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साम्यवाद, सामाजिक न्याय और राज्य

सामान्य
  • फासिज्म रोकने का श्रेष्ठतम उपाय है, समाज में सामाजिक न्याय की यथासंभव प्रतिष्ठाआर्नोल्ड टॉयनबी.

  • भारत के संदर्भ में सामाजिक न्याय लोकप्रिय राजनीति का तकिया कलाम है. जिसे हर नेता प्रत्येक चुनाव में

    अपनीअपनी तरह से इस्तेमाल करता है.

साम्यवाद’ और ‘सामाजिक न्याय’ दोनों आयातित पद हैं. हमारे यहां मार्क्सवाद ज्यादा चलता है, जिसे खुद मार्क्स ने ही खारिज कर दिया था. लोहिया भी मार्क्सवाद कहने से बचते थे. हालांकि मार्क्सवाद के आदर्श से उन्हें कोई शिकायत न थी. साम्यवादी लक्ष्य को लेकर इस देश में जितने भी राजनीतिक संगठन बने, किसी न किसी रूप में वे सभी मार्क्सवाद का प्रतिनिधि दल होने का दावा करते हैं. इतनी शिद्दत से करते हैं कि अपना लक्ष्य, साम्यवाद का आदर्श ही उन्हें याद नहीं रहता. शायद इसलिए कि ‘मार्क्सवाद’ की प्रचलित शब्दावली यथा वर्गसंघर्ष, मजदूर, पूंजीपति, शोषण आदि को लोकप्रिय राजनीति के खांचे में आसानी से फिट किया जा सकता है. उसे लेकर राजनीति करना आसान है. साम्यवाद अपेक्षाकृत स्वप्नीला शब्द है. आदर्श और मनुष्यता के बेहद करीब. वह जिस आदर्शोन्मुखी, वर्गहीन और समतायुक्त समाज का सपना देखता है, उसकी पूर्णता पर आमजन तो क्या, आकादमिक प्रतिष्ठा वाले बड़ेबड़े विद्वान विश्वास नहीं करते.

पश्चिम में प्लेटो का आदर्श राज्य का सपना करीबकरीब साम्यवादी परिकल्पना ही थी. भारत में रैदास ने ‘बेगमपुरा’ तथा कबीर ने ‘अमरपुरी’ के रूप में समताआधारित समाज का सपना देखा था. उसके कुछ समय बाद योरोप में संत साइमन ने भी व्यंग्यात्मक शैली में वर्गहीन तथा आदर्श समाज की परिकल्पना की थी. प्लेटो की परिकल्पना को अरस्तु ने ही अव्यावहारिक मानकर नकार दिया था, वहीं संत साइमन के सपने पर उनके समकालीनों ने कोई ध्यान ही नहीं दिया. मगर डेड़दो शताब्दी बाद ही, यूरोपीय पुनर्जागरण के दौर में साइमन की यूटोपियाई कल्पना आदर्शवादी समाज का सपना देखने वाले विद्वानों, चिंतकों और आंदोलनकारियों का सपना बन गई. संत साइमन के थोड़ा आगेपीछे जॉन लाक, इमानुएल कांट, प्रस्टीले, रूसो, राबर्ट ओवेन, बैंथम, जान स्टुअर्ट मिल, मिखाइल बकुनिन आदि ने समानता और स्वाधीनता पर आधारित ऐसे राजनीतिक दर्शन को दुनिया के सामने रखा, जिसमें व्यक्तिमात्र की गरिमा, स्वतंत्रता और समान सुख की उम्मीद शामिल थी. भारत में स्थितियां अलग थीं. यहां का समाज जाति और धर्म के आधार पर बुरी तरह विभाजित था. सत्ता और संसाधन जिन लोगों के अधीन थे, वे हर हालत में यथास्थिति बनाए रखना चाहते थे. जिस धर्मसंस्कृति के भारतीय अनुगामी रहेवह खुद वर्गभेद का पोषण करता है. इसलिए समाज के उत्पीड़ित वर्गों से आए रैदास आदि संत कवियों के सपने की ओर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया. जाति और वर्णभेद में बुरी तरह फंसे, उन्हें विधि का विधान मानकर जीने वाले समाज के लिए यह कोई अनहोनी बात नहीं थी. लोग अपने दुख, दैन्य, दमन और दासत्व के साथ जीना सीख चुके थे. आजादी के बाद भी शताब्दियों के संस्कार देश के बुद्धिजीवियों के अवचेतन पर असर बनाए रहे. यही कारण है कि हमारे यहां खुद को समाजवादी कहने वाले नेता हुए, मार्क्सवादी हुए, मगर साम्यवाद कभी भी बौद्धिक और आकादमिक बहसों से बाहर न आ सका.

आजादी के बाद रोजमर्रा की शब्दावली में साम्यवाद अ़ौर मार्क्सवाद दोनों के लिए वैकल्पिक शब्द का चलन शुरू हुआ. वह शब्द हैवामपंथ. बदले परिवेश में ‘वामपंथ’ को गाली मान लिया गया है. तो भी मार्क्सवाद के पर्याय के रूप में या जिन्हें मार्क्सवाद कहनेलिखने से चिढ़ है, वे प्रायः ‘वामपंथ’ का ही प्रयोग करते हैं. वामपंथ क्या है? वह जो दक्षिणपंथ नहीं है? एक वैचारिकी के रूप में वामपंथ का साम्यवाद या मार्क्सवाद से दूरपास का कितना नाता है? क्या वह मार्क्सवाद या साम्यवाद के पर्याय से अधिक कुछ नहीं है? ऐसे प्रश्नों पर वे विचार ही नहीं करना चाहते. मार्क्सवाद और साम्यवाद की तरह ‘वामपंथ’ भी आयातित विचार है. अपने मूल अर्थों में इसका मार्क्सवाद से दूर का ही नाता है. एक रास्ता है, जिससे साम्यवाद की ओर बढ़ा जा सकता है. वामपंथ का संबंध फ्रांस की क्रांति से है, जो कभी मार्क्सवादी या साम्यवादी देश नहीं रहा. प्रथम वामपंथी होने का श्रेय टॉमस पेन तथा उसके सहयोगियों को जाता है. पेन मूलतः व्यक्तिमात्र की अधिकतम स्वाधीनता का समर्थक था. अमेरिकी क्रांति की सफलता के पश्चात, मित्र थॉमस जेफरसन से विदा लेकर वह फ्रांस पहुंचा था. वहां राजशाही के विरुद्ध उसका संघर्ष जारी था. पेन की पुस्तक ‘राइट्स ऑफ मेन’ उनीसवीं शताब्दी की सर्वाधिक प्रभावशाली पुस्तकों में से है. इस पुस्तक ने फ्रांसिसी क्रांति के लिए उत्प्रेरक का काम किया था.

फ्रांसिसी क्रांति ने सामाजिकराजनीतिक संरचनाओं में अनेक बदलाव किए थे. उससे पहले धर्म राजनीति के मुख्य मार्गदर्शक की भूमिका निभाता था. क्रांति के बाद धर्म के प्रभावक्षेत्र मनुष्य के निजी विश्वास और आचरण तक सीमित हो गया. नई विचारधाराओं के आलोक में राजनीति में धर्म की कार्यकारी भूमिका को लगभग समाप्त कर दिया गया था. उसके स्थान पर न्याय, लोककल्याण, नागरिक और राज्य की आंतरिक शुभता, मानवाधिकार आदि को राजनीति का प्रमुख मार्गदर्शक घोषित कर दिया गया. फलस्वरूप विधि के शासन को बल मिला. राज्य जिसे पहले दैवीय अथवा देवताओं की विशेष अनुकंपा माना जाता था, उसको मनुष्य द्वारा अपने तथा मानवमात्र के कल्याण हेतु निर्मित संस्था कहा जाने लगा. राज्य के संचालन में नागरिकों की भूमिका जो धर्मप्रधान राजनीति में अत्यंत गौण थी, वह प्रमुख हो गई. तीसरी और प्रमुख सफलता थी, राजनीति में कुल, परंपरा, जाति, वंशाधिकार, वर्णश्रेष्ठता आदि के दावे के आधार पर विशेषाधिकारों का लोप. उससे, कालांतर में लोकतंत्र के रास्ते प्रशस्त हुए, आधुनिक समाज की नींव रखी गई.

आरंभिक अवधारणा के अनुसार वामपंथ मार्क्सवाद या साम्यवाद का पर्याय भले न हो, किंतु अपनी इन समानधर्मा विचारधाराओं की भांति वह किसी भी प्रकार की सर्वसत्तावादी अवधारणा का विरोध करता है, इस दृष्टि से इसे साम्यवाद और मार्क्सवाद दोनों के करीब माना जा सकता है. मार्क्सवाद का मूलभूत विचार वर्गसंघर्ष है. वर्गहीन समाज की स्थापना उसका लक्ष्य है. वर्गसंघर्ष को हम हीगेल की दार्शनिक संकल्पना ‘द्वंद्ववाद’ का राजनीतिक अवतार भी कह सकते हैं. 1848 में श्रमिकों का आवाह्न करते हुए मार्क्स ने कहा थाᅳ‘तुम्हारे पास खोने के लिए सिवाय अपनी बेड़ियों के कुछ नहीं है, लेकिन जीतने के लिए पूरी दुनिया पड़ी है.’ इस कथन के संकेत साफ थे. मार्क्स चाहता था कि श्रमिक वर्ग संगठित क्रांति द्वारा उत्पादन एवं सत्ता प्रतिष्ठानों पर अधिकार कर ले. इस आवाह्न का श्रमिक संगठनों ने खुले दिल से स्वागत किया था. उसके आधार पर 1871 में पेरिस क्रांति हुई. उसका सुफल ‘पेरिस कम्यून’ के रूप में दुनिया सामने आया. पेरिस और आसपास के कुछ ठिकानों पर श्रमिकसंगठनों का अधिकार हो गया. वह सफलता अस्थायी सिद्ध हुई. तीन महीने से भी कम समय में सत्ता श्रमिकसंगठनों से वापस छीन ली गई. पेरिस कम्यून की असफलता मार्क्स के लिए भी सबक थी. वर्गक्रांति की सफलता के लिए वर्गभेद के कारणों को समझना और समझाना अत्यावश्यक था. उसके बाद मार्क्स ने खुद को पूंजीवाद के गंभीर अध्ययन के लिए समर्पित कर दिया था. वर्गहीन समाज की संकल्पना उसके लंबे अध्ययनमनन का सुफल थी. ‘पेरिसक्रांति’ के बाद मार्क्स का नाम दुनियाभर में फैल चुका था. लोग संगठित विद्रोह की शक्ति से परिचित हो चुके थे. समझने लगे थे कि संगठित ताकत से आजादी को संभव बनाया जा सकता है. भारत भी उससे अछूता न था. ‘वर्गसंघर्ष का उपयोग औपनिवेशिक दासता से मुक्ति के लिए किस प्रकार किया जाए?’ यह प्रश्न अनेक विचारवान लोगों को उद्वेलित करने लगा था. मार्क्स से मिलने की साध लेकर राजा राममोहनराय ने इंग्लेंड की यात्रा भी की थी. हालांकि उन दोनों की भेंट के बारे में दावे के साथ कुछ भी कह पाना कठिन है.

सर्वहारा शोषण की जिन स्थितियों का विश्लेषण मार्क्स ने अपने लेखन में किया था, वे उससे पहले भी अजानी नहीं थीं. प्लेटो और अरस्तु दोनों यद्यपि दास पृथा के समर्थक थे, लेकिन वे राज्य से अपेक्षा करते थे कि वह नागरिकों के प्रति अपने दायित्वों को समझे तथा उनका निष्ठापूर्वक पालन करे. मध्यकाल के विचारक भी लोककल्याण के लिए राज्य की ओर से उत्तरदायी आचरण की अपेक्षा करते हैं. फ्रांसिसी विचारक पियरे जोसेफ प्रूंधों ने समाजार्थिक समानता पर आधारित राज्य की परिकल्पना की थी. बेहद मामूली, गरीब परिवार में जन्मा प्रूंधों बचपन में अपने पिता के साथ कहवाघर में काम करता था. उसने अपना सारा ज्ञान जीवनानुभवों और स्वाध्याय के बल पर अर्जित किया था. वह अराजकतावादी था. उसका मानना था कि राज्य की कुल संपत्ति पर सरकार का अधिकार होना चाहिए. सरकार कैसी हो? इस बारे में उसकी स्पष्ट मान्यता थीᅳ‘प्रत्येक के द्वारा खुद की सरकार’. कुल मिलाकर शासक वर्ग का पूर्णतया लोप. प्रत्येक नागरिक के लिए अधिकतम स्वतंत्रता. यह थोरो द्वारा दी गई अच्छी सरकार की विशेषता, ‘अच्छी सरकार वह है जो बिलकुल भी शासन नहीं करती’का समर्थन करती है. प्रूंधों ने व्यक्तिगत संपत्ति को चोरी और संपत्तिधारक को चोर कहा था. अपने समय में वह मार्क्स कहीं अधिक लोकप्रिय था. लेकिन पूंजीवाद के दुष्प्रभावों को लेकर मार्क्स का अध्ययन कहीं अधिक व्यापक और तथ्यपरक था. सभ्यताओं के लंबे, ऐतिहासिक अध्ययन द्वारा वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि उत्पादन प्रविधियों में बदलाव संस्कृति एवं सभ्यता को प्रभावित करता है. उत्पादकता के साधनों पर पूंजीवादी वर्चस्व के रहते शोषण से मुक्ति असंभव है. एकमात्र समाधान वर्गसंघर्ष है. वह सामाजिक परिवर्तन की दिशा में प्रमुख औजार है. ऐसा रास्ता, जिसका लक्ष्य साम्यवाद है. ‘थीसिस ऑन फायरबाख’ में मार्क्स का निष्कर्षवाक्य हैᅳ‘दार्शनिकों ने इस संसार की अनेक तरह से व्याख्या की है. सवाल है कि उसे बदला किस तरह जाए?’ मार्क्स का पूरा जीवन बदलाव को समर्पित रहा. इसके लिए उसने वर्गक्रांति का आवाह्न किया, जो इतनी ओजपूर्ण है कि प्रायः वर्गसंघर्ष को ही साम्यवाद की आधारसैद्धांतिकी मान लिया जाता है. मार्क्स और मार्क्सवाद के नाम पर राजनीति करने वाले लोग कभी अनजाने में तो कभी जानबूझकर ऐसी गलती करते रहते हैं. कदाचित इसलिए भी कि वर्गसंघर्ष यानी टकराव की राजनीति करना आसान है. विशेषकर भीषण असमानता के शिकार उन समाजों में जहां लोकतंत्र लोकप्रिय राजनीति तक सिमटकर अपनी गरिमा तथा उद्देश्य दोनों से दूर जा चुका है.

सामाजिक न्याय : ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

सामाजिक न्याय’ पर चर्चा करने से पहले उचित होगा कि उसके इतिहास पर भी कुछ बातचीत कर ली जाए. उन परिस्थितियों पर विचार किया जाए जिनके कारण चर्च जैसी शक्तिशाली संस्था को कल्याणराज्य के समर्थन में उतरना पड़ा था? 16वीं शताब्दी की वैज्ञानिक क्रांति यूरोप में कई वैचारिक आंदोलनों की प्रेरक बनी थी. उनके केंद्र में मनुष्य था. फलस्वरूप सामंतवादी दौर की वे विचारधाराएं सवालों के घेरे में आने लगीं, जो किसी अजाने, अदृश्य लोक तथा पैगंबर की बातें किया करती थीं. जिनकी निगाह में सब कुद्ध नियतिबद्ध था. उन्हें कठघरे में लाने की शुरुआत थॉमस हॉब्स की ओर से हो चुकी थी. आगे चलकर उसे ह्यूम, जान लॉक, देकार्त्त, वाल्तेयर, रूसो, इमानुएल कांट, बैंथम, प्रूधां और टॉमस पेन जैसे विचारकों का समर्थन मिला. इनमें कई आस्थावादी भी थे, मगर धर्म उनके लिए व्यक्तिगत आस्था और विश्वास तक सीमित था. राजनीति के साथ उसके घालमेल के सभी विरोधी थे. नई विचारधाराओं के आलोक में लोकतंत्र और व्यक्तिस्वातंत्र्य पर जोर दिया जाने लगा था. फ्रांसिसी क्रांति तथा उसके पहले संपन्न हुई अमेरिकी क्रांति, धर्म केंद्रित प्राचीन राजनीतिक संस्थाओं को वर्षों पहले नकार चुकी थीं. नए राजनीतिक दर्शनों पर बहस जारी थी. इससे पुरातनपंथी धर्माचार्यों में बेचैनी थी. अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए वे छटपटा रहे थे.

विज्ञान के पंखों पर सवार होकर आने वाली औद्योगिक क्रांति सर्वथा निरापद न थी. अनियोजित मशीनीकरण ने अनेक समस्याओं को जन्म दिया था. वैज्ञानिक क्रांति का स्वागत करते हुए ‘आधुनिक विज्ञान का पितामह’ कहे जाने वाले फ्रांसिस बेकन ने कहा था कि औद्योगिक क्रांति श्रमिकों को उनके जानलेवा कष्टों से मुक्ति दिलाकर नए समाज की नींव रखेगी. किंतु उद्योगपतियों की स्वार्थपरता, लाभ को केंद्र में रखकर उत्पादन करने की उनकी नीति तथा श्रमिकों को उनके श्रम का पूरा लाभ न देकर सबकुछ हड़प जाने की लालची वृत्ति ने मशीनीकरण के लाभों को विशिष्ट वर्ग तक सीमित कर, श्रमिक वर्ग के उन सभी सपनों पर पानी फेरने का काम किया था, जो उसने औद्योगिक क्रांति के साथ देखे थे. उससे श्रमिकों का आक्रोश बढ़ रहा था. वे एक साथ लामबंद होने लगे थे. चार्ल्स फ्यूरियर, प्रूंधों, मार्क्स, मिखाइन बकुनिन जैसे विचारक, आंदोलनकारी उनके समर्थन में थे. फ्रांसिसी क्रांति की सफलता से श्रमिक संगठनों के हौसले बढ़े हुए थे. उसका दूरगामी असर भविष्य की राजनीति पर पड़ा. फलस्वरूप राजनीति में धर्म की भूमिका सिमटने लगी. न्याय का ईश्वरीय आधार समाप्त हो गया. प्रशासनिक फैसलों में तर्क और ज्ञानविज्ञान की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो गई. क्रांति की तीसरी बड़ी उपलब्धि थी, वंशानुगत शासन का अंत. फलस्वरूप वैधानिक और नागरिक अधिकार राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनने लगे. शासनप्रशासन में लोकतांत्रिक संस्थाओं की संख्या बढ़ने लगी, जिनके लिए नागरिक तथा नागरिकअधिकार प्रमुख थे.

बीसवीं शताब्दी के आरंभ में सोवियत क्रांति की कामयाबी श्रमिक आंदोलन के इतिहास में निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई. सोवियतसंघ विश्व का पहला समाजवादी राज्य था, जिसका गठन साम्यवादी सपने के मद्देनजर किया गया था. उस सफलता से उत्साहित सर्वहारा वर्ग पूरे विश्व को कम्युनिज्म की परिसीमा में लाने का सपना देख रहा था. मंगोलिया, जर्मनी, इटली, रोमानिया जैसे दर्जनों देशों उसके प्रभाव में आ चुके थे. अमेरिका, इंग्लेंड जैसे ठेठ पूंजीवादी देशों में साम्यवादी दलों का गठन हो चुका था. उन्हें अपने समय के प्रखर विद्वानों और बुद्धिजीवियों का नेतृत्व प्राप्त था. चीन भी तेजी से श्रमिकक्रांति की ओर अग्रसर था. वहां माओ के नेतृत्व में परिवर्तन की लड़ाई सफलतापूर्वक लड़ी जा रही थी. उधर अमेरिका के उपनिवेश रहे अफ्रीकी देशों में वर्गचेतना अंगड़ाई ले रही थी. लोग औपनिवेशिक दासता से बाहर निकलने के लिए आतुर थे. हथियार खरीद की अवांछित स्पर्धा का सीधा असर उन देशों की विकासदर पर पड़ा. दूसरे विश्वयुद्ध का डर दिखाकर प्रतिक्रियावादी शक्तियां सत्ताकेंद्रों पर सवार होने लगी थीं.

औपनिवेशिक देशों में आजादी की बढ़ती मांग का एक असर विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के रूप में सामने आ रहा था. उनीसवीं शताब्दी में तेजी से हो रही बाजारवृद्धि लगभग रुकसी गई थी. ऊपर से विश्वयुद्ध की मार. विश्वघटनाक्रम तेजी से बदल रहा था. जिन देशों में सर्वहारा क्रांति संपन्न हुई थी, वहां वर्गहीन समाज की स्थापना का लक्ष्य अभी बाकी था. युद्ध से जनअसंतोष में वृद्धि हुई थी. पूंजीवादी ताकतों के सामने केवल दो रास्ते शेष थे. पहला बिना किसी ढांचागत परिवर्तन के, श्रमिक आंदोलन की ओर से आंखें मूंदकर उत्पादन में तेजी लाई जाए. तत्कालीन परिस्थतियां में वह असंभव जैसा था. दूसरा और अंतिम रास्ता यही था कि श्रमिकों की वैध मांगों से समझौता कर श्रमिकअसंतोष को दूर करने के उपाय किए जाएं. इस भावना ने ‘सामाजिक न्याय’ की अवधारणा को जन्म दिया. इस तरह अपने मूल में ‘सामाजिक न्याय’ जरूरतमंदों को बहलाफुसलाकर उनके असंतोष को दबा देने की कोशिश का परिणाम था. धार्मिक संगठन उसे राज्य की उदारता के रूप में, जनता का विश्वास जीतने के लिए आवश्यक मानते थे, ताकि उसकी आड़ में धर्मसत्ता अपने वर्गीय स्वार्थों का संरक्षण कर सकें. इसके समर्थन में वे विचारक, बुद्धिजीवी, लेखक और धर्माचार्य भी थे जो सामाजिकऔद्योगिक संरचना में बड़ा बदलाव किए बिना, औद्योगिक लाभों का एक हिस्सा राज्य के माध्यम से श्रमिकों तक पहुंचाकरश्रमिकआंदोलनों से उपजे असंतोष का समाधान खोजना चाहते थे. इसे श्रमिक आंदोलन से गुजर रहे देशों की सरकारों का समर्थन हासिल था. प्रथम विश्वयुद्ध के बाद विभिन्न राष्ट्रों में मारक हथियार खरीदने की होड़ शुरू हो चुकी थी. वर्गक्रांति से गुजर चुके देशों ने भी अपने संसाधन युद्ध की तैयारी अथवा संभावित युद्ध की अवस्था में बचाव के लिए झोंक दिए थे. वे देश एकदूसरे के साथ स्पर्धा में थे. साम्यवाद की सफलता स्पर्धा के बजाय सहयोग पर टिकी होती है. स्पर्धा, भले ही वह हथियारों के लिए दूसरे देशों के साथ हो, साम्यवाद के मूल सिद्धांतों के विपरीत है. हथियारों की स्पर्धा उन देशों में साम्यवादी मूल्यों के प्रचारप्रसार पर भारी पड़ने लगी थी.

सामाजिक न्याय की उद्भावना के दौर में एक वर्ग आमूल परिवर्तनवादियों का भी था. उसके समर्थक मानते थे कि धर्म और धर्म जैसी सामंती चरित्र वाली संस्थाओं के सहारे सामाजिक संरचना में आमूल परिवर्तन असंभव है. इन विचारधाराओं के मूल में यूरोप की वैज्ञानिक क्रांति का बड़ा योगदान था. मशीनीकरण द्वारा पूंजीपति वर्ग की संपत्ति में तेज बढ़ोत्तरी हुई थी. पुराने उद्योगधंधे उजड़ने से शिल्पकार और कामगार वर्ग में असंतोष पनप रहा था. अनियोजित शहरीकरण ने भी अनेक समस्याओं को जन्म दिया था. फलस्वरूप उन देशों में पूंजीवाद के विरुद्ध माहौल बनने लगा था. वैज्ञानिक क्रांति ने लोगों के सोच और मानस को बदला था. नईनई विचारधाराएं सामने आ रही थीं. धार्मिक संस्थाएं, पहले जिनकी हर शिक्षा जनसाधारण के लिए आदेश होती थी, अब उतनी विश्वसनीय नहीं रह गई थीं. बल्कि यह मानते हुए कि धर्म शोषण में मददगार है, उसके विरुद्ध आवाज उठने लगी थीं. हॉब्स, ह्यूम, जान लॉक, देकार्त्त, वाल्तेयर, रूसो, बैंथम, प्रूधों आदि ने धर्म की विश्वसनीयता तथा उसके सर्वसत्तावादी स्वरूप पर सवाल उठाए थे. नए विचारों का मूल्यबोध मानवमात्र के सुख, स्वतंत्रता और सम्मान से अभिप्रेत था. उन्हें जनसमाज का समर्थन भी प्राप्त था. औद्योगिकीकरण रोजगार के परंपरागत संसाधनों पर उनकी निर्भरता घटी थी. उनका आत्मविश्वास लौटा था और अब वे स्वतंत्र निर्णय लेने में सक्षम थे. इसका एहसास पूंजीपति और राजनेताओं को भी था. इसलिए श्रमिककामगार वर्ग को संतुष्ट रखने की कोशिशें श्रमिक चेतना के उभार के साथ ही आरंभ हो चुकी थी. चूंकि जनसाधारण पर धर्म का गहरा प्रभाव था, इसलिए श्रमिक असंतोष को नियंत्रित करने के लिए आरंभ में धर्म को ही माध्यम बनाया गया.

यह कम आश्चर्यजनक नहीं है कि ‘सोशल जस्टिस’ जैसे शब्दयुग्म जिसका प्रयोग राज्य की उदारता और न्यायप्रियता दर्शाने के लिए किया जाता है, का प्रथम प्रयोग एक कट्टर पुरातनपंथी द्वारा किया गया था. इटली निवासी ल्यूगी अजीलिओ टपरेली पेशे से धर्मप्रचारक पादरी था. 1845 में लिखे गए एक लेख Theoretic Essay of Natural Straight में उसने इस शब्दयुग्म का पहली बार प्रयोग किया था. ‘सामाजिक न्याय’ से टपरेली का आशय भी वह नहीं था, जैसा आज है. उसका आशय राज्य के सामान्य न्यायबोध से था. उन दिनों लेखकों और चिंतकों का एक ऐसा वर्ग था जो ईसाई धर्म की मूलभूत मान्यताओं को आगे रखकर राज्य से नागरिकों के प्रति करुणा और सहानुभूतिपूर्ण आचरण की मांग कर रहा था. थॉमस एक्वीनस से प्रभावित, उसे अपना गुरु मानने वाले टपरेली का संबंध इसी वर्ग से था. वह मानता था कि आधुनिकता से लोगों की जो अपेक्षाएं हैं, धर्म की परिसीमा में उनका समाधान संभव है. समानता और व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता को लेकर टपरेली के विचार दकियानूसी किस्म के थे. वह मध्यकालीन दर्शनों से प्रभावित था. जिनमें राजसत्ता से, धर्मसत्ता की अनुप्रेरणा अथवा उसके मार्गदर्शन में काम करने की अपेक्षा की जाती है. उसका विचार था कि प्राकृतिक आधार पर मनुष्य भी बाकी जीवों के समान है. परंतु अपनी मेधा, स्वाध्याय, धन, चरित्र, कुलपरंपरा आदि के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति दूसरों से अलग होता है. चरित्र एवं गुणों में दूसरों से श्रेष्ठतर व्यक्ति, श्रेष्ठता की कसौटी पर कमजोर वर्गां पर शासन करने का अधिकार स्वाभाविक रूप से प्राप्त कर लेता है. समाज को शासक एवं शासित के रूप में देखने वाले टपरेली के लिए न्याय राज्य की उदारता का लक्षण है. उसके दर्शन में शासक एवं शासित के बीच द्वंद्वात्मकता के लिए जगह नहीं है. वह किसी व्यक्ति के शिखर पर होने को उसका विशेषाधिकार मान लेता है. उसके अनुसार कोई व्यक्ति शासन इसलिए करता है, क्योंकि उसमें राज करने का स्वयंअर्जित गुण है.

वर्तमान में ‘सामाजिकन्याय’ जिन अर्थों में प्रयुक्त किया जाता है, उन तक पहुंचने के लिए उसे आधी शताब्दी से भी अधिक का समय लगा है. इस बीच उसका प्रयोग विभिन्न लेखकों, विचारकों द्वारा अलगअलग संदर्भों में किया जाता रहा. 1851 में इतालवी भाषा के एक आलेख ‘दि कैथोलिक सिविलाइजेशन’ में ‘सामाजिक न्याय’ को सामान्य प्रकृतिबोध, ज्ञानविज्ञान और अनुभव पर आधारित ऐसा दर्शन माना गया जो विकेंद्रीकृत सत्ता का विरोध करता है. उसके लगभग तीन दशक बाद 1883 में फ्रांसिसी कैथोलिक समाजविज्ञानी दि मुन ने ‘सामाजिक न्याय’ को श्रमिकों और कामगारों के ऐसे संगठन के साथ जोड़ा, जिसके सदस्य पारस्परिक उत्तरदायित्व एवं सामाजिक आदर्श की भावना के साथ समान उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु परस्पर एकजुट होकर काम करते हैं. उसके दो वर्ष बाद फ्रांसिसी समाजवादी नेता, लेखक और विचारक जार्ज गोयो ने ‘सामाजिक न्याय’ की कामना के साथ ऐसे राष्ट्र के गठन पर जोर दिया, जिसमें नागरिक और सरकार दोनों अपनेअपने कर्तव्य को समर्पित हों; तथा जिसमें नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा का पूरा भरोसा हो. बीसवीं शताब्दी के आरंभ में यह शब्दयुग्म विमर्श का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन चुका था. दर्जनों लेखकों ने ‘सामाजिक न्याय’ को अपनीअपनी तरह से परिभाषित करते हुए उसकी जरूरत पर बल दिया. अमेरिकी लेखक डब्ल्यू विलियोग्वि ने ‘सामाजिक न्याय’ को लेकर कई लेख लिखे. एक लेख में उसने लिखाᅳ‘न्याय का आशय नागरिकों को यथासंभव ऐसे और इतने अवसर उपलब्ध कराना है, जिनसे वह अपने भीतर के शुभत्व को उच्चतम बिंदू तक उठान दे सके. राज्य का स्वरूप ऐसा हो जिसमें सभी को अपने विकास के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हों.’ विलियोग्वि की यह परिभाषा ‘सामाजिक न्याय’ की आधुनिक अवधारणा के काफी करीब है. 1930 तक ‘सामाजिक न्याय’ की अवधारणा पूरी तरह चलन में आ चुकी थी. उसके माध्यम से ऐसे राज्य की परिकल्पना को बल मिला, जहां नागरिक व्यक्तिगत एवं सामूहिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए अपने कर्तव्यों के प्रति सजग हों और राज्य अपने नागरिकों के हितों के प्रति जागरूक.

1924 में सोवियत क्रांति के महानायक रहे विलादिमिर लेनिन की मृत्यु के बाद सत्ता जोसेफ स्टालिन के हाथों में आ चुकी थी. स्टालिन का अर्थ हैलौहपुरुष. अपने नाम के अनुरूप स्वभाव पाया था उसने. इरादों से मजबूत. कड़े फैसले लेने में सक्षम. स्टालिन की पूरी कोशिश सोवियत संघ को वर्गहीन समाज में बदल देने की थी. उसके लिए बड़े पैमाने पर भूप्रबंधन किया जा रहा था. धर्म को किनारे कर पारंपरिक संस्थाओं को शक्तिहीन किया जा चुका था. अपने कठोर निर्णयों से वह अपने मित्रों की नाराजगी भी मोल ले चुका था. मगर स्टालिन के लिए यह विशेष चिंता का विषय नहीं था. ट्राटस्की, लेव केमानोव जैसे नेता जो सोवियत क्रांति के दौरान लेनिन के सहयोगी रह चुके थे, को मृत्युदंड देकर उसने अपने मजबूत इरादों को दर्शा दिया था. चूंकि स्टालिन के नेतृत्व में रूस तरक्की कर रहा था, इसलिए जनता उसके साथ थी. साम्यवादी राष्ट्रकुल के गठन की दिशा में उसकी उसकी प्रगति दर चौंकाने वाली थी. औपनिवेशिक दासता का शिकार देशों में साम्यवाद का तेजी से विस्तार हो रहा था. यह डर पूंजीपतियों तथा उनके समर्थनसहयोग के आधार पर टिकी सरकारों के लिए काफी था. यथास्थिति बनाए रखने का एकमात्र रास्ता था, श्रमिकों और कामगारों को अपने पक्ष में लिया जाए. इसके लिए उन्हें थोड़ीबहुत छूट देकर न्याय का माहौल बनाया गया. विश्वस्तर पर ऐसे बुद्धिजीवियों की पहचान की जाने लगी, जिन्हें पूंजीवाद से कोई शिकायत न थी; अथवा जो बदलाव के लिए हिंसक क्रांति का विरोध करते थे ऐसे बुद्धिजीवियों के समर्थन में आने से ‘सामाजिक न्याय’ का खूब प्रचारप्रसार हुआ.

साम्यवाद, सामाजिक न्याय और राज्य

सामाजिक न्याय’ की ऐतिहासिक अवधारणा हमें प्लेटो और अरस्तु तक ले जाती है. न्याय से प्लेटो का अभिप्राय थामानवीय सद्गुण. ऐसे गुण जो आत्मा का लक्षण और मनुष्यता की कसौटी हैं. जो मनुष्य को एकदूसरे के प्रति सदाशयी तथा समाज का जिम्मेदार सदस्य बनाते हैं.’ न्याय समाज से प्लेटो का अभिप्राय ऐसे समाज से था, जिसमें मनुष्य उन सभी कर्तव्यों को स्वेच्छापूर्वक पूरा करे, जिनका पालन समाज के प्रयोजनों की दृष्टि से अपरिहार्य है. आदर्श समाज में समाज और राज्य मिलकर नागरिकों की योग्यतानुसार जिन कर्तव्यों का निर्धारण करते हैं, उन्हें पालन किया जाना ही श्रेयस्कर है. न्यायअनुगामी व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन इस भावना के साथ करता है कि उसी में उसकी तथा बाकी समाज की खुशी है. बदले में समाज भी पीछे नहीं रहता. अपनी प्रत्येक इकाई के साथ वह ऐसा व्यवहार करता है मानो उसकी खुशी के अभाव में शेष समाज की खुशी भी अधूरी है. इस तरह एक व्यक्ति का सुख समाज के सुख में तथा समाज का सुख उसकी प्रत्येक इकाई के सुख के संरक्षण में नजर आने लगता है. उस अवस्था में सुख का बंटवारा नहीं, उसमें हिस्सेदारी होती है. न्यायसमर्पित समाज सुख को सामूहिक उपलब्धि मानता है. उसमें व्यक्तिगत इच्छाओं का सम्मान किया जाता है, पर जोर सामूहिक लक्ष्यों की प्राप्ति पर दिया जाता है. यह काम सामान्य इच्छा के भरोसे किया जाता है. फलस्वरूप ऐसे समाज में व्यक्तिगत और सामूहिक सुख का अंतर मिटने लगता है. न्यायसमर्पित समाज अपनी प्रत्येक इकाई की इच्छाओं सम्मान यह सोचकर करता है, मानो वे उसका अधिकार हां. वहां प्रत्येक नागरिक दूसरों की इच्छाओं का सम्मान करते हुए अपनी इच्छाओं को मर्यादित रखता है. जिम्मेदार समाज इसमें भी सदस्य इकाइयों की मदद करता है. इस तरह कि सदस्य इकाइयों की अधिकतम इकाइयों की इच्छाओं की अधिकतम पूर्ति संभव हो सके.

