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सहकार : आत्मनिर्भरता का दर्शन

सामान्य

उत्तरोत्तर कठिन होते जा रहे श्रमिक-जीवन की परेशानियों से मुक्ति का एक रास्ता समस्याओं के साथ-साथ जीवन से पलायन का हो सकता है. जैसा कि हमारे पूर्वज भी करते आए हैं. कभी संतोष के नाम तो कभी भाग्य के नाम पर. कभी धर्म तो कभी परलोक-सिद्धि के प्रलोभन से. कभी आत्मविश्वास गंवा जिंदगी से हार मानते हुए तो कभी शक्तिशाली के आतंक के चलते. यदि हमेशा यही होता तो जीवन में संभावनाओं की उपस्थिति और मानवीय जिजीविषा की चामत्कारिक देन से लोगों का भरोसा ही उठ जाता. परस्पर सहयोग और समर्पण की जादुई शक्ति को मनुष्य पहचान ही नहीं पाता. अमेरिका के शेकर साहचर्यवादियों के एक प्रसिद्ध गीत का गीत का भावार्थ  है—

जो भी सर्वोच्च शिखर तक पहुंचना चाहता है, उसको सर्वप्रथम समाज के सबसे निचले स्तर की ओर देखना चाहिए. तत्पश्चात सबसे नीचे मौजूद व्यक्ति को साथ लेकर सर्वोच्च शिखर तक पहंुचने के लिए चढ़ाई आरंभ कर देनी चाहिए.’

मनुष्य एवं सहकार का संबंध सहस्राब्दियों पुराना है. हड़प्पा और मोअ-जो-दड़ो की सभ्यता के अवशेष बताते हैं कि उन दिनों भारतीय व्यापारिक संगठन सुदूर रोम तक की यात्रा करते थे. प्राचीन चीन और जापान में ऐसे सहयोगी संगठन थे, जिनके सदस्य प्रतिमाह एक निश्चित रकम एक स्थान पर जमा करते रहते थे. धीरे-धीरे रकम बड़ी हो जाती, तो परस्पर बांट लिया जाता था. ऐसे सहयोगी संगठनों को चीन और जापान में क्रमशः यू हुई तथा तोनोमुशी कहा जाता था. भारतीय श्रेणि और यूरोपीय देशों में गिल्ड के बीच अच्छे व्यापारिक संबंध थे. आधुनिक सहकारिता आंदोलन की विधिवत शुरुआत रोशडेल पायनियर्स द्वारा 21 दिसंबर, 1844 को सहकारी उपभोक्ता भंडार की शुरुआत के साथ हुई थी.

सहकारिता को प्रेरित करने में सुप्रसिद्ध इतिहासकार चार्ल्स डिकेन्स की अद्वितीय प्रेरणा का योगदान भी कम नहीं है. 1843 की गर्मियों में चार्ल्स डिकेन्स, जो उन दिनों 31 वर्ष के सुदर्शन युवक थे, लंकाशायर की यात्रा पर निकले. उद्देश्य था अपनी नई पुस्तक के लिए जमीनी अनुभव बटोरना. देखना चाहते थे कि उत्तरी इंग्लेंड, जो उद्योग के क्षेत्र में विश्व-भर में नाम कमा रहा है, वहां पर आम जनजीवन कैसा है. उन्होंने मेनचेस्टर की मजदूर बस्तियों की यात्रा की, यह जानने के लिए कि अपने मालिकों के लिए साल में करोड़ों पाउंड का मुनाफा कमाने वाली कपड़ा मिलों के मजदूर किन परिस्थितियों में रहते हैं. डिकेन्स ने वहां जो देखा वह देह तो देह आत्मा तक को सुन्न कर देने वाला था. मजदूर बस्तियों में भूख, गरीबी और बीमारियों के नंगे नांच ने डिकेन्स को विचलित कर दिया. औद्योगिक क्रांति का हृदय-प्रदेश माने जाने वाले उस क्षेत्र में जीवन कितना मुश्किल और अमानवीय है. मानो पूरे इंग्लेंड को दो हिस्सों में बांट दिया गया हो. उसके एक ओर तो बड़े-बड़े धन्नासेठों, पूंजीपतियों, उद्योगपतियों और कमाऊ नौकरशाहों का इंग्लंेड है, तो दूसरे इंग्लेंड में भूखे, नंगे, विपन्न, शोषित-उत्पीड़ित और बीमार स्त्री-पुरुषों का बसेरा है. पूंजीवाद प्रेरित औद्योगिक क्रांति का कड़वा सच उसके सामने था. उसने जो देखा वह घोर अमानवीय, मनुष्यता को लांछित करने वाला था. अनियमितत मशीनीकरण के कारण प्रदूषण लगातार बढ़ता ही जा रहा था. नागरिक सुविधाएं पूरी तरह उजाड़ पड़ी थीं. वस्तुतः 1848 के आसपास रोशडेल में जीवन-संभाव्यता मात्र 21 वर्ष थी, जो उस समय इंग्लेंड की औसत जीवन-संभाव्यता से कहीं कम थी. औरतों के पास बदलने के लिए कपड़े तक नहीं होते थे. उनके गंदे और चिथड़े कपड़े बेहद बदबूदार होते थे. पलंग पर न तकिये होते थे, न चादर. बच्चे को जन्म देने के लिए औरतें प्रसूता के अगल-बगल, अपनी बाहों का सहारा देने के लिए खड़ी हो जाती थीं. भीषण दरिद्रता की यह अवस्था उन बुनकर परिवारों की साथ थी, जिनके बारे में यह दावा किया जाता था, कि वे पूरे विश्व के लिए कपड़ा तैयार करते हैं.

अगले ही दिन अथेनयिम क्लब में नौकरशाहों तथा कारखाना मालिकों की उपस्थिति में, वहां उपस्थित मजदूरों का आवाह्न करते हुए डिकेन्स ने कहा कि उन्हें अपनी इस अज्ञानता और अपराध-ग्रंथि से बाहर आ जाना चाहिए कि वे गरीबी और अपराध के बेबस जन्मदाता हैं. कि वे स्वयं कुछ भी करने में असमर्थ हैं, या उनका विकास दूसरे की दया-दृष्टि के बगैर संभव ही नहीं है. उन्हें इस भ्रम से भी बाहर आ जाना चाहिए कि एक दिन धनवान लोग अपनी आत्मा की आवाज से प्रेरित होकर आए आएंगे; और मिलकर उनकी समस्याओं का खोजेंगे. उन्होंने नौकरशाहों और कारखाना मालिकों से भी अपील की थी कि श्रमिकों की हालत में सुधार लाने के लिए वे आपसी कर्तव्यों तथा जिम्मेदारियों का परस्पर आदान-प्रदान करें. कि उनकी समृद्धि समाज की समृद्धि के बिना अधूरी और बेमानी है.

मजदूर बस्तियों में छायी गरीबी और बदहाली ने डिकेन्स को इतना व्यथित कर दिया था कि ट्रेन द्वारा लंदन वापस लौटते हुए उन्होंने अपनी नई पुस्तक ‘दि क्रिसमस कैरोल’ की अभिकल्पना की. एक सप्ताह बाद ही उन्होंने वह पुस्तक लिखनी प्रारंभ कर दी. उसके लगभग छह महीने के बाद 19 दिसंबर, 1843 को वह पुस्तक प्रकाशित होकर आई, जिसने पूरे इंग्लेंड के बुद्धिजीवियों को झकझोर कर रख दिया. लोग मजदूरों की स्थिति के बारे में सोचने को विवश हो उठे. क्रिसमस का उस जैसा उल्लास पहले कभी नहीं हुआ था— डेविड जे. थांपसन उस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए लिखा था कि लंदन लौटने के बाद चार्ल्स डिकेन्स ने अपने आंख, नाक तथा कान यह जानने पर लगा दिए थे कि मेनचेस्टर और लंकाशायर की मजदूर बस्तियों के उत्थान के लिए पूंजीपति और सरकार कितने चिंतित हैं; तथा मजदूर अपने शोषण एवं उत्पीड़न का कितना और किस तरह सकारात्मक विरोध कर पाते हैं.

चार्ल्स डिकेन्स की पुस्तक ‘दि क्रिसमल कैरोल’ लगभग जीवनी थी. एक मजदूर के संघर्षों और दुःखों की महागाथा. उसमें डिकेंस ने यह कल्पना कि थी एक पिता अपनी गरीबी से बेहद तंग आ चुका है. कर्ज न चुका पाने के कारण सजा काटते हुए भी वह अपने परिवार के प्रति चिंचित और परेशान है. उपन्यास का मुख्य पात्र बॉब क्रेस्टी नाम के अत्यंत गरीब मजदूर को बनाया गया था, जो अपने मालिक के लिए कमरतोड़ परिश्रम करने के बावजूद परिवार का भरण-पोषण कठिनाई-पूर्वक ही कर पाता है. उसका एक बेटा नन्हा टिम बीमार और चलने-फिरने में असमर्थ है. बॉब का मालिक स्क्रूज खूब धनवान मगर हद से ज्यादा कंजूस है. उसके जीवन का प्रमुख लक्ष्य अधिक से अधिक धन इकट्ठा करना है. स्क्रूज को उन भूखे-बीमार मजदूरों और उनके परिवारों की कतई फिक्र नहीं है, जिनके परिश्रम के दम पर उसके कारखाने सोना उगलते हैं.

पुस्तक के बहाने डिकेन्स द्वारा गढ़ा गया रूपक तेजी से बदलते ब्रिटिश समाज पर तीखा कटाक्ष था, जिसका एक सिरा बेहद चमकदार और चकाचौंध से युक्त था, उसपर मुट्ठी-भर लोगों का अधिपत्य था. जबकि दूसरे सिरे पर हजारों-लाखों उत्पीड़ित-शोषित जन थे, जीवन की मामूली सुविधाओं के लिए तरसते हुए. आगे चलकर इसी वर्ग को कार्ल माक्र्स ने सर्वहारा कहकर पुकारा था. कड़ी मेहनत के बावजूद उन्हें न भरपेट रोटी मिलती थी, न तन ढकने को जरूरत-भर कपड़ा. पुस्तक के बहाने लेखक ने मजदूर जीवन की विसंगतियों को पूरी दुनिया के सामने लाने का प्रयास किया था, जिसमें उन्हें भरपूर कामयाबी प्राप्त हुई. डिकेन्स की यह पुस्तक आगे चलकर यूरोप देशों के सामाजिक अध्ययन का प्रमुख दस्तावेज बनी. उससे लोग विकास को आलोचनात्मक दृष्टि से परखने के लिए विवश हो उठे. डिकेन्स द्वारा गढ़ा गया पात्र बॉब क्रेस्टी समाज के गरीब, ऋणग्रस्त, उत्पीड़ित और शोषित मजदूर का प्रतीक बन गया. कुटिल स्क्रूज को कंजूसी और शोषक पूंजीपति का पर्याय मान लिया गया. एक और मुख्य बात मजदूरों को यह समझ में आने लगी कि अपनी बेहाली और दुर्दशा के वे या उनका भाग्य जिम्मेदार नहीं हैं, असली जिम्मेदार वह व्यवस्था है, जो पूंजी को सीमित हाथों में कैद करने का अवसर देती है. वे समझने लगे कि इस अवस्था से उभरने के लिए उन्हें स्वयं ही प्रयास करने होंगे.

इंग्लेंड के चार्टिस्ट आंदोलनकारियों को आम मताधिकार के लिए छेड़े गए लंबे संघर्ष के लिए जाना जाता है. मगर सहकारिता के क्षेत्र में भी उनका योगदान कम नहीं है. मजदूरों की आवास समस्या के समाधान के लिए चार्टिस्ट नेता ओ’काॅनर ने 1843 ईस्वी में ‘चार्टिस्ट को-आपरेटिव लेंड कंपनी’ नाम से एक सहकारी संस्था का गठन किया था. उसे आगे चलकर ‘नेशनल लेंड कंपनी’ का नाम दिया गया. उस संस्था का एक सम्मिलित कोष था. केवल मजूदर उसके सदस्य बन सकते थे. 1844 से 1848 के दौरान संस्था द्वारा पांच स्थानों पर विशाल भूखंडों पर आवासीय इकाइयों का निर्माण कर, उन्हें चुने हुए श्रमिकों में बांटा भी गया. तत्कालिक कानून के अनुसार भूमिहीनों को मताधिकार से वंचित रखा गया था. अतः श्रमिकों को भू-स्वामी बनाना, उस समय के नियमों के अनुसार श्रमिकों को मान-सम्मान दिलाना था. उससे भी पहले 1830 में आर्थिक आत्मनिर्भरता द्वारा जनसाधारण का सम्मान वापस लाने का प्रयास सहयोगी उद्यमों के माध्यम से हो चुका था. 1830 में चार्ल्स हावर्थ के प्रयासों से ‘रोशडेल फ्रेंडली कोआपरेटिव सोसाइटी’ का गठन किया गया था. उस समिति ने सहकारी उद्यम की शुरुआत उपभोक्ता भंडार के माध्यम से की थी. परंतु अनुभव की कमी, सहकारिता संबंधी जागरूकता के अभाव, व्यवस्थागत कमजोरियों तथा कानूनी शिथिलताओं के वह समिति असफलता का शिकार हुई थी. असफलता के अन्य कारणों में प्रमुख कारण थे, उधार बिक्री का प्रावधान तथा नियमों की अस्पष्टता. मजदूरों की दयनीय आर्थिक स्थिति को देखते हुए, समिति के विधान में की गई व्यवस्था के अनुसार सदस्यों को उसके उपभोक्ता भंडार से एक सप्ताह का उधार दिया जाता था. उनसे यह अपेक्षा की जाती थी कि सप्ताह के अंत में उधार की रकम का भुगतान कर देंगे. व्यावहारिक रूप में वह व्यवस्था बहुत दिनों तक नहीं चल सकी. सीमित वेतन तथा अन्य आकस्मिक खर्चों के कारण बहुत से मजदूर सप्ताहांत में रकम लौटाने में असमर्थ रहते थे. परिणाम यह हुआ कि समिति को व्यापार मेें घाटा होने लगा. चार्ल्स हावर्थ को व्यक्तिगत रूप में भी बहुत नुकसान उठाना पड़ा. कुछ ही दिनों पश्चात वह समिति भंग हो गई.

कोई और होता तो दो बड़ी असफलताओं के चलते टूट जाता. भारी नुकसान सहकर शायद ही अगला प्रयास करता. लेकिन मजदूरों के समक्ष ‘करो या मरो’ की स्थिति थी. बाजार में महंगाई बढ़ती जा रही थी, ऊपर से दुकानदार खाने-पीने के सामान में भारी मिलावट करते थे. उससे भी अधिक था उधार का बोझ, जो मजदूरों के जीवन की पहली सांस से आरंभ होकर अंतिम क्षणों तक बना रहता था. मजदूरों को यह बोध हो चला था कि अपनी समस्याओं का निदान स्वयं उनके हाथों में है. इसलिए बिना और विलंब किए उन्हें स्वयं आगे आना होगा. इनमें वे लोग लोग थे, जिनकी भविष्य पर निगाह थी. जिनका आशावाद अभी मरा नहीं था, जिनकी जनसंगठन और लोकशक्ति में प्रबल आस्था थी, जो जानते थे कि मनुष्यमात्र उतना बुरा नहीं, जितनी कि लोग उसके बारे में सामान्य धारणा बना लेते हैं. मनुष्य की सकारात्मक प्रवृत्तियों को उभारकर उसकी समस्याओं का निदान संभव है. मनुष्यता के ऐसे ही महान स्वप्नदृष्टाओं में से एक था, डॉ. विलियम किंग(1786-1865), जिसकी सहकार और सहयोगाधारित उपक्रमों में प्रबल आस्था थी. सहकारिता के विचार को जन-जन तक पहुंचाने के लिए डॉ. किंग ने एक समाचारपत्र भी निकाला था, नाम था—दि को-आॅपरेटर. अपने समाचारपत्र में उसने लिखा था—

‘बगैर संगठन के संख्या-बल निःशक्त है. जबकि विवेक बिना संगठन-शक्ति निरर्थक.’

डिकेन्स के मेनचेस्टर दौरे से पहले ही मजदूरों एक समूह वहां से मात्र सतरह किलोमीटर दूर रोशडेल में अपनी समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए निरंतर बैठकें करता आ रहा था. उन बैठकों में मजदूरों की समस्याओं तथा उनसे मुक्ति के बारे में विचार होता. ऐसी ही एक बैठक में जॉन कार्सव नामक एक मजदूर कार्यकर्ता ने सहकारी समिति के गठन का सुझाव दिया था. सहकारिता के पुराने प्रयोग असफल सिद्ध हो चुके थे. इसलिए उसके प्रस्ताव पर कुछ लोग चौंके. परंतु यदि सहकारिता नहीं तो क्या? दूसरे विकल्पों का सरासर अभाव था. अंततः उस सभा में सहकारी समिति बनाने के निर्णय को अनुमति मिल गई. उसका मुख्य उद्देश्य बनाया गया ग्राहकों को शुद्ध, पवित्र पूरे माल की आपूर्ति.

वह 15 अगस्त, 1844 का दिन था. बाकी दिनों से कहीं अधिक पवित्र और उम्मीदों से भरा हुआ, जब ‘रोशडेल पायनियर्स इक्वीट्वेल कोआॅपरेटिव सोसाइटी’ के गठन को सैद्धांतिक सहमति मिली, जिसने दुनिया-भर के सहकारिता आंदोलन को नई दिशा दी. रोशडेल पायनियर्स की संस्थापकों में कुल अठाइस सदस्य थे. सहकारी समिति की बात करना, उसके विचार को आगे चलाना अलग बात थी. उसके लिए पूंजी का प्रबंध करना अलग बात. मगर जहां चाह-वहां राह, और जहां राह-वहां हिम्मत और मंजिल भी. बैठक के दौरान मजदूरों ने निर्णय लिया कि प्रत्येक मजदूर को जो समिति का सदस्य बनना चाहता है, समिति के कोष में न्यूनतम एक पाउंड का निवेश करना होगा. एक-एक पेनी के लिए कमरतोड़ परिश्रम करने वाले मजदूरों के लिए एक पाउंड की रकम बहुत बड़ी थी. समस्या किसी एक की नहीं, अधिकांश मजदूरों की थी. तब सर्वसम्मिति से यह सुझाव आया कि इसके लिए कारखाना मालिकों से उधार लिया जाए. जो उधार देने में आनाकानी करें, उन्हें हड़ताल या धरना-प्रदर्शन के माध्यम से अग्रिम धनराशि देने के लिए विवश किया जाए. उस समय जो सदस्यगण काम करें, वे यह प्रयास भी करें कि हड़ताल पर गए सदस्यों के हिस्से के पेंस भी बचा सकें.

हड़ताल की धमकी मिलते ही कुछ कारखाना मालिक एडवांस देने को सहमत हो गए. यह संगठित शक्ति की पहली जीत थी. कुछ कारखाना मालिकों ने एकदम इंकार कर दिया. इसपर श्रमिकों का आक्रोश फूट पड़ा. उसके बाद मालिकों एवं मजदूरों के बीच संघर्ष भी हुआ. इसपर कुछ मजदूर निराश होकर समिति के प्रस्ताव से पीछे हटने लगे. कुछ अभी भी उम्मीद बांधे रहे. प्रत्येक सप्ताह दो पेंस की रकम उनके लक्ष्य को देखते हुए अपर्याप्त थी. हालांकि कुछ कारखाना मालिक उतनी रकम एडवांस के रूप में देने को तैयार थे, जबकि कुछ इस मांग को पूरी तरह नकार चुके थे. अततः मजदूरों तथा कारखाना मालिकों के बीच यह समझौता हुआ कि उतनी रकम मालिकों की ओर से मजदूर संगठन को एडवांस के रूप दी जाएगी. वहां से सदस्य उस राशि को उधार के रूप में ग्रहण कर सकते हैं.

 दो पेंस की रकम उस समय अधिकतर कामगारों की लगभग दो सप्ताह की मजदूरी के बराबर थी. कह सकते हैं कि उन बुनकरों के लिए यह रकम भी मामूली न थी. इसे उगाहने के लिए तीन व्यक्ति नियुक्त किए गए, जो प्रत्येक सोमवार सदस्यों से रकम लाकर खजांची के पास जमा कर देते थे. विषम स्थितियों में एक पाउंड की शेयर-निधि जुटाना भी कठिन प्रतीत हो रहा था. सदस्य प्रति सप्ताह दो पेंस जमा करने में भी नाकाम हो रहे थे. कई बार ऐसे भी अवसर आए जब सदस्यों पर निराशा हावी होने लगी थी. उस समय यह सुझाव दिया गया कि समिति के गठन का कार्य फिलहाल स्थगित कर दिया जाए तथा विकास के वैकल्पिक उपायों के बारे में सोचा जाए. साथ ही अभी तक जमा की गई रकम, संबंधित सदस्यों को लौटा दी जाए. भविष्य में जब भी हालात अनुकूल हों, तब संगठन के बारे में नए सिरे से विचार किया जाए. कुछ सदस्य तो हताश होकर उस समय तक जमा कराई गई शेयर-निधि वापस भी मांगने लगे थे.

यह प्रतिकूल स्थिति थी. लेकिन उम्मीदों एवं घनी निराशाओं के बीच मजदूरों का अभियान आगे बढ़ता रहा. इस बीच चार्ल्स हावर्थ बिना समय खोए तेजी से समिति के लिए विधान की रचना में लगा था. विपरीत स्थितियों और आस-निराश के बीच डोलते उस छोटे-से समूह के लिए पहला पड़ाव आया 24 अक्टूबर 1844 को, जब हावर्थ द्वारा बनाए गए नियमों को ‘रजिस्ट्रार आॅफ फैमिली सोसाइटीज’ द्वारा पंजीकृत कराके, नियमों की उस व्यवस्था को संसद के अधिनियम के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्था की पहचान दी गई. इस तरह ‘रोशडेल इक्वीटेवल पायनियर्स को-आपरेटिव संस्था’ की नींव रखी गई. एक सपना अंगड़ाई लेने को आंखों में उतर चुका था. पंछी उड़ान भरने को पर खोल चुके थे, और अब पूरा अंतरिक्ष उनके लिए खुला था.

सदस्यगण अपने बाकी खर्च में कटौती करके एक-एक पेनी जोड़ते रहे. अंततः दिसंबर तक रोशडेल पायनियर्स मिलकर प्रारंभिक 28 पाउंड की पूंजी जमा करने में कामयाब हो गए. अब समस्या ऐसे स्थान की थी जो व्यावसायिक दृष्टि से उपयुक्त हो, साथ में पर्याप्त सस्ता भी. थोड़ी तलाश के बाद वह स्थान भी मिल गया. रोशडेल के 21, टोड लेन पर एक पुरानी मिल वर्षों से बंद पड़ी थी. देखभाल न होने के कारण वह खंडहर में बदलती जा रही थी. उसके मालिक मिस्टर डनलप से बात की गई, लेकिन वे उसको किसी समिति के नाम किराये पर देने को तैयार न थे. अंततः एक उपाय निकाला गया. समिति के ही एक स्थायी सदस्य के नाम पर उस गोदाम के भू-तल स्थित 23 फुट चौड़े तथा 50 फुट लंबे स्थान को तीन वर्ष के लिए किराये पर लिखवा लिया गया. किराया तय हुआ—दस पाउंड प्रति वर्ष. उसी स्थान के अगले हिस्से के 23 फुट चौड़े तथा सतरह फुट लंबे स्थल को दुकान के रूप में प्रयोग में लाया गया. शेष स्थान को भंडार तथा मीटिंग आदि के उपयोग के छोड़ दिया गया.

