Category Archives: वितरणात्मक न्याय का उपयोगितावादी द्रष्टिकोण

इच्छा-स्वातंत्र्यवाद (Libertarianism)

सामान्य

धर्म और अभिजन संस्कृति—15

 
सम्मानजनक जीवन जीने का एकमात्र रास्ता है, किसी को हानि मत पहुंचाओ, प्रत्येक व्यक्ति को वह सब दो, जो उसकी अपनी कमाई है.1
                                                                         अल्पीनियस(170—235 ईस्वी).

मनुष्य स्वतंत्र प्रकृति की स्वतंत्र संतान है. परतंत्र रहना उसका स्वभाव नहीं है. सामाजिकता की भावना उसमें विवेक और सुरक्षा की चाहत के साथ फूटी है. इस बोध से फूटी है कि अपनी शारीरिक और बौद्धिक सीमाओं के बीच वह अपने लिए सभी सुखों का प्रबंध करने में अक्षम है. यह अपूर्णताबोध केवल मनुष्य की समस्या नहीं है. प्रकृति में हर कोई किसी न किसी प्रकार के अपूर्णताबोध द्वारा ग्रस्त है. उसी के प्रभाव में विराट, विलक्षण और तबीयत से स्वतंत्र प्रकृति स्वयं अनेक मर्यादाओं से आबद्ध होती है. जैसे सूरज समयानुसार उदय-अस्त होता है. ऋतुएं तय समय के अनुरूप बदलती हैं. वनस्पतियां निर्धारित समय पर फलती-फूलती हैं. ऐसे ही मनुष्य की मर्यादाएं भी निर्धारित हैं. समाज मर्यादाओं का सांस्थानिक रूप है; सभ्यता और संस्कृति उनकी तारतम्यता की विकास यात्रा. इस विकासयात्रा की उपलब्धियों में मनुष्य की जरूरतों का बहुत बड़ा योगदान है. मनुष्य की आवश्यकताएं केवल जैविक नहीं हैं. बौद्धिक प्राणी होने के नाते वह आवश्यकताओं का सृजन भी करता है. यह विशेषता उसको अन्य प्राणियों से अलग करती है. यही मनुष्य तथा शेष प्राणियों में अंतर का आधार है. दूसरे प्राणी प्रायः उतना अर्जित करते हैं, जितना उनके तात्कालिक भोग के लिए जरूरी हो. अपने स्वाद और रुचि के अनुसार वे व्यंजन तैयार नहीं करते. भविष्य की ओर से वे लगभग निश्चिंत होते हैं. मनुष्य के साथ ऐसा नहीं है. उसे प्रकृति की ओर से स्मृति का उपहार मिला हुआ है. उसकी मदद से वह अनुभवों को सहेज सकता है. प्राणिजगत में सबसे तेज-तर्रार मस्तिष्क का वह स्वामी है. अनुभवों का विश्लेषण, संश्लेषण आदि कर, वह उनसे सीख ले सकता है. यह गुण उसको श्रेष्ठ उत्पादक बनाता है. एक उत्पादक के रूप में वह अपनी तात्कालिक आवश्यकता से अधिक अर्जित करने में सक्षम होता है. मनुष्य की यह विशेषता उसकी सुदीर्घ सांस्कृतिक यात्रा का आधार रही है. एक प्रश्न और भी है जिसे हम उपर्युक्त विशेषता की निष्पत्ति कह सकते हैं. प्रश्न कुछ यों है कि मनुष्य यदि श्रेष्ठ उत्पादक है तो उसके अतिरिक्त श्रम-कौशल का लाभ किसे प्राप्त होना चाहिए? मनुष्य को, जिसने अपनी सूझबूझ और कठिन परिश्रम से उत्पादन को संभव बनाया है? अथवा उस समाज को जिसका वह सदस्य है, जिसमें रहकर वह ज्ञानानुभव ग्रहण करता है. अपनी निरंतरता में जो मनुष्य के शिक्षण-प्रशिक्षण एवं मानवीकरण में सहायक होता है, जिससे परे मनुष्य की अपनी महत्ता शून्य है. जो उसकी अस्मिता, उसके आत्मगौरव का परिचायक है तथा जिसके आधार पर वह प्राणिजगत से अलग और विशिष्ट होने का दावा करता है. लाभ यदि मनुष्य को मिलना चाहिए तो किस अनुपात में?

यह प्रश्न आज का नहीं है. सभ्यताकरण के आरंभ से ही उत्पादन पर अधिकार तथा उसके न्यायपूर्ण वितरण को लेकर एक चुनौती इंसान के सामने हमेशा रही है. विद्वानों के बीच इसे लेकर मतभेद हैं. एक वर्ग का मानना है कि मनुष्य के श्रम-लाभ पर सबसे पहला अधिकार श्रम-कर्ता का ही होता है. तदनुसार मनुष्य अपने श्रम एवं बुद्धिबल द्वारा जो भी अर्जित करता है, उसका लाभ उसको मिलना ही चाहिए. यह तर्क अपने आप में महत्त्वपूर्ण हैं. लेकिन मनुष्यता की विविधता वैचारिक स्वातंत्र्य में भी है. विद्वानों के दूसरे वर्ग का मानना है कि संसार अनुभवों का विशाल महासागर है. इस महासागर में पीढ़ी-दर-पीढ़ी नया जल अंतरित होता रहता है. नई पीढ़ी अपने अनुभवों का सफर वहां से आरंभ करती है, जहां उसकी पिछली पीढ़ी ने छोड़ा था. इस आधार पर प्रत्येक पीढ़ी पुरानी पीढ़ी की कर्जमंद होती है, वह जिस अनुभव और ज्ञान-संपदा के बल पर आगे बढ़ती है, वह पिछली पीढ़ियों की ओर से सभ्यता, संस्कृति एवं संचित ज्ञान-संपदा के रूप में प्राप्त होता है. इन्हें सहेजने वाली व्यवस्था का नाम ही समाज है. वह परंपरा एवं सांस्कृतिक प्रवाह के बीच वर्तमान की यात्रा और भविष्य का सपना है. उसका दायित्व मनुष्य को संरक्षण प्रदान करना तथा विकास हेतु अनुकूल वातावरण का सृजन करना है. साथ में उसे भावनात्मक रूप से समृद्ध करते रहना है, ताकि वह योग्य नागरिक बनकर समाज-विकास में अपना अधिकतम योगदान दे सके. अगर समाज यह सब न करे? अगर वह अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट जाए तब? हालांकि समाज के लिए ऐसा करना आसान नहीं होगा, क्योंकि मनुष्य उसकी रचना का आधारस्रोत है. उसकी उपेक्षा करना खुद को संकट में डालना होगा. यदि ऐसा हो जाए तो समाज अस्तित्वहीन हो जाएगा. बिना समाज के मनुष्य और पशु के बीच किसी प्रकार का अंतर ही न रहेगा. इसलिए मनुष्य का कर्तव्य है कि वह समाज, जिसने उसकी कदम-कदम पर सहायता की है—के विकास में अपना भरपूर योगदान दे. इस वर्ग का मानना है कि समस्त संसाधन समाज की सांझी धरोहर हैं. उनके उपयोग अथवा परिशोधन द्वारा मनुष्य जो अर्जित करता है, उसपर संपूर्ण समाज का अधिकार होता है. सभ्यता के आरंभिक वर्षों से लेकर आजतक सामाजिक न्याय के नाम पर जितने भी विचार जन्मे हैं, सभी संसाधनों और अवसरों के न्यायिक वितरण की मांग करते आए हैं. उनमें दृश्यमान अंतर का आधार संसाधनों के वितरण तथा व्यक्ति-स्वातंत्र्य को लेकर उनके स्वतंत्र दृष्टिकोण हैं.

अपनी सीमाओं में मनुष्य समाज से सामंजस्य बनाए रखने का यथासंभव प्रयत्न करता है. स्वतंत्र सामाजिक इकाई के रूप में वह प्रायः यही चाहता है कि अपने योगदान के रूप में कुछ न कुछ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी छोड़ता चले. कुछ ऐसा करे जो समाज के अधिकतम वर्गों के लिए लाभकारी हो. कह सकते हैं कि मनुष्य समाज से यदि कुछ ग्रहण करता है, तो कदाचित परिष्कृत-परिवर्धित रूप में कुछ न कुछ लौटा भी देता है. इसे माटी का कर्ज उतारना कह सकते हैं. सामाजिकता के निर्वाह के लिए यह जरूरी भी है. मगर इस दायित्व का इकतरफा निबाह सरासर असंभव है. यह ठीक है कि मनुष्य के दायित्व बड़े हैं. उनसे वह भाग नहीं सकता. उनका अनुपालन करना मनुष्यता का लक्षण है. लेकिन इससे समाज की जिम्मेदारियां कम होने के बजाय और भी बढ़ जाती हैं. समाजीकरण की प्रक्रिया में मनुष्य को अपनी आजादी का एक अंश कुर्बान करना पड़ता है. यह अंश समाज एवं शासन को शक्तिशाली बनाने में मदद करता है. इस तरह राज्य की कुल शक्ति उनके नागरिकों का विशिष्ट प्रदेय होती हैं. इसकी सफलता हेतु व्यक्ति को समाज के साथ हितों का अनुकूलन भी करना पड़ता है. दूसरे शब्दों में समाज से जुड़ना भले ही मनुष्य की अपनी आवश्यकता हो, सर्वथा निःशुल्क नहीं होता. अपनी स्वतंत्रता के एक हिस्से के रूप में मनुष्य के उसकी कीमत चुकानी पड़ती है. यह कार्य वह समाज की मर्यादा, उसमें सुख और शांति की स्थापना के लिए करता है. इसलिए समाज का कर्तव्य है कि व्यक्ति-हितों का ध्यान रखे. ऐसी व्यवस्था बनाए ताकि संबंधित इकाइयां उससे जुड़ा होने पर गर्व का अनुभव करें. बड़ी, संगठित इकाई होने के नाते समाज के दायित्व भी बड़े हैं. उसका सर्वप्रथम दायित्व है कि वह अपनी सदस्य इकाइयों के सुख का ख्याल रखे. उन्हें कभी अन्याय की प्रतीति न होने दे. उदारतापूर्वक उनकी स्वतंत्रता के अधिकार को बनाए रखे. ध्यान रखे कि शांति और व्यवस्था हेतु लोकहित में कानून आवश्यक हैं, किंतु मनुष्यता किसी भी प्रकार के कानून से ऊपर है. कानूनों का अतिस्त्व मनुष्य से है. मनुष्य उनपर निर्भर नहीं है. मानवीय अस्मिता एवं स्वतंत्रता के आगे हर कानून बौना है. अल्पीनियस की यह नेक सलाह महत्त्वपूर्ण है कि परिस्थितियां चाहे जो भी हों, मनुष्य की ‘स्वतंत्रता को कानून से आबद्ध नहीं होना चाहिए.’2 कानून का ध्येय होना चाहिए, अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख और स्वतंत्रता को सुनिश्चित करना. ऐसे वातावरण का निर्माण करना, जिसमें मनुष्य अधिकतम स्वतंत्रता के साथ अधिकतम सुखोपभोग कर सके. यह तभी संभव है जब समाज अपनी प्रत्येक इकाई की इच्छाओं का सम्मान करे. व्यक्ति को अपना मंतव्य खुलकर प्रकट करने की आजादी हो.

उत्तरोत्तर बढ़ती सामाजिक जटिलताओं के बीच जहां आधुनिकीकरण और सभ्यताकरण के नाम पर निरंतर नई संस्थाओं का गठन होता रहता हो, वहां मानवीय स्वतंत्रता का संरक्षण असंभव भले न हो, मगर चुनौती-भरा कार्य है. इसलिए भी कि सभ्यताकरण के नाम पर नई संस्थाओं और विधानों का गठन जितनी जल्दबाजी के साथ होता है, वैसी जल्दबाजी लोगों को उससे परचाने, नई व्यवस्था से उसका अनुकूलन करने हेतु नहीं की जाती. जन और अभिजन में विभाजित समाजों में उसके लिए कोई कोशिश भी नहीं होती. मानवीकरण की कोशिशों को पूरी तरह परिस्थिति के भरोसे छोड़ दिया जाता है. परिणामस्वरूप यथार्थ एवं आदर्श; यानी ‘जो है’ और ‘जो होना चाहिए’—का अंतराल निरंतर बढ़ता ही जाता है. लोक-स्वातंत्र्य एवं मानवाधिकारिता के पक्ष में बढ़ती मांगों के दबाव में शासन और शीर्षस्थ अभिजन मिलकर निगरानी संस्थाएं तो खड़ी कर देते हैं, किंतु उनके शिखर पर उन्हीं वर्चस्वकारी शक्तियों का कब्जा होता है, जो जनसाधारण के दमन और दुर्दशा के लिए जिम्मेदार रही हैं; तथा जिनसे मुक्ति की कामना उन संस्थाओं के गठन का मूल उद्देश्य होता है. जिसकी मनमानी के चलते व्यवस्था का अभिजात संस्कृति की ओर झुकाव वर्ष-दर-वर्ष बढ़ता ही जाता है, जिससे आमजन के लिए न्याय निरंतर दुर्लभ और दुरूह होने लगता है. समस्या है कि न तो यह प्रवृत्ति नई है, न संस्थाएं आज पैदा हुई हैं. इतिहास साक्षी है कि समाजीकरण के आरंभ से ही व्यवस्था का चरित्र मूलतः लोक-विरोधी रहा है. उससे पहले परिवार ही समाज था. उसका मुखिया मर्यादाएं निर्धारित कर लेता था. जनसंख्या कम थी, जरूरतें सीमित. ऊपर से पूर्णतः प्रकृति-आधारित जीवन की अनिश्चितता. इसके बावजूद परिवार या कबीलाई गुट में बंटे मनुष्य आपसी संबंधों का युक्ति-युक्त ढंग से निर्वाह कर लेते थे.

जरूरतों को मिल-बांटकर पूरा करने की प्रवृत्ति समाजीकरण की आरंभिक प्रेरणा थी. कालांतर में जनसंख्या बढ़ी. जरूरतें विस्तार लेती गईं. व्यक्ति एक स्थान पर टिककर रहने लगा. तब समस्या के निदान के लिए व्यक्ति की आध्यात्मिक जिज्ञासा, सामाजिक आचारसंहिता तथा सामान्य नैतिकता के योग से धर्म का गठन किया गया, जो एक सर्वथा कल्पित, कथितरूप से सर्वाधिक शक्तिशाली और सर्वेसर्वा परमात्मा की मनमानी के इर्द-गिर्द घूमता है. प्रकृति से डरे, अशीक्षित जनसमाज में धर्म को पूरी जगह मिली. बाद में तो उसे बलात् थोपा जाने लगा था. राजसत्ता और धर्मसत्ता के संयुक्त प्रयासों के परिणामस्वरूप राजा को धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि मान लिया गया. अपनी मूल प्रवृत्ति में धर्म ठेठ सामंतवादी था. अपनी विशिष्ट संरचना के कारण ही वह शिखर की ओर देखता था. शिखरस्थ अभिजन उसमें लाभ की अवस्था में थे. धर्म की वर्चस्ववादी, केंद्रोन्मुखी, परंपरानुयायी प्रवृत्ति ने ही सामाजिक स्तरीकरण और ऊंच-नीच की भावना को स्थायित्व देने का काम किया था. लोग धीरे-धीरे उसी में मग्न होते गए. इस बीच समाज और मनुष्य की जरूरतों का दायरा और भी फैलता गया. पंद्रहवीं शताब्दी के वैज्ञानिक प्रबोधन तक यह सिलसिला अबाध चलता रहा. उसके बाद धार्मिक संस्थाओं के औचित्य पर जोर-शोर से सवाल उठाए जाने लगे थे. नए ज्ञान की रोशनी में धर्म के लिए यह संभव न रहा कि वह समाज को पूरी तरह अनुशासित रख सके. उस जरूरत ने आर्थिक साम्राज्यवाद के विचार को जन्म दिया. बहरहाल सभ्यता की यात्रा में मनुष्य निरंतर नई-नवेली संस्थाएं गढ़ता गया. उनसे संतुलन बनाए की चाहत में मनुष्य को हर बार नई अनुशासन प्रणाली को अपनाना पड़ा. हर बार उसे अपनी स्वतंत्रता के एक हिस्से की बलि देनी पड़ी. यह जानते हुए भी कि ‘प्रत्येक व्यक्ति को उसके अधिकार दिलाने की दृढ़ और स्थायी इच्छा ही न्याय है.’3 समाज अपनी सभी इकाइयों को एकसमान न्याय उपलब्ध कराने, उसकी स्वतंत्रता के अधिकतम स्तर को अक्षुण्ण रखने के अपने मूलभूत ध्येय से निरंतर दूर होता गया.

सामान्य परिस्थितियों में मनुष्य दो प्रकार की स्वतंत्रता की परिकल्पना करता है. पहली राजनीतिक स्वतंत्रता, यानी सामाजिक मर्यादाओं के भीतर स्वतंत्र नागरिक जीवन जीने की स्वतंत्रता. स्वतंत्र, सामाजिक जीवन के लिए अर्थ भी महत्त्वपूर्ण होता है, अतएव आर्थिक स्वतंत्रता का भाव भी इसी में सन्निहित है. तदनुसार दूसरी स्वतंत्रता है, अवसरों की समानता के बीच विधिपूर्ण ढंग से संपत्ति उपार्जन करने तथा उसका बगैर किसी प्रतिबंध के इच्छानुसार भोग करने की स्वतंत्रता. अपने नागरिकों के लिए दोनों स्वतंत्रताओं को सुनिश्चित करना किसी भी कल्याण राज्य का प्रथम-संकल्प होना चाहिए. न्याय के इस रूप की व्याख्या को इच्छा-स्वातंत्र्यवाद या ‘लिबरटेरियनिज्म’ कहा जाता है. इस न्यायवादी विचारधारा के अनुसार सभी मनुष्य एकसमान है. अतएव राज्य का कर्तव्य है कि वह व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता को बनाए रखे. यहां स्वतंत्रता का अर्थ उसके सामान्य अर्थों से कहीं व्यापक है. उसमें अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य, अवसरों की समानता के साथ संपत्ति अधिकार भी सम्मिलित हैं. इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारकों के अनुसार आर्थिक स्वतंत्रता एवं उपयुक्त संपत्ति प्राधिकार के बगैर राजनीतिक स्वतंत्रता अर्थहीन है. इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार संपत्ति अर्जित करने तथा उसका इच्छानुसार भोग करने का अधिकार मिलना ही चाहिए. जान हास्पर्स के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन का स्वामी है. किसी भी व्यक्ति को किसी दूसरे के जीवन का स्वामित्व हासिल नहीं है. इसलिए एक व्यक्ति का दूसरे के जीवन में अवांछित हस्तक्षेप सर्वथा अनुचित है. इच्छा-स्वातंत्र्यवाद आधुनिक मानवतावादी दर्शन है. पुरानी विचारधाराओं से हटकर. ‘प्राचीन एवं आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत परंपरागत रूप से इस बात पर ध्यान देते थे कि कौन स्वामी होगा और कौन दास और कौन दास….’4 इच्छा-स्वातंत्र्यवादियों के अनुसार, ‘न तो कोई किसी का स्वामी है, न ही कोई किसी का दास. जिस प्रकार अपने बारे में एकमात्र मुझे यह तय करने का अधिकार है कि मेरा जीवन किस प्रकार का हो, उसी प्रकार तुम्हें अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने का पूरा-पूरा अधिकार है. मैं चाहे जितना शक्तिशाली होऊं, या फिर सत्ता मेरी मुट्ठी में हो, इसके बावजूद तुम्हें दास बनाकर तुम्हारा स्वामी बन बैठने का कतई अधिकार नहीं है, इसी तरह तुम्हें भी यह अधिकार नहीं है कि मुझे गुलाम बनाकर मेरे हाकिम बन जाओ. दासता बलात् ताबेदारी है.’5 अतएव प्रत्येक व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह अपने पसंदीदा कार्यक्षेत्र को चुने और इच्छानुसार काम भी करे. बशर्ते उसके कार्य से किसी अन्य व्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित न होती हो.

इच्छा-स्वातंत्र्यवाद का जन्म बीसवीं शताब्दी के उस दौर में हुआ, जब पूंजीवाद समाजार्थिक एवं राजनीतिक सत्ताओं पर अपना प्रभुत्व जमा चुका था. साम्राज्यवाद अपने पराभव के दौर में था, वैज्ञानिक प्रबोधन के बीच पुरानी विचारधाराओं के आगे प्रश्न-चिह्न लग चुका था. नई प्रौद्योगिकी के आगमन से परंपरागत उत्पादन प्रविधियों पर संकट मंडराने लगा था. बड़ी पूंजीपति कंपनियां लोगों के दिलो-दिमाग पर कब्जा कर, उसको अनुगामी उपभोक्ता में ढाल देना चाहती थीं. राजनीतिक अस्थिरता एवं अदूरदर्शिता के बीच महत्त्वपूर्ण निर्णयों पर पूंजीपति घरानों का असर साफ नजर आने लगा था. उनकी ओर से निहित स्वार्थ हेतु उपभोक्ताकरण का अभियान जोर-शोर से चलाया जा रहा था. तेजी से उभरता मीडिया उनका सबसे बड़ा मददगार बना हुआ था. ऐसे प्रलोभनकारी परिवेश में मनुष्य की भौतिक इच्छाओं का फैलाव अवश्यंभावी था. यही पूंजीवादी शक्तियां भी चाहती थीं कि मनुष्य परंपरागत विधानों, विशेषकर उन व्यवस्थाओं के जो उसे संयम और त्याग का पाठ पढ़ाती हैं, सांसारिक सुखामोदों को निस्सार समझती हैं—के नियंत्रण से मुक्त हो. उससे पहले धर्म और सामंती संस्कारों के रूप में अनेक बेड़ियां मनुष्य अनेक को जकड़े हुए थी. विचारकों का बड़ा वर्ग उनसे बाहर लाने को कटिबद्ध था. फलस्वरूप बीसवीं शताब्दी तक मानवीय स्वतंत्रता और समानता के पक्ष में माहौल पूरी तरह बन चुका था. नए विचारों के आलोक में विश्व-भर में लोकतांत्रिक संस्थाएं मजबूत हुईं. उनका संघर्ष किसी भी प्रकार के वर्चस्ववाद के विरुद्ध था. इस बीच अपनी अनुकूलनवादी प्रवृत्ति के कारण पूंजीवादी ताकतें भी लोकतांत्रिक परिवेश का लाभ उठाने में कामयाब हुईं. शती के मध्याह्न तक पूंजीवाद दुनिया के आधे से अधिक देशों को अपने प्रभाव में ले चुका था. दूसरे विश्वयुद्ध में हुई भीषण जनहानि और पश्चातापग्रस्त राजनीति ने उसे अपने पांव फैलाने का कुछ और मौका दिया. फलस्वरूप मानवाधिकार समर्थक ऐसे अनेक बुद्धिजीवी प्रकाश में आए, जो पूंजीवाद की चमक-दमक से प्रभावित थे और उसी में मानवीय समस्याओं का हल खोजते थे. इच्छा-स्वातंत्र्यवाद जैसी मुखर विचारधाराओं का उभार उसी दौर की घटना है.