सामाजिक न्याय’ राज्य के समर्थन तथा उसके जिम्मेदराना आचरण पर टिका होता है. वह राज्य को न केवल आवश्यक कार्यकारी शक्तियां सौंपने का समर्थन करता है, बल्कि उनके सकारात्मक उपयोग की राह भी बताता है. वह राज्य से अपेक्षा करता है कि ऐसे नागरिकों के साथ सहानुभूति और जिम्मेदराना ढंग से पेश आए, जो प्राकृतिक अथवा अन्य किसी कारण से सामान्य सुखसुविधा के मामले में पिछड़ चुके हैं. इसके लिए कोई एक और सार्वभौमिक रास्ता संभव नहीं है. संसाधनों के उपयोग के लिए न्यायानुगामी राज्य सामान्य सहमति को आधार बनाता है. फिर उसपर इस तरह अमल करता है, जिससे समाजार्थिक असमानताओं को न्यूनतम किया जा सके. फलस्वरूप अन्याय और असमानता के शिकार रहे लोगों के मन में एकदूसरे के प्रति सामंजस्य भाव का संचार होता है. उनका आत्मविश्वास बढ़ता है. इस प्रकार न्यायप्रधान राज्य वह है जिसमें दुखदैन्य के शिकार प्रत्येक नागरिक को राज्य और समाज दोनों की मदद का भरोसा होता है. ऐसा राज्य जो न्याय को अपना नैतिक और वैधानिक कर्तव्य मानता है. उसके अभाव में राज्य अपने होने का औचित्य खो देता है. न्यायशास्त्र के सुविख्यात अध्येता, विचारक जान रॉल्स ने ‘सामाजिक न्याय’ की महत्ता को रेखांकित करते हुए लिखा है

जैसे किसी भी विचारधारा की पहला गुण उसका सत्य होना है, वैसे ही न्याय, सामाजिक संस्थाओं का प्रथम सद्गुण है. कोई दर्शन वह चाहे जितना सरल और सुंदर क्यों न हो, यदि वह असत्य को बढ़ावा देता है तो उसे या तो बदलना चाहिए, अन्यथा मिट जाना चाहिए. ऐसे ही कोई कानून या संस्था वह चाहे जितनी व्यवस्थित और क्षमतावान क्यों न हो, यदि वह अन्याय का समर्थन करती है, तो उसे सुधरना चाहिए, वरना खत्म हो जाना चाहिए.’2

अपने विशद लेखन में रॉल्स क्लासिक समाजवादियों यथा हॉब्स, जॉन लाक, रूसो की ‘सोशल कांट्रेक्ट’ की सैद्धांतिकी को ही विस्तार देता है. उसके अनुसार न्याय श्रेष्ठ समाज का सर्वश्रेष्ठ गुण है. न्याय की पहचान कैसे की जाए? कोई नियम या विचार कब न्यायसंगत बनता है? इसके लिए रॉल्स बहुत साधारण सूत्र देता हैयदि व्यक्तियों के एक समूह को उनकी वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थितियों से एकदम स्वतंत्र कर, उन्हें अपने लिए नया देश, नया परिवेश चुनने तथा नवीन संस्थाएं गढ़ने की आजादी हो, तो उस समूह के लिए यह प्राकृतिक अवस्था में लौटने जैसा होगा. रॉल्स इसे मूल अवस्था की संज्ञा देता है. पुनश्चः मूल अवस्था में लौटी इकाइयों को यदि यह आजादी दी जाए कि भावी समाज के गठन हेतु सोचसमझकर जरूरी नियमों का गठन करें. उस समय परस्पर सहमति, सहभागिता तथा सहकल्याण हेतु वे जिन नियमों का वरण करेंगी, वही न्यायोचित राह होगी. उन नियमों पर ईमानदारी से चलते हुए वे जिन कर्तव्यों का निष्पादन करेंगे, वे सामाजिक न्याय को बढ़ावा देंगे. उसके अनुसार ‘सामाजिक न्याय’ समाज की प्रत्येक इकाई की आंतरिक शक्तियों, शुभताओं, सद्गुणों एवं कर्तव्यों को पहचानने, तथा उन्हें अपने भले के लिए इस प्रकार प्रयुक्त करना है, जिससे शेष सामाजिक इकाइयों के हित बाधित न हों. ‘सामाजिक न्याय’ उत्तरदायी सरकार का सबसे महत्त्वपूर्ण और प्राथमिक कर्तव्य है. उसके माध्यम से वह अपने होने के औचित्य को सिद्ध कर सकती है.

यदि नागरिककल्याण को कसौटी मान लिया जाए तो ‘साम्यवाद’ और ‘सामाजिक न्याय’ के बीच की दूरी मिटने लगती है. वे समानधर्मा न होकर पूरक विचारधाराएं सिद्ध होती हैं. लक्ष्य की दृष्टि से दोनों के बीच कोई खास मतभेद नहीं है. अंतर वहां तक पहुंचने के रास्ते में है. उसके लिए साम्यवाद वर्गसंघर्ष का रास्ता अपनाता है. उसकी मूल धारणा है कि शिखर पर आसीन सर्वसत्तावादी शक्तियां अपने विशेषाधिकारों को छोड़ने के लिए कभी तैयार न होंगी. वर्गहीन समाज की रचना के लिए आवश्यक है कि उनसे उन सभी संसाधनों को छीनकर राज्य के नियंत्रण में ले लिया जाए जो उन्होंने श्रमिकों और कामगारों के अंतहीन शोषण द्वारा अर्जित किए हैं. ‘सामाजिक न्याय’ समाजवादी राज्य का आदर्श सामने रखता है. वह अपेक्षा करता है कि सरकार उन लोगों के प्रति सहानुभूति से पेश आए जो किसी कारण विकास की स्पर्धा में पिछड़ चुके हैं. वर्गहीन समाज की परिकल्पना के साथ साम्यवाद, समाजवाद से आगे की, अपेक्षाकृत प्रगतिशील विचारधारा है, जिसमें नागरिकों को सहभागिता के सिद्धांत पर अपनी अधिकतम स्वतंत्रता का भोग करने के अवसर प्राप्त होते हैं.

साम्यवाद’ और ‘समाजवाद’ दोनों में संपत्ति पर राज्य का अधिकार होता है. समाजवाद की मूल सैद्धांतिकी है, ‘प्रत्येक से उसकी क्षमतानुसार, तथा प्रत्येक को उसके योगदान के अनुसार.’ साम्यवाद राज्य से और अधिक जिम्मेदार आचरण की अपेक्षा रखता है. उसका आदर्श हैᅳ‘प्रत्येक से उसकी क्षमता के अनुसार, प्रत्येक को उसकी जरूरत के अनुसार.’ ‘साम्यवाद’ और ‘समाजवाद’ दोनों ही अपने नागरिकों से उम्मीद करते हैं कि वे राज्य के विकास में अपना भरपूर योगदान दें. यह पूंजीवादी तंत्र से बिलकुल अलग है. उसमें लाभ पर पूंजीपति का एकाधिकार होता है. वही उत्पादन किया जाता है, जिससे पूंजीपति को अधिकतम लाभ की संभावना हो. समाजवादी राज्य लोगों की सामान्य आवश्यकताओं के आधार पर अपनी उत्पादननीति बनाता है; तथा उनका लोककल्याण के निमित्त प्रयोग करता है. दूसरी ओर पूंजीवादी उत्पादन की मुख्य प्रेरणा लाभार्जन होता है. अधिक लाभ की उम्मीद हो तो पूंजीपति, केवल अपने स्वार्थ को ध्यान में रखकर नई मांग बनाने का प्रयत्न करता है. उसका लोगों की सामान्य जरूरत से कोई संबंध नहीं होता. अशक्तता अथवा किसी अन्य कारण से यदि कोई नागरिक राज्य के विकास में अपना पर्याप्त योगदान देने में असमर्थ है तो, समाजवादी तंत्र में उसकी आय या परिलब्धियां उसके द्वारा दिए गए योगदान के अनुसार तय होंगी. साम्यवादी राज्य व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने की जिम्मेदारी स्वयं उठाता है. उसका संकल्प यहीं पूरा नहीं हो जाता. अपति साम्यवादी राज्य निरंतर ऐसी कोशिश में रहता है, जिससे नागरिक असमानता और अन्याय को बढ़ावा देने वाली परिस्थितियां दुबारा पैदा न हों. इस तरह साम्यवाद, मानवमात्र के कल्याण की दृष्टि से अधिक उपयोगी दर्शन है.

अधिकांश लोग ‘समाजवाद’ और ‘साम्यवाद’ का अंतर ही नहीं समझ पाते. जैसा कि कहा गया है साम्यवाद, समाजवाद से आगे की चीज है. समाजवाद में उत्पादन एवं वितरण का अधिकार चुनी गई सरकार के अधीन होता है. समस्त संसाधन जनता की संपत्ति माने जाते हैं. सरकार न्याय भावना के साथ, सभी के विकास को ध्यान में रखकर उनका प्रबंधन करती है. साम्यवाद राजनीतिक परिवर्तन का सपना संजोता है और श्रमिक संगठनों द्वारा अधिकृत व्यवस्था में समतामूलक समाज की स्थापना पर जोर देता है. इस रूप में वह एक राजनीतिक संकल्प है. अपनी मूल संकल्पना में ‘सामाजिक न्याय’ बीच का रास्ता है, जो व्यवस्था में बिना किसी बड़े परिवर्तन के राज्य से समाजार्थिक विपन्नता के शिकार नागरिकों के कल्याण हेतु विशेष प्रयास करने की अपेक्षा रहता है. वह कामना करता है कि अपने उत्तरदायी आचरण द्वारा राज्य ऐसे नागरिकों के कल्याण के लिए विशेष प्रयत्न करें, जो किसी कारणवश विकास की स्पर्धा में पिछड़ चुके हैं. साम्यवाद का मुख्यआधार बहुआयामी समानता है. समाजवाद भी सामाजिक स्तर पर नागरिकों के लिए समान अवसरों का पक्ष लेता है. ‘सामाजिक न्याय’ समान अवसर उपलब्ध कराने के अलावा राज्य द्वारा ऐसे आचरण की अपेक्षा रखता है, ताकि सभी नागरिक उसका लाभ उठा सकें और ऐसे नागरिक जिन्हें किसी भी रूप में विशेष मदद या प्रोत्साहन की आवश्यकता है, उन्हें वह समयानुसार प्राप्त होता रहे. ‘सामाजिकन्याय’ चूंकि राज्य की सदेच्छा का सुफल है, इसलिए यदि पूर्ण समानता संभव न हो तो समरसता से ही संतोष कर लिया जाता है. ताकि सामाजिक विक्षोभों में कमी आए और राज्य की ऊर्जा प्रतिक्रियात्मक कार्यों के बजाय राज्य के निर्माण में काम आने लगे. साम्यवाद का लक्ष्य पूर्ण समानता है. जिसमें किसी भी प्रकार की ऊंचनीच, वर्गीकरण आदि के लिए कोई जगह न हो. भारतीय समाज में जाति सामाजिक विषमता, अन्याय, वर्गभेद और उत्पीड़न का मुख्य कारण रही है. इसलिए यहां धर्म, जाति, वर्ण जैसी विभेदकारी संस्थाओं का उन्मूलन सामाजिक न्याय के कार्यकर्ताओं और विचारकों की प्रमुख मांग रही है.

किसी राज्य को साम्यवाद की ओर ले जाना आसान नहीं है. यह कई चरणों में संपन्न होने वाली प्रक्रिया है. मार्क्स इसके दो प्रमुख चरणों का उल्लेख करता है. उसके अनुसार केवल सत्ताकेंद्रों पर सर्वहारा के अधिकार से क्रांति का लक्ष्य पूरा नहीं हो जाता. उसकी अगली चुनौती यानी दूसरा चरण वर्गहीन समाज की स्थापना करना है. उसमें समस्त अंतर्भेदों का शमन हो जाता है. उन स्थितियां का लोप हो जाता है, जो असमानता और असुरक्षा को बढ़ावा देती हैं. यह बड़ा लक्ष्य है. आदर्श को एकदम छूता हुआ. मार्क्स मानता है कि वर्गहीन समाज की स्थापना शीर्षस्थ वर्ग का सपना नहीं हो सकता. जो सुख, सुविधाएं और विशेषाधिकार उसे वर्तमान व्यवस्था में आसानी से प्राप्त हैंउन्हें वह आसानी से छोड़ने के लिए भला क्यों तैयार होगा? यथास्थिति बनाए रखने के लिए उसे जो भी कदम उन्हें उठाना पड़े, उससे वह पीछे नहीं रहता. आमूल परिवर्तन का सपना केवल सर्वहारा देख सकता है. इसलिए क्रांति की सफलता और संचालन उसी पर निर्भर करता है.

साम्यवाद जिस वर्ग का सपना या संकल्प हो सकता है, उसका बड़ा हिस्सा, भीषण गरीबी, अशिक्षा और अनेकानेक रूढ़ियों से ग्रस्त रहा है. भारत के संदर्भ में जाति भी बाधा है. हजारों वर्षों की पराधीनता, शोषण और उत्पीड़न का शिकार रहने के कारण, अपने लिए स्वयं निर्णय लेने की आदत करीबकरीब छूट चुकी है. दूसरी ओर विपुल संसाधनों, ज्ञानविज्ञान तथा सभी प्रकार की शक्तियों से लैस अल्पसंख्यक अभिजन समुदाय हमेशा आत्मविश्वास से भरा रहता है. वह बदलाव के लिए उतनी ही छूट देने को तैयार होता है, जिससे उसके स्वार्थ को किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचे. व्यवस्था में आमूल परिवर्तन न तो उनका सपना होता है, न ही संकल्प. आमूल परिवर्तन तभी संभव है, जब लोगों में वर्गीय चेतना जागृत हो. वे शोषण के कारणों को समझें तथा समान हितों के लिए संगठित हों. ‘थीसिस ऑन फायरबाख’ का समापन वाक्य, जिसमें मार्क्स बदलाव की जरूरत पर अतिरिक्त बल देता है, क्रांति की आवश्यकता तथा आकादमिक ज्ञान की सीमाओं को ही रेखांकित करता है. इससे मार्क्स तथा उसके पूर्ववर्ती चिंतकों, जिनमें उदार कैथोलिक विचारक भी शामिल हैं, का अंतर साफ दिखने लगता है. मार्क्स का केवल कथनी और करनी के अंतर को पाटने तक सीमित नहीं रहता, लक्ष्य तक पहुंचने का रास्ता भी बताता है. कथनी और करनी की समानता को लेकर गांधी का उल्लेख प्रासंगिक है. बताया जाता कि उनकी कथनी और करनी में समानता थी. लेकिन उनकी कथनी, करनी सामान्य राजनीतिक कार्यक्रमों तक सीमित थी. ग्राम को स्वतंत्र आर्थिक इकाई के रूप में प्रचारित करते हुए वे भूल जाते हैं कि अपनी समाजार्थिक संरचना में भारतीय गांव सामंतवाद और जातिवाद के गढ़ रहे हैं. सामाजिक न्याय की गांधीवादी परिकल्पना उच्चस्थ जातियों द्वारा निचली जातियों के प्रति सामान्य सदाचार से अधिक कुछ न थी. यानी कुल मिलाकर उसमें ‘सामाजिक न्याय’ जैसा कुछ था ही नहीं. जाति और धर्म को लेकर सामान्य उदारता गांधी से पहले के विचारक भी प्रकट कर चुके थे. गांधी लगभग उसी को दोहराते हैं. ‘हिंदस्वराज’ में उनका आधुनिकताविरोधी रवैया मशीनीकरण से विलगाव के रूप में सामने आता है. गांधी लोकतंत्र और व्यक्तिस्वातन्त्र्य के क्षेत्र में हो रहे बदलावों से निस्पृह थे, जबकि मार्क्स का एकएक शब्द आवाह्नकारी है.

यहां से साम्यवाद जिसे मार्क्स के प्रति सम्मानभाव दिखाने के लिए सामान्यतः ‘मार्क्सवाद’ भी कहा जाता है, का अन्य विचारधाराओं से अंतर साफ दिखने लगता है. मार्क्स के पूर्ववर्ती विचारक सभ्यता के आधुनिक मूल्यों की प्राप्ति के लिए राज्य से उदार आचरण की उम्मीद करते थे. किसी न किसी रूप में वे राज्य की अधिसत्ता को स्वीकारते थे. उनका विश्वास था कि राज्य के अभाव में समाज का ऐच्छिक विकास संभव ही नहीं है. बदलाव संबंधी उनकी उम्मीदें राज्य के उदार एवं जिम्मेदाराना आचरण पर टिकी थीं. मार्क्स सत्ता एवं शक्ति के केंद्रीकरण के दुष्परिणामों को समझता था. उसके अनुसार सत्ता हाथ में आने के बाद सर्वहारा संगठनों को चाहिए कि वे ऐसे प्रयास करें, जिससे वर्गसंघर्ष की स्थितियां दुबारा उत्पन्न न हों. पर यह काम आसान नहीं है. इसलिए कि लगातार वर्गभेद के बीच रहने के कारण उत्पीड़क वर्ग उसी के अनुसार जीने का अभ्यस्त हो जाता है. चूंकि शीर्षस्थ वर्ग उससे दूर होता है. इतना दूर कि उसके करीब पहुंचना तो दूर, ऐसा सोचना भी उसके लिए सपने जैसा होता है. उसका संपर्क उन्हीं हालात में जी रहे, अपने जैसे आसपास के लोगों से रहता है. इसलिए वह अपने हालात की तुलना बजाय शिखरस्थ अभिजन के, अपने ही जैसे लोगों के साथ करने लगता है. शीर्षस्थ अभिजन के सुखसाधन तथा वैभवविलास उसे मिथकीय आभास देने लगते हैं. समयसमय पर उनका प्रयोग वह अपनी कुंठाओं के शमन हेतु करता है. जीवन की लगातार बढ़ती चुनौतियां उसे बहुत बड़े सपने देखने की अनुमति नहीं देतीं. सपनों के अभाव में वह अपने कष्टों की तुलना आसपास के लोगों से करता है, जब सैकड़ोंहजारों लोगों को अपने जैसे हालात में जीते हुए देखता है, तब वह उन्हें जीवन की स्वाभाविक अवस्था मानने लगता है. यह अनुभूति उसे समझौतावादी बनाती है. यदि वह स्पर्धा के लिए आगे आता तो अपने ही जैसे लोगों के साथ. उस समय अपने ही जैसे लोगों साथ वह वही आचरण करता है; जैसा वह भोगता हुआ आया है. इस तरह परिवर्तन का उसका सपना स्वयं को उत्पीड़क की स्थिति में लाने तक सिमट जाता है. ऐसे में यदि वर्गक्रांति सफल हो जाए तब भी वास्तविक परिवर्तन अलभ्य बना रहता है.

  अगले खंड में समाप्य…..

ओमप्रकाश कश्यप

विनोबा भावे: प्रथम सत्याग्रही—दो

सामान्य

सर्वोदय की ओर

स्वाधीनता संग्राम को तेज करने के लिए ढेर सारे सत्याग्रही आंदोलनकारियों की आवश्यकता थी. ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध उस संघर्ष में सफलता जनता के सहयोग और लोगों द्वारा कंधे से कंधा मिलाकर समर में उतरे बिना असंभव थी. मगर स्वाधीनता के लिए एकजुट होना, कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष के लिए आगे आना तब तक असंभव था, जब तक लोगों के मन में जाति-पांत की भावना और धार्मिक संकीर्णता हो. जातिगत ऊंचनीच की भावना शताब्दियों से इस देश को कमजोर करती आ रही थी. वर्गीय स्तरीकरण के आधार पर जन्मना श्रेष्ठता का दावा करते हुए समाज के मुट्ठी-भर लोग, पीढ़ी दर पीढ़ी संसाधनों पर कुंडली मारे बैठे रहते थे. वर्णव्यवस्था के समर्थक हालांकि यही कहते आए थे कि यह एक खुली व्यवस्था थी. वह जन्मना न होकर कर्मणा थी. कोई भी व्यक्ति अपने गुण और योग्यता के आधार पर एक वर्ग से दूसरे वर्ग में अंतरण कर सकता है. ब्राह्मण होने के लिए ‘फलां-फलां’ शर्त है. अपने तर्क के समर्थन में उनके पास चंद उदाहरण भी होते थे. ‘गिने-चुने’ और गढ़े गए उदाहरण. वे ऐसा एक भी उदाहरण देने में असमर्थ रहते थे, जिनमें किसी ब्राह्मण ने अपने मूर्ख और स्वार्थी बेटे को ब्राह्मणत्व से अपदस्थ किया हो. यही जाति सम्मोहन चार पन्नो की पोथी रटने वाले को विद्वान शिरोमणि ब्राह्मण देवता की उपाधि देता गया. जाति और वर्ण के नाम पर शीर्षस्थ वर्ग शताब्दियों से जनसाधारण का शोषण-उत्पीड़न करता रहा. इस कारण समाज के उत्पीड़ित वर्ग में गहरा असंतोष था.

     अंग्रेजी शिक्षा और समाज में ज्योतिबा फुले के समय से चले आ रहे अस्मितावादी आंदोलनों ने इस असंतोष को और भी हवा दी थी. सामंत और राजे-महाराजे तो श्रीहीन हो ही चुके थे. गांधी के नेतृत्व में आंदोलनरत कांग्रेस के कार्यक्रमों में उनका योगदान यूं भी नगण्य ही था. कांग्रेस के सिपाही जनसाधारण थे. उभरते जनांदोलन को कमजोर करने के लिए अंग्रेजों के पास एक ही रास्ता था, लोगों को जाति, धर्म, संप्रदाय आदि पर आधारित ऊंच-नीच की भावना का शिकार बनाया जाए. भारतीय समाज की फूट का लाभ उठाकर अंग्रेज सत्ता सुंदरी को येन-केन-प्रकारेण अपने पाश्र्व में बनाए रखना चाहते थे. लगभग पौने दो सौ वर्षों से उन्होंने इसी नीति से देश पर राज किया था. उनका हाथ समाज के अंत्यजों और अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों पर था, जिनके पूर्वजों ने इस देश पर शताब्दियों तक राज किया था और उनमें से अधिकांश अब भी स्वयं को दिल्ली की गद्दी का वास्तविक उत्तराधिकारी समझते थे. अनेक हिंदू और मुस्लिम नेता स्वार्थवश उनके साथ थे. दोनों ही एक-दूसरे को ढकेलकर केंद्रीय सत्ता का निकटतम स्थान प्राप्त करना चाहते थे. ऐसे में स्वाधीनता संग्राम का संचालन कर रहे गांधी तथा समर्थकों के आगे बड़ी चुनौती थी, समाज को एक रखना. जनशक्ति को बंटने से रोकना, तथा जनता की ताकत का उपयोग अपने आंदोलन को बढ़ावा देने के लिए करना. अंग्रेज समाज को जातीय आधार पर बांट न पाएं, इसलिए समाज को जातीय आधार पर एक रखने की जरूरत थी. इसके लिए आवश्यक था कि सभी देवालय समाज के प्रत्येक व्यक्ति के लिए समानरूप से खुले हों. लोगों में आपसी भाईचारा और धार्मिक-सामाजिक एकजुटता हो. जातिवादी आग्रहों की खाई को पाटकर पूरे समाज को एक राष्ट्र की आत्मा के साथ एकीकृत करना, उनका लक्ष्या था.

     दक्षिण भारत के कई मंदिरों में हरिजनों के प्रवेश की मनाही थी. गांधी जी पहले ही कह चुके थे कि अश्पृश्यता हिंदू समाज के माथे पर कलंक है. उनके इसी वक्तव्य को मंत्र मानते हुए विनोबा ने हिंदू समाज में व्याप्त अश्पृश्यता और जात-पांति के विरुद्ध कई लेख अपनी पत्रिका में लिखे थे. विनोबा की निष्ठा और समर्पण भाव को देखते हुए 1925 में गांधी जी ने उन्हें केरल के वाइकोन नामक स्थान पर एक आंदोलन का नेतृत्व करने का दायित्व सौंपा. आंदोलन हरिजनों की अस्मिता और उनके मंदिर-प्रवेश के अधिकार को लेकर था. विनोबा ने उस आंदोलन का सफलतापूर्वक नेतृत्व कर गांधी जी के भरोसे को पूरा किया. 1932 में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए सरकार बिनोवा से फिर नाराज हो गई. उन्हें छह महीने की सजा सुनाई गई. धुलिया जेल में सजा काटते हुए विनोबा ने अपने रचनात्मक कार्यक्रमों पर निरंतर काम करते रहे. लगातार परिश्रम और जेल के प्रतिकूल वातावरण का प्रभाव विनोबा की सेहत पर पड़ा था. वे दिनोंदिन कमजोर होते जा रहे थे. 1938 में उन्हें गंभीर बीमारी ने आ घेरा, तब गांधी जी ने उन्हें कुछ दिन आराम करने की सलाह दी.

     ‘ठीक है, बापू. आपकी आज्ञा है तो मैं आराम अवश्य करूंगा.’ विनोबा ने आश्वासन दिया.

     पवनार में जमनालाल बजाज का बंगला खाली पड़ा हुआ था. गांधी जी स्वयं चाहते थे कि वर्धा में भी साबरमती जैसा आश्रम स्थापित किया जाए, ताकि स्वाधीनता आंदोलन को गतिमान बनाया जा सके. वर्धा की जलवायु भी अनुकूल थी. गांधी जी का आग्रह विनोबा के लिए आदेश ही था. उन्होंने वर्धा जाने की सहमति दे दी. एक दिन गांधी जी से अनुमति ले उन्होंने पवनार के लिए प्रस्थान कर दिया. आगे चलकर वही उनकी गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बना. वहीं रहते हुए उन्होंने अनेक सत्याग्रह आंदोलनों का नेतृत्व किया. वहीं से राजनीतिक आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी की.

     इधर देश में राजनीतिक गतिविधियां तेज होती जा रही थीं. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी माहौल गर्मा रहा था. इसी बीच दूसरा विश्वयुद्ध छिड़ने से मामला और भी बिगड़ गया. गांधी जी को भरोसा था कि दूसरे  विश्वयुद्ध के पश्चात अंग्रेज भारत को अधिक स्वायत्तता सौंप देंगे, इसलिए उन्होंने युद्ध में औपनिवेशिक सरकार का साथ देने का निर्णय लिया था. अंग्रेजों के पक्ष में हजारों भारतीय सैनिकों ने उस युद्ध में हिस्सा लिया. विजय मित्र देशों की हुई. मगर गांधीजी का आकलन गलत निकला. अंग्रेज इतनी आसानी से हिंदुस्तान छोड़ने वाले न थे. उधर लगातार संघर्ष के पश्चात भारतीय जनता में स्वाधीनता की चाहत बढ़ चुकी थी. उसकी उपेक्षा कर पाना गांधी जी और कांग्रेस के लिए भी संभव न था. अतएव अंग्रेज सरकार के विरुद्ध व्यापक स्तर पर जनांदोलन छेड़ने की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी थी. आजादी की मुहिम को और तेज करते हुए गांधी जी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया और अंग्रेजों के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष छेड़ने की घोषणा कर दी.

     आजादी की यह लड़ाई अहिंसक तरीके से लड़ी जाने वाली थी. गांधी जी उसके माध्यम से एक ऐसा संदेश दुनिया को देना चाहते थे कि भारत अपनी स्वाधीनता के प्रति प्रतिबद्ध है. अंग्रेजों की धारणा के उलट वह एक-राष्ट्र है. सांस्कृतिक एकता और इच्छाशक्ति पूरे भारत को आपस में जोड़ती है. संगठित जनशक्ति की इच्छा का अब और दमन असंभव है. यदि ऐसा हुआ तो पूरा देश अंग्रेजों के विरुद्ध उठ खड़ा हो सकता है. मगर जनसाधारण को आजादी की लड़ाई में उतार पाना तभी संभव था जब उन्हें यह संदेश जाए कि गुलामी उनकी अस्मिता और सम्मान के लिए खतरा है और वे उनकी एकजुटता ही उन्हें इसके पार ले जा सकती है.

     जनता और सरकार दोनों को सही संदेह जाए, इसके लिए आंदोलन का जोरदार शुभारंभ महत्त्वपूर्ण था. उसके लिए ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी जिसकी गांधी जी के नैतिक सिद्धांतों में न केवल पूरी आस्था हो, बल्कि उसका अपना प्रभामंडल भी कम देदीप्यमान न हो. जनता का उसपर अटूट विश्वास हो. इसके लिए गांधी जी के दिमाग में सिर्फ एक व्यक्ति का नाम था. वे थे विनोबा भावे, जिन्हें लोग प्यार से आचार्य विनोबा भावे कहने लगे थे. गांधी जी की अनुशंसा पर विनोबा को 1940 में प्रथम सत्याग्रही चुना गया. उस समय तक बहुत से लोगों नहीं जानते थे कि विनोबा नामक यह शख्स कौन-सा है, जिसपर गांधी जी ने इतना बड़ा भरोसा किया है. लोग प्रथम सत्याग्रही के बारे में जानने को उत्सुक थे. लोगों की जिज्ञासा शांत करने के लिए स्वयं गांधी जी ने विनोबा का परिचय कराते हुए लिखा कि—

     ‘विनोबा भारतीय स्वाधीनता में विश्वास करते हैं. वे इतिहास के विद्धान हैं. लेकिन उनका मानना है कि भारत के गांवों की वास्तविक आजादी बिना रचनात्मक कार्यक्रमों के असंभव है, और यह रचनात्मक कार्यक्रम खादी है.’

     प्रथम सत्याग्रही चुने जाने और गांधी द्वारा परिचय कराए जाने के बाद विनोबा की ख्याति पूरे देश में फैल गई. विनोबा भी ने बापू के विश्वास की रक्षा की. अंग्रेज सरकार के विरुद्ध सत्याग्रह आंदोलन का शुभारंभ उन्होंने नागपुर से किया गया. आंदोलन पूरी तरह कामयाब रहा. देश गांधी की भांति विनोबा पर भी  भरोसा करने लगा. उसके बाद तो एक के बाद एक कई सत्याग्रह आंदोलनों में हिस्सा लेते हुए विनोबा को 1940 से 1941 के बीच तीन बार जेल जाना पड़ा. पहली बार तीन महीने के लिए. दूसरी बार छह महीने और तीसरी बार एक वर्ष के लिए. 1942 में गांधी जी ने भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान किया तो अहिंसा के प्रशिक्षित सैनिक की तरह विनोबा भावे फिर उस आंदोलन में कूद पड़े. तब तक अंगे्रज सरकार उनके पीछे पड़ चुकी थी. परिणाम यह हुआ कि वे पकड़ लिए गए. इस बार उन्हें तीन वर्ष तक वैलूर और सियोनी जेलों में रखा गया. हमेशा की तरह इस बार भी कारावास की अवधि का उपयोग उन्होंने अध्ययन और लेखन के लिए किया. गीता के अनुवाद-कर्म को आरंभ किए वर्षों बीत चुके थे. अंततः वैलूर जेल में सजा काटते हुए वह अवसर आया जब विनोबा ने ‘गीताई’ को अंतिम रूप दिया. विनोबा का यह जेल प्रवास अनेक रचनात्मक उपलब्धियों से भरा हुआ था.

     वैलूर जेल में देश के विभिन्न प्रांतों से आए हुए कैदी थे. आपस में संवाद के लिए वे प्रायः अंग्रेजी का प्रयोग करते. विनोबा को यह बहुत बुरा लगता. जिन अंग्रेजों से वे स्वाधीनता के लिए संघर्ष कर रहे हैं, आपसी संवाद के लिए उनकी भाषा पर निर्भरता क्यों हो! लोगों को यह संदेश देने के लिए कि वे एक-दूसरे की भाषाएं सीखें, उन्होंने जेल प्रवास के दौरान तमिल, तेलुगु, कन्नड और मलयालम भाषाएं सीखीं. उनके अध्ययन-पाठन को आसान बनाने के लिए उन्होंने ‘लोकनागरी लिपि’ का आविष्कार भी किया, जिसमें वे चारों भाषाएं सफलतापूर्वक लिखी जा सकती हैं. उर्दू वे सेवाग्राम में रहते हुए न केवल सीख चुके थे, बल्कि प्रवीणता भी प्राप्त कर चुके थे. विनोबा की उर्दू प्रवीणता को दर्शाने वाली एक दिलचस्प घटना है.

     सेवाग्राम में, गांधी जी की सेवा का व्रत लेकर एक मुस्लिम युवक भर्ती हुआ. आश्रम की नीति सर्व-धर्म समभाव की थी. उसके अनुसार मुस्लिम किशोर को अरबी भाषा सिखाना जरूरी था. लेकिन संयोग से वहां ऐसा कोई व्यक्ति न था जो अरबी के अध्यापन की जिम्मेदारी संभाल सके. इस समस्या के निदान के लिए विनोबा ने अरबी सीखना आरंभ कर दिया. कुरआन शरीफ की आयतों के सही उच्चारण के लिए वे नियमित रूप से उनका रेडियो प्रसारण सुनते. एक दिन उनके ज्ञान की परीक्षा की घड़ी भी आ गई. आश्रम में मौलाना अबुल कलाम आजाद आए हुए थे. वे अरबी-फारसी के विद्वान थे. गांधी जी ने उनसे विनोबा के अरबी भाषा के ज्ञान की परीक्षा लेने को कहा. परीक्षा के उपरांत मौलाना आजाद ने गांधी जी से कहा—

     ‘बापू, आपका विनोबा तो हाफिज हो गया है.’

     अरबी भाषा में में ‘हाफिज’ होना धर्म की परीक्षा में प्रवीणता प्राप्त कर लेना है. विनोबा द्वारा धर्म, दर्शन पर लिखी गई पुस्तकें अनेक भाषाओं में प्रकाशित हुईं और उन्हें एक आध्यात्मिक संत की पहचान मिलने लगी. देश-भर में अंग्रेज विरोध की लहर बढ़ती ही जा रही थी. गांधी के नेतृत्व में उनकी पूरी अहिंसक सेना आंदोलन में हिस्सा ले रही थी. विनोबा भी उसमें सम्मिलित थे. गांधी द्वारा सौंपे गए दायित्वों को सफलतापूर्वक पूरा करते हुए. साथ में बढ़ रही थी, उनकी ख्याति. अहिंसा और सत्याग्रह के प्रति उनकी निष्ठा. यदि किसी देश की प्रजा समझ जाए कि वह गुलाम है, और ठान ले कि आजाद होना है, तो फिर उसकी स्वाधीनता को लंबे समय तक टाला नहीं जाता. जागरूक जनता अपनी आजादी, अपने अधिकार किसी न किसी रूप में छीन ही लेती है. भारतवर्ष में भी यही हुआ.

अगस्त 1947 को देश स्वाधीन हुआ. आजादी के बाद देश के पुनः निर्माण की आवश्यकता थी. अब अलग चुनौतियां थीं. पहले से अलग और कई मायने में उनसे बड़ी भी. बिखरे हुए को समेटते हुए देश की ऊर्जा को रचनात्मक मोड़ देना था. इस बारे में गांधी जी का सोच पूरी तरह साफ था. उन्होंने पहले ही कह दिया था कि कांग्रेस और उनके कार्यकर्ताओं का काम आजादी मिलने मात्र से पूरा नहीं होगा. नई भूमिका के लिए वे चाहते थे कि आजादी के बाद कांग्रेस भंग कर दी जाए तथा उसके कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर रचनात्मक कार्यक्रमों का संचालन करें. वे गांवों को आत्मनिर्भर देखना चाहते थे. गांधी जी के सपने को ही अपना दायित्व मानते हुए विनोबा ने कई रचनात्मक कार्यक्रमों की शुरुआत की. उन्होंने बैलों की सहायता के बिना खेती का प्रारूप देश के सामने रखा. जाते-जाते अंग्रेज इस देश को बांटकर गए थे. आजादी के बाद देश में दंगे भड़क उठे. लोग भारत-पाकिस्तान में बंटने लगे. समस्या थी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को बसाने की. विनोबा इसमें भी जी जान से जुटे रहे. भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान हुए दंगों के बाद शांति-स्थापना के कार्य में भी उन्होंने बढ़-चढ़कर योगदान किया.

