Category Archives: साम्यवाद, सामाजिक न्याय और राज्य

साम्यवाद, सामाजिक न्याय और राज्यᅳदो

सामान्य

साम्यवाद, सामाजिक न्याय और संस्कृति

 

न्याय एक वर्ग संख्या हैपाइथागोरस

मार्क्स ने मुख्यतः पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की विसंगतियों का विश्लेषण किया है. उसमें एक सिरे पर अनियोजित मशीनीकरण का शिकार श्रमिक वर्ग है, दूसरे पर पूंजीपति उत्पादक. उन दिनों चीन, रूस, ब्राजील आदि देशों की अर्थव्यवस्था की भांति भारतीय अर्थव्यवस्था भी कृषिकेंद्रित थी. इन सभी देशों ने वर्गसंघर्ष के सिद्धांत का प्रयोग स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार किया. जहां आवश्यक लगा, वहां संशोधन भी किया. भारत में ऐसा नहीं हो सका. जबकि मार्क्स तथा उसके वर्गसंघर्ष की सूचना यहां बहुत पहले पहुंच चुकी थी. बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में युवा क्रांतिकारी आजाद भारत के लिए वर्गसंघर्ष की अनिवार्यता को समझते थे. सोवियत संघ की ओर से उन्हें भरपूर मदद भी मिल रही थी. स्वामी विवेकानंद, डॉ. हरदयाल, रासबिहारी बोस, करतार सिंह सराबा, सोहन सिंह भखना आदि पर साम्यवादी विचारधारा का प्रभाव था. भगत सिंह तो लेनिन को अपना आदर्श मानते ही थे. आधुनिक भारत के निर्माताओं में प्रमुखतम स्थान रखने वाले डॉ. आंबेडकर की आरंभिक चेतना भी समाजवादी थी. दक्षिण में रामास्वामी पेरियार ने अपनी राजनीति साम्यवादी संगठनों के सक्रिय सदस्य के रूप में आरंभ की थी. उन दिनों सैकड़ों उत्साही युवा वर्गक्रांति का सपना देखते थे. उनमें से कुछ ने साम्यवाद को समझने के लिए सोवियतसंघ की यात्रा तक थी. उसकी तरफ से साम्यवादीक्रांति की कोशिश में जुटे युवाओं को आर्थिक मदद भी प्राप्त होती थी. देश में साम्यवाद के नाम पर राजनीतिक दल भी बने, लेकिन वे सभी प्रयास केवल राजनीतिक सत्ता हथियाने तक सीमित थे. परिणामस्वरूप हमारे यहां वर्गसंघर्ष की वैसी स्थिति कभी नहीं बन सकीं, जिस तरह बाकी देशों में, जिनका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है. जिन प्रांतों में वर्षों तक साम्यवादी दलों की सरकारें रहीं, वहां भी न तो धर्म को राजनीति से पूरी तरह अलग किया गया, न जाति को किसी प्रकार की चुनौती पेश की गई. न ही वर्गहीन समाज की स्थापना के विशेष प्रयास किए गए. परिणामतः जातिधर्म के चक्रब्यूह में बुरी तरह फंसा भारतीय ‘सर्वहारा’, वर्गचेतना से दूर बना रहा. वह वर्चस्वकारी संस्कृति से इतना अनुकूलित रहा कि उससे बाहर निकलने के विचारमात्र से उसे अपने अस्तित्व पर संकट नजर आने लगता था.

जातिव्यवस्था के शिखर पर ब्राह्मण और उसके आजूबाजू क्षत्रिय और वैश्य रहे हैं. चौथे यानी अंतिम पायदान पर शूद्र. उनकी स्थिति उन मजदूरों से भी कहीं अधिक दयनीय थी, जिन्हें मार्क्स ने अपने विशद ग्रंथ पूंजी में ‘सर्वहारा’ से संबोधित किया था. ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने श्रमिकोंमजदूरों और मेहनतकश जिंदगी जीने वाले छोटेकिसानों, शिल्पकर्मियों को छोटेछोटे जातिसमूहों में बांट दिया है. शूद्र को उसकी सेवा का वास्तविक मूल्य देने के बजाय, स्वर्गादि के प्रलोभन से बहला दिया जाता है. इसलिए संख्या में प्रथम तीन वर्गों से चार गुना होने के बावजूद वे कोई परिवर्तनकारी शक्ति नहीं बन पाते. उनके हित पहले भी एकदूसरे से टकराते थे, आज भी टकराते हैं. परिणामस्वरूप उनकी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा आंतरिक संघर्ष में खपता रहता है. इसका एकमात्र समाधान था कि शूद्रों में वर्गीय चेतना का विस्तार किया जाए. मगर गांधी सहित लगभग सभी कांग्रेसी नेता शूद्रों में वर्गीय चेतना उभारने के बजाय उन्हें हालात से संतोष करने की सलाह देते थे. सामाजिक मोर्चे पर गांधी का समूचा आंदोलन यथास्थिति बनाए रखने तक सीमित था. व्यवस्था परिवर्तन की यदि कोई मांग भी करे तो वे तत्क्षण विरोध पर उतर आते थे. गांधी के अनुसार पाखाना साफ करने का काम दैवीय अनुभव था. ठीक यही बात हमारे आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी पुस्तक ‘कर्मयोग’(2007) में दोहरा चुके हैं. कुल मिलाकर मार्क्स ने जिन परिस्थितियों को वर्गसंघर्ष के लिए जरूरी माना है, उसकी जो कसौटियां तय कीं हैं, भारत में उससे कहीं त्रासद हालात होने के बावजूद यहां क्रांति की बात करना, दिवास्वप्न बना रहा. निम्नस्थ वर्गों में वर्गीय चेतना की कमी, शीर्षस्थ वर्गों के उत्पीड़न और अत्याचारों को स्थायी बनाती है. उसके अभाव में बहुसंख्यक वर्ग छोटेछोटे टुकड़ों में बंटकर अपनी प्रभावी क्षमता को नष्ट करता रहता है.

ऊपर से सत्तासीन अभिजन द्वारा यथास्थिति बनाए रखने की कूटनीतिक चालें. जो कभी दान, कभी सहयोग, तो कभी न्याय के नाम पर अपनी आय का एक हिस्सा उन कार्यों पर खर्च करता है, जिनके माध्यम से बहुजन को निरंतर भुलावे में रख सके. उन्हें लगे कि वर्तमान व्यवस्था ही उनके लिए सर्वाधिक हितकारी और श्रेयस्कर है. यथास्थिति बनाए रखने के लिए शक्तिशाली अभिजन अनेक रणनीतियां अपनाता है. भारतीय संस्कृति के संदर्भ में उसका भावप्रवण नारा हैᅳ‘अनेकता में एकता.’ जनाक्रोश से बचने के लिए अल्पसंख्यक अभिजन प्रायः इस तर्क के माध्यम से भारतीय संस्कृति का महिमामंडन करता है कि तमाम भिन्नताओं के बावजूद भारतीय संस्कृति में एकता के तत्व समाहित हैं. स्कूलों में बच्चों को यह पाठ शुरुआत से ही पढ़ाया जाता है. इस नारे के साथ भारतीय समाज के अंतर्विरोधों तथा उस उत्पीड़न की ओर से आंखें मूंद ली जाती हैं, जिसका सामना बहुजन समूह शताब्दियों से करते आए हैं. प्रकारांतर में ‘अनेकता में एकता’ का मिथ सांस्कृतिक शोषण का शिकार रहे लोगों के लिए बोझ बन जाता है. चूंकि सांस्कृतिक प्रतीक आस्था और विश्वास के रास्ते जीवन में जगह बनाते हैं, उन्हें तर्क और संशय से प्रायः परे रखा जाता हैइस कारण उनसे निपटना आसान नहीं होता. दूसरी ओर अल्पसंख्यक अभिजन यथास्थिति बनाए रखने के लिए हर समय यथाशक्ति प्रयत्नशील रहते हैं. संस्कृति के शोषणकारी तत्वों का वे मिथों के माध्यम से निरंतर महिमामंडन करते रहते हैं. आवश्यकता पड़ने पर नए मिथ गढ़ना अथवा लोकप्रचलित मिथों की स्वार्थानुकूल व्याख्या करना उनकी पुरानी आदत है. वौद्धिक स्तर पर शीर्षस्थ जातियों पर पूरी तरह निर्भर बहुजन समुदाय, इन चालाकियां को समय रहते समझ नहीं पाता; और अपनी अज्ञानता के कारण ‘अनेकता में एकता’ की भ्रांति को सच माने रहता है.

वर्गचेतना, वर्गसंघर्ष की प्रथम और अनिवार्य शर्त है. जातिभेद का शिकार रहे, दैवीयअनुकंपा की आस में जीने वाले तथा शोषण को अपनी नियति मान चुके भारतीय समाज में शुरू से ही इसका अभाव रहा है. सांस्कृतिक एकता की दुहाई भजनकीर्तन, पूजापाठ जैसे अनुत्पादक तरीकों, त्योहारों तथा उन सामान्य रीतिरिवाजों के माध्यम से दी जाती है, जो विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच एकदूसरे के साथ रहते, साथसाथ काम करते हुए स्वाभाविक रूप से एकदूसरे समूह के बीच चले आते हैं. इसके बहाने अल्पसंख्यक अभिजन आसानी से उन प्रतीकों को थोपने में सफल हो जाता है, जो वर्गीय असमानता तथा अल्पसंख्यक शीर्षस्थ अभिजन की सामाजिकसांस्कृतिक श्रेष्ठता के मिथ को, बहुजन के मानस पर स्थापित करते हैं. गांवों में दिवाली से चार दिन पहले कुम्हार घरघर दिये पहुंचाता है. यत्न से दीपक बनाने, घरघर पहुंचाने के बावजूद कीमत वही मिलती है, जो यजमान तय करता है. अपने ही श्रमोत्पाद का मूल्यांकन करने का अधिकार कुम्हार को नहीं होता. होली को समसरता का त्योहार माना जाता है. कहा जाता है कि सारे वर्गभेद होली के रंगों में बह जाते हैं. असल में ऐसा नहीं है. उस दिन भी पुजारी पूजापाठ करता है, बढ़ई लकड़ियां चीरता है और कुम्हार हमेशा की तरह घरघर मिट्टी के बर्तन सप्लाई करता है. यही स्थिति बाकी त्योहारों की भी है. इन विसंगतियों को प्रायः सहजीवन और समरसता, जिन्हें समाज में समानता के पूरक के रूप में पेश किया जाताके नाम पर पचा लिया जाता है. जाहिर है भारतीय संस्कृति को लेकर ‘अनेकता में एकता’ का मिथ भ्रम अथवा भावुक अवधारणा से इतर कुछ भी नहीं है. जाति और वर्ण के आधार पर असमानता को नैसर्गिक मान लेने वाली भारतीय संस्कृति, मूलतः वर्चस्वकारी संस्कृति है. उसे मुट्ठीभर लोगों की मर्जी से, उन्हीं के द्वारा, उन्हीं की स्वार्थसिद्धि के लिए कायम रखा गया है. सांस्कृतिक अंतर्विरोधों एवं तज्जनित असंतोषों को नकारने की बात, मूलतः सामाजिक यथास्थिति बनाए रखने की चाहत है. यह काम वही लोग करते हैं, जिन्हें इस संस्कृति ने असीमित विशेषाधिकार देकर अपने सिर पर सवार रखा है. बहुजन समूहों की अज्ञानता, आपसी स्पर्धा और दूसरों के लिए श्रम करने की प्रवृत्ति ने उन्हें शक्तिशाली बनाया हुआ है.

अनेकता में एकता’ की दावेदार भारतीय संस्कृति में अंतर्विरोधों की भरमार है. इसलिए उसमें अंतर्संघर्ष भी हैं. वैदिक काल में उसे आजीवकों, लोकायतियों, वैनायिकों, चार्वाकों जैसे भौतिकवादी चिंतकों की ओर से चुनौती मिलती थी. कालांतर में श्रमणसाधकों ने आश्रमों में पनपने वाली कर्मकांड संस्कृति को चुनौती पेश की और मध्यमार्गी तत्वदर्शन के भरोसे ऐसी कामयाबी हासिल की कि कर्मकांड केंद्रित वैदिक धर्मदर्शनों को, आने वाली कई शताब्दियों तक पुनः आश्रमों और कंदराओं में शरण लेने को विवश होना पड़ा. बौद्ध दर्शन के पराभव की शुरुआत हुई तो पुरोहित स्तर के धर्माचार्यों ने स्मृति, पुराण जैसे ग्रंथों के माध्यम से धार्मिक कर्मकांडों, पाखंडों को नए सिरे से थोपना आरंभ कर दिया. उस दौर में भी उसका सामना श्रमणों और भौतिकवादी दार्शनिकों द्वारा किया गया. उसके कुछ अर्से बाद यहां इस्लाम का आगमन हुआ. तैंतीस करोड़ देवीदेवताओं के बोझ से दबे हिंदू धर्म को इस्लाम के एकेश्वरवाद की ओर से चुनौती मिली. उसमें जीत एकेश्वरवाद की हुई. जातीय भेदभाव झेल रही जातियों में इस्लाम के प्रति आकर्षण बढ़ने लगा. धर्मांतरण की बढ़ती घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए शंकराचार्य को वेदांत में अद्वैतवाद के समर्थन में आना पड़ा. मध्यकाल में धर्म के नाम पर तंत्रमंत्र, ऊंचनीच और पाखंड बढ़े तो संतकवि आड़े आ गए. तुकाराम, रैदास, कबीर, दादू आदि ने धार्मिक पाखंडियों को खूब ललकारा. औपनिवेशिक भारत में हालात बदले. अठारवींउनीसवीं शताब्दी के वैचारिक आंदोलनों से अनुप्रेत अंग्रेज अपेक्षाकृत विकसित संस्कृति अनुगामी थे. उनके समक्ष ब्राह्मण संस्कृति की अतीतोन्मुखी महानता कारगर न थी. दूसरे उन्हें योरोप के जनांदोलनों का अनुभव था. इसलिए विपुल जनशक्ति की अवहेलना उनके लिए संभव न थी. इसलिए उन्होंने यहां विधि के शासन को लागू किया.

ये उदाहरण जहां भारतीय संस्कृति के असमानताकारी रूप को सामने लाते हैं, वहीं दिखाते हैं कि भारतीय समाज में द्वंद्वात्मकता के लक्षण आरंभ से ही रहे हैं. वे काफी विस्तृत हैं. इस वर्गभेद को आर्यअनार्य, सवर्णअवर्ण, ब्राह्मणअब्राह्मण, तथाकथित ऊंची जाति वाले, नीची जाति वाले जैसा कुछ भी कहा जा सकता है. भारतीय समाज के आंतरिक विभाजन को दर्शाने वाला एक महत्त्वपूर्ण आधार और भी है. ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य अनुत्पादक वर्ग हैं. तीनों ही दूसरों के श्रम पर आश्रित रहते हैं. इसके बावजूद उन्हें ‘सवर्ण’ होने का गुमान रहता है. वर्णश्रेष्ठता का यह दंभ, श्रम और समानता दोनों का सिद्धांततः विरोधी है. जो संस्कृति इस दंभ को शरण देती है, वह शारीरिक श्रम को बौद्धिक श्रम से हेय मानती है. परिणामस्वरूप यहां जो हुनरमंद है, जो परिश्रम करता है, अपने शिल्पकौशल के भरोसे समाज को संवारता हैउसके हिस्से आजीवन तिरष्कार और उपेक्षा ही आती है. आर्थिक दृष्टिकोण से भारतीय संस्कृति मूलतः अनुत्पादक संस्कृति सिद्ध होती है, जो उत्पादनकर्म में लगे श्रमिकों तथा कामगारों को, बौद्धिक कर्म का दिखावा करने वाले वर्गों से हेय माने रहती है.

