Category Archives: विमुद्रीकरण के बहाने

सार्वजनिक उद्यमों का विनिवेशीकरण

सामान्य

निजीकरण के माध्यम से जातिवादी एजेंडे को साधने की कोशिश

आर्थिक मंदी से उबरने का सरकार को जो सबसे आसान तरीका नजर आता है, वह है विनिवेशीकरण। नीति-आयोग की ऑनलाइन बैठक में प्रधानमंत्री ने कहा कि उद्योग-धंधे चलाना सरकार का काम नहीं है। वित्त-मंत्री भी बजटीय भाषण में विनिवेशीकरण का ऐलान कर चुकी हैं। फैसले की आलोचना कर रहे लोगों से प्रधानमंत्री का कहना है कि ‘निजी क्षेत्र की महत्ता से भली-भांति परिचित होने के बाद भी कुछ नेता, न केवल अप्रासंगिक हो चुके समाजवादी सोच से चिपके हुए हैं, बल्कि निजी क्षेत्र के उद्यमियों को खलनायक की तरह पेश करने का भी काम कर रहे हैं’1 पुनः 24 फरवरी को बजट पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा था कि सरकार द्वारा संचालित उद्यमों के सुनियोजित निनिवेशीकरण द्वारा नागरिकों के विकास एवं रोजगार हेतु नए संसाधन प्राप्त होंगे। उस भाषण में उन्होंने 100 सरकारी उद्यमों के विनिवेशीकरण द्वारा 2.5 लाख करोड़ की धनराशि जुटाने की बात कही थी।2 इस लेख का उद्देश्य पाठकों को  पूंजीवाद और समाजवाद की बहस पर उलझाना नहीं है। लेकिन यह याद दिलाना जरूरी है कि ‘संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य’ बनाने का संकल्प आज भी उस भारतीय संविधान की प्रस्तावना का हिस्सा है, जिसकी शपथ लेकर हमारे मंत्री और सांसद, संसद भवन की शोभा बनते आए हैं।

2014 में जब यह सरकार सत्ता में आई थी, तो विकास सबसे बड़ा मुद्दा था। विदेशी निवेशकों को रिझाने के लिए मोदीजी अगले दो वर्षों तक इस देश से उस देश तक घूमते रहे। उन वर्षों में उन्होंने जितनी विदेश यात्राएं की थीं, वह स्वयं एक रिकार्ड है। यह बात अलग है कि अपेक्षित तो क्या न्यूनतम सफलता भी उन्हें इस काम में नहीं मिल सकी। इसके लिए कोई और नहीं, भाजपा के अपने ही नेता जिम्मेदार थे। खासकर वे नेता जिनके लिए हिंदुत्व का मुद्दा, देशहित के किसी भी मुद्दे से बढ़कर था। जीत के साथ ही वे हिंदुत्व के एजेंडे को लागू करने में जुट गए थे। उससे समाज में अशांति और असुरक्षा का वातावरण पनपा, जिसकी क्रूर परिणति मुजफ्फरनगर दंगे के रूप में हुई। अर्थव्यवस्था की दृष्टि से सरकार का दूसरा ध्वंसात्मक कदम था─विमुद्रीकरण का फैसला। काले धन को बाहर निकालने के नाम पर उठाए गए उस कदम का वास्तविक उद्देश्य उत्तर प्रदेश चुनावों से ठीक पहले विपक्ष को धराशायी कर देना था। कालाधन तो बाहर नहीं आया, उल्टे पुराने नोटों के स्थान पर नए नोट छापने में देश को अरबों रुपयों का चूना लग गया। सामाजिक अविश्वास, अशांति, निरंतर बढ़ते ध्रुवीकरण तथा विमुद्रीकरण के फैसले ने छोटे-उद्योगों और व्यापारियों की कमर तोड़कर रख दी। उसके बाद तो लोग विकास की उम्मीद छोड़, जो था उसी को बचाने की फिक्र करने लगे। ऐसा वातावरण पूंजीवादी कंपनियों के लिए, जो निवेश से पहले नए ठिकाने की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों की भली-भांति पड़ताल करती हैं, उपयुक्त नहीं था। कोविड-19 के कारण फैली महामारी की शुरुआत में, चीन के निरंकुश आचरण से खिन्न बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने नए ठिकाने की तलाश शुरू कर दी थी। भारत उनके लिए वैकल्पिक ठिकाना हो सकता था। मगर बढ़ती सांप्रदायिकता के कारण, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की खराब होती छवि ने भारत को उन अवसरों का लाभ उठाने से वंचित रखा।

सवाल है कि विनिवेशीकरण के मुद्दे से इस सबका क्या संबंध है? क्यों हम सरकार की कमजोरियां गिना रहे हैं? वस्तुतः देश आज जिस आर्थिक मंदी का शिकार है, उसके पीछे सरकार की नीतियों का बड़ा योगदान है। एक ओर जहां सरकार और जनसाधारण को आर्थिक मोर्चे पर बुरी तरह जूझना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर इसी अवधि में देश के चुनींदा घरानों की पूंजी में बेइंतहा वृद्धि हुई है। मई 2014 में जब मोदी सरकार पहली बार सत्ता में आई थी, सेन्सेक्स 24,000 था। फ़िलहाल वह 50,000 के शिखर को पार कर नई ऊंचाइयों की ओर अग्रसर है। इसका मोटा-मोटा संकेत यह है कि सात वर्ष से भी कम समय में, देश के शीर्ष पूंजीपति घरानों के खजाने में दो गुने से ज्यादा की वृद्धि हुई है। दूसरी ओर मानव विकास सूचकांक की दृष्टि से भारत 189 देशों में 2014 में भी 131वें स्थान पर था, आज भी वहीं टिका है। साफ है सरकार की नीतियों का जितना लाभ पूंजीपतियों और सरमायेदारों को मिला, उतना छोटे-उद्यमियों, व्यापारियों और आम आदमी को नहीं मिल पाया है। साफ है पूंजी का निचले वर्गों से ऊपर की ओर प्रवाह हुआ है; और जो मंदी है वह पैदा की हुई है। यह अन्यथा नहीं है कि देश के शीर्ष उद्योगपति वर्तमान सरकार से ज्यादा आशान्वित हैं। वे चाहते हैं कि सरकार विनिवेशीकरण की प्रक्रिया में तेजी लाए।

