Category Archives: समाजवादी चिंतन की पृष्ठभूमि

‘समाजवादी चिंतन की पृष्ठभूमि’ पुस्तक की भूमिका

सामान्य

लगभग पांच वर्ष पुरानी यह घटना दिमाग से उतरती नहीं. अपनी पुस्तक ‘सहकारिता आंदोलन: उद्भव एवं विकास’ के प्रकाशन को लेकर राजधानी के जाने-माने प्रकाशक से संपर्क साधा था. संस्थान स्वामी का छूटते ही कहना था—‘आजकल सहकारिता को कौन पढ़ता है!’ मैंने सहकारिता को लेकर कुछ छिटपुट आलेख 1997 से लिखने आरंभ किए थे. कहा जा सकता है कि 2007 में तैयार हुई वह पांडुलिपि लगभग 10 वर्ष के स्वाध्याय और परिश्रम की देन थी. जबकि प्रकाशक महोदय वे थे जिन्होंने पूंजीवाद विरोधी विचारधारा पर केंद्रित विदेशी पुस्तकों के अनुवाद प्रकाशित कर खूब वाहवाही बटोरी थी. रूस के क्रांतिकारी साहित्य के अनुवाद के अलावा मार्क्स, लेनिन, रोजा लेक्समबर्ग, चे ग्वेरा जैसे क्रांतिकारी समाजवादियों पर केंद्रित उनकी कई पुस्तकें बाजार में थीं. उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा उन्हीं की बिक्री से आता था. वे बाजारवाद के विरोध में चल रही बहसों से बने बाजार को तो कब्जाए रखना चाहते थे, परंतु उसके सबसे सार्थक विकल्प पर उन्हें भरोसा न था. जिस सहकारिता आंदोलन से विश्व के अस्सी करोड़ नागरिक जुड़े हों. भारत के बीस और अमेरिका जैसे महापूंजीवादी देश के चालीस प्रतिशत नागरिकों का जिससे आत्मीय संबंध हो—उसके बारे में हिंदी प्रकाशक का व्यंग्यात्मक लहजे में बातें करना, सिर्फ उसका दिमागी खोखलापन नहीं, हिंदी प्रकाशन-जगत की विडंबना भी है. इसको एक प्रकाशक की बौद्धिक अल्पज्ञता मानकर भुला पाना आसान भी नहीं है. खासकर तब जबकि उदारवाद, भूमंडलीकरण, बाजारवाद, विनिवेशीकरण गत दो दशकों में सर्वाधिक चर्चित शब्द रहे हैं. इनके बनिस्पत सहकारिता, समाजवाद, सहजीवितावाद और समष्ठिवाद जैसे उपक्रमों, जो पूंजीवाद का सार्थक विकल्प रचने की क्षमता रखते हैं, की चर्चा मीडिया में ‘न’ के बराबर हुई है. सहकारिता का यदा-कदा उल्लेख होता भी है, तो उसके आधार पर गठित संगठनों में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर, उन्हें बदनाम करने के लिए. इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि हमारे अखबार, मीडियाकर्मी तथा उनके द्वारा पोषित, स्थापित बुद्धिजीवी सार्थक विकल्पों की चर्चा कम, प्याले में तूफान ज्यादा खड़ा करते हैं. इसलिए बाजारवाद, भूमंडलीकरण, आर्थिक उदारीकरण जैसे शब्द तथा इनके बहाने होने वाले विमर्श महज प्रतिक्रियावादी सिद्ध होते हैं और सार्थक विकल्पों की खोज बार-बार पटरी से उतरती रहती है.

प्रस्तुत पुस्तक की रचना के दौरान भी कई अनुभव हुए. उन दिनों प्रसंगवश जिससे भी इसका जिक्र किया, एकाध को छोड़कर प्रायः सभी ने भारतीय वाङमय का अध्ययन करने का परामर्श दिया. किसी ने कहा—वेदों का प्रणयन करो, वे समाजवादी प्रेरणा के आदिस्रोत हैं. किसी ने जैन और बौद्ध दर्शन के विशिष्ट अध्ययन की सलाह दी. खासकर उनकी नैतिक व्यवहार संबंधी मान्यताओं को लेकर. एक मित्र से तो जब भी मिला, हर बार उनके दिमाग की घड़ी की सुई शंकराचार्य पर अटकी हुई मिली—‘वेदांत से परे समाजवाद क्या है?’ कोई उनकी इस स्थापना की गहराई में जाने की कोशिश करे, उससे पहले ही वे आगे बढ़ जाते. बार-बार वही धुन, वही टेक, वही लगन—‘जिस दर्शन ने मान लिया कि कण-कण में भगवान हैं, उससे परे सोचने की गुंजाइश ही कहां रह जाती है….क्या बचा रह जाता है आगे सोचने को!’ वेदांत के प्रति इस सम्मोहन के शिकार वे अकेले नहीं हैं. परंपरा के प्रति जड़ आसक्ति ने भारत के मौलिक चिंतन को बहुत नुकसान पहुंचाया है. परिणामस्वरूप गत बारह सौ वर्षों में एक भी नया दर्शन नहीं जन्मा है. आखिर क्यों? इस पर उन्होंने शायद ही कभी विचार किया हो! अध्यात्म जैसे परम जिज्ञासु विषय को धर्म और परंपरा के नाम पर अतार्किक और कर्मकांडी बनाए रखने की स्वार्थपूर्ण कोशिश में ‘न्याय’ और ‘वैशेषिक’ जैसे दर्शन जो, ज्ञानार्जन को मोक्ष का माध्यम बताते थे, एक षड्यंत्र की भांति नेपथ्य में ढकेले जाते रहे. उस पर तुर्रा यह कि हम विश्वगुरु थे, विश्वगुरु हैं….मैं मानता हूं कि मित्र द्वारा भारतीय समाजवाद की मूल प्रेरणाओं की पड़ताल हेतु वेदों, उपनिषदों के अलावा जैन और बौद्ध साहित्य को पढ़ने की सलाह देना निस्संदेह सदाशयतापूर्ण था. मैंने उनकी सलाह के अनुसार बरतने की कोशिश भी है. भारतीय समाजवाद की पृष्ठभूमि पर केंद्रित पूरा एक खंड इस पुस्तकमाला में लाने की योजना है. हैरानी मात्र इस बात की है कि दो-ढाई वर्ष के अंतराल में जब तक इस पुस्तक की लेखन प्रक्रिया चली, किसी ने भी भारत के भक्ति आंदोलन की सामाजिकी के बारे में जानने की सलाह नहीं दी. किसी ने नहीं कहा कि समाजवादी आंदोलन को महज आर्थिक मुक्ति का आंदोलन समझ लेना भारी भूल होगी. समाजवाद मनुष्य की सर्वतोन्मुखी स्वाधीनता और समानता का संपूर्ण मानवतावादी दर्शन है. उसके साथ सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता भी जुड़ी हुई है. भारत में इसके स्वर पहली बार भक्त-कवियों की ओजपूर्ण वाणी में सुनाई पड़े थे.

पश्चिम में पंद्रहवीं शताब्दी में आरंभ हुए सुधारवादी आंदोलनों का लक्ष्य मनुष्य की राजनीतिक, सामाजिक आजादी को वापस लाना था. आर्थिक समानता का विचार उस समय तक अजन्मा था. धर्म को समस्त जीवनमूल्यों का आधार माना जाता था. उसका नियंत्रण उन शक्तियों के अधीन था, जो इस संसार और यहां उपलब्ध प्रत्येक सुख-सुविधा को मायाजाल बताकर जनसाधारण को पाप-पुण्य, लोक-परलोक की भ्रांत धारणाओं में उलझाए रखना चाहती थीं. उनमें अधिकांश बेहतर जीवन जीते थे और कुछ का जीवन तो अत्यंत विलासितापूर्ण था. निहित स्वार्थ के लिए धर्मसत्ता आततायी एवं विभेदकारी सामंती शक्तियों का समर्थन करती थी. इसलिए आरंभिक समानतावादी आंदोलनों का प्रमुख लक्ष्य मानवमात्र को पुरोहितवाद, आडंबरवाद और पोंगापंथी से मुक्ति दिलाना था. पश्चिम में उसकी शुरुआत मार्टिन लूथर द्वारा हुई, जिसे जॉन कॉल्विन, सरवाइंतिस, जियादार्नो ब्रूनो, संत साइमन, वाल्तेयर, रूसो आदि विचारकों ने गति दी. लगभग इसी कालखंड में धार्मिक सुधारवादी आंदोलन भारत में भी जन्मे, परंतु यहां की परिस्थितियों में वे उतने कारगर सिद्ध न हो सके. भारत में भक्ति आंदोलन का विकास एक क्रांतिकारी विचारधारा के रूप में हुआ था. आरंभिक दिनों में उसको यथास्थितिवादियों से टकराना भी पड़ा. परंतु संत कवियों का नैतिक आभामंडल, उनका उच्च मानवीय सरोकार जैसे कुछ कारण थे, जिनसे लोगों के बीच उनकी प्रतिष्ठा निरंतर बढ़ती गई. वह सही मायने में सामाजिक आंदोलन था. उसमें ऐसे लोग सम्मिलित थे, जिन्हें परंपरागत धर्मायोजनों में भाग लेने की मनाही थी. जिनके लिए वेदाध्ययन पाप था. मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने से जिन्हें रोक दिया जाता था. जो धर्म और जाति के नाम पर शताब्दियों से उत्पीड़न सहते आए थे.

भक्त कवियों ने धर्म के नाम पर व्याप्त कर्मकांड और बलिप्रथा को चुनौती दी. कहा कि परमात्मा निर्मल हृदय में निवास करता है. ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’. तब आदमी को मंदिर-मस्जिद जाने, तीरथ नहाने, दान-पुण्य का नाटक करने, व्यर्थ का चढ़ावा चढ़ाने के ढकोसलों की आवश्यकता ही क्या है! ‘एक नूर से सब जग उपज्या’ कहकर उन्होंने जाति के नाम पर भेदभाव करने वालों को ललकारा. उससे पहले जितने भी धर्म, संप्रदाय पनपे थे, सबके पीछे किसी न किसी राजा का समर्थन था. पुरोहितवर्ग सत्तावर्ग से हाथ मिलाए रहता था. आपद्कर्म के बहाने वह उनके हर धत्कर्म में न केवल सहयोगी बनता, बल्कि अपनी ऊल-जुलूल मान्यताओं, रूढ़ियों के आधार पर उसे बढ़ावा भी देता था. अकेले संतकवि ऐसे थे जो अपनी नैतिक सत्ता के बूते ‘कहा मोको सीकरी सौ काम’ कहकर बादशाह अकबर को भी ठेंगा दिखा सकते थे. बड़े-बड़े सरदारों, मुल्ला-मौलवी, पंडित ओझाओं को राजदरबार में सिर झुकाए देखने वाला जनसमाज संतकवियों के फक्कड़पन, वाणी के ओज, साफगोई भरी ललकार और सीधी-सरल भाषा में ज्ञान संप्रेषण की कला पर सम्मोहित था. उनकी बातें उलझाव से दूर, सीधी और व्यावहारिक होती थीं. आरंभिक भक्त कवि समाज की निचली जातियों से आए थे. वे निर्गुण के उपासक थे. मूर्तिपूजा, जातिभेद, कर्मकांड आदि का विरोध करते थे. भक्ति आंदोलन की उस आरंभिक सफलता ने काफी लोगों को आकर्षित किया. कबीर, दादू दयाल, रविदास, मलूका, पीपा जैसे संत कवियों की वाणियां घर-घर गूंजने लगीं. इन कवियों के लिए साहित्य जीवन का सार, लोकाचार का हिस्सा था. उनसे प्रभावित होकर दूसरे वर्ण के लोग भी भक्ति आंदोलन से जुड़ने लगे. वे अपने साथ अपने संस्कार भी लाए थे. परिणामस्वरूप निराकार अराधना साकार पूजा-पाठ में ढलने लगी. प्रकारांतर में उसने जातिवाद, धार्मिक आडंबरवाद के पोषण को बढ़ावा दिया. उसने भक्ति आंदोलन के समस्त क्रांतिकारी सोच पर पानी फेरने का काम किया, जिससे वह मठों और दरगाहों में सिमटने लगा. सतरहवीं-अठारवीं शताब्दी का वह समय जब पश्चिम में वाल्तेयर, रूसो, वोलेनी, मिल, बैंथम आदि जड़ रूढ़ियों और बंजर परंपराओं पर जमकर प्रहार कर रहे थे, भारतीय मेधा अपने पराभव के कदाचित अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही थी. इसलिए जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय शासकों की मदद से देश को धीरे-धीरे कब्जाना आरंभ किया तो उसकी चाल को भांप, उनके संगठित विरोध के लिए आवाज उठाने वाला एक भी सूरमा इस देश में नहीं था.

अभी तक समाज का सामान्यबोध धर्म से अनुशासित होता आया है. धर्म की नींव अध्यात्म पर आधारित होती है. जनसाधारण को अपने अनुभवों पर सर्वाधिक अविश्वास इसी क्षेत्र में होता है. यह उसकी दूसरों पर निर्भरता बढ़ाता है. चूंकि आध्यामिक प्रेरणाओं का कोई स्पष्ट रूप नहीं है, इसलिए इसके नाम पर आरंभ से खूब घालमेल होता रहा है. इस घालमेल को महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, अजित केशकंबलि आदि विचारकों ने समझा था. परंतु असली चुनौती मिली बौद्ध दर्शन की ओर से. उन्होंने धर्म और अध्यात्म के नाम पर यज्ञों के औचित्य पर सवाल उठाए. कर्मकांड, पशुबलि तथा पुरोहितवाद के रूप में समाज में व्याप्त एक वर्ग की मनमानी का विरोध करते हुए उन्होंने सबको साथ लेकर चलने की सलाह दी. गौतम बुद्ध ने मगध जैसे भारी-भरकम साम्राज्य के आगे वैशाली जैसे आकार में काफी छोटे राज्य को अजेय बताया. परिणाम यह हुआ था कि छोटे-छोटे व्यापारी, उद्यमी, दस्तकार और शिल्पी संगठित होकर देश-देशांतर तक व्यापार करने लगे. फलस्वरूप स्पर्धा के बजाय सहयोग और सहकार विकास के मूल-मंत्र बन गए. देश समृद्धि की ओर अग्रसर होने लगा. जिसे भारतीय इतिहास का स्वर्णकाल कहा जाता है, वह वही दौर था जब देश प्रपंची पुरोहितों तथा उनके द्वारा पोषित आडंबरवाद से मुक्त था. बाद में बौद्ध धर्म में भी वही विकृतियां आने लगीं, जो वैदिक धर्मों के पराभव का कारण बनी थीं. राजनीतिक अस्थिरता बढ़ने से राज्यों का आकर भी सिकुड़ने लगा था. राजनीतिक स्वार्थपरता इतनी बढ़ी कि अपने प्रतिद्वंद्वी को सिर नीचा दिखाने या खुन्नस मिटाने के लिए राजा-सामंत विदेशी आक्रामकों को न्योतने लगे. इस प्रवृत्ति ने मुगलों को जमीन दी थी. इसी से ईस्ट इंडिया कंपनी को पांव जमाने का अवसर मिला.