‘इच्छा-स्वातंत्र्यवाद’ का अभिप्राय केवल रुचियों की स्वतंत्रता पर विचार करना नहीं है. अपने समर्थकों की निगाह में यह सामाजिक न्याय की उदात्त भावना पर केंद्रित व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने का विधान है. आदमी स्वतंत्र होगा, तभी वह स्वयं को अभिव्यक्त करने का साहस जुटा पाएगा, तभी वह अधिकतम इच्छाओं को अभिव्यक्त कर, उनकी पूर्ति के लिए आखिर तक, समर्पित भाव से काम करने में सक्षम होगा. इच्छा-स्वातंत्र्यवाद नागरिकों को वैचारिक आजादी देता है. उनका विवेकीकरण कर, स्वतंत्रता से प्रेम करना सिखाता है. उसमें मनुष्य को विश्वास होता है कि समाज में उसकी इच्छा के विरुद्ध यदि कुछ भी अप्रिय होगा, तो पूरा समाज मददगार की भूमिका में उसके साथ खड़ा नजर आएगा. स्वेच्छानुसार तय की गई मर्यादाओं के बावजूद वह इतना स्वाधीन और मुक्त होगा कि बगैर किसी बाहरी प्रतिबंधों के अपने लक्ष्य का निर्धारण कर सके. इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारकों का मानना है कि उस व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति हर वह वस्तु प्राप्त करने में सक्षम होगा, जिसको वह अपने लिए जरूरी मानता है. उसे अपने भविष्य को ऐच्छिक दिशा देने की भरपूर स्वतंत्रता होगी. राज्य का एकमात्र उद्देश्य अपने नागरिकों के हितों की सुरक्षा करना है. यह कार्य मनुष्य की अधिकतम स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने की भावना के साथ किया जाना चाहिए. इच्छा-स्वातंत्र्यवादियों के अनुसार प्रत्येक नागरिक के सामान्य अधिकार होते हैं. वही कल्याणराज्य की परिकल्पना को साकार करने में सक्षम है. उनके अनुसार मानवाधिकार केवल मनुष्य को उसके नागरिक अधिकारों से ही नहीं परचाते. उनकी उपस्थिति दूसरे व्यक्तियों को भी उतने ही अधिकार देती है जितने मनुष्य को स्वतंत्र और सम्मानजनक जीवन जीने के लिए आवश्यक हों. उन्हें ‘कुदरती राज्य’ की स्वच्छदतावादी अवधारणा प्रिय है. उसे वे राज्य के न्यूनतम नियंत्रण के बीच आधुनिक राष्ट्र-राज्यवादी चेतनाओं के बीच भी जिलाए रखना चाहते हैं. प्रकारांतर में वे स्वच्छंद आचरण यानी स्वतंत्रता को स्वच्छंदता मान लेने से भी रोकते हैं. मगर स्वतंत्रता कोई नया प्रत्यय नहीं है. लॉक की ‘प्राकृतिक राज्य’ की अवधारणा के अनुसार वह मनुष्य को जन्म से ही प्राप्त होती है. उसी तरह संपत्ति भी प्रकृति का अंश है. स्वतंत्रता के सिद्धांत के अनुसार दूसरों पर अधिकर करना भी अनुचित एवं प्रकृति-विरुद्ध आचरण है. फिर इच्छा-स्वातंत्र्यवादी अभिव्यक्ति और संपत्ति अधिकार की स्वतंत्रता पर इतना जोर क्यों देते हैं? उनमें और दूसरे स्वतंत्रतावादियों में प्रमुख अंतर क्या हैं? इसपर विचार करने के लिए इच्छा-स्वातंत्र्यवाद की वैचारिकी में गहरे उतरना पड़ेगा.

इच्छा-स्वातंत्र्यवाद के प्रमुख विचारक जॉन हॉस्पर्स(1918—2011) तथा राबर्ट नॉजिक(1938—2002) रहे हैं. अपनी पुस्तक ‘लिबरटेरियन मेनीफेस्टो’ में हॉस्पर्स लिखता है—‘प्रत्येक मनुष्य अपना स्वामी है. सभी स्वतंत्र हैं. किसी को किसी पर अधिकार नहीं है.’ उसके अनुसार प्रत्येक मनुष्य अपनी रुचि एवं जरूरत के अनुसार कार्य करने के लिए स्वतंत्र है, बशर्ते उस कदम से किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन में किसी प्रकार का अवांछित हस्तक्षेप न होता हो. न ही उस व्यक्ति को लगे कि उसकी उपेक्षा की जा रही है. वह इस बात पर जोर देता है कि समाज में न तो कोई स्वामी है, न दास. या तो सभी स्वामी हैं अथवा सभी दास. दूसरे शब्दों में प्रत्येक मनुष्य अपना स्वामी है. इसलिए किसी भी मनुष्य को यह अधिकार नहीं है कि वह दूसरे के जीवन में हस्तक्षेप कर सके. यह स्वतंत्रताबोध ही इच्छा-स्वातंत्र्यवाद की आधारशिला है. रूसो से लेकर लॉक तक इसी का समर्थन करते आए हैं. इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारक इसका जोरदार समर्थन करते हैं. इतना कि कई बार उनका स्वातंत्र्यबोध नकारात्मक दिखने लगता है. अधिकारों को लेकर भी इच्छा-स्वातंत्र्यवादी काफी उदार हैं. उसमें वे सभी अधिकार सम्मिलित हैं जिन्हें आधुनिक विचारक मानवाधिकार के अंतर्गत सम्मिलित करते हैं. उनका मानना है कि मनुष्य को संपत्ति अर्जित करने का पूरा अधिकार प्राप्त होना चाहिए. प्रकारांतर में उन्हें पूंजीवाद से भी परहेज नहीं हैं. संपत्ति अधिकार को वे मानवीय स्वतंत्रता और अस्मिता की सुरक्षा के लिए अनिवार्य मानते हैं. उनके लिए संपत्ति अधिकार के बगैर नागरिक अधिकार की परिकल्पना अनौचित्यपूर्ण है.

इच्छा-स्वातंत्र्यवादियों के लिए संपत्ति का आशय महज जमीन-जायदाद या नकदी तक सीमित नहीं है. उनके लिए हर वह वस्तु जिसे कोई व्यक्ति अपना होने का दावा करते हुए, गर्वानुभूति करता है—संपत्ति की श्रेणी में आती है. जैसे आभूषण, पुस्तक, वस्त्राभरण आदि. यही नहीं ज्ञान, कला-कौशल, क्षेत्र-विशेष में अर्जित विशेष योग्यता और बौद्धिक संपदा को भी वे संपत्ति की श्रेणी में रखते हैं. उनके अनुसार ऐसी बहुत-सी चीजें संपत्ति कही जा सकती हैं, जिन्हें केवल कुछ चुने हुए लोग पसंद करते हों. उन्हें लेकर समाज में बहुत स्पर्धा की भावना भी न हो. चूंकि उनके होने से व्यक्ति को कुछ होने की गर्वानुभूति होने लगती है, इसलिए वे संपत्ति का ही अपररूप हैं. विचारधारा के रूप में इच्छा-स्वातंत्र्यवाद का उद्भव बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अमेरिका में हुआ. तब तक लोकतंत्र पर पूंजीवादी ताकतें अपना प्रभुत्व जमा चुकी थीं. लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कारपोरेट संस्कृति का असर साफ दिखने लगा था. संभवतः उसी से सम्मोहित इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारक व्यक्तिवाद का महिमा-मंडन करते हुए, सर्वस्वातंत्र्य की भावना को उदार-समाज के प्रमुख लक्षण के रूप में देखते हैं. लेकिन किसी भी विचार को सामाजिक मान्यता दिलाना सामान्य नैतिकता को बीच में लाए बिना असंभव है. तदनुसार संपत्ति पर अधिकार का आशय यह हरगिज नहीं है कि किसी की भी संपत्ति को कब्जाकर उसपर अपना दावा ठोक दिया जाए. जैसा कि प्राचीन काल में साम्राज्यवादी सोच के चलते होता था. जब कोई सम्राट अपनी सैन्य-शक्ति या कूटनीति द्वारा किसी राज्य पर कब्जा कर ले तो वह उसका अधिकार मान लिया जाता था. संपत्ति अधिकार की प्राचीन परिभाषा में वह उचित माना जाता है. इच्छा-स्वातंत्र्यवादी इस मायने में व्यावहारिक नैतिकता का समर्थन करते हुए नजर आते हैं. उनके अनुसार संपत्ति अधिकारिता का अभिप्राय वैध तरीकों द्वारा अर्जित संपत्ति पर अधिकार, फिर उसका सकारात्मक ढंग से समाज की कुल उत्पादन क्षमता में वृद्धि हेतु उपयोग किए जाने से है. ताकि समाज विकास की ओर अग्रसर रह सके. कुल मिलाकर संपत्ति से उनका आशय उस धन से है जो आसानी से, स्वैच्छिक आदान-प्रदान की सीमा में आता है. और उसपर अधिकारिता के मायने संपत्ति का अपने संपूर्ण सामर्थ्य से, अपने साथ-साथ लोकहित में उपयोग करने से है. लोगों को संपत्ति अधिकार से वंचित करना, उनसे उनके मूलभूत अधिकार जो उन्हें मनुष्य होने का बोध कराते हैं—छीन लेना है. व्यक्तिमात्र के लिए स्वतंत्रता अपने भविष्य की बेहतरी के लिए सोचने तथा उसके लिए पर्याप्त योजनाएं विकसित करने में देखी जाती है.

इच्छा-स्वांतत्र्यवादियों के अनुसार मानवीय इच्छा और कर्तव्य को निर्धारित करने वाले अधिकार उदार होने चाहिए. उनका स्वरूप ऐसा होना चाहिए कि समाज का कमजोर से कमजोर व्यक्ति उनका लाभ उठा सके. संपत्ति जुटाने तथा उसके हस्तांतरण संबंधी अधिकार मनुष्य की पसंद तथा उसकी कार्यशैली की स्वतंत्रता के लिए आवश्यक हैं. यदि व्यक्ति को अपने जीवन के बारे में उपयुक्त निर्णय लेने, विकास के लिए योजनाएं बनाने या अपने ही श्रम के लाभों से वंचित कर दिया जाए? यदि उसको स्वतंत्र बताते हुए उससे अभिव्यक्ति के अधिकार को ही छीन लिया जाए? उस अवस्था में स्वतंत्रता और समानता के कोई मायने ही नहीं रहेंगे. यहां विचारणीय है कि बौद्धिक संपदा, शिल्प-कौशल, व्यावसायिक हुनर, श्रम आदि को छोड़ दिया जाए तो संपत्ति प्रायः प्रकृति का हिस्सा होती है. इस नाते वह पूरे समाज की है. बल्कि उन समाजों की है जो धरती पर कहीं भी किसी भी रूप में मौजूद हैं. जड़ वस्तुओं की भांति मनुष्य भी कहीं न कहीं प्रकृति के नियमों से अनुशासित होता है. सवाल है कि क्या एक प्राकृतिक वस्तु या प्राणी का दूसरी प्राकृतिक वस्तु या प्राणी पर अधिकार न्यायोचित है. बीसवीं शताब्दी में जितनी भी मानवतावादी विचारधाराएं उभरीं, वे इस इसके पक्ष, विपक्ष और समन्वय का ही लेखा हैं. मनुष्य हालांकि अन्य प्राणियों और वस्तुजगत की भांति प्रकृति का ही हिस्सा हैं. घर्षण, जड़त्व, गुरुत्वाकर्षण आदि प्रभाव जैसे जड़ वस्तुओं और जीवजगत को प्रभावित करते हैं, मनुष्य भी उनसे उसी तरह प्रभावित होता है. अंतर केवल इतना है कि सहस्राब्दियों के अंतराल में मनुष्य ने अपनी बुद्धि विकसित की है. यही वह गुण है जिसके आधार पर वह शेष प्राणियों और वस्तुजगत पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करता आया है. उसी के आधार पर वह प्राकृतिक संसाधनों का अपने हित में शोधन, परिशोधन करता रहता है. चूंकि प्रत्येक मनुष्य का बौद्धिक सामर्थ्य और समाज निर्माण में उसका योगदान भिन्न होता है, यह मनुष्य की अपनी योग्यता पर भी निर्भर करता आया है, इसलिए मनुष्य के संबंध में संपत्ति अधिकारों की स्वतंत्र व्याख्या की आवश्यकता हमेशा रही है. मनुष्य की सीमा है कि वह प्रकृति में मौजूद पदार्थ को केवल वस्तु में बदल सकता है. उसका शोधन-परिशोधन कर सकता है. पदार्थ को बना नहीं सकता. यदि किसी मनुष्य का संपत्ति पर अधिकार है तो वह संबंधित वस्तु के शोधन-प्रशोधन में किए गए योगदान तक सीमित रहना चाहिए. जॉन लॉक की ओर से आए ये विचार कालांतर में इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारकों की प्रेरणा बने. उनमें से अधिकांश का मानना था कि अभिव्यक्ति या अभिमत के अधिकार के बिना स्वतंत्रता असंभव है. इसलिए संपत्ति अधिकारों की रूपरेखा, योजनावद्ध तरीके से, कुल समाज के दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए. यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी का संपत्ति अधिकार दूसरों के अधिकार में बाधा न बने.

इच्छा-स्वांतत्र्यवादी विचारकों के अनुसार संपत्ति उपार्जन की दो मान्य विधियां हैं. पहला दो व्यक्तियों अथवा दो समूहों अथवा व्यक्ति और समूह के बीच हुआ अंतरण. उसके अनुसार संपत्ति का यह अंतरण न्यायसंगत होना चाहिए. समाज द्वारा घोषित ऐसे तरीके से संपत्ति अंतरण ही कानून सम्मत कहा जाएगा. जिसमें क्रेता और विक्रेता दोनों के बीच विश्वास की भावना हो. अंतरण के बाद भी क्रेता को लगे कि उसके साथ कोई धोखा या छल नहीं हुआ है. वहीं विक्रेता को यह विश्वास होना चाहिए कि वह किए गए भुगतान के बदले उपयुक्त मूल्य की संपत्ति प्राप्त कर चुका है. श्रम, बौद्धिक संपदा तथा ऐसे सभी उपार्जन जो पूर्ण संपत्ति-प्राधिकार के साथ संपन्न होते हैं, इसी श्रेणी में आते हैं. उपार्जन की दूसरी श्रेणी में अस्वामित्व युक्त संपत्ति से स्वामित्व युक्त संपत्ति का अंतरण आता है. यानी ऐसा उपार्जन जो किसी व्यक्ति द्वारा ऐसी संपत्ति के माध्यम से किया गया हो, जिसका वह स्वामी ही नहीं है. उल्लेखनीय है कि श्रम पर सबसे पहला अधिकार श्रमिक का होता है. यदि कोई व्यक्ति श्रम का वाजिब मूल्य, यानी श्रम के मूल्यांकन का अधिकार छीनकर उसके उत्पाद पर कब्जा कर लेता है. तब उसका मामला दूसरी श्रेणी में आता है. यह कुछ ऐसा ही है जैसे कोई जमींदार उस जमीन की फसल को घर ले जाए, जो उसने अपनी दबंगई के आधार पर कब्जाई हुई है. इच्छा-स्वातंत्र्यवाद के अनुसार व्यक्ति का संपत्ति पर अधिकार तभी मान्य है, जब उसे विधि-मान्य तरीकों द्वारा अर्जित किया गया हो. इसमें न्यायपूर्ण आधार पर अर्जित संपत्ति के वे सभी अपररूप सम्मिलित हैं, जिन्हें मनुष्य इस श्रेणी में सम्मिलित करता आया है. उनकी निगाह में संपत्ति अर्जन का दूसरा तरीका निकृष्ट है. यह मानवीय स्वतंत्रता के दायरे में अनावश्यक और अनुचित हस्तक्षेप करता है. यदि संपत्ति का अंतरण न्यायपूर्ण ढंग से हुआ है, तो उसके आधार पर समाज में असमान आर्थिक वितरण को भी मान्यता देनी होगी. इच्छा-स्वातंत्र्यवादियों को ऐसी आर्थिक असमानता से भी गुरेज नहीं है. यहां वे मानवीय इच्छा के निर्माण में उन वर्चस्वकारी शक्तियों की अदृश्य भूमिका की उपेक्षा कर देते हैं, जो समाजार्थिक असमानता तथा तज्जनित ऊंच-नीच की भावना के वास्तविक कारण होते हैं. वे सामाजिक असमानताओं की बीच पनपते हैं; तथा मनुष्य के सोच पर नकारात्मक असर डालते हैं. जिनके चलते श्रमिक से उसके श्रम के मूल्यांकन का वैध अधिकार देखते ही देखते छीन लिया जाता है. उसके अभाव में मनुष्य का स्वातंत्र्य-बोध शीर्षस्थ शक्तियों का विशेषाधिकार उनकी अनुकंपा तक सिमट जाता है. तदनुसार इच्छा-स्वातंत्र्यवादियों के लिए संपत्ति का असमान वितरण कोई महत्त्व नहीं रखता. चाहे हर व्यक्ति को उसकी आवश्यकतानुरूप संपत्ति प्राप्त हो अथवा वह कुछेक हाथों में सिमट जाए. वे इसे व्यक्ति-स्वातंत्र्य के उपहार के रूप में देखते हैं.

इच्छा-स्वातंत्र्यवादियों की दृष्टि में नियोजित अर्थव्यवस्था उतनी महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितनी निजी स्वतंत्रता तथा व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा का मान-सम्मान. उसमें व्यक्ति को न केवल संपत्ति-अधिकार, बल्कि संगठन बनाने, मुक्त व्यापार करने की आजादी प्राप्त होती है. शर्त केवल इतनी है कि उसके द्वारा किया गया कार्य विधि-सम्मत होना चाहिए. निजी-अधिकारिता पर जरा-सा अंकुश, मामूली नियंत्रण उन्हें स्वीकार्य नहीं है. पूंजीवाद भी कुछ ऐसा ही चाहता है. उनका मानना है कि व्यक्ति जितना नियंत्रण मुक्त होगा, उतना उसके उपभोक्ताकरण में आसानी रहेगी. यदि वह अकेलापन अनुभव करेगा तो उसके खालीपन को भरने के लिए नई वस्तुओं का बाजार बढ़ेगा. इससे कुल मिलाकर पूंजीपतियों का ही लाभ होगा. उल्लेखनीय है कि उनीसवीं शताब्दी में सुखवादी विचारक भी पूंजीवाद को व्यक्तिमात्र के सुख के विस्तार के लिए जरूरी मानते थे. उनका मानना था कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था से समाज-कल्याण में वृद्धि होगी और सुख जो प्रत्येक मनुष्य के जीवन का ध्येय है, उसका लोग अधिकाधिक भोग कर सकेंगे. इच्छा-स्वातंत्र्यवादी भी पूंजीवाद का समर्थन करते हैं, लेकिन केवल सुख के लिए नहीं. उनकी दृष्टि में व्यक्ति-स्वातंत्र्य का मूल्य ‘व्यक्तिमात्र के सुख’ से कहीं अधिक है. अधिकारों की समानता को बढ़ावा दिए बगैर भ्रष्टाचार, धोखादड़ी और बाजार की मनमानियों पर रोकथाम असंभव है. इच्छा-स्वातंत्र्यवादियों को कल्याण राज्य की अवधारणा भी अमान्य है. कल्याण राज्य के मूल लक्ष्य अर्थात लोगों के भले के लिए अनिवार्य संस्थाओं का गठन, सामाजिक सुरक्षा, श्रम-कल्याण, स्वास्थ्य संबंधी देखभाल, स्वास्थ्य बीमा, रंगभेद तथा लैंगिक पक्षपात पर रोकथाम वाले कानून बना देने से उन्हें संतोष नहीं है. इसके बजाय वे व्यक्तिमात्र की संपूर्ण स्वतंत्रता पर जोर देते हैं. सब आजाद होंगे, परस्पर बराबर होंगे तो समाज में शोषण के लिए जगह न बचेगी—ऐसा वे मानते हैं. उनका यह भी मानना है कि लोगों को पूर्ण संपत्ति अधिकार देने के साथ-साथ इच्छानुसार संगठन बनाने, अपनी निधियों का अपने भले के लिए उपयोग करने की संपूर्ण आजादी होनी चाहिए. मगर उनकी कमजोरी है कि व्यक्ति-स्वातंत्र्य का पक्ष लेते-लेते कई बार वे अपनी सीमा के पार निकल जाते हैं. ‘अति सर्वत्र वज्र्यते’ की चेतावनी उन्हें याद नहीं रहती. यदि कोई व्यक्ति रंगभेद समर्थक सोच के कारण अपने संस्थान में केवल गोरों को नौकरी पर रखना चाहता है तो, इच्छा-स्वातंत्र्यवादियों के अनुसार उसे इसका भी अधिकार है. शेष समाज को उसके अधिकार का सम्मान करना चाहिए. बशर्ते उसके कृत्य से किसी हिंसक व्यवहार या दूसरों के जीवन में हस्तक्षेप न होता हो. ऐसे ही यदि कोई गृह-स्वामी अपने भवन को अपने ही वर्ण के किसी व्यक्ति को बेचना चाहता है, तो उसको भी इसका अधिकार है. उनके अनुसार न्याय की मांग है कि यह अधिकार उन्हें मिलना ही चाहिए. बशर्ते वह दूसरों के जीवन का उतना ही सम्मान करता हो, जितने सम्मान की अपेक्षा वह दूसरों से अपने लिए रखता है. यहां वे भूल जाते हैं कि वर्णभेद या किसी अन्य प्राकृतिक या सामाजिक कारण जो व्यक्ति के नियंत्रण में न हो, से लोगों को उनके वाजिब अधिकारों से वंचित कर देना—उनके जीवन में अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप है. चूंकि कोई व्यक्ति नहीं चाहता कि उसे उन कारणों के लिए दंडित किया जाए, जो प्राकृतिक होने के कारण उसके नियंत्रण से बाहर हैं, इसलिए इच्छा-स्वातंत्र्यवादियों की स्वतंत्रता संबंधी अवधारणा में किंचित दोषपूर्ण नजर आती है.

