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भक्ति-वेदांत : बहुजन समाज को बौद्धिक दास बनाए रखने का ब्राह्मणवादी प्रपंच

सामान्य

जाति बहुजन के गले की फांस है, वही मुट्ठी-भर लोगों के लिए उनके विशेषाधिकारों का सुरक्षा-कवच है। ब्राह्मण तथा दूसरे सवर्ण नहीं चाहते कि जातिप्रथा समाप्त हो। वे तो चाहते हैं कि शूद्र सदैव शूद्र, दलित हमेशा दलित बना रहे। इसके लिए कदम-कदम पर साजिशें रची जाती हैं। यह षड्यंत्र जितना सामाजिक दिखता है, उससे कहीं ज्यादा मनोवैज्ञानिक है। जितना हिंसक है, उतना अहिंसक भी है। ब्राह्मणों की सदैव कोशिश होती है कि दलित और शूद्र दोनों दिलो-दिमाग से उनके अधीन बने रहें। वे जहां भी, जिस हालत में भी हैं, उसी को अपनी नियति मान लें। इसके लिए वे न केवल गैर-ब्राह्मणों की संस्कृति में जबरन दखलंदाजी करते हैं, बल्कि उनसे उनका इतिहास, उनके महापुरुष तक छीन लेते हैं। चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले ‘भक्तमाल’ से एक दृष्टांत—

‘रामानंद जी का एक ब्रह्मचारी शिष्य था। वह नित्य चून की चुटकी मांगकर लाता। उसी से ठाकुर का भोग लगता, और उसी से संतों का सत्कार किया जाता था। कुटिया के आसपास एक बनिया रहता था। उसने दस-बीस बार ब्रह्मचारी से सीधा लेने का आग्रह किया, किंतु स्वामी जी की आज्ञानुसार उसने कभी उस बनिये से भिक्षा लेना स्वीकार नहीं किया था। एक दिन मूसलाधार वर्षा हो रही थी। भिक्षा द्वारा अन्न-संग्रह करना भी आवश्यक था। उस दिन गुरु-आज्ञा का उल्लंघन कर, ब्रह्मचारी बनिये द्वारा दिया गया सीधा ले आया। गुरु ने उससे बने हुए पदार्थ को मूर्ति के सामने भोग के लिए रखा और ध्यान किया तो प्रभु की मूरत ध्यान में नहीं आई। इसपर उन्होंने शिष्य से पूछा—‘अरे! आज भीख कहां-कहां से मांगकर लाए हो?’

शिष्य ने सच बता दिया। तब गुरु ने उस दुकानदार के बारे बताया। मालूम हुआ कि वह अत्यंत नीच मनोवृत्ति का है। रुपये के लोभ से एक चमार से साझा कर, व्यापार करता था। स्वामीजी ने इसपर शिष्य को शाप दिया—‘चूंकि तूने गुरु की आज्ञा का उल्लंघन किया है, अतः तू हीन-कुल में जन्म ग्रहण करेगा। वही शिष्य दूसरे जन्म में रैदास नाम से एक चमार के घर के घर पैदा हुआ।’1 

इस मिथकीय आख्यान के निहितार्थों पर चर्चा बाद में, पहले दृष्टांत का अगला हिस्सा—

‘बालक रैदास को अपनी माता का दूध पीना तो दूर रहा, उसके शरीर का स्पर्श करना भी बुरा लगता था। गुरु सेवा के प्रभाव से उसे पिछले जन्म की सब याद बनी रही। वह सोचता यदि चमार के यहां भिक्षा मांगने से यह दंड मिला है, तब यदि दूध पी लूंगा तो न जाने क्या गति होगी! इसी बीच स्वामी रामानंद जी को आकाशवाणी हुई कि तुम्हारा शिष्य चमार के घर जन्मा है, उसकी सहायता करिए। सुनकर उनके हृदय को बड़ा कष्ट हुआ। वे तुरंत वहां पहुंचे जहां रैदास जन्मे थे। बच्चे के दूध न पीने के कारण माता-पिता बहुत दुखी थे। स्वामी रामानंद को देखते ही वे उनके पैरों पर गिर पड़े और प्रार्थना की कि कुछ ऐसा उपाय करिए जिससे बच्चा दूध पीने लगे। इसपर रामानंदजी ने बालक को वहीं राम नाम(रं रामाय नमः) की दीक्षा देकर अपना शिष्य बनाया। फलस्वरूप उसके सब पाप धुल गए; और वह मां का दूध पीने लगा। दूध पीते ही बच्चे का मानो पुनर्जन्म हो गया और वह स्वामी रामानंद को ईश्वर करके मानने लगा। उसका पूर्वजन्म की भूल का सारा संताप मिट गया।2

आगे दिए गए विवरण के अनुसार, बड़ा होने पर रैदास भक्ति में लीन रहते। घर आए साधु-संतों की पूजा, आदर-सत्कार करते। मजदूरी करके जो कमाते, उसे भिखारियों में बांटकर बचे हुए को आप खाते। धन और मोह-माया से पूरी तरह निर्लिप्त। आखिरकार, नाभादास के शब्दों में— 

‘भगवान की कृपा के फलस्वरूप श्रीरैदास जी ने इसी मर्त्य शरीर से परम-पद प्राप्त किया और राजसिंहासन पर बैठे। अपने शरीर में यज्ञोपवीत का चिन्ह दिखाकर, अपने लोगों को यह विश्वास दिलाया कि आप पूर्व जन्म में ब्राह्मण थे।’3

‘भक्तमाल’ को भक्तिभाव से पढ़ने वालों से पूछा जा सकता है कि जिस घर में चमड़ा पकाया जाता हो, जो वर्ण-व्यवस्था के हिसाब से अतिशूद्रों और चांडालों की बस्ती हो—वहां रामानंद जैसा ब्राह्मण भला कैसे जा सकता है? यह शंका भी जायज होगी कि एक अबोध शिशु कथित राम-मंत्र को कैसे हृदयंगम कर सकता है? सवाल यह भी है कि जन्म के तुरंत बाद मां की जाति के कारण उसका दूध त्याग देने वाला अबोध शिशु, उसके गर्भ में कैसे रहा था? और राम-नाम का रट्टा मारने से ही यदि ‘रैदास’ बनना संभव था, तो रामानंद के कथित 52 के 52 शिष्यों को रैदास जैसा महाज्ञानी बन जाना चाहिए था, फिर वे क्यों नहीं बन पाए? लेकिन भक्तिमार्ग आस्था पर टिका होता है। भक्त को सवाल उठाने की अनुमति वह नहीं देता। चूंकि मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है, इसलिए कह सकते हैं कि भक्तिमार्ग, जिसे कुछ लोग भक्ति-वेदांत भी कहते हैं—मनुष्य के विवेकीकरण का अवरोधक, समाज को अपने जाल में फंसाए रखने के लिए ब्राह्मणवादी प्रपंच हैं। 

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रैदास ने कहीं भी रामानंद को अपना गुरु स्वीकार नहीं किया है। उन्होंने न केवल ब्राह्मणों द्वारा स्थापित वर्ण-व्यवस्था और धर्माडंबरों की आलोचना की, अपितु शूद्र होने के कारण जिन वेदों को पढ़ने का अधिकार उन्हें नहीं था, जिनके सुनने मात्र से दंड का सहभागी बनना पड़ता हो—उन्हें प्रामाणिक मानने से ही इन्कार कर दिया—

चारिउ वेदि किया खण्डोति

ताको विप्र करै दंडोति। 

            ***

जग में वेद वैद्य जानये

पढ़त समझ कुछ न आवत

रैदास की तरह कबीर को भी नहीं बख्शा गया। उनके जन्म के बारे में फैलाई गई कहानी, श्यामसुंदर दास के शब्दों में, कुछ इस प्रकार है—

‘काशी में एक सात्विक ब्राह्मण रहते थे। वे स्वामी रामानंद के बड़े भक्त थे। उनकी एक विधवा कन्या थी। उसे साथ लेकर एक दिन वे रामानंद के आश्रम पर गये। प्रणाम करने पर स्वामी रामानंद ने उसे पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया। ब्राह्मण देवता ने चौंककर जब पुत्री का वैधव्य निवेदन किया तब स्वामी ने सखेद कहा कि मेरा वचन तो अन्यथा नहीं हो सकता है। इतने से संतोष करो कि इससे उत्पन्न पुत्र बड़ा प्रतापी होगा। आशीर्वाद के फलस्वरूप जब उस ब्राह्मण कन्या को पुत्र उत्पन्न हुआ तो लोकलज्जा और लोकापवाद के भय से उसने उसे लहर तालाब के किनारे डाल दिया।4 वही बालक बाद में नीरू नामक जुलाहे के घर पला-बढ़ा और श्यामसुंदर दास के शब्दों में, ‘परम भगवद्भक्त कबीर’ हुआ। कबीर के सूर-तुलसी की तरह भक्तिमार्गी होने में किसी प्रकार का संदेह न रह जाए, इसलिए बाद में उन्हें रामानंद का शिष्य दर्शाने के लिए कहानी भी गढ़ी गई। यह बात अलग है कि रैदास की तरह कबीर भी ब्राह्मणों और पुरोहितों के कर्मकांडों, पूजा-पाखंडों के विरोधी बने रहे। वेदों की दुहाई देने वाले ब्राह्मणों तथा उनकी बनाई गई हर व्यवस्था पर उन्होंने जमकर कटाक्ष किया है। ‘वेद पढ़ते हैं और आत्मप्रशंसा करते हैं। लेकिन मन से संशय की गांठ आज भी नहीं छूटती— 

     पढ़ें वेद और करें बढ़ाई,

     संशय गांठि अजहुं नहिं जाई।।  

कबीर की कविता जीवन-सत्य की खोज की कविता है। उसके लिए बाह्याडंबरों का आमूल बहिष्कार आवश्यक है। धर्म और जाति के नाम पर मिथ्याभिमान वहां चल नहीं सकता—

कबिरा का घर सिखर पै जहां सिलहली गैल

पांव न टिकै पिपीलिका पंडित बांधै बैल

कबीर ज्ञान के शिखर पर विराजमान हैं। वहां का रास्ता फिसलन-भरा है। चींटी(बौद्धिक रूप से क्षुद्र लोगों) का वहां पहुंचना असंभव है; और पंडित उसे ज्ञानाडंबर और मिथ्याभिमान के जरिये प्राप्त करना चाहते हैं।  

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सवाल है कि रैदास, कबीर जैसी प्रतिभाओं के ब्राह्मणीकरण के पीछे क्या ब्राह्मणों की उदारता है? क्या ऐसी कोशिशें वर्ण-व्यवस्था को लचीला दर्शाने के लिए की जाती है? क्या शूद्रातिशूद्र वर्ग के महापुरुषों-मनीषियों को ब्राह्मणत्व या कभी-कभी ‘ईश्वरत्व’ मिलने पर, बहुजन समाज को खुश होना चाहिए? प्रसन्न होना चाहिए कि उनमें से कम से कम एक व्यक्ति तो खुद को जाति की जलालत से बाहर निकालने में सफल हुआ? अगर बहुजन समाज ऐसा ही सोचता है, तो यह सचमुच ब्राह्मणवाद की जीत है। इसका मतलब होगा कि उसने जाति-व्यवस्था को, जो प्राकृतिक एवं सामाजिक न्याय दोनों के विपरीत है—स्वीकार कर लिया है। उस हालत में वे समझ ही नहीं पाएंगे कि किसी एक युग-प्रवर्त्तक महापुरुष के ब्राह्मणीकरण(अथवा ईश्वरीकरण), परिवर्तन की बनती हुई संभावनाओं को एकाएक खारिज कर देने जैसा है। ब्राह्मणीकरण के साथ ही वह ‘महापुरुष’ अपना सारा तेज गंवा देता है। अपने नए ‘अवतार’ में वह उन्हीं बातों का समर्थन करता हुआ नजर आता है, जिनके विरुद्ध कभी उसने आवाज उठाई थी। इस तरह एक उभरता हुआ आंदोलन असमय ही दम तोड़ने लगता है।

गैर-ब्राह्मण महापुरुषों का ब्राह्मणीकरण कर, उन्हें उनके समाज से छीन लेने की प्रवृत्ति और तरीका बहुत पुराना है। इसी प्रवृत्ति के चलते दो हजार वर्ष पहले ब्राह्मणों ने गौतम बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित किया था। यही प्रवृत्ति वाल्मीकि को ब्राह्मण संतान घोषित करते समय काम कर रही थी। इसके लिए वे संबंधित व्यक्ति के जीवन या कथित पूर्वजन्म/जन्मों के बारे में, कोई न कोई चमत्कारपूर्ण आख्यान गढ़ लेते है। लोकश्रुति या शास्त्रों के माध्यम से उसे प्रचारित भी कर लेते हैं। जरूरत पड़े तो उसे पुराणों और दूसरे धर्मग्रंथों में जगह देकर ब्राह्मण-परंपरा का हिस्सा बना लेते हैं। ऐसा करते समय वे मनमानी छूट लेते हैं। जिसके अंतर्गत संबंधित महापुरुष के क्रांतिकारी विचारों को तोड़-मरोड़कर इस तरह पेश किया जाता है कि अंततः वे ब्राह्मणवाद के पोषक, समर्थक और पूरक नजर आने लगते हैं। लोकश्रुतियों/शास्त्रों का हवाला देकर वे भोले-भाले लोगों को, यह विश्वास दिलाने लगते हैं कि उस महापुरुष की विशिष्ट मेधा तथा उसका योगदान, केवल उसकी अपनी प्रतिभा, श्रम और समर्पण का सुफल न होकर दैवीय अनुकंपा की देन है। उस अवस्था में उसके अनुयायी, महापुरुष के विचारों को पढ़ने-समझने तथा उनसे प्रेरणा लेने के बजाय, उन्हें पूजने लग जाते हैं। उन्हें लगता है कि उनके (गैर-ब्राह्मण)महापुरुष की इज्जत अफजाई के लिए ब्राह्मण खुद आगे आ रहे है। अतिविश्वास में वे यह भी मानने लगते हैं कि ब्राह्मणों की नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी जैसी कठोर नहीं है। इससे उनके मन में ब्राह्मणों तथा उनकी व्यवस्था के प्रति आक्रोश घटने लगता है। यानी एक महापुरुष का ब्राह्मणीकरण, चाहे वह झूठमूठ ही क्यों न हो, उसके समाज के ब्राह्मणीकरण के दरवाजे भी खोल देता है। इससे परिवर्तन की प्रक्रिया, जो महापुरुष द्वारा ब्राह्मणवाद को चुनौती के फलस्वरूप आरंभ हुई थी, धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती है। 

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परिवर्तन के लिए समाज में परिवर्तन की इच्छा का होना भी आवश्यक है। वर्तमान के प्रति असंतोष जितना प्रबल होगा, उसे बदलने की इच्छा भी उतनी ही तीव्रतर होगी। उसके लिए उदात्त, सकारात्मक एवं यथार्थोन्मुखी प्रेरणाएं अपरिहार्य हैं। ब्राजील के शिक्षाशास्त्री पाब्लो फ्रेरा के शब्दों में—‘उत्पीडि़तों को अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष में सफल होने के लिए यथार्थवादी होना पड़ेगा। उन्हें उत्पीड़न के यथार्थ को ऐसी बंद दुनिया के रूप में हरगिज नहीं देखना चाहिए, जिससे निकल पाना असंभव है। उन्हें उसको ऐसी अवरोधक स्थिति के रूप में देखना चाहिए, जिसे वे बदल सकते हैं।’5 बहुजन मुक्ति के लिए भी ऐसी दृष्टि चाहिए जो धर्मशास्त्रों और सांस्कृतिक परंपराओं, रिवाजों में अंतनिर्हित सत्य की बहुजन-दृष्टि से पड़ताल कर सके। उनके बारे में स्थापित सत्य के विखंडन एवं नवोन्मेषण द्वारा वास्तविक और जनोन्मुखी सत्य को सामने ला सके। यहां छांदोग्योपनिषद का एक दृष्टांत द्रष्टव्य है—

‘विद्याध्ययन को उत्सुक सत्यकाम हरिद्रमुत गौतम के आश्रम में पहुंचा। शिष्य बनाने से पहले हरिद्रमुत ने आगंतुक से उसके कुल-गौत्र के बारे में पूछा। वापस आकर सत्यकाम अपनी मां से मिला। पूछने पर उसकी मां ने बताया—‘उन दिनों मैं घर-घर चक्की पीसने का काम करती थी। वहां किसके संसर्ग से तू मेरे गर्भ में चला आया, मुझे नहीं पता….’ सत्यकाम दुबारा हरिद्रमुत के आश्रम में पहुंचा। पूछने पर बोला—‘मेरी मां एक पिसनहारी है। उसका कहना है कि घर-घर जाकर काम करते हुए मैं कब उसके गर्भ में चला आया, उसे पता ही नहीं चला। मैं सत्यकाम हूं। मेरी मां का नाम जाबाला है। सो मैं सत्यकाम जाबालि हुआ।’ यह सुनकर हरिद्रमुत प्रसन्न होकर बोले—‘इतना सत्यभाषी बालक सिवाय ब्राह्मण के और कौन हो सकता है। जा समिधा ले आ। मैं तुझे दीक्षा दूंगा।’

यह कहानी प्राचीन वर्ण-व्यवस्था के उदात्त पक्ष के रूप में अकसर दोहराई जाती है। इस तरह कि पढ़ने-सुनने वाला गदगद् हो जाता है। सर्वपल्ली राधाकृष्णन सहित अनेक विद्वानों ने प्राचीन भारत के दर्शन एवं संस्कृति का विवेचन करते समय इसका उल्लेख किया है। उनके प्रभाव में मान लिया जाता है कि वर्ण-व्यवस्था की आरंभिक संकल्पना एकदम दोष-विहीन थी। सदियों से ब्राह्मणों के बताए झूठ को सच मानता आया बहुजन मानस इसके ठेठ ब्राह्मणवादी निहितार्थ को समझ ही नहीं पाता। हरिद्रमुत गौतम यह कहकर कि इतना सत्यभाषी बालक सिवाय ब्राह्मण के और कौन हो सकता है, पूरे गैर-ब्राह्मण समुदाय को मिथ्याभाषी घोषित कर देते हैं। यही नहीं वे घर-घर जाकर चक्की पीसने वाली गरीब-मजबूर स्त्री के यौन-शोषण को भी नजरंदाज कर देते हैं, जो उस समाज में स्त्री की दुर्दशा को दर्शाता है। धर्मशास्त्रों में इस तरह के प्रसंग भरे पड़े हैं। उन्हें समझने के लिए उनकी बहुजन दृष्टि से पड़ताल जरूरी है। फुले इसकी शुरुआत बहुत पहले कर चुके थे। बाद में डॉ. आंबेडकर, पेरियार आदि ने इसे विस्तार दिया। समकालीन बुद्धिजीवियों में कांचा इलैया, डॉ. धर्मवीर ऐसे ही मौलिक व्याख्याकार हैं।  

माओत्से-तुंग ने कहा था कि सत्ताएं बंदूक की गोली से निकलती हैं। यह उनका सच था। सत्ताएं बंदूक की गोली से निकल सकती हैं। मगर इतिहास उनका नहीं होता जिनके हाथों में तलवार होती है। इतिहास उनका होता है जिनके हाथों में कलम होती है। अगर तलवार के जोर पर कलम वाले हाथों को मनमाना इतिहास गढ़ने को मजबूर कर भी दिया जाए तो वह रचना अस्थायी होती है। मुक्त होते ही कलम वाले हाथ, इतिहास को नया रूप देने लगते हैं। अतएव ब्राह्मणवाद के स्वार्थपूर्ण और अवांछित हस्तक्षेप से बचने का एकमात्र रास्ता है कि बहुजन बुद्धिजीवी आगे आएं; वे अपनी मेधा को तराशें तथा धर्म और संस्कृति के नाम पर थोपे गए प्रतीकों-मिथों के निर्माण के पीछे ब्राह्मणवादी षड्यंत्र को समझते हुए, न्याय, स्वतंत्रता और समानतावादी दृष्टि से उनकी पुनर्व्याख्या करें। यह बहुजन अस्मिता और सम्मान की रक्षा का एकमात्र तरीका है। 

ओमप्रकाश कश्यप

  1.  रामानंदुजू कौ शिष्य ब्रह्मचारी रहे एक गहे वृत्ति चुटकीकी कहे तासों बानियों। 

करौ अंगीकार सीधो दस-बीस बार बरसे प्रबल धार तामें वापै आनियों।

भोग कों लगावै प्रभु ध्यान नहीं आवै अरे कैसे करि ल्यावै जाय पूछी नीच मानियों।

दियो शाप भारी बात सुनी न हमारी घटि कुल में उतारि देहि सोईं याको जानियों—श्रीभक्तमाल, नाभादास, भक्ति-रस-बोधिनी-टीका, व्याख्याकार श्रीरामकृष्णदेव गर्ग, श्री अखिल भारतीय  श्रीनिंबार्काचार्य पीठ, वृंदावनधाम, 1960।)

  • माता दूध प्यावै याकों छुयोऊ न भावै सुधि आवै सब पाछिली सुसेवा कों प्रताप है

भई नभ-बानी रामानंद मन जानी बड़ो दंड दियो मानी वेगि आयो चल्यौ आप है

दुखी पितु-मात देखि धाय लपटाये पाय कीजिए उपाय किये शिष्य गयो पाप है। 

स्तन पान किसी जियो जिलयो उन्हें ईस जाति निपट अज्ञानि फेरि भूले भयो ताप है। —वही

  • भगवत कृपा प्रसाद परम गति इहि तन पाई

राजसिंहासन बैठि ग्याति परतीति दिखाई—वही

  • श्यामसुंदर दास द्वारा संपादित ‘कबीर ग्रंथावली’ की प्रस्तावना, हिंदी समय।
  • पाब्लो फ्रेरा, उत्पीडि़तों का शिक्षाशास्त्र, रमेशचंद शाह द्वारा अनूदित, ग्रंथशिल्पी, नई दिल्ली।

धर्म के बहाने बौद्धिक जड़ता का सनातनीकरण

सामान्य

आधुनिकता की ओर बढ़ती आज की दुनिया के आगे सर्वाधिक ज्वलंत प्रश्न है—क्या दुनिया को धर्म की सचमुच जरूरत है? क्या उसके बिना उसका कारोबार एकदम थम जाएगा? धर्म के आलोचक आज भी कम नहीं हैं। धर्मानुयायी मानते हैं कि आलोचक धर्म के मर्म को समझ ही नहीं पाते। यह बात अलग है कि स्वयं धर्म के अनुयायी भी उसे पूरी तरह समझने का दावा नहीं करते। धर्म की आलोचना, अन्वीक्षा से वे प्रायः यह कहकर पीछे हट जाते हैं कि उसे  समझना आसान नहीं है। इसके पीछे उनकी मंशा धर्म के नाम पर गुरुडम को थोपने तथा उसे ‘नेति-नेति’ कहते हुए इतना महान बना देने की होती है कि सामान्य आलोचना-समीक्षा को भी समाज और राष्ट्रीय भावना के विरुद्ध मान लिया जाता है। असल में वे तयशुदा सीमाओं से, उन सीमाओं से जो उन्होंने धर्म से बंधकर अपने लिए सहर्ष चुनी हैं, अथवा किसी न किसी बहाने उनपर थोप दी गई हैं, बाहर आना ही नहीं चाहते। न ही वे चाहते हैं कि उनका कोई अनुयायी उस सीमा रेखा को लांघने की हिमाकत करे। हम धर्म को ऐसी हवेली मान सकते हैं, जिसके अनेकानेक दावेदार हैं। कदाचित इसी कारण वह हजारों वर्षों से बंद है। ताजी हवा का प्रवेश भी उसमें निषिद्ध है। यहाँ तक कि उसके भीतर झांकने की इजाजत भी किसी को नहीं है। यदि कोई उस हवेली के भीतर जाकर झाड़-पौंछ करना चाहे तो उसके दावेदार नाराज हो जाते हैं। डरते हैं कि हवेली साफ हुई तो उनकी सत्ता गई। बाहरी हस्तक्षेप को रोकने के लिए वे कई बार इतनी कुटिल चालें चलते हैं कि बड़े-बड़े प्रतिभाशाली उनके आगे घुटने टेक देते हैं। जनसाधारण को बस इतनी अनुमति होती है कि अपने विवेक को गिरवी रखकर उस हवेली के दूर से ही दर्शन कर सके।

ऐसा आज से नहीं, सैकड़ों वर्षों से है। मध्यकाल में इसका सटीक उदाहरण मीमांसक कुमारिल भट्ट हैं। अपने समय के विलक्षण प्रतिभाशाली कुमारिल भट्ट ने बौद्ध विद्वानों को शास्त्रार्थ में परास्त करने के लिए बौद्ध दर्शन का अध्ययन किया था। वे अपने मकसद में कामयाब भी हुए। बौद्ध पराजित हुए। लेकिन कुमारिल भट्ट अपनों से हार गए। प्रायश्चित स्वरूप उन्हें धीमी आंच में तपकर मृत्यु का वरण करना पड़ा। केवल इसलिए कि उन्होंने गुरु की अनुमति लिए बिना बौद्धमत का अध्ययन किया था। हिंदू धर्म में व्याप्त जड़ता, गुरुडम तथा नए और समकालीन ज्ञान-विज्ञान से जान-बूझकर बनाई गई दूरी को समझने के लिए यहाँ उनकी विशेष चर्चा प्रासंगिक है।

शंकराचार्य से एक पीढ़ी, लगभग 650 ईस्वी पूर्व जन्मे कुमारिल भट्ट वैदिक परंपरा में विश्वास रखते थे। तिब्बतीय बौद्ध ग्रंथों के हवाले से यह भी बताया गया है कि कुमारिल भट्ट के पास धान का विशाल खेत था, जिसमें 500 पुरुष और इतनी ही स्त्रियां दास के रूप में काम करते थे। उन दिनों भारत में बौद्ध दर्शन का बोलबाला था। कुमारिल भट्ट मानते थे कि बिना बौद्ध धर्म-दर्शन के पराभव के वैदिक परंपरा का पुनर्जीवन असंभव है। वैदिक धर्म को पुनःस्थापित करने की प्रेरणा उन्हें एक राजकुमारी से मिली थी। राजकुमारी बौद्ध दर्शन से घबराई हुई थी। बौद्ध दर्शन सनातन वर्ण-व्यवस्था और वंशगत अधिकारों का विरोध करता था। द्विज वर्ग की परंपरागत श्रेष्ठता के विचार को अस्वीकार करते हुए वह निर्वाण(मोक्ष) को सर्वसाधारण के लिए संभव बताता था। राजकुमारी को डर था कि बौद्ध धर्म के प्रभाव के चलते उसके वंशगत अधिकार उससे छिन सकते हैं। अद्वितीय प्रतिभा के धनी कुमारिल भट्ट उन दिनों वैदिक ग्रंथों के अध्ययन-अनुशीलन में लगे थे। गुरुजन उनकी मेधा से अत्यंत प्रभावित थे। वंशानुगत अधिकारों के छिन जाने की आशंका से बुरी तरह घबराई राजकुमारी कुमारिल भट्ट से मिलते ही रो पड़ी। उसने रोते-रोते ही अपनी व्यथा प्रकट की—

‘क्या करूं, कहां जाऊं, वेदों का उद्धार कौन करेगा?’

‘हे सुकुमारे! रो मत!! वेदों का उद्धार कुमारिल भट्ट करेगा’1 राजकुमारी के आंसुओं से विगलित युवा कुमारिल भट्ट के मुख से सहसा निकला। कहते हैं कि कुमारिल भट्ट ने उसी दिन से बौद्ध धर्म-दर्शन की प्रतिष्ठा को कम करना अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। उन दिनों बिना गुरु की अनुमति के किसी और धर्म-दर्शन की शिक्षा लेना अपराध माना जाता था। लक्ष्य-सिद्धि हेतु कुमारिल भट्ट ने पहले तो बौद्ध धर्म का गहरा अध्ययन किया। तदनंतर, राजकुमारी को दिए गए वचन का निर्वहन करते हुए उन्होंने बौद्ध धर्म-दर्शन की जमकर आलोचना की। यहां तक कि नालंदा जाकर उस समय के प्रसिद्ध बौद्ध आचार्यों को शास्त्रार्थ में पराजित भी किया। लेकिन अपने गुरु से छिपकर बौद्ध दर्शन की शिक्षा लेने की ग्लानि उन्हें लगातार सालती रही। इसलिए प्रायश्चित स्वरूप उन्होंने खुद को धीमी अग्नि शिखाओं के समर्पित कर दिया। बौद्ध धर्म-दर्शन के पराभव के लिए उन्होंने जो जमीन तैयार की, उसी पर चलते हुए वेदांती शंकराचार्य ने अपनी कीर्ति-कथा लिखी। इस योगदान हेतु वैदिक परंपरा के अनुयायी कुमारिल भट्ट को पहला बलिदानी ब्राह्मण मानते हैं।

वेदांत की ध्वजा फहराने के लिए निकले शंकराचार्य काशी-मार्ग में कुमारिल भट्ट से भी मिले थे। अपने मत को स्थापित करने के लिए वे उनसे शास्त्रार्थ करना चाहते थे। जिस समय शंकराचार्य कुमारिल के पास पहुंचे, वे स्वयं को धीमी अग्नि युक्त चिता को समर्पित कर चुके थे। उनकी टांगें और शरीर का निचला हिस्सा जल चुका था। उस अवस्था में वे शंकराचार्य से शास्त्रार्थ नहीं कर सकते थे। अतः उन्होंने अपने शिष्य मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ करने का सुझाव दिया। कुमारिल भट्ट को अग्नि-शैय्या पर झुलसता हुआ छोड़, शंकराचार्य वहां से चल दिए। धार्मिक दृष्टिकोण से वह भले ही कुमारिल भट्ट का प्रायश्चित रहा हो, लेकिन व्यापक अर्थों में क्या वह अवसाद-जनित आत्महत्या नहीं थी? यदि ऐसा है तो शंकराचार्य का कुमारिल भट्ट को अग्नि-चिता पर छोड़कर जाना क्या उचित था? क्या उनका यह कर्तव्य नहीं था कि वे कुमारिल भट्ट से आत्मदहन का इरादा त्याग देने का निवेदन करते? उन्हें उस आत्म-ग्लानि से बाहर लाने की कोशिश करते, जिसने आत्महत्या जैसा घृणित कदम उठाने को विवश किया था? सामान्य नैतिकता कहती है कि आत्महत्या को उद्यत व्यक्ति को, वह चाहे जिस कारण से प्राणांत चाहता हो, किसी भी प्रकार से रोका जाए। लेकिन जिस दौर की यह घटना है, उसमें धार्मिक आग्रह हठधर्मी की सीमा तक प्रभावी होते थे। धार्मिक वाद-विवाद प्रायः जीवन-मरण का सवाल बन जाता था। ऐसे में व्यक्ति के साथ उसके विचार का अंत भी स्वाभाविक था। शंकराचार्य से हारकर मींमासक मंडन मिश्र, वेदांती सुरेश्वराचार्य बनकर उसके प्रचार-प्रसार में लग जाते हैं। उसके बाद मीमांसा दर्शन बौद्धिक विमर्श और जीवन दोनों से गायब हो जाता है।

इस प्रसंग के कुछ खास संकेत हैं। पहला प्राचीन गुरु नहीं चाहते थे कि उनका शिष्य ज्ञान और यश में उनसे आगे जाए। दूसरे प्राचीन ऋषियों के लिए बौद्धिक शास्त्रार्थ शारीरिक कुश्ती से भी गया-गुजरा था। कुश्ती में हारा हुआ पहलवान नई तैयारी और हौसले के साथ उसी पहलवान को दुबारा चुनौती दे सकता है। लेकिन शास्त्रार्थ में विजेता, पराजित व्यक्ति के तन और मन दोनों पर अधिकार जमा लेता था। व्यक्ति के साथ उसकी विचारधारा भी पराजित मान ली जाती थी। केवल विजेता का धर्म रह जाता है। कुल मिलाकर विचार को भी अखाड़े में उतर कर प्रतिद्विंद्वी विचारधारा को चुनौती देनी पड़ती थी।

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जैन और बौद्ध धर्म-दर्शन इसके अपवाद थे। यहाँ जैन दर्शन की तो हमें खास तौर पर प्रशंसा करनी होगी। वैदिक हिंसा और गलाकाट बौद्धिक स्पर्धा के बीच उसने ‘स्याद्वाद’ का सिद्धांत सामने रखा था। वह विभिन्न विचारों को स्वतंत्र रूप से, एक-दूसरे के समानांतर बहने की अनुमति देने का उदारतापूर्ण विधान था। इसके अनुसार कोई भी विचार अंतिम सत्य नहीं है। प्रत्येक विचार अपने भीतर सत्य का कोई न कोई अंश छिपाए रखता है। वह पूरा सत्य हो ही नहीं सकता। चार अंधे एक ही बार में हाथी के पूर्ण रूप का बयान नहीं कर सकते। इसलिए उनमें से प्रत्येक द्वारा दिया गया विवरण, सत्य होने के बावजूद सत्य नहीं है। वह पूर्ण सत्य की एकांगी अथवा आंशिक अनुभूति है। ‘स्याद्वाद’ का दर्शन, वैदिक दर्शन की वैचारिक हिंसा के विरोध में उपजा था। लेकिन राजाओं के साम्राज्यवादी मनसूबे साधने के लिए युद्ध आवश्यक थे; और बगैर हिंसा के युद्ध लड़ना संभव ही नहीं था। ऐसे समाज में वैचारिक अहिंसा का कोई व्यावहारिक महत्व न था। अतः कालांतर में हिंसा को उसके स्थूल रूप; यानी केवल जैविक हिंसा तक सीमित मान लिया गया।

‘स्याद्वाद’ से पता चलता है कि जैन दर्शन में अहिंसा का अर्थ कहीं व्यापक था। उसकी कामना थी कि समाज में विभिन्न मतांतर वाले लोग, एक-दूसरे का सम्मान करते हुए जीवन जिएं। उनमें कोई द्वैष न हो। यदि वैचारिक लोकतंत्र होगा, तो लोग एक-दूसरे की भावनाओं का ख्याल रखेंगे, तभी समाज में वैचारिकता के प्रति अनुराग होगा। मगर केवल अपने विचारों को सर्वोपरि समझने, बताने की जिद के चलते, ‘स्याद्वाद’ का विचार समाज में गहरी जड़ें न जमा सका। यह बात भुला दी गई कि हिंसा प्रधान समाज में वैचारिक अहिंसा का टिके रहना असंभव है। वैचारिक लोकतंत्र के समर्थक, ‘स्याद्वाद’ जैसे दर्शन के कमजोर पड़ने का परिणाम यह हुआ कि ब्राह्मणों ने न केवल दूसरे विचारों की ओर से अपने आँख-नाक-कान बंद कर लिए, अपितु गैर-ब्राह्मण उनके धर्म-ग्रंथों के पढ़ न पाएँ, इसके लिए भी उनपर बड़े-बड़े प्रतिबंध थोप दिए।

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हम पुनः कुमारिल भट्ट की कहानी पर लौटते हैं। हमने जाना कि कुमारिल भट्ट को अग्नि-शिखाओं पर आसीन देखकर भी शंकराचार्य का हृदय मोम न हुआ। संभवत: उनकी उत्कृष्ट मेधा का भय शंकराचार्य को रहा हो। यह आशंका कि कुमारिल भट्ट जैसे विद्वान को पराजित करना शायद उनके लिए संभव न हो! यह भी संभव है कि  वेदोक्त धर्म-दर्शन के शीर्ष-पुरुष बनने की महत्वाकांक्षा के साथ निकले शंकराचार्य, ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना चाहते हों, जिससे उनपर वैदिक परंपरा का दोषी होने का आरोप लगाया जा सके। इसलिए उन्होंने कुमारिल भट्ट को बचाने की कोई कोशिश न की। आज शंकराचार्य के समर्थक उस प्रसंग को गोल-मोल कर जाते हैं। हिंदू परंपराओं के जानकार के लिए इसमें कुछ भी अजूबा नहीं है। परंपरानुगामी भारतीय मेधा घटनाओं के निष्पक्ष विवेचन के बजाय श्रद्धा को महत्व देती है। उसकी कोशिश व्यक्तिगत श्रद्धा को सामूहिक श्रद्धा में बदल देने की रहती है। उस समय यदि शंकराचार्य कुमारिल भट्ट को चिता से उबार लेते तो वेदांत भले ही न जीतता, लेकिन इंसानियत अमर हो जाती।

यहां एक किस्सा याद आ रहा है। रामानुजाचार्य को उनके गुरु ने एक मंत्र दिया था। मंत्र देते समय उन्होंने शिष्य रामानुज के कान में कहा—

‘बहुत पवित्र मंत्र है। जिसे बताओगे वह तर जाएगा।’

‘जी….गुरु जी।’ रामानुज ने गुरु का धन्यवाद किया।

‘लेकिन एक शर्त है। इस मंत्र को किसी अपात्र के समक्ष कभी प्रकट मत करना।’

‘अपात्र कौन?’

‘शूद्र, अछूत, स्त्री….शास्त्रों में उनका उल्लेख है।’

‘यदि मैं ऐसा करूं तो….’

‘घोर पाप….घोर पाप। सीधे रौरव नर्क में जाओगे।’

गुरुजी को दंडवत कर रामानुज वहां से चल दिए। रास्ते में उन्हें जो भी पात्र व्यक्ति दिखाई दिया, सभी को मंत्र दिया। गुरु को जब पता चला कि रामानुजाचार्य पात्र-अपात्र का ध्यान रखे बिना ही दीक्षा दे रहे हैं तो उन्होंने उन्हें बुलवाया, बरजा। गुरु के आदेश का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। तब रामानुजाचार्य ने कहा—

‘आप ही ने कहा था कि जो भी व्यक्ति इस मंत्र का पाठ करेगा, उसका उद्धार होगा?’

‘मैंने यह भी कहा था कि अपात्र को इस मंत्र की दीक्षा दी तो तुम सीधे रौरव नर्क में जाओगे।’

‘यदि मुझ अकेले के नर्क में जाने से इतने सारे लोगों को मुक्ति मिलती है तो मुझे सौ-सौ जन्मों तक नर्क स्वीकार्य है।’ रामानुज का उत्तर था।

इसकी प्रतिक्रिया में रामानुज के गुरु ने क्या कहा होगा, मालूम नहीं। लेकिन उनके साथ अप्रत्यक्ष स्पर्धा में जीत शंकराचार्य की हुई थी। कैसे? रामानुज विशिष्टाद्वैत दर्शन के प्रवर्त्तक थे, और शंकराचार्य अद्वैत के। रामानुज मानते थे कि आत्मा और परमात्मा एक ही हैं, मगर संसार में आकर उनकी अलग-अलग प्रतीति होती है। शंकराचार्य आत्मा और परमात्मा को एक मानते थे। ब्राह्मणों ने घोषित रूप से शंकराचार्य के मत को स्वीकार किया। इस्लाम के सूफीवाद की और से मिल रही चुनौती से निपटने के लिए यह जरूरी था। किंतु आत्मा और परमात्मा एक हैं, इस आधार पर सभी मनुष्य बराबर हैं—इस सत्य को वे कभी गले से नहीं उतार पाए।  

हम यह नहीं कहते कि रामानुज का विशिष्टाद्वैत आदर्श दर्शन है। असल में न तो स्वर्ग होता है, न ही नर्क। मुक्ति स्वयं एक मिथ है। अतएव ऊपर दी गई कहानी को उसकी प्रतीकात्मकता, यानी सामाजिक संदर्भों में समझना चाहिए। कहानी बताती है कि किसी काम से यदि एक व्यक्ति को नुकसान, मगर अनेक को लाभ पहुंचता है तो वह कार्य करणीय हो सकता है, और व्यावहारिक नैतिकता के दायरे में आता है। पूर्ण नैतिकता तब होगी जब बाकी सब लोग, व्यक्ति विशेष को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई करने की ठान लें।

अपने मान-अपमान और आलोचनाओं की चिंता किए बिना शंकराचार्य कुमारिल भट्ट जैसे मनीषी की प्राण रक्षा को आगे आते; तो वे मनुष्यता के लिए आदर्श उदाहरण पेश करते। मगर परंपरा से भयभीत शंकराचार्य उस अवसर की जानबूझकर उपेक्षा कर जाते हैं। बहरहाल, बौद्ध दर्शन के अध्ययन हेतु प्रस्थान करते समय कुमारिल भट्ट की मनःस्थिति को लेखक यशपाल ने खूब समझा था। वे लिखते हैं—

‘कुमारिल भट्ट दो बातें खूब समझते थे। पहली बात यह कि बौद्ध दर्शन उनकी प्रतिपालक और रक्षक द्विज श्रेणी के हित और अधिकारों पर आघात कर रहा है; और दूसरी बात, द्विज श्रेणी के सामाजिक और आर्थिक शासन की वेदोक्त व्यवस्था….द्विज श्रेणी के शासन के अधिकारों का विरोध करने वाले बौद्ध दर्शन की सत्य, अहिंसा और न्याय की मांग—द्विज श्रेणी के अधिकारों की हिंसा करती है। अतः बौद्ध दर्शन से ‘फाइट’ करना आवश्यक है।’2 

कुमारिल भट्ट के प्रायश्चित की घटना द्वारा हम, न केवल उनकी मनोरचना, अपितु तत्कालीन समाज के मनोविज्ञान को  भी समझ सकते हैं। उन दिनों धर्म, दर्शन और विचार की प्रामाणिकता को परखने के उपाय कभी-कभी इतने विचित्र, अविचारी और अस्वाभाविक होते थे कि आज उनपर विश्वास करना कठिन जान पड़ता है। कुमारिल भट्ट के जीवन का ही एक किस्सा और है। उन्होंने बौद्ध दर्शन के अध्ययन हेतु नालंदा विश्वविद्यालय में छद्म नाम से प्रवेश लिया था। बौद्ध विचारक वेदों को अप्रामाण्य और मानवकृत मानते थे। बौद्ध दर्शन को मिटाने के कुमारिल भट्ट के संकल्प के पीछे यही मुख्य वजह थी। जब उनके बारे में विश्वविद्यालय में पता चला तो सब बहुत कुपित हुए। कुछ शरारती लड़कों ने उन्हें सबक सिखाने का फैसला कर लिया। जब वे लड़के कुमारिल भट्ट को ढकेलने जा रहे थे, तब उन्होंने उन सभी को सुनाते हुए कहा था—

‘यदि वेद प्रामाण्य हैं तो मुझे कोई भी चोट नहीं पहुंचेगी।’

संयोगवश वे सकुशल बच गए। उसी दिन से कुमारिल ने मान लिया कि वेद स्वतः प्रामाण्य हैं। वह विवेक पर  अंधश्रद्धा की जीत थी। आत्मदहन से पहले कुमारिल भट्ट ने विपुल वाङ्मय की रचना की थी। लेकिन विलक्षण मेधा के बावजूद वे मीमांसा दर्शन को वह सम्मान दिलाने में नाकाम रहे, जिसके वे आचार्य थे। जिसके लिए उन्होंने बौद्धों को पराजित करने की कामना के साथ गुरु-द्रोह किया था। मंडन मिश्र के पराजित होते ही मीमांसा दर्शन लगभग पूरी तरह उखड़ गया।

शब्द की कसौटी शब्द; और विचार की कसौटी केवल विचार बन सकता है। बावजूद इसके चमत्कारों और संयोगों के माध्यम से किसी विचार या वस्तु को प्रमाणित करने की प्रवृत्ति भारतीय समाज में बहुत पुरानी है। रूढ़ियों को विचारधारा का रूप देने तथा विरोधी विचारों से सीख लेने के बजाय उन्हें मिटा देने के उदाहरण भी कई हैं। कहीं पढ़ा था कि उज्जैन नगरी में एक ऐसा तालाब था, जिसका उपयोग शास्त्रीय ग्रंथों की जांच के लिए कहा जाता था। तरकीब निराली थी। यदि ग्रंथ तैर जाए तो उसको मौलिक और महत्वपूर्ण मानकर सम्मान मिलता था। अगर डूब जाए तो उसे स्थायी जल-समाधि के लिए छोड़ दिया जाता था। समझ सकते हैं कि वह गुणवत्ता जांच के नाम पर ग्रंथ को ही मिटा देने की बौद्धिक वर्ग की साजिश थी। लोकश्रुति के अनुसार उस तालाब में पांच हजार से अधिक ग्रंथों को इसी तरह डुबोया गया था। बाद में उस तालाब को पाट दिया गया। इस तरह न जाने कितनी बहुमूल्य पांडुलिपियां, केवल इसलिए कि उनमें व्यक्त विचार शासन और उसके चहेते बुद्धिजीवी वर्ग की विचारधारा से मेल नहीं खाते थे, हमेशा-हमेशा के लिए दफन कर दिए गए।

बौद्ध काल में चार्वाक, लोकायत और आजीवक धर्म जैसी भौतिकवादी विचारधाराएं विमर्श में थीं। अजित केशकंबलि, मक्खलि घोषाल, पूर्ण कस्सप जैसे विचारक उनके पोषण में लगे थे। वैदिक परंपरा के पुरोहितों और आचार्यों से उनका शास्त्रार्थ चलता रहता था। इसके बावजूद इन विचारधाराओं से संबंधित स्वतंत्र ग्रंथ हमें प्राप्त नहीं होता। इसके पीछे तत्कालीन आचार्यों की विरोधी विचारधारा के प्रति असहिष्णुता रही है। संवैधानिक व्यवस्थाओं और लोकतंत्र के इस दौर में होना तो यह चाहिए कि हम इतिहास से कुछ सबक लें, किंतु विचार के नाम पर जड़ता और धर्म-दर्शन के नाम पर असहिष्णुता निरंतर बढ़ती ही जा रही है। शायद ऐसी ही परिस्थितियां डॉ.  आंबेडकर की बहुचर्चित पुस्तक ‘हिंदू धर्म की पहेलियां’ लिखने की प्रेरणा बनी थीं।

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धर्म से अपेक्षा की जानी चाहिए कि राजनीतिक और आर्थिक कार्य-कलापों से दूर, नैतिक व्यवस्था बने। लेकिन व्यवहार में वह ऐसा धंधा है जो बिना निवेश के स्थायी लाभ देता है। अमीर जनसाधारण की धार्मिक भावनाओं के दोहन के लिए मंदिर बनवाता है। नियमित पूजन-अर्चन के लिए पुजारी स्वयं हाजिर हो जाता है। जो कुछ ज्यादा अमीर है, वह पुजारी और पूजा का खर्च भी उठा लेता है। ऐसे धनाढ्य को मंदिर की ओर देखने की जरूरत नहीं पड़ती। इसके बावजूद पुजारी उसे धर्म-रक्षक, ईश्वर प्रेमी, भक्त शिरोमणि, ईश्वरानुरागी जैसी पदवियां सौंपता है। इससे उसको व्यापार करने, व्यापार के नाम पर मनमाना लाभ कमाने की छूट मिल जाती है। अपने बनाए मंदिर में व्यापारी स्वयं पूजा करे, आवश्यक नहीं है। इसके लिए वह मंदिर बनवाता ही नहीं। पूजा-पाठ उसके लिए तीसरे-चैथे दर्जे या  बैठे-ठाले का काम होता है। अवसर विशेष को छोड़कर वह उस ओर झांकता तक नहीं है। केवल पुजारी को दी गई तनख्वाह और यदा-कदा की दान-दक्षिणा से उसका ‘धर्म’ सधता रहता है। पुराने जमाने में इसलिए प्राचीन राजा-महाराजा, जमींदार, सेठ आदि का धर्मालय प्रवेश भी खास घटना हुआ करती थी। आज भी व्यापारी वर्ग मोटे दान-दक्षिणा द्वारा वह पुरोहितों को प्रसन्न रखता है। बदले में पुजारी वर्ग उसके मुनाफा कमाने के तरीकों, व्यापारिक अनाचार और भ्रष्टाचार की ओर से आंख मूंद लेता है। गलती के लिए आर्थिक शक्तियों को जिम्मेदार ठहराने की तो मानो उस युग में परंपरा ही नहीं थी। इसलिए भारतीय और विश्व वाङ्मय में राजनीतिकों के अनाचार और दुराचार के किस्से तो अनगिनत हैं, यहां तक कि देवताओं को भी नहीं छोड़ा गया है, मगर आर्थिक दुराचार के बारे में चर्चाएं नगण्य हैं। यहां कुबेर के खजाने का बखान हुआ है। राजा-महाराजाओं, सेठ-साहूकारों के खजाने को भी कुबेर का खजाना कहकर महिमा-मंडित किया जाता रहा है। उस खजाने में धन कैसे आता है, कहां से आता है, धनार्जन के रास्ते नैतिक हैं या अनैतिक—इस पर चर्चा कम ही हो पाती है। हालांकि कौटिल्य, कात्यायन, याज्ञवल्क्य आदि ने कराधान और राज्य के वित्त प्रबंधन संबंधी आवश्यक निर्देश दिए गए हैं, लेकिन उनका वास्तव में कितना पालन होता था, उल्लंघन करने पर कब, किसे, कितना दंड दिया गया था, इस तरह का कोई उदाहरण धर्म-ग्रंथों में नहीं मिलता।

धर्म के नाम पर जीवन के जरूरी सवालों से बच निकलने के प्रसंग इतिहास में अनगिनत हैं। धर्मानुयायी आस्थावादी दृष्टि से उनका महिमामंडन करते हैं। लेकिन विमर्श से बच निकलते हैं। यदि कहीं फंसते हुए दिखें तो ‘नेति-नेति’ कहकर तत्काल पीछा छुड़ा लेते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि धर्म आज भी समाज के बहुसंख्यक वर्ग के लिए मानवीय कम, आस्था का विषय ज्यादा है। हालांकि अपनी नैतिक प्रेरणाओं के लिए करोड़ों लोग धर्म पर आज भी आश्रित हैं। धर्म उनके लिए अस्मिता का मसला है। धर्म-विहीन जीवन के बारे में वे सोच भी नहीं सकते। हरिद्वार के कुंभ और गढ़-मुक्तेश्वर के गंगा मेले को देखिए, श्रद्धालुओं का चारों ओर से उमड़ता हुआ हुजूम….कड़कड़ाती ठंड और वर्फ-से हाड़ जमा देने वाले पानी में, आपको सत्तर-अस्सी वर्ष तक के बूढ़े-बूढ़ियां गोते लगाते हुए नजर आएंगे। अनगिनत कष्ट सहकर भी वे खुद को धन्य मानते हैं; या यूं कहो कि श्रद्धातिरेक में काया-कष्ट को भूल जाते हैं। माक्र्स इसे अफीम कहता है। कदाचित धर्म एक नशा है भी। वाल्तेयर, फायरबाख, ब्रूनो बायर, मिखाइल बकुनिन, बर्ट्रेण्ड रसेल जैसे विचारकों ने भी अलग-अलग अंदाज में धर्म को नशा और शोषण का जरिया माना है। लेकिन जब कोई नशा ही समाज के अधिसंख्यक लोगों को प्रिय हो, लोग उसको अपनी पहचान से जुड़ा हुआ मानते हों, और जो पूरी दुनिया के तीन-चौथाई से ज्यादा लोगों की जीवनचर्या को किसी न किसी रूप में प्रभावित करता हो, तब उसके प्रति एकाएक उपेक्षा या तिरस्कार-भाव कैसे संभव है? क्या ऐसा करना लोगों की नैसर्गिक स्वतंत्रता का अपमान नहीं है? अवश्य होता; बशर्ते मनुष्य अपना धर्म स्वयं तय करता। उसको अपना ईश्वर चुनने का अधिकार होता और जन्म के साथ ही धर्म उसपर थोप नहीं दिया जाता। यह किसी से छिपा नहीं कि जन्म के समय शिशु का मस्तिष्क कोरी सलेट जैसा होता है। कम से कम ईश्वर और धर्म को लेकर तो वह कुछ भी नहीं जानता। ऐसे में जन्म के साथ ही शिशु के धर्म और ईश्वर का निर्धारण कैसे संभव है! क्या यह खुली हवा में पहली सांस के साथ ही मनुष्य के विवेक को बांध देने की साजिश नहीं है? असल में यह धर्म के आधार पर संगठित होने वाले समाजों का मूक समझौता है, जिसके आधार पर वे अपने अनुयायी बांटते रहते हैं।  

धर्म की प्रमुख विशेषता उसका लचीलापन, परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने की ताकत है। लेकिन परिस्थितियों के अनुसार कैसे बदलना है, यह तय करने का अधिकार जनसाधारण को नहीं होता। तय करता है पुरोहित वर्ग। इस काम को वह शास्त्रों की  दुहाई देकर करता है। यहां शास्त्र व्यापक पद है। उसमें ग्रंथों के अलावा श्रुति, परंपरा, यहां तक की शास्त्र के नाम पर मनमानी और अपने मत को ही प्रामाण्य मानने के दुराग्रह के साथ, एकाएक गढ़ ली गई संकल्पनाएं भी शामिल होती हैं। शास्त्रीय पैमाने पुरोहित वर्ग पर भी ज्यों की त्यों लागू हों, यह आवश्यक नहीं है। उनके लिए आपद् धर्म की व्यवस्था हर समय रहती है। जीवन महत्वपूर्ण है इसलिए क्षुधा पीड़ित विश्वामित्र की जीवन रक्षा हेतु मृत पशु का मांस खाने की अनुमति शास्त्र देते हैं। यह इजाजत सभी को; और हमेशा नहीं थी। जो धर्म भूखे विश्वामित्र के प्राण बचाने के लिए लचीलापन दिखाता है, वह महाभारत में राजनीति के साथ जुड़कर बेहद आक्रामक हो जाता है। वहां पांच पांडव बंधुओं को न्याय दिलाने के नाम पर महाभारतकार अठारह अक्षौहिणी सेना को युद्ध की आग में झोंक देने की घटना को धर्म युद्ध की संज्ञा देता है, जिसमें सब कुछ ऊपर से तय होता है और तथाकथित धर्म के नाम पर 19,68,300 सैनिक, 3,93,660 हाथी तथा 11,80,980 घोड़े युद्ध की बलि चढ़ा दिए जाते हैं।

साफ है, सामान्य व्यवहार में धर्म केवल आध्यात्मिक विषय नहीं रह जाता। उसमें शीर्षस्थ वर्ग की स्वार्थपूर्ण राजनीति, उसके मनसूबों और महत्वाकांक्षाओं को साधने का पूरा व्यवहारशास्त्र होता है। नैतिकता का आवरण तो लोगों को लुभाने के लिए होता है। समाज में अपनी पैठ बनाने के लिए कुछ प्रावधान आवश्यक हैं, जैसे—‘अपने पड़ोसी से प्यार करो, सत्यभाषी बनो, आवश्यकता से अधिक संचय मत करो, सभी जीवों पर दया, क्षमा, धृत्ति, करुणा, परोपकार आदि। धर्म की ये व्यवस्थाएं उसके चेहरे को मानवीय बनाती हैं। उसके लिए लोगों के दिल में जगह पैदा करती हैं। जनसाधारण उनसे यथोचित प्रेरणाएं भी लेता है। लेकिन यदि किसी क्षण पुरोहित वर्ग की मदद या व्याख्या की जरूरत आ पड़े तब वह धार्मिक प्रावधानों का उपयोग निहित स्वार्थ के लिए करता है। स्थितियां प्रतिकूल हों तो धर्म तत्क्षण अपने दिखावटी रूप को सामने लाकर उदार सामाजिक मूल्यों का हवाला देने लगता है। चूंकि नैतिकता के स्तर पर सभी धर्मों में अनूठी समानता है, इसलिए उस स्तर पर वे सभी विद्वेष एकाएक मिट जाते हैं, जिन्हें धर्म से जुड़ा सांप्रदायिक सोच जन्म देता हैं। सच तो यह है कि उस समय सिवाय कर्मकांडों और मिथकीय कल्पनाओं के धर्म का अपना कुछ रह ही नहीं जाता, बल्कि दबाव मैं धर्म स्वयं उन्हें दूसरे दर्जे का मानने लगता है। लेकिन दबाव हटते ही धार्मिक दुराग्रह फिर प्रबल होने लगते हैं। वर्गीय सोच के कारण प्रत्येक धर्म किसी न किसी रूप में सामाजिक स्तरीकरण का समर्थन करता है। ऊंच-नीच को स्थायी बनाता है।

ऐसे धर्म की जरूरत आखिर किसे है? पूंजीपति को या जनसाधारण उपभोक्ता को? मेरा उत्तर होगा, दोनों के लिए। पूंजीपति की धार्मिक प्रतीकों में कोई आस्था न हो तो भी वह स्वयं को धार्मिक इसलिए दर्शाता है, क्योंकि उसको अपना सर्वस्व समझने वाले गरीब, मेहनतकश यह मानते हुए कि उसकी संपन्नता के पीछे उसकी चालाकियां, अंधाधुंध मुनाफाखोरी, लालच, झूठ और बेईमानी न होकर ईश्वर की विशेष अनुकंपा है, उसकी ओर से उदासीन हो जाते हैं। इससे केवल अपने लाभ के लिए उत्पादन करनेवाली पूंजीपति कंपनियों को बढ़ावा मिलता है। इस तरह धर्म सचाई पर पर्दा डालने का काम करता है। उल्लेखनीय है कि अमीर के लिए धर्म का अभिप्राय धार्मिक प्रतीकों, रीति-रिवाजों में आस्था तक सीमित नहीं होता, न वह केवल स्वर्ग के सुखों तक फैला होता है, बल्कि वह उसकी सीधी-सादी व्यापारिक रणनीति का हिस्सा होता है। धर्म की शरण में जाकर अमीर अपने इस जन्म की समृद्धि को पक्का करता है। जबकि गरीब अपने लिए सहनशीलता की मांग करता है, ताकि वर्तमान दुख-अभाव, उत्पीड़न की मार से बच सके। इसी खातिर वह अपने दुखों से खेलता तथा गरीबी और दुश्वारियों को गले लगाता है। वह ताकतवर के अत्याचार को नतभाव से सह लेता है। केवल इस उम्मीद में कि सब कुछ ईश्वर के नाम कर देने से या उसके नाम पर अपने दुखों की ओर से उदासीन हो जाने पर वह प्रसन्न होगा। बदले में उसका भविष्य बेहतर होगा। दूसरे शब्दों में धर्म धनवान और शक्तिशाली के हितों की तात्कालिक सिद्धि करता है, जबकि कमजोर को भरमाता है। उसे प्रलोभन से बांधे रखता है। उल्लेखनीय है कि धर्म और ईश्वर का महिमा-मंडन केवल आस्था-प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहता। उसके सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ भी होते हैं। जो मनुष्य को अपनी सीमाओं में बांधते हुए सामाजिक असमानता में उत्तरोत्तर वृद्धि करते हैं।

ईश्वर नामक काल्पनिक और गढ़ी गई सत्ता का प्रयोग प्रायः दो प्रकार के लोग करते हैं। एक जो उसे चाहते या उससे डरते हैं; तथा डर और चाहत के चलते यथा-सामर्थ्य वह सबकुछ करते हैं, जैसा उनसे पुरोहितवर्ग द्वारा कराया जाता है। दूसरे वे जो लोगों पर उसके प्रभाव का उपयोग निहित स्वार्थ हेतु करते हैं। जो लोग ईश्वर को चाहते या उससे डरते हैं—वे इस भ्रम के नाम पर लगातार छले जाते हैं। ईश्वरत्व की वास्तविकता कि वह केवल मनुष्य की मनोरचना है, को समझने वाले ईश्वर की काल्पनिक तस्वीर गढ़ते हैं।  निहित स्वार्थ के लिए वे उसके चारों ओर झूठे किस्से-कहानियों और गाथाओं का पूरा शास्त्र खड़ा कर लेते हैं। फिर उसके माध्यम से उस वर्ग का जो अपने भोलेपन के कारण ईश्वर के अस्तित्व पर भरोसा करता है, को बरगलाते तथा उसका तरह-तरह से शोषण करते हैं।

धर्मशास्त्रों में बार-बार बताया जाता है कि दुनिया धर्म पर टिकी है। धर्म के न होने से सामाजिक व्यवस्था गड़बड़ा जाएगी। इंसान इंसान को खाने लगेगा। चारों ओर अराजकता छा जाएगी। असल में यह डर ही धर्म की नींव, उसकी प्राणवायु है। यह डर मनुष्यों में एक-दूसरे के प्रति अविश्वास पैदा करता है, जिसे पैदा करने में धर्म की बड़ी भूमिका होती है। एक-दूसरे के प्रति डर और अविश्वास उन्हें अनावश्यक स्पर्धा में उलझाए रखता है। यह धर्म के संबंध में परस्पर विरोधाभासी मान्यताओं को सामने लगाता है। क्योंकि एक ओर तो वह मानवीय स्नेहानुराग को बनावटी, दुनिया को नकली और मोह-माया ग्रस्त, भव-प्रपंच आदि बताकर जीवन-संघर्ष से पलायन को उकसाता है, दूसरी ओर वह देवताओं की ऐसी कृपालु और महिमामयी तस्वीर गढ़ता है, जो पलक झपकते ही भक्त को उसके समस्त दुखों, अभावों, कमजोरियों और दुश्वारियों से मुक्ति दिला सकते हैं। हालांकि जैसा कि माना जाता है, देवताओं की ‘कृपा’ विनीत बने रहने पर ही संभव हो पाती है। सचाई और साफगोई किसी देवता को पसंद नहीं है। न ही आंख से आंख मिलाकर बात करने वाले भक्त उन्हें रास आते हैं। देवता उन भक्तों को पसंद करते हैं, जो हमेशा गिड़गिड़ाते हुए नजर आएं। खुद सत्तु खाकर उन्हें पकवानों का भोग लगाएं। इस तरह पुरोहितों द्वारा गढ़े गए देवता और तानाशाह में कोई अंतर नहीं रह जाता। बल्कि कई बार तो देवता तानाशाह से भी कहीं अधिक क्रूर और सनकी नजर आते हैं। तानाशाह नाराज होने पर अधिक से अधिक कैद कर लेता है अथवा मनुष्य को मौत के घाट उतार देता है। देवता नाराज हों तो मृत्युदंड के बाद आत्मा युगों-युगों तक दंड की भागी बनती है। बल्कि तानाशाह की अपेक्षा देवताओं के नाराज होने की संभावना अधिक होती है। क्यांकि वहां मानवीय भूलों के लिए कोई स्थान नहीं होता। मानो गुस्सा और नाराजगी देवताओं की नाक पर रखी रहती है। भक्तों से सुबह-शाम नाम लिवाना देवताओं को सर्वाधिक प्रिय है। इस काम यदि भूल से भी चूक हो जाए तो देवताओं का कोप-भाजन बनना पड़ता है। नाराजगी मानो उनकी नाक पर रखी रखती है। दावा किया जाता है कि देवताओं की मर्जी के बिना सृष्टि में पत्ता तक नहीं हिलता, बावजूद इसके यदि कोई चूक हो जाए तो दंड का भागी केवल इंसान को बनना पड़ता है। धर्म की माने तो माया का भरमाया मनुष्य कोई न कोई चूक हर घड़ी करता ही रहता है। इसलिए हर किए-अनकिए की जिम्मेदारी मनुष्य पर आ पड़ती है। माया या माया बनाने वाले का कोई दोष नहीं मानता। प्रत्येक कार्य के पीछे दैवी-विधान मान लेने का नुकसान यह है कि इससे जीवन में सामान्य सुख, यहां तक कि नैसर्गिक स्वतंत्रता भी मनुष्य का अधिकार होने के बावजूद, ‘दैवी-कृपा’ मान लिए जाते हैं। जो लोग किसी कारणवश इन सुविधाओं तथा मौलिक अधिकारों से वंचित हैं, उन्हें देवी कृपा से भी वंचित और ‘अभागा’ कहा जाता है।

धर्म का यह चरित्र तभी से है जब से साम्राज्यवादी चेतना का उदय हुआ। तभी से राजा-महाराजाओं, जमींदारों के इर्द-गिर्द चाटुकारों का वर्ग बनने लगा था। चाटुकार वर्ग में पुरोहित भी सम्मिलित थे। वे राजा की सहानुभूति प्राप्त करने तथा जनता पर अपने प्रभाव को स्थायी बनाने के लिए धार्मिक अनुशंसाओं की मनमानी व्याख्याएं करते थे। राजाओं और सामंतों को भोग-विलास प्रिय था। इसलिए पुरोहितों ने देवताओं को भी  स्वार्थी, विलासी, स्वर्णाभूषणों से मंडित दिखाया है। परिणाम यह हुआ कि धर्म की नैतिक और सामाजिक व्यवस्थाएं केवल दिखावे की चीज बनती गईं। धार्मिक मान्यताएं जैसे-जैसे फैलीं, सामाजिक असहिसुष्णता लगातार बढ़ती गई। कालांतर में यही दिखावा देवताओं के चरित्र-चित्रण में भी समा गया। परिणामस्वरूप जो देवता चित्रित किए गए, आदमी की तरह वे भी अपनी आत्मप्रशंसा के भूखे थे। गुस्सा उन्हें भी आता था। साधारण इंसान की भांति मनमानी करने से उनका अहं भी ठंडा होता था। यहां तक कि षड्यंत्र रचने, भोग-विलास और वैभव प्रदर्शन करने में भी वे कम नहीं हैं।

प्रमाण के लिए लक्ष्मी से लेकर विष्णु या किसी और हिंदू देवी-देवता का चित्र देख लीजिए, सभी स्वर्णाभरण से सज्जित हैं। उनके मुकुट हीरे के जड़े हैं। वे चढ़ावे की कीमत देखकर आनुपातिक रूप से प्रसन्न होते हैं। केवल पाशुपति इसके अपवाद हैं। वे देवताओं में सबसे पुराने भी हैं। उनके बारे में प्रस्तर शिल्प से लेकर लिखित साहित्य में इतना कुछ मौजूद था कि पुरोहितों द्वारा उसमें फेरबदल कर पाना, आसान नहीं था। उपलब्ध साक्ष्य यह भी बताते हैं कि शिव अवैदिक देवता हैं। त्रिदेवों में ब्रह्मा को सृजन और विष्णु को पालन का दायित्व सौंपा गया है। थोड़ा-सा विचार करने पर इस रूपक के अभिप्राय को आसानी से समझा जा सकता है। ब्रह्मा के हाथ में वेद हैं, जिसके पीछे असली मंशा वेदों को अपौरुषेय दिखाने की है। विष्णु को पालक देवता का दर्जा प्राप्त है। उन्हें अवतार लेकर बार-बार सृष्टि में आना पड़ता है। यह क्षत्रियों के बीच पीढ़ी-दर-पीढ़ी सत्ता हस्तांतरण का संकेतक है।

शिव को संहार का देवता बताया जाता है। आखिर द्रविड़ों या अनार्यों का देवता ही संहार का देवता क्यों? इसके पीछे की मानसिकता का आकलन कठिन भले हो, असंभव नहीं है। आर्यों के आगमन से पहले इस देश में शिव की प्रतिष्ठा थी। इसके भी प्रमाण हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप में पांव जमाने से पहले आर्यों को न केवल यहां के मूल निवासियों से संघर्ष करना पड़ा था, बल्कि अनेक समझौते भी उन्हें करने पड़े थे। आर्यों के साथ निरंतर चलने वाले युद्धों में अंततः अनार्यों को पराजित होना पड़ा पड़ा था, तथापि अनार्यों का डर आर्यों के मन से गया नहीं था। शिव के चिर संगी के रूप में भूत, प्रेत, वैताल आदि हैं, जो अलग-अलग कबीलों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यही गणशक्ति शिव को संहार का देवता मानने के लिए विवश करती है। शासक वर्ग के मन में जनता का डर, यह डर कि शिव के एक संकेत पर कबीलाई समूह आर्यों के श्रेष्ठ योद्धा होने के सपने को चकनाचूर कर सकते है, शिव को देवताओं का देवता, महादेव और संहार का देवता बनाता है। शिव की भांति गणेश भी गण-प्रमुख यानी कबिलाई संगठनों के नेता हैं। लंबे समय तक उन्हें अनार्यों के मुखिया के रूप में मान्यता मिलती रही। गणेश को उनका वर्तमान रूप आर्यों की गणतंत्र के प्रति अनास्था के कारण, उसके उपहास के कारण मिला है।

विभिन्न धर्मावलंबियों की कोशिश होती है, अपने धर्म को पुराने से पुराना दिखाने की। इसके पीछे उनकी कोशिश अपने-अपने धर्म के रीति-रिवाज, कर्मकांड आदि को ज्यों की त्यों, चलाते जाने की होती है। यह बात अलग है कि उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर दुनिया में धर्म की आमद को 5000 वर्ष से पहले नहीं ले जाया जा सकता। यह वही समय है जब इंसान ने संगठित होकर रहना सीखा। नगर राज्यों की नींव रखी गई। उन्हीं दिनों धर्म की सांगठनिक शक्ति को पहचाना गया और उसके आधार पर लोगों को जोड़ने की शुरुआत की गई। हालांकि सभ्यता का इतिहास इससे भी काफी पुराना है। यदि प्रबोधीकरण के युग को ही लें तो करीब 12000 वर्ष बीत चुके हैं। यानी प्रबोधीकरण का दो-तिहाई हिस्सा मनुष्य ने बगैर किसी धार्मिक विश्वास के बिताया है। लेकिन एक बार धर्म के अस्तित्व में आने के बाद उससे पीछा छुटा पाना मनुष्य के लिए असंभव रहा है। इस बीच राजसत्ताएं बदलीं। सत्ताओं के रूप और मायने बदले। साथ-साथ धर्म के मायने तथा उसके अभीष्ट भी बदलते रहे हैं। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि धर्म गायब हुआ हो। संगठित राजसत्ता के दौर में धर्म सत्ता और भी फली-फूली और मजबूत हुई है। ऐसे में धर्म से मुक्ति, उसके कर्मकांडों से मुक्ति क्या संभव है? खासकर गत दो हजार वर्षों से धर्म दुनिया-भर के समाजों, लोक-परंपराओं में जितनी गहराई से अंतर्गुंफित हुआ है। उससे मनुष्य की धर्म से मुक्ति आसान नहीं लगती। खासकर तब जब धर्मसत्ता और राजसत्ता दोनों के स्वार्थ एक समान हों। दोनों एक-दूसरे को समर्थन और बल प्रदान करती हों। यह धर्म की ही माया है कि कंप्यूटर अपने ईजाद होने के साथ ही भविष्यवाणी करने लगता है।

यह ठीक है कि आधुनिक युग में धर्म से मुक्ति आसान नहीं दिखती। लेकिन जो कठिन दिखती हो, वह असंभव भी हो, यह बात जमती नहीं। बल्कि इतिहास ने दर्शा दिया है कि कठिनता का जीवनकाल बस कुछ वर्ष का होता है। उसके बाद वह व्यवहार का हिस्सा बन जाती है। आज से सत्तर-अस्सी वर्ष पहले एवरेस्ट की गगनचुंबी चोटी पर पहुंचना असंभव बात थी। बाद में हिलेरी, शेरपा तेनसिंह के साथ गए। असंभव संभव हुआ। आज तो यह स्थिति है कि वहां अपेक्षाकृत आसानी से जाया जाता है। ऐवरेस्ट यात्रा खबरें कोई खास रोमांच नहीं बना पातीं। यही हाल धर्म का है। आज भले ही लोग मानते हों कि सृष्टि धर्म के बल पर टिकी है। पर कल हालात बदल भी सकते हैं। कोई भी दो सत्ताएं जिनके अपने-अपने स्वार्थ हों, लंबे समय तक एक-दूसरे के समर्थन में नहीं रह सकतीं। खासकर तब जब शक्ति के केंद्र बदल रहे हों। पहले भू-संपदा पूंजी का प्रतीक थी। उससे पहले कुछ और था। इसलिए वह दिन दूर नहीं कि जब धर्म की असलियत भी लोगों के सामने होगी। वे उन चेहरों को देख सकेंगे, जो उसकी महिमा मंडन के पीछे हैं।

दूसरी ओर यह भी सही है कि आदमी के मन से आगत-अनागत का डर निकल जाए, धर्म अपने आप ‘फालतू’ मान लिया जाएगा। यह भ्रम भी जाता रहेगा कि धर्म मनुष्य को जोड़ता है। भ्रम टूटते ही मनुष्य समझने लगेगा कि जीवन के जो लक्ष्य हैं, उन्हें प्राप्त करने के लिए किसी तीसरी शक्ति की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य आपसी सहयोग, समर्पण और विश्वास द्वारा भी जीवन-लक्ष्यों को प्राप्त कर सकता है। इससे उसका दैन्य घटेगा। आत्मविश्वास में वृद्धि होगी। भटकाव में कमी आएगी। जीवन के लक्ष्य जब तीसरी अदृश्य सत्ता को बीच में रखकर लेने के बजाय समाज और सामाजिकता को ध्यान में रखकर तय होने लगेंगे तो सामाजिक अंतद्र्वंद्वों का हृास होगा। तनाव में कमी आएगी। समाज की ऊर्जा सामाजिक कार्यों में विकास के लिए खर्च होने लगेगी। अपने पुरुषार्थ पर भरोसा मनुष्य को जीवन और एक-दूसरे के करीब लाएगा। हमें उस दिन की प्रतीक्षा तो कर ही सकते हैं।

ओमप्रकाश कश्यप 

1.  किं करोमि क्वगच्छामि को वेदानुधरिष्यति.