सवाल उठता है कि सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम यदि लाभ नहीं कमा रहे हैं, सरकार के अनुसार उन्हें चलाए रखने के लिए हर वर्ष करीब 400 अरब रुपये का घाटा उठाना पड़ता है─तब उन्हें चलाए रखने का फायदा क्या है? पहली बात तो यह कि यह रकम उससे बहुत कम है जो सरकार को लगभग हर साल बैंकों के घटते एनपीए, कारपोरेट सेक्टर की कर्ज माफी/ब्याज माफी वगैरह के रूप में समायोजित करनी पड़ती है। दूसरा और महत्वपूर्ण प्रश्न, आखिर क्या कारण है कि जो उद्यम सरकार के नियंत्रण में रहते हुए लगातार घाटे में रहते हैं, वे निजी हाथों में जाते ही सोना उगलने लगते हैं? उदाहरण के लिए ‘भारत एल्युमिनियम कारर्पोरेशन लिमिटेड’(बाल्को) तथा ‘हिंदुस्तान जिंक’ जैसी कंपनियां जो कभी घाटे में थीं। निजी हाथों में जाने के बाद ही उनका कायापलट हो चुका है। इनमें से बाल्को की स्थापना 1965 में की गई थी। 2001 तक यह कंपनी शत-प्रतिशत स्वामित्व के साथ भारत सरकार के नियंत्रण में थी। कंपनी विशेष प्रकार के एलुमिनियम धातु का निर्माण करती है, जिसका उपयोग मध्यम और लंबी दूरी की मिसाइलों यथा अग्नि, पृथ्वी आदि के निर्माण के लिए किया जाता था। 2001 में उसकी 51 प्रतिशत साझेदारी वेदांता समूह को बेच दे दी गई। दूसरी कंपनी ‘हिंदुस्तान जिंक’ भी वेदांता के अधिकार में हैं। आज ये कंपनियां अपने मालिकों के लिए सालाना अरबों रुपये का मुनाफा कमाती हैं। इन्हीं के कारण वेदांता समूह के अध्यक्ष अनिल अग्रवाल को आजकल ‘मेटल टाइकून’ कहा जाता है। निजी हाथों में जाते समय कंपनी ने इनमें कोई छंटनी नहीं की थी। यानी कमी प्रबंधन के स्तर पर थी, जिसके लिए सरकार और नौकरशाही ज्यादा जिम्मेदार है। इस बात को देश का पूंजीपति वर्ग भी समझता है। वेदांता समूह के अनिल अग्रवाल विनिवेशीकरण की प्रक्रिया का लंबे इंतजार कर रहे उद्यमियों में से हैं। इसलिए अवसर मिलते ही वे न केवल सरकार को विनिवेशीकरण के फायदे गिनाने लगते हैं, बल्कि बीमार सार्वजनिक उद्यमों की खरीद पर, चरणबद्ध तरीके से लगभग 74,000 हजार रुपये के निवेश की घोषणा भी कर देते हैं।3

सार्वजनिक क्षेत्र किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं। वे देश की आधारभूत संरचना को मजबूत करने के काम आते हैं। पूंजीवादी अर्थतंत्र की कमजोरी होती है कि एक अंतराल के बाद उसमें मंदी के दौर आते हैं। सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले, पूंजीवाद का आदर्श कहे जाने वाला अमेरिका 1785 से अब तक, यानी 240 वर्ष के इतिहास में कुल 47 आर्थिक मंदी के दौर झेल चुका है।4 भारत में औद्योगिकीकरण की शुरुआत बीसवीं शताब्दी के आरंभ की घटना है। बावजूद इसके आजादी के बाद इस देश में आर्थिक मंदी के 5 दौर आ चुके हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि इसी अवधि; यानी 1947 के बाद अमेरिका को मंदी के छोटे-बड़े 12 झटकों से गुजरना पड़ा है। मंदी से उबारने के लिए पूंजीवादी अर्थतंत्र को बाहरी मदद पहुंचानी पड़ती है। उस समय वे सरकार से करीब-करीब इतनी ही धनराशि ऐंठ लेते हैं, जितनी उन्होंने अपने अच्छे दिनों में कराधान आदि के रूप में सरकार को प्रदान की थी। कभी-कभी आर्थिक मंदी पूर्णतः कृत्रिम होती है। फिर भी मजबूर सरकारों को कर्ज लेकर भी, पूंजीवादी अर्थतंत्र को मदद पहुंचानी पड़ती है। 2008 से 2011 की भीषण आर्थिक मंदी के दौरान अमेरिका की अर्थव्यवस्था इतनी रसातल में पहुंच चुकी थी कि दिवालियापन से बचने से लिए उसे कर्ज लेना पड़ा था।

एक समय था जब किसी सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक मसलों पर क्षेत्र विशेष के विशेषज्ञों और विद्वानों की राय महत्वपूर्ण मानी जाती थी। समाचारपत्र-पत्रिकाएं गर्व के साथ समाजविज्ञानियों, अर्थशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों  को जगह देते थे। कथित सोशल मीडिया इस गंभीर कार्य को भी ग्लैमराइज्ड कर दिया है। सोशल मीडिया पर आए दिन कोई अभिनेता, अभिनेत्री, क्रिकेटर सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों की विवेचना करता हुआ नजर आता है। ट्विटर और फेसबुक के चलताऊ विमर्श के आधार पर सरकारें भी अपनी राय बनाती नजर आती हैं। ऐसे कृत्रिम बौद्धिकता के माहौल में समाजवाद को समय-बाह्यः मान लेना, न तो अस्वाभाविक है, न ही चौंकाने वाला। असलियत कुछ और ही है। 

एडीसन मेंगस की रिपोर्ट के अनुसार 1700 ईस्वी में जब भारत में औद्योगिकीकरण की हवा तक नहीं पहुंची थी, और पश्चिम में मशीनीकरण की धूमधाम के साथ शुरुआत हो चुकी थी─सकल वैश्विक उत्पादन में भारत और चीन का योगदान 24.4 प्रतिशत और 22.3 प्रतिशत था। इसमें गिरावट का दौर ईस्ट इंडिया कंपनी के आने के बाद शुरू हुआ। ये कंपनियां दोनों ही देशों में पहुंचीं। परिणामस्वरूप 1913 में भारत 7.5 प्रतिशत; तथा चीन 8.8 प्रतिशत पर सिमटकर रह गया। 1947 में भारत आजाद हुआ और चीन 1949 में साम्यवादी झंडे के नीचे चला गया। मगर 1950 तक चीन और भारत की अर्थव्यवस्था में बहुत अधिक अंतर नहीं था। उस समय वैश्विक सकल उत्पादन में भारत और चीन का योगदान क्रमश 4.2 प्रतिशत और 4.5 प्रतिशत था। यही नहीं, 1991 तक लोकतंत्रात्मक भारत, अपनी मिश्रित अर्थव्यवस्था के बल पर, चीन को टक्कर देता था। उस समय दोनों की वैश्विक उत्पादकता लगभग समान थी।5 इसमें परिवर्तन 1991 के बाद भारत, उस समय आया जब भारत ने अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के नाम पर अपने दरवाजे बहुराष्ट्रीय निगमों के लिए खोल दिए। दूसरी ओर चीन मिश्रित अर्थव्यवस्था की डगर पर आगे बढ़ गया। आज भारत और चीन की आर्थिक हैसियत में जमीन-आसमान का अंतर है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार 2019 में चीन का सकल घरेलू उत्पाद 14.34 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर था, जो भारत के 2.9 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर, से पांच गुना अधिक है।6

उपर्युक्त विवरण से साफ है कि आर्थिक उदारीकरण के साथ देश ने जो सपने देखे थे, वे महज छलावा सिद्ध हुए हैं। बावजूद इसके पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के विरोध में कोई आवाज नहीं उठती। सत्ता में बने रहने के लिए भाजपा, मजदूरों और छोटे व्यापारियों की आवाज को दबाकर निजी क्षेत्र को मजबूत करने के लिए प्राण-प्रण के साथ जुटी है। खुद प्रधानमंत्री समाजवाद को समयबाह्य दर्शन कह जाते हैं। आखिर क्यों? हमें इसके पीछे निहित षड्यंत्र को समझना पड़ेगा। समझना पड़ेगा कि वे कौन से कारण हैं जिन्होंने कुछ वर्ष पहले तक ‘स्वदेशी’ के पैरोकार रही ‘भारतीय जनता पार्टी’ नेता अब उसका नाम तक लेना नहीं चाहते। निश्चय ही इसका तात्कालिक उद्देश्य येन-केन-प्रकारेण सत्ता में बने रहना है। साथ ही इसका एक दीर्घकालिक उद्देश्य भी है।