इस तरह भारतीय समाज अनायास ही दो हिस्सों, उत्पादक और अनुत्पादक समूहों में बंट जाता है. संख्या में उत्पादक समूह अपने प्रतिद्विंद्वी से लगभग चार गुना होता है. मगर समाज और संस्कृति की संरचना ऐसी है कि इस अधिसंख्यक वर्ग के हाथों में न्यूनतम संसाधन और नाकुछ अधिकार आते हैं. जिस अल्पसंख्यक अभिजन को यह संस्कृति विशेषाधिकार सौंपकर अत्यंत शक्तिशाली बनाती है, वह मुख्यतः अपने स्वार्थ के लिए काम करता है. दिखने में ब्राह्मणक्षत्रियवैश्य तीन अलगअलग वर्ण हैं, जो क्रमशः धर्म, राजनीति और अर्थसंपदा का प्रबंधन करते हैं. बहुजन मुख्यतः सेवाप्रदाता वर्ग है. वह वर्णव्यवस्था में सबसे निचला या उससे बाहर का हिस्सा है. दोनों ही स्थितियों में उसका दायित्व शीर्षस्थ वर्गों की सेवा करना है. उसे न तो अपने श्रमोत्पाद पर अधिकार होता है, न ही संपत्ति अर्जित करने का अधिकार उसे है. उसका कर्तव्य है सेवाश्रम के बदले जो मिले उसे अनुकंपाभाव से ग्रहण करना. वह अनेक जातियों, वर्गों, उपवर्गों और पेशों में बंटी, संख्याबहुल और प्रभावी जनशक्ति है. प्रत्येक का पेशा ही उसकी पहचान है. इनके सपने छोटे होते हैं, संघर्ष बड़े. छोटीछोटी जरूरतों की खातिर इन्हें एकदूसरे के साथ स्पर्धा करनी पड़ती है. अनेक जातियों, वर्गों, उपवर्गों में बंटा होने के कारण इस वर्ग की प्रभावी शक्ति क्षीण हो जाती है. दूसरी ओर सामान्य हित उच्चस्थ वर्णों को आपस में जोड़े रखते हैं. प्रतिस्पर्धा उच्चस्थ वर्गों में भी रही है. किंतु उसका आधार जीवन के मूलभूत प्रश्नों, समस्याओं से प्रभावित नहीं होता. उदाहरण के लिए परशुराम द्वारा पृथ्वी को 21 बार क्षत्रियविहीन करने का मिथ क्षत्रियों के विशेष रोष का कारण नहीं बन पाता. यह जानते हुए कि जो संस्कृति ब्राह्मण को श्रेष्ठतम ठहराती है, वह क्षत्रियों को राजकर्म का अधिकार भी देती है. इसलिए वर्णव्यवस्था के आगे जब भी कोई चुनौती आती है; अथवा उनमें से किसी एक वर्ण के अधिकारों पर हमला होता हैतीनों एकजुट भाव से उसका सामना करते हैं. इससे संख्या में कम होने के बावजूद पहला वर्ग शक्तिशाली बनकर, खुद को समाज का नियामक और वास्तविक कर्ता सिद्ध करने में सफल हो जाता है.

व्यवस्था में आमूल परिवर्तन हेतु आवश्यक है कि उत्पीड़ित लोगों की वर्गचेतना को उभारा जाए. लोगों को बताया जाए कि ‘अनेकता में एकता’ का मिथ संस्कृति के वर्चस्वकारी स्वरूप को बनाए रखने का उद्यम हैं. सामाजिक क्रांति को सफल बनाने के लिए आवश्यक है कि उत्पीड़न के शिकार वर्गों को उनकी स्थिति और अधिकारों से परचाया जाए. बताया जाए कि उनके हित साझे है. जो संस्कृति उन्हें भेद करना सिखाती है, समाज को जन्म और पेशों के आधार पर अलगअलग जातियों में बांटती है, जो श्रम की अवमानना करती हैवह उनकी संस्कृति हो ही नहीं सकती. इसकी शुरुआत ज्योतिराव फुले द्वारा की गई. फुले ने उन मिथकों का पुनर्पाठ किया, जिनसे भारतीय संस्कृति की पहचान निर्धारित की जाती है. जिनके सहारे सवर्ण जातियां शताब्दियों से अपना श्रेष्ठत्व गैरसवर्ण समूहों पर थोपती आई थीं. अवसर अनुकूल था. शिक्षा के द्वार सभी वर्गों के लिए खुल चुके थे. ‘मनुस्मृति’ की जगह ‘कानून के राज्य’ ने ले ली थी. नए कानून के आगे सभी नागरिक बराबर थे. ज्योतिराव फुले ने निर्भय होकर हिंदू मिथों के बारे में लिखा. धर्मग्रंथों का पुनर्पाठ प्रस्तुत किया. शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए, अपनी पत्नी के साथ मिलकर जगहजगह स्कूल खोले. स्त्रियों की पढ़ाईलिखाई को जरूरी माना. धीरेधीरे लोगों को यह एहसास होने लगा कि जिस धर्म और संस्कृति की वे अभी तक पूजा करते आए हैं, असल में वह एक षड्यंत्र, उन्हें बरसोंबरस गुलाम बनाए रखने का प्रलोभनकारी माध्यम है. जिन मिथकीय प्रतीकों, स्वार्थी विधान के भरोसे वे अभी तक शासित होते आए हैं, वे अंतिम या परमसत्य नहीं हैं. बल्कि शक्तिशाली जातीय समूहों द्वारा उन्हें मानसिकशारीरिक रूप से दास बनाए रखने के लिए की गई सोचीसमझी साजिश हैं. उनके सहारे शीर्षस्थ जातियां शताब्दियों से उनपर राज करती आई हैं. फुले के प्रयासों से पिछड़े और अंतज्य समाजों में वर्गचेतना पनपने लगी.

फुले के बाद परिवर्तनकारी राजनीति की बागडोर उत्तर में डॉ. आंबेडकर के हाथों में आ गई. वे अपने समय के नेताओं में सर्वाधिक पढ़ेलिखे, बुद्धिमान, व्यवहारकुशल, दूरदृष्टा और लक्ष्य के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध नेता थे. जिस वर्ष फुले का निधन हुआ, उसी वर्ष उनका जन्म हुआ था. मानो समय खुद बदलाव के लिए आमादा था. इसलिए एक जिम्मेदार और समर्पित नेता द्वारा शुरू किए गए आंदोलन की कमान संभालने के लिए उसने वैसे ही जिम्मेदार, समर्पित, बुद्धिमान और संघर्षधर्मी व्यक्तित्व को समयपटल पर आगे कर दिया था. डॉ. आंबेडकर के आंदोलन का दायरा व्यापक था. उन्होंने बहुजन अस्मिता के प्रश्न को उठाया. फुले का अनुसरण करते हुए धार्मिक प्रतीकों की अधुनातन व्याख्या को अपने हाथ में लिया. उन मिथों को आड़े हाथों लिया जो सामाजिकसांस्कृतिक शोषण का माध्यम बने थे. उनका सबसे बड़ा काम जातिव्यवस्था पर हमला था, जिसने तथाकथित सवर्णों को तिलमिलाने को विवश कर दिया. जिस जाति के आधार पर वे बहुजन का शोषण करते आए थे, डॉ. आंबेडकर ने उसी के संगठनसामर्थ्य का सहारा लेकर दलितों और पिछड़ों को एकजुट करने में कामयाबी हासिल की थी. इससे शीर्षस्थ जातियों की चिंता बढ़ना स्वाभाविक था. वे डॉ. आंबेडकर के वर्गशत्रु बन गए. मगर डॉ. आंबेडकर के बौद्धिक तेज के आगे उनकी एक न चली.

देश के उत्तरपश्चिम में जिस संकल्प के साथ डॉ. आंबेडकर आगे बढ़ रहे थे, दक्षिण भारत में वही जिम्मेदारी, उतनी ही शिद्दत के साथ रामास्वामी पेरियार संभाले हुए थे. दोनों के व्यक्तित्व और विचारों में अंतर था, परंतु लक्ष्य एक ही था, जिसे लेकर वे पूरी तरह स्पष्ट और ईमानदार थे. आरंभ में पेरियार पर साम्यवाद का असर था. गांधी दक्षिण अफ्रीका से लौटे तो पेरियार उनसे प्रभावित होकर कांग्रेस में शामिल हो गए. गांधी के आवाह्न पर उन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार कार्यक्रमों में हिस्सा लिया. असहयोग आंदोलन में लाठियां खाईं. लेकिन बहुत जल्दी उनका कांग्रेस तथा उसके नेताओं से मोह भंग हो गया. उसके बाद सक्रिय राजनीति से संन्यास लेकर उन्होंने खुद को सामाजिक आंदोलनों के समर्पित कर दिया. ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के माध्यम से उन्होंने बहुजन समूहों के बीच वर्गीय चेतना फैलाने का काम किया. उन्हें अपेक्षित सफलता भी मिली. भारत को आधुनिक राज्य बनाने में डॉ. आंबेडकर और पेरियार का लगभग बराबर का योगदान है.

डॉ. आंबेडकर और पेरियार के प्रयासों से दलितों और शोषितों में वर्गचेतना का संचार हुआ था. सवाल है यदि उन सभी का मकसद समानताआधारित समाज की रचना करना, भेदभावों को मिटाना था, तो उसके लिए ‘मार्क्सवाद’ या ‘साम्यवाद’ की प्रचलित सैद्धांतिकी को क्यों नहीं अपनाया गया? यह सवाल उन साम्यवादियों से भी है जो वर्गहीन समाज की स्थापना को लेकर राजनीति में आए थे; और समस्त वर्गभेदों का उन्मूलन कर समताआधारित समाज का सपना देखते थे. प्रथम दृष्टया इसे हम भारतीय वामपंथ तथा सामाजिक न्याय के पक्ष में चलने वाले आंदोलनों की कमजोरी मान सकते हैं. इसके कारणों को भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की मामूली पड़ताल से समझा जा सकता है. यहां उनका वर्णन विषयांतर होगा. इतना कह सकते हैं कि भारत में वर्गक्रांति की शुरुआत ‘सामाजिक न्याय’ की मांग के तहत हुई थी. हालांकि वर्गसंघर्ष की अवधारणा को ‘सामाजिकन्याय’ की भावना तक सीमित कर देना कभी निरापद नहीं रहा. इससे बहुजन समाज की एकता प्रभावित हुई. इसे समझने के लिए ‘सामाजिक न्याय’ की सैद्धांतिकी तथा उन परिस्थितियों को समझना होगा, जिनके कारण ‘सामाजिक न्याय’ को अधिकांश अस्मितावादी आंदोलनों का लक्ष्य मान लिया गया था.

साम्यवाद बनाम सामाजिक न्याय

साम्यवाद की मुश्किल यह रही है कि बीसवीं शताब्दी के आरंभ में जब बड़े साम्राज्यवादी राज्यों का गठन आरंभ हुआ, और जिन दिनों पूरी दुनिया को साम्यवाद की परिधि में शामिल करने का स्वप्न देखा जा रहा था, उन्हीं दिनों दुनिया को दो विश्वयुद्धों का सामना करना पड़ा. वे युद्ध केवल राजनीतिक उद्देश्य के लिए नहीं लड़े गए थे. उनके पीछे पूंजीपति वर्ग की महत्त्वाकांक्षाएं भी शामिल थीं. प्रौद्योगिकीय क्रांति के दौर में हथियार निर्माण के क्षेत्र में भारी निवेश हुआ था. उत्पाद की खपत के लिए हथियारनिर्माता कंपनियों को नए बाजारों की जरूरत थी. उनका हित इसी में था कि दुनिया पर युद्ध का खतरा मंडराता रहे. देश एकदूसरे से लड़तेझगड़ते रहें. इस उद्देश्य में वे कामयाब भी रहीं. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा बेहद जरूरी मुद्दा बन गया. आंतरिक और बाहरी सुरक्षा के नाम पर हथियारों की अधिकाधिक खरीद की जाने लगी. इनमें भारत जैसे विकासशील देश भी पीछे न थे, जिनका कथित रूप से अहिंसा में विश्वास था और जिन्होंने अपनी आधीअधूरी स्वाधीनता अहिंसक तरीकों से अर्जित की थी. 1930 में दुनियाभर में आर्थिक मंदी पैठी हुई थी. हालांकि मंदी के जो मापदंड निर्धारित किए गए थे, वे स्वयं संदेह से परे न थे. राजनीति और पूंजीपतियों के गठजोड़ के चलते उस समय तक अर्थव्यवस्था की रफ्तार का आकलन करने के पैमाने बदल चुके थे. चुनिंदा कंपनियों की विश्वबाजार में स्थिति से मंदी या तेजी का आकलन किया जाने लगा था. आभासी मंदी से इतर जनता की दुर्दशा का असली कारण यह था कि सरकारों ने अपने समस्त संसाधन युद्ध और युद्ध की तैयारियों पर झोंक दिए थे. साम्यवादी देश भी इसमें पीछे न थे. इस कारण वहां जनअसंतोष पनपने लगा था. उसे दबाने तथा प्रतिस्पर्धी पूंजीवादी देशों के साथ विकास की दौड़ में बने रहने की जरूरत ने स्टालिन जैसे कट्टर साम्यवादी नेताओं को जगह दी.

प्रथम विश्वयुद्ध दुनिया में भारी तबाही का कारण बना था. और जैसा कि बताया गया है, युद्ध की परिस्थितियां बनाने में अतिमहत्त्वाकांक्षी नेताओं तथा पूंजीपतियों का समान योगदान था. लेकिन जब युद्ध के परिणाम आने लगे तो आर्थिक घराने बड़ी चतुराई से खुद को उनसे अलग करने में कामयाब हो गए. इस कारण युद्ध के बाद उत्पन्न समस्याओं तथा उनसे उपजे जनाक्रोश का सामना संबंधित देशों की सरकारों को करना पड़ा. युद्ध के मोर्चे पर सारे संसाधन झोंक चुके राष्ट्रप्रमुखों के लिए उस समय एकमात्र रास्ता था कि आर्थिक विपन्नता से घिर चुके राज्य के विकास; तथा जनाक्रोश से बचने के लिए पूंजीपतियों को आमंत्रित किया जाए. यही हुआ भी. दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति के पश्चात, पुनर्निर्माण के नाम पर सारे ठेके, बड़ीबड़ी पूंजीप्रधान कंपनियों को सौंप दिए गए. आर्थिक विकास के नाम पर उन्हें तरहतरह की छूट दी जाने लगी. वह विचित्र संयोग था. जब तीसरी दुनिया के देश तेजी से योरोप और अमेरिका की औपनिवेशिक दासता से बाहर आ रहे थे, तभी बड़ीबड़ी पूंजीवादी कंपनियां, तीसरी दुनिया के देशों में पहुंचकर वहां आर्थिक औपनिवेशीकरण की शुरुआत कर रही थीं. अर्थसत्ता का उत्तरोत्तर सबलीकरण राजसत्ता को कमजोर कर रहा था. उसका प्रभाव दुनिया के प्रायः सभी देशों पर था. चूंकि तीसरी दुनिया के अल्पविकसित और विकासशील देश स्थानीय समस्याओं और समाज की उत्तरोत्तर बढ़ती महत्त्वाकांक्षाओं के लिए पूंजीवाद पर आश्रित हो चुके थे, इसलिए वे आर्थिक औपनिवेशीकरण के सर्वाधिक शिकार थे.

