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मार्क्सवाद : आलोचना के बिंदू

सामान्य

हर विलक्षण परिवर्तनकामी बुद्धिजीवी की भांति मार्क्स को भी अपने जीवनकाल में आलोचनाओं और विरोधों का सामना करना पड़ा था. अपने उग्र विचारों और क्रांतिकारी लेखन के लिए उसे फ्रांस, प्रूशिया, बेल्जियम, कोलोन आदि से खदेड़ा जाता रहा. मगर अपने विचारों के प्रति पूरी तरह से आस्थावान और संघर्षशील मार्क्स हर बार श्रमिक क्रांति के पक्ष में आवाज उठाता रहा. इसका उसको नुकसान भी उठाना पड़ा. उसके बेटेबेटियां समय पर बीमारियों का उपचार न होने के कारण चल बसे. स्वयं मार्क्स फेफड़े की कमजोरी का शिकार था, जिसके कारण उसको अपनी युवावस्था में सेना की नौकरी से हाथ धोना पड़ा था. मगर अपने और अपने परिवार के उपचार के लिए न तो उसके पास पर्याप्त धन था, न ही समय. रातदिन उसका बस एक ही काम था. लेखन और केवल लेखन. सार्थक और प्रतिबद्ध लेखन. अपने जीवनकाल में उसने विपुल मात्रा में साहित्यरचना की. प्रतिबंधों, आलोचनाओं और विरोध से घबराये बिना उसने वही लिखा जो उसको युक्तिसंगत लगा. अपने प्रतिबद्ध लेखन के कारण ही उसके विचारों की प्रासंगिकता मृत्यु के 127 वर्ष बाद भी अक्षुण्ण है. यही नहीं बुर्जुआ पक्ष के बुद्धिजीवियों और उसके प्रेस ने मार्क्स और उसके विचारों की जितनी आलोचना की, वह लोगों के दिल में उतनी ही गहरी जगह बनाता गया.

मार्क्सवाद के आलोचक इस विचार से अपनी असहमति अनेक स्तरों पर दर्शाते हैं. अधिकांश का मानना है कि पूंजीवाद धन के अर्जन एवं उसके वितरण की अधिक उपयोगी एवं न्यायिक व्यवस्था है. उनके अनुसार पूंजीवाद व्यक्तिमात्र के अधिकारों एवं हितों की ओर अधिक ध्यान देता है. श्रमिक को यह भरोसा होने पर कि उसके श्रम का पूरा लाभ मिलेगा, वह अपनी संपूर्ण क्षमता से कार्य करता है. स्पर्धात्मक वातावरण में प्रत्येक व्यक्ति को दूसरों से आगे निकलने का अवसर प्राप्त होता है. यह विश्वास होने पर कि श्रमकौशल का पूरा लाभ उसी को मिलेगा, श्रमिक अधिक परिश्रम और तन्मयता के साथ काम करता है, जिससे अधिकतम उत्पादकता संभव है. पूंजीवादी व्यवस्था में अर्जित संपत्ति पर श्रमिक का अपना अधिकार होता हैइस कारण पूंजीवाद के समर्थक उसको साम्यवाद और समाजवाद से अधिक कारगर व्यवस्था मानते हैं. पूंजीवादी तंत्र में उद्योगपति को भी यह विश्वास होता है कि नए शोध और तकनीक का लाभ सीधे उसको मिलने वाला है. इसलिए वह नए शोध और अन्वेषणों पर भी पूरापूरा ध्यान देता है. उद्योगपति की समृद्धि का एक हिस्सा वेतन एवं अन्य परिलब्धियों के माध्यम से समाज के निचले हिस्सों में भी अंतरित होता रहता है, जिससे समाज का आर्थिक स्तर लगातार ऊपर उठता जाता है. उनके अनुसार साम्यवाद और समाजवाद में श्रमिक को कड़े अनुशासन में कार्य करना पड़ता है. बावजूद इसके उसे उत्पादनलाभों से वंचित रखा जाता. इसलिए वहां पर श्रमिक मुक्त मन से उत्पादनव्यवस्था में हिस्सा नहीं ले पाता. जिससे वहां उत्पादकता का स्तर लगातार गिरता चला जाता है. कुछ विद्वान मानते हैं कि मार्क्सवाद व्यक्ति के नकारात्मक सोच को दर्शाता है. यह समन्वय और सहयोग द्वारा मिलजुलकर विकासमार्ग पर अग्रसर होने के बजाय हिंसक क्रांति पर जोर देता है. परिणामस्वरूप समाज में अस्थिरता और अराजकता बढ़ती है और समाज की ऊर्जा गैररचनात्मक कार्यों में खपने लगती है.

धर्म के प्रति अपने लगभग कट्टरपंथी रवैये के कारण भी मार्क्सवाद की आलोचना की जाती है. विद्वानों के अनुसार कल्याण सरकार का पहला कर्तव्य है कि वह व्यक्तिमात्र के विश्वास तथा अधिकारों की रक्षा करे. धर्म व्यक्ति की निजी आस्था और विश्वास का प्रश्न है, जिसको शेष समाज पर नहीं थोपा जाना चाहिए, न ही व्यक्तिमात्र की आस्था और विश्वास की अवमानना करना नीतिसंगत है. इतिहास के समाजार्थिक अध्ययनविश्लेषण के बाद मार्क्स इस नतीजे पर पहुंचा था कि धर्म का उपयोग वर्गीय ताकतों द्वारा अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए जानबूझकर किया जाता है. वह व्यक्ति को अपने अधिकारों और सामथ्र्य से उदासीन बनाता है. मृत्यु के बाद सुख की कामना व्यक्ति को भाग्यवादी तथा पलायनोन्मुखी बनाती है. अपनी दुर्दशा के लिए वह अपने भाग्य को दोषी ठहराने लगता है. परिणामस्वरूप उन शक्तियों की ओर से उसका ध्यान पूरी तरह हट जाता है, जो वास्तव में उसकी दुर्दशा के लिए जिम्मेदार हैं. कहा जा सकता है कि मार्क्सवाद निजता को उस समय तक कोई कोई महत्त्व नहीं देता, जबतक कि वह मनुष्य को अपने कर्तव्यों से उदासीन बनाती है. उसको शेष समाज से इतर, सिर्फ अपने बारे में सोचने के लिए प्रेरित करती है.

कुछ विद्वानों का आरोप है कि समाजवाद और साम्यवाद दोनों में व्यक्ति को समाज के पक्ष में अपने हितों का बलिदान करना पड़ता है. चूंकि किन्हीं भी दो व्यक्तियों के हित एक समान नहीं हो सकते, इसलिए साम्यवाद जैसी व्यवस्था हालांकि हितों के सामान्यीकरण का नारा लगाती हैं, मगर प्रकट में वह जनसाधारण के हितों से खिलवाड़ ही करती है. वृहद समाज के हितों की रक्षा का नारा लगाने वाला साम्यवाद असल में किसी भी व्यक्ति के हितों की पूरी तरह रक्षा नहीं कर पाता. वहां व्यक्ति को समूह के आगे नगण्य और उपेक्षित मान लिया जाता है. इसी आधार पूंजीवाद के समर्थक कुछ विद्वान मार्क्सवाद को नागरिक अधिकारों का हनन करने वाली विचारधारा स्वीकार करते हैं. कुछ लेखकों के अनुसार मार्क्स का अर्थचिंतन हीगेल की विचारधारा का विस्तार है. उनके अनुसार मार्क्स अपने विचारों को लेकर सुश्निश्चित नहीं था. उनको लेकर उसके मन में सदैव असंतोष बना रहा. उसको लगने लगा था कि आर्थिक प्रगति की पूर्वस्थापित योजनाएं अतार्किक एवं अवास्तविक हैं. वैचारिक आस्था के अभाव में वह अपनी महत्त्वाकांक्षी पुस्तक ‘पूंजी’ के बाकी दो खंडों को अपने जीवनकाल में पूरा करने में असमर्थ रहा था.

1930 की भयानक मंदी के चलते अनेक देशों ने मार्क्सवाद के प्रति उत्सुकता प्रकट की थी. जनाक्रोश से बचने के लिए मंदी से प्रभावित देशों की सरकारों ने सुरक्षात्मक कदम उठाने आरंभ कर दिए थे. तात्कालिक कार्रवाही से दुनिया पर छाये मंदी के बादल छंटने लगे, नतीजा यह हुआ कि मार्क्सवाद अनेक छोटे देशों का सरकारी धर्म बनतेबनते रह गया. उधर साम्यवादी देशों की हालत भी बहुत अच्छी न थी. उनीसवीं शताब्दी में ही साम्यवाद को अपना चुके देशों में राजनीतिक उथलपुथल और आर्थिक मंदी के कारण हालात बिगड़ने लगे थे. इससे वहां की जनता का मार्क्सवाद से मोहभंग होने लगा. यहां ‘मोहभंग’ शब्द शायद अनुपयुक्त प्रयोग है. कुछ विद्वान मार्क्स की धर्मसंबंधी अवधारणा में भी विरोधाभास खोजते हैं. उनके अनुसार मार्क्स परंपरागत धर्म का प्रतिकार करता है, मगर अपनी विचारधारा मार्क्सवाद को धार्मिक आस्था की भांति आरोपित करता है. यह विरोधाभासी स्थिति है, जो मार्क्स के विचारों की वैज्ञानिकता पर सवाल खड़े करती है.

मार्क्स के आलोचकों में से एक कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर लेविस एस. फ्यूअर(19122002) का मानना है कि स्वयं मार्क्सवाद में धर्म की अनेक विशेषताएं सुरक्षित हैं. फ्यूअर के अनुसार मार्क्सवाद के समर्थक उसको बड़े ही सुनियोजित तरीके से आस्था और विश्वास के रूप में जनमानस में रोपने का प्रयास करते हैं, न कि ऐसे सत्य के रूप में जिसको प्रयोगों के आधार पर जांचापरखा गया हो. फ्यूअर के अनुसार मार्क्सवाद और ईसाइयत में सिर्फ इतना अंतर है कि मार्क्सवाद इसी जीवन को सुखमय बनाने का दावा करता है, जबकि ईसाई धर्म मृत्यु के बाद सुखप्राप्ति का विश्वास दिलाता है. तर्क की कसौटी पर दोनों ही कच्चे हैं. वस्तुतः मार्क्स ने अपने जीवनकाल में ही बुद्धिजीवियों का आवाह्न किया था कि वे मार्क्सवाद के प्रचार में अपना अधिकाधिक योगदान दें. रूस, चीन, कोरिया आदि देशों में मार्क्सवाद से प्रेरित होकर अनेक विद्वान लेखक, साहित्यकार उसकी ओर आकर्षित भी हुए थे. क्रांति के बीच और उसके बाद जिस प्रकार का प्रचार साहित्य बांटा, उसने मार्क्सवाद को एक धार्मिक सत्ता की तरह ही स्थापित करने का प्रयास किया था. अंतर सिर्फ इतना है कि ईसाइयत परमात्मा और पैगंबरवाद में भरोसा करती है. डार्विन के विकासवाद से प्रेरित मार्क्स इस प्रकार की किसी अलौकिक शक्ति की उपस्थिति को सरासर नकारता है. इसके बावजूद फ्यूअर ने मार्क्सवाद की उपयोगिता को स्वीकारा था.

कार्ल पोपर ने भी मार्क्स के विचारों पर अवैज्ञानिक होने का आरोप लगाया है. उसके अनुसार मार्क्स के विचार प्रभावी और दिल को भले ही लगें, मगर वे तार्किकता से परे हैं. पोपर ने मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद की भी आलोचना की है. उसके अनुसार मार्क्स का विकासवादी चिंतन कुछ पूर्वनिर्धारित मान्यताओं से प्रभावित है. पूंजीवाद की आलोचना करते समय मार्क्स अत्यधिक आक्रामक हो जाता है, जिससे निष्पक्ष विवेचना की संभावना घट जाती है. जैसा कि पहले भी संकेत किया गया है, मार्क्स और ऐंगल्स का विचार था कि मार्क्सवाद की सफलता यूरोप के विकसित देशों में ही संभव है. जिस समय व्लादिमिर लेनिन ने सोवियत रूस की राजनीति में कदम रखा, वह आर्थिकरूप से बेहद पिछड़ा देश था. लेनिन के राजनीतिक सहयोगी ट्रोटस्की ने ‘स्थायी क्रांति’ की अभिकल्पना प्रस्तुत की थी, जिसमें उसने कहा था कि रूस जैसी कृषिआधारित व्यवस्था और विस्तृत भूभाग वाले देश में भी मार्क्सवादी क्रांति संभव है. बाद में सोवियत संघ की स्थापना से उसने अपने विचारों की प्रामाणिकता सिद्ध भी कर दी थी.

कुछ विद्वानों ने मार्क्स के ऐतिहासिक द्वंद्ववाद के विचार को भी कठघरे में खड़े करते हुए आरोप लगाया था कि वह तर्क से सिद्ध करने के बजाय, केवल स्थापनाएं देता है, जो विमर्श के दौरान कहीं टिक ही नहीं पातीं. निष्कर्ष तक पहंुचने की हड़बड़ी उसकी पूरी मेहनत पर पानी फेर देती है. केवल दक्षिणपंथी विचारक ही मार्क्स से असंतुष्ट हों, ऐसा नहीं है. कतिपय वामपंथियों ने भी उसके विचारों के प्रति अपनी असहमति दर्ज की है. इनमें से एक उसका समकालीन हेनरी जाॅर्ज था, जिसका मानना था कि मार्क्स के विचारों को शायद ही कभी परखा गया है. हेनरी जाॅर्ज ने मार्क्स के विचारों पर कृत्रिमता का आरोप लगाया था. मार्क्स के विचारों से उसका समकालीन रूसी अराजकतावादी मिखाइन बेकुनिन भी असहमत था. बेकुनिन और मार्क्स में व्यक्तिगत स्तर पर तो मतभेद भी ही. ये मतभेद ‘प्रथम इंटरनेशनल’ के दौरान खुलकर सामने आए थे. मार्क्स का मानना था कि बेकुनिन इंटरनेशनल का उपयोग निजी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए करना चाहता है, जबकि बेकुनिन ने मार्क्स पर फ्रांसिसी राजनीति का यहूदीकरण करने के आरोप लगाए थे. दोनों में परस्पर सैद्धांतिक मतभेद भी थे. बेकुनिन की मान्यता थी कि भविष्य के संगठनों का निर्माण पूर्णत नीचे से ऊपर की ओर होना चाहिए. उसने परिकल्पना की थी कि श्रमिक पहले स्वैच्छिक मजदूर संघों में संगठित होंगे. उन मजदूर संघों के स्वतंत्र श्रमिकबस्तियां(कम्यून) होंगी. तदनंतर वे क्षेत्र, प्रांत, राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक संगठित शक्ति का रूप ले लेंगे और इस तरह संपूर्ण समाजवाद का आगमन होगा. मार्क्स के कथन ‘एक अच्छे दिन काम करने के एवज में आकर्षक, न्यायोचित वृत्तिका’ के समानांतर उसका कहना था‘वृत्तिका प्रणाली का उन्मूलन.’ स्पष्ट है कि श्रमिकसंघवादी बेकुनिन श्रमिक संघों को राजनीतिकआर्थिक शक्तियों से लैस करना चाहता था. उसका मानना था किजब दुनियाभर के उद्योगों का संचालन श्रमिकों द्वारा अपने भले के लिए किया जाएगा, उस समय भीषण बेरोजगारी, युद्ध, सामाजिक अंतद्र्वंद्व यहां तक कि बड़े अपराध और गंभीर सामाजिक समस्याओं के बने रहने का कोई आधार ही नहीं रहेगा.

मार्क्स के चिंतन की व्यापकता से इनकार नहीं किया जा सकता, मगर यह भी सत्य है कि मार्क्स के बाद से करीब सवा सौ वर्ष के अंतराल में समाज में व्यापक परिवर्तन आया है. इनमें से एक बदलाव प्रेस की स्वतंत्रता और उसकी शक्ति से भी जुड़ा है. हाल के दशकों में मीडिया जितना ताकतवर होकर उभरा है, इसके बारे में मार्क्स और ऐंगल्स ने शायद कल्पना भी न की थी. मीडिया और शिक्षा की मिलीजुली ताकत ने उपभोक्ता को भी अपने हितों के प्रति जागरूक किया है. उत्पाद से जुड़ी सूचनाएं अब केवल उत्पादक की संपत्ति नहीं है. बल्कि व्यापक लोकहित में उसको उन्हें सार्वजनिक भी करना पड़ सकता है. बाजारोन्मुखी व्यवस्था में संबंधों में परिवर्तन अवश्य हुआ है. अपने दैनिक जीवन में उपभोक्ता और उत्पादकों का सम्मिलन न केवल आर्थिक बल्कि सामाजिक संबंधों को भी प्रभावित करता है, जिसके आधार पर हमारे जीवन का स्वरूप तय होता है. हालांकि अब भी उपभोक्ता और उत्पादक के संबंधों में उत्पादक का हाथ ऊपर होता है. वही तय करता है कि उपभोक्ता के साथ मेलमुलाकात के समय कहां तक समझौता किया जाए. बावजूद इसके यह भी सच है कि

यदि सिस्टम जैसा कुछ होता है तो मार्क्स का समकालीन पूंजीवादी तंत्र आधुनिक पूंजीवाद तंत्र की अपेक्षा अधिक ताकतवर और खुल्लमखुल्ला वर्गविभाजित था. उन दिनों वह सचमुच ‘उनका’ यानी उत्पादक का तंत्र था, जबकि आजकल यह हमारा तंत्र है. मार्क्स और एंेगल्स इस मायने में एकदम सही थे कि ‘सर्वहारा का मुक्तियज्ञ पूरी तरह से उसका अपना आयोजन होना चाहिए.’

स्पष्टरूप से मार्क्सवाद की अभिकल्पना यह सोचकर की गई थी कि मानवीय व्यवस्था के रूप में यह एक दिन पूंजीवाद को अपदस्थ कर उसका स्थान ले लेगा. दरअसल यह ‘स्थान ले लेना’ ही मार्क्सवाद की दुर्बलता है. इससे कई बार यह संकेत भी मिलता है मार्क्सवाद केवल सत्ताओं के विकल्प की बात करता है. वास्तविक परिवर्तन उसका लक्ष्य है ही नहीं. मार्क्स और ऐंगल्स निःसंदेह विलक्षण प्रतिभाशाली थे, जिन्होंने सर्वहारा वर्ग का आवाह्न किया था कि अपने हितों की पहचान करे. संगठित होकर विरोध की रूपरेखा तैयार करे. पूंजीवाद के विरुद्ध संघर्ष में सफलता के लिए प्रतिबद्ध साहित्य के अध्ययन की ओर प्रवृत्त हो और पूरी तैयारी के साथ पूंजीवाद की जड़ों पर प्रहार करें. मगर कब तक? लेखकद्वय संभवतः यह सोच भी नहीं पाए थे कि मार्क्सवादी विचारधारा से लैस मजदूर, पूंजीवाद को उखाड़ फैंकने के बजाय उसके समर्थन में भी जा सकता है. ऐसा इतिहास में होता भी रहा है. मजदूर संगठनों की असफलता के पीछे इस तरह के ढेरों उदाहरण आसानी से खोजे जा सकते हैं.

अंत में एक प्रश्न. हालांकि यह सिर्फ आकलन करने की कोशिश है. प्रश्न यह है कि मार्क्स और ऐंगल्स यदि अपने विचारों के साथ दुबारा जन्म ले लें तो उनकी और उनके विचारों की प्रासंगिकता होगी? यानी क्या समाज को आज भी मार्क्स और ऐंगल्स की जरूरत है. यह बात गांधी अथवा किसी और महापुरुष को लेकर भी उठाया जाता सकता है. इसमें तो कोई दो राय नहीं कि मार्क्स और ऐंगल्स का दर्शन आज की स्थितियों में बहुत प्रामाणिक लगता है. तो भी मार्क्स और ऐंगल्स के दर्शन की वापसी की स्थिति में उसके हम आंशिक रूप में ही उसके साथ होंगे. शायद इसलिए कि लगभग डेढ़दो शताब्दी के अंतराल पूंजीवाद ने हमारे सोच और व्यवहार दोनों को ही आमूल बदला है. यह बदलाव इतना व्यापक और सूक्ष्म है कि पूंजीवाद के धुर विरोधी विचारक भी अपने व्यवहार से उसका समर्थन करते हुए देखे जा सकते हैं.

मेरे विचार में ‘कम्युनिस्ट’ मेनीफेस्टो जैसे विचारों की आज कोई प्रासंगिकता नहीं है. हां मार्क्स की पूंजी का बहुतसा हिस्सा आज भी प्रासंगिक है; और बना रहेगा. कहा जा सकता है कि हमें युवा मार्क्स नहीं, अनुभवी मार्क्स की आवश्यकता है. हमें आवश्यकता है मार्क्स और ऐंगल्स की विलक्षण मेधाओं की. पुनर्जन्म अप्रामाण्य है, फिर भी यदि मार्क्स घूमतेफिरते हमारे युग में लौट आएं तो हमारा आग्रह यह भी हो सकता है कि वह पूंजी का आधुनिक संदर्भयुक्त ग्रंथ दुबारा से लिखे. हम यह भी चाहेंगे कि उसमें पूंजीवाद की समालोचना हो, सिर्फ आलोचना नहीं. मार्क्स से यदि मुलाकात हो तो हम चाहेंगे कि वह धर्म की आलोचना को सस्ते में ही न निपटा दे. बल्कि उसपर तथ्यों के साथ विचार करे. यह भी विचारे कि क्या धार्मिक प्रभावों का कोई अनुकूल लाभ उठाया जा सकता है. हालांकि यह एक मुश्किल पाठ होगा. तो भी मार्क्सवाद की प्रासंगिकता को अगली शताब्दी तक ले जाने के लिए यह छोटासा मूल्य होगा. यदि यह काम ईमानदारी से किया जाए तो उसके फल भी दूरगामी महत्त्व के होंगे. और अंत में मार्क्स के बारे में महान क्यूबाई क्रांतिकारी चे’ ग्वेरा के विचार जानना उसके विचारों की समकालीनता को दर्शाने के लिए पर्याप्त होगा

मार्क्स की प्राथमिकता थी कि वह सामाजिक विचारों के इतिहास में ठोस गुणात्मक एवं तात्कालिक परिवर्तन ला सके. इसके लिए उसने इतिहास की नई व्याख्या की, उसकी गतिशीलता को समझा, भविष्य का आकलन किया, साथ ही उसने क्रांतिकारी संकल्पना भी दुनिया के सामने रखी किकेवल संसार की व्याख्या से काम नहीं चलेगा, इसको बदलना ही चाहिए.’

और अंत में सिर्फ इतना कि हम मार्क्स के समाज को बदलने के नारे से असहमत हो सकते हैं, उसके क्रांतिकारी विचारों से अपनी असहमति दर्शा सकते हैं, उन्हें हिंसक बताकर उनसे नफरत कर सकते हैं. यही नहीं उसके पूंजीवाद विरोध को हम एकतरफा, वैचारिक दुराग्रह का प्रतीक भी मान सकते हैं. हम यह भी कह सकते हैं कि पचास साल में पूंजीवाद के खात्मे की मार्क्स की भविष्यवाणी झूठ सिद्ध हो चुकी है, इसलिए उसके पूंजीवादविरोध में कोई दम नहीं है. लेकिन उसके दृष्टिकोण से, सर्वहारा वर्ग के कल्याण की उसकी सदेच्छा तथा उसके प्रति समर्पण हेतु किए गए सतत संघर्ष के लिए, उन कष्टों के लिए जो अपने विचारों पर दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ते हुए मार्क्स और उसके परिवार को उठाने पड़े थे, हमें उसका सम्मान करना ही पड़ेगा. इसलिए यदि दुनियाभर में करोड़ों मजदूर, उसके नाम का एक साथ नारा लगाते हैं, जीजान से उसको चाहते हैं, उसको अपना सच्चा हितैषी, गुरु और पथप्रदर्शक मानते हैं, तो हमें यह मानना ही पड़ेगा कि वह सच्चा मनुष्यता का सच्चा हितैषी, महान विचारक, अर्थशास्त्री, समाजविज्ञानी और अपने समय का महान चिंतक था. मानवीय सभ्यता के उन महानतम चिंतकों में से एक जो शताब्दियों के अंतराल में कभीकभी ही जन्मते हैं. इसलिए मार्क्स की मेधा, उसके संघर्ष, सोच, दूरदृष्टि, मानवप्रेम, उसकी जीवनसंगिनी जेनी और मित्र एंगल्स को हमारा नमन! शतसहस्र नमन!

ओमप्रकाश कश्यप

इकीसवीं शताब्दी में मार्क्सवाद की प्रासंगिकता

सामान्य

कुछ देर के लिए मार्क्स को एक सरल रेखा मान लिया जाए तो पूरी दुनिया, उसके दोनों तरफ बंटी मिलेगी. एक दिशा में मार्क्स के समर्थक होंगे, जिनके लिए मार्क्स का एकएक शब्द पवित्र और बौद्धिक चेतना की धरोहर है. वे मार्क्स के नाम पर, उसके विचारों के लिए अपने खून का एकएक कतरा बलिदान करने को तत्पर होंगे. दूसरी ओर मार्क्स के आलोचक हैं. जिनके लिए मार्क्स एक दुर्भावना, एक जिद, एक नासमझीभरा, अड़ियल और प्रतिगामी विचार है. हाल ही में बीबीसी रेडियो सेवा द्वारा ब्रिटेन के सर्वाधिक सम्मानित और प्रतिभाशाली दार्शनिकों का सर्वे कराया गया. उस सर्वे में साम्यवादी मार्क्स ख्याति के मामले में सबसे ऊंचे पायदान पर था. दार्शनिक के रूप में दुनियाभर में पहचाने वाले नाम यथा प्लेटो, अरस्तु, कांट, डेविड ह्यूम, देकार्त, जान ला॓क जैसे विचारक ख्याति के मामले मे उसके आसपास भी नहीं ठहरते. हीगेल मार्क्स का गुरु, जिससे उसने भौतिक द्वंद्ववाद का सिद्धांत ग्रहण किया था, आश्चर्यजनकरूप से इस सूची में कहीं भी नहीं है. और तो और मार्क्स के समकालीन प्रतिभाशाली दार्शनिकों में से एक भी इस सूची में स्थान पाने में असमर्थ रहा है. आखिर ऐसी कौनसी बात है, जो मार्क्स को अपने समकालीन और पूर्ववर्ती विचारकों से अलग सिद्ध करती है. मार्क्स ने एक साथ धर्म, दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्र, इतिहास की गवेषणाएं की हैं. मगर मार्क्स खुद क्या है? दार्शनिक अथवा अर्थशास्त्री? ये सामान्य जिज्ञासा से जुड़े कुछ जरूरी प्रश्न हैं. हालांकि बहुतसे लोगों के लिए मार्क्स एक खलनायक भी है, जो अपने विचारानुकूल समाज के गठन के लिए खुल्लमखुल्ला हिंसा का सहारा लेता है. मगर वे भूल जाते हैं कि सामाजिक परिवर्तन के लिए मार्क्स द्वारा हिंसा का समर्थन उस तरह से नहीं है, जैसे कि पहले राजामहाराजा अपनी सनक में पड़ोसी राजा पर हमला बोल देते थे. मार्क्स की हिंसा मर्यादित है. वह समाज के बड़े वर्ग के कल्याण के लिए विशेष परिस्थितियों में जब बाकी सभी उपाय असफल सिद्ध हो चुके हों, केवल बुर्जुआ वर्ग को सत्ताच्युत करने के लिए हिंसा का समर्थन करना पसंद करता है. दूसरे पूंजीवादी चंगुल से मुक्ति के लिए हिंसा का समर्थन पेरिस कम्यून की असफलता से पहले की घटना है. पेरिस कम्यून की असफलता के बाद उसके विचारों में बदलाव आया था.

मार्क्स अपने समय की सबसे विवादित हस्तियों में से एक है. उसका रचनात्मक अवदान केवल अकादमिक चिंतनलेखन तक सीमित नहीं था. उसके लेखन में संघर्ष की लौ थी. हालांकि श्रमिकों के पक्ष में आवाज उठाने वाला वह पहला दार्शनिकलेखक नहीं था. उससे पहले रूसो जनसामान्य का सबसे बड़ा पैरोकार बनकर उभरा था. राबर्ट ओवेन, विलियम किंग, जोसेफ ब्लेंक आदि दार्शनिक चिंतक भी पूंजीवादी शोषण से उबरने के लिए श्रमिकों मजदूरों को और अधिक सुविधा दिए जाने की मांग कर चुके थे. इसी श्रेणी में चार्टिस्ट आंदोलनकारियों का नाम भी लिया जा सकता है, जिन्होंने जनाधिकारिता के लिए बड़े पैमाने पर वर्षों तक चलने वाला संघर्ष किया था. जनसाधारण के लिए लोकतांत्रिक अधिकारों के पक्ष में 1838 में एफ. ओ’क्रोनर एवं विलियम ला॓वेट के नेतृत्व में चले वर्षों लंबे संघर्ष में सैकड़ों चार्टिस्ट आंदोलनकर्मियों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया था. हजारों को निष्कासन की सजा मिली थी.

स्मरणीय है कि सोहलवीं शताब्दी में आरंभ हुए प्रौद्योगिकीकरण की रफ्तार उनीसवीं शताब्दी आतेआते अत्यधिक तीव्र हो चुकी थी. परंपरागत शिल्पकारों पर मशीनीकरण की मार तथा उनके संरक्षण के लिए सरकार की ओर से कोई योजना न होने के कारण ब्रिटेन समेत प्रायः सभी यूरोपीय देशों में बेरोजगारी का संकट बढ़ा था. गांवों में स्थिति और भी शोचनीय थी. क्योंकि कारखानों में बने सस्ते माल की आमद से स्थानीय उद्योगधंधे पूरी तरह चौपट हो चुके थे. भीषण गरीबी के कारण मातापिता अपने बच्चों को उन नारकीय परिस्थितियों में काम पर भेजने के लिए विवश थे, जहां सामान्य स्थितियों काम करने की उनकी हिम्मत भी जवाब दे जाती थी. बाकी मजदूरों, कामगारों यहां तक कि साधारण नौकरीपेशा लोगों की हालत भी संतोषजनक नहीं थी. काम के अत्यधिक बोझ के कारण वे सदैव तनाव में रहते थे. इससे उनकी कार्यकुशलता नकारात्मक रूप से प्रभावित हुई थी. सरकार और प्रशासन पूंजीपतियों के सतत दबाव में रहते थे, इसलिए उनसे मनचाहे फैसले करा लेना, स्थानीय पूंजीपतियों के लिए बहुत आसान था. पूंजी का असमान वितरण, भीषण बेरोजगारी, नगरों में पर्यावरणसंबंधी लगातार बढ़ती समस्याएं आदि अनेक ऐसे कारण थे, जिन्होंने विचारकों के एक बड़े वर्ग को उद्वेलित किया था. पूंजीवाद प्रेरित औद्योगिकीकरण के विरोध में अनेक आंदोलन भी हो चुके थे, जिनमें लाखों श्रमिकों ने सहभागिता की थी. जिन्हें समाज के लाखों श्रमिकों का समर्थन मिला था.

पूंजीवादी शोषण से उबरने के लिए विद्वानों के अलगअलग सुझाव थे. विचारकों का एक दल सहकारिता के माध्यम से पूंजीवादी उत्पीड़न से उबरने का सपना देख रहा था. इस वर्ग में विलियिम किंग, राबर्ट ओवेन फ्यूरियर जैसे विचारक थे. साहित्यिक प्रेरणाएं भी परिवर्तनकारी आंदोलनों के साथ थीं. उनमें सबसे अग्रणी थे, उस समय के महान उपन्यासकार चाल्र्स डिकेन्स, जिन्होंने अपने उपन्यास ‘दि क्रिसमस कैरोल’ में ब्रिटिश समाज में पनप चुके सूदखोर वर्ग का सशक्त चित्रण किया था. रिकार्डो और एडम स्मिथ आदि अर्थशास्त्रियों का मानना था कि सिर्फ औद्योगिक समृद्धि द्वारा गरीबी से लड़ा जा सकता है. सरकार को चाहिए कि उत्पादन और विपणन से जुड़े मामले पूंजीपतियों और उद्यमियों के हवाले कर दे, ताकि वे परिस्थितियों के अनुकूल निर्णय लेने में सक्षम हों.

संगठित आंदोलन को मुक्ति का आधार मानने वाले विचारकों के भी दो अलगअलग वर्ग थे. उनमें से एक धड़ा सहकारिता आंदोलन के समर्थक विद्वानों एवं कार्यकर्ताओं का था, जो सफलता के लिए सहयोग को स्पर्धा से अधिक कारगर और उपयोगी मानते थे. दूसरे धड़े के विचारक मानते थे कि पूंजीवाद से मुक्ति के लिए पूंजीपतियों को कमजोर करना जरूरी है. यह केवल संगठित ताकत के बल पर संभव है. इसके लिए हिंसा का सहारा लेने में भी उन्हें संकोच नहीं था. प्रूधों, मार्क्स, ब्लेंक, बकुनाइन, ऐंगल्स आदि विद्वान पूंजीवाद के उग्र विरोधियों में आते थे.

उल्लेखनीय है कि मार्क्स से पहले ही हीगेल द्वंद्ववाद की सार्थकता को स्थापित कर चुका था. विचारक उसके विचारों की भांतिभांति से व्याख्या कर रहे थे. बल्कि उसके विचारों की व्याख्या के लिए ही दार्शनिकों के अलगअलग गुट बन चुके थे. ऐसे में मार्क्स ने द्वंद्ववाद की विशुद्ध भौतिकवादी दृष्टिकोण से विवेचना कर, सत और असत् का भौतिकीकरण कर दिया. मार्क्स के दर्शन में श्रमिक वर्ग ‘सत्’ का पर्याय था, जो अपने श्रमकौशल के आधार पर उत्पादन कार्य में प्रमुख भूमिका निभाता है. जो सही मायने में उत्पादक है. पूंजीपति वर्ग ‘असत्’ का प्रतीक है, जो दूसरों के श्रम को अपना बताकर मुनाफे का अधिकांश हिस्सा स्वयं हड़प जाता है, जिससे धनी लगातार धनवान तथा गरीब लगातार अधिक गरीब होता जाता है. परिणामस्वरूप समाज में अस्थिरता और असमानता बढ़ती है.

समाज में व्याप्त आर्थिक वैषम्य से निपटने के लिए भी विद्वानों के अलगअलग विचार थे. एक वर्ग का मानना था कि समाज में आर्थिक समानता स्थापित करना सरकार का दायित्व है, अतः सरकार को श्रमिकों के हितों की सुरक्षा हेतु समुचित कानून बनाने चाहिए. दूसरे वर्ग का विश्वास था कि पूंजीवाद का सामना केवल संगठित शक्ति द्वारा ही संभव है. इस वर्ग का सुझाव था कि श्रमिकों, छोटे उद्यमियों और व्यवसायियों को अपनेअपने संगठन बनाकर सहकार के माध्यम से पूंजीवाद के विरुद्ध सार्थक समर छेड़ा जा सकता है. इनसे अलग एक वर्ग कतिपय उदारपंथी विचारकों का था, उनका मानना था कि मनुष्यता के नाते पूंजीपति को स्वयं आगे आकर समाज के बड़े वर्ग के पक्ष में अतिरिक्त संपत्ति का परित्याग करना चाहिए. बहुत बाद में गांधी जी ने इसी भावना को ‘ट्रस्टीशिप’ के सिद्धांत के रूप में प्रकट किया था.

मार्क्स का विचार था कि स्वार्थी पूंजीपतियों को मनाना, उन्हें नैतिक जीवन जीने के लिए प्रेरित करना आसान नहीं है. ऐसे में शोषण से मुक्ति का एक ही उपाय है कि श्रमिकवर्ग संगठित होकर स्वार्थी पूंजीपतियों के विरुद्ध संघर्ष की घोषणा कर दे. जिस दौर में मार्क्स यह घोषणा कर रहा था, वही दौर अस्मितावादी आंदोलन के उदय का भी था. फ्रांस में लोकतंत्र की स्थापना हो चुकी थी. उसकी देखादेखी यूरोप के अन्य देशों में भी लोकतंत्र की मांग जोर पकड़ रही थी. ऐसे में मार्क्स का दर्शन लोगों को पे्ररित करने के लिए पर्याप्त था. अतएव जहांजहां मशीनीकरण जोर पकड़ चुका था, जहांजहां सामंत और जागीरदारी प्रथा शेष थी, वहां पर श्रमिक वर्ग माक्र्सवादी विचारधारा के अनुरूप संगठित होता चला गया. दूसरी ओर अमेरिका और यूरोप के दिन देशों में पूंजीवाद अपनी जड़ जमाए था, वहां मार्क्सवादी विचारधारा के ठीक विपरीत प्रतिक्रिया हुई. मीडिया और सरकार के सहयोग से वहां मार्क्स के कटुआलोचकों का वर्ग पनपा. मगर इस द्वंद्वात्मकता में मार्क्स की चर्चा दोनों ही पक्षों में होती रही.

