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सामाजिक गतिशीलता एवं अंतर्विरोध

सामान्य

स्वाधीन भारत में हम अक्सर अपनी सार्वजनिक असफलताओं व भटकावों पर चिंता व्यक्त करते रहते हैं. इन असफलताओं व भटकावों के पीछे जो कारण निहित हैं, उनमें से एक प्रमुख कारण यह है कि हम अपने अंतर्विरोधों को समाप्त कर, उनमें खप रही ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देने में विफल सिद्ध हुए हैं. ज्ञातव्य है कि सामाजिक अंतर्विरोधों की जड़ें गहरी और परंपरा से पोषित होती हैं. इन्हें एकाएक दूर कर पाना संभव नहीं होता. अंतर्विरोधों क रूप से निष्प्रभावी कर दिया था. सामाजिक अंतर्विरोधों के जन्मदाता कारक धार्मिक, राजनैतिक, सामाजिक, औपनिवेशिक आदि किसी भी प्रकार के हो सकते हैं. ये स्पष्ट भी हो सकते हैं और अस्पष्ट भी. ये स्वाभाविक रूप से उत्पन्न और/या प्रायोजित भी हो सकते हैं. मुल मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने के लिए भी कभीकभी राज्य भी, सामाजिक अंतर्विरोधों को हवा देने लगता है. ज्योतिष शास्त्र को विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जाने तथा घटती सरकारी नौकरियों के बावजूद आरक्षण को चुनावी मुद्दा बनाना कुछ इसी प्रकार के मामले हैं.

भारतीय समाज, जैसा कि हम सभी जानते हैं, विविध संस्कृतियों का समुच्चय है. दूसरे समाजों की अपेक्षा हमारे समाज की संरचना कहीं अधिक जटिल व बहुआयामी है. ऐसे समाज में अंतर्विरोधों की उपस्थिति पूर्णतः स्वाभाविक है. उन पर नियंत्रण तथा उनमें खप रही ऊर्जा को सही दिशा देने का दायित्व केवल राज्य का नहीं है. यह, इस दिशा में कार्यरत सभी संस्थाओं और बुद्धिजीवियों की भी जिम्मेदारी है. विचारणीय यह भी है कि सत्ता एवं शक्ति के बल पर, अंतर्विरोधों से मुक्ति पाना प्रायः संभव नहीं होता. अंतर्विरोधों का शमन करने का एकमात्र रास्ता, परस्पर विरोधी शक्तियों को संवाद के स्तर तक लाकर, ऐसे संवादों की निरंतरता बनाए रखनरे में ही निहित होता है.

यह मान लेना कुछ विचित्रसा लगता है कि समाज तात्कालिकता के सिद्धांत के आधार पर विकसित होता है. यह कुछ वैसे ही संकल्पना है जैसी किसी गांव में बिजली आ जाने मात्र से ही उनके संपूर्ण कायापलट की कल्पना कर बैठना. चूँकि समाज संबंधों की बहुआयामी और जटिल संरचना है, इसलिए सामाजिक विकास की व्याख्या किसी अकेले सिद्धां के आधार पर नहीं की जा सकती दूसरे शब्दों में ऐसा कोई नियम नहीं है जो सामाजिक गतिशीलता के सभी पहलुओं को उनकी संपूर्णता के साथ परिभाषितव्याख्यायित कर सके. तात्कालिकता समाज की बृहद चेतना में स्फुरण मात्र ही उत्पन्न कर पाती है. सामाजिक परिवर्तन को नियंत्रित करने वाली शक्तियों में से कुछ तो इस स्फुरण को ऊर्जा प्रदान करने का कार्य करती हैं. जबकि कुछ उनके विरोध में खड़ी हो जाती हे. समर्थन और विरोध के सिलसिले के बीच ही सामाजिक परिवर्तन अपना स्वरूप ग्रहण करते हैं सामाजिक विकास की प्रवत्ति वर्तुलाकार स्प्रिंग जैसी होती है. जिसमें संस्कृति और परंपराएँ अतीत से जुड़े रहने का आग्रह करती हैं. जबकि प्रौद्योगिकी और अपने लिए अधिकतम सुखसुविधा जुटा लेने की आकांक्षा इसे आगे की ओर बल प्रदान करती है हर बार ऐसा लगता है कि विकास चक्र अपनी पुरानी स्थिति में लौट आया है, मगर यह सिर्फ भ्रम होता है. इस बीच परिस्थितियाँ बदल चुकी होती हैं. परिवर्तन चक्र आगे की ओर बढ़ चुका होता है. संस्कति या परम्पराओं को सामाजिक गतिशीलता का प्रतिद्वंद्वी मान लेना भी जल्दबाजी भरा निर्णय होगा. संस्कृति तथा परंपराएँ मात्रा परिवर्तनों के नियंत्रक एवं मार्गदर्शक की भूमिका निभाती है. इसके बावजूद कि जो नए परिवर्तन समाज में होते हैं, वे संस्कृति और परंपराएँ मात्र परिवर्तनों के नियंत्रक व मार्गदर्शक की भूमिका निभाती है. इसके बावजूद कि जो नए परिवर्तन समाज में होते हैं, वे संस्कृति और परंपराओं को भी पहले जैसा नहीं रहने देते. इस प्रकार विकास के साथसाथ, संस्कृति और परंपराओं के नवीकरण का दौर भी चलता रहता है. आगे हम समाज की गतिशीलता को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों प्रौद्योगिकी, राजनीति, धर्म व जातीयता तथा उनके बीच पल रहे अंतर्विरोधों पर विचार करेंगे.