तैयारियां पूरी हो चुकी थीं. आखिर वह दिन भी आ गया जिसकी उन्हें वर्षों से प्रतीक्षा थी. रात-दिन जिसका उन्होंने इंतजार किया था. हजारों-लाखों सपने संजोए थे. अठाइस पाउंड में से दस पाउंड किराये के नाम खर्च हो चुके थे. कुछ उस इमारत की मरम्मत और सफेदी के नाम चढ़ गए. बाकी पाउंड से उन्होंने रोजमर्रा में काम आने वाली चीजें खरीदीं. कुल इतना सामान जितना कि छोटी-सी ट्राली में समा सके. उपभोक्ता भंडार का सपना और जरा-सा सामान! यह कहकर रोशडेल पायनियर्स का उपहास भी किया गया. मगर उन्होंने धैर्य से काम लिया. बिना प्रतिक्रिया दिए वे अपने काम से लगे रहे. पूर्णतः अनुशसित और लक्ष्य-समर्पित. आखिर उसी स्थान से, वर्ष की सबसे लंबी रात अर्थात 21 दिसंबर, 1844 को, सायं आठ बजे किटकिटाती ठंड के बीच रोशडेल पायनियर्स द्वारा सहकारी उपभोक्ता भंडार की शुरुआत की गई. मानो घने अंधियारे के बीच एक टिमटिमाती-सी लौ जली हो, जो बढ़ते-बढ़ते विश्वव्यापी दीपमाल बन गई. कुछ ही समय बाद जब वह स्थान छोटा पड़ने लगा तो भंडार को नए स्थान पर ले जाया गया. उपभोक्ता भंडार से आरंभ हुआ सहकारिता का अभियान उत्पादन, विपणन, निर्माण, थोक आपूर्ति जैसे नए-नए क्षेत्रों में फैलता चला गया. रोशडेल नाम सहकारिता का पर्याय बन गया. जगह-जगह से लोग उस स्थान को देखने के लिए आने लगे. उस अभियान कामयाबी ने सहकारिता का मखौल उड़ाने वाले लोगों की आंखें चैंधियां दीं. इस भ्रम को भी दूर कर दिया कि सीमित पूंजी के दम पर कोई उद्यम आरंभ कर पाना असंभव है.

तब से आज तक लगभग 170 वर्ष की अवधि में सहकारी आंदोलन ने पूरी दुनिया में तरक्की के नए-नए सोपान प्राप्त किए हैं. यह उस मिथ का खंडन करता है जो मानता है कि व्यावसायिक सफलता केवल स्पर्धा के माध्यम से संभव है. इसके उलट आधुनिक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का तो संपूर्ण दर्शन ही स्पर्धा पर टिका हुआ है. एक-दूसरे को नीचा दिखाकर बाजार पर छा जाने का प्रयास; और प्रयास भी ऐसा जो षड्यंत्र तक जाता हो, करना—आधुनिक उद्योग-नीति का ही हिस्सा है. इसमें कोई संदेह नहीं कि स्पर्धा से उत्पादकता पर प्रभाव पड़ता है. एक-दूसरे से बेहतर बनने की चाहत, स्वयं में परिष्कार का बोध भी जगाती है. लेकिन स्पर्धा सदैव निरापद नहीं होती. वह अपने साथ अनेक चुनौतियां लिए चलती है, जिनमे जरा-सी चूक पिछली सभी सफलताओं पर भारी पड़ सकती है. सुदीर्घ यात्रा के दौरान सहकारिता के क्षेत्र में भी अनेक बदलाव आए हैं. उच्च तकनीक ने सहकारी उद्यमों में भी जगह बनाई है. बावजूद इसके मूल सिद्धांत लगभग वही हैं, जो रोशडेल पाॅयनियर्स द्वारा अपनाए गए थे. उनमें देशकाल और परिस्थितियों के अनुसार समय-समय पर संशोधन अवश्य होते रहते हैं. इंग्लेंड से शुरू हुआ सहकारिता आंदोलन बड़ी तेजी से फ्रांस, स्वीडन, चीन, इटली, जर्मनी, जापान, स्पेन, अमेरिका, भारत आदि देशों में फैलता चला गया. आखिर क्यों, इसे समझने के लिए एक पुराना प्रसंग—

अरस्तु जब वह मात्र इकीस वर्ष युवा था, एक दिन वह मेकदोलन के सम्राट फिलिप के दरबार में पहुंचा. वहां उसने सिकंदर को पढ़ाने की इच्छा व्यक्त की. प्लेटो के शिष्य रह चुके अरस्तु को भला कौन मना करता! अनुमति मिलते ही अरस्तु ने अध्यापन आरंभ कर दिया. सिकंदर उस समय ग्यारह वर्ष का किशोर था. बड़ा ही सुंदर और उससे कहीं ज्यादा मेधावी. एक दिन की बात. अरस्तु गणित पढ़ा रहे थे कि अचानक सिकंदर ने टोक दिया—‘गुरुजी, एक कितने होते हैं?’

सवाल बहुत आसान दिखता है. अरस्तु इसको दार्शनिक रूप देना चाहते तो कह सकते थे कि एक यानी एकता यानी एकेश्वर अर्थात परमशक्ति! वे गणित का खेल दिखाते हुए यह भी कह सकते थे कि एक यानी दो का आधा या एक बटा दो का दुगुना; अथवा चार का एक-चौथाई. चाहते तो कोई और भी पहेली की तरह जवाब सुझा सकते थे. लेकिन जवाब देने के बजाय अरस्तु ने कहा—

‘मुझे सोचना होगा?’ उसके बाद वे घर लौट आए.

अगले दिन वे वापस लौटे. सिंकदर उत्तर की प्रतीक्षा में था. तब अरस्तु ने कहा—‘एक बहुत अधिक से भी अधिक हो सकता है.’

बात स्पष्ट थी. हम सब अलग-अलग मिलकर यदि केवल भीड़ बनाते हैं तो हमारी शक्ति, अकेले इंसान की शक्ति से कुछ ही ज्यादा होगी है. लेकिन यदि हम एकजुट हो जाएं, हमारे मनोरथ आपस में मिल जाएं, यदि हम अपनी संकल्पशक्ति का साझा कर लें, तब हम एक-एक होकर भी बहुत अधिक से अधिक हो सकते हैं.

यही सहकारिता है. यही संगठन की ताकत, यही इस लेख का उद्देश्य भी है.

© ओमप्रकाश कश्यप

 

भारत में आर्थिक सहकार की परंपरा

सामान्य

सहकार का विचार भारतीय समाज के लिए अनजाना नहीं है. यह उस समय का है जब भारत ने सभ्यता का पहला पाठ पढ़ना सीखा. यदि हम यह मानकर चलें कि भारतीय सभ्यता, विश्व की प्रचीनतम और परिष्कृत सभ्यताओं में से एक है तो यह कहना भी अतार्किक न होगा कि सहकारी आर्थिक संगठन की पर्याय श्रेणियों का सर्वप्रथम उद्भव भारत में ही हुआ. आर्थिक सहकारिता का विचार यहीं से दुनिया के बाकी देशों में फैला और अपनी बहुआयामी उपयोगिता के कारण सर्वत्र स्वीकारा भी गया. यूनानी सभ्यता के पैरोकार उस सभ्यता के भारतीय सभ्यता के समकालीन होने का दावा कर सकते हैं, परंतु यह निर्विवाद सत्य है कि प्राचीन यूनानी सभ्यता अथवा उसकी समकालीन अन्य सभ्यताओं में साहचर्य आधारित उद्यमों का उतना विकास नहीं हो पाया था, जितना की भारत में. कारण यह था कि यूनानी राजसत्ता सहकार आधारित उद्यमों को अपनी स्वयंप्रभुता के लिए चुनौती मानती थी. दूसरी ओर भारत में राजनीति और सहकार आधारित उद्यमों के बीच सदैव अच्छा तालमेल बना रहा. कुछ यूनानी विचारकों की भांति चंद्रगुप्त मौर्य का महामंत्री कौटिल्य श्रेणियों की स्वायत्तता को शासन की स्वयंप्रभुता के लिए खतरे के रूप में देखता था, परंतु उसने भी श्रेणियों की आर्थिकसामाजिक उपयोगिता को देखते हुए उन्हें मुक्त व्यापार करने की अनुमति प्रदान करने की अनुशंसा की थी. इसलिए मौर्य प्रशासन में श्रेणियों का तीव्र विकास संभव हो सका.

जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है भारत में श्रेणियों का उद्भव वैदिक काल से ही देखने को मिल जाता है. मोहनजोदारो, हड़प्पा आदि सिंधु घाटी की सभ्यता का प्रतीक कहे जाने वाले प्राचीन स्थानों की खुदाई से जो अवशेष प्राप्त हुए हैं, उनके अनुसार तो प्रागैतिहासिक काल के भारतीय व्यापारी प्राचीन रोम, यूनान, मिश्र और सुमेर आदि अपनी समकालीन सभ्यताओं के व्यापारियों के साथ संबंध बनाए हुए थे. महाकाव्यकाल तक आतेआते सहयोगाधारित व्यापारिक समूह और भी मजबूत हो चुके थे. सभी जानते हैं कि महाभारत के युद्ध की परिणति अंततः विखंडित भारत के रूप में होती है. परीक्षित के बाद देश राजनीतिक रूप से अनेक छोटेछोटे राज्यों में विभाजित हो चुका था. विकास और लोकसशक्तीकरण के नाम पर आर्थिक एवं राजनीति शक्तियां अपनी मनमानी करने लगीं थीं, जिससे भारत कुछ वर्षों के लिए संभवतः कमजोर पड़ा. उस दौर के इतिहास की अनेक कड़ियां आज भी अनसुलझी हैं. बाद के भारत का प्रामाणिक रूप से उपलब्ध इतिहास ईसा से लगभग छह सौ वर्ष पहले का है. इसी कालखंड में संसार के दो महत्त्वपूर्ण उदारवादी धर्मों, जैन एवं बौद्धधर्म का उद्भव हुआ. प्रसंगवश बता दें कि इन दोनों ही धर्मों का उदय वैदिक धर्म में कर्मकांडों के अतिरेक के विरोधस्वरूप हुआ था, जो समाज के धूर्त और प्रपंची परजीवी पुरोहित वर्ग की देन थे. यह परजीवी वर्ग निहित स्वार्थों के लिए धर्म और राजनीति का गठजोड़ करने में सफल रहा था. जनसामान्य को लुभाए रखने के लिए इसी वर्ग ने एक के बाद एक कर्मकांडों की अंतहीन शृंखला आरंभ की, जिसके परिणामस्वरूप पूरा समाज बौद्धिकता से कटकर नियतिवाद और आंडबरवाद के चंगुल में फंसता गया, जिसने प्रकारांतर में बौद्ध और जैन दर्शनों के उद्भव की जमीन तैयार की.

बौद्धधर्म ने तर्क का सहारा लेते हुए मानव की सत्ता को सर्वोच्च माना और धर्म के नाम पर चलाई जा रही निरर्थक बहसों से दूर रहने की सलाह दी. यही नहीं उसने ईश्वर और आत्मा जैसे पदों की व्याख्या से दूर रहते हुए, अपने चिंतन को व्यावहारिक धरातल तक सीमित रखा, जिसका जनसामान्य द्वारा स्वागत किया गया. इस बीच दोनों धर्मों के अनुयायियों के बीच वर्चस्व का संघर्ष भी हुआ, जिसमें जनसाधारण का समर्थन बौद्धधर्म के प्रति बना रहा. अपने वैज्ञानिक सोच के कारण ही वह धर्म की सीमाओं को लांघकर दुनियाभर में फैला. विश्वविजय केवल तीरतलवारों और बंदूक की नोक के दम पर ही नहीं, अध्यात्म के बल पर भी सच हो सकती है, यह उसने संभव कर दिखाया.

जैन धर्म के प्रवर्त्तक महावीर स्वामी एवं गौतम बुद्ध दोनों ही क्षत्रिय कुल में जन्मे थे, किंतु उनके द्वारा प्रवर्त्तित जैन और बौद्ध दोनों ही धर्मों को व्यापारी वर्ग का भरपूर समर्थन प्राप्त हुआ. जैन धर्म चूंकि अहिंसा पर अधिक जोर देता था, इस कारण अपेक्षाकृत कम व्यावहारिक था. इसलिए उसको सीमित लोकव्याप्ति मिली. दूसरी ओर व्यावहारिक होने के कारण बौद्धधर्म का प्रसार बहुत तेजी से हुआ. इसके पीछे एक कारण संभवतः यह भी रहा कि ब्राह्मण धर्म के हिमायती खुद तो अमर्यादित भोग में लिप्त रहते थे, किंतु जनसामान्य से वे उपभोग को सीमित रखने की अपेक्षा रखते थे. भोगवादी जीवन को हेय माना जाता था. उपभोग के प्रति जनसाधारण की उदासीनता तेजी से बढ़ते व्यापारी एवं उत्पादक वर्गों के लिए घाटे का सौदा थी. इसलिए नएउभरते बौद्धधर्म को व्यापारी वर्ग का भी भरपूर समर्थन प्राप्त हुआ.

भारत में श्रेणियों का वास्तविक उद्भव एवं विकास छह सौ ईसा पूर्व से लेकर 1000 ईस्वी पश्चात तक है. इतिहास में लगभग यही कालखंड बौद्धधर्म की और उसके विकास का भी रहा है. उस युग में संगठित व्यापारी श्रेणियों के माध्यम से दूरदराज के देशों तक अपने व्यापार को विस्तार दे रहे थे. वहीं अपेक्षाकृत छोटे व्यापारी और उद्यमी साहचर्य के सिद्धांत के अनुरूप संगठित होकर, अपने उत्पादों को देश के कोनेकोने तक पहुंचा रहे थे. भारतीय इतिहास का यह कालखंड आर्थिक विकास के साथसाथ सुरुचि एवं सांस्कृतिक समृद्धि के लिए भी जाना जाता है. वर्णाश्रम व्यवस्था हिंदुत्व की देन थी. बौद्धधर्म में उसके और जातिप्रथा के लिए कोई स्थान नहीं था. वर्णाश्रमवादियों के प्रभाव के चलते भारतीय समाज में विभिन्न जातियों के मध्य आपसी व्यवहार को लेकर में जो अनुशासन अथवा निषेद्ध प्रचलन में थे, बौद्धधर्म उनका बहिष्कार करता था. उसके तेजी से लोकप्रिय होते जाने का यह भी एक कारण था. अंतद्वंद्वों की कमी के कारण आंतरिक और बाहरी व्यापार में तेजी आई. शताब्दियों से जातिवादी अनुशासन में बंधकर समाज के शीर्षस्थ वर्ग को सेवा देती आईं शूद्रवर्ग की शिल्पकार जातियां अनुकूल अवसर पाकर संगठित होने लगीं.

कुलीनचित्त’ नामक जातक में ‘बड्ढकिगम्’ नामक एक बस्ती का उल्लेख है, जो वाराणसी के करीब थी. उसमें 500 बढ़ई परिवार निवास करते थे. ऐसे ही एक अन्य जातक में ‘महाबड्ढकिगम्’ नामक बस्ती का जिक्र आता है,जहां एक हजार शिल्पियों के प्रवास करने का वर्णन किया है. बौद्ध साहित्य में 18 प्रकार की शिल्पी श्रेणियों का उल्लेख मिलता है. जिनका स्वतंत्र अस्तित्व था और जिन्हें राज्य द्वारा भी पर्याप्त अधिकार प्राप्त थे. स्पष्ट है कि तब तक कर्मकारों की न केवल अलगअलग श्रेणियाँ बन चुकी थीं. बल्कि उसमें उनके संगठन भी कायम थे. ये संगठन इतने कार्यक्षम थे कि राज्यसत्ता के समानांतर अपने हित के लिए, आवश्यक नियम बना सकते थे. कतिपय विवादों में निर्णय का अधिकार भी उन्हें प्राप्त था.

विनय पिटक में उल्लिखित है कि चौर कर्म करने वाली स्त्री को भिक्षुणी बनाने से पहले संघ, गण अथवा उसकी श्रेणि से उसकी अनुमति ले ली जाए. ध्यान देने की बात है कि तब तक अंतरद्विपीय व्यापार शुरू हो चुका थाशिल्पकार और व्यापारी दोनों यह मान चुके थे कि व्यापार को बढ़ाने—उसकी सुरक्षा और समृद्धि के लिए संगठित होकर रहना अत्यावश्यक था. यह आर्थिकराजनीतिक शक्तियों के सहसंबंधों के विकसित होने की शुरुआत थी. हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस प्रकार के संगठन उसी तरह सहकार में लिप्त थे—जिस तरह कि आज के सहकारी संगठन. हम केवल यह मान सकते हैं कि उस संगठनों में आधुनिक सहकारिता के बीजतत्व मौजूद थे. लोग सहयोग की महत्ता को स्वीकार कर चुके थे. बौद्धधर्म के आगमन के सौडेढ़ सौ वर्षों में ही सामाजिकता की भावना का तीव्रतर विकास हुआ.

इस युग में अनेक महान ग्रंथों की रचना हुई. बौद्धधर्म के प्रचारप्रसार के लिए भी अनेक ग्रंथ लिखे गए. वैदिक परंपरा भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी. उसमें तात्विक चिंतन का कार्य जारी था. दार्शनिक चिंतन के क्षेत्र में भी इस दौरान मौलिक कार्य हुए. गौतम मुनि के न्याय, कणाद के वैशेषिक दर्शन की नींव रखी गई. वैदिक सहिंताओं के नवान्वेषण की परंपरा में कपिल मुनि का सांख्य, जैमिनी का पूर्व मीमांसा एवं वेद व्यास का उत्तर मीमांसा(ब्रह्मसूत्र) दर्शन प्रकाश में आए. इसी दौर में छठा भारतीय दर्शन योग के नाम से पातंजलि की मेधा का उपहार बना. दर्शन और अध्यात्म के अतिरिक्त लोकव्यवहार के क्षेत्र में भी मौलिक रचनाएं प्रकाश में आईं. अनेक उपनिषदों, पुराणों, स्मृतियों की रचना का साक्षी यह कालखंड रहा. कौटिल्य, कणाद, याज्ञवल्क्य, कात्यायन, कपिल, इस दौर के अतिमहत्त्वपूर्ण ग्रथों में कौटिल्य रचित अर्थशास्त्र का नाम बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है. ईसापूर्व चौथी शताब्दी में एक जिद्दी और धुन के पक्के ब्राह्मण विष्णुगुप्त चाणक्य, जिन्हें कूटनीतिक निपुणता के कारण कौटिल्य कहकर सम्मानित किया जाता है, ने मगध के सम्राट महानंद को गद्दी से उतारकर चंद्रगुप्त मौर्य के अधीन नए और कहीं विशाल राज्य की नींव डाली. इस कारण उनकी प्रतिष्ठा समाज के बीच आज भी बनी हुई है. अपने अर्थनीति एवं राजनीति संबंधी विचारों को लेकर उन्होंने ‘अर्थशास्त्र’ नामक पुस्तक की रचना की, जो अपने समय के महत्त्वपूर्ण ग्रंथों में से एक है. तत्कालीन भारत की राजनीति, अर्थशास्त्र एवं व्यवहारशास्त्र संबंधी विचारों को जानने के लिए अर्थशास्त्र की मान्यता इतनी बड़ी है कि बिना उसके उस कालखंड की चर्चा ही असंभव है.

अर्थशास्त्र अर्थनीति और राजनीति पर केंद्रित महान रचना है. हालांकि उसमें केंद्रीय सत्ता की भूमिका को अत्यधिक महत्त्व दिया गया है. लेकिन यह मान लेना कि उस समय स्थानीय तंत्र पूरी तरह नाकाम हो चुके थे, अनुचित होगा. उन दिनों केंद्रीय सत्ता की सर्वोच्चता के बावजूद समाज में सक्रिय निजी तंत्र की प्रभावी मौजूदगी थी, विशेषकर आर्थिक कार्यकलापों को लेकर. समाज की प्रमुख आर्थिकव्यापारिक गतिविधियां श्रेणियों के अधीन थीं. मौर्यकालीन भारत में उत्पादन की गतिविधियां निजी क्षेत्र द्वारा नियंत्रित थीं. उपभोक्ता वस्तुओं का निर्माण विपुल मात्र में किया जाता था. उस युग में श्रेणियों की शक्ति और उनकी पहुंच का अनुमान केवल इसी बात से लगाया जा सकता है कि महाकूटनीतिज्ञ चाणक्य उनकी सत्ता को संदेह की दृष्टि से देखते था; उसका मानना था कि सम्राट को उनसे सतर्क रहना चाहिए. राधाकुमुद मुखर्जी आदि विद्वानों के हवाले से विक्रमादित्य खन्ना लिखते हैं कि—

ऐसी संभावना है कि चाणक्य श्रेणियों की उपस्थिति को लेकर काफी शंकाकुल थे. श्रेणि से उनका आशय एक ऐसी स्वयंभू सत्ता से था, जिसके बहुत से सक्रिय सदस्य हों, अच्छे संसाधन तथा सदस्यों के मन में संगठन के प्रति समर्पण की उदात्त भावना हो. कौटिल्य ऐसे संगठनों, जो किसी खास उद्देश्य के लिए प्रयत्नपूर्वक गठित किए गए हों, को चंद्रगुप्त के नवगठित साम्राज्य की एकता के लिए एक बड़े खतरे के रूप में देखते थे. बावजूद इसके श्रेणियों के गठन को हतोत्साहित करने के लिए वे कोई कानून नहीं बना सके. क्योंकि एक तो श्रेणियां मौर्य साम्राज्य की स्थापना से भी बहुत पहले से समाज और शासन में अपनी पैठ बना चुकी थीं. दूसरे उन्हें लगता था कि नवगठित साम्राज्य को मजबूत एवं वैभवशाली बनाए रखने के लिए श्रेणियों का सहयोगसमर्थन आवश्यक है. यह मानने के भी पर्याप्त कारण हैं कि राज्य की आर्थिक संपन्नता, विकास एवं नागरिक समर्थन, जो सम्राट को लोकप्रिय एवं उसकी सत्ता की सर्वोच्चता बनाए रखने के लिए अनिवार्य था, हासिल करने के लिए वे व्यापारिक संगठनों को पर्याप्त महत्त्व देते थे. यह स्वाभाविक ही था, क्योंकि मौर्यकाल में सहयोगाधारित स्वतंत्र आर्थिकवाणिज्यिक संगठन/श्रेणियां आर्थिक विकास के सर्वाधिक सक्षम एवं कारगर ऊर्जास्रोत थे. अतः उनके साथ किसी भी प्रकार की उदासीनता या अभद्रतापूर्ण व्यवहार असमीचीन था. राज्य की समृद्धि के उनका उनका सहयोग तो आवश्यक था, लेकिन किसी भी प्रकार से उनकी संगठित ताकत साम्राज्य की अस्थिरता का कारण न बने, इसलिए उनपर नजर रखना अत्यावश्यक था.’1

यही कारण है कि कौटिल्य द्वारा ‘अर्थशास्त्र’ में ‘सामुत्थायक’ अर्थात साथ मिलकर सभी का समान उत्थान करने वाले समुदायों को कायम रखने की व्यवस्था की गई. सामुत्थायक का अभिप्राय ऐसे समूहों से था, जिनका संगठन परस्पर मिलकर (सामुत्थान द्वारा) किया गया है. ‘अर्थशास्त्र’ में इस प्रकार के सामुत्थानकों (सहकारी समूहों) का भी उल्लेख है, जो मुख्यतः मजदूर संगठन थे. सामुत्थानकों में मजदूर सम्मिलित कार्य करते थे. उस कार्य से हुई आय या मजदूरी परस्पर बाँट ली जाती थी—

एक समान कार्य करने वाले श्रमिकगण एकजुट होकर एकलशक्ति की तरह, साथसाथ संवाद करते हुए कार्य करें तथा उस कार्य से हुई आमदनी को परस्पर बराबरबराबर बांट लें.’2

मौर्यकाल से पहले ही शिल्पकारों के स्वतंत्र संगठन बनने लगे थे. वे संगठन अपने आप में स्वायत्त थे. सामूहिक हितों को देखते हुए वे परस्पर मिलजुलकर निर्णय लेते थे. उनका सुदूर रोम व्यापारिक संगठनों के साथ तालमेल था. यहां यह उल्लेखनीय है कि आपस में व्यापारिक तालमेल होने के बावजूद रोम के व्यापारिक समूहों की आंतरिक संरचना भारतीय श्रेणियों की संरचना से भिन्न थी. उन्हें संभवतः उतनी स्वायत्ता प्राप्त नहीं थी, जो उनके समकालीन भारतीय शिल्पकार संगठनों को प्राप्त थी. न ही वे निर्णय लेने के बारे में सामूहिक राय को उतना महत्त्व देते थे. यह बात चौंका देने वाली हो सकती है कि भारत के सहकारआधारित व्यापारिक संगठनों की क्षमता एवं कार्यकुशलता से परिचित होने तथा उनके साथ दीर्घकालीन व्यापारिक संबंध होने के बाद भी, रोम के व्यापारियों ने भारतीय श्रेणियों के समानांतर स्वतंत्र आर्थिक संगठनों के गठन से परहेज क्यों रखा?