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पूंजीवाद ने भी खुद को बदला था. सामाजिक भेदभाव और भारी आर्थिक विषमता से गुजर रहे देशों में वर्गसंघर्ष की स्थिति दुबारा न बने, इसके लिए जनसाधारण में यह विश्वास जगाना अत्यावश्यक था कि वह पूंजीवाद के विस्तार में ही अपना भला समझे. इसके लिए वह सरकार के साथ मिलकर लोगों की मनोरचना बदलने में लगा था. लोगों की प्रशंसा तथा सहानुभूति बटोरने के लिए उसने सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, उपभोक्ता अधिकार जैसे कई मुखौटे पहने हुए थे. पूंजीवादी कंपनियों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा, खेती जैसे बुनियादी क्षेत्रों में सुधारवादी कार्यक्रमों में हिस्सेदारी आरंभ कर दी थी. इसी दौर में मान लिया गया कि जनसमस्याओं का समाधान अकेले सरकार द्वारा संभव नहीं है. विकासकार्यक्रमों में सरकार की मदद हेतु गैरसरकारी संस्थाओं को बढ़ावा दिया जाने लगा था. उन संस्थाओं के संचालन का दायित्व पढ़ेलिखे, समाज के प्रबुद्ध हिस्से के अधीन था, जिसकी जनता पर पकड़ थी. उसे लुभाने के लिए बड़े कारपोरेट घरानों ने अपनी आय का एक हिस्सा, जाहिर है बहुत मामूली हिस्सा, चंदे तथा अनुदान के रूप में गैरसरकारी संस्थाओं को देना आरंभ कर दिया. एक तरह से वह जनता का ही पैसा था. गैरसरकारी संस्थाओं को दिए गए चंदे को लोककल्याण की मद में किया गया खर्च दिखाकर, पूंजीवादी कंपनियां टैक्स के रूप में दी जाने वाली धनराशि में कटौती कर लेती थीं. चूंकि पूंजीपति घरानों की ओर से यह पैसा सीधे गैरसरकारी संस्थाओं को जाता था, इसलिए परोक्ष रूप में वे जनता के पढ़ेलिखे वर्गों की, उन लोगों की जिन्हें जनता की समस्याओं की समझ थी और जो समाज के भीतर रहकर काम करने का अनुभव रखते थेसहानुभूति बटोर रहे थे. इन संस्थाओं में प्रायः वही मध्यमवर्ग शामिल था, जिसकी पिछली पीढ़ियां अमेरिका और योरोपीय देशों मेंआम मताधिकार, न्यूनतम मजदूरी तथा लोकतंत्र, समाजवाद, साम्यवाद, अराजकतावाद जैसे राजनीतिक दर्शनों के समर्थन में सड़कों पर उतरी थीं; जिनकी बौद्धिक चेतना ने अनेक नए राजनीतिक दर्शनों को जन्म दिया था. परिणामस्वरूप पूरी दुनिया में पूंजीवाद के समर्थन में माहौल बन रहा था. साम्यवाद, समाजवाद जैसे दर्शन जिन्हें कभी आधुनिक और उदार समाज की पहचान से जोड़ा गया था, की प्रतिष्ठा निरंतर घट रही थी. युवा पीढ़ी तो उन्हें समयबाह्यः मान चुकी थी.

गैरसरकारी संस्थाएं समाज में पूंजीवाद के लिए अनुकूल माहौल बनाने का काम कर रही थीं. यह कार्य समाजकल्याण, सामाजिक न्याय, कला, साहित्य एवं संस्कृति के प्रचारप्रसार के नाम पर किया जा रहा था. सरकारों को भी इससे लाभ था. योजनाओं के कार्यान्वन की जिम्मेदारी स्वयंसेवी जनसंस्थाओं के कंधों पर डालकर वे सीधी जिम्मेदारी से बचने लगी थीं. इससे साम्यवाद के उभार के दिनों में पूंजीवाद के प्रति जो आक्रोश पनपा था, वह धीरेधीरे घटने लगा. इसलिए वह अकारण नहीं है कि 1930 का दशक जो वैश्विक मंदी का दशक भी थाᅳ‘सामाजिक न्याय’ के राज्यों की कल्याण नीति का प्रमुख हिस्सा बनने का भी दशक बना. उसके बाद यह शब्दयुग्म, विशेषकर लोकतांत्रिक राज्यों में इस तरह प्रचलित हुआ कि उसे उत्तरदायी सरकार के प्रमुख लक्षण के रूप में गिना जाने लगा. उससे लोगों की मनोरचना में ऐसा बदलाव आया, जो पूंजीवादी विस्तार के अनुकूल था. उपभोक्तावाद के पक्ष में माहौल बनाने के लिए लोकतंत्र, सामाजिक न्याय तथा व्यक्तिस्वातन्त्र्य जैसी आधुनिक विचारधाराओं को अपनाया गया. फिर जैसेजैसे पूंजीवाद का विस्तार हुआ, राज्य के प्रमुख उद्देश्य के रूप में ‘सामाजिक न्याय’ की महत्ता लगातार बढ़ती गई.

उससे पहले की व्यवस्थाओं में धर्म व्यक्ति, समाज और राज्य तीनों की मार्गदर्शक शक्ति हुआ करता था. राजा खुद को ईश्वरीय प्रतिनिधि बताकर जनता पर अपनी इच्छाएं थोपता था. उस व्यवस्था में ‘कल्याण’ धर्म और ईश्वर के नाम पर, दान अथवा राज्य की अनुकंपा के रूप में निचले तथा जरूरतमंद वर्गों को अंतरित होता था. आजकल वह ‘सामाजिक न्याय’ जैसा आकर्षक से जाना जाता है. उसमें न्याय नागरिक का अधिकार न होकर सहायता, अनुदान, प्रोत्साहननिधि जैसे नामों से जनता की ओर अंतरित होता है. यह पूंजीवाद की कार्यशैली के अनुरूप है. ‘ट्रिकल डाउन थियरी’ जिसे ‘रिसाव का सिद्धांत’ कहा जाता है, में समृद्धि नीचे की ओर धीरेधीरे रिसकर पहुंचती है. कुछ विद्वान इसी आधार पर पूंजीवाद की प्रशंसा करते हैं. किंतु ‘रिसाव का सिद्धांत’ सामान्यतः तब कारगर होता है, जब ऊपर के स्तर पर ‘बफर’ समृद्धि हो. चूंकि पूंजीपति अपनी आमदनी को खर्च करने के बजाय पुनर्लाभ हेतु उसका निवेश करना पसंद करता हैइसलिए पूंजीवादी व्यवस्था में असमानता का अनुपात निरंतर बढ़ता जाता है. ऐसे देश जो लोकतांत्रिक होने का दावा करते हैं, किसी न किसी रूप में वे सभी ‘सामाजिक न्याय’ के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते रहते हैं. वे इस बात को बढ़ाचढ़ाकर जनता के बीच लाते हैं कि सामाजिक न्याय को लेकर उनकी योजनाएं जनता की सामान्य सहमति के आधार पर चलाई जाती हैं. उनका उद्देश्य समाज में व्याप्त गैरबराबरी को समाप्त करना नहीं होता. न ही वे उन समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश करते हैं जो सामाजिक विषमताएं पैदा कर, कमजोर वर्गों के लिए ‘सामाजिक न्याय’ को प्रासंगिक बनाती हैं. परिणामस्वरूप न्याय के नाम पर बनीं योजनाएं राज्य की अनुकंपा, अनुदान जैसी वे धर्मप्रधान राजतंत्र में होती हैंलौकतांत्रिक राज्यों में भी बनी रहती हैं.

देखनेसुनने में ‘सामाजिकन्याय’ बड़ा रुपहला शब्द है. अधिकांश समाजों में उसे मनुष्यता के पर्याय, राज्य के पुनीत कर्तव्य के रूप में लिया जाता है. दूसरी ओर यह भी सच है कि उसका लक्ष्य गैरबराबरी को समाप्त करना नहीं होता. न ही वह उन समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश करता है जो सामाजिक विषमताएं पैदा कर, कमजोर वर्गों के लिए ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर विशेष कार्यक्रम चलाने की जरूरत पैदा करती हैं. उल्टे परंपरा, संस्कृति तथा निजी पहचान के नाम पर अन्याय एवं असमानताकारी संस्थाओं का संरक्षण किया जाता है. ‘सामाजिक न्याय’ के तहत बनाई जाने वाली अधिकांश योजनाएं प्रायः सस्ते भोजन, सामान्य शिक्षा, सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं तथा इतिहास एवं संस्कृति के सरंक्षण संबंधी कार्यक्रमों तक सीमित रहती हैं. इसलिए वे कमजोर वर्गों का ज्यादा भला नहीं कर पातीं. यही कारण है कि सरकार द्वारा लोकतंत्र और कल्याण राज्य की दावेदारी के बावजूद, राज्यों की केंद्राभिमुखता में कोई कमी नहीं आ पाती. पहले वे पुरोहितों और सामंतों के संरक्षण तथा उन्हीं के नेतृत्व में चलाई जाती थीं. नए विधान में उनका कार्यान्वन विशेषज्ञों के नेतृत्व में किया जाता है, जो उन्हीं वर्गों से आते हैं, जिनके हित असमानताकारी संस्कृति से जुड़े होते हैं. अपनेअपने स्वार्थ के लिए पूंजीपति और शीर्षस्थ राजनीतिज्ञ उनका संरक्षण करते हैं. कल्याणकार्यक्रमों में जनसहभागिता का अभाव, लोगों के आत्मविश्वास को कमजोर कर, उन्हें पराश्रित बनाए रखता है. इससे उन योजनाओं का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है.

सवाल है कि यदि केंद्र उतना ही शक्तिशाली है बना जितना वह धर्मकेंद्रित व्यवस्थाओं में था और आमजन की हालत वैसी की वैसी थी, तो धर्म के स्थान पर, ‘सामाजिक न्याय’ जैसी नई अवधारणाओं को लाने से शीर्षस्थ वर्गां की कौनसी स्वार्थसिद्धि हो रही थी? इसके लिए धर्म के मनोविज्ञान को समझना आवश्यक है. दुनिया के जितने भी धर्म हैं, कमोबेश सभी इस संसार और सांसारिक सुखों के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं. लगभग सभी इसपर सहमत हैं कि सांसारिक सुख जीवन के अंतिम उद्देश्यों की प्राप्ति में बाधक हैं. शंकर का मायावाद, विभिन्न नामों और मिलेजुले सिद्धांतों के आधार पर कमोबेश हर धर्म का हिस्सा है. किसी न किसी रूप में वे सभी सांसारिक सुखों को हेय मानते हैं. यह सोच मुक्त उपभोग को बढ़ावा देने की सबसे बड़ी बाधा है. दुनियावी सुखों के प्रति नकारात्मक सोच के चलते उपभोक्तावाद, जिसके भरोसे पूंजीवाद ने अपनी विस्तारवादी नीतियों को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है, उस तरह से पनप ही नहीं सकता था, जिस तरह से वह आज है. इसलिए पूंजीवादी तंत्र के लिए धर्म गैरजरूरी संस्था है. हां, सांप्रदायिकता पूंजीवाद का खूब भला करती है. बढ़ती सांप्रदायिकता लोगों के अंतर्मन में भ्रम की सृष्टि करती है. उससे एकदूसरे के प्रति संदेह, स्पर्धा तथा जीवन के प्रति अनिश्चितता बढ़ती है. प्रकारांतर में वह उपभोग की संस्कृति को बढ़ावा देती है.

हमारा आशय लोकतंत्र, सामाजिक न्याय जैसी आधुनिक विचारधाराओं की महत्ता को नकारना नहीं है. मगर इनकी सफलता तभी संभव है जब जनता अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो. वह तर्कसम्मत निर्णय लेने की अभ्यस्त हो चुकी हो. भारत जैसे समाजों में जहां मनुष्य कदमकदम पर जाति, धर्म और वर्गभेद से प्रेरणा लेती हो, उन्हें अपनी सामाजिक पहचान का जरूरी हिस्सा मानती हो, वहां लोकतंत्र और व्यक्तिस्वातं×य जैसी विचारधाराएं अधिक कारगर नहीं हो पातीं. पर्याप्त अधिकारबोध के अभाव में नागरिक सरकार पर आवश्यक दबाव बनाने के बजाए, आपस में ही एकदूसरे के साथ स्पर्धा करते रहते हैं. इससे चुने गए प्रतिनिधि लोकहित के बजाए अपने स्वार्थ के लिए काम करने लगते हैं. जनता द्वारा निर्वाचित सरकारें जब लोकतांत्रिक उद्देश्यों की प्राप्ति में नाकाम सिद्ध होती हैं, तब जनाक्रोश से बचने के लिए वे ‘सामाजिक न्याय’ को ढाल बनाती हैं. जागरूकता के अभाव में लोकतंत्र भीड़तंत्र में तथा ‘सामाजिक न्याय’ गैरबराबरी को पोषण करने वाली व्यवस्था का रक्षाकवच बन जाता है.