     आजादी के बाद देश को जवाहर लाल नेहरू जैसा कल्पनाशील प्रधानमंत्री मिला था. स्वाधीनता संग्राम के दौरान जवाहरलाल ने गांधीजी का स्नेह और विश्वास प्राप्त करने में सर्वाधिक सफल सिद्ध हुए थे. वे विद्वान प्रधानमंत्री थे, लेकिन उनके निर्णयों में प्रशासनिक ढुलमुलपन था; साथ में कूटनीतिक चातुर्य की कमी भी. दूसरे उनके इर्द-गिर्द एक चमचा-मंडली जन्म ले चुकी थी. यह सब गांधी जी की पैनी निगाह से छिपा न था. उन्हें रहा था कि प्रशासनिक व्यवस्था में आजादी के बाद जो जिन आमूल परिवर्तनों की आवश्यकता थी, वे नहीं हो पा रहे हैं. वे उसमें बदलाव चाहते थे. इसके लिए विनोबा की भूमिका अवश्य उनके मन में रही होगी. लेकिन कोढ़ में खाज यह कि 30 जनवरी 1948 को एक सिरफिरे ने महात्मा गांधी की हत्या कर दी. विनोबा सकते में रह गए. अहिंसा के पुजारी की गोली मारकर हत्या. उन्हें लगा कि उनसे इस देश के मानस को पहचानने में चूक हुई है.

     महात्मा गांधी की हत्या के पश्चात उनके देश-भर में फैले गांधीवादी कार्यकर्ताओं को नेतृत्व की तलाश थी. विनोबा गांधी के स्वाभाविक उत्तराधिकारी थे. गांधी स्वयं यह कह चुके थे कि विनोबा ने उनके विचारों को उनसे भी अधिक गहराई से समझा है. इसका प्रमाण भी था. विनोबा की गांधीवाद संबंधी अवधारणाएं अपेक्षाकृत स्पष्ट थीं. इसलिए उनके समक्ष नेतृत्व का प्रस्ताव आया. मगर विनोबा की नेतृत्व के लिए तैयार न थे. महात्मा गांधी की हत्या से वे बुरी तरह टूट चुके थे. बार-बार उन्हें वह दिन याद आ रहा था, जब उन्होंने परमसत्य को पाने की चाहत में घर छोड़ा था. मुंबई जाने के लिए घर से निकले थे, मगर जा पहुंचे थे काशी. वहीं गांधी जी को पहली बार सुना था. उन्हीं से प्रभावित होकर वे स्वाधीनता आंदोलन में उतरे थे. अब आजादी का लक्ष्य पूरा हो चुका था. विनोबा को लग रहा था कि अपनी पुरानी खोज को, सत्य की खोज को नए सिरे से आरंभ करने का समय आ चुका है. इसलिए वे दिनोंदिन आत्मोन्मुखी होते जा रहे थे. उनका मन अध्यात्म और आश्रम की दिनचर्या में रमता. दिमाग निरंतर भविष्य के कार्यक्रम बनाता रहता.

     उधर नेतृत्व की आस लेकर आए कार्यकर्ताओं को तसल्ली भी देनी ही थी. सो उनसे विनोबा ने वही कहा, जो गांधी जी चाहते थे. आजादी के लाभ को जन-जन तक पहुंचाना. प्रत्येक नागरिक को यह एहसास दिलाना कि वह आजाद है. स्वतंत्रता भी केवल राजनीतिक सीमाओं में कैद नहीं है. राजनीति के साथ-साथ उसमें आर्थिक और सामाजिक आजादी के सभी मूल्य अंतर्निहित हैं. इसलिए मार्गदर्शन की उम्मीद लेकर आए कार्यकर्ताओं से विनोबा ने कहा कि वे अविलंब लोककल्याण के कार्यों में जुट जाएं. ‘भारत स्वराज प्राप्त कर चुका है. अब एक ही लक्ष्य बाकी है, जन-जन का कल्याण, स्वाधीनता का लाभ देश के प्रत्येक नागरिक, अमीर-गरीब और हर छोटे-बड़े तक पहुंचाना.

     सभी का कल्याण यानी ‘सर्वोदय’(Universal Awakening). यह नया मंत्र था. विनोबा का सुझाव सबको पसंद आया. कार्यकर्ताओं को विनोबा के रूप में एक और गांधी मिल गया. सर्वोदय के संकल्प को साधने के लिए ‘सर्व-सेवा-संघ’ नामक संगठन की स्थापना की गई. गांधी जी के सपनों को कार्यरूप देने के लिए जितने भी कार्यकर्ता और संगठन उन दिनों देशभर में कार्यरत थे, उन सबका ‘सर्व-सेवा-संघ’ के अंतर्गत विलय कर दिया गया. सर्वोदय को गांधीजी के सपनों की अभिव्यक्ति मान लिया गया. विनोबा ही गांधीजी के सच्चे उत्तराधिकारी हैं, यह एक बार फिर सिद्ध हुआ. लोगों द्वारा यह स्वीकार भी लिया गया. विनोबा व्यक्तिगत मान-प्रतिष्ठा से हमेशा ही ऊपर थे. देश के पुनर्निर्माण में उनका वास्तविक अवदान अब भी बाकी था. नियति उन्हें उसी ओर लिए जा रही थी.

     मार्च 1948 में गांधी जी के रचनात्मक कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने के लिए उनके अनुयायियों ने सेवाग्राम में एक सम्मेलन की योजना बनाई. विनोबा ने उसमें आत्मनिर्भर गांव की एक छवि प्रस्तुत की. सम्मेलन के दौरान सर्वोदय समाज की योजनाओं को सर्वसम्मिति से स्वीकार लिया गया. परिणामस्वरूप उनकी व्यस्तता और भी बढ़ गई. रचनात्मक कार्यों को अंजाम देने के लिए संसाधनों की आवश्यकता थी. देश के अधिकांश लोग गरीब थे. उनसे उम्मीद रखना उचित न था. इसलिए विनोबा ने देश के संपन्न लोगों से अपील की कि वे लोककल्याण के लिए अपने सारे मतभेद भुलाकर आगे आए. स्त्रियों से प्रार्थना की कि वे लोककल्याण के लिए अपने रत्नाभूषणों का दान कर दें. अपील पर गांधीजी का असर था.

     विनोबा की हृदयग्राही अपील का व्यापक असर हुआ. सर्वोदय कार्यक्रम चल निकला. बावजूद इसके विनोबा को लग रहा था कि आजादी के बाद से देश के पुनःनिर्माण के कार्यों को जितनी तेजी से चलाया जाना चाहिए था, उनकी तेजी से वे नहीं चला पा रहे हैं. परिणास्वरूप आजादी का जो लाभ जनता को मिलना चाहिए था, जो सपने उसको आजादी के आंदोलन के दौरान दिखाए गए थे, वे दूर छिटकते जा रहे हैं. गांधी जी की नीतियां और उनके विचार जो अंग्रजों के विरुद्ध जंग में हथियार बने थे, सरकार उनकी उपेक्षा करती जा रही है. ऐसे में उनका उदास होना स्वाभाविक था. उनके मन में हलचल थी. पवनार आश्रम की रचनात्मक गतिविधियों के नेतृत्व के साथ-साथ उस हलचल के पार जाने की कोशिशें भी निरंतर जारी थीं. वे भविष्य के आंदोलन की रूप रेखा गढ़ने की कोशिश कर रहे थे कि एक परिवर्तनकामी अवसर एकाएक सामने आ गया, उससे वह क्रांति संभव हो सकी, जिसके लिए दूसरे देशों में हिंसा और सैन्यबल का सहारा लेना पड़ा था. भारत में यह क्रांति पूरी तरह अहिंसक और जनसहयोग से संपन्न हुई थी, इसलिए भारत एक बार फिर दूसरों के लिए मिसाल बन गया.

भूदान आंदोलन

15 अगस्त 1947 को देश को आजादी मिली. जनता उससे बड़ी आस लगाए बैठी थी. लोगों को उम्मीद थी कि अब उनकी सरकार है, इसलिए न्याय स्वयं उनके द्वार तक चलकर आएगा. उनमें खासकर वे लोग थे जो शताब्दियों से भू-सामंतों और जागीरदारों के उत्पीड़न का शिकार रहे थे. जिनके पास जीविका का माध्यम मात्र उनकी देह थी. पेट था, इसलिए भूख भी लगती थी. भूख के दबाव में ही वे देह बेचकर बंधुआगिरी करने को बाध्य थे. इसके बावजूद उन्हें अपमान और अत्याचार दोनों का सामना करना पड़ता था. आजादी से उन्हें उम्मीद थी. उन्हें भरोसा था कि अपना निजाम होगा तो उनकी समस्याओं की सुनवाई भी हो सकेगी. सोचते थे कि अपने राज्य में बंधुआगिरी से मुक्त होगी. वे भी आजादी की हवा में सांस ले सकेंगे. इसी उम्मीद के साथ वे आजादी के आंदोलन में कूदे थे. गांधी जी आह्वान पर. बिना कोई विरोध किए लाठियां खाई थीं. अहिंसक सत्याग्रह में हिस्सा लिया था. गांधी जी के आंदोलन की सफलता का रहस्य ही इसमें था कि वे सत्याग्रह को व्यापक जनांदोलन का रूप देने में कामयाब रहे थे. लेकिन आजादी के बाद भू-सामंत जब सत्ता के गलियारों से संपर्क गांठकर प्रत्यक्ष या परोक्षरूप में दुबारा उनपर शासन करने लगे तो उनका भड़क जाना स्वाभाविक ही था. रूस और चीन की क्रांति की खबरें उनको प्रेरणा दे रही थीं. अफ्रीकी महाद्वीप से भी साम्यवादी क्रांति की खबरें आ रही थीं.

     हैदराबाद के पास का एक क्षेत्र तेलुगू भाषियों का है. इस कारण वह तेलंगाना कहलाता है. वहां की भू-संपत्ति का बंटवारा बड़े ही असामान्य ढंग से हुआ है. एक ओर वहां पचासियों हजार एकड़ के अनेक जमींदार थे, तो दूसरी ओर हजारों-लाखों की संख्या में बेघर, बे जमीन लोग. वे विलासी और कठोर, अत्याचारी जमींदारों, भू-सामंतों के यहां मजदूरी करते, बंधुआ रहकर चाकरी बजाते. यदि किसी प्राकृतिक आपदा के कारण फसल नष्ट हो जाए तो उनके अत्याचार-उत्पीड़न सहते थे. ऊपर से लगान वसूली के लिए सरकार और जमींदार का तानाशाही भरा रवैया. आजादी से उन्हें उम्मीद थी. आजादी मिली, परंतु उनकी समस्या ज्यों की त्यों थी. इसलिए नक्सली और साम्यवादी विचारधारा के नेता उन इलाकों में अपना प्रभाव जमाते जा रहे थे, जो रूस की भांति भारत में भी सशस्त्र क्रांति का सपना देख रहे थे. उन्हें उन गरीब, साधनहीन लोगों का समर्थन था, जिनके सपने देश की राजनीतिक आजादी प्राप्त होने के बाद भंग हुए थे. और वे अब अपनी तरह से बदलाव चाहते थे.

     तेलंगाना के तीन हजार से ऊपर गांवों पर नक्सलवादियों का प्रभाव था. स्थानीय प्रशासन उनके आगे बेबस था. कारण यह था कि उग्रपंथियों को स्थानीय जनता का समर्थन प्राप्त था. वर्षों से उपेक्षित-उत्पीड़ित लोग उनका साथ भी दे रहे थे. तेलंगाना की हालत अत्यंत चिंताजनक थी. लग रहा था कि वह कभी भी भारत की झोली से छिटक सकता है. स्थिति जब नियंत्रण से बाहर जाने लगी तो वह इलाका सेना को सौंप दिया गया. मगर अपने ही देशवासियों के बीच समस्या के समाधान के लिए सेना का उपयोग, किसी भी देश के लिए अच्छी बात न थी. विशेषकर भारत के लिए, जहां कुछ ही महीने पहले गणतांत्रिक व्यवस्था लागू की गई थी, जिसमें लोगों को यह भरोसा दिलाया गया था कि नई व्यवस्था में जाति-धर्म-वर्गीय पहचान से परे अमीर-गरीब सबके लिए विकास के एकसमान अवसर प्राप्त होंगे. सेना के उपयोग से अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में बदनामी का पूरा-पूरा खतरा था.

     विनोबा को निमंत्रण मिला था कि वे तेलंगाना जाकर आंदोलनरत किसानों को समझाएं. उन्हीं दिनों शिवराम पल्ली में ‘अखिल भारतीय सर्वोदय सम्मेलन’ की योजना बनी. सर्वोदय सम्मेलन की स्थापना विनोबा के कहने पर ही की गई थी. अब ऐसे सम्मेलन में विनोबा न जाएं यह संभव न था. वे उन दिनों वर्धा में थे, जो शिवरामपल्ली, हैदराबाद से तीन सौ मील अर्थात लगभग चार सौ अस्सी किलोमीटर की दूरी पर था. अंततः विनोबा ने सम्मेलन में जाने की सहमति दे दी. लेकिन उन्होंने ठान लिया कि वे उस सम्मेलन में हिस्सेदारी के लिए पैदल चलकर पहुंचेंगे.

     ‘ठीक है, मैं पहुंचूंगा, मगर पैदल चलकर’.

     विनोबा ने घोषणा की थी. मानो नियति ही उनके मुंह से यह कहलवा रही थी. देश के पटल पर विनोबा की विशिष्ट भूमिका अभी लिखी जानी बाकी थी. गांधी जी के रहते तो वे वहीं करते रहे थे, जो गांधी जी चाहते थे. जिसकी गांधी जी की ओर से आज्ञा प्राप्त होती थी. अब गांधी जी नहीं थे. उनकी अनुपस्थिति में विनोबा को अपनी आंतरिक प्रेरणा के आधार पर अपने रचनात्मक कार्यक्रमों को आगे बढ़ाना था. 7 मार्च 1951 को गांधी जी की कुटिया को नमन करते हुए विनोबा ने उस यात्रा की शुरुआत की. वह एक अचर्चित यात्रा थी. समाचारपत्रों में उसका खास उल्लेख भी नहीं हुआ. मगर उस समय कोई नहीं जानता था कि आने वाले कई वर्षों में समस्त अखबार उस यात्रा की कामयाबियों से रंगे होंगे. बाद में एक कवि ने उस यात्रा पर लिखा—

     ‘धर्मचक्र फिरते पड़ता एकाकी पाउले.’

     ‘वह एकाकी जैसे ही आगे बढ़ा, धर्मचक्र में प्रवत्र्तन होने लगा.’

     सर्वोदय सम्मेलन ठीक-ठाक संपन्न हो गया. अब तेलंगाना की यात्रा की बारी थी, जो वहां से थोड़ी ही दूरी पर था. मगर वहां के हालात बिगड़े हुए थे. विनोबा के हितैषियों ने उनके पुलिस की मदद लेने को कहा. लेकिन विनोबा ने तत्काल मना कर दिया. अहिंसा के सिपाही को हथियारबंद सिपाहियों की क्या आवश्यकता. तेलंगाना यात्रा आरंभ हुई. यात्रा में वे पीड़ित किसानों से मिलते. उनसे उनकी समस्याओं पर बात करते. साम्यवादी नेता भी उनके संपर्क में आते, वही समझाते कि समस्या का निदान बिना हथियारों के प्रयोग के असंभव है. बिना आर्थिक समानता और स्वतंत्रता के संविधान जिसे लागू हुए बस कुछ ही महीने हुए थे, के सपने को भी सच नहीं किया जा सकता. इसमें यदि कोताही हुई तो लोग उखड़ेंगे ही. एक तेलंगाना की समस्या का समाधान यदि समय रहते नहीं खोजा गया तो ऐसे तेलंगाना पूरे देश में जगह-जगह होंगे. क्योंकि असमानता और असमान भूवितरण केवल हैदराबाद की समस्या नहीं है. यह तो पूरे देश में है. देश अमीरी और गरीबी में पूरी तरह बंटा है. विनोबा भी समझ रहे थे कि देश को राजनीतिक आजादी मिल चुकी है. अब बारी आम जन के लिए उसकी सामाजिक-आर्थिक स्वतंत्रता मुहैया कराना है.

     विनोबा को समस्या का केवल एक ही हल सुझाई देता. भूमिहीनों को भूमि दे जी जाए. ताकि उनकी जीविका का साधन हो सके. पर भूमि देगा कौन. विनोबा को महाभारत की कहानी रह-रह कर याद आती. दुर्योधन ने पांडवों के मांगने पर पांच गांव देने से इंकार कर दिया था, तो महाभारत हुआ, जिसमें पूरा कौरव-कुल तबाह हो गया. तेलंगाना की समस्या का समाधान न हुआ तो ऐसे महाभारत पूरे देश में जगह-जगह होंगे. मगर समस्या थी कि जमींदारों को जमीन देने के लिए तैयार कैसे किया जाए. सरकार इसमें कुछ सार्थक भूमिका निभा सकती थी, मगर सरकार तो अपना वायदा बिसरा ही चुकी थी. लोकसेवा का व्रत लेकर राजनीति में आए नेता प्रण भूलकर अपना घर भरने में लगे थे. अंग्रेज साहबों की जगह भारतीय बाबुओं ने ले ली थी. विनोबा रात-दिन सोचते, बेचैन रहते. मगर निदान नहीं था. उधर समस्या इतनी विकराल कि निदान तत्काल चाहती थी. सर्वोदय सम्मेलन के अंतिम दिन विनोबा ने तेलंगाना के उपद्रव-ग्रस्त क्षेत्रों में शांति संदेश ले जाने का निर्णय लिया. 17 अप्रैल को अपनी यात्रा के दूसरे दिन विनोबा ने अनुभव किया कि ग्रामीण दुहरे आतंक के शिकार हैं. एक और पुलिस उन्हें परेशान करती है, दूसरी और कम्युनिस्ट आंदोलनकारी उनपर दबाव डालते रहते हैं. तेलंगाना क्षेत्र के गांव के गांव वर्गीय आधार पर विभाजित थे.

     और फिर वह दिन आ ही गया जिस दिन वास्तविक क्रांति की शुरुआत हुई. 18 अप्रैल, 1951 का दिन था. विनोबा का डेरा पोचमपल्ली गांव में जमा था. लगभग सात सौ परिवारों का गांव था पोचमपल्ली जिसमें दो-तिहाई आबादी भूमिहीनों की थी. गांव में विनोबा का जोरदार स्वागत किया गया. गांव की हरिजन बस्ती में प्रार्थना सभा हुई. दोपहर बाद का समय था. लोग विनोबा का प्रवचन सुनने के लिए उनके आसपास जुटने लगे. विनोबा ने सदा ही तरह गीता और वेंदात से बात आरंभ की. लोगों को मिलजुलकर रहने का उपदेश दिया. लोग तन्मय होकर सुनते रहे. उस सभा में भूमिहीन हरिजन भी थे. सबके सब विनोबा के पास उम्मीद भरी नजरों से देख रहे थे. उनकी निगाह में विनोबा की पैठ सरकार में सीधे प्रधानमंत्री तक थी. इसलिए प्रवचन के पश्चात जब चर्चा का दौर आरंभ हुआ तो हरिजनों की ओर से जमीन की मांग की गई—

     ‘हमारे पास न तो जमीन है, न दूसरा कोई रोजगार, थोड़ी-सी जमीन भी होती तो हम उसपर मेहनत करके अपना गुजारा कर लेते.’

     ‘जमीन चाहिए, पर कितनी?’ विनोबा ने सवाल किया.

     ‘हमारे कुल चालीस परिवार है. सो कुल चालीस एकड़ सिंचाईयुक्त और चालीस एकड़ सूखे की जमीन मिल जाए तो हमारे लिए पर्याप्त होगी.’

     ‘आपको जमीन मिल जाए तो सब मिलकर खेती तो करोगे न!’

     ‘जी, हम सब मिलकर आपका एहसान भी मानेंगे.’

     ‘ठीक है, लिखकर दीजिए, मैं आपका प्रार्थनापत्र सरकार को भिजवा दूंगा.’ उस समय विनोबा के पास उन हरिजनों को सांत्वना देने का यही एक उपाय था कि उनकी फरियाद सरकार तक पहुंचा दी जाए. हरिजन लिखकर देने की तैयारी करने लगे. तभी विनोबा को न जाने क्या सूझा उन्होंने वहां बैठे लोगों का आवाहन करते हुए कहा—

     ‘अगर किसी कारण सरकार इन्हें जमीन देने में असफल होती है तो क्या आप गांववाले मिलकर इनकी मदद करने को तैयार हैं?’

     उस सभा में गांव के ही किसान रामचंद्र रेड्डी भी उपस्थित थे. उदारमना, बाकी भू-सामंतों से बिलकुल अलग. विनोबा की ख्याति सुनकर प्रवचन सुनने चले आए थे. हरिजनों की बात सुनी तो विनोबा के प्रवचन का असर उनपर था ही. हरिजनों की बात सुनते ही तत्काल बोल पड़े—‘मैं देता हूं सौ एकड़ जमीन.’ जिसने भी सुना वही अवाक रह गया. इसे जादू कहें या चमत्कार. विनोबा हैरान थे. जितनी जमीन चाहिए थी, उससे ज्यादा जमीन उन्हें मिल रही है. वह भी बिना मांगे. शाम की प्रार्थना सभा में रामचंद्र रेड्डी फिर उपस्थित हुए. उन्होंने अपने निर्णय पर दुबारा सहमति की मुहर लगा दी. अनायास ही एक नए आंदोलन का जन्म हो चुका था.

     विनोबा के लिए वह पवित्र अनुष्ठान था. यज्ञ था. तेलांगाना की समस्या से जूझने, उसके पार जाने का रास्ता उन्हें मिल चुका था. ईश्वर में उनकी आस्था थी. विनोबा ने उस उपलब्धि को भी ईश्वर का आशीर्वाद ही माना. विनोबा की पदयात्रा वहां से आगे बढ़ने लगी. वे जहां भी जाते, सीधे ग्रामीणों, किसानों से सीधे संवाद करते. महाभारत की कहानी का हवाला देकर पूछते कि पांडव कितने भाई थे?

     ‘पांच!’ तत्काल उत्तर मिलता.

     ‘नहीं छह, कर्ण छठा पांडव था. पांडवों ने उसको अपने साथ मिलाने से इंकार कर दिया तो वह कौरवों में जा मिला. नतीजा भाई-भाई के बीच युद्ध हुआ. आप भी अपने क्षेत्र में शांति चाहते हैं, पूरे देश और समाज का कल्याण चाहते हैं तो अपने भूमिहीन भाइयों को अपना लीजिए. उन्हें उनका अधिकार दे दीजिए.’

     कहीं वे कहते कि मैं दरिद्र नारायण का प्रतिनिधि बनकर आया हूं. आप पांच भाई हैं तो मुझे छठा मानकर मेरा हिस्सा मुझे दे दीजिए. विनोबा की अपील का जादुई असर होता. तेलंगाना की उस पदयात्रा में विनोबा को प्रतिदिन औसतरूप में लगभग 200 एकड़ जमीन प्राप्त हुई. वह एक चमत्कार ही था. दान में जमीन. जिस देश में एक-एक इंच जमीन के लिए झगड़े होते हों, मामूली टुकड़े के लिए भाई-भाई की गर्दन तराश देता हो, जहां की जनता ने शताब्दियों तक सामंतवाद का दमन सहा हो, वहां दान में जमीन मिलना अनूठी घटना थी. मगर वह हो रहा था और पूरी दुनिया के सामने हो रहा था. हालांकि कुछ मतिमंद आलोचक बैठे-ठाले दूसरों को संदेह की नजर से देखने वाले विनोबा के अभियान पर भी सवाल खड़े कर कर रहे थे. चूंकि जमीन का मिलना तो झुठलाया नहीं जा सकता था. जमीन न केवल मिल रही थी, बल्कि हाथोंहाथ बंट रही थी. जिन इलाकों से विनोबा गुजर जाते, वह इलाका अप्रत्याशित रूप से शांत हो जाता. इसके बावजूद आलोचकों ने कहना आरंभ कर दिया कि तेलंगाना में जमींदार कम्युनिस्टों से डरकर जमीन दान कर रहे हैं. हैदराबाद से बाहर जाते ही भूदान आंदोलन ठप्प पड़ जाएगा. मगर विनोबा को अपने आप में विश्वास था. अपने ईश्वर में विश्वास था और उससे भी अधिक जनता जनार्दन में विश्वास था. और विश्वास था कि सच्चे मन से आरंभ किए गए अभियान में असफलता की संभावना न्यूनतम होती है.

     तेलांगाना से बाहर विनोबा को लगभग तीन सौ एकड़ प्रतिदिन जमीन प्राप्त हुई. इससे स्वयं विनोबा भी हैरान रह गए. यह तेलंगाना में प्रतिदिन के औसत से लगभग डेढ़ गुनी थी. इससे उनके आलोचकों को मौन हो जाना पड़ा. मध्यप्रदेश की घटना है. दिन का समय था. विनोबा उस समय कुछ पढ़ रहे थे. तभी एक किसान चुपके से सामने आकर बैठ गया. विनोबा ने पूछा तो उसने कहा—

     ‘आज प्रातःकाल पूजापाठ के उपरांत ही मिलने के लिए चल पड़ा था. अब पहुंचा हूं.’ विनोबा के कारण पूछने पर उसने अंटी में से जमीन दान करने के कागज निकाले और विनोबा की ओर बढ़ाते हुए बोला—‘ये पचीस एकड़ मेरी ओर से?’

     ‘आपके पास कुल कितनी जमीन है?’ विनोबा ने मुस्कराते हुए प्रश्न किया.

     ‘छह सौ एकड़…’ किसान ने बताया.

     ‘और आप भाई कितने हैं?’

     ‘दो!’

     ‘तो मैं हुआ आपका तीसरा भाई. मेरा हिस्सा हिस्सा मुझे दे दीजिए.’

दान हमेशा दाता की मर्जी पर निर्भर रहता है. मगर यहां दान लेने वाला स्वयं दान की निर्धारित कर रहा था. मगर देने वाला जानता था कि वह संत अपने लिए कुछ नहीं रखने वाला. वह किसान शाम तक आश्रम में रुका. अंततः दो सौ एकड़ का दान पत्र विनोबा भूदान समिति के नाम लिख गया. जब से आंदोलन की शुरुआत हुई थी, विनोबा के पास दूर-दूर से लोग आते थे. आगंतुकों को कोई परेशानी न हो, इसलिए आश्रम का एक न एक कार्यकर्ता रात को जागा रहता था.

     एक बार मुंह-अंधेरे एक अंधा किसान बैलगाड़ी में सवार होकर विनोबा का पता पूछता-पूछता उनके शिविर में पहुंचा. रात का समय था, विनोबा समेत शिविर में सभी लोग सोए हुए थे. गाड़ीवान के सहारे से वह किसान नीचे उतरा. कार्यकर्ता विनोबा को जगाने चला तो उसने रोक दिया, बोला—

     ‘बहुत दूर से आना हुआ. गाड़ीवान अंधेरे में रास्ता भी ठीक से नहीं पहचान पाया. इसलिए देर हो गई. मेरे छोटे-से दान के लिए बाबा को जगाने के लिए जरूरत नहीं है. सुबह जब वे उठें तो यह दानपात्र उन्हें थमा देना.’

     इतना कहकर वह अंधा किसान गाड़ी में सवार हो जैसा आया वैसा ही लौट गया. सुबह जब लोगों ने सुना तो सब उस अंधे भूदानी की चर्चा करने लगे. विनोबा के मुंह से निकला—

     ‘स्वयं भगवान मुझे दर्शन देने आए थे. मैं ही अवसर चूक गया.’

     कुछ लोगों को संदेह था कि जमीन गरीब लोगों तक नहीं पहुंच पाएगी. जमीन सही लोगों तक पहुंचे इसके लिए कई सुझाव आए. विनोबा सब पर विचार करते. अंततः तय हुआ कि जमीन गांव में सबसे अधिक गरीब लोगों में बांटी जाएगी. उनमें से एक-तिहाई लोग दलित होंगे. भूदान की सफलता से उल्लसित विनोबा के कार्यकर्ता भूमिहीनों की सूची आमतौर पर पहले ही बना लेते थे. फिर उनके लिए गांव वालों से जमीन मांगी जाती. बैठक में ही सरकारी पटवारी भी तैनात रहता. दान में मिली जमीन का बैनामा तत्काल जरूरतमंदों के नाम कर दिया जाता. बैठक में कई बार भावुक अवसर भी आते जब आंखें छलछला जातीं. नियम के अनुसार जहां जमीन मिलती, वहीं के भूमिहीनों में बांट दी जाती.

     एक बार विनोबा एक गांव में थे. गांव में जरूरतमंदों की सूची बनाई गई. कुल बारह व्यक्ति थे, जिन्हें जमीन की आवश्यकता थी. मगर जब भूदान आरंभ हुआ तो जरूरत की आधी जमीन ही मिल पाई. कार्यकर्ता असंमजस में पड़ गए. लेकिन किया क्या जा सकता था. जो जमीन प्राप्त हुई थी उसी को प्रभु की अनुकंपा मानकर विनोबा जमीन बांटने लगे. बुराई बुराई को, अच्छाई अच्छाई को और त्याग त्याग को आमंत्रित करता है. कम जमीन जरूरतमंदों के बीच कैसे बांटी जाए कि उनका गुजारा हो सके, इस समस्या को लेकर विनोबा सहित सभी भूदानी असमंजस में थे. इसपर उनमें से एक व्यक्ति बोल पड़ा कि जमीन दूसरे व्यक्ति को दे दी जाए.

     ‘क्यों, तुम्हें जमीन नहीं चाहिए?’ विनोबा ने सहजभाव से पूछा.

     ‘मेरे बच्चे बड़े हैं, कहीं भी मेहनत-मजदूरी करके अपना पेट भर लेंगे. उसके बच्चे छोटे हैं. उसे ज्यादा जरूरत है.’ उसकी बात सुनकर विनोबा की आंखें भर आईं. उन्होंने तब बैठक में हिस्सा लेने आए लोगों को संबोधित करके कहा, ‘जब यह व्यक्ति इतना त्याग कर सकता है, तो आप क्यों पीछे रहते हैं.’ उस सभा में एक व्यक्ति पाकिस्तान से आया था. कुछ अपनी मेहनत से और कुछ पीछे की कमाई से जोड़-जाड़कर उसने जमीन का जुगाड़ किया गया था. विनोबा को असमंजस में देख उससे न रहा गया. उसने खड़े होकर कहा—

     ‘मेरी बारह एकड़ जमीन भी लिख लीजिए. मैं तो किसी तरह खा-कमा ही लूंगा.’

     इसपर दान में मिली जमीन का खाता चढ़ा रहे पटवारी से न रहा गया.

     ‘मेरे पास कुछ ढाई एकड़ जमीन है. मुझे तो सरकार से गुजारे लायक मिल ही जाता है. जमीन से किसी का परिवार पल सकता है तो उसको ले लीजिए.’

     ऐसे अवसर भूदान के दौरान अक्सर आते. एक बार एक मुसलमान जमीन दान करने के लिए विनोबा के पास पहुंचा. वह दस एकड़ के कागजात बनवाकर लाया था. विनोबा ने उससे उसकी कुल जमीन के बारे में पूछा—

     ‘आप भाई कितने हैं?’

     ‘पांच.’

     ‘तो छठा मुझे मानकर मेरा हिस्सा मुझे दे दीजिए.’ हमेशा की तरह विनोबा ने कहा.

     ‘इस्लाम में लड़कियों का भी पिता की जायदाद में हिस्सा होता है. मेरे तीन बहने भी हैं.’

     आगंतुक ने बताया. इसके बाद वह विनोबा को अपनी जमीन का नौ वां हिस्सा दान कर गया. विनोबा के आंदोलन से तेलंगाना आंदोलन में नरमी आई थी. केवल सात सप्ताह के भीतर विनोबा 12000 एकड़ जमीन प्राप्त कर चुके थे, जो एक चमत्कार था. इस बीच स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं की पूरी फौज सम्मिलित हो चुकी थी. वे विनोबा के नाम पर भूदान मांग रहे थे और लोग खुशी-खुशी उनका मनोरथ साध रहे थे. विनोबा ने जब दक्षिण छोड़ा उस समय तक उन्हें एक लाख एकड़ से अधिक जमीन प्राप्त हो चुकी थी. वे तेलंगाना के दो सौ से अधिक गांवों में भूदान के लिए गए. इससे सभी प्रभावित थे.

     जिन दिनों विनोबा दक्षिण में थे, तभी उन्हें जवाहर लाल नेहरू का दिल्ली आने का निमंत्रण प्राप्त हुआ था. वे भूदान आंदोलन की सफलता से अभिभूत थे और पंचवर्षीय योजना में उसको एक आंदोलन के रूप में सम्मिलित करना चाहते थे. विनोबा ने दिल्ली पहुंचने की सहमति दी. लेकिन अपनी पदयात्रा की शर्त जड़ दी. पवनार से दिल्ली की तरफ बढ़ते हुए विनोबा को प्रतिदिन तीन सौ एकड़ जमीन प्राप्त हुई. इससे उनके आलोचकों का मुंह बंद हो गया, जो यह कह रहे थे कि हैदराबाद और उसके आसपास सटे क्षेत्रों में लोगों ने कम्युनिस्टों के डर से जमीन दान में दी है. सरकार ने भूदान आंदोलन को पंचवर्षीय योजना में शामिल किया. दिल्ली से विनोबा ने उत्तरप्रदेश का रुख किया.

     जैसे ही दिल्ली से विनोबा ने उत्तरप्रदेश के लिए कूंच किया, गांव-गांव में समाचार फैलने लगा कि विनोबा आ रहे. भूमिहीनों की उम्मीद बलवती होने लगी. जिस गांव में भी विनोबा कदम रखते वहां उनका बड़े जोरदार तरीके से स्वागत किया जाता. पवनार से दिल्ली तक आते-आते प्रतिदिन औसतन तीन सौ एकड़ भूमि दान में प्राप्त हुई थी. उत्तरप्रदेश राम और कृष्ण की भूमि थी. विनोबा को वहां भी सफलता की पूरी-पूरी उम्मीद थी. और हुआ भी ऐसा ही. कुछ ही महीने के भीतर विनोबा उत्तरप्रदेश में सवा तीन लाख एकड़ जमीन दान में प्राप्त कर चुके थे. उनका कहना था कि दलितों और अंतज्यों के प्रति केवल करुणा-प्रदर्शन के लिए नहीं आए हैं. बल्कि हमारा उद्देश्य ही ऐसे समाज की रचना करना है, जहां के निवासियों में एक-दूसरे के प्रति प्यार, मैत्री, विश्वास और करुणा हो. ऐसे ही समाज का गठन करना मेरा लक्ष्य है.

     बैशाख का महीना था. ऊपर आसमान में सूरज तप रहा था. कार्यकर्ता चिलचिलाती धूप से परेशान रहते. मगर विनोबा के आगे तो लक्ष्य था. उनका इरादा पूरे देश में एक करोड़ एकड़ भूमि दलितों के लिए जुटाना था. प्रकट में उन्होंने केवल पचास लाख एकड़ का लक्ष्य अपने कार्यकर्ताओं के समक्ष रखा था. फिर आया भूदान के इतिहास का अविस्मरणीय दिन यानी 29 मई 1952. विनोबा बेतवा के किनारे अपने साथियों के साथ डेरा डाले हुए थे. इरादा जल्दी से जल्दी और अधिक से अधिक जमीन जुटा लेना था. सुबह और शाम की पूजा-अर्चना उनकी दैनिक गतिविधि का हिस्सा थी. दिन में प्रायः दो बैठकें होतीं, उनसे पहले पूजा का कार्यक्रम संपन्न होता. उस समय वे मंगरौठ के राजा के आथित्य में थे. वहां की सभा में विनोबा ने मंत्र दिया—सारी जमीन देवताओं की, गांव का मतलब बड़ा परिवार.’