मा रुदसि बाले, कुमारिलभट्टोवेदानुद्धारिष्यति. —यशपाल द्वारा ‘अपने संपर्कों के प्रति मेरे देय’ से उद्धृत, यशपाल के निबंध, पृष्ठ 431.

2 . यशपाल के निबंध, अपने संपर्कों के प्रति मेरे देय, 431।

बुद्धिवाद की प्रासंगिकता

सामान्य

—ई.वी. रामासामी पेरियार

(बुद्धिवाद की प्रासंगिकता पर यह भाषण पेरियार ने 22 जून 1971 को कोयंबटूर जिले के मेट्टुपलायम नामक कस्बे में दिया था। अवसर था, ‘तर्कवादी संगठन’ (रेशनलिष्ट एसोशिएसन) के उद्घाटन का। भाषण में वे ईश्वर, धर्म, महाकाव्य, पुराण, धर्मशास्त्र आदि ब्राह्मणवाद के विभिन्न रूपाकारों की बेबाक समीक्षा करते हैं। हर उस चीज पर भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण से विचार करते हैं, जो मनुष्य को भीरू और बौद्धिक दास बनाकर उसकी अज्ञानता; प्रकारांतर में शोषण की नींव तैयार करती है। यह भाषण उनके वैचारिक सातत्य का उदाहरण भी है। उससे सात दशक पहले, 1922 में पेरियार ने कहा था कि ‘रामायण’ और ‘मनुस्मृति’ को आग के हवाले कर देना चाहिए। 1925 में उन्होंने सलाह दी थी कि बड़ी-बड़ी मूर्तियों को नदी किनारे रख देना चाहिए, जहां वे गंदे कपड़े धोने, पछारने के काम आ सकें। 1930 में ‘दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ की रचना की। 1956 में राम की तस्वीरों का दहन किया। मूर्तियां तोड़ने का आंदोलन भी चलाया। आरंभ में वे केवल हिंदू धर्म और ब्राह्मणवाद के आलोचक थे। आगे चलकर उन्होंने संपूर्ण धर्मसत्ता को आलोचना के दायरे में ले दिया। उनका मानना था कि धर्म, ईश्वर, वर्ण-व्यवस्था, पाप-पुण्य, स्वर्ग-नर्क, अवतारवाद आदि ब्राह्मणवादी प्रपंच हैं। इनका एकमात्र उद्देश्य सामाजिक विषमता को स्थायी बनाना है। तदनुसार ब्राह्मणों को सर्वेसर्वा मान अधिकार-शून्य और मतिविहीन हो जाना है। इस भाषण में वे राम, कृष्ण, शिव, ब्रह्मा जैसे हिंदुओं के सभी देवताओं पर निशाना साधते हैं। जहां तक कृष्ण की बात है, पेरियार ब्राह्मणों द्वारा सृजित उस ‘कृष्ण’ की आलोचना करते हैं जो ‘गीता’ के बहाने चातुर्वर्ण्य धर्म का समर्थन करता है। यदुओं के वास्तविक नायक, ऋग्वेद में वर्णित दशराज्ञ युद्ध में यदुसेना का नेतृत्व करने वाले, 10000 योद्धाओं के साथ इंद्र से समरांगण में लोहा लेने वाले महानायक कृष्ण, ब्राह्मणों द्वारा गढ़े गए कृष्ण से एकदम अलग हैं।

पेरियार की खूबी है कि वे अपने विचारों को पाठक पर थोपते नहीं है। वे श्रोताओं से निरंतर आग्रह करते हैं कि उनकी कही बातों पर इसलिए विश्वास न करें कि वे कह रहे हैं। अपितु मुक्त मन से उनपर विचार करें। उसके बाद जो जंचे फैसला करें। जिस समय पेरियार ने यह भाषण दिया, वे 92 वर्ष के थे। इस उम्र तक आते-आते मनुष्य प्रायः अपने विचारों के प्रति दुराग्रही हो जाता है। अपने अनुभवों के आगे दूसरों के अनुभव उसे बेमानी लगने लगते हैं। अपने विचार दूसरों पर लादने में उसे कुछ भी अस्वाभाविक नहीं लगता। पेरियार इसके अपवाद थे। 92 की उम्र में करीब 3 घंटे धाराप्रवाह, विषय से भटके बगैर बोलना, बगैर ऐसी उदात्त भावना के संभव ही नहीं था।

साथियो!

यहां आकर मैं अत्यंत प्रसन्न हूं। मुझे बताया गया है कि करीब दस वर्ष पहले भी मैं यहां आया था। मुझे भी याद है। लेकिन इससे पहले मैं यहां किस वर्ष आया था, वह मुझे ठीक-ठीक याद नहीं है। इसके बावजूद मैं खुश हूं। इस बात से खुश हूं कि मुझे आपसे दुबारा मिलने का अवसर दिया गया है। मुझसे पहले यहां कई विद्वान अपनी बात कह चुके हैं। उन सभी के भाषण विचारोत्तेजक थे। कुछ बातें मैं भी आपसे आपसे करना चाहता हूं। आगे मैं जो भी कहूं, उससे पहले मेरा आग्रह है कि मेरी बातों पर, बिना भली-भांति विचार किए हरगिज विश्वास न करें। न ही बिना विचारे उनका अनुसरण करें। मैं बस इतना चाहता हूं कि मैं जो भी कहूं, आप खुले दिमाग से उसपर चिंतन करें। सोचें कि मैंने जो भी कहा है—वह सही है; अथवा नहीं। मेरी बातों में यदि आपको कुछ भी सार्थक लगता है, तभी उसे ग्रहण करें। उसके बाद यदि आपकी इच्छा हो तो उन विचारों को आगे बढ़ाने के लिए जैसा उचित लगे—वैसा कदम उठाएं।

मैंने कहा है, अथवा हमने कहा है—सिर्फ इसीलिए किसी बात पर भरोसा न करें।

किसी व्यक्ति को आखिर क्यों सोचना चाहिए?

मैं आपको बताऊंगा, किसलिए….

हम यहां बुद्धिवाद के प्रचार के लिए आए हैं। हम चाहते हैं कि मनुष्य तर्कशील प्राणी के रूप में जीवनयापन करें। हम अविश्वसनीय और तर्कातीत समझी जाने वाली बातों का प्रचार नहीं करते। न ही हम ईश्वर, ईश्वर की संतान, अवतारों, धर्म, धर्मशास्त्रों, रीति-रिवाजों तथा परंपरा वगैरह के प्रचार में अपना श्रम खपाते हैं। हम केवल उन्हीं चीजों का प्रचार करने में विश्वास रखते हैं, जो आपकी तर्कबुद्धि को हर तरह से स्वीकार्य हो। यदि हमारा समाज तार्किकता और तार्किक मनोवृत्ति को अपना चुका होता, तब चिंता का कोई कारण नहीं था। लेकिन हमारे लोगों को ऐसा करने से रोका गया है।

‘हमने जो कहा है वह आपको सुनना ही चाहिए। हमने जो भी, जैसा भी कहा है वह सब निरा ईश्वरीय कथन है। मैं ईश्वर का ही एक अवतार हूं। इसलिए आपको वही करना चाहिए, जैसा मैं कहता हूं।’—दूसरों पर अपने विचार लादने के लिए इस तरह के भाषण और धार्मिक आख्याएं जरूरी थीं। इनकी मदद से लोगों को स्वतंत्रतापूर्वक सोचने, स्वयं किसी निष्कर्ष तक पहुंचने से रोक दिया गया था। यह आज का चलन नहीं है। आरंभ में मनुष्य तर्क और बौद्धिक सामर्थ्य से संपन्न था। 2000-3000 वर्षों के बाद आज हम आपसे दुबारा वहीं अपील करना चाह रहे हैं कि स्वतंत्र भाव से सोचो, अपने विवेक पर भरोसा रखो। कितने अफसोस की बात है!

आज यहां हमने एक बुद्धिवादी संगठन का उद्घाटन किया है। यह बात स्वयं-सिद्ध है कि यह बुद्धिवादी लोगों की संस्था है। हम यहां जीवनयापन के सही तरीके पर चर्चा करने जा रहे हैं।

वे लोग जो सोचने अथवा तर्कसम्मत आचरण से इन्कार करते हैं, वे पशुओं के समान हैं। यह मैंने किस आधार पर कहा है? जीवित प्राणियों में, पशुओं के पास तार्किक दृष्टिकोण तथा चिंतन-मनन की शक्ति का अभाव होता है। मनुष्य उनकी तरह नहीं है। मानवीय प्राणियों के पास स्वतंत्र विवेक होता है। उनकी चेतना बहुआयामी होती हैं। पेड़-पौधों और झाड़ियों के बारे में कहा जाता है कि उनकी चेतना का स्वरूप एकांगी होता है। समानांतर चेतनाओं यानी अपने से बाहर की दुनिया से वे अनभिज्ञ होते हैं। कीड़े-मकोड़ों तथा अन्यान्य जीवाणुओं के पास दो तरह की संवेदनशीलता होती हैं। तैरने वाले प्राणियों यथा—मछली, व्हेल वगैरह के पास त्रिआयामी संवेदन शक्तियां बताई गई हैं। उड़ने वाले पक्षियों के पास चार प्रकार का संवेदन-सामर्थ्य; तथा घूमने-फिरने वाले जीवों यथा गाय, घोड़ा आदि के पास पांच प्रकार की संवेदन-शक्तियां बताई जाती हैं। बुद्धिवाद यानी तर्क करने की शक्ति, स्वतंत्र भाव से सोचने-समझकर निर्णय लेने की आत्मनिर्भरता, जिसे छठी संवेदन-शक्ति भी कहा जाता है—वह केवल मानवीय प्राणी में ही देखी जाती है।

ऐसे भी जीवित प्राणी हैं जिनमें विशिष्ट शक्तियां होती हैं। कुछ ऐसे प्राणी भी हैं जो उन कार्यों को भी कर सकते हैं, जिन्हें कर पाना मानव-सामर्थ्य से परे है। जैसे कि चींटियां। उनकी सूंघने की शक्ति मनुष्य से बेहतर होती है। पक्षियों को देखिए। वे ऊंची उड़ान भर सकते हैं। लंबी दूरी बहुत कम समय में तय कर सकते हैं। मनुष्य ऐसा नहीं कर सकता। बंदरों को लीजिए। वे एक जगह से दूसरी जगह तक लंबी छलांग लगा सकते हैं। एक शेर अपने से कहीं बड़े हाथी को धराशायी कर सकता है। इस तरह की और भी अनेक विशेषताएं हैं जो मानवेत्तर प्राणियों में ही पाई जाती हैं। कई ऐसे कार्य हैं जिन्हें मनुष्य नहीं कर सकता, जबकि दूसरे प्राणी उन्हें सहज भाव से; तथा बड़ी मात्रा में कर सकते हैं। लेकिन मनुष्य के भीतर सोचने-समझने तर्क करने की ताकत और अपनी अनुभव तथा मानसिक विकास के अनुसार निर्णय लेने की शक्ति उसे सुखी जीवन जीने का अवसर प्रदान करता है। सोच-समझकर निर्णय लेने की क्षमता सिवाय मनुष्य के अन्य किसी प्राणी के पास नहीं है।

अपनी तर्क-शक्ति से मनुष्य ने अपनी मेधा को निरंतर विकसित किया है। मगर, ऐसा यानी तर्कशक्ति से संपन्न मनुष्य भी अपने तर्क-सामर्थ्य के प्रयोग में असफल होता आया है। इस कमी के कारण अनेक क्षेत्रों में मनुष्य की प्रगति शून्य है। हम द्रविड़ जनों को तो देखते ही पता चल जाता है कि उनमें स्वाभिमान चेतना का अभाव है। इस बात की उन्हें चिंता भी नहीं है। हमारे लोग यह जानते हुए भी कि दूसरे देशों में मनुष्य लगातार आगे बढ़ रहा है—अपनी तरक्की कर पाने में असमर्थ हैं। दूसरे देशों की प्रगति के बारे में हम लगातार पढ़ते ही रहते हैं। उनके से अनेक महान आविष्कार हमारी नजरों के सामने हैं।

हम ‘शूद्र’ हैं।

हमें शूद्र कहा जाता है। शूद्र का आशय है—वेश्या की संतान। यदि हम पूझते हैं यह कैसे? वे कहते हैं कि शास्त्रों में लिखा है; या किसी ने ऐसा कहा था; और बहुत पहले ईश्वर का भी यही कहना था। इस बात को पूरी तरह सच मान लेने के कारण हम अपनी मर्यादा, आत्मगौरव और स्वाभिमान को गंवा चुके हैं। हमें केवल अपनी भूख की चिंता रहती थी। केवल भोजन की चाहत हम रखते थे। हमारी प्रगति को हर लिया गया था। हमें बस उन चीजों की चिंता रहती थी जिनकी मदद से हम जैसे-तैसे अपना जीवन बिता सकें। यह तो पशुओं की विशेषता है। हम भी जानवरों जैसा जीवन बिता रहे हैं।

अपने देश में कोई व्यक्ति ऐसा नहीं था जो आगे बढ़कर बुद्धिवाद के समर्थन में खड़ा हो पाता। यदि किसी ने तर्कवाद की चर्चा की थी, तो 2000-3000 वर्ष पहले।1 वे जो कहते थे, उनके जमाने के लोग उसपर विश्वास भी करते थे। आज हम बावजूद इसके आजकल कोई उनका सम्मान नहीं करता। हमारे तर्कशील बुद्धिजीवियों को भी आज वे बातें स्वीकार्य नहीं हैं। किसी में भी उनके बारे में सोचने-समझने की हिम्मत नहीं है। ऐसा किसलिए हुआ?

वे बीच में भगवान को ले आए। उन्होंने सृष्टि की निर्मितियों पर बात की। उन्होंने बताया कि केवल ईश्वर ही सर्वशक्तिमान हैं। उन्होंने कहा कि ईश्वर-पुत्रों ने कुछ विशिष्ट उपदेश दिए हैं।  उनके अलावा ईश्वर के संदेश-वाहकों ने भी कुछ बातें कही हैं। ये बातें समाज पर इस तरह थोप दी गई थीं कि मनुष्य का स्वयं विचार करना, स्वतंत्र विवेक से निर्णय लेना अनावश्यक मान लिया गया।

इस तरह की गंदी और रूढ़ धारणाएं मनुष्य के दिलोदिमाग में बैठा दी गई थीं। अब उसका कर्तव्य केवल ईश्वर के नाम पर कही गई बातों पर बगैर सोचे-समझे, विश्वास कर लेना था। हर वस्तु के साथ यह मानकर व्यवहार करना था कि वह ईश्वर प्रदत्त है। इस सोच ने मनुष्य को बौद्धिक रूप से जड़ बनाने का काम किया। हमारे यहां कोई तरक्की न होने का भी यही कारण है। आप पूछ सकते हैं कि यह सब हमारे विकास को कैसे अवरुद्ध करता है? कैसे इसने हमारी प्रगति को नाकाम किया है? विदेशों में मनुष्य, पृथ्वी से करीब 4 लाख किलोमीटर दूर चांद तक जाने लगा है। वे 8000-10000 किलोमीटर प्रति घंटा के हिसाब से उड़ान भरने में सक्षम हैं। सोचने समझने, तर्क करने, अपने मस्तिष्क से काम लेने की क्षमता ने उन्हें इतने सारे आविष्कारों के करने के योग्य बनाया है। क्या हम इस तरह का कोई भी लक्ष्य हासिल करने में सक्षम हैं?

हम मानते हैं कि हमारे पास ऋषि-मुनियों और अवतारों की ढेर सारी शुभकामनाएं, आज्ञाएं, उपदेश, संदेश आदि हैं। हमारे यहां हजारों नेता, ऋषि, मुल्ला, पादरी, धर्माचार्य और सनातनी पंडित हैं। हमारे यहां अनेक धर्म भी हैं। मगर इन सबसे मिला हमें क्या है? सिर्फ अपने बल पर हम कुछ भी करने में सक्षम नहीं हैं। आखिर किसलिए? मनुष्य पहली बार जब इस धरती पर आया, उसे कितने वर्ष बीत चुके हैं? हम यह बताने में असमर्थ हें कि पहला व्यक्ति कब जन्मा था। कुछ शोधकर्ता बताते हैं एक लाख वर्ष पहले। कुछ ऐसे लोग भी हैं जो बताते हैं कि मनुष्य इस धरती पर 18 लाख वर्ष पहले जन्मा था। कुछ अन्य विद्वानों का दावा है कि मनुष्य उससे भी पहले आया था। इतने वर्षों के दौरान हमने क्या प्राप्त किया है? हमने पिछले सौ वर्षों में अनेक बदलाव देखे हैं। लेकिन उनमें से कितने आविष्कार अपने देश में हुए हैं? इतनी लंबी अवधि में हमें कितना कुछ प्राप्त कर लेना चाहिए था? हम ऐसा करने में असमर्थ क्यों रहे? इतने सारे साधु-महात्माओं और ईश्वरों के अस्तित्व का औचित्य क्या है। क्या मिला है हमें उनसे?

हमारे पास असंख्य ‘महान’ थे। हमारे समाज में कोई भी व्यक्ति बड़ी आसानी से साधु, महात्मा, भक्त या धार्मिक नेता बन सकता है। फिर भी हम अपने भरोसे कुछ भी नया हासिल करने में अक्षम हैं।

वे सभी सुख, सुविधाएं और आराम के संसाधन जिनका हम आनंद उठा रहे हैं, सब के सब दूसरे देशों के वैज्ञानिकों का आविष्कार हैं। हमारे देवताओं को अत्यधिक शक्तिशाली बताया गया है। असलियत में उनकी उपलब्धि क्या है? ईश्वरीय अवतारों से जुड़े मिथकीय आख्यानों में बड़े-बड़े चमत्कारी दावे किए गए हैं। बताया गया है कि कुछ ऐसे भगवान हैं जो पर्वतों से ऐसे खेल सकते हैं मानों गैंद से खेल रहे हों। हमारे देवताओं की अनेक विचित्र गुण हैं। लेकिन क्या बाहरी देशों के लिए हम एक भी चमत्कार दिखा पाए; या मनुष्यता के लिए एक भी मौलिक खोज कर पाए हैं? अभी तक तो नहीं!

यदि यूरोपवासी इस देश में नहीं आते होते तो हमारे देश में माचिस भी नहीं आ पाती। हम अंधेरे में पड़े रहने को मजबूर होते। जीवन ठहरा हुआ होता। हम यात्रा के लिए बैलगाड़ी का इस्तेमाल कर रहे होते। अब आप हवाई जहाज का इस्तेमाल कर सकते हैं? वे सब कहां से आए थे? क्या वे किसी प्रार्थना की देन हैं; अथवा श्लोकों के पाठ से प्राप्त हुए हैं? क्या ये किसी पूजा-पाठ की देन है? नहीं? हरगिज नहीं। ईश्वर की मदद से आप कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकते।

यही कारण है कि हम लोगों से अपने विवेक का इस्तेमाल करने, तथा तर्कशील प्राणी के रूप में जीवन जीने का आग्रह करते हैं। ईश्वर के प्रति पारंपरिक अंधश्रद्धा, धर्म, वेद, शास्त्र एवं धर्माचार्यों के प्रति अंधश्रद्धा के कारण आज हमारे लोग अपने सुखमय जीवन के लिए अपेक्षित संसाधन जुटाने में असमर्थ हैं। धार्मिक नेताओं तथा उनकी शिक्षाओं पर आंख मूंदकर भरोसा करने के कारण ही हम दूसरों की अपेक्षा बहुत पीछे हैं।

कुछ वक्ताओं ने हमें हमारे अज्ञान के बारे में बताया है। मत सोचिए कि शास्त्र क्या कहते हैं। धर्माज्ञाएं क्या हैं? हमें बदलना चाहिए। हमें सोचना ही चाहिए। आप ऐसे लोगों को देखते होंगे जो बिल्ली के रास्ता काटने पर उल्टे पांव लौट आते हैं। कुछ देर विश्राम करने के बाद फिर आगे बढ़ते हैं। कारण जानने के लिए आप ऐसे किसी व्यक्ति से पूछ सकते हैं। वह कहेगा कि यह बुरा शकुन है। समाधान के बारे में वह कहेगा कि कुछ देर बैठने के बाद वह फिर आगे जाएगा। जब कोई कौआ कांव-कांव करता है, तब भी ऐसा व्यक्ति आगे बढ़ने से झिझकता है। सोचता है कि अपनी कांव-कांव के जरिए कौआ उसे सावधान कर रहा है। वह मानता है कि पक्षी की बीट पड़ने से वह अपवित्र हो जाएगा। उस अवस्था में वह दूसरों को छूने से इन्कार कर देगा। वह पहने हुए वस्त्रों के साथ ही स्नान करेगा। उसकी ऐसी हरकतें देखकर क्या हम उसे आदमी कह सकते हैं?

ऐसा व्यक्ति मानता है कि दिन का खास समय ही ‘शुभ’ होता है। क्या इस बकवास का, ऐसी भ्रांत धारणा का कोई अर्थ है? इन मूर्खतापूर्ण रीति-रिवाजों का खंडन किसने किया है? कौन है जो ऐसे लोगों को अपने दिमाग से काम लेने की सलाह देता है? अपने ज्ञान और अनुभव से हम कितनी ही वस्तुएं प्राप्त कर सकते थे? लेकिन हमने उनका इस्तेमाल ही नहीं किया। यही कारण कि हम असभ्य दुनिया में रह रहे हैं। मैं बस इतना ही कह सकता हूं।

अच्छा ही हुआ जो विदेशी हमारे देश में आए। उन्होंने साहसपूर्वक कई सुधार लागू किए। उनपर हमारे धर्म और शास्त्रों में हस्तक्षेप करने के आरोप लगाए गए। यदि अंग्रेज यहां नहीं आए होते तो हम आज भी बहुत पिछड़े हुए होते। विदेशियों पर तरह-तरह के आरोप लगाने के पीछे लोगों के अपने स्वार्थ थे। उनके चले जाने के बाद किसी ने भी लोगों को जागरूक करने की कोशिश नहीं की। केवल ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के हम कार्यकर्ता ही बुद्धिवाद के प्रचार जैसे श्रेष्ठ कार्य हेतु स्वेच्छा से आगे आए थे। यह देखकर कि धर्म और ईश्वर के नाम पर धोखादड़ी और लूट मची हुई है, तथा धर्माचार्य और राजनेता अपनी मनमानी कर रहे हैं—हमने बुद्धिवाद के प्रचार-प्रसार का खतरा मोल लिया है। हमारा मानना है कि बुद्धिवाद का प्रचार-प्रचार ही अंधविश्वासों से मुक्ति का एकमात्र रास्ता है।

हमारी कोशिश समाज के भले के लिए है। हमारे प्रयास मनुष्य को विवेकवान बनाने के लिए हैं। हमने ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ जैसे बुद्धिवादी आंदोलन की शुरुआत की थी। उसके माध्यम से हम लोगों के मन में स्वाभिमान चेतना लाना चाहते थे। चाहते थे कि लोग अपनी अस्मिता के प्रति सजग हो जाएं। जिस समय हमने वह आंदोलन आरंभ किया था, अनेक लोगों ने हमारा विरोध किया था। उन्हीं दिनों एक जिम्मेदार मंत्री ने अपनी सुंघनी सूंघते हुए मुझसे पूछा था—‘आत्मसम्मान से तुम्हारा भला क्या मतलब है? इसका तो नाम ही हास्यास्पद है। कोई भी सुनकर हंसने लगेगा।’

मैंने शांतिपूर्वक उसे उत्तर दिया था—‘इसका हमें भी खेद है। कृपया बताएंगे कि आप क्या हैं?’ उन्होंने पूछा कि मैं उनसे ऐसे प्रश्न क्यों कर रहा हूं? मैंने उनसे पूछा था कि इस समय समाज में उनकी हैसियत क्या है? जातीय अनुक्रम में उनका स्थान क्या है? उन्होंने बताया कि वे मंत्री हैं। यही उनकी उपलब्धि है। आगे उन्होंने बताया था कि जाति से वे रेड्डियार हैं। उन्हें यह बताते हुए कि रेड्डी, गाउंडर, नायडु, नायकर आदि वे नाम हैं जो हमने स्वयं गढ़े हैं, लेकिन शास्त्रों के अनुसार, धर्म और परंपरा के अनुसार हम सभी ‘शूद्र’ यानी चौथा वर्ण हैं। यही लंबे समय से चला आ रहा है। मैंने उनसे कहा कि हमने अपना आंदोलन लंबे समय से चले आ रहे इस अवमाननाकारी विभाजन को खत्म करने के लिए आरंभ किया था। उसके बाद मैंने उनसे पूछा, ‘शूद्र से क्या अभिप्राय है?’ फिर मैंने खुद की उनसे कह दिया—‘शूद्र के मायने हैं, वेश्या की संतान।’

उसके बाद मैंने अपना कथन जारी रखा। मैंने बताया, ‘आप उच्च शिक्षा प्राप्त हैं। आपने बीए, बीएल की उपाधियां प्राप्त की हैं। आप तीन वर्षों तक मंत्री थे। आज भी आप मंत्री हैं। आप अभी भी ‘शूद्र’ यानी वेश्या की संतान हैं। बावजूद इसके आप अपने हीन सामाजिक स्तर पर शर्मिंदा नहीं है। एक व्यक्ति जो आपके दरवाजे पर भिक्षा मांगने आता है, एक व्यक्ति जो आपके लिए अपनी स्त्रियों को वेश्यावृति में ढकेलने को भी तैयार है—वह ऊंची जाति का होने का दावा करता है। उसे जाति के आधार पर खुद से ऊंचा मान लेते हैं, आप उसके कदमों पर झुक जाते हैं।’

अंत में मैंने उससे पूछा—‘अब आप बताएं, क्या आप ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की जरूरत महसूस करते हैं या नहीं?’ उसने बस इतना ही कहा था कि यह सब बहुत लंबे समय से चला आ रहा है।

आप स्वयं महसूस करेंगे कि हमारे आंदोलन का उद्देश्य बहुत महान है। हमारा लक्ष्य आसान भी नहीं है। हमें कठिन परिश्रम करना होगा। जख्म हाल का हो तो उसका इलाज करना आसान होता है। लेकिन यह घाव(कैंसर) तो बहुत पुराना है। ऑपरेशन करके अवांछित से मुक्ति पाने के अतिरिक्त इसका और कोई उपचार नहीं है। हमारी सामाजिक बुराइयों की जड़ें बहुत गहरी हैं। इसकी चीर-फाड़ करने के लिए हमें सर्जन की भूमिका में आना ही पड़ेगा।

आत्मसम्मान आंदोलन: एक बुद्धिवादी अभियान

‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की विचारधारा क्या है? किस सैद्धांतिकी पर वह टिका है? इसे समझने से पहले हमें वास्तविक समस्या को समझना पड़ेगा। उन चीजों को समझना पड़ेगा जिन्होंने हमें नीचा दिखाया है। उन कारणों की खोज करनी पड़ेगी जिन्होंने हमें लज्जाजनक परिस्थितियों में लाकर खड़ा किया है। हमने देखा है कि ईश्वर की रचना भी हमें लज्जाजनक परिस्थितियों में ढकेलने की एक वजह है, इसलिए हमें ईश्वर को नष्ट कर देना चाहिए। हमने पाया है कि हमें शर्मनाक हालात तक पहुंचाने कांग्रेस पार्टी का भी योगदान रहा है। इसलिए हम कांग्रेस को खत्म कर देना चाहते हैं। हमने मोहनदास कर्मचंद गांधी को भी हमारे हितों के विरुद्ध काम करते हुए देखा था। इसलिए हम उनके प्रभाव-क्षेत्र से उबरना चाहते हैं। इसी तरह हमने देखा है कि हमें इस विपन्नावस्था में पहुंचाने में ब्राह्मणों का बड़ा योगदान है। इसलिए हम उनके विरुद्ध हैं। हमने देखा है कि धर्म एक सामाजिक बुराई है। इसलिए हम धर्म को भी नष्ट कर देना चाहते हैं।

‘आत्मसम्मान आंदोलन’ इन पांचों बुराइयों के विरुद्ध है। संक्षेप में आत्मसम्मान आंदोलन ने धर्म, कांग्रेस, गांधीवाद, ईश्वर और ब्राह्मणों के विरुद्ध संघर्ष की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली है। यही पांचों ताकतें हैं जो समाज में हानिकारक विचार फैलाकर हमारे लोगों को निशाना बनाती हैं। उन्होंने हमारे लोगों को दास बनाया हुआ है। जब तक हम इस पांचों बुरी ताकतों को ध्वस्त नहीं कर देते, तब तक हम अपने लोगों को उनके उत्तरोत्तर बिगड़ते हालात से, भयावह और चुनौतीपूर्ण सामाजिक जीवन से बाहर नहीं ला सकते। हम अपने लोगों के आत्मसम्मान को लौटाने के लिए संकल्परत हैं।

मेरा मतलब यह नहीं है कि हम राजनीति में छलांग लगाने जा रहे हैं। ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ राजनीतिक संगठन नहीं है। यह विशुद्ध रूप से समाज सुधारवादी आंदोलन है। लेकिन यदि ये प्रतिक्रियावादी ताकतें हमारी प्रगति के रास्ते में आएंगीं, हमारे लक्ष्य की बाधा बन खड़ी होंगी—तब उनका विरोध करने के अतिरिक्त हमारे पास अन्य कोई उपाय न होगा। आप जरा कांग्रेसी की नीतियों पर विचार कीजिए। कांग्रेस ने अपनी नीतियों को गांधी, धर्म, जाति तथा ब्राह्मणों के हितों की सुरक्षा के लिए तैयार किया है। ब्राह्मण अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए गांधी की मदद लेना चाहते थे। चूंकि गांधी का सोच पूरी तरह प्रतिक्रियावादी था, इसलिए उन्होंने गांधी को ‘महात्मा’ घोषित किया था। गांधी ब्राह्मणों के साथ हमेशा खड़े होते थे।

एक शराबी और विक्षिप्त व्यक्ति की भांति गांधी हमेशा ईश्वर, धर्मशास्त्र, वर्णाश्रम धर्म, राम और हिंदू धर्म पर बातें करते थे। लोगों पर उनके प्रचार का कुछ असर भी था। आज सभी पत्र-पत्रिकाएं ब्राह्मणों के एकल प्रभाव में हैं। हमारे पास अपनी कोई प्रभावशाली पत्रिका नहीं है। उनके प्रचारतंत्र ने हमारे लोगों को अपने प्रभाव में ले लिया है। जैसे ही किसी ब्राह्मण का जिक्र होता है, उनके मन में आदरभाव उमड़ आता हैं। यही कारण है कि हमने ब्राह्मणवाद को समाज से उखाड़ फैंकने की कसम खाई है। धर्म और ईश्वर दोनों को समाज से बाहर खदेड़ देना चाहिए। गांधी जिन्होंने हमेशा ही वर्णाश्रम व्यवस्था का पक्ष लिया था, का विरोध होना चाहिए। जो सरकार उन सबका, कानून की ताकत के साथ जोरदार समर्थन करती है, उसे बदल देना चाहिए। जो ब्राह्मण विभेदकारी वर्णव्यवस्था के समर्थक हैं, जो जाति के नाम पर अपने विशेषाधिकारों को सुरक्षित रखना चाहते हैं—उन्हें कड़वा पाठ पढ़ाया जाना चाहिए। चारों ओर शर्मनाक घटनाएं घट रही हैं।

आप कृपया इन बातों पर विचार कीजिए। मैंने जो कहा वह सही है या नहीं, इसपर सोचिए। मेरे विचार किसी शास्त्र या वेद पर केंद्रित नहीं हैं। मैं बस वही कहता हूं जो मेरे मस्तिष्क को सही जंचता है। आपके पास भी तर्क और विवेचन का सामर्थ्य है। सोचिए….लगातार सोचिए। यदि आपको लगता है कि मैंने जो कहा, उसमें सचाई है, तो उसे अपना लीजिए। नहीं तो जाने दीजिए। मैं अपने विचार किसी ऐसे व्यक्ति पर नहीं थोपना चाहता जिन्हें वे पसंद न हों। दूसरों को अपने इशारों पर हांकने की मेरी  कोई इच्छा नहीं है।

मैं बस आपको इतनी याद दिलाना चाहता हूं कि आप सभी के पास अपना स्वतंत्र विवेक है। उसकी मदद से आप तथ्यों की विवेचना कर सकते हैं। उनके पीछे निहित अच्छे और बुरे की पहचान कर सकते हैं। इसके लिए मैं आपके ऊपर कोई दबाव बनाना नहीं चाहता। मैं तो आपका ध्यान केवल इस तथ्य की ओर दिलाना चाहता हूं कि ब्राह्मणवाद के विनाशकारी औजारों ने आपको विचारहीन गुलाम में बदल दिया है। आप अपनी सोचने-समझने की ताकत गंवा चुके हैं। यही कारण है कि मैं समाज के पुनर्गठन की आवश्यकता पर जोर देता हूं। अनेक नेताओं ने अपने बेहतर जीवन के लिए दूसरे रास्तों को चुना है। वे स्वार्थी हैं। मैं अपने मकसद को लेकर थोड़ा जिद्दी हूं।

तर्कवाद

हमारे समाज को क्रांतिकारी नीतियों की आवश्यकता है। इसके लिए समाज में बुद्धिवाद के प्रचार-प्रसार में तेजी लानी होगी। इस पुनीत उद्देश्य हेतु हमने ‘तर्कवादी मंच और संगठन’(रेशनलिष्ट फोरम एंड एसोशिएसन) का गठन किया है। कुछ ऐसे लोग भी हो सकते हैं जिन्हें इस ‘तर्कवादी संगठन’ के विस्तार से परेशानी हो। जो नहीं चाहते हों  कि यह मंच फले-फूले। वे यह दुष्प्रचार कर सकते हैं कि हमारा आंदोलन अमुक व्यक्ति अथवा वस्तु के विरुद्ध है। मैं आपको स्पष्ट रूप से बता देना चाहता हूं। वस्तु या विचार विशेष के विरुद्ध हम चाहे हों, या न हों। लेकिन हम न तो कभी न्याय के विरुद्ध हो सकते हैं, न ही कभी तर्क की उपयोगिता पर सवाल खड़े कर सकते हैं। हमने अपने संगठन को ‘तर्कवादी संगठन’ का नाम दिया है। यह आपके ऊपर है कि आप अपने बारे में क्या सोचते हैं। आप सोचें, बस इतनी ही हम आपसे अपेक्षा रखते हैं। वस्तुतः यही एकमात्र यही श्रेष्ठ कार्य है जिसे आपको नि:संकोच करना ही चाहिए।

जरा देखें, दूसरे लोग क्या कर रहे हैं। समानधर्मा लोगों के साथ मिलकर वे आज भी कुटिल कर्मों में संलिप्त हैं। उन्होंने ‘वर्णाश्रम धर्म संगठन’ आरंभ किया है। उसका उद्देश्य जाति-व्यवस्था को संरक्षण प्रदान करना है। उन्होंने ‘सनातनी संघों’ का गठन किया है, जिससे वे प्राचीन रीति-रिवाजों और परंपराओं को बचाए रखना चाहते हैं। वे ऊंची आवाज में रामकथा की महिमा बखानते हैं। कृष्ण के उपदेशों की बढ़ाई करते हैं और ऐसे ही निरर्थक कार्यों में लगे रहते हैं। इस काम के बदले वे अपने लिए विशेषाधिकारों का दावा करते हैं। वे आपको स्वतंत्र रूप से सोचने-विचारने की अनुमति नहीं देते। ईश्वर, धर्म, धर्माचार्यों तथा दूसरी वस्तुओं के बारे में अभी तक जो कहा गया है, वे आपको उसपर सोचने का अधिकार नहीं देते। उनका यह कहना गलत है कि हमारा अभियान उनके ईश्वर, धर्म और धर्मशास्त्रों के विरुद्ध है। वे चीख-चीख कर कहते हैं कि हमारा आंदोलन उनकी भावनाओं को क्षति पहुंचा रहा है। कि हमारी बातों से उनकी भावनाएं आहत होती हैं। इस सब का हमारे लिए इसका क्या मतलब है? बस इतना कि वे जितना नीचा गिरते हैं, गिरने दो।

आखिर हम कब तक सहन कर सकते हैं कि कोई ‘शूद्र’ कहकर हमारी अवमानना करे। मुझे अपने लोगों की बेहद चिंता है। आखिर कब तक हम हर तरह के अपमान को गर्दन झुकाकर सहते रहेंगे? ब्राह्मण जो कहते हैं, उसपर हम और कब तक आंखें मूंदकर विश्वास करते रहेंगे? अगर ऐसा है तो हमारे दिमागों की उपयोगिता ही क्या है? हम लोगों को खुली हवा में उड़ान भरते देखते हैं। क्या हम सिर्फ ब्राह्मणों के पांव धोकर, गंदे पानी को पीकर संतुष्ट हो जाने वाले लोग हैं? जब वे कहते हैं कि हमारे अभियान से उनकी भावनाएं आहत होती हैं, तो हमें उसकी जरा भी परवाह क्यों करनी चाहिए? वे हमसे ज्यादा उदार नहीं हैं। न ही उनका दिल हमारे दिलों से बड़ा हैं। हमें जो ठीक लगता है, वही करना चाहिए। हम जानते हैं कि हमें खतरों और मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। उसके लिए हम सदैव तैयार हैं। जान की बाजी लगानी पड़े तब भी तैयार हैं। मौत को तो किसी न किसी दिन आना ही है। उसके भय से हम अब और ज्यादा चुप नहीं रह सकते।

अतीत में चूकि हम अत्यधिक विनम्र और सहनशील रहे थे, इसलिए हम कोई विकास नहीं कर सके। पढ़े-लिखे द्रविड़ लोग भी आलसी थे। परिणामस्वरूप उपद्रवी और ठेकेदार किस्म के लोग धर्म की सुरक्षा के के नाम पर एकजुट होते गए। अन्यथा आज तक हम शानदार प्रगति कर चुके होते। आज भी यदि हम(धर्म के विरुद्ध) कुछ कहने के लिए मुंह खोलते हैं, तो ईसाई हमपर हमलावर होकर आ जाते हैं। हम कुछ और कहते हैं तो मुसलमान उसका विरोध करने लगते हैं। उन्हें छोड़कर जब हम केवल अपने धर्म की बारे में बात करते हैं, तब ब्राह्मण अपनी भृकुटियां तान लेते हैं। विरोध प्रदर्शन के लिए ब्राह्मण खुद कभी सामने नहीं आते। ऐसे लोग जो आज भी वेश्या और रखैलों की संतान कहे जाने को तैयार हैं, ऐसे लोग जो माथे पर भभूत मलकर खुद को धन्य समझते हैं; और ऐसे लोग जो ‘राम-राम’, ‘शिव-शिव’ का मंत्रजाप कर रहे होते हैं—वही लड़ने के लिए हमारे आगे तन जाते हैं।

मैं अदालत में अपने ऊपर दायर मुकदमे के बारे में कुछ नहीं कहना चाहता। जब हमने सलेम में राम के चित्रों को पैरों तले कुचला था, तब हमारे विरुद्ध कोई ब्राह्मण कोर्ट में नहीं गया था। वे हमारे ही लोग हैं जिन्होंने मेरे ऊपर मुकदमा दायर किया था। उन्होंने शिकायत की थी कि मेरे कृत्य ने उनकी भावनाओं को आहत किया है। मुझे अदालत का सम्मन प्राप्त हुआ था। उसके बारे में आपने अखबारों में पढ़ा ही होगा। जब तक हम इस भयानक और जानलेवा बीमारी के इलाज के लिए बड़ा ऑपरेशन नहीं करते, तब तक मुझे नहीं लगता कि हम इसका इलाज कर सकते हैं। आज यह छूत का रोग बन चुका है। यही कारण है कि मैं समस्या की जड़ तक जाना चाहता हूं। केवल बातों द्वारा लक्ष्य सिद्धि असंभव है। इस ‘तर्कवादी संगठन’ का आरंभ हमने कुछ क्रांतिकारी विचारों के प्रचार-प्रसार हेतु किया है। यदि हम स्वयं को तुच्छ, हीन और निचले स्तर का मान लें, यदि हम हिंदू होने को स्वीकार कर लें तो हमें उनके शास्त्रों, रीति-रिवाजों, परंपराओं, ईश्वर तथा रूढ़िवादी मिथों तथा कर्मकांडों को भी उसी तरह स्वीकार करना पड़ेगा।

क्या हमें यह सवाल नहीं करना चाहिए कि हमें ‘शूद्र’ यानी वेश्या की संतान किसने कहा था? क्या वह तुम्हारा भगवान कृष्ण था? यदि हां, तो उसने ऐसा कहां कहा था? यदि उसने गीता में ऐसा कहा था तो क्या हमें अपनी चप्पलें निकालकर कृष्ण और उसकी गीता की पिटाई नहीं करनी चाहिए? यदि तुम्हें इससे डर लगता है तब तुम सचमुच एक शूद्र का जीवन जीते हो। क्या हुआ अगर हम राम की चप्पलों से पिटाई करते हैं। क्योंकि उसने कहा था कि हम शूद्र हैं।  उसने शूद्रों की हत्या की थी। चूंकि शंबूक शूद्र था, इसलिए उसकी पीट-पीटकर हत्या की गई थी। शंबूक ब्राह्मण के बजाय ईश्वर की पूजा करता था। इसलिए उसके शरीर को टुकड़े-टुकड़े कर दिया था। शूद्रों को भगवान की पूजा करने का कोई अधिकार नहीं था। उन्हें केवल ब्राह्मण को पूजना चाहिए। यही राम ने कहा था। यह प्रसंग धूर्त्ततापूर्ण ढंग से गढ़ा गया था कि शूद्र द्वारा ईश्वर की प्रार्थना करने से एक ब्राह्मण की मौत हुई है; और उसका मृत शरीर राम के आगे लाकर रख दिया गया था।

मैं आपसे सवाल करना चाहता हूं कि कोई ब्राह्मण इस प्रकार कैसे मर सकता है? उसे तो केवल स्वर्ग जाना चाहिए। यदि एक ब्राह्मण मर भी गया तो क्या हुआ?

कहानी के अनुसार, कहा यह गया है कि राम के शासनकाल में ‘अधर्म’ होने के कारण एक ब्राह्मण की मृत्यु हुई थी। किसके पाप से ऐसा हुआ—राम ने पूछा था। ब्राह्मणों ने उसका कोई तर्कसंगत उत्तर नहीं दिया था। उन्होंने राम से कहा था कि वह जाएं और खुद इसका पता लगाएं। इसलिए वह वन में गया। वहां उसने शंबूक को तपस्या करते देखा था।

‘तुम क्या कर रहे हो?’ राम ने पूछा था।

‘मैं ईश्वर की साधना कर रह हूं।’ शंबूक का उत्तर था।

राम नाराज हो गया। वह चिल्लाया, ‘तुम शूद्र हो। तुम्हें केवल ब्राह्मणों की पूजा करनी चाहिए। वह करने के बजाय तुम यहां ईश्वर की पूजा कर रहे हो? यह ‘अधर्म’ है। तुम्हें तो टुकड़े-टुकड़े कर देना चाहिए।’ और कसाई की तरह राम ने शंबूक को मार डाला।

कल्पना कीजिए, यदि हम यहां न हों तो ये ब्राह्मण क्या कर सकते हैं। क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि ब्राह्मण मारने के लिए निकल आएंगे? यहां तक कि उन्हें भी जो ईश्वर की पूजा करते हैं। क्या वे हमारे लोगों को दोष नहीं देते? वे इस बात का रोना रोएंगे कि शूद्रों ने हमें बदनाम किया है। वर्णाश्रम पद्धति यानी जाति प्रथा के नियमों को ढंग से लागू न करने के लिए वे शासकों को पहले ही दोष देते रहते हैं।

गीता

ब्राह्मण कहते हैं कि जाति-व्यवस्था की रचना कृष्ण ने की थी। कहा जाता है कि कृष्ण ने ही प्रत्येक जाति के लिए उसके विशिष्ट कर्तव्य का विधान किया था। शूद्रों का जन्म परमपुरुष के पैरों से हुआ था। चूंकि वह असम्मानजनक स्थान है, इसलिए शूद्र चौथे वर्ण में आते हैं। उन्हें दास बनकर ब्राह्मणों की सेवा करनी चाहिए। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो वे दंड के पात्र हैं। बताया गया है कि दंड के रूप में कृष्ण उन्हें नर्कवास की सजा देगा।

गीता का यही संदेश है। चूंकि गीता में ब्राह्मणों को समाज में सर्वोच्च स्थान पर रखा गया है, इसलिए सभी ब्राह्मण गीता का विशेष सम्मान करते हैं। जरा सोचिए ऐसे कृष्ण की यदि हम चप्पलें निकालकर पिटाई न करें, तो हमारा भविष्य क्या होगा? लेकिन जब हम कहते हैं कि उसकी चप्पलों से पिटाई होनी चाहिए, तो लोग नाराज हो जाते हैं। वे उस समय नाराज नहीं होते जब यह कहा जाता है कि हम वेश्या के गर्भ से जन्मे हैं। क्या हम इस बात को सहन कर सकते हैं कि हमारी सब की माताएं वेश्याएँ थीं।

ब्राह्मणों के इस घोषणा ने हमें बरबाद किया है कि कोई भी ईश्वर, धर्म, और शास्त्रों का अनादर नहीं करेगा। उनपर सवाल नहीं उठाएगा। उन्होंने हमें हिंदुत्व के विरुद्ध कुछ भी कहने से रोका हुआ है। जब हम सच बोलते हैं, तब वे कहते हैं कि हमने उन्हें आहत किया है। वे धमकी देते हैं कि बदले में हमारे साथ कुछ बुरा होगा। इस व्यवस्था के तहत उन्होंने हमारे लोगों को प्रतिक्रियावादी बना दिया है। हम द्रविड़ियन तमिलों को  तिरष्कृत और अपमानित किया गया है। इस देश में आज भी यही हो रहा है। क्या त्रासदी है। यहां तक कि पढ़े-लिखे लोगों को भी आजीवन यही झेलना पड़ता है. यह सब देखकर एक विदेशी की क्या प्रतिक्रिया होगी?

कल्पना कीजिए एक विदेशी एक धर्मप्राण हिंदू से मिलकर सवाल करता है—

‘आप कहां जा रहे हैं?’ इसपर हिंदू का जवाब होगा—

‘मैं ईश्वर की पूजा करने मंदिर जा रहा हूं।’

‘कैसा ईश्वर?’ वह प्रश्न करेगा।

‘मंदिर में उसकी मूर्ति है।’ उत्तर होगा।

‘कितने मूर्ख हो तुम! पत्थर या मिट्टी की मूर्ति भला भगवान कैसे हो सकती है? तुम्हें किसने बताया कि यह भगवान है?’

एक विदेशी यह सवाल कर सकता है। लेकिन हमारे लोग यह पूछने से हिचकिचाएंगे। यहां तक कि मुस्लिम भी यह सवाल करने के लिए आगे नहीं आते कि पत्थर के टुकड़े में क्या भगवान सचमुच समाया हुआ है। क्यों? क्योंकि वे बहुसंख्यक हिंदुओं से डरते हैं। वही क्यों, ईसाई भी इसी तरह के हैं।

कौन यह सिद्ध करने की जहमत उठाता है कि पत्थर में भगवान समाया हुआ है? लेकिन आदमी चुपचाप यह विश्वास कर लेता है कि भगवान पत्थर में छिपा हुआ है। मैं पूछता हूं क्या किसी ने भी स्वर्ग या नर्क के दर्शन किए हैं? आने वाले समय में संसार द्वारा हमें दोष नहीं दिया जाना चाहिए। इसके लिए यहां हमारे लोगों की चिंता करने, उनके हितों के निमित्त काम करने वाला कौन है? कौन है जो उनकी मुक्ति के रास्ते तलाशेगा? यदि हर आदमी ब्राह्मणों के पैरों पर गिरकर महान भक्त बनने जिद ठाने है तो कौन हमारी रक्षा करने करने करने की सोचेगा? इसीलिए मैं ‘तर्कवादी संगठन’ को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर देता हूं। यह काम किसी भी कीमत पर होना चाहिए। तभी कोई आदमी, आदमी की तरह ससम्मान जी सकता है। हर आदमी, आदमी की तरह वर्ताब करे, उसी के लिए हमारे अभियान की आवश्यकता है। हमें साहसी होना चाहिए। हमें किसी भी चुनौती, किसी भी परीक्षा के लिए तैयार रहना चाहिए। आप जानते हैं कि मुस्लिमों ने अपने धर्म को कैसे सुरक्षित बनाया है। क्या उन्होंने कोई बलिदान नहीं दिया था? यहां तक कि ईसाइयों ने भी अपने धर्म की सुरक्षा के लिए काफी कष्ट सहे हैं। इस अभियान से मुझे काफी उम्मीदें हैं। हमें अच्छे संकेत भी मिल रहे हैं। हवा हमारे अनुकूल है। इस महान अवसर का उपयोग हमें ज्ञान के प्रसार के लिए करना चाहिए।

ब्राह्मणों ने बौद्ध धर्म को किस प्रकार नष्ट किया था? उन्होंने हिंसात्मक तरीकों का सहारा लिया था। बौद्धों का कत्लेआम किया गया था. उनके घरों को आग के हवाले कर दिया था। उनके मठों पर कब्जा कर लिया गया था।

श्रमण(जैन) धर्म को कैसे नष्ट किया गया था? क्या उन्होंने जैन श्रमणों का तेज धार वाले हथियारों द्वारा बेरहमी से कत्ल नहीं किया था? उस नरसंहार में 8000 श्रमणों की जानें गई थीं।2 आज उस भीषण नरसंहार की याद में उत्सव मनाया जाता है। आगे चलकर उन्होंने इस घटना को अपने धर्मशास्त्रों जैसे ‘थेवरम’ और ‘प्रबंधम’3 में इस तरह शामिल किया, मानो वे इस अमानवीय कृत्य से प्रसन्न हों।

आज ब्राह्मण शिकायत करते हैं हम जो भाषण देते हैं वे बहुत कड़वे और असहनीय हैं। देखें कि प्रबंधम में क्या लिखा गया है। क्या ये ग्रंथ हिंसा का उपदेश नहीं देते। क्या ये नहीं बताते कि दूसरे धर्मों तथा आध्यात्मिक विश्वासों को बलपूर्वक नष्ट-भ्रष्ट कर देना चाहिए।  

क्या तुमने देखा नहीं कि हिंदू आस्थावादी—स्त्रियों के साथ बलात्कार करने, दूसरे धर्मावलंबियों को उत्पीड़ित करने, यहां तक कि उनकी हत्या हेतु आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए भी, ईश्वर की प्रार्थना करते आए हैं? यहां तक कि ‘प्रबंध’ महाकाव्य भी, जो उनके अनुसार पवित्र ग्रंथ हैं—हिंदुओं को दूसरे धर्मावलंबियों को मारने, उनकी हत्या करने, सताने तथा उन्हें कष्ट पहुंचाने के लिए अधिकृत करते आए हैं।

बाइबिल क्या कहती है? उसके अनुसार ईश्वर में विश्वास नहीं रखने वाला व्यक्ति मूर्ख है। दूसरे धर्मों में भी यही सब लिखा हुआ है।

उस अवस्था में हम भला चुप क्यों रहेंगे। हमारे यह कहने में भला क्या बुराई है कि जिसने धर्म का प्रचार किया; और जो ईश्वर की पूजा करता है—मूर्ख हैं। किसी व्यक्ति विशेष पर प्रहार करने के बजाय हम कह सकते हैं—

ईश्वर नहीं है

ईश्वर हरगिज नहीं है

जिसने भी ईश्वर की रचना की वह मूर्ख है

जो भी ईश्वर का प्रचार करता है, वह कपटी और बदमाश है

जो ईश्वर को पूजता है वह असभ्य है।

यह बात हम किस आधार पर कहते हैं, आगे मैं उसकी सविस्तार विवेचना करूंगा। जिसने भी आत्मा, स्वर्ग, नर्क, यमलोक आदि की रचना की, वह दुष्ट था। उससे भी बड़ा दुष्ट वह है जो इन बातों पर विश्वास रखता है। वे सब हमें अज्ञानी बताते हैं। कहते हैं कि हम कुछ नहीं जानते। हम अज्ञानियों में दिमाग ही नहीं है। वे हमें असभ्य और मूर्ख कहते हैं।

हम उनके झूठे प्रचार तथा धूर्ततापूर्ण आरोपों पर शर्मिंदा नहीं है। क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो ‘पुनर्जन्म’ की व्याख्या कर सके। बता सके कि पुनर्जन्म के मायने क्या हैं? क्या आप सचमुच ऐसे स्थान की परिकल्पना करते हैं, जहां दिवंगत पूर्वज निवास करते हैं? केवल ब्राह्मण ही इस तरह के प्रवचन देते हैं। हमारे अपने लोग उन्हें दाल, चावल आदि देकर, उनके समक्ष दंडवत प्रणाम करते हैं। ब्राह्मण दावा करता है कि वे सब वस्तुएं उसने हमारे पूर्वजों के लिए ली हैं। आप ब्राह्मण से पूछिए कि वह हमारे दिवंगत पूर्वजों से कब और कहां मिला था? स्वर्ग में या नर्क में अथवा उनके पुनर्जन्म होने के बाद इसी दुनिया में? उसकी ओर से आपको कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिलेगा। ब्राह्मण हमारे लोगों को डराते और भरमाते हैं। बावजूद इसके प्रत्येक आदमी जो ब्राह्मणों तथा उनकी बनाई व्यवस्था में विश्वास रखता है और दिवंगत पूर्वजों के नाम पर उनकी बताई वस्तुएं भेंट करता है—ब्राह्मणों से सवाल करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। वह सहज भाव से कहेगा, ‘मैं इस सबके बारे में कुछ भी नहीं जानता। मैं तो अपनी पत्नी और बच्चों के साथ ब्राह्मण के आगे महज दंडवत था। इस प्रकार के मूर्खतापूर्ण आचरण के बारे में हम क्या सोचें? ऐसे लोगों को मूर्ख कहने में हमारी भला क्या गलती है?

ईश्वर

ईश्वर के अस्तित्व के बारे में कौन दावा कर सकता है? कोई यह नहीं कह सकता कि फलां-फलां व्यक्ति ने ईश्वर के दर्शन किए थे। वे केवल आंखें मिचमिचाते रहेंगे। जोर देने पर सिर्फ इतना कहेंगे कि ईश्वर के बारे में कुछ लोग यही बताते हैं। धर्माचार्य कहते हैं कि ईश्वर किसी का बनाया हुआ नहीं है। वह अपनी इच्छा से स्वयं अस्तित्ववान है। उस अवस्था में वे भला मुझसे क्यों लड़ाई मोल लेंगे? मैं तो सिर्फ ईश्वर के निर्माता को दोषी मानता हूं। जबकि वे कहते हैं कि ईश्वर की रचना ही नहीं हुई है। वह अजन्मा है।

उस अवस्था में, थोड़ा साहस करते हुए मैं सवाल करना चाहूंगा कि ईश्वर के अस्तित्ववान होने की प्रक्रिया, उसके जन्म होने के बारे में ब्राह्मणों को जानकारी कैसे और कहां से मिली? जबकि दूसरे लोग उसके व्युत्पत्ति के बारे में कुछ नहीं जानते। ईश्वर अपनी मर्जी से कैसे अस्तित्व में आया इस प्रक्रिया से भी वे अनजान हैं। वे कहते हैं कि ईश्वर अत्यंत शक्तिशाली है। परंतु इस बात का उन्हें पता कैसे चला? यह कैसे संभव है कि केवल ब्राह्मण ही इस बारे में जान सकते हैं, दूसरे लोग नहीं? क्या बाकी सभी लोग मूर्ख हैं? यह क्यों कहा जाता है कि ईश्वर से संबंधित जानकारी केवल ब्राह्मण ही रख सकता है? दूसरों को भी ऐसा क्यों नहीं बनाया गया कि वे ईश्वर की उत्पत्ति के बारे में जान सकें? चूंकि हमारे पास प्रतिभा और बुद्धि है, हम अपने तर्कों के सहारे आगे बढ़ सकते हैं।

ईश्वर की उत्पत्ति

यह तय है कि मानव सभ्यता के आरंभिक दौर में ईश्वर जैसी कोई चीज नहीं थी। ईश्वर का प्रचलन केवल विगत 3000 वर्षों में हुआ है। उससे पहले उसका कोई जिक्र तक नहीं करता था। न ही उसके बारे में कोई कुछ जानता था। जब मनुष्य ने तूफान की आवाज सुनी, तब उसके डर से बाहर निकलने की चाहत में उसने कल्पना की कि ऐसी कोई महाशक्ति है जो हवाओं पर नियंत्रण रखती है। तूफानों को बांधे रखना जिसका स्वभाव है। अंधेरे को देखकर भी उसके मन में ऐसे ही विचार उमड़े होंगे। फिर जब सूरज की चमक देखी होगी तब भी उसने ऐसा ही सोचा होगा।

इस तरह की छोटी-छोटी बातों से उसका देवताओं और ईश्वर के प्रति विश्वास बढ़ता गया। फिर सहज भाव से लोगों ने मान लिया कि ढेर सारे देवता और ईश्वर ब्रह्मांड में घट रही घटनाओं पर नियंत्रण रखते हैं। आगे चलकर देवताओं के राजा के रूप में इंद्र की कल्पना की गई। बाद में कुछ और देवता भी गढ़े गए। कल्पना की गई कि उनमें एक ऐसा देवता है जो संपूर्ण प्राणिजगत के जन्म की देखभाल करता है। दूसरा देवता मानव जीवन और पूरी सृष्टि को संभालता है। जबकि तीसरा देवता सृष्टि को नष्ट करने के लिए है। उन्हें क्रमशः विष्णु, ब्रह्मा, विष्णु और महेश का नाम दिया गया। ऐसी चीजों के बारे में जो मानवीय समझ से परे थीं, मनुष्य सोचने लगा कि देवताओं से परे भी कोई शक्ति है जो सबपर नियंत्रण रखती है। हालांकि अभी तक उसने शीर्षतम शक्ति को परमात्मा का दर्जा नहीं दिया था। वह उसका उसी तरह सम्मान करता था, जैसे हम आजकल मंत्रियों का सम्मान करते हैं। हमारे यहां मंत्रीमंडल में अनेक मंत्रीगण होते हैं। इसी तरह मनुष्य ने कल्पना की कि एक सर्वशक्तिमान परमात्मा है जो हर चीज को नियंत्रित करता है।

वेद के अनुसार हर विशिष्ट शक्ति को नियंत्रित करने वाला एक देवता है। ईसाइयों ने सिर्फ 2000 वर्ष पहले ईश्वर में विश्वास करना शुरू किया। मुसलमानों ने भी सर्वशक्तिमान अल्लाह के बारे में महज 1500 वर्ष सोचना आरंभ किया। इस्लाम में लगभग 1500 वर्ष पहले एक बदलाव हुआ था। लेकिन ब्राह्मणों ने 3000 वर्ष पहले ही अपना ईश्वर गढ़ दिया था। ऐसा वेदों की रचना के बाद ही संभव हो सका। वैदिक युग में कोई भगवान नहीं था। हिंदुओं के देवताओं की निर्मिति वेदों की रचना के बाद हुई थी।

उन दिनों ब्राह्मण अपने देवताओं को क्या कहते थे? वे कहते थे कि एक परमात्मा है। जब पूछा गया कि वह कहां है? ब्राह्मण का उत्तर था, ‘वह अदृश्य है। उसे देख पाना असंभव है।’ जब ईश्वर के अस्तित्व पर शंका करते हुए पूछा गया कि यदि ईश्वर है तो कम से ब्राह्मण ने उसे देखा ही होगा? यदि ‘हां’ तो वह कैसा दिखाई पड़ता है? उसने जवाब दिया, ‘उसे छूना-देखना संभव नहीं है।’ उसने बताया कि ईश्वर की कोई आकृति नहीं है। जब आपने पूछा कि इसपर विश्वास कैसे किया जाए? उसने बताया कि ईश्वर इंद्रियगोचर नहीं है। वह अगम्य, अगोचर, अनुभवातीत है।

यदि मामला इतना ही गड़बड़ है तो इससे कैसे इन्कार किया जाए कि ब्राह्मण मूर्ख हैं। हम उन्हें बुद्धिमान कैसे मान सकते हैं? यदि ईश्वर को कोई भी देख, छू या महसूस नहीं कर सकता तो यह कैसे मान लिया जाए कि केवल ब्राह्मण ही ईश्वर के बारे में जानता है? उन्हें ईश्वर के अस्तित्व की जानकारी कहां से मिली? हमारे लोग ब्राह्मण जो भी उपदेश दें, उसपर आसानी से विश्वास कर लेते हैं। क्या यह मूर्खता नहीं है? क्या ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए नवीनतम और पुख्ता साक्ष्यों के साथ कोई कम से कम एक प्रमाण आवश्यक नहीं है? ऐसा साक्ष्य जिससे ईश्वर की मौजूदगी को असंद्धिग्ध रूप से प्रमाणित किया जा सके।  

क्या ब्राह्मण यहीं पर रुक जाता है? वह कहता है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है। कि दुनिया में जो कुछ भी घटता है, उसके पीछे ईश्वरीय इच्छा है। वह ईश्वर को उच्चतम गुणों का अधिष्ठान मानता है। वह कहता है कि ईश्वर पवित्र है, करुणानिधान, सत्य और निष्पक्ष है। यदि आप उससे पूछें कि किस आधार पर वह ऐसा मानता है? उसका बस यही जवाब होगा कि लोगों को उसकी सभी बातों पर विश्वास करना चाहिए। यदि यह सत्य है कि ईश्वर परमशक्ति अथवा परा-प्राकृतिक शक्ति है, तो वह अपने होने का प्रमाण क्यों नहीं देता? कुछ ऐसा क्यों नहीं करता कि मैं उसपर विश्वास कर सकूं? यदि वह ऐसा करने में असमर्थ है, जो मैं उसका सम्मान भला कैसे कर सकता हूं? उसकी परमशक्तियां कहां हैं? उसकी शक्तियां इस योग्य नहीं हैं कि उनके माध्यम से लोग उसके बारे में जान सकें।

यदि दुनिया ईश्वर के अस्तित्व को मानने से ही इन्कार कर दे तो उसका क्या बिगड़ जाएगा? कौन-सी ऐसी चीज है जो उसके हाथों से फिसल जाएगी? विश्व की कुल जनसंख्या 450 करोड़(1971 में) आंकी गई है। इतने सारे लोगों में 200 करोड़ लोग नास्तिक हैं। किसी भी ईश्वर में ऐसा इतना सामर्थ्य नहीं है जो इन नास्तिकों को आस्थावादी बना सके।

क्या ब्राह्मण ईश्वर की रचना के बाद शांत बैठ जाता है? नहीं, उसके बाद वह ईश्वर का प्रचार करना चाहता है। इसलिए मैं कहता हूं कि वह धूर्त्त है। वह कहता है कि ईश्वर शक्तिशाली है। तब उसे ईश्वर का प्रचार करने की क्या आवश्यकता है? आप देखिए ब्राह्मण ने क्या किया है। उसने मंदिर बनाया। मूर्तियां गढ़कर देवताओं को आकार दिया। यह कहते हुए कि ईश्वर निराकार है उसने ईश्वर को अनेकानेक रूपों में ढाल दिया। आखिर ईश्वर के इतने सारे रूपाकारों के बारे में उसे पता कैसे चला? जब भी उसने ईश्वर के बारे में कुछ बताने के लिए मुंह खोला, हमेशा उसे मनुष्य जैसा ही बताया। बाकी सभी धर्म कहते हैं कि ईश्वर निराकार है। उसकी कोई आकृति नहीं है। केवल ब्राह्मणों का दावा है कि हिंदू देवी-देवता साकार हैं। इसका क्या मतलब है? आकृति तो स्थायी बनी रहती है। विभिन्न ईश्वरों को विभिन्न रूपाकारों में गढ़ने के पीछे क्या उसका कोई तर्क अथवा विशिष्टानुभूति थी?

