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श्रमिकसंघवाद (‘सिंडीकेलिज्म’)

सामान्य
समाजवाद के आधुनिक विकल्प

पूंजीवाद के वर्चस्वकारी रवैये की प्रतिक्रिया में उससे मुक्ति पाने के जनांदोलनों की शुरुआत अठारहवीं शताब्दी में ही हो चुकी थी. यही वह दौर था, जब व्यक्तिस्वातंत्रय और उपयोगितावाद की मांग ने जोर पकड़ा. दोनों विचारधाराओं का ध्येय धर्मसत्ता और सामंतवाद के चंगुल में शताब्दियों से पिसते आ रहे जनसामान्य के लिए मुक्ति की राह प्रशस्त करना था. दोनों समाजवाद की मूल भावना से भी मेल खाती थीं, जो उन दिनों पूंजीवाद के विरुद्ध तेजी से उभरती विचारधारा थी. उपयोगितावाद के समर्थकों का मानना था कि सृष्टि में कुछ भी अनुपयोगी नहीं है. सुख प्राप्त करना व्यक्तिमात्र का अधिकार है. इसे आगे बढ़ाते हुए स्वाधीनतावादी विद्वान व्यक्तिमात्र को अपनी रुचि के अनुसार कार्य चुनने तथा सुख के अवसर जुटाने के अवसर देने के समर्थक थे. उल्लेखनीय है कि विश्व के प्रायः सभी समाजों में बुद्धिजीवियों का एक वर्ग भौतिक सुख के प्रति नकारात्मक सोच रखते हुए, त्याग और दीनताबोध का अतिरिक्तरूप से महिमामंडन करता रहा है. इससे संसार को माया कहकर इससे पलायन का उपदेश देने वाले, मोक्ष की कामना में शरीर को तरहतरह की प्रताड़ना देने वाले तांत्रिकों, धर्माचार्यों को बढ़ावा मिला. इसी विचारधारा के समर्थन से प्रायः सभी समाजों में पुरोहितवर्ग का उदय हुआ जो प्रकटरूप में भौतिक सुखों का तिरष्कार करते थे, किंतु उनका अपना जीवन त्यागतपश्चर्य की स्वनिर्मित आचारसंहिता का उल्लंघन करता था. यहां यह जानना भी प्रासंगिक है कि व्यक्तिस्वातंत्र्य की मांग सामंतवाद के चंगुल में शताब्दियों से पिसते आ रहे लोगों को देखकर जन्मी थी, जिसने बुद्धिजीवियों के बड़े वर्ग को प्रभावित किया. प्रकारांतर में उसको पूंजीवाद का भी भरपूर समर्थन प्राप्त हुआ. दरअसल पूंजीवाद के विकल्प की खोज के लिए बुद्धिजीवियों का उछाह इतना था कि एक के बाद एक नई विचारधाराएं सामने आ रही थीं. ध्येय सभी का एक थाकिसी भी भांति पूंजीवाद के जिन्न को बोतल में बंद करना. साम्यवाद, समाजवाद, अराजकतावाद, सामूहिकतावाद, राज्यप्रेरित समाजवाद, गणतांत्रिक समाजवाद सहित अनेक विचारधाराएं उस दौर में लगभग साथसाथ जन्मीं. चूंकि सभी विचारधाराओं का ध्येय एक था तथा सभी पर मार्क्सवाद का गहरा प्रभाव भी था, इसलिए उन सब में कुछ समानताएं भी थी. कुछ विचारधाराओं का अंतर तो इतना मामूली कि बस शब्दों का ऐरफेर जान पड़ता है. ‘श्रमिकसंघवाद’ अथवा ‘सिंडीकेलिज्म’ इसी प्रकार की एक विचारधारा थी, जिसका उदय राज्याश्रित समाजवाद तथा पूंजीवादी शोषण से मुक्ति पाने की कामना के साथ हुआ था. असल में यह एक राजनीतिकआर्थिक दर्शन है, जिसका ध्येय समाज को पूंजीवाद के चंगुल से छुटकारा दिलाना है. प्रकारांतर में यह व्यवस्था राज्य द्वारा पे्ररितअनुशासित समाजवाद का भी विरोध करती है. अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए श्रमिकसंघवाद श्रमिक संघों, मजदूर संगठनों तथा औद्योगिक श्रमिकयूनियनों का उपयोग करता है. इसमें श्रमिक आगे बढ़कर उत्पादनतंत्र को अपने हाथों में ले लेते हैं. उत्पादन केंद्रों का संचालन श्रमिकों द्वारा सामूहिक लाभ की अवधारणा के साथ किया जाता है, जहां औद्योगिक स्पर्धा, एकाधिकार की भावना का नामोनिशां नहीं होता. अराजकतावाद की भांति श्रमिकसंघवाद भी राज्य को मानवीय स्वतंत्रता का अवरोधक मानता है. उसका विश्वास है कि सत्ता का कोई भी रूप वर्चस्वकामना से मुक्त नहीं हो सकता. जहां वर्चस्व की कामना है, वहां आर्थिकसामाजिक असमानताएं हैं. जहां असमानता है, वहां शोषणकारी प्रवृत्तियां हैं. जहां शोषणकारी प्रवृत्तियां हैं, वहां शोषणकारी शक्ति के प्रतीक सत्ताशिखर पर विराजमान लोग, राज्य के संसाधनों का अपने वर्गीय हितों के अनुरूप दोहन करने लगते हैं. कालांतर में राज्य पूंजीवाद का सहायक बनकर, श्रमिकों का विरोधी बन जाता है. इसलिए राज्यसत्ता का विरोध करते हुुए श्रमिकसंघवाद, उसे श्रमिक संगठनों के लोकतांत्रिक संगठनों द्वारा अनुशासित किए जाने का सुझाव देता है.

सिंडीकेलिज्म’ फ्रांसिसी शब्द है, जिसका अर्थ है—‘व्यापारिक संगठनवाद’. यानी वह विचारधारा जो संगठित श्रमशक्ति, जो वास्तविक उत्पादक और उपभोक्ता है, द्वारा राज्य और पूंजीवाद की मनमानियों से ऊपर उठकर समस्त आर्थिकराजनीतिक सत्ताकेंद्रों पर अधिकार जमा लेने का पक्ष लेती है तथा उत्पादन को संगठन के हित में उपयोग करने का समर्थन करती है. बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में इसे अराजकतावादीश्रमिकसंघवाद भी कहा जाने लगा था. ‘श्रमिकसंघवाद’ राज्य और पूंजीवाद दोनों की अधिसत्ता के विरुद्ध है. उसका प्रथम लक्ष्य है, राजनीति के बजाय व्यवसाय के नाम पर व्यक्तियों और संगठनों को एकजुट करना, तदनंतर आमूल परिवर्तन के हेतु सदैव तैयार रहना. इस विचारधारा के अनुसार आर्थिक अल्पतंत्र तथा राज्य प्रेरित अधिनायकवाद से मुक्ति के लिए श्रमसंगठन सर्वाधिक सशक्त माध्यम हैं. बहुसंख्यक श्रमिक वर्ग के हितों की रक्षा केवल उनकी संगठित शक्ति और लोकतांत्रिक निर्णयप्रक्रिया द्वारा संभव है. उत्पादन कार्य श्रमसंगठनों के परस्पर सहयोग और श्रमअंतरण के आधार पर संपन्न किया जाए तो उसके बेहतर परिणाम निकलेंगे.

श्रमसंगठनवाद का जन्म फ्रांस में राजनीति प्रेरित समाजवाद के विरोधस्वरूप हुआ था. अल्प समय में ही विश्वभर के समाजवादी दलों ने स्वयं को इसको जोड़ लिया. ‘सिंडीकेलिज्म’ के माध्यम से सभी का एक ही ध्येय था, श्रमिक संघों को संगठन एवं क्रांति के लिए प्रेरित करना और उनकी सहायता से पूंजीवाद को उखाड़ फेंकना. तदनंतर ऐसी समानताधर्मी व्यवस्था का गठन करना जिसमें श्रमिक को उसके द्वारा किए गए कार्य का पूरा पारिश्रमिक प्राप्त हो सके. श्रम के प्रति सम्मान की भावना हो तथा शारीरिकबौद्धिक श्रम के बीच कहीं भी, किसी भी प्रकार का स्तरीकरण जन्म न ले सके. ‘श्रमिकसंघवाद’ की समानधर्मा विचारधारा समाजवाद गणतंत्र का पक्ष लेती थी, वह राज्य को यह अधिकार देती थी कि वह समस्त संसाधनों पर अधिकार कर, लोगों से उनकी क्षमता के अनुरूप काम लेते हुए, उन्हें उनकी आवश्यकता के अनुसार समिधा उपलब्ध कराए. समाजवाद लोकतंत्र और राज्य दोनों का समर्थक था. श्रमिक संघवाद के समर्थकों को लगता था कि राज्य अपने कर्तव्य का पालन करने में असमर्थ रहा है. गणतांत्रिक प्रक्रिया के सहारे सत्ता में आए कथिक सेवाव्रती नेतागण बहुत शीघ्र अपना कर्तव्य भूल जाते हैं. इसलिए श्रमिकसंघवाद राज्य और संसदीय गणतंत्र दोनों का निषेध करता है. इसके स्थान पर वह समस्त सत्ता श्रमिकसंघों को सौंपे जाने का पक्ष लेता है. समाजवाद, अराजकतावाद और समाजवाद की भांति श्रमिकसंघवाद भी मानता है कि श्रमिक वास्तविक उत्पादक हैं, इसलिए उत्पादन का लाभ उनको मिलना ही चाहिए. श्रमिकसंघवाद का विकास समाजवादी ढांचे की असफलता के फलस्वरूप हुआ था. जर्मनी में वामपंथी आंदोलन उनीसवीं शताब्दी में ही जोर पकड़ चुका था. लेकिन इसी शताब्दी के अंत तक समाजवादी नेताओं के बीच तीखे मतभेद जन्म ले चुके थे. 1912 के चुनावों में वहां सोशिलिस्ट पार्टी को एकतिहाई सीटें मिली थीं. समाजवादी धड़ों की इस सफलता में पुनरुत्थानवादी लेखकविचारक आ॓गस्ट बेबल का बड़ा योगदान था. उसकी मृत्यु के उपरांत समाजवादी दलों में फूट पड़ने लगी थी, जिससे ‘जर्मन सोशिलिस्ट’ पार्टी दो हिस्सों में बंट गई. इससे समाजवादी आंदोलन को तात्कालिक रूप से धक्का पहुंचा.

मार्क्स ने अपने जीवन के अंतिम दिन इंग्लेंड में बिताए थे. वहीं रहकर उसने अपने वृहदग्रंथ ‘पूंजी’ का लेखन भी किया था. इसके बावजूद वह इंग्लेंड में मार्क्सवाद का बहुत कम प्रभाव छोड़ पाया था. पूंजीवाद को जोरदार टक्कर देने के लिए वहां सहकारिता आंदोलन पनपा था, जिसने दुनियाभर के परिवर्तनकामियों नेताओं, विचारकों, लेखकों, साहित्यकारों और कार्यकर्ताओं को प्रेरित किया था. 1848 में जब मार्क्स कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो द्वारा श्रमिकों को नए सिरे से एकजुट होने और संगठित विरोध के आवाह्न कर रहा था, इंग्लेंड ‘रोशडेल पायनियर्स’ के नेतृत्व में सहकार की सफल, अहिंसक, परस्पर सहयोगकारी, लोकतांत्रिक डगर पर कदम बढ़ा चुका था. यूरोपीय देशों में चल रहे समाजवादी आंदोलनों से फ्रांस भी अछूता नहीं था. रूसो, चाल्र्स फ्यूरियर, प्रूधों जैसे महान विचारकों जिन्होंने पूंजीवाद विरोध की वैश्विक पृष्ठभूमि तैयार करने का काम किया, वहीं जन्मे थे. श्रममुक्ति एवं श्रमस्वालंबन के लिए चलाए जा रहे आंदोलन के फलस्वरूप फ्रांस में जो समाजवादी आंदोलन जन्मा, उसपर प्रूधों का काफी प्रभाव था. उसको वहां पर ‘क्रांतिकारी श्रमिकसंघवाद’ अथवा ‘श्रमिकसंघवाद’ कहा गया, जो कालांतर में केवल श्रमिकसंघवाद के नाम से पहचाना जाने लगा. नए नाम के बावजूद श्रमिकसंघवाद समाजवाद की प्रारंभिक स्थापनाओं के बेहद करीब था. श्रम, सहयोग, एकता, अखंडता और सीधी कार्रवाही और लोकतांत्रिक संगठन उसके प्रमुख उद्देश्य थे, हालांकि इसमें कुछ सैद्धांतिक कमजोरियां भी थीं. वहीं इसके विकास में अवरोधक बनीं.

अराजकतावाद और समाजवाद यह व्यवस्था करते हैं कि एक बार सत्ताकेंद्रों पर अधिकार जमा लेने के बाद समाजवादी विचारधारा के अनुकूल संस्थाओं का गठन किया जाएगा, जो प्रकारांतर में अर्थिक एवं राजनीतिक गतिविधियों को संभाल लेंगी. उनसे भिन्न श्रमिकसंघवाद श्रमिकसंघों को महत्त्वपूर्ण दायित्व सौंपे जाने का पक्ष लेता है. वह नए श्रमसंगठनों का गठन करने तथा कार्यरत श्रमिकसंघों को अधिक अधिकार दिए जाने का समर्थन करता है. अपने इसी सोच के अनुरूप उसने अपनी सैद्धांतिकी विकसित की थी, जिसके आधार पर फ्रांस में श्रमिकसंघवाद की नींव रखी गई. इसके आशय को समझने के लिए फ्रांस के व्यापारिक संघों, संगठनों की गतिविधियों पर विचार करना प्रासंगिक होगा. फ्रांस में श्रमिकसंघवाद का उदय असल में वहां की आर्थिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों की देन था. अराजकतावादी बकुनिन के समर्थकों का भी उनमें प्रमुख योगदान था. उन्हीं के प्रभावस्वरूप फ्रांस में ‘प्रथम इंटरनेशनल’ को अप्रत्याशित सफलता प्राप्त हुई थी. 1869 में ही ‘प्रथम इंटरनेशनल’ के फ्रांसिसी सदस्यों की संख्या 2,50,000 को पार कर चुकी थी. जाहिर है कि अपनी संगठित शक्ति के बल पर श्रमिक संगठनों का आत्मविश्वास बहुत बढ़ा हुआ था. इसका पहला सुखद परिणाम 1871 की पेरिस क्रांति के रूप में सामने आया. लेकिन बिना किसी पूर्वयोजना के एकाएक सत्ताशिखर पर काबिज हुए श्रमसंगठन लंबे समय तक अपनी स्थिति को बनाए नहीं रह सके; और ‘पेरिस कम्यून’ का वह प्रथम समाजवादी प्रयोग तीन महीने से भी कम समय में विफल हो गया. बहरहाल फ्रांसिसी श्रमिक आंदोलन की उपलब्धियों से इन्कार नहीं किया जा सकता. यह स्थिति तब थी, जब फ्रांसिसी समाजवादी आंदोलन स्वयं कई विचारधाराओं और गुटों में बंटा था तथा फ्रांस और जर्मनी के बीच युद्ध के कारण उसमें 1870—1877 के बीच बड़ा व्यवधान आ चुका था. 1875 के आसपास फ्रांसिसी समाजवादी आंदोलन के दो प्रमुख धड़े थे. एक धड़ा संसदीय लोकतंत्र के समर्थकों का था और दूसरा ‘साम्यवादीअराजकतावादी’ विचारकों का. दूसरा धड़ा राज्य को अपने लक्ष्य की प्राप्ति में सबसे बड़ा दुश्मन मानता था. वे संसदीय लोकतंत्र में चारों से उठ रही सुधारवाद की मांगों की यह कहकर उपेक्षा करते आ रहे थे कि सामाजिक क्रांति के माध्यम से राज्य को सदा के लिए खत्म किया जा सकता है. जब राज्य ही नहीं रहेगा तो संसदीय सुधारों का भी कोई अर्थ ही न रह जाएगा. राज्यसत्ता के विरोधी विचारक दूसरों से संख्याबल में भले ही कम हों, परंतु बौद्धिक प्रखरता में वे अपने प्रतिपक्षियों से कहीं आगे थे. उनमें पू्रधों और बकुनिन प्रमुख थे. उनके विचारों के फलस्वरूप फ्रांस में समाजवादी आंदोलन को भारी सफलता तो मिली थी, लेकिन वह अपने ही अंतर्विरोधों का शिकार होकर रह गया. समाजवादियों का वह धड़ा जो यह मान रहा था कि समाजवादी विचारधारा पर आधारित समाज की स्थापना के पश्चात राज्य नेपथ्य में चला जाएगा, वह स्वयं भारी अंतद्र्वंद्वों का शिकार था. परिणाम यह हुआ कि 1882 में समाजवादी आंदोलनों दो धड़ों में विभाजित हो गया. एक का नेता ज्यूस्ड को बनाया गया. मार्क्स के विचारों का समर्थक ज्यूस्ड अवसरवादी राजनीतिज्ञ पा॓ल बूस का अनुयायी था. मार्क्सवाद को वह वहीं तक अपनाना चाहता था, जहां तक वह उसकी स्वार्थसिद्धि में सहायक हो. 1890 तक आतेआते बूस के साथ उसके जैसे स्वार्थी, कट्टरपंथी और अवसरवादी नेता जुड़ते चले गए. दूसरा वर्ग स्वतंत्र समाजवादियों का था, जिनमें जोर्स, विवायनी, मिलरेंड आदि सम्मिलित थे.

दोनों धड़ों के बीच विवाद लगातार बढ़ते ही जा रहे थे. इससे फ्रांसिसी का परेशान होना स्वाभाविक था. अंततः श्रमसंगठनों ने आपसी सहमति से एक युगांतरकारी निर्णय लिया, जिसके द्वारा श्रमिकहितों को राजनीति से दूर रखने का निर्णय लिया गया. इसके अनुकूल परिणाम कुछ ही समयावधि में सामने आने लगे. आगे चलकर इससे श्रमिक संगठनों को नई ताकत और ऊर्जा हासिल हुई. प्रकारांतर में यही घटना श्रमिकसंघवाद के उद्भव का कारण बनी. बदलती वैश्विक परिस्थितियों ने 1905 में फ्रांसिसी समाजवादी पार्टी के दोनों धड़ों को फिर से एक हो जाने के लिए बाध्य कर दिया. इसका परिणाम ‘यूनाइटेड सोशियलिस्ट पार्टी’ के रूप में सामने आया. उस समय कुछ बुद्धिजीवी ऐसे भी थे जिन्होंने किसी पार्टीविशेष से जुड़ने के बजाय स्वतंत्र रहना पसंद किया था. 1914 में चुनावों में ‘यूनाइटेड सोशियलिस्ट पार्टी’ को 102 सीटें मिली. उनके अलावा 30 समाजवादी निर्दलीय जीतकर आए. दोनों की सम्मिलित संख्या 132, कुल 590 सीटों में बहुमत के अनुसार कम थी, तो भी वह समाजवादी खेमे की अप्रत्याशितअभूतपूर्व विजय थी, जिसने फ्रांस में समाजवादी विचारधारा को पांव जमाने में मदद मिली. समाजवादी होना, फ्रांस की राजनीति में प्रवेश करने के लिए अनिवार्य होता चला गया. लेकिन विडंबना यह रही थी कि समाजवादी झंडे के नीचे चुनाव लड़कर संसद में पहुंचे नेतागण अपने आचरण और व्यवहार में समाजवादी विचारधारा के क्रमशः दूर होते जाते थे. राजनेता ही क्यों पत्रकारों का भी यही हाल था. समाजवादी पत्रिका के संपादक मिर्लेंड का चरित्र तो मानो राजनीतिक अवसरवाद का पक्का उदाहरण था. इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि श्रमिक वर्ग के हितों की राजनीति करने वाले नेताओं का राजनीति से मन उचटता चला गया और वे संगठन की ओर वापस लौटने लगे. इसके फलस्वरूप श्रमिकसंघवाद को नएनए क्षेत्रों में पांव जमाने का अवसर मिला—श्रमिकसंघवाद की दृढ़ मान्यता थी कि श्रमिक वर्ग ही प्रमुख उत्पादक शक्ति है. यह पूंजीवाद की उस अवधारणा का विरोध करता था, जो उसको मात्र उपभोक्ता मानती आई है. उसके नेताओं का जोर कार्य की परिस्थितियों में सुधार के साथ उद्योगों को पुनर्गठित करने पर था—

वह औद्योगिक कार्रवाही को राजनीतिक कार्रवाही के विकल्प के रूप में स्थापित करना तथा विभिन्न व्यापारसंघों एवं श्रमिक संगठनों को ऐसे उद्देश्यों के निमित्त उपयोग करना चाहता था, जिन्हें पारंपरिक समाजवाद संसदीय लोकतंत्र के माध्यम से पूरा करने का सपना देखता रहा है.’

फ्रांस में ‘सिंडीकेलिज्म’ शब्द असल में ट्रेड यूनियनिज्म के पर्याय के रूप में प्रयोग किया जाता है. आगे चलकर फ्रांसिसी श्रमिक संगठनवादी दो भागों में बंटते चले गए. पहला वर्ग सुधारवादियों का था, जो वर्तमान व्यवस्था को ही श्रमिकोन्मुखी एवं उदार बनाना चाहते थे. दूसरा वर्ग क्रांतिधर्मा ‘ट्रेड यूनियनिस्ट’ का था. उनका मानना था कि राज्य की मनमानी के चलते श्रमिक कल्याण के वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त कर पाना असंभव है. इसके लिए श्रमिक संघों को राजनीतिक संस्थाओं के विकल्प के रूप में इस्तेमाल करना होगा. यह दूसरा वर्ग ही आधुनिक ‘सिंडीकेलिज्म’ से संबद्ध माना जा सकता है. फ्रांसिसी श्रमिकसंघवादियों का मूल संगठन 1895 में स्थापित ‘कन्फेडरेशन जनरल आॅफ लेबर’ था, जिसमें आरंभ में 700 से अधिक मजदूर संघ सम्मिलित थे. उनके सदस्यों की संख्या लाखों में थी. इसके बावजूद इस संगठन के महत्त्व को 1902 में ही स्वीकारा जा सका. आरंभ में उसके सदस्यों की संख्या सीमित ही थी—लगभग पांच लाख. परंतु युद्ध की संकटकालीन परिस्थितियों में उसने अपने हजारों समर्थक पैदा कर लिए थे. वाल्डेक रूसो ने 1884 में श्रमिकसंघों को मान्यता देकर ‘श्रमिकसंघवाद’ को नई पहचान दी. उसके बनाए गए कानून में प्रत्येक श्रमिकसंघ की स्वायत्तता को, चाहे वह छोटा हो अथवा बड़ा, उसकी सदस्य संख्या से निरपेक्ष रहते हुए, महत्त्व दिया गया था. प्रत्येक श्रमिकसंघ में राजनीति से दूर रखने का निर्णय लिया गया था. इस निर्णय के पीछे मान्यता थी कि समाजवादी विचारधारा के बीच राजनीति की घुसपैठ संगठन को तोड़ने का काम करेगी. श्रमिकसंघवादियों की मान्यता थी कि कि वर्गसंघर्ष की लड़ाई औद्योगिक प्रविधियों द्वारा लड़ी जानी चाहिए, न कि राजनीतिक प्रविधियों द्वारा. ये औद्योगिक माध्यम क्या हो सकते हैं, इनके लिए उसने औद्योगिक हड़ताल, धरना, प्रदर्शन, पोस्टर और प्रचार को चुना है. उसके अनुसार तोड़फोड़ की कारर्वाही, मशीनरी को नुकसान पहुंचाना असल में श्रमविरोधी कार्रवाही हैं. इससे औद्योगिक संपदा को तो नुकसान पहुंचता ही है, श्रमिक संघों की ऊर्जा का भी दुरुपयोग होने लगता है, जो श्रमिकों में नकारात्मक भावनाएं जगाता है. श्रमिकसंघवाद की सफलता समस्त श्रमिकों, कामगारों, शिल्पकर्मियों को एक बड़े संगठन में ढाल देने तथा उसका अपने वर्गीय हितों के अनुसार उपयोग करने में निहित है. ऐसा संगठन जो नौकरशाही को जन्म देने वाली प्रत्येक व्यवस्था का विरोध करता है, और इस प्रकार वह जनकल्याण एवं विकास से जुड़ी समस्त गतिविधियों पर अपना नियंत्रण रखता है. नौकरशाही और पूंजी के वर्चस्व का निरंतर विरोध करते हुए वह संगठन पूंजीवाद के निर्मूलीकरण की ओर अग्रसर होता है. मानवीय स्वभाव की भिन्नता के आधार पर श्रमिकसंघवादी विचारककार्यकर्ता यह मानते हैं कि आम श्रमिक क्रांतिकारी नहीं हो सकता. आवश्यकता पड़ने पर उसे हड़ताल के लिए प्रेरित अवश्य किया जा सकता है. जिसके माध्यम से क्रांति के लक्ष्य को अपेक्षाकृत आसानी से प्राप्त किया जा सकता है.