साम्यवाद और बहुजन

जाति हमारे यहां ‘सामाजिक न्याय’ और ‘साम्यवाद’ दोनों के गले की फांस रही है. यह व्यक्ति को जन्म के आधार पर छोटाबड़ा बनाकर, मनुष्य से उसकी स्वतंत्रता तथा जीवन के मूलभूत अधिकार छीन लेती है. भारतीय समाज में निचली जातियों के शोषण और उत्पीड़न का इतिहास उतना ही पुराना है, जितना सभ्यता का. उनका संत्रास इतना बड़ा है कि भीषण आर्थिक विपन्नता के बावजूद उन्हें जातिवाद से मुक्ति ही बड़ी और न्यायपूर्ण उपलब्धि जान पड़ती है. जातिव्यवस्था के कारण ही भारत में राजनीति सवर्णों का विषेषाधिकार रही है. जातिवादी सोच से साम्यवादी दल भी उससे मुक्त नहीं है. अधिकांश सवर्ण वामपंथी वर्णव्यवस्था के प्रश्न पर मौन साधते आए हैं. जातिसंबंधी प्रश्न तथा उसके नाम पर होने वाले अत्याचार उन्हें उद्वेलित नहीं करते. वे उन्हें भारत की सांस्कृतिक पहचान के रूप में सहेजे रखना चाहते हैं. इस कारण दलितों और पिछड़ों के मन में, जो भारतीय समाज का सबसे बड़ा हिस्सा है, मार्क्स की भाषा में जिसे सर्वहारा कहा जा सकता हैसाम्यवाद को लेकर कभी कोई उत्साह नहीं रहा. एकाध अवसर पर उन्होंने साम्यवाद को अपनाने की कोशिश भी की. कुछ ऐसे संकेत दिए, जिनपर ध्यान दिया जाता तो देश में साम्यवाद की सफलता की कहानी लिखी जा सकती थी. यहां एक घटना का वर्णन प्रासंगिक होगा. इसका उल्लेख डॉ. धर्मवीर ने अपने लेख ‘दलितों ने क्या चाहा था’ में किया है

दलितों ने कम्यूनिस्ट शब्द का अपनी देशी जबान में तद्भव बनाकर ‘कौमनष्ट’ के रूप में अर्थ लिया था. उस जमाने में कम्यूनिस्ट पार्टी के शांति त्यागी अपने समर्थकों के साथ मेरे गांव में चमारों की तरफ वोट मांगने आए. हम सब दादा हरिया के ओसारे के नीचे थे. धूलधूप में शांति त्यागी(मेरठ के कम्यूनिस्ट नेता) ने आते ही दादा से पानी मांगा. दादा हरिया ने घड़े से गिलास में ठंडा पानी निकाला और शांति त्यागी ने वहीं वह सबके सामने पिया. उनके जाने के बाद चमारों में वोट के बारे में मंत्रणा हुई. सारे चमारों का वोट एकमुश्त एक तरफ जा रहा था, पर दादा हरिया ने कह दिया, मेरा वोट शांति त्यागी को जाएगा, क्योंकि उसने मेरे हाथ का पानी पिया है. चमारों में से केवल वही एक वोट शांति त्यागी को मिला था .3

कम्यूनिस्ट’ को ‘कौमनष्ट’ मान लेना दलितों और पिछड़ों की एकतरफा अपेक्षा थी. नई, मूल्य आधारित राजनीति से उनके जुड़ने का कारण ही यह उम्मीद थी कि उससे सामाजिकसांस्कृतिक दासता से मुक्ति की राह प्रशस्त होगी. उसमें समानताआधारित समाज की उनकी पुरानी आकांक्षा भी अंतनिर्हित थी. लेकिन उसकी चिंता न तो कांग्रेसी नेताओं को थी, न ही साम्यवाद के तत्कालीन कर्णधारों को. भारतीय साम्यवादियों में अधिकतर उच्चस्थ जातियों से आए थे. वे अपने जातीय पूर्वाग्रहों से बाहर निकलने को कतई तैयार न थे. उनके लिए साम्यवाद सामाजिक पुनर्निर्माण का लक्ष्य न होकर महज राजनीति थी. ऐसे नेताओं के मार्गदर्शन में साम्यवादी दलों ने जातिव्यवस्था के उन्मूलन के लिए न तो कोई कार्यक्रम बनाया, न इस मांग के समर्थन में वे डॉ. आंबेडकर जैसे नेताओं के साथ आए. दलितों और पिछड़ों को साम्यवाद से ज्यादा उम्मीद अंग्रेजों द्वारा लागू किए गए विधि के शासन से थी, जिसने उन्हें मनुस्मृति के सहस्राब्दियों पुराने विधान से मुक्ति दिलाकर, कानूनी तौर पर ही सही, बराबरी के एहसास के साथ जीने का अवसर दिया था. हालांकि सामाजिक समानता का लक्ष्य अभी बहुत दूर था. दलितों द्वारा यह मजबूरी में किया गया समझौता था. इसका नुकसान न केवल भारतीय साम्यवादी आंदोलन, अपितु दलितों को भी उठाना पड़ा.

भेदभाव से परे, समानता पर आधारित वर्गहीन समाज की रचना यदि बहुजन का सपना है तो उसने इस लक्ष्य की दिशा में अपने भरोसे बढ़ने की कोषिष क्यों नहीं की? वे संख्याबहुल थे. अगर जातिविहीन समाज की दिशा में स्वयं आगे बढ़ते तो अपने मकसद में सफल हो सकते थे. संभवतः अंग्रेजों का साथ भी उन्हें मिलता. बहुजन ने इसके लिए स्वयं पहल क्यों नहीं की? इस तरह की जिज्ञासाएं स्वाभाविक हैं. किंतु हमें याद रखना होगा कि सांस्कृतिक दासता से मुक्ति की राह बेहद कठिन होती है. राजनीति में शासक और षासित आमनेसामने होते हैं. अवसर मिलने पर शासक को पराजित कर शासित, राजनीतिक दासता से मुक्त हो सकता है. सांस्कृतिक दासता से उबरने के लिए व्यक्ति को अपने साथसाथ, आसपास के लोगों से भी, जो उसकी सामाजिक पहचान का हिस्सा हो सकते हैंजूझना पड़ता है. उसका अपना समाज भी आड़े आता है. इसलिए सांस्कृतिक परिवर्तन की लड़ाई बेहद कठिन और लंबी होती है. उसके लिए व्यक्ति को अपनों के ही विरोध का सामना करना पड़ता है. जाति के आधार पर हजारों वर्षों से शोषण एवं उत्पीड़न का षिकार रहा बहुजन स्वयं हजारों प्रकार की जातियों, उपजातियां में बंटा था. धर्म और क्षेत्रीयता की दीवारें भी थीं. उन सबकी अपनीअपनी सामाजिकसांस्कृतिक विविधताएं, संघर्ष और अंतर्द्वंद्व थे. इस कारण वह कभी ऐसी सामाजिक षक्ति नहीं बन सका, जो उसे सांस्कृतिक वर्चस्व से मुक्ति दिला सके. उसकी इस कमजोरी का लाभ जिससे जैसे भी बन पड़ा, उसने वैसे ही उठाया.

अंग्रेजों ने भारत में पुराने धर्मसम्मत राज्य को विधिशासित राज्य में बदलने का बड़ा काम किया. हालांकि इसके पीछे उनका न तो कोई उदारवादी नजरिया था, न ही ‘सामाजिक न्याय’ जैसा बड़ा उद्देश्य. उनके स्वार्थ उनके कद से कहीं ज्यादा बड़े थे. भारत आने के बाद उन्होंने अपनी न्यायप्रियता का बढ़चढ़कर बखान किया, मगर सामाजिक अन्याय के निवारण हेतु सार्थक कार्यक्रम की शुरुआत उन्होंने कभी नहीं की. वे इस देश में शासक बनकर रहना चाहते थे. और हमेशा रहे भी. विधिसम्मत शासनव्यवस्था लागू करने के पीछे उनका एकमात्र उद्देश्य खुद को परिष्कृत सभ्यता का अनुगामी सिद्ध कर जनसाधारण की सहानुभूति और समर्थन प्राप्त करना था. इसका उन्हें लाभ भी मिला. समाज का बड़ा हिस्सा जो धर्मकेंद्रित शासनव्यवस्था में उपेक्षा, उत्पीड़न और जातीय शोषण का शिकार था, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में वह नए शासन का समर्थन करने लगा.

अपनी न्यायप्रियता का बढ़चढ़कर बखान करने के बावजूद अंग्रेजों ने न तो जातिव्यवस्था के उन्मूलन के लिए कोई कानून बनाया, न तत्संबंधी किसी सुधार कार्यक्रम का कभी समर्थन किया. जबकि भारत में जड़ जमाने के साथ ही वे भारतीय जातिव्यवस्था तथा उसकी कमजोरियों को भलीभांति समझ चुके थे. वे ब्राह्मणों और क्षत्रियों की सामाजिक हैसियत और समाज पर उनकी पकड़ को समझते थे. जानते थे कि इन वर्गों की मदद से, शेष समाज को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है. ब्राह्मण तथा दूसरे सवर्ण सोचते थे कि अंग्रेज उनके निजी मामलों में दखल न देने की नीति पर अटल हैं. मुगल शासकों से भी उनकी यही अपेक्षा थी. इसलिए ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि उनके मुगलकाल में भी शीर्ष पदों पर थे. इस प्रवृत्ति के चलते देश को एक हजार से अधिक वर्ष विदेशी शासकों के अधीन काटने पड़े. यही कारण रहा जो मुट्ठीभर अंग्रेज, अपने देश से आठ हजार किलोमीटर दूर आकर भारत पर करीब दो सौ वर्षों तक राज करते रहे. हजार वर्षों के पराधीनताकाल में ब्राह्मणों की सामाजिक हैसियत पर कोई अंतर नहीं पड़ा. ब्राह्मणों के लिए उनका धर्म और कर्मकांड की सबकुछ थे. वे बचे रहें, देशप्रेम तथा राष्ट्रीयता की भावना से उनका कोई सरोकार न था.

अवर्णों को भी औपनिवेशिक शासन से खास आपत्ति न थी. अंग्रेजों ने उन्हें ‘मनुस्मृति’ के चंगुल से आजाद कराया था. शिक्षा जो पुरानी व्यवस्था में अपराध थी, उसके दरवाजे शूद्रों और दलितों के लिए खोल दिए गए थे. दलितों और पिछड़ों के लिए यह बड़ी उपलब्धि थी. यही कारण है कि स्वाधीनता संग्राम का समर्थन करने के बावजूद दलित और पिछड़े वर्ग के नेता, सामाजिक आजादी की मांग बराबर दोहराते रहे. पेरियार ने तो सक्रिय राजनीति से 1925 में ही किनारा कर लिया था. उसके बाद उन्होंने स्वयं को ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ को समर्पित कर दिया था, जो सामाजिक न्याय को समर्पित बड़ा, वर्षों लंबा चलने वाला सफल आंदोलन था.

सामाजिकन्याय’ की अवधारणा ने भारत में पश्चिम के रास्ते प्रवेश किया था. स्वाधीनता आंदोलन में अपनी सक्रियता और चरमसफलता के दिनों में भी कांग्रेस ने, जो खुद को भारतीयों की एकमात्र प्रतिनिधि पार्टी होने का दावा करती थी, सामाजिक न्याय की कभी मांग नहीं की. देश की राजनीति में उसे आजादी के बाद ही जगह मिल सकी. उस समय तक दलित और पिछड़ी जातियां राजनीतिक चेतना से लैस हो चुकी थीं. स्वाधीनता संग्राम में उन्होंने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया था. बदले परिवेश में उनकी उपेक्षा असंभव थी. इसलिए कांग्रेस तथा दूसरे अभिजन नेताओं द्वारा तमाम चालाकी बरतने के बावजूद अंतत उन्हें ‘सामाजिक न्याय’ को अपने राजनीतिक कार्यक्रम का हिस्सा बनाना ही पड़ा. आजाद भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपना गया. चूंकि लोकतंत्र में संख्याबल बड़ी भूमिका होती है, इसलिए दलितों और पिछड़ों को साथ लेकर चलना सभी दलों की मजबूरी बन गई. दलितों को फुसलाने के लिए फिर सामाजिक न्याय का प्रलोभन दिया जाने लगा. इस बीच ऐसा वर्ग भी रहा जिसका मानना था कि समानता और न्याय के लक्ष्य को हासिल करने के लिए विदेशों से विचारधारा उधार लेने की आवश्यकता नहीं है.

ऐसे लोगों ने ‘सामाजिक न्याय’ के विकल्प के तौर पर ‘रामराज्य’ को आगे किया. प्रकारांतर में उनकी कोशिश प्राचीन धर्मकेंद्रित शासन को वापस लाने की थी. वे अपने उन स्वार्थों को विशेषाधिकार बनाना चाहते थे, जिन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था में लगातार चुनौती मिल रही थी. जिनकी सुरक्षा हेतु दलितों और पिछड़ों का सांस्कृतिकरण या यूं कि कहें कि वर्चस्वकारी संस्कृति के प्रति समर्पण आवश्यक था. 2014 में सत्तापरिवर्तन के बाद वे शक्तियां केंद्र तक पहुंच चुकी हैं. उनका नया नारा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का है. ‘रामराज्य’ उनके लिए सांस्कृतिक वर्चस्ववाद का टोटम, ऐसा औजार है जिसके माध्यम से वे सांस्कृतिक वर्चस्व को बनाए रखना चाहते हैं. अपने समर्थक बुद्धिजीवियों के माध्यम से वे उसे जनता के बीच लगातार प्रचारित करते हैं. जरूरत पड़ने पर इतिहास में मनमाना हस्तक्षेप तक करते हैं. भूल जाते हैं कि राज्य जब वास्तविक न्याय की ओर से तटस्थ हो जाता है, तो वह वर्गीय तानाशाही का शिकार होने लगता है. उस समय धर्म स्वतः उसकी कार्यशैली में हस्तक्षेप करने लगता है. ऐसा राज्य अपने निर्णय न्याय और नागरिकों की सामान्य इच्छा, जरूरतों के आधार पर लेने के बजाय आस्था, विश्वास और परंपरा के अनुसार लेने लगता है. प्रकारांतर में राज्य का औचित्य ही समाप्त हो जाता है. उसकी बनावटी निष्पक्षता, शीर्षस्थ वर्गों की आत्ममुग्धता का रूप ले लेती है.

रामराज्य’ का जिक्र हुआ है तो उसपर थोड़ी चर्चा और. कल्याण राज्य की पहचान उसकी उदारता और न्यायभावना से की जाती है. इस बात से होती है कि उसका मनुष्यता में कितना विश्वास है. राजा के रूप में राम की कोई न्यायसंहिता नहीं है. राम को धर्मसंस्थापक माना गया है. उसकी कथित महानता ब्राह्मणवाद को सर्वोपरि मान उसे ‘धर्म’ के नाम से प्रतिस्थापित करना है. इस कारण वह न तो अपनी पत्नी के साथ न्याय कर पाता है, न शंबूक के साथ. निर्दोष पत्नी को धोबी के मिथ्या आक्षेप पर देशनिकाला दे देता है तो शंबूक को चंट ब्राह्मणों के बहकावे में आकर मौत के घाट उतार देता है. ऐसे न्याय से एक ही वर्ग लाभान्वित हो सकता है. वह जिसके हाथों में धर्म का नियंत्रण है. चूंकि सामाजिक न्याय की अवधारणा अपने आप में अस्पष्ट अवधारणा है, उसकी कार्यशैली स्पष्ट नहीं है, इसलिए उसके नाम पर मनमानी करने का अवसर स्वार्थी राज्यप्रतिनिधियों को आसानी से मिल जाता है. ‘रामराज्य’ जैसी पुराकथाओं के माध्यम से वे जनसाधारण का सतत भावनात्मक दोहन करते हैं.

यदि ‘सामाजिक न्याय’ नहीं तो और क्या? क्या सामाजिक उत्पीड़न तथा भेदभाव का शिकार रहे लोगों के लिए ‘सामाजिक न्याय’ पूर्णतः अप्रासंगिक और अनपेक्षित है? क्या जाति, धर्म, वर्ण आदि के नाम पर शोषण और अन्याय का शिकार होते आए बहुजनों द्वारा ‘सामाजिक न्याय’ की मांग निरर्थक है? क्या बहुजन को ‘सामाजिक न्याय’ की मांग तक सीमित रह जाना चाहिए? अथवा ‘साम्यवाद’ की मांग करते हुए वर्गहीन समाज की संरचना हेतु अग्रसर होना चाहिए? ‘साम्यवाद’ और ‘सामाजिक न्याय’ की मूलभूत विशेषताओं का अभी तक जो विवेचन किया गया है, उससे यह द्वंद्व स्पष्ट हो जाता है. उपसंहार के रूप में हमें केवल इतना जोड़ना है कि ‘सामाजिक न्याय’ समानता का समर्थन नहीं करता. वह असमानता के शिकार लोगों को थोड़ी राहत की मांग करते हुए यथास्थिति बनाए रखना चाहता है. शासक और शासित, दाता और याचक के बीच जो अंतर है, उसे मिटाने के बजाए वह उन्हें अपरोक्ष समर्थन देता है. वैसे भी ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर न्यायसंबंधी अधिकांश योजनाएं जनता की जरूरत के बजाय संसाधनों की उपलब्धता के आधार पर बनाई जाती हैं. युद्ध, महंगाई, आर्थिक मंदी, प्राकृतिक आपदा आदि से अर्थव्यवस्था पर आकस्मिक दबाव उत्पन्न हो तो उसकी भरपाई ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर बनी संस्थाओं के बजट से की जाती है. सरकार ऐसी योजनाओं को औपचारिक भाव से कार्यान्वित करती है. प्रतिबद्धता के अभाव में वे योजनाएं आसानी से भ्रष्टाचार का शिकार हो जाती हैं.