     सभा में मंगरौठ के जमींदार शत्रुघ्न सिंह तथा उनकी पत्नी राजेंद्र कुमारी भी पधारे हुए थे. दोनों पर महात्मा गांधी के विचारों का गहरा प्रभाव था. उनके आंदोलन में वे हिस्सा भी ले चुके थे. बात जब भूदान की आई तो होठों पर अधखिली मुस्कान लिए विनोबा ने उनकी ओर मुड़कर पूछा—

     ‘आप इस फकीर की झोली में क्या डालने जा रहे हैं?’

     इस पर शत्रुघ्न सिंह ने अपनी अर्धांगिनी राजेंद्र कुमारी की ओर देखा. आंखों ही आंखों में जैसे निर्णय ले लिया गया—

     ‘जितनी भी हमारी जमींदारी है, सब.’ शत्रुघ्न सिंह ने पूरी सभा को चमत्कृत कर दिया.

     गांव वाले पहले भी जानते थे कि उनके जमींदार बड़े दिल के इंसान हैं. पर उनका दिल बड़ा है, इसकी उन्होंने कल्पना भी न की थी. और जब गांव का राजा अपना सबकुछ त्याग सकता है तो वे क्यों नहीं. फिर तो सभा में दानदाताओं की जैसे कतार-सी लग गई. अगले दिन विनोबा को लिखा हुआ दानपत्र मिल गया. गांव का अमीर-गरीब हर आदमी अपनी जमीन दान कर दी थी. गांव में अब भी उतनी ही मिल्कियत थी. मगर अब उसपर एक का साझा नहीं था. वह सबकी हो चुकी थी. पूरा गांव जैसे बड़े परिवार में ढल चुका था. ‘सबै भूमि गोपाल की’ तो किसी कवि द्वारा भावुकतावश रचा गया छंद रहा होगा. मगर मंगरौठ में तो वह दिन की रोशनी में चरितार्थ हो रहा था. जिस जमीन के एक-एक इंच पर अधिकार-भावना को लेकर गांव वाले मरने-मारने पर उतारू हो जाते थे, उसपर गांव वालों की त्यागवृत्ति से विनोबा अभिभूत थे. इसकी तो उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी. वह पहला ग्रामदान हुआ. उसके बाद तो ग्रामदान की मानो झड़ी-सी लग गई.

     उत्तर प्रदेश में अपनी पदयात्रा पूरी कर विनोबा बिहार के लिए बढ़ गए. वहां  सितंबर 1952 से दिसबंर 1954 के बीच के लगभग सताइस महीनों में उन्हें कुल 23 लाख एकड़ जमीन दान में प्राप्त हुई. उड़ीसा, केरल, तमिलनाडु में विनोबा को कई ग्रामदान हुए. उड़ीसा की पदयात्रा के दौरान कुल 6,38,706.50 एकड़ जमीन दान में मिली. गांव दान के अलावा संपत्ति दान, स्वर्णदान आदि की झड़ी ही लग गई. इसी से जन्म हुआ श्रमदान का. श्रमदान के पीछे अवधारणा थी कि अकेले जमीन देने से ही गांव का कल्याण होना संभव नहीं है. अभी तक गांववाले विकास के लिए सरकार की ओर देखते आए थे. श्रमदान आत्मनिर्भरता का मूलमंत्र था. लोककल्याण के लिए लिया गया लोकसंकल्प. गांव के सभी काम करने योग्य व्यक्तियों का योगदान उसमें अपेक्षित था. यानी जिसके पास कुछ नहीं है, सिर्फ उसका श्रम है, रचनात्मक कार्यों से वह भी पीछे क्यों रहे. श्रम दान कर अपनी भूमिका सुनिश्चित करे. देने वाला देवता है, उसका दर्जा ईश्वर जितना है, लेने वाले से उसका योगदान ज्यादा बड़ा है. विनोबा अक्सर दोहराते—

     ‘हमें स्वराज की, जनता के शासन की स्थापना करनी है. हमें स्वयं को इतना ऊंचा उठाना है कि समाज में व्याप्त हिंसा और दमन पर काबू पर सकें. जनता ही ईश्वर है, जनता ही जर्नादन है.’

     ग्रामदान अपने आप में एक क्रांति था. प्रवृत्ति में भूदान से भी अधिक सुधारवादी. वर्षों से सामाजिक न्याय के पक्षधर गांवों में समानता और बराबरी का सपना देखते आए थे. उनका कहना था कि गांवों से ऊंच-नीच मिटेगी तो पूरे देश में समानता का संचार होगा. समाजवाद का सपना सच हो जाएगा. उल्लेखनीय है कि समाजवादी क्रांति के नाम पर रूस सुलग चुका था. चीन की आंच अभी ठंडी नहीं पड़ी थी. अफ्रीकी देशों जैसे क्यूबा, बोलेविया, घाना, ग्वाटेमाला आदि में अमेरिकी उपनिवेश से आजाद होने के लिए संघर्ष जारी था. खूनी संघर्ष….उन सबसे अलग भारत में भी समाजवादी आंदोलन जारी था. भूदान के नाम पर. बाकी दुनिया से अलग. सबको शांति और सहअस्तित्व का संदेश देता हुआ. यह बताता हुआ कि भारत अब भी अपनी संस्कृति और परंपरा से जुड़ा हुआ है. यह आंदोलन एक ऐसे व्यक्ति के कंधों पर था जिसका वजन बामुश्किल तीस किलो था. जो केवल डेढ़ छटांक चावल पर अपना गुजारा करता था.

     ग्रामदान के अंतर्गत आए गांव में वहां की पूरी जमीन पर पूरे गांव का सामूहिक अधिकार होता. परिवारों के बीच उनकी जरूरत के आधार पर भूमि का विभाजन कर दिया जाता. बांटी गई जमीन पर लोगों को केवल खेती करने का अधिकार होता. उस जमीन को वे न तो खरीद-बेच सकते थे, न बंधक रखकर उसपर उधार ले सकते थे. न ही जरूरत के समय उस बेचकर रकम उठा सकते थे. गांव के प्रशासनिक मामलों की देखभाल के लिए ग्राम परिषद का गठन किया जाता था. गांव के सभी वयस्क सदस्य परिषद के भी सदस्य होते. परिषद के निर्णय के आपसी विचार-विमर्श के उपरांत लिए जाते. निर्णय का आधार सर्वसम्मिति होता, मगर सामाजिक हित के मुद्दों पर सर्वसम्मिति बनाना बहुत जटिल काम था. यानी जब तक एक भी सदस्य निर्णय से असहमत है, तब तक परिषद का निर्णय अमान्य समझा जाता था.

     सर्वसम्मत निर्णय उसी स्थिति में संभव था, जब गांव के सदस्यों के बीच आपसी भाईचारा और विश्वास हो. इससे यह भी साफ है कि परिषद का अनुचित लाभ उठा पाना असंभव था. ग्रामदान की रफ्तार आरंभ में ठीक रही. 1965 तक ग्रामदान आंदोलन धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा. ग्रामदान आंदोलन में गति लाने के लिए विनोबा ने बाद में उसके लिए सघन अभियान भी छेड़ा, जिसे उन्होंने ‘तूफान यात्रा’ का नाम दिया. इसका आशानुकूल परिणाम भी निकला. 1975 तक ग्रामदान के साये में आए गांवों की संख्या 1,60,000 हो चुकी थी, जो देश के कुल गांवों की संख्या की लगभग एक-तिहाई थी.

     बाद में ग्रामदान आंदोलन में भी स्वार्थी तत्व सम्मिलित होने लगे. आंदोलन इतना फैल चुका था कि अकेले विनोबा के बूते उसको संभाल पाना संभव न था. समर्पित और ईमानदार कार्यकर्ताओं की कमी भी साफ तौर पर अनुभव की जाने लगी थी. स्वार्थपरता और प्रसिद्धि की भूख के चलते यह भी देखने को आया कि लोग केवल नाम के लिए ग्रामदान की घोषणा कर देते हैं. अच्छे खेत देने के बजाय अक्सर ऊसर और तराई की जमीन दान में कर दी जाती थी. कुछ लोग विनोबा के नैतिक प्रभामंडल के दबाव में आकर जमीन दान कर देते थे. मगर जैसे ही विनोबा प्रस्थान करते, वे जमीन वापस छीन लेते थे. ग्रामदान की आचार संहिता के अंतर्गत उसकी आमूल कायापलट नहीं हो पाता था. 1970 तक ग्रामदान के अंतर्गत प्राप्त गांवों में से मात्र कुछ गांवों में ग्राम-परिषद का गठन हो पाया था. दरअसल विनोबा का प्रभामंडल जनता के मन में इतनी तेजी से फैलता जा  रहा था कि लोकप्रिय राजनीति के कर्णधारों के मन में उसको लेकर ईश्र्या-सी व्यापने लगी थी. वे भूदानी मुखौटा लगाकर उसमें सम्मिलित हो रहे थे. विनोबा उनकी चाल को समझते थे. देशव्यापी आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए अब सरकारी मदद की आवश्यकता महसूस की जा रही थी. मगर छठे दशक की समाप्ति तक राजनीति जोड़-तोड़ और स्वार्थपरता का खेल बन चुकी थी. इस कारण सरकार से किसी प्रकार के नैतिक समर्थन की उम्मीद विनोबा को न थी. परिणामस्वरूप 1971 के आसपास ग्रामदान आंदोलन अपने ही भार तले दबकर शांत हो गया.

     भूदान आंदोलन की सफलता आगे चलकर और भी कई रूपों में सामने आई. उपद्रव ग्रस्त क्षेत्रों में अहिंसक तरीके से शांति स्थापना के लिए शांति सेना बनी. भूदान आंदोलन की सफलता के लिए आजीवन उसके लिए कार्य करने का व्रत यानी जीवनदान. बिहार में जयप्रकाश नारायण ने विनोबा के भूदान यज्ञ के लिए अपना जीवन आहूत करने का निश्चय किया. इसी यात्रा में विनोबा की सर्वोदय की अवधारणा खुल कर सामने आई. सर्वोदय यानी सभी का उदय. सभी का कल्याण. विकास में सबकी समान सहभागिता. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि विनोबा को लगभग 1,60,000 ग्रामदान प्राप्त हुए, जो देश के कुल गांवों की संख्या का लगभग एक तिहाई है. हर घर के लिए एक ‘सर्वोदय-पात्र’ की संकल्पना की गई. बिहार यात्रा के दौरान विनोबा ने लोगों से आग्रह किया कि वे अपने घर में एक पात्र रखें और हर सद्ग्रहस्थ उस पात्र में प्रतिदिन अंजुलि-भर अनाज डालता चला जाए. ताकि उन लोगों का जो भूखे हैं, विपन्न हैं, पेट भर सके.

     विनोबा को स्वास्थ्य की समस्या आरंभ से ही थी. लंबी यात्रा की थकान वे सह ही नहीं सकते थे. लेकिन वह संत ही क्या जो अपनी सीमाओं का अतिक्रमण न कर सके. विनोबा तो रोज-रोज अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करने के लिए विख्यात होते जा रहे थे. भूदान यात्रा के दौर भी उनका स्वास्थ्य खराब था. फिर भी वे प्रतिदिन दस से बारह मील यानी सतरह से बीस किलोमीटर तक यात्रा करते. यात्रा दल का अनुशासन पक्का था. प्रातः तीन बजे सब जाग जाते. प्रार्थना होती. उसके बाद यात्रा आरंभ हो जाती. भूदान की चाहत में सर्वोदयी कार्यकत्र्ता गांव-गांव जाते. यात्रा टोली में स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़े, जवान, आदर्शवादी स्वयंसेवक, गृहस्थ सभी होते. राजनेता, व्यापारी गरीब, मजदूर सभी के बीच विनोबा की लोकप्रियता एकसमान थी. गांव, शहर और कस्बों से लोग विनोबा दर्शन के लिए आते. जिस गांव भी विनोबा का आगमन होता, वहां के निवासी उनके दर्शन के लिए मुख्यमार्ग के किनारे-किनारे जुट जाते. हाथ में फूलमालाएं लिए. सजे-धजे, अपनी विपन्नता छिपाकर मुस्काने का प्रयास करते, मन में बदलाव की आस जगाए हुए. गांव के प्रवेशद्वार पर तोरण सजाए जाते. जैसे ही विनोबा की एक झलक ग्रामीणों को मिलती, वे संत विनोबा, संत विनोबा, भूदानी बाबा के नाम से उनका जयगान करने लगते. विनोबा का वह स्वागत होता, जो संभवतः गांधीजी का भी नहीं होता था. वहां कुछ देर विश्राम करने के बाद कार्यकर्ता नाश्ता करते. उसके बाद सभी कार्यकर्ता गांव में फैल जाते. जगह-जगह ग्रामीणों से भेंट-मुलाकात जमती. उस समय विनोबा एक स्थान पर बैठे रहते, आगंतुकों और ग्रामीणों से बतियाते. उनके प्रश्नों का जवाब देते हुए.

     दोपहरी में कुछ देर आराम करते. उसके बाद शाम की प्रार्थना का समय हो आता. प्रार्थना सभा में सैकड़ों ग्रामीणों की भीड़ होती. दूर-दूर से आए हुए लोग. सभा में लोकगीत, भजन के अलावा सांस्कृतिक कार्यक्रमों की बैठक भी जमती. उसके बाद विनोबा का प्रवचन आरंभ होता. उनकी गंभीर, ओजस्वी वाणी जब सभा-मंडप में गूूंजती तो चारों और सन्नाटा छा जाता. लोग एकाग्र होकर उनका प्रवचन सुनने लगते. प्रवचन से पहले विनोबा पूरी तैयारी कर चुके होते. जिस विषय को भी वे छूते वह जीवंत हो उठता. भारतीय धर्मग्रंथों के अलावा वे ग्रामीण जीवन से भी जीवंत चरित्र उठाते. उनके संदेश में सर्व धर्म समभाव होता. आपस में मिल-जुलकर रहने की भावना का संदेश देते. फिर भूदान की बारी आती. सभा के समापन पर एक बार फिर प्रार्थना होती. विनोबा धर्म के नाम पर, इंसानियत के नाम पर, आपसी भाईचारे और सद्भाव के नाम पर, संस्कृति और सौहार्द के नाम पर भूदान का आह्वान करते. उनके आह्वान से लोगों के दिल खुल जाते. दानदाताओं की कतार-सी बंध जाती.

     भूदान यात्रा अनवरत चलती. प्रतिदिन, बिना किसी विराम, बगैर किसी साप्ताहिक अवकाश के. विनोबा उस समय जीवन के 57 वर्ष में थे. बुढ़ापा देह पर असर जमाने लगा था. ऊपर से स्वास्थ्य अक्सर चुनौती बना रहता था. रोजाना बदलती परिस्थितियां और जलवायु उन्हें और भी परेशान करतीं. कभी पेचिश आ घेरती, कभी वातरोग तो कभी मलेरिया अपना शिकार बना लेता. अलसर तो ताजिंदगी बना रहा. जो खाते आंत्र-शोथ के कारण उसका बहुत कम हिस्सा देह को लग पाता. फिर भी उनकी चुस्ती-फुरती देखने लायक होती. उनकी आवाज का ओज कभी मंद न पड़ता. दिमाग हमेशा तेज और जिज्ञासु बना रहता. स्वास्थ्य कारणों से यात्रा में कोई बिघ्न न पड़े, लोककार्य बाधित न हो, इसके लिए खाने-पीने का परहेज वे हमेशा रखते. अधिकतर शहद और दही पर गुजारा होता. जहां यह न मिलता वहां केवल पानी पर दिन गुजार देते. लोग उनका श्रम और उसकी तुलना में लिया गया अल्पाहार देखकर हैरान होते. सोचते इतना कम खाकर इतना श्रम कैसे कर लेते हैं बाबा. श्रद्धावश कुछ लोग उन्हें ‘भूदानी बाबा’ तो कुछ अतिउत्साही ‘वरदानी बाबा’ भी कहते. और वे गलत भी नहीं थे. लगभग एक दशक की भूदान यात्रा के दौरान विनोबा लाखों एकड़ जमीन भूदान में लेकर बेजमीनों में बांट चुके थे. कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था में बेजमीनों को जमीन मिल जाना, वरदान ही तो था.

     विनोबा का नाम देश की जुबान पर था. लोग कहते—‘दूसरा गांधी उनके भले के लिए गांव-गांव भटकर रहा है.’ वे उनमें किसी सिद्ध-महात्मा की छवि देखते. सोचते कि विनोबा के हाथ में जादू की छड़ी है. जिसके माध्यम से पलक झपकते सारी समस्याओं का निदान संभव है. विनोबा स्वयं बीमार रहते. यात्रा की थकान, पेट की बीमारी लगी ही रहतीं. फिर भी लोग विनोबा के पास अपने बीमार परिजनों को लेकर आते. स्त्रियां अपने बच्चों को विनोबा के आगे कर कहतीं—

     ‘बाबा देखिए तो, पंद्रह दिनों से बीमार है. न हंसता है और न खेलता है. और तो और मां का दूध तक नहीं पीता. इसको आशीर्वाद दीजिए कि पहले जैसा हंसने-खेलने लगे.’

     विनोबा लाख समझाते कि वे साधारण आदमी हैं. हाड़-मांस का पुतला, ‘अगर हाथ में जस होता तो अपनी ही बीमारियों से न सुलट लेता.’ लेकिन ऋद्धावान लोग कहां मानने वाले थे! आशीर्वाद लेकर ही टलते. विनोबा ईश्वर से प्रार्थना करते कि उनकी इच्छाएं पूरी हों. रोग-शोक का जड़ से नाश हो. ये प्रार्थनाएं किसी साधु-तांत्रिक या चमत्कारी की भांति न होकर एक संत प्रवृत्ति के व्यक्ति की ओर से थीं. जिसके मन में पूरी दुनिया के लिए दर्द था. सच्चे मन से उस समय वे यदि पीड़ित व्यक्ति को छू भी लेते तो उसका दर्द घट जाता. आत्मा को नैतिक संबल मिलता. इसे दूसरों के लिए जीने वालों की आत्मिक शक्ति का परिणाम माने या प्रकृति की सहज कृपा. बहुत से रोगी ठीक हो जाते. या विनोबा के दर्शनमात्र से उन्हें अपने संकट का एहसास जाता रहता.

     विनोबा उन दिनों असम की यात्रा पर थे. संत शंकरदेव का देश. विनोबा ने उनकी ख्याति सुनी थी. असम की मिट्टी में उस महान संत की आत्मा को महसूस कर वे अभिभूत हो उठे. वहां से वे पश्चिमी बंगाल जाने चाहते थे. गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर और शरतचंद्र का प्रांत. सुभाष और रासबिहारी बोस की धरती. महर्षि अरविंद की जन्मस्थली.

     पांच सितंबर 1962 को विनोबा असम की सीमा पर पहुंचे. मगर इस बार अपना देश नहीं, दूसरे देश की सीमा थी. पूर्वी पाकिस्तान. विनोबा को पदयात्रा पर निकले कई वर्ष बीत चुके थे. इस बीच हजारों किलोमीटर लंबी पदयात्रा उन्होंने बिना थके, बगैर रुके की थी. पहली बार वे दूसरे देश की सीमा पर थे. विनोबा के लिए हालांकि दूसरा देश कुछ भी नहीं था. वे तो खुद को आरंभ से ही पूरे विश्व का मानते हुए आए थे. फिर पाकिस्तान, वह तो भारत का ही छोटा हिस्सा, उसी की आत्मा का टुकड़ा था. वक्त की गलतफहमियों ने उसको दूसरे देश का रूप दे दिया था. हालात ने इन दोनों देशों को दो दुश्मन पड़ोसियों के रूप में ढाल दिया था. पूर्वी पाकिस्तान से होकर पश्चिमी बंगाल तक जाने में छोटा रास्ता पड़ता था. विनोबा ने अनुमति मांगी. अब ऐसे संत को भला कौन मना करता. विनोबा न तो राजनीतिक थे, न राजनीति उनका पेशा थी. वे भारतीय जनता के चहेते थे तो पाकिस्तानी आवाम के भी. अनुमति मिल गई. उस समय जवाहरलाल नेहरू का बयान आया—

     ‘विनोबा जी की इस छोटी-सी पाकिस्तान यात्रा से दो देशों के बीच आपसी सौहार्द बढ़ेगा. मन-मुटाव कम होगा.’

     विनोबा भले ही अराजनीतिक व्यक्ति हों, उनका अभियान भी मानवमात्र के कल्याण के प्रति समर्पित हो जिसके लिए देश-समाज की सीमाएं कोई मायने नहीं रखतीं. मगर लोग तो उतने सच्चे, उतने ही खरे न थे. कुछ लोगों को पाकिस्तान सरकार द्वारा रास्ता दिए जाने के काम में भी राजनीति नजर आई. आर्थिक विभाजन वहां भी था. सामंतवाद के साथ कंधे से कंधा मिलाकर जमा हुआ. वहां के जमींदार और उनकी नुमाइंदगी करने वाला बुद्धिजीवी वर्ग मानो डरा हुआ था. नहीं चाहता था कि नैतिक दबाव में आकर उसको भूदान के लिए बाध्य होना पड़े. ऐसे लोगों द्वारा विनोबा की अराजनीतिक यात्रा का राजनीतिकरण किया गया. पश्चिमी पाकिस्तान के समाचारपत्रों ने विनोबा को अनुमति दिए जाने की खुलकर आलोचना की. कुछ लोगों ने इसको भारत की चाल बताया. अंततः पाकिस्तान के विदेशमंत्री को ही हस्तक्षेप करना पड़ा. विनोबा की यात्रा के प्रति अपनी प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि—

     ‘विनोबा जी को पूर्वी पाकिस्तान जाने की इजाजत केवल इंसानियत के नाते दी गई है. पाकिस्तान सरकार के इस कार्य की तारीफ पूरी दुनिया में हो रही है. विनोबा की पाकिस्तान यात्रा बहुत थोड़े समय की है. इससे दोनों देशों के बीच आपसी मेल-मिलाप बढ़ेगा. हम भी भारत के साथ मेल-मिलाप चाहते हैं.’

     विनोबा की कश्मीर यात्रा के दौर की बात है. जब वे पाकिस्तान सीमा के निकटवर्ती गांवों की यात्रा पर थे तो सीमा से सटे पाकिस्तानी गांवों के नागरिक भारत से जाने वाले लोगों से अक्सर यह सवाल पूछते—

     ‘आपका यह बाबा हमारे पाकिस्तान कब आएगा?’

     ‘वह इधर क्यों आएगा, आना भी चाहे तो पाकिस्तान सरकार क्या आज्ञा देगी!’

     ‘क्यों नहीं देगी…बाबा क्या केवल हिंदुस्तान का है!’

     सच ही तो कहा था. विनोबा जैसे महापुरुषों को क्या किसी एक देश की सीमा में बांधा सकता है. विनोबा की पाकिस्तान आने की बाट जोहने वाले पाकिस्तानी नागरिकों में प्रायः भूमि से वंचित लोग थे. जिनके लिए विनोबा एक उम्मीद की किरण थे. विनोबा के पूर्वी पाकिस्तान में प्रवेश पर ऐसे लोगों में खुशी की लहर दौड़ना स्वाभाविक था. विनोबा के लिए तो देशकाल की सीमाएं न पहले थीं, न बाद में. उनके लिए पूरी दुनिया ‘विश्वग्राम’ थी. पाकिस्तान की धरती पर अपने पहले प्रवचन में इन्हीं अनुभूतियों का विस्तार करते हुए उन्होंने कहा—

     ‘मैं अमन और मुहब्बत का पैगाम लेकर पाकिस्तान की आवाम के बीच उपस्थित हूं. आप सब मेरे अपने हैं. किसी तरह के परायेपन का एहसास यहां मुझे नहीं हो रहा. वही आवोहवा, वही आसमान, वही मिट्टी, वही इंसान, वही मुहब्बत-भरा दिल. हिंदुस्तानी आवाम को देखकर मेरे दिल में प्यार की जैसी लहर उठती है. वैसा ही यहां भी हो रहा है. सारी दुनिया मेरी है; मैं केवल उसका सेवक हूं. मैं ‘जय जगत’ कहता हूं, जिसका मतलब है कि सारी दुनिया एक है. सारे इंसान एक हैं.’

     जो लोग यह सोच रहे थे कि विनोबा की पाकिस्तान यात्रा साधारण ही रहेगी, भारत विरोध की राजनीति करने वाले पाकिस्तानी राजनीतिज्ञों की भांति वहां की जनता भी कूटनीति की भाषा बोलेगी; और हिंदू विनोबा पाकिस्तान की मुस्लिम बहुल जनता के बीच उपेक्षित होकर रह जाएंगे—वे पूरी तरह गलत सिद्ध हुए. जिस रास्ते से वे गुजरते वहां की जनता विनोबा के दर्शनों को उमड़ पड़ती. लोग पैदल, गाड़ियों पर चलकर उनके दर्शनों को खिंचे चले आते. विनोबा जहां से भी गुजरते, पाकिस्तानी सरकार का धन्यवाद देने से न चूकते. फिर भी विनोबा से तेज उनकी कीर्ति पाकिस्तान की यात्रा पर थी. लोग कहते, ‘हिंदुस्तान से एक फकीर आया है. वह पैदल चलता है. दान में जमीन और गांव मांगता है. अपने लिए नहीं, गरीबों के लिए. हिंदुस्तान में लाखों गरीबों का भला उसने किया है. अब पाकिस्तान के लोगों की बारी है. हिंदुस्तान के दूसरे सूबे में जाने के लिए पाकिस्तानी सरकार ने रास्ता दिया है. जिधर से वह फकीर गुजरेगा, उस इलाके के गरीबों की किस्मत संवर जाएगी.

     लोगों को संबोधन के दौरान विनोबा कुरआन से संदर्भ लेते. स्थानीय सांस्कृतिक प्रतीकों को भी अपने प्रवचन का विषय बनाते. पाकिस्तान यात्रा में पहला पड़ाव भरूंगामारी गांव बना. साथ चल रहे कार्यकर्ताओं ने पड़ाव के बारे में पहले ही घोषित कर दिया था. इसलिए विनोबा के पहुंचने से पहले ही हजारों की तादाद में दर्शानार्थी वहां जमा थे. विनोबा के आने की सूचना बिना पंखों के, मानो हवा पर सवार होकर गांव-गांव फैल जाती थी. विनोबा के साथ चलने वाले बहुत से कार्यकर्ता पाकिस्तान यात्रा के दौरान भी उनके साथ थे. उन्हें लग ही नहीं रहा था कि वे किसी बाहरी मुल्क में हैं. पाकिस्तान में हैं.

     भारत की भांति भरूंगामारी में भी सर्वधर्म प्रार्थना सभा हुई. पाकिस्तान में यह शायद पहला अवसर रहा हो, जब हिंदू, मुसलमान, सिख और ईसाई एक साथ प्रार्थना में सम्मिलित हुई. स्थानीय नागरिक द्वारा कुरआन पाठ कराया गया. प्रार्थना सभा के बाद विनोबा फिर अपने रंग में आ गए. उन्होंने पाक्स्तिानी नागरिकों को संबोधित करते हुए कहा कि उन्हें यह हरगिज नहीं लगा रहा है कि वे किसी दूसरे देश में हैं. उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान की तरह पाक्स्तिान में भी गरीबी है. बेरोजगारी और विषमता है. गरीबों के कल्याण के लिए गरीबी को मिटाना होगा. कैसे मिटाना होगा, इसके लिए विचार करना है. गरीबी हिंदुस्तान में है. गरीबी पाकिस्तान में भी है. गरीबों की गरीबी मिटे, उनके दुःख दूर हों, उसके लिए सबको मिलकर प्रयास करने चाहिए. प्रयास कैसे होने चाहिए इस पर भी उन्होंने बताया, बोले—

     ‘भाइयो, आपने मुझे खिलाया-पिलाया. इस फकीर को अपना प्यार दिया. मगर गांव के गरीबों को कौन खिलाएगा-पिलाएगा. कौन उन्हें प्यार देगा. कौन उनके सुख-दुःख का इंतजाम करेगा.’

     लोग चुप हो गए. सभा में सन्नाटा व्याप गया. भारत में विनोबा के कारनामे के बारे में वे लोग सुन चुके थे. गरीब लोगों के दिल धड़क रहे थे. भारत में तो इस फकीर के आवाह्न पर दानदाताओं की कतार लग जाती है. पाकिस्तान में कौन आएगा. कुछ देर सन्नाटा भांय-भांय करता रहा. विनोबा अपने आसन पर शांतचित्त बैठे रहे. थोड़ी देर बाद एक व्यक्ति खड़ा हुआ. चेहरे पर नूरानी चमक और विश्वास लिए हुए. मानो भीतर से कोई दिव्य प्रेरणा उभर रही हो. विनोबा को संबोधित कर उसने कहा—

     ‘बाबा, मेरे पास कुल चार एकड़ जमीन है. मेरा परिवार बड़ा है. घर में कई खाने वाले हैं. फिर भी एक बीघा जमीन तो मैं दे ही सकता हूं.’

     साथ चल करे कार्यकर्ताओं ने दानपत्र उसकी ओर बढ़ा दिया. दानपत्र पर हस्ताक्षर करते समय उस व्यक्ति की अंतश्चेतना एक बार पुनः प्रबल हो उठी. वहां मौजूद एक-एक व्यक्ति को चमत्कृत करते हुए उस आदमी ने कहा,

     ‘एक बीघा से उस गरीब का गुजारा कैसे चलेगा. एक एकड़ ही लिख लीजिए. रजिस्ट्री कराने का खर्च भी मैं ही दे दूंगा.’

     उस व्यक्ति का नाम था अब्दुल खालिफ मुंशी. उसकी खुद की आर्थिक हालत भी बहुत टिकाऊ न थी. लोगों की आंखें झरझरा उठीं. खुद विनोबा भी भावविह्वल हो उठे. पाकिस्तान के उस रामचंद्र रेड्डी के कंधे पर हाथ रखकर बोले, ‘मैं आपके लिए ईश्वर से प्रार्थना करूंगा.’

     भारत में विनोबा की यात्रा का प्रबंध कार्यकर्ता और स्थानीय निवासी करते थे. पाकिस्तान में वे सरकारी अतिथि थे. इसलिए नियमानुसार पुलिस उनके साथ रहती. भरूंगामारी में पुलिस के सिपाही भी विनोबा का चमत्कार देखकर दंग थे. जिस जमीन के एक-एक अंश के लिए लोग अपनों की लाशें बिछा देते हैं. झूठ बोलते हैं. पाप करते हैं. बेईमानी से दूसरे का हिस्सा दबा जाते हैं. वही जमीन एक आदमी अपनी मर्जी से खुशी-खुशी दूसरों के नाम लिख रहा था. अब्दुल खालिफ मुंशी….पाकिस्तान का रामचंद्र रेड्डी. पाकिस्तान का भरूंगामारी गांव, भूदान की पहल का साक्षी, भारत का पोचनपल्ली बन बन गया. भारत के रामचंद्र रेड्डी तो बड़े जमींदार थे. पर अब्दुल खालिफ तो मात्र चार एकड़ जमीन का मालिक ठहरा. उसपर उसका बड़ा परिवार. दानपात्र पर दस्तखत होते ही लोग भारत और पाकिस्तान की जय के नारे लगाने लगे. विनोबा ने उन्हें समझाया कि इंसानियत को देशों की सीमाओं में मत बांधिए. ‘जय जगत’ बोलिए. पाकिस्तान यात्रा के दौरान पहले दो दिन तो दर्शानार्थी भारत और पाकिस्तान की जीत के नारे लगाते रहे. फिर वे नारे ‘जय-जगत’ में बदल गए. लोगों ने मनुष्यता का एक नया पाठ पढ़ा. ‘वसुधैव कुटंुबकम्’ की औपनिषदिक् भावना साकार होने लगी.

     यात्रा आगे बढ़ गई. पूरे जोश और हुजूम के साथ. रास्ते में विनोबा से तरह-तरह सवाल करते. विनोबा भी खुले मन से उनका जवाब देते. दूर-दूर से उनसे मिलने के लिए लोग आते. अगले पड़ाव में वे अपने कारवां के साथ पगलागीर गांव पहुंचे. लोग पहले की तरह वहां उपस्थित थे. छोटे-से गांव में दूर-दूर से चलकर आए लोग. उन्हीं लोगों में एक सुदर्शन युवक भी था. हाथ में कैमरा लिए हुए. स्थानीय नागरिकों में से कई उसको पहचानते थे. वह एक अभिनेता था, जो विनोबा से मिलने के लिए ढाका से चलकर पहुंचा था.उस युवक ने तीन एकड़ जमीन का दानपत्र लिखा. और विनोबा को नमन कर वापस लौट गया. खुद को अभिनेता बताते हुए उसने कहा कि बाबा के दर्शनों के लिए दूर ढाका से चलकर आया हूं.

     विनोबा के लिए यह क्षण नया नहीं था. पहले भी ऐसे अवसर आए थे जब लोग उनके प्रति अपनी श्रद्धा का प्रदर्शन करने दूर-दराज से चलकर उनसे मिलने पहुंचते थे. पर पराए देश में. ऐसे देश में जो भारत को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता आया हो, जहां के नागरिकों के दिलों में विभाजन की त्रासदी अभी भी जिंदा हो, वहां के लोगों का इतना प्यार देखकर विनोबा का दिल भी पिघलने लगा. इसमें कोई अनूठी बात भी नहीं थी. दूसरों के कल्याण के लिए अपना जीवन जीने वालों, निष्प्रह और अपरिग्रही लोगों का जनता इसी तरह खुले दिल से स्वागत करती रही है. पगलागीर में पांच दानदाताओं ने भूदानपत्र विनोबा को सौंपे. मगर एक व्यक्ति का दान वहां मौजूद सभी को भावाकुल कर गया.

     नंगे पांग गांव-गांव जाकर दूसरों के लिए जमीन मांगने वाले विनोबा की ख्याति सुनकर उनके दर्शनों की साध ले एक गरीब लड़का सभा में पहुंचा. उसके तन पर साधारण कपड़े थे. विनोबा के पास पहुंचकर उस लड़के ने जेब में हाथ डाला. कुछ रुपये बाहर निकाले और विनोबा की ओर बढ़ाते हुए बोला—

     ‘बाबा, मुझ गरीब के पास जमीन नहीं है. दान देने के लिए कोई बड़ी संपत्ति भी नहीं. चना-चबैना बेचता हूं. बड़े प्रयत्न से चना-चबैना बेचकर पांच रुपए जमा किए हैं. आप इन्हें स्वीकार कर लेंगे तो मेरी यात्रा सफल हो जाएगी.’

     विनोबा ने रुपए ले लिए. दानपत्र लिख दिया गया. लड़के के कंधे पर हाथ रख प्यार और आशीर्वाद देते हुए विनोबा बोले—

     ‘तुम्हारा दान किसी भू-स्वामी से कम नहीं है. मैं इसका मोल नहीं चुका सकता. अल्लाह तुम्हें बरकत दे. वही तुम्हारे दान कर हिसाब रखेगा.’

     पगलागीर से यात्रा-दल आगे बढ़ गया. रास्ते में नए लोग मिले. भजन-कीर्तन के साथ-साथ विचार-विमर्श चलता रहा. लोग विनोबा से भारत और पाकिस्तान के बीच व्याप्त तनाव पर बात करना चाहते. पूर्वी पाकिस्तान के लिए बृह्मपुत्र नदी की बाढ़ एक समस्या थी. नदी जब उफनती तो आसपास के इलाके को अपने आगोश में ले लेती. फसलें तबाह हो जातीं. घर-झोपड़ियां और मवेशी बह जाते. बाढ़ के बाद बीमारियों का दौर चलता. हैजा, खांसी, बुखार और दूसरी जानलेवा बीमारियों से जनजीवन त्रस्त हो उठता. किसी ने विनोबा से प्रश्न किया, इस बाढ़ का कोई समाधान बताइए बाबा. विनोबा तो संगठन और समन्वय के पक्षधर थे. बोले—

     ‘भारत और पाकिस्तान दोनों देशों को इसके लिए मिलकर काम करना होगा.’