श्रममुक्ति के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए श्रमिकसंघवादियों की योजना क्या है? किस प्रकार वे अराजकतावाद और समाजवाद से भिन्न हैं? अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए वे कौनसा मार्ग अपनाते हैं? जैसे कुछ प्रश्नों को जानने की जिज्ञासा यहा स्वतः उत्पन्न हो जाती है. श्रमक्रांति के ये पक्षकार हिंसक क्रांति का समर्थन नहीं करते अपनी लक्ष्यसिद्धि के लिए श्रमिकसंघवादी अभी तक हड़ताल का सहारा लेते आए हैं. कहा जा सकता है कि यही उनका सबसे ताकतवर हड़ताल है. विशेष उद्देश्य के लिए विशिष्ट हड़ताल, जिसको वे पूर्वाभ्यास कहते हैं. यह पूर्वाभ्यास एकजुट होकर संगठन में उत्साह भरने तथा उसके सदस्यों को अपने अधिकारों के प्रति सचेत करने के लिए आवश्यक होता है. संघर्ष में सफलता की स्थिति से भी वे संतुष्ट नहीं होते. श्रमिकसंघवादी मानते हैं कि हड़ताल अथवा पूर्वाभ्यास द्वारा उनका लक्ष्य सिर्फ तात्कालिक मांगें पूरे किए जाने तक सीमित नहीं है. न ही वे मालिकमजदूरों के संबंध में सुधार को अपना लक्ष्य मानते हैं. उनका वास्तविक उद्देश्य पूर्वाभ्यास अथवा हड़ताल के माध्यम से उद्योगों से स्वामित्व की परंपरा को पूरी तरह समाप्त कर, संपूर्ण श्रममुक्ति होता है. उनका लक्ष्य होता है कि हड़ताल द्वारा उत्पादन को पूरी तरह ठप्प कर, पूंजीवाद की रीढ़ तोड़ दी जाए. तदनंतर उद्योगतंत्र पर अपना अधिकार कर, उसका संचालन श्रमकल्याण के मानकों के अनुरूप किया जाए. जहां उत्पादनकर्म लाभ के लिए न होकर सदस्यगणों की आवश्यकता के अनुसार हो. उत्पादनवितरण दौरान किसी भी प्रकार के आर्थिक विषमता घटना को न पनपने दिया जाए, बल्कि जिन क्षेत्रों में पहले से ही आर्थिक असमानता व्याप्त है, वहां उसकी खाई को पाटने के समुचित प्रयत्न किए जाएं.

श्रमिकसंघवाद के व्याख्याकार जार्ज सोरेल(2 नवंबर, 1847—29 अगस्त 1922) उसको ऐसे मिथक के रूप में जनमानस में स्थापित करना चाहता था, जो समाजवाद की स्थापना के लिए अपरिहार्य है. यह मानते हुए कि जनसाधारण की धर्म के प्रति गहरी अभिरुचि होती है, उसने आमहड़ताल को एक ऐसी पौराणिक कथा के रूप में समझने की सलाह दी थी, जिसमें भरपूर आशावाद और मानवकल्याण की संभावना निहित होती है. सोरेल के तर्क को सीधी कार्रवाही में विश्वास रखने वाले श्रमिकसंघवादियों ने पूरी तरह नकार दिया था. उनका कहना था कि यदि आमहड़ताल को मात्र गल्पकथा अथवा मिथक मान लिया तो हड़ताल में जुटे आंदोलनकारियों की संपूर्ण ऊर्जा ही निरर्थक चली जाएगी. लोग उसका व्यर्थ महिमामंडन करेंगे. हो सकता है भावुक प्रवृत्ति के लोग उन मिथकों की अतिश्योक्तिपूर्ण व्याख्या करते उन्हें अपनी स्मृति का स्थायी हिस्सा बनाने का प्रयास करें, लेकिन मिथकीकरण की कृत्रिमता में श्रमसंघवादी आंदोलन अंततः निस्तेजनिष्प्रभ ही होगा. श्रमिकसंघवाद की आलोचना कर रहे कुछ समाजवादी विचारकों का मानना था कि पूंजीवाद के विरुद्ध लड़ाई संसदीय बहुमत प्राप्त करके ही जीती जा सकती है. इसके लिए श्रमिकों में लोकतांत्रिक चेतना का उदय आवश्यक है, ताकि वे राजनीति में अपने प्रतिनिधि उतार सकें अथवा चुनाव मैदान में पहले से मौजूद प्रतिनिधियों में से अपने वर्गीय हितों के समर्थक प्रतिनिधियों का चयन कर सकें. वे हड़ताल द्वारा सरकार पर दबाव बनाए जाने की श्रमिकसंघवादियों की रणनीति का विरोध करते थे. दूसरी ओर अधिकांश श्रमिकसंघवादियों के लिए नेताओं की कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी ही संद्धिग्ध थी. वे ऐसे किसी भी सुधार का विरोध करते थे, जिसमें राज्य और राजनीतिज्ञों की भागीदारी हो. और इस प्रकार वे प्रकारांतर में अराजकतावाद का समर्थन करते थे. हालांकि वे अपने लक्ष्यों में उतने स्पष्ट नहीं थे, जितने कि प्रविधियों में. श्रमिकसंघवाद के समर्थन के लिए भविष्य का स्पष्ट खाका भी उनके पास नहीं था. कहा जा सकता है कि श्रमिकसंघवाद अधूरा दर्शन था, जिसके बारे में श्रमिकसंघवादी विचारक ही अस्पष्ट थे.

श्रमिकसंघवादियों की राय में राज्य पूंजीवादी संस्था है, उसका गठन ही पूंजीवादी शोषण के निमित्त पूंजीवाद की पहल पर, उसकी शर्तों के अनुसार किया जाता है. राज्य की अधिसत्ता के चलते श्रमिकवर्ग आतंक के वातावरण में जीने को विवश होता है. अपनी अधिसत्ता के साथ यदि कोई राज्य श्रमकल्याण का दावा भी करे तो वह निरर्थक और झूठा ही होगा—इस कारण वे राज्यप्रेरित समाजवाद का भी विरोध करते हैं. इसका विकल्प क्या हो? श्रमिकसंघवादी उद्योगों की स्वायत्तता चाहते हैं. उद्योग पर उनका नियंत्रण हो जो स्वयं काम करते हैं—श्रमिकसंघवाद का दर्शन इसी अवधारणा पर टिका हुआ है. लेकिन समाज केवल उत्पादन व्यवस्था पर ही तो निर्भर नहीं. व्यक्ति और समाज के अनगिनत संबंधों की शृंखला तथा उनके बीच जटिल अंतक्र्रियाओं का नियंत्रण भी राज्य को करना पड़ता है. यहां तक कि विभिन्न औद्योगिक संस्थानों के व्यापारिक संबंधों के निर्वहन के लिए भी अलग व्यवस्था की आवश्यकता पड़ती है. नए समाज में इन संबंधों, अंतक्रियाओं का नियंत्रण किस प्रकार संभव होगा? इस बारे में श्रमिकसंघवाद मौन रह जाता है. दुनिया के मजदूर एक हैं, उनकी समस्याएं एक हैं. सभी समस्याएं राज्य और पूंजीवाद की देन हैं. जब न राज्य होगा, न पूंजीवाद तब सेना, न्यायपालिका तथा पुलिसबल की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी. श्रमिकसंघवादी इन सब संस्थाओं को साम्राज्यवाद का प्रतीक मानते हुए उनका विरोध करते हैं. उनके द्वारा पुलिस, न्यायपालिका एवं सैन्यबलों का विरोध इसलिए भी स्वाभाविक था, क्योंकि हड़ताल के दौरान सेना एवं पुलिस राज्य और पूंजीपतियों के हितों की रक्षा का काम करते हैं. चूंकि वे निरंकुशतावादी शासन की उपज होते हैं, अतएव वे तानाशाही को बनाए रखने में मददगार होते हैं. श्रमिकसंघवादी विचारकों के लिए राजनीतिक सीमाएं कोई मायने नहीं रखतीं. उनके अनुसार राज्य द्वारा सेनाओं के ऊपर अंधाधुंध खर्च करना भी औचित्यविहीन है. दूसरी ओर आम हड़ताल तथा प्रकारांतर में विरोधी शक्तियों से सतत संघर्ष, श्रमिक हितों के लिए अनिवार्य हैं. श्रमिकसंघवादी यद्यपि शांतिकामी नहीं हैं, तथापि वे दो विरोधी राज्यों के बीच युद्ध का इस आधार पर विरोध करते हैं, क्योंकि उसके द्वारा श्रमिक को कोई लाभ नहीं पहुंचता. उल्टे युद्ध की स्वाभाविक परिणति के रूप में जन्मीं बेरोजगारी, महंगाई, महामारी जैसी समस्याएं आम जनता के क्लेश का कारण बन जाती हैं. युद्ध के बाद पूंजीवाद और अधिक ताकतवर होकर सामने आता है. इससे समाज में आर्थिक असमानता बढ़ती है. श्रमिकसंघवाद के दर्शन को बीसवीं शताब्दी के महानतम दार्शनिकों में से एक बर्ट्रेंड रसेल ने ‘सिंडीकेलिस्ट रेलवेमैन’ में प्रकाशित एक लेखांश के माध्यम से प्रस्तुत किया है—

श्रमिकसंघवाद, सामूहिकतावाद तथा अराजकतावाद का प्रारंभिक उद्देश्य समाज में व्याप्त आर्थिक असमानता, तज्जनित ऊंचनीच की भावना तथा अन्यान्य वस्तुओं पर निजी अधिकारिता को पूरी तरह समाप्त करना है. लेकिन जहां सामूहिकतावाद निजी अधिकारिता को सर्वाधिकारिता में, अराजकतावाद उसको ‘प्रत्येक की अनाधिकारिता’ में बदलने का लक्ष्य रखता है, वहीं श्रमिकसंघवाद का लक्ष्य संगठित श्रमशक्ति को पूर्ण स्वामित्व दिए जाने से है. तदनुसार यह विशुद्ध रूप से सामाजिक अर्थसंहिता और समाजवाद द्वारा प्रस्तावित वर्गसंघर्ष की श्रमसंगठनवादी व्याख्या है. अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए यह संसदीय कार्रवाही का पूरी तरह बहिष्कार करता है, जिसपर सामूहिकतावाद(सहकार) का समूचा दर्शन आधारित है तथा अराजकतावाद जिसके अत्यधिक निकट है, हालांकि अराजकतावाद की अपेक्षा इसकी कार्रवाही का क्षेत्र बहुत कुछ सीमित भी है.’

प्रसिद्ध ‘टाइम’ पत्रिका के 25 अगस्त 1911 को प्रकाशित इस आलेख से न केवल श्रमिकसंघवाद को समझता जा सकता है, बल्कि उसका अपनी समानधर्मा विचारधाराओं यथा अराजकतावाद तथा सामूहिकतावाद से अंतर भी इस उद्धरण द्वारा स्पष्ट हो जाता है. यद्धपि यह अंतर इतना सूक्ष्म है, खासकर सामूहिकतावाद और श्रमिकसंघवाद में कि उनके बीच स्पष्ट विभाजनरेखा खींच पाना कठिन है. उल्लेखनीय है कि फ्रांस में जहां पर श्रमिकसंघवाद का दर्शन विकसित हुआ, वहां श्रमिक संगठन बहुत शक्तिशाली थे. निरंकुश राजशाही के आतंक तले पनपे उन संगठनों में संघर्ष की पर्याप्त जिजीविषा थी. वे पूंजीवाद और राज्यसत्ता दोनों का उन्मूलन करना चाहते थे. उनके आंदोलन को ही ‘सिंडीकेलिज्म’ कहा गया. वह समाजवाद नहीं था, सच में तो वह समाजवाद का धुर विरोधी दर्शन था. दोनों का प्रथम मतवैभिन्न्य राज्य की अनिवार्यता को लेकर था. समाजवाद का सपना ऐसा निष्पक्ष राज्य था जो अपने नागरिकों के बीच कल्याण के समान बंटवारे की भूमिका निभाए. जबकि श्रमिकसंघवादी विचारक राज्य के पूर्ण उन्मूलन के पक्ष में थे. पूंजीवाद के उन्मूलन हेतु उनके पास एक ही हथियार था. वह हथियार था, हड़ताल! वे चाहते थे व्यापक जनहड़ताल द्वारा पूंजीपतियों को घुटने टेकने को विवश कर देना. इसमें उन्हें प्रारंभिक सफलताएं भी मिली थीं. विकास के आरंभिक दौर की कई बड़ी हड़तालें श्रमसंघवादियों के आंदोलन के नाम इतिहास में दर्ज हैं. उनमें अक्टूबर 1910 की इंग्लेंड की प्रसिद्ध रेलवे हड़ताल भी सम्मिलित है. वर्षों तक चलने वाली इस हड़ताल ने इंग्लेंड का जनजीवन ठप्प कर दिया था. स्पष्ट है कि श्रमिकसंघवाद ने समयसमय पर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया है और कालांतर में यदि पूंजीवाद ने श्रमिक हितों के प्रति यत्किंचित उदारवादी रवैया अपनाया तो उसके पीछे श्रमिकसंघवादियों के आंदोलन का योगदान था. यहां एक स्वाभाविकसा प्रश्न सामने आता है कि समाजवाद के इन तीनों अपररूपों के पारस्परिक संबंध कैसे हैं? जहां तक अराजकतावाद का प्रश्न है, वह श्रमसंघवादियों से सहानुभूति रखता है, बशर्ते उनके द्वारा बुलाई गई हड़ताल को हिंसक क्रांति का विकल्प न मान लिया जाए. उल्लेखनीय है कि अराजकतावाद भी श्रमिकसंघवादियों की भांति राज्यसत्ता का पूर्ण उन्मूलन चाहता है. मगर उसका रास्ता हिंसक क्रांति से होकर गुजरता है. इससे अलग श्रमिकसंघवादी हड़ताल जैसी सामान्य प्रविधियों से काम निकालना चाहते हैं. इसके बावजूद अराजकतावादियों के लिए श्रमिकसंघवाद अपने तात्कालिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सर्वोचित माध्यम है. रुडोल्फ रा॓कर ने श्रमिकसंघवाद की कार्यपद्धति की ओर संकेत किया है कि श्रमिकों यानी—

वास्तविक उत्पादकों द्वारा समस्त उद्यमों का प्रबंधनदायित्व कुछ इस प्रकार संभाल लेने के पश्चात कि विभिन्न समूह, कारखाने, उद्योगशाखाएं समाज की वृहद आर्थिक संरचना के स्वतंत्र सदस्य की गरिमा को प्राप्त कर आवश्यक वस्तुओं का सुव्यवस्थित उत्पादनवितरण करने लगें….उनमें आर्थिक उत्पीड़न की अनगिनत बेड़ियों में जकड़े श्रमिक को मुक्त कराने का संकल्प निहित होना चाहिए.’

श्रमिकसंघवाद के अराजकतावादीसाम्यवादी नजरिये को समझने के लिए हमें इतिहास की गोद में जाना पड़ेगा. करीब डेढ़ सौ वर्ष पहले यानी 1860 के आसपास समाजवादी आंदोलन अपनी रूपरेखा गढ़ ही रहा था. उस समय ‘अंतरराष्ट्रीय वर्किंग मैन ऐसोशिएसन जिसको ‘प्रथम इंटरनेशनल’ के नाम से भी जाना जाता है, क्रांतिधर्मी श्रमिकों का बड़ा संगठन बनता जा रहा था. उनका आंदोलन जैसेजैसे आगे बढ़ रहा था, समाजवादी मार्क्स तथा अराजकतावादी मिखाइल बकुनिन के समर्थकों के बीच तनाव बढ़ रहा था. उस समय तक एक बुद्धिजीवी के रूप में मार्क्स की धाक थी. उसने बकुनिन तथा उसके समर्थकों को ‘प्रथम इंटरनेशनल’ से बाहर जाने पर विवश कर दिया. इसका श्रमिक आंदोलन पर दूरगामी प्रभाव पड़ा. 1871 में पेरिस में कामगारों ने विद्रोह कर, राजसत्ता को बेदम कर दिया और सत्ता की बागडोर अपने हाथों में ले ली. बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में, श्रमिकसंघवादियों को उल्लेखनीय सफलता मिली. श्रमसंघवादियों के पहले अंतरराष्ट्रीय संगठन का गठन 1922 में बर्लिन में किया गया, जिसमें अर्जेंटीना, चिली, डेनमार्क, बलगारिया, मैकिस्को, जर्मनी, पुर्तगाल, स्पेन, फ्रांस, नीदरलेंड आदि देशों के श्रमिकसंगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था. उन्हें लग रहा था कि राज्यसत्ता के विरोध में उपजा साम्यवाद अंततः सत्ताधारी जैसा ही आचरण कर रहा है. श्रमसंघवादियों के खाते में उससे पहले भी कई उपलब्धियां दर्ज हो चुकी थीं. उनमें सबसे बड़ी उपलब्धि थी, ब्रिटेन की 1910 से 1914 के बीच चली हड़ताल, जिसको इतिहास में ‘महान अशांति’ के नाम से जाना जाता है. इस हड़ताल के महानायक टा॓म मान तथा उसके श्रमिकसंघवादी सहयोगी थे. आमहड़ताल की शुरुआत ब्रिटेन की सोशलिस्ट पार्टी के आवाह्न पर हुई थी. सोशिलिस्ट लेबर पार्टी की सदस्य संख्या कम ही थी, लेकिन उसके नेताओं का श्रमिकों पर गहरा प्रभाव था. इसलिए पूंजीवादी शोषण के विरुद्ध एक वर्ग आगे आया तो बाद में एक के बाद एक, नए मोर्चे खुलते चले गए. ‘महान अशांति’ के नाम से विख्यात वह हड़ताल ब्रिटेन की सबसे बड़ी हड़ताल थी, जिसमें छोटीबड़ी 872 हड़तालें शामिल थीं. उस हड़ताल को स्कूल, खनन, यातायात, इंजीनियरिंग, कपड़ा उद्योग आदि उत्पादकता के लगभग सभी क्षेत्रों के श्रमिकों का समर्थन प्राप्त था. वह हड़ताल श्रमिकों में यह भावना पैदा करने में सफल रही कि अपने संगठन के बल पर वे पूंजीवाद को घुटने टेकने के लिए विवश कर सकते हैं. श्रमिक संघवाद का उदय उसी आत्मविश्वास की परिणति बना. बीसवीं शताब्दी के चौथे दशक तक श्रमिकसंघवादी पूरे यूरोप में सक्रिय रहे, लेकिन उसके बाद बदली हुई वैश्विक परिस्थितियों में यह आंदोलन ठंडा पड़ता गया. अपनी उद्देश्यपरकता के बल पर यह आंदोलन दुनियाभर के श्रमिक संगठनों, समाजवादी विचारकों, दार्शनिकों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कराने में सफल रहा था. हालांकि अपनी सीमाओं के चलते यह समाज में अपना समुचित स्थान नहीं बना पाया. इसका कारण संभवतः यह था कि श्रमिकसंघवाद आर्थिक उत्पादनकेंद्रों को अतिरिक्तरूप से महत्त्व देता है. यह मान लेता है कि अर्थव्यवस्था के òोतों तथा आर्थिक उत्पादन केंद्रों पर अधिपत्य कर लेने के उपरांत श्रमिकों की सभी समस्याएं समाप्त हो जाएंगी. इस सीमित दृष्टि को आधार बनाकर अनेक बुद्धिजीवियों ने इसकी आलोचना भी की है. रोजा लेक्समबर्ग ने श्रमिकसंघवादियों पर मार्क्सवाद की मूल अवधारणा से दूर जाने का भी आरोप लगाया था. उसके अनुसार—

आधुनिक सर्वहारा वर्ग का संघर्ष किसी पूर्वनिर्धारित सिद्धांत अथवा परिकल्पना के आधार पर जैसा कुछ पुस्तकों अथवा विचारधाराओं के आधार पर तय किया गया है, आगे नहीं बढ़ाएगा. श्रमिकों का आधुनिक संघर्ष इतिहास और सामाजिक प्रगति का सहज हिस्सा है और इतिहास के बीच में, प्रगतिधारा के बीच में, संघर्ष के बीच में हम लगातार यह सीखते रहे हैं कि हमें अपने संघर्ष को किस प्रकार आगे बढ़ाना चाहिए.’

स्वयं श्रमिकसंघवाद में भी, उसके एक शताब्दी के इतिहास में अनेक परिवर्तन हुए हैं. व्यावसायिक संगठनवादी आंदोलन के विकल्प के रूप में जन्मा श्रमिकसंघवाद अपने लक्ष्य को पाने के लिए केवल हड़ताल और श्रमिक आंदोलन को पर्याप्त मानता था. वह श्रमिकों को अपने आर्थिक हितों के लिए संगठित संघर्ष की प्रेरणा देता था. बहुत जल्दी श्रमिक संघवादियों को लगने लगा था कि सिर्फ सैद्धांतिक व्यवस्था कर देने मात्र से समस्या का समाधान संभव नहीं है. पूंजीपति आसानी से उस हड़ताल को तोड़ सकते हैं. अपनी पूंजी के दम पर वे राज्य को श्रमिकविरोधी कदम उठाने के लिए बाध्य कर सकते हैं. अतः लक्ष्यप्राप्ति के लिए कुछ ठोस प्रयास आवश्यक हैं. श्रमिकसंघवादियों का एक समूह मानता था कि उत्पादनतंत्र पर कब्जा करने के लिए बलप्रयोग आवश्यक है. उन्हीं की प्रेरणा से अराजकश्रमिकसंघवाद की अवधारणा का विकास हुआ. अराजकतावादी श्रमिकसंघवाद पद का आशय ऐसे श्रमिक आंदोलन से है, जो येनकेनप्रकारेण, यहां तक कि हिंसा के प्रयोग द्वारा भी, पूंजीवाद को समाप्त करने के लिए कटिबद्ध हो. इसके समर्थकों का मानना है कि लघु शैक्षिक समूहों से लेकर बड़े औद्योगिक क्रांतिधर्मी संगठनों तक, स्वाधीनतावादी जनसमूहों को अपने लक्ष्य के मद्देनजर निरंतर संघर्षरत रह उस समय तक आगे बढ़ते रहना चाहिए, जब तक कि समस्त उत्पादन केंद्रों पर उसका अधिकार न हो जाए. मगर पूंजीवाद के विरुद्ध लंबी लड़ाई बिना जनसमर्थन के लिए असंभव है. उसके लिए संगठन का लोकतांत्रिक होना अनिवार्य है. उसके अभाव में संघर्ष के अपने लक्ष्य से भटकने तथा तानाशाही में ढल जाने का खतरा बना रहता है, यह स्थिति पहले से भी खतरनाक हो सकती है. इससे बचाव हेतु सभी प्रमुख निर्णय कार्यालयीन सभाओं में न लेकर बड़ी सर्वसदस्यीय बैठक के बीच लिए जाने चाहिए. परंपरागत श्रमिक संघवाद यह नहीं बताता था कि उत्पादन केंद्रों पर अधिकार करने का मार्ग कौनसा होगा. लेकिन अराजकतावादी श्रमिकसंघवाद में उत्पादन केंद्रों पर कब्जा करने के लिए हिंसात्मक क्रांति का सहारा लेने की छूट दी जाती है. इसके समर्थक ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ से प्रेरित हैं, जिसके बारे में स्वयं मार्क्स भी आशंकित था. विश्वभर में आजकल अराजकतावादीश्रमिकसंघवाद का ही अधिक प्रचलन है. स्पेन, आट्रेलिया, फ्रांस, इंग्लेंड, डेनमार्क, नीदरलेंड आदि देशों के श्रमिक आज भी भारी संख्या में श्रमिकसंघवादी संगठनों से जुड़े हुए हैं. सभी स्थानों पर उसकी स्थिति पूंजीवाद के सशक्त विपक्ष की है.

©ओमप्रकाश कश्यप

समाजवाद के आधुनिक विकल्प

सामान्य

अराजकतावाद(अनार्किज्म)

समाजवाद उदार मन की अपरिग्रही कामना है. यह समाजवाद का जादू ही है जिसने बीसवीं शताब्दी के प्रायः सभी प्रमुख बुद्धिजीवियों, दार्शनिकों, वैज्ञानिकों को अपनी ओर आकर्षित किया है. उसके समर्थकों में बर्ट्रेंड रसेल, जॉन रस्किन, अल्बर्ट आइंस्टाइन, ग्राम्शी, जॉन स्टुअर्ट मिल, ज्यां पाल दि सार्त्र आदि विश्व की महानतम प्रतिभाएं सम्मिलित हैं. ये सभी कहीं न कहीं मार्क्स से प्रेरित हैं. परवर्ती विचारकों ने मार्क्स के दर्शन को अपने उठान बिंदु के रूप में लिया है. मार्क्स के अलावा मिल भी उन्हें प्रभावित करता है. अतः मार्क्स को यदि ‘समाजवाद का चैंपियन’ कहा जाता है, तो मिल ‘स्वाधीनता का चैंपियन’ स्वतः बन जाता है. हालांकि दोनों के बीच कोई स्पष्ट विभाजन रेखा खींच पाना संभव नहीं है. इसलिए कि मिल का ‘स्वाधीनतावाद’ ही अपने भीतर ‘समाजवाद’ की अनेक विशेषताओं को सहेजे हुए है.