इच्छा-स्वातंत्र्यवाद की विशेषता जिसे उसका नकारात्मक पक्ष कहा जाएगा, यह है कि रंगभेद, जाति, धर्म अथवा क्षेत्रीयता की भावना से ग्रस्त कोई व्यक्ति यदि अपनी इच्छा और अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य के बहाने किसी प्रकार का पूर्वाग्रह रखता है, तो इच्छा-स्वातंत्र्यवादी उसे व्यक्ति-स्वातंत्र्य की सीमा में रखकर स्वीकार्य मान लेता है. व्यक्ति रंगभेद की भावनाओं से मुक्त हो, इसके लिए भी व्यक्ति-स्वातंत्र्य की भावना को परम के स्तर तक ऊपर उठाना होगा. यह केवल व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं है. समाज का भी दायित्व है कि वह ऐसा वातावरण निर्मित करे जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता और समानता का अधिकतम आनंद ले सके. आशय यही है कि मनुष्य अच्छे हों, इसके लिए समाज को अपनी अच्छाई के उच्च मापदंड स्थापित करने होंगे, ताकि उसके सदस्य अपने भीतर से ही प्रेरणाएं ग्रहण कर सकें. समाज में समानता एवं स्वतंत्रता का उच्चतम स्तर बना रहा तो व्यक्ति की रंग अथवा लिंग के आधार पर पक्षपातपूर्ण निर्णय लेने की इच्छा ही नहीं रहेगी. इस तरह इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारक मानव-मात्र के सुख की कल्पना करते हुए उसके आधार पर आदर्श समाज की रचना का सपना देखते हैं. अपनी विचारधारा के प्रति उनका गजब का सम्मोहन है. मानते हैं कि इच्छा-स्वातंत्र्यवाद के माध्यम से ही मानवीकरण के उच्चतम लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है. दूसरी ओर उसके आलोचकों का मानना है कि वह व्यक्ति-स्वातंत्र्य की आड़ में रंग-भेद, लैंगिक असमानता आदि का समर्थन कर, परोक्ष रूप में नकारात्मक अधिकारों की स्थापना करता है. इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारक अर्थव्यवस्था के उदारीकरण तथा मुक्त बाजार व्यवस्था का अति की सीमा तक समर्थन करते हैं. ‘लेजेज फेयर’ उनके लिए न केवल अर्थव्यवस्था, बल्कि राजनीति और समाज के लिए भी सर्वाधिक अपेक्षित दर्शन है. व्यक्ति-स्वातंत्र्य का समर्थन करते-करते वे अप्रकट रूप में लोक-शिक्षा, नियोजित अर्थव्यवस्था, लोकतंत्र आदि को ही नकारने लगते हैं. यही उनकी विशेषता है और कदाचित यही उनकी सीमा भी.

इच्छा-स्वातंत्र्यवाद के समर्थक विद्वानों में जॉन हास्पर्स के अलावा राबर्ट नॉजिक का नाम भी लिया जा सकता है. बीसवीं शताब्दी का यह अराजकतावादी विचारक न्याय की स्थापना के लिए संपूर्ण स्वाधीनता का समर्थन करता है. इस लक्ष्य-प्राप्ति की राह में वह राज्य की सीमित भूमिका का समर्थन करता है. इसलिए कुछ विद्वान उसे अर्ध-अराजकतावादी भी मानते हैं. जॉन हॉस्पर्स पूर्ण स्वतंत्रता का समर्थक था. उसने जोर देकर कहा था कि अपने जीवन पर सर्वाधिक अधिकार संबंधित व्यक्ति का है. परिवार, समाज और देश बाद में आते हैं. व्यक्ति-स्वातंत्र्य का आधार ही यह भावना है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा का मान रखने, उसको लक्ष्य मानकर उसके अनुरूप आचरण करने का पूरा-पूरा अधिकार है. यह एक व्यक्तिवादी द्रष्टिकोण है. चूंकि सुखवाद और व्यक्तिवाद परस्पर पूरक और सहायक विचारधाराएं हैं, इसलिए अधिकांश इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारक स्वयं को सुखवादी दर्शन के करीब मानते थे. वे पूंजीवाद का सीधे समर्थन नहीं करते. सर्व-स्वातंत्र्य का पक्ष एक मुक्त, आत्मनिर्णयी व्यक्ति और समाज की रचना उनका ध्येय है. लेकिन पूंजी के आधार पर समाज में जिस प्रकार का विभाजन स्वाभाविक रूप से आ जाता है, उसपर भी वह कोई विचार नहीं करते. इस तरह वे जाने-अनजाने पूंजीवाद का अप्रत्यक्ष समर्थन करते हुए नजर आते हैं. वे सुखवाद का समर्थन भी इसलिए करते हैं क्योंकि यह व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता की राह को आसान बनाता है. मगर कोरे सुखवादी द्रष्टिकोण से समाज में न्याय की स्थापना असंभव है. राबर्ट नॉजिक स्वयं यह मानता था कि सुखवाद न्याय की राह का सबसे बड़ा पत्थर है. यदि सब अपने-अपने सुख की स्पर्धा में होंगे तो उन लोगों के सुख की चिंता जो किसी कारणवश दौड़ से बाहर हैं, अथवा दौड़ में पिछड़ चुके हैं—कौन करेगा! इस तर्क के साथ नॉजिक सुखवादी दर्शन को, विशेषकर न्याय के संदर्भ में, करीब-करीब नकार ही देता है. उसकी पुस्तक ‘अनार्की, स्टेट और यूटोपिया’ जॉन लाक(1632—1704) के मानवाधिकार संबंधी विचारों के आगे का चिंतन है. राजनीतिक दर्शन के अंतर्गत मानवाधिकारों का पक्ष लेते हुए उसने लिखा था कि मनुष्य प्रकृति से ही मुक्त और समान होता है. प्रकृति से उसे जीवन, स्वतंत्रता, संपत्ति-संबंधी अधिकार प्राप्त होते हैं. उन्हीं के आधार पर वह समाज से जुड़ता है. समाज व्यक्ति की निजी एवं सार्वजनिक इच्छा-आकांक्षाओं का विस्तार है. उसकी स्थिरता, संपन्नता तथा अपनी स्वाधीनता के सुखमय भोग हेतु मनुष्य अपनी नैसर्गिक स्वतंत्रता के एक हिस्से को समाज और सरकार को सौंप देता है. उसी से उन दोनों को वैधता और ताकत प्राप्त होती है. चूंकि सरकार लोगों की इच्छा से बनती तथा उनकी सहमति से चलती है, इसलिए उसका प्रथम कर्तव्य लोगों की स्वाधीनता तथा अधिकारों की रक्षा करना है. राबर्ट नॉजिक जॉन लॉक के प्राकृतिक अधिकारों को स्वीकारता है. उसके अनुसार ये अधिकार मनुष्य होने की कसौटी हैं, इसलिए इनका किसी प्रकार से उल्लंघन मनुष्यता के प्रति अक्षम्य अपराध है. चूंकि सभी के जीवन-संबंधी अधिकार बराबर हैं, इसलिए मनुष्य के संपत्ति-संबंधी अधिकार सामाजिक नैतिकता से बंधे होते हैं. वे तभी तक मान्य हैं जब तक संपत्ति का अर्जन और हस्तांतरण विधिमान्य तरीके से, बगैर किसी हिंसा, धोखादड़ी और क्षोभ के संभव हो सके. नॉजिक के अनुसार संपत्ति अधिकार तथा उनके अंतरण की संबंधी न्याय के तत्संबंधी तीन सामान्य सिद्धांतों द्वारा समझी जा सकती है—

1. यदि कोई व्यक्ति न्याय के सिद्धांतों के अनुसार संपत्ति अर्जित करता है, तो उसको अर्जित संपत्ति को अपने अधीन रखने का अधिकार है, अथवा
2. कोई व्यक्ति किसी संपत्ति को न्याय के सिद्धांत के अनुसार ऐसे व्यक्ति की ओर से अंतरण के दौरान प्राप्त करता है, जिसका उस संपत्ति पर विधिक अधिकार था, तब भी प्राप्तकर्ता अर्जित संपत्ति को अपने अधीन रखने का अधिकारी है.
3. उपर्युक्त दो प्रविधियों के अलावा किसी भी अन्य तरीके से अर्जित की गई संपत्ति अनाधिकृत कब्जे के भीतर मानी जाएगी.

नॉजिक कराधान व्यवस्था का विरोध करता है. सरकार और प्रशासन द्वारा उसके पक्ष में दिए जाने वाले अनेक तर्कों के बावजूद, वह इसे लागू रखने के लिए कतई तैयार नहीं था. उसके अनुसार कराधान की पद्धति ही दोषपूर्ण है. वह मनुष्य की स्वतंत्रता और संपत्ति संबंधी अधिकारों में सेंध लगाती है. ऐसा प्रतीत होता है कि वह कराधान को एक प्रकार की चोरी मानता है. ऐसी चोरी जो सरकार अथवा राज्य द्वारा कानून और अधिकार के नाम पर की जाती है. सरकार टैक्स वसूलने के लिए बलप्रयोग का सहारा ले सकती है. उसके अनुसार मनुष्य के वैध संपत्ति-अधिकार पर, उसकी इच्छा के बगैर हस्तक्षेप करने का अधिकार सरकार समेत किसी को भी नहीं है. तदनुसार गरीबों के लिए निःशुल्क शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, भोजन, आवास आदि संबंधी कोई भी गतिविधि जो कराधान के नाम पर जनता से बलपूर्वक ऐंठी गई धनराशि द्वारा संचालित है, अवैध मानी जाएगी. अराजकतावादी नॉजिक का मानना था कि राज्य को अल्पाधिकार संपन्न होना चाहिए. उसका दायित्व नागरिक-कल्याण के लिए बनाए गए विधान को लागू करना तथा अपराध जैसे डकैती, चोरी, धोखादड़ी, लूट-खसोट, मारपीट आदि के मामलों में समाज की रक्षा तक सीमित है. बाकी दायित्व नागरिकों द्वारा अपने विवेक, संगठन, सहकार, स्वातंत्र्यबोध एवं समानता की भावना से संपन्न होने चाहिए. नॉजिक के ये विचार हास्पर्स की भावनाओं से मेल खाते हैं. उसके अनुसार, ‘सरकार की जरूरत केवल विद्रोह या उपद्रव को शांत करने के लिए पड़ती है. विकास अथवा दुनिया को बेहतर बनाने जैसे कार्यों में उसकी कोई भूमिका नहीं है. न ही सरकार का काम फैसला करना है कि उसे किस व्यवसाय से कितना मुनाफा मिल सकता है. उसका कार्य कानून की सहायता से आक्रामक कार्यवाही को नियंत्रित करना है.’6

इन विचारों पर हम ‘लैजेज फेयर’ की छाया देख सकते हैं. नॉजिक के अनुसार ‘राजनीतिक दर्शन की मूलभूत समस्या’ इस तथ्य पर विचार करना नहीं है कि ‘सरकार का स्वरूप कैसा होना चाहिए.’ बल्कि यह देखना है कि ‘क्या सभी के लिए एक राज्य होना चाहिए.’ नॉजिक राज्य के औचित्य पर हालांकि उतनी गंभीरता से सवाल नहीं उठाता, जिस तरह पियरे जोसेफ प्रूधों, मिखाइल बकुनिन जैसे अराजकतावादी उठाते हैं, मगर नागरिक कल्याण और विकास के क्षेत्र में उसकी भूमिका को बहुत सीमित कर देना चाहता है. नॉजिक राज्य तथा उसके उद्देश्यों की समीक्षा को आधुनिक राजनीतिक दर्शन की प्रमुख समस्या मानता था. इस संबंध में वह सतरहवीं शताब्दी के महान अनुभववादी दार्शनिक जॉन लॉक के बेहद करीब था. लॉक का कहना था—‘कुदरती राज्य को शासित करने के लिए प्रकृति के अपने नियम होते हैं.’7 लॉक के अनुसार वह नियम है—‘न्याय.’ जाहिर है कि न्याय यहां व्यापक संदर्भों में प्रयुक्त हुआ है. उसका मूल संदेश है कि दुनिया में, ‘किसी को भी दूसरे के जीवन, स्वतंत्रता तथा संपत्ति को हानि पहुंचाने का कोई अधिकार नहीं है.’8 ‘कुदरती राज्य’ की अवधारणा को आगे बढ़ाते हुए नॉजिक आधुनिक राष्ट्र-राज्य के अधिकारक्षेत्र में कटौती का सुझाव देता है. उसका कहना था कि नागरिकों में यह भ्रम नहीं फैलाया जाना चाहिए कि उनकी सुरक्षा सरकार के शक्तिशाली होने पर निर्भर है और सरकार जैसे-जैसे शक्तिशाली होगी, उनकी स्वतंत्रता, सुरक्षा और समृद्धि उसी अनुपात में बढ़ती जाएंगी. मनुष्य दूसरे मनुष्य से राज्य के आधार पर नहीं, मुख्यतः प्रकृति, समाज तथा अपनी जरूरतों के आधार पर जुड़ा होता है. उसके अनुसार राज्य की शक्तियों का उपयोग नागरिकों को एक-दूसरे की मदद करने, अपने हितों की स्वयं सुरक्षा करने की सहज-स्वाभाविक प्रवृत्ति के उत्प्रेरक के रूप में किया जाना चाहिए, न कि उनके विरुद्ध अवरोधक शक्ति के रूप में. व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता तथा अपने संसाधनों का अपने सुख और स्वतंत्रता के लिए प्रयोग किए जाने के अधिकार को वह खिलाड़ी का उदाहरण देकर समझाने की कोशिश करता है—‘मान लीजिए कोई व्यावसायिक खिलाड़ी किसी टीम के लिए अपनी शर्तों पर खेलने के लिए तैयार होता है. शर्त के अनुसार वह तय कर लेता है कि वह खेल के लिए बिके टिकटों से प्राप्त धनराशि का पांच प्रतिशत लेगा. आयोजक खिलाड़ी के मानदेय या कमीशन को लेकर सौदेबाजी कर सकते हैं. लेकिन बाद में अनुबंध के अंतर्गत प्राप्त होने वाली धनराशि को इच्छानुसार खर्च करने का सर्वाधिकार केवल उस खिलाड़ी को होगा. एक बार अनुबंध कर लेने के बाद टीम प्रबंधन अथवा किसी भी अन्य को यह अधिकार नहीं रह जाता कि वह खिलाड़ी से अनुबंध के तहत मिलने वाली धनराशि के खर्च को लेकर किसी प्रकार का सवाल-जवाब करे.’

बीसवीं शताब्दी में पूंजीवाद के औचित्य को दर्शाने के लिए उसको मानवीय स्वतंत्रता के साथ जोड़कर देखने की कोशिशें लगातार होने लगी थीं. मनुष्य स्वतंत्र है. वह अपनी मर्जी का मालिक है. उसके अपने अधिकार हैं. किसी को उसकी स्वतंत्रता में दखल देने का अधिकार नहीं है—मानवीय स्वतंत्रता और अस्मिता के नाम पर ये बातें खूब उछाली जा रही थीं. राज्य चूंकि जनता की सामूहिक इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए व्यक्ति-स्वातंत्र्य के नाम पर व्यक्तिवाद का नारा तभी सफल हो सकता था, जब राज्य के अधिकार क्षेत्र को सीमित कर दिया जाए. यदि व्यक्तिमात्र अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है, वह स्व-चेता, स्व-अनुशासित है तो राज्य की भूमिका अपने आप ही सिमट जाती है. लेकिन आजादी का अभिप्राय यदि केवल अपनी संपत्ति और संसाधनों का मनमाना उपयोग है तब, यह माना जाएगा कि व्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग उसको पूंजीवादी ताकतों के हाथों का खिलौना बनाने के लिए किया जा रहा है. नॉजिक व्यक्ति को अपनी संपत्ति और संसाधनों के निर्बंध उपयोग का अधिकार देने का जोरदार समर्थन करता है. अप्रत्यक्ष रूप से वह स्वीकार लेता है कि मनुष्य अकेला है. वह भूल जाता है कि स्वतंत्रता का ध्येय व्यक्ति को उसकी निजता के दायरे में कैद कर देना नहीं है, बल्कि समाज में सबके साथ रहते हुए अपने सम्मान, अस्मिताबोध एवं अभिव्यक्ति कौशल को बचाए रखने का अधिकार है. यह स्वतंत्रता की नकारात्मक व्याख्या है. इसपर विचार करते समय नॉजिक समाज कल्याण, शिक्षा जैसे सकारात्मक मूल्यों की एकाएक उपेक्षा कर देता है. दूसरे इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारकों की भांति कराधान प्रणाली की आलोचना करते हुए वह उसको सरकार की ओर से अवरोधक कार्रवाही मान लेता है, जो उसके अनुसार संपत्ति पर मनुष्य के नैतिक अधिकार में कटौती का काम करती है. तो क्या समाज कल्याण जैसी कोई अवधारणा नहीं है? और जो स्पर्धा में किसी कारण पिछड़ चुके हैं, उनके विकास को लेकर राज्य और समाज की कोई जिम्मेदारी नहीं है? नॉजिक इन प्रश्नों को नजरंदाज कर जाता है. उसका मानना है कि जब राज्य की ओर से न्यूनतम प्रतिबंध होंगे, मनुष्य-मात्र को अपने द्वारा अर्जित की गई संपदा पर अधिकार होगा, तब सभी लोग अपने-अपने विकास के लिए समर्पित भाव से कार्य करेंगे. समाज में सभी को विकास के समान अवसर और स्वतंत्रता रहेगी तो एक भी व्यक्ति विकास के लाभों से वंचित न रहेगा. और समाज उस आदर्श की ओर अग्रसर होगा जो मनुष्यता का सबसे बड़ा सपना है. इसके लिए वह मनुष्य के अधिकारों की व्याख्या करता है. कहने की आवश्यकता नहीं है कि नॉजिक की मानवाधिकार संबंधी अवधारणा मुख्यतः संपत्ति पर अधिकार एवं तत्संबंधी स्वतंत्रता पर केंद्रित है.

इच्छा-स्वातंत्र्यवाद एवं मानवाधिकार

व्यक्ति विशेष के संदर्भ में स्वतंत्रता सम्मानजनक व्यवहार, जीवन-सुरक्षा, अवसरों की समानता, अभिव्यक्ति तथा अर्जित संपत्ति के ऐच्छिक उपयोग का अधिकार है. किसी समाज में इन अधिकारों की अनुपस्थिति में माना जाएगा कि वहां व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता खतरे में हैं. यहां जिन अधिकारों को स्वतंत्रता का पर्याय माना गया है, वे व्यक्ति के मूलभूत अधिकार हैं. समाज में सम्मिलित होने से पूर्व भी वे मनुष्य को प्राप्त होते हैं. समाजीकरण की आनुपातिक सफलता, समाज में नागरिक अधिकारों की उपलब्धता के स्तर पर निर्भर करती है. उसी से समाज में न्याय की पैठ का अनुमान लगाया जा सकता है. दूसरे शब्दों में अधिकार समाज में न्याय की स्थापना को संभव बनाते हैं. चूंकि ये व्यक्ति के मौलिक अधिकार हैं, इसलिए व्यक्ति को उनके लिए आवाज उठाने तथा आवश्यकता पड़ने पर संघर्ष करने का अधिकार भी सहज प्राप्त होता है. नॉजिक समाज में न्याय के स्वरूप को लेकर बहुत स्पष्ट न हो, किंतु अधिकारों की उसने जोरदार वकालत की है. वह अधिकारों को न्याय का पर्याय मानता हैं. समाज में, ‘न्याय की पकड़ तभी तक संभव है जब तक वहां मानवाधिकारों का सम्मान होता है.’9—यह बात उसने अनेक संदर्भों के साथ, कई बार-घुमा-फिराकर कही है. उसका मानना है कि अधिकार मनुष्य की स्वतंत्रता का प्रतीक हैं, आदर्श समाज में ये व्यक्ति को सहजरूप में प्राप्त होने चाहिए. इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारक इसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा संपत्ति संबंधी अधिकारों ज्यादा महत्त्व देते हैं. उनका मानना है कि अर्जित संपत्ति पर मनुष्य का पूरा अधिकार है. और राज्य समेत किसी को भी इस अधिकार में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है. जो कानूनी रूप से जिसका है, वह उसको सहज-स्वाभाविक रूप में प्राप्त हो—यह इच्छा-स्वातंत्र्यवादी न्याय का आधार-सिद्धांत है. संपत्ति संबंधी अधिकारों को लेकर उनका आग्रह इतना अधिक है कि अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य जो मानवीय स्वतंत्रता का असली पहचान है, कदाचित पीछे छूटा प्रतीत होता है. आगे हम नॉजिक की न्यायाधारित समाज की परिकल्पना में अधिकारों के महत्त्व पर विचार करेंगे. यह जानने की कोशिश करेंगे कि उसकी ‘स्वत्व’ अथवा ‘आत्म-स्वामित्व’ की सैद्धांतिकी क्या है? साथ ही हम इसपर भी विचार करेंगे कि नॉजिक के लिए संपत्ति अधिकार, संपत्ति के मायने तथा उसकी विशिष्टयां क्या हैं?

