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सहविधान और अर्थनीति : असमान संपत्ति वितरण की समस्याएं और विकल्प

सामान्य

धर्म और अभिजन संस्कृति—8

राज्य का ध्येय होना चाहिएराष्ट्रीय समर्थताओं का विकास. राष्ट्रीय जीवन का परिमार्जन तथा अंत में उसकी पूर्णता. किंतु नैतिक एवं राजनीतिक गति का मानवनियति से विरोध न हो. ब्लंट्श्ली, ’थ्योरी आ॓फ दि स्टेट’.

आधुनिक समाज की अधिकांश समस्याएं आर्थिकसामाजिक विषमताओं की देन हैं. और समाजार्थिक विषमताएं! वे किसकी देन हैं? गौरतलब है कि समाज में आर्थिकसामाजिक वैषम्य केवल आर्थिकसामाजिक कारणों से पैदा नहीं होता. उनके गढ़न में उस समाज की संस्कृति और भौगोलिक परिस्थितियां भी बड़ी भूमिका निभाती हैं. संसाधनों की उपलब्धता, भौगोलिक परिवेश, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, लोकाचार आदि सब मिलकर समाज की आर्थिक संरचनाओं को प्रभावित करते हैं. वे एकाएक पैदा नहीं हो जातीं. किसी मुक्त वनचारी सरल सभ्यता को आधुनिक प्रौद्योगिकीकुशल सभ्यता की ऊंचाइयों तक पहुंचने में सहस्राब्दियां लग जाती हैं. इस परिवर्तन यात्रा के दौरान विकासरत समाज को सभ्यता और संस्कृति के लंबे द्वंद्व से गुजरना पड़ता है. विकास की चेष्ठा में हुई ज्ञानविज्ञान की हर नई पहल का प्रथम सामना धार्मिकसांस्कृतिक शक्तियों होता है. वे परिवर्तन की प्रत्येक धारा को आसन्न संकट के रूप में देखती हैं. चूंकि विकासोन्मुखी धारा में समाज के अधिकांश लोग सम्मिलित होते हैं, वे भी जो धर्म एवं संस्कृति के पैरोकार होने का दावा करते हैं, इसलिए परिवर्तन के विरुद्ध उनका दिखावटी प्रतिरोध लंबा नहीं खिंच पाता. विरोध की अवधि का उपयोग वे परिवर्तन का वाहक बने हर नए व्यक्ति, विचार, आविष्कार आदि को अपने अनुकूल ढालने अथवा उसकी काट के लिए परंपरा और संस्कृति में से स्वार्थानुरूप तर्क खोजने; और यदि बस न चले तो उससे अनुकूलन के लिए करते हैं. उनके साथ समाज के प्रतिभाशाली और समर्थक बुद्धिजीवियों की टीम होती है. उनकी सहायता द्वारा अंततः वे अपने लक्ष्य में सफल भी हो जाते हैं.

उदाहरण के लिए कंप्यूटर के आविष्कार को लें. हर नए आविष्कार की भांति आरंभ में उसे भी यथास्थितिवादियों का खुला विरोध झेलना पड़ा था. परंपरा से जुड़े लोगों को लगता था कि उनकी प्राचीन कार्यशैली कंप्यूटर के अकूत सामर्थ्य के आगे असफल सिद्ध होगी. कुछ अन्य का मानना था कि उससे मानवीय श्रम की अवमानना होगी; तथा उत्पादनक्षेत्र में मानवश्रम की महत्ता और भी कम हो जाएगी. कंप्यूटर के आने के बाद उसकी कार्यक्षमता ने लोगों को चैंकाया भी. मगर जैसे ही उसने आमजन के बीच पैठ बनानी आरंभ की, जैसे ही उसकी उपयोगिता को परखा गया, पढ़ेलिखे लोगों में अपनी पैठ बनाने के इच्छुक ज्योतिषी आधुनिक होने का दावा करते हुए, कंप्यूटर द्वारा जन्मकुंडली बनाने लगे. ब्रह्मांडीय हलचलों के अध्ययन के लिए गढ़ा गया विषय ज्योतिष जो उससे पहले ‘शास्त्र’ कहलाता था, उसे अकारण ही ‘विज्ञान’ कहा जाने लगा. परिणाम सामने है. देश में अंतरराष्ट्रीय स्तर के खगोल वैज्ञानिक हाथ में उंगलियों की संख्या से भी कम होंगे, जबकि मोटी दक्षिणा के बदले पाखंड का सौदा करने वाले ज्योतिषियों की संख्या हजारों में है. प्रत्येक छोटेबड़े अवसर को अपने मुनाफे तब्दील कर लेने के अभ्यस्त पूंजीपति भी भला क्यों पीछे रहते. यथासंभव उन्होंने भी इस काम में मदद की. उनके दिए दान से कथावाचक किस्म के स्वयंभू महात्मा अपने प्रवचन के वीडियो बनवाकर बांटने लगे. धंधा बढ़ा तो उन्होंने अपने लिए टेलीविजन के चौनल ही खरीद लिए. कुल मिलाकर ज्ञानविज्ञान और आधुनिक क्रांति के संदेश के साथ विकसित एक तकनीक के प्रभाव को यथास्थितिवादियों ने भौंथरा कर दिया.

केवल कंप्यूटर के आविष्कार के साथ ऐसा हुआ हो, यह भी नहीं है. लिपि का आविष्कार कबीलाई संस्कृति की असाधारण प्रतिभाओं की देन था. अभिव्यक्ति, प्रशिक्षण, संप्रेषण आदि के लिए पहले प्रस्तर चित्रों को उपयोग में लाया जाता था. कालांतर में मनुष्य का बौद्धिक विकास हुआ तो अभिव्यक्तियों में प्रतीकात्मकता बढ़ने लगी. संकेतों द्वारा संप्रेषण की कला कीलाक्षर लिपि के रूप में विकसित हुई. दुनिया की अधिकांश लिपियां उसी कीलाक्षर लिपि का संशोधित संस्करण हैं. लिपि के विकास के उपरांत आदर्श स्थिति तो यह होती कि उसमें ऐसा काम होता, जिससे ज्ञानविज्ञान का पोषण हो सके. ताकि समाज का बहुमुखी विकास संभव हो, जो ज्ञानानुभवों की परंपरा को सहेजकर समाज के वास्तविक विकास को गति दे सके. जिसकी मदद से ज्ञान, विज्ञान और तकनीक का लाभ सीधे आमजन तक पहुंचाया जा सके. लेकिन हुआ क्या? ज्ञान को सहेजने की प्रक्रिया में भारत में सबसे पहली कृति सामने आई—ऋग्वेद. वह धार्मिक दृष्टिकोण से लिखा गया, भारत का सांस्कृतिक दस्तावेज था. उसका वर्णित प्रच्छन्न इतिहास आर्य लड़ाकों का महिमामंडन करता था. वह सीधेसीधे विजेता के द्रष्टिकोण से, उसे प्रसन्न रखने के लिए किया गया स्तुतिकर्म था. कालांतर में उसकी धार्मिकदार्शनिक ग्रंथ के रूप में प्रतिष्ठा हुई.

ऋग्वेद ने तत्कालीन धर्माचार्यों को इतना सम्मोहित किया कि कालांतर में उसकी प्रतिष्ठा हेतु साम और यजुर्वेद नामक संहिताओं की रचना की गई, जिनमें साम् ऋक् की ऋचाओं के गायन तथा यजुर्वेद उसके याज्ञिक कर्मकांड के निरूपण से संबंधित थी. आशय है कि ज्ञान और परंपरा के संहिताकरण की शुरुआत ही कर्मकांडीकरण से हुई. इसके बावजूद ऋग्वेद के आगे ही संकरी हो चली इस धारा को ‘वेद(ज्ञान)’ कहा गया. कालांतर में यजु, साम और अथर्व को भी उसकी श्रेणी में रख लिया गया. वेद नाम की संज्ञा ज्ञान के पर्याय के रूप में रूढ़ होती गई. शताब्दियों तक भारतीयों की चिंतनधारा वेदों को आप्तवाक्य मानने अथवा न मानने की बहसों में उलझी रही. वेदों का पठनपाठन पुनीत कर्तव्य माना गया, उनमें विश्वास विद्वता की निशानी. आलोचकीय दृष्टि से दूर रखने के लिए समाज के बड़े वर्ग पर उनके पठनपाठन पर पाबंदी लगा दी गई. यह मनुष्य की स्वाभाविक जिज्ञासा का आस्थाकरण था, जिसने आने वाली सहस्राब्दियों को प्रभावित किया था.

भारत ही क्यों, पूरी दुनिया में, लिपि का सर्वप्रथम उपयोग समाज की धार्मिक मान्यताओं, रीतिरिवाजों और कर्मकांडों को सहेजने के लिए किया गया. इसका यह अर्थ नहीं है कि सांस्कृतिकरण की सभी कोशिशें मानवीय स्वार्थ से प्रेरित थीं. दरअसल धर्मप्रेरित आरंभिक सभ्यताकरण का इतिहास व्यक्तिगत स्वार्थ और लोककल्याण, दोनों ही भावनाओं से बना है. प्राचीन आचार्यों ने धार्मिक आचारविचार के साथ तत्कालीन नैतिक मूल्यों को भी समान स्थान दिया गया था. तदनुसार यह कहना उचित होगा कि आरंभिक समाजीकरण की कोशिशों के मूल में कदाचित लोककल्याण की भावना भी थी. किंतु धर्म नामक जिस संस्था के बूते तत्कालीन आचार्य समाज को संगठित करना चाहते थे, उसकी नींव पलायनवाद पर टिकी थी. इहलोक से ज्यादा उसका आग्रह परलोक के प्रति था. सांसारिक सुखसुविधाओं को वह दोयम दर्जे का मानता है. अर्थधर्मकाम और मोक्ष में स्वार्थवश चौथे पुरुषार्थ मोक्ष पर ज्यादा जोर दिया गया था. उसका आकर्षण इतना प्रबल था कि दुनियादारी के संघर्ष में नाकाम रहे; अथवा बलपूर्वक पीछे ढकेल दिए गए लोग आसानी से उसकी ओर मुड़ जाते हैं. धार्मिक सम्मोहन में फंसकर वे स्वयं को परिस्थितियों के हवाले कर देते हैं. यह प्रवृत्ति समाज के बड़े वर्ग को विकास की दौड़ से अनायास ही बाहर कर देती है. कुल मिलाकर इस प्रवृत्ति ने पूर्ण समाजीकरण की कोशिशों को अवमंदित करने का काम किया.

आरंभिक जीवन पूरी तरह प्रकृतिआधारित था. अनिश्चित और संघर्षपूर्ण. उसकी निरंतर परिवर्तनशील स्थितियां मनुष्य के लिए जहां चुनौती थीं, वहीं प्रेरक का काम भी करती थीं. प्राकृतिक शक्तियों के उपादान कारण के रूप में मनुष्य ने अनेक देवताओं की परिकल्पना की. फिर उनके कोप का डर दिखाकर समाज को नियंत्रित करने की कोशिश भी. हालांकि यह कहना बड़ा मुश्किल है कि भारतीय समाज में समाजार्थिकवैषम्य पहले आया अथवा उसे नियति बना देने की चालें लोगों के दिमाग में पहले आईं, किंतु इतना तय है कि पूरी तरह प्रकृतिआश्रित समाज में धर्म के पालक, संरक्षक, संवर्धक तथा व्याख्याकार के रूप में जो वर्ग सामने आया, उसमें अधिकांश लोग लालची और विशिष्टताबोध का शिकार थे. बगैर किसी श्रम के वे अपनी सामाजिक हैसियत को बनाए रखना चाहते थे. अपनी पैठ का अनुचित लाभ उठाते हुए उन्होंने जनसाधारण के मन में लौकिक सुखसुविधाओं के प्रति विरक्ति का भाव पैदा करना आरंभ कर दिया, जबकि उनका अपना जीवन उनकी खुद की स्थापित मान्यताओं के विपरीत था. समाज के शीर्षस्थ वर्ग के दोहरे चरित्र का असर बाकी लोगों पर भी पड़ा. उससे शारीरिक श्रम को लेकर हेय भाव लोगों के मनस् में घर करता गया. धीरेधीरे निर्णय के सारे अधिकार समाज के शीर्षस्थ बुद्धिजीवी वर्ग के हाथों में समाते गए. ऐसे लोग जो केवल शारीरिक श्रम पर निर्भर थे, वे श्रम के मूल्यांकन का अधिकार दूरे वर्ग के अधीन होने के कारण जीवनसमर में निरंतार पिछड़ते गए.

राजसत्ता इस विसंगति का समाधान कर सकती थी. यह उसके गठन का मूल उद्देश्य भी था. लोगों ने राज्य के अधीन रहना स्वीकार ही इसलिए किया था कि वह शांति एवं व्यवस्था बनाए रखने के साथ सभी को जीवन के समान अधिकार प्रदान करेगा. न्यूनतम बलप्रयोग द्वारा शोषणकारी शक्तियों का शमन कर वह ऐसी न्यायपूर्ण एवं कल्याणकारी व्यवस्था स्थापित करेगा, जिसमें सभी को विकास के समान अवसर प्राप्त हों. विडंबना ही कहिए कि राज्य अपने मूल उद्देश्य से प्रायः विमुख ही रहा. उसके इतिहास में ऐसे अवसर बहुत कम आए जब वह अपने आदर्श के करीब पहुंच सका हो. सामान्यतः वह अपने उद्देश्य को पूरा करने में नाकाम ही रहा है. इसके बावजूद आमजन के कल्याण की कीमत पर राज्य की स्तुति, उसे अतिरिक्त सामर्थ्यशाली बनाने के प्रयास महाभारतकाल में ही नजर आने लगे थे. चाटुकारिता की परंपरा में राज्य सभी प्रकार के धर्मों, विद्या एवं शक्तियों का भंडार कहा जाने लगा था. सुशासन के लिए दंडनीति को आवश्यक मानते हुए राज्य को अतिरिक्त अधिकार दिए गए

जिस समय दंडनीति निर्जीव हो जाती है, उस समय तीनों वेद डूब जाते हैं. सभ्यता और संस्कृति के आधार सभी धर्म, चाहे वे कितने ही उन्नत क्यों न हों, पूर्णतः नष्ट हो जाते हैं. जब प्राचीन राजधर्म का त्याग कर दिया जाता है, तब व्यैक्तिक आश्रम धर्म के आधार भी शेष नहीं बचते. इस प्रकार समस्त प्रकार के त्याग राजधर्म में ही दिखाई पड़ते हैं और समस्त प्रकार की दीक्षाएं राजधर्म में ही युक्त हैं. सब प्रकार की विद्याएं राजधर्म में ही सम्मिलित हैं और समस्त लोक राजधर्म के अंतर्गत हैं.’1

स्पष्ट है महाभारतकाल तक राज्यसत्ता और धर्मसत्ता का गठबंधन काफी मजबूत हो चुका था. वर्चस्व कायम रखने, यथास्थिति पर आंच न आने देने तथा खुद को शीर्ष पर रखने के लिए कूटनीतिक चालें चलने के मामले में धर्मसत्ता और राजसत्ता दोनों एक थे. कालांतर में तीसरा वर्ग भी उनमें आ मिला. यह तीसरा वर्ग अर्थसत्ता का प्रतीक था. जिसने विभिन्न समाजों, संस्कृतियों और राज्यों के बीच बढ़ते व्यापार का लाभ उठाकर अकूत संपदा बटोरी थी. अपने बुद्धिचातुर्य और संगठन सामर्थ्य के बल पर वास्तविक उत्पादक वर्ग को अपदस्थ कर वह अर्थसत्ता के शीर्ष पर जा विराजा था. पशुचारण अर्थव्यवस्था तक संपत्ति पूरे समाज की मानी जाती थी. कृषि ने जीवन में स्थायित्व तथा भूमि को स्थायी संपदा के रूप में पहचान दी थी. उपज बढ़ने से लोगों की आय भी बढ़ती जा रही थी. साथ में जरूरतें भी. उनकी भरपाई के लिए आरंभ में समाज का शिल्पकार वर्ग संगठित होकर व्यापार करने लगा. इससे उसकी सामाजिक प्रस्थिति में सुधार हुआ. सभ्यताकरण के दौर में जैसेजैसे मार्ग एवं परिवहनसंबंधी सुविधाए बढ़ीं, शिल्पकार संगठनों का व्यापार भी बढ़ता गया. चूंकि उन दिनों लंबी यात्राएं करना खतरनाक था. मार्ग में लुटेरे, डाकुओं का भय बना रहता था. राज्य की सुरक्षा सेवाएं सब जगह उपलब्ध नहीं थीं. विशेषकर दूसरे राज्यों तथा दुर्गम जंगलों से गुजरते समय. इसलिए लंबी दूरी के व्यापारी अपने माल की सुरक्षा के लिए हथियारबंद दस्ता रखने लगे. धीरेधीरे शिल्पकार वर्ग की दो कोटियां बनती चली गईं. एक वह जो अपने शिल्प एवं श्रम की सहायता से उत्पादन करता था. दूसरे उत्पाद को ग्राहकों तक पहुंचाता था. छोटे उत्पादकों के लिए यह संभव न रहा होगा कि उत्पादन कार्य को छोड़कर माल की बिक्री के लिए लंबी दुर्गम यात्राओं पर निकल सकें. इसलिए एक कोटि उन शिल्पकारों की बनी, जो केवल उत्पादन करते थे. बिक्री के लिए उन्हें स्थानीय ग्राहकों तथा व्यापारिक संगठनों पर निर्भर रहना पड़ता था. जैसेजैसे व्यापार बढ़ा, तीसरा यानी व्यापारी वर्ग और भी मजबूत होता गया. ऋग्वेद में ‘पण’ शब्द की आवृत्ति हुई है, जो सहयोगाधारित व्यापारिक संगठनों का पर्यायवाची है. महाभारत में यह वर्ग इतना शक्तिशाली हो चुका था कि उसकी उपेक्षा कर पाना संभव न रहा.