मिल ने सुखवाद का प्रणयन किया और कहा कि व्यक्तिमात्र का सुख बिना उसकी स्वतंत्रता की सुरक्षा के असंभव है. यदि व्यक्तिमात्र को सुख पाने का अधिकार है तो यह व्यवस्था किसी एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने का अधिकार नहीं दे सकती. दूसरे शब्दों में मिल का ‘स्वाधीनतावाद’ समाजवाद का पूरकसंरक्षक एवं संसाधक है. किंतु व्यक्तिस्वातंत्र्य का समर्थक मिल कुछ भी ऊपर से थोपना नहीं चाहता. वह इसको चेतना की उठान के निक्ष के रूप में प्राप्त करना चाहता है. जबकि मार्क्स का मानना था कि सत्ताशिखर पर विराजमान लोग आसानी से कुछ भी छोड़ने को तैयार न होंगे. उनसे मुक्ति के लिए सर्वहारा का संगठित संघर्ष अपरिहार्य है. मार्क्स और मिल के समाजवाद में अंतर भी यही है. मार्क्स समाजवाद को समाज के लिए अपरिहार्य मानता है, जबकि मिल उसको मनुष्य की इच्छा पर सौंप देता है. उसके अनुसार यह लोगों की इच्छा से ही तय होना चाहिए कि वे ‘निजी संपत्ति’ अथवा ‘सामूहिक संपत्ति’ में से किसको वरीयता देते हैं. पूर्वग्रह की पराकाष्ठा में सामंजस्य की संभावना घट जाती है. फलतः व्यक्ति भीड़ के आचरण पर उतर आता है, जहां विचारधाएं तथा निजी पूर्वग्रह इतने गड्डमड्ड हो जाते हैं कि उनमें वास्तविक की पहचान करना असंभवसा हो जाता है. उल्लेखनीय है कि समाजवादी चिंतक ‘स्पर्धा’ को पूंजीवाद का औजार मानते रहे हैं. मिल सहकारिता का समर्थन करता है, लेकिन सीमित अर्थों में. वहां भी वह व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता को बनाए रखना चाहता है. औद्योगिक स्पर्धा की आलोचना करते समय थांपसन ने कहा था कि—

स्पर्धा, सहृदयता, सहकार एवं सदाचार की विचारधारा के सर्वथा प्रतिकूल है. स्पर्धा के बीच में सप्लाई को मांग के अनुसार इच्छुक व्यक्तियों में समविभाजित कर पाना अत्यंत कठिन होता है. श्रमिकगण मशीनरी के साथ बेमेल स्पर्धा से सदैव त्रस्त रहते हैं. स्पर्धा का स्वभाव ही है मनुष्य और मनुष्य के बीच ऊंची दीवार खींचकर, उन्हें एकदूसरे का दुश्मन बना देना.’

थांपसन की आलोचना करते हुए मिल ने कहा था कि यदि अत्यंत प्राचीन उत्पादन पद्धतियों को छोड़ दें तो स्पर्धा प्रत्येक समाज में उपस्थित रही है. उससे बच पाना मनुष्य के लिए सदैव कठिन रहा है. उसने कहा था कि यदि कोई समुदाय किसी एक वस्तु का उत्पादन करता है, तो उसी वस्तु का उत्पादन करने वाले दूसरे समाज अथवा औद्योगिक वर्गों से उसकी स्पर्धा रहेगी. फिर चाहे व्यापार का मामला हो अथवा उत्पादन का. इस आधार पर उसने बाजारआश्रित अर्थव्यवस्था का पक्ष लिया है. दरअसल व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता एवं सुख का समर्थक मिल मनुष्य पर किसी भी प्रकार के बाहरी प्रतिबंध को अनुचित मानता था. वह समाजवाद को राजनीतिक दर्शन मानते हुए उसका प्रचलित राजनीतिक दर्शनों के साथ तुलनात्मक अध्ययन करता है. दूसरी ओर मार्क्स समाजवाद को विशुद्ध विज्ञान मानता था. उसका मानना था कि विज्ञान की उपयोगिता असंद्धिग्ध है. मिल समाज के हित में व्यक्तिहितों का बलिदान करने को सरासर अमानवीय मानता था. मिल का कहना था कि, ‘प्रायः सभी समाजों में पहले से ही व्यक्तिहित की सामूहिक हितों से तुलना करना लगातार बढ़ती बुराई है. साम्यवादी वातावरण में यह और भी अधिक हो सकती है, जबकि यह मनुष्य के हाथ में है कि वह प्रत्येक व्यक्ति को इतनी छूट दे कि वह अपनी रुचि एवं स्वभाव के अनुकूल अपने कार्यक्षेत्र का निर्धारण करे.’

असल में मिल और मार्क्स दोनों ही समाजवाद के समर्थक हैं. केवल उसकी स्थापना के तौरतरीकों को लेकर दोनों में कुछ मतभेद हैं. बीसवीं शताब्दी में समाजवाद ने स्वयं को लोगों की आवश्यकता के अनुसार बदला है. हालांकि आज भी समाजवाद की परिभाषा को लेकर लोगों के बीच विचारवैभिन्न्य है. तो भी समाज की कुल पूंजी, भूसंपदा और संसाधनों पर समाज के गणतांत्रिक नियंत्रण को समाजवाद मान लिया गया है. जहां संपत्ति राज्याधिकार में हो परंतु गणतांत्रिक व्यवस्था का अभाव हो, उन्हें समाजवादी राज्य मानने में संकोच है. समाजवाद का समानधर्मा अराजकतावाद भी संपत्ति पर राज्याधिकार को मान्यता देता है. लेकिन अराजकतावाद में राज्य लोगों की चेतना में विस्तरित मानवतावादी अवधारणा है, जिसमें आधुनिक राज्य की अन्य सभी विशेषताओं यथा कानून, अदालत, पुलिस, वकील, न्यायाधीश आदि का अभाव होता है. अराजकतावाद राज्यसत्ता की संपूर्ण अनुपस्थिति की अवधारणा पर आधारित है. अराजकतावादी राज्य में संपत्ति स्वयंचेता और आत्मानुशासित नागरिक समूहों के अधिकार में होती है.

उनीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में समाजवाद शब्द के अतित्व में आने के पश्चात से आज तक इसकी अनेक व्याख्याएं हुई हैं. 1830 में अलेक्जेंडर विनेट द्वारा इस शब्द को पहली बार परिभाषित करने से लेकर आज तक इस शब्द को लेकर अनेक परिभाषाएं सामने आई हैं. विनेट ने सीधेसीधे कहा था कि ‘समाजवाद पूंजीवाद का विलोम है.’ जबकि इस शब्द को उछालने वाले राबर्ट ओवेन के अनुसार समाजवाद ‘नैतिकता की विषयवस्तु’ है. समाज का गठन इस प्रकार किया जाना चाहिए कि वह अपने अधिकतम लोगों का अधिकतम हितसाधन का माध्यम बने. जबकि पियरे जोसेफ प्रूधों ने कहा था कि मनुष्य की प्रत्येक अभिलाषा जो सामाजिक उन्नति में योगदान दे—समाजवाद है.

समाजवाद की लगभग एक सर्वमान्य परिभाषा संत साइमन ने देने की कोशिश की थी. उसने कहा था—‘प्रत्येक से उसकी क्षमता के अनुसार तथा प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुरूप.’ संत साइमन को समाजवादी चिंतकों में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है. उससे पहले हेनरी मूर अपनी पुस्तक ‘यूटोपिया’ में समानता पर आधारित समाज की झलक प्रस्तुत कर चुका था. मूर का ‘यूटोपिया’ हालांकि समानता के विचार का मजाक उड़ाते हुए लिखी गई पुस्तक थी. लेकिन अपने प्रकाशन के बाद ही यह पुस्तक परिवर्तनकामियों की आंखों पर ऐसी चढ़ी कि शताब्दियों तक इसका सम्मोहन बना रहा. साइमन के अनुसार समाजवादी तंत्र में उन सभी व्यवस्थाओं को मिटाने का भरसक प्रयत्न किया जाता है, जो आर्थिक असमानताओं को बनाए रखने में सहायक हों. संत साइमन के बाद रूसो ने व्यक्ति स्वातंत्रय का विचार सामने रखा, जो कालांतर में समाजवादी विचारधारा को संपुष्ट करने में मददगार बना. चाल्र्स फ्यूरियर, राबर्ट ओवेन, डेविड रिकार्डो ने अपनीअपनी तरह से आर्थिक असमानता की खाई को पाटने के लिए सुझाव दिए. पर समाजवाद को वास्तविक बल मिला, कार्ल मार्क्स से. उनीसवीं शताब्दी के इस विलक्षण प्रतिभाशाली और मेधावी विचारक ने इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या करते हुए विकास एवं उत्पादन के साधनों को एकदूसरे का पूरक माना. प्रतीकात्मकता से बाहर आर्थिकसामाजिक तथ्यों की ठोस व्यावहारिक स्तर पर समीक्षा करते उसने वैज्ञानिक समाजवाद का नारा दिया.

मार्क्सवादी विचारधारा में समाजवाद सामाजार्थिक विकास की विशिष्ट स्थति है. मार्क्स ने कामना की थी कि सुरसामुखी पूंजीवाद बढ़तेबढ़ते एक दिन अपने चरम पर पहुंचेगा और वर्गसंघर्ष का शिकार बनेगा. उसने सर्वहारा वर्ग का आवाह्न भी किया था कि वह संगठित विद्रोह द्वारा अपनी परतंत्रता की बेड़ियों को काट फेंके. ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’(1848) के लेखन के बाद से हालांकि स्वयं मार्क्स की विचारधारा में परिवर्तन दृष्टिगत हुए, इसके बावजूद उनीसवीं और बीसवीं शताब्दी में, 1871 में पेरिस कम्यून की असफलता के बावजूद मार्क्सवाद एवं समाजवाद परस्पर पर्याय बने रहे. मार्क्स ने समाजवादी विचारधारा को धर्म की भांति अपने अनुयायियों के दिमाग में पैठाया, परिणाम यह हुआ कि मार्क्सवाद की शरण में आने वाले राजनीतिज्ञों, विचारकों की संख्या लगातार बढ़ती गई. मार्क्सवाद का प्रसार दुनियाभर में हुआ, लेकिन उसकी खूबी यह रही कि अलगअलग देशों के नेताओंविचारकों ने मार्क्सवाद का अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप स्थानीयकरण किया गया. जिसके फलस्वरूप आज समाजवाद के दर्जनों रूप समाज में प्रचलित हैं. मार्क्सवादलेनिनिज्म, मार्क्सवादट्राट्सकिज्म’ वैज्ञानिक समाजवाद, समष्ठिवाद, श्रमिकसंघवाद, अराजकतावाद, सहजीवितावाद उनमें से हालांकि कुछ का प्रभाव निश्चय ही दूसरों से अधिक है, लेकिन आर्थिकसामाजिकराजनीतिक असमानता को मिटाने के लिए उनकी प्रतिबद्धता लगभग एकसमान है. बीसवीं शताब्दी में समाजवाद के कुछ नए रूप सामने आए हैं, उनमें ‘समष्ठिवाद’, ‘श्रमिकसंघवाद’, ‘अराजकतावाद’, ‘सहजीवितावाद’, ‘संघवाद’, सामूहिकतावाद आदि विभिन्न विचारधाराएं हैं. समाजवाद के विभिन्न वैश्विक रूपों को देखते हुए उन्हें दो प्रमुख वर्गों में विभाजित किया जा सकता है.

इनमें पहला है, क्रांतिकारी समाजवाद. इस वर्ग में मार्क्सवाद और अराजकतावाद जैसी विचारधाराएं आती हैं, जो संगठित सर्वहारा शक्ति के बल पर उत्पादनतंत्र पर अधिकार जमा लेने का पक्ष लेती हैं. जिनके समर्थकों का विश्वास है कि पूंजीपति वर्ग स्वेच्छा से कुछ भी छोड़ने को तत्पर न होगा. इसके प्रवर्तक क्रमशः कार्ल मार्क्स एवं मिखाइल बकुनिन हैं. दूसरे वर्ग में श्रमिक संघवाद, सहजीवितावाद, सामूहिकतावाद, सहकारिता आदि विचार आते हैं, जो संगठित जनशक्ति का रचनात्मक उपयोग करने के समर्थक हैं तथा किसी न किसी प्रकार सहकारिता से प्रेरितप्रभावित हैं. मार्क्सवाद और अराजकतावाद जहां पूंजीवाद से सीधे टकराने के समर्थक हैं. इसी की समानधर्मा अन्य विचारधाराओं में लेनिनवाद, ट्राट्स्कीवाद, माओवाद, क्रांतिकारी मार्क्सवाद, सामाजिक अराजकतावाद, जैसी विचारधाराएं भी क्रांति के आधार पर बदलाव की समर्थक हैं. वहीं दूसरे वर्ग की विचारधाराएं पूंजीवाद के समानांतर स्वयं को शक्तिशाली और सर्वव्यापी बनाते हुए स्वयं को उसके विकल्प के रूप में प्रस्तुत करना चाहती हैं. इनमें सहकारिता का विचार सबसे पुराना है. इनके अतिरिक्त ‘अराजकश्रमसंघवाद’(अनार्कोसिंडीक्लिज्म) जैसे सम्मिलित विचार भी जन्मे, जिसमें कोई श्रमिकसंघ अथवा श्रमिक संगठन गणतांत्रिक पद्धति से सत्ता पर अधिकार जमा लेता है, तथा अर्थव्यवस्था का संचालन समाजवादी आदर्शों के अनुरूप करने लगता है. यहां हम इन विचारधाराओं का संक्षिप्त परिचय प्राप्त करेंगे.

अराजकतावाद

अराजकतावाद यानी ‘anarchism’ ग्रीक मूल के शब्द ‘anarchos’ से जन्मा है, जिसके उपसर्ग ‘an-‘ का अर्थ है ‘बिना’(without), जबकि ‘archê’ का अभिप्राय राज्यसत्ता, सरकार अथवा कानून से है. इस प्रकार ‘अनार्किज्म’ का अर्थ हुआ—‘बिना सरकार का राज’. ऐसा राज्य जो नागरिकसंचेतना द्वारा अनुशासित हो. कानून के बजाय जहां मनुष्यता का अनुशासन चलता हो. यह थोपे हुए शासन का विरोध करता है. ‘अनार्किज्म’ के पर्यायवाची के रूप में कुछ विद्वान ‘लिब्रटेरियनिज्म’ यानी ‘स्वाधीनतावाद’ शब्द का उपयोग करते हैं, इसका भी अभिप्राय मनुष्य की अबाधगतिशील स्वाधीनता से है. यह माना गया है कि बाह्यः सत्ता द्वारा आरोपित कानून, पुलिस, न्यायिक संस्थाएं, सैन्य बल आदि मनुष्य की स्वतंत्रता को बाधित करते हैं. इससे सत्ता शक्तिकेंद्र के रूप में ढलती जाती है और प्रकारांतर में वह मनुष्य के नैतिक उत्थान में अवरोधक बनती है. अपनी अधिसत्ता की सुरक्षा के लिए शिखरस्थ शक्तियां समाजिक स्तरीकरण की पोषक संस्थाओं का सहारा लेते हैं. कुछ विद्वान ‘अराजकतावाद’ के स्थान पर ‘लिबर्टेरियन सोशियलिज्म’ ‘स्वाधीनतावादी समाजवाद’ शब्दयुग्म का उपयोग भी करते हैं. विश्व में अराजकतावाद समर्थक दार्शनिकों की खासी संख्या रही है. ईसापूर्व पांचवीछठी शताब्दी में भारत, चीन और यूनान में अराजकतावाद के समर्थक दार्शनिक रहे हैं. चीन में ताओ के शिष्य लाओ जु, चुआंगजु, बाओ जिंग्यान राज्यसत्ता के आलोचक थे. चुआंग जु(369—286) ने किसी भी प्रकार की अधिकारिता को मनुष्यता पर अंकुश माना था. राज्यसत्ता में पलने वाले अन्याय का उल्लेख करते हुए उसने लिखा था कि वह प्रायः अन्यायी का पक्ष लेती है. साधारण व्यक्ति के लिए कानून अनगिनत निषेधाज्ञाओं और प्रतिबंधों का जखीरा खड़ा कर देता है, जबकि शक्तिशाली को मनमानी करने के लिए खुला छोड़ देता है. कानून का लाभ उठाकर सत्ताशीर्ष पर विराजमान लोग जनसाधारण का शोषण और उत्पीड़न करते रहते हैं. राज्य का झुकाव समृद्धिशाली वर्ग की ओर होता है, वह पहले से ही सुविधासंपन्न वर्ग को और अधिक सुखसुविधाएं बटोरने का अवसर प्रदान करता है, जबकि निर्धन उसकी दया पर जीने के लिए विवश होता है.

राज्य के असमानतापूर्ण आचरण के बारे में चुआंग जु ने लिखा था कि उसके बनाए कानून ने—‘मामूली चोर को जेल भेज दिया गया है, जबकि खूंखार डकैत राज्याधिपति बना हुआ है.’ जीवन में कृत्रिमता के विरुद्ध चुआंगजु का मानना था कि प्रत्येक प्राणी अपने आप में पूर्ण है. प्राकृतिक रूप से समृद्ध. सामान्य जीवन जीने के लिए प्राणी को किसी बाह्यः साधन की आवश्यकता ही नहीं है. वह उदाहरण देता है—

घोड़ों के खुर होते हैं, जिनसे वे बर्फीली, फिसलनयुक्त सतह पर चल सकें. बाल होते हैं जो उनकी तेज हवा और ठंड से रक्षा कर सकें. वे प्रकृति में सहज उपलब्ध घास खाते, पानी पीते तथा अपनी मजबूत ऐड़ियों के बल पर लंबी दौड़ भी लगाते हैं. यह घोड़ों का कुदरती लक्षण है. राजसी जीन उनके लिए व्यर्थ है.’

चुआंगजु के विचार सुनकर एक दिन पो लो नामक व्यक्ति उसके सामने पहुंचा और कहने लगा—‘घोड़ों की देखभाल कैसे की जाए, यह मैं भलीभांति जानता हूं.’

उसने घोड़ों पर निशान लगाया, उन्हें बांधा, उनके खुरों को अच्छी तरह से साफ किया, वे भागें नहीं इसलिए पैरों में रस्सा भी डाल दिया. उसके बाद उसने उनपर लगाम कसकर अश्वशाला में बांध दिया. लेकिन इस कोशिश में कुछ दिनों बाद दस में से दोतीन घोड़े मर गए. प्रशिक्षण देने के लिए उसने घोड़ों को भूखा और प्यासा रखा, उन्हें सरपट और दुलकी चाल से दौड़ाया. उनके बालों को तराशा. लगाम कसी. फिर एक दिन ऐसा भी आया जब उनमें से आधों ने दम तोड़ दिया.’

चुआंगजु का यह उदाहरण दर्शाता है कि कृत्रिमता जीवन को सुविधाजनक भले बनाए, किंतु वह अनेक व्यवधान भी खड़े करती है. मनुष्य को हालांकि सामाजिक प्राणी कहा जाता है, लेकिन सामाजिक होना केवल मनुष्य का लक्षण नहीं है. यह गुण अन्य जीवों में भी पाया जाता है. चींटियों, मधुमक्खियों तथा पक्षियों की सामाजिकता पर अनेक ग्रंथ रचे जा चुके हैं. मनुष्य ने लंबा जीवन प्रकृति के सान्न्ध्यि में बिताया है. अब भी प्रकृति पर उसकी निर्भरता कम नहीं हो पाई है. इसलिए उसकी सामाजिकता प्रकृति और नैसर्गिक नियमों से मुक्त नहीं हो सकती, जो जीवन में कृत्रिमता का निषेध करते हैं. जीवन की नैसर्गिकता को बचाए रखने की आवश्यकता के पक्ष में चुआंगजु एक के बाद एक कई तर्क देता है. वह लिखता है कि कुम्हार यह दावा करता है कि वह मामूली मिट्टी को मनमानी आकृति में ढाल सकता है, चाहे गोल हो या चौकोर, आयताकार हो अथवा वृताकार—उसके लिए कुछ भी कठिन या असंभव नहीं है. काष्ठकार यह गुमान करता है कि वह लकड़ी को जैसी चाहे वैसी आकृति देने में कुशल है. चाहे गोलाकार हो या घुमावदार. सीधी हो अथवा आड़ी—सब उसके लिए बाएं हाथ का खेल है. ऐसा ही दावा दूसरे शिल्पकर्मी भी कर सकते हैं. चुआंगजु के अनुसार उपर्युक्त उदाहरण में कुम्हार और काष्ठकार दोनों अपनीअपनी कला का बखान करते हैं. मिट्टी और लकड़ी स्वयं क्या चाहती हैं, उनकी अपनी खुशी किसमें है, यह उनमें से कोई नहीं जानना चाहता. जैसे पो लो ने घोड़ों से साथ वह किया जो वह चाहता था; या जो उसको सिखाया गया था. घोड़े स्वयं क्या पसंद करते हैं. किस कार्य में उन्हें सर्वाधिक खुशी हासिल होती है, यह उसने कभी जानने का प्रयास ही नहीं किया था.

यही प्रवृत्ति शासक की होती है. हर शासक सत्ता पर सवार होते ही मनमानी पर उतर आता है. वह दावा करता है कि उसका शासन जनता के हक में, उसकी बेहतरी के लिए है. जनता स्वयं क्या चाहती है, यह जानने का वह कभी प्रयास तक नहीं करता. जनता के लिए ऐसा शासक अनपेक्षित और अनावश्यक है. राज्यसत्ता को अनावश्यक और अप्रासंगिक बताने वाला चुआंगजु पहला विद्वान नहीं था. उससे लगभग दो शताब्दी पहले जन्मे लाओजु ने साफ लिखा था कि सर्वोत्तम तो यह है कि सरकार हो नहीं. यदि सरकार बनाना अनिवार्य है, तो बुद्धिमानी इसमें है कि उसका स्वरूप एकदम सादा और सरल हो. वह कोई काम न करे. बस शांत बनी रहे. व्यक्तिमात्र को बदलने के लिए, उसको नागरिक धर्म सिखाने के लिए वे अपनी ओर से कौनसा कदम उठाना चाहेंगे, इस प्रश्न के उत्तर में लाओजु का कहना था—

मैं कोई कदम नहीं उठाऊंगा. लोग खुद अपने आप को बदलेंगे. मैं खामोशी का पक्ष लूंगा, लोग स्वयं अपनी मंजिल तय कर लेंगे. मैं कोई कार्रवाही नहीं करूंगा, अपने उत्थान के लिए लोग स्वयं आगे आएंगे….’

लाओजु का मानना था—

संसार में लोगों पर जितने अधिक प्रतिबंध और निषेध थोपे गए हैं, उतनी ही यहां दरिद्रता है….दुनिया में जितने अधिक नियम, कानूनादि होंगे, उतने ही अधिक चोरडकैतदुराचारी यहां होंगे.’

मानवसमूह की कुछ सामान्य विशेषताएं होती हैं. जैसे हर व्यक्ति अपना भोजन स्वयं कमानाकरना पसंद करता है. अपने कपड़े वह स्वयं पहनता है. अनौपचारिक वातावरण में ऐसे अनेक कार्य हो सकते हैं, जिन्हें मनुष्य को स्वयं करने से प्रसन्नता प्राप्त होती हो. कहा जा सकता है कि ये उसके जन्मजात लक्षण हैं. इन कार्यों के लिए किसी बाहरी उपकरण अथवा सहायता की आवश्यकता भी नहीं पड़ती. इस स्तर तक मनुष्य को शासन की भी आवश्यकता नहीं है. यह आदिम अवस्था है. परंतु जब कोई समाज विकास की ओर अग्रसर होता है, तो वह पाता है कि विकास के लिए आवश्यक मानी जाने वाली सभी वस्तुओं का उत्पादन प्रत्येक के लिए संभव नहीं है. अपनी रुचि, स्वभाव, सामथ्र्य के आधार पर व्यक्ति किसी कार्यविशेष में ही निपुण हो सकता है. इन स्थितियों में कार्यविभाजन समाज की आवश्यकता बन जाता है. पूंजीवादी व्यवस्था में कार्यविभाजन का आधार लाभ की वांछा से किया जाता है. उससे समाज में स्पर्धा बढ़ती है, जो एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति की दासता के लिए बाध्य करती है. इसलिए आवश्यक है कि कार्यविभाजन लार्भाजन के बजाय सामूहिक कल्याण की भावना से प्रेरित हो, ताकि मनुष्य की स्वतंत्रता किसी भी प्रकार से बाधित न हो.