मार्क्स के विचारों की वर्तमान संदर्भों में क्या प्रासंगिकता है! उसको अर्थशास्त्री माना जाए या दार्शनिक? या फिर राजनीतिक चिंतक? मार्क्स की ख्याति एक दार्शनिक के रूप में भी रही है. हालांकि उसका दर्शन के क्षेत्र में विशेष मौलिक योगदान बहुत कम है. धर्म को लेकर आलोचना फायरबाख और बायर से प्रभावित है. द्वंद्ववाद पर हीगेल उससे पहले ही गंभीर चिंतन कर चुका था, और वह दर्शनशास्त्र की प्रामाणिक धारा के रूप में मान्य हो चुका था. तत्वमीमांसा से वह कोसों दूर था. तो फिर वह कौनसी बात है, जो मार्क्स को जनसाधारण एवं बुद्धिजीवियों के बीच एकाएक जनता का नायक बना देती है. मार्क्स मूल रूप से अर्थशास्त्री था. बल्कि कहना चाहिए कि एडम स्मिथ के बाद मार्क्स ही वह अर्थशास्त्री है, जिसने पूरी दुनिया को प्रभावित करने में सफलता प्राप्त की थी. सच तो यह है कि मार्क्स का अर्थचिंतन एडम स्मिथ के मुक्त अर्थतंत्र को उसका खरा जवाब था. एडम स्मिथ ने अपने सिद्धांत ‘लेजेज फेयर’ द्वारा सरकारों से पूंजीपतियों के रास्ते से हट जाने का आवाह्न किया था. कहा था कि उद्योगों से सरकारी नियंत्रण हटाओ. पूंजीपतियों को निर्बंध ‘अपना काम करने दो.’

एडम स्मिथ की खुली अर्थव्यवस्था के विचार की आलोचना करते हुए मार्क्स ने कहा था कि औद्योगिक उदारता श्रमशोषण के दम पर ही संभव है. नियंत्रणहीन पूंजीवाद को उसने पूंजी का अराजक खेल माना, जिसमें उद्योगपतियों की भले चांदी कटे, मगर मजदूरों का शोषण बढ़ता ही जाता है. स्पर्धा में बने रहने के लिए पूंजीपति वर्ग मजदूरों की मजदूरी कम करता जाता है. कम वृत्तिका और महंगाई मिलकर मजदूरों और कामगारों के जीवन को उत्तरोत्तर कठिन बनाती है. नई प्रौद्योगिकी सिर्फ अमीरों का बैंक बैलेंस बढ़ाती है. और मजदूर की गरीबी, बेबसी तथा दुर्दशा. स्मिथ के कथन कि ‘उन्हें अपना काम करने दो’ के बदले में मार्क्स का कहना था कि ‘श्रमिकों को उनका हक दो’. हालांकि वह यह भी मानता था कि स्वार्थ में डूबे पूंजीपति श्रमिकों को उनका अधिकार आसानी से देने को तैयार नहीं होंगे. इसलिए वह संगठित विरोध का हिमायती था. उसने आवाह्न किया था कि शोषणकारी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के लिए दुनिया के मजदूरो एक हो जाओ. तुम्हारे पास हुनर है. काम करने का सामथ्र्य, इच्छाशक्ति और लग्न है. साथ में वर्षों का अनुभव भी. अपनी ताकत, संगठन की ताकत, अपने कौशल और क्षमताओं को पहचानो, एकजुट होकर उत्पादनव्यवस्था को अपने हाथ में ले लो. कौटिक हाथ मिलकर अपने भविष्य का स्वयं निर्माण करो. उत्पादन का माध्यम बनने से, दूसरों के लिए पसीना बहाने से अच्छा है कि स्वयं उत्पादक बनो. आगे बढ़ो. तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है, मगर जीतने के लिए पूरी दुनिया पड़ी है. कफ और बलगम भरी छाती से निकले मार्क्स के ये भरभराते शब्द विश्वभर के कोटिक श्रमिकों के कंठ से निकली आवाज बन गए. ईसाइयों ने इन शब्दों को पवित्र बाइबिल की वाणी माना, हिंदु ने गीता की अमर सूक्तियां. मुस्लिमों इन्हें कुरआन की महान आदेश मानकर संगठित होने लगे. मार्क्सवाद जनमन की भाषा बन गया.

इकीसवीं शताब्दी में मार्क्सवाद की प्रासंगिकता क्या है? बाजारवाद के इस दौर में जब पूंजीवाद बेलगाम और करीबकरीब अराजक हो चुका है, मार्क्स के विचार कितनी दूर तक हमारा साथ दे सकते हैं? इस बारे में परस्परविरोधी मत सुने जा सकते हैं. मार्क्सवाद के आलोचकों ने बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ही मान लिया था कि उसका पतन अवश्यंभावी है. मार्क्सवाद के सबसे बड़े गढ़ सोवियत संघ का बिखरना उन्हें अपने निष्कर्ष पर मुहर लगने जैसा प्रतीत होता है. उन्होंने बारबार कहा था, बल्कि आज भी यही दावा करते हैं कि मार्क्सवाद के दिन लद चुके हैं. समाजवाद का सपना बीते जमाने की बात हुई. उनके अनुसार यह जानकर भी जो उससे उम्मीद लगाए बैठे हैं, वे स्वप्नदृष्टा, कल्पनाजीवी हैं. उन भोले बच्चों की तरह हैं जिनकी दुनिया लालीपाप में समाई होती है. पर क्या संभव है किसी विचार का यूं ही एकाएक मर जाना?

यदि कोई पेरिस कम्यून की असफलता या सोवियत संघ के बिखरते जाने जैसी घटनाओं से ही उस विचार को अप्रासंगिक और समयबाह्यः मान बैठे और पूंजीवाद की सार्वकालिक जीत का दावा करने लगे तो यह उसकी नादानी ही कही जाएगी. इसलिए कि साम्यवाद नैतिकता और आदर्शवादी पहचान से युक्त एक अवस्था है, जिसकी संकल्पना लोकगीतों, धार्मिकसामाजिक आख्यानों, कविलेखकोंसाहित्यकारों के मानवतावादी सोच से प्रेरणा पाती है. पेरिस कम्यून में श्रमिक संगठनों और नागरिक सेना की जीत के फलस्वरूप जो अल्पकालिक सरकार बनी थी, उसके अपने मतभेद और आपसी अविश्वास थे. साथ में क्रांति का श्रेय लेने की, दूसरों पर छा जाने की आदिम लालसा भी थी. जो एक तरह से प्राचीन साम्राज्यवाद, सामंतवाद, कुलीनतावाद, ब्राह्मणवाद, यहां तक कि पूंजीवादी वर्चस्व का पर्याय थी.

क्रांति के जुनून में उन्होंने सबकुछ उलटपलट तो दिया था, जोशजोश में जनोन्मुखी व्यवस्था कायम करने की शुरुआती कोशिश भी की. किंतु आपसी मतभेद और तनाव के कारण वे ऐसा कोई तंत्र विकसित करने में असफल सिद्ध हुए थे, जो साम्यवादी मान्यताओं के अनुरूप एक दीर्घगामी व्यवस्था के गठन में सहायक बनता. पेरिसक्रांति के दो प्रमुख सूत्रधारों, मार्क्स और बेकुनिन के मतभेद तो जगजाहिर हैं ही. मार्क्स को लगता था कि क्रांति की सफलता के बाद बेकुनिन अपनी राजनीतिक ताकत को बढ़ाना चाहता है. जबकि बेकुनिन का मानना था कि मार्क्स की बढ़ती हुई भूमिका पेरिस में यहूदीवाद को बढ़ावा देगी. इसी प्रकार के मतभेदों के चलते साम्राज्यवादीपूंजीवादी ताकतों के मनसूबों को भांपने में असफल रहे थे. परिणाम यह हुआ था कम्यून पर फिर सशस्त्र सेनाओं का हमला हुआ और राजशाही दुबारी सत्ता पर काबिज होने में कामयाब हुई. व्लादिमिर लेनिन के पेरिस कम्यून की असफलता के कारणों को चिह्नित किया है. एक समाचारपत्र में लिए लिखे गए लेख ‘पेरिस कम्यून का पाठ’ में उसने लिखा था कि कम्यून के नेताओं की

केवल दो बड़ी गलतियों ने उस दमदमाती ऐतिहासिक विजय के लाभों पर पानी फेर दिया. सच तो यह है कि सर्वहारा वर्ग के नेता आधे रास्ते पर ही आराम फरमाने लगे थे. अवैद्य कब्जाधारकों की संपत्ति का अधिग्रहण करके न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के करने के बजाय वे कुछ लोकप्रिय राष्ट्रीय मुद्दों के पक्ष में माहौल बनाने का प्रयास करते रहे. बैंक और ऐसे ही दूसरे अन्य संस्थानों का अधिग्रहण, जो बहुत जरूरी था, नहीं किया गया. सर्वहारा वर्ग के शासकों की दूसरी बड़ी भूल उनकी अतिशय दयालुता थी, जिसके कारण अपने दुश्मनों को कुचलने के बजाय वे उनके साथ दयालुतापूर्ण व्यवहार कर, उनके हृदयपरिवर्तन की उम्मीद करते रहे. जनक्रांति में सीधी सैन्य कार्रवाही की उपयोगिता को उन्होंने बहुत कम करके आंका था. बजाय इसके कि पेरिस के पूर्वशासकों से अपनी सुरक्षा के ठोस और पुख्ता इंतजाम करते, उन्होंने उन्हें आराम से दुबारा ताकत बटोरने का पूरापूरा अवसर दिया, जो मई महीने के भीषण खूनखराबे का कारण बना.’

 

कुछ ऐसा ही रूस में हुआ था. पेरिस क्रांति की असफलता ने मार्क्स को अपनी मान्यताओं पर पुनर्विचार का अवसर दिया था. सशस्त्र विद्रोह से उसका विश्वास घटा था. राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक अधिनायकवाद से दीर्घकालिक मुक्ति के नए रास्तों की खोज का सुफल ‘दि कैपीटल’ के रूप में सामने आया था, जिसे उसने इतिहास, दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्र, विज्ञान आदि गहन अध्ययन के बाद लिखा था. पुस्तक में उसने वर्गहीन समाज की परिकल्पना की थी. स्मरणीय है कि पेरिस कम्यून को मार्क्स ने ‘सर्वहारा का अधिनायकवाद’ की संज्ञा दी थी. वह उसको साम्यवाद की स्थापना की दिशा में पहला चरण मानता था. साम्यवाद की परिकल्पना इस सोच पर आधारित थी कि द्वंद्व की स्थिति विपरीत शक्तियों में ही संभव है. उनसे बचाव का एक ही उपाय है कि समाज में शक्तिकेंद्र ही न रहें. इसलिए श्रमिक वर्ग सत्ता को हाथ में ले. मगर सत्ता हस्तांतरण से ही उसका काम पूरा नहीं हो जाता. उसके लिए आवश्यक है कि समाज में वर्गहीनता की स्थापना के प्रयास भी साथ ही आरंभ कर दिए जाएं. एक समरस समाज की स्थापना, साम्य की स्थापना उनका ध्येय हो, ऐसा उसने कहा था.

रूस में जो हुआ, वह क्रांति का पहला चरण था. वहां लेनिन के नेतृत्व में जारशाही के विरुद्ध संघर्ष का आवाहन किया गया था. जिसमें मजदूर वर्गों को जीत मिली और जारशाही के स्थान पर श्रमिकों की सरकार अस्तित्व में आई. अपने दायित्व को समझते उसने समाज के पुननिर्माण पर जोर दिया. उसका सुखद परिणाम भी मिला. क्रांति के समय रूस की हालत भारत से कहीं बदतर थी. देखते ही देखते वहां विकास का ऐसा दौर चला कि पचाससाठ वर्षों में उसने स्वयं को विश्व की दूसरी महाशक्ति के रूप में स्थापित कर लिया. बस यही उसकी विड़बना थी. क्रांति का पहला चरण पार कर सत्ता पर अधिकार जमा लेने के बाद उसकी कोशिश द्वंद्व की समस्त संभावनाओं को मेटने के लिए जहां वर्गहीन समाज की स्थापना करना था, वहीं उसने खुद को द्वंद्व में झोंकना प्रारंभ कर दिया. सोवियत सरकार असल में तलवार से तराजू का काम लेना चाहती थी. घोषित रूप उसका लक्ष्य साम्यवाद था, मगर असल में थी विरोधियों को परास्त कर, नंबर एक पर बने रहने की कामना. वह दुहाई न्याय की देती थी, मगर अपने नागरिकों के खूनपसीने की कमाई को, हथियारों और अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को विस्तार देने पर खर्च कर रही थी.

इन परिस्थितियों में भी रूस लंबे समय तक साम्यवादी बना रहा तो इसलिए कि मार्क्स ने अपने समर्थक लेखकोंबुद्धिजीवियों का बड़ा वर्ग पैदा किया था, जिनमें गोर्की, चेखव, टालस्टाय, दोस्तोयवस्की आदि महान साहित्यकार सम्मिलित थे. जो साम्यवादी विचारधारा के अनुरूप लगातार सारगर्भित और प्रतिबद्ध लेखन कर रहे थे. इससे वहां के जनमानस में साम्यवाद के प्रति आस्था बनी रही. बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में प्रतिबद्ध साहित्य की चमकदमक खासकर उसमें नए चेहरों की आमद घटती चली गई. वहीं सरकार ने खुद को और भी महत्त्वाकांक्षी बना लिया था. साम्यवादी नीतियों के अनुरूप वर्गहीन समाज की स्थापना पर जोर देने के बजाय, सरकार अपने संसाधन पूंजीवाद के पर्याय बन चुके अमेरिका को परास्त करने पर तुली हुई थी. यह मजदूरों के दम पर बनी सरकार का वैभव प्रेम था. ब्राजील के दर्शनशास्त्री पाउलो फ्रेरा ने बड़े काम की बात कही है. ‘उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र’ में उसने लिखा है कि आमूल परिवर्तन के पहले दौर में, जिसको परिवर्तन की अपरिपक्व अवस्था भी कहते हैं, उत्पीड़ित अवसर मिलते ही वही करता है, जैसा उसने उत्पीड़क को करते हुए देखा है. इस अवस्था में उत्पीड़क और उत्पीड़ित की सिर्फ भूमिकाएं और सिर्फ चेहरे बदलते हैं, स्थितियां नहीं. इसलिए परिवर्तनकामी शक्तियों को, उन शक्तियों को समाज में वास्तविक परिवर्तन की चाहत रखती हैं, प्रारंभिक सफलता के साथ ही रुक नहीं जाना चाहिए. बल्कि आमूल परिवर्तन की कोशिश पहली सफलता के साथ ही आरंभ कर देनी चाहिए. सोवियत संघ के शासकों से भी यही अपेक्षित था कि वे साम्राज्यवादी गतिविधियों में उलझने के बजाय एक नीतिआधारित समाज की स्थापना पर जोर देते. ताकि वर्गहीन समाज की स्थापना संभव हो सके.

रूसी शासक यह भूल चुके थे कि जनता की सोचने की शक्ति भले ही धीमी हो, मगर उसमें छोटे वैचारिक परिवर्तन भी दूरगामी महत्त्व के सिद्ध होते हैं. पूंजीवादी सरकार में हथियारों के निर्माण से लेकर शोध तक का सारा काम पूंजीपति करते हैं. इसके लिए वे श्रमिकों का ऐसे ही शोषण करते हैं, जैसे कि बाकी अन्य उद्योग. लेकिन उनमें काम करने वाला श्रमिक बिना किसी वैचारिक प्रतिबद्धता के, सिर्फ आजीविका की खोज में उनके साथ जुड़ता है. असहमति अथवा असंतुष्टि की अवस्था में वह जब चाहे तब उसको छोड़कर अन्य उद्योग के साथ जुड़ सकता है. कानून उसके इस अधिकार की रक्षा करता है. हालांकि दूसरी जगह भी उसका शोषण होता है, और भौतिक स्थितियां उसके लिए बहुत अधिक बदलती भी नहीं है. तो भी एक उत्पादक को छोड़ आने का जो संतोष है, साथ ही चयन का आनंद और इसके पीछे निहित अस्मिताबोध श्रमिक का अपना और निजी होता है. इससे अधिक वह सामान्यतः अपेक्षा भी नहीं करता. इससे उसका आक्रोश एक सीमा से बाहर नहीं जा पाता.

सोवियत संघ में यद्यपि उपभोग को बढ़ावा देने वाली प्रौद्योगिकी को प्रतिबंधित किया गया था. मगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हथियारों की स्पर्धा और उसमें आगे निकलने की होड़ में वहां की सरकारें राष्ट्रीय आय का बड़े पैमाने पर निवेश कर रही थीं. इस होड़ का नागरिकों के वास्तविक कल्याण से कोई लेनादेना नहीं था. इससे वहां सामाजिक विकास की रफ्तार उतनी नहीं पहुंच पाई थी, जितनी कि साम्यवादी व्यवस्था में अपेक्षित थी. सोवियत नागरिक स्वयं को भावनात्मक रूप से ठगा हुआ महसूस कर रहे थे. इसपर टिप्पणी करते हुए सुविख्यात चिंतक किशन पटनायक ने लिखा था‘आधुनिकतावादी दिमाग, आधुनिक टेक्नालाजी(यंत्रेश्वर) के बारे में इतना ज्यादा अंधविश्वासी है कि उसके विकल्प की संभावनाओं पर सोच नहीं पाता. एक वैकल्पिक यंत्रप्रणाली की तलाश वह कर नहीं सकता. सोवियत रूस में यही हुआ. रूसी कम्युनिस्टों ने कुछ प्रकार की, खासकर उपभोग की टेक्नोलाॅजी को बड़े पैमाने पर प्रतिबंधित किया. लेकिन वैकल्पिक टेक्नोलाॅजी की तलाश के लिए उनका दिमाग तैयार नहीं था. अंततोगत्वा उनके दिमाग पर आधुनिकता का दबाव इतना गहरा हुआ कि रूस साम्यवाद छोड़ने को तैयार हो गया.’

सोवियत संघ में समस्त उत्पादन व्यवस्था श्रमिक संगठनों के और अंततः राज्य के अधीन थी, जिसका उपयोग उनके नेता अपने राजनीतिक मंसूबों को पूरा करने के लिए करते थे. आम मजदूर के लिए कुछ खास नहीं बदला था. उसके लिए शोषणकारी स्थितियों में अपेक्षित सुधार हो ही नहीं पाया था. इसलिए उस व्यवस्था से उनका हताश होना स्वाभाविक ही था. ऊपर से तयशुदा उत्पादन करना मजबूरी. यही कारण है कि वहां श्रमिकों के मन में व्यवस्था के प्रति आक्रोश बढ़ता ही गया. परिणाम सोवियत संघ के विघटन के रूप में सामने आया. बावजूद इसके सोवियत संघ के बिखराव को, मानवाधिकार के पतन के रूप में देखना अनुचित होगा. बस इतना कहा जा सकता है कि सोवियत नेताओं की निजी महत्त्वाकांक्षाओं और अदूरदर्शिता के कारण समाजवाद का प्रयोग वहां उतनी अपेक्षा के साथ सफल न हो सका.

दरअसल मार्क्सवाद की मौत का दावा वे करते हैं जो मानते हैं कि साम्यवाद का उद्भव मार्क्स के जन्म अथवा उसके विवेकीकरण के बाद की घटना है. जबकि ऐसा नहीं है. मार्क्स से पहले भी साम्यवाद था. लोग उपलब्ध सुविधाओं और संसाधनों का मिलजुल कर उपयोग करते थे. स्वयं मार्क्स ने ऐतिहासिक भौतिकवाद की अवधारणा इसी मान्यता के आधार पर प्रस्तुत की है. मार्क्सवाद का अभिप्राय अर्थसत्ता का विकेंद्रीकरण, धर्मसत्ता का विलोपीकरण तथा राजसत्ता का लौकिकीकरण है. ये विचार मार्क्स से ढाई हजार वर्ष पहले जन्मे प्लेटो ने भी व्यक्त किए थे. प्रत्येक धर्म अपना औचित्य सिद्ध करने के लिए इसी प्रकार की लोककल्याणकारी प्रार्थनाओं की अपने विस्तार की सीढी बनाता है. दूसरे शब्दों में मार्क्स के आलोचक वे हैं जो गलत तरीके से संसाधनों पर अधिपत्य जमाए हैं. जो सारा का सारा मुनाफा स्वयं लील जाना चाहते हैं. जो अपनी पूंजी और ताकत के दम पर वर्चस्व बनाए रखना चाहते हैं. जिन्हें दूसरों के श्रमकौशल पर जीने की, परजीवी होने की आदत पड़ चुकी है. मार्क्स के आलोचक वे हैं, जिन्होंने अपनी संपन्नता दूसरों के श्रम पर अर्जित की है. इसके कारण उन देशों के समाज में भारी आर्थिक असमानता है. ऐसे उदाहरण पूंजीवादी देशों में हर जगह हैं.

अमेरिका का ही उदाहरण लें, वहां पूंजीवाद के बाद स्थिति कितनी बिगड़ी है, वह सामने भले ही न आ पाती हो, क्योंकि जनता और बाकी शक्तियों के बीच पुल की भूमिका निभानेवाला मीडिया, पूंजीपतियों का पक्ष लेता है, और उनके हितों के अनुरूप खबरों की मार्केटिंग करता है. जबकि हालात कितने विकट हैं, यह देखकर मन संताप से भर जाता है. बेलगाम पूंजीवाद समाज को सर्वाधिक अमीर और भीषण गरीब लोगों में बांट रहा है, जो अमीर है, वही उत्पादक है. गरीब के श्रम का उपयोग कर वह उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन करता है. गरीब प्राप्त वृत्तिका का बड़ा हिस्सा उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद पर निवेश करता है. मजदूरी के रूप में उसको सिर्फ उतना ही मिल पाता है, जिससे वह अगले लिए काम पर जा सके. कई बार तो प्राप्त वृत्तिका उसकी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी अपर्याप्त सिद्ध होती है.

एक रिपोर्ट के अनुसार 1994 में अमेरिका की 500 प्रमुख कंपनियां उस देश की कुल 92 प्रतिशत आमदनी पर कब्जा जमाए थीं, जबकि विश्वस्तर की 1000 सबसे बड़ी कंपनियों की सालाना आमदनी आठ अरब डालर है, जो दुनिया के कुल लाभ का एक तिहाई है. अमेरिका में ही केवल आधा प्रतिशत सर्वाधिक धनी कंपनियों के अधिकार क्षेत्र में वहां की 50 प्रतिशत संपत्ति आती है. यही नहीं अमीरों की अमीरी निरंतर बड़ती जा रही है. अमेरिका की सबसे धनी एक प्रतिशत जनसंख्या, वहां की राष्ट्रीय आय में 1978 में जहां केवल 17.6 प्रतिशत हिस्सेदारी रखती थी, वह मात्र दस वर्ष अर्थात 1989 में बढ़कर 36.3 प्रतिशत हो चुकी थी. स्मरणीय है कि पश्चिमी समाज में यही वह समय है, जिसे पूंजीवाद का सबसे सुनहरा दौर माना जाता है.

पूंजीवादी अमेरिका में पूंजी का कुछ हाथों में लगातार सिमटते जाना एक राष्ट्रीय समस्या बन चुका है. 2007 में वहां आई भीषण मंदी का खेल हम देख ही चुके हैं, जिसमें पचास से ऊपर भीमकाय बैंक दिवालियेपन का शिकार हुए थे. उससे पहले वहां बड़ी कंपनियों द्वारा छोटे उद्यमों के अधिग्रहण का दौर चला था, जो 1995 अपने चरमबिंदू पर था. मनोरंजन क्षेत्र की दिग्गज कंपनियां वाल्ट डिजनी, वाशिंगटन हाउस, दवा उद्योग की ग्लैक्सो, कागज उद्योग की स्का॓ट पेपर अपनेअपने क्षेत्र की वे महारथी कंपनियां थीं, जिन्होंने अपनी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों को एकाएक निगल लिया था. चेज मेनहट्टन और केमीकल बैंक ने उसी वर्ष मिलकर, 297 अरब डा॓लर की भारीभरकम पूंजी के साथ, अमेरिका के सबसे बड़े बैंकिंग समूह की आधारशिला रखी थी. पूंजीवाद के चरमोत्कर्ष काल में सबकुछ चमकतादमकता हो, यह बात भी नहीं है. बहुत कुछ ऐसा भी था जो चमचमाती रोशनी के पीछे गहराये अंधेरे की हकीकत बयान करता था. अधिग्रहण के उस दौर में छोटी मछलियां आराम से बड़ी मछलियों का शिकार बन रही थीं. उसी वर्ष मित्शुबिशी बैंक और बैंक आफ टोकियो जो दुनिया के सबसे बड़े बैंकों में से थे, दिवालिया घोषित किए गए थे. अधिग्रहण और विलय का यह खेल यूरोपीय देशों में भी फैला और ब्रिटेन, स्विटजरलेंड, जर्मनी आदि अनेक देशों में पूंजी के बड़े मगरमच्छ छोटी मछलियों को निगलने लगे. इससे मार्क्स और ऐंगल्स की यह भविष्यवाणी सच सिद्ध हो रही थी कि पूंजी का सहज स्वभाव केंद्र की ओर खिसकते जाने का होता है. इस प्रकार वह कुछ समूहों तक सिमटकर रह जाती है. अधिग्रहण और विलयीकरण के इस खेल में हर बार कुछ कंपनियां बंद कर दी जाती हैं, जिसका कुफल उनमें कार्यरत श्रमिकों को बेरोजगारी के रूप में भोगना पड़ता है. स्पष्ट है कि

केंद्र की ओर पूंजी का सतत जमाव उत्पादन में किसी प्रकार की वृद्धि नहीं करता, बल्कि इसका उल्टा ही होता है.’

बेरोजगारी का जिक्र हुआ है तो मार्क्स को एक बार पुनः याद करना पड़ेगा. कम्यूनिस्ट मेनीफेस्टो में उसने कहा था कि बुर्जुआ वर्ग लंबे समय तक सत्ता पर काबिज नहीं रह पाएगा. इसलिए कि वह गरीब और विपन्न वर्गों को अपने दम पर अपने राज्य में सहने की सहूलियत नहीं देता, बल्कि उनके बल पर अपने लिए सुविधाओं का अंबार लगा लेता है. इससे श्रमिक वर्ग के मन में आक्रोश पैदा होता है, जो लगातार बढ़ता जाता है, जो एक दिन बुर्जुआ वर्ग के सत्ताच्युत होने का कारण बनता है. हालांकि पूंजीवादी देशों में ऐसी खबरें प्रायः छनछनकर ही सामने आ पाती हैं. पूंजीपतियों से अस्थिमज्जा प्राप्त मीडिया तथा उन्हीं के दम पर पलने वाली सरकारें, उनपर पर्दा डालने का काम करती हैं. 2007 में छाई मंदी से ठीक पहले पूंजीवाद के समर्थक अर्थशास्त्रीविचारक उदार आर्थिक नीतियों का गुणगान करते नहीं थकते थे. 1995-1996 के पूंजीवाद के सुनहरे दौर में जब बड़ी कंपनियां अपेक्षाकृत छोटी कंपनियों का अधिग्रहण कर अपने विस्तारवादी मंसूबों को अंजाम दे रही थीं, उस समय संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक बेरोजगारों की संख्या 12 करोड़ से भी अधिक थी. ये वे आंकड़े थे, जो पूंजीपतियों के आसरे फलनेफूलने वाले मीडिया ने दिए थे. वास्तविक स्थिति और भी भयावह एवं चिंताजनक है. यदि अस्थायी और ठेके पर अल्पावधि के लिए काम करने वाले कर्मचारियों को भी बेरोजगारों की श्रेणी में रख लिया जाए तो दुनिया के कुल बेरोजगारों की संख्या एक अरब से ज्यादा हो सकती है.

संयुक्त राष्ट्र की उस रिपोर्ट के अनुसार पश्चिमी यूरोप में बेरोजगारों की संख्या दो करोड़ से भी अधिक थी, जो वहां की कुल जनसंख्या का करीब 10.6 प्रतिशत हैं. यही हाल यूरोप के ‘लौहपुरुष’(स्ट्रांग मैन) कहे जाने वाले जर्मनी का था, वहां हिटलर के पतन के बाद पहली बार बेरोजगारों की संख्या में जबरदस्त वृद्धि हुई थी और वह एक झटके में पचास लाख को पार कर चुकी थी. इनमें भी सबसे अधिक आश्चर्यजनक जापान की हालत है. अपनी वैज्ञानिक और तकनीकी क्रांति से पूरे विश्व को चैंका देने वाले जापान में 1930 के बाद पहली बार बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई. हालांकि सरकारी आंकड़े वहां तीन प्रतिशत बेरोजगारी की बात स्वीकारते हैं, मगर वास्तविक बेरोजारों की संख्या का, कुल जनसंख्या का आठ से दस प्रतिशत होना, चिंताजनक स्थिति है. बढ़ती बेरोजगारी ने इस बार उन क्षेत्रों को भी प्रभावित किया है, जो इससे पहले रोजगार की दृष्टि से अत्यंत सुरक्षित और लाभदायक समझे जाते थे. इनमें अध्यापक, नर्स, डाॅक्टर, बैंक कर्मचारी, वकील आदि सम्मिलित हैं, जो अपनी व्यावसायिक योग्यता के दम पर रोजगार पाते रहे थे. 2007 के बाद तो बेरोजगारी ने युवाओं की कमर ही तोड़ दी है. अमेरिका, यूरोप आदि के देशों में बैंकों और बड़े उद्योगों के बंद अथवा दिवालिया होने के बाद दुनियाभर के श्रमिकोंकामगारों को छंटनी का शिकार होना पड़ा. उनकी संख्या करोड़ों में है.

उदार अर्थनीति की विडंबना है कि आर्थिक प्रगति का लाभ जहां चंद विकसित देश ही उठा पा रहे थे, जबकि छंटनी और दिवालियेपन का असर प्रायः छोटी और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को ही झेलना पड़ा है. इससे मार्क्स का यह कथन एक बार फिर प्रासंगिक लगने लगा, जिसमें उसने कहा था कि पूंजीवाद एक वैश्विक व्यवस्था के रूप में विकसित होगा. मगर विश्वबाजार का अस्तित्व लंबे समय तक टिके रहने वाला नहीं है. इसका अंत सुनिश्चित है. यह हमारे समय का बेहद निर्णायक समय है. सच तो यह है कि हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जिसमें कुछ भी निजी अथवा स्थानीय नहीं है. हमारी अर्थव्यवस्था, राजनीति, संस्कृति यहां तक कि कूटनीति भी स्थानीय नहीं है. सबकुछ वैश्विक और अंतरराष्ट्रीय है. प्रौद्योगिकी प्रेरित अंतरराष्ट्रीयकरण ने हमारी संवेदनाओं को भौंथरा किया है. आजकल युद्ध के समाचार भी तब तक रोमांचित नहीं करते, जब तक कि उनमें अंतरराष्ट्रीयता का पुट न हो. वैसे युद्ध अब राजनीतिक मसला नहीं रहा. बीसवीं शताब्दी ने जितने युद्ध झेले, उनके पीछे बाजार का अधिक हाथ था, जिनमें करोड़ों की जानें गईं. इनमें सबसे आखिरी युद्ध अमेरिका और इराक के बीच था, जिसमें एक महादेश की पूंजीवादी आकांक्षाओं ने अपने से कहीं छोटे देश को पहले तो बदनाम करने की साजिश की. फिर दादागिरी दिखाते हुए उसपर हमला बोल दिया.

यह दादागिरी राजनीति प्रेरित नहीं थी. न उसको देश के नागरिकों का समर्थन प्राप्त था. समर्थन था, पूंजीपतियों का, जो युद्ध में अपनेअपने लाभ देख रहे थे. एक वर्ग को युद्ध की तबाही के बाद उस देश में नवनिर्माण के लिए ठेके मिलने की उम्मीद थी. कुछ का धंधा हथियार बनानेबेचने का था. वे मानते थे कि युद्ध नवनिर्मित रासायनिक हथियारों के प्रदर्शन का अच्छा अवसर सिद्ध होगा, बाद में उनके ग्राहक भी आएंगे. इन महत्त्वाकांक्षाओं ने एक फलतेफूलते देश को तबाही के गर्त में ढकेल दिया. हैरानी की बात है कि जनता और बुद्धिजीवी उस युद्ध को केवल राजनीतिक मसला समझे रहे. युद्ध के वास्तविक जिम्मेदार व्यक्ति कभी सामने आ ही नहीं पाए. युद्ध से नाराज जनता ने बुश महाराज से कुर्सी तो छीन ली. नई उम्मीदों के साथ नया चेहरा राजनीति में आया. मगर पूंजीवादी मंसूबे खत्म नहीं हुए. यानी युद्ध की संभावनाओं और उससे जुड़ी पूंजीवादी आकांक्षाओं का कोई निदान आज तक नहीं खोजा जा सका.

समस्या है कि पूंजीवाद के इस खेल से बचा कैसे जाए? इसका एक ही हल है. किसी भी तरह किसान, मजदूर और कामगार वर्ग अपनेअपने हितों की रक्षा में एकजुट हों. अपनी वास्तविक जरूरतों का आकलन करें. उपलब्ध संसाधनों को जांचे परखें. तत्पश्चात अनुकूल प्रौद्योगिकी का चयन कर उत्पादन की जिम्मेदारी स्वयं संभालें. प्रौद्योगिकी भी ऐसी हो जो समूह के सदस्यों की कुशलता का उपयोग कर, उन्हें आर्थिकसामाजिक रूप में आत्मनिर्भर बनाती हो. लेकिन क्या यह इतना ही आसान है? आजकल सामान्य समझबूझ वाला बुद्धिजीवी भी मानता है कि उद्योगों को बंधनमुक्त होना चाहिए. सरकार उनपर कम से कम नियंत्रण रखे. वैश्विक अर्थव्यवस्था का विकास हो, ताकि उद्योगों को हर जगह एक जैसा वातावरण मिले. सभी देशों में लाइसेंस और परमिट की एकसी शर्तें, एक जैसे विधान हों. व्यवस्था हो कि उद्योगों को समाज के बहुसंख्यक वर्ग के विकास के लिए काम करने की पूरीपूरी छूट मिले. साथ में आवश्यक सुविधाएं भी. ऐसे में कैसे संभव है, पूंजीवाद के संकट से बच पाना. खासकर तब जब पूंजीवाद लगातार मजबूत और हिंò होता जा रहा हो. श्रमिक शोषण के नएनए रास्ते खोजे जा रहे हों. शोध का क्षेत्र पूंजीपतियों के हाथ में चले जाने से सारी प्रतिभाएं, सारे के सारे पेटेंट पहले से ही उनके हाथों में जा ही चुके हैं. पूंजीपतियों के लिए तो वैश्वीकरण भी एक अवसर है. यह वैश्वीकरण भी निरापद कहां है? इससे बड़ी विडंबना भला और क्या होगी कि पिछली शताब्दी में भूमंडलीकरण एवं अर्थव्यवस्था के अंतरराष्ट्रीयकरण की तमाम सूचनाओं के बावजूद भारत में आर्थिक विसंगतियां सिर चढ़कर बोल रही हैं. देश में रोजगार के जितने अवसर बढ़े हैं, बेरोजगारों की संख्या उससे कहीं अधिक बढ़ी है. उससे कहीं तेजी से देश में आर्थिक असमानता बढ़ती जा रही है.

पूंजीवाद के अंतरराष्ट्रीय फैलाव के कारण विभिन्न देशों के आंतरिक और बाह्यः तनावों में भी वृद्धि हुई है. राज्यों के विरोधाभास और भी खुलकर सामने आए हैं. पूंजी का खिंचाव अतिविकसित देशों की ओर बढ़ता ही जा रहा है. हालात को समझने के लिए सिर्फ एक उदाहरण पर्याप्त होगा. 1987 में संयुक्त राज्य अमेरिका अपने कुल सालाना बजट का मात्र छह प्रतिशत हिस्सा निर्यात के माध्यम से जुटाता था. 1997 में निर्यात का हिस्सा बढ़कर 13 प्रतिशत यानी दुगुने से भी अधिक हो चुका था. इकीसवीं शताब्दी की दहलीज पर सरकार की योजना 22 प्रतिशत के लक्ष्य को पाने की है. इससे अमेरिका जैसे विकसित देशों की अर्थव्यवस्था के रहस्य को समझा जा सकता है. विकसित देशों के पास तो पूंजी है, संसाधन हैं, इसलिए वे अपने उत्पादों के लिए बाजार की सतत खोज में रहते हैं. ऐसी तकनीक की खोज में रहते हैं, जिसकी स्थापना लागत भले ही अधिक हो, मगर जिसके माध्यम से उत्पादन व्यवस्था का अधिकाधिक स्वचालीकरण कर सकें. स्वचालीकरण की तीव्र प्रक्रिया में स्थापना लागत भले ही अपेक्षाकृत अधिक हो, मगर उत्पादनवृद्धि और प्रचालन लागत में भारी कमी से उद्योगपति को दीर्घकालिक लाभ मिलता है. दूसरी ओर श्रमिकों पर निर्भरता में लगातार गिरावट आती है. इससे पूंजीपति लगातार ताकतवर होता है और श्रमिक कमजोर.

