादी आंदोलन में कमी आई थी फिर 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग और धर्मसंसद का क्या संबंध? सही मायने में तो यह शोध का विषय है। लेकिन जो लोग धर्म के अभिजन चरित्र को जानते हैं, जिन्होंने वोलनी, मोसका और परेतो को पढ़ा है, उनके लिए इस पहेली को सुलझा पाना कठिन नहीं होगा। आखिर क्या कारण है कि जिस अमेरिका में 8 घंटे के कार्यदिवस की मांग के समर्थन में सबसे बड़ी वर्गक्रांति ने जन्म लिया था, उस देश में वह मांग 1937 में मानी गई, जबकि दुनिया के छोटेबड़े दर्जनों देश 191819 में ही इसे मान चुके थे?
© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

1. अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग, दि हिस्ट्री ऑफ़ मे डे, इंटरनेशनल पंपलेट, 14, 799 ब्रोडवे, न्यू यार्क, पृष्ठ 3

2. वही पृष्ठ 3

3. वही, पृष्ठ 3

4. वही, पृष्ठ 4

5. जे. डेविड सेकमेन, मे डे एंड दि स्ट्रगल फॉर दि एट आवर डे इन कैलीफोर्निया

6. अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग, दि हिस्ट्री ऑफ़ मे डे, इंटरनेशनल पंपलेट, 14, 799 ब्रोडवे, न्यू यार्क, पृष्ठ 6

7. कार्ल मार्क्स, पूंजी, अध्याय 10, प्रोग्रेस पब्लिशर, मास्को, 2015, पृष्ठ 162,

8. संपत्ति क्या है? पियरे जोसेफ प्रूधों

9. मिखाइल बकुनिन, लेटर टू फ्रेंचमेन, ऑन दि प्रजेंट क्राइसिस, 1870

10. अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग, दि हिस्ट्री ऑफ़ मे डे, इंटरनेशनल पंपलेट, पृष्ठ 8

11. पॉल एवरिच, दि हेमार्किट ट्रेजेडी, प्रिंस्टन यूनीवर्सिटी प्रेस, पृष्ठ 182

12. पॉल एवरिच, पृष्ठ 182

13 अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग, दि हिस्ट्री ऑफ़ मे डे, इंटरनेशनल पंपलेट, 14, 799 ब्रोडवे, न्यू यार्क। पृष्ठ 10

14 दि इकोनॉमिक्स पर्फोमेंस इंडेक्स, इंटरनेशनल मोनेटरी फंड, वादिम खरामोव एंड जॉन राइडिंग्स ली, अक्टूबर 2013

15. माइकल हुबरमेन, वर्किंग हावर्स ऑफ़ दि वर्ल्ड यूनाइट?, न्यू इंटरनेशनल एवीडेंस ऑन वर्कटाइम, 1870-1900, पृष्ठ-19

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17. जेनिस एल. रीफ, प्रेस एंड लेबर इन 1880, एन्साइक्लोपीडिया ऑफ़ शिकागो, http://www.encyclopedia.chicagohistory.org/pages/11407.html

18. अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग, दि हिस्ट्री ऑफ़ मे डे, इंटरनेशनल पंपलेट, 14, 799 ब्रोडवे, न्यू यार्क, पृष्ठ 10-11.

19. ऐरिक चेज द्वारा उद्धृत, दि ब्रीफ ओरीजिंस ऑफ़ मे डे, 1993

20. लुईस एडामिक, डायनामाइट : स्टोरी ऑफ़ क्लास वायलेंस इन अमेरिका, 1931, पृष्ठ-69

21. लुईस एडामिक, पृष्ठ-69

22. न्यू यार्क टाइम्स, 20 जुलाई 1886

23. पॉल एवरिच, दि हेमार्किट ट्रेजेडी, पृष्ठ 75

24. पॉल एवरिच, दि हेमार्किट ट्रेजेडी, पृष्ठ 75

25. ऐरिक चेज द्वारा उद्धृत, दि ब्रीफ ओरीजिंस ऑफ़ मे डे, 1993(कुछ स्थानों पर यह संख्या 400000 दी है)

26. अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग, पृष्ठ-11

27. मिशेल जे. स्काक, अनार्की एंड अनार्किस्ट, एफ. जे. स्कल्ट एंड कंपनी, न्यू यार्क, 1889, पृष्ठ-83

28. अनार्किस्ट ओरीजिन ऑफ़ मे डे, लीफलेट बाई वर्कर्स सोल्डरिटी मूवमेंट.

29. हॉवर्ड फ़ास्ट, शिकागो के शहीद मजदूर नेताओं की कहानी, राहुल फाउंडेशन, पृष्ठ-16

30. लुईस एडामिक, डायनामाइट : स्टोरी ऑफ़ क्लास वायलेंस इन अमेरिका, 1931, पृष्ठ-70

31. लुईस एडामिक, डायनामाइट, पृष्ठ-71

32. लुईस एडामिक, डायनामाइट, पृष्ठ-71

33. लुईस एडामिक, डायनामाइट, पृष्ठ-71

34. लुईस एडामिक, डायनामाइट, पृष्ठ-74

35. उपर्युक्त, पृष्ठ-74

36. उपर्युक्त, पृष्ठ-72

महात्मा ज्योतिबा फुले और ‘सत्यशोधक समाज’

सामान्य

अच्छे विचार जब तक उनपर अमल न किया जाए, महज अच्छे सपनों की तरह होते हैं….केवल कर्म ही हैं, जो किसी विचार को मूल्यवान बनाते हैं.—इमर्सन

वर्ष 1873, सिंतबर महीने का 24वां दिन. महाराष्ट्र का मुंबई के बाद दूसरे सबसे बड़े महानगर पुणे का जूनागंज मुहल्ला, मकान नंबर 527. सभागार में पुणे सहित महाराष्ट्र के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से पहुंचे करीब 60 लोग जमा थे. उन्हें ज्योतिबा ने आमंत्रित किया था. बाकी का आना जारी था. ज्योतिबा स्वयं अतिथियों की अगवानी करने में लगे थे. उस समय तक उनकी प्रतिष्ठा शिखर पर पहुंच चुकी थी. पूरा महाराष्ट्र, खासकर पुणे ज्योतिबा को लेकर दो हिस्सों में बंटा हुआ था. एक ओर वे लोग थे जो उनके विकास-पुरुष कहकर उनका सम्मान करते थे. महाराष्ट्र में शिक्षा-क्रांति के जन्मदाता के रूप में उनका सम्मान करते थे. दूसरी ओर थे कट्टरपंथी ब्राह्मण, जिन्हें बदलाव के नाम से ही चिढ़ थी. साथ में वे लोग भी थे, जो अपना दिलो-दिमाग ब्राह्मणवाद के आगे गिरवी रख चुके थे. समाज में व्याप्त अशिक्षा, आडंबरवाद और जातीय विषमता के विरोध में संघर्ष करते हुए फुले को 25 वर्ष से अधिक हो चुके थे. इस बीच उनके संघर्ष का दायरा बढ़ा था. अब उन्हें लगता है कि आगे के सफर के लिए कुछ सहयोगियों को साथ रखना जरूरी होगा. काम समाज का है तो जितने ज्यादा से ज्यादा लोग साथ निभाएं उतना ही अच्छा.

इसी पर विचार करने के लिए महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों से बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को आमंत्रित किया गया था. सभा में ज्योतिबा ने जोरदार भाषण दिया. कहा कि समाज को जातिवाद, पुरोहितवाद, अंधविश्वास और अशिक्षा के दुष्चक्र से बाहर लाने के लिए लोगों को जागरूक करना होगा. यह काम अभी तक सब अपने-अपने स्तर पर करते आ रहे हैं. इस बीच उनके विरोधी संगठित हुए हैं. इसलिए आंदोलन को मजबूती से आगे बढ़ाने के लिए उन्हें मजबूत संगठन की आवश्यकता है. उपस्थित लोगों ने हर्षध्वनि के साथ प्रस्ताव पर मुहर लगा दी. संगठन को नाम दिया गया—‘सत्यशोधक समाज’. ज्योतिबा ने नवगठित संगठन के अध्यक्ष और खजांची का पद-भार संभाला. सचिव का दायित्व सौंपा गया—नारायणराव गोपालराव कडलक को. ज्योतिबा के तीन ब्राह्मण मित्रों विनायक बापूजी भंडारकर, विनायक बापूजी डांगले और सीताराम सखाराम दतार की भी संगठन के निर्माण में प्रमुख भूमिका थी. समाज के तीन प्रारंभिक उद्देश्य थे. पहला—ईश्वर एक है, सब उसकी संतान हैं. दूसरा—जैसे माता-पिता से संवाद के लिए किसी बिचौलिए की आवश्यकता नहीं पड़ती, वैसे ही ईश्वर की अराधना के लिए भी किसी मध्यस्थ यानी पुरोहित की जरूरत नहीं है. तीसरा—किसी भी जाति, धर्म को मानने वाला कोई भी व्यक्ति जो समाज के उद्देश्य और लक्ष्य के प्रति एक-भाव रखता हो, उसका सदस्य बन सकता है.

उस समय देश-भर में राजा राममोहनराय का ‘ब्रह्म समाज’, केशवचंद सेन का ‘प्रार्थना समाज’, महादेव गोविंद रानाडे का ‘पुणे सार्वजनिक सभा’—जैसे अनगिनत संगठन समाज-सुधार के क्षेत्र में कार्यरत थे. ऐसे में नए संगठन की क्या आवश्यकता थी? दरअसल उस समय तक जितने भी संगठन समाज सुधार के क्षेत्र में काम कर रहे थे, सभी द्विजों द्वारा, द्विजों की हित-सिद्धि हेतु बनाए गए थे. उनके लिए बस इतना समाज-सुधार अभीष्ट था कि चमार के घर में जन्म लेने वाला चमार रहे, जूते गांठे, मरे पशुओं की खाल निकाले, जरूरत पड़ने पर जमींदार की बेगार बजाए, उसी से संतुष्ट रहें. बस इतना हो कि काम के आधार पर उन्हें कोई ओछा न माने. किसी तरह का दुव्र्यवहार उसके साथ न हो. शिक्षा के मामले में राजा राममोहनराय सहित उस समय के द्विज समाज सुधारकों का सोच था कि पहले ऊंची जातियां पढ़-लिख जाएं. वे पढ़-लिख जाएंगी तो नीचे तक शिक्षा अपने आप चली जाएगी. यह अर्थशास्त्र के प्रचलित सिद्धांत—‘ट्रिकिल डाउन थियरी’ जैसा था, जिसे हिंदी में ‘रिसाव का सिद्धांत’ कह दिया जाता है. उसके अनुसार ऊपर के स्तर पर समृद्धि होगी तो बूंद-बूंद रिसकर नीचे भी आएगी. इस सिद्धांत की आलोचना उसकी शुरुआत से ही होने लगी थी. बावजूद इसके अधिकांश समाज-सुधारक ‘रिसाव के सिद्धांत’ पर भरोसा कर, काम करते रहे. उनसे पूछा जा सकता था कि शताब्दियों तक कथित विश्व-गुरु रहने के बावजूद भारत में निचली जातियां अज्ञान के अंधकार में क्यों दबी थीं? ऊपर के वर्गों की शिक्षा, उनकी ज्ञान-संपदा और चालाकियां निचले वर्गों तक क्यों अंतरित नहीं हुईं? यह भी पूछा जा सकता था के ‘महासागर’ के लोकहित में पुनः-पुनः उमगने, सभी को साथ लेकर चलने से किसने रोका था? जो लोग 2000-2500 वर्षों में तक ऊपर के वर्गों की समृद्धि और ज्ञान संपदा नीचे रिसने से रोके रहे, क्या वे उनके कहने भर से एकाएक मान जाएंगे? ज्योतिबा का स्पष्ट मत था कि वे नहीं मानने वाले. ब्राह्मण तो हरगिज नहीं, क्योंकि वर्तमान वर्ण-व्यवस्था उनके आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक हितों की पूर्ति करती है. शताब्दियों से बिना कुछ किए-धरे मिल रहे मान-सम्मान, जिसे वे दैवीय कहते हैं, को छोड़ना उनके लिए संभव नहीं. इसलिए बहुजन शूद्र-अतिशूद्रों को अपने विकास के लिए प्रयास स्वयं ही करने होंगे. इसके लिए एक सशक्त संगठन की जरूरत थी. ऐसे सक्रिय, जुझारू और ईमानदार लोगों की जरूरत थी जो संगठन के आदर्शों की प्रति समर्पित होकर लगातार काम कर सकें. उससे पहले जितने भी संगठन थे, सभी समाज के शीर्ष वर्ग के सदस्यों ने गठित किए थे. ‘सत्यशोधक समाज’ ऐसा संगठन था जिसकी स्थापना समाज के बहुजन शूद्रों अतिशूद्रों ने अपने अधिकारों की बहाली के लिए स्वयं की थी. ‘सत्यशोधक समाज’ के पहले वर्ष की रिपोर्ट में कहा गया था कि उसकी स्थापना—

‘ब्राह्मण, पंडित, जोशी, उपाध्याय-पुरोहित आदि लोगों, जो अपने स्वार्थी (धर्म)ग्रंथों द्वारा हजारों वर्षों से शूद्रों को नीच समझकर लूटते आ रहे हैं—से मुक्त करने के लिए की गई है. इसलिए उपदेश और ज्ञान के द्वारा लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने; अर्थात धर्म एवं व्यवहार से संबंधित ब्राह्मणों के छदम्, स्वार्थी ग्रंथों से जनसाधारण को मुक्ति दिलाने हेतु कुछ जागरूक शूद्रों ने इस समाज की स्थापना की है.’

‘सत्यशोधक समाज’ पूरी तरह से गैर-राजनीतिक संगठन था. राजनीतिक सवालों पर बोलना उसमें सख्त मना था.  यह फुले का जनता पर प्रभाव और अनूठी कार्यशैली थी कि ‘सत्यशोधक समाज’’ को पांव जमाते देर न लगी. स्थापना के कुछ ही महीनों में मुंबई और पुणे के शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में उसकी शाखाएं स्थापित होने लगीं. उसका प्रभाव लगभग सभी शूद्र ओर अतिशूद्र जातियों पर था, फिर भी माली और कुन्बी जातियों का उत्साह सबसे बढ़-चढ़कर था. वे ‘सत्यशोधक समाज’ के आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही थीं. 1874 में समाज की मुंबई शाखा का उद्घाटन किया गया. उसके पीछे मुख्य योगदान तेलूगु के कमाठी और माली जाति के सदस्यों का था. 1884 में समाज का विस्तार जुन्नार परिक्षेत्र और पश्चिमी पुणे, अहमदनगर के इंदापुर तहसील और थाणे तक फैल गया. अगले दो वर्षों में वह लगभग सभी मराठी भाषी क्षेत्रों तक फैल चुका था. एक वर्ष पूरा होते-होते उसके 232 औपचारिक सदस्य बन चुके थे. लोगों ने शादी-विवाह, नामकरण जैसे अवसरों पर ब्राह्मण पुरोहितों को बुलाना छोड़ दिया था. ‘सत्यशोधक समाज’ के सिद्धांतों पर ज्योतिबा फुले के विचारों की स्पष्ट छाया थी. उनका मानना था कि विवाह के समय पंडित-पुरोहित अपने स्वार्थ को ध्यान में रखकर शूद्रों को बरगलाते हैं. उनका पूरा ध्यान यजमान से अधिक से अधिक दक्षिणा वसूलने पर रहता है. शूद्रों-अतिशूद्रों का हित इसी में है कि ऐसे अवसरों पर ब्राह्मण पुरोहित को दूर रखा जाए. इस लक्ष्य में ‘सत्यशोधक समाज’ को सफलता भी मिली थी. सतारा निवासी गोविंदराव बापूजी भिलारे ने ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना के पहले वर्ष में छह विवाह, तथा दूसरे वर्ष में पांच विवाह बगैर ब्राह्मण पुरोहित की उपस्थिति के कराए थे. ‘सत्यशोधक समाज’ की पद्धति के अनुरूप पहला विवाह, 25 दिसंबर, 1873 को पेठ जूनागंज, पूना के रहने वाले सीताराम जवाजी आल्हाट और राधाबाई ग्यानोबा निंबणकर के बीच संपन्न हुआ था. उसमें अन्य लोगों के अलावा सावित्रीबाई फुले और श्रीमती बजूबाई ग्यानोबा निंबणकर ने भी वर-वधु की आर्थिक मदद की थी. दूसरा विवाह ग्यानोबा कृष्णाजी ससाने, मुकाम हड़पसर, पूना का काशीबाई, पुत्री श्री नारायणराव विठोजी शिंदे, निवासी पर्वती, पूना के बीच संपन्न हुआ था. इस बार भी समाज के सदस्यों ने नव-दंपति को उपहार आदि देकर सम्मानित किया था.

‘सत्यशोधक समाज’ द्वारा सामाजिक कार्यक्रमों में ब्राह्मण पुरोहित की अनिवार्यता को खत्म करने से स्वयं ब्राह्मण समाज उनसे बुरी तरह नाराज था. वे अपनी पुनर्वापसी के लिए तरह-तरह के प्रयास कर रहे थे. ग्यानोबा ससाने और काशीबाई का विवाह पहले हड़पसर में होना था. लेकिन एक दुष्ट दलाल ने ऊल-जुलूल बातों द्वारा लड़के के रिश्तेदारों और दोस्तों के दिमाग में भ्रम पैदा कर दिया था. उससे बचने के लिए ज्योतिबा ने विवाह को पूना में कराने का सुझाव दिया. वहां भी लोगों को भड़काने वाले कम न थे. पंडितों के बहकावे में आकर मारुति सटवाजी फुले तथा तुकाराम खंडोजी फुले ने दोनों पक्षों को भड़काने के लिए अफवाह फैलाई कि, ‘हमारे दुर्बल बच्चों के विवाह इन लोगों के जानते-बूझते हुए हैं. उनमें से एक दुलहन उम्र में दो वर्ष की थी, जो ब्याह के कुछ ही दिनों में मर गई. इस लापरवाही के लिए तुकाराम सोनाजी भुजबल को करीब 400 रुपये का नुकसान सहना पड़ा.’ आखिकर ‘सत्यशोधक समाज’ के कार्यकर्ता बाबाजी राणोजी फुले के हस्तक्षेप से वह विवाह पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार संपन्न हो सका. इसके बावजूद ब्राह्मणों ने हार नहीं मानी थी. उन्होंने शूद्र-अतिशूद्रों को यह कहकर भड़काना शुरू कर दिया था कि बिना पुरोहित के उनकी प्रार्थनाएं ईश्वर तक नहीं पहुंच पाएंगीं. घबराए हुए लोग फुले के पास गए. फुले ने उन्हें समझाया कि जब तमिल, बंगाली, मलयाली, कन्नड, फारसी आदि गैर-संस्कृत भाषी लोगों की प्रार्थनाएं ईश्वर तक पहुंच सकती हैं, तब उनकी प्रार्थना कैसे अनसुनी रह सकती है. हम अपने माता-पिता, अभिभावक से सीधे संवाद करते हैं. इसलिए ईश्वर को अपना पिता मानने वालों को भी उससे डरने, घबराने तथा पूजा-अर्चना के लिए पुरोहित को बीच में लाने की आवश्यकता कतई नहीं है. फिर भी यदि कोई पूजा-पाठ जैसे कार्यों में पुरोहित की भूमिका को आवश्यक समझता है, तो वह अपनी ही जाति के अनुभवी व्यक्ति को यह जिम्मेदारी सौंपकर अपने मन को समझा सकता है.

धीरे-धीरे ही सही, लोग ज्योतिबा की बातों को समझने लगे थे. तीसरे वर्ष के दौरान उसकी सदस्य संख्या बढ़कर 316 तक पहुँच चुकी थी. दूसरी ओर उनके विरोधी भी शांत न थे. एक परिवार में शादी होने वाली थी. पुरोहितों ने उस घर में पहुंचकर डराया कि बिना ब्राह्मण एवं संस्कृत मंत्रों के हुआ विवाह ईश्वर की दृष्टि में अशुभ माना जाएगा. उसके अत्यंत बुरे परिणाम होंगे. गृहणी सावित्रीबाई फुले को जानती थी. फुले को पता चला उन्होंने ‘सत्यशोधक समाज’ के बैनर तले विवाह संपन्न कराने का ऐलान कर दिया. सैकड़ों सदस्यों की उपस्थिति में वह विवाह खुशी-खुशी संपन्न हुआ. प्रत्येक व्यक्ति कोई न कोई उपहार लेकर पहुंचा था. उस घटना के बाद ब्राह्मण सतर्क हो गए. एक अन्य घटना में ब्राह्मणों ने दूल्हे के पिता को धमकी दी. लोगों को यह कहकर भड़काया कि फुले उन्हें ईसाई बना देना चाहते हैं. लेकिन ज्योतिबा के लिए ऐसी चुनौतियां नई नहीं थीं. न ही वे धमकियों से डरने वाले थे. अप्रिय घटना से बचने के लिए उन्होंने प्रशासन से मदद मांगी. पुलिस आई और उसकी निगरानी में वह विवाह सफलतापूर्वक संपन्न हुआ.

‘सत्यशोधक समाज’ के दूसरे वर्ष की रिपोर्ट के अनुसार तब तक उसके में एक और घटना का उल्लेख किया गया है. विट्ठल नामदेव गुठाड़ पुणे के व्यापारी थे. गुठाड़ ने समाज की पद्धति के अनुसार ब्राह्मण को बुलाए बिना ही गृहप्रवेश कर लिया. इससे ब्राह्मणों ने उनके व्यापारिक हिस्सेदार को इतना भड़काया कि उसने हिस्सेदारी तोड़ दी. विरोधी इतने से ही शांत नहीं हुए. उन्होंने गुठाड़ के कामकाज में इतनी परेशानियां पैदा कीं कि उनका व्यापार घाटे में आ गया. हालात यहां तक पहुंच गए कि बच्चे के स्कूल की फीस जमा करने में मुश्किल होने लगी. मामला जब ‘सत्यशोधक समाज’ के सदस्यों के संज्ञान में पहुंचा तो उन्हें गुठाड़ के प्रति चिंता होने लगी. आखिरकार उनकी मदद के लिए गंगाराम भाऊ म्हस्के ने बच्चे के स्कूल की फीस के लिए तीन रुपये प्रतिमाह छात्रवृत्ति देने का ऐलान कर दिया. पांच माह तक गुठाड़ ने वह छात्रवृत्ति ली. बाद में जब उनका व्यापार पटरी पर लौट आया तो उन्होंने म्हस्के का आभार व्यक्त करते हुए और अधिक मदद लेने से इन्कार कर दिया.

केवल शिक्षा ही नहीं, सामाजिक मदद के लिए भी ‘सत्यशोधक समाज’ के सदस्य हमेशा आगे रहते थे. सितंबर 1875 में अतिवृष्टि के कारण अहमदाबाद में जल-प्रलय जैसे हालात पैदा हो चुके थे. परिणामस्वरूप हजारों लोगों के आगे जीवन का संकट पैदा हो गया. भीषण बारिश के कारण उनके कपड़े, अनाज, घर आदि सब-कुछ नष्ट हो चुका था. ऐसे आपदाग्रस्त लोगों की मदद के लिए ‘सत्यशोधक समाज’ के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ.  विश्राम रामजी घोले ने सदस्यों से मदद के लिए आगे आने का आवाह्न किया. उसके बाद कुल 195 रुपये की रकम चंदे के रूप में जमा की गई. वह धनराशि अहमदाबाद के कलेक्टर को बाढ़-पीड़ितों की मदद के लिए भेज दी गई. उसकी देखा-देखी ‘सत्यशोधक समाज’ की मुंबई शाखा भी सक्रिय हुई. वहां भी 130 रुपये चंदा के रूप में उगाहकर अहमदाबाद के कलेक्टर के पास भेज दिए गए.

इस बीच कुछ लोगों ने यह कहना आरंभ कर दिया कि बगैर ब्राह्मण पुरोहित की मौजूदगी के होने वाले विवाह  हिंदू रीति-नीति या कानून, किसी भी आधार पर मान्य नहीं हैं. इस कारण लोगों के मन में शंका उत्पन्न होने लगी थी. उसके समाधान के लिए ‘सत्यशोधक समाज’ के अध्यक्ष की ओर से एक पत्र उच्च न्यायालय के एक अधिकारी राघवेंद्रराव रामचंद्रराव को पत्र लिखकर उन विवाहों की वैधता के बारे में राय देने का अनुरोध किया. जवाब में राघवेंद्रराव ने कानूनी प्रमाणों के आधार पर बताया कि ‘सत्यशोधक समाज’ की पद्धति के अनुसार हो रहे सभी विवाह कानून सम्मत हैं. ज्योतिबा समझते थे कि सामाजिक रूढ़ियों से जूझने के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता अपरिहार्य है. शूद्रों में रचनात्मक प्रतिभा का विकास हो, वे लिखने-पढ़ने के लिए आगे आएं, इसके लिए ‘सत्यशोधक समाज’ ने ऐलान किया कि खेती की उन्नति के उपायों के बारे में शूद्रों में से जो-जो व्यक्ति मौलिक पुस्तक की रचना करेंगे, उनमें से प्रत्येक को डॉ. विश्राम रामजी घोले और रामशेट बापूशेट उरवणे की ओर से 25-25 रुपये का पुरस्कार दिया जाएगा.

अधिकांश शूद्र-अतिशूद्र खेती या दूसरे मेहनत-मजदूरी वाले कामों में जुटे थे. कई बार बच्चों को परिवार के काम में हाथ बंटाना पड़ता था. इस कारण वह दिन में स्कूल जाने के लिए समय नहीं निकाल पाता था. ऐसे युवकों की पढ़ाई अवरुद्ध न हो इसके लिए भांबुर्डे नामक गांव में रात्रि-पाठशाला की शुरुआत की गई थी. समाज को रात्रि-पाठशाला के कामकाज के बारे में शिकायत मिली तो उसने तत्काल, 3 महीने की अवधि के लिए कृष्णराव नामक व्यक्ति को नियुक्त कर दिया. उसका काम था, पाठशाला का नियमित निरीक्षण कर, उसकी रिपोर्ट समाज को देना. शिक्षा के प्रति जागरूकता की कमी के चलते शूद्र और अतिशूद्र परिवारों के बच्चे स्कूल से कन्नी काट जाते थे. इसे देखते हुए समाज ने पांच रुपये प्रतिमाह की वृत्तिका पर एक पट्टेवाले को नौकरी पर रखा. उसका काम था, बच्चों में शिक्षा के प्रति जागरूकता लाना तथा उन्हें सही समय पर स्कूल पहुंचाना. उच्च शिक्षा के लिए भी ‘सत्यशोधक समाज’ की ओर से व्यवस्था की गई थी. विश्राम रामजी घोले ने समाज की ओर से इंजीनियरिंग कालेज के समक्ष एक प्रतिवेदन पेश किया गया था. प्रतिवेदन में शूद्र विद्यार्थियों को निःशुल्क शिक्षा देने की प्रार्थना की गई थी. उसका सकारात्मक असर हुआ. 1876 में इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रधानाचार्य मिस्टर कूक ने 2-3 गरीब विद्यार्थियों को निःशुल्क शिक्षा के लिए भर्ती किया था. बच्चों में भाषण कला के विकास के लिए भी 2 मई 1876 को व्याख्यान प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था. व्याख्यान के लिए दो विषय निर्धारित किए गए. पहला था—‘हिंदुस्तान की जातिभेद समस्या से व्यावहारिक लाभ और हानि’. और दूसर था ‘मूर्तिपूजा से लाभ और हानि’. ‘जातिभेद समस्या से व्यावहारिक लाभ और हानि’ विषय पर व्याख्यान के लिए द्वारकानाथ त्रिंबक सोनार को पहला और गणपत तुकाराम कुंहाड़े को दूसरा स्थान प्राप्त हुआ. प्रथम विजेता को समाज की ओर से 10 रुपये तथा द्वितीय विजेता को डॉ. विश्राम रामजी घोले घोले की ओर से 5 रुपये की सम्मान राशि दी गई थी. दूसरे विषय पर दामोदर बापूजी शिंपी को समाज के फंड से दस रुपये तथा आनंदराव रणछोड़ को रामशेट बापूशेट तुरवणे की ओर से 5 रुपये की सम्मान राशि प्रदान की गई थी. एक और वक्ता गोपाल विश्राम घोले को प्रोत्साहन पुरस्कार के रूप में ज्योतिराव की ओर से 3 रुपये प्रदान किए गए थे. ‘सत्यशोधक समाज’ गरीब बच्चों को पढ़ाई की ओर उन्मुख करने के छात्रवृत्ति आदि के रूप में तरह-तरह से मदद करता था.

‘सत्यशोधक समाज’ की गतिविधियों से प्रसन्न होकर लोग तरह-तरह से उसकी मदद के लिए आगे आ रहे थे. हरीरामजी चिपलूनकर ब्राह्मण थे. वे समाज के सदस्य भी नहीं थे. बावजूद इसके उन्होंने शूद्र विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति के लिए प्रतिवर्ष 60 रुपये देने की घोषणा की थी. रामचंद्र मनसाराम ढवारे नाईक पुणे के बड़े ठेकेदार माने जाते थे. उनकी बेतालपेठ में दुमंजिली इमारत थी. उस इमारत को एक मारवाड़ी सेठ 16 रुपये प्रतिमाह पर किराये पर लेने को सहमत था. ‘सत्यशोधक समाज’ को अपने कामकाज के लिए ऐसे ही स्थान की आवश्यकता थी. अध्यक्ष विश्राम रामजी घोले ने तत्काल रामचंद्र नाईक को पत्र लिखकर उस इमारत को सत्यशोधक के कामकाज के लिए देने का अनुरोध किया. रामचंद नाईक ने मात्र 10 रुपये प्रतिमाह के किराये पर वह इमारत समाज को सौंप दी. यही नहीं, उन्होंने समाज के कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए 20 रुपये का चंदा भी अपनी ओर से दिया. बाहर से आए शूद्र विद्यार्थियों के भोजन, आवास और अध्ययन की व्यवस्था के लिए समाज ने छात्रावास के निर्माण का फैसला किया था.

शूद्रों और अतिशूद्रों के बीच शिक्षा का प्रचार-प्रसार ज्योतिबा के जीवन का प्रमुख उद्देश्य था. इसके लिए उन्होंने स्वयं कई पाठशालाओं की स्थापना की थी. इसी को आगे बढ़ाते हुए ‘सत्यशोधक समाज’ ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के प्रसार के लिए काम कर रहा था. समाज की ओर से पूना से पांच किलोमीटर दूर हड़पसर में एक विद्यालय की स्थापना की गई थी. सरकारी विद्यालयों में गरीब बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दिलाने के लिए उसने संबंधित अधिकारियों को कई पत्र लिखे थे. उसके फलस्वरूप ‘सार्वजनिक निर्देश’ विभाग के निदेशक के.एम. चेटफील्ड ने एक आदेश के द्वारा सरकारी स्कूलों के लिए एक आदेश जारी किया गया, जिसके अनुसार उनमें पांच प्रतिशत स्थान गरीब शूद्र बच्चों के लिए आरक्षित कर दिए गए थे.