1. सर्वसुलभ मौलिक अधिकार

नॉजिक के लिए न्यायाधारित समाज की पहली विशेषता है कि उसमें व्यक्ति के मूलभूत अधिकार सुरक्षित होने चाहिए. हालांकि वहां उसका चिंतन केवल संपत्ति संबंधी अधिकारों की विवेचना तक सीमित होकर रह जाता है. उसके अनुसार प्रत्येक मनुष्य का अर्जित संपत्ति पर पूर्णाधिकार है. वह उसको अपनी मर्जी के अनुसार खर्च कर सकता है, दान में दे सकता है. इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारक मानते आए हैं कि मनुष्य अपना मालिक स्वयं होता है. नॉजिक की पुस्तक ‘अनार्की, स्टेट एंड यूटोपिया’ में ‘आत्म-स्वामित्व’(सेल्फ आनरशिप) शब्द केवल एक बार, उस समय आता है, जब वह कराधान और बेगार पर चर्चा करता है. उसकी परिभाषा में आत्म-स्वामित्व वह अवस्था है जब स्वामी और वस्तु एक और समान हो. अपने शरीर पर सबसे पहला अधिकार मनुष्य का है. अपने श्रम एवं योग्यता के बल पर वह जो भी अर्जित करता है, उसका लाभ उसे मिलना ही चाहिए. आत्मस्वामित्व के अलावा वह ‘संपूर्ण स्वामित्व’ की अवधारणा को भी स्पष्ट करता है. उसके अनुसार समाज में न्याय की उपस्थिति तभी संभव है जब व्यक्ति को अपने कमाई पर पूरा अधिकार हो. वह अर्जित संपत्ति को बेचने, अंतरित करने को पूरी तरह स्वतंत्र हो. आत्मरक्षा और संपत्ति की सुरक्षा के लिए शत्रु का प्रतिकार करने, हिंसा को टालने, नुकसान की वैध तरीकों से भरपाई करने का अधिकार व्यक्ति को मिलना चाहिए. यह भी ‘संपूर्ण स्वामित्व की श्रेणी में आता है. संपूर्ण स्वामित्व की दूसरी घटनाएं संपत्ति के अंतरण, सुरक्षा, दंगों तथा किसी भी अन्य प्रकार की आपदा से संपत्ति को होने वाले नुकसान से बचाव के अधिकार के रूप में आता है. यह संपत्ति अधिकार के प्रति दूसरों की विनम्र सहमति, नैतिक सामर्थ्य, तथा संपत्ति के उपयोग को लेकर स्वामी के असीमित अधिकार का प्रतीक होती है. लेकिन ‘संपूर्ण स्वामित्व’ का आशय अर्जित संपत्ति के मनमाने प्रयोग का अधिकार नहीं है. हाकी खिलाड़ी को मैदान में इस बात का पूरा अधिकार होता है कि वह अपनी स्टिक का कमाल दिखाकर प्रतिद्विंद्वी टीम को मैदान में पूरी तरह छका दे. उससे लगातार गोल दागे. लेकिन उसको हाकी स्टिक से प्रतिद्विंद्वी का सिर फोड़ने का अधिकार नहीं दिया जा सकता. व्यक्ति इस बात के लिए पूर्ण स्वतंत्र है कि अर्जित संपत्ति का विधिमान्य ढंग से अपने सुख एवं स्वतंत्रता के विस्तार हेतु प्रयोग करे, लेकिन दूसरों को उसके माध्यम से हानि पहुंचाए, यह स्वतंत्रता उसे हरगिज नहीं दी जा सकती. क्योंकि प्रकारांतर में ऐसा करना, दूसरों के जीवन में अवांछित हस्तक्षेप है, जिसका इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारक विरोध करते हैं. साफ है कि संपत्ति पर संपूर्ण अधिकारिता का भाव भी दूसरे के अधिकार और जीवन का सम्मान करने की भावना से जुड़ा है. उसमें केवल वे वैध उपयोग सम्मिलित हैं, जो बिना दूसरे के जीवन और स्वतंत्रता में अवांछित, अनाधिकार हस्तक्षेप किए बगैर विधिमान्य ढंग से प्रदान किए जाते हैं. इसलिए संपूर्ण स्वामित्व भी समाज द्वारा मर्यादित, नियंत्रित उपयोग लिए होता है. इसलिए कुछ विद्वानों ने इसके लिए ‘सीमित निजी-स्वामित्व’ भी कहा है. हालांकि स्वयं नॉजिक इस शब्द-युग्म के प्रयोग से बचा है. वह निजी संपत्ति को जरूरी मानता है. उसका जोरदार तरीके से समर्थन भी करता है. साथ ही जोड़ देता है कि व्यक्ति बिना दूसरों को किसी भी प्रकार भी प्रकार की क्षति पहुंचाए, उग्रता दिखाए या दूसरों की स्वतंत्रता को बाधित किए निजी संपत्ति के उपयोग हेतु पूरी तरह स्वतंत्र है.

2.  न्यायसंगत अधिग्रहण

संपत्ति के अर्जन को लेकर इच्छा-स्वातंत्र्यवादी दृष्टिकोण पूरी तरह स्पष्ट है. मनुष्य का केवल उसी संपत्ति के उपयोग पर नैतिक अधिकार है, जो उसने न्याय संगत ढंग से अर्जित की हो. ऐसी संपत्ति जो उसने बलपूर्वक हथियाई गई हो, जिसके अर्जन में उसका कोई योगदान न हो, उसके उपयोग का व्यक्ति को कोई नैतिक अधिकार नहीं है. मगर समाज में हर बार आदर्श से काम नहीं चलाया जा सकता. कुछ व्यावहारिक दृष्टिकोण भी अपनाना पड़ता है. मनुष्य दूसरे के श्रम से से अर्जित वस्तु का उपयोग करे, यह उचित नहीं है. किंतु यदि उस अस्वामित्व युक्त संसाधनों, यानी ऐसे संसाधनों द्वारा जिनपर व्यक्ति का वैध अधिकार न हो, की मदद से यदि वह कुछ अर्जित करता है, तब उस उत्पाद पर किसका अधिकार माना जाएगा? न्यायसंगत अधिग्रहण में इसी पर विचार किया गया है. उसके अनुसार ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जो अस्वामित्वयुक्त संपत्ति पर अपना दावा करते हुए उससे कुछ अर्जित करता है, उसके लिए उचित है कि अर्जित उत्पाद के बड़े हिस्से को दूसरों के लिए छोड़ दे. यह सीधा-सा व्यावहारिक द्रष्टिकोण है. जिसको मानवीय कमजोरियों के बीच सामंजस्य तथा समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखने की अनुकरणीय कोशिश के रूप में भी देख सकते हैं. यह व्यावहारिकता के दबाव ही हैं कि प्रायः सभी इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विद्वान अस्वामित्वयुक्त संपत्ति पर कब्जे की स्थिति को स्वीकारते हैं. लेकिन वे उस अस्थायी अधिकार या व्यवस्था को उसी सीमा तक मान्यता देते हैं, जब तक वह कुछ न्यूनतम शर्तों का पालन करता है. उनके इस द्रष्टिकोण की आलोचना भी होती रही है. ‘अनाधिकृत संपत्ति पर अधिकार’ की तीन भिन्न स्थितियों की चर्चा इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारकों ने की है. उनके अनुसार मान लीजिए कोई व्यक्ति किसी ऐसे संसाधन पर जो उसके स्वामित्त्व से बाहर है, श्रम करते हुए कुछ अर्जित करता है. अथवा जिसका वह संसाधन है, उसके साथ मिलकर श्रम करते हुए उत्पादन में सहायक बनता है—तब उसका उस उत्पाद पर कितना और किस सीमा तक अधिकार होगा?

बिलकुल भी नहीं….शून्य.’ आलोचक खरा जवाब देते हैं. उनके अनुसार यदि कोई व्यक्ति चैराहे पर खड़ी कार के शीशों की, बगैर उसके स्वामी की अनुमति के आकर सफाई करने लगे तो उसको उस कार का स्वामित्व नहीं दिया जा सकता. इसके समर्थन में यदि कोई यह दावा करे कि इस प्रकार मिला-जुला श्रम आवश्यक है, और समाज में बिना श्रम का साझा किए काम नहीं चलता, तब तो न्याय-संगत अधिकारिता की अवधारणा ही अर्थहीन होकर रह जाएगी. क्योंकि तीसरा अचानक बीच में आकर दूसरे व्यक्ति द्वारा संपत्ति पर बलात् कब्जे को भी बैध घोषित कर सकता है. इससे उस व्यक्ति के अधिकारों का सीधा हनन होगा, जो उत्पादन के लिए वाकई जिम्मेदार है, दूसरे व्यक्ति ने दबंगई दिखाकर जिसके उत्पाद को कब्जाने की कोशिश की है. राजशाही और साम्राज्यवाद में यही होता था. अपने सम्राट या आश्रयदाता को प्रसन्न करने के लिए ऐसा सुझाव उनके मुंह-लगे दरबारी प्रायः देते ही रहते थे. यात्रा के दौरान जंगल में एक रात बिता लेने का मतलब यह नहीं है कि आप उसपर स्वामित्व का दावा ठोकने लगें. तीसरे अधिग्रहण अथवा कब्जे के माध्यम से अर्जित संपत्ति पर आवश्यक नहीं कि वह आपके संपूर्ण स्वामित्व वाली ही हो. उनके स्वामित्व को लेकर दूसरे लोगों की भी वैसी ही दावेदारी संभव है. उस अवस्था में वास्तविक स्वामी जानबूझकर या अनजाने ही अपनी दावेदारी पेश करने में चूक भी सकता है. साफ है कि सांसारिक वस्तुओं पर संपत्ति अधिकारिता ऐतिहासिक संदर्भ लिए रहते हैं. यह समस्याएं इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारकों के समक्ष पहले से ही थीं. नॉजिक ने उसकी सरल और सटीक विवेचना की है.

संपत्ति अधिग्रहण को लेकर राबर्ट नॉजिक ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाता. इस विषय में उसका मन संशयग्रस्त है. वह लॉक से सहमति दर्शाते हुए श्रम के सम्मिश्रण पर अपना ध्यान केंद्रित रखता है. उल्लेखनीय है कि ईसाई परंपरा में समस्त भूमि परमात्मा की मानी जाती है. राजा धरती पर परमात्मा के परम-पुत्र का प्रतिनिधि है. राजा को दैवीय-अधिकार से संपन्न मानने वाले सोलहवीं शताब्दी के अंग्रेजी लेखक राबर्ट फिल्मर ने लिखा था कि परमात्मा ने समस्त भूमि ईसा मसीह को सौंपी थी. मसीह ने उसको नागरिकों के बीच विभाजित कर दिया. फिल्मर के कथन कि परमात्मा ने संपूर्ण धरा ईश्वर के प्रतिनिधि यानी राजा को सौंपी गई थी, का विरोध करते हुए लॉक ने ‘सैकिंड टिट्रीज आन गवर्नमेंट’ में लिखा कि ईश्वर के सामने राजा और प्रजा के प्रश्न उठाने का कोई औचित्य नहीं है. उसके अनुसार परमात्मा ने जमीन सीधे जनसाधारण को उसकी सामान्य देखभाल के लिए सौंपी थी. इसलिए वह स्वामित्व से परे है. प्रत्येक व्यक्ति का उसपर उतना ही अधिकार है, जितना किसी दूसरे का है. किसी व्यक्ति द्वारा शेष समाज की मर्जी के बगैर प्राकृतिक संपत्ति और संसाधनों पर किसी भी प्रकार की दावेदारी अवैध कही जाएगी. तब मनुष्य के बस में क्या है? भू-उत्पाद पर उसकी दावेदारी का आधार क्या हो? लॉक का मानना है कि मनुष्य परिश्रम के जरिये अस्वामित्व युक्त धरा पर निजी अधिकारिता का दावा कर सकता है. ‘सैकिंड ट्रिटीज आन दि सिविल गवर्नमेंट’ के पांचवे अध्याय में वह तर्क देता है—

1. यदि कोई व्यक्ति अपने स्वामित्व युक्त वस्तु को किसी ऐसी वस्तु में मिलाता है, जिसका कोई स्वामी नहीं है, तो वह वस्तु उस व्यक्ति की मान ली जाती है.
2. प्रत्येक मनुष्य को अपने श्रम पर पूरा अधिकार है.
3. इसलिए जब कोई व्यक्ति अपने श्रम को जिसका वह स्वामी है, अस्वामित्व युक्त भूमि से योग करता है तो वह उसपर स्वामित्व प्राप्त कर लेता है.11

लॉक का ‘श्रम-सम्मिश्रण’ के आधार पर संपत्ति-अधिकार के पक्ष में दिया गया यह तर्क दोषपूर्ण था. चूंकि अन्यान्य प्राणियों, वस्तुजगत की भांति मनुष्य भी प्रकृति का ही हिस्सा है. इसलिए शोधन, परिशोधन अथवा रूपांतरण के बहाने व्यक्ति द्वारा प्राकृतिक संसाधनों पर जिन तर्कों के आधार पर निजी अधिकारिता का दावेदारी की जाती है, उसी तरह, उन्हीं तर्कों के आधार पर प्राकृतिक संपदा होने के कारण मनुष्य पर भी प्रकृति या समाज की दावेदारी संभव है. उस अवस्था में मनुष्य की अविकल स्वतंत्रता की अवधारणा खटाई में पड़ सकती है. इन कमियों के बावजूद लॉक का विचार आधुनिक इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विद्वानों को आकर्षित करता है. स्वयं नॉजिक ने भी श्रम-सम्मिश्रण के विचार को दोषपूर्ण माना था. हालांकि वह उसका सार्थक विकल्प देने में असमर्थ रहा था. नॉजिक के अनुसार ‘श्रम-सम्मिश्रण’ के सिद्धांत की कमजोरी है कि इस आधार पर हुए संपत्ति अंतरण पर स्वामित्व की सीमा के बारे में ठोस समाधान नहीं देता. उदाहरण के लिए मान लीजिए मंगलग्रह की यात्रा पर निकला यात्री उस ग्रह पर उतरने में कामयाब हो जाता है. मंगल की सतह पर उतरने के बाद वह उस स्थल की सफाई करता है. लंबे परिश्रम के बाद वह उस स्थल को साफ और समतल करने में कामयाब हो जाता है. अब यदि मंगलग्रह पर उतरने वाला वह पहला अंतरिक्ष यात्री है तो सवाल उठता है कि श्रम-सम्मिश्रण के सिद्धांत के अनुसार उसका कितनी भूमि पर अधिकार होगा. क्या पूरा मंगल ग्रह उसका मान लिया जाना चाहिए, अथवा केवल वह स्थल जितना उसने साफ किया है? नॉजिक इस प्रश्न को यहीं छोड़ देता है. उत्तर नहीं देता. उसकी ओर एक सुझाव यह भी आता है कि ‘श्रम-सम्मिश्रण’ के विचार को ही किनारे कर अधिकारिता की समस्या पर व्यक्तिमात्र की मौजूदगी तथा उसकी मूलभूत आवश्यकता को ध्यान में रख, उपयोगितावादी द्रष्टिकोण से विचार किया जाए.

आगे बढ़ने से पहले उचित होगा कि उस समस्या पर विचार कर लिया जाए जिसका हमने ऊपर उल्लेख किया है. यानी अस्वामित्वयुक्त यानी नैसर्गिक संपदा पर निजी अधिकारिता को किस प्रकार परिभाषित किया जाए? उसके वर्गीकरण का आधार क्या हो? ‘श्रम-सम्मिश्रण’ के आधार पर व्यक्ति की संपत्ति कितनी और किस सीमा तक उचित है. कुछ विद्वान इसे सीमाहीन मानते हैं. उनके अनुसार यह मनुष्य पर है कि अपनी योग्यता और सामर्थ्य के बल पर वह अस्वामित्वयुक्त वस्तुओं के जितने बड़े हिस्से पर दावा ठोंक सकता है, वह उसका अधिकार है—जो उसको मिलना ही चाहिए. लेकिन उनके आगे भी व्यावहारिक समस्याएं कम नहीं है. ‘श्रम-सम्मिश्रण’ के आधार पर मनुष्य जिस संपत्ति पर अपनी दावेदारी प्रस्तुत करना चाहता है, संभव है उसके पहले से ही लोग उसका किसी ओर रूप में उपयोग कर चुके हों. उदाहरण के लिए एक किसान जंगल को साफ कर, उसको खेती लायक बनाता है. वह साफ की गई जमीन पर अपने स्वामित्व का दावा भी करता है. लेकिन किसान जमीन को उपयोग में लाने वाला अकेला पहला व्यक्ति नहीं है. यह पूरी तरह संभव है कि उससे पहले भी कुछ लोग उसका उपयोग कर चुके हों. गांव के आसपास खाली पड़ी जमीन का उपयोग लोग पशुओं को बांधने, उपले थापने के लिए करते हैं. बाद में उस जमीन पर कोई व्यक्ति घर बना लेता है, अथवा खेती या कुछ और करने लगता है. यदि प्रथम उपयोग ही स्वामित्व की शर्त है तो बाद में जिसने उस जमीन पर गृह-निर्माण किया है, उसका अधिकार अवैध माना जाना चाहिए. किंतु अवैध कहे जाने की बात तब तक निराधार है, जब तक कि बाकी लोगों को उससे कोई आपत्ति न हो. यदि वह समाज द्वारा मान्य चलन है तो ऐसे संपत्ति अधिकार को मान्यता देनी होगी. हालांकि यह भी संभावना है कि उस संपत्ति अधिकार से शेष लोगों को कोई शिकायत न हो, किंतु हमेशा ही उन्हें कोई शिकायत या नुकसान न होगा, यह कहना बहुत ही कठिन है. यह भी संभव है कि उस कब्जे से केवल संबंधित व्यक्ति को लाभ हो, जबकि बाकी गांव वालों को नुकसान उठाना पड़ रहा हो. क्या उस अवस्था में भी उस व्यक्ति के संपत्ति प्राधिकार को वैध माना जाएगा. इस तर्क के बाद समाधान के लिए नॉजिक पुनः लॉक की ओर देखने लगता है और लॉक ऐसे संपत्ति प्राधिकार को, जिससे दूसरों को हानि पहुंचने की संभावना हो, इस शर्त के साथ स्वीकृति देता है कि दूसरों के लिए भी श्रेष्ठ और पर्याप्त हिस्सा छोड़ दिया जाना चाहिए—

‘बहती नदी से पानी पी लेने से किसी को नुकसान पहुंच सकता है? इसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता. भले किसी ने उससे आकंठ जल पिया हो. क्योंकि नदी वैसी की वैसी वहां होगी, दोनों की प्यास बुझाने के लिए पर्याप्त. यदि बात दोनों के लिए ठीक-ठाक पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध भूमि के बारे में भी कही जा सकती है.’12 नॉजिक के अनुसार अस्वामित्वयुक्त संपत्ति पर अधिकार दर्शाने के लिए लॉक के उपर्युक्त प्रतिबंध का पालन किया जाना चाहिए. हालांकि इस तर्क में इतनी खामियां हैं कि स्वयं नॉजिक ही उससे संतुष्ट नहीं हो पाता. अपने तर्क को आगे बढ़ाता हुआ वह लिखता है, ‘किसी भी व्यक्ति का स्वामित्व उससे अधिक भला क्यों हो, जितना उसने किसी पदार्थ की मूल्यवत्ता को बढ़ाने में योगदान दिया है.’13 अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले वह स्थिति की पूरी व्याख्या करता है. कोई व्यक्ति किसी वस्तु का स्वामित्व हासिल करने के लिए अपना श्रम क्यों लगाता है. शायद इसलिए कि उसके पास केवल उसका श्रम है. उसी के माध्यम से वह अपनी उपयोगिता दर्शा सकता है. जब कोई व्यक्ति अस्वामित्वयुक्त वस्तु पर अपना श्रम लगाता है, जो उसका श्रम उस वस्तु पर छा जाता है. उसका प्रभाव वस्तु पर स्पष्ट झलकने लगता है. श्रम के पश्चात वस्तु ठीक पहले जैसी नहीं रहती. श्रम का यही प्रसार दूसरों के मुकाबले वस्तु पर श्रमिक की दावेदारी को पुष्ट करता है. लेकिन श्रम का स्वरूप क्या हो? क्या किसी भी प्रकार के श्रम से वस्तु पर दावेदारी कर पाना नैतिक होगा. नॉजिक इस एक उदाहरण के माध्यम से स्पष्ट करता है, ‘मान लीजिए मेरे हाथ में टमाटर के सूप से भरी एक केन है. उस केन को मैं यदि समुद्र की लहरों पर बहा दूं तो सूप के कण समुद्र में दूर तक फैल जाएंगे. क्या उसके आधार पर समुद्र के उतने हिस्से पर, जहां तक टमाटर सूप के कण फैले हैं, मैं अपने स्वामित्व का दावा कर सकता हूं. जाहिर है यह मूर्खतापूर्ण बात होगी.’ इसके बाद वह निष्कर्ष पर आता है कि वही श्रम स्वामित्व दिलाने में सहायक है, जिससे वस्तु के मूल्य में वृद्धि होती है. वह अपनी और समाज की नजरों में अधिक मूल्यवान होता हो. यह एक महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष है. जो जीवन के उद्देश्य तथा समाज में मनुष्य की उपयोगिता के लिए मार्गदर्शक का काम करता है. कोई कार्य जो केवल व्यक्ति विशेष के लिए मूल्यवान है, बाकी लोगों के लिए व्यर्थ, बल्कि नुकसानदेह तो उसका संसार में उसका वास्तविक मूल्य शून्य है. उदाहरण के लिए उपर्युक्त उदाहरण में ऐसा हो सकता है कि टमाटर सूप को पानी पर बहाना किसी व्यक्ति के लिए खेल हो, उसे उससे खुशी मिलती हो. लेकिन यदि उससे समुद्र में किसी प्रकार का प्रदूषण फैलता है, तो उसका नुकसान पूरे समाज को होगा. जाहिर है कि व्यक्ति का श्रम-उत्पाद न केवल उसके लिए, बल्कि बाकी समाज उपयोगी होना चाहिए, तभी व्यक्ति की उसपर दावेदारी वैध मानी जाएगी. श्रम का सकारात्मक उपयोग, अपने साथ-साथ दूसरों का भी भला देखना ही स्वत्वाधिकार की पहली और आखिरी शर्त है.

3.  न्यायसंगत अंतरण

न्यायसंगत अंतरण संपत्ति पर संपूर्ण स्वामित्व की स्थिति को दर्शाता है. समाज में संपत्ति अंतरण के निकृष्ट रूप भी प्रचलित हैं. उदाहरण के लिए कुछ व्यक्ति चोरी कर, दूसरे के धन को घर ले आते हैं. कुछ ऐसे लोग भी हैं जो इसके लिए धोखादड़ी जैसे आसान किंतु हेय रास्ते का चयन करते हैं. इससे संपत्ति अंतरित होकर उनके कब्जे में चली जाती है. लेकिन उसपर न्यायिक दावेदारी संभव नहीं है. चोर यह कहकर कि उसने संपत्ति संचय के लिए चोरी का सहारा लिया है, उसपर अपनी दावेदारी नहीं कर सकता. न ही कोई धोखेबाज व्यक्ति दूसरों के साथ छल-प्रपंच के आधार पर जुटाई गई संपत्ति को अपना बना सकता है. इसी प्रकार यदि कोई संपत्ति का स्वामी है, मगर उसके अंतरण के लिए तैयार नहीं है. उसकी असहमति के बावजूद यदि उसे संपत्ति-अंतरण हेतु बाध्य किया जाता है, तो उस अवस्था में, भले ही अंतरण की प्रक्रिया विधि-सम्मत हो, स्वामी के इच्छा-विरुद्ध वस्तु के अंतरण को न्यायिक नहीं कहा जा सकता. यदि उस वस्तु से व्यापक लोकहित जुड़े हैं तथा अंतरण की प्रक्रिया विधि-सम्मत है तब भी व्यक्ति को उस अंतरण के लिए राजी करना न्याय-भावना के अनुसार अपेक्षित होगा. ऐसे राज्य में जो न्याय-मार्ग पर होने की दावेदारी करता है, अंतरण हेतु वैध प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है. तदनुसार संपत्ति पर स्वामित्व के अंतरण के लिए आवश्यक है कि उसे स्वेच्छापूर्वक, वैध, न्याय-सम्मत प्रक्रिया के माध्यम से संपन्न किया जाए. यदि कोई व्यक्ति किसी संपत्ति या संसाधन पर अधिकार रखता है, उसका अधिकार विधिसम्मत तथा समाज द्वारा मान्य है, तभी वह उसको किसी दूसरे को अंतरित करने का अधिकार भी रखता है. श्रमिक के मामले में यदि कोई श्रमिक किसी कार्य को स्वेच्छापूर्वक करने के लिए तैयार नहीं है, तब उसकी मर्जी के बिना कार्य करने के लिए बाध्य किया जाना, इस विचारधारा के अंतर्गत अमान्य है.