इस स्थिति को मार्क्स ने 1848 में ही भांप लिया था. कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो में उसने लिखा था

सघन मशीनीकरण तथा श्रमविभाजन की त्वरित प्रक्रिया में सर्वहारा काम के दौरान अपनी समस्त कार्यकौशल और विशिष्टताएं खो बैठता है. इसका प्रतिकूल प्रभाव उसकी कार्यक्षमता पर पड़ता है. उसका उल्लास धीरेधीरे कम होने लगता है. एक दिन वह मशीनों का आश्रित बनकर रह जाता है. पूंजीवादी समाजों में श्रमिक के कौशल को कुंद करने, उसको मशीनों का दास बनाने की सर्वाधिक सरल और प्रचलित चाल है. इससे श्रमिक की उत्पादन लागत को लगभग पूरी तरह से, उसकी रोजमर्रा की आवश्यकताओं तक, सिर्फ उन आवश्यकताओं तक जिनसे वह अपना भरणपोषण कर, कलकारखानों के लिए मजदूरों की नई फसल पैदा कर सके, सीमित कर दिया जाता है. चूंकि किसी उपभोक्ता वस्तु, साथ ही उसके श्रम की कीमत उत्पादन लागत के तय होती है. अतएव जैसेजैसे श्रमिक का उत्पादन से मोहभंग बढ़ता है, काम के प्रति उसका विकर्षण बढ़ता जाता है. दूसरी ओर उसकी वृत्तिका भी उसी अनुपात में गिरती चली जाती है. इसी के साथ कामगार के ऊपर, चाहे वह कार्यघंटों में हुई बढ़ोत्तरी के कारण हो या तय समयसीमा में अधिक काम देने के दबाव का मामला, अथवा उच्च उत्पादनक्षमता युक्त मशीनरी के साथ काम करने के कारण उसके साथ तालमेल बनाए रखने की चुनौतीश्रम का दबाव भी लगातार बढ़ता जाता है.

सोवियत संघ के अवसान के बाद भारत आदि देशों में अमेरिकापरस्त अर्थशास्त्रियों एवं बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग पैदा हुआ है, जिसने पूंजीवाद को लगभग अपरिहार्य और विकल्पहीन मान लिया है. स्वयं अमेरिका की क्या स्थिति है, इस बारे में बहुत अधिक समाचार मीडिया में नहीं दिए जाते हैं. यह भी कहा जा सकता है कि अपने पूंजीवादी संबंधों की लाज रखने के लिए मीडिया उनपर पर्दा डाले रखता है. वस्तुतः आधुनिक अमेरिका की वही हालत है, जो मार्क्स के समय में तत्कालीन सर्वाधिक विकसित पूंजीवादी देश ब्रिटेन की थी. अंतर केवल इतना है कि ब्रिटेन अपने उपनिवेशों के दोहन के लिए राजनीति का सहारा लेता था, अमेरिका यह काम अपनी अर्थसत्ता के माध्यम से करता है. उसने पूरी दुनिया में अपने आर्थिक उपनिवेश बसाए हुए हैं, जिनपर वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक जैसी संस्थाओं के माध्यम से राज करता है. उपनिवेशों के शोषण में बौद्धिक संपदा जैसे कानून उसके मददगार सिद्ध होते हैं. इसके बावजूद हालात संतोषजनक नहीं हैं. आक्रोश भीतर ही भीतर भड़क रहा है. इसके पीछे अमेरिकी अर्थव्यवस्था की वे विसंगतियां हैं, जो धीरेधीरे सामने आ रही हैं. ऐलेन वुड के अनुसार अमेरिका में

गत बीस वर्षों के दौरान अमेरिकी श्रमिकों की वास्तविक मजदूरों में बीस प्रतिशत तक की भारी गिरावट दर्ज हुई है, दूसरी ओर उन्हें पहले की अपेक्षा प्रतिदिन दस प्रतिशत अधिक काम करना पड़ता है. कहा जा सकता है कि अमेरिका की औद्योगिक क्रांति वहां के श्रमिक वर्ग के हितों पर कुठाराघात के बाद संभव हो सकी है. उदाहरणार्थ, एक अमेरिकी कर्मचारी को एक वर्ष में औसतन 168 घंटे ओवरटाइम करना पड़ता है, जो एक महीने के कार्य के बराबर है. अमेरिकी आॅटोमोबाइल उद्योग के लिए यह विशेषरूप में सही है, जहां एक कार्यदिवस में नौ घंटे और सप्ताह में छह दिन कार्य करने का प्रावधान है. अमेरिकी मजदूर संगठनों के अनुसार यदि वहां कार्यसप्ताह को चालीस घंटों तक सीमित कर दिया जाए तो मात्र इसी से 59,000 नए रोजगार अवसर पैदा किए जा सकते हैं.’


ऐसा नहीं है कि अपने शोषण के विरोध में श्रमिकों में कोई चेतना या सुगबुगाहट न हो. बल्कि वहां आवाजें उठने लगी हैं. करीब पंद्रह वर्ष पहले 24 अक्टूबर, 1994 को टाइम पत्रिका में प्रकाशित एक आलेख में पूंजीवादी शोषण के विरोध में बढ़ते श्रमिकआक्रोश का उल्लेख किया गया था, जिसमें उन्होंने उदारवाद प्रेरित आर्थिक विस्तार को अपने हितों के प्रतिकूल बताया था. लेख में बताया गया था कि काम के अत्यधिक बोझ के कारण, श्रमिकों की दिनचर्या कारखाने में काम तथा ओवरटाइम करने के बाद घर जाकर नहानेखानेसोने और अगली सुबह फिर कारखाने के लिए दौड़ लगाने तक सिमट चुकी है. इसने वहां के सामाजिक जीवन को भी प्रभावित किया है. इससे जहां शिशु जन्म दर में गिरावट दर्ज की गई है, वहीं तलाक की घटनाओं में भी अप्रत्याशित तेजी आई है. जबकि 1980 तक लगातार विकासमान रही जीवनसंभाव्यता, उसके बाद लगभग स्थिर हो गई है. यह स्थिति अमेरिकी समाज के विकास की विडंबना को दर्शाती है. ब्रिटेन का हाल भी इससे भिन्न नहीं है. जब मादाम थैचर वहां की प्रधानमंत्री थीं तो उद्योगों में 25 लाख रोजगार अवसरों में गिरावट दर्ज की गई थी. बावजूद इसके वहां कारखानों के उत्पादनसामर्थ्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है. कामगारों की संख्या में हुई भारी गिरावट के बावजूद उत्पादन स्तर पूर्ववत रहने का कारण केवल उन्नत मशीनों का उपयोग नही है, बल्कि मजदूरों का शोषण भी है. अत्याधुनिक तकनीक भी श्रमिकों के लिए राहतकारी सिद्ध नहीं हुई है. उनकी मुश्किलें बढ़ती ही जा रही हैं. श्रमिकों एवं आम जनता को भुलावे में रखने के लिए नए उपकरणों को बड़ी तेजी से एक के बाद कर उतारा जा रहा है. ऐसे उत्पादों के निर्माण पर जोर दिया जा रहा है, जिनका वास्तविक विकास से कोई संबंध ही न हो. लोकतांत्रिक खुलेपन का उपयोग फैशन और नईनई उपभोक्तावस्तुओं के साथ, लोगों को मोबाइल और इंटरनेट पर खुली सेक्ससामग्री परोसने के लिए किया जा रहा है. तंत्रमंत्र और जादूटोने की बढ़ती लोकप्रियता का लाभ उपभोक्तासामग्री के प्रचारप्रसार के लिए किया है. इसका दुष्परिणाम यह है कि समाज में आर्थिक विषमता लगातार बढ़ रही है.

अमेरिका की भांति ब्रिटेन में भी श्रमिकों को अधिक देर तक कार्य करने के लिए बाध्य किया जाता है. उन्हें उस अवधि का वेतन भी नहीं दिया जाता. यही हाल यूरोप के बाकी देशों का है. वहां भी बड़ी औद्योगिक कंपनियां छोटे उत्पादकों को लीलती जा रही हैं. सबसे धनी और निर्धनतम व्यक्ति के बीच आय का अंतर लगातार बड़ता जा रहा है. भारत समेत ऐशियाई देशों में पूंजीवादी व्यवस्था को लागू हुए अधिक दिन नहीं हुए हैं. पश्चिम का अंधानुकरण करते हुए भारत ने उदार अर्थव्यवस्था को अपनाकर, गत पचीसतीस वर्ष से पूंजीपतियों को मनमानी करने का अधिकार दे दिया है. इससे पूंजी का तेजी से केंद्र की ओर खिंचाव जारी है. पिछले एक दशक में जहां देश में अरबपतियों की संख्या में कई गुना वृद्धि हुई है, वहीं पैंतीस करोड़ नागरिकों को प्रतिदिन बीस रुपये से भी कम आय में जीवनयापन करना पड़ता है. बढ़ते जनाक्रोश के दुष्परिणामस्वरूप पिछले कुछ दिनों से देश में नक्सलवादी गतिविधियां बढ़ी हैं. सरकार और पूंजीपतियों के दबाव में अपनी जमीन और संसाधन लुटा चुके हजारों लोग विद्रोह में व्यवस्था के विरुद्ध हथियारबंद हो उठे हैं. छोटे कारखानों में मजदूरी की बुरी हालत है. वहां बिना किसी नोटिस के कार्यघंटों में 50 प्रतिशत तक वृद्धि हो चुकी थी. इससे पहले जहां श्रमिकों को केवल आठ घंटे काम करना पड़ता था, अब बारह घंटे उतने ही वेतन में काम करना उनकी विवशता बनती जा रही है. यही हालात एशिया के बाकी देशों में हैं. पश्चिम भी इनसे बचा नहीं है. मीडिया पूंजी की इस तानाशाही के विरुद्ध आवाज उठाने के बजाय उसके महिमामंडन में लगा रहता है. स्थिति पर गंभीरतापूर्वक विचार किए बिना उसका प्रयास मार्क्सवाद कठघरे में खड़ा करने का होता है, जिससे अंततः पूंजीवाद ही मजबूत होता है.

यह मार्क्स और ऐंगल्स ही थे, जिन्होंने हमारा परिचय सामाजिक विकास के इस सर्वमान्य और महत्त्वपूर्ण नियम से कराया था, जिसके अनुसार समाज का वर्तमान ढांचा पूंजीपतियों के अनुकूल विकसित हुआ है. यह उसी अवस्था में स्थिर रह सकता है, जब तक समाज की उत्पादक शक्तियां सुरक्षित हैं. कोई भी समाज इससे उस समय तक बच नहीं सकता, जब तक कि वह अपने समस्त संसाधन इस व्यवस्था के विकास के लिए, पूंजीवाद की समृद्धि के निमित्त झोंक नहीं देता. पूंजीवाद के समर्थक अक्सर इस बात का दावा करते हैं कि बाजार की समृद्धि का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचता है. क्योंकि बाजार सभी को अपनी वस्तु का मूल्यांकन करने तथा उसके अनुसार उसका मूल्य वसूलने का आश्वासन देता है. उनके अनुसार यह व्यवस्था श्रमिक के लिए अधिक लाभकारी है. इसमें वह स्पर्धा का लाभ उठाकर अपने लिए ऐसे नियोक्ता की तलाश की तलाश कर सकता है, जहां उसको अधिकतम वृत्तिका की संभावना हो. यह एक दिवास्वप्न ही है. उन्हें जिस गुण में पंूजीवाद की सार्थकता नजर आती है, दरअसल वही उसकी कमजोरी है. नियम है कि बाजार में पूंजी की ताकत ही सर्वोपरि होती है. इसलिए वहां छोटी पूंजी को बड़ी पूंजी के आगे परास्त होना पड़ता है. किसान और श्रमिक के पास अपना श्रम या वे छोटे संसाधन पूंजी के रूप में होते हैं, जो बाजार में किसी प्रकार की ताकत बनने में नाकाम होते हैं. परिणामस्वरूप अपने मूल्यांकन के लिए वे सदैव दूसरों पर निर्भर रहते हैं, जहां उनकी योग्यता का न्यूनतर मूल्यांकन किया जाता है. यह स्थिति पूंजीवादी शोषण को जन्म देती है.

पूंजी की तानाशाही के चलते हम सिर्फ यह सोचकर तसल्ली कर सकते हैं कि किसी भी अन्य विधान की भांति पूंजीवाद का भी जन्म हुआ है. वह भी दूसरी विचारधाराओं की भांति इतिहास के साथ विकसित हुआ है, और आज वह जिस अवस्था में है, वह उसके चढ़ाव की चरम अवस्था है. यहां से उसका पतन अवश्यंभावी है. यही ऐतिहासिक भौतिकवाद की अवधारणा है. यही मार्क्स के चिंतन का लक्ष्यबिंदू है. जब हम इस वैज्ञानिक तथ्य को समझ लेते हैं, तो यह समझना भी आसान हो जाता है कि इतिहास घटनाओं की भावहीन, अतार्किक, अनियोजित और आकस्मिक व्यवस्था नहीं है, जिसको चंद लोग अपनी मनमर्जी से हांक सकें. न ही यह कुछ लोगों की गतिविधियों का परिणाम है. बल्कि यहां जो घटता है, वह एक नैसर्गिक व्यवस्था के अनुसार संचालित होता है, जिसकी सुसंगत व्याख्या संभव है.

मार्क्स के ये विचार चाल्र्स डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत से प्रेरित थे, जिसने जीवजगत को परिवर्तनशील माना था. अपने अध्ययन द्वारा वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि जीवजंतुओं का भी अपना भूतवर्तमान और भविष्य होता है. विकासक्रम के दौरान उन्हें एक सतत परिवर्तनशील एवं विकासमान प्रक्रिया से अनिवार्यतः गुजरना पड़ता है. डार्विन की वैज्ञानिक खोज की सामाजिक विकास के संदर्भ में व्याख्या करते समय मार्क्स एवं ऐंगल्स का मानना था कि इस सृष्टि में पूर्णतः स्थायी और अपरिवर्तनशील सत्ता की कल्पना मात्र एक भ्रम है. इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है, जो पूरी तरह स्थायी एवं अपरिवर्तनीय हो. सामाजिकतंत्र, चाहे जो भी हो, वह मानवीय भावनाओं के सीमित स्वरूप का प्रदर्शन करता है. अपने भरणपोषण के लिए प्रत्येक समाज उत्पादकता के संसाधनों को अपनाता है. उसके लिए जिन संसाधनों को वह चुनता है, उन्हीं पर उसके विकास की दिशा एवं गति निर्भर करती है. ऐतिहासिक भौतिकवाद का विवेचन करता हुआ मार्क्स अंततः इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि वर्तमान समाजों का अभी तक तक इतिहास वर्ग, संघर्ष का इतिहास रहा है.

मजदूर कोरी वितंडा नहीं चाहता. मार्क्स ने उसके हक की बात कही थी. अपने सुख, प्रतिष्ठा और परिवार के भविष्य को दाव पर लगाकर उसने उनके लिए संघर्ष किया था. मजदूर इस तथ्य को जानता है. अतएव मार्क्स उसके लिए देवता हैं. सच तो यह है कि मार्क्स ने हीगेल का द्वंद्ववाद का मानवीकरण किया था. वह उसको आकाश से उतारकर जमीन पर ले आया था. एक तत्ववादी चिंतन को विशुद्ध यथार्थ, लोकोपयोगी चिंतन के रूप में ढाल दिया था. उसका मानना था कि पूंजीवाद का खात्मा श्रमिकों द्वारा उत्पादनतंत्र पर कब्जा कर लेने मात्र से संभव नहीं है. उनके वास्तविक कल्याण के लिए व्यवस्था में आमूल बदलाव जरूरी है. ऐसी व्यवस्था की नींव रखनी होगी जो वर्गहीनता की समर्थक हो. तभी सामाजिकआर्थिक ऊंचनीच की खाई को पाटा जा सकता है. मार्क्स के आलोचकों का सोच केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित है. वे व्यवस्था परिवर्तन के संकल्प से दूर हैं. ऐसे आलोचकों द्वारा मार्क्स की आलोचना की कोई भी बात, उसके चेलेचपाटों की समझ में नहीं आतीं. उन्हें तो गोपियों जैसी साकार भक्ति चाहिए. उद्धव का ज्ञानयोग उनके किसी काम कर नहीं.

मार्क्स अर्थव्यवस्था, राजनीति और समाजनीति में व्यापक परिवर्तन चाहता था. वह चाहता था कि अर्थनीति का ढांचा मुनाफे के आधार पर नहीं, मानवीय विकास और संवेदनाओं के अनुसार तय किया जाए. मार्क्स के अनुयायी दुनिया को उसी की निगाह से देखते हैं, सिर्फ उसको चाहते हैं. यही उनके लोकप्रिय अथवा अलोकप्रिय होने का कारण है. यही वह गुण है जिसने पूरी दुनिया को दो धु्रवों में बांट रखा है. मार्क्स के चिंतन में सर्वभक्षक पूंजीवाद का विकल्प उपलब्ध है, जिसने पूरी दुनिया की संपदा का प्रवाह विकसित देशों की ओर मोड़ दिया है. कहने को तो तमाम अंतरराष्ट्रीय संधियां देशों के बीच मुक्त व्यापार की बात करती हैं. प्रत्येक देश को यह अधिकार देतीं है कि वह अपने संसाधनों का उपयोग कर अपने उत्पादक सामथ्र्य का अधिक से लाभ उठा सके. मगर व्यवहार में विकसित देशों की अत्याधुनिक तकनीक और विपुल साधनों के आगे स्पर्धा में वे टिक ही नहीं पाते हैं. इसलिए उदार अर्थव्यवस्था का लाभ केवल विकसित देशों के लाभाधिकार तक सीमित होकर रह जाता है. ऐसे में मार्क्स का विश्लेषण हमें पूंजीवाद को गहराई से समझने और उसका सार्थक विकल्प खोजने में मदद कर सकता है.

मार्क्स का सारा जोर पूंजीवाद के चरित्र और उसकी विवेचना को लेकर था. इसी संकल्पना के साथ उसने ‘पूंजी’ की रचना की थी. मार्क्स के निधन के बाद से पिछले 127 वर्षों में पूंजीवाद के चरित्र में व्यापक बदलाव आया है. तो भी उसका मूल चरित्र लगभग वही है, जो उनीसवीं शताब्दी के दौरान था. बल्कि कई मायने में वह पहले से अधिक ताकतवर, क्रूर, उत्पीड़क एवं दुःखदायी हुआ है. स्वचालित प्रौद्योगिकी ने पूंजीपति को पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली तथा निष्ठुर बनाया है. इसकी मार्क्स के जीवनकाल में केवल शुरुआत ही हो पाई थी. हाल के वर्षों में कंप्यूटरआधारित तकनीक ने मशीनों को इतना कार्यक्षम और स्वचालित बना दिया है, कि अनेक क्षेत्र ऐसे हैं, जहां मशीनों का नियंत्रण रिमोट के माध्यम से संभव है. उन स्थानों में श्रमिक का कार्य केवल तैयार माल को सुरक्षित रखने या उसको गंतव्यस्थल तक लानेले जाने में सिमट गया है. वह मानवी हस्तकौशल एवं उसके तकनीकी ज्ञान की उपेक्षा करती है. चूंकि मशीनें तकनीकी कौशल की भरपाई आसानी से कर देती हैं, इसलिए पूंजीपति के लिए श्रमिक की भूमिका उत्पादनकार्य में मात्र सहायक तक सिमटकर रह जाती है. उन्नत प्रौद्योगिकी ने श्रमिकों के मन से ‘उत्पादकशक्ति’ होने की अनुभूति को छीनकर उन्हें कुंठाग्रस्त करने का काम किया है. श्रम का शोषण करना, अधिलाभ के बड़े हिस्से पर उत्पादक का अधिकार, अपने से छोटे उद्यमियों को स्पर्धा में परास्त कर बाजार पर एकाधिकार कायम कर लेने की इच्छा आदि आधुनिक पूंजीवाद के कुछ ऐसे अवगुण हैं, जो आज भी उनीसवीं शताब्दी के पूंजीवाद से मेल खाते हैं, जिनमें कतई सुधार नहीं हुआ है. इससे भी बड़ी बात यह हुई है कि पूंजीपतियों ने लंबी पहुंच वाले संचारमाध्यमों पर कब्जा करके प्रतिपक्ष की आवाज को न उभरने देने का पूरापूरा प्रबंध कर लिया है. कहा जा सकता है कि जिस वैज्ञानिक समाजवाद की परिकल्पना मार्क्स ने की थी, उसकी पहले से कहीं अधिक आवश्यकता आज है.

बावजूद इसके यह एक सामान्य जिज्ञासा का सवाल है कि मार्क्स की आज के संदर्भों में कितनी प्रासंगिकता है. क्या उसके विचारों को इकीसवीं शताब्दी में भी ज्यों का ज्यों अपनाया जा सकता है. दरअसल किसी भी कालखंड में मार्क्स के विचारों को संपूर्णता से आत्मसात नहीं किया गया. इसके कारण स्वयं मार्क्स के लेखन में ही सुरक्षित हैं. ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ में वह मजदूरों का सक्रिय क्रांति के लिए आवाह्न करता है. अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हिंसा का सहारा लेने में भी उसको संकोच नहीं है. पेरिस की रक्तरंजित क्रांति और तदनंतर कम्यून की स्थापना के पीछे भी माक्र्सवादी प्रेरणाएं ही थीं. मार्क्स के विचारों के आधार पर ही श्रमिक आंदोलन की नींव रखी गई. यद्यपि बाद में उसका हिंसक क्रांति से मोहभंग होता है और वह आमूल परिवर्तन के लिए, पूंजीवाद से साम्यवाद तक की यात्रा को दो हिस्सों में बांट देता है. उसके अनुसार क्रांति के पहले चरण में श्रमिक संगठन समस्त राजनीतिक और उत्पादनतंत्रों पर अपना अधिकार जमा लेंगे. उसके बाद वे आमूल परिवर्तन के लिए वर्गहीन समाज की स्थापना के लिए प्रयासरत होंगे.

इतनी स्पष्टता के बावजूद मार्क्स के विचारों को लेकर उसके समर्थकों के बीच आज भी भारी मतभेद हैं. मार्क्स का राजनीतिकआर्थिक दर्शन दुनियाभर में ‘मार्क्सवाद ’ के नाम से जाना जाता है, जिसमें वह ऐतिहासिक द्वंद्ववाद के आधार पर पूंजीवाद की तीखी आलोचना करता है. परिवर्तन के लिए वर्गसंघर्ष को अवश्यंभावी मानते हुए उसमें सर्वहारावर्ग की जीत की ओर संकेत करता है. दावा करता है कि पूंजीवाद का अंत निश्चित है, वह अपनी ही कमजोरियों का शिकार होकर एक दिन धराशायी हो जाएगा. मार्क्स के इस विश्वास के बावजूद एक स्वाभाविकसा प्रश्न यहां उभरता है कि क्या ‘मार्क्सवाद ’ उसकी मान्यताओं का सहीसही प्रतिनिधित्व करता है. इस प्रकार की बहसें नई नहीं हैं. मार्क्स के जीवनकाल में ये आरंभ हो चुकी थीं. शायद ऐसी ही किसी बहस से तंग आकर अपनी मृत्यु से कुछ दिन पहले मार्क्स ने अपने साले पाल ला॓फर्ग और फ्रांस के चर्चित श्रमिक नेता जूल्स जूडे पर ‘क्रांतिकारी नारों की सौदेबाजी’ तथा उनका श्रमिकों की संगठित शक्ति में अविश्वास होने का आरोप लगाया था. उल्लेखनीय है कि जूडे ने अपने सहयोगियों से पार्लियामेंट हा॓ल से वर्गसंघर्ष की शुरुआत करने का प्रस्ताव रखा था, जिसका उसके साथियों ने जो संसदीय तरीकों में विश्वास रखते थे और मिलजुलकर रास्ता निकालने की नीति के समर्थक थे,जमकर विरोध किया था. इस घटना के बाद कुछ लोगों द्वारा यह आरोप लगाने पर कि जूडे ने जो किया, उसके पीछे मार्क्स की ही प्रेरणा थी, मार्क्स ने अपनी प्रतिक्रिया ऐंगल्स को संबोधित एक पत्र में व्यक्त की थी. उसने लिखा था कि

‘‘यदि यही मार्क्सवाद है तो मैं मार्क्सवादी नहीं हूं.’’

इस तरह मार्क्स के जीवनकाल में ही उसके विचारों के आधार पर समर्थकों के दो दल बन चुके थे. इनमें से एक वर्ग मार्क्स की उपभोक्ता सामग्री, उत्पादन, पूंजी, श्रम आदि को लेकर तर्कसम्मत गवेषणासामथ्र्य का प्रशंसक था, जिसके आधार पर उसने ‘दि कैपीटल’ नामक ग्रंथ की रचना की थी. यह पुस्तक साम्यवादी राज्य की अभिकल्पना प्रस्तुत करती थी. मार्क्स के प्रशंसकों का दूसरा वर्ग ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ के साथ गहराई से जुड़ा था और मानता था कि समाजवाद की स्थापना के लिए क्रांति अपरिहार्य है. उसके अलावा परिवर्तन का कोई दूसरा रास्ता नहीं है. मार्क्स की मृत्यु के छह वर्ष उपरांत ऐंगल्स ने ‘दूसरा इंटरनेशनल’ की स्थापना की तो उसने भी राजनीतिक प्रतिरोध की नीति को अपनाया था. ‘दूसरा इंटरनेशनल’ को मार्क्स के सहयोग से स्थापित ‘प्रथम इंटरनेशनल’ की अपेक्षा अधिक सफलता प्राप्त हुई थी. रूस में साम्यवादी क्रांति के बीजतत्व ‘दूसरा इंटरनेशनल’ तथा प्रथम विश्वयुद्ध की असंगतियों से उपजे असंतोष का ही परिणाम थे. लेनिन ने स्वयं को मार्क्स के दर्शन और राजनीतिक चिंतन का असली उत्तराधिकारी घोषित करते हुए रूस में बोल्शेविक क्रांति की नींव रखी. दरअसल लेनिन की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं बड़ी थीं. उसने मार्क्स से उतना ही ग्रहण किया था, जितना उसको अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए आवश्यक लगता था. मार्क्स का साम्यवाद सर्वहारा क्रांति से आगे की अवस्था थी. मगर रूस में बोल्शेविक क्रांति पहले चरण पर ही ठहर चुकी थी. बजाय इसके कि मार्क्स के विचारों पर पूरी तरह अमल करते हुए पूर्ण साम्यवाद की स्थापना के प्रयास किए जाएं, रूसी सरकार ने खुद को मारक हथियारों की दौड़ में शामिल कर लिया था. सर्वहारा कल्याण के अनुकूल वैकल्पिक प्रौद्योगिकी की खोज और उसके आधार पर साम्यवाद की स्थापना की ओर किसी का ध्यान ही नहीं था. इससे वहां के नागरिकों के मन में असंतोष पनपा जो अंततः सोवियत संघ के बिखराव का कारण बना. फिर भी यदि करीब अस्सी वर्ष तक रूस में साम्यवाद बना रहा तो इसके पीछे चेखव, गोर्की, दोस्तोयवस्की, अलेक्जांद्र पुश्किन, इवान तुर्गनेव जैसे महान लेखकों का हाथ था, जिसने उस व्यवस्था का एक रूमानी सपना अपने समाज को दिखाया था, जिसकी वास्तविक स्थापना के लिए रूसी समाज दशकों तक प्रतीक्षा करता रहा.

मार्क्स का मानना था कि साम्यवादी क्रांति विकसित औद्योगिक समाजों में ही सफल होगी. फ्रांस, जर्मनी, इंग्लेंड जैसे देशों को जहां औद्योगिक क्रांति फैल चुकी थी उसने साम्यवादी क्रांति के लिए सर्वाधिक उपयुक्त बताया था. उसका मानना था कि विकसित समाजों में औद्योगिकीकरण के कारण समाज में आर्थिक असमानताओं में वृद्धि होती जाएगी, जो सर्वहारावर्ग को अपनी स्थिति में परिवर्तन के लिए एकजुट होने तथा उत्पीड़क पूंजीपतियों के विरुद्ध संघर्ष छेड़ने की प्रेरणा देगी. इससे भिन्न व्लादिमिर लेनिन का विचार था कि साम्राज्यवादी शोषण तथा अनियोजित एवं असमान आर्थिक विकास के चलते सर्वहारा क्रांति के लिए पिछड़े देशों में अधिक संभावनाएं हैं. उसका मानना था कि पूंजीवाद जनित उत्पीड़क स्थितियों तथा आर्थिक असमानता का यह दबाव अपेक्षाकृत छोटे और पिछड़े समाजों में सर्वहारा क्रांति की अधिक संभावना पैदा करेगा. वहीं से क्रांति की हवा विकसित देशों की ओर बहेगी, जहां का समाज समाजवाद की स्थापना के तैयार है, तदनंतर वह रूस की ओर बढ़ेगी. ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ के रूसी संस्करण की भूमिका में भी मार्क्स ने कुछ ऐसी ही संभावना व्यक्त की थी. इस संभावना पर विचार करते हुए कि सार्वजनिक भूस्वामित्व का अभ्यस्त रूसी समाज क्या साम्यवाद के ऊंचे आदर्शों को अपनाने के आसानी से तैयार होगा, उसने लिखा था कि संभावना यही है कि यदि रूसी क्रांति पश्चिम में सर्वहारा क्रांति के लिए प्रेरणा बनती है तो भूमि पर सार्वजनिक अधिकार का मुद्दा साम्यवाद के विकास का आधारभूत सिद्धांत सिद्ध होगा, इसलिए कि वह साम्यवाद का ही एक रूप है.

मार्क्स का यह विचार कि रूस पश्चिम की साम्यवादी क्रांति का प्रेरणास्रोत बन सकता है, लेनिन और उसके सहयोगी ट्राटस्की के चिंतनकर्म का आधार बना. ट्राटस्की और उसके सहयोगी इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि पश्चिम में साम्यवादी क्रांति की असफलता रूसी क्रांति और कालांतर में पश्चिमी देशों में सर्वहारा क्रांति को प्रेरित करेगी और इस तरह रूस वैश्विक सर्वहारा क्रांति का सूत्रधार बनेगा. इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए स्टालिन ने ‘एक देशीय समाजवाद’ की परिकल्पना से छलांग लगाकर विश्वव्यापी सर्वहारा क्रांति के लिए संघर्ष छेड़ने का आवाह्न किया था. स्टालिन का यह सोच 1930 में लाखों सर्वहारा मजूदरों की मौत का कारण बना, जिसके कारण स्टालिन के विरुद्ध जनाक्रोश फैला. महान रूसी लेखक सोल्झेनित्सिन ने जब स्टालिन के शासनकाल में चलने वाले कारावास शिविरों की अमानवीय स्थितियों का बयान अपने उपन्यास ‘दि गुलाग आर्किपैलेगो’ में किया तो उनको रूसी शासकों की ओर से तरहतरह की प्रताड़नाएं दी गईं. इस उपन्यास के लिए सोल्झेनित्सिन को निर्वासन की सजा भी भुगतनी पड़ी. स्टालिन की मृत्यु के बाद रूस की बागडोर जब निकिता ख्रुश्चेव के हाथों में आई तो उसने स्टालिनवाद को विकार मानते हुए, पूरी तरह नकार दिया. सोल्झेनित्सिन का निर्वासन भी समाप्त हुआ. इस तरह उस रक्तरंजित युग का अंत हुआ, जिसमें स्टालिन के नेतृत्व में साम्यवाद अधिनायकवाद का रूप ले चुका था,

रूस की भांति चीन भी कृषिआधारित अर्थव्यवस्था पर निर्भर था. वहां साम्यवादी क्रांति का अलख जगाने वाला माओ जि दांग था. ‘चीनी साम्यवादी पार्टी’ के स्थापक चेन दुजियु तथा दझाओ के साथ मिलकर उसने चीन में साम्यवादी क्रांति के पक्ष में माहौल बनाने के लिए लंबा संघर्ष किया था. वस्तुतः 1925 तक मार्क्सवादी चीनी नेता मानते आ रहे थे कि शहरी मजदूर ऐतिहासिक द्वंद्ववाद की भावना को समझकर अपने वर्गीय हितों के लिए आसानी से संगठित हो सकते हैं. इसलिए उनकी वर्गचेतना ही चीन में साम्यवादी क्रांति का सूत्रधार बनेगी. माओ किसान का बेटा था. साम्यवादी पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने से पहले वह छह महीने तक एक क्रांतिकारी संगठन में काम कर चुका था. उसके बाद मार्क्सवाद के अध्ययन के लिए वह उससे अलग हो गया. बीजिंग में अध्ययन के दौरान उसकी भेंट ली दझाओ और चेन दुजियु से हुई. तीनों क्रांति के समर्थक थे तथा लक्ष्यप्राप्ति के लिए हिंसा का सहारा लेने से भी उन्हें परहेज नहीं था.

साम्यवादी क्रांति के लिए संघर्ष करते हुए माओ इस नतीजे पर पहुंचा कि क्रांति की सफलता के लिए शहरी मजदूरों के बजाय किसानों पर अधिक विश्वास करना चाहिए. इस विचार के लिए माओ को अनेक नेताओं और बुद्धिजीवियों की आलोचना का पात्र बनना पड़ा. परंतु आलोचनाओं से हतोत्साहित हुए बिना माओ किसानों को साथ लेकर माक्र्सवादी क्रांति की सफलता के लिए संघर्ष करता रहा. चीन के गांवों में विद्रोही किसानों को एकजुट करते हुए उसने चीनी सोवियत रिपब्लिक की नींव रखी. उसकी लालसेना ने चियांग केई शेक के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी सेना पर हमले आरंभ कर दिए. राष्ट्रवादी सेना की ताकत बड़ी थी. उसको जापान जैसे पड़ोसी देशों का समर्थन भी प्राप्त था. माओ ने छापामार युद्ध की शैली को अपनाया, जिसमें लालसेना को भारी सफलता मिली. बढ़ी हुई ताकत से वह जापानी मदद से लैस राष्ट्रवादी सेना को पराजित करने में सफल रहा. इस जीत ने उसको चीनी मजदूरों और किसानों का निर्विवाद नेता बना दिया. 1931 में उसे चीन की साम्यवादी पार्टी का नेता चुन लिया गया, इस पद पर वह अगले 45 वर्षांे तक बना रहा. अपने उग्र भाषणों से माओ ने चीनी जनता का दिल जीतने में सफलता प्राप्त की. धीरेधीरे उसकी ताकत बढ़ती गई. एक दिन ऐसा आया जब उसकी ख्याति चीन की सरहदों को पार कर सोवियत संघ पर छाने लगी. सोवियत संघ ने उसके आगे मदद का प्रस्ताव रखा. उस पेशकश को ठुकराते हुए वह अपने ही दम पर मुक्तिसंघर्ष को आगे बढ़ाता रहा.

अंततः 1949 में लंबे गृहयुद्ध के बाद माओ के नेतृत्व में चीन में साम्यवादी सेना को जीत हासिल हुई. उस समय रूस की ओर से नई सरकार को समर्थन के साथसाथ सहयोग की पेशकश गई. परिणाम की चिंता किए बिना ही माओ ने सोवियत संघ पर आरोप लगाया कि वहां साम्यवादियों के बीच कुछ ‘बुर्जुआ’ घुसपैठ कर चुके हैं. इस आलोचना से नाराज होकर सोवियत संघ ने 1960 में चीन को दी जाने वाली तकनीकी मदद से हाथ खींच लिया. उससे घबराए बिना माओ अपने दम पर चीन को समृद्धि की ओर आगे बढ़ाता रहा. उसकी दृढ़ आस्था थी कि तीसरे देशों में जहां औद्योगिक क्रांति अभी तक सफल नहीं हो पाई है, वहां कृषक संघों की मदद से सर्वहारा क्रांति को सफल बनाया जा सकता है. माओ की सफलता से मार्क्सवाद और लेनिनवाद की कमजोरियों को उजाकर किया था. यहां बताना प्रासंगिक होगा कि लेनिन के नेतृत्व में सोवियत संघ की सरकार द्वारा पूंजीवाद के विरुद्ध संघर्ष का नारा देते हुए जनाधिकारों की व्यापक उपेक्षा की गई थी. इसकी भरपाई के लिए माओ ने चीन के अतीत और संस्कृति का सहारा लिया. परिणामस्वरूप वह चीनी समाज को एकता के सूत्र में बांधे रखने में सफल हुआ. उसके विचारों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माओवाद के नाम से जाना जाता है, जो साम्यवाद की ही सहोदर विचारधारा है.