तीसरे वर्ग के सत्ताकेंद्र से मिल जाने के बाद आम जन को सत्ता और संसाधनों से बेदखल करना आसान हो गया. हालांकि राज्य के अधीन धनबल, राज्यबल, जनबल और बुद्धिबल सभी कुछ था, किंतु जनाक्रोश के आग के आगे वे कभी भी खाक हो सकते हैं, इस हकीकत का एहसास शीर्षस्थ शक्तियों को था. अपनी हैसियत को बचाए रखने का उनके पास एकमात्र उपाय था—जनशक्ति को भुलावे में रखकर जनाक्रोश की संभावनाओं को न्यूनतम किया जाए. उल्लेखनीय है कि आरंभ में कृषियेतर आर्थिक गतिविधियों की बागडोर शिल्पकार वर्ग के हाथों में थी. जैसेजैसे व्यापार कर्म का विस्तार हुआ, बाजार पर व्यापारी वर्ग की पकड़ बढ़ती गई. शिल्पकार वर्ग का आर्थिक स्तर निरंतर गिरता गया. उसके लिए यह संभव न था कि उत्पादन और व्यापार दोनों को एक साथ संभाल सके. वास्तविक क्रेता तक पहुंच व्यापारी की थी. इसलिए वह उत्पादक शिल्पकारों से मनमाना दाम वसूलने की स्थिति में था. दूसरे शब्दों में सभ्यताकरण के आरंभिक दौर में ही समाज में दो ताकतवर वर्ग पनप चुके थे. धर्मसत्ता आदमी और ईश्वर के बीच दलाली के नाम पर अपना उल्लू सीधा करती थी, तो अर्थसत्ता वास्तविक उत्पादक और उपभोक्ता के बीच.

सामाजिक असंतोष की मार से खुद को बचाने के लिए राजसत्ता ने सर्वकल्याणकारी, मुक्तिदाता, जीवन का परम लक्ष्य कहते हुए धर्म को न केवल खुद अपनाया, बल्कि लोगों को भी उसके लिए बाध्य किया. उसने दान, प्रलोभन, लालच के सहारे पुरोहित वर्ग को अपने समर्थन में ला खड़ा किया. राजसत्ता से निकटता और सामंजस्य बनाए रखने के लिए पुरोहित वर्ग ने भी ऊंचनीच, पापपुण्य, धर्मअधर्म के किले बनाए, जिनमें जनसाधारण को मानसिक गुलामी के लिए कैद किया जाने लगा. लोगों के मन में विद्रोह की भावना जन्मे ही नहीं, इसके लिए कर्मवाद का सहारा लिया गया. राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि घोषित कर, उसके हर अच्छेबुरे निर्णय को महिमामंडित करने की कोशिश की गई. सत्ता पर विराजमान लोगों के भोगविलास को औचित्यपूर्ण ठहराने के शास्त्रीय उपक्रम रचे गए. यही नहीं, उनके प्रत्येक निर्णय को ईश्वरीय कहकर हर गलतसही फैसले का समर्थन किया गया. आशय यह है कि जिसे सभ्यताकरण कहा जाता है, वह समाज के अभिजनवर्ग के उदय और निरंतर शक्तिशाली होते जाने की यात्रा है.

परिणाम यह हुआ कि समाज के संसाधन, जिनके भरोसे कुल समाज के विकास का दावा सच हो सकता था, सभी समाज के प्रभुवर्ग के अधीन होते चले गए. जब फैसले विवेक और तर्क के बजाय आस्था और कुलपरंपरा के नाम पर होने लगें तो समाज में न्याय का पलड़ा स्वतः ही शिखर की ओर झुक जाता है. उसी का सहारा लेकर शिखरस्थ वर्ग खुद को किसी भी प्रकार के न्याय, आलोचना, समीक्षा, विमर्श आदि से ऊपर समझने लगता है. सभ्यताकरण का यह कौतुक दुनिया के किसी एक कोने या समाज में नहीं, कुछेक कबीलाई संगठनों को छोड़कर, प्रायः सभी समाजों में रचा गया. उम्मीद थी कि विज्ञान के आगमन के पश्चात नई शिक्षा और ज्ञान की रोशनी में आम आदमी अभिजन के इस षड्यंत्र को समझ सकेगा. लेकिन विवेकवान जनसमाज या जनसमाज का विवेकीकरण को, प्रौद्योगिकीकरण के सहारे सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहा पूंजीवाद भी अपने लिए अहितकारी समझता था. उसकी जरूरत जनसमाज नहीं उपभोक्ता समाज की रचना करना था. मशीनों का आविष्कार व्यापारी वर्ग के लिए वरदान सरीखा था, जिसने शिल्पकार वर्ग पर उसकी निर्भरता को न्यूनतम कर दिया. उसके लिए पूरी दुनिया महज उपभोक्ता थी. पूंजीवाद एक प्रकार का नया धर्म था, जो उपभोक्ताओं के लिए इसी जन्म में स्वर्ग गढ़ने का दावा करता था. आम आदमी अपने स्वर्ग को अपनी मर्जी से गढ़े. उसमें उसकी भावनाओं की भी कद्र हो, इसकी अनुमति न परंपरागत धर्म देता है, न पूंजीवाद प्रेरित प्रौद्योगिकीयधर्म. जब सबकुछ ऊपर से थोपा जाने लगे तो न्याय का पलड़ा उसी ओर झुक जाना स्वाभाविक था. यह हुआ और धूमधाम से विकास के नारों के बीच हुआ. गत दो दशकों में उसमें परिवर्तन के लिए कितने ही विचार आए, संघर्षकारी स्थितियां बनीं, सत्तापरिवर्तन हुए, किंतु जनसाधारण के लिए स्थिति लगभग वैसी ही रही, जैसी पहले थी.

क्या सहविधान समाज में व्याप्त आर्थिक विषमता का समाधान कर सकेगा? इसका सहीसही उत्तर तो इसको अपनाने वालों की निष्ठा पर होगा. इस बात से तय होगा कि सहविधान को अपना विधान बनाने वाला समाज उसके प्रति कितना गंभीर है. कितनी निष्ठा के साथ उसे अपनाना चाहता है. इतना सुनिश्चित है कि वह आरोपित व्यवस्था नहीं होगी. सहविधान लोगों का स्वैच्छिक वरण होगा. इसकी सफलता लागू करनेवालों पर नहीं, अपनाने वालों पर निर्भर होगी. यह लोगों को निर्देशित नहीं अनुशासित करने पर जोर देगा. इसकी उपस्थिति दस्तावेजी न होकर नागरिकसंकल्प के रूप में होगी. समाज में उसकी उपस्थिति कानून न होकर नैतिक बल के रूप में होगी.

सहविधान के अनुसार संपत्ति पर व्यक्ति की अधिकारिता दो प्रकार से तय होगी—सामूहिक और व्यक्तिगत. बिना किसी पूर्वाग्रह अथवा भेदभाव के समाज यह प्रबंध करेगा कि व्यक्ति की सामान्य जरूरतें पूरी होती रहें. दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उसको किसी का भी सहारा न लेना पड़े. वह ऐसी उत्पादन प्रणाली को अपनाने पर जोर देगा जिसके माध्यम से व्यक्ति अपने उत्पादनसामर्थ्य, शिल्पकौशल की रक्षा कर सके और समाज के विकास में अपनी भूमिका निभा सके. नागरिकों को अपने अधीन संपत्ति के ऐच्छिक उपयोग की अनुमति होगी. व्यक्ति की जरूरतें क्या हैं, इसका निर्धारण मिलबैठकर, आपसी विचारविमर्श के बाद किया जाएगा और इसके लिए समानता और न्याय के सिद्धांत का पालन किया जाएगा. साथ में यह भी ध्यान में रखना होगा कि सदस्य इकाइयां अपनी रुचि, प्रकृति, मनोविज्ञान में अलग हो सकती हैं. यह भी कि व्यक्तिगत रुचियों, रुझानों, पसंदों, सोच और सामान्य आवश्यकताओं के मामले में समाज की ओर से अनावश्यक दखल मनुष्य की नैसर्गिक स्वतंत्रता को बाधित कर सकता है. यदि ऐसा हुआ तो सहविधान की स्थापना का उद्देश्य ही व्यर्थ चला जाएगा. मनुष्य की नैसर्गिक स्वतंत्रता, विचारवैविध्य और मानवीय गरिमा बनी रहे इसके लिए उसकी सामान्य निजता और रुचियों का भी ध्यान रखा जाएगा. इस सावधानी के साथ कि समाज की कोई भी इकाई स्वयं को उपेक्षित अनुभव न करे. प्रत्येक को यह विश्वास रहे कि समाज के विकास में उसका भी योगदान है. उसकी महत्ता है और समाज को उसकी उतनी ही आवश्यकता है, जितनी कि उसको समाज की.

इकाई विशेष की जरूरतों को तय करने का एक मापदंड यह भी हो सकता है कि समाज की कुल संपत्ति को उसकी सदस्यसंख्या के अनुपात में बांट दिया जाए. फिर प्रत्येक इकाई के हिस्से में जितनी संपत्ति आती है, औसतरूप में उतनी संपत्ति पर व्यक्तिगत अधिकारिता की सीमा तय कर दी जाए. उसी के आधार पर व्यक्ति को अपनी आवश्यकताओं को तय करने की आजादी हो. सहविधान में मनुष्य की सुखसुविधाओं में बढ़ोत्तरी के लिए समाज की कुल आय, संपदा में वृद्धि अपरिहार्य होगी. किसी कारणवश यदि प्रगतिचक्र धीमा पड़ जाए, अर्थव्यवस्था को मंदी का सामना करना पड़े अथवा उसपर अनावश्यक संकट आन पड़े तब? क्या मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं में कटौती की जाएगी? हरगिज नहीं. मूलभूत आवश्यकताएं मनुष्य के अस्तित्व से जुड़ी अनिवार्यताएं हैं. यह समाज का दायित्व है कि उनमें कमी यथासंभव न होने दे. यदि ऐसी कोई विपत्ति आन पड़े तो उसकी भरपाई अपने बाकी खर्चों में कटौती करके पूरा करने की करे. यदि फिर भी काम न बने तो नागरिकों से उसकी भरपाई के लिए अतिरिक्त योगदान का आग्रह करे. परस्पर आत्मीय व्यवहार, संगठन, सहानुभूति और लक्ष्य के प्रति समर्पण से समस्या का समाधान संभव है.

यदि कोई दावा करे कि समाज के विकास के लिए उसका योगदान दूसरों से कहीं अधिक है. इसलिए उसको अपनी इच्छाओं के विस्तार तथा उन्हें पूरा करने की अनुमति मिलनी ही चाहिए, तब समाज को चाहिए कि ऐसी नैतिक व्यवस्था करे ताकि दूसरों से विशिष्ट दिखने जैसा व्यक्तिवादी विचार नागरिकों के मन में पनपने ही न पाए. यदि किसी नागरिक के मन में ऐसा विचार आता है तो मान लेना चाहिए कि उससे अपने नागरिकों के सहविधान की भावना के अनुरूप शिक्षणप्रशिक्षण में चूक हुई है. व्यक्ति को भी समझना चाहिए कि प्रकृति के कुल ज्ञानविज्ञान और कर्मकौशल के समक्ष उसके द्वारा अर्जित ज्ञान नगण्य हैं. और जो भी ज्ञानकौशल उसने अर्जित किया है, वह वही है जिसको समाज पीढ़ीदरपीढ़ी सहेजता आया है. ज्ञान के इस अनुदान के लिए व्यक्ति समाज का ऋणी है. समाज से अलग रहकर वह उसका एकांश भी शायद ही अर्जित कर पाता. समाज की ज्ञानराशि अपनी सभी सदस्य इकाइयों के लिए खुली होती हैं और अर्जित ज्ञानसंपदा का अपनी तरह से विश्लेषण करने का अधिकार वह अपने प्रत्येक नागरिक को देता है. अतः यदि कुछ मामलों में वह दूसरे व्यक्तियों से बढ़कर है तो बाकी मामलों में अन्य लोग उससे काफी आगे हो सकते हैं. यह एहसास व्यक्ति को उसके विशिष्टताबोध से बाहर निकलने में कामयाब रहेगा.

दूसरी ओर समाज को भी समझना चाहिए कि किसी व्यक्ति ने यदि कुछ अतिरिक्त अर्जित किया है तो उसमें उसकी योग्यता एवं परिश्रम का भी योगदान है. ऐसे किसी व्यक्ति को उसके उत्कृष्ट योगदान के बदले जो सामाजिक लाभ मिलना चाहिए था, यदि वह नहीं मिला है, तो उसका आक्रोश तर्कसम्मत माना जाएगा. उस स्थिति में समाज को चाहिए कि समय रहते अपनी भूल स्वीकार कर ले और उस व्यक्ति को उसके अतिरिक्त योगदान के लिए लाभान्वित करे. यह लाभ पुरस्कार, सम्मान के माध्यम से भी किया जा सकता है. अथवा इसके लिए लोग आपस में मिलबैठकर ऐसी योजना बना सकते हैं, जो व्यक्ति को उसकी अधिकतम सेवाओं के लिए प्रोत्साहित कर सके. जिससे वह हताश हुए बगैर अपने योगदान को जारी रख सके. यह काम समाज में अभिजन मानसिकता के चलते नहीं हो सकता. इसके लिए विराट जनसंस्कृति को बढ़ावा देना जरूरी होगा. यह विश्वास रखना होगा कि पराजित सत्ताएं होती हैं, जनता नहीं. जनता को तो पराजय का एहसास कराया जाता है.

उत्पादकता को लेकर सामान्य धारणा यह भी है कि व्यक्ति तभी अतिरिक्त कार्य करने को उत्सुक होता है, जब उसको अतिरिक्त प्राप्तियों की संभावना हो. प्रायः कहा जाता है कि कुछ समाजवादी व्यवस्थाएं इसलिए ढह गईं कि श्रम पर सीधे लाभ मिलने की कोई उम्मीद न देख नागरिक अपने दायित्वों के प्रति उदासीन होने लगे थे. उत्पादन को लेकर अतिरिक्त उत्सुकता दिखाने, अपने श्रमकौशल के उपयोग से वृहद सामाजिक उद्देश्य की प्राप्ति हेतु स्वयंस्फूत्र्त निर्णय लेना और उत्पादन व्यवस्था में अभीष्ट बदलाव लाने की प्रवृत्ति जो नए शोधों को बढ़ावा देती है—पीछे छूटने लगी थी. परिणाम यह हुआ कि सहजीवितावादी द्रष्टिकोण को गठित वे अर्थव्यवस्थाएं—सीधे और तात्कालिक लाभ पहुंचाने वाली पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले निरंतर पिछड़ती चली गईं.

इस दावे में किंचित सचाई हो सकती है. लेकिन एकाएक यह मान लेना कि मनुष्य केवल सम्मान, पुरस्कार अथवा अतिरिक्त भौतिक सुखसुविधाओं के लिए काम करता है, भारत की उदार श्रमसंस्कृति की अवमानना करने जैसा है. ‘आदमी तभी काम करेगा, जब उसको सीधा लाभ होगा’यह सोच मुनाफे की संस्कृति की उपज है. इतिहास साक्षी है, सर्वहारा श्रमिक वर्ग तो हमेशा से ही न्यूनतम प्राप्तियों के बदले अधिकतम उत्पादन देता आया है. सच्चे कलाकार की भांति वे अपने हुनर की बोली नहीं लगाते. बल्कि उसे तराशने का अवसर तलाशते रहते हैं. लाभ का मनोविज्ञान न तो उनकी ईजाद है, न ही यह उनको सुहाता है. अधिकाधिक उत्पादकता के लिए स्पर्धा का सिद्धांत पूंजीवाद की देन है. शिल्पकर्मी और सर्वहारा मजदूर तो हमेशा अपने लिए सही अवसर और कद्रदान की तलाश में रहते हैं, ताकि अपने हुनर को पेश कर सकें. जिन समाजवादी राज्यों के असमय ढह जाने का उदाहरण दिया जाता है. कहा जा सकता है कि वे इसलिए नहीं ढही थीं कि वहां श्रमिक, सर्वहारा, शिल्पकर्मी अपने लिए अतिरिक्त सुविधाओं की मांग करने लगे थे. जिन्हें पूरा करना राज्य के बस से बाहर था. बल्कि इस कारण असमय कालकवलित हुईं कि जिन वादों, जो आश्वासन आमजन को सत्तापरिवर्तन के समय दिए गए थे, समय आने पर राष्ट्र उनसे मुंह मोड़ने लगा था. सोवियत संघ का उदाहरण दिया जा सकता है. सब जानते हैं कि वह मार्क्सवादी विचारों के आधार पर पहला प्रयोग था. बोल्शेविकों ने लेनिन का साथ इसलिए दिया था कि नवगठित राज्य में सत्ता प्राप्ति के पश्चात वर्गहीन समाज की स्थापना की ओर तेजी से बढ़ा पाएगा. समाजवाद उसका परमलक्ष्य होगा. लेकिन सत्ता प्राप्ति के बाद साम्यवादी सरकार की प्राथमिकताएं बदल चुकी थीं. वह सहयोग के बजाय स्पर्धा और प्रतिस्पर्धा की बातें करने लगी. शीतयुद्ध के बहाने देश को हथियारों की अंधस्पर्धा में झोंक दिया गया था. इससे उन लोगों का सपना चकनाचूर हुआ जो नए शासन से जीवन में बदलाव की उम्मीद लगाए थे. उल्लेखनीय है कि सोवियत क्रांति की सफलता में आमनागरिक का भी काफी योगदान था. क्रांति के लिए वहां के स्त्रीपुरुषों, मजदूरों और कारीगरों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था. जिस नेतृत्व को उन्होंने अपने लिए चुना था, वही अब साम्यवाद के नाम पर उनके साथ छल कर रहा था. इसलिए उसके मन में असंतोष स्वाभाविक था. सोवियत शासन का रवैया संघीय राज्य की स्थापना के मूल सिद्धांत के एकदम उलट था. यह विचलन ही उसके पतन का कारण बना था. इसलिए सोवियत संघ के पतन को समाजवाद या साम्यवाद की आलोचना का आधार नहीं बनाया जा सकता. न इससे यह सिद्ध होता है कि उत्पादकता केवल व्यक्तिगत स्वार्थ से अनुप्रेत होती है?