संविधान प्रदत्त अधिकारों का लाभ उठाकर, दलित और पिछड़ी जातियों के लोग सरकारी नौकरियों, उद्योगों और व्यापार में जगह बनाने लगे हैं। हालांकि शिखरस्थ जातियों की अपेक्षा उनकी भागीदारी, उनके जनसंख्या अनुपात  से अभी भी बहुत कम है। बावजूद इसके विप्र मानसिकता के लोगों को यह बहुत रास नहीं आ रहा है। येन-केन-प्रकारेण वे दलितों और पिछड़ों के सबलीकरण की प्रक्रिया को अवरुद्ध करना चाहते हैं। चूंकि संवैधानिक प्रावधानों के कारण वे सरकार में रहकर ज्यादा कुछ नहीं कर सकते, इसलिए निजी क्षेत्र को मजबूत किया जा रहा है, जहां पिछड़ों और दलितों की उपस्थिति नगण्य है। विनिवेशीकरण इसलिए किया जा रहा है ताकि आरक्षित वर्गों के सार्वजनिक प्रतिष्ठानों के रास्ते सरकारी नौकरियों में जाने के अवसर कम से कम हो जाएँ। अपने इस प्रयोग से वर्तमान सरकार इतनी खुश है कि प्रशासनिक सेवाओं के जिन पदों के लिए युवा घर-परिवार से अलग रहकर रात-दिन मेहनत करते हैं, उनपर भी निजी क्षेत्र से उधार लिए अधिकारियों को बैठाया जा रहा है। कुल मिलकर ‘2014 में सरकार बनाते समय मोदी जी द्वारा दिया गया नारा ‘सबका साथ-सबका विकास’, सरकार के जातिवादी एजेंडे पर चढ़कर, ‘सबका साथ अपनों का विकास’ बनकर रह गया है।

ओमप्रकाश कश्यप

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संदर्भ

1. जागरण संपादकीय, 21 फरवरी, 2021.

2. दि टाइम्स ऑफ इंडिया, 25 फरवरी, https://timesofindia.indiatimes.com/india/pm-sets-target-of-2-5l-cr-from-asset-monetisation/articleshow/81200196.cms

3. नवभारत टाइम्स, 19 दिसंबर, 2020 https://navbharattimes.indiatimes.com/business/business-news/anil-agarwal-vedanta-and-centricus-to-invest-10-billion-dollar-in-indian-companies/articleshow/79812797.cm

4. बिजनिस साइकिल्स: थ्योरी, हिस्ट्री, इंडीकेटर्स एंड फोरकास्टिंग, विक्टर जार्नोविट्ज, शिकागो यूनीवर्सिटी, शिकागो प्रेस, 221-226

5. डेवलपमेंट सेंटर स्टडीज दि वर्ल्ड इकॉनामी स्टेटीटिक्स, ओईसीडी, फ्रांस, पृष्ठ 261-262  

6. विश्वबैंक, वर्ल्ड डेवलपमेंट इंडीकेटर्स, 2 जुलाई 2020 https://en.wikipedia.org/wiki/List_of_countries_by_GDP_(nominal)

विमुद्रीकरण के बहाने

सामान्य

जनता जब तक निजी क्षेत्र की बढ़ती अर्थशक्ति की ओर से आंखे मूंदे रहेगी, उस समय तक मूंदे रहेगी जब तक कि वे गणतांत्रिक राज्य से अधिक शक्तिशाली नहीं हो जाते, तब तक गणतंत्र असुरक्षित बना रहेगा. कुल मिलाकर फासिस्ज्म का अर्थ सरकार पर किसी व्यक्ति, दल अथवा निजी संस्थान का सर्वाधिकार है.रूजवेल्ट, अमेरिकी राष्ट्रपति.

बाजार केंद्रित अर्थव्यवस्था में मुद्रा के महत्त्व से इन्कार नहीं किया जा सकता. 8 नवंबर के बाद ‘नोटबंदी’ या ‘विमुद्रीकरण’ की घोषणा के पश्चात देशभर में मचे हाहाकार से उसे समझा जा सकता है. सरकार ने आतंकवाद और कालेधन पर रोकथाम के लिए विमुद्रीकरण की घोषणा की थी. उसका मानना है कि प्रचलित मुद्रा का बड़ा हिस्सा गैरकानूनी रूप से जमाखोरों तथा कालाबाजारियों के पास जमा है, पड़ोसी देश नकली करेंसी भारत में झोंककर आतंकवाद को बढ़ावा देता है. इसलिए एक साहसिक निर्णय के अंतर्गत प्रधानमंत्री ने प्रचलित मुद्रा को निश्चित अवधि के भीतर वापस लेने का ऐलान किया है. वर्तमान सरकार के लगभग ढाई वर्ष के कार्यकाल में यह पहला निर्णय है, जिसपर पिछली यूपीए सरकार की छाप नहीं है. इसके अलावा वर्तमान सरकार की ‘जनधन’ तथा ‘मनरेगा’ जैसी जितनी भी योजनाएं हैं, सब विरासत में मिली हैं. वर्तमान सरकार ने उन्हें ज्यों की त्यों अथवा नाम बदलकर अपनाया है. योजना आयोग के स्थान पर सरकार ने नीति आयोग का गठन जरूर किया है, परंतु नए संस्थान की ओर से अभी तक ऐसा ठोस कार्यक्रम सामने नहीं आया है, जिससे इस बदलाव का औचित्य सिद्ध हो. जिन मामलों में सरकार ने तत्परता से काम किया है, उनमें उच्च पदों पर प्रतिबद्ध संघियों को नियुक्त करना, उनके संगठनों को प्रोत्साहित करना तथा यथासंभव मदद पहुंचाना शामिल हैं. इसके अलावा जिन कार्यों को इस सरकार ने प्राथमिकता दी है, उनके नाम हैंदूरदर्शन पर तंत्रमंत्र, पूजापाखंड वाले धारावाहिकों को बढ़ावा देना, पाठ्यक्रम में अपनी विचारधारा के अनुरूप फेरबदल करना और हिंदू मतों के ध्रुवीकरण हेतु हिंदूमुस्लिम सांप्रदायिकता को हवा देना. इन सबका विकास से कोई संबंध नहीं है. बल्कि ये समाज को पीछे ढकेलकर लोगों के बीच अविश्वास और अव्यवस्था फैलाने वाले हैं. वर्तमान सरकार ने यदि इनका चयन किया है तो इसलिए कि उसके सबसे बड़े घटक की राजनीति सांप्रदायिक अविश्वास और धार्मिक पाखंड के सहारे चलती है.