इकीसवीं शताब्दी में मार्क्सवाद की प्रासंगिकता

कुछ देर के लिए मार्क्स को एक सरल रेखा मान लिया जाए तो पूरी दुनिया, उसके दोनों तरफ बंटी मिलेगी. एक दिशा में मार्क्स के समर्थक होंगे, जिनके लिए मार्क्स का एकएक शब्द पवित्र और बौद्धिक चेतना की धरोहर है. वे मार्क्स के नाम पर, उसके विचारों के लिए अपने खून का एकएक कतरा बलिदान करने को तत्पर होंगे. दूसरी ओर मार्क्स के आलोचक हैं. जिनके लिए मार्क्स एक दुर्भावना, एक जिद, एक नासमझीभरा, अड़ियल और प्रतिगामी विचार है. हाल ही में बीबीसी रेडियो सेवा द्वारा ब्रिटेन के सर्वाधिक सम्मानित और प्रतिभाशाली दार्शनिकों का सर्वे कराया गया. उस सर्वे में साम्यवादी मार्क्स ख्याति के मामले में सबसे ऊंचे पायदान पर था. दार्शनिक के रूप में दुनियाभर में पहचाने वाले नाम यथा प्लेटो, अरस्तु, कांट, डेविड ह्यूम, देकार्त, जान ला॓क जैसे विचारक ख्याति के मामले मे उसके आसपास भी नहीं ठहरते. हीगेल मार्क्स का गुरु, जिससे उसने भौतिक द्वंद्ववाद का सिद्धांत ग्रहण किया था, आश्चर्यजनकरूप से इस सूची में कहीं भी नहीं है. और तो और मार्क्स के समकालीन प्रतिभाशाली दार्शनिकों में से एक भी इस सूची में स्थान पाने में असमर्थ रहा है. आखिर ऐसी कौनसी बात है, जो मार्क्स को अपने समकालीन और पूर्ववर्ती विचारकों से अलग सिद्ध करती है. मार्क्स ने एक साथ धर्म, दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्र, इतिहास की गवेषणाएं की हैं. मगर मार्क्स खुद क्या है? दार्शनिक अथवा अर्थशास्त्री? ये सामान्य जिज्ञासा से जुड़े कुछ जरूरी प्रश्न हैं. हालांकि बहुतसे लोगों के लिए मार्क्स एक खलनायक भी है, जो अपने विचारानुकूल समाज के गठन के लिए खुल्लमखुल्ला हिंसा का सहारा लेता है. मगर वे भूल जाते हैं कि सामाजिक परिवर्तन के लिए मार्क्स द्वारा हिंसा का समर्थन उस तरह से नहीं है, जैसे कि पहले राजामहाराजा अपनी सनक में पड़ोसी राजा पर हमला बोल देते थे. मार्क्स की हिंसा मर्यादित है. वह समाज के बड़े वर्ग के कल्याण के लिए विशेष परिस्थितियों में जब बाकी सभी उपाय असफल सिद्ध हो चुके हों, केवल बुर्जुआ वर्ग को सत्ताच्युत करने के लिए हिंसा का समर्थन करना पसंद करता है. दूसरे पूंजीवादी चंगुल से मुक्ति के लिए हिंसा का समर्थन पेरिस कम्यून की असफलता से पहले की घटना है. पेरिस कम्यून की असफलता के बाद उसके विचारों में बदलाव आया था.

मार्क्स अपने समय की सबसे विवादित हस्तियों में से एक है. उसका रचनात्मक अवदान केवल अकादमिक चिंतनलेखन तक सीमित नहीं था. उसके लेखन में संघर्ष की लौ थी. हालांकि श्रमिकों के पक्ष में आवाज उठाने वाला वह पहला दार्शनिकलेखक नहीं था. उससे पहले रूसो जनसामान्य का सबसे बड़ा पैरोकार बनकर उभरा था. राबर्ट ओवेन, विलियम किंग, जोसेफ ब्लेंक आदि दार्शनिक चिंतक भी पूंजीवादी शोषण से उबरने के लिए श्रमिकों मजदूरों को और अधिक सुविधा दिए जाने की मांग कर चुके थे. इसी श्रेणी में चार्टिस्ट आंदोलनकारियों का नाम भी लिया जा सकता है, जिन्होंने जनाधिकारिता के लिए बड़े पैमाने पर वर्षों तक चलने वाला संघर्ष किया था. जनसाधारण के लिए लोकतांत्रिक अधिकारों के पक्ष में 1838 में एफ. ओ’क्रोनर एवं विलियम ला॓वेट के नेतृत्व में चले वर्षों लंबे संघर्ष में सैकड़ों चार्टिस्ट आंदोलनकर्मियों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया था. हजारों को निष्कासन की सजा मिली थी.

स्मरणीय है कि सोहलवीं शताब्दी में आरंभ हुए प्रौद्योगिकीकरण की रफ्तार उनीसवीं शताब्दी आतेआते अत्यधिक तीव्र हो चुकी थी. परंपरागत शिल्पकारों पर मशीनीकरण की मार तथा उनके संरक्षण के लिए सरकार की ओर से कोई योजना न होने के कारण ब्रिटेन समेत प्रायः सभी यूरोपीय देशों में बेरोजगारी का संकट बढ़ा था. गांवों में स्थिति और भी शोचनीय थी. क्योंकि कारखानों में बने सस्ते माल की आमद से स्थानीय उद्योगधंधे पूरी तरह चौपट हो चुके थे. भीषण गरीबी के कारण मातापिता अपने बच्चों को उन नारकीय परिस्थितियों में काम पर भेजने के लिए विवश थे, जहां सामान्य स्थितियों काम करने की उनकी हिम्मत भी जवाब दे जाती थी. बाकी मजदूरों, कामगारों यहां तक कि साधारण नौकरीपेशा लोगों की हालत भी संतोषजनक नहीं थी. काम के अत्यधिक बोझ के कारण वे सदैव तनाव में रहते थे. इससे उनकी कार्यकुशलता नकारात्मक रूप से प्रभावित हुई थी. सरकार और प्रशासन पूंजीपतियों के सतत दबाव में रहते थे, इसलिए उनसे मनचाहे फैसले करा लेना, स्थानीय पूंजीपतियों के लिए बहुत आसान था. पूंजी का असमान वितरण, भीषण बेरोजगारी, नगरों में पर्यावरणसंबंधी लगातार बढ़ती समस्याएं आदि अनेक ऐसे कारण थे, जिन्होंने विचारकों के एक बड़े वर्ग को उद्वेलित किया था. पूंजीवाद प्रेरित औद्योगिकीकरण के विरोध में अनेक आंदोलन भी हो चुके थे, जिनमें लाखों श्रमिकों ने सहभागिता की थी. जिन्हें समाज के लाखों श्रमिकों का समर्थन मिला था.

पूंजीवादी शोषण से उबरने के लिए विद्वानों के अलगअलग सुझाव थे. विचारकों का एक दल सहकारिता के माध्यम से पूंजीवादी उत्पीड़न से उबरने का सपना देख रहा था. इस वर्ग में विलियिम किंग, राबर्ट ओवेन फ्यूरियर जैसे विचारक थे. साहित्यिक प्रेरणाएं भी परिवर्तनकारी आंदोलनों के साथ थीं. उनमें सबसे अग्रणी थे, उस समय के महान उपन्यासकार चाल्र्स डिकेन्स, जिन्होंने अपने उपन्यास ‘दि क्रिसमस कैरोल’ में ब्रिटिश समाज में पनप चुके सूदखोर वर्ग का सशक्त चित्रण किया था. रिकार्डो और एडम स्मिथ आदि अर्थशास्त्रियों का मानना था कि सिर्फ औद्योगिक समृद्धि द्वारा गरीबी से लड़ा जा सकता है. सरकार को चाहिए कि उत्पादन और विपणन से जुड़े मामले पूंजीपतियों और उद्यमियों के हवाले कर दे, ताकि वे परिस्थितियों के अनुकूल निर्णय लेने में सक्षम हों.

संगठित आंदोलन को मुक्ति का आधार मानने वाले विचारकों के भी दो अलगअलग वर्ग थे. उनमें से एक धड़ा सहकारिता आंदोलन के समर्थक विद्वानों एवं कार्यकर्ताओं का था, जो सफलता के लिए सहयोग को स्पर्धा से अधिक कारगर और उपयोगी मानते थे. दूसरे धड़े के विचारक मानते थे कि पूंजीवाद से मुक्ति के लिए पूंजीपतियों को कमजोर करना जरूरी है. यह केवल संगठित ताकत के बल पर संभव है. इसके लिए हिंसा का सहारा लेने में भी उन्हें संकोच नहीं था. प्रूधों, मार्क्स, ब्लेंक, बकुनाइन, ऐंगल्स आदि विद्वान पूंजीवाद के उग्र विरोधियों में आते थे.

उल्लेखनीय है कि मार्क्स से पहले ही हीगेल द्वंद्ववाद की सार्थकता को स्थापित कर चुका था. विचारक उसके विचारों की भांतिभांति से व्याख्या कर रहे थे. बल्कि उसके विचारों की व्याख्या के लिए ही दार्शनिकों के अलगअलग गुट बन चुके थे. ऐसे में मार्क्स ने द्वंद्ववाद की विशुद्ध भौतिकवादी दृष्टिकोण से विवेचना कर, सत और असत् का भौतिकीकरण कर दिया. मार्क्स के दर्शन में श्रमिक वर्ग ‘सत्’ का पर्याय था, जो अपने श्रमकौशल के आधार पर उत्पादन कार्य में प्रमुख भूमिका निभाता है. जो सही मायने में उत्पादक है. पूंजीपति वर्ग ‘असत्’ का प्रतीक है, जो दूसरों के श्रम को अपना बताकर मुनाफे का अधिकांश हिस्सा स्वयं हड़प जाता है, जिससे धनी लगातार धनवान तथा गरीब लगातार अधिक गरीब होता जाता है. परिणामस्वरूप समाज में अस्थिरता और असमानता बढ़ती है.

समाज में व्याप्त आर्थिक वैषम्य से निपटने के लिए भी विद्वानों के अलगअलग विचार थे. एक वर्ग का मानना था कि समाज में आर्थिक समानता स्थापित करना सरकार का दायित्व है, अतः सरकार को श्रमिकों के हितों की सुरक्षा हेतु समुचित कानून बनाने चाहिए. दूसरे वर्ग का विश्वास था कि पूंजीवाद का सामना केवल संगठित शक्ति द्वारा ही संभव है. इस वर्ग का सुझाव था कि श्रमिकों, छोटे उद्यमियों और व्यवसायियों को अपनेअपने संगठन बनाकर सहकार के माध्यम से पूंजीवाद के विरुद्ध सार्थक समर छेड़ा जा सकता है. इनसे अलग एक वर्ग कतिपय उदारपंथी विचारकों का था, उनका मानना था कि मनुष्यता के नाते पूंजीपति को स्वयं आगे आकर समाज के बड़े वर्ग के पक्ष में अतिरिक्त संपत्ति का परित्याग करना चाहिए. बहुत बाद में गांधी जी ने इसी भावना को ‘ट्रस्टीशिप’ के सिद्धांत के रूप में प्रकट किया था.

मार्क्स का विचार था कि स्वार्थी पूंजीपतियों को मनाना, उन्हें नैतिक जीवन जीने के लिए प्रेरित करना आसान नहीं है. ऐसे में शोषण से मुक्ति का एक ही उपाय है कि श्रमिकवर्ग संगठित होकर स्वार्थी पूंजीपतियों के विरुद्ध संघर्ष की घोषणा कर दे. जिस दौर में मार्क्स यह घोषणा कर रहा था, वही दौर अस्मितावादी आंदोलन के उदय का भी था. फ्रांस में लोकतंत्र की स्थापना हो चुकी थी. उसकी देखादेखी यूरोप के अन्य देशों में भी लोकतंत्र की मांग जोर पकड़ रही थी. ऐसे में मार्क्स का दर्शन लोगों को पे्ररित करने के लिए पर्याप्त था. अतएव जहांजहां मशीनीकरण जोर पकड़ चुका था, जहांजहां सामंत और जागीरदारी प्रथा शेष थी, वहां पर श्रमिक वर्ग माक्र्सवादी विचारधारा के अनुरूप संगठित होता चला गया. दूसरी ओर अमेरिका और यूरोप के दिन देशों में पूंजीवाद अपनी जड़ जमाए था, वहां मार्क्सवादी विचारधारा के ठीक विपरीत प्रतिक्रिया हुई. मीडिया और सरकार के सहयोग से वहां मार्क्स के कटुआलोचकों का वर्ग पनपा. मगर इस द्वंद्वात्मकता में मार्क्स की चर्चा दोनों ही पक्षों में होती रही.

मार्क्स के विचारों की वर्तमान संदर्भों में क्या प्रासंगिकता है! उसको अर्थशास्त्री माना जाए या दार्शनिक? या फिर राजनीतिक चिंतक? मार्क्स की ख्याति एक दार्शनिक के रूप में भी रही है. हालांकि उसका दर्शन के क्षेत्र में विशेष मौलिक योगदान बहुत कम है. धर्म को लेकर आलोचना फायरबाख और बायर से प्रभावित है. द्वंद्ववाद पर हीगेल उससे पहले ही गंभीर चिंतन कर चुका था, और वह दर्शनशास्त्र की प्रामाणिक धारा के रूप में मान्य हो चुका था. तत्वमीमांसा से वह कोसों दूर था. तो फिर वह कौनसी बात है, जो मार्क्स को जनसाधारण एवं बुद्धिजीवियों के बीच एकाएक जनता का नायक बना देती है. मार्क्स मूल रूप से अर्थशास्त्री था. बल्कि कहना चाहिए कि एडम स्मिथ के बाद मार्क्स ही वह अर्थशास्त्री है, जिसने पूरी दुनिया को प्रभावित करने में सफलता प्राप्त की थी. सच तो यह है कि मार्क्स का अर्थचिंतन एडम स्मिथ के मुक्त अर्थतंत्र को उसका खरा जवाब था. एडम स्मिथ ने अपने सिद्धांत ‘लेजेज फेयर’ द्वारा सरकारों से पूंजीपतियों के रास्ते से हट जाने का आवाह्न किया था. कहा था कि उद्योगों से सरकारी नियंत्रण हटाओ. पूंजीपतियों को निर्बंध ‘अपना काम करने दो.’

एडम स्मिथ की खुली अर्थव्यवस्था के विचार की आलोचना करते हुए मार्क्स ने कहा था कि औद्योगिक उदारता श्रमशोषण के दम पर ही संभव है. नियंत्रणहीन पूंजीवाद को उसने पूंजी का अराजक खेल माना, जिसमें उद्योगपतियों की भले चांदी कटे, मगर मजदूरों का शोषण बढ़ता ही जाता है. स्पर्धा में बने रहने के लिए पूंजीपति वर्ग मजदूरों की मजदूरी कम करता जाता है. कम वृत्तिका और महंगाई मिलकर मजदूरों और कामगारों के जीवन को उत्तरोत्तर कठिन बनाती है. नई प्रौद्योगिकी सिर्फ अमीरों का बैंक बैलेंस बढ़ाती है. और मजदूर की गरीबी, बेबसी तथा दुर्दशा. स्मिथ के कथन कि ‘उन्हें अपना काम करने दो’ के बदले में मार्क्स का कहना था कि ‘श्रमिकों को उनका हक दो’. हालांकि वह यह भी मानता था कि स्वार्थ में डूबे पूंजीपति श्रमिकों को उनका अधिकार आसानी से देने को तैयार नहीं होंगे. इसलिए वह संगठित विरोध का हिमायती था. उसने आवाह्न किया था कि शोषणकारी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के लिए दुनिया के मजदूरो एक हो जाओ. तुम्हारे पास हुनर है. काम करने का सामथ्र्य, इच्छाशक्ति और लग्न है. साथ में वर्षों का अनुभव भी. अपनी ताकत, संगठन की ताकत, अपने कौशल और क्षमताओं को पहचानो, एकजुट होकर उत्पादनव्यवस्था को अपने हाथ में ले लो. कौटिक हाथ मिलकर अपने भविष्य का स्वयं निर्माण करो. उत्पादन का माध्यम बनने से, दूसरों के लिए पसीना बहाने से अच्छा है कि स्वयं उत्पादक बनो. आगे बढ़ो. तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है, मगर जीतने के लिए पूरी दुनिया पड़ी है. कफ और बलगम भरी छाती से निकले मार्क्स के ये भरभराते शब्द विश्वभर के कोटिक श्रमिकों के कंठ से निकली आवाज बन गए. ईसाइयों ने इन शब्दों को पवित्र बाइबिल की वाणी माना, हिंदु ने गीता की अमर सूक्तियां. मुस्लिमों इन्हें कुरआन की महान आदेश मानकर संगठित होने लगे. मार्क्सवाद जनमन की भाषा बन गया.

इकीसवीं शताब्दी में मार्क्सवाद की प्रासंगिकता क्या है? बाजारवाद के इस दौर में जब पूंजीवाद बेलगाम और करीबकरीब अराजक हो चुका है, मार्क्स के विचार कितनी दूर तक हमारा साथ दे सकते हैं? इस बारे में परस्परविरोधी मत सुने जा सकते हैं. मार्क्सवाद के आलोचकों ने बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ही मान लिया था कि उसका पतन अवश्यंभावी है. मार्क्सवाद के सबसे बड़े गढ़ सोवियत संघ का बिखरना उन्हें अपने निष्कर्ष पर मुहर लगने जैसा प्रतीत होता है. उन्होंने बारबार कहा था, बल्कि आज भी यही दावा करते हैं कि मार्क्सवाद के दिन लद चुके हैं. समाजवाद का सपना बीते जमाने की बात हुई. उनके अनुसार यह जानकर भी जो उससे उम्मीद लगाए बैठे हैं, वे स्वप्नदृष्टा, कल्पनाजीवी हैं. उन भोले बच्चों की तरह हैं जिनकी दुनिया लालीपाप में समाई होती है. पर क्या संभव है किसी विचार का यूं ही एकाएक मर जाना?

यदि कोई पेरिस कम्यून की असफलता या सोवियत संघ के बिखरते जाने जैसी घटनाओं से ही उस विचार को अप्रासंगिक और समयबाह्यः मान बैठे और पूंजीवाद की सार्वकालिक जीत का दावा करने लगे तो यह उसकी नादानी ही कही जाएगी. इसलिए कि साम्यवाद नैतिकता और आदर्शवादी पहचान से युक्त एक अवस्था है, जिसकी संकल्पना लोकगीतों, धार्मिकसामाजिक आख्यानों, कविलेखकोंसाहित्यकारों के मानवतावादी सोच से प्रेरणा पाती है. पेरिस कम्यून में श्रमिक संगठनों और नागरिक सेना की जीत के फलस्वरूप जो अल्पकालिक सरकार बनी थी, उसके अपने मतभेद और आपसी अविश्वास थे. साथ में क्रांति का श्रेय लेने की, दूसरों पर छा जाने की आदिम लालसा भी थी. जो एक तरह से प्राचीन साम्राज्यवाद, सामंतवाद, कुलीनतावाद, ब्राह्मणवाद, यहां तक कि पूंजीवादी वर्चस्व का पर्याय थी.

क्रांति के जुनून में उन्होंने सबकुछ उलटपलट तो दिया था, जोशजोश में जनोन्मुखी व्यवस्था कायम करने की शुरुआती कोशिश भी की. किंतु आपसी मतभेद और तनाव के कारण वे ऐसा कोई तंत्र विकसित करने में असफल सिद्ध हुए थे, जो साम्यवादी मान्यताओं के अनुरूप एक दीर्घगामी व्यवस्था के गठन में सहायक बनता. पेरिसक्रांति के दो प्रमुख सूत्रधारों, मार्क्स और बेकुनिन के मतभेद तो जगजाहिर हैं ही. मार्क्स को लगता था कि क्रांति की सफलता के बाद बेकुनिन अपनी राजनीतिक ताकत को बढ़ाना चाहता है. जबकि बेकुनिन का मानना था कि मार्क्स की बढ़ती हुई भूमिका पेरिस में यहूदीवाद को बढ़ावा देगी. इसी प्रकार के मतभेदों के चलते साम्राज्यवादीपूंजीवादी ताकतों के मनसूबों को भांपने में असफल रहे थे. परिणाम यह हुआ था कम्यून पर फिर सशस्त्र सेनाओं का हमला हुआ और राजशाही दुबारी सत्ता पर काबिज होने में कामयाब हुई. व्लादिमिर लेनिन के पेरिस कम्यून की असफलता के कारणों को चिह्नित किया है. एक समाचारपत्र में लिए लिखे गए लेख ‘पेरिस कम्यून का पाठ’ में उसने लिखा था कि कम्यून के नेताओं की

केवल दो बड़ी गलतियों ने उस दमदमाती ऐतिहासिक विजय के लाभों पर पानी फेर दिया. सच तो यह है कि सर्वहारा वर्ग के नेता आधे रास्ते पर ही आराम फरमाने लगे थे. अवैद्य कब्जाधारकों की संपत्ति का अधिग्रहण करके न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के करने के बजाय वे कुछ लोकप्रिय राष्ट्रीय मुद्दों के पक्ष में माहौल बनाने का प्रयास करते रहे. बैंक और ऐसे ही दूसरे अन्य संस्थानों का अधिग्रहण, जो बहुत जरूरी था, नहीं किया गया. सर्वहारा वर्ग के शासकों की दूसरी बड़ी भूल उनकी अतिशय दयालुता थी, जिसके कारण अपने दुश्मनों को कुचलने के बजाय वे उनके साथ दयालुतापूर्ण व्यवहार कर, उनके हृदयपरिवर्तन की उम्मीद करते रहे. जनक्रांति में सीधी सैन्य कार्रवाही की उपयोगिता को उन्होंने बहुत कम करके आंका था. बजाय इसके कि पेरिस के पूर्वशासकों से अपनी सुरक्षा के ठोस और पुख्ता इंतजाम करते, उन्होंने उन्हें आराम से दुबारा ताकत बटोरने का पूरापूरा अवसर दिया, जो मई महीने के भीषण खूनखराबे का कारण बना.’

 

कुछ ऐसा ही रूस में हुआ था. पेरिस क्रांति की असफलता ने मार्क्स को अपनी मान्यताओं पर पुनर्विचार का अवसर दिया था. सशस्त्र विद्रोह से उसका विश्वास घटा था. राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक अधिनायकवाद से दीर्घकालिक मुक्ति के नए रास्तों की खोज का सुफल ‘दि कैपीटल’ के रूप में सामने आया था, जिसे उसने इतिहास, दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्र, विज्ञान आदि गहन अध्ययन के बाद लिखा था. पुस्तक में उसने वर्गहीन समाज की परिकल्पना की थी. स्मरणीय है कि पेरिस कम्यून को मार्क्स ने ‘सर्वहारा का अधिनायकवाद’ की संज्ञा दी थी. वह उसको साम्यवाद की स्थापना की दिशा में पहला चरण मानता था. साम्यवाद की परिकल्पना इस सोच पर आधारित थी कि द्वंद्व की स्थिति विपरीत शक्तियों में ही संभव है. उनसे बचाव का एक ही उपाय है कि समाज में शक्तिकेंद्र ही न रहें. इसलिए श्रमिक वर्ग सत्ता को हाथ में ले. मगर सत्ता हस्तांतरण से ही उसका काम पूरा नहीं हो जाता. उसके लिए आवश्यक है कि समाज में वर्गहीनता की स्थापना के प्रयास भी साथ ही आरंभ कर दिए जाएं. एक समरस समाज की स्थापना, साम्य की स्थापना उनका ध्येय हो, ऐसा उसने कहा था.

रूस में जो हुआ, वह क्रांति का पहला चरण था. वहां लेनिन के नेतृत्व में जारशाही के विरुद्ध संघर्ष का आवाहन किया गया था. जिसमें मजदूर वर्गों को जीत मिली और जारशाही के स्थान पर श्रमिकों की सरकार अस्तित्व में आई. अपने दायित्व को समझते उसने समाज के पुननिर्माण पर जोर दिया. उसका सुखद परिणाम भी मिला. क्रांति के समय रूस की हालत भारत से कहीं बदतर थी. देखते ही देखते वहां विकास का ऐसा दौर चला कि पचाससाठ वर्षों में उसने स्वयं को विश्व की दूसरी महाशक्ति के रूप में स्थापित कर लिया. बस यही उसकी विड़बना थी. क्रांति का पहला चरण पार कर सत्ता पर अधिकार जमा लेने के बाद उसकी कोशिश द्वंद्व की समस्त संभावनाओं को मेटने के लिए जहां वर्गहीन समाज की स्थापना करना था, वहीं उसने खुद को द्वंद्व में झोंकना प्रारंभ कर दिया. सोवियत सरकार असल में तलवार से तराजू का काम लेना चाहती थी. घोषित रूप उसका लक्ष्य साम्यवाद था, मगर असल में थी विरोधियों को परास्त कर, नंबर एक पर बने रहने की कामना. वह दुहाई न्याय की देती थी, मगर अपने नागरिकों के खूनपसीने की कमाई को, हथियारों और अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को विस्तार देने पर खर्च कर रही थी.

इन परिस्थितियों में भी रूस लंबे समय तक साम्यवादी बना रहा तो इसलिए कि मार्क्स ने अपने समर्थक लेखकोंबुद्धिजीवियों का बड़ा वर्ग पैदा किया था, जिनमें गोर्की, चेखव, टालस्टाय, दोस्तोयवस्की आदि महान साहित्यकार सम्मिलित थे. जो साम्यवादी विचारधारा के अनुरूप लगातार सारगर्भित और प्रतिबद्ध लेखन कर रहे थे. इससे वहां के जनमानस में साम्यवाद के प्रति आस्था बनी रही. बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में प्रतिबद्ध साहित्य की चमकदमक खासकर उसमें नए चेहरों की आमद घटती चली गई. वहीं सरकार ने खुद को और भी महत्त्वाकांक्षी बना लिया था. साम्यवादी नीतियों के अनुरूप वर्गहीन समाज की स्थापना पर जोर देने के बजाय, सरकार अपने संसाधन पूंजीवाद के पर्याय बन चुके अमेरिका को परास्त करने पर तुली हुई थी. यह मजदूरों के दम पर बनी सरकार का वैभव प्रेम था. ब्राजील के दर्शनशास्त्री पाउलो फ्रेरा ने बड़े काम की बात कही है. ‘उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र’ में उसने लिखा है कि आमूल परिवर्तन के पहले दौर में, जिसको परिवर्तन की अपरिपक्व अवस्था भी कहते हैं, उत्पीड़ित अवसर मिलते ही वही करता है, जैसा उसने उत्पीड़क को करते हुए देखा है. इस अवस्था में उत्पीड़क और उत्पीड़ित की सिर्फ भूमिकाएं और सिर्फ चेहरे बदलते हैं, स्थितियां नहीं. इसलिए परिवर्तनकामी शक्तियों को, उन शक्तियों को समाज में वास्तविक परिवर्तन की चाहत रखती हैं, प्रारंभिक सफलता के साथ ही रुक नहीं जाना चाहिए. बल्कि आमूल परिवर्तन की कोशिश पहली सफलता के साथ ही आरंभ कर देनी चाहिए. सोवियत संघ के शासकों से भी यही अपेक्षित था कि वे साम्राज्यवादी गतिविधियों में उलझने के बजाय एक नीतिआधारित समाज की स्थापना पर जोर देते. ताकि वर्गहीन समाज की स्थापना संभव हो सके.

रूसी शासक यह भूल चुके थे कि जनता की सोचने की शक्ति भले ही धीमी हो, मगर उसमें छोटे वैचारिक परिवर्तन भी दूरगामी महत्त्व के सिद्ध होते हैं. पूंजीवादी सरकार में हथियारों के निर्माण से लेकर शोध तक का सारा काम पूंजीपति करते हैं. इसके लिए वे श्रमिकों का ऐसे ही शोषण करते हैं, जैसे कि बाकी अन्य उद्योग. लेकिन उनमें काम करने वाला श्रमिक बिना किसी वैचारिक प्रतिबद्धता के, सिर्फ आजीविका की खोज में उनके साथ जुड़ता है. असहमति अथवा असंतुष्टि की अवस्था में वह जब चाहे तब उसको छोड़कर अन्य उद्योग के साथ जुड़ सकता है. कानून उसके इस अधिकार की रक्षा करता है. हालांकि दूसरी जगह भी उसका शोषण होता है, और भौतिक स्थितियां उसके लिए बहुत अधिक बदलती भी नहीं है. तो भी एक उत्पादक को छोड़ आने का जो संतोष है, साथ ही चयन का आनंद और इसके पीछे निहित अस्मिताबोध श्रमिक का अपना और निजी होता है. इससे अधिक वह सामान्यतः अपेक्षा भी नहीं करता. इससे उसका आक्रोश एक सीमा से बाहर नहीं जा पाता.

सोवियत संघ में यद्यपि उपभोग को बढ़ावा देने वाली प्रौद्योगिकी को प्रतिबंधित किया गया था. मगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हथियारों की स्पर्धा और उसमें आगे निकलने की होड़ में वहां की सरकारें राष्ट्रीय आय का बड़े पैमाने पर निवेश कर रही थीं. इस होड़ का नागरिकों के वास्तविक कल्याण से कोई लेनादेना नहीं था. इससे वहां सामाजिक विकास की रफ्तार उतनी नहीं पहुंच पाई थी, जितनी कि साम्यवादी व्यवस्था में अपेक्षित थी. सोवियत नागरिक स्वयं को भावनात्मक रूप से ठगा हुआ महसूस कर रहे थे. इसपर टिप्पणी करते हुए सुविख्यात चिंतक किशन पटनायक ने लिखा था‘आधुनिकतावादी दिमाग, आधुनिक टेक्नालाजी(यंत्रेश्वर) के बारे में इतना ज्यादा अंधविश्वासी है कि उसके विकल्प की संभावनाओं पर सोच नहीं पाता. एक वैकल्पिक यंत्रप्रणाली की तलाश वह कर नहीं सकता. सोवियत रूस में यही हुआ. रूसी कम्युनिस्टों ने कुछ प्रकार की, खासकर उपभोग की टेक्नोलाॅजी को बड़े पैमाने पर प्रतिबंधित किया. लेकिन वैकल्पिक टेक्नोलाॅजी की तलाश के लिए उनका दिमाग तैयार नहीं था. अंततोगत्वा उनके दिमाग पर आधुनिकता का दबाव इतना गहरा हुआ कि रूस साम्यवाद छोड़ने को तैयार हो गया.’

सोवियत संघ में समस्त उत्पादन व्यवस्था श्रमिक संगठनों के और अंततः राज्य के अधीन थी, जिसका उपयोग उनके नेता अपने राजनीतिक मंसूबों को पूरा करने के लिए करते थे. आम मजदूर के लिए कुछ खास नहीं बदला था. उसके लिए शोषणकारी स्थितियों में अपेक्षित सुधार हो ही नहीं पाया था. इसलिए उस व्यवस्था से उनका हताश होना स्वाभाविक ही था. ऊपर से तयशुदा उत्पादन करना मजबूरी. यही कारण है कि वहां श्रमिकों के मन में व्यवस्था के प्रति आक्रोश बढ़ता ही गया. परिणाम सोवियत संघ के विघटन के रूप में सामने आया. बावजूद इसके सोवियत संघ के बिखराव को, मानवाधिकार के पतन के रूप में देखना अनुचित होगा. बस इतना कहा जा सकता है कि सोवियत नेताओं की निजी महत्त्वाकांक्षाओं और अदूरदर्शिता के कारण समाजवाद का प्रयोग वहां उतनी अपेक्षा के साथ सफल न हो सका.

दरअसल मार्क्सवाद की मौत का दावा वे करते हैं जो मानते हैं कि साम्यवाद का उद्भव मार्क्स के जन्म अथवा उसके विवेकीकरण के बाद की घटना है. जबकि ऐसा नहीं है. मार्क्स से पहले भी साम्यवाद था. लोग उपलब्ध सुविधाओं और संसाधनों का मिलजुल कर उपयोग करते थे. स्वयं मार्क्स ने ऐतिहासिक भौतिकवाद की अवधारणा इसी मान्यता के आधार पर प्रस्तुत की है. मार्क्सवाद का अभिप्राय अर्थसत्ता का विकेंद्रीकरण, धर्मसत्ता का विलोपीकरण तथा राजसत्ता का लौकिकीकरण है. ये विचार मार्क्स से ढाई हजार वर्ष पहले जन्मे प्लेटो ने भी व्यक्त किए थे. प्रत्येक धर्म अपना औचित्य सिद्ध करने के लिए इसी प्रकार की लोककल्याणकारी प्रार्थनाओं की अपने विस्तार की सीढी बनाता है. दूसरे शब्दों में मार्क्स के आलोचक वे हैं जो गलत तरीके से संसाधनों पर अधिपत्य जमाए हैं. जो सारा का सारा मुनाफा स्वयं लील जाना चाहते हैं. जो अपनी पूंजी और ताकत के दम पर वर्चस्व बनाए रखना चाहते हैं. जिन्हें दूसरों के श्रमकौशल पर जीने की, परजीवी होने की आदत पड़ चुकी है. मार्क्स के आलोचक वे हैं, जिन्होंने अपनी संपन्नता दूसरों के श्रम पर अर्जित की है. इसके कारण उन देशों के समाज में भारी आर्थिक असमानता है. ऐसे उदाहरण पूंजीवादी देशों में हर जगह हैं.

अमेरिका का ही उदाहरण लें, वहां पूंजीवाद के बाद स्थिति कितनी बिगड़ी है, वह सामने भले ही न आ पाती हो, क्योंकि जनता और बाकी शक्तियों के बीच पुल की भूमिका निभानेवाला मीडिया, पूंजीपतियों का पक्ष लेता है, और उनके हितों के अनुरूप खबरों की मार्केटिंग करता है. जबकि हालात कितने विकट हैं, यह देखकर मन संताप से भर जाता है. बेलगाम पूंजीवाद समाज को सर्वाधिक अमीर और भीषण गरीब लोगों में बांट रहा है, जो अमीर है, वही उत्पादक है. गरीब के श्रम का उपयोग कर वह उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन करता है. गरीब प्राप्त वृत्तिका का बड़ा हिस्सा उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद पर निवेश करता है. मजदूरी के रूप में उसको सिर्फ उतना ही मिल पाता है, जिससे वह अगले लिए काम पर जा सके. कई बार तो प्राप्त वृत्तिका उसकी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी अपर्याप्त सिद्ध होती है.

एक रिपोर्ट के अनुसार 1994 में अमेरिका की 500 प्रमुख कंपनियां उस देश की कुल 92 प्रतिशत आमदनी पर कब्जा जमाए थीं, जबकि विश्वस्तर की 1000 सबसे बड़ी कंपनियों की सालाना आमदनी आठ अरब डालर है, जो दुनिया के कुल लाभ का एक तिहाई है. अमेरिका में ही केवल आधा प्रतिशत सर्वाधिक धनी कंपनियों के अधिकार क्षेत्र में वहां की 50 प्रतिशत संपत्ति आती है. यही नहीं अमीरों की अमीरी निरंतर बड़ती जा रही है. अमेरिका की सबसे धनी एक प्रतिशत जनसंख्या, वहां की राष्ट्रीय आय में 1978 में जहां केवल 17.6 प्रतिशत हिस्सेदारी रखती थी, वह मात्र दस वर्ष अर्थात 1989 में बढ़कर 36.3 प्रतिशत हो चुकी थी. स्मरणीय है कि पश्चिमी समाज में यही वह समय है, जिसे पूंजीवाद का सबसे सुनहरा दौर माना जाता है.

पूंजीवादी अमेरिका में पूंजी का कुछ हाथों में लगातार सिमटते जाना एक राष्ट्रीय समस्या बन चुका है. 2007 में वहां आई भीषण मंदी का खेल हम देख ही चुके हैं, जिसमें पचास से ऊपर भीमकाय बैंक दिवालियेपन का शिकार हुए थे. उससे पहले वहां बड़ी कंपनियों द्वारा छोटे उद्यमों के अधिग्रहण का दौर चला था, जो 1995 अपने चरमबिंदू पर था. मनोरंजन क्षेत्र की दिग्गज कंपनियां वाल्ट डिजनी, वाशिंगटन हाउस, दवा उद्योग की ग्लैक्सो, कागज उद्योग की स्का॓ट पेपर अपनेअपने क्षेत्र की वे महारथी कंपनियां थीं, जिन्होंने अपनी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों को एकाएक निगल लिया था. चेज मेनहट्टन और केमीकल बैंक ने उसी वर्ष मिलकर, 297 अरब डा॓लर की भारीभरकम पूंजी के साथ, अमेरिका के सबसे बड़े बैंकिंग समूह की आधारशिला रखी थी. पूंजीवाद के चरमोत्कर्ष काल में सबकुछ चमकतादमकता हो, यह बात भी नहीं है. बहुत कुछ ऐसा भी था जो चमचमाती रोशनी के पीछे गहराये अंधेरे की हकीकत बयान करता था. अधिग्रहण के उस दौर में छोटी मछलियां आराम से बड़ी मछलियों का शिकार बन रही थीं. उसी वर्ष मित्शुबिशी बैंक और बैंक आफ टोकियो जो दुनिया के सबसे बड़े बैंकों में से थे, दिवालिया घोषित किए गए थे. अधिग्रहण और विलय का यह खेल यूरोपीय देशों में भी फैला और ब्रिटेन, स्विटजरलेंड, जर्मनी आदि अनेक देशों में पूंजी के बड़े मगरमच्छ छोटी मछलियों को निगलने लगे. इससे मार्क्स और ऐंगल्स की यह भविष्यवाणी सच सिद्ध हो रही थी कि पूंजी का सहज स्वभाव केंद्र की ओर खिसकते जाने का होता है. इस प्रकार वह कुछ समूहों तक सिमटकर रह जाती है. अधिग्रहण और विलयीकरण के इस खेल में हर बार कुछ कंपनियां बंद कर दी जाती हैं, जिसका कुफल उनमें कार्यरत श्रमिकों को बेरोजगारी के रूप में भोगना पड़ता है. स्पष्ट है कि

केंद्र की ओर पूंजी का सतत जमाव उत्पादन में किसी प्रकार की वृद्धि नहीं करता, बल्कि इसका उल्टा ही होता है.’

