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दो आसमानों के बीच: समापन किश्त

सामान्य

यात्रा संस्मरण

चार किलोमीटर की चढ़ाई के लिए गाड़ी पर पंद्रह मिनट का समय लगा. पहाड़ की चोटी पर मानो पूरा नगर बसा हुआ था. वहीं बीच चौक में ड्राइवर ने गाड़ी रोक दी. चौक से मात्र पचास कदम दूर था नीलाचल पहाड़ी के शीर्ष पर ऊर्ध्वाधर खड़ा कामाख्या मंदिर. मुक्त आकाश से बतियाता हुआ. मंदिर के उत्तुंग शिखर को देखकर लगता था मानो उसके गर्भ में नीचे, मंदिर के प्रांगण में धर्म और आस्था के नाम पर जो कारोबार चलता है, उस ओर वह शायद ही देखता हो. शिखर की निगाह या तो दूर आसमान में तैरते बादलों पर जाती होगी, यदि कभी झुकें तो सीधे ब्रह्मपुत्र की विशाल जलराशि पर. आखिर पानी तो जड़जंगम को भी चाहिए ही.

मेजबान और सहयात्री आस्था में डूबे हुए, आगे बढ़ रहे थे. मैं पीछे था. आगे की अपनी भूमिका के बारे में अनुमान लगाता, अपने विश्वास को तौलता हुआ. मैं मन ही मन उन उन कारीगरों का चित्र अपने मनस् में बनाने की कोशिश कर रहा था, जिन्होंने रातदिन एक कर इस मंदिर का निर्माण किया था. बारीक नक्काशी का हुनर हासिल करने के लिए पहले वर्षों तक खुद को तराशा था, और बाकी की जिंदगी इस मंदिर को तराशने में खपा दी. क्या राजा सही मायने में उनके कला का मूल्यांकन कर पाया होगा! सुना है ऐसी विलक्षणभव्य इमारतों का निर्माण करने के बाद कारीगरों के हाथ काट दिए जाते थे. ताकि वे वैसी दूसरी कोई इमारत खड़ी न कर सकें. खुद को बाकी राजाओं से अलग दिखने के लिए सनकी सम्राट ऐसे कुकर्म करते ही रहे हैं. हम तो गाड़ी पर सवार होकर मजे से शीर्ष तक चले आए. जिस राजा ने इसका निर्माण करवाया वह भी पालकियों पर सवार होकर इसी तरह ऊपर चढ़ आया होगा. अपनी रानियों, मंत्रियों, संतरियों और कारिंदों के साथ. न उसको पसीना बहाना पड़ा न हमें. पर जिन्होंने पहाड़ी को काटकर यह रास्ता बनाया. मंदिर बनाने के लिए पत्थरों को तराशा, निर्माण सामग्री को दूर मैंदानों से लाकर यहां चोटी पर पहुंचाया. वे कितने पानीदार, जीवट वाले और उत्साही लोग रहे होंगे. या यह सब उन्होंने विवश होकर किया होगा?

पचास रुपये बतौर रिश्वत चढ़ावे में देकर सहयात्री और मेजबान मंदिर का गर्भद्वार खुलवाने में सफल हो चुके थे. भीतर अंधेरा था. कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था. सहयात्री और मेजबान मेरे आगे थे. मुझे नहीं लगता कि उन्होंने भी कुछ देखा हो. पर सहयात्री और मेजबान दोनों की आंखें श्रद्धावनत थीं. मेरा व्यवहार मेजबान को कुछ अजूबा लगा हो. निस्पंद खड़ा देख उन्होंने मुझसे भी देवी की अभ्यर्थना करने को कहा था. मैं मौन रहा. प्रतिवाद का मतलब था उनकी आस्था को ठेस पहुंचाना. उस सुंदर आतिथ्य का अपमान जो अभी तक हमारे लिए करते आ रहे थे. उस क्षण मैं सोच रहा था कि जिस देवी को हम इस अनंत सृष्टि की पालक, संहारकर्ता, निर्मात्री, सब मानते हैं, जिसमें समाये अनेकानेक ब्रह्मांडों के आगे इंसान तो क्या, स्वयं पृथ्वी का अस्तित्व नदी किनारे पड़े रेत कण जितना हो, उसके आगे धरती के एक क्षुद्र इंसान की गर्दन दो इंच उठाने या झुकान से क्या अंतर पड़नेवाला है! अंतर पड़ता भी हो उन पंडेपुजारियों के लिए जिनका कारोबार धर्म को कर्मकांड बनाए रखने पर निर्भर है, जो मनुष्य के विवेकीकरण से घबराते हैं तथा जैसे भी हो यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं.

देवी अभ्यर्थना के बाद लौटने की बारी थी. ड्राइवर हमें और ऊपर की ओर ले गया. वहां एक दर्शनस्पॉट था. उस स्थान से खड़ा होकर देखने पर गुवाहाटी शहर बिजली के बल्वों से झिलमिलाते टापू जैसा लग रहा था. ब्रह्मपुत्र की अथाह जलराशि का आकलन रात में संभव न था. परंतु पानी में झिलमिलाती तरहतरह की रोशनियां अलग ही नजारा पेश कर रही थीं. ऊपर से गहनजलराशि को छूकर आती ठंडी हवा. मन को भीतर तक शीतलता से भर जाती थी. हमें बताया गया था कि कुछ दिन बाद अंबुमासी मेला लगने वाला है. रास्ते के किनारे गाढ़े गए बांस बता रहे थे कि तैयारियां जोरों पर हैं. कुछ ही दिनों बाद यहां श्रद्धालुओं का हुजुम जुड़ने वाला है.

अंबुमासी का मतलब तो बाद में पता चला. असमवासी वर्ष में एक बार अंबुमासी के रूप में देवी के मासिकधर्म को पर्व की तरह मनाते हैं. हिंदुस्तान के बहुत से समाजों में मातृशक्ति की पूजा आज भी प्रचलित है. सभ्यता के आदिकाल से यह प्रथा चली आ रही है. खासकर जनजातियों में जहां प्रकृति के अपार वैभव के बीच जीवन बहुत विरल था. वहां जीवनचक्र को बनाए रखने के प्रयास भी स्तुत्य माने जाते थे. वही शिवलिंग की पूजा का आधार बने. वही मातृ शक्ति की अराधना का. हिंदुस्तान में जहांजहां देवी के मंदिर हैं, उनकी महिमा बनाए रखने के लिए उनमें से प्रत्येक को देवी के किसी न किसी अंग के गिरने से जोड़ा गया है. जहां कामाख्या का मंदिर है, वहां देवी का योनि भाग गिरा था. यह तांत्रिकों का प्रसिद्ध पीठ है. आमतौर पर कहा जाता है कि गौतम बुद्ध ने बौद्धधर्म के प्रचारप्रसार के लिए जो बौद्ध विहार बनवाए थे, वहीं कालांतर में मठ में रहने वालों के भोगविलास का कारण बन गए. उनमें मुक्त काम पनपने लगा, वही अंततः उनके पतन का कारण भी बना. भारतीय संस्कृति में योनि पूजा नई बात नहीं, बल्कि शताब्दियों से चली आ रही परंपरा है. अपनी यौनलिप्सा को संतुष्ट करने के लिए वैदिक पुजारियों ने यज्ञादि कर्मकांड को भी माध्यम बनायात्र. वौद्धधर्म के पराभव के दौर में वे रीतियां अपने रहस्यमयी आवरण के साथ तांत्रिक क्रियाकलापों में ढल गईं. परिणामस्वरूप बौद्ध मठों में मुक्त काम को जगह मिलने लगी. इससे तंत्र मार्ग का जन्म हुआ. देवीअराधना के नाम पर योनि पूजा और मुक्त कामाचार केवल बौद्धविहारों तक सीमित नहीं था. उसकी नींव महाकाव्य काल तक आतेआते चढ़ चुकी थी. मनुस्मृति के बाद ब्राह्मणवर्ग लोगों को यह समझाने में सफल हो चुका था कि संपूर्ण सृष्टि उसकी है. यहां तक कि स्त्रियां भी. इसलिए स्त्रियों में मुक्त भोग का खेल वैदिक काल में ही खेला जाने लगा था. उसी ने नियोगप्रथा को जन्म दिया. नियोग के लिए ब्राह्मण सर्वाधिक उपयुक्त पात्र है. यह भी शास्त्रसिद्ध बताया गया. रामायण के राम तथा उनके बंधु तथा महाभारत के पांच पांडवों को वीरता में अद्वितीय माना गया है. हमारा इरादा अर्जुन के समक्ष एकलव्य को खड़ा करके द्रोणाचार्य के छल को सामने लाना नहीं है. इतिहास उनके पाखंड को स्वयं तारतार कर चुका है. हम तो बस इतना याद दिलाना चाहते हैं कि रामायण और महाभारत दोनों के महानायक, महाकाव्यों के अद्वितीय वीर यानी चारों दशरथ पुत्र तथा पांचों पांडव नियोगसंतान हैं. क्या यह अन्यथा है? इस बात पर विमर्श अपेक्षित है कि कहीं यह नियोग को बढ़ावा देने का छल तो नहीं? यह कि ब्राह्मण की औरस संतान ही अद्वितीय वीर हो सकती है?