समाज की गतिशीलता को परखने का एक पैमाना उस समाज में प्रौद्योगिकी विकास की दर भी है. उत्पादन प्रणाली में प्रौद्योगिकी एवं अन्य कारणों से आई जटिलता, समानुपातिक रूप में अन्य सामाजिक जटिलताओं को भी जन्म देती है. प्रौद्योगिकी का अपरिष्कृत यानी कम जटिल रूप मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता था. अभी कुछ दशक पहले तक लुहारबढ़ई आदि ग्रामीण शिल्पकार, अपनी निम्न सामाजिक प्रस्थिति के बावजूद, ग्रामीण समाज व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण हिस्सा माने जाते थे. प्रौद्योगिकी विकास का आरंभिक दौर उत्पादन प्रक्रिया में श्रम की लागत घटाने और उसे आरामदेय बनाने पर जोर देता थां उदाहरण के लिए हाथ से बान बंटनेवाले दस्तकारों ने जब गाँव के कारीगरों द्वारा ही बनी बानबटाई मशीन का उपयोग करना शुरू किया तो उत्पादन प्रक्रिया आरामदेय हुई. उत्पादन बढ़ा और कामगारों की उपयोगिता भी पूर्णतः बनी रही. यह छोटीसी मशीन मानवीय श्रम को पूरा सम्मान देती थी. उसके बुद्धि कौशल का मान रखती थी. परन्तु अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी मानवीय श्रम को हीनदृष्टि से देखती है. यह मानवीकौशल की उपेक्षा और अवमानना करती है. स्वचालीकरण की अधुनातन खोजें उत्पादनप्रक्रिया का शतप्रतिशत मशीनीकरण करने पर उतारु हैं, अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी पर टिके उद्यमों में कर्मचारी की उपयोगिता मशीन की भूल पर नजर रखने तथा भूल होने की स्थिति में उसकी सूचना विशेषज्ञ तक पहुँचाने तक सीमित होकर रह गई है. उत्तरआधुनिक प्रौद्योगिकी इसे भी समाप्त करने को कृतसंकल्प है. यह कर्मिकदक्षता का शून्यीकरण करने जैसी स्थिति है. विकास और संचारक्रांति के नाम पर देश के संरचनात्मक ढांचे को मजबूत किए बिना जो लगभग गैरजरूरी प्रौद्योगिकी समाज पर थोपी जा रही है, वह भी समाज के आधारभूत ढांचे को नुकसान पहुँचाने वाली है, यह बात किसी से छिपी नहीं है.