बेरोजगारी का जिक्र हुआ है तो मार्क्स को एक बार पुनः याद करना पड़ेगा. कम्यूनिस्ट मेनीफेस्टो में उसने कहा था कि बुर्जुआ वर्ग लंबे समय तक सत्ता पर काबिज नहीं रह पाएगा. इसलिए कि वह गरीब और विपन्न वर्गों को अपने दम पर अपने राज्य में सहने की सहूलियत नहीं देता, बल्कि उनके बल पर अपने लिए सुविधाओं का अंबार लगा लेता है. इससे श्रमिक वर्ग के मन में आक्रोश पैदा होता है, जो लगातार बढ़ता जाता है, जो एक दिन बुर्जुआ वर्ग के सत्ताच्युत होने का कारण बनता है. हालांकि पूंजीवादी देशों में ऐसी खबरें प्रायः छनछनकर ही सामने आ पाती हैं. पूंजीपतियों से अस्थिमज्जा प्राप्त मीडिया तथा उन्हीं के दम पर पलने वाली सरकारें, उनपर पर्दा डालने का काम करती हैं. 2007 में छाई मंदी से ठीक पहले पूंजीवाद के समर्थक अर्थशास्त्रीविचारक उदार आर्थिक नीतियों का गुणगान करते नहीं थकते थे. 1995-1996 के पूंजीवाद के सुनहरे दौर में जब बड़ी कंपनियां अपेक्षाकृत छोटी कंपनियों का अधिग्रहण कर अपने विस्तारवादी मंसूबों को अंजाम दे रही थीं, उस समय संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक बेरोजगारों की संख्या 12 करोड़ से भी अधिक थी. ये वे आंकड़े थे, जो पूंजीपतियों के आसरे फलनेफूलने वाले मीडिया ने दिए थे. वास्तविक स्थिति और भी भयावह एवं चिंताजनक है. यदि अस्थायी और ठेके पर अल्पावधि के लिए काम करने वाले कर्मचारियों को भी बेरोजगारों की श्रेणी में रख लिया जाए तो दुनिया के कुल बेरोजगारों की संख्या एक अरब से ज्यादा हो सकती है.

संयुक्त राष्ट्र की उस रिपोर्ट के अनुसार पश्चिमी यूरोप में बेरोजगारों की संख्या दो करोड़ से भी अधिक थी, जो वहां की कुल जनसंख्या का करीब 10.6 प्रतिशत हैं. यही हाल यूरोप के ‘लौहपुरुष’(स्ट्रांग मैन) कहे जाने वाले जर्मनी का था, वहां हिटलर के पतन के बाद पहली बार बेरोजगारों की संख्या में जबरदस्त वृद्धि हुई थी और वह एक झटके में पचास लाख को पार कर चुकी थी. इनमें भी सबसे अधिक आश्चर्यजनक जापान की हालत है. अपनी वैज्ञानिक और तकनीकी क्रांति से पूरे विश्व को चैंका देने वाले जापान में 1930 के बाद पहली बार बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई. हालांकि सरकारी आंकड़े वहां तीन प्रतिशत बेरोजगारी की बात स्वीकारते हैं, मगर वास्तविक बेरोजारों की संख्या का, कुल जनसंख्या का आठ से दस प्रतिशत होना, चिंताजनक स्थिति है. बढ़ती बेरोजगारी ने इस बार उन क्षेत्रों को भी प्रभावित किया है, जो इससे पहले रोजगार की दृष्टि से अत्यंत सुरक्षित और लाभदायक समझे जाते थे. इनमें अध्यापक, नर्स, डाॅक्टर, बैंक कर्मचारी, वकील आदि सम्मिलित हैं, जो अपनी व्यावसायिक योग्यता के दम पर रोजगार पाते रहे थे. 2007 के बाद तो बेरोजगारी ने युवाओं की कमर ही तोड़ दी है. अमेरिका, यूरोप आदि के देशों में बैंकों और बड़े उद्योगों के बंद अथवा दिवालिया होने के बाद दुनियाभर के श्रमिकोंकामगारों को छंटनी का शिकार होना पड़ा. उनकी संख्या करोड़ों में है.

उदार अर्थनीति की विडंबना है कि आर्थिक प्रगति का लाभ जहां चंद विकसित देश ही उठा पा रहे थे, जबकि छंटनी और दिवालियेपन का असर प्रायः छोटी और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को ही झेलना पड़ा है. इससे मार्क्स का यह कथन एक बार फिर प्रासंगिक लगने लगा, जिसमें उसने कहा था कि पूंजीवाद एक वैश्विक व्यवस्था के रूप में विकसित होगा. मगर विश्वबाजार का अस्तित्व लंबे समय तक टिके रहने वाला नहीं है. इसका अंत सुनिश्चित है. यह हमारे समय का बेहद निर्णायक समय है. सच तो यह है कि हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जिसमें कुछ भी निजी अथवा स्थानीय नहीं है. हमारी अर्थव्यवस्था, राजनीति, संस्कृति यहां तक कि कूटनीति भी स्थानीय नहीं है. सबकुछ वैश्विक और अंतरराष्ट्रीय है. प्रौद्योगिकी प्रेरित अंतरराष्ट्रीयकरण ने हमारी संवेदनाओं को भौंथरा किया है. आजकल युद्ध के समाचार भी तब तक रोमांचित नहीं करते, जब तक कि उनमें अंतरराष्ट्रीयता का पुट न हो. वैसे युद्ध अब राजनीतिक मसला नहीं रहा. बीसवीं शताब्दी ने जितने युद्ध झेले, उनके पीछे बाजार का अधिक हाथ था, जिनमें करोड़ों की जानें गईं. इनमें सबसे आखिरी युद्ध अमेरिका और इराक के बीच था, जिसमें एक महादेश की पूंजीवादी आकांक्षाओं ने अपने से कहीं छोटे देश को पहले तो बदनाम करने की साजिश की. फिर दादागिरी दिखाते हुए उसपर हमला बोल दिया.

यह दादागिरी राजनीति प्रेरित नहीं थी. न उसको देश के नागरिकों का समर्थन प्राप्त था. समर्थन था, पूंजीपतियों का, जो युद्ध में अपनेअपने लाभ देख रहे थे. एक वर्ग को युद्ध की तबाही के बाद उस देश में नवनिर्माण के लिए ठेके मिलने की उम्मीद थी. कुछ का धंधा हथियार बनानेबेचने का था. वे मानते थे कि युद्ध नवनिर्मित रासायनिक हथियारों के प्रदर्शन का अच्छा अवसर सिद्ध होगा, बाद में उनके ग्राहक भी आएंगे. इन महत्त्वाकांक्षाओं ने एक फलतेफूलते देश को तबाही के गर्त में ढकेल दिया. हैरानी की बात है कि जनता और बुद्धिजीवी उस युद्ध को केवल राजनीतिक मसला समझे रहे. युद्ध के वास्तविक जिम्मेदार व्यक्ति कभी सामने आ ही नहीं पाए. युद्ध से नाराज जनता ने बुश महाराज से कुर्सी तो छीन ली. नई उम्मीदों के साथ नया चेहरा राजनीति में आया. मगर पूंजीवादी मंसूबे खत्म नहीं हुए. यानी युद्ध की संभावनाओं और उससे जुड़ी पूंजीवादी आकांक्षाओं का कोई निदान आज तक नहीं खोजा जा सका.

समस्या है कि पूंजीवाद के इस खेल से बचा कैसे जाए? इसका एक ही हल है. किसी भी तरह किसान, मजदूर और कामगार वर्ग अपनेअपने हितों की रक्षा में एकजुट हों. अपनी वास्तविक जरूरतों का आकलन करें. उपलब्ध संसाधनों को जांचे परखें. तत्पश्चात अनुकूल प्रौद्योगिकी का चयन कर उत्पादन की जिम्मेदारी स्वयं संभालें. प्रौद्योगिकी भी ऐसी हो जो समूह के सदस्यों की कुशलता का उपयोग कर, उन्हें आर्थिकसामाजिक रूप में आत्मनिर्भर बनाती हो. लेकिन क्या यह इतना ही आसान है? आजकल सामान्य समझबूझ वाला बुद्धिजीवी भी मानता है कि उद्योगों को बंधनमुक्त होना चाहिए. सरकार उनपर कम से कम नियंत्रण रखे. वैश्विक अर्थव्यवस्था का विकास हो, ताकि उद्योगों को हर जगह एक जैसा वातावरण मिले. सभी देशों में लाइसेंस और परमिट की एकसी शर्तें, एक जैसे विधान हों. व्यवस्था हो कि उद्योगों को समाज के बहुसंख्यक वर्ग के विकास के लिए काम करने की पूरीपूरी छूट मिले. साथ में आवश्यक सुविधाएं भी. ऐसे में कैसे संभव है, पूंजीवाद के संकट से बच पाना. खासकर तब जब पूंजीवाद लगातार मजबूत और हिंò होता जा रहा हो. श्रमिक शोषण के नएनए रास्ते खोजे जा रहे हों. शोध का क्षेत्र पूंजीपतियों के हाथ में चले जाने से सारी प्रतिभाएं, सारे के सारे पेटेंट पहले से ही उनके हाथों में जा ही चुके हैं. पूंजीपतियों के लिए तो वैश्वीकरण भी एक अवसर है. यह वैश्वीकरण भी निरापद कहां है? इससे बड़ी विडंबना भला और क्या होगी कि पिछली शताब्दी में भूमंडलीकरण एवं अर्थव्यवस्था के अंतरराष्ट्रीयकरण की तमाम सूचनाओं के बावजूद भारत में आर्थिक विसंगतियां सिर चढ़कर बोल रही हैं. देश में रोजगार के जितने अवसर बढ़े हैं, बेरोजगारों की संख्या उससे कहीं अधिक बढ़ी है. उससे कहीं तेजी से देश में आर्थिक असमानता बढ़ती जा रही है.

पूंजीवाद के अंतरराष्ट्रीय फैलाव के कारण विभिन्न देशों के आंतरिक और बाह्यः तनावों में भी वृद्धि हुई है. राज्यों के विरोधाभास और भी खुलकर सामने आए हैं. पूंजी का खिंचाव अतिविकसित देशों की ओर बढ़ता ही जा रहा है. हालात को समझने के लिए सिर्फ एक उदाहरण पर्याप्त होगा. 1987 में संयुक्त राज्य अमेरिका अपने कुल सालाना बजट का मात्र छह प्रतिशत हिस्सा निर्यात के माध्यम से जुटाता था. 1997 में निर्यात का हिस्सा बढ़कर 13 प्रतिशत यानी दुगुने से भी अधिक हो चुका था. इकीसवीं शताब्दी की दहलीज पर सरकार की योजना 22 प्रतिशत के लक्ष्य को पाने की है. इससे अमेरिका जैसे विकसित देशों की अर्थव्यवस्था के रहस्य को समझा जा सकता है. विकसित देशों के पास तो पूंजी है, संसाधन हैं, इसलिए वे अपने उत्पादों के लिए बाजार की सतत खोज में रहते हैं. ऐसी तकनीक की खोज में रहते हैं, जिसकी स्थापना लागत भले ही अधिक हो, मगर जिसके माध्यम से उत्पादन व्यवस्था का अधिकाधिक स्वचालीकरण कर सकें. स्वचालीकरण की तीव्र प्रक्रिया में स्थापना लागत भले ही अपेक्षाकृत अधिक हो, मगर उत्पादनवृद्धि और प्रचालन लागत में भारी कमी से उद्योगपति को दीर्घकालिक लाभ मिलता है. दूसरी ओर श्रमिकों पर निर्भरता में लगातार गिरावट आती है. इससे पूंजीपति लगातार ताकतवर होता है और श्रमिक कमजोर.

इस स्थिति को मार्क्स ने 1848 में ही भांप लिया था. कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो में उसने लिखा था

सघन मशीनीकरण तथा श्रमविभाजन की त्वरित प्रक्रिया में सर्वहारा काम के दौरान अपनी समस्त कार्यकौशल और विशिष्टताएं खो बैठता है. इसका प्रतिकूल प्रभाव उसकी कार्यक्षमता पर पड़ता है. उसका उल्लास धीरेधीरे कम होने लगता है. एक दिन वह मशीनों का आश्रित बनकर रह जाता है. पूंजीवादी समाजों में श्रमिक के कौशल को कुंद करने, उसको मशीनों का दास बनाने की सर्वाधिक सरल और प्रचलित चाल है. इससे श्रमिक की उत्पादन लागत को लगभग पूरी तरह से, उसकी रोजमर्रा की आवश्यकताओं तक, सिर्फ उन आवश्यकताओं तक जिनसे वह अपना भरणपोषण कर, कलकारखानों के लिए मजदूरों की नई फसल पैदा कर सके, सीमित कर दिया जाता है. चूंकि किसी उपभोक्ता वस्तु, साथ ही उसके श्रम की कीमत उत्पादन लागत के तय होती है. अतएव जैसेजैसे श्रमिक का उत्पादन से मोहभंग बढ़ता है, काम के प्रति उसका विकर्षण बढ़ता जाता है. दूसरी ओर उसकी वृत्तिका भी उसी अनुपात में गिरती चली जाती है. इसी के साथ कामगार के ऊपर, चाहे वह कार्यघंटों में हुई बढ़ोत्तरी के कारण हो या तय समयसीमा में अधिक काम देने के दबाव का मामला, अथवा उच्च उत्पादनक्षमता युक्त मशीनरी के साथ काम करने के कारण उसके साथ तालमेल बनाए रखने की चुनौतीश्रम का दबाव भी लगातार बढ़ता जाता है.

सोवियत संघ के अवसान के बाद भारत आदि देशों में अमेरिकापरस्त अर्थशास्त्रियों एवं बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग पैदा हुआ है, जिसने पूंजीवाद को लगभग अपरिहार्य और विकल्पहीन मान लिया है. स्वयं अमेरिका की क्या स्थिति है, इस बारे में बहुत अधिक समाचार मीडिया में नहीं दिए जाते हैं. यह भी कहा जा सकता है कि अपने पूंजीवादी संबंधों की लाज रखने के लिए मीडिया उनपर पर्दा डाले रखता है. वस्तुतः आधुनिक अमेरिका की वही हालत है, जो मार्क्स के समय में तत्कालीन सर्वाधिक विकसित पूंजीवादी देश ब्रिटेन की थी. अंतर केवल इतना है कि ब्रिटेन अपने उपनिवेशों के दोहन के लिए राजनीति का सहारा लेता था, अमेरिका यह काम अपनी अर्थसत्ता के माध्यम से करता है. उसने पूरी दुनिया में अपने आर्थिक उपनिवेश बसाए हुए हैं, जिनपर वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक जैसी संस्थाओं के माध्यम से राज करता है. उपनिवेशों के शोषण में बौद्धिक संपदा जैसे कानून उसके मददगार सिद्ध होते हैं. इसके बावजूद हालात संतोषजनक नहीं हैं. आक्रोश भीतर ही भीतर भड़क रहा है. इसके पीछे अमेरिकी अर्थव्यवस्था की वे विसंगतियां हैं, जो धीरेधीरे सामने आ रही हैं. ऐलेन वुड के अनुसार अमेरिका में

गत बीस वर्षों के दौरान अमेरिकी श्रमिकों की वास्तविक मजदूरों में बीस प्रतिशत तक की भारी गिरावट दर्ज हुई है, दूसरी ओर उन्हें पहले की अपेक्षा प्रतिदिन दस प्रतिशत अधिक काम करना पड़ता है. कहा जा सकता है कि अमेरिका की औद्योगिक क्रांति वहां के श्रमिक वर्ग के हितों पर कुठाराघात के बाद संभव हो सकी है. उदाहरणार्थ, एक अमेरिकी कर्मचारी को एक वर्ष में औसतन 168 घंटे ओवरटाइम करना पड़ता है, जो एक महीने के कार्य के बराबर है. अमेरिकी आॅटोमोबाइल उद्योग के लिए यह विशेषरूप में सही है, जहां एक कार्यदिवस में नौ घंटे और सप्ताह में छह दिन कार्य करने का प्रावधान है. अमेरिकी मजदूर संगठनों के अनुसार यदि वहां कार्यसप्ताह को चालीस घंटों तक सीमित कर दिया जाए तो मात्र इसी से 59,000 नए रोजगार अवसर पैदा किए जा सकते हैं.’

ऐसा नहीं है कि अपने शोषण के विरोध में श्रमिकों में कोई चेतना या सुगबुगाहट न हो. बल्कि वहां आवाजें उठने लगी हैं. करीब पंद्रह वर्ष पहले 24 अक्टूबर, 1994 को टाइम पत्रिका में प्रकाशित एक आलेख में पूंजीवादी शोषण के विरोध में बढ़ते श्रमिकआक्रोश का उल्लेख किया गया था, जिसमें उन्होंने उदारवाद प्रेरित आर्थिक विस्तार को अपने हितों के प्रतिकूल बताया था. लेख में बताया गया था कि काम के अत्यधिक बोझ के कारण, श्रमिकों की दिनचर्या कारखाने में काम तथा ओवरटाइम करने के बाद घर जाकर नहानेखानेसोने और अगली सुबह फिर कारखाने के लिए दौड़ लगाने तक सिमट चुकी है. इसने वहां के सामाजिक जीवन को भी प्रभावित किया है. इससे जहां शिशु जन्म दर में गिरावट दर्ज की गई है, वहीं तलाक की घटनाओं में भी अप्रत्याशित तेजी आई है. जबकि 1980 तक लगातार विकासमान रही जीवनसंभाव्यता, उसके बाद लगभग स्थिर हो गई है. यह स्थिति अमेरिकी समाज के विकास की विडंबना को दर्शाती है. ब्रिटेन का हाल भी इससे भिन्न नहीं है. जब मादाम थैचर वहां की प्रधानमंत्री थीं तो उद्योगों में 25 लाख रोजगार अवसरों में गिरावट दर्ज की गई थी. बावजूद इसके वहां कारखानों के उत्पादनसामर्थ्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है. कामगारों की संख्या में हुई भारी गिरावट के बावजूद उत्पादन स्तर पूर्ववत रहने का कारण केवल उन्नत मशीनों का उपयोग नही है, बल्कि मजदूरों का शोषण भी है. अत्याधुनिक तकनीक भी श्रमिकों के लिए राहतकारी सिद्ध नहीं हुई है. उनकी मुश्किलें बढ़ती ही जा रही हैं. श्रमिकों एवं आम जनता को भुलावे में रखने के लिए नए उपकरणों को बड़ी तेजी से एक के बाद कर उतारा जा रहा है. ऐसे उत्पादों के निर्माण पर जोर दिया जा रहा है, जिनका वास्तविक विकास से कोई संबंध ही न हो. लोकतांत्रिक खुलेपन का उपयोग फैशन और नईनई उपभोक्तावस्तुओं के साथ, लोगों को मोबाइल और इंटरनेट पर खुली सेक्ससामग्री परोसने के लिए किया जा रहा है. तंत्रमंत्र और जादूटोने की बढ़ती लोकप्रियता का लाभ उपभोक्तासामग्री के प्रचारप्रसार के लिए किया है. इसका दुष्परिणाम यह है कि समाज में आर्थिक विषमता लगातार बढ़ रही है.

अमेरिका की भांति ब्रिटेन में भी श्रमिकों को अधिक देर तक कार्य करने के लिए बाध्य किया जाता है. उन्हें उस अवधि का वेतन भी नहीं दिया जाता. यही हाल यूरोप के बाकी देशों का है. वहां भी बड़ी औद्योगिक कंपनियां छोटे उत्पादकों को लीलती जा रही हैं. सबसे धनी और निर्धनतम व्यक्ति के बीच आय का अंतर लगातार बड़ता जा रहा है. भारत समेत ऐशियाई देशों में पूंजीवादी व्यवस्था को लागू हुए अधिक दिन नहीं हुए हैं. पश्चिम का अंधानुकरण करते हुए भारत ने उदार अर्थव्यवस्था को अपनाकर, गत पचीसतीस वर्ष से पूंजीपतियों को मनमानी करने का अधिकार दे दिया है. इससे पूंजी का तेजी से केंद्र की ओर खिंचाव जारी है. पिछले एक दशक में जहां देश में अरबपतियों की संख्या में कई गुना वृद्धि हुई है, वहीं पैंतीस करोड़ नागरिकों को प्रतिदिन बीस रुपये से भी कम आय में जीवनयापन करना पड़ता है. बढ़ते जनाक्रोश के दुष्परिणामस्वरूप पिछले कुछ दिनों से देश में नक्सलवादी गतिविधियां बढ़ी हैं. सरकार और पूंजीपतियों के दबाव में अपनी जमीन और संसाधन लुटा चुके हजारों लोग विद्रोह में व्यवस्था के विरुद्ध हथियारबंद हो उठे हैं. छोटे कारखानों में मजदूरी की बुरी हालत है. वहां बिना किसी नोटिस के कार्यघंटों में 50 प्रतिशत तक वृद्धि हो चुकी थी. इससे पहले जहां श्रमिकों को केवल आठ घंटे काम करना पड़ता था, अब बारह घंटे उतने ही वेतन में काम करना उनकी विवशता बनती जा रही है. यही हालात एशिया के बाकी देशों में हैं. पश्चिम भी इनसे बचा नहीं है. मीडिया पूंजी की इस तानाशाही के विरुद्ध आवाज उठाने के बजाय उसके महिमामंडन में लगा रहता है. स्थिति पर गंभीरतापूर्वक विचार किए बिना उसका प्रयास मार्क्सवाद कठघरे में खड़ा करने का होता है, जिससे अंततः पूंजीवाद ही मजबूत होता है.

यह मार्क्स और ऐंगल्स ही थे, जिन्होंने हमारा परिचय सामाजिक विकास के इस सर्वमान्य और महत्त्वपूर्ण नियम से कराया था, जिसके अनुसार समाज का वर्तमान ढांचा पूंजीपतियों के अनुकूल विकसित हुआ है. यह उसी अवस्था में स्थिर रह सकता है, जब तक समाज की उत्पादक शक्तियां सुरक्षित हैं. कोई भी समाज इससे उस समय तक बच नहीं सकता, जब तक कि वह अपने समस्त संसाधन इस व्यवस्था के विकास के लिए, पूंजीवाद की समृद्धि के निमित्त झोंक नहीं देता. पूंजीवाद के समर्थक अक्सर इस बात का दावा करते हैं कि बाजार की समृद्धि का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचता है. क्योंकि बाजार सभी को अपनी वस्तु का मूल्यांकन करने तथा उसके अनुसार उसका मूल्य वसूलने का आश्वासन देता है. उनके अनुसार यह व्यवस्था श्रमिक के लिए अधिक लाभकारी है. इसमें वह स्पर्धा का लाभ उठाकर अपने लिए ऐसे नियोक्ता की तलाश की तलाश कर सकता है, जहां उसको अधिकतम वृत्तिका की संभावना हो. यह एक दिवास्वप्न ही है. उन्हें जिस गुण में पंूजीवाद की सार्थकता नजर आती है, दरअसल वही उसकी कमजोरी है. नियम है कि बाजार में पूंजी की ताकत ही सर्वोपरि होती है. इसलिए वहां छोटी पूंजी को बड़ी पूंजी के आगे परास्त होना पड़ता है. किसान और श्रमिक के पास अपना श्रम या वे छोटे संसाधन पूंजी के रूप में होते हैं, जो बाजार में किसी प्रकार की ताकत बनने में नाकाम होते हैं. परिणामस्वरूप अपने मूल्यांकन के लिए वे सदैव दूसरों पर निर्भर रहते हैं, जहां उनकी योग्यता का न्यूनतर मूल्यांकन किया जाता है. यह स्थिति पूंजीवादी शोषण को जन्म देती है.

पूंजी की तानाशाही के चलते हम सिर्फ यह सोचकर तसल्ली कर सकते हैं कि किसी भी अन्य विधान की भांति पूंजीवाद का भी जन्म हुआ है. वह भी दूसरी विचारधाराओं की भांति इतिहास के साथ विकसित हुआ है, और आज वह जिस अवस्था में है, वह उसके चढ़ाव की चरम अवस्था है. यहां से उसका पतन अवश्यंभावी है. यही ऐतिहासिक भौतिकवाद की अवधारणा है. यही मार्क्स के चिंतन का लक्ष्यबिंदू है. जब हम इस वैज्ञानिक तथ्य को समझ लेते हैं, तो यह समझना भी आसान हो जाता है कि इतिहास घटनाओं की भावहीन, अतार्किक, अनियोजित और आकस्मिक व्यवस्था नहीं है, जिसको चंद लोग अपनी मनमर्जी से हांक सकें. न ही यह कुछ लोगों की गतिविधियों का परिणाम है. बल्कि यहां जो घटता है, वह एक नैसर्गिक व्यवस्था के अनुसार संचालित होता है, जिसकी सुसंगत व्याख्या संभव है.

मार्क्स के ये विचार चाल्र्स डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत से प्रेरित थे, जिसने जीवजगत को परिवर्तनशील माना था. अपने अध्ययन द्वारा वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि जीवजंतुओं का भी अपना भूतवर्तमान और भविष्य होता है. विकासक्रम के दौरान उन्हें एक सतत परिवर्तनशील एवं विकासमान प्रक्रिया से अनिवार्यतः गुजरना पड़ता है. डार्विन की वैज्ञानिक खोज की सामाजिक विकास के संदर्भ में व्याख्या करते समय मार्क्स एवं ऐंगल्स का मानना था कि इस सृष्टि में पूर्णतः स्थायी और अपरिवर्तनशील सत्ता की कल्पना मात्र एक भ्रम है. इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है, जो पूरी तरह स्थायी एवं अपरिवर्तनीय हो. सामाजिकतंत्र, चाहे जो भी हो, वह मानवीय भावनाओं के सीमित स्वरूप का प्रदर्शन करता है. अपने भरणपोषण के लिए प्रत्येक समाज उत्पादकता के संसाधनों को अपनाता है. उसके लिए जिन संसाधनों को वह चुनता है, उन्हीं पर उसके विकास की दिशा एवं गति निर्भर करती है. ऐतिहासिक भौतिकवाद का विवेचन करता हुआ मार्क्स अंततः इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि वर्तमान समाजों का अभी तक तक इतिहास वर्ग, संघर्ष का इतिहास रहा है.

मजदूर कोरी वितंडा नहीं चाहता. मार्क्स ने उसके हक की बात कही थी. अपने सुख, प्रतिष्ठा और परिवार के भविष्य को दाव पर लगाकर उसने उनके लिए संघर्ष किया था. मजदूर इस तथ्य को जानता है. अतएव मार्क्स उसके लिए देवता हैं. सच तो यह है कि मार्क्स ने हीगेल का द्वंद्ववाद का मानवीकरण किया था. वह उसको आकाश से उतारकर जमीन पर ले आया था. एक तत्ववादी चिंतन को विशुद्ध यथार्थ, लोकोपयोगी चिंतन के रूप में ढाल दिया था. उसका मानना था कि पूंजीवाद का खात्मा श्रमिकों द्वारा उत्पादनतंत्र पर कब्जा कर लेने मात्र से संभव नहीं है. उनके वास्तविक कल्याण के लिए व्यवस्था में आमूल बदलाव जरूरी है. ऐसी व्यवस्था की नींव रखनी होगी जो वर्गहीनता की समर्थक हो. तभी सामाजिकआर्थिक ऊंचनीच की खाई को पाटा जा सकता है. मार्क्स के आलोचकों का सोच केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित है. वे व्यवस्था परिवर्तन के संकल्प से दूर हैं. ऐसे आलोचकों द्वारा मार्क्स की आलोचना की कोई भी बात, उसके चेलेचपाटों की समझ में नहीं आतीं. उन्हें तो गोपियों जैसी साकार भक्ति चाहिए. उद्धव का ज्ञानयोग उनके किसी काम कर नहीं.

मार्क्स अर्थव्यवस्था, राजनीति और समाजनीति में व्यापक परिवर्तन चाहता था. वह चाहता था कि अर्थनीति का ढांचा मुनाफे के आधार पर नहीं, मानवीय विकास और संवेदनाओं के अनुसार तय किया जाए. मार्क्स के अनुयायी दुनिया को उसी की निगाह से देखते हैं, सिर्फ उसको चाहते हैं. यही उनके लोकप्रिय अथवा अलोकप्रिय होने का कारण है. यही वह गुण है जिसने पूरी दुनिया को दो धु्रवों में बांट रखा है. मार्क्स के चिंतन में सर्वभक्षक पूंजीवाद का विकल्प उपलब्ध है, जिसने पूरी दुनिया की संपदा का प्रवाह विकसित देशों की ओर मोड़ दिया है. कहने को तो तमाम अंतरराष्ट्रीय संधियां देशों के बीच मुक्त व्यापार की बात करती हैं. प्रत्येक देश को यह अधिकार देतीं है कि वह अपने संसाधनों का उपयोग कर अपने उत्पादक सामथ्र्य का अधिक से लाभ उठा सके. मगर व्यवहार में विकसित देशों की अत्याधुनिक तकनीक और विपुल साधनों के आगे स्पर्धा में वे टिक ही नहीं पाते हैं. इसलिए उदार अर्थव्यवस्था का लाभ केवल विकसित देशों के लाभाधिकार तक सीमित होकर रह जाता है. ऐसे में मार्क्स का विश्लेषण हमें पूंजीवाद को गहराई से समझने और उसका सार्थक विकल्प खोजने में मदद कर सकता है.

मार्क्स का सारा जोर पूंजीवाद के चरित्र और उसकी विवेचना को लेकर था. इसी संकल्पना के साथ उसने ‘पूंजी’ की रचना की थी. मार्क्स के निधन के बाद से पिछले 127 वर्षों में पूंजीवाद के चरित्र में व्यापक बदलाव आया है. तो भी उसका मूल चरित्र लगभग वही है, जो उनीसवीं शताब्दी के दौरान था. बल्कि कई मायने में वह पहले से अधिक ताकतवर, क्रूर, उत्पीड़क एवं दुःखदायी हुआ है. स्वचालित प्रौद्योगिकी ने पूंजीपति को पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली तथा निष्ठुर बनाया है. इसकी मार्क्स के जीवनकाल में केवल शुरुआत ही हो पाई थी. हाल के वर्षों में कंप्यूटरआधारित तकनीक ने मशीनों को इतना कार्यक्षम और स्वचालित बना दिया है, कि अनेक क्षेत्र ऐसे हैं, जहां मशीनों का नियंत्रण रिमोट के माध्यम से संभव है. उन स्थानों में श्रमिक का कार्य केवल तैयार माल को सुरक्षित रखने या उसको गंतव्यस्थल तक लानेले जाने में सिमट गया है. वह मानवी हस्तकौशल एवं उसके तकनीकी ज्ञान की उपेक्षा करती है. चूंकि मशीनें तकनीकी कौशल की भरपाई आसानी से कर देती हैं, इसलिए पूंजीपति के लिए श्रमिक की भूमिका उत्पादनकार्य में मात्र सहायक तक सिमटकर रह जाती है. उन्नत प्रौद्योगिकी ने श्रमिकों के मन से ‘उत्पादकशक्ति’ होने की अनुभूति को छीनकर उन्हें कुंठाग्रस्त करने का काम किया है. श्रम का शोषण करना, अधिलाभ के बड़े हिस्से पर उत्पादक का अधिकार, अपने से छोटे उद्यमियों को स्पर्धा में परास्त कर बाजार पर एकाधिकार कायम कर लेने की इच्छा आदि आधुनिक पूंजीवाद के कुछ ऐसे अवगुण हैं, जो आज भी उनीसवीं शताब्दी के पूंजीवाद से मेल खाते हैं, जिनमें कतई सुधार नहीं हुआ है. इससे भी बड़ी बात यह हुई है कि पूंजीपतियों ने लंबी पहुंच वाले संचारमाध्यमों पर कब्जा करके प्रतिपक्ष की आवाज को न उभरने देने का पूरापूरा प्रबंध कर लिया है. कहा जा सकता है कि जिस वैज्ञानिक समाजवाद की परिकल्पना मार्क्स ने की थी, उसकी पहले से कहीं अधिक आवश्यकता आज है.

बावजूद इसके यह एक सामान्य जिज्ञासा का सवाल है कि मार्क्स की आज के संदर्भों में कितनी प्रासंगिकता है. क्या उसके विचारों को इकीसवीं शताब्दी में भी ज्यों का ज्यों अपनाया जा सकता है. दरअसल किसी भी कालखंड में मार्क्स के विचारों को संपूर्णता से आत्मसात नहीं किया गया. इसके कारण स्वयं मार्क्स के लेखन में ही सुरक्षित हैं. ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ में वह मजदूरों का सक्रिय क्रांति के लिए आवाह्न करता है. अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हिंसा का सहारा लेने में भी उसको संकोच नहीं है. पेरिस की रक्तरंजित क्रांति और तदनंतर कम्यून की स्थापना के पीछे भी माक्र्सवादी प्रेरणाएं ही थीं. मार्क्स के विचारों के आधार पर ही श्रमिक आंदोलन की नींव रखी गई. यद्यपि बाद में उसका हिंसक क्रांति से मोहभंग होता है और वह आमूल परिवर्तन के लिए, पूंजीवाद से साम्यवाद तक की यात्रा को दो हिस्सों में बांट देता है. उसके अनुसार क्रांति के पहले चरण में श्रमिक संगठन समस्त राजनीतिक और उत्पादनतंत्रों पर अपना अधिकार जमा लेंगे. उसके बाद वे आमूल परिवर्तन के लिए वर्गहीन समाज की स्थापना के लिए प्रयासरत होंगे.

इतनी स्पष्टता के बावजूद मार्क्स के विचारों को लेकर उसके समर्थकों के बीच आज भी भारी मतभेद हैं. मार्क्स का राजनीतिकआर्थिक दर्शन दुनियाभर में ‘मार्क्सवाद ’ के नाम से जाना जाता है, जिसमें वह ऐतिहासिक द्वंद्ववाद के आधार पर पूंजीवाद की तीखी आलोचना करता है. परिवर्तन के लिए वर्गसंघर्ष को अवश्यंभावी मानते हुए उसमें सर्वहारावर्ग की जीत की ओर संकेत करता है. दावा करता है कि पूंजीवाद का अंत निश्चित है, वह अपनी ही कमजोरियों का शिकार होकर एक दिन धराशायी हो जाएगा. मार्क्स के इस विश्वास के बावजूद एक स्वाभाविकसा प्रश्न यहां उभरता है कि क्या ‘मार्क्सवाद ’ उसकी मान्यताओं का सहीसही प्रतिनिधित्व करता है. इस प्रकार की बहसें नई नहीं हैं. मार्क्स के जीवनकाल में ये आरंभ हो चुकी थीं. शायद ऐसी ही किसी बहस से तंग आकर अपनी मृत्यु से कुछ दिन पहले मार्क्स ने अपने साले पाल ला॓फर्ग और फ्रांस के चर्चित श्रमिक नेता जूल्स जूडे पर ‘क्रांतिकारी नारों की सौदेबाजी’ तथा उनका श्रमिकों की संगठित शक्ति में अविश्वास होने का आरोप लगाया था. उल्लेखनीय है कि जूडे ने अपने सहयोगियों से पार्लियामेंट हा॓ल से वर्गसंघर्ष की शुरुआत करने का प्रस्ताव रखा था, जिसका उसके साथियों ने जो संसदीय तरीकों में विश्वास रखते थे और मिलजुलकर रास्ता निकालने की नीति के समर्थक थे,जमकर विरोध किया था. इस घटना के बाद कुछ लोगों द्वारा यह आरोप लगाने पर कि जूडे ने जो किया, उसके पीछे मार्क्स की ही प्रेरणा थी, मार्क्स ने अपनी प्रतिक्रिया ऐंगल्स को संबोधित एक पत्र में व्यक्त की थी. उसने लिखा था कि

‘‘यदि यही मार्क्सवाद है तो मैं मार्क्सवादी नहीं हूं.’’