जुलाई 1875 में महर्षि दयानंद, महादेव गोविंद रानाडे के आमंत्रण पर पूना गए थे. उस समय तक ‘आर्यसमाज’ की स्थापना को 15 महीने बीत चुके थे. दयानंद उसके प्रचार के लिए देश-भर की यात्रा कर रहे थे. दो महीने के पूना प्रवास के दौरान दयानंद वहां ‘आर्यसमाज’ के प्रचार के लिए कई सभाएं कर चुके थे. उनके कई विचार ‘प्रार्थना समाज’ और रानाडे के ‘पूना सार्वजनिक सभा’ के सिद्धांतों से मेल खाते थे. इसलिए रानाडे सहित कुछ और सुधारवादियों ने दयानंद के सम्मान में जुलूस निकालने का निर्णय लिया. पुरातनपंथियों के लिए वह सीधी चुनौती थी. वे उसके विरोध पर आमादा हो गए. जुलूस के लिए 5 सिंतबर 1875 का दिन तय किया गया था. रानाडे उसकी तैयारी में जुटे थे. जुलूस के लिए पुलिस को भी सूचना दी जा चुकी थी. इस बीच सूचना मिली कि जुलूस में विघ्न डालने के लिए कट्टरपंथी बड़े पैमाने पर विरोध की तैयारी में जुटे हैं. स्थिति से निपटने के लिए जुलूस से एक दिन पहले, सुधारवादियों ने ज्योतिबा फुले से संपर्क किया. ‘आर्यसमाज’ का जाति और छूआछूत विरोधी अभियान, ‘सत्यशोधक समाज’ के मूल सिद्धांतों से मेल खाता था. इसलिए ज्योतिबा उनके साथ सहयोग करने के लिए तैयार हो गए. अगले दिन जुलूस निकला. दयानंद हाथी पर सवार थे. आगे-आगे उनके समर्थक नाचते-गाते, ढोल बजाते हुए चल रहे थे. ज्योतिबा स्वयं रानाडे के साथ जुलूस में शामिल थे. उनके पीछे ‘सत्यशोधक समाज’ के सैकड़ों कार्यकर्ता थे. उधर कट्टरपंथी किसी भी तरह से जुलूस में व्यवधान डालने पर आमादा थे. वे नहीं चाहते थे कि पूना में ऐसे किसी नए आंदोलन को जन्म मिले, जो ‘सत्यशोधक समाज’ की भांति उनकी हजारों वर्ष पुरानी सत्ता को चुनौती देता हो. दयानंद का उपहास उड़ाने के लिए उन्होंने एक गधे को सजाकर उसे ‘गदर्भानंद’ का नाम दिया था. जैसे ही महर्षि दयानंद का जुलूस अपने नियत स्थल पर पहुंचा, कट्टरपंथी भी सजे-धजे ‘गदर्भानंद’ के साथ उनके सामने पहुंच गए. दोनों के बीच टकराव हो गया. टकराव बड़ी हिंसा का रूप ले, उससे पहले ही पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया. उपद्रवी यहां-वहां शरण लेने के लिए भागने लगे. उसके बाद दयानंद ने वहां अपना प्रवचन दिया.

‘आर्यसमाज’ वेदों को प्रामाण्य मानता था, ठीक ऐसे ही जैसे मुस्लिम कुरआन को दैवीय ग्रंथ मानते हैं. महाराष्ट्र, विशेषकर पूना में पेशवाओं के समर्थन के कारण ब्राह्मण अत्यंत शक्तिशाली बन चुके थे. इस कारण वहां जातिवाद की जड़ें भी बहुत गहरी थीं. ‘गुलामगिरी’, ‘तृतीय रत्न’ जैसी रचनाओं के माध्यम से ज्योतिबा तथा उनके द्वारा गठित ‘सत्यशोधक समाज’, जातिभेद और पुरोहितवाद को नकारकर—ब्राह्मणवाद को सीधी चुनौती दे रहे थे. दूसरी ओर वेदों को सर्वोपरि बताकर ‘आर्यसमाज’ छद्म रूप से ब्राह्मणवाद को संरक्षण देता था. इस कारण शूद्रों और अतिशूद्रों के मन में उसके प्रति संदेह का भाव था. ब्राह्मणों के लिए हर वह व्यक्ति जो उनके जातीय वर्चस्व को चुनौती दे, उसे वे देश और धर्म दोनों का दुश्मन मानते थे. यही कारण है कि पूना में दो महीनों तक लगातार प्रचार करने और जाति-भेद को नकारने के बावजूद, ‘आर्यसमाज’ को महाराष्ट्र में अपेक्षित सफलता न मिल सकी.

ज्योतिराव अपना संदेश लोगों तक कैसे पहुंचाते थे, इसका एक रोचक किस्सा रोजलिंड ओ’ हेनलान ने अपनी पुस्तक ‘कास्ट कनफिलिक्ट एंड आइडियालाजी’(पृष्ठ-251) में दिया है. यह एक घटना को लेकर है, जिसके बारे में फुले के व्यापारिक सहयोगी और मित्र ज्ञानोबा ससाने ने बताया था—‘एक बार की बात है. फुले अपने मित्र ज्ञानोबा ससाने के साथ पुणे के बाहर स्थित एक बगीचे के भ्रमण के लिए गए. वहां एक कुआं था, जिससे उस बगीचे की सिंचाई होती थी. जैसे ही दोपहर का अवकाश हुआ, सभी कर्मचारी खाना खाने चले गए. यह देख फुले कुएं तक पहुंचे और कुएं के डोल को चलाने लगे. इसके साथ-साथ वे गीत गाने लगे. उन्हें गीत गाता देख वहां काम करने वाले मजदूर हंसने लगे. इसपर फुले ने बताया कि इसमें हंसने की बात क्या है? मजदूर लोग काम करते हुए अकसर गाते-बजाते हैं, केवल मेहनत से जी चुराने वाले फुर्सत के समय वाद्ययंत्रों का शौक फरमाते हैं. असली मेहनतकश जैसा काम करता है, वैसा ही अपना संगीत गढ़ लेता है.’

ज्योतिबा फुले आजन्म सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करते रहे. उनका सपना ऐसे समाज की स्थापना का था, जो सर्व-समानता के सिद्धांत पर आधारित हो. इसके लिए आजीवन संघर्ष करते रहे. 11 मई 1888 को ‘सत्यशोधक समाज’ और नगर के प्रमुख सुधारवादी नेताओं ने उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि से अलंकृत किया. हालांकि उनके व्यक्तित्व और कृतित्व कोई भी उपाधि छोटी पड़ जाती है.

ओमप्रकाश कश्यप

बालक और उसका समयबोध

सामान्य

ओमप्रकाश कश्यप

इस लेख का उद्देश्य न तो बालक को समय-प्रबंधन के गुर सिखाना है. न उसे समय-संबंधी दार्शनिक जटिलताओं में उलझाना. हम बालक तथा उसके समयबोध को लेकर सामान्य चर्चा करेंगे. यह जानने की कोशिश करेंगे कि समय को लेकर बालक की जो प्रतीतियां हैं; स्कूल से लेकर घर तक, समय के बारे में उसे जितना और जैसा समझाया जाता है, क्या उसके समय-प्रबोधन का वही एकमात्र और सही तरीका है? बालक के व्यक्तित्व पर समय से संबंधित ऐसी प्रतीतियों और प्रज्ञप्तियों का जो तर्क एवं ज्ञान से परे, केवल सुनी-सुनाई बातों अथवा पूर्वाग्रहों पर आधारित हैं—क्या कोई दुप्रभाव पड़ता है? क्या वे बालक के स्वतंत्र विवेक की राह में बाधक हैं? आदिकाल से ही मानवमन में एक किस्सागो बैठा हुआ है, जो मनुष्य को अपने आसपास के परिवेश के बारे में झूठी-सच्ची कहानियां गढ़ने; तथा उनके साथ किसी न किसी रूप में अपना संबंध स्थापित करने को प्रेरित करता रहता है. आमतौर पर वे कहानियां संबंधित समाज की सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक मानी जाती हैं. धर्म, ईश्वर, किस्म-किस्म के देवी-देवता सब उसी मानस किस्सागो की कल्पना हैं. क्या समय भी मनुष्य की ऐसी ही रोचक परिकल्पना है?

स्पर्धा के इस युग में बालक को अन्य चुनौतियों के साथ-साथ समय की चुनौती से भी जूझना पड़ता है. जो लोग समय को अनादि, अनंत तथा सतत प्रवाहमान मानते हैं, वही उसकी कमी का हवाला देकर बालक को डराते रहते हैं. खुद को ‘बड़ा’ समझने वाला प्रत्येक व्यक्ति बालक को सावधान करता है—‘समय बरबाद मत करो. वह किसी की प्रतीक्षा नहीं करता. जरा-भी चूके तो हाथ से फिसल जाएगा….समय के साथ चलो, चलते रहो, नहीं तो पिछड़ जाओगे.’ ऐसे निर्देश बालक को अभिभावकों तथा अध्यापकों की ओर से निरंतर, इतनी बार तथा इतनी तरह से सुनने को मिलते हैं कि उसका आत्मविश्वास डगमगाने लगता है. अपनी सीमाओं में वह समय की चुनौतियों से निपटने की कोशिश भी करता है. उसके लिए समय-सारणी बनाता है. अपने अध्ययन-कार्य को छोटे-छोटे उपखंडों में बांटता है. घड़ी की टिक-टिक के साथ सामंजस्य बैठाने की कोशिश करता है. इसके बावजूद चुनौती बनी ही रहती है. क्योंकि खंडों-उपखंडों में समाहित प्रत्येक घटना बालक के अधिकार में नहीं होती. किसी न किसी रूप में दूसरे भी उससे जुड़े होते हैं.

नई शिक्षा व्यवस्था में सहयोग की अपेक्षा स्पर्धा पर ज्यादा जोर दिया जाता है. पर्याप्त सहयोग-समर्थन के अभाव में बालक अपनी ही बनाई समय-सारणी के हिसाब से पिछड़ने लगता है. बड़े टोकते हैं. बालक कोशिश करता है. कभी सफल होता है, कभी परिस्थितियां भारी पड़ जाती हैं. ऐसे में समय हाथ से निकल जाने की चिंता बालक का पीछा नहीं छोड़ती. धीरे-धीरे वह उसके आत्मविश्वास पर भारी पड़ने लगती है. ऐसा नहीं है कि केवल बालक ही समय के बारे में प्रचलित पूर्वाग्रहों से प्रभावित होता है. बड़े भी उससे मुक्त नहीं रह पाते. समय-संबंधी पूर्वाग्रह तो प्रायः बड़ों के माध्यम से ही बच्चों तक पहुंचाए जाते हैं. बालक उन्हें लंबे समय तक, कभी-कभी जीवन-भर विरासत के तौर पर संभाले रखता है.

सामान्य दिनचर्या में समय को ‘सर्वशक्तिमान’ के रूप में पेश किया जाता है. ऐसा महानायक जो कथित देवी-देवताओं से भी ऊपर, सीधे किसी पराशक्ति के अधीन है. जो दैवीय आदेशों से अनुशासित होता है. कभी बताया जाता है कि खुद ईश्वर भी समय के बंधन में बंधा है. भारतीय समाज की जो स्थिति है, उसमें किशोरावस्था तक पहुंचते-पहुंचते बालक अंध-श्रद्धा का शिकार हो चुका होता है. उसके बाद वह तर्क छोड़ आस्था की राह पकड़ लेता है; तथा दैवीय अनुकंपा को समस्त समस्याओं का एकमात्र समाधान मानने लगता है. ईश्वर का जिक्र हो तो वह सर्वशक्तिमान के रूप में सर्वप्रथम उसी की कल्पना करता है. किंतु अगले ही क्षण जब समय की चुनौती सामने होती है, तब वही उसे सर्वशक्तिमान नजर आने लगता है. समय और तथाकथित ईश्वर को लेकर गढ़ी गई कहानियां भी एक-दूसरे में गड्ड-मड्ड होती हैं. उनमें कहीं ईश्वर समय पर भारी पड़ता है तो कभी समय ईश्वर के सामने चुनौती बन जाता है. इससे बालक की उलझन सुलझने के बजाय और भी उलझ जाती है. भ्रांत बालमन समझ ही नहीं पाता कि पराशक्ति हो अथवा समय, दोनों में कोई एक ही सर्वशक्तिमान हो सकता है. ऊहापोह में वह किसी कार्य को तत्संबंधी घटनाओं के संबंध में देखने-समझने के बजाय, आस्था और पूर्वाग्रहों द्वारा नियंत्रित होने लगता है. यहीं से उसके विचलन का दौर आरंभ होता है, जो उसे वास्तविक और अन्वीक्षणात्मक ज्ञान के बजाय आभासी दुनिया में ले जाकर छोड़ देता है─जहां या तो निरे सपने होते या फिर परंपराओं का बोझ. जहाँ    

रोजमर्रा के कार्य के सिलसिले में बालक द्वारा घड़ी देखने का सिलसिला सुबह के साथ आरंभ हो जाता है. उसके बाद नहाने, नाश्ता करने, स्कूल जाने, स्कूल में टाइम-टेबिल के अनुसार विभिन्न विषयों का पाठ करने, लंच करने, खेलने, घर लौटने, आराम करने, होमवर्क निपटाने, टेलीविजन देखने, भोजन करने से लेकर रात को बिस्तर तक जाने के बीच अपने माता-पिता की भांति बालक भी समय के हिसाब-किताब में उलझा रहता है. उसके समस्त कार्यकलाप छोटे-छोटे टाइम-पॉकेट में बंधे होते हैं. हर पीरियड के साथ स्कूल की घड़ी बदले समय और चुनौती का एहसास कराती है. बीच-बीच में जब भी घटनाक्रम बदलता है, बालक की निगाहें घड़ी की सुइयों में उलझकर रह जाती हैं. उसके सामने चुनौती होती है कि वह न केवल समय के साथ अपनी दिन-चर्या को व्यवस्थित रखे साथ ही सहपाठी अथवा समवयस्क बच्चों, जिनके साथ उसकी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष स्पर्धा है─से जरूरी बढ़त भी बनाए रखे. दूसरों के बराबर रहने वाले को यहां औसत तथा पीछे रहने वाले को फिसड्डी मान लिया जाता है. समय और समवयस्क बच्चों के साथ स्पर्धा बालक को अनावश्यक रूप से तनावग्रस्त रखती है. इसके अलावा एक जैविक घड़ी भी होती है. उसके बारे में आवश्यक नहीं कि बड़े ही बालक को समझाएं. उसका एहसास प्रकृति स्वयं कराने लगती है. जैसे  समय होते ही भूख भोजन तथा थकान आराम की जरूरत की ओर संकेत करने लगती है.

सुबह से शाम तक अनगिनत बार घड़ी देखने से जो प्रथम प्रभाव बालक के मनो-मस्तिष्क पर पड़ता है, वह यह कि घड़ी की सुइयां ही समय हैं. कि अपनी महीन टिक-टिक के साथ घड़ी विराट समय को अपने भीतर समेटे है. घड़ी की सुइयां आगे बढ़ेंगी, तभी समय आगे खिसकेगा. बालक ही क्यों? घर में माता-पिता, स्कूल में अध्यापकगण, मित्र-हितैषी, सगे-संबंधी सभी सीधे घटनाओं पर नजर रखने, उन्हें नियंत्रित करने के बजाए—घड़ी की सुइयों से नियंत्रित होने लगते हैं. स्पर्धा में समय से पिछड़ जाने की आशंका बालक को अनावश्यक चिंता में डाल देती है. उसका आत्मविश्वास आहत होने लगता है. उस समय बालक को यह बताना आवश्यक है कि घड़ी की टिक-टिक समय नहीं है. वह स्वयं एक घटना है, सिर्फ घटना, जिसकी दो आवृतियों के बीच सुनिश्चित अंतराल होता है. घड़ी का कार्य किन्हीं दो घटनाओं के बीच का अंतराल बताना है. प्रत्येक घटना के समानांतर  और आगे-पीछे हजारों-हज़ार घटनाएँ अनंत ब्रह्मांड के भीतर और बाहर, लगातार घटती रहती हैं. जो लोग समय को घटनाओं के प्रवाह के रूप में देखते हैं, वे उनमें रमे रहकर भी अपना नियंत्रण बनाए रखते हैं. ऐसे लोगों के लिए समय चुनौती नहीं बनता. उनके साथ विलक्षण यात्रा का अनकहा रोमांच होता है.  

बालक को बताया जाना चाहिए कि समय घटनाओं की अन्विति से परे कुछ नहीं है. कि घटनाओं पर विजय पाना, उनके साथ सामंजस्य बनाकर चलना—कठिन भले हो, असंभव नहीं है. कि इस धरती पर ऐसे नरपुंगव भी हुए हैं जिन्होंने समय को न तो देवता माना, न उसकी कभी परवाह ही की. बिना परिस्थितियों से घबराए, चुनौतियों को स्वीकार करके ही वे इस दुनिया को अपनी इच्छानुसार चलाने में कामयाब होते आए हैं. ऐसा बोध बालक के आत्मविश्वास को बढ़ा सकता है. प्रायः ऐसा नहीं होता. क्योंकि समय को ‘नियति’ और ‘भाग्य’ के समकक्ष रखने वाले, दोनों को परस्पर पर्याय मानने वाले, बालक के माता-पिता समय को परम-नियंता और महाशक्तिशाली मान स्वयं उससे भयभीत रहते हैं.

भारतीय दर्शनों में समय पर विचार किया गया है, किंतु उनमें तत्वपरक सामग्री का अभाव है. उसे या तो दैवीय शक्ति के समकक्ष रखकर मनुष्य का भाग्य-नियंता बताया गया है; अथवा घटनाओं तथा उनके वेग के प्रतिफल के रूप में दर्शाया जाता है. भारतीय प्रज्ञा की कमजोरी है कि वह तर्क और विवेक से अधिक, आस्था और पूर्वाग्रहों से प्रेरणा ग्रहण करती है; और उससे बहुत कम बाहर निकल पाती है. समय को लेकर वस्तुनिष्ट चिंतन के अभाव का भी यही कारण है. पूर्वाग्रहों के दबाव में हम समय-संबंधी प्रज्ञप्तियों जिन्हें समयाभास भी कहा जा सकता है, को अपने आसपास घट रही घटनाओं के सापेक्षिक वेग, परिवर्तनशीलता, पदार्थ की विशेष अवस्था आदि के संदर्भ में देखने के बजाए स्वतंत्र सत्ता माने रहते हैं. यह ‘कार्य’ को ‘कारण’ मान लेने जैसी गंभीर चूक है, जिसके साधारण और विशेष सभी लोग शिकार होते आए हैं.  

आगे बढ़ने से पहले समय और समयबोध की ओर संकेत करना आवश्यक है. जैसा ऊपर संकेत किया गया है, समय को लेकर दो प्रकार की प्रज्ञप्तियां आमतौर पर प्रत्येक मनस् में होती हैं. ये एक साथ भी हो सकती हैं तथा एक-दूसरे से स्वतंत्र भी. पहली मान्यता के अनुसार समय कोई भागती हुई चीज है. नदी की मानिंद सतत प्रवाहमान. भूत-वर्तमान और भविष्य में निरूपित. एक के बाद एक गुजरते रात-दिन इसका उदाहरण हैं. जॉन मेकटेग्गार्ट ने इसे ‘ए’ श्रेणी माना है. यानी वह समय जिसे हम श्रेणीबद्ध रूप में अपने सामने से गुजरते हुए देखते हैं. उसका एक उदाहरण इतिहास लेखन भी है. हमारे समय और तत्संबंधी सामान्यबोध की शुरुआत ही सौर दिवस से होती है. आदमी रोजमर्रा के कार्यों को अपनी जरूरत, सुविधा अथवा दायित्व-भावना के आधार पर, छोटी-छोटी घटनाओं में बांट लेता है. उन घटनाओं की सापेक्षिक गति ही समयाभास का कारण बनती है. इस मान्यता के अनुसार समय दो संबद्ध घटनाओं के बीच का अंतराल है, जो उनके घटने की दर को दर्शाता है. उससे घटना की अनुभूति तथा उसकी सापेक्षिक गति का आकलन किया जा सकता है. समय पर विचार करते हुए इस तथ्य को प्रायः नजरंदाज कर दिया जाता है कि ब्रह्मांड में घट रही अनंत घटनाओं की भांति सौर दिवस भी प्राकृतिक घटना है. पृथ्वी का अपनी धुरी पर घूमना इस घटना को अंजाम देता है. दिन-रात को जन्म देने वाली यह घटना भी अपने आप में पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है. पृथ्वी अपने केंद्र पर घूमने के अलावा सूर्य की कक्षा में भी चक्कर काटती रहती है. इससे दिन-रात के कुल समय में भले ही ज्यादा अंतर न पड़ता हो, मगर उनकी अवधि घटती-बढ़ती रहती है. यह समय अथवा समयाभास की सापेक्षिकता का द्योतक है.

उपर्युक्त से निष्कर्ष निकलता है कि घटनाएं तथा उनका आधार यह सतत-परिवर्तनशील ब्रह्मांड—शाश्वत हैं. समय वह अंतराल है, जिसमें हम ब्रह्मांड की विभिन्न गतिविधियों के अंतराल का अनुभव करते हैं; तथा जिसके माध्यम से उनकी गति का आकलन किया जा सकता है. परिवर्तन को सृष्टि का मूल लक्षण बताने वाला यूनानी विचारक हेराक्लीट्स कहता है—‘प्रत्येक वस्तु गतिमान है. तुम किसी नदी में दुबारा हाथ नहीं डाल सकते.’ समय को सतत प्रवाह मानने वाली विचारधारा भी कहती है—‘बीता हुआ समय लौटकर नहीं आता. हम किसी क्षण को दुबारा नहीं जी सकते.’ समय की इस परम-भौतिकता को वैरागी भृर्तहरि अपनी तरह से अभिव्यक्त करता है—‘कालो न यातं वयमेव याताः’—‘समय नहीं गुजरता, हम गुजरते हैं.’1 अरस्तु समय को अवधि(अंतराल) के रूप में देखता था. उसके लिए समय किसी क्रिया की पूर्वकालिक एवं उत्तरकालिक अवस्था की आवधिक गणना है. वह लिखता है—

‘यदि आत्मा की सत्ता नहीं थी, उस अवस्था में समय की सत्ता रही होगी या नहीं—यह जिज्ञासा सीधे-सीधे एक प्रश्न पर ले आती है. जहां कोई गिनने वाला ही नहीं है, वहां ऐसी चीज भी नहीं हो सकती, जिसे गिना जा सके.’2 

इस तर्क को स्वीकारने में वही मुश्किल है, जो यह स्वीकार करने में है, कि गंगाधर और तिलक को बनारस जाना था, गंगाधर नहीं गया इसलिए तिलक भी नहीं गया.  समय का तारतम्यता वाला लक्षण बालक के लिए सदैव तनाव या चुनौतियां पेश करे, ऐसा नहीं होता. यह बालक को निश्चिंत भी करता है. बालक अथवा किशोर जब अपने माता-पिता या दादा-दादी, नाना-नानी को क्रमशः वृद्धावस्था और मृत्यु की ओर अग्रसर देखता है, तब उसके अवचेतन में सहज रूप से यह भाव उत्पन्न होता है कि उसके जीवन की तो अभी बस शुरुआत है. जीने के लिए बड़ा हिस्सा अभी शेष है; तथा सामाजिक जिम्मेदारियों का दौर लंबे अंतराल के पश्चात आरंभ होने वाला है. यह विश्वास बालक को अवसाद से बाहर रखने में मदद करता है. इससे बालक और समय अथवा समयाभास के बीच अनूठा संबंध बनता है, जो उम्मीदों से लबालब और सकारात्मक होता है. यह निश्चिंतता उसे नित-नवीन सपने देखने को प्रेरित करती है. छोटा बालक उमंगों से सराबोर रहता है. मनमानी शरारतें करता है. भविष्य के प्रति आशावान रहता है. उसकी कल्पना बड़ों की अपेक्षा ज्यादा रंगीन होती है. ये सब उसे अधपकी उम्र में जिम्मेदारियों से सीधे टकराने, टूटकर बिखर जाने से बचाते हैं.

सामान्य भौतिकी के लिए समय का प्रवाहशीलता वाला गुण विशेष काम का है. उसके माध्यम से पदार्थ की आंतरिक एवं बाहरी गतियों का अध्ययन किया जाता है. गति पदार्थ की विशेष अवस्था है. क्या पदार्थ की गतिहीन अवस्था में भी समय या समयाभास की कल्पना की जा सकती है? यदि हम वस्तु-विशेष के संदर्भ में देखें तो इस प्रश्न का उत्तर ‘हां’ में होगा. गति के लिए किसी पिंड अथवा कण का होना आवश्यक है. पिंड स्थिर हो और परिवेश परिवर्तनशील, तब भी पिंड तथा उसके परिवेश के बीच सापेक्षिक गति बनी रहेगी; और घटनाओं की एक के बाद एक आवृति हमारे समयाभास का कारण होगी. इसे समझने के लिए एक असंभव स्थिति की कल्पना करते हैं. मान लेते हैं कि एक व्यक्ति अंतरिक्ष में किसी अकेले पिंड पर खड़ा है. चारों और केवल शून्य पसरा है. उस अवस्था में यदि प्रेक्षक की आंखों पर ऐसा चश्मा चढ़ा दिया जाए, जिससे वह अपने पिंड की गतिविधियों के साथ-साथ अपनी शारीरिक गतिविधियों की ओर से भी निःसंवेद हो जाए, उस अवस्था में वह खुद को परिवर्तन-शून्य विश्व में पाएगा. ऐसी स्थिति में वह समय की अनुभूति नहीं कर पाएगा. जाहिर है, तब उसका समयबोध भी शून्य होगा.

समय संबंधी पहली प्रज्ञप्ति जिसके अनुसार समय को दो घटनाओं के अंतराल से मापा जाता है, का वर्णन हम ऊपर कर चुके है. दूसरी प्रज्ञप्ति जिसे जॉन मेकटेग्गार्ट ने ‘बी’ श्रेणी की संज्ञा दी है, के अनुसार समय अंतरिक्ष जैसी अंतहीन संरचना हैं, जिसमें सब कुछ निरंतर घटता रहता है. ब्रह्मांड की समस्त घटनाएं, ग्रह-पिंड सभी उसमें समाहित हैं. वह भूत-वर्तमान-भविष्य सभी का आधार तथा ब्रह्मांड की प्रत्येक घटना का साक्षी है. इस मान्यता के अनुसार सृष्टि की प्रत्येक घटना, अंतरिक्ष के साथ-साथ समय में भी घटित होती है. पहली मान्यता जहां समय को गतिशील मानती है, वहीं इस समानांतर मान्यता के अनुसार समय स्थिर होता है. स्थिर भाव से ही वह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष घटनाओं का लेखा रखता है. जिस प्रकर अंतरिक्ष में घटनाएं घटती रहती हें. वैसे ही अनंत समय के बीच भी घटनाओं का सिलसिला बना रहता है. अंतरिक्ष वस्तुजगत के भौतिक स्वरूप को वितान देता है. वस्तुहीनता की अवस्था में विराट आभासीय शून्य होगा; जिसमें समस्त गतियों, परिवर्तनशीलता का लोप हो चुका होगा, ऐसी स्थिति में भी समय की परिकल्पना असंभव होगी. आशय है कि परिवर्तन-शून्यता अथवा परम-स्थिर विश्व में समय की परिकल्पना अप्रासंगिक हो जाती है.  

एक मान्यता के अनुसार समय सृष्टि के प्रत्येक परिवर्तन का साक्षी है, मगर खुद परिवर्तनकारी शक्ति नहीं है. न उसका कोई साक्षी होता है. स्टीफन हाकिंग अपनी पुस्तक ‘समय का संक्षिप्त इतिहास’ में ब्रह्मांड की उत्पत्ति परम-विस्फोट से मानते हैं. हॉकिंग के अनुसार समय की उत्पत्ति का क्षण भी वही है. अपनी बहुचर्चित पुस्तक में ‘समय का इतिहास’ के बहाने वे ब्रह्मांड के इतिहास की ही चर्चा कर रहे होते हैं. उस अवस्था की चर्चा कर रहे होते हैं, जब अपनी पहली हलचल के साथ ब्रह्मांड परम-शून्य से परिवर्तन ओर अग्रसर होता है. हॉकिंग के अनुसार परम-विस्फोट से पहले ब्रह्मांड परम-संपीडन की अवस्था में था. वह परम-स्थिरता की अवस्था थी, जिसका उल्लेख हमने ऊपर किया है. चूंकि उस समय सर्वत्र गति-शून्यता थी, इसलिए उसमें समय अथवा समयाभास की कल्पना भी असंभव है. महाविस्फोट के पश्चात ग्रह-नक्षत्रों का आदि का जन्म हुआ, जिनमें हमारी पृथ्वी भी सम्मिलित हैं.

समयहीनता की कल्पना हमारे लिए उतनी ही दुष्कर है, जितनी कि ब्रह्मांड के लोप हो जाने की परिकल्पना. ब्रह्मांडहीनता की अवस्था में समयबोध का क्या होगा? उसकी पहचान किस तरह से की जाएगी? ऐसे प्रश्न हमारी कल्पना से बाहर है. सवाल है कि समय यदि ‘कुछ भी नहीं’ है, केवल आभास मात्र है, तो उसे व्यावहारिक जीवन में उसे सबकुछ क्यों दिखाया जाता है. कारण है कि ऐसे अवसरों पर हम सत्य की उपेक्षा कर, भ्रांत धारणाओं को ही सबकुछ माने रहते हैं. इसके बीजतत्व भी हमारी शिक्षा-संस्कृति में अंतनिर्हित हैं. हमारी जरूरत की सभी वस्तुएं पृथ्वी उपलब्ध कराती है. बिना उसके जीवन संभव ही नहीं है. मगर हम यह माने रहते हैं कि सातवें-आठवें आसमान पर बैठा कोई देवता है, जो हमें जीवन और पृथ्वी को उर्वरा शक्ति प्रदान करता है. इस तरह से सोचने की आदत ज्यादा से ज्यादा ढाई-तीन हजार वर्ष पुरानी है. लेकिन यही वह कालखंड है जब आदमी द्वारा आदमी पर शासन करने, आदमी द्वारा आदमी को गुलाम बनाने की शुरुआत हुई. धर्म, जाति, संप्रदाय के नाम पर असहिष्णुता और असमानता को व्यक्ति की पहचान जोड़ा जाने लगा. ऐसी व्यवस्था में जो भी ऊंचाई पर होता है, वह अपनी ऊंचाई को वैध बनाने के लिए अपने से भी ऊंचे का हवाला देता है. जैसे कि ब्राह्मणों ने अपने शीर्षस्व को वैध बनाने के लिए देवताओं की पूरी फौज की परिकल्पना कर डाली. इसलिए समय को और दूसरी चीजों को सही ढंग से जाना न केवल विज्ञान की दृष्टि से आवश्यक है, बल्कि संस्कृति के परिष्करण तथा मनुष्य के नैतिक प्रबोधन हेतु भी अपरिहार्य है.