     ‘क्या दोनों देश इस मुद्दे पर एक साथ होंगे?’

     पता चला कि सरकारें राजनीति करती हैं. वे लोककल्याण के किसी मुद्दे पर शायद ही एक मंच पर आएं. लेकिन आवाम के लिए उसकी समस्याएं प्रमुख हैं. उसके लिए राजनीतिक दांव-पेंच से अधिक रोजमर्रा की मुश्किलों से निजात पाना है. ये समस्याएं दोनों तरफ लगभग एक जैसी हैं. विनोबा अपनी यात्रा को राजनीतिक होने से बचाए रखना चाहते थे. उन्होंने लोगों से मिल-जुलकर रहने और संबंधों में राजनीति को न लाने की अपील की.

     भूदान यात्रा के दौरान ही विनोबा को पदयात्रा का महत्त्च समझ में आया. उन्हें समझ आया कि समाज में अच्छे लोगों की बहुतायत है. जरूरत उन्हें अपनी सचाई का भरोसा दिलाने, अपने आचरण द्वारा उनकी अच्छाइयों को सामने लाने की है. अपने इसी विश्वास की खातिर वे लगातार तेरह वर्ष तक पदयात्रा करते रहे. 12 सितंबर, 1951 को पवनार आश्रम से शुरू हुई उनकी यात्रा लगभग 13 वर्ष पश्चात 10 अप्रैल, 1964 को वहीं पहुंचकर संपन्न हुई. इस बीच उन्होंने पूरे देश की पदयात्रा की. हजारों किलोमीटर पैदल चले.     विनोबा की पदयात्राओं से पूरे देश में एक नैतिक वातावरण बना था. इसलिए उसका उपयोग देश की अन्य जटिल समस्याओं के निदान के लिए करने का विचार भी बना. चंबल की तलहटी में बसे गांववालों ने विनोबा के आगे जाकर गुहार की. बाबा, हमारे पास थोड़ी-बहुत जमीन भी है. लेकिन डाकू हैं कि खेती ही नहीं करने देते. वे हमारी सारी कमाई लूट ले जाते हैं. ना करो तो गोली मार देते हैं. हमारे बच्चों का अपहरण करके ले जाते हैं. और नहीं तो खड़ी फसल को ही आग लगा देते हैं.

     कानून की नजर में डाकू अपराधी थे. इसलिए उसने अपने सिपाही और सैनिक डाकुओं की खोज में छोड़ रखे थे. कभी आमना-सामना हो जाता, तो कभी डाकू चकमा देकर निकल जाते. आमने-सामने की लड़ाई कभी सिपाही दो-चार डाकुओं की लाश बिछाने में कामयाब भी हो जाते. कभी इसका उल्टा भी हो जाता. डाकुओं की लाशें बिछतीं तो सरकार और कानून अपनी पीठ थपथपाते. सिपाहियों की मौत पर डाकु समस्या पर चर्चाएं आम हो जातीं. इस बीच खबर मिलती कि घाटी में उससे कहीं ज्यादा नए डाकू बढ़ चुके हैं. कानून मन मसोसता. उनसे निपटने के नाम पर कुछ सिपाही तथा सैनिक भेजता. नए-नए चक्रव्यूह डाकुओं को फंसाने के लिए बनाए जाते. मगर समस्या ज्यों की त्यों बनी रहती.

     विनोबा सोचते कि समस्या सिर्फ लूट-खसोट की नहीं है. कहीं न कहीं वह संपत्ति और संसाधनों के असमान बंटवारे से जुड़ी है. डाकू भी आखिर इंसान हैं. जब तक आसानी से खाने को मिलेगा, तब तक कोई बीहड़ का रास्ता क्यों चुनेगा. वह कहते थे कि दोष डाकुओं का नहीं, उस बंदूक का है, जो उन्हें हिंसा की ओर ले जाती है. मई 1960 में चंबल के बीहड़ों में ही विनोबा को आशातीत सफलता प्राप्त हुई थी. अनेक खूंखार डाकू जो वर्षों से पुलिस और प्रशासन को छकाते आ रहे थे, उन्होंने विनोबा के आगे अपने हथियार डाल दिए थे. उनमें एक खूंखार डाकू लालमन भी था.

     7 जून 1966 को विनोबा को गांधी से मिले पूरे पचास वर्ष बीत चुके थे. इस बीच गांधी जी के आदर्शों को उन्होंने संभवतः गांधी जी से भी अधिक पवित्रता के साथ जिया था. लेकिन अब उन्हें लगने लगा था कि बाहरी यात्रा का दौर पूरा हो चुका है. अब उन्हें अपने भीतर की यात्रा करनी होगी. भारत-भर का भ्रमण करने के बाद 2 नबंवर 1969 को अपने आश्रम पवनार में लौट आए. और यह तय कर लिया कि अब वे एक स्थान पर टिके रहकर अध्यात्म चिंतन करेंगे. 25 दिसंबर 1974 को उन्होंने अपना मौनव्रत आरंभ कर दिया. 1976 में उन्होंने गौकशी के विरोध में अनशन आरंभ किया.

     भूदान ऐसा आंदोलन था जिसे पश्चिम में संभवतः गांधी जी के सत्याग्रह आंदोलन से भी अधिक सराहना मिली. अमेरिका के लुइस फिश्चर ने लिखा—

     ‘ग्रामदान हाल के दौर में पूर्व की ओर से आने वाला सबसे रचनात्मक विचार है.’

     अल्फ्रेड टेनीसन के पोते हेलम टेनीसन ने विनोबा के साथ कई वर्षों तक पदयात्रा की थी. भूदान से जुडे़ अपने अनुभवों को उसने एक पुस्तक की शक्ल में दी, जिसका शीर्षक ह—‘पदयात्रा पर संत(The Saint on the march) भारत में अमेरिकी राजदूत चेस्टर बाउल ने अपनी पुस्तक ‘शांति के सोपान’ (The dimensions of peace) में भूदान के बारे में अपने अनुभवों का उल्लेख करते हुए लिखा कि हमने पाया कि 1955 में भूदान आंदोलन भारत-भर में परिवर्तनकारी संदेश दे रहा था. उसने साम्यवाद के विरुद्ध एक क्रांतिकारी विचार बनकर सामने आया, जिसने मानवीय आत्मसम्मान और अस्मिता को नए सिरे से स्थापित किया.

     भूदान ने न केवल भारत में बल्कि दुनिया के उद्योगपतियों पर भी अपना प्रभाव छोड़ा. ब्रिटिश उद्योगपति अर्नेस्ट बार्डर ने भूदान आंदोलन की सफलता से प्रेरित-प्रभावित होकर अपनी कंपनी के 90 प्रतिशत शेयर कंपनी के कर्मचारियों में बांट दिए. एक आंदोलन के रूप में भूदान को खूब सराहना मिली. उसको परिवर्तनकामी आंदोलन माना गया. हालांकि कुछ विद्वानों ने उसकी जमकर आलोचना भी की. जितने दिन आंदोलन चला उतने दिन संयुक्त राष्ट्र के समाचारपत्र आंदोलन की खबरों से भरे रहते थे. न्यूयार्क टाइम्स, दि नयू यार्कर जैसे अखबारों में आंदोलन को लेकर नित्यप्रति कुछ न कुछ प्रकाशित होता था. सुप्रसिद्ध ‘टाइम’ पत्रिका ने विनोबा का चित्र अपने मुख्य पृष्ठ पर छापकर उनके प्रति अपने सम्मान का प्रदर्शन एवं भूदान को अपनी नमन प्रस्तुत किया था.

     भूदान के दौरान देश भर में कुल 41,94,270 एकड़ जमीन प्राप्त हुई. विड़ंबना देखिए कि 1975 तक सरकार उस जमीन में से केवल 12,85,738 एकड़ ही भूमिहीनों को बांट पाई थी. 18,57,398 एकड़ जमीन को बंटवारे के अयोग्य पाया गया. ब्रिटेन का डोनाल्ड गू्रम सर्वोदय कार्यकर्ताओं के साथ पूरे छह महीने साथ रहा और इस अवधि में उसने 2200 किलोमीटर से अधिक की पदयात्रा की. आर्थर कोस्टलर ने 1959 में लंदन आबजर्बर में लिखा कि भूदान आंदोलन ने नेहरू के प्रश्चिम से प्रेरित विकास के मा॓डल का सार्थक स्वदेशी विकल्प दुनिया के सामने रखा. जितने दिन भूदान आंदोलन चला, अमेरिकी अखबार उसके समाचारों से भरे रहते थे. न्यूयार्क टाइम्स और न्यूयार्क जैसे प्रतिष्ठित समाचारपत्रों ने विनोबा पर कई लेख प्रकाशित किए.

    अगर हम गांधी के जीवन को देखें तो उसमें हमें कई विचलन दिखाई पड़ेंगे. बचपन में चोरी करने से लेकर अपने सेक्स के विवादित प्रयोगों तक. वहां गाधीं का महात्मापन कई बार हमें चैंकाता है तो अनेक बार हमारे मन में क्षोभ और जुगुप्सा का संसार करता है. इसके विपरीत विनोबा का जीवन एक संत का कल्याणकामी जीवन है. संभव है बचपन की कुछ स्वाभाविक गलतियां विनोबा ने भी की हों. और उन्हें गांधी जी की तरह सार्वजनिक करने का साहस उनमें न रहा हो. तो भी यह सत्य है कि आरंभ से ही संन्यास उन्हें आकर्षित करता रहा था. मां की आध्यात्मिक शिक्षा उन्हें इस संसार की मोह-माया से निर्लिप्त रखती रही. इसलिए किशोर विनोबा अपने सारे प्रमाणपत्र आग के हवाले कर देते हैं. उस समय तक उन्होंने गांधी जी का नाम भी नहीं सुना था. बस एक ही साध थी, हिमालय में जाकर तापसी जीवन जीने की. तुकाराम, शंकराचार्य और समर्थ गुरु रामदास उनके आदर्श थे. इस चाहत को मां रुक्मिणी बाई यह कहकर कि ‘अगर मैं पुरुष होती तो बताती कि संन्यास क्या होता है, और भी हवा देती रहीं. मां ने उन्हें संन्यास की ओर ले जाने की मदद की. उन्हें अपरिग्रही, और आत्मसंतोषी जीव बनाया तो गांधी जी ने उन्हें कर्मयोग से जोड़ा. विनोबा के जीवन में मां रुक्मिणी बाई और गांधी दोनों में से किसका योगदान अधिक है, यह कह पाना कठिन है. इतना अवश्य कहा जा सकता है कि उनके जीवन और आचरण में गीता जैसी विविधता है. उसमें भक्ति है और ज्ञानयोग भी कर्मयोग है और चरैवेति-चरैवेति की भावना भी.

     बचपन में मां रुक्मिणी बाई विनोबा को यदि संन्यास की ओर न ले जातीं तो उनका नैतिक आभामंडल शायद उतना ऊंचा न उठता. ऐसे में भूदान जैसे आंदोलन की सफलता संद्धिग्ध ही थी. गांधी जी जब आवाहन करते थे तो स्त्रियां अपने घरों से निकल आती थीं. अपने कीमती गहने और वस्त्राभूषण दान कर देती थीं. विनोबा जब आवाह्न करते हैं तो किसान जमींदार और सामंत जो उससे पहले जमीन के लिए खून-खराबा और मारकाट करते आए थे, जिसके एक कूंड के लिए गांवों में लाशें बिछ जाया करती थीं, वे उस जमीन को खुशी-खुशी दान कर देते हैं, ताकि वह गांव के ही भूमिहीनों के पेट भरने के काम आ सके.

     उल्लेखनीय है कि भूदान की संकल्पना का जन्म गांधी जी की मृत्यु के लगभग तीन वर्ष बाद हुआ था. स्वयं विनोबा भी कहां सोचते थे कि जिस जमीन के लिए महाभारत हुआ, लोग आपस में लड़-मर जाया करते हैं, उससे इतनी आसानी से अधिकार छोड़ने को राजी हो जाएंगे. निश्चितरूप से इसके पीछे रूस और  चीन की क्रांतियों का भी हाथ था. जहां आंदोलनकारियों ने आततायी जमींदारों को विषैली गैसों के चेंबर में बंदकर मौत की सजा दी थी. उनपर तेलगांना के कम्युनिस्टों का भी दबाव था, जिन्होंने अपने अधिकारों और न्याय के लिए संघर्ष की राह चुनी थी. इससे जागीरदारों और सामंतों को लगने लगा था कि यदि उन्होंने गरीबों को खुशी-खुशी उनका हक नहीं दिया तो भारत में भी हिंसक क्रांति होने से वे रोक नहीं पाएंगे. यह उन्होंने तेलगांना में देखा था. बंगाल में भी ऐसी ही परिस्थितियां बन रही थीं. बाद में किसी किसान ने जो भूदान करने के बाद टिप्पणी भी की थी कि विनोबा ने हमें उग्र कम्युनिस्टों के कोप से बचाया है. वरना हमारा हाल भी चीन और रूस के किसानों जैसा हुआ होता.

     विनोबा के भूदान को विश्वव्यापी ख्याति मिली. राजनीतिक कारणों से यूरोपीय इतिहासकार और विद्वान गांधी जी के आंदोलन और उनके सत्याग्रह पर उतना सकारात्मक नहीं लिख पाए थे, जितना अपेक्षित और न्यायसंगत था. मगर विनोबा के भूदान पर उन्होंने खूब लिखा. कई विदेशी पत्रकार वर्षों तक विनोबा की भूदान यात्रा में उनके साथ रहे और उसके सकारात्मक प्रभाव को दुनिया के सामने लाते रहे. 1951 में विनोबा ने शिवराम पल्ली जाने के लिए पवनार छोड़ा था. उसके बाद वे 1964 तक भूदान के काम से बाहर ही रहे. इन तेरह वर्षों में उन्हें दान-स्वरूप चालीस लाख एकड़ से अधिक भूमि दान में प्राप्त हुई. अपने अंतिम वर्षों में भूदान का प्रभाव वह नहीं रह गया था जो उसके आरंभिक वर्षों में था. आंदोलन की असफलता में उन अवसरवादी लोगों का भी हाथ था जो विशुद्ध राजनीतिक महत्त्चाकांक्षाओं के कारण विनोबा के साथ जुड़े थे. फिर भी भूदान की उपलब्धियां अतुलनीय थीं. वह एक सच्चा परिवर्तनकामी आंदोलन था.

     प्रश्न उठता है कि इतनी अप्रतिम कामयाबी के बावजूद भूदान को क्यों भुला दिया गया? उनके विरोधी उनपर कांग्रेस सरकार और इंदिरागांधी के अंर्धसमर्थक होने का आरोप लगाते हैं. विनोबा ने आपातकाल का समर्थन ‘अनुशासन पर्व’ कहकर किया था, जो उनके विरोधियों को बुरा लगा. बल्कि इससे जयप्रकाश नारायण जैसे उनके समर्थक भी विनोबा से परे छिटक गए. लेकिन सत्ता में आने के बाद जनता पार्टी और उसके नेताओं जो धत्कर्म किया, उसके छोटे-से कार्यकाल में जैसी अराजकता पनपी, और उसके बाद लोगों में जो गुस्सा और असंतोष फैला, जिससे इंदिरा गांधी की सत्ता वापसी संभव हुई—उसे देखकर तो लगता है कि विनोबा ने गलत नहीं कहा था. वे जनता पार्टी तथा उसके नेताओं के अवसरवादी चरित्र को समझते थे. इसलिए उन्होंने आपातकाल को अनुशासन पर्व समझने-कहने की भूल कर बैठे थे. यहां उल्लेखनीय है कि विनोबा कोई राजनीतिक जीव नहीं थे. होते तो अपने वक्तव्य को घुमा-फिराकर ऐसा मोड़ दे सकते थे, जिससे की दोनों अर्थ निकाले जा सकें. परंतु विनोबा ने न तो कभी अपने तर्क का खंडन किया न कभी पछतावा व्यक्त किया. बल्कि बाद में उनका मौन और गहरा गया, जो आगे उनकी मृत्यु तक बना रहा.

     1965 में उड़ीसा में बाढ़ आई हुई थी. जुलाई-अगस्त 1965 में मूर डिक्सन ने उड़ीसा के गांवों का निरीक्षण किया. उससे पहले के वर्षों में मानसून असफल होने के कारण उड़ीसा समेत पूर्वी भारत के कई हिस्सों में अकाल जैसी स्थिति बन चुकी थी. स्थानीय नागरिकों की याद में उससे ठीक एक शताब्दी पहले का वह भीषण अकाल पसारा हुआ था, जिसने कुछ ही वर्षों में उड़ीसा और आसपास के इलाकों की लगभग एक-चैथाई आबादी को अपना शिकार बनाया था. इस बार भी पहले सूखे 1965 में भी सूखे के हालात लगभग वैसे ही थे. कई जिलों की जमीन सूखे के कारण पड़ा चुकी थी. हालांकि अब हिंदुस्तान आजाद था और सरकार तथा स्वयंसेवी संगठन बचाव कार्य में जी-जान से जुटे हुए थे. हालांकि सरकार ने हालात की गंभीरता का अनुमान देरी से लगाया था. तब तक सूखे और कुपोषण के कारण सैकड़ों जाने जा चुकी थीं. सरकार उसको अकाल घोषित करने से बच रही थी. दूसरी ओर विदेशी अखबार बार-बार अकाल की चेतावनी दे रहे थे. उसी दौर में मूरे डिक्सन ने उड़ीसा के गांवों में सूखे और राहत कार्यों की स्थिति का जायजा लेने के लिए जुलाई 1966 में वहां का निरीक्षण किया था.

     उस समय तक राहत कार्यों को शुरू हुए कुछ महीने बीत चुके थे. लोगों को भोजन के साथ-साथ मुफ्त दवाइयां भी उपलब्ध कराई जा रही थीं. अंतरराष्ट्रीय संस्था रेडक्रास उन गरीब बच्चों की देखभाल में लगी थी, जिनकी माताएं कुपोषण के चलते उन्हें स्तनपान कराने में असमर्थ थीं. निरीक्षण के दौरान मूर ने पाया कि एक गांव ऐसा था, जहां प्राकृतिक सूखे के बावजूद लोगों के जीवन पर उसका बहुत कम प्रभाव हुआ था. हालांकि वहां के नागरिकों ने सूखे के प्रकोप को उतनी ही बुरी तरह झेला था, जैसा कि आसपास के ग्रामवासियों ने. बावजूद इसके वे उसकी विभीषिका से खुद को बचाए हुए थे. अपने इस अनुभव का डिक्सन ने बड़ा ही मर्मस्पर्शी वर्णन किया है, अपनी पुस्तक COMMUNITY DEVELOPMENT AND THE GRAMDAN MOVMENT IN INDIA  में वे लिखते हैं—

     ‘सूखाग्रस्त क्षेत्र की अपनी यात्रा के दौरान में एक ऐसे गांव में पहुंचा जहां किसी प्रकार के राहत कार्य की आवश्यकता नहीं थी. यद्यपि वहां के निवासी सूखे के भयावह दौर से गुजर चुके थे. लेकिन उन्होंने बिना किसी बाहरी मदद के उसका सफलतापूर्वक सामना किया था. उनपर आसपास के गांवों की अपेक्षा सूखे का कम असर था. उनकी यह उपलब्धि सराहनीय थी. मैंने उनसे पूछा कि उन्होंने अपने बचाव के लिए क्या किया? उसके जवाब में गांव के प्रमुख व्यक्तियों ने जो कहा, उसको मेरे साथ चल रहे अनुवादकों के माध्यम से मैंने सुना, ‘हमारा गांव ग्रामदान गांव है. इसलिए हम अपनी समस्याओं का निवारण ग्राम परिषद में आपसी विचार-विमर्श के द्वारा करने में विश्वास रखते हैं. हम मिल-बांटकर खाने में विश्वास रखते हैं. हमारा प्रयास रहता है कि अपने गांव को अधिकतम की सीमा तक आत्मनिर्भर बनाएं. इसलिए पिछले वर्ष जब मानसून की उदासीनता के चलते यह स्पष्ट हो चला था कि आने वाले महीने भारी सूखे के होंगे. खेत खाली रह जाएंगे, तब ग्राम-परिषद ने आपसी परामर्श से आने वाली परिस्थितियों का सामना करने के लिए योजनाएं बनाना आरंभ कर दिया था. ग्राम-परिषद में विचार-विमर्श के दौरान अनेक व्यक्तियों ने बड़े उपयोगी सुझाव दिए. जैसे कि कुछ आदमी यह बताने में निपुण थे कि आने वाले दिनों में कौन-कौन से काम कर सकते हैं. उसी दौरान एक आदमी ने परिषद को बताया कि वह अभी भी अपनी परंपरा का पालन करते हुए घर में एक वर्ष का अनाज आरक्षित रखता है. उसने खुशी-खुशी सुझाव दिया कि सुरक्षित अनाज को वह गांव वालों के साथ मिल-बांट सकता है. उस व्यक्ति की बात का असर हुआ. इससे दूसरे व्यक्ति भी उन वस्तुओं का साझा करने को तैयार हो गए, जिसका दूसरे व्यक्तियों के पास अभाव था. अंततः हमने एक योजना बनाई. पूरे गांव के लिए लिए एक कार्यनिर्देशिका. उस योजना से हमें अपने गांव के सर्वांगीण विकास हेतुु, उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करते हुए योजना बनाने में मदद की. ध्यान यह रखा गया कि गांव का एक भी व्यक्ति भूख से त्रस्त न हो.

     हमारे द्वारा ग्रामदान का संकल्प लिए जाने से पहले सूखे की आपदा गांव के हर किसान के लिए उसकी निजी समस्या होती थी. जिसका सामना कुछ परिवार तो बहुत आसानी से कर लेते थे. जबकि कुछ इससे तबाह हो जाते थे. ग्रामदान ने हमें मिल-जुलकर करना सिखाया, हमें यह भी सिखाया कि हम कैसे दूसरों के सुख-दुःख में साथ दें, कैसे उनके हितों की सुरक्षा करें.’

     गांधी जी अस्प्रश्यता विरोधी आंदोलन के माध्यम से हरिजनों को कांग्रेस से जोड़ा था. सत्याग्रह को एक आंदोलन से अधिक विचार की मान्यता प्राप्त थी. बाद में यही काम विनोबा ने भूदान आंदोलन का विकल्प देश को दिया और उसके माध्यम से लाखों-करोड़ों दलितों, गरीब लोगों को कांग्रेस से जोड़कर किया. उन्हीं के दम पर कांग्रेस 25 वर्षों तक निष्कंट राज करती रही. इन आंदोलनों को मिली अप्रत्याशित कामयाबी के पीछे भी यही तथ्य था कि जनता उन्हें विचार के रूप में स्वीकार चुकी थी. 1951 से पहले विनोबा का जीवन आध्यात्मिक कार्यकर्ता का रहा. गांधी जी के अनुशासित शिष्य के रूप में उन्होंने सत्याग्रह आंदोलन में भी हिस्सा लिया. भूदान की कोई रूपरेखा उस समय तक विनोबा के मन में न थी. भूदान आंदोलन का रास्ता दिखाने वाला तो किसान रामचंद्र रेड्डी था. संभव है कि भूदान के समय कम्युनिस्टों का डर भी उसकी प्रेरणा रहा हो. मगर उससे जो राह प्रशस्त हुई उसने देश में भू-वितरण संबंधी असमानताओं, ग्रामीण जीवन की विसंगतियों और संसाधनों के असमान वितरण से उत्पन्न समस्याओं के निदान का एक सार्थक रास्ता देश दुनिया को दिखा दिया. जनता पार्टी के शासनकाल के दौरान जो जो लोग विनोबा का विरोध कर रहे थे, वे दरअसल उस विचार की आलोचना कर रहे थे, जो समानतावादी, समताधारी दृष्टिकोण से प्रेरित हो सकता था.

     एक वक्तव्य के दौरान विनोबा को सरकारी संत की उपाधि दी गई. पूछा जा सकता है कि आपातकाल को अनुशासन पर्व कहना क्या इतनी बड़ी भूल थी कि इसके लिए उनके भूदान जैसे आंदोलन को भुला दिया जाए. उल्लेखनीय है कि भूदान ने गांधीवादी विचारधारा के समर्थक राजनीतिक सामाजिक-कार्यकर्ताओं की एक पूरी पीढ़ी तैयार की थी, जिसने आगे चलकर कांगेस सरकार को जीवनदान दिया. मौन के बावजूद विनोबा के जीवन के अंतिम वर्ष सक्रियता से भरपूर थे. उन्होंने स्त्री शक्ति के उत्थान, स्त्रीवादी विमर्श को आगे ले जाने के लिए भी समय-समय पर आंदोलन किए. भारत की तीन-चैथाई आबादी कृषि पर निर्भर है और कृषि बैल पर. ग्रामीण जीवन में कृषि का महत्त्व पहचानते हुए विनोबा ने गौकशी के विरुद्ध आंदोलन भी छेड़ा. हालांकि उसके लिए भी उन्हें काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा. जयप्रकाश नारायण ने भूदान आंदोदन के लिए अपना सर्वस्व दान करने का संकल्प लिया था, बिहार में आंदोलन को सफल बनाने के लिए उन्होंने विनोबा के साथ पदयात्राएं भी कीं. पर इससे राजनीति ही अधिक पनपी.

     सत्तर के दशक के मध्य में विनोबा ‘सर्व सेवा संघ’ में अलग-थलग पड़ने लगे थे. इंदिरा गांधी द्वारा थोपे गए आपातकाल के विरोध में जयप्रकाश नारायण ने भूदान के बजाय अपना लक्ष्य कांग्रेस की नेता इंदिरा गांधी को हटाने का बना लिया और वे अपने एकसूत्री कार्यक्रम के प्रति समर्पित हो गए. क्या यह काम भूदान आंदोलन जितना ही महत्त्वपूर्ण था? इस बात पर बहस हो सकती थी. मगर इसने चतुराई पूर्वक, आपातकाल के बहाने से, सर्वोदय और भूदान के समानतावादी विचार को ही मीडिया से गायब कर दिया गया. यह सामाजिक परिवर्तन की जरूरत और भूदान जैसे परिवर्तनकारी आंदोलन को बहस से बाहर ले जाने के लिए रची गई साजिश थी. जिसके लिए आपातकाल को माध्यम बनाया गया था. 15 नबंवर 1982 को विनोबा ने अंतिम सांस ली. विनोबा को पेट के अल्सर की बीमारी वर्षों से थी. इस कारण वे अपना जीवन शहद और दही के सहारे बिताते आ रहे थे.

     अप्रैल 1951 का महीना परिवर्तनवादियों के लिए खास अविस्मरणीय है. विशेषकर उनके लिए जो आर्थिक-सामाजिक समानता का सपना देखते हैं. जिनके लिए मनुष्यमात्र में एकसमानता है. ध्यातव्य है कि उससे मात्र पंद्रह महीने पहले अर्थात 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू किया गया था. जिसके साथ देश को प्रभुसत्ता संपन्न गणराज्य घोषित किया गया था. संविधान के माध्यम से देश में समानता पर आधारित कानून-व्यवस्था लागू करने, आर्थिक-सामाजिक समानता के लिए निरंतर प्रयास करने की कसमें भारतीय कर्णधारों ने खाई थी. उससे ठीक तीन वर्ष पहले ही महात्मा गांधी का अवसान हुआ था. लेकिन भारतीय राजनीति पर उनके विचारों का असर था. नेहरू, पटेल, पंत समेत अनेक नेता जिन्होंने महात्मा गांधी के साथ स्वाधीनता आंदोलन में हिस्सा लिया था, उस समय भारतीय राजनीति में थे. हालांकि ऐसे भी अनेक नेता थे, जो महात्मा गांधी के आदर्शों को बिसराकर केवल निहित स्वार्थों के लिए ही काम कर रहे थे. फिर भी राजनीति पर गांधीजी के विचारों का असर था. हालांकि कुछ नेता यह मान चुके थे कि गांधीजी के विचारों को व्यावहारिकता के धरातल पर लोगों को लग रहा था, कि

     आजीवन राजनीति से दूर रहने वाले उस विनोबा भावे अंततः राजनीति के शिकार हुए थे. वर्तमान राजनीति की कमजोरी यह है कि वह हर विचार अथवा वस्तु को उसकी तात्कालिक उपयोगिता के आधार पर आंकती है. और जो विचार तात्कालिक नहीं है, जो दूरगामी प्रभाव देने वाला है, वह बहुउपयोगी होने के बावजूद नकार दिया जाता है. परिणामस्वरूप आमूल परिवर्तन हर बार आगे टलता जाता है. कहा जा सकता है कि स्वातंत्रयोत्तर भारत में जिन महापुरुषांे के आकलन में विद्वानों से चूक हुई उनमें विनोबा भावे भी हैं. वे राजनीति का शिकार हुए. विद्याधर सूरज नायपाल जैसे लेखक भी विनोबा के आलोचकों में से एक हैं. अनंत विजय ने अपने एक लेख में नायपाल के विनोबा संबंधी विचारों को प्रकट किया है. उन्हें पढ़कर हैरानी होती है कि कोई संवेदनशील लेखक भला ऐसी टिप्पणी कैसे कर सकता है. लेख में गांधी की आलोचना की गई है, लेकिन बख्शा विनोबा को भी नहीं गया है—

     ‘एक मूर्ख शख्स थे विनोबा भावे, जिन्होंने पचास के दशक में गांधी की नकल करने की कोशिश की. वे गांधी के विभिन्न आश्रमों में रहे थे. उन जगहों की बौद्धिक शिथिलता ने उनके दिमाग को मोथरा कर दिया था और ये उनकी आत्मा तक में प्रवेश कर गया था. वो रसोई में काम करते थे, पखाना भी साफ करते थे…इतनी देर तक चरखा चलाते थे कि गांधी भी उनके बारे में चिंतित रहने लगे थे….खुशी की बात ये है कि विनोबा को बाद में एक करियर मिल गया—एक सुधारक के रूप में नहीं, बुद्धिमान व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक तरह के धार्मिक मूर्ख के रूप में, जिनके साथ आला नेता फोटो खिंचवाना पसंद करते थे और आशीर्वाद के लिए लालायित रहते थे।’ (वक्त के साथ बूढ़े हो चले हैं ना॓यपा॓ल के विचार, अनंत विजय, आईबीएन खबर, सिंतबर 8, 2008).

     असल में यह ना॓यपा॓ल जैसे लेखकों की भड़ास है जो विनोबा और भूदान की वैचारिकी को न जानने के कारण जन्मी है. इस देश की विडंबना ही यही है कि यहां वास्तविक परिवर्तन को समर्पित जब भी कोई नई और कारगर व्यवस्था सामने आती है, यथास्थितिवादियों तथा उनके द्वारा खरीदे गए बुद्धिजीवियों की एक जमात उस आंदोलन को टालने, बदनाम करने की बार-बार कोशिश करती है. भूदान का आंदोलन विषमताकारी समाज में एक उम्मीद की तरह जन्मा था. यह उम्मीद आगे भी बनी रहे, इसकी आवश्यकता है, फिर चाहे ना॓यपा॓ल जैसे लेखक कुछ भी कहें. गांधी को इस देश के कुछ लोग राष्ट्रपिता कहते हैं. उन्हें आजादी का श्रेय दिया जाता है.

     इस देश को विनोबा का बहुत बड़ा, संभवतः गांधी से भी बड़ा योगदान होता, यदि भूदान आंदोलन पूरी तरह सफल हो गया होता. भूदान असल में उस सामाजिक स्वतंत्रता का पर्याय था, जिसका सपना ज्योतिबा फुले ने देखा था, जिसकी मांग डॉ. आंबेडकर कर रहे थे, जिसकी कामना ऋग्वेद में की गई है तथा जिसकी आवश्यकता इस देश के करोड़ों दलित, मजूदरों, गरीब किसानों, सर्वहारा श्रमिकों तथा आर्थिक-सामाजिक स्तर पर पिछड़े हुए लोगों को थी. कमी विनोबा की भी रही, उन्होंने स्वयं को कभी गांधी की छवि से बाहर लाने की कोशिश नहीं की. अगर वे ‘सर्वोदय’ के अपने चिंतन को ‘गांधीवाद’ के समानांतर खड़ा करने की कोशिश करते, अगर वे उसको समाजार्थिक आंदोलन की तरह प्रस्तुत करते तथा बार-बार धर्म का उल्लेख करने के बजाय उसे केवल नैतिकतावादी आंदोलन रहने देते तब शायद उसपर अधिक गंभीरता से बहस हो पाती. उसके परिणाम भी अधिक स्थायी और दूरगामी होते थे. तब उन्हें इस देश में स्वतंत्र विचारक की तरह याद किया जाता. भूदान असल में परिस्थितिजन्य आंदोलन था. दान में जमीन भी ली जा सकती है, इसकी उम्मीद विनोबा को भी न थी. पोचनपल्ली में जो हुआ, वह आकस्मिक घटना थी. हालांकि उसके बीजतत्व चीन, रूस में चल रहे समाजवादी आंदोलनों तथा तेलंगाना सहित देश के अन्य क्षेत्रों में चल रहे जनविद्रोह में छिपे थे.

     भूदान ने जहां क्षेत्रीय स्तर पर बड़ी संख्या में आदर्शोंन्मुखी कार्यकर्ताओं तैयार किए वहीं उसके प्रभाव में अवसरवादी नेताओं, सामंती शक्तियों को भी अपनी छवि सुधारने का अवसर मिला. आगे चलकर वे शक्तियां जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में एकजुट हुईं और इंदिरा विरोध के नाम पर भूदान आंदोलन की सारी उपलब्धियों पर पानी फेरने का काम उन्होंने किया. इसके बावजूद भूदान आंदोलन को इस लिए याद किया जाएगा कि उसने इस देश के आम आदमी पर भरोसा कायम किया. इस विश्वास को पुनर्जीवित किया कि जनसाधारण आज भी सहयोग और सहअस्तित्व की चाहत रखता है. नेतृत्व यदि ईमानदार, भरोसेमंद और उच्च नैतिकता संपन्न है तो वह स्वयं कष्ट सहकर भी दूसरों की मदद को तत्पर रहता है.

©  ओमप्रकाश कश्यप

समाजवाद का उत्तरपक्ष

सामान्य

प्रश्न है कि इकीसवीं शताब्दी के आरंभ में समाजवाद को कैसे लिया जाए? क्या राजनीतिक दर्शन के रूप में यह आज भी प्रासंगिक है? विशेषकर ऐसे समय में जब पूंजी का बोलबाला हो और उसके समर्थक अर्थविज्ञानी समाजवाद को डूबा हुआ जहाज मान चुके हों. समाजवाद का समर्थन करते आए विद्वानों में हताशा का माहौल हो. मनुष्यता की कीमत पर प्राप्त आधुनिक सुखसुविधाओं के आगे वह नतमस्तक हो. दरअसल उनीसवीं शताब्दी के मध्याह्न तक समाजवाद का ग्राफ जितनी तेजी से ऊपर चढ़ा, वाद में उतनी ही तेजी से नीचे खिसकता गया. एकएक कर उसके गढ़ पूंजीवाद के गाल में समाते चले गए. सोवियत संघ का बिखराव उसके ताबूत की अंतिम कील साबित हुआ. रही सही कसर चीन ने पूंजीवाद की गोद में शरण लेकर पूरी कर दी. मात्र ढाईतीन दशक पहले तक दुनिया की आधी आबादी के सपनों में छाया रहने वाला समाजवाद आज उजड़ा हुआ दयार है, जिसपर बात करना भी बौद्धिक पिछड़ापन माना जाने लगा है. हालांकि बौद्धिक रूप से आज भी उसका तेज ज्यों का ज्यों है.