यदि अपवादस्वरूप ऐसा कहीं हुआ है तो इसके लिए सारा दोष श्रमिकवर्ग का नहीं है. उसका दोष मात्र इतना है कि वह हालात से अनुकूलन कर चुका है. शताब्दियों तक अभिजन समुदाय के नेतृत्व में काम करने के कारण यह अस्वाभाविक भी नहीं है. इसलिए अपनी मुक्ति का खयाल तक उसके दिमाग में नहीं आता. शोषणकारी शक्तियों का प्रभाव उसके दिल पर इतना गहरा है कि वह अपनी मुक्ति, शोषित वर्ग से बाहर शोषकवर्ग की श्रेणी में शामिल होने में देखता है. औपनिवेशिक शोषण का शिकार रहे देशों में तो अकसर ऐसा होता है. आवश्यकता इसी मनोस्थिति को बदलने की है. लक्ष्य साफ है, लेकिन डगर कठिन है. सहविधान की कामयाबी के लिए स्पर्धा के स्थान पर सहयोग की अवधारणा को स्थान देना होगा. स्पर्धा मुनाफे की संस्कृति की उपज है. सहयोग सहअस्तिव की अनिवार्यता. सहविधान की कामयाबी के लिए लाभ की वर्तमान परिभाषा को संशोधित कर बताना होगा कि आदर्श लाभ वह है जिसमें व्यक्तिगत लाभ और सामाजिक लाभ के बीच की दूरी न्यूनतम हो. दोनों में ऐसी निकटता हो कि उनकी स्वतंत्र पहचान कर पाना कठिन हो जाए.

चलिए कुछ देर के लिए मान लेते हैं कि सीधे और तात्कालिक लाभ की संभावना व्यक्ति को अतिरिक्त श्रम की प्रेरणा देती हैं. लेकिन ऐसा वहीं होता है जहां व्यक्ति अपने साथी कारीगर, मजदूर से ही नहीं, समाज में अपने भाई, रिश्तेदार, पड़ोसी से भी स्पर्धा करने लगता है. उस समय वह भूल जाता है कि वह अपने साथी, परिजनों, पड़ोसियों से नहीं, अपने आप से भी स्पर्धा कर रहा होता है. इसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगते हैं. मान लीजिए कारखाने में एक काम के लिए न्यूनतम चार घंटे का समय निर्धारित है. इस अवधि काफी सोचविचार और कार्यअध्ययन के बाद तय की गई है. इससे मालिक भी संतुष्ट है. अब यदि कोई कामगार मालिक को प्रसन्न करने या अतिरिक्त आय के लिए उस काम को साढ़े तीन घंटे में करने का दावा करता है, तो निश्चित रूप से उसका व्यक्तिगत कौशल सराहनीय होगा, लेकिन उस समय वह किसी अजाने ही किसी अन्य कामगार को स्पर्धा के लिए तैयार कर रहा होता है. मालिक को भले ही ऐसी कोई अपेक्षा न हो, किंतु संभव है कुछ दिन बाद कारखाना कोई और मजदूर उसके आगे पहुंचकर उस कार्य को केवल तीन घंटे में निपटाने का दावा करे. मालिक तो खुश होकर उसको काम का न्योता दे देगा. श्रम की यह स्पर्धा उसके लिए लाभकारी है. जिस काम के लिए पहले चार घंटे लगाने पड़ते थे, अब वह तीन घंटों में पूरा हो रहा है, 25 प्रतिशत श्रमघंटों की सीधी बचत. उत्पादकता के लिहाज से यह बुरा नहीं है.

मुनाफे की संस्कृति के अनुयायी इसका पक्ष लेंगे. आप किसका पक्ष लेते हैं, इस निर्णय के लिए मैं इस उदाहरण को थोड़ा और आगे बढ़ाता हूं. श्रम का सीधा मूल्यांकन उसे उत्पाद बना देना है. स्वाभाविक रूप से बाजार में उपलब्ध श्रेष्ठ उत्पाद कम श्रेष्ठ अथवा निकृष्ट उत्पाद को चलनबाह्यः कर देता है. उपर्युक्त उदाहरण में भी वे कामगार जो किसी कारणवश त्वरित उत्पादन करने में अक्षम हैं, स्पर्धा से बाहर चले जाते हैं. उनके समक्ष बेरोजगारी का संकट मंडराने लगता है. यानी स्पर्धा से कारखाना मालिक और उत्पादन कुशल कामगार को तो लाभ है. दोनों को अतिरिक्त आमदनी होती है. किंतु अपनी समग्रता में यह स्थिति शेष समाज के लिए नुकसानदेह सिद्ध होती है. देखा जाए तो उत्पादनकुशल कामगार भी हमेशा लाभ की स्थिति में नहीं रहता. काम को त्वरित स्तर पर निटपाने के लिए वह उत्पादन के कुछ ऐसे चरणों, अनुदेशों की उपेक्षा करता है, जिनका उत्पादन से सीधे स्तर प्रभावित नहीं करते, किंतु स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए उनका पालन अनिवार्य है. जाहिर है उत्पादनकुशल कामगार मानक स्तर से अधिक उत्पादन अपनी सेहत और सुरक्षा की कीमत पर ही कर पाता है. दूसरे उसे डर होता है कि कोई तीसरा व्यक्ति कभी भी उसको चुनौती दे सकता है; या अपनी अतिरिक्त कार्यक्षमता जिसके लिए अतिरिक्त कौशल की आवश्यकता है, को वह लंबे समय तक स्थिर नहीं रख पाएगा. इससे एक असुरक्षाबोध उसके दिलोदिमाग में समा जाता है. इस असुरक्षाबोध के कारण वह अपने आसपास के हर व्यक्ति पर संदेह करने लगता है. कदमकदम पर उसे भ्रांति होती है कि उसके पड़ोसी, रिश्तेदार सभी उसकी तरक्की से ईर्ष्या करते हैं. मौका पड़ते ही वे सुख को हड़पने जाने वाले हैं. अपनों के प्रति उसके अविश्वास और डांवाडोल मनःस्थिति का लाभ उठाने के लिए धर्माचार्य आगे आ जाते हैं. इस अवसर का लाभ वे दुनिया को मायाजाल, आदमी को स्वाभाविक रूप से छलीप्रपंची सिद्ध करने में लगा देते हैं. नतीजा यह होता है कि व्यक्ति समाज में रहकर भी वह स्वयं को पराया समझने लगता है. नियति नाम की अदृश्य छाया का पीछा करने लगता है. उसके परिणामस्वरूप समाज और व्यक्ति दोनों के लिए यह स्थिति अलाभकारी होती है. इस डर का लाभ उठाने में कारखाना मालिक भी पीछे नहीं रखता. मौका देखकर वह अपने लाभानुपात को बढ़ा देता है.

इसका यह निष्कर्ष नहीं है कि उत्पादकता को बढ़ाने की कोशिश ही बेकार है. ऐसे कामगार को जो चार घंटे के मानक कार्य को केवल तीन घंटे में पूरा कर देता है, हमेशा खलनायक की देखा जाना चाहिए! उसकी तत्परता और उत्पादनकौशल असम्मानेय है! आगे बढ़ते समाज की जरूरतें भी बढ़ती जाती हैं. समाज के सतत विकास हेतु उत्पादकतावृद्धि अपरिहार्य है. लेकिन उत्पादन वृद्धि श्रमिक की सेहत या उसके जीवन को दांव पर लगाकर हासिल नहीं की जानी चाहिए. इससे तात्कालिक लाभ भले हों, व्यापक परिप्रेक्ष्य में यह स्थिति व्यक्ति एवं समाज दोनों के लिए हानिकारक होती है. उत्पादनवृद्धि के लिए प्रौद्योगिकी में सुधार की कोशिश की जानी चाहिए. ऐसी प्रौद्योगिकी के विकास पर जोर देना चाहिए जो कामगार के शिल्पकौशल तथा श्रमसंस्कृति का सम्मान करती हो.जो कामगार चार घंटे के कार्य को तीन घंटे में पूरा करने में सक्षम है, उसकी कार्यशैली का अध्ययन कर सामान्य निष्कर्ष निकाले जाने चाहिए, ताकि बाकी मजदूरों को भी, उनके जीवन या सेहत पर विपरीत प्रभाव के बिना अपनाया जा सके.

अधिकतम उत्पादकता के सिद्धांत का समर्थन पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का समर्थन करना नहीं है. इसका आशय श्रमसंस्कृति का सम्मान करने वाली ऐसी जनोन्मुखी उत्पादनशैली से है जो न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन के लक्ष्य को पूरा कर सके. इस संशोधन के साथ कि विनिर्मित उत्पाद समाज के अधिकतम लोगों के लिए कल्याणकारी हो तथा उसके उत्पादन का लाभ पूरे समाज तक पहुंचता हो. पूंजी आधारित अर्थव्यवस्थाओं में स्पर्धा और निजी लाभ का बोलबाला होता है. वहां उत्पाद और उत्पादन प्रणाली का चयन व्यक्ति और समाज की मूलभूत आवश्यकताओं के बजाय पूंजीपति के मुनाफे के आधार किया जाता है. अधिकतम लाभ और स्पर्धा की दौड़ में आगे निकलने के लिए वहां पूंजीपति उत्पादन के नए क्षेत्र तलाशने पर जोर देता है. भले ही वे व्यक्ति मूल आवश्यकता से परे हों. पूंजीवादी अर्थतंत्र बड़ी चतुराई से व्यक्ति की पहचान और प्रतिष्ठा को विलासितापूर्ण उत्पादों से जोड़ देता है. परिणामस्वरूप समाज में निरर्थक होड़ पैदा होती है और विकास के मायने ही बदल जाते हैं. वहां सभ्यताकरण का अभिप्राय मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा और अधिकतम लोगों को अधिकतम सुख के बजाय ‘सर्वाधिक सक्षम को अधिकतम सुख’ तक सिमट जाता है.

सहविधान के अंतर्गत उत्पादन का आधार मुनाफा न होकर व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताएं होंगी. विकास के साथ आवश्यकताओं में वृद्धि संभव है—इस तथ्य की उपेक्षा नहीं की जा सकती. इसलिए सहविधान सम्मत राज्य में नागरिकों की बढ़ी हुई जरूरतों का भी ध्यान रखा जाएगा. इस शर्त के साथ कि उनका प्रयोग केवल प्रतिष्ठा, प्रदर्शन अथवा विलासिता तक सीमित न हो. वे मनुष्य और मानवीय गरिमा का सम्मान करती हों, समाज के अधिकांश लोगों की सीधी पहुंच में हों तथा उनका उत्पादन किसी व्यक्ति या समूह विशेष को लाभ पहुंचाने के बजाय कुल समाज के विकास को ध्यान में रखकर किया जाता हो. सहविधान सम्मत राज्य में व्यक्ति की अधिकतम उत्पादकता को बनाए रखने के लिए समाज ऐसे साधनों की खोज करेगा, जो उसको अतिरिक्त श्रम के लिए उत्पे्ररित करते हों. इसके लिए मुद्रा का योगदान कम से कम होगा. दरअसल पूंजीवादी अर्थतंत्र बहुसंख्यक समाज को छोटेछोटे हिस्सों में बांटकर उन्हें एकदूसरे से इस प्रकार अलग कर देता है कि वे स्वयं को एकदूसरे के प्रतिस्पर्धी मानने लगते हैं. इससे सहयोग, समर्पण एवं त्याग जैसे जीवनमूल्य जो किसी भी समाज में सुख, शांति, समृद्धि और सदाचार का मूलाधार होते हैं, वे पीछे छूटने लगते हैं. लोग अजाने ही एकदूसरे की जड़ें खोखली करने पर जुट जाते हैं. सहविधान की नींव स्वैच्छिक सहभागिता, सहयोग और सर्वकल्याण की पुनीत भावना पर टिकी होगी. इसलिए लोगों को अतिरिक्त श्रम के लिए प्रोत्साहित करने हेतु ऐसे उत्पादनतंत्र को अपनाया जाएगा जो व्यक्ति को मौद्रिक लाभ के स्थान पर सामाजिक लाभ को महत्त्व देना सिखाते हों. यह ध्यान रखते हुए कि समस्त सुख मनुष्य के लिए हैं. मनुष्य यदि उपभोक्ता वस्तुओं को ही सुख का पर्याय मान लेगा तो उन्हीं का दास बनकर रह जाएगा. वास्तविक सुख को भोग ही नहीं सकेगा. इस स्थिति में वह अपने ही बंधुबांधवों से ईष्र्या करने लगेगा, जो अंततः पूरे समाज के लिए चुनौती का सबब बनेगी.

विनिमय

समाज के विकास में वहां की विनिमय प्रणाली का भी बड़ा योगदान होता है. किसी राष्ट्र के पास खाद्य वस्तुओं का बफर स्टाक हो, दवाइयां हों, सुगम यातायात के भरपूर संसाधन और सुखी जीवन हेतु व्यापक इंतजाम हों, यदि वहां की वस्तुविनिमय प्रणाली अक्षम है, यदि समाज समय रहते जरूरतमंद व्यक्ति तक आवश्यक वस्तु पहुंचाने में नाकाम रहता है, तो उस राष्ट्र की तरक्की और विकास के कोई मायने नहीं हैं. पहले उत्पादन प्रणाली सरल थी. उतना ही सरल था वस्तु विनिमय. किसान को मिट्टी के बर्तन की जरूरत पड़ती तो वह कुम्हार से ले लेता था. औजारों की जरूरत पड़ती तो लुहार या बढ़ई की सेवाएं लेता था. लुहार, बढ़ई और कुम्हार अपनी अनाजसंबंधी जरूरतों के लिए किसान पर निर्भर थे. फसल आने के साथ ही अनाज की पूर्वनिर्धारित मात्रा उन्हें प्राप्त हो जाती थी. कालांतर में व्यापार बढ़ा तो नईनई वस्तुएं मनुष्य के उपयोग में जुड़ती गईं. उन सभी का स्थानीय उत्पादन संभव न था, न ही आपसी आदानप्रदान पर आधारित वस्तुविनिमय संभव था. विकल्प रूप में महंगी धातुओं, सोनेचांदी को विनिमय का आधार बनाया गया. कालांतर में मुद्राओं का चलन हुआ. आधुनिक सभ्यता में मुद्रा ही विनिमय का सीधा, सरल और सबसे कारगर उपाय है. इससे विनिमय न केवल आसान और तात्कालिक हो जाता है, बल्कि उसके माध्यम से वस्तु का सटीक मूल्यांकन भी संभव है, जो दूसरी विनिमय प्रणालियों में कदाचित बेहद असहज और कठिन है. इसलिए मुद्राआधारित विनिमय प्रणाली का चलन इन दिनों पूरी दुनिया में है. विभिन्न देशों के बीच करार आधारित विनिमय का भी चलन है, जिसमें वस्तुओं का मूल्यांकन मुद्रा अथवा महंगी धातुओं के रूप में होता है. सभी देशों की अपनीअपनी मुद्राएं हैं. उनका मूल्यांकन आपसी सहमति के आधार पर तय होता है, जिसमें संबंधित देश की अर्थव्यवस्था भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है.

मुद्राआधारित विनिमय ने बाजार को विकास की नई जमीन दी है. वह हमारे अभ्यास का अभिन्न हिस्सा बन चुका है. मुद्राआधारित विनिमय के हम इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि बिना उसके जीवन की कल्पना तक नहीं कर सकते. परिणामस्वरूप उससे होने वाले नुकसान की ओर हमारा कभी ध्यान ही नहीं जाता. अंतरराष्ट्रीय व्यापार और जटिल व्यापारिक कार्यकलापों की तो उसके अभाव में कल्पना भी संभव नहीं लगती. पूंजीवादी तंत्र के इशारे पर काम करने वाले, उसके द्वारा उपकृत उद्योगपति, अधिकारी, अर्थशास्त्री, राजनेता मौद्रिक विनिमिय के विकल्पों पर विचार तक नहीं करते. यही नहीं यदि कोई व्यक्ति, संस्था उस दिशा में काम करना चाहे, नई शुरुआत करे तो उसको पुराना, समयबाह्यः आदि कहकर अपमानित करने की कोशिश की जाती है.