आखिर क्या कारण है कि पश्चिम के सुधारवादी आंदोलन कामयाब हुए और अठारहवीं शताब्दी तक आते-आते उसने स्वयं को पूरी तरह बदल डाला. यहां तक कि वह अपनी सहस्राब्दियों पुरानी दास प्रथा के कलंक से भी छुटकारा पाने में सफल हुआ. इस बीच भारत मुगलों की झोली से छिटककर अंग्रेजों की पॉकिट में समा गया. दो-चार को छोड़कर अधिकांश राजे-रजबाड़े चांदी की थाली में सजाकर अपना-अपना राज्य उनके सुपुर्द करते गए. इसका एक कारण तो भारतीय समाज की विशिष्ट जातीय संरचना थी, जो समाज के बड़े वर्ग को शिक्षा, संसाधन और निर्णय-प्रक्रिया से काट देती थी. दूसरा कारण भी कम महत्त्वपूर्ण न था. यूरोप में धार्मिक सुधारवाद औद्योगिक क्रांति के कंधों पर सवार होकर आया था. वैज्ञानिक चेतना उसकी बांह में बांह डाले साथ चल रही थी. सोलहवीं शताब्दी के दार्शनिक-वैज्ञानिक फ्रांसिस बेकन ने यह कहकर कि ‘ज्ञान ही शक्ति है….मशीनें आने वाले समय में मनुष्यता की उद्धारक सिद्ध होंगी’—प्रौद्योगिकी पर आधारित नई समाज-व्यवस्था का सपना लोगों की आंखों में भरा था. इसके फलस्वरूप वहां वैज्ञानिक शोधों को बढ़ावा मिला. मशीनें न केवल कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था का बेहतर विकल्प बनकर आई थीं, बल्कि उन्होंने कृषिक्षेत्र में भी अपनी महत्ता सिद्ध कर, श्रम पर लोगों की निर्भरता कम कर दी थी. हालांकि नई अर्थव्यवस्था की भी अपनी विसंगतियां थीं. उसके कारण समाज में बेरोजगारी बढ़ी थी. शिल्पकार वर्ग मशीनों के आने से पहले सम्मान का जीवन जीता आया था, उसको अब उद्योगपतियों की चाकरी करनी पड़ रही थी. सघन उत्पादन-क्षम मशीनों के आने के बाद उसके श्रम-कौशल की अवमानना का जो सिलसिला आरंभ हुआ था, वह बढ़ता ही जा रहा था. लेकिन नई अर्थव्यवस्था अपने साथ शिक्षा का उपहार लेकर आई थी. पढ़ा-लिखा मध्यवर्ग हालांकि अधिकांश मामलों में पूंजीपतियों के साथ था. उनके हर निर्णय को आप्त-वचन मानकर शिरोधार्य कर लेता था. परंतु उनके बीच कुछ दूरंदेश ऐसे भी थे, जिन्होंने पूंजीवाद के कुटिल चेहरे को समय रहते पहचान लिया था. अपने गुस्से का इजहार वे विभिन्न मंचों से करते थे. सामंतकालीन अर्थव्यवस्था में लोगों को मुंह खोलने की आजादी न के बराबर थी. नई अर्थव्यस्था से श्रमिकों-कामगारों को संतुष्टि भले न हो, फिर भी उसमें ऐसा बहुत कुछ था, जो लोगों को उससे समझौता करने को प्रेरित करता था. चैतरफा आलोचनाओं से घिरे पूंजीवाद का आकर्षण इतना गहरा था कि मन से कोई भी पुराने दौर में लौटने को तैयार न था. हालांकि संघर्ष और परिवर्तन का सिलसिला निरंतर बना हुआ था.

सवाल उठता है कि समाजवाद ही क्यों? यह प्रश्न सोवियत संघ के पराभव के बाद से और जोर देकर उठाया जाने लगा है. हाल में चीन का नाम भी यह कहकर जोड़ दिया जाता है कि उसने भी अपनी साम्यवादी निष्ठाओं को त्याग, अपने दरवाजे पूंजीवादी उद्यमों के लिए खोल दिए हैं. इसका उत्तर आसान है. समाजवाद केवल आर्थिक व्यवस्था नहीं है. उसका अभिप्राय सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक बराबरी को बढ़ावा देने वाले पूरी तरह लोकतांत्रिक-समानतावादी तंत्र से है. आर्थिक संसाधन किसी एक के हाथों में रहें अथवा सरकार के, उनका लोकोपकारी उपयोग तब तक असंभव है, जब तक लोक का उनपर वास्तविक नियंत्रण न हो. बहुसंख्यक के हितों की सुरक्षा का दायित्व किसी एक को सौंप देने के अनेक खतरे हैं. ऐसी व्यवस्था लंबे समय तक निरापद नहीं हो सकती. इसलिए चालीस वर्ष की उम्र में दार्शनिक सम्राट का समर्थन करने वाला प्लेटो पैंसठ का होते-होते दार्शनिकों के समूह को सत्ता सौंपने का समर्थन करने लगता है. व्यावहारिक रूप में यह असंभव है कि सभी लोग सभी दायित्वों का निर्वहन कर सकें. अतएव दायित्व-विभाजन अपरिहार्य हो जाता है, जिसके अंतर्गत शासन-व्यवस्था चुने हुए प्रतिनिधियों को सौंपने की अनुशंसा की जाती है. ऐसे निर्वाचित तंत्र की सफलता तभी तक संभव है, जब तक लोक यह न भूले कि वह अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से स्वयं शासित है तथा उसके प्रतिनिधि हर समय उसकी इच्छानुसार आचरण करने को बाध्य हैं. लोक को यह भी समझना चाहिए कि लोगों की इच्छाएं अस्थिर और परिवर्तनशील होती हैं. बदलती परिस्थितियों में उनमें परिवर्तन अवश्यंभावी है. समाज में समरसता और विकास की निरंतरता को बनाए रखने के लिए लोगों की इच्छाओं के बीच तालमेल की आवश्यकता प्रत्येक समाज में हर समय होती है. यह तभी संभव है जब वह सदैव जागरूक एवं चैतन्य बना रहे.

इस पुस्तक में एडम स्मिथ की मौजूदगी कुछ पाठकों को चौंका सकती है. लेकिन यहां उसे काफी सोच-विचार के बाद सम्मिलित किया गया है. यह तय है कि आधुनिक पूंजीवाद स्मिथ के विचारों से प्रेरणा लेकर खड़ा हुआ है. तो भी उसको पूंजीवाद का समर्थक नहीं कहा जा सकता. इस शब्द को जन्म ही स्मिथ के बाद हुआ. कुछ विद्वानों ने स्मिथ को पूंजीवाद के शब्द-मंत्र Laissez-faire का जन्मदाता माना है. यह शब्द भी उसकी पुस्तकों में सर्वथा अनुपस्थित है. बाजार और उत्पादकता के संबंधों की व्याख्या के लिए वह नए पद ‘अदृश्य हाथ’(इन्वीजिविल हेंड) का प्रयोग करता है. उसका मानना था कि बाजार में स्वतः अनुशासन की क्षमता होती है. बाजार की परमस्वातंत्रय की अवस्था उसे परमसमानता की ओर अग्रसर करती है. डेविड वार्समेन के साथ एक साक्षात्कार में नाम चाॅमस्की बड़े काम की बात कहता है—‘वह(एडम स्मिथ) अठारवीं शताब्दी के प्रबोधनयुग का महत्त्वपूर्ण विचारक है. उस समय तक पूंजीवाद का जन्म ही नहीं हुआ था. जिसे आज हम पूंजीवाद कहते हैं, सही मायने में उसने उसका तिरष्कार ही किया था.’ नोम चॉमस्की के अनुसार, ‘लोग स्मिथ को लेकर स्कूलों-कॉलेजों में पढ़ाई जाने वाली बातों को लेकर राय बना लेते हैं. हर कोई ‘दि वेल्थ आ॓फ नेशन्स्’ के आरंभिक पैराग्राफ को पढ़कर निष्कर्ष निकाल लेता है, जिसमें उसने श्रम विभाजन को चामत्कारिक रूप से लाभकारी बताया है. जबकि इसी पुस्तक में आगे वह श्रम-विभाजन के पूंजीवादी सिद्धांत की आलोचना करता है. वह लिखता है कि श्रम-विभाजन मनुष्यता के लिए नुकसानदेह है. वह लोगों को इतना ज्यादा मूर्ख और लापरवाह बना सकता है, जितने वे बन सकते हैं. इसलिए किसी भी सभ्य समाज में सरकार को श्रम-विभाजन को एक सीमा तक ही मान्यता देनी चाहिए.’

पूंजीवाद ने आरंभ से प्रत्येक उपलब्ध ज्ञान, उसके हरेक अनुशासन का उपयोग निहित स्वार्थ के हित किया है. कभी वह विरोधी विचारों को अपना बनाकर प्रस्तुत करता है, तो कभी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उनके समर्थन में उतर आता है. यह कार्य वह लोगों का व्यवस्था से अनुकूलन करने, उनके मन में यह विश्वास जाग्रत करने के लिए करता है कि वही सर्वाधिक हितैषी है. ध्यान रहे नियंत्रण-मुक्त उत्पादन अकेले पूंजीवादी उद्यमों की मांग नहीं है. सहकारी समितियां भी यही मांग करती रही हैं. छोटे से छोटा कारीगर भी उम्मीद करता है कि उसके काम में अड़चन न डाली जाए. उत्पादकता के हक में यह शर्त मान भी ली जाती है. फिर पूंजीवादी उत्पादन और समाजवादी उत्पादन तंत्र में क्या भेद है? अधिकतम लाभ के लिए पूंजीवादी उत्पादन श्रमिक से लेकर उपभोक्ता तक सभी का अवमूल्यन करता है. उसके लिए सामाजिक लाभ गौण होते हैं. दूसरी ओर समाजवादी संस्थान सामाजिक लाभों को भी पूंजीगत लाभ जितनी महत्ता देते हैं. उनके लिए उपभोक्ता की इच्छा का महत्त्व होता है, इसलिए उत्पाद और उत्पाद का चयन समाज की मूलभूत आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया जाता है.

एक अर्थशास्त्री के रूप में अधिकतम उत्पादकता के हक में स्मिथ ने जैसा सोचा, वैसा ही लिखा है. साथ में कार्य-विभाजन के खतरे भी गिनाए हैं. कुशल अर्थविज्ञानी की भांति वह उत्पादन तंत्र की कार्यकुशलता को बढ़ाने के लिए सुझाव देता है. वह अर्थविज्ञानी है. न कि राजनयिक, जो सभी को संतुष्ट दिखने का नाटक रचा सके. अधिकतम उत्पादकता की अर्थ-वैज्ञानिकी का उपयोग जितना पूंजीवादी तंत्र के लिए जरूरी है, उतना समाजवादी उत्पादन तंत्र के लिए भी है. यह सरकार चलाने वालों की जिम्मेदारी है कि वे अधिकतम उत्पादकता और स्पर्धा के नाम पर उत्पादन एवं विपणन के क्षेत्र में एकाधिकार एवं अंध-स्पर्धा न पनपने दें. वे उत्पादकों को विवश करें कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कच्चे माल के शोधन के लिए अनुकूल तकनीक विकसित करें. लोगों की कार्यकुशलता में सुधार के लिए प्रशिक्षण दिलवाएं. जो सरकारें चलाते हैं, उनकी जिम्मेदारी दूसरों से कहीं बड़ी होती है. उनकी दायित्व है कि वे पूंजीपतियों से कहें कि वे कच्चेमाल, श्रम, तकनीक आदि का उपयोग ‘अधिकतम लोगों को अधिकतम सुख’ की कामना के साथ करें. सरकार चलाने वाले केवल—‘ज्ञान ही शक्ति है’ पर न ठहर जाएं.बेकन ने इसके अलावा जो कहा था उसपर भी ध्यान दें—‘ज्ञान-विज्ञान और तकनीक का उपयोग जनसाधारण के कल्याण, उसके कष्टों को दूर करने के लिए किया जाना चाहिए.’ सरकार को ब्लैंक का वह कथन भी याद रखना होगा, जिसके अनुसार सरकार का कर्तव्य है—‘हर व्यक्ति से उसकी क्षमता के अनुरूप काम ले और उसकी जरूरत के अनुसार भुगतान करे.’ इसलिए उसे चाहिए कि जीवन की सामान्य आवश्यकताओं तथा श्रम के बीच स्पर्धा हरगिज न पनपने दे. सरकार का यह भी कर्तव्य है कि वह जेफरसन और थामस पेन की सुने और मानवाधिकारों की रक्षा करे. कुछ ऐसा करें जिससे मनुष्य अपनी स्वतंत्रता में स्वच्छंदता का आनंद ले सके. शासन-प्रणाली को इतनी भारी-भरकम न बनाए कि वह मनुष्य के मूल-भूत अधिकारों का ही हनन करने लगे. यहां थोरो उसका मार्गदर्शक बन सकता है—‘सरकार वही भली है जो शासन बिलकुल न करे’.

लियोनार्दो दा विंसी को लेकर भी कुछ विद्वान आपत्ति कर सकते हैं, किंतु हमें याद रखना चाहिए कि समाजवादी विचारधारा का विकास एक साथ नहीं हुआ है. यदि सामंतकालीन व्यवस्थाओं की बात करें तो उसमें समाज के सुख-संसाधनों पर मुट्ठी-भर लोगों का अधिकार होता था. शेष लोगों को भाग्य के भरोसे जीने के लिए विवश कर दिया जाता था. स्वयं सुख-संपन्नता में आकंठ डूबे मुट्ठी-भर लोग दूसरों को त्याग का उपदेश देते रहते थे. भौतिक सुखों को लेकर लोगों के मन में अजीब किस्म की कुंठा समाई होती थी. इसलिए सुधारवादी आंदोलनों का आरंभिक ध्येय था, धार्मिक-सामाजिक-सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से सर्वथा मुक्ति तथा सुख में साधारणजन की हिस्सेदारी बढ़ाते हुए उसको लेकर समाज में व्याप्त भ्रांत धारणाओं का समाधान करना था. लियोनार्दो ने यह कार्य एक कलाकार के रूप में किया. जिस समय कला का काम केवल देवालयों तथा राजदरबारों और सामंतों की हवेलियों की शोभा बनना था, लियोनार्दो ने ‘मोनालिसा’, दि बैपटिस्ट’ जैसे दर्जनों चित्र बनाए. उनमें अतिसाधारण चरित्रों को लाकर विंसी ने लोगों की इस भ्रांति को तोड़ा. आमजन के प्रति उसकी संवेदना उसकी रचनाओं से झलकती है, जो संख्या में कम होने के बावजूद महत्त्वपूर्ण हैं…..

अंत में बाबा चाणक्य के कथन को दोहराते हुए कि शास्त्र अनंत हैं, विद्याएं ढेरी सारी, समय अल्प और विघ्न हजार. ऐसे में जो सारभूत है वही वरेण्य है. जैसे हंस दूध को पानी से अलग करके पी जाता है.