© ओमप्रकाश कश्यप

‘हिंद स्वराज’ का बहुजन पाठ

सामान्य

‘हिंद स्वराज’ गांधी विचार की प्रतिनिधि पुस्तक है। गांधी ने इसकी रचना 1909 में समुद्री यात्रा के दौरान की थी। उन दिनों वे दक्षिणी अफ्रीका में भारतीयों की अस्मिता की लड़ाई के लिए संघर्ष कर रहे थे। वहां सत्याग्रह को आरंभिक सफलताएं मिलने से उनकी ख्याति देश-देशांतर तक फैलने लगी थी। कुशल पत्रकार, संपादक और जनसंवादन कला के धनी गांधी ने ‘हिंद स्वराज’ मूल रूप से गुजराती में लिखा और अपने अखबार ‘इंडियन ओपीनियन’ में छाप दिया। अगले ही वर्ष वह पुस्तक रूप में भी बाजार में आ गया। फिर जैसी उम्मीद थी, वही हुआ। पुस्तक अंग्रेज सरकार द्वारा जब्त कर ली गई। पहले संस्करण के लगभग छह वर्ष पश्चात 1915 में नया अंग्रेजी अनुवाद आया तो अंग्रेजों ने उसकी अनदेखी कर दी। देखते ही देखते पुस्तक विमर्श के क्षेत्र में छा गई।

पूरी पुस्तक बीस अध्यायों में बंटी, संवाद शैली में है। गांधी जी ने इस शैली का उपयोग क्यों किया? यह सोचने की बात नहीं। भारतीय उपनिषदों में यह शैली खूब चली है। केनोपनिषद् तो पूरा का पूरा संवाद-शैली में ही है। सुकरात और उसके प्रिय शिष्य प्लेटो की यह प्रिय शैली रही है। हालांकि धीरे-धीरे इस शैली का प्रचलन बुद्धिजीवियों में कम होता गया था। जिन दिनों गांधी जी ने ‘हिंद स्वराज’ की रचना की थी, यह गंभीर लेखन के क्षेत्र में बहुत लोकप्रिय शैली भी नहीं थी। कदाचित गांधी का इरादा गंभीर पुस्तक लिखने का था भी नहीं। ‘हिंद स्वराज’ लिखने से करीब एक वर्ष पहले उन्होंने जाॅन रस्किन की पुस्तक ‘अनटू दि लाॅस्ट’ का ‘सर्वोदय’ शीर्षक से गुजराती अनुवाद भी किया था, जो ‘इंडियन ओपीनियन’ में प्रकाशित हुआ था। ‘हिंद स्वराज’ में गांधी आधुनिकता का पर्याय मान ली गई पश्चिमी संस्कृति की प्रशंसा करते हैं। इसके लिए वे वकील, डॉक्टर, रेल, अदालत आदि की आलोचना करते हैं। यहां तक कि ब्रिटिश संसद पर भी आक्षेप लगाते हैं। कदाचित इसीलिए ‘हिंद स्वराज’ को खूब प्रचार मिला। पुस्तक के अनगिनत प्रशंसक थे तो आलोचक भी कम न थे। अनेक देशी-विदेशी विद्वानों ने ‘हिंद स्वराज’ की प्रशंसा की, वहीं गोखले ने उसे अधकचरी पुस्तक माना और उम्मीद जाहिर की कि भारत लौटने के बाद गांधी स्वयं उस पुस्तक को खारिज कर देंगे।

रस्किन के अतिरिक्त ‘हिंद स्वराज’ पर रूसो, कारपेंटर और थोरो के विचारों की छाया भी देख सकते हैं। पुस्तक के बारे में गांधी की टिप्पणियों से पता चलता है कि वे इस पुस्तक को लेकर अतिरिक्त रूप से मोहाग्रस्त थे। एक जगह उन्होंने लिखा है—‘यह पुस्तक इतनी निर्दोष है कि बच्चों के हाथ में यह दी जा सकती है। यह पुस्तक द्वैषधर्म की जगह प्रेमधर्म सिखाती है, हिंसा की जगह आत्म-बलिदान को स्थापित करती है और पशुबल के खिलाफ आत्मबल को खड़़ा करती है।’ अगर गांधी की संपूर्ण राजनीति को देखें तो उसके पीछे गांधी के कथित आत्मबल की ही प्रेरणा है। यह बात अलग है उस आत्मबल की शक्ति गांधी की अपनी कम, उनके प्रायोजकों की अधिक थी, जिन्होंने गांधी को देखते ही देखते भारतीय राजनीति के महानायक का दर्जा दे दिया था। हजारों वर्षों से दमन और शोषण का शिकार रही दलित और पिछड़ी जातियों में पनप रही जातीय चेतना, जो कभी भी वर्ग-चेतना का रूप ले सकती थी—से बचाव के लिए उन्हें सुरक्षित आड़ की आवश्यकता थी। गांधी और गांधीवाद दोनों इस भूमिका के लिए एकदम खरे थे।

‘हिंद स्वराज’ में कोई क्रमबद्ध चिंतन नहीं है। कुछ छिटपुट गांधी-विचार टिप्पणियों के रूप में आए है। बावजूद इसके ‘हिंद स्वराज’ के प्रति गांधी का विश्वास इतना दृढ़ था कि उसके प्रकाशन के तीन दशक बाद जब किसी पत्रकार ने पूछा कि क्या आप इसमें कोई फेरबदल करना चाहेंगे तो गांधी ने लिखा—‘यह पुस्तक अगर आज मुझे लिखनी हो तो कहीं-कहीं मैं इसकी भाषा को बदलूंगा। लेकिन इसे लिखने के बाद तीस वर्ष जो मैंने आंधियों में बिताए हैं, उनमें मुझे इस पुस्तक में बताए गए विचारों में फेरबदल का कोई कारण नहीं मिला।’1 ‘हिंद स्वराज’ को गांधी विचार का प्रतिनिधि दस्तावेज मानने के पीछे गांधी का यही विश्वास था। बहरहाल, पुस्तक का पांचवां अध्याय ‘इंग्लेंड की हालत’ पर है। हम अपना विमर्श इसी अध्याय से आरंभ करेंगे। चौथे अध्याय में ‘पाठक’ के यह कहने पर कि इंग्लेंड की पार्लियामेंट सब ‘पार्लियामेंटों की माता’ तो बेशक हमें उसकी नकल करनी चाहिए—अगले अध्याय में गांधी ‘इंग्लेंड की हालत’ पर विचार करते हैं। शीर्षक से उम्मीद जगती है कि गांधी इसमें इंग्लेंड के समाज, वहां के जन-जीवन तथा समाजार्थिक परिस्थितियों पर विचार करेंगे। मगर उनपर कोई बातचीत किए बगैर गांधी सीधे इंग्लेंड की पार्लियामेंट पर चर्चा करने लगते हैं। वे लिखते हैं—

‘इंग्लेंड में आज जो हालत है, वह सचमुच तरस खाने लायक है। मैं तो भगवान से यही मानता हूं कि हिंदुस्तान की ऐसी हालत कभी न हो। जिसे आप पार्लियामेंटों की माता कहते हैं, वह पार्लियामेंट तो बांझ और बेसवा है। ये दोनों शब्द बहुत कड़े हैं, तो भी उसपर बहुत अच्छी तरह से लागू होते हैं। मैंने उसे बांझ कहा, क्योंकि अब तक पार्लियामेंट ने अपने आप एक भी अच्छा काम नहीं किया। अगर उसपर दबाव डालने वाला कोई न हो तो वह कुछ भी न करे, ऐसी उसकी कुदरती हालत है और वह बेसवा है, क्योंकि जो मंत्री मंडल उसे रखे, उसके पास वह रहती है। आज उसका मालिक एसक्विथ है, कल वालफर होगा और परसों को तीसरा।’’2

उपर्युक्त टिप्पणी को पढ़ते हुए कुछ प्रश्न एकाएक दिमाग में एकाएक आ सकते हैं। मसलन क्या गांधी ब्रिटिश पार्लियामेंट की सुस्ती या नकाराकन के लिए उसकी आलोचना कर रहे थे? क्या उनकी आलोचना ब्रिटिश पार्लियामेंट तक सीमित थी, अथवा उसका दायरा अथवा उनकी आलोचना पूरी संसदीय प्रणाली को लेकर है? क्या ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री हर्बर्ट हेनरी एसक्विथ का आचरण गैर-जिम्मेदाराना और तानाशाही पूर्ण था? संसदीय प्रणाली में पार्लियामेंट की जनता के प्रति जो जवाबदेही होनी चाहिए, क्या ब्रिटिश पार्लियामेंट उसमें नाकाम थी? यदि गांधी की आलोचना केवल पार्लियामेंट की सुस्ती को लेकर है, तो एक सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या उन दिनों ब्रिटिश पार्लियामेंट सचमुच निष्क्रिय और नाकारा थी? एसक्विथ अप्रैल 1908 से दिसंबर 1916 तक यूनाईटिड किंग्डम के प्रधानमंत्री थे। उन्हें संसदीय सुधार के लिए जाना जाता है। हालांकि 1914 में ब्रिटेन को प्रथम विश्वयुद्ध में ढकेलने के लिए एसक्विथ की आलोचना की जाती है। चूंकि 1914 की घटना ‘हिंद स्वराज’ लिखे जाने के बाद की है, इसलिए हमारे लिए ब्रिटिश पार्लियामेंट और एसक्विथ द्वारा नवंबर 1909; यानी ‘हिंद स्वराज’ लिखे जाने के पहले लिए गए निर्णय ही महत्त्वपूर्ण होंगे।

लेबर पार्टी के सत्ता में आने से पहले यूनाइटिड किंग्डम में कंसरबेटिव पार्टी की सरकार थी। उसने 1902 में शिक्षा अधिनियम पास किया था, जिसके फलस्वरूप वहां शैक्षिक क्रांति को बढ़ावा मिला। उस अधिनियम के फलस्वरूप 1914 तक यानी केवल 12 वर्ष के अंतराल में इंग्लेंड में 1000 नए माध्यमिक विद्यालय खोले गए थे, जिनमें से 349 स्कूल केवल लड़कियों के लिए थे।3 उसके अगले वर्ष कंजरवेटिव सरकार ने ‘एंप्लायमेंट आफ चिल्ड्रन अधिनियम-1903 को मंजूरी दी थी, जिनमें कारखानों में काम कर रहे बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा के लिए आवश्यक कानून बनाए गए थे। उस कानून के अनुसार 10 वर्ष के कम के किसी भी बच्चे को फैक्ट्री के काम में नहीं लगाया जा सकता था। बच्चों को ऐसा कोई भी काम सौंपने की मनाही थी, जिसकी परिस्थितियां उनके स्वास्थ्य के प्रतिकूल हों। यही नहीं, काम के साथ-साथ-साथ उनकी शिक्षा की व्यवस्था भी की गई थी।4 1905 में वही संसद ‘बेरोजगारी श्रमिक अधिनियम—1905 के माध्यम से ‘आपदा समिति’ का गठन करती है, आपदा समिति का काम स्थानीय निकायों एवं व्यापरिक निगमों में बेरोजगारों की अधिकाधिक भर्ती के अनुदान आदि की अनुशंसा करना था। ऐसी संसद को, जो प्रतिवर्ष लोककल्याण की दिशा में नए-नए कानून बना रही थी, उसपर अमल भी कर रही थी, गांधी ‘बांझ’ ओर ‘बेसवा’ कह जाते हैं। गौरतलब है कि भारत में गरीब बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा, जो बच्चे किसी कारणवश स्कूल नहीं जा पाते, मिल-कारखानों-खदानों आदि में काम करने को विवश होते हैं—उनके लिए काम के दौरान शिक्षा की मांग कांग्रेस या उसके किसी बड़े नेता के आंदोलन का हिस्सा नहीं थी। कांग्रेस अभिजात्य वर्ग के पढ़े-लिखे युवाओं को सरकारी नौकरियों की हिस्सेदारी की मांग तो कर रही थी, लेकिन किसान और मजदूरों की बेरोजगारी उसके लिए कोई मुद्दा न थी। उसके नेताओं का विचार था की जाति प्रथा के चलते सबके लिए उनके पैतृक व्यवसाय निर्धारित है, ऐसे में बेरोजगारी भारत के लिए बड़ा मुद्दा हो ही नहीं सकती।

बहरहाल, हम पुन: इंग्लेंड की संसद पर लौटकर आते हैं, जिसपर गांधी ने बेसवा’ और नाकारा होने जैसे आरोप लगाए हैं। यूनाइटिड किंग्डम में 1906 में एसक्विथ के नेतृत्व वाली, ‘लेबर पार्टी’ बहुमत के साथ सरकार बनाती है। उसके बाद वहां सामाजिक और प्रशासनिक सुधारों का सिलसिला और गति पकड़ लेता है। गांधी नशाबंदी के समर्थक थे। भारत लौटने के बाद वे इसके लिए आंदोलन भी चलाते हैं। जन्म के समय होने वाली बाल मृत्युदर पर नियंत्रण हेतु 1907 में इंग्लेंड सरकार ने ‘नोटिफिकेशन आफ बर्थ अधिनियम’ लागू किया था। उसके अनुसार शिशु के जन्म के 36 घंटों के भीतर उसकी सूचना सरकार को देना अनिवार्य कर दिया गया था। 1908 में एसक्विथ सरकार इग्लेंड और वॉल्स के शराब और जुआखानों की लाइसेंसिंग का नया कानून बनाते हैं, परिणामस्वरूप इंग्लेंड और वॉल्स के 100000 पबों में से एक तिहाई बंद करा दिए जाते हैं। इसके अलावा एजुकेशन(एडमिनस्ट्रिेटिव प्रोवीजन) एक्ट-1907, ‘प्रोबेशन आफ ओफेंडर्स एक्ट-1907, चिल्ड्रन एंड यंग पर्सन एक्ट-1908, आइरिश यूनीवर्सिटीज एक्ट-1908, ओल्ड एज पेंशन एक्ट-1908, लेबर एक्सचेंज एक्ट-1909 जैसे दर्जनों सुधारवादी कानून वहां की एसक्विथ के नेतृत्व वाली सरकार बनाती है। यही नहीं, छोटे किसानों को बड़े जमींदारों के चंगुल से बचाने के लिए एसक्विथ सरकार ने 1906 से 1908 के बीच भू-सुधार हेतु अनेक लोकोपयोगी कानून बनाए थे। उनमें एग्रीकल्चर होल्डिंग एक्ट-1906, स्माल होल्डिंग एंड एलाटमेंट एक्ट-1907, कसोलिडेशन एक्ट-1907 जैसे कानून शामिल थे। ‘स्माल होल्डिंग एंड एलाॅटमेंट एक्ट-1907’ में सुधार करते हुए ‘स्माल होल्डिंग एंड एलाटमेंट एक्ट-1908’ नामक नया कानून बनाया गया, उसके तहत 1908 से 1914 के बीच लगभग दो लाख एकड़ कृषि भूमि का अधिग्रहण किया, जिसे 14000 लघु-जोतों में बांटकर छोटे किसानों को मदद पहुंचाई गई। आशय है कि 1900 से लेकर 1909 के वे दिन जब गांधी ‘हिंद स्वराज’ में ब्रिटिश संसद पर बांझ और बेसवा होने का आरोप लगा रहे थे, ब्रिटिश जनता की दृष्टि से ब्रिटिश संसद उत्तरदायी सरकार की भूमिका निभा रही थी। सरकार ने नियंत्रित पूंजीवादी व्यवस्था लागू की थी। यही नहीं 1909 में लेबर पार्टी सरकार की ओर से संसद के आगे जो फाइनेंस बिल(बजट) पेश किया गया था, उसे उन्होंने बुद्धिजीवियों ने ‘जनता का बजट’ की संज्ञा दी थी। भारत में उसी तरह के कानून बनाने की आवश्यकता के बजाय गांधी ब्रिटिश पार्लियामेंट पर ही आरोप लगाने लगते हैं।

भारत के संबंध में भी ब्रिटिश संसद ने ऐसे कई युगांतरकारी निर्णय लिए थे, जो आगे चलकर इस देश को आधुनिक राज्य बनाने में सहायक सिद्ध हुए। चार्टर अधिनियम-1813 में भारत में शिक्षा सुधारों की नींव रखी गई थी। शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कंपनी के बजट में न्यूनतम एक लाख रुपये का प्रावधान किया गया। उसके फलस्वरूप शूद्रों और अतिशूद्रों के लिए शिक्षा प्राप्ति के रास्ते प्रशस्त हुए। उससे पहले देश में मनुस्मृति का विधान लागू था। उसके अनुसार संपूर्ण शिक्षा का अधिकार केवल ब्राह्मणों तक सीमित था। गैर-ब्राह्मण सवर्ण केवल अपने व्यवसाय से संबंधित शिक्षा ग्रहण कर सकते थे। जिन्हें इसमें संदेह है वे विश्वामित्र और वशिष्ट के संघर्ष को याद कर सकते हैं। शूद्रों और अतिशूद्रों के लिए शिक्षा पूरी तरह निषिद्ध थी।

चार्टर अधिनियम-1813 केवल 20 वर्षों के लिए लाया गया था। 1833 में लागू अगले चार्टर में विधि संहिता के निर्माण हेतु विधि आयोग बनाने की अनुशंसा की गई थी। उसके अधीन जो कानून बने, वे सभी भारतीयों यहां तक कि भारत में रह रहे अंग्रेजों पर भी लागू होते थे। उस अधिनियम के बाद प्रशासनिक सेवाओं को पूरी तरह से स्पर्धात्मक बना दिया गया था। जाति, धर्म, संप्रदाय से परे कोई भी उनमें हिस्सा ले सकता था। उससे पहले तीन-चार प्रतिशत ब्राह्मण आबादी 70 प्रतिशत सरकारी पदों पर कब्जा जमाए हुए थी। नए अधिनियम के लागू होने के बाद शूद्रों ओर अतिशूद्रों के लिए सरकारी नौकरियों में जाने का रास्ता साफ हो गया। चार्टर अधिनियम-1853 में स्थानीय प्रशासन में भारतीयों को जगह देने की अनुशंसा की गई थी। 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेज समझ चुके थे कि ताकतवर जातियों को संतुष्ट किए बिना उनका इस देश में टिके रहना संभव नहीं है। इसलिए 1858 में भारत को ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बनाते समय इंग्लेंड की महारानी ने जो घोषणा की थी, उसमें जमींदारों और राजे-रजबाड़ों के विशेषाधिकारों की सुरक्षा का आश्वासन दिया गया था। तथापि ब्रिटिश सरकार की प्रशासनिक नीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया था। उसके फलस्वरूप शूद्रों और अतिशूद्रों में अपने अधिकारों के प्रति चेतना बढ़ी और पूरे भारत में सामाजिक सुधार के आंदोलनों में तेजी आई।

ऐसी संसद को गांधी किस आधार पर ‘बांझ’ और ‘बेसवा’ कहते हैं, यह बात समझ से परे है। हालांकि आगे चलकर उन्होंने पार्लियामेंट के लिए ‘वेश्या’ शब्द को बदलने की इच्छा व्यक्त की थी। इसलिए नहीं कि ब्रिटिश संसद को लेकर उनके विचारों में किसी प्रकार का परिवर्तन आया था, या संसदीय प्रणाली में उनके विश्वास में वृद्धि हुई थी, अपितु इसलिए कि उनकी एक अंग्रेज महिला मित्र को पार्लियामेंट के लिए ‘वेश्या’ शब्द अच्छा नहीं लगा गया था। ‘हिंद स्वराज’ के अंग्रेजी अनुवाद की प्रस्तावना में उन्होंने लिखा था—

‘‘इस समय इस पुस्तक को इसी रूप में प्रकाशित करना मैं आवश्यक समझता हूं। परंतु यदि इसमें, मुझे कुछ भी सुधार करना हो, तो मैं केवल एक शब्द सुधारना चाहूंगा। एक अंग्रेज महिला मित्र को मैंने वह शब्द बदलने का वचन दिया है। पार्लियामेंट को मैंने वेश्या कहा है। यह शब्द उस बहन को पसंद नहीं है। उनके कोमल हृदय को इस शब्द के ग्राम्यः भाव से दुख पहुंचा है।’’

पार्लियामेंट के लिए उन्होंने ‘वेश्या’ जैसा तीखा शब्द क्यों इस्तेमाल किया? इसपर चौंकने की आवश्यकता नहीं है। जिन दिनों ‘हिंद स्वराज’ की रचना हुई, गांधी की संसदीय शासन प्रणाली में कोई आस्था नहीं थी। बजाय संसदीय लोकतंत्र के उनका आदर्श रामराज्य था। भारत के लिए वे रामराज्य की ही परिकल्पना करते थे। उनकी कल्पना का रामराज क्या था, इसे निम्नलिखित उद्धरण से समझा जा सकता है—

‘हम राज को रामराज तभी कह सकते हैं, जब राजा और प्रजा दोनों पवित्र हों। जब दोनों त्यागवृत्ति रखते हों, जब दोनों के बीच पिता ओर पुत्र जैसे संबंध हों। हम यह बात भूल गए, इसलिए डेमोक्रेसी की बात करते हैं। आज ‘डेमोक्रेसी’ का जमाना है। जहां प्रजा की बात सुनी जाती हो। जहां प्रजा के प्रति प्रेम का प्राधान्य हो—कहा जा सकता है कि वहां डेमोक्रेसी है। मेरी कल्पना के ‘रामराज्य’ में सिरों की गिनती अथवा हाथों की गिनती से प्रजा के मत को नहीं मापा जा सकता। जहां इस तरह से मत लिए जाते हों, उसे मैं प्रजा का मत नहीं मापता। ऋषियों-मुनियों ने तपस्या करके यह देखा कि जो व्यक्ति तपश्चर्या करते हों और प्रजा के कल्याण की भावना रखते हों, उनका मत प्रजा का मत कहला सकता है। इसी का नाम सच्ची डेमोक्रेसी है। यदि मुझ जैसा व्यक्ति व्याख्यान देकर आपका मत चुराकर ले जाए तो उस मत से प्रकट होने वाली डेमोक्रेसी नहीं है। मेरी डेमोक्रेसी तो रामायण में लिखी पड़ी है, और मैंने जिस सीधे-सादे ढंग से रामायण को पढ़ा है, रामचंद्रजी उसी के अनुसार राज करते थे।5

हम समझ सकते हैं ‘रामराज्य’ की गांधीवादी अवधारणा में आम-मताधिकार के लिए कोई स्थान नहीं है। वहां एक प्रकार का मुनितंत्र है। चूंकि ऋषि-मुनि बनने का अधिकार ब्राह्मणों तक सीमित था, इसलिए परोक्ष रूप में गांधी सीधे-सीधे ब्राह्मण-तंत्र की अनुशंसा कर मनु के विधान का समर्थन कर रहे होते हैं। 19 सितंबर 1929 के ‘यंग इंडिया’ में वे पुनः लिखते हैं—‘रामराज्य से मेरा अभिप्रायः हिंदू राज्य से नहीं है। मेरा आशय दैवीय राज्य से, ईश्वरीय राज्य से है….भले ही राम इस धरती पर जीवित रूप में कभी थे या नहीं थे, प्राचीन रामराज्य का आशय सच्चे जनतंत्र से है। जिसमें गरीब से गरीब आदमी भी कम से कम खर्च में न्याय प्राप्त कर सके। रामराज्य में तो बताया गया है कि कुत्ते को भी न्याय प्राप्त हुआ था(यंग इंडिया, 19 सितंबर, 1929)….रामराज्य का मेरा सपना ऐसे राज्य का है जिसमें राजा और रंक दोनों को बराबर अधिकार प्राप्त हों।’(अमृत बाजार पत्रिका, 2 अगस्त, 1934)6

गांधी के लिए रामराज्य आदर्श है, मगर बहुजनों के लिए ऐसे राज्य का कोई महत्त्व नहीं है, जहां का राजा मात्र ब्राह्मण की शिकायत पर, वगैर अपने विवेक का इस्तेमाल किए, वेदाध्ययन के इच्छुक शूद्र को मृत्युदंड देने को अपना पुनीत कर्तव्य मानता हो। अथवा व्यक्ति मात्र के आक्षेप पर अपनी गर्भवती पत्नी को घर से निकाल दे। गांधी राजनीति को ईश्वरीय आस्था और धार्मिक आदर्शों के आधार पर चलाना चाहते थे। इसकी प्रेरणा उन्हें ईसाई धर्म खासतौर पर जाॅन रस्किन जैसे समाजवादियों की ओर से प्राप्त हुई थी, जो समाजवाद का मूल ईसाई धर्म की उदारवादी मान्यताओं में खोजते थे। गांधी का हिंदू मन ‘रामराज्य’ में समाजवादी आदर्श खोजने लगता है। वे भूल जाते हैं कि ईसाई धर्म में जाति-आधारित विभाजन नहीं है। वहां जन्म के आधार पर मनुष्य को जीवन के मूल-भूत अधिकारों, उसकी स्वतंत्रता और समानता के अधिकार से वंचित नहीं किया जाता था। जबकि हिंदू धर्म की नींव ही जाति-व्यवस्था पर टिकी है। चूंकि ब्रिटिश संसद ने एक के बाद एक प्रशासनिक सुधारों के माध्यम से भारत में जाति-आधारित विभाजन पर चोट की थी, इसलिए गांधी को वहां की संसद से शिकायत थी। यह शिकायत इतनी बड़ी थी कि वे उसे वेश्या तक कह जाते हैं।

भारत में आधुनिकीकरण की शुरुआत 19वीं शताब्दी से होती है। वही समय औद्योगिकीकरण की शुरुआत का भी है। आवाजाही को सुगम बनाने के लिए रेलगाड़ी की शुरुआत होती है। स्वास्थ्य की देखभाल के लिए अस्पताल बनाए जाते हैं। उससे पहले जो वैद्य आदि हुआ करते थे, वे ऊंची जातियों से आते थे। जातीय शुचिता के नाम पर वे निचली जातियों के मरीजों के इलाज से बचते थे। मजबूर होकर उन्हें तांत्रिकों और ओझाओं की शरण में जाना पड़ता था, जो उनका शोषण करता था। अस्पतालों, वकीलों और स्कूलों के खुलने से शूद्रों और अतिशूद्रों के मन में न्याय की उम्मीद जगी थी। रेलों ने गरीब मजदूरों, कामगारों और शिल्पकारों को यह अवसर दिया था कि वे गांवों के सामंती उत्पीड़न से बचने के लिए वैकल्पिक रोजगार के लिए शहरों की ओर जा सकें। सरकारी अस्पतालों में सभी वर्ग के लोग आ जा सकते थे। उससे जातिवाद पर चोट पड़ी थी। गांधी आधुनिक समाज के सभी प्रतीकों जैसे अदालत, रेल, अस्पताल, वकील, डॉक्टर आदि की आलोचना करते हुए उन्हें सभ्यता के संकट के रूप में देखते हैं। उन्हें समाज के हजारों वर्षों तक गरीब, विपन्न और एक जैसे हालात में रहने से कोई दुख नहीं है। अपितु उनके लिए यह गौरव की बात है। इसलिए वे गरीबी का महिमामंडन तक कर जाते हैं—

‘हजारों साल पहले जो काम हल से लिया जाता था, उससे हमने काम चलाया। हजारों साल पहले जैसे झोंपड़े थे, उन्हें हमने कायम रखा। हजारों साल पहले जैसी हमारी शिक्षा थी, वही चलती आई….ऐसा नहीं है कि हमें यंत्र-वगैरह की खोज करना नहीं आता था। लेकिन हमारे पूर्वजों ने देखा कि यंत्र वगैरह की खोज करेंगे तो गुलाम बनेंगे, और अपनी नीति को छोड़ देंगे।’7

जिन दिनों गांधी इन पंक्तियों को लिख रहे थे, उससे करीब एक हजार पहले से ही भारत किसी न किसी विदेशी शासक का गुलाम था। उससे पीछे के हजार वर्षों में भारत में वैज्ञानिक और तकनीकी क्रांति लगभग शूण्य थी। जाति-व्यवस्था के कारण भारत में सस्ता श्रम लगभग बेगार के रूप में गांव-गांव मौजूद था। मशीनी क्रांति पर आक्षेप लगाकर गांधी जाति-व्यवस्था के समर्थक और यथास्थितिवादी नजर आते हैं। गांधी के शिष्य भी उन्हीं की तरह परिवर्तन-विरोधी थे। विनोबा को आम-मताधिकार से शिकायत थी। नेहरू और उनके खानसामा दोनों को एक ही वोट का अधिकार हो—यह उन्हें विचित्र लगता था। गांधी के दूसरे शिष्य भी ऐसे थी। नवजीवन ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित ‘हिंद स्वराज’ के हिंदी अनुवाद की भूमिका में काका कालेलकर लिखते हैं—‘उनकी रेलें, उनकी चिकित्सा और रुग्णालय, उनके न्यायालय और न्याय-दान पद्धति आदि सब बातें अच्छी संस्कृति के लिए आवश्यक नहीं हैं, बल्कि विघातक ही हैं…’ ऐसे गांधीवादियों को कौन समझाए कि रेल, चिकित्सा प्रणाली, न्यायालय आदि अनायास हुई खोजेें नहीं थीं। अपितु इसके पीछे यूरोपीय बौद्धिक चेतना और वैज्ञानिक क्रांति का योगदान था। न्यूटन और काॅपरनिकस जैसे वैज्ञानिकों की उत्कट मेधा और समर्पण था। उससे पहले यूरोप का हाल भारत जैसा ही था। गौरतलब है कि यूरोप की औपनिवेशिक नीतियों की आलोचना दुनिया-भर में हुई थी। लेकिन वहां की बौद्धिक और प्रौद्योगिकीय क्रांति से किसी को शिकायत न थी। यहाँ तक कि मार्क्स जैसे ठेठ समाजवादी को भी नहीं। यूरोप की बौद्धिक क्रांति का असर दुनिया के सभी अगड़े-पिछड़े समाजों पर पड़ा था। ऐसे में यूरोपीय सभ्यता, संस्कृति की आंख-मूंदकर आलोचना करने नैतिकता की दृष्टि से उचित न था।

शिक्षा-नीति के बारे में भी गांधी के विचार इतने ही दक़ियानूसी हैं। हालांकि ऐसे कई लोग आज भी मिल जाएंगे जो गांधी की बुनियादी शिक्षा-नीति को आदर्श मानकर उसका महिमा मंडन करते हैं। लेकिन ऐसा केवल वही सोच सकता है, जिसे भारतीय सभ्यता और संस्कृति में सबकुछ साफ-सुथरा, उजला-उजला और पाक-साफ नजर आता हो। इस पर बात करने से पहले गांधी के शिक्षा पर विचार को जान लेना उचित होगा। वे लिखते हैं—‘बहुत से लोग उस(अक्षर-ज्ञान) का बुरा प्रयोग करते हैं, यह तो हम देखते ही हैं। उसका अच्छा प्रयोग प्रमाण में कम ही लोग करते हैं। यह बात अगर ठीक है तो इससे यह साबित होता है कि अक्षर-ज्ञान से दुनिया को फायदे के बदले नुकसान ही हुआ है….एक किसान ईमानदारी से खुद खेती करके रोटी कमाता है। उसे मामूली तौर पर दुनियावी ज्ञान है। अपने मां-बाप के साथ कैसे बरतना, अपनी स्त्री से कैसे बरतना, अपने बच्चों के साथ कैसे पेश आना, जिस देहात में वह बसा हुआ है वहां उसकी चाल-ढाल कैसी होनी चाहिए, इन सबका उसे काफी ज्ञान है। वह नीति के नियम समझता है और उनका पालन करता है, लेकिन वह अपने दस्तखत करना नहीं जानता। इस आदमी को अक्षर-ज्ञान देकर आप क्या करना चाहते हैं? उसके सुख में आप कौन-सी बढ़ती करेंगे? क्या उसकी झोपड़ी या उसकी हालत के बारे में आप उसके मन में असंतोष पैदा करना चाहते हैं? ऐसा करना हो तो भी उसे अक्षर-ज्ञान की आवश्यकता नहीं है।’8