इस तरह मार्क्स के जीवनकाल में ही उसके विचारों के आधार पर समर्थकों के दो दल बन चुके थे. इनमें से एक वर्ग मार्क्स की उपभोक्ता सामग्री, उत्पादन, पूंजी, श्रम आदि को लेकर तर्कसम्मत गवेषणासामथ्र्य का प्रशंसक था, जिसके आधार पर उसने ‘दि कैपीटल’ नामक ग्रंथ की रचना की थी. यह पुस्तक साम्यवादी राज्य की अभिकल्पना प्रस्तुत करती थी. मार्क्स के प्रशंसकों का दूसरा वर्ग ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ के साथ गहराई से जुड़ा था और मानता था कि समाजवाद की स्थापना के लिए क्रांति अपरिहार्य है. उसके अलावा परिवर्तन का कोई दूसरा रास्ता नहीं है. मार्क्स की मृत्यु के छह वर्ष उपरांत ऐंगल्स ने ‘दूसरा इंटरनेशनल’ की स्थापना की तो उसने भी राजनीतिक प्रतिरोध की नीति को अपनाया था. ‘दूसरा इंटरनेशनल’ को मार्क्स के सहयोग से स्थापित ‘प्रथम इंटरनेशनल’ की अपेक्षा अधिक सफलता प्राप्त हुई थी. रूस में साम्यवादी क्रांति के बीजतत्व ‘दूसरा इंटरनेशनल’ तथा प्रथम विश्वयुद्ध की असंगतियों से उपजे असंतोष का ही परिणाम थे. लेनिन ने स्वयं को मार्क्स के दर्शन और राजनीतिक चिंतन का असली उत्तराधिकारी घोषित करते हुए रूस में बोल्शेविक क्रांति की नींव रखी. दरअसल लेनिन की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं बड़ी थीं. उसने मार्क्स से उतना ही ग्रहण किया था, जितना उसको अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए आवश्यक लगता था. मार्क्स का साम्यवाद सर्वहारा क्रांति से आगे की अवस्था थी. मगर रूस में बोल्शेविक क्रांति पहले चरण पर ही ठहर चुकी थी. बजाय इसके कि मार्क्स के विचारों पर पूरी तरह अमल करते हुए पूर्ण साम्यवाद की स्थापना के प्रयास किए जाएं, रूसी सरकार ने खुद को मारक हथियारों की दौड़ में शामिल कर लिया था. सर्वहारा कल्याण के अनुकूल वैकल्पिक प्रौद्योगिकी की खोज और उसके आधार पर साम्यवाद की स्थापना की ओर किसी का ध्यान ही नहीं था. इससे वहां के नागरिकों के मन में असंतोष पनपा जो अंततः सोवियत संघ के बिखराव का कारण बना. फिर भी यदि करीब अस्सी वर्ष तक रूस में साम्यवाद बना रहा तो इसके पीछे चेखव, गोर्की, दोस्तोयवस्की, अलेक्जांद्र पुश्किन, इवान तुर्गनेव जैसे महान लेखकों का हाथ था, जिसने उस व्यवस्था का एक रूमानी सपना अपने समाज को दिखाया था, जिसकी वास्तविक स्थापना के लिए रूसी समाज दशकों तक प्रतीक्षा करता रहा.

मार्क्स का मानना था कि साम्यवादी क्रांति विकसित औद्योगिक समाजों में ही सफल होगी. फ्रांस, जर्मनी, इंग्लेंड जैसे देशों को जहां औद्योगिक क्रांति फैल चुकी थी उसने साम्यवादी क्रांति के लिए सर्वाधिक उपयुक्त बताया था. उसका मानना था कि विकसित समाजों में औद्योगिकीकरण के कारण समाज में आर्थिक असमानताओं में वृद्धि होती जाएगी, जो सर्वहारावर्ग को अपनी स्थिति में परिवर्तन के लिए एकजुट होने तथा उत्पीड़क पूंजीपतियों के विरुद्ध संघर्ष छेड़ने की प्रेरणा देगी. इससे भिन्न व्लादिमिर लेनिन का विचार था कि साम्राज्यवादी शोषण तथा अनियोजित एवं असमान आर्थिक विकास के चलते सर्वहारा क्रांति के लिए पिछड़े देशों में अधिक संभावनाएं हैं. उसका मानना था कि पूंजीवाद जनित उत्पीड़क स्थितियों तथा आर्थिक असमानता का यह दबाव अपेक्षाकृत छोटे और पिछड़े समाजों में सर्वहारा क्रांति की अधिक संभावना पैदा करेगा. वहीं से क्रांति की हवा विकसित देशों की ओर बहेगी, जहां का समाज समाजवाद की स्थापना के तैयार है, तदनंतर वह रूस की ओर बढ़ेगी. ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ के रूसी संस्करण की भूमिका में भी मार्क्स ने कुछ ऐसी ही संभावना व्यक्त की थी. इस संभावना पर विचार करते हुए कि सार्वजनिक भूस्वामित्व का अभ्यस्त रूसी समाज क्या साम्यवाद के ऊंचे आदर्शों को अपनाने के आसानी से तैयार होगा, उसने लिखा था कि संभावना यही है कि यदि रूसी क्रांति पश्चिम में सर्वहारा क्रांति के लिए प्रेरणा बनती है तो भूमि पर सार्वजनिक अधिकार का मुद्दा साम्यवाद के विकास का आधारभूत सिद्धांत सिद्ध होगा, इसलिए कि वह साम्यवाद का ही एक रूप है.

मार्क्स का यह विचार कि रूस पश्चिम की साम्यवादी क्रांति का प्रेरणास्रोत बन सकता है, लेनिन और उसके सहयोगी ट्राटस्की के चिंतनकर्म का आधार बना. ट्राटस्की और उसके सहयोगी इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि पश्चिम में साम्यवादी क्रांति की असफलता रूसी क्रांति और कालांतर में पश्चिमी देशों में सर्वहारा क्रांति को प्रेरित करेगी और इस तरह रूस वैश्विक सर्वहारा क्रांति का सूत्रधार बनेगा. इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए स्टालिन ने ‘एक देशीय समाजवाद’ की परिकल्पना से छलांग लगाकर विश्वव्यापी सर्वहारा क्रांति के लिए संघर्ष छेड़ने का आवाह्न किया था. स्टालिन का यह सोच 1930 में लाखों सर्वहारा मजूदरों की मौत का कारण बना, जिसके कारण स्टालिन के विरुद्ध जनाक्रोश फैला. महान रूसी लेखक सोल्झेनित्सिन ने जब स्टालिन के शासनकाल में चलने वाले कारावास शिविरों की अमानवीय स्थितियों का बयान अपने उपन्यास ‘दि गुलाग आर्किपैलेगो’ में किया तो उनको रूसी शासकों की ओर से तरहतरह की प्रताड़नाएं दी गईं. इस उपन्यास के लिए सोल्झेनित्सिन को निर्वासन की सजा भी भुगतनी पड़ी. स्टालिन की मृत्यु के बाद रूस की बागडोर जब निकिता ख्रुश्चेव के हाथों में आई तो उसने स्टालिनवाद को विकार मानते हुए, पूरी तरह नकार दिया. सोल्झेनित्सिन का निर्वासन भी समाप्त हुआ. इस तरह उस रक्तरंजित युग का अंत हुआ, जिसमें स्टालिन के नेतृत्व में साम्यवाद अधिनायकवाद का रूप ले चुका था,

रूस की भांति चीन भी कृषिआधारित अर्थव्यवस्था पर निर्भर था. वहां साम्यवादी क्रांति का अलख जगाने वाला माओ जि दांग था. ‘चीनी साम्यवादी पार्टी’ के स्थापक चेन दुजियु तथा दझाओ के साथ मिलकर उसने चीन में साम्यवादी क्रांति के पक्ष में माहौल बनाने के लिए लंबा संघर्ष किया था. वस्तुतः 1925 तक मार्क्सवादी चीनी नेता मानते आ रहे थे कि शहरी मजदूर ऐतिहासिक द्वंद्ववाद की भावना को समझकर अपने वर्गीय हितों के लिए आसानी से संगठित हो सकते हैं. इसलिए उनकी वर्गचेतना ही चीन में साम्यवादी क्रांति का सूत्रधार बनेगी. माओ किसान का बेटा था. साम्यवादी पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने से पहले वह छह महीने तक एक क्रांतिकारी संगठन में काम कर चुका था. उसके बाद मार्क्सवाद के अध्ययन के लिए वह उससे अलग हो गया. बीजिंग में अध्ययन के दौरान उसकी भेंट ली दझाओ और चेन दुजियु से हुई. तीनों क्रांति के समर्थक थे तथा लक्ष्यप्राप्ति के लिए हिंसा का सहारा लेने से भी उन्हें परहेज नहीं था.

साम्यवादी क्रांति के लिए संघर्ष करते हुए माओ इस नतीजे पर पहुंचा कि क्रांति की सफलता के लिए शहरी मजदूरों के बजाय किसानों पर अधिक विश्वास करना चाहिए. इस विचार के लिए माओ को अनेक नेताओं और बुद्धिजीवियों की आलोचना का पात्र बनना पड़ा. परंतु आलोचनाओं से हतोत्साहित हुए बिना माओ किसानों को साथ लेकर माक्र्सवादी क्रांति की सफलता के लिए संघर्ष करता रहा. चीन के गांवों में विद्रोही किसानों को एकजुट करते हुए उसने चीनी सोवियत रिपब्लिक की नींव रखी. उसकी लालसेना ने चियांग केई शेक के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी सेना पर हमले आरंभ कर दिए. राष्ट्रवादी सेना की ताकत बड़ी थी. उसको जापान जैसे पड़ोसी देशों का समर्थन भी प्राप्त था. माओ ने छापामार युद्ध की शैली को अपनाया, जिसमें लालसेना को भारी सफलता मिली. बढ़ी हुई ताकत से वह जापानी मदद से लैस राष्ट्रवादी सेना को पराजित करने में सफल रहा. इस जीत ने उसको चीनी मजदूरों और किसानों का निर्विवाद नेता बना दिया. 1931 में उसे चीन की साम्यवादी पार्टी का नेता चुन लिया गया, इस पद पर वह अगले 45 वर्षांे तक बना रहा. अपने उग्र भाषणों से माओ ने चीनी जनता का दिल जीतने में सफलता प्राप्त की. धीरेधीरे उसकी ताकत बढ़ती गई. एक दिन ऐसा आया जब उसकी ख्याति चीन की सरहदों को पार कर सोवियत संघ पर छाने लगी. सोवियत संघ ने उसके आगे मदद का प्रस्ताव रखा. उस पेशकश को ठुकराते हुए वह अपने ही दम पर मुक्तिसंघर्ष को आगे बढ़ाता रहा.

अंततः 1949 में लंबे गृहयुद्ध के बाद माओ के नेतृत्व में चीन में साम्यवादी सेना को जीत हासिल हुई. उस समय रूस की ओर से नई सरकार को समर्थन के साथसाथ सहयोग की पेशकश गई. परिणाम की चिंता किए बिना ही माओ ने सोवियत संघ पर आरोप लगाया कि वहां साम्यवादियों के बीच कुछ ‘बुर्जुआ’ घुसपैठ कर चुके हैं. इस आलोचना से नाराज होकर सोवियत संघ ने 1960 में चीन को दी जाने वाली तकनीकी मदद से हाथ खींच लिया. उससे घबराए बिना माओ अपने दम पर चीन को समृद्धि की ओर आगे बढ़ाता रहा. उसकी दृढ़ आस्था थी कि तीसरे देशों में जहां औद्योगिक क्रांति अभी तक सफल नहीं हो पाई है, वहां कृषक संघों की मदद से सर्वहारा क्रांति को सफल बनाया जा सकता है. माओ की सफलता से मार्क्सवाद और लेनिनवाद की कमजोरियों को उजाकर किया था. यहां बताना प्रासंगिक होगा कि लेनिन के नेतृत्व में सोवियत संघ की सरकार द्वारा पूंजीवाद के विरुद्ध संघर्ष का नारा देते हुए जनाधिकारों की व्यापक उपेक्षा की गई थी. इसकी भरपाई के लिए माओ ने चीन के अतीत और संस्कृति का सहारा लिया. परिणामस्वरूप वह चीनी समाज को एकता के सूत्र में बांधे रखने में सफल हुआ. उसके विचारों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माओवाद के नाम से जाना जाता है, जो साम्यवाद की ही सहोदर विचारधारा है.

 

ओमप्रकाश कश्यप

 


 

कार्ल मार्क्स के सहयोगी : जेनी कोरलाइन, फ्रैड्रिक ऐंगल्स और देमुट

सामान्य

मार्क्स के व्यक्तित्व को देखें तो उसके निर्माण में अनके विद्वानों, दार्शनिकों और विचारकों का योगदान है. इनमें सबसे पहला नाम महान दार्शनिक फ्रैड्रिक हीगेल का है. मार्क्स की संपूर्ण दार्शनिक चेतना, भौतिकवादी चिंतन हीगेल से ही प्रभावितप्रेरित है. इसके अतिरिक्त उसपर प्लेटो, वाल्तेयर, रूसो, रिकार्डो आदि अनेक विद्वानों का प्रभाव था. धर्म की आलोचना संबंधी तत्व उसने फायरबाख एवं ब्रूनो बायर से उधार लिए थे. जबकि जनप्रतिबद्धता, स्पष्टवादिता, वैचारिक निष्ठा तथा उसके लिए किसी भी प्रकार का जोखिम मोल लेने की कला उसने वाल्तेयर और रूसो से सीखी थी. मार्क्स इन सबसे प्रेरित भी था और प्रभावित भी. इसके साथसाथ वह विमर्शचिंतन को लेकर सर्वथा मौलिक भी था.उसके दिल में श्रमिकों के प्रति बेहद प्यार था. खुद वह सदैव संघर्षशील अवस्था में रहा.शायद ही ऐसा कोई अवसर आया हो जब उसको अपनी आर्थिक चिंताओं से पूर्ण मुक्ति मिली हो. हालांकि अपनी प्रतिभा के दम पर वह अच्छी जीवनशैली को अपना सकता था. मगर उसने अपनी वैचारिक निष्ठा से कभी समझौता नहीं किया. उसके इस संघर्ष को सफल बनाने में जिन दो व्यक्तित्वों का बड़ा योगदान था, जिनके बिना उसका अस्तित्व अधूरा रह जाता है, उनमें एक है, जेनी कोरलीनमार्क्स की पत्नी. दूसरा उसका अभिन्न मित्र एवं मददगारफ्रैड्रिक ऐंगल्स. कई पुस्तकों में उसका सहलेखक, ऐसा मित्र जो आजीवन मार्क्स को आर्थिक मदद पहुंचाता रहा. जिसने अपने परिवार का जमाजमाया व्यापार अपनी मैत्री और वैचारिक निष्ठा पर न्योछावर कर दिया.

 

जीवनसंगिनी : जेनी

 

उसका पूरा नाम था जेनी वान कोरलाइन. वह एक सुंदर, संवेदनशील, दयालु, कोमल हृदय वाली, ममतामयी और अपने परिवार के प्रति समर्पित स्त्री थी. उदारमना और संघर्षशील. पूंजीवाद के मुखर आलोचक और प्रखर लेखक की छवि बना चुका मार्क्स अपने जीवन में आरामदेय नौकरी की संभावना तो पहले ही खारिज कर चुका था, सिर्फ लेखन ही उसका सहारा था. वैचारिक उग्रता के कारण गिनेचुने समाचारपत्रों में ही उसके लेखों को जगह मिलती थी. ऐसे समाचारपत्र निजी परिश्रम और संसाधनों के दम पर निकाले जाते थे. उनका आर्थिक पक्ष भी अपेक्षाकृत कमजोर होता था. अतएव वहां से मिलने वाला मानदेय अपेक्षाकृत बहुत कम होता. ऊपर से उसका बड़ा परिवार. मार्क्स स्वयं फेफड़ों की कमजोरी का शिकार था. अपने उपचार और बड़े परिवार का खर्च चलाने के लिए जितनी धनराशि की उसे आवश्यकता पड़ती, आय के स्रोत अत्यंत सीमित थे. परिणामस्वरूप जेनी को काफी कष्ट उठाना पड़ता था. लेकिन यह सब वह प्रसन्नतापूर्वक करती थी. यहां तक कि मार्क्स कभीकभी खुद भी घर की दरिद्रता देखकर दुखी हो जाता. उदासमन से अपने आप को दोष देने लगता. उस समय जेनी ही उसको गरीब मजदूरों के जीवन से तुलना करके बताती कि उनकी अपेक्षा वह कितनी बेहतर अवस्था में हैकि लेखक का काम मजदूर के काम से कितना आरामदेय और सुखकर है. जेनी सुंदर होने के साथसाथ भावुक कवियित्री भी थी. संघर्ष के दिनों में जेनी की प्रेमकविताएं मार्क्स के लिए बहुत बड़ा सहारा थीं. वह आजीवन श्रमिकों के हित में सोचतालिखता रहा तो उसके पीछे जेनी का बहुत बड़ा योगदान था. बल्कि लेखक मार्क्स की कामयाबी के पीछे जेनी का ही हाथ था. वह एक अच्छी पत्नी, आदर्श मां, कुशल ग्रहणी और संवेदनशील महिला थी. वह चाहती तो स्वयं भी अच्छी लेखक बन सकती थी. किंतु वह आजीवन मार्क्स की मदद करने, उसको लेखन के लिए उत्साहित करने का काम करती रही.

 

अभिन्न मित्र : फ्रैड्रिक ऐंगल्स


जेनी के अलावा मार्क्स की जीवनगाथा जिस व्यक्ति के बगैर अधूरी है, वह था फ्रैड्रिक ऐंगल्स. ऐंगल्स के लिए तो मार्क्स की मित्रता उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुकी थी. दोनों परम मित्र और सहयोगी थे. दोनों की हीगेल के विचारों में आस्था थी. दोनों श्रमिक जीवन की त्रासदियों से परिचित थे और उत्पादनतंत्र में सुधार की कामना करते थे. दोनों की रुचि दर्शनशास्त्र में थी. उम्र में मार्क्स से मात्र दो वर्ष छोटा ऐंगल्स धनी उद्योगपति की संतान था. उसके पिता सूती मिल के हिस्सेदार थे. इसलिए ऐंगल्स का बचपन आरामदेय परिस्थितियों में बीता. तो भी अपने स्वतंत्र सोच और पारिवारिक स्थितियों के कारण वह हाईस्कूल से आगे शिक्षा प्राप्त न कर सका. वस्तुतः अध्ययन के दौरान ही उसका झुकाव प्रगतिशील विचारों की ओर हो चुका था, जिसको उसके पिता और संबंधी अपने वर्गीय हितों के विपरीत मानते थे. उन्हांेने अपने बेटे को अपने व्यवसाय से जोड़े रखने, अपने वर्गीय हितों से जोड़ने का भरपूर प्रयास किया. लेकिन ऐंगल्स की वैचारिक निष्ठा उसके मन में पूंजीवाद के विरोध की प्रेरणाएं भरती रही. इससे परिवार में तनाव की स्थिति आना स्वाभाविक था.

पारिवारिक कलह से तंग आकर वह ब्रीमेन चला गया, जहां उसने एक कार्यालय में बिना वेतन के लिपिक का काम किया. ब्रीमेन में काम करते हुए ऐंगल्स ने दर्शन का अध्ययन जारी रखा. कविताओं में उसकी रुचि थी. मात्र अठारह वर्ष की अवस्था में उसका पहला कविता संग्रह प्रकाशित हुए. उस समय तक उसके समाचारपत्रों में लेख भी छपने लगे थे. बीस वर्ष की अवस्था में वह प्रूशिया की सेना में भर्ती हो गया. उसी दौरान उसको बर्लिन जाना पड़ा, जहां उन दिनों नवहीगेलवादियों की बड़ी चर्चा थी. युवा और स्वप्नदृष्टा ऐंगल्स स्वयं को उनके प्रभाव से न बचा सका. वहीं रहते हुए उसने हीगेल सहित समकालीन दार्शनिकों का गहन अध्ययन किया. अनेक समकालीन विचारकों की भांति वह भी हीगेल के विचारों से प्रभावित हुए बिना न रह सका.

1841 तक ऐंगल्स एक युवा लेखक के रूप में अपनी पहचान बना चुका था. उसी समय उसको अपने परिवार की ओर से मेनचेस्टर स्थित सूती मिल का काम देखने का निमंत्रण मिला. ऐंगल्स के पिता उस मिल के हिस्सेदारों में से थे. उन्होंने सोचा था कि कारखाने की जिम्मेदारी सौंपने से ऐंगल्स के मन में अपने वर्गीय हितों के प्रति झुकाव पैदा होगा. उन दिनों मार्क्स ‘रींसचे जीटुंग’ नामक प्रगतिशील समाचारपत्र का संपादक था. कम उम्र में ही वह प्रगतिशील विचारक, लेखक के रूप में पर्याप्त ख्याति बटोर चुका था. मेनचेस्टर जाते समय ऐंगल्स ने मार्क्स से मुलाकात की. दोनों की पहली भेंट औपचारिक ही रही. कोई भी एकदूसरे को प्रभावित करने में असमर्थ रहा. मेनचेस्टर में ऐंगल्स की भेंट मेरी बन्र्स नामक महिला से हुई. दोनों ही प्रगतिशील विचारों को मानने वाले थे. मेरी बन्र्स और ऐंगल्स का संबंध आजीवन बना रहा. ऐंगल्स की विवाह नामक संस्था में कोई आस्था न थी. दोनों आजीवन अविवाहित रहकर भी परस्पर गहरे मित्र और शुभचिंतक बने रहे.

मेनचेस्टर में रहते हुए ऐंगल्स को मजदूरों के जीवन को करीब से देखने का अवसर मिला. उसने देखा कि दिनभर कारखाने में जीतोड़ परिश्रम करने वाले श्रमिक शाम को भरपेट खाना भी नहीं खा पाते हैं. उनकी स्त्रियों और बच्चों को अधनंगे तन रहना पड़ता है. रातें भूख से काटनी पड़ती हैं. छोटेछोटे मकानों में जानवरों की भांति रहकर वे अपना समय बिता देते हैं. ऐंगल्स के लिए ये नए अनुभव थे, जिन्हें केवल लेखक के रूप में श्रमिकजीवन को करीब से देखे बिना वह समझ नहीं सकता था. ऐंगल्स ने अनुभव किया कि इंग्लेंड में लगभग सभी जगह मजदूरों की एक जैसी हालत है. उसी से प्रेरित होकर उसने अपनी पुस्तक ‘दि कंडीशन आ॓फ दि वर्किंग क्ला॓स इन इंग्लेंड इन 1844’ पूरी की. इंग्लेंड में उन दिनों चार्टिस्ट आंदोलन का उफान पर था. चार्टिस्ट आंदोलनकारी मजूदरों के सम्मान और उनके संवैधानिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे थे. यूरोप के करोड़ों मजदूर उसके समर्थन में थे. उनके संपर्क में आने के बाद ऐंगल्स में मजदूर आंदोलनों के प्रति निष्ठा का विकास हुआ. उन्हीं दिनों राबर्ट ओवेन, विलियम किंग, रिकार्डो तथा अन्य साहचर्यवादी अर्थशास्त्रियों को भी उसने पढ़ा. मगर उसको संतोष न हुआ. श्रमिकों के जीवन की दुर्दशा देखकर उसको अपने जीवन से घिन होने लगी. आखिर उसने मेनचेस्टर छोड़ने का निश्चय कर लिया. वहां से वह जर्मनी के लिए प्रस्थान कर गया. पेरिस में उसने एक बार फिर मार्क्स से मिलने का निश्चय किया. दोनों की भेंट एक स्थानीय कहवाघर में हुई. इस मुलाकात में दोनों एकदूसरे के मित्र बन गए. उनकी मित्रता आजीवन बनी रही. मार्क्स उन दिनों ‘दि होली फैमिली’ नामक पुस्तक पर काम कर रहा था. इस पुस्तक में उसने ब्रूनो बायर और अन्य नवहीगेलवादियों की आलोचना की थी. मार्क्स का जीवन संघर्षमय था. ऐंगल्स उसके काम से बेहद प्रभावित था. इसलिए उसने पेरिस में ही रुकने का निर्णय लिया, ताकि वहां रहकर अपने मित्र की आर्थिक मदद कर सके.

1848 में पेरिस में क्रांति भड़क उठी. मार्क्स को प्रूशिया में शरण लेनी पड़ी. वहां उसने एक समाचारपत्र का संपादन शुरू किया. मगर कलम का धनी और विचारों से निर्भीक मार्क्स वहां भी शांत रहने वाला न था. उसकी कुछ विवादित टिप्पणियों के कारण प्रूशिया की सरकार मार्क्स से नाराज हो गई. परिणामस्वरूप उसको समाचारपत्र और पू्रशिया की नागरिकता, दोनों से हाथ धोना पड़ा. मार्क्स वहां से इंग्लेंड चला गया. जहां उसने स्वयं को ‘पूंजी’ के लेखन के प्रति समर्पित कर दिया. ऐंगल्स को कारखानेदारों के जीवन से चिढ़ थी. उन्हें वह दूसरों के श्रम पर जीवनवाला, परजीवी वर्ग मानता था. उनकी विलासिता एवं स्पर्धा में एकदूसरे को पछाड़ देने की आदत से उसको कोफ्त होती थी. एक मालिक के रूप में उसे अपना जीवन बोझ लगता था. इसलिए वह मेनचेस्टर छोड़कर बर्लिन पहुंचा था. बर्लिन जैसे अपेक्षाकृत शांत नगर को अपना डेरा बनाने का उसका उद्देश्य यह भी था कि वह अपनी लेखनसंबंधी योजना को आगे बढ़ाना चाहता था. उसकी कोशिश आंशिक रूप से सफल भी रही. बर्लिन में उसके लेख वहां के प्रसिद्ध समाचारपत्रों में स्थान पाने लगे. बर्लिन पहुंचकर थोड़े ही दिन हुए थे कि उसको मार्क्स के परिवार पर आए आर्थिक संकट पर पड़ी. अंततः अपने परममित्र के जीवनसंघर्ष को देखते हुए उसको पुनः उसी जीवन में लौटना पड़ा. परिस्थितिवश जिस मिल में उसके पिता की साझेदारी दी, उसी में उसको लिपिक के रूप में काम करना पड़ा.

स्मरणीय है कि ऐंगल्स ने अपने कैरियर की शुरुआत भी एक लिपिक के रूप में की थी. तब उसने वैचारिक मतभेदों के कारण परिवार छोड़ा था. इस बार वह इसलिए काम पर लगा था, क्योंकि उसके परममित्र को उसकी मदद की आवश्यकता थी. एक बार फिर ऐंगल्स ने स्वयं को कुशल प्रबंधक सिद्ध किया और 1864 में उसने पुनः उस कारखाने की हिस्सेदारी खरीद ली. इस बीच मार्क्स लंदन के लिए रवाना हो गया. कारखाने का सफलतापूर्वक संचालन करता हुआ ऐंगल्स बर्लिन से ही मार्क्स की मदद बराबर करता रहा. उन दिनों मार्क्स एवं ऐंगल्स के बीच संवादवहन का एकमात्र माध्यम पत्राचार था. ऐंगल्स को अपने मित्र मार्क्स से मिलने की ललक थी. इसलिए उसने कारखाना छोड़ दिया. इस बार भी उसके परिजनों ने खूब समझाया. जमाने की ऊंचनीच का वास्ता दिया. लेकिन ऐंगल्स को उनसे अधिक अपने मित्र मार्क्स की चिंता थी. इसलिए वह लंदन के लिए रवाना हो गया, जहां वह मार्क्स के साथ रहने लगा. अपने जीवन के अंतिम दिनों में मार्क्स की बीमारी ने जोर पकड़ लिया था, उस समय ऐंगल्स ने एक आदर्श मित्र का दायित्व निभाते हुए उसकी भरपूर मदद की थी. ऐंगल्स जिद्दी, धुन का पक्का और खुशमिजाज इंसान था. साहित्य, संगीत, कविता लिखने के अतिरिक्त उसको लोमड़ी का शिकार करने का भी शौक था, जो उन दिनों इंग्लेंड के रईसों का पसंदीदा खेल था. जीवन के आरंभिक दिनों में वह क्रांति के लिए हिंसा का समर्थक था, मगर आगे चलकर वह शांतिपूर्ण तरीके से समाजवाद का पक्षधर बना.

मार्क्स के जीवन की एक विडंबना यह भी है कि वह आजीवन पूंजीवाद की आलोचना करता रहा. किंतु उसका सर्वाधिक घनिष्ट मित्र स्वयं एक पूंजीपति वर्ग से आता था. जिससे वह आजीवन मदद लेता रहा. मार्क्स ने जब ‘पूंजी’ की रचना की तो उसके लिए श्रमिकों के बारे में तथ्यात्मक जानकारी उसको ऐंगल्स से ही प्राप्त हुई थी. यही नहीं पूंजी की रचना के दौरान वह समयसमय पर मार्क्स को सुझाव भी देता रहा. इस पुस्तक के दूसरे और तीसरे खंड तो उसके संपादन में ही प्रकाशित हुए थे. दोनों ने हालांकि एक साथ कई पुस्तकों पर काम किया, लेकिन दोनों में कुछ उल्लेखनीय मतभेद भी थे. मार्क्स राजनीतिक अर्थशास्त्र में रुचि रखता था, जबकि ऐंगल्स की विशेषज्ञता इतिहास और प्राकृतिक विज्ञान में थी. दोनों के स्वभाव में भी काफी अंतर था. मार्क्स जहां तुनकमिजाज और बहुत जल्दी आपा खो देने वाला इंसान था, वहीं ऐंगल्स अपेक्षाकृत धैर्यवान और सोचसमझकर निर्णय लेता था. इन चारित्रिक भिन्नताओं के बावजूद दोनों के बीच गहरी और अटूट दोस्ती थी.

 

देमुट

जेनी और ऐंगल्स के अतिरिक्त एक तीसरा व्यक्ति और भी है, जिसका मार्क्स से अंतरंग संबंध था. वह थी, हेलेन लेंकन देमुट. देमुट मार्क्स की समवयस्का थी, और उसके घर नौकरानी का काम करती थी. मार्क्स की नौकरानी बनने से पहले सतरह वर्ष की जेनी टायर निवासी हेमुट जाॅन लुडविग वाॅन वेस्टफ्लान के घर नौकरी करती थी. जेनी काॅरलीन का जब मार्क्स से विवाह हुआ तो, देमुट भी जेनी के साथ उसके परिवार में चली आई. उन दिनों के सामंती परिवेश का अनुमान लगाया जा सकता है. भारत समेत पूरे यूरोप में स्त्री की यही अवस्था थी. खासकर नौकरानियां. संपन्नवर्ग के परिवार अपने घरों में काम करने वाली स्त्रियों का भी दहेज के रूप में लेनदेन करते रहते थे. यद्यपि मार्क्स दंपति के घर देमुट की हैसियत केवल नौकरानी तक सीमित नहीं थी. वह उनकी शुभचिंतक, सलाहकार, मित्र और नौकर सबकुछ थी. युवा मार्क्स भी उसके आकर्षण से बच न सका. 23 जून, 1851 को हेलेन देमुट ने मार्क्स के संपर्क से एक बच्चे को जन्म दिया, मगर वह कभी पिता का नाम न पा सका. सर्वहारा वर्ग को क्रांति के लिए प्रेरित करने वाला, ऐतिहासिक भौतिकवाद के सिद्धांत का जन्मदाता, श्रमिकों का हितचिंतक, महान दार्शनिक, क्रांतिकारी चिंतक और संवेदनशील कवि मार्क्स, अपने घर में देमुट के गर्भ से जन्मी अपनी औरस संतान को कभी अपना नाम न दे सका. तो भी धीरेधीरे देमुट के बच्चे को लेकर अफवाहें बढ़ती गईं. मार्क्स के आलोचकों के लिए उसको बदनाम करने का यह एक बेहतरीन अवसर था.

एक बार फिर ऐंगल्स मार्क्स का सखा और उद्धारक बनकर आगे आया. उसने खुद को देमुट के गर्भ से जन्मे बच्चे का पिता होने की घोषणा कर दी, ताकि मार्क्स और जेनी के संबंधों में किसी भी प्रकार की खटास न आए. मार्क्स के घर में रहने के कारण उसपर आरोप तो लगने ही थे, लगे, मगर ऐंगल्स ने अपनी जिंदादिली से उन सबको चुप रहने को विवश कर दिया. 1883 में मार्क्स की मृत्यु के पश्चात देमुट ऐंगल्स के घर में नौकरानी का काम करने लगी. 1890 में उस दयालु और परिश्रमी स्त्री को केंसर ने घेर लिया. ऐंगल्स ने उसका उपचार करने का भरसक प्रयास किया. लेकिन पहले अपनी मित्र जेनी कोरलीन और बाद में मार्क्स की मृत्यु से हताश देमुट की सेहत में कोई सुधार न हुआ. आखिर उसी वर्ष 4 नवंबर को बीमारी के कारण उसका निधन हो गया. उसको मार्क्स के परिवार के साथ दफनाया गया है.

ओमप्रकाश कश्यप

मार्क्स का राजनीतिक-सामाजिक दर्शन

सामान्य

मार्क्स के चिंतन का क्षेत्र व्यापक था. हालांकि उसका मूल चिंतन अर्थशास्त्र और राजनीति से संबंधित है. उसकी सबसे महान कृति ‘पूंजी’ अर्थशास्त्र जैसे निष्ठुर माने जाने वाले विषय की भी मानवतावादी दृष्टि से विवेचना करती है. पूंजीवाद की तार्किक आलोचना करते हुए वह उसे कठघरे में ले जाती है. लेकिन मार्क्स का बुद्धिविस्तार वहीं तक सीमित नहीं है. अर्थशास्त्र और राजनीति के अतिरिक्त उसने दर्शन, इतिहास, समाज आदि पर गंभीर लेखन किया था. वाल्तेयर, रूसो, प्रूधों, हीगेल, रिकार्डो आदि से प्रभावित मार्क्स द्वंद्ववाद का समर्थक था. चूंकि द्वंद्व के लिए दो पक्षों का आमनेसामने होना आवश्यक है, इसलिए उसने सृष्टि में स्थूल के अस्तित्व को स्वीकार किया और तदनुसार भौतिकवादी यथार्थ को प्रमुखता दी. मार्क्स का दर्शनसंबंधी ज्ञान भी अद्भुत और श्लाघनीय था. यदि वह किसी कारण राजनीति और अर्थशास्त्र के अध्ययन से बचता तो निश्चय ही दर्शन के क्षेत्र में अपनी खास पहचान बनाता. तब उसकी चिंतनधारा हीगेल के दर्शन की कुछ और गांठें खोलती. उसको कुछ नया विस्तार देती. मार्क्स के दार्शनिक विचारों की झलक, उसकी ज्ञानमीमांसा मुख्यतः ‘आ॓न दि ज्यूइश क्वश्चन’, ‘थीसिस आ॓न फायरबाख’ आदि में देखने को मिलती है. उसने ये पुस्तकें क्रमशः ब्रूनो बायर और फायरबाख की पुस्तकों की आलोचना करते हुए रची थीं. ये दोनों विद्वान भी हीगेल के अनुयायी थे. दोनों ने अपनीअपनी तरह से हीगेल के दर्शन को विस्तार दिया था. हीगेल से ही प्रेरित मार्क्स का द्वंद्वात्मक भौतिकवाद अपने आप में एक विलक्षण स्थापना थी, जिसने उसको भौतिकवादी दार्शनिकों की पहली कतार में सम्मिलित कर दिया था.

मार्क्स के अनुसार चूंकि पदार्थ से चेतना की निष्पत्ति होती है, इसलिए ज्ञान का स्वरूप भी अनिवार्यतः वास्तविक होना चाहिए. यानी हम जो सोचते हैं, निष्कर्ष निकालते हैं, वह वास्तविक और विश्वसनीय है. कर्ता अथवा भोक्ता कर्म का सृजन नहीं करता. बल्कि कर्म वस्तु रूप में संसार में अलग से उपलब्ध रहता है. वह क्रियाओं और मानवसंबोधि की अनिवार्य परिणति के रूप में सामने आता है. वह कर्ता से भिन्न, उससे परे और स्वतंत्र है. ज्ञानप्राप्ति के वास्तविक स्रोत मनुष्य के इंद्रियानुभव, दृश्य, मनोवेग, मस्तिष्क में पहले से ही मौजूद मानसिक छवियां आदि हैं, जिनके वह संपर्क में आता है. मार्क्स के अनुसार इस अखिल बृह्मांड में कुछ भी ऐसा नहीं है, जिसको जाना न जा सके. जो इंद्रियों का विषय न होकर सर्वथा अज्ञेय हो. जो है, उसकी स्वतंत्र सत्ता है, पूर्णतः ज्ञेय है, इंद्रियों के माध्यम से उसको जाना जा सकता है. चूंकि दृश्यमान जगत एक वास्तविक सत्ता है, इसलिए उससे उपजा ज्ञान भी वास्तविक है.

मार्क्स स्वयं वैज्ञानिक नहीं था. मगर वह यूरोप के वैज्ञानिक प्रबोधन का कायल था. ज्ञानार्जन की वैज्ञानिक पद्धति पर उसका अटूट विश्वास था. इसलिए उसने सतत प्रेक्षण और विश्लेषण पर आधारित वैज्ञानिक ज्ञान का पक्ष लिया था. उसके अनुसार ज्ञान के वास्तविक स्रोत वैज्ञानिक प्रेक्षण और विश्लेषण हैं. वे तकनीकी व्यवहार हैं, जो वैज्ञानिकता की कसौटी से आविष्कृत किए जाते हैं. उनके निष्कर्षों को जानापरखा जा सकता है. सामान्य परिस्थितियों में वे सार्वकालिक होते हैं. मार्क्स ने अनुभववाद को भी सीमांकित किया था. उसके अनुसार अकेले अनुभव से वास्तविक ज्ञान तक पहुंच पाना संभव नहीं. जब तक उसको बुद्धि की कसौटी पर परखा, तकनीकी युक्तियों से जांचा न जा सके. उल्लेखनीय है कि तकनीकी विकास ने अनुभववाद की विकृतियों को सामने ला दिया था. अनुभव स्थितिसापेक्ष होते हैं. इसलिए अनुभव के दौरान व्यक्ति के पूर्वाग्रहों के उसके निष्कर्षों पर हावी होने का खतरा सदैव बना रहता है. यद्धपि ज्ञान का आशय अनिवार्यरूप से ज्ञान ही है. अनुभव से अर्जित बोध को वैज्ञानिक प्रबोध में बदलने के लिए, आंकड़ों के संश्लेषणविश्लेषण द्वारा अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए वैचारिक चैतन्य अनिवार्य है. तभी उनपर गहराईपूर्वक विचार संभव है. मार्क्स ने अनुभववाद की आलोचना की थी. उसके अनुसार अनुभववाद बुर्जुआ वर्ग की गपशप है, वाग्विलास है. धोखा है, सत्य से परे ले जाने वाला है.