एक देवता के धड़ पर सिर्फ एक सिर है। दूसरे देवता के धड़ पर दो सिर उगे हैं। इनके अलावा जो देवता हैं, उनके चार, पांच यहां तक कि छह सिर भी हैं। क्या वह इतने भर से रुक गया? रावण जिनसे राम का प्रतिकार किया था, उसके दस सिर थे। आप जानते हैं, क्यों? उसका उद्देश्य था राम की महानता को स्थापित करना। ऐसी की पराकल्पना देवताओं के हाथों की संख्या के बारे में भी देखी जा सकती है। कुछ देवताओं के महज दो हाथ हैं। कुछ देवताओं के छह हाथ हैं। कुछ देवताओं के इससे भी ज्यादा हाथ हैं। यह सब मनुष्य को छलने, धोखा देने के लिए किया गया। लोगों को मूर्ख बनाने के लिए ही ब्राह्मणों ने चमत्कारों से भरपूर कहानियां गढ़ी थीं। कोई भी औसत बुद्धिवाला, संवेदनशील व्यक्ति ऐसी मूर्खतापूर्ण परिकल्पनाओं पर कैसे भरोसा कर सकता है? यदि हम दादी-दादा मार्का इन कहानियों पर विश्वास न करें तो हमारा क्या बिगड़ जाएगा?

एक बुद्धिजीवी को इस सबके बारे में क्यों नहीं सोचना चाहिए? इन कुत्ता-बिल्ली मार्का कहानियों पर अपना सिर हिलाते हुए हम आखिर कब तक, दीन-हीन और निम्न जातीय शूद्र का जीवन जीते रहेंगे? यदि हमारे भीतर जरा-भी आत्मसम्मान है, तो क्या हमें इस मूर्खतापूर्ण चीजों को नष्ट नहीं कर देना चाहिए? एक भी ऐसा ईश्वर नहीं है जो श्रेष्ठ गुणों से संपन्न हो।

आप शिव के बारे में विचार कर सकते हैं। उसके पांच सिर थे। दूसरे देवता ‘ब्रह्मा’ के भी पांच सिर थे। बताया गया है कि शिव की पत्नी पार्वती इससे भ्रमित हो गई। ब्रह्मा और शिव दोनों के पांच-पांच सिर होने के कारण वह अपने पति की पहचान ही नहीं कर पाती थी। अपनी दुविधा के बारे में उसने अपने पति से शिकायत की। शिव परेशान हो गया। पार्वती की उलझन को दूर करने के लिए उसने तत्क्षण कदम उठाने का फैसला कर लिया। आप जानते हैं कि उसने क्या किया था। उसने ब्रह्मा के पांच सिरों में से एक को उड़ा दिया था, ताकि पार्वती उसे आसानी से पहचान सके। ईश्वर की इस कहानी के बारे में आप क्या सोचते हैं? क्या आप मानते हैं कि पार्वती की समस्या के समाधान के लिए शिव ने जो किया, वह सही था?

मुझे ब्राह्मणों से पूछना चाहिए कि ईश्वरों को चार या पांच सिरों की जरूरत किसलिए पड़ती है। क्या भोजन करने के लिए इतने सारे हाथों की आवश्यकता पड़ती है? वे कहते हैं कि चार सिर चारों दिशाओं में और पांचवा आसमान पर नजर रखने के लिए चाहिए। इस सबका आधिकारिक प्रमाण क्या है? हिंदू धर्म से संबंधित ये लोग हमेशा ही काल्पनिक कहानियां गढ़ने में लगे रहते हैं।  

ईश्वर को बनाने वाले ने कहा था कि उसकी कोई आकृति नहीं है। वह निराकार है। उसने यह नहीं कहा था कि ईश्वर के अनेक हाथ हैं। उसने कहा था कि ईश्वर महज एक विचार है। ईश्वर को मानवेंद्रियों की सीमा से परे, अगम-अगोचर बताया गया है। अलवारों, नयनमारों और महानों में से किसी ने भी नहीं कहा था कि ईश्वर की सुनिश्चित आकृति या कोई निर्धारित रूपाकार है। तब हमारे आज के देवताओं को उनकी तयशुदा देह-यष्टि कहां से प्राप्त हुई? मंदिर में मूर्तियां रख, उन्हें अलग-अलग ईश्वर नामों से पुकारना कैसे सही हो सकता है? क्या ईश्वर को रचने वाला धूर्त्त नहीं था? क्या वह आदमी मूर्ख नहीं था जिसने ईश्वर को सुनिश्चित रूपाकार में ढालने का काम किया था?

यदि यह सच है कि ईश्वर को न तो देखा जा सकता है, न ही स्पर्श किया जा सकता है, तब उसको भोग लगाने का, वह भी दिन में छह-छह बार—भला क्या कोई औचित्य है? चूंकि समाज में ऐसे मूर्खों की संख्या पर्याप्त है जो इन सब बातों पर अपने धन को बरबाद कर सकते हैं, इसलिए ये धूर्त्त लोग अपना षड्यंत्र रचते रहते हैं। ईश्वर को भोजन करते हुए किसने देखा है? क्या ईश्वर को अपने शरीर के लिए दिन में छह बार भोजन की आवश्यकता है? कौन आदमी ईश्वर के मुंह में भोजन का कौर रखता है? क्या ईश्वर भोजन को पचा सकता है? क्या किसी ने भगवान को, दिन में कम से कम एक बार, शौच के लिए जाते हुए देखा था? ईश्वर को पेशाब करते हुए किसने देखा है? वह चल-फिर नहीं सकता। तब वह इन प्राकृतिक क्रियाओं को कैसे संपन्न करता होगा? वे लोग जो सोचने-विचारने में असमर्थ हैं, जिनका दिमाग कुंद हो चुका है, उन्हें महान समझ लिया गया है। ऐसे ही लोगों को आस्तिक माना जाता है।

यदि यह सही है कि ईश्वर संपूर्ण है। उसे किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है। तब ये ब्राह्मण ईश्वर का ब्याह क्यों रचाते हैं? उसे पत्नी, बच्चों आदि की आवश्यकता ही क्या है?

एक ईश्वर के दो पत्नियां हैं। किसी के हजारों पत्नियां हैं। ईश्वर को हजारों पत्नियों की क्या जरूरत है? इन प्रश्नों के उत्तर के बारे में वे विचार नहीं करते। वे चीजों को उसी रूप में नहीं रहने देना चाहते जैसी कि वे हैं। हमारे लोग जो ईश्वर के विवाह को साल-दर-साल पूरी श्रद्धा के साथ मनाते  हैं, वे एक बार भी यह नहीं पूछते कि पिछले वर्ष जो विवाह हुआ था, उसका क्या हुआ? क्या ईश्वर की पत्नी किसी के साथ भाग गई है? अथवा किसी बीमारी के कारण उसका निधन हो चुका था? अथवा ऐसा कोई कानून है कि ईश्वर का विवाह केवल एक वर्ष के लिए ही वैध माना जाएगा? इस प्रकार के सवालों की किसे परवाह है? कैसी मूर्खता है कि लोग हर साल ईश्वर के विवाह में शामिल होने के लिए जाते हैं। आप देख सकते हैं कि किस तरह हमें मूर्ख बनाया जाता था। यदि यह सही है कि ईश्वर सद्गुणों का आधार, उनका एकमात्र स्रोत है, तब हम ईश्वरों को वेश्याओं के साथ संबंध स्थापित करते हुए कैसे देख सकते हैं?

महाकाव्यों के अनुसार सुब्रमानिया, शिव, विष्णु, कृष्ण आदि सभी भगवानों की बहुपत्नियां(रखैल) हैं! क्या किसी ने पूछा है कि अनेक पत्नियों के रहते हुए भी ईश्वर को रखैलों की क्या आवश्यकता है!

जिन लोगों ने देवताओं को गढ़ा है, वे बस यही विराम नहीं लेते। उन्होंने उनके चरित्र और आचरण के बारे में अनेक कहानियां गढ़ी हैं। उनके देवताओं के बारे में यह सोचना कितना डरावना है कि वे अनैतिक और लंपट जैसा व्यवहार करते हैं।

कुछ देवताओं के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने दूसरों की पत्नियों के साथ बलात्कार किया था। कुछ मामलों में उनका भेद खुल गया था। कुछ देवताओं को मामूली दंड मिला था। कुछ को गंभीर रूप से दंडित किया गया था। यह सब देवताओं के नाम पर गढ़ा गया है। आप देख सकते हैं कि इस तरह की चीजें हिंदू मंदिरों में आज भी उत्सव की तरह मनाई जाती हैं। श्रीरंगम का देवता एक वेश्या की खोज में उड़ायुर तक पहुंच जाता है। ये ब्राह्मण देवता को अपने कंधों पर लादकर ले जाते हैं। वहां पूरी रात वे प्रतीक्षा करते हें। अगली सुबह वे पत्थर की मूर्ति को वापस श्रीरंगम ले जाते हैं। इसे प्रतिवर्ष एक उत्सव की भांति मनाया जाता है। इसी तरह आप देखते हैं त्योहारों के दौरान देवतागण भी वेश्याओं के घर जाते हैं। कोई ऐसा ईश्वर नहीं है, जिसके मन में नैतिकता के प्रति सम्मान भाव हो। शिव और विष्णु के चरित्र एवं आचरण तो बुरी तरह चित्रित किया गया है।

क्या आप सोचते हैं कि इन देवताओं के चरित्र के अनुसरण द्वारा मनुष्य अपने आपको सुधार सकते हैं? क्या उनसे प्रेरणा लेकर उच्च नैतिक गुणों पर आधारित समाज की रचना संभव है? क्या ईश्वर के लिए एक पत्नी और वेश्या दोनों का होना आवश्यक हे? कोई भी संवेदनशील मनुष्य हिंदू धर्म में झूठ और प्रपंच के इस दलदल से भला कैसे सहमत हो सकता है?

क्या ईश्वर दयावान है

वे कहते हैं कि ईश्वर प्रेम और करुणा के प्रतीक हैं। आप जाकर देवताओं पर नजर डालिए। उनके हाथों में कटार, तलवार, चक्र, त्रिशूल, वाण, हथौड़ा, तेजधार वाले तथा डरावने हथियार दिखाई देंगे। क्या हिंदू देवता ठग, डकैत, लुटेरे और हत्यारे हैं? हम इस कथन से भला कैसे सहमत हो सकते हैं कि देवता दयालु हैं? यदि यह मान लिया जाए कि शिव प्रेम के प्रतीक हैं, तो उन्होंने अपने हाथ में त्रिशूल क्यों थामा हुआ है?(श्रोताओं की हंसी)। मैं ये बातें सिर्फ हंसी-मजाक के लिए नहीं कह रहा हूं। आप द्रविड़ियन लोगों को इन बातों पर अत्यंत गंभीर होकर विचार करना चाहिए। आपको समझना चाहिए कि हमें किस सीमा तक मूर्ख बनाया गया है। हम इन देवताओं के बीच मनुष्य की भांति रहते हैं। हमें इन देवताओं की जरूरत ही क्या है? देवताओं के इतने सारे अवतार किसलिए हैं? शिव के अवतार का जन्म क्यों होता है? भगवान के रूप में विष्णु की क्या उपयोगिता है? उन्होंने किया क्या है?

यह कहा जाता है कि उन्होंने अनेक लोगों की हत्याएं की हैं। किस्से-कहानियों में सविस्तार बताया गया है कि उन्होंने असुरों, राक्षसों तथा करोड़ों लोगों को मारा था, ठीक ऐसे ही जैसे कोई कसाई  असंख्य बकरियों को मौत के घाट उतार देता है। क्या ये देवता कसाई और हत्यारे हैं? वे खुद को भगवान कहते हैं। रामायण महाकाव्य में कहा गया है कि राम ने करोड़ों लोगों की हत्या की थी। बताया गया है कि इतने लोगों की हत्या उन्होंने भूमा देवी(पृथ्वी) का भार कम करने के लिए की थी। हिंदू धर्म में देवताओं का मुख्य कार्य क्या है? वे सिर्फ मारकाट करने, नरसंहार और लोगों की हत्याएं करने के लिए हैं। यदि आप सोचना आरंभ करेंगे, तभी आप इन देवताओं, मंदिरों और धर्म के बारे में अनेक मूर्खतापूर्ण एवं हास्यास्पद दावों की असलियत को समझ पाएंगे।

कोई मूर्ख ही होगा जो यह मान बैठेगा कि ये सब बातें उससे संबंधित नहीं हैं।

आप देखेंगे कि तमिलवासी द्रविड़ों को अतीत में किस प्रकार छला जाता रहा है। कितने लोगों को मूर्ख बनाया गया होगा? इन बातों पर आपको कम से कम अब तो विचार करना चाहिए। सोचना चाहिए कि हिंदू धर्मशास्त्रों, मंदिरों, भगवानों और मूर्तियों से अब तक हमें क्या लाभ हुआ है।

ये ब्राह्मण अभी तक हिंदू धर्म के लिए सिर्फ पौराणिक ग्रंथ ही रच पाए हैं। पुराणों की संख्या अनगिनत है। वे रामायण से बात शुरू करते हैं। फिर अचानक स्कंद पुराण, वैनायक पुराण आदि  पर चले जाते हैं। ये पुराण वगैरह क्या हैं? आप किसी भी एक पुराण को उठा लीजिए। उसमें केवल अश्लील, अशिष्ट और अविश्वसनीय प्रसंगों की भरमार मिलेगी।

ब्राह्मण हिंदू देवताओं का खूब बखान करते हैं। किंतु एक भी ऐसा देवता नहीं खोज पाएंगे जो अश्लीलता, अनैतिकता और हिंसक व्यवहार के मुक्त हो। कम से कम ईश्वर के मामले में, यदि वह ईश्वर है तो उसके चरित्र में क्या थोड़ी सी भी सचाई, थोड़ा-सी शुभता नहीं होनी चाहिए! हमारी यह चिंता व्यर्थ है, क्योंकि ब्राह्मणों ने जानबूझकर इन कपटपूर्ण चीजों को ईश्वर के नाम पर गढ़ा है। इनके द्वारा ही वे अज्ञानी जनता को धोखा देने में सफल रहे हैं! लेकिन मैं बेहूदा चित्रों और छवियों द्वारा परिकल्पित नीच, दुष्ट, अनैतिक और हत्यारे देवताओं की असलियत को भली-भांति समझता हूं। क्या कोई सचमुच ऐसा ईश्वर है जिसे मनुष्य अपनी इच्छा से स्वीकार कर सके?

अपने समाज में ढेर सारा पुलिस बल, अदालतें और कारागार हैं। क्या इन सब का श्रेय इतने सारे देवताओं को जाता है?

इसलिए मैं जोर देकर कहना चाहूंगा कि असंख्य हिंदू देवताओं ने ही हम द्रविड़ों को मूर्ख बनाया है। ये हिंदू देवता ही समाज में निरंतर बढ़ते भीषणतम अपराधों तथा नैतिक पतन के लिए जिम्मेदार हैं। हम द्रविड़जन आज पहले की अपेक्षा कहीं अधिक साहसी हैं। हम कुछ भी कर सकते हैं। सही हो गलत, अच्छा हो या बुरा—सभी तरह का काम करने की हिम्मत हमारे भीतर है।

यदि हम सब संगठित हो, लोगों को तार्किक बनाकर समाज को बदलना चाहें तो हम अवश्य ही एक बेहतर समाज की रचना कर सकते हैं। एक बार व्यक्ति तर्कशील बन जाए, तब वह दूसरों को नुकसान पहुंचाने के बारे में कभी नहीं सोचेगा। केवल तर्कशील मनुष्य ही दूसरों की भावनाओं को भली-भांति समझ सकता है। वह सोचेगा कि उसका पड़ोसी भी उसी की तरह मनुष्य है। क्या यह भावना हमें आज, इस समाज में दिखाई पड़ती है? वहां तो ऐसे लोग हैं जो दूसरों का शोषण करते रहते हैं। लोगों का शोषण करने के लिए उनके पास आज भी ज्यादा से ज्यादा अवसर हैं। वे अपनी समाज-विरोधी गतिविधियों में संलिप्त हैं। इसलिए मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि आप हमारे जीवन को बरबाद करने वाले कारकों एवं कारणों के बारे में अच्छी तरह सोचें। हमारे इस दीन-हीन जीवन की वजह क्या है? करोड़ों तमिलों की प्रगति और सुधार की राह में अवरोध उत्पन्न करने वाले कारक कौन से हैं?

क्या ईश्वर, धर्म, धर्मशास्त्र, रीति-रिवाज, परंपरा, वेदादि ग्रंथ तथा हिंदू धर्माचार्य हमारे पतन और पिछड़ेपन का वास्तविक कारण नहीं हैं? इस दोषारोपण के कारण मुझे गलत मत समझिए। इन बातों पर यदि आप स्वयं स्वतंत्रतापूर्ण विचार करेंगे, तो अवश्य ही मुझसे सहमत होंगे।

ब्राह्मणों ने इन सब चीजों को कब गढ़ा था? कमोबेश 3000 वर्ष पहले इन देवताओं की रचना की गई थी। उसके बाद ही देवताओं से जुड़ी कहानियां रची गईं। मेरे विचार में रामायण की रचना लगभग 2000 वर्ष पहले हुई। ईसाई धर्म का आगमन ठीक 2000 वर्ष हुआ था। इस्लाम की उम्र तो मात्र 1500 वर्ष है।

आदिम मनुष्य

प्राचीन काल में मानव-जीवन कैसा था? क्या आप जानते हैं कि लगभग 5000 वर्ष पहले मनुष्य किस तरह से रहता था? क्या वह वस्त्र धारण करता था? उन दिनों तन ढकने के लिए वह केवल पत्तों का इस्तेमाल करता था। जंगलों में घूमता रहता था। हरी वनस्पतियों और कच्चे फलों का सेवन करता था। बिना पकाए मछलियों को खा जाता था। जानवरों के कच्चे मांस का भक्षण करता था। उसका भोजन तथा उसके बाकी सभी कार्य उसके अपने ज्ञानानुभवों के अनुसार थे। उसे आधुनिक शिक्षा के वैसे अवसर प्राप्त नहीं थे, जैसे आज हमें प्राप्त हैं।

ऐसे ही दौर में कुछ चतुर किस्म के लोगों ने हमारे अज्ञान का लाभ उठाना उठाना शुरू कर दिया। घोर निराशा के आलम में हमने भी उन अविश्वसनीय बातों पर विश्वास करना आरंभ कर दिया। मानवीय विवेक, विश्वास और तर्क से परे की चीजें हर धर्म में शामिल हैं। धर्म की रचना ही मूर्खतापूर्ण विश्वासों तथा अंतहीन झूठ के बल पर हुई है।

आप रामायण, महाभारत, हिंदू, शैव, वैष्णव, ईसाई और इस्लाम किसी भी धर्म को देख सकते हैं। ऐसा कोई धर्म या संप्रदाय नहीं है जो सत्य को पूरी तरह दर्शाता हो। चूंकि विभिन्न धर्मों का समय अलग-अलग समय में हुआ है, इसलिए उनके मिथ्याचार की मात्रा और प्रकृति में अंतर है। मान लीजिए यदि आज कोई व्यक्ति नए धर्म की रचना का संकल्प लेता है, तो वह केवल आज की परिस्थितियों के अनुसार उसकी रचना करेगा। नए धर्म को अधिकाधिक तर्कसंगत, वस्तु-जगत के करीब और आधुनिकतम ज्ञान से समृद्ध करने की कोशिश करेगा। पुराने धर्मप्रवर्त्तकों ने धर्म को अपने समय के अज्ञान के अनुसार गढ़ा है।

पुराने समय में किसी भी धर्म के लिए ‘ईश्वर’ की संकल्पना अनिवार्य थी। ईश्वर भी ऐसा जो पराभौतिक शक्तियों से समृद्ध हो। हिंदू धर्म की रचना भी इसी तरह हुई। बाकी धर्मों ने भी उसी की नकल की। यही सच है। कल को ब्राह्मण कह सकते हैं कि महान परमात्मा गाय के गोबर को भी चंदन लेप जैसा बना सकता है। ऐसा कैसे हो सकता है, इस बात पर कोई विचार नहीं करेगा। वे हमारे साथ ऐसे छल क्यों करते हैं? वह कोई झक्की-पागल ही होगा जो यह दावा करेगा कि कोई शक्ति मरे हुए आदमी को जिंदा कर सकती है। वे इसी तरह लोगों को झांसा देते रहते हैं। वे देव-पुरुषों के चमत्कारों की चर्चा करते हैं। मानते हैं कि कथित ‘ऋषि-मुनियों’ में परामानवीय शक्तियां होती हैं। उनका सारा जोर दिव्यता, धार्मिक नेताओं और ऋषि-मुनियों के महिमा-मंडन पर केंद्रित रहता है। कुल मिलाकर वे सब लोग झूठे हैं।

महाकाव्य

जरा सोचिए, रामायण और महाभारत क्या हैं? बिना धोखे, छल और प्रपंच वे टिक नहीं सकते। वे कहते हैं कि राम दशरथ की संतान थे। यह भी बताया जाता है कि दशरथ 60,000 वर्षों तक जीवित रहा था; तथा उसकी 40,000 रानियां थीं। आजकल वह कहां है? क्या हम यह सवाल नहीं करेंगे? कोई व्यक्ति 60,000 वर्षों तक कैसे जीवित रह सकता है? कोई आदमी भला 60,000 वर्षों तक जीवित क्यों रहेगा? लोगों को धोखे में रखने के लिए ही रामायणकार ने लिखा था कि वह 60,000 वर्षों तक जीवित रहा था। लेकिन कोई व्यक्ति 40,000 स्त्रियों के साथ विवाह भला क्यों करेगा? उस इसकी आवश्यकता ही क्या है? क्या यह कभी भी संभव है?

मान लीजिए ऐसा आदमी किसी एक पत्नी के पास एक दिन गया। तब उससे दुबारा मिलने के लिए उसे 300 वर्ष लगेंगे। वह रानी 300 वर्षों तक क्या करेगी? क्या आप सोचते हैं कि 300 वर्षों तक वह सद्गुणी और ईमानदार पत्नी बनी रहेगी? क्या कमाल की कहानी है? इन बातों पर विश्वास भी कैसे किया जाए। व्यक्ति 40,000 पत्नियों के साथ कैसे निभा सकता है? क्या वह मशीन है? क्या झूठ का अंबार लगाने की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए?  

इतनी सारी बेतुकी और हास्यास्पद बातों के रहते क्या कोई राम को ईश्वर के रूप में स्वीकार सकता है? क्या ईश्वर को गढ़ते समय शिष्टता के नियमों का पालन आवश्यक नहीं है? क्या यह जरूरी नहीं था कि वे कम से कम भगवान के प्रति आदर-भाव बनाए रखते? और राम ने क्या किया था? उसने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया था। क्या वह यज्ञ उसने एक शिष्ट मानवीय प्राणी के नाते संपन्न किया था? क्या एक निरर्थक कार्य में पत्नी के साथ भाग लेना, और जिस अनैतिक तरीके से यज्ञ किए जाते हैं, उसमें अपनी पत्नी और बच्चों को सहभागी बनाना जरूरी था? यहां मैं अपनी ओर से कुछ नहीं कह रहा। यज्ञ के बारे में यह सब स्वयं रामायण में ही वर्णित है।

यह साफ तौर पर लिखा है कि विवाहिता स्त्रियां दैहिक संबंधों के लिए ब्राह्मणों को सौंप दी जाती थीं। स्त्रियां ब्राह्मणों का वीर्य अपने गर्भ में धारण करतीं तथा उनकी संतान को जन्म देती थीं। इस कार्य के भी ब्राह्मणों को अकूत धन-संपदा भेंट की जाती थी। यही वह विधि थी, जिससे दशरथ को संतान प्राप्ति हुई थी? फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि राम उनके पुत्र थे? यह स्पष्ट रूप से लिखा है कि दशरथ के बेटों का जन्म उसकी पत्नियों के ब्राह्मणों के साथ सहवास के बाद हुआ था।

राम को ईश्वर का अवतार बताया जाता है। उसके जन्म के बारे में विस्तार के साथ सूचना है। ब्राह्मणों ने राम की मां कौश्लया को नंगा किया था। उससे जमीन पर लेट जाने को कहा गया था। एक घोड़ा मंगवाया गया। उसके लिंग को कौश्लया की योनि में प्रविष्ट कराया गया। इसी विधि से अश्वमेध यज्ञ संपन्न हुआ था।

इसके लिए आपको मेरे शब्दों पर विश्वास करने की आवश्यकता नहीं है। आपको खुद ही रामायण का अध्ययन करना चाहिए। ये सभी बातें आपको उसमें मिल जाएंगीं। मैं ये बातें आपको विस्तार से क्यों बता रहा हूं? आपको जानना चाहिए कि पुराने लोग कितने अज्ञानी थे। ब्राह्मणों ने चतुराईपूर्वक, शातिराना ढंग से ईश्वर की रचना की, जिससे वे द्रविड़ियन लोगों शोषण कर सकें। क्या हम आज भी उस समय के लोगों जितने ही मूर्ख और नासमझ हैं? इसलिए मैं साफ तौर पर, बिना किसी संदेह या हिचक के कहता हूं कि सारे के सारे देवता ब्राह्मणों की कल्पना की उपज थे।

यदि वे मान लें कि राम-कथा काल्पनिक है, तब  हम रामायण को स्वीकार भी कर सकते हैं। यहां तक कि राम को जन्म देने का तरीका भी उतना बुरा नहीं था। परंतु क्या ब्राह्मणों का कर्तव्य नहीं था कि वे राम के चरित्र को शिष्ट और सद्गुण संपन्न इंसान के चरित्र की तरह गढ़ते। उन्होंने क्या किया था? वे कहते हैं कि उसने अपने मददगारों, राक्षस-असुर(द्रविड़ियन) बाली तथा दूसरे कई साथियों, जिनसे वह मिला था—का वध किया था। आप जानते हैं, किसलिए? मेरी बातें आपको सावधानीपूर्वक सुननी चाहिए। ध्यान देना चाहिए कि उसने किसकी हत्या की थी; और किसलिए की थी। राम ने खुद कहा है—‘क्या आप मेरे बारे में जानते हैं। मेरा जन्म ब्राह्मणों के समस्त दुश्मनों के विनाश के लिए हुआ है।’

भले मानुषो! आप यह सब रामायण में पढ़ सकते हो।

यदि ऐसा ही है, तब हम क्या समझें? क्या इसका मतलब यह नहीं है कि ब्राह्मणों ने रामायण की रचना हमारे अपमान, अवमानना और हमें शर्मिंदा करने के लिए नहीं की है? हमें शूद्र जिसका अभिप्राय वेश्या की संतान है, क्यों कहा जाता है? राम को शूद्रों की हत्या क्यों और किसलिए करनी चाहिए थी? इस अवस्था में हमें खुद को हिंदू क्यों मानना चाहिए? देवता के रूप में राम की पूजा हमें क्यों करनी चाहिए?

अब आप देखिए कि ब्राह्मणों ने अपनी सुरक्षा के लिए क्या किया था? वे सिर्फ इसलिए कामयाब हुए क्योंकि हम द्रविड़ियन लोग मूर्ख थे।

रामायण की रचना शूद्रों के उपहास, उनकी अवमानना करने के लिए की गई है। लेकिन क्या ब्राह्मण राम को सम्मानित देवता बनाने में कामयाब हुए थे? उसकी पत्नी के साथ क्या हुआ था? वह किसी और के साथ भाग निकली थी। वह उसके साथ रही और गर्भवती हुई। उसी अवस्था में वह लौटकर आई। इस कहानी के दूसरे रूप भी हैं। दूसरी कहानी में बताया गया है कि राम की पत्नी सीता का अपहरण किया गया था। यदि राम सचमुच भगवान था, और यह बात यदि सच है तो वह इससे अनभिज्ञ कैसे हो सकता था? उसे इस बात की जानकारी होनी चाहिए थी कि उसके पीछे कोई आकर बलपूर्वक उसकी पत्नी का हरण करके ले जाएगा। अपनी पत्नी की समुचित सुरक्षा का इंतजाम किए बिना ही वह उसे छोड़कर भला कैसे जा सकता था? अपनी पत्नी की सुरक्षा के लिए उसने क्या सावधानियां बरती थीं? कुछ भी नहीं!

क्या राम वास्तव में देवता था? क्या उसकी शक्ति असली थीं? वह अपनी पत्नी को जंगल में बिलकुल अकेले कैसे छोड़ सकता था, जबकि वह खुद भी जंगल में अकेला ही था। जैसा सोचा था, वैसा ही हुआ। मानो सीता ने पहले से ही यह इंतजाम किया हुआ था कि रावण उससे मिले। रावण ने सीता से साथ चलने को कहा था। वह शांतिपूर्वक उसके साथ चली गई। वह वापस नहीं आई थी। जब वह लौटी तब उसे चार महीनों का गर्भ था।

सज्जनो, क्या यह भगवान की कहानियां गढने का तरीका है? यही कारण है कि हम रामायण को स्वीकार नहीं करते। आप देखेंगे कि ब्राह्मणों ने सीता को एक देवी के रूप में गढ़ा है, जिसकी पूजा की जानी चाहिए। राम के चरित्र के बारे में तो आप जानते ही हैं! उसे ईश्वर बनाया गया था। ब्राह्मण राम को ईश्वर बनाकर ही शांत नहीं हुए। उन्होंने राम की पत्नी को भी देवी बना दिया।

कोई विदेशी हमारे बारे में क्या सोचेगा? क्या वह यह कहने में संकोच करेगा कि हमारे देवता दुष्ट प्रवृत्ति के हैं? हमारी देवियां वेश्या हैं?

क्या हमें इनपर विचार करने की कोई समझ नहीं होनी चाहिए? यदि हमारे भीतर थोड़ा स्वाभिमान भी बाकी है तो हम इन सब चीजों को कैसे सहन कर सकते हैं? इस तरह की बेतुकी और हास्यास्पद कहानियां और कलंककारी देवता किसलिए हैं?

कृष्ण, स्कंद, कार्तिकेय, विनायक(गणेश), शिव, विष्णु आदि दूसरे देवताओं को देखिए! वे कौन थे? उनका जन्म कैसे हुआ था?

कृष्ण का जन्म

आपको पता होना चाहिए कि कृष्ण का जन्म कैसे हुआ था। इस बारे में ब्राह्मणों ने बड़ा रोचक  विवरण दिया है। बताया जाता है कि महाविष्णु ने अपने दो बाल उखाड़े। उनका एक बाल काला था, दूसरा सफेद। सो एक बाल कृष्ण बन गया, दूसरा उसका भाई बलराम।4 सोचकर देखें, क्या यह सही है? बालों की मदद से देवताओं के जन्म लेने का क्या यह श्रेष्ठ, सम्मानजनक और भरोसेमंद तरीका है? यदि आपको मुझपर विश्वास नहीं होता तो आप स्वयं पुराणों का अध्ययन कर सकते हैं। देखें, यह कितना भद्दा और बेहूदा है!

विनायक पुराणम्

अब मैं आपको बताऊंगा कि दूसरे भगवान की रचना किस तरह की गई थी। ब्राह्मणों ने गणेश को भी हिंदू देवता के रूप में रचा था। आपको यह जानने में रुचि होगी कि उसका जन्म कैसे हुआ था?

यह बताया गया है कि परमशिव(महादेव) और पार्वती जंगल में विचरण करने के लिए गए थे। वहां उन्होंने एक हाथी युगल रतिक्रिया में तल्लीन देखा? उसे देखकर पार्वती के मन में भी अपने पति के साथ हाथी की तरह संभोग करने की इच्छा जागी। महादेव राजी हो गए। दोनों हाथी-युगल बन गए। उन्होंने परस्पर संभोग किया। उसके बाद गणेश का जन्म हुआ, जो हाथी के बच्चे की तरह था। क्या आप इस कहानी से सहमत हैं? क्या यह देवता गढ़ने का एक सभ्य तरीका है? यह डरावना देवता विनायक(मूर्तियों के रूप में) तमिल नाडु में हर जगह दिखाई पड़ता है। वह यहां अपेक्षाकृत ज्यादा लोकप्रिय है। इस देवता की उत्पत्ति एकदम हाल में हुई है।

यह बताया गया है कि नरसिंह पल्लव का सेनापति वाथापी5 गया था। वहीं से वह नए देवता को हमारे क्षेत्र में लेकर आया। आप मिस्टर टी. पी. मीनाक्षीसुंदरम को जानते हैं। वे विद्वान अध्येता और उपकुलपति हैं। गहन शोध के पश्चात वे कुछ ठोस निष्कर्षों तक पहुंचे हैं। बिना किसी संदेह के, वे सप्रमाण दावा करते हैं कि 1200-1300 वर्ष पहले देवता के रूप में विनायक को उत्तर में स्थित वाथापी से लेकर आया था। आज उसकी हिंदुओं के बड़े देवता के रूप में पहचान है।

सुब्रमणियम देवता

सुब्रमणियम देवता की कहानी क्या है? इस हिंदू देवता को 2000 वर्ष पहले गढ़ा गया था। इस देवता के जन्म के बारे में ब्राह्मणों ने दो कहानियां गढ़ी हुई हैं। एक कथा रामायण में ही उपलब्ध है। मेरे पास यह पुस्तक है(पेरियार ने वह पुस्तक सम्मेलन की अध्यक्ष को सौंपी थी और श्रोताओं को संबंधित हिस्सा पढ़कर सुनाया था)।

सज्जनो! उन दिनों हमारे लोग केवल मूर्ख ही नहीं थे, अपितु वे अपने आत्मसम्मान को भी गंवा चुके थे।

यह कहा गया है कि एक बार सभी देवता मिलकर कैलाश पहुंचे। महादेव के ठिकाने पर पहुंचकर उन्होंने उनकी तपस्या की तथा उनसे देवताओं का सेनापति देने का आग्रह किया। लगता है कि देवताओं की तपस्या को स्वीकार शिव उन्हें उनका सेनापति देने को तैयार हो गए। देवता वापस लौट आए। तदनंतर शिव पार्वती से मिले और कहा कि उन्हें देवताओं को उनका सेनापति देना चाहिए। उसके बाद दोनों ने संभोग आरंभ कर दिया।

क्या किसी सेनापति को जन्म देने का यह उचित तरीका है? संसर्ग का आनंद लेने के लिए वे इस बहाने सहवासरत क्यों हुए होंगे? मैं ये बातें सप्रमाण बता रहा हूं। ठीक है, उसके बाद क्या हुआ था। उनका संभोग लंबा खिंचता गया। केवल कुछ घंटे, दिन, सप्ताह या महीने नहीं। देवताओं का सेनापति पैदा करने के लिए वे दोनों 1000 वर्षों तक एक-दूसरे के साथ सहवासरत पड़े रहे। बावजूद इसके उनके कोई बच्चा नहीं हुआ। बेचारे देवता परेशान थे। वे घबराये हुए थे। आखिरकार वे महादेव और पार्वती के निकट पहुंचे तथा उनसे अपनी अनिच्छा जाहिर की। इसपर महादेव और पार्वती ने उसका कारण जानना चाहा। देवताओं को भय था कि 1000 वर्षों लंबे संभोग से पैदा हुआ देवता खुद उन्हें भी नष्ट कर सकता है। यह सुनते ही पार्वती और महादेव संभोग छोड़कर एक-दूसरे से अलग हो गए। इस बीच महादेव स्खलित हुए और उनका वीर्य नदी की तरह बह निकला। बहता-बहता वह नदी में जा मिला। तुरंत उसने बाढ़ का रूप ले लिया। नदी से होती हुई वीर्य की लहर समुद्र तक पहुंची। समुद्र की सतह पर तैरती हुई वीर्य की उस लहर ने छह सिरों का रूप ले लिया।

यह कैसी गणना है? उसके केवल छह सिर ही क्यों थे? इस शंका का समाधान, इसकी व्याख्या करने कौन करेगा?

छह सिरों वाली वीर्य की वह लहर धारा गंगा तक पहुंची। वहां एक स्त्री खड़ी थी। उसने अपने हाथ बढ़ाकर उस वीर्य को उठाया तथा अपने गले से लगा लिया। वीर्य तत्क्षण छह सिर वाले मनुष्य में बदल गया। उस स्त्री ने किसी तरह उस छह मुंह वाले देवता को दुग्ध पान कराया; तथा उस बच्चे को नाम दिया—अरमुगम। यह वैष्णवियों द्वारा की गई व्याख्या है। इसका विवरण वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध है।

शैव मतावलंबी इसकी अलग व्याख्या करते हैं। उसके अनुसार शिव और पार्वती को संभोगरत हुए 1000 वर्ष बीत जाने से प्रतीक्षारत देवता अकुला गए। उन्होंने उन दोनों से संभोग रोक देने का आग्रह किया। शिव ने मना कर दिया। कहा कि यदि उसने संभोग बीच ही में रोक दिया तो उनका वीर्य उद्दाम वेग से बह निकलेगा। उन्होंने देवताओं से कहा कि हाथ खड़े होकर उसे अपने हाथों में संभाल लें। देवताओं ने ऐसा ही किया। शिव ने संभोग रोक दिया। वीर्य बह निकला। देवताओं ने उसे अपनी हथेलियों में संभाल लिया। तदनंतर शिव ने देवताओं से वीर्य को पी लेने का आग्रह किया। देवताओं ने उसे पी लिया। उसी क्षण उनके गर्भ ठहर गया। यह देख वे फिर चिंतातुर हो गए। उन्होंने फिर शिव की प्रार्थना की। तब शिव ने उन्हें मुक्ति का मार्ग बताया। उन्होंने देवताओं से एक विशिष्ट तालाब में जाकर स्नान करने का आग्रह किया। परेशान देवता तुरंत उस तालाब तक पहुंचे और वहां स्नान किया। इससे उनका गर्भ स्खलित हो गया।

सज्जनो! ये सब कहानियां पौराणिक ग्रंथों में तरह-तरह से दी हुई हैं।

गर्भ स्खलित होने के बाद शिव के वीर्य की कुछ बूंदें गिर पड़ीं, उन्हीं से सुब्रमणियम का जन्म हुआ। उसे ‘कांदन’ भी कहा जाता है। संस्कृत में ‘कांदन’ का अर्थ ‘वीर्य’ है। तमिल में हम जिसे ‘कांदन’ कहते हें। संस्कृत में उसको ‘स्कंद’ कहा जाता है। ‘संस्कृत में उसका अर्थ ‘निकल पड़ना’ या ‘उछलना’ है। उसका आशय स्खलन से है। तमिल में जो ‘अरुमुगम’ है, वही ब्राह्मणों के लिए ‘सुब्रमणियम’ है।

देखें, ब्राह्मणों ने देवताओं को कितना सम्मान दिया हैं। ब्राह्मणों ने देवताओं को इसी तरह के घृणास्पद तरीकों से गढ़ा है।

ब्रह्मा

अब एक और देवता ब्रह्मा के आचरण पर गौर करें। यह बताया गया है कि उसने अपनी ही पुत्री सरस्वती के साथ विवाह किया था। यह भी पुराणों में आया है।

ब्रह्मा ने एक लड़की की रचना की। वह बहुत सुंदर थी। इसलिए वह उस लड़की पर इतना सम्मोहित हो गया कि उसने अपनी इच्छापूर्ति के लिए दबाव डाला। सरस्वती ने मना कर दिया और अपनी ऐड़ियों तक झुक गई। उसके बाद ब्रह्मा हरिण बन गया और उसकी पुत्री हरिणी बन गई। दोनों दौड़ते-दौड़ते शिव के पास पहुंचे। सरस्वती ने शिव के आगे अपने पिता की शिकायत की। महादेव ने ब्रह्मा को फटकारा। ब्रह्मा ने कहा कि सरस्वती के सौंदर्य को देखकर ही उसमें उससे सहवास की इच्छा जन्मी है और प्यार जब वासना में बदल जाए तो किसी के लिए भी उसे नियंत्रित कर पाना संभव नहीं है। माताओं, बहनों और बेटियों में भेद न कर पाने के पीछे उनकी भला कौन-सी समझदारी, कैसा देवत्व था? जो बात ब्रह्मा ने शिव से कही थी, वही बात शिव ने सरस्वती के आगे रख दी। सरस्वती ने महसूस किया कि स्वयं शिव भी अपनी पुत्री से प्रेम करते थे।

दोस्तो! इस तरह की कहानियां गढ़ने का उद्देश्य क्या था? किसके लिए? इन कहानियों से किसे लाभ पहुंचता था? आप बस इतना समझ लें कि ये कहानियां उन दिनों गढ़ी गई थीं, जब लोग अशिक्षित थे। किसी भी विषय पर गहन विचार कर पाने का सामर्थ्य उनमें नहीं था। आजकल लोगों के पास ज्ञानार्जन के सभी अवसर हैं। वे सोच-समझकर किसी निष्कर्ष तक पहुंचने में सक्षम हैं।

मैं समझता हूं कि यह बात आप भली-भांति समझ चुके होगे कि पुराणों में जो लिखा है, वह सच से सर्वथा परे है। उसे गंदा, अश्लील, गंवारू, असभ्य और मनुष्य के विकास का अवरोधक मानकर उसकी भत्र्सना की जानी चाहिए।

‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के बुद्धिवादी अभियान का उद्देश्य लोगों का ध्यान भटकाने के लिए नहीं है। बुद्धिवाद का मकसद ‘कुदाल’ को ‘कुदाल’ यानी जो जैसा है, वही बताना है। दूसरी ओर खुद को शंकराचार्य और माधवाचार्य का शिष्य बताने वाले लोग भी हैं, जो लोगों का ध्यान उनकी प्रगति से हटाना चाहते हैं। ऊंचे-ऊंचे मंचों पर विराजमान ये आध्यात्मिक गुरु लोगों के सम्मान के पात्र हैं। लोग उनपर विश्वास करने के लिए ही बने हैं। यही कारण है कि हमने एक अलग संस्था का गठन किया है, जिसका उद्देश्य लोगों को जागरूक करना है। हमारे अभियान के बिना मनुष्य को जागरूक नहीं किया जा सकता। न ही वह वुद्धिमान बन सकता है।

एक सभा के दौरान मैं कुनराक्कुदी आदिगलार6 से मिला था। उनकी उपस्थिति में मैंने देवताओं और पुराणों पर भाषण दिया था। मैंने उनके अस्तित्व से इन्कार किया था। कहा था कि केवल मूर्ख लोग ही ईश्वर पर विश्वास कर सकते हैं। आदिगलार भाषण के लिए खड़े हुए तो उन्होंने बताया कि वे ईश्वर में विश्वास करते हैं। उन्होंने मुझपर नास्तिकता के प्रचार का आरोप लगाया था, लेकिन कुल मिलाकर उनका आरोप उन लोगों पर था जिन्होंने अस्वाभाविक तरीके से ईश्वर को गढ़ा था। वे मेरे साथ तर्क करने, मेरे कथन का तर्कसंगत खंडन में सक्षम नहीं थे। इसलिए चतुराईपूर्वक वहां से निकल गए थे।

कोई भी व्यक्ति भला तार्किकता और तर्कसंगत बनने से कैसे इन्कार कर सकता है। खासकर तब जब सारी की सारी पुराकथाएं इतने बेहूदा तरीके से लिखी गई हों। अब विचारणीय बात यह है कि इस तरह की कहानियां 2000 वर्ष ही क्यों रची गई थीं। उन दिनों के लोग मूर्ख थे। लेकिन आज भी उन्होंने मंदिर बना लिए हैं। उन्होंने देवताओं की रचना की है। धर्म को फैलाया है। यह सब वे यह सोचकर करते हैं कि आम जनता आज भी मूर्ख है। आखिर क्या कारण हैं कि वे हमारे बुद्धिवादी आंदोलन से ईर्ष्या करते हैं? जबकि हम तो नि:स्वार्थ सेवा में लगे हैं।

आज तक भी, हमारे पास अपनी और ऐसी सरकार नहीं है जिसमें ब्राह्मणों का वर्चस्व न हो। पुराने जमाने में जो राजा-महाराजा शासन करते थे, वे ब्राह्मणों का पूरा-पूरा साथ देते थे। उनके आगे गुलामों की तरह झुके रहते थे. हमारे चेर, चोल, पांडया सम्राट क्या कर रहे थे? वे भी ब्राह्मणों के सम्मान में झुके रहते थे।

केवल इसी शताब्दी में स्थितियों ने बदलना शुरू किया है। यहां तक कि जब मैं बच्चा था, स्त्रियां  ब्राह्मण की पहली नजर को आशीर्वाद जैसा मानती थीं। यह भावना उनके भीतर थी कि ब्राह्मण की उपस्थिति मात्र से स्वर्ग के दरवाजे उनके लिए खुल सकते हैं। संभव है ये सब बातें आज आपकी जानकारी में न हों। मैं आपको पिछले जमाने के बारे में बता रहा हूं। उन दिनों गाय के गोबर को छूना भी पवित्र माना जाता था, जैसा कि आज भी माना जाता है। इसलिए ब्राह्मण को पवित्र समझना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

नास्तिक

हमने दुनिया में कितने बदलाव देखे हैं? अनुमान लगाया गया है कि इस समय(1971 में) दुनिया की जनसंख्या 400 से 450 करोड़ है। उनमें से करीब 125 करोड़ लोग स्पष्ट रूप से कहते हैं कि वे ईश्वर में विश्वास नहीं करते। 100 करोड़ लोग खुद को गर्व से बुद्धिवादी बताते हैं। सोवियत संघ में करीब 35 करोड़ लोग नास्तिक हैं। उन्होंने गिरिजाघरों को ढहा दिया है। बाइबिल को उन्होंने आग के हवाले कर दिया है। धर्माचार्यों की उन्होंने हत्या कर दी है। परिणाम क्या हुआ? आप इसे खुद देख सकते हैं। वहां न कोई धनवान है, न ही विपन्न। सभी समान हैं। सभी खुश हैं। चीन के 85 करोड़ लोगों में से 75 करोड़ जनता बौद्ध धर्म में विश्वास करती है। बर्मा में 2 करोड़ लोग बौद्ध धर्म को मानते हैं। श्रीलंका में दो-तिहाई जनता बौद्ध धर्म को मानने वाली है। स्याम(थाइलेंड) में तीन-चौथाई लोग बौद्ध हैं। इतने सारे लोग ईश्वरीय सत्ता की मौजूदगी से इन्कार करते हैं। वे ईश्वर में आस्था नहीं रखते। वे सभी नास्तिक हैं।

यूरोप में अनेकानेक तर्कवादी संगठन हैं। जर्मनी, स्पेन, ग्रीक तर्कवादी संगठनों, शोध-केंद्रों, सत्यशोधक संगठनों, थिंकर्स ऐसोशिएसन, नास्तिक संगठन आदि के बल पर आधुनिक सभ्यता का उदाहरण बन चुके हैं। हर शहर में इन संगठनों के लाखों सदस्य मौजूद हैं। मैं उन सभी स्थानों का भ्रमण कर चुका हूं। पेरिस में मैं एक नास्तिक संगठन का मेहमान बना था। उन्होंने एक पत्रिका प्रकाशित की थी। आप उसमें ‘क्रास’ के निशान को तलवार से कटते हुए देख सकते हैं। यह दर्शाता है कि ‘क्रास’(ईसाइयों का धार्मिक चिह्न) महज दिखावटी है। ईश्वर को मारा जा रहा है। केवल इस्लाम ही है जो धर्म के नाम पर इधर-उधर की बातों में उलझा हुआ है। वे केवल सामाजिक एकता पर ध्यान देते हैं।

त्योहार

भारत में मंदिरों की भरमार है। हर मील पर कम से कम पांच-छह मंदिर नजर आ जाएंगे। प्रत्येक मंदिर में 20, 30 से लेकर सौ-सौ भगवान हो सकते हैं। इन मंदिरों में तीन से लेकर छह-छह बार इन प्रभुओं की पूजा की जाती है।

इसके अलावा, प्रतिवर्ष तीन-चार बड़े त्योहार आते हैं। लड़कियों से मिलने के लिए युवा लड़के इन त्योहारों की बेताबी से प्रतीक्षा करते हैं। लड़कियां अच्छी तरह सज-धजकर लड़कों को लुभाने मंदिर और त्योहारों में शामिल होती हैं। इस मुलाकात को ही वे त्योहार कहते हैं। कुछ वर्ष पहले तक, भीड़ जुटाने के लिए मंदिरों में वेश्याओं को बुलाया जाता था। बड़े मंदिरों में तो सौ-सौ वेश्याओं को आमंत्रित किया जाता था। अपने शहर कस्बे में तो हर वेश्या मंदिर के उत्सव में शामिल होती थी। यह पुरानी परंपरा थी। आजकल यह परंपरा धीरे-धीरे लुप्त हो रही है। हम अपने परिवार की स्त्रियों को बाहर जाने की आजादी नहीं देते। मगर उन्हें मंदिर जाकर उत्सव में शामिल होने की अनुमति होती है। वे क्या कर सकती थीं? केवल स्त्रियों के मंदिर जाने के नाम पर ही पुरुष शांत रहते हैं। इसलिए उनके पास युवाओं के मिलने के लिए उससे अच्छा और कोई बहाना ही नहीं होता। स्वाभाविक रूप से कि मंदिर उत्सव, युवा लड़के-लड़कियों के एक-दूसरे से मिलने के लिए अच्छा अवसर लेकर आते हैं। बड़ी भीड़ जुटाने के इसके अलावा और इंतजाम भी करने पड़ते हैं। ईश्वर को इतने सारे प्रचार की क्या आवश्यकता है? इतनी चमक-दमक, तामझाम और दिखावा किसलिए? इन उत्सवों की आखिर क्या आवश्यकता है?

हम, तर्कशील लोग इन मंदिरों, भगवानों और उत्सवों के विरुद्ध हैं। हम बड़े परिवर्तन की कामना करते हैं। यह कैसे संभव है? हम मानते हैं कि बड़े बदलाव के लिए प्रचार-प्रसार ही एकमात्र रास्ता है। हम लोगों को अपने तर्कों द्वारा समझाने की कोशिश करते हैं। उन्हें वास्तविक तथ्यों से अवगत कराते हैं। बिना इसके उनकी मुक्ति का दूसरा कोई रास्ता नहीं है। इसलिए हम लोगों को जागरूक करने की कोशिश करते हैं। हमें ईश्वरों पर हमला करते देख कुछ लोगों को दुख होता है। वे इस बात को नहीं समझते कि ईश्वर, मंदिर और धर्म जैसी बुराइयों को चुनौती दिए बिना समाज में अभीष्ट परिवर्तन असंभव है।

इस निरंतर परिवर्तनशील दुनिया की ओर देखो। एक साथ कई बदलाव बड़ी तेजी से हो रहे हैं। हम सफलता की सीढ़ी के आखिरी पायदान पर हैं। हम शैक्षिक रूप से काफी पिछड़े हुए थे। दो हजार वर्ष पहले, हजार लोगों में केवल एक व्यक्ति पढ़ा-लिखा होता था। वह भी ब्राह्मण हुआ करता था। वह भी आधी-अधूरी शिक्षा प्राप्त होता था। जो रटाई गई चीजों को केवल कंठस्थ करके रखता था। लिखना और पढ़ना उसे नहीं आता था।

आप संस्कृत के बारे में क्या सोचते हैं। ब्राह्मण अपनी भाषा के बारे में गर्व के साथ बात करते हैं। क्या वह लोकप्रिय लिपि है? वेदों का तो वे खूब महिमामंडन करते हैं। उनकी भी कोई लिपि नहीं है। वह महज ध्वनियां हैं। उन्होंने हाल ही में सुधरना शुरू किया है।

जनसंख्या

जिस समय ईसा मसीह का जन्म हुआ, दुनिया की आबादी महज 20 करोड़ थी। सन 1460 में यह आवादी 47 करोड़ थी। आबादी को दुगुना होने में 1500 वर्ष लगे थे। 1800 ईस्वी में वह बढ़कर 74 तक पहुंच गई। जनसंख्या बढ़ने के पीछे अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं का बड़ा योगदान था। 1914 में विश्व की जनसंख्या 165 करोड़ थी। उसके बाद वैश्विक जनसंख्या ने तेज गति से बढ़ना शुरू कर दिया। हर 15 वर्ष में वह दो गुनी हो जाती थी। 1955 वह बढ़कर 360 करोड़ हो गई। 1964 में उसने 380 करोड़ का आंकड़ा छू लिया। उसके छह वर्ष बाद, 1970 में विश्व की जनसंख्या बढ़कर 400 करोड़ तक पहुंच गई। विज्ञान और प्रौद्योगिकीय आविष्कारों की मदद से स्वास्थ्य सेवाओं में हुए सुधार के कारण विगत शताब्दी में दुनिया की जनसंख्या तेजी से बढ़ी है। तमिलनाडु में यह 4 करोड़ से बढ़कर 5 करोड़ तक पहुंच चुकी है। इन दिनों मनुष्यों की जनसंख्या अपेक्षा सुरक्षित है। मृत्युदर में आई कमी के कारण वह तेजी से बढ़ रही है।

आज मनुष्य की औसत जीविता 45 वर्ष है। पश्चिमी देशों में मानव जीविता 70 वर्ष है। हम इन निष्कर्ष पर पहुंच चुके हैं कि अगले तीन दशकों के बाद मनुष्य की औसत उम्र 75 वर्ष हो चुकी होगी।7 जबकि यूरोपवासियों का औसत जीवनकाल 100 वर्ष को भी पार कर चुके होगा। यहां आंकड़ों की गणना औसत के आधार पर की गई है। बहुत से लोग इस वृद्धि के कारण को नहीं समझते।

प्राचीन काल में यदि किसी एक गांव में हैजा फैलता था तो पूरे गांव पर मौत बरस पड़ती थी। कई बार तो एक आदमी भी जीवित नहीं बचता था। हाल-फिलहाल की बात यह है कि एक बड़े शहर में 8 लोग हैजे के कारण मारे गए। इससे वहां के स्वास्थ्य अधिकारियों की खिंचाई हुई। उनसे पूछा गया कि बीमारी को रोकने के लिए उन्होंने पहले ही आवश्यक कदम क्यों नहीं उठाए थे। यह सब विज्ञान के क्षेत्र में तरक्की के कारण संभव हुआ कि हम लोगों के जीवन और स्वास्थ्य दोनों का ध्यान रख पा रहे हैं। मुझे थातमबट्टी की एक घटना याद है। वह मेरी मां का पैत्रिक गांव है। उस गांव में हैजा फैला, तो पचास घर एकदम वीरान हो गए। आज भी वहां 3-4 घर हैं।

उन दिनों सलेम में जब हैजा फैलता था तो हर साल 2000 से 3000 जानें ले लेता था। जिन दिनों में इरोद नगरपालिका का अध्यक्ष था, वहां एक साल हैजे के कारण 400 जानें गई थीं। अब इस तरह की मौतें अपवाद बनती जा रही हैं। क्यों? इसलिए कि स्वास्थ्य अधिकारियों ने महामारियों की रोकथाम के लिए सुरक्षात्मक कदम उठाए हैं। नहरें खोदी गई हैं। पानी को छानकर घरों में पहुंचाया जाता है। पानी में बैक्टीरिया नाशक रसायन डाले जाते हैं। इंजेक्शन लगवाने को अनिवार्य कर दिया गया है। उसके फलस्वरूप संक्रामक बीमारियों से होने वाली मौतें थम चुकी हैं।

उन दिनों यदि किसी को टीबी हो जाती तो उसकी मौत निश्चित थी। आज ऐसा नहीं है। अनेक मामलों में सफल इलाज हो चुका है। उन दिनों अनेक बीमारियों का तो इलाज ही नहीं था। इसलिए उनसे होने वाली मौतें भी ज्यादा थीं। आज अस्पतालों में डॉक्टर लगभग सभी बीमारियों का उपचार करने में सफल होते हैं।

सज्जनो! क्या आपने विज्ञान और स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में हुई महान प्रगति के बारे में नहीं सुना है? आजकल डॉक्टर किडनी और हृदय का प्रत्यारोपण करने में भी सफल हैं। वे झूठे नहीं हैं। आगे आप और भी चमत्कार देखने वाले हैं। सन 2000 ईस्वी में आप देखेंगे कि लोग 100 वर्ष लंबा जीवन जी रहे हैं। आने वाले समय में मनुष्य की जीविता 150 वर्ष भी हो सकती है। अपने बुद्धिबल की बदौलत मनुष्य ढेर सारी उपलब्धियां प्राप्त करने वाला है।

आपने देखा, मैं 92 वर्ष पार करने के बाद भी जिंदा हूं। अनेक लोगों ने मुझे आराम करने की सलाह दी थी। मैं नाराज हो गया। आराम की जरूरत किसे है? आराम की जरूरत तो धनवानों के लिए है। उन लोगों के लिए है जो महान होने के गुमान में घर से तने-तने निकलते हैं। मैं आराम क्यों करूं? मैं मानता हूं कि कुछ न करना और शांत पड़े रहना भी एक बीमारी है। जहां तक मेरा मामला है, मेरे पास पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं। मैं तो जहां भी जाता हूं, वहां जो भी मिले खा लेता हूं। मैने रेलगाड़ियों में कई रातें बिताई हैं। बावजूद इसके मैं 92 वर्ष की उम्र में भी जीवित हूं।

यदि आप पुराने ढंग से अंधविश्वासियों की तरह सोचें तो मुझे बहुत पहले मर जाना चाहिए था। मैं वह हूं जिसने भगवान को चप्पलों से पीटा था। ऐसा व्यक्ति भला जीवित कैसे रह सकता है? इस समय तक तो मुझे अंधा हो जाना चाहिए था। शरीर को अनगिनत बीमारियों का डेरा बन जाना चाहिए था। आप क्या देखते हैं? मैं अभी तक चुस्त-तंदुरुस्त हूं। आज सभी बीमारियों के उपचार के लिए संसाधन हैं।

एक बार मुझे मूत्राशय संबंधी समस्या हुई थी। ऑपरेशन द्वारा डॉक्टरों ने उसका इलाज कर दिया। मुझे उसके बारे में कुछ भी मालूम नहीं था। डॉक्टरों ने मुझसे पूछा था, क्या मैं ऑपरेशन कराना पसंद करूंगा। मैंने उनसे कहा कि यदि उन्हें अपने ऊपर पूरा विश्वास है तो वे कुछ भी कर सकते हैं। मैं बिस्तर पर था। नींद में डूबा हुआ। वे मुझे ऑपरेशन कक्ष में ले गए। ढाई घंटों तक वे ऑपरेशन करते रहे। उसके बाद मुझे बाहर लाकर बिस्तर पर लिटा दिया गया। एक-दो घंटे के बाद मुझे होश आ गया। मैं जानता था कि मेरा ऑपरेशन हुआ था। मैंने उसके बारे में पूछाताछ की। उन्होंने बताया कि सब कुछ निपट चुका है। ‘सबकुछ’ के बारे में अगले दिन ही जान पाया। वह सब कैसे हुआ था? उन्होंने कुछ दवाइयां लिखी थीं। मुझे इंजेक्शन भी लगे थे। उनसे मैं कुछ देर के लिए बेहोश हो गया था। आखिर सब कुछ ठीक-ठाक निपट गया। इस बीमारी की तरह दूसरी बीमारियों के इलाज के लिए भी हर दिन नई-नई औषधियों की खोज की जा रही है।

लेकिन हमारे बारे में क्या है? हम आज भी चिकने पत्थर से बने लिंग को भगवान मानकर पूज रहे हैं। हम उसके साथ विवाह करते हैं। हम मूर्तियों को वेश्या के कोठे तक ले जाते हैं। भगवान के रथ को खींचते हैं। इन सब मूर्खतापूर्ण गतिविधियों से हम क्या हासिल करने वाले हैं?

इसके ऊपर प्रतिवर्ष लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं। रथ का वजन 150 टन है। उसे खींचने के लिए लगभग 5000 लोगों की जरूरत पड़ती है। प्रत्येक को मजदूरी के रूप में दो रुपये दिए जाते हैं। आज, 1971 में भी सरकार उसका समर्थन करती है। देखा कितने मूर्ख हैं हम। हमारे लिए मुक्ति का ठौर कहां है?

इसलिए मेरे प्यारे साथियो, हमें सभ्य आदमी बनने का प्रयत्न भी करना चाहिए। उसके लिए हमें धर्म, ईश्वर, शास्त्र तथा अन्यान्य अंधविश्वासों से पीछा छुड़ाना होगा। मुक्ति पानी होगी उनसे। हमें पुराणों को फाड़कर, उनकी चिंदी-चिंदी करके कूड़ेदान में फैंक देना चाहिए। हमें यह पता होना चाहिए कि मनुष्य से बड़ी कोई शक्ति नहीं हैं। ईश्वर नाम की कोई चीज नहीं हैं।

सज्जनो, मैं बहुत लंबा बोल चुका हूं। फिर भी बहुत-सी चीजें छूट रही हैं। कई बातों पर बोलना बाकी है। आपको इस तरह की कहानियां दुनिया में और कहीं नहीं मिलेंगीं। ब्राह्मण और शूद्र आपको केवल यहीं तमिल नाडु, भारत में ही मिलेंगे।

स्वयं शंकराचार्य ने भी माना है कि ये कहानियां पढ़े-लिखे लोगों के लिए नहीं हैं। वे केवल अशिक्षित लोगों के लिए हैं। आम लोग ईश्वर के अस्तित्व पर भरोसा करने लगें, केवल इसलिए कि इन कहानियों को रचा गया है।

यदि हम चुप रहकर, चीजों पर आंख मूंदकर विश्वास करते रहे, तो कभी प्रगति नहीं कर पाएंगे। ब्राह्मण अपने स्वार्थ की फसल काटते रहेंगे। यही कारण है कि हम ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के अभियान द्वारा लोगों को जागरूक करने का काम करते हैं। हम लोगों से अपील करते हैं कि वे अपने अंध विश्वासों से मुक्ति पाएं। हम अपने तर्कवादी देश के लोगों को सुख-सुविधामय और सम्मानित जीवन के योग्य बनाना चाहते हैं। जैसा कि दूसरे देशों के नागरिकों को उपलब्ध है।

अंत में, मैं आपसे कहता हूं कि मैंने जो भी कहा है, उसपर आंख मूंदकर विश्वास न करें। अपने आप सोचें। यदि आपको लगता है कि जो मैंने कहा वह सही है, तो उसे स्वीकार करें और कल से ही अपने जीवन को नया मोड़ दें। यदि आप हमारे संगठन का सदस्य बनना चाहते हैं, तो मंदिरों में जाना छोड़ दें। अपनी पहचान के साथ कोई जातिसूचक चिह्न न लगाएं। ब्राह्मणों को एक पैसा भी दक्षिणा के रूप में न दें। उनके विशेषाधिकारों, मनमानियों और शोषण यहीं खत्म कर दें।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपने भाषण को समाप्त करता हूं।

—ई. वी. रामासामी पेरियार

संदर्भ:

1. ईसापूर्व छठी-सातवीं शताब्दी में भौतिकवादी चिंतन अपने देश में चरम पर था। आजीवक, चार्वाक, लोकायत, वैनायिक जैसी अनीश्वरवादी विचारधाराएं वैदिक धर्म को चुनौती देती रहती थीं। दीघनिकाय(ब्रह्मजाल सुत्त) में गौतम बुद्ध ने अपने समय में प्रचलित 62 दार्शनिक मतों का उल्लेख किया है। बौद्धधर्म, ठेठ अनीश्वरवादी विचारधाराओं और ईश्वरवादी विचारधाराओं(वैदिक धर्म-दर्शन) के सम्मिलन से जन्मा मध्यममार्गी दर्शन था। उसकी गिनती नास्तिक दर्शनों की परंपरा में की जाती है। उन दिनों ब्राह्मण धर्म-दर्शन समाज के अल्पसंख्यक अभिजनों का धर्म-दर्शन था। बहुसंख्यक समाज आजीवक और लोकायत परंपरा में विश्वास रखता था।

2. 11वीं शताब्दी के शैव संत नांबियार नंबी के अनुसार, मदुरै में सातवीं शताब्दी के शैव संत संबदार ने जैन श्रमणों को लंबे शास्त्रार्थ के दौरान पराजित किया था। उससे प्रभावित होकर जैन सम्राट सुंदर पांडयान, जिसे कून पांडयान भी कहा जाता है, ने शैव धर्म अपना लिया था। उससे पहले वह शैव मतावलंबी ही था। जैन धर्म से प्रभावित होकर उसने उस धर्म में दीक्षा ली थी। उसके बाद वह दिगंबर साधु बना और कालांतर में एक मठ का अध्यक्ष भी। बताते हैं कि जैन मठ का अध्यक्ष रहते वह बीमार पड़ गया। तब शैव संत संबदार ने उसका इलाज किया था। ठीक होने के बाद सुंदर पांडयान ने जैन धर्म छोड़ वापस शैव धर्म में शामिल हो गया। संबदार के कहने पर ही उसने 8000 जैन श्रमणों को सूली पर चढ़ा दिया था। कुछ विद्वानों का मत है कि उसके बाद मदुरै से जैन धर्म का अंत हो गया था। पॉल दुंडास के अनुसार उस घटना को मदुरै के प्रसिद्ध मीनाक्षी मंदिर सहित अनेक मंदिरों तथा शैव एवं जैन ग्रंथों में दर्शाया गया है। —स्रोत: दि जैन्स, पॉल दुंडास, रालिज, टेलर एंड फ्रांसिस ग्रुप, लंदन/न्यु यार्क, दूसरा संस्करण, पृष्ठ 127।

3. ‘थेवरम’ और ‘प्रबंधम’ प्रसिद्ध तमिल शैव ग्रंथ हैं.

4. भगवान नारायण ने अपने मस्तक से दो केश निकाले, उनमें एक सफेद था और दूसरा श्याम। ये दोनों केश यदुवंश की दो स्त्रियों देवकी तथा रोहिणी के भीतर प्रविष्ट हुए। उनमें से रोहिणी के बलदेव प्रकट हुए, जो भगवान नारायण के श्वेत केश थे। दूसरा केश जिसे श्याम वर्ण बताया गया है, वह देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण के रूप में प्रकट हुआ. महाभारत, आदिपर्व—196/32—33, गीता प्रेस गोरखपुर, 16वां संस्करण. हिंदी : अनुवाद गीता प्रेस,  

5. उत्तरी कर्नाटक, उन दिनों वह चालुक्यों की राजधानी थी। सातवीं शताब्दी में नरसिंह पल्लव ने चालुक्यों को हराकर, विनायक को अपने अधिकार में लिया था। आजकल यह स्थान उत्तरी कर्नाटक के बागलकोट जिले में पड़ता है।

6. कुनराकुद्दी आदिगलार(1925—1995) देवता मुरुगन को अपना आराध्य मानने वाले शैव मतावलंबी, तमिल आध्यात्मिक गुरु।  

7. सन 2001 में भारत में मनुष्य की औसत जीविता 62.69 वर्ष थी। 2020 में वह 69.63 वर्ष तक पहुंच चुकी है।

संस्कृति और सामाजिक न्याय

सामान्य

प्रत्येक समाज अपनी संस्कृति से पहचाना जाता है. उसका प्रमुख कार्य समाज में एकता की अनुभूति जगाना पैदा करना है. इसके लिए जरूरी है कि वह सामाजिक संबंधों, नागरिकों के सामान्य व्यवहारों, सार्वकालिक जीवन-मूल्यों और भविष्य के सपनों से अनुप्रेत हो. प्रायः धर्म एवं संस्कृति को एक मान लिया जाता है. जबकि आस्था और विश्वास को अपनी पीठ पर ढोने वाला धर्म विराट संस्कृति का अंग तो हो सकता है, उसका पर्याय नहीं. किसी समाज द्वारा धर्म की केंचुल से बाहर आने की छटपटाहट विवेकीकरण के प्रति उसकी उत्सुकता को दर्शाती है. जहां तक भारतीय संस्कृति का प्रश्न है, अधिकांश विद्वान इसे ‘विविधता की संस्कृति’ मानते तथा ‘सनातन संस्कृति’ कहकर इसका महिमा-मंडन करते हैं. इनमें से एक भी धारणा मूल्यबोधक नहीं हैं. सांस्कृतिक वैविध्य तभी सार्थक है जब वह मानवीय चेतना का स्वयं-स्फूर्त विस्तार हो. साथ ही लोकतांत्रिक सोच को बढ़ावा देता हो. प्राचीनता काल-सापेक्ष स्थिति है. वह केवल घटना-विशेष की ऐतिहासिकता को दर्शाती है. संस्कृति का असल बड़प्पन इसमें है कि अपने अनुयायियों के बीच न्याय, समानता और समरसता के वितरण को लेकर वह कितनी उदार है! कितने प्रयास उसने अपने अंतर्विरोधों के समाहार हेतु किए हैं. और इन सब के लिए वह लोकतंत्र के कितने करीब है. इस कसौटी पर भारतीय संस्कृति उतनी सफल सिद्ध नहीं होती, जितनी बताई जाती है.