नीलाचल पर्वतमाला से ब्रह्मपुत्र तथा गुवाहाटी का विहंगावलोकन करने के बाद हम होटल वापस पहुंचे तो दस बज चुके थे. शरीर में थकान, आंखों में नीद दस्तक देने लगी थी. देह पर थकान ने कब्जा किया तो उसकी सहोदरा नींद भी आंखों के रास्ते उतरने लगी. दिल्ली की कूलर या एयरकंडीश्नर की बनावटी ठंडक से कुदरती शीलतता में अलग आनंद था. इसलिए भोजन के बाद नींद आई तो सुबह होने पर ही आंखें खुलीं. अगला दिन, अगली यात्रा. यह निर्णय लेने के बाद ही हमने एकदूसरे को शुभरात्रि कहा था.

सुबह का नाश्ता, आराम से केंटीन में किया. टेलीविजन, देखते हुए. दिल्ली में कांग्रेस प्रणव दा को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित कर चुकी थी. उनको समर्थनविरोध पर विभिन्न दलों की राजनीति जारी थी. व्यावसायिक चैनलों की खूबी देखिए कि उन्होंने खबरों को भी मनोरंजन का माध्यम बना दिया है. उसके चलते राजनीतिक समाचार भी अच्छेखासे प्रहसन लगने लगे हैं. उस समय भी टेलीविजन पर ऐसा ही प्रहसन जारी था. राष्ट्रपति गरिमामय पद है, उनका चुनाव भी गरिमापूर्ण होना चाहिए. परंतु यह प्रत्येक बात में मुनाफा और धंधागिरी करने वाले नेताओं की समझ आए तब न! भारतीय राजनीतिक दल जिस प्रकार स्वार्थी आचरण करते हैं, उससे तो देश का लोकतंत्र ही खतरे में नजर आने लगा है.

ठीक दस बजे होटल छोड़ा तो मन काफी शांत था. किसी भी नए शहर की सड़कों को सुबह की ताजगी में देखना यादों को गाढ़ा कर लेने जैसा जरूरी उपक्रम है. सहयात्री बहुत ही संवेदनशील हैं. उनका एक ही शौक, हर खास दृश्य, को अपने मोबाइल कैमरे में कैद कर लेना. कहीं सीधे फोटो, तो कभी वीडियोग्राफी के माध्यम से. उनका फोन हाथ से छूटता नहीं था. राजनीति में फुर्सत के क्षण बहुत कम आते हैं. उन व्यस्ततम क्षणों में एक पल को इन चित्रों को देखकर कुछ क्षणों के लिए तनाव से मुक्ति पाने का यह उनका अपना रास्ता है. चलने से पहले ही उन्होंने ड्राइवर से कह दिया था कि गाड़ी ब्रह्मपुत्र के घाट पर खड़ी करना. ताकि दिन के उजाले में ब्रह्मपुत्र के वैभव को जीभर निहार सकें. ड्राइवर ने मन की बात पकड़ ली. उसने गाड़ी को वहीं खड़ा किया जहां से ब्रह्मपुत्र साफ नजर आती थी. किनारे पर मजदूर बांसों की धुलाई कर रहे थे. उसी ने बताया कि ऊपर बांसों की खेती होती है. वहीं से वे यहां तक बहा कर लाए गए हैं. बहकर आए बांसों का किनारे जमघट लगा था. मानों दर्जनों नावों ने एकसाथ किनारे आकर लंगर डाल लिया हो. उस ओर गांव था, ड्राइवर हमें बता रहा था कि गुवाहाटी के लिए दूध की आपूर्ति उसी दिशा से होती है.

बांसों के ऊपर चढ़कर देखने से ब्रह्मपुत्र के बहाव को सीधे अनुभव किया जा सकता था. नीचे नदी की वेगवती धारा. मैं नदी के वैभव में डूबा हुआ था. जबकि सहयात्री को वहां के चित्र लेने की धुन सवार थी. जब से आए हैं उनका मोबाइल कैमरा लगातार चल रहा था. नदी किनारे झौपड़ियां पड़ी थीं. खाली. उनमें मजदूर परिवार आकर बसर करते होंगे. कड़ी मेहनत के बाद थकन मिटाने के लिए भी ये झोपड़ियां सिर पर छाया देने का काम करती होंगी. ब्रह्मपुत्र का विराट वैभव देखकर गंगा का चौड़ा पाट नजर आने लगा. बचपन में कई बार उसको देखा था. गढ़मुक्तेश्वर पर गंगा इसी तरह विराटरूप लेकर बहा करती थी. अब वह सिकुड़ने लगी है. फिर भी दिल्ली की यमुना से लाख दर्जे बेहतर. यमुना तो गंदानाला बनकर रह गई है. अपनी आर्थिक प्रगति पर इतराने वाली दिल्ली प्राकृतिक संसाधनों के मामले में कितनी कंगाल है, यह साफ नजर आ रहा था. संभव है अपनी आर्थिक ताकत के बल पर वह कुछ दशक और अपनी कंगाली को छिपा सके. लेकिन एक न एक दिन तो असलियत सामने आएगी ही.

विमान ने गुवाहाटी की उड़ान भरी तो मन वहां की यादों से भराभरा था. मेजबान का आत्मीय व्यवहार. निश्छल, प्यारे, सरलमना लोग. राजधानी होने के बावजूद गुवाहाटी अपने कस्बाई चरित्र को नहीं भुला पाया है. यह इस बात का प्रतीक है कि वहां की मिट्टी अपने लोगों को इतनी जल्दी नहीं भुलाती. लौटते हुए रहरह कर याद आ रहा था, राज्यपाल का वह गमन. जिसमें उनके आगेपीछे पचीसतीस कारों का कारवां था. सारा ट्रैफिक रोक दिया गया था. बीस मिनट से अधिक हमें चौराहे पर ही बिताने पड़े थे. इस देश में लोकतंत्र को आए 65 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन लोकतंत्र के झंडे तले सत्ता पर विराजमान होने वाले यहां के हुक्मरान, आज भी अपने चरित्र को लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप नहीं ढाल पाए हैं. संविधान उनके लिए महज औपचारिक व्यवस्था है. एक ढाल जिसके पीछे वे अपने सामंती चरित्र को छिपाये रहते हैं.

विमान एक बार फिर दो आसमानों के बीच उड़ रहा था. ऊपरनीचे बादल ही बादल. नीम बेहोशी में डूबे. हौलेहौले चहलकदमी करते, आसमान में कुलांचे भरते, नन्हे मृगछौने से बादल. आसमान में व्यावहारिक दिशाबोध काम नहीं करता. जैसे बादल इस ओर हैं, ठीक वैसे ही बादल, ठीक ऐसा ही आसमान, ठीक ऐसे ही नीलाचल पर तैरतीं, श्वेत कपासी चट्टानें. हिमालय के उस पार चीन में भी होंगी. ऐसे ही बादल भूटान, नेपाल, तिब्बत, बर्मा आदि उस पार के देशों में भी होंगे. आदमी की हवस का सिक्का सिर्फ धरती पर चलता है. अच्छा ही है, जो आसमान को वह बांट नहीं पाया है. कुछ औपचारिक विभाजन आसमान का भले ही हुआ हो. हमारी धरती से ऊपर, फलां ऊंचाई तक का आसमान हमारा है. पर यह आसमान धरती की कक्षा के साथ ही अपनी जगह बदलता रहता है. आदमी की हवस का सिक्का आसमान पर चल ही नहीं सकता.

गुवाहाटी से डिब्रूगढ़….केवल पचपन मिनट का सफर. चालक दल विमान के उतरने की घोषणा कर कर रहा था‘अब से थोड़ी ही देर बाद हम डिब्रूगढ़ में होंगे. यात्री कृपया अपनी सीटबैल्ट बांध लें. खूबसूरत शहर डिब्रूगढ़ में आपका स्वागत है.’

डिब्रूगढ़! पहाड़ की गोद में बसा छोटासा शहर. डिबू्रगढ़ नाम बना है ‘डिब्रामुख’ से. यहां कभी अहोम राजाओं की छावनी हुआ करती थी. कुछ लोग मानते हैं कि ‘डिब्रू’ शब्द ‘डिबारू’ या ‘दिमसा’ नदी से निकला है. एक परंपरा के अनुसार ‘दिमसा’ का अर्थ ‘विशाल नदी का शहर’ भी है. ब्रिटिश इस शहर में 1826 में कदम रख चुके थे. अंग्रेजों को डिब्रूगढ़ की भौगोलिक स्थिति इतनी पसंद आई थी कि यहां फौरन अपना व्यापारिक और प्रशासनिक कार्यालय बना लिया. 1840 में इसे लखीमपुर जिले का मुख्यालय बनाया गया. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान यह शहर ब्रिटिश सेना का मुख्यालय बना. युद्ध के दौरान बर्मा से विस्थापित शरणार्थियों के लिए यह शरणस्थली बना. जनसंख्या के हिसाब से देखें तो डिब्रूगढ़ गुवाहाटी और जोरहट के बाद असम का तीसरा सबसे बड़ा शहर है. फिर भी कुल जनसंख्या मात्र तीन लाख. उत्तर भारत किसी छोटे शहर जितनी.