प्रचलित करेंसी नोटों को तयशुदा अवधि में वापस लेने की योजना को प्रधानमंत्री ने ‘डीमोनीटाइजेशन’ का नाम दिया है. जिसे मीडिया ने ‘नोटबंदी’ या ‘विमुद्रीकरण’ कहकर प्रचारित करना शुरू कर दिया. इसका आशय प्रचलित मुद्रा जिसका एक हिस्सा, सरकार के अनुसार टैक्स चोरों की गिरफ्त में हैको सरकारी खजाने में खींच लेने या छिपाए रखने की स्थिति में उसे कागज के टुकड़ों में बदल देने की नीति से है. यह अर्थशास्त्र सम्मत प्रक्रिया है, जिसकी अनुशंसा डॉ. आंबेडकर जैसे विद्वान अर्थशास्त्री ने भी की है. ‘नोटबंदी’ या ‘विमुद्रीकरण’ इस योजना के लिए उपयुक्त शब्द नहीं हैं. लेकिन व्यक्ति की भांति भाषा की भी सीमा होती है. कभीकभी ऐसा होता है जब सटीक शब्द की खोज के लिए शब्दकोश अपर्याप्त दिखने लगते हैं. हड़बड़ी में हम उन शब्दों का उपयोग करने लगते हैं, जो हमारे मंतव्य से मेल न खाते हों. यह मुख्यतः मुद्रा के स्वरूप में परिवर्तन से जुड़ा मसला है. उपयुक्त शब्द के अभाव में हम फिलहाल ‘विमुद्रीकरण’ का उपयोग करेंगे. ‘विमुद्रीकरण’ को लेकर असमंजस सरकार के स्तर पर भी था. इसलिए आरंभ में केवल करेंसी नोटों में बदलाव का संकेत देते हुए, बड़े नोटों को बैंकों में जमा करने का आदेश दिया गया. बाद में नकदी की कमी से समाज में अफरातफरी मची तो कागजी मुद्रा के स्थान पर डिजिटल लेनदेन पर जोर दिया जाने लगा.

इस लेख का उद्देश्य विमुद्रीकरण या उसके प्रभावों की समीक्षा करना नहीं है, केवल यह देखना है कि योजना लागू होने के पश्चात समाज में जो उथलपुथल मची है, क्या उसे स्वाभाविक माना जाएगा! क्या यह स्वस्थ समाज का लक्षण है! लाभकेंद्रित अर्थव्यवस्था में ‘विमुद्रीकरण’ पूंजीवादी कामना है. इससे लोगों के मुद्राअधिकार बाजारहित में बदला जा सकता है. भारत जैसे भीषण समाजार्थिक असमानताओं वाले देश में यह विषमताओं और अधिक बढ़ाएगा. शायद इसीलिए पिछली सरकारें उसे लागू करने से बचती आई थीं. यदि लागू किया भी तो पर्याप्त लचीलापन अपनाते हुए, ताकि जनसाधारण को किसी प्रकार की परेशानी न झेलनी पड़े. कदाचित वर्तमान सरकार को इस कार्य की जटिलता का आभास नहीं था. इतनी बड़ी योजना को तरीके से निपटाने के लिए जैसी तैयारी चाहिए, सरकार उससे बहुत पीछे थी. केवल राजनीतिक हित साधने हेतु किए गए निर्णय के दुष्परिणाम बैंकों तथा एटीएम के आगे लंबीलंबी लाइनों के रूप में सामने आए. लगभग 135 व्यक्तियों की बैंक और एटीएम की लाइनों में लगेलगे जानें चली गईं. यह इस साल भारतपाकिस्तान बार्डर पर मारे गए सैनिकों की संख्या से सवा गुनी है. बाजार से मुद्रा गायब होने से उपभोक्ता और व्यापारी सबका हालबेहाल हैं. उद्योगधंधे ठप्प पड़ चुके हैं. दिहाड़ी मजदूर, रिक्शाचालक, ऑटोवाले, रेहड़ीखोमचे वाले जिनका चूल्हा रोज की कमाई से चलता हैसब परेशान हैं. रोजगार की तलाश में गांव छोड़ चुके लोग आहत हैं. गांव की राजनीति और बेरोजगारी से बचने के लिए शहर चुना था. अब यहां से कहां जाएं! किसी के पास ग्राहक नहीं है तो किसी के नियोक्ता के पास उसे देने के लिए नकदी का अभाव है. शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन, आयातनिर्यात उत्पादन, सर्विस सेक्टर, खेतीबाड़ी आदि अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्र आर्थिक मंदी के शिकार हैं. विडंबना यह कि सरकार के कदम से जितना कालाधन उजागर होने की उम्मीद है, उससे कहीं अधिक धनराशि का नुकसान व्यापार तथा उद्योगधंधों की मंदी के चलते पूरा देश उठा चुका है. घोषणा में तीस दिसंबर के बाद हालात सामान्य होने की बात कही गई थी, मगर इसके छह महीने बाद भी सब कुछ पटरी पर आ पाएगा, इसकी बहुत क्षीण संभावना है.

क्या यह मुद्रा की ताकत है? समाजार्थिक विषमताओं से घिरे देश में जो कल्याणराज्य होने का दावा करता हो, क्या मुद्रा को इतना ही शक्तिशाली होना चाहिए? क्या मुद्रा का शक्तिशाली होना देश और समाज के शक्तिशाली होने जैसा ही है? लोकतंत्र में समस्त निर्णायक शक्तियां जनता के पास होती हैं. परंतु लोकहित के नाम पर लिए गए इस निर्णय में लोक ही सर्वाधिक आहत हुआ है. अधिकांश जन निर्णय से नाखुशी जता चुके हैं. बैंक और एटीएम की लाइनों में लोग दम तोड़ रहे हैं. कामधंधे तबाह हो चुके हैं. फिर भी सरकारी निर्णय के विरोध में कोई विशेष आक्रोश नजर नहीं आता. क्यों? बिना सार्थक आक्रोश और विरोध की अभिव्यक्ति के क्या लोकतंत्र सुरक्षित रह सकता है? आप कह सकते हैंजीवन में अर्थ की उपयोगिता है. ‘रुपया’ को ‘बाप और भइया से बड़ा’ भी हमारे यहां कहा गया है. कितने ही मुहावरे जीवन में अर्थ की उपयोगिता को लेकर लोकप्रचलित हैं. हिंदू धर्म में उसे जीवन के चार पुरुषार्थों में से एक माना गया है. ठीक है, लेकिन हम एक बात प्रायः भूल जाते हैं. जिन दिनों यह ‘अर्थ’ को पुरुषार्थ माना गया था, उन दिनों मुद्रा का मूल्य वास्तविक होता था. सौ मुद्राएं चुकाने का मतलब था, सौ स्वर्णभार का भुगतान. आज मुद्रा का मूल्य प्रतीकात्मक है. बिना सरकार की गारंटी के नोट महज कागज का टुकड़ा है. वह बाजार में मनुष्य के क्रय सामर्थ्य को दर्शाता है, परंतु स्वयं ‘समृद्धि’ का मानक नहीं है. यद्यपि उसके उपयोग द्वारा वास्तविक ‘समृद्धि’ खरीदी जा सकती है.

यदि बिना सरकारी गारंटी के मुद्रा का वास्तविक मूल्य शून्य है तो नागरिक जीवन में मुद्रा के वास्तविक महत्त्व की समीक्षा आवश्यक हो जाती है. खासकर समृद्धि में उसके योगदान को लेकर. क्योंकि कोई भी सरकार समाज से बड़ी नहीं होती. खुद को व्यवस्थित रखने के लिए समाज ही सरकार का गठन करता है. समाज राज्य की आत्मा है तो सरकार महज उसका एक संस्कार. यदि सरकार अथवा उसकी कोई संविदा सामाजिक संबंधों के लिए ही संकट का विषय बन जाए तो मान लेना चाहिए कि उस संविदा और समाज के अंतःसंबंधों की समीक्षा का समय आ चुका है. उस ओर से समाज की उदासीनता उसके पतन की संकेतक हैं. यह स्वस्थ समाज का लक्षण नहीं कि बैंक की कतार में खड़ेखड़े नागरिक की मृत्यु हो जाए और लाश को किनारे कर, दोचार हजार रुपये की उम्मीद में लोग कतार में बने रहने के लिए धक्कामुक्की करते रहें. इस घटना ने मानवीय संबंधों को तारतार कर दिया है. उधर सरकार है कि उसके कर्ताधर्ताओं को हर वह व्यक्ति जो बैंक या एटीएम की कतार में है, कहीं न कहीं चालू, बेईमान और भ्रष्टाचारी नजर आता है.