हालांकि हताशा के कठिन दौर में भी पूंजीवाद के विकल्प के रूप में समाजवाद की भावना से औतप्रोत नित नए विचार सामने आ रहे हैं. पूंजीवादी शोषण से खिन्न और उसके असंतुष्टों का दायरा बढ़ता ही जा रहा है. यह विरोध विश्व के अलगअलग क्षेत्रों में भिन्नभिन्न प्रकार से, स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप आकार ले रहा है. यह अनायास नहीं है कि उनीसवीं और बीसवीं शताब्दी के प्रायः सभी मौलिक विचारक, साहित्यकार, दार्शनिक और वैज्ञानिक समाजवाद के समर्थक रहे हैं. इनमें जान स्टुअर्ट मिल, बट्रेंड रसेल, आ॓स्कर वाइल्ड, अल्बर्ट आइंस्टाइन, जा॓न रस्किन, एमाइल दुर्खीम, अंतोनियो ग्राम्शी, रोजा लेक्जमबर्ग, पीटर क्रोप्टोकिन, थोरो, चे ग्वेरा, चार्ल्स डिकेंस, आ॓स्कर वाइल्ड जैसे लेखक, विचारक समाजवाद के समर्थक रहे हैं. इस अवधि में पूंजीवाद यदि मजबूत हुआ तो समाजवाद ने भी स्वयं को नएनए विचारों से लैस किया है. पूंजीवाद के एक से बढ़कर एक विकल्प वह लाया है, भले ही उनकी पहुंच कुछ देशों, समाजों, समूहों तक सीमित हो और पूंजीवाद की खाकर रातदिन गाल बजाने वाला मीडिया उसकी पहुंच और प्रभावक्षेत्रों की लगातार उपेक्षा करता आ रहा होफिर भी दुनिया के प्रायः सभी क्षेत्रों में उसकी सार्थकसशक्तसारगर्भित उपस्थिति है. इस बीच पूंजीवाद और समाजवाद की बीच भी परस्पर आदानप्रदान हुआ है. समाजवादी हलचलों से प्रेरणा लेते हुए पूंजीवाद ने स्वयं को उदार बनाया है तथा श्रमिक बीमा, स्वास्थ्य बीमा, आवास जैसी सुविधाएं भी जोड़ी हैं, हालांकि उनकी पहुंच सीमित क्षेत्रों तक है और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को अभाव और शोषण की स्थितियों में जीना पड़ता है.

दूसरी ओर पूंजीवाद से प्रेरणा लेते हुए समाजवाद ने भी अपनी उग्रता को कुछ कम किया है. मानवस्वातंत्र्य के पक्ष में समाजवाद और लोकतंत्र की नजदीकियां बढ़ी हैं, जिसका सुफल समष्ठिवाद, सहजीवितावाद, गणतांत्रिक समाजवाद जैसे नए समाजार्थिक दर्शन हैं, जो राज्य के समानांतर अथवा उसके बिना भी स्वतंत्रता और समानता के लक्ष्य को पाने के लिए संकल्पबद्ध हैं. उत्पादन के पूंजीवादी तरीकों, यहां तक कि सघन उत्पादन तकनीक से उसको परहेज नहीं है. गणतांत्रिक समाजवाद का समर्थन तो घोर पूंजीवादी देशों में भी किया जाने लगा है. कई बार तो पूंजीवाद अपनी असल मंशा छिपाने के लिए भी गणतांत्रिक समाजवाद का नारा लगाने लगता है. समाजवाद सैद्धांतिक वादविवाद में पड़ने के बजाय अब सीधे कार्रवाही में विश्वास करने लगा है. हालांकि विश्व में युवा मार्क्स और माओ जिदांग को आदर्श मानने वाले उग्र साम्यवादियों की कमी नहीं है, तो भी उसके आधुनिक संस्करण जैसे समष्ठिवाद, श्रमिकसंघवाद आदि हिंसा से सुरक्षित दूरी बनाए रखने में विश्वास रखते हैं. पूंजीवाद को टक्कर देने में समर्थ सहकारिता आंदोलन भी किसी न किसी रूप में इसी भावना से संचालित हैं. दूसरी ओर पूंजीवाद से सम्मोहित ऐसे अमेरिकापरस्त विचारकों की भी कमी नहीं है, जो गर्व से कभी ‘इतिहास का अंत’ तो कभी ‘विचारधारा का अंत’ जैसी घोषणाएं करते रहते हैं.

इधर कुछ विद्वान कह रहे हैं कि गणतांत्रिक समाजवाद राजनीतिकसमाजार्थिक चिंतन की पराकाष्ठा है. विचारहंस इससे ऊंची उड़ान नहीं भर सकता. इससे बेहतर अर्थदर्शन कुछ भी संभव नहीं. ऐसे विद्वानों की भी भारी संख्या है जो पूंजीवाद पर अटूट भरोसा रखते हैं और मानते हैं कि ऊपरी वर्ग की समृद्धि वहीं नहीं टिकी रहेगी, वह रिसकर निचले स्तर की ओर जाएगी. इससे प्रकारांतर में गरीबी हटेगी. समाज में समृद्धि आएगी.ऐसे विद्वानों की संख्या भी बहुतायत में है जो गणतांत्रिक समाजवाद को पूंजीवाद का छल मानते हैं. उनके अनुसार गणतांत्रिक समाजवादी और कुछ नहीं, बल्कि पूंजीवाद का लोकलुभावन चेहरा है. जबकि गणतांत्रिक समाजवादियों का मानना है कि हिंसा अथवा सर्वहारा क्रांति द्वारा आर्थिकराजनीतिक शक्तिकेंद्रों पर बलात् अधिकार जमा लेने से वास्तविक और स्थायी परिवर्तन संभव नहीं. आवश्यकता है कि आर्थिकराजनीतिक असमानता को दूर करने हेतु ठोस राजनीतिकसामाजिक परिवर्तन का सहारा लिया जाए.मानवमात्र की मूलभूत अच्छाई में विश्वास रखते हुए वे हिंसा के बजाय हृदयपरिवर्तन को प्राथमिकता देते हैं. गणतांत्रिक समाजवादी पूंजीवाद के प्रति आलोचनात्मक रुख अपनाते हैं, मगर उनका मानना है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा पूंजीवाद की उग्रता को समाप्त करना संभव है. चाल्र्स एंथनी क्रासलेंड(1918—1977) जैसे अर्थविज्ञानी इस विचारधारा के समर्थक हैं. उनका मानना है कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पूंजीवाद ने स्वयं को बदला है तथा बदली हुई परिस्थितियों में वह अपेक्षाकृत बड़े लोकहितैषी के रूप में उभरा है. इस आधार पर वह मानता है कि सर्वहारा क्रांति अथवा हिंसा का सहारा लिए बिना भी, पूंजीवादी तरीकों से अर्जित आय के लोकोपकारी कल्याणकार्यक्रमों में निवेश तथा जनसुविधाओं में विस्तार द्वारा सामाजिक समानता के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है. श्रम सहकारिताएं तथा नागरिक संगठन इस लक्ष्य को और भी आसान बना सकते हैं. इसके लिए वे अधिक आय वाले नागरिकों पर आनुपातिकरूप में अधिक आयकर लगाकर विकास के लिए अपेक्षित पूंजी अर्जित करने का पक्ष लेते हैं. इससे पूंजी का प्रवाह स्वाभाविक रूप से निचले वर्गों की ओर होने लगता है. यह अहिंसक और मंथर क्रांति है, और हृदय परिवर्तन पर आश्रित होने के कारण अपेक्षाकृत अधिक स्थायी है. अपने समर्थन के लिए वे विद्वान जान स्टुअर्ट मिल के स्वाधीनतावादी समाजवाद का भी उदाहरण देते हैं. मिल का कहना था कि गणतांत्रिक समाजवाद असल में मुक्त उपभोक्तावाद को मान्यता दिए जाने जैसा है, लेकिन यदि इससे व्यक्तिमात्र की स्वाधीनता की रक्षा होती है तो इसमें कुछ अनुचित भी नहीं है. अपनी पुस्तक ‘दि प्रिंसिपल्स आ॓फ पा॓लिटिकल इकानामी(1848)’ के परिवर्धित संस्करण में मिल ने कहा था—

जहां तक आर्थिक विचारधारा का प्रश्न है, अर्थशास्त्र के सिद्धांतों में ऐसा कुछ नहीं है, जो किसी समाजवादी रणनीति पर आधारित विचारधारा को प्रतिबंधित करता हो.’

गणतांत्रिक समाजवाद को अमेरिका में भी भरपूर समर्थन मिला. विशेषकर शीत युद्ध के दौर में अमेरिकी अर्थशास्त्री सोवियत संघ की आलोचना के लिए इस विचारधारा को मान्य ठहराते रहे. लेकिन यह उनकी तात्कालिक कूटनीति का हिस्सा था. इसलिए सोवियत संघ के पतन के बाद उसने समाजवाद से पूरी तरह किनारा कर लिया है. लेकिन इससे यह मान लेना अनुचित होगा कि अमेरिका में समाजवाद के लिए कोई स्थान ही नहीं है. वहां समाजवादी आंदोलन की शुरुआत उनीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में ही हो चुकी थी. अमेरिकी समाजवादियों के आमंत्रण पर ही राबर्ट ओवेन वहां पहुंचा था और उसने जोसीह वारेन जैसे सहयोगियों को साथ लेकर सहजीवन पर आधारित बस्तियां बसाने का निर्णय किया था. ‘न्यू हार्मोनी’ वहां सहकारिता के दर्शन पर आधारित पहली बस्ती थी. ‘सोश्लिस्ट लेबर पार्टी’ का गठन वहां पर 1876 में हुआ. 1901 में वहां ‘सोश्यिलिस्ट पार्टी आ॓फ अमेरिका’ का गठन किया गया. अमेरिकी बहुमत की पसंद भले ही समाजवाद कभी नहीं बन सका, लेकिन एक सशक्त विपक्ष के रूप में उसकी 1901 के बाद से निरंतर उपस्थिति रही है. कई राष्ट्रपति चुनावों में कई बार पार्टी के प्रतिनिधि पूंजीवाद समर्थित उम्मीदार को जबरदस्त टक्कर दे चुके हैं. औद्योगिक सुधार के लिए कई सफल हड़तालें समाजवादियों के नाम रही हैं. लेकिन अमेरिका में समाजवाद की लोकप्रियता को लेकर सबसे चौंकाने वाले परिणाम रासम्सेन रिपोर्ट में सामने आए. 2007 की भीषण आर्थिक मंदी के के प्रभाव के आकलन के लिए रासम्सेन की अध्यक्षता में एक सर्वे कराया गया था. अपनी रिपोर्ट में समिति ने अमेरिका में समाजवाद के प्रति बढ़ते रुझान की ओर संकेत किया था. रिपोर्ट के अनुसार यद्यपि 53 प्रतिशत अमेरिकी नागरिक पूंजीवाद को बेहतर मानते हैं, समाजवाद के समर्थन में मात्र 20 प्रतिशत नागरिक थे और 27 प्रतिशतों ने अपनी स्पष्ट राय जताने में असमर्थता प्रकट की थी. लेकिन इससे इतना तो स्पष्ट है कि दुनिया में पूंजीवाद का डंका बजाने वाले अमेरिका में उसके विरुद्ध माहौल बनता जा रहा है. वहां लगभग आधे लोग ऐसे हैं जो पूंजीवाद के या तो सीधे विरोध में हैं अथवा उसकी उपयोगिता को लेकर सुनिश्चित नहीं हैं. सर्वे का सबसे चौंकाने वाला निष्कर्ष यह था कि 30 वर्ष से कम के युवकों में से मात्र 37 प्रतिशत नागरिक पूंजीवाद के पक्ष में थे. शेष 33 प्रतिशत समाजवाद के और लगभग 30 प्रतिशत अनिर्णय की स्थिति में थे. उल्लेखनीय है कि रासम्सेन द्वारा जो प्रश्नावली सर्वे के लिए नागरिकों में दी गई थी, उसमें पूंजीवाद और समाजवाद को परिभाषित नहीं किया गया था और अमेरिका में समाजवाद का अर्थ प्रायः ‘गणतांत्रिक समाजवाद’ से ले लिया जाता है. जो कम से कम गणतंत्र के बारे में पूंजीवाद से निकट संबंध रखता है.

आशय है कि राज्य के स्तर पर अमेरिका में भले ही पूंजीवाद फलफूल रहा हो, मगर वहां लोकतंत्र आधारभूत संस्थाओं ने नागरिकों को अपने हितानुरूप समानांतर संगठन चलाने का प्रशिक्षण भी दिया है. इसलिए वहां सहजीवितावाद, श्रमिकसंघवाद, समष्ठिवाद जैसे समाजवाद के आधुनिक रूप भी जहांतहां अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं. चूंकि वहां जनजीवन में पर्याप्त समृद्धि है, इसलिए थोड़ीबहुत शिकायतों से अधिक नागरिक असंतोष वहां नहीं पनप पाता. लेकिन प्रकट रूप में अमेरिका की नीति पूंजीवाद को प्रश्रय देने की है, ताकि दुनियाभर में फैली उसकी पूंजीवादी कंपनियों को बढ़ावा मिले. वहां के पूंजीवाद समर्थित अर्थशास्त्रियों के लिए समाजवाद और फासीवाद में कोई अंतर ही नहीं है. अमेरिकी अर्थनीति के समर्थन में नोबल पुरस्कार विजेता अमेरिकी अर्थशास्त्री फ्रैड्रिक आ॓गस्ट हायक के विचारों की व्याख्या करते हुए ‘फ्यूचर फ्रीडम फाउंडेशन’ के अध्यक्ष जेकब हा॓नबर्गर लिखते हैं—

नाजीवाद, समाजवाद, साम्यवाद तथा फासीवाद की अर्थनीतियों तथा कल्याण राज्य अमेरिका की नियंत्रित अर्थनीति में कोई अंतर नहीं है.’

क्या सचमुच नाजीवाद, फासीवाद और समाजवाद में कोई अंतर नहीं है? क्या सचमुच समाजवाद की डगर अंततः तानाशाही की ओर ले जाती है? इन्हीं के बीच से एक प्रश्न उभरता है कि क्या समाजवाद का कोई भविष्य है? इस प्रश्न एक स्वाभाविक प्रश्न और जुड़ा हुआ है कि क्या समाजवाद का अपना कोई अतीत था? एक राजनीतिक दर्शन के रूप में समाजवाद का उदय और पूंजीवाद का जन्म लगभग साथसाथ हुआ. दोनों मानवमात्र को सुखी देखना चाहते हैं. दोनों अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के समर्थक हैं तथा व्यक्ति को स्वतंत्र इकाई मानते हैं. दोनों का दावा मानवमात्र को अधिकतम सुख पहुंचाने का है. अंतर सिर्फ उत्पादन पर अधिकारिता को लेकर है. पूंजीवाद में आर्थिक संसाधन चंद हाथों तक सिमटे होते हैं. समाजवाद में उत्पादन प्रणाली पर राज्य अथवा श्रमिकों का, जिन्हें वह वास्तविक उत्पादक मानता है—अधिकार होता है. पूंजीवाद में पूंजी के बल पर एक विशेषाधिकार संपन्नवर्ग पनपने लगता है. जो स्वयं निष्क्रिय रहता है, लेकिन उत्पादन के लाभ पर अपना अधिकार जमाए रहता है. कहीं न कहीं उसको यह भय भी होता है कि वास्तविक उत्पादक यानि श्रमिकवर्ग कभी भी अपने अधिकारों के लिए उपस्थित हो सकता है. अतः अपने सुरक्षित भविष्य, सुनिश्चित लाभ हेतु श्रमशक्ति पर अपनी निर्भरता को कम करने के लिए प्रयत्नरत रहता है. इसके लिए वह स्वचालित तकनीक का चयन करता है तथा अपने लाभ का बड़ा हिस्सा तकनीकी शोध पर खर्च करता है, मशीनों की अधिकाधिक मदद करता है, जो उसके लिए उत्पादन की जिम्मेदारी निभाते हुए लाभ में हिस्सेदावेदारों को कम से कम करने का काम करती हैं. हालांकि पूंजीपति जिसको पूंजीवाद के आलोचक निष्क्रिय उत्पादक कहते हैं, वह सदैव निष्क्रिय नहीं होता. वह शारीरिक के बजाय बौद्धिक श्रम में दक्ष होता है. अपनी पूंजी और बुद्धिबल द्वारा वह श्रमिकों से पूरा काम लेता है. वह श्रमिकों को अपना बुद्धिसामर्थ्य उपयोग करने की वहीं तक अनुमति देता है, जहां तक वे उसका हित साधन करते हैं. कहा जा सकता है, कि पूंजीवाद में समाज का बौद्धिक सामथ्र्य कुछ व्यक्तियों का हित सोचने लगता है. सामंतवाद में भी पूंजीवाद की भांति सभी लोगों को अपनी बौद्धिक क्षमताओं का अपने लिए इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जाती. इस कार्य के लिए सामंतवाद धर्म को सहायक बनाता है, जो मनुष्य का ध्यान इहलौकिक समस्याओं तथा उनके कारणों की ओर से हटाकर अमत्र्य संसार की ओर ले जाते हैं. धर्म भौतिक संसार की आलोचना करता है, ऐंद्रियक सुखों को छलावा बताता है. इसके लिए उनको राजसत्ता का पूरा समर्थन प्राप्त होता है. राजसत्ता से अपनी निकटता का लाभ उठाकर धर्मसत्ता के शीर्ष पर विराजमान लोग स्वयं तो ऐंद्रियक सुखों में डूबे रहते हैं, जबकि जनसाधारण को अपरिग्रह और अस्तेय का दर्शन बघारते थे.

सतरहवीं शताब्दी में जब मशीनों ने रोजगार छीनने आरंभ किए तो उनकी आलोचना ने जोर पकड़ा. यह वास्तविक उत्पादक के हाथों में उत्पादन का श्रेय छिन जाने जैसी सामान्य घटना नहीं थी. चूंकि मशीनें त्वरित उत्पादन करती थीं, इसलिए उत्पाद की खपत के लिए नए बाजारों की आवश्यकता थी. नए बाजारों की खोज ने ब्रिटिश उपनिवेशों को जन्म दिया. यह संभवतः पहली बार हो रहा था जब साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाओं की पहल व्यापारिक दलों की ओर से आरंभ हुई थी. मशीनों ने पहले लोगों के हाथों से रोजगार छीना. उससे पहले मनुष्य औजारों से काम लेता था. लेकिन वे मनुष्य के सहायक की भूमिका निभाते थे. पाषाण युग से ही विकासयात्रा में औजार मनुष्य का हमसफर बने थे. मशीनों ने मनुष्य को उत्पादक के स्थान से बेदखल कर दिया था. पहले उत्पादन पर उनका अधिकार होता था जो अपने श्रमकौशल से उसको संभव बनाते थे. मशीनों ने ऐसे व्यक्तियों को उत्पादक बनाने का काम किया, जिनमें ऐसे कौशल का अभाव था, और जो सिर्फ अपनी पूंजी के बल पर अपने लिए मशीनें खरीद सकते थे. कार्य में प्रवीणता उत्पादक होने की शर्त नहीं रह गई थी. इसलिए ऐसे लोग भी उत्पादक की ओर आकर्षित हुए जो अपनी पूंजी के बल पर उत्पादन का लाभ उठाने को तैयार थे. बाजार की ललक ने लोगों से उनकी जमीनें और प्राकृतिक संसाधन छीनना भी आरंभ कर दिया था. पूंजीपतियों का आग्रह था—तुम हमारे कारखानों में काम करो, हमारे कारखानों में बना माल उपयोग में लाओ, अपनी धरती, अपने संसाधन, अपने सपने और महत्त्वाकांक्षाएं हमें सौंप दो. वे हमारे कारखानों के काम आएंगे. बदले में हम तुम्हें नया सामाजिक बोध देंगे. जिसमें व्यक्ति सिर्फ अपने लिए जीता है. अपने सारों ओर मौजूद लोगों पर संदेह करता है. अंतर्मन में समाए डर से मुक्ति तथा सामाजिकता की तलाश में वह मायावी दुनिया में घुसता चला जाता है.

उल्लेखनीय है कि मायावी दुनिया का यह सच सामंतवादी समाज में भी था. यहां तो काम पूंजीपतियों के पैसे पर पलने वाले समाजविज्ञानी और अर्थशास्त्री और नौकरशाह करते हैं, सामंतवाद में वह पुरोहितवर्ग के जिम्मे था. पूंजीवाद की भांति पुरोहितवाद भी शीर्षस्थ वर्ग के हितों को समर्पित था. पूंजीवादी तकनीक द्वारा रची गई आभासी दुनिया का सपना दिखा लोगों का ध्यान उनकी वास्तविक समस्याओं की ओर से हटाए रखता है. पुरोहित इसके लिए धर्म, स्वर्ग, नर्क जैसी भ्रांत और अतींद्रिय कल्पनाएं रचता है. समाज में उस समय भी शिल्पकार वर्ग का यथेष्ट सम्मान नहीं था. मनुष्य की पहली आवश्यकता भोजन था. और अनाज पर जमींदार का अधिकार होता था. जो यह कहकर कि जिस भूमि पर अनाज उपजा है, वह उसके स्वामित्व में है, अनाज का बड़ा हिस्सा घर ले जाता था. तथा गांवदेहात की बाकी जनता, जिसमें नाई, बुनकर, काष्टकार, लौहकार, चर्मकार, कुंभकार आदि सम्मिलित थे, उन्हें अनाज के छोटे हिस्से से संतोष करना पड़ता था. एक बुनकर से कहीं अधिक उन दिनों भी पुरोहित सम्मान का पात्र था, जो धर्म के क्षेत्र में भक्त और भगवान के बीच दलाल की भूमिका निभाता था. कर्मकांडों और आडंबरों की उसकी दुनिया का बड़ा महत्त्व था. सामंतवर्ग उसको सम्मान देता था, इसलिए कि पुरोहित की दिखाई दुनिया के बहाने वह जनसाधारण का ध्यान अपने शोषण, उत्पीड़न से दूर रख सकता था. लोगों का भरमाए रखने में उसको विशेषज्ञता प्राप्त थी. पुरोहित वर्ग भी अपने काम की निस्सारता को समझता था. वह यह सब यजमान की संतुष्टि के लिए करता था. हालांकि उन दिनों भी ऐसे अवसर आए जब शिल्पकारों, छोटे व्यापारियों ने राजनीति और धर्मसत्ता को समझौता करने के लिए बाध्य कर दिया. मगर उन संगठनों का प्रभाव सीमित लोगों पर था. दूसरे धर्मसत्ता को चुनौती देने का हौसला भी उनमें नहीं था. सच तो यह है कि वे धर्मसत्ता के संरक्षण में ही स्वायत्तता चाह रहे थे. आशय यह है कि कि पूंजीवाद ने ऐसा कुछ नहीं किया जो सामंतवादी व्यवस्था में पहले से ही मौजूद न हो. बल्कि अपने स्वार्थ के लिए ही सही, पूंजीवाद ने शिक्षा का सरलीकरण किया. उसे विभिन्न क्षेत्रों में फैलाया. इसलिए कि कारखानों और बाजार पर पकड़ बनाए रखने के लिए उसे विभिन्न क्षेत्रों के कुशल पेशवरों की जरूरत थी. पूंजीवाद ने दुनिया को नवीनतम शोध दिए, जीवन को सुविधामय बनाया. संचार, यातायात, कृषि, चिकित्सा, आवास आदि अनेक क्षेत्र हैं जहां पूंजीवाद ने सफलता का परचम लहराया लेकिन हमें मालूम होना चाहिए कि इन्हीं क्षेत्रों में ऐसी कई चूक भी हुई हैं, जिन्हें विज्ञान का अभिशाप कहा जा सकता है. पूंजीवादी सोच के चलते नई चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार हुआ, जिससे जीवन संभाव्यता में आशानुरूप सुधार हुआ. बड़ी महामारियां अब प्रायः नहीं आतीं. लेकिन पूंजीवाद ने जो कुछ किया वह सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए किया है. उसने तनाव कुंठा, हृदयरोग, रक्तचाप, जैसी बीमारियां भी दी हैं. पूंजीवादी तंत्र द्वारा विकसित किए गए रिऐक्टरों ने विद्युत उत्पादन की ओर कदम बढ़ाया है तो ऐसे परिस्थिकीय संकट भी पैदा किए हैं, जिनसे जबतब सभ्यता पर संकट मंडराने लगता है.

पूंजीवाद का स्वभाव है कि वह हर काम में अपना मुनाफा देखता है. जिसमें उसका लाभ न हो उसे वह अनुत्पादक मानता है. यहां लाभ का अभिप्राय मौद्रिक लाभ से है जो प्रायः पूंजीपति वर्ग का उत्प्रेरक होता है. सहकार जैसे गैरपूंजीवादी उपक्रम मौद्रिक लाभ के बजाय सामाजिक लाभों को वरीयता देते हैं. जबकि पूंजीवाद ऐसे उत्पाद जिससे केवल जनता को लाभ हो और पूंजीपति को अपेक्षित धनलाभ न पहुंचता हो, उन्हें अनुत्पादक मानकर उनकी ओर से वह मुंह फेरे रहता है. उदाहरण के रूप में हम साइकिल और हल को ले सकते हैं. साइकिल आम आदमी की जरूरत है, हल भारतीय किसान की. आजादी से पहले भी साइकिल और हल का मूलभूत आकारप्रकार ऐसा ही था, जैसा आज है. यही हल के साथ है. उसका रूप पिछले पचाससौ वर्ष में अपरिवर्तित रहा है, जबकि इस बीच विज्ञान ने अवर्णनीय तरक्की की है. इसके बावजूद इन लोकोपयोगी यंत्रों की कार्यक्षमता में सुधार लाने के लिए कोई शोध पिछले पांचछह दशकों में नहीं हुआ, जबकि कार, रेफरीजरेटर, टेलीविजन, कंप्युटर, मोबाइल जैसी वस्तुओं के दिनप्रतिदिन नएनए माॅडल बाजार की शोभा बढ़ाते रहते हैं. चूंकि अधिकांश शोधों में पूंजीपति का धन लगा होता है, अतएव उनका विस्तार उन्हीं क्षेत्रों में होता है, जहां पूंजीपति के वर्गीय हित साधे जा सकें. पूंजीवादी का स्वार्थ नवीनतम उपभोक्ता वस्तुओं तथा उनके नएनए माॅडल विकसित कर बाजार पर एकाधिकार कायम करने तक सीमित नहीं होता. बल्कि वह उत्पादन पद्धति का भी निरंतर स्वचालीकरण करता जाता है, जिससे उत्पादन में श्रमिकों का योगदान घटता है. इससे बेरोजगारी बढ़ती है और मनुष्य की उपयोगिता पूंजीपति के निए नए बाजारों की खोज तक सिमटकर रह जाती है. कह सकते हंै कि पूंजीवादी व्यवस्था में मनुष्य को जो मिला है, उसकी बहुत बड़ी कीमत उसको अदा करनी पड़ी है. इसमें मनुष्य को सबसे बड़ा आघात यह जानकर लगता है कि पूंजीपति की निगाह में उसका मूल्य महज एक उपभोक्ता जितना है, जो उसके मुनाफे के लिए उसके कारखानों में अपना श्रम बेचता है, प्राप्त मजदूरी से अपनी आवश्यकता की वस्तुएं खरीदता है, और उनके उपभोग द्वारा इतनी ऊर्जा अर्जित कर लेता ताकि अगले दिन कारखाने में जाकर पूंजीपति के लिए काम कर सके. पूंजीपति मजदूरी के रूप में उसको इतना ही देता है, जिससे वह तैयार होकर अगले दिन काम पर आ सके. अपने प्रत्येक उपभोक्ता को वह लाभ के उपकरण के रूप में देखता है और निरंतर इस प्रयास में रहता है कि लाभानुपात को कैसे बढ़ाया जाए. इस बीच वह अपना शोषणकारी चेहरा कतई सामने नहीं आने देता. इसके उलट जो सामने आता है, वह दाता का पूरी तरह बनावटी चेहरा होता है, जिसको और लोकलुभावन बनाए रखने के लिए वह अपने साथ समाजविज्ञानियों, अर्थशास्त्रियों और राजनीतिज्ञों की पूरी फौज रखता है, जो लगातार उसका महिमामंडन करते रहते हैं. अपने पक्ष में शास्त्रीय समर्थन जुटाए रखने के लिए वह दान का सहारा लेता है. अपनी पूंजी के नितांत छोटे हिस्से का उपयोग वह दान और लोककल्याण के नाम पर करता है, इससे धर्म और संस्कृति के प्रचारप्रसार में लगी शक्तियां अनायास ही उसकी ओर आकर्षित होती हैं. पूंजीपति इस अवसर का उपयोग अपने उत्पाद के लिए नए अवसरों की खोज तथा पूंजीवाद के प्रति सहानुभूति अर्जित करने के लिए करता है. दान, चैरिटी आदि की मद में खर्च की गई धनराशि पर वह सरकार से कर लाभ अर्जित करता है. राजसत्ता और धर्मसत्ता का समर्थन पूंजीपति को समाज में अतिरिक्तरूप से प्रतिष्ठित करता है. इससे सरकार और अन्य संस्थाओं का ध्यान उसके शोषण की ओर नहीं जा पाता.

सामंतवाद में सहायक की भूमिका में धर्म होता है. वहां यह प्रसारित किया जाता है, ज्ञान की सभी धाराएं तथा उसके समस्त प्रकल्प, माध्यम आदि एकमात्र धर्म से जन्मते तथा उसी में समाते चले जाते हैं. इसलिए सामंतगण धर्माचारियों, पुरोहितों, तांत्रिकों को अपने सान्न्ध्यि में रखा करते थे. पूंजीवाद का धर्म के प्रति रवैया कभी आलोचनात्मक तो कभी सहयोगकारी होता है. चूंकि पूंजीवादी कारखानों में सभी प्रकार के उत्पाद विनिर्मित होते हैं, इसलिए उसको अपनी छवि सर्वहितैषी, सर्वकल्याणक, सर्वसहयोगी की गढ़नी पड़ती है. वह परंपरापोषक और परंपराभंजक साथसाथ होता है. अपने नए उत्पादों को खपाने के लिए वह उपभोक्ता के मनस् में अपनी आधुनिक छवि गढ़ता है, ताकि वैज्ञानिक शोधों के आधार पर नए उत्पाद बाजार में लाकर उनसे मुनाफा कमा सके. प्रत्येक धर्म अपने कुछ विशिष्ट प्रतीकों एवं कर्मकांडों से पहचान पाता है. वही बहुसंख्यक वर्ग की जीवनशैली को निर्धारित करते हैं. उनके पीछे बड़ा बाजार होता है. पूंजीपतियों का एक वर्ग इन्हीं कर्मकांडों, प्रतीकों में बाजार की नईनई संभावनाएं खोजता हुआ भाड़े के पुरोहितों, पंडितों, आचार्यों की सहायता से उनसे जुड़ी वस्तुओं का बाजार विनिर्मित करता है. कह सकते हैं कि पूंजीवाद एक ओर तो समाज में ज्ञानविज्ञान के नएनए रूपों को स्थापित करने हेतु प्रयासरत होता है, दूसरी ओर वह धर्म और अध्यात्म पर प्रायोजित बहसें चलाकर उनका अधिक से अधिक स्थूलीकरण करता चला जाता है. परिणामस्वरूप धर्म और अध्यात्म की दूरी लगातार बढ़ती जाती है. यह स्थिति धर्म के बाजारीकरण के लिए मददगार सिद्ध होती है. आवश्यकता पड़ने पर वह धर्म की आलोचना करता है, लेकिन वहां भी उसका ध्यान अपने लिए नए बाजारों की खोज पर होता है. इस तरह धर्म की आलोचना करतेकरते पूंजीवाद उसके सहायक की भूमिका में आ जाता है. इसके उदाहरण के रूप में कांबड़ यात्रा को ले सकते हैं. बाजार और पूंजीवाद के आसरे पल रहे बुद्धिजीवियों तथा लोकप्रिय राजनीति के जरिये सत्ता की वैतरिणी से गुजरने की चाहत रखने वाले राजनीतिज्ञों के लिए कांबड़ियों की बरसोंबरस बढ़ रही संख्या, अपनेअपने प्रभावक्षेत्रों का विस्तार करने का अनूठा अवसर सिद्ध होती है. इसलिए तमाम असुविधाओं के बावजूद पूंजीवाद के प्रभावक्षेत्र वाले समाचारपत्र तथा समाचार चैनल उन यात्राओं की प्रशंसा ही करते हैं. इससे यात्रियों का जोश बढ़ता है और उनकी संख्या भी. पूंजीवाद यात्रापयोगी वस्तुओं के उत्पादनवितरण द्वारा वहां भी लार्भाजन का अवसर खोज लेता है. लाभ की यह प्रवृत्ति अंतहीन होती है, जो सामाजिक शुचिता, पवित्रता, शांति, सद्भावना और मानवीय सौहार्द की कीमत पर निरंतर बढ़ती जाती है.

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मनुष्य को उपभोक्ता से अधिक कुछ न समझने वाला, मशीन को जीवित मनुष्य ये अधिक महत्त्व देने वाला पूंजीवाद मनुष्यता का भविष्य नहीं हो सकता. तो क्या साम्यवाद मनुष्यता का भविष्य बन सकता है? सर्वहारा क्रांति का आवाह्न करते समय मार्क्स ने तो यही कहा था कि भविष्य साम्यवाद का है. पूंजीवाद तो अपनी करनी आप भुगतेगा. अपने ही हाथों उसका सर्वनाश होगा. पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. उल्टे बीसवीं शताब्दी में साम्यवाद के जो गढ़ बने थे, शताब्दी का उत्तरार्ध आतेआते वे एकएक कर स्वयं ढहते चले गए. अतः एक स्वाभाविकसा प्रश्न उपजता है कि पूंजीवाद से निपटने का सही रास्ता क्या हो? समाज में उत्तरोत्तर बढ़ती उपभोक्तावादी ललक, आर्थिकसामाजिक विषमताओं पर काबू कैसे पाया जाए? बाजार में व्याप्त स्पर्धा और एकाधिकारवाद को किस प्रकार परस्पर पूरक, सहयोगी, सर्वोपकारी एवं सौहार्दमय उत्पादनतंत्र में बदला जाए? इतना तो हम मान ही चुके हैं कि पूंजीवाद बेहतर विकल्प नहीं है. इसलिए यदि अमीरगरीब के बीच बढ़ती खाई को रोकना है, यदि संस्कृति को बाजार बनने से बचाना है, यदि मनुष्य के उत्तरोत्तर उपभोक्ताकरण पर अंकुश लगाना है, यदि इस पृथ्वी और यहां के वासियों को परिस्थितिकीय संकट से उबारते हुए स्पर्धा रहित, समानतामूलक और सहयोगाधारित समाज की रचना करनी है, यदि आपसी अंतद्र्वंद्व, डर, पीड़ा, घुटन, संत्रास, वेदना, तनाव, ईष्र्या, द्वैध, चिंता और आपाधापी से भरे समाज को विवेकवान, संवेदनशील, सौहार्दमय, सदभावना और सामंजस्य पूर्ण बनाना है, तो पूंजीवाद के प्रेत को बोतल से बाहर छोड़ देना नासमझी है. लेकिन पूंजीवाद को यह बढ़त आसानी से नहीं मिली. इसके पीछे भी कहीं न कहीं मार्क्स वाद की दुर्बलताएं छिपी हैं. वैचारिक जकड़बंदी द्वारा मार्क्स वाद यह तो दर्शा ही चुका है कि उसके आधार पर समतामूलक, सर्वकल्याणकारी विश्वसमाज का गठन संभव नहीं. इसलिए कि परंपरागत धर्म की आलोचना के साथ उसके निषेध का नारा लगाने वाले मार्क्स वाद ने अपने प्रभावक्षेत्र के विस्तार के लिए अंततः उन्हीं रास्तों का उपयोग किया जिन्हें धर्म बहुत पहले अपनाता आया था. इसमें बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों की मार्क्स और उसके विचारों के प्रति अंधश्रद्धा भी सम्मिलित है. ऐसा नहीं है कि इस बीच मार्क्स वाद के स्वस्थ आलोचना बिलकुल संभव न हो सकी, किंतु इतना अवश्य हुआ कि मार्क्स वाद के आधार पर गठित राज्यों के स्वस्थ सैद्धांतिक आलोचना को भी असहनीय बनी रही. परिणाम यह हुआ कि मार्क्स वाद में वे सभी जड़ताएं, टोटम और विकार घर करते गए, जो परंपरागत धर्म के क्षरण का कारण बने थे या जिनके कारण धर्म रूढ़िवाद का शिकार होकर जीवन से पलायनोन्मुखी बन जाता है. यहां तक कि साम्यवाद की जिस सैद्धांतिकी को मार्क्स ने अपने जीवन के उत्तरार्ध में विकसित किया था, वैचारिक अंधश्रद्धा के चलते वह निरंतर प्रदूषित होती चली गई और मार्क्स वाद साम्यवाद के अपने ही लक्ष्य के दूर, ‘सर्वहारा के अधिनायकवाद’ तक सिमट कर रह गया, जिसके खतरे के बारे में स्वयं मार्क्स ने आगाह किया था.