यूनानी विचारकों में अराजकतावाद का प्रमुख व्याख्याकार हम क्रीटवासी जीनो को पाते हैं. ईसा पूर्व 342 ईस्वी में जन्मा यह प्रतिभाशाली यूनानी दार्शनिक स्टोइक दर्शन का जन्मदाता था. प्लेटो के आदर्श राज्य की परिकल्पना का विरोध करते हुए उसने मुक्त समाज की स्थापना पर जोर दिया था. उसने राज्य की संप्रभुता, शक्ति संपन्नता, नागरिकों के जीवन में हस्तक्षेप करने के उसके अधिकार, ताकत बटोरने हेतु सेनाएं खड़ी करने की प्रवृत्ति तथा साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाओं का विरोध करते हुए व्यक्तिमात्र की नैतिकता तथा उसको संरक्षण प्रदान करने वाले नियमों का पक्ष लिया था. व्यक्ति की जटिल मनोरचना का विश्लेषण करते हुए जीनो ने लिखा था कि आत्मसंरक्षण और आत्मपरिर्वधन की प्रवृत्ति जहां मनुष्य को अहंवादी बनाती है, वहीं इसको संतुलित करने के लिए एक अन्य प्रवृत्ति भी मानव मन में सतत सक्रिय रहती है, वह है व्यक्तिमात्र में अंतनिर्हित उसका सामाजिकताबोध, जो विश्वभर के जनसमूहों में दूसरे जनसमूहों यानी मानवमात्र के बीच एकता का भाव पैदा करता है. दूसरों से मिलजुलकर रहने का स्वभाव मनुष्य को प्रकृति की ओर से प्राप्त है. मैत्री नैसर्गिक गुण है. इसलिए उसको न तो किसी कानून की आवश्यकता है, न पुलिस, न कोर्टकचहरी की. यहां तक कि उसे धर्म, धर्मालय, धनसंपदा, उपहार आदि की भी कोई आवश्यकता नहीं है. इसके लिए मनुष्य को चाहिए कि वह आवश्यकताओं को सीमित रखे, विलासिता के दुर्गुण को अपने मन में न पनपने दे. अपने अधिकार में ऐसी कोई वस्तु न रखे, जो समाज के दूसरे सदस्यों को सहज उपलब्ध न हो.

यह दुर्भाग्य ही है कि जीनो के अराजकतावादी विचारों को उन दिनों बहुत महत्त्व नहीं दिया जा सका. इसका कारण उसके समकालीन प्लेटो और अरस्तु की उच्चस्तरीय ख्याति थी, जिनके विचार सुकरात के दर्शन की छत्रछाया में विकसित हुए थे. उन दिनों राज्य छोटे थे और और वे आपस में युद्ध करते रहते थे. ऐसे में बिना राज्य के राज्य यानी ‘वैराज्य’ की परिकल्पना के लिए उन दिनों समाज में बहुत कम स्थान था. एक अन्य कारण जीनो की लिखी पुस्तकों का अनुपलब्ध होना है. उसके अराजकतावादी विचारों की झलक छिटपुट रूप से प्राप्त उसके वक्तव्यों में दर्ज है. भारत में बौद्ध धर्म का उदय राजसत्ता का प्रतीकात्मक विरोध था. ‘अप्प दीपोभव’ की चेतना के साथ गौतम बुद्ध ने मनुष्य से अपना मार्गदर्शक स्वयं बनने का आवाह्न किया. उन्होंने बाहरी अनुशासन के बजाय आंतरिक अनुशासन पर जोर दिया. बौद्ध विहारों की स्थापना की जहां जीवन सामूहिकता के नियम से अनुशासित होता था. महावीर स्वामी ने भी स्वयांनुशासित जीवन पर जोर दिया. उन्होंने अहिंसा को अपने दर्शन के केंद्र में रखा जो समाज और सहसंबंधों के स्थायित्व से लिए अपरिहार्य है.

मध्यकाल में अराजकतावादी दर्शन की झलक मार्को जिरोलमो वाइड के विचारों में देखने को मिलती है. अराजकतावाद और स्वाधीनतावाद के बारे में विस्तृत विमर्श हमें सोलहवीं शताब्दी के फ्रांस के दूरद्रष्टा कविदार्शनिक ला बूइटी(1530—1563) के साहित्य में भी प्राप्त होता है. उसने स्वाधीनतावाद के पक्ष में जोरदार तर्क दुनिया के सामने रखे. क्रीटवासी जीनो से प्रभावित बूइटी का विचार था कि तानाशाही चाहे वह बलपूर्वक स्थापित की गई हो, अथवा किसी अन्य माध्यम से, बड़े से बड़ा तानाशाह केवल उस समय तक सत्ता शिखर पर बना रह सकता है, जब तक कि जनता उसको वहां बनाए रखना चाहती है. ऐसे तानाशाह को बलपूर्वक खदेड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ती. जनता यदि अपने दासताबोध से बाहर आ जाए तो तानाशाही स्वतः दम तोड़ लेती है. इसलिए आजादी की चाह रखने वाली जनता को सबसे पहले स्वयं दासताचक्र से बाहर निकालना चाहिए. बूइटी को हम सत्याग्रह आंदोलन का आदि प्रवत्र्तक भी मान सकते हैं. यह बात चैंका सकती है कि 1575 में धार्मिक सुधारवादी नेता ह्युजनोट द्वारा प्रकाशित एक पंपलेट में बूइटी ने—

कस्बों और शहर में रहने वाले लोगों से सिविल नाफरमानी का सहारा लेते हुए राज्य को दिए जाने वाला किसी भी प्रकार का टैक्स न चुकाने की अपील की थी.’

बूइटी असल में मानवतावादी विचारक था. उस समय तक भी अराजकतावाद अथवा उसके किसी पर्यायवाची शब्द का चलन नहीं हो पाया था. अंग्रेजी शब्दावली में ‘अनार्किस्ट’ शब्द 1642 में इंग्लेंड के गृहयुद्ध के दौरान उपयोग किया गया. उन दिनों इस शब्द का आशय आज से एकदम भिन्न था. तब यह शब्द उपहास और हेयताबोध दर्शाने के लिए प्रयुक्त किया गया था. प्रयोग करने वाले अंग्रेजी राजशाही के समर्थक थे. उन्होंने इस शब्द का गालीनुमा प्रयोग राजशाही के स्थान पर संसदीय राज्यप्रणाली की मांग कर रहे परिवर्तनवादियों के लिए किया था. 1793 में फ्रांसिसी क्रांति के दौरान साम्राज्यवादी जेकोबिन के विरुद्ध परिवर्तनवादी आंदोलनकारियों द्वारा भी इस शब्द का उपयोग किया था. हालांकि उस समय भी अराजकतावादी होना, उपहास और हंसी का पात्र माना जाता था. आंदोलनकारी भीड़ को संबोधित करते हुए फ्रांसिसी क्रांति के सूत्रधार जेकुइस राॅक्स ने ‘आक्रोश का घोषणापत्र’ में समाज में व्याप्त असमानता पर प्रहार करते हुए कहा था कि ऐसे राज्य में जहां—

एक वर्ग शोषण द्वारा दूसरे वर्ग को भूखा मरने पर विवश कर दे, वहां आजादी सिवाय प्रेतछाया के कुछ नहीं है. जहां धनी अपने एकाधिकार और मनमानी द्वारा निर्धन व्यक्ति के जीवनमरण का फैसला करने लगे, वहां समानता सिवाय प्रेतछाया के कुछ नहीं है. जिस राज्य की तीनचैथाई जनता दिनोंदिन आसमान चढ़ती महंगाई से त्रस्त होकर रातदिन आंसू बहाती हो, वहां गणतंत्र सिवाय प्रेतछाया के कुछ नहीं है.’

अपने घोषणापत्र में रा॓क्स ने जनता से आततायी राजसत्ता को उखाड़ फेंकने का आवाह्न किया था. इस पर साम्राज्यवादियों द्वारा प्रतिक्रियावादी कहकर उसका मजाक उड़ाया गया था. अठारवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक व्यक्तिस्वातंत्रय की मांग विस्तार ले चुकी थी. उन्हीं दिनों इमानुएल जोसेफ सीयेस(1748—1836) ने क्रांतिकारी काम किया, जिसने इतिहास की धारा ही बदल दी. कुलीन मध्यवर्गी परिवार में जन्मे सीयेस ने अपनी शिक्षा धार्मिक माहौल में पूरी की थी. समय आने पर उसको एक चर्च में पादरी की नौकरी मिल गई. लेकिन वह पादरी के परंपरागत कार्य में रमे रहने के बजाय सुधारवादी कार्यक्रमों में प्रवृत्त हुआ. अपने क्रांतिधर्मी विचारों को लेकर सीयेस ने कई छोटेछोटे परिपत्र लिखे, जिन्होंने समाज में नई चेतना का प्रसार किया. उसके लिखे परिपत्रों में ‘तीसरी दुनिया क्या है?(व्हा॓ट इज थर्ड एस्टेट?)’ शीर्षक से लिखा गए परिपत्र में नए युग का संदेश निहित था. कालांतर में यही परिपत्र फ्रांसिसी क्रांति का प्रमुख उत्प्रेरक बना. राजशाही में जनता की हैसियत पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए सीयेस ने लिखा था—

तीसरी दुनिया क्या है?’

सबकुछ.’

अभी तक राजतंत्र में तीसरी दुनिया की हैसियत कैसी है?’

तुच्छ, कुछ भी नहीं.’

इसकी हसरत क्या है?’

थोड़ेसे मानसम्मान की.’

किसी राष्ट्र की जीवंतता और समृद्धि के लिए क्या अनिवार्य है?’

व्यक्तिगत प्रयास एवं सामूहिक कर्तव्यपरायणता.’

सीयेस ने अस्सी प्रतिशत नागरिकों को अधिकार वंचित करने वाली व्यवस्था को चुनौती दी थी. उसके परिपत्र ने जादू का असर किया, इसके बावजूद उनीसवीं शताब्दी के आरंभ तक ‘अनार्किज्म’ तथा उसके समर्थकों के प्रति लोगों का नकारात्मक रवैया बना रहा. अराजकतावाद को कोई भी गंभीरता से लेने को तैयार न था, किंतु उनीसवीं शताब्दी में यूरोपीय नवजागरण के दौर में, विशेषकर रूसो द्वारा व्यक्ति स्वातंत्रय के पक्ष में दिए गए जोरदार तर्कों के बाद अराजकतावाद के प्रति लोगों ने नए सिरे से सोचना आरंभ किया. उनीसवीं शताब्दी में पहली बार विलियम गुडविन(1756—1836) ने पहली बार अराजकतावाद का दर्शन सामने रखा, हालांकि अपने इस दर्शन को उसने कोई नया नाम नहीं दिया था. गुडविन के विचारों का प्रभाव एडमंड ब्रूक, बेंजामिन टुकर पर पड़ा. परंतु उसका श्रेय मिला अमेरिकी सुधारवादी विचारक जोसीह वारेन(1798—1874) को जिसने संभवतः पहली बार राज्य की उपयोगिता को नकारते हुए राज्यविहीन स्वावलंबी बस्तियों की स्थापना पर जोर दिया. राबर्ट ओवेन के सामूहिक आवास बस्तियों के विचार से प्रभावित वारेन के प्रस्तावित स्वावलंबी राज्य में सभी संपत्तियों तथा सेवाकार्यों को सामूहिक बस्तियों के अधिकार में रखा गया था. वारेन द्वारा स्थापित सामूहिक आवास बस्तियों में मानवजीवन पर बाहरी हस्तक्षेप कम से कम था. वे व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता का समर्थन करती थीं, लेकिन निवासियों में सामूहिक जीवन के प्रति निष्ठा का अभाव, अनुभव की कमी के कारण उनका वही अंत हुआ जो राबर्ट ओवेन द्वारा स्थापित ‘न्यू हार्मोनी’ का हुआ था. उन दिनों सहकारिता आंदोलन उठान पर था. वारेन के प्रयासों को भी सहकारिता के उपांग के रूप में देखा गया. असफलता का एक कारण यह भी था कि वारेन ने सहजीवन का पक्ष तो लिया, किंतु राजशाही और साम्राज्यवाद की उतनी तीखी आलोचना नहीं की, जैसी फ्रांसिसी क्रांति के सूत्रधार नेताओं ने की थी.

दर्शन के रूप में ‘अराजकतावाद’ भले ही ढाई हजार वर्ष अथवा उससे भी अधिक पुराना हो, परंतु एक परिपक्व राजनीतिक दर्शन के रूप में इस शब्द का सर्वप्रथम उपयोग 1890 में फ्रांस में पियरे जोसेफ प्रूधों द्वारा किया गया था. वह पहला विचारक था जिसने खुद को जोरदार शब्दों में अराजकतावादी कहते हुए व्यवस्था परिवर्तन की मांग की थी. निजी संपत्ति की अवधारणा को चुनौती देते हुए उसने लिखा था—‘निजी संपत्ति चोरी है तथा संपत्तिधारक व्यक्ति चोर है.’ प्रूधों सीयेस की तीसरे राज्य की अवधारणा से प्रभावित था, जिसने बाइबिल से संदर्भ लेकर राजशाही की तीखी आलोचना की थी. अपने समय में प्रूधों की ख्याति मार्क्स से कहीं बढ़कर थी. प्रूधों जब व्यक्तिगत संपत्ति को चोरी बता रहा था तो उसका आशय उसके कुछ हाथों तक सिमट जाने से था. राज्य चूंकि संपत्ति के केंद्रीयकरण को वैधता प्रदान करता है, इसलिए उसने राज्य की सत्ता को ही अवैध मानते हुए ऐसे राज्य की परिकल्पना की थी, जहां व्यक्ति कानून की अपेक्षा आत्मसंयम एवं आत्मानुशासन से बंधा हो.

अराजकतावाद की सैद्धांतिकी

अराजकतावाद ऐसा विचार अथवा सिद्धांत है जिसमें कोई समाज बिना सरकारी हस्तक्षेप अथवा मदद के आपसी भाईचारा, एकता और खुशहाली के लिए प्रयासरत रहता है. अराजकतावादी समाज में लोग स्वेच्छा और सहमति की भावना से एकदूसरे के साथ सहयोग करते हैं. वहां समर्पण की भावना किसी सत्ता के प्रति न होकर एकदूसरे के प्रति होती है. उत्पादन का कार्य तकनीक विशेषज्ञों, पेशेवरों, कामगारों के समूह द्वारा किया जाता है, जो लाभ के बजाय सामूहिक हितों के लिए स्वेच्छापूर्वक संगठित होते हैं. एम्मा गोल्डमेन ने अराजकतावाद को परिभाषित करते हुए लिखा है—

अराजकतावाद—नव्य सामाजिक व्यवस्था का दर्शन है, जिसमें मानवीय स्वाधीनता को मनुष्यनिर्मित कानूनों द्वारा सुरक्षितसंरक्षित किया जाता है. इस दर्शन की मूल अवधारणा यह है कि सरकार के सभी रूप हिंसा पर टिके होते हैं, इसलिए वे अनुचित, अनावश्यक एवं हानिकारक हैं.’

अराजकतावाद मनुष्य की स्वाधीनता और समृद्धि दोनों की सुरक्षा चाहता है. वह दर्शाता है कि ‘समाजवाद के अभाव में स्वाधीनता कुछ लोगों का विशेषाधिकार और अनाचार है, जबकि स्वाधीनता के अभाव में समाजवाद दासता और क्रूरता का प्रतीक है. अराजकतावाद के आधार पर अनुशासित समाज में स्वयंसेवी संस्थाएं, समितियां उत्पादन, विपणन, अंतरण, शिक्षा, व्यापार, चिकित्सा, यातायात सहित सभी आवश्यक क्षेत्रों तक विस्तृत होती हैं. आवश्यकता पड़ने पर वे सरकार के श्रेष्ठतर विकल्प के रूप में राजनीतिक निर्णय भी लेती हैं. वे उत्पादन, वितरण, संचार, सफाई, शिक्षा, उपचार, सुरक्षा, प्रबंधन, अंतरण, आवागमन आदि समाजोपयोगी कार्यों के लिए विभिन्न आकारप्रकार की स्थानीय, क्षेत्रीय तथा राष्ट्रीय स्तर की सभी संस्थाओं, संगठनों, संघीय स्वरूपों को परस्पर जोड़े रखती हैं. साहित्य, कला, संस्कृति आदि मानवरुचि के विभिन्न क्षेत्रों में भी वे समाज के सक्रिय कार्यकत्र्ताओं, संगठनों, जनसमूहों के सहयोग द्वारा परस्पर संबंध बनाए रखती हैं. वे मनुष्य को यह संदेश देती हैं कि पारस्परिक सहयोग और सद्भाव मानवमात्र की आवश्यकता हैं तथा ऐसा कोई भी सुख और संतुष्टि नहीं है, जिसको इनके द्वारा प्राप्त कर पाना असंभव हो. और समाज के पास जो कुछ है, उसपर उसके प्रत्येक सदस्य का अधिकार है.

अराजकतावाद में चूंकि बाहरी सत्ता की पूरी तरह अनुपस्थिति होती है, इसलिए वहां सामाजिक अंर्तद्वंद्वों में खप रही ऊर्जा को अन्य उत्पादक कार्यों में लगा पाना संभव होता है, जिससे अपेक्षाकृत अधिक स्थायी सामाजिक संरचना जन्म लेती है तथा सामाजिक विकास को गति प्राप्त होती है. इस व्यवस्था में उत्पादन कार्य में लगे समूह, लोगों की रुचि एवं आवश्यकता को पहचानकर उत्पादन कर्म में हिस्सा लेते हैं, न कि लाभार्जन की वांछा से. उत्पादन प्रक्रिया में हिस्सा ले रहा व्यक्ति पूरे समाज के प्रति उत्तरदायी होता है, न कि किसी एक व्यक्ति के. एकाधिकारवाद और मनमानी के लिए अराजकतावादी समाज में कोई स्थान नहीं होता, इससे समाज पूंजीवादी समाज की बुराइयों से दूर बना रहता है. वहां उत्पादन के लाभ पर पूरे समूह का अधिकार होता है. चूंकि व्यक्तिमात्र स्वेच्छा और सहयोग भावना से उत्पादनकार्य में हिस्सा लेता है, इसलिए उसकी उत्पादकता अधिकतम होती है. उत्पादन समाज के निर्देशन और आवश्यकता के अनुरूप होने के कारण वहां स्पर्धा का लोप हो जाता है, इससे सामाजिक अंतद्र्वंद्वों में कमी आती है. व्यक्ति को कला, संस्कृति, नैतिकता, आदर्श आदि के मामले में विकास की सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त करने के अवसर प्राप्त होते हैं. प्रत्येक व्यक्ति चूंकि नैतिकता और आत्मानुशासन की भावना से शेष समाज के प्रति कर्तव्यरत होता है, इसलिए वहां कानून, अदालत, पुलिस जैसी पूंजीवादी समाजों में सभ्यता का प्रतीक मानी जाने वाली व्यवस्थाएं अपनी प्रासंगिकता खोने लगती हैं. उनमें खप रही समाज की ऊर्जा एवं संपदा का उपयोग अन्य रचनात्मक कार्यों के लिए किया जा सकता है. नागरिकों का आपसी विश्वास बढ़ने से तीव्र सामाजिक विकास संभव होता है.

अराजकतावाद समाजवाद की पूरक विचारधारा है. उसकी आर्थिक नीतियां समाजवाद की आर्थिकी से मेल खाती है. भूसंपदा, संसाधनों पर निजी अधिकारिता तथा पूंजीवादी उत्पादन पद्धतियां अपने एकाधिकारवादी सोच के कारण सामाजिक न्याय की भावना के प्रतिकूल कार्य करती हैं. इससे समाज में विशेषाधिकार संपन्न वर्ग पनपने लगता है. परिणामस्वरूप नवीनतम तकनीक, शिक्षा एवं वैज्ञानिक शोधों का लाभ समाज के सीमित वर्गों तक सिमटकर रह जाता है. इससे धन का ऊपरी वर्गों की ओर संचरण होने लगता है. खुली स्पर्धा के अंतर्गत वे लाभ को अपने पक्ष में मोड़े रखते हैं. परिणामस्वरूप समाज में आर्थिकसामाजिक स्तरीकरण बढ़ता है. अराजकतावादी विचारक मानते हैं कि श्रम एवं मजदूरी की आधुनिक पद्धतियां तथा राज्य के संरक्षण में बने उत्पादन के पूंजीवादी तरीके, समाज के सर्वांगीण विकास में बाधक हैं. इसलिए शक्ति के दम पर टिकी राजसत्ता येनकेनप्रकारेण शक्तिशाली का ही पक्ष लेती है. इससे समाज में अन्याय की मात्रा बढ़ती है. वे यह भी मानते हैं कि राज्य अपने आरंभ से, अब तक भूमि पर सीमित व्यक्तियों के अधिकार को समर्थन देता रहा है. राज्य की अनुमति पर पूंजीवादी शक्तियां लाभ के बड़े हिस्से को पूंजी में बदलकर उसका उपयोग अपने लाभानुपात को और तीव्रता से बढ़ाने के लिए करती हैं. इसलिए भूमि और उत्पादन पर सीमित लोगों के अधिकार को समर्थन देने वाली सामंतवादीपूंजीवादी व्यवस्थाओं के साथसाथ अराजकतावाद को राज्य से भी जूझना पड़ता है, जो सामाजिक असमानताओं को जन्म देने वाली व्यवस्थाओं का पोषणसंरक्षण करता है. अराजकतावाद के लिए इस बात से अधिक अंतर नहीं पड़ता कि सत्ता का स्वरूप कैसा है. तानाशाही अथवा गणतंत्र?

अराजकतावादी विचारक मानते हैं कि सत्ताशिखर पर विद्यमान लोगों के चरित्र में बहुत अधिक अंतर नहीं होता. राज्य का झुकाव केंद्र की ओर होता है. इसी विशेषता के चलते सुविधाभोगी अल्पसंख्यक लोगों के हाथों में असीमित अधिकार एवं शक्तियां सौंप देता है, जिसका उपयोग वे अपनी सत्ता को अक्षुण्ण रखने के लिए बहुसंख्यक वर्गों के अधिकार हनन के रूप में करते हैं. सत्ताशिखर पर विराजमान अल्पसंख्यक वर्ग कानून के समर्थन द्वारा उत्पादन, यातायात, खनन, भूमि, बीमा, विपणन, व्यापार समेत आय के समस्त स्रोतों पर अपना अधिकार जमा लेता है. राज्य के संरक्षण में पलने वाला पूंजीवाद नौकरशाही को बढ़ावा देता है, जिससे केंद्रीय सत्ता निरंतर ताकतवर होती जाती है. इससे मुक्ति का एक ही उपाय है, शक्ति और अधिकारों का विकेंद्रीकरण. अतः अराजकतावाद सत्ता, शक्ति एवं अधिकारों के संपूर्ण विकेंद्रीकरण का पक्ष लेता है, ताकि आमजन की शासन में सहभागिता सुनिश्चित की जा सके. यह कतिपय सर्वाधिक पुराना और अकेला राजनीतिक दर्शन है, जो मनुष्य को उसकी चेतना से जोड़ता है. उसके अनुसार ईश्वर, राज्य, समाज जैसे पारंपरिक विश्वास जो अभी तक सामाजिक चेतना को निर्धारित करने वाले प्रमुख कारक रहे हैं, असल में ये बाहर से थोपी गई यथास्थितिवाद की पोषकसमर्थक और अनावश्यक व्यवस्थाएं हैं. नई सामाजिक संरचना का जन्म मनुष्य के स्वेच्छिक और सहयोगात्मक संगठनों के द्वारा ही संभव है.

अराजकतावाद आज का दर्शन नहीं है. भले ही मानवेतिहास में लंबा दौर ऐसा रहा हो जब इसको हेय और निंदात्मक दृष्टि से देखने वालों की खासी संख्या रही हो. लेकिन लगभग प्रत्येक युग और कालखंड में राजसत्ता और धर्मसत्ता समेत किसी भी प्रकार की सत्ता पर प्रश्न उठाने वाले लोग समाज में हुए हैं. भारतीय धर्मग्रंथों में सतयुग भले ही मिथकीय कल्पना हो, लेकिन उसमें भी ‘राज्यविहीन समाज’ की परिकल्पना की गई है. ‘वैराज’ अर्थात ‘बिना राजा का राज्य’ यहां सम्मानित शास्त्रीय परिकल्पना का हिस्सा रहा है. ऋग्वेद में कहा गया था—‘मनुर्भव! ‘मनुष्य बनो!’ ‘रामराज्य’ की परिकल्पना में भले ही ब्राह्मणवादी दृष्टि रही हो, किंतु इसके मूल में समानताधारित समाज की स्थापना का सपना निहित है. महाभारत तक आतेआते साम्राज्यवाद राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा का रूप ले चुका था. लेकिन मनुष्य के प्रति आस्था उस समय में भी विद्यमान थी, तभी तो व्यास ने लिखा है—

इस सृष्टि में मनुष्य से श्रेष्ठतर कुछ भी नहीं है.’