राज्य और सरकार दोनों नागरिक का कार्य हैं. उनका गठन सामाजिक सुरक्षा एवं ऐसे लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु किया जाता है, जिससे उन सुखों को आसानी से प्राप्त किया जा सके, जो किसी अकेले व्यक्ति के लिए संभव नहीं है. जैसे राज्य और सरकार नागरिक का कार्य है, ऐसे ही सामाजिक न्याय राज्य का दायित्व है, जिसे वह नागरिकों के प्रति अपने दायित्वों की पूर्ति हेतु अपनाता है. बावजूद इसके जनता द्वारा निर्वाचित सरकारें चाहे वे किसी भी तरह की क्यों न हों, नागरिकों के श्रम और पैसे से चलने के बावजूदकालांतर में अपने दायित्वों से मुंह मोड़ने लगती हैं. वे ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर विपन्नताग्रस्त वर्गों को मामूली राहत पहुंचाकर कल्याणकारी होने का दम भरती रहती हैं. प्रकारांतर में वे ऐसी संस्कृति का पोषणपल्लवन करती हैं, जो समाज को श्रेष्ठतम और साधारण, शासक और शासित में बांटे रखती हैं. जनता की उदासीनता के चलते, वे येनकेनप्रकारेण नागरिकों को यह विश्वास दिलाने में कामयाब होती हैं कि श्रेष्ठतम की शासकीय भूमिका और साधारण का शासित होना नियतिसिद्ध है. साम्यवाद इस तरह के वर्गभेद को नकारता है. वह सांस्कृतिक वर्चस्व के मूलाधार धर्म को राज्य के कामकाज से एकदम अलग रखने पर जोर देता है. धर्मकेंद्रित संस्कृति के स्थान पर वह श्रमकेंद्रित संस्कृति को बढ़ावा देता है. जिससे शारीरिक और बौद्धिक श्रम के बीच का अंतर मिटने लगता है. ऐसा ही समाज बहुजन का सपना और आदर्श हो सकता है.

तो क्या आमूल परिवर्तन की मांग को टालने, यथास्थिति बनाए रखने के लिए ‘सामाजिक न्याय’ महज राजनीतिक स्टंट है? ‘सामाजिक न्याय’ के उद्देश्य को देखते हुए उसकी सीधे आलोचना भले ही अनुचित लगे, परंतु जब तक जनता अपने हितों एवं अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं होगी हालात में सुधार के लिए जब तक खुद को दूसरों पर आश्रित मानती रहेंगीतब तक ‘सामाजिक न्याय’ अपने उद्देश्य में विफल बना रहेगा. हालात उसी ओर संकेत कर रहे हैं. हाल के वर्षों में राजनीति व्यापार तथा चुनाव मतप्रबंधन में बदल चुका है. दलित और पिछड़े मतदाताओं को लुभाने के चुनावी प्रयासों के लिए इधर एक नया शब्द निकलकर आया हैᅳ‘सोशल इंजीनियरिंग. उसका सामाजिक न्याय से कोई संबंध नहीं है. यह उसके नाम पर मतदाताओं को लुभाने जातीय समीकरणों को अपने पक्ष में साधने की चुनावी तकनीक है, जिसे अवसरवादी दल अकेले या दूसरे दलों के साथ गठजोड़ करके अमल में लाते हैं. सामाजिक न्याय का संबंध राज्य के स्वरूप से न होकर, उसके उत्तरदायी आचरण से है; और राज्य तभी अपने दायित्वों के प्रति सजग रह सकता है, जब जनता जागरूक तथा अपने अधिकारों के प्रति सजग हो.

संक्षेप में सामाजिक न्याय धर्म की प्रभुता में, मानवीय मूल्यों को साथ लेकर चलने की कला है. जबकि साम्यवाद धर्म को किनारे कर, विधायी तरीकों से न्याय की अपेक्षा करता है. अभी तक साम्यवाद के लिए वर्गक्रांति को अनिवार्य माना गया है. किंतु वर्गक्रांति केवल हिंसा के बल पर फलीभूत हो, यह आवश्यक नहीं है. देखा यही गया है कि जिन देशों में हिंसक वर्गक्रांति के बल पर सत्ता परिवर्तन हुआ, वहां वर्गहीन समाज की रचना का स्वप्न पूरा होने से पहले ही सर्वहारा शक्तियां अपने अंतर्द्वंद्वों के कारण बिखराब का शिकार होती गईं. कारण है कि हिंसा की मदद से सत्तापरिवर्तन का लक्ष्य पाने वाले राज्य आगे भी उसके पैरोकार बने रहते हैं. इससे चाहेअनचाहे वे अपने चारों और फैली बुर्जुआ ताकतों के बीच शक्तिसंतुलन बनाने की होड़ में जुट जाते हैं. नतीजा यह होता है कि उनके संसाधनों का बड़ा हिस्सा अनुत्पादक कार्यों पर खर्च होने लगता है, जो प्रकारातंर में सामाजिक असंतोष में वृद्धि करता है. वर्गहीन समाज की रचना तभी संभव है जब जनता के सभी समूह उसके लिए प्रतिबद्ध हों. यह कैसे संभव हो? समानता, समरसता, न्याय और स्वतंत्रता का सपना देखने वालों के लिए हमारे समय की यही सबसे बड़ी चुनौती है.

© ओमप्रकाश कश्यप

1. The best safeguard against fascism is to establish social Justice to the maximum possible extent. Arnold Toynbee, 1876

2. Justice is first virtue of social institutions, as truth is of system of thought. A theory however elegant and economical must be rejected or revised if it is untrue; likewise laws and institutions no matter how efficient and well arranged must be reformed or abolished. -John Rowls(1971)

3. http://janadesh.in/InnerPage.aspx?Story_ID=5525

साम्यवाद, सामाजिक न्याय और राज्य

सामान्य
  • फासिज्म रोकने का श्रेष्ठतम उपाय है, समाज में सामाजिक न्याय की यथासंभव प्रतिष्ठाआर्नोल्ड टॉयनबी.

  • भारत के संदर्भ में सामाजिक न्याय लोकप्रिय राजनीति का तकिया कलाम है. जिसे हर नेता प्रत्येक चुनाव में

    अपनीअपनी तरह से इस्तेमाल करता है.

साम्यवाद’ और ‘सामाजिक न्याय’ दोनों आयातित पद हैं. हमारे यहां मार्क्सवाद ज्यादा चलता है, जिसे खुद मार्क्स ने ही खारिज कर दिया था. लोहिया भी मार्क्सवाद कहने से बचते थे. हालांकि मार्क्सवाद के आदर्श से उन्हें कोई शिकायत न थी. साम्यवादी लक्ष्य को लेकर इस देश में जितने भी राजनीतिक संगठन बने, किसी न किसी रूप में वे सभी मार्क्सवाद का प्रतिनिधि दल होने का दावा करते हैं. इतनी शिद्दत से करते हैं कि अपना लक्ष्य, साम्यवाद का आदर्श ही उन्हें याद नहीं रहता. शायद इसलिए कि ‘मार्क्सवाद’ की प्रचलित शब्दावली यथा वर्गसंघर्ष, मजदूर, पूंजीपति, शोषण आदि को लोकप्रिय राजनीति के खांचे में आसानी से फिट किया जा सकता है. उसे लेकर राजनीति करना आसान है. साम्यवाद अपेक्षाकृत स्वप्नीला शब्द है. आदर्श और मनुष्यता के बेहद करीब. वह जिस आदर्शोन्मुखी, वर्गहीन और समतायुक्त समाज का सपना देखता है, उसकी पूर्णता पर आमजन तो क्या, आकादमिक प्रतिष्ठा वाले बड़ेबड़े विद्वान विश्वास नहीं करते.

पश्चिम में प्लेटो का आदर्श राज्य का सपना करीबकरीब साम्यवादी परिकल्पना ही थी. भारत में रैदास ने ‘बेगमपुरा’ तथा कबीर ने ‘अमरपुरी’ के रूप में समताआधारित समाज का सपना देखा था. उसके कुछ समय बाद योरोप में संत साइमन ने भी व्यंग्यात्मक शैली में वर्गहीन तथा आदर्श समाज की परिकल्पना की थी. प्लेटो की परिकल्पना को अरस्तु ने ही अव्यावहारिक मानकर नकार दिया था, वहीं संत साइमन के सपने पर उनके समकालीनों ने कोई ध्यान ही नहीं दिया. मगर डेड़दो शताब्दी बाद ही, यूरोपीय पुनर्जागरण के दौर में साइमन की यूटोपियाई कल्पना आदर्शवादी समाज का सपना देखने वाले विद्वानों, चिंतकों और आंदोलनकारियों का सपना बन गई. संत साइमन के थोड़ा आगेपीछे जॉन लाक, इमानुएल कांट, प्रस्टीले, रूसो, राबर्ट ओवेन, बैंथम, जान स्टुअर्ट मिल, मिखाइल बकुनिन आदि ने समानता और स्वाधीनता पर आधारित ऐसे राजनीतिक दर्शन को दुनिया के सामने रखा, जिसमें व्यक्तिमात्र की गरिमा, स्वतंत्रता और समान सुख की उम्मीद शामिल थी. भारत में स्थितियां अलग थीं. यहां का समाज जाति और धर्म के आधार पर बुरी तरह विभाजित था. सत्ता और संसाधन जिन लोगों के अधीन थे, वे हर हालत में यथास्थिति बनाए रखना चाहते थे. जिस धर्मसंस्कृति के भारतीय अनुगामी रहेवह खुद वर्गभेद का पोषण करता है. इसलिए समाज के उत्पीड़ित वर्गों से आए रैदास आदि संत कवियों के सपने की ओर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया. जाति और वर्णभेद में बुरी तरह फंसे, उन्हें विधि का विधान मानकर जीने वाले समाज के लिए यह कोई अनहोनी बात नहीं थी. लोग अपने दुख, दैन्य, दमन और दासत्व के साथ जीना सीख चुके थे. आजादी के बाद भी शताब्दियों के संस्कार देश के बुद्धिजीवियों के अवचेतन पर असर बनाए रहे. यही कारण है कि हमारे यहां खुद को समाजवादी कहने वाले नेता हुए, मार्क्सवादी हुए, मगर साम्यवाद कभी भी बौद्धिक और आकादमिक बहसों से बाहर न आ सका.

आजादी के बाद रोजमर्रा की शब्दावली में साम्यवाद अ़ौर मार्क्सवाद दोनों के लिए वैकल्पिक शब्द का चलन शुरू हुआ. वह शब्द हैवामपंथ. बदले परिवेश में ‘वामपंथ’ को गाली मान लिया गया है. तो भी मार्क्सवाद के पर्याय के रूप में या जिन्हें मार्क्सवाद कहनेलिखने से चिढ़ है, वे प्रायः ‘वामपंथ’ का ही प्रयोग करते हैं. वामपंथ क्या है? वह जो दक्षिणपंथ नहीं है? एक वैचारिकी के रूप में वामपंथ का साम्यवाद या मार्क्सवाद से दूरपास का कितना नाता है? क्या वह मार्क्सवाद या साम्यवाद के पर्याय से अधिक कुछ नहीं है? ऐसे प्रश्नों पर वे विचार ही नहीं करना चाहते. मार्क्सवाद और साम्यवाद की तरह ‘वामपंथ’ भी आयातित विचार है. अपने मूल अर्थों में इसका मार्क्सवाद से दूर का ही नाता है. एक रास्ता है, जिससे साम्यवाद की ओर बढ़ा जा सकता है. वामपंथ का संबंध फ्रांस की क्रांति से है, जो कभी मार्क्सवादी या साम्यवादी देश नहीं रहा. प्रथम वामपंथी होने का श्रेय टॉमस पेन तथा उसके सहयोगियों को जाता है. पेन मूलतः व्यक्तिमात्र की अधिकतम स्वाधीनता का समर्थक था. अमेरिकी क्रांति की सफलता के पश्चात, मित्र थॉमस जेफरसन से विदा लेकर वह फ्रांस पहुंचा था. वहां राजशाही के विरुद्ध उसका संघर्ष जारी था. पेन की पुस्तक ‘राइट्स ऑफ मेन’ उनीसवीं शताब्दी की सर्वाधिक प्रभावशाली पुस्तकों में से है. इस पुस्तक ने फ्रांसिसी क्रांति के लिए उत्प्रेरक का काम किया था.

फ्रांसिसी क्रांति ने सामाजिकराजनीतिक संरचनाओं में अनेक बदलाव किए थे. उससे पहले धर्म राजनीति के मुख्य मार्गदर्शक की भूमिका निभाता था. क्रांति के बाद धर्म के प्रभावक्षेत्र मनुष्य के निजी विश्वास और आचरण तक सीमित हो गया. नई विचारधाराओं के आलोक में राजनीति में धर्म की कार्यकारी भूमिका को लगभग समाप्त कर दिया गया था. उसके स्थान पर न्याय, लोककल्याण, नागरिक और राज्य की आंतरिक शुभता, मानवाधिकार आदि को राजनीति का प्रमुख मार्गदर्शक घोषित कर दिया गया. फलस्वरूप विधि के शासन को बल मिला. राज्य जिसे पहले दैवीय अथवा देवताओं की विशेष अनुकंपा माना जाता था, उसको मनुष्य द्वारा अपने तथा मानवमात्र के कल्याण हेतु निर्मित संस्था कहा जाने लगा. राज्य के संचालन में नागरिकों की भूमिका जो धर्मप्रधान राजनीति में अत्यंत गौण थी, वह प्रमुख हो गई. तीसरी और प्रमुख सफलता थी, राजनीति में कुल, परंपरा, जाति, वंशाधिकार, वर्णश्रेष्ठता आदि के दावे के आधार पर विशेषाधिकारों का लोप. उससे, कालांतर में लोकतंत्र के रास्ते प्रशस्त हुए, आधुनिक समाज की नींव रखी गई.