ऐसा प्रतीत होता है कि मौर्यकालीन भारत एवं तत्कालीन रोमन साम्राज्य की परिस्थितियां एकदम अलग थीं. हालांकि दोनों साम्राज्यों को स्वायत्त व्यापारिक संगठनों के बारे में पर्याप्त जानकारी थी. संभवतः दोनों ही मानते थे कि स्वाधीन व्यापारिक संगठनों का प्रसार, प्रजा की साम्राज्य के प्रति निष्ठा और सेवाभावना को प्रभावित कर सकता है. बावजूद इसके मौर्यों ने पहले से चले आ रहे स्वायत्त व्यापारिक संगठनों को आगे भी कार्य करते रहने की अनुमति प्रदान की, जबकि रोमन साम्राज्य ऐसा कर पाने में असमर्थ रहा. इससे कोई भी यह अनुमान लगा सकता है कि मौर्य शासकों को पहले से चले आ रहे शिल्पकार संगठनों का समर्थन प्राप्त था. इसलिए उन्होंने यह ध्यान रखते हुए कि वे राज्य के लिए किसी प्रकार का खतरा न बन सकें, उन्हें स्वतंत्रतापूर्वक कार्य करते रहने की अनुमति प्रदान की थी. उस समय रोम में ऐसे स्वाधिकार संपन्न और व्यापारिक संगठन विकसित नहीं हो पाए थे, जिनपर भरोसा किया जा सके.’3

यहां यह मान लेना कि तत्कालीन रोम में सहयोगाधारित संगठनों का एकदम अभाव रहा, अनुचित होगा. भारत की तरह वहां भी सहयोगाधारित स्वायत्त संगठन बने थे, परंतु वे छोटे स्तर थे, उनका प्रमुख लक्ष्य केवल मुनाफा कमाना था. भारतीय शिल्पकार संगठनों जैसी सामूहिक चेतना का उनमें अभाव था. इसलिए रोमन साम्राज्य को किसी भी प्रकार का नुकसान पहुंचा सकने की उनकी क्षमता लगभग शूण्य ही थी. उधर अपनी साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाओं के बावजूद रोमन साम्राज्य अपने आप से ही भयभीत था. इसलिए वहां उस तरह के स्वशासी शिल्पकार संगठन विकसित नहीं हो सके, जैसे कि उसके समकालीन भारत में बहुत पहले से चले आ रहे थे. रोमन साम्राज्य को इसका नुकसान भी उठाना पड़ा. स्वायत्त शिल्पकार संगठनों को हतोत्साहित करने का ही परिणाम था कि कालांतर में रोमन साम्राज्य आर्थिक संकट का शिकार होता चला गया. दूसरी ओर कौटिल्य की सूझबूझ और चंद्रगुप्त के राजनीतिक कौशल का लाभ मौर्य साम्राज्य को मिला, जिससे वह तेजी से विकासशील शिल्पकार संगठनों का पूरा लाभ अपनी समृद्धि के लिए उठा सका. हालांकि कौटिल्यकृत ‘अर्थशास्त्र’ में श्रेणियों पर नियंत्रण या उनपर नजर रखने स्पष्ट उल्लेख कहीं नहीं है, तथापि इस बात की पर्याप्त संभावना है कि कौटिल्य के निर्देश पर सम्राट ऐसी सावधानियों का पालन करता था.

अर्थशास्त्र द्वारा यह भी बोध होता कि बुद्ध द्वारा निर्वाण प्राप्ति के सवाडेढ़ सौ वर्ष बाद ही समाज में पारस्परिकता का विकास बहुत तीव्रता से हुआ था. उस युग में एक ओर जहाँ बड़े व्यापारी अपने संगठन के माध्यम से देशदुनिया में अपने कार्यव्यापार का विस्तार कर रहे थे, वहीं अपेक्षाकृत छोटे व्यापारिक समूह सहकल्याण में ही जीवन की सार्थकता के दर्शन कर रहे थे. धनार्जन की भूख के साथ धन को त्यागने, उससे दूर रहने, अतिरिक्त धन को दान कर देने की प्रवृत्तियां जोर पकड़ती जा रही थीं. इनके साथसाथ अपरिग्रह, अस्तेय जैसी कल्याणकारी विचारधाराओं की मान्यता तेजी से बढ़ रही थी. आवश्यकता से अधिक धनसंचय को हेय मानकर उसका लगातार निषेद्ध किया जा रहा था. श्रीमद्भागवत में कहा गया—

जितने से पेट भरे उतना ही पाने का लोगों को अधिकार है. इससे अधिक रखने वाला चोर है.’4

प्रोफेसर आर.सी. मजुमदार के चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में सहकार पर आधारित संगठनों की मौजूदगी का उल्लेख अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ Cooperate life in Ancient Indiaमें किया है, जिसमें उन्होंने 27 प्रकार के संगठनों का उल्लेख किया है, जिन्हें श्रेणि, समिति, पुग, पाणि व्रात्य आदि विभिन्न नामों से संबोधित किया जाता था. कात्यायन ने भी कई प्रकार की समितियों, जो अलगअलग नामों से पुकारी जाती थीं, का उल्लेख किया है, जिसमें परस्पर विश्वास और उसके साथसाथ सामूहिक कल्याण की भावना से काम करने पर जोर दिया गया है.

भारतीय वाङ्मय में स्मृतियों का अत्यंत सम्मानीय स्थान है. इनमें तत्कालीन समाज के आचारव्यवहार पर न केवल गंभीर चिंतन है, बल्कि उसकी मौलिक गवेषणा के साथसाथ जीवन के लिए उनकी अपरिहार्यता सिद्ध करने वाली व्याख्याएँ भी मौजूद हैं. स्मृति ग्रंथों में भी शुक्रनीति, याज्ञवल्क्य स्मृति आदि का कार्यकाल अर्थशास्त्र से पहले का है. मनुस्मृति हालाँकि बाद की रचना है, तथापि राजनीतिक कारणों से उसको दूसरी स्मृतियों की अपेक्षा अधिक प्रसिद्धि मिली है. यद्यपि जिन कारणों से उसको राजनीतिक चर्चा में रखा जाता है, वे याज्ञवल्क्य स्मृति में अधिक तीव्रता या कहें कि कटुता के साथ विद्यमान हैं. जैसा कि पहले कहा गया है मनुस्मृति की रचना कौटिल्य का अर्थशास्त्र लिखे जाने के बाद हुई. मगर यदि यह मान लिया जाए कि उसकी ऋचाएं, लिखे जाने से पहले से ही लोकअनुश्रुति में प्रचलित थीं, तब मनुस्मृति के अनुसार भी समितियों को स्वायत्तता प्राप्त थी. एक प्रसंग में मनु ने लिखा भी है कि—

गांव या देश के संघों के साथ समझौता करने के बाद, यदि कोई व्यक्ति किसी लोभ या स्वार्थ के कारण उस समझौते की अवमानना करे तो ऐसे व्यक्ति को जेल में डाल दिया जाए और उसपर जुर्माना भी किया जाए.5

उल्लेखनीय है कि मनु ने समाज को चार वर्गों में विभाजित करते हुए राजनय एवं दंडनीति संबंधी व्याख्या में विभिन्न वर्गों के अपराधियों के लिए अलगअलग सजाएं सुनिश्चित की हैं, जिनमें ब्राह्मण को या तो सजा से पूरी तरह मुक्त रखा गया है, अथवा चारों वर्णों में उसके लिए न्यूनतम सजा का प्रावधान किया गया है. इसके लिए मनु की आलोचना भी की जाती है. किंतु श्रेणि के साथ किए समझौते के उल्लंघन को लेकर उसने वर्णभेद की ओर इशारा नहीं किया है. इसका कारण यह हो सकता है कि या तो वह इन आर्थिक संगठनों को वर्णाश्रम धर्म के बाहर मानता था. इसलिए उसपर विचार करते समय उसने विशुद्ध आर्थिक हितों पर ध्यान दिया था अथवा यह मानते हुए कि अधिकांश श्रेणियां ब्राह्मणेत्तर व्यापारी वर्ग अथवा शिल्पकारों द्वारा संचालित की जा रही थीं, जिनमें प्रायः एक ही वर्ण के लोग सम्मिलित होते थे, ऐसी संस्थाओं से उसके द्वारा पोषित वर्णव्यवस्था को कोई खतरा नहीं है, उसने वर्णाश्रम व्यवस्था के प्रतिबंधों को श्रेणियों पर लागू करने में उदासीनता बरती. एक तरह से इसका उसको लाभ ही हुआ. व्यापारी वर्ग जो उन दिनों अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत बना चुका था, तथा जिसका जनमानस पर गहरा प्रभाव भी था, वह उसके समर्थन में बना रहा.

इसका परिणाम यह हुआ कि मनुस्मृतिकाल में इन व्यापारिक संघों की महत्ता और भी बढ़ी. जिसके परिणामस्वरूप गाँव अथवा देश के साथ किए समझौते के उल्लंघन को केवल श्रेणि या वर्ग तक सीमित कर दिया गया. इस बात से ये संकेत भी मिलते हैं कि धीरेधीरे ही सही उस युग में विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था की रूपरेखा बन रही थी. मनुस्मृति के टीकाकार मेधातिथि और कुल्लूक भट्ट ने अपने ग्रंथों में इसका स्पष्ट उल्लेख किया है. याज्ञवल्क्य स्मृति में भी गणों की महत्ता को अक्षुण्ण रखने तथा उनसे विश्वासघात करने वाले अथवा उन्हें किसी भी प्रकार का नुकसान पहुंचाने वाले व्यक्ति से समस्त संबंध तोड़ लेने के निर्देश दिए गए हैं. यह बात भी ध्यान देने की है कि है कि भारत के संदर्भ में श्रेणियों का योगदान केवल आर्थिक कार्यक्रमों तक ही सीमित नहीं था. बल्कि उनकी व्याप्ति धार्मिक और सामाजिक सभी क्षेत्रों में बराबर बनी हुई थी. अतएव याज्ञवल्क्य स्मृति का संदेश सभी के लिए एकसमान है.

सामूहिकता की भावना को सामाजिकता की अनिवार्यता बताते हुए तत्कालीन ऋषियोंमुनियों ने उसपर बहुत जोर दिया है. उनका अपना आचरण भी सहयोगी और परस्पर समर्पित जीवन की मिसाल था. आश्रमों का जीवन न्यूनतम आवश्यकता और सुखदुःख में समान सहभागिता के सिद्धांत पर आधारित होता था. उनकी अर्थव्यवस्था पशुशक्ति, शिल्पकर्म और कृषिकर्म पर आधारित थी, जिसमें आश्रमप्रमुख या गुरु के साथ सभी आश्रमवासी मिलजुलकर खेती करते थे. उससे होने वाली आय से ही सभी का भरणपोषण होता था. कई स्थानों पर आश्रमों को गाय, स्वर्णादि दृव्य दान में देने का भी उल्लेख है. बावजूद इसके समाज में प्रतिष्ठा उन्हीं आश्रमों की थी, जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होते थे. उल्लेखनीय है कि भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में व्यक्तिगत और आर्थिक उपलब्धियों को उल्लेखनीय कभी माना ही नहीं गया. उनके स्थान पर यहां मोक्ष अर्थात मुक्ति की कामना पर जोर दिया गया है. जिसे सभी वर्गों के बीच समान रूप से मान्यता प्राप्त है. याज्ञवल्क्य स्मृति में गण के अधिकारों को प्रमुखता दी गई है. उसके अनुसार—

समूह द्वारा जो कानून अथवा नियम बनाए गए हों, यदि राजा के अपने कानूनों द्वारा उनका विरोध न होता हो तो राजकीय कानूनों के समान उनकी भी संरक्षा की जानी चाहिए. यदि कोई व्यक्ति गण के अधिकार को बाधा पहुंचाए अथवा उसके साथ किए गए किसी समझौते का उल्लंघन करे, तो उसपर पर्याप्त जुर्माना किया जाना चाहिए. सामूहिक हितों को ध्यान में रखते हुए सबको समूह द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करना चाहिए. जो भी इसका उल्लंघन करे अथवा पालन करने में आनाकानी करे, तो उस पर जुर्माना किया जाना चाहिए. राजा को चाहिए कि सामूहिक कार्य से उसके पास पहुँचे लोगों के काम पूरा होने पर, विदा होते समय उनको दान और मान के साथ विदा करे. उधर समूह के कार्य से राजा के पहुँचे लोगों का भी कर्तव्य है कि वे सामूहिक हित से प्राप्त धन को समूह को अर्पण कर दें. जो स्वयं अर्पण न करें उसपर ग्यारह गुना दंड लगाया जाए. इन समूहों के कार्यचिंतक ऐसे व्यक्ति होने चाहिए, जो धर्म के ज्ञान, शुचि एवं लोक से परे हों. समूह का हित चाहनेवालों को चाहिए कि उनके वचन को क्रियान्वित करें. यह विधि, श्रेणि, निगम और पाषंड सभी प्रकार के समूहों के लिए है. राजा इसके भेद की रक्षा करे—जो परंपरा चली आ रही हो, उसका सभी से पालन कराए.6

यह बात भी ध्यान में रखने की है कि उन दिनों उत्पादन मूलतः आवश्यकता केंद्रित था. आमतौर पर जीवन में नित्यप्रति काम आने वाली वस्तुओं का उत्पादन स्थानीय शिल्पकारों, कारीगरों द्वारा ही कर लिया जाता था. उनके लिए स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कच्चेमाल का ही प्रयोग किया जाता था. हालांकि जैसेजैसे मनुष्य की रुचि एवं संसाधनों का विकास हो रहा था, माल की खपत के लिए दूसरे बाजारों की खोज के साथ ही आयातित कच्चेमाल का प्रयोग भी आम हो चला था. फिर भी कच्चेमाल के स्रोत उन दिनों शिल्पकेंद्रों के विकास का प्रमुख कारण रहे. तत्कालीन समाज में शिल्पकार और कारीगर समाज का महत्त्वपूर्ण हिस्सा थे. तथापि जैसेजैसे जातिप्रथा अपना संकुचित रूप धारण करती चली गई, शिल्पकारों की प्रतिष्ठा भी उत्तरोत्तर घटती चली गई. धर्मशास्त्रों में यह भी उल्लिखित है कि स्थानीय उद्योगों एवं व्यवसायों से जुड़ी जातियां व्यवस्थित एवं धनवान थीं. उनके अनेक और मजबूत संगठन थे, जिन्हें उनकी संरचना और कार्यशैली के अनुसार विभिन्न नामों से पुकारा जाता था.

कौटिल्य ने भले ही आर्थिक समितियों को संदेह की दृष्टि से देखते हुए सम्राट को उनसे सावधान रहने को कहा हो, किंतु उनके पूर्ववर्ती एवं परिवर्ती चिंतकों ने श्रेणि आदि सभी आर्थिकवाणिज्यिक संगठनों को सामाजिक विकास के लिए अपरिहार्य माना था. आलोचना के बावजूद कौटिल्य भी श्रेणियों को समाप्त करने के पक्ष में नहीं थे. वे उनको राज्य के विकास के लिए अपरिहार्य मानते थे. यही कारण है कि उन्होंने श्रेणियों को प्रोत्साहित करने के लिए राजा को आवश्यक निर्देश दिए. अर्थशास्त्र में उसके लिए आवश्यक व्यवस्थाएं कीं. आर्थिक समितिकरण की आवश्यकता मात्र उद्यमियों एवं व्यापारियों के हित में ही नहीं थी. बल्कि उसका उद्देश्य आम जन को भी शोषण से सुरक्षित रखना था, जिसमें उन्हें पूर्ण सफलता प्राप्त हुई थी.

प्राचीन भारत के अर्थशास्त्रियों में शुक्राचार्य और बृहश्पति के नाम बहुत सम्मान के साथ लिए जाते हैं. दोनों ही प्रखर विद्वान और कालजयी चिंतक थे, जिन्होंने आर्थिक समितियों पर खुलकर विचार किया था, उनकी उपयोगिता को दर्शाते हुए उनकी स्थापना एवं विकास पर जोर दिया तथा राज्य को उन्हें यथासंभव सहायता उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिए. अर्थशास्त्र के आदि आचार्य माने जाने वाले बृहश्पति ने आर्थिक विषयों को अपने विवेचन, चिंतन का मुख्य आधार बनाया. यह बात अलग है कि उनका अधिकांश चिंतन भारतीय समाज में व्याप्त वर्णवाद को प्रश्रय देने वाला और परंपरावादी किस्म का है. हमें यह मानने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि वर्णाश्रम धर्म को लेकर आचार्य बृहश्पति ने भी तत्कालीन वर्णभेद संबंधी मान्यताओं का समर्थन किया. शायद इसी कारण उन्हें पर्याप्त प्रतिष्ठा से वंचित रहना पड़ा है. उनका आर्थिक चिंतन तत्कालीन वर्चस्ववादी शक्तियों की अपेक्षाओं के अनुकूल था, जिससे तर्काधारित ज्ञानविज्ञान के प्रति जिज्ञासा के स्थान पर रूढ़िवाद को पांव जमाने का अवसर मिला. बावजूद इसके उनकी अप्रतिम मेधा का लोहा हमें मानना ही होगा. उन्हें अर्थशास्त्र में व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया है. एक स्थान पर वे लिखते हैं कि—

दान करना चाहिए….पचीस वर्षों तक अध्ययनमनन आदि करना चाहिए, तत्पश्चात धनोपार्जन. सम्राट को कृषि, गोकुल तथा वाणिज्य की सुरक्षा करनी चाहिए….नीति के चार उपाय हैं—साम दाम दंड और भेद….इनके अतिरिक्त तीन और भी हैं—माया, उपेक्षा एवं वध….धन को उसी प्रकार अर्जित करना चाहिए जिस प्रकार हाथी से हाथी पकड़ा जाता है….धन जगत का मूल हैइस कारण सब इसकी कामना करते हैं, जिसके पास धन हो उसके पास मित्रहितैषीधर्मविद्यागुणविक्रमादि सब मौजूद होते हैं….’7

बृहश्पति के आर्थिक विचारों में साम्राज्यवादी ढाँचे को मजबूत बनाए रखने की भावना प्रकट हुई हैब्राह्मणवादी विचारधारा का समर्थन करते हुए वे वर्णाश्रम धर्म की रक्षा करने का आह्नान करते हैं. सामाजिक स्तरीकरण को प्राकृतिक बताते हुए वे अन्याय और अनाचार का पक्ष लेने से भी नहीं चूकते. दुष्ट एवं दोषी ब्राह्मण को भी अबध्य बताकर वे समाज के एक वर्ग को अतिरिक्त रूप से अधिकारसंपन्न बनाने का कार्य करते हैं. यह वर्गीय दृष्टि आज के वैज्ञानिक समाज में भले ही अर्थहीन हो चुकी हो, किंतु एक समय में स्थिति इतनी ज्यादा पेचीदा और गंभीर थी कि भारतीय समाज में एक पराश्रित/परजीवी किस्म का वर्ग, शताब्दियों तक दूसरों की मेहनत और संसाधनों के दम पर मौज उड़ाता रहा.

भारत के प्राचीन अर्थशास्त्रियों में शुक्राचार्य का योगदान भी उल्लेखनीय है. मौलिकता की दृष्टि से उनका योगदान आचार्य बृहश्पति से भी बढ़कर है. उनका अर्थदर्शन कहीं अधिक आधुनिक एवं तर्काधारित है. इसी कारण वे भारतीय आर्थिक चिंतन के पितामह माने जाते हैं. भारतीय धर्मशास्त्रों के अनुसार शुक्राचार्य को असुरों का गुरु माना गया है. लोकश्रुति में असुर को देवविरोधी और घृणा का पात्र माना गया है, वस्तुतः असु़र(+सुर)से तात्पर्य उन लोगों से था, जो वैदिक कर्मकांड के विरोधी थे. ध्यातव्य है कि वैदिक सभ्यता मुख्यतः पशुचारण व्यवस्था थी. जबकि असुर, जिनमें अधिकांश संख्या भारत के मूलनिवासियों की ही थी, कृषिकर्म में पूर्ण दक्षता प्राप्त कर चुके थे. इसलिए उनकी अर्थव्यवस्था में स्थायित्व अधिक था. उनके विचारों में यथास्थतिवाद एवं परंपरा के पोषण की अपेक्षा व्यावहारिकता अधिक है. शायद इसी कारण हमें आचार्य बृहश्पति की अपेक्षा शुक्राचार्य के विचार कहीं अधिक व्यावहारिक एवं तर्कसंगत नजर आते हैं. अर्थशास्त्रीय मान्यताओं की सैद्धांतिक पुष्टि के लिए सर्वप्रथम शुक्राचार्य ने ही मूल्य की परिभाषा की थी, जो आज करीब 2600 वर्ष बाद भी लगभग ज्योंकीत्यों प्रचलन में है. मूल्य का 2600 वर्ष पूर्व इतना सटीक एवं प्रामाणिक विवेचन किसी अन्य विद्वान ने नहीं किया. मूल्य को परिभाषित करते हुए शुक्राचार्य ने लिखा है कि—

जिसके माध्यम से कोई वस्तु प्राप्त होती है, वही उसका मूल्य है. अर्थ अथवा मूल्य वस्तु के सुलभ अथवा असुलभ होने तथा गुण या अगुण और लोगों की कामना अथवा इच्छा के अनुसार घटताबढ़ता रहता है.’8

आचार्य शुक्र मूल्य को दो तरह देखते थे—एक तो मूल्य अथवा मूल्यक, दूसरा अर्थक. मूल्य अथवा मूल्यक वह खर्च था जो किसी वस्तु को खरीदने के लिए किया जाता है, जिसे क्रेता वांछित वस्तु के बदले में विक्रेता की सहमति होने पर उसे प्रदान कर वस्तु का स्वामित्व खरीदता है. वस्तु का मूल्य उसकी उपलब्धता एवं मांग के आधार पर घटताबढ़ता रहता है. अर्थ की विशेषता वस्तु की उपयोगिता में निहित रही है. कोई वस्तु जिस कार्य के निर्मित एवं अपेक्षित है, उसे पूरा करने में जितनी सामथ्र्यवान वह उतनी ही मूल्यवान भी समझी जाएगी. दूसरे शब्दों में कोई वस्तु जितनी अधिक उपयोगी होगी, वह उतनी ही अधिक मूल्यवान मानी जाएगी. कात्यायन और शुक्राचार्य की भांति आचार्य कामंदक भी विद्वान अर्थशास्त्री थे. हालांकि अर्थशास्त्र संबंधी उनकी स्थापनाएं बहुत कुछ आध्यात्मिक किस्म की हैं. उन्होंने अर्थशास्त्र को धर्म का ही उपांग माना है. उनका मानना था कि अर्थशास्त्र में धर्म की प्रतिष्ठा होनी चाहिए. दूसरे शब्दों में अर्थिक महत्त्व के विषयों की विवेचना के लिए धार्मिक मान्यताओं तथा रीतिरिवाजों का पूरा ध्यान रखना चाहिए.