अत्याधुनिकी प्रौद्योगिकी सामाजिक गतिशीलता को प्रभावित करनेवाले कारणों में प्रमुख है. परन्तु नवीन आविष्कारों पर समाज के मुट्ठीभर लोगों का नियंत्रण तथा इससे होनेवाले लाभ का समाज के वर्गविशेष तक सीमित होकर रह जाना, कल्याणकारी राज्य की आधारमान्यताओं के सर्वथा विरुद्ध है. प्रौद्योगिकी विकास का संकुचित हितों में उपयोग सामाजिक असंतुलन और तदनंतर सामाजिक असंतोष को बढ़ाता है इससे समाज की विकासशीलता में पश्चगामी खिंचाव पैदा हो जाता है.

समाज की जीवंतता का एक लक्षण राजनीति भी है. किंतु हाल के वर्षों में राजनैतिक प्रश्न अचानक इतने महत्त्वपूर्ण हो चुके हैं कि उन्होंने समाज से जुड़े अन्य प्रश्नों को हाशिये पर पहुँचा दिया है. यह एक त्रासदीसा लगता है कि संस्कृतिप्रधान भारतीय समाज, राजनीति को ही सामाजिक परिवर्तन का एकमात्र कारक मानकर, सत्ताप्रधान समाजों जैसा आचरण कर रहा है. चूँकि यह प्रवृत्ति हमारी संस्कृति के विरुद्ध है, हमारी परंपराएं इसका विरोध करती हैं, इसलिए इससे होने वाले परिवर्तनों को समाज का पूरा समर्थन नहीं मिल पाता. संक्षेप में कहें तो अर्थव्यवस्था और उत्पादन प्रणालियों का अतिसंक्रेदित रूप अनियोजित विकास व सामाजिक अंतर्विरोधों को बढ़ावा देता है जो समस्याएँ आज हमें परेशान कर रही हैं, उनके मूल में यही कारण निहित हैं. इसके पीछे बहुतसा दोष हमारे संचार माध्यमों का भी है. ये जिस रूप में जनता के साथ संवाद करते हैं, उसमें से जनता के मूल मुद्दों की प्रतिध्वनि गायब कर दी जाती हे.

आज हम इस बात में खुशी का अनुभव करते हैं कि हमारा लोकतंत्र प्रबुद्ध हो रहा है इसके सीमित फायदे हैं, जिन्हें हम देख भी रहे हैं. परंतु किसी भी देशकाल में राजनैतिक चेतना के उदय को संपूर्ण सामाजिक चेतना के उदय का पर्याय नहीं माना जा सकता. स्वयं गाँधी जी सामाजिक चेतना के विकास को राजनैतिक चेतना से अलग और बढ़कर मानते थे इसलिए उन्होंने कांग्रेस से आजादी प्राप्त होते ही राजनीति छोड़कर सामाजिक उत्थान के लिए जुट जाने को कहा था.

राजनीति की भाँति धर्म भी सामाजिक गतिशीलता को प्रभावित करने वाला मुख्य कारक है. धर्म यद्यपि व्यक्ति की निजी अभिधारणा मात्र होता है. मगर समूह के रूप में यह अक्सर आक्रामकता को प्रोत्साहित करने वाला ही सिद्ध होता है. प्रकट में प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय यही मानता और घोषणा करता है कि सभी धर्मों का मूल स्वरूप एक जैसा है. परम सत्ता एक है. विभिन्न धर्म उसी को पाने के लिए अपने विधिविधानों के अनुसार प्रयत्नशील रहते हैं. परन्तु वास्तविक दृष्टि इस समतावादी दष्टिकोण से भिन्न ही रहती है.