एयरपोर्ट से बहार निकले तो अगवानी के लिए यहां भी लोग तैयार थे. वही आत्मीय व्यवहार. वैसा ही दिल को छू लेने वाला संबोधन. सड़क संकरी थी. पर आसपास प्रकृति का वैभव मानो बिखरा पड़ा था. अतुलनीय सौंदर्य. ऐसा कि निगाह टिकी की टिकी रह जाए. सड़क के दोनों और चाय के बागान. दूर जहां तक नजर जाए, हरियाली ही हरियाली. लोग इसे ‘भारत का चाय का शहर’ कहते हैं तो वे गलत नहीं हैं. डिब्रूगढ़ को भारत के तीन प्रमुख चाय उत्पादक जिलों, तिनसुकिया, सिवसागर और स्वयं डिब्रूगढ़ का प्रवेश द्वार माना जाता है. देश के कुल चाय उत्पादन का आधा हिस्सा इन्हीं तीन जिलों से आता है. यहां गुवाहाटी जैसी भीड़भाड़ नहीं. न ही सड़कों पर अवैध कब्जादारी. प्राकृतिक वैभव ने यहां के निवासियों को संतोषी बना दिया है.

गाड़ी जहां रुकी वह डिब्रूगढ़ का पॉश इलाका था. होटल भी वहां के अच्छे होटलों में गिना जाता होगा. हालांकि दिल्ली के हिसाब से वह रेलवे स्टेशन के आसपास बने सस्ते विश्रामग्रह जैसा ही था. अधिक ठहरने का समय न था. डिबू्रगढ़ शहर और वहां के पठारों, नदियों का अवलोकन करना था. उसी शाम डिब्रूगढ़ की दलित बस्तियों में घूमने का अवसर मिला. पूरे नगर की साजसफाई की जिम्मेदारी संभालने वालों की हालत दिल्ली की किसी मलिन बस्ती से भी हजार गुना खस्ता थी. टीन के आठ बाई बारह के खोलीनुमा घर. सीलन और बदबू से बेहाल. छत पर प्लास्टिक, पोलीथीन, बांस की टाटियों सं बनी झोपड़ियां. सड़क से नीची. इतनी की गली का पानी सीधे झोपड़ी में जाकर रुके. कुम्हलाया बचपन. यूं तो दिल्ली में भी कई भारत बसते हैं. पर यह तस्वीर उस भारत की थी, जिसके अभी तक दर्शन नहीं हो पाए थे. लोकतंत्र का उत्सव तो यहां भी मनाया जाता होगा. हर पांच वर्ष में उम्मीद की गठरियां खोली जाती होंगी. पर पांच वर्ष ऐसे ही बीत जाते हैं, उन गठरियों की सौगात इन तक पहुंच ही नहीं पाती. छह फुट लंबा, चार फुट चौड़ा और लगभग डेढ़ फुट गहरा हथठेला. जिसे वे लोग शहर का कूड़ा यहां से वहां पहुंचाने के लिए काम में लाते हैं. कालोनी के सिरे पर ही एक अपेक्षाकृत पक्का कमरा था. सामने आंबेडकर जी की तस्वीर. अपनी कालोनी की तरह की खस्ताहाल. उसके आगे विद्यालय लिखा था. पर क्या वह सचमुच विद्यालय ही था! यहां बढ़कर जो विद्यार्थी बाहर निकलते होंगे, वे कितना आगे तक जाते होंगे. उनके सपने यहीं कीचड़ में दम तोड़ लेते हैं. ऐसे स्कूलों को उन लोगों को अवश्य दिखाया जाना चाहिए जो आरक्षण का विरोध करते हैं. जिन बच्चों को समय पर खाना, पेटभर भोजन, पहनने को कपड़े, पढ़ने को किताबें, सिर पर छत तक उपलब्ध नहीं, वे स्पर्धा के मामले में कितना टिक सकते हैं. उन लोगों के आगे तो सुविधासंपन्न एयरकंडीशनड विद्यालयों में पढ़े हैं. मेरे सहयात्री उनके लिए एक उम्मीद थे. बस्ती का युवक बता रहा था कि उसके दादेपरदादे असम के शासकों के बुलावे पर वहां पहुंचे थे. तीनचार पीढ़ियां वहीं गुजर चुकी हैं. इसके बावजूद उन्हें वहां का स्थायी निवासी नहीं माना जाता.

डिब्रूगढ़ के प्राकृतिक वैभव ने मन लुभाया था. पर उस बस्ती से गुजरने के बाद यात्रा का आनंद हवा हो चला था. अब वापस लौटना था. उस रात ढंग से सो भी न पाया. अगले दिन चाय बागान देखने का अवसर मिला. ब्रह्मपुत्र के दर्शन भी किए. पाट तक गए. असम की बोडो समस्या के बारे में भी पता चला. लेकिन बीते दिन की यादों ने पीछा नहीं छोड़ा. वे मुझे मनुष्यता के नाम पर गाली लगती रहीं. जहां एक ओर मीलों तक फैले चायबागान हों, धरती के वैभव का प्रदर्शन करती नदियां, ऊंचे पहाड़ और बेशुमार हरियाली हो. वहीं दूसरी ओर कीचड़सनी, भूख, बेकारी, गरीबी और गिजालतभरी जिंदगी हो, वहां ऐसे विद्रोही स्वरों का उभरना असामान्य नहीं. रूसो ने कहा था कि आदमी आजाद जन्मता है. लेकिन वह हर कहीं कैद में है. किसी और ने नहीं उसको इंसान ने उसके लिए बेड़ियां इंसान ने ही तैयार की हैं. इसलिए उत्पीड़ितों के न्याय के लिए विरोध के स्वर उभरना अवश्यंभावी है. भरपूर प्राकृतिक संपदा के बीच अमानवीय जिंदगी ये दस्तावेज इन संभावनाओं को और बढ़ा देते हैं.

वापसी में उड़ान चालीस मिनट के लिए कोलकाता में ठिठकी थी. कोलकाता भारतीय चेतना का शहर. महर्षि अरविंद, सुभाषचंद बोष और ऐसे ही न जाने कितने बंगवीरों, विद्वानों और महात्माओं की धरती. ममता दीदी का राज्य….उनकी राजनीति के बारे में तो नहीं मालूम, प्रथम दृष्टया वे मुझे ‘राजनीति की हरावल लेडी’ जान पड़ती हैं. कोलकाता से उड़ान भरी तो तेज हवाएं चल रही थीं. बादल कुछ और बोझिल हो चले थे. द्रवभार से झुकेझुके नजर आ रहे थे. बीच रास्ते दो बार चालक दल को सीटबेल्ट बांध लेने के निर्देश देने पड़े. थोड़ी घबराहट हुई. परंतु हवा के झोंके की तरह वह वक्त भी गुजर गया. अब दिल्ली करीब थी. अपनी उमस, प्रदूषण, भीड़भाड़, ट्रेफिक जाम, नाजनखरे, वैभव और अपनी समस्त राजनीतिक चालकुचाल के साथ.

© ओमप्रकाश कश्यप

दो आसमानों के बीच-एक

सामान्य

यात्रा संस्मरण

कुल डेढ़ महीना पहले संपन्न हुई इलाहाबाद यात्रा के अनुभव अच्छे नहीं थे. मन में कड़वाहट घुली थी. उस यात्रा की कुछ परेशानियां अपनी ही चूक का नतीजा थीं, कुछ दूसरों की गलती का. कुछ रेले में ढेले की भांति अकस्मात बीच में आ अड़ी थीं. इसलिए जब असम में गुवाहाटीडिब्रूगढ़ की यात्रा का प्रस्ताव आया तो जाने की कतई उत्सुकता नहीं थी. पर बानक कुछ ऐसा बना कि यात्रा टल गई. दो सप्ताह बाद जब नए सिरे से कहा गया तब तक पिछली यात्रा की कडु़वाहट और थकान उड़न छू हो चुकी थी. इसलिए बिना किसी हिचक, बगैर कोई अवसर गंवाए ‘हां’ कह दिया. यदि भाग्यवादी या ज्योतिष में विश्वास रखने वाला होता तो इस बार यात्रा पर निकलने से पहले शुभ मुहुर्त अवश्य बंचवाता, पंडेपुजारी की सलाह लेता. मुहुर्त निकलवाना आज भले कितना ही निरर्थक और कर्मकांडी आयोजन बन चुका हो, बीते जमाने में इसकी भरपूर प्रासंगिकता थी. उन दिनों यात्रा करना दुरूह और कष्टदायी कर्म था. बीच रास्ते सैकड़ों बाधाएं आतीं. सकुशल घर लौटना भी चुनौतीपूर्ण होता. गंतव्य तक पहुंचने में महीनों, कभीकभी तो पूरा वर्ष लग जाता था. यात्रा के बीच मौसम की मार भी असर करती. कभी आंधीतूफान तो कभी बरसात राह रोक लेती. समुद्री यात्राओं की सफलता तो मौसम की मेहरबानी बगैर मानो असंभव ही थी. पुराने ज्योतिषी, भविष्यवक्ता असल में अच्छे मौसम विज्ञानी होते थे. वे खुले आसमान को ताककर मौसम का मिजाज भांप लेते. हवाओं का रुख देख अपने अनुभवविवेक के बाद ही कोई समाधान देते थे. फिर भी अनिश्चितता तो थी. अनचीन्हे हजार संकट. शकुनविचार भी चलता था. यात्रा सफल हो, बाहर गए प्रियजन, सकुशल वापस लौट आएंइस कामना के साथ शहर में अप्र्रिय काम रोक दिए जाते थे. सुकरात की फांसी को एक महीना इसलिए टालना पड़ा था, क्योंकि एथेंस का पवित्र जहाज डेलोस की यात्रा पर निकला हुआ था. बाद में यात्राएं सुगम होती गईं. फिर भी आदमी के दिल का डर गया नहीं. सुविधाओं के साथ वह भी परवान चढ़ता गया. लेकिन हालात बदल चुके थे. अब पहले जैसे अनुभव का ताप खाए मौसमविज्ञानी न थे. वे कुछ और ‘सभ्य’ हो चुके थे. ज्योतिष परजीवियों का बैठेठाले का धंधा बन चुकी थी, भविष्यवाणी करना कोरा कर्मकांड. भविष्यवक्ता और प्रपंची तांत्रिक दोनों घुलमिल गए थे. वे जैसे भी संभव हो, लोगों का उल्लू सीधा करने में लगे रहते.