आरंभिक अवधारणा के अनुसार वामपंथ मार्क्सवाद या साम्यवाद का पर्याय भले न हो, किंतु अपनी इन समानधर्मा विचारधाराओं की भांति वह किसी भी प्रकार की सर्वसत्तावादी अवधारणा का विरोध करता है, इस दृष्टि से इसे साम्यवाद और मार्क्सवाद दोनों के करीब माना जा सकता है. मार्क्सवाद का मूलभूत विचार वर्गसंघर्ष है. वर्गहीन समाज की स्थापना उसका लक्ष्य है. वर्गसंघर्ष को हम हीगेल की दार्शनिक संकल्पना ‘द्वंद्ववाद’ का राजनीतिक अवतार भी कह सकते हैं. 1848 में श्रमिकों का आवाह्न करते हुए मार्क्स ने कहा थाᅳ‘तुम्हारे पास खोने के लिए सिवाय अपनी बेड़ियों के कुछ नहीं है, लेकिन जीतने के लिए पूरी दुनिया पड़ी है.’ इस कथन के संकेत साफ थे. मार्क्स चाहता था कि श्रमिक वर्ग संगठित क्रांति द्वारा उत्पादन एवं सत्ता प्रतिष्ठानों पर अधिकार कर ले. इस आवाह्न का श्रमिक संगठनों ने खुले दिल से स्वागत किया था. उसके आधार पर 1871 में पेरिस क्रांति हुई. उसका सुफल ‘पेरिस कम्यून’ के रूप में दुनिया सामने आया. पेरिस और आसपास के कुछ ठिकानों पर श्रमिकसंगठनों का अधिकार हो गया. वह सफलता अस्थायी सिद्ध हुई. तीन महीने से भी कम समय में सत्ता श्रमिकसंगठनों से वापस छीन ली गई. पेरिस कम्यून की असफलता मार्क्स के लिए भी सबक थी. वर्गक्रांति की सफलता के लिए वर्गभेद के कारणों को समझना और समझाना अत्यावश्यक था. उसके बाद मार्क्स ने खुद को पूंजीवाद के गंभीर अध्ययन के लिए समर्पित कर दिया था. वर्गहीन समाज की संकल्पना उसके लंबे अध्ययनमनन का सुफल थी. ‘पेरिसक्रांति’ के बाद मार्क्स का नाम दुनियाभर में फैल चुका था. लोग संगठित विद्रोह की शक्ति से परिचित हो चुके थे. समझने लगे थे कि संगठित ताकत से आजादी को संभव बनाया जा सकता है. भारत भी उससे अछूता न था. ‘वर्गसंघर्ष का उपयोग औपनिवेशिक दासता से मुक्ति के लिए किस प्रकार किया जाए?’ यह प्रश्न अनेक विचारवान लोगों को उद्वेलित करने लगा था. मार्क्स से मिलने की साध लेकर राजा राममोहनराय ने इंग्लेंड की यात्रा भी की थी. हालांकि उन दोनों की भेंट के बारे में दावे के साथ कुछ भी कह पाना कठिन है.

सर्वहारा शोषण की जिन स्थितियों का विश्लेषण मार्क्स ने अपने लेखन में किया था, वे उससे पहले भी अजानी नहीं थीं. प्लेटो और अरस्तु दोनों यद्यपि दास पृथा के समर्थक थे, लेकिन वे राज्य से अपेक्षा करते थे कि वह नागरिकों के प्रति अपने दायित्वों को समझे तथा उनका निष्ठापूर्वक पालन करे. मध्यकाल के विचारक भी लोककल्याण के लिए राज्य की ओर से उत्तरदायी आचरण की अपेक्षा करते हैं. फ्रांसिसी विचारक पियरे जोसेफ प्रूंधों ने समाजार्थिक समानता पर आधारित राज्य की परिकल्पना की थी. बेहद मामूली, गरीब परिवार में जन्मा प्रूंधों बचपन में अपने पिता के साथ कहवाघर में काम करता था. उसने अपना सारा ज्ञान जीवनानुभवों और स्वाध्याय के बल पर अर्जित किया था. वह अराजकतावादी था. उसका मानना था कि राज्य की कुल संपत्ति पर सरकार का अधिकार होना चाहिए. सरकार कैसी हो? इस बारे में उसकी स्पष्ट मान्यता थीᅳ‘प्रत्येक के द्वारा खुद की सरकार’. कुल मिलाकर शासक वर्ग का पूर्णतया लोप. प्रत्येक नागरिक के लिए अधिकतम स्वतंत्रता. यह थोरो द्वारा दी गई अच्छी सरकार की विशेषता, ‘अच्छी सरकार वह है जो बिलकुल भी शासन नहीं करती’का समर्थन करती है. प्रूंधों ने व्यक्तिगत संपत्ति को चोरी और संपत्तिधारक को चोर कहा था. अपने समय में वह मार्क्स कहीं अधिक लोकप्रिय था. लेकिन पूंजीवाद के दुष्प्रभावों को लेकर मार्क्स का अध्ययन कहीं अधिक व्यापक और तथ्यपरक था. सभ्यताओं के लंबे, ऐतिहासिक अध्ययन द्वारा वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि उत्पादन प्रविधियों में बदलाव संस्कृति एवं सभ्यता को प्रभावित करता है. उत्पादकता के साधनों पर पूंजीवादी वर्चस्व के रहते शोषण से मुक्ति असंभव है. एकमात्र समाधान वर्गसंघर्ष है. वह सामाजिक परिवर्तन की दिशा में प्रमुख औजार है. ऐसा रास्ता, जिसका लक्ष्य साम्यवाद है. ‘थीसिस ऑन फायरबाख’ में मार्क्स का निष्कर्षवाक्य हैᅳ‘दार्शनिकों ने इस संसार की अनेक तरह से व्याख्या की है. सवाल है कि उसे बदला किस तरह जाए?’ मार्क्स का पूरा जीवन बदलाव को समर्पित रहा. इसके लिए उसने वर्गक्रांति का आवाह्न किया, जो इतनी ओजपूर्ण है कि प्रायः वर्गसंघर्ष को ही साम्यवाद की आधारसैद्धांतिकी मान लिया जाता है. मार्क्स और मार्क्सवाद के नाम पर राजनीति करने वाले लोग कभी अनजाने में तो कभी जानबूझकर ऐसी गलती करते रहते हैं. कदाचित इसलिए भी कि वर्गसंघर्ष यानी टकराव की राजनीति करना आसान है. विशेषकर भीषण असमानता के शिकार उन समाजों में जहां लोकतंत्र लोकप्रिय राजनीति तक सिमटकर अपनी गरिमा तथा उद्देश्य दोनों से दूर जा चुका है.

सामाजिक न्याय : ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

सामाजिक न्याय’ पर चर्चा करने से पहले उचित होगा कि उसके इतिहास पर भी कुछ बातचीत कर ली जाए. उन परिस्थितियों पर विचार किया जाए जिनके कारण चर्च जैसी शक्तिशाली संस्था को कल्याणराज्य के समर्थन में उतरना पड़ा था? 16वीं शताब्दी की वैज्ञानिक क्रांति यूरोप में कई वैचारिक आंदोलनों की प्रेरक बनी थी. उनके केंद्र में मनुष्य था. फलस्वरूप सामंतवादी दौर की वे विचारधाराएं सवालों के घेरे में आने लगीं, जो किसी अजाने, अदृश्य लोक तथा पैगंबर की बातें किया करती थीं. जिनकी निगाह में सब कुद्ध नियतिबद्ध था. उन्हें कठघरे में लाने की शुरुआत थॉमस हॉब्स की ओर से हो चुकी थी. आगे चलकर उसे ह्यूम, जान लॉक, देकार्त्त, वाल्तेयर, रूसो, इमानुएल कांट, बैंथम, प्रूधां और टॉमस पेन जैसे विचारकों का समर्थन मिला. इनमें कई आस्थावादी भी थे, मगर धर्म उनके लिए व्यक्तिगत आस्था और विश्वास तक सीमित था. राजनीति के साथ उसके घालमेल के सभी विरोधी थे. नई विचारधाराओं के आलोक में लोकतंत्र और व्यक्तिस्वातंत्र्य पर जोर दिया जाने लगा था. फ्रांसिसी क्रांति तथा उसके पहले संपन्न हुई अमेरिकी क्रांति, धर्म केंद्रित प्राचीन राजनीतिक संस्थाओं को वर्षों पहले नकार चुकी थीं. नए राजनीतिक दर्शनों पर बहस जारी थी. इससे पुरातनपंथी धर्माचार्यों में बेचैनी थी. अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए वे छटपटा रहे थे.

विज्ञान के पंखों पर सवार होकर आने वाली औद्योगिक क्रांति सर्वथा निरापद न थी. अनियोजित मशीनीकरण ने अनेक समस्याओं को जन्म दिया था. वैज्ञानिक क्रांति का स्वागत करते हुए ‘आधुनिक विज्ञान का पितामह’ कहे जाने वाले फ्रांसिस बेकन ने कहा था कि औद्योगिक क्रांति श्रमिकों को उनके जानलेवा कष्टों से मुक्ति दिलाकर नए समाज की नींव रखेगी. किंतु उद्योगपतियों की स्वार्थपरता, लाभ को केंद्र में रखकर उत्पादन करने की उनकी नीति तथा श्रमिकों को उनके श्रम का पूरा लाभ न देकर सबकुछ हड़प जाने की लालची वृत्ति ने मशीनीकरण के लाभों को विशिष्ट वर्ग तक सीमित कर, श्रमिक वर्ग के उन सभी सपनों पर पानी फेरने का काम किया था, जो उसने औद्योगिक क्रांति के साथ देखे थे. उससे श्रमिकों का आक्रोश बढ़ रहा था. वे एक साथ लामबंद होने लगे थे. चार्ल्स फ्यूरियर, प्रूंधों, मार्क्स, मिखाइन बकुनिन जैसे विचारक, आंदोलनकारी उनके समर्थन में थे. फ्रांसिसी क्रांति की सफलता से श्रमिक संगठनों के हौसले बढ़े हुए थे. उसका दूरगामी असर भविष्य की राजनीति पर पड़ा. फलस्वरूप राजनीति में धर्म की भूमिका सिमटने लगी. न्याय का ईश्वरीय आधार समाप्त हो गया. प्रशासनिक फैसलों में तर्क और ज्ञानविज्ञान की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो गई. क्रांति की तीसरी बड़ी उपलब्धि थी, वंशानुगत शासन का अंत. फलस्वरूप वैधानिक और नागरिक अधिकार राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनने लगे. शासनप्रशासन में लोकतांत्रिक संस्थाओं की संख्या बढ़ने लगी, जिनके लिए नागरिक तथा नागरिकअधिकार प्रमुख थे.

बीसवीं शताब्दी के आरंभ में सोवियत क्रांति की कामयाबी श्रमिक आंदोलन के इतिहास में निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई. सोवियतसंघ विश्व का पहला समाजवादी राज्य था, जिसका गठन साम्यवादी सपने के मद्देनजर किया गया था. उस सफलता से उत्साहित सर्वहारा वर्ग पूरे विश्व को कम्युनिज्म की परिसीमा में लाने का सपना देख रहा था. मंगोलिया, जर्मनी, इटली, रोमानिया जैसे दर्जनों देशों उसके प्रभाव में आ चुके थे. अमेरिका, इंग्लेंड जैसे ठेठ पूंजीवादी देशों में साम्यवादी दलों का गठन हो चुका था. उन्हें अपने समय के प्रखर विद्वानों और बुद्धिजीवियों का नेतृत्व प्राप्त था. चीन भी तेजी से श्रमिकक्रांति की ओर अग्रसर था. वहां माओ के नेतृत्व में परिवर्तन की लड़ाई सफलतापूर्वक लड़ी जा रही थी. उधर अमेरिका के उपनिवेश रहे अफ्रीकी देशों में वर्गचेतना अंगड़ाई ले रही थी. लोग औपनिवेशिक दासता से बाहर निकलने के लिए आतुर थे. हथियार खरीद की अवांछित स्पर्धा का सीधा असर उन देशों की विकासदर पर पड़ा. दूसरे विश्वयुद्ध का डर दिखाकर प्रतिक्रियावादी शक्तियां सत्ताकेंद्रों पर सवार होने लगी थीं.

औपनिवेशिक देशों में आजादी की बढ़ती मांग का एक असर विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के रूप में सामने आ रहा था. उनीसवीं शताब्दी में तेजी से हो रही बाजारवृद्धि लगभग रुकसी गई थी. ऊपर से विश्वयुद्ध की मार. विश्वघटनाक्रम तेजी से बदल रहा था. जिन देशों में सर्वहारा क्रांति संपन्न हुई थी, वहां वर्गहीन समाज की स्थापना का लक्ष्य अभी बाकी था. युद्ध से जनअसंतोष में वृद्धि हुई थी. पूंजीवादी ताकतों के सामने केवल दो रास्ते शेष थे. पहला बिना किसी ढांचागत परिवर्तन के, श्रमिक आंदोलन की ओर से आंखें मूंदकर उत्पादन में तेजी लाई जाए. तत्कालीन परिस्थतियां में वह असंभव जैसा था. दूसरा और अंतिम रास्ता यही था कि श्रमिकों की वैध मांगों से समझौता कर श्रमिकअसंतोष को दूर करने के उपाय किए जाएं. इस भावना ने ‘सामाजिक न्याय’ की अवधारणा को जन्म दिया. इस तरह अपने मूल में ‘सामाजिक न्याय’ जरूरतमंदों को बहलाफुसलाकर उनके असंतोष को दबा देने की कोशिश का परिणाम था. धार्मिक संगठन उसे राज्य की उदारता के रूप में, जनता का विश्वास जीतने के लिए आवश्यक मानते थे, ताकि उसकी आड़ में धर्मसत्ता अपने वर्गीय स्वार्थों का संरक्षण कर सकें. इसके समर्थन में वे विचारक, बुद्धिजीवी, लेखक और धर्माचार्य भी थे जो सामाजिकऔद्योगिक संरचना में बड़ा बदलाव किए बिना, औद्योगिक लाभों का एक हिस्सा राज्य के माध्यम से श्रमिकों तक पहुंचाकरश्रमिकआंदोलनों से उपजे असंतोष का समाधान खोजना चाहते थे. इसे श्रमिक आंदोलन से गुजर रहे देशों की सरकारों का समर्थन हासिल था. प्रथम विश्वयुद्ध के बाद विभिन्न राष्ट्रों में मारक हथियार खरीदने की होड़ शुरू हो चुकी थी. वर्गक्रांति से गुजर चुके देशों ने भी अपने संसाधन युद्ध की तैयारी अथवा संभावित युद्ध की अवस्था में बचाव के लिए झोंक दिए थे. वे देश एकदूसरे के साथ स्पर्धा में थे. साम्यवाद की सफलता स्पर्धा के बजाय सहयोग पर टिकी होती है. स्पर्धा, भले ही वह हथियारों के लिए दूसरे देशों के साथ हो, साम्यवाद के मूल सिद्धांतों के विपरीत है. हथियारों की स्पर्धा उन देशों में साम्यवादी मूल्यों के प्रचारप्रसार पर भारी पड़ने लगी थी.