इसमें कोई संदेह नहीं कि संचारक्रांति के दौर में जब विश्वग्राम की संकल्पना साकार होने लगी है, मौद्रिक विनिमय प्रणाली की सहजता एवं उपयोगिता लगभग विकल्पहीन है. हालांकि यह प्रणाली सर्वथा निरापद नहीं है. इसकी सबसे बड़ी कमजोरी है कि इससे संबंधों में निरर्थक किस्म की व्यावसायिकता जन्म लेने लगती है. आदमी एकएक पाई का हिसाब रखने में अपना कौशल समझने लगता है. ‘हिसाब तो बापबेटे का’ जैसा मुहावरा इसी असामान्य किस्म की व्यावसायिकता के चलते बना है. इसके चलते सहज मानवीय संबंध और सामान्य नैतिकताएं भी मौद्रिक व्यवहार का रूप ले लेती हैं. मनुष्य हर कार्य का आकलन मौद्रिक लाभ की दृष्टि से करने लगता है. यह व्यावसायिकरण का जीवन में अवांछित हस्तक्षेप है. आदर्श अवस्था तो यह होगी कि आदमी की रोजमर्रा की जरूरत में काम आने वाली वस्तुएं, सामान्य सेवाएं आदि बगैर किसी मौद्रिक व्यवहार के प्राप्त हो. विनिमय प्रणाली के अंतर्गत वस्तुओं के आदानप्रदान में लगने वाले श्रम को श्रमघंटों में बांटा दिया जाए. किसी सेवा या वस्तु का विनिमय उसके निर्माण में लगे औसत कार्यघंटों के भुगतान के साथ किया जाता सकता है.

तदनुसार सहविधान में सदस्य इकाइयां इस बात के लिए सहमत और सदैव तत्पर होंगी की समुदाय के भीतर, जहां तक संभव हो मुद्रा आधारित विनिमय को नियंत्रित किया जाए. समूह के भीतर रोजमर्रा के व्यवहार हेतु ऐसे विकल्प आजमाए जाएं जिनमें मुद्रा का प्रयोग न्यूनतम हो. विशेषकर सेवाआधारित उद्यमों में. प्रायः हर समूह के भीतर बिजली मिस्त्री, लौहार, बढ़ई, नाई, प्लंबर, कंप्यूटर मैकेनिक, हलवाई आदि विभिन्न पेशे वाले लोग एक साथ रहते हैं. वे एकदूसरे से सेवाओं का आदानप्रदान करते हैं. सेवाओं के भुगतान हेतु मुद्रा का प्रयोग किया जाता है. यह एक विडंबना ही कही जाएगी कि एक ही समाज में, एक साथ रहते हुए जब उन्हें एकदूसरे की आवश्यकता पड़ती है, तो मंजे हुए व्यवसायी की भांति संपर्क में आते हैं. धर्म, जाति, आसपड़ोस, भाईचार कुछ काम नहीं आता. ऐसी अनावश्यक व्यावसायिकता, जिससे जीवन में पूंजी को अनावश्यक महत्त्व मिलता हो, बचा जा सकता है. यह चलन न तो समाज की एकता और अखंडता के हित है न ही मानवीय मूल्यों के. समाजीकरण के हित में इससे दूर रहना ही श्रेयस्कर है.

सहविधान में मुद्राआधारित विनिमय को नियंत्रित करने के लिए लोगों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा कि वे सेवाओं का आदानप्रदान आपसी सहयोग और समझौते के आधार पर करें. मुद्रा के प्रयोग को न्यूनतम बनाए रखने के लिए श्रम मुद्रा के चलन को बढ़ावा दिया जाएगा. इसके लिए आवश्यक वस्तुओं एवं सेवाओं में लगने वाले श्रम की गणना कर, उसका श्रमघंटों के आधार पर मूल्यांकन किया जाएगा. उदाहरण के लिए यदि विद्युत चलित ब्लेंडर की मरम्मत करने में दो घंटे लगते हैं, तो उसका श्रम मूल्यांकन दो श्रमघंटे होगा. ऐसे ही यदि नापित द्वारा किसी व्यक्ति की हजामत बनाने में आधा घंटा लगता है तो उसकी सेवा का मूल्य आधी श्रममुद्रा माना जाएगा. अब यदि किसी नापित को ब्लेंडर की मदद के लिए इलेक्ट्रीशियन की आवश्यकता है तो उसके मरम्मत के बाद इलेक्ट्रशियन की दो श्रममुद्राएं उसकी ओर उधार हो जाएंगी. जिन्हें वह अपने चार बार सेवाविनिमय द्वारा वापस कर सकता है. यदि किन्हीं कारणवश इलेक्ट्रीशियन नाई से उसकी सेवाओं से निपटान नहीं करना चाहता तो उस व्यक्ति के दो श्रममुद्रा के बदले नाई किसी तीसरे व्यक्ति से श्रममुद्रा विनिमय के आधार पर सेवाओं का समायोजन कर सकता है, और तीसरा किसी चौथे व्यक्ति के साथ. चूंकि यह व्यवस्था मान्य नियमों के तहत होगी और समाज को बीच में लाने की जरूरत ही न पड़ेगी, न ही औपचारिक मुद्रा की आवश्यकता होगी. यहां एक समस्या खड़ी हो सकती है. जो लोग सेवा उद्योग के दायरे के बाहर हैं, वे इस व्यवस्था में कैसे हिस्सा लेंगे. सो इसमें कोई मुश्किल नहीं है. थोड़े से प्रयास से उन्हें भी इसमें सम्मिलित किया जा सकता है. पढ़ेलिखे व्यक्ति सामाजिक सेवाओं को प्राप्त करने के लिए आवश्यक कार्यघंटे ट्यूशन या लिखापढ़ी के दूसरे कार्यों के जरिये जमा कर सकते हैं.

उल्लेखनीय है कि पूंजीवादी अर्थतंत्र में वस्तुओं का मूल्यांकन प्रचलित मुद्रा के माध्यम से किया जाता है. जो अपेक्षाकृत आसान है और यह मानने में भी कोई गुरेज नहीं है कि व्यक्ति ने लंबे अंतराल में उसको विकसित किया है. लेकिन उसकी कमी है कि इससे प्रत्येक वस्तुओं के खरीदयोग्य होने का भ्रम पैदा होता है. कई बार यह भ्रम जानबूझकर पैदा किया जाता है. सेवाओं के विनिमय या स्वैच्छिक आदानप्रदान की व्यवस्था एक बार लोगों को भा जाए तो उसके बाद इसका प्रयोग एकदम सहज लगने लगेगा. श्रमघंटों का हिसाबकिताब रखने के लिए स्थानीय सामाजिक इकाइयां रजिस्टर रख सकती हैं. या कोई और सर्वस्वीकार्य प्रणाली आविष्कृत कर सकती हैं. इस बात की भी काफी संभावना है कि यह प्रणाली आरंभ में बहुत दुष्कर नजर आए. कार्य का श्रममुद्रा में विभाजन अनुचित और अव्यावहारिक लगने पड़े. मगर जो इससे सहमत हैं, जो इससे होने वाले सामाजिक लाभों की कल्पना कर सकते हैं, वे व्यापक लोकहित में इसे सफलतापूर्वक लागू करने की यथासंभव कोशिश करेंगे.

सहविधान पर आधारित राज्य में नागरिक इसपर सहमत होंगे कि वे एक ऐसी सामाजिक इकाई के सदस्य हैं, जिनके सुखदुख, हानिलाभ, जीवनमरण सब साझे हैं. उसकी सफलता के लिए आदर्श स्थिति तो यह होगी कि उसके नागरिकों में नकारात्मक स्पर्धा बिलकुल भी न हो. सकारात्मक स्पर्धा भी केवल सामूहिक कल्याण की भावना के साथ अनुमन्य होगी. यानी विकास की होड़ में एक समूह दूसरे समूह से होड़ करे तो चलेगा, किंतु उनका ध्येय अपनी सदस्य इकाइयों तथा प्रकारांतर में पूरे समाज का कल्याण होना चाहिए. उम्मीद करनी चाहिए कि श्रममुद्राओं के आधार पर सेवाओं के विनिमय की प्रणाली समाज से अनावश्यक स्पर्धा को बाहर करने, व्यावहारिक नैतिकता को बनाए रखने में सहायक होगी. एक बार अपनाने के बाद आदमी धीरेधीरे इस व्यवस्था का अभ्यस्त होता जाएगा.

इस बात की भी संभावना है कि जटिल उत्पादन पद्धतियों के बीच श्रमविनिमय की प्रणाली काम ही न आए. ऐसी जगह इसपर जोर देना आवश्यक भी नहीं है. वहां आवश्यकतानुसार मुद्रा का प्रयोग जारी रखा जा सकता है. यह ध्यान में रखते हुए कि इसमें समाज का हित सन्निहित है, और यह भी कि मुद्रा का उपयोग उत्पादन, विपणन को आसान एवं उसकी उत्पादक को बनाए रखने के लिए है, न कि इसलिए कि उससे लाभ का अंतरण कुछ खास वर्गों की ओर ले जाने के लिए. ऐसा कुछ नहीं होना चाहिए जिससे समाज में आर्थिक स्तरीकरण फैले. इसे रोकने के लिए ऐसी मुद्रानीति अपनाई जानी चाहिए जिसका केवल सार्वजनिक व्यवहार संभव हो. व्यक्तिगत व्यवहार में मुद्रा के उपयोग को वहीं तक बढ़ावा दिया जाना चाहिए जहां तक उससे सार्वजनिक हित जुड़े हों. इससे पूंजी के एक जगह जमा होने की संभावनाएं कम होंगी. समाज में पूंजी का प्रवाह बढ़ेगा तो उसके लाभ उसके सभी वर्गों तक पहुंच सकेंगे.

यह भी आवश्यक नहीं है कि मनुष्य की आवश्यकता की सभी वस्तुएं उसको सेवाओं के आदानप्रदान के तहत मिल सकें. यदि कोई व्यक्ति सेवाओं के आदानप्रदान के दायरे के बाहर की कोई वस्तु प्राप्त करना चाहता है, तो क्या उसको प्राप्त करने की छूट होगी? इसका उत्तर ‘हां’ में है. अपने सुख को प्राप्त करने के लिए व्यक्ति स्वतंत्र होगा. मगर उस अवस्था में उसका निर्णय नैतिकतासम्मत एवं विवेकपूर्ण होना चाहिए. उसको जानना चाहिए कि ऐच्छिक सुख की प्राप्ति के लिए आवश्यक वस्तु प्राप्त करने का अधिकार उसको समाज की ओर से दिया जा चुका है. इसलिए कि सुख उसका जैविक अधिकार है. चूंकि वह सामाजिक प्राणी भी है, इसलिए सुख का सामाजिक अधिकार बनना भी जरूरती है. कोई सुख उसका नैतिकसामाजिक अधिकार बन सके, इसके लिए उसको ‘सुख की सार्वजनिकता’ के सिद्धांत पर विचार करना होगा. वस्तुतः यही वह बात है जो सहविधान को दूसरे अर्थदर्शनों से भिन्न डगर पर लाकर खड़ा करती है. अपने सुख का प्रबंध करने से पहले प्रत्येक नागरिक से यह अपेक्षा होगी कि वह सोचे कि जिस सुख को अपने लिए प्राप्त करना चाहता है, क्या वह दूसरों को भी, विशेषकर उसके आसपास के लोगों की भी पहुंच में है? यदि है तो उस सुख के लिए प्रयास करते समय समाज में कोई विक्षोभ तो नहीं होगा? सीधासा डिमांड और सप्लाई का नियम है. यदि मांग है और समाज के बहुसंख्यक वर्ग में मांग को पूरा करने का सामर्थ्य भी है तो व्यक्ति निःसंकोच उस सुख को प्राप्त करने के लिए अधिकृत होगा.

समस्या उस समय हो सकती है कि व्यक्ति जिस वस्तु में अपना सुख देखता है, वह उसके समाज के अधिकांश की पहुंच से बाहर हो. ऐसे माहौल में किसी अकेले व्यक्ति को वह सुख का उपलब्ध कराने का अभिप्राय है, बाकी को उससे वंचित कर देना. इससे समाज में अविश्वास और अशांति फैलेगी. तो क्या व्यक्ति को ऐसे सुख की कामना छोड़ देनी चाहिए? उस अवस्था में व्यक्तिस्वातंत्रय के लक्ष्य का क्या होगा? राज्य जो स्वयं को बड़ी संस्था मानता है, क्या यह उसकी क्षमताओं पर सवाल नहीं होगा कि वह अपने किसी नागरिक की इच्छाओं का सम्मान करने में अक्षम है. यहां हमारा सुझाव यह है कि इच्छाओं के द्वंद्व के मसले सामूहिक स्तर पर मिलबैठकर सुलझाने चाहिए. व्यक्ति को सोचना होगा कि समाज कोई बाहरी व्यवस्था नहीं है. बल्कि उसका अपना परिवार है. उसके सीमित परिवार की अपेक्षा बड़ा परिवार. परिवार में जैसे सभी मिलजुलकर भोग करते हैं, वैसे ही समाज में भी होना चाहिए. उसे समझना चाहिए कि जो वस्तु अधिकांश नागरिकों को अनुपलब्ध है, उसे प्राप्त करने का दुराग्रह समाज को विघटन के कगार पर ले जाएगा. वहीं समाज का भी दायित्व होगा कि वह अतिरिक्त इच्छाएं रखने वाले नागरिकों के साथ उदारता से पेश आए. यदि ऐच्छिक वस्तु समाज के बाकी लोगों के लिए भी उपयोगी है अथवा उनकी पसंद में शामिल है तो मिलबैठकर विचार करे, उन उपायों पर अमल भी करे जिससे उस वस्तु को समूह के अधिकतम सदस्यों के लिए कैसे उपलब्ध कराया जा सकता है, ताकि सदस्यों के सुख में वृद्धि हो सके. मंतव्य पूरी तरह स्पष्ट है, समाज को अपनी सदस्य इकाइयों की पसंदों का आकलन करते समय जिम्मेदार अभिभावक की भूमिका में नजर आए.

समाज द्वारा अपने प्रत्येक नागरिक के साथ समभावी द्रष्टिकोण तभी संभव है जब संबंध सामान्य नैतिकता द्वारा मर्यादित हों. अर्थव्यवस्था का परिचालन व्यावसायिकता के आधार पर न होकर समानता और सहयोग के आधार पर हो. यह उस पूंजीवादी दृष्टि इससे अलग है, जो मानती है कि समाज में सभी एकसमान नहीं होते. लोगों की रुचियां, कार्यक्षमता, बौद्धिक सामर्थ्य, चीजों को परखने की दृष्टि, उत्पादनकौशल तथा आवश्यकताएं अनेकस्तरीय एवं भिन्नभिन्न होती हैं. उसके अनुसार, ‘जो ज्यादा करता है, उसे अधिक लाभ पाने का अधिकार है.’ इस सिद्धांत के आधार पर पूंजीवादी तंत्र मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं का भी स्तरीकरण कर देती है. जिससे आर्थिक मोर्चे पर कमजोर पड़े व्यक्तियों को उनकी दैनिक जरूरत की वस्तुएं भी पूरी तरह नहीं मिल पातीं. यह प्रवृत्ति विशेषज्ञ संस्कृति और एकाधिकार को बढ़ावा देती है. यही कारण है कि वहां बौद्धिक श्रम करने वाला शारीरिक श्रम करने वाले से अधिक कमा लेता है. अभिजन मानसिकता, फिर चाहे पूंजीवादी हो या धार्मिक—इसे अपना अधिकार मानती है. यह जानते हुए भी कि धन का असमान वितरण बहुसंख्यक निर्धन लोगों से उनके विकास की आजादी छीन लेता है. ऐसे में उनकी स्वतंत्रता दिखावटी बनकर रह जाती है, बाबा भृर्तहरि लिखते हैं—

जिसके पास धन है, वही उच्चकुलोद्भव और वही ज्ञाता पंडित है. वही सर्वशास्त्र प्रवीण है, वही दूसरों के गुणों का आकलन करने की योग्यता रखता है. वही प्रभावी वक्ता है. उसी का व्यक्तित्व दर्शनीय है. इसलिए कि सभी गुण धन के प्रतीक कांचन अर्थात सोने पर निर्भर हैं. धन है तो वे गुण हैं, अन्यथा वे भी नहीं हैं.’2

धन और पारिवारिक हैसियत के आधार पर व्यक्ति के चरित्र का आकलन, अमानवीय एवं प्रकृति विरुद्ध है. कुछ ऐसा ही है जैसे पहले तो किसी से समानतापूर्वक जीवन जीने के अधिकार छीन लिए लो, उसका तरहतरह से उत्पीड़न करो, मारो, पीटो, प्रताड़ित करो. फिर यदि कोई दुर्बल तन, विगलित मन व्यक्ति हृष्टपुष्ट, भरे पेट वालों से स्पर्धा में पिछड़ जाता है तो उसे धिक्कारो. उसे नाकारा, कामचोर और निकम्मा घोषित कर सम्मानपूर्वक जीवन जीने के सारे अधिकार भी छीन लो. देश का अभिजन सर्वजन समाज के साथ अर्से से यही स्वार्थक्रीड़ा करता आया है. पहले तो उसको शताब्दियों तक शिक्षा और विकास से दूर रखा. जाति, परंपरा, कुल, गोत्र, धर्म, क्षेत्र, रीतिरिवाज आदि के नाम पर भेदभाव का शिकार बनाया गया. निरंतर उपेक्षा और उत्पीड़न से जब वह पिछड़ गया तो समाज के सारे नियमकानून अभिजन समूह ने अपने स्वार्थ के अनुसार ढाल लिए. समस्या का एकमात्र निदान है, हितों का सामान्यीकरण और लक्ष्य की एकता. अभिजन वर्ग की कामयाबी का मूल है कि वह सर्वजन को छोटेछोटे खानों में बांटकर उसकी शक्ति को बिखेर देता है. फिर अल्पमत में होकर भी अपने से कई गुने बड़े सर्वजन पर राज्य करता है. अपने बुद्धिचातुर्य से समस्त संसाधनों का स्वामी बन जाता है और सर्वजन को जो वास्तविक उत्पादक और कार्यकर्ता है, मूलभूत अधिकारों से भी वंचित कर देता है. केवल अपना हित, अपना ही कल्याण, अपना ही सुख देखना पशुता का लक्षण है. संगठित सर्वजन अपने नैतिक बल द्वारा आसानी से उसे अपदस्थ कर सकता है.