अराजकतावाद यह शिक्षा देता है कि मनुष्य और समाज में इतना ही अंतर है जितना रक्त और धमनियों में. इमर्सन ने कहा था कि इस संसार में काम की एक ही चीज है. एक जीवंत आत्म, जो हर व्यक्ति में मौजूद होती है तथा हर वस्तु पर निगाह रखती है. आत्मरूप होने के कारण ही व्यक्तिमात्र महत्त्वपूर्ण है. अराजकतावाद संसार में एकता और अभिन्नता का संदेश देता है. चूंकि हर व्यक्ति आत्मरूप है, इसलिए सब एक हैं. सभी को समान अधिकार हैं. कोई छोटा है न बड़ा. इस कारण उनमें से किसी भी उपेक्षा संभव नहीं. अतएव आवश्यकता है कि प्रत्येक के कहे का सम्मान हो. प्रत्येक को अपने परिष्कार के बराबर अवसर प्राप्त हों. प्रत्येक के जीवन की महत्ता है. इसको तभी अक्षुण्ण रखा जा सकता है, जब कि उस पर समाज, राज्य, कानून आदि के न्यूनतम दबाव हों. रूसो ने कहा था—मनुष्य स्वतंत्र जन्मा है, पर हर जगह वह बेड़ियों में है. ये बेड़ियां मनुष्य ने कुछ अपने आप पैदा की हैं, कुछ उसी के स्वार्थी बंधुबांधवों द्वारा पैदा की गई हैं. कुछ प्रसिद्ध बेड़ियों के नाम धर्म, राज्य, संपत्ति आदि हैं, जो मनुष्य की गुलामी के कारक हैं—

इनमें धर्म मानवमस्तिष्क का उपनिवेश है. संपत्ति मानवीय आवश्यकताओं की उपनिवेश है. इसी प्रकार सरकार मानवीय व्यवहार की उपनिवेश है—ये सब मिलकर मानवीय दासता और उसके लिए अन्यान्य डरों का कारण बनते हैं. यहां एक प्रश्न सहज ही उपस्थित हो जाता है कि धर्म! आखिर किस प्रकार यह मानवमस्तिष्क को नियंत्रित करता है? किस तरह से यह आत्मा के उत्पीड़न तथा उसकी अवमानना का कारण बनता है? धर्म कहता है—जो भी है, ईश्वर है, मनुष्य कुछ भी नहीं.’ जबकि इसी ‘नाकुछसे इंसान’ के बल पर ईश्वर ने इस अनाचारी, निरंकुश, कठोर, निर्दयी, आतंककारी, अनमेल सृष्टि की रचना की है. सच तो यह है कि उदासी, आंसू और रक्त मिलकर इस संसार को तब से अनुशासित करते आए हैं, जब से ईश्वर का जन्म हुआ है.’

संपत्ति जो मानवीय आवश्यकताओं का उपनिवेश है, वह मनुष्य के असंतोष को विस्तार देती है. वह कुछ मनुष्यों को यह हौसला भी देती है कि वे दूसरों के सुख की कीमत पर अपने असंतोष का दायरा बढ़ाते रहें. यह हमेशा नहीं था. प्रारंभ में जब सभ्यता का इतना विकास नहीं हुआ था, मानव जीवन पूरी तरह प्रकृतिआश्रित था, तब वह संपत्ति और संसाधनों का भोग करते समय यह ध्यान रखता था कि वे उसके अपने न होकर प्रकृतिप्रदत्त हैं. इसलिए वह प्रकृति के प्रति एक सम्मानभाव से भरा रहता था. अपने साथ वह दूसरों की आवश्यकताओं की चिंता भी करता था. उल्लेखनीय है कि मानवमात्र की कुछ न कुछ आध्यात्मिक जिज्ञासा होती है. धर्म इसी विश्वास को जमीन देता है. सभी व्यक्ति कैसे एक ही आध्यात्मिक विश्वास की ओर प्रेरित हों, कैसे उस जमीन पर संगठित होकर खड़े रहें. इसके लिए धर्म को नैतिकता से जोड़ा गया. चूंकि विराट वसुंधरा पर मनुष्य की चिंताएं एक समान हैं, उनका संघर्ष, सपने और समस्याएं एक हैं, इसलिए विभिन्न धर्मों के आध्यात्मिक विश्वास चाहे जो हों, उनकी नैतिक मान्यताएं आपस में इतनी मेल खाती हैं कि इस आधार पर उनकी पहचान कर पाना अंसभवसा है. कालांतर में सत्ता और संसाधनों पर कब्जे की होड़ में मनुष्यों के अतिमहत्त्वाकांक्षी वर्ग ने प्रकृतिजन्य वस्तुओं पर भी अपना अधिकार जमाना आरंभ कर दिया. इससे अव्यवस्था फैली, जिसको नियंत्रित करने के लिए कानून, पुलिस, न्यायालय आदि बनाए गए. अराजकतावाद मनुष्य को वही नैसर्गिक परिवेश प्रदान करने के लिए संकल्पबद्ध है. यह मनुष्य की अपनी खोज है जो शताब्दियों लंबी सभ्यता की यात्रा में कहीं गुम हो चुकी है. यह मनुष्य द्वारा अपने व्यक्तित्व को संपूर्णता प्रदान करने का प्रयास है.

अराजकतावाद का पक्ष लेते हुए एम्मा गोल्डमेन ने लिखा है कि संपूर्ण मानवीय व्यक्ति उसी समाज और राज्य में संभव है जो उसको अपने कार्य का चयन, उसकी परिस्थितियों का निर्धारण करने की खुली छूट देता हो. तभी व्यक्ति अपने काम का आनंद ले सकेगा. तभी उसकी अधिकतम उत्पादकता संभव है. यह मुमकिन है उस समय उसकी आर्थिक उपलब्धियां कम रह जाएं. पर उसके माध्यम से जो सामाजिक लाभ होंगे, उनके आगे मौद्रिक लाभ गौण पड़ जाएंगे. इसलिए कि सरकार और शासन मनुष्य को बांधते हैं. वहां व्यक्ति की आवश्यकताओं और भावनाओं को एक ही तराजू पर तौला जाता है; तथा मौद्रिक आमदनी के आधार पर मनुष्य के सुख के स्तर की परिकल्पना कर ली जाती है. ऐसी सुविधाओं और स्पर्धाओं से घिरा मनुष्य कितना एकाकी, निरीह और बेबस होता है, इसका आकलन करने अथवा इसपर अंकुश लगाने के लिए कोई कानून दुनिया के किसी भी देश में आज तक नहीं बन पाया है. निरंकुश व्यवहार हर शीर्षस्थ शक्ति का लक्षण है, शायद इसलिए इमर्सन ने कहा था—

सरकार चाहे किसी भी प्रकार की हो, मूलतः तानाशाही का प्रतीक होती है. यह सवाल पूरी तरह अर्थहीन है कि वह सरकार दैवीय अधिकार द्वारा संचालित है अथवा बहुमत के आधार पर. प्रत्येक परिस्थिति में उसका एक ही उद्देश्य होता है, व्यक्तिमात्र को पूरी तरह अपने अधीन बना लेना.’

आधुनिक युग में भी अराजकतावादी विचारकों की लंबी शृंखला रही है. हेनरी डेविड रूसो, बट्रेंड रसेल, पीटर क्रोप्टोकिन, थोरो, महात्मा गांधी जैसे विचारक राज्य की मनमानी से आहत होकर स्वतंत्र, विवेकवान, स्वअनुशासित समाज की स्थापना पर जोर देते रहे हैं. थोरो ने सरकार की आलोचना करते हुए कहा था कि प्राचीनकाल से आज तक सरकार सिर्फ अपनी समृद्धि, शक्तिसंपन्नता और सफलता पर जोर देती रही है. हर बार उसकी निष्ठा को संदेहजनक पाया गया है. नियम कभी भी मनुष्य को श्रेष्ठ नागरिक नहीं बनाता. कानून के प्रति सम्मान दर्शाता हुआ व्यक्ति अनायास ही अन्याय की ओर मुड़ जाता है. किसी विद्वान की उक्ति याद आती है. कानून की निस्सारता और उसकी असफलता के बारे में उसका कहना था—

दुनिया के सभी कानून व्यर्थ हैं. इसलिए कि बुरा आदमी उनसे सुधर नहीं पाता और भले को उसकी आवश्यकता ही नहीं पड़ती.’

यह मानते हुए कि सत्तामद में शीर्षस्थ शक्तियां सदैव अकसर अधिकारों का उल्लंघन करने लगती हैं, राज्य की आलोचना करने वाले विद्वानों की संख्या खासी रही है. लियो टॉल्सटाय जैसे महान लेखक, विचारक और महात्मा गांधी जैसे नेता अराजकतावाद के समर्थक रहे हैं. टॉल्सटाय द्वारा महात्मा गांधी को लिखित पत्र ‘लेटर टू ए हिंदू’, जिसने उन्हें सत्याग्रह के लिए प्रेरित किया, पर फ्रांसिसी कवि ला बूइटी का प्रभाव था. उनीसवीं शताब्दी का महान अमेरिकी विचारकदार्शनिक हेनरी डेविड थोरो राज्यसत्ता के पर कतर देने के पक्ष में था. उसका मानना था—

सरकार वही सर्वोत्तम है जो बिलकुल भी शासन नहीं करती.

थोरो का ‘सिविल नाफरमानी’ का विचार ही आगे चलकर ‘सत्याग्रह’ के रूप में विकसित हुआ था. महात्मा गांधी की ग्रामस्वराज्य की परिकल्पना भी राज्य की भूमिका को कमतर करने की कोशिश थी. हालांकि भारत में उसको अपेक्षित महत्त्व कभी मिल ही नहीं पाया.

कहा जा सकता है कि अराजकतावाद का लक्ष्य मस्तिष्क को धर्म की अधीनता से, शरीर को संपत्ति की गुलामी से तथा उसकी मानवस्वातंत्रय को सरकार की हड़कड़ियों, बेड़ियों और अन्यान्य बंधनों से मुक्त कराना है. इस लक्ष्य को पाने के लिए वह नागरिक चेतना का पक्ष लेता है. यह मनुष्य के स्वेच्छिक समूहों के गठन के प्रति आग्रहशील होता है, जो समाजकल्याण की व्यापक लक्ष्य के लिए समूहबद्ध होते हैं. यह मानते हुए कि मनुष्य स्वतंत्र जन्मा है तथा उसको अपनी रुचि के अनुरूप सुखोभोग के सभी अधिकार प्राप्त हैं. इसलिए आवश्यक है कि उसपर न्यूनतम नियंत्रण हों. इसके लिए प्रूधों ने ‘सरकार रहित राज्य’ की अवधारणा प्रस्तुत की थी, जिसके लिए उसने ‘अराजकता’ शब्द का उपयोग किया. उसने साम्यवाद का यह कहकर विरोध किया था कि उसमें वैचारिक दुराग्रह के चलते पूरे समाज को मठों और छावनियों में बदल दिया जाता है. वह राज्याश्रित समाजवाद का भी विरोधी था, जिसका समर्थन उसके समकालीन लुइस ब्लेंक जैसे विचारक कर रहे थे. ‘संपत्ति चोरी है’ उक्ति से प्रूधों का आशय था कि संपत्ति अधिकारिता से जुड़े रोमन कानून संपत्ति पर अल्पसंख्यक वर्ग के अधिकार को मान्यता देते आए हैं. यानी धर्म समाज में व्याप्त आर्थिक विभाजन को न केवल मान्यता देता है, बल्कि पापपुण्य, पुनर्जन्म की अपनी व्याख्याओं के आधार पर उसको तार्किक भी ठहराता है. लेकिन इससे मुक्ति कैसे संभव हो? कैसे धार्मिक पाखंड से समाज की रक्षा की जाए, अपने समकालीन विचारकों की भांति प्रूधों के समक्ष भी यह चुनौती थी. मार्क्स ने श्रमिक समूहों का आवाह्न किया कि वे संगठित विरोध द्वारा उत्पादनतंत्र को अपने अधिकार में ले लें. प्रूधों नहीं चाहता था कि जमींदारों, खान मालिकों, कारखानेदारों आदि को बेदखल करने के लिए हिंसा का उपयोग किया जाए. हिंसा किसी भी मुक्त समाज के लिए वरेण्य नहीं है, इसलिए उसने उस राज्यसत्ता की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े किए जो ऊंचनीच और आर्थिक विषमता को अधिमान्य ठहराती है. उसने संपत्ति पर सामूहिक अधिकारिता के विचार का समर्थन किया जो उन दिनों समाजवादियों की प्रमुख मांग थी.

समाज के संसाधनों को सामूहिक अधिकारिता की परिधि में कैसे लाया जा सकता है? संपत्ति को लाभ की अवधारणा से मुक्त करके यह संभव है—प्रूधों का सुझाव था. बैंकों में जो धनराशि हो, वह पूरी तरह ब्याजमुक्त रहे. अपना प्रशासनिक खर्च निकालने के लिए बैंक अधिक से अधिक एक प्रतिशत वार्षिक ब्याज ले सकते हैं. इससे बैंकों से ऋण प्राप्त करना सुविधाजनक होगा. इसके लिए उसने बैंकों के राष्ट्रीयकरण का सुझाव देते हुए आपसी सहमति के सिद्धांत का पक्ष लिया था. यही व्यवस्था अन्य उद्योगों, कामधंधों के लिए भी संभव है. लाभ की कामना से मुक्ति के लिए आवश्यक है कि उत्पादन में जुडे़ समूह अपने उत्पाद का विपणन न कर, आपसी समझौते के आधार पर आदानप्रदान की नीति को अपनाएं. जिसके पास जो वस्तु अपनी आवश्यकता से अधिक है, वह अपनी जरूरत की अन्य वस्तुओं के आधार पर उनका दूसरे उत्पादक समूहों के साथ आदानप्रदान करे. आदानप्रदान का स्वरूप तय करने के लिए प्रत्येक वस्तु में लगे श्रम को कार्यघंटों में बांट दिया जाए. उन्हीं श्रमघंटों के आधार पर लोग अपनी आवश्यकता की वस्तुओं का लेनदेन करें. पारस्परिक सहमति की इस व्यवस्था में सभी सेवाओं को बराबर आंका जाएगा.

प्रूधों का विश्वास था कि समाज में धन को अत्यधिक महत्त्व मिलने से लोगों में उसको अतिरिक्तरूप से अर्जित करने की चाहत पैदा होती है. इससे समाज में स्पर्धा बढ़ती है तथा मुनाफाखोरी भी. धन को लाभ की वांछा से मुक्त कर दिए जाने से समाज में उसका महत्त्व घटेगा, जिससे आर्थिक समानता के लक्ष्य को प्राप्त कर पाना आसान होगा. इस आधार पर गठित समाज में राज्य की भूमिका गौण होगी. संबंध पारस्परिक सहयोग और सद्भावना पर आधारित होंगे. क्या ऐसा समाज विवादों और आपसी अंतद्र्वंद्वों से सर्वथा मुक्त होगा? प्रूधों का मानना था कि मानवीय कमजोरियां वहां भी होंगी. इसके समाधान हेतु उसका सुझाव था कि अराजकतावाद पर आधारित समाज में विवादों का निपटान आपसी समझौते के आधार पर किया जाएगा. परस्पर समर्पित, स्पर्धाविहीन समाज में पुलिस, कानून, न्यायालय आदि की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. अराजकतावाद के प्रति पू्रधों की निष्ठा उसकी पुस्तक ‘व्हा॓ट इज प्रापर्टी’ के इस संवाद से समझी जा सकती है—

क्यों, आप यह सवाल कैसे कर सकते हैं? आप तो गणतंत्रसमर्थक हैं.’

गणतंत्र समर्थक, ठीक है, लेकिन इस शब्द से कुछ साफ नहीं होता. ‘रिपब्लिक’ यानी ‘रेस पब्लिका’ के मायने हैं, जनता से संबंधित मुद्दा. ऐसा कोई मसला जिसका लोकहित से सचमुच संबंध हो, वह न तो इस शब्द की सीमा में आता है, न उस सरकार के जो स्वयं के ‘रिपब्लिकन’ होने का दावा करती है. इस शब्दार्थ के अनुसार तो एक तानाशाह सम्राट भी स्वयं को गणतंत्रवादी कह सकता है.’

समझ गया, तुम प्रजातंत्र समर्थक हो?’

नहीं.’

क्या! क्या तुम्हारा विश्वास राजशाही में है?’

यह भी नहीं.’

संविधानवादी हो?’

भगवान माफ करे!’

अच्छा! तब तुम जरूर कुलीनतंत्र में विश्वास करते होगे?

कतई नहीं.’

क्या तुम चाहते हो कि मिलीजुली बने?

इससे भी कम.’

तुम आखिर चाहते क्या हो?’

मैं अराजकतावादी हूं.’

अराजकतावादी! तुम अवश्य ही परिहास रहे हो. वरना यह तो सरकार पर प्रहार करने जैसा है.’

कदापि नहीं! मैंने बस वही कहा है जो मैं एक मनुष्य के रूप में सोचता रहा हूं. मैं अनुशासन का कट्टर समर्थक हूं, लेकिन कुल मिलाकर हूं एक अराजकतावादी ही.’

प्रूधों के बाद अराजकतावाद की सैद्धांतिकी को आगे बढ़ाने वाले विद्वानोंआंदोलनकारियों में महत्त्वपूर्ण नाम है—मिखाइल बकुनिन(30 मई, 1814—1 जुलाई, 1876) का. मार्क्स के समकालीन बकुनिन की उससे कई मुद्दों में गहरी असहमति थी. हालांकि दोनों ही पूंजीवाद और साम्राज्यवाद से मुक्ति चाहते थे. दोनों का ही रुझान समाजवाद की ओर था. दोनों ने ही फ्रांस की समाजवादी क्रांति में हिस्सा लिया था. प्रथम इंटरनेशनल की बैठक के दौरान उनके मतभेद खुलकर सामने आए थे, जो प्रकारांतर में उसकी असफलता का कारण भी बने. मार्क्स जहां श्रमिक वर्ग की अधिसत्ता में विश्वास रखता था, वहीं बकुनिन किसी भी प्रकार की सत्ता को मनुष्यता के लिए घातक मानता था, इसलिए उसने अराजकतावाद का समर्थन किया, किंतु मार्क्स की बौद्धिक प्रतिष्ठा के आगे बकुनिन के विचार अपना अपेक्षित प्रभाव न छोड़ सके. अपने अतिसक्रिय जीवन में उसने श्रमिकों और दासों की मुक्ति के लिए एक गोपनीय संगठन ‘इंटरनेशनल ब्रदरहुड’ का गठन किया था, जिसमें फ्रांस, इटली, स्केंडनेविया, स्वीडन, नार्वे, डेनमार्क, बेल्जियम, इंग्लेंड, स्पेन, पोलेंड, रूस आदि देशों के दास और श्रमिकसंगठन सम्मिलित थे. वह राजसत्ता की भांति धर्मसत्ता को भी मनुष्य की पराधीनता का कारण मानता था. अपने निबंध ‘केटकिज्म आफ ए रिवोल्युशनरी’ में उसने धर्मसत्ता और राजसत्ता दोनों का यह कहकर विरोध किया था कि—

किसी भी प्रकार की सत्ता के किसी भी रूप, जिसमें राज्य की सुविधा के नाम पर नागरिकों की स्वतंत्रता न्योछावर करा ली जाती है, का संपूर्ण निषेध.’

बकुनिन की आस्था समाजवाद में थी, किंतु समाजवाद की संरचना किसी गुलाम समाज में संभव नहीं, ऐसे समाज में भी वह असंभव है, जहां अभिव्यक्ति के अधिकार को बाधित किया जाता है. इसलिए बकुनिन स्वाधीनता के बगैर समाजवाद को दिवास्वप्न मानता था. उसका कहना था कि—

बगैर समाजवाद स्वाधीनता कुछ लोगों का विशेषाधिकार और अन्याय है, जबकि समाजवाद के बिना स्वाधीनता दासता और पाशविकता.’

मिखाइल बकुनिन ने श्रमिकों का आवाह्न किया था कि वे अपने उत्पादन संगठन बनाएं तथा उत्पादन कार्य को अपने हाथ में ले लें. उत्पादन, शिक्षा, अर्जन, भोजन, आवास आदि के साधन सामूहिक होने चाहिए. प्रत्येक बालक को चाहे वह लड़का हो अथवा लड़की, भोजन, वस्त्र, शिक्षा, आदि के समान अवसर प्राप्त होने चाहिए. बड़ा होने पर उसको अपनी रुचि का व्यवसाय चुनने, सम्मानजनक ढंग से आजीविका कमाने का अवसर मिले, ताकि वह अपनी स्वाधीनता और श्रम का भरपूर आनंद ले सके. कुछ अराजकतावादी स्वाधीनता को समानता की अपेक्षा अधिक महत्त्व देते थे. यहां तक कि स्वाधीनता के पक्ष में वे समानता के लक्ष्य को टालने के भी समर्थक थे. बेंजामिन टुकर ने कहा था कि समानता हमें चाहिए—

यदि हम इसको प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन स्वाधीनता हमें किसी भी कीमत पर चाहिए.’

समानता सहकारिता का अभीष्ठ है. सहकारी समूह अपने सदस्यों के बीच हर तरह की समानता का पक्ष लेता है. स्वाधीनता के अभाव में स्वैच्छिक सहयोग असंभव है. इसलिए अजारकतावादी का सहकार एवं समाजवाद का समन्वित रूप था. मार्क्स के साम्यवाद से थोड़ा अलग. हालांकि दोनों का ही लक्ष्य राजनीति और अर्थव्यवस्था को समाजवादी भावना के अनुरूप ढालना था. उसके सिद्धांत को ‘सांगठनिक अराजकतावाद’ कहा जाता है.

अराजकतावाद के सिद्धांत के आधार पर किसी प्रथक राज्य का गठन तो नहीं हो सका, तो भी उनीसवीं शताब्दी के बाद से ही यह यह दर्शन परिवर्तनकामी विचारकों, साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों को आकर्षित करता रहा है. विलियम थांपसन, मिखाइल बकुनिन, लियो टाल्सटाय, जॉन ग्रे, जे. एफ. फ्रे. जोसीह वारेन, एडवर्ड कारपेंटर, फ्रैड्रिक नीत्शे, जॉन स्टुअर्ट मिल, लार्ड गैरीसन, हेनरी डेविड थोरो, एम्मा गोल्डमेन, स्पेंसर, पीटर क्रोप्टकिन, नोम चामस्की, महात्मा गांधी, भगत सिंह आदि उनीसवींबीसवीं शताब्दी के अनेक महत्त्वपूर्ण विचारक, नेता, साहित्यकार अराजकतावाद का समर्थन करते आए हैं. अराजकतावाद का पूरक सिद्धांत ‘स्वाधीनतावाद’ तो बीसवीं शताब्दी के प्रायः सभी महत्त्वपूर्ण लेखकों, साहित्यकारों का सर्वाधिक पसंदीदा विषय रहा है.

इकीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में अराजकतावाद ने अपने पंख फैलाए हैं. इन दिनों विश्व का सबसे बड़ा अराजकतावादी आंदोलन स्पेन में चल रहा है. वहां ‘नेशनल कन्फेडरेशन आ॓फ लेबर’(1910) तथा ‘जनरल कन्फेडरेशन आफ लेबर(1979) नामक अराजकतावाद समर्थकों के दो बड़े संगठन हैं. इनमें नेशनल कन्फेडरेशन आ॓फ लेबर के सदस्यों की संख्या लगभग 50000 है, जबकि दूसरे संगठन की सदस्य संख्या 2003 में 1 लाख से ऊपर थी. इसके अलावा अमेरिका, फ्रांस, इटली आदि देशों में भी अराजकतावाद के समर्थक विचारकों, लेखकों, संगठनों की अच्छीखासी संख्या है. आदर्श के सर्वाधिक निकट होने के बावजूद अराजकतावाद विश्वसमाज में अपना सम्मानजनक स्थान बना पाने में असमर्थ रहा है. इसका कारण यह हो सकता है कि सहस्राब्दियों से राजशाही, सामंतवाद तथा अन्यान्य व्यवस्थाओं के अनुशासन में स्वयं को ढालने में अभ्यस्त हो चुका जनसमाज, बिना सत्ता के राज्य की कल्पना ही नहीं कर सकता. ऐसे लोगों के लिए अराजकता आज भी नकारात्मक स्थिति है. दूसरे धर्म के सामंती ढांचे में बंधे समाजों की मानसिकता समर्पण की होती है, जो आत्मचेतित समाज के राजदर्शन ‘अराजकतावाद’ के विरुद्ध जाती है. इसलिए अराजकतावाद को यदि जनमानस में अपनी व्यापक पैठ बनानी है तो उसको बड़े स्तर पर लोकप्रबोधीकरण का आंदोलन खड़ा करना होगा, जो मनुष्य के उपभोक्ताकरण जिसमें पूंजीवाद के प्राण बसते हैंके सर्वथा विरुद्ध है.