सामाजिक न्याय की उद्भावना के दौर में एक वर्ग आमूल परिवर्तनवादियों का भी था. उसके समर्थक मानते थे कि धर्म और धर्म जैसी सामंती चरित्र वाली संस्थाओं के सहारे सामाजिक संरचना में आमूल परिवर्तन असंभव है. इन विचारधाराओं के मूल में यूरोप की वैज्ञानिक क्रांति का बड़ा योगदान था. मशीनीकरण द्वारा पूंजीपति वर्ग की संपत्ति में तेज बढ़ोत्तरी हुई थी. पुराने उद्योगधंधे उजड़ने से शिल्पकार और कामगार वर्ग में असंतोष पनप रहा था. अनियोजित शहरीकरण ने भी अनेक समस्याओं को जन्म दिया था. फलस्वरूप उन देशों में पूंजीवाद के विरुद्ध माहौल बनने लगा था. वैज्ञानिक क्रांति ने लोगों के सोच और मानस को बदला था. नईनई विचारधाराएं सामने आ रही थीं. धार्मिक संस्थाएं, पहले जिनकी हर शिक्षा जनसाधारण के लिए आदेश होती थी, अब उतनी विश्वसनीय नहीं रह गई थीं. बल्कि यह मानते हुए कि धर्म शोषण में मददगार है, उसके विरुद्ध आवाज उठने लगी थीं. हॉब्स, ह्यूम, जान लॉक, देकार्त्त, वाल्तेयर, रूसो, बैंथम, प्रूधों आदि ने धर्म की विश्वसनीयता तथा उसके सर्वसत्तावादी स्वरूप पर सवाल उठाए थे. नए विचारों का मूल्यबोध मानवमात्र के सुख, स्वतंत्रता और सम्मान से अभिप्रेत था. उन्हें जनसमाज का समर्थन भी प्राप्त था. औद्योगिकीकरण रोजगार के परंपरागत संसाधनों पर उनकी निर्भरता घटी थी. उनका आत्मविश्वास लौटा था और अब वे स्वतंत्र निर्णय लेने में सक्षम थे. इसका एहसास पूंजीपति और राजनेताओं को भी था. इसलिए श्रमिककामगार वर्ग को संतुष्ट रखने की कोशिशें श्रमिक चेतना के उभार के साथ ही आरंभ हो चुकी थी. चूंकि जनसाधारण पर धर्म का गहरा प्रभाव था, इसलिए श्रमिक असंतोष को नियंत्रित करने के लिए आरंभ में धर्म को ही माध्यम बनाया गया.

यह कम आश्चर्यजनक नहीं है कि ‘सोशल जस्टिस’ जैसे शब्दयुग्म जिसका प्रयोग राज्य की उदारता और न्यायप्रियता दर्शाने के लिए किया जाता है, का प्रथम प्रयोग एक कट्टर पुरातनपंथी द्वारा किया गया था. इटली निवासी ल्यूगी अजीलिओ टपरेली पेशे से धर्मप्रचारक पादरी था. 1845 में लिखे गए एक लेख Theoretic Essay of Natural Straight में उसने इस शब्दयुग्म का पहली बार प्रयोग किया था. ‘सामाजिक न्याय’ से टपरेली का आशय भी वह नहीं था, जैसा आज है. उसका आशय राज्य के सामान्य न्यायबोध से था. उन दिनों लेखकों और चिंतकों का एक ऐसा वर्ग था जो ईसाई धर्म की मूलभूत मान्यताओं को आगे रखकर राज्य से नागरिकों के प्रति करुणा और सहानुभूतिपूर्ण आचरण की मांग कर रहा था. थॉमस एक्वीनस से प्रभावित, उसे अपना गुरु मानने वाले टपरेली का संबंध इसी वर्ग से था. वह मानता था कि आधुनिकता से लोगों की जो अपेक्षाएं हैं, धर्म की परिसीमा में उनका समाधान संभव है. समानता और व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता को लेकर टपरेली के विचार दकियानूसी किस्म के थे. वह मध्यकालीन दर्शनों से प्रभावित था. जिनमें राजसत्ता से, धर्मसत्ता की अनुप्रेरणा अथवा उसके मार्गदर्शन में काम करने की अपेक्षा की जाती है. उसका विचार था कि प्राकृतिक आधार पर मनुष्य भी बाकी जीवों के समान है. परंतु अपनी मेधा, स्वाध्याय, धन, चरित्र, कुलपरंपरा आदि के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति दूसरों से अलग होता है. चरित्र एवं गुणों में दूसरों से श्रेष्ठतर व्यक्ति, श्रेष्ठता की कसौटी पर कमजोर वर्गां पर शासन करने का अधिकार स्वाभाविक रूप से प्राप्त कर लेता है. समाज को शासक एवं शासित के रूप में देखने वाले टपरेली के लिए न्याय राज्य की उदारता का लक्षण है. उसके दर्शन में शासक एवं शासित के बीच द्वंद्वात्मकता के लिए जगह नहीं है. वह किसी व्यक्ति के शिखर पर होने को उसका विशेषाधिकार मान लेता है. उसके अनुसार कोई व्यक्ति शासन इसलिए करता है, क्योंकि उसमें राज करने का स्वयंअर्जित गुण है.

वर्तमान में ‘सामाजिकन्याय’ जिन अर्थों में प्रयुक्त किया जाता है, उन तक पहुंचने के लिए उसे आधी शताब्दी से भी अधिक का समय लगा है. इस बीच उसका प्रयोग विभिन्न लेखकों, विचारकों द्वारा अलगअलग संदर्भों में किया जाता रहा. 1851 में इतालवी भाषा के एक आलेख ‘दि कैथोलिक सिविलाइजेशन’ में ‘सामाजिक न्याय’ को सामान्य प्रकृतिबोध, ज्ञानविज्ञान और अनुभव पर आधारित ऐसा दर्शन माना गया जो विकेंद्रीकृत सत्ता का विरोध करता है. उसके लगभग तीन दशक बाद 1883 में फ्रांसिसी कैथोलिक समाजविज्ञानी दि मुन ने ‘सामाजिक न्याय’ को श्रमिकों और कामगारों के ऐसे संगठन के साथ जोड़ा, जिसके सदस्य पारस्परिक उत्तरदायित्व एवं सामाजिक आदर्श की भावना के साथ समान उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु परस्पर एकजुट होकर काम करते हैं. उसके दो वर्ष बाद फ्रांसिसी समाजवादी नेता, लेखक और विचारक जार्ज गोयो ने ‘सामाजिक न्याय’ की कामना के साथ ऐसे राष्ट्र के गठन पर जोर दिया, जिसमें नागरिक और सरकार दोनों अपनेअपने कर्तव्य को समर्पित हों; तथा जिसमें नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा का पूरा भरोसा हो. बीसवीं शताब्दी के आरंभ में यह शब्दयुग्म विमर्श का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन चुका था. दर्जनों लेखकों ने ‘सामाजिक न्याय’ को अपनीअपनी तरह से परिभाषित करते हुए उसकी जरूरत पर बल दिया. अमेरिकी लेखक डब्ल्यू विलियोग्वि ने ‘सामाजिक न्याय’ को लेकर कई लेख लिखे. एक लेख में उसने लिखाᅳ‘न्याय का आशय नागरिकों को यथासंभव ऐसे और इतने अवसर उपलब्ध कराना है, जिनसे वह अपने भीतर के शुभत्व को उच्चतम बिंदू तक उठान दे सके. राज्य का स्वरूप ऐसा हो जिसमें सभी को अपने विकास के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हों.’ विलियोग्वि की यह परिभाषा ‘सामाजिक न्याय’ की आधुनिक अवधारणा के काफी करीब है. 1930 तक ‘सामाजिक न्याय’ की अवधारणा पूरी तरह चलन में आ चुकी थी. उसके माध्यम से ऐसे राज्य की परिकल्पना को बल मिला, जहां नागरिक व्यक्तिगत एवं सामूहिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए अपने कर्तव्यों के प्रति सजग हों और राज्य अपने नागरिकों के हितों के प्रति जागरूक.

1924 में सोवियत क्रांति के महानायक रहे विलादिमिर लेनिन की मृत्यु के बाद सत्ता जोसेफ स्टालिन के हाथों में आ चुकी थी. स्टालिन का अर्थ हैलौहपुरुष. अपने नाम के अनुरूप स्वभाव पाया था उसने. इरादों से मजबूत. कड़े फैसले लेने में सक्षम. स्टालिन की पूरी कोशिश सोवियत संघ को वर्गहीन समाज में बदल देने की थी. उसके लिए बड़े पैमाने पर भूप्रबंधन किया जा रहा था. धर्म को किनारे कर पारंपरिक संस्थाओं को शक्तिहीन किया जा चुका था. अपने कठोर निर्णयों से वह अपने मित्रों की नाराजगी भी मोल ले चुका था. मगर स्टालिन के लिए यह विशेष चिंता का विषय नहीं था. ट्राटस्की, लेव केमानोव जैसे नेता जो सोवियत क्रांति के दौरान लेनिन के सहयोगी रह चुके थे, को मृत्युदंड देकर उसने अपने मजबूत इरादों को दर्शा दिया था. चूंकि स्टालिन के नेतृत्व में रूस तरक्की कर रहा था, इसलिए जनता उसके साथ थी. साम्यवादी राष्ट्रकुल के गठन की दिशा में उसकी उसकी प्रगति दर चौंकाने वाली थी. औपनिवेशिक दासता का शिकार देशों में साम्यवाद का तेजी से विस्तार हो रहा था. यह डर पूंजीपतियों तथा उनके समर्थनसहयोग के आधार पर टिकी सरकारों के लिए काफी था. यथास्थिति बनाए रखने का एकमात्र रास्ता था, श्रमिकों और कामगारों को अपने पक्ष में लिया जाए. इसके लिए उन्हें थोड़ीबहुत छूट देकर न्याय का माहौल बनाया गया. विश्वस्तर पर ऐसे बुद्धिजीवियों की पहचान की जाने लगी, जिन्हें पूंजीवाद से कोई शिकायत न थी; अथवा जो बदलाव के लिए हिंसक क्रांति का विरोध करते थे ऐसे बुद्धिजीवियों के समर्थन में आने से ‘सामाजिक न्याय’ का खूब प्रचारप्रसार हुआ.

साम्यवाद, सामाजिक न्याय और राज्य

सामाजिक न्याय’ की ऐतिहासिक अवधारणा हमें प्लेटो और अरस्तु तक ले जाती है. न्याय से प्लेटो का अभिप्राय थामानवीय सद्गुण. ऐसे गुण जो आत्मा का लक्षण और मनुष्यता की कसौटी हैं. जो मनुष्य को एकदूसरे के प्रति सदाशयी तथा समाज का जिम्मेदार सदस्य बनाते हैं.’ न्याय समाज से प्लेटो का अभिप्राय ऐसे समाज से था, जिसमें मनुष्य उन सभी कर्तव्यों को स्वेच्छापूर्वक पूरा करे, जिनका पालन समाज के प्रयोजनों की दृष्टि से अपरिहार्य है. आदर्श समाज में समाज और राज्य मिलकर नागरिकों की योग्यतानुसार जिन कर्तव्यों का निर्धारण करते हैं, उन्हें पालन किया जाना ही श्रेयस्कर है. न्यायअनुगामी व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन इस भावना के साथ करता है कि उसी में उसकी तथा बाकी समाज की खुशी है. बदले में समाज भी पीछे नहीं रहता. अपनी प्रत्येक इकाई के साथ वह ऐसा व्यवहार करता है मानो उसकी खुशी के अभाव में शेष समाज की खुशी भी अधूरी है. इस तरह एक व्यक्ति का सुख समाज के सुख में तथा समाज का सुख उसकी प्रत्येक इकाई के सुख के संरक्षण में नजर आने लगता है. उस अवस्था में सुख का बंटवारा नहीं, उसमें हिस्सेदारी होती है. न्यायसमर्पित समाज सुख को सामूहिक उपलब्धि मानता है. उसमें व्यक्तिगत इच्छाओं का सम्मान किया जाता है, पर जोर सामूहिक लक्ष्यों की प्राप्ति पर दिया जाता है. यह काम सामान्य इच्छा के भरोसे किया जाता है. फलस्वरूप ऐसे समाज में व्यक्तिगत और सामूहिक सुख का अंतर मिटने लगता है. न्यायसमर्पित समाज अपनी प्रत्येक इकाई की इच्छाओं सम्मान यह सोचकर करता है, मानो वे उसका अधिकार हां. वहां प्रत्येक नागरिक दूसरों की इच्छाओं का सम्मान करते हुए अपनी इच्छाओं को मर्यादित रखता है. जिम्मेदार समाज इसमें भी सदस्य इकाइयों की मदद करता है. इस तरह कि सदस्य इकाइयों की अधिकतम इकाइयों की इच्छाओं की अधिकतम पूर्ति संभव हो सके.

सामाजिक न्याय’ राज्य के समर्थन तथा उसके जिम्मेदराना आचरण पर टिका होता है. वह राज्य को न केवल आवश्यक कार्यकारी शक्तियां सौंपने का समर्थन करता है, बल्कि उनके सकारात्मक उपयोग की राह भी बताता है. वह राज्य से अपेक्षा करता है कि ऐसे नागरिकों के साथ सहानुभूति और जिम्मेदराना ढंग से पेश आए, जो प्राकृतिक अथवा अन्य किसी कारण से सामान्य सुखसुविधा के मामले में पिछड़ चुके हैं. इसके लिए कोई एक और सार्वभौमिक रास्ता संभव नहीं है. संसाधनों के उपयोग के लिए न्यायानुगामी राज्य सामान्य सहमति को आधार बनाता है. फिर उसपर इस तरह अमल करता है, जिससे समाजार्थिक असमानताओं को न्यूनतम किया जा सके. फलस्वरूप अन्याय और असमानता के शिकार रहे लोगों के मन में एकदूसरे के प्रति सामंजस्य भाव का संचार होता है. उनका आत्मविश्वास बढ़ता है. इस प्रकार न्यायप्रधान राज्य वह है जिसमें दुखदैन्य के शिकार प्रत्येक नागरिक को राज्य और समाज दोनों की मदद का भरोसा होता है. ऐसा राज्य जो न्याय को अपना नैतिक और वैधानिक कर्तव्य मानता है. उसके अभाव में राज्य अपने होने का औचित्य खो देता है. न्यायशास्त्र के सुविख्यात अध्येता, विचारक जान रॉल्स ने ‘सामाजिक न्याय’ की महत्ता को रेखांकित करते हुए लिखा है

जैसे किसी भी विचारधारा की पहला गुण उसका सत्य होना है, वैसे ही न्याय, सामाजिक संस्थाओं का प्रथम सद्गुण है. कोई दर्शन वह चाहे जितना सरल और सुंदर क्यों न हो, यदि वह असत्य को बढ़ावा देता है तो उसे या तो बदलना चाहिए, अन्यथा मिट जाना चाहिए. ऐसे ही कोई कानून या संस्था वह चाहे जितनी व्यवस्थित और क्षमतावान क्यों न हो, यदि वह अन्याय का समर्थन करती है, तो उसे सुधरना चाहिए, वरना खत्म हो जाना चाहिए.’2

अपने विशद लेखन में रॉल्स क्लासिक समाजवादियों यथा हॉब्स, जॉन लाक, रूसो की ‘सोशल कांट्रेक्ट’ की सैद्धांतिकी को ही विस्तार देता है. उसके अनुसार न्याय श्रेष्ठ समाज का सर्वश्रेष्ठ गुण है. न्याय की पहचान कैसे की जाए? कोई नियम या विचार कब न्यायसंगत बनता है? इसके लिए रॉल्स बहुत साधारण सूत्र देता हैयदि व्यक्तियों के एक समूह को उनकी वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थितियों से एकदम स्वतंत्र कर, उन्हें अपने लिए नया देश, नया परिवेश चुनने तथा नवीन संस्थाएं गढ़ने की आजादी हो, तो उस समूह के लिए यह प्राकृतिक अवस्था में लौटने जैसा होगा. रॉल्स इसे मूल अवस्था की संज्ञा देता है. पुनश्चः मूल अवस्था में लौटी इकाइयों को यदि यह आजादी दी जाए कि भावी समाज के गठन हेतु सोचसमझकर जरूरी नियमों का गठन करें. उस समय परस्पर सहमति, सहभागिता तथा सहकल्याण हेतु वे जिन नियमों का वरण करेंगी, वही न्यायोचित राह होगी. उन नियमों पर ईमानदारी से चलते हुए वे जिन कर्तव्यों का निष्पादन करेंगे, वे सामाजिक न्याय को बढ़ावा देंगे. उसके अनुसार ‘सामाजिक न्याय’ समाज की प्रत्येक इकाई की आंतरिक शक्तियों, शुभताओं, सद्गुणों एवं कर्तव्यों को पहचानने, तथा उन्हें अपने भले के लिए इस प्रकार प्रयुक्त करना है, जिससे शेष सामाजिक इकाइयों के हित बाधित न हों. ‘सामाजिक न्याय’ उत्तरदायी सरकार का सबसे महत्त्वपूर्ण और प्राथमिक कर्तव्य है. उसके माध्यम से वह अपने होने के औचित्य को सिद्ध कर सकती है.