क्रमशः…..

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ:

1. मज्जेत्रयी दण्डनीतौ हतायां सर्वे धर्मा प्रक्षयेयुर्विवृद्धाः

सर्वे धर्माश्चाश्रमाणां हताः सयुः क्षात्रो त्यक्ते राजधर्मे पुराणे

सर्वे त्यागा राजधर्मेषु दृष्टा सर्वा दीक्षा राजधर्मेषु युक्ताः

सर्वा विद्या राजधर्मेषु चोक्ताः सर्वे लोका राजधर्मे प्रविष्टाः महाभारत, शांतिपर्व, 68/27-29

2. ‘म्स्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः स पंडितः स श्रुतवान् गुणज्ञः.

स एव वक्ता स च दर्शनीयः सर्वे गुणा कांचनमाश्रयंति.’ भृत्रहरि नीतिशतक.

सहविधान : एक विकल्प

सामान्य

धर्म और अभिजन संस्कृति7

आप जिसे संविधान कहते हैं, मैं उसको सहविधान के रूप में देखना चाहूंगा. सहविधान ही क्यों? क्या अंतर है दोनों में? संविधान की भांति सहविधान के गठन में भी नागरिकों की सहमति होती है. उसे भी जनसहमति पर उनके प्रतिनिधियों द्वारा बनाया जाता है. बनाने के पहले लंबी चर्चां, विचारविमर्श होते हैं. बन जाने के बाद भी उसपर विचार किया जा सकता है. आवश्यकता पड़ने पर संशोधन मंजूर होते हैं. तदनंतर सर्वसम्मति अथवा बहुमत के आधार पर ही उसको लागू किया जाता है. इस प्रकार संविधान अपने नागरिकों की सामान्य इच्छा की अभिव्यक्ति होता है. एक ऐसा अनुबंध जिससे राष्ट्र और नागरिक दोनों बंधे होते हैं. संविधान में उनके कर्तव्यों एवं अधिकारों की सुस्पष्ट व्याख्या होती है. अपेक्षा की जाती है कि दोनों अपने कर्तव्य के प्रति सत्यनिष्ठ रहकर प्रदत्त अधिकारों का व्यापक लोकहित में उपयोग करेंगे. इन व्यवस्थाओं के बाद प्रकटतः उसमें कोई झोल नहीं रह जाता. उसमें विश्वास करना राष्ट्रभक्ति का परिचायक माना जाता है और अविश्वास राष्ट्रद्रोह. लागू संविधान में संशोधनों की प्रक्रिया यद्यपि बहुत लंबी और जटिल होती है, तथापि असहमति और अस्वीकारों के बावजूद, संविधान के प्रति सम्मान बनाए रखना राष्ट्रीय भावनाओं का प्रतीक माना जाता है.

इसके बावजूद सहविधान की मेरी कल्पना संविधान से मेल नहीं खाती. हालांकि संविधान भी मेरी परिकल्पना के सहविधान की भांति खुली व्यवस्था है. जिसे सर्वसम्मति अथवा बहुमत की स्वीकृति के उपरांत लागू किया जाता है. उसमें भी संशोधनों के लिए आवश्यक गुंजाइश होती है. संविधान भी न्याय एवं समानता की भावना से आबद्ध होता है. उसी के अनुसार उसमें समाज के विभिन्न वर्गों, संस्थाओं और समूहों के अधिकारों एवं कर्तव्यों की सुस्पष्ट व्याख्या होती है. इन सब विशेषताओं के बावजूद संविधान की मूल अभिकल्पना को निर्दोष मानने में मुझे संकोच है. मेरे विचार में संविधान एक बेहद जटिल संरचना है. कुछ विशेषज्ञों को छोड़कर शेष के लिए उसे आत्मसात करना तो दूर, पढ़ना तक संभव नहीं हो पाता. सरकार की ऐसी योजना भी नहीं है कि वह संविधान के बारे में लोगों को शिक्षित करे, उन्हें उनके नागरिक धर्म से परचाए. न नागरिकों की ऐसी रुचि होती है कि संविधान को भी अपने परमप्रिय धर्मग्रंथों की बगल में जगह दें तथा संवैधानिक व्यवस्थाओं को अपने नागरिक धर्म का हिस्सा माने रहें. कई बार तो सरकार संविधान को लोकतंत्र के धर्मग्रंथ की भांति परोसती है. वह उसके प्रति उतनी ही दुराग्रही नजर आती है, जितना कोई मठाधीश धर्मग्रंथों को लेकर. अंतर केवल इतना है कि धर्माचार्य अपने धर्मग्रंथों की महत्ता से परचाने के लिए बड़े स्तर पर अभियान चलाते रहते हैं, यहां तक कि प्रचारसाहित्य को निःशुल्क उपलब्ध कराते हैं, वहीं सरकार का इस ओर कोई प्रयास नहीं होता. इस उद्देश्य के लिए गठित संस्थाएं भी अधिकारियों की काहिली, अदूरदर्शिता तथा सरकार की उपेक्षा के चलते प्रभावहीन सिद्ध होती हैं. पर्याप्त चर्चाविमर्श के अभाव में संविधान अभिजात्य तानाशाही का मूकदृष्टा बनकर रह जाता है. उसका महत्त्व मठों में संरक्षित उस धर्मग्रंथ की तरह होता है जो सिर्फ इसलिए मान्य होता है कि कुछ लोगों ने जिन्हें हम बड़ा मानते है, उसको विशिष्ट माना और अपनाया है. इस धारणा के चलते लोग निजविवेक से काम लेना बंद कर देते हैं. उनकी वृत्ति अनुसरणात्मक हो जाती है. यह वृत्ति समाज के बड़े हिस्से को उसके बौद्धिक सामर्थ्य का उपयोग करने से रोकती है. उसका नुकसान व्यक्ति एवं समाज दोनों को उठाना पड़ता है.

संविधान और उसके तहत गठित संस्थाएं पेशेवर बुद्धिजीवियों को जन्म देती हैं. इससे विशेषज्ञ संस्कृति पनपने लगती है. पेशेवर बुद्धिजीवियों की कमजोरी होती है कि वे मानवीय विवेकीकरण के प्रत्येक आयोजन को निजी लाभ की दृष्टि से देखते हैं. और जिस दिशा में उन्हें लाभ दिखाई दे, अपने बुद्धिविवेक के अनुसार संविधान की वैसी ही व्याख्याएं करने लगते हैं. संविधान सम्मत भारीभरकम संस्थाओं के औचित्य का वे जमकर समर्थन करते हैं, इसलिए कि वे संस्थाएं उनकी स्वार्थसिद्धि का खूबसूरत ठिकाना सिद्ध होती हैं. वे उन्हें भले ही लोकहित से जोड़कर देखते हों, किंतु उनका बड़ा श्रम निजी हितों की सुरक्षा करने में ही खप जाता है. उनके नेतृत्व में संवैधानिक संस्थाओं में वर्गीय सोच पनपने लगता है. परिणामस्वरूप उनके न्याय का पलड़ा समाज के प्रभुवर्ग की ओर झुक जाता है. इस प्रकार वे सकल राष्ट्रीय उत्पाद के बड़े हिस्से को अपने अधिकार में रख लेते हैं. मूल संवैधानिक प्रावधान भले ही इसका विरोध करते हों, किंतु खरीदे गए बुद्धिजीवियों की टीम उनकी मनमानी व्याख्या कर माहौल को उनके अनुकूल बनाए रखती है.

लोकतंत्र के सफल संचालन, कल्याण के समविभाजन तथा न्यायाधारित राज्यों की स्थापना हेतु ऐसे भारीभरकम संविधान भले ही अपरिहार्य माने जाते हों, लेकिन यह भी सच है कि उनकी उलझी हुई कानूनी व्याख्याएं कथित कल्याण राज्यों में, जहां संपत्ति और अधिकारों के विभाजन में ढेर सारा अंतर और अनियमितताएं हों, वहां जनसाधारण के हित में उन्हें लागू कर पाना असंभवप्रायः होता है. ऐसे समाजों में सरकारी उदासीनता और जनसाधारण में अधिकारचेतना की कमी के चलते, संवैधानिक व्यवस्थाएं अल्पसंख्यक अभिजन समाज के एकाधिकार के समर्थन में उतर आती हैं. उसकी अगली परिणति बहुसंख्यक जनसमाज पर अल्पसंख्यक अभिजन वर्ग की तानाशाही के रूप में होती है. परिणामस्वरूप संविधान में अंतनिर्हित न्याय और समानता की भावना बहुत पीछे छूट जाती है. संविधान, विशेषरूप से लोकतांत्रिक देशों के संविधान के पक्ष में यह कहा जा सकता है कि वे सामाजिक असमानता का प्रकटतः समर्थन नहीं करते. लेकिन यह भी उतना ही सही है कि उनके अधीन बनी कथित लोकतांत्रिक सरकारें वर्गीय असमानता को दूर करने के गंभीर प्रयासों से सुरक्षित दूरी बनाए रखती हैं, जिससे आमजन और न्याय के बीच की दूरी निरंतर बढ़ती जाती है.

एक बार लागू हो जाने के बार राष्ट्र अपने नागरिकों को निर्दिष्ट करता है कि वे संविधान के अनुबंधों का अक्षरशः पालन करें. यदि कोई उल्लंघन करता है तो उसे कानूनी उलझनों का सामना करना पड़ता है. आशय है कि लागू होने के तुरंत बाद संविधान ऐसा बंद निकाय बन जाता है, जिसके प्रति श्रद्धा राष्ट्रभक्ति तथा संदेह राष्ट्रद्रोह मान लिया जाता है. सरकार और शीर्ष पर विराजमान अल्पसंख्यक अभिजन की कोशिश होती है कि लोग संविधान को चाहे पढ़ें या न पढ़ें, उसके पालन में जराभी कोताही न बरतें. संविधान के प्रति उनकी अंधश्रद्धा ठीक वैसी ही होती है, जैसी धार्मिक संस्थाओं की अपने विश्वासों को लेकर. इसके फलस्वरूप अंधश्रद्धा का कारोबार करने वाले लोगों की बन आती है. लोकतांत्रिक छूटों का सहारा लेकर स्वार्थी राजनीतिक दल, कभी लोकहित तो कभी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नारा लगाते हुए सत्ता में चले आते हैं. प्रकारांतर में वे समाज के वर्गीय विभाजन की जड़ों को मजबूत करने का काम करते हैं, जिससे सामाजिक अंतर्द्वंद्वों को जमीन मिलती है, राष्ट्र विकास की पटरी से उतरकर अंतर्द्वंद्वों के दिखावटी समाहार में जुट जाता है. चूंकि राष्ट्र का संचालन कर रही शक्तियों में अधिसंख्यक लोग अल्पसंख्यक अभिजन वर्ग से संबंधित होते हैं, इसलिए उनका स्वाभाविक झुकाव समाज के शीर्षस्थ वर्गों के हितसंरक्षण की ओर होता है. नतीजा यह होता है कि उत्पीड़ित वर्ग के पक्ष में न्याय की संभावना और भी कम हो जाती है.

एक और बात भी ध्यान देने योग्य है. अभी तक के अनुभव से यह प्रमाणित हुआ है कि संविधान की जरूरत प्रायः उन्हीं समाजों में ज्यादा पड़ती है, जहां आर्थिकसामाजिक स्तर पर भारी असमानताएं हों, सामाजिक न्यायव्यवस्था एवं संसाधनों पर मुट्ठीभर लोगों का अधिकार हो.. ऐसे समाजों में संविधान वंचित वर्ग के मन में न्याय की उम्मीद जगाता है. इसलिए नहीं कि संविधान ऐसा करने में सर्वथा सक्षम होता है. बल्कि इसलिए कि शताब्दियों लंबी राजनीतिकमानसिक दासता के चलते आमजन का आत्मविश्वास बुरी तरह डगमगाया होता है. उसका आंतरिक बिखराव, अपने ही जैसे लोगों के साथ प्रतिस्पर्धा एवं तज्जनित अंतर्द्वंद्व भी उसे मानसिक रूप से डावांडोल रखते हैं. आपसी सूझबूझ एवं संगठनसामर्थ्य के बल पर वह परिवर्तनचक्र को अपने बलबूते नई दिशा दे सकता है—आत्मविश्वास की कमी के चलते इसका उसे ख्याल तक नहीं आता. इसलिए लोकतंत्र का सहारा लेकर वह अपना नेतृत्व अपने प्रतिनिधियों को सौंप, स्वयं नेपथ्य में चला जाता है. यह अस्वाभाविक भी नहीं है. लोकतांत्रिक प्रणाली को अपनाने वाले समाजों में, लंबी सामंती दासता से उबरने के बाद जनसाधारण के विवेकीकरण का यह पहला चरण होता है. विवेकीकरण के दूसरे चरण में लोग समझने लगते हैं कि अपने दैन्य से उबरने के लिए उन्हें स्वयं आगे आने आना होगा. इस बोध के पश्चात, अभिजन प्रतिनिधियों के बजाय वे अपने ही समूह के सदस्यों पर विश्वास करने लगते हैं. तदनंतर कॉमन समस्याओं की पहचान की जाती है. उसके बाद ही परिवर्तन की वास्तविक शुरुआत संभव हो पाती है. संविधान की परिकल्पना इसी आदर्श को सामने रखकर की जाती है. लेकिन इतिहास में ऐसा उदाहरण दीया लेकर खोजने पर भी नहीं मिलेगा जहां संविधान दूसरे चरण में सफल हो पाया हो. लोकतंत्र के पहले चरण में शीर्ष पर विराजमान शक्तियां समस्त सत्ताकेंद्रों पर अपना अधिकार जमाकर उन्हें ऐसी दिशा देने में कामयाब हो जाती हैं, जो संविधानसम्मत विकास की मूल भावना से एकदम परे होती है. इससे जनसाधारण के लिए दिल्ली उत्तरोत्तर दूर होती जाती है.

संविधान प्रायः उन अर्धलोकतांत्रिक अथवा सामंती समाजों में अपनाया जाता है, जिनमें अत्यधिक आर्थिकसामाजिक विषमताएं और अंतर्द्वंद्व हों. सार्थक विकल्पों के अभाव में संविधान निर्माताओं को उम्मीद होती है कि उसकी मदद से वे समाज के वंचित वर्गों को एकजुट कर उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक और संप्रेरित कर सकेंगे. व्यवहार में उसके एक छोर पर पर वे लोग होते हैं जो संविधान की धाराओं का जोड़तोड़ द्वारा अपने पक्ष में उपयोग करने में सक्षम होते हैं. संविधान विशेषज्ञों की बड़ी फौज उनकी मदद को तैयार होती है. दूसरी ओर साधारणजन रहता है, जिनके हितरक्षण हेतु संविधान विशिष्ट प्रावधानों का दावा करता है. विडंबना यह है कि संविधान को समझने तथा उसकी व्यवस्थाओं का लाभ उठाने के लिए यह वर्ग पूरी तरह समाज के प्रभुवर्ग पर आश्रित होता है. इस कारण वह संविधान प्रदत्त लाभों से वंचित रह जाता है. लंबे शोषण एवं उत्पीड़न के दौरान ऐसे क्षण अकसर आते हैं जब जनसाधारण को अपने छले जाने का बोध हो और उसे शीर्षस्थ वर्ग की मनमानी अखरने लगे. लेकिन उपयुक्त नेतृत्व एवं प्रेरणाओं के अभाव में जनगणमन की यह कचोट सार्थक आक्रोश में ढलने में नाकाम सिद्ध होती है. यदि असंतोष की चिंगारी उठे भी तो यथास्थिति बनाए रखने के लिए समाज का प्रभुवर्ग तानाशाहीपूर्ण आचरण पर उतर आता है.

उल्लेखनीय है कि संविधान के जटिल प्रावधान व्यापक लोकहित की दुहाई देते हुए बनाए जाते हैं. चूंकि जिनके नाम पर वे प्रावधान होते हैं, विभिन्न कारणों से वे उन्हें समझ पाने में असमर्थ होते हैं, इसलिए आवश्यकता पड़ने पर उन्हें अभिजन विशेषज्ञों की शरण में जाना ही पड़ता है. विभिन्न दबावों के बीच जनसाधारण को अभिजन वर्ग के तानाशाही पूर्ण आचरण का विरोध करने की न तो छूट होती है, न इसका उन्हें अवसर मिल पाता है. इस अवस्था में संविधान केवल दिखावे और मनबहलाव की चीज बनकर रह जाता है.