समूह के रूप में धर्म शक्ति का व्रत प्रतीक होता है. अतः शक्ति केन्द्र में सर्वोपरि स्थान पाने की लालसा प्रायः सभी धर्मावलंबियों में होती है. इसी कारण विधर्मी को उसकी इच्छा या अनिच्छा से अपने धर्म या संप्रदाय में खींच लेने की प्रवत्ति प्रायः हर धर्मावलंबी की होती है. धर्मांतरण को विकास का प्रतीक बताकर सामूहिक धर्मांतरण की कोशिशें प्राचीन काल से ही, दुनियाभर में होती रही हैं. परंतु आध्यात्मिक निष्ठा में परिवर्तन और तदनुरूप धर्मांतरण के मामले बहुत कम देखे जाते हैं. जो लोग हिंदू से मुसलमान या मुसलमान से हिंदू बनते हैं, वे इसलिए नहीं कि इस्लाम का भ्रातत्व और समतावादी दृष्टिकोण उन्हें लुभाता है. या हिंदुत्व की दार्शनिक गवेष्णाएँ उन्हें अपनी ओर आकर्षित करती हैं यदि बाह्य दबाव न हो तो सत्ता केंद्र से जुड़ने या उसका संरक्षण पाने की लालसा ही धर्मांतरण का प्रमुख कारण बनती है. सत्ता से जुड़ा या उसमें रुचि रखने वाला व्यक्ति धर्मांतरण को सत्ता केंद्र के और अधिक निकट पहुँचानेवाले माध्यम के रूप में देखता है. जबकि जीवन की मामूली जरूरतों के लिए कठिन संघर्ष करने वाला व्यक्ति, यह सोचकर धर्मांतरण के लिए सहमत हो जाता है कि इससे उसके जीवनसंघर्ष में कुछ कमी आएगी और प्रकारांतर में वह एक सुखमय जीवन जी सकेगा. धर्मांतरण आमतौर पर स्वयंस्फूर्त नहीं होता. प्रायः यह बाह्यः उत्प्रेरणा के आधार पर ही संभव हो पाता है धर्म और राजनीति का गठजोड़ इस उत्प्रेरण को बढ़ावा देता है. सामाजिक गतिशीलता के भारतीय संदर्भों को समझने के लिए हमें अपने समाज के वर्गीय चरित्र को भी समझना होगा. सामाजिक अंरर्विरोधों को उभारने में इसकी अहम भूमिका रहती है. स्वाधीन भारत में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली का चयन इस उम्मीद के साथ किया गया था कि यह समाज के सभी वर्गों को विकास के एकसमान अवसर उपलब्ध कराएगी. इससे सहअस्तित्व की भावना बढ़ेगी. लेकिन वर्गीय अंतर्द्वंद्वों को मिटाने के लिए कोई असरकारी प्रयास सरकार या राजनैतिक दलों द्वारा नहीं किया गया. संभवतः यह मान लिया था कि लोकतंत्र जो बहुजन की इच्छानुकूल सत्ता परिवर्तन का औजार है, वह समाज और सत्ता के वर्गीय चरित्र में बदलाव के लिए असरकारी सिद्ध होगा. अर्थात् एक राजनैतिक प्रणाली सामाजिक प्रणाली की जिम्मेदारी भी निभा लेगी. यही भूल हमारी वर्तमान समस्याओं के मूल में है. सत्ता परिवर्तन, समग्र सामाजिक परिवर्तन का पर्याय नहीं है, तो भी ऐसा मान लिया गया कि राजनीति के केंद्र में स्थापित होने के पश्चात, सामाजिक प्रस्थिति में भी व्यापक बदलाव संभव हो जाएगा. इसलिए प्रायः सभी सामाजिक संस्थाएँ जनाकांक्षाओं को सशक्त जनांदोलनों में परिवर्तित करने की कोशिश करने की बजाय, राजनीति से जुड़ने या उसका समर्थन पाने में ही अपनी ऊर्जा खपाती रहीं हैं.

भारतीय जनमानस के इसी वर्गीय चरित्र का लाभ उठाने के लिए विभिन्न पूँजीवादी एवं राजनैतिक शक्तियाँ, संस्कृति और अन्य सामाजिक प्रकल्पों की अपने स्वार्थानुकूल व्याख्या करती हैं. संचार माध्यमों का संकुचित सन्दर्भों में और कदाचित अनुचित भी, उपयोग करते हुए ये शक्तियाँ, दीर्घकालिक लाभों के लिए शुरू किए गए आंदोलनों को अल्पकालिक लाभों तक सीमित करने में, सफल हो जाती हैं. आरक्षण और फिर आरक्षण में से आरक्षण जैसी व्यवस्थाओं को ऐसी कोशिशों के रूप में ही लिया जाना चाहिए. ऐसे अल्पकालिक लाभ, सामाजिक व्यवस्था में युगांतरकारी आमूलचूल परिवर्तन करने में सफल नहीं हो पाते. इसलिए ये सामाजिक अंतर्विरोधों को कम कर पाने में भी अक्षम सिद्ध होते हैं.