सच तो यह है कि स्मृति-ग्रंथों, पुराणों, महाकाव्यों आदि के माध्यम से जो संस्कृति हमारे जीवन में दाखिल होती है, या एक अल्पसंख्यक अभिजन वर्ग द्वारा बहुसख्यक जनसमुदाय पर बरबस थोप दी जाती है, वह सामाजिक न्याय की अवरोधक तथा सामूहिक विवेक का क्षरण करने वाली है. सामान्य नैतिकता एवं लोकादर्शों को अमल में लाने के बजाय वह धर्म के हाथों में खेलती है; और खुद को बड़ी आसानी से उसकी सामंती वृत्तियों के अनुसार ढाल लेती है. वह लोगों से अपेक्षा रखती है कि वे क्या करें, क्या खाएं, क्या पियें, क्या पढ़े-लिखें, और किन लोगों से कैसे संबध बनाएं? न तो उसे मानवीय विवेक की परवाह रहती है, न उसकी रुचियों का परिष्कार. बावजूद इसके जीवन में अनावश्यक दखल देकर, वह समानता और स्वतंत्रता की भावना का हनन करती है. कभी धर्म, कभी समाज और कभी परंपरा-वैविध्य के बहाने, असमानता को मानवीय नियति घोषित करना उसकी मूल प्रवृत्ति रही है. वह असल में शासक संस्कृति है, जो व्यक्ति को जन्म के साथ ही बता देती कि उसका जन्म शासन करने के वास्ते हुआ है या शासित होने के लिए. जो लोग शासक वर्ग में जन्म लेते हैं, अभिजनोन्मुखी संस्कृति का रेशा-रेशा उनकी मदद में जुटा होता है. शासितों की कोटि में जन्मे व्यक्ति, यदि दुर्दशा से उबरना चाहें या इस तरह का सपना भी देखें तो वह लगातार अवरोध उत्पन्न कर, परिवर्तन की चाहत को ही मिटाने पर तुल जाती है. लोगों के सवाल करने की आदत को छुड़ाकर वह उनके निर्मानवीकरण को गति देती है. इससे सामूहिकताबोध, जो संस्कृति का प्रमुख उद्देश्य है, का हृास होता है. सांप्रदायिकता पनपती है; और जनशक्ति छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटकर निष्प्रभावी हो जाती है. इससे परिवर्तन का लक्ष्य निरंतर दूर खिसकता रहता है.

हम भारतीयों, विशेषकर जो लोग स्वयं को हिंदू मानते हैं, का जीवन जन्म से लेकर मृत्यु तक तरह-तरह के कर्मकांडों से बंधा होता है. वे अनेक प्रकार के हो सकते हैं. एक समाज से दूसरे समाज, यहां तक कि एक जाति समूह से दूसरे जाति-समूह के बीच उनका रूप बदलता रहता है. कर्मकांडों का उद्देश्य होता है, किसी महाशक्ति को प्रसन्न करना. उनमें एक पक्ष दाता(जाहिर है काल्पनिक), दूसरा याचक की भूमिका में होता है. याचक अपने श्रेष्ठतम को समर्पित करने की भावना के साथ दाता के आगे नतशिर होता है. तत्क्षण खुद को दाता का प्रतिनिधि घोषित करते हुए पुरोहित बीच में आ टपकता है. याचक द्वारा दाता के नाम पर समर्पित सामग्री के अलावा वह दक्षिणा की भी दावेदारी करता है. कर्मकांडों को लोक की सामान्य स्वीकृति प्राप्त होने के कारण उनसे पैदा स्तरीकरण समाज में गहरी पैठ बना लेता है. तदनुसार जो दाता या उसके स्वयं-घोषित प्रतिनिधि की इच्छा है, उसे उसी रूप में, बगैर किसी ना-नुकर के, स्वीकार कर लेना याचक की विवशता होती है. इसका लाभ शिखर पर बैठे लोग उठाते हैं. राज्य की कुल उत्पादकता में नगण्य योगदान के बावजूद वे किसी न किसी बहाने लाभ के नब्बे प्रतिशत को हड़पे रहते हैं. उसी के दम पर वे दाता की भूमिका निभाए जाते हैं. उनके नेतृत्व में पूरी संस्कृति कर्मकांडों में सिमटकर रह जाती है.

कर्मकांडों की व्याख्या जिन ग्रंथों में है, सब ब्राह्मणों द्वारा रचे गए हैं. उनकी समीक्षा अथवा संशोधन-विस्तार का अधिकार ब्राह्मणेत्तर वर्गों को नहीं है. उनसे बस इतनी अपेक्षा होती है कि ब्राह्मणों द्वारा गढ़े गए लिखित-अलिखित विधान का बगैर ना-नुकुर अनुसरण करें. उनपर किसी भी प्रकार का संदेह, आलोचना, समीक्षा पाप की कोटि में आती है. सांस्कृतिक-सामाजिक असमानता का पोषण करने वाली इस संस्कृति के प्रति विरोध के स्वर आरंभ से ही उठते रहे हैं. उनके दस्तावेजीकरण का काम हमें अपेक्षाकृत उदार एवं समावेशी संस्कृति के करीब ला सकता है. उसे हम जनसंस्कृति अथवा मूल भारतवंशियों की संस्कृति भी कह सकते हंै.

सत्य यह भी है कि कोई भी संस्कृति स्वयं लक्ष्य नहीं होती. वह केवल मार्ग चुनने में मदद करती है. उसका काम मानवीय वृत्तियों को सुसंस्कृत करना है, किसी व्यक्ति या व्यक्तियों की रोजमर्रा की आदतों पर नियंत्रण करना नहीं. विडंबना है कि भारतीय संस्कृति की अधिकांश ऊर्जा नकारात्मक कार्यों में खपती आई है. वह बड़ी आसानी से उन लोगों के हाथों में खेलने लगती है, जिनका काम दूसरों के मूल-भूत अधिकारों का हनन करना है. शिखरस्थ ब्राह्मण उसके विधान का निर्माता, व्याख्याता, पालक-अनुपालक सब होता है. विशेष मामलों में, या यूं कहिए कि अपवाद-स्वरूप संस्कृति के विशिष्ट प्रवत्र्तकों को, जन्मना ब्राह्मण न हों तो भी उन्हें कर्मणा ब्राह्मण मान लिया जाता है. व्यास, वाल्मीकि, महीदास आदि शास्त्रीय परंपरा के ब्राह्मण नहीं हैं. फिर भी उन्हें ब्राह्मण माना गया है. क्योंकि वे उस संस्कृति के सिद्ध संहिताकार हैं, जो वर्ण-व्यवस्था को आदर्श तथा ब्राह्मणों को समाज का सर्वेसर्वा मानकर उन्हें अंतहीन अधिकार सौंप देती है. कुछ लोग इसे भारतीय संस्कृति की उदारता या उसका लचीलापन मानते हैं. असल में यह दूसरे वर्गों के बुद्धिजीवी, उनकी उपलब्धियों का श्रेय हड़प लेने की स्वार्थ-पूर्ण व्यवस्था है. इससे निम्न वर्गों की उच्च स्तरीय मेधा, उच्चस्थ वर्गों की स्वार्थ-सिद्धि में लगी रहती है.

इस प्रवृत्ति के दर्शन ऋग्वेद से लेकर आधुनिक साहित्य तक मौजूद हैं. गुरु उद्दालक के पास सत्यकाम जाबाल जब यह कहता है कि वह घरों में काम करने वाली दासी के गर्भ से जन्मा है और पिता का नाम पता नहीं है, तो महर्षि उसे यह कहकर कि ‘तूने सत्य कहा, ऐसा सत्यभाषी ब्राह्मण पुत्र ही हो सकता है.’-दीक्षा देने को तैयार हो जाते हैं. भारतीय संस्कृति के अध्येता इस उद्धरण को उसके उदात्त लक्षण के रूप में प्रस्तुत करते आए हैं. वस्तुतः यह बौद्धिक धूर्तता है, जिससे ब्राह्मणेत्तर वर्गों को एक ही झटके में ‘मिथ्याभाषी’ घोषित दिया जाता है. सत्यकाम जाबालि की भांति महीदास भी दासी पुत्र था. जन्म से शूद्र किंतु मन-बुद्धि से ब्राह्मण संस्कृति का प्रतिभाशाली संहिताकार. ऋग्वेद शाखा के ‘ऐतरेय ब्राह्मण’, ‘ऐतरेय उपनिषद’ और ‘ऐतरेय आरण्यक’ का रचियता. इस संस्कृति ने महीदास को भी शूद्रों से झटक लिया. अपवादस्वरूप ही सही, ब्राह्मणेत्तर वर्ग के कुछ अतिप्रतिभाशाली बुद्धिजीवियों को अनुलोम परंपरा के अनुसार ब्राह्मण मान लिए जाने की नीति, प्रतिभाहीन ब्राह्मण पुत्रों के लिए शिखर का स्थान सुरक्षित रखती है. स्तर से ऊपर उठने के लिए ब्राह्मणेत्तर वर्ग के बुद्धिजीवियों को जहां विरलतम प्रतिभा, सर्जनात्मक मेधा एवं विभेदकारी ब्राह्मण-संस्कृति के प्रति अटूट निष्ठा का प्रदर्शन करना पड़ता है, वहीं ब्राह्मण-संतति को उसका स्वाभाविक उत्तराधिकारी मान लिया जाता है. प्रमुख प्रतिभाओं के पलायन के बाद निचले वर्ग आवश्यक बौद्धिक नेतृत्व से वंचित रह जाते हैं. दूसरे षब्दों में भारतीय संस्कृति, उसके नामित देवता, कर्मकांड, धर्म-दर्शन आदि केवल ब्राह्मणों का सृजन नहीं हंै. उसमें ब्राह्मणेत्तर वर्गों का भी भरपूर योगदान रहा है. हालांकि लाभ सर्वाधिक ब्राह्मणों ने उठाया है.

ब्राह्मण संस्कृति के व्याख्याकारों की प्रशंसा करनी होगी कि वर्गीय श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए उन्होंने अपनी रचना का श्रेय स्वयं लेने के बजाय वर्गीय श्रेय को प्राथमिकता दी. ब्राह्मण होने के नाते व्यक्तिगत श्रेय-सम्मान तो उन्हें आसानी से मिल ही जाता है. व्यास, याज्ञवल्क्य, वशिष्ट आदि किसी मनीषी के नहीं, गौत्र या परंपरा के नाम हैं. उनका उल्लेख स्मृतिग्रंथों से लेकर रामायण, महाभारत, पुराण यहां तक कि उत्तरवर्ती ग्रंथों में भी, मुख्य सिद्धांतकार के रूप में होता आया है. व्यक्तिगत श्रेय के आगे वर्गीय श्रेय को वरीयता दिए जाने का अच्छा उदाहरण ‘योग वशिष्ट’ है. लगभग एक हजार वर्ष पुराने, 29000 से अधिक पदों वाले तथा शताब्दियों के अंतराल में अनाम लेखकों द्वारा रचित, परिवर्धित इस विशद् ग्रंथ का रचनाकार होने का श्रेय आदि कवि वाल्मीकि को प्राप्त है, जबकि वाल्मीकि का नाम लगभग दो हजार वर्ष पुरानी कृति ‘पुलत्स्य वध’ जो निरंतर प्रक्षेपण के उपरांत ‘रामायण’ महाकाव्य के रूप में ख्यात हुआ-से भी जुड़ा है. ज्ञान को परंपरा में ढाल देने का लाभ तो केवल ब्राह्मणों को जबकि नुकसान पूरे बहुजन समाज को उठाना पड़ा है. वर्ण-व्यवस्था के चलते पोंगा पंडितों को भी बौद्धिक नेतृत्व का अवसर मिलता रहा. पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही धारा के लेखन से मौलिकता का हृास हुआ. चूंकि धर्म-ग्रंथों में प्रक्षेपण अलग-अलग समय में हुआ था, इसलिए उनमें परस्पर विरोधी बातें भी शामिल होती गईं. जिस महाभारत(शांतिपर्व) कहा गया था, ‘वर्ण-विभाजन जैसी कोई चीज असलियत में नहीं है. यह पूरी सृष्टि ब्रह्म है, क्योंकि इसे ब्रह्मा ने बनाया है.’ उसी में द्रोणाचार्य द्वारा एकलव्य का अंगूठा मांग लेने के धत्तकर्म को भी ‘धर्म’ मान लिया गया.

उधर व्यवस्था से अनुकूलित गरीब-विपन्न लोग निरंतर यह आस बांधे रहे कि जो पंडित लोग चैंसठ लाख योनियों का हिसाब रखते हैं, आदमी के ‘भाग्य’ का अगला-पिछला सब बांच लेने का दावा करते हैं, वे उनका भी ‘हिसाब’ रखेंगे! यदि परमात्मा छोटे-बड़े, गरीब-अमीर, ब्राह्मण और शूद्र में भेद नहीं रखता तो वे भी नहीं रखेंगे. इस भरोसे के साथ वे अपने अधिकारों की ओर से, इतिहास की ओर से मुंह फेरे रहे. समय के दस्तावेजीकरण के प्रति निचले वर्गों की उदासीनता का लाभ ऊपर वालों ने खूब उठाया. उन्होंने कर्मफल का सिद्धांत पेश किया. उसके जरिये शोषित वर्गों को समझाया जाने लगा कि उनकी दुर्दशा के लिए कोई दूसरा नहीं, वे स्वयं जिम्मेदार हैं. संस्कृति के आवरण में उन्होंने पहले अवसर छीने, फिर मान-सम्मान. अपने से नीचे के लोगों को बर्बर, असभ्य, गंवार, गलीच घोषित करके खुद इतिहास में तोड़-मरोड़ करते रहे. उनके द्वारा रचे गए इतिहास में ‘भेड़ों’ और ‘मेमनों’ को जंगल में अव्यवस्था का दोषी बताया जाता रहा तथा ‘भेड़ियों’ और ‘लक्कड़बघ्घों’ को प्रत्येक अपराध से बरी रहने की व्यवस्था की गई. पंडित, देवता, करुणानिधान, अन्नदाता, रक्षक, सेठ, साहूकार जैसे सुशोभन विशेषण उन्होंने अपने लिए सुरक्षित कर लिए. पिछले दो हजार साल का सांस्कृतिक खेल उनकी चालों और समझौतापरस्ती से बना है. ऐसी संस्कृति में जनसाधारण के लिए न्याय की उम्मीद करना खुद को धोखा देना है.

‘सांस्कृतिक वर्चस्व’ बनाए रखने की कोशिश के समानांतर उससे उबरने की छटपटाहट भी मानव-इतिहास का हिस्सा रही है. भारत में उसका पहला उदाहरण मक्खलि गोशाल के चिंतन-कर्म में दिखाई पड़ता है. वह पहला विद्वान था जिसने श्रम-शोषक, परजीवी ब्राह्मण संस्कृति के बरक्स समाज में मेहनतकशों, शिल्पकारों तथा उसके श्रम-कौशल के सहारे आजीविका जुटाने वाले लोगों को संगठित कर आजीवक संप्रदाय की स्थापना की थी. मक्खलि की लोकप्रियता का अनुमान इससे भी लगाया जाता है कि उसके जीवनकाल में आजीवक संप्रदाय के अनुयायियों की संख्या बौद्ध अनुयायियों से अधिक थी. विद्वता के मामले में भी वह अद्वितीय था. सम्राट प्रसेनजित ने बुद्ध से कहा था कि वह गोशाल को उन(बुद्ध)से अधिक प्रतिभाशाली मानते हैं. बुद्ध की हिंसा तथा कर्मकांड विरोधी भौतिकवादी विचारधारा पर आजीवक संप्रदाय का ही प्रभाव था. मक्खलि तथा बुद्ध के अलावा निगंठ नागपुत्त, संजय वेठलिपुत्त, पूर्ण कस्सप, अजित केशकंबलि, कौत्स आदि विद्वान भी यज्ञों में दी जाने वाली बलि तथा कर्मकांड का विरोध कर रहे थे. निगंठ नागपुत्त आगे चलकर महावीर स्वामी के नाम से जैन दर्शन के प्रवर्त्तक माने गए. इनमें सर्वाधिक ख्याति मध्यमार्गी गौतम बुद्ध को मिली, जो उस समय की चर्चित दार्शनिक समस्याओं ‘आत्मा’, ‘परमात्मा’ आदि पर विमर्श करने के बजाय उन्हें टालने के पक्ष में थे. क्षत्रिय कुल में जन्म लेने के कारण बुद्ध और उनके विचारों को उन राजदरबारों में आसानी से प्रवेश मिलता गया, जो ब्राह्मण पुरोहितों के बढ़ते दबाव से तंग आ चुके थे. ‘आजीवक’ और ‘लोकायत’ धारा का प्रतिनिधि साहित्य आज अप्राप्य है. उनका छिटपुट उल्लेख ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन ग्रंथों में ही प्राप्त होता है. सभी में उनकी पड़ताल नकारात्मक दृष्टिकोण के साथ की गई है. संकेत साफ हैं कि विजेता संस्कृतियों ने, पराजित संस्कृति के ग्रंथों को मिटाने का काम पूर्णतः योजनाबद्ध ढंग से किया.

धर्म और संस्कृति का आधार कहे जाने वाले ग्रंथों में, लंबे प्रक्षेपण के बावजूद ऐसे अनेक तत्व हैं, जो वैकल्पिक जनसंस्कृति के प्रवत्र्तक और संवाहक रहे हैं. महिषासुर, बालि, पौराणिक सम्राट वेन के अलावा गणेश, शिव जैसे अनेक नाम मिथक भी हो सकते हैं और यथार्थ भी. लेकिन यदि इन्हें मिथक मान लिया जाए तो ब्राह्मण संस्कृति के प्रमुख संवाहक ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र, हनुमान तथा अन्य देवी-देवताओं को भी मिथक मानना पड़ेगा. क्योंकि उसका पूरा का पूरा भवन इन्हीं के कंधों पर टिका है. शिव भारत की आदिम जातियों के मुखिया रहे होंगे. उनके सहयोगी के रूप में भूत, पिशाच, प्रेत आदि हमें भारत के आदिम कबीलों की याद दिलाते हैं. आर्यों ने शिव को तो अपनाया. मगर उनके सहयोगी कबीलों की पूरी तरह उपेक्षा की. अप्रत्यक्ष रूप से बख्शा शिव को भी नहीं गया. उन्हें आक, धतूरा खाने और भभूत लगाकर रमने वाले अवधूत की तरह दर्शाते हुए सृष्टि चलाने(शासन करने) का अधिकार ‘ब्राह्मण ब्रह्मा’ तथा ‘क्षत्रिय विष्णु’ की बपौती मान लिया गया. गणेश का मिथक भी प्राचीन भारतीय गणतंत्रों के मुखिया की याद दिलाता है. गणतांत्रिक व्यवस्थाओं में मुखिया को प्रथम सम्मानेय माना जाता था. कालांतर में बड़े राज्यों का गठन होने लगा तो सभा का नेतृत्व करने वाले गण-प्रमुख के चरित्र का भी विरूपण किया जाने लगा. बैठे-बैठे सूंड लटक आना और लंबोदर जैसे प्रतीक गण-प्रमुख पर कटाक्ष तथा उसे अपमानित करने के लिए रचे गए.

‘सामाजिक न्याय’ का सपना देखने वाले बुद्धिजीवियों की असली लड़ाई धार्मिक वर्चस्ववाद, विपन्नता और जड़ हो चुकी वर्ण-व्यवस्था से है. इस लक्ष्य की सिद्धि वर्चस्वकारी संस्कृति से मुक्ति के बिना असंभव है. ब्राह्मण संस्कृति ईश्वरीय न्याय में विश्वास करती है. न्याय का स्वरूप क्या हो? वंचित तबकों की उन्नति में वह किस भांति सहायक हो सकता है-यह नहीं बताती. ‘सामाजिक न्याय’ के पैरोकारों का प्रथम लक्ष्य ऐसी संस्कृति का पुनरुद्धार करना है, जिसमें संगठित धर्म का हस्तक्षेप न्यूनतम हो. जो पूरी तरह उदार एवं लोकतांत्रिक हो. इसके लिए आवश्यक है कि प्राचीन संस्कृति के उन प्रतीकों को रेखांकित किया जाए जो कभी ब्राह्मण संस्कृति के विरोध में या उसके समानांतर खड़े थे. क्या यह धर्म के भीतर एक और धर्म की खोज सिद्ध नहीं होगी? यह आशंका पूर्णतः निर्मूल नहीं है. ध्यान यह रखना होगा कि समानांतर संस्कृति के इन प्रतीकों, नायकों, मिथकों का योगदान दमित-शोषित वर्गों के आत्मविश्वास को लौटाने तक सीमित हो. यह एहसास दिलाने के लिए हो कि वे हमेशा से ही ‘ऐसे’ नहीं थे. वे न केवल ‘वैसे’ बल्कि कई मायनों में उनसे भी बढ़कर थे-रावण की लंका में विभीषण को अपनी आस्था और विश्वास के साथ ससम्मान जीने की स्वतंत्रता प्राप्त थी. रामराज्य में शंबूक से यह स्वतंत्रता छीन ली जाती है. इसी तरह राक्षस-सम्राट जलंधर अपनी विष्णु-भक्त पत्नी वृंदा के साथ सुखी जीवन जीता है और उनके दांपत्य के बीच अविश्वास की किरच तक मौजूद नहीं है, जबकि सीता को रावण की अशोकवाटिका में रहने के लिए भी अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ता है. यह गरीबी तथा जाति-भेद द्वारा पैदा की गई अन्यान्य विषमताओं के विरुद्ध जंग भी है. सदियों से जाति के आधार पर सुख-सुविधा और सम्मान भोगते आए समूह, परिवर्तनकामी समूहों पर जातिभेद को बढ़ावा देने का आरोप लगा रहे हैं. दूसरी ओर जातीय उत्पीड़न का शिकार रहे वर्गों को लगता है कि लोकतांत्रिक माहौल का लाभ उठाकर वे अपने संघर्ष को आगे बढ़ा सकते हैं. इसलिए वे जाति को संगठनकारी ‘टूल’ की तरह इस्तेमाल कर रहे है. लेकिन जाति-आधारित संगठनों की अपनी परेशानियां हैं. इस देश में हजारों जातियां हैं. अपनें दम पर कोई भी जाति परिवर्तनकारी ताकत बनने में अक्षम है. अतः लोग समझने लगे हैं कि सामाजिक न्याय के संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए समानांतर लड़ाई संस्कृति के मोर्चे पर भी लड़नी होगी. जीत उन्हीं की होगी जो संगठित रहने के साथ-साथ सामूहिक विवेक से काम लेंगे.

ओमप्रकाश कश्यप

प्राचीन भारत में दास प्रथा : एक सामाजिक-सांस्कृतिक कलंक

सामान्य

अरस्तु ने कहा था, कुछ व्यक्तियों का जन्म दास बनने के लिए ही हुआ है। मैं इससे इन्कार करता हूं। क्योंकि मैं नहीं मानता कि कुछ लोग जन्मजात मालिक होते हैं—डेनियल वी. चेप्पल

कहा जाता है कि सभ्यता को दासों की जरूरत पड़ती है। मैं कहता हूं, गुलामों की मदद से कोई भी सभ्य और सुसंस्कृत समाज नहीं बनाया जा सकता—विल्हेम रीश

संस्कृति के बारे में जितनी अच्छी-अच्छी बातें संभव हैं, सब भारतीय संस्कृति में भी कही जाती हैं। जैसे कि भारतीय संस्कृति उदार है। समरस है। पुरानी है। नए विचारों का स्वागत करने वाली है। दास प्रथा के बारे में पूछा जाए तो अधिकांश का उत्तर होगा—‘नहीं, यह तो पश्चिम की विशेषता है। खासकर रोम की। भारत का इससे दूर-दूर तक नाता नहीं है।’ जवाब में कोई देवदासी का जिक्र छेड़ दे तो आस्था का मामला कहकर तुरंत दबा दिया जाएगा। बड़े-बड़े विद्वानों का भी यही हाल रहा है। ‘हिंदू सभ्यता’ में राधाकुमुद मुखर्जी इस कुप्रथा पर लगभग मौन साधे रहते हैं। रामविलास शर्मा कुछ ईमानदार हैं। उनके अनुसार यह प्रथा भारत में थी, मगर बहुत बड़े स्तर पर नहीं।1 हालांकि इससे हमारी समस्या कम नहीं होती। महाभारत(सभापर्व-52/45, विराटपर्व-18/21) में युधिष्ठिर द्वारा 88,000 स्नातकों में से प्रत्येक को 30, कुल 26,40,000 दासियां दान में देने का उल्लेख है। यह एक राजा द्वारा अवसर-विशेष पर दिए गए दान का उदाहरण है। धर्मशास्त्रों में एक बार में हजारों दासियां दान करने के उल्लेख कई जगह हैं। रामविलासजी दास-प्रथा के और कितने बड़े स्तर की कल्पना करते थे, कहना मुश्किल है। काणे थोड़ा संतुलित करने का प्रयास करते हैं—‘ऐसा प्रतीत होता है कि यहां दास का अर्थ गुलाम या अर्धदास है।’2 यहां ‘गुलाम’ और ‘दास’ में पारिभाषिक दृष्टि से क्या अंतर है, यह तो काणे साहब ही बता सकते हैं। रोम में अर्धदास को ‘शेरिफ’ अथवा ‘हेलोट’ कहा जाता था। वे कृषि-भूमि के साथ जुड़े होते थे। भूमि के खरीद-बिक्री में उनकी खरीद-फरोख्त भी शामिल होती थी। उपर्युक्त ऋचा में कृषि-भूमि अथवा खेती का कोई उल्लेख नहीं है। कौटिल्य या नारद के विभाजन में कृषिदास का अलग से कोई उल्लेख नहीं है। ए. एल. बाशम ने ‘दास’ शब्द का प्रयोग आक्रमणकारी आर्यों द्वारा पराजित प्राग्वैदिक अनार्यों के लिए किया है।

सिंधु सभ्यता में दास

भारत सहित प्राचीन सभ्यताओं में दास प्रथा के कम से कम 5200 पहले तक के प्रमाण उपलब्ध हैं। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो आदि सिंधु सभ्यता(3300—1750 ईस्वीपूर्व) के प्रमुख नगरों में बड़े-बड़े भवनों के साथ एक कमरे के मकान भी मिले हैं। उससे तत्कालीन समाज के आर्थिक-सामाजिक विभाजन का अनुमान लगाया जाता है। पुरातत्ववेत्ता जॉन मार्शल के अनुसार एक कमरे के मकान नौकरों अथवा दासों के हो सकते हैं। हालांकि यह केवल अनुमान है। व्हीलर ने हड़प्पा और सुमेरियन सभ्यता के बीच हाथीदांत, कपास के साथ-साथ दासों के व्यापार की संभावना भी व्यक्त की है। उसके अनुसार लागेश के बाउ के मंदिर परिसर में एक फैक्ट्री थी। उसमें 21 डबलरोटी बनाने वाले, 27 दासियां, 25 शराब खींचने वाले और छह दास, बुनकर और कताई करने वाले, लुहार तथा अन्य शिल्पकर्मी काम करते थे। व्हीलर के अनुसार कारखाने की संरचना हड़प्पा शैली के अनुरूप थी।3 अब यदि मान लिया जाए कि हड़प्पा और सुमेरियन सभ्यता के बीच दासों का व्यापार भी होता था, तो सिंधु सभ्यता में दासों के मौजूगी स्वतः प्रमाणित हो जाती है। दास प्रथा की उत्पत्ति का संबंध, खेती के विकास से भी बताया जाता है। उसके लिए अतिरिक्त श्रम की आवश्यकता थी। इसलिए आरंभ में ताकत के बल पर लोगों को खेतों में काम करने के लिए बाध्य किया जाने लगा। कुछ लोग जो प्रकृति-आधारित खेती की अनिश्चितता के स्थान पर निश्चित आजीविका को पसंद करते थे, वे दूसरों को अपना श्रम बेचने लगे होंगे। कालांतर में उसी से दास प्रथा का जन्म हुआ, फिर धीरे-धीरे इस प्रथा को समाज की स्वीकृति मिलने लगी। खेती के अलावा घरों, उद्यमों में भी दासों की मदद ली जाने लगी। ऐसा विकास के आरंभिक चरणों में सभी समाजों में हुआ था। फिर जैसे-जैसे राज्य नामक संस्था मजबूत हुई, दासप्रथा के अन्यान्य रूपों का विस्तार होता गया। गौरतलब है कि भारतीय और रोम तथा सुमेरियन समाज में दासों की स्थिति में बड़ा अंतर है। रोम और सुमेर में दास तत्कालीन अर्थव्यवस्था के उपकरण मात्र थे। वे खरीदे-बेचे जाते थे। उस दासप्रथा का जन्म सामंतशाही की चरम अवस्था में हुआ था। सिंधु सभ्यता में दासों की उपस्थिति के जो संकेत मिले हैं, वे रोम और सुमेर की तरह आर्थिक दास ही हैं। जिनका उस समय की अर्थव्यवस्था के संचालन में बड़ा योगदान था। लेकिन जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं, भारतीय दासप्रथा वर्णव्यवस्था के अनुरूप ढलने लगती है।

ऋग्वेदकालीन दासप्रथा

प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में ऐसे शताधिक विवरण मौजूद जिनसे तत्कालीन भारतीय समाज में दास प्रथा की बड़े स्तर पर उपस्थिति का पता चलता है। ऋग्वेद में ‘दास’ शब्द अनेक स्थानों पर आया है। उसमें दासों के खरीदने-बेचने, भेंट करने, उपहार अथवा दान में देने, यहां तक कि दान लेने के भी, अनेकानेक प्रसंग हैं। ऋग्वेद(8/56/3) के बालखिल्य सूक्तों में पृषध्र मुनि की उक्ति है—‘शतं मे गर्दभानां, शतमूर्णावतीनाम्। शतं दासाः अति स्रजः।।

‘मुझे एक सौ गधे, एक सौ भेड़ें और एक सौ दास दो।’—यहां दास को गधे और भेड़ के समकक्ष रखकर उसे मनुष्य की संपदा माना गया है।

ऋग्वेद में मोटे तौर पर दो प्रकार के दासों का उल्लेख है। पहले वे जो अपने स्वामी की संपत्ति कहे जाते थे। जिनके शरीर पर उनके मालिक का अधिकार होता था। यानी ऐसे दास जिनका जिक्र होते ही श्रीविहीन, दीन-हीन, अपने मालिक के इशारों पर नाचने वाले व्यक्ति की छवि मन में उभर आती है। इस श्रेणी में आर्य और अनार्य दोनों प्रजातियों के दास शामिल थे। दूसरी श्रेणी उन अनार्य दासों की थी, जो अपेक्षाकृत साधन-संपन्न थे। जिनके पूर्वजों ने सिंधु सभ्यता की नींव रखी थी। उस समय वह सभ्यता अपने पराभवकाल में थी, मगर उसका वैभव पूरी तरह क्षीण नहीं हुआ था। 8 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक में फैली उस सभ्यता के मूल बाशिंदों से आर्य कहीं जूझ रहे थे, तो कहीं मैत्री का हाथ बढ़ा रहे थे। ऋग्वेद(7/99/4) में वृषशिप्र नामक दास का उल्लेख है, जिसमें विष्णु और इंद्र की स्तुति करते हुए कहा गया है—‘तुमने वृषशिप्र नामक दास की माया को संग्राम में विनष्ट किया है।’ एक मंत्र(ऋग्वेद-10/22/8) से आर्यों एवं अनार्यों के बीच भीषण संघर्ष का पता चलता है। युद्धरत आर्य इंद्र की स्तुति कर, उससे अनार्यों के विनाश के लिए प्रार्थना करते हैं—‘हम सब चारों ओर से दस्युओं से घिर चुके हैं। वे यज्ञ कर्म नहीं करते(अकर्मन)। न वे किसी वस्तु को मानते हैं(अमंतु)। उनके व्रत हमसे भिन्न हैं(अन्यव्रत)। वे मनुष्यों जैसा व्यवहार नहीं करते(अमांतुष)। हे शत्रुनाशक इंद्र! तू उन दासों का विनाश कर।’ जाहिर है, इस श्रेणी के ‘दास’ केवल नाम के दास थे—‘दासों और दस्युओं, दोनों ही के कब्जे में अनेक किलाबंद बस्तियां थीं….माना जाता है कि घुमक्कड़ आर्यों की आंखें दुश्मनों की बस्तियों पर संचित संपत्ति पर लगी हुई थीं। उसके लिए दोनों में सतत संघर्ष होता रहता था….ऐसे दो दास प्रमुखों का उल्लेख किया गया है कि जो धनलोलुप माने गए हैं। कामना की गई है कि इंद्र दासों की शक्ति को क्षीण करें तथा उनके द्वारा जमा की गई संपत्ति को लोगों में बांट दें।’4 

‘निरुक्त’ में ‘दास’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘दश्’ धातु से हुई है। इसका तात्पर्य संपन्न करना है। तदनुसार जो व्यक्ति अपने स्वामी के विविध कार्य संपन्न करता है, वह दास कहलाता है। इसका अर्थ ‘देना’ भी है। सवाल है कि दास का देने से क्या संबंध है? जिसकी देह पर भी उसके स्वामी का कब्ज़ा है, जिसे संपत्ति रखने का कोई भी अधिकार नहीं है, वह दूसरों को क्या देगा. ऋग्वैदिक काल के  ‘तरुक्ष’ और ‘बल्बूथ’ नामक अनार्य दास इस कसौटी पर खरे नजर आते हैं। श्रेणी में आते थे। ऋग्वेद में दोनों का उल्लेख दास-प्रमुख के रूप में हुआ है। ऋग्वेद(8/46/32) में लिखा गया है—‘मैंने बल्बूथ नामक दास से सौ गौ और अश्व प्राप्त किए थे।’ बल्बूथ की भांति तरुक्ष नामक दासप्रमुख का उल्लेख भी दानदाता के रूप में आया है। इन दोनों की ओर से पुरोहितों को जो उपहार दिए गए थे उससे उनकी बड़ी सराहना हुई थी।5 ऋग्वेद(8/19/36) में त्रसदस्यु को पचास युवतियां दान करते हुए बताया गया है। निश्चय ही वे युवतियां दासकर्म के निमित्त दान की गई होंगी। ऋग्वेद(10/33/4) में त्रसदस्यु के पुत्र कुरुश्रवण राजा को भी श्रेष्ठ दाता बताया गया है—‘मैं कवष ऋषि हूं। मैं त्रसदस्यु के पुत्र कुरुश्रवण राजा के पास याचना करने गया था; क्योंकि वे श्रेष्ठ दाता हैं।’ अथर्ववेद के आरंभिक अंशों में भी दासप्रथा का विवरण दिया है। उसमें दासियों के संबंध में प्रमाण मिले हैं। उसमें एक दासी का उल्लेख है जिसके हाथ भीगे होते थे। वह ओखल-मूसल कूटती थी; तथा गाय के गोबर पर पानी छिड़कती थी।6 

केवल संपदा नहीं, ज्ञान के क्षेत्र में भी दासों का हस्तक्षेप था। ऋग्वेद के उद्गाता ऋषियों में एक महत्त्वपूर्ण नाम कक्षीवान का है। उनका जन्म दीर्घतमस और उशिज नामक स्त्री जो दास कन्या थी, के संसर्ग से हुआ था। उशिज अंगदेश की महारानी की दासी थी। ऋग्वेद में एक बड़ा ही महत्त्वपूर्ण और लोकोपयोगी प्रसंग है, जुआरी का। उसके उद्गाता ऋषि कवष ऐलूष भी एक दासी की संतान थे। सूर्यकांत बाली ने ‘भारत गाथा’ में कवष ऐलूष को ‘वैदिक कविता को जमीन से जोड़ने वाला कवि’ कहा है। कवष के ऋग्वेद के दशम मंडल में कुल पांच(10/30-34) मंत्र हैं। जिनमें वह जुआरी की मनःस्थिति का वर्णन करता है। अंतः में उसे महत्त्वपूर्ण लौकिक संदेश तक ले जाता है—‘ओ जुआरी। जुआ मत खेल। मत खेल जुआ। जा अपने खेतों को देख। भार्या को देख। खेती करेगा तो धन आएगा। उसी से तुझे इज्जत मिलेगी। उसी से गौएं आएंगी। तेरी भार्या प्रसन्न होगी….घर जा। जुआ मत खेल।’ इस प्रसंग को महाभारतकार ने युधिष्ठिर के प्रसंग में ज्यों का त्यों अपना लिया गया है। बौद्ध धर्म के उभार से पहले भारत में भौतिकवादी दर्शन अपने शिखर पर था। उस समय के पांच प्रमुख आजीवक चिंतकों में से एक पूर्ण कस्सप को दास बताया गया है। बाकी दो आजीवक विद्वानों अजीत केशकंबलि और मक्खलि गोसाल की समाजार्थिक स्थिति भी दास की तरह ही थी।

ऋग्वेद(1/24) में शुनःशेप का कथासूत्र आता है। उस कथा का विस्तार ऐतरेय ब्राह्मण, भागवत पुराण, ब्रह्मपुराण आदि में भी देखने को मिलता है। कहानी के अनुसार राजा हरिश्चंद्र संतान की आकांक्षा के साथ वरुण की प्रार्थना करता है। वरुण प्रसन्न होते हैं। परंतु उनका वरदान सशर्त है—‘तुम्हारे संतान तो अवश्य होगी। लेकिन उसके लिए तुम्हें बलि देनी होगी।’ वरदान के फलस्वरूप हरिश्चंद्र के रोहित नामक पुत्र का जन्म होता है। लेकिन राजा बलि देना भूल जाता है। आखिरकार उसे याद दिलाया जाता है। रोग से पीडि़ता, दारुण अवस्था में हरिश्चंद्र 100 गायों के बदले अजीगर्त के पुत्र शुनःशेप को बलि के लिए खरीद लेता है। बाद में विश्वामित्र उसकी रक्षा करते हैं।

ऋग्वेद(2/12/4) तथा अथर्ववेद(20/34/4) में कहा गया है कि इंद्र ने दासों को गुफाओं में रहने को बाध्य कर दिया था। अनार्य दासों को आर्य ‘असुर’ मानते थे(ऋग्वेद, 9/71/2)। उन्हें पराधीन बनाने की जिम्मेदारी इंद्र पर डाली गई है। इंद्र से दासों को पराधीन करने के लिए जिस तरह बार-बार प्रार्थना की गई है, उससे लगता है, कि यह संबोधन उस समय के पूरे आर्येत्तर समुदाय के लिए रहा होगा, जो आर्यों के आगमन के पहले से ही इस भूभाग पर रहते आ रहे थे। ऋग्वेद में ‘दास’ के अलावा ‘दस्यु’ शब्द का भी कई बार प्रयोग हुआ है। सामान्यत दासों एवं दस्युओं को एक मान लिया जाता है। लेकिन ऋग्वेद में दस्युहत्या के उल्लेख हैं, जबकि दासहत्या का कोई उल्लेख नहीं है। दासों की अपेक्षा दस्युओं के विनाश तथा उन्हें पराधीन बनाने की चर्चा अधिक की गई है। इंद्र से अनुरोध किया गया है कि वे दस्युओं से युद्ध कर उन्हें परास्त करें, ताकि आर्यों की शक्ति बढ़ सके। ऋग्वेद(4/30/21) के एक प्रसंग में 30 सहस्र दासों को माया द्वारा मूर्छित करने का उल्लेख है। इससे पता चलता है कि दस्यु भारत आर्यों के आने से पूर्व शासक कबीले थे। ऋग्वेद में दस्युओं की हत्या की चर्चा कम से कम 12 स्थानों पर हुई है। अधिकांश हत्याएं इंद्र द्वारा ही कराई गई है।7 अंतर्जातीय युद्धों में दासों को भी सहायक सेना के रूप भर्ती किया जाता था। बावजूद इसके ‘कृष्णवर्ण अनार्यों को पराजित करना हंसी-खेल न था। अनार्य अपनी बढ़ी-चढ़ी सभ्यता के साथ अपने दुर्गों में सुरक्षित थे। ऋग्वेद(1/4/1/3) में उनके सैकड़ों पुरों और दुर्गों का उल्लेख है। उनमें लोहे(आयसी, 2/58/8), पत्थर(अश्ममयी, 4/30/20), लंबे-चौड़े(पृथ्वी), विस्तृत(उर्वी), गउओं से भरे हुए(गोमती, अथर्व 8/6/23), सौ खंबों वाले(शतभुजी) तथा शरतकालीन जलौघ से बचाने वाले दुर्ग शामिल थे.

अनार्य दास काले रंग(कृष्ण-योनि) के और अनास या चपटी नाक वाले थे। इसके अलावा कुछ सामाजिक-सांस्कृतिक भिन्नताएं भी थीं; यथा—

1. उनकी भाषा वैदिक-संस्कृति से भिन्न थी जो स्पष्ट नहीं थी(मृध-वाक्)।

2. वे वैदिक कर्मकांड से शून्य थे।(अकर्मन)

3. वे वैदिक देवों को नहीं पूजते थे(अदेवयु)।

4. वे देवों के लिए भक्ति से रहित थे(अब्रह्मन्)।

5. वे यज्ञ से विरहित थे(अयज्वन्)।

6. वे वैदिक व्रतों का पालन नहीं करते थे।(अव्रत)।

7. उनके स्थान पर भिन्न प्रकार व्रतों या धार्मिक नियमों को मानते थे(अन्यव्रत)।

8. वे वैदिक देवों के निंदक थे(देवपीयु)।

9. वे लिंग की पूजा करते थे(शिश्नदेव)।

ऋग्वेद में इंद्र को पुरंदर और शत्रु हंता कहा गया है। इसलिए कि उसने अनार्यों के सैकड़ों दुर्गों को नष्ट किया था। हजारों हत्याएं की थीं। इंद्र ने ये हत्याएं क्यों कीं? इन्हें समझना कठिन नहीं है। आर्य अपने लिए बेहतर देश की खोज में भारत तक पहुंचे थे। भारत पहुंचने पर उनका सिंधुवासियों से सामना हुआ। जो अपनी नागरी सभ्यता पर गर्व करने वाले, भले और शांतिप्रिय लोग थे। आर्यों ने कहीं बलपूर्वक, तो कहीं सहयोग-समझौते से सिंधु सभ्यता के मूल निवासियों को अपने प्रभाव में लेना आरंभ किया। इस कार्य में उन्हें जैसे-जैसे सफलता मिली, उनका लक्ष्य भी बदलता गया। राजनीतिक विजय के बाद उनका लक्ष्य था, देव-संस्कृति की श्रेष्ठता को स्थापित करना; तथा अनार्यों की श्रम संस्कृति, जिसका विकास कृषि के विकास के साथ-साथ हुआ था, को हेय सिद्ध कर, धीरे-धीरे नष्ट कर देना।

गौरतलब है कि अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक श्रेष्ठता को श्रेष्ठतम मानकर, पराजित समूहों को अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक परिधि में लाने का काम लगभग सभी ब्राह्मणेत्तर धर्मों और संस्कृतियों में हुआ था। ईसाई और इस्लाम के अनुयायियों ने तो उसके लिए बल-बुद्धि दोनों का प्रयोग किया था। मगर ब्राह्मणों ने एकदम उलटा तरीका अपनाया था। वर्ण-व्यवस्था की मदद से उन्होंने न केवल आर्येत्तर समूहों को, अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सेदारी से दूर रखा, अपितु अपने ही एक हिस्से पर जिसे उन्होंने शूद्र की संज्ञा दी थी, ऐसे अनेक प्रतिबंध लागू कर दिए जिससे उनका सामाजिक जीवन, अत्यंत कष्टकारी होता गया। इसके पीछे आर्यों की कुंठा का योगदान भी रहा होगा। सिंधुवासी समृद्ध नागरी सभ्यता के उत्तराधिकारी थे, जो समकालीन संस्कृतियों से श्रेष्ठतम थी। 1500 ईस्वीपूर्व में आर्यों के आगमन तक, उसका प्राचीन वैभव यद्यपि क्षीण होने लगा था, तथापि घुमक्कड़ आर्यों की संस्कृति की अपेक्षा वे कहीं अधिक विकसित थे। यह जानते हुए कि भौतिक प्रगति के मामले में वे सिंधुवासियों से होड़ कर पाना असंभव है, आर्यों ने यज्ञ केंद्रित वायवी संस्कृति की नींव रखी। उन्होंने प्राकृतिक शक्तियों का मानवीकरण किया। दावा करने लगे कि यज्ञादि के माध्यम से वे देवताओं से सीधे संवाद कर सकते हैं। आवश्यकता पड़ने पर उन्हें बुला भी सकते हैं। चूंकि उन दिनों सिंधु सभ्यता अपने अवसानकाल में थी, इसलिए एक समृद्ध सभ्यता के पराभव से निराश हुए सिंधुवासी धीरे-धीरे ब्राह्मणों की वायवी संस्कृति के प्रलोभन में फंसने लगे। ब्राह्मणों ने उन्हें आर्य संस्कृति में जगह दी, मगर इसके लिए उन्हें अपना आत्मसम्मान गंवाना पड़ा। ब्राह्मणों ने उन्हें शूद्र और दास के रूप में स्वीकार किया। दासों की कोई जाति नहीं थी। मगर कई शूद्र जातियों का सामाजिक स्तर शूद्र से भी बदतर था।

ऋग्वेद की कई ऋचाएं इसकी साक्षी हैं कि आरंभिक विजयों के साथ ही आर्यों को अपनी सांस्कृतिक विजय की चिंता होने लगी थी। वे अनार्यों के संसाधनों को कब्जाने के साथ-साथ उनकी संस्कृति को भी तहस-नहस कर देना चाहते थे। कभी छल तो कभी बल-पूर्वक वे लड़ाई को जीतते भी रहे। यह लड़ाई आसान नहीं थी। लोग ईसाइयों पर आरोप लगाते हैं कि मिशनरियों ने जनता के बीच जाकर लोगों को धर्मांतरण के लिए उकसाने, प्रलोभन देकर अपनी ओर मिलाने की कोशिशें कीं। वे इस्लाम के प्रसार हेतु जेहाद छेड़ने वाले मुस्लिमों को भी दोषी ठहराते हैं। जबकि भारत में सबसे पहला ‘जेहाद’ तो आर्यों ने अनार्यों के साथ किया था। बाद में वैसा ही जेहाद पुष्यमित्र शुंग ने वौद्धों का कत्लेआम करके किया था।

उपनिषदों में दासप्रथा

उपनिषदों को आमतौर पर दार्शनिक विमर्श के लिए जाना जाता है। कहा जाता है कि वेदों में जो दार्शनिक विचार सूत्र रूप में दिए हैं, उपनिषदों में आकर वे स्वतंत्र धारा का रूप ले लेते हैं। उपनिषदों में भी सबसे बड़ा है—छांदोग्योपनिषद। उसके चौथे अध्याय में राजा जानश्रुति और वायु को सृष्टि का मूल तत्व मानने वाले ऋषि रैक्व का संदर्भ आता है। रैक्व की ख्याति से प्रभावित जानश्रुति धर्मोपदेश की कामना के साथ अपनी पुत्री और धन-धान्य उन्हें भेंट कर देता है। उपनिषदों में ऐसे और प्रसंग भी हैं, जिनमें स्त्री के साथ दास जैसा व्यवहार किया गया है। कुछ विद्वान ऋग्वेद के दिवोदास को जो स्वयं कई ऋचाओं के उद्गाता थे, दासी-पुत्र मानते हैं।9

दासियों से मनोरंजन का काम लेने का भी उल्लेख है। तैत्तिरीय संहिता में सिर पर कलश रखकर नाचती-गाती हुई दासियों का वर्णन आया है। इसी ग्रंथ में दास के दान का भी उल्लेख है(2/2/6/3)। कठोपनिषद में दासियां नचिकेता को अपनी ओर लुभाने का यत्न करती हैं।11 ऐतरेय ब्राह्मण(39.8) में जिक्र आता है कि राजा ने राज्याभिषेक वाले पुरोहित को दस हजार दासियां और दस हजार हाथी दिए। वृहदारण्यकोपनिषद्(4.4.23) में आया है कि याज्ञवल्क्य से बृह्मविद्या की शिक्षा लेने के पश्चात जनक ने उनसे कहा, ‘विदेहों के साथ मैं स्वयं को दास बनने की कामना के साथ, आपको दान-स्वरूप प्रदान करता हूं।’ छांदोग्योपनिषद(7.24.2) में लिखा है, ‘इस संसार में लोग गायों, घोड़ों, हाथियों, सोने, खेतों, घरों एवं दासियों के साथ अपने घरों को समृद्ध करते हैं।’ इसी उपनिषद के एक प्रसंग में राजा अश्वपति ने सत्ययज्ञ से कहा था—‘खच्चरों से जुता हुआ यह रथ, दासियों तथा हार सहित प्रस्तुत है।12 इससे पता चलता है कि ऋग्वेदयुगीन दास प्रथा का वेदोत्तरकाल में खूब विकास हुआ था। यह प्रथा तत्कालीन अभिजन समाज के लिए गर्व की बात थी। यहां तक कि स्वयं को तापस और साधक कहने वाले तथाकथित वेदज्ञ ब्राह्मण भी उससे बचे न थे। आरुणि जब अपने पुत्र श्वेतकेतु के साथ ज्ञान-प्राप्ति की आकांक्षा में पांचाल नरेश प्रवाहण जाबालि के निकट पहुंचे तो वहां गाय, अश्व, परिवार और परिधानों के अतिरिक्त ‘दासी’ भी मौजूद थी।13 

स्मृतिकालीन दासप्रथा

हिंदू धर्म में स्मृतियों का स्थान वेद-वेदांगों के बाद आता है। उन्हें हिंदू धर्म का आधारभूत ढांचा माना गया है। सभी धर्मशास्त्र, पुराण, महाकाव्य, सूत्र आदि स्मृतियों का अंग माने गए हैं। जहां तक दासप्रथा का सवाल है, मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, नारद, बृहस्पति, कात्यायन स्मृति सहित दोनों महाकाव्यों तथा अन्य धर्मशास्त्रों में उसका उल्लेख हुआ है। स्मृतियों का रचनाकाल बौद्ध धर्म के बाद से, चौथी शताब्दी तक फैला हुआ है। इस बीच दासों के कार्यक्षेत्र में भी वृद्धि हुई थी। गृह्मसूत्रों में सम्मानित अतिथियों के चरण धोने के लिए दासों की नियुक्ति का उल्लेख है। मनु(1.91, 8.413-414) के अनुसार शूद्रों का प्रमुख कर्तव्य है, उच्च वर्णों की सेवा करना। उसके बाद उसने जो व्यवस्थाएं की हैं, उनमें अधिकांश वही हैं, जो दासों के लिए थीं। धन-संचय का अधिकार न शूद्रों को था, न ही दासों को। यदि कोई शूद्र अथवा दास संपत्ति संचय में सफल हो जाए तो उसकी संपत्ति को छीनकर ब्राह्मणों को देने का नियम था। जैसे कुम्हार की संतान कुम्हार, जुलाहे की जुलाहा कही जाती थी, ठीक उसी प्रकार दास की संतान भी दास कहलाती थी। अंतर बस एक था। विशिष्ट परिस्थितियों में दास को स्वतंत्र किया जा सकता था। वह सामान्य जीवन जी सकता था। परंतु शूद्र को अपने जातिगत पेशे से हटकर काम करने की अनुमति नहीं थी। यहां तक कि आजाद होने के बाद भी दास पर उसकी जाति चिपकी रहती थी।

स्मृतिकाल तक दास प्रथा सांस्थानिक रूप ले चुकी थी। दास-दासियों को लेकर कानून बनाए जाने लगे थे। याज्ञवल्क्य किसी दास के साथ विवाद न करने की सलाह देते हैं। वहीं जैमिनी(6.7.6) ने शूद्रों के दान को निषिद्ध माना है, जबकि मनु ने शारीरिक दंड की व्यवस्था में दास एवं पुत्र को एक ही श्रेणी में रखा है(8.299-300)। आपस्तंबधर्मसूत्र(2.4.9.11) में आया है कि अतिथि के अकस्मात पहुंच जाने पर, खुद को, स्त्री या पुत्र को भूखा रखा जा सकता है, किंतु उस दास को नहीं, जो रात-दिन सेवा में लिप्त रहता है। नारद के अनुसार गृहस्वामी चाहे तो दास को पुत्र की भांति अपनी संपत्ति का एक हिस्सा प्रदान कर सकता है। वर्ण-व्यवस्था के बंधन दासों पर भी उसी प्रकार लागू होते थे। याज्ञवल्क्य (2.183) तथा नारद (39) के अनुसार ब्राह्मण के अतिरिक्त बाकी तीनों वर्ण ब्राह्मण के दास बन सकते थे। क्षत्रिय के दास केवल वैश्य अथवा शूद्र बन सकते थे। क्षत्रिय किसी वैश्य या शूद्र का तथा वैश्य शूद्र का दास नहीं सकता था। कात्यायन ब्राह्मण के दासत्व ग्रहण करने पर थोड़ी छूट प्रदान करते हैं। उनके अनुसार ब्राह्मण किसी ब्राह्मण का भी दास नहीं बन सकता। यदि बनना ही चाहता है तो उसे किसी चरित्रवान, एवं वैदिक ब्राह्मण का दास बनने की अनुमति है। वह भी केवल पवित्र कार्यों के लिए।14 कात्यायन(7.33) ने व्यवस्था थी कि संन्यास से भटके हुए ब्राह्मण को राज्य से बाहर निकाल देना चाहिए। लेकिन संन्यास भ्रष्ट क्षत्रिय एवं वैश्य राजा के दास होते हैं। कौटिल्य(3.13) एवं कात्यायन(7.23) के अनुसार यदि स्वामी दासी से संसर्ग करे और संतानोत्पत्ति हो तो दासी एवं पुत्र दोनों को दासत्व से मुक्ति मिल जाती है। दास की गवाही अमान्य थी। परंतु विशिष्ट परिस्थिति में जब कोई अन्य साक्ष्य अनुपलब्ध हो तो मनु(8.70) ने नाबालिग, स्त्री, नौकर आदि के साथ दास की गवाही को भी मान्य ठहराया है।

स्मृतिकाल तक दासों की कई कोटियां बन चुकी थीं। मनुस्मृति(8.415) में 7 प्रकार के दासों का उल्लेख है। कौटिल्य का मत भी मिलता-जुलता है, जबकि नारदस्मृति दासों की 15 कोटियों की लंबी सूची प्रस्तुत करता है—‘1. घर में पैदा हुआ, 2. खरीदा हुआ।, 3. दान अथवा किसी अन्य प्रकार से प्राप्त, 4. वसीयत से प्राप्त, 5. अकाल में रक्षित, 6. किसी अन्य स्वामी द्वारा प्रतिश्रुत, 7. बड़े ऋण से युक्त, 8. युद्धबंदी, 9. बाजी में जीता हुआ, 10. ‘मैं आपका हूं’ कहकर दासत्व ग्रहण करने वाला, 11. संन्यास से च्युत, 12. जो कुछ दिनों के लिए स्वेच्छापूर्वक दास बना हो, 13. भोजन के लिए दास बना हुआ, 14. दासी के प्रेम से आकृष्ट(बड़वाहृत) तथा 15. स्वयं को बेच देने वाला।15  

‘अर्थशास्त्र’ के अनुसार स्मृतिकाल में दासों की खरीद-फरोख्त, उन्हें दान में लेने-देने, गिरवी रखने का प्रचलन बढ़ चुका था। कौटिल्य ने लिखा था कि प्रत्येक स्वतंत्र परिवार उदरदास(दास के पेट से उत्पन्न संतान) अवश्य रखता है। दास अपने स्वामी की संपदा कहे जाते थे। उन्हें गिरवी रखा जा सकता था। यहां तक कि उनकी हत्या भी की जा सकती थी। दासों को न्यूनतम न्याय देने के लिए स्मृतियों में कुछ अनुशंषाएं की गई थीं। परंतु व्यवहार में उनका उपयोग बहुत कम हो पाता था। इसलिए स्वामी द्वारा दास पर दंडात्मक कार्यवाही के विरुद्ध किसी अदालत में सुनवाई नहीं थी।16 

उन दिनों दासों का जीवन अत्यंत कष्टकारी होता था। बीमार पड़ जाने पर उनके लिए इलाज की कोई व्यवस्था न थी। नियमानुसार दास अपना मूल्य चुकाकर अपनी आजादी खरीद सकता था। परंतु व्यवहार में ऐसा संभव ही नहीं था। इसलिए दास और उसका परिवार मालिक के लिए जो भी परिश्रम और धनार्जन करता था, उससे उत्पन्न आय उसके स्वामी की मानी जाती थी। दास का अपनी आय का कोई स्रोत नहीं था। इसलिए उसकी आजादी, सिवाय किसी चमत्कार के, असंभव जैसी थी। मुक्ति की चाहत में कई बार कुछ दास अपने स्वामी का घर छोड़कर भाग भी जाते थे। दास पर अत्याचार के समय मौन रहने वाला, उसके विरुद्ध मनमानी दंडात्मक कार्यवाही को दास-स्वामी का विशेषाधिकार मानने वाला राज्य, उस समय एकाएक बीच में कूद पड़ता था। राज्य के कर्मचारी भगोड़े दास को पकड़कर पुनः उसके स्वामी के सुपुर्द कर देते थे। खुद को गिरवी रखने वाला व्यक्ति यदि घबराकर भाग जाता तो उसे जीवन-भर के लिए दास बना लिया जाता था। मालिकों द्वारा दासियों का मान-भंग करने तथा उन्हें दूसरों के आगे पेश करना तो शान की बात मानी जाती थी।

स्मृतिकाल के दौरान दास-प्रथा पर काफी लिखा गया है। विशेषकर नारद और कात्यायन स्मृति में। नारद ने दूसरों की सेवा करने वाले(शुश्रूषक) को पांच भागों में बांटा है—1. वैदिक छात्र, 2. अंतःवासी, 3. पर्यवेक्षक(अधिकर्मकृत), 4. भृतक, तथा 5. दास। इनमें प्रथम चार को कर्मकार कहा जाता था। पवित्र कार्यों के समय उन्हें आवश्यकतानुसार बुलाया जा सकता था। दासों के लिए काम की कोई तय सूची नहीं थी। उनसे कोई भी काम लिया जा सकता था। नारद स्मृति(6.7) के अनुसार दासों के कुछ सामान्य कार्य थे—‘साज-सफाई करना, यथा झाड़ू लगाना, गंदे गड्ढों, मार्ग, गोबर, कूड़ा, तालाब आदि की सफाई करना गुप्तांगों को खुजलाना, मल-मूत्र फेंकना आदि। गौतम धर्मसूत्र(2.1.59) में भी ‘पुरुष दासादयः वंशोवंध्या’ कहकर समाज के उच्च वर्गों की सेवा को उनका कर्तव्य कहा गया है।

दासों के छूटने के नियम तथा उसके मुक्त होने की पूरी पद्धति थी। याज्ञवल्क्य(2.182) के अनुसार यदि दास किसी हमले या दुर्घटना के कारण स्वामी के संकट में पड़े जीवन की रक्षा कर ले, तो उसे मुक्त किया जा सकता है। नारद ने भी इसकी पुष्टि की है। दासत्व से मुक्ति का प्रावधान भी धर्मशास्त्रों में दिया गया है। नारद स्मृति के अनुसार स्वामी जल से भरे मिट्टी के एक घड़े को दास के कंधे से उतारकर उसे तोड़ डालता था। तदनंतर अन्न एवं पुष्पमिश्रित जल को दास के सिर पर छिड़कते हुए तीन बार उसके स्वतंत्र होने की घोषणा करता था।17 ध्यातव्य है कि यूनानी लेखक  मेगस्थनीज, जो चंद्रगुप्त मौर्य की सभा में सेल्यूकस निकेटर का राजदूत था—ने अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में भारत में दासप्रथा की मौजूदगी से इन्कार किया है। जबकि उस दौरान लिखे जा रहे सभी धर्मग्रंथ दास प्रथा की मौजूदगी का समर्थन करते हैं।

महाकाव्यों में दास प्रथा

भारतीय जनमानस में रामायण और महाभारत की बड़ी प्रतिष्ठा है। इनमें रामायण को महाभारत से पहला माना जाता है। परंतु जिस तरह उसमें ब्राह्मणवाद मुखर होकर आया है, वह बौद्ध धर्म से पहले की रचना नहीं हो सकती। अपने वर्तमान स्वरूप में दोनों ही ग्रंथ पुष्यमित्र शुंग के बाद की रचना है। हालांकि उनके कुछ कथासूत्र प्राचीन हो सकते हैं। ईसा पूर्व पांचवी-छठी शताब्दी में आजीवकों और बौद्धों की ओर से मिल रही चुनौतियों के कारण आभाहीन हो चुका ब्राह्मण-धर्म, अनुकूल माहौल में अपने राजनीतिक एवं सांस्कृतिक वर्चस्व को पुनःस्थापित करने में लगा था। इसके लिए समर्थन और विरोध दोनों नीतियों पर काम जारी था। एक ओर बुद्ध को दसवें अवतार के रूप में प्रतिष्ठित करके उनके विचारों को भारतीय धर्म-दर्शन की शाखा के रूप में मान्यता दी जा रही थी, दूसरी ओर ब्राह्मण धर्म को मजबूत करने के लिए वर्ण-व्यवस्था को दैवीय घोषित करने वाले ग्रंथ रचे जा रहे थे। उन सबका एकमात्र उद्देश्य था, जनसाधारण को यह विश्वास दिलाना कि ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ है और वर्ण-व्यवस्था उसका आदर्श विधान है।

जो लोग रामायण और महाभारत की अतिप्राचीनता का दावा करते हैं, उन्हें समझ लेना चाहिए कि रामायण का मूल संस्करण, जिसे वाल्मीकि ने ‘पुलत्स्य वध’ शीर्षक से लिखा था, वह अनुपलब्ध है। महाभारत के पूर्व संस्करणों ‘जय’, ‘विजय’ और ‘भारत’ के बारे में भी हमारी जानकारी शून्य है। यहां तक कि हम उनकी शैली और कथा-वस्तु के बारे में कुछ भी दावे के साथ नहीं कह सकते। लेकिन इतना अवश्य कह सकते हैं कि इनके मूल कथानक अपने समय की साहित्यिक संपदा रहे होंगे। बाद की कृतियों में राम का अतिमानवीकरण, गौतम बुद्ध की श्रीलंका तथा पड़ोसी देशों में ‘धम्म विजय’ के बाद, ब्राह्मणों के मन में जन्मी कुंठा की सृजनात्मक परिणति थे। यह काम बौद्ध धर्म के कमजोर होने के बाद ही संभव था।

महाभारत में जिस प्रकार गणसंघों का प्रमुखत: उल्लेख हुआ है, वह रामायण में मौजूद समाज से करीब 200-300 वर्ष पुराने समाज की प्रतीति कराता है। उन दिनों भारत में गणराज्य काफी मजबूत अवस्था में थे। महाभारत छोटे राज्यों की अप्रासंगिकता को भी दर्शाता है। भारतीय समाज में यह बोध सिकंदर के आक्रमण के बाद बना था। उल्लेखनीय है कि सिंकदर के आक्रमण से पहले भी भारत पर यूनान की तरफ से दो बड़े हमले हो चुके थे। उनमें पहला हमला असीरिया की साम्राज्ञी सेमिरामिस की ओर से था। दूसरा आक्रमण ईरान के प्रसिद्ध विजेता कुरु की ओर से। कुरु को अंग्रेजी में साइरस लिखा जाता है। कुरु ने काबुल से लेकर इराक, शाम, टर्की, बेबिलोन, मिस्र तथा यूनान के कुछ हिस्से पर अपनी विजय पताका लहराई थी। भारत पर आक्रमण के बाद उसे सेमिरामिस की तरह ही शर्मनाक पराजय का रूप देखना पड़ा था। कुरु की मृत्यु भारतीय योद्धा के हाथों ही हुई थी। सिंकदर का आक्रमण इन सबमें बड़ा था। मगर उसका सामना चंद्रगुप्त मौर्य जैसे राजा से था, जिसके पास विश्व की सबसे विशाल सेना थी। उसमें छह लाख से ज्यादा पैदल सिपाही थे। चंद्रगुप्त ने उसमें से पांच लाख सैनिक सिंकदर से लड़ने के लिए उतारे थे। भारतीय कवियों, लेखकों ने पहली बार बड़ी सेना को दुश्मन से लोहा लेते हुए देखा था। उसी से बड़े राज्यों की अवधारणा ने जन्म लिया। कदाचित वही महाभारत की  18 अक्षौहिणी सेना के मिथ की प्रेरणा बना। उसका परिणाम रामायण और महाभारत के उपलब्ध आख्यानों के पुनर्लेखन के रूप में सामने आया। उसके बाद भी इन दोनों ग्रंथों में शताब्दियों तक प्रक्षेपण होते रहे हैं। दो हजार वर्ष पहले तक भारत में दास प्रथा, सामाजिक व्यवस्था का आवश्यक अंग बन चुकी थी। इसलिए रामायण और महाभारत में उनका खूब उल्लेख हुआ है। तत्कालीन परिस्थितियों में इतनी बड़ी सेना का खर्च उठाने के लिए भारी-भरकम अर्थव्यवस्था; तथा उसके लिए दासप्रथा का होना अपरिहार्य जैसा था। इसके प्रमाण इन दोनों महाकाव्यों में उपलब्ध हैं।  

रामायण में राम के चरित्र को उदात्त बताया गया है। तुलसी उसे ‘मर्यादापुरुषोत्तम’ तक कह जाते हैं। तुलसी के लिए ‘मर्यादापुरुषोत्तम’ का मतलब ब्राह्मणवादी संस्कृति और वर्णव्यवस्था के प्रति अंध-समर्पण है। दास-दासियों के मामले में भी वह ठेठ परंपरावादी हैं। इसलिए विवाह में खुशी-खुशी दहेज लेते हैं। बकौल तुलसीदास—‘दहेज इतना अधिक था कि उसका वर्णन संभव ही नहीं है। स्वर्ण आभूषणों तथा मणियों से मंडप भर गया था। वहां हाथी, स्वर्णाभूषण, माणिक-मणियां, घोड़े, दास और दासियां तथा अलंकारों से सजी कामधेनु सरीखी बहुत-सी गौएं थीं।’