सहविधान

सवाल है कि सहविधान और संविधान को अलगअलग करके कैसे देखा जाए? दोनों एकदूसरे से कहां मिलते और किन बिंदुओं पर अपनी स्वतंत्र राह ले लेते हैं? उनके संधिस्थल एवं विरोधबिंदुओं की पहचान कैसे की जाए? यह बहुत उलझनवाली बात भी नहीं है. संविधान को हम लोकतंत्र का संरक्षक कह सकते हैं. जबकि सहविधान न केवल लोकतंत्र के जिम्मेदार संरक्षक का दायित्व निभाता है, बल्कि लोगों की जीवनशैली में ढलकर मनोभौतिक एवं समाजार्थिक विकास का वातावरण तैयार करता है. दूसरे शब्दों में सहविधान ‘अपूर्ण लोकतंत्र’ से ‘संपूर्ण जनतंत्र’ को प्राप्त करने की यात्रा है. इसके लिए व्यक्ति और समाज दोनों के विवेकीकरण एवं सामंजस्यपूर्ण प्रयत्न आवश्यक होते हैं. सहविधान चुनींदा व्यक्तियों अथवा घटकों के नेतृत्व में होने वाली प्रयाण यात्रा, जिसमें कुछ अतिसक्रिय लोग, लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बूते आगे बढ़कर राज्य की बागडोर संभाले रहते हैं, तथा पूरा समाज शासक और शासित में बंटा होता है—से पूरी तरह भिन्न है.

सहविधान में प्रत्येक व्यक्ति अपने परिवार, समाज और फिर राज्य के साथ पूरे जोश एवं उछाह से जुड़ा होता है. उसमें न कोई बड़ा होता है न छोटा. न निदेशक होता है न ही निदेशित. यदि कुछ अंतर हो भी तो वह परिस्थितिगत होता है. जिसे पाटने की भरपूर स्वतंत्रता और समूह के सदस्यों का संपूर्ण भरोसा, उस सदस्य को सहज प्राप्त होता है. दूसरी ओर संविधान में वर्णित लोक एक अमूर्त्त धारणा है. सहविधान लोकतंत्र पर जनतंत्र को वरीय बनाकर उसे लौकिक संस्कार देता है. फलस्वरूप वह राजनीति का ऐसा विधान बन जाता है, जिसमें राज की समस्त शक्तियां निचुड़कर उसकी सदस्य इकाइयों के हाथों में चली आती हैं और समाजदेश के समस्त कार्यकलाप जनसंगठनों द्वारा संचालित पूर्णतः विकेंद्रीकृत संस्थाओं और दलों द्वारा संपन्न होने लगते हैं. दूसरे शब्दों में सहविधान, संविधान में फलनेफूलने वाली विशेषज्ञ संस्कृति को जनसंस्कृति में परिवर्तित कर देने वाली युगांतरकारी यात्रा का प्रबंधकाव्य है, जिसकी रचना जनता द्वारा अपने सहज विवेक और समन्वयकारी चेतना के बल पर की जाती है.

लोकतांत्रिक समाजों में ऐसे क्षण प्रायः आते हैं जब संविधानप्रदत्त छूटों का लाभ उठाते हुए विशेषज्ञ शक्तियां निर्णायक पदों पर विराजमान हो जाती हैं और वे शेष समाज का संचालन निहित स्वार्थ के अनुसार करने लगती हैं. वे ऐसा वातावरण रचते हैं जिससे शासित जनसमाज के लिए उनके शीर्षत्व को चुनौती देना असंभवप्रायः हो जाए. परिणामस्वरूप वहां धार्मिक और समाजार्थिक स्तरीकरण पनपने लगता है. जनचेतना के अभाव में वह निरंतर बढ़ता ही जाता है. सहविधान में अधिकारों एवं कर्तव्यों का नियोजन इस प्रकार होता है कि वहां कोई भी व्यक्ति अपने पद, प्रतिष्ठा, धनसंपदा, रंग, पारिवारिक हैसियत, कुल, गौत्र, जाति, लिंग अथवा किसी भी अन्य लौकिक कारण से दूसरों पर अधिपत्य जमाने की स्थिति में नहीं रहता. प्रत्येक नागरिक इस भावना से बंधा होता है कि उसका अस्तित्व दूसरों पर निर्भर है. इसलिए अपने सुखसम्मान को पाने का एकमात्र रास्ता है कि दूसरों के सुख और सम्मान का ख्याल रखा जाए. जनसंस्कृति की यह अंकुराहट कालांतर में समानतावादी, समरस समाज की स्थापना के लक्ष्य को पाने में सहायक होती है.

सहविधान का उद्देश्य है औपचारिक सरकार के लिए अवसरों को शून्य की स्थिति में ले आना. एकएक कर उन सभी कारणों का उन्मूलन जो सरकार की सर्वस्वीकार्यता को अनिवार्य बनाते हैं. यह तभी संभव है जब लोग जागरूक और आत्मानुशासित हों. वे यह भलीभांति जानते हों कि उनके विकास, शोषण एवं उत्पीड़न से मुक्ति के लिए कोई उनकी मदद को आगे आने वाला नहीं है. इसके लिए उन्हें स्वयं प्रयास करना होगा. वर्गीय हितों को पहचानकर उन लोगों के साथ मिलजुलकर आगे बढ़ना होगा, जो उन्हीं भांति शोषित और उत्पीड़ित हैं. उन लोगों के साथ साझा करना करना जो उन्हीं के समान परिस्थितियों में जी रहे हैं. हो सकता है कि इतिहास में कुछ ऐसे उदाहरण उन्हें मिलें जब किसी महापुरुष ने वर्गीय हितों से ऊपर उठकर जनसामान्य के कल्याण के लिए ईमानदार प्रयास किए हों और उनसे समाज वास्तविक परिवर्तन की डगर पर आगे बढ़ा हो. ऐसे महापुरुषों के प्रति सम्मान व्यक्त करना हमारा कर्तव्य है. लेकिन यह समझना भी जरूरी है कि महापुरुषों के उत्तराधिकारी लंबे समय तक अपने कर्तव्य और सोच के प्रति ईमानदार नहीं रह पाते. वे महापुरुष के आदर्शों का मिथकीकरण कर, उन्हें बड़ी आसानी से अपने वर्गीय हितों के समर्थन में उतार देते हैं. ऐसे माहौल में आमूल परिवर्तन की संभावना कमजोर पड़ती जाती है. जनसामान्य को यह हकीकत बहुत देर से समझ में आती है कि वास्तविक एवं स्थायी परिवर्तन तभी संभव है जब समाज और व्यवस्था का नियंत्रण उसके अपने हाथों में हो.

सहविधान का आशय ऐसी व्यवस्था से भी है जिसमें सबकी स्वैच्छिक सहभागिता हो. इस उत्तरदायी तंत्र के एक छोर पर मनुष्य होगा. अपनी स्वतंत्रता, मर्यादा, इच्छाआकांक्षा, कर्तव्यनिष्ठा से युक्त स्वतंत्र, विवेकवान इकाई. दूसरे छोर पर समाज को रखा जाएगा. विभिन्न वर्गों, क्षेत्रीय विषमताओं, संस्कृति, धनसंपदा के साथ अनेकता में एकता तथा सामूहिक विवेक की प्रतीति कराता मानव समुदाय. यहां समाज की मेरी कल्पना वैसी नहीं है जैसी इसे सामान्यतः समझा जाता है. प्रायः समाज को व्यक्ति से बड़ा माना जाता है. अपने भीतर अनेक मानव इकाइयों को समाहित रखने के कारण कदाचित वह बड़ा है भी. अनेक एकल इकाइयों के हित जुड़े होने के कारण समाजहित में व्यक्ति का बलिदान करना प्रशंसनीय कर्तव्य माना जाता रहा है. किंतु यदि स्वतंत्रता के लिहाज से देखा जाए तो सहविधान में जितनी स्वतंत्रता समाज के लिए जरूरी है, उतनी ही जरूरी व्यक्ति की स्वतंत्रता भी है. स्वतंत्रता के मामले में सहविधान में व्यक्ति दूसरे पक्ष यानी समाज से न एक अंश कम होगा, न एक अंश ज्यादा. उनकी स्वतंत्रता अपनीअपनी जगह पूर्ण, समानांतर और महत्त्वपूर्ण मानी जाएगी.

पूर्ण स्वातंत्र्य एवं सहअस्तित्व के लिए दोनों यह स्वीकार करेंगे कि उनकी स्वतंत्रता एकदूसरे पर निर्भर है. सहविधान में स्वतंत्रता की कसौटी इससे तय होगी कि वह मनुष्य की प्राकृतिक स्वच्छंदता के कितनी निकट है. समाज के गठन से पहले या समाज से मुक्त होने के बाद जितनी स्वच्छंदता की कल्पना मनुष्य अपने लिए कर सकता है, वह उसको न्यूनतम कटौती के साथ प्राप्त होनी चाहिए. न्यूनतम कटौती का मापदंड समाज और मनुष्य के सहसंबंधों को स्थायी एवं उत्पादनसक्षम बनाए रखने की आवश्यकता के अनुसार तय किया जाना चाहिए. इसमें कानून और अनुशासन के नाम पर अधिकारों में कटौती न्यूनतम होगी. सहविधान अपने प्रत्येक नागरिक से यह अपेक्षा करेगा कि वह स्वयं को नैतिकता के उच्चतम मापदंड के अनुरूप मर्यादित करें और दूसरों के साथ सहयोग करते हुए समाजकल्याण की राह पर आगे बढ़े.

संक्षेप में सहविधान ‘अपूर्ण लोकतंत्र’ से ‘संपूर्ण जनतंत्र’ तक की यात्रा होगी. इस दृष्टि से देश के इतिहास में ‘बड़ा दिन’ वह होगा जब हम ‘गणतंत्र दिवस’ के स्थान पर ‘जनतंत्र दिवस’ कहकर पुकार सकेंगे तथा प्रस्तावित ‘जनतंत्र दिवस’ ‘गणतंत्र दिवस’ की भांति केवल उत्सवी आयोजन न होकर लोगों की संस्कारचेतना का हिस्सा होगा. वह कागजी व्यवस्था तक सीमित न होकर सचमुच का जनतंत्र होगा, जिसमें नागरिक अधिकारों और कर्तव्यों की व्याख्या उस अर्थ में फिजूल मानी जाएगी क्योंकि समूहसमाज के सभी सदस्य अपनेअपने कर्तव्य एवं अधिकारों के प्रति स्वतः जागरूक होंगे तथा उन्हें पाने के लिए अंतःस्फूर्त्त प्रेरणा से प्रवृत्त भी होंगे. सहविधान का मूल मंत्र होगा—‘हितों का सामान्यीकरण, अपने समूह एवं समाज के प्रति पूर्ण प्रतिबद्धता तथा साझा प्रयास.’ सहविधान में शिक्षा, धर्म, राजनीति, अर्थव्यवस्था, अंतराष्ट्रीय संबंध, उत्पादन, विपणन, न्याय, कानून, प्रशासन, लोकनीति आदि का स्वरूप इस प्रकार तय होगा कि वे विकास की सार्वजनीन प्रक्रिया, मानव स्वातंत्र्य तथा उच्चतम जीवनमूल्यों द्वारा परिचालित हों.

शिक्षा

शिक्षा के सामान्यतः तीन उद्देश्य होते हैं. अपने लिए, यानी अपना बौद्धिक परिष्कार. यह सोचना कि समाज के लिए स्वयं को अधिकाधिक उपयोगी कैसे बनाया जा सकता है? फिर उस दिशा में संकल्पबद्ध हो आगे बढ़ना. दूसरा अपने ज्ञान और कौशल का समाज के हित के उपयोग. तदनुसार समाज में रहते हुए अपनी उपयोगिता सिद्ध करना तथा सामाजिक विकास को गति प्रदान करना. शिक्षा का तीसरा उद्देश्य ज्ञान को सहेजने और विस्तार देने के लिए है. ये तीनों ही भेद व्यावहारिक हैं. बारीकी से सोचा जाए तो इनमें कोई अंतर है ही नहीं. समाज और व्यक्ति दोनों ही अन्योन्याश्रित हैं. एकदूसरे पर निर्भर, एकदूसरे से बंधे हुए. इसलिए उनके हित भी आपस में जुड़े हैं. व्यक्ति द्वारा अर्जित ज्ञान में समाज का भी साझा होता है. उन लोगों का भी जो कभी समाज का हिस्सा थे; और अब केवल स्मृतियों में हैं. इस तरह व्यक्ति और समाज दोनों का हित ज्ञान की सुदीर्घ परंपरा को सहेजने और उपयुक्त विस्तार देने में है. व्यक्ति की कार्यकुशलता का अधिकतम सदुपयोग समाज में रहकर ही संभव है. शिक्षा व्यक्ति को समाज के लिए उपयोगी बनाती है. उसे वह आत्मविश्वास देती है जो अच्छे और बुरे की पहचान करने और फिर अच्छाई के मार्ग पर दृढ़तापूर्वक डटे रहने के लिए जरूरी है. अच्छे से अच्छे हलवाई की सर्वश्रेष्ठ मिठाई भी तभी अपना महत्त्व रखती है, जब उसका कोई भोग करने वाला हो. अपने लिए तो कोई रोजरोज मिठाई नहीं बना सकता! फिर अच्छी मिठाई बनाने के लिए जिस सामग्री की दरकार है वह दूसरों की मदद के बिना संभव नहीं. व्यक्ति के ज्ञान, अनुभव, बौद्धिक सामर्थ्य एवं कार्यकौशल का समाज में रहकर ही उपयोग संभव है. इसी तरह किसी समाज में अनगिनत ज्ञानीध्यानी व्यक्ति हों, खूब हुनरमंद और बेमिसाल कारीगर हों, लेकिन यदि उस समाज में तालमेल का अभाव है, यदि वे अपनी ऊर्जा एकदूसरे को आगे बढ़ाने के बजाय पीछे खींचने में खपाते हैं, तो वहां के लोगों के ज्ञानानुभव और कार्यकौशल तथा समाजीकरण की प्रक्रिया का होना निरर्थक है. यानी अच्छी शिक्षा व्यक्ति को सहयोग और समभाव के दर्शन से भी परचाती है. किंतु और व्यक्ति का समाज से संबंध एकतरफा नहीं है. व्यक्ति समाज की महत्त्वपूर्ण इकाई है. अतएव व्यक्ति की समाज से भी कुछ स्वाभाविक अपेक्षाएं होती हैं.

यदि कोई समाज अपने शिल्पकारों, श्रमजीवियों, कारीगरों यथा हलवाई, कुंभकार, बुनकर, राजमिस्त्री, बिजली मिस्त्री, बढ़ई, लुहार आदि की प्रतिभा को पहचानता है, मनस्वियों का सम्मान करता है, उनकी कार्यकुशलता के भरपूर उपयोग की योग्यता रखता है, उनके लिए पर्याप्त रोजगार अवसरों का सृजन करता है, यदि वह उनके विकास हेतु व्यापक योजनाएं बनाता है तथा सामूहिक प्रेरणाओं के सिद्धांत के आधार पर उनसे अधिकतम उत्पादकता हासिल करने में कामयाब भी रहता है तो यह उसकी व्यावहारिक सफलता मानी जाएगी. किंतु समाज के गठन का उद्देश्य मात्र इसी से पूरा नहीं हो जाता. न इससे समाज का वास्तविक विकास संभव है. यदि उसके सुधारों की प्रक्रिया यदि यहीं आकर विराम ले लेती है, तब यह मानना पड़ेगा कि वहां समाजीकरण की प्रक्रिया अभी अधूरी है. उसमें कहीं न कहीं खोट है. सदस्य इकाइयां और उनके संगठन सहविधान के दर्शन को समझने में नाकाम रहे हैं; तथा विकास के परम लक्ष्य को हासिल कर रहे जनसमूह के लिए समाजीकरण की कसौटी पर खरा उतरना अभी बाकी है.