अनन्तशास्त्रं, बहुलाश्च विद्याः, अल्पश्च कालो बहुविघ्नता च।
यद्सारभूतं तदुपासनीयम्, हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्।।

ओमप्रकाश कश्यप

भारत में समाजवादी चिंतन की पृष्ठभूमि—दो

सामान्य

इंग्लेंड में ‘इंडिया हाउस’ ब्रिटिश साम्राज्यवाद को जड़ से उखाड़ने के लिए कृतसंकल्प था. अमेरिका में बसे भारतवासी भी पीछे न थे. भारत में अंग्रेज सरकार द्वारा लगाए गए भारीभरकम करों ने पंजाब के किसानों का जीवन दूभर किया था. 1857 में कंपनी का साथ देने वाले तथा बाद में अंग्रेज सरकार के लिए कई मोर्चे संभाल चुके पंजाबी सैनिक अब स्वयं को ठगा हुआ अनुभव कर रहे थे. जिस कृषि भूमि पर पंजाबी किसानों को गर्व था, भारीकराधान और व्यापारियों की दुर्नीति के कारण वह तेजी से उनके हाथों से छिन रही थी. किसानों का कर्ज बढ़ता ही जा रहा था. खेतिहार लोगों की जमीन से बेदखली के लिए सरकार द्वारा 1901 में बनाया गया कानून बेअसर हो चुका था. कर्जमंद किसान अपनी जमीन बेचने को विवश थे. हकीकतबयानी के लिए यह जानना पर्याप्त होगा कि 1901 से 1909 के बीच, मात्र आठ वर्षों में अकेले पंजाब में 4,13,000 एकड़ जमीन की बिक्री हुई थी, जबकि 2.5 करोड़ एकड़ जमीन किसानों द्वारा कर्ज के एवज में बंधक रखी जा चुकी थी. किसानों की यह दुर्दशा ब्रिटिश सरकार की सोचीसमझी रणनीति के तहत थी. गुरु रामसिंह के नेतृत्व में 1871 में कूका विद्रोह के बाद से ही ब्रिटिश सरकार पंजाब की उपेक्षा करती आ रही थी. 1905 में बंगाल विभाजन के उपरांत देश में स्वदेशी वस्तुओं के प्रति जागरूकता बढ़ी तो पंजाब में भी उसका असर पड़ा. उसपर नियंत्रण के लिए पंजाब के गर्वनर ने देशी उद्योगधंधों को बंद करने के लिए चालें चलनी आरंभ कर दी. इसका वर्णन शहीद भगतसिंह ने 1931 में पंजाब में राजनीतिक जागरण की पृष्ठभूमि पर लिखे गए अपने लेख में किया है. वे लिखते हैं

उन दिनों यहां(पंजाब) स्वदेशी वस्तुएं, विशेषतः खांड तैयार करने का सवाल पैदा हुआ और देखतेदेखते एकदो मिलें भी खुल गईं. यद्यपि सूबे के राजनीतिक जीवन पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा, लेकिन सरकार ने इसे नष्ट करने के लिए गन्ने की खेती का लगान तीन गुना कर दिया. पहले एक बीघे का लगान केवल 2.50 रुपये था, अब 7.50 रुपये देने पड़ते थे. इससे किसानों पर एक भारी बोझ आ पड़ा और वह एकदम हतबुद्धिसे रह गए.’1

इसी लेख में भगतसिंह पंजाब के किसानों को उत्पीड़ित करने वाले ‘नए कलोनी एक्ट’ का भी उल्लेख करते हैं. पंजाब सरकार ने लायलपुर आदि जिलों में नहरें खुदवाकर जालंधर, अमृतसर, होशियारपुर के किसानों को वहां आमंत्रित किया. सरकार पर विश्वास कर किसान अपनीअपनी जमीनजायदाद छोड़कर नए ठिकानों पर आकर बसने लगे. कई वर्षों तक अपना पसीना बहाकर, रातदिन की मेहनत के पश्चात उन्होंने उस क्षेत्र को गुलजार कर दिया. तभी सरकार ‘नया कलोनी एक्ट’ ले आई. उसके प्रभाव का खुलासा करते हुए भगतसिंह आगे लिखते हैं—

यह एक्ट क्या था, किसानों के अस्तित्व को ही मिटा देने का एक तरीका था. इस एक्ट के अनुसार हर व्यक्ति की जायदाद का वारिस केवल उसका बड़ा लड़का ही हो सकता था. छोटे पुत्रों का उसमें कोई हिस्सा नहीं रखा गया था. बड़े लड़के के मरने पर वह जमीन या जायदाद छोटे लड़कों को नहीं मिल सकती थी, जिससे उसपर सरकार का अधिकार हो जाता था.’2

गौरतलब है कि अमेरिका स्थित प्रवासी भारतीयों में लगभग आधी जनसंख्या पंजाब से आए लोगों की थी. एक तो गुलाम देश का नागरिक होने के कारण होने वाला अपमान, दूसरा औपनिवेशिक सरकार द्वारा किसानों का शोषणउत्पीड़न—प्रवासी भारतियों को क्षुब्ध करने के लिए ये सूचनाएं पर्याप्त थीं. उस समय तक अमेरिका ब्रिटेन के साथ व्यावसायिक स्पर्धा में था. वह भारत में अपनी जड़ें मजबूत करना चाहता था. सिंगापुर, मलाया, पनाग, शिंघाई के बंदरगाहों पर कनाडा और अमेरिका के व्यापारी अपने देश की समृद्धि का वास्ता देकर भारतीय व्यापारियों को ललचाते थे. भारतीयों के मन में भी अमेरिका के प्रति अतिरिक्त आकर्षण था. 1902 में स्वामी विवेकानंद तथा 1904 में स्वामी रामतीर्थ ने अमेरिका की यात्रा की थी. वापस लौटने पर उन दोनों ने अमेरिका, विशेषकर वहां की उन्नत शिक्षा प्रणाली तथा सरकारी नीतियों की प्रशंसा करते हुए भारतीय युवाओं को उस देश से प्रेरणा लेने के लिए उत्प्रेरित किया था.3 फलस्वरूप अमेरिका जाने वाले भारतीयों की संख्या में वृद्धि हुई. भारत में व्यापारिक संभावनाएं खोज रहे अमेरिका के लिए भी यह हितकर था. भारतीयों को लुभाने के लिए अमेरिकी उद्योगपति ब्रिटिश सरकार की आलोचना करते थे तथा उसको देश में अशिक्षा, गरीबी और आर्थिक असमानता के लिए जिम्मेदार मानते थे. ये घटनाएं प्रवासी भारतीयों के मन में ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध आग भड़काने का काम करती थीं. मार्क्स के विचारों पर आधारित फ्रांसिसी क्रांति की सफलता तथा रूस में चल रहे संघर्ष ने उन्हें नया हौसला दिया था, किंतु वैश्विक तनाव और आर्थिक मंदी के बीच हालात बदलने लगे थे. अमेरिका में प्रवासी भारतीयों की बढ़ती संख्या और समृद्धि बहुतसे अमरीकियों को खलने लगी थी.

दरअसल, बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशक में कनाडा में प्रवासी भारतीयों ने अपनी आर्थिक स्थिति काफी मजबूत कर ली थी. इस कामयाबी का कारण उनका अतिरिक्त मेहनती होना भी था. लेकिन 1907-08 की मंदी ने अमेरिकी किसानों को बड़ा झटका दिया था. भारतीय चूंकि अपने खेतों में स्वयं काम करते थे, इसलिए उनपर मंदी का प्रभाव अपेक्षाकृत कम था. इससे अमेरिकी किसान वहां के भारतीय भूस्वामियों से ईर्ष्या करने लगे. उस समय भी ढाबों, होटलों, बाजार आदि में बहुतसे भारतीय काम करते थे. गुलाम देश का नागरिक होने के कारण ईष्यालु अमेरिकी उन्हें ‘हैलो हिंदी स्लैब’ कहकर चिढ़ाते थे. उसकी प्रतिक्रिया में भारतीयों में राष्ट्रीयता की भावना पैदा हुई और वे एकजुट होने लगे. उनकी एकजुटता केवल अमेरिका में अपने मानसम्मान और अधिकार तक सीमित न थी. उभरती राष्ट्रीय चेतना के बीच भारत पर राज कर रहे अंग्रेज भी उनके उतने ही दुश्मन थे. प्रवासी भारतीयों में स्वाधीनता की भावना पैदा करने के लिए पर्चे बांटे जाने लगे.

उस समय मार्क्स के विचार पूरी दुनिया में परिवर्तन के प्रतीक माने जा चुके थे. उसका कथन, ‘दुनिया से भागने के बजाय उसको बदलने की जरूरत है.’—देश और देश से बाहर रह रहे हजारों भारतीयों का प्रेरणास्रोत बन चुका था. सरकारी उपेक्षा और भेदभावपूर्ण कृषिनीति के कारण एक ओर तो पंजाब के किसान स्वयं को ठगा हुआ अनुभव कर रहे थे, दूसरी ओर औपनिवेशिक सरकार ने 1905 में बंगाल विभाजन द्वारा पढ़ेलिखे बंगाली वर्ग को भी नाराज कर दिया था. अमेरिका, कनाडा और यूरोप के देशों में बंगालियों की संख्या भी काफी थी. बंगाल का विभाजन उन्हें अपनी अस्मिता पर हमला जान पड़ा था. इन घटनाओं ने भारत से बाहर रह रहे प्रवासियों में राष्ट्रीयता की भावना पैदा करने का काम किया. तारकनाथ दास कोलंबिया विश्वविद्यालय में राजनीति के प्राध्यापक, स्वदेशी भावना से ओतप्रोत प्रतिभाशाली भारतीय थे. जुलाई 1907 में उन्होंने खेमकरनवासी रामनाथ पुरी के साथ मिलकर एक परिपत्र भारतीयों के बीच प्रचारित किया था, उसका शीर्षक था—‘सरकुलरे आजादी.’ परिपत्र में अंग्रेज सरकार द्वारा भारतीयों के शोषण एवं अत्याचार का उल्लेख करते हुए भारतीयों का आवाह्न किया गया था वे अंग्रेजी वस्तुओं का बायकाट करें. पुलिस और सेना की नौकरी से त्यागपत्र दे दें.’ इस परिपत्र को भारत में प्रतिबंधित कर दिया गया. उसके कुछ ही महीने बाद गुरमुखी में लिखा गया एक और परिपत्र ‘खालसा’ शीर्षक से लंदन में बांटा गया. उसमें भी अंग्रेज सरकार की साम्राज्यवादी नीति की आलोचना की गई थी. इसके बाद तो आजादी समर्थक परिपत्रों के छपने तथा नए संगठन बनने का सिलसिलासा बन गया. ये सब घटनाएं अंततः ‘गदर पार्टी’ के गठन की पीठिका बनीं. उसके संस्थापकों में महान क्रांतिकारी करतार सिंह सराबा, सोहन सिंह भाकना, लाला हरदयाल, तारकनाथ दास जैसे दिलेर हिंदुस्तानी थे. उनके समर्थक अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, रूस आदि देशों में फैले हुए थे. भारत को स्वाधीन देखने के लिए इनकी रणनीति कांग्रेसी नेताओं से अलग थी. इनपर फ्रांसिसी क्रांति और अराजकतावादी चिंतन का गहरा प्रभाव था. सही मायने में वे पढ़ेलिखे और चुनौतियों से जूझ पड़ने वाले युवा भारतीय थे, जो अपने लक्ष्य को पाने के लिए किसी भी सीमा तक जाने का हौसला रखते थे.

उनकी गतिविधियों में तेजी आई लाला हरदयाल के उनके साथ सम्मिलित होने के बाद. बेहद प्रतिभाशाली लाला हरदयाल विचारों से अराजकतावादी थे. वे अक्सर कहा करते थे कि केवल सत्तापरिवर्तन पर्याप्त नहीं है. हमें सत्ता की अनिवार्यता को ही समाप्त कर देना है. यदि बहुत जरूरी है तो उसका आकार लघुत्तम होना चाहिए. इतना छोटा कि सरकार अस्तित्वविहीन दिखाई पड़ने लगे. रूसी अराजकतावादी विचारक पीटर क्रोप्टोकिन से प्रभावित होकर डा. हरदयाल ने एक बार कहा था—

स्वामी और सेवक के बीच कभी कोई समानता नहीं हो सकती. भले ही वे दोनों मुसलमान हों, सिख हों, अथवा वैष्णव हों….अमीर हमेशा गरीब पर शासन करेगा….आर्थिक समानता के अभाव में भाईचारे की बात करना केवल एक सपना है.’

सितंबर 1912 में स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय में व्याख्याता के पद से इस्तीफा देने के बाद लाला हरदयाल ने स्वयं खुद को भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के लिए पूरी तरह समर्पित कर दिया था. उससे पहले 1910 में अपनी पेरिस यात्रा के दौरान उन्होंने कार्ल मार्क्स के पौत्र जीन लेंगुइट से मुलाकात की थी. लेंगुइट पेशे से पत्रकार था. अपने दादा की भांति लेंगुइट की भी भारत की राजनीति में रुचि थी. उसने कई लेख भारत में ब्रिटिश सरकार की आलोचना करते हुए लिखे थे. जिस समय वीर सावरकर को फ्रांसिसी पुलिस ने गैरकानूनी ढंग से गिरफ्तार कर ब्रिटिश सरकार को सौंपा तो जीन लेंगुइट के नेतृत्व में वहां के समाजवादी विचारधारा के पत्रकारों ने उस कार्रवाही का तीखा विरोध किया था. इसके अलावा भी वह न केवल भारत, बल्कि सभी ब्रिटिश उपनिवेशों की स्वतंत्रता के लिए आवाज उठाता रहता था. भारतीयों के बीच उसका अखबार अत्यंत लोकप्रिय था. भारतीय क्रांतिकारियों से उसे विशेष सहानुभूति थी. डा. हरदयाल ने लेंगुइट से मिलकर उसकी और उसके दादा मार्क्स के कार्यों तथा भारतीय जनता के प्रति उन दोनों की चिंताओं की सराहना की थी.

मार्च 1914 में करतार सिंह भाकना ने प्रवासी भारतीय बुद्धिजीवियों के साथ मिलकर ‘हिंदी सभा’ की स्थापना की तो लाला हरदयाल को उसका महासचिव नियुक्त किया गया. पार्टी का मुख्यालय ‘युगांतर आश्रम’ के नाम से प्रसिद्ध था. बंगाल विभाजन से अंग्रेजों से नाराज अनेक बंगाली बुद्धिजीवी उसके सदस्य थे. वहीं पर अंग्रेजों को भारत से भगाने के लिए सशस्त्र संघर्ष को आगे बढ़ाने की योजना पर विचार किया गया. पेरिस क्रांति से प्रभावित क्रांतिकारियों का मानना था कि मुट्ठीभर अंग्रेजों को भारत के जमींदारों और सामंतों का संरक्षण प्राप्त है. देश पर हालांकि ब्रिटिश सरकार की हुकूमत है, लेकिन जमींदार और सामंत यदि उनका साथ छोड़ दें तो ब्रिटिश सत्ता के लिए भारत में एक दिन भी टिकना मुश्किल हो जाए. यह आकलन गलत भी नहीं था. उस समय भारत में ब्रितानी मूल के अंग्रेजों की संख्या पचास हजार से कुछ ही अधिक थी. अब यदि मुट्ठीभर अंग्रेज पचीस करोड़ भारतीयों पर शासन करने में सफल थे, तो इसलिए नहीं कि उनमें देवत्व जैसा कोई गुण था. अथवा वह सर्वथा अपराजेय कौम थी? उनका शासन भारतीय जागीरदारों और सत्तालोलुपों की मदद के बगैर संभव ही नहीं था. स्वार्थी और विलासी जमींदारों, सामंतों तथा उनके पिछलग्गु सरदारों से निपटने का उनके पास एक ही रास्ता था. जनता को संघर्ष के लिए तैयार किया जाए. उसको उसकी गुलामी का एहसास कराया जाए. फिर जैसे भी संभव हो पुलिस, सेना को साथ लेकर, व्यापक जनविद्रोह के माध्यम से उन्हें कुचल दिया जाए. इसके लिए वे तरहतरह से प्रयासरत थे.

अक्टूबर 1913 में ‘हिंदी सभा’ की दूसरी बैठक में क्रांतिकारियों की ओर से एक समाचारपत्र निकालने का निर्णय लिया गया. समाचारपत्र का नाम रखा गया—‘दि गदर’. यह 1857 के प्रथम स्वाधीनता आंदोलन की याद दिलाता था. उद्देश्य था भारतीयों के मन में स्वाधीनता के प्रति चेतना जाग्रत करना था. समाचारपत्र के मुखपृष्ठ से ही उसकी क्रांतिधर्मी विचारधारा का संकेत मिलता था. उसपर लिखा होता था—‘अंग्रेजी राज का दुश्मन.’ उस समाचारपत्र में एक विज्ञापन अक्सर छपा करता था—‘चाहिए साहसी और बहादुर सिपाही, भारत में क्रांति के लिए. वेतन—मौत, पुरस्कार—शहीदाना. पेंशन—आजादी, कार्यक्षेत्र—संपूर्ण भारतवर्ष.’4 गदर का पहला अंक 1 नवंबर, 1913 को सेनफ्रांसिस्को से अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में एक साथ प्रकाशित हुआ. इसके संपादक डा. हरदयाल थे, जिनकी विलक्षण प्रतिभा के चर्चे देशविदेश चारों ओर फैले हुए थे. पहले ही अंक के साथ अखबार के तेवर एकदम साफ थे—

आज, विदेशी भूमि पर लेकिन देश की भाषा में, ब्रिटिश राज के विरुद्ध जंग की शुरुआत हुई है….‘हमारा नाम क्या है?’ ‘गदर’….‘हमारा कर्म क्या है?’ ‘गदर.’ यह कहां और कब से शुरू होगा? भारत में, बहुत जल्दी ऐसा समय आएगा जब बंदूकें और खून लोगों के पेन और स्याही की जगह ले लेंगे.’5

अंग्रेजों के प्रति उग्र लाला हरदयाल की भारत के संबंध में नीति समन्वयवादी थी—‘हम न हिंदू हैं न मुस्लिम. हम केवल देशभक्त हैं….हमें न पंडित चाहिए न मुल्ला. हमें केवल भारत के बारे सोचने और करने वाले चाहिए.’ लाला हरदयाल अद्भुत प्रतिभा के धनी थे. उनके प्रयासों से ‘दि गदर’ को अप्रत्याशित लोकप्रियता मिली. अप्रैल 1914 तक वह समाचारपत्र हिंदी और अंग्रेजी के अलावा पश्तो, गुजराती, गुरमुखी और उर्दू में निकलने लगा. इस समाचारपत्र की लोकप्रियता का अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि उसके अंक अंग्रेज सरकार से छिपाकर तस्करी के जरिये भारत में लाए जाते थे. इस समाचारपत्र को मिली अप्रत्याशित कामयाबी से प्रभावित होकर ही नए संगठन का नाम ‘गदर पार्टी’ रखा गया था. ‘दि गदर’ से जुड़े नेता अंग्रेजों की आंख की किरकिरी बन चुके थे. सरकार उनके पीछे थी. लेकिन उनके समर्थक दुनिया के अनेक देशों में फैले चुके थे. भारतीय जनता के मन में उनके प्रति सहानुभूति थी.