‘कहि न जाय कछु दायज भूरी, रहा कनक मणि मंडप पूरी

गज रथ तुरग, दास अरु दासी, धेनु अलंकृत काम दुहासी।

इस बात से वाल्मीकि भी इत्तफाक रखते हैं। राम के विवाह में दिए गए दहेज का वर्णन करते हुए वे भी गदगद हो जाते हैं—‘कन्या के पिता जनक ने दास-दासियों सहित, सोने, मोती-माणिकों और मुद्राएं दहेज में अर्पित की थीं।’18 यह तो राजा जनक द्वारा वरपक्ष यानी राम और उसके परिवार को दिए गए दहेज का वर्णन है। इसके अलावा उन्होंने सीता और अपनी बाकी पुत्रियों को भी सौ-सौ कन्याएं तथा उत्तम दास-दासियां दहेज के रूप में प्रदान की थीं। उत्तरकांड में अयोध्या के सामंत और छोटे राजाओं ने दासियां प्रदान की थीं।19 उन दिनों गुरु लोग आश्रमवासी हुआ करते थे। परंतु दासियों का दान लेने से उन्हें भी इन्कार न था। सो मर्यादापुरुषोत्तम गुरु, ब्राह्मणों और आचार्यों को कैसे भूल जाते। खुशी का अवसर नहीं था। वनवास के लिए निकलना था। राजमहल में क्लेश व्याप्त था। फिर भी गुरु को प्रसन्न करने के लिए राम ने उन्हें अपने दास-दासियों को भेंट कर दिया था—‘दासी-दास बोलाइ बहोरी, गुरहि सौंपि बोले कर जोरि’ (रामचरितमानस, अयोध्याकांड)। दशरथ का महल दास-दासियों से भरा हुआ था। राम का भवन हो या लक्ष्मण का; या फिर भरत की आरामगाह हो। सभी जगह दास-दासियों की भरमार थी। कैकई तो मंथरा नामक दासी को मैके से अपने साथ लेकर आई थी। चूंकि मंथरा के लिए कैकई ही उसकी स्वामिनी और सबकुछ थी। इसलिए वह चाहती थी कि भरत ही अयोध्या का भावी सम्राट बने। हनुमान का अपना आचरण दासत्व को पूरी तरह स्वीकार लेने वाला प्राणी जैसा है। उसकी अष्ठ सिद्धियां और नवनिधियां राम के चरणों में पड़े-पड़े गारत हो जाती हैं। शुनःशेप की कहानी रामायण में कुछ और विस्तार से प्रस्तुत है।

रामायण में हमारा तीन समाजों और संस्कृतियों से वास्ता पड़ता है। पहला अयोध्या और उसकी संस्कृति है। दूसरी किश्किंधा और तीसरी लंका की। किश्किंधा में बालि, सुग्रीव अंगद जैसे नेता हैं। वे आखेटक समुदाय से हैं जो प्रकृति से अपना भोजन जुटाते थे। बालि के राज्य में अथवा सुग्रीव के ठिकाने पर किसी दास के दर्शन नहीं होते। आवश्यकता पड़ने पर सभी वानर स्वेच्छा से राम की सेना में भागीदारी करते हैं। उनमें पदानुक्रम तो है परंतु दास और अदास का विभाजन नहीं है। लंकाकांड के दौरान हनुमान राम का संदेश लेकर लंका जाता है। वहां का वैभव देखकर वह हतप्रभ रह जाता है। लंका के सभी घर बराबर थे। धन-धान्य और वैभव से भरपूर। रामायण में लंका की अर्थव्यवस्था के बारे में कोई उल्लेख नहीं है। मगर जिस तरह की समृद्धि का वर्णन हनुमान करता है, उससे पता चलता है कि वहां अवश्य ही व्यापार केंद्रित अर्थव्यवस्था रही होगी, जबकि अयोध्या का समाज कृषि-केंद्रित था। जहां तक दास-दासियों का सवाल है, उनका उल्लेख न तो किश्किंधा के वानर समाज में था, न ही लंका के राक्षसों के बीच। यहां तक कि रावण के दरबार में भी किसी दास या दासी का उल्लेख नहीं है। अशोकवाटिका में राक्षसियां पहरा देती थीं। मगर वे सभी अनुचरी थीं। यह भी संभव है कि दास प्रथा को शान और समृद्धि का प्रतीक माना जाता था, इस कारण वाल्मीकि और तुलसी दोनों ने वहां दासों की कल्पना न की हो। यह बात पात्रों के चरित्र-चित्रण में भी नजर आती है। रावण के दरबारी जरूरत पड़ने पर अपने राजा से बहस करते, उसे समझाते हैं। राम के दरबारियों को यह सुविधा प्राप्त नहीं थी। वहां सिर्फ ‘हां’ में ‘हां’ मिलाने और जय-जयकार करने का अवसर था। कह सकते हैं कि समाज का दासभाव दरबारियों के चरित्र की भी विशेषता था, इसलिए वहां दास-प्रथा के मजबूत होने के सभी अवसर थे। रामायण का आदर्श भी ऐसा ही समाज है, जहां कुछ लोग मालिक हों और बाकी लोग दास जैसा आचरण करते हों।

महाभारत के नायक कृष्ण हैं। वे अंधक गणराज्य के मुखिया है। गणतंत्र में भरोसा रखते हैं। इसलिए दासत्व के लिए उनके यहां वैसी जगह नहीं है, जैसी राम के यहां हैं। कृष्ण स्वयं अपने साथियों-सहयोगियों के साथ मैत्री-भाव रखते हैं। मगर कृष्ण के देवत्व को मान्यता देने वाले ब्राह्मण उन्हें खुली छूट देने को तैयार नहीं थे। इतिहासचक्र के अचानक घूम जाने की बात है जिससे ब्राह्मणों को एक ग्वाले के देवत्व को स्वीकारना पड़ा। फिर भी इतना ध्यान उन्होंने रखा कि वे ब्राह्मण विरोधी न दिखें। ऋग्वेद में इंद्र को चुनौती देने वाले कृष्ण का नया रूपाकार ब्राह्मणवाद का आराधक हो, इस कारण उन्हें सुदामा के पैर धोते हुए दिखाया गया है। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में अतिथियों के पांव धोने की जिम्मेदारी भी उन्हीं को ओटनी पड़ी। महाभारतकार उसी का महिमा मंडन करता है। यदि अतिथियों के पांव-प्रक्षालन करना इतना ही पुनीत कार्य था तो यह काम किसी ब्राह्मण को क्यों नहीं सौंपा गया? अथवा वह जिम्मेदारी युधिष्ठिर या उसके किसी भाई न स्वयं क्यों न संभाल ली? महाभारत में इस सवालों के लिए कोई जगह नहीं है। वैसे भी, जहां धर्म होता है, वहां सवाल या शंकाएं नहीं होतीं। केवल आस्था होती है। आंख मूंदकर विश्वास करना पड़ता है। अगर सवाल होते तो महाभारत धर्मयुद्ध कभी न बन पाता।

महाभारत में दास प्रथा का उल्लेख अनेक अवसरों पर हुआ है। हमने आरंभ में ही बता दिया है कि राजसूय यज्ञ कराने के उपलक्ष्य में युधिष्ठिर ने 88,000 ब्राह्मण पुरोहितों में से प्रत्येक को तीस दासियां उपहार स्वरूप दी थीं। वनपर्व में दिया है कि वैन्य ने अत्रि को एक हजार सुंदर दासियां प्रदान कीं।20 विराटपर्व(18.21) में 30 दासियां दान करने का एक और उल्लेख आया है। दासों का वर्णन जितना खुलकर दिया गया है, उससे लगता है कि समाज में शूद्र और दास में बहुत अंतर नहीं था। सभापर्व में युधिष्ठिर के महल में एक लाख दासियां होने का वर्णन हुआ है। यह वर्णन अतिश्योक्तिपूर्ण हो सकता है। संभव है हस्तिनापुर की कुल शूद्र स्त्रियों को ही युधिष्ठिर की दासी मान लिया हो। क्योंकि आगे उसमें लिखा है कि युधिष्ठिर अपनी दासियों का अनुरोध सुनने के लिए सदैव तत्पर रहता था। विराटपर्व(7.17) के अनुसार पांडवों के निजी कक्ष भी दास-दासियों से समृद्ध थे।। दास-दासियों की संख्या को लेकर यह अतिरंजना अन्य स्थानों पर भी पाई जाती है। उदाहरण के लिए देवयानी और शर्मिष्ठा के विवरण को ही लें। उन दोनों की एक-एक हजार दासियां बताई गई हैं। उन दिनों दहेज में दास-दासियां देने का चलन था। द्रोपदी के विवाह में भी द्रुपद की ओर से पांडवों को बड़ी संख्या में दासियां दी गई थीं।21 महाभारत काल में दास-दासियों की उपस्थिति के प्रचुर प्रसंग हैं। दुर्योधन के साथ जुआ खेलते समय युधिष्ठिर ने दावा किया था कि उसके पास एक लाख तरुण दासियां हैं। वे सुंदर हैं। सुवर्णमय मांगलिक आभूषण तथा मनोहारी वस्त्र धारण करती हैं। मणि और स्वर्णाभूषणों से लदीं, चौसठ कलाओं में निपुण उन दासियों को युधिष्ठिर अपना धन मानते थे।22 

महाभारत एक वृहद ग्रंथ है। उसके भीतर अनेक उपकथाएं समाहित हैं। कद्रु-वनिता, नल-दमयंती, देवयानी, शर्मिष्ठा जैसे उपाख्यानों में भी दास प्रथा का उल्लेख है। इसमें भी नल-दमयंती का प्रकरण इतना रोचक है कि वह स्वतंत्र लोककथा के रूप में भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में ख्यात रहा है। इस उपकथा में भी जुए की बुराई को दर्शाया गया है। नल-दमयंती आख्यान के अंतिम हिस्से में पुष्कर जुए में खुद को हार जाता है। परिणामस्वरूप उसे अपनी स्वतंत्रता लुटाकर दास बनना पड़ता है। कालांतर में वह पुनः मुक्त हो जाता है। उन दिनों एक नियम यह भी था कि युद्ध में पराजित को, विजेता का दासत्व स्वीकारना  वह आमतौर पर तब तक रहता था, जब तक फिरौती या बदले में कुछ हासिल न हो जाए।23 प्राय:  विजेता को प्रसन्न करने के लिए बाकी भेंटों के अलावा दासियां भी भेंट की जाति थीं, इस कारण उन दिनों दास-दासियां प्रचुर संख्या में होती थीं।  महाभारत(3.76.77)। लोपामुद्रा की सेवा में 1000 दासियां रहती थीं। एक प्रसंग में च्यवन ऋषि मछुआरे के जाल में फंसकर उसकी संपत्ति बन जाते हैं। आखिरकार एक राजा उन्हें खरीदकर उनकी स्वतंत्रता वापस दिलाता है। भरत दक्षिणा स्वरूप दासों की भेंट करते हैं। असल में वह शक्तिशालियों का समाज था। स्त्री, पुरुष, धन-धान्य, पशु, भूमि कुछ भी हो, इन सभी को ताकत के बल पर जीता जा सकता था। जीतने के बाद वे विजेता की संपत्ति मान लिए जाते थे। ताकत का बोलबाला था। जो ताकतवर था, वह लोगों गरीबों, विपन्नों और कमजोरों को कैद करने, उन्हें दास बनाने यहां तक कि हत्या करने की धमकी भी देते रहते थे। दास का कर्तव्य था, अपने प्राणों पर खेलकर भी अपने स्वामी के आदेश का पालन करना। कुरुक्षेत्र में युद्ध के दौरान एक अवसर ऐसा आता है जब भीष्म(भीष्मपर्व 4.15.534) कृष्ण को अपना स्वामी मानकर अपने हथियार डाल देते हैं—‘हे प्रभो! तुम मुझ पर चाहे जैसे आक्रमण करो, मैं तुम्हारा दास हूं।’ युधिष्ठिर द्वारा खुद को तथा अपने भाइयों को दाव पर लगा देने के बाद, पांडवों की स्थिति भी दास जैसी बन चुकी थी। दास बनने के साथ ही वे अपनी इच्छाएं, अपनी स्वतंत्रता और विरोध की क्षमता भी गंवा चुके थे। उनके शरीर, इच्छाएं सभी कुछ दुर्योधन के अधीन हो चुके थे, जिसने उन्हें जुए में जीता था। एक स्थान पर आता है कि पुत्र, पत्नी और दास का संपत्ति में कोई अधिकार नहीं होता, क्योंकि उनपर क्रमशः पिता, पति और स्वामी का अधिकार होता है।

दास प्रथा में स्त्रियों की और भी अधिक दुर्दशा होती थी। प्राचीन मनीषी मानते थे कि कन्या गिरवी रखे आभूषण की तरह है, जिसे मांगे जाने पर उसके वास्तविक स्वामी को वापस लौटाना ही धर्म है। इस धारणा का विकृत विस्तार मंदिरों में देवदासी प्रथा के रूप में मिलता है जिसमें ईश्वर को समर्पित करने के नाम पर नन्ही बालिकाएं मंदिर के पुजारियों को सौंप दी जाती थीं। महाभारत में एक और प्रसंग आया है जो उस समाज में स्त्री की दुर्दशा को दर्शाता है, जिसके अनुसार स्त्री की हैसियत उस समाज में दास और कहीं-कहीं तो उससे भी बदतर थी। विश्वामित्र ने ऋषि गालव से गुरु दक्षिणा के रूप में 800 श्यामकर्णी घोड़ों की मांग की। 800 श्यामकर्णी घोड़ों का प्रबंध करना हंसी-खेल नहीं था। अगर इससे दस गुनी दासियां मांगी होतीं तो कोई भी राजा पलक झपकते इंतजाम कर देता। लेकिन 800 श्यामकर्णी घोड़े! परेशान गालव अपने मित्र गरुड़ से मिला। गरुड़ ने उसे सम्राट ययाति के पास जाने की सलाह दी। ययाति के पास श्यामकर्णी घोड़े तो थे नहीं। परंतु द्वार पर आए याचक को लौटाए कैसे? अंतत: उसने माधवी नामक अपनी सुंदर पुत्री गालव ऋषि को सौंपते हुए कहा—

‘हे महर्षि! यह मेरी कन्या है। यह अपूर्व सुंदरी, लावण्यमयी एवं सर्वगुणसंपन्न है। तीनों लोकों में ऐसा कोई भी नहीं जो इसे वरण करने की इच्छा न रखता हो। इसमें सुर, नर, किन्नर, आर्यों, अनार्यों सभी को सम्मोहित करने की अभूतपूर्व शक्ति है। मैं इस कन्या को आपको अर्पित करता हूं। इसे किसी भी राजा के पास बेचकर आप आसानी से गुरु दक्षिणा का इंतजाम कर सकते हैं।’24

मानो लड़की न होकर कोई ‘हुंडी’ हो। अपने मित्र गरुण के साथ गालव माधवी को लेकर अयोध्या नरेश हर्यश्व के दरबार में पहुंचा। हर्यश्व के कोई पुत्र नहीं था। ऋषि ने दो सौ श्यामकर्णी अश्वों के बदले माधवी को उसके हवाले कर दिया—‘आप इससे एक पुत्र उत्पन्न कर लें।’(उद्योगपर्व 116.15)। हर्यश्व के माधवी से वसुमना नामक पुत्र पैदा हुआ। कुछ समय बाद गालव ने हर्यश्व से मालती को वापस ले लिया। तदनंतर उस ‘हुंडी’ को लेकर वह राजा दिवोदास के पास पहुंचा। वहां भी दो सौ घोड़ों के बदले उसने लड़की राजा को सौंप दिया(उद्योगपर्व 117.7)। दिवोदास के यहां माधवी से प्रतर्दन नामक पुत्र का जन्म हुआ। निश्चित अवधि के बाद गालव पुन: राजा दिवोदास के दरबार में जा धमका तथा उससे माधवी को वापस ले लिया। तदनंतर वह राजा उशीनर से मिला। राजा उशीनर से भी 200 घोड़े लेकर उसने माधवी को सौंप दिया। उशीनर और माधवी के संयोग से शिवि नामक पुत्र का जन्म हुआ। अब तक गुरु दक्षिणा के 600 घोड़ों का प्रबंध हो चुका था। बाकी दो सौ का प्रबंध कहां से किया जाए? आखिरकार गालव माधवी को लेकर विश्वामित्र के पास पहुंचा और पूरी कहानी सुनाने के बाद, उसने 200 घोड़ों के बदले माधवी को रखने को कहा। मेनका को देखकर आपा खो देने वाला विश्वामित्र भला क्यों इन्कार करता! उसने माधवी को रख लिया। दोनों के संयोग से अष्टक नामक पुत्र का जन्म हुआ(उद्योगपर्व 118.3-8)। बाद में गालव माधवी को उसके पिता के पास वापस लौटाने पहुंचता है। ययाति ने माधवी का स्वयंवर करने की इच्छा प्रकट की। अनिच्छा से चार अलग-अलग पुरुषों की संतान को जन्म देने के बाद बुरी तरह टूट चुकी माधवी ने विवाह से इन्कार कर, संन्यास धारण कर लिया।

इस घटना में माधवी की स्थिति दासी से भी बदतर है। सामान्य दासी का अपनी संतान पर अधिकार होता था। परंतु इस कहानी में माधवी पशुवत एक राजा से दूसरे राजा तक ले जाई जाती है। ले जाने वाला एक ऋषि है और उसका भोग करने वाले उस समय के प्रतिष्ठित राजा हैं, जिनपर न्याय की रक्षा का भार होता है।   

बौद्धकालीन दासप्रथा

बौद्ध धर्म में अष्ठधम्म पद गृहस्थ जनों के लिए आचारसंहिता है। इसका पांचवा ‘धम्म’ ‘सम्यक आजीव’ है। बौद्ध धर्म गृहस्थ जनों के लिए धनार्जन का निषेध नहीं करता। किंतु चोरी, डकैती, हिंसा, लूटमार जैसे दूसरों के लिए कष्टकारी कार्यों द्वारा अर्जित धन को उसमें वर्ज्य माना गया है। ‘अपण्णकसुत्त’ में कहा गया है—‘वही व्यक्ति न्यायपथ पर है, जिसका मस्तिष्क शुद्ध एवं सात्विक है। जो अपने मन को प्रसन्न रखता है, तथा दास अथवा दासी रखने से बचता है।’ दीघनिकाय, ‘सामञ्ञफलसुत्त’ में ‘संतोष’ की स्थितियों का वर्णन करते समय कहा गया है—‘जैसे महाराज कोई पुरुष दास हो। जो पराधीन हो। जिसे अपनी इच्छा से कहीं भी आने-जाने का अधिकार न हो। समय आने पर जब वह दासता से मुक्त हो जाए। स्वतंत्र, अपराधीन, यथेच्छगामी हो जाए। तब उसके मन में ऐसे भाव होने के साथ प्रसन्न एवं आनंदित होना चाहिए—‘मैं पहले दास था, अब स्वतंत्र हूं। जहां जी चाहे वहां जा सकता हूं।’ भिक्षु संघ के नियमों के अनुसार समाज का कोई भी व्यक्ति उसकी दीक्षा ग्रहण कर सकता था। परंतु सैनिक,कर्जदार, दास आदि को भिक्षु संघ में शामिल होने के लिए संबंधित व्यक्ति की अनुमति लेनी पड़ती थी। 

अंगुत्तर निकाय(5.177) के अनुसार बुद्ध ने पांच प्रकार की आजीविकाओं, जो दूसरों के लिए कष्टकारी हो सकती हैं, को अपनाने से मना किया है। जैसे हथियारों, विष, दास-दासी, वेश्यावृति, मांस तथा उसके उत्पादों की खरीद-बिक्री द्वारा अर्जित धन। इसका आशय यह नहीं है कि बौद्ध काल में दास प्रथा का अभाव था; अथवा बौद्ध धर्म की उपस्थिति से दास-प्रथा में परिमाणात्मक कमी आई थी। अन्य सभ्यताओं और संस्कृतियों की भांति बौद्धकाल में भी दासप्रथा अपने निकृष्टतम रूप में मौजूद थी। सस्ता श्रम, विकास की चाहत और स्वामी के लिए सामाजिक प्रतिष्ठा—दासप्रथा की ऐसी देन थीं, जिसके कारण सुकरात से लेकर अरस्तु तक सभी ने उसे आवश्यक माना था। भारत में भी बुद्ध जैसे कुछेक अपवादों को छोड़कर लगभग सभी बुद्धिजीवी, दास प्रथा का या तो समर्थन कर रहे थे, अथवा उसकी ओर से मौन साधे हुए थे। ध्यातव्य है कि बौद्ध धर्म के प्रभाव में चलते यज्ञ-बलियों में कमी आई थी। बची हुई पशु-शक्ति का उपयोग उत्पादक कार्यों में होने लगा था। उसका सकारात्मक प्रभाव विकास पर भी पड़ा था। व्यक्तिगत संपत्ति की लालसा में निरंतर वृद्धि हो रही थी। उसके लिए सस्ता, लगभग मुफ्त श्रम उपलब्ध कराने वाली दासप्रथा का महत्त्व बढ़ता ही जा रहा था। यह भी कह सकते हैं कि अधिकाधिक लाभ की वांछा के कारण तत्कालीन व्यापारी वर्ग उसे छोड़ने को तैयार नहीं था।

बौद्धकाल तक बड़े राज्यों का बनना आरंभ नहीं हुआ था। उन दिनों भारत में मगध और उज्जैनी जैसे राजतंत्र थे। उनके साथ-साथ लिच्छिवी, वाहीक, शाक्य, मल्ल, वृष्णि जैसे गणों की भी प्रतिष्ठा थी। दासों की उपस्थिति राजतंत्र और गणतंत्र दोनों में थी। राजतंत्र में सेना के दरवाजे समाज के सभी वर्गों के लिए खुले थे।25 आवश्यकता पड़ने पर दासों को सेना में भी भर्ती किया जा सकता था। हालांकि उनका स्तर, बाकी सैनिकों से कमतर होता था। कई बार राजा युद्धकाल में मृत्युदंड पाए अपराधियों को दास के रूप में सेना में शामिल कर लेता था। वे सैनिकों और जानवरों की देखभाल के काम आते थे। सेना में भर्ती दासों को ‘दासकपुत्त’ कहा जाता था। उन्हें गृह-दास योद्धा का नाम भी दिया गया था। कई बार राजा किसी अपराधी का मृत्युदंड माफ करने के बाद, उसे अपनी सेना में शामिल कर लेता था।

कृषिकर्म के लिए भी दासों की मदद ली जाती थी। समाज के संपन्न वर्गों के पास हजारों एकड़ जमीन पर अधिकार होता था। इतनी बड़ी जमीन पर खेती करने के लिए दासों की मदद लेना तत्कालीन समाज का सामान्य चलन था। उस समय रोम की तरह भारत में दासों की दो श्रेणियां थीं। पहली श्रेणी में वे दास थे, जिनका दासत्व कृषि-भूमि से जुड़ा था। भूमि की बिक्री के साथ वे भी नए स्वामी के अधिकार में चले जाते थे। दूसरे स्वतंत्र दास थे। वे घरों और संस्थानों में काम करते थे। थेरीगाथा एक की कहानी के अनुसार, बौद्धकाल में बनारस के पास ‘दासग्राम’ था, जिसमें संपूर्ण आबादी दासों की थी। यह उन 14 गांवों में से एक था, जिनपर बुद्ध के शिष्य ‘पिप्पली मानव’ यानी महाकाश्यप का नियंत्रण था। विशाखा को दहेज में कृषि औजारों से भरी 500 गाडि़यां तथा सैकड़ों दास भेंट किए गए थे। उन दिनों दासों को अंतःवासी, अहेटक, केटक, दता, मानुस्स, सेवक, उपत्थका जैसे नाम दिए जाते थे, जबकि स्त्री दासों को अंतःपुरिका, अट्ठककारिका, इत्थी, पसेन दारिका आदि नामों से पुकारा जाता था। उनसे दासत्व की प्रवृत्ति तथा उसके कार्यक्षेत्र का बोध भी होता था।  

बुद्ध के समकालीन दार्शनिकों में भौतिकवादी चिंतक पूर्ण कस्सप की बड़ी प्रतिष्ठा थी। वे अपने समय के महान आजीवक चिंतक थे। उनके जीवन के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं है। उनके नामकरण के साथ एक कहानी जुड़ी है। हालांकि उसपर विश्वास करना कठिन है। बौद्धग्रंथों के अनुसार वे एक दास थे। जो स्वामी उन्हें दास बनाने के लिए लाया था, उसके 99 दास पहले से ही थे। पूर्ण कस्सप के आने के बाद सौ होने पर, स्वामी को लगा कि उसके दासों की संख्या पूरी हो चुकी है, इसलिए स्वामी ने ही उसका नामकरण पूर्ण या पूरण कस्सप नाम दिया था। उस समय के दूसरे आजीवक एवं लोकायत चिंतकों मक्खलि गोसाल और अजित केशकंबलि की सामाजिक स्थिति भी एक दास की तरह थी। डॉ. धर्मबीर ने ‘महान आजीवक : कबीर, रैदास और गोसाल’(पृष्ठ-227) नामक पुस्तक में कबीर के ‘बीजक’ के शीर्षक की मुख्य प्रेरणा ‘महानारद कश्यप जातक’ के कथासूत्र को बताया है। उक्त जातक में बीजक आजीवक विद्वान है। उसका जन्म पानी लाने वाली दासी के गर्भ से हुआ था। दासता को उन्होंने करीब से देखा था। धर्मवीर के अनुसार बीजक, ‘अपने धर्म और दर्शन में आजीवक थे और दासता के विरोध में लड़ रहे थे।’

मेगस्थनीज चंद्रगुप्त के शासनकाल में भारत आया था। वह चंद्रगुप्त के दरबार में सेल्यूकस की ओर से राजदूत था। अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में मेगस्थनीज ने भारत में दासप्रथा की उपस्थिति से इन्कार किया है। जबकि उन्हीं दिनों रचे जा रहे बौद्ध साहित्य में दासों का खुला उल्लेख है। क्या मेगस्थनीज भारतीय दासप्रथा से सचमुच अनभिज्ञ था? अथवा उसने जानबूझकर उसे छिपाया था? जबकि वह स्वयं ऐसे देश से आया था, जहां जनसंख्या का करीब एक-तिहाई हिस्सा दास की श्रेणी में आता था। असल में मेगस्थनीज की जानकारी का स्रोत केवल ब्राह्मण थे। अतएव एक कारण तो यह हो सकता है कि ब्राह्मणों ने भारत में मौजूद दासप्रथा को जानबूझकर छिपाया हो। दूसरा कारण यह कि भारत में शूद्र एवं दास की स्थिति में बहुत अंतर नहीं था। इसलिए संभव है मेगस्थनीज स्वयं उस समय के शूद्रों एवं दासों के जीवन में अंतर करने में असमर्थ रहा हो।

उन दिनों दास प्रथा अपने चरम पर था। दासों के शरीर पर उसके स्वामी का अधिकार होता था। नाराज होने पर स्वामी उसे दंडित कर सकता था। एक जातक में एक दासी का उल्लेख हुआ है जिसे उसके स्वामी ने दूसरे व्यक्ति के पास काम के लिए भेजा था। जब वह काम करने में असमर्थ रही तो बेंतों से उसकी पिटाई की थी। दूसरी ओर दास द्वारा आत्म-उत्थान के भी उदाहरण है। कटहक का एक दास तीव्र बुद्धि था। वह स्वामी के पुत्रों के साथ पढ़ना-लिखना सीख गया। अन्य कर्मों के साथ-साथ वह भाषण कला में भी पारंगत था। मालिक ने प्रसन्न होकर उसे भंडारगृह के रक्षक के रूप में नियुक्त कर दिया था। लेकिन उसे सदैव यह भय रहता था कि उसे कभी भी किसी अपराध के कारण काम से हटाया अथवा प्रताडि़त किया जा सकता है।26

बौद्धकाल में दासों की उपस्थिति प्रायः सभी पेशों और उद्यमों में थी। विनयपिटक, दीघनिकाय, जातक कथाओं आदि में दासों की उपस्थिति बनी हुई है। बौद्ध साहित्य में आठ प्रकार के दासों का उल्लेख मिलता है—ध्वजाहृत(युद्ध में जीता गया), उदरदास(भरण-पोषण), आमाय दास(जीवकोपार्जन हेतु दासता स्वीकारना), भयाक्रांत दास(भय के कारण), स्वैच्छिक दास(स्वेच्छापूर्वक दासता को अपनाने वाला), क्रीतदास(धन देकर खरीदा गया), पादमूलिक(राजा और राजपरिवार का विश्वसनीय एवं अंतरंग दास), कम्मंतदास(खेत एवं कार्यशाला में काम करने वाला) तथा दौवारिक(द्वार पर नियुक्त रहकर स्वामी की रक्षा करने वाला)। ‘थेरवादी अट्ठकथा’ के अनुसार सेट्ठि सुदंत अनाथिपिंडक ने विहार की रक्षा के लिए एक दास दिया था। बौद्ध ग्रंथों में दासियों के भी भेद मिलते हैं। दासियां घर के प्रत्येक काम में सहयोग करती थीं। दासी की बेटी भी दासी ही कहलाती थी। ‘विदुर जातक’(जातक संख्या 545) के अनुसार कुछ लोग केवल दासी के पेट से जन्म लेने के कारण दास होते हैं। कुछ लोग धन से खरीदे जाने के बाद दास बनते हैं। कुछ भय से दास बनते हैं तो कुछ स्वयं दास बन जाते हैं। 

दास को योनि मान लिया था। उससे पता चलता था की दासप्रथा को कुछ लोग दैवी विधान घोषित करने  में लगे थे तदनुसार जो व्यक्ति एक बार दास बन जाता वह हमेशा दास ही बना रहता है। इसी जातक में एक जगह माणवक कहता है—’निश्चित रूप से मैं दास योनि में पैदा हुआ हूं। चाहे राजा की वृद्धि हो, चाहे अवृद्धि हो, दूर जाकर भी मैं देव का दास ही रहूंगा।’ ‘निमी जातक’ की बिरानी दासी को दासत्व उत्तराधिकार में मिला था। एक जातक में लापरवाह और आलसी ब्राह्मण स्त्री अपने पति को यह कहकर भिक्षा लेने के लिए भेजती है कि वह उसके लिए दासी खरीदकर लाए। पत्नी की इच्छा पूरी करने के लिए ब्राह्मण 700 कार्षापण मांग कर लाता है। उतने मूल्य में एक दासी खरीदी जा सकती थी। दासियां दहेज में भी दी जाती थीं। ‘सुप्पारक जातक’ के अनुसार विशारक को दहेज में दासियां प्रदान की गई थीं। गणिकाओं के यहां 500 दासियों के होने का उल्लेख है। ‘खंडहाल जातक’ में चंद्रकुमार स्वयं को दास बनाने के लिए समर्पित करता है—

‘देव! हमारा वध न करें। हमें दास बनाकर ‘खंडहाल’ को दे दें। पैरों में बेड़ी पड़ी रहने पर भी हम हाथी-घोड़ों का पालन करेंगे। देव हमारा वध न करें….हम हाथियों की लीद बटोरेंगे….हम घोड़ों की लीद बटोरेंगे….हमें चाहे जिसे दास बनाकर दे दें।’27

ऐसे ही वास्संत्र जातक में एक राजकुमार स्वयं को 1000 पण में बेच देता है। ‘कुस्सजातक’ से पता चलता है कि विधुर के घर में 700 दासियां थीं। दास-दासियों का प्रमुख कार्य परिवार के सदस्यों की सेवा करना था। अतिथियों के आने पर उनके पैर धोना, आवष्यकता पड़ने पर उनके पैर दबाना जैसे कार्य दासों के जिम्मे थे। ‘मझिम्मनिकाय’ के अनुसार ‘काली’ नामक एक दासी चावल पकाने, बिस्तर लगाने, गाय दुहने से लेकर दीपक जलाने जैसे काम करती थी। दासियां धाय का काम भी करती थीं। वे खासतौर पर लड़कियों को पालती-पोसतीं, उन्हें बड़ा करतीं और लड़की के विवाह के बाद, उसकी ससुराल वालों को दान दे जाती थीं। एक जातक कथा के अनुसार एक राजकुमार के 64 दासियां थीं। दासों का रोजमर्रा का जीवन आमतौर पर बड़ा ही कठिन था। वे अपनी नियति को जानते थे, इसलिए उनके सपने बहुत छोटे होते थे। एक जातक कथा में राजा ने प्रसन्न होकर अपने कुलपुरोहित से वरदान मांगने को कहा। इसपर पुरोहित ने अपने परिजनों के साथ-साथ घर में काम करने वाली दासी पुण्णा से उसकी आवष्यकता के बारे में भी पूछा। जवाब में पुण्णा अपने लिए मूसल, सूप तथा गारा मांगती है। दासियों को अपने स्वामी की काम-वासना का षिकार भी होना पड़ता था। जो दासियां सुंदर होतीं, वे अपने स्वामी की रखैल बनकर रहने से खुद को कृतार्थ समझने लगती थीं। उद्दालक जातक के अनुसार एक ब्राह्मण राजपुरोहित अपनी दासी पर आसक्त हो गया। आगे चलकर दासी के गर्भ से उद्दालक का जन्म हुआ। आगे चलकर वह बड़ा ऋषि बना। इस तरह हम देखते हैं कि बुद्ध ने हालांकि दासप्रथा को हेय माना, तथा दास अथवा दासी न रखने की सलाह दी थी। तथापि इस बात के प्रबल प्रमाण हैं कि बौद्ध काल में दासप्रथा पूरे जोरों पर थी।

प्राकृत भाषा में ‘दास’ का उल्लेख अन्य अर्थों में देखने को मिलता है। वह उसकी अब तक स्थापित सामाजिकी से बिलकुल अलग है. प्राकृत में दास का अर्थ है, देखना। ‘दर्शन’ का अर्थ भी यही है। ऐसे लोग जो संसार के आंतरिक और बाहरी रहस्यों को समझते थे, जितनी अंतर्चेतना प्रबल थी, उन्हें दास कहा जाता था। वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा, बिहार में प्राचीन भारतीय इतिहास के गंभीर अध्येता डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह के अनुसार, दास मूल रूप से बौद्ध थे. उनके अनुसार साँची और भरहुत के स्तूपों पर अनेक दास तथा दासी उपाधिधारक बौद्धों के शिलालेख हैं, जिन्होंने स्तूप-निर्माण में मदद की थी।’ वे लिखते हैं—

”अरहत दास थे, अरहत दासी थीं, यमी दास थे, जख दासी थीं….अनेक, सभी के नाम लिखे हुए हैं। एक बौद्धकालीन शिलालेख पर प्राकृत में ‘थूप दास’ का वर्णन मिलता है। उसपर लिखा है-‘मोरगिरिह्मा थूपदासस दान थंभे।’ थूप दास मोरगिरि(महाराष्ट्र) के निवासी थे। उन्होंने भरहुत के एक स्तंभ-निर्माण में मदद की थी। वैदिक साहित्य में वर्णित आर्यों का सांस्कृतिक संघर्ष इन्हीं बौद्ध दास-दासियों से हुआ था। वैदिक साहित्य इन दास-दासियों के बारे में बताता है कि ये लोग यज्ञ नहीं करते और न ये इंद्र-वरुण की पूजा करते हैं…स्पष्ट है कि ये बौद्ध हैं। प्राकृत भाषा में ‘दास'(दसन) का अर्थ द्रष्टा है। मगर आर्यों ने सांस्कृतिक दुश्मनी के कारण अपनी पुस्तकों में ‘दास’ का अर्थ ‘गुलाम/नौकर’ कर लिया है। दास और आर्यों का यह सांस्कृतिक संघर्ष 1500 ई.पू. में नहीं बल्कि मौर्य काल के बाद हुआ था।”

इस संबंध में अभी और शोध की अपेक्षा है. यह सच है कि समय और परिस्थितियों में आए बदलाव के कारण शब्द अपनी अर्थ-छवियां बदलती रही हैं। अठारहवीं-उनीसवीं शताब्दी में ‘अराजकतावाद’ शब्द ‘जनतंत्र’ की उच्चतम अवस्था का प्रतीक था। उसका अर्थ ऐसे राज्य से था, जहां के प्रबुद्ध नागरिक अपने आप में ही इतने अनुशासित और समर्पित हों कि राज्य की आवश्यकता और उसका औचित्य ही जाता रहे। आज यह शब्द एकदम भिन्न अर्थों में अव्यवस्था और कानून विरोध के संदर्भ में प्रयुक्त किया जाने लगा है। अराजक शब्द का उपयोग कई बार गाली की तरह भी किया जाता है.

जैन दर्शन भी बौद्ध दर्शन का समकालीन है। जैन धर्म में अहिंसा पर अत्यधिक जोर दिया गया है। वहां अहिंसा की परिभाषा बहुत व्यापक है। उसमें मनसा-वाचा-कर्मणा किसी भी प्रकार की हिंसा का निषेध है। चूंकि दास प्रथा में स्वामी दास के विवेक को पनपने नहीं देता। उसपर हमेशा अपना निर्णय लादे रहता है। दास से जीवन के कई मौलिक अधिकार जैसे संपत्ति संचय, छीन लिए जाते हैं। इसलिए कह सकते हैं कि प्रत्यक्ष न सही, परोक्ष में ही—जैन धर्म दास प्रथा का विरोध करता है। हालांकि उसमें सीधे तौर पर कहीं भी दास प्रथा का विरोध नहीं है। जैन दर्शन में महावीर स्वामी के आरंभिक अनुयायियों में चंदनबाला का उल्लेख मिलता है। वह महावीर स्वामी की प्रथम महिला शिष्या थी। कहानी के अनुसार चंदनबाला चंपानगरी के राजा दधिवाहन की बेटी थी। उसका मूल नाम वसुमती था। एक बार चंपानगरी पर पड़ोसी राजा शतानीक ने हमला कर दिया। आकस्मिक हमले से आक्रांत दधिवाहन जंगलों की ओर भाग गए। उनकी पत्नी और बेटी वसुमती को शत्रु सेना ने कैद कर लिया। बाद में उन्होंने वसुमती को बेचने के लिए कोशांबी के चौराहे पर खड़ा कर दिया। वहां उसे धन्नासेठ नाम के व्यापारी ने खरीद लिया। यह देखते हुए कि वसुमती किसी संभ्रांत घर की लड़की है, धन्ना ने उससे दासी का काम लेने के बजाए, चंदनबाला नाम देकर अपनी पुत्री की तरह उसका लालन-पालन किया। बदलते घटनाचक्र के दौरान चंदनबाला महावीर स्वामी के संपर्क में आई और उनकी शिष्या बन गई।

बुद्धेत्तर भारत में दास प्रथा

बाद के कालखंड में भी दास प्रथा की मौजूदगी के पर्याप्त प्रमाण हैं। संस्कृत नाटक ‘मृच्छकटिकम’ में दासों की मंडी का उल्लेख किया गया। एक व्यक्ति उधार चुकाने में असमर्थ रहता है। इसपर साहूकार के आदमी उसे पीटते हुए मंडी में ले जाते हैं। जहां उसको नीलाम करके अपना कर्ज वसूल लिया जाता है। भारतीय दास प्रथा की चर्चा मध्य एशिया की ओर से आए योद्धाओं की चर्चा के बिना पूरी नहीं हो सकती। अपने लिए स्थायी राज्य की चाहत में उन्होंने हजारों किलोमीटर लंबी कठिन यात्राएं की थीं। बीच-बीच में उन्हें अस्थायी सफलताएं भी मिलती रहीं। कारण है कि एक अंतराल के पश्चात उनके सहयोगी सैनिकों, जिनमें उनके अपने परिजन भी होते थे—की अपनी महत्त्वाकांक्षाएं अंगड़ाई लेने लगती थीं। जिससे विजित क्षेत्र के शासन-प्रशासन के अधिकार को लेकर उनके बीच सत्ता-संघर्ष शुरू हो जाता था। उससे बचने के लिए कुछ लड़ाकों ने दास प्रथा का सहारा लिया था। दास के पास सिवाय ‘स्वामीभक्ति’ के अपना और गर्व करने लायक कुछ नहीं होता था। यह प्रत्यय भी दास प्रथा को दैवीय उठान देने के मंशा के साथ मालिक ही दासों के मनस् में रोपते आए थे। समय के साथ दास उस अमानवीय प्रथा से अनुकूलित होने लगे। एक समय ऐसा आया, जब दास उन असमानताकारी पृथा को अपना चुके थे। परिणामस्वरूप स्वामीभक्ति उनके लिए बड़ा जीवनमूल्य, बन गई। इसकी पराकाष्ठा हमें पन्ना धाय के चरित्र में दिखाई पड़ती है। सोलहवीं शताब्दी की वह स्त्री जिसका स्तर समाज में दास जैसा ही था, महाराणा संग्राम सिंह के बेटे और मेवाड़ के भावी सम्राट उदय सिंह को बचाने के लिए, अपने बेटे चंदन को हत्यारे बनवीर के आगे कर देती है। बनवीर बिना कोई दया दिखाए एक झटके में उस मासूम की हत्या कर देता है। ऐसा उदात्त दासत्व सत्तानशीनों के बड़े काम का था, इसलिए राजस्थान के इतिहास में पन्ना धाय के त्याग का खूब महिमामंडन किया गया। पन्ना धाय जैसे स्वामीभक्त हर शासक की जरूरत थे। बगैर उनके बड़े और स्थायी राज्य स्थापित कर पाना असंभव था।  

दास के लिए अपने मालिक के सुख-वैभव के अलावा कुछ भी महत्त्वपूर्ण नहीं था। वे मानापमान की भावना से कोसों परे थे। इसे समझने के लिए एक खलीफा की यह स्वीकारोक्ति काफी होगी—

‘जब मैं दरबार में बैठता हूं तो एक गुलाम को बुलाकर अपने बगल में बिठा सकता हूं। इस तरह कि उसके और मेरे घुटने एक-दूसरे को जकड़ें। जैसे ही दरबार समाप्त हो जाए तो मैं उसे अपने घोड़े की मालिश को कह सकता हूं। उसे इसमें तनिक भी बुरा नहीं लगेगा। अगर में यही काम किसी और से करने को कहूं तो वह कहता, ‘मैं आखिर तुम्हारे पक्षधर का बेटा हूं।’ या ‘तुम्हारा खास साथी हूं।’ और मैं उसे राजी नहीं करवा पाता।’28 

तो बात मध्य एशिया, ईरान और अफगानिस्तान के जुझारू लड़ाकों की हो रही थी। दसवीं शताब्दी में वे अपनी-अपनी सैन्य टुकडि़यों के साथ संघर्षरत थे। उन्हें जहां भी कमजोर राज्य दिखता, फौरन हमला कर देते थे। मगर वह जीत स्थायी न होती थी। कुछ दिनों बाद उनके अपने बीच भी सत्ता संघर्ष पनपने लगता था। उसे शांत रखने के लिए उन्हें या तो राज्य का बंटवारा करना पड़ता; अथवा अपने अधिकारों में कटौती करनी पड़ती थी। उससे मुक्ति के लिए कुछ महत्त्वाकांक्षी लड़ाकों ने प्रशिक्षित और ख्यातिनाम सैनिकों के बजाए, अपनी सेना में दासों को भर्ती करना शुरू कर दिया। उन्हें सैन्य-प्रशिक्षण देकर लड़ने लायक बनाया। प्रयोग कामयाब रहा। उदाहरण के लिए कुतबुद्दीन ऐबक शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी का गुलाम था। गौरी के साथ उसने कई युद्धों में हिस्सा लिया था। मुहम्मद गौरी ने भारत में गौरी-साम्राज्य की नींव डाली थी। परंतु उसका शासन ज्यादा लंबा न खिंच सका। अवसर मिलते ही कुतबुद्दीन ऐबक ने मुहम्मद गौरी के उत्तराधिकारियों से सत्ता छीन ली। कुतबुद्दीन ऐबक के बाद दिल्ली सल्तनत उसके भाई आरामशाह के हाथों में चली गई। वह अपने नामानुरूप ऐशोआरामपरस्त था। उसे मारकर इल्तुतमिश ने दिल्ली सल्तनत पर कब्जा कर लिया। इल्तुततमिश कुतबुद्दीन ऐबक का दास, यानी गुलाम का भी गुलाम था। विद्रोहियों के दमन के लिए उसने 40 भरोसेमंद गुलामों को लेकर ‘तुर्कान-ए-चिहालगानी’ नामक संगठन बनाया था, जो साये की तरह उसकी सुरक्षा में रहता था। इल्तुतमिश दास-योद्धाओं से अपने बेटों से भी अधिक प्यार करता था। भारत में गुलाम वंश का शासन 84 वर्षों(1206—1290 ईस्वी) तक रहा। लेकिन वह गुलाम वंश का शासन था, गुलामों का नहीं। क्योंकि न तो उससे समाज के गुलामों के प्रति नजरिये में बदलाव आया, न बाकी गुलामों में उससे आत्मविश्वास का संचार हुआ था और न ही उन शासकों का गुलामों के प्रति नजरिया बाकी लोगों से बहुत ज्यादा अलग था।

दासों का जीवन बहुत चुनौतीपूर्ण और कष्टकारी होता था। इस मामले में शूद्रों की स्थिति भी उनसे खास अच्छी नहीं थी। अछूतों का तो और भी बुरा हाल था। डॉ. आंबेडकर ने छूआछूत को दास प्रथा से भी घृणित एवं निदंनीय माना है—

‘अस्पृश्यता, दासत्व से कहीं अधिक निकृष्ट है, क्योंकि यह अछूतों को उनके हाल पर ऐसे स्थान पर पटक देती है, जहां उनकी आजीविका का कोई साधन ही न हो….दास अपने स्वामी की संपत्ति होता था। इसलिए स्वामी द्वारा उसे मुक्त व्यक्ति के सापेक्ष वरीयता दी जाती थी। मूल्यवान होने के कारण उससे स्वामी के स्वार्थ भी जुड़े होते थे, वह दास के स्वास्थ की देखभाल करता था। रोम में दासों को दलदल  और मलेरिया से ग्रस्त स्थान पर कभी नहीं ठहराया जाता था। वहां केवल मुक्त व्यक्तियों को ही नियुक्त किया जाता था।’29

बावजूद इसके भारतीय छूआछूत को हजारों वर्षों तक गले लगाए रहे। अंग्रेजों ने दास प्रथा को निंदनीय मानते हुए, 1843 में ही समाप्त कर दिया था। मगर छुआछूत को पूरी तरह खत्म करने के लिए संविधान के लागू होने तक प्रतीक्षा करनी पड़ी।

ओमप्रकाश कश्यप

9013 254 232 

संदर्भ

1. डॉ. रामविलास शर्मा, मानव सभ्यता का विकास, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ-74

2. डॉ. रामविलास शर्मा द्वारा उद्धृत, उपर्युक्त, पृष्ठ-74

3. मोर्टीमर व्हीलर, दि इंडस सिविलाइजेशन, कैंब्रिज यूनीवर्सिटी प्रेस, लंदन, 1968, पृष्ठ-34 & 135

4. रामशरण शर्मा, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, राजकमल प्रकाशन, 1992, पृष्ठ- 17

5.  उपर्युक्त, 25

6. यद्वा दास्र्याद्रहस्ता समत उलूखल मुसलम् शुम्भताप-अथर्ववेद, 12/3/13)

7. रामशरण शर्मा, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, राजकमल प्रकाशन, 1992, पृष्ठ-16

8. राधाकुमुद मुखर्जी, हिंदू सभ्यता, पृष्ठ 89

9. रामशरण शर्मा, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, 25

10. उदकुंभानधिनिधाम दास्यौ मार्जालीयं परिनृत्यंति पदों

      निध्नतीरिदं मधुगायन्त्यों मधु वै दैवानां परममन्नाधाम—तैत्तिरीय संहिता, 7/5/101

  1. डॉ. रामविलास शर्मा, मानव सभ्यता का विकास, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ-74

12. प्रवृत्तोऽश्वतरीरथो दासीनिष्कोऽत्स्यन्नं पश्यसि—छांदोग्योपनिषद, 5.13.2

13. स होवाच विज्ञायते हस्ति, हिरण्यस्पापस्तं गौ, अश्वानां दासीनां—बृहदारण्यक उपनिषद(6.2.7)।

14. ओमप्रकाश प्रसाद, प्राचीन भारत का सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास, राजकमल प्रकाशन, 2006

15. गृह जातस्था, क्रीतो लब्धो, दायादुपागतः

अनाकाल भृतो, लोके अहितः स्वामिना च यः। 24

मोक्षितो महतश्चार्णात्प्राप्तो, युद्धात्पणार्जितः

तवाह मित्युपगतः प्रवज्यावसितः कृतः। 25

भक्तदासश्चविज्ञेयस्तथैव वडवाहतः

विक्रेता चात्मनः शास्त्रै दासाः पंचदशस्मृताः। 26

  1. श्रीपाद अमृत डांगे, आदिम साम्यवाद, हिंदी अनुवाद आदित्य मिश्र, राजकमल प्रकाशन, 1978,  पृष्ठ 195

17. डॉ. सुरेद्र कुमार शर्मा अज्ञात, क्या बालू की भीत पर खड़ा है हिंदू धर्म, विश्व बुक्स प्रा. लिमिटेड,

18. ददौ कन्यापिता तासां दासीदासमनुत्तमम्।

हिरण्यस्य सुवर्णस्य मुक्तानां विद्रुमस्य च। रामायण, बालकांड, 1.74.5

19. रूपाजीवाश्म वादिन्यो वणिजश्य महाधनाः

शोभयंतु कुमारस्य वाहिनी सुप्रसारिताः।। उत्तरकांड-6.74.2

20. तस्माततेऽहं प्रदास्यामि विविधं वसु भूरि च

      दासी सहस्राश्यामानं सुवस्त्राणामलंकृतम्।। वनपर्व, 185.34

21. ‘दासाश्च दास्याश्च सुमृष्ठवेषाः। संभोजकाश्चाप्युपजहृनुरत्नम्।। आदिपर्व-193।

22. शतं दासीसहस्राणि तरूण्यो हेमभद्रिकाः

कंबूकेयूर धारिष्यो निष्ककंठयः स्वलंकृता-महाभारत, 2.61.8

23.  दासॊऽसमीति तवया वाच्यं संसत्सु च सभासु च।
       एवं ते जीवितं दद्याम एष युद्धजितॊ विधिः।। महा.3.256.11

24.  इयं सुरसुतप्रख्या सर्वधर्मोपचायिनी

सदा देवमनुष्याणामसुराणां च गालव।।

कांछिता रूपतो बाला सुता मे प्रतिगृह्यताम्

अस्याः शुल्कं प्रदास्यंति नृपा राज्यमपि ध्रुवम्।। उद्योगपर्व, 115.2-3

25. देवराज चानना, सलेवरी इन एन्शीएंट इंडिया, पिपुल्स पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, 1960, पृष्ठ-40

26. डांगे, आदिम समाज, पृष्ठ 195

27. खंडहाल जातक, भदंत आनंद कौसल्यायन, जातक संख्या 542, हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग।

28. सी.एन.सुब्रह्मण्यम, जब गुलाम सुल्तान बने, शैक्षिक संदर्भ, मार्च-अप्रैल 1996

29. कौन ज्यादा बुरा है—गुलामी या अस्पृश्यता?, डॉ. भीमराव आंबेडकर।

मई दिवस : संघर्ष की याद और संकल्पों का दिन

सामान्य

मई दिवस पर विशेष

यदि तुम सोचते हो कि हमें फांसी पर लटकाकर तुम मजदूर आंदोलन को, गरीबी, बदहाली और विपन्नता में कमरतोड़ परिश्रम करने वाले लाखों लोगों के आंदोलन कोकुचल डालोगे….अगर तुम्हारी यही राय है तो हमें खुशीखुशी फांसी के तख्ते पर चढ़ा दो। किंतु याद रहे, आज तुम एक चिंगारी को कुचल रहे हो, कल यहांवहां, तुम्हारे आगेपीछे, प्रत्येक दिशा से लपटें उठेंगीं। यह जंगल की आग है। तुम इसे कभी भी बुझा नहीं पाओगे। एक दिन आएगा, जब हमारी खामोशी उन आवाजों से कहीं ज्यादा ताकतवर होगी, जिनका तुम आज गला घोंट रहे हो ऑगस्ट स्पाइस।

मई दिवस’ के साथ कोई खुशनुमा प्रसंग नहीं जुड़ा है। न यह मजदूरों के लिए उत्सव मनाने का दिन है। फिर भी हर मेहनतकश के लिए इस दिन का महत्त्व है। यह उन्हें संगठन की ताकत का एहसास दिलाता है। उस हौसले की याद दिलाता है जिसके बल पर उनके लाखों मजदूर भाई अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर आए थे। चार्ल्स. रथेनबर्ग के शब्दों में, ‘मई दिवस वह दिन है जो मजदूरों के दिलों में उम्मीद तथा पूंजीपतियों के मन में खौफ पैदा करता है।’ यह अकेला दिन है जिसे मजदूरों के नाम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाता है। मजदूरों के लिए यह याद रखने का दिन है। ठीक ऐसे ही जैसे कोई जीवंत समाज अपनी आजादी के महानायकों के किस्सों को सहेजकर रखता है।

मशीनीकरण के बाद का दौर पूंजी के केंद्रीकरण का था। उसमें आदमी को भी मशीन मान लिया गया था। फैक्ट्रियों में काम के घंटे निर्धारित नहीं थे। उनीसवीं शताब्दी के आरंभ तक ‘कार्यदिवस’ का अर्थ था, सूरज निकलने से सूरज छिपने तक काम करना।1 मौसम के अनुसार दिन घटताबढ़ता तो काम के घंटे भी घटबढ़ जाते। हर कामगार को प्रतिदिन 14 से 16 घंटे काम करना पड़ता था। कभीकभी तो एक कार्यदिवस 18 घंटे तक पहुंच जाता था।2 कार्यघंटों को लेकर महिलाओं और पुरुषों, बच्चों और बड़ों में कोई भेद नहीं थाइसके आलावा मजदूरी बहुत कम थी। 16 से 18 घंटों तक काम करने के बावजूद मजदूरों को इतनी मजदूरी नहीं मिलती थी, जिससे वे सामान्य जीवन भी जी सकें। ऊपर से बार-बार आने वाली मंदी के कारण मजदूरों को बेरोजगारी का सामना करना पड़ता था। आड़े वक्त में सरकार भी उद्यमियों और पूंजीपतियों का ही पक्ष लेती थी। 1834 में ‘वर्किंगमेन्स एडवोकेट’ नामक अखबार ने छापा था, ‘डबलरोटी के पैकेटों को लानेले जाने के काम में लगे मजदूरों की हालत मिस्र के बंधुआ मजदूरों से भी बुरी थी। उन्हें दिन के 24 घंटों में 18 से 20 घंटे काम करना पड़ता था।’ मजदूर उसे 10 घंटों तक सीमित करने की मांग करते आ रहे थे। 1791 में फिलाडेफिया के बढ़इयों ने 10 घंटे के कार्यदिवस के लिए हड़ताल की थी। उसके बाद 1827 में ‘मेकेनिक्स यूनियन ऑफ़ फिलाडेफिया’, जिसे विश्व का पहला मजदूर संगठन कहा जा सकता है, के नेतृत्व में निर्माण कार्य के मजदूरों ने, 10 घंटों के कार्यदिवस की मांग को लेकर हड़ताल की थी।3 उनके बैनरों पर लिखा होता था—‘छह से छह तक, दस घंटे काम के, दो घंटे आराम के।’ 1830-40 के बीच उनकी मांग में और भी तेजी आ गई। उसके फलस्वरूप 1860 तक लगभग सभी देशों ने कार्यदिवस के औसत घंटों को 12 से घटाकर, 11 कर दिया था

मजदूर कार्यदिवस को 10 घंटों तक सीमित करने की मांग पर अड़े थे। 1837 में अमेरिका में उसे लेकर चक्काजाम जैसी स्थिति बन गई। आखिरकार संयुक्त राष्ट्र के राष्ट्रपति वेन बुरान ने सरकारी दफ्तरों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए प्रतिदिन 10 घंटे करने का आदेश जारी कर दिया। उसकी देखादेखी कारखाना मजूदरों ने यह कहते हुए कि उनसे भी सरकारी कर्मचारियों के बराबर काम लिया जाए, आंदोलन को और तेज कर दिया4 1853 में नएनए बने कैलीफोर्निया राज्य ने कार्यघंटों को सीमित करने से संबंधित पहला, मगर आधाअधूरा कानून बनाया था। मूल प्रस्ताव में दस घंटे के वैध कार्यदिवस के साथ, उससे अधिक काम लेने वाले नियोक्ताओं को दंडित किए जाने का प्रावधान था। उसकी काफी चर्चा भी हुई थी। प्रस्ताव कानून की शक्ल ले, उससे पहले ही उद्यमियों ने सरकार पर जोर डालकर, उसे कमजोर करने का षड्यंत्र रच दिया। जो कानून बना उसमें कहा गया था कि ‘राज्य की किसी भी अदालत में 10 घंटों के श्रम को, एक कार्यदिवस का श्रम माना जाएगा।’5 इस तरह दस घंटों के कार्यदिवस की घोषणा महज कानूनी अवधारणा तक सीमित थी। वह नियोक्ताओं को न तो कोई निर्देश देता था, न उसमें क़ानून के उल्लंघन पर किसी तरह के दंड काप्रावधान था। कानून की कमजोरी का लाभ उठाकर नियोक्ता मजदूरों के साथ खूब सौदेबाजी करते थे। मजदूर संगठन उस कानून में आवश्यक संशोधन की मांग कर रहे थे।

10 घंटे के कार्यदिवस की मांग अभी चल ही रही थी कि श्रमिकों ने 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग तेज कर दी। इस बार वह मांग सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं थी। बल्कि जहां-जहां भी श्रमिक उत्पीड़न का शिकार थे, वहांवहां वे अपनी मांग के समर्थन में सरकार और उद्योगों पर दबाव बनाने में लगे थे। 1856 में आस्ट्रेलिया के निर्माण मजदूरों ने, 8 घंटे की मांग को लेकर नारा गढ़ा था—‘8 घंटे काम, 8 घंटे मनोरंजन और 8 घंटे आराम।’ इस मांग को तब बल मिला जब अगस्त 1866 में ‘नेशनल लेबर यूनियन’ ने 8 घंटे की मांग का समर्थन किया। वह अमेरिका का पहला मजदूर संगठन था। अपने स्थापना समारोह में ही 8 घंटे के कार्यदिवस की मांग के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाते हुए संगठन की ओर कहा गया था कि पूंजीवादी दासता से श्रमिकों की मुक्ति हेतु वर्तमान समय की सबसे पहली और बड़ी जरूरत है, अमेरिका के सभी राज्यों में 8 घंटे के कार्यदिवस को वैध माना जाए। सितंबर 1866 में फर्स्ट इंटरनेशनल द्वारा अपने जिनेवा सम्मेलन में 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग, घोषणा के साथ ही अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गईफर्स्ट इंटरनेशनल का निष्कर्ष था—

काम के घंटों की वैध सीमा तय होना आवश्यक है। इसके अभाव में कामगार वर्गों की स्थिति में सुधार तथा शोषण से मुक्ति का कोई भी प्रयास सफल नहीं हो सकता…..एक वैध कार्यदिवस के लिए यह सभा 8 घंटों की सीमा के प्रस्ताव को मंजूर करती है।’6

1867 में ‘पूंजी’ का प्रथम खंड प्रकाशित हो चुका था। उससे पहले माना जाता था कि उत्पादकता सांस्कृतिक उपादानों पर निर्भर करती है। मार्क्स ने शताब्दियों से चली आ रही इस धारणा का खंडन किया था। कहा था कि संस्कृति स्वयं उत्पादकता के साधनों द्वारा तय होती है। उस पुस्तक में मार्क्स ने श्रमिक शोषण की विशद विवेचना की थी। पूंजीवादी शोषण के लगभग सभी पक्ष उसमें शामिल थे। उसका विश्लेषण इतना गहन था कि श्रमिक शोषण से जुड़ी छोटी-सेछोटी बात भी उसकी पैनी नजर से बच नहीं पाई थीमार्क्स ने ‘नेशनल लेबर यूनियन’ के 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग का समर्थन किया था। कहा था कि श्रमिकों को रंग-भेद की भावना से ऊपर उठकर, अपने अधिकारों के पक्ष में आवाज उठानी चाहिए। उन दिनों अमेरिका में मजदूर को प्रति सप्ताह 63 घंटे काम करना पड़ता थामार्क्स चाहता था कि संयुक्त राष्ट्र अमेरिका श्रमिक अधिकारों के समर्थन में 8 घंटों के वैध कार्यदिवस की घोषणा करेपूंजीपतिवर्ग दूसरों को दास बनाकर रखने की मानसिकता से बाहर आए। उसने लिखा था—

जब तक दासता उसके गणतंत्र को विरुपित करती रहेगी, तब तक श्रमिक मुक्ति की दिशा में उठाया गया कोई भी कदम नाकाम सिद्ध होगा। जब तक काले श्रमिकों की पहचान उनके रंग के आधार पर होगी, तब तक श्वेत मजदूरों के लिए भी शोषणमुक्ति संभव नहीं है….24 घंटे के सामान्य दिन में मनुष्य अपनी कार्यशक्ति का भरपूर इस्तेमाल सीमित घंटों तक ही कर सकता है। यहां तक कि एक घोड़ा भी, प्रतिदिन अधिकतम 8 घंटे काम कर सकता है। दिन के बाकी घंटों में 8 घंटे कार्यशक्ति को आराम करना चाहिए, बाकी घंटे उन्हें अपने भौतिक आवश्यकताओं स्नान, भोजन आदि के लिए मिलने चाहिए।’7

8 घंटे के कार्यदिवस की मांग असामयिक नहीं थी। उसके पीछे भरा-पूरा वैचारिक दर्शन था। उसे जमीन दी थी, पीयरे जोसेफ प्रूधों, मार्क्स, मिखाइल बकुनिन, एंगेल्स जैसे विचारकों ने। वे अर्थव्यवस्था के समाजीकरण की मांग कर रहे थे। उसके पीछे समानता और स्वतंत्रता का दर्शन था। मान्यता थी कि यदि सब बराबर हैं, तो सभी को अपनी जरूरत के अनुसार भोग करने का भी अधिकार है। इसलिए मार्क्स का कहना था—‘प्रत्येक से उसकी योग्यता के अनुसार। प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुरूप।’ समाजवाद की दिशा में सबसे क्रांतिकारी पहल प्रूधों ने की थी। वह अराजकतावादी चिंतक था। मानता था कि व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा गुलामी जितनी ही घातक है। उसका कहना था—‘व्यक्तिगत संपत्ति चोरी है। संपत्तिधारक व्यक्ति चोर है।’ वह संपत्ति को सामाजिक दासता का कारक मानता था—

यदि मुझसे कोई यह पूछे कि गुलामी क्या है? तो मैं उसका एक ही शब्द में उत्तर दूंगा—‘गुलामी, हत्या है!’ मेरा मंतव्य पूरी तरह सरल और स्पष्ट है। उसके लिए किसी अतिरिक्त प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य की चेतना, उसके मस्तिष्क तथा व्यक्तित्व को छीन लेने की शक्ति—उसके जीवनमृत्यु का फैसला करने की शक्ति के समान हैं। यह मनुष्य को गुलाम बनाती है। यह उसकी हत्या है, क्यों? अब यदि कोई मुझसे पूछे—‘संपत्ति क्या है?’ क्या मुझे इसका वैसा ही उत्तर नहीं देना चाहिए! कहना चाहिए कि यह डकैती है!’ इसमें गलत समझे जाने की कतई गुंजाइश नहीं है। दूसरा निष्कर्ष निश्चित रूप से पहले का ही रूपांतरण है?8

प्रूधों की धारा का ही दूसरा विचारक था, मिखाइल बकुनिन। उसका राजनीतिक दर्शन नागरिक स्वतंत्रता, समाजवाद, संघवाद, नास्तिकता और भौतिकवाद से मिलकर बना था। बकुनिन का मानना था कि किसी समाज में व्यक्ति अथवा व्यक्ति समूह को दिए गए विशेषाधिकार उसके बुद्धि-विवेक एवं संवेदनशीलता को मार देते हैं। विशेषाधिकार चाहे राजनीतिक हों अथवा आर्थिक, वे मनुष्य के समाजीकरण की धारा को अवरुद्ध करते हैं। उसे स्वार्थी और आत्मपरक बनाते हैं। मनुष्य की अधिकतम स्वतंत्रता का समर्थक बकुनिन लोकतंत्र का भी आलोचक था। उसका कहना था कि जब जनता पर लाठियां बरसाई जा रही हों तो लोगों को यह जानकर कोई प्रसन्नता नहीं होगी कि वे लोकतंत्र की लाठियां हैं। बुद्धिजीवियों और दार्शनिकों से उसकी अपील थी—

हमें अपने सिद्धांतों का प्रचार शब्दों के माध्यम से नहीं, कार्यों के माध्यम से करना चाहिए। यही प्रचार का सबसे लोकप्रिय, शक्तिशाली और अनूठा तरीका है….दुनिया में क्रांतिकारी गतिविधियों को बढ़ावा देने में सत्तावादी क्रांतिकारियों का बहुत कम योगदान रहा है। इसलिए कि वे जनमानस को आड़ोलित कर, क्रांति की ओर उन्मुख करने के बजाय, मात्र अपने दम पर, अपनी योग्यता, सत्ता और विचारों के माध्यम से क्रांति लाना चाहते थे….उन्हें क्रांति के समर्थन में फरमान जारी करके नहीं, अपितु जनता को अपने लक्ष्यप्राप्ति की दिशा में प्रोत्साहित करके, क्रांति को बढ़ावा देना चाहिए।’9

मई दिवस के आंदोलन का चरित्र मूलतः ‘अराजकतावादी’ था। बता दें कि अराजकतावाद का आशय, जैसा प्रचार किया जाता है, राज्य तथा उसकी शक्तियों का लोप हो जाना नहीं है। उसके मूल में यह विचार है कि राज्य जनता का चयन है। उसका गठन जनता द्वारा अपने सुख एवं सुरक्षा के लिए किया जाता है। वह जनता के तभी हितकारी हो सकता है, जब उसपर जनता का अधिकाधिक नियंत्रण हो। अराजकतावाद में राज्य की अधिकतम शक्तियां जनता की ओर अंतरित हो जाती हैं। परिणामस्वरूप राज्य की शक्तियां प्रतीकात्मक होकर रह जाती हैं। सरकार की आवश्यकता नहीं रह जाती, यदि हो भी तो वह न्यूनतम अधिकारों के साथ न्यूनतम शासन करती है।

2

प्रूधों और बकुनिन का उल्लेख यहां इसलिए प्रासंगिक समझा गया क्योंकि मई दिवस आंदोलन की बागडोर मुख्यतः अराजकतावादियों के हाथों में थी, जो किसी भी प्रकार के सत्तावाद का विरोध करते थे। ‘अंतरराष्ट्रीय वर्किंग मेन्स ऐसोशिएसन’ जिसे ‘प्रथम इंटरनेशनल’ के नाम से भी जाना जाता है, समाजवादी संगठन था। उसके पीछे सोच था कि मजदूर चाहे किसी देश का हो, उसकी मूलभूत समस्याएं और चुनौतियां एक जैसी होती हैं, इसलिए उसके विरोध में लड़ाई भी संगठित होकर लड़ी जानी चाहिए। वे समाजवाद के समर्थक थे, किंतु उसके लिए रास्ता क्या हो, इसे लेकर उनमें मतभेद थे। उसमें से कुछ राबर्ट ओवन के अनुयायी थे, कुछ लुइस ब्लेंक के। कुछ का भरोसा संघवाद में था, तो कुछ अपना तारणहार गणतंत्र को मानते थे। यह विभाजन ऊपर की श्रेणी के बुद्धिजीवियों में भी था। हीगेल से प्रभावित कार्ल मार्क्स द्वंद्ववादी विचारधारा का समर्थक था। उसका मानना था कि सत्ता प्रतिष्ठानों और उत्पादन केंद्रों पर श्रमिक वर्गों का नियंत्रण होना चाहिए। बकुनिन किसी भी प्रकार के सत्तावाद का विरोधी था। उसे वह मनुष्य की स्वतंत्रता में बाधक मानता था। दोनों गुटों के मतभेद इतने बढ़े कि इंटरनेशनल की छठी कांग्रेस के बाद, दोनों के बीच विभाजन हो गया। अराजकतावादी बकुनिन के नेतृत्व में अलग हुए टुकड़े को ‘एंटी-आथरटेरियन इंटरनेशनल’ का नाम दिया गया था। ‘एंटी-आथरटेरियन इंटरनेशनल’ के नेता मानते थे कि ‘हड़ताल का संघर्ष का बेशकीमती हथियार’ है। इसलिए श्रमिकों को ‘महान एवं अंतिम चुनौती’ के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए। अराजकतावादी नेताओं के मनस् में नई वर्गहीन, समाजवादी आदर्शों से युक्त और सभी प्रकार यहां तक राज्य के वर्चस्व से भी मुक्त नए समाज का सपना कौंधता रहता था। 8 घंटे के कार्यदिवस से जुड़ी हड़ताल में इसी गुट के नेता थे, जो ‘बेहतर समाजवादी दुनिया’ के सपने के साथ जूझ रहे थे