शिक्षा के बारे में ये ऐसे व्यक्ति के विचार हैं जिसे जीते-जी महात्मा मान लिया गया था। गांधी को लगता था कि ज्ञान का सभी लोग सही प्रयोग नहीं कर सकते। वे सही प्रयोग करें, इसके लिए उन्हें और अधिक शिक्षित-प्रेरित करने से अच्छा है कि उन्हें अक्षर ज्ञान से ही वंचित कर दिया जाए। यहां गांधी दलित-बहुजनों का जिक्र नहीं करते। बात उन्होंने सामान्य तौर पर ही कही है। लेकिन संदेश वही है जो मनुस्मृति और दूसरे हिंदू धर्मशास्त्रों का है। यही कि ज्ञान पर कुछ वर्गों का एकाधिकार रहे। जनसाधारण दुनियावी ज्ञान से अलग-थलग बना रहे, वही अच्छा है। यदि वह पढ़-लिख जाएगा तो अन्याय का विरोध करेगा, धर्म-शास्त्रों को स्वयं पढ़कर उसका अर्थ निकालने लगेगा, पंडे-पुरोहित के जाल में आसानी से फंस न सकेगा। जिन दिनों गांधी यह सब लिख रहे थे, उन दिनों गांव-गांव में महाजनी तंत्र का जाल फैला हुआ था। वे एक के बदले चार चढ़ाकर बही में किसानों और मजदूरों से अंगूठा लगवा लिया करते थे। ओने-पौने ब्याज वसूलते थे। जिस गुजरात से गांधी आते हैं वहां महाजनी प्रथा और भी चरम पर थी। उनके शोषण और षड्यंत्र की ओर इशारा करने, लोगों को उसके विरुद्ध जागरूक करने के लिए शिक्षा की अनिवार्यता पर ज़ोर देने के बजाए, वे अक्षर-ज्ञान की आवश्यकता को ही नकार देते हैं।

इसलिए ‘हिंद स्वराज’ का आदर्श बहुजनों का आदर्श नहीं हो सकता। बहुजन अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले लगभग सभी महामानवों ने शिक्षा को जरूरी माना था। ज्योतिराव फुले, पेरियार, डॉ. आंबेडकर, स्वामी अछूतानंद, महामना अय्यंकालि, पोइकाइल योहन्नान आदि जितने भी बहुजन-चिंतक और आंदोलनकारी हैं उन सभी ने वर्चस्वकारी संस्कृति से मुक्ति के लिए शिक्षा पर ज़ोर दिया था। उसके लिए आंदोलन चलाए थे। सड़कों पर संघर्ष किया था। उन्हें अपना महानायक मानने वाले बहुजन, भारतीय सभ्यता और संस्कृति की आड़ में वर्ण-व्यवस्था के पोषक और समर्थक गांधी को अपना नायक भला कैसे मान सकते हैं।

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ :

1. अंग्रेजी मासिक ‘आर्यन पाथ’ के सिंतबर 1938 में ‘हिंद स्वराज अंक’ के लिए भेजा गया संदेश।

2. हिंद स्वराज, अध्याय 5, इंग्लैंड की हालत।

3. जी. आर. शीर्ले, ए न्यू इंग्लेंड? पीस एंड वार, 1886-1918(2005), आक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी प्रेस, पृष्ठ 333-334

4. http://www।educationengland।org।uk/documents/acts/1903-employment-children-act।pdf

5. संपूर्ण गांधी वाङ्मय खंड 35, 1927-28, पृष्ठ 508-509, ‘गांधीजी हिंद स्वराज से नेहरू तक’ में देवेंद्र स्वरूप द्वारा उद्धृत, पृष्ठ 76)

6. https://www।mkgandhi।org/momgandhi/chap67।htm

7. हिंद स्वराज, अध्याय 18, शिक्षा।

8. वही

पेरियार ललई सिंह : प्रखर मानवतावादी एवं विद्रोही चेतना

सामान्य

राजनीतिक स्वतंत्रता की आवश्यकता इसलिए होती है कि मनुष्य को सामाजिक स्वतंत्रता हो। मनुष्य, दूसरों की स्वतंत्रता में बाधक न होकर स्वेच्छानुसार खा-पी सके, पहन-ओढ़ सके, चल-फिर सके, मिल-जुल और ब्याह-शादी कर सके। यदि सामाजिक स्वतंत्रता न तो राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं रह जाता…इसलिए सामाजिक समता और सामाजिक स्वतंत्रता ही हमारा मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। राजनीतिक स्वतंत्रता तो उसमें सहायक होने के कारण ही वांछनीय है।

संतराम बीए, ‘हमारा समाज’ से

कुछ नेता स्वाभाविक नेता होते हैं। समाज की कच्ची-खुरदरी जमीन पर हालात से संघर्ष करते हुए स्वयं उभरते हैं। विपरीत परिस्थितियों से जूझने की प्रवृत्ति उन्हें नेता बना देती है। दूसरे वे नेता होते हैं, जिन्हें थोप दिया जाता है। ऐसे नेता प्रायः मान लेते हैं कि राजनीति उनके खून में है, इसलिए सत्ता-केंद्र पर छाए रहना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। वे प्रायः परिवर्तन-विरोधी होते हैं। गांधी ऐसे ही नेता थे। 1917 में रूसी क्रांति से डरे हुए भारतीय उद्योगपतियों, जमींदारों यहां तक कि यूरोप को भी ऐसे नेता की आवश्यकता थी, जो इस देश के मानस को समझता हो। साथ में ठेठ परंपरावादी भी हो। जो परिवर्तन की इच्छा और संभावनाओं को धर्म की आड़ में दबा सके। इसलिए दक्षिण अफ्रीका से लौटकर आए गांधी को उन्होंने हाथों-हाथ लिया। गांधी ने भी उनकी उम्मीद से बढ़कर काम किया। गरीब जनता के दिल में जगह बनाने के लिए लंगोटी धारण कर ली। उसके बाद जो हुआ, सबके सामने है।

दूसरी श्रेणी के नेताओं की संख्या भी कम नहीं है। ऐसे महामनाओं में ज्योतिराव फुले, डाॅ. आंबेडकर, ई. वी. रामासामी पेरियार, स्वामी अछूतानंद जैसे क्रांतिकारी विचारकों का नाम आता है। पेरियार को छोड़ दें तो बाकी तीनों बहुत साधारण परिवारों से आए थे। परंतु अपने असाधारण सोच, सरोकार और संघर्ष के बल पर वे बड़े परिवर्तन के संवाहक बने। ये सब नए भारत के वास्तुकार हैं। संघर्ष में तपकर निकले नेताओं में ललई सिंह का नाम भी शामिल है। वे कानपुर देहात के छोटे-से गांव में जन्मे और विद्रोही चेतना के बल पर लोगों के दिलो-दिमाग पर छाये रहे। वर्षों लंबे संघर्ष के दौरान उन्होंने विरोधी भी बनाए और समर्थक भी। विरोधी मृत्यु के साथ ही उन्हें भुला चुके थे, जबकि समर्थकों की संख्या आज भी लगातार बढ़ती जा रही है। बड़े नेता और महत्त्वपूर्ण विचार की प्रासंगिकता समय के साथ-साथ निरंतर बढ़ती जाती है। ललई सिंह इस कसौटी पर एकदम खरे उतरते हैं।

ललई सिंह यादव का जन्म 1 सितंबर, 1911 को कानपुर देहात के गांव कठारा के किसान परिवार में हुआ था। पिता का नाम था गज्जू सिंह और मां थीं, मूला देवी। पिता गज्जू सिंह पक्के आर्यसमाजी थे। जाति-भेद उन्हें छू भी नहीं गया था। उनकी गिनती गांव के दबंग व्यक्तियों में होती थी। मां मूला देवी के पिता साधौ सिंह भी खुले विचारों के थे। समाज में उनकी प्रतिष्ठा थी। ललई सिंह के जुझारूपन के पीछे उनके माता-पिता के व्यक्तित्व का गहरा प्रभाव था।

ललई सिंह की प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई थी। उन दिनों दलितों और पिछड़ों में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ने लगी थी। हालांकि सवर्ण समाज का नजरिया अब भी नकारात्मक था। उन्हें यह डर नहीं था कि दलित और शूद्र पढ़-लिख गए तो उनके पेशों को कौन करेगा। असली डर यह था कि पढ़े-लिखे दलित-शूद्र उनके जातीय वर्चस्व को भी चुनौती देंगे। उन विशेषाधिकारों को चुनौती देंगे जिनके बल पर वे शताब्दियों से सत्ता-सुख भोगते आए हैं। इसलिए दलितों और पिछड़ों की शिक्षा से दूर रखने के लिए वह हरसंभव प्रयास करते थे। ऐसे चुनौतीपूर्ण परिवेश में ललई सिंह ने 1928 में आठवीं की परीक्षा पास की। उसी दौरान उन्होंने फारेस्ट गार्ड की भर्ती में हिस्सा लिया और चुन लिए गए। वह 1929 का समय था। 1931 में मात्र 20 वर्ष की अवस्था उनका विवाह सरदार सिंह की बेटी दुलारी देवी से हो गया। दुलारी देवी पढ़ी-लिखी महिला थीं। उन्होंने टाइप और शार्टहेंड का प्रशिक्षण प्राप्त किया था। ललई सिंह को फारेस्ट गार्ड की नौकरी से संतोष न था। सो 1933 में वे सशस्त्र पुलिस कंपनी में कनिष्ठ लिपिक बनकर चले गए। वहां उनकी पहली नियुक्ति भिंड मुरैना में हुई।

कानपुर देहात जहां ललई सिंह का जन्म हुआ था, से लेकर भिंड मुरैना तक का क्षेत्र विद्रोही चेतना के लिए विख्यात रहा है। उसका असर ललई सिंह के व्यक्तित्व पर भी पड़ा। उन दिनों गांव-देहात में पुलिस का रौव था, लेकिन स्वयं पुलिस-कर्मियों को अनेक विपरीत परिस्थितियों में काम करना पड़ता था। उनका वेतन भी मामूली था। जिसे लेकर उनके मन में आक्रोश था। ललई सिंह के रूप में उन्हें ऐसा साथी मिल चुका था, जो जुझारू होने के साथ-साथ ईमानदार भी था। पुलिसकर्मियों की समस्याओं के समाधान के लिए ललई सिंह ने एक संगठन बनाया। उसके माध्यम से वे सहकर्मियों की समस्याओं को लेकर आवाज उठाने लगे। परिणामस्वरूप अधिकारी वर्ग उनसे नाराज रहने लगा। फिर ऐसा अवसर आया जिससे ललई सिंह और उनके साथियों की अधिकारियों से ठन गई।

जहां उनकी कंपनी का ठिकाना था, वहां एक बावड़ी थी। सभी पुलिसकर्मी नहाने-धोने और पीने के पानी के लिए सीढ़ीदार बावड़ी पर निर्भर थे। नहाने-धोने के लिए सीढ़ियों का इस्तेमाल किया जाता। सो बचा हुआ पानी वापस बावड़ी में चला जाता था। वही पानी पीने के काम भी आता था। प्रदूषित पानी शरीर में जाकर अनेक बीमारियां पैदा करता। उसपर कंपनी कमांडर कुटिल प्रवृत्ति का था। पुलिसकर्मियों की बीमारी उसे बहाना लगती। उपचार के लिए अस्पताल भेजने में वह आनाकानी करता था। अपने साथियों को लेकर ललई सिंह उस अमानवीय व्यवस्था के विरोध में डट गए। अधिकारी पहले ही उनसे नाराज थे। सो जायज विरोध को भी अनुशासनहीनता का नाम देकर उन्होंने ललई सिंह को नौकरी से बर्खास्त कर दिया। ललई सिंह गांव-देहात से आए थे। बहुत अधिक पढ़े-लिखे भी न थे। लेकिन अधिकार चेतना उनमें खूब थी। सो यह दिखाते हुए कि आसानी से हार मान लेने वालों में से वे नहीं हैं, बर्खास्तगी के विरोध में उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने वस्तुस्थिति की समीक्षा की। ललई सिंह निर्दोष सिद्ध होकर, नौकरी में वापस आ गए।

ललई सिंह ससम्मान नौकरी पर वापस लौटे थे। मगर उनका मन सशस्त्र पुलिस बल की नौकरी से ऊब चुका था। वे समय निकालकर पढ़ाई करने लगे। इसका उन्हें फायदा भी हुआ। उन्हीं दिनों उन्होंने फौज की परीक्षा दी और उसमें भर्ती हो गए। फौज की नौकरी सशस्त्र पुलिस बल से अच्छी मानी जाती है। माना जाता है कि सरकार भी फौजियों पर पूरा ध्यान देती है। लेकिन अंदरूनी हालत इससे अलग थी। खासकर ललई सिंह जैसे जुझारू व्यक्ति के लिए। फौज में रहते हुए ललई सिंह ने सैनिक जीवन की विसंगतियों को समझा और उनके विरोध में आवाज उठाने लगे। 1946 में उन्होंने ‘नान-गजेटेड पुलिस मुलाजिमान एंड आर्मी संघ’ की स्थापना की तथा उसके अध्यक्ष चुन लिए गए।

एक और नौकरी की चुनौतियां और संघर्ष थे, दूसरी ओर व्यक्तिगत जीवन की त्रासदियां। ललई सिंह का पारिवारिक जीवन बहुत कष्टमय था। उनकी पत्नी जो उन्हें कदम-कदम पर प्रोत्साहित करती थीं, वे 1939 में ही चल बसी थीं। परिजनों ने उनपर दूसरे विवाह के लिए दबाव डाला, जिसके लिए वे कतई तैयार न थे। सात वर्ष पश्चात 1946 में उनकी एकमात्र संतान, उनकी बेटी शकुंतला का मात्र 11 वर्ष की अवस्था में निधन हो गया। कोई दूसरा होता तो कभी का टूट जाता। परंतु समय मानो बड़े संघर्ष के लिए उन्हें तैयार कर रहा था। निजी जीवन दुख-दर्द उन्हें समाज में व्याप्त दुख-दर्द से जोड़ रहे थे। उसी वर्ष उन्होंने ‘सिपाही की तबाही’ पुस्तक की रचना की। इस पुस्तक की प्रेरणा उन्हें लाला हरदयाल की पुस्तक ‘सोल्जर आफ दि वार’ से मिली थी। ‘सिपाही की तबाही’ छपी न सकी। भला कौन प्रकाशक ऐसी पुस्तक छापने को तैयार होता! सो ललई सिंह ने टाइप कराकर उसकी प्रतियां अपने साथियों में बंटवा दीं। पुस्तक लोक-सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाने वाले सिपाहियों के जीवन की त्रासदी पर आधारित थी। परोक्षरूप में वह व्यवस्था के नंगे सच पर कटाक्ष करती थी। पुस्तक में सिपाही और उसकी पत्नी के बीच बातचीत के माध्यम से घर की तंगहाली को दर्शाया गया था। पुस्तक का समापन करते हुए उन्होंने लिखा था—

‘वास्तव में पादरियों, मुल्ला-मौलवियों-पुरोहितों की अनदेखी कल्पना, स्वर्ग तथा नर्क नाम की बात बिल्कुल झूठ है। यह है आंखों देखी हुई, सब पर बीती हुई सच्ची नरक की व्यवस्था सिपाही के घर की। इस नर्क की व्यवस्था का कारण है—सिंधिया गवर्नमेंट की बदइंतजामी। अतः इसे प्रत्येक दशा में पलटना है, समाप्त करना है। ‘जनता पर जनता का शासन हो’, तब अपनी सब मांगें मन्जूर होंगी।’

पुस्तक में आजादी और लोकतंत्र दोनों की मांग ध्वनित थी। पुस्तक के सामने आते ही पुलिस विभाग में खलबली मच गई। सैन्य अधिकरियों को पता चला तो पुस्तक की प्रतियां तत्काल जब्त करने का आदेश जारी कर दिया। उस घटना के बाद ललई सिंह अपने साथियों के ‘हीरो’ बन गए। मार्च 1947 में जब आजादी कुछ ही महीने दूर थी, उन्होंने अपने साथियों को संगठित करके ‘‘नान-गजेटेड पुलिस मुलाजिमान एंड आर्मी संघ’ के बैनर तले हड़ताल करा दी। सरकार ने ‘सैनिक विद्रोह’ का मामला दर्ज कर, भारतीय दंड संहिता की धारा 131 के अंतर्गत मुकदमा दायर कर दिया। ललई सिंह को पांच वर्ष के सश्रम कारावास तथा 5 रुपये का अर्थदंड सुना दिया। वे जेल में चले गए। इस बीच देश आजाद हुआ। अन्य रजबाड़ों की तरह ग्वालियर स्टेट भी भारत गणराज्य का हिस्सा बन गया। 12 जनवरी को 1948 को लगभग 9 महीने की सजा काटने के बाद, ललई सिंह को कारावास से मुक्ति मिली। वे वापस सेना में चले गए। 1950 में सेना से सेवानिवृत्त होने के पश्चात उन्होंने अपने पैत्रिक गांव झींझक को स्थायी ठिकाना बना लिया। वैचारिक संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए वहीं उन्होंने ‘अशोक पुस्तकालय’ नामक संस्था गठित की। साथ ही ‘सस्ता प्रेस’ के नाम से प्रिंटिंग पे्रस भी आरंभ किया।

कारावास में बिताए नौ महीने ललई सिंह के नए व्यक्तित्व के निर्माण के थे। जेल में रहते हुए उन्होंने प्राचीन भारतीय ग्रंथों का अध्ययन किया। धीरे-धीरे हिंदू धर्म की कमजोरियां और ब्राह्मणवाद के षड्यंत्र सामने आने लगे। जिन दिनों उनका जन्म हुआ था, भारतीय जनता आजादी की कीमत समझने लगी थी। होश संभाला तो आजादी के आंदोलन को दो हिस्सों में बंटे पाया। पहली श्रेणी में अंग्रेजों को जल्दी से जल्दी बाहर का रास्ता दिखा देने वाले नेता थे। उन्हें लगता था वे राज करने में समर्थ हैं। उनमें से अधिकांश नेता उन वर्गों से थे जिनके पूर्वज इस देश में शताब्दियों से राज करते आए थे। लेकिन आपसी फूट, विलासिता और व्यक्तिगत ऐंठ के कारण वे पहले मुगलों और बाद में अंग्रेजों के हाथों सत्ता गंवा चुके थे। देश की आजादी से ज्यादा उनकी चाहत सत्ता में हिस्सेदारी की थी। वह चाहे अंग्रेजों के रहते मिले या उनके चले जाने के बाद। 1930 तक उनकी मांग ‘स्वराज’ की थी। ‘राज’ अपना होना चाहिए, ‘राज्य’ इंग्लेंड की महारानी का भले ही रहे। स्वयं गांधी जी ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ का शीर्षक पहले ‘हिंद स्वराज्य’ रखा था। बाद में उसे संशोधित कर, अंग्रेजी संस्करण में ‘हिंद स्वराज’ कर दिया था। ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’—नारे के माध्यम से तिलक की मांग भी यही थी। 1930, विशेषकर भगत सिंह की शहादत के बाद जब उन्हें पता चला कि जनता ‘स्वराज’ नहीं, ‘स्वराज्य’ चाहती है, तब उन्होंने अपनी मांग में संशोधन किया था। आगे चलकर जब उन्हें लगा कि औपनिवेशिक सत्ता के बस गिने-चुने दिन बाकी हैं, तो उन्होंने खुद को सत्ता दावेदार बताकर, संघर्ष को आजादी की लड़ाई का नाम दे दिया। अब वे चाहते थे कि अंग्रेज उनके हाथों में सत्ता सौंपकर जल्दी से जल्दी इस देश से चले जाएं।

दूसरी श्रेणी में वे नेता थे, जो सामाजिक आजादी को राजनीतिक आजादी से अधिक महत्त्व देते थे। मानते थे कि बिना सामाजिक स्वाधीनता के राजनीतिक स्वतंत्रता अर्थहीन है। कि राजनीतिक स्वतंत्रता से उन्हें कुछ हासिल होने वाला नहीं है। उनकी दासता और उसके कारण हजारों साल पुराने हैं। नई शिक्षा ने उनके भीतर स्वाभिमान की भावना जाग्रत की थी। उनकी लड़ाई अंग्रेजों से कम, अपने देश के नेताओं से अधिक थी। वे सामाजिक और राजनीतिक मोर्चे पर साथ-साथ जूझ रहे थे। महामना फुले, संतराम बी.ए., अय्यंकालि, डाॅ. आंबेडकर, पेरियार जैसे नेता इसी श्रेणी में आते हैं। स्वयं ललई सिंह इस श्रेणी से थे और जिस परिवेश से जूझते हुए वे निकले थे, उसमें अपना मोर्चा चुन लेना कोई मुश्किल बात न थी। भविष्य के संघर्ष की रूपरेखा क्या हो, इस बारे में वे सोच ही रहे थे कि 1953 में उनके पिता का भी निधन हो गया। ललई सिंह के लिए यह बड़ा आघात था। पिता उनके लिए प्रेरणाशक्ति थे। अपने अधिकारों के संघर्ष के संस्कार पिता की ही देन थे। एक-एक कर उनके सभी परिजन जा चुके थे। परिवार के नाम पर अब वे स्वयं थे, दूसरी ओर था पूरा देश। खासकर धार्मिक और जातीय बंधनों से आहत समाज। उनके अलावा चारों ओर पसरी चुनौतियां थीं। एक बड़ा कार्यक्षेत्र उनकी प्रतीक्षा कर रहा था।

विद्रोही चेतना का विस्तार

धर्मग्रंथों के निरंतर अध्ययन द्वारा उन्हें पता चला कि हिंदू धर्म असल में राजनीतिक षड्ंयत्र है। ब्राह्मण-पुरोहित उसके नीतिकार हैं। क्षत्रिय अपनी ताकत से लोगों को डराने-दबाने का काम करते हैं; और निहित स्वार्थ के लिए वैश्य इस व्यवस्था का आर्थिक पोषण करते हैं। भाग्य-कर्मफल, स्वर्ग-नर्क, पाप-पुण्य, छूत-अछूत में उलझे बहुजन इसे समझ ही नहीं पाते हैं। धर्मग्रंथों में ब्राह्मणों के अनर्गल बखान से ललई सिंह को इस षड्यंत्र की तह तक जाने में मदद मिली थी। वे समझ चुके थे कि हिंदू धर्म तथा उसके ग्रंथ सवर्णों की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं के औजार हैं। जेल में रहते हुए उन्होंने डाॅ. आंबेडकर के भाषणों को सुना था, जिन्होंने हिंदू धर्म को धर्म मानने से ही इन्कार कर दिया था। आंबेडकर स्वयं हिंदू धर्म तथा उसके ग्रंथों को राजनीति मानते थे। कांग्रेसी नेताओं के व्यवहार से यह सिद्ध भी हो रहा था। 1930 के आसपास दलितों और पिछड़ी जातियांें में राजनीतिक चेतना का संचार हुआ था। ‘त्रिवेणी संघ’ जैसे संगठन उसी का सुफल थे। उसकी काट के लिए कांग्रेस ने पार्टी में पिछड़ों के लिए अलग प्रकोष्ठ बना दिया था। उसका मुख्य उद्देश्य था, किसी न किसी बहाने पिछड़ों को उलझाए रखकर उनके वोट बैंक को कब्जाए रखना।

दूसरा कारण पिछड़ी जातियों में शिक्षा का बढ़ता स्तर तथा उसके फलस्वरूप उभरती बौद्धिक चेतना थी। उससे पहले पंडित अपने प्रत्येक स्वार्थ को ‘शास्त्रोक्त’ बताकर थोप दिया करते थे। बदले समय में बहुजन उन ग्रंथों को सीधे पढ़कर निष्कर्ष निकाल सकते थे। इसलिए महाकाव्य और पौराणिक कृतियां जिनका प्रयोग ब्राह्मणादि अल्पजन बहुजनों को फुसलाने के लिए करते थे, जिनमें बहुजनों के प्रति अन्याय और अपमान के किस्से भरे पड़े थे—वे अनायास ही आलोचना के केंद्र में आ गईं। हमें याद रखना चाहिए कि उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा आदि राज्यों में निर्णायक राजनीतिक शक्ति बन चुके यादवों को क्षत्रिय मानने पर ब्राह्मणादि अल्पजन आज भले ही मौन हों, मगर उससे पहले वे उनकी निगाह ‘क्षुद्र’ यानी शूद्र ही थे। महाभारत जिसमें कृष्ण को अवतार के रूप में प्रस्तुत किया गया है, उसमें भी ऐसे अनेक प्रसंग हैं जब कृष्ण का उसकी जाति के आधार पर मखौल उड़ाया जाता है। डी. आर. भंडारकर यादवों को भारतीय वर्ण-व्यवस्था से बाहर का गण-समूह यानी पंचम वर्ण का मानते हैं।

महाभारत और ऋग्वेद यदुओं को सरस्वती तट का रहने वाला बताते हैं। लेकिन रामायण जो हिंदुओं का सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है, में यदुओं का महासागर से पानी पीना भी अपराध मान लिया गया है। याद कीजिए लंका पर चढ़ाई करते समय राम समुद्र से रास्ता मांगता है। समुद्र के प्रसन्न न होने पर वह धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा लेता है। घबराया हुआ समुद्र उपस्थित होकर रास्ता देने को तैयार हो जाता है। वह राम से वाण को तूणीर में वापस रखने की प्रार्थना करता है। अब राम तो राम है, एक बार प्रत्यंचा चढ़ा वाण नीचे कैसे उतारे। सो समुद्री जीव-जंतुओं को बचाने के लिए वह समुद्र से ही रास्ता पूछता है। समुद्र जो उत्तर देता है, उससे लगता है कि यह पूरा प्रसंग बस इसी के निमित्त गढ़ा गया है—

उत्तरेणावकाशोऽस्ति कश्चित पुण्यतरो मम,

द्रुमकुल्य इति ख्यातो लोके ख्यातो यथा भवान

उग्रदर्शन कर्मणो बहवस्तत्र दस्यवः

आभीर प्रमुखाः पापाः पिबन्ति सलिलं मम

तैन तत्स्पर्शनं पापं सहेयं पापकर्मभिः

अमोधः क्रियतां राम अयं तत्र शरोत्तमः(रामायण, युद्धकांड, 22वां सर्ग)

”प्रभो! जैसे आप सर्वत्र विख्यात एवं पुण्यात्मा हैं, उसी प्रकार मेरे उत्तर की ओर ‘द्रुमकुल्य’ नाम से विख्यात एक बड़ा ही पवित्र देश है। वहाँ आभीर (अहीर, यादव) आदि जातियों के अनेकानेक मनुष्य निवास करते हैं। उनके रूप और रंग बड़े ही भयानक हैं। वे सब के सब पापी और लुटेरे हैं। वे लोग मेरा जल पीते हैं। उन पापचारियों का स्पर्श मुझे प्राप्त होता रहता है, इस पाप को मै नहीं सह सकता। हे, राम! आप अपने इस उत्तम बाण को वहीं सफल कीजिए।’

गोया रामायणकार को ‘राक्षस’ रावण से पहले यदुओं को ठिकाने लगा देने की जल्दी थी। राम का जैसा चरित्र गढ़ा है, उसके हिसाब से वह ऐसी सलाह को टाल ही नहीं सकता था। ‘महात्मा’ समुद्र की सलाह मानकर वह उसी दिशा में शर-संधान कर यदुओं सहित बाकी गणों का सफाया कर देता है। यदुओं के प्रति तत्कालीन समाज की नफरत को तुलसीदास ज्यों का त्यों आगे बढ़ा देते हैं। उनके अनुसार—‘आभीर, यवन, किरात, खस, स्वपचादि अति अधरूपजे’। अहीर, यवन(मुस्लिम), किरात, खस, स्वपच आदि जातियां अत्यंत अधम हैं। यदुओं के विनाश की कहानी को महाभारत में भी बढ़ाया गया है। परंतु थोड़े भिन्न तरीके से। ‘सभा-पर्व’ में यदुओं को सरस्वती नदी के तट बसने वाला बताया गया है।1 कृष्ण को भगवान का दर्जा प्राप्त है। मगर क्षत्रीय जैसे राम की वंश-परंपरा से जोड़ने को आजाद हैं, उस तरह की दावेदारी स्वयं को कृष्ण का वंशज बताकर यादव न करे—इसके लिए गांधारी के शाप को बहाना बनाया जाता है। उसके अनुसार सारे यदुवंशी अंतर्कलह से आपस में लड़-झगड़कर मर जाते हैं। आशय है कि यादवों की बढ़ी राजनीतिक शक्ति से भय खाकर ब्राह्मणों ने ‘कृष्ण’ को अवतार का दर्जा तो दिया, लेकिन उनके वंशजों को एक-दूसरे से लड़वाकर मरवा दिया। पहले ये प्रसंग या तो धर्म ग्रंथों में दबे-छिपे रह जाते थे, या ब्राह्मणों की व्याख्या में कुछ का कुछ बना दिए जाते थे, नई शिक्षा और ज्ञान की रोशनी में उनके वास्तविक पाठ सबके सामने थे। उन्हें पढ़कर यदु-वंशजों में आक्रोश उभरना तय था।

‘त्रिवेणी संघ’ की सिद्धांत पुस्तिका ‘त्रिवेणी संघ का बिगुल’ का प्रकाशन 1940 में हो चुका था, उसके लेखक थे—यदुनंदन प्रसाद मेहता संघ में यादव जाति का प्रतिनिधित्व करते थे।। धर्म के नाम पर हो रहे आडंबरों पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने उसमें लिखा था—

‘‘धार्मिक मंदिरों और मठों के बाहर साइन-बोर्ड टँगा हुआ है कि ‘जाति पाँति पूछै नहीं कोई, हरि के भजे से हरि का होई।’ लेकिन भीतर जाकर देखिए कि कैसी-कैसी करामातें हो रही हैं। पुजारी कौन हो सकता है? जो उसमें जाति का ब्राह्मण हो। चाहे वह नया हो, साधु या कम ही पढ़ा-लिखा क्यों न हो।भंडारी कौन हो सकता है? जो उसमें जाति का ब्राह्मण हो। चाहे उसे पाचन-कर्म का ज्ञान भले ही न हो। अमुक साधु अमुक जाति का है, इसलिए उसे अमुक काम दिया जाए। ब्राह्मण साधु दूसरी जाति के साधु का बनाया हुआ नहीं खा सकता। क्या यहां धर्म की ओट में धर्म का शिकार नहीं किया जाता? तो, त्रिवेणी संघ ऐसी धार्मिक धांधलियों, लूटों, अन्यायों, अत्याचारों, अंधेरों और स्वार्थों का अंत सदा के लिए कर देना चाहता है और उनके स्थान पर, धर्म का सच्चा रूप बताकर जनता को उजाले में ले जाना चाहता है।’’

यही चीजें ललई सिंह का मानस निर्माण कर रही थीं। देश को आजादी मिल चुकी थी, मगर जिस स्वाधीनता की कामना आजादी के साथ की गई थी, वे सपना ही थीं। विशेषरूप से सामाजिक आजादी का सपना। ललई सिंह समझ चुके थे कि यहां से आगे का रास्ता संघर्ष का है, जो उन्हें स्वयं तय करना है। वे ‘रिपब्लिक पार्टी आफ इंडिया’ के सदस्य बन गए। उनकी आवाज कड़क थी। एक सैनिक का जोश उसमें भरा होता था। बिहार में बाबू जगदेव प्रसाद कुशवाहा त्रिवेणी संघ के आंदोलन को आगे बढ़ाने में जुटे थे तो उत्तर प्रदेश में रामस्वरूप शर्मा ने ‘समाज दल’ की स्थापना कर, यथास्थितिवादी राजनीतिक दलों के विरुद्ध एक और मोर्चा खोल दिया था। उधर रिपब्लिकन पार्टी डाॅ. आंबेडकर के बाद बिखरने लगी थी। ललई सिंह उसे छोड़ रामस्वरूप वर्मा के साथ जुड़ गए। बाद में जगदेव प्रसाद कुशवाहा के ‘शोषित दल’ और रामस्वरूप वर्मा के ‘समाज दल’ का एकीकरण हुआ तो उनके लिए लड़ाई और भी आसान हो गई। वे इन दलों के सम्मिलन से बने ‘शोषित समाज दल’; तथा वैकल्पिक राजनीति के प्रचार में जी-जान से जुट गए। उन दिनांे ई। वी। रामासामी पेरियार अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए देश-विदेश की यात्राएं कर रहे थे। इसी सिलसिले में जब वे उत्तर प्रदेश आए तो संभवतः 1967 में, ललई सिंह का उनसे संपर्क हुआ। पहली मुलाकात में ही ललई सिंह उनके व्यक्तित्व से प्रभावित हो गए। रामस्वरूप वर्मा ने 1 जून 1968 को ‘अर्जक संघ’ की स्थापना की। ललई सिंह उसके साथ भी प्राण-प्रण से जुड़ गए।   