© ओमप्रकाश कश्यप

समाजवाद का उत्तरपक्ष

सामान्य

प्रश्न है कि इकीसवीं शताब्दी के आरंभ में समाजवाद को कैसे लिया जाए? क्या राजनीतिक दर्शन के रूप में यह आज भी प्रासंगिक है? विशेषकर ऐसे समय में जब पूंजी का बोलबाला हो और उसके समर्थक अर्थविज्ञानी समाजवाद को डूबा हुआ जहाज मान चुके हों. समाजवाद का समर्थन करते आए विद्वानों में हताशा का माहौल हो. मनुष्यता की कीमत पर प्राप्त आधुनिक सुखसुविधाओं के आगे वह नतमस्तक हो. दरअसल उनीसवीं शताब्दी के मध्याह्न तक समाजवाद का ग्राफ जितनी तेजी से ऊपर चढ़ा, वाद में उतनी ही तेजी से नीचे खिसकता गया. एकएक कर उसके गढ़ पूंजीवाद के गाल में समाते चले गए. सोवियत संघ का बिखराव उसके ताबूत की अंतिम कील साबित हुआ. रही सही कसर चीन ने पूंजीवाद की गोद में शरण लेकर पूरी कर दी. मात्र ढाईतीन दशक पहले तक दुनिया की आधी आबादी के सपनों में छाया रहने वाला समाजवाद आज उजड़ा हुआ दयार है, जिसपर बात करना भी बौद्धिक पिछड़ापन माना जाने लगा है. हालांकि बौद्धिक रूप से आज भी उसका तेज ज्यों का ज्यों है.

हालांकि हताशा के कठिन दौर में भी पूंजीवाद के विकल्प के रूप में समाजवाद की भावना से औतप्रोत नित नए विचार सामने आ रहे हैं. पूंजीवादी शोषण से खिन्न और उसके असंतुष्टों का दायरा बढ़ता ही जा रहा है. यह विरोध विश्व के अलगअलग क्षेत्रों में भिन्नभिन्न प्रकार से, स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप आकार ले रहा है. यह अनायास नहीं है कि उनीसवीं और बीसवीं शताब्दी के प्रायः सभी मौलिक विचारक, साहित्यकार, दार्शनिक और वैज्ञानिक समाजवाद के समर्थक रहे हैं. इनमें जान स्टुअर्ट मिल, बट्रेंड रसेल, आ॓स्कर वाइल्ड, अल्बर्ट आइंस्टाइन, जा॓न रस्किन, एमाइल दुर्खीम, अंतोनियो ग्राम्शी, रोजा लेक्जमबर्ग, पीटर क्रोप्टोकिन, थोरो, चे ग्वेरा, चार्ल्स डिकेंस, आ॓स्कर वाइल्ड जैसे लेखक, विचारक समाजवाद के समर्थक रहे हैं. इस अवधि में पूंजीवाद यदि मजबूत हुआ तो समाजवाद ने भी स्वयं को नएनए विचारों से लैस किया है. पूंजीवाद के एक से बढ़कर एक विकल्प वह लाया है, भले ही उनकी पहुंच कुछ देशों, समाजों, समूहों तक सीमित हो और पूंजीवाद की खाकर रातदिन गाल बजाने वाला मीडिया उसकी पहुंच और प्रभावक्षेत्रों की लगातार उपेक्षा करता आ रहा होफिर भी दुनिया के प्रायः सभी क्षेत्रों में उसकी सार्थकसशक्तसारगर्भित उपस्थिति है. इस बीच पूंजीवाद और समाजवाद की बीच भी परस्पर आदानप्रदान हुआ है. समाजवादी हलचलों से प्रेरणा लेते हुए पूंजीवाद ने स्वयं को उदार बनाया है तथा श्रमिक बीमा, स्वास्थ्य बीमा, आवास जैसी सुविधाएं भी जोड़ी हैं, हालांकि उनकी पहुंच सीमित क्षेत्रों तक है और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को अभाव और शोषण की स्थितियों में जीना पड़ता है.

दूसरी ओर पूंजीवाद से प्रेरणा लेते हुए समाजवाद ने भी अपनी उग्रता को कुछ कम किया है. मानवस्वातंत्र्य के पक्ष में समाजवाद और लोकतंत्र की नजदीकियां बढ़ी हैं, जिसका सुफल समष्ठिवाद, सहजीवितावाद, गणतांत्रिक समाजवाद जैसे नए समाजार्थिक दर्शन हैं, जो राज्य के समानांतर अथवा उसके बिना भी स्वतंत्रता और समानता के लक्ष्य को पाने के लिए संकल्पबद्ध हैं. उत्पादन के पूंजीवादी तरीकों, यहां तक कि सघन उत्पादन तकनीक से उसको परहेज नहीं है. गणतांत्रिक समाजवाद का समर्थन तो घोर पूंजीवादी देशों में भी किया जाने लगा है. कई बार तो पूंजीवाद अपनी असल मंशा छिपाने के लिए भी गणतांत्रिक समाजवाद का नारा लगाने लगता है. समाजवाद सैद्धांतिक वादविवाद में पड़ने के बजाय अब सीधे कार्रवाही में विश्वास करने लगा है. हालांकि विश्व में युवा मार्क्स और माओ जिदांग को आदर्श मानने वाले उग्र साम्यवादियों की कमी नहीं है, तो भी उसके आधुनिक संस्करण जैसे समष्ठिवाद, श्रमिकसंघवाद आदि हिंसा से सुरक्षित दूरी बनाए रखने में विश्वास रखते हैं. पूंजीवाद को टक्कर देने में समर्थ सहकारिता आंदोलन भी किसी न किसी रूप में इसी भावना से संचालित हैं. दूसरी ओर पूंजीवाद से सम्मोहित ऐसे अमेरिकापरस्त विचारकों की भी कमी नहीं है, जो गर्व से कभी ‘इतिहास का अंत’ तो कभी ‘विचारधारा का अंत’ जैसी घोषणाएं करते रहते हैं.

इधर कुछ विद्वान कह रहे हैं कि गणतांत्रिक समाजवाद राजनीतिकसमाजार्थिक चिंतन की पराकाष्ठा है. विचारहंस इससे ऊंची उड़ान नहीं भर सकता. इससे बेहतर अर्थदर्शन कुछ भी संभव नहीं. ऐसे विद्वानों की भी भारी संख्या है जो पूंजीवाद पर अटूट भरोसा रखते हैं और मानते हैं कि ऊपरी वर्ग की समृद्धि वहीं नहीं टिकी रहेगी, वह रिसकर निचले स्तर की ओर जाएगी. इससे प्रकारांतर में गरीबी हटेगी. समाज में समृद्धि आएगी.ऐसे विद्वानों की संख्या भी बहुतायत में है जो गणतांत्रिक समाजवाद को पूंजीवाद का छल मानते हैं. उनके अनुसार गणतांत्रिक समाजवादी और कुछ नहीं, बल्कि पूंजीवाद का लोकलुभावन चेहरा है. जबकि गणतांत्रिक समाजवादियों का मानना है कि हिंसा अथवा सर्वहारा क्रांति द्वारा आर्थिकराजनीतिक शक्तिकेंद्रों पर बलात् अधिकार जमा लेने से वास्तविक और स्थायी परिवर्तन संभव नहीं. आवश्यकता है कि आर्थिकराजनीतिक असमानता को दूर करने हेतु ठोस राजनीतिकसामाजिक परिवर्तन का सहारा लिया जाए.मानवमात्र की मूलभूत अच्छाई में विश्वास रखते हुए वे हिंसा के बजाय हृदयपरिवर्तन को प्राथमिकता देते हैं. गणतांत्रिक समाजवादी पूंजीवाद के प्रति आलोचनात्मक रुख अपनाते हैं, मगर उनका मानना है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा पूंजीवाद की उग्रता को समाप्त करना संभव है. चाल्र्स एंथनी क्रासलेंड(1918—1977) जैसे अर्थविज्ञानी इस विचारधारा के समर्थक हैं. उनका मानना है कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पूंजीवाद ने स्वयं को बदला है तथा बदली हुई परिस्थितियों में वह अपेक्षाकृत बड़े लोकहितैषी के रूप में उभरा है. इस आधार पर वह मानता है कि सर्वहारा क्रांति अथवा हिंसा का सहारा लिए बिना भी, पूंजीवादी तरीकों से अर्जित आय के लोकोपकारी कल्याणकार्यक्रमों में निवेश तथा जनसुविधाओं में विस्तार द्वारा सामाजिक समानता के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है. श्रम सहकारिताएं तथा नागरिक संगठन इस लक्ष्य को और भी आसान बना सकते हैं. इसके लिए वे अधिक आय वाले नागरिकों पर आनुपातिकरूप में अधिक आयकर लगाकर विकास के लिए अपेक्षित पूंजी अर्जित करने का पक्ष लेते हैं. इससे पूंजी का प्रवाह स्वाभाविक रूप से निचले वर्गों की ओर होने लगता है. यह अहिंसक और मंथर क्रांति है, और हृदय परिवर्तन पर आश्रित होने के कारण अपेक्षाकृत अधिक स्थायी है. अपने समर्थन के लिए वे विद्वान जान स्टुअर्ट मिल के स्वाधीनतावादी समाजवाद का भी उदाहरण देते हैं. मिल का कहना था कि गणतांत्रिक समाजवाद असल में मुक्त उपभोक्तावाद को मान्यता दिए जाने जैसा है, लेकिन यदि इससे व्यक्तिमात्र की स्वाधीनता की रक्षा होती है तो इसमें कुछ अनुचित भी नहीं है. अपनी पुस्तक ‘दि प्रिंसिपल्स आ॓फ पा॓लिटिकल इकानामी(1848)’ के परिवर्धित संस्करण में मिल ने कहा था—

जहां तक आर्थिक विचारधारा का प्रश्न है, अर्थशास्त्र के सिद्धांतों में ऐसा कुछ नहीं है, जो किसी समाजवादी रणनीति पर आधारित विचारधारा को प्रतिबंधित करता हो.’

गणतांत्रिक समाजवाद को अमेरिका में भी भरपूर समर्थन मिला. विशेषकर शीत युद्ध के दौर में अमेरिकी अर्थशास्त्री सोवियत संघ की आलोचना के लिए इस विचारधारा को मान्य ठहराते रहे. लेकिन यह उनकी तात्कालिक कूटनीति का हिस्सा था. इसलिए सोवियत संघ के पतन के बाद उसने समाजवाद से पूरी तरह किनारा कर लिया है. लेकिन इससे यह मान लेना अनुचित होगा कि अमेरिका में समाजवाद के लिए कोई स्थान ही नहीं है. वहां समाजवादी आंदोलन की शुरुआत उनीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में ही हो चुकी थी. अमेरिकी समाजवादियों के आमंत्रण पर ही राबर्ट ओवेन वहां पहुंचा था और उसने जोसीह वारेन जैसे सहयोगियों को साथ लेकर सहजीवन पर आधारित बस्तियां बसाने का निर्णय किया था. ‘न्यू हार्मोनी’ वहां सहकारिता के दर्शन पर आधारित पहली बस्ती थी. ‘सोश्लिस्ट लेबर पार्टी’ का गठन वहां पर 1876 में हुआ. 1901 में वहां ‘सोश्यिलिस्ट पार्टी आ॓फ अमेरिका’ का गठन किया गया. अमेरिकी बहुमत की पसंद भले ही समाजवाद कभी नहीं बन सका, लेकिन एक सशक्त विपक्ष के रूप में उसकी 1901 के बाद से निरंतर उपस्थिति रही है. कई राष्ट्रपति चुनावों में कई बार पार्टी के प्रतिनिधि पूंजीवाद समर्थित उम्मीदार को जबरदस्त टक्कर दे चुके हैं. औद्योगिक सुधार के लिए कई सफल हड़तालें समाजवादियों के नाम रही हैं. लेकिन अमेरिका में समाजवाद की लोकप्रियता को लेकर सबसे चौंकाने वाले परिणाम रासम्सेन रिपोर्ट में सामने आए. 2007 की भीषण आर्थिक मंदी के के प्रभाव के आकलन के लिए रासम्सेन की अध्यक्षता में एक सर्वे कराया गया था. अपनी रिपोर्ट में समिति ने अमेरिका में समाजवाद के प्रति बढ़ते रुझान की ओर संकेत किया था. रिपोर्ट के अनुसार यद्यपि 53 प्रतिशत अमेरिकी नागरिक पूंजीवाद को बेहतर मानते हैं, समाजवाद के समर्थन में मात्र 20 प्रतिशत नागरिक थे और 27 प्रतिशतों ने अपनी स्पष्ट राय जताने में असमर्थता प्रकट की थी. लेकिन इससे इतना तो स्पष्ट है कि दुनिया में पूंजीवाद का डंका बजाने वाले अमेरिका में उसके विरुद्ध माहौल बनता जा रहा है. वहां लगभग आधे लोग ऐसे हैं जो पूंजीवाद के या तो सीधे विरोध में हैं अथवा उसकी उपयोगिता को लेकर सुनिश्चित नहीं हैं. सर्वे का सबसे चौंकाने वाला निष्कर्ष यह था कि 30 वर्ष से कम के युवकों में से मात्र 37 प्रतिशत नागरिक पूंजीवाद के पक्ष में थे. शेष 33 प्रतिशत समाजवाद के और लगभग 30 प्रतिशत अनिर्णय की स्थिति में थे. उल्लेखनीय है कि रासम्सेन द्वारा जो प्रश्नावली सर्वे के लिए नागरिकों में दी गई थी, उसमें पूंजीवाद और समाजवाद को परिभाषित नहीं किया गया था और अमेरिका में समाजवाद का अर्थ प्रायः ‘गणतांत्रिक समाजवाद’ से ले लिया जाता है. जो कम से कम गणतंत्र के बारे में पूंजीवाद से निकट संबंध रखता है.

आशय है कि राज्य के स्तर पर अमेरिका में भले ही पूंजीवाद फलफूल रहा हो, मगर वहां लोकतंत्र आधारभूत संस्थाओं ने नागरिकों को अपने हितानुरूप समानांतर संगठन चलाने का प्रशिक्षण भी दिया है. इसलिए वहां सहजीवितावाद, श्रमिकसंघवाद, समष्ठिवाद जैसे समाजवाद के आधुनिक रूप भी जहांतहां अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं. चूंकि वहां जनजीवन में पर्याप्त समृद्धि है, इसलिए थोड़ीबहुत शिकायतों से अधिक नागरिक असंतोष वहां नहीं पनप पाता. लेकिन प्रकट रूप में अमेरिका की नीति पूंजीवाद को प्रश्रय देने की है, ताकि दुनियाभर में फैली उसकी पूंजीवादी कंपनियों को बढ़ावा मिले. वहां के पूंजीवाद समर्थित अर्थशास्त्रियों के लिए समाजवाद और फासीवाद में कोई अंतर ही नहीं है. अमेरिकी अर्थनीति के समर्थन में नोबल पुरस्कार विजेता अमेरिकी अर्थशास्त्री फ्रैड्रिक आ॓गस्ट हायक के विचारों की व्याख्या करते हुए ‘फ्यूचर फ्रीडम फाउंडेशन’ के अध्यक्ष जेकब हा॓नबर्गर लिखते हैं—

नाजीवाद, समाजवाद, साम्यवाद तथा फासीवाद की अर्थनीतियों तथा कल्याण राज्य अमेरिका की नियंत्रित अर्थनीति में कोई अंतर नहीं है.’

क्या सचमुच नाजीवाद, फासीवाद और समाजवाद में कोई अंतर नहीं है? क्या सचमुच समाजवाद की डगर अंततः तानाशाही की ओर ले जाती है? इन्हीं के बीच से एक प्रश्न उभरता है कि क्या समाजवाद का कोई भविष्य है? इस प्रश्न एक स्वाभाविक प्रश्न और जुड़ा हुआ है कि क्या समाजवाद का अपना कोई अतीत था? एक राजनीतिक दर्शन के रूप में समाजवाद का उदय और पूंजीवाद का जन्म लगभग साथसाथ हुआ. दोनों मानवमात्र को सुखी देखना चाहते हैं. दोनों अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के समर्थक हैं तथा व्यक्ति को स्वतंत्र इकाई मानते हैं. दोनों का दावा मानवमात्र को अधिकतम सुख पहुंचाने का है. अंतर सिर्फ उत्पादन पर अधिकारिता को लेकर है. पूंजीवाद में आर्थिक संसाधन चंद हाथों तक सिमटे होते हैं. समाजवाद में उत्पादन प्रणाली पर राज्य अथवा श्रमिकों का, जिन्हें वह वास्तविक उत्पादक मानता है—अधिकार होता है. पूंजीवाद में पूंजी के बल पर एक विशेषाधिकार संपन्नवर्ग पनपने लगता है. जो स्वयं निष्क्रिय रहता है, लेकिन उत्पादन के लाभ पर अपना अधिकार जमाए रहता है. कहीं न कहीं उसको यह भय भी होता है कि वास्तविक उत्पादक यानि श्रमिकवर्ग कभी भी अपने अधिकारों के लिए उपस्थित हो सकता है. अतः अपने सुरक्षित भविष्य, सुनिश्चित लाभ हेतु श्रमशक्ति पर अपनी निर्भरता को कम करने के लिए प्रयत्नरत रहता है. इसके लिए वह स्वचालित तकनीक का चयन करता है तथा अपने लाभ का बड़ा हिस्सा तकनीकी शोध पर खर्च करता है, मशीनों की अधिकाधिक मदद करता है, जो उसके लिए उत्पादन की जिम्मेदारी निभाते हुए लाभ में हिस्सेदावेदारों को कम से कम करने का काम करती हैं. हालांकि पूंजीपति जिसको पूंजीवाद के आलोचक निष्क्रिय उत्पादक कहते हैं, वह सदैव निष्क्रिय नहीं होता. वह शारीरिक के बजाय बौद्धिक श्रम में दक्ष होता है. अपनी पूंजी और बुद्धिबल द्वारा वह श्रमिकों से पूरा काम लेता है. वह श्रमिकों को अपना बुद्धिसामर्थ्य उपयोग करने की वहीं तक अनुमति देता है, जहां तक वे उसका हित साधन करते हैं. कहा जा सकता है, कि पूंजीवाद में समाज का बौद्धिक सामथ्र्य कुछ व्यक्तियों का हित सोचने लगता है. सामंतवाद में भी पूंजीवाद की भांति सभी लोगों को अपनी बौद्धिक क्षमताओं का अपने लिए इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जाती. इस कार्य के लिए सामंतवाद धर्म को सहायक बनाता है, जो मनुष्य का ध्यान इहलौकिक समस्याओं तथा उनके कारणों की ओर से हटाकर अमत्र्य संसार की ओर ले जाते हैं. धर्म भौतिक संसार की आलोचना करता है, ऐंद्रियक सुखों को छलावा बताता है. इसके लिए उनको राजसत्ता का पूरा समर्थन प्राप्त होता है. राजसत्ता से अपनी निकटता का लाभ उठाकर धर्मसत्ता के शीर्ष पर विराजमान लोग स्वयं तो ऐंद्रियक सुखों में डूबे रहते हैं, जबकि जनसाधारण को अपरिग्रह और अस्तेय का दर्शन बघारते थे.

सतरहवीं शताब्दी में जब मशीनों ने रोजगार छीनने आरंभ किए तो उनकी आलोचना ने जोर पकड़ा. यह वास्तविक उत्पादक के हाथों में उत्पादन का श्रेय छिन जाने जैसी सामान्य घटना नहीं थी. चूंकि मशीनें त्वरित उत्पादन करती थीं, इसलिए उत्पाद की खपत के लिए नए बाजारों की आवश्यकता थी. नए बाजारों की खोज ने ब्रिटिश उपनिवेशों को जन्म दिया. यह संभवतः पहली बार हो रहा था जब साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाओं की पहल व्यापारिक दलों की ओर से आरंभ हुई थी. मशीनों ने पहले लोगों के हाथों से रोजगार छीना. उससे पहले मनुष्य औजारों से काम लेता था. लेकिन वे मनुष्य के सहायक की भूमिका निभाते थे. पाषाण युग से ही विकासयात्रा में औजार मनुष्य का हमसफर बने थे. मशीनों ने मनुष्य को उत्पादक के स्थान से बेदखल कर दिया था. पहले उत्पादन पर उनका अधिकार होता था जो अपने श्रमकौशल से उसको संभव बनाते थे. मशीनों ने ऐसे व्यक्तियों को उत्पादक बनाने का काम किया, जिनमें ऐसे कौशल का अभाव था, और जो सिर्फ अपनी पूंजी के बल पर अपने लिए मशीनें खरीद सकते थे. कार्य में प्रवीणता उत्पादक होने की शर्त नहीं रह गई थी. इसलिए ऐसे लोग भी उत्पादक की ओर आकर्षित हुए जो अपनी पूंजी के बल पर उत्पादन का लाभ उठाने को तैयार थे. बाजार की ललक ने लोगों से उनकी जमीनें और प्राकृतिक संसाधन छीनना भी आरंभ कर दिया था. पूंजीपतियों का आग्रह था—तुम हमारे कारखानों में काम करो, हमारे कारखानों में बना माल उपयोग में लाओ, अपनी धरती, अपने संसाधन, अपने सपने और महत्त्वाकांक्षाएं हमें सौंप दो. वे हमारे कारखानों के काम आएंगे. बदले में हम तुम्हें नया सामाजिक बोध देंगे. जिसमें व्यक्ति सिर्फ अपने लिए जीता है. अपने सारों ओर मौजूद लोगों पर संदेह करता है. अंतर्मन में समाए डर से मुक्ति तथा सामाजिकता की तलाश में वह मायावी दुनिया में घुसता चला जाता है.

उल्लेखनीय है कि मायावी दुनिया का यह सच सामंतवादी समाज में भी था. यहां तो काम पूंजीपतियों के पैसे पर पलने वाले समाजविज्ञानी और अर्थशास्त्री और नौकरशाह करते हैं, सामंतवाद में वह पुरोहितवर्ग के जिम्मे था. पूंजीवाद की भांति पुरोहितवाद भी शीर्षस्थ वर्ग के हितों को समर्पित था. पूंजीवादी तकनीक द्वारा रची गई आभासी दुनिया का सपना दिखा लोगों का ध्यान उनकी वास्तविक समस्याओं की ओर से हटाए रखता है. पुरोहित इसके लिए धर्म, स्वर्ग, नर्क जैसी भ्रांत और अतींद्रिय कल्पनाएं रचता है. समाज में उस समय भी शिल्पकार वर्ग का यथेष्ट सम्मान नहीं था. मनुष्य की पहली आवश्यकता भोजन था. और अनाज पर जमींदार का अधिकार होता था. जो यह कहकर कि जिस भूमि पर अनाज उपजा है, वह उसके स्वामित्व में है, अनाज का बड़ा हिस्सा घर ले जाता था. तथा गांवदेहात की बाकी जनता, जिसमें नाई, बुनकर, काष्टकार, लौहकार, चर्मकार, कुंभकार आदि सम्मिलित थे, उन्हें अनाज के छोटे हिस्से से संतोष करना पड़ता था. एक बुनकर से कहीं अधिक उन दिनों भी पुरोहित सम्मान का पात्र था, जो धर्म के क्षेत्र में भक्त और भगवान के बीच दलाल की भूमिका निभाता था. कर्मकांडों और आडंबरों की उसकी दुनिया का बड़ा महत्त्व था. सामंतवर्ग उसको सम्मान देता था, इसलिए कि पुरोहित की दिखाई दुनिया के बहाने वह जनसाधारण का ध्यान अपने शोषण, उत्पीड़न से दूर रख सकता था. लोगों का भरमाए रखने में उसको विशेषज्ञता प्राप्त थी. पुरोहित वर्ग भी अपने काम की निस्सारता को समझता था. वह यह सब यजमान की संतुष्टि के लिए करता था. हालांकि उन दिनों भी ऐसे अवसर आए जब शिल्पकारों, छोटे व्यापारियों ने राजनीति और धर्मसत्ता को समझौता करने के लिए बाध्य कर दिया. मगर उन संगठनों का प्रभाव सीमित लोगों पर था. दूसरे धर्मसत्ता को चुनौती देने का हौसला भी उनमें नहीं था. सच तो यह है कि वे धर्मसत्ता के संरक्षण में ही स्वायत्तता चाह रहे थे. आशय यह है कि कि पूंजीवाद ने ऐसा कुछ नहीं किया जो सामंतवादी व्यवस्था में पहले से ही मौजूद न हो. बल्कि अपने स्वार्थ के लिए ही सही, पूंजीवाद ने शिक्षा का सरलीकरण किया. उसे विभिन्न क्षेत्रों में फैलाया. इसलिए कि कारखानों और बाजार पर पकड़ बनाए रखने के लिए उसे विभिन्न क्षेत्रों के कुशल पेशवरों की जरूरत थी. पूंजीवाद ने दुनिया को नवीनतम शोध दिए, जीवन को सुविधामय बनाया. संचार, यातायात, कृषि, चिकित्सा, आवास आदि अनेक क्षेत्र हैं जहां पूंजीवाद ने सफलता का परचम लहराया लेकिन हमें मालूम होना चाहिए कि इन्हीं क्षेत्रों में ऐसी कई चूक भी हुई हैं, जिन्हें विज्ञान का अभिशाप कहा जा सकता है. पूंजीवादी सोच के चलते नई चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार हुआ, जिससे जीवन संभाव्यता में आशानुरूप सुधार हुआ. बड़ी महामारियां अब प्रायः नहीं आतीं. लेकिन पूंजीवाद ने जो कुछ किया वह सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए किया है. उसने तनाव कुंठा, हृदयरोग, रक्तचाप, जैसी बीमारियां भी दी हैं. पूंजीवादी तंत्र द्वारा विकसित किए गए रिऐक्टरों ने विद्युत उत्पादन की ओर कदम बढ़ाया है तो ऐसे परिस्थिकीय संकट भी पैदा किए हैं, जिनसे जबतब सभ्यता पर संकट मंडराने लगता है.