1872 में ‘प्रथम इंटरनेशनल’ का कार्यालय, लंदन से न्यू यार्क शिफ्ट कर दिया गया था। इससे उसकी गतिविधियों में व्यवधान आया था। प्रभाव भी घटने लगा था। लेकिन मजदूर 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग पर अडिग थे। उसके लिए धरना, प्रदर्शन, हड़ताल चलते ही रहते थे। 1877 में मार्टिंग्स वर्ग, पश्चिमी वर्जिनिया में रेलवे कर्मचारियों ने हड़ताल का ऐलान कर दिया। मामला इतना बढ़ा कि उसपर काबू करने के लिए सेना बुलानी पड़ी। बलप्रयोग के कारण हड़ताल तो दब गई, परंतु उससे जो चिंगारियां फूटीं उसने बहुत जल्दी वाल्टीमोर, ओहियो, पेनसिल्वेनिया जैसे शहरों की रेलवे कंपनियों को अपनी गिरफ्त में ले लिया। धीरे-धीरे दूसरे उद्यमों से जुड़े मजदूर भी हड़ताल पर उतर आए। पहली बार मजदूरों ने सरकार और पूंजीपतियों को अपनी विराट शक्ति का एहसास कराया था। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा था। वह ऐसा जनउभार था, जिसका असर राष्ट्रव्यापी था

1884 का वर्ष अंतरराष्ट्रीय मजदूर आंदोलनों के इतिहास में बड़ा परिवर्तनकारी सिद्ध हुआ। उसी वर्ष फेडरेशन ऑफ़ आर्गनाइज्ड ट्रेड एंड लेबर यूनियंस, जिसे बाद में ‘अमेरिकन फेडरेशन ऑफ़ लेबर’ के कूटनाम से भी जाना गया—का शिकागो में चौथा राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ। 7 अक्टूबर, 1884 को आयोजित उस सम्मेलन में निम्नलिखित प्रस्ताव को स्वीकृति मिली थी—

‘‘फेडरेशन ऑफ़ आर्गनाइज्ड ट्रेड एंड लेबर यूनियंस ऑफ़ दि यूनाइटिड स्टेट्स एंड कनाडा’ तय करती है कि पहली मई तथा उसके बाद से 8 कार्यघंटों का एक कार्यदिवस, वैध कार्यदिवस के रूप में जाना जाएगा। हम सभी श्रमिक संगठनों से अपील करते हैं कि वे अपने-अपने नियमों को इस प्रकार निर्धारित करें कि वे इस प्रस्ताव के अनुकूल हों10

अमेरिकन फेडरेशन ऑफ़ लेबर’ स्वैच्छिक और संघीय आधार पर बना था। फेडरेशन के राष्ट्रीय सम्मेलन के निर्णय सिर्फ उससे जुड़े श्रमिक संगठनों पर लागू होते थे; वह भी तब जब श्रमिक संगठन उन निर्णयों का विधिवत समर्थन करें। 8 घंटे के प्रस्तावित कार्यदिवस की घोषणा में हड़ताल का संकल्प भी छिपा था। चूंकि हड़ताल के दौरान श्रमिकों के पास अपनी आजीविका का कोई साधन नहीं होता, इसलिए हड़ताल लंबी खिंचने पर मजदूरों को संगठन की आर्थिक मदद की जरूरत पड़ सकती थी। परोक्ष रूप में फेडरेशन का संकेत बड़ी हड़ताल की ओर था। उसके लिए सदस्य श्रमिक संगठनों का समर्थन और सहभागिता आवश्यक थी। उस समय फेडरेशन के सदस्यों की संख्या लगभग 50000 थी। राष्ट्रीय स्तर पर यह बहुत ज्यादा भी नहीं थी। सरकारों पर दबाव बनाने की स्थिति में तो वह संगठन बिलकुल भी नहीं था

उस दिनों अमेरिका का श्रमिक आंदोलन तीन प्रमुख धाराओं में बंटा हुआ था। उसके सबसे बड़े मजदूर संगठन का नाम था—‘आर्डर ऑफ़ दि नाइट्स ऑफ़ लेबर’ यानी योद्धाओं का संगठन।’ 1886 में सदस्य संख्या की दृष्टि से वह सबसे बड़ा मजदूर संगठन था। उसके लगभग 7 लाख से अधिक सदस्य थे। उसमें कई महिलाएं भी शामिल थीं। टेरेंस वी. पोव्देर्ली उसका नेता था। यह संगठन 1878 में ही 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग करता हुआ आ रहा था। उसकी ख्याति एक जुझारू संगठन की थी। 1886 में उसकी लोकप्रियता शिखर पर थी। इस कारण उसके सदस्यों की संख्या भी बढ़ती जा रही थी। उसके प्रमुख नेता हड़ताल के बजाए सरकार के साथ सहयोग और बातचीत करते हुए, उसका हल निकालना चाहते थे। हालांकि उसका एक हिस्सा हड़ताल के लिए तैयार था। नाइट ऑफ़ लेबरने 1886 की 8 घंटों के कार्यदिवस हेतु ऐतिहासिक हड़ताल में हिस्सा न लेने का निर्णय लिया था।. नतीजा यह हुआ कि उसका प्रभाव कम पड़ने लगा।। उसके बाद जितनी तेजी से उसकी सदस्य संख्या बढ़ी थी, उतनी ही तेजी से उसकी सदस्य संख्या और प्रतिष्ठा कम होने लगी थी। दूसरी धारा अराजकतावादियों की थी। उन्होंने 1883 में ‘इंटरनेशनल वर्किंग पिपुल्स एसोशिएसन’ का गठन किया था। वे लोग न केवल कानून अपितु राज्य की सत्ता को ही श्रमिक हितों में बाधक मानते थे। इसलिए वे सहयोग या बातचीत के बजाए, मांग को लेकर जोरदार संघर्ष छेड़ने के पक्ष में थे। उसके लिए मारक हथियारों के प्रयोग से भी उन्हें आपत्ति नहीं थी।

तीसरा संगठन ‘अमेरिकन फेडरेशन ऑफ़ लेबर’ था। इस संगठन के कई सदस्य मार्क्सवादी विचारधारा के थे। यह संगठन शुरू से ही आठ घंटों के कार्यदिवस की मांग करता आया था। आरंभ में इसका तरीका भी संवाद और सहयोग पर आधारित था। उसमें एक गुट ऐसा भी था जिसे बातचीत के तरीके पर शुरू से ही विश्वास न था। यह गुट आगे चलकर न केवल फेडरेशन के बाकी सदस्यों को हड़ताल के लिए तैयार करने में सफल रहा, अपितु अपने अनुषंगी संगठनों के कुछ गुटों को हड़ताल के लिए अपने साथ लाने में सफल रहा था

यह दिखाने के लिए कि 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग केवल घोषणा नहीं है, श्रमिक संगठन उसके बारे में पूरी तरह से गंभीर हैं, ‘फेडरेशन ऑफ़ लेबर’ ने अपरोक्ष तैयारियां आरंभ कर दी थीं। आने वाले वर्ष में श्रमिक नेताओं की जगह-जगह सभाएं आयोजित की गईं। हर जगह 8 घंटों के कार्यदिवस के संकल्प को दोहराया गया। उसे सबसे सुधारवादी कदम बताया जा रहा था। कहा जा रहा था कि उससे ‘पूंजीवाद’ की जड़ पर प्रहार होगा। हालांकि कुछ अराजकतावादी अब भी यह मानकर चल रहे थे कि 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग से श्रमिकों की हालत में सुधार होने की संभावना बहुत कम है। श्रमिक नेताओं में ऑगस्ट स्पाइस जैसे उग्र अराजकतावादी भी थे, जो 8 कार्यघंटों की मांग से सहमत थे, मगर श्रमिकों के कल्याण के लिए उन्हें अपर्याप्त मानते थे। स्पाइस का विचार था कि—‘हमारी समस्याओं का वास्तविक समाधान बुराई की जड़ पर सीधा प्रहार किए बगैर संभव नहीं है।’11 एक और अराजकतावादी सेमुअल फील्डेन ने हेमार्किट नरसंहार से एक वर्ष पहले अराजकतावादी अखबार ‘दि अलार्म’ में लिखा था—‘‘कोई आदमी चाहे दिन में आठ घंटे काम करे या दस घंटे, वह गुलाम है, गुलाम रहेगा।’12 फील्डेन ने कहा था कि मजदूरों की समस्या का एकमात्र समाधान है, ‘निजी संपत्ति का खात्मा और प्रतिस्पर्धा का अंत।’

8 कार्यघंटों की मांग को श्रमिकों का चौतरफा समर्थन मिल रहा था। मजूदर संगठन भी अपनी-अपनी तरह से सक्रिय थे। ‘कारपेंटरर्स एंड सिगार मेकर्स’, ‘नाइट्स ऑफ़ लेबर’ की सदस्य संख्या में दिन दूनी, रात चौगुनी वृद्धि हो रही थी। इसका अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है, कि फेडरेशन की घोषणा के बाद, श्रमिक संगठन ‘नाइट्स ऑफ़ लेबर’(मजदूरों के शूरवीर) की सदस्य संख्या 1884 में 70000 से 1885 तक 200000 और फिर 1886 तक 700000 हो चुकी थी13 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग नाइट आफ लेबर के कार्यक्रम का हिस्सा थी। आरंभ में वह उस मुद्दे पर हड़ताल के लिए बाकी सदस्यों का साथ देने को तत्पर था. मगर बाद में, कदाचित मजदूर संगठनों पर अराजकतावादियों के प्रभाव के चलते, नाइट ऑफ़ लेबरके नेता हड़ताल से कटने लगे थे. स्वयं पोव्देर्ली, फेडरेशन से जुड़ी यूनियनों से हड़ताल में भाग लेने को कहने लगा था।

दूसरे कई संगठनों में भी बढ़ती सदस्य संख्या को देखकर उत्साह था। उसका असर किसी एक शहर तक सीमित नहीं था, बल्कि अमेरिका के विभिन्न शहरों के श्रमिक इस मांग को लेकर जोश से भरे हुए थे। मजदूरों को अंदाजा था कि 8 कार्यघंटों की मांग के लिए होने वाली हड़ताल लंबी खिंच सकती है। इसलिए कुछ सरकार पर दबाव बनाने के लिए निर्धारित तिथि से पहले अल्पावधिक हड़तालों का सिलसिला शुरू हो चुका था। उन हड़तालों में ‘कुशल और अकुशल, काले और गोरे, स्त्री और पुरुष, नेटिव और प्रवासी सभी शामिल होते थे

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मजूदर संघर्ष का केंद्र शिकागो बना था। क्या इसके पीछे कोई खास कारण था? बिलकुल। अमेरिकी गृहयुद्ध(1861-1865) के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था को जोरदार झटका लगा था। वह भयानक मंदी के दौर से गुजर रही थी। 1873 से 1879 के बीच 18000 कंपनियां दिवालिया घोषित हो चुकी थीं। 8 राज्य और सैकड़ों बैंक तबाह हो चुके थे14 मगर जैसे ही मंदी का दौर समाप्त हुआ, अमेरिका खासकर उसके शिकागो शहर में जो उन दिनों बड़ा औद्योगिक केंद्र था—बाहर से आने वाले मजदूरों की संख्या अचानक बढ़ चुकी गई। इससे शहर की समस्याएं भी बढ़ी थीं। उन दिनों अमेरिका में प्रति सप्ताह औसत 63 घंटे काम का प्रावधान था15 मंदी से उबरने की छटपटाहट में जहां उद्योगपति अधिक से अधिक मुनाफा कमाना चाहते थे। वहीं श्रमिक संगठन अपने लिए बेहतर मजदूरी की मांग कर रहे थे। कारण यह था कि मंदी के बाद जिस अनुपात में मंहगाई में वृद्धि हो रही थी, उस अनुपात में वेतनवृद्धि नहीं हो पा रही थीतनाव तब और बढ़ गया था जब बाल्टिमोर एंड ऑहियो रेलरोड ने मंदी के बहाने मजदूरों की पगार में 10 की कटौती की घोषणा की नतीजा यह हुआ की जुलाई 25, 1877 से मजदूरों ने हड़ताल कर दी देखते ही देखते उसने पूरे अमेरिका को अपनी चपेट में ले लिया स्थानीय पुलिस और सुरक्षा बल हड़ताल पर काबू पाने में नाकाम रहे तो सेना बुलानी पड़ी दो सप्ताह चलने वाली उस हड़ताल ने सैकड़ों की जान ली थी करोड़ों डॉलर की संपत्ति को नुकसान पहुंचा था जार्ज शिलिंग नाम के एक मजदूर नेता ने उसे ‘सामाजिक और औद्योगिक ग़दर’ की संज्ञा की थी

महत्त्वपूर्ण बात यह कि ‘गृह युद्ध की समाप्ति के एक दशक के भीतर ही उद्योगपति शिकागो पुलिस को गैरभरोसेमंद बताने लगे थे। उनका मानना था कि सरकारी सुरक्षाबल मजदूरों के प्रति उदारता बरतते हैं। ऐसा न हो, इसके लिए सुरक्षा बलों की जगह अपने खर्च पर पेशेवर संगठन बनाने की कोशिश जारी थी। 1870 और 1880 के दशक में उन्होंने प्राइवेट सशस्त्र बलों की भर्ती शुरू कर दी थी। निजी तथा सरकारी सशस्त्र बलों की सुरक्षा के लिए मजबूत हथियार-घर और किले बनाए जा रहे थे16 इसके साथसाथ मजदूर संगठनों पर लगाम लगाने के प्रयत्न भी जारी थे। वे मजदूरों को डराने, धमकाने, उनके संगठनों को काली सूची में डालने जैसे काम कर रहे थे। श्रमिक संगठनों में फूट डालने के लिए जासूसों, ठगों, निजी सुरक्षा बलों, और भेदियों की भरती की जा रही थी। सीधे-साधे गरीब मजदूरों को अनार्किस्ट और कम्युनिस्ट जैसे नाम देकर नौकरी से हटाया जा रहा था। मंदी के नाम पर मजदूरों के वेतन की कटौती की जा रही थी।

इसके बावजूद मुख्य धारा के अखबार पूंजीपतियों का समर्थन कर रहे थे। शिकागो ट्रिबून, दि टाइम्स, जैसे बड़े अखबारों का किसी न किसी रूप में राजनीतिकरण हो चुका था। मजदूरों की ओर ‘सोशलिष्ट’ और ‘अनार्किस्ट’ जैसे कुछ जनवादी तेवर के अखबार थे। लेकिन तुलनात्मक रूप से उनकी पहुंच बहुत छोटे समूह तक थी। उदाहरण के लिए 1890 के दशक में शिकागो डेली न्यूज की पाठकसंख्या जहां 2,00,000 थी, वहीं सोशलिष्ट और अनार्किस्ट जैसे प्रतिबद्ध विचारधारा के अखबारों की संयुक्त पाठक संख्या महज 30,000 थी17 जैसेजैसे मई का महीना करीब आ रहा था, मजदूरों का जोश भी बढ़ता जा रहा था। 1886 के आरंभ में, जहां जाओ वहां, 8 घंटे के कार्यदिवस, मजदूर एकता और पूंजीपतियों के शोषण पर चर्चा होती सुनाई पड़ती थी। सड़कों पर, सेलूनों और बाजारों में जोशीले गीत सुनाई पड़ते थे —

लाखों मेहनतकश, जागे हुए है

आओ उन्हें मार्च करते हुए देखें

उधर देखो, तानाशाह कांप रहे हैं,

अरे! उनकी ताकत खत्म होने लगी है

ओ श्रमयोद्धाओं किलों को उड़ा दो

अपने उद्देश्य की खातिर लड़ो

लड़ो, ताकि तुम्हें और तुम्हारे

सभी पड़ोसियों को बराबर का हक मिल सके

उठो, इन निरंकुश कानूनों को दफन कर दो

ऐसे गीतों ने श्रमिकों की आंखों में सपने रोपने का काम किया था। सपने बराबरी और एकता के। समानता और स्वतंत्रता के। फेडरेशन ऑफ़ लेबर की 8 कार्यघंटों को कानूनी घोषित करने की मांग के साथ ही श्रमिक संगठन उसके लिए तैयारियों में जुटने लगे थे। कामगारों का जुझारूपन, लक्ष्यप्राप्ति के लिए बलप्रयोग से न हिचकने का संकल्प श्रम आंदोलनों को विस्तार दे रहा था। अराजकतावादी नेताओं में से अल्बर्ट पार्सन्स, जोहान्न मोस्ट, ऑगस्ट स्पाइस, लुईस लिंग्ग जैसे नाम घरघर के जानेपहचाने नाम बन चुके थे। 1885 में ही हड़तालों का सिलसिला आरंभ हो चुका था। अपनी एकजुटता दर्शाने के लिए मजदूर बेंड-बाजे के साथ परेड के निकलते थे। 1881-1884 के बीच अमेरिका में हड़ताल और तालाबंदी की घटनाओं का वार्षिक औसत लगभग 500 था। उनमें करीब 1,50,000 श्रमिकों ने हिस्सा लिया था। मगर 1885 में हड़ताल और तालाबंदी की घटनाओं की संख्या 700 तक पहुंच चुकी थी। उनमें 2,50,000 मजदूरों की भागीदारी थी। उससे अगले साल यानी 1886 में हड़तालों तथा तालाबंदी की संख्या पिछले साल, यानी 1885 के मुकाबले दुगुनी से भी ज्यादा, 1572 थी। उनमें 6,00,000 श्रमिकों की हिस्सेदारी थी। 1885 में जहां 2467 औद्योगिक संस्थान हड़ताल और तालाबंदी से प्रभावित थे, वहीं उससे अगले वर्ष में 11562 कारखाने प्रभावित हुए थे। ‘नाइट्स ऑफ़ लेबर’ के नेताओं ने हालांकि हड़ताल में भाग न लेने का खुला ऐलान कर दिया था बावजूद इसके उसके लगभग 7,00,000 सदस्यों में से 5,00,000 कामगार हड़ताल में सीधे तौर पर शामिल थे18

आसन्न संकट को सामने देख सावधान हो जाना मनुष्य का प्राकृतिक लक्षण है। संकट जितना अधिक बड़ा हो, वह उतनी ही अधिक शक्ति से उसका सामना करता है। 1870 और 1880 के बीच श्रमिक संगठनों की भी यही हालत थी। इसलिए एक और जहां पूंजीपति और राज्य मिलकर मजदूर एकता और उनके संगठनों को कमजोर करने में लगे थे, उनसे निपटने की तैयारियां की जा रहीं थीं, वहीं श्रमिक भी 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग को लेकर एकजुट हो रहे थे। इस बीच श्रमिक संगठनों में ही कुछ ऐसे नेता भी थे, जो मजदूर एकता में खलल डालकर, हड़ताल की संभावना का टालने या उसे कमजोर करने में लगे थेउनमें ऐसे लोग भी थे जिन्हें पूंजीपतियों ने इस काम के लिए नियुक्त किया था। लेकिन मजदूरों में जोश था। 1 मई से ठीक पहले एक गुमनाम प्रकाशक की ओर से छपा पर्चा मजूदरों में बांटा गया, जिसमें अपील थी—

    • मजदूर हथियारों के लिए!

    • महल के लिए युद्ध, झोपड़ी के लिए शांति, विलासितापूर्ण सुस्ती के लिए मौत

    • मजदूरी प्रथा दुनिया की बदहाली की एकमात्र वजह है। वह धनाढ्यों द्वारा समर्थित है। इसे नष्ट करने के लिए उन्हें या तो काम करना होगा, अथवा मरना होगा

    • एक पाउंड डायनामाइट, एक बुशेल मतदातापत्रों से बेहतर है!(बुशेल: 32 सेर या 25.4 किलोग्राम की माप)

    • पूंजीपति लकड़बघ्घों, पुलिस और लड़ाकुओं का समुचित सामना करने के लिए, अपने हाथों में हथियार लेकर, आठ घंटों की मांग उठाओ19

साफ है कि दोनों ओर से कमानें तन चुकी थीं। हड़ताल का केंद्र शिकागो था। लेकिन आंदोलन केवल वहीं तक सीमित नहीं था। न्यू यार्क, बाल्टीमोर, सिनसिनाटी, सेंट लुईस, वाशिंग्टन, डेट्रोइट, पिटसबर्ग, मिलवोकी, कैलीफोर्निया सहित दूसरे और भी कई शहरों में मजदूर भड़के हुए थे। अफवाहों का बाजार गर्म था। इतिहासकार और समाज-वैज्ञानिक एक और गृह युद्ध की संभावना जता रहे थे। पूंजीपतियों के प्रति घृणा चारों ओर पसरी हुई थी। मजदूर मान चुके थे कि कार्यघंटों को लेकर सरकार और कारखाना मालिकों ने उन्हें और रियायत मिलने वाली नहीं है। मैकार्मिक कंपनी ने अपने सैकड़ों कर्मचारियों को लॉकआउट के बहाने बाहर निकाल दिया था। बाहर किए गए कर्मचारी किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न न करें, इसके लिए 300 सुरक्षा कर्मियों को नियुक्त किया गया था। कंपनी के इस निर्णय को लेकर कर्मचारियों में खासी कड़वाहट थी। मैकार्मिक के लॉकआउट में ‘इंटरनेशनल कारपेंटरर्स यूनियन’ की बड़ी भूमिका था। उसके नेताओं में से एक लुइस लिंग्ग चरमपंथी था। वह निर्भीक और मुखर वक्ता था तथा जो डायनामाइट को ‘सच्चा औजार’ मानता था।

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आखिर वह दिन भी आ पहुंचा जिसके लिए दोनों ही वर्गों ने भरपूर तैयारी की थी। सबसे ज्यादा क्रांतिधर्मा श्रमिक संगठन शिकागो में ही जमा हुए थे। विभिन्न संगठनों के बीच तालमेल बनाए रखने के लिए ‘8-घंटा समिति’ का गठन किया गया था। दूसरी ओर उग्र वामपंथी मजदूर संगठनों ने हड़ताल का मोर्चा संभालने के लिए ‘सेंट्रल लेबर यूनियन’ का गठन किया था। समन्वय की व्यवस्था ‘8-घंटा समिति’ और ‘सेंट्रल लेबर यूनियन’ के बीच भी थी। उन्होंने हड़ताल के संचालन के लिए एक संयुक्त मोर्चा बनाया हुआ था। ‘सेंट्रल लेबर यूनियन’ ने अभ्यास के लिए 1 मई से पहले रविवार के दिन लामबंदी प्रदर्शन किया था। उसमें कई श्रमिक संगठनों के लगभग 25000 मजदूरों ने हिस्सा लिया था। उसके साथ नाइट्स ऑफ़ लेबर, सोशलिष्ट लेबर पार्टी भी थीं। लेकिन नाइट्स ऑफ़ लेबर ने, शिकागो में एकदम अंतिम क्षण में खुद को प्रस्तावित हड़ताल से अलग कर लिया20 इससे नाराज उसका एक गुट, हड़ताल के सक्रिय समर्थन में उतर आया था। 1 मई का ‘दि आर्बीटर जाइटुंग’ हड़ताल के आवाह्न के साथ पाठकों तक पहुंचा था—

बहादुरो आगे बढ़ो! संघर्ष शुरू हो चुका है….साथियो! इन शब्दों पर ध्यान रखना—कोई समझौता नहीं। कापुरुष पीछे चले जाएं, बहादुर आगे आ जाएं। अब हम पीछे नहीं हट सकते। यह मई की पहली तारीख है….अपनी बंदूकों को साफ करो, कारतूसों को संभालकर रखो। पूंजीपतियों द्वारा किराये पर बुलाए गए हत्यारे, पुलिस और सैन्यबल, हत्या के लिए तैयार हैं। इन दिनों कोई भी मजदूर खाली जेब घर से बाहर कदम नहीं रखेगा।’21

उद्योगपतियों और व्यापारियों ने अपनी सुरक्षा के लिए निजी सुरक्षा बलों का गठन किया था। दूसरी ओर मजदूर संगठन भी 8 घंटे कार्यदिवस की मांग को अपने जीवन और मरण का सवाल बना चुके थे। पूंजीपतियों के सुरक्षाबलों का जवाब देने के लिए जर्मन तथा बोहेमियन समाजवादियों की ओर से शिकागो में ‘लेहर अंड वेहर वीरीन’(शैक्षिक एवं सुरक्षा समिति) का गठन किया गया था22 उद्देश्य था कि राज्य यदि श्रमआंदोलनों को रोकने के लिए बल का इस्तेमाल करे तो उसका उत्तर बलपूर्वक उसी अंदाज में दिया जा सके। साथी मजदूरों से संवाद करने के लिए श्रमिक संगठनों के पास ‘अलार्म’ और ‘आर्बीटर जाइटुंग’ जैसे समाचारपत्र थे। उनका सर्कुलेशन मुख्यधारा के अखबारों के मुकाबले बहुत कम था। मगर मजदूरों पर उनका प्रभाव दूसरे अखबारों की अपेक्षा कहीं ज्यादा था। उनकी भाषा आह्वानकारी होती थी। इसे एक उदाहरण के जरिये समझना उपयुक्त होगा। नवंबर-1884 में ‘इंटरनेशनल एसोशिएसन ऑफ़ वर्किंगमेन’ ने, स्थानीय श्रमिक संगठनों और संस्थाओं की मदद से समाजवाद को परिभाषित करने की कोशिश की थी23

1. निष्ठुर क्रांति तथा अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों की मदद से वर्तमान वर्गीय वर्चस्व को समाप्त करना

2. साम्यवादी संगठनों अथवा उत्पादन को लेकर मुक्त समाज की रचना

3. उत्पादक संगठनों के माध्यम से, बगैर लार्भाजन तथा लूट के बराबर श्रममूल्य के आधार पर वस्तुओं का विनिमय।

4. ऐसा शिक्षातंत्र खड़ा जिसमें स्त्रीपुरुष सभी धर्मरहित, वैज्ञानिक सूझबूझ तथा बराबरी के सिद्धांत के अनुरूप शिक्षा ग्रहण कर सकें।

5. लिंग अथवा जातीय भेदभाव से परे, सभी के लिए समान अधिकार

6. जनता के आपसी कार्यकलापों को संघों एवं कम्यूनों के बीच समझौतों के माध्यम से नियंत्रित करना

इस समाचार को 3 नवंबर 1884 के ‘अलार्म’ ने निम्नलिखित टिप्पणी के साथ प्रकाशित किया गया था—

दुनियाभर के मजदूर भाइयो! एक हो जाओ। साथियो! इस महान लक्ष्य तक पहुंचने के लिए जो सबसे आवश्यक है, वह है हमारा संगठन और हमारी एकता…..सो एकजुट होने का दिन आ पहुंचा है। हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो जाओ। ड्रम बजाकर बेखटके युद्ध की मुद्रा में आ जाओ—दुनिया के मजदूरो एक हो जाओ। तुम्हारे पास खोने के लिए जंजीरों के अलावा कुछ भी नहीं है, जीतने के लिए दुनिया पड़ी है।’24

जैसे ही पहली मई का दिन आया, मजदूरों ने अपने औजार रख दिए। उनके चेहरों पर विश्वास था। हर कोई अपने अधिकारों के लिए लड़ने का उद्धत था। श्रमिक आंदोलनों के इतिहास का वह सबसे अविस्मरणीय दिन था। शिकागो मजदूर क्रांति का केंद्र था। वहां मेकार्मिक हार्वेस्टर नामक कंपनी थी, जो खेती के औजार, मशीनें और ट्रक बनाने का काम करती थी। उसके आधे कामगार पहले ही दिन सड़क पर उतर आए। अकेले शिकागो में लगभग 40000 मजदूर हड़ताल पर थे25 उनके चेहरों पर जोश था। होठों पर गगनभेदी नारे थे—‘‘8 घंटे काम के। आठ घंटे आराम के। 8 घंटे हमारी मर्जी के।’ काम के घंटे घटाओ-मजदूरी बढ़ाओ।’ हड़ताल में 11562 कारखानों के मजदूर शामिल हुए थे26 शिकागो के अलावा केलीर्फोनिया जैसे दूसरे बड़े शहर भी हड़ताल में शामिल थे। पूरे अमेरिका में पांच लाख से अधिक मजदूर सड़कों पर थे। नेतागण अपने भाषण द्वारा मजदूरों को प्रोत्साहित कर रहे थे। अल्बर्ट पार्सन्स, ऑगस्ट स्पाइस, जोहन्न मोस्ट, लुईस लिंग्ग, सेमुअल फील्डेन जैसे अराजकतावादी नेताओं के भाषण आग उगल रहे थे। हड़ताल के बारे में एक अखबार ने लिखा था—‘फैक्ट्रियों और मिलों की ऊंची-ऊंची चिमनियों से उस दिन धुंआ नहीं निकला था। लगता था, जैसे छुट्टी के दिन, सब कुछ ठहरा हुआ हो।’27 उल्लेखनीय स्तर पर शांत रही पहले दिन की हड़ताल ने अमेरिका के श्रम आंदोलन के इतिहास में बड़ा अध्याय जोड़ दिया था

3 मई को हड़ताली फिर सड़क पर थे। इस बार मैकार्मिक हार्वेस्टर कंपनी के अलावा ‘लंबर शोवर’ के 6000 कर्मचारी भी सड़क पर थे। गौरतलब है कि मैकार्मिक कंपनी में 16 फरवरी, 1886 से लॉकआउट चल रहा था। उसके कर्मचारी पिछले तीन महीनों से काम न मिलने के कारण क्षुब्ध थे। सच तो यह है कि वे हताश हो चुके थे। इसलिए उनमें दो वर्ग बन चुके थे। हड़ताली मजदूर मैकार्मिक हार्वेस्टर से थोड़ा हटकर जमा हुए थे। कुछ और हड़ताली वहां पहले से ही जमा थे। कुल लगभग 15000 हडताली वहां जमा थे। हड़ताल का नेतृत्व कर रहे नेताओं में से एक ऑगस्ट स्पाइस ने जोरदार भाषण दिया था। अपने भाषण में उसने पूंजीवादी दमन, उसकी क्रूरताओं और कुटिलताओं पर चर्चा की थी। कहा था कि मजदूरों की हालत गुलामों से भी बदतर है। उसने मजदूरों से अपील की थी कि एकजुट होकर खड़े रहें। अपने मालिकों और हड़ताल तोड़ने वालों को बीच में न घुसने दें। मजदूर सावधान थे। हड़ताली मजदूर सड़क पर आकार मार्च करने लगे। इस बीच उनके बीच कुछ भेदिये भी आ मिले थे, जिन्हें मजदूरों ने वापस लौटने को विवश कर दिया था। मजदूरों का जुलूस शांतिपूर्वक आगे बढ़ रहा था। चारों तरफ से जत्थे निकलकर उसमें शामिल हो रहे थे। तभी हड़तालियों पर पत्थरों, ईंटों और लाठीडंडों से मार पड़ने लगी। मजदूर समझ पाएं, तभी 200 पुलिसकर्मियों का जत्था उनके सामने पहुंच गया। बिना किसी चेतावनी के लिए उसने मजदूरों पर लाठियों और बंदूकों से हमला कर दिया। उसमें चार मजदूरों की मृत्यु हो गई। अनेक घायल हो गए।28

3 मई की घटना के बारे में शिलिंग नामक मजदूर ने पीटर आल्टगोल्ड के सामने इस प्रकार बयान दिया था—‘‘मैकार्मिक कारखाने पर आयोजित प्रदर्शन सिर्फ लंबर शोवर्स यूनियन का ही प्रदर्शन नहीं था, वहां पर मैकार्मिक कारखाने के भी एक हजार से अधिक हड़ताली मजदूर थे। हालांकि ऑगस्ट स्पाइस वहां बोला था, पर उसने गड़बड़ी करने का नारा नहीं दिया था। उसने एकता का आह्वान किया था….गड़बड़ी तो तब शुरू हुई जब हड़तालभेदिये कारखाने से बाहर जाने लगे। हड़तालियों ने उन्हें देख लिया और भला-बुरा कहना, गालियां देना शुरू कर दिया जो यहां दोहराने लायक नहीं हैं। उस दृश्य की कल्पना करो। दो यूनियनों के छह हजार हड़ताली मजदूर बाहर सभा कर रहे हैं और उनकी नजरों के सामने से हड़ताल भेदिये चले जा रहे हैं। मैंने देखा वहां क्या हुआ। मैकार्मिक के हड़ताली कारखाने की ओर बढ़ने लगे। किसी ने उनसे कहा नहीं था। किसी ने उन्हें उकसाया नहीं था। उन्होंने सुनना बंद कर दिया था और वे फाटकों की ओर बढ़ रहे थे। हो सकता है उन्होंने कुछ पत्थर उठा रखे हों, हो सकता है उन्होंने भद्दी बातें कही हों। लेकिन उनके कुछ कहने से पहले की कारखाने की पुलिस ने गोलियां चलानी शुरू कर दीं। हे भगवान लगता है, जैसे कोई युद्ध हो। हड़ताली निहत्थे और पुलिस मानो चांदमारी कर रही हो, पिस्तौलें हाथभर की दूरी पर थीं। रायफलें भी तनी हुई थीं—धांय, धांय, धांय…..मजदूर ऐसे गिर रहे थे, जैसे लड़ाई का मैदान हो। जब उन्होंने टिककर खड़े होने की कोशिश की तो पुलिस वाले चढ़ दौड़े और लाठियों से पीटकर उन्हें अलग कर दिया। जब वे तितर-बितर होकर दौड़े तो पुलिसवालों ने उनका पीछा किया। पीछे से लाठियां बरसाईं। देखा नहीं जाता था। वह क्रूरता थी। बहशीपन था। भाग जाने का मन कर रहा था। लगता था कै हो जाएगी। और यही किया मैंने.’29

ऊपर के विवरण से स्पष्ट है कि हड़तालियों पर पुलिस का हमला न केवल आकस्मिक, अपितु पूर्वनिर्धारित षड्यंत्र जैसा था। क्रोधित ऑगस्ट स्पाइस अराजकतावादी दैनिक आर्बीटर जाइटुंग के कार्यालय में पहुंचा था। वहां उसने हड़तालियों के नाम एक पोस्टर जारी किया। उसका शीर्षक था—‘बदला।’ घटना के कुछ ही घंटों बाद सड़कें उन पोस्टरों से पटी हुई थीं—

‘‘तुम्हारे मालिकों ने अपने शिकारी कुत्ते, पुलिस भेज दी है। इस दोपहर उन्होंने मैकार्मिक के पास तुम्हारे छह साथियों को मार गिराया है। उन्होंने उन गरीब दुखियारों को मार गिराया है, क्योंकि तुम्हारी तरह उन्होंने भी अपने मालिकों के आगे झुकने से इन्कार कर दिया था….तुम वर्षों से अंतहीन असमानता को झेलते आ रहे हो। तुम उनके लिए मृत्युपर्यंत काम करते हो। उनके लिए तुम अपनी इच्छाओं के साथसाथ, अपनी और अपने बच्चों की भूख को अनंतकाल से दबाते आए हो। यहां तक कि अपने बच्चों को भी तुमने अपने मालिकों के लिए कुर्बान कर दिया है। तुम हमेशा से दुखियारे और आज्ञाकारी गुलाम रहे हो। क्यों? अपने सुस्त और चोर मालिकों के अंतहीन लालच और उनकी तिजोरियों को भर देने के लिए….

यदि तुम इंसान हो, यदि तुम अपने उन पूर्वजों की संतान हो, जिन्होंने तुम्हें आजाद करने के लिए अपनी कुबार्नियां दी हैं, तो महाशक्तिशाली हरकुलिस की तरह उठो। और उन छिपे हुए राक्षसों का अंत कर दो, जो तुम्हें मिटा देना चाहते हैं। हथियार उठाओ….हम तुमसे कहते हैं….हथियार उठा लो।’’30

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4 मई की सुबह ‘दि आर्बीटर जाइटुंग’ के मुख्य पृष्ठ पर मोटे अक्षरों में छपा था—

खून! असंतुष्ट मजदूरों की सेवा के लिए सिर्फ गोली और बारूद….यह है कानून और पुलिस! वे महलों में महंगी शराब से अपने जाम भरकर कानून और पुलिस के खूनी दरिंदों के स्वास्थ्य की कसमें उठा रहे हैं। गरीब और दुखियारो, अपने आंसू पोंछ डालो। अपनी ताकत को पहचानकर उठे खड़े हो और इस बेईमान शासन को धूल में मिला दो।’31

रातभर में पोस्टरों और पर्चों की एक और खेप सड़कों पर आ चुकी थी। लिखा था—‘मजदूरो, हथियार बांध लो। पूरी ताकत के साथ मोर्चे पर डट जाओ।’ पूरा शहर अफवाहों से भरा हुआ था। दोपहर होते-होते हेमार्किट चौक पर भीड़ जुटने लगी। उपस्थित श्रमिकों में बहुत से बेरोजगार थे। भूख से व्याकुल थे। अनेक लोग ऐसे भी थे, जिनके पास सिर छिपाने के लिए कोई ठिकाना तक नहीं था। सैकड़ों ऐसे थे जिनके सिर पर महीनों से मंदी की तलवार लटकी हुई थी। ऐसा लग रहा था कि जो वे कर रहे या करने जा रहे हैं, खुद को और अपने परिवार को बचाए रखने के लिए, उसके अलावा उनके पास दूसरा कोई रास्ता ही नहीं है। उनके पूंजीपति मालिक उन्हें रोजगार देते हैं। लेकिन उनके सपने देखने के अधिकार को छीन लेना चाहते है। यदि कोई सपना बचता-बचाता कहीं से चला आए तो वे उसे नोंचने पर उतारू हो जाते हैं। उनके नेताओं ने उन्हें सपना देखना सिखाया है। अपने ऊपर विश्वास करना सिखाया है। बताया है कि अपनी तमाम लाचारी, बेकारी, हताशा, विपन्नता और दैन्य के बावजूद वे इन्सान हैं। सपने देखने का हक उन्हें भी है। संगठन उनके सपनों के पूरा होने का भरोसा दिलाता है। सपने पूरे हों न हों, लेकिन वे सपनों को छोड़ना नहीं चाहते। 8 घंटे का कार्यदिवस तो असल में बहाना है। हड़ताल तो सपनों को बचाने के लिए है। जीवन रहे या जाए, बस सपने बचे रहें

पूरा शहर दो हिस्सों में बंट चुका था। एक ओर मजदूर थे। भूख और बेरोजगारी के मारे हुए, ठंडे, गरीब और बदहाल। उन्हीं के सामने, उनकी ओर बंदूकें थामें, पुलिस के सिपाही और सुरक्षाबल थे। उनमें और मजदूरों में ज्यादा अंतर नहीं था। बल्कि उन्हीं के बीच से निकलकर आए थे। उन्हीं के भाई-बंधुपड़ोसीरिश्तेदार थे। मालिकों ने उन्हें बंदूकें और लाठियां थमायी थीं। उन हथियारों का असर था कि अब वे अपने ही भाई-बंधुपड़ोसी या रिश्तेदारों को पहचानने को भी तैयार न थे। मालिकों के इशारे पर वे कुछ भी कर सकते थे। दूसरी ओर बड़े-बड़े उद्योगपति, व्यापारी, पूंजीपति, राजनेता और व्यापारी थे। उनके पास धन था। ताकत थी। अखबार थे, जिनके मदद से वे अपने झूठ को भी सच बनाते आए थे। अपने वर्चस्व को बचाने के लिए वे कुछ भी करने को तैयार थे।

अचानक आसमान घिर आया। तेज हवाएं चलने लगीं। ऊपर काले बादलों की मोटी परत छा गई। फिर बूंदाबांदी होने लगी। मानो मौसम उन्हें सावधान कर देना चाहता हो। मैदान पर उस समय मात्र तीन हजार लोग थे। जिनमें स्त्री-पुरुष, बच्चेबड़े सभी शामिल थे। मजदूर नेता भाषण दे रहे थे। उनके भाषण में हिंसा की कोई बात नहीं थी। पार्संस ने अर्थव्यवस्था पर बात रखी थी। समानांतर से रूप से उसी समय कारखाना मालिकों की भी गुप्त बैठक चल रही थी। गोपनीय ढंग से आदेश आ-जा रहे थे। घटना स्थल से थोड़ी दूर पर पुलिस स्टेशन था। वहां पुलिस कप्तान पूरे दल-बल के साथ मौजूद था। इस बीच मौसम कुछ और खराब हुआ था। झील की ओर से आती तेज-ठंडी हवाएं चल रही थीं। उससे पहले कि तूफान आए लोग घर लौट जाना चाहते थे।

उस समय शिकागो के मेयर कार्टर एच. हरीसन थे। अपनी लोकप्रियता के दम पर चौथी बार मेयर चुना गया था। हरीसन झुकाव मजदूरों की ओर था। शिकागो को वह अपनी ‘दुल्हन’ मानता था। वह चाहता था कि मजदूर उसपर भरोसा करें—‘मैं चाहता हूं कि लोग यह जान लें कि उनका मेयर यहीं पर है।’32 कार्यघंटों के लिए चल रहे आंदोलन के दौरान उसने अपनी ओर से तनाव को कम करने की पूरी कोशिश की थी। उसने यह कहते हुए कि मजदूर भी शिकागो के नागरिक हैं, सुरक्षा बलों को बुलाने से इन्कार कर दिया था। लेकिन मेयर होने के बावजूद सब कुछ उसके नियंत्रण में नहीं था। अनजाना भय उसे खाए जा रहा था। घबराया मेयर कभी निकट के पुलिस स्टेशन पर जाता तो कभी हेमार्किट चौक पर लौट आता था। थाने में कुछ सिपाही तैयार बैठे थे। कुछ काली पोशाक पहले लोग भी वहां थे।33 बावजूद इसके मेयर के लिए मजदूरों की सभा ‘अनुशासित’ थी। उसके नेताओं के भाषण अहिंसक थे।

10 बजे, मेयर हरीसन अपने बुझे हुए सिगार को चबाता हुआ पुलिस स्टेशन पहुंचा। और वहां मौजूद पुलिस अधिकारी से बोला—‘ऐसा कुछ भी होने की संभावना नहीं है, जिससे हस्तक्षेप की जरूरत पड़े।’ इसके बाद वह घर चला गया। मानो सब मेयर के वहां से चले जाने की प्रतीक्षा में हों। उसके जाने के 15 मिनट के भीतर ही पुलिस इंस्पेक्टर ने अपने सहायक से सारी पुलिस को आगे बढ़ने को कहा। उसमें 176 अधिकारी थे। आदेश मिलने पर वे घटनास्थल की ओर बढ़ने लगे। पुलिस इंस्पेक्टर बोनाफाइड को संभवतः उसे किसी बड़े अधिकारी, कदाचित मेयर से भी ऊंचे अधिकारी, का आदेश मिला था, जो निस्संदेह दंगा कराना चाहता था34

उस समय फील्डेन का भाषण चल रहा था। हड़ताली घर वापसी की तैयारी कर रहे थे। बारिश के कारण अधिकांश जा भी चुके थे। मैदान पर अब केवल 500 लोग जमा थे। फील्डेन आखिरी वक्ता था। वह अपने भाषण को समेटना चाहता था। पुलिस इंस्पेक्टर को करीब आते देख उसने कहा—‘यहां सब कुछ शांतिपूर्वक है। बस कुछ मिनट दीजिए, हम सब जाने ही वाले हैं।’ उसके बाद वह वहां उपस्थित लोगों की ओर मुड़ा और अपने भाषण का समापन करते हुए कहने लगा, ‘और अंत में….तभी उसने पुलिस के दस्ते को आंदोलनकारियों की ओर बढ़ते हुए देखा। मंच से कुछ फुट दूर रहने पर इंस्पेक्टर ने सिपाहियों को रुकने का आदेश दिया ओर स्वयं मंच की ओर बढ़ा। फील्डेन के पास पहुंचकर उसने जोर से कहा—‘मैं तुम्हें गिरफ्तार करता हूं।’

मैं लोगों की ओर से तुम्हें अभी इसी क्षण यहां से शांतिपूर्वक हट जाने का आदेश देता हूं।’ उसकी बात सुनते ही वहां शांति पसर गई। अब केवल हवाओं का शोर था जो झील से होकर आ रही थीं। आसमान में बादल मंडरा रहे थे।

किसलिए कैप्टन, यहां सब शांतिपूर्वक चल रहा है।’ फील्डेन ने कहा। फील्डेन ने गलत नहीं कहा था। बैठक पिछले सात-आठ घंटों से शांतिपूर्वक जारी थी। किसी भी पक्ष ने शिकायत का अवसर नहीं दिया था। एक सफल बैठक के शांतिपूर्वक समापन के अवसर पर फील्डेन इसके अलावा कुछ और कह ही नहीं सकता था। बावजूद इसके पुलिस की ओर से जो फील्डेन का जो बयान अदालत के सामने पेश किया गया, वह उपर्युक्त बयान से पूर्णतः भिन्न था। पुलिस रिकार्ड के अनुसार फील्डेन के शब्द थे, ‘यहां कुछ शिकारी कुत्ते हैं! जाओ, अपना काम करो और मैं अपना काम करूंगा।’ फील्डेन के बयान के बाद वहां पुनः शांति छा गई। हालांकि भविष्य में क्या होने वाला है, कुछ लोग यह अवश्य जानते थे

और तब अचानक, एक भयानक विस्फोट हुआ। तेज रोशनी में कुछ चेहरे दमके, और वातावरण दुर्गंध से भर गया। पुलिस की टुकड़ी की दायीं ओर से फैंका गया, हवा में लहराता हुआ बम स्पीकर स्टेंड से कुछ फुट दूरी पर फटा था। इसी के साथ वहां अव्यवस्था फैल गई। क्या हुआ किसी की कुछ समझ में नहीं आया। बम किसी अराजकतावादी ने फैंका था अथवा किसी उपद्रवी ने, अथवा पूंजीपतियों ने मिलकर हड़ताली नेताओं के विरोध में साजिश रची थी। या किसी सिरफिरे का काम था—इस बारे में अंत तक कुछ पता नहीं चला। हड़बड़ी में पुलिस ने भी फायरिंग शुरू कर दी। उधर मजदूर भी गोलियां बरसाने लगे। बम का धुंआ फैलने से कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था। पुलिस मजदूरों के साथ अपने साथियों पर भी गोली चला रही थी। बदहवासी का वह आलम 2-3 मिनट में समाप्त हो गया। उसके बाद किसी की लाश जमीन पर पड़ी थी। कोई घायलों में अपने मित्र, परिचित या रिश्तेदार को खोज रहा था। कोई खुद घायल पड़ा कराह रहा था। कानून की तरफ से 7 पुलिसकर्मियों की मृत्यु हुई थी। 67 घायल हुए थे35 मजदूरों की ओर से मरने वालों तथा हताहतों की संख्या उससे कई गुना था। परंतु सचमुच कितनी थी, यह कभी पता नहीं चल सका। अगले दिन के अखबारों ने मुख्यपृष्ठ पर उस घटना को जगह दी थी। सभी ने अराजकतावाद को अमेरिकी लोकतंत्र के लिए खतरा बताया था।

आठ अराजकतावादी नेता, अल्बर्ट पार्संस, ऑगस्ट स्पाइस, सेमुअल फील्डेन, ऑस्कर नीबे, माइकल श्वाब, जार्ज एंजिल, एडोल्फ फिशर तथा लुईस लिंग्ग को गिरफ्तार कर दिया गया। आठों मामूली मजदूर और कारीगर थे। अल्बर्ट पार्संस, प्रिंटिंग प्रेस का मजदूर था; और ‘अलार्म’ नाम का अख़बार निकलता गस्ट स्पाइस फर्नीचर तैयार करने वाला बढ़ई। फिशर भी प्रिंटिंग प्रेस में काम करता था। जार्ज एंजिल खिलौने बेचता था। ऑस्कर नीबे के अनुसार, एंजिल मजदूर वर्ग के संघर्ष का एक बहादुर सिपाही था। वह मेहनतकशों की मुक्ति के लिए जीजान लड़ा देने वाला बागी था।’ सेमुअल फील्डेन कारखाने में सामान की ढुलाई करने वाला साधारण मजदूर था। वह कहा करता था, ‘लिखनेपढ़ने वालों के बीच से अगर कोई क्रांतिकारी बन जाए तो आमतौर पर उसे गुनाह नहीं माना जाता। लेकिन अगर कोई गरीब क्रांतिकारी बन जाए तो वह भयंकर गुनाह हो जाता है।’ लुईस लिंग्ग बढ़ई था। विचारों से अराजकतावादी लिंग्ग के क्रांति रग-रग में बसी थी। वह कहा करता था, ‘मजदूरों को दबाने के लिए ताकत का इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए उसका जवाब भी ताकत से ही दिया जाना चाहिए।’ माइकल श्वाब बुकबाइंडर था। ऑस्कर नीबे साधारण मजदूर संगठनकर्ता था। दिल का साफ और सरल। उसकी खमीर बेचने वाली एक दुकान में भागीदारी थी।

आठों पर हत्याओं का आरोप था। लेकिन एक को भी बम फैंकने का आरोपी नहीं बताया गया था। बम वास्तव में किसने फैंका था, यह कभी पता नहीं चल सका। साफ था कि अदालत को उन नेताओं के कारनामे से ज्यादा उनकी विचारधारा से चिढ़ थी। हालांकि केवल ऊपर दिए गए नामों में से मात्र 3 नेता ही घटनास्थल पर मौजूद थे। बावजूद इसके जज जोसेफ ई. गैरी की अध्यक्षता में जूरी का गठन किया गया था, जो एक प्रतिक्रियावादी राजनेता था। अदालत ने उन सभी को फांसी की सजा सुनाई। यह वही अमेरिका था जिसने अपने संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ससम्मान अपने संविधान में जगह दी थी, और उसके लिए अपनी पीठ थपथपाता था। उसी अमेरिका में 8 लोगों को फांसी की सजा इसलिए सुनाई गई थी, क्योंकि वे खास विचारधारा में विश्वास रखते थे। लोकतांत्रिक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सबसे बड़े दावेदार अमेरिका के लिए तो वह कलंक जैसा था यह हुआ क्योंकि वहां का लोकतंत्र पूंजीपतियों के कब्जे में जा चुका था। जूलिस ग्रिनेल्ल जिसकी राजनीतिक संपर्क किसी से छिपे न थे, को मुदकमे का एटोर्नी बनाया गया था। जूरी के सामने अपने तर्क का समापन उसने इन शब्दों में किया था—

यह कानून की परीक्षा है, अराजकता की परीक्षा है। इन लोगों को जिन्हें सामने लाया गया है, जिन्हें इस महान जूरी द्वारा अभियुक्त ठहराया गया है, और चिन्हित किया गया है, क्योंकि वही नेता थे। ये उन हजारों लोगों से बड़े अपराधी नहीं हैं जो इनका अनुसरण करते हैं। जूरी के माननीय सदस्यो, इन लोगों को दंडित करो। फांसी पर लटकाकर इन्हें दूसरों के लिए नजीर बनाओ, और हमारी संस्थाओं और हमारे समाज की रक्षा करो36

11 नवंबर 1887 को पार्सन्स, स्पाइस, जार्ज एंगेल्स और एडोल्फ फिशर को मृत्युदंड दे दिया गया। लुईस लिंग्ग ने जल्लाद को फांसी लगाने का मौका तक नहीं दिया। उसने अपने मुंह में विस्फोटक दबाकर खुद को उड़ा दिया था। विस्फोटक सिगार की आकृति में लाया गया था। लाने वाला लिंग्ग का करीबी दोस्त था। जिस दिन उन्हें दफनाया गया, उस दिन उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए 600000 लोग शिकागो की सड़कों पर थे। फील्डेन, नीबे और श्वाब की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया। पूंजीवादी मीडिया ने, जिसे बुद्धिजीवियों ने मुख्यधारा का मीडिया कहना आरंभ कर दिया था, अराजकतावाद, समाजवाद आदि की इतनी आलोचना की कि इन्हें अमेरिका के लिए निषिद्ध मान लिया गया। मुदकमें के दौरान आठों अभियुक्तों को अदालत को संबोधित करने का अवसर मिला था। फील्डेन ने तीन घंटे समाजवाद सहित मजदूरों की समस्या पर भाषण दिया था। उसने कहा था—

‘‘आज, ठंडी मनभावन हवाओं के साथ शरत्काल की रुपहली किरणें हर आजाद ख्याल इंसान के चेहरे को स्पर्श कर रही हैं। लेकिन मैं यहां अपने चेहरे को फिर कभी सूर्य-रश्मियों में स्नान न कराने के लिए खड़ा हूं। मैं अपने साथियों से प्यार करता हूं। मैं अपने आप से प्यार करता हूं। मैं धोखेबाजी, बेईमानी और अन्याय से नफरत करता हूं। यदि इससे कुछ भला होगा, तो मैं मुक्त भाव से इन्हें अपना लूंगा।’

स्पाइस का भाषण जोशीला था—

यदि तुम सोचते हो कि हमें फांसी पर चढ़ा देने से तुम मजदूर आंदोलन को दबा दोगे, तब बुलाओ अपने जल्लाद को….तुम इसे नहीं समझ सकते।’

नीबे;

ठीक है, यह सब अपराध था मैं मान लेता हूं: मैंने मजदूर आंदोलनों को संगठित किया था। मैं कार्यघंटों को सीमित कराने को, मजदूरों की शिक्षा को, श्रमिकों के अखबार दाई आर्बीटर जाइटुंग को नए सिरे से आरंभ करने को समर्पित था। इसका कोई प्रमाण नहीं है कि बम फेंकने से मेरा कोई संबंध है, या मैं उसके पास था, या मैंने कुछ वैसा किया था।’

फिशर;

इन मांगों के लिए जितने ज्यादा लोग फांसी पर चढ़ाए जाएंगे, विचार उतनी ही जल्दी हकीकत बन जाएंगे

पार्संस;

मैं उनमें से एक हूं, यद्यपि मैं वृत्तिकदास हूं, जो मानता है कि यह मेरे लिए अपराध है, मेरे पड़ोसी के लिए गलत है….मेरे लिए यह….गुलामी से पीछा छुड़ाने अपना स्वामी आप बनने के लिए था….अनंत आकाश के नीचे यह मेरा इकलौता अपराध है।

एंजिल;

मैं भी ऐसे बहुत कुछ ऐसे व्यक्ति की तरह हूं, वर्तमान से टकराने से बचने की सोचता है। प्रत्येक विचारशील व्यक्ति को ऐसी सत्ता से जूझना चाहिए तो एक आदमी को कुछ ही वर्षों में विलासी और जमाखोर बना देती है, दूसरी ओर हजारों बेरोजगार आवारा और भिखमंगे बना दिए जाते हैं।’

श्वाब ने अराजकतावाद को परिभाषित करते हुए कहा था—

ऐसे समाज में जिसमें केवल सरकार को नीतिसंगत कहा जाता हो, ऐसे समाज में(बदल देना) जिसमें सभी मनुष्य सामान्य हितों के लिए नीतिसंगत कार्य करें और ऐसी चीजों से घृणा करें जो सचमुच घृणा के योग्य हैं

लिंग्ग पूरी अदालती कार्रवाही के दौरान सबसे निर्भीक सबसे विद्रोही बनकर उभरा था। अपने दिलेर और तिरस्कारपूर्ण भाषण में उसने कहा था—

मैं फिर याद दिलाता हूं कि मैं आज के ‘कानून’ का दुश्मन हूं। और मैं फिर से यह दोहराता हूं कि जब तक भी मेरे शरीर में सांस रहेगी, अपनी पूरी शक्तियों के साथ में इससे जूझता रहूंगा। मैं साफ तौर पर, सबके सामने कहता हूं कि मैं बलप्रयोग का हिमायती था। मैंने कैप्टन स्काक से कहा था(जिसने उसे गिरफ्तार किया था) और मैं आज भी उसपर कायम हूं, ‘यदि तुम हम पर गोली चलाओगे, हम तुम्हें बम से उड़ा देंगे। ओह! तुम्हें हंसी आ रही है! शायद तुम सोचते हो, ‘तुम और ज्यादा बम नहीं फेंक सकते।’ परंतु मुझे यह विश्वास है कि मैं फांसी के फंदे पर पर भी इसी तरह खुशी-खुशी चढ़ जाऊंगा और मुझे आपको आश्वस्त करना चाहिए कि सैकड़ों, हजारों लोग ऐसे होंगे जो मेरे इन शब्दों को याद रखेंगे, वे बम फैंकना जारी रखेंगे। इस उम्मीद के साथ मैं आपको कहना चाहूंगा कि मैं आपसे घृणा करता हूं! आपके ‘आदेश’ आपके कानून, बलप्रयोग पर टिकी आपकी सत्ता से नफरत करता हूं। इसके लिए मुझे फांसी पर लटका दिया जाए।’

उन आठों ने अदालत के सामने जो कहा था, वह मुख्यधारा के अखबारों में ठीक उसी भावना के साथ भले ही न आया हो, लेकिन बाद में इश्तहारों, पर्चों और पोस्टरों के रूप में लोगों के बीच फैल गया आज भी उनके विचार लोगों को प्रभावित करते हैं दुख की बात यह नहीं है कि लाखों मजदूरों के समर में उतरने के बावजूद अमेरिका में 1 मई, 1886 की क्रांति की नाकाम क्यों रही थी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जिस अमेरिका ने अब्राह्मम लिंकन के नेतृत्व में दासता को शिकस्त दी थी जिसके पास थॉमस जेफरसन और मानव थॉमस पेन ने द्वारा तैयार किया गया आधुनिकतम संविधान था ऐसा संविधान जो नागरिक अधिकारों को राज्य के अधिकारों जितना ही महत्त्व देता था—वह सातआठ दशक के भीतर ही वह अप्रासंगिक क्यों होने लगा था क्यों उनके विरुद्ध मजदूरों को कामगारों को खड़ा होना पड़ा जो लोकतंत्र से सर्वाधिक उम्मीद पाले रहते हैं, और जिन्हें उसकी सर्वाधिक आवश्यकता पड़ती है—वहां अराजकतावाद को जमीन कैसे मिली इस प्रश्न का उत्तर कुछ जटिल हो सकता है लेकिन यदि हम इसका उत्तर खोज लें तो भारतीय समाज में उभर रहे असंतोष, जिसे कुछ लोग भीड़तंत्र भी कह रहे हैं, का जवाब मिल सकता है

इस बारे में हम अभी सिर्फ इतना कहना आवश्यक समझते हैं कि अराजकतावाद लोकतंत्र का पुरोगामी दर्शन हैं। लोकतंत्र को न संभाल सकने वाली जनता, अराजकतावादी समाज गढ़ ही नहीं सकती। उसे संभालने के लिए लोकतंत्र से कहीं अधिक प्रबुद्ध जनता चाहिए। उस अवस्था में सत्ता परिवर्तन के लिए हिंसा गैर जरूरी हो जाती है। दूसरे शब्दों में अराजकतावाद का रास्ता लोकतंत्र की बहुविध सफलता से निकल सकता है। ऐसे लोकतंत्र से जो अपने नागरिकों के प्रबोधीकरण को भी आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक विकास जितना ही महत्त्व देता है। अमेरिकी क्रांति की असफलता के पीछे भी उसमें हिस्सेदारी कर रहे नेताओं तथा उनके अनुयायियों की अधूरी समझ थी। वे राज्य की आवश्यकता को समाप्त करने के बजाय, राज्य को ही समाप्त कर देना चाहते हैं। जबकि अराजकतावाद में राज्य समाप्त नहीं होता, अपनी खूबियों के साथ वह नागरिकों के रोजमर्रा के व्यवहार का हिस्सा बन जाता है। वह नागरिकीकरण की उच्चतम अवस्था है। इस बात को शिकागो के भोले-भाले मजदूर समझ ही नहीं पाए थे। इसलिए पूंजीवाद के शिकंजे में जकड़े हुए अमेरिकी राज्य की शक्ति द्वारा कुचल किए गए। अच्छा जनतंत्र चलाने की जिम्मेदारी नेताओं से ज्यादा जनता की होती है। जो जनता नेताओं पर जितनी कम निर्भर होगी, वह उतनी ही लोकतांत्रिक बन सकेगी
अमेरिका में 8 घंटे के कार्यदिवस की मांग 1836 से आरंभ हुई थी। 1864 में वह अमेरिकी मजदूरों की प्रमुख मांग बन चुकी थी। आखिरकार 1916 एडमसन एक्ट के माध्यम से अमेरिका रेलरोड वर्कर्स के लिए पहली बार 8 घंटे का कार्यदिवस लागू किया गया। फैक्ट्री मजदूरों को यह अधिकार मिला, फेयर लेबर स्टेंडर्डस् एक्ट—1938 के लागू होने के बाद। इस तरह से देखा जाए तो 8 घंटे के कार्यदिवस के लिए मजदूरों को एक शताब्दी से भी लंबा संघर्ष करना पड़ा था। चलतेचलते एक अवांतरसी चर्चा अमेरिका में धर्मसंसद का आयोजन 1893 में किया गया था कहा यह गया था कि धर्मसंसद का आयोजन क्रिस्ठोफर कोलंबस के अमेरिकी महाद्वीप पर पहुंचने की 400वीं सालगिरह के तौर पर मनाया गया था लेकिन क्या यही एकमात्र कारण था? ध्यान रहे कि हेमार्केट नरसंहार के दौरान ज्यादा नुकसान मजदूर पक्ष को उठाना पड़ा था लेकिन उससे न तो मजदूर अपनी मांगों को लेकर पीछे हटे थे न वहां समाजवादी आंदोलन में कमी आई थी फिर 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग और धर्मसंसद का क्या संबंध? सही मायने में तो यह शोध का विषय है। लेकिन जो लोग धर्म के अभिजन चरित्र को जानते हैं, जिन्होंने वोलनी, मोसका और परेतो को पढ़ा है, उनके लिए इस पहेली को सुलझा पाना कठिन नहीं होगा। आखिर क्या कारण है कि जिस अमेरिका में 8 घंटे के कार्यदिवस की मांग के समर्थन में सबसे बड़ी वर्गक्रांति ने जन्म लिया था, उस देश में वह मांग 1937 में मानी गई, जबकि दुनिया के छोटेबड़े दर्जनों देश 191819 में ही इसे मान चुके थे?
© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

1. अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग, दि हिस्ट्री ऑफ़ मे डे, इंटरनेशनल पंपलेट, 14, 799 ब्रोडवे, न्यू यार्क, पृष्ठ 3

2. वही पृष्ठ 3

3. वही, पृष्ठ 3

4. वही, पृष्ठ 4

5. जे. डेविड सेकमेन, मे डे एंड दि स्ट्रगल फॉर दि एट आवर डे इन कैलीफोर्निया

6. अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग, दि हिस्ट्री ऑफ़ मे डे, इंटरनेशनल पंपलेट, 14, 799 ब्रोडवे, न्यू यार्क, पृष्ठ 6

7. कार्ल मार्क्स, पूंजी, अध्याय 10, प्रोग्रेस पब्लिशर, मास्को, 2015, पृष्ठ 162,

8. संपत्ति क्या है? पियरे जोसेफ प्रूधों

9. मिखाइल बकुनिन, लेटर टू फ्रेंचमेन, ऑन दि प्रजेंट क्राइसिस, 1870

10. अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग, दि हिस्ट्री ऑफ़ मे डे, इंटरनेशनल पंपलेट, पृष्ठ 8

11. पॉल एवरिच, दि हेमार्किट ट्रेजेडी, प्रिंस्टन यूनीवर्सिटी प्रेस, पृष्ठ 182

12. पॉल एवरिच, पृष्ठ 182

13 अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग, दि हिस्ट्री ऑफ़ मे डे, इंटरनेशनल पंपलेट, 14, 799 ब्रोडवे, न्यू यार्क। पृष्ठ 10

14 दि इकोनॉमिक्स पर्फोमेंस इंडेक्स, इंटरनेशनल मोनेटरी फंड, वादिम खरामोव एंड जॉन राइडिंग्स ली, अक्टूबर 2013

15. माइकल हुबरमेन, वर्किंग हावर्स ऑफ़ दि वर्ल्ड यूनाइट?, न्यू इंटरनेशनल एवीडेंस ऑन वर्कटाइम, 1870-1900, पृष्ठ-19

16. डेविड मोबर्ग, एंटीयूनियनिज्म, एन्साइक्लोपीडिया ऑफ़ शिकागो, http://www.encyclopedia.chicagohistory.org/pages/55.html

17. जेनिस एल. रीफ, प्रेस एंड लेबर इन 1880, एन्साइक्लोपीडिया ऑफ़ शिकागो, http://www.encyclopedia.chicagohistory.org/pages/11407.html

18. अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग, दि हिस्ट्री ऑफ़ मे डे, इंटरनेशनल पंपलेट, 14, 799 ब्रोडवे, न्यू यार्क, पृष्ठ 10-11.

19. ऐरिक चेज द्वारा उद्धृत, दि ब्रीफ ओरीजिंस ऑफ़ मे डे, 1993

20. लुईस एडामिक, डायनामाइट : स्टोरी ऑफ़ क्लास वायलेंस इन अमेरिका, 1931, पृष्ठ-69

21. लुईस एडामिक, पृष्ठ-69

22. न्यू यार्क टाइम्स, 20 जुलाई 1886

23. पॉल एवरिच, दि हेमार्किट ट्रेजेडी, पृष्ठ 75

24. पॉल एवरिच, दि हेमार्किट ट्रेजेडी, पृष्ठ 75

25. ऐरिक चेज द्वारा उद्धृत, दि ब्रीफ ओरीजिंस ऑफ़ मे डे, 1993(कुछ स्थानों पर यह संख्या 400000 दी है)

26. अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग, पृष्ठ-11

27. मिशेल जे. स्काक, अनार्की एंड अनार्किस्ट, एफ. जे. स्कल्ट एंड कंपनी, न्यू यार्क, 1889, पृष्ठ-83

28. अनार्किस्ट ओरीजिन ऑफ़ मे डे, लीफलेट बाई वर्कर्स सोल्डरिटी मूवमेंट.

29. हॉवर्ड फ़ास्ट, शिकागो के शहीद मजदूर नेताओं की कहानी, राहुल फाउंडेशन, पृष्ठ-16

30. लुईस एडामिक, डायनामाइट : स्टोरी ऑफ़ क्लास वायलेंस इन अमेरिका, 1931, पृष्ठ-70

31. लुईस एडामिक, डायनामाइट, पृष्ठ-71

32. लुईस एडामिक, डायनामाइट, पृष्ठ-71

33. लुईस एडामिक, डायनामाइट, पृष्ठ-71

34. लुईस एडामिक, डायनामाइट, पृष्ठ-74

35. उपर्युक्त, पृष्ठ-74

36. उपर्युक्त, पृष्ठ-72

महात्मा ज्योतिबा फुले और ‘सत्यशोधक समाज’

सामान्य

अच्छे विचार जब तक उनपर अमल न किया जाए, महज अच्छे सपनों की तरह होते हैं….केवल कर्म ही हैं, जो किसी विचार को मूल्यवान बनाते हैं.—इमर्सन

वर्ष 1873, सिंतबर महीने का 24वां दिन. महाराष्ट्र का मुंबई के बाद दूसरे सबसे बड़े महानगर पुणे का जूनागंज मुहल्ला, मकान नंबर 527. सभागार में पुणे सहित महाराष्ट्र के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से पहुंचे करीब 60 लोग जमा थे. उन्हें ज्योतिबा ने आमंत्रित किया था. बाकी का आना जारी था. ज्योतिबा स्वयं अतिथियों की अगवानी करने में लगे थे. उस समय तक उनकी प्रतिष्ठा शिखर पर पहुंच चुकी थी. पूरा महाराष्ट्र, खासकर पुणे ज्योतिबा को लेकर दो हिस्सों में बंटा हुआ था. एक ओर वे लोग थे जो उनके विकास-पुरुष कहकर उनका सम्मान करते थे. महाराष्ट्र में शिक्षा-क्रांति के जन्मदाता के रूप में उनका सम्मान करते थे. दूसरी ओर थे कट्टरपंथी ब्राह्मण, जिन्हें बदलाव के नाम से ही चिढ़ थी. साथ में वे लोग भी थे, जो अपना दिलो-दिमाग ब्राह्मणवाद के आगे गिरवी रख चुके थे. समाज में व्याप्त अशिक्षा, आडंबरवाद और जातीय विषमता के विरोध में संघर्ष करते हुए फुले को 25 वर्ष से अधिक हो चुके थे. इस बीच उनके संघर्ष का दायरा बढ़ा था. अब उन्हें लगता है कि आगे के सफर के लिए कुछ सहयोगियों को साथ रखना जरूरी होगा. काम समाज का है तो जितने ज्यादा से ज्यादा लोग साथ निभाएं उतना ही अच्छा.