मार्क्स ने अनुभवाद को अपरिपक्व विचार माना था. मगर उसका बुद्धिवाद से भिन्न था. उसका बुद्धिवाद असल में अनुभववाद और यथार्थवाद के बीच की चीज था. किंतु अपनी प्राथमिकताओं के चलते वह इसपर अधिक काम न कर सका. सच तो यह है कि मार्क्सवादी ज्ञानमीमांसा के समर्थक विद्वानों ने अभी तक खुद को सामान्य स्तर का अनुभववादी और अनुभवहीन यथार्थवादी ही सिद्ध किया है. मार्क्सवादी भौतिकवाद की विशिष्टता इस तथ्य में निहित है कि इसकी वास्तविक छवि दूसरे के भीतर नजर आती है, जिसमें व्यावहारिकता का संपुट है और पर्याप्त लचीलापन है. मार्क्सवादी चिंतन की मूल अवधारणा है कि हमारी चेतना के समस्त तत्व हमारी आर्थिक आवश्यकताओं से निर्धारित होते हैं. वही हमारे आचरण और सामाजिक व्यवहार को तय करते हैं. इससे यह संकेत भी मिलता है कि समाज के प्रत्येक वर्ग का स्वतंत्र दर्शन और विज्ञान होता है. यह विज्ञान और मानव समाज के संबंधों की अनिवार्यता की ओर भी इंगित करता है. मार्क्स के अनुसार सर्वथा निरपेक्ष और समाज से परे विज्ञान की अभिकल्पना असंभव है. यही वह सत्य है जो सफलता की ओर ले जाता है, और यही वह कोशिश है जो सत्य की स्थापना के लिए नए मापदंड गढ़ती है.

अनुभववाद और बुद्धिवाद के बीच यह बहस कोई नई और अनोखी नहीं थीं. मार्क्स से पहले ही अनुभववादी जा॓न ला॓क और बुद्धिवादी देकार्त के अनुयायियों के बीच शताब्दियों लंबी बहस छिड़ चुकी थी. इस बहस को इटली के महान दर्शनशास्त्री इमानुएल कांट ने पटरी पर लाने का काम किया था. उसके बाद हीगेल का आदर्शवादी द्वंद्ववाद भी विपरीत ध्रुवों के मध्य समन्वय का प्रयास जैसा था. मगर मार्क्स को हीगेल के आदर्शवाद पर भरोसा न था. उसने हीगेल के द्वंद्वात्मक दर्शन की सामाजिक परिस्थितियों के आधार पर समीक्षा की और उसके माध्यम से सामाजिक संघर्षों की व्याख्या करने का प्रयास किया. इस प्रयास में उसको सफलता भी मिली. यही कारण है कि माक्र्सवाद के बीच बुद्धिवाद और अनुभववाद दोनों ही दर्शन एकदूसरे के समानांतर गतिमान दिखाई पड़ते हैं. उनके बीच समन्वय की कोई कोशिश नजर नहीं आती. मगर उसका यह एकदम सुस्पष्ट संदेश है कि हमारा ज्ञान परमसत्य की खोज के लिए समर्पित है, लेकिन क्षणविशेष के अनुसार देखें अथवा सीमित अर्थों में उसका आकलन करें तो वे आपस में बड़ी आसानी से एकदूसरे के संबंधी और पराश्रित हैं. मार्क्स का विचार था कि सत्य हमारी आवश्यकताओं से जुड़ा है, उनपर आश्रित है तो हमारा ज्ञान न तो यथार्थ का अनुगामी बन सकता है, न उसकी पूरक छायाप्रति.

मार्क्स की दार्शनिक विचारधारा अकाट्य नहीं है. उसमें जगहजगह विरोधाभास नजर आते हैं. इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि वह एक एक्टीविस्ट लेखक था. उसकी प्राथमिकताएं भिन्न थीं. वह मजदूर आंदोलन के द्वारा पूंजीवाद के जिन्न को कैद करने का सपना देखता था. उसका अध्ययन व्यापक था. अपनी वैचारिक आस्था से प्रतिबद्ध मार्क्स के विचारों में ईमानदारी है. उसका आग्रह सामाजिकराजनीतिक क्रांति समाज में आमूल परिवर्तन के प्रति था. अपने विचारों के बल पर उसने समाज के बड़े वर्ग को बहुत गहरे तक प्रभावित किया है. इसलिए किसी के लिए भी उसकी उपेक्षा कर पाना असंभव है. उसके दर्शनसंबंधी विचारों की सीमा और उनके विरोधाभास के बावजूद उनमें इतना कुछ है, जिसके कारण वह शताब्दियों से विद्वानों को प्रभावित करता आया है. भविष्य में भी उसके विचारों की प्रासंगिकता बनी रहेगी, इसमें संदेह नहीं. सच तो यह है कि उनीसवीं शताब्दी का वह अकेला दार्शनिक था, जिसने आम और खास सभी को समानरूप से प्रभावित किया और आज भी जब परिवर्तनकारी राजनीति पर चर्चा होती है, मार्क्स का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है.

 

धर्मसंबंधी विचार

उपभोक्ता वस्तु, श्रम, उत्पादनसंबंध, अधिलाभ आदि अर्थशास्त्रीय विषयों पर मार्क्स ने ‘पूंजी’ में गहन विमर्श किया है. वह एक ओर तो इन विषयों की वस्तुनिष्ठ ढंग से समीक्षा करता है, उपभोक्ता और वस्तु के स्थूल संबंधों को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर उसके मन में पैठा दार्शनिक स्थितियों की गहराई में जाकर तात्विक विवेचना करता है. वह अर्थशास्त्र को दार्शनिक आधार देता है. दर्शन का मानवीकरण करते हुए वह उसको सर्वहारा वर्ग की समस्याओं के निदान के लिए एक जरूरी उपकरण का रूप देता है. यही वह गुण है, जो उसके आर्थिक चिंतन को मौलिक और अनूठा सिद्ध करता है. पूंजी में मार्क्स ऐतिहासिक भौतिकवाद की चर्चा करते हुए यह प्रमाणित किया है कि मानवीय चेतना के सभी तत्व मनुष्य की अर्थसंबंधी आवश्यकताओं का परिणाम हैं, जो सतत परिवर्तनशील हैं. यह नियम धर्म, आस्था, सौंदर्यशास्त्र और नैतिकता पर भी समानरूप से लागू होता है. जहां तक नैतिकता का संबंध है, ऐतिहासिक भौतिकवाद हमें ऐसा कोई सार्वकालिक सूत्र उपलब्ध नहीं कराता, जिससे यह सिद्ध हो कि नैतिकता समाज निरपेक्ष है. सच तो यह है कि नैतिकता और समाज परस्पर आबद्ध होते हैं. समाज से परे उसकी नैतिकता के कोई मायने नहीं. उल्लेखनीय है कि प्रत्येक समाज की अपनी नैतिकता होती है. ऐसे में सर्वहारा वर्ग के लिए नैतिकता के मापदंड क्या हों? मार्क्स सर्वहारा वर्ग को सर्वाधिक प्रगतिशील इकाई मानता था. उसके अनुसार सर्वहारा वर्ग का एकमात्र नैतिककर्म यह होगा कि वह बुर्जुआ वर्ग को उखाड़ फेंके और एक नए समाज की रचना पर काम करे. इसके लिए यदि हिंसा का सहारा लेना पड़े तो क्षम्य है. मार्क्स के अनुसार बड़े उद्देश्य के लिए इस तरह की हिंसाएं स्वीकार्य हैं.

सौंदर्यशास्त्र में स्थितियां और जटिल हो जाती हैं. हमें बिना हिचक यह मान लेना चाहिए कि प्रत्येक वस्तु में एक अंतर्निहित गुण होता है, जो उसको अन्य वस्तुओं से अलग और विशिष्ट बनाता है, वही गुण उस वस्तु के सौंदर्यबोध के लिए आधार का काम करता है, जिसके अनुसार उस वस्तु का सुंदर अथवा कुरूप होना तय किया जाता है. कोई वस्तु समाज के प्रत्येक व्यक्ति की प्रशंसा प्राप्त कर सके, प्राणीजगत के प्रत्येक सदस्य को प्रिय हो, यह संभव नहीं. इसके विपरीत यदि कोई वस्तु व्यक्तिविशेष की अनिवार्यता है, तो वह उसके बाह्यः रूप की उपेक्षाकर उसकी प्रशंसा ही करेगा. वस्तु का लोकप्रिय होना, सभी के लिए प्रशंसनीय होना, विकासवाद से भी जुड़ा है. यदि किसी प्राणी को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है, तो वह वस्तु सुंदर होने के बावजूद उसकी प्रशंसा अथवा सहानुभूति प्राप्त करने में असमर्थ सिद्ध होगी. समाज में प्रत्येक वर्ग की कुछ सामान्य आवश्यकताएं होती हैं, जो दूसरे समाज के सदस्यों से अलग होती हैं. उन्हीं के आधार पर वह समाज वस्तुविशेष का अपने पक्ष में मूल्यांकन करता है. मूल्यांकन के परिणाम ही वस्तुविशेष को लेकर उसके सौंदर्यबोध का निर्धारण करते हैं. इस विश्लेषण के उपरांत मार्क्स जीवन में कला की उपयोगिता की समीक्षा पर आता है.

कला जीवन के लिए’ या ‘कला सिर्फ कला के लिए’—विद्वानों के बीच यह एक पुरानी बहस है. मार्क्स इस बहस में नहीं पड़ता. बल्कि जैसी कि उम्मीद की जाती है, वह प्रतिबद्ध ढंग से सर्वहारावर्ग का पक्ष लेता है. निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले ही वह स्पष्ट कर देता है कि जीवन से निरपेक्ष कला का कोई मूल्य नहीं है. कला का सौंदर्य इसमें हैं कि वह जनसाधारण के जीवन को कितना सुखी और समृद्ध बनाती है. या वैसी प्रेरणाएं जगाती है, जिससे इस वर्ग के पूंजीवादी शोषण से मुक्ति का रास्ता साफ हो सके. इसलिए वह कला को जीवन से जोड़ता है. क्योंकि जीवन को सौंदर्यवान बनाने के लिए उसकी उपयोगिता असंद्धिग्ध है. लेकिन कला को सर्वहारा वर्ग की वीरता के उन कारनामों का दस्तवेजीकरण करना चाहिए जो वह समाजवादी दुनिया की स्थापना के लिए संघर्ष के दौरान प्रदर्शित करता है. वह कलाओं का समाजीकरण कर, जनमानस पर उनकी पकड़ को बढ़ाना चाहता है. प्रकारांतर में इस पकड़ का उपयोग वह सामाजिक परिवर्तन के लिए करना चाहता है.

धर्म को लेकर मार्क्स का कुछ ऐसा ही सोचना था. वस्तुतः धर्म ही वह चीज है, जिसको लेकर मार्क्स शुरू से बेहद आलोचक था. मार्क्स द्वारा प्रणीत द्वंद्वात्मक भौतिकवाद धर्म को विकास के लिए अनावश्यक और प्रतिरोधी मानता है. उसके अनुसार धर्म झूठी और मनगढ़ंत बातों का ऐसा गुंबद तैयार करता है, जो न केवल विज्ञानविरुद्ध होती हैं, बल्कि मनुष्य को डरपोक और प्रतिगामी भी बनाती हैं. इसलिए केवल विज्ञान ही मनुष्य को वास्तविक ज्ञान की ओर ले जाने में सक्षम है. वह आलोचना, समीक्षा अथवा पुनः विवेचन का अवसर ही नहीं देता. हर धर्माचार्य धार्मिक प्रतीकों, रीतिरिवाजों को आस्था का विषय बनाकर जनमानस पर आरोपित करता है. धार्मिक चर्चाओं के दौरान वह सिर्फ विश्वास पर जोर देता है और किसी भी प्रकार के संदेह आदि को अधार्मिक कहकर नकारता है. परिणामतः धार्मिक अंधविश्वास मानवीय विवेक को कुंठित करने का प्रयास करते हैं. इससे ज्ञान का स्वाभाविक विकास अवरुद्ध हो जाता है. धार्मिक प्रतीकों, पूजापद्धतियों और उनसे जुड़े कर्मकांडों का मूल स्वरूप सामंतवादी होता है, जो मानवीय अधिकारों का हनन कर, मनुष्य के नैसर्गिक विकास पर बुरा असर डालती हैं. चूंकि धर्म सामान्यतः मानवीय विवेक की उपेक्षा करता है, इसलिए इससे वैचारिक जड़ता का विकास होता है.

धर्म भय और असुरक्षा की भावना से जन्मता है. वह मनुष्य को ईश्वर जैसी भ्रांत शक्तियों के आगे नतमस्तक होने को उकसाता है. भयभीत मनुष्य बाहरी मदद की अपेक्षा करता है और अपने समाज की मदद न मिलने पर अतींद्रिय शक्तियों के आगे झुकता चला जाता है. इससे उसके धार्मिकआर्थिक और सामाजिक शोषण की संभावना को विस्तार मिलता है. उसके अंतर्मन में पैठा हुआ भय एवं चुनौतियों से पलायन का स्वभाव उसे अपने उत्पीड़कों के आगे झुकने, उत्पीड़न के कारणों से विमुख रहने, मृत्योपरांत न्याय की आस में जीने, अभावों को अपनी नियति मान लेने को विवश कर देता है. वह अपनी खुद की शक्ति और क्षमताओं को समाज के शीर्षस्थ वर्गों की शक्ति और क्षमताएं मानने लगता है. जिससे उसका अपने प्रति अविश्वास लगातार बढ़ता जाता है. धर्म मनुष्य को भाग्यवादी बनाता है. वह उसके आत्मविश्वास का हनन कर, उसको दासभाव से भर देता है. परिणामस्वरूप वह उन शक्तियों से न्याय और कल्याण की अपेक्षा करने लगता है, जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं है. बल्कि जिनकी सोचीसमझी अभिकल्पना समाज के शीर्षस्थ वर्गों द्वारा निहित स्वार्थों के लिए, समाज के सर्वहारावर्ग के शोषण तथा उसको उलझाए रखने के लिए की गई है.

मार्क्स के अनुसार भूसामंत, पूंजीपति जैसे उत्पीड़क वर्ग धर्म का सम्मान करने का दिखावा करते हैं. वे धर्म को पवित्र विश्वास के रूप में जनमानस पर आरोपित करते रहते हैं. इसके पीछे उनका वास्तविक उद्देश्य समाज के बहुसंख्यक मेहनतकशों, शिल्पकारों, किसानों और मजदूरों को अपने चंगुल में बांधे रखने का होता है, ताकि उसके माध्यम से वे उनपर राज्य कर सकें. धर्म मानवीय विवेक का हनन कर व्यक्ति को रूढ़िवादी एवं पलायनोन्मुखी बनाता है. उसकी सामंती वृत्तियां पूंजीपतियों और सामंतों के लक्ष्य को आसान और संभव बनाती हैं. सामंतीवर्ग की विलासिता और शोषणआधारित समृद्धि को धर्म दैविक वरदान सिद्ध करने का प्रयास करता है, इससे सर्वहारा के मन में यह विश्वास जगने लगता है कि शीर्षस्थ वर्ग की अतुलनीय संपन्नता और सुखवैभव ईश्वरीय वरदान हैं. उसके द्वारा पूर्वजन्म में किए गए पुण्यों का फल है. परिणामस्वरूप एक ओर तो वह समाज के उत्पीड़क वर्ग को बड़ा और महान समझने लगता है. दूसरी ओर वह स्वयं कुंठाग्रस्त होकर पलयानवादी बन जाता है. उसका ध्यान शीर्षस्थ वर्गों की शोषणकारी नीतियों और उस भेदकारी व्यवस्था से हट जाता है, जो धर्म के सहारे फूलतीफलती है तथा प्रकारांतर में समाज में ऊंचनीच एवं सांप्रदायिक वैषम्य को बढ़ावा देती हैं. धर्ममय आचरण द्वारा अपरिमित पारलौकिक सुखसमृद्धि की मरीचिका, सर्वहारा वर्ग को हालात से समझौता करने, धर्म की लकीर पीटते रहने तथा दूसरों का अनुगामी बनने के लिए प्रेरित करती है. वह क्रांति की संभावनाओं पर कुठाराघात करती है, जिससे समाज पर यथास्थितिवाद हावी होता चला जाता है. धर्म के इन्हीं प्रतिगामी गुणों के कारण मार्क्स उसके संपूर्ण उन्मूलन के पक्ष में था. सर्वहारा के शोषण को दूर करना है तो उसको धर्म से दूर रखना होगा, नैतिकता और सौंदर्यशास्त्र तो परिवर्तनशील हैं, धर्म के आमूल उन्मूलन के साथ ही वे भी पटरी पर लौट आएंगे—ऐसा मार्क्स का मानना था.

इस संदर्भ में उसने अपने गुरु हीगेल को भी आड़े हाथों लिया था. अपनी पुस्तक ‘फिला॓स्फी आ॓फ राइट’ में धर्म की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए हीगेल ने कहा था कि ‘धर्म का प्राथमिक उद्देश्य सामाजिक एकता का विस्तार है.’ धर्म मानवसमूहों को परस्पर करीब लाता है. पूजा, पद्धति, संस्कार आदि के माध्यम से उनमें ऎक्यभाव कायम करता है. इसकी आलोचना करते हुए मार्क्स ने लिखा था कि धर्म का एकमात्र लक्ष्य राजनीतिकआर्थिकसामाजिक असमानता की सुरक्षा और उसको बढ़ावा देना है. आस्था को केंद्र बनाकर लोगों को तर्क एवं ज्ञानविज्ञान से विमुख रखना है. हीगेल के ‘धर्म के आदर्शात्मक योगदान’ की बखिया उधेड़ते हुए मार्क्स ने धर्म को प्रतिगामी शक्ति और ‘संसार की उल्टी मति को दर्शाने वाला…’ बताया था. धर्म का निषेध करते हुए उसने कहा था कि मनुष्यता का वास्तविक कल्याण इसमें है कि वह विज्ञान की शरण ले. धर्म के जुए को अपने कंधे से उतार फेंके. जीवन की समस्याओं के निपटान हेतु विवेक और तर्कबुद्धि से काम ले. उसने आगे लिखा था कि धर्म

इस संसार की विपरीत मति हैदर्शनशास्त्र का सर्वप्रथम कर्तव्य, जो इतिहास के भले के लिए होगा, यह है कि वह इसके अपवित्र चेहरों पर पड़े नकाब को उतार फेंके. एक बार जब धर्म का वास्तविक चेहरा समाज के सामने आएगा, तब समाज फिर से अपने पवित्र रूप में लौटने लगेगा.’

मार्क्स ने धर्म की उपस्थिति को मनुष्यता का द्दास माना है. उसके अनुसार धर्म मनुष्य को स्वार्थी बनाता है. इससे मुक्ति तभी संभव है, जब सर्वहारा वर्ग अपनी एकजुटता की क्रांतिकारी ताकत को पहचानकर मुक्तिसंघर्ष के लिए उन्मुख होगा. पूंजी एवं धर्म की अधिसत्ता को उखाड़ फेंकेगा. धर्म की विरूपताओं तथा उसकी अनावश्यकता पर विचार करते हुए मार्क्स अंत में प्रूधों से इस मायने में सहमति दर्शाता है कि समाज में निजी संपत्ति की मान्यता समाप्त होनी चाहिए. साथ ही वह प्रूधों से एक कदम आगे बढ़ जाता है, जिसने निजी संपत्ति की अवधारणा का केवल विरोध किया था. यह नहीं बताया था कि इस लक्ष्य को प्राप्त कैसे किया जा सकता है. मार्क्स को सर्वहारा वर्ग की शक्ति और संकल्प में भरोसा था. इसलिए उसने इसी वर्ग का आह्वान किया था कि वह निजी संपत्तिधारकों को उखाड़ फेंके. उत्पादन के समस्त साधनों को अपने कब्जे में लेकर एक समरस समाज की स्थापना की शुरुआत करे. यह बुर्जुआ वर्ग द्वारा श्रमिक वर्ग के शताब्दियों से चलते आ रहे शोषण के अंत की दिशा में पहला कदम होगा, जिसकी अंतिम परिणति वर्गहीन, शोषणमुक्त साम्यवादी समाज की स्थापना में होगी. यह सर्वहारा क्रांति के बाद की अवस्था है.

वैज्ञानिक समाजवाद

समाजवाद मार्क्स का विचार नहीं था. मगर आधुनिक विद्वानों में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो उसको समाजवाद का चैंपियन स्वीकारते हैं. जबकि उसके निर्भीक एवं ओजस्वी लेखन से प्रभावित कुछ विद्वान उसे ‘क्रांतिकारी साम्यवाद’ का जन्मदाता कहते हैं. जिससे उसका आशय था—सर्वहारा क्रांति पर आधारित वर्गहीन समाज की स्थापना, जो माक्र्सवाद का प्रमुख लक्ष्य था. पूंजीवाद और सामंतवाद के वर्चस्वयुक्त दौर में वह सचमुच क्रांतिकारी स्थापना थी. ऐसा ही सपना मार्क्स ने 1848 में कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो के माध्यम से देखा था. मगर उसने जिस प्रकार एक के बाद एक आर्थिक एवं सामाजिक पहलुओं का तार्किक विश्लेषण किया है, उसको देखते हुए उसके समाजवादी चिंतन को ‘वैज्ञानिक समाजवाद’ का नाम देना ही समुचित होगा, जैसा कि ऐंगल्स ने भी माना था. उल्लेखनीय है कि क्रांतिकारी साम्यवाद सर्वहाराक्रांति का परम लक्ष्य है. वह श्रमिक अधिनायकवाद के बाद की स्थिति है. मार्क्स को सर्वहारावर्ग से काफी उम्मीदें थीं. उसका मानना था कि क्रांति के पहले चरण में सर्वहारावर्ग बुर्जुआ वर्ग को अपदस्थ कर सत्ता पर कब्जा कर लेगा. उसके बाद वह वर्गहीन समाज की स्थापना के लिए योजनाबद्ध तरीके से काम करेगा. वैज्ञानिक समाजवाद एक ऐतिहासिक अवस्था है, जो उत्पादन के संसाधनों के अनुसार सामज की सहज परिणति है. प्रथम दृष्ट्या ‘क्रांतिकारी साम्यवाद’ और ‘वैज्ञानिक समाजवाद’ एकदूसरे के प्रतिस्पर्धी जान पड़ते हैं. ‘वैज्ञानिक समाजवाद’ सामान्यतः मार्क्स के समाजवादी विचारों को मान्य ठहराता है.

उल्लेखनीय है कि मार्क्स अपने अर्थनीति संबंधी विचारों को किसी पर थोपता नहीं है. वह सीधे संवाद करता है. अपनी मान्यता के पक्ष में तर्क रखता है. उनकी विश्वसनीयता जांचने के लिए अध्ययनमनन, आंकड़ों एवं तथ्यों का संचयन, पुनः उनका वर्गीकरण और विश्लेषण करता है. ये सब वैज्ञानिक पद्धति की विशेषताएं हंै. दूसरी ओर ‘क्रांतिकारी साम्यवाद’ मात्र यह संकेत करता है कि मार्क्स समाजवादी व्यवस्था का पक्षधर था, और उसको पूंजीवादी उत्पीड़न से बचाने के कारगर उपाय के रूप में देखता था. इसके लिए उसने सर्वहारा वर्ग का आवाह्न किया था कि वह एकजुट होकर पूंजीवादी व्यवस्था का बहिष्कार करे.

वैज्ञानिक समाजवाद’ के संबोधन से मार्क्स के जीवन के संघर्ष की झलक भी मिल जाती है. यहां याद दिलाना प्रासंगिक होगा कि मार्क्स ने राजनीतिक अर्थशास्त्र के क्षेत्र में गंभीर कार्य की शुरुआत 1850 के दशक से की थी. 1848 में प्रकाशित ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ में उसने सर्वहारा वर्ग से, संगठित होकर पूंजीवादी उत्पीड़न के विरोध में हल्ला बोलने का आवाह्न किया था. ‘सर्वहारा के पास खोने के लिए सिवाय अपनी जंजीरों के कुछ नहीं है, मगर जीतने के लिए दुनिया पड़ी हैदुनिया के मजदूरो एक हो जाओ!’ कम्यूनिस्ट मेनीफेस्टो के पहले संस्करण में मार्क्स द्वारा मजदूरों से की गई इस क्रांतिकारी अपील का जादुई असर हुआ था. उसी के आधार पर फ्रांसिसी क्रांति की इबारत लिखी गई थी. किंतु बाद के वर्षों में, विशेषकर पेरिस कम्यून की असफलता के पश्चात, मार्क्स का क्रांतिकारी गतिविधियों से भरोसा कम होने लगा था. 1872 तक आतेआते उसकी विचारधारा में उल्लेखनीय परिवर्तन आया था. वह मानने लगा था कि किसी भी राष्ट्र के पुनःनिर्माण के रास्ते, वहां की विशिष्ट परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं. उसके विचारों में आ रहे परिवर्तन की झलक ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ के दूसरे जर्मन संस्करण की भूमिका से मिल जाती है. उस भूमिका में मार्क्स और ऐंगल्स ने लिखा था—

हर जगह, प्रत्येक कालखंड में, जैसा कि मेनीफेस्टो में पहले ही दर्शाया गया है, उसके सिद्धांतों का व्यावहारिक उपयोग, स्थानविशेष की तात्कालिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है. अतएव, इसी कारण (कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो के) दूसरे अध्याय के अंत में प्रस्तावित क्रांतिकारी उपायों पर विशेष जोर नहीं दिया गया है. वह अनुच्छेद, अनेक मायनों में, आज की परिस्थितियों में बिलकुल नए शब्दों में लिखा जाएगा.’

जाहिर है कि मार्क्स के तेवरों में कमी आई थी. सशस्त्र क्रांति से उसका भरोसा घटा था. वह संघर्ष से सहयोग की ओर लौट रहा था. प्रश्न उठता है कि मार्क्स द्वारा प्रणीत ‘वैज्ञानिक समाजवाद’ आखिर है क्या? मार्क्स का राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र और दर्शनसंबंधी ज्ञान बहुत गहरा था. वैज्ञानिक समाजवाद की उसकी अवधारणा वस्तुतः इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या से प्रेरित थी, जिसकी उसने ‘पूंजी’ में विस्तार सहित व्याख्या की थी. लेकिन उसके बीजतत्व उसकी पुस्तक ‘दि जर्मन आइडियोला॓जी’(1840) जो उसने हीगेल की आलोचना करते हुए लिखी थी, और ‘दि मेनीफेस्टो आ॓फ कम्युनिस्ट पार्टी’(1848) में सुरक्षित थे. ‘मेनीफेस्टो आ॓फ दि कम्युनिस्ट पार्टी’ के लिखे जाने तक उसका समाजवादी सपना अपना आकार ग्रहण कर चुका था. इस सपने को साकार कैसे किया जाए, उसका आगे का समूचा चिंतनमनन इसी बौद्धिक छटपटाहट का परिणाम है.

मार्क्स के मन में समाजवाद के प्रति आस्था 1840 के आसपास ही उभरने लगी थी. ‘ए प्रीफेस टू ए कंट्रीब्यूशन टू क्रिटीक टू दि पा॓लिटीकल इकाना॓मी’ की भूमिका में उसने पूंजीवादी व्यवस्था में उत्पादक शक्तियों के मनमाने आचरण की ओर संकेत किया था. उसने लिखा था—

उत्पादक शक्तियों के निरंतर विकास के फलस्वरूप, जो महज उत्पादन और मालिकों के संबंध को दर्शाती हैं. उत्पादक शक्तियों के अतिरिक्त विकास के साथसाथ मालिकमजदूर संबंध एक बेड़ी में बदलने लगते हैं, ठीक यही समय होता है, जब कोई सामाजिक क्रांति जन्म लेती है.’

कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ में आधुनिक राज्य की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए मार्क्स ने भूसंपत्ति से निजी अधिकारिता को समाप्त कर, उसे व्यापक लोकाधिकार के दायरे में लाने, बहुस्तरीय कराधान पद्धति लागू करने, उत्तराधिकार की प्रथा समाप्त करने, बैंकों के राष्ट्रीयकरण, संचारयातायातकलकारखानों एवं उत्पादन के अन्य माध्यमों को केंद्र के अधिकार में लाने, बेकार पड़ी जमीन को खेतीयोग्य बनाने, सभी के लिए काम की एकसमान अनिवार्यता का कानून लागू करने, कृषि और उद्योगों के समन्वय, शहर और कस्बे के अंतर को समाप्त कर जनसंख्या के एकसमान बंटवारे, बालमजदूरी प्रथा के उन्मूलन तथा सरकारी स्कूलों में सभी बच्चों के लिए निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था करने का आह्वान किया था. सामंतवादी वातावरण में जीते आए समाज के लिए ये स्थितियां बहुत सराहनीय थीं.

स्पष्ट है कि मार्क्स द्वारा प्रणीत समाजवाद पूंजीवादी व्यवस्था में उत्पादक शक्तियों एवं उत्पादनसंबंधों के अंतःसंघर्ष का परिणाम था. उसके निष्कर्ष कल्पना की उड़ान तक सीमित नहीं थे. विभिन्न समाजों के विकास का ऐतिहासिक अध्ययन करने के उपरांत वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि पूंजीवादी व्यवस्था में उत्पादक शक्तियों और सर्वहारा वर्ग के बीच संघर्ष अनिवार्य है. उसने इसको प्रकृति विज्ञान का सटीक परिणाम माना था. उसने लिखा था कि सामूहिक चेतना के उभार के दौर में मनुष्य कानूनी, राजनीतिक, धार्मिक, सौंदर्यवादी, दार्शनिक यानी कुल मिलाकर आदर्शवाद जैसे मुद्दों पर काफी सावधान हो जाता है. वह अपनी गरीबी, समाज पर आए आर्थिक संकट, सामाजिकराजनीतिकआर्थिक विषमता के कारणों की गंभीरतापूर्वक पड़ताल करने लगता है. जैसेजैसे सच उसकी पकड़ में आता है, व्यवस्था के प्रति उसके मन में असंतोष उमड़ने लगता है. कालांतर में व्यक्ति का आक्रोश समूह के गुस्से में बदलता चला जाता है. यही जनाक्रोश बड़े राजनीतिकआर्थिक परिवर्तनों को जन्म देता है. राजनीतिक इतिहास के अध्ययन के दौरान मार्क्स ने समयसमय पर आने वाले आर्थिक संकटों, गरीबी की बढ़ती रफ्तार, श्रमिकों की दुर्दशा तथा पूंजीपतियों की मनमानी के कारणों का गहरा अध्ययन किया था. उसके बाद ही वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि ये सभी संकट समाज की वास्तविक उत्पादक शक्तियों और छद्म उत्पादकों के बीच पनपे अंतर्विरोधों का परिणाम हैं.

मार्क्स का मानना था कि मानवीय चेतना समाज में प्रचलित जीविकोपार्जन के तरीकों, विशेषकर उत्पादनसंबंधों पर निर्भर करती है. उसको विश्वास था कि पूंजीवादी उत्पीड़न का दौर लंबा खिंचने वाला नहीं है. अपनी आर्थिक कठिनाइयों से त्रस्त होकर एक न एक दिन श्रमिक स्वयं विद्रोह पर उतर आएंगे. चूंकि वास्तविक उत्पादक वही हैं, अतएव वह पूंजीवाद का आखिरी समय होगा. भस्मासुर की भांति पूंजीवाद की मौत उसके अपने हाथ में है, कुछ ऐसा उसका सोच था. मार्क्स ने अपनी मान्यता इतने सुसंगठित और क्रमबद्ध ढंग से प्रस्तुत की थी कि उसको एकाएक नकार पाना असंभव था. तथ्यों के विश्लेषण के लिए उसने दर्शन, इतिहास, राजनीति, अर्थशास्त्र, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को आधार बनाया था. ‘वैज्ञानिक समाजवाद’ का नाम उसको ऐंगल्स ने दिया था, जिससे उसका आशय उत्पादन का लाभ समाज के बहुसंख्यक वर्ग तक पहुंचाना था, जो पूंजीवादी व्यवस्था में असंभव हो चला था.

मार्क्स के अनुसार समाजवाद समाज की अनिवार्यता है. किसी समाज को यदि दीर्घजीवी होना है, उसको सुखशांतिपूर्वक समृद्धि का भोग करना है तो उसको संपत्ति और संसाधनों के विकेद्रीकरण के सिद्धांत को स्वीकारना ही होगा. हर व्यक्ति की कुछ सामाजिकजैविक आवश्यकताएं होती हैं. वे बिना किसी बाधा के न्यायोचित ढंग से पूरी होती रहें, यह समाजवाद का उद्देश्य है. उल्लेखनीय है कि मार्क्स के समय में ही सहकारिता आंदोलन का विकास हो चुका था. सहकारिता आधारित उद्यम पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के बेहतर विकल्प सिद्ध हो रहे थे. मार्क्स ने सहकारिता आंदोलन की प्रशंसा की थी, लेकिन उसका मानना था कि केवल सहकारिता द्वारा आर्थिक समरसता के लक्ष्य को प्राप्त कर पाना असंभव है. यही नहीं साहचर्य समाजवादियों राबर्ट ओवेन, फ्यूरियर, संत साइमन आदि को कल्पनाजीवी कहकर उसने उनका मजाक भी उड़ाया था. सहकारिता के प्रति कुछ ऐसा ही विचार मार्क्स के समकालीन विद्वान जाॅन स्टुअर्ट मिल का भी था. सहकारिता एवं स्पर्धात्मक अर्थव्यवस्था की बुराइयों पर निष्पक्ष ढंग से पुनःविचार कर कोई नया, कारगर रास्ता खोजने की जरूरत को लक्ष्य करते हुए मिल ने लिखा था—

प्रश्न यह नहीं है कि क्या स्पर्धायुक्त राज्य को उसकी स्वाभाविक दुष्टताओं से मुक्त कर दिया गया है, विशेषकर तब जबकि हम जानते हैं कि बुराई या कि दुष्टता मानवमात्र के स्वभाव में घुल चुकी है. प्रश्न यह भी नहीं है कि सहयोग और स्पर्धा में मानवसमाज के लिए अधिकतम खुशियों संवाहक बनने की योग्यता किसमें है, अथवा क्या स्पर्धात्मक व्यवस्था पर पुनर्विचारमात्र से मानवमात्र की समस्त समस्याओं का निदान संभव है? असल में तो सहकारिता और स्पर्धा दोनों व्यवस्थाओं की कमजोरियों के निष्पक्ष तुलनात्मक अध्ययन से ही समाज की समस्याओं का समाधान खोजा जा सकता है.’

उल्लेखनीय है कि प्रायः सभी समाजवादी विचारकों ने पूंजीवादी व्यवस्था की बुराइयों और कमजोरियों का विस्तार से वर्णन किया है. उनमें से प्रत्येक ने अपनीअपनी तरह से इन बुराइयों से मुक्ति के लिए वैकल्पिक अर्थव्यवस्था का सुझाव भी दिया है. मार्क्स भी इसका अपवाद नहीं है. किंतु मार्क्स को छोड़कर बाकी सभी के विश्लेषण की एक सामान्य कमजोरी यह है कि वे नई व्यवस्था में एकदम आदर्शात्मक स्थितियों की कल्पना करते हैं. यह मान लेते हैं कि नई व्यवस्था में व्यक्ति बिना किसी बाहरी दबाव के सिर्फ अपनी नैतिक अंतःप्रेरणाओं के आधार पर स्वयं को समाज की एक इकाई मानते हुए अपने हिस्से की सुविधाओं से समझौता कर लेगा. साथ ही वह समाज के विकास में अपनी क्षमतानुरूप अधिकतम योगदान भी करेगा. अतिरिक्त की वांछा ही नहीं होगी. इस तरह स्वार्थ भावना, आलस्य, लालच, विलासप्रियता आदि का अपने आप ही अंत हो जाएगा. वस्तुतः अधिकतम योगदान के बाद सामान्य सुविधाओं की प्राप्ति का दावा व्यक्ति को बहुत आकर्षित करने वाला नहीं है. यह आदर्श के रूप में भले स्वीकार्य हो, किंतु यथार्थ में भी उतना ही कारगर सिद्ध हो सकेगा, यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता. यदि सचमुच ऐसा हो भी जाए तो क्या वैज्ञानिक आविष्कारों और औद्योगिक प्रगति की इतनी ही गति संभव है? और यदि यह संभव नहीं है तो प्राकृतिक आपदाओं, जनसंख्या वृद्धि जैसी समस्याओं से कैसे निदान संभव है, इस बारे में नई व्यवस्था के लिए कोई सुझाव मार्क्स के पास नहीं था. देखा जाए तो यही मार्क्स के चिंतन की सीमा भी है. जितनी गंभीरता से वह पूंजीवाद की बुराइयों की चर्चा करता है, उसके छलप्रपंचों को सामने लाता है, उतनी ही गंभीरता के साथ वह उसके विकल्पों पर बात नहीं कर पाता. वह सबकुछ सर्वहारावर्ग की नैतिकता पर छोड़ देता है. सर्वहारावर्ग के प्रति अपने अतिविश्वास के चलते वह भूल जाता है कि वह भी मानवीय कमजोरी का शिकार हो सकता है, उस अवस्था में सर्वहारावर्ग का अधिनायकत्व एक भीड़ के शासन की भांति, समाज को अराजक स्थितियों की ओर ले जा सकता है.