उस समय पूरी दुनिया में राजनीतिक उथलपुथल जारी थी. अपनी सामरिक ताकत के दम पर जर्मनी आगे बढ़ता जा रहा था. प्रथम विश्वयुद्ध की आहट सुनाई देने लगी थीं. युद्ध को लेकर गदर पार्टी से जुडे़ नेताओं का मानना था—‘ब्रिटेन का संकट हमारे लिए नया अवसर होगा.’ इसी सिद्धांत को आधार मानकर गदर पार्टी के नेता, विश्वयुद्ध में ब्रिटेन के विरोधी देशों से संपर्क साधने लगे. उन दिनों बंगाली नेता वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय जर्मनी में थे. खुद को ‘अराजकतावादी’ कहने वाले वीरेंद्रनाथ आरंभिक क्रांतिकारियों में से थे. उनके मानवेंद्रनाथ राय, वीर सावरकर आदि से गहरे संबंध थे. अपने साथियों के बीच ‘चट्टो’ के नाम से पहचाने जाने वाले वीरेंद्रनाथ का नाम स्टालिन की उस सूची में था, जिसे उसने मृत्युदंड सुनाया था. एक बहुश्रुत मान्यता यह भी है कि वीरेंद्रनाथ को सोवियत गुप्तचर सेवा के लिए काम करने वाले डोनाल्ड गुलिक ने 1937 में उस समय गोली से उड़ा दिया था, जब वे फ्रांस से बाहर जा रहे थे. उनकी मृत्यु को लेकर विवाद अब भी बना हुआ है. बहरहाल, चट्टोपाध्याय के जर्मन अधिकारियों से उनके अच्छे संबंध थे. उन्हें जर्मन सरकार से काफी उम्मीद थी. दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है, इस नीति के तहत जर्मन सरकार के साथ हुए एक अनुबंध के आधार पर चट्टोपध्याय की ओर से गदर पार्टी के नेताओं सहित, दुनियाभर में फैले क्रांतिकारियों को जर्मनी पहुंचने के लिए आमंत्रित किया गया, ताकि ब्रिटिश शासन से मुक्ति के लिए संगठित प्रतिरोध किया जा सके. क्रांतिकारी चाहते थे कि विद्रोह इतने जोरदार तरीके से हो कि उसकी धमक पूरी दुनिया में सुनाई दे, जिससे निकली चिंगारियां ब्रिटिश सत्ता को भस्म कर दें. लाला हरदयाल जर्मनी पहुंचना चाहते थे. लेकिन तब तक अमेरिकी सरकार पर ब्रिटेन की ओर से उन्हें गिरफ्तार करने का दबाव बढ़ चुका था. अंततः 25 मार्च 1914 को उन्हें अमेरिकी हवाई अड्डे पर कैद कर लिया गया. उनपर आरोप था कि उन्होंने तीन वर्ष पहले रूस की जार सरकार के विरोध में भाषण देकर उसे उखाड़ फेंकने का आवाह्न किया था. हरदयाल हालांकि 10 अप्रैल 1914 को जमानत पर रिहा हो चुके थे, परंतु यह सोचते हुए कि अमेरिका सरकार उन्हें दुबारा हिरासत में लेकर ब्रिटिश सरकार के हवाले कर सकती है, उनके साथियों ने उन्हें तत्काल अमेरिका छोड़ने की सलाह दी. हरदयाल अमेरिका छोड़कर जर्मनी को प्रस्थान कर गए.

उस समय तक गदर पार्टी का आंदोलन आगे बढ़ चुका था. पार्टी भाई संतोख सिंह के नेतृत्व में तेजी से संगठित हो रही थी. जुलाई 1914 में विश्वयुद्ध की घोषणा कर दी गई. गदर पार्टी के नेताओं को इसी अवसर की प्रतीक्षा थी. करतार सिंह सराबा और उनके साथियों ने 5 अगस्त को ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध युद्ध की घोषणा करते हुए गदर सेनानियों से भारत पहुंचने को कहा. उनके आवाह्न पर सरकारी आंकड़ों के अनुसार फरवरी 1915 तक देश में 2312 गदर सेनानी प्रवेश कर चुके थे. 1916 के अंत उनकी संख्या 8000 से भी ऊपर पहुंच गई. भारत में अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध व्यापक लड़ाई की तिथि तय कर ली गई थी. लेकिन भारतीय क्रांतिकारियों और गदर सैनिकों पर ब्रिटिश सरकार की नजर थी. अंग्रेज समझ रहे थे कि युद्ध की परिस्थितियों का लाभ उठाकर भारतीय क्रांतिकारी जनता को सरकार के विरुद्ध उकसा सकते हैं. 1857 का सबक उसके सामने था. इस कारण वह कोई भी खतरा नहीं उठाना चाहती थी. ‘गदर पार्टी’ से देश के कई बुद्धिजीवी पत्रकार जुड़े थे, जो विदेश में रहकर समाचारपत्र के माध्यम से सरकार की वास्तविकता को पूरी दुनिया के सामने ला रहे थे. पार्टी की साम्यवादी शाखा ने आगे चलकर एक समाचारपत्र ‘किश्ती’ का प्रकाशन आरंभ किया था, उसमें सरकार की साम्राज्यवादी नीति की आलोचना के साथ भारतीयों के शोषण के भी जीवंत समाचार होते थे. फलस्वरूप ब्रिटिश सरकार का दावा कि उसका भारत में बने रहना वहां की जनता के हित में है, खोखला पड़ता जा रहा था. चैतरफा आलोचनाओं से क्षुब्ध होकर सरकार ने ‘गदर पार्टी’ सहित दूसरे राष्ट्रवादी संगठनों से जुड़े नेताओं को गिरफ्तार करना शुरु कर दिया. कुशल नेतृत्व का अभाव, विभिन्न दलों में तालमेल की कमी, धनाभाव, ब्रिटिश सरकार की सफल गुप्तचर नीति, बाहरी मदद के अभाव तथा जमींदारों, ताल्लुकेदारों एवं विश्वासघातियों द्वारा अंग्रेज सरकार को मदद पहुंचाने के कारण गदरसैनिकों में से भी अधिकांश पकड़ लिए गए. गदर पार्टी के नेताओं को जापान, जमनी, इटली आदि बाहरी मुल्कों से मदद की उम्मीद थी. वे ऐन वक्त पर धोखा देकर अलग हो चुके थे. विद्रोह की नाकामी का एक कारण यह भी था.

अपने तेजस्वी लेखन से कार्ल मार्क्स ने विश्वभर के बुद्धिजीवियों को प्रभावित किया था. उसके ओजस्वी विचार छनछन कर भारत भी पहुंच रहे थे. इससे आर्थिक मामलों के संदर्भ में ब्रिटिश सरकार के दावों को परखने का सिलसिला आरंभ हुआ. इस दिशा में पहल करने वाले थे दादा भाई नौरोजी(1825—1917) और महादेव गोविंद रानाडे(1842—1901). उस समय प्रायः सभी भारतीय नेताओं का मानना था कि अंग्रेज देश का आर्थिक शोषण कर रहे हैं. आयात के अनुपात में निर्यात काफी कम है, जिससे देश की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ रहा है. आयातित मिल के कपड़ों ने भारतीय कारीगरों को सड़क पर ला दिया है. किसान कर्ज से तबाह हो रहे हैं. आंकड़े इसके गवाह थे. 1850 से 1900 के बीच देश में 25 अकाल पड़ चुके थे. उनमें लाखों लोगों की जानें गई थीं. देश की अर्थव्यवस्था की पड़ताल करते हुए दादा भाई नौरोजी ने अंग्रेज सरकार पर आरोप लगाया था कि उसके शासन में भारत की बहुमूल्य संपदा इंग्लेंड को जा रही है. नौरोजी की यह अवधारणा मौलिक न थी. अंग्रेज सरकार के बारे में प्रायः सभी भारतीय नेताओं का यही मानना था. राजा राममोहन राय 1831 में ही इस ओर इशारा कर चुके थे. इसे रोकने के लिए उन्होंने कंपनी सरकार को सलाह दी थी कि अपने बेशुमार खर्चों को काबू में रखने के लिए कंपनी को पुलिस और न्याय सेवाओं में अधिक से अधिक भारतीयों को नौकरी पर रखना चाहिए. साफ है कि ‘ड्रेन थ्योरी’ के रूप में नौरोजी ने देश की अर्थव्यवस्था को लेकर भारतीय नेताओं की सामान्य राय का ही उल्लेख अपने भाषणों में किया था. इसके बावजूद 1901 में उनके भाषण जब ‘पावर्टी एवं अनब्रिटिश रूल इन इंडिया’ के रूप में पुस्तकाकार प्रकाशित हुए तो उन्हें उसके लिए भरपूर सम्मान मिला. उस पुस्तक के माध्यम से ब्रिटिश सरकार की हकीकत दुनिया के सामने पहुंची. इससे औपिनिवेशिक शासन की नीतियों को लेकर एक नई बहस आरंभ हुई और उसके आलोचकों को सरकार की आलोचना का ठोस आधार प्राप्त हुआ.

औपनिवेशिक सरकार की आर्थिक नीतियों को लेकर चिंतन करने वाले दूसरे भारतीय थे, गोविंद महादेव रानाडे. प्रखर भारतीय अर्थशास्त्री के रूप में उनकी ख्याति जगजाहिर थी. चूंकि भारत में आर्थिक चिंतन की परंपरा क्षीण रही है, और इस विषय को लेकर मौलिक चिंतक बहुत कम हुए हैं इसलिए कुछ विद्वान उन्हें चाणक्य के बाद का प्रमुख अर्थशास्त्री मानते हैं. उन्होंने देश की समस्याओं का प्रमुख कारण यहां की गरीबी को माना था. हालांकि उन्होंने सीधेसीधे यह मानने से इन्कार किया था कि ब्रिटिश सरकार के आने से देश की गरीबी में इजाफा हुआ है. नौरोजी ने देश की गरीबी के लिए जहां ब्रिटिश सरकार की ‘ड्रेन थ्योरी’ को जिम्मेदार माना था, वहीं रानाडे का मानना था कि ब्रिटिश सरकार की अदूरदर्शिता और कृषि पर अत्यधिक निर्भरता के कारण देश में गरीबी बढ़ी है. आयातित माल सस्ता पड़ता है, इसलिए लोग उसको खरीदने के लिए विवश हैं. सरकार को चाहिए था कि मशीनीकरण द्वारा देश के संसाधनों का अधिकतम उपयोग करने के साथ, वैकल्पिक रोजगार अवसरों को बढ़ावा देने के लिए समुचित प्रयास करती. साथ ही औद्योगिकीकरण से बेरोजगार हुए शिल्पकारों को कारखानों में पचाने का इंतजाम करती. मगर सरकार इस मोर्चे पर असफल रही है. अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए उन्होंने किसानों को महाजनों के चंगुल से बाहर लाने तथा खेती को बढ़ावा देने पर जोर दिया था. रानाडै के चिंतन का दायरा व्यापक था. राष्ट्र का निर्माण अकेले सरकार की जिम्मेदारी नहीं. नागरिकों को भी अपनी भूमिका का निर्वाह करना चाहिए. आयातित माल का असर शहरों में अधिक था, इसलिए रानाडे ने उन कारोंगरों से जिन्हें मशीनीकरण से नुकसान पहुंचा है, गांवगांव में फैल जाने की अपील की थी—

सभी किस्म के शिल्पकारों, बुनकरों, जुलाहों, तैलिकों, रंगरेजों, कागज बनाने वालों, सिल्क के कारखानों, चीनी मिलों और धातु निर्माण में के काम में जुटे कारीगरों और उन सभी से जो ब्रिटिश मशीनीकरण के परिणामस्वरूप जन्मी स्पर्धा से बेरोजगारी का शिकार हुए हैं, से मेरा आग्रह है कि वे शहर और गांव तत्काल खाली कर दें और दूरदराज के गांवों में जाकर वहां की जनता में घुलमिल जाएं. उन लोगों की भीड़ में एकमेव हो जाएं, जो अकाल और सत्ता दोनों से जूझते हुए मात खाने को तत्पर हैं.6

प्रकारांतर में रानाडे भी मान चुके थे कि ब्रिटिश सत्ता ने भारतीय जनजीवन की उपेक्षा की है. उसके आगमन से भारतीय कारीगर बेरोजगार हुए हैं. किसानों की हालत लगातार बिगड़ी है. इसके लिए संगठित होकर काम करने की आवश्यकता है. हालात में सुधार के लिए वे सरकार के साथसाथ भारतीयों से भी डटकर काम करने की अपील करते हैं. उनकी अपील का असर भी साफ दिखाई दिया था. किसानों की हालत में सुधार के लिए सरकार ने 25 मार्च 1904 में ऋण सहकारिताओं के गठन के लिए सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम को स्वीकृति दी थी. इससे किसानों को सस्ता ऋण मिलने की संभावना बढ़ी. लेकिन ऋण सहकारिताओं को आगे बढ़ाने के लिए जिस प्रकार के समर्पण और योजनाबद्ध प्रयास की आवश्यकता थी, उसका सरकार के नीतिनिर्माताओं के पास अभाव था. दरअसल विश्वयुद्ध की आहट के बीच औपनिवेशिक सरकार की प्राथमिकताएं एकदम अलग थीं. लंकाशायर की मिलों और कलकारखानों को चमकाने के लिए भारतीय खनिज संपदा का बड़े पैमाने पर दोहन जारी था. इससे किसानों तथा कामगार वर्ग के बीच असंतोष बढ़ रहा था. जनाक्रोश को सार्थक दिशा देने के लिए मार्क्स के चिंतन से भारतवासियों को सीधे परचाने की जरूरत थी. छिटपुट चर्चाएं हालांकि गोष्ठियों और बैठकों में चलती रहती थीं. मगर मार्क्स के विचारों के प्रति गंभीर समझ का अभाव था. मार्क्स के जीवन संघर्ष और उसके विचारों पर पहली पुस्तक लिखने का श्रेय भी डा. हरदयाल को जाता है. उन्होंने मार्क्स के जीवनदर्शन पर केंद्रित एक लंबा लेख ‘मार्डन रिव्यू’ के लिए लिखा, शीर्षक था—काल मार्क्स : आधुनिक संत’, जो तुरंत बाद पुस्तकाकार प्रकाशित होकर सामने आ गया. हरदयाल की पुस्तक अंग्रेजी में थी, जिसमें उन्होंने मार्क्स की विलक्षण प्रतिभा की सराहना की थी. मार्क्स द्वारा ‘इंटरनेशनल वर्किंग मेंस एसोशिएसन’ जिसको आगे चलकर ‘प्रथम इंटरनेशनल’ के नाम से प्रसिद्धि मिली, की स्थापना की प्रशंसा करते हुए उन्होंने लिखा था—

उसकी सबसे बड़ी महानता दुनियाभर अनेक देशों के मजदूरवर्ग की एकता और संगठनशक्ति को जाग्रत करने में निहित थी. मार्क्स की ओजभरी पुकार, ‘दुनिया के मजदूरो एक हो जाओ.’—संपूर्ण यूरोप में गूंज उठी….पुस्तक में आगे लंदन टाइम्स को उद्धृत करते हुए उन्होंने लिखा था—‘पुरानी सभ्यताओं के पतन और ईसाईयत की स्थापना के बाद श्रमिकों के जागरण जैसी विलक्षण घटना किसी ने नहीं देखी देखी थी.’7

डा. हरदयाल मार्क्स के वर्गसंघर्ष के सिद्धांत से असहमत थे. मार्क्स के वैज्ञानिक भौतिकवाद को वे ‘अधूरा सच’ मानते थे. लेकिन श्रमिकवर्ग के प्रति उत्थान और उसकी अस्मिता की सुरक्षा के लिए मार्क्स की नीयत में उन्हें कोई संदेह न था. पुस्तक के समापन पर मार्क्स की प्रशस्ति में उन्होंने लिखा—

मार्क्स पहला आदमी था, जिसने यह फार्मूला दिया कि श्रमिकवर्गों को अपनी मुक्ति अपनी आप प्राप्त करनी होगी….उसकी यह महानतम अपील सीधे मजदूरों के दिलों को, उनके भीतर छिपी इंसानियत की गहराई तक छूती थी, जिसके बारे में वे स्वयं अनजान थे, ‘दुनिया के मजदूरो एक हो जाओ. तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है. जीतने के लिए दुनिया पड़ी है.’ उसके बाद वर्षों बीत गए. आदमी आए और गए. लेकिन मैलेकुचेले और लापरवाह श्रमिकों के मन में उनके नेता ही यह भावुक अपील आज भी पूरी निष्ठा के साथ गूंजती है.’8

हरदयाल की इस पुस्तक को देश में खूब प्रसिद्धि मिली. उन्होंने अपनी पुस्तक अंग्रेजी में लिखी थी. किसी भारतीय भाषा में मार्क्स की जीवनी लिखने का श्रेय के. रामकृष्ण पिल्लई को जाता है. उन्होंने अपनी पुस्तक ‘मार्क्स’ मातृभाषा मलयालम में लिखी थी. यह पुस्तक ‘मनुष्यता के उपकारक’ शृंखला के अंतर्गत 1912 में पहली बार प्रकाशित हुई थी. केरल के त्रावणकोर में गरीब परिवार में जन्मे पिल्लई के पिता पुजारी थे. मां मंदिर में झाड़ूपोंछा का काम करती थी. घर में गरीबी का आलम ऐसा था कि प्राथमिक पढ़ाई के लिए भी उन्हें अपने मामा की मदद लेनी पड़ी. उनकी मदद से हाईस्कूल की परीक्षा पास की. बीए के लिए प्रवेश लिया. प्रगतिशील विचारों के पिल्लई ने अपने खानदान से नीची समझे जाने वाली जाति में विवाह किया था. उन्हें बचपन से ही पत्रकारिता से लगाव था. पढ़नेलिखने में रुचि आरंभ से ही थी. इससे उनकी ख्याति बढ़ने लगी थी. अभी स्नातक हो नहीं पाए थे कि ‘कलादर्पण’ की संपादकी का निमंत्रण मिला. युवा रामकृष्ण ने उसके लिए तत्काल सहमति दे दी. मामा चाहते थे कि वे अपनी पढ़ाई पर ध्यान दें, ताकि महाराजा के यहां नौकरी पक्की की जा सके. लेकिन पिल्लई पर तो पत्रकारिता का भूत सवार था. यह वह सपना था जिसको वे बचपन से देखते आए थे. इसलिए मामा की सलाह को नजरंदाज कर उन्होंने अखबार का संपादनभार संभाल लिया. वे उनके जीवन और समाज में बदलाव के दिन थे. भारत में रहते हुए उन्होंने ‘शारदा’ और ‘स्वदेशाभिमानी’ पत्रों की शुरुआत की. शारदा महिलाओं की पत्रिका थी. जबकि स्वदेशाभिमानी प्रगतिशील विचारधारा से ओतप्रोत अखबार.

रामकृष्ण की निडर और मूल्यआधारित पत्रिका का पहला शिकार त्रावणकोर का दीवान पी. राजगोपालाचार्य बना. अपने समाचारपत्र में पिल्लई ने दीवान के अनैतिक आचरण और भ्रष्टाचार पर केंद्रित कई लेख प्रकाशित किए थे. त्रावणकोर रियायत के सम्राट मूलम थिरूनल आलसी और विलासी राजा था. राज्य की सुरक्षा के लिए वह 8 लाख रुपये सालाना अंग्रेजों को देता था. रियासत के सभी प्रमुख पदों पर ब्राह्मणों का अधिकार था. छोटी जातियों का काम था, ब्राह्मणों तथा अन्य उच्च जातियों की सेवा करना. ब्राह्मणों को भोजन और अन्य सुविधाएं राज्य की ओर से मुफ्त प्राप्त होती थीं. बदले में ब्राह्मणों ने यह घोषित किया हुआ था कि रियासत के महाराज दैवी संतान हैं तथा वे श्रीपद्मनाभ की ओर से शासनकार्य संभाले हुए हैं. उनका आदेश दैवीय आदेश है.

रामकृष्ण पिल्लई ने 1899 में एक नए समाचारपत्र ‘केरल दर्पण’ की शुरुआत की. उसका पहला अंक 14 सिंतबर को प्रकाशित हुआ. पहले ही अंक में उन्होंने घोषणा की थी कि पत्र का उद्देश्य आम जनता की सेवा करना है. यह कोरा राजनीतिक वक्तव्य नहीं था. ‘केरल दर्पण’ के माध्यम से उन्होंने रियासत में चल रहे भ्रष्टाचार से जुड़ी खबरें आम जनता में पहुंचानी आरंभ कर दीं. समाचारों के जरिये उन्होंने बताया कि राज्य में ऊपर से नीचे तक, जिनमें राज्य के दीवान भी शामिल हैं, सभी भ्रष्टाचार में लिप्त हैं. एक रियासत के ऐसी खबरों से निपटना आसान बात थी. जनता भी ऐसी बातों पर कम ध्यान देती थी. ‘बड़े लोगों की बड़ी बातें’ कहकर ऐसे समाचारों को नजरंदाज कर देना सामान्य बात थी. मगर पिल्लई ने जब धर्म के नाम पर अपने हर जुर्म को वैध ठहराने, जनता का शोषण दिखाने वाले समाचारों को तजरीह देना आरंभ किया तो महाराज और उसके मुंह लगे मंत्री पी. राजगोपालाचार्य का तिलमिला उठना स्वाभाविक था. सम्राट द्वारा स्वयं को श्रीपद्मनाभ का उत्तराधिकारी घोषित करने पर कटाक्ष करते हुए पिल्लई ने लिखा था—

सम्राट खुद यह मानते, तथा दूसरों को भी यह मानने पर विवश करते हैं कि वे ईश्वर के प्रतिनिधि या अवतार हैं. उनका यह विचार पूरी तरह हास्यास्पद है. अगर ऐसा है तो क्या ईश्वर ने कुत्तों पर राज करने के लिए किसी खास किस्म के कुत्ते और हाथियों पर शासन चलाने के लिए विशिष्ट किस्म के हाथी की रचना की थी?’9

पिल्लई की इस टिप्पणी को पढ़कर यूनानी दार्शनिक जेनो की याद आना स्वाभाविक है. विचारों से नास्तिक कहे जा सकने वाले जेनो का कहना था कि यदि कुत्ते, बिल्ली को अपना ईश्वर गढ़ने की क्षमता हो और उनसे उनके ईश्वर का चित्र बनाने को कहा जाए तो वे ईश्वर को क्रमशः कुत्ते या बिल्ली के रूप में चित्रित करेंगे. ब्राह्मण अधिकारियों के इस दावे कि त्रावणकोर रियायत श्रीपद्भनाभ को समर्पित राज्य है. इसलिए गैरहिंदू और शूद्र को राजकार्य में हिस्सेदारी धर्मविरुद्ध है, पर उन्होंने लिखा—

क्या मुस्लिम और ईसाई त्रावणकोर के बाशिंदे नहीं हैं? क्या यह राज्य केवल अनैतिक और गैरजिम्मेदार ब्राह्मणों की जागीर है? जब तक इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया जाता, ईसाई, मुस्लिम तथा गैरब्राह्मण हिंदुओं का यहां कोई भविष्य नहीं होगा.10

उन्होंने लिखा कि राजा मूलम थिरूनल वर्मा कुछ भी करने को स्वतंत्र नहीं हैं. अपने प्रत्येक निर्णय के लिए वे ब्रिटिश अधिकारियों पर निर्भर हैं. उन्होंने यह भी लिखा कि केवल और केवल जनता की सहमति से गठित राज्य ही आदर्श हो सकता है. पिल्लई द्वारा राजा और उसके अधिकारियों की निरंतर आलोचना से राजा का नाराज होना स्वाभाविक था. परिणाम यह हुआ कि उनका प्रेस सील कर दिया गया. रामकृष्ण पिल्लई को गिरफ्तार कर उन्हें राज्य से निष्कासन की सजा सुनाई गई. इन्हीं रामकृष्ण पिल्लई ने मलयालम में मार्क्स पर पुस्तक लिखी, जो किसी भी भारतीय भाषा में मार्क्स पर लिखी पहली पुस्तक थी. वह पुस्तक घरघर में पढ़ी जाने लगी. के रामकृष्ण पिल्लई को दक्षिण भारत में मार्क्सवाद का युग प्रवर्त्तक नेता मान लिया गया.

लाला हरदयाल, करतार सिंह सराबा, सोहन सिंह भाखना, रामकृष्ण पिल्लई यहां तक कि भगतसिंह को भी भारत में कोरा क्रांतिकारी माना जाता है. यह धारणा है कि वे केवल हिंसा के माध्यम से सत्ता पर काबिज होना चाहते थे. इसके अलावा उनका कोई सोच, कोई स्वतंत्र दृष्टि आजादी को लेकर थी ही नहीं. दरअसल यह भारतीय क्रांतिकारियों, जिनमें भगत सिंह भी सम्मिलित हैं, के विचारों को न समझने के कारण पैदा हुई दृष्टि नहीं है. बल्कि उनके वास्तविक अवदान को भुला देने, बल्कि उस क्रांति के पीछे निहित विचारधारा को विस्मृत कर देने की साजिश का परिणाम है. गांधी जी भी इसके लिए जिम्मेदार हैं. उन्होंने क्रांतिकारियों से उनकी विचारधारा के स्तर पर जाकर संवाद करने के बजाय, उन्हें ‘हिंसात्मक गतिविधियों में लिप्त’ बताकर संवाद को ही नकार दिया था. वही गांधी बोअर युद्ध में अंग्रेजों के पक्ष में न केवल स्वयं हिस्सा लेते हैं. बल्कि देश को भी अंग्रेजों का साथ देने को विवश कर देते हैं, और अप्रत्यक्ष रूप से साम्राज्यवादी अंग्रेजों की मदद करते हैं, वे क्रांतिकारियों क्रांति के पीछे निहित विचारधारा को जानने, समझने के बजाय उसे हिंसा में लिप्त बताकर उनसे कोई सीधा संवाद नहीं करते. भगतसिंह की शहादत पर इलाहाबाद के पत्र ‘भविष्य’ में प्रकाशित उनकी टिप्पणी युवाओं से उनके नाम और योगदान को भुला देनी की अपील जैसी थी—‘भगतसिंह और उनके साथी अमर शहीद हो गए हैं. उनकी मृत्यु से आज लाखों व्यक्ति दुखी हैं. मैं इन नवयुवक देशभक्तों की लगन की भूरिभूरि प्रशंसा करता हूं. परंतु मैं इस देश के नवयुवकों को इस बात की चेतावनी देता हूं कि वे उनके पथ का अवलंबन न करें.’ हिंसा के नाम पर क्रांतिकारियों को बदनाम करने, उन्हें कोरा ‘हथियारबंद’ बताने वाला लेखन आजादी के बाद तो जानबूझकर किया जाता रहा. यह सब मार्क्स के नाम पर, मार्क्सवाद को बदनाम करने की कोशिश करते हुए किया गया, इस तथ्य को नजरंदाज करते हुए कि 1871 में पेरिस क्रांति की असफलता के बाद मार्क्स ने स्वयं को हिंसात्मक परिवर्तन की राह से अलग कर लिया था.

यहां सरदार भगतसिंह को लेकर अक्सर सुनाई जाने वाली एक कहानी को ध्यान में लाना जरूरी है. कहानी के अनुसार बचपन में भगत सिंह अपने पिता से खेत में बंदूक बोने को कहते हैं. ताकि उन बंदूकों से अंगे्रजों को देश के बाहर खदेड़ सकें. यह किसी क्रांतिकारी को निरा लड़ाका बना देने की कोशिश थी. आजाद भारत में ऐसा जानबूझकर किया गया. इसलिए नहीं लोगों के मन में क्रांतिकारियों के प्रति कम सम्मान था. जनमानस पर तो क्रांतिकारियों का ही अधिक प्रभाव था. धर्म के नाम पर, जेहाद के नाम पर आम आदमी को अभी तक लड़मरना ही सिखाया जाता था. परंतु वे लड़ाइयां भगवान के नाम पर होती थीं, राजा के नाम पर होती थीं. क्रांतिकारी पहली बार उन्हें अपने अधिकार के लिए लड़ना सिखा रहे थे. लोग अपने लिए सोचें, अपने सुखदुख को ध्यान में रखकर बड़े निर्णय लें, सरकार नहीं चाहती थी कि भारतीय जनता में वर्गीय चेतना पैदा हो. इसलिए आजादी के बाद, बल्कि आजादी से पहले ही क्रांति के मकसद को झुठलाने की, विचार को बाहर निकालकर उसको कंकाल में ढाल देने की कोशिशें बड़े पैमाने पर होती रहीं. इस मामले में जमींदार और उद्योगपति सब एक थे. चूंकि जनसाधारण में क्रांतिकारियों के बलिदान से, उनकी कहानियां सुनते हुए स्वातंत्रय चेतना पैदा हुई थी, इसलिए उनके प्रभाव को झुठला पाना, मिटाना या उसका असर कम कर पाना आसान न था. क्रांतिकारियों की ख्याति से उन्हें कोई डर भी न था, लेकिन वे उस विचारधारा से घबराते थे, जो उसके मूल में थी. खूब सोचविचार के बाद उन्होंने क्रांति के पीछे निहित विचार को मारने की साजिश रची. देश की जातीयधार्मिक संरचना से वे इसमें सफल भी हुए. आजाद भारत में क्रांतिकारियों को केवल हिंसात्मक गतिविधियों द्वारा अंग्रेजों से निपटनेवाला कहकर प्रचारित किया गया. जबकि उसके मूल में एक ठोस विचारधारा थी. इसका खुलासा स्वयं भगतसिंह ने ‘माडर्न रिव्यू’ के संपादक रामानंद चट्टोपाध्याय को संबोधित अपने पत्र में किया था. रामानंद चट्टोपाध्याय ने 63 दिनों की भूख हड़ताल के बाद यतींद्रनाथ दास के जेल में शहीद होने पर क्रांतिकारियों के नारे ‘इन्कलाब जिंदाबाद’ की आलोचना की थी. उसका प्रत्युत्तर में भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने संपादक को 22 दिसंबर 1929 को एक पत्र लिखा था. वे लिखते हैं—

क्रांति (इन्कलाब) का अर्थ अनिवार्य रूप से सशस्त्र आन्दोलन नहीं होता. बम और पिस्तौल कभीकभी क्रांति को सफल बनाने के साधन मात्र हो सकते हैं. इसमें भी सन्देह नहीं है कि कुछ आंदोलनों में बम एवं पिस्तौल एक महत्त्वपूर्ण साधन सिद्ध होते हैं, परंतु केवल इसी कारण से बम और पिस्तौल क्रांति के पर्यायवाची नहीं हो जाते. विद्रोह को क्रांति नहीं कहा जा सकता, यद्यपि हो सकता है कि विद्रोह का अंतिम परिणाम क्रांति हो. एक वाक्य में क्रांति शब्द का अर्थ ‘प्रगति के लिए परिवर्तन की भावना एवं आकांक्षा’ है.’11

भगतसिंह का राजनीतिक दर्शन हालांकि पूरी तरह परिपक्व नहीं हो पाया था. पर जितना उन्होंने लिखा है, उससे इतना तो स्पष्ट है कि क्रांति से उनका अभिप्राय आमूल परिवर्तन से था. क्रांति का पर्याय कहा जाने वाला परिवर्तन क्या हो सकता है, इस बारे में संकेत वे 20 मार्च 1931 को, अपनी फांसी से मात्र तीन दिन पहले, पंजाब के गर्वनर के नाम अपने पत्र में करते हैं—

अंग्रेज जाति और भारतीय जनता के मध्य एक युद्ध चल रहा है….यह लड़ाई तब तक चलती रहेगी जब तक कि शक्तिशाली व्यक्तियों ने भारतीय जनता और श्रमिकों की आय के साधनों पर अपना एकाधिकार कर रखा है—चाहे ऐसे व्यक्ति अंग्रेज पूंजीपति और अंग्रेज या सर्वथा भारतीय ही हों, उन्होंने आपस में मिलकर एक लूट जारी कर रखी है. चाहे शुद्ध भारतीय पूंजीपतियों के द्वारा ही निर्धनों का खून चूसा जा रहा हो तो भी इस स्थिति में कोई अंतर नही पड़ता. यदि आपकी सरकार कुछ नेताओं या भारतीय समाज के मुखियों पर प्रभाव जमाने में सफल हो जाए, कुछ सुविधाएं मिल जाएं, अथवा समझौते हो जाएं, इससे भी स्थिति नहीं बदल सकती, तथा जनता पर इसका प्रभाव बहुत कम पड़ता है. हमें इस बात की भी चिंता नही कि युवकों को एक बार फिर धोखा दिया गया है और इस बात का भी भय नहीं है कि हमारे राजनीतिक नेता पथभ्रष्ट हो गए हैं और वे समझौते की बातचीत में इन निरपराध, बेघर और निराश्रित बलिदानियों को भूल गए हैं, जिन्हें दुर्भाग्य से क्रांतिकारी पार्टी का सदस्य समझा जाता है. हमारे राजनीतिक नेता उन्हें अपना शत्रु मानते हैं, क्योंकि उनके विचार में वे हिंसा में विश्वास रखते हैं, हमारी वीरांगनाओं ने अपना सब कुछ बलिदान कर दिया है. उन्होंने अपने पतियों को बलिवेदी पर भेंट किया, भाई भेंट किए, और जो कुछ भी उनके पास था सब न्यौछावर कर दिया. उन्होंने अपने आप को भी न्यौछावर कर दिया, परंतु आपकी सरकार उन्हें विद्रोही समझती है. आपके एजेंट भले ही झूठी कहानियां बनाकर उन्हें बदनाम कर दें और पार्टी की प्रसिद्धि को हानि पहुंचाने का प्रयास करें, परंतु यह युद्ध चलता रहेगा….हो सकता है कि यह लड़ाई भिन्नभिन्न दशाओं में भिन्नभिन्न स्वरूप ग्रहण करे. किसी समय यह लड़ाई प्रकट रूप ले ले, कभी गुप्त दशा में चलती रहे, कभी भयानक रूप धारण कर ले, कभी किसान के स्तर पर युद्ध जारी रहे और कभी यह घटना इतनी भयानक हो जाए कि जीवन और मृत्यु की बाजी लग जाए….बहुत सभव है कि यह युद्ध भयंकर स्वरूप ग्रहण कर ले. पर निश्चय ही यह उस समय तक समाप्त नहीं होगा जब तक कि समाज का वर्तमान ढांचा समाप्त नहीं हो जाता, प्रत्येक वस्तु में परिवर्तन या क्रांति समाप्त नहीं हो जाती और मानवी सृष्टि में एक नवीन युग का सूत्रपात नही हो जाता.’12

स्वाधीनता संग्राम में क्रांतिकारियों की भूमिका को नकारने, उन्हें कोरा खाड़कू सिद्ध करने की कोशिश बीसवीं शताब्दी के आरंभ में ही शुरू हो चुकी थी. उनके योगदान को नकारना, उनकी आलोचना करना केवल साम्राज्यवाद ब्रिटेन की मदद करना नहीं था, बल्कि उस पूंजीवाद को भी तसल्ली देना था, जो गांधी और कांग्रेस को ढाल बनाकर दबे पांव अपनी जगह बना रहा था.

क्रमश:…

© ओमप्रकाश कश्यप

अनुक्रमणिका :

1. भगतसिंह के राजनीतिक दस्तावेज, नेशनल बुक ट्रस्ट, पृष्ठ-4

2. वही, पृष्ठ-5

3. Gurdev Singh, Deol, The Role of The Ghadar Party in the National Movement, Sterling Publishers, Jalandhar, 1969, pp. 39-40.

4. Wanted: Enthusiastic and heroic soldiers for

	organizing Ghadr in Hindustan:
	Renumeration: Death
	Reward  : Martyrdom
	Pension : Freedom

Field of work : Hindustan.

5. “Today, there begins in foreign lands, but in our country’s language, a war against the British Raj…What is our name? Gadar. What is our work? Gadar. Where will Gadar break out? in India. The time will soon come when rifles and blood will take the place of pen and ink.”Proceedings Home Political (Deposit) October, 1915, No. 43 (N.A.I.) and Gadar, November 1, 1913; quoted in Khushwant Singh, History of the Sikhs, Vol. II, p. 177.

6 Every class of artizans, the spinners, weavers and dyers, the oilsmen, the papermakers, the silk and sugar and metal workers, etc. who are unable to bear against western competition resort to the land, leave the towns and go into the country and are lost in the mass of helpless people who are unable to bear up against scarcity and famine. – A History of Indian Economic Thought by Ajit K.Dasgupta

7. Its greatest value lay in its efforts in promotion the unity and solidarity of the working- class in various countries. Marx’s battle cry, ‘Workingmen of all countries, unite!’ reverberated throughout Europe.’ Hardyal approvingly quotes the London Times Since the time of the establishment of Christianity and the destruction of the ancient world one had seen nothing like this awakening of labor.” Karl Marx : A Modern Rishi, Hardyal.

8. Marx was the first man who lay down the formula that the emancipation of the Working- classes must be achieved by themselves….His great appeal was addressed to the hearts of workingmen, to the latent manhood in them, of which they themselves were not conscious: ‘Workingmen of all countries unite! You have nothing to lose but your chains. You have a world to gain.’ Years have passed away. Men have come and gone; but this passionate cry of the leader who believed in the ignorant and dirty laborer still raises them in the full level of manhood. – Karl Marx : A Modern Rishi, Hardyal.

9. The monarchs believe and force others to believe that they are God’s representatives or incarnations. This is absurd. Did God create a special kind of dog to be the king of dogs,or a special kind of elephant to rule over all elephants?” R. Pillai,

10. Are the Christians and the Muslims not the people of Travancore? Does the state belong only to a handful of immoral irresponsible Brahmins? Unless this question is answered, the Christians, Muslims and non-Brahmins of this kingdom will not have any future.-R. Pillai, as quoted by Sh. Damodaran in Marx comes to India edited by Sh. P. Joshi & Damodaran.

11. भगतसिंह और उसके साथियों के दस्तावेज

12. वही

समाजवादी चिंतन की पृष्ठभूमि

सामान्य

प्लेटो का समाजार्थिक दर्शन 

रिपब्लिक’ में प्लेटो ने अपने राजनीतिक दर्शन के मूलभूत तत्वों की रूपरेखा प्रस्तुत की थी. गंभीर चिंतन के उपरांत वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि समाज के गठन का उद्देश्य अयाचित और किसी कल्याणभाव से प्रेरित नहीं है. यह सीधेसीधे व्यक्ति के स्वार्थ से जुड़ा है. चूंकि अकेले मनुष्य के लिए जीवन की अनेक दुश्वारियां थीं, इसलिए उसने समूह में रहना सीखा. समूह को स्थायित्व प्रदान करने, उसमें शांतिव्यवस्था बनाए रखने, विकास और सुखानंद के लिए उसने कुछ नियमों का विन्यास किया. कालांतर में ये नियम सभ्यता का प्रतीक बनकर जटिल सामाजिक संबंधों में ढलते चले गए. आज से करीब पांच हजार वर्ष पहले मनुष्य व्यापार में तरक्की कर चुका था. उसने नौकाओं और भारी जलयानों की सहायता से लंबी समुद्री यात्राएं करना सीख लिया था. दुर्गम स्थानों की यात्रा के लिए वह पशुओं की मदद लेता था. रास्ते में हिंस्र पशुओं और दस्युओं का खतरा था. उनसे निपटने के लिए उसने भाड़े के सैनिक रखने आरंभ किए. सैन्यबल और धनसंपदा दोनों ही ताकत का प्रतीक थीं,

व्यक्ति के पास जब इनका प्राचुर्य हआ तो उसकी महत्त्वाकांक्षाएं अंगड़ाई लेने लगीं. प्रारंभ में जिन स्थानों से उसको वाणिज्यिक लाभ पहुंचता था, उन स्थानों पर सीधे अथवा अपने सहयोगियों की सहायता से अपने उपनिवेश कायम करने लगा. प्रारंभ में जो राज्य बने उनका क्षेत्रफल बहुत कम, नगरविशेष की सीमा तक होता था. निश्चितरूप से तत्कालीन नगरराज्य की स्थापना एक स्वतंत्र एवं आत्मनिर्भर आर्थिकराजनीतिक इकाई के रूप में की गई होगी. शीघ्र ही मनुष्य को लगने लगा था कि विकास की निरंतरता के लिए संबंधों का विस्तार अत्यावश्यक है. ऐसी कार्यकारी संस्थाओं की आवश्यकता है जिनके द्वारा संबंधों को मर्यादित और नियंत्रित किया जा सके. इससे नए राजनीतिक दर्शन की आवश्यकता महसूस की जाने लगी. आदिम मानवीय जिज्ञासा केवल जीवन और प्रकृति के रहस्यों के अन्वेषण तक सीमित थी, जिसके कारण दर्शनों का विस्तार हुआ. बहुत शीघ्र मनुष्य को लगने लगा कि केवल पराभौतिक सत्ता की खोज से काम चलने वाला नहीं है. जीवन को अधिक सुविधासंपन्न बनाने तथा प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए प्रकृति को समझना भी अनिवार्य है. इसलिए बुद्धिजीवियों का ध्यान इहलौकिक सत्यों के अन्वेषण की ओर गया, जिससे ज्ञानविज्ञान की खोज के नए रास्तों का विकास हुआ.

ईसा से 426 वर्ष पहले जन्मे यूनानी दार्शनिक वैज्ञानिक डेमोक्रिटिस ने लोकभ्रांतियों का खंडन करते हुए घोषणा की कि चंद्रमा पर दिखने वाली छाया वस्तुतः उसकी सतह पर बने ऊबड़खाबड पठार हैं. उसने नीहारिकाओं का रहस्योद्घाटन करते हुए बताया कि रात में आसमान में नजर आने वाली दूधिया नदी, वास्तव में तारों का प्रकाश है, जो अरबों की संख्या में विराट अंतरिक्ष में फैले हुए हैं. हालांकि लोकमानस सूर्य, चंद्र आदि ग्रहनक्षत्रों की भावनात्मक कहानियां आगे भी गढ़ता रहा, तो भी डेमोक्रिटिस के लेखन से आने वाले विचारकों को एक नई दिशा मिली. लोगों को लगा कि विश्वसमाज और उसकी उत्पत्ति की तह में जाने का एक तरीका यह भी हो सकता है, जो दूसरे की अपेक्षा कहीं अधिक वस्तुनिष्ठ और तर्कसम्मत है. इससे आगे चलकर विज्ञान के विकास को नई दिशा मिली. देखा जाए तो वह समय दुनिया की सभी बड़ी सभ्यताओं भारत, यूनान, मिश्र, चीन में वैचारिक क्रांति के उद्घोष का था, जिसमें महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, सुकरात, कन्फ्यूशियस, अजित केशकंबलि आदि का प्रादुर्भाव हुआ, जिन्होंने अपने मौलिक चिंतन से प्रचलित धर्मदर्शन की जड़ता और उसके पोंगापंथी सोच पर तीखा प्रहार किया.

लगभग यही वह दौर था जब व्यवस्थित राजनीतिक दर्शन पर विचार किया गया, जो धार्मिक आग्रहों से पूरी तरह स्वतंत्र था. यह नया चिंतन विज्ञानवादी सोच के साथसाथ उभर रहा था. राज्य की उत्तरोत्तर बढ़ती महत्ता को पहचानकर डेमोक्रिटिस ने ही सपना देखा था कि कोई तो होगा जो राज्य के मामलों को दूसरे सभी मामलों पर तजरीह देगा. कुछ इस तरह कि सबकुछ संतुलितसा लगे. जो न तो वास्तविकता से बहुत परे, विवादपूर्ण हो, न ही किसी सार्वजनिक शुभ से इतर विषयों पर जोर देता हो. उसकी निगाह में राज्य का प्रबंधन किसी भी अन्य कार्य से अधिक महत्त्वपूर्ण और श्लाघनीय कर्म था. उसके अनुसार ऐसे राज्य के लिए जिसको सही ढंग से व्यवहृत किया जा रहा हैµ

विकास का सर्वोत्तम रास्ता है कि सबकुछ इसी(राज्य)पर निर्भर हो. यदि राज्य की सुरक्षा हुई तो बाकी सब सुरक्षित रहेगा; और यदि राज्य को नष्ट किया गया तो शेष सभी नष्ट हो जाएगा.’

डेमोक्रिटिस का यही सोच आगे चलकर प्लेटो, अरस्तु आदि के राजनीतिक चिंतन की प्रेरणा बना. पश्चिमी समाज में सुकरात की स्थिति एक धार्मिक आचार्य के तुल्य है.उसने हालांकि स्वयं कुछ नहीं लिखा था, लेकिन एक मसीहा की भांति उसका गहरा प्रभाव पूरे यूरोपीय चिंतन पर बना हुआ है. सुकरात के बारे में दुनिया जो भी जानती है, वह प्लेटो सहित सुकरात के अन्य शिष्यों, समकालीनों के माध्यम से ही. तो भी यह सुकरात के सोच का अनूठापन ही था कि उसको प्लेटो जैसे विचारकों ने अपना गुरु माना. धर्मदर्शन के क्षेत्र में जिस आदर्शवाद का पक्ष सुकरात लेता था, प्लेटो ने उसी के माध्यम से अपने राजनीतिक दर्शन की परिकल्पना की. यही कारण है कि प्लेटो का राजनीतिक दर्शन धार्मिक टच लिए हुए है. सुकरात का उल्लेख उसने तेजस्वी विद्वान व्यक्ति के रूप में किया है, जो ‘शुभ’ को पहचानने तथा उसका अनुसरण करने की आवश्यकता पर जोर देता है. वह ईश्वर की परंपरागत अवधारणा से भिन्न, यद्यपि उसकी कुछ समानताएं लिए हुए है. प्लेटो एथेंस की राजनीतिक उथलपुथल का साक्षी रहा था. सुकरात से करीब 40 वर्ष छोटे प्लेटो ने एथेंस और स्पार्टा के बीच तीस वर्ष तक चलने वाले युद्ध को अपनी आंखों से देखा था. वह 429 ईस्वी पूर्व की एथेंस की प्लेग का भी साक्षी रहा था, जिसमें उसके महान योद्धा और राजनीतिज्ञ पेरीक्लीस समेत अनेक बहादुर सैनिकों को जान गंवानी पड़ी थी. 401 ईस्वी पूर्व में एथेंस की हार के बाद वहां के सम्राट को अपदस्थ कर विजयी स्पार्टा ने वहां तीस सदस्यीय संसद की स्थापना की थी. उसके बाद कुछ समय तक सबकुछ ठीकठाक चलता रहा, मगर उसके बाद एथेंस में भ्रष्टाचार और तानाशाही का बोलबाला हो गया. इस तरह प्लेटो ने राजशाही और कुलीनतंत्र दोनों का अनुभव था. गणतंत्र के नाम पर गठित परिषद के सदस्य निजी अहं के शिकार होकर मनमानी करने लगे. परिषद कुलीनतंत्र की हठधर्मी का माध्यम बन चुकी है. इन दोनों राजनीतिक प्रणालियों से निराश प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ में दार्शनिक सम्राट की अनिवार्यता पर जोर दिया था. वह स्वयं एक अभिजात परिवार से था, एथेंस के सम्राट से उसका संबंध था, इस कारण वह स्वयं को एथेंस की राजनीति का उत्तराधिकारी भी मानता था. उसको सक्रिय राजनीति में योगदान देने का अवसर तो कभी न मिल सका, तो भी राजनीति उसके दिलोदिमाग पर सदैव हावी रही. ‘रिपब्लिक’ में जिस आदर्शलोक का सपना वह देखता है और उसके लिए जिस राजनीतिक दर्शन की परिकल्पना करता है, वह सक्रिय राजनीति में हिस्सा न ले पाने से उत्पन्न कुंठा की उपज था.

प्लेटो को लगता था कि राजनीतिक पदों पर जिम्मेदारी का निर्वहन चुनौतीभरा काम होता है. महत्त्वपूर्ण कर्तव्यों के निष्पादन के लिए उपयुक्त व्यक्ति पर्याप्त संख्या में सर्वदा उपलब्ध हों, यह संभव भी नहीं होता. इसलिए किसी भी राज्य के सामने, जो नागरिक हितों को सर्वोपरि समझता है, बड़ी समस्या ईमानदार, दूरदृष्टा, साहसी और नीतिवान राजनीतिज्ञों के चयन की होती है. प्लेटो को विश्वास था कि शिक्षा के माध्यम से अच्छे राजनीतिज्ञ तैयार किए जा सकते हैं. उसने द्वारा ‘अकादमी’ की स्थापना इसी उद्देश्य के निमित्त की गई थी. पलभर के लिए एकदम हाल के युग में लौटकर याद करने की कोशिश करें. कुशलनीतिवान राजनीतिज्ञों की उपलब्धता की समस्या को लेकर ब्रिटिश की तत्कालीन प्रधानमंत्री मारर्गेट थैचर ने भी अपने एक बयान में कहा था कि उन्हें राजकर्म के कुशल संपादन के लिए केवल छह व्यक्तियों की आवश्यकता है, जो निपुण एवं नीतिवान हों. पर ऐसे लोग इतनी संख्या में कभी एक साथ नहीं मिल पाते. यही समस्या प्लेटो के सामने भी थी. इसलिए उसने शिक्षा के माध्यम से भावी राजनीतिज्ञों की पीढ़ी तैयार करने पर जोर दिया था. ‘रिपब्लिक’ की रचना में प्लेटो के गुरु सुकरात के अलावा उसके और भी कई समकालीन एवं पूर्ववत्र्ती दार्शनिकों का योगदान था. उनमें पाइथागोरेस के अनुयायी, पेरामेनीडिस, डेमोक्रिटिस, हेराक्लाटस आदि प्रमुख थे. इनमें से प्लेटो पर सर्वाधिक प्रभाव, ईसा से पांच शताब्दी पहले जन्मे यूनानी दार्शनिक पेरामेनीडिस का पड़ा था. उसका मानना था कि ‘सत्य को अनतिंम तथा अपरिवर्तनीय होना चाहिए.’ पेरामेनीडिस शब्दों की ताकत पर भरोसा करता था. उसका विचार था कि यदि भाषा में अभिव्यक्तिसामथ्र्य है तो उसके द्वारा हम जिस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं, यानी लगातार विमर्श के माध्यम से जो ज्ञान हमें प्राप्त होता है, वह भी सच होना चाहिए. पेरामेनीडिस के दर्शन का स्रोत ‘दि नेचर’ शीर्षक से लिखी गई एक कविता है. कहा जाता है कि उस कविता में लगभग 3000 पद थे. उनमें से अधिकांश पद अब गायब हो चुके हैं. मूल भी कविता अनुपलब्ध है. उसका सिर्फ संदर्भ प्राप्त होता है. अपनी कविता में पेरामनीडिस ने कहा था कि आप उस वस्तु के बारे में नहीं जान सकते जिसका कोई अस्तित्व ही न हो. इसका अभिप्राय है कि मनुष्य का ज्ञान केवल अस्तित्वमान प्रत्ययों की व्याख्याविश्लेषण तक संभव है. इस आधार पर पेरामेनीडिस को पहला तत्वविज्ञानी भी कहा जा सकता है, जो कालांतर में भौतिकवादी दर्शन की प्रेरणा बना.

पेरामेनीडिस के अलावा प्लेटो पर सर्वाधिक प्रभाव उससे कुछ ही वर्ष पहले जन्मे हेराक्लाट्स का पड़ा था. यूनानी दर्शन के पितामह थेल्स से प्रभावित हेराक्लाट्स जल को ही सृष्टि का मूलाधार मानता था. उसका मानना था कि सबकुछ गतिमान है. दो व्यक्ति यदि आगे पीछे जा रहे हैं तो पीछे मौजूद व्यक्ति कभी पहले को नहीं पकड़ पाएगा. इसलिए कि उनकी यात्रा का भौतिक जगत के अलावा एक आयाम और भी हैवह है समय, जो सदैव गतिमान रहता है. जिस समय पीछे चल रहा व्यक्ति आगे वाले के बराबर पहुंचेगा, उस समय तक आगे वाला व्यक्ति समय के प्रवाह में कुछ और आगे निकल चुका होगा. हेराक्लाइटस की प्रसिद्ध उक्ति हैµ‘सबकुछ प्रवाहमान है.’ किवदंति है कि उसने यह नदी में खड़े होकर, उसके प्रवाह को देखते हुए कहा था. हेराक्लाइट्स के अनुसार

यह विश्व, जो सभी के लिए एक समान है, इसमें जो कुछ है सभी सनातन हैवह न तो ईश्वरनिर्मित है, न ही मानवनिर्मित. जो कुछ आज है वह अखंड ज्योति के समान, परिवर्तनशीलता के बीच, हमेशाहमेशा के लिए रहने वाला है.’

हेराक्लाइट्स के चिंतन में भौतिकवादी विचारधारा के बीजतत्व मौजूद हैं, जिन्होंने प्लेटो, अरस्तु समेत आने वाली पीढ़ी के अनेक दार्शनिकों को प्रभावित किया था. उसके बारे में यह बात भी चैंका सकती है कि वह युद्ध का समर्थक था. यहां तक कि न्याय की स्थापना के लिए भी वह युद्ध को अनिवार्य मानता था. युद्ध का जैसा दुराग्रही समर्थन हेराक्लाइट्स ने किया, वैसा शायद ही किसी और विचारक ने किया हो

युद्ध आमखास, राजाओं तथा राजाओं के राजा का जनक है. युद्ध ने ही कुछ को भगवान, कुछ को इंसान, कुछ को दास, कुछ को स्वामी बनाया है. हमें मालूम होना चाहिए कि युद्ध से हम सभी का नाता है. विरोध न्याय का जन्मदाता है, प्रत्येक वस्तु संघर्ष से ही जन्मती तथा उसी से अंत को प्राप्त होती है.

हेराक्लाइट्स तथा पारमेनीडिस की विचारधारा के प्रभाव में कालांतर में जिस विचारधारा ने यूनानी बुद्धिजीवियों का दिल जीता, उसके अनुसार ठोस और दृश्यमान जगत को अस्थायी एवं क्षणभंगुर माना गया है. इस विचारधारा के अनुसार दृश्यमान जगत स्वयं में अवास्तविक और मायावी है, जैसा कि आगे चलकर भारतीय वेदांतियों की मान्यता रही.यह विचारधारा लोगों में यह विश्वास जगाने में कामयाब हुई कि मनुष्य का ज्ञान स्वतः प्रामाण्य है. चेतना जगत वास्तविक है. ज्ञान के रूप में यह जो ग्रहण करता है, जिन निष्कर्षों की सृष्टि करता है, वे चिरंतन एवं कालातीत होते हैं. प्लेटो ने इसी विचारधारा का उपयोग अपने राजनीतिक दर्शन के लिए किया था. लंबे विमर्श के उपरांत वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि आदर्श राज्य की स्थापना केवल समर्थन, सहयोग और परिवर्तनशील बने रहने से संभव नहीं है. इसे दृढ़, स्थायी, अपरिवर्तनीय राजनीतिक तंत्र के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है, जो सामाजिक परिवर्तनों को निरंतर नियंत्रितनिर्देशित करने में सक्षम हो. उस समय तक राजनीति के इतने व्यवस्थित उपयोग के बारे में किसी ने नहीं सोचा था. अतः राजनीतिक दर्शन के लिहाज से यह एक अद्भुत और विकासगामी सोच था. इस विचार को नए आयाम देते हुए प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ की रचना की और एक आदर्श समाज का खाका तैयार किया. इस कार्य के पीछे उसके कविहृदय का भी उतना ही योगदान था, जितना कि दार्शनिक मस्तिष्क का. इसलिए अपने आदर्शराज्य में उसने कानून के हस्तक्षेप को न्यूनतम रखते हुए आत्मानुशासन पर ज्यादा जोर दिया है. इस ग्रंथ को कुछ विद्वान प्लेटो की कुंठा की उपज भी मानते हैं, जो एथेंस की राजनीति में सक्रिय भूमिका न निभा पाने के कारण जनमी थी. प्लेटो स्वयं दार्शनिक था. सुकरात, डेमोक्रिटिस, हेराक्लाइट्स, पेरामेनीडिस समेत पाइथागोरस के अन्य अनुयायी आदि जिनसे वह प्रभावित था, वे सब भी दार्शनिक थे. ‘रिपब्लिक’ को राजनीति के विभिन्न स्वरूपों का अनुभव था. उसने एथेंस में गणतंत्रीय शासन को कुलीनतंत्र की मनमानी में ढलते हुए देखा था. सायराकस के सम्राट डायोनिसियस प्रथम और द्वितीय की तानाशाही भी देखी थी. डायोनिसियस प्रथम अपने राज्य में विद्वानों और दार्शनिकों को रखता था. लेकिन उसकी मनमानी, सनकों और महत्त्वाकांक्षाओं पर रोक लगाने में वे सभी अक्षम थे. इस कारण राजशाही से भी उसका विश्वास उठ चुका था. इसलिए राज्य के मुखिया के रूप में वह ऐसे शासकों की कल्पना करता था, जो दूरदर्शी, वीर, साहसी, दृढ़निश्चयी, बुद्धिमान और किसी भी प्रकार से प्रलोभन से मुक्त हों. उसके अनुसार ये गुण किसी दार्शनिक में ही संभव हैं. इसलिए उसने राज्य की बागडोर किसी दार्शनिक के हाथों में सौंपने की कल्पना की थी. ‘रिपब्लिक’ में उसकी यही परिकल्पना विस्तार लेती दिखाई पड़ती है. ध्यातव्य है कि ‘रिपब्लिक’ उसके प्रौढ जीवन की रचना है, हालांकि उसका लेखन वर्षों तक चलता रहा. कुछ खंड उसने अपने उत्तरवर्ती जीवन में पूरे किए थे. जब उसको लगने लगा था कि ‘रिपब्लिक’ के सपने को यथार्थ में साकार कर पाना सहज नहीं है. तो भी उसका ‘शुभ’ की अनिवार्यता और आदर्शों से मोह भंग नहीं हुआ था. अतएव अपने अंतिम दिनों की कृति ‘लाॅज’ में वह उन व्यवस्थाओं की परिकल्पना करता है, जिनके द्वारा उस सपने को साकार किया जा सकता है. ‘रिपब्लिक’ की मुख्य स्थापना थी कि राज्य का मुखिया किसी दार्शनिक को होना चाहिए. वही चुनौतीपूर्ण स्थितियों में दृढ़ निश्चय लेकर राज्य का कल्याण कर सकता है. दार्शनिक सम्राट का प्रयोग प्लेटो से पहले भी यूनान के नगरराज्यों में हो चुका था. बल्कि किसी नगरराज्य के विकास के लिए आचारसंहिता तैयार करने का काम प्रायः दार्शनिकविचारक ही करते आए थे. परंतु माक्र्स की भांति प्लेटो भी दुनिया को समझने नहीं, बदलने में विश्वास करता था. यही कारण है कि वह सहस्राब्दियों से दार्शनिक विचारकों को प्रभावित करने में सक्षम रहा है.

राजनीतिक दर्शन को समर्पित प्लेटो की महान रचना ‘रिपब्लिक’ न तो किसी विशिष्ट राजनीतिक दर्शन की स्थापना करती है, न ही किसी खास राजनीतिक विचारधारा का पक्ष लेती है. उसकी स्थापनाएं यूनान के किसी भी नगरराज्य के बारे में सच हो सकती थीं. इसलिए कि वह किसी विशेष राजनीतिक प्रणाली पर जोर देने के बजाय समाज में आदर्शों की स्थापना पर जोर देता था. चूंकि आदर्श की स्थापना परोक्षतः न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना ही है, इसलिए इस ग्रंथ में वह न्याय को विभिन्न कोणों से परिभाषित करने का प्रयास करता है. न्याय की उसकी अवधारणा भी तत्संबंधी आधुनिक विचारधाराओं से भिन्न है. ‘जस्टिस’ के माध्यम से एक भयमुक्त, अपराधमुक्त, न्यायाधारित समाज की स्थापना का पक्ष लेने के बजाय वह नागरिकों में कर्तव्यबोध पैदा करने पर ज्यादा जोर देता है. उसकी निगाह में न्याय का अभिप्राय व्यक्ति और समाज के आचरण की स्वयंस्फूर्त पवित्रता से है. ‘न्याय’ हालांकि अपने आप में एक जटिल अवधारणा है. इसका संबंध व्यक्ति मात्र के सदाचरण तथा समाज में अनुशासन बनाए रखने से होता है. ‘रिपब्लिक’ के पहले खंड में प्लेटो ने सुकरात को अपने साथियों के साथ ‘न्याय’ की अवधारणा पर विस्तार से चर्चा करते हुए दर्शाया है. उस चर्चा के माध्यम से ‘न्याय’ की चार परिभाषाएं हमें प्राप्त होती हैं. मगर उनमें से एक भी परिभाषा ऐसी नहीं है, जिसे सर्वमान्य सर्वकालिक सत्य माना जा सके. स्वयं प्लेटो के अनुसार न्याय व्यक्तिसापेक्ष, स्थितिसापेक्ष होता है. अतः उसकी उपयोगिता विशिष्ट संदर्भों तक सीमित होती है. चर्चा के भागीदारों में से एक केफलस के अनुसार न्याय का आशय, ‘सच बोलना तथा दूसरों से लिए उधार को समय पर लौटाना है.’ यह अवधारणा व्यक्ति की सत्यनिष्ठा तथा सामाजिक परंपरा, जो आपसी व्यवहार को बनाए रखने के लिए अत्यावश्यक है, पर जोर देती है. पर न्याय क्या सिर्फ सच बोलने और समय पर उधार चुकाने तक सीमित है? उससे परे कुछ नहीं? सुकरात प्रतिवाद करता है‘यह सही है कि न्याय शुभ का प्रतीक है. व्यक्ति ने किसी से उधार लिया है तो उसे समय पर चुकाना उसका दायित्व है. किंतु यह प्रत्येक अवस्था में उतना ही सम्मानेय हो, जरूरी नहीं है. वह तर्क देता है

मान लीजिए मेरा एक दोस्त अपनी अच्छी मनःस्थिति में अपना कोई हथियार मेरे पास सुरक्षित रख देता है. उस हथियार को वह उस समय मांगने आता है, जब वह संतुलित मनःस्थिति में नहीं है. तो क्या मुझे उसके हथियार को तत्क्षण वापस कर देना चाहिए? कोई इस बात से सहमत नहीं होगा कि ऐसी स्थिति में जब मेरे प्रिय मित्र का मानसिक संतुलन डांवाडोल है, मुझे उसके हथियार को लौटा देना चाहिए. स्पष्ट है कि दोस्त को उसी समय हथियार न लौटाने के लिए मुझे कोई बहाना भी बनाना पड़ सकता है. यानी ऐसी अवस्था में न केवल उधार चुकाना अनैतिक हो सकता है, बल्कि सच बोल पाना भी संभव नहीं है.’

इससे सुकरात और उसके साथी इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि सिर्फ समय पर उधार चुकाने को न्याय का पर्याय नहीं माना जा सकता. दूसरे शब्दों में समय पर उधार चुकाना न्याय का द्योतक तो हो सकता है, लेकिन न्याय की सर्वांगता का प्रतीक वह हरगिज नहीं बन सकता. केफलस का बेटा पोलीमार्क्स चर्चा को विस्तार देते हुए न्याय को नए ढंग से परिभाषित करने का प्रयास करता है. उसके अनुसार

न्याय का आशय मित्रों के साथ सहृयतापूर्ण तथा दुश्मनों के प्रति क्रूरतापूर्ण व्यवहार करना है.’

परंतु मित्रों के चयन में भी व्यक्ति का स्वार्थभाव झलकता है. इसलिए वह उन्हीं लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करेगा, जो उसकी स्वार्थसिद्धि के काम आते हैं या आने वाले हैं. इस तरह तो पूरा समाज ही स्वार्थभावना से संचालित होगा. फिर व्यक्ति का स्वार्थ भी हमेशा एक जैसा नहीं रहता. कोई वस्तु एक समय में उसके लिए सुखकारी हो सकती है तथा अगले ही क्षण दुखदायी. ऐसा हो तो, सुकरात तर्क देता है‘न्याय अन्याय को बढ़ावा दे सकता है. पोलीमार्क्स सुकरात के तर्क से सहमत है कि न्याय जो सर्वत्रसार्वकालिक शुभ की कामना करता है, वह किसी के लिए हानिकारक हो ही नहीं सकता. सुकरात साइमनडिस के इस तर्क से सहमति जताता है कि, ‘न्याय प्रत्येक व्यक्ति को वह सबकुछ देता है, तो उसके लिए लाभकारी है.’

रिपब्लिक’ के पहले खंड में ‘न्याय’ की अवधारणा को लेकर सभी अपनेअपने तर्क प्रस्तुत करते हैं. वहां न्याय को लेकर सबसे चैंकाने वाली परिभाषा थ्रमाइचस की ओर से आती है. वह जोर देकर कहता था कि, ‘न्याय बलशाली के हित के सिवाय और कुछ नहीं है.’ सुकरात को यह भी मंजूर नहीं. वह तर्क करता है

हमारे बीच पोलीडमस मौजूद है, हम सब जानते हैं कि यह पहलवान है. यह हम सबसे अधिक बलशाली है. अपने शरीर की ताकत को बनाए रखने के लिए यह मांस का नियमित सेवन करता है. तो क्या यह समझना चाहिए कि मांस का सेवन करना हम सभी के लिए, जो शारीरिक रूप से बहुत दुर्बल हैं, उतना ही स्वास्थ्यकारी है, जितना वह पोलीडमस के लिए है? क्या यह हमारे लिए भी उतना ही पोषक सिद्ध होगा, जितना इसके लिए?’

सुकरात की आपत्ति पर थ्रमाइचस अपने तर्क के समर्थन में प्रजातांत्रिक, कुलीनतंत्र और तानाशाही सरकारों का उदाहरण देता हुआ कहता है कि सरकार के ये सभी रूप आम हैं‘विभिन्न प्रकार की सरकारें यथा लोकतांत्रिक, कुलीनतंत्र और तानाशाही अपनीअपनी विचारधारा को ध्यान में रखकर कानून बनाती हैं, जिन्हें वे सिर्फ अपने हितों को ध्यान में रखकर विरचित करती हंै. ऐसे कानून भला उस जनता के लिए कैसे न्यायकारी हो सकते हैं, जिसपर उन्हें शासन करना है? यदि कोई व्यक्ति उन कानूनों का अतिक्रमण करेगा, विरोध का साहस दिखाएगा तो वे उसको कानून का द्रोही मानकर दंडित करेंगे. यही वह बात है जो मैं समझाना चाहता हूं कि सभी राज्यों के न्याय के अपने सिद्धांत और व्याख्याएं होती हैं, जिनका झुकाव सरकार के हितों की ओर होता है, जो स्वाभाविक रूप से राज्य में सर्वाधिक शक्तिशाली होती है. इसलिए मेरी यह बात सच है कि न्याय हमेशा शक्तिशाली का हित देखता है.’

सुकरात विनम्रतापूर्वक थ्रमाइचस के इस तर्क को नकार देता है. वह अपने प्रतिवादी को समझाता है कि डा॓क्टर की दवा स्वयं डा॓क्टर के लिए नहीं, बल्कि मरीज के लिए हितकारी होती है. सारथी का हुनर उसके किसी काम का नहीं होता, वह अपेक्षाकृत सवार के लिए हितकारी होता है. इसलिए राज्य जो कानून बनाता है, वे भी उसके लिए तथा उसकी जनता के लिए समानरूप से हितकारी होने चाहिए. इसलिए ‘न्याय शक्तिशाली के लिए हितकारी होता हैइस परिभाषा में दोष है.

रिपब्लिक’ में आगे भी न्याय की अवधारणा पर चर्चा होती है, परंतु किसी एक परिभाषा पर सहमति नहीं बन पाती, सिवाय इस मान्यता के कि न्याय को सर्वत्रसार्वकालिक शुभ होना चाहिए. परंतु थ्रमाइचस के तर्कों से एक बात पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है कि सरकार चाहे जिस तरह की हो, वह सिर्फ अपना स्वार्थ देखती है. लोकतांत्रिक सरकारें ऐसे नियम बनाती हैं, जो लोकतंत्र को पुष्ट करने वाले हों. राजशाही ऐसे कानून बनाने पर जोर देती है, जिनके द्वारा उसकी आने वाली पीढ़ियों के लिए सत्ता सुरक्षित रहे. पूंजीवादी सरकारें उन कानूनों को अपनाती हैं, जिससे समाज में उपभोक्तावाद पनपे, जो अंततः व्यापारियों के लिए खुलकर लाभ कमाने का अवसर प्रदान करता है. उन सभी के लिए न्याय वही है, जो उनके अपने हितों के फलनेफूलने का अवसर देता है. परंतु सरकार चाहे जिस प्रकार हो, वह कानून भले अपने हितों को केंद्र में रखकर बनाए, मगर उसका दावा यही होता है कि वे पूरे राज्य के हितों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं. उनमें जनता के हितों का पूरा ध्यान रखा गया है. अतः राज्य के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह उन कानूनों का पालन करे. उल्लंघन करने वाले को दंडित करने का प्रावधान भी उन कानूनों में होता है. चूंकि सत्ता ताकत का प्रतीक होती है, इसलिए उसके द्वारा बनाए गए कानून प्रायः ताकतवर का ही समर्थन करते हैं. अतएव वे समाज के दुर्बल वर्गों के लिए हानिकर होते हैं. न्याय को लेकर लंबी परिचर्चा एवं वादप्रतिवाद के बावजूद हम पाते हैं कि ‘रिपब्लिक’ का पहला खंड अनिर्णय की स्थिति में समाप्त हो जाता है. थ्रमाइचस यह कहकर रोषपूर्ण तरीके से चर्चा से बाहर हो जाता इस बहस से किसी परिणाम तक पहुंचना असंभव है.

चर्चा का सूत्रधार और प्रमुख वार्ताकार सुकरात समस्या पर अगले दिन नए सिरे से विचार करने का निश्चय कर घर की राह लेता है. न्याय की सर्वमान्य परिभाषा की खोज की ओर बढ़ रहा पाठक अचानक निराशा से भर जाता है. लगता है कि पुस्तक के माध्यम से प्लेटो का लक्ष्य ‘न्याय’ को परिभाषित करना था ही नहीं. वास्तव में वह विभिन्न प्रकार की राजनीतिक प्रणालियों को अपनी समीक्षा के दायरे मे लाना चाहता था. उसका ध्येय यह दर्शाना था कि शीर्षस्थ शक्तियों के लिए केवल अपने हित सर्वोपरि होते हैं. यह कार्य वे व्यापक लोकहित का नाम लेते हुए करती हैं. इससे नुकसान उन्हें उठाना पड़ता है जो शक्तिहीन और विपन्न हैं. बहस के दौरान सुकरात न्याय को सार्वकालिकसर्वहितकारी बताकर उसको नैतिक उठान तो देता है, परंतु वह यह संकेत भी करता है कि शासन की प्रचलित प्रणालियों में से कोई भी ‘न्याय’ की स्थापना करने में समर्थ नहीं है. यानी सत्ता के नैतिक स्वरूप की खोज ‘रिपब्लिक’ का उद्देश्य है, मगर अंत तक वह लक्ष्य ही बना रहता है. इससे एक निष्कर्ष यह भी निकलता है कि सत्ताकेंद्र पर विराजमान व्यक्तियों के हितों में कोई तालमेल नहीं होता है. वे सिर्फ अपने स्वार्थ पर एकमत होते हैं. इसलिए सदैव यही प्रयास करते हैं कि अपनी सत्ता को अक्षुण्ण रखते हुए अपने हितों को कैसे साधा जाए? और किस प्रकार उन्हें प्रकार जल्दी से जल्दी तथा अधिकतम सीमा तक पूरा किया जा सकता है?

पुस्तक का अगला खंड छोड़ी गई चर्चा को नए पात्रों के साथ विस्तार देता है. सुकरात के माध्यम से प्लेटो न्याय की पुरानी अवधारणा को पुनः दोहराता है, जिसके अनुसार न्याय का उद्देश्य सार्वकालिकसार्वत्रिक शुभ और सर्वश्रेष्ठ न्यायिकराजनीतिक शासन की स्थापना करना है. तुलनात्मक रूप से न्याय को वह दो प्रकार से देखता है. उसका पहला चेहरा वह है जो राज्य की कार्यप्रणाली के जरिए सामने आता है. जिसके द्वारा निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए कोई राज्य अपने कर्तव्यों के निष्पादन के बहाने, विभिन्न संस्थाओं का गठन तथा उनका नियमिन करता है. न्याय का दूसरा चेहरा वह है जो उसके नागरिकों के आचरण में दिखाई पड़ता है.

प्लेटो की मान्यता थी कि व्यक्ति की अपेक्षा बड़े तंत्र, जैसे राज्य के व्यवहार में न्याय की पहचान अपेक्षाकृत आसानी से की जा सकती है. लेकिन यदि प्रत्येक नागरिक न्याय की ओर से उदासीन हो जाए तो राज्य के न्याय का कोई अर्थ नहीं रह जाता. ऐसे में उसे मनमानी करने का अवसर मिल जाता है. इसलिए व्यक्तिमात्र का कर्तव्य है कि वह समाज को उस रूप में व्यवस्थित करने के बारे में सोचे जिस, प्रकार वह स्वयं को व्यवस्थित करना चाहता है. किसी प्रकार के संदेह की गुंजाइश न रहे. वह स्पष्ट कर देना चाहता है कि मनुष्य न्याय को एक गुण के रूप में देखना चाहता है जो व्यक्ति के व्यवहार में भी उसी प्रकार मौजूद हो, जैसे कि वह समाज में है. जबकि समाज सदैव दो से बड़ा होता है. इसलिए वहां न्याय की मौजूदगी उसी अनुपात में अधिक होनी चाहिए. प्लेटो का यह तर्क बड़ा ही अजीब है. तो भी इस बात में कोई संदेह नहीं कि वह राजनीतिक सत्ता को अधिक न्यायोन्मुखी, उदार, कर्तव्यपरायण और दायित्वभावना से युक्त देखना चाहता था. उसका राजनीतिकदर्शन ही इस सिद्धांत पर टिका है कि अपने समाज और राज्य के लिए ‘मैं क्या कर सकता हूं?’ उसके प्रति मेरा ‘कर्तव्य और जिम्मेदारियां क्या हों?’

वस्तुतः इसे कर्तव्यबोध कहें अथवा नागरिकबोध, प्लेटो के मन में वह यूनानवासियों, विशेषकर वहां के अभिजात्यवर्ग के चारित्रिक पतन की प्रतिक्रियास्वरूप उपजा था. परोक्ष रूप में समाज को बेहतर बनाने की चिंता ही ‘रिपब्लिक’ का प्रतिपाद्य विषय है, जो कभी ‘न्याय’ की अवधारणा और कभी ‘आदर्श राज्य’ की परिकल्पना के रूप में सामने आती है. उसकी निगाह में आदर्श राज्य की स्थापना उस समय तक असंभव है, जब तक वहां के नागरिक और शीर्षस्थ वर्ग के लोग ‘शुभत्व’ से भलीभांति परिचित न हों. ‘शुभत्व’ की संकल्पना सुकरात की देन थी, जिसको पाने की लालसा प्लेटो के पूरे साहित्य की कसौटी है.

प्लेटो को पढ़ते हुए मार्क्स की याद आना स्वाभाविक है. दोनों ही भौतिकवादी थे. दोनों का ही मानना था कि कोई मनुष्य अपने आप में पूर्ण नहीं है. मानवमात्र की यही अपूर्णता समाज की आवश्यकता की जननी है. लेकिन एक सीमा के बाद मनुष्य और समाज के रिश्ते जटिल होने लगते हैं. उन्हें नियंत्रित करना अकेले समाज के लिए संभव नहीं होता. ऐसे में राज्य की अहमियत बढ़ जाती है. मनुष्य की अनेक आवश्यकताएं होती हैं. उनमें भोजन, वस्त्र, आवास आदि ऐसी आवश्यकताएं हैं, जिन्हें उसकी मूलभूत आवश्यकताएं माना जाता है. इनके बगैर जीवन असंभव है. कुछ आवश्यकताएं विकास की देन होती हैंजैसे सड़क, औजार, मशीनें, बिजली के उपकरण, यातायात के साधन इत्यादि.

प्रत्येक मनुष्य कामना करता है कि उसके जीवन में दूसरों का हस्तक्षेप न हो. सुरक्षा का पक्का भरोसा हो. यह काम मनुष्य आपस में एकदूसरे के साथ सहयोग करते हुए भी कर सकता है. अक्सर करता भी है. सहकारिता आंदोलन इसी का सुपरिणाम है, जहां राज्य के हस्तक्षेप अथवा उसकी नीतियों से स्वतंत्र रहकर भी व्यक्तिसमूह अपना विकास कर सकते हैं. परंतु सहकार के लिए जैसे विवेक और समूह के हित में अपने हितों के किंचित त्याग और सामान्यीकरण की आवश्यकता पड़ती है, वह हर समाज और हर समूह में संभव नहीं हो पाता. व्यक्ति के भीतर मौजूद स्वार्थलोलुपताएं सहकारी प्रयासों के लिए घातक होती हैं. व्यक्ति की स्वार्थलोलुपता दूसरों के लिए घातक सिद्ध न हो, इसके लिए राज्य की आवश्यकता पड़ती है. लेकिन मनमानी करना तो राज्य में भी संभव नहीं होता. वहां भी व्यक्ति को दूसरे के हितों का ध्यान रखकर चलना पड़ता है. हितों के सामान्यीकरण की प्रक्रिया ही व्यक्ति को परस्पर करीब लाने का काम करती है. यही उनको एक स्थान पर टिककर रहने और समाज की स्थापना करने के लिए प्रेरित करती और अंततः राज्य की आवश्यकता को जन्म देती है.

क्रमशः

© ओमप्रकाश कश्यप