इसी पर विचार करने के लिए महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों से बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को आमंत्रित किया गया था. सभा में ज्योतिबा ने जोरदार भाषण दिया. कहा कि समाज को जातिवाद, पुरोहितवाद, अंधविश्वास और अशिक्षा के दुष्चक्र से बाहर लाने के लिए लोगों को जागरूक करना होगा. यह काम अभी तक सब अपने-अपने स्तर पर करते आ रहे हैं. इस बीच उनके विरोधी संगठित हुए हैं. इसलिए आंदोलन को मजबूती से आगे बढ़ाने के लिए उन्हें मजबूत संगठन की आवश्यकता है. उपस्थित लोगों ने हर्षध्वनि के साथ प्रस्ताव पर मुहर लगा दी. संगठन को नाम दिया गया—‘सत्यशोधक समाज’. ज्योतिबा ने नवगठित संगठन के अध्यक्ष और खजांची का पद-भार संभाला. सचिव का दायित्व सौंपा गया—नारायणराव गोपालराव कडलक को. ज्योतिबा के तीन ब्राह्मण मित्रों विनायक बापूजी भंडारकर, विनायक बापूजी डांगले और सीताराम सखाराम दतार की भी संगठन के निर्माण में प्रमुख भूमिका थी. समाज के तीन प्रारंभिक उद्देश्य थे. पहला—ईश्वर एक है, सब उसकी संतान हैं. दूसरा—जैसे माता-पिता से संवाद के लिए किसी बिचौलिए की आवश्यकता नहीं पड़ती, वैसे ही ईश्वर की अराधना के लिए भी किसी मध्यस्थ यानी पुरोहित की जरूरत नहीं है. तीसरा—किसी भी जाति, धर्म को मानने वाला कोई भी व्यक्ति जो समाज के उद्देश्य और लक्ष्य के प्रति एक-भाव रखता हो, उसका सदस्य बन सकता है.

उस समय देश-भर में राजा राममोहनराय का ‘ब्रह्म समाज’, केशवचंद सेन का ‘प्रार्थना समाज’, महादेव गोविंद रानाडे का ‘पुणे सार्वजनिक सभा’—जैसे अनगिनत संगठन समाज-सुधार के क्षेत्र में कार्यरत थे. ऐसे में नए संगठन की क्या आवश्यकता थी? दरअसल उस समय तक जितने भी संगठन समाज सुधार के क्षेत्र में काम कर रहे थे, सभी द्विजों द्वारा, द्विजों की हित-सिद्धि हेतु बनाए गए थे. उनके लिए बस इतना समाज-सुधार अभीष्ट था कि चमार के घर में जन्म लेने वाला चमार रहे, जूते गांठे, मरे पशुओं की खाल निकाले, जरूरत पड़ने पर जमींदार की बेगार बजाए, उसी से संतुष्ट रहें. बस इतना हो कि काम के आधार पर उन्हें कोई ओछा न माने. किसी तरह का दुव्र्यवहार उसके साथ न हो. शिक्षा के मामले में राजा राममोहनराय सहित उस समय के द्विज समाज सुधारकों का सोच था कि पहले ऊंची जातियां पढ़-लिख जाएं. वे पढ़-लिख जाएंगी तो नीचे तक शिक्षा अपने आप चली जाएगी. यह अर्थशास्त्र के प्रचलित सिद्धांत—‘ट्रिकिल डाउन थियरी’ जैसा था, जिसे हिंदी में ‘रिसाव का सिद्धांत’ कह दिया जाता है. उसके अनुसार ऊपर के स्तर पर समृद्धि होगी तो बूंद-बूंद रिसकर नीचे भी आएगी. इस सिद्धांत की आलोचना उसकी शुरुआत से ही होने लगी थी. बावजूद इसके अधिकांश समाज-सुधारक ‘रिसाव के सिद्धांत’ पर भरोसा कर, काम करते रहे. उनसे पूछा जा सकता था कि शताब्दियों तक कथित विश्व-गुरु रहने के बावजूद भारत में निचली जातियां अज्ञान के अंधकार में क्यों दबी थीं? ऊपर के वर्गों की शिक्षा, उनकी ज्ञान-संपदा और चालाकियां निचले वर्गों तक क्यों अंतरित नहीं हुईं? यह भी पूछा जा सकता था के ‘महासागर’ के लोकहित में पुनः-पुनः उमगने, सभी को साथ लेकर चलने से किसने रोका था? जो लोग 2000-2500 वर्षों में तक ऊपर के वर्गों की समृद्धि और ज्ञान संपदा नीचे रिसने से रोके रहे, क्या वे उनके कहने भर से एकाएक मान जाएंगे? ज्योतिबा का स्पष्ट मत था कि वे नहीं मानने वाले. ब्राह्मण तो हरगिज नहीं, क्योंकि वर्तमान वर्ण-व्यवस्था उनके आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक हितों की पूर्ति करती है. शताब्दियों से बिना कुछ किए-धरे मिल रहे मान-सम्मान, जिसे वे दैवीय कहते हैं, को छोड़ना उनके लिए संभव नहीं. इसलिए बहुजन शूद्र-अतिशूद्रों को अपने विकास के लिए प्रयास स्वयं ही करने होंगे. इसके लिए एक सशक्त संगठन की जरूरत थी. ऐसे सक्रिय, जुझारू और ईमानदार लोगों की जरूरत थी जो संगठन के आदर्शों की प्रति समर्पित होकर लगातार काम कर सकें. उससे पहले जितने भी संगठन थे, सभी समाज के शीर्ष वर्ग के सदस्यों ने गठित किए थे. ‘सत्यशोधक समाज’ ऐसा संगठन था जिसकी स्थापना समाज के बहुजन शूद्रों अतिशूद्रों ने अपने अधिकारों की बहाली के लिए स्वयं की थी. ‘सत्यशोधक समाज’ के पहले वर्ष की रिपोर्ट में कहा गया था कि उसकी स्थापना—

‘ब्राह्मण, पंडित, जोशी, उपाध्याय-पुरोहित आदि लोगों, जो अपने स्वार्थी (धर्म)ग्रंथों द्वारा हजारों वर्षों से शूद्रों को नीच समझकर लूटते आ रहे हैं—से मुक्त करने के लिए की गई है. इसलिए उपदेश और ज्ञान के द्वारा लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने; अर्थात धर्म एवं व्यवहार से संबंधित ब्राह्मणों के छदम्, स्वार्थी ग्रंथों से जनसाधारण को मुक्ति दिलाने हेतु कुछ जागरूक शूद्रों ने इस समाज की स्थापना की है.’

‘सत्यशोधक समाज’ पूरी तरह से गैर-राजनीतिक संगठन था. राजनीतिक सवालों पर बोलना उसमें सख्त मना था.  यह फुले का जनता पर प्रभाव और अनूठी कार्यशैली थी कि ‘सत्यशोधक समाज’’ को पांव जमाते देर न लगी. स्थापना के कुछ ही महीनों में मुंबई और पुणे के शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में उसकी शाखाएं स्थापित होने लगीं. उसका प्रभाव लगभग सभी शूद्र ओर अतिशूद्र जातियों पर था, फिर भी माली और कुन्बी जातियों का उत्साह सबसे बढ़-चढ़कर था. वे ‘सत्यशोधक समाज’ के आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही थीं. 1874 में समाज की मुंबई शाखा का उद्घाटन किया गया. उसके पीछे मुख्य योगदान तेलूगु के कमाठी और माली जाति के सदस्यों का था. 1884 में समाज का विस्तार जुन्नार परिक्षेत्र और पश्चिमी पुणे, अहमदनगर के इंदापुर तहसील और थाणे तक फैल गया. अगले दो वर्षों में वह लगभग सभी मराठी भाषी क्षेत्रों तक फैल चुका था. एक वर्ष पूरा होते-होते उसके 232 औपचारिक सदस्य बन चुके थे. लोगों ने शादी-विवाह, नामकरण जैसे अवसरों पर ब्राह्मण पुरोहितों को बुलाना छोड़ दिया था. ‘सत्यशोधक समाज’ के सिद्धांतों पर ज्योतिबा फुले के विचारों की स्पष्ट छाया थी. उनका मानना था कि विवाह के समय पंडित-पुरोहित अपने स्वार्थ को ध्यान में रखकर शूद्रों को बरगलाते हैं. उनका पूरा ध्यान यजमान से अधिक से अधिक दक्षिणा वसूलने पर रहता है. शूद्रों-अतिशूद्रों का हित इसी में है कि ऐसे अवसरों पर ब्राह्मण पुरोहित को दूर रखा जाए. इस लक्ष्य में ‘सत्यशोधक समाज’ को सफलता भी मिली थी. सतारा निवासी गोविंदराव बापूजी भिलारे ने ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना के पहले वर्ष में छह विवाह, तथा दूसरे वर्ष में पांच विवाह बगैर ब्राह्मण पुरोहित की उपस्थिति के कराए थे. ‘सत्यशोधक समाज’ की पद्धति के अनुरूप पहला विवाह, 25 दिसंबर, 1873 को पेठ जूनागंज, पूना के रहने वाले सीताराम जवाजी आल्हाट और राधाबाई ग्यानोबा निंबणकर के बीच संपन्न हुआ था. उसमें अन्य लोगों के अलावा सावित्रीबाई फुले और श्रीमती बजूबाई ग्यानोबा निंबणकर ने भी वर-वधु की आर्थिक मदद की थी. दूसरा विवाह ग्यानोबा कृष्णाजी ससाने, मुकाम हड़पसर, पूना का काशीबाई, पुत्री श्री नारायणराव विठोजी शिंदे, निवासी पर्वती, पूना के बीच संपन्न हुआ था. इस बार भी समाज के सदस्यों ने नव-दंपति को उपहार आदि देकर सम्मानित किया था.

‘सत्यशोधक समाज’ द्वारा सामाजिक कार्यक्रमों में ब्राह्मण पुरोहित की अनिवार्यता को खत्म करने से स्वयं ब्राह्मण समाज उनसे बुरी तरह नाराज था. वे अपनी पुनर्वापसी के लिए तरह-तरह के प्रयास कर रहे थे. ग्यानोबा ससाने और काशीबाई का विवाह पहले हड़पसर में होना था. लेकिन एक दुष्ट दलाल ने ऊल-जुलूल बातों द्वारा लड़के के रिश्तेदारों और दोस्तों के दिमाग में भ्रम पैदा कर दिया था. उससे बचने के लिए ज्योतिबा ने विवाह को पूना में कराने का सुझाव दिया. वहां भी लोगों को भड़काने वाले कम न थे. पंडितों के बहकावे में आकर मारुति सटवाजी फुले तथा तुकाराम खंडोजी फुले ने दोनों पक्षों को भड़काने के लिए अफवाह फैलाई कि, ‘हमारे दुर्बल बच्चों के विवाह इन लोगों के जानते-बूझते हुए हैं. उनमें से एक दुलहन उम्र में दो वर्ष की थी, जो ब्याह के कुछ ही दिनों में मर गई. इस लापरवाही के लिए तुकाराम सोनाजी भुजबल को करीब 400 रुपये का नुकसान सहना पड़ा.’ आखिकर ‘सत्यशोधक समाज’ के कार्यकर्ता बाबाजी राणोजी फुले के हस्तक्षेप से वह विवाह पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार संपन्न हो सका. इसके बावजूद ब्राह्मणों ने हार नहीं मानी थी. उन्होंने शूद्र-अतिशूद्रों को यह कहकर भड़काना शुरू कर दिया था कि बिना पुरोहित के उनकी प्रार्थनाएं ईश्वर तक नहीं पहुंच पाएंगीं. घबराए हुए लोग फुले के पास गए. फुले ने उन्हें समझाया कि जब तमिल, बंगाली, मलयाली, कन्नड, फारसी आदि गैर-संस्कृत भाषी लोगों की प्रार्थनाएं ईश्वर तक पहुंच सकती हैं, तब उनकी प्रार्थना कैसे अनसुनी रह सकती है. हम अपने माता-पिता, अभिभावक से सीधे संवाद करते हैं. इसलिए ईश्वर को अपना पिता मानने वालों को भी उससे डरने, घबराने तथा पूजा-अर्चना के लिए पुरोहित को बीच में लाने की आवश्यकता कतई नहीं है. फिर भी यदि कोई पूजा-पाठ जैसे कार्यों में पुरोहित की भूमिका को आवश्यक समझता है, तो वह अपनी ही जाति के अनुभवी व्यक्ति को यह जिम्मेदारी सौंपकर अपने मन को समझा सकता है.

धीरे-धीरे ही सही, लोग ज्योतिबा की बातों को समझने लगे थे. तीसरे वर्ष के दौरान उसकी सदस्य संख्या बढ़कर 316 तक पहुँच चुकी थी. दूसरी ओर उनके विरोधी भी शांत न थे. एक परिवार में शादी होने वाली थी. पुरोहितों ने उस घर में पहुंचकर डराया कि बिना ब्राह्मण एवं संस्कृत मंत्रों के हुआ विवाह ईश्वर की दृष्टि में अशुभ माना जाएगा. उसके अत्यंत बुरे परिणाम होंगे. गृहणी सावित्रीबाई फुले को जानती थी. फुले को पता चला उन्होंने ‘सत्यशोधक समाज’ के बैनर तले विवाह संपन्न कराने का ऐलान कर दिया. सैकड़ों सदस्यों की उपस्थिति में वह विवाह खुशी-खुशी संपन्न हुआ. प्रत्येक व्यक्ति कोई न कोई उपहार लेकर पहुंचा था. उस घटना के बाद ब्राह्मण सतर्क हो गए. एक अन्य घटना में ब्राह्मणों ने दूल्हे के पिता को धमकी दी. लोगों को यह कहकर भड़काया कि फुले उन्हें ईसाई बना देना चाहते हैं. लेकिन ज्योतिबा के लिए ऐसी चुनौतियां नई नहीं थीं. न ही वे धमकियों से डरने वाले थे. अप्रिय घटना से बचने के लिए उन्होंने प्रशासन से मदद मांगी. पुलिस आई और उसकी निगरानी में वह विवाह सफलतापूर्वक संपन्न हुआ.

‘सत्यशोधक समाज’ के दूसरे वर्ष की रिपोर्ट के अनुसार तब तक उसके में एक और घटना का उल्लेख किया गया है. विट्ठल नामदेव गुठाड़ पुणे के व्यापारी थे. गुठाड़ ने समाज की पद्धति के अनुसार ब्राह्मण को बुलाए बिना ही गृहप्रवेश कर लिया. इससे ब्राह्मणों ने उनके व्यापारिक हिस्सेदार को इतना भड़काया कि उसने हिस्सेदारी तोड़ दी. विरोधी इतने से ही शांत नहीं हुए. उन्होंने गुठाड़ के कामकाज में इतनी परेशानियां पैदा कीं कि उनका व्यापार घाटे में आ गया. हालात यहां तक पहुंच गए कि बच्चे के स्कूल की फीस जमा करने में मुश्किल होने लगी. मामला जब ‘सत्यशोधक समाज’ के सदस्यों के संज्ञान में पहुंचा तो उन्हें गुठाड़ के प्रति चिंता होने लगी. आखिरकार उनकी मदद के लिए गंगाराम भाऊ म्हस्के ने बच्चे के स्कूल की फीस के लिए तीन रुपये प्रतिमाह छात्रवृत्ति देने का ऐलान कर दिया. पांच माह तक गुठाड़ ने वह छात्रवृत्ति ली. बाद में जब उनका व्यापार पटरी पर लौट आया तो उन्होंने म्हस्के का आभार व्यक्त करते हुए और अधिक मदद लेने से इन्कार कर दिया.

केवल शिक्षा ही नहीं, सामाजिक मदद के लिए भी ‘सत्यशोधक समाज’ के सदस्य हमेशा आगे रहते थे. सितंबर 1875 में अतिवृष्टि के कारण अहमदाबाद में जल-प्रलय जैसे हालात पैदा हो चुके थे. परिणामस्वरूप हजारों लोगों के आगे जीवन का संकट पैदा हो गया. भीषण बारिश के कारण उनके कपड़े, अनाज, घर आदि सब-कुछ नष्ट हो चुका था. ऐसे आपदाग्रस्त लोगों की मदद के लिए ‘सत्यशोधक समाज’ के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ.  विश्राम रामजी घोले ने सदस्यों से मदद के लिए आगे आने का आवाह्न किया. उसके बाद कुल 195 रुपये की रकम चंदे के रूप में जमा की गई. वह धनराशि अहमदाबाद के कलेक्टर को बाढ़-पीड़ितों की मदद के लिए भेज दी गई. उसकी देखा-देखी ‘सत्यशोधक समाज’ की मुंबई शाखा भी सक्रिय हुई. वहां भी 130 रुपये चंदा के रूप में उगाहकर अहमदाबाद के कलेक्टर के पास भेज दिए गए.

इस बीच कुछ लोगों ने यह कहना आरंभ कर दिया कि बगैर ब्राह्मण पुरोहित की मौजूदगी के होने वाले विवाह  हिंदू रीति-नीति या कानून, किसी भी आधार पर मान्य नहीं हैं. इस कारण लोगों के मन में शंका उत्पन्न होने लगी थी. उसके समाधान के लिए ‘सत्यशोधक समाज’ के अध्यक्ष की ओर से एक पत्र उच्च न्यायालय के एक अधिकारी राघवेंद्रराव रामचंद्रराव को पत्र लिखकर उन विवाहों की वैधता के बारे में राय देने का अनुरोध किया. जवाब में राघवेंद्रराव ने कानूनी प्रमाणों के आधार पर बताया कि ‘सत्यशोधक समाज’ की पद्धति के अनुसार हो रहे सभी विवाह कानून सम्मत हैं. ज्योतिबा समझते थे कि सामाजिक रूढ़ियों से जूझने के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता अपरिहार्य है. शूद्रों में रचनात्मक प्रतिभा का विकास हो, वे लिखने-पढ़ने के लिए आगे आएं, इसके लिए ‘सत्यशोधक समाज’ ने ऐलान किया कि खेती की उन्नति के उपायों के बारे में शूद्रों में से जो-जो व्यक्ति मौलिक पुस्तक की रचना करेंगे, उनमें से प्रत्येक को डॉ. विश्राम रामजी घोले और रामशेट बापूशेट उरवणे की ओर से 25-25 रुपये का पुरस्कार दिया जाएगा.

अधिकांश शूद्र-अतिशूद्र खेती या दूसरे मेहनत-मजदूरी वाले कामों में जुटे थे. कई बार बच्चों को परिवार के काम में हाथ बंटाना पड़ता था. इस कारण वह दिन में स्कूल जाने के लिए समय नहीं निकाल पाता था. ऐसे युवकों की पढ़ाई अवरुद्ध न हो इसके लिए भांबुर्डे नामक गांव में रात्रि-पाठशाला की शुरुआत की गई थी. समाज को रात्रि-पाठशाला के कामकाज के बारे में शिकायत मिली तो उसने तत्काल, 3 महीने की अवधि के लिए कृष्णराव नामक व्यक्ति को नियुक्त कर दिया. उसका काम था, पाठशाला का नियमित निरीक्षण कर, उसकी रिपोर्ट समाज को देना. शिक्षा के प्रति जागरूकता की कमी के चलते शूद्र और अतिशूद्र परिवारों के बच्चे स्कूल से कन्नी काट जाते थे. इसे देखते हुए समाज ने पांच रुपये प्रतिमाह की वृत्तिका पर एक पट्टेवाले को नौकरी पर रखा. उसका काम था, बच्चों में शिक्षा के प्रति जागरूकता लाना तथा उन्हें सही समय पर स्कूल पहुंचाना. उच्च शिक्षा के लिए भी ‘सत्यशोधक समाज’ की ओर से व्यवस्था की गई थी. विश्राम रामजी घोले ने समाज की ओर से इंजीनियरिंग कालेज के समक्ष एक प्रतिवेदन पेश किया गया था. प्रतिवेदन में शूद्र विद्यार्थियों को निःशुल्क शिक्षा देने की प्रार्थना की गई थी. उसका सकारात्मक असर हुआ. 1876 में इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रधानाचार्य मिस्टर कूक ने 2-3 गरीब विद्यार्थियों को निःशुल्क शिक्षा के लिए भर्ती किया था. बच्चों में भाषण कला के विकास के लिए भी 2 मई 1876 को व्याख्यान प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था. व्याख्यान के लिए दो विषय निर्धारित किए गए. पहला था—‘हिंदुस्तान की जातिभेद समस्या से व्यावहारिक लाभ और हानि’. और दूसर था ‘मूर्तिपूजा से लाभ और हानि’. ‘जातिभेद समस्या से व्यावहारिक लाभ और हानि’ विषय पर व्याख्यान के लिए द्वारकानाथ त्रिंबक सोनार को पहला और गणपत तुकाराम कुंहाड़े को दूसरा स्थान प्राप्त हुआ. प्रथम विजेता को समाज की ओर से 10 रुपये तथा द्वितीय विजेता को डॉ. विश्राम रामजी घोले घोले की ओर से 5 रुपये की सम्मान राशि दी गई थी. दूसरे विषय पर दामोदर बापूजी शिंपी को समाज के फंड से दस रुपये तथा आनंदराव रणछोड़ को रामशेट बापूशेट तुरवणे की ओर से 5 रुपये की सम्मान राशि प्रदान की गई थी. एक और वक्ता गोपाल विश्राम घोले को प्रोत्साहन पुरस्कार के रूप में ज्योतिराव की ओर से 3 रुपये प्रदान किए गए थे. ‘सत्यशोधक समाज’ गरीब बच्चों को पढ़ाई की ओर उन्मुख करने के छात्रवृत्ति आदि के रूप में तरह-तरह से मदद करता था.

‘सत्यशोधक समाज’ की गतिविधियों से प्रसन्न होकर लोग तरह-तरह से उसकी मदद के लिए आगे आ रहे थे. हरीरामजी चिपलूनकर ब्राह्मण थे. वे समाज के सदस्य भी नहीं थे. बावजूद इसके उन्होंने शूद्र विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति के लिए प्रतिवर्ष 60 रुपये देने की घोषणा की थी. रामचंद्र मनसाराम ढवारे नाईक पुणे के बड़े ठेकेदार माने जाते थे. उनकी बेतालपेठ में दुमंजिली इमारत थी. उस इमारत को एक मारवाड़ी सेठ 16 रुपये प्रतिमाह पर किराये पर लेने को सहमत था. ‘सत्यशोधक समाज’ को अपने कामकाज के लिए ऐसे ही स्थान की आवश्यकता थी. अध्यक्ष विश्राम रामजी घोले ने तत्काल रामचंद्र नाईक को पत्र लिखकर उस इमारत को सत्यशोधक के कामकाज के लिए देने का अनुरोध किया. रामचंद नाईक ने मात्र 10 रुपये प्रतिमाह के किराये पर वह इमारत समाज को सौंप दी. यही नहीं, उन्होंने समाज के कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए 20 रुपये का चंदा भी अपनी ओर से दिया. बाहर से आए शूद्र विद्यार्थियों के भोजन, आवास और अध्ययन की व्यवस्था के लिए समाज ने छात्रावास के निर्माण का फैसला किया था.

शूद्रों और अतिशूद्रों के बीच शिक्षा का प्रचार-प्रसार ज्योतिबा के जीवन का प्रमुख उद्देश्य था. इसके लिए उन्होंने स्वयं कई पाठशालाओं की स्थापना की थी. इसी को आगे बढ़ाते हुए ‘सत्यशोधक समाज’ ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के प्रसार के लिए काम कर रहा था. समाज की ओर से पूना से पांच किलोमीटर दूर हड़पसर में एक विद्यालय की स्थापना की गई थी. सरकारी विद्यालयों में गरीब बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दिलाने के लिए उसने संबंधित अधिकारियों को कई पत्र लिखे थे. उसके फलस्वरूप ‘सार्वजनिक निर्देश’ विभाग के निदेशक के.एम. चेटफील्ड ने एक आदेश के द्वारा सरकारी स्कूलों के लिए एक आदेश जारी किया गया, जिसके अनुसार उनमें पांच प्रतिशत स्थान गरीब शूद्र बच्चों के लिए आरक्षित कर दिए गए थे.

जुलाई 1875 में महर्षि दयानंद, महादेव गोविंद रानाडे के आमंत्रण पर पूना गए थे. उस समय तक ‘आर्यसमाज’ की स्थापना को 15 महीने बीत चुके थे. दयानंद उसके प्रचार के लिए देश-भर की यात्रा कर रहे थे. दो महीने के पूना प्रवास के दौरान दयानंद वहां ‘आर्यसमाज’ के प्रचार के लिए कई सभाएं कर चुके थे. उनके कई विचार ‘प्रार्थना समाज’ और रानाडे के ‘पूना सार्वजनिक सभा’ के सिद्धांतों से मेल खाते थे. इसलिए रानाडे सहित कुछ और सुधारवादियों ने दयानंद के सम्मान में जुलूस निकालने का निर्णय लिया. पुरातनपंथियों के लिए वह सीधी चुनौती थी. वे उसके विरोध पर आमादा हो गए. जुलूस के लिए 5 सिंतबर 1875 का दिन तय किया गया था. रानाडे उसकी तैयारी में जुटे थे. जुलूस के लिए पुलिस को भी सूचना दी जा चुकी थी. इस बीच सूचना मिली कि जुलूस में विघ्न डालने के लिए कट्टरपंथी बड़े पैमाने पर विरोध की तैयारी में जुटे हैं. स्थिति से निपटने के लिए जुलूस से एक दिन पहले, सुधारवादियों ने ज्योतिबा फुले से संपर्क किया. ‘आर्यसमाज’ का जाति और छूआछूत विरोधी अभियान, ‘सत्यशोधक समाज’ के मूल सिद्धांतों से मेल खाता था. इसलिए ज्योतिबा उनके साथ सहयोग करने के लिए तैयार हो गए. अगले दिन जुलूस निकला. दयानंद हाथी पर सवार थे. आगे-आगे उनके समर्थक नाचते-गाते, ढोल बजाते हुए चल रहे थे. ज्योतिबा स्वयं रानाडे के साथ जुलूस में शामिल थे. उनके पीछे ‘सत्यशोधक समाज’ के सैकड़ों कार्यकर्ता थे. उधर कट्टरपंथी किसी भी तरह से जुलूस में व्यवधान डालने पर आमादा थे. वे नहीं चाहते थे कि पूना में ऐसे किसी नए आंदोलन को जन्म मिले, जो ‘सत्यशोधक समाज’ की भांति उनकी हजारों वर्ष पुरानी सत्ता को चुनौती देता हो. दयानंद का उपहास उड़ाने के लिए उन्होंने एक गधे को सजाकर उसे ‘गदर्भानंद’ का नाम दिया था. जैसे ही महर्षि दयानंद का जुलूस अपने नियत स्थल पर पहुंचा, कट्टरपंथी भी सजे-धजे ‘गदर्भानंद’ के साथ उनके सामने पहुंच गए. दोनों के बीच टकराव हो गया. टकराव बड़ी हिंसा का रूप ले, उससे पहले ही पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया. उपद्रवी यहां-वहां शरण लेने के लिए भागने लगे. उसके बाद दयानंद ने वहां अपना प्रवचन दिया.

‘आर्यसमाज’ वेदों को प्रामाण्य मानता था, ठीक ऐसे ही जैसे मुस्लिम कुरआन को दैवीय ग्रंथ मानते हैं. महाराष्ट्र, विशेषकर पूना में पेशवाओं के समर्थन के कारण ब्राह्मण अत्यंत शक्तिशाली बन चुके थे. इस कारण वहां जातिवाद की जड़ें भी बहुत गहरी थीं. ‘गुलामगिरी’, ‘तृतीय रत्न’ जैसी रचनाओं के माध्यम से ज्योतिबा तथा उनके द्वारा गठित ‘सत्यशोधक समाज’, जातिभेद और पुरोहितवाद को नकारकर—ब्राह्मणवाद को सीधी चुनौती दे रहे थे. दूसरी ओर वेदों को सर्वोपरि बताकर ‘आर्यसमाज’ छद्म रूप से ब्राह्मणवाद को संरक्षण देता था. इस कारण शूद्रों और अतिशूद्रों के मन में उसके प्रति संदेह का भाव था. ब्राह्मणों के लिए हर वह व्यक्ति जो उनके जातीय वर्चस्व को चुनौती दे, उसे वे देश और धर्म दोनों का दुश्मन मानते थे. यही कारण है कि पूना में दो महीनों तक लगातार प्रचार करने और जाति-भेद को नकारने के बावजूद, ‘आर्यसमाज’ को महाराष्ट्र में अपेक्षित सफलता न मिल सकी.

ज्योतिराव अपना संदेश लोगों तक कैसे पहुंचाते थे, इसका एक रोचक किस्सा रोजलिंड ओ’ हेनलान ने अपनी पुस्तक ‘कास्ट कनफिलिक्ट एंड आइडियालाजी’(पृष्ठ-251) में दिया है. यह एक घटना को लेकर है, जिसके बारे में फुले के व्यापारिक सहयोगी और मित्र ज्ञानोबा ससाने ने बताया था—‘एक बार की बात है. फुले अपने मित्र ज्ञानोबा ससाने के साथ पुणे के बाहर स्थित एक बगीचे के भ्रमण के लिए गए. वहां एक कुआं था, जिससे उस बगीचे की सिंचाई होती थी. जैसे ही दोपहर का अवकाश हुआ, सभी कर्मचारी खाना खाने चले गए. यह देख फुले कुएं तक पहुंचे और कुएं के डोल को चलाने लगे. इसके साथ-साथ वे गीत गाने लगे. उन्हें गीत गाता देख वहां काम करने वाले मजदूर हंसने लगे. इसपर फुले ने बताया कि इसमें हंसने की बात क्या है? मजदूर लोग काम करते हुए अकसर गाते-बजाते हैं, केवल मेहनत से जी चुराने वाले फुर्सत के समय वाद्ययंत्रों का शौक फरमाते हैं. असली मेहनतकश जैसा काम करता है, वैसा ही अपना संगीत गढ़ लेता है.’

ज्योतिबा फुले आजन्म सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करते रहे. उनका सपना ऐसे समाज की स्थापना का था, जो सर्व-समानता के सिद्धांत पर आधारित हो. इसके लिए आजीवन संघर्ष करते रहे. 11 मई 1888 को ‘सत्यशोधक समाज’ और नगर के प्रमुख सुधारवादी नेताओं ने उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि से अलंकृत किया. हालांकि उनके व्यक्तित्व और कृतित्व कोई भी उपाधि छोटी पड़ जाती है.

ओमप्रकाश कश्यप

बालक और उसका समयबोध

सामान्य

ओमप्रकाश कश्यप

इस लेख का उद्देश्य न तो बालक को समय-प्रबंधन के गुर सिखाना है. न उसे समय-संबंधी दार्शनिक जटिलताओं में उलझाना. हम बालक तथा उसके समयबोध को लेकर सामान्य चर्चा करेंगे. यह जानने की कोशिश करेंगे कि समय को लेकर बालक की जो प्रतीतियां हैं; स्कूल से लेकर घर तक, समय के बारे में उसे जितना और जैसा समझाया जाता है, क्या उसके समय-प्रबोधन का वही एकमात्र और सही तरीका है? बालक के व्यक्तित्व पर समय से संबंधित ऐसी प्रतीतियों और प्रज्ञप्तियों का जो तर्क एवं ज्ञान से परे, केवल सुनी-सुनाई बातों अथवा पूर्वाग्रहों पर आधारित हैं—क्या कोई दुप्रभाव पड़ता है? क्या वे बालक के स्वतंत्र विवेक की राह में बाधक हैं? आदिकाल से ही मानवमन में एक किस्सागो बैठा हुआ है, जो मनुष्य को अपने आसपास के परिवेश के बारे में झूठी-सच्ची कहानियां गढ़ने; तथा उनके साथ किसी न किसी रूप में अपना संबंध स्थापित करने को प्रेरित करता रहता है. आमतौर पर वे कहानियां संबंधित समाज की सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक मानी जाती हैं. धर्म, ईश्वर, किस्म-किस्म के देवी-देवता सब उसी मानस किस्सागो की कल्पना हैं. क्या समय भी मनुष्य की ऐसी ही रोचक परिकल्पना है?

स्पर्धा के इस युग में बालक को अन्य चुनौतियों के साथ-साथ समय की चुनौती से भी जूझना पड़ता है. जो लोग समय को अनादि, अनंत तथा सतत प्रवाहमान मानते हैं, वही उसकी कमी का हवाला देकर बालक को डराते रहते हैं. खुद को ‘बड़ा’ समझने वाला प्रत्येक व्यक्ति बालक को सावधान करता है—‘समय बरबाद मत करो. वह किसी की प्रतीक्षा नहीं करता. जरा-भी चूके तो हाथ से फिसल जाएगा….समय के साथ चलो, चलते रहो, नहीं तो पिछड़ जाओगे.’ ऐसे निर्देश बालक को अभिभावकों तथा अध्यापकों की ओर से निरंतर, इतनी बार तथा इतनी तरह से सुनने को मिलते हैं कि उसका आत्मविश्वास डगमगाने लगता है. अपनी सीमाओं में वह समय की चुनौतियों से निपटने की कोशिश भी करता है. उसके लिए समय-सारणी बनाता है. अपने अध्ययन-कार्य को छोटे-छोटे उपखंडों में बांटता है. घड़ी की टिक-टिक के साथ सामंजस्य बैठाने की कोशिश करता है. इसके बावजूद चुनौती बनी ही रहती है. क्योंकि खंडों-उपखंडों में समाहित प्रत्येक घटना बालक के अधिकार में नहीं होती. किसी न किसी रूप में दूसरे भी उससे जुड़े होते हैं.

नई शिक्षा व्यवस्था में सहयोग की अपेक्षा स्पर्धा पर ज्यादा जोर दिया जाता है. पर्याप्त सहयोग-समर्थन के अभाव में बालक अपनी ही बनाई समय-सारणी के हिसाब से पिछड़ने लगता है. बड़े टोकते हैं. बालक कोशिश करता है. कभी सफल होता है, कभी परिस्थितियां भारी पड़ जाती हैं. ऐसे में समय हाथ से निकल जाने की चिंता बालक का पीछा नहीं छोड़ती. धीरे-धीरे वह उसके आत्मविश्वास पर भारी पड़ने लगती है. ऐसा नहीं है कि केवल बालक ही समय के बारे में प्रचलित पूर्वाग्रहों से प्रभावित होता है. बड़े भी उससे मुक्त नहीं रह पाते. समय-संबंधी पूर्वाग्रह तो प्रायः बड़ों के माध्यम से ही बच्चों तक पहुंचाए जाते हैं. बालक उन्हें लंबे समय तक, कभी-कभी जीवन-भर विरासत के तौर पर संभाले रखता है.

सामान्य दिनचर्या में समय को ‘सर्वशक्तिमान’ के रूप में पेश किया जाता है. ऐसा महानायक जो कथित देवी-देवताओं से भी ऊपर, सीधे किसी पराशक्ति के अधीन है. जो दैवीय आदेशों से अनुशासित होता है. कभी बताया जाता है कि खुद ईश्वर भी समय के बंधन में बंधा है. भारतीय समाज की जो स्थिति है, उसमें किशोरावस्था तक पहुंचते-पहुंचते बालक अंध-श्रद्धा का शिकार हो चुका होता है. उसके बाद वह तर्क छोड़ आस्था की राह पकड़ लेता है; तथा दैवीय अनुकंपा को समस्त समस्याओं का एकमात्र समाधान मानने लगता है. ईश्वर का जिक्र हो तो वह सर्वशक्तिमान के रूप में सर्वप्रथम उसी की कल्पना करता है. किंतु अगले ही क्षण जब समय की चुनौती सामने होती है, तब वही उसे सर्वशक्तिमान नजर आने लगता है. समय और तथाकथित ईश्वर को लेकर गढ़ी गई कहानियां भी एक-दूसरे में गड्ड-मड्ड होती हैं. उनमें कहीं ईश्वर समय पर भारी पड़ता है तो कभी समय ईश्वर के सामने चुनौती बन जाता है. इससे बालक की उलझन सुलझने के बजाय और भी उलझ जाती है. भ्रांत बालमन समझ ही नहीं पाता कि पराशक्ति हो अथवा समय, दोनों में कोई एक ही सर्वशक्तिमान हो सकता है. ऊहापोह में वह किसी कार्य को तत्संबंधी घटनाओं के संबंध में देखने-समझने के बजाय, आस्था और पूर्वाग्रहों द्वारा नियंत्रित होने लगता है. यहीं से उसके विचलन का दौर आरंभ होता है, जो उसे वास्तविक और अन्वीक्षणात्मक ज्ञान के बजाय आभासी दुनिया में ले जाकर छोड़ देता है─जहां या तो निरे सपने होते या फिर परंपराओं का बोझ. जहाँ    

रोजमर्रा के कार्य के सिलसिले में बालक द्वारा घड़ी देखने का सिलसिला सुबह के साथ आरंभ हो जाता है. उसके बाद नहाने, नाश्ता करने, स्कूल जाने, स्कूल में टाइम-टेबिल के अनुसार विभिन्न विषयों का पाठ करने, लंच करने, खेलने, घर लौटने, आराम करने, होमवर्क निपटाने, टेलीविजन देखने, भोजन करने से लेकर रात को बिस्तर तक जाने के बीच अपने माता-पिता की भांति बालक भी समय के हिसाब-किताब में उलझा रहता है. उसके समस्त कार्यकलाप छोटे-छोटे टाइम-पॉकेट में बंधे होते हैं. हर पीरियड के साथ स्कूल की घड़ी बदले समय और चुनौती का एहसास कराती है. बीच-बीच में जब भी घटनाक्रम बदलता है, बालक की निगाहें घड़ी की सुइयों में उलझकर रह जाती हैं. उसके सामने चुनौती होती है कि वह न केवल समय के साथ अपनी दिन-चर्या को व्यवस्थित रखे साथ ही सहपाठी अथवा समवयस्क बच्चों, जिनके साथ उसकी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष स्पर्धा है─से जरूरी बढ़त भी बनाए रखे. दूसरों के बराबर रहने वाले को यहां औसत तथा पीछे रहने वाले को फिसड्डी मान लिया जाता है. समय और समवयस्क बच्चों के साथ स्पर्धा बालक को अनावश्यक रूप से तनावग्रस्त रखती है. इसके अलावा एक जैविक घड़ी भी होती है. उसके बारे में आवश्यक नहीं कि बड़े ही बालक को समझाएं. उसका एहसास प्रकृति स्वयं कराने लगती है. जैसे  समय होते ही भूख भोजन तथा थकान आराम की जरूरत की ओर संकेत करने लगती है.

सुबह से शाम तक अनगिनत बार घड़ी देखने से जो प्रथम प्रभाव बालक के मनो-मस्तिष्क पर पड़ता है, वह यह कि घड़ी की सुइयां ही समय हैं. कि अपनी महीन टिक-टिक के साथ घड़ी विराट समय को अपने भीतर समेटे है. घड़ी की सुइयां आगे बढ़ेंगी, तभी समय आगे खिसकेगा. बालक ही क्यों? घर में माता-पिता, स्कूल में अध्यापकगण, मित्र-हितैषी, सगे-संबंधी सभी सीधे घटनाओं पर नजर रखने, उन्हें नियंत्रित करने के बजाए—घड़ी की सुइयों से नियंत्रित होने लगते हैं. स्पर्धा में समय से पिछड़ जाने की आशंका बालक को अनावश्यक चिंता में डाल देती है. उसका आत्मविश्वास आहत होने लगता है. उस समय बालक को यह बताना आवश्यक है कि घड़ी की टिक-टिक समय नहीं है. वह स्वयं एक घटना है, सिर्फ घटना, जिसकी दो आवृतियों के बीच सुनिश्चित अंतराल होता है. घड़ी का कार्य किन्हीं दो घटनाओं के बीच का अंतराल बताना है. प्रत्येक घटना के समानांतर  और आगे-पीछे हजारों-हज़ार घटनाएँ अनंत ब्रह्मांड के भीतर और बाहर, लगातार घटती रहती हैं. जो लोग समय को घटनाओं के प्रवाह के रूप में देखते हैं, वे उनमें रमे रहकर भी अपना नियंत्रण बनाए रखते हैं. ऐसे लोगों के लिए समय चुनौती नहीं बनता. उनके साथ विलक्षण यात्रा का अनकहा रोमांच होता है.  

बालक को बताया जाना चाहिए कि समय घटनाओं की अन्विति से परे कुछ नहीं है. कि घटनाओं पर विजय पाना, उनके साथ सामंजस्य बनाकर चलना—कठिन भले हो, असंभव नहीं है. कि इस धरती पर ऐसे नरपुंगव भी हुए हैं जिन्होंने समय को न तो देवता माना, न उसकी कभी परवाह ही की. बिना परिस्थितियों से घबराए, चुनौतियों को स्वीकार करके ही वे इस दुनिया को अपनी इच्छानुसार चलाने में कामयाब होते आए हैं. ऐसा बोध बालक के आत्मविश्वास को बढ़ा सकता है. प्रायः ऐसा नहीं होता. क्योंकि समय को ‘नियति’ और ‘भाग्य’ के समकक्ष रखने वाले, दोनों को परस्पर पर्याय मानने वाले, बालक के माता-पिता समय को परम-नियंता और महाशक्तिशाली मान स्वयं उससे भयभीत रहते हैं.

भारतीय दर्शनों में समय पर विचार किया गया है, किंतु उनमें तत्वपरक सामग्री का अभाव है. उसे या तो दैवीय शक्ति के समकक्ष रखकर मनुष्य का भाग्य-नियंता बताया गया है; अथवा घटनाओं तथा उनके वेग के प्रतिफल के रूप में दर्शाया जाता है. भारतीय प्रज्ञा की कमजोरी है कि वह तर्क और विवेक से अधिक, आस्था और पूर्वाग्रहों से प्रेरणा ग्रहण करती है; और उससे बहुत कम बाहर निकल पाती है. समय को लेकर वस्तुनिष्ट चिंतन के अभाव का भी यही कारण है. पूर्वाग्रहों के दबाव में हम समय-संबंधी प्रज्ञप्तियों जिन्हें समयाभास भी कहा जा सकता है, को अपने आसपास घट रही घटनाओं के सापेक्षिक वेग, परिवर्तनशीलता, पदार्थ की विशेष अवस्था आदि के संदर्भ में देखने के बजाए स्वतंत्र सत्ता माने रहते हैं. यह ‘कार्य’ को ‘कारण’ मान लेने जैसी गंभीर चूक है, जिसके साधारण और विशेष सभी लोग शिकार होते आए हैं.  

आगे बढ़ने से पहले समय और समयबोध की ओर संकेत करना आवश्यक है. जैसा ऊपर संकेत किया गया है, समय को लेकर दो प्रकार की प्रज्ञप्तियां आमतौर पर प्रत्येक मनस् में होती हैं. ये एक साथ भी हो सकती हैं तथा एक-दूसरे से स्वतंत्र भी. पहली मान्यता के अनुसार समय कोई भागती हुई चीज है. नदी की मानिंद सतत प्रवाहमान. भूत-वर्तमान और भविष्य में निरूपित. एक के बाद एक गुजरते रात-दिन इसका उदाहरण हैं. जॉन मेकटेग्गार्ट ने इसे ‘ए’ श्रेणी माना है. यानी वह समय जिसे हम श्रेणीबद्ध रूप में अपने सामने से गुजरते हुए देखते हैं. उसका एक उदाहरण इतिहास लेखन भी है. हमारे समय और तत्संबंधी सामान्यबोध की शुरुआत ही सौर दिवस से होती है. आदमी रोजमर्रा के कार्यों को अपनी जरूरत, सुविधा अथवा दायित्व-भावना के आधार पर, छोटी-छोटी घटनाओं में बांट लेता है. उन घटनाओं की सापेक्षिक गति ही समयाभास का कारण बनती है. इस मान्यता के अनुसार समय दो संबद्ध घटनाओं के बीच का अंतराल है, जो उनके घटने की दर को दर्शाता है. उससे घटना की अनुभूति तथा उसकी सापेक्षिक गति का आकलन किया जा सकता है. समय पर विचार करते हुए इस तथ्य को प्रायः नजरंदाज कर दिया जाता है कि ब्रह्मांड में घट रही अनंत घटनाओं की भांति सौर दिवस भी प्राकृतिक घटना है. पृथ्वी का अपनी धुरी पर घूमना इस घटना को अंजाम देता है. दिन-रात को जन्म देने वाली यह घटना भी अपने आप में पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है. पृथ्वी अपने केंद्र पर घूमने के अलावा सूर्य की कक्षा में भी चक्कर काटती रहती है. इससे दिन-रात के कुल समय में भले ही ज्यादा अंतर न पड़ता हो, मगर उनकी अवधि घटती-बढ़ती रहती है. यह समय अथवा समयाभास की सापेक्षिकता का द्योतक है.

उपर्युक्त से निष्कर्ष निकलता है कि घटनाएं तथा उनका आधार यह सतत-परिवर्तनशील ब्रह्मांड—शाश्वत हैं. समय वह अंतराल है, जिसमें हम ब्रह्मांड की विभिन्न गतिविधियों के अंतराल का अनुभव करते हैं; तथा जिसके माध्यम से उनकी गति का आकलन किया जा सकता है. परिवर्तन को सृष्टि का मूल लक्षण बताने वाला यूनानी विचारक हेराक्लीट्स कहता है—‘प्रत्येक वस्तु गतिमान है. तुम किसी नदी में दुबारा हाथ नहीं डाल सकते.’ समय को सतत प्रवाह मानने वाली विचारधारा भी कहती है—‘बीता हुआ समय लौटकर नहीं आता. हम किसी क्षण को दुबारा नहीं जी सकते.’ समय की इस परम-भौतिकता को वैरागी भृर्तहरि अपनी तरह से अभिव्यक्त करता है—‘कालो न यातं वयमेव याताः’—‘समय नहीं गुजरता, हम गुजरते हैं.’1 अरस्तु समय को अवधि(अंतराल) के रूप में देखता था. उसके लिए समय किसी क्रिया की पूर्वकालिक एवं उत्तरकालिक अवस्था की आवधिक गणना है. वह लिखता है—

‘यदि आत्मा की सत्ता नहीं थी, उस अवस्था में समय की सत्ता रही होगी या नहीं—यह जिज्ञासा सीधे-सीधे एक प्रश्न पर ले आती है. जहां कोई गिनने वाला ही नहीं है, वहां ऐसी चीज भी नहीं हो सकती, जिसे गिना जा सके.’2 

इस तर्क को स्वीकारने में वही मुश्किल है, जो यह स्वीकार करने में है, कि गंगाधर और तिलक को बनारस जाना था, गंगाधर नहीं गया इसलिए तिलक भी नहीं गया.  समय का तारतम्यता वाला लक्षण बालक के लिए सदैव तनाव या चुनौतियां पेश करे, ऐसा नहीं होता. यह बालक को निश्चिंत भी करता है. बालक अथवा किशोर जब अपने माता-पिता या दादा-दादी, नाना-नानी को क्रमशः वृद्धावस्था और मृत्यु की ओर अग्रसर देखता है, तब उसके अवचेतन में सहज रूप से यह भाव उत्पन्न होता है कि उसके जीवन की तो अभी बस शुरुआत है. जीने के लिए बड़ा हिस्सा अभी शेष है; तथा सामाजिक जिम्मेदारियों का दौर लंबे अंतराल के पश्चात आरंभ होने वाला है. यह विश्वास बालक को अवसाद से बाहर रखने में मदद करता है. इससे बालक और समय अथवा समयाभास के बीच अनूठा संबंध बनता है, जो उम्मीदों से लबालब और सकारात्मक होता है. यह निश्चिंतता उसे नित-नवीन सपने देखने को प्रेरित करती है. छोटा बालक उमंगों से सराबोर रहता है. मनमानी शरारतें करता है. भविष्य के प्रति आशावान रहता है. उसकी कल्पना बड़ों की अपेक्षा ज्यादा रंगीन होती है. ये सब उसे अधपकी उम्र में जिम्मेदारियों से सीधे टकराने, टूटकर बिखर जाने से बचाते हैं.

सामान्य भौतिकी के लिए समय का प्रवाहशीलता वाला गुण विशेष काम का है. उसके माध्यम से पदार्थ की आंतरिक एवं बाहरी गतियों का अध्ययन किया जाता है. गति पदार्थ की विशेष अवस्था है. क्या पदार्थ की गतिहीन अवस्था में भी समय या समयाभास की कल्पना की जा सकती है? यदि हम वस्तु-विशेष के संदर्भ में देखें तो इस प्रश्न का उत्तर ‘हां’ में होगा. गति के लिए किसी पिंड अथवा कण का होना आवश्यक है. पिंड स्थिर हो और परिवेश परिवर्तनशील, तब भी पिंड तथा उसके परिवेश के बीच सापेक्षिक गति बनी रहेगी; और घटनाओं की एक के बाद एक आवृति हमारे समयाभास का कारण होगी. इसे समझने के लिए एक असंभव स्थिति की कल्पना करते हैं. मान लेते हैं कि एक व्यक्ति अंतरिक्ष में किसी अकेले पिंड पर खड़ा है. चारों और केवल शून्य पसरा है. उस अवस्था में यदि प्रेक्षक की आंखों पर ऐसा चश्मा चढ़ा दिया जाए, जिससे वह अपने पिंड की गतिविधियों के साथ-साथ अपनी शारीरिक गतिविधियों की ओर से भी निःसंवेद हो जाए, उस अवस्था में वह खुद को परिवर्तन-शून्य विश्व में पाएगा. ऐसी स्थिति में वह समय की अनुभूति नहीं कर पाएगा. जाहिर है, तब उसका समयबोध भी शून्य होगा.

समय संबंधी पहली प्रज्ञप्ति जिसके अनुसार समय को दो घटनाओं के अंतराल से मापा जाता है, का वर्णन हम ऊपर कर चुके है. दूसरी प्रज्ञप्ति जिसे जॉन मेकटेग्गार्ट ने ‘बी’ श्रेणी की संज्ञा दी है, के अनुसार समय अंतरिक्ष जैसी अंतहीन संरचना हैं, जिसमें सब कुछ निरंतर घटता रहता है. ब्रह्मांड की समस्त घटनाएं, ग्रह-पिंड सभी उसमें समाहित हैं. वह भूत-वर्तमान-भविष्य सभी का आधार तथा ब्रह्मांड की प्रत्येक घटना का साक्षी है. इस मान्यता के अनुसार सृष्टि की प्रत्येक घटना, अंतरिक्ष के साथ-साथ समय में भी घटित होती है. पहली मान्यता जहां समय को गतिशील मानती है, वहीं इस समानांतर मान्यता के अनुसार समय स्थिर होता है. स्थिर भाव से ही वह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष घटनाओं का लेखा रखता है. जिस प्रकर अंतरिक्ष में घटनाएं घटती रहती हें. वैसे ही अनंत समय के बीच भी घटनाओं का सिलसिला बना रहता है. अंतरिक्ष वस्तुजगत के भौतिक स्वरूप को वितान देता है. वस्तुहीनता की अवस्था में विराट आभासीय शून्य होगा; जिसमें समस्त गतियों, परिवर्तनशीलता का लोप हो चुका होगा, ऐसी स्थिति में भी समय की परिकल्पना असंभव होगी. आशय है कि परिवर्तन-शून्यता अथवा परम-स्थिर विश्व में समय की परिकल्पना अप्रासंगिक हो जाती है.  

एक मान्यता के अनुसार समय सृष्टि के प्रत्येक परिवर्तन का साक्षी है, मगर खुद परिवर्तनकारी शक्ति नहीं है. न उसका कोई साक्षी होता है. स्टीफन हाकिंग अपनी पुस्तक ‘समय का संक्षिप्त इतिहास’ में ब्रह्मांड की उत्पत्ति परम-विस्फोट से मानते हैं. हॉकिंग के अनुसार समय की उत्पत्ति का क्षण भी वही है. अपनी बहुचर्चित पुस्तक में ‘समय का इतिहास’ के बहाने वे ब्रह्मांड के इतिहास की ही चर्चा कर रहे होते हैं. उस अवस्था की चर्चा कर रहे होते हैं, जब अपनी पहली हलचल के साथ ब्रह्मांड परम-शून्य से परिवर्तन ओर अग्रसर होता है. हॉकिंग के अनुसार परम-विस्फोट से पहले ब्रह्मांड परम-संपीडन की अवस्था में था. वह परम-स्थिरता की अवस्था थी, जिसका उल्लेख हमने ऊपर किया है. चूंकि उस समय सर्वत्र गति-शून्यता थी, इसलिए उसमें समय अथवा समयाभास की कल्पना भी असंभव है. महाविस्फोट के पश्चात ग्रह-नक्षत्रों का आदि का जन्म हुआ, जिनमें हमारी पृथ्वी भी सम्मिलित हैं.

समयहीनता की कल्पना हमारे लिए उतनी ही दुष्कर है, जितनी कि ब्रह्मांड के लोप हो जाने की परिकल्पना. ब्रह्मांडहीनता की अवस्था में समयबोध का क्या होगा? उसकी पहचान किस तरह से की जाएगी? ऐसे प्रश्न हमारी कल्पना से बाहर है. सवाल है कि समय यदि ‘कुछ भी नहीं’ है, केवल आभास मात्र है, तो उसे व्यावहारिक जीवन में उसे सबकुछ क्यों दिखाया जाता है. कारण है कि ऐसे अवसरों पर हम सत्य की उपेक्षा कर, भ्रांत धारणाओं को ही सबकुछ माने रहते हैं. इसके बीजतत्व भी हमारी शिक्षा-संस्कृति में अंतनिर्हित हैं. हमारी जरूरत की सभी वस्तुएं पृथ्वी उपलब्ध कराती है. बिना उसके जीवन संभव ही नहीं है. मगर हम यह माने रहते हैं कि सातवें-आठवें आसमान पर बैठा कोई देवता है, जो हमें जीवन और पृथ्वी को उर्वरा शक्ति प्रदान करता है. इस तरह से सोचने की आदत ज्यादा से ज्यादा ढाई-तीन हजार वर्ष पुरानी है. लेकिन यही वह कालखंड है जब आदमी द्वारा आदमी पर शासन करने, आदमी द्वारा आदमी को गुलाम बनाने की शुरुआत हुई. धर्म, जाति, संप्रदाय के नाम पर असहिष्णुता और असमानता को व्यक्ति की पहचान जोड़ा जाने लगा. ऐसी व्यवस्था में जो भी ऊंचाई पर होता है, वह अपनी ऊंचाई को वैध बनाने के लिए अपने से भी ऊंचे का हवाला देता है. जैसे कि ब्राह्मणों ने अपने शीर्षस्व को वैध बनाने के लिए देवताओं की पूरी फौज की परिकल्पना कर डाली. इसलिए समय को और दूसरी चीजों को सही ढंग से जाना न केवल विज्ञान की दृष्टि से आवश्यक है, बल्कि संस्कृति के परिष्करण तथा मनुष्य के नैतिक प्रबोधन हेतु भी अपरिहार्य है.

© ओमप्रकाश कश्यप

‘हिंद स्वराज’ का बहुजन पाठ

सामान्य

‘हिंद स्वराज’ गांधी विचार की प्रतिनिधि पुस्तक है। गांधी ने इसकी रचना 1909 में समुद्री यात्रा के दौरान की थी। उन दिनों वे दक्षिणी अफ्रीका में भारतीयों की अस्मिता की लड़ाई के लिए संघर्ष कर रहे थे। वहां सत्याग्रह को आरंभिक सफलताएं मिलने से उनकी ख्याति देश-देशांतर तक फैलने लगी थी। कुशल पत्रकार, संपादक और जनसंवादन कला के धनी गांधी ने ‘हिंद स्वराज’ मूल रूप से गुजराती में लिखा और अपने अखबार ‘इंडियन ओपीनियन’ में छाप दिया। अगले ही वर्ष वह पुस्तक रूप में भी बाजार में आ गया। फिर जैसी उम्मीद थी, वही हुआ। पुस्तक अंग्रेज सरकार द्वारा जब्त कर ली गई। पहले संस्करण के लगभग छह वर्ष पश्चात 1915 में नया अंग्रेजी अनुवाद आया तो अंग्रेजों ने उसकी अनदेखी कर दी। देखते ही देखते पुस्तक विमर्श के क्षेत्र में छा गई।

पूरी पुस्तक बीस अध्यायों में बंटी, संवाद शैली में है। गांधी जी ने इस शैली का उपयोग क्यों किया? यह सोचने की बात नहीं। भारतीय उपनिषदों में यह शैली खूब चली है। केनोपनिषद् तो पूरा का पूरा संवाद-शैली में ही है। सुकरात और उसके प्रिय शिष्य प्लेटो की यह प्रिय शैली रही है। हालांकि धीरे-धीरे इस शैली का प्रचलन बुद्धिजीवियों में कम होता गया था। जिन दिनों गांधी जी ने ‘हिंद स्वराज’ की रचना की थी, यह गंभीर लेखन के क्षेत्र में बहुत लोकप्रिय शैली भी नहीं थी। कदाचित गांधी का इरादा गंभीर पुस्तक लिखने का था भी नहीं। ‘हिंद स्वराज’ लिखने से करीब एक वर्ष पहले उन्होंने जाॅन रस्किन की पुस्तक ‘अनटू दि लाॅस्ट’ का ‘सर्वोदय’ शीर्षक से गुजराती अनुवाद भी किया था, जो ‘इंडियन ओपीनियन’ में प्रकाशित हुआ था। ‘हिंद स्वराज’ में गांधी आधुनिकता का पर्याय मान ली गई पश्चिमी संस्कृति की प्रशंसा करते हैं। इसके लिए वे वकील, डॉक्टर, रेल, अदालत आदि की आलोचना करते हैं। यहां तक कि ब्रिटिश संसद पर भी आक्षेप लगाते हैं। कदाचित इसीलिए ‘हिंद स्वराज’ को खूब प्रचार मिला। पुस्तक के अनगिनत प्रशंसक थे तो आलोचक भी कम न थे। अनेक देशी-विदेशी विद्वानों ने ‘हिंद स्वराज’ की प्रशंसा की, वहीं गोखले ने उसे अधकचरी पुस्तक माना और उम्मीद जाहिर की कि भारत लौटने के बाद गांधी स्वयं उस पुस्तक को खारिज कर देंगे।

रस्किन के अतिरिक्त ‘हिंद स्वराज’ पर रूसो, कारपेंटर और थोरो के विचारों की छाया भी देख सकते हैं। पुस्तक के बारे में गांधी की टिप्पणियों से पता चलता है कि वे इस पुस्तक को लेकर अतिरिक्त रूप से मोहाग्रस्त थे। एक जगह उन्होंने लिखा है—‘यह पुस्तक इतनी निर्दोष है कि बच्चों के हाथ में यह दी जा सकती है। यह पुस्तक द्वैषधर्म की जगह प्रेमधर्म सिखाती है, हिंसा की जगह आत्म-बलिदान को स्थापित करती है और पशुबल के खिलाफ आत्मबल को खड़़ा करती है।’ अगर गांधी की संपूर्ण राजनीति को देखें तो उसके पीछे गांधी के कथित आत्मबल की ही प्रेरणा है। यह बात अलग है उस आत्मबल की शक्ति गांधी की अपनी कम, उनके प्रायोजकों की अधिक थी, जिन्होंने गांधी को देखते ही देखते भारतीय राजनीति के महानायक का दर्जा दे दिया था। हजारों वर्षों से दमन और शोषण का शिकार रही दलित और पिछड़ी जातियों में पनप रही जातीय चेतना, जो कभी भी वर्ग-चेतना का रूप ले सकती थी—से बचाव के लिए उन्हें सुरक्षित आड़ की आवश्यकता थी। गांधी और गांधीवाद दोनों इस भूमिका के लिए एकदम खरे थे।

‘हिंद स्वराज’ में कोई क्रमबद्ध चिंतन नहीं है। कुछ छिटपुट गांधी-विचार टिप्पणियों के रूप में आए है। बावजूद इसके ‘हिंद स्वराज’ के प्रति गांधी का विश्वास इतना दृढ़ था कि उसके प्रकाशन के तीन दशक बाद जब किसी पत्रकार ने पूछा कि क्या आप इसमें कोई फेरबदल करना चाहेंगे तो गांधी ने लिखा—‘यह पुस्तक अगर आज मुझे लिखनी हो तो कहीं-कहीं मैं इसकी भाषा को बदलूंगा। लेकिन इसे लिखने के बाद तीस वर्ष जो मैंने आंधियों में बिताए हैं, उनमें मुझे इस पुस्तक में बताए गए विचारों में फेरबदल का कोई कारण नहीं मिला।’1 ‘हिंद स्वराज’ को गांधी विचार का प्रतिनिधि दस्तावेज मानने के पीछे गांधी का यही विश्वास था। बहरहाल, पुस्तक का पांचवां अध्याय ‘इंग्लेंड की हालत’ पर है। हम अपना विमर्श इसी अध्याय से आरंभ करेंगे। चौथे अध्याय में ‘पाठक’ के यह कहने पर कि इंग्लेंड की पार्लियामेंट सब ‘पार्लियामेंटों की माता’ तो बेशक हमें उसकी नकल करनी चाहिए—अगले अध्याय में गांधी ‘इंग्लेंड की हालत’ पर विचार करते हैं। शीर्षक से उम्मीद जगती है कि गांधी इसमें इंग्लेंड के समाज, वहां के जन-जीवन तथा समाजार्थिक परिस्थितियों पर विचार करेंगे। मगर उनपर कोई बातचीत किए बगैर गांधी सीधे इंग्लेंड की पार्लियामेंट पर चर्चा करने लगते हैं। वे लिखते हैं—

‘इंग्लेंड में आज जो हालत है, वह सचमुच तरस खाने लायक है। मैं तो भगवान से यही मानता हूं कि हिंदुस्तान की ऐसी हालत कभी न हो। जिसे आप पार्लियामेंटों की माता कहते हैं, वह पार्लियामेंट तो बांझ और बेसवा है। ये दोनों शब्द बहुत कड़े हैं, तो भी उसपर बहुत अच्छी तरह से लागू होते हैं। मैंने उसे बांझ कहा, क्योंकि अब तक पार्लियामेंट ने अपने आप एक भी अच्छा काम नहीं किया। अगर उसपर दबाव डालने वाला कोई न हो तो वह कुछ भी न करे, ऐसी उसकी कुदरती हालत है और वह बेसवा है, क्योंकि जो मंत्री मंडल उसे रखे, उसके पास वह रहती है। आज उसका मालिक एसक्विथ है, कल वालफर होगा और परसों को तीसरा।’’2

उपर्युक्त टिप्पणी को पढ़ते हुए कुछ प्रश्न एकाएक दिमाग में एकाएक आ सकते हैं। मसलन क्या गांधी ब्रिटिश पार्लियामेंट की सुस्ती या नकाराकन के लिए उसकी आलोचना कर रहे थे? क्या उनकी आलोचना ब्रिटिश पार्लियामेंट तक सीमित थी, अथवा उसका दायरा अथवा उनकी आलोचना पूरी संसदीय प्रणाली को लेकर है? क्या ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री हर्बर्ट हेनरी एसक्विथ का आचरण गैर-जिम्मेदाराना और तानाशाही पूर्ण था? संसदीय प्रणाली में पार्लियामेंट की जनता के प्रति जो जवाबदेही होनी चाहिए, क्या ब्रिटिश पार्लियामेंट उसमें नाकाम थी? यदि गांधी की आलोचना केवल पार्लियामेंट की सुस्ती को लेकर है, तो एक सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या उन दिनों ब्रिटिश पार्लियामेंट सचमुच निष्क्रिय और नाकारा थी? एसक्विथ अप्रैल 1908 से दिसंबर 1916 तक यूनाईटिड किंग्डम के प्रधानमंत्री थे। उन्हें संसदीय सुधार के लिए जाना जाता है। हालांकि 1914 में ब्रिटेन को प्रथम विश्वयुद्ध में ढकेलने के लिए एसक्विथ की आलोचना की जाती है। चूंकि 1914 की घटना ‘हिंद स्वराज’ लिखे जाने के बाद की है, इसलिए हमारे लिए ब्रिटिश पार्लियामेंट और एसक्विथ द्वारा नवंबर 1909; यानी ‘हिंद स्वराज’ लिखे जाने के पहले लिए गए निर्णय ही महत्त्वपूर्ण होंगे।

लेबर पार्टी के सत्ता में आने से पहले यूनाइटिड किंग्डम में कंसरबेटिव पार्टी की सरकार थी। उसने 1902 में शिक्षा अधिनियम पास किया था, जिसके फलस्वरूप वहां शैक्षिक क्रांति को बढ़ावा मिला। उस अधिनियम के फलस्वरूप 1914 तक यानी केवल 12 वर्ष के अंतराल में इंग्लेंड में 1000 नए माध्यमिक विद्यालय खोले गए थे, जिनमें से 349 स्कूल केवल लड़कियों के लिए थे।3 उसके अगले वर्ष कंजरवेटिव सरकार ने ‘एंप्लायमेंट आफ चिल्ड्रन अधिनियम-1903 को मंजूरी दी थी, जिनमें कारखानों में काम कर रहे बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा के लिए आवश्यक कानून बनाए गए थे। उस कानून के अनुसार 10 वर्ष के कम के किसी भी बच्चे को फैक्ट्री के काम में नहीं लगाया जा सकता था। बच्चों को ऐसा कोई भी काम सौंपने की मनाही थी, जिसकी परिस्थितियां उनके स्वास्थ्य के प्रतिकूल हों। यही नहीं, काम के साथ-साथ-साथ उनकी शिक्षा की व्यवस्था भी की गई थी।4 1905 में वही संसद ‘बेरोजगारी श्रमिक अधिनियम—1905 के माध्यम से ‘आपदा समिति’ का गठन करती है, आपदा समिति का काम स्थानीय निकायों एवं व्यापरिक निगमों में बेरोजगारों की अधिकाधिक भर्ती के अनुदान आदि की अनुशंसा करना था। ऐसी संसद को, जो प्रतिवर्ष लोककल्याण की दिशा में नए-नए कानून बना रही थी, उसपर अमल भी कर रही थी, गांधी ‘बांझ’ ओर ‘बेसवा’ कह जाते हैं। गौरतलब है कि भारत में गरीब बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा, जो बच्चे किसी कारणवश स्कूल नहीं जा पाते, मिल-कारखानों-खदानों आदि में काम करने को विवश होते हैं—उनके लिए काम के दौरान शिक्षा की मांग कांग्रेस या उसके किसी बड़े नेता के आंदोलन का हिस्सा नहीं थी। कांग्रेस अभिजात्य वर्ग के पढ़े-लिखे युवाओं को सरकारी नौकरियों की हिस्सेदारी की मांग तो कर रही थी, लेकिन किसान और मजदूरों की बेरोजगारी उसके लिए कोई मुद्दा न थी। उसके नेताओं का विचार था की जाति प्रथा के चलते सबके लिए उनके पैतृक व्यवसाय निर्धारित है, ऐसे में बेरोजगारी भारत के लिए बड़ा मुद्दा हो ही नहीं सकती।