बहरहाल, पिछली यात्रा के दौरान एक के बाद एक जो समस्याएं झेली थीं. उन्हें देख शुभ मुहुर्त का विचार मन में आना स्वाभाविक ही था. भारतीय मन कुछ इसी प्रकार सोचताकरता है. परंतु अपन न तो किसी कोण से आस्थावादी है, न घटनाओं के पीछे ‘अदृश्य हाथ’ पर विश्वास करने वाले. ठेठ नास्तिक ठहरे. अपना ऐसी किसी सत्ता में विश्वास नहीं जो भौतिक नियमों के दायरे से बाहर हो. जो संसार में है, इस अखिल ब्रह्मांड में है, वह चाहे दृश्य हो अथवा अदृश्य—भौतिकी के नियमों से आबद्ध है. यहां अमरत्व की बात करना, भले ही देवताओं के लिए हो, नादानी है. गत पांचछह हजार वर्षों में जब से सभ्यता ने कुलांचे भरना आरंभ किया है, आदमी ने न जाने कितने देवता गढ़े हैं. और आदमी की उपेक्षा से ही, न जाने कितने देवता काल के गाल में समा चुके हैं. आदमी की तरह उसका बनाया भगवान भी नश्वर है. उससे जुड़ा हर चमत्कार कपोलकल्पना, निठल्लों का स्वार्थकृत्य है. यह संभव है कि अपनी ज्ञान की सीमाओं के रहते हम प्रकृति में हर रोज घटने वाली चमत्कारनुमा घटनाओं की सटीक व्याख्या न कर सकें. लेकिन उनकी व्याख्या होगी भौतिकी और ज्ञानविज्ञान की सीमाओं में ही—ऐसा मेरा विश्वास है. भौतिक घटनाएं कभी अभौतिक कारणों से प्रभावित नहीं होतीं. ऐसा हो, इसका कोई कारण भी नहीं है. जीवनसृष्टि अपनी ही विज्ञान दृष्टि में चलायमान है. इसलिए प्रतीत्यसमुत्पाद यानी कार्यकारण की खोज अपुन को किसी अदृश्य सत्ता तक नहीं ले जाती. इस कारण न तो ग्रहनक्षत्रों की कृपा पर भरोसा जमता है, न किसी और देवीदेवता पर. मन सहज भाव से बीती भुला आगे बढ़ने को तैयार रहता है.

टिकटों का इंतजाम समय रहते हो चुका था. साथ में मार्गव्यय की व्यवस्था भी. इसलिए निश्चिंत था. काफी हद तक शांत. आपातस्थिति से निपटने के लिए एटीएम भी कब्जे में कर लिया था. यात्रा छोटी अवधि की थी. सुबह मुंहअंधेरे निकलने के बाद तीसरी रात वापस लौट आना था. परिजनों से मात्र दो रात, तीन दिन का वियोग….सहा जा सकता है. इस विचार के साथ गंतव्य के पतेठिकाने नोट कर, टिकटों को संभाल आगे का विचार किया. पिछली यात्रा की असफलता के अनुभव इस बार काम आ रहे थे. एक समय में किसी एक ही काम पर ध्यान केंद्रित करना. दुनिया के बाकी लंदफंद में उलझने से खुद को बचाए रखना. कार्यक्रम के अनुसार सुबह साढ़े चार बजे टैक्सी दरवाजे पर आ लगी. ड्राइवर भला था. समय का पाबंद. इस धंधे में घंटाआधा घंटा खपा देना मुश्किल नहीं. चतुरसुजान वाहन चालक पांच मिनट कहतेकहते पूरा घंटा चाट जाते हैं. पर इसने ठीक समय पर टैक्सी दरवाजे पर लगा दी. घर से चला तो सीधे सहयात्री के आवास पर. वे लगभग तैयार थे. पांच मिनट में हम थोड़ेसे सामान के साथ वहां से निकल चुके थे. खाली सड़कों पर टैक्सी रफ्तार दिखाने लगी.

किसी को दिल्ली की हरियाली, चिकनी सड़कें और नई दिल्ली इलाके की खूबसूरती देखनी हो तो उसके लिए मुंहअंधेरे का समय सर्वोत्तम है. सड़क किनारे खड़े पेड़पौधों, हरी घास, फूलपत्तियों के लिए यही समय होता है, जब वे इत्मिनान से सांस ले सकें. अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए आवश्यक प्राणवायु वे इसी अवधि में पचा लेती हैं. दिन के बाकी समय तो उनकी नियति कुचलना, झुलसना और धुआं, दुर्गंध के बीच दम घुंटना रह जाता है. उस समय देर रात तक दिल्ली की सड़कों को रौंद चुकी गाड़ियां गैराज में आराम कर रही होती हैं. जिन्हें गैराज नसीब नहीं होता, उन्हें सड़क किनारे लावारिस की भांति खड़ा कर दिया जाता है. गाड़ी उसी समय तक स्टेटस सिंबल है, जब आप लोगों के बीच हैं. घर पहुंचते ही गाड़ी आफत लगने लगती है. टीन के उस हाथी की तरह जिसने आंगन के बड़े हिस्से को कब्जाया हुआ है. जिनके आंगन बड़े हैं, वे चाहें जितनी गाड़ियां खड़ी करें. पर निम्नमध्यमवर्गीय आदमी के लिए तो एक को संभालना भी भारी पड़ जाता है. सुबह की ठंडक में उनके सवार, जिनकी देह देर तक बैठने से बुरी तरह अकड़ चुकी होती है, कमर सहलाने पर जुटे होते हैं. रात में उन्हें नींद आती भी है तो खर्राटों के बम फोड़ते हुए. देह न जाने कितनी बीमारियों का ठिकाना बनी होती है. नई सभ्यता का यही चलन है. परंतु समाज में होड़, अपने ही जैसे जिंदगी की जद्दोजहद से रोजरोज गुजरनेवाले पड़ोसियों के साथ इर्ष्या, दिखावा सबकुछ करताकराता है. जगह और विश्वास की कमी ने यहां आदमियों के दिलों में सिकुड़न पैदा कर दी है. इस सिकुड़न को आपसी विश्वास, सहयोग, सद्भाव से दूर करने के बजाय आदमी दूसरे की सिकुड़न को बढ़ाकर मिटाना चाहता है. पूंजीवादी विकास की यह अवश्यंभावी देन है. उस व्यवस्था की निगाह में आदमी की हैसियत महज एक उपभोक्ता की है. जिसमें आदमी को खिलानेपिलाने, हिलानेडुलाने से लेकर घुमानेफिराने यहां तक कि बीमार पड़ने पर इलाज करने वालों की भी लंबी कतार लगी होती है. एक विक्रेता बीच में आकर ‘खाते जाओखाते जाओ’ का प्रलोभन इसलिए देता है, ताकि ग्राहक पेटदर्द और बदहजमी के शिकार ग्राहकों के बीच पाचक गोलियों का बाजार बने. पूंजीवादी निर्माणतंत्र उपभोक्ता के दिलोदिमाग पर इसी तरह कब्जा करके उसको हांकता रहता है.