ये तमाम अवधारणाएं अलगअलग दीखती हुई भी एक दूसरे से संबंधित हैं तथा तत्कालीन समाज के भीतर प्रचलित अलगअलग वैचारिक धाराओं तथा अपने समाज की परिस्थतियों का खुलासा करती हैं. आचार्य बृहश्पति देवताओं के गुरु थे. देवसमाज असुरों के समाज की अपेक्षा संगठित तथा आर्थिक रूप से संपन्न था. अपने आप में संपूर्णता का बोध लिए हुए, जो बाकी समाजों को खुद से हेय मानता था और इसी आधार पर दूसरों पर अपनी संस्कृति लादने के लिए सतत प्रयत्नशील रहता था. इसलिए उनके चिंतन में व्यावहारिकता के स्थान पर उपदेशात्मकता अधिक नजर आती है. इसके विपरीत शुक्राचार्य जिस असुर समाज के निर्देशन का गुरुत्वभार संभाले हुए थे, वहां पर आंतरिक लोकतंत्र की भावना बहुत प्रिय थी. शिल्पकलाओं के विकास में इस वर्ग का योगदान सराहनीय रहा है, जो कालांतर में व्यापारिक विकास का मुख्याधार बनीं. स्पष्ट है कि आर्थिक एवं सामाजिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए पारस्परिक सहयोग की परंपरा बहुत पहले शुरू हो चुकी थी. कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी श्रेणियों का वर्णन है, जिन्हें आधुनिक सहकारिताओं का आदिकालीन रूप में माना जा सकता है. यही नहीं कौटिल्य मजदूर समितियों का भी उल्लेख करते हैं, जो परस्पर संगठित होकर कार्य करते थे और प्राप्त मजदूरी को आपस में बाँट लेते थे—

एक साथ रहने, साथसाथ कार्य करने वाले शिल्पकर्मी समुत्थान अर्थात अपने समूह के कल्याण के लिए एकजुट होकर व्यापारकर्म अपनाते हैं और उससे हुई आय को आपस में बांट लिया करते हैं.’9

इस प्रकार समुत्थारक का आशय ऐसे गतिवान संगठन से है जिसके सदस्य परस्पर संगठित होकर सामूहिक लक्ष्यों के लिए कार्य करते थे. नारद स्मृति हालांकि बाद की रचना है, जिसमें व्यावहारिक जीवन की अनेक समस्याओं पर विचार किया गया है. उसमें भी सहयोग एवं सहकार की महत्ता पर प्रकाश डाला गया है. वहाँ भी समुत्थान की उपयोगिता पर बल देते हुए संगठित होने तथा एकदूसरे के कल्याण के लिए सहकार करने की आवश्यकता पर जोर दिया है—

वणिकगण जहाँ संगठित होकर कार्य करते हैं, उसे संभूय समुत्थान कहा जाता है. लाभ की कामना से जब कोई कार्य अपनी ओर से किया जाए तो उसका आधार अपनी ओर से लगाया हुआ धन ही होता है. इसी हिस्से के आधार पर प्रत्येक हिस्सेदार को लाभ का उपयुक्त अंश प्रदान किया जाना चाहिए. लाभ, व्यय और वृद्धि—तीनों का अंश प्रत्येक हिस्सेदार पर उसके हिस्से के अनुसार पड़ना चाहिए.’10

समूह की सफलता के लिए यह भी आवश्यक है कि उसके सदस्यों के बीच एकता के साथसाथ उनका मानसिक स्तर एक जैसा हो, उनमें अटूट विश्वास एवं संपूर्ण सांगठनिक चेतना हो. इससे आपस में तालमेल कायम रखने के साथसाथ कार्यक्रमों के निर्माण एवं उनके संचालन में मदद मिलती है. नारद स्मृति में चतुर एवं कुशल व्यापारियों को, मूर्ख और आलसी व्यक्तियों के साथ मिलाकर काम न करने की सीख दी गई है. इसके स्थान पर अपना लाभहित देखते हुए आचरण करने का फैसला किया गया है. आधुनिक अर्थशास्त्री भी अपना लाभहित देखते हुए आचरण करने की सलाह देते हैं. सामूहिकता की भावना को सामाजिकता की अनिवार्यता बताते हुए तत्कालीन ऋषियोंमुनियों ने उसपर बहुत जोर दिया है. उल्लेखनीय है कि भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में आर्थिक उपलब्धियों को बहुत ज्यादा उल्लेखनीय कभी माना ही नहीं गया. उनके स्थान पर मुक्ति की कामना पर जोर दिया गया है. लेकिन यह मान लेना कि व्यावहारिक स्तर पर भारतीय मनीषी पूर्णतः निरपेक्ष एवं चिंतनशूण्य थे, लौकिक विषयों की ओर उनका कोई रुझान ही नहीं था, अनुचित होगा. अगर ऐसा होता तो भारतीय कलाओं का विकास अधूरा ही रह जाता. बौद्धधर्म के विकास के पीछे वैदिक धर्माचार्यों द्वारा थोपे गए कर्मकांडों के अतिरिक्त भारतीय समाज के कुछ उपभोक्तावादी संस्कार भी थे. दरअसल भारतीय मेधा बहुआयामी रही है. उसने जहां विराट से लेकर शूण्य तक को अपनी विचारणा का विषय बनाया, वहीं उसके चिंतनमनन में लौकिक विषयों को लेकर चमत्कृत कर देने वाली, बहुरंगी और विविधतापूर्ण उपलब्धियां भी मौजूद हैं.

प्राचीन भारतीय मुनियों की अंतर्दृष्टि एक ओर तो विराट ब्रह्मांड के सूक्ष्मतम रहस्यों की पड़ताल में लगी थी, वहीं उसका दूसरा हिस्सा लौकिक विषयों को लेकर निरंतर शोध और संभावनाओं की तलाश में जुटा था. इनमें वैदिक और द्राविड़ दोनों ही सभ्यताओं का समान योगदान था. बल्कि यह कहना उचित होगा कि दोनों ही सभ्यताएं परस्पर समानांतर, कहीं एकदूसरे की पूरकसहयोगी बनकर साथसाथ आगे बढ़ती हुई, कहीं परस्पर तिर्यक—एकदूसरे को काटती हुईसी, सामाजिक विकास के कार्य में लगी रहती थीं. कालांतर में बड़े व्यापारिक संघों को स्वयंप्रभुता के लिए खतरे के रूप में देखता था, परंतु उसने भी श्रेणियों की आर्थिकसामाजिक उपयोगिता को देखते हुए उन्हें मुक्त व्यापार करने की अनुमति देने की अनुशंसा की थी. इसलिए मौर्य प्रशासन में श्रेणियों का तीव्र विकास संभव हो सका. मौर्यशासन से श्रेणियों ने विकास की जो रफ्तार पकड़ी वह गुप्तकाल तक बनी रही. बल्कि अपने पूर्ववर्ती शासनों की अपेक्षा विकेंद्रीकृत शासनव्यवस्था होने के कारण वह श्रेणियों के विकास के लिए और भी अनुकूल सिद्ध हुई. इस अवधि में व्यापार संगठनों एवं राजदरबार के संबंध परस्पर अन्योन्याश्रित रहे, जिससे राज्य का त्वरित विकास संभव हुआ, साथ ही श्रेणियों को अभूतपूर्व प्रतिष्ठा प्राप्त हुई.

गौतम बुद्ध ने सामाजिकआर्थिक विकास में श्रेणियों के योगदान को देखते हुए उनकी मुक्त कंठ से प्रशंसा की है. जातक कथाओं में उस समय की प्रतिष्ठित श्रेणियों का ससम्मान उल्लेख किया गया है. आगे चलकर गुप्त सम्राट स्कंदगुप्त का एक लेख देखने में आया है, जिसमें तेलियों की श्रेणि के पास अक्षयनिधि जमा कराने का उल्लेख मिलता है. लेख के अनुसार इंद्रपुर में निवास करने वाली तेलियों की एक श्रेणि के पास सम्राट स्कंदगुप्त द्वारा धन जमा कराया गया था. उद्देश्य मात्र इतना था कि उस धन से प्राप्त ब्याज से सूर्य मंदिर के दीपक के लिए तेल का खर्च चलता रहे. इस लेख के अनुसार आदेश था कि भले ही तैलिक श्रेणि स्थानापन्न होकर अन्यंत्र जा बसे, वहीं अपना व्यवसाय आदि करें, मगर राजा की ओर से जमा कराया गया धन उसी के पास जमा रहे. उस समय के प्रसिद्ध ग्रंथों यथा अर्थशास्त्र, याज्ञवल्क्य स्मृति, नारद स्मृति, नीति वाक्यामृत आदि में श्रेणियों के योगदान की चर्चा की गई है. इससे स्पष्ट है कि प्राचीन भारत में समाजव्यवस्था के अंतर्गत श्रेणियों और निगमों को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था. अथर्ववेद के एक सूक्त के अनुसार—

राज्य, संस्था या समाज मनुष्य के क्रमिक विकास का परिणाम हैं. राज्य संस्था से पूर्व विराट(राज्यविहीन या अराजक) दशा थी. उस दशा के होने से भय होता था कि क्या सदैव यही दशा रहेगी. क्योंकि वह दशा भयावह थी, अतः उत्क्रांति होकर, ग्रहिपत्य संगठन बने. मनुष्यों का सबसे पहला संगठन परिवार के रूप में था. पारिवारिक दशा में उन्नति होकर ‘आहवनीय’ दशा आई. इस दशा में ग्रहों (परिवारों) के स्वामियों (गृहपतियों) का एक स्थान पर आह्नान किया जाता था. आहवनीय के नेताओं को वेदों में ग्रामणी कहा गया है. आहवनीय (ग्राम) से उत्क्रांति होकर ‘दक्षिणाग्नि’ दशा आई. यह गाँव की अपेक्षा अधिक बड़ा संगठन था. निरुक्त में अग्नि का अर्थ अग्रणी किया गया है. इस दक्षिणाग्नि दिशा में उत्क्रांति होकर सभा और समिति, संस्थाओं का निर्माण हुआ.’11

इस तरह समितिकरण की शुरुआत को हम विकासक्रम की अधिक परिपक्व अवस्था भी कह सकते है. जिसके आधार पर अपरिग्रह के महत्त्व को दर्शाते हुए, ‘सैकड़ों हाथों से अर्जन करने और हजारहजार हाथों से विसर्जित करने यानी बांटने.’ की उदात्त भावना भारतीय संस्कृति के पवित्र लोकादर्शों में सम्मिलित रही है. लोकतंत्र जिस सांगठनिता एवं समानता के उच्चादर्श के साथ आज प्रचलित है, वैसा तब भले ही न हो, उसका सीमित और अपरिष्कृत रूप की उस समय प्रचलित हो, किंतु प्राणिमात्र के प्रति समानता का आदर्श उस समय के प्रायः सभी ग्रंथों में मौजूद रहा है. उसी के अनुसार उस समय के आर्थिक सिद्धांत गढ़े गए है. उसी के आधार पर किसान अन्न उगाते समय समस्त प्राणियों के पोषण की कामना करता है, शिल्पकार अपने शिल्प के माध्यम से सबके काम आना चाहता है और मनस्वी कामना करता है कि वह सबके हित का सोचे, सबके कल्याण का सपना देखे और उसके लिए प्राणप्रण से संकल्प साधना को समर्पित होवे. तदनुसार बिना किसी वर्गभेद के समाज के एक समान कल्याण की कामना को समर्पित शास्त्रीय व्यवस्थाएं पूरे समाज को परिवार की भांति मानकर सबके उपकार का संकल्प रचती हैं. तभी तो वाणी के स्तर पर भी किसी का अकल्याण न हो, ऐसी हमारे यहां मान्यताएं थीं और सबके अनुपालन के लिए पर्याप्त शास्त्रीय व्यवस्थाएं भी थीं. एक वैदिक प्रार्थना देखिए—

हम सब समान गति, समान कर्म, समान ज्ञान एवं एक समान नियम अपनाते हुए, सबका कल्याण करने वाली वाणी बोलें.12

इसी प्रकार की एक पवित्र सद्कामना अथर्वेद के उद्गाता कवि की है—

हमारा साथसाथ रहनसहन हो—संकट में हम एकदूसरे के मददगार हों—एक साथ रहकर भरणपोषण करें.’13

और यह सब अचानक न होकर मनीषियों के शताब्दियों लंबे चिंतन की परिणति थी. प्राचीन भारत में सहकार की स्थिति को बल मिला था, उन जनतांत्रिक संस्थाओं के कारण जिनकी उपस्थिति ग्रामीण भारत में प्राचीनकाल से ही रही है. हम इस पर गर्व कर सकते हैं कि सामंतवाद के कठिन दौर में भी हमारे गांव आंतरिक लोकतंत्र का श्रेष्ठतम उदाहरण बने रहे. गांव की आंतरिक व्यवस्था को बनाए रखने, आपसी झगड़ों को सुलझाने, आर्थिक एवं सामाजिक नीतियां तय करने जैसे कार्य गांव पंचायतों तथा जनतांत्रिक ढंग से चुनी गई ऐसी ही अन्य व्यवस्थाओं पर निर्भर रहा है. ईसा से भी लगभग दो शताब्दी पहले तक भारत में ऐसी संस्थाओं यथा ग्रामसभा, ग्राम परिषद, ग्राम पंचायत, क्षेत्रीय पंचायत आदि स्थानीय निकायों की सार्थक एवं सक्रिय उपस्थिति थी, जो आंतरिक झगड़ों का निपटान करने, करों की वसूली तथा स्थानीय प्रशासन का दायित्व संभालती थीं.

ईसा से छह शताब्दी पूर्व परंपरागत ब्राह्मण धर्म अपनी ही कमजोरियों के कारण अपनी प्रासंगिकता खोने लगा था. बलि, बोझिल कर्मकांड एवं यज्ञों का अतिरेक उसकी प्रतिष्ठा और छवि को कलंकित करने में सहायक बने थे. उसके स्थान पर बौद्धधर्म तेजी से अपना स्थान बनाता जा रहा था, जो राजनीतिक रूप से राजामहाराजाओं का संरक्षण पाने के बावजूद धर्म के मामले में केंद्रीय सत्ता का विरोधी था. श्रेणियां चूंकि सत्ता एवं संसाधनों के विकेंद्रीकरण में सहायक थीं, संभवतः इसीलिए गौतम बुद्ध ने श्रेणियों के विकास पर जोर दिया था. बौद्धधर्म की संरचना एवं उसका प्रसार भी श्रेणियों के विकास में सहायक बना था. इस संबंध में विक्रमादित्य खन्ना के विचार दृष्टव्य हैं, जो उन्होंने किरन कुमार थपल्याल के हवाले से व्यक्त किए हैं—

बौद्ध धर्म एवं जैनधर्म, जिनका प्रादुर्भाव ईसापूर्व छठी शताब्दी में हुआ था, अपने पूर्ववत्ती ब्राह्मण धर्म की अपेक्षा अध्कि उदार एवं समतावादी थे. जिससे श्रेणियों को अपने विकास के लिए अपेक्षाकृत बेहतर एवं अनुकूल अवसर प्राप्त हों. ब्राह्मण धर्म के प्रभाव के चलते यज्ञों में बलि देने की घटनाएं तेजी से बढ़ी थीं, परिणामस्वरूप समाज की बहुत बड़ी पूंजी व्यर्थ चली जाती थी. बौद्ध तथा जैन धर्म यज्ञों नहीं करते थे. दोनों ही धर्मों में अपने से निचले वर्ग के साथ भोजन न करने की ब्राह्मणवादी शुचिताओं, निषेधों के लिए कोई स्थान नहीं था. व्यापार के सिलसिले में लंबी यात्राएं करना उनके लिए वर्जित नहीं था.’14

चंद्रगुप्त मौर्य यद्यपि हिंदू सम्राट था, लेकिन अशोक ने स्वयं को बौद्ध घोषित कर ब्राह्मणधर्म द्वारा पोषित कर्मकांडों पर अंकुश लगाने का कार्य किया था. यज्ञों में पशुबलि पर रोक लगाकर उसने स्वयं को न केवल अधिक मानवतावादी सम्राट सिद्ध किया था, बल्कि उस बहुमूल्य पशुशक्ति का भी संरक्षक घोषित किया था, जो उस समय भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मूलाधार थी. जातीय निषेधों के कमजोर पड़ने से समाज में आपसी संवाद एवं सहयोग की परंपरा को बल मिला, जिसके फलस्वरूप स्थानीय संस्थाएं और अधिक मजबूत बनकर उभरने लगीं. मौर्यकाल(322 .पू.) में गांवों में पंचायत की मौजूदगी थी, जिसका गठन गांव के पांच चुने हुए व्यक्तियों से किया जाता था. वह गांव की सुरक्षा तथा स्थानीय प्रशासन संबंधी अन्य मामलों की देखरेख करती थी. उसके सारे पद स्वैच्छिक होते थे. लोग समाजसेवा की भावना के साथ उन जिम्मेदारियों का वहन करते थे. गुप्तकाल(320 . से 600ई तक) के दौरान भी स्थानीय प्रशासन व्यवस्था मजबूत थी. उन दिनों भी ग्राम प्रमुख को ग्रामिका कहा जाता था. दस गांवों पर नियंत्रण तथा उनके आपसी व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए दस ग्रामिका अथवा महत्तर सभा होती थी.

ईसा से छह सौ वर्ष पश्चात देश में पालवंश का शासन था, उन दिनों गांव का मुखिया पाटक कहलाता था. गांव पंचायत के सदस्य गांव के वरिष्ठजन होते थे. उन्हीं के बीच से एक वरिष्ठ एवं योग्य सदस्य को ग्रामपति अथवा मुखिया चुन लिया जाता था. उससे ऊपर दस गांवों की एक सभा होती थी, जिसको महत्तर सभा अथवा दस ग्रामिका के नाम से पुकारा जाता था. उसका मुखिया दसग्रामिका कहलाता था. स्थानीय प्रशासन की यह व्यवस्था ईसा पूर्व दो हजार वर्ष से भी पुरानी है. इसके संकेत वैदिक ग्रंथों से लेकर कौटिल्य के अर्थशास्त्र तथा गुप्तकाल के साहित्य में मिलते हैं. विकेंद्रीकृत शासनव्यवस्था शिल्पकलाओं के विकास में सहायक सिद्ध हुई थी.

ईसा से पांचवी शताब्दी पूर्व के ग्रंथ गौतम धर्मसूत्र में इस बात के स्पष्ट उल्लेख है कि उस समय—

किसानों, व्यापारियों, पशुचारकों, साहूकारों तथा शिल्पकर्मियों के भी संगठन थे तथा उन्हें यह अधिकार प्राप्त था कि अपने वर्ग के कल्याण के लिए जरूरी नियम बना सकें. यहां तक कि सम्राट भी आवश्यक मसलों को लेकर संबंधित वर्ग के प्रतिनिधि से परामर्श करता था.’15

जातक कथाओं में अठारह प्रकार की श्रेणियों तथा श्रेणिप्रमुखों का उल्लेख आता है. वे बारबार विभिन्न व्यवसायों की वंशानुगतता की ओर भी संकेत करती हैं, जिसके अनुसार पुत्र अपने पिता के व्यवसाय को अपना लेता था. यहां तक कि व्यक्ति के परिवार, कुल आदि की पहचान भी उसकी श्रेणि या व्यवसाय से होती थी और लोग उनका उपयोग अपने नाम के साथ सम्मानसूचक शब्दों की भांति करते थे. वंशानुगतता भारतीय श्रेणियों का विशिष्ट गुण था. यही परंपरा भारतीय श्रेणियों को पश्चिम के उद्यमी संगठनों से अलग सिद्ध करती है. एक स्वाभाविक प्रश्न यहां जन्म लेता है कि देश में लगभग ढाई हजार वर्ष पहले ही कामयाब जनतंत्र लोकतांत्रिक शासन प्रणाली होने के बावजूद वे कौनसे कारण थे कि भारतीय समाज भटकाव का शिकार हुआ. अपने भटकाव के दौरान समाज न केवल अपनी स्थिति से गिरा, बल्कि उसको इसके लिए आर्थिक हानि भी उठानी पड़ी. कारण कई हैं और उनमें से अधिकांश उसी परांपरा एवं संस्कृति की देन हैं, जिन्हें वैदिक परंपरा सांस्कृतिक समृद्धि के प्रतीक मानती आई है. यानी समाज का चातुवर्ण्य विभाजन जो कालांतर में अनगिनत जातियों और वर्गों में बदल चुका है.

वस्तुतः ज्ञान के प्रत्येक सूत्र को वेदों में तलाशने की प्रवृत्ति ने भी समाज का नुकसान ही किया. क्योंकि निहित स्वार्थों के कारण समाज का एक वर्ग नए ज्ञान के प्रति उत्सुक्ता और उसके लिए बदलाव की हर स्वाभाविक प्रवृत्ति का निषेध, यह कहकर करता रहा कि उसमें नया कुछ भी नहीं है, वह तो हमारे शास्त्रों में पहले से ही उपलब्ध है. यह मनुष्य की विवेकशीलता की अवमानना जैसा,प्रतीक था, भारत की उस गुलाम मानसिकता का जो वर्तमान से उबरने की छटपटाहट में बारबार अतीत की ओर पलायन कर रही थी. अतएव सहकार की भावना का जो उभार प्राचीन भारत में देखने को मिलता है, मध्यकाल में आकर वह सहसा अवरुद्ध हो जाता है. परंतु वह ठहरता नहीं है, अवमंदन की स्थिति में भी वह सतत आगे बढ़ता जाता है. भारत में वैदिककाल से ही साहचर्य आधारित उद्यमों को सामाजिक संबंधों के विकास एवं उनके स्थायित्व के लिए, एक अनिवार्य उपक्रम के रूप में स्वीकारा गया. प्रायः सभी सम्राटों ने साहचर्य आधारित समूहों की उपयोगिता को स्वीकारते हुए उन्हें अपने राज्य में सम्मानजनक स्थान दिया, तथापि उनकी भिन्न राजनीतिकसामाजिक विचारधारा का प्रभाव श्रेणियों के विकास पर भी निरंतर पड़ा. जैसे मौर्यशासन के अंतर्गत जब केंद्रीय सत्ता अपेक्षाकृत मजबूत थी, उन दिनों श्रेणियों को अपने विकास के लिए उतने अनुकूल अवसर नहीं मिल पाए थे, जितने कि आगे चलकर गुप्तकाल के दौरान उन्हें मिले, जो अपेक्षाकृत विकेंद्रीकृत शासनव्यवस्था थी.