करेंसी राज्य की ओर से आपसी लेनदेन को सुगम बनाने के लिए की जाने वाली व्यवस्था है. उसका अपना कोई मूल्य नहीं होता. राज्य की गारंटी उसे मूल्यवान बनाती है. चूंकि करेंसी का अपने आप में कोई मूल्य नहीं होता, इसलिए वह अर्थव्यवस्था की मजबूती का पर्याय भी नहीं होती. वह केवल उसके प्रवाह को दर्शाती है. जैसे थर्मामीटर का तापांक स्वयं उष्मा न होकर मात्र उसके स्तर को दर्शाता है, वैसे ही मुद्रा की मात्रा केवल मनुष्य के क्रयसामर्थ्य की संकेतक होती है, समृद्धि की नहीं. बाजारकेंद्रित मुद्राप्रवाह में समृद्धि का आवागमन बराबर नहीं होता, बल्कि वह मुनाफे के रूप में निरंतर ऊपर की ओर अग्रसर रहता है. मुद्रा की उपयोगिता आपसी लेनदेन को सहज बनाने में है. उससे बाजार को गति मिलती है. लोग अपने अधीन मुद्रा का अधिकाधिक उपयोग खरीदफरोख्त में करें, इसके लिए बाजार मुद्रा की मौजूदगी को सराहता है. उसे आर्थिक शक्ति के रूप में पेश करता है. किंतु उसकी मूल्यवत्ता तभी तक है, जब तक उसके पीछे सरकार की गारंटी हो. मुद्रा का उपयोग सभी वर्गों में समान नहीं होता. उसकी मुख्य उपयोगिता मध्य तथा निम्न वर्गों तक सीमित होती है, जिन्हें अपनी तात्कालिक जरूरतों के लिए खरीदफरोख्त करनी होती है. बड़े व्यापारियों, उद्योगपतियों तथा पेशेवरों के लेनदेन में, जहां भुगतान राशि अत्यधिक हो, मुद्रा का उपयोग अव्यावहारिक मान लिया जाता है. उनके यहां समृद्धि का आकलन संसाधनों पर अधिकार से किया जाता है, न कि लेनदेन से. उदाहरण के लिए जमींदार की समृद्धि का आकलन भूसंपदा के आधार किया जाता है. व्यापारी और उद्योगपति की समृद्धि, उसके अधीन बाजार, कलकारखानों आदि पर एकाधिकार से आंकी जाती है. मुद्रा का महत्त्व केवल व्यापारिक हिसाबकिताब तक सीमित होता है.

व्यक्ति करेंसी के उपयोग द्वारा भूमि तथा समृद्धि के दूसरे स्थायी उपादानों का अर्जन कर सकता है. उस समय वह वास्तव में ‘अर्थ’ बन जाती है. लेकिन जनसाधारण द्वारा अर्जित करेंसी का अधिकांश जीवन की भोजन, वस्त्र, स्वास्थ्य जैसी बेहद सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति में ही खप जाता है. वास्तविक समृद्धि में अंतरित करने का अवसर उसे कम ही प्राप्त होता है. उसे भुलावे में रखने के लिए बाजारवादी ताकतें तथा उसके पोषित अर्थविज्ञानी समृद्धि को दैनिक जरूरतों के संदर्भ में, क्रयसामर्थ्य द्वारा परिभाषित करते हैं. सामान्यतः यह मान भी लिया जाता है. मुद्रा को वास्तविक संपदा अथवा समृद्धि का प्रतीक मानना मूर्ति को देवता मानने की स्थिति है. चालाक पुरोहित जैसे पत्थर की मूर्ति में देवता की प्रतिष्ठा करते रहते हैं, वैसे ही पूंजीवादी शक्तियां अर्थव्यवस्था की सारी ताकत मुद्रा में केंद्रित होने का भ्रम फैलाए रखती हैं. बाजारकेंद्रित अर्थव्यवस्था में ऊपर के स्तर पर मुनाफे की स्पर्धा होती है, जबकि निचले वर्ग रोजीरोटी के संघर्ष में उलझे रहते हैं. स्पर्धा उनके आत्मविश्वास, आपसी विश्वास और सहअस्तित्व की भावना का हनन करती है. आपसी विश्वासहीनता तथा निचले स्तर की स्पर्धा उनके जीवन में मुद्राआधारित लेनदेन को अपरिहार्य बना देती है. इस तरह मुद्रा की आभासी शक्ति सामान्यतः जनसाधारण तथा मध्यवर्ग को प्रभावित करती है, उच्च वर्गों को नहीं. मुद्रा उनके लिए महज संख्या जितना महत्त्व रखती है, जिसका उपयोग व्यापारिक हिसाबकिताब तक सीमित होता है.

बाजार में करेंसी की किल्लत तथा शीघ्र ही उसके समाधान की क्षीण संभावनाओं को देखते हुए सरकार रोजमर्रा के लेनदेन में डिजिटल करेंसी को अपनाने पर जोर दे रही है. उपभोक्ताओं को डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, पेटीएम, आधारकार्ड आदि के माध्यम से खरीदफरोख्त करने की सलाह दी जा रही है. डिजिटल पेमेंट गेटवे को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने कई उपहार योजनाएं लागू की हैं. सेवाकर की छूट, लॉटरी द्वारा पुरस्कार आदि योजनाओं से सरकार की नीयत और नीति दोनों को समझा जा सकता है. इससे सरकार का क्या लाभ है? यह समझने के लिए ज्यादा माथापच्ची की आवश्यकता नहीं है. ऐसे दुकानदारों की संख्या लाखों में है जो कर चोरी को अपना अधिकार मान बैठे हैं. बिना रसीद के लेनदेन बाजार में बहुत आम है. करयोग्य आमदनी वाले दुकानदारों में से बामुश्किल दो या तीन प्रतिशत आयकर देते हैं. सरकार का मानना है कि लेनदेन डिजिटल गेटवे से होगा तो भ्रष्ट दुकानदारों, व्यापारियों तथा कालेधन के बूते खरीदारी करने वालों पर नजर रखना आसान हो जाएगा. उसकी आमदनी बढ़ेगी. भ्रष्टाचार पर काबू कर पाना संभव होगा. सवाल है कि इससे उपभोक्ता को क्या लाभ होगा? दुकानदार उसे ‘अधिकतम खुदरा मूल्य’ पर बेचता है, जिसमें सामान्यतः स्थानीय कर भी सम्मिलित होता है. इस तरह व्यक्ति जो भी वस्तु खरीदता है, उसपर दुकानदार के लाभ तथा कर आदि का भुगतान वह कमोबेश करता ही है. क्या नई व्यवस्था उसके लिए हितकर सिद्ध होगी? पेमेंट सीधे बैंक में जाने से धनराशि की सुरक्षा, लानेले जाने में बचत, रकम पर मिलने वाला तात्कालिक ब्याज अपरोक्ष रूप में बड़े दुकानदारों को लाभ पहुंचाएगा. ग्राहक को भी इसका लाभ पहुंचे, सरकार इसपर विचार करने के लिए फिलहाल तैयार नहीं है. इतना तय है कि इस व्यवस्था से डिजिटल पेमेंट के लिए जिस माध्यम को ग्राहक अपनाएगा, उसके सेवामूल्य के साथ सेवाकर के रूप में अतिरिक्त धनराशि भी उसे वहन करनी पड़ेगी.