पेरियार से पहली मुलाकात के समय ही ललई सिंह ने उनकी पुस्तक ‘रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ को हिंदी में प्रकाशित करने का मन बना लिया था। इसके लिए उन्होंने पेरियार से चर्चा की। पेरियार उन उस पुस्तक के हिंदी अनुवाद की अनुमति चंद्रप्रकाश जिज्ञासु को दे चुके थे। कुछ ही महीने बाद जुलाई 1968 में ललई सिंह को ‘रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ का हिंदी संस्करण प्रकाशित करने की लेखकीय सहमति प्राप्त हो गई।

सहमति मिलना अलग बात थी। पुस्तक प्रकाशित होकर बाजार में आना दूसरी बात। कोई भी प्रकाशक हिंदी अनुवाद छापने को तैयार न था। ललई सिंह हार मानने वालों में से न थे। उन्होंने पुस्तक को अपनी ‘अशोक पुस्तकालय’ नामक संस्था से प्रकाशित करने का फैसला कर लिया। आगे चलकर यही संस्था ‘सच्ची रामायण’ सहित उनकी दूसरी पुस्तकों की प्रथम प्रकाशक बनी। ‘सच्ची रामायण’ का हिंदी अनुवाद राम अधार ने किया था। पुस्तक का पहला संस्करण जुलाई 1969 में आया। उसके आने के साथ ही हिंदी जगत में तहलका मच गया। पुस्तक को हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं आहत करने वाली बताकर, उसके विरोध में प्रदर्शन होने लगे। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी बिना देर किए, 8 दिसंबर 1969 को पुस्तक पर प्रतिबंध की घोषणा कर, प्रकाशित प्रतियों को अपने कब्जे में लेने का आदेश सुना दिया। सरकार का मानना था कि पुस्तक समुदाय विशेष की धार्मिक भावनाओं का अपमान करती है। इससे समाज में शांति-भंग खतरा है। यह भी कहा गया कि पुस्तक जानबूझकर समाज में अशांति फैलाने के ध्येय से लिखी गई है। प्रतिबंध केवल हिंदी संस्करण को लेकर था। अंग्रेजी संस्करण ‘रामायण : दि ट्रू रीडिंग’ के तमिल और अंग्रेजी संस्करण उन दिनों भी धड़ल्ले से बिक रहे थे।    

ललई सिंह सरकार के निर्णय से आहत थे। उन्हें लगा कि भारतीय समाज आज भी लोकतांत्रिक भावना से दूर है। उन्होंने प्रदेश सरकार के विरुद्ध अदालत में अपील कर दी। लेकिन मन हिंदू धर्म से खट्टा हो चुका था। वैसे भी ईश्वर, धर्म, आत्मा-परमात्मा, स्वर्ग-नर्क आदि में विश्वास वे पेरियार के संपर्क में आने से पहले ही खो चुके थे। अब उनका इरादा हिंदू धर्म को हमेशा के लिए छोड़ देने का था। इसके लिए उन्होंने विभिन्न धर्मों का अध्ययन करना आरंभ कर दिया। यहां डाॅ. आंबेडकर उनके प्रेरणा-पुरुष बने। बौद्ध धर्म उन्हें अपनी कसौटी पर खरा लगा। जैसे-जैसे उनका अध्ययन बढ़ रहा था, वैसे-वैसे ब्राह्मण धर्म के षड्यंत्र भी खुलकर सामने आ रहे थे। उन्हें यह लगा कि जातियां हिंदू समाज को बांटने का काम करती हैं। अपनी सत्ता को बचाए रखने के लिए ही ब्राह्मणों ने हजारों जातियों की रचना की है। यहां तक कि शोषितों के भी दो वर्ग बना दिए हैं। पहली श्रेणी में वे हैं जिन्हें स्पर्श करने से कोई अपवाद नहीं होता। दूसरी श्रेणी में वे हैं जिनकी छाया भी सवर्णों को अपवित्र कर देती है। ये चीजें जहां ललई सिंह को आहत करती थीं, वहीं संघर्ष में लगातार बने रहने की प्रेरणा भी देती थीं।

पुस्तक जब्ती के सरकारी आदेश के विरुद्ध उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दी। मामले की सुनवाई के लिए तीन सदस्यों की बैंच बनाई गई। ‘सच्ची रामायण’ का मामला अभी न्यायालय में विचारधीन ही था कि सरकार ने 1970 में ललई सिंह की पुस्तकों ‘सच्ची रामायण की चाबी’ और ‘सम्मान के लिए धर्म-परिवर्तन करें’ की जब्ती के आदेश जारी कर दिए। ‘सच्ची रामायण’ में पेरियार ने अपने तर्क तो प्रस्तुत किए थे, परंतु उनके संदर्भ वे नहीं दे पाए थे। ‘सच्ची रामायण की चाबी’ में ललई सिंह ने ‘सच्ची रामायण’ के तर्कों को पुख्ता बनाने वाले संदर्भ दिए थे। दूसरी पुस्तक डाॅ. आंबेडकर के भाषणों पर आधारित थी। इस जब्ती के मात्र छह महीनों के पश्चात 12 सितंबर 1970 को सरकार ने डाॅ. आंबेडकर की अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘जातिभेद का उच्छेद’ को भी प्रतिबंधित घोषित कर दिया गया। यह सरकार का तानाशाही-भरा आचरण था जो हर विरोधी विचारधारा को दबा देना चाहता था। रामस्वरूप वर्मा के प्रोत्साहन पर ललई सिंह ने डाॅ. आंबेडकर की पुस्तकों की जब्ती के आदेश के विरुद्ध अदालत में मुकदमा दायर कर दिया। परिणाम अनुकूल ही निकला। न्यायमूर्ति ए. कीर्ति ने 19 जनवरी 1971 को ‘सच्ची रामायण’ पर जब्ती के आदेश को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला मानते हुए रद्द कर दिया। फैसले में उन्होंने सरकार को निर्देश दिया था कि वह जब्त की गई पुस्तक को लौटाकर प्रकाशक को 300 रुपए का हर्जाना दे। सरकार भी ललई सिंह के पीछे पड़ी थी। उसने ललई सिंह की पुस्तक ‘आर्यों का नैतिक पोल प्रकाश’ के विरुद्ध मुकदमा दायर कर दिया। यह मुकदमा उनकी मृत्युपर्यंत अदालत में बना रहा।

ललई सिंह इन दबावों के आगे झुकने वाले न थे। बल्कि इन दबावों से उन्हें और अधिक लिखने की प्रेरणा मिलती थी। इस बीच उन्होंने पांच नाटकों की रचना की थी, उनमें अंगुलीमाल, शंबूक वध, संत माया बलिदान, एकलव्य शामिल थे। संत माया बलिदान का प्रथम लेखन स्वामी अछूतानंद ने किया था। लेकिन वह नाटक अनुपलब्ध था। ललई सिंह ने उसका पुनर्लेखन किया था। वे रामस्वरूप वर्मा और जगदेव प्रसाद सिंह कुशवाहा के साथ वंचना एवं षोषण के षिकार हर व्यक्ति के साथ थे। नाटकों के अलावा उन्होंने ‘शोषितों पर धार्मिक डकैती’, ‘शोषितों पर राजनीतिक डकैती’, तथा ‘सामाजिक विषमता कैसे समाप्त हो?’ जैसी पुस्तकों की रचना भी की। उनकी सभी पुस्तकें ब्राह्मणवादी वर्चस्व के विरुद्ध शंखनाद करने वाली थीं। साधारण प्रकाशक उनकी पुस्तकें छापने को तैयार न थे। इसलिए उन्होंने एक के बाद एक तीन प्रेस खरीदे। पुस्तकें छापने और उन्हें बांटने में उनकी काफी जमा रकम निकल गई। यह सोचकर कि मोटी पुस्तकों को खरीदना आम आदमी के लिए आसान नहीं है, उन्होंने छोटी प्रचारनुमा पुस्तकें लिखने को प्राथमिकता दी। वैसे भी उनका उद्देष्य अपने विचारों को अधिकतम लोगों तक पहुंचाना था। यदि ब्राह्मण बीस से चौबीस पृष्ठों की पोथी को पढ़कर ‘पंडित’ कहला सकता है और लोगों को मूर्ख बना सकता है, तो उतने ही आकार की पुस्तकों से लोगों में चेतना का संचार भी संभव है। इसलिए अपने विचारों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए उन्होंने छोटी पुस्तकों को प्राथमिकता दी।

‘सच्ची रामायण’ पर लगे प्रतिबंधों के विरुद्ध वे उच्च न्यायालय में मुकदमा जीत चुके थे। लेकिन उनके विरोधी षांत नहीं थे। उनके दबाव में सरकार ने उच्चतम न्यायालय में अपील कर दी। वहां मामला वरिष्ठ जजों की पीठ के सम्मुख पहुंचा। कोर्ट ने गंभीरतापूर्वक मामले की सुनवाई की। न्यायालय ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को केंद्र में रखकर निर्णय सुनाया, जो ललई सिंह के पक्ष में था। यही नहीं, ‘जातिवाद का उच्छेद’ तथा ‘सम्मान के लिए धर्म-परिवर्तन करें’ को भी न्यायालय ने प्रतिबंध से मुक्त कर दिया। अदालत के सामने पहुंचे इन मामलों में जीत ललई सिंह की हुई थी। लेकिन जिस तरह प्रतिक्रियावादी षक्तियां उनके पीछे पड़ी थीं, उससे हिंदू धर्म की ओर से उनका मोह-भंग होना स्वाभाविक था। डाॅ. आंबेडकर 1935 में ही हिंदू धर्म छोड़ने की घोषणा कर चुके थे। धर्मांतरण का कार्यक्रम बना 14 अक्टूबर, 1956 को। ललई सिंह अपने प्रेरणा पुरुष के साथ ही धर्मांतरण करना चाहते थे। लेकिन अचानक खून की उल्टी होने के कारण उन्हें अपना फैसला रोकना पड़ा। उन्होंने घोषणा की कि जिन महास्थिविर से डाॅ. आंबेडकर से दीक्षा ली थी, उन्हीं से वे भी दीक्षा ग्रहण करेंगे। इससे मामला थोड़े दिन टला। आखिरकार 21 जुलाई 1967 को उन्होंने महास्थविर चंद्रमणि के मार्गदर्शन में बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण कर ली।

उस समय वे बहुत आह्लादित थे। धर्मांतरण के बाद दिए गए अपने संक्षिप्त भाषण में उन्होंने न केवल स्वयं को बौद्ध माना था, अपितु अपने नाम के साथ जुड़ा जातिसूचक षब्द छोड़ने का ऐलान भी किया था। उनका कहना था, ‘आज से मैं मनुष्य हूं, मानवतावादी हूं, आज से मैं सिर्फ ललई हूं।’ किसी भी प्रकार के जातीय आग्रहों, मान्यताओं से संपूर्ण मुक्ति का ऐलान करते हुए उन्होंने भविष्य में कभी जातिसूचक शब्द या सामंती शब्दावली का प्रयोग न करने का ऐलान किया था। जुझारूपन उन्हें पिता से विरासत में प्राप्त हुआ था। रामस्वरूप वर्मा ने अपने संस्मरण में एक घटना का उल्लेख किया है—

‘वह हमारे चुनाव प्रचार में भूखे-प्यासे एक स्थान से दूसरे स्थान भागते। बोलने में कोई कसर नहीं रखते थे। उनके जैसा निर्भीक भी मैंने दूसरा नहीं देखा। एक बार चुनाव प्रचार से लौटे पैरियर ललई सिंह जी को मेरे साथी ट्रैक्टर ट्राली से लिए जा रहे थे। जैसे ही खटकर गाँव के समीप से ट्रैक्टर निकला, उन पर गोली चला दी गई। संकट का आभास पाते ही वह कुछ झुक गए, गोली कान के पास से निकल गई। लोगों ने गाँव में चलकर रुकने का दबाव डाला। किन्तु वह नहीं माने। निर्भीकता से उन्होंने कहा, ‘चलो जी, यह तो कट्टेबाजी है, मैंने तो तोपों की गड़गड़ाहट में रोटियां सेकीं हैं।’

24 दिसंबर 1973 को पेरियार का निधन हुआ। उनकी स्मृति में बड़ी सभा का आयोजन 30 दिसंबर 1974 को किया गया। उसमें विश्व-भर के बुद्धिजीवी, चिंतक और राजनेता पधारे हुए थे। ललई सिंह भी उसमें पहुंचे। उन्हें बोलने के लिए आमंत्रित किया गया तो ब्राह्मणवाद सहित हिंदू मिथों पर वैसा ही हमला किया जैसा पेरियार किया करते थे। अंतर केवल इतना था कि पेरियार नास्तिक थे और मनुष्य के लिए किसी भी धर्म को अनावश्यक मानते थे। जबकि डाॅ. आंबेडकर के प्रभाव में आकर ललई सिंह बौद्ध धर्म में शामिल हो चुके थे। अपने भाषण में ललई सिंह ने बौद्ध धर्म का ही पक्ष लिया। बौद्ध धर्म को श्रेष्ठतम बताते हुए उन्होंने कहा कि वह तर्क और मनुष्यता का समर्थन करता है। किसी भी प्रकार के आडंबरवाद के लिए बौद्ध धर्म में कोई गुंजाइश नहीं है। हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म की तुलना करते हुए उन्होंने पहले को ‘उधार का धर्म’ और दूसरे को ‘नकद का धर्म’ बताया। अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुए कहा कि बौद्ध धर्म मनुष्य को जन्म-मरण के चक्कर में नहीं उलझाता। उसमें मनुष्य जो भलाई करता है, उसका परिणाम इसी जन्म में स्वयं उसके आगे आता है, यानी—‘जा हाथ देब और वा हाथ लेव।’ जबकि हिंदू धर्म भलाई इस जन्म में करो, उसका फल अगले जन्म में प्राप्त होगा—कहकर लोगों को भरमाता रहता है।

वे स्पष्ट और निर्भीक वक्ता थे। घुमा-फिराकर बात करना उन्हें आता ही नहीं था। एक बार वे आगरा में एक सम्मेलन में हिस्सा लेने पहुंचे थे। मंच पर बौद्ध आचार्यों सहित अनेक विद्वान और कार्यकर्ता मौजूद थे। ललई सिंह के बोलने का नंबर आया तो उन्होंने मंचासीन लोगों पर कटाक्ष करते हुए कहा—‘मेरे पास जो लोग मंच पर बैठे हैं एवं जो लोग सामने बैठे हैं वह सब सहायताइष्ट, वजीफाइष्ट और रिजर्वेशनाइष्ट हैं, आप में से कोई भी बौद्धिष्ट व अम्बेडकराइष्ट नहीं है।’ इसपर कुछ मंचासीन हस्तियों ने आपत्ति की तो उन्होंने उत्तर दिया—‘जब तक आप बौद्धों में रोटी-बेटी का संबंध नहीं बनाएंगे, हिंदू रीति-रिवाजों और त्योहारों को मनाना नहीं छोड़ेंगे—तब तक तक आपका बौद्ध होना सिर्फ ढोंग ही रहेगा।’ उस बैठक के बाद ही उन्हें पेरियार की उपाधि मिली, जो स्वयं ललई सिंह के लिए गर्व की बात थी।

ललई सिंह सच्चे मानवतावादी थे। आस्था से अधिक महत्त्व वे तर्क को देते थे। सच्ची रामायण के प्रकाशन के पीछे उनका उद्देश्य हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को खारिज करना न होकर, मिथों की दुनिया से बाहर निकलकर जीवन-जगत के बारे तर्क संगत ढंग से सोचने और उसके बाद फैसला करने के लिए प्रेरित करना था। वे जाति-भेद और छूआछूत के विरुद्ध आजीवन संघर्षरत रहे। उनका एक ही ध्येय था, समाज को धार्मिक आंडबरों और जातिवाद जैसी रूढ़ियों से मुक्ति दिलाना। जीवन के अंतिम दिनों में वे आंखों की असाध्य बीमारी का शिकार था। अंततः सामाजिक क्रांति का वह अनन्य सेनानी, अनथक योद्धा 7 फरवरी 1993 को संघर्ष की लंबी विरासत छोड़कर हमारे बीच से उठ गया। गांव में लोग उन्हें ‘दीवानजी’ कहा करते थे। उनके संघर्ष के साक्षी रहे लोग आज भी उन्हें उसी मान-सम्मान और गर्व के साथ याद करते हैं।  

ओमप्रकाश कश्यप

1। गणानुत्सवसङ्केतान्वयजयत्पुरुषर्षभः

संदर्भ:

सिंधूकूलाश्रिता ये च ग्रामणेया महाबलाः

शूद्राभीरगणाश्चैव ये चाश्रित्य सरस्वतीम्

वर्तयंति चे ये मत्स्यैर्ये च पर्वतवासिन, सभापर्व, अध्याय 29, 8-9, महाभारत, भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट, संपादन: विष्णु एस। सकथांकर

आस्था और समाज

सामान्य

आस्था का सामान्य अर्थ दैवी शक्ति पर विश्वास से है। आमतौर पर वह सृष्टि या दृश्यमान जगत से परे होती है। उसका उलट नास्तिकता है। लेकिन इस लेख के माध्यम से हमारा मकसद पाठक को आस्तिक और नास्तिक की बहस में उलझाना नहीं है। इस कार्य को हम दार्शनिकों के लिए छोड़ देते हैं। हमारा उद्देश्य आस्था के सामाजिक पक्ष पर विचार करना है। यह देखना है कि जिस आस्था को जीवन के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और कल्याणकारी बताया जाता है, धर्म के हाथों में पड़कर वह मनुष्य को कैसे उसके वास्तविक लक्ष्यों से भटकाने का काम रखती है। जिस जाति-व्यवस्था को हिंदू समाज का कलंक बताया जाता है, उसे सहेजकर आगे बढ़ाने में भी आस्था का योगदान है। यह काम धर्म, समाज और पूर्वजों के प्रति आस्था के नाम पर किया जाता है। इसलिए इस लेख के बहुजन-संदर्भ भी हैं, जो लेख में यथा-स्थान सामने आ जाएंगे।
आस्थावान व्यक्ति आमतौर पर कार्य-कारण संबंधों पर विश्वास रखता है। मूल कारण को वह दृश्यमान जगत की हलचलों से मुक्त और सर्वोपरि मानता है। किंतु वह दृश्यमान जगत से सर्वथा परे हो, यह आवश्यक नहीं है। उसकी व्याप्ति दृश्यमान जगत के भीतर भी हो सकती है। कबीर इसे ‘चकमक में आग’ और वेदांती ‘सर्वखाल्विदं ब्रह्म’ कहते आए हैं। फिर भी आस्था के मूल केंद्र के रूप में मुख्य कार्यकारी शक्ति का दृश्यमान जगत से परे होना अनिवार्य है। इसका आशय यह नहीं है कि आस्था केवल परमानवीय शक्ति के प्रति संभव है। वह जीवित अथवा मृत व्यक्ति, वस्तु, विचार आदि किसी के भी प्रति हो सकती है। उस अवस्था में वह कहीं न कहीं स्थितियों अथवा व्यक्तियों का परामानवीकरण करती है। मानव-प्रवृत्ति के अनुसार आस्था के कई रूप हो सकते हैं। वह सामूहिक भी हो सकती है और व्यक्तिगत भी। प्रत्येक अवस्था में उसके गुण-दोष, हानि-लाभ करीब-करीब एक जैसे होते हैं।
नास्तिक के लिए दृश्यमान जगत कार्य भी है, कारण भी। वह प्रकृति को स्वतंत्र और सक्षम मानता है। वही जड़-चेतन सबकी जीवनदाता है। सृष्टि में पल-छिन घट रहीं असंख्य घटनाओं की भांति मानव-जीवन भी एक प्राकृतिक घटना है। इसलिए नास्तिक दृश्यमान जगत से इतर किसी पराशक्ति या कारक सत्ता पर विश्वास नहीं करता। वह मानता है कि जन्म से पहले मनुष्य प्रकृति का हिस्सा होता है। मृत्यु के बाद पुनः उसी में समा जाता है। अपने दार्शनिक मत को लेकर वह तर्क करने के लिए सदैव तैयार होता है। उसके तर्क अपेक्षाकृत वैज्ञानिक आधार लिए होते हैं। यही कारण है कि अठारवीं-उनीसवीं शताब्दी के बौद्धिक पुनर्जागरण के पश्चात जितने भी नए दर्शन सामने आए हैं, सभी के केंद्र में मनुष्य है। उनमें प्रत्ययवादी दर्शनों की संख्या, ऐसे दर्शनों की संख्या जो मानव जीवन की समस्याओं और उसकी जिज्ञासाओं का समाधान सृष्टि से परे, किसी काल्पनिक दुनिया में खोजने की कोशिश करते हैं—आनुपातिक रूप से बहुत कम, लगभग नगण्य है। इस कारण उनमें आस्था के लिए भी बहुत कम गुंजाइश है।
आस्तिक व्यक्ति सृष्टि की कारक सत्ता के रूप में अपने विश्वास या आस्था के अनुरूप केंद्रीय शक्ति की कल्पना करते हैं। जो स्वयं वैसी कल्पना नहीं कर सकते वे दूसरों द्वारा कल्पित कारक सत्ता पर विश्वास करने लगते हैं। जनसाधारण के लिए रोजमर्रा के जीवन की चुनौतियां ही इतनी विकट होती हैं, कि वह उनसे मुक्त होकर सोच ही नहीं पाता, इसलिए दूसरों द्वारा कल्पित या बताई गई कारक सत्ता पर विश्वास रखने वाले लोग ही ज्यादा होते हैं। हिंदू धर्म में जनसाधारण को थोपी गई आस्था के साथ-साथ, दूसरों के आदेश या सलाह के अनुसार काम करने का संस्कार जाति प्रथा से प्राप्त होता है—जो ब्राह्मण को शिखर पर रखकर, उसकी योग्यता के बारे में सवाल किए बगैर ही, समाज के नेतृत्व का अधिकार सौंप देती है। जनसाधारण की यह कमजोरी, जो प्रायः उसकी समाजार्थिक विवशता की देन होती है—समाज में धर्म के लिए जगह बनाकर जातिप्रथा को मजबूती प्रदान करती है। इस कमजोरी(या विवशता) का लाभ वे लोग उठाते हैं, जो कारक सत्ता का जानकार होने का दावा करते हैं। इसका शिकार वे लोग ज्यादा होते हैं, जो समाजार्थिक स्तर पर पिछड़े तथा अपनी आवश्यकताओं के लिए दूसरों पर आश्रित होते हैं। प्रकारांतर में आस्था, विशेषरूप से धार्मिक प्रतीकों से जुड़ी आस्था, सामाजिक अन्याय का पोषण करती है। असमानता को दैवीय बताकर, विषमता और अन्याय को स्वीकार्य बनाती है।
सृष्टि से परे कही जाने वाली, तथाकथित मूल कारक सत्ता का अस्तित्व कल्पना या अनुमान पर टिका होता है। तर्क के आधार पर उसे सिद्ध कर पाना संभव नहीं होता। इसलिए उसके समर्थक आस्था और विश्वास पर जोर देते हैं; तथा धर्म के नाम पर उसका मानकीकरण कर, उसे किसी भी प्रकार के तर्क और संदेह से परे मान लेते हैं। उनके तर्क बड़े ही कमजोर, ‘मानो तो देव या फिर मिट्टी का लेप’ या ‘मानो तो ईश्वर नहीं तो पत्थर’ जैसे होते हैं। यदि ईश्वर का अस्तित्व केवल व्यक्ति के मानने या न मानने पर टिका है, तो मान लेने की क्या जरूरत है? क्या जरूरत है पत्थर की शिला छाती पर रखकर कसरत का दिखावा करने की? इसके बावजूद अपने विश्वास को पुख्ता दिखाने के लिए वे तर्क का दमदार नाटक करते हैं। लोक-लुभावन किस्से-कहानियां गढ़कर प्रायः अपने समर्थक भी जुटा लेते हैं। परिणामस्वरूप नए संप्रदायों का जन्म होता है। ध्यानपूर्वक देखा जाए तो उनके तर्कों का मूलाधार उनकी आस्था होती है। वे प्रायः परंपरा की दुहाई देते हैं। ईश्वर या परमसत्ता को अनुभूति का विषय बताकर उन्हें तर्कातीत मान लेते हैं। तत्संबंधी अनुभवों का विवरण देने को कहा जाए तो सिवाय कल्पनाओं के, जिनके पीछे उनके पूर्वाग्रहों और संस्कारों का योगदान होता है—से आगे बढ़ ही नहीं पाते। उनके हर संदेह का समाधान परामानवीय होता है। वैसे भी धर्म तथा उससे जुड़ी परंपराएं मानवीय आस्था और विश्वास पर टिकी होती हैं। अपने-अपने आराध्य को बड़ा घोषित करने के लिए वैष्णव, शाक्त अथवा अन्य कोई धर्मावलंबी लंबे-लंबे तर्क दे सकते हैं। परंतु उनके तर्कों का मूलाधार उनकी आस्था ही होगी। उनके हर तर्क के साथ यह विश्वास जुड़ा होगा कि ‘मैं ऐसा सोचता हूं, इसलिए तुम भी इसपर विश्वास करो।’ वे संदेह को अज्ञान और विश्वास को ज्ञान का मूल मानते हैं। दूसरे शब्दों में उनके तर्क भी कल्पना या पूर्वानुमान पर आधारित होते हैं। गीता-रामायण पवित्र ग्रंथ हैं, यह घोषणा वे उन्हें बिना पढ़े ही कर सकते हैं। बिना यह समझे कि आस्था और पवित्रता दोनों मिथ हैं—वे उन्हें यत्नपूर्वक सहेजे रहते हैं।

दर्शनों का विकास मानवीय जिज्ञासा के भरोसे हुए है। मनुष्य अपने आसपास जो भी देखता है, उसको समझना भी चाहता है। इसलिए जिज्ञासा के मूल में अनुभव की महत्ता को नकारा नहीं जा सकता। यही कारण है कि प्रत्येक दर्शन के पीछे कहीं न कहीं भौतिकवादी प्रेरणा अंतनिर्हित होती है। इसे तथ्यों की मामूली पड़ताल से भी समझा जा सकता है। आरंभ में आसपास के जीवन में जो वस्तु जितनी अधिक महत्त्वपूर्ण और अपरिहार्य दिखाई पड़ती थी, उसी को जीवन का आधार मान लिया जाता था। ऋग्वैदिक मनीषी परमेष्ठिन को जब लगा कि बिना पानी के जीवन असंभव है तो उसने जल को सृष्ठि का मूल ठहरा दिया। ऐसे ही प्रकृतिवादी रैक्व ने वायु को सृष्टि का सारतत्व माना। परमेष्ठिन की भांति यूनानी दार्शनिक थेलीज भी जल को मूल तत्व मानता था। हेराक्लाइट्स का विचार था कि मूल-तत्व अग्नि है। हेराक्लाइट्स को दर्शन के क्षेत्र में अनिश्चिततावाद का समर्थक भी माना जाता है। नदी के उद्दाम प्रवाह के बीच उसे यह बोध हुआ था कि कुछ भी स्थिर नहीं है। हम एक ही नदी में दो बार स्नान नहीं कर सकते। विराट, पल-छिन परिवर्तनशील प्रकृति के सीधे सान्निध्य में रहने वाले मनुष्य के लिए इस प्रकार का बोध अस्वाभाविक नहीं था। बावजूद इसके देश-विदेश के दर्शनों में संदेहवाद खास जगह नहीं बना सका। मगर आज जब हम क्वांटम यांत्रिकी को पढ़ते हैं तो पता चलता है कि प्रकृति के सातत्य के पीछे संदेह और अनिश्चितता का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। उसे नकारा नहीं जा सकता। यह दर्शाता है कि ब्रह्मांड जितना दृश्यमान और ज्ञेय है, उतना अदृश्य और अज्ञेय भी है। कोरी आस्था के भरोसे उसे जानना संभव नहीं है। उसकी ओर से आंखें अवश्य मूंदी जा सकती हैं, जो मनुष्य के सहज जिज्ञासा-भाव के प्रतिकूल है। इसीलिए ब्रह्मांड की व्याख्या के नाम पर आस्थावादी जहां तरह-तरह की कहानियां गढ़कर मन बहलाते रहते हैं, वहीं अनास्थावादी ज्ञान-विज्ञान के रास्ते संदेहों के समाधान पर जोर देता है। ‘संदेह हमें जांच-पड़ताल तक ले जाते हैं। जांच-पड़ताल सत्य तक तक पहुंचने में हमारी मदद करती है’—मध्यकालीन विचारक पीटर अबेलार्ड का यह कथन उसका मार्गदर्शन करता है। उसके फलस्वरूप नए ज्ञान के रास्ते प्रशस्त होते हैं। समाज में नएपन का सम्मान बढ़ता है। यही कारण है कि आस्थावादी की अपेक्षा अनास्थावादी के तर्क ज्यादा ठोस और वस्तुनिष्ठ हो सकते हैं।
दुनिया में जितने भी धर्म-दर्शन हैं, कहीं न कहीं सब प्रकृतिवाद से पोषित और प्रभावित हैं। लगभग सभी सभ्यताओं में सूर्य को देवता माना गया है। चीन, इंडोनेशिया, जापान में सूर्य को सृष्टि का जन्मदाता मानने से जुड़ी अनेक कहानियां हैं। यूनानी पुराकथाओं का पात्र प्रोमेथियस सूर्य को सर्वेसर्वा मानता था। रामायण में आदिवासी समाज के संपाति का उल्लेख आया है। हम उसे भारतीय परंपरा के आदि-जिज्ञासुओं में से एक मान सकते हैं। संपाति को धूप-ताप उगलता सूर्य ललचाता था। वह उसे जानना-समझना चाहता था। इसलिए एक वैज्ञानिक की भांति, अंजाम की परवाह किए बगैर वह सूर्य की ओर बढ़ा था। सूर्य के करीब पहुंचने से पहले ही उसके पंख झुलस गए। संभव है भारत के लंबे सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास में संपाति जैसा कोई प्राणी रहा ही न हो। रामायण के दूसरे मिथों की भांति वह भी एक मिथ हो। इसके बावजूद संपाति की कथा का महत्त्व है। यह सूर्य के तेज पीछे निहित कारण को समझने की आदिम छटपटाहट की परिचायक है।
प्राचीन मिस्र का इख्नातून भी सूर्य से प्रभावित था। उसका विश्वास था कि सूर्य की अंतहीन ऊर्जा के पीछे कोई न कोई कारक सत्ता है। वही सूर्य के तेज की जन्मदाता है। इख्नातून ने सूर्य की अपेक्षा उसके पीछे अंतनिर्हित काल्पनिक शक्ति को पूजने पर जोर दिया जाता है। इसलिए कुछ विद्वान इख्नातून को धर्म के जन्मदाता के रूप में भी देखते हैं। कदाचित सूर्य से ही देवताओं के आकाश में स्थित होने की प्रेरणा जगी थी, लेकिन जब हम इख्नातून के उल्लेखों को देखते हैं, तो पाते हैं कि सूर्य की कारक सत्ता को पूजने के नाम पर असल में वह सूर्य की ही पूजा करता है। इख्नातून की सूर्य की प्रशस्ति में रची गई कविता प्राचीन साहित्य की धरोहर हैं—
डूब जाता है जब तू पश्चिमी आसमान के पीछे
मृत्यु समान कालिमा घेर लेती है, इस धरा को
सिंह निकल पड़ते हैं अपनी मांदों से
सांप बिलों से निकलकर डंसने लगते हैं
अंधकार का राज पसर जाता है,
सन्नाटा अपने पंजों में जकड़ लेता है धरती को

क्षितिज से निकलते ही दमक उठती है, धरा
अंधेरे का हो जाता है लोप
किरनें पसरते देख मुस्करा उठता है इंसान
जाग उठता है, अपने पैरों पर खड़ा हो जाता है,
तू ही उसे जगाता है
….. …..