उपर्युक्त विश्लेषण का अभिप्राय यह नहीं कि मार्क्स वाद अप्रासंगिक हो उठा है.उनमें अब भी काफी कुछ मौलिक और समाज को बदलने का सामथ्र्य मौजूद है. अतएव आवश्यकता उससे मुक्ति की न होकर उसके परिष्करण की है. बीसवीं शताब्दी में मार्क्स वाद की इस आधार पर तीखी आलोचना की गई कि उसने राज्य के समक्ष मनुष्य सत्ता को अत्यधिक बौना कर दिया है. विशेषकर रूसो के स्वाधीनतावाद, मिल के व्यक्तिस्वातंत्रय, थाॅमस पेन(1737—1809) के मानवाधिकारवादी विचारों के प्रवाह तथा लोकतंत्र की बयार ने ‘व्यक्तिमात्र’ को महत्त्वपूर्ण बना दिया था. इससे लोकतांत्रिक समाजवाद की प्रतिष्ठा और स्वीकार्यता बढ़ी. किंतु लोकतंत्र की अपनी दुर्बलताएं हैं. जनमत के वास्तविक मुद्दों से भटकने के साथ ही उसको अल्पसंख्यक का राजतंत्र बनते देर नहीं लगती. चुने गए जनप्रतिनिधि अपनी विशिष्टताबोध को बनाए रखने के लिए पूंजी की शरण में चले जाते हैं. इससे विकास के वास्तविक मुद्दों से लोगों का ध्यान हट जाता है. पूंजीवाद की निगाह में मानवमात्र एक उपभोक्ता है. वह उसको उपभोग के लिए स्वतंत्र देखना चाहता है. इसी के चलते समाजवादी विचारधारा के पूंजीवाद और समाजवाद के सभी आधुनिकतम रूप इस तथ्य से तो एकमत हैं कि मानवस्वातंत्रय की रक्षा करनी चाहिए. दरअसल मानवस्वातंत्रय ही एक ऐसा बिंदू है जिसपर ये दोनों एकमत हैं. इसलिए भविष्य का समाजार्थिक दर्शन ऐसा नहीं हो सकता जो मानवस्वांतत्रय का विरोध करता हो. लेकिन यह भी ध्यान रखना अनिवार्य है कि मनुष्य मात्र का हित समाज के हित से अलग नहीं हो सकता. इसी को केंद्र में रखकर समाजवाद कहता है कि समाज में—सब एक के लिए काम करे और एक सबके कल्याण के प्रति समर्पित हो. मगर यह तभी संभव है जब प्रत्येक मनुष्य मुक्त हो. उसको यह एहसास हो कि वह समाजकल्याण के निमित्त समर्पित है. दूसरी ओर यह भरोसा भी उसको हो कि संकट के समय वह कतई अकेला नहीं होगा. उसका संकट समाज का संकट होगा और समाज का प्रत्येक सदस्य व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से उसकी सहायता के लिए तत्पर होगा. व्यक्तिगत और सामाजिक आकांक्षाओं का रचनात्मक तालमेल ही एक सफल समाजदर्शन की पीठिका बन सकता है. बीसवीं शताब्दी के विचारकों के समक्ष सबसे बड़ी समस्या यह रही कि व्यैक्तष्ठि और समष्ठि में तालमेल कैसे बनाया जाए. कुछ इस प्रकार की व्यक्ति की अबाध स्वाधीनता के साथ उसकी कार्यक्षमता और सामाजिक प्रतिबद्धताएं भी अप्रभावित बनी रहे. समाज में आर्थिक विषमता फैलाए बिना विकासदर बनी रहे. समष्ठिवाद, संघवाद, अराजकतावाद, सहजीवितावाद, श्रमिक संघवाद जैसी अनेक विचारधाएं इस कालखंड में उभरीं. जिन्होंने मार्क्स वादी गरिमा के साथ पूंजीवाद की असल मनोवृत्तियों को पकड़ते हुए समाजवाद के किंचित लाभों को भी अपनाते जाने पर जोर दिया. असल में मनुष्यता के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती भी यही है कि किस प्रकार व्यक्तिहित और समाजहित में तालमेल बनाया जाए. बीसवीं शताब्दी में समष्ठिवाद, श्रमिकसंघवाद, अराजकतावाद और सहजीवितावाद, संगठनवाद समष्ठि में व्यैक्तष्ठि एवं समष्ठि में एक विश्वसमाज का दर्शन मानवाधिकारों की सुरक्षा, सहभागिता और सहअस्तित्व की जरूरी शर्तों पर अमल करने से ही निकल सकता है.

पूंजीवाद से मुक्ति की छटपटाहट

पूंजीवाद से मुक्ति की छटपटाहट अलगअलग देशों में अलगअलग तरीके से दिखाई पड़ रही है. कहीं वह आर्थिक औपनिवेशीकरण की प्रक्रिया से आने के लिए उत्सुक है. तो कहीं समाज में बड़ी आर्थिक असमानता अंतःसंघर्ष की स्थिति पैदा कर रही है. और असंतुष्ट वर्ग शोषण से मुक्ति के लिए आर्थिक व्यवस्था में बदलाव की मांग कर रहे हैं. कुछ देशों में जनता में बढ़ रहा क्रांतिबोध तानाशाही से मुक्ति का जोश पैदा कर रहा है. विशेषकर 2011 के प्रारंभिक महीनों लीबिया, यमन, मिश्र में नागरिक चेतना ने जो अंगड़ाई ली, उसने अन्याय और दमन की प्रतीक सामंती सत्ताओं को हिलाकर रख दिया है. उनका संघर्ष अभी जारी है, हालांकि पूंजीवाद आधुनिकता और व्यक्तिस्वांत्रय के नाम पर आंदोलन को अपने प्रभाव में लेने का प्रयास कर रहा है. इससे उसकी सफलता की संभावनाएं इसलिए भी हैं, ये जनक्रांतियों आधुनिक संचार तकनीक पर अतिरिक्तरूप से निर्भर हैं. ऐसा कोई वैश्विक क्रांतिकारी चेहरा इनके पीछे नहीं है, जिसमें लोगों का लंबे समय तक नेतृत्व करने का सामथ्र्य हो, न ही कोई बड़ा विचार इसके पीछे है, जो अपने साथ लोगों को बांधे रख सके. इसलिए यह प्रश्न अब भी अपनी जगह है कि बीसवीं शताब्दी में समाजवाद का क्या रूप होगा. राज्य आश्रित समाजवाद अपनी असफलता दर्शा चुका है. बीसवीं शताब्दी में सोवियत क्रांति की असफलता के बाद एक के बाद एक कई देशों ने राज्यआश्रित समाजवाद को अपना था. परंतु देखा गया कि सत्ताएं अपना मूल चरित्र कभी नहीं बदलतीं. इसी कारण जनमत के दबाव में जिन देशों ने राज्याश्रित समाजवाद को अपनाया गया था, वे सभी एकएक कर पूंजीवाद की शरण में जाते रहे. समाजवादी व्यवस्थाओं की इस अवस्था पर बुद्धिजीवियों ने विचार कर कुछ सुझाव भी दिए. इससे समाजवादी राजनीतिक दर्शन के नए रूप सामने आए. अराजकतावाद, श्रमिकसंघवाद, समष्ठिवाद, सहजीवितावाद आदि राजनीतिक दर्शन नए न होकर भी इसलिए चर्चा का विषय बने कि उनीसवीं शताब्दी में मार्क्स वाद की आंधी में इन नए विचारों की विद्वानों का ध्यान की नहीं कहा गया है. अधिकांश बुद्धिजीवीराजनेता जिनमें लेनिन ट्राटस्की, रोजा लेक्समबर्ग, अंतोनियो ग्राम्शी आदि सम्मिलित हैं, मार्क्स वाद के भीतर रहकर भी उसमें संशोधनपरिष्करण के पक्ष में थे. कालांतर में मार्क्स वाद की विश्वव्यापी असफलता ने अराजकतावाद, श्रमिकसंघवाद, समष्ठिवाद आदि समाजवाद की समानधर्मा विचारधाराओं को एकाएक चर्चा के केंद्र में ला दिया. मार्क्स वाद के विकल्प के रूप में बीसवीं शताब्दी में तेजी से उभरी इन विचारधाराओं की प्रमुख कमजोरी यह है कि ये साम्यवादमार्क्सवाद की भांति साधारणजन के बीच अपनी पैठ बनाने में असफल सिद्ध हुई हैं. इसलिए बीसवीं शताब्दी के प्रमुख प्रतिभाशाली दार्शनिकों, विचारकों ने समाजवाद के इन युवा प्रकल्पों को अपनी रचनात्मक मेधा से समृद्ध किया है, तथापि ये जनमानस में पैठ न होने के कारण ये अकादमिक बहसों का हिस्सा जान पड़ती हैं. हालांकि सहजीवितावाद, श्रमिकसंघवाद के समर्थकों की संख्या अमेरिका जैसे ठेठ पूंजीवादी देश में भी है. लेकिन वे किसी प्रभावकारी भूमिका में नहीं हैं.

स्वयं को पूंजीवाद का विकल्प कहने वाले ये राजनीतिकआर्थिक दर्शन किसी न किसी रूप में राज्य नामक संस्था का विरोध करते हैं तथा उसकी उपस्थिति को समाजवाद और श्रमकल्याण पर संकट के रूप में देखते हैं, परंतु कानूनव्यवस्था पर आए आसन्न संकट से निपटने, बाहरी आक्रमण के सामय देशसमाज की अस्मिता की सुरक्षा के लिए कोई सशक्त और संदेहरहित विकल्प इनके पास नहीं है. वे यह मान लेते हैं कि दुनिया के प्रायः सभी देशों में श्रमिकों की समस्या तथा उनकी चुनौतियां एक समान हैं, अतएव समाजवाद की ओर बढ़ते श्रमिक संगठन स्वयं को विश्वसमुदाय का अभिन्न अंग समझेंगे. इस तरह सीमाओं के संघर्ष, बाहरी आक्रमण जैसी स्थितियां ही नहीं रहेंगी. पूरा विश्व समाजवाद के झंडे के नीचे होगा. इस आदर्शोन्मुखी परिकल्पना को भारत में ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के नाम से जाना जाता है. परंतु वे भूल जाते हैं कि राज्यों का निर्माण केवल केवल राजनीतिकआर्थिक कारणों से नहीं होता. धर्म भी राज्यनिर्माण में महती भूमिका निभाता है. आज भी दुनिया के पचास प्रतिशत देशों में धर्म निर्णायक शक्ति बना हुआ है. पाकिस्तान जैसे देशों का तो गठन ही धर्म के आधार पर हुआ है. ऐसे देशों को श्रमिकसंघों की परिसीमा में कैसे लाया जाएगा, इसके बारे में ये विचारधाराएं कोई सुझाव नहीं देतीं. फिर धर्म स्वयं में गजब की संगठन शक्ति रखता है. बल्कि आर्थिक मसलों से अधिक संगठन की सामथ्र्य धर्म में देखी गई है. अधिकांश धर्म अर्थोपार्जन को हेय दृष्टि से देखते हैं. ऐसे में धर्माधारित संगठनों, समूहों को समाजवाद की परिसीमा में कैसे लाया जाएगा, इसके बारे में भी कोई सुझाव समाजवाद के इन नए प्रकल्पों के पास नहीं है. शायद इसीलिए वे धर्म को उपेक्षित कर आगे बढ़ जाना चाहते हैं. कहा जा सकता है कि धर्म को लेकर समाजवाद के नए प्रकल्प भी उसी गलतफहमी का शिकार हैं, जो गलतफहमी कभी मार्क्स वाद ने की थी. जिसके कारण साम्राज्यवादीसामंतवादी ताकतों को उसकी आलोचना का आधार मिला और अनेक ऐशियाई देशों में मार्क्स वाद आतेआते रह गया. समाजवाद के ये प्रकल्प मनुष्य को आर्थिकराजनीतिक प्राणी के रूप में देखते हैं. जबकि ‘अर्थ’ और ‘राज्य’ के अलावा भी मनुष्य की चेतना को प्रभावित करने वाले अनेक कारक हैं. एक कारक संस्कृति भी है, जो मनुष्य की पूरी जीवनपद्धति को प्रभावित करती है. ग्राम्शी ने संस्कृति के आधार पर ही समाज में पलने वाले वर्गभेद की व्याख्या की है.

धर्म नैतिकता का उपयोग आध्यात्मिक मान्यताओं के अवलंबन के रूप में करता है. अध्यात्म चेतना मानवमात्र का विषय है. हर कोई सृष्टि और जीवन के रहस्यों को लेकर विशिष्ट सोच रखता है. धर्म नहीं मान्यताओं का सामान्यीकरण करता है. उनके प्रकटीकरण हेतु कुछ कर्मकांडों का विधान रचता है. धर्म का मूल्य समाजीकरण का विषय है, अपने औचित्य को बनाए रखने के लिए ही धर्म नैतिकता का सहारा लेता है. तो क्या समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना के लिए राज्य का धर्म की शरण में आना उपयुक्त स्थिति है? क्या समाजवाद को समर्पित कोई राज्य धर्म का उपयोग अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक उपकरण के रूप में कर सकता है? इसका उत्तर ‘न’ में है. इसलिए कि धर्म की नींव भले ही कुछ मानवमात्र की अध्यात्मिक जिज्ञासा के निदान और कुछ नैतिक मान्यताओं पर रखी जाती हो, परंतु जिस आध्यात्म संपदा को वह अपनी धरोहर मानता है, उसका पूरा का पूरा अभिकल्पन सामंती परिवेश से युक्त होता है. प्रत्येक धर्म सृष्टि के मूल में किसी सर्वशक्तिमान सत्ता के योगदान की बात करता है. जो इतना शक्तिसंपन्न है कि बैठेठाले संकेतमात्र से अपनी इच्छाओं की पूर्ति कर सकता है. सर्वगुणसंपन्नता को महत्त्व दिए जाने का यही संस्कार कुछ लोगों को दूसरों से स्वयं को श्रेष्ठ ठहराने का बहाना देता है. ईश्वर की यह अभिकल्पना समाज के शीर्षस्थ वर्ग द्वारा अपनी श्रेष्ठता को सिद्ध करने के लिए की गई है. इसके अनुसार जो बैठेठाले सबकुछ सहजता से प्राप्त कर सके, जिसको परिश्रम करना ही न पड़े वही श्रेष्ठ है. जबकि समाजवाद का प्रयास होता है, समस्त सुखों में सभी की साझेदारी. इस दायित्व के लिए वह राज्य को नियुक्त करता है तथा समस्त संसाधन उसके अधीन रखने का सुझाव देता है. यह देखते हुए कि सत्ता का प्रत्येक रूप कभी न कभी तानाशाही का रूप ले लेता है, समाजवाद के आधुनिक संस्करण राज्यसत्ता का विरोध करने लगे हैं. समाजवाद के इन नए प्रकल्पों के अनुसार समाजवाद विशिष्टता का नहीं साधारणतम के संगठित प्रयास की परिणति होता है. इस प्रकार वह धर्म की सैद्धांतिकी जो किसी न किसी सर्वशक्तिमान केंद्रीय सत्ता पर विश्वास रखती से विपरीत आचरण रखता है. आध्यात्मिकता की खोज के लिए धर्म का नारा होता है—‘स्वयं को पहचानो.’

अकेले व्यक्ति की अंतर्यात्रा समाजवाद के लिए विशिष्ट महत्त्व नहीं रखती. इसलिए वह नारा देता है उल्लेखनीय है कि भारत, श्रीलंका आदि ऐशियाई देशों में समाजवाद की असफलता का एक कारण यह भी रहा कि वहां की जनता सहòाब्दियों से धर्म और राजशाही की जकड़न में रहने के कारण लोकतांत्रिक परिवेश में रहने का अभ्यास भूल चुकी थी. उस जकड़न से बाहर लाने के लिए जबजब इन देशों में प्रयास किया गया, तब तक रूढ़िवादियों ने उसको धर्म और संस्कृति पर हमला बताकर लोगों के चिंतन की धारा ही पलट दी. ‘खुद को पहचानो(नो दाइसेल्फ)’ के स्थान पर नए मनुष्य का नारा होना चाहिए—‘अपने जैसा बनो(बी दाइसेल्फ). अर्थात वह बनो, जो तुम बनना चाहते हो. उन लोगों के साथ जुड़ो जो तुमको पसंद हैं. उस संगठन अथवा समूह के साथ हितों का साझा करो, जिसको तुम्हें सर्वाधिक हितकारी लगता हो. वह करो जिससे तुम्हें अधिकतम लाभ की संभावना हो. ‘स्वैच्छिक सहभागिता’ आधुनिक समाजवादी चिंतन का मूल सिद्धांत है. आस्कर वाइल्ड का कहना है—

सभी संगठन पूर्णतः स्वैच्छिक होने चाहिए. केवल स्वैच्छिक संगठनों में ही मनुष्य पूर्णतः प्रसन्न रह सकता है.’

स्वैच्छिक सहभागिता उन्हीं समाजों में संभव है, जहां लोगों को अपने मन का करने की आजादी हो. जहां लोकतांत्रिक परिवेश हो. इसका दूसरा छोर ‘व्यक्तिवाद’ की ओर जाता है. समाजवाद में राज्य की मर्जी सर्वोपरि होती है. वहां व्यक्तिविशेष के बजाय संपूर्ण समाज के कल्याण पर जोर दिया जाता है. प्रश्न उठता है कि क्या व्यक्तिवादी माहौल में समाजवाद की उपस्थिति संभव है? यदि सभी को अपने मन की करने, मर्जी का व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता होगी तो फिर लोग दूसरों से क्यों जुड़ेंगे? क्यों कोई दूसरे के लिए अपने सुख का बलिदान करने को तैयार होगा? जबकि इच्छाओं का सामान्यीकरण समाजवाद की पहली शर्त है. व्यक्तिवादी वातावरण में पूंजीपति को कैसे दोषी ठहराया जा सकता है, क्योंकि उसका संपत्ति अर्जित करने का चाहे जो रास्ता रहा हो, है तो आखिर वह भी एक व्यक्ति ही? उसको भी इच्छानुरूप व्यवसाय चुनने की उतनी ही स्वतंत्रता है, जितनी दूसरों को! और यदि सभी अपनी मर्जी की करने को स्वतंत्र होंगे तो व्यक्तिगत कामनाओं और लालचों पर कैसे अंकुश साधा जाएगा? आर्थिक विषमता को कैसे कठघरे में लाया जा सकता है? समाजवादियों के लिए तो ये सब पुरानी समस्याएं हंै. इसके लिए वे राज्य को अतिरिक्तरूप से अधिकारसंपन्न बनाने पर जोर देते हैं. जबकि समाजवाद के आधुनिक संस्करण यह मानकर कि राज्य का चाहे जो स्वरूप हो, वह अंततः मनमाना आचरण करने लगता है, राज्य का ही निषेध करते हैं. यद्यपि आजकल यह माना जाने लगा है कि लोकतांत्रिक समाजवाद राजनीतिक दर्शन की सर्वोच्च उड़ान है, तथा उससे परिपक्व राजनीतिक दर्शन की परिकल्पना संभव ही नहीं है. पर इन सभी का एक निहितार्थ है. वह है व्यक्तिगत संपत्ति का निषेध. समाजवाद के नए रूप व्यक्तिगत संपत्ति का परोक्षतः निषेद्ध करते हुए उसको सामूहिक अधिकारिता में ले आना चाहते हैं. लेकिन इन्हें अमेरिका तथा यूरोप के उन देशों में ही सफलता मिल पाई है, जहां पूंजीवाद पहले से ही काफी मजबूत है. भारत और अन्य दक्षिण एशियाई देशों में में जहां पूंजीवाद अपनी जड़े तेजी से गहरी करता जा रहा है, और उसके दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं, समाजवाद के नए प्रकल्प समष्ठिवाद, सहजीवितावाद, श्रमिकसंघवाद, संगठनवाद यहां उतने असरकारक नहीं बन पाए. आखिर क्यों? असल में ये समाज धर्म और क्षेत्रीयता की जकड़बंदी में इतने गहरे फंसे हैं कि उससे बाहर निकल पाना इनके लिए संभव ही नहीं हो पा रहा है. भारत में तो धर्म के अलावा जाति भी समाज को बांटने वाला प्रमुख कारक है, जिसके चलते यहां व्यक्तिगत संपत्ति का निषेध कर पाना संभव नहीं हो पाया है. जाति की विशेषता है कि वह जन्म के आधार पर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्वतः अंतरित होती है. जाति के साथ व्यक्ति के व्यवसाय की अवधारणा भी जुड़ी है. प्रत्येक व्यक्ति जब जन्मना आधार पर अपने व्यवसाय से जुड़ा है तो उसके आधार पर होने वाले हानिलाभ और संपत्ति संबंधी अधिकारों से उसको वंचित कर पाना जातिप्रथा पर प्रहार किए बिना संभव ही नहीं है. लेकिन इन देशों मंे तेजी से बढ़ती आर्थिक असमानता और पूंजीवाद की मनमानी के चलते यह बात साफ हो चली है कि जनता लंबे समय तक शोषण को सह नहीं पाएगी. और जनता का संघर्ष आज का नहीं है. यह शताब्दियों पुराना है, हालांकि भारत जैसे संस्कृति अधीन समाजों में उसकी धमक बहुत अधिक सुनाई नहीं पड़ती है, लेकिन यत्रतत्र उसकी उपस्थिति का अनुभव आसानी से किया जा सकता है. यहां एक बार फिर पू्रधों को याद करना आवश्यक है. ‘संपत्ति क्या है?’ पुस्तक में वह सीयेस के ‘थर्ड एस्टेट’ के विचार को विस्तार देता हुआ कहता है—

यह थर्ड एस्टेट क्या है?’

कुछ नहीं!’

इसको क्या होना चाहिए?’

सब कुछ.’

राजा क्या है?’

जनता का सेवक’

यदि राजा हमारा सेवक है तो उसका कर्तव्य है हमें रिपोर्ट करे, हमारा आदेश माने.’

यदि वह हमें रिपोर्ट करता, हमारा आदेश मानता है तो वह हमारे नियंत्रण में है.’

यदि वह हमारे नियंत्रण में है तो उसकी कुछ जिम्मेदारियां हैं.’

यदि उसकी कुछ जिम्मेदारियां हैं तो उसको दंडित किया जा सकता है.’

यदि उसको दंडित किया जा सकता है तो उसको उसके अपराध के अनुसार दंड जाएगा.’

यदि उसको अपराध के अनुसार दंड जाएगा तो उसको मृत्युदंड भी संभव है.’

उल्लेखनीय है कि जिस समय सीयेस ने थर्ड एस्टेट को लेकर अपनी मामूली पंपलेट के आकार की थी पुस्तक लिखी, उस समय फ्रांसिसी जनता की हालत बहुत बुरी थी. राजा और अधिकारी विलासिता में डूबे थे. ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार व्याप्त था. धर्मसत्ता राजनीति से सांटगांठ कर जनता को बरगलाती और मजे लूटती थी. आम जनता की कहीं सुनवाई न थी. अपनी दुर्दशा के कारण जनसाधारण के मन में धर्मसत्ता और राजसत्ता के प्रति आक्रोश पनप रहा था. उसको हवा देने के लिए कवि, लेखक, साहित्यकार, विचारक, दार्शनिक अपनीअपनी तरह से प्रयास कर रहे थे. समाज और जनाकांक्षाओं का नए सिरे से विश्लेषण किया जा रहा था. सीयेस और समकालीन विचारकों ने तत्कालीन फ्रांसिसी समाज को तीन हिस्सों में बांटा है. प्रथम एस्टेट, द्वितीय एस्टेट तथा तृतीय एस्टेट. प्रथम एस्टेट में धर्माचार्य और पुरोहित वर्ग सम्मिलित थे, जिनपर कथित रूप से धर्म के संचालन की जिम्मेदारी थी. प्रथम एस्टेट में हालांकि कोई औपचारिक विभाजन न था, तो भी भीतर ही भीतर यह वर्ग दो प्रमुख भागों ‘उच्च’ एवं ‘निम्न’ वर्ग में विभाजित था. पहले वर्ग में बिशप तथा चर्च के प्रतिष्ठित अधिकारीगण आते थे, जो धर्मसत्ता में ऊंचा स्थान रखते थे. दूसरे वर्ग में सहायक पादरी, नर्स, चर्च के सेवादार आदि आते थे, जिनकी संख्या प्रथम एस्टेट के कुल सदस्यों की संख्या का 90 प्रतिशत थी. 1789 यानी सीयेस के जीवनकाल में प्रथम एस्टेट के सदस्यों की संख्या लगभग 130000 थी, जो उस समय की फ्रांस की कुल जनसंख्या का आधा प्रतिशत थी.

द्वितीय एस्टेट में फ्रांस के अभिजन तथा राजकुल से जुड़े लोग आते थे. यह वर्ग राजसत्ता के निकटस्थ था और स्वयं को धर्मसत्ता के अधीन मानता था. हालांकि उसकी अपनी सत्ता भी धर्मसत्ता के समानांतर थी. इस वर्ग में वरिष्ठ नौकरशाह, सेनापति, उच्च राजकीय अधिकारी वगैरह भी आते थे, जो उन दिनों के कानून के अनुसार केवल अभिजन वर्ग के हो सकते थे. वे समाज के प्रतिष्ठित नागरिक माने जाते थे. उनसे जबरन काम नहीं लिया जा सकता था. इस वर्ग को प्रत्यक्ष कर संबंधी छूट भी प्राप्त थी. द्वितीय एस्टेट के सदस्यों का संख्यानुपात फ्रांस की कुल जनसंख्या का मात्र 1.5 प्रतिशत था. शेष 98 प्रतिशत जनसंख्या तृतीय एस्टेट के अंतर्गत आती थी. एक तरह से यह छोटे व्यापारियों, उत्पादकों का समूह था, जो बहुसंख्यक होकर भी अधिकार और संपत्ति के मामले में बहुत पिछड़े हुए थे. तृतीय एस्टेट में भी दो प्रकार के लोग थे. 8 प्रतिशत हिस्सा शहरी सीमा में रहने वाले नागरिक वर्ग का थे. उनमें से अधिकांश व्यापारी, नौकरशाह और वेतन भोगी मजदूर थे. बाकी 90 प्रतिशत में ग्रामीण किसान, खेतिहर मजदूर, मिल मजदूर आदि सम्मिलित थे. तृतीय वर्ग के पास अपनी कोई संपत्ति नहीं थी. न उन्हें राजनीति में हिस्सा लेने के अवसर प्राप्त थे. अपनी कोई संपत्ति न होने के कारण यह वर्ग अपनी जीविका के लिए अभिजन जमींदारों, नौकरशाहों के अधीन कार्य करने को विवश था. बदले में उन्हें जो वृत्तिका प्राप्त होती थी, उसका बड़ा हिस्सा उनसे कराधान के रूप में वापस ले लिया जाता था. इस वर्ग में छोटे शिल्पकार भी सम्मिलित थे, जिनके व्यवसाय मशीनीकरण के कारण तेजी से छिन रहे थे. रोजगार का संकट, गरीबी, कराधान की लगातार बढ़ती दरें आदि तृतीय एस्टेट के सदस्यों की कुछ सामान्य समस्याएं थीं, जो उन्हें एक करती थीं. फ्रांसिसी क्रांति दरअसल इसी तृतीय स्टेट के आक्रोश की परिणति थी. सीयेस के पुस्तिका ने जादूई असर किया था. प्रूधों लिखता है कि सीयेस की पुस्तक के पांच वर्ष के अंदर ही स्थिति एकदम पलट चुकी थी. उसके बाद तीसरी स्टेट ही सबकुछ थी. सम्राट, अभिजन, तथा धर्माधिकारी वर्ग अपनी चमकदमक गंवा चुके थे. फ्रांसिसी नवोदय की चमक पूरे यूरोप में कौंधी थी. इसके फलस्वरूप इंग्लेंड, जर्मनी, इटली, स्पेन आदि देशों में समाजवादी चेतना का विस्तार हुआ, हालांकि उसका स्वरूप विभिन्न देशों की परिस्थिति के अनुसार परिवर्तनशील था.

आधुनिक भारत की यदि तत्कालीन फ्रांसिसी समाज से तुलना करें तो स्थिति में बहुत अधिक अंतर नजर नहीं आता. बल्कि अठारवीं शताब्दी के फ्रांसिसी समाज की जो दुरवस्था थी, भारतीय समाज की स्थिति आज भी उससे कुछ अलग नहीं है. कहने को इस देश में लोकतंत्र है. मगर व्यवहार में पूरी राजनीतिक सत्ता पांचछह सौ राजनीतिक परिवारों के बीच सिमटी हुई है. बारीबारी से वही लोग सत्ता में आते रहते है. उनके बीच लोकतंत्रीय छूट का लाभ उठाकर यदि को नया प्रतिनिधि चुनकर आ भी जाए तो संसदीय बहुमत की राजनीति में उसकी आवाज नक्कारखाने में तूती बनकर रह जाती है. उच्च वर्ग के चक्रव्यूह को तोड़ने की न तो वह हिम्मत जुटा पाता है, न इसके लिए उसको व्यापक जनसमर्थन ही मिल पाता है. यही वर्ग अपने चहेतों के साथ राजनीतिक और उच्च नौकरशाही के रूप में सत्ता को कब्जाए रहता है. अर्थतंत्र की हालत भी इससे बेहतर नहीं है. देश के उत्पादन तंत्र पर भी लगभग चारपांच सौ बड़ी कंपनियों का अधिपत्य है. उनमें भी मात्र आठदस उद्यमी ऐसे हैं जिनका पूरे व्यापारतंत्र के आधे से अधिक हिस्से पर कब्जा है. यह स्थिति तब है जबकि भारतीय संविधान में आर्थिक असमानता को उखाड़ फंेकने का आवाह्न किया गया है. संविधान से कट जाने के कारण ही भारतीय राजनीति और समाज में अनेकानेक बुराइयां आ चुकी हैं. संसदीय राजनीति का आज भले ही कोई विकल्प नजर न आता हो, किंतु यह भी सच है कि भारतीय लोकतंत्र में आज वे सभी बुराइयां आ चुकी हैं, जिनकी ओर प्लेटो ने संकेत किया था. लोकतंत्र के नाम पर भारतवासी अर्थसत्ता, धर्मसत्ता और कुलीतंत्र के मकड़जाल में जी रहे हैं. अस्सी प्रतिशत राजनीति विकास की परिधि से बाहर है. ऐसे में भारत के लिए सर्वाधिक उपयुक्त रास्ता जिससे यह देश पूंजीवादी प्रभुत्व के दायरे से बाहर आ सके कौनसा हो सकता है? इसका एक विकल्प महात्मा गांधी ने सुझाया था. वह था ग्रामीण स्वराज्य और आर्थिक विकेंद्रीकरण का. वह अपने आप में एक बेहतर व्यवस्था हो सकती है. परंतु भारत के संबंध में उसकी उपयोगिता इसलिए संदेह से परे नहीं है, इसलिए कि यहां एक तो अशिक्षा का साम्राज्य है, विशेषकर गांवों में अभी भी पचास प्रतिशत आबादी अशिक्षितों की है, शिक्षितों में भी अल्पशिक्षित ही अधिक हैं. उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों की जनसंख्या तो पढ़ेलिखों का पांचछह प्रतिशत ही है. दूसरा कारण जो इससे भी अधिक चिंतनीय है, वह भारतीय समाज में व्याप्त जातिप्रथा है, जिसको फासीवाद से प्रेरणा मिलती है. जातिप्रथा में समाज का बहुसंख्यक वर्ग सिर्फ इस कारण कि उसका जन्म किसी कुल या जाति विशेष में नहीं हुआ, विकास के अवसरों यहां तक कि सामान्य मानसम्मान से भी वंचित कर दिया जाता है. महात्मा गांधी समाज का बदलाव तो चाहते थे, परंतु भारतीय समाज के जातिवादी ढांचे से उन्हें कोई शिकायत न थी. इसलिए ग्राम स्वराज्य से समानता के अपेक्षित लक्ष्य की प्राप्ति उस समय तक संभव नहीं है, जब तक देश में जाति प्रथा है. भारत में मार्क्स वाद की दस्तक उनीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ही हो चुकी थी. 1925 में ‘भारतीय साम्यवादी पार्टी’ का विधिवत गठन हुआ. लेकिन भारतीय समाज की संरचना और साम्यवादी दलों का नेतृत्व प्रायः उच्चस्थ वर्गों के अधीन रहने के कारण यहां साम्यवादी चेतना का भरपूर विस्तार नहीं हो सका. साम्यवादी विचारधारा के विकास के लिए न केवल धार्मिक रूढ़ियों पर प्रहार किया जाना आवश्यक था, बल्कि इसके जातिवादी ढांचे को तोड़ना भी आवश्यक था. मगर इस ओर से निरपेक्ष रहने के कारण भारतीय साम्यवाद एक प्रकार से बुर्जुआ राजनीति का प्रतीक बना रहा. आजादी के बाद राममनोहर लोहिया ने अवश्य जातिव्यवस्था पर प्रहार किए, परंतु भारतीय जनमानस की धार्मिक छवि को बदलने के लिए वे भी कुछ खास नहीं कर पाए. विशेषकर धार्मिक मान्यताओं को लेकर तो वे भी भारत की लोकप्रिय राजनीति का ही परिष्कृत संस्करण जान पड़ते हैं. इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि आजादी के तुरंत बाद देश में दक्षिणपंथी राजनीति मजबूत हो चुकी थी, जो ब्राह्मणवादी व्यवस्था को बनाए रखना चाहती थी. समाज के जातिवादी ढांचे को लेकर भारत के मार्क्सवादी नेताओं को भी कोई शिकायत न थी. चूंकि दक्षिणपंथी विचारों को प्रश्रय देने वाली पार्टियां दूसरी भी थीं तथा भारतीय साम्यवादी नेता समाज के उत्पीड़ित वर्ग का विश्वास जीतने में असफल सिद्ध हुए थे, इसलिए आजादी के साठ वर्ष बाद भी भारत में साम्यवादी राजनीति अपना असर छोड़ने में असमर्थ रही हैं. बीते दो दशकों में तो उदार आर्थिक नीतियों ने तो प्रशासन और मीडिया में पूंजीवाद के इतने प्रशंसक खड़े कर दिए हैं कि उनके प्रभाव में साम्यवादी राजनीति की आमजन तक पहुंच भी घटी है.