उड़ान समय पर थी. जानकर मन को संतोष हुआ. बीते दिनों पायलटों और सरकार के बीच जो रस्साकशी चली उसके दौरान उड़ान लटक जाने का खतरा भी बना हुआ था. पर कहीं यह भरोसा भी था कि सरकारी अस्तपालों में डाॅक्टर, नर्सों की हड़ताल के समय सबकुछ भगवान भरोसे छोड़ देने वाली सरकार पायलेट की हड़ताल को खिंचने नहीं देगी. इसलिए कि हवाई जहाज से वह तबका चलता है जो देश और सरकार चलाता है. सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने वाली जनता की जरूरत तो पांच वर्ष में एक बार पड़ती है. उस समय भी उसे जाति, धर्म, सांप्रदायिकता, क्षेत्रीयता, भूख, गरीबी, मंदिरमस्जिद आदि के नाम पर इस प्रकार बांट दिया जाता है कि वह अपने ही बंधुवांधवों और पड़ोसियों पर संदेह करने लगती है. ऐसे में सरकार को अपनी मर्जी से हांकने वालों को मनमानी करने का अवसर मिल जाता है. वे बारीबारी से लोकतंत्र की चक्की चलाते हैं, जनता उसमें पिसती रहती है.

यही अवसर है कि आपको अपने सहयात्री से परचा दिया जाए. हालांकि यह केवल औपचारिकता ही होगी. न बताऊं तो भी इस यात्रा के बयान पर शायद ही कोई असर पड़े. मेरा मानना है कि हर यात्रा दो स्तरों पर चलती है. भीतरी और बाहरी यात्रा. बाहरी यात्रा का संबंध हमारे शरीर और परिवेश से होता है. किसी भी यात्रा को कलेवर प्रदान करने के लिए बाहरी यात्रा अनिवार्य है. परंतु मात्र कलेवर से तो कोई रचना प्राणवंत हो नहीं सकती. यात्रा में प्राणप्रतिष्ठा करती है—अंदरूनी यात्रा जो हर समय चलती रहती है. परिवेश के अनुसार हमारे सोच में भी बदलाव होता रहता है, जो प्रकारांतर में बाहरी यात्रा पर भी असर डालता है. अतः बाहरी यात्रा के साथ यदि अंतर्मन की यात्रा का मेल न हो तो वह इकहरी यात्रा बनकर रह जाए. बाहरी यात्रा की अनुभूतियां बदलती रहती हैं, उसका परिवेश और पात्र परिवर्तनशील रहते हैं, लेकिन भीतरी यात्रा में हमारे अंतःप्रदेश का वातावरण अपरिवर्तित रहता है, सिर्फ उसपर नए अनुभव टंकते जाते हैं. बदलते परिवेश के साथ हमारे मनस् का सतत जुड़ाव हमें एकता की अनुभूति कराता है. वही हमारी यात्रा को संपूर्ण बनाता है. किसी भी यात्रा में ये दोनों साथसाथ न चलें तो वह महज मशीनी क्रिया बनकर रह जाए. मानो हम नहीं, मात्र हमारी देह यात्रारत है. मेरे बारे में तो यह शब्दशब्द सत्य है. अंदर की यात्रा को संपन्न बनाने के लिए जरूरी नहीं कि यात्राएं बड़ी ही हों. कई बार छोटी यात्राएं भी बड़ी कारगर सिद्ध होती हैं. वे भी मन को इतना कुछ एकसाथ दे जाती हैं कि वह सदैव नए सोच और चेतना से भराभरा रहता है. दूसरे, सहयात्री चाहे परिचित हो अथवा अपरिचित, वह होता तो परिवेश का ही हिस्सा है. उसके होने या न होने से भी यात्रा अबाध चलती रहती है, बशर्ते उसके साथ अंतर्मन की यात्रा का पूरापूरा योग हो. सहयात्री का होना तो परिवेश में कुछ चीजोंप्राणियों का घटनाबढ़ना है.

इस यात्रा में मेरे साथ चल रहे मेरे सहयात्री एक नेता हैं. दिल्ली के पिछड़े इलाके से चुनाव जीतकर तीन बार विधानसभा पहुंचे हुए. बहुत कम पढ़ेलिखे होने के बावजूद अपने मतदाताओं का भरपूर प्यार उन्हें मिलता रहा है. गत पचास वर्षों में इस देश में यदि कोई क्षेत्र सर्वाधिक आभाहीन हुआ है वह राजनीति का है. क्या इसका कारण जितने बाहरी हैं, उतने ही अंदरूनी भी हैं. कम पढ़ालिखा होने के बावजूद जनता ने उन्हें तीन बार विधानसभा जाने का अवसर दिया है. इससे लगता है कि जनता औपचारिक शिक्षा से अधिक इसमें विश्वास रखती है कि उसका नेता उसके लिए कितना काम कर पाता है, कितनी लोकनिष्ठा उसमें है, कितना समय उसके कार्यों के लिए देता है. अपने सहयात्री के बारे में इतना मैं जान पाया हूं कि अपनी जनता के प्रति वे पूरी तरह ईमानदार हैं. उसमें शायद ही कभी कोताही बरतते हों. एकाध बार तो ऐसा हुआ कि आधी रात को किसी का फोन आया और उठकर चल दिए. रास्ते में गश्ती पुलिस ने रोका, पूछताछ की, तब जाने दिया. इसी कारण लोग उन्हें अपना मानते हैं. इसके बावजूद लोकप्रतिनिधि होना उनके लिए दर्प नहीं कृतज्ञता का विषय है. कृतज्ञताबोध जनता के बजाय उस राजनीतिक दल की मुखिया के प्रति है, जिसने उन्हें पार्टी झंडे के नीचे चुनाव में उतर जाने का अवसर दिया था. इसे भारतीय राजनीति की विडंबना कहें कि सहòाब्दियों से चली आ रही जातिप्रथा के साथ अनुकूलन. अपने दम पर चुनाव जीतने का दम रखने वाले, जातीय संस्कारों से दबे और व्यवस्था को आत्मसात् कर चुके बहुतसे नेता अपनी लोकतांत्रिक उपलब्धियों का श्रेय ऐसे ही बांटते रहे हैं. उनकी जिंदगी बीत जाती है जनता के बीच जाते, उसका विश्वास जीतते हुए. फिर भी अपने नेता के एहसान से मारी उनकी कमर सीधी नहीं होती. आत्मविश्वास की कमी के कारण वे समझकर भी अनजान बने रहते हैं कि जनता का विश्वास महज दलीय अनुकंपा से प्राप्त नहीं होता. उसके लिए लोगों के बीच रहकर उसके दुखसुख का साझीदार बनना पड़ता है. यह काम उन्होंने किया है, कर रहे हैं. फिर भी उनकी सफलता उन्हें दर्प नहीं देती. जिस जाति समूह से वे संबंध रखते हैं, वह समाज के निम्नतम स्तर पर आती है. वहां गर्त से उबरकर सतह तक आ जाना ही बड़ी उपलब्धि है. दूसरे, हमारी राजनीति में या तो अत्यधिक महत्त्वाकांक्षी नेता हैं, या वे लोग जिन्होंने अपनी और अपने समर्थकों की महत्त्वाकांक्षाएं अपने नेता के नाम समर्पित कर दी है. अति महत्त्वाकांक्षी लोगों ने अपनीअपनी पार्टी बना ली है. उसका वे जमकर दुरुपयोग करते हैं. ये पार्टियां असल में प्राइवेट लिमिटेड कंपनियां हैं, जिनसे वे राजनीतिक दांव लगाते रहते हैं. उसी के आधार पर वे वोटों का सौदा करते हैं, सदन में होहल्ला मचाते हैं और जरूरत पड़ने पर सांसदोंविधायकों की बोली भी लगवाते हैं. जिनकी महत्त्वाकांक्षाएं कमजोर हैं, भरपूर जनाधार होने के बावजूद वे राजनीति का खेल दूसरों के लिए खेलते हंै. हालांकि, चुनाव जीतने के लिए जरूरी लंदफंद उन्हें भी करने पड़ते हैं, लेकिन उनके प्रयासों में उस संभ्रातपन का अभाव होता है, जो शासनप्रशासन को अपनी उंगलियों पर नचा सके. इसलिए दूसरे के खेल का हिस्सा और उनके सर्वाधिकारवाद का मूक समर्थक बन जाना उनकी नियति होती है. परिणामस्वरूप आमूल परिवर्तन टलता जाता है तथा लूट संस्कार बनी लगती है.

इंदिरागांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा’ यहां आने वालों को अपने देश की हकीकत से दूर पश्चिमी सभ्यता के करीब ले जाता है. सब कुछ औपचारिक, बनावटी पर करीने से सजा हुआ. जो पैसा खर्च कर सकते हैं, वे लोगों की मुस्कान भी खरीद सकते हैं. उन्हें सबकुछ इसी तरह करीने से सजा हुआ चाहिए. इसके लिए कितना खर्च होता है, इसकी वे चिंता नहीं करते. वह आएगा कहां से इसकी भी उन्हें परवाह नहीं होती. विमान परिचारिका के मुस्कराते चेहरे देखने से उन्हें तसल्ली होती है. भले ही वह मुस्कान नकली क्यों न हो. जब से आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत हुई, बाजारवादी संस्कृति ने पांव पसारे हैं, तब से भारतीय मध्यवर्ग भी अपनी बचतसंस्कृति की केंचुल उतारकर अपने ऊपर खर्च करने लगा है. इस कारण हवाई जहाज के टिकट के लिए भी रेलगाड़ी के टिकट जैसी मारामारी रहती है. आपाधापी के बीच टिकट लेना जंग जीतने का एहसास करा देता है. इसके बाद आदमी अपनी सफलता के नशे में डूब जाता है. नशा स्पर्धा का. दूसरों को पीछे छोड़कर आगे निकल आने का. विमान उड़ान भरने को तैयार था. परिचारिकाएं सुरक्षा निर्देश दे रही थीं. उनके स्वभाव में हड़बड़ी का भाव था. गोया जानती थीं कि जहाज में बैठे यात्रियों के लिए यह रोज की बात है. फिर रोजरोज बल्कि दिन में कईकई बार वही बातें दोहरानी पड़ें तो नयापन कहां से लाएं! यात्रियों के लिए विमान परिचारिकाओं की बातों से अधिक महत्त्वपूर्ण उनके दमकते चेहरे और रूपलावण्य था.