कालांतर में जैसेजैसे समाज का विकास हुआ, मनुष्य की जरूरतें बढ़ीं, नई खोजों ने मानवीय सभ्यता के नए पथों को प्रशस्त किया, तब सहकारिता भी अलगअलग रूपों में पनपती चली गई. उसका स्वरूप और अधिक जटिल तथा विस्तृत होता चला गया, जो बदली हुई परिस्थतियों में स्वाभाविक ही था. बदलते वक्त के साथ सहकारी संस्थाओं के व्यवसाय में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई तथा वे उत्तरोत्तर बहुउद्देश्यीय संगठन के रूप में ढलती चली गईं. लेकिन प्राचीन भारत में, विशेषकर ईसा पूर्व पांचवीं शताब्दी से लेकर ईसा पश्चात छठी शताब्दी तक सहकारी संबंधों का जितना विकास हुआ, उतना आगे के वर्षों में न हो सका. वस्तुतः उसके बाद के वर्षों में भारत आंतरिक रूप से निरंतर कमजोर पड़ने लगा था. विदेशी आक्रमणों के कारण यहां का सामाजिक ढांचा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका था. प्रारंभिक भारतीय समाज में जो खुलापन तथा नए ज्ञान को आत्मसात करने की ललक थी, बाद के वर्षों में उसका स्थान रूढ़ियों एवं जड़ परंपराओं ने ले लिया था. गुलाम मानसिकताओं की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि हताशा के क्षणों में वे अक्सर अतीतोन्मुखी बनकर जीने लगती हैं, परिणामस्वरूप विकास उनके लिए छलावा बन जाता है.

जो भी हो, सहकारिता जिस स्वतन्त्रय चेतना की अपेक्षा रखती है, बदलती परिस्थितियों एवं राजनीतिक अस्थिरता के चलते, आगे के वर्षों में वह लगातार शिथिल पड़ती गई. इसके बावजूद अनौपचारिक रूप में सहकारिता का प्रभाव हमेशा बना रहा. विशेषकर खेतिहर ग्रामीण समाज मेंफसल की कटाईबुवाई, शादीविवाह, सुखदुःख के बीच सहयोग की उपस्थिति प्रत्येक वर्गजाति में सदैव और हरेक स्तर पर बनी रही. सामंतवाद ने स्वयं को स्थायित्व बनाने के लिए इस देश की जाति आधारित परंपराओं का सहारा लिया. परिणाम यह हुआ कि जैसेजैसे सामंतवाद का प्रभाव समाज पर बढ़ा, सहकार आधारित संगठनों की चमक फीकी पड़ती चली गई.

कहने को तो वर्णव्यवस्था की संकल्पना भी समाज में, मनुष्य की कार्यक्षमता के अधिकतम उपयोग और उसकी सामुदायिक एकता को बनाए रखने की कामना की देन थी. उसमें उत्पादन और वितरण से लेकर वैचारिक दायित्वों के निर्वहन की पूरीपूरी व्यवस्था थी. लेकिन कालांतर में धीरेधीरे वर्णव्यवस्था में उच्च स्तर पर मौजूद लोग अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर शेष समाज पर हावी होते चले गए. आगे चलकर वर्ण व्यवस्था ने ‘जाति व्यवस्था’ जैसी विकृति का रूप धारण कर लिया, जिसमें मौलिक प्रतिभाओं को या तो दरकिनार किया जाने लगा अथवा उन्हें इतना उपेक्षित किया गया कि वे कुंठा की शिकार होने लगीं. ऐसे में स्वाभाविक ही था कि दोयम दर्जे की प्रतिभाएं प्रायः हर क्षेत्र पर हावी होती चली जाएं; और यही हुआ भी. ध्यातव्य है कि प्राचीन भारत में सहकारिता अपने वर्तमान स्वरूप से कतई भिन्न थी. इसका कारण यह है कि तत्कालीन समाज में व्यक्ति चेतना सामाजिक चेतना की अपेक्षा कमजोर रहती थी. दूसरे शब्दों में उस समय तक व्यक्तिवाद उतना प्रभावकारी नहीं हुआ था जितना कि वह इन दिनों है. कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो वह साम्राज्यवाद के अधिपत्य का युग था. अतएव ग्रामीण समाज, यहाँ तक कि ग्राम पंचायतों का स्वरूप भी उसी का विस्तार था और उनमें सीमित जनतांत्रिकता थी. साफ शब्दों में कहें तो वह एक प्रकार का कुलीनतंत्र था, जिसमें समाज के खास वर्गों के लोग ही हिस्सा ले सकते थे.

निःसंदेह, सहकारिता का वर्तमान स्वरूप उनीसवीं शताब्दी की ही देन है—जब दुनियाभर में व्यक्तिस्वातन्त्रय एवं लोकतांत्रिक विचारों का प्रभाव बढ़ा. इसके बावजूद भारतीय समाज के उन प्राचीन सहकारी संगठनों को भूल पाना आसान नहीं है, क्योंकि सीमित जनतांत्रिकता के बावजूद उनमें जो खुलापन एवं पारदर्शिता थी, वह आज के लोकतांत्रिक समाजों में भी दुर्लभ है. शायद यही कारण है कि राजशाही और सामंतवाद के कठिनतम दौर में भी उन्होंने अपनी उपयोगिता बनाए रखी. इसका अभिप्राय यह नहीं है कि मध्यकाल में सहकारिता आंदोलन बिल्कुल बेअसर था. लेकिन यह भी सच है कि उसमें इस बीच कोई बहुत सैद्धांतिक विकास नजर नहीं आता. मध्यकाल में आर्थिक सुधार के कार्यक्रम तो चलाए गएव्यापारी संगठन भी अवसरानुकूल अपना कार्य करते रहे….परंतु बाह्यः दबावों तथा राजनीतिक उथलपुथल के कारण व्यापारिक समूहों की आजादी या तो छीन ली थी अथवा उसे इतना सीमित कर दिया था कि वह लगभग बेअसर हो चुकी थी. वैसे भी मध्यकाल की उपलब्धियां कला, साहित्य और स्थापत्य के क्षेत्र में अधिक प्रभावशाली हैं. निरंतर बाहरी आक्रमणों और बिखरी राजशक्ति के कारण जनजीवन में अनिश्चितता बढ़ी, जिसने लोगों को भाग्यवादी बनाने का काम किया. दर्शन को कर्मकांड का जामा पहनाकर उसे धर्म में ढालने की कोशिश तो वैदिककाल में ही प्रारंभ हो चुकी थी. उसी को मान्यता दिलाने के लिए यजुर्वेद की रचना की गई थी. आगे चलकर दर्शन को छिछले कर्मकांड में ढालने की षड्यंत्रकारी प्रवृत्ति का जोरदार विरोध उपनिषदों के रूप में देखने को मिला, जिसने कुछ वर्षों के लिए वैदिक समाज की ज्ञान एवं चिंतनआधारित परंपरा को पुनर्जीवित करने का काम किया.

इस बीच एक वर्ग निहित स्वार्थों के लिए समाज को बौद्धिक एवं गैरबौद्धिक वर्गों विभाजित करने में सफल रहा था. वह यह समझाने में भी सफल हुआ था कि समाज में एक गैरबौद्धिक यानी जनसामान्य वर्ग भी है, जो कठिन परिश्रम द्वारा जीवनयापन करने के लिए अभिशप्त है, जिसका कार्य समाज के शीर्षस्थ वर्ग की सेवा करना था—जिसका मनुष्यता की ज्ञानआधारित परंपरा से कोई लेनादेना नहीं है. वह वर्ग मात्र कर्मकांड के जरिए ही मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है. कहने की आवश्यकता नहीं कि बौद्धिकता पर दावा करने वाला वर्ग, दूसरों के श्रम पर मौज उड़ाने वाले धूर्त परिजीवियों का था. यह वर्ग शारीरिक श्रम से दूर रहता था, बावजूद इसके समाज के अधिकांश संसाधनों पर इसी का कब्जा था.

परिवार या जन्म के आधार पर समाज का विभाजन पूर्णतः अस्वाभाविक तथा मनुष्यता के सिद्धांतों के विपरीत था, जिसने समाज के बड़े वर्ग के मानस में कुंठा परोसने का कार्य किया. बाद में धर्म और राजनीति के गठजोड़ ने इसके ऊपर उठने वाले समस्त प्रश्नों को नेपथ्य में ढकेल दिया. ज्ञान की परंपरा से कटने का परिणाम यह हुआ की जनसाधारण का नैसर्गिक पराक्रम और आत्मविश्वास शिथिल होते चले गए. उनके स्थान पर कुंठा और हताशा का प्रसार बढ़ने लगी. अतएव वैसी चेतना जो सहकार संवर्धन के लिए प्रेरक शक्ति बनकर, सामाजिकता को गतिमान बनाती है, उसका समाज से लोप होता चला गया. तो भी समयसमय पर, अलगअलग क्षेत्रों में राजाओं ने कुछ ऐसे फैसले अवश्य लिए जिनसे जनसाधारण को लाभ पहुंचा; और जो सहकार की मूल भावना के अनुकूल भी थे. यह बात अलग है कि पर्याप्त जनचेतना के अभाव में उनका लाभ समाज के शीर्षस्थ वर्गों तक ही सिमटकर रह गया.

उस समय के आर्थिक सुधारकों में अलाउद्दीन खिलजी का नाम बहुत महत्त्वपूर्ण है. भारतीय इतिहास में इस बादशाह की अपनी घोर स्त्री लोलुपता के लिए यद्यपि खूब छीछालेदार हुई है. परंतु इससे अलग उसका एक चेहरा ओर भी था, जो उसको न्यायप्रिय और दूरदर्शी बादशाह का दर्जा प्रदान करता है. अलाउद्दीन खिलजी ने आमजनता के हित में आवश्यक वस्तुओं के मूल्यनियंत्रण की प्रणाली शुरू की. मुनाफाखोरी को उसने अपराध का दर्जा देते हुए उसके लिए कठोर दंड की व्यवस्था की. फलस्वरूप उसके राज्य में मुनाफाखोरी घटी. आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए उसने आम उपयोग की वस्तुओं की राशनिंग की व्यवस्था की. बेईमान दुकानदार लोगों को ठग न पाएं, इसके लिए उसने नए बाट बनाकर मापतोल प्रणाली को विश्वसनीय बनाया.

मध्यकाल का एक और बादशाह जिसका उल्लेख यहां अनुचित न होगा, का नाम था—मुहम्मद तुगलक! यद्यपि वह इतिहास में अपने तानाशाहीपूर्ण आचरण और कठोरतम आदेशों के लिए कुख्यात है. लेकिन आमजन के सुखसुविधा के लिए उसने भी कई उल्लेखनीय काम किए थे. अलाउद्दीन की भांति मुहम्मद तुगलक ने भी नई मुद्रा का चलन कर एक क्रांतिकारी शुरुआत की. उसने जमाखोरी को हराम घोषित कर उसकी रोकथाम के लिए कठोर कानून बनाए, जिनके फलस्वरूप वह जमाखोरों पर लगाम लगाने में कामयाब रहा. उसने व्यापारियों को निर्देश दिया कि वे अपने मुनाफे लिए आमजनता की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखें. प्रजा के कल्याण को ध्यान में रखते हुए उसने व्यापारियों को कम से कम मुनाफे के साथ व्यापार करने को बाध्य कर दिया था.

मध्ययुग के जिस बादशाह का उल्लेख किए बिना उस युग के आर्थिक परिवेश की सटीक व्याख्या असंभव है, वह था—शेरशाह सूरी. एक उदार, दूरदर्शी और पराक्रमी सम्राट! शेरशाह प्रजा का बहुत ही प्यारा बादशाह था. अपने राज्य के विस्तार के लिए उसने अनेक युद्ध लड़े थे. एक मामूली परिवार से निकलकर बाहशाह की गद्दी पर बैठा वह महान योद्धा आजीवन संघर्ष करता रहा. प्रजा के कल्याण को ध्यान में रखते हुए उसने कई विकास कार्यक्रम चलाए. सुखसमृद्धि के लिए उसने सड़कें बनवाईंभूमि की मापजोख कर लगान की आसान विधि की शुरुआत की. किसानों को मदद पहुंचाने के लिए भी उसने कई योजनाएं बनाई थीं. यही नहीं अंतःप्रांतीय व्यापार को प्रोत्साहित करने के लिए शेरशाह ने कारीगरों, उद्यमियों के कल्याण लिए विशेष कार्ययोजनाएं बनाईं, जिनका सकारात्मक परिणाम भी निकला.

शेरशाह के बाद जिस बादशाह ने सामाजिक कल्याण के कामों को सर्वाधिक बढ़ावा दिया, वह था—मुगल बादशाह अकबर! उसके एक दरबारी राजा टोडरमल को भूमिसुधार कार्यक्रमों को नए सिरे से लागू करने का श्रेय जाता है. टोडरमल ने भूमि की नए सिरे से मापजोख कर लगान की नई दरें लागू कीं. छोटे और मझोले कारीगरों को पुरस्कार, प्रोत्साहन आदि के जरिए आगे बढ़ाया. उस समय भी श्रेणियां या व्यापारिक संगठन देशदेशांतर तक अपना काम करते थे. हालांकि समाज के बीच उनकी अब पुरानी प्रतिष्ठा शेष नहीं थी. हालांकि लगभग पूरा भारतवर्ष उन दिनों मुगल साम्राज्य के अधीन था, किंतु अंतर्राराज्यीय संगठित व्यापार के संवर्धन के लिए शासन के पास संभवतः कोई बड़ी योजना नहीं थी. छोटेछोटे जनपदों में बंटे देश में उन दिनों नया काम नहीं हो सका.

अकबर के बाद भी भारत में यद्यपि बड़ेबड़े साम्राज्यों का उदय हुआ—मगर सामूहिकता या सहकारिता का बहुत ज्यादा विकास वहीं हो पाया. हां, उस दौर में भी श्रेणियां प्रच्छन्न रहकर अर्थव्यवस्था के सातत्य में महत्त्वपूर्ण योगदान कर अपना औचित्य सिद्ध करती रहीं. संगठित उद्यमों के विकास में आए ठहराव का एक कारण संभवतः यह हो सकता है कि उन दिनों समाज में सामंती मूल्यों का बोलबाला था. उद्योगधंधे ठप्प पड़े थे….बारबार पड़नेवालों अकालों ने जनमानस को हताश बना दिया था. प्रजा में जागरूकता का अभाव था. जाति और धर्म जैसे नकारात्मक मूल्यों ने समाज को बुरी तरह बाँटा हुआ था.

बौद्धिकता की दृष्टि से वह युग क्रांतिकारी भले ही न हो, लेकिन साहित्य, खगोलविज्ञान, आयुर्वेद, वास्तुकला जैसे अनेक ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें उस युग की उपलब्धियां चैंका देने वाली हैं. यह बात अलग है कि उस युग के अधिकांश विद्वानों का चिंतन शासनोन्मुखी था. समूचा साहित्य, कलाएँ, वास्तुनिर्माण, भूसंपदा आदि बादशाह को प्रसन्न करने का माध्यम थे. उनका उपयोग राजा की मर्जी से और उसके सुख के लिए ही संभव था. राजशाही और सामंतवादी चिंतन का प्रभाव उस समय के साहित्य और इतिहास पर भी पड़ा. हालांकि कुछ विद्वान उस युग में बादशाह को उसके कर्तव्य की याद दिलाते रहते थे. ग्यारहवीं शताब्दी में जन्मे प्रसिद्ध अर्थशास्त्री सोमदेव सूरि, प्रजा की खुशहाली को राजा के सुखसमृद्धि से जोड़कर देखते हैं—

जहाँ राजा ही निर्धन होगा, वहाँ प्रजा कैसे धनी हो सकती हैजहाँ समुद्र ही प्यासा होगा वहाँ संसार में जल कैसे पाया जा सकता है.16

सोमदेव सूरि ने पशुओं के साथ मित्रवत व्यवहार करने, व्यापारियों और उद्योगसमूहों की रक्षा करने पर जोर दिया है. किंतु ये बदलाव वे राज्य के संरक्षण में ही चाहते थे. यह उनके चिंतन की सीमा थी. स्वतंत्र कार्यकारी समूह, जिनका नियंत्रण जनतांत्रिक परंपराओं और भावनाओं के अनुरूप हो, जो केवल अपने समूह के हितों को ध्यान में रखकर नीतियां बनाने, काम करने के लिए बाध्य हों, जिसमें पूरे समूह की सहभागिता हो, का उस युग में कोई अस्तित्व था ही नहीं.

इस युग में कबीर, सूर, तुलसी, नानक और रविदास जैसे कवि भी हुए—भक्त कवियों की सुदीर्घ परंपरा चली, मगर उन सभी ने इस संसार को माया और अस्सार बताते हुए, एक स्वर से धन के परित्याग की भावना पर ही जोर दिया. हताश और मानसिक रूप से हार माने बैठा जनमानस, अपनी स्थिति में सुधार के लिए किसी चमत्कार की उम्मीद लगाए बैठा था. अपरिग्रह, अस्तेय और अहिंसा को उस युग के दर्शनों में केंद्रीय विचार की मान्यता मिलती रही. इस सब से हिंदू समाज का कितना हित हुआ और कितना अहित, यह हमेशा ही बहस का मुद्दा रहा है. एक तरह से यह गरीबी, धर्मांधता और रूढ़ियों में जकड़ी हताश जनता को झूठी तसल्ली देने की ही कोशिश थी.

आइने अकबरी’ नामक ग्रंथ में भी अकबर के दरबारी और मंत्री अबुल फजल, कृषि, व्यापार, भूमि आदि की व्यवस्था के उपाय तो सुझाते हैं, मगर स्वचेतित कार्यशील समूहों को बढ़ावा देने की युक्ति या परंपरा से सीख लेने की ललक का उनमें अभाव था. वस्तुतः अकबर के दरबार के नवरत्नों में से अधिकांश वे हताश योद्धा, बुद्धिजीवी आदि थे, जिन्हें सम्राट ने स्वयं को बहुसंख्यक हिंदू समाज का प्रतिनिधि सिद्ध करने के लिए चुना था. उन दिनों पूरा समाज शासक और शासित, नामक दो वर्गों में बंटा हुआ था, जिनके बीच आपसी सामाजिक व्यवहार लगभग शून्य था. जीवन का धर्म में अनावश्यक हस्तक्षेप था और धार्मिक शक्तियां ऐसे किसी भी वाद या विचार को आगे लाने से बचती थीं, जो परंपरा और पुरातन के संदर्भ में सवाल उठाता हो. आपसी संवाद के अभाव में समाज में बौद्धिक ठहराव की स्थिति बनी हुई थी.

एक तरह से वह सामाजिक विकास के ठहराव का भी युग था….उस युग में यद्यपि देश को बाहरी आक्रमणों का सामना भी करना पड़ा. उपनिषदों, आरण्यकों की मौलिकता, स्मृतियों के कर्मकांड और पुराणों की गल्पकथाओं में सिमटकर रह गई. बौद्ध धर्म की तार्किकता का स्थान तांत्रिकों तथा आश्रमों में पलने वाले व्यभिचारों ने ले लिया. पुराण आदि ग्रंथ वर्गविशेष द्वारा अपने वर्गीय हितों के समर्थन एवं सुरक्षा हेतु लिखे जा रहे थे, अतएव इनके माध्यम से ऐसी शास्त्रीय व्यवस्थाएँ परोसी जा रहीं थीं जिनसे समाज का बड़ा हिस्सा, चिंतन और कर्म के लिए दूसरों पर निर्भर होकर रह जाए. और उसका असर भी हो रहा था. यही कारण है कि इस आठनौ सौ वर्ष के अंतराल में एक भी ऐसा मौलिक विचारक, अन्वेषक भारत में नहीं जन्मा, जो अपने चिंतन या कर्म द्वारा वैश्विक ख्याति अर्जित कर सके. अनेक राज्यों, भौगोलिक सीमाओं में बंटा भारतीय समाज, कभी बाहरी आक्रामकों के इशारे पर, कभी अपने ही स्वार्थी सम्राट के कहने पर आपस में लड़ताझगड़ता रहा. सत्ता और ताकत के लिए यहां दुश्मनों से मिलकर अपनों को तबाह कर देने की नीति सैकड़ों वर्ष तक चली. परिणाम सैकड़ों वर्षों लंबी गुलामी. धर्मभीरूता और कुंठित समाज.

वाराहमिहिर या आर्यभट्ट का योगदान महत्त्वपूर्ण हो सकता है, और है भी. लेकिन एक तो उनकी कोटि के विद्वानों की संख्या उंगलियों पर गिने जाने योग्य है, दूसरे ज्ञान की परंपरा को बिना किसी पूर्वाग्रह, जातिभेद के आगे बढ़ाने का जो साहस और आत्मविश्वास चाहिए, भारतीय बुद्धिजीवियों में उसका सरासर अभाव था. इसीलिए वहां वाराहमिहिर, आर्यभट्ट अथवा उनके उत्तराधिकारियों में से एक भी न्यूटन, का॓परनिकस, गैलीलियो जितना योगदान अपने समाज को दे पाने में असमर्थ रहा. वैसे भी इतने बड़े समयांतराल में दोतीन मेधाओं की मौजदूगी अपवाद ही कही जाएगी—आश्वस्तिकारक नहीं. समाज के जातीय आधार पर विभाजन के ही कारण यहां पर मनुष्यता की रक्षा के लिए वैसे वौद्धिक आंदोलन जन्म नहीं ले पाए, जो यूरोप के देशों में जन्में और प्रकारांतर में पूरी दुनिया में फैले.

भारत में मुगल शासन के दौरान भी स्थानीय प्रशासन काफी मजबूत स्थिति था. उन्होंने बिना किसी छेड़छाड़ के परंपरा से चली आ रही स्थानीय प्रशासन की व्यवस्थाओं की स्वायत्तता को बनाए रखा. उन दिनों दस्तकारी, शिल्पकला, स्थापत्य, आभूषण आदि उद्योगों में पर्याप्त संभावनाएं जागी हुई थीं. उन दिनों भी किसी संस्था में यह सभी पद पूर्णतः बने हुए थे. जहांगीर के पश्चात मुगल साम्राज्य कमजोर पड़ने लगा था, जिससे स्थानीय जमींदार, राजेरजबाड़े सिर उठाने लगे थे. राजनीतिक अराजकता के उस माहौल में ईस्ट इंडिया कंपनी को अपना राज कायम करने का अवसर मिला. कहने की आवश्यकता नहीं कि कंपनी के मददगारों में यहीं के राजेरजबाड़े थे, जो किसी न किसी कारण असंतुष्ट रहते थे. यही कारण था कि प्लासी की लड़ाई में मुट्ठीभर अंग्रेज सेना अपने से दस गुना बड़ी सुराजुद्दौला की सेना पर भारी पड़ी. उसके बाद से अठारह सौ सतावन तक देश का इतिहास आपसी लड़ाई और व्यापार एकतरफा शोषण एवं संसाधनों की लूट का रहा. परंतु सन अठारह सौ सतावन के सैनिक एवं उससे पहले के किसान विद्रोहों ने अंग्रजों को जता दिया था कि वे अपने तानाशाही पूर्ण रवैये के साथ इस देश पर अधिक दिन तक राज नहीं कर पाएंगे. निश्चित रूप से फ्रांस समेत पूरे यूरोप में चल रहे नवजागरण के आंदोलनों का भी प्रभाव था कि अंग्रेज शासक इस देश के आधारभूत ढांचे में सुधार के लिए तैयार हुए.

अठारह सौ पिचासी के पश्चात ब्रितानी सरकार ने स्थानीय प्रशासन का पुनर्गठन किया, लेकिन उसने प्रशासन के लोकतांत्रिक स्वरूप को बनाए रखा. उसने प्रशासन की तीन स्तरीय व्यवस्था कायम की, जिसमें स्थानीय बोर्ड, जिला स्तरीय बोर्ड तथा एक केंद्रीय बोर्ड सम्मिलित थे. तीनों ही स्तर पर नियुक्तियां शिक्षित व्यक्तियों के बीच से वयस्क मताधिकार द्वारा की जाती थीं. सभी पद स्वैच्छिक थे. अगले पृष्ठ पर दी गई तालिका में इन व्यवस्थाओं पर एक विहंगम दृष्टि डाली गई है.