आखिर क्या है समाजीकरण की कसौटी? इसकी ओर संकेत हम आरंभ में ही कर चुके हैं. समाज और मनुष्य का संबंध अन्योन्याश्रित है. मनुष्य समाज में अपने सुख की वृद्धि, शांति और समृद्धि के लिए सम्मिलित हुआ है. यह सोचकर कि जिन सुखसुविधाओं को वह स्वयं अर्जित नहीं कर सकता, उन्हें पाने में समाज उसकी मदद करेगा. समाजीकरण की प्रक्रिया के आरंभ में यही शर्त थी. बदले में व्यक्ति को समाज के साथ हितों का साझा करना पड़ता था और अपनी नैसर्गिक स्वच्छंदता के थोड़ेसे हिस्से की कुर्बानी देनी पड़ती थी. उस समय भी जिन्हें यह बंधन अस्वीकार्य था, वे समाज की जकड़न से दूर, यायावरी जीवन बिताते थे. देशविदेश का साहित्य उनके उदात्त किस्सों से भरा है. किंतु समाज से दूर रहने के बावजूद वे उसके औचित्य पर उंगली कभी नहीं उठाते थे. बल्कि उनका सारा चिंतन समाज के कल्याण के लिए होता था. दूसरे शब्दों में वे खुद को समाज नहीं, मात्र उसके प्रलोभनों से दूर रखते थे. समाज से विलग रहकर भी उसके विकास और कल्याण की चिंता उन्हें हर पल सताती थी. उनमें से कुछ तो इसलिए सामाजिक प्रलोभनों से दूर रहते थे, ताकि समाज को और भी सुंदर भी, और अधिक विकासोन्मुखी बना सकें. इस तरह उनका समाज से छिटके रहना भी लोककल्याण के निमित्त होता था. समाज से भौतिक दूरी बनाए सिद्ध यायावर, लोगों से परस्पर मिलजुलकर रहने तथा समन्वित विकास के लिए निरंतर प्रयासरत रहने की कामना करते थे—

तुम्हारा अध्यवसाय एक हो, तुम्हारे हृदय एक हों, तुम्हारा अंतःकरण एक हो, और तुम लोगों का संगठन अटूट हो.’1

ऋग्वेद की इस प्रार्थना में उदगाता ऋषि उपद्रष्टाओं के संगठित होने की कामना करता है. वहां स्पर्धा नहीं मैत्री और सहयोग का दर्शन है. इसे महाभारतकार ने कुछ अलग ढंग से कहा है. ‘न मानुषात श्रेष्ठतरं हि किंचित.’ सृष्टि में मनुष्य से श्रेष्ठतर कुछ भी नहीं है, कहकर वह मनुष्य को विमर्श के केंद्र में ले आता है. यह बात अलग है कि भारतीय वाङमय की, इस विरल किंतु नैतिकतावादी अवधारणाओं पर भारत में बहुत कम काम हो पाया है. उस अनुपात में तो और भी कम जितना उस दौर में चीन और प्राचीन यूनान में हुआ. पश्चिमी विचारकों में यदि हम देखें तो सुकरात, प्लेटो और अरस्तु आदि से लेकर इमानुएल कांट, स्पिनोजा, बट्रेंड रसेल, आस्कर वाइल्ड तक नैतिकतावादी चिंतन की वहां सुर्दीर्घ परंपरा रही है. चीन में भी बुद्ध के समकालीन कन्फ्यूशियस ने शिक्षा में नैतिक मूल्यों को बनाए रखने पर जोर दिया. उसका कहना था शिक्षा और ज्ञान पर सभी का समानाधिकार है. इसलिए सभी बच्चों को बगैर किसी भेदभाव के शिक्षा मिलनी चाहिए. कन्फ्यूशियस द्वारा अकेले दम पर संचालित विद्यालय में तीन हजार से ऊपर विद्यार्थी थे और वहां दर्शन, राजनीति, शिल्पकला, युद्धनीति आदि की शिक्षा दी जाती थी. ईसा से भी पांच शताब्दी पहले यह बात बहुत मायने रखती है. ‘इल्म के लिए चीन भी जाना पड़े तो जाना चाहिए.’ यह कहावत कन्फ्यूशियस जैसे महान शिक्षकों के अवदान के कारण ही बनी है. इसके पीछे उन जिज्ञासुओं का भी बड़ा योगदान था, जो कष्ट सहकर भी ज्ञान को सहेजना चाहते थे. इसके विपरीत भारत में शिक्षा पर खास वर्गों का विशेषाधिकार माना गया. ऊपर से मनुष्य की स्वाभाविक नैतिकता को धर्म से आच्छादित कर दिया गया.

व्यक्ति और समाज के बीच बेहतर तालमेल के लिए ज्ञानाधारित समाज की स्थापना कैसे संभव हो, पश्चिम में इस पर शुरू से ही विचार होता रहा है. वहां विचारकों ने लोगों के बीच रहकर शिक्षा और नीतिदर्शन के प्रसार के लिए कार्य किया. इसके लिए अपने निजी सुख यहां तक की परिवार की भी परवाह न की. यूनानी दार्शनिक सुकरात का निजी जीवन बहुत कष्टमय था. पत्नी चिड़चिड़ी थी. घर में क्लेश रहा करता था. इसके बावजूद वह अपनी शिष्यमंडली से घिरा मनुष्यता की बेहतरी की चिंता में डूबा रहता था. जिस समाज में वह रहता था, जिसके कल्याण के लिए वह हमेशा विचारमग्न रहता थाउसी ने उसे जहर पीने को विवश किया. सुकरात ने विनम्र रहकर समाज के उस अतिचार को सहा और जहर गले में उतार लिया. उस ‘शुभत्व’ की मानरक्षा के लिए जिसे वह मानवमात्र के जीवन का लक्ष्य बनाना चाहता था. सुकरात के अनुसार शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य है, व्यक्ति को अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित कर उसको पाने योग्य बनाना. तदनंतर उसे अपने परमलक्ष्य यानी ‘शुभत्व’ की प्राप्ति हेतु अग्रसर करना. शुभत्व नैतिकता की चरमसीमा है, जिसमें मानवमात्र के विकास और पूर्ण कल्याण की भावना सन्निहित है.

अरस्तु ने मनुष्य को विवेकशील प्राणी कहा है. उसके अनुसार विवेक की सफलता जीवन को समग्रता से देखने में है. प्लेटो का आदर्शवाद अरस्तु की चिंतनधारा में आकर व्यावहारिक चिंतन में ढल जाता है. उसका मानना था कि शासनव्यवस्था चाहे जैसी हो, यदि वह लोककल्याण को समर्पित है, तो शुभ है. अरस्तु जीवन को समग्रता से देखता था. यह कला स्पर्धायुक्त समाजों में नहीं आती. इसलिए कि स्पर्धा समाज को बांट देती है. उसमें एकदूसरे को पीछे ढकेल, आगे निकलने की होड़ कर रहे व्यक्तियों का समूह होता है, जिनका दूसरों के सुखसुविधाओं से कोई संबंध नहीं होता. उनमें से प्रत्येक अपना स्वार्थ देखता है. दूसरों को दौड़ में पछाड़कर वह आगे निकल जाने को आतुर रहता है. सीधी तरह से काम न चले तो उसके लिए कुटिल चालें चली जाती हैं. स्पर्धा की और भी सीमाएं है. उसका लाभ हर कोई नहीं उठा सकता. उसमें बराबरी नहीं, आगेपीछे की दौड़ होती है. उस दौड़ में एक वर्ग का पीछे छूट जाना लाजिमी होता है, जिसे उस व्यवस्था की स्वाभाविक नियति मान बड़ी बेदर्दी से बिसरा दिया जाता है.

स्पर्धायुक्त समाजों में एक समूह ऐसा भी होता है, जो चाहकर भी उससे नहीं जुड़ पाता. वह खुद को अलग रखने के लिए विवश होता है. इसमें नुकसान भी उस वर्ग का अधिक होता है. इसलिए कि वह दौड़ में उतरने से पहले ही वह स्वयं को पराजित मान लेता है. स्पर्धा के एकाधिकारवादी माहौल में ऐसे लोगों के लिए न जगह होती है, न उनके प्रति किसी की सहानुभूति. ‘दौड़ में आगे रहने वाले को अधिकतम’—के सिद्धांत के चलते किसी कारणवश पीछे छूट गए समूह निरंतर पिछड़ते जाते हैं. इससे विषमता पनपती है. शिक्षा का काम ऐसे लोगों को एकजुट करना है. उनमें यह विश्वास पैदा करना है कि स्पर्धा नहीं, सहयोग के आधार पर वे आगे निकल चुके समूहों को चुनौती दे सकते हैं. उन्हें समझाया जा सकता है कि आगे निकल चुके समूह हमेशा आगे रहने वाले नहीं हैं. क्योंकि उनकी अंतहीन स्पर्धा और अंतसंघर्ष, एकदूसरे को टंगड़ी मार आगे बढ़ जाने की उनकी सहजवृत्ति, जिसे वे व्यावसायिक कौशल का नाम देते हैं—उन्हें एकदूसरे की काट करने को प्रेरित करती रहेगी. इससे शिखर पर मौजूद शक्तियों का एक न एक दिन नीचे आना तय है. आशय है कि स्पर्धायुक्त समाजों में शीर्ष पर, जहां उसके सर्वाधिक संसाधन और बौद्धिक संपदा जुटी होती हैं, वहां भी घोर अनिश्चितता का माहौल रहता है. अंतर केवल इतना है कि शीर्ष पर मौजूद लोगों के पास संसाधनों का जखीरा होता है, जरूरत पड़ने पर सरकार और अन्य संस्थाएं भी उनकी मदद को आ जाती हैं. इसलिए कड़ी स्पर्धा के बीच वे देर तक संघर्ष करने और अपनी हैसियत को बनाए रखने में सक्षम होते हैं. जबकि श्रमिक वर्ग को केवल अपने श्रम—कौशल के साथ अपने ही जैसे साधन—विपन्न लोगों से स्पर्धा करनी पड़ती है. सिवाय चंद सरकारी आश्वासनों के उनके समर्थन में कोई नहीं आता. इसलिए स्पर्धा उसके अस्तित्व के लिए चुनौती बनकर आती है. व्यावसायिक अनिश्चितता ऊपरले वर्गों को और अधिक स्वार्थी, शंकालू एवं क्रूर बनाती है. परिणामस्वरूप उनके निर्णयों में व्यावसायिक हिंसा एवं स्वार्थपरता का अनुपात बढ़ता ही जाता है. इसका नुकसान अपने श्रमकौशल के बल पर जीवनयापन करने वाले लोगों को अधिक होता है. उच्चतकनीक और स्पर्धा के चलते उत्पादनतंत्र में उनकी भूमिका निरंतर घटती जाती है.

शिक्षा का प्रमुख कार्य है ज्ञानविज्ञान को सहेजना, उसको आगे बढ़ाने के साथ मनुष्य में यह विवेक पैदा करना कि उसका अस्तित्व दूसरों के साथ सुरक्षित है. न केवल अपनी दैनिक आवश्यकताओं, बल्कि अपने अस्तित्व के लिए भी वह दूसरों के सहयोग पर निर्भर है. अतएव सहविधान के अंतर्गत मैं ऐसी शिक्षा प्रणाली का पक्ष लूंगा जो व्यावहारिक और सरलतम हो. जो लोगों में सहकारदर्शन के प्रति विश्वास लगाए तथा उनके विज्ञानबोध का विस्तार करे. मनुष्य की आंतरिक अच्छाइयों को बाहर लाकर उसे शुभत्व की डगर पर आगे ले जाए तथा नवीनतम ज्ञान की राह प्रशस्त करे. सहविधान में शिक्षा ‘शुभत्व’ के पवित्र लक्ष्य को समर्पित होगी. यहां ‘शुभत्व’ का अभिप्राय है, अधिकतम लोगों का अधिकतम कल्याण और सुख का न्यायिक विभाजन. तदनुसार सहविधान में शिक्षा का तीसरा और वास्तविक लक्ष्य होगा—लोगों के मनमस्तिष्क से आपसी द्वैत का उन्मूलन. स्पर्धा को पूर्ण तिलांजलि. समाज का मैत्री, बंधुत्व, समानता, सहयोग, सद्भाव एवं सर्वकल्याण की भावना के अनुरूप संचालन. इसके लिए व्यक्ति और समाज के बीच बराबरी का नाता अनिवार्य है.

इधर समाज में विज्ञान शिक्षा का बड़ा जोर है. सुनियोजित एवं त्वरित विकास बगैर विज्ञान और तकनीक की सहायता के संभव नहीं. समाज को अज्ञानता की रूढ़ियों से बाहर निकालने के लिए भी वैज्ञानिक शिक्षा अनिवार्य है. बच्चों को विज्ञान और तकनीक की आधुनिकतम शिक्षा मिले, सहविधान में इसकी भी माकूल व्यवस्था होगी. ऐसी विज्ञान और तकनीक के आविष्कार पर जोर दिया जाएगा, जो लोगों के श्रमकौशल का सम्मान करे, उसे विस्तार दे. उन्हें अनावश्यक श्रम तथा खतरों से बचाए. जो सस्ती तथा अधिकतम लोगों की सीधी पहुंच में हो. इतनी सरल हो कि उसे आसानी से इस्तेमाल किया जा सके. लोग अपनी जरूरत के अनुसार उसमें आवश्यक संशोधन भी कर सकें. वैज्ञानिक आविष्कार यूं तो आज भी संपूर्ण समाज की थाती कहे जाते हैं. लेकिन व्यवहार में ऐसा होता नहीं है. बौद्धिक संपदा कानून और पेटेंट जैसी पूंजीवादी व्यवस्थाएं उनपर कुछ समूहों के एकाधिकार को वैध ठहराती हैं. इससे उनका लाभ समाज के कुछ वर्गों तक सीमित होकर रह जाता है. समाज का वह वर्ग जो अपने श्रमकौशल पर जीना चाहता है, जो वास्तविक उत्पादक और सर्वहारा है, उसके लाभों से वंचित रह जाता है.

सहविधान में वैज्ञानिक आविष्कार के क्षेत्र में पेटेंट व्यवस्था के लिए कोई स्थान न होगा. सवाल उठाया जा सकता है कि यदि किसी वैज्ञानिक या इंजीनियर को उसके आविष्कार का सीधा लाभ न मिला तो वह शोध की थकाऊ स्थितियों में खुद को क्यों खपाएगा! इस बारे में जो मूलभूत भ्रांति है उसे मैं पहले ही दूर कर देना चाहता हूं. पेटेंट व्यवस्था या बौद्धिक संपदा कानून का आविष्कार किसी वैज्ञानिक के दिमाग की उपज नहीं है. वह सीधेसीधे पूंजीवाद के एकाधिकारवादी आचरण की खोज रही है. उनीसवीं शताब्दी तक के आविष्कारों में से अधिकांश वैज्ञानिकों के निजी श्रमकौशल का सुफल थे. उनके पीछे व्यक्तिगत लाभ उठाने की मंशा उतनी न थी जितनी आज है. उत्पादन व्यवस्था के पूंजीवादी ताकतों के हाथों में जाने के बाद वह निरंतर विस्तार लेती गई. यदि पेटेंट हुए भी थे तो वास्तविक शोधकर्ताओं के नाम, जिन्हें उपयुक्त शुल्क चुकाने पर कोई भी इस्तेमाल कर सकता था. औद्योगिक क्रांति ने जोर पकड़ा तो वैज्ञानिक शोधों पर भी पूंजी का एकाधिकारवादी रवैया हावी होता चला गया. बड़े औद्योगिक घरानों ने वैज्ञानिकों को मोटा वेतन देकर नौकरी पर रखना आरंभ कर दिया. इससे जो आविष्कार हुए वे पूंजीवादी ताकतों के कब्जे में चले गए. आविष्कार भी वही हुए जिनसे पूंजीपतियों को सीधा लाभ पहुंचे. उनका एकाधिकार मजबूत हो. यह एक तरह से समाज की कुल मेधा को निहित स्वार्थ के लिए कैद कर लेने जैसा उपक्रम था.

सहविधान में ऐसी स्वार्थपरता के लिए कोई स्थान न होगा. वैज्ञानिक शोधों को बढ़ावा देने के लिए वहां भी हर संभव प्रयास किए जाएंगे. और उनके शोध पर समाज का अधिकार होगा. यहां पुनः एक शंका खड़ी हो सकती है. यह कि ऊंचे वेतन और सुविधाओं के बीच काम करने के अभ्यस्त वैज्ञानिक कम परिलब्धियों के लिए क्यों तैयार होंगे? और सुविधाओं के अभाव में क्या वैज्ञानिक शोधों की गति को बनाए रखा जा सकता है. एक एक बड़ी चुनौती है. यही सहविधान की सफलता की कसौटी होगी. परंतु इसका निदान सहविधान की स्थापना की उस अवधारणा में छिपा है जो आर्थिक लाभ को सामाजिक लाभ में बदल देने पर जोर देगी. वैज्ञानिक आविष्कार भी सामाजिक लाभ की मूल सैद्धांतिकी को ध्यान में रखकर किए जाएंगे. सहविधान में बड़ी मशीनों और आधुनिकतम तकनीक के लिए भी जगह होगी. लेकिन उनपर निर्वाचित संगठनों का अधिकार होगा. वे समूह और समाज की संपत्ति माने जाएंगे. उनका उपयोग इस प्रकार किया जाएगा कि उनकी सघन उत्पादकता का लाभ समाज के सभी वर्गों को एकसमान रूप से पहुंचे. उसपर कुछ लोगों अथवा उनके समूह का एकाधिकार न हो. इसके लिए ‘आर्थिक लाभ’ के स्थान पर ‘सामाजिक लाभ’ की अवधारणा को अपनाया जाएगा.

समाज में वैज्ञानिक शिक्षा को नैतिक शिक्षा जितना ही सम्मान प्राप्त होगा. लेकिन यदि विज्ञान और नैतिक शिक्षा के बीच चयन का अवसर आन पड़े तो वहां नैतिक शिक्षा को पहले स्थान पर रखूंगा. इस डर से कि नैतिक शिक्षा का अर्थ लोग धार्मिक शिक्षा न निकालने लगें, मैं वही कहूंगा जो अन्यत्र इससे पहले भी कह चुका हूं. मेरे विचार में नैतिकता धर्म का एकमात्र संबल है. अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करने के लिए नैतिकता को धर्म के सहारे की आवश्यकता नहीं पड़ती. जबकि धर्म नैतिकता के बगैर केवल कर्मकांडीय टीमटाम है. धर्म से अध्यात्म तक की यात्रा को संभव बनाने के लिए यह कोशिश की जाएगी की समाज में पर्याप्त वैज्ञानिक बोध हो. यह लक्ष्य दर्शन और विज्ञान की नियमित शिक्षा द्वारा प्राप्त किया जा सकता है.