हवाई उड़ान का अनुभव अपने लिए नया नहीं था. एक बात जरूर नई थी. इससे पहले जितनी भी विमान यात्राएं की थीं, संयोगवश सभी रात में थीं. दिन में उड़ान के समय आसमान कैसा दिखता है, मन में यह कौतूहल था. इस बार कुछ ऐसा बानक बना था कि तीनों यात्राएं दिन के उजाले में संपन्न होनी थीं. जहाज का रनवे पर दौड़ना और हवा में उठना कुछ भी अनोखा नहीं लगा. अभ्यास की बात है. मौत जब तक दूर है, अदृश्य है तभी तक उसका भय समाया होता है. अगर वह मानवरूप धारण कर साथ चलने लगे तो आदमी उसके साथ भी जीना सीख ले. जमकर चुहलबाजी करे. वह एक तरह से अच्छा ही होगा. मौत से डरे इंसान ने जो ढेर सारे धर्मकर्म, देवीदेवता और भगवान पैदा किए हैं, उनकी जरूरत ही न पड़े. जहाज बादलों को चीरता हुआ ऊपर उठ रहा था. दिल्ली का आसमान तो धुंध और धुंए से बाहर जा ही नहीं पाता. महानगरीकरण ने यहां के निवासियों से आसमान का मुक्त वितान, उसका अकूत सौंदर्य छीन लिया है, यह बात दिल्ली वाले समझते तो हैं, पर चर्चा नहीं कर पाते. राजधानी से दूर जाने का विचार ही उन्हें डरा देता है. कुछ मिनटों की उड़ान के बाद ही हवाई जहाज दिल्ली के धुंध और धुंए भरे आसमान से काफी दूर निकल चुका था. पूरब में मानसून दस्तक दे चुका है. उसकी आहट आसमान में सुनाई दे रही थी. दूरदूर तक फैले बेपरवाह बादल मानो धरती से गले मिलने को आतुर थे.

यान में सबसे लुभावना था वह कार्यदल का व्यवहार. यह दिखाता हुआ कि पूंजीवाद के मूलमंत्र स्पर्धा ने जहां आदमी को मशीन बनाने जैसा धत्कर्म किया है, वहीं कुछ अच्छे काम भी उसके नाम हैं. उनमें एक है परंपरागत पेशों की दीवार को तोड़कर जातिवाद की रीढ़ पर प्रहार करना. कुछ ही देर पहले जो परिचारिकाएं सुरक्षा निर्देश दे रही थीं, वे जलपान की व्यवस्था में जुट चुकी थीं. सहयात्री को मधुमेह की बीमारी है. देर तक खाली पेट रहना उनसे बन नहीं पाता. वे नाश्ते की ट्राली के इंतजार में थे. लेकिन परिचारिकाओं का अपना नियम था. जहां सभी अतिविशिष्ट हों, वहां वीआईपी होना काम नहीं आता. परिचारिकाओं ने पूरा काम मिलकर संभाल लिया है. उनमें न कोई छोटा है, न बड़ा. औरत की वैसे भी कोई जाति नहीं होती. वे जिससे ब्याह दी जाएं उसी का जातिनाम अपना लेती हैं. पूंजीवाद ने जाति की जकड़न को तोड़ा है. हालांकि यह सब उसने स्वार्थवश, सिर्फ अपने हितों को ध्यान में रखकर किया है. चालक दल जहाज के का॓कपिट में था. कार्यदल और चालक दल के बीच कार्यविभाजन हो तो हो, कार्यदल में आंतरिक कार्यविभाजन शून्य था. यह बात उस समय पूरी तरह साफ हो गई जब उद्घोषिका के रूप में सुरक्षासंकेत बता रही परिचारिकाएं हाथ में प्लास्टिक का बड़ासा थैला उठाए बीच से गुजरीं. जूठे चाय के कप, खाली कार्टन उसमें डाल देने का आग्रह करती हुईं.

मेरा ध्यान खिड़की से बाहर अटका था. दिल्ली का आकाश तो प्रदूषण से धुंधला नजर आता है. खुले आसमान को देख पाना भी असंभव है. यहां मेरे सामने दोदो आसमान थे. एक जहाज के नीचे. कालेमोटे बादलों से भरा. नील छटा बिखेरता हुआ. दूसरा ऊपर. हल्के, सफेद, आलसी बादलों से निर्मित. दूर, जहां तक नजर जाए वहां बादल ही बादल. ऊपरनीचे, मोटे, रूई से हलके, गेंद से गोलगदबदे. सुदूर क्षितिज तक, शामियाने से तने. बीचबीच में सफेद दूध की नदी, नदी में उभरे वर्फ के टापू जैसे. या फिर जलपोत, हौलेहौले आसमान की नील नदी में डुबकी लगाते हुए. कालिदास ने कभी संदेश ले जाने के लिए बादल को अपना दूत बनाया था. वे बादलों का ऐसा जमघट देखते तो पेशोपेश में पड़ जाते कि इनमें से कौनसा बादल अधिक सुंदर, संवेदनशील और आज्ञाकारी है जो प्रियतमा तक संदेश पहुंचा सके! पर मेरे ही जनपद के कवि घनानंद के लिए यह कोई समस्या न होती. प्रीति का सच्चा मतलब ही खुद को दुख में रखकर प्रियतम के लिए मंगल कामना करना है. इसलिए सफेदमोटियाए, बूढ़ेजवान वारिदकणों से लबालब बादलों को देख, वियोग की पीड़ा से विदीर्ण विरहनीर बहाते हुए वे उलाहना देते—

पर कारज देह को धारे फिरों, पर्जण्य जथारथ ह्वें दरसों

निधिनीर सुधा के समान करौं, सबहिं विधि सुंदरता हरषों

….

कबहूं वा विसांसि सुजान के आंगन मो अंसुआन को ले बरसौं.

बरसों पहले कालिज में पढ़े इस सवैया की पंक्तियां स्मृति ओझल हो चुकी हैं. संभव है कि कुछ शब्द या वर्तनी भी इधरउधर हो. पर भरोसा गया नहीं कि घनानंद ने ये पंक्तियां ऐसे ही दमदार बादलों को देखकर रची होंगी. ऐसे दमदार बादलों को देख किसी का भी दिल उमंगित हो सकता है. वह तो घनानंद थे. सुजान के प्रेमरस में रमे हुए. कहते हैं कि घनानंद की कविता की चहुंदिश प्रशंसा सुनकर दिल्ली के बादशाह मुहम्मदशाह रंगीले ने उन्हें बुलवा भेजा. घनानंद की प्रतिभा देख उन्हें अपना मीरमुंशी बना लिया. एक बार बादशाह का मन हुआ कि घनानंद से कुछ सुनें.

कुछ सुनाइए, दोहा, सवैया, छप्पय, सोरठा, जिससे बादशाह का दिल बहले. हीरों की पहचान है उन्हें. खुश हुए तो इनामइकराम का ढेर लगा देंगे.’ घनानंद से कहा गया.

पर घनानंद का मन तो कहीं और था. दूसरी बार कहा गया. फिर भी चुप. नजर कहीं और टिकी रही. तब किसी दरबारी ने कहा, ‘महाराज, ये ऐसे नहीं गाएंगे. सुजान को बुलाइए.’ बादशाह ने फौरन सुजान को बुलवा भेजा. सुजान का मुख देखना था कि घनानंद के रोमरोम से कविता झरने लगी. वे गाने लगे. सुजान की ओर देखकर. भूल गए कि बादशाह की ओर पीठ करना बेअदबी है. मुहम्मदशाह का पारा चढ़ गया. बादशाही ऐंठ, उसने घनानंद को राज्य से निकाल दिया. घनानंद ने सुजान से भी साथ चलने को कहा. पर वह नट गई. एकतरफा मुहब्बत को ले घनानंद वहां से चले आए….प्रेम की नई इबारत लिखने.