बहरहाल, हम पुन: इंग्लेंड की संसद पर लौटकर आते हैं, जिसपर गांधी ने बेसवा’ और नाकारा होने जैसे आरोप लगाए हैं। यूनाइटिड किंग्डम में 1906 में एसक्विथ के नेतृत्व वाली, ‘लेबर पार्टी’ बहुमत के साथ सरकार बनाती है। उसके बाद वहां सामाजिक और प्रशासनिक सुधारों का सिलसिला और गति पकड़ लेता है। गांधी नशाबंदी के समर्थक थे। भारत लौटने के बाद वे इसके लिए आंदोलन भी चलाते हैं। जन्म के समय होने वाली बाल मृत्युदर पर नियंत्रण हेतु 1907 में इंग्लेंड सरकार ने ‘नोटिफिकेशन आफ बर्थ अधिनियम’ लागू किया था। उसके अनुसार शिशु के जन्म के 36 घंटों के भीतर उसकी सूचना सरकार को देना अनिवार्य कर दिया गया था। 1908 में एसक्विथ सरकार इग्लेंड और वॉल्स के शराब और जुआखानों की लाइसेंसिंग का नया कानून बनाते हैं, परिणामस्वरूप इंग्लेंड और वॉल्स के 100000 पबों में से एक तिहाई बंद करा दिए जाते हैं। इसके अलावा एजुकेशन(एडमिनस्ट्रिेटिव प्रोवीजन) एक्ट-1907, ‘प्रोबेशन आफ ओफेंडर्स एक्ट-1907, चिल्ड्रन एंड यंग पर्सन एक्ट-1908, आइरिश यूनीवर्सिटीज एक्ट-1908, ओल्ड एज पेंशन एक्ट-1908, लेबर एक्सचेंज एक्ट-1909 जैसे दर्जनों सुधारवादी कानून वहां की एसक्विथ के नेतृत्व वाली सरकार बनाती है। यही नहीं, छोटे किसानों को बड़े जमींदारों के चंगुल से बचाने के लिए एसक्विथ सरकार ने 1906 से 1908 के बीच भू-सुधार हेतु अनेक लोकोपयोगी कानून बनाए थे। उनमें एग्रीकल्चर होल्डिंग एक्ट-1906, स्माल होल्डिंग एंड एलाटमेंट एक्ट-1907, कसोलिडेशन एक्ट-1907 जैसे कानून शामिल थे। ‘स्माल होल्डिंग एंड एलाॅटमेंट एक्ट-1907’ में सुधार करते हुए ‘स्माल होल्डिंग एंड एलाटमेंट एक्ट-1908’ नामक नया कानून बनाया गया, उसके तहत 1908 से 1914 के बीच लगभग दो लाख एकड़ कृषि भूमि का अधिग्रहण किया, जिसे 14000 लघु-जोतों में बांटकर छोटे किसानों को मदद पहुंचाई गई। आशय है कि 1900 से लेकर 1909 के वे दिन जब गांधी ‘हिंद स्वराज’ में ब्रिटिश संसद पर बांझ और बेसवा होने का आरोप लगा रहे थे, ब्रिटिश जनता की दृष्टि से ब्रिटिश संसद उत्तरदायी सरकार की भूमिका निभा रही थी। सरकार ने नियंत्रित पूंजीवादी व्यवस्था लागू की थी। यही नहीं 1909 में लेबर पार्टी सरकार की ओर से संसद के आगे जो फाइनेंस बिल(बजट) पेश किया गया था, उसे उन्होंने बुद्धिजीवियों ने ‘जनता का बजट’ की संज्ञा दी थी। भारत में उसी तरह के कानून बनाने की आवश्यकता के बजाय गांधी ब्रिटिश पार्लियामेंट पर ही आरोप लगाने लगते हैं।

भारत के संबंध में भी ब्रिटिश संसद ने ऐसे कई युगांतरकारी निर्णय लिए थे, जो आगे चलकर इस देश को आधुनिक राज्य बनाने में सहायक सिद्ध हुए। चार्टर अधिनियम-1813 में भारत में शिक्षा सुधारों की नींव रखी गई थी। शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कंपनी के बजट में न्यूनतम एक लाख रुपये का प्रावधान किया गया। उसके फलस्वरूप शूद्रों और अतिशूद्रों के लिए शिक्षा प्राप्ति के रास्ते प्रशस्त हुए। उससे पहले देश में मनुस्मृति का विधान लागू था। उसके अनुसार संपूर्ण शिक्षा का अधिकार केवल ब्राह्मणों तक सीमित था। गैर-ब्राह्मण सवर्ण केवल अपने व्यवसाय से संबंधित शिक्षा ग्रहण कर सकते थे। जिन्हें इसमें संदेह है वे विश्वामित्र और वशिष्ट के संघर्ष को याद कर सकते हैं। शूद्रों और अतिशूद्रों के लिए शिक्षा पूरी तरह निषिद्ध थी।

चार्टर अधिनियम-1813 केवल 20 वर्षों के लिए लाया गया था। 1833 में लागू अगले चार्टर में विधि संहिता के निर्माण हेतु विधि आयोग बनाने की अनुशंसा की गई थी। उसके अधीन जो कानून बने, वे सभी भारतीयों यहां तक कि भारत में रह रहे अंग्रेजों पर भी लागू होते थे। उस अधिनियम के बाद प्रशासनिक सेवाओं को पूरी तरह से स्पर्धात्मक बना दिया गया था। जाति, धर्म, संप्रदाय से परे कोई भी उनमें हिस्सा ले सकता था। उससे पहले तीन-चार प्रतिशत ब्राह्मण आबादी 70 प्रतिशत सरकारी पदों पर कब्जा जमाए हुए थी। नए अधिनियम के लागू होने के बाद शूद्रों ओर अतिशूद्रों के लिए सरकारी नौकरियों में जाने का रास्ता साफ हो गया। चार्टर अधिनियम-1853 में स्थानीय प्रशासन में भारतीयों को जगह देने की अनुशंसा की गई थी। 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेज समझ चुके थे कि ताकतवर जातियों को संतुष्ट किए बिना उनका इस देश में टिके रहना संभव नहीं है। इसलिए 1858 में भारत को ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बनाते समय इंग्लेंड की महारानी ने जो घोषणा की थी, उसमें जमींदारों और राजे-रजबाड़ों के विशेषाधिकारों की सुरक्षा का आश्वासन दिया गया था। तथापि ब्रिटिश सरकार की प्रशासनिक नीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया था। उसके फलस्वरूप शूद्रों और अतिशूद्रों में अपने अधिकारों के प्रति चेतना बढ़ी और पूरे भारत में सामाजिक सुधार के आंदोलनों में तेजी आई।

ऐसी संसद को गांधी किस आधार पर ‘बांझ’ और ‘बेसवा’ कहते हैं, यह बात समझ से परे है। हालांकि आगे चलकर उन्होंने पार्लियामेंट के लिए ‘वेश्या’ शब्द को बदलने की इच्छा व्यक्त की थी। इसलिए नहीं कि ब्रिटिश संसद को लेकर उनके विचारों में किसी प्रकार का परिवर्तन आया था, या संसदीय प्रणाली में उनके विश्वास में वृद्धि हुई थी, अपितु इसलिए कि उनकी एक अंग्रेज महिला मित्र को पार्लियामेंट के लिए ‘वेश्या’ शब्द अच्छा नहीं लगा गया था। ‘हिंद स्वराज’ के अंग्रेजी अनुवाद की प्रस्तावना में उन्होंने लिखा था—

‘‘इस समय इस पुस्तक को इसी रूप में प्रकाशित करना मैं आवश्यक समझता हूं। परंतु यदि इसमें, मुझे कुछ भी सुधार करना हो, तो मैं केवल एक शब्द सुधारना चाहूंगा। एक अंग्रेज महिला मित्र को मैंने वह शब्द बदलने का वचन दिया है। पार्लियामेंट को मैंने वेश्या कहा है। यह शब्द उस बहन को पसंद नहीं है। उनके कोमल हृदय को इस शब्द के ग्राम्यः भाव से दुख पहुंचा है।’’

पार्लियामेंट के लिए उन्होंने ‘वेश्या’ जैसा तीखा शब्द क्यों इस्तेमाल किया? इसपर चौंकने की आवश्यकता नहीं है। जिन दिनों ‘हिंद स्वराज’ की रचना हुई, गांधी की संसदीय शासन प्रणाली में कोई आस्था नहीं थी। बजाय संसदीय लोकतंत्र के उनका आदर्श रामराज्य था। भारत के लिए वे रामराज्य की ही परिकल्पना करते थे। उनकी कल्पना का रामराज क्या था, इसे निम्नलिखित उद्धरण से समझा जा सकता है—

‘हम राज को रामराज तभी कह सकते हैं, जब राजा और प्रजा दोनों पवित्र हों। जब दोनों त्यागवृत्ति रखते हों, जब दोनों के बीच पिता ओर पुत्र जैसे संबंध हों। हम यह बात भूल गए, इसलिए डेमोक्रेसी की बात करते हैं। आज ‘डेमोक्रेसी’ का जमाना है। जहां प्रजा की बात सुनी जाती हो। जहां प्रजा के प्रति प्रेम का प्राधान्य हो—कहा जा सकता है कि वहां डेमोक्रेसी है। मेरी कल्पना के ‘रामराज्य’ में सिरों की गिनती अथवा हाथों की गिनती से प्रजा के मत को नहीं मापा जा सकता। जहां इस तरह से मत लिए जाते हों, उसे मैं प्रजा का मत नहीं मापता। ऋषियों-मुनियों ने तपस्या करके यह देखा कि जो व्यक्ति तपश्चर्या करते हों और प्रजा के कल्याण की भावना रखते हों, उनका मत प्रजा का मत कहला सकता है। इसी का नाम सच्ची डेमोक्रेसी है। यदि मुझ जैसा व्यक्ति व्याख्यान देकर आपका मत चुराकर ले जाए तो उस मत से प्रकट होने वाली डेमोक्रेसी नहीं है। मेरी डेमोक्रेसी तो रामायण में लिखी पड़ी है, और मैंने जिस सीधे-सादे ढंग से रामायण को पढ़ा है, रामचंद्रजी उसी के अनुसार राज करते थे।5

हम समझ सकते हैं ‘रामराज्य’ की गांधीवादी अवधारणा में आम-मताधिकार के लिए कोई स्थान नहीं है। वहां एक प्रकार का मुनितंत्र है। चूंकि ऋषि-मुनि बनने का अधिकार ब्राह्मणों तक सीमित था, इसलिए परोक्ष रूप में गांधी सीधे-सीधे ब्राह्मण-तंत्र की अनुशंसा कर मनु के विधान का समर्थन कर रहे होते हैं। 19 सितंबर 1929 के ‘यंग इंडिया’ में वे पुनः लिखते हैं—‘रामराज्य से मेरा अभिप्रायः हिंदू राज्य से नहीं है। मेरा आशय दैवीय राज्य से, ईश्वरीय राज्य से है….भले ही राम इस धरती पर जीवित रूप में कभी थे या नहीं थे, प्राचीन रामराज्य का आशय सच्चे जनतंत्र से है। जिसमें गरीब से गरीब आदमी भी कम से कम खर्च में न्याय प्राप्त कर सके। रामराज्य में तो बताया गया है कि कुत्ते को भी न्याय प्राप्त हुआ था(यंग इंडिया, 19 सितंबर, 1929)….रामराज्य का मेरा सपना ऐसे राज्य का है जिसमें राजा और रंक दोनों को बराबर अधिकार प्राप्त हों।’(अमृत बाजार पत्रिका, 2 अगस्त, 1934)6

गांधी के लिए रामराज्य आदर्श है, मगर बहुजनों के लिए ऐसे राज्य का कोई महत्त्व नहीं है, जहां का राजा मात्र ब्राह्मण की शिकायत पर, वगैर अपने विवेक का इस्तेमाल किए, वेदाध्ययन के इच्छुक शूद्र को मृत्युदंड देने को अपना पुनीत कर्तव्य मानता हो। अथवा व्यक्ति मात्र के आक्षेप पर अपनी गर्भवती पत्नी को घर से निकाल दे। गांधी राजनीति को ईश्वरीय आस्था और धार्मिक आदर्शों के आधार पर चलाना चाहते थे। इसकी प्रेरणा उन्हें ईसाई धर्म खासतौर पर जाॅन रस्किन जैसे समाजवादियों की ओर से प्राप्त हुई थी, जो समाजवाद का मूल ईसाई धर्म की उदारवादी मान्यताओं में खोजते थे। गांधी का हिंदू मन ‘रामराज्य’ में समाजवादी आदर्श खोजने लगता है। वे भूल जाते हैं कि ईसाई धर्म में जाति-आधारित विभाजन नहीं है। वहां जन्म के आधार पर मनुष्य को जीवन के मूल-भूत अधिकारों, उसकी स्वतंत्रता और समानता के अधिकार से वंचित नहीं किया जाता था। जबकि हिंदू धर्म की नींव ही जाति-व्यवस्था पर टिकी है। चूंकि ब्रिटिश संसद ने एक के बाद एक प्रशासनिक सुधारों के माध्यम से भारत में जाति-आधारित विभाजन पर चोट की थी, इसलिए गांधी को वहां की संसद से शिकायत थी। यह शिकायत इतनी बड़ी थी कि वे उसे वेश्या तक कह जाते हैं।

भारत में आधुनिकीकरण की शुरुआत 19वीं शताब्दी से होती है। वही समय औद्योगिकीकरण की शुरुआत का भी है। आवाजाही को सुगम बनाने के लिए रेलगाड़ी की शुरुआत होती है। स्वास्थ्य की देखभाल के लिए अस्पताल बनाए जाते हैं। उससे पहले जो वैद्य आदि हुआ करते थे, वे ऊंची जातियों से आते थे। जातीय शुचिता के नाम पर वे निचली जातियों के मरीजों के इलाज से बचते थे। मजबूर होकर उन्हें तांत्रिकों और ओझाओं की शरण में जाना पड़ता था, जो उनका शोषण करता था। अस्पतालों, वकीलों और स्कूलों के खुलने से शूद्रों और अतिशूद्रों के मन में न्याय की उम्मीद जगी थी। रेलों ने गरीब मजदूरों, कामगारों और शिल्पकारों को यह अवसर दिया था कि वे गांवों के सामंती उत्पीड़न से बचने के लिए वैकल्पिक रोजगार के लिए शहरों की ओर जा सकें। सरकारी अस्पतालों में सभी वर्ग के लोग आ जा सकते थे। उससे जातिवाद पर चोट पड़ी थी। गांधी आधुनिक समाज के सभी प्रतीकों जैसे अदालत, रेल, अस्पताल, वकील, डॉक्टर आदि की आलोचना करते हुए उन्हें सभ्यता के संकट के रूप में देखते हैं। उन्हें समाज के हजारों वर्षों तक गरीब, विपन्न और एक जैसे हालात में रहने से कोई दुख नहीं है। अपितु उनके लिए यह गौरव की बात है। इसलिए वे गरीबी का महिमामंडन तक कर जाते हैं—

‘हजारों साल पहले जो काम हल से लिया जाता था, उससे हमने काम चलाया। हजारों साल पहले जैसे झोंपड़े थे, उन्हें हमने कायम रखा। हजारों साल पहले जैसी हमारी शिक्षा थी, वही चलती आई….ऐसा नहीं है कि हमें यंत्र-वगैरह की खोज करना नहीं आता था। लेकिन हमारे पूर्वजों ने देखा कि यंत्र वगैरह की खोज करेंगे तो गुलाम बनेंगे, और अपनी नीति को छोड़ देंगे।’7

जिन दिनों गांधी इन पंक्तियों को लिख रहे थे, उससे करीब एक हजार पहले से ही भारत किसी न किसी विदेशी शासक का गुलाम था। उससे पीछे के हजार वर्षों में भारत में वैज्ञानिक और तकनीकी क्रांति लगभग शूण्य थी। जाति-व्यवस्था के कारण भारत में सस्ता श्रम लगभग बेगार के रूप में गांव-गांव मौजूद था। मशीनी क्रांति पर आक्षेप लगाकर गांधी जाति-व्यवस्था के समर्थक और यथास्थितिवादी नजर आते हैं। गांधी के शिष्य भी उन्हीं की तरह परिवर्तन-विरोधी थे। विनोबा को आम-मताधिकार से शिकायत थी। नेहरू और उनके खानसामा दोनों को एक ही वोट का अधिकार हो—यह उन्हें विचित्र लगता था। गांधी के दूसरे शिष्य भी ऐसे थी। नवजीवन ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित ‘हिंद स्वराज’ के हिंदी अनुवाद की भूमिका में काका कालेलकर लिखते हैं—‘उनकी रेलें, उनकी चिकित्सा और रुग्णालय, उनके न्यायालय और न्याय-दान पद्धति आदि सब बातें अच्छी संस्कृति के लिए आवश्यक नहीं हैं, बल्कि विघातक ही हैं…’ ऐसे गांधीवादियों को कौन समझाए कि रेल, चिकित्सा प्रणाली, न्यायालय आदि अनायास हुई खोजेें नहीं थीं। अपितु इसके पीछे यूरोपीय बौद्धिक चेतना और वैज्ञानिक क्रांति का योगदान था। न्यूटन और काॅपरनिकस जैसे वैज्ञानिकों की उत्कट मेधा और समर्पण था। उससे पहले यूरोप का हाल भारत जैसा ही था। गौरतलब है कि यूरोप की औपनिवेशिक नीतियों की आलोचना दुनिया-भर में हुई थी। लेकिन वहां की बौद्धिक और प्रौद्योगिकीय क्रांति से किसी को शिकायत न थी। यहाँ तक कि मार्क्स जैसे ठेठ समाजवादी को भी नहीं। यूरोप की बौद्धिक क्रांति का असर दुनिया के सभी अगड़े-पिछड़े समाजों पर पड़ा था। ऐसे में यूरोपीय सभ्यता, संस्कृति की आंख-मूंदकर आलोचना करने नैतिकता की दृष्टि से उचित न था।

शिक्षा-नीति के बारे में भी गांधी के विचार इतने ही दक़ियानूसी हैं। हालांकि ऐसे कई लोग आज भी मिल जाएंगे जो गांधी की बुनियादी शिक्षा-नीति को आदर्श मानकर उसका महिमा मंडन करते हैं। लेकिन ऐसा केवल वही सोच सकता है, जिसे भारतीय सभ्यता और संस्कृति में सबकुछ साफ-सुथरा, उजला-उजला और पाक-साफ नजर आता हो। इस पर बात करने से पहले गांधी के शिक्षा पर विचार को जान लेना उचित होगा। वे लिखते हैं—‘बहुत से लोग उस(अक्षर-ज्ञान) का बुरा प्रयोग करते हैं, यह तो हम देखते ही हैं। उसका अच्छा प्रयोग प्रमाण में कम ही लोग करते हैं। यह बात अगर ठीक है तो इससे यह साबित होता है कि अक्षर-ज्ञान से दुनिया को फायदे के बदले नुकसान ही हुआ है….एक किसान ईमानदारी से खुद खेती करके रोटी कमाता है। उसे मामूली तौर पर दुनियावी ज्ञान है। अपने मां-बाप के साथ कैसे बरतना, अपनी स्त्री से कैसे बरतना, अपने बच्चों के साथ कैसे पेश आना, जिस देहात में वह बसा हुआ है वहां उसकी चाल-ढाल कैसी होनी चाहिए, इन सबका उसे काफी ज्ञान है। वह नीति के नियम समझता है और उनका पालन करता है, लेकिन वह अपने दस्तखत करना नहीं जानता। इस आदमी को अक्षर-ज्ञान देकर आप क्या करना चाहते हैं? उसके सुख में आप कौन-सी बढ़ती करेंगे? क्या उसकी झोपड़ी या उसकी हालत के बारे में आप उसके मन में असंतोष पैदा करना चाहते हैं? ऐसा करना हो तो भी उसे अक्षर-ज्ञान की आवश्यकता नहीं है।’8

शिक्षा के बारे में ये ऐसे व्यक्ति के विचार हैं जिसे जीते-जी महात्मा मान लिया गया था। गांधी को लगता था कि ज्ञान का सभी लोग सही प्रयोग नहीं कर सकते। वे सही प्रयोग करें, इसके लिए उन्हें और अधिक शिक्षित-प्रेरित करने से अच्छा है कि उन्हें अक्षर ज्ञान से ही वंचित कर दिया जाए। यहां गांधी दलित-बहुजनों का जिक्र नहीं करते। बात उन्होंने सामान्य तौर पर ही कही है। लेकिन संदेश वही है जो मनुस्मृति और दूसरे हिंदू धर्मशास्त्रों का है। यही कि ज्ञान पर कुछ वर्गों का एकाधिकार रहे। जनसाधारण दुनियावी ज्ञान से अलग-थलग बना रहे, वही अच्छा है। यदि वह पढ़-लिख जाएगा तो अन्याय का विरोध करेगा, धर्म-शास्त्रों को स्वयं पढ़कर उसका अर्थ निकालने लगेगा, पंडे-पुरोहित के जाल में आसानी से फंस न सकेगा। जिन दिनों गांधी यह सब लिख रहे थे, उन दिनों गांव-गांव में महाजनी तंत्र का जाल फैला हुआ था। वे एक के बदले चार चढ़ाकर बही में किसानों और मजदूरों से अंगूठा लगवा लिया करते थे। ओने-पौने ब्याज वसूलते थे। जिस गुजरात से गांधी आते हैं वहां महाजनी प्रथा और भी चरम पर थी। उनके शोषण और षड्यंत्र की ओर इशारा करने, लोगों को उसके विरुद्ध जागरूक करने के लिए शिक्षा की अनिवार्यता पर ज़ोर देने के बजाए, वे अक्षर-ज्ञान की आवश्यकता को ही नकार देते हैं।

इसलिए ‘हिंद स्वराज’ का आदर्श बहुजनों का आदर्श नहीं हो सकता। बहुजन अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले लगभग सभी महामानवों ने शिक्षा को जरूरी माना था। ज्योतिराव फुले, पेरियार, डॉ. आंबेडकर, स्वामी अछूतानंद, महामना अय्यंकालि, पोइकाइल योहन्नान आदि जितने भी बहुजन-चिंतक और आंदोलनकारी हैं उन सभी ने वर्चस्वकारी संस्कृति से मुक्ति के लिए शिक्षा पर ज़ोर दिया था। उसके लिए आंदोलन चलाए थे। सड़कों पर संघर्ष किया था। उन्हें अपना महानायक मानने वाले बहुजन, भारतीय सभ्यता और संस्कृति की आड़ में वर्ण-व्यवस्था के पोषक और समर्थक गांधी को अपना नायक भला कैसे मान सकते हैं।

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ :

1. अंग्रेजी मासिक ‘आर्यन पाथ’ के सिंतबर 1938 में ‘हिंद स्वराज अंक’ के लिए भेजा गया संदेश।

2. हिंद स्वराज, अध्याय 5, इंग्लैंड की हालत।

3. जी. आर. शीर्ले, ए न्यू इंग्लेंड? पीस एंड वार, 1886-1918(2005), आक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी प्रेस, पृष्ठ 333-334

4. http://www।educationengland।org।uk/documents/acts/1903-employment-children-act।pdf

5. संपूर्ण गांधी वाङ्मय खंड 35, 1927-28, पृष्ठ 508-509, ‘गांधीजी हिंद स्वराज से नेहरू तक’ में देवेंद्र स्वरूप द्वारा उद्धृत, पृष्ठ 76)

6. https://www।mkgandhi।org/momgandhi/chap67।htm

7. हिंद स्वराज, अध्याय 18, शिक्षा।

8. वही

पेरियार ललई सिंह : प्रखर मानवतावादी एवं विद्रोही चेतना

सामान्य

राजनीतिक स्वतंत्रता की आवश्यकता इसलिए होती है कि मनुष्य को सामाजिक स्वतंत्रता हो। मनुष्य, दूसरों की स्वतंत्रता में बाधक न होकर स्वेच्छानुसार खा-पी सके, पहन-ओढ़ सके, चल-फिर सके, मिल-जुल और ब्याह-शादी कर सके। यदि सामाजिक स्वतंत्रता न तो राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं रह जाता…इसलिए सामाजिक समता और सामाजिक स्वतंत्रता ही हमारा मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। राजनीतिक स्वतंत्रता तो उसमें सहायक होने के कारण ही वांछनीय है।

संतराम बीए, ‘हमारा समाज’ से

कुछ नेता स्वाभाविक नेता होते हैं। समाज की कच्ची-खुरदरी जमीन पर हालात से संघर्ष करते हुए स्वयं उभरते हैं। विपरीत परिस्थितियों से जूझने की प्रवृत्ति उन्हें नेता बना देती है। दूसरे वे नेता होते हैं, जिन्हें थोप दिया जाता है। ऐसे नेता प्रायः मान लेते हैं कि राजनीति उनके खून में है, इसलिए सत्ता-केंद्र पर छाए रहना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। वे प्रायः परिवर्तन-विरोधी होते हैं। गांधी ऐसे ही नेता थे। 1917 में रूसी क्रांति से डरे हुए भारतीय उद्योगपतियों, जमींदारों यहां तक कि यूरोप को भी ऐसे नेता की आवश्यकता थी, जो इस देश के मानस को समझता हो। साथ में ठेठ परंपरावादी भी हो। जो परिवर्तन की इच्छा और संभावनाओं को धर्म की आड़ में दबा सके। इसलिए दक्षिण अफ्रीका से लौटकर आए गांधी को उन्होंने हाथों-हाथ लिया। गांधी ने भी उनकी उम्मीद से बढ़कर काम किया। गरीब जनता के दिल में जगह बनाने के लिए लंगोटी धारण कर ली। उसके बाद जो हुआ, सबके सामने है।

दूसरी श्रेणी के नेताओं की संख्या भी कम नहीं है। ऐसे महामनाओं में ज्योतिराव फुले, डाॅ. आंबेडकर, ई. वी. रामासामी पेरियार, स्वामी अछूतानंद जैसे क्रांतिकारी विचारकों का नाम आता है। पेरियार को छोड़ दें तो बाकी तीनों बहुत साधारण परिवारों से आए थे। परंतु अपने असाधारण सोच, सरोकार और संघर्ष के बल पर वे बड़े परिवर्तन के संवाहक बने। ये सब नए भारत के वास्तुकार हैं। संघर्ष में तपकर निकले नेताओं में ललई सिंह का नाम भी शामिल है। वे कानपुर देहात के छोटे-से गांव में जन्मे और विद्रोही चेतना के बल पर लोगों के दिलो-दिमाग पर छाये रहे। वर्षों लंबे संघर्ष के दौरान उन्होंने विरोधी भी बनाए और समर्थक भी। विरोधी मृत्यु के साथ ही उन्हें भुला चुके थे, जबकि समर्थकों की संख्या आज भी लगातार बढ़ती जा रही है। बड़े नेता और महत्त्वपूर्ण विचार की प्रासंगिकता समय के साथ-साथ निरंतर बढ़ती जाती है। ललई सिंह इस कसौटी पर एकदम खरे उतरते हैं।

ललई सिंह यादव का जन्म 1 सितंबर, 1911 को कानपुर देहात के गांव कठारा के किसान परिवार में हुआ था। पिता का नाम था गज्जू सिंह और मां थीं, मूला देवी। पिता गज्जू सिंह पक्के आर्यसमाजी थे। जाति-भेद उन्हें छू भी नहीं गया था। उनकी गिनती गांव के दबंग व्यक्तियों में होती थी। मां मूला देवी के पिता साधौ सिंह भी खुले विचारों के थे। समाज में उनकी प्रतिष्ठा थी। ललई सिंह के जुझारूपन के पीछे उनके माता-पिता के व्यक्तित्व का गहरा प्रभाव था।

ललई सिंह की प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई थी। उन दिनों दलितों और पिछड़ों में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ने लगी थी। हालांकि सवर्ण समाज का नजरिया अब भी नकारात्मक था। उन्हें यह डर नहीं था कि दलित और शूद्र पढ़-लिख गए तो उनके पेशों को कौन करेगा। असली डर यह था कि पढ़े-लिखे दलित-शूद्र उनके जातीय वर्चस्व को भी चुनौती देंगे। उन विशेषाधिकारों को चुनौती देंगे जिनके बल पर वे शताब्दियों से सत्ता-सुख भोगते आए हैं। इसलिए दलितों और पिछड़ों की शिक्षा से दूर रखने के लिए वह हरसंभव प्रयास करते थे। ऐसे चुनौतीपूर्ण परिवेश में ललई सिंह ने 1928 में आठवीं की परीक्षा पास की। उसी दौरान उन्होंने फारेस्ट गार्ड की भर्ती में हिस्सा लिया और चुन लिए गए। वह 1929 का समय था। 1931 में मात्र 20 वर्ष की अवस्था उनका विवाह सरदार सिंह की बेटी दुलारी देवी से हो गया। दुलारी देवी पढ़ी-लिखी महिला थीं। उन्होंने टाइप और शार्टहेंड का प्रशिक्षण प्राप्त किया था। ललई सिंह को फारेस्ट गार्ड की नौकरी से संतोष न था। सो 1933 में वे सशस्त्र पुलिस कंपनी में कनिष्ठ लिपिक बनकर चले गए। वहां उनकी पहली नियुक्ति भिंड मुरैना में हुई।

कानपुर देहात जहां ललई सिंह का जन्म हुआ था, से लेकर भिंड मुरैना तक का क्षेत्र विद्रोही चेतना के लिए विख्यात रहा है। उसका असर ललई सिंह के व्यक्तित्व पर भी पड़ा। उन दिनों गांव-देहात में पुलिस का रौव था, लेकिन स्वयं पुलिस-कर्मियों को अनेक विपरीत परिस्थितियों में काम करना पड़ता था। उनका वेतन भी मामूली था। जिसे लेकर उनके मन में आक्रोश था। ललई सिंह के रूप में उन्हें ऐसा साथी मिल चुका था, जो जुझारू होने के साथ-साथ ईमानदार भी था। पुलिसकर्मियों की समस्याओं के समाधान के लिए ललई सिंह ने एक संगठन बनाया। उसके माध्यम से वे सहकर्मियों की समस्याओं को लेकर आवाज उठाने लगे। परिणामस्वरूप अधिकारी वर्ग उनसे नाराज रहने लगा। फिर ऐसा अवसर आया जिससे ललई सिंह और उनके साथियों की अधिकारियों से ठन गई।

जहां उनकी कंपनी का ठिकाना था, वहां एक बावड़ी थी। सभी पुलिसकर्मी नहाने-धोने और पीने के पानी के लिए सीढ़ीदार बावड़ी पर निर्भर थे। नहाने-धोने के लिए सीढ़ियों का इस्तेमाल किया जाता। सो बचा हुआ पानी वापस बावड़ी में चला जाता था। वही पानी पीने के काम भी आता था। प्रदूषित पानी शरीर में जाकर अनेक बीमारियां पैदा करता। उसपर कंपनी कमांडर कुटिल प्रवृत्ति का था। पुलिसकर्मियों की बीमारी उसे बहाना लगती। उपचार के लिए अस्पताल भेजने में वह आनाकानी करता था। अपने साथियों को लेकर ललई सिंह उस अमानवीय व्यवस्था के विरोध में डट गए। अधिकारी पहले ही उनसे नाराज थे। सो जायज विरोध को भी अनुशासनहीनता का नाम देकर उन्होंने ललई सिंह को नौकरी से बर्खास्त कर दिया। ललई सिंह गांव-देहात से आए थे। बहुत अधिक पढ़े-लिखे भी न थे। लेकिन अधिकार चेतना उनमें खूब थी। सो यह दिखाते हुए कि आसानी से हार मान लेने वालों में से वे नहीं हैं, बर्खास्तगी के विरोध में उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने वस्तुस्थिति की समीक्षा की। ललई सिंह निर्दोष सिद्ध होकर, नौकरी में वापस आ गए।

ललई सिंह ससम्मान नौकरी पर वापस लौटे थे। मगर उनका मन सशस्त्र पुलिस बल की नौकरी से ऊब चुका था। वे समय निकालकर पढ़ाई करने लगे। इसका उन्हें फायदा भी हुआ। उन्हीं दिनों उन्होंने फौज की परीक्षा दी और उसमें भर्ती हो गए। फौज की नौकरी सशस्त्र पुलिस बल से अच्छी मानी जाती है। माना जाता है कि सरकार भी फौजियों पर पूरा ध्यान देती है। लेकिन अंदरूनी हालत इससे अलग थी। खासकर ललई सिंह जैसे जुझारू व्यक्ति के लिए। फौज में रहते हुए ललई सिंह ने सैनिक जीवन की विसंगतियों को समझा और उनके विरोध में आवाज उठाने लगे। 1946 में उन्होंने ‘नान-गजेटेड पुलिस मुलाजिमान एंड आर्मी संघ’ की स्थापना की तथा उसके अध्यक्ष चुन लिए गए।

एक और नौकरी की चुनौतियां और संघर्ष थे, दूसरी ओर व्यक्तिगत जीवन की त्रासदियां। ललई सिंह का पारिवारिक जीवन बहुत कष्टमय था। उनकी पत्नी जो उन्हें कदम-कदम पर प्रोत्साहित करती थीं, वे 1939 में ही चल बसी थीं। परिजनों ने उनपर दूसरे विवाह के लिए दबाव डाला, जिसके लिए वे कतई तैयार न थे। सात वर्ष पश्चात 1946 में उनकी एकमात्र संतान, उनकी बेटी शकुंतला का मात्र 11 वर्ष की अवस्था में निधन हो गया। कोई दूसरा होता तो कभी का टूट जाता। परंतु समय मानो बड़े संघर्ष के लिए उन्हें तैयार कर रहा था। निजी जीवन दुख-दर्द उन्हें समाज में व्याप्त दुख-दर्द से जोड़ रहे थे। उसी वर्ष उन्होंने ‘सिपाही की तबाही’ पुस्तक की रचना की। इस पुस्तक की प्रेरणा उन्हें लाला हरदयाल की पुस्तक ‘सोल्जर आफ दि वार’ से मिली थी। ‘सिपाही की तबाही’ छपी न सकी। भला कौन प्रकाशक ऐसी पुस्तक छापने को तैयार होता! सो ललई सिंह ने टाइप कराकर उसकी प्रतियां अपने साथियों में बंटवा दीं। पुस्तक लोक-सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाने वाले सिपाहियों के जीवन की त्रासदी पर आधारित थी। परोक्षरूप में वह व्यवस्था के नंगे सच पर कटाक्ष करती थी। पुस्तक में सिपाही और उसकी पत्नी के बीच बातचीत के माध्यम से घर की तंगहाली को दर्शाया गया था। पुस्तक का समापन करते हुए उन्होंने लिखा था—

‘वास्तव में पादरियों, मुल्ला-मौलवियों-पुरोहितों की अनदेखी कल्पना, स्वर्ग तथा नर्क नाम की बात बिल्कुल झूठ है। यह है आंखों देखी हुई, सब पर बीती हुई सच्ची नरक की व्यवस्था सिपाही के घर की। इस नर्क की व्यवस्था का कारण है—सिंधिया गवर्नमेंट की बदइंतजामी। अतः इसे प्रत्येक दशा में पलटना है, समाप्त करना है। ‘जनता पर जनता का शासन हो’, तब अपनी सब मांगें मन्जूर होंगी।’

पुस्तक में आजादी और लोकतंत्र दोनों की मांग ध्वनित थी। पुस्तक के सामने आते ही पुलिस विभाग में खलबली मच गई। सैन्य अधिकरियों को पता चला तो पुस्तक की प्रतियां तत्काल जब्त करने का आदेश जारी कर दिया। उस घटना के बाद ललई सिंह अपने साथियों के ‘हीरो’ बन गए। मार्च 1947 में जब आजादी कुछ ही महीने दूर थी, उन्होंने अपने साथियों को संगठित करके ‘‘नान-गजेटेड पुलिस मुलाजिमान एंड आर्मी संघ’ के बैनर तले हड़ताल करा दी। सरकार ने ‘सैनिक विद्रोह’ का मामला दर्ज कर, भारतीय दंड संहिता की धारा 131 के अंतर्गत मुकदमा दायर कर दिया। ललई सिंह को पांच वर्ष के सश्रम कारावास तथा 5 रुपये का अर्थदंड सुना दिया। वे जेल में चले गए। इस बीच देश आजाद हुआ। अन्य रजबाड़ों की तरह ग्वालियर स्टेट भी भारत गणराज्य का हिस्सा बन गया। 12 जनवरी को 1948 को लगभग 9 महीने की सजा काटने के बाद, ललई सिंह को कारावास से मुक्ति मिली। वे वापस सेना में चले गए। 1950 में सेना से सेवानिवृत्त होने के पश्चात उन्होंने अपने पैत्रिक गांव झींझक को स्थायी ठिकाना बना लिया। वैचारिक संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए वहीं उन्होंने ‘अशोक पुस्तकालय’ नामक संस्था गठित की। साथ ही ‘सस्ता प्रेस’ के नाम से प्रिंटिंग पे्रस भी आरंभ किया।

कारावास में बिताए नौ महीने ललई सिंह के नए व्यक्तित्व के निर्माण के थे। जेल में रहते हुए उन्होंने प्राचीन भारतीय ग्रंथों का अध्ययन किया। धीरे-धीरे हिंदू धर्म की कमजोरियां और ब्राह्मणवाद के षड्यंत्र सामने आने लगे। जिन दिनों उनका जन्म हुआ था, भारतीय जनता आजादी की कीमत समझने लगी थी। होश संभाला तो आजादी के आंदोलन को दो हिस्सों में बंटे पाया। पहली श्रेणी में अंग्रेजों को जल्दी से जल्दी बाहर का रास्ता दिखा देने वाले नेता थे। उन्हें लगता था वे राज करने में समर्थ हैं। उनमें से अधिकांश नेता उन वर्गों से थे जिनके पूर्वज इस देश में शताब्दियों से राज करते आए थे। लेकिन आपसी फूट, विलासिता और व्यक्तिगत ऐंठ के कारण वे पहले मुगलों और बाद में अंग्रेजों के हाथों सत्ता गंवा चुके थे। देश की आजादी से ज्यादा उनकी चाहत सत्ता में हिस्सेदारी की थी। वह चाहे अंग्रेजों के रहते मिले या उनके चले जाने के बाद। 1930 तक उनकी मांग ‘स्वराज’ की थी। ‘राज’ अपना होना चाहिए, ‘राज्य’ इंग्लेंड की महारानी का भले ही रहे। स्वयं गांधी जी ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ का शीर्षक पहले ‘हिंद स्वराज्य’ रखा था। बाद में उसे संशोधित कर, अंग्रेजी संस्करण में ‘हिंद स्वराज’ कर दिया था। ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’—नारे के माध्यम से तिलक की मांग भी यही थी। 1930, विशेषकर भगत सिंह की शहादत के बाद जब उन्हें पता चला कि जनता ‘स्वराज’ नहीं, ‘स्वराज्य’ चाहती है, तब उन्होंने अपनी मांग में संशोधन किया था। आगे चलकर जब उन्हें लगा कि औपनिवेशिक सत्ता के बस गिने-चुने दिन बाकी हैं, तो उन्होंने खुद को सत्ता दावेदार बताकर, संघर्ष को आजादी की लड़ाई का नाम दे दिया। अब वे चाहते थे कि अंग्रेज उनके हाथों में सत्ता सौंपकर जल्दी से जल्दी इस देश से चले जाएं।

दूसरी श्रेणी में वे नेता थे, जो सामाजिक आजादी को राजनीतिक आजादी से अधिक महत्त्व देते थे। मानते थे कि बिना सामाजिक स्वाधीनता के राजनीतिक स्वतंत्रता अर्थहीन है। कि राजनीतिक स्वतंत्रता से उन्हें कुछ हासिल होने वाला नहीं है। उनकी दासता और उसके कारण हजारों साल पुराने हैं। नई शिक्षा ने उनके भीतर स्वाभिमान की भावना जाग्रत की थी। उनकी लड़ाई अंग्रेजों से कम, अपने देश के नेताओं से अधिक थी। वे सामाजिक और राजनीतिक मोर्चे पर साथ-साथ जूझ रहे थे। महामना फुले, संतराम बी.ए., अय्यंकालि, डाॅ. आंबेडकर, पेरियार जैसे नेता इसी श्रेणी में आते हैं। स्वयं ललई सिंह इस श्रेणी से थे और जिस परिवेश से जूझते हुए वे निकले थे, उसमें अपना मोर्चा चुन लेना कोई मुश्किल बात न थी। भविष्य के संघर्ष की रूपरेखा क्या हो, इस बारे में वे सोच ही रहे थे कि 1953 में उनके पिता का भी निधन हो गया। ललई सिंह के लिए यह बड़ा आघात था। पिता उनके लिए प्रेरणाशक्ति थे। अपने अधिकारों के संघर्ष के संस्कार पिता की ही देन थे। एक-एक कर उनके सभी परिजन जा चुके थे। परिवार के नाम पर अब वे स्वयं थे, दूसरी ओर था पूरा देश। खासकर धार्मिक और जातीय बंधनों से आहत समाज। उनके अलावा चारों ओर पसरी चुनौतियां थीं। एक बड़ा कार्यक्षेत्र उनकी प्रतीक्षा कर रहा था।

विद्रोही चेतना का विस्तार

धर्मग्रंथों के निरंतर अध्ययन द्वारा उन्हें पता चला कि हिंदू धर्म असल में राजनीतिक षड्ंयत्र है। ब्राह्मण-पुरोहित उसके नीतिकार हैं। क्षत्रिय अपनी ताकत से लोगों को डराने-दबाने का काम करते हैं; और निहित स्वार्थ के लिए वैश्य इस व्यवस्था का आर्थिक पोषण करते हैं। भाग्य-कर्मफल, स्वर्ग-नर्क, पाप-पुण्य, छूत-अछूत में उलझे बहुजन इसे समझ ही नहीं पाते हैं। धर्मग्रंथों में ब्राह्मणों के अनर्गल बखान से ललई सिंह को इस षड्यंत्र की तह तक जाने में मदद मिली थी। वे समझ चुके थे कि हिंदू धर्म तथा उसके ग्रंथ सवर्णों की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं के औजार हैं। जेल में रहते हुए उन्होंने डाॅ. आंबेडकर के भाषणों को सुना था, जिन्होंने हिंदू धर्म को धर्म मानने से ही इन्कार कर दिया था। आंबेडकर स्वयं हिंदू धर्म तथा उसके ग्रंथों को राजनीति मानते थे। कांग्रेसी नेताओं के व्यवहार से यह सिद्ध भी हो रहा था। 1930 के आसपास दलितों और पिछड़ी जातियांें में राजनीतिक चेतना का संचार हुआ था। ‘त्रिवेणी संघ’ जैसे संगठन उसी का सुफल थे। उसकी काट के लिए कांग्रेस ने पार्टी में पिछड़ों के लिए अलग प्रकोष्ठ बना दिया था। उसका मुख्य उद्देश्य था, किसी न किसी बहाने पिछड़ों को उलझाए रखकर उनके वोट बैंक को कब्जाए रखना।

दूसरा कारण पिछड़ी जातियों में शिक्षा का बढ़ता स्तर तथा उसके फलस्वरूप उभरती बौद्धिक चेतना थी। उससे पहले पंडित अपने प्रत्येक स्वार्थ को ‘शास्त्रोक्त’ बताकर थोप दिया करते थे। बदले समय में बहुजन उन ग्रंथों को सीधे पढ़कर निष्कर्ष निकाल सकते थे। इसलिए महाकाव्य और पौराणिक कृतियां जिनका प्रयोग ब्राह्मणादि अल्पजन बहुजनों को फुसलाने के लिए करते थे, जिनमें बहुजनों के प्रति अन्याय और अपमान के किस्से भरे पड़े थे—वे अनायास ही आलोचना के केंद्र में आ गईं। हमें याद रखना चाहिए कि उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा आदि राज्यों में निर्णायक राजनीतिक शक्ति बन चुके यादवों को क्षत्रिय मानने पर ब्राह्मणादि अल्पजन आज भले ही मौन हों, मगर उससे पहले वे उनकी निगाह ‘क्षुद्र’ यानी शूद्र ही थे। महाभारत जिसमें कृष्ण को अवतार के रूप में प्रस्तुत किया गया है, उसमें भी ऐसे अनेक प्रसंग हैं जब कृष्ण का उसकी जाति के आधार पर मखौल उड़ाया जाता है। डी. आर. भंडारकर यादवों को भारतीय वर्ण-व्यवस्था से बाहर का गण-समूह यानी पंचम वर्ण का मानते हैं।

महाभारत और ऋग्वेद यदुओं को सरस्वती तट का रहने वाला बताते हैं। लेकिन रामायण जो हिंदुओं का सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है, में यदुओं का महासागर से पानी पीना भी अपराध मान लिया गया है। याद कीजिए लंका पर चढ़ाई करते समय राम समुद्र से रास्ता मांगता है। समुद्र के प्रसन्न न होने पर वह धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा लेता है। घबराया हुआ समुद्र उपस्थित होकर रास्ता देने को तैयार हो जाता है। वह राम से वाण को तूणीर में वापस रखने की प्रार्थना करता है। अब राम तो राम है, एक बार प्रत्यंचा चढ़ा वाण नीचे कैसे उतारे। सो समुद्री जीव-जंतुओं को बचाने के लिए वह समुद्र से ही रास्ता पूछता है। समुद्र जो उत्तर देता है, उससे लगता है कि यह पूरा प्रसंग बस इसी के निमित्त गढ़ा गया है—

उत्तरेणावकाशोऽस्ति कश्चित पुण्यतरो मम,

द्रुमकुल्य इति ख्यातो लोके ख्यातो यथा भवान

उग्रदर्शन कर्मणो बहवस्तत्र दस्यवः

आभीर प्रमुखाः पापाः पिबन्ति सलिलं मम

तैन तत्स्पर्शनं पापं सहेयं पापकर्मभिः

अमोधः क्रियतां राम अयं तत्र शरोत्तमः(रामायण, युद्धकांड, 22वां सर्ग)

”प्रभो! जैसे आप सर्वत्र विख्यात एवं पुण्यात्मा हैं, उसी प्रकार मेरे उत्तर की ओर ‘द्रुमकुल्य’ नाम से विख्यात एक बड़ा ही पवित्र देश है। वहाँ आभीर (अहीर, यादव) आदि जातियों के अनेकानेक मनुष्य निवास करते हैं। उनके रूप और रंग बड़े ही भयानक हैं। वे सब के सब पापी और लुटेरे हैं। वे लोग मेरा जल पीते हैं। उन पापचारियों का स्पर्श मुझे प्राप्त होता रहता है, इस पाप को मै नहीं सह सकता। हे, राम! आप अपने इस उत्तम बाण को वहीं सफल कीजिए।’

गोया रामायणकार को ‘राक्षस’ रावण से पहले यदुओं को ठिकाने लगा देने की जल्दी थी। राम का जैसा चरित्र गढ़ा है, उसके हिसाब से वह ऐसी सलाह को टाल ही नहीं सकता था। ‘महात्मा’ समुद्र की सलाह मानकर वह उसी दिशा में शर-संधान कर यदुओं सहित बाकी गणों का सफाया कर देता है। यदुओं के प्रति तत्कालीन समाज की नफरत को तुलसीदास ज्यों का त्यों आगे बढ़ा देते हैं। उनके अनुसार—‘आभीर, यवन, किरात, खस, स्वपचादि अति अधरूपजे’। अहीर, यवन(मुस्लिम), किरात, खस, स्वपच आदि जातियां अत्यंत अधम हैं। यदुओं के विनाश की कहानी को महाभारत में भी बढ़ाया गया है। परंतु थोड़े भिन्न तरीके से। ‘सभा-पर्व’ में यदुओं को सरस्वती नदी के तट बसने वाला बताया गया है।1 कृष्ण को भगवान का दर्जा प्राप्त है। मगर क्षत्रीय जैसे राम की वंश-परंपरा से जोड़ने को आजाद हैं, उस तरह की दावेदारी स्वयं को कृष्ण का वंशज बताकर यादव न करे—इसके लिए गांधारी के शाप को बहाना बनाया जाता है। उसके अनुसार सारे यदुवंशी अंतर्कलह से आपस में लड़-झगड़कर मर जाते हैं। आशय है कि यादवों की बढ़ी राजनीतिक शक्ति से भय खाकर ब्राह्मणों ने ‘कृष्ण’ को अवतार का दर्जा तो दिया, लेकिन उनके वंशजों को एक-दूसरे से लड़वाकर मरवा दिया। पहले ये प्रसंग या तो धर्म ग्रंथों में दबे-छिपे रह जाते थे, या ब्राह्मणों की व्याख्या में कुछ का कुछ बना दिए जाते थे, नई शिक्षा और ज्ञान की रोशनी में उनके वास्तविक पाठ सबके सामने थे। उन्हें पढ़कर यदु-वंशजों में आक्रोश उभरना तय था।

‘त्रिवेणी संघ’ की सिद्धांत पुस्तिका ‘त्रिवेणी संघ का बिगुल’ का प्रकाशन 1940 में हो चुका था, उसके लेखक थे—यदुनंदन प्रसाद मेहता संघ में यादव जाति का प्रतिनिधित्व करते थे।। धर्म के नाम पर हो रहे आडंबरों पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने उसमें लिखा था—

‘‘धार्मिक मंदिरों और मठों के बाहर साइन-बोर्ड टँगा हुआ है कि ‘जाति पाँति पूछै नहीं कोई, हरि के भजे से हरि का होई।’ लेकिन भीतर जाकर देखिए कि कैसी-कैसी करामातें हो रही हैं। पुजारी कौन हो सकता है? जो उसमें जाति का ब्राह्मण हो। चाहे वह नया हो, साधु या कम ही पढ़ा-लिखा क्यों न हो।भंडारी कौन हो सकता है? जो उसमें जाति का ब्राह्मण हो। चाहे उसे पाचन-कर्म का ज्ञान भले ही न हो। अमुक साधु अमुक जाति का है, इसलिए उसे अमुक काम दिया जाए। ब्राह्मण साधु दूसरी जाति के साधु का बनाया हुआ नहीं खा सकता। क्या यहां धर्म की ओट में धर्म का शिकार नहीं किया जाता? तो, त्रिवेणी संघ ऐसी धार्मिक धांधलियों, लूटों, अन्यायों, अत्याचारों, अंधेरों और स्वार्थों का अंत सदा के लिए कर देना चाहता है और उनके स्थान पर, धर्म का सच्चा रूप बताकर जनता को उजाले में ले जाना चाहता है।’’

यही चीजें ललई सिंह का मानस निर्माण कर रही थीं। देश को आजादी मिल चुकी थी, मगर जिस स्वाधीनता की कामना आजादी के साथ की गई थी, वे सपना ही थीं। विशेषरूप से सामाजिक आजादी का सपना। ललई सिंह समझ चुके थे कि यहां से आगे का रास्ता संघर्ष का है, जो उन्हें स्वयं तय करना है। वे ‘रिपब्लिक पार्टी आफ इंडिया’ के सदस्य बन गए। उनकी आवाज कड़क थी। एक सैनिक का जोश उसमें भरा होता था। बिहार में बाबू जगदेव प्रसाद कुशवाहा त्रिवेणी संघ के आंदोलन को आगे बढ़ाने में जुटे थे तो उत्तर प्रदेश में रामस्वरूप शर्मा ने ‘समाज दल’ की स्थापना कर, यथास्थितिवादी राजनीतिक दलों के विरुद्ध एक और मोर्चा खोल दिया था। उधर रिपब्लिकन पार्टी डाॅ. आंबेडकर के बाद बिखरने लगी थी। ललई सिंह उसे छोड़ रामस्वरूप वर्मा के साथ जुड़ गए। बाद में जगदेव प्रसाद कुशवाहा के ‘शोषित दल’ और रामस्वरूप वर्मा के ‘समाज दल’ का एकीकरण हुआ तो उनके लिए लड़ाई और भी आसान हो गई। वे इन दलों के सम्मिलन से बने ‘शोषित समाज दल’; तथा वैकल्पिक राजनीति के प्रचार में जी-जान से जुट गए। उन दिनांे ई। वी। रामासामी पेरियार अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए देश-विदेश की यात्राएं कर रहे थे। इसी सिलसिले में जब वे उत्तर प्रदेश आए तो संभवतः 1967 में, ललई सिंह का उनसे संपर्क हुआ। पहली मुलाकात में ही ललई सिंह उनके व्यक्तित्व से प्रभावित हो गए। रामस्वरूप वर्मा ने 1 जून 1968 को ‘अर्जक संघ’ की स्थापना की। ललई सिंह उसके साथ भी प्राण-प्रण से जुड़ गए।   

पेरियार से पहली मुलाकात के समय ही ललई सिंह ने उनकी पुस्तक ‘रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ को हिंदी में प्रकाशित करने का मन बना लिया था। इसके लिए उन्होंने पेरियार से चर्चा की। पेरियार उन उस पुस्तक के हिंदी अनुवाद की अनुमति चंद्रप्रकाश जिज्ञासु को दे चुके थे। कुछ ही महीने बाद जुलाई 1968 में ललई सिंह को ‘रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ का हिंदी संस्करण प्रकाशित करने की लेखकीय सहमति प्राप्त हो गई।

सहमति मिलना अलग बात थी। पुस्तक प्रकाशित होकर बाजार में आना दूसरी बात। कोई भी प्रकाशक हिंदी अनुवाद छापने को तैयार न था। ललई सिंह हार मानने वालों में से न थे। उन्होंने पुस्तक को अपनी ‘अशोक पुस्तकालय’ नामक संस्था से प्रकाशित करने का फैसला कर लिया। आगे चलकर यही संस्था ‘सच्ची रामायण’ सहित उनकी दूसरी पुस्तकों की प्रथम प्रकाशक बनी। ‘सच्ची रामायण’ का हिंदी अनुवाद राम अधार ने किया था। पुस्तक का पहला संस्करण जुलाई 1969 में आया। उसके आने के साथ ही हिंदी जगत में तहलका मच गया। पुस्तक को हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं आहत करने वाली बताकर, उसके विरोध में प्रदर्शन होने लगे। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी बिना देर किए, 8 दिसंबर 1969 को पुस्तक पर प्रतिबंध की घोषणा कर, प्रकाशित प्रतियों को अपने कब्जे में लेने का आदेश सुना दिया। सरकार का मानना था कि पुस्तक समुदाय विशेष की धार्मिक भावनाओं का अपमान करती है। इससे समाज में शांति-भंग खतरा है। यह भी कहा गया कि पुस्तक जानबूझकर समाज में अशांति फैलाने के ध्येय से लिखी गई है। प्रतिबंध केवल हिंदी संस्करण को लेकर था। अंग्रेजी संस्करण ‘रामायण : दि ट्रू रीडिंग’ के तमिल और अंग्रेजी संस्करण उन दिनों भी धड़ल्ले से बिक रहे थे।    

ललई सिंह सरकार के निर्णय से आहत थे। उन्हें लगा कि भारतीय समाज आज भी लोकतांत्रिक भावना से दूर है। उन्होंने प्रदेश सरकार के विरुद्ध अदालत में अपील कर दी। लेकिन मन हिंदू धर्म से खट्टा हो चुका था। वैसे भी ईश्वर, धर्म, आत्मा-परमात्मा, स्वर्ग-नर्क आदि में विश्वास वे पेरियार के संपर्क में आने से पहले ही खो चुके थे। अब उनका इरादा हिंदू धर्म को हमेशा के लिए छोड़ देने का था। इसके लिए उन्होंने विभिन्न धर्मों का अध्ययन करना आरंभ कर दिया। यहां डाॅ. आंबेडकर उनके प्रेरणा-पुरुष बने। बौद्ध धर्म उन्हें अपनी कसौटी पर खरा लगा। जैसे-जैसे उनका अध्ययन बढ़ रहा था, वैसे-वैसे ब्राह्मण धर्म के षड्यंत्र भी खुलकर सामने आ रहे थे। उन्हें यह लगा कि जातियां हिंदू समाज को बांटने का काम करती हैं। अपनी सत्ता को बचाए रखने के लिए ही ब्राह्मणों ने हजारों जातियों की रचना की है। यहां तक कि शोषितों के भी दो वर्ग बना दिए हैं। पहली श्रेणी में वे हैं जिन्हें स्पर्श करने से कोई अपवाद नहीं होता। दूसरी श्रेणी में वे हैं जिनकी छाया भी सवर्णों को अपवित्र कर देती है। ये चीजें जहां ललई सिंह को आहत करती थीं, वहीं संघर्ष में लगातार बने रहने की प्रेरणा भी देती थीं।

पुस्तक जब्ती के सरकारी आदेश के विरुद्ध उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दी। मामले की सुनवाई के लिए तीन सदस्यों की बैंच बनाई गई। ‘सच्ची रामायण’ का मामला अभी न्यायालय में विचारधीन ही था कि सरकार ने 1970 में ललई सिंह की पुस्तकों ‘सच्ची रामायण की चाबी’ और ‘सम्मान के लिए धर्म-परिवर्तन करें’ की जब्ती के आदेश जारी कर दिए। ‘सच्ची रामायण’ में पेरियार ने अपने तर्क तो प्रस्तुत किए थे, परंतु उनके संदर्भ वे नहीं दे पाए थे। ‘सच्ची रामायण की चाबी’ में ललई सिंह ने ‘सच्ची रामायण’ के तर्कों को पुख्ता बनाने वाले संदर्भ दिए थे। दूसरी पुस्तक डाॅ. आंबेडकर के भाषणों पर आधारित थी। इस जब्ती के मात्र छह महीनों के पश्चात 12 सितंबर 1970 को सरकार ने डाॅ. आंबेडकर की अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘जातिभेद का उच्छेद’ को भी प्रतिबंधित घोषित कर दिया गया। यह सरकार का तानाशाही-भरा आचरण था जो हर विरोधी विचारधारा को दबा देना चाहता था। रामस्वरूप वर्मा के प्रोत्साहन पर ललई सिंह ने डाॅ. आंबेडकर की पुस्तकों की जब्ती के आदेश के विरुद्ध अदालत में मुकदमा दायर कर दिया। परिणाम अनुकूल ही निकला। न्यायमूर्ति ए. कीर्ति ने 19 जनवरी 1971 को ‘सच्ची रामायण’ पर जब्ती के आदेश को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला मानते हुए रद्द कर दिया। फैसले में उन्होंने सरकार को निर्देश दिया था कि वह जब्त की गई पुस्तक को लौटाकर प्रकाशक को 300 रुपए का हर्जाना दे। सरकार भी ललई सिंह के पीछे पड़ी थी। उसने ललई सिंह की पुस्तक ‘आर्यों का नैतिक पोल प्रकाश’ के विरुद्ध मुकदमा दायर कर दिया। यह मुकदमा उनकी मृत्युपर्यंत अदालत में बना रहा।

ललई सिंह इन दबावों के आगे झुकने वाले न थे। बल्कि इन दबावों से उन्हें और अधिक लिखने की प्रेरणा मिलती थी। इस बीच उन्होंने पांच नाटकों की रचना की थी, उनमें अंगुलीमाल, शंबूक वध, संत माया बलिदान, एकलव्य शामिल थे। संत माया बलिदान का प्रथम लेखन स्वामी अछूतानंद ने किया था। लेकिन वह नाटक अनुपलब्ध था। ललई सिंह ने उसका पुनर्लेखन किया था। वे रामस्वरूप वर्मा और जगदेव प्रसाद सिंह कुशवाहा के साथ वंचना एवं षोषण के षिकार हर व्यक्ति के साथ थे। नाटकों के अलावा उन्होंने ‘शोषितों पर धार्मिक डकैती’, ‘शोषितों पर राजनीतिक डकैती’, तथा ‘सामाजिक विषमता कैसे समाप्त हो?’ जैसी पुस्तकों की रचना भी की। उनकी सभी पुस्तकें ब्राह्मणवादी वर्चस्व के विरुद्ध शंखनाद करने वाली थीं। साधारण प्रकाशक उनकी पुस्तकें छापने को तैयार न थे। इसलिए उन्होंने एक के बाद एक तीन प्रेस खरीदे। पुस्तकें छापने और उन्हें बांटने में उनकी काफी जमा रकम निकल गई। यह सोचकर कि मोटी पुस्तकों को खरीदना आम आदमी के लिए आसान नहीं है, उन्होंने छोटी प्रचारनुमा पुस्तकें लिखने को प्राथमिकता दी। वैसे भी उनका उद्देष्य अपने विचारों को अधिकतम लोगों तक पहुंचाना था। यदि ब्राह्मण बीस से चौबीस पृष्ठों की पोथी को पढ़कर ‘पंडित’ कहला सकता है और लोगों को मूर्ख बना सकता है, तो उतने ही आकार की पुस्तकों से लोगों में चेतना का संचार भी संभव है। इसलिए अपने विचारों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए उन्होंने छोटी पुस्तकों को प्राथमिकता दी।

‘सच्ची रामायण’ पर लगे प्रतिबंधों के विरुद्ध वे उच्च न्यायालय में मुकदमा जीत चुके थे। लेकिन उनके विरोधी षांत नहीं थे। उनके दबाव में सरकार ने उच्चतम न्यायालय में अपील कर दी। वहां मामला वरिष्ठ जजों की पीठ के सम्मुख पहुंचा। कोर्ट ने गंभीरतापूर्वक मामले की सुनवाई की। न्यायालय ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को केंद्र में रखकर निर्णय सुनाया, जो ललई सिंह के पक्ष में था। यही नहीं, ‘जातिवाद का उच्छेद’ तथा ‘सम्मान के लिए धर्म-परिवर्तन करें’ को भी न्यायालय ने प्रतिबंध से मुक्त कर दिया। अदालत के सामने पहुंचे इन मामलों में जीत ललई सिंह की हुई थी। लेकिन जिस तरह प्रतिक्रियावादी षक्तियां उनके पीछे पड़ी थीं, उससे हिंदू धर्म की ओर से उनका मोह-भंग होना स्वाभाविक था। डाॅ. आंबेडकर 1935 में ही हिंदू धर्म छोड़ने की घोषणा कर चुके थे। धर्मांतरण का कार्यक्रम बना 14 अक्टूबर, 1956 को। ललई सिंह अपने प्रेरणा पुरुष के साथ ही धर्मांतरण करना चाहते थे। लेकिन अचानक खून की उल्टी होने के कारण उन्हें अपना फैसला रोकना पड़ा। उन्होंने घोषणा की कि जिन महास्थिविर से डाॅ. आंबेडकर से दीक्षा ली थी, उन्हीं से वे भी दीक्षा ग्रहण करेंगे। इससे मामला थोड़े दिन टला। आखिरकार 21 जुलाई 1967 को उन्होंने महास्थविर चंद्रमणि के मार्गदर्शन में बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण कर ली।

उस समय वे बहुत आह्लादित थे। धर्मांतरण के बाद दिए गए अपने संक्षिप्त भाषण में उन्होंने न केवल स्वयं को बौद्ध माना था, अपितु अपने नाम के साथ जुड़ा जातिसूचक षब्द छोड़ने का ऐलान भी किया था। उनका कहना था, ‘आज से मैं मनुष्य हूं, मानवतावादी हूं, आज से मैं सिर्फ ललई हूं।’ किसी भी प्रकार के जातीय आग्रहों, मान्यताओं से संपूर्ण मुक्ति का ऐलान करते हुए उन्होंने भविष्य में कभी जातिसूचक शब्द या सामंती शब्दावली का प्रयोग न करने का ऐलान किया था। जुझारूपन उन्हें पिता से विरासत में प्राप्त हुआ था। रामस्वरूप वर्मा ने अपने संस्मरण में एक घटना का उल्लेख किया है—

‘वह हमारे चुनाव प्रचार में भूखे-प्यासे एक स्थान से दूसरे स्थान भागते। बोलने में कोई कसर नहीं रखते थे। उनके जैसा निर्भीक भी मैंने दूसरा नहीं देखा। एक बार चुनाव प्रचार से लौटे पैरियर ललई सिंह जी को मेरे साथी ट्रैक्टर ट्राली से लिए जा रहे थे। जैसे ही खटकर गाँव के समीप से ट्रैक्टर निकला, उन पर गोली चला दी गई। संकट का आभास पाते ही वह कुछ झुक गए, गोली कान के पास से निकल गई। लोगों ने गाँव में चलकर रुकने का दबाव डाला। किन्तु वह नहीं माने। निर्भीकता से उन्होंने कहा, ‘चलो जी, यह तो कट्टेबाजी है, मैंने तो तोपों की गड़गड़ाहट में रोटियां सेकीं हैं।’

24 दिसंबर 1973 को पेरियार का निधन हुआ। उनकी स्मृति में बड़ी सभा का आयोजन 30 दिसंबर 1974 को किया गया। उसमें विश्व-भर के बुद्धिजीवी, चिंतक और राजनेता पधारे हुए थे। ललई सिंह भी उसमें पहुंचे। उन्हें बोलने के लिए आमंत्रित किया गया तो ब्राह्मणवाद सहित हिंदू मिथों पर वैसा ही हमला किया जैसा पेरियार किया करते थे। अंतर केवल इतना था कि पेरियार नास्तिक थे और मनुष्य के लिए किसी भी धर्म को अनावश्यक मानते थे। जबकि डाॅ. आंबेडकर के प्रभाव में आकर ललई सिंह बौद्ध धर्म में शामिल हो चुके थे। अपने भाषण में ललई सिंह ने बौद्ध धर्म का ही पक्ष लिया। बौद्ध धर्म को श्रेष्ठतम बताते हुए उन्होंने कहा कि वह तर्क और मनुष्यता का समर्थन करता है। किसी भी प्रकार के आडंबरवाद के लिए बौद्ध धर्म में कोई गुंजाइश नहीं है। हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म की तुलना करते हुए उन्होंने पहले को ‘उधार का धर्म’ और दूसरे को ‘नकद का धर्म’ बताया। अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुए कहा कि बौद्ध धर्म मनुष्य को जन्म-मरण के चक्कर में नहीं उलझाता। उसमें मनुष्य जो भलाई करता है, उसका परिणाम इसी जन्म में स्वयं उसके आगे आता है, यानी—‘जा हाथ देब और वा हाथ लेव।’ जबकि हिंदू धर्म भलाई इस जन्म में करो, उसका फल अगले जन्म में प्राप्त होगा—कहकर लोगों को भरमाता रहता है।

वे स्पष्ट और निर्भीक वक्ता थे। घुमा-फिराकर बात करना उन्हें आता ही नहीं था। एक बार वे आगरा में एक सम्मेलन में हिस्सा लेने पहुंचे थे। मंच पर बौद्ध आचार्यों सहित अनेक विद्वान और कार्यकर्ता मौजूद थे। ललई सिंह के बोलने का नंबर आया तो उन्होंने मंचासीन लोगों पर कटाक्ष करते हुए कहा—‘मेरे पास जो लोग मंच पर बैठे हैं एवं जो लोग सामने बैठे हैं वह सब सहायताइष्ट, वजीफाइष्ट और रिजर्वेशनाइष्ट हैं, आप में से कोई भी बौद्धिष्ट व अम्बेडकराइष्ट नहीं है।’ इसपर कुछ मंचासीन हस्तियों ने आपत्ति की तो उन्होंने उत्तर दिया—‘जब तक आप बौद्धों में रोटी-बेटी का संबंध नहीं बनाएंगे, हिंदू रीति-रिवाजों और त्योहारों को मनाना नहीं छोड़ेंगे—तब तक तक आपका बौद्ध होना सिर्फ ढोंग ही रहेगा।’ उस बैठक के बाद ही उन्हें पेरियार की उपाधि मिली, जो स्वयं ललई सिंह के लिए गर्व की बात थी।

ललई सिंह सच्चे मानवतावादी थे। आस्था से अधिक महत्त्व वे तर्क को देते थे। सच्ची रामायण के प्रकाशन के पीछे उनका उद्देश्य हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को खारिज करना न होकर, मिथों की दुनिया से बाहर निकलकर जीवन-जगत के बारे तर्क संगत ढंग से सोचने और उसके बाद फैसला करने के लिए प्रेरित करना था। वे जाति-भेद और छूआछूत के विरुद्ध आजीवन संघर्षरत रहे। उनका एक ही ध्येय था, समाज को धार्मिक आंडबरों और जातिवाद जैसी रूढ़ियों से मुक्ति दिलाना। जीवन के अंतिम दिनों में वे आंखों की असाध्य बीमारी का शिकार था। अंततः सामाजिक क्रांति का वह अनन्य सेनानी, अनथक योद्धा 7 फरवरी 1993 को संघर्ष की लंबी विरासत छोड़कर हमारे बीच से उठ गया। गांव में लोग उन्हें ‘दीवानजी’ कहा करते थे। उनके संघर्ष के साक्षी रहे लोग आज भी उन्हें उसी मान-सम्मान और गर्व के साथ याद करते हैं।  

ओमप्रकाश कश्यप

1। गणानुत्सवसङ्केतान्वयजयत्पुरुषर्षभः

संदर्भ:

सिंधूकूलाश्रिता ये च ग्रामणेया महाबलाः

शूद्राभीरगणाश्चैव ये चाश्रित्य सरस्वतीम्

वर्तयंति चे ये मत्स्यैर्ये च पर्वतवासिन, सभापर्व, अध्याय 29, 8-9, महाभारत, भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट, संपादन: विष्णु एस। सकथांकर