कहने का आशय यह है कि भारत में आदिकाल से ही स्थानीय लोकतंत्र मजबूत रहा है. हालांकि सामंतवाद का एक दौर ऐसा भी आया जब स्थानीय व्यवस्थाएं जाति और धर्म के आधार पर बंटती चली गईं. बावजूद इसके देश में ऐसा समय कभी नहीं आया जबकि संगठन की अनिवार्यता को नकारा गया हो. चाहे वह जातीय पंचायतों के रूप में हो अथवा व्यापारिक श्रेणियों के रूप में, भारतीय समाज में सांगठनिकता ने सदैव अपनी उपस्थिति बनाए रखी. स्थानीय जनतंत्र की मिसाल के रूप में जहां प्रत्येक जाति की अपनी अलग पंचायत होती थी, वहीं शिल्पकारों, श्रेष्ठियों के अपने व्यावसायिक संगठन थे. प्राचीन समाज में श्रेणियों की महत्ता मात्र इसी से परखी जा सकती है कि उस समय में कतिपय चोरों की भी अपनी श्रेणियां थीं. हां तक कि धार्मिक मामलों की देखरेख का कार्य भी श्रेणियों के जिम्मेदारी थी. महस्थानगढ़ और मैनामती में बने बौद्ध स्तूपों इस बात का प्रमाण हैं कि उन दिनों धार्मिक संस्थाएं भी सामूहिक कल्याण के कार्यक्रमों यथा शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति के प्रचारप्रसार के कार्यों में समानरूप से रुचि लेती थीं.

प्राचीन भारत में सहकारिता के समानधर्मा संस्थानों/संगठनों की स्थिति17

अवधि

संथान

संगठन

सेवा की प्रकृति

से

तक

322 ईस्वी पूर्व

ग्रामीण परिषद

प्रतिष्ठित परिवारों के सदस्य

स्वैच्छिक

322 ईस्वी पूर्व

320 ईस्वी

पंचायत

समाज के वरिष्ठ लोग

स्वैच्छिक

321 ईस्वी

600 ईस्वी

ग्रामिका

ग्राम प्रमुख या मुखिया

स्वैच्छिक

601 ईस्वी

900 ईस्वी

दस ग्रामिका या पातक

दस गांवों का मुखिया

स्वैच्छिक

901 ईस्वी

1200 ईस्वी

ग्रामपति

ग्रामप्रमुख या मुखिया

स्वैच्छिक

1201 ईस्वी

1300 ईस्वी

पंचायत

प्रतिष्ठित वरिष्ठजन

स्वैच्छिक

1301 ईस्वी

1526 ईस्वी

पंचायत

प्रतिष्ठा, आयु एवं अनुभव के आधार पर निर्वाचित व्यक्ति

स्वैच्छिक

1527 ईस्वी

1757 ईस्वी

परगना

निर्वाचित अधिकारी

स्वैच्छिक

1758 ईस्वी

1885 ईस्वी

जमींदारी

शाही नुमाइंदा

कमीशन आधार पर

श्रेणियां, भारत में जिनका इतिहास लगभग चार हजार वर्ष पुराना है, न केवल इस देश बल्कि दुनिया के अनेक देशों में कतिपय संगठनात्मक अंतर के बावजूद समानरूप से प्रचलित थीं. पुराने मिश्र में उन्हें ‘कोयनन’(Koinon)कहा जाता था, जो रोम के ‘कालेजिया’(Collegia)से प्रेरित था. चीन में ईसापूर्व तीसरी शताब्दी, हान साम्राज्य से गिल्ड की उपस्थिति के संकेत मिलते हैं. वहां उन्हें ‘हंगुई’ (Hanghui)कहा जाता था. इटली में मध्यकाल में व्यापारियों के संगठन बहुत मजबूत माने जाते थे. वहां उन्हें अर्स(ars)की संज्ञा दी गई थी. जर्मनी में ‘जुंफ’(Zunft)फ्रांस में मेटायर(Métier)ईरान में सेंफ अथवा सिंफ(senf, sinf)तथा इंग्लैंड क्राफ्ट, गिल्ड, अरब तथा तुर्की आदि देशों में उन्हें फुतुवा (futuwwah or fütüvvet)आदि नामों से पुकारा जाता था. उनके संगठनात्मक स्तर पर थोड़ी भिन्नता थी, परंतु सामूहिक कल्याण की उनकी भावना उन्हें एक जैसा स्तर प्रदान करती थी.

आधुनिक सहकारिता आंदोलन का भारत में आगमन उन्नीसवीं शताब्दी में हुआ. निश्चित रूप से इसके पीछे पश्चिम की प्रेरणाएं थीं. इसका श्रेय नवजागरण और उन सुधारवादी आंदोलनों को भी जाता है, जिन्होंने सोए हुए जनमानस का परिचय अपने गौरवमय अतीत से कराया जिससे जनता का अस्मिताबोध प्रखर हुआ. इनमें राजा राममोहन राय, बंगाली अर्थशास्त्री शशिपद बनर्जी, गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर, आचार्य विनोबा भावे, महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, गोविंद रानाडे, विवेकानंद आदि प्रमुख थे. आधुनिक मनीषियों में पी.जी. कुरियन जैसे सहकारिता पुरुष सम्मिलित हैं, जिन्होंने भारतीय आंदोलन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में मदद की है.

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भानुक्रमणिका

1. Chanakya appeared quite suspicious of the sreni. He was generally concerned with any entity that had many members, good resources and a strong sense of group loyalty as the sreni did. He probably viewed them as potential threats to the cohesion of the recently formed empire, which was knit together with some considerable effort. However, the sreni could not simply be outlawed because they existed before the Mauryans and the support of the sreni was probably needed to increase the chances of unity in the empire. Moreover, it is likely that Chanakya was cognizant of the importance of economic prosperity to maintaining the support of the citizenry – a matter of paramount importance to the emperor and to maintaining unity. The sreni were the engines of economic growth and could not be dealt with in the same manner as a hostile regional monarch. Thus, regulating the sreni was a matter of balance for Chanakya – their support was needed, but they could not be permitted to destabilize the empire and hence needed to be watched carefully. Vikramaditya Khanna in The Economic History of the Corporate Form in Ancient India.

2. संद्यभृता संभूय समुत्थारा वा यथा

संभाषित वेतनं सम वा विभजरेन। रामशास्त्री द्वारा प्रणीत: कौटिल्य अर्थशास्त्र: नाम पुस्तक बुक नं VI, अध्याय 14, पृष्ठ संख्या-64.

3. It appears that the Mauryans and the Romans were in quite different situations. Both empires could have been concerned about alternative entities (e.g., sreni) that might attract the public’s loyalty away from the Empire, but the Romans did not, it appears, have to contend with pre-existing private commercial entities as the early Mauryan Empire did. One might speculate this would lead the Mauryans to be more concerned about keeping the support of the pre-existing private commercial entities (the sreni) while carefully watching that they do not threaten the cohesion of the Empire. The Romans did not have such entities to contend with and hence could have prevented any threat to the cohesion of their Empire by not permitting such entities to develop.- Vikramaditya Khanna.

4.  यावद् भ्रियेत जठरं तावत् स्वत्वं हि देहिनाम्।
अधिकं योऽभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति।। श्रीमद्भागवत, 7/14/8.

5. यो ग्रामदेश संघानां कृत्वा सत्येन संविदाय

विसंवदेन्नरो लोभात्त राष्ट्रा द्विप्रवासयेत। मनुस्मृति.

6. निज धर्माधिरोधेन यस्तु सामयिको भवेत सोऽपि यत्नेन संरक्ष्यो धर्मोराज कृतश्च यः।

गणद्रव्यं हरेद यस्तु संविदं लंग्येत्च यः सर्वस्वरण कृतवातं राजद्विप्रवास येत्।

कर्तव्यं वचनं सर्वे समूहितवामिनाम्—यस्तत्र विपरीत रयात् सदाप्य प्रथम दमम्।

समूह कार्य अयातनान् कृत कर्मान विसर्जयेत, सदानमान सत्कारै पूजयित्वा महीपति।

समूहकार्येप्रहितो यल्लभेत तदर्पयेत—एकादश गुणंदाम्यो मद्यसौ नार्पयते स्वयम्।

धर्मज्ञाः शुचयोऽलुब्धा भवेयु कार्यचिंतका, कर्तव्यंवचनं तेषां समूह हितवादिनाम्।

श्रेणिनैगम्पाषिंड गणानाप्ययं विधिः भैद×चैषां नृपो रक्षेत पूर्ववृतिं च पालयेत।याज्ञवलक्य: 2/186-192

7. ब्राहस्पत्य अर्थशास्त्र—लाला कन्नोमल: 3/38

8. ये न व्ययेन संसि(स्त द्रव्यपस्तस्य मूल्यकम्

सुलभा सुलभत्वाच्चा गुणत्वगुण संश्रयै

यथा कामात्पदार्थानामघं हीनाधिकं भवेतः। शुक्रनीति 2/348-349

9. संघभृता संभूय समुत्थारां वा

यधा संभाषितं वेतनं समं वा विभजरेन, –आर. शाम शास्त्री, कौटिल्य अर्थशास्त्र.

10. वणिक प्रभृतयो यग कर्म सम्भूय कुर्वते

तत्सम्भूयसमुत्थानं व्यवहार पदं स्मृतम्

फलहेतो रूपायेन कर्म संम्भूय कुर्वताम्। —नारद स्मृति.

11. अर्थवेद-8/10/1, प्राचीन भारत की शासन संस्थाएँ एवं राजनीतिक विचार : डा॓. सत्यकेतु विद्यालंकार—पृ. 277.

12. समंन्च: सव्रताभूत्वा वाचं वदत भद्रया। अर्थवेद।

13. सहजाववजु सहसौ भुजुक्तु सहवीर्य करवाव है। अर्थवेद।

14. ….that Buddhism and Jainism, which emerged in the 6th century BC, were more egalitarian than Brahmanism that preceded them and provided a better environment for the growth of guilds. Material wealth and animals were sacrificed in the Brahmanical yajnas. The Buddhists and Jains did not perform such yajnas. Thus, material wealth and animals were saved and made available for trade and commerce. Since the Buddhists and Jains disregarded the social taboos of purity/pollution in mixing and taking food with people of lower varnas, they felt less constrained in conducting long distance trade. – Dr. Vikrmaditya Khanna.

15. …cultivators, traders, herdsmen, moneylenders, and artisans have authority to lay down rules for their respective classes and the king was to consult their representatives while dealing with matters relating to them.- Gautama Dharmasutra (c. 5th century BC) as qouted by Dr. Vikrmaditya Khanna.

16. समुद्रस्य पिपासायाँ कुतो जगति जलानि।नीति वाक्यामृत-817.

17. सैम्युअल हसन की पुस्तक Voluntarism and Rural Development in Bangladesh’ The Asian Journal of Public Administration, Vol. 15, No. 01, 1992, pp. 82-108.(संशोधित) से उद्धृत.

सहकार : एक संस्कार

सामान्य

सहकारिता एक सुपरिचित और सामान्यसा पद है, जिसकी व्याप्ति इस जीवन के प्रायः सभी क्षेत्रों में है. सामान्य इस अर्थ में कि इसका अर्थ बूझने के लिए बहुत ज्यादा दिमागी कसरत की जरूरत नहीं पड़ती. न किसी खास किस्म की विशेषज्ञता की अनिवार्यता होती है. साधारण पढ़ालिखा, सामान्य बुद्धिविवेक का आदमी भी सहकारिता और उसके निहितार्थों को जानता और समझता है. इसलिए कि सहकार उसके लिए कोई नई बात नहीं है. समाज में रहना है तो दूसरों के साथ तालमेल बनाकर रहना ही पड़ेगा. अपने कंधे का भारी बोझ यदि बांटना है तो अपने कंधे भी किसी जरूरतमंद की मदद के लिए आगे करने होंगे. अपने जीवन के लिए दूसरों के जीवन के अधिकार का सम्मान करना भी आवश्यक है. तब बात घूमफिरकर सहयोग पर ही आ जाती है. हम कह सकते हैं कि सहयोग ही सहकारिता का आधारसिद्धांत है. इसी के कारण सहकार की व्याप्ति लोकस्तर पर सदैव रही है. सभ्यता के प्रारंभ से लेकर आज तक. आदिम मनुष्य सहयोग को भले ही उन अर्थों में पारिभाषित नहीं कर पाता हो, जिन अर्थों में हम आज इसे जानते हैं, मगर प्राकृतिक आपदाओं तथा जंगली जानवरों से सुरक्षा का भाव उसे अनायास ही दूसरों के निकट ले जाता था, वही संगठन की प्रेरणा बनता था, उसी से सहअस्तित्व की भावना पनपी. मनुष्य को समूह के रूप में, साथसाथ रहने की प्रेरणा मिली. सामाजिक संबंधों का विकास हुआ. सभ्यता जन्मी, संस्कारों का उद्गम हुआ, संस्कृति को नए आयाम मिले.

लोकजीवन में सहकार और सहयोग में प्रायः कोई अंतर नहीं किया जाता. इन्हें अक्सर एकदूसरे का पर्याय मान लिया जाता है. लोकमेधा की यह विशेषता भी है कि वह सामान्यीकरण द्वारा निष्कर्ष तक पहुंचती है. इसलिए उसके निष्कर्ष लंबे समय तक मान्य भी होते हैं. समाज और जीवन में सहयोग की अपरिहार्य मौजूदगी के कारण ही मानव सभ्यताओं और संस्कृतियों का विकास हुआ है. विश्वग्राम की संकल्पना के मूल में भी सहयोग और सहकार का ही योगदान है. यही मानवीकरण का कारक तत्व, मनुष्यता की अनिवार्य विशेषता है.

अपने रोजमर्रा के जीवन में मनुष्य को अनेक स्तर पर, जानेअनजाने अनेक व्यक्तियों के साथ सहकारभावना के साथ पेश आना पड़ता है अथवा दूसरे उनके साथ सहकारभावना से सहयोग करते हैं. इस तरह सहकारिता समान कल्याणकारी उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए समूहबद्ध और संकल्पनिष्ठ होकर काम करने का नाम है. चूंकि कर्तव्य के प्रति वास्तविक निष्ठा बाह्यारोपित नहीं हो सकती. उसके लिए आंतरिक प्रेरणा और स्वयंस्फूर्ति आवश्यक हैं—अतएव सहकार के लिए स्वैच्छिक समर्पण और समूहबद्धता अनिवार्य शर्त हैं. यही वह कसौटी हैं जिनके आधार पर सहकारभावना की गहराई की समीक्षा संभव है, उसके प्रति समर्पणभाव को परखा जा सकता है और किसी समूह की सफलता एवं दीर्घजीविता का अनुमान लगा पाना मुमकिन होता है. यहां समूहबद्धता का आशय उपलब्ध संसाधनों का संतुलित एवं न्यायिक तालमेल है, जबकि समर्पण से हमारा मंतव्य, समूह की प्रत्येक इकाई द्वारा अपने संपूर्ण संसाधनों तथा मनोयोग के साथ शेष समूह के साथ सहभागिता, दायित्वों के न्यायिक संवितरण के साथसाथ, अपने हितों एवं महत्त्वाकांक्षाओं के सामान्यीकरण से है.

जाहिर है कि सहकार के दौरान व्यक्ति अपने हितों को सामूहिक हितों के साथ जोड़ने लगता है. सबके कल्याण में ही उसको अपने कल्याण की प्रतीति होने लगती है. तभी वह सामान्य हितों की प्राप्ति के लिए अपनी ओर से यथासंभव सहयोग प्रदान करता है. सहकारी समूह में व्यक्ति का अपने समूह के प्रति सहयोग, उसके हितों का सामूहिक हितों के साथ संविलयन पूरी एकात्मकता एवं निहित संभावनाओं के साथ होता है. समूह भी व्यक्तिविशेष के हितों को अपना मानते हुए उसकी पूर्ति हेतु समेकित प्रयास करता है. परिणामतः व्यक्ति समूह का पर्याय बन जाता है—और समूह अपनी संपूर्ण शक्ति एवं विशेषताओं के साथ व्यक्तिमात्र में ढल जाता है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति के अनुभव, कार्यक्षमता, बुद्धिमत्ता, कौशल एवं उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम योगदान संभव होता है. दूसरे शब्दों में यह व्यक्ति के सफल समाजीकरण और समाज के पूर्ण एकात्मीकरण की अवस्था है.

इस तरह सहकार नामक सामान्यसा पद अपने भीतर विराट अर्थवत्ता एवं दायित्वभावना को समेटे हुए है. दूसरे शब्दों में सहकार या सहकारिता अर्थ से ज्यादा अर्थचेतना एवं संकल्पबोध का नाम है. ऐसी अर्थचेतना जो मानवीकरण की साथसाथ विस्तार ग्रहण करती है; और संकल्पबोध ऐसा जो नैतिकता से उद्भूत एवं अनुप्रेरित हो. यह एक ऐसी साधना है जो मनुष्य को मनुष्य के करीब लाने का काम करती है.

मनुष्य चूंकि एक सामाजिक प्राणी है, विवेकशीलता जिसका गुण है, अतएव सहकार को हम उन्नत सामाजिकता का लक्षण भी कह सकते हैं. सामान्य अर्थों में तो यह है भी. सामान्यतः सहकारिता और सहकारी समूहों का अभिप्राय, सामूहिक कल्याण की भावना के साथ वैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत गठित, स्वैच्छिक समूहों तथा उनके द्वारा किए गए कल्याण कार्यों से है. इसकी वजह है कि सहयोग; जो कि सामाजिक संबंधों का आधार सिद्धांत है—जिसपर कुल सामाजिकता की नींव टिकी है, वह किसी भी समाज की आधारशिला होता है, वही मनुष्यता को गतिमान बनाता है. सहयोग के अभाव में समाज का एक बने रहना तो दूर, उसका निर्माण तक संभव नहीं है. आपसी सहयोग एवं सहकार के आधार पर मनुष्य ने अनेक बार विषम परिस्थितियों पर विजयश्री हासिल की है. सफलता एवं कीर्ति के अनेक मानक स्थापित किए हैं. उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में, भीषण गरीबी एवं आर्थिक विसंगतियों से जूझते ब्रिटिश मजदूरों के एक समूह ने राबर्ट ओवेन से प्रेरणा लेते हुए एक उपभोक्ता संगठन की शुरुआत की थी, उन्हें मिली सफलता ने ही आगे चलकर सहकारिता आंदोलन का मार्ग प्रशस्त किया.

इस प्रकार सहकारिता का अर्थ मान्यताप्राप्त सहकारी समूह द्वारा किसी एक अथवा एक से अधिक उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु किए गए कर्तव्य से जाना जाता है. सहकारी समूहों के प्रमाणन एवं संस्थानिकीकरण की व्यवस्थाएं सरकारी स्तर पर दुनिया के प्रायः सभी देशों में हैं. भारत में औपचारिक सहकारिता आंदोलन की शुरुआत का श्रेय यद्धपि तत्कालीन अंग्रेज सरकार को ही जाता है, तथापि जनसाधारण के लिए सहकार कोई कर्तव्य अथवा व्यवस्थाविशेष न होकर, उसकी पूरी जीवनपद्धति और सामाजिकता की पहचान होता है, जो उसके पूरे जीवन को प्रभावित एवं संचालित करता है. अपने समुदाय के साथ वह इतना अधिक घुलमिल जाता है कि सहकार उसको अपनी सभ्यता और संस्कारों का बेहद सामान्य और सुपरिचित हिस्सा जान पड़ता है. उसे लगता ही नहीं कि वह अपनी सामान्यचर्या से बाहर का काम कर रहा है. इसीलिए दुनिया के अन्य हिस्सों की तरह भारतीय शहरोंगांवों में भी सहकारिता आंदोलन का प्रभाव देखने को मिलता है. विशेषकर आजादी के बाद, सामूहिक खेती, सहकारी ऋण समिति, आवास समिति, सहकारी बैंक जैसे पदों से भारतीय नागरिक भलीभांति परिचित हो चुके हैं. आवास, ग्रामीण विकास, चीनी एवं दुग्ध उद्योग, शिक्षा, सीमेंट, मछलीपालन जैसे अनेक क्षेत्र हैं, जहां सहकारी क्षेत्र की उपलब्धियां सरकारी और निजी क्षेत्र से भी, कहीं अधिक हैं. यदि प्रति व्यक्ति आनुपातिक निवेश के आधार पर देखा जाए तो संगठित क्षेत्र उसके आगे कहीं नहीं टिकता.

सहकारी समूह के लक्षण

सहकारिता के उद्देश्य, उसकी मूल संकल्पना तथा व्यापकता को देखते हुए सहकारी समूहों के वैधानिकीकरण की आवश्यकता सैद्धांतिक तौर पर अनपेक्षित एवं अर्थहीन जान पड़ती है. इसलिए कि सहयोग एवं सहकार हमारे लोकचरित्र का हिस्सा रहे हैं, जिन्हें सामाजिकता के अनिवार्य लक्षण की तरह व्यवहार में लाया जाता रहा है. लेकिन जब कोई सहकारी समूह उत्पादन अथवा सेवाकर्म से जुड़ता है तथा अपने उत्पाद, सेवाकार्य के माध्यम से बाजार में हिस्सेदारी की अपेक्षा रखता है, तब स्वाभाविक रूप में उसका मुकाबला नियोजित एक संगठित क्षेत्र के कतिपय बड़े और संसाधनसंपन्न उत्पादकों से होता है. अतः बाजार का विश्वास प्राप्त करने और वहां लंबे समय तक टिके रहने के लिए आवश्यक है कि सहकारी समूह भी संगठित एवं नियोजित उत्पादनव्यवस्था को अपनाएं. उसके लिए अधिक पूंजी तथा अन्य संसाधनों की आवश्यकता पड़ती है. ऐसे में सहकारी समूहों का वैधानिकीकरण तथा उनके उत्पादों का प्रमाणन, सामयिक आवश्यकता बन जाता है. समूह का औपचारिक गठन, उसके उद्देश्यों के निर्धारण तथा उसकी कार्यप्रणाली का मानकीकरण करने के लिए अत्यावश्यक है. हालांकि उसके बाद भी संगठन की सफलता का सारा दारोमदार उसके सदस्यों के सहयोग, कार्यकुशलता, बौद्धिक क्षमता एवं संसाधनों की उपलब्धता पर निर्भर करता है.

मनुष्य मनुष्य की मानसिकता का एक सहज लक्षण है. मनुष्य की सहयोगकारी प्रवृत्ति को बढ़ावा देने वाले कुछ प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

1. सीमित क्षमताएं

2. संसाधनों की अपर्याप्तता

3. असुरक्षाबोध

4. महत्त्वाकांक्षाएं

5. नैतिकता के दबाव

6. प्राकृतिक आपदाएं तथा अनिश्चितता.

उपर्युक्त के अतिरिक्त परोपकार की प्रवृति, सतत परिवर्तनशील सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियां, भौगोलिक विशेषताएं आदि उन महत्त्वपूर्ण कारकों में से हैं, जिनसे व्यक्ति अपने हितों का सामान्यीकारण करते हुए, उनका शेष समाज के हितों के साथ तालमेल करने को विवश हो जाता है. यही भावना सहकारिता को जन्म देती है— इसकी महत्ता को रेखांकित करते हुए इसे आगे ले जाने की प्रेरणा बनती है और आगे चलकर उसकी मुख्य मार्गदर्शक भी सिद्ध होती है.