तू ही मां के गर्भ में शिशु को सिरजता है
आदमी में आदमी का बीज रखता है
गर्भस्थ शिशु रोये नहीं, इसलिए तू उसे प्यार से दुलराता है
धाय है तू कोख के बालक के लिए
तू ही उसे सिरजता, प्राण फूंकता है उसमें
गिरता है जब वह मां की कोख से धरा पर
उसके कंठ में आवाज भरता है तू ही।

भौतिकवादियों ने पृथ्वी जल, वायु और आकाश इन चार तत्वों को जीवन का स्रोत माना। याज्ञवल्क्य जैसे प्रत्ययवादियों ने इसमें आकाश को भी जोड़ दिया। फिर भी मौटे तौर पर देखा जाए तो अनीश्वरवादी भौतिकवादी दर्शनों तथा आस्तिक दर्शनों में बहुत अंतर नहीं है। भौतिकवादी प्राकृतिक शक्तियों से सीधे संबोधित होते हैं। उनके लिए प्रकृति अपने सहज निरपेक्ष भाव से क्रियाशील रहती है। वह आकर्षक और आत्मीय है तो वीभत्स और डरावनी भी है। उनके अनुसार अच्छा समाज केवल नैतिकता के भरोसे गढ़ा जा सकता है। बैंथम जैसे विचारक विधि शासित राज्य की अनुशंसा करते हैं। ऐसा समाज जो ‘अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख’ के सिद्धांत पर गढ़ा गया हो। जिसमें मनुष्य अपने साथ-साथ दूसरों के सुख का भी ख्याल रखे। दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करे, जैसा वह उनसे अपने प्रति चाहता है।
आस्तिक के लिए धर्म ही नैतिकता है और उसके द्वारा कल्पित देवता नैतिकता का स्रोत। जीवन की अनिवार्यता होने के कारण प्रकृति को नकार पाना उनके लिए भी संभव नहीं है। अंतर केवल इतना है कि वे प्राकृतिक शक्तियों पर सीधे विश्वास न करके, उनके पीछे की कारक सत्ता पर, जो किसी के लिए भी अनदेखी-अजानी है और कल्पना से परे जिसका कोई महत्त्व नहीं है—को ज्यादा महत्त्व देते हैं। चूंकि उन काल्पनिक शक्तियों को सीधे-सीधे नहीं समझा जा सकता, इसलिए वहां आस्था को अपरिहार्य मान लिया जाता है। ठीक ऐसे ही जैसे इख्नातून ने करीब 3300 वर्ष पहले किया था। हर आस्तिक की स्थिति इख्नातून जैसी होती है, जो सीधे नजर आ रही प्राकृतिक सत्ता के बजाय उसकी कारक सत्ता के रूप में काल्पनिक देवता को ले आता है। परिणामस्वरूप अग्नि का स्वामी अग्निदेव को मान लिया जाता है, वायु का मरुत। हिंदू धर्म में चराचर जगत में नजर आने वाली प्रत्येक वस्तु के लिए एक देवता कल्पित है। नास्तिक गंगा को महज नदी मानता है। आस्तिक गंगा में स्नान करता है, लेकिन पूजता किसी काल्पनिक ‘देवी’ को है। उसके आस्थालोक की नदी, कभी प्रदूषित नहीं होती। परंपरा और संस्कृति के नाम पर वह उसमें रोज अपशिष्ट बहाता है और धार्मिक होने का ढोंग पाले रहता है।
नास्तिक के लिए भौतिक पदार्थों की सत्ता स्वतः प्रामाणित होती है। उसके लिए जो दिखता है, वही सत्य है। आस्तिक दृश्यमान भौतिक जगत को माया कहता है। सांसारिक सुख उसे छलावा और भरमाने वाले लगते हैं। उनके प्रति अनुराग भव-प्रपंच में फंसना है। यह धारणा परिवेश के प्रति अलगाव को जन्म देती है। उससे मुक्ति के लिए वह अधिदैविक शक्तियों को खुश करने की कोशिश में लगा रहता है। इससे उसके श्रम और विवेक का बड़ा हिस्सा अनुत्पादक कार्यों में खर्च होने लगता है। नास्तिक के लिए मानवजीवन का उद्देश्य अपने और समाज के सुख के स्तर में वृद्धि करना है। इसके लिए समाज के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण आवष्यक है। वह आस्तिक की भांति माया कहकर संसार के अस्तित्व को नकारता नहीं है। उन्हें उसी रूप में स्वीकारता है, जैसे वे दिखाई पड़ते हैं। नास्तिक जल को जीवनोपयोगी तत्व मानता है। आस्तिक के लिए जल वरुणदेव की अनुकंपा है। उनकी कृपा बनी रहे, तो जल का अभाव न होगा। यह धारणा अनेक पर्यावरणीय समस्याओं को जन्म देती है। इस आस्था के साथ कि देवताओं की अनुकंपा जब तक है, सब मंगल होगा, आस्थावादी पर्यावरण संबंधी समस्याओं से मुंह फेरे रहते हैं। चूकि धर्म का राजनीतिक पक्ष भी है, इसलिए लोगों की नाराजगी से बचने के लिए सरकार भी धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करने से बचती है।
मनुष्य की पहुंच से परे, काल्पनिक सत्ता को सर्वेसर्वा मानते ही मनुष्य का जीवन के प्रति पूरा नजरिया बदल जाता है। वहां मनुष्य और उसके कर्तव्य के बीच तीसरी सत्ता के रूप में ईश्वर आ जाता है, मानव-समाज से ज्यादा देवता महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। अपने आसपास के लोगों को सुखी एवं संतुष्ट देखने के बजाए मनुष्य काल्पनिक शक्तियों को खुश करने में जुट जाता है। सामाजिक संबंध गौण होने लगते हैं। काल्पनिक सुखों की चाहत में वह छायाओं के पीछे भागने लगता है। संसार को माया समझकर, छाया के पीछे भागने की प्रवृत्ति मनुष्य को परिवेश के प्रति उदासीन और स्वार्थी बनाती है। रोज-रोज धर्म-कर्म, पूजा-पाठ में लीन रहने वाला आस्तिक शनैः-शनैः यह विश्वास करने लगता है कि उसपर उसके आराध्य की विशेष कृपा है। इस कारण वह बाकी लोगों से उत्तम और आराध्य के करीब है। धीरे-धीरे यह विशिष्टताबोध उसके व्यवहार का हिस्सा बन जाता है। धार्मिक आख्यानों में निष्कर्ष केवल थोपे जाते हैं। विपरीत विचारधारा से संवाद की उनमें कोई कोशिश नहीं होती, इसलिए खास किस्म की अलोकतांत्रिक जड़ता उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बनती चली जाती है। यदि जातिगत पूर्वाग्रह भी इसमें मिल जाएं तो स्थिति करेले और नीमचढ़े जैसी हो जाती है। उसके प्रभाव में समाज कुछ लोगों की मर्जी से चलने लगता है। बहुसंख्यक वर्ग के विवेक, इच्छाओं और सपनों की उपेक्षा होने लगती है। परिणामस्वरूप समाज में ऊंच-नीच का अनुपात बढ़ता ही जाता है। कालांतर में वह अनेक अंतर्द्वंद्वों को जन्म देता है। समाज में नए ज्ञान को आत्मसात करने की प्रवृत्ति कम होने से रूढ़ियों और आडंबरों में वृद्धि होने लगती है। सामाजिक विकास थम-सा जाता है।

इसका आशय यह नहीं है कि आस्था सदैव नकारात्मक होती है। जीवन में उसकी कोई भूमिका नहीं है। चूंकि मानव जीवन की सीमा है, इस कारण उसकी बुद्धि की भी सीमा है। प्रकारांतर में वही सीमा समाज की भी है। मनुष्य और समाज दोनों स्थायित्व चाहते हैं, इसके लिए कुछ मर्यादाओं का होना आवश्यक है। इसलिए प्रत्येक समाज अपने स्थायित्व और पहचान के लिए कुछ मूल्यों का निर्धारण करता है। चाहता है कि उसकी प्रत्येक इकाई उनमें विश्वास रखे, उनका पालन करे। समाज की सुख-शांति के लिए उन मूल्यों के प्रति सदस्य इकाइयों का विश्वास आवश्यक है। लेकिन अपनी आस्था को सर्वोपरि मान, दूसरे के विश्वासों का निरादर करना, सांप्रदायिक अस्थिरता पैदा करता है। इसलिए आवश्यक है कि मनुष्य अपनी आस्था के साथ दूसरों की आस्था का भी सम्मान करे। पारंपरिक धर्म इसकी इजाजत नहीं देते। क्योंकि लंबे समय में उनके बीच ऐसा वर्ग पनप चुका होता है जो यथास्थिति बनाए रखने में ही अपना स्वार्थ देखता है। हिंदू वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार यह ब्राह्मण है, जो वर्गीय स्वार्थों की सुरक्षा के लिए जातिवाद का समर्थन और पोषण करता है। वह धार्मिक आस्था और तत्संबंधी कर्मकांडों को किसी भी प्रकार के संदेह और संशोधन से परे मान लेता है। इस तथ्य को नजरंदाज कर देता है कि आस्था और विश्वास किसी वस्तु, विचार, प्रतीक, लौकिक या तथाकथित पारलौकिक शक्ति के प्रति संवेदनमात्र होते हैं, जो वस्तु-विशेष के प्रति कौतूहल तो जगा सकते हैं, स्वयं ज्ञान नहीं होते।
उदाहरण के लिए हिंदू धर्म में मूर्तियों के प्रति आस्था(संवेदन) को ज्ञान मान लिया जाता है। प्रकट में कहा जाता है कि मूर्ति देवता न होकर उसका प्रतीक मात्र होती है। मनुष्य अपने विवेक, कल्पनाशक्ति और अनुभवजन्य बोध से उस मूर्ति के पीछे निहित सत्य, जिसके प्रतीक स्वरूप उसे गढ़ा गया है—को प्राप्त कर सकता है। लेकिन यह केवल सैंद्धांतिक रह जाता है। व्यवहार में मूर्ति ही सबकुछ मान ली जाती है। पुजारी के लिए मूर्ति और मंदिर उसकी विशिष्ट सामाजिक प्रस्थिति, मान-सम्मान, प्रतिष्ठा के साथ-साथ आजीविका का आधार भी होते हैं। वह मूर्ति को नहलाता, धुलाता, भोग लगाता और समय-समय पर वे सभी काम करता है, जिन्हें वह तथाकथित देवता के नाम पर करना चाहता है। मूर्ति के अवमानना को वह देवता और प्रकारांतर में धर्म का अपमान समझता हैं। आडंबरों के चलते मूर्ति केवल प्रतीक नहीं रह पाती। चूंकि समाज में धर्म-शास्त्रों की व्याख्या उनके पठन-पाठन का अधिकार स्वयं ब्राह्मण ने कब्जाया हुआ है और मानव जीवन में जन्म से लेकर मृत्यु तक, कदम-कदम पर उसकी भूमिका है, इसलिए पुजारी के कथन और उसके सभी कर्मकांडों पर जनसाधारण आसानी से विश्वास कर लेता है।
आस्था के अतिरेक में, मूर्ति को देवता मान लेने से आस्था के प्रभाव और भी विकृत हो जाते हैं। विशेषरूप से उन लोगों के लिए जो विभिन्न प्रकार के समाजार्थिक शोषण का शिकार रहे हैं। इसका असर जातिवाद से प्रभावित वर्गों में देख सकते हैं। उनीसवीं और बीसवीं शताब्दी में दलितों और पिछड़ों में जागृति लाने में महामना ज्योतिराव फुले, डा. आंबेडकर, ई. वी. रामास्वामी नायकर आदि ने अनथक संघर्ष किया था। जातिवाद से मुक्ति के लिए इन सभी ने तंत्र-मंत्र, मूर्ति-पूजा जैसे ब्राह्मणवादी औजारों से मुक्ति को आवश्यक माना था। वे चाहते थे कि दलित और पिछड़े अधिकाधिक शिक्षा ग्रहण करें। ब्राह्मणवाद के चंगुल से बाहर आने के लिए उसके द्वारा थोपे गए सभी कर्मकांडों का बहिष्कार करें। शताब्दियों से ब्राह्मणवाद के दमन के चलते उनसे अनुकूलित हो चुकी चेतना का ही असर है कि दलितों और पिछड़ों में जातिभेद आज भी बरकार है। ब्राह्मणवाद से मुक्त दिखने के लिए वे फुले और आंबेडकर की मूर्तियां बस्तियों में लगा लेते हैं, और बजाय इन महापुरुषों के लिखे हुए को पढ़ने के, उनकी मूर्तियों की वैसी ही पूजा-अभ्र्यना करते हैं, जैसा पुजारी मंदिर में करता है। ब्राजील के शिक्षा शास्त्री पाब्लो फ्रेरा के अनुसार परिवर्तन के आरंभिक चरण में उत्पीड़ित, उत्पीड़क की भूमिका में आने की कोशिश करता है। वह उन्हीं गतिविधियों को दोहराता है, जिन्हें उत्पीड़क अपना वर्चस्व दर्शाने के लिए करता है. इससे परिवर्तन की गति धीमी पड़ने लगती है। प्रतिक्रियावादी शक्तियों को नए सिरे से, नई ताकत और रणनीतियों के साथ उभरने का अवसर मिल जाता है।
आमूल परिवर्तन के लिए आवश्यक है कि समाज विशेष के महापुरुषों की चेतना, उसके प्रत्येक नागरिक की चेतना का अनिवार्य हिस्सा बन जाए। यह कार्य डा. आंबेडकर, फुले, पेरियार जैसे महापुरुषों के प्रति कोरी आस्था द्वारा संभव नहीं है। उसके लिए आवश्यक कि उन्हें आदर्श मानने वाले लोग वैसी ही चेतना से लैस हों। कुछ लोग कह सकते हैं कि महापुरुष रोज-रोज पैदा नहीं होते। हर व्यक्ति उनके जैसा नहीं बन सकता। हम मान लेते हैं। पर इतना तो कोई भी कर सकता है कि दूसरों की नकल करने, उनके कहे अनुसार आचरण करने के बजाए, व्यक्ति अपने विवेक का अधिकाधिक इस्तेमाल करे। दूसरों की बातों में आने के बजाय खुद फैसला करने की आदत डाले। यदि किसी को गीता या रामचरितमानस में कोई आदर्श नजर आता है, तो बजाय पंडा-पुरोहित के बहकावे में आने के स्वयं पढ़कर उनके बारे में अपनी राय बनाए। साथ में वह सब भी पढ़े जो इन धर्मग्रंथों की आलोचना में महापुरुषों ने कहा था।
सारतः, आमूल परिवर्तन की इच्छा रखने वाले बहुजन समाज के लिए, जड़ आस्था चाहे वह खास मूल्यों के प्रति हो या महापुरुषों के प्रति—किसी काम की नहीं है।

ओमप्रकाश कश्यप

क्रांतिकारी कवि और उपदेशक : पोईकाइल योहन्नान

सामान्य

लेख

बीसवीं शताब्दी का दूसरा दशक। पूरा भारतवर्ष आजादी के संघर्ष में डूबा हुआ है। रविवार का दिन। दूर दक्षिण की त्रावणकोर रियासत में खपरैली छत की पुरानी इमारत प्रार्थना-संगीत से गूंज रही है। श्रद्धालु सफेद वस्त्र धारण किए, कच्चे फर्श पर विराजमान हैं। उनके आगे थोड़ा खाली स्थान है। उसके बाद चार फुट ऊंचा मिट्टी का बना चबूतरा। चबूतरे के बीचों-बीच दीपक झिलमिला रहा है। एक अधेड़, अधनंगा आदमी उसमें तेल डालने के लिए बार-बार उठकर आता है। दीपक के पीछे कोई दैवी प्रतीक है। उसका चेहरा एकदम खाली है। सिर के पीछे पीला प्रकाश फैला हुआ है। श्रद्धालुओं के आगे कुछ कुर्सियां और एक मेज हैं। एक बुजुर्ग आदमी कुर्सी के सहारे खड़ा होकर प्रवचन कर रहा है। सम्मोहित श्रद्धालु उसकी उपदेश गंगा में स्नान कर रहे हैं। बीच-बीच में वह अपनी आंखों में उतर आई नमी को साफ करता है। उपदेशक सीरियाई मारथोमा चर्च से छिटककर आया है। बाईबिल में इसलिए विश्वास नहीं करता, क्योंकि उसमें उसके लोगों और पूर्वजों के बारे में एक भी शब्द नहीं है। प्रवचन के बीच-बीच में वह उपस्थित श्रद्धालुओं को अपने दास पूर्वजों के बारे में बताता है। उनके साथ हुए जातीय और सामंती उत्पीड़न का जिक्र करता है। श्रद्धालुओं को उपदेशक की एक-एक बात पर विश्वास है। इसलिए कि जो वह बता रहा है, वे स्वयं उन्हीं हालात से गुजर रहे हैं। दास लोग हैं, उन्हें न खुलकर बोलने की आजादी है, न मनभाता खाने और पहनने की। सार्वजनिक स्थानों पर वे आ-जा नहीं सकते। अपने मालिक से बात करनी हो तो कम से कम पचास कदम की दूरी रखनी पड़ती है। कहीं देह की  छाया भी उनपर पड़ न जाए। ऊपर से बात-बात पर मार देने या बेच आने की धमकी। उपदेशक उन्हें उनके जीवन की त्रासदियों के साथ-साथ सपनों से भी परचाता है। प्रवचन में लीन श्रद्धालु कभी भाव-विभोर होकर झूमने लगते हैं, तो कभी उनकी आंखें छलछला जाती हैं। सारा देश अंग्रेजों से देश की आजादी चाहता है। वे लोग जातीय उत्पीड़न और अपने दासत्व से मुक्ति के लिए प्रार्थनारत हैं। मुक्ति-संदेश जब-जब आंखों में आजादी का बिंब बनकर उभरता है, झुर्राए चेहरों पर खुशी झिलमिलाने लगती है।

भारतीय इतिहास की कोई भी पुस्तक उठाकर देख लीजिए। इस तरह की घटनाओं का उल्लेख नहीं मिलेगा। क्योंकि इतिहासकारों को राजा-महाराजाओं की जय-पराजय, उनके वैभव-विलास और पर्दे के पीछे चलने वाले षड्यंत्रों को लिखने में मजा आता है। आम आदमी की समस्याएं, उसके सुख-दुख उनकी चिंता का विषय नहीं होते। ‘फलां राजा ने नहर बनवाई’─वे बस इतना लिखते हैं। नहर का पानी हर जरूरतमंद तक पहुंचा या नहीं, यह उनकी चिंता का विषय नहीं होता। उनीसवीं और बीसवीं शताब्दी को वे भारतीय समाज के नवजागरण का नाम देते हैं। लेकिन समाज सुधारकों का नाम पूछा जाए तो अधिकांश की सुई राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, दयानंद सरस्वती और विवेकानंद तक आते-आते अटक जाएगी। कुछ और खंगाला जाए तो संभव है, केशवचंद सेन, महादेव गोविंद रानाडे का नाम भी निकलकर सामने आ जाए। किसी पिछड़े या दलित समुदाय के समाज सुधारक का नाम जानने की कोशिश कीजिए? सवाल सुनते ही लोग कन्नी काटने लगेंगे। संभव है कुछ हंसने भी लग जाएं? कहें कि जो अपना भला नहीं कर सकते वे समाज का खाक सुधार करेंगे। इस तरह की टिप्पणी करने वालों पर आपको चाहे जितना गुस्सा आए, पर असल में उनका ज्यादा दोष नहीं है। शताब्दियों से उन्हें यही सिखाया गया है। यही उनकी मानस-रचना है। भारत का इतिहास, उसके धर्म-शास्त्र, नीति-शास्त्र सब समाज के खास लोगों द्वारा खास लोगों के लिए गढे़ गए हैं। इस तरह गढे़ गए हैं कि उनमें जो विरोधाभास और बड़बोलापन है, वह नजर ही नहीं आता। महाभारत के लिए नायक अवतारी कृष्ण हैं। परंतु धर्मराज का दर्जा पांडव-ज्येष्ठ को प्राप्त है। ये ‘धर्मराज’ एक बार 88000 ब्राह्मण स्नातकों को, प्रति स्नातक 30 के हिसाब से कुल 26,40,000 दासियां दान कर देते हैं(सभापर्व, शिशुपाल बध, भाग 48)। इतनी सारी दासियां कहां से जुटाई गईं? ब्राह्मण स्नातक इतनी दासियों का क्या करेंगे? ये सवाल दिमाग में आते ही नहीं हैं। क्योंकि सवाल करना उन धर्मग्रंथों के अनुसार पाप की श्रेणी में आता है।

यहां जो धर्म का लाभार्थी है, वह जाति का लाभार्थी भी है। जो इन दोनों का जितना बड़ा लाभार्थी है, समाज में उसका स्थान उतना ही ऊंचा है। जो इनका लाभार्थी नहीं है, उससे इस व्यवस्था में हस्तक्षेप करने का अधिकार ही छीना हुआ है। जातिवाद की पैठ इतनी गहरी है कि ईसाई और इस्लाम जैसे धर्म जिनकी मूल संरचना में जाति के लिए कोई स्थान नहीं था, भारत आकर वे भी जाति के प्रभाव से मुक्त न रह सके। हिंदू धर्म से राहत की उम्मीद लेकर दूसरे धर्मों में गए लोग, अपने साथ जाति ले जाना नहीं भूले─

एक के बाद एक नए-नए चर्च बनते गए

फिर भी जाति-भेद गया नहीं….

एक चर्च स्वामी की खातिर है

एक चर्च दास के लिए

एक चर्च पुलाया के लिए है

एक परायास के लिए

एक चर्च ‘मुराक्कन’

मछुआरे के लिए है।1

इस प्रवृत्ति का विरोध न हुआ हो, ऐसा भी नहीं है। उनीसवीं शताब्दी में दलितों और पिछड़ों को लेकर कई सुधारवादी आंदोलन समानांतर रूप से चले थे, जिनका नेतृत्व उन समाजों के महापुरुषों के हाथों में था। उनकी पहल करने वाले थे, ज्योतिराव फुले। महाराष्ट्र में ‘सत्यशोधक मंडल’ की स्थापना द्वारा उन्होंने सीधे ब्राह्मणवाद को चुनौती दी थी। पंजाब में जाति-भेद और ब्राह्मणवाद विरोधी चेतना ‘आदिधर्म आंदोलन’, मध्यप्रदेश में ‘आदि हिंदू आंदोलन’ और बंगाल में ‘नामशूद्र आंदोलन’ के रूप में विद्यमान थी। दक्षिण भारत भी अप्रभावित नहीं था। बल्कि कुछ मायनों में तो वह शेष भारत से भी आगे था। तमिलनाडु में पेरियार के नेतृत्व में ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के साथ वैकल्पिक राजनीति की मांग करते हुए धर्म तथा जाति से जुड़े सभी प्राचीन संस्थानों को चुनौती दे रहे थे। केरल में श्री नारायण गुरु, अय्यंकालि, तथा पोईकाइल योहन्नान के नेतृत्व में क्रमशः ‘श्री नारायण धर्म परिपालन योगम’, ‘साधु जन परिपालन संघम’ तथा ‘प्रत्यक्ष रक्षा दैव सभा’ ने भी शताब्दियों से व्याप्त जातीय असमानता के विरुद्ध लोगों को जागरूक करने का काम किया था। आधुनिक भारत के निर्माण में इन आंदोलनों की बड़ी भूमिका है। 

ऊपर जिस उपदेशक का जिक्र हुआ है, वे थे─पोईकाइल योहन्नान। जिस सभा का वर्णन किया गया है, वह थी पोईकाइल योहन्नान द्वारा स्थापित ‘प्रत्यक्ष रक्षा देव सभा’ की साप्ताहिक धर्म-गोष्ठी। आगे बढ़ने से पहले उचित होगा कि सरसरी निगाह केरल के तत्कालीन हालात पर भी डाल ली जाए। 19वीं शताब्दी का केरल तीन बड़े राज्यों─कोचीन, त्रावणकोर और मालाबार में बंटा हुआ था। ईसाई मिशनरियां वहां सक्रिय थीं। समाज मुख्यतः दो हिस्सों में विभाजित था। पहले में विशेषाधिकार प्राप्त जातियां थीं। नंबूदरी ब्राह्मण, जो स्थानीय ब्राह्मण थे। उनका दर्जा समाज में सबसे ऊंचा था। दूसरे स्थान पर बाहर से आए ब्राह्मण और क्षत्रिय थे। नैय्यर मुख्यतः जमींदार थे। मंदिरों की देखरेख का काम भी उन्हीं के अधीन था। सरकारी नौकरियों पर भी उनका अधिकार था। इनके अलावा चेट्यिार, मुस्लिम और ईसाई भी समाज के उच्च वर्गों में आते थे। निचले वर्गों में इझ़वा, पुलाया, परायास, चेनान जैसी जातियां शामिल थीं। इझ़वा पिछड़ी जाति में गिने जाते थे। उनकी कुल जनसंख्या लगभग 15 प्रतिशत थी।  इझ़वाओं की आर्थिक स्थिति दलितों से कुछ बेहतर थी; लेकिन सामाजिक स्तर पर वे भी भेदभाव का शिकार थे। पुलाया(पुलायार), परायास, चेन्नान जातियों  की स्थिति दास के समान थी। छूआछूत कायम थी। इझ़वा ब्राह्मण से 30 फुट दूर रखकर बात कर सकता था, जबकि नैय्यर के अधिकाधिक 12 फुट निकट जा सकता था। वहीं पुलाया को ब्राह्मण से 90 फुट तथा नैय्यर से 60 दूरी रखनी पड़ती थी। सब कुछ ब्राह्मणवादी व्यवस्था के अनुसार था।

दास प्रथा का चलन था। चांगनचेरी बड़ा बाजार था, जहां दासों की बड़े पैमाने पर खरीद-फरोख्त होती थी। अन्य बाजारों में तिरुअंकारा, अलेप्पी, कुनोल, अतिंग्गल, कायमकुलम जैसे बाजार थे। उनमें माता-पिता या सगे-संबंधी दास लड़के-लड़कियों को बिक्री के लिए लाते थे। एक दास युवक का मूल्य 6 से 18 रुपयों के बीच हो सकता था। डॉ। जेनफी के अनुसार अकेले त्रावणकोर में खरीदे गए दासों की संख्या 130000 थी। ईसाई मिशनरियां उनके बीच तेजी से पैठ बना रही थीं। धर्मांतरित पुलाया, परायास को ईसाई धर्म में स्वीकृति तो मिल जाती थी। परंतु उनकी सामाजिक स्थिति पर कोई अंतर नहीं पड़ता था। इझ़वा चूंकि समाज में बीच की हैसियत रखते थे, इसलिए तत्कालीन जातिप्रथा से उन्हें बहुत ज्यादा शिकायत नहीं थी। श्री नारायण गुरु ने इझ़वाओं को सड़क पर चलने और मंदिर प्रवेश की आजादी के लिए सफल आंदोलन किया था। जिसके लिए उन्हें पेरियार का समर्थन भी प्राप्त हुआ था, लेकिन पुलाया आंदोलन के नेता अय्यंकालि का, जिन्होंने दलित जातियों के आत्मसम्मान के लिए सवर्णों से सीधी लड़ाई लड़ी थी, श्रीनारायण गुरु ने कोई साथ नहीं दिया था। इससे तत्कालीन केरल की सामाजिक स्थिति को समझा जा सकता है। नारायण गुरु का नारा था─‘एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर।’ पेरियार और अय्यंकालि के सपने को उन आंदोलनों के साक्षी और सहभागी रहे, कवि सहोदरन अय्यपन(1889-1968) की कविता से समझा जा सकता है─

‘कोई धर्म नहीं, कोई जाति नहीं,

न कोई ईश्वर

केवल सदाचार, सदाचार….सदाचार

सबसे अच्छी तरह से,

और भी अच्छी तरह से’

पोईकाइल योहन्नान का जन्म 17 फरवरी 1879 को तत्कालीन त्रावणकोर राज्य तथा आधुनिक केरल के  पथानमथिट्टा जिले के इराबीपेरूर नामक गांव में हुआ था। पिता थे कंडन, मां केचि। माता-पिता ने उन्हें कोमारन नाम दिया था। ‘कोमारन’ कुमारन का अपभ्रंश है। जिस जाति, परायास में उनका जन्म हुआ था, समाज में उसकी हैसियत दास के समान थी। उन्हें शुद्ध संस्कृत नाम रखने की अनुमति न थी। हालांकि सरकार 1855 में कानून बनाकर दास प्रथा के उन्मूलन की घोषणा कर चुकी थी। बावजूद इसके दूर-दराज के क्षेत्रों हालात पहले जैसे ही थे। कुमारन के माता-पिता उसी गांव के जमींदार शंकरमंग्गलम के यहां दास थे। उस जाति के अधिकांश सदस्यों की हैसियत भू-दास के समान थी। जिस जमीन पर वे खेती करते थे, उसी के साथ उनका जीवन बंधा होता था। जमीन की खरीद-फरोख्त में आमतौर पर उससे जुड़े दास के स्वामी भी बदल जाते थे। ऐसा भी होता था कि दासों की खरीद-फरोख्त में उनका पूरा परिवार बिखर जाता था। नया मालिक केवल माता-पिता की कीमत लगाता, ऐसे में बच्चे अनाथ होकर रह जाते थे। कई बार माता-पिता अलग-अलग मालिकों की सेवा में चले जाते; और बच्चे बेसहारा होकर इधर-उधर भटकते रहते थे─

सुनो-सुनो

मेरे प्यारे भाइयो सुनो

हमारे पूर्वजों ने खूब झेला है

गुलामी में जीना

बिना रुके मालिक की मार सहना

कष्ट और अभावों से गुजरना

पिता एक बाजार में बिके

मां दूसरे में

बच्चे हुए अनाथ2

उन दिनों ईसाई मिशनरियां दलितों के बीच अपनी पैठ बनाने में लगी थीं। कुमारन जब पांच वर्ष का था, तभी उसका ‘बपत्सिमा’ कर दिया था। अपनी जाति के दूसरे किशोरों की भांति कुमारन को भी जमींदार के लिए काम करना पड़ता था। अपने मालिक के लिए वह जानवर चराता। हल जोतते समय यथासंभव मदद करता। इसके अलावा वह काम भी करता जो उसका मालिक उसे सौंपता था। दास के रूप में जन्म लेने के बावजूद कुमारन अपने हमउम्र बच्चों से अलग था। उसका मस्तिष्क सक्रिय था। अपनी सामाजिक स्थिति को देखकर उसके दिमाग में अनेक सवाल कौंधते रहते थे। जातीय ऊंच-नीच और छूआछूत के प्रति वह उद्धिग्न रहता था। घर में तरह-तरह के रीति-रिवाज देख वह चकित रह जाता था। 