एक स्थिति यह भी हो सकती है कि कोई व्यक्ति अपने स्वामित्वयुक्त वस्तु को न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से किसी व्यक्ति को अंतरित करना चाहता हो, किंतु दूसरा व्यक्ति उसे लेने के लिए तैयार न हो. नॉजिक जोर देकर कहता है कि संपत्ति अंतरण की वैधता हेतु दाता की सहमति अनिवार्य है. लेकिन लेने वाले की सहमति? यदि कोई व्यक्ति किसी दान या उपहार को लेना न चाहे, तब? इस स्थिति को वह पूरी तरह स्पष्ट नहीं कर पाता. लेकिन वह जोर देकर कहता है कि क्रेता को उस अवसर पर उपस्थित अवश्य होना चाहिए. मौन को सहमति का पर्याय मानते हुए वह इस निर्णय पर पहुंचता है कि संपत्ति अंतरण की प्रक्रिया के दौरान क्रेता की सहमति भी अनिवार्य है. यानी कोई व्यक्ति कहे कि उसने संपत्ति का स्वेच्छापूर्वक अंतरण किया है, मगर संबंधित व्यक्ति उसे स्वीकार करने से इन्कार कर दे, तब अंतरण की प्रक्रिया को अपूर्ण माना जाएगा. दूसरे शब्दों में अंतरण-प्रक्रिया को भली-भांति संपन्न होने के लिए क्रेता के साथ-साथ विक्रेता की सहमति भी अनिवार्य है. यह कार्य दोनों के हितों को ध्यान में रखकर शांतिपूर्वक और विधिसम्मत ढंग से किया जाना चाहिए. नॉजिक के अनुसार जो शर्तें किसी वस्तु के अर्जन पर लागू होती हैं, वही शर्तें उसकी बिक्री या अन्य किसी अंतरण पर भी लागू होती हैं. उदाहरण के लिए यदि किसी शर्त के अधीन किसी को दुनिया में कहीं से भी पेयजल लेने से प्रतिबंधित कर दिया है, तो इस नियम की पूर्वापेक्षा और शर्त के अनुसार उस व्यक्ति के लिए पेयजल की बिक्री भी स्वाभाविक रूप से प्रतिबंधित होगी. दूसरे शब्दों में यदि किसी व्यक्ति के लिए कोई वस्तु निषिद्ध मान ली गई है, तो उसके उपयोग की छूट, उस व्यक्ति को किसी भी प्रकार से नहीं दी जा सकती. कुछ स्थानों पर हम नॉजिक को अस्पष्ट और धुंधला पाते हैं. वस्तुविशेष के स्वामित्व को लेकर यह दावा प्रायः किया जाता है कि उसमें सभी अधिकार पूर्ण अंतरणीय हैं. लेकिन यह सोचा-विचारा सत्य नहीं है. ऐसे अनेक उदाहरण खोजे जा सकते हैं जिसके अनुसार व्यक्ति के पास किसी वस्तु को अपने पास रखने का अधिकार हो, किंतु उसके अंतरण का अधिकार उसके पास न हो. मसलन, किराये का मकान, जिसमें व्यक्ति रह सकता है, उसपर अपने तात्कालिक कब्जे की दावेदारी कर सकता है, अपने सामर्थ्य के अनुसार उसकी मरम्मत, सजावट आदि पर धनराशि भी खर्च कर सकता है, किंतु उसे बेचना उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर होता है. आशय है कि यदि व्यक्ति का संपूर्ण स्वामित्व किसी वस्तु पर है, तभी उसे उस वस्तु को बेचने अथवा इच्छानुसार अंतरित करने के वाजिब अधिकार प्राप्त होंगे. एक तरह से वह वस्तु उसकी दास के समान होगी. उसके बारे में संपूर्ण निर्णय लेने का अधिकार, उसका स्वामी होने के कारण उसके पास माना जाएगा. किसी को अनाधिकार बेचना, अथवा वैध स्वामी की इच्छा के बिना, वस्तु का मूल्य चुकाए बगैर उसे अपने स्वामित्व में लेना अनैतिक एवं स्वामित्व के सिद्धांत का उल्लंघन है. दूसरे शब्दों में वस्तु का संपूर्ण स्वामित्व प्राप्त करने के लिए वस्तु के वर्तमान स्वामी की सहमति जुटाना, फिर उसका उपयुक्त मूल्य चुकाना आवश्यक है. इनमें से एक भी अभाव, अथवा आंशिक विचलन से भी संपूर्ण स्वामित्व खतरे में पड़ सकता है. न्याय की मांग है कि वस्तु का अंतरण संपूर्ण स्वामित्व से संपूर्ण स्वामित्व के लिए हो. यदि कोई सोचता है कि न्याय का मुख्य उद्देश्य वस्तु-विशेष पर संपूर्ण स्वामित्व की रक्षा करना, अथवा स्वामित्व को बढ़ावा देना, अथवा उसके लिए प्रभावी कोशिश करना है, उस अवस्था में स्वैच्छिक दासत्व समस्या हो सकती है. इसपर यदि कोई यह सोचता है कि न्याय का मूल उद्देश्य केवल स्वायत्तता को बचाए रखने की कवायद है, तब भी वह गलती पर है. उदाहरण के लिए अपने परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए सोच-समझकर खुद की बोली लगवाना, खुद की नीलामी पर उतर आना—केवल स्वायत्तता की कवायद मानी जाएगी. हालांकि इस तरह से किसी व्यक्ति द्वारा अपनी स्वायत्तता के विचार को लागू करना, उसकी चरम कार्रवाही कहा जाएगा. आदर्श समाज में ऐसी स्थिति की कल्पना भी नहीं की जा सकती.

4.  न्यायिक संशोधन एवं निवारण

न्याय सौगात नहीं है. न ही समाज में हमेशा सब कुछ शुभ और शांतिमय होता है. प्रत्येक समय समाज में अनुकूल एवं विरोधी शक्तियां कार्यरत रहती हैं. वे कभी मनुष्य के कर्तव्य पालन में सहायक बनती हैं तो कभी विरोध पर उतर आती हैं. इसलिए न्याय का एक रूप संघर्ष का भी है. समाज चाहता है कि वहां न्याय के लिए कभी कोई खतरा न हो. यानी न तो व्यक्ति किसी दूसरे के अधिकारों के लिए संकट का कारण बने, न ही कोई उसके अधिकारों के लिए संकट की जमीन तैयार करे. यह आदर्श स्थिति है. व्यवहार में समाज में संघर्ष की स्थितियां बनी रहती हैं. राज, समाज किसी के लिए भी यह संभव नहीं होता कि वह चैबीस घंटे व्यक्ति के अधिकार-संरक्षण तथा कर्तव्यपालन के प्रेरणा में लगा रहे. इसलिए व्यक्ति को अपने अधिकारों और अस्तित्व पर संकट के समय, आत्मरक्षा अथव संपत्ति की सुरक्षा के लिए समयानुसार प्रतिकार करने की छूट दे दी जाती है. यह सामाजिक गतिविधियों में संशोधन एवं निवारण के दौरान न्याय की स्थिति को दर्शाती है. राबर्ट नॉजिक के अनुसार व्यक्तिमात्र को यह आजादी होती है कि वह अपने अधिकार, संपत्ति और जीवन की रक्षा के लिए आवश्यकता पड़ने पर उपयुक्त बलप्रयोग कर सके, मगर यह ध्यान रखते हुए कि संकट अथवा आसन्न आपदा की स्थिति में दूसरों को भी वही अधिकार उपलब्ध होंगे. यदि ‘क’ को ‘ख’ द्वारा किए गए दुराचरण से नुकसान उठाना पड़ा है तब, ‘क’ को उसका समयानुसार प्रतिरोध करने तथा नुकसान की स्थिति में ‘ख’ से क्षतिपूर्ति का दावा करने का पूरा अधिकार होगा. इसके बावजूद यदि ‘ख’ का दुराचरण बना रहता है, तब ‘क’ को उसे कानून द्वारा अथवा सीधे ही दुराचरण के लिए दंडित करने का अधिकार होगा. ये अधिकार सामाजिकता की नींव हैं तथा सभी सदस्यों को बराबर होते हैं. उपर्युक्त उदाहरण की ही बात करें तो यदि किसी भी क्षण ‘क’, ‘ख’ के साथ दुराचरण में लिप्त पाया जाता है तो ‘ख’ को भी अधिकार होगा कि वह ‘क’ को दंडित कर सके, और यदि उसके आचरण से उसको क्षति पहुंची है तो अपनी क्षतिपूर्ति के लिए दावा कर सके.

नॉजिक की खूबी है कि अपने विवेचन में वह न केवल मानव-व्यवहार की दुर्बलताओं पर विचार करता है, बल्कि मानवीय स्वतंत्रता के दायरे में उनका समाधान भी सुझाता है. अपने सूक्ष्म विवेचन सामर्थ्य से वह जहां अनेक गंभीर मुद्दों का समाधान देता है, वहीं कुछ मुद्दों को अनसुलझा ही छोड़ जाता है. व्यक्ति को अपनी प्राणरक्षा, संपत्ति रक्षा का अधिकार है, आवश्यकता पड़ने पर वह अपने ऊपर होने वाले किसी भी प्रकार के हमले का प्रतिकार कर सकता है. और यदि किसी के आचरण से उसको नुकसान पहुंचा है तो उस नुकसान की भरपाई की दावेदारी भी कर सकता है. मनुष्य को ये अधिकार कुछेक परंपरागत समाजों को छोड़कर, प्रायः सभी आधुनिक समाजों में प्राप्त हैं. इसके बावजूद विद्वानों के एक वर्ग को नॉजिक के अति-व्यक्तिवादी सोच से आपत्ति है. यह आपत्ति अकेले नॉजिक से नहीं, लगभग सभी इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारकों से है. उन्हें लगता है कि संपत्ति अधिकार को लेकर व्यक्ति-स्वातंत्र्य का समर्थन करते हुए वे इतनी आगे निकल जाते हैं कि उसके विचारों में व्यक्तिवाद उन्मुक्त और उच्छ्रंखल दिखने लगता है. इससे भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षतिपूर्ति की दावेदारी का अधिकार है. लेकिन क्षतिपूर्ति की सीमा क्या हो? इसको तय करने का अधिकार किसे होगा? क्या केवल उसको जिसे क्षति पहुंची है? यदि वह अपनी क्षति का बढ़-चढ़कर मूल्यांकन करता है तब क्या होगा? ऐसे में यदि सरकार कानून के माध्यम से हस्तक्षेप करती है तो क्या उसका प्रयास व्यक्ति-स्वातंत्र्य के दायरे में अनावश्यक माना जाएगा? ऐसे प्रश्नों पर प्रतिक्रिया बहुत विलंब से मिल पाती है. राबर्ट नॉजिक की ओर से अपराध के लिए दूसरे को दंडित करने का सुझाव पर बहुतों को आपत्ति है. उनके अनुसार व्यक्ति को अपने ही स्तर पर दंड सुनाने का कोई अधिकार नहीं है. क्योंकि नुकसान की भरपाई किस सीमा तक हो? यदि यह उस व्यक्ति पर छोड़ दी जाए जिसका नुकसान हुआ है, तो वह सही है या गलत इसका निर्णय कौन करेगा? अभियुक्त को दंडित करने का अधिकार प्रभावित मनुष्य को एकाएक नहीं दिया जाता. ऐसे मामलों में राज्य की उपस्थिति जरूरी मानने से हालांकि व्यक्ति-स्वातंत्र्य की भावना को ठेस पहुंच सकती है, लेकिन इससे स्वार्थ के वशीभूत हो, एक व्यक्ति द्वारा दूसरे को हानि पहुंचाए जाने की संभावना में भी कमी आती है. यह ऐसा मोड़ है जहां इच्छा-स्वातंत्र्यवाद की सीमा साफ नजर आने लगती है. नॉजिक बड़े परिश्रम से व्यक्तिमात्र के संपूर्ण स्वातंत्र्य का पक्ष लेता है, किंतु संपत्ति के संरक्षण तथा समस्याओं के सीधे निवारण में इच्छा-स्वातंत्र्यवाद की जो दुर्बलताएं हैं, वे थोड़ा-सा विचार करने पर सामने आ ही जाती हैं..

राबर्ट नॉजिक ने कराधान पद्धति की आलोचना की है. लोगों से कराधान जुटाकर उसी धनराशि से पुलिस को पोसना, यह लोगों की नैसर्गिक स्वाधीनता पर डाका डालना है. लेकिन शासन और सरकार चलाने के लिए तो धन चाहिए. नॉजिक इसके लिए लोगों को जागरूक करने की बात करता है. लोगों को अपने अधिकारों और कर्तव्यों का बोध होगा, साथ में यह विश्वास होगा कि उनकी स्वाधीनता अक्षुण्ण है. समाज में रहकर उनकी संपत्ति और अधिकारों को कोई खतरा नहीं है, तो वे स्वयं अनुशासित होकर काम करेंगे. लेकिन समाज में अनुशासन और शांति-व्यवस्था बनाए रखने के अतिरिक्त राज्य के और भी दायित्व होते हैं. शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति, अभिरक्षा जैसे बहुत से मामले हैं जिन्हें बढ़ावा देना राज्य का पुनीत कर्तव्य माना जाता है. उनके लिए धन की आपूर्ति कहां से होगी? नॉजिक इसके लिए दान और स्वैच्छिक सहयोग का समर्थन करता है. यहां नॉजिक और हास्पर्स के विचारों में समानता देखी जा सकती है. जॉन हास्पर्स भी मानता था कि सरकार का एकमात्र कार्य ‘उपद्रव आदि के समय लोगों के जान-माल की रक्षा करना है.’ लेकिन उपद्रवियों पर काबू पाने के सरकार के पास समुचित शक्ति और अधिकारों का होना जरूरी है, ताकि अवसर पड़ने पर वह न्यायकर्ता की भूमिका भी निभा सके. इन सब कार्यों के लिए सरकार के पास धन आना चाहिए. हास्पर्स के अनुसार उपयुक्त तो यही है कि कानून और व्यवस्था के लिए सरकार को धन की आपूर्ति नागरिकों के स्वैच्छिक सहयोग और दान की भावना से हो. यदि कराधान का सहारा लेती है तो कर-राशि का उपयोग केवल समाज में शांति और सुरक्षा के विस्तार के लिए किया जाना चाहिए. वह जोर देकर कहता है—‘समाज में कानून और व्यवस्था कायम रखने के अलावा किसी और कार्य के लिए जनता से धन जुटाने का सरकार को कोई अधिकार नहीं है.’ नॉजिक का न्यायदर्शन एक आदर्शवादी उद्गार है. एक भावुक मन का सर्वशुद्धतावादी सपना. एक ऐसा विचार जिसे मानवतावादी समय-समय पर देखते आए हैं. उसकी कुछ सीमाएं हैं. अनेक समस्याएं ऐसी हैं जिनपर नॉजिक विचार करने से बचा है. इसके बावजूद उसके विचारों में एक आदर्श, मानवतावादी समाज के गठन का सपना मौजूद है. कुल मिलाकर इच्छा-स्वातंत्र्यवाद मनुष्य के अधिकार, स्वतंत्रता और एक आदर्श समाज के सपने को बहुत ही आसान भाषा में दुनिया के सामने लाता है. नथानियल ब्रांडेन के शब्दों में, ‘इच्छा-स्वातंत्र्यवाद बहुत सरल, स्पष्ट, आसान भाषा में लिखा हुआ दर्शन है, जिसे समझने के लिए किसी विशेष तकनीकी योग्यता की आवश्यकता नहीं है. यह जानकारीपरक और आनंददायक पाठ है.’14

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भानुक्रमणिका

1. To live honorably, to harm no one, to give to each his own.” Ulpianus in Digesta of Justinianus Augustus, 1.1.10.1
2. The sovereign is not bound by the laws.-Ulpianus, Digesta 1.3.31.
3. Justice is the constant and perpetual will to render to every man his due.” Digesta 1.1.10.
4. Political theories past and present have traditionally been concerned with who should be the master (usually the king, the dictator, or government bureaucracy) and who should be the slaves, -John Hospers, What Libertarianism Is.
5. No one is anyone else master, and no one is anyone else slave. Since I am the one to decide how my life is to be conducted, just as you decide about yours, I have no right (even if I had the power) to make you my slave and be your master, nor have you the right to become the master by enslaving me. Slavery is forced servitude. Ibid
6. Government should intervene only in a RETALIATORY situation. The government must never INITIATE an action to create a better world — it is not the business of government to make an advance decision about what counts as benefit. Through laws, government can prohibit various aggressive actions, but it cannot require the bringing about of supposedly beneficial ones. John Hospers, What Libertarianism Is.
7. The state of Nature has a law of Nature to govern it.- John Locke, Second Treatise on Civil Government.
8. …no one ought to harm another in his life, liberty, and or property-Ibid.
9. justice to hold just in case rights are respected. -Peter Vallentyne in Nozick’s Libertarian Theory of Justice
10. a right is something for which one can demand or enforce compliance” Nozick in Philosophical Explanations ,1981, p. 499.
11. a. If one mixes what one owns with something that is unowned, one thereby comes to own the unowned thing.
b. Each person owns her own labor.
c. If one mixes one’s labor with unowned land, one thereby comes to own the land.
12. No body could think himself injured by the drinking of another man, though he took a good drought, who had a whole river of the same water left him to quench his thirst: and the case of land and water, where there is enough of both, is perfectly the same.-John Locke: Second Treatise of Civil Government, Chapter 5.
13. Why should one’s entitlement extend to the whole object rather than just to the added value one’s labor has produced?- Nozick, Anarchy, State, and Utopia, p. 175.
14. “Libertarianism is very simply and clearly written and requires no technical knowledge on the part of the reader. Enjoyable, informative reading.”- Nathaniel Branden, as quoted by John Hospers in Libertarianism: A Political Philosophy for Tomorrow.

वितरणात्मक न्याय का उपयोगितावादी द्रष्टिकोण

सामान्य

धर्म एवं अभिजन संस्कृति—13

मुक्त बाजार में स्वतंत्र अभिव्यक्ति भी न्याय, मानवाधिकार, पेयजल तथा स्वच्छ हवा की तरह ही उपभोक्ता-सामग्री बन चुकी है. यह उन्हें ही हासिल हो पाती हैं, जो उन्हें खरीद पाते हैं. वे मुक्त अभिव्यक्ति का प्रयोग भी उस तरह का उत्पादन बनाने में करते हैं जो सर्वथा उनके अनुकूल होता है.— अरुंधती राय

जब हम कहते हैं कि ‘श्रेष्ठतम जनता ही श्रेष्ठतम शासन दे सकती है’—तब इसका अर्थ है कि सुशासन के लिए जनता को शासकों पर नहीं, स्वयं पर भरोसा करना होगा. खुद को इस योग्य बनाना होगा कि बगैर किसी बाहरी मदद के अपना नेतृत्व स्वयं कर सके. देश और समाज से जुड़े मसलों में फैसला करते समय उसे दूसरों से न्यूनतम मदद की अपेक्षा हो. जनता स्वयं शासन को सन्नद्ध होगी तो उसके लिए गठित भारी-भरकम तथा खर्चीले संस्थानों की अनिवार्यता ही नहीं रहेगी. किंतु यह काम क्या इतना ही सरल है! विशेषकर तब जब हम जानते हैं कि शासकवर्ग की उत्पत्ति अनायास नहीं हुई है. आठ-दस हजार वर्षों से, जब से मनुष्य ने सभ्यता की सीढ़ियां चढ़ना सीखा, किसी न किसी रूप में समाज में नेतृत्व की मौजूदगी हमेशा से रही है. जिन दिनों मनुष्य शिकार पर जीवनयापन करता था, खुले जंगलों में रहता था, तब वन्य पशुओं का शिकार अथवा उनके हमलों से समूह की रक्षा करने के लिए कुशल नेतृत्व की आवश्यकता पड़ती थी. उस स्पर्धा में जो स्वयं को कुशल सिद्ध करता, खुद जान पर खेलकर समूह की प्राण-रक्षा करता, वह सम्मान का पात्र बनता था. संभवतः तभी से यह धारणा बनी कि ‘कोई हमसे श्रेष्ठ है….और जो श्रेष्ठ है, वह चुनौती का सामना भी बेहतर कर सकता है.’ उसके अनुसार बाकी लोग उसका अनुसरण करने लगे. यह जीवनानुभवों से उपजा सहज बोध था. कालातंर में इसी ने समाजीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में मदद की.

उन दिनों संबंध सरल थे. कोई कल्पना नहीं कर सकता था कि सामूहिक कल्याण हेतु निःस्वार्थ भाव से नेतृत्व की डगर अपनाने वाले लोग दूसरों को छोटा मानकर उनकी उपेक्षा करने लगेंगे तथा चाहे-अनचाहे नेतृत्व में पीछे रह जाना समाज के बड़े वर्ग का स्वभाव, उनकी आगे आने वाली पीढ़ियों के गले की फांस बन जाएगा. नैसर्गिक कारणों से कुछ मामलों में दूसरों पर आश्रित हो जाने की प्रवृत्ति कालांतर में समाज को शासक एवं शासित में बांट देगी. ऊंच-नीच में बंटे समाज में, अधिसंख्यक निम्नवर्ग की निष्क्रियता तथा अल्पसंख्यक उच्चवर्ग की सक्रियता से होनेवाले विकास की ये स्वाभाविक विसंगतियां हैं. उनमें ताकतवर समूह कमजोर को पीछे ढकेल देता है. परिणामस्वरूप समाज में असमानता पनपती है. निर्णय प्रक्रिया में हिस्सेदारी घटने से अधिकांश लोग दूसरों पर निर्भर होने लगते हैं. उनका खंडित आत्मविश्वास उनके आत्मनिर्भर बनने में बाधा उत्पन्न करता है. उधर शीर्ष पर मौजूद लोग चाहते हैं कि यथास्थिति बनी रहे. उनकी सत्ता पर कोई आंच न आए. उसके लिए वे किस्म-किस्म के षड्यंत्र रचते रहते हैं. चूंकि वे सत्ता के शिखर पर विराजमान होते हैं, अधिकांश संसाधनों पर उनका अधिकार होता है. इसलिए वे जनसाधारण पर, जो अपनी जरूरतों के आधार पर छोटे-छोटे वर्गों में बंटे होते हैं, अपनी स्वार्थपूर्ण हठों को थोपने में कामयाब हो जाते हैं. इससे विपन्नता का शिकार समाज का बड़ा हिस्सा उनपर आश्रित हो जाता है. इन हालात में किसी भी प्रकार का सार्थक हस्तक्षेप उसके सामर्थ्य से परे होता है. परिणामस्वरूप समाज में शीर्षस्थ वर्गों की मनमानी लंबे समय तक चलती रहती है.