यदि नागरिककल्याण को कसौटी मान लिया जाए तो ‘साम्यवाद’ और ‘सामाजिक न्याय’ के बीच की दूरी मिटने लगती है. वे समानधर्मा न होकर पूरक विचारधाराएं सिद्ध होती हैं. लक्ष्य की दृष्टि से दोनों के बीच कोई खास मतभेद नहीं है. अंतर वहां तक पहुंचने के रास्ते में है. उसके लिए साम्यवाद वर्गसंघर्ष का रास्ता अपनाता है. उसकी मूल धारणा है कि शिखर पर आसीन सर्वसत्तावादी शक्तियां अपने विशेषाधिकारों को छोड़ने के लिए कभी तैयार न होंगी. वर्गहीन समाज की रचना के लिए आवश्यक है कि उनसे उन सभी संसाधनों को छीनकर राज्य के नियंत्रण में ले लिया जाए जो उन्होंने श्रमिकों और कामगारों के अंतहीन शोषण द्वारा अर्जित किए हैं. ‘सामाजिक न्याय’ समाजवादी राज्य का आदर्श सामने रखता है. वह अपेक्षा करता है कि सरकार उन लोगों के प्रति सहानुभूति से पेश आए जो किसी कारण विकास की स्पर्धा में पिछड़ चुके हैं. वर्गहीन समाज की परिकल्पना के साथ साम्यवाद, समाजवाद से आगे की, अपेक्षाकृत प्रगतिशील विचारधारा है, जिसमें नागरिकों को सहभागिता के सिद्धांत पर अपनी अधिकतम स्वतंत्रता का भोग करने के अवसर प्राप्त होते हैं.

साम्यवाद’ और ‘समाजवाद’ दोनों में संपत्ति पर राज्य का अधिकार होता है. समाजवाद की मूल सैद्धांतिकी है, ‘प्रत्येक से उसकी क्षमतानुसार, तथा प्रत्येक को उसके योगदान के अनुसार.’ साम्यवाद राज्य से और अधिक जिम्मेदार आचरण की अपेक्षा रखता है. उसका आदर्श हैᅳ‘प्रत्येक से उसकी क्षमता के अनुसार, प्रत्येक को उसकी जरूरत के अनुसार.’ ‘साम्यवाद’ और ‘समाजवाद’ दोनों ही अपने नागरिकों से उम्मीद करते हैं कि वे राज्य के विकास में अपना भरपूर योगदान दें. यह पूंजीवादी तंत्र से बिलकुल अलग है. उसमें लाभ पर पूंजीपति का एकाधिकार होता है. वही उत्पादन किया जाता है, जिससे पूंजीपति को अधिकतम लाभ की संभावना हो. समाजवादी राज्य लोगों की सामान्य आवश्यकताओं के आधार पर अपनी उत्पादननीति बनाता है; तथा उनका लोककल्याण के निमित्त प्रयोग करता है. दूसरी ओर पूंजीवादी उत्पादन की मुख्य प्रेरणा लाभार्जन होता है. अधिक लाभ की उम्मीद हो तो पूंजीपति, केवल अपने स्वार्थ को ध्यान में रखकर नई मांग बनाने का प्रयत्न करता है. उसका लोगों की सामान्य जरूरत से कोई संबंध नहीं होता. अशक्तता अथवा किसी अन्य कारण से यदि कोई नागरिक राज्य के विकास में अपना पर्याप्त योगदान देने में असमर्थ है तो, समाजवादी तंत्र में उसकी आय या परिलब्धियां उसके द्वारा दिए गए योगदान के अनुसार तय होंगी. साम्यवादी राज्य व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने की जिम्मेदारी स्वयं उठाता है. उसका संकल्प यहीं पूरा नहीं हो जाता. अपति साम्यवादी राज्य निरंतर ऐसी कोशिश में रहता है, जिससे नागरिक असमानता और अन्याय को बढ़ावा देने वाली परिस्थितियां दुबारा पैदा न हों. इस तरह साम्यवाद, मानवमात्र के कल्याण की दृष्टि से अधिक उपयोगी दर्शन है.

अधिकांश लोग ‘समाजवाद’ और ‘साम्यवाद’ का अंतर ही नहीं समझ पाते. जैसा कि कहा गया है साम्यवाद, समाजवाद से आगे की चीज है. समाजवाद में उत्पादन एवं वितरण का अधिकार चुनी गई सरकार के अधीन होता है. समस्त संसाधन जनता की संपत्ति माने जाते हैं. सरकार न्याय भावना के साथ, सभी के विकास को ध्यान में रखकर उनका प्रबंधन करती है. साम्यवाद राजनीतिक परिवर्तन का सपना संजोता है और श्रमिक संगठनों द्वारा अधिकृत व्यवस्था में समतामूलक समाज की स्थापना पर जोर देता है. इस रूप में वह एक राजनीतिक संकल्प है. अपनी मूल संकल्पना में ‘सामाजिक न्याय’ बीच का रास्ता है, जो व्यवस्था में बिना किसी बड़े परिवर्तन के राज्य से समाजार्थिक विपन्नता के शिकार नागरिकों के कल्याण हेतु विशेष प्रयास करने की अपेक्षा रहता है. वह कामना करता है कि अपने उत्तरदायी आचरण द्वारा राज्य ऐसे नागरिकों के कल्याण के लिए विशेष प्रयत्न करें, जो किसी कारणवश विकास की स्पर्धा में पिछड़ चुके हैं. साम्यवाद का मुख्यआधार बहुआयामी समानता है. समाजवाद भी सामाजिक स्तर पर नागरिकों के लिए समान अवसरों का पक्ष लेता है. ‘सामाजिक न्याय’ समान अवसर उपलब्ध कराने के अलावा राज्य द्वारा ऐसे आचरण की अपेक्षा रखता है, ताकि सभी नागरिक उसका लाभ उठा सकें और ऐसे नागरिक जिन्हें किसी भी रूप में विशेष मदद या प्रोत्साहन की आवश्यकता है, उन्हें वह समयानुसार प्राप्त होता रहे. ‘सामाजिकन्याय’ चूंकि राज्य की सदेच्छा का सुफल है, इसलिए यदि पूर्ण समानता संभव न हो तो समरसता से ही संतोष कर लिया जाता है. ताकि सामाजिक विक्षोभों में कमी आए और राज्य की ऊर्जा प्रतिक्रियात्मक कार्यों के बजाय राज्य के निर्माण में काम आने लगे. साम्यवाद का लक्ष्य पूर्ण समानता है. जिसमें किसी भी प्रकार की ऊंचनीच, वर्गीकरण आदि के लिए कोई जगह न हो. भारतीय समाज में जाति सामाजिक विषमता, अन्याय, वर्गभेद और उत्पीड़न का मुख्य कारण रही है. इसलिए यहां धर्म, जाति, वर्ण जैसी विभेदकारी संस्थाओं का उन्मूलन सामाजिक न्याय के कार्यकर्ताओं और विचारकों की प्रमुख मांग रही है.

किसी राज्य को साम्यवाद की ओर ले जाना आसान नहीं है. यह कई चरणों में संपन्न होने वाली प्रक्रिया है. मार्क्स इसके दो प्रमुख चरणों का उल्लेख करता है. उसके अनुसार केवल सत्ताकेंद्रों पर सर्वहारा के अधिकार से क्रांति का लक्ष्य पूरा नहीं हो जाता. उसकी अगली चुनौती यानी दूसरा चरण वर्गहीन समाज की स्थापना करना है. उसमें समस्त अंतर्भेदों का शमन हो जाता है. उन स्थितियां का लोप हो जाता है, जो असमानता और असुरक्षा को बढ़ावा देती हैं. यह बड़ा लक्ष्य है. आदर्श को एकदम छूता हुआ. मार्क्स मानता है कि वर्गहीन समाज की स्थापना शीर्षस्थ वर्ग का सपना नहीं हो सकता. जो सुख, सुविधाएं और विशेषाधिकार उसे वर्तमान व्यवस्था में आसानी से प्राप्त हैंउन्हें वह आसानी से छोड़ने के लिए भला क्यों तैयार होगा? यथास्थिति बनाए रखने के लिए उसे जो भी कदम उन्हें उठाना पड़े, उससे वह पीछे नहीं रहता. आमूल परिवर्तन का सपना केवल सर्वहारा देख सकता है. इसलिए क्रांति की सफलता और संचालन उसी पर निर्भर करता है.

साम्यवाद जिस वर्ग का सपना या संकल्प हो सकता है, उसका बड़ा हिस्सा, भीषण गरीबी, अशिक्षा और अनेकानेक रूढ़ियों से ग्रस्त रहा है. भारत के संदर्भ में जाति भी बाधा है. हजारों वर्षों की पराधीनता, शोषण और उत्पीड़न का शिकार रहने के कारण, अपने लिए स्वयं निर्णय लेने की आदत करीबकरीब छूट चुकी है. दूसरी ओर विपुल संसाधनों, ज्ञानविज्ञान तथा सभी प्रकार की शक्तियों से लैस अल्पसंख्यक अभिजन समुदाय हमेशा आत्मविश्वास से भरा रहता है. वह बदलाव के लिए उतनी ही छूट देने को तैयार होता है, जिससे उसके स्वार्थ को किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचे. व्यवस्था में आमूल परिवर्तन न तो उनका सपना होता है, न ही संकल्प. आमूल परिवर्तन तभी संभव है, जब लोगों में वर्गीय चेतना जागृत हो. वे शोषण के कारणों को समझें तथा समान हितों के लिए संगठित हों. ‘थीसिस ऑन फायरबाख’ का समापन वाक्य, जिसमें मार्क्स बदलाव की जरूरत पर अतिरिक्त बल देता है, क्रांति की आवश्यकता तथा आकादमिक ज्ञान की सीमाओं को ही रेखांकित करता है. इससे मार्क्स तथा उसके पूर्ववर्ती चिंतकों, जिनमें उदार कैथोलिक विचारक भी शामिल हैं, का अंतर साफ दिखने लगता है. मार्क्स का केवल कथनी और करनी के अंतर को पाटने तक सीमित नहीं रहता, लक्ष्य तक पहुंचने का रास्ता भी बताता है. कथनी और करनी की समानता को लेकर गांधी का उल्लेख प्रासंगिक है. बताया जाता कि उनकी कथनी और करनी में समानता थी. लेकिन उनकी कथनी, करनी सामान्य राजनीतिक कार्यक्रमों तक सीमित थी. ग्राम को स्वतंत्र आर्थिक इकाई के रूप में प्रचारित करते हुए वे भूल जाते हैं कि अपनी समाजार्थिक संरचना में भारतीय गांव सामंतवाद और जातिवाद के गढ़ रहे हैं. सामाजिक न्याय की गांधीवादी परिकल्पना उच्चस्थ जातियों द्वारा निचली जातियों के प्रति सामान्य सदाचार से अधिक कुछ न थी. यानी कुल मिलाकर उसमें ‘सामाजिक न्याय’ जैसा कुछ था ही नहीं. जाति और धर्म को लेकर सामान्य उदारता गांधी से पहले के विचारक भी प्रकट कर चुके थे. गांधी लगभग उसी को दोहराते हैं. ‘हिंदस्वराज’ में उनका आधुनिकताविरोधी रवैया मशीनीकरण से विलगाव के रूप में सामने आता है. गांधी लोकतंत्र और व्यक्तिस्वातन्त्र्य के क्षेत्र में हो रहे बदलावों से निस्पृह थे, जबकि मार्क्स का एकएक शब्द आवाह्नकारी है.

यहां से साम्यवाद जिसे मार्क्स के प्रति सम्मानभाव दिखाने के लिए सामान्यतः ‘मार्क्सवाद’ भी कहा जाता है, का अन्य विचारधाराओं से अंतर साफ दिखने लगता है. मार्क्स के पूर्ववर्ती विचारक सभ्यता के आधुनिक मूल्यों की प्राप्ति के लिए राज्य से उदार आचरण की उम्मीद करते थे. किसी न किसी रूप में वे राज्य की अधिसत्ता को स्वीकारते थे. उनका विश्वास था कि राज्य के अभाव में समाज का ऐच्छिक विकास संभव ही नहीं है. बदलाव संबंधी उनकी उम्मीदें राज्य के उदार एवं जिम्मेदाराना आचरण पर टिकी थीं. मार्क्स सत्ता एवं शक्ति के केंद्रीकरण के दुष्परिणामों को समझता था. उसके अनुसार सत्ता हाथ में आने के बाद सर्वहारा संगठनों को चाहिए कि वे ऐसे प्रयास करें, जिससे वर्गसंघर्ष की स्थितियां दुबारा उत्पन्न न हों. पर यह काम आसान नहीं है. इसलिए कि लगातार वर्गभेद के बीच रहने के कारण उत्पीड़क वर्ग उसी के अनुसार जीने का अभ्यस्त हो जाता है. चूंकि शीर्षस्थ वर्ग उससे दूर होता है. इतना दूर कि उसके करीब पहुंचना तो दूर, ऐसा सोचना भी उसके लिए सपने जैसा होता है. उसका संपर्क उन्हीं हालात में जी रहे, अपने जैसे आसपास के लोगों से रहता है. इसलिए वह अपने हालात की तुलना बजाय शिखरस्थ अभिजन के, अपने ही जैसे लोगों के साथ करने लगता है. शीर्षस्थ अभिजन के सुखसाधन तथा वैभवविलास उसे मिथकीय आभास देने लगते हैं. समयसमय पर उनका प्रयोग वह अपनी कुंठाओं के शमन हेतु करता है. जीवन की लगातार बढ़ती चुनौतियां उसे बहुत बड़े सपने देखने की अनुमति नहीं देतीं. सपनों के अभाव में वह अपने कष्टों की तुलना आसपास के लोगों से करता है, जब सैकड़ोंहजारों लोगों को अपने जैसे हालात में जीते हुए देखता है, तब वह उन्हें जीवन की स्वाभाविक अवस्था मानने लगता है. यह अनुभूति उसे समझौतावादी बनाती है. यदि वह स्पर्धा के लिए आगे आता तो अपने ही जैसे लोगों के साथ. उस समय अपने ही जैसे लोगों साथ वह वही आचरण करता है; जैसा वह भोगता हुआ आया है. इस तरह परिवर्तन का उसका सपना स्वयं को उत्पीड़क की स्थिति में लाने तक सिमट जाता है. ऐसे में यदि वर्गक्रांति सफल हो जाए तब भी वास्तविक परिवर्तन अलभ्य बना रहता है.

  अगले खंड में समाप्य…..

ओमप्रकाश कश्यप