परायास जाति का एक रिवाज था। बालक के शुद्धिकरण के नाम पर उसके कान में पानी डालना। कुमारन की मां जब उसका शुद्धिकरण करने चलीं तो उसने मां से सहज भाव से पूछा था─‘एक कान में पानी डालते समय, यदि दूसरे कान से गंदगी प्रवेश करेगी, तब तुम उसे कैसे रोकोगी?’3 भोली स्त्री को कोई जवाब न सूझा। वह बस बेटे के मुंह की ओर देखने लगी। कुमारन की व्यवस्था से विद्रोह, परंपराओं को लेकर सवाल खड़े करने की प्रवृत्ति, उम्र के साथ-साथ बढ़ती गई। उसकी जिज्ञासाएं व्यावहारिक होती थीं। उनका समाधान वह अपने रोजमर्रा के जीवन से ही खोजने की कोशिश करता था। निचली जातियों में तंत्र-मंत्र, झाड़-फूंक और काला जादू को लेकर अनेक भ्रांतियां व्याप्त थीं। एक जादूगर कौड़ियों और घंटी की मदद से काला-जादू दिखाया करता था। एक बार कुमारन ने खेल-खेल में उसकी कौड़ियां और घंटी चुरा लीं। जब वह तांत्रिक काला-जादू दिखाने लगा तो उसने इन चीजों को अपने झोले से गायब पाया। इसपर कुमारन ने उसे चुनौती दी, ‘यदि तुम्हारे काले जादू में सचमुच कोई शक्ति है तो उसकी मदद से उन चीजों को ढूंढकर दिखाओ।’ तांत्रिक बगलें झांकने लगा। कुमारन ने अपने दोस्तों को समझाया कि काला जादू जैसी कोई चीज नहीं होती─

‘यदि काला जादू ठीक उसी तरह काम करता, जैसा तांत्रिक का दावा है तो हम शताब्दियों से दास बनकर नहीं रह रहे होते।’4

इससे जहां कुमारन की सूझबूझ का पता चलता है, वहीं अंदाजा लगाया जा सकता है कि अपने दासत्व को लेकर वह बचपन में कितना सजग था। यही सजगता आगे चलकर जातीय शोषण और सामाजिक रूढ़ियों प्रति आक्रोश का रूप लेती गई। उन्हीं दिनों की एक घटना है। एक दिन कुमारन सामंत के खेतों में हल चला रहा था। उसकी जाति के कई और लड़के भी उसके साथ थे। खेत जोतते समय एकाएक नरकंकाल सामने आ गया। बाकी लड़के भी नरकंकाल को देखने के लिए आसपास सिमट आए। सभी के भीतर कंकाल के बारे में जानने की उत्सुकता थी। तब कुमारन ने अपने साथियों से कहा कि वह कंकाल उनके किसी पुरखे का भी हो सकता है, जो भूख-प्यास से व्याकुल काम करते-करते खेत में गिर पड़ा हो या मालिक ने मारकर यहां दफना दिया हो। सुनते ही उसके दोस्त सोच में पड़ गए। उन्होंने नरकंकाल के अवशेषों को संभालकर मिट्टी से उठाया और पूरे सम्मान के साथ पुनः जमीन में दफना दिया।

मालिक के यहां कुमारन को सुपारी के पत्तों पर खाना परोसा जाता था, जो उनके दासत्व को दर्शाता था। पोईकाइल नामकरण के पीछे भी एक कहानी है। कुमारन अपने अनुभव से जो सीखता था, उसे अपने दोस्तों को बता देता था। धीरे-धीरे दोस्तों के बीच उसकी इज्जत बढ़ने लगी। उसने ‘पोइका कूत्तर’(पोइका की सभा) नामक एक संगठन बनाया था, जिसमें वह अपने अनुभव द्वारा सीखी हुई बातें नियमित रूप से साथियों को बताता था। उसी से उसको ‘पोईकाइल’ उपनाम मिला। आगे चलकर वही उसकी मुख्य पहचान बन गया।  

ईसाई मिशनरियां दलितों में अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए कई तरह से प्रयास कर रही थीं। भयंकर जातिवाद के चलते सरकारी स्कूलों में दलित और निम्नतर जातियों को पढ़ाए जाने की सुविधा प्राप्त न थी। मिशनरियां ऐसी ही जातियों में पैठ बनाने की कोशिशा में लगी थीं। उनके लिए स्कूल खोले जा रहे थे। शिक्षा के नाम पर वहां केवल बाईबिल तथा ईसाई धर्म से जुड़े विश्वासों के बारे में सिखाया जाता था। विद्यालयों में प्रवेश के समय ही बच्चों को ईसाई परंपरा के अनुरूप नया नाम दिया जाता था। उसके बाद वे ईसाई समुदाय का हिस्सा मान लिए जाते थे, उसके लिए बपत्सिमा की रस्म, जो ईसाई धर्म का खास संस्कार है─आवश्यक नहीं थी। नए नाम या धार्मिक पहचान से जुड़ने का विद्यार्थी या उसके माता-पिता की सामाजिक हैसियत पर कोई अंतर नहीं पड़ता था, बावजूद इसके स्कूल प्रवेश के समय नया नाम देने की परंपरा बड़े पैमाने पर स्वीकार्य थी। इसका मुख्य कारण यह भी था कि हिंदू धर्म की मान्यताओं के चलते दास समुदाय अपने लिए अच्छे नाम चुन ही सकता था। बाकी स्कूलों के दरवाजे दलित समुदाय के लिए बंद थे। ऐसी स्थिति में मिशनरी स्कूल जो पहचान देते, वही मान ली जाती थी।

उन थेवरक्कुटू कोचकुंजु नाम का दलित अध्यापक बच्चों को ईसाई धर्म के अनुरूप शिक्षा देने के लिए पाठशाला चलाता था। कुमारन को उसी की पाठशाला में भर्ती कराया गया। वहीं रहकर उसने बाईबिल का अध्ययन किया। बाईबिल की कहानियों में पढ़ाया जाता था कि परमात्मा दुखी लोगों की मदद करता है। उनके लिए ईश्वर के दरवाजे सदैव खुले रहते हैं। इसपर वह सोचता कि यदि परमात्मा सचमुच ऐसा ही है तो वह दलितों और दासों के उद्धार के लिए कोई पहल क्यों नहीं करता? किसने उसे रोक रखा है? बाईबिल में किसी दास जाति का वर्णन क्यों नहीं है? यहीं से प्रचलित धर्म को लेकर उसके मन में शंकाएं पैदा होने लगीं। पर यह शुरुआत थी। शिक्षा के दौरान कुमारन ने स्वयं को अच्छा विद्यार्थी सिद्ध किया। बड़ा होने पर कुमारन की धर्म-संबंधी जिज्ञासाएं उसे चर्च की ओर ले गईं।

वे पोईकाइल के पोईकाइल योहन्नान बनने के लिए दिन थे। हालांकि माता-पिता और बस्ती वालों के लिए वह तब भी ‘कोमारन’ ही था। योहन्नान संत थॉमस द्वारा स्थापित मारथोमा चर्च में धर्म की शिक्षा देने लगे। चर्च का हिस्सा बनने के बावजूद योहन्नान के अपने समाज और जाति के प्रति सरोकार पूर्ववत थे। धीरे-धीरे उन्होंने खुलना आरंभ किया। दुनिया भर में बाईबिल को परमात्मा का संदेश खोजने के लिए पढ़ा जाता है। योहन्नान उसमें अपने समाज को खोजने लगे। उन्हें लगा कि बाईबिल के पात्रों की त्रासदी उनके अपने समाज के, त्रावणकोर के दास जीवन की त्रासदी से मेल खाती हैं। 

उन दिनों ईसाई धर्म की ओर आकर्षित होने वाले दो तरह के लोग थे। अंग्रेजों को अपना शासन चलाने के लिए अंग्रेजी के जानकार लोगों की आवश्यकता थी, ऐसे लोगों की आवश्यकता थी जो उनके भरोसेमंद रहकर सौंपी गई जिम्मेदारियों को निभा सकें। इससे आकर्षित होकर आरंभ में उच्च जाति के लोग बड़ी संख्या में ईसाई धर्म की ओर आकर्षित हुए थे। दूसरा वर्ग पुलाया, परायास जैसी दास जातियों का था, जो जातीय उत्पीड़न से तंग आकर या सरकारी स्कूलों में शिक्षा के अवसर न देखकर ईसाई मिशनरियों की शरण में चले जाते थे। वहां उन्हें, उनके चाहे-अनचाहे ईसाई पहचान से जोड़ दिया जाता था। उच्च जाति के ईसाई धर्म में शामिल हुए लोग अपने साथ अपने जातीय संस्कार भी ले जाते थे। इसलिए मूल ईसाई धर्म में जाति-आधारित विभाजन की भले ही कोई अनुमति न हो, परंतु भारतीय ईसाइयों में इस तरह का विभाजन सामान्य बात थी। इसी से योहन्नान के मन में ईसाई धर्म के प्रति शंकाएं उत्पन्न होने लगीं। उन्हें लगा कि ईसाई धर्मांतरित होकर आने वाले दलितों को कभी भी अपेक्षित मान-सम्मान देने वाले नहीं हैं। धर्म की सांगठनिक क्षमता का उपयोग करते हुए उन्होंने निचली जाति के लोगों को जोड़ना आरंभ किया।

लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए योहन्नान ने जो रास्ता अपनाया उसी में उनकी मौलिकता छिपी थी। दूसरे धर्मप्रचारक परमात्मा के साम्राज्य का महिमा-मंडन करते। इस संसार तो पाप और दुराचारों से भरपूर बताते थे। मानव-जीवन को वे अब्बा और ईव के दुराचार की देन मानते थे। योहन्नान का इस कहानी पर विश्वास नहीं था। जीवन चाहे जितना कष्टमय हो, पर है तो वह जीवन ही। जिस बाईबिल में यह कहानी है, वह उनके समाज की नहीं हो सकती। होगी किसी अदृश्य-अनाम समाज की। बाईबिल में जो स्थितियां हैं उनका देशकाल एकदम भिन्न है। उसमें एक भी अध्याय ऐसा नहीं है जो पुलायाओं और परायासों की कहानी कहता हो─

मैंने पढ़े हैं कई सभ्यताओं के इतिहास

खोजा है, देश-प्रदेश के प्रत्येक इतिहास में

कहीं, कुछ भी नहीं मिला मेरी जाति पर

पृथ्वी पर नहीं कोई ऐसा कलमकार

जो लिखे मेरी जाति का इतिहास

जिसे डुबा दिया गया है रसातल में

जो खो चुकी है

इतिहास की अतल गहराइयों में

यह एक प्रकार की राजनीति ही थी? शताब्दियों से लुटी-पिटी जातियों को न्याय दिलाने की राजनीति! या फिर पुराने धर्म को कठघरे में लाकर नया संप्रदाय चलाने की राजनीति! परंतु राजनीति कहां नहीं है? हिंदू धर्म स्वयं बड़ी राजनीति है जो जाति के नाम पर समाज का स्तरीकरण कर देता है। उसे ऊंच-नीच में बांट देता है। व्यवस्था ऐसी है कि जो इसमें सबसे ऊपर है, तमाम कमजोरियों के बावजूद वह वहीं बना रहता है। और जो नीचे है, वह कितना ही अच्छा करने का प्रयत्न करे, ऊपर जाने का उसका स्वप्न भी पाप मान लिया जाता है। यह ऐसी संस्कृति है जिसमें देवराज इंद्र चाहे जितने बलात्कार करें, उनका देवत्व कभी खंडित नहीं होता। अपवित्र और पतित मानी जाती हैं, बलत्कृत होने वाली स्त्रियां।

बाईबिल का स्वप्नलोक(यूटोपिया) यदि योहन्नान का स्वप्नलोक नहीं था तो फिर क्या था? कह सकते हैं कि योहन्नान ने अपना स्वप्नलोक बड़ी शाइस्तगी से गढ़ा था। वही द्रविड़ अस्मिता का यूटोपिया, जिसमें उसने बस थोड़ा-सा संशोधन किया था। ब्राह्मणों को विदेशी मूल का बताकर फुले ने अनार्य बहुजनों को इस देश का मूल निवासी घोषित किया था। मैक्समूलर से लेकर तिलक तक, सबकी यही मान्यता थी। यह दर्शाती थी कि दक्षिण भारत के निवासी ही इस देश के मूल निवासी हैं। ऐतिहासिक सिद्धांत के रूप में पेरियार ने इसी को आधार मानकर ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की रूपरेखा गढ़ी थी। योहन्नान ने इसका सीमित संदर्भों में, अपनी तरह से प्रयोग किया था। उसने पुलाया और परायास जातियों को समझाया कि उनके पूर्वज त्रावणकोर के वैभवशाली बाशिंदे थे। उसकी सुख-समृद्धि उनकी अपनी सुख-समृद्धि थी। आर्य उसे लूटकर खुद त्रावणकोर के वैभवशाली शासक बन बैठे। जो कभी स्वामी थे आज वे गुलामगिरी करने के लिए विवश हैं।

पुराने वैभव को प्राप्त करने के फुले बहुजनों को शिक्षित होने की सलाह देते हैं। पेरियार का तरीका लोकतांत्रिक था। वे चाहते थे कि धर्म और जाति का विनाश हो। लोग उनसे ऊपर उठकर सोचें। जातिवाद के संरक्षक ब्राह्मणवाद भी नाश हो। लोग लोकतांत्रिक तरीके से अपने अधिकारों के लिए संगठित हों। योहन्नान के लिए वही पुराना धर्म का रास्ता था। उद्धार के लिए मसीहा का इंतजार करना। कई बार वे स्वयं को ही मसीही दूत के रूप में पेश कर देते थे। रास्ता भले ही पुराना हो, सपना तो नया था। वह सपना ही लोगों को योहन्नान की ओर खींच रहा था। योहन्नान की धर्म-संबंधी व्याख्याएं चर्च के अधिकारियों को स्वीकार्य न थीं। भीतर ही भीतर उसके विरुद्ध माहौल बनता जा रहा था। लेकिन यह सोचकर कि लोग योहन्नान से प्रभावित हैं, उनकी सभाओं में भीड़ बढ़ती ही जा रही है, सब के सब अनुयायी ईसाई धर्म की निरंतर फूलती-फलती खेती हैं─वे आरंभ में उनके प्रति नर्म बने रहे।

उन्हीं दिनों एक घटना घटी जिससे योहन्नान को सीधे चर्च के विरोध में उतरना पड़ा। एक निम्न जातीय दलित को चर्च की कब्रगाह में दफनाया गया था। अधिकारियों को पता चला तो उन्होंने कब्र खोदकर उसका शव बाहर निकाल दिया। कहा कि उसे उसकी जाति की कब्रगाह में ले जाकर दफनाएं। योहन्नान के लिए यह सूचना हैरान कर देने वाली थी। उन्हें चर्च का व्यवहार पक्षपातपूर्ण लगा। विवाद बढ़ा तो योहन्नान ने सीरयाई चर्च को अलविदा कह दिया। बाद उन्होंने ‘चर्च मिशनरी सोसाइटी’ की सदस्यता ग्रहण कर ली। लोगों तक अपना संदेश पहुंचाने के लिए योहन्नान को खास ठिकाने की आवश्यकता नहीं थी। लोगों के बीच जाकर, जहां भी, जिस रूप में भी अपने विचार रखने का अवसर मिले, उन्हें स्वीकार था। वे चौराहों पर, सड़क किनारे, घरों और झोंपड़ियों के बीच कहीं भी उपयुक्त स्थान देख, लोगों को एकजुट कर, उपदेश देने लगते थे। बाईबिल की बातों को ज्यों का त्यों स्वीकारने के बजाए वे दलित दृष्टिकोण से उनकी व्याख्या करते। उनका मानना था कि बाईबिल ने स्वयं दमितों के साथ छल किया गया है। ये बातें चर्च की चारदीवारी में संभव नहीं थीं, इसलिए वे वहां से हटकर सभाएं करते। लोगों को समझाते कि उनकी सामाजिक हैसियत हमेशा से ऐसी न थी, अपितु त्रावणकोर के प्राचीन वैभव में उनका भी योगदान था। आर्यों ने उनपर हमला करके द्रविड़ों को अपना गुलाम बना लिया। वे लोगों को बताते कि प्राचीन द्रविड़ उदार सभ्यता के निर्माता थे। उनमें ऊंच-नीच की भावना नहीं थी। आर्यों ने न केवल उस सभ्यता को नष्ट किया, अपितु दास-पृथा भी लागू की। जिससे समाज में गुलाम और मालिक का चलन आरंभ हुआ। तभी से द्रविड़ों का जीवन नर्कमय बना हुआ है। योहन्नान के उपदेशों से प्रभावित होकर पुलायार और परायास जैसी दास जातियों के लोग उसके पीछे संगठित होने लगे। एक उपदेशक के रूप में उनका मान-सम्मान बढ़ता ही जा रहा था। योहन्नान ने बड़ी कुशलता से धर्म की ताकत को शताब्दियों से होते आ रहे शोषण से जोड़ा था। 

लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए वे कई कहानियों का सहारा लेते। कुछ मौखिक कहानियां भी दासों के बीच विद्यमान थी। उनमें से एक यह थी कि दास पृथा लागू होने से पहले खेती के लिए बैलों का उपयोग किया जाता था। दास पृथा लागू होने के बाद हल में बैलों के साथ-साथ दास भी जोते जाने लगे। उनकी साप्ताहिक बैठकों में एक किस्सा खूब चलता था, जिसमें एक कमजोर मरणासन्न दास को हल में बैल के साथ जुता हुआ दिखाया जाता। बताया जाता कि 1855 में दास-पृथा उन्मूलन से पहले प्रत्येक दास की पीठ पर सांड का निशान बना होता था, जो उसके दासत्व का प्रतीक था। उनके पुराने अनुयायी मानते थे कि वैसा ही निशान योहन्नान की पीठ पर भी था। साप्ताहिक सभाओं में योहन्नान अकसर यह गीत लोगों को सुनाया करते थे─

जंजीरों में जकड़े, तालों में कैद

रखा जाता था उन्हें बंदियों की तरह

पीठ पर बरसते कोड़े कर उन्हें देते थे अधमरा

जीवन उनका था जानवरों के समान

बैल के साथ हल में जोतकर

जुतवाए जाते थे खेत….

ये गीत दासों को उनके जीवन की त्रासदियों से परचाते थे। इसलिए लोग उन कहानियों पर सहज विश्वास कर लेते थे। योहन्नान उनके लिए न केवल उपदेशक थे, बल्कि मार्गदर्शक भी। अनुयायियों को लगता था कि केवल वही उनका उद्धार कर सकते हैं। 

उच्च जातियों में इसकी प्रतिक्रिया होनी स्वाभाविक थी। सो चर्च सहित तथाकथित उच्च जातियों का बड़ा वर्ग योहन्नान के विरोध में संगठित होने लगा। उसकी सभाओं पर हमले होने लगे। एक बड़ा हमला, 1905 में कडापरा में धर्मांतरित दलित ईसाई कुझीपरंबिल पैथ्रोस के घर पर हुआ। उस दिन योहन्नान ने एक गोपनीय बैठक बुलाई हुई थी। बैठक का विषय था, ‘अनैतिकता की संतान, ईश्वर की संतान तथा एशिया के सात चर्च’। उस बैठक में उनका व्याख्यान व्यंग्यात्मक था। दूसरा हमला जो पहले से भी बड़ा था, ‘ओथारा’ में हुआ। उस बैठक में भारी संख्या में लोग जमा थे। बैठक के लिए पंडाल का इंतजाम किया गया था। उपद्रवियों ने रोशनी के लिए लगाए गए लालटेनों की मदद से पंडाल को आग के हवाले कर दिया। दलितों को वहां से भागना पड़ा। योहन्नान को अपने अनुयायियों के साथ एक पेड़ के नीचे शरण लेने पड़ी। ऐसे ही एक बार जब हमलावर उनपर आक्रमण के उतारू थे, योहन्नान को भागकर नाले में छिपना पड़ा था। कोझुकुचिरा, वेलांदि, वैंकठनम, मंगलम् की सभाओं में भी व्यवधान उत्पन्न किया गया। वेत्तियादु की बैठक में उपद्रवियों के हमले में एक महिला की हत्या कर दी गई। एक बार जब वे प्रवचन कर रहे थे, उच्च जातियों का हमला हुआ। जान बचाने के लिए उन्हें स्त्रियों के बीच छिपना पड़ा।  

योहन्नान उच्च जाति के लोगों के साथ-साथ चर्च की निगाह में खटकने लगे थे। उसपर चर्च छोड़ने का दबाव बढ़ता ही जा रहा था। लोग किसी भी तरह योहन्नान को दंडित करना चाहते थे। दूसरी ओर लगातार हमलों से योहन्नान की प्रतिष्ठा बढ़ती ही जा रही थी। साथ ही बढ़ रहा था, उसका हौसला। एक अवसर ऐसा आया जब योहन्नान और चर्च एकदम आमने सामने थे। उन दिनों वे ‘ब्रेदरान मिशन’ के सदस्य थे। उस संप्रदाय के लोगों का विश्वास था कि यह संसार कपटपूर्ण लोगों का जमाबड़ा है। योहन्नान को वह कपट अपने चारों और नजर आता। उन्हीं दिनों योहन्नान ने बाईबिल को भी अपनी आलोचना के दायरे में शामिल कर लिया। उसके तर्क बहुत सीधे और लोगों के दिमाग में घर कर जाने वाले थे। जैसे कि उसका कहना था कि बाईबिल के धर्मादेश बाहरी लोगों के लिए हैं। नए धर्मादेश(न्यू टेस्टामेंट) के बारे में योहन्नान का कहना था कि उसमें संत पॉल और दूसरे लोगों के धर्म-संदेश उन लोगों, जैसे रोमन और कुरिंथवासियों के लिए हैं, जिन्हें वे संबोधित करना चाहते थे। उनमें त्रावणकोर के पुलायाओं के लिए एक भी धर्म-संदेश शामिल नहीं है। ईसाई धर्म कहता है कि स्वर्ग का राज्य उन लोगों के लिए है, जो शोषित और उत्पीड़ित हैं। यह सच के नाम पर मजाक है। वे लोगों को समझाते कि धरती से परे स्वर्ग कहीं नहीं है। पुलायाओं और परायासों का स्वर्ग कभी त्रावणकोर था। उसका वैभव उनका अपना वैभव था। उसकी समृद्धि उनके अपने जीवन से झलकती थी। कुछ कपटी लोगों के कारण उनका सुख-वैभव उनसे छिन चुका है। केवल बाईबिल के प्रति आस्था उसे नहीं लौटा सकती। उसे दुबारा प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए मृत्यु की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। मृत्यु बाद स्वर्ग का बाईबिल का दावा लोगों के साथ सिवाय छल के कुछ और नहीं है।

ध्यातव्य है कि पेरियार ने भी तमिलनाडु को द्रविड़ों की मूल भूमि घोषित करने के साथ-साथ ब्राह्मणों को बाहरी घोषित किया था। वे नास्तिक थे। किसी धर्म में विश्वास नहीं करते थे। योहन्नान आस्थावादी थे। उन्होंने अपना जीवन चर्च के उपदेशक से आरंभ किया था। लेकिन बाईबिल से उनका विश्वास हट चुका था। इस ईसाई मान्यता पर भी उनका विश्वास नहीं था कि परमात्मा सब देख रहा है। जितने भी दीन-दुखी हैं, अंत में सब उसकी शरण में होंगे। वह न्याय करेगा। योहन्नान ने स्वतंत्र रास्ता चुना था। ईसाई धर्म के प्रति उठते इन्हीं संदेहों के फलस्वरूप योहन्नान ने बहुप्रसिद्ध मेरामोन सम्मेलन का बहिष्कार कर दिया। उसके पहले वे वेकठनम की सभा में बाईबिल की आलोचना कर चुके थे। उनका कहना था कि दासों के लिए वह पुस्तक वृथा है। इसलिए उसे साथ लेकर चलना बेमानी है।

मेरामेन सम्मेलन के विरोध में मुथलपुरा में समानांतर सम्मेलन का आयोजन किया गया। उस समय तक योहन्नान अपने समर्थकों के हृदय में ईसाईधर्म और बाईबिल के प्रति आक्रोश पैदा कर चुके थे। मुथलपुरा सम्मेलन में उसका चरमोत्कर्ष देखने को मिला। उसके अनुयायी अपने हाथों में बाईबिल की प्रतियां लिए हुए थे। उत्साहित लोगों ने बड़ी वेदिका तैयार की। उसमें आग जलाई गई। देखते ही देखते लोग साथ लाई बाईबिल की प्रतियां उसमें फैंकने लगे। जो लोग बाईबिल को आग के हवाले करने से झिझक रहे थे, उन्हें दूसरे लोगों  द्वारा उकसाया गया। एक ही दिन में बाईबिल की हजारों प्रतियां आग के हवाले कर दी गईं।5 यह अप्रत्याशित था। योहन्नान के उस कदम से सारा ईसाई समुदाय सकते में आ गया। आनन-फानन में योहन्नान के कृत्य को धर्म-विरोधी घोषित कर दिया गया। जांच कमीशन बिठाया गया। योहन्नान को मारथोमा चर्च से निष्काषित कर दिया गया।

यह 1905 के आसपास की घटना है। उसके बाद वे ‘चर्च मिशनरी सोसाइटी’ से जुड़े। उसका नजरिया अपेक्षाकृत सुधारवादी था। उसका प्रभावक्षेत्र ऊंची जाति के लोगों में अधिक था। जाति-भेद के प्रति उसका नजरिया भी दूसरों से अलग न था। योहन्नान का बहुत जल्दी उससे भी मोह भंग हो गया। खिन्न होकर उन्होंने ‘चर्च मिशनरी सोसाइटी’ को छोड़ दिया। उसके बाद कुछ समय के लिए ‘ब्रोदरान मिशन’ में शामिल हुए। ये ईसाई धर्म की वे संस्थाएं थीं जो मानव-मात्र के बीच बराबरी का दावा करती थीं। लेकिन एक के बाद एक संस्था का अनुभव प्राप्त करने के बाद योहन्नान समझ चुके थे कि संस्थाओं का मूल चरित्र जो बताया जाता है, उससे बिलकुल अलग है। उनके साथ रहकर दासत्व और जातिभेद का समाधान तो दूर, उनके विरोध में आवाज उठाना भी संभव नहीं है। 1907 के आसपास उन्होंने ‘ब्रोदरान मिशन’ को भी छोड़ दिया और स्वतंत्र होकर काम करने लगे।

प्रत्यक्ष रक्षा दैव सभा

यह मानते हुए कि ईसाई धर्म में कपटी जातिवादी लोगों का जमाबड़ा है, बाईबिल दासों के लिए पूरी तरह अप्रासंगिक  है। वह दमित जातियों की समस्या का समाधान करने में अक्षम है─ योहन्नान ने 1909 में उन्होंने ‘प्रत्यक्ष रक्षा दैव सभा’ की स्थापना की। अब योहन्नान स्वतंत्र ‘उपदेशी’ थे। उनके सामने उनका समाज था, उसके दमन और शोषण की अंतहीन व्यथाएं थीं। अपने व्याख्यानों वे दास जातियों से साफ-सुथरा रहने को कहते। शिक्षा ग्रहण करने की सलाह देते और संगठित होने का आवाह्न करते। ‘प्रत्यक्ष रक्षा दैव सभा’ के मुख्य उद्देश्य थे─

1. ईसाई धर्म और हिंदुत्व दोनों का खंडन करना।

2. यह विश्वास करना कि ईश्वर दमित लोगों के उत्थान के लिए पुनः अवतरित होंगे।

3. समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व भाव में विश्वास रखना

4. सृष्टि रचियता के नाम पर प्रार्थना करना, लेकिन बलिप्रथा का परित्याग

5. चर्च से अलग, अपने मंदिर में प्रार्थना करना

‘प्रत्यक्ष रक्षा दैव सभा’ का एकमात्र स्वप्न था, दासत्व से मुक्ति उसका एकमात्र स्वप्न था। दास जातियों के पुराने वैभव को प्राप्त करना। हालांकि इसके लिए योहन्नान के पास सिवाय प्रार्थना के दूसरा कोई रास्ता न था। प्रत्यक्ष रक्षा दैव सभा का एक गीत6 जिसमें व्यंग्य भी झलकता है, इस प्रकार है─

ईश्वर को किसी ने नहीं सुना

देवदूतों को किसी ने भी देखा नहीं

मुक्ति की चाहत में प्रार्थना करने वाले

उसके सेवक भी दिखाई नहीं पड़ते

मैंने परमात्मा को नहीं देखा

मैंने जीसस को नहीं देखा

कोई देवदूत, कोई आत्मा

भी मेरी निगाह से नहीं गुजरी

…..