सहकार के प्रेरकतत्व

सभ्यता के प्रारंभ से ही सहकार मनुष्य के मूल स्वभाव का अभिन्न हिस्सा रहा है. हालांकि सहकार को प्रेरित करने वाले कारक, उसकी प्रेरणाएं समयानुरूप परिवर्तित होते रहे हैं. आगे हम सहकार के सहकारिता के प्रेरक तत्वों पर कतिपय विस्तार से चर्चा करेंगे—

1. सीमित क्षमताएं

सुख की कामना करना मनुष्य की एक सहज प्रवृत्ति है. हर प्राणी अपने जीवन को सरल, सुखी और आनंदमय बनाना चाहता है. उसका सारा प्रयास भी इसी दिशा में होता है. अपने सुखोपभोग के लिए अधिकतम साधन जुटाने का सतत प्रयास करते रहना मनुष्यमात्र की प्रवृत्ति होती है. चूंकि प्रत्येक मनुष्य की मानसिक संरचना भिन्न परिस्थितियों में निरंतर विकासमान रहती है, अतएव सुख और उसके उपादानों के प्रति धारणा भी व्यक्तिसापेक्ष होती है, यानी किसी एक वस्तु या स्थिति को कोई आदमी बिलकुल नापसंद कर सकता है, उससे बहुत जल्दी ऊब सकता है, जबकि दूसरा उन वस्तुओं या स्थितियों को लंबे समय तक अपने लिए अनुकूल और सुखदायी मान सकता है.

सुख और उसके उपादानों के प्रति भले ही रुचिवैभिन्न्य हो, मगर सुख की लालसा सभी मनुष्यों में लगभग एकसमान होती है. परंतु प्रत्येक व्यक्ति में इतना सामथ्र्य नहीं होता कि वह अपनी इच्छाआकांक्षाओं के अनुरूप सुख के साधन जुटा सके. ये सीमाएं प्राकृतिक और परिवेशगत, किसी भी प्रकार की हो सकती हैं. इन्हीं अक्षमताओं के कारण व्यक्ति देश एवं समाज पर अवलंबित रहता है. सहकार और सहकारिता की आवश्यकता इसी अभाव की पूर्ति के लिए पड़ती है. दुनिया के किसी भी व्यक्ति की कार्यक्षमता इतनी नहीं है कि वह दूसरों के सहयोग के बिना, अपने लिए सभी सुखसुविधाओं का प्रबंध करके, उनका आनंद उठा सके. आवश्यक संसाधनों और सुविधाओं से वंचन तथा उनके अर्जन की संकुचित सीमाओं का बोध, मनुष्य को समाज के प्रति विनम्र एवं आग्रहशील बनाता है, वही उसको उस दिशा में कार्यशील समूह की शरण में ले जाता है.

सहकारिता या समूह की शरण में जाते ही मनुष्य की सभी आकांक्षाओं की पूर्ति हो पाना आवश्यक नहीं है. सदस्य इकाइयों की महत्त्वाकांक्षाओं एवं उनके लिए संसाधनों की उपलब्धता को देखते हुए, समूह की भी सीमाएं हो सकती हैं. सामूहिकीकरण की इस प्रक्रिया में व्यक्ति और समूह दोनों को ही अपने हितों की आंशिक कुर्बानी देनी पड़ सकती है. अतः समूह से जुड़ने के साथ ही समय और संसाधनों की उपलब्धता के आधार पर, हितों के स्वैच्छिक सामान्यीकरण की प्रक्रिया भी प्रारंभ हो जाती है. वही मनुष्य को सहकार के लिए प्रेरित और निर्देशित करती है, वही उसकी आकांक्षाओं को विस्तार देने का काम करती है और कई बार वही नियंत्रक शक्ति के रूप में लोगों की अवांछित विचलन से सुरक्षा भी करती है.

2. संसाध्नों की अपर्याप्तता

किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए संसाधनों की आवश्यकता पड़ती ही है. किंतु यह जरूरी नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति के पास अपेक्षित संसाधनों की उपलब्धता सदैव बनी रहे, यानी उनका पूर्ण अथवा आंशिक अभाव हो सकता है. वैसी अवस्था में उस मनुष्य के पास विकास के लिए केवल दो रास्ते होते हैं— कि या तो संसाधनों के उपलब्ध होने तक वह हाथ पर हाथ रखे बैठा रहे अथवा उन सामथ्र्यवान लोगों के साथ समन्वित प्रयास करे, जिनके पास अपेक्षित संसाधनों का प्राचुर्य है, किंतु अन्य किसी अभाव के कारण वे अपने संसाधनों का पर्याप्त उपयोग नहीं कर पा रहे हैं.

पहली स्थिति मनुष्य के अवसाद एवं नैराश्य को बढ़ाती है, जबकि दूसरी प्रकारांतर में सामाजिकता को प्रगाढ़, दीर्घतर और मजबूत बनाने का काम करती है. पारस्परिक तालमेल तथा हितों के सामान्यीकरण से सामाजिक समन्वय एवं एकरूपता की गति को बढ़ावा मिलता है. संसाधनों का तालमेल तथा हितों का सहमतियुक्त सामान्यीकरण मनुष्यों को परस्पर करीब ले आता है, उनके नागरिकता बोध को विस्तार देता है, जिससे सामाजिक अंतर्विरोध कम होने लगते हैं तथा उनमें खप रही ऊर्जा निर्माण कार्यों में काम आने लगती है, जिससे विकास की प्रक्रिया गतिवान हो उठती है.

कभीकभी यह भी होता है कि किसी एक व्यक्ति के पास संसाधनवर्ग में कुछ चीजों की कमी होती है, जबकि दूसरे के पास उस वर्ग की चीजें बहुलता में होती है. मगर उसके पास भी कुछ अन्य वस्तुओं का अभाव हो सकता है; जो पहले अथवा किसी अन्य सदस्य के पास उसकी तात्कालिक आवश्यकताओं से अधिक हों. किसी अन्य व्यक्ति के पास भी संसाधनवर्ग के कुछ ऐसे उपस्कर अनुपलब्ध हो सकते हैं; जो अन्य सदस्यों के पास अतिरिक्त रूप में मौजूद हों, यानी हरेक के पास कुछ अभाव और कुछ उपलब्धताएं हो सकती हैं. दूसरे शब्दों में संसाधनों की उपलब्धता के बावजूद ऐसी स्थिति हो सकती है कि व्यक्ति या समाज अपेक्षित विकास से दूर हो. कई बार नेतृत्व की कमी, अकेलेपन की अनुभूतियां अथवा अनजाने डर भी व्यक्ति को विकास की प्रक्रिया से दूर रखते हैं. सहकारभावना सामाजिक अंतर्विरोधों, डरों, अकेलेपन की अनुभूतियों से उसकी रक्षा करती है, इसके फलस्वरूप वह दूसरों के साथ मिलकर, अपने लक्ष्य की प्राप्ति हेतु संगठित प्रयास कर सकता है. ऐसी स्थितियां आकस्मिक न होकर प्रायः घटती रहती हैं, अतएव संसाधनों की विरल अनुपलब्धता की स्थिति में भी, उपलब्ध संसाधनों के बेहतर तालमेल, आपसी संयोजन से काम निकाला जा सकता है. इस तरह सहकारभाव व्यक्ति और समाज दोनों की अनिवार्यता बन जाता है.

3. असुरक्षाबोध्

मनुष्य की आवश्यकताएं अनंत होती हैं. विज्ञापन, बाजार तथा विकास के अन्य मानक भी उनके रूप निरंतर बदलते रहते हैं. कुछ जरूरतों के बगैर उसका काम बहुत आसानी से सध जाता है, कुछ को वह अपनी प्राथमिकताओं में सम्मिलित करता है, जबकि बहुतसी जरूरतों के लिए उसको समाज के शेष सदस्यों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिनके लिए वह दूसरों की मदद की कामना करता है. मदद पाने के लिए मदद करता भी है. कुछ आवश्यकताओं का वह इतना अभ्यस्त हो जाता है कि समूह से अलग रहने का विचार ही उसके मन में अनगिनत आशंकाओं को जन्म देने लगता है. यही आशंकाएं तथा परनिर्भरता की भावना, मनुष्य के भीतर इस एहसास को जन्म देती हैं कि उसका अस्तित्व बाकी मनुष्यों के साथ, उनके सान्निध्य में रहकर ही संभव है.

समूह से अलग होते ही उसका अस्तित्व संकट में पड़ सकता है अथवा उसको उन सुविधाओं से वंचित होना पड़ सकता है, जो उसे समूह का सदस्य होने के नाते प्राप्त हुई हैं, जिनके अभाव में वह अपने सुखी, संतुष्ट और सुरक्षित जीवन की कल्पना तक नहीं कर सकता. जैविक स्तर पर यह स्थिति स्त्रीपुरुषपरिवार और अन्यान्य सामाजिक संबंधों को जन्म देती है. इन्हीं से उसको समूह से जुड़े रहने की प्रेरणा मिलती है. आर्थिक स्तर पर भी सहकारी प्रयास पूरे समूह के स्वावलंबन और उसकी आत्मनिर्भरता को आगे बढ़ाते हैं. परिणामस्वरूप उस समूह से जुडे़ सदस्यों की निजी चिंताएं कम होने लगती हैं.

सहकारी समूह का गठन मनुष्य की इन्हीं आर्थिक, सामाजिक और जैविक आवश्यकताओं की भरपाई के लिए किया जाता है. प्राकृतिक तथा अन्यान्य आपदाएं भी मनुष्य के मन में असुरक्षाबोध में वृद्धि करती हैं, उनके कारण भी वह दूसरों की मदद के लिए मजबूर हो जाता है. उस समय समूह की ओर से अपने प्रत्येक सदस्य को सिद्धांततः यह आश्वस्ति होती है कि संकटकाल या जरूरत के समय कभी भी पूरा समूह उसके साथ है. साथ ही उसकी आकांक्षापूर्ति के लिए सततसदैव प्रयासरत भी. यह आश्वस्ति मनुष्य को उसके भविष्य, रोजमर्रा के तनावों, यहां तक कि उसकी तात्कालिक चिंताओं से मुक्त रखने में भी सहायक होती है, परिणामतः वह तनावरहित रहकर अपने सामाजिक एवं राष्ट्रीय दायित्वों का निर्वाह कर सकता है. राज्य के वैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत होने के कारण सहकारी संस्थाओं, समितियों को स्वायत्त दर्जा प्राप्त होता है, अतः उसके कार्यक्रम राज्य समेत सभी संस्थाओं का ध्यान अपनी ओर खींचते हैं, जिससे उसको अपनी पहचान बनाना आसान हो जाता है.

4. महत्त्वाकांक्षाएं

महत्त्वाकांक्षाएं मनुष्य के मन में पलने वाली वे उच्चतर लालसाएं हैं, जिन्हें वह अपने सुखवैभव और अहं की संतुष्टि के लिए अपने कामनाजगत में बसाए रखता है. वे मनुष्य की तात्कालिक पहुंच से प्रायः दूर होती हैं, तो भी उसे लगता है कि वह उन्हें प्राप्त कर सकता है और एक न एक दिन वैसा होगा भी. ये प्रायः सकारात्मक होती हैं. इसलिए मनुष्य के जीवनलक्ष्यों के निर्धारण में सहायक होने के साथसाथ ये उसके जीवन को दिशा भी प्रदान करती हैं. मनुष्य अपनी उच्चाकांक्षाओं के प्रति संवेदनशील होता है. उसे लगता है कि उनकी उपलब्धता ही उसके ‘होने’ को सार्थक बना सकती हैं. महत्त्वाकांक्षाएं अनंत प्रकार की हो सकती हैं. वे उतनी ऊंची भी हो सकती हैं, जितनी मनुष्य की कल्पना की उड़ान, जिनकी पूर्ति बहुत दुष्कर बल्कि असंभव जैसी प्रतीत हो. वे बहुत क्षुद्रतर भी हो सकती हैं कि केवल दैनिक आवश्यकताओं तक सिमटकर रह जाएं. वे स्पष्ट और उजागर भी हो सकती हैं, इतनी कि समूह का प्रत्येक सदस्य अपने बाकी सदस्यों की महत्त्वाकांक्षाओं से परिचित और अंतरंग हो तथा नितांत गोपनीय भी. परंपरागत भारतीय समाज में संतोष और अपरिग्रह को आधार मानते हुए भौतिक प्रवृत्ति की महत्त्वाकांक्षाओं पर नियंत्रण रखने पर जोर दिया गया है. इसके बावजूद इच्छाओं एवं आकांक्षाओं के दबाव से मुक्त हो पाना मनुष्य के लिए आसान नहीं होता.

यह जरूरी नहीं है कि सभी मनुष्य अपनी उच्चाकांक्षाओं के प्रति गंभीर हों तथा उन्हें पूरा करने का सामथ्र्य भी रखते हों. परिस्थिति एवं स्वभावगत अंतर होने के कारण यह संभव भी नहीं होता. ऐसी अवस्था में समाज के बाकी सदस्यों के साथ तालमेल बनाने, संसाधन जुटाने, अपनी उच्चाकांक्षाओं का समूह के शेष सदस्यों की महत्त्वाकांक्षाओं के साथ सामान्यीकरण करने और उनकी संपूर्ति के लिए समन्वित प्रयास करने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पड़ती है. समूह, सहकार भावना को अपनाते हुए, उपलब्ध संसाधनों का नियोजन इस प्रकार करता है कि व्यक्ति को अपनेपन की अनुभूति होने के साथसाथ उसकी आकांक्षाओं के सफलीभूत होने की उम्मीद बढ़ जाती है. इससे उसके मन में आत्मविश्वास और सामाजिकता का विकास होता है. जो अंततः समाज को तनावमुक्ति और एकदिशीय गति प्रदान करता है; जिससे समूह अपनी ऊर्जा का प्रयोग अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कर सकता है.

यहां पर यह उल्लेख करना भी प्रसंगानुकूल होगा कि महत्त्वाकांक्षाएं हमारी प्रेरणाओं की उत्प्रेरक और विकास की नींव होती हैं. एक तरह से वे हमारा वर्तमान के प्रति असंतोष और भविष्य की कामनाएं हैं, जो मनुष्य को विकास के लिए प्रेरित करता है. महत्त्वाकांक्षाएं भी मनुष्य को परिवर्तन के लिए संप्रेरित करती हैं. इन्हें जन्म देने वाले कारक भौतिक सुविधाएं, आधुनिकतम खोजें, शिक्षा, आय के बढ़ते स्रोत, संचारतंत्र, नवीनतम प्रौद्योगिकी आदि हैं. महत्त्वाकांक्षाओं के पूरा न होने का डर व्यक्ति के भीतर हताशा एवं अवसाद की वृद्धि करता है. सहकारभावना से वह न केवल अपनी इच्छाओं के बीच संतुलन कायम रखने में सफल रहता है, अपितु शेष समाज के विकास में भी सार्थक भूमिका निभा पाता है. ध्यातव्य है कि अतृप्त आकांक्षाएं और दिशाहीनता से पैदा हुई कुंठा मनुष्य को भटकाव तक ले जाती है. उनपर नियंत्रण न होने पर वह उन रास्तों पर बढ़ जाता है, जो व्यक्ति और समाज दोनों के लिए अहितकर होते हैं.

सहकार भावना, मनुष्य की महत्त्वाकांक्षाओं का सामान्यीकरण करने के साथसाथ, उन हताशाओं से भी बचाती है जो उनके अभाव में पनपने लगती हैं तथा प्रकारांतर में कुंठा, अवसाद समेत व्यक्तित्व की अनेक कमजोरियों का कारण बनती हैं. सहकार के माध्यम से व्यक्ति की इच्छाओं का विकास संतुलित और समाजोपयोगी तरीके से होता है, वह व्याक्ति की इच्छाओं को नैतिक धरातल प्रदान करता है, जिससे नकारात्मक स्थितियों की संभावना न्यूनतम हो जाती है.

5. नैतिकता के आग्रह

मनुष्य की श्रेष्ठता उसकी विवेकशीलता में सन्निहित रहती है. वही उसको शेष प्राणीजगत से श्रेष्ठतर रखते हुए उसके व्यक्तित्व की विशिष्ट पहचान बनती है. इसके अतिरिक्त प्रेम, श्रद्धा, आस्था, सचाई, सहयोग, समर्पण, परोपकार, परदुःखकातरता, सहानुभूति जैसे कई उदात्त मानवीय गुण हैं, जो मनुष्यता के आधारस्तंभ तो हैं ही, ये मनुष्य को नैतिक ऊंचाई प्रदान करने के साथसाथ समाज के साथ उसका तालमेल बनाए रखने में भी सहायक सिद्ध होते हैं. चूंकि अकेले आदमी की नैतिकता कोई मायने नहीं रखती. मनुष्य की चेतना की परख समूह के बीच ही हो पाती है. दूसरों के साथ काम करने, उनके साथ सहयोग करने की प्रवृत्ति मनुष्य को आत्मतुष्टि प्रदान करती है. इससे उसका आत्मविश्वास बढ़ता है. आत्मसंतोष के लिए व्यक्ति एक ओर जहां दूसरों को कष्ट पहुंचाने से बचने लगता है, वहीं जनकल्याण के कार्यक्रमों में रुचि भी दर्शाता है. उसे अपना होना, दूसरों के होने में नजर आने लगता है, यही प्रवृत्ति शेष समूह के लिए प्रेरणास्रोत भी बन जाती है.

सहकारिता चूंकि आधुनिक विचारधारा है और विचारधारा से भी अधिक यह एक उपक्रम है, जो मनुष्य को न केवल उसके दायित्व का एहसास दिलाने का कार्य करता है; साथ ही उसको समाजप्रदत्त जिम्मेदारियों का निर्वाह करने का अवसर भी प्रदान करता है. यह मनुष्य को उन कार्यों से सक्रिय रूप से जुड़ने का अवसर भी देता है, जिनके साथ सामूहिक हित जुड़े हों. इस कारण कभीकभी नैतिक दबाव भी व्यक्ति को सहकारी प्रयासों की ओर प्रेरित करते हैं. स्थानस्थान पर विभिन्न उद्देश्यों हेतु कार्यरत सहकारी समितियां, जनकल्याण की भावना के साथ गठित संगठन और संस्थाएं तथा उनके द्वारा संचालित हजारों कल्याण कार्यक्रम, मनुष्य की नैतिक प्रेरणाओं का ही परिणाम है.

यह मानना भी भारी भूल होगी कि केवल विकसित और सुशिक्षित समाज ही नैतिक दबावों को महसूसते हुए सहकारी प्रयासों की ओर अग्रसर होते हैं. बल्कि आम और रोजमर्रा की जिंदगी में अत्यंत संघर्षशील लोग भी अपनी विवेकशीलता और सूझबूझ के बल पर सहकारी प्रयासों में कामयाब होते रहे हैं. वह भी बिना किसी लाभकामना के. शिक्षा, स्वास्थ्य, आदिवासी कल्याण, दलितोद्धार, बालअधिकार, श्रमिक कल्याण, ग्रामीण ऋण व्यवस्था, स्त्रीचेतना जैसे क्षेत्रों में हजारों समिति एवं संस्थाएं सहकारकर्म कर रही हैं. कई बार तो उन क्षेत्रों में भी सहकारी आंदोलन की धमक सुनाई पड़ने लगती है, जो आधुनिक शिक्षा और वैचारिक चेतना से दूर हैं, जहां सामान्यजन उसकी अपेक्षा भी नहीं कर सकते.

उपर्युक्त के अतिरिक्त राजनीतिकआर्थिक परिस्थितियां, सामाजिक चेतना, नैतिकता के आग्रह, परोपकार की भावना, करुणा, मैत्रीभाव जैसे बहुत से कारक हैं; जो मनुष्य को सहकारी आंदोलन में हिस्सेदारी की प्रेरणा दे सकते हैं.

6. प्राकृतिक आपदाएं तथा अनिश्चितता

प्राकृतिक आपदाएं एवं अनिश्चितता मनुष्य के जीवन में एक बड़ी चुनौती हैं. ये चेतावनी के रूप में मनुष्य को जहां एक ओर सजग और चैतन्य बने रहने के लिए प्रेरित करती हैं, वहीं मनुष्य के भीतर भय, निराशा, कुंठा और चिंता को बढ़ावा भी देती हैं, जो मनुष्य को अस्थिर और बेचैन बनाते हैं. ये अनिश्चितताएं किसी भी रूप में मनुष्य के सामने उपस्थित हो सकती हैं. इनके कारण प्राकृतिक और गैरप्राकृतिक दोनों ही तरह के हो सकते हैं. प्राकृतिक आपदाओं तथा अन्यान्य कारणों से उत्पन्न अनिश्चितताएं, दुर्योग की संभावना मनुष्य के मन में डर और अविश्वास पैदा करती है, जिसके परिणामस्वरूप वह अपने भविष्य के प्रति शंकालु हो जाता है. ऐसे में वह अपने लिए सहारे की खोज करता है. अगर उचित वातावरण न मिले तो दूसरों के प्रति अविश्वास, डर और अनिश्चितताएं मनुष्य को स्वार्थी भी बना सकती हैं, जिससे उसके मन में भविष्य के लिए अधिकाधिक संचयन तथा दूसरों से दुराव की स्थितियां पैदा हो सकती हैं. इन परिस्थितियों से घिरे मनुष्य को उन लोगों की ओर से मदद मिलने की संभावना सर्वाधिक होती है जो उसी की भांति अपने भविष्य को लेकर शंकालू हैं. वैसी स्थिति में वे सभी परस्पर तालमेल रखते हुए समन्वित प्रयास करते हुए देखे गए हैं. एक जैसी परिस्थितियों का शिकार होने के कारण उनके सामूहिक प्रयास में सफलता की संभावना भी अधिक होती है.

सामूहिक प्रयास और सहकारी समितियों के गठन के पीछे, अन्यान्य कारणों के अतिरिक्त मनुष्य का यह विश्वास भी होता है कि संकट के समय वह अकेला नहीं होगा, बल्कि समूह के बाकी सदस्य भी मददगार के रूप में उसके साथ होंगे. उसके दुःख को बांटने, लक्ष्य तक पहुंचने में उसका साथ देने के लिए. यही विश्वास मनुष्य को काफी संबल देता है और उसे डर, अवसाद, हताशा, कुंठा जैसी भयावह स्थितियों से बचाए रखता है. साझेपन की अनुभूति मनुष्य के आत्मविश्वास को सुरक्षित बनाए रखती है, जिससे उसका मनुष्यता के प्रति विश्वास अक्षुण्ण तथा सोच सकारात्मक बना रहता है. इससे उसके प्रयासों में गंभीरता आ पाती है.

उपर्युक्त के अतिरिक्त तेजी से परिवर्तनशील सामाजिकराजनीतिक परिस्थितियां, आर्थिक परिवेश, लोकचेतना, परोपकार की भावना आदि अनेकानेक कारण हैं, जो व्यक्ति को सहकारी प्रयासों की प्रेरणा देते हैं. उसे एकदूसरे के करीब लाने, परिस्थितियों को समझने के लिए बाध्य करते हैं. निरंतर बदलती वैश्विक परिस्थितियां भी, जिनमें पूंजी का असंयत निवेश, विशेषकर ऐसे क्षेत्रों में जिनका मनुष्य के वास्तविक विकास से कोई संबंध ही न हो, प्रकारांतर में सहकारिता आंदोलन के उत्थान में सहायक हैं. इससे उसे लगता है कि अपने हितों के लिए उसे स्वयं ही प्रयास करने होंगे. ऐसी ही परिस्थितियों के बीच से आधुनिक सहकारिता आंदोलन का विकास हुआ है. विषम परिस्थितयां व्यक्ति को संघर्ष के लिए पे्ररित करने में न केवल सहायक होती हैं, साथ ही उसको सामाजिक रूप से चैतन्य भी बनाती हैं.