तो क्या यह मान लिया जाए कि पूंजीवाद के अंधकूप से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है? भारत में साम्यवादी राजनीति के दिन लद चुके हैं? वर्तमान और भविष्य पूंजीवाद के हाथ में है और वह अनिश्चित समय तक अपनी मनमानी करता रहेगा? रूस में साम्यवादी राजनीति के पराभव के उपरांत अराजकतावाद, समष्ठिवाद, श्रमिकसंघवाद, सहजीवितावाद, संगठनवाद, अराजक समष्ठिवाद आदि समाजवाद के जो नए विकल्प आए हैं, क्या उनका भारतीय समाज में कोई भविष्य अथवा उपयोगिता नहीं है? यह तो कहना सरासर अनुचित होगा कि भारतीय और समाज में परिवर्तन की संभावनाएं लुप्त हो चुकी हैं. भविष्य ऐसे घटाटोप के घेरे में जिससे लंबे समय तक मुक्ति असंभव है. लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि भारतीय समाज जब तक जातिवादी ढांचे को बनाए रखता है, जब तक यहां कथावाचक या पुरोहित स्तर के लोग स्वयं को भगवान कहकर जनता को बरगलाते रहेंगे, जब तक समाज में अशिक्षा का साम्राज्य है—उस समय तक भारतीय समाज में किसी स्थायी परिवर्तन की उम्मीद नहीं की जा सकती. हालांकि इसी घटाटोप और नाउम्मीदी के बीच परिवर्तन की हल्कीसी सुगबुगाहट पिछले कुछ वर्षों में देखने को मिली है. भारत में जिस प्रकार भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनता में चेतना फैली है. मिश्र और यूनान के प्रचीनतम देशों से जैसी खबरें आ रही हैं, उनसे तो लगता है कि पूरे विश्व में तानाशाही और पूंजीवाद की वर्चस्वकारी नीतियों के विरोध में माहौल बन चुका है. लोग बदलाव चाहतें हैं. खुशी की बात यह है कि इस बार जनता खुद सड़क पर है, नेता या तो बचाव की मुद्रा में हैं अथवा उसके पीछे. प्रथम दृष्टया इसे विचारहीन क्रांतियों का दौर भी कहा जा सकता है, लेकिन इस जनआड़ोलन से जो नवनीत निकलेगा, वह अवश्य ही आमूलपरिवर्तनकारी होगा, जिसका सपना हर मानवतावादी विचारक देखता है.

ओमप्रकाश कश्यप

साम्यवाद : द्वैत से अद्वैत की यात्रा

सामान्य

मनुष्यता के इतिहास में उनीसवीं शताब्दी का बड़ा महत्त्व है. यह वह कालखंड है जब मार्क्स ने वर्गसंघर्ष के नारे के साथ सर्वहारा क्रांति का आवाह्न किया था. ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ के माध्यम से दिए गए इस नारे की सीमाएं अथवा कमजोरियां 23वें वर्ष में ‘पेरिस कम्यून’ के प्रयोग की असफलता के साथ सामने आ गईं. मार्क्स के विचारों पर आधारित वह पहली समाजवादी क्रांति थी. अपने विचारों की प्रारंभिक असफलता से निराश होने के बजाय मार्क्स ने वर्गसंघर्ष की सैद्धांतिकी में सुधार हेतु स्वयं को नए सिरे से इतिहास, दर्शन, समाजविज्ञान, अर्थशास्त्र, राजनीतिक दर्शन आदि के अध्ययन को समर्पित कर दिया. वह फ्रांस छोड़कर इंग्लेंड चला आया जहां अपेक्षाकृत शांति थी. साथ में बौद्धिकरूप से खुला माहौल भी. करीब 15 वर्ष के गहन अध्ययनमनन के फलस्वरूप ‘पूंजी’ का पहला खंड सामने आया. इस युग प्रवर्त्तक ग्रंथ में पूंजी के शोषणकारी चरित्र तथा उसकी बहुआयामी पैठ को पहली बार समग्रता के साथ इतिहास, दर्शन एवं अर्थनीति के संदर्भ में उजागर किया गया था. सर्वहारा क्रांति का समर्थक मार्क्स इस नतीजे पर पहुंचा था कि पूंजीवादी अधिनायकवाद का उत्तर श्रमअधिनायकवाद से नहीं दिया जा सकता. श्रमअधिनायकत्व की संभावनाओं को कम करने के लिए उसने वर्गहीन समाज की संकल्पना की थी. लिखा था कि समाजवादी क्रांति का लक्ष्य बुर्जुआ वर्ग को अपदस्थ कर उत्पादन के साधनों पर कब्जा कर लेने से पूरा नहीं हो जाता. वास्तविक चुनौती उस एकाधिकारवादी भावना को समाप्त करने की है, जो वर्गविभाजन की संभावना को जन्म देती तथा प्रकारांतर में उसे मजबूत एवं स्वीकार्य बनाती है. ‘थीसिस आन फायरबाख’ में उसने लिखा था—

विद्वानों ने इस सृष्टि की अनेक प्रकार से व्याख्या की है. वास्तविक चुनौती तो इसको बदलने की है.’ 1

दुनिया को बदलने की कामना के साथ मार्क्स ने वर्गसंघर्ष का सिद्धांत प्रस्तुत किया. इसकी प्रेरणा उसको हीगेल के दार्शनिक सिद्धांत ‘द्वंद्ववाद’ से मिली थी. हीगेल के ‘शुभ’ एवं ‘अशुभ’ के द्वंद्व को उसने सर्वहारा और पूंजीपति के द्वंद्व के रूप में देखा था. उल्लेखनीय है कि हीगेल से बहुत पहले शंकराचार्य ने जीवन की व्याख्या के लिए आत्मा और परमात्मा के द्वैत का विचार प्रस्तुत किया था. कार्यकारण संबंधों की व्याख्या करते हुए उन्होंने सृष्टि की रचना में माया की अतार्किकअवैज्ञानिक परिकल्पना की थी. उनसे पहले सांख्य दर्शन में भी सृष्टिरचना को प्रकृति एवं पुरुष के संपर्क द्वारा समझाने की कोशिश की गई. सांख्याचार्य के अनुसार प्रकृति प्रमुख कार्यकारी शक्ति है. वही पुरुष को कार्य के उकसाती है.2

तुलनात्मकरूप से देखा जाए तो माया की अपेक्षा प्रकृति की परिकल्पना अधिक यथार्थवादी है. वेदांताचार्य के अनुसार माया कार्यकारण की प्रेरक शक्ति है. वहीं द्वैत की जन्मदाता है. इसके मूल में अज्ञान है. जैसे ही आत्मा अपने मूलस्वरूप अर्थात परमात्मा को पहचानने लगती है, उसका मायारूपी संसार से मोहभंग हो जाता है. आत्मा और परमात्मा के द्वैत के समापन की अवस्था को वेदांत में ‘मोक्ष’ कहा गया. उसके अनुसार मोक्ष चिरंतन ठहराव और परमशांति की ऐसी कल्पनातीत अवस्था है, जिसमें मानवात्मा के समस्त विक्षोभ शांत हो जाते हैं. मन से माया का आवरण हट जाता है और मनुष्य परमात्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानने लगता है. वेदांत दर्शन में आत्मतत्व स्वयं क्रियात्मक नहीं हैं. माया के संपर्क में आने के उपरांत उत्पन्न विक्षोभ उसे क्रियाधर्मी बनने को उकसाता है. इसके विपरीत हीगेल का ‘द्वंद्ववाद’ विपरीत गुणसंपन्न शक्तियों की नैसर्गिक क्रियाशीलता तथा उनके बीच सतत द्वंद्व की परिणति है. द्वंद्वात्मकता की प्रतीति सृष्टि में अनेक स्तर पर भिन्न रूपों में, विभिन्न प्रकार से द्रष्टिगत होती है. द्वंद्व के कारणों को हीगेल ने आभासी माना है. हीगेल के अनुसार यह सृष्टि परमसत्ता का विस्तार है. उसमें आभासी विपरीतात्मकता मानवेंद्रियों की सीमा की देन है.

सृष्टि व्यापार को द्वंद्वात्मकता के सिद्धांत से समझाने वाले हीगेल ने द्वैत को ‘शुभ’ और ‘अशुभ’ के रूप में देखा था. उसका मानना था कि सृष्टि में प्रत्येक विचार का प्रतिविचार मौजूद है. सफेद के साथ स्याह, अच्छे के साथ बुरा, पुण्य के साथ पाप, उत्तर के विरुद्ध दक्षिण आदि परस्पर विपरीतार्थी एवं समानधर्मा सत्ताओं से दुनिया भरी पड़ी है. साधारण द्रष्टिबोध उन्हें अलग, एकदूसरे से स्वतंत्र तथा परस्पर विरोधी मानता है. हीगेल के लिए इस विपरीतार्थ के अलग मायने थे. वह द्वैत की सत्ता को स्वीकारता है, लेकिन उसका कारण वस्तुगत न होकर मानवेंद्रियों की सीमा है. दूसरों से अलग वह ‘शुभ’ को ‘अशुभ’ का पूरक, उनके द्वैत को अस्थायी मानता था, जिसको मनुष्य अपने ज्ञान के माध्यम से चुनौती दे सकता था. परमसत्ता के बारे में स्पिनोजा से सहमत हीगेल का मानना था कि वह परमशुभ है. उसका विस्तार अनंत है. मानवेंद्रियों का सामथ्र्य नहीं कि उसकी विलक्षणता और विराटपन का साक्षात कर सकें. शंकर इसे माया के आवरण के रूप में देखते हैं. उसको देखते हुए हीगेल का विचार अधिक तार्किक प्रतीत होता है. हीगेल के अनुसार मनुष्य की विवशता है कि वह सत्य को केवल टुकड़ों में देख पाता है. मसलन आंखें त्रिविमीय संसार की केवल दो विमाओं को देख पाती हैं. जबकि दृश्यमान जगत की समस्त वस्तुएं त्रिविमीय संसार का हिस्सा हैं. प्रसंगवश बता दें कि चैथी विमा के रूप में ‘समय’ को मान्यता बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशक में उस समय मिली, जब आइंस्टाइन ने अपने आपेक्षिकता के सिद्धांत की व्याख्या करते हुए समय को चौथा आयाम माना. दर्शन के क्षेत्र में चैथी विमा की परिकल्पना बहुत पहले लगभग ढाई हजार वर्ष पहले की जा चुकी थी. उसकी ओर स्पष्ट संकेत अठारहवीं शताब्दी के दार्शनिक डेविड ह्यूम ने किया. समय को पहली बार महत्त्व देते हुए ह्यूम ने कहा था कि कोई भी व्यक्ति एक ही नदी में दो बार पांव नहीं रख सकता. जब तक हम नदी के प्रवाह में दूसरी बार पैर रखते हैं, उसका जल कहीं आगे बढ़ चुका होता है. उस समय दार्शनिकों ने डेविड ह्यूम को संदेहवादी कहकर उसकी खिल्ली उड़ाई गई थी. बाद में जब यही बात आइंस्टाइन ने वैज्ञानिक प्रमाण देते हुए कही, तब जाकर समय को चैथी विमा के रूप में मान्यता मिल सकी. आज अनिश्चितता अथवा संदेह के सिद्धांत को वैज्ञानिक मान्यता मिल चुकी है. ‘थ्योरी आ॓फ अनसर्टेनिटी’ आधुनिक परमाणु विज्ञान का अत्यंत महत्त्वपूर्ण अनुसंधान है, जिससे सृष्टि के रहस्यों को समझने में मदद मिल सकती है. विज्ञान की इस संशयवादी धारा ने दर्शन और विज्ञान के बीच की दूरी को पाटने का काम किया है.

ऐंद्रियक अनुभवों की सीमा की ओर संकेत करते हुए हीगेल का कहना था कि ‘सांत’ इंद्रियों द्वारा ‘अनंत’ को पूरी तरह समझा ही नहीं जा सकता. अपने बोध के लिए मनुष्य को जिन इंद्रियों पर भरोसा करना पड़ता है, वे पूरा सच कभी देख ही नहीं पातीं. मसलन आंखें दीवार पर लगी तस्वीर का एक समय में केवल एक ही पृष्ठ देख पाती हैं. तस्वीर के अगलेपिछले हिस्सों को, एक ही समय में देख पाना उनके लिए कदापि संभव नहीं है. यह कार्य मस्तिष्क को करना पड़ता है. इसलिए दीवार पर टंगी तस्वीर का हमारा आकलन सिर्फ वह नहीं होता जो हमारी आंखें तात्कालिक रूप से देख रही होती हैं. तस्वीर को पूरा देखने के लिए हमें अपनी स्थिति में बदलाव करना होता है. मगर स्थिति में परिवर्तन के साथ हम दूसरे समय में चले जाते हैं. पहला पक्ष तत्क्षण हमसे ओझल हो जाता है. पूरी छवि की परिकल्पना के लिए हमें अपने मस्तिष्क और अनुभव की मदद लेनी ही पड़ती है. आशय है कि किसी वस्तु अथवा विचार की अवधारणा के पीछे हमारे अनुभवों, स्मृतिबोध तथा मस्तिष्क का योगदान होता है.

यदि मनुष्य की इंद्रिया सांत हैं, उनकी सीमा है, तब तो वह अनंत को कदापि नहीं जान पाएगा. उस अवस्था में तो उसको अनंत सत्ता को जाननेसमझने की कोशिश छोड़ ही देनी चाहिए. हीगेल के विचारों को पढ़ते हुए ऐसा निष्कर्ष सहसा दिमाग से टकराने लगता है. लेकिन अगर यहीं तक सीमित होता तो हीगेल का दर्शन द्वंद्ववाद से आगे बढ़ ही नहीं पाता. वह संशयवादी ही बना रहता. जबकि द्वंद्व उसके दर्शन का प्रस्थान बिंदू है, लक्ष्य नहीं. प्रारंभिक स्थापना से आगे बढ़कर वह कहता है कि ठीक है, मानवेंद्रियों की सीमाएं हैं. उसकी इंद्रियां उसको किसी वस्तु को समग्रता से एक ही पल में देखने का अवसर ही नहीं देतीं. इसके बावजूद उसके पास एक चीज है, जो उसके ऐंद्रियक अनुभवों की सीमा को पाटने में सहायक है. वह है उसका मस्तिष्क. मानव मस्तिष्क ही है जो एक ही क्षण में किसी तस्वीर को पूरा न देख पाने के बावजूद उसका यथार्थबोध कराने में सक्षम होता है. इसलिए जो मनुष्य अपने सांत ऐंद्रियक साधनों से अनंत को समझना चाहता है, उसे निरंतर अपना बौद्धिक परिष्कार करते रहना चाहिए. इसके लिए वह अनुभव के साथ निरंतर अध्ययनमनन पर जोर देता है. कोई हताश न हो, इसलिए वह द्वंद्ववाद की आगे व्याख्या भी करता है. वह समझाता है कि ‘अच्छे’ और ‘बुरे’, ‘काले’ और ‘सफेद’, ‘गुणअवगुण’ का भेद आभासी है.

असल में वह हमारी अज्ञानता और अधूरे ज्ञान की देन है. सही मायने में हमारी सीमाओं का प्रतीक. परोक्षरूप में वह भी द्वैत की महत्ता को स्वीकारता है. परंतु मानता है कि बोध के विकासक्रम में द्वैतभाव तिरोहित होने लगता है. मनुष्य समझने लगता है कि ‘काला’ और ‘सफेद’ रंग एकदूसरे के विपरीतधर्मा न होकर परस्पर भिन्न स्थितियां हैं. जो वस्तु काली दिखती है, वह अपने ऊपर पड़ी प्रकाश किरणों को पूरी तरह सोख लेती है. दूसरे शब्दों में उसका गुण है अपने ऊपर पड़ने वाली समस्त प्रकाश किरणों को अवशोषित कर लेना. जबकि सफेद रंग वाली वस्तु का गुण है, प्रकाश किरणों को ज्यों का त्यों परावर्तित कर देना. दोनों के अपनेअपने गुण हैं. उनमें विरोधाभास हो सकता है, परंतु विपरीत गुणसंपन्न होने के बावजूद दोनों में कहीं टकराव नहीं है. बल्कि वे एकदूसरे के पूरक का कार्य करती हैं. साधारण मनुष्य इस अंतर को समझ नहीं पाता, इसलिए वह सफेद और काले को एकदूसरे का विपरीतधर्मा मान लेता है. हीगेल के तर्कों के आगे हमारी आंखों के आगे पड़ी द्वैत की चदरिया लगातार झीनी पड़ती हुई अंत में गायबसी हो जाती है. यही ‘सांत’ के ‘अनंत’ तक पहुंचने की यात्रा है.

अच्छे’ और ‘बुरे’, गुणअवगुण’ के विपरीतार्थ को नकारता हुआ वह कहता है कि ‘अच्छा’, ‘बुरे’ का विलोम न होकर भिन्न स्थिति है. यह वह प्रत्यय है जो समाज के एक वर्ग द्वारा थोप दिया जाता है. समाज बदलने पर वह बदल भी सकता है. हीगेल की दृष्टि में ‘बुरा’ वह है जिसमें उन गुणों का, जिन्हें हम अच्छाई का प्रतीक मानते हैं, अभाव है. ये गुण या स्थापनाएं व्यक्ति की न होकर उस समाज की होती हैं, जिसमें वह जन्मा है. इसी प्रकार तस्वीर या कमरे में पड़ी मेज की वह व्याख्या करता है कि जो दिख रहा है, वह तस्वीर वास्तविक नहीं है. वह मात्र द्विविमीय छवि है. आंखें अपनी खूबी तथा मस्तिष्क की मदद से उसको त्रिविमीय छवि में बदल रही हैं. छवि की सीमा है कि वह केवल स्थिति एवं क्षणविशेष में ही सत्य हो सकती है. मेज को पूरा समझने के लिए हमें उसके दूसरे पहलुओं को भी जोड़ना पड़ता है. इसलिए अलगअलग समय में मस्तिष्क पर पड़ने वाले मेज के बिंबों को एकदूसरे का विरोधी नहीं माना जा सकता, बल्कि वे एकदूसरे के पूरक हैं. जैन दर्शन इसे स्याद्वाद के सिद्धांत द्वारा अभिव्यक्त करता है. चार अंधों और हाथी के रूपक द्वारा वह समझाता है कि हाथी को पहचानने में जुटे चार अंधों के अनुभव परस्पर भिन्न होंगे. उनमें जो व्यक्ति हाथी की सूंड की ओर होगा वह उसकी उपमा बेल से देगा, कानांे को छूकर हाथी को पहचानने में जुटे अंधे की निगाह में हाथी का आकार सूप के समान होगा. इसी प्रकार पेट और पैर का स्पर्श करने वाले अंधों के निष्कर्ष भी एकदूसरे से अलग होंगे. व्यक्तिगत निष्कर्ष में वे चारों सही हैं, परंतु उनमें से एक भी सत्य का पूर्णानुमान लगाने में असमर्थ है. सामान्य व्यक्ति के प्रकरण में भी उसकी ऐंद्रियिक सीमा सत्य की पूर्णानुभूति कराने में अक्षम होती है. तर्कों के माध्यम से हीगेल स्पष्ट करता है संसार में दिखने वाली सभी विरोधी स्थितियां एकदूसरे की पूरक हैं. यहां हम हीगेल को स्पिनोजा के करीब पाते हैं. अंतर सिर्फ इतना है कि स्पिनोजा ‘सर्वेश्वरवाद’ को सीधेसीधे एक झटके में छू लेता है. हीगेल वहां तक पहुंचने के लिए अनेक तर्कों, स्थितियों का सहारा लेता है. स्पिनोजा पर अतिरेकी आस्था का दबाव है. हीगेल बौद्धिकता के मुक्ताकाश में सत्य को समझने की चेष्ठा करता है. कह सकते हैं कि स्पिनोजा जो लक्ष्य निर्धारित करता है, हीगेल उसको स्वीकार करता है, लेकिन पूरी तर्कबुद्धि के साथ. एकएक के लिए समर्थन जुटाते हुए. वह एक ओर तो मनुष्य को उसकी सीमाओं का एहसास कराता है, दूसरी ओर उसे यह विश्वास भी दिलाता है कि निरंतर अभ्यास, अध्ययनचिंतन से वह अपनी दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त कर सकता है.

मार्क्स हीगेल से द्वंद्ववाद की विचारधारा उधार लेता है. लेकिन उसका उपयोग केवल साधन तक सीमित रखता है. वह द्वंद्ववाद से प्रभावित है. पूंजीवादी समाज में जन्मे मार्क्स को सर्वहारा और बुर्जुआ ही अपने चारों ओर दिखाई पड़ते हैं. अपने परिवेश के प्रति वह इतना सम्मोहित है कि उससे इतर अतींद्रिय दुनिया की परिकल्पनाएं उसको जम ही नहीं पातीं. आरंभ में समाज में वांछित परिवर्तन के लिए वह दोनों वर्गों के संघर्ष की अनिवार्यता पर जोर देता है. शुभ और अशुभ के शाश्वत संघर्ष की भांति, ताकि परमशुभ की सर्वकल्याणक, सर्वत्र शुभदायक स्थिति को प्राप्त किया जा सके. वह साम्यवाद का सपना रचता है, जिसमें सुख पर किसी का भी एकाधिकार न हो. बल्कि अधिकतम व्यक्ति अधिकतम सुख का भोग कर सकें. यह सपना उसकी आंखों में 1845 में ही जन्म ले चुका था. साम्यवाद की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए उसने ‘दि जर्मन आइडियोला॓जी’ में लिखा है—

हमारे लिए साम्यवाद किसी प्रस्तावित राज्य के गठन का ऐसा मसला नहीं है जिससे अपने आदर्श लक्ष्य की प्राति हेतु वह नागरिकों से सहयोग एवं समन्वय बनाए रखने की अपेक्षा करे. इसके बजाय साम्यवाद को ऐसा जमीनी आंदोलन कहना उचित होगा जो वर्तमान राज्य को विखंडित कर देगा. नए राज्य की शर्त उसके होने में न होकर उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता में निहित होगी.’3

वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि समाज में असमानता का कारण केवल आर्थिक विषमता नहीं है. अकेले पूंजी के रहने या न रहने से वर्गीय विषमताओं को मिटा पाना असंभव होगा. उसके पीछे धर्म, राजनीति, समाज आदि कारक भी सम्मिलित हैं, जो वर्गभेदकारी स्थितियों को जन्म देने के साथसाथ नागरिकों को विभेदकारी तंत्र से अनुकूलन की प्रेरणा देते हैं. इन्हीं की मदद से शिखरस्थ शक्तियां उत्पादन केंद्रों पर अधिकार जमाए रहती हैं. स्थायी परिवर्तन वर्गभेद को जन्म देने वाली स्थितियों के उन्मूलन बगैर संभव नहीं. आमूल परिवर्तन के लिए उस मानसिकता में भी संशोधन करना पड़ेगा जो विभेदकारी वातावरण से अनकूलन करना सिखाती है. स्थितियों को उनकी समग्रता में देखने का यह गुण मार्क्स ने अपने गुरु हीगेल से लिया था. अन्य शब्दों में द्वंद्वात्मक भौतिकवाद वह दरवाजा है जिसको वह अपने जीवनकाल में ही पार कर चुका था. भौतिकवादी मार्क्स आत्मा, परमात्मा और माया जैसी अमूत्र्त धारणाओं के फेर में नहीं पड़ता. हीगेल की पुस्तक ‘फिलास्फी आ॓फ राइट’ की आलोचना करते हुए वह धर्म को जनसाधारण के लिए अफीम बताता है. ‘थीसिस आ॓न फायरबाख’, ‘क्रिटीक आन फिलास्फी आ॓फ राइट’ ऐसी ही पुस्तकें हैं, जिनमें उसके धर्मसंबंधी विचारों की आलोचना की झलक है. एक अन्य पुस्तक में उसने हीगेल के शिष्य और अपने मित्र बूनो बायर की आलोचना की थी. लेकिन पेरिस क्रांति की असफलता के बाद उसको अपने चिंतन के अधूरेपन की अनुभूति होती है. उसको लगता है कि ‘सर्वहारा’ और ‘पूंजीपति’ की विपरीतधर्मिता ‘काले’ और ‘सफेद’, ‘अच्छे’ और ‘बुरे’ की द्वैत जितनी ही आभासी है. आमूल परिवर्तन के अभाव में ही सर्वहारा राज्य के सर्वहारा अधिनायकवादी राष्ट्र में बदलते देर नहीं लगती.

मार्क्स द्वंद्वात्मक भौतिकवाद से अपने चिंतन की शुरुआत करता है, लेकिन वह उससे उतना ही काम लेता है, जितना कोई भौतिक विज्ञानी गणित के पूर्वस्थापित सूत्र से, मिस्त्री अपने औजार से. सर्वहारा वर्ग द्वारा सत्ता पर अधिकार कर लेने के बाद आंदोलन का दूसरा लेकिन अतिमहत्त्वपूर्ण चरण आरंभ हो जाता है, साम्यवाद के सिद्धांतों के अनुरूप राज्य को ढालने का. उसमें वह वर्गहीन समाज की स्थापना के लक्ष्य को सामने रखता है. वह एक ऐसे समाज की परिकल्पना करता है, जिसमें लोग पारस्परिक कल्याण भावना के आधार पर एकदूसरे से जुड़े हों. उसकी व्याख्या में साम्यवाद केवल राजनीतिक व्यवस्था तक ही सीमित नहीं रह जाता. साम्यवादी दर्शन को उठान देता हुआ मार्क्स , उसे अपने गुरु हीगेल के ‘परमशुभ’ का पर्याय बना देता है. उसके अनुसार साम्यवाद ऐसी अवस्था है, जहां समाज के सभी प्रकार के द्वैतों का शमन हो जाता है. समस्त द्वंद्वों का समाधान हो जाता है. सामाजिकआर्थिकराजनीतिकमनोभौतिक समरसता का वातावरण बनने लगता है. असंतुलन एवं असमानता की भावना कमजोर पड़ जाती है. कह सकते हैं कि साम्यवाद के रूप में वह ऐसे दर्शन की परिकल्पना करता है जहां नियंत्रणकारी समूहों की आवश्यकता ही न हो. मनुष्य जीवन और समाज के उच्चादर्शों से स्वतः अनुशासित हों. धर्म, संस्कृति जैसे परंपरागत मूल्यों के बजाय लोग उत्पादन, समान उपभोग और सहजीवन के वैज्ञानिक नियमों से एकदूसरे से आबद्ध हों. समाज अपनी आंतरिक नैतिकता, समानता के सिद्धांत एवं लोकतंत्र द्वारा मर्यादित रहे . ऐसे राज्य में सरकार की उपस्थिति महज इसलिए जरूरी हो, ताकि वह शेष विश्व को उसकी भावनाओं और संकल्पों से परचा सके. हीगेल के दर्शन में परमशुभ एक लक्ष्य है. चूंकि वर्गहीन समाज की स्थापना का लक्ष्य भी अपने आप में काफी जटिल और लंबी प्रक्रिया है, इसलिए साम्यवाद को समर्पित संस्थाओं को इसके लिए सतत प्रयासरत रहना होता है.

यहां एक स्वाभाविक प्रश्न उभरता है कि यदि साम्यवाद इतनी ही उत्कृष्ट व्यवस्था है तो यह विश्व में इतनी सिमटी हुई क्यों है? बीसवीं शताब्दी के मध्याह्न में विश्व के लगभग आधे देशों में प्रभाव रखने वाला साम्यवाद शताब्दी के अंत तक मात्र पांच देशों का खेवनहार बनकर रह गया, आखिर क्यों? सोवियत संघ जैसी व्यवस्था का पतन हुआ. अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए चीन पूंजीवाद के साथ समझौतावादी रुख अपनाए हुए है. आखिर क्या कारण है कि साम्यवाद जैसी आदर्शोन्मुखी प्रणाली अपनी प्रतिबद्ध सैद्धांतिकी के बावजूद बिखराव का शिकार होने से स्वयं को बचाने में असमर्थ रही? इसके बरक्स पूंजीवाद जिसकी अपनी कोई सैद्धांतिकी नहीं है, आज दुनिया के बड़ेबड़े देशों का भाग्यविधाता बना हुआ है. आखिर क्यों? मुझे लगता है कि साम्यवाद की अतिआदर्शोन्मुखी दार्शनिक प्रतिबद्धता ही उसकी असफलता का कारण है, बड़ा कारण. इसकी तह में जाने के लिए हमें एक बार फिर मार्क्स की शरण में लेनी होगी. कार्ल मार्क्स का कुल जीवनदर्शन दो हिस्सों में बंटा है. द्वंद्वात्मक भौतिकवाद. जिसमें वह सर्वहारा और पूंजीपति के बीच संघर्ष को अनिवार्य मानता है. दूसरा वर्गहीन समाज की स्थापना का साम्यवादी लक्ष्य. जो उसका दूसरा और महत्त्वपूर्ण चरण है. इतना कि उसके अभाव में पहले चरण की सफलता के असफलता में बदलते देर नहीं लगती. यदि ध्यानपूर्वक देखा जाए तो पहली अवधारणा में जबरदस्त राजनीतिक अपील है, जो व्यवस्था से उत्पीड़ित बहुसंख्यक वर्ग को सामूहिक कल्याण की भावना के अनुसार संगठित करने का सामर्थ्य रखती है. यह अपील बहुत कुछ परंपरागत सामंतवादी राजनीति से मिलतीजुलती है. जिसमें युद्ध एवं हिंसा के रास्ते सत्ता हथिया ली जाती थी. अंतर केवल इतना है कि सामंतवाद में प्रायः उग्र राष्ट्रवाद और बाद में तलवार की ताकत के दम पर ही उसको कायम रखा जाता था. अंतर सिर्फ इतना है कि राजशाही में युद्ध किसी एक व्यक्ति की साम्राज्यवादी लिप्साओं द्वारा आम प्रजा पर थोप दिए जाते थे, साम्यवाद में वे सर्वहारा वर्ग द्वारा, जो मार्क्स के अनुसार वास्तविक उत्पादक शक्ति है, परिवर्तन की कामना के साथ तय होते हैं. दोनों अवस्थाओं में हिंसा अपरिहार्य है. इसलिए हम देखते हैं कि जिन देशों में साम्यवादी क्रांति हुई वहां जनाक्रोश का लाभ उठाने के लिए ऐसे नेता उभरकर सामने आए जो सैन्य संचालन में निपुण थे. रूस, चीन, क्यूबा, वियतनाम, आदि इसके उदाहरण हैं. जर्मनी में हिटलर ने जब निरंकुश तानाशाही कायम की तो उसका नारा भी समाजवादी होने का था. भारत आदि देशों में जहां नेतृत्व की बागडोर गैर सैनिक नेताओं के हाथों में थी, वहां साम्यवाद केंद्रीय व्यवस्था का हिस्सा कभी न बन सका. जिन देशों में सैन्य कार्रवाही अथवा सैन्य नेताओं के प्रभाव से साम्यवाद आया, वहां जनता और सामरिक शक्तियां साथसाथ थीं. लेकिन सैन्य नेतृत्व की अपनी कमजोरी होती है. साम्यवादी अनुशासन में स्वयं को ढालने के लिए बाहरी के साथ आंतरिक अनुशासन भी अपेक्षित था. सामरिक बल पर सत्तारूढ़ हुए सर्वहारा संगठन जनता पर बाहरी अनुशासन तो थोप सकते थे, आंतरिक अनुशासन के लिए उनमें न तो आवश्यक नैतिक बल था, न ही वैसा अभ्यास. इसलिए कि यह राजनीति से अधिक सामाजिक कृत्य था, जिसका उनको अभ्यास न था. तलवार की धार और बाहरी अनुशासन के बल पर साम्यवादी शक्तियां जब तक बनी रह सकती थीं, रहीं. बाद में उनको बढ़ते जनाक्रोश की मदद से अपदस्थ कर दिया गया.

पूंजीवाद साम्यवाद के मुकाबले बहुत लचीली व्यवस्था है. वह उपभोक्ताअधिकार, मानवाधिकार, लैंगिक समानता, जातीय भेदभाव के उन्मूलन, मुक्त व्यापार, लोकतंत्र आदि लोकलुभावन नारों के बूते जनता का अपने प्रति अनुकूलन कर लेती है. साम्यवाद आधुनिकता का दावा करते हुए धर्म का विरोध करता था. लेकिन पूंजीवाद धर्म का उपयोग भी अपने पक्ष में माहौल बनाए रखने के लिए करता है. साम्यवाद के प्रचार में लगी शक्तियों की कमजोरी है कि जनता पर अपना प्रभाव बनाए रखने वे उन्हीं रास्तों का अनुसरण करती हैं, जिनपर चलकर धर्म मानवीय विवेक की उपेक्षा का वातावरण बनाता है. शायद इसी कारण अल्पचेतनशील समाजों वे आरोपित धर्म को अपनाने के बजाय परंपरागत धर्म की शरण में जाना उचित समझते हैं. ऐसा नहीं है कि साम्यवादी विचारक इस कमजोरी से अनभिज्ञ हों. अंतोनियो ग्राम्शी ने इसलिए सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से मुक्ति का नारा भी साथसाथ दिया था. उसने सर्वहारा वर्ग से अपील की थी कि वे अपने बीच से बुद्धिजीवी पैदा करें. ताकि उसके अनुरूप राजनीतिक नेतृत्व तैयार हो सके. भारत जैसे देशों में साम्यवाद की असफलता का कारण यह रहा है कि यहां राजनीति में वे लोग आए जो संसद में घुसपैठ के लिए गलियारों की तलाश में थे. साम्यवाद के दार्शनिक पक्ष को समझेसमझाए बिना केवल व्यावहारिक पक्ष की राजनीति को बढ़ावा दिया गया. उन समस्याओं को केंद्र में रखकर आंदोलन चलाए गए, जिनका जनता के वास्तविक विकास से कोई सीधा संबंध न था. उन्होंने सामाज के न तो मूल ढांचे में छेड़छाड़ की जरूरत महसूस की, न आमूल परिवर्तन के लिए वांछित प्रयास किए. वैचारिक निष्ठा के अभाव तथा लोकप्रिय राजनीति से लगाव के कारण वे हताशा की लड़ाई लड़ते रहे हैं.

अंत में एक प्रश्न कि क्या साम्यवाद का कोई भविष्य है. तो मैं बेहिचक बिना कोई पल गंवाए कहूंगा कि है. राजनीतिक सामंतवाद की तरह पूंजीवादी सामंतवादी निरंकुशता नहीं चल सकती. इसलिए एक न एक दिन साम्यवाद को अपनाना ही होगा. शोषणकारी शक्तियों में साम्यवाद का आज भी कितना भय है, वह एक उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है. मार्क्स ने ‘बुर्जुआ’ शब्द का उपयोग अनेक स्थान पर किया है. इस शब्द से उसका आशय उन लोगों से था जिन्होंने तीव्र मशीनीकरण का लाभ उठाकर, पूंजीगत निवेशविनिवेश के माध्यम से अकूत पूंजी जमा की है. उसका उपयोग अब वे श्रमिक शोषण को बनाए रखने के लिए नएनए रूप में कर रहे हैं. लेकिन आधुनिक शब्दकोशों में इस शब्द का अर्थ देख लीजिए, वह ‘मध्यवर्ग’ अथवा ‘शिक्षित मध्यवर्ग’ ही मिलेगा, जिसका मार्क्स की अवधारणा से कोई संबंध नहीं है.

अब यह सर्वहारा वर्ग के ऊपर है कि कब पूंजीवादी प्रलोभनों से बाहर निकलकर आमूल परिवर्तन का आवाह्न करता है.

© ओमप्रकाश कश्यप

1. the philosophers have only interpreted the world, the point is to change it” – Karl Marx in Theses on Feuerbach, 1845.

2. कार्याणि प्रकृतिजेगुणे कर्माणि सर्वशः।

अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।

3. Communism is for us not a state of affairs which is to be established, an ideal to which reality will have to adjust itself. We call communism the real movement which abolishes the present state of things. The conditions of this movement result from the premises now in existence.” —Karl Marx in The German Ideology, 1845.