जहाज उस समय पृथ्वी से तकरीबन 10000 मीटर की ऊंचाई पर, 1000 किलोमीटर प्रतिघंटा के वेग से उड़ रहा था. सत्तरअस्सी किलोमीटर प्रतिघंटा के वेग से भागती रेलगाड़ी की पटरियों पर नजर रखना कठिन हो जाता है. लेकिन उससे चैदहगुना तेज उड़ रहे जहाज के साथ अनुभव बिलकुल अलग था. लगता था कि हम एक जगह ठहरे हुए हैं. मानो किसी ने आसमान में लटका दिया हो. दूरियां वेग की अनुभूति को घटा देती हैं. मैं कल्पना करता हूं कि अगर आसमान एकदम साफ होता, बादलों का टुकड़ा तक कहीं नजर न आता तो जहाज की गति का एहसास कराने के लिए निकटवर्ती माध्यम कोई न होता. दस किलोमीटर ऊपर से पृथ्वी भी नजर आए यह संभव नहीं. उस अवस्था में गति की अनुभूति शून्य होती. इस समय बादलों के बीच जहाज धीरेधीरे उड़ता प्रतीत हो रहा है, उस समय यह बोध भी नदारद होता. समय आरोपित प्रत्यय है. एक गैरजरूरी अवधारणा. असल चीज परिवर्तन है, जो घटनाओं के माध्यम से हमारे सामने आता है. स्मृति द्वारा घटनाओं का मस्तिष्क पर टंकित प्रभाव ही समय की अनुभूति बनता है. ठीक अंतरिक्ष की भांति. जो कुछ न होकर भी होने का आभास देता है.

लगभग दो घंटे की उड़ान के बाद चालक दल गुवाहाटी पहुंचने की घोषणा कर चुका था. विमान उतार पर था. खिड़की से नजर आती गुवाहाटी दूर तक हरियाला पाट थी. बड़ीबड़ी झीलें, तालाब, पानी से लबालब खेत, उनके बीच सिर उठाए खड़े सुपारी और नारियल के एकदम हरियाले लंबे पेड़, असमवासियों के स्वाभिान का प्रतीक. झीलों, तालाबों के बीच सिर उठाए खड़ी इमारतें, मानो कपास वन फूला हो. उन्हें देखते हुए मैं दिल्ली के कंक्रीट के जंगल को याद नहीं करना चाहता. फिर कहां राजधानी में पानी की एकएक बूंद के लिए तरसते हुए लोग, कहां यह प्रकृति प्रदत्त जलराशि का अकूत भंडार. गर्वीली ब्रह्मपुत्र की अथाह जलराशि. मैदान इतने हरे और जलसमृद्ध कि आंखें टिकी की टिकी रह जाएं. अपने शहर की प्राकृतिक निर्धनता को पर्दे में रखने के लिए मैं गुवाहाटी का इतिहास याद करने की कोशिश करने लगता हूं.

पौराणिक नगर गुवाहाटी. इसका इतिहास हजारों वर्ष पीछे तक जाता है. महाभारत काल में यह नरकासुर की राजधानी ‘प्राग्ज्योतिषानंद’ कहलाता था. जिसका अर्थ है ‘पूर्वी ज्ञानोदय का नगर’. कुछ इसका अनुवाद ‘पूर्वी ज्योतिष का नगर’ भी करते हैं. अपनी अजेय जिजीविषा के लिए इसे कहींकहीं ‘दुर्जय’—जिसको ‘जीता न जा सके, भी कहा गया है. यह इतिहासप्रसिद्ध वर्मन और पाल राजाओं की राजधानी रहा है. सातवीं शताब्दी में यहां सम्राट भास्कर वर्मन के शासनकाल में यह नगर समृद्धि के लिए जाना जाता था. इसकी मुक्तकंठी प्रशंसा हुऐनसांग ने भी की है. वह लिखता है कि सातवीं शताब्दी में यह नगर भास्कर वर्मन की राजधानी थी. जिसके पास 30,000 से अधिक मारक युद्धक जलपोत थे. पूरा नगर 15 मील तक फैला था. दक्ष नाविक चीन तक अबाध यात्राएं किया करते थे. सेना समुद्री युद्धकला में प्रवीण थी. उस समय इस नगर का वैभव देखते ही बनता था. ग्यारहवीं शताब्दी में वर्मन राजाओं की कीर्ति मंद पड़ने लगी. मध्यकाल में नगर पर हमले हुए, जिसमें प्रसिद्ध कामाख्या देवी मंदिर तहसनहस कर दिया गया. आगे चलकर ओहम राजाओं ने नगर की कीर्ति को वापस लाने का काम किया. बताते हैं कि नगर को जीतने के लिए मुगलों ने इसपर 17 बार आक्रमण किया. 1610 में सरायघाट में निर्णायक युद्ध हुआ, जिसमें लचित बोरफुकन के नेतृत्व में ओहम सेनाओं ने मुगल सेनाओं के छक्के छुड़ा दिए. उसकी वीरता की कहानी आज भी घरघर दोहराई जाती है.

यान उतर चुका था. एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही पता चला की असमावसियों की मेहमाननवाजी का परिचय हुआ. धरती पर कदम पड़ चुके हैं. बाहर स्वागत के लिए मेजबान के प्रतिनिधि मौजूद थे. अंगवस्त्र पहनने के बाद गाड़ी में बैठे तो मन उनकी मेहमाननवाजी से अभिभूत था. पहाड़ी लोग भले होते हैं. प्रकृति से जुड़े हुए. मैदानी लोगों जैसी स्वार्थपरता, बनावटीपन और छलछदम् से कोसों दूर. मेजवान की ओर से आत्मीयतापूर्ण स्वागत ने यह सिद्ध कर दिया था. कार्य निपटान के लिए उनकी ओर से गाड़ी की व्यवस्था थी. स्थानीय अधिकारी हमारे साथ थे. पूरा दिन मेलमुलाकात और कार्य संपादन में किस प्रकार गुजर गया, पता ही चला. आपसी संवाद के लिए हम हिंदी का प्रयोग कर रहे थे. विभागीय यात्रा के सिलसिले में कुछ महीनों में देश के चार बड़े शहरों की यात्राएं की थीं. संयोग से सभी उन प्रदेशों में आते हैं जिन्हें अहिंदीभाषी माना जाता है. हर बार मैंने पाया कि हिंदी भाषी के लिए किसी भी शहर में कोई समस्या नहीं है. वे लोग हिंदी को अपना चुके हैं. हम भी उनकी भाषाओं को अपना लें तो उस संकट का हमेशाहमेशा के लिए समाधान हो जाएगा, जिसे हम सांस्कृतिक अपसंस्करण कहते हैं.

हमारे मेजबान चाहते थे कि सोने से पहले हम हम कामाख्या देवी के दर्शन करें. मुझे इसमें कोई आस्था न थी. मेरे सहयात्री भी बहुत उत्सुक न थे. पर मेजबान बंधु हमें वहां ले जाने को उत्सुक थे.

नीलाचल की चोटी से ब्रह्मपुत्र और शहर का नजारा देखने लायक होगा सर!’ उन्होंने सहयात्री की जिज्ञासा बढ़ाने के लिए कहा.

सात बज चुके हैं. जातेजाते आठ बज जाएंगे. मंदिर बंद हो चुका होगा.’ मंदिर आठ बजे बंद हो जाता है, यह हमें बेयरे से पता चल चुका था.

फिर भी, ब्रह्मपुत्र के दर्शन तो कर ही सकते हैं.’ उन्होंने आग्रह किया. टैक्सी की व्यवस्था उन्हीं की ओर से थी. फिर भी हमें घुमाने की इतनी उत्सुकता. हम सुबह तीन बजे से जगे हुए थे. थकान भी थी. मैंने सहयात्री की ओर देखा—

फिर कभी….हम लोग थके हुए हैं.’ सहयात्री ने कहा.

मैं जानता हूं….आप वहां जाना चाहते हैं सर, पर यह सोचकर सकुचा रहे हैं, कि पता नहीं इतनी रात गए माता के दर्शन होंगे कि नहीं. जो हो, हमें चलना चाहिए. मुझे भी माता के दो भक्तों को उनके मंदिर तक ले जाने का पुण्य मिलेगा.’

अब उनका आशय समय आया. उस भोली आस्था पर मैं हंस सकता था. पर उनकी सहृदयता ने मुझे चुप रहने को बाध्य कर दिया. आखिर हमें मेजबान की इच्छा को पानी देना पड़ा. मेरा मन ब्रह्मपुत्र के चैड़े पाट को देखने का था. देखना चाहता कि नमदार हवा में गुवाहाटी की सड़कें कितनी सुहानी लगती हैं. देखना चाहता था नीलाचल पहाड़ की ऊंचाई से गुवाहाटी शहर को. मेरे सहयात्री मंदिर को दूर से देखकर नमन करने को कह चुके थे. पर मेजबान के उत्साह के आगे वे भी समर्पित थे. शाम के साढ़े सात बज रहे थे. बताया गया था कि असम में रात कुछ जल्दी हो जाती है. पर हम तो आधीरात को सलाम करने के बाद चारपाई पर जाने के अभ्यस्त ठहरे. ड्राइवर नीचे प्रतीक्षारत था. कुछ देर बाद गाड़ी गुवाहाटी की सड़कों पर दौड़ रही थी.