विडंबना यह है कि सत्ता शीर्षों पर विद्यमान शक्तियाँ इन अल्पकालिक परिवर्तनों को भी, अक्सर अपने अस्तित्व पर संकट के रूप में देखती हैं. इसलिए वे इन प्रणालियों से जो इन परिवर्तनों को प्रोत्साहित करती हैं, या तो उदासीन हो जाती हैं अथवा उनका अपने क्षुद्र स्वार्थों के लिए उपयोग करने का प्रयत्न करती हैं जिससे उन प्रणालियों में और बाहर असंतोष पनपने लगते हैं. जिससे समाज की गतिशीलता बाधित होती है. यही कारण है कि आमचुनावों के दौरान जहाँ देश के अभिजात वर्ग में, मतदान के प्रति उदासीनता छाई रहती है, वहीं उत्पीड़ित और सत्ता से वंचित वर्ग में, इस लेकर उत्सव का जैसा माहौल रहता है. दक्षिणी दिल्ली की पाॅश कालोनियों और यमुनापार की झुग्गीझोंपड़ी बस्तियों में, मतदान के प्रतिशत में भारी अंतर से, यह परिवर्तन साफ देखा जा सकता है. एक ओर तो प्रगतिशील शक्तियाँ देश को अंधविश्वास और समाज के वर्गीय चरित्र से छुटकारा दिलाने के लिए प्रयत्नशील हैं, तो दूसरी ओर जनतंत्रीय और वैज्ञानिक सोच को परंपरा और रुढ़ि में ढाल देने की कोशिश भी प्रतिरोधी शक्तियों द्वारा जारी है. सामाजिक व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर स्थित लोग, एक ओर अपनी स्थिति में सुधार लाने के लिए संगठित होकर संघर्ष कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर लोगों को धार्मिक व जातीय आधार पर बाँटकर, उनके आंदोलन को निष्प्रभावी करने की कोशिशें भी बराबर चल रही हैं. सामाजिक गतिशीलता के भटकाव का सबसे बेहतर उदाहरण और क्या होगा कि कुछ वर्षों पूर्व, जब सरकारी और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में कंप्यूटर का प्रयोग नाममात्र को होता था, तब भी महानगरों के अखबार, चौराहे और गलियाँ कंप्यूटर द्वारा जन्मपत्री बनाने के विज्ञापनों से भरे रहते थे विज्ञान की आधुनिक और चमत्कारी खोज का लाभ उपयोग कर, देश की आम जनता जिसका बहुलांश अनपढ़ है, को और अधिक रूढ़िवादी बनाया जा रहा था. क्या इसके पीछे सिर्फ व्यावसायिक कारण ही थे? और यदि इसके निहितार्थ कुछ और भी थे तब देश के बुद्धिमान समाजशास्त्री इसे चुपचाप क्यों देखते रहे? दरअसल व्यावसायिक शक्तियां सबसे पहले अपने समय के सोच को नियंत्रित करने का प्रयास करती हैं, ताकि उनके विरोध की कम से कम संभावना हो, और यदि ऎसी स्थिति बने तो उसे आसानी से नियंत्रित किया जा सके. क्योंकि उस अवस्था में समाज का स्थापित बुद्धिजीवी वर्ग या तो मौन धारण कर लेता है, अथवा वह समर्थन और विरोध में इतना बंट जाता है कि परिवर्तन में उसकी भूमिका गौण हो जाती है.

अंत में सिर्फ इतना कि हमारा समाज इन दिनों अंतर्द्वंद्वों के एक दौर से गुजर रहा है जो इस देश में प्रबुद्ध होते जनतन्त्र का लक्षण है. अब तक की तमाम निराशाओं के बावजूद, भारतीय समाज में चल रही उथलपुथल यह विश्वास जगाती है कि हम कोई जड़ समाज नहीं हैं और जब तक समाज के उत्पीड़ित और वंचित वर्ग के मन में असंतोष तथा आँखों में सुनहरे कल का सपना शेष है, तब तक सामाजिक परिवर्तनों की धारा को, न तो कोई रोक पाएगा, न ही इनकी दिशा बदलने में कामयाब हो सकेगा.

ओमप्रकाश कश्यप