नैतिकता को विज्ञान से ऊपर रखने का निर्णय भी सोचाविचारा है. सहविधान में नागरिक स्वतंत्र, विवेकवान इकाई के रूप में, सामान्य नैतिकता और कल्याणभावना के साथ एकजुट होकर काम करेंगे. इसके फलस्वरूप वैज्ञानिक शोधों में कमी नहीं आएगी. यदि एकाध अवसर हाथ से चला भी जाता है तो सहयोग, समन्वय और संगठनसामर्थ्य के बल पर उस कमी को पूरी कर लिया जाएगा. यदि नैतिकता न रही तो वैज्ञानिक आविष्कारों का दुरुपयोग होगा. लोग उनका अपने स्वार्थानुरूप उपयोग करने के लिए स्वतंत्र होंगे. वह समाज में भयानक समाजार्थिक स्तरीकरण का कारण बनेगा. समाज में ऊंचनीच की खाइयां बनेंगी. ऐसे में यदि युद्ध हुआ तो वह पूरी दुनिया को शताब्दियों पीछे ढकेल देगा. इसलिए शिक्षा का नैतिक होना, कानून की परिभाषा में न्यायसंगत होने से कहीं ज्यादा जरूरी है. मनुष्यता का महान शिक्षक कन्फ्यूशियस नैतिक शिक्षा पर जोर देते हुए कहता है—

कानून एवं दंडप्रणाली द्वारा शासित राज्यों में लोग केवल इतना जानते हैं कि खुद को कानूनी अड़चनों से कैसे बचाया जाए. ऐसा करते समय उन्हें शर्म भी नहीं आती. जबकि ‘सद्गुण’ एवं ‘नैतिकता’ प्रधान शिक्षा पाए नागरिक अनजानी गलती पर भी न केवल ग्लानिबोध से भर जाते हैं, बल्कि खुद को स्वयं सुधारना भी जानते हैं.’2

जन्म से सभी बालक एकसमान होते हैं. सभी का मस्तिष्क कोरी स्लेट जैसा होता है. शिक्षा के आधार पर उनके अनुभव और ज्ञान का दायरा बंटता है. इसलिए शिक्षा को लेकर किसी भी प्रकार का पक्षपात, एकाधिकार अथवा मनमानी, चाहे किसी भी वर्ग की क्यों न हो—अस्वीकार्य होगी. सहविधान में सभी वर्गों के लिए एक समान शिक्षा की व्यवस्था होगी. इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक विद्यार्थी को इतिहास पढ़ना पड़ेगा; या कविता में रुचि रखने वाले विद्यार्थी को गणित में अपना दिमाग खपना ही पड़ेगा. इसका बस इतना अभिप्राय है कि जो विद्यार्थी इतिहास पढ़ना चाहता है, उसको उस विषय में शिक्षा और रोजगार के उतने ही अवसर प्राप्त होंगे, जितने उस विद्यार्थी को जो अपनी रुचि के अनुसार विज्ञान पढ़ा है—प्राप्त हैं. लेकिन समाज, राजनीति, दर्शन और नैतिक शिक्षा सभी के लिए अनिवार्य होगी. शिक्षा का ढांचा इस प्रकार बनाया जाएगा ताकि वह लोगों को संगठित के स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाए और सम्मिलित हितों के लिए कार्य करने को प्रेरित करे. इसके लिए ऐसे शिक्षकों की आवश्यकता होगी, जो बिना किसी गुरुताबोध के पढ़ाने के लिए आगे आएं. कक्षा में आकर जो स्वयं को विद्यार्थी ही समझें और छात्रों को ज्ञान बांटने के साथसाथ उनसे कुछ ग्रहण करने का साहस भी दिखला सकें. जो विद्यार्थियों को समझाएं कि मनुष्य सामान्यतः भला होता है. यदि उसमें कुछ विचलन है तो उसके लिए वह अकेला जिम्मेदार नहीं. उसका परिवेश भी समानरूप से जिम्मेदार है. इसलिए यही न्याय संगत है कि स्थितियों के समग्र विवेचन के बाद निर्णय लिया जाए. उन्हें यह भी समझाया जाना चाहिए कि लोकहित के कार्य को आगे बढ़ाना उसपर बातचीत करने से कहीं ज्यादा जरूरी है. अतीत में इस बारे में बातें अधिक होती रही हैं. वास्तविक काम बहुत कम हो पाया है. इससे विद्यार्थियों की समाज के प्रति अनुराग में वृद्धि होगी, साथ ही उनमें कर्तव्यनिष्ठा भी जगेगी.

शिक्षार्जन के दौरान विद्यार्थी को जाति, धर्म, गौत्र वर्ण आदि की कम से कम शिक्षा मिलनी चाहिए. उसे निरंतर यह बोध होना चाहिए कि ‘अपने लिए’ और ‘समाज के लिए’ शिक्षा की अवधारणा में कोई व्यावहारिक अंतर नहीं है. देखा जाए तो दोनों एक ही सिक्के के दो पक्ष हैं. मनुष्य शिक्षा ग्रहण करता है तो उसकी समाज के लिए उपयोगिता बढ़ जाती है. उधर समाज का भी दायित्व है कि वह बालक को वह सब सिखाए जो उसके लिए जरूरी हो. ताकि उसका बहुआयामी विकास संभव हो सके. साथ में यह व्यवस्था भी करे कि शिक्षा की समाप्ति के बाद उसको रोजगार की तलाश में भटकना न पड़े. दूसरी ओर विद्यार्थी का दायित्व है कि वह खुद को समाज के लिए उपयोगी बनाए. ध्यान रखे कि समाज भले ही उसका स्वैच्छिक वरण हो, शताब्दियों से समाज के साथ रहते आए मनुष्य के लिए आज वह एक अनिवार्यता है. इस कारण कुछ विद्वान अरस्तु की परिभाषा, ‘मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है’ को संशोधित कर, ‘मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है’ कहने लगे हैं. यह समाज और मनुष्य के गाढे़ संबंधों का प्रतीक है. शिक्षा मानवीकरण की सीढ़ी, आजीवन चलने वाली प्रक्रिया है. बालक के लिए अनिवार्य शिक्षा उसके समाजीकरण की आरंभिक जरूरत भले हो, किंतु यह बड़ों के लिए उतनी ही जरूरी है जितनी बच्चों को किशोरों के लिए. इसलिए आवश्यक है कि शिक्षा को ताउम्र चलने वाली ज्ञार्नाजन की सतत प्रक्रिया के रूप में अपनाया जाए. कन्फ्यूशियस कुछ ऐसा ही चाहता था—

‘‘कन्फ्युशियस चीन के प्रांत ‘वी’ की यात्रा पर था. उसका शिष्य रेन यू उसकी गाड़ी हांक रहा था. वी एक घनी आबादी वाला शहर था. इतने बड़े शहर में पहुंचकर रेन ने हैरानी से कन्फ्युशियस से पूछा—

गुरुदेव! शहर की इतनी सघन आबादी में भला हम क्या करेंगे?’

लोगों को समृद्धि की ओर ले जाएंगे.’ कन्फ्यूशियस ने नपातुला जवाब दिया. रेन यू को अपने गुरु पर विश्वास था. किंतु उसके दिमाग में अब भी एक शंका थी. इसलिए उसने आगे पूछा—

एक दिन जब शहर के सभी नागरिक समृद्ध हो जाएंगे, तब हम क्या करेंगे.’

तब हम उन्हें शिक्षित करेंगे.’3

कन्फ्यूशियस शिक्षा को नैतिक आयोजन मानता था. उसने परंपरा का भी पक्ष लिया था, लेकिन इस तरह कि लोग उसके पीछे अंतनिर्हित सत्य से परिचित हो सकें. भारतीय पंरपरा में शिक्षा को विशिष्ट वर्गों तक सीमित रखा गया है. शिक्षा के लिए विद्यार्थी की प्रतिभा और रुचि नहीं, उसका वर्ग देखा जाता था. लंबे समय तक यही नीति भारतीय शिक्षा की दिशादशा को तय करती रही. आधुनिक भारत के राष्ट्रपिता कहे जाने वाले गांधी भी इसी के समर्थक थे. ‘शिक्षा का आश्रमी यथार्थ’ के नाम पर वर्णव्यवस्था का समर्थन करते हुए वे लिखते हैं—

इस काल में मातापिता का धंधा यदि निश्चित रूप से मालूम हो, तो बच्घ्चे को उसी धंधे का ज्ञान मिलना चाहिये; और उसे इस तरह तैयार किया जाय कि वह अपने बापदादा के धंधे से जीविका चलाना पसंद करे. यह नियम लड़की पर लागू नहीं होता.’4

एक कहावत है कि उत्पीड़ित को उसकी दुर्दशा का एहसास करा दो, वह बगावत कर देगा. दुरवस्था की जानकारी और उसके फलस्वरूप जन्मे असंतोष ने कई मानवीय आविष्कारों और क्रांतिकारी विचारों की राह प्रशस्त की है. मगर गांधी के विचार इस मामले में भिन्न थे. यहां वे परंपरा का दामन छोड़ नहीं पाते. गोया वे नहीं चाहते थे कि गरीब अपनी दुरवस्था और उसके कारणों को समझे. इसलिए अन्यत्र लिखते हैं—

शिक्षा तालीम का अर्थ क्या है?….एक किसान ईमानदारी से खुद खेती करके रोटी कमाता है. उसे मामूली तौर पर दुनियावी ज्ञान है. अपने मां बाप के साथ कैसे बरतना, अपनी स्त्री के साथ कैसे बरतना? बच्चों से कैसे पेश आना? जिस देहात में वह बसा हुआ है वहां उसकी चालढाल कैसी होनी चाहिये? इस सबका उसे काफी ज्ञान है. वह नीति के नियम समझता है और उनका पालन करता है. लेकिन वह अपने दस्तखत करना नहीं जानता. इस आदमी को आप अक्षर ज्ञान देकर क्या करना चाहते है? उसके सुख में आप कौनसी बढ़ती करेंगे? क्या उसकी झोपड़ी या उसकी हालत के बारे में आप उसके मन में असंतोष पैदा करना चाहते हैं? ऐसा करना हो तो भी उसे अक्षर ज्ञान देने की जरूरत नहीं है. पश्चिम के असर के नीचे आकर हमने यह बात चलायी है कि लोगों को शिक्षा देनी चाहिये, लेकिन उसके बारे में हम आगेपीछे की बात सोचते ही नहीं.’5

भारत में धर्म महत्त्वपूर्ण है. वह लोगों की जीवनशैली और दिनचर्या को प्रभावित करता है. यदि सत्तरअस्सी वर्ष के बूढ़े व्यक्ति तमाम कष्ट सहकर दुर्गम यात्राओं को निकल पड़ते हैं, कड़क सर्दी में भी गंगाजल में स्नान करने की हिम्मत जुटा पाते हैं, तो साफ है कि उनकी आस्था उन्हें इसके लिए प्रेरित करती है. इसलिए धर्म के सवाल की एकाएक उपेक्षा संभव नहीं है. इसके बावजूद जहां तक धार्मिक शिक्षा का प्रश्न है, समाज में वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना और कल्याण के समविभाजन के लिए उसको फिलहाल तिलांजलि देनी होगी. तब शिक्षा का धर्म से नाता क्या हो? इसका सीधासा उत्तर है, निषेध का, या फिर धर्म की अवधारणा में आमूल परिवर्तन का. इसे गहराई में जानने के लिए हम एक प्रतिप्रश्न का सहारा लेते हैं—‘क्या धर्म शिक्षा से जुड़कर ज्ञान की परंपरा को विस्तार देने में सक्षम होगा? क्या वह जिज्ञासा को बढ़ावा देता है? यदि ईमानदारी से देखें तो धर्म ऐसा नहीं करता. हम सब जानते हैं कि धर्म और ज्ञान के नवीकरण का दूर तक संबंध नहीं है, ज्ञान की खोज का सिलसिला संदेह से आरंभ होता है; और संदेह धर्म की निगाह में ‘पाप’ है. परंपरागत धर्म में संदेह के लिए कोई स्थान नहीं है. न वह जिज्ञासा को महत्त्व देता है. बल्कि आस्था के नाम पर वह दैनंदिन अनुभव के दौरान में जन्मते रहनेवाले संदेहों पर पर्दा डालने का काम करता है. शंका करना वहां गुरुअपराध है. धर्म में जो जितना पुराना है, परिवर्तन से दूर है, वह उतना ही सम्मानेय है. दूसरी ओर वास्तविक शिक्षा मनुष्य का नित नवीकरण करती है. वह मानवीय विवेक की ऊंचाइयों की ओर सतत आरोहण है. जबकि धर्म जड़ता है, ठहराव है. भ्रांति है. यथास्थिति बनाए रखने के लिए प्रभुवर्ग का षड्यंत्र, झूठी दिलासा है.

आस्था की नींव पर खड़े धर्म से, यदि कोई व्यक्तिस्वातंत्र्य की दुहाई देते हुए उससे चिपका रहना चाहता है तो उसी तक सीमित रखने में भलाई है. ऐसे लोगों के लिए शिक्षक का काम है, उसको धर्म के स्थान पर अध्यात्म से जोड़ने को प्रेरित करे. यह काम आसान नहीं है. जो लोग शताब्दियों से धर्म से चिपके हुए हैं, उनके लिए एकाएक अध्यात्म की डगर पकड़ना कठिन हो सकता है. ऐसे लोगों को धीरेधीरे उसकी ओर लाना होगा. उसका पहला चरण यह हो सकता है कि धर्म के नाम पर, कर्मकांड के नाम पर वे जो भी करना चाहते हैं, उसे अपने बूते पर करें. मसलन यदि किसी को ‘सत्यनारायण की कथा’ में धर्म का पालन नजर आता है, तो वह इसी से शुरुआत कर सकता है. बाजार से इस कथा की पुस्तक लेकर उसको पढ़नासमझना शुरू करे. यदि उससे जुड़े कर्मकांडों को जरूरी मानता है तो बिना किसी मध्यस्थ को बीच में लाए उस अनुष्ठान को स्वयं करने की कोशिश करे. खुद नहीं पढ़ सकते तो किसी परिजन या पड़ोसी से पढ़वाए. परंपरागत पुरोहितों को बीच में न आने दे. शब्द से जुड़ाव का सिलसिला एक बार शुरू हुआ तो थम नहीं पाएगा. उसकी जिज्ञासा उसको दूसरी पुस्तकों की ओर ले जाएगी. जिससे धर्म के नाम पर व्याप्त रूढ़ियों और निरर्थक कर्मकांडों से मुक्ति की राह प्रशस्त होगी.

संविधान लोकविकास के नाम पर शिक्षा के प्रति वचनबद्ध होता है. किंतु शिक्षा कैसी हो, इस बारे में बहुसंख्यक समाज की राय की प्रायः उपेक्षा होती है. उसका स्वरूप विशेषज्ञों द्वारा तय किया जाता है, जो अपने वर्गीय हितों की ओर ज्यादा समर्पित होते हैं. कदाचित यह जरूरी भी है. लेकिन विशेषज्ञों के हाथों में पड़कर शिक्षा का प्रभाव एकतरफा रह जाता है. व्यक्ति अपनी और स्थानीय समुदाय की विशेषताओं को समझ ही नहीं पाता. इससे उसके भीतर अविश्वास बढ़ने लगता है. इसलिए वह समाजकल्याण के कार्यों से मुंह चुराने लगता है. जबकि सामाजिक विकास संबंधी कार्यों में व्यक्ति की हिस्सेदारी आत्मस्फूर्त्त होनी चाहिए. दबाव की स्थिति मनुष्य को भविष्य के प्रति शंकालु बनाती है. नैतिक दायरे से बाहर आकर वह केवल स्वार्थसिद्धि का संकल्प मन पर लादे रखता है. औनिषदिक चिंतन का निचोड़ हैं—‘सर्व भूत हिते रतः, कृणवंतो विश्वमार्यम्।’ समस्त प्राणियों के कल्याण की वांछा रखते हुए विश्व को श्रेष्ठ बनाने का संकल्प लें.’ सहविधान में शिक्षा ज्ञान की इसी उदात् भावना और संकल्प से अनुप्रेरित होगी.

क्रमश:….

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भानुक्रमणिका :

 1. समानी व आकूति समाना हृदयानि वः।

समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति।।—ऋग्वेद, अष्ठम अध्याय, दशम मंडल, 191/4.

2. Regulated by the edicts and punishments, the people will know only how to stay out of t rouble but will not have a sense of shame. Guilted by virtues and the rites, they will not only have a sense of shame but also know how to correct their mistakes of their own accord.Analects of Confucius, pp. 13, Beijing Foreign Languages Printing House, 1994.

3. When Confucius went to the state of Wei, Ran You (one of Confucius’ student) drove the carriage for him. Confucius said, ‘What a large population Wei has?’ Ran You asked, ‘what should be done with such a large population?’ Confucius answered, ‘Enrich the people.’ Ran You went on asking. ‘What should be done when they have become rich?’ Confucius answered, ‘Educate them.’ Analects of Confucius, pp. 233-234.

4. महात्मा गांधी, मेरे सपनों का भारत.

5. वही.