पूंजीवाद का स्वभाव है कि वह हर काम में अपना मुनाफा देखता है. जिसमें उसका लाभ न हो उसे वह अनुत्पादक मानता है. यहां लाभ का अभिप्राय मौद्रिक लाभ से है जो प्रायः पूंजीपति वर्ग का उत्प्रेरक होता है. सहकार जैसे गैरपूंजीवादी उपक्रम मौद्रिक लाभ के बजाय सामाजिक लाभों को वरीयता देते हैं. जबकि पूंजीवाद ऐसे उत्पाद जिससे केवल जनता को लाभ हो और पूंजीपति को अपेक्षित धनलाभ न पहुंचता हो, उन्हें अनुत्पादक मानकर उनकी ओर से वह मुंह फेरे रहता है. उदाहरण के रूप में हम साइकिल और हल को ले सकते हैं. साइकिल आम आदमी की जरूरत है, हल भारतीय किसान की. आजादी से पहले भी साइकिल और हल का मूलभूत आकारप्रकार ऐसा ही था, जैसा आज है. यही हल के साथ है. उसका रूप पिछले पचाससौ वर्ष में अपरिवर्तित रहा है, जबकि इस बीच विज्ञान ने अवर्णनीय तरक्की की है. इसके बावजूद इन लोकोपयोगी यंत्रों की कार्यक्षमता में सुधार लाने के लिए कोई शोध पिछले पांचछह दशकों में नहीं हुआ, जबकि कार, रेफरीजरेटर, टेलीविजन, कंप्युटर, मोबाइल जैसी वस्तुओं के दिनप्रतिदिन नएनए माॅडल बाजार की शोभा बढ़ाते रहते हैं. चूंकि अधिकांश शोधों में पूंजीपति का धन लगा होता है, अतएव उनका विस्तार उन्हीं क्षेत्रों में होता है, जहां पूंजीपति के वर्गीय हित साधे जा सकें. पूंजीवादी का स्वार्थ नवीनतम उपभोक्ता वस्तुओं तथा उनके नएनए माॅडल विकसित कर बाजार पर एकाधिकार कायम करने तक सीमित नहीं होता. बल्कि वह उत्पादन पद्धति का भी निरंतर स्वचालीकरण करता जाता है, जिससे उत्पादन में श्रमिकों का योगदान घटता है. इससे बेरोजगारी बढ़ती है और मनुष्य की उपयोगिता पूंजीपति के निए नए बाजारों की खोज तक सिमटकर रह जाती है. कह सकते हंै कि पूंजीवादी व्यवस्था में मनुष्य को जो मिला है, उसकी बहुत बड़ी कीमत उसको अदा करनी पड़ी है. इसमें मनुष्य को सबसे बड़ा आघात यह जानकर लगता है कि पूंजीपति की निगाह में उसका मूल्य महज एक उपभोक्ता जितना है, जो उसके मुनाफे के लिए उसके कारखानों में अपना श्रम बेचता है, प्राप्त मजदूरी से अपनी आवश्यकता की वस्तुएं खरीदता है, और उनके उपभोग द्वारा इतनी ऊर्जा अर्जित कर लेता ताकि अगले दिन कारखाने में जाकर पूंजीपति के लिए काम कर सके. पूंजीपति मजदूरी के रूप में उसको इतना ही देता है, जिससे वह तैयार होकर अगले दिन काम पर आ सके. अपने प्रत्येक उपभोक्ता को वह लाभ के उपकरण के रूप में देखता है और निरंतर इस प्रयास में रहता है कि लाभानुपात को कैसे बढ़ाया जाए. इस बीच वह अपना शोषणकारी चेहरा कतई सामने नहीं आने देता. इसके उलट जो सामने आता है, वह दाता का पूरी तरह बनावटी चेहरा होता है, जिसको और लोकलुभावन बनाए रखने के लिए वह अपने साथ समाजविज्ञानियों, अर्थशास्त्रियों और राजनीतिज्ञों की पूरी फौज रखता है, जो लगातार उसका महिमामंडन करते रहते हैं. अपने पक्ष में शास्त्रीय समर्थन जुटाए रखने के लिए वह दान का सहारा लेता है. अपनी पूंजी के नितांत छोटे हिस्से का उपयोग वह दान और लोककल्याण के नाम पर करता है, इससे धर्म और संस्कृति के प्रचारप्रसार में लगी शक्तियां अनायास ही उसकी ओर आकर्षित होती हैं. पूंजीपति इस अवसर का उपयोग अपने उत्पाद के लिए नए अवसरों की खोज तथा पूंजीवाद के प्रति सहानुभूति अर्जित करने के लिए करता है. दान, चैरिटी आदि की मद में खर्च की गई धनराशि पर वह सरकार से कर लाभ अर्जित करता है. राजसत्ता और धर्मसत्ता का समर्थन पूंजीपति को समाज में अतिरिक्तरूप से प्रतिष्ठित करता है. इससे सरकार और अन्य संस्थाओं का ध्यान उसके शोषण की ओर नहीं जा पाता.

सामंतवाद में सहायक की भूमिका में धर्म होता है. वहां यह प्रसारित किया जाता है, ज्ञान की सभी धाराएं तथा उसके समस्त प्रकल्प, माध्यम आदि एकमात्र धर्म से जन्मते तथा उसी में समाते चले जाते हैं. इसलिए सामंतगण धर्माचारियों, पुरोहितों, तांत्रिकों को अपने सान्न्ध्यि में रखा करते थे. पूंजीवाद का धर्म के प्रति रवैया कभी आलोचनात्मक तो कभी सहयोगकारी होता है. चूंकि पूंजीवादी कारखानों में सभी प्रकार के उत्पाद विनिर्मित होते हैं, इसलिए उसको अपनी छवि सर्वहितैषी, सर्वकल्याणक, सर्वसहयोगी की गढ़नी पड़ती है. वह परंपरापोषक और परंपराभंजक साथसाथ होता है. अपने नए उत्पादों को खपाने के लिए वह उपभोक्ता के मनस् में अपनी आधुनिक छवि गढ़ता है, ताकि वैज्ञानिक शोधों के आधार पर नए उत्पाद बाजार में लाकर उनसे मुनाफा कमा सके. प्रत्येक धर्म अपने कुछ विशिष्ट प्रतीकों एवं कर्मकांडों से पहचान पाता है. वही बहुसंख्यक वर्ग की जीवनशैली को निर्धारित करते हैं. उनके पीछे बड़ा बाजार होता है. पूंजीपतियों का एक वर्ग इन्हीं कर्मकांडों, प्रतीकों में बाजार की नईनई संभावनाएं खोजता हुआ भाड़े के पुरोहितों, पंडितों, आचार्यों की सहायता से उनसे जुड़ी वस्तुओं का बाजार विनिर्मित करता है. कह सकते हैं कि पूंजीवाद एक ओर तो समाज में ज्ञानविज्ञान के नएनए रूपों को स्थापित करने हेतु प्रयासरत होता है, दूसरी ओर वह धर्म और अध्यात्म पर प्रायोजित बहसें चलाकर उनका अधिक से अधिक स्थूलीकरण करता चला जाता है. परिणामस्वरूप धर्म और अध्यात्म की दूरी लगातार बढ़ती जाती है. यह स्थिति धर्म के बाजारीकरण के लिए मददगार सिद्ध होती है. आवश्यकता पड़ने पर वह धर्म की आलोचना करता है, लेकिन वहां भी उसका ध्यान अपने लिए नए बाजारों की खोज पर होता है. इस तरह धर्म की आलोचना करतेकरते पूंजीवाद उसके सहायक की भूमिका में आ जाता है. इसके उदाहरण के रूप में कांबड़ यात्रा को ले सकते हैं. बाजार और पूंजीवाद के आसरे पल रहे बुद्धिजीवियों तथा लोकप्रिय राजनीति के जरिये सत्ता की वैतरिणी से गुजरने की चाहत रखने वाले राजनीतिज्ञों के लिए कांबड़ियों की बरसोंबरस बढ़ रही संख्या, अपनेअपने प्रभावक्षेत्रों का विस्तार करने का अनूठा अवसर सिद्ध होती है. इसलिए तमाम असुविधाओं के बावजूद पूंजीवाद के प्रभावक्षेत्र वाले समाचारपत्र तथा समाचार चैनल उन यात्राओं की प्रशंसा ही करते हैं. इससे यात्रियों का जोश बढ़ता है और उनकी संख्या भी. पूंजीवाद यात्रापयोगी वस्तुओं के उत्पादनवितरण द्वारा वहां भी लार्भाजन का अवसर खोज लेता है. लाभ की यह प्रवृत्ति अंतहीन होती है, जो सामाजिक शुचिता, पवित्रता, शांति, सद्भावना और मानवीय सौहार्द की कीमत पर निरंतर बढ़ती जाती है.

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मनुष्य को उपभोक्ता से अधिक कुछ न समझने वाला, मशीन को जीवित मनुष्य ये अधिक महत्त्व देने वाला पूंजीवाद मनुष्यता का भविष्य नहीं हो सकता. तो क्या साम्यवाद मनुष्यता का भविष्य बन सकता है? सर्वहारा क्रांति का आवाह्न करते समय मार्क्स ने तो यही कहा था कि भविष्य साम्यवाद का है. पूंजीवाद तो अपनी करनी आप भुगतेगा. अपने ही हाथों उसका सर्वनाश होगा. पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. उल्टे बीसवीं शताब्दी में साम्यवाद के जो गढ़ बने थे, शताब्दी का उत्तरार्ध आतेआते वे एकएक कर स्वयं ढहते चले गए. अतः एक स्वाभाविकसा प्रश्न उपजता है कि पूंजीवाद से निपटने का सही रास्ता क्या हो? समाज में उत्तरोत्तर बढ़ती उपभोक्तावादी ललक, आर्थिकसामाजिक विषमताओं पर काबू कैसे पाया जाए? बाजार में व्याप्त स्पर्धा और एकाधिकारवाद को किस प्रकार परस्पर पूरक, सहयोगी, सर्वोपकारी एवं सौहार्दमय उत्पादनतंत्र में बदला जाए? इतना तो हम मान ही चुके हैं कि पूंजीवाद बेहतर विकल्प नहीं है. इसलिए यदि अमीरगरीब के बीच बढ़ती खाई को रोकना है, यदि संस्कृति को बाजार बनने से बचाना है, यदि मनुष्य के उत्तरोत्तर उपभोक्ताकरण पर अंकुश लगाना है, यदि इस पृथ्वी और यहां के वासियों को परिस्थितिकीय संकट से उबारते हुए स्पर्धा रहित, समानतामूलक और सहयोगाधारित समाज की रचना करनी है, यदि आपसी अंतद्र्वंद्व, डर, पीड़ा, घुटन, संत्रास, वेदना, तनाव, ईष्र्या, द्वैध, चिंता और आपाधापी से भरे समाज को विवेकवान, संवेदनशील, सौहार्दमय, सदभावना और सामंजस्य पूर्ण बनाना है, तो पूंजीवाद के प्रेत को बोतल से बाहर छोड़ देना नासमझी है. लेकिन पूंजीवाद को यह बढ़त आसानी से नहीं मिली. इसके पीछे भी कहीं न कहीं मार्क्स वाद की दुर्बलताएं छिपी हैं. वैचारिक जकड़बंदी द्वारा मार्क्स वाद यह तो दर्शा ही चुका है कि उसके आधार पर समतामूलक, सर्वकल्याणकारी विश्वसमाज का गठन संभव नहीं. इसलिए कि परंपरागत धर्म की आलोचना के साथ उसके निषेध का नारा लगाने वाले मार्क्स वाद ने अपने प्रभावक्षेत्र के विस्तार के लिए अंततः उन्हीं रास्तों का उपयोग किया जिन्हें धर्म बहुत पहले अपनाता आया था. इसमें बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों की मार्क्स और उसके विचारों के प्रति अंधश्रद्धा भी सम्मिलित है. ऐसा नहीं है कि इस बीच मार्क्स वाद के स्वस्थ आलोचना बिलकुल संभव न हो सकी, किंतु इतना अवश्य हुआ कि मार्क्स वाद के आधार पर गठित राज्यों के स्वस्थ सैद्धांतिक आलोचना को भी असहनीय बनी रही. परिणाम यह हुआ कि मार्क्स वाद में वे सभी जड़ताएं, टोटम और विकार घर करते गए, जो परंपरागत धर्म के क्षरण का कारण बने थे या जिनके कारण धर्म रूढ़िवाद का शिकार होकर जीवन से पलायनोन्मुखी बन जाता है. यहां तक कि साम्यवाद की जिस सैद्धांतिकी को मार्क्स ने अपने जीवन के उत्तरार्ध में विकसित किया था, वैचारिक अंधश्रद्धा के चलते वह निरंतर प्रदूषित होती चली गई और मार्क्स वाद साम्यवाद के अपने ही लक्ष्य के दूर, ‘सर्वहारा के अधिनायकवाद’ तक सिमट कर रह गया, जिसके खतरे के बारे में स्वयं मार्क्स ने आगाह किया था.

उपर्युक्त विश्लेषण का अभिप्राय यह नहीं कि मार्क्स वाद अप्रासंगिक हो उठा है.उनमें अब भी काफी कुछ मौलिक और समाज को बदलने का सामथ्र्य मौजूद है. अतएव आवश्यकता उससे मुक्ति की न होकर उसके परिष्करण की है. बीसवीं शताब्दी में मार्क्स वाद की इस आधार पर तीखी आलोचना की गई कि उसने राज्य के समक्ष मनुष्य सत्ता को अत्यधिक बौना कर दिया है. विशेषकर रूसो के स्वाधीनतावाद, मिल के व्यक्तिस्वातंत्रय, थाॅमस पेन(1737—1809) के मानवाधिकारवादी विचारों के प्रवाह तथा लोकतंत्र की बयार ने ‘व्यक्तिमात्र’ को महत्त्वपूर्ण बना दिया था. इससे लोकतांत्रिक समाजवाद की प्रतिष्ठा और स्वीकार्यता बढ़ी. किंतु लोकतंत्र की अपनी दुर्बलताएं हैं. जनमत के वास्तविक मुद्दों से भटकने के साथ ही उसको अल्पसंख्यक का राजतंत्र बनते देर नहीं लगती. चुने गए जनप्रतिनिधि अपनी विशिष्टताबोध को बनाए रखने के लिए पूंजी की शरण में चले जाते हैं. इससे विकास के वास्तविक मुद्दों से लोगों का ध्यान हट जाता है. पूंजीवाद की निगाह में मानवमात्र एक उपभोक्ता है. वह उसको उपभोग के लिए स्वतंत्र देखना चाहता है. इसी के चलते समाजवादी विचारधारा के पूंजीवाद और समाजवाद के सभी आधुनिकतम रूप इस तथ्य से तो एकमत हैं कि मानवस्वातंत्रय की रक्षा करनी चाहिए. दरअसल मानवस्वातंत्रय ही एक ऐसा बिंदू है जिसपर ये दोनों एकमत हैं. इसलिए भविष्य का समाजार्थिक दर्शन ऐसा नहीं हो सकता जो मानवस्वांतत्रय का विरोध करता हो. लेकिन यह भी ध्यान रखना अनिवार्य है कि मनुष्य मात्र का हित समाज के हित से अलग नहीं हो सकता. इसी को केंद्र में रखकर समाजवाद कहता है कि समाज में—सब एक के लिए काम करे और एक सबके कल्याण के प्रति समर्पित हो. मगर यह तभी संभव है जब प्रत्येक मनुष्य मुक्त हो. उसको यह एहसास हो कि वह समाजकल्याण के निमित्त समर्पित है. दूसरी ओर यह भरोसा भी उसको हो कि संकट के समय वह कतई अकेला नहीं होगा. उसका संकट समाज का संकट होगा और समाज का प्रत्येक सदस्य व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से उसकी सहायता के लिए तत्पर होगा. व्यक्तिगत और सामाजिक आकांक्षाओं का रचनात्मक तालमेल ही एक सफल समाजदर्शन की पीठिका बन सकता है. बीसवीं शताब्दी के विचारकों के समक्ष सबसे बड़ी समस्या यह रही कि व्यैक्तष्ठि और समष्ठि में तालमेल कैसे बनाया जाए. कुछ इस प्रकार की व्यक्ति की अबाध स्वाधीनता के साथ उसकी कार्यक्षमता और सामाजिक प्रतिबद्धताएं भी अप्रभावित बनी रहे. समाज में आर्थिक विषमता फैलाए बिना विकासदर बनी रहे. समष्ठिवाद, संघवाद, अराजकतावाद, सहजीवितावाद, श्रमिक संघवाद जैसी अनेक विचारधाएं इस कालखंड में उभरीं. जिन्होंने मार्क्स वादी गरिमा के साथ पूंजीवाद की असल मनोवृत्तियों को पकड़ते हुए समाजवाद के किंचित लाभों को भी अपनाते जाने पर जोर दिया. असल में मनुष्यता के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती भी यही है कि किस प्रकार व्यक्तिहित और समाजहित में तालमेल बनाया जाए. बीसवीं शताब्दी में समष्ठिवाद, श्रमिकसंघवाद, अराजकतावाद और सहजीवितावाद, संगठनवाद समष्ठि में व्यैक्तष्ठि एवं समष्ठि में एक विश्वसमाज का दर्शन मानवाधिकारों की सुरक्षा, सहभागिता और सहअस्तित्व की जरूरी शर्तों पर अमल करने से ही निकल सकता है.

पूंजीवाद से मुक्ति की छटपटाहट

पूंजीवाद से मुक्ति की छटपटाहट अलगअलग देशों में अलगअलग तरीके से दिखाई पड़ रही है. कहीं वह आर्थिक औपनिवेशीकरण की प्रक्रिया से आने के लिए उत्सुक है. तो कहीं समाज में बड़ी आर्थिक असमानता अंतःसंघर्ष की स्थिति पैदा कर रही है. और असंतुष्ट वर्ग शोषण से मुक्ति के लिए आर्थिक व्यवस्था में बदलाव की मांग कर रहे हैं. कुछ देशों में जनता में बढ़ रहा क्रांतिबोध तानाशाही से मुक्ति का जोश पैदा कर रहा है. विशेषकर 2011 के प्रारंभिक महीनों लीबिया, यमन, मिश्र में नागरिक चेतना ने जो अंगड़ाई ली, उसने अन्याय और दमन की प्रतीक सामंती सत्ताओं को हिलाकर रख दिया है. उनका संघर्ष अभी जारी है, हालांकि पूंजीवाद आधुनिकता और व्यक्तिस्वांत्रय के नाम पर आंदोलन को अपने प्रभाव में लेने का प्रयास कर रहा है. इससे उसकी सफलता की संभावनाएं इसलिए भी हैं, ये जनक्रांतियों आधुनिक संचार तकनीक पर अतिरिक्तरूप से निर्भर हैं. ऐसा कोई वैश्विक क्रांतिकारी चेहरा इनके पीछे नहीं है, जिसमें लोगों का लंबे समय तक नेतृत्व करने का सामथ्र्य हो, न ही कोई बड़ा विचार इसके पीछे है, जो अपने साथ लोगों को बांधे रख सके. इसलिए यह प्रश्न अब भी अपनी जगह है कि बीसवीं शताब्दी में समाजवाद का क्या रूप होगा. राज्य आश्रित समाजवाद अपनी असफलता दर्शा चुका है. बीसवीं शताब्दी में सोवियत क्रांति की असफलता के बाद एक के बाद एक कई देशों ने राज्यआश्रित समाजवाद को अपना था. परंतु देखा गया कि सत्ताएं अपना मूल चरित्र कभी नहीं बदलतीं. इसी कारण जनमत के दबाव में जिन देशों ने राज्याश्रित समाजवाद को अपनाया गया था, वे सभी एकएक कर पूंजीवाद की शरण में जाते रहे. समाजवादी व्यवस्थाओं की इस अवस्था पर बुद्धिजीवियों ने विचार कर कुछ सुझाव भी दिए. इससे समाजवादी राजनीतिक दर्शन के नए रूप सामने आए. अराजकतावाद, श्रमिकसंघवाद, समष्ठिवाद, सहजीवितावाद आदि राजनीतिक दर्शन नए न होकर भी इसलिए चर्चा का विषय बने कि उनीसवीं शताब्दी में मार्क्स वाद की आंधी में इन नए विचारों की विद्वानों का ध्यान की नहीं कहा गया है. अधिकांश बुद्धिजीवीराजनेता जिनमें लेनिन ट्राटस्की, रोजा लेक्समबर्ग, अंतोनियो ग्राम्शी आदि सम्मिलित हैं, मार्क्स वाद के भीतर रहकर भी उसमें संशोधनपरिष्करण के पक्ष में थे. कालांतर में मार्क्स वाद की विश्वव्यापी असफलता ने अराजकतावाद, श्रमिकसंघवाद, समष्ठिवाद आदि समाजवाद की समानधर्मा विचारधाराओं को एकाएक चर्चा के केंद्र में ला दिया. मार्क्स वाद के विकल्प के रूप में बीसवीं शताब्दी में तेजी से उभरी इन विचारधाराओं की प्रमुख कमजोरी यह है कि ये साम्यवादमार्क्सवाद की भांति साधारणजन के बीच अपनी पैठ बनाने में असफल सिद्ध हुई हैं. इसलिए बीसवीं शताब्दी के प्रमुख प्रतिभाशाली दार्शनिकों, विचारकों ने समाजवाद के इन युवा प्रकल्पों को अपनी रचनात्मक मेधा से समृद्ध किया है, तथापि ये जनमानस में पैठ न होने के कारण ये अकादमिक बहसों का हिस्सा जान पड़ती हैं. हालांकि सहजीवितावाद, श्रमिकसंघवाद के समर्थकों की संख्या अमेरिका जैसे ठेठ पूंजीवादी देश में भी है. लेकिन वे किसी प्रभावकारी भूमिका में नहीं हैं.

स्वयं को पूंजीवाद का विकल्प कहने वाले ये राजनीतिकआर्थिक दर्शन किसी न किसी रूप में राज्य नामक संस्था का विरोध करते हैं तथा उसकी उपस्थिति को समाजवाद और श्रमकल्याण पर संकट के रूप में देखते हैं, परंतु कानूनव्यवस्था पर आए आसन्न संकट से निपटने, बाहरी आक्रमण के सामय देशसमाज की अस्मिता की सुरक्षा के लिए कोई सशक्त और संदेहरहित विकल्प इनके पास नहीं है. वे यह मान लेते हैं कि दुनिया के प्रायः सभी देशों में श्रमिकों की समस्या तथा उनकी चुनौतियां एक समान हैं, अतएव समाजवाद की ओर बढ़ते श्रमिक संगठन स्वयं को विश्वसमुदाय का अभिन्न अंग समझेंगे. इस तरह सीमाओं के संघर्ष, बाहरी आक्रमण जैसी स्थितियां ही नहीं रहेंगी. पूरा विश्व समाजवाद के झंडे के नीचे होगा. इस आदर्शोन्मुखी परिकल्पना को भारत में ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के नाम से जाना जाता है. परंतु वे भूल जाते हैं कि राज्यों का निर्माण केवल केवल राजनीतिकआर्थिक कारणों से नहीं होता. धर्म भी राज्यनिर्माण में महती भूमिका निभाता है. आज भी दुनिया के पचास प्रतिशत देशों में धर्म निर्णायक शक्ति बना हुआ है. पाकिस्तान जैसे देशों का तो गठन ही धर्म के आधार पर हुआ है. ऐसे देशों को श्रमिकसंघों की परिसीमा में कैसे लाया जाएगा, इसके बारे में ये विचारधाराएं कोई सुझाव नहीं देतीं. फिर धर्म स्वयं में गजब की संगठन शक्ति रखता है. बल्कि आर्थिक मसलों से अधिक संगठन की सामथ्र्य धर्म में देखी गई है. अधिकांश धर्म अर्थोपार्जन को हेय दृष्टि से देखते हैं. ऐसे में धर्माधारित संगठनों, समूहों को समाजवाद की परिसीमा में कैसे लाया जाएगा, इसके बारे में भी कोई सुझाव समाजवाद के इन नए प्रकल्पों के पास नहीं है. शायद इसीलिए वे धर्म को उपेक्षित कर आगे बढ़ जाना चाहते हैं. कहा जा सकता है कि धर्म को लेकर समाजवाद के नए प्रकल्प भी उसी गलतफहमी का शिकार हैं, जो गलतफहमी कभी मार्क्स वाद ने की थी. जिसके कारण साम्राज्यवादीसामंतवादी ताकतों को उसकी आलोचना का आधार मिला और अनेक ऐशियाई देशों में मार्क्स वाद आतेआते रह गया. समाजवाद के ये प्रकल्प मनुष्य को आर्थिकराजनीतिक प्राणी के रूप में देखते हैं. जबकि ‘अर्थ’ और ‘राज्य’ के अलावा भी मनुष्य की चेतना को प्रभावित करने वाले अनेक कारक हैं. एक कारक संस्कृति भी है, जो मनुष्य की पूरी जीवनपद्धति को प्रभावित करती है. ग्राम्शी ने संस्कृति के आधार पर ही समाज में पलने वाले वर्गभेद की व्याख्या की है.