मार्क्स का समाजवाद उसके भौतिकवादी द्वंद्ववाद से प्रेरित था. उसका मानना था कि समाजवाद का सपना बिना श्रमिकों के संगठित और सक्रिय विरोध के असंभव है. दूसरे शब्दों में मार्क्स और ऐंगल्स पहले समाजवादी थे, जिन्होंने मजदूर संगठनों का समर्थन किया था. अधिकांश विद्वान मानते हैं सामाजिक परिवर्तन, समाज की सामान्य बौद्धिक हलचल का सुफल होता है, जिसको कुछ साहसी और विवेकवान महामानव, जनसमर्थन के बल पर संभव बनाते हैं. मार्क्स की राय इससे बिलकुल भिन्न थी. उसका मानना था कि इतिहास में—

पुराने सभी आंदोलनअल्पसंख्यक वर्ग द्वारा अथवा अल्पसंख्यक वर्ग के हित में चलाए गए जनांदोलन थे. जबकि सर्वहारा का आंदोलन अपरिमित जनसमुदाय द्वारा ऊर्जस्वित एवं अपरिमित जनसमुदाय के हित में चलाया जाने वाला एक आत्मचेतित, आत्मनिर्भर आंदोलन है.’

अपरिमित बहुमत’ अथवा श्रमिकों की अद्वितीय एकता समाजवादी विचारों द्वारा संभव नहीं. उस समय के अधिकांश समाजवादी विचारक भी यही मानते थे. मगर उन सबसे हटकर मार्क्स का विचार था कि ऐसा संभव है. उसको विश्वास था कि इसके अवसर उग्र पूंजीवाद के गर्भ से ही जन्म लेंगे. पूंजीवाद की जकड़बंदी के बीच, उद्योगों के विकास के साथसाथ श्रमिकों की संख्या भी बढ़ती जाएगी. फिर एक दिन वे न केवल संख्याबल में, बल्कि संगठित दल के रूप में भी महान ताकत होंगे. आगे, जैसेजैसे पूंजीवाद और उसके कलकारखानों का विकास होगा, इस संख्या में और अधिक वृद्धि होगी. भिन्नभिन्न स्थानों पर रहने, तरहतरह के कारखानों में काम करने के बावजूद, उनकी प्रमुख समस्याएं एक जैसी होंगी. प्रौद्योगिकी का जितना अधिक विकास होगा, परिष्कृत और स्वचालित मशीनों का आगमन भी उतना ही अधिक होगा. उनमें प्रयुक्त श्रमविरोधी तकनीक श्रमिकों के हितों को नकारात्मक ढंग से प्रभावित करेगी, जिससे उनकी मजदूरी निरंतर घटती जाएगी. जो पुनः उनके असंतोष को उभारकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष की प्रेरणा देगी. यह क्रम एक वर्गहीन समाज की स्थापना तक सतत चलता ही रहेगा.

पूंजीवाद के उत्तरोत्तर उग्र होते तेवर सर्वहारा वर्ग को एकजुट होने को बाध्य करेंगे. एक दिन उसकी संगठित ताकत पूंजीवाद से मुक्ति का कारण बनेगी. संक्षेप में मार्क्स द्वारा प्रकल्पित ऐतिहासिक भौतिकवाद, इतिहास की भौतिकवादी अवधारणा, इस सामान्य तथ्य पर आधारित है कि उत्पादन ‘मानवअस्तित्व का प्रथम आधार’ है. सामाजिक संबंध उत्पादनसंसाधनों के अनुसार बदलते रहते हैं. मनुष्य को इस स्थिति में होना चाहिए कि उसका जीवन इतिहास बन जाए. मार्क्स अपने प्रसिद्ध सिद्धांत, इतिहास की भौतिकवादी अवधारणा की व्याख्या ही इस प्रकार करता है. उसके अनुसार प्रत्येक सामाजिक सिद्धांत, उत्पादन तथा उत्पाद की अदलाबदली के सामान्य नियमों एवं स्थितियों से प्रभावित होता है. वही समाज के प्रत्येक आचरण और व्यवहार के लिए जिम्मेदार है. उसका मानना था कि समाज का विभिन्न वर्गों, राज्यों में वर्गीकरण—वहां प्रचलित प्रौद्योगिकी तथा उत्पादों की विपणन पद्धति द्वारा तय होता है. मशीनें मानवीय संबंधों के स्वरूप को तय करती हैं— मार्क्स की यह अवधारणा ही उसके ऐतिहासिक भौतिकवाद का प्राणतत्व है.

इस तरह मार्क्स की संकल्पना का समाजवाद कोई समाजार्थिक व्यवस्था न होकर इतिहास का वह दौर है, जिससे कोई समाज पूंजीवाद के पतन के बाद आवश्यक रूप से गुजरता है. मार्क्स की मंजिल समाजवाद नहीं था, बल्कि वह तो उसकी विचारयात्रा का पड़ाव मात्र है. समाजवाद से अगली स्थिति साम्यवाद की आती है, जिसमें व्यक्तिगत संपत्ति और सत्ताओं का लोप हो चुका होता है. क्रांति के पहले चरण में संगठित सर्वहारावर्ग बुर्जुआवर्ग को अपदस्थ कर समस्त संसाधनों पर अपना अधिपत्य जमा लेता है. मार्क्स इस अवस्था को सर्वहारा वर्ग के अधिनायकवाद की संज्ञा देता है. पूंजीवादीसामंतवादी शोषण की स्थितियां दुबारा न जन्में, इसलिए वह एक के बाद एक सभी शक्तिशिखरों को ध्वस्त करता चला जाता है. प्रकारांतर में एक वर्गहीन, सर्वकल्याणकारी, समानताधारित व्यवस्था का जन्म होता है. यही सर्वहाराक्रांति का मूल उद्देश्य है.

पेरिस कम्यून में मार्क्स के आरंभिक समाजवाद की एक झलक हमें दिखाई देती है, जिसमें समाज के उत्पादनतंत्र पर सर्वहारा वर्ग का अधिपत्य हो चुका है. पूरा का पूरा उत्पादनतंत्र श्रमिकसंगठनों के हाथों में है, जिसका संचालन व्यापक लोककल्याण की भावना के साथ किया जाता है. जहां न कोई मालिक है, न मजदूर. उत्पादकता बनाए रखने के लिए प्रोत्साहन योजनाओं की मदद ली जाती है. लोग बिना किसी बाहरी दबाव के स्वयंस्फूर्त भाव से काम में जुटे हैं. संभव है सामाजिक स्तरीकरण, आर्थिक भेदभाव के कुछ अवशेष उस अवस्था में भी शेष हों, लेकिन कालांतर में वे घटने लगते हैं और वह उस समय तक निरंतर घटते जाते हैं, जब तक कि पूंजीवादी अवशेषों का पूरी तरह लोप नहीं हो जाता. माक्र्सवादियों द्वारा अभिकल्पित समाजवाद में हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार योगदान देता है, उसके अनुसार ही उसकी प्राप्तियां भी होती हैं. उनके अनुसार समाजवाद का सूत्रवाक्य है—

प्रत्येक से उसकी योग्यता के अनुसार, प्रत्येक को उसके योगदान के अनुरूप.’

समाजवाद की अगली अवस्था, साम्यवाद में हालात मानवीय हो जाते हैं. उत्पादनतंत्र लौकिक स्वरूप धारण कर लेता है. उसमें मालिकमजदूर का भेद मिट जाता है. कार्यरत श्रमिक अपना मालिक स्वयं होता है. वह उत्पादक भी होता है तथा उत्पादकशक्ति भी. साम्यवादी व्यवस्था में उद्योग लोगों की जरूरत के माल का उत्पादन करते हैं. स्वयंस्फूर्त भावना से प्रेरित होकर प्रत्येक मनुष्य अपनी क्षमताओं के अनुसार भरपूर योगदान देता है. बदले में समाज की ओर से उसको उसकी आवश्यकता के अनुसार प्राप्तियां होती है. साम्यवाद की प्रेरक सिद्धांत है कि—

प्रत्येक से उसकी योग्यता के अनुसार काम, हरेक को उसकी आवश्यकता के अनुरूप दाम.’

सच यह भी है कि मानवीय आवश्यकताओं को किसी सीमा में बांध पाना असंभव है. इसलिए साम्यवाद में व्यक्ति को अपनी आवश्यकताओं का अनुकूल शेष समाज की आवश्यकताओं के साथ करने के लिए बाध्य किया जाता है. परिणामस्वरूप उपभोग को लेकर उसको अपनी विशिष्ट पसंदों को त्यागना पड़ता है. इसलिए कुछ विद्वान साम्यवाद को व्यक्तित्व निर्माण के लिए बाधक मानते हैं. यह एक तरह से मनुष्य के व्यक्तित्व विसर्जन के सिद्धांत पर टिका है, जिसमें उसकी व्यक्तिगत विशिष्टताओं के लोप की संभावना बढ़ जाती है. इससे उसके मन में आक्रोश जन्म लेने लगता है. मनुष्य का असंतोष साम्यवादी व्यवस्था के लिए हानिकर सिद्ध हो सकता है. किसी भी स्तर पर यदि किसी व्यक्ति को यह लगने लगे कि उसको होने वाली प्राप्तियां उसके द्वारा किए जा रहे योगदान के मुकाबले न्यून हैं, तब उसका उस व्यवस्था से विश्वास उठ सकता है. वह अपने काम के प्रति उदासीन हो जाता है, जिससे अंततः उत्पादकता में गिरावट की संभावना बढ़ जाती है. अतएव साम्यवाद के लिए वस्तुओं की प्रचुरता और स्वचालित उत्पादन होना आवश्यक है. ताकि मनुष्य के लिए अप्रीतिकर माने जाने वाले कार्यों को मशीनों द्वारा निपटाया जा सके. इस लक्ष्य को प्राप्त करना अकेले सर्वहारा वर्ग के लिए संभव नहीं है. दूरदृष्टा मार्क्स को इसका पूर्वानुमान था. किंतु उसको विश्वास था कि पूंजीवाद स्वयं साम्यवाद के अनुकूल स्थितियों का सृजन करेगा. कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो में इस स्थिति की परिकल्पना करते हुए लेखकद्वय मार्क्स और ऐंगल्स ने लिखा था—

प्रौद्योगिकी के विकास के साथ उद्योगों का विकास होगा, जिससे सर्वहारा वर्ग की संख्या में भी अनुकूल वृद्धि होगी. कालांतर में समाज में सर्वहाराओं की बहुलता हो जाएगी, जिससे उनकी शक्ति बढ़ेगी और उस शक्ति की अनुभूति भी. उच्चतकनीकयुक्त मशीनें श्रम के भेदभाव को समाप्त कर देंगी, जिसके परिणामस्वरूप सर्वहारा वर्ग के हितों और उसके जीवन में एकरूपता का विकास होगा. दूसरी ओर मजदूरी में सर्वव्यापी गिरावट आएगी और वह अपने न्यूनतम स्थिति में पहुंच जाएगी.’

मार्क्स ने आगे लिखा था कि न्यूनतम मजदूरी और संगठित शक्ति का एहसास सर्वहाराओं को संघर्ष के लिए प्रेरित करेगा. संगठित विरोध की संभावनाएं समाजवादियों की प्रेरणास्वरूप नहीं, बल्कि पूंजीवाद की ओर से उत्तरोत्तर बढ़ते दबावों के फलस्वरूप पैदा होंगी. ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ में करीब 160 वर्ष पहले की गई यह परिकल्पना कितनी सटीक थी, इसका ताजा उदाहरण, ब्रेन जोन्स ने अपने लेख ‘मार्क्स की समाजवादी परिकल्पना’ में किया है. जोन्स ने यह लेख हाल के वैश्विक आर्थिक संकट की समीक्षा करते हुए लिखा है. अतः प्रकारांतर में यह लेख मार्क्स के विचारों की समसामयिकता का प्रमाण भी देता है. जोन्स ने लिखा है कि—

वर्ष 2008 में भीषण वैश्विक मंदी के फलस्वरूप प्राय सभी किस्म के उत्पादों की मांग में भारी गिरावट आई थी. निर्यात में कमी आने से कारखानों पर मुद्रा संकट आ गया. इस स्थिति से निपटने के लिए न्यू यार्क के एक उपनगर ब्रोंक्स में बिस्कुट बनाने की फैक्ट्री ‘स्टेला डी’ओरो’ के प्रबंधकों ने मंदी के फलस्वरूप आए मुद्रा संकट से उबरने के लिए श्रमिकों के वेतन में 25 प्रतिशत की कटौती की घोषणा कर दी. इस खबर के फैलते ही श्रमिकों में उबाल आ गया. बगैर इसकी चिंता किए कि औद्योगिक मंदी के दौर में, जब अधिकांश बड़ी कंपनियां छंटनी कर रही हैं, उनकी नौकरी के लिए भी खतरा उत्पन्न हो सकता है, वे हड़ताल पर चले गए. इससे मिलतीजुलती प्रतिक्रिया शिकागो में देखने को मिली. वहां की एक फैक्ट्री ‘रिपब्लिक विंडो एंड डोअर्स’ ने जब दिसंबर(2009) में कारखाने को बंद करने की कोशिश की. कामगारों का वेतन रोक लिया गया. इसपर श्रमिकों ने उग्र होकर प्रबंधन का विरोध किया. उनका उग्र रूप देखकर प्रबंधक भाग छूटे. श्रमिकों ने बंद कारखाने को अपने अधिकार में लेकर उत्पादन आरंभ कर दिया.

श्रमिक एकता की ये अनूठी घटनाएं किसी कल्पनाजगत का हिस्सा नहीं है, बल्कि हमारे ही समय की, हमारी आंखों के सामने घटी सच्ची घटनाएं हैं. भले ही पूंजी के दम पर फलनेफूलने हमारा आधुनिक मीडिया इन घटनाओं को बहुत अधिक तूल न देता हो, अथवा जानबूझकर उनपर पर्दा डाले रखता हो. पर इसमें कोई संदेह नहीं हक ऐसी घटनाएं घट रही हैं. श्रमिक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो रहे हैं. जिस द्वंद्वात्मकता के ऊपर मार्क्स का ऐतिहासिक भौतिकवाद का दर्शन आधारित है, ये घटनाएं उसका सर्वोत्तम उदाहरण हैं. इनमें श्रमिकों की संगठित शक्ति का सकारात्मक रूप देखने को मिलता है. श्रमिकशक्ति का सकारात्मक उपयोग ही समाजवादी आंदोलन का प्राणतत्व है—

यदि बुर्जुआ वर्ग एवं राजारानी के बीच हुए वर्गसंघर्ष का परिणाम पूंजीवाद था, तो आधुनिक यानी बुर्जुआ वर्ग और सर्वहाराओं के वर्गसंघर्ष की परिणति है—समाजवाद.’

मार्क्स के अनुयायी और वैज्ञानिक समाजवादी आज भी पेरिस कम्यून को समाजवाद की आदर्श व्यवस्था स्वीकारते हैं. जैसाकि पहले भी उल्लेख किया गया है, 1871 में आंदोलनरत श्रमिकों के एक समूह ने पेरिस के शासकों को अपदस्थ कर, वहां की सत्ता अपने कब्जे में कर ली थी. उन्होंने मिलकर अपनी सरकार का गठन किया. समुचित और कारगर प्रबंधन के लिए विभाग बनाए. बंद पड़े कारखाने श्रमिकों के नेतृत्व में मुनाफा उगलने लगे थे. लोकप्रतिनिधित्व को शासनव्यवस्था का आधार बनाया गया. व्यवस्था थी कि जिन प्रतिनिधियों को शासन की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी, वे अपने अधिकारों का सही प्रयोग करने, श्रमिकों के व्यापक हित में कार्य करने की शर्त पर ही सत्ता में बने रह सकते हैं. कर्तव्यपालन में असमर्थ सिद्ध होने, भ्रष्टाचार में लिप्त होने अथवा अपने दायित्वों के प्रति उदासीनता दर्शाने पर उन्हें वापस बुलाने का अधिकार कम्यूनवासियांे को था. चुने गए प्रतिनिधियों को श्रमिकों की औसत मजूदरी के बराबर वृत्तिका प्रदान की जाती थी. कम्यून की व्यवस्था में स्त्रियों की समान भागीदारी थी. शिक्षा तथा अन्य मामलों में उन्हें पुरुष के बराबर अधिकार प्राप्त थे. मार्क्स ने लिखा है—

सभी शिक्षण संस्थान लोगों के लिए निःशुल्क उपलब्ध थे, उन्हें चर्च और सरकार के किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप से सर्वथा मुक्त रखा गया था. इस प्रकार न केवल शिक्षा समाज के सभी वर्गों के लिए सहज उपलब्ध थी, बल्कि वैज्ञानिक शोधों को भी वर्गीय पूर्वग्रहों एवं सरकारी दबावों से परे रखा था.’

पेरिस कम्यून की पूरी व्यवस्था जनता द्वारा संचालित थी. आश्चर्यजनक रूप से श्रमिकों ने खुद को कुशल प्रबंधक सिद्ध किया था. उन्होंने कारखानों को अपने अधिकार में ले लिया था. कारखाने मुनाफा बटोर रहे थे. पूरे शहर में न कहीं पुलिस नजर आती थी, न अदालतें. बावजूद इसके अपराधों और लूटमार की घटनाओं में भारी कमी आई थी. बल्कि यह कहना चाहिए कि अपराधों का आश्चर्यजनक रूप से लोप हो चुका था. सबकुछ व्यवस्थित और नियंत्रण में था. सारी व्यवस्था लोककल्याण की अपेक्षाओं के अनुकूल थी. लोग बिना किसी बाह्यः दबाव के कर्तव्यपरायण बने हुए थे. पूंजीवादी व्यवस्था की पहचान बन चुके सामाजिक तनावों, अंतद्र्वंद्वों का कहीं स्थान न था. मार्क्स के अनुसार श्रमिकसमाज के लिए वे दिन ‘स्वर्ग का भ्रमण करने’(Stormed heaven) जैसे थे, जबकि धनवान पूंजीपति वर्ग विरोध में सिर्फ आर्तनाद कर रहा था. उस समय तक लोकतांत्रिक चेतना और उदार श्रमकानूनों की मांगों को आधी शताब्दी से अधिक का समय बीत चुका था. उस स्थिति का चित्रण करते हुए उत्साहित मार्क्स ने लिखा है—

यह एक आश्चर्यजनक सत्य है कि पिछले साठ वर्षों में श्रमविमुक्ति के बड़ेबड़े दावों और उसके बारे में रचे गए ढेर सारे साहित्य के बावजूद ऐसा कहीं नहीं हुआ था, जब कामगारों ने संपूर्ण उत्पादनतंत्र को, दृढ़ इच्छाशक्ति और विश्वास के साथ अपने हाथों में ले लिया हो.उसके साथसाथ वे सभी, पूंजी और श्रमबेगार के विपरीत ध्रुवों में बंटे होने के बावजूद, अपने समाज की आवाज बनकर पूरी विनम्रता के साथ उठ खड़े हुए होंवे चिल्ला रहे थे कि कम्यून, संपत्ति के उन्मूलन के लिए दृढ़संकल्पित, संपूर्ण मानवीय सभ्यता का आधार है.

जी हां, मित्रो! कम्यून निजी संपत्ति को जो बहुसंख्यक कामगारों के श्रम को मुट्ठीभर पूंजीपतियों की संपन्नता में बदलने की दोषी है, के उन्मूलन हेतु दृढ़ प्रतिज्ञ है. इसका उद्देश्य है, समाज की संपत्ति पर अनुचित ढंग से कब्जा जमाए बैठे लोगों को उनके स्वत्त्वाधिकार से वंचित कर देना. जी हां, इसका लक्ष्य है व्यक्तिगत संपत्ति को, जो फिलहाल सर्वभक्षी श्रमशोषण और श्रमदासता का मूल कारण है, उत्पादनतंत्र, भूमि और पूंजी आदि के प्रबंधन में व्यापक संशोधन कर, सर्वथा मुक्त और परस्पर सहयोगाधारित श्रमव्यवस्था में ढाल देना. यही साम्यवाद है, ‘असंभव’ मान लिया साम्यवाद’

मार्क्स ने पेरिस कम्यून की स्थापना में सक्रिय भूमिका निभाई थी. वह प्रयोग हालांकि केवल 70 दिनों ही खिंच पाया था. बिना किसी विशेष तैयारी के स्थापित पेरिस कम्यून का ऐसा अंत अस्वाभाविकअप्रत्याशित भी नहीं था. बावजूद इसके उन 70 दिनों की अवधि में कम्यून के नेताओं ने कम्यून को समाजवाद की अपनी परिकल्पना के अनुसार व्यवस्थित करने का भरसक प्रयास किया था. हालांकि मार्क्स को उसी से संतुष्टि नहीं थी. उसके मतानुसार वह गैरपूंजीवादी समाज की स्थापना की दिशा में पहला कदम था. उसने लिखा भी था—

श्रमिक वर्ग को कम्यून से किसी चामत्कारिक परिणाम की अपेक्षा नहीं थी. उनके पास पहले से तैयार कल्पनालोक भी नहीं था, जिसको वे साकार कर सकेंवे जानते थे कि अपनी आत्ममुक्ति की कोशिश के बीचउन्हें लंबे संघर्ष से गुजरना होगा. मानवसमाज, उसके रीतिरिवाजों और परिस्थितियों में बदलाव के अनेक ऐतिहासिक चरण उनको पार करने होंगे. उनके पास ऐसा कोई आदर्श नहीं था, जिसको वे साकार कर सकें, सिवाय इसके कि पतनोन्मुखी बुर्जुआ समाज के गर्भ में पहले से ही मौजूद तत्वों के आधार पर वे एक नए समाज की आधारशिला रख सकें.’

और यही उन्होंने किया भी था. मार्क्स को विश्वास था समानताआधारित समाज की स्थापना का सपना, साम्यवाद की प्राप्ति का लक्ष्य केवल श्रमिकवर्ग की संगठित एकता द्वारा संभव हो सकता है. लेकिन श्रमिकों द्वारा स्थापित वह व्यवस्था, समाजवादी व्यवस्था आदर्श न होकर साम्यवादी आदर्श की स्थापना का आरंभिक चरण होगी. पूंजीवाद से मुक्ति की पहली अवस्था को, समाजवाद को मार्क्स ने ‘सर्वहारा की तानाशाही’ का नाम दिया है, जिसमें सबकुछ समाज के बहुसंख्यक वर्ग की इच्छा से, बहुसंख्यक वर्ग द्वारा, बहुसंख्यक वर्ग के कल्याण की कामना के साथ संचालित किया जाता है. ‘सर्वहारावर्ग की तानाशाही’ में प्रयुक्त पद ‘तानाशाही’ की मार्क्स की अवधारणा हिटलर, मुसोलिनी और स्टालिन की तानाशाही की संकल्पना से एकदम परे थी. हिटलर का ‘तानाशाह’ असीमित शक्तियों का स्वामी था. उसपर किसी का अंकुश नहीं था. वह देश के संसाधनों का अपनी मर्जी से, सिर्फ अपनी सुखसुविधाओं के लिए कर सकता था. दूसरों की सहमतिअसमति उसके लिए महत्त्वहीन होती थी. ये तानाशाह अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के लिए अपने देश और उसकी संप्रभुता को अक्सर दाव पर लगा देते थे.

मार्क्स ने तानाशाह की परिकल्पना रोमन साम्राज्य से ग्रहण की थी, जिसके सम्राट को व्यापक अधिकार होते थे, तो भी उसके अधिकारों की सीमा थी. इस बारे में मार्क्स ने अपने विचार 1871 में ‘फस्र्ट इंटरनेशनल’ की सातवीं सालगिरह पर हुए आयोजन के दौरान व्यक्त किए थे. उनके अनुसार ‘तानाशाह सर्वहारा’ वर्ग के रूप में मार्क्स की परिकल्पना श्रमिकों की ऐसी संगठित ताकत की थी, जिसके पास विकट परिस्थितियों में काम करने के लिए व्यापक अधिकार हों, लेकिन उसपर शेष समाज एवं श्रमिक संगठनों का पूरा नियंत्रण हो. मार्क्स का मानना था कि उत्पादनतंत्र पर श्रमिकों का कब्जा होने से लाभ का अधिकांश हिस्सा उनके हिस्से में जाएगा, इसलिए वे अपनी पूरी क्षमता के साथ उत्पादन प्रक्रिया में सहयोग करेंगे. पेरिस कम्यून के दौरान यह प्रमाणित भी हो चुका था.

यहां स्मरणीय है कि मार्क्स अथवा उसका मित्र ऐंगल्स समाजवाद और साम्यवाद का जन्मदाता नहीं हैं. ये दोनों पवित्र विचार तो मार्क्स तथा ऐंगल्स से बहुत पहले से ही दुनिया में उपस्थित रहे हैं. दुनियाभर के विचारक समानताआधारित, विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था पर जोर देते आए थे. वेदउपनिषद, बाईबिल, कुरआन आदि ग्रंथों में उपलब्ध संसाधनों का मिलजुलकर भोग करने, मिलबांटकर खाने, सबके साथ मित्रवत आचरण तथा आवश्यकता से अधिक संचय न करने का आग्रह किया जाता रहा है. एक वर्गहीन समाज की स्थापना का सपना प्लेटो, संत साइमन, हेनरी मूर, राबर्ट ओवेन, फ्यूरियर आदि विद्वानों ने अपनेअपने समय में देखा था. मार्क्स और ऐंगल्स इस विचार के प्रवत्र्तक मात्र थे. लेकिन समाजवाद को लेकर मार्क्स और ऐंगल्स की अवधारणा अपने पूर्ववर्ती विद्वानांे से एकदम भिन्न और आगे की थी. हेनरी मूर, संत साइमन राबर्ट ओवेन, फ्यूरियर आदि द्वारा परिकल्पित समाजवाद एक आदर्शवादी संरचना थी, जिसे वे अपने समय की त्रासिदयों यथा समाजार्थिक ऊंचनीच, गरीबी आदि से उबरने के लिए विकल्प के तौर पर देख रहे थे. उनसे भिन्न मार्क्स और ऐंगल्स ने वैज्ञानिक समाजवाद की स्थापना पर जोर दिया था. ऐसी व्यवस्था जिसमें ऊंचनीच के प्रतीक वर्गों का पूरी तरह लोप हो चुका हो. इन लेखकद्वय के मतानुसार आदर्शवादी समाजवाद जिसको उसके समर्थक विद्वानों ने ‘यूटोपिया’ कहा था, महज एक सद्विचार था. एक ऐसी आदर्शवादी परिकल्पना जो मनुष्य के नैतिक आग्रहों के फलस्वरूप आकार लेती है या जिसका बिंब प्रार्थना सभाओं के माध्यम से हमारे मनोमस्तिष्क पर बना दिया जाता है, जिसका यथार्थ से कोई वास्ता नहीं होता.

मार्क्स और ऐंगल्स का वैज्ञानिक समाजवाद विज्ञान, कृषि, उद्योग, तकनीक आदि अन्यान्य क्षेत्रों में उत्पादक शक्तियों के विकास की स्वाभाविक एवं अवश्यंभावी अवस्था है. उसका ठोस एवं वैज्ञानिक आधार है. वह बाह्यारोपित न होकर समाज की स्वयंस्फूर्त एवं अनिवार्य प्रक्रिया है. मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद का आशय ही था कि मानवसभ्यता का विकास कृषि, विज्ञान, तकनीक, उद्योग आदि क्षेत्रों में हुए क्रमिक विकास का पर्याय है. ज्ञानविज्ञान की उन्नति के साथ जैसेजैसे उत्पादन के साधन विकसित हुए, मानवसमाज भी उसी रूप में बदलता गया. सभी कुछ नियमबद्ध एवं तार्किक ढंग से हुआ है. इसी कारण मार्क्स के आलोचक उसपर अक्सर यह आरोप लगाते हैं कि ऐतिहासिक भौतिकवाद की व्याख्या करते समय वह समाज की ‘प्रत्येक वस्तु एवं गतिविधि को अर्थकेंद्रित’ कर देता है. मगर ऐलन वुड समेत साम्यवादी विचारकों के अनुसार यह विचार मार्क्स के दर्शन की अधूरी समझ से पैदा हुआ भ्रम है. यह आरोप नया भी नहीं है. मार्क्स और ऐंगल्स के समय में ही ऐसे आरोप उनपर लगने लगे थे, जिनका उन्होंने विरोध भी किया था. ऐसे ही विवाद पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए फ्रांसिसी इतिहासकार ब्लोच को संबोधित पत्र में ऐंगल्स ने लिखा था—

इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना के अनुसार, उसके प्रवाह को निर्धारित और नियंत्रित करने वाले वास्तविक तत्व, मूलतः जीवन में उत्पादन और पुनरुत्पादन की घटनाएं हैं—इससे अधिक का दावा न कभी मैंने, न ही कभी मार्क्स ने किया है. बावजूद इसके यदि कोई इनसे तोड़मरोड़कर यह निष्कर्ष निकालता है कि आर्थिक तत्व ही समाज की प्रमुख दिशानिर्धारक शक्तियां हैं, तो वह इसकी अर्थहीन व्याख्या, इनके ऊपर एक भद्दी और ओछी टिप्पणी मात्र है. आर्थिक मुद्दे आधार अवश्य हैं, मगर इस अधिरचना के अन्य बहुत से तत्व, वर्गसंघर्ष के राजनीतिक रूपाकार यथा लंबे संघर्ष के उपरांत विजेता वर्गों द्वारा लागू किए गए विधान, तरहतरह के कानून, रीतिरिवाज, इन सभी वास्तविक संघर्षों के फलस्वरूप दिलोदिमाग में चलने वाले राजनीतिक, वैधानिक एवं दार्शनिक विचारधाराओं के द्वंद्व, धार्मिक विश्वास और उनके अनुसार जन्मे मतमतांतर, भिन्न परिस्थितियों के बीच पनपे अंतःसंघर्ष की उपज हैं. किसी न किसी रूप में ये सभी ऐतिहासिक संघर्ष को प्रभावित करते हैं, बल्कि अक्सर उनके स्वरूपनिर्धारण के लिए कभी उत्प्रेरक तो कभी संतुलन बनाने का काम करते हैं.’

स्पष्ट है कि मार्क्स की साम्यवाद की परिकल्पना पूरी तरह आदर्श और वैज्ञानिक विश्लेषणों पर आधारित है, जिसमें वह मान लेता है कि अपनी आवश्यकता के अनुरूप प्राप्त करने के बाद भी कोई व्यक्ति उत्पादन में अपने सामथ्र्यानुसार सहयोग कर सकता है. मिल ने इसको कोरा आदर्शवाद कहा था. इसी आधार पर उसने मार्क्स के समाजवादसंबंधी दृष्टिकोण की आलोचना भी की थी. मिल हालांकि स्वयं भी समाजवादी विचारों में आस्था रखता था, किंतु मार्क्स के लिए समाजवाद जहां ‘आवश्यकताकेंद्रित’(Matter of necessity) है, वहीं मानवमात्र की स्वाधीनता के प्रति आग्रहशील मिल के लिए समाजवाद व्यक्ति की ‘पसंद का विषय’(Matter of choice)है. समाजवाद की स्थापना के लिए मार्क्स ने श्रमिकक्रांति द्वारा पूंजीवाद को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया था. उसके द्वारा अभिकल्पित समाजवाद क्रांतिकारी, केंद्रीयकृत, सुनिर्धारित, वैज्ञानिक अवस्था है. दूसरी ओर मिल समाजवाद को सभी के लिए सुखदायी, विकेंद्रीकृत, विकासमान अवस्था मानता था, जिसमें समाज का प्रत्येक नागरिक अपनी स्वतंत्रता का अधिकतम भोग कर सके.

ओमप्रकाश कश्यप


मार्क्स का दर्शन : भौतिकवाद की साम्यवादी अभिकल्पना

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मार्क्स उन दार्शनिकों में से है जो अपने विचार और चेतना के माध्यम से अपने समय को सर्वाधिक प्रभावित करते हैं तथा लाखोंकरोड़ों प्रशंसकों के दिल पर राज करते हुए अपने जीवनकाल में ही किंवदंति बन जाते हैं. स्वभाव से भावुक और बेहद पढ़ाकू किस्म का मार्क्स आजीवन विचारों की दुनिया में जीता रहा. उसने धर्म, दर्शन, इतिहास, राजनीति, विज्ञान, मानवव्यवहार आदि विषयों का गंभीर अध्ययन किया. उसपर हीगेल के अलावा प्लेटो, प्रूधों, ब्रूनो बायर, फायरबाख आदि अपने समकालीन और पूर्ववर्ती दार्शनिकों का गहरा प्रभाव पड़ा था. डार्विन का वह प्रशंसक था और उसके ऐतिहासिक भौतिकवाद की व्याख्या के बहुत से सूत्र डार्विन के विकासवाद से प्रेरित थे. अपने लंबे अध्ययन के उपरांत उसने राजनीति, दर्शन, अर्थशास्त्र आदि विभिन्न क्षेत्रों में कुछ मौलिक विवेचनाएं प्रस्तुत की हैं. जिनके कारण आधुनिक दर्शनशास्त्रियों में उसका स्थान अक्षुण्ण है. इन सभी में उसका झुकाव दमित और शोषित वर्ग के प्रति साफ झलकता है. इस कारण वह हमारे समय का सबसे आधुनिक और मानवीय विचारक नजर आता है. शायद यही कारण है कि मार्क्स के दर्शन के आधार पर विकसित राजनीति को आधुनिक समाजों में सर्वाधिक जगह मिली है. दुनिया के कई ऐसे देश हैं, जहां मार्क्सवाद वहां की राजनीति की मुख्य विचारधारा नहीं है. इसके बावजूद ऐसा शायद की कोई देश होगा, जहां मार्क्स के विचार राजनीति को प्रभावित न करते हों. हालांकि भारत और एशियाई देशों के परंपरागत समाजों में धर्म के प्रति आलोचनात्मक रवैये के कारण मार्क्स को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता. किंतु उन सभी देशों में शोषित और दमित वर्गों के बीच मार्क्सवाद आज भी अपना सम्मानित स्थान बनाए हुए है. यह सब इसलिए है कि मार्क्स बिना किसी लागलपेट के अपनी बात कहता है. मनुष्यता के पक्ष में उसकी निष्ठा साफ झलकती है.

आगे हम मार्क्स के दार्शनिक विचारों पर संक्षिप्त चर्चा करेंगे.

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद

मार्क्स का पूरा जीवन लेखन को समर्पित रहा. उसके इतिहास, दर्शन, राजनीति, अर्थनीति, व्यवहारशास्त्र आदि का विशद अध्ययन किया था. उसके विचारों पर फ्रैड्रिक हीगेल का सर्वाधिक प्रभाव था. हीगेल को दर्शन के क्षेत्रा में द्वंद्ववाद का जन्मदाता माना जाता है. उसको उनीसवीं शताब्दी के सर्वाधिक प्रतिभाशाली दर्शनशास्त्री होने का गौरव प्राप्त है. यह भी कि जितना हीगेल ने अपने समय और बाद के दर्शनशास्त्रियों को प्रभावित किया, उतना शायद ही कोई दूसरा विद्वान कर सका. हीगेल के समय में ही उसके अनुयायी ‘वाम’ और ‘दक्षिण’ दो हिस्सों में बंट चुके थे. उस समय मार्क्स बर्लिन विश्वविद्यालय में अध्ययनरत था. हीगेल के ‘वामपंथी’ अनुयायियों में लुडबिग फायरबाख सबसे प्रखर प्रतिभाशाली था. फायरबाख ने हीगेल के आदर्शवादी द्वंद्ववाद की विवेचना विशुद्ध भौतिकवादी आधार पर की थी और इस नतीजे पर पहुंचा था कि दुनिया का इतिहास किसी आदर्शवाद या परमसत्ता की देन न होकर, भौतिकवाद से प्रेरित है. दृश्यमान जगत से परे किसी दिव्य सत्ता की खोज निरर्थक है. सत्य वही है, जो आंखों को दिखाई देता है और जिसे मानवेंद्रियां अनुभव कर सकती हैं. मार्क्स ने फायरबाख की विवेचना को ही सही माना. मगर उस समय तक वैज्ञानिक शोध कुछ और आगे बढ़ चुके थे. वैज्ञानिकों ने ब्रह्मांड और सृष्टि के रहस्यों को लेकर जो परिकल्पनाएं की थीं, वे प्रायोगिकरूप से सच सिद्ध हुई थीं. बल्कि कई ऐसी धारणाएं जो धर्म के नाम पर वर्षों से चली आ रही थीं, विज्ञान उनका तर्क के आधार पर समर्थन या विरोध करता था. विशेष बात यह थी कि उसके निष्कर्षों को प्रयोगशाला में जांचापरखा जा सकता था. उनपर बहस हो सकती थी. इससे भी बड़ी बात यह है कि विज्ञान का लक्ष्य मानवीय था. वह अपना प्रत्येक कृत्य बिना किसी वर्गीय पूर्वाग्रह के मानवमात्र के कल्याण की वांछा के साथ करता था,