इन परिस्थितियों में जनता की वास्तविक मुक्ति का एक ही उपाय है. बौद्धिक नेतृत्व के लिए बाहरी वर्गों पर निर्भरता को समाप्त करना. धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों से अपने बूते निपटना. यह तभी संभव है जब जनता यह जान ले कि कुछ व्यक्तियों के हाथों में नेतृत्व खिसक जाने का अभिप्राय है, अधिकांश का निर्णय-प्रक्रिया से बाहर हो जाना. इससे सामाजिक प्रतिभा का बड़ा हिस्सा उसके विकास में अपना योगदान देने से वंचित रह जाता है. इसका आरंभ भले ही सर्वसम्मिति के आधार पर होता हो, मगर वंचित समूह धीरे-धीरे अभ्यास से कटने लगता है. उस समय बिना यह सोचे-जाने कि योग्यता जन्मजात नहीं होती, वह केवल अर्जित की जा सकती है, विशाल जनसमूह यह मान लेता है कि वह ‘राज करने के लिए नहीं बना है.’ आमजन की यह धारणा नेतृत्वकारी अभिजनों के लिए यथास्थिति बनाए रखने में मदद करती है. स्थिति-परिवर्तन के लिए व्यक्ति की आंतरिक प्रेरणाएं दिशा-निर्देशक सिद्ध होती हैं. लेकिन हालात से अनुकूलन के पश्चात जनसाधारण बदलाव के सपने देखना ही छोड़ देता है. सामान्यतः वह मान लेता है कि ‘राज करने की योग्यता रखने वाले दूसरे वर्ग के लोग हैं ….उसका दायित्व केवल उन लोगों की आज्ञा का पालन करना है.’ शीर्षस्थ अभिजन चाहते हैं, जनसाधारण के ये पूर्वाग्रह बने रहें. उसके लिए वे तरह-तरह के आयोजन रचते हैं. उस समय धर्म और संस्कृति उनके सर्वाधिक भरोसेमंद तथा कारगर हथियार सिद्ध होते हैं. आमूल परिवर्तन के लिए आवश्यक होता है कि विकासोन्मुखी आंतरिक प्रेरणाओं को समाज की कार्यकारी ऊर्जा से जोड़ा जाए, किंतु शीर्षस्थ शक्तियां जिस तरीके से भी संभव हो, यथास्थिति बनाए रखने के लिए प्रयत्नरत रहती हैं. परंपरावादी दबावों के बीच अपने सत्तामोह का औचित्य सिद्ध करने के लिए उनके तर्क बहुत पुराने तथा घिसे-पिटे होते हैं. वे बताते हैं कि नकारात्मक शक्तियों के दमन तथा सकारात्मक को प्रोत्साहित करते हुए, समाज को विकास-पथ पर अग्रसर रखने हेतु शक्तिशाली तंत्र की आवश्यकता पड़ती है. सत्ता की उनकी परिकल्पना कुछ लोगों को अधिकतम अधिकार देकर विभेदकारी व्यवस्थाओं को बनाए रखने की होती है. कभी-कभार लोकतंत्र का नाम लेकर वे अधिकारों की बराबरी की बात अवश्य करते हैं. मगर सामान्यतः उनका आचरण वर्गीय सोच तथा पक्षपात से भरपूर होता है. अपने शीर्षत्व को बचाए रखने के लिए वे सत्ता और संसाधनों का सहारा लेते हैं. इस तरह किसी न किसी बहाने दमन और बलप्रयोग को बढ़ावा देते हैं. उनके नेतृत्व में राज्य आमजन की सामान्य अपेक्षाओं से निरंतर दूर जाता रहता है, परिणामस्वरूप सामाजिक असमानता लगातार बढ़ती जाती है.

यह ठीक है कि समाज में सभी प्रकार के मनुष्य होते हैं. उनमें पुष्ट भी होते हैं और निर्बल भी. सज्जन भी होते हैं, दुर्जन भी. किंतु यह भी उतना ही बड़ा सत्य है कि वे अपनी समस्त अच्छाई-बुराई समाज में रहकर ही ग्रहण करते हैं. जन्म के समय बालक कोरे मस्तिष्क के साथ संसार में आता है. परिवार और समूह के बीच रहते हुए वह सबकुछ जानता-समझता है. उसके और समाज के विकास की धारा एक हो, व्यक्ति एवं समाज के हितों में कोई टकराव न आने पाए, वह सामाजिकता की नींव कहे जानेवाले नैतिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों को भली-भांति ग्रहण कर सके—इसके लिए उसकी उपयुक्त शिक्षा और अनुकूल परिवेश की आवश्यकता पड़ती है. यानी कोरी स्लेट पर इबारत लिखना, मासूम बालक को सभ्यता, संस्कृति तथा जीवनमूल्यों से परचाकर जिम्मेदार नागरिक बनाना, उसे इस योग्य बनाना कि बड़ा होने पर वह अपना दायित्व स्वयं वहन करते हुए अपने और समाज के विकास में यथासंभव योगदान दे सके—यह उसके परिवार और समाज का दायित्व होता है. यह भी सच है कि समाज में अधिकतम व्यक्ति शांतिप्रिय तथा अपने काम से काम रखने वाले होते हैं. वे परंपरा और कानून के दायरे से बाहर निकलने से बचते हैं. उसके लिए अपने मान-सम्मान और हितों से छोटे-मोटे समझौते करने पड़ें तो भी पीछे नहीं रहते. फलस्वरूप समाज में सामान्य शांति बनी रहती है. इससे कहा जा सकता है कि समाजीकरण के अधिकांश मामलों में परिवार और समाज सफल होते हैं. बहुत थोड़े मामलों में परिवार या समाज को लगता है कि व्यक्ति-विशेष का आरचण उसके हितों के प्रतिकूल है. परिवार तो जहां तक संभव हो, सुधार और समझौते की संभावना के साथ काम करता है. किंतु समाज, जो दरअसल बड़ा परिवार है तथा किसी भी मामले में उसके दायित्व और अधिकार परिवार से कम नहीं हैं—यह भूलकर कि अपने सदस्यों के व्यक्तित्व निर्माण में उसका भी पर्याप्त योगदान रहा है, एकाएक उसकी ओर से मुंह फेर लेता है. न्याय करते समय वह आत्मावलोकन की भावना से प्रायः दूर ही रहता है. अपराधी पर विचार करते समय कानून भी इस तथ्य पर ध्यान नहीं देता कि उसके व्यक्तित्व निर्माण में समाज का भी योगदान रहा है. दंड देते समय मनुष्य को एकदम अकेला छोड़ दिया जाता है. कानून के नाम पर राज्य का निस्पृह आचरण, प्रकारांतर में व्यक्ति और समाज के संबंधों में दरार डालने का काम करता है. उसपर समयानुसार ध्यान न देने से व्यक्ति और समाज के अंतद्र्वंद्व बढ़ते ही जाते हैं.

कह सकते हैं कि समाज की व्यवस्थाएं सभी के लिए होती हैं. उन्हीं के बीच से अच्छे व्यक्ति जन्म लेते हैं, उन्हीं से वे जिन्हें समाज दायित्वहीन और अपराधी मानकर तिरष्कृत करता है. चूंकि आनुपातिक रूप में कानून और समाज की मर्यादाओं का पालन करने वाले लोग ही अधिक होते हैं, अतएव समाजीकरण की प्रक्रिया को दोषपूर्ण ठहराना या कुछ लोगों के विचलन के लिए पूरे समाज को कठघरे में खड़ा कर देना अनुचित है—इस तर्क का स्वागत किया जा सकता है. इसलिए भी कि व्यक्ति एक स्वतंत्र जैविक इकाई है. वह अपने अनुभवों और शिक्षा को ज्यों का त्यों स्वीकार नहीं करता, बल्कि अपनी रुचि एवं आवश्यकता के अनुसार उनमें आवश्यक संशोधन करता है. इसी से ज्ञान की विभिन्न धाराएं जन्म लेती हैं. और इसी से संस्कृति की बहुरंगी छटाएं फूटती हैं. इसके बावजूद व्यक्ति की रुचियों और विचारों में नकारात्मक तत्वों का प्रवेश उस समय तक असंभव है, जब तक समाज में सीधे अथवा प्रच्छन्न रूप से उनकी उपस्थिति न हो. समाज में नकारात्मक तत्वों की यदि किसी भी रूप में उपस्थिति है, तब यह मान लेना चाहिए समाजीकरण की प्रक्रिया कहीं न कहीं दोषपूर्ण रही है. व्यक्ति और समाज के संबंधों के नकारात्मक संस्कार अंततः उनके हितों के टकराव का कारण बनते हैं. ये सब समाज के जाने-पहचाने सत्य हैं.

मानवमन में पनपने वाले असंतोष के मूल में सामाजिक असमानता होती हैं. वह मानने लगता है कि समाज अपने कर्तव्य का निर्वहन करने में नाकाम रहा है. ध्यातव्य है कि समाज का कार्य अपने सदस्यों के लिए न केवल न्याय सुनिश्चित करना है, बल्कि यह ध्यान भी रखना है कि किसी के साथ, किसी भी प्रकार का भेदभाव न हो. इसके लिए आवश्यक है कि शिखर पर बैठे लोग राज्य के अधिकार तथा कर्तव्यों के बीच संतुलन बनाए रखें. किंतु यह एकतरफा कार्रवाही नहीं है. न ही मात्र प्रशासनिक कार्रवाही द्वारा राज्य के अधिकारों एवं कर्तव्यों के बीच तालमेल संभव है. राज्य जनता का कार्य है. केवल जनता ही उसे नियंत्रित कर सकती है. इसके लिए समाज की चेतना का ऊर्ध्वमुखी रहना अत्यावश्यक है. वह तभी संभव है जब समाज के आदर्श उसकी सदस्य इकाइयों के स्वभाव में रच-बस चुके हों. लोग अपने विचारों को जीने के अभ्यस्त हों. उनका जनसंस्कृति में अटूट भरोसा हो, ताकि वे अपने समाजार्थिक विकास के साथ-साथ, संस्कृतियों के छोटे-छोटे टापुओं को उभारने के बजाय—विराट, बहुआयामी और समावेशी जनसंस्कृति के उत्थान हेतु समर्पित भाव से काम कर सकें.

यह भी ध्यान रखना होगा कि सांस्कृतिक बदलाव, तदनंतर अनुकूल संस्कृतियों का सृजन, समाज के सभी वर्गों की सम्मिलित इच्छाशक्ति के बगैर असंभव है. न्याय के संबंध में कानून और अदालतें यदि राज्य का अधिकार पक्ष दर्शाती हैं, तो समाज के अंतःसंघर्षों को न्यूनतम रखने के लिए न्याय का संवितरण उसके कर्तव्य पक्ष की ओर संकेत करता है. अधिकारपक्ष एवं कर्तव्यपक्ष के बीच संतुलन कायम करने के लिए समाज को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिससे राज्य अपनी सदस्य इकाइयों की मनोवांछाओं को समझकर उनका समयानुसार समाधान कर सके. साथ ही व्यक्ति का भी दायित्व है कि वह समाज में रहते हुए उसके लिए कोई चुनौती पेश न करे. स्वयं को समाज के लिए अधिकतम उपयोगी सिद्ध करे. समाज को अतिरिक्त बोझ से बचाने के लिए अपनी आवश्यकताओं को लोगों की सामान्य रुचियों के यथासंभव निकट रखे. जहां संसाधनों का टोटा हो, कमी को पाटने के लिए उनकी राशनिंग पर जोर दिया जाता हो, वहां बृहद लोकहित में उनका लाभ समाज के अधिकतम लोगों तक पहुंचाने की अनकूल व्यवस्था हो, ताकि अधिसंख्यक लोग विकास में भागीदारी कर सकें. लोगों को लगे कि राज्य उनकी इच्छाओं का सम्मान करता है और उन्हें अपने विकास के लिए वांछित अवसर बगैर किसी अवरोध और पक्षपात के प्राप्त हैं. न्याय के संवितरण हेतु शासन, प्रशासन की भूमिका को हम दो वर्गों में बांट सकते हैं—

1. समावेशी विकास के लिए उपयुक्त वातावरण बनाना. समाज में शांति और सुरक्षा की भावना पैदा करना.
2. उत्पादकता के कुल लाभों को समाज के सभी सदस्यों तक पहुंचाने की अनुकूल व्यवस्था करना अर्थात वितरणात्मक न्याय.

उपर्युक्त में से पहला कानून व्यवस्था यानी सरकार के अधिकार पक्ष से संबंधित है. अरस्तु ने इसे प्रतिकारात्मक न्याय कहा है. उसके अनुसार सामाजिक आचारसंहिता की विश्वसनीयता के लिए आवश्यक है कि प्रत्येक अपराधी को उसके अपराध के अनुसार दंडित किया जाए तथा पीड़ित की उसी अनुपात में क्षतिपूर्ति हो, ताकि समाज में शांति और व्यवस्था बनी रहे. इस तरह प्रतिकारात्मक न्याय का लक्ष्य है—कानून का निर्माण तथा निष्पक्ष परिपालन. वितरणात्मक न्याय का संबंध राज्य के कर्तव्य पक्ष से है. अपने नागरिकों के बीच ‘कल्याण’ का समविभाजन आदर्श राज्य का सपना होता है. कल्याण राज्य की विशेषता बताते हुए प्लेटो ने कहा था कि वही राज्य न्यायपूर्ण है, जिसमें सब अपना-अपना कार्य करें. शासक शासन करें, श्रमिक मजदूरी, और व्यापारी व्यापार को संभालें. वितरणात्मक न्याय की इस परिभाषा में असंतुलन का दोष है, क्योंकि कार्य के चयन की स्वतंत्रता को लेकर इसमें कोई उल्लेख नहीं है. दरअसल प्लेटो और सुकरात दोनों शासक वर्ग से थे. प्लेटो तो एथेंस की सत्ता के मुख्य दावेदारों में से एक था. दोनों दास प्रथा को यूनान की प्रगति के लिए आवश्यक मानते थे. इस कारण दासों के अधिकार एवं उनकी न्यायिक समानता की ओर उनका ध्यान ही नहीं था. जबकि अरस्तु न्याय को राजनीतिक दर्शन की मुख्य विषय-वस्तु मानता था. न्याय की अपरिहार्यता और सभी के लिए समान उपलब्धता पर जोर देते हुए उसने कहा था कि राज्य का प्रमुख दायित्व अपने नागरिकों के बीच न्याय को सर्वसुलभ बना देना है. ज्ञान-विज्ञान की समस्त धाराओं, विद्याओं का अंतिम लक्ष्य अपने साथ-साथ दूसरों को भी सुख पहुंचाना तथा लोककल्याण का मार्ग प्रशस्त करना है. वह मानता था कि राजनीति स्वयं में सर्वश्रेष्ठ विद्या है. उसका एकमात्र लक्ष्य मनुष्यमात्र के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करना है. अपने इसी विश्वास को सूत्रबद्ध करते हुए उसने ‘पालिटिक्स’ में लिखा है—‘राजनीति का सच्चा सद्गुण है—न्याय! तथा न्याय का अभिप्राय है, सर्वसाधारण का सामान्य हित.’ कहा जा सकता है कि अरस्तु का संपूर्ण वाङमय इसी सूत्र का बहुआयामी विस्तार है.

‘सर्वसाधारण का सामान्य हित’ व्यापक निहितार्थ वाला पद है, किंतु अरस्तु के लिए इससे कोई उलझन न थी. उसके न्यायसिद्धांत का मूल सिद्धांत था—‘जो योग्यतम है, वही सर्वोत्तम का अधिकारी है’. इस मामले में अपने पूर्ववत्र्ती विचारकों से भिन्न था. अरस्तु के लिए योग्यतम का अभिप्राय विपुल धन-संपदा का स्वामी अथवा श्रेष्ठ कुलोद्भव होने तक सीमित नहीं था. अपने लेखन में उसने धन-संपदा को महत्त्व दिया था. दास-प्रथा के समर्थन से ही स्पष्ट हो जाता है कि उसकी निगाह में धन-संपदा तथा सामाजिक पदानुक्रम का विशिष्ट महत्त्व था. उन्हें वह समाज में मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा आदि अर्जित करने का माध्यम मानता था. इसके बावजूद उसने इन्हें दूसरे स्थान पर रखा है. इनकी अपेक्षा मानवीय सद्गुण एवं नैतिक आचरण उसके लिए कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण थे. उसका संपूर्ण लेखन सार्वजनिक जीवन में नैतिकता की प्रतिष्ठा को समर्पित है. ‘पालिटिक्स’ में उसने उदाहरण के साथ समझाने की कोशिश की है कि अच्छी बांसुरियां केवल अच्छे बांसुरीवादक को दी जानी चाहिए. वह लिखता है—‘यदि बहुत से बांसुरीवादक इस कला में समान रूप में निपुण हों तो उनमें केवल उच्चकुल में जन्म लेने के कारण किसी को भी अच्छी या अधिक बांसुरियां नहीं मिलनी चाहिए. क्योंकि अच्छे बांसुरीवादन के लिए उच्च कुल में जन्म लेना अनिवार्य नहीं है. घटिया बांसुरीवादक अच्छी बांसुरी का सदुपयोग कर ही नहीं पाएगा. अतएव सर्वोत्तम वाद्य को सर्वोत्तम कलाविद् के लिए सुरक्षित रखना ही न्यायसंगत है.’ किसी को कोई संदेह न रहे, इसलिए इसे और स्पष्ट करते हुए वह लिखता है—‘यदि कोई व्यक्ति ऐसा हो जो बांसुरी बजानेवालों की कला में दूसरों से अधिक निपुण हो, किंतु कुल और सुंदरता में दूसरों की अपेक्षा कमतर हो तो बावजूद इसके कि उच्चकुल एवं सुंदरता जैसे गुण समाज में सम्मान का कारण माने जाते हैं, बांसुरीवादकों के बीच इन गुणों की तुलना करने पर श्रेष्ठतम(और अधिकतम) बासुरियां बांसुरीवादन कला में सर्वाधिक निपुण वादक को ही दी जानी चाहिए.’

अरस्तु के अनुसार न्याय इसलिए न्याय है क्योंकि वह व्यक्तियों के बीच पक्षपात नहीं करता. दूसरे शब्दों में राज्य तभी न्याय-पथ पर रह सकता है, जब वह पक्षपातरहित होकर अपने सभी नागरिकों के साथ समानतापूर्ण व्यवहार करता है. यही वितरणात्मक न्याय की कसौटी है. उसका अंतिम और एकमात्र लक्ष्य है—संपूर्ण समानतावाद. संपूर्ण समानतावाद में ‘कल्याण’ के वितरण में समानता के सिद्धांत का कड़ाई से पालन किया जाता है. यह मानते हुए कि कुल संपदा राज्य की है, और नागरिकों में सभी बराबर हैं, वह संसाधनों के एकसमान बंटवारे पर जोर देता है. लेकिन संपूर्ण समानतावादी द्रष्टिकोण में विचारकों को अनेक खोट नजर आते हैं. उनके अनुसार जरूरी नहीं कि समानतावाद में जिसे व्यक्ति की जरूरत या सुख मानकर बांटा गया हो, उससे सभी को एक समान संतुष्टि प्राप्त होती हो. मान लीजिए बीस व्यक्तियों में सौ अमरूद समानतावादी द्रष्टिकोण के आधार पर बांटे जाते हैं. तब उनमें से प्रत्येक व्यक्ति के हिस्से में पांच अमरूद आते हैं. ठेठ समानतावादी द्रष्टिकोण के अनुसार इससे सभी को सुख की बराबर अनुभूति होनी चाहिए. किंतु ऐसा नहीं है. यह संभव है कि किसी व्यक्ति को अमरूद बिलकुल पसंद न हो, अथवा दूसरे व्यक्ति का काम केवल दो अमरूदों से चल जाए. तीसरा व्यक्ति ऐसा भी हो सकता है जिसे केले अधिक पसंद हों और पांच अमरूद उसे उतनी संतुष्टि न दे पाएं, जितनी वह केवल दो केलों से पा सकता है. मनुष्य अपने व्यक्तित्व और रुचियों के मामले में एक-दूसरे से भिन्न होते हैं. उन्नत समाजीकरण का ध्येय चरित्रों की भिन्नता को बचाए रखने में है, उसको मिटा देने में नहीं. दूसरे शब्दों में समाज में ज्ञान की विभिन्न धाराओं के पोषण-प्रेषण के लिए रुचि-वैभिन्न्य की रक्षा भी जरूरी है. उसको मिटाने की कोशिश व्यक्ति की नैसर्गिक स्वतंत्रता को कठघरे में लाना होगा. इस समस्या के समाधान के लिए विशिष्ट सुविधाओं के बजाय सुविधाओं के पैकेज की भी सलाह दी जाती है. इसके अलावा कुछ और भी सुझाव हैं, जिनके आधार वितरणात्मक न्याय को हम निम्नलिखित उपधाराओं में बांट सकते हैं—

1. उपयोगितावाद (Utilitarianism)
2. निष्पक्षतावाद या न्यायवाद (Justice as Fairness)
3. स्वाधीनतावाद (Libertarianism)
4. असादृश्य समानतावाद (Difference Principle)

उपर्युक्त के बारे में स्वतंत्ररूप से विचार करने से पूर्व हम जान लें कि न्याय का वितरणात्मक सिद्धांत अपने आप में बहुलार्थी एवं विविध आयामी विस्तार लिए होता है. उसे किसी एक परिभाषा अथवा कसौटी से जोड़ना संभव नहीं है. वितरणात्मक न्याय की की परिकल्पना समाज में ‘अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख’ के उपयोगितावादी लक्ष्य को मूत्र्तरूप देने हेतु, सुख-संसाधनों के पक्षपातरहित बंटवारे के लक्ष्य को ध्यान में रखकर की जाती है. तदनुसार उसमें सदस्य इकाइयों की सकल आय, धन, विकास के अवसर, रोजगार, आर्थिक संसाधन, सुख-सुविधा आदि की उपलब्धता के अनुसार परिवर्तन होता रहता है. न्यायपूर्ण, समरस समाज की स्थापना हेतु वितरणात्मक न्याय के योगदान को लेकर अधिकांश विचारक एकमत हैं, हालांकि उसके कार्यान्वन को लेकर उनके किंचित मतभेद हैं. उनकी व्याख्या के आधार पर हम इसकी विशेषताओं का आकलन कर सकते हैं. वितरणात्मक न्याय को विद्वानों ने अपने-अपने तरीके से परिभाषित करने की कोशिश की है. किसी ने मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं की उपलब्धता को इसकी कसौटी माना है, तो किसी ने व्यक्तिमात्र के सुख एवं स्वातंत्रय को इसका लक्ष्य स्वीकार किया है. कुछ विद्वानों का द्रष्टिकोण सुखवाद से प्रेरित रहा है. इनके मिले-जुले अपररूप भी हैं. अर्थशास्त्र का सामान्य नियम, ‘आवश्यकता आविष्कार की जननी है’—आवश्यकता को पहले पायदान पर रखता है. आविष्कार का नंबर उसके बाद में आता है. किंतु आवश्यकताओं का आविष्कारों की अपेक्षा तीव्र विस्तार मनुष्य को संसाधनों के मोर्चे पर भारी पड़ता है. ऐसा क्यों होता है? समाज अपनी उन आवश्यकताओं की ओर कैसे अग्रसर होता है, जिनका अभी तक न तो आविष्कार हुआ है, न ही उसके जीवन और समस्याओं से दूर का संबंध है. जैसे मोबाइल, संचार और मनोरंजन के क्षेत्र में हो रहे निरंतर नए शोध, जो मनुष्य की किसी मूलभूत आवश्यकता का हिस्सा नहीं हैं, मगर समाज का बड़ा वर्ग उनकी ओर ललचाई दृष्टि से देखता है. भले ही वह नई प्रौद्योगिकी के प्रयोग से अनजान हो, फिर भी आधुनिकतम प्रौद्योगिकी-युक्त उपकरण को खरीदकर वह स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता है. ऐसी घटनाएं मनुष्य के निर्णय-सामर्थ्य पर उत्पादक शक्तियों के प्रभुत्व को दर्शाती हैं, जिनकी दृष्टि में मनुष्य की कीमत उपभोक्ता जितनी होती है. वे निहित स्वार्थ के लिए जैसे भी हो उपभोक्ता के मानस पर छाए रहना चाहते हैं. वितरणात्मक न्याय का लक्ष्य व्यक्ति के विवेक को सम्मुनत करना भी है, ताकि व्यापक लोकहित को ध्यान में रखते हुए वह स्वयं को ऐसे अनावश्यक प्रलोभनों से दूर रख सके.