धर्म नैतिकता का उपयोग आध्यात्मिक मान्यताओं के अवलंबन के रूप में करता है. अध्यात्म चेतना मानवमात्र का विषय है. हर कोई सृष्टि और जीवन के रहस्यों को लेकर विशिष्ट सोच रखता है. धर्म नहीं मान्यताओं का सामान्यीकरण करता है. उनके प्रकटीकरण हेतु कुछ कर्मकांडों का विधान रचता है. धर्म का मूल्य समाजीकरण का विषय है, अपने औचित्य को बनाए रखने के लिए ही धर्म नैतिकता का सहारा लेता है. तो क्या समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना के लिए राज्य का धर्म की शरण में आना उपयुक्त स्थिति है? क्या समाजवाद को समर्पित कोई राज्य धर्म का उपयोग अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक उपकरण के रूप में कर सकता है? इसका उत्तर ‘न’ में है. इसलिए कि धर्म की नींव भले ही कुछ मानवमात्र की अध्यात्मिक जिज्ञासा के निदान और कुछ नैतिक मान्यताओं पर रखी जाती हो, परंतु जिस आध्यात्म संपदा को वह अपनी धरोहर मानता है, उसका पूरा का पूरा अभिकल्पन सामंती परिवेश से युक्त होता है. प्रत्येक धर्म सृष्टि के मूल में किसी सर्वशक्तिमान सत्ता के योगदान की बात करता है. जो इतना शक्तिसंपन्न है कि बैठेठाले संकेतमात्र से अपनी इच्छाओं की पूर्ति कर सकता है. सर्वगुणसंपन्नता को महत्त्व दिए जाने का यही संस्कार कुछ लोगों को दूसरों से स्वयं को श्रेष्ठ ठहराने का बहाना देता है. ईश्वर की यह अभिकल्पना समाज के शीर्षस्थ वर्ग द्वारा अपनी श्रेष्ठता को सिद्ध करने के लिए की गई है. इसके अनुसार जो बैठेठाले सबकुछ सहजता से प्राप्त कर सके, जिसको परिश्रम करना ही न पड़े वही श्रेष्ठ है. जबकि समाजवाद का प्रयास होता है, समस्त सुखों में सभी की साझेदारी. इस दायित्व के लिए वह राज्य को नियुक्त करता है तथा समस्त संसाधन उसके अधीन रखने का सुझाव देता है. यह देखते हुए कि सत्ता का प्रत्येक रूप कभी न कभी तानाशाही का रूप ले लेता है, समाजवाद के आधुनिक संस्करण राज्यसत्ता का विरोध करने लगे हैं. समाजवाद के इन नए प्रकल्पों के अनुसार समाजवाद विशिष्टता का नहीं साधारणतम के संगठित प्रयास की परिणति होता है. इस प्रकार वह धर्म की सैद्धांतिकी जो किसी न किसी सर्वशक्तिमान केंद्रीय सत्ता पर विश्वास रखती से विपरीत आचरण रखता है. आध्यात्मिकता की खोज के लिए धर्म का नारा होता है—‘स्वयं को पहचानो.’

अकेले व्यक्ति की अंतर्यात्रा समाजवाद के लिए विशिष्ट महत्त्व नहीं रखती. इसलिए वह नारा देता है उल्लेखनीय है कि भारत, श्रीलंका आदि ऐशियाई देशों में समाजवाद की असफलता का एक कारण यह भी रहा कि वहां की जनता सहòाब्दियों से धर्म और राजशाही की जकड़न में रहने के कारण लोकतांत्रिक परिवेश में रहने का अभ्यास भूल चुकी थी. उस जकड़न से बाहर लाने के लिए जबजब इन देशों में प्रयास किया गया, तब तक रूढ़िवादियों ने उसको धर्म और संस्कृति पर हमला बताकर लोगों के चिंतन की धारा ही पलट दी. ‘खुद को पहचानो(नो दाइसेल्फ)’ के स्थान पर नए मनुष्य का नारा होना चाहिए—‘अपने जैसा बनो(बी दाइसेल्फ). अर्थात वह बनो, जो तुम बनना चाहते हो. उन लोगों के साथ जुड़ो जो तुमको पसंद हैं. उस संगठन अथवा समूह के साथ हितों का साझा करो, जिसको तुम्हें सर्वाधिक हितकारी लगता हो. वह करो जिससे तुम्हें अधिकतम लाभ की संभावना हो. ‘स्वैच्छिक सहभागिता’ आधुनिक समाजवादी चिंतन का मूल सिद्धांत है. आस्कर वाइल्ड का कहना है—

सभी संगठन पूर्णतः स्वैच्छिक होने चाहिए. केवल स्वैच्छिक संगठनों में ही मनुष्य पूर्णतः प्रसन्न रह सकता है.’

स्वैच्छिक सहभागिता उन्हीं समाजों में संभव है, जहां लोगों को अपने मन का करने की आजादी हो. जहां लोकतांत्रिक परिवेश हो. इसका दूसरा छोर ‘व्यक्तिवाद’ की ओर जाता है. समाजवाद में राज्य की मर्जी सर्वोपरि होती है. वहां व्यक्तिविशेष के बजाय संपूर्ण समाज के कल्याण पर जोर दिया जाता है. प्रश्न उठता है कि क्या व्यक्तिवादी माहौल में समाजवाद की उपस्थिति संभव है? यदि सभी को अपने मन की करने, मर्जी का व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता होगी तो फिर लोग दूसरों से क्यों जुड़ेंगे? क्यों कोई दूसरे के लिए अपने सुख का बलिदान करने को तैयार होगा? जबकि इच्छाओं का सामान्यीकरण समाजवाद की पहली शर्त है. व्यक्तिवादी वातावरण में पूंजीपति को कैसे दोषी ठहराया जा सकता है, क्योंकि उसका संपत्ति अर्जित करने का चाहे जो रास्ता रहा हो, है तो आखिर वह भी एक व्यक्ति ही? उसको भी इच्छानुरूप व्यवसाय चुनने की उतनी ही स्वतंत्रता है, जितनी दूसरों को! और यदि सभी अपनी मर्जी की करने को स्वतंत्र होंगे तो व्यक्तिगत कामनाओं और लालचों पर कैसे अंकुश साधा जाएगा? आर्थिक विषमता को कैसे कठघरे में लाया जा सकता है? समाजवादियों के लिए तो ये सब पुरानी समस्याएं हंै. इसके लिए वे राज्य को अतिरिक्तरूप से अधिकारसंपन्न बनाने पर जोर देते हैं. जबकि समाजवाद के आधुनिक संस्करण यह मानकर कि राज्य का चाहे जो स्वरूप हो, वह अंततः मनमाना आचरण करने लगता है, राज्य का ही निषेध करते हैं. यद्यपि आजकल यह माना जाने लगा है कि लोकतांत्रिक समाजवाद राजनीतिक दर्शन की सर्वोच्च उड़ान है, तथा उससे परिपक्व राजनीतिक दर्शन की परिकल्पना संभव ही नहीं है. पर इन सभी का एक निहितार्थ है. वह है व्यक्तिगत संपत्ति का निषेध. समाजवाद के नए रूप व्यक्तिगत संपत्ति का परोक्षतः निषेद्ध करते हुए उसको सामूहिक अधिकारिता में ले आना चाहते हैं. लेकिन इन्हें अमेरिका तथा यूरोप के उन देशों में ही सफलता मिल पाई है, जहां पूंजीवाद पहले से ही काफी मजबूत है. भारत और अन्य दक्षिण एशियाई देशों में में जहां पूंजीवाद अपनी जड़े तेजी से गहरी करता जा रहा है, और उसके दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं, समाजवाद के नए प्रकल्प समष्ठिवाद, सहजीवितावाद, श्रमिकसंघवाद, संगठनवाद यहां उतने असरकारक नहीं बन पाए. आखिर क्यों? असल में ये समाज धर्म और क्षेत्रीयता की जकड़बंदी में इतने गहरे फंसे हैं कि उससे बाहर निकल पाना इनके लिए संभव ही नहीं हो पा रहा है. भारत में तो धर्म के अलावा जाति भी समाज को बांटने वाला प्रमुख कारक है, जिसके चलते यहां व्यक्तिगत संपत्ति का निषेध कर पाना संभव नहीं हो पाया है. जाति की विशेषता है कि वह जन्म के आधार पर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्वतः अंतरित होती है. जाति के साथ व्यक्ति के व्यवसाय की अवधारणा भी जुड़ी है. प्रत्येक व्यक्ति जब जन्मना आधार पर अपने व्यवसाय से जुड़ा है तो उसके आधार पर होने वाले हानिलाभ और संपत्ति संबंधी अधिकारों से उसको वंचित कर पाना जातिप्रथा पर प्रहार किए बिना संभव ही नहीं है. लेकिन इन देशों मंे तेजी से बढ़ती आर्थिक असमानता और पूंजीवाद की मनमानी के चलते यह बात साफ हो चली है कि जनता लंबे समय तक शोषण को सह नहीं पाएगी. और जनता का संघर्ष आज का नहीं है. यह शताब्दियों पुराना है, हालांकि भारत जैसे संस्कृति अधीन समाजों में उसकी धमक बहुत अधिक सुनाई नहीं पड़ती है, लेकिन यत्रतत्र उसकी उपस्थिति का अनुभव आसानी से किया जा सकता है. यहां एक बार फिर पू्रधों को याद करना आवश्यक है. ‘संपत्ति क्या है?’ पुस्तक में वह सीयेस के ‘थर्ड एस्टेट’ के विचार को विस्तार देता हुआ कहता है—

यह थर्ड एस्टेट क्या है?’

कुछ नहीं!’

इसको क्या होना चाहिए?’

सब कुछ.’

राजा क्या है?’

जनता का सेवक’

यदि राजा हमारा सेवक है तो उसका कर्तव्य है हमें रिपोर्ट करे, हमारा आदेश माने.’

यदि वह हमें रिपोर्ट करता, हमारा आदेश मानता है तो वह हमारे नियंत्रण में है.’

यदि वह हमारे नियंत्रण में है तो उसकी कुछ जिम्मेदारियां हैं.’

यदि उसकी कुछ जिम्मेदारियां हैं तो उसको दंडित किया जा सकता है.’

यदि उसको दंडित किया जा सकता है तो उसको उसके अपराध के अनुसार दंड जाएगा.’

यदि उसको अपराध के अनुसार दंड जाएगा तो उसको मृत्युदंड भी संभव है.’

उल्लेखनीय है कि जिस समय सीयेस ने थर्ड एस्टेट को लेकर अपनी मामूली पंपलेट के आकार की थी पुस्तक लिखी, उस समय फ्रांसिसी जनता की हालत बहुत बुरी थी. राजा और अधिकारी विलासिता में डूबे थे. ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार व्याप्त था. धर्मसत्ता राजनीति से सांटगांठ कर जनता को बरगलाती और मजे लूटती थी. आम जनता की कहीं सुनवाई न थी. अपनी दुर्दशा के कारण जनसाधारण के मन में धर्मसत्ता और राजसत्ता के प्रति आक्रोश पनप रहा था. उसको हवा देने के लिए कवि, लेखक, साहित्यकार, विचारक, दार्शनिक अपनीअपनी तरह से प्रयास कर रहे थे. समाज और जनाकांक्षाओं का नए सिरे से विश्लेषण किया जा रहा था. सीयेस और समकालीन विचारकों ने तत्कालीन फ्रांसिसी समाज को तीन हिस्सों में बांटा है. प्रथम एस्टेट, द्वितीय एस्टेट तथा तृतीय एस्टेट. प्रथम एस्टेट में धर्माचार्य और पुरोहित वर्ग सम्मिलित थे, जिनपर कथित रूप से धर्म के संचालन की जिम्मेदारी थी. प्रथम एस्टेट में हालांकि कोई औपचारिक विभाजन न था, तो भी भीतर ही भीतर यह वर्ग दो प्रमुख भागों ‘उच्च’ एवं ‘निम्न’ वर्ग में विभाजित था. पहले वर्ग में बिशप तथा चर्च के प्रतिष्ठित अधिकारीगण आते थे, जो धर्मसत्ता में ऊंचा स्थान रखते थे. दूसरे वर्ग में सहायक पादरी, नर्स, चर्च के सेवादार आदि आते थे, जिनकी संख्या प्रथम एस्टेट के कुल सदस्यों की संख्या का 90 प्रतिशत थी. 1789 यानी सीयेस के जीवनकाल में प्रथम एस्टेट के सदस्यों की संख्या लगभग 130000 थी, जो उस समय की फ्रांस की कुल जनसंख्या का आधा प्रतिशत थी.

द्वितीय एस्टेट में फ्रांस के अभिजन तथा राजकुल से जुड़े लोग आते थे. यह वर्ग राजसत्ता के निकटस्थ था और स्वयं को धर्मसत्ता के अधीन मानता था. हालांकि उसकी अपनी सत्ता भी धर्मसत्ता के समानांतर थी. इस वर्ग में वरिष्ठ नौकरशाह, सेनापति, उच्च राजकीय अधिकारी वगैरह भी आते थे, जो उन दिनों के कानून के अनुसार केवल अभिजन वर्ग के हो सकते थे. वे समाज के प्रतिष्ठित नागरिक माने जाते थे. उनसे जबरन काम नहीं लिया जा सकता था. इस वर्ग को प्रत्यक्ष कर संबंधी छूट भी प्राप्त थी. द्वितीय एस्टेट के सदस्यों का संख्यानुपात फ्रांस की कुल जनसंख्या का मात्र 1.5 प्रतिशत था. शेष 98 प्रतिशत जनसंख्या तृतीय एस्टेट के अंतर्गत आती थी. एक तरह से यह छोटे व्यापारियों, उत्पादकों का समूह था, जो बहुसंख्यक होकर भी अधिकार और संपत्ति के मामले में बहुत पिछड़े हुए थे. तृतीय एस्टेट में भी दो प्रकार के लोग थे. 8 प्रतिशत हिस्सा शहरी सीमा में रहने वाले नागरिक वर्ग का थे. उनमें से अधिकांश व्यापारी, नौकरशाह और वेतन भोगी मजदूर थे. बाकी 90 प्रतिशत में ग्रामीण किसान, खेतिहर मजदूर, मिल मजदूर आदि सम्मिलित थे. तृतीय वर्ग के पास अपनी कोई संपत्ति नहीं थी. न उन्हें राजनीति में हिस्सा लेने के अवसर प्राप्त थे. अपनी कोई संपत्ति न होने के कारण यह वर्ग अपनी जीविका के लिए अभिजन जमींदारों, नौकरशाहों के अधीन कार्य करने को विवश था. बदले में उन्हें जो वृत्तिका प्राप्त होती थी, उसका बड़ा हिस्सा उनसे कराधान के रूप में वापस ले लिया जाता था. इस वर्ग में छोटे शिल्पकार भी सम्मिलित थे, जिनके व्यवसाय मशीनीकरण के कारण तेजी से छिन रहे थे. रोजगार का संकट, गरीबी, कराधान की लगातार बढ़ती दरें आदि तृतीय एस्टेट के सदस्यों की कुछ सामान्य समस्याएं थीं, जो उन्हें एक करती थीं. फ्रांसिसी क्रांति दरअसल इसी तृतीय स्टेट के आक्रोश की परिणति थी. सीयेस के पुस्तिका ने जादूई असर किया था. प्रूधों लिखता है कि सीयेस की पुस्तक के पांच वर्ष के अंदर ही स्थिति एकदम पलट चुकी थी. उसके बाद तीसरी स्टेट ही सबकुछ थी. सम्राट, अभिजन, तथा धर्माधिकारी वर्ग अपनी चमकदमक गंवा चुके थे. फ्रांसिसी नवोदय की चमक पूरे यूरोप में कौंधी थी. इसके फलस्वरूप इंग्लेंड, जर्मनी, इटली, स्पेन आदि देशों में समाजवादी चेतना का विस्तार हुआ, हालांकि उसका स्वरूप विभिन्न देशों की परिस्थिति के अनुसार परिवर्तनशील था.

आधुनिक भारत की यदि तत्कालीन फ्रांसिसी समाज से तुलना करें तो स्थिति में बहुत अधिक अंतर नजर नहीं आता. बल्कि अठारवीं शताब्दी के फ्रांसिसी समाज की जो दुरवस्था थी, भारतीय समाज की स्थिति आज भी उससे कुछ अलग नहीं है. कहने को इस देश में लोकतंत्र है. मगर व्यवहार में पूरी राजनीतिक सत्ता पांचछह सौ राजनीतिक परिवारों के बीच सिमटी हुई है. बारीबारी से वही लोग सत्ता में आते रहते है. उनके बीच लोकतंत्रीय छूट का लाभ उठाकर यदि को नया प्रतिनिधि चुनकर आ भी जाए तो संसदीय बहुमत की राजनीति में उसकी आवाज नक्कारखाने में तूती बनकर रह जाती है. उच्च वर्ग के चक्रव्यूह को तोड़ने की न तो वह हिम्मत जुटा पाता है, न इसके लिए उसको व्यापक जनसमर्थन ही मिल पाता है. यही वर्ग अपने चहेतों के साथ राजनीतिक और उच्च नौकरशाही के रूप में सत्ता को कब्जाए रहता है. अर्थतंत्र की हालत भी इससे बेहतर नहीं है. देश के उत्पादन तंत्र पर भी लगभग चारपांच सौ बड़ी कंपनियों का अधिपत्य है. उनमें भी मात्र आठदस उद्यमी ऐसे हैं जिनका पूरे व्यापारतंत्र के आधे से अधिक हिस्से पर कब्जा है. यह स्थिति तब है जबकि भारतीय संविधान में आर्थिक असमानता को उखाड़ फंेकने का आवाह्न किया गया है. संविधान से कट जाने के कारण ही भारतीय राजनीति और समाज में अनेकानेक बुराइयां आ चुकी हैं. संसदीय राजनीति का आज भले ही कोई विकल्प नजर न आता हो, किंतु यह भी सच है कि भारतीय लोकतंत्र में आज वे सभी बुराइयां आ चुकी हैं, जिनकी ओर प्लेटो ने संकेत किया था. लोकतंत्र के नाम पर भारतवासी अर्थसत्ता, धर्मसत्ता और कुलीतंत्र के मकड़जाल में जी रहे हैं. अस्सी प्रतिशत राजनीति विकास की परिधि से बाहर है. ऐसे में भारत के लिए सर्वाधिक उपयुक्त रास्ता जिससे यह देश पूंजीवादी प्रभुत्व के दायरे से बाहर आ सके कौनसा हो सकता है? इसका एक विकल्प महात्मा गांधी ने सुझाया था. वह था ग्रामीण स्वराज्य और आर्थिक विकेंद्रीकरण का. वह अपने आप में एक बेहतर व्यवस्था हो सकती है. परंतु भारत के संबंध में उसकी उपयोगिता इसलिए संदेह से परे नहीं है, इसलिए कि यहां एक तो अशिक्षा का साम्राज्य है, विशेषकर गांवों में अभी भी पचास प्रतिशत आबादी अशिक्षितों की है, शिक्षितों में भी अल्पशिक्षित ही अधिक हैं. उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों की जनसंख्या तो पढ़ेलिखों का पांचछह प्रतिशत ही है. दूसरा कारण जो इससे भी अधिक चिंतनीय है, वह भारतीय समाज में व्याप्त जातिप्रथा है, जिसको फासीवाद से प्रेरणा मिलती है. जातिप्रथा में समाज का बहुसंख्यक वर्ग सिर्फ इस कारण कि उसका जन्म किसी कुल या जाति विशेष में नहीं हुआ, विकास के अवसरों यहां तक कि सामान्य मानसम्मान से भी वंचित कर दिया जाता है. महात्मा गांधी समाज का बदलाव तो चाहते थे, परंतु भारतीय समाज के जातिवादी ढांचे से उन्हें कोई शिकायत न थी. इसलिए ग्राम स्वराज्य से समानता के अपेक्षित लक्ष्य की प्राप्ति उस समय तक संभव नहीं है, जब तक देश में जाति प्रथा है. भारत में मार्क्स वाद की दस्तक उनीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ही हो चुकी थी. 1925 में ‘भारतीय साम्यवादी पार्टी’ का विधिवत गठन हुआ. लेकिन भारतीय समाज की संरचना और साम्यवादी दलों का नेतृत्व प्रायः उच्चस्थ वर्गों के अधीन रहने के कारण यहां साम्यवादी चेतना का भरपूर विस्तार नहीं हो सका. साम्यवादी विचारधारा के विकास के लिए न केवल धार्मिक रूढ़ियों पर प्रहार किया जाना आवश्यक था, बल्कि इसके जातिवादी ढांचे को तोड़ना भी आवश्यक था. मगर इस ओर से निरपेक्ष रहने के कारण भारतीय साम्यवाद एक प्रकार से बुर्जुआ राजनीति का प्रतीक बना रहा. आजादी के बाद राममनोहर लोहिया ने अवश्य जातिव्यवस्था पर प्रहार किए, परंतु भारतीय जनमानस की धार्मिक छवि को बदलने के लिए वे भी कुछ खास नहीं कर पाए. विशेषकर धार्मिक मान्यताओं को लेकर तो वे भी भारत की लोकप्रिय राजनीति का ही परिष्कृत संस्करण जान पड़ते हैं. इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि आजादी के तुरंत बाद देश में दक्षिणपंथी राजनीति मजबूत हो चुकी थी, जो ब्राह्मणवादी व्यवस्था को बनाए रखना चाहती थी. समाज के जातिवादी ढांचे को लेकर भारत के मार्क्सवादी नेताओं को भी कोई शिकायत न थी. चूंकि दक्षिणपंथी विचारों को प्रश्रय देने वाली पार्टियां दूसरी भी थीं तथा भारतीय साम्यवादी नेता समाज के उत्पीड़ित वर्ग का विश्वास जीतने में असफल सिद्ध हुए थे, इसलिए आजादी के साठ वर्ष बाद भी भारत में साम्यवादी राजनीति अपना असर छोड़ने में असमर्थ रही हैं. बीते दो दशकों में तो उदार आर्थिक नीतियों ने तो प्रशासन और मीडिया में पूंजीवाद के इतने प्रशंसक खड़े कर दिए हैं कि उनके प्रभाव में साम्यवादी राजनीति की आमजन तक पहुंच भी घटी है.

तो क्या यह मान लिया जाए कि पूंजीवाद के अंधकूप से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है? भारत में साम्यवादी राजनीति के दिन लद चुके हैं? वर्तमान और भविष्य पूंजीवाद के हाथ में है और वह अनिश्चित समय तक अपनी मनमानी करता रहेगा? रूस में साम्यवादी राजनीति के पराभव के उपरांत अराजकतावाद, समष्ठिवाद, श्रमिकसंघवाद, सहजीवितावाद, संगठनवाद, अराजक समष्ठिवाद आदि समाजवाद के जो नए विकल्प आए हैं, क्या उनका भारतीय समाज में कोई भविष्य अथवा उपयोगिता नहीं है? यह तो कहना सरासर अनुचित होगा कि भारतीय और समाज में परिवर्तन की संभावनाएं लुप्त हो चुकी हैं. भविष्य ऐसे घटाटोप के घेरे में जिससे लंबे समय तक मुक्ति असंभव है. लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि भारतीय समाज जब तक जातिवादी ढांचे को बनाए रखता है, जब तक यहां कथावाचक या पुरोहित स्तर के लोग स्वयं को भगवान कहकर जनता को बरगलाते रहेंगे, जब तक समाज में अशिक्षा का साम्राज्य है—उस समय तक भारतीय समाज में किसी स्थायी परिवर्तन की उम्मीद नहीं की जा सकती. हालांकि इसी घटाटोप और नाउम्मीदी के बीच परिवर्तन की हल्कीसी सुगबुगाहट पिछले कुछ वर्षों में देखने को मिली है. भारत में जिस प्रकार भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनता में चेतना फैली है. मिश्र और यूनान के प्रचीनतम देशों से जैसी खबरें आ रही हैं, उनसे तो लगता है कि पूरे विश्व में तानाशाही और पूंजीवाद की वर्चस्वकारी नीतियों के विरोध में माहौल बन चुका है. लोग बदलाव चाहतें हैं. खुशी की बात यह है कि इस बार जनता खुद सड़क पर है, नेता या तो बचाव की मुद्रा में हैं अथवा उसके पीछे. प्रथम दृष्टया इसे विचारहीन क्रांतियों का दौर भी कहा जा सकता है, लेकिन इस जनआड़ोलन से जो नवनीत निकलेगा, वह अवश्य ही आमूलपरिवर्तनकारी होगा, जिसका सपना हर मानवतावादी विचारक देखता है.

ओमप्रकाश कश्यप