उनसे जुड़ी दुखद अनुभूतियों

की चर्चा न कर पाने का मुझे खेद है।

पेरियार की भांति योहन्नान ने भी अपने अनुयायियों को ‘आदि द्रविड़’ कहकर संबोधित किया है। उसका मानना था कि दलित एक समृद्ध परंपरा के अनुगामी थे। लेकिन लंबी दासता के चलते वे अपने ही इतिहास को भुला चुके हैं। और जब तक उनमें दास-भाव है, तब तक वे अपनी समृद्ध परंपरा की ओर नहीं लौट सकते। उसका विश्वास था कि ‘परमात्मा गुलामों की मुक्ति के रूप में उसके रूप में अवतरित हुए हैं।’7 यह कहना एकदम गलत है कि ‘स्वर्ग’ और ‘मोक्ष’ की प्राप्ति केवल मृत्यु के बाद ही संभव है। परमात्मा अपनी मर्जी से समय-समय पर जन्म लेते हैं। इसलिए उनके नाम पर बनी परंपराएं और कर्मकांड वृथा हैं। मुथलपुरा की घटना की जांच के लिए समिति के सदस्यों में के। वी। सिमॉन नाम का सदस्य भी था। जन्म से दलित सिमॉन कवि, लेखक और उपदेशक भी थे। अपनी पुस्तक ‘दि वर्क आफ पोईकाइल योहन्नान एंड पीआरडीएस’ में उसने लिखा है─

‘योहन्नान और उसके साथियों का मुख्य लक्ष्य था, अपने अनुयायियों को जाति-आधारित भेदभाव से मुक्ति दिलाना….बाईबिल उस समय या उसकी पीढ़ी(जाति) के लिए उपयोगी नहीं थी। इस दुनिया में चर्च को धर्मदूतों(जीसस के प्रथम 12 अनुयायी) के साथ ही समाप्त हो जाना चाहिए था। तब से आज तक हजारों वर्ष के अंतराल में एक भी व्यक्ति की रक्षा नहीं हो सकी है….कोई दुबारा आने वाला नहीं है, कोई हजार वर्ष लंबा शासन नहीं है। इन(बाईबिल के) उपदेशों के फलस्वरूप जिन्होंने स्वयं को औपचारिक रूप से ‘सुरक्षित’ मान लिया था, वे एक बार फिर योहन्नान के हाथों में सुरक्षित हुए(उनमें से अधिकांश निचली जाति के लोग थे)। इन ‘सुरक्षित’ अनुयायियों को योहन्नान के उपदेशों और विचारों से परे किसी चीज की आवश्यकता नहीं थी। इसलिए उन्होंने बाईबिल को आग के हवाले कर दिया। उनके लिए योहन्नान के शब्द किसी भी धर्मादेश या कानून से बढ़कर थे।’7  

यह ठीक है कि योहन्नान दलितों को कोई स्पष्ट पहचान देने में असमर्थ रहे। उनका प्रभाव क्षेत्र भी सीमित था। फिर भी वे अकेले संत थे, जो ईसाई धर्म को मंदिरों और चर्च की दीवारों से बाहर निकालकर लोगों के बीच ले आए थे। उनके लिए मुक्ति का अभिप्राय मोक्ष नहीं था, बल्कि उस दासत्व से मुक्ति थी, जिसे उनके लोगों पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुलामी के रूप में भोगते आए थे। ऐसे लोग पचास-सौ या हजार नहीं, लाखों में हैं। योहन्नान के समकालीन कवि और समाज सुधारक सहोदरान अय्यपन ने अपनी कविता में इस ओर इशारा करते हुए कहा है─

अपने पसीने और जीवन-रक्त के साथ

इस वसुंधरा के धन-भंडार भरने वाले बहुजनो

श्रमजनो….याद रखो

जीर्ण-शीर्ण झोपड़ियों में,

भोजन और वस्त्रों के लिए तिल-तिल करतीं संघर्ष

गरीब, अभावग्रस्त─कच्चे नर्म फर्श पर बच्चे जनती स्त्रियां                                                                                                                                                                                                               

एक-दो नहीं लाखों में हैं

योहन्नान के योगदान को देखते हुए उन्हें त्रावणकोर की पहली विधायिका ‘श्री मूलम पोपुलर असेंबली’ का सदस्य चुना गया था। वे 1921 और 1931 में दो बार उस पद पर रहे। वे कदाचित अकेले सदस्य थे जिन्हें कई जातियों के प्रतिनिधि के रूप में चुना गया था। उस पद पर रहते हुए योहन्नान ने दास कही जाने वाली जातियों के लड़कों को शिक्षा में अतिरिक्त मदद देने का प्रस्ताव पेश किया था, ताकि वे दूसरी जाति के बच्चों के साथ स्पर्धा कर सकें। इसके अलावा उन्होंने सरकार निचली जाति की गरीबी दूर करने के लिए उनके बीच छोटे उद्यमों को बढ़ावा देने की मांग भी की थी , जिससे वे आत्मनिर्भर होकर आगे बढ़ सकें। अपने अनुयायियों के बीच वे पोईकाइल अप्पचन, कुमार देवा के नाम से भी जाने जाते हैं.

ओमप्रकाश कश्यप

1-      PRDS and Dalit Renaissance: An essay set by The Association of Kerala History Publication Committee, translated by P. M. Abraham, February 1996, Page 15.

1.      PRDS and Dalit Renaissance: An essay set by The Association of Kerala History Publication Committee, translated by P. M. Abraham, February 1996, Page 15.

2.           Songs of Poykayil Appachan 1905 to 1939, Edited by V V Swamy and E V Anil, Institute of PRDS Studies, Kottayam

3.            An Anti-Slavery Spiritual Revolution in Kerala — Prathyaksha Raksha Daiva Sabha, article written by Tharun T. Tharun

4.           As above

5.            PRDS and Dalit Renaissance: An essay set by The Association of Kerala History Publication Committee, translated by P. M. Abraham, February 1996, Page 12.

6.      Above, page 14-15.

7।       As above page 13

1-      PRDS and Dalit Renaissance: An essay set by The Association of Kerala History Publication Committee, translated       by P। M। Abraham, February 1996, Page 15।

2।            Songs of Poykayil Appachan 1905 to 1939, Edited by V V Swamy and E V Anil, Institute of PRDS Studies,        Kottayam।

3।            An Anti-Slavery Spiritual Revolution in Kerala — Prathyaksha Raksha Daiva Sabha, article written by Tharun T।             Tharun

4।            As above।

5।            PRDS and Dalit Renaissance: An essay set by The Association of Kerala History Publication Committee, translated       by P। M। Abraham, February 1996, Page 12।

6।       Above, page 14-15।

7।       As above page 13

नुपी लेन : मणिपुर के महिला-संघर्ष की अनूठी दास्तान

सामान्य

आज की राज बीत चुकी है

एक दिन और गुजर गया

स्त्रियो! अपने बाल बांध लो

वे अराजक होकर उड़ रहे हैं

क्या तुम भूल गईं….

एक 12 दिसंबर गुजर चुका है

दूसरा 12 दिसंबर आने को है

भूल जाओ कि बालों को बांधना जरूरी है

भूल जाओ कि यह दिन दुबारा लौटकर आएगा

स्त्रियो! अपने बाल बांध लो….

—हाजिम इराबोट, मणिपुरी जननेता और लोककवि

भारत विविध संस्कृतियों और मान्यताओं वाला विशाल देश है। अपने आप में लंबा इतिहास समेटे हुए। मगर जब भी देश के इतिहास और संस्कृति की बात होती है, आमतौर पर सारा विमर्श उत्तर, उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत तक सिमटकर रह जाता है। ज्यादा से ज्यादा सुदूर दक्षिण को शामिल कर लिया जाता है। पूर्वाेत्तर के प्रदेशों जो भारतीय भू-भाग के वैसे ही हिस्से हैं, जैसे बाकी प्रदेश—के योगदान को आमतौर पर बिसरा दिया जाता है। इसका एक कारण तो उनकी विशिष्ट जनजातीय संस्कृति है। हम प्रायः मान लेते हैं कि जनजातीय प्रभाव के कारण पूर्वाेत्तर के समाज आधुनिकताबोध से कटे हुए हैं। जबकि सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक हलचलों से यह क्षेत्र वैसा ही प्रभावित रहा है, जैसा बाकी देश। कुछ मामलों में तो यह दूसरों से विशिष्ट है। जैसे 1904 और 1939 में मणिपुर में हुए दो ‘नुपी-लेन’(महिला-युद्ध) की मिसाल पूरे देश में अन्यत्र नहीं मिलती। वे महिलाओं द्वारा अपने बल पर चलाए गए एकदम कामयाब जनांदोलन थे, जिन्होंने औपनिवेशिक भारतीय सरकार के संरक्षण में पल रही भ्रष्ट राजसत्ता को झुकने के लिए विवश कर दिया था। उनके फलस्वरूप सामाजिक सुधारों का सिलसिला आरंभ हुआ। संवैधानिक सुधारों की राह प्रशस्त हुई।

मणिपुर विरल जनसंख्या वाला प्रांत है। लगभग 22300 वर्ग किलोमीटर में फैले इस प्रांत की जनसंख्या करीब तीस लाख है। प्रदेश का 91 प्रतिशत हिस्सा पहाड़ी क्षेत्र है। पर जो बात उसे खास बनाती है, वह है—समाजार्थिक-सांस्कृतिक जीवन में महिलाओं की पुरुषों के मुकाबले ज्यादा भागीदारी। इस दृष्टि से वह देश का इकलौता प्रांत है। मणिपुर का इतिहास 2000 वर्ष पहले, 33वें ईस्वी सन से आरंभ होता है, जब वहां मैतेई प्रजाति के नोंग्दा लैरन पाखनग्बा ने शासन संभाला। मैतेई प्रजाति के कारण ही उस क्षेत्र का नाम मणिपुर हुआ। इस बीच वहां अनेक सामंती समूह पनपे। परंतु शासन-प्रशासन में मैतेई लोगों की प्रधान भूमिका बनी रही। 15वीं-16वीं शताब्दी के बीच मणिपुर में ब्राह्मणों ने प्रवेश किया। देखते ही देखते वे राजसत्ता के करीबी और उसके सबसे बड़े लाभार्थी बन गए। पूजा-पाठ और कर्मकांडों के माध्यम से उन्होंने वहां के जनजीवन पर कब्जा कर लिया। सामाजिक सरंचना में सबसे ऊपर मैतेई थे, दूसरे स्थान पर ब्राह्मण, तीसरा वर्ग आम प्रजा, मेहनतकश लोगों का था। जिनकी अहमियत वहां दासों के समान थी। उन्हें बाकी दोनों वर्गों की गुलामी करनी पड़ती थी।

मणिपुर की स्वतंत्रता को झटका 1819 में उस समय लगा, जब वहां बर्मा का आक्रमण हुआ। स्वतंत्रता प्रेमी मणिपुर वासी अगले 7 वर्षों तक हमलावरों से लगातार जूझते रहे। उन्होंने अपनी स्वतंत्रता की रक्षा तो कर ली, परंतु प्रदेश का लैंगिक अनुपात गड़बड़ा गया। युद्ध में भारी संख्या में पुरुष हताहत हुए थे। इसलिए गृहस्थी चलाने की जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर आ गई। स्त्रियां कढ़ाई, बुनाई जैसे हस्तशिल्पों में जुट गईं। हाट-बाजार में सामान ले जाकर बेचने लगीं। महिलाओं की सक्रियता के फलस्वरूप ‘इमा’ जैसे बाजार बने। अपने आप में अद्वितीय। ऐसे बाजार जिन्हें केवल महिलाएं चलाती हैं। मणिपुर के हस्तशिल्प ने अंग्रेज व्यापारियों को आकर्षित किया था। मारवाड़ी भी वहां पहुंचे। अंग्रेज व्यापारियों के साथ मिलकर वे स्थानीय बाजार पर छा गए।

1891 में मणिपुर अंग्रेजों के अधिकार में आ गया। राजा से सेना और हथियार रखने के अधिकार छीन लिए गए। अंग्रेजों की ओर से राजनीतिक प्रतिनिधि, जिसे राज्याध्यक्ष का दर्जा प्राप्त था, शासनकार्य संभालने लगा। अंग्रेज राजा को शक्तिविहीन-श्रीविहीन कर चुके थे, परंतु मणिपुर के नागरिकों की स्वातंत्र्य-चेतना मरी नहीं थी। इस कारण वहां अंग्रेज प्रशासकों को अनेक प्रतिरोध का सामना करना पड़ता था। स्थानीय नागरिकों का प्रतिरोध भिन्न-भिन्न रूपों में सामने आता था। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में महिलाओं का वर्चस्व हो तो प्रतिरोध के मामले में वे भला कैसे पीछे रह सकती थीं। पहले नुपी लेन(Nupi-Lan) को वहां ‘महिला-युद्ध’ के रूप में देखा जाता है। लेकिन उसके मूल में दास प्रथा और नाकारा शासन-व्यवस्था थी। धर्मसत्ता और राजसत्ता ने मिलकर तरह-तरह के टैक्स जनता पर थोपे हुए थे। कर-वसूली के लिए अमानवीय बल-प्रयोग आम बात थी। उनसे वहां का सामान्य जनजीवन त्रस्त था।

पहले महिला-विद्रोह(नुपी लेन) की कहानी 15 मार्च 1904 से आरंभ हुई। कुछ विद्रोहियों ने औपनिवेशिक सरकार के राजनीतिक प्रतिनिधि तथा सुपरिटेंडेंट जे। जे। डनलप के बंगले को आग लगा दी। उस घटना के बारे में जांच-पड़ताल चल ही रही थी कि छह महीनों के भीतर 4 अगस्त को डनलप और सहायक राजनीतिक प्रतिनिधि एवं राज्याध्यक्ष आई। आर। नटाल के बंगले दुबारा आग के हवाले कर दिए गए। उससे पहले 6 जुलाई 1904 को विद्रोहियों ने राजधानी इंफाल के सबसे बड़े व्यापारिक स्थल, ख्वारमबंद बाजार में भी आग लगा दी थी। विद्रोहियों के सुराग के लिए अंग्रेज शासकों ने काफी जतन किए। आगजनी को षड्यंत्र मानते हुए डनलप ने सुराग देने के वाले को 500 रुपये का ईनाम भी घोषित किया। लेकिन कोई भी आगे नहीं आया। तिलमिलाए डनलप ने वर्षों पहले समाप्त कर दी गई बेगार पृथा लालअप(Lalup) को इंफाल में दुबारा शुरू करने का ऐलान कर दिया। पाखनग्बा राजाओं के शासनकाल में आरंभ हुई ‘लालअप’ पृथा असल में कराधान प्रणाली थी। जिसमें जनता को प्रत्येक 40 दिनों में से 10 दिन बेगार ली जाती थी। इस तरह स्थानीय जनता से उसके 25 प्रतिशत श्रम-दिवस कराधान के बहाने झटक लिए जाते थे। डनलप ने घोषणा की थी कि क्षतिग्रस्त भवनों का पुनर्निर्माण के लिए स्थानीय जनता को बेगार करनी होगी।

मनुष्य प्रकृति से आजाद होता है। जब भी उसे अपनी स्वाधीनता पर खतरा दिखाई देता है, विद्रोह की स्वाभाविक चेतना उसके भीतर उमगने लगती है। चूंकि मनुष्य का व्यवहार उसके विवेक के साथ-साथ परिस्थितियों भी प्रभावित होता है। इससे संभव है, उसकी कोई तात्कालिक प्रतिक्रिया न हो। कई बार तात्कालिक प्रतिक्रिया न होना भी अच्छा होता है। विशेषकर सामाजिक परिवर्तन की दृष्टि से। स्थायी परिवर्तन के लिए वही बदलाव कामयाब होते हैं, जो लंबे समय तक सुलगती सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना का परिणाम हों। क्योंकि इस बीच उत्पीड़ित जन, उत्पीड़क सत्ता के मनोविज्ञान को पहचानकर उसका सामना करने की रणनीति तैयार कर लेते हैं। भारतीय स्वाधीनता संग्राम ऐसे ही सत्ता विरोध का परिणाम था। जबकि 1857 का प्रथम स्वाधीनता संग्राम सैनिकों के तात्कालिक आक्रोश की परिणति होने के कारण अपेक्षित सफलता प्राप्त न कर सका था। दक्षिण में पेरियार द्वारा शुरू किए गए ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की सफलता के मूल में भी लोगों के मन में वर्ण-व्यवस्था के प्रति शताब्दियों पुराने आक्रोश की भूमिका थी। लंबे समय की परतंत्रता के कारण मनुष्य की स्वातंत्र्य-चेतना कमजोर पड़ सकती है। कई बार वह परिस्थितियों से समझौता कर लेता है। परिणामस्वरूप पराधीनता उसे समाज और संस्कृति का सहज-स्वाभाविक हिस्सा लगने लगती है। ऐसे में यदि कोई उसे स्वतंत्रता का बोध करा दे, अथवा उसे पराधीनता के कारणों का पता चल जाए तो वह दुबारा दासता के लिए आसानी से तैयार नहीं होता।

डनलप के ऐलान के साथ के साथ ही लोगों को ‘लालअप’ पृथा की वापसी का डर सताने लगा था। जनमानस में बढ़ता आक्रोश देख पंचायत और स्थानीय मुखियाओं के एक दल ने डनलप से भेंट कर फैसला वापस लेने की अपील की। डनलप का कहना था कि स्थानीय पुलिस और चौकीदार अपनी जिम्मेदारी निभाने में नाकाम रहे हैं। उसने धमकी दी कि आदेश के विरोध को ‘राजद्रोह’ माना जाएगा। भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए पुलिस चौकियां बनाई जाएंगी। उनका खर्च भी स्थानीय जनता से वसूला जाएगा। इन सूचनाओं ने आग में घी डालने का काम किया।

5 अक्टूबर की सुबह को महिलाएं निकल पड़ीं। लगभग 3000 निहत्थी महिलाओं ने डनलप के आवास को घेर लिया। वे लालअप के आदेश को वापस लेने की मांग पर अड़ी थीं। आंदोलनकारियों के बढ़ते दबाव को देखते हुए डलनप को आदेश पर पुनर्विचार करने का निर्णय लेना पड़ा। स्थानीय अधिकारियों के आश्वासन पर महिलाएं वापस लौट आईं। मगर उसी दिन शाम को ख्वारमबंद बाजार में 5000 से अधिक महिलाओं की भीड़ जुट गई। वे अंग्रेज प्रशासक द्वारा दिए गए आदेश पर अमल चाहती थीं। आखिर आंदोलनकारियों की जीत हुई। लालअप आदेश को वापस ले लिया गया। यह अशिक्षित, गंवई, गरीब और साधनविहीन महिलाओं की बड़ी कामयाबी थी। इतिहास में अपने किस्म की अनूठी घटना।

दूसरा नुपी लेन

दूसरे ‘नुपी लेन’ की परिस्थितियां भिन्न थीं। मगर पहले नुपी लेन की भांति वह भी महिलाओं का स्वयं-स्फूर्त आंदोलन था। उसका दायरा पहले नुपी-लेन की अपेक्षा काफी विस्तृत था। आरंभ में आंदोलनकारी महिलाएं चावलों के बढ़ते मूल्य तथा उनके निर्यात पर पाबंदी के लिए एकजुट हुई थीं। बाद में उनका लक्ष्य बढ़ता गया। उसमें वाखई सेल, मेगा सेखई तथा मांग्बा-सेंग्बा जैसी कुरीतियों से मुक्ति की मांगें भी शामिल होती गईं। अंग्रेजों के आने के बाद ‘लालअप’ नामक बेगारी की प्रथा समाप्त हो चुकी थी। उसके स्थान पर सरकार ने नई कराधान प्रणाली लागू की थी, जिसके अनुसार खाड़ी क्षेत्र में 2 रुपये प्रति आवास तथा पहाड़ी क्षेत्र में तीन रुपये प्रति आवास का नया कर लगाया गया था। कृषि-योग्य भूमि भी कराधान के दायरे में आती थी। कर-वसूली के लिए जबरदस्ती करना आम बात थी। उसके कारण जनता में आक्रोश था। शासन प्रणाली में शिखर पर महाराजा और ब्रिटिश सरकार का प्रतिनिधि था, जो ‘दरबार’ की मदद से शासन करते थे। दरबार में अधिकांश प्रतिनिधि राजा की ओर से नियुक्त किए जाते थे। आमतौर पर वे उसके सगे-संबंधी होते थे। बड़े व्यापार पर मारवाड़ियों का कब्जा था। सबने मिलकर आम जनता पर तरह-तरह के कर लादे हुए थे।

1939 में चारुचंद मणिपुर का महाराजा था, लेकिन नाममात्र का। अधिकांश अधिकार औपनिवेशिक सरकार के प्रतिनिधि के अधीन थे। बड़े फैसलों में उसी की मनमानी चलती थी। राजसत्ता और धर्मसत्ता की ओर से थोपे गए करों का बोझ आमजन को उठाना पड़ता था। वाखई सेल(Wakhei sel), मांग्बा-सेंग्बा(Mangba-Sengba), पंडित लोइशंग(Pandit Loishang), चंदन सेंखाई(Chandan Senkhai) तथा कुंजा सेन(Kunja Sen) असल में जनता से वसूले जाने वाले तरह-तरह के टैक्स थे। इनमें से कुछ तो बड़े ही विचित्र थे। उनके पीछे राजसत्ता और धर्मसत्ता का स्वार्थमय गठजोड़ था। कई कर मनुष्य के जनजीवन से जुड़ी सामान्य गतिविधियों के नाम पर लगाए गए थे। वे मनुष्य की मौलिक स्वतंत्रता का हनन करते थे। ‘वाखई सेल’ भूमि के बंदोबस्त, चकबंदी से जुड़ा था, जबकि ‘पंडित लोइशंग’ ब्राह्मण मंडल के नाम पर थोपा हुआ कर था। ‘चंदन सेंखाई’ माथे पर तिलक लगाने के नाम पर वसूला जाता था। उसके अनुसार प्रत्येक हिंदू परिवार को ‘चार आना’ केवल माथे पर तिलक लगाने के लिए चुकाना पड़ता था। ‘कुंजा सेन’ वेशभूषा कर था। इनके अतिरिक्त गायकों के नाम पर भी टैक्स का प्रावधान था।

‘मांग्बा-सेंग्बा’ सबसे निकृष्ट और अमानवीय कराधान व्यवस्था थी। यदि कोई व्यक्ति सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन करता हुआ पाया जाता अथवा ब्रह्म-सभा की सत्ता को चुनौती देता या किसी कारणवश ब्रह्म-सभा उससे रुष्ट हो जाती थी, तो ऐसे व्यक्ति को अशुद्ध(मांग्बा) घोषित कर दिया था। ‘मांग्बा’ घोषित व्यक्ति अपने समाज और जाति के लिए अछूत हो जाता था। शुद्धीकरण(सेंग्बा) यानी समाज में पुनर्वापसी के लिए उसे भारी जुर्माना भरना पड़ता था। जुर्माने की दर अलग-अलग थी। यदि निचली सभा व्यक्ति को अशुद्ध घोषित करती, तो मात्र 50 रुपये की क्षतिपूर्ति देकर शुद्धीकरण किया जा सकता था। लेकिन यदि ब्रह्म सभा के अशुद्ध घोषित करने पर 85 रुपये 23 पैसे। ‘ब्रह्म सभा’ के अध्यक्ष के रूप में राजा भी किसी व्यक्ति को अशुद्ध घोषित कर सकता था। महाराजा द्वारा ‘मांग्बा’ घोषित व्यक्ति को अपने शुद्धीकरण के लिए, 500 रुपये की मोटी धनराशि भेंट करनी पड़ती थी।

महाराजा चारुचंद्र सिंह के शासनकाल में ‘मांग्बा-सेंग्बा’ की समस्या प्लेग की तरह भयावह हो चुकी थी। उसका सामना गरीब, विपन्न और कमजोर तबके को करना पड़ता था। ‘लालअप’ से मिलती-जुलती ‘पोथांग’ जैसी बेगार पृथा भी थी। उसके अनुसार राजा, शाही परिवार का और कोई सदस्य अथवा अंग्रेज अधिकारी जब भी यात्रा या शिकार पर निकलते तो मैदानी और पहाड़ी दोनों इलाकों में उन्हें तथा उनके सामान को ढोने की जिम्मेदारी स्थानीय प्रजा की होती थी। भोजन और मनोरंजन आदि का प्रबंध भी गरीब जनता को करना पड़ता था। लोगों का विश्वास था कि महाराजा ने ‘ब्रह्म सभा’ के प्रभाव में आकर इन करों को थोपा हुआ है। संवैधानिक सुधारों के बिना उनसे मुक्ति असंभव है। यह आधुनिक चेतना थी जो लगभग सभी पूर्वोत्तर के सभी प्रदेशों में एक साथ पनप रही थी। लोग राजा की शक्तियों पर नियंत्रण चाहते थे। यही वे कारण थे जिन्होंने दूसरे ‘महिला युद्ध’ की जमीन तैयार की थी। दूसरे ‘महिला युद्ध’ को निखिल मणिपुरी महासभा का समर्थन प्राप्त था।

1938-39 में मणिपुर को भारी बाढ़ का सामना करना पड़ा था। बाढ़ से तबाह हुई संपत्ति की मरम्मत हेतु दरबार की ओर से 16000 रुपये की धनराशि स्वीकृत की गई। लेकिन फसल से हुए नुकसान की भरपाई होना मुश्किल था। फसल मारे जाने से खाद्य-सामग्री के दाम तेजी से बढ़ने लगे। राज्य में अकाल जैसे हालात पैदा हो गए। हालात को काबू करने के लिए दरबार ने चावल, चिवड़ा के निर्यात को अपने नियंत्रण में ले लिया। आदेश दिया गया कि यदि निर्यात आवश्यक हुआ तो वह केवल राज्य के अन्न-भंडारों के माध्यम से किया जा सकेगा। चावल तथा उसके उत्पादों के निर्यात को हालांकि राजा की मंजूरी प्राप्त नहीं थी। लेकिन ब्रिटिश सरकार के राजनीतिक प्रतिनिधि ने उसके पीछे राजा का हाथ मानते हुए, तत्काल प्रतिबंध उठा लेने का निर्देश दिया। दबाव में आकर राजा वैसा ही आदेश देना पड़ा। अंततः चावल तथा चावल उत्पादों के निर्यात से प्रतिबंध हटा लिया गया। जनता पर इसका उल्टा असर पड़ा। उन्हें अकाल का डर सताने लगा। अफवाहों ने काम किया। लोग गुस्से से उबलने लगे।

चावल और धान के निर्यात की अनुमति का असर स्थानीय बाजारों में आपूर्ति पर पड़ा। परिणामस्वरूप उनके दाम तेजी से बढ़ने लगे। अफवाहों का बाजार पुनः गर्म हो गया। स्त्रियों के अहिंसक आंदोलन का पहला निशाना बनीं खुमुककेम(Khumukcham Tclchcu vhc) चावल मिल, जो चावल के निर्यात में अग्रणी थी। आंदोलनकारी महिलाओं ने मिल बंद करने को विवश कर दिया। उसके बाद वे साहसी महिलाएं सीधे राजनीतिक प्रतिनिधि क्रिस्टोफर जिमसन के सहायक टी। ए। शार्पे के पास पहुंचीं तथा उससे चावल निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की मांग की। उनका आक्रोश देख शार्पे ने अगले दिन तक संबंधित आदेश जारी करने का आश्वासन दिया। उसके बाद आंदोलनकारी महिलाएं वापस लौट आईं। मगर आंदोलन का यही समापन नहीं था। अगले दिन बाजार में काम करने वाली महिलाओं ने बिक्री के लिए आए धान की गाड़ियों को अपने कब्जे में ले लिया। कब्जे में लिए गए धान को इकट्ठा कर वे दरबार की इमारत के आगे पहुंचीं तथा किसी भी सूरत में धान और चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की मांग करने लगीं।

महिलाओं का आक्रोश देख दरबार के सदस्य एक-एक कर बाहर निकल गए। केवल राजनीतिक प्रतिनिधि वहां रह गया। महिलाएं घेरा डाले पड़ी थीं। वे उससे निर्यात पर तत्काल प्रतिबंध की मांग कर रही थीं। फंसे हुए राजनीतिक प्रतिनिधि ने महाराज की अनुपस्थिति में प्रतिबंध के आदेश देने में असमर्थता प्रकट की। इसपर औरतों ने कहा कि वे महाराज को टेलीग्राम कर, तत्काल आने को कहें। उग्र महिलाओं ने राजनीतिक प्रतिनिधि को अपने साथ तार-घर तक चलने को विवश कर दिया। आंदोलनकारियों का व्यवहार देखकर राजनीतिक प्रतिनिधि ने असम रायफल्स के कमांडर बुलफिल्ड को संदेश भेजकर स्थिति से परचाया। हालात की गंभीरता समझते हुए बुलफिल्ड फौज की टुकड़ी के साथ वहां पहुंच गया। पुलिस बल को वहां देख आंदोलनरत महिलाओं का गुस्सा और भी बढ़ गया। उसकी परिणति महिलाओं और सिपाहियों के बीच झड़प के रूप में हुई। घायल महिलाओं को इंफाल के अस्पताल में भर्ती कराया गया। अगले दिन महाराज की ओर से चावल के निर्यात पर प्रतिबंध के आदेश आ गए। उसके अनुसार असम रायफल्स की कोहिमा और इंफाल छावनियों को छोड़कर बाकी निर्यात को प्रतिबंधित कर दिया गया था।

उसी दिन आदेश पर अमल के लिए महिलाएं दुबारा राजनीतिक प्रतिनिधि और इंजीनियर के आफिस पहुंचीं। उन्होंने दोनों को अपने साथ चलने के लिए विवश कर दिया। दोनों अधिकारियों को साथ लेकर आंदोलनकारी महिलाएं चावल मिलों तक पहुंची। वहां उन्होंने मिलों के विद्युत कनेक्शन काटने के लिए विवश कर दिया। ख्वारेमबंद बाजार में पूरे सात दिनों तक हड़ताल रही। आंदोलनकारी महिलाओं ने बाजार पहुंचकर माल बेचने बैठे दुकानदारों का सारा सामान उलट-पुलट दिया। इतने प्रयासों के बावजूद बाजार में चावल का भाव गिर नहीं रहा था। महिलाओं ने पाया कि प्रतिबंध के बाद भी दुकानदार माल को मुनाफे के लिए यहां से वहां ले जा रहे हैं। उसे रोकने के लिए 28 दिसंबर को महिलाओं का एक जत्था इंफाल के निकट केसमपेट नाम स्थान पर पहुंचा। वहां उन्होंने चावल से लदी नौ गाड़ियों को गुजरते हुए देखा। महिलाओं ने उन गाड़ियों को अपने अधिकार में ले लिया। उन्होंने गाड़ीवान पर दबाव डाला कि वह चावलों को एक रुपया बारह आना प्रति मन(चालीस सेर) के हिसाब से बेचे। चावलों का व्यापारी उस माल को सीधे दुकानदारों को, ऊंचे दाम पर बेचना चाहता था। उसके कहने पर गाड़ीवान ने चावल को सस्ता बेचने से इन्कार कर दिया। इसपर आंदोलनकारी महिलाएं भड़क गईं। कुपित महिलाओं ने सारा चावल बिखेर दिया और गाड़ीवान को मारने के लिए चढ़ गईं। अभी तक महिलाओं का आंदोलन अहिंसक चल रहा था। लेकिन ख्वारेमबंद बाजार और केसमपेट की घटनाओं में महिलाओं का उग्र रूप सामने आया था। इसके बाद शासन को आंदोलनकारियों पर बल प्रयोग का बहाना मिल गया। पुलिस बल ने हस्तक्षेप करते हुए आंदोलनकारी महिलाओं को गिरफ्तार कर लिया।

दूसरा ‘नुपी-लेन’ लगभग 14 महीनों तक चला था। इतने दिनों तक महिला बाजार भी अस्त-व्यस्त रहा। महिलाएं वहां माल बेचने पहुंचतीं तो पुलिस बल निगरानी के लिए पहुंच जाता। इससे आंदोलनकारियों में फूट पड़ने लगी। बावजूद इसके उस ‘नुपी-लेन’ की सफलताएं कम नहीं थीं। असम रायफल्स की दो छावनियों को छोड़कर चावल बाहर भेजने प्रतिबंध लग चुका था। आंदोलन का असर वाखई सेल, मांग्बा-सेंग्बा, चंदन शेखई जैसे कानूनों पर भी पड़ा था। उसने पूरे मणिपुरी समाज को जाग्रत करने का काम किया था। फलस्वरूप मणिपुर में कानून के राज्य और संवैधानिक सुधारों का मार्ग प्रशस्त हुआ। आंदोलन के दौरान महिलाएं बजाय किसी नेता के ‘मणिपुर माता की जय’ के साथ आगे बढ़ती थीं। मणिपुर में ‘वंदेमातरम’ गीत सबसे पहले दूसरे नुपी-लेन के दौरान गूंजा था।

दूसरे नुपी-लेन की एक विशेषता यह भी थी कि अपनी एकता, संगठन सामर्थ्य और सूझबूझ के कारण महिलाओं ने शासन-प्रशासन को अपने पीछे चलने के लिए विवश कर दिया था। बावजूद इसके उस आंदोलन के लिए किसी भी महिला को सजा नहीं हुई। पिछले 12 दिसंबर 2018 को राज्य सरकार द्वारा राजधानी इंफाल में ‘नुपी लेन दिवस’ के रूप में, राजकीय स्तर पर बड़ी धूमधाम से मनाया गया। उसमें राज्य सरकार ने निर्णय लिया कि आंदोलन के साक्षी रहे, कासिमपेठ से संजेनथोंग(इंफाल) मार्ग का नामकरण दूसरे नुपी लेन की आंदोलनकारी ‘इमास’(माओं) और इच्स(बहनों) की याद में ‘नुपी लेन रोड़’ के रूप में किया जाएगा।

ओमप्रकाश कश्यप