असम का पहला नगर, राजधानी होने के बावजूद गुवाहाटी की हालत किसी भारतीय कस्बे जैसी ही है. सड़कों पर वही भीड़भाड़, अनियंत्रित यातायात, दुकानदारों द्वारा सड़क पर कब्जा. यहांवहां ठेले लगाए खड़े दुकानदार, रिक्शाचालक और चाटपकौड़ीवाले ठीक वैसे ही मिले जैसे किसी दूसरे देश में. बाहर से आया कोई यात्री, जो यहां की बोलीबानी से अपरिचित है, भारतीय शहरों के बाजार देखकर भी यहां की साभ्यतिक एकता का अनुमान लगा सकता है. ड्राइवर सड़कों से अभ्यस्त था. पहाड़ के चढ़ावदार, संकरे, चक्राकार मार्गों पर गाड़ी दौड़ाने में कलावंत. सड़क पहाड़ की परिक्रमा करती हुई ऊपर उठ रही थी. उसी के अनुपात में घूम रहा था, गाड़ी का स्टेयरिंग. ड्राइवर बायें हाथ से गाड़ी के गीयर बदलता. दायें से स्टेयरिंग को संभालता. मानो किसी समर में हो. सबकुछ चैकन्नी नजर और सधे हाथों की कलाबाजी. संतुलन जरासा बिगड़ा नहीं कि गाड़ी लुढ़कती हुई पहाड़ी की तलहटी में जा गिरेगी. उसकी निपुणता की सराहना करते हुए मैं उन मजदूरों और श्रमिकों को याद कर रहा था, जिन्होंने इन पत्थरों को काटकर रास्ता बनाया था. संभव है उनमें भी कोई ‘दशरथ मांझी’ रहा हो. आनबान का पक्का. या कोई और दीवाना प्रेमी जिसकी प्रिया बातोंबातों में कह बैठी हो—

ब्रह्मपुत्र मैया और गुवाहाटी के दर्शन एक साथ करना चाहती हूं.’

तो सोचना क्या है, अभी चल.’

नहीं….ऐसे नहीं.’ वह मानिनी की तरह मचली होगी. सबकुछ एक ही बार में. ब्रह्मपुत्र और शहर दोनों को. एक साथ. एक जगह से….’ और प्रिया ने अपनी नजर नीलाचल की गर्विणी चोटी पर टिका दी होगी. प्रियामन को समझ पाए वह प्रेमी कैसा!’

इतना ऊंचा पहाड़….लगातार पानी बरसने से चट्टानों पर काई जम चुकी है, तुम चढ़ पाओगी?’

वही तो!’

कहकर वह चुप हो गई होगी. मानो प्रियतम को मन ही मन तोल रही हो. और चेहरे की झलक से प्रिया के मनोभावों को पहचान लेने वाला उसका दीवाना प्रेमी, अगले ही दिन छैनीहथौड़ाकुदाली लेकर पहाड़ियों को काटने पर तुल गया होगा. आंखों में प्रिया की तस्वीर, कंधे पर गमछा, पसीना पोंछने के लिए. हाथों में छेनीहथौड़ा, कुदाली और मन में अटूट संकल्प. दीवाना प्रेमी पहाड़ काटता रहाकाटता ही रहा होगा. उसके दीवानेपन पर लोग लोग हंसे होंगे. जैसे दशरथ मांझी पर हंसे थे. उसे ‘पागल’ कहा होगा, जैसे दशरथ मांझी को कहा था. लेकिन वह अपनी धुन में जुटा रहा होगा. दशरथ मांझी की पत्नीप्रिया तो अपने दीवाने के पसीने से झरी इबारत को देख पाने में नाकाम रही थी. पति के भीष्म संकल्प के लिए खुद को जिम्मेदार ठहराती….उसके कष्ट के लिए खुद को दोषी मानती वह जल्दी ही चल बसी थी. नीलाचल के ‘दशरथ मांझी’ की प्रिया क्या अपने दीवाने के संकल्पपथ को साकार होते देख पाई होगी! कुछ भी हुआ हो, लेकिन प्यार की कसौटियां तो ऐसे ही बना करती हैं….

सुना है पहले राजा लोग सजायाफ्ता कैदियों को ऐसे ही मेहनतदार कामों में जोत दिया करते थे. कमी पड़ती तो सैनिक गांवों से गरीब मजदूरों, किसानों को खदेड़ लाते थे. इस मंदिर के निर्माण में कितने मजदूरों ने कितने दिनों तक बेगार किया होगा? पांचसात सौ मजदूर तो रहे ही होंगे. और समय. सातआठ वर्ष या इससे भी अधिक. इतने श्रमिकों लिए भोजन की व्यवस्था क्या राजा के खजाने से होती होगी? पगार की बात तो सोचिए भी मत, सामंती आतंक के बीच किसानमजदूर की जिंदगी बचे रहना ही सबसे बड़ी पगार थी. संभव है मजदूरों ने श्रद्धावश वैसी कोई अपेक्षा भी न की हो. सिर्फ आस्था के वशीभूत पसीना बहाने चले आए हों. राजा का नाम हो, गरीब का संतोष बना रहे, और क्या! दिनभर वे काम करते होंगे, भूख लगने पर जंगल के कंदमूल पर गुजारा करते होंगे.पानी तो ब्रह्मपुत्र मैया की मेहरबानी ठहरी. उन सातआठ वर्षों या में या जब तक यह मंदिर बना तब तक मजदूरों, शिल्पकारों ने पसीना बहाया, यदि उसको एक जगह जमा किया जा सकता तो ब्रह्मपुत्र मैया के बराबर में ही एक विशाल झील उस पसीने से बन जाती. एक और कल्पना, जो मजदूर पहाड़ खोदकर रास्ता बना रहे थे, सीढ़ियों बनाने के लिए छैनीहथौड़ी चला रहे थे, काम करतेकरते उनमें से कितने फिसले होंगे. कितनों की जानें गई होंगी. कितने हमेशा के लिए अपंग हो गए होंगे, क्या राजा ने उनका हिसाब रखा होगा? हो सकता है काम के बीच किसी युवा मजदूर को अपनी पत्नी की याद हो आई हो, जिसे वह गांव में अकेली छोड़कर आया हो. तब संभव है उसने राजा के कारिंदों से घर जाने की अनुमति मांगी हो! क्या उन्होंने वह अनुमति दी होगी? सत्तामद में चूर हो उस अलबेले युवक को हमेशा के लिए अपनी विरहणि पत्नी से अलग कर दिया गया होगा! उसकी पीड़ा और छटपटाहट का क्या किसी ने हिसाब रखा होगा? देवी का जयकारा लगाकर मनौती की गठरी कंधों पर लादे, उखड़ी सांस से ऊपर चढ़ते श्रद्धालुओं ने क्या कभी उन संकल्प सारथियों और श्रमकरों को याद किया होगा, जिन्होंने भूखे पेट, अधनंगे तन इन पहाड़ों को काटने में अपनी पूरी जिंदगी खपा दी. यहीं पर जो मरखप गए, अपने प्यार की खातिर, अपने संकल्प की खातिर….अपने जुनून और भूख की खातिर. उनकी मौत पर शोक तो जाने दीजिए, क्या कभी किसी ने उनके श्रमसीकरों को सराहा होगा?

यहां आकर पता चलता है कि इतिहास कितना बड़ा झूठ होता है. उसकी निगाह केवल शिखर पर टिकी होती है. ठीक कामाख्या देवी के मंदिर की तरह. जो जब मर्जी हो बादलों से बतियाने लगता है और जब चाहे ब्रह्मपुत्र की लहरों पर खेल सकता है. पर उसके प्रांगण में कितने निरीह जानवरों की जानें गईं. कितनों को कनफड़ करके भटकने के लिए छोड़ दिया गया? कितनों ने उसके नाम पर गरीब जनता का शोषण किया? उन्हें क्या मालूम! मंदिर तो पत्थर की इमारत ठहरी, क्या इस शक्तिपीठ की अधिष्ठाता देवी ने भी इसका हिसाब रखा होगा? देवी रखे न रखे पर मजदूर देवी का हर हिसाब रखता है. अपने पसीने का भी जो उसने अधनंगे तन बहाया है. उनका भी जो उनसे बीच राह बिछड़े हैं, काम करतेकरते जिन्होंने अपनों को खोया है. पर वह सब्र कर जाता है. अपने लिए नहीं, इस दुनिया की खातिर, यहां के देवीदेवताओं की खातिर, क्योंकि वह जानता है कि मरी खाल की सांस से लोहा भी भस्म हो जाता है—फिर वह तो जिंदा इंसान है. फिर सारा दोष पुजारियों और मंदिर निर्माताओं का तो नहीं है. उन्होंने तो अपने स्वार्थ को युगधर्म बना लिया था. दोष उन लोगों का भी है जो इस चालाकी को कभी समझ न पाए. या समझकर भी अनजान बने रहे. जो खुद को भीड़ का हिस्सा से अधिक मानने को तैयार नहीं होते….सच यह भी है कि देरसबेर जबजब उनका रक्त उबला है, उसमें सारे आततायी सम्राट, धर्म, देवता, पंडेपुजारी भस्म होते रहे हैं.

क्रमश:

ओमप्रकाश कश्यप