सहकारिता मानवीय चेतना को विकास की ओर उन्मुख करने के साथसाथ, उसके लिए उपयुक्त अवसर भी उपलब्ध कराती है. सभ्यता के प्रारंभ से ही मनुष्य में आगे बढ़कर काम करने की प्रवृत्ति रही है. सहकार उस प्रवृत्ति के बिलकुल उलट है, जब मनुष्य निजी स्वार्थों को महत्त्व देते हुए केवल आत्मकल्याण में लीन रहता है. अपनी लालसाओं की पूर्ति के लिए वह विकास का कोई भी सूत्र थामने को उत्सुक होता है, जिसके लिए समाज की मौजूदगी केवल समर्थक परिवेश और वातावरण अथवा स्वार्थसाधन के माध्यम के रूप में होती है. संक्षेप में सहकारिता मनुष्यता के सपने को जीने का पवित्र सिद्धांत तथा आत्मनिर्भरता की स्थिति को साकार करने का आदर्श उपक्रम है, जिसे पूरी दुनिया में अनेक बार आजमाया जा चुका है.

जीवन की जटिलताओं तथा परिस्थितिवश भी यह संभव नहीं है कि प्रत्येक मनुष्य असीमित दायित्वों का भार वहन कर सके. इस कारण तथा संसाधनों की अपर्याप्तता के चलते, मनुष्य पारस्परिक सहयोग की ओर आकृष्ट होता है. फलतः समूह के भीतर आवश्यक सेवाओं और वस्तुओं का आदानप्रदान होने लगता है. इससे समूह के सदस्यों को विकास के अनुकूल वातावरण तथा अपेक्षित साधन सहज ही प्राप्त होने लगते हैं अथवा कम से कम उनकी उपस्थिति की संभावना बढ़ जाती है. उस अवस्था में समूह का प्रत्येक सदस्य शेष समूह की आकांक्षापूर्ति में भी अपना योगदान देता है; जो अंततः संपूर्ण समाज एवं राष्ट्र की विकासधारा को प्रभावित करने में सक्षम होता है और आगे चलकर पीढ़ियों तक प्रेरणा की सामग्री उपलब्ध कराता रहता है.

सहकारिताः एक संस्कार

उपर्युक्त विवेचन से तय है कि समाज में अकेले व्यक्ति का कोई भविष्य नहीं है, न ही उसके विकास का कोई अर्थ है. वस्तुतः विकास हो या सुख, ये सभी सापेक्षिक स्थितियां तथा मनोवृत्तियां हैं; जो समाज के साथ ही अपनी सार्थकता सिद्ध कर सकती हैं. अतएव सामाजिक नियमों का गठन भले ही मनुष्य की अंतःप्रेरणा तथा दूसरी जरूरतों के कारण हुआ हो, संबंधों के विकास के पीछे जैविक कारण रहे हैं. सामाजिकता तो उन्हें बदलते समय के अनुरूप परिभाषित एवं अनुकूलित करने का कार्य करती रही है.

यहां पर यह उल्लेख करना अत्यावश्यक है कि सहकारिता आकस्मिक उद्वेग अथवा स्वार्थसाधन के लिए किया गया अल्पकालिक तालमेल नहीं है. ना ही यह पारस्परिक सहयोग, अवसरानुकूल तालमेल की क्षणभंगुर व्यवस्था है. अपने आधुनिक संदर्भों में सहकारिता भले ही वर्तमान युग की देन रही हो, मगर सभ्यता की शुरुआत से ही सहयोग और सहकार हमारी संस्कृति और संस्कारों का अभिन्न हिस्सा रहे हैं. यद्यपि कार्य की प्रकृति और आवश्यकता के अनुसार अल्पकालिक सहकारी संगठन बनाए जा सकते हैं और बनाए जाते भी रहे हैं, तथापि अपने बृहद संदर्भों में सहकार एक सुनियोजित एवं सोचीसमझी व्यवस्था है. यह व्यक्ति के भीतर यह एहसास निरंतर जगाए रहती है कि मनुष्यता की दृष्टि से अकेलापन कोई उपलब्धि नहीं है, कि अकेले मनुष्य का न तो वर्तमान है न ही भविष्य; बल्कि सबके होने के साथ ही उसके होने की सार्थकता है. सबके साथ मिलकर सुनियोजित प्रयास से न केवल विकास के इच्छित लक्ष्य तक पहुंचा जा सकता है; बल्कि आसन्न आपदाओं तथा जीवन की दूसरी चुनौतियों पर काबू भी पाया जा सकता है.

यह मनुष्य की उस एकांगी और स्वार्थमयी विचारधारा का भी निषेध करती है, जिसके अनुसार वह अपनी निजता को सर्वोपरि मानते हुए— सामूहिक हितों की उपेक्षा करता है अथवा निजता को सामाजिकता के आगे वरीयता देने लगता है. पारदर्शिता, चाहे वह विचारों की हो अथवा व्यवहार की, सहकारी समूह के स्थायित्व एवं प्रामाणिकता की पहली शर्त है. यह मनुष्य की स्वार्थसाधन की हेय प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने का कार्य करती है. यह उस प्रवृत्ति के एकदम विपरीत है जब व्यक्ति शेष समाज की उपेक्षा करता हुआ, केवल अपने स्वार्थों की पूर्ति में तल्लीन रहता है तथा उपलब्ध सामूहिक संसाधनों को अपनी लिप्साओं की पूर्ति के माध्यम के रूप में देखता है, सहकार के नाम पर निहित स्वार्थ अथवा लालच के कारण शेष समूह से जुड़ता है तथा उनके लिए क्षुद्रता की किसी भी सीमा तक गिरने को तत्पर रहता है.

यद्धपि स्वार्थसाधन की प्रवृत्ति की सराहना करने वाले लोग भी समाज में हो सकते हैं. यदि वे हैं और ऐसा करते भी हैं, तब समूह के साथसाथ उसके सदस्य विशेष का दायित्व होता है कि वह अपने वास्तविक हितों की पहचान करते हुए, आचरण करे और नैतिकता की भावना को आहत न होने दे. बात जब समाज की आती है, भले ही वह अत्याधुनिक विकसित समाज हो, जिनमें संबंधों की डोर शिथिल पड़ती जाती है तथा सामाजिक न्याय पर व्यावसायिकता हावी होने लगती है. सामाजिक रिश्ते तेजी से व्यावसाय आधारित अनुबंधों में ढलते चले जाते हैं. ऐसे समाजों में भी स्वार्थमय आचरण को सम्मान्य नहीं माना जाता, न ही उसको श्रेयस्कर की गरिमा मिल पाती है. समाज में वही उपक्रम आदर्श एवं प्रशंसनीय माना जाता है, जो सामाजिकता की मर्यादा और विकास के मानवीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में सक्षम होता है. साथ ही जो संपूर्ण समाज के संतुलित विकास के पक्ष में खड़ा होता है.

सहकारिता की भावना, व्यक्ति को उसके विशिष्टताबोध के अनुचित एवं अवांछित दबावों से मुक्त रखती है; जिनके कारण वह दूसरों को आकर्षित करने की कोशिश करता रहता है. सहकार, पारस्परिक सहयोग के साथ संपूर्ण समाज के समन्वित विकास एवं उसकी एकात्मकता को बढ़ाने वाली भावना और तत्संबंधी प्रयासों का नाम है. यह सामाजिक सुरक्षा के साथसाथ उसके प्रत्येक सदस्य के विकास के प्रति आश्वस्ति भी है. यह मनुष्य को उन दुष्चिंताओं, डरों और तनावों से दूर रखता है, जो उसे अकेलेपन या आसन्न संकटों की संभावना के रूप में आक्रांत करते रहते हैं. सहकारी समाज में मनुष्य की निजी इच्छाएं, आकांक्षाएं, अपने समूह और समाज की कतिपय महत्त्वपूर्ण आकांक्षाओं के साथ इतनी घुलमिल जाती हैं कि वह सामूहिक हितसाधन में ही अपने हितों की पूर्णता देखने लगता है. स्वयंस्फूर्त भावना के साथ वह शेष समाज के हितरक्षण के लिए यथासामथ्र्य सहयोग करता है. दूसरी ओर समाज भी अपने दायित्वों के अनुपालन में अपने प्रत्येक सदस्य की आवश्यकताओंइच्छाओं को ध्यान में रखकर, उनकी पूर्ति के लिए यथोचित वातावरण बनाने के साथ, अपेक्षित सहयोग भी प्रदान करता है. इस तरह सहकार द्विपक्षीय सहयोग का सिलसिला है, जिसके एक सिरे पर मनुष्य और उसके संसाधन तथा दूसरे सिरे पर, पूरक के रूप में उसका अपना समाज तथा शेष समूह विद्यमान रहता है.

पारस्परिक सहयोग की भावना मनुष्य में सभ्यता के प्रारंभिक वर्षों से ही विद्यमान रही है. आदिम मनुष्य जिन दिनों अपने अस्तित्व की रक्षा हेतु संघर्ष कर रहा था, अकेला या समूह के रूप में, और जिन दिनों पारिवारिक संस्था का विकास तक नहीं हो पाया था, जिन दिनों मनुष्य अपने झुंड का केवल एक सदस्य या कि एक प्राणिमात्र था और उसके संबंध केवल दैहिक आवश्यकताओं पर आधारित थे. सामाजिकता के बदले जब वह केवल अपनी प्राकृतिकजैविक आवश्यकताओं की पूर्ति पर ध्यान देता था. संबंध अपरिभाषित थे तथा उनमें स्थायित्व के स्थान पर केवल तात्कालिकता थी— उन दिनों, जी हां, उन दिनों भी सहकारभावना अपने पूरे एहसास और समर्पण भावना के साथ विद्यमान थी और इतनी विस्तीर्ण भी थी कि मनुष्य प्रकृति की प्रत्येक वस्तु को अपना मित्रहितैषी मानता था. निर्जीव ग्रहनक्षत्रों से उसका अपनापन था. दुनिया के सभी धर्मग्रंथ मैत्री की इसी उदात्त भावना और पवित्र स्तुति से भरे पड़े हैं. हालांकि उसका स्वरूप आधुनिक सहकारिता से भिन्न और अनौपचारिक था. आधुनिक सहकारिता सिद्धांत के बीज तत्व पारस्परिक सहयोगसमर्पण की उसी पवित्र भावना में खोजे जा सकते हैं.

ग्रामीण जीवन तो शुरू से ही परस्पर सहयोग एवं सहभागिता के सिद्धांत को अपनाता आया है. न केवल अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, बल्कि सांस्कृतिक स्तर पर भी सहकार वहां संबंधों को स्थायित्व एवं आत्मीयता प्रदान करने का प्रमुख कारण रहा है. पर्वत्योहारों से लेकर फसलों की कटाई, मेलेउत्सव, यहां तक कि गांवों में छप्पर छवाने का काम भी सहयोग भावना से मिलजुलकर किया जाता रहा है. सहकारिता का विधायी और सांगठनिक स्वरूप, पंजीकृत सहकारी संगठनों के माध्यम से निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति, उनीसवीं शताब्दी की देन है. प्राचीन भारतीय वांङ्मय में ‘सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामयाः’, ‘कामयेः दुःखताप्तानाम्, प्राणिनाम् आर्तिनाशनम्’ तथा ‘वसुधैव कुंटुबकम्’ की मंगलकामनाएं, शंकराचार्य का सत्चित्आनंद, सुकरात का ‘शुभ’, प्लेटो का कल्याणकारी समाज का सपना, महावीर स्वामी का ‘कैवल्य’ आदि सभी में सहकारिता के सिद्धांत के बीजतत्व मौजूद रहे हैं. धर्म का लक्षण ही मानवमात्र की कल्याण कामना करते हुए स्वयं को अधिक से अधिक नैतिक बनाना है. ये सभी चूंकि समाज में सहस्राब्दियों से विद्यमान हैं, इसलिए सहकार की उपस्थिति भी सामान्य रूप से सभी जगह है. बावजूद इसके, सहकारिता का जनक, या कि प्रमुख प्रणेता होने का श्रेय राबर्ट ओवेन को ही दिया जाना चाहिए. क्योंकि सामूहिक लक्ष्यों और दायित्वों का निर्धारण करते हुए, जनतांत्रिक भावना पर आधारित समूह का गठन और फिर सर्वकल्याण के लिए संगठित प्रयासों की पहली कोशिश उसी ने की थी. जिसके लिए उसने अपने समस्त संसाधनों को होम दिया था.

इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि सहकारिता की ओर ध्यान या कहें कि इसके विधानिकीकरण की कोशिशें तभी शुरू हुईं, जब शिक्षित वर्ग का ध्यान उसकी ओर गया. दरअसल लोकतंत्र एवं शिक्षा के कारण लोगों में अपने आसपास की स्थितियों और घटनाओं को गहराई से समझने तथा दुरवस्था ने निपटने की कोशिशें लगातार चलती रहीं. उससे पहले इन जिम्मेदारियों को भगवानभरोसे छोड़ा जा सकता है. हालांकि तब भी सहकारिता की वास्तविक शक्ति, अर्धशिक्षित तथा उत्पीड़न के शिकार ऐसे लोग रहे जिनकी महत्त्वाकांक्षाएं बहुत सीमित थीं, जिनके पास संसाधनों का अभाव था, लेकिन स्थितियां एक समान थीं और नैतिकता के आग्रह इतने प्रबल थे कि वे सामाजिक हितों के आगे अपने हितों का निःसंकोच बलिदान भी कर सकते थे. प्रारंभिक सफलता के पश्चात आगे चलकर इसके माध्यम से कतिपय बड़े और दीर्घकालिक उद्देश्यों के लिए काम हो सका. सहकारी समूहों को मान्यता मिलने से उन्हें सरकार द्वारादृऋण मिलना आसान हो गया, उन्हें अपेक्षित सम्मान भी मिलने लगा जिससे सहकारिता की ओर पूरी दुनिया का ध्यान गया. और जगहजगह अपनी स्थितियों के अनुरूप उसको अपनाया भी गया.

सहकार के जिस स्वरूप से आज हम परिचित हैं— वह एक विदेशी अवधारणा है. जिसके बीजतत्व औद्योगिक क्रांति द्वारा पोषित असमान विकास में सन्निहित हैं. वस्तुतः सोलहवीं शताब्दी के बाद से यूरोप में आई औद्योगिक क्रांति ने पूंजीपतियों के हाथों में ऐसी क्षमतावान मशीनें सौंप दी थीं, जिनसे उनकी मानवीय कौशल पर निर्भरता घटी थी. ऐसी मशीनों के लिए प्रारंभिक निवेश की मात्रा उच्च थी, लेकिन उनकी उत्पादनक्षमता भी अद्भुत थी. नई प्रौद्योगिकी के आगमन के बाद पूंजीपतियों को लगने लगा था कि वे केवल पूंजी के दम पर मनचाहा मुनाफा खींच सकते हैंकि नई प्रौद्योगिकी वरदान है, जिसके द्वारा मजदूरों और शिल्पकारों से मुक्ति संभव हैं.

इसी विचारधारा ने उन्हें निरंकुश और स्वार्थी बना दिया था, उनमें अधिकाधिक मुनाफा कमाने की होड़ मची हुई थी. अधिक मुनाफे के लिए वे कारखानों में कार्यरत श्रमिकों ने मनचाहा काम तो लेते ही थे, बाजार में उत्पाद को मनमाने दामों पर बेचते भी थे, रोजमर्रा की वस्तुओं में मिलावट की शिकायत बिलकुल आम थी, जिससे महंगाई आसमान छूने लगी थी तथा आम नागरिक का जीवन बहुत कठिन होता जा रहा था. सरकार पर चूंकि पूंजीवादी शक्तियों का दबाव रहता था. अतः अपने प्रभाव के दम पर वे ऐसे कानून बनवाने में सफल रहते थे जो उनके मुनाफे को तो बढ़ाते हों, किंतु मानवीय श्रम एवं कौशल का विरोध करते हों.

सोलहवीं शताब्दी के वैज्ञानिक आविष्कारों के प्रभाव से अठारहवीं शताब्दी बीततेबीतते यूरोपीय समाज में सामंतशाही और गुलामियत से मुक्ति के लिए छटपटाहट शुरू हो चुकी थी. नवजागरण का नारा हवा में था. देकार्ते के बुद्धिवादी चिंतन से प्रेरणा लेते हुए बेंथम, जेम्स मिल, पू्रधों तथा जान स्टुअर्ट मिल जैसे विचारकों ने व्यक्तिवादी चिंतन को आगे बढ़ाया था. फलतः इतिहास में पहली बार आम आदमी को केंद्रबिंदु बनाकर सोचने की शुरुआत हुई. अर्थशास्त्र के क्षेत्र में भी संत आगस्टीन, रिकार्डो, एडम स्मिथ जैसे उदारवादी अर्थशास्त्री आगे आए थे; जो आर्थिक नीतियों में खुलेपन के समर्थक थे तथा योजनाओं को जनोन्मुखी बनाने के पक्षधर थे. उन्होंने नीतियों की समीक्षा करते हुए एक बौद्धिक वातावरण ही संरचना की जिससे बाजार की परंपरागत नीतियों पर पुनर्वीक्षा की मांग भी की जाने लगी.

नवचेतना की यह लहर वंचित और उपेक्षित वर्ग के बीच भी फैली हुई थी. यह वर्ग सहस्राब्दियों से समाज के साधनसंपन्न वर्ग के शोषण का शिकार होता आया था. सपनों के हवामहल दिखाने वाले शासकों तथा उनके द्वारा बनाई गई व्यवस्था से उसका विश्वास खंडित हो चुका था. उसे लगने लगा था कि ऐच्छिक विकास का रास्ता केवल निजी प्रयासों से ही संभव है. उजला भविष्य उसके अपने ही श्रम की कोख से जन्म लेगा, जिसमें उसके अपने ही समूह की साझेदारी होगी, ऐसा उसको आभास हो चला था.

ऐसे ही संक्रांतिपूर्ण माहौल में सहकारिता की रूपरेखा तय की गई थी, अनायास नहीं, लंबे अनुभव के पश्चात, खूब सोचविचार के बाद. हम पहले भी लिख चुके हैं कि— सहकारिता का उद्भव समाज में मौजूद सहस्राब्दियों पुरानी सहयोग की परंपरा से ही हुआ है. आपसी सहयोग की उसी सनातन परंपरा को सामूहिक विकास और उत्पादकता से जोड़ते हुए सहकारिता की रूपरेखा गढ़ी गई. कह सकते हैं कि आमजन की अस्मिता की रक्षा एवं पूंजीवाद के संकट से बचाव के रूप में सहकारिता का जन्म हुआ था. दूसरे शब्दों में पूंजीवादी खतरों की प्रतिक्रिया में उत्पन्न मध्यमवर्गीय चेतना का परिणाम ही सहकारिता है.

प्रारंभ में सहकारिता आंदोलन केवल उपभोक्ता सामग्री के वितरण तक सीमित था, जिसकी पहंुच केवल श्रमिक बस्तियों तक थी. रोशडेल पायनियर्स समूह के अधिकांश सदस्य गरीब और अल्पशिक्षित बुनकर थे. वे पूंजीवादी दबावों और बढ़ती महंगाई से तंग आ चुके थे. पहले पहल उन्होंने सहकारी उपभोक्ता भंडारों की शुरुआत की, जिसको व्यापक जनसमर्थन प्राप्त हुआ. अनेक उतारचढ़ावों के बाद वह आंदोलन विस्तार ग्रहण करता गया. नएनए लोग उससे जुड़ते चले गए. उत्पादकता से जुड़े दूसरे क्षेत्रों में भी सहकारी संगठन बनाए गए. बाद में राज्य सरकारें भी सहकारी आंदोलन की समर्थक बनकर उससे जुड़ती चली गईं. उन्हें लगा कि सहकारी संस्थाएं सरकार के कल्याण कार्यक्रमों में उसकी मदद कर सकती हैं. सरकारों को अपने दायित्व के निवर्हन के लिए जिस प्रकार के जिम्मेदार संगठनों की आवश्यकता पड़ती है, सहकारी समितियांे वे सभी गुण थे. इसीलिए सहकारिता को सरकारी समर्थन, चाहे वह किसी भी दल अथवा विचारधारा की हो, मिलना आवश्यक था. सहकारिता के विकास में यह भी महत्त्वपूर्ण कारण रहा है.

भारत में इस सहकारिता आंदोलन की शुरुआत कतिपय विलंब से, बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में, तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के प्रयासों के फलस्वरूप हुई. तब से आज तक यह आंदोलन एक शताब्दी से भी लंबा सफर तय कर चुका है. जमीनी स्तर पर सहकारिता की उपलब्धियां सराहनीय रही हैं. आज हालात यह हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था से यदि सहकारी संस्थाओं के योगदान को निकाल दिया जाए तो वह कंकाल में बदल जाएगी. न केवल अर्थव्यवस्था बल्कि समाजव्यवस्था को कायम रखने में भी सहकार की भारी उपयोगिता रही है. भारत के साथसाथ ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, डेनमार्क, नार्वे, चीन, अमेरिका, कनाडा आदि लगभग सभी देशों में सहकारिता आंदोलन की उपलब्धियां सराहना योग्य हैं, जिन्हें भुला पाना अथवा जिनकी उपेक्षा कर पाना नामुमकिन है.

इन दिनों अनियोजित विकास तथा आधुनिकता के दबावों के चलते भारतीय ग्रामव्यवस्था का परंपरागत ढांचा चरमायी बुरी तरह से चरमराया हुआ है. ग्रामीण क्षेत्रों में, पहले जहां अनौपचारिक सहकारी प्रयास अक्सर देखने को मिल जाते थे, सहयोग की जहां सहजस्वाभाविक उपस्थिति थी, संबंधों में जहां आत्मीयता रहती थी, वहां आजकल बाजारवाद अपने पांव जमाने में लगा है. जिस मानवीय उदारता की हमारे गांव मिसाल हुआ करते थे, वह तेजी से गायब होती जा रही है, बल्कि कहना चाहिए कि बाजार के दबावों के आगे दम तोड़ चुकी है, जिससे वहां पर भारी आपाधापी का माहौल है.

कल्याण राज्य का सपना देखने वालों के लिए सहकारिता एक अनिवार्य उपक्रम है. यह लोगों को आत्मविश्वासयुक्त एवं आत्मनिर्भर बनाने के लिए जरूरी है, ताकि सरकार पर उनकी निर्भरता कम से कम हो सके. एक आदर्श राज्य के लिए बहुत जरूरी है कि व्यक्ति, समाज और सरकार के संबंध परस्पर अन्योन्याश्रित हों. उनमें कहीं भी विवशता अथवा परावलंबनता दिखाई न पड़े. तभी समाज एवं सरकार अपनेअपने दायित्व का अनुपालन कर सकते हैं. सहकार भावना केवल सजग और चैतन्य समाज में ही संभव है, जबकि आत्मचेतित समाज के लिए यह अत्यावश्यक होता है कि उसके सदस्यों में सहयोग और समर्पण का भाव तो हो, मगर परावलंबन की भावना हरगिज न हो. इसलिए समेकित विकास के लक्ष्य के लिए सहकारिता एक अनिवार्य उपक्रम बन जाती है जिसका उपयोग पिछले डेढ़ सौ वर्षों से लगातार विभिन्न मंचों पर, नाना प्रतिरूपों में दिखाई पड़ने लगा है.

©ओमप्रकाश कश्यप