पूंजीप्रेरित समाजों में उत्पादन पर बड़े उद्योगपतियों और सरमायेदारों का कब्जा होता है. आविष्कारों की दिशा बहुसंख्यक की आवश्यकता को ध्यान में रखकर तय नहीं की जाती. न ही विज्ञान एवं तकनीकी शोध के समय कल्याण के न्यायिक विभाजन पर ध्यान दिया जाता है. यही क्यों अर्थशास्त्र के जितने भी लोकप्रिय सिद्धांत हैं, सभी वितरणात्मक न्याय पर विचार करते समय संद्धिग्ध लगने लगते हैं. इसका कारण है कि अर्थशास्त्र के प्रमुख सिद्धांत लोककल्याण की अपेक्षा राज्य की अर्थव्यवस्था को गतिमान रखने के लिए बनाए जाते हैं. विशेषकर पूंजीवादी समाजों में यह मान लिया जाता है कि ऊपर के स्तर पर संपन्नता रहेगी तो वह प्रकारांतर में, रिसते-रिसते निचले समूहों तक भी पहुंचेगी. इससे निचले वर्गों को विकास के लिए उच्चस्थ वर्गों पर आश्रित रहना पड़ता है. दरअसल समाज में व्याप्त आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक स्तर पर भारी असमानता, समाज में पूंजी का बढ़ता वर्चस्व आदि ऐसे कारण हैं जो मनुष्य की निर्णय प्रक्रिया यहां तक कि उसके क्रय-सामर्थ्य तथा क्रय-प्रयोजन को प्रभावित करते हैं. आर्थिक रूप से शक्तिशाली समूह, जो अपने निजी हितों को शेष समाज के हितों से ऊपर मानते हैं, वे समाज की सर्वोत्तम मेधा को अपनी स्वार्थ-सिद्धि के कार्यों में लगाए रखते हैं. विशिष्ट प्रतिभाओं के शिखरस्थ समूहों की सेवा में जुट जाने से समाज का बौद्धिक संतुलन गड़बड़ाने लगता है. निचले स्तर पर मौलिक प्रतिभाओं की कमी उनमें अनुसरण की प्रवृत्ति को बढ़ावा देती है. परिणामस्वरूप समाज में असमानता बढ़ने लगती है. स्तरीकरण की प्रतीक तथा असमानता को बढ़ावा देने वाली संस्थाओं का प्रभाव सरकार पर बढ़ता जाता है. आर्थिक असमानता अनेकानेक सामाजिक अंतर्विरोधों का कारण बनती है. उनपर काबू गांठने के लिए विकास के लाभ को जन-जन तक पहुंचाना, सरकारों के लिए मुश्किल काम रहा है. इसलिए जब-जब शासक अथवा शासन बदले हैं, समाज की आर्थिक-राजनीतिक नीतियों में भी बदलाव आया है. शासन के स्तर पर होने वाले लगभग सभी परिवर्तन चाहे वे टैक्स को लेकर हों अथवा उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य, आदि से संबंधित, सभी कहीं न कहीं वितरणात्मक न्याय को प्रभावित करते हैं. चूंकि जनाकांक्षाएं विकास के अनुपात में तेजी से बढ़ती हैं, इसलिए सरकारों के समक्ष सदैव यह चुनौती होती है कि परंपरागत नियमों में कितना और किस प्रकार का संशोधन करें, ताकि समाज में बढ़ रहे विक्षोभों को न्यूनतम रखा जा सके. ऐसे वातावरण में वितरणात्मक न्याय सरकारों का नैतिक मार्गदर्शन करता है. यह कोरा आदर्श नहीं है. बल्कि व्यावहारिक सत्य है और सीधे सरकार के कर्तव्य पक्ष से जुड़ा है. यदि कोई सरकार इसे अपनाने से पीछे रहती है, तो माना जाएगा कि वह अपने ‘होने’ के औचित्य से बहुत पीछे है. यह ऐसी कसौटी है, जिसके आधार पर कल्याण सरकार की सदेच्छाओं को जांचा-परखा जा सकता है.

प्रत्येक समाज के कुछ आदर्श होते हैं, जो परोक्षरूप में उसके नैतिक लक्ष्य की ओर संकेत करते हैं. यह भी सत्य है कि पूर्ण स्वतंत्रता किसी भी समाज के लिए सदैव सपना होती है. लेकिन यह सोचकर कि यथार्थ और नैतिकता की दूरी अवश्यंभावी है; अथवा संपूर्ण स्वतंत्रता महज एक सपना है—कोई समाज न तो नैतिकता की ओर से आंख फेरता है, न ही पूर्ण स्वतंत्रता की कामना करना छोड़ देता है. अपनी स्थिति से निरंतर ऊपर उठते जाना ही न ही मनुष्यता का लक्षण है. वितरणात्मक न्याय की आवश्यकता मनुष्यता के इसी चिर-परिचित स्वप्न को साकार करने के लिए पड़ती है. यह भी सच है कि अभी तक ऐसी प्रणाली की खोज संभव नहीं हो पाई है, जिसके द्वारा जीवन में मानवादर्शों की शत-प्रतिशत स्थापना तथा विसंगतियों का संपूर्ण निदान संभव हो. इसके बावजूद इसकी अपनी महत्ता है. यह शिखरस्थ शक्तियों का नैतिक मार्गदर्शन प्रदान करती हैं. उन्हें राह दिखाती हैं ताकि समाज में व्याप्त असमानताओं को दूर करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा सकें. वितरणात्मक न्याय आधुनिक समाजों की अनिवार्यता है. इसलिए यह कहना कि समाज अथवा व्यक्ति इसको पूरी तरह नजरंदाज कर सकते हैं, सरासर भ्रांति होगी. वर्तमान समाजों में संचारक्रांति के विकास तथा उपभोक्तावादी प्रचारतंत्र ने लोगों को सूचनाओं के करीब ला दिया है. ऐसी अवस्था में कानून और शासन का एकतरफा मा॓डल, जो केवल अधिकार की बात करता हो, कर्तव्य की ओर जिसका कोई ध्यान न हो—चल ही नहीं सकता. आवश्यकता सरकार और जनता के स्तर पर विकास के सकारात्मक द्रष्टिकोण को अपनाने की है. समाज विशेष के लिए वितरणात्मक न्याय की कौन-सी पद्धति श्रेष्ठ और प्रभावकारी होगी, इसके लिए भी सकारात्मक द्रष्टिकोण आवश्यक है. यह हमें नैतिक मूल्यों से बंधे रहने, उनकी ओर निरंतर अग्रसर होने के लिए प्रेरित एवं दिशा-निर्देशित करता है. यह हमें अधिक से अधिक लोगों को अधिक से अधिक सुखी और संतुष्ट करने की नैतिक दृष्टि देता है. इसका अभाव अथवा समाजीकरण के उद्देश्यों के प्रति हताशा प्रायः हमें भटका देती है. कई बार हम विकास की धारा तथा उसके उद्देश्य को लेकर उलझन में पड़ जाते हैं.

उदाहरण के लिए यदि बाकी स्थितियां एक समान हों तो प्रायः यह मान लिया जाता है कि ब्याजदर में वृद्धि के दुहरे परिणाम होते हैं. पहला मुद्रा-स्फीति तथा दूसरा रोजगार के अवसरों में गिरावट. इनमें मुद्रा-स्फीति में गिरावट को सामान्यतः अच्छा माना जाता है, रोजगार के अवसरों में गिरावट को सरकार की अर्थनीतियों की असफलता के रूप में देखने का चलन है. इसलिए सामान्य सलाह यही होगी कि मुद्रा-स्फीति पर नियंत्रण के लिए बैंक को ब्याजदर में कमी करनी चाहिए. यह माना जाता है कि इससे वस्तुएं सस्ती होकर आम आदमी की पहुंच में आ जाएंगी. यानी प्रथम आग्रह उपभोक्ता वस्तुओं के सस्ती होने तथा उन्हें जनसाधारण की पहुंच में बनाए रखने का होता है. पूरक परिणाम यानी रोजगार में गिरावट की ओर अकसर ध्यान ही नहीं दिया जाता. जबकि रोजगार अवसरों में कमी समाज की आय में कमी लाकर उसके क्रय-सामर्थ्य को प्रभावित करती है. चूंकि रोजगार अवसरों में गिरावट के परिणाम देर से सामने आते हैं, इसलिए लोकप्रियता बनाए रखने के लिए अर्थशास्त्री मुद्रा-स्फीति को नियंत्रण में रखने की सलाह देते हैं. यह कुछ ऐसा ही है जैसे यह मान लेना कि समाज में जितने अधिक चिकित्सक होंगे, वह उतना ही स्वस्थ एवं खुशहाल रहेगा. फिर इस मान्यता को सिद्ध करने के लिए सभी प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को चिकित्सक बनने के लिए बाध्य करना. इससे निस्संदेह चिकित्सा के क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं के आने की संभावना बढ़ेगी, किंतु यह कदम बाकी क्षेत्रों में मौलिक प्रतिभाओं के अभाव का कारण बनेगा. अनिच्छापूर्वक चिकित्सा क्षेत्र में ढकेले गए विद्यार्थी अनमने भाव से कार्य करेंगे. अपनी समग्रता में यह निर्णय समाज के लिए नुकसानदेह सिद्ध होगा. आशय है कि जल्दबाजी में, समस्याओं पर समग्र दृष्टि से विचार किए बगैर खोजे गए समाधान दूसरी अन्य समस्याओं को जन्म दे सकते हैं. उदाहरण के लिए सामाजिक संपदा के प्रबंधन करने के लिए अर्थशास्त्र के सिद्धांत एक टूल की तरह होते हैं. अर्थशास्त्री ज्ञान के उपकरणों का उतना ही प्रयोग करता है, जो अर्थशास्त्रीय सिद्धांतों की कसौटी पर खरे उतरते हों. उसका असली ध्येय पूंजी के आवागमन द्वारा विकास की रफ्तार को बनाए रखना होता है. दूसरी ओर विकास को लेकर दार्शनिक के सोच का दायरा बड़ा होता है. वह भौतिक आवरण के पीछे अंतनिर्हित नैतिक सत्य को भी महत्त्व देता है. इसलिए दार्शनिक विचारों की महत्ता सार्वकालिक होती है. वितरणात्मक न्याय की सफलता के लिए आवश्यक है कि फैसले खूब सोच-समझकर लिए जाएं. वस्तुनिष्ट सत्य के अलावा सामाजिक आदर्शों को भी ध्यान में रखा जाए. लेकिन सभी अर्थशास्त्री दार्शनिक नहीं हो सकते. इसलिए समस्या के दीर्घायामी समाधान हेतु आवश्यक है कि लिए गए निर्णयों में दार्शनिक गहनता हो. वितरणात्मक न्याय को प्रतिष्ठा उसकी दार्शनिकी के कारण मिली है. यह कार्यक्रम न होकर एक वैचारिकी है. इस कारण हर विद्वान ने वितरणात्मक न्याय की संकल्पना अपनी वैचारिक कसौटी के आधार पर की है. आगे हम उसके विविध स्वरूपों पर संक्षेप में चर्चा करेंगे—

उपयोगितावादी द्रष्टिकोण

मनुष्य समाज में अपने सुख एवं सुरक्षा के लिए सम्मिलित होता है. कामना करता है कि ये दोनों उसको निर्बाध प्राप्त होते रहेंगे. इसके लिए वह अपनी नैसर्गिक स्वतंत्रता के एक हिस्से की बलि चढ़ाकर, सामाजिक आचारसंहिता के अनुसार अनुशासित जीवनयापन का भरोसा दिलाता है. समाज में शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए वह आवश्यक कानून गढ़ता है. राज्य में कानून के गठन तथा उनके अनुपालन का दायित्व हालांकि सरकार का होता है. कानून एवं सामाजिक आचारसंहिता के परिपालन हेतु उपयुक्त वातावरण बनाने के लिए सरकार को आवश्यक अधिकार भी दिए जाते हैं, जिनसे वह ऐसे प्रभावशाली तंत्र का गठन कर सके, जिसपर सभी को विश्वास हो, जो नागरिकों को अपने सामर्थ्य के सदुपयोग तथा विकास के उपयुक्त अवसर प्रदान करने में सक्षम हो. अपेक्षा की जाती है कि जिन्हें सरकार के भीतर मनोनीत किया गया है, वे अपने कर्तव्यों को भली-भांति समझेंगे तथा व्यापक लोकहित में जो दायित्व उन्हें सौंपे गए हैं, उनका उसी भावना के साथ पालन करेंगे. शासन-प्रशासन की सफलता कानून के समुचित पालन तथा विकासोन्मुखी अर्थव्यवस्था के गठन से आंकी जाती है. इसके साथ वह वैचारिकी भी महत्त्वपूर्ण होती है, जिसपर सरकार तथा उसकी सहयोगी संस्थाओं का ढांचा खड़ा होता है. समाजार्थिक असमानता के निराकरण तथा समावेशी विकास हेतु सरकार की प्राथमिकताएं क्या हों, इस प्रश्न का उत्तर स्वाधीनतावादी, सुखवादी, उपयोगितावादी, आदर्शवादी, यथार्थवादी आदि विभिन्न मत-मतांतरों वाले विद्वान अपनी-अपनी तरह से देते हैं. उपयोगितावादी विचारकों के अनुसार समाजीकरण का परम लक्ष्य ‘अधिकतम लोगों की अधिकतम प्रसन्नता’ सुनिश्चित करने में है. मगर मात्र कह देने से तो यह लक्ष्य-सिद्धि संभव नहीं. सुख तो किसी न किसी रूप में पशु-पक्षी भी प्राप्त करते हैं. उनके व्यवहार से कभी उनका दुख या असंतोष प्रकट नहीं होता. हम प्रायः मान लेते हैं कि वे अपनी स्थिति से संतुष्ट हैं.

उपयोगितावाद की मुख्य समस्या यह पता लगाना है कि व्यक्ति के सुख तथा प्रसन्नता के आकलन का आधार क्या हो? हम यह कैसे तय करें कि ‘अमुक’ व्यक्ति पूरी तरह सुखी और संतुष्ट है. वे कौन-सी कसौटियां हैं, जिनसे माना जाए कि समाज ने अपने अधिकतम सदस्यों के लिए अधिकतम सुख का प्रबंध कर लिया है. सुख न तो बिजली है, न टेलीफोन, न द्रव्यमान है, न ही यह कुछ और जिसे आंकड़ों में अभिव्यक्त किया जा सके. दूसरे शब्दों में सुख चाहे जितना सुखकारी हो, उसकी अवधारणा बहुत जटिल है. विशेषकर उसको परिभाषा में बांधना. इससे सुख तथा उसकी कसौटी का निर्धारण बहुत कठिन हो जाता है. तब और भी जब हम देखते हैं कि उसे लेकर प्रत्येक व्यक्ति की चाहत तथा मान्यताएं अलग-अलग हैं. किसी व्यक्ति को सुबह-शाम दाल-रोटी मिल जाए तो वह खुद को सुखी मान लेता है. उसको समाज या सरकार से कोई गिला-शिकवा नहीं रहता. दूसरा व्यक्ति पांच-तारा होटल में भोजन करने के बाद भी चिड़चिड़ा और असंतुष्ट बना रहता है, चार बार पेट-भर खा लेने के बाद भी उसकी क्षुधा शांत नहीं होती. क्या इसे केवल मावन-प्रवृत्ति अथवा स्वभाव का अंतर मानकर उपेक्षित किया जा सकता है! जाहिर है उपयोगितावाद को चुनौती बाहर से नहीं, अपने ही भीतर से प्राप्त होती है. इस समस्या के निदान के लिए उपयोगितावादी विचारकों की राय है कि जो मानवमात्र के लिए ‘शुभ’ है, अथवा जिससे समाज में ‘शुभता’ की वृद्धि हो, वही असली सुख है. फिर भी सवाल रह जाता है कि समाज में ‘शुभ’ की सार्वत्रिक उपस्थिति कैसे संभव हो! कैसे उसको बढ़ावा दिया जाए! इस बारे में लोगों से बात की जाए तो वे पुनः अलग-अलग रास्ते बताएंगे. अर्थात ‘शुभ’ के प्रति अपनी असहमति के बावजूद, यदि उनसे इसकी स्वतंत्र व्याख्या करने को कहा जाए तो वे किसी एक मुद्दे पर शायद ही एकमत हो पाते हैं. शुभ के स्वरूप की व्याख्या केवल जनसाधारण की समस्या नहीं है? कलाकार, बुद्धिजीवी, राजनेता, मंत्री, संतरी, कारपोरेट सेक्टर में काम करने वाले प्रखर अधिकारी, अड़ियल नौकरशाह, दुकानदार, इंजीनियर सब उसे लेकर असमंजस में जान पड़ेंगे. एक भी विश्वास के साथ यह नहीं कह पाएगा कि सुख की उसकी अवधारणा क्या है? मनुष्य का असली सुख किसमें है! कुछ लोग सुख के òोत के रूप में कुछ वस्तुओं या उपकरणों का नाम लेंगे. कुछ का जवाब दार्शनिक अंदाज वाला भी हो सकता है. ऐसे लोग कहेंगे कि जीवन में दुखों का अभाव ही सुख है. लेकिन दुखों का अभाव तो अभौतिक घटना है. दूसरे शब्दों में सुख की परिभाषा तथा उसका आकलन बहुत चुनौती-भरा कार्य है. उपयोगितावाद की ये समस्याएं उसके समर्थकों के लिए भी अजानी नहीं थीं. इसलिए इसे विचारधारा के रूप में समाज के सामने प्रस्तुत करने से पहले, उन्हें सुख की परिभाषा में आने वाली चुनौतियों का सामना करना पड़ा था, अंततः उन्हें ‘शुभ अमूत्र्तन किंतु सर्वकल्याणकारी है’ के विचार से समझौता करना पड़ा.

उपयोगितावादी विचारकों के अनुसार सुख की अवधारणा चाहे जितनी वैविध्यपूर्ण हो, फिर भी जीवन में सुख और खुशहाली के मापदंड के लिए सुविधाओं के न्यूनतम ‘पैकेज’ की परिकल्पना की जा सकती है. उनमें ऐसी सुविधाओं को शामिल किया जा सकता है, जिनके अभाव में मनुष्य को सामान्य जीवन जीना भी दूभर लगने लगे. भोजन, भवन, वस्त्र जैसी कुछ आवश्यकताएं ऐसी हैं, जिनकी कमी मनुष्य के अस्तित्व पर संकट ला सकती है. उसको शारीरिक और मानसिक स्तर पर रोगी बना सकती है. लेकिन न्याय की अपेक्षा यह भी है कि आवश्यकताओं के आकलन में देश-भर में सामान्य एकरूपता बरती जाए. उदाहरण के लिए भूखा व्यक्ति रोटी-दाल मिलने पर तीव्र सुखानुभूति की घोषणा कर सकता है. किंतु धनवान के मामले में स्थिति इससे अलग होगी. इसलिए गरीब के लिए साधारण भोजन और धनवान के लिए उसके पसंदीदा व्यंजनों का प्रबंध कर देना न्याय नहीं है. भूखा व्यक्ति दाल-रोटी को अपने सुख का आधार मान लेता है, तो केवल इसलिए कि उसका तात्कालिक संघर्ष भूख से है. उससे आगे सोच पाने में वह असमर्थ है. इसलिए जीवन की न्यूनतम आवश्यकता दाल-रोटी पाकर भी उसके चेहरे पर संतुष्टि के भाव देखे जा सकते हैं. भूखे व्यक्ति के लिए दाल-रोटी का इंतजाम कर देने से उसकी जीवन संभाव्यता को बढ़ाया जा सकता है, किंतु यह अंतरिम राहत होगी. व्यक्ति और समाज दोनों की जिम्मेदारी उस समय तक समाप्त नहीं होती, जब तक वह व्यक्ति स्वयं-स्फूत्र्त और आत्मनिर्भरता के साथ विकास की मुख्यधारा में सम्मिलित नहीं हो जाता. यह वितरणात्मक न्याय की पहली स्थिति है. इसमें स्थायित्व उस समय तक असंभव है, जब तक व्यक्ति समाजार्थिक भेद-भाव का शिकार बना हुआ है. लोग शासक और शासित में बंटे हुए हैं. फैसले सर्वसम्मति से लेने के बजाय ऊपर से थोप दिए जाते हैं. इस उपलब्धि पर समाज और सरकार अपनी पीठ ठोंक सकते हैं. मगर उन्हें यहीं संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए. यहां से आगे की उनकी यात्रा समाज में विषमता की खाई को पाटकर एक समरस समाज की स्थापना तक जारी रहनी चाहिए, ऐसा समाज जिसमें जिसमें व्यक्ति को न केवल अवसर समान हों, बल्कि संसाधनों में भी समान हिस्सेदारी हो.