बाजार की नीयत और नीति को समझने वालों के लिए यह कोई अबूझ पहेली नहीं है. परंपरागत पद्धतियों में उत्पादक एवं उपभोक्ता का सीधा संबंध होता था. उत्पादक अपने उपभोक्ता की आवश्यकता के अनुसार उत्पादन करता था. मुनाफे के लालच में उत्पाद का निर्माण करना तब की अर्थव्यवस्था में प्रचलित नहीं था. कुछ कारीगर और कलाकार ऐसे अवश्य होते थे जो अपने हुनर का प्रदर्शन राजाओं और सामंतों को प्रसन्न करने के लिए करते थे. उनके उत्पाद को कई बार कला तो कई बार विलासिता की वस्तु तक मान लिया जाता था. परंतु वह संख्या की दृष्टि से समाज का मामूली हिस्सा था. वे अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने की हैसियत नहीं रखते थे. दूसरे उनका ध्येय महज अपने आश्रयदाता को खुश करना होता था. बाजार केंद्रित अर्थव्यवस्था में उत्पाद और उपभोक्ता के बीच दुकानदार के रूप में तीसरा पक्ष उपस्थित हो जाता है. उसके तहत उत्पादक लाभ की कामना के साथ माल बनाता है. उपभोक्ता तक पहुंचतेपहुंचते वस्तु के मूल्य में उत्पादक के मुनाफे तथा उत्पादनकर के साथसाथ, दुकानदार का मुनाफा भी जुड़ जाता है. यदि उत्पादक के अलावा उपउत्पादक भी हैं, तथा अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचने के वस्तु कई दुकानदारों के हाथों से होकर गुजरती है तो उसमें उपउत्पादकों तथा बिचौलिए दुकानदारों का मुनाफा भी जुड़ता चला जाता है. उपभोक्ता न केवल उन सबके मुनाफे का हिस्सा वहन करता है, अपितु अपरोक्ष रूप में विभिन्न स्तरों पर देय कराधान, यातायात, सर्विस चार्ज, विज्ञापन आदि का बोझ भी वही उठाता है. परिणामस्वरूप वास्तविक उपभोक्ता तक पहुंचतेपहुंचते वस्तु की कीमत कई गुना बढ़ जाती है. कई बार तो वास्तविक मूल्य तथा सभी बिचौलिये दुकानदारों के सकल मुनाफे का अनुपात एक और चार का हो जाता है. उत्पादक एवं उपभोक्ता के बीच सीधा संबंध न होने के कारण चालू अर्थव्यवस्था को मुनाफे की अर्थव्यवस्था माना जाता है. जिसमें उपभोक्ता एवं उत्पादक के बीच किसी भी प्रकार की आत्मीयता नहीं पनप पाती. वस्तुविनिमय जरूरत और मुनाफे का लेनदेन बन जाता है. इसमें उपभोक्ता जो अपनी जरूरत के चलते खरीदारी को विवश है, हमेशा घाटे में रहता है.

सरकार को लगता है कि व्यापारी और दुकानदार अपने मुनाफे पर देय आयकर तथा अन्य करों का भुगतान करने में बेईमानी करते हैं. हालांकि इसकी रोकथाम के लिए सरकार के अधीन भारीभरकम निगरानी तंत्र रहता है. उसका कार्य दुकानदारों के आयव्यय पर नजर रखना तथा उनसे निर्धारित कर वसूली करना है. डिजिटल पेमेंट गेटवे को बढ़ावा देने का अर्थ यह भी है कि सरकार अपने निगरानी तंत्र की विफलता को स्वीकार चुकी है. उसे लगता है कि लेनदेन के डिजिटलाइजेशन द्वारा कराधान का हिसाबकिताब और संग्रह सुगम हो जाएगा. चूंकि धनराशि का लेनदेन बैंकों या उपबैंकीय संस्थानों तथा संविदाओं यथा पेटीएम, आधारकार्ड, डेबिटक्रेडिट कार्ड आदि के माध्यम से होगा, तब उसकी वसूली भी आसान होगी. फलस्वरूप सरकार की अपने ही तंत्र पर निर्भरता घटेगी. इस निर्णय द्वारा सरकार को दुहरा लाभ होने की उम्मीद है. सरकार को लगता है कि इससे वह अधिकतम कराधान में सफल होगी. दूसरे बैंकिंग सेवाओं के जरिये उसे मोटी रकम सेवाकर के रूप में भी प्राप्त होगी. कुल मिलाकर सरकार अपने निगरानी तंत्र और उपभोक्ताओं से अधिक भरोसा उपबैंकीय एजेंसियों पर कर रही है. यह तब है जबकि उपभोक्ता वस्तुओं तथा अधिकांश औद्योगिक उत्पादों के मूल्य पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है. कराधान से बढ़े खर्च की भरपाई पूंजीपति और उद्यमी बड़ी आसानी से मूल्य बढ़ाकर कर सकते हैं. उसका असर सीधे उपभोक्ता की जेब पर पड़ेगा. उसके लिए चीजें और भी महंगी होंगी. सेवा प्रदाता बैंकिंग और उपबैंकिंग एजेंसियों का खर्च तथा उसपर लगने वाला सेवा कर भी अंततः उपभोक्ता की जेब से ही जाएगा. उसे न केवल बैंकिंग सेवा के बदले भुगतान करना पड़ेगा, बल्कि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में दुकानदार पर लगने वाले करों का हिस्सा भी उसे ही वहन करना पड़ेगा. चूंकि नकदी जेब में नहीं रहेगी, इसलिए उसका लाभ बैंक उठाएगा. ये बातें आम उपभोक्ता से छिपी नहीं हैं. बावजूद इसके सामाजिक स्तर पर कोई बड़ी हलचल या आक्रोश नजर नहीं आता. आमजन की इस चुप्पी या अपार सहनशीलता को सरकार अपने निर्णय के प्रति समर्थन के रूप में पेश कर रही है. क्या हालात पूर्णतः विकल्पहीन हैं?

लोकतंत्र में मतसंख्या महत्त्वपूर्ण होती है. लेकिन मतदान में समाज के सभी वर्ग समान रूप से हिस्सा नहीं लेते. मतदाताओं की आय के आधार पर हम उन्हें तीन वर्गों में बांट सकते हैं. पहला अतिसंपन्न वर्ग. प्रत्यक्ष या परोक्ष उसका संबंध पक्षविपक्ष के सभी नेताओं से होता है. असल में यह वर्ग राजनीति का उपयोग अपने हक में करता है. चाहे जिस दल की जीत हो यह वर्ग सत्ता के हमेशा करीब रहता है. उसे निर्वाचन प्रक्रिया की परवाह नहीं होती. चुनावों में इसकी आनुपतिक भागीदारी सबसे कम होती है. दूसरा मध्य वर्ग. इस वर्ग में पढ़ालिखा रोजगारपरस्त वर्ग, छोटेव्यापारी, पेशेवर, बुद्धिजीवी आदि आते हैं. यह किसी भी समाज की प्राणशक्ति होता है. इसका एक हिस्सा समाज के शीर्षस्थ वर्ग से समझौता कर अपनी स्वार्थसिद्धि में लगा रहता है, जबकि दूसरा हिस्सा व्यवस्था से असंतुष्टों का होता है. जनता का साथ मिले तो यह सामाजिक क्रांति का वाहक बन जाता है. इसकी दुर्बलता है कि यह राजनीतिक रूप से बेहद बंटा हुआ होता है. संख्या में यह अतिसंपन्न वर्ग से अधिक तथा राजनीतिक दृष्टि से सबसे चलायमान वर्ग माना जाता है. चुनावों में आगापीछा सोचकर मतदान करता है. बंटा होने के कारण यह वर्ग खुद तो राजनीतिक ताकत नहीं बन पाता, लेकिन लोकमानस को बनानेबिगाड़ने, दलविशेष के संबंध में हवा बनाने में इस वर्ग का बहुत योगदान होता है. इसके मामूली प्रतिशत का किसी दल या विचार की ओर झुकाव, मतदाताओं के बड़े वर्ग को प्रभावित करता है. तीसरा वर्ग जनसाधारण का होता है, जिसमें किसान, मजदूर, छोटे पेशेवर आदि आते हैं. इस वर्ग के लिए रोजीरोटी के मसले जीवन के बाकी मामलों से बड़े होते हैं. वर्तमान चुनौतीपूर्ण होता है, जिससे भविष्य के सपनों की ओर उनका ध्यान ही नहीं जा पाता. इस वर्ग के पास देशदुनिया के बारे में ज्यादा सोचने का अवसर नहीं होता. इसलिए मतदान के समय धर्म, जाति, क्षेत्रीयता जैसे मुद्दों के आधार पर अपनी राय बनाता है, जिनका इसके विकास से कोई संबंध नहीं होता. लोकतांत्रिक विवेक की कमी भी इसका कारण बनती है. इस वर्ग का मानस धर्म, संस्कृति परंपरा के मौखिक पाठों द्वारा तैयार होता है. समस्याओं के निदान के लिए इसे सदैव किसी तारणहार की प्रतीक्षा रहती है. इस कारण इसे फुसलाना आसान होता है. अतएव नेतागण चुनावी नारे इसी वर्ग को ध्यान में रखकर बनाते हैं. रातदिन इसी के कल्याण का राग अलापते हैं. परंतु चुनाव जीतते ही वे इससे पूरी तरह कटकर उस वर्ग के रहनुमा बन जाते हैं जिसे हमने पहले स्थान पर रखा है.

जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि यदि जनता के नहीं रहते, जनकल्याण के नाम पर बनी सरकारें यदि पूंजीपतियों और सरमायेदारों की हितैषी बन जाती हैं, तो जनता क्या करे? समस्या का कारण जनता की दुर्बलता नहीं, आत्मविश्वास और अपनी शक्ति के प्रति अनभिज्ञता है. लोग जानते हैं कि संसद में पहुंचे नेताओं को सर्वाधिक वोट उन्हीं के प्राप्त होते हैं. जो अमीर हैं, जिनकी सत्ता और संस्थानों तक पहुंच है, वे मतदान के दिन घर से नहीं निकलते. इसके बावजूद नेता हैं कि संसद तथा विधायिकाओं में जाते ही उस वर्ग को भुला देते हैं, जिसका उनकी जीत में सर्वाधिक योगदान है. वे उस वर्ग के पिछलग्गू बन जाते हैं, जो सामान्यतः उनकी परवाह नहीं करता. जनसाधारण जो मतदान में उत्साहपूर्वक हिस्सा लेता है, जनप्रतिनिधियों के माध्यम से सरकार के गठन को संभव बनाता है, अपनी समस्याओं के समाधान के लिए पुनः किसी तारणहार की प्रतीक्षा में लगा रह जाता है.

दरअसल हमने लोकतंत्र को तो अपनाया, मगर आधेअधूरे मन से. संविधान की भावना के अनुरूप लोगों की चेतना का लोकतांत्रिकरण कर ओर हमने ध्यान ही नहीं दिया. बताया गया कि लोकतंत्र की परिभाषा जनता द्वारा सरकार चुनना है. जनता इसके लिए निर्वाचन प्रक्रिया में हिस्सा लेती रही. बिना यह जाने कि उसके द्वारा चुने गए प्रतिनिधि संसद और विधायिकाओं में जाते ही शासक बन जाते हैं. निहित स्वार्थ के लिए वे जनसाधारण से उसकी स्वतंत्रता, समानता तथा विकास के अवसर छीन लेते हैं, जिनपर नागरिक होने के नाते उनका अधिकार है. लोकतांत्रिक सरकार को चाहिए कि वह न्यूनतम शासन करे. उसके लिए लोगों का जागरूक रहना जरूरी है. लोग स्वयं जागरूक होंगे तो अनुशासित भी होंगे. अनुशासित होंगे तो सरकार का लावलश्कर कम होगा. लाव लश्कर कम होगा तो नागरिकों की जेब पर पड़ने वाला खर्च स्वतः घट जाएगा. वर्तमान व्यवस्था में सरकार मानती है कि लोगों में जागरूकता की कमी है. अनुशासन बनाए रखने के लिए वह नागरिकों के खर्च पर पुलिस को ले आती है. पुलिस से झगड़ा नहीं सुलझता तो अदालतें आ जाती हैं. हर संस्था नागरिक आजादी को थोड़ी कम करती है और उसकी जेब पर बोझ बढ़ा देती है. यानी लोकतंत्र में जनता की जिम्मेदारी केवल प्रतिनिधि चुनने से पूरी नहीं हो जाती. वे प्रतिनिधि ही बने रहें, शासक और सर्वेसर्वा न बनें इसका ध्यान रखना भी जनता की जिम्मेदारी है. इस तरह जनता का जनताकरण राजनीति के लोकतांत्रिकरण की बुनियादी शर्त है.

इस अवांतर से वार्तालाप का लेख की विषयवस्तु से क्या संबंध है? विमुद्रीकरण अर्थशास्त्र की समस्या है, राजनीति की नहीं. फिर भी यह हमें आवश्यक लगा, क्योंकि विमुद्रीकरण का वर्तमान निर्णय विशुद्ध अर्थशास्त्रीय नहीं है. उसके पीछे राजनीति छिपी है. यदि सरकार इसे अर्थशास्त्रीय मुद्दा समझती तो रिजर्ब बैंक या ज्यादा से ज्यादा वित्तमंत्री के स्तर पर इसकी घोषणा होनी चाहिए थी. आधीअधूरी तैयारी के साथ स्वयं प्रधानमंत्री को पहल करने की आवश्यकता नहीं थी. विमुद्रीकरण की घोषणा चार राज्यों में विधानसभा चुनावों से पहले की गई है. सो इसके राजनीतिक निहितार्थ होंगे ही. नेताओं की हर निर्णय को राजनीतिक नफानुकसान सोचकर करने की प्रवृत्ति की ओर ध्यान आकृष्ट कराना हमें इसलिए भी आवश्यक लगा क्योंकि यह न केवल समस्या की जड़ है, बल्कि समाधान भी इसी में अंतर्निहित है. लोकतांत्रिक व्यवस्था में यदि जनप्रतिनिधि कर्तव्यपथ से विचलित होते हैं, तो उसके लिए केवल वही दोषी नहीं होते. प्रकारांतर में जनता भी उसके लिए जिम्मेदार होती है. यदि निर्वाचित प्रतिनिधि या चुनी हुई सरकार जनता के कष्टों की ओर से लापरवाह हैं तो जनता के लिए सबसे अच्छा रास्ता यही है कि वह अपनी संगठित शक्ति का उपयोग हालात को सुधारने के लिए करे. इस कार्य को जनप्रतिनिधियों पर दबाव डालकर किया सकता है, यदि फिर भी सरकार के स्तर पर निरंकुशता बनी रहती है तो जनता के पास एकमात्र रास्ता बचता है कि वह सरकार पर अपनी निर्भरता को कम करते हुए न्यूनतम स्तर पर ले आए. हमारी यह सलाह अव्यावहारिक लग सकती है. लेकिन लोकतंत्र को उत्सव की तरह जीने का रास्ता इसी ओर से जाता है. प्रूधों के शब्दों मेंᅳ‘मुक्त समाज में कानून बनाने, नई संस्थाएं गठित करने, उनका संविधान रचने, स्थापना एवं प्रशासनिक ढांचा खड़ा करने से लेकर कार्यारंभ तक सरकार की भूमिका न्यूनतम, इतनी कम जितनी कि संभव होहोनी चाहिए. राज्य (सरकार का लाभकारी) उद्यम नहीं है. इसलिए उद्यमों एवं संस्थाओं की स्थापना/संचालन के उपरांत सरकार को उनसे स्वयं अलग होकर, उन्हें स्थानीय प्राधिकरणों और जनसंस्थाओं के सुपुर्द कर देना चाहिए.’

राज्य पर निर्भरता को कम करने के अनेक रास्ते हैं. करेंसी के मुद्दे को ही लें. किसी भी राज्य की राज्य की वास्तविक शक्ति उसकी जनता में अंतर्निहित होती है. जबकि राज्य करेंसी को प्रत्याभूत करता है. इस तरह करेंसी के प्रत्याभूतिकरण के पीछे अंतिम शक्ति जनता की ही होती है. जनता यदि करेंसी को प्रत्याभूत कर सकती है तो उसके विकल्प भी तलाश सकती है. ऐसे विकल्प जो उसे अधिक स्वतंत्रता तथा आत्मनिर्भरता का एहसास दिलाते हुए उसके आत्मविश्वास बनाए रखने में मददगार हों. इस दिशा में प्रचलित विकल्पों को समाजवाद के आधुनिक अपररूप की संज्ञा दी जा सकती है. हालांकि इनकी कार्यशैली उससे भिन्न है. ये पूंजीवाद के जूझने के बजाए संगठन और सामूहिक विवेक के बल पर उससे मुक्ति का भरोसा दिलाते हैं. कुछ दशक पहले तक भारत के गांवों में जो प्राचीन सहयोगाधारित व्यवस्था रही है, जिसे हमारी ही पीढ़ी ने दम तोड़ते देखा है, इन्हें उसका संशोधित संस्करण भी कहा जा सकता है. आजकल शहरों में मिश्रित बस्तियों का चलन है. एक ही मुहल्ले में विभिन्न पेशों और कलाओं में दक्ष लोग रहते हैं. उनमें प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, बढ़ई, लुहार, एकाउंटेंट, राजमिस्त्री, पेंटर, ऑटो चालक वगैरह अनेक प्रकार के पेशेवर और तकनीकी कौशल वाले लोग रहते हैं. यदि ये ठान लें कि आपसी व्यवहार के दौरान मुद्रा का प्रयोग न्यूनतम करेंगे, तो थोड़ीसी आरंभिक हिचक के बावजूद, वे आसानी से ऐसा कर सकते हैं. इस व्यवस्था के अंतर्गत श्रम का आकलन एवं भुगतान बजाय मुद्रा के श्रमघंटों में किया जाएगा. मान लीजिए ‘क’ कंप्यूटर पेशेवर है. उसे अपने घर के लिए प्लंबर की आवश्यकता है. वह बस्ती के प्लंबर ‘ख’ को आमंत्रित करेगा. ‘ख’ को काम पूरा करने में यदि दो घंटे लगते हैं, तो उसके दो श्रमघंटे ‘क’ पर उधार माने जाएंगे. मुद्रा रहित भुगतान प्रणाली में ‘क’ को कुछ ऐसा करना होगा, जिससे वह ‘ख’ के श्रमघंटों का भुगतान श्रमघंटों में ही कर सके. इसके लिए वह ‘ख’ की आवश्यकतानुसार कुछ डिजायन कर सकता है. यदि ऐसा होता है तो वह श्रमघंटों का सीधा आदानप्रदान मान लिया जाएगा. यह भी हो सकता है कि ‘ख’ को ‘क’ की सेवाओं की तत्काल कोई जरूरत न हो. उस अवस्था में उनके बीच का लेनदेन सुरक्षित माना जाएगा. मान लीजिए कुछ दिनों के बाद ‘ख’ को बिजली मिस्त्री ‘ग’ की आवश्यकता पड़ती है. जिसपर ‘क’ के किसी काम के दो श्रमघंटे बकाया हैं. तो ‘ग’ उस उधार के बदले ‘ख’ को अपनी सेवाएं देकर ‘क’ से उऋण हो सकता है. यह उदाहरण है. इस प्रणाली को थोड़े प्रबंधन के साथ आसानी से अपनाया जा सकता है. मुहल्ला सभाएं इस काम को बड़े आराम से कर सकती हैं. हो सकता है कंप्यूटर पेशेवर दावा करे कि उसके काम के लिए आनुपातिक रूप से अधिक योग्यता की आवश्यकता पड़ती है. और वह अपने श्रमघंटों के मूल्य की तुलना बिजली मैकेनिक या पलंबर से करने को तैयार न हो. इस समस्या के समाधान के दो रास्ते हैं. पहला और श्रेष्ठतर उपाय है कि कंप्यूटर पेशेवर से अनुरोध किया जाए कि वृहद सामूहिक हितों के लिए उदारता दिखाते हुए इस प्रकार की तुलना को रहने दे. दूसरा यह कि आपसी सहमति से ऐसे नियम बनाए जाएं जिससे इस प्रकार के विवाद उत्पन्न ही न हों. इससे मौद्रिक लाभ सामाजिक लाभ के अपेक्षा श्रेष्ठतर रूप में प्राप्त होंगे. यह रास्ता अव्यावहारिक लग सकता है, मुश्किल बिलकुल नहीं है. अधिकांश कारखाने अपने कामगारों को वेतन देने के लिए उनके कार्य का मूल्यांकन श्रमघंटों के आधार पर करते ही हैं. एक बार चलन में आ जाने के बाद व्यवस्था सहज लगने लगेगी. इससे सरकार और उसके तंत्र पर निर्भरता घटेगी और मुद्राकेंद्रित क्रयविक्रय में जनता को जो भारीभरकम कर सरकार को चलाने के लिए देना पड़ता है, उसकी बचत हो जाएगी. सरकार का काम सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय संबंधों तक सिमट जाएगा. क्लेरेंस ली स्वार्ज ने अपनी पुस्तक ‘व्हॉट इज म्युच्युलिज्म’(1927) में इसकी प्रशंसा करते हुए लिखा है

यह एक ऐसा सामाजिक दर्शन है जो सभी नागरिकों के लिए समान स्वाधीनता, पारस्परिक समानताधारित लेनदेन तथा व्यक्तिविशेष की अपने जीवन, श्रम एवं श्रमोत्पाद पर पूर्ण संप्रभुता को दर्शाता है.’

सच यह है कि सरकार का विवेक, जनता के विवेक पर टिका होता है.

© ओमप्रकाश कश्यप