यहां आते-आते उपयोगितावाद की तस्वीर साफ होने लगती है. तय हो जाता है कि समाज में न्याय की आदर्श उपस्थिति तभी संभव है, जब मनुष्य को आवश्यकता की सभी ऐच्छिक वस्तुएं आसानी से उपलब्ध हों. ताकि वह अपने शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करते हुए खुद को विकास की मुध्यधारा से जोड़ सके. ऐच्छिक वस्तुएं तथा मूलभूत आवश्यकता में अंतर है. ऐच्छिक वस्तुओं में वे सभी संसाधन और अवसर सम्मिलित हैं, जो किसी व्यक्ति को विकास की स्पर्धा में बनाए रखने के लिए जरूरी होते हैं. अभी तक रोटी, कपड़ा और मकान को मनुष्य की मूल आवश्यकताओं की उपलब्धता को सरकार के कर्तव्य में गिना जाता रहा है. सामान्यतः यह उचित भी है. किंतु इससे व्यक्ति का विकास की दौड़ में बने रहना संभव नहीं है. केवल उम्मीद की जा सकती है कि मूल आवश्यकताओं की पूर्ति के आश्वासन के बाद मनुष्य निश्चिंत होकर अपने भविष्य के बारे में सोच सकेगा, किंतु समाज में व्यक्ति के विकास हेतु पर्याप्त अवसर ही न हों तो? अथवा जितने अवसर हैं, उनपर पहले से समृद्ध वर्गों का कब्जा हो तब? अथवा अवसर हों और व्यक्ति को निर्णय लेने की स्वतंत्रता न हो तब? यानी केवल मूलभूत आवश्यकताओं की आपूर्ति से विकास की संभावना न्यूनतम बनी रहती है. विकास से वंचित व्यक्ति मूल आवश्यकताओं का कोई संकट न होने के बावजूद, स्वयं को असंतुष्ट, असहाय और दुखी महसूस करेगा. इससे समाज में अशांति और अव्यवस्था संबंधी चुनौतियां भी जन्म लेंगी. समस्या के स्थायी समाधान के लिए उपयोगितावादी विचारकों का द्रष्टिकोण है कि मनुष्य को उसकी आवश्यकता की मूलभूत वस्तुएं यथा भोजन, वस्त्र, आवास, दवाएं, सुरक्षा, पारिवारिक सान्निध्य आदि आसानी से प्राप्त होना चाहिए. साथ में उसे यह भरोसा होना चाहिए कि उसके विकास हेतु समाज में समुचित अवसर भी आसानी से उपलब्ध हैं. इनके अलावा समाज की विकासवादी परंपरा से जोड़ने या जोड़े रखने के लिए व्यक्ति में इच्छाशक्ति का होना भी आवश्यक है. इच्छाओं के चयन में अरस्तु से प्रेरणा ली जा सकती है. उसके अनुसार विवेक-संपन्न होने के नाते यह स्वाभाविक है कि इच्छाओं के निर्माण तथा उनके निर्वहन के समय मनुष्य के निर्णय तर्कपद्धति के अनुरूप हों. इच्छा मनुष्य की न्याय-चेतना तथा कर्तव्यों की दिशा का निर्धारण करती है. दूसरे शब्दों में इच्छा भविष्य की पूर्ववत्र्ती, विकासपथ को रोशन करनेवाली मशाल है. मनुष्य जिस जीवन की अपने लिए कामना करता है, जैसा भविष्य वह अपने लिए गढ़ना चाहता है, पहले वैसा सपना, वैसी इच्छा और वैसा ही संकल्प-भाव उसके भीतर पनपना चाहिए. इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य को मनोवांछित कार्यक्षेत्र में प्रवेश की पूरी-पूरी स्वतंत्रता हो. साथ में यह विश्वास भी जरूरी है कि उस दिशा में प्रयास करने पर सरकार और शेष समाज भी उसकी सहायता को उपलब्ध होंगे.

यदि मनुष्य परतंत्र होता, उसकी निर्णय-शक्ति किसी अन्य से प्रभावित होगी तो वह इच्छा, सपनों, संकल्पों और संसाधनों के बावजूद उस दिशा में कुछ भी कर पाने में असमर्थ रहेगा. इसलिए समाज में न्याय की स्थापना के लिए स्वतंत्रता अपरिहार्य है. दूसरे शब्दों में समाज और सरकार न्याय का वातावरण बना सकते हैं, उसको ऊपर से थोप पाना नामुमकिन है. कह सकते हैं कि न्याय की प्रेरणा चाहे जिस दिशा से मिले, उसकी आकांक्षा को उसकी मानवीय चेतना से उद्भूत तथा स्वतंत्र कार्यशैली से समर्थित होना चाहिए. अरस्तु की यह विचारधारा उपयोगितावाद की आधारशिला तथा उसकी सफलता की कसौटी है. हर मनुष्य अपने लिए सुखी तथा खुशहाल जीवन की कामना करता है. इसके लिए अवश्यक है कि समाज में पर्याप्त रोजगार हों. उनके माध्यम से व्यक्तिमात्र के लिए इतनी आय सुनिश्चित हो, ताकि वह अपने लिए न्यूनतम सुविधाओं का इंतजाम कर सके. ऐसे अवसर हों, जिनमें वह अपने अपने भविष्य के सपने सजा सके. इतनी स्वतंत्रता हो कि आगे बढ़कर अपने सपनों को अंजाम तक पहुंचा सके. इस सबके लिए लोकोन्मुखी और जवाबदेह व्यवस्था का होना जरूरी है. ऐसी व्यवस्था जो न केवल संसाधनों के न्यायिक विभाजन के प्रति ईमानदार हो, बल्कि प्रतिव्यक्ति आय, रोजगार अवसर तथा समाज की कुल संपदा में वृद्धि के माध्यम से सदस्य इकाइयों की महत्त्वाकांक्षाओं को मूत्र्तरूप दे सके. सुख की अवधारणा को लेकर जेरमी बैंथम, हेनरी सिडविक, जान स्टुअर्ट मिल आदि उपयोगिता विचारकों में हल्के-फुल्के मतभेद हैं, किंतु वे सभी इसपर सहमत थे कि जीवन में सुख का नैरंतर्य सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक स्वतंत्रता के बिना असंभव है. इसके लिए आवश्यक है कि शासन जवाबदेह हो. मनुष्य को अपना मत-अभिव्यक्त करने की पूरी स्वतंत्रता हो. उसको अपने हित के अनुसार निर्णय लेने, उसके लिए उपलब्ध संसाधनों की वांछित क्षेत्र में निवेश करने की आजादी हो. यह भी जरूरी है कि संविधान निर्माण से लेकर, कानून, शासन-प्रशासन की आचारसंहिता तथा कार्यकारी संस्थाओं के गठन में जनसाधारण के हितों, इच्छा और आकांक्षाओं का पूरा-पूरा ध्यान रखा गया हो. इसके लिए उपयोगितावादी विचारक तीन प्रकार की संस्थाओं के गठन को जरूरी मानते हैं—

1. सार्वजनिक खर्च पर चलने वाली ऐसी शिक्षण संस्थाएं जो सभी के लिए खुली हों, जिनमें सभी प्रकार की आधुनिक शिक्षा के व्यापक इंतजाम हों.
2. मुक्त स्पर्धात्मक बाजार, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने, अपने श्रम-कौशल का पूरा लाभ उठाने की स्वतंत्रता हो. उल्लेखनीय है कि प्रतिस्पर्धी बाजार के लिए आरंभिक उपयोगितावादी विचारक ‘लेजेज फेयर’ तथा उदार पूंजीवादी तंत्र की प्रशंसा करते थे. मगर पिछले कुछ दशकों में पूंजीवादी ताकतों ने निहित स्वार्थ के लिए जिस तरह से लोगों की निर्णय-प्रक्रिया को प्रभावित करना आरंभ किया है, उपयोगितावादी विचारकों का उससे मोह भंग हुआ है. इन दिनों वे समाजवादी अर्थव्यवस्था का समर्थन करने लगे हैं.
3. नागरिक अधिकारों का संरक्षण; जिससे व्यक्ति अपने विकास को लेकर स्वयं निर्णय लेने में सक्षम हो तथा अर्जित सुख-सुविधाओं का स्वतंत्र भोग कर सके.
4. जबावदेह लोकतंत्र. शिक्षा के प्रति समानतावादी द्रष्टिकोण, सभी वर्गों तक उसकी समान पहुंच, नागरिक अधिकारों के संरक्षण हेतु उत्तरदायी न्याय प्रणाली की सफलता, मुक्त और सकारात्मक स्पर्धायुक्त बाजार की स्थापना केवल लोकतांत्रिक परिवेश में संभव है. दूसरे शब्दों में उपयोगितावादी न्याय और लोकतंत्र एक-दूसरे के पूरक तथा कदाचित समानार्थी भी हैं.

यदि ध्यानपूर्वक देखा जाए तो ऊपरोल्लिखित सब किसी आधुनिक समाज की विशेषताएं जान पड़ेंगी. आधुनिक समाज सामान्यतः लोकतंत्र को महत्त्व देते हैं. घोषितरूप से नागरिक अधिकारों के संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हैं. उसके लिए आमतौर पर संविधान में उपयुक्त व्यवस्था भी करते हैं. वे सिद्धांततः मानते हैं कि शिक्षा सभी के लिए एक समान हो. उसका तमाम खर्च सरकार वहन करे. दूसरे शब्दों में माना जा सकता है कि आधुनिक समाजों के गठन पर उपयोगितावादी विचारधारा का गहरा प्रभाव रहा है. इससे पूरी तरह इन्कार भी नहीं किया जा सकता. किंतु यदि ध्यानपूर्वक देखा जाए तो चाहे वह अमेरिका जैसे अतिआधुनिक समाज हों; अथवा भारत जैसे त्वरित परिवर्तन से गुजर रहे परंपरा-पोषी देश—सभी में संवैधानिक व्यवस्थाओं तथा विचारधाराओं का ईमानदार अनुसरण संभव नहीं हो पाता. क्योंकि न्याय की जरूरत समाज के बहुसंख्यक गरीबों, बेरोजगारों तथा दूसरे संघर्षशील वर्गों को पड़ती है, जबकि उसको लागू करने का अधिकार अल्पसंख्यक अभिजनों का होता है, जो संसाधनों और अवसरों पर कुंडली मारे बैठा रहते हैं. वे इतनी आसानी से अपने कब्जे को छोड़ने को तैयार नहीं होते. धर्म, कानून, राजनीति, सामाजिक आचारसंहिता और संस्थाएं, सभी पर उनका अधिकार होता है. भारत जैसे देशों में तो जाति नाम की अतिरिक्त संस्था विकास के रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा है. धार्मिक जड़ता, ऊंच-नीच और तरह-तरह के पाखंडों को बनाए रखने में वह प्रमुख भूमिका निभाती है. ऐसी यथास्थितिवादी संस्थाओं के चलते शीर्षस्थ अभिजनों को वास्तविक चुनौती बहुत कम मिल पाती है. परिणामस्वरूप जनसाधारण और न्याय के बीच अंतराल बढ़ता ही जाता है. दरअसल उपयोगितावादी न्याय की संकल्पना एक ऐसी अर्थ-प्रणाली पर निर्भर करती है जो सभी के साथ उदारता से पेश आए. जिसका उपयोग समाज के बहुसंख्यक वर्ग के कल्याण के लिए उसकी इच्छा, आकांक्षाओं के अनुरूप किया गया हो. उसके लिए जब आमूल परिवर्तन की बारी आती है, तो शीर्षस्थ अभिजन समूह एकजुट होकर उसका विरोध करने लगते हैं. अपने प्रभाव का उपयोग कर, प्रायः वे यथास्थिति बनाए रखने में सफल भी होते हैं. उनकी शोषणकारी नीतियों के चलते विकास का लाभ समाज के शीर्षस्थ वर्गों तक सिमटकर रह जाता है. लोकतंत्र और स्वतंत्रता आभासी बनकर रह जाते हैं. लोगों का उस ओर ध्यान न जाए, इसके लिए वे उनके दिलो-दिमाग पर कब्जा जमा लेते हैं. इसमें मीडिया तथा लाकसंपर्क के अन्य सभी माध्यम की मदद ली जाती है. लोकतांत्रिक संस्थाओं में केंद्रीय पदों पर आसीन होकर वे उनका स्र्वार्थानुरूप संचालन करने लगते हैं. परिणामस्वरूप जनसाधारण के लिए न्याय की संभावना क्रमशः क्षीण होती जाती है. इसका परिणाम सामाजिक विषमता की उत्तरोत्तर चैड़ी होती खाई के रूप में सामने आता है.

मुक्त, उदार एवं बाजारवादी अर्थव्यवस्था के समर्थक दावा करते हैं कि स्पर्धात्मक अर्थव्यस्था मानवमात्र के उपयोग को केंद्र में रखकर बनाई गई है. इसमें जो जितना योग्य है, वह समाज के विकास में उतना ही योगदान कर अपने लिए उपयुक्त सुख-सामग्री जुटा सकता है. उद्यमियों के बीच स्पर्धा होने पर उपभोक्ता को चीजें सस्ती मिलने की संभावना बन जाती है. लेकिन वे इस तथ्य को नजरंदाज कर जाते है कि बाजार के अधिकतम हिस्से पर कब्जा जमाने के लिए बाजारवादी शक्तियां मनुष्य का उपभोक्ताकरण करती हैं, तरह-तरह के प्रलोभन, आकर्षण एवं चमक-दमक के माध्यम से वे उपभोक्ताओं के मन-मस्तिष्क पर कब्जा जमाकर उसके निर्णय-सामर्थ्य को अपने बस में कर लेती हैं. निर्णय क्षमता में कमी आने पर व्यक्ति शोषणकारी व्यवस्था से अनुकूलन करने लगता है. स्पर्धा भले ही मानवीय गरिमा को ठेस पहुंचाती हो, भले ही वह पूंजीवाद के हाथ का सबसे ताकतवर औजार हो, भले ही वर्चस्वकारी शक्तियों को सत्ता में बने रहने के तर्क उपलब्ध कराता हो, सच यह भी कि स्पर्धा पूंजीवाद की खोज नहीं है. परंपरागत अर्थव्यवस्थाओं में भी वह मौजूद थी. मगर तब और आजकल पूंजीवाद की सफलता का पर्याय बन चुकी स्पर्धा में अंतर है. पहले वह मुख्यतः उत्पादकों अथवा विक्रेताओं के बीच होती थी. क्रेता का महत्त्व था, किंतु कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो, आमतौर पर वह स्पर्धा से बाहर होता था. आजकल उत्पादक और विक्रेता दोनों की भूमिका परस्पर पूरक और सहायक की है. विक्रेता भी उत्पादन-प्रक्रिया का महत्त्वपूर्ण सदस्य है, इसलिए कह सकते हैं कि प्राचीन स्पर्धा केवल उत्पादनकर्म तक सीमित थी. उपभोक्ता उस समय तक उतना महत्त्वपूर्ण नहीं था. इसलिए उसे स्पर्धा से बाहर रखा जाता था. त्वरित उत्पादन प्रणाली में उपभोक्ता का स्थान भी निर्णायक है. उसके पास चयन के वाजिब अवसर भी हैं. इसलिए आधुनिक विद्वान बाजार को आर्थिक गतिविधियों के ऐसे केंद्र के रूप में देखते हैं, जहां क्रेता और विक्रेता अपने-अपने हितों की स्पर्धा में होते हैं. विक्रेता और उत्पादक तो स्वयं को एक-दूसरे का पूरक और सहयोगी मान ही चुके हैं. उपयोगितावाद बाजार में मुक्त स्पर्धा का समर्थक है, लेकिन वह स्पर्धा बाजार में मौजूद क्रेता और विक्रेता दोनों के लिए लाभकारी होनी चाहिए. वह इसे सकारात्मक स्पर्धा का नाम देता है. सकारात्मक स्पर्धा की कुछ स्थितियां निम्नवत हो सकती हैं—

1. बाजार में क्रेता और विक्रेता पर्याप्त संख्या में उपलब्ध हों. दोनों में से कोई भी मूल्यों में हस्तक्षेप कर पाने में असमर्थ होगा. फलस्वरूप उत्पादक को वस्तु का पूरा दाम प्राप्त होगा तथा उपभोक्ता को वाजिब मूल्य में अपेक्षित वस्तु इच्छानुसार समय पर उपलब्ध होगी. यह आदर्श अवस्था है. जिसमें स्पर्धा के लिए कुछ खास नहीं है. प्राचीन अर्थव्यवस्थाएं कुछ इसी प्रकार की होती थीं.
2. बाजार उत्पादकों तथा ग्राहकों के लिए पूरी तरह से खुला हो. नया उत्पादक जब चाहे बाजार में अपने उत्पाद की बिक्री की संभावना खोजने के लिए प्रवेश कर सके. साथ ही असफल अथवा ऐसे उत्पादक जो किसी कारणवश बाजार छोड़कर जाना चाहते हैं, उन्हें स्वतंत्रता हो कि अपनी इच्छानुसार बाजार को छोड़कर जा सकें.
3. बाजार की सफलता उत्पादक एवं विक्रेता दोनों के हितों की रक्षा में है. अतः वहां उत्पाद की गुणवत्ता तथा उसके मूल्य में तालमेल होना चाहिए. साथ ही उत्पादक को लगे कि उसे अपने श्रम-कौशल का पूरा मूल्य प्राप्त किया है और उपभोक्ता को विश्वास हो कि उसे चुकाई गई कीमत के बदले में उपयुक्त वस्तु प्राप्त हुई है. कोई भी स्वयं को छला हुआ या आहत महसूस न करे. केवल लाभार्जन को ध्यान में रखकर उत्पाद की गुणवत्ता से किया गया समझौता बाजार को नकारात्मक स्पर्धा की ओर ढकेल देगा. अमर्यादित स्पर्धा दूसरे दुकानदारों को कम समय में अधिकाधिक लाभार्जन के उकसाएगी. उससे केवल मुनाफे के लिए वस्तुओं के निर्माण और विपणन की प्रवृत्ति बढ़ेगी. इससे उत्पादक को मनमानी मूल्यबृद्धि का अधिकार देना होगा. यदि ऐसा नहीं हुआ तो वे अवसर मिलते ही गुणवत्ता से समझौता करने लगेंगे. अथवा आकर्षक पैकिंग, फैशन आदि बहानों से उत्पाद की अतिरिक्त कीमत वसूलने लगेंगे, जिसका उत्पाद की उपयोग से कोई लेना-देना न हो. इससे उपभोक्ता स्वयं को छला हुआ महसूस करेगा. उसे खर्चे गए मूल्य का वाजिब माल नहीं मिल पाएगा. इससे न्याय की अवधारणा ही गड़बड़ा जाएगी. और कालांतर में बाजार अराजक होकर मुनाफाखोरों की मनमानी का अखाड़ा बनकर रह जाएगा.

उपयोगितावादी विचारकों के अनुसार जब बाजार में विशुद्ध स्पर्धा का माहौल हो, क्रेता और विक्रेता के संबंध सौहार्दपूर्ण तथा विश्वास से भरे हों तो बाजार अपने स्वाभाविक विकास की ओर अग्रसर होता है. पूंजी वहां सहज उपलब्ध होती है. श्रमिकों के लिए पर्याप्त रोजगार होते हैं. मालिक-मजदूर संबंधों में आत्मीयता होती है. श्रमिकों अपनी अधिकतम उत्पादकता के साथ काम कर पाते हैं, फलस्वरूप वस्तु-निर्माण में न्यूनतम लागत आती है और उत्पादक उन्हें पर्याप्त लाभांश के साथ बेच पाता है. ऐसे परिवेश में संसाधनों का अधिकतम सदुपयोग संभव होता है. समाज जिन वस्तुओं की अपेक्षा करता है, वे आसानी से उपलब्ध होती हैं. इसके लिए उत्पादक को उपयुक्त लाभ होता है. सभी कामगारों को संतोषजनक रोजगार मिलता है. इस तरह उपयोगितावादी विचारक न्याय को बगैर किसी बाहरी प्रयास के स्थापित करना चाहते हैं. सरकार की भूमिका न्यूनतम हस्तेक्षप द्वारा देश, समाज में अनुकूल वातावरण बनाने की है, जिसमें उत्पादक और उपभोक्ता सौहार्दपूर्ण परिवेश में काम कर सकें.

उपर्युक्त से यह भी संकेत मिलता है कि सुखवादी विचारक वितरणात्मक न्याय को बाजार के भरोसे छोड़ देना चाहते हैं. उनका मानना है कि सरकार यदि अपने हस्तक्षेप को न्यूनतम रखे, बाजार को अपने भरोसे आगे बढ़ने का अवसर दे तो स्थितियां स्वतः सुधरती जाएंगी. उनके अनुसार प्रत्येक मनुष्य सुख की कामना करता है. व्यक्ति दूसरे के सुख के लिए धनराशि का भुगतान कर, अपने लिए सुख खरीद लेना चाहता है. सुख का यह आदान-प्रदान सौहार्दपूर्ण वातावरण ही संभव है. चूंकि एकमात्र सुख प्राप्त करना मनुष्य का ध्येय है, इसलिए जीवन में बाहरी हस्तक्षेप कम होना चाहिए. उल्लेखनीय है कि सुखवाद नई विचारधारा नहीं है. प्लेटो से लेकर अरस्तु तक ने इसपर विचार किया है. आधुनिक सुखवादी विचारकों का प्रेरणास्रोत जा॓न काल्विन है, जिसका मानना था कि दुनिया में मनुष्य को सुख प्रदान करने वाली एक भी वस्तु ऐसी नहीं है, जिसका उपयोग उसके लिए निषिद्ध हो. जा॓न काल्विन के बाद बैंथम ने सुखवाद को एक दर्शन के रूप में विस्तार दिया. लेकिन सुखवाद या उपयोगितावाद के साथ मुक्त बाजार का समर्थन करते हुए उसके समर्थक विद्वान बाजार को एक तरह से पूंजीवादी शक्तियों के हवाले कर देना चाहते हैं. लेकिन मुक्त बाजार में बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के सुख का न्यायिक वितरण कैसे संभव होगा, इस बारे में वे कोई ठोस और आश्वस्तिकारक जवाब नहीं दे पाते. उपयोगितावाद पर आधारित न्याय की स्वीकार्यता में यह सबसे बड़ी अड़चन है.

जारी…..

© ओमप्रकाश कश्यप

